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Sarhad Ke Suleh
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सरहद पर सुलह (कथा-सग्रह)
मेरी तथा कमला की
लाडली बहुरानियो
सरोज और लता
को
सरहद पर सुलह
हरदर्शन सहगल
मेधा बुक्स
दिल्ली-110032
प्रकाशक
मेधा बुक्स
एक्स-11, नवीन शाहदरा
दिल्ली-110032
15000
©लेखकाधीन
प्रथम सस्करण
1999
आवरण
नरेन्द्र श्रीवास्तव
मुद्रक
अजय प्रिटर्स
SARHAD PAR SULEH
(Hindi) stories by
Hardırshan Schg 11
ISBN 81 8711021-९
दिल्ली-110032
कहानियो से पहले की कहानी प्राय दूसरे-तीसर दिन वह मेरे पास आ पहुंचता है और एक लफ्न बालता हे-चलो। मेरे सम्मुख यह 'चलो' एक बडा तथ्य है-चलना, जिसका दूसरा कोई विकल्प नहीं है। -तो चलो। में उसके साथ चल देता हूँ, क्योकि जैसा कि पहले कहा, इससे बचा नही जा सकता। एक बार वह मुझ जुआघर ले गया था। एक बार राजनैतिक मण्डली मे जा बैठाया। एक मर्तबा कीर्तन-भजन की महफिल। फिर बिल्कुल फालतू आदमिया की महफिल। एक बार साहित्यिक सगोष्ठी मे। एक बार अफसरो, बाबुओ, चपरासिया के दरबार मे शिरकत । चुलबुली लडकियो, मुहल्ले की नेतागीरी करते हुए छुटभैयो तथा नीम- हकीमा से भी मेरे उसी ने मेरा परिचय कराया। ऐसे ही अनेक बार अनक जगहा, ठिकाना की सैर और पुनरावृत्तियाँ। मुझे जब-तब कहीं न कहीं खेचकर ले-जाने का मकसद, शायद मुझ अलग-थलग पडे हुए जीव का मनोरजन कराना हो। लेकिन पता नहीं क्या, हमारे मनोरजन के दौरान ही क्या-कुछ होने लगता है। एक अजीबोगरीब उथल-पुथल के हम शिकार होने लगते हैं, जो हम अदर तक झकझोरकर रख देती है। इस उथल-पुथल से हम घबरा जाते हैं, अस्त होते हैं। भयावह स्थितिया से हमारा दम घुटने लगता है, और फिर एक ऊब-सी पैदा होने लगती है। इन मौजूदा हालात से किनाराकश हो हम यहां-वहाँ से भागने लगते हैं। बहुत दूर छिटककर, फिर से अलग-थलग पड जाने की एक गैरमुपक्नि कोशिश।
क्याकि तीन-चार रोज भी नई गुजरते कि फिर वही-चलो।
एमी ही जिस-तिस तरह का जमाअता में हम बारहा शुमार होना पड़ता
--चाहते न चाहते हुए।
शायद आज हम सब की यही सबसे बडी नियति है-विद्रूप-विसगत
स्थितिया से गुजरना।
ता भी यह नितात निराशा का बात नहीं अपितु इन विसगतिया में उबरने
जुझने तथा जीवन को विविधताआ को कहानी है चलना-खाज-जुस्तजू।
ता चला।
हरदर्शन सहगल
5-ई-9 सवाद इलैक्स
गोकानर-334003
राजस्थान
6
अनुक्रम
हारते हुए
रुसदी 9
शिखर मार्ग 15
24
सरहद पर सुलह 32
जाल-मुक्त
40
कारोबार 49
मेमरा काशू उर्फ सुलगती हुइ याद 55
रास्ता किधर से है। 62
पुनरागमा 70
क्बूतरी 80
लपट 87
चलती-फिरती प्रतिमा 95
स्वर्ग की खाज 106
लुटे हुए दिन 118
अदर शोर कैसा है 127
फ्कत तुम्हारे लिए 136
तिलिस्म से बाहर 144
स्मृति-गीत 155
-
रुसदी।"
"रुसदी?" मैं चौंका ओर उसके मुँह
से निकला अक्षर दाहरा दिया-"रुसदी।"
"जी, मैं रसदी हूँ।" उसने दुवारा
यही वाक्य दाहराया-"जी मैं रुसदी हूँ
जी"
स्वर को अनुगूंज से मैं नहा उठा
जेस आराधक के सम्मुख उसका इष्टदेव
अवतरित हो गया हा। तब मुझे लगा,
रुसदी 'एक अक्षर' मात्र नहीं है मेरा
बचपन है। मेरे बचपन के सस्कारो तथा
इतिहास का अविभाज्य अग है यह
रुसदी। मैंने सिर उठाकर देखा। अपनी
आदत के खिलाफ आँखे गडाकर उस नारी
को धूरा जैसे बार-बार तसल्ली कर रहा
-क्या यही है रुसदी?
मैं अपने का रोक न सका।मगर इतना
भर ही कर पाया कि उसका हाथ अपने हाथ
मे ले लिया। उस भीड-भरे माहोल म उसे
सकाच हो रहा था परन्तु उसने अपना हाथ
मरे ही हाथ मे रहने दिया।
उसके साथ छोटा मुन्ना था। बडे
भोलेपन से वह हमे दख रहा था। मैंने निफ्ट
से निकलते हुए गुब्बारवाले का राका। मुन्ना
को एक गुब्यारा और झुनझुना दिलवाया।
रुसदी
रुसदी
9
अब मेरा हाथ बच्चे के सिर का सहला रहा था। "इन्हे नमस्ते करा।"दा शब्दा का निर्देश। बच्चे ने अपने छोटे-छोटे हाथ जाडने की चेष्टा की। मुझ अच्छा तो लगा परन्तु इससे मेरे तात्कालिक अभीष्ट की गुत्थी न सुलझ सकी। मैं रुसदी का कौन हूँ? यदि वह उससे कहती--यह तर मामा चाचा फूफा या यह या वह हैं तो कम से कम का रिश्ता ता उभरता (जिसे मैं अपनी पत्नी को भी बता सकता)। लेकिन नहीं। मेरी तरह ही शायद वह भी न जानती हो कि वह मेरी क्या लगती ह। और दूसरे ही क्षण-बिना पुल के निकट आने की स्थिति-न जाने क्या मेरे अन्दर की कुछ पतों का लहरा-सी गई। बचपन मे रुसदी उपनाम की लडकी से मुलाकात हुआ करती थी। उन दिना जय हमारा परिवार दशहरे की या काई दूसरी छुट्टियां बिताने अपने कस्वे करोड लालीसन जाया करता था। बहुत ही चचल बेहद शरारती, सबको खिजाने में माहिर-यही रुसदी की पहचान थी। पर नहीं, रुसदी की असली पहचान ता उसके बार-बार जल्दी रूह जाने से पदा हुई थी। और इसी पैदाइश ने 'रुसदी' नाम को जन्म दिया था। रुसदी यानी रूठनेवाली लडकी। बस यही उसम एक कमी थी। खुद तो सबक साथ बढ-चढकर छेडछाड शरारत मजाक करती थी परन्तु प्रतिक्रिया में दूसरा कुछ कहे या करे ता बुरा मान बैठती थी। रूठ जाती थी। फिर रुसदी कहने पर और चिढती थी। बच्चो से हाता हुआ यह नाम बडा की जबान तक जा चदर था। और मजे की बात यह कि बाद में वह स्वय अपना परिचय इसी रुसदी नाम से देने लगी थी। ठीक एसे ही बालती थी जैसे आज अभी-अभी बोली थी-जी मै रुसदी हूँ जी। और उसी लबी प्रक्रिया मे उसका वास्तविक नाम हम लोगा के बीच से धुल गया था। पाकिस्तान बनने के बाद हमारा परिवार कानपुर आ बसा था। जब तक माताजी रहीं तब तक पुरानी बाते-अपने वतन की बाते ले बैठती- अपने पुरखा के गोरवमय इतिहास को जैसे लोक सगीत का-सा स्वर देकर हम अच्चा को अभिभूत करतीं। आडे वक्त रिश्तेदार कैसे काम आते थे? मुहब्बत किस तरह एक के मन से दूसरे के मन तक रेशमी धागे की तरह पिरोई रहती थी। बच्चे सभी के सांझे थे। और बच्चे भी पूरी तरह से हर एक के आज्ञाकारी । ऐसे बखाना के चलते हमारे परिवार म रुसदी भी आ उपस्थित हाती-पूरे अल्हडपन के साथ। 10 रुसदी मेरी शादी के बाद मेरी पली को भी माताजी बताती-'अरे उस रुसदी की ता बात ही निराली। कितनी छटकनी-सी। इधर से उधर, उधर से इधर फुदकती फिरती-भम्भीरी की तरह। आफ्त की पुडिया-न खुद चैन से बैठती न किसी का चैन से बैठने देती। मगर हर परिवार का काम-काज बढ-चढके कर देती ता थक जाती और हॉफ्ने भी लगती। फिर बडे-बूढा को ऐसे सलाह-मशविरा देती, जैसे सबकी दादी हा।' माताजी थोडा रुकी। फिर खिलखिला पडती। मेरी आर देखती-'अरे इसके ऊपर तो खास मेहरबान रहती। बचपन कितना भाला होता है। कहती-इसी से शादी करुंगी। हम सब औरत कहती-अरे, यह ता काला है। वह उत्तर देती- कोई बात नहीं। मैं कहती-बडा गुस्सैल है यह। तुझे मारा करेगा। कहती--काइ बात नहीं। मार लिया करे। इस पर यह बडे रौब से कहता-तो चल हमारे घर के भाण्डे माज। सचमुच वह अपने छाट-छाट हाथो से बतन मांजने बठ जाती। में बडी मुश्किल से उसे उठाती।' फिर माताजी लबी आह भरती हुई कहती--'इस पाकिस्तान ने किसी को किसी का न रहने दिया। किस-किस को, कहाँ जा पटका। इस वक्त न जाने कहाँ हागी रुसदी। कौन जिंदा है, कौन मर गया, क्या पता।' लबे-चौडे रिश्तो के जाल का मै न तो कोई महत्त्व देता हूँ और न ही याद रख पाता हूँ। माताजी ने कभी कुछ बताया हागा तो भी ध्यान नहीं। परन्तु रुसदी से मैं किस स्तर पर जुडा रहा इसकी कल्पना बहुत कठिन भी नही । परन्तु वह सब व्याख्याविहीन तो है ही। अब तो कहने को इतना ही है कि बचपन की दोस्ती थी। आज एकाएक इस विशालकाय अस्पताल की इमारत के साये म लाह के जंगले के सामने एक औरत को खडे पाता हूँ। 'नहीं पहचाना ना आपने? मै रुसदी हूँ।" मैं उस नीचे से ऊपर तक बस देखता ही चला जाता हूँ। एकदम चुप। विश्वास करूं या न करूं? "याद आई कि नहीं रुसदी?" उसा फिर कहा। हाँ-हाँ वही स्वर, बचपन की दूरी पार कर गया है । मरे स्नायु-तन झनझना उठत है-रुसदी। मेरी एक महक है जा कई वर्षों ओर हजारा मोला का फासला तय करके मुझे घर लेती है। मै जैस लुका-छिपी खेलत-खेलते पुकार उठता हूँ-- 'रुसदी । रुसदी । रुसदी' कहता हुआ सामने खडी ओरत का खुरदरा हाथ पकड लेता हूँ। इससे अधिक नही। भरी-पूरी जवानी की रेखा का जल्दी ही फाँद गई लगती थी वह । साधारण " रुसदी सलवार-कमीज-चुन्नी से अपना शरीर ढके हुए थी। मैंने अदाजा लगाया कि दिन-भर किसी कारखाने या फैक्ट्री में कडी मेहनत करती है। गारे रग पर गेहुए रंग की परत आ बैठी है। तो भी उसके तीखे नयन-नरश मेरे आकर्षण का केन्द्र बने हैं। रिश्ता के जगल से बाहर आ जाता हूँ। असलीयत से रू-ब-रू होने लगता हूँ। मुद्दतो तक सूखी जमीन में पड़ा कोई बीज बरसात के आ जाने से अकुरित हो 64 - " मेरे द्वारा छूने और इस तरह देखने से उसके मुखमडल पर एक स्मित-रेखा उभरी है। उस जा अपनापन मिला है, उन्हीं क्षणो में जो रही है वह। 'ओह रुसदी कमाल कर दिखाया तुमने मुझे पहचान लिया?" 'अपना को कोई भूल सकता है ? फिर आपका चेहरा तो लरे अर्से तक वही का वही रहा है मरे सामने।" "हाँ-हाँ में तो वहीं का वही हूँ ही। और तुम तुम भी यही।" मैं हँसने की चेप्टा करने लगा-"न पहचानने पर काई ओर तो हो नहीं जाते हम दोना।" "नही मैंन ता आपका एक ही नजर में तभी पहचान लिया था जब आप सीढियाँ उतर रहे थे।" दरअसल में अस्पताल की बडी विल्डिग मे रास्ता भटक गया था। कई माड मुडता आखिर, सीढियो से उतर आया था ताकि नीचे से ठीक ठिकाने ऊपर पहुंचा जा सका मैंने पूछा-"ता तभी क्या न बुला लिया?" 'उस वक्त इसकी बुआ साथ थी।" "मैं अटक गया। "इसकी बुआ का मेरा किसी आदमी से बालना बर्दाश्त नही हाता, भले ही पैक्टी म मजदूर लोग हमसे ऊलजलूल मजाक करते रहे। तब तो कोई बात नहीं, यह बुढिया सामने नहीं होती। छिले हुए हाड-मास से घर पहुंचते ही यह हमारी जेबे स्टालती है।" कहत-कहते रुमा हाँफने लगी। "चला रसदी, पहले किसी जगह बैठकर चाय पीते हैं। फिर तीसरे फाटक से ऊपर चलकर वार्ड न० 17 मे चलते हैं। वहाँ मेरी पली दाखिल है। उनसे तुम्हे मिलवाता हूँ।" "क्ल आर मिल लूँगो अगर इसकी बुआ साथ नहीं हुई। कह तो रही थो अपनी मामी के यहां जाएगी। वहीं गई तो दो-तीन रोज से पहले लौटेगी नहीं। अच्छा अब चलूँ। शटल छूट जाएगी। युआ का भाई यहीं दाखिल है। कल आऊँगी। ठीक यहीं पर मिलिएगा" 12 रुसदी अपने मुन्ने को लगभग घसीटते हुए तेजी से चली गई। पत्नी स्वस्थ थी। मेरे पहुंचते ही डॉक्टर ने डिस्चार्ज-मीमो पर साइन लिये और छुट्टी दे दी। मैं पूरे उत्साह में था और साचा जैसे ही मौका मिलेगा पत्नी को रुसदी के मिलने का पूरा किस्सा सुना दूंगा। परन्तु टैक्सी से लोटते हुए जब उसने देरी से पहुँचने का उलाहना दिया ता मैं मन की बात टाल गया और बाला "कहा फंस गया था। घर चलकर बताऊँगा।" सोचा-यह काई साधारण घटना नहीं। धैर्य और विस्तार से इसका वर्णन करना होगा। दूसरे दिन फिर घर देरी से पहुंचा और बताया--"अस्पताल वाला से अभी हिसाब करना बाकी है।" मैं और रुसदी हर रोज अस्पताल के अहाते मे मिलने लगे। मैं उसे कुछ रुपए दे देता जिसे वह घर पर आवरटाइम कहकर दे देती। मैंने कुछ दिन की छुट्टी ले ली। फैक्ट्री-मैनेजर से मिला। उसे अपना परिचय दिया। पहले तो वह मेरे रैंक से प्रभावित हुआ और दूसरे ही क्षण उछलकर खडा हो गया-"अरे पहचाना नहीं ? एक-साथ ही ता पढ़ते थे । अपना" "हाँ-हाँ" करते मैं उसकी ओर झुका तो उसने मुझे कसकर गले लगा लिया। रुसदी को वहीं लिखा-पढी का काम दिलवा दिया। मैनेजर का बताया कि यह एफ०ए० पास है पर इस बेचारी को किसी बात की समझ नहीं। मैं पाकिस्तान यूनिवर्सिटी से सपर्क बनाए हुए हूँ। हमे इनका सर्टिफिकेट मिल जाएगा। "ओके आके।" दोस्त हँसा-"डोट वरी। सो फार आइ एम हीयर गा एड एज्वॉय।" मैं मन ही मन तिलमिलाया। पूछना चाहता था-एज्वॉय से उसका अभिप्राय क्या है ? मगर मैं भी हँस दिया-"सिमिलरली दैन आई विल एज्वॉय विद यू ऑलसी।" खीं-खीं करता दोस्त उठ खडा हुआ-"कम-ऑन।" वह मुझे उसी कॉम्प्लेक्स मे बने क्वार्टर मे ले गया, हाथ मे हाथ लिये। पत्नी को बडे जोश से आवाज लगाई। उसके आते ही मेरे गले मे बाँहे डालकर झूलने-सा लगा-"तुम नहीं जानती यह कौन है मेरा दोस्त । मेरा जिगरी। मेरा क्लासफैला।" उसकी पत्नी हमे देखकर बहुत खुश हुई। बडी जल्दी-जल्दी अच्छा-खासा खाने का सामान मेज पर लगा दिया। मैंने सोचा, मै भी इसी तरह रुसदी का अपनी पत्नी के पास ले जाऊँगा। वह 1 रुसदी 13 ता थोडा-बहुत रसदी के नाम से परिचित भी है। मगर बीमारी के बाद पत्नी का मिजाज बहुत चिडचिडा हा गया है। उसे कुछ और बताकर ज्यादा नाराज नहीं करना चाहता। में देर से घर पहुंचने लगा हूँ। रुसदी का व्यवस्थित कर रहा हूँ। पाकिस्तान-दूतावास फोन भी मिलाना होता है। इसी क्रम मे आए दिन बहुत-से पत्र लिखकर रजिस्ट्री भी करानी होती है। छह महीन की कडी महनत के बाद रुसदी का सर्टिफिकट आ गया है। परन्तु अब तक पली के कान भर जा चुक हैं कि मैं बराबर किसी औरत से मिलता हूँ। उसके साथ घूमता-फिरता हूँ। इससे मैं थोडा विचलित हुआ हूँ। इधर रुसदी के चेहरे पर निखार आ गया है। वह अब सुन्दर दीखने लगी है। उसे पत्नी से मिलवाने के विचार का स्थगित किए चला जा रहा हूँ। उवित अवसर की प्रतीक्षा में हूँ। रसदी का अब उसी फैक्ट्री म निरीक्षक का पद मिल गया है। अस्पताल के निकट ही एक किराए के कमरे में अपने मुन्ने के साथ रह रही है। अब भी अपने रिश्तेदारा की सहायता करती है पर उनसे दबना या घबराना छोड दिया है। मैंने पाया है उसकी रुचियों विधार मेरे समान है। उससे घटो बात की जा सकती है। सर बाजार किमी ओरत की तरफ हाथ बढाना हाथ हिलाना । टा-टा टाटा या बाय-बॉय करना उसकी तरफ देखकर खुलकर मुसकराता ओर बदले में उस आरत से यही सब वसूल करना। धीरे-धीरे यही सब होने लगा था हम दोना के बीच। दफ्तर के साथी फिरे कसने लगे थे। कुछ कुठा की कगार पर आ बैठे थे। कुछ कम जान- पहचानवाले 'दिल फेकू', 'लक्को' 'ग्रेट लक्की' फुसफुसाने लगे थे। पत्नी कुछ ज्यादा हो खोजने लगी थी। मैंने कहा था-"यह रुसदी है 'रुसदी, वही जिसका जिक्र माताजी किया करती थीं ! मेरी बाल-सखा।" मेरी बात सुनकर पत्नी ने झंझलाते स्वर मे कहा-"बाल-सखा या सखो' ता एक ही बार ले क्या नहीं आते यहाँ? मैं ही घर छाइ दूंगी।" 14सदी प्रोफेसर फेसर कुणाल मुबई जा रहे थे। वहाँ उन्हे एक विशाल सभा को सबाधित करना था। रिसर्च इस्टीट्यूट ऑफ मॉडर्न फिलॉसाफिकल सासायटी के अध्यक्ष डॉ. अजीज अहमद ने इनसे बहुत ही आदर से विनती की थी कि वे एक बार आकर उन्हे व्यक्तिगत रूप से कृतार्थ करे। प्रा० कुणाल के सपक में जो व्यक्ति थोडी देर के लिए भी आ जाता है, वह हमेशा के लिए एक तरह से उनका भक्त हो जाता है फिर प्रतिभा सम्पन्न छात्रा की तो बात ही अलग थी। डॉ. अजीज अहमद भी ऐसे ही उनके प्रतिभावान पूर्व-छात्र थे जा होते-हाते आज इस फ्लिॉसाफिकल सोसायटी के अध्यक्ष- पद पर विराजमान हैं। प्रो० कुणाल का डॉ० अहमद के पत्र थाडे अतराल से मिलते रहते थे। पत्रो के एक-एक शब्द से माना श्रद्धा-रस टपकता था। प्राय यह भी लिखते कि उनका कोई मिन ऐसा नही है जा प्रोफेसर साहब को न जानता हा। भले ही उन्हाने प्रो० कुणाल का प्रत्यक्षत न देखा हो किन्तु वे सब उनकी मान्यताआ और स्थापनाओ से भली-भांति परिचित हैं। एक तो वे सब उनके पत्र पत्रिकाआ में छपे लेख-निबध पढे बिना शिखर मार्ग शिखर मार्ग 15 नहीं रहत दूसरा डॉ० अहमद स्वय भी उन आलेखा की चचा, व्याख्या सहित अपन मिलनेवाला क बीच निरन्तर करत रहते हैं। प्रा० कुणाल की इस यात्रा मे, उनको एक प्रिय छात्रा भी साथ थी। इसका नाम सुकीर्ति था। सुकीर्ति का सम्बन्ध एक बडे कुलीन घराने से था। वह बहुत खूबसूरत तथा नाजुक-मिजाज थी। एक तरह से उसे छुईमुई कहा जा सकता है। उसक मुखमडल पर हर समय जिज्ञासु-भाव छाया रहता था। दरअसल प्रो० कुणाल मे अपना दर्शन-कौशल है। विषय को विस्तार देते समय उसके विभिन्न रूपा-विरूपा का वर्णन करत चलते हैं और इस प्रकार श्राताआ म तत्वज्ञान को अधिक गहराई से समझन-जानने और स्वय काइ उचित निष्कर्ष निकालने की उत्सुकता भी जागृत करते चलते हैं। अत सुकीर्ति ही क्यो उन्हे थोडा-सा ध्यान से सुननेवाले प्राय सभी 'जिज्ञासु' की श्रेणी में आ जाते थे। जब वे कॉलेज में पढ़ते थे, तो छात्र-छात्राआ के अतिरिक्त प्रिंसिपल तथा दूसरे लॅक्चरर यहाँ तक कि नगर के प्रतिष्ठित विद्वान् भी उनको सुनने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे। उनकी अलमस्त तबीयत और सरल शब्दावली से लगता जैसे सिर्फ गप्पबाजी हो रही है, किन्तु बाद में उनके वही वाक्य सबके मन- मस्तिष्क पर मगीत-सी अनुगूंज पैदा करते। एक-एक शब्द जैसे विशेष अर्थ खोलता चला जाता । मर्म को छूते ही श्रोता जैसे एक नशे से झूम उठते और उनक सामने फिर से देदीप्यमान हो उठते-गोरे और लम्बे बालोवाले प्रो० कुणाल। यही सब बात थीं जिन्हे डॉ० अजीज अहमद अपन ट्रस्ट के अन्य मित्र पदाधिकारिया आदि को बताया करत ओर उन सबका मुस्तकिल तकाता सुना करते-~-'उन्हे कभी बुलाओ तो।' अव प्रा० कुणाल की उम्र काफी बढ़ चली थी। अपने घर या शहर से बहुत कम निकलते थे। परतु इस बार जब डॉ० अहमद राजस्थान के दौरे पर आए तो सबसे पहले रतनगढ पहुंचे। यूनिवर्सिटी से सेनानिवृत्ति-पश्चात् अब प्रो० कुणाल, अपने पुश्तैनी मकान रतनगढ में हो रह रहे थे। अब की डॉ० अहमद ने एक तरह से जिद पकड ली आर प्रो० कुणाल को मुबई आने पर राजी कर लिया। इसी माह की अट्ठाईस तारीख को उनका भाषण था किन्तु डॉ० अहमद का यह भी आग्रह था कि वे कुछ राज पहले ही आकर उनका आतिथ्य ग्रहण करे आर मुयइ म पूम-फिर। उन्हे दशनशास्त्र के विविध पक्षा पर अपनी स्थापनाआ का निरूपण करना था। विशेष रूप से व्यक्तिवाद-सिद्धान्न की मीमासा करती थी। व्यक्तिविशेष की अस्मिता क्या सर्वोपरि है? किसी भी व्यक्ति को हित-पूर्ति में समष्टि का दखल 1161 शियर मार्ग क्या येजा है? जब दा के हित एव अह परस्पर टकराते हैं ता नई चेतना की चिंगारिया का कैसा विस्फाट हाता है ? समाज को इनसे कितना लाभ हाता है या कितनी हानि झेलनी पड़ती है? क्या ठीक उसी समय नए मूल्यो का उद्भव हाने लगता है। इन सब तथ्या की व्याख्या उनकी नितात अपनी थी, ता भी वे एक तरह से हरवट स्पसर फ्रोमेन मिल, हम्बोल्ट तथा माइकल आदि व्यक्तिवादिया के आधारभूत सिद्धान्ता के बड़े प्रशसफ थे उन्हे सराहते थे। इस समय भी अपनी छात्रा के साथ इन्हीं विन्दुआ पर चर्चा कर रहे थे। लेकिन उनकी यात्रा के आरभिक दौर मे ही घटनाक्रम ने एक नया रुख ले लिया। जय गाडी श्रीडूंगरगढ स्टेशन पहुंची तो उन्हाने सोचा कि क्या न सुकीर्ति को कुछ रखडी, बडे (पकौडी) खिलाए जाएं। जैसे ही उन्हाने अपने कम्पार्टमेट की खिडकी ऊँची को तो देखा-सामने कपाडिया साहय खडे हैं। दोना की नजर मिली। कपाडिया साहय लपककर उन तक पहुंचे। उनके साथ कुछ और लाग भी थे। वे सब भी नगदीक आ खडे हुए। कपाडिया साहय गद्गद हो उठे। उनका हालचाल पूछा तथा यात्रा के विषय में जानकारी हासिल की। फिर बडे अपनत्व- अधिकार से याले-"उतरिए। वाह मुबई तो जा सकते हैं, हमारे पास नहीं ? हमने भी तो कई बार बुलाया है आपका" प्रा० कुणाल बाले-"आप तो हर तरह से मरे अति निकट हैं। कभी भी हाजिर हो जाऊँगा। इस वक्त तो देखिए " उन्होंने आरक्षण की टिकट दिखलाई--"कायक्रम निर्धारित हो चुका है। डॉ० अजीज अहमद का मुझ स्टशन पर न पाकर अजहद परेशानी होगी।" "वह हम सब देख तेगे।" उनमे से एक व्यक्ति बाला। वह ठेठ राजस्थानी गालाकार पगडी बाँधे हुए था। कपाडिया साहब ने कहा-"अब ये लोग आपको आगे नहीं बढने देगे। 'डॉ० अहमद का तार दे दिया जाएगा। आपको हर सूरत मे अट्ठाईस तारीख तक मुबइ पहुँचा दिया जाएगा चाहे जैसे भी। आपको तो कुछ नहीं करना। बस आदेश देना है।" "आदेश तो आप प्रियजना का।" मुसकराते हुए प्रो० कुणाल अपनी छाना के साथ गाड़ी से उतर आए थे। कपाडिया साहब यहाँ नगर परिषद के अध्यक्ष हैं। वे कला, साहित्य आदि के रसिक है । इस छाटे शहर मे प्रबुद्धजनो की एक बड़ी जमात है। यहाँ उपस्थित सभी जना के वाट कपाडिया साहब के पक्ष में थे। अत प्रो० कुणाल को गाडी से उतरना पड़ा था। शिखर मार्ग, 17 वाहर आते ही बाता का जमघट शुरु हो गया। एक बात पहली बात से ऊपर आ रही थी-होड़ की तरह। जरा शार थमत ही माथे पर हाथ रखते हुए प्रा० कुणाल न कहा-"हाँ- हाँ एक बात "वे किंचित् रुके, शायद उन्हे एक लडकी की याद आ गई थी, फिर बोले- "बहुत पहले एक लड़की थी, बहुत होशियार हमारी यूनिवर्सिटी की यही की या इसी इलाके को बिलाग करती थी। क्या नाम था अच्छा-सा बचारी चेहरे से कुछ डिसफिगड जरूर थी, मगर हर पचीदा सवाल के जवाब मे अव्वला" बिल्कुल निकट खडे थे चोधरी लक्ष्मणसिह वही जो ठेठ राजस्थानी लाल- पीली पगडी बाँध थे आद्र स्वर मे बाल उठ-"मुझ बदनसीब बाप की बेटी की बात कर रहे हैं सर आप ही ने ता गाँव का नाम हटवाकर उसे शुद्धप्रिया नाम दिया था। "हाँ-हाँ शुद्धप्रिया हो हम उसे भूले नहीं हैं।" "वह भी कब भूली अपने सर का। लगभग हर राज याद करती है।" 'ता आपके पास यहीं है?" 'हाँ हुजूर, कौन शादी करता उससे।" 'याग्य लामा की हर कही कद्र है विदेशा मे विशेष रूप से। वहाँ शक्ल की नही, अक्ल की कद्र होती है। में रिक्मड करूँगा तो उसे कहीं पर भी अच्छा जॉब मिल जाएगा। फिर देखिएगा चौधरी साहब। लाग आपक दरवाज स सरकेगे 5 नहा।" "इतना ही नहीं ।"कहते-कहते लक्ष्मणसिह रक गए। कपाडिया साहव ने बताया-"इश्वर वहा तक रखता ता भी कोई बात रहती। एक एक्सिडेन्ट ने तो उसका रहा-सहा हुलिया ऐसा चौपट कर दिया कि धेचारी घर से निकलने लायक ही नहीं रही।" एसो लडकी की कल्पना मात्र से ही सुकीर्ति मन ही मा बुरी तरह गइ। पर यह पूववत् मौन बनी रही। एक अन्य सज्जन वाले-" 'प्रा० साहब हमारा सौभाग्य है कि आपने हमारा निमन्त्रण स्वीकार किया। आपक सुभाषणा स हम सब लाभान्वित ता हाग हो आप एक बार उसस अवश्य मिला उसे दिलासादा आपका राकन को यह खास यजा भी।" स्टशन क टो-स्टाल पर खड-खड़े प्यालिया को छन-छन्न क बीच ये सार यातानाप हा रह थे और यार जोप मयमा इन्तजार कर रही थी। 18 शिखर मार्ग गए रात तक कपाडिया साहब के यहाँ पूरी महफिल जमी। सब इष्ट मित्रा ने वही भाजन किया। सुबह वे सभी कुछ देरी से उठ पाए। दापहर को दूर-दूर तक डाडी पिटवाई गई कि कल रात्रि एक भव्य समारोह होगा जिसमे मुख्य अतिथि देश के जाने-माने विद्वान् प्रो० कुणाल हागे। उनके सम्मान में एक नाटक भी खेला जाएगा। कवि-सम्मेलन और मुशायरा भी होगा। यह सूचना शुद्धप्रिया ने सुनी तो मानो खुशी से पागल हा उठी। वह शीघ्रातिशीघ्न प्रो० कुणाल तक पहुंचना चाहती थी। उससे कहा गया कि थाडा धैय रखे। वे कपाडिया साहब के यहाँ ठहरे है। भोजन करने के बाद प्रा० साहब स्वय उससे आकर मिलनेवाले हैं। शुद्धप्रिया उद्विग्न हो उठी। तेज आवाज में जैसे चीख पडी-"वह तो गुरु हैं। मै पहल जाकर उन्हें प्रणाम करूंगी।" वह उसी हाल मे अस्त-व्यस्त कपडे पहने सबको धकेलती हुई, वहाँ से भाग छूटी और सीधे कपाडिया साहब के घर जा पहुंची। प्रो० कुणाल सुर्कीति के साथ अन्दर के हॉल मे बैठे अखबार पढ़ रहे थे। बिना पूर्व-सूचना के अकस्मात् धडधडाते कदमा की आवाज से वे चौंक उठे। सिर उठाकर देखा तो एक बार अदर तक थर्रा गए। अति भयानक रूप-काया कमरे के वाचोबीच खडी थी। ऊपर का होठ बुरी तरह से कटा हुआ, नीचे का लुढककर ठोड़ी का पकडता हुआ-सा। इसी प्रकार माथे पर कई खराचा के निशान । मुसकराई तो आकृति अधिक भयावह हो उठी। वह आगे बढकर प्रो० साहब के पाँव छू रही थी। प्रा० कुणाल ने बड़ी मुश्किल से अपने-आपको संभाला और समझ गए-यह और कोई नही शुप्रिया ही है। लेकिन सुकीर्ति तो इस कदर खौफजदा हुई कि चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी और मुंह से आवाज निकती तो बस चाख मार रही थी। इतने में लक्ष्मणसिह वही पीली-लाल पगडी पहने वहाँ आ पहुँचा। उसने हाथ जोडकर वहाँ मौजूद तमाम लोगो से माफी मांगी। उसके साथ एक और आदमी था। दोनो शुद्धप्रिया को घसीटते हुए ले-जाने लगे। प्रो० कुणाल ने उन्हे रोका-"ऐसी खींचातानी बन्द कीजिए। इसे अभी यहीं रहन दीजिए।" "नहीं-नहीं" फिर से चीखने लगी सुकीर्ति-"इसे फौरन यहाँ से हटाइए, नहीं तो मैं पागल हो जाऊंगी।" सुकीर्ति को कपाडिया साहब की धमपला साथ कमरे मे ले गई ता भी शियर मार्ग वह शुद्धप्रिया की वहाँ उपस्थिति से कांप रही थी। 'शुक्र है प्रो० साहब, आप अभी जिन्दा हैं । अब मेरा यहां कोई कुछ नहीं बिगाड सकता।" शुद्धप्रिया की साँस ऊँची-नीची हो रही थी। "चिन्ता मत करो। सब ठीक हो जाएगा।" प्रो० कुणाल उसकी पीठ थपथपाने लग। 'आप नहीं जानते। यहाँ सब मेरे दुश्मन हैं। मैं कहीं आ-जा नहीं सकती।" शुद्धप्रिया घुटनो म सिर देकर सिसकने लगी। लक्ष्मणसिंह प्रो० कुणाल को एक तरफ ले-जाकर बताने लगे-"मामूली- से सदमे या खुशी से इस पर पागलपन सवार हो जाता है। वैसे जब कभी यह बाहर निकलती है तो सभी विशेषकर बच्चे, या तो डरकर भागने लगते हैं या इसे चिढात है। तभी बस इसे दुगुने वेग से दौरा पडता है। वरना तो ठीक रहती है यह।" खैर, किसी प्रकार धीरे-धीरे समझा-बुझाकर प्रो० कुणाल शुद्धप्रिया का वापस घर भेजने मे सफल हुए कि वे स्वय उसके यहां आकर खूब-खूब बाते करेगे। उसी दिन शाम को, और दूसरे दिन भी प्रो० कुणाल शुद्धप्रिया के पास उसके घर पर बहुत देर तक रहे। शुद्धप्रिया अतीत के स्मृति-रस मे डूबती-उतगती रही। उसने अपने प्रो० साहब के स्वागत में कोई कमी नहीं आने दी। उसका व्यवहार पूर्णत सामान्य था। प्रो० कुणाल यह देखकर चकित रह गए कि इतने अतराल के बावजूद अपने विषय से कटे रहने पर भी उसे सब-कुछ अच्छी तरह से याद था। यहाँ तक कि दर्शनशास्त्रियो के कोटेशन ज्यो के त्यो रटे हुए थे। इधर इन दोनो मे विचार-विमश चल रहा था उधर सामने ही समारोह का तैयारियां चल रही थीं। पडाल का लाल-हरी झडियों और रंग-बिरंगे गुब्बारा से सजाया जा रहा था। कई तरह के उपकरण बीकानर से भी मंगाए गए थे जिन्हे सही जगह पर फिट किया जा रहा था। यह सारा दृश्य शुद्धप्रिया की खिडकी से बड़े आराम से दिखाई दे रहा था। शुप्रिया पुलकित थी। बार-बार कह रही थी-"सर, आज मैं कितनी सुश हूँ कि बता नहीं सकती। लगता है दो दिनो के लिए ही सही मेरे जीवन की सार्थकता लोट आई है। आज एक जमाने के बाद मैं फिर से आपको सुनूँगी। हो सकता है मैं कुछ प्रश्न भी कर बैतूं। यदि वे लोग आज्ञा देगे तो मैं भी मच से आपके स्वागत मे बोलूंगी।" 'अवश्य-अवश्य तुम जरूर बोलना। तुम्हे इस तरह मै तरोताजा देखकर तुम मेरी प्रसन्नता का अनुमान नहीं लगा सस्ती।' 120 शियर मार्ग A तभी कपाडिया साहब वहाँ पर आए। उनके साथ कुछ देर के लिए रुके, फिर प्रो० कुणाल को अपने साथ लिवा ले गए। सध्या से लाउडस्पीकरो का शोर और पडाल के आस-पास सरगर्मियाँ शुरू हो गई थी। बच्चे, बूढे, जवान सभी उत्साह से भरे हुए थे। कहीं कोई कमी नजर आती तो उसे तुरन्त ठीक करा देते। वहाँ पर हर चीज जैसे चमक मार रही थी। अतत कार्यक्रम आरम्भ हुआ। मगलाचरण, सरस्वती-वदना हुई। मच पर प्रो० कुणाल के साथ बैठे थे कपाडिया साहब और साथ ही प्रदेश के चर्चित साहित्यकार श्री राममूर्ति। इन सब का अभिनन्दन हुआ। फोटो खींचे गए। विशिष्ट नागरिका ने इन्हे पुष्पमालाएँ पहनाई। प्रो० कुणाल ने अगली पक्ति मे सुकीर्ति तथा शुद्धप्रिया क बैठन की विशेष व्यवस्था कराई थी। उन्होने देखा-सुकीर्ति तो ठीक-ठाक बैठी है परन्तु दूसरी कुर्सी अभी तक खाली पड़ी हुई है। उन्होंने सोचा-उसे देर नहीं करनी चाहिए थी शायद आती ही होगी। बहुत छोटी बालिकाआ ने फूलमालाएँ लेकर एक नृत्य प्रस्तुत किया। तब तक भी शुद्धप्रिया नहीं पहुंची। सयोजक अगली प्रस्तुति के विषय मे घोषणा कर रहा था। प्रो० कुणाल न कपाडिया साहब के कान की तरफ मुंह बढाया। कपाडिया साहब टाल गए, जैस कुछ समझ नहा। एक युवक मच पर आया और प्रो० कुणाल के स्वागत मे एक कविता पढने लगा। प्रो० कुणाल ने उसे रोका और कहा-"ठहरो, पहले शुद्धप्रिया को आने दो।" "वह नहीं आएगी।" भीड मे से थोडी तेज आवाज आई। "हाँ-हाँ वह नहीं आएगी" समर्थन मे कुछ आर स्वर भी उभरने लगे जैसे मिलकर नारे लगा रहे हो। "उसके बिना यहाँ कोई कार्यक्रम नहीं होगा" सबको प्रो० कुणाल की दबग आवाज सुनाई दी। अब कपाडिया साहब ने धीरे से बडी शालीनता के साथ कहा-"क्या कहते हैं सर। उसके यहाँ आने पर बहुत-से लोग चले जाएंगे। और तो छोडिए, अपनी इस प्रिय शिष्या से पूछ देखिए।" उन्होने सुकीर्ति की ओर इगित किया। सुकीर्ति थोडे फासले पर बैठी सब समझ रही थी। वह आहिस्ता-आहिस्ता आकर भच के साथ सटकर खडी हो गई-"उसे बुलाना है तो मुझे अपने घर वापस भिजवा दीजिए।" शिखर मार्ग 21 "यह ता हागा हो।" न जाा कोन याल उठा। प्रा० कुणाल ने सबकी आर दाते हुए कहा-"कुछ नहीं होगा। मैं सय संभाल लूंगा। मुझ पर विश्वास रखिए और शुद्धप्रिया को आने दीजिए।" कुछ समय के लिए सवत्र मौन छा गया। परन्तु उसी मौन का रौंदती हुई चीखा ने सबको दहला दिया-"मुझका छोडो छाडा मुझ! मुझ जाना है। मैं रुकूँगी नहीं।" स्पष्ट था पडाल के निकट लक्ष्मणसिंह की खुली खिडकी से बार-बार आने वाली ये चुलद आवाज शुद्धप्रिया की थीं। "उसे आने दीजिए प्लीज।" प्रो० कुणाल ने सानह दाहराया। "मेरी बच्ची पागल नहीं है।" लक्ष्मणसिंह पाला-"आपके डराने या चिढाने से ही वह उन्मत्त हो उठती है।" एक बुजुर्ग ने ऊंची आवाज मे सवका ध्यान आकर्षित करना चाहा-"हाँ लक्ष्मण भाई सच कहते हैं।" मगर भीड ने उसकी आवाज छिन्न-भिन्न कर दी। प्रो० कुणाल अपनी कुर्सी से उठ खडे हुए। आयोजक जोर-जोर से बोल रहा था- -"बस आप भाई लोग थोडा शात बने रहे । शायद प्रो० साहब आपसे कुछ कहना चाहते हैं।" प्रो० कुणाल शोर के बीच कह रहे थे-"मैं शुद्धप्रिया से मिल चुका हूँ। मेरी बात तो सुनिए। यदि आप सब ने उसे सहज रूप मे लिया होता तो सभी अभ्यस्त हो चुके हाते। अब भी कोई समस्या नहीं है। उसे अवसर तो दीजिए। कोशिश कीजिए। मेरी विनती है। मैं सब संभाल लूंगा। मुझ पर विश्वास कीजिए।" सामने भीड थी। उठता-बैठता शोर था। उन्हे अनुकूल प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा थी। तभी पूरी फिजा मे भयकर रूप से 'कड कड''पड पड' होने लगी। कमरे बन्द शुद्धप्रिया दरवाजो-खिडकियो पर प्रहार कर रही थी सामान बिखेर रही थी जेसे अब सब-कुछ तहस-नहस होनेवाला है। लक्ष्मणसिंह ने आगे बढकर हाथ जोडते हुए कहा-"मुझे खेद है। आप अपना कार्यक्रम जारी रखे। मैं जाकर उसे संभालता हूँ।" साथ खडा हुआ कोई दर्शक बुदबुदाया-"एक के लिए सब क्या भुक्ते।" साहित्यकार राममूर्ति कब से बैठे अपने होठ चबा रहे थे, बेबस किसी तरह अपने-आपको चुप रखे हुए। अब इतना सुनते ही उन्हाने अपना ज्ञानकोष खोल डाला "यस येस आफ्टर ऑल लार्जर इन्ट्रेस्ट Lussez fare अकेला रहने दा। 22 शिखर मार्ग ५ "नहीं।" गरज उठे प्रो० कुणाल-"उसे फौरन यहाँ ले आइए।" 'नहीं-नहीं।" भीड-तन्त्र अपनी जगह कायम था। प्रो० कुणाल तीन कदम आगे बढे । सामने रखे पेट्रोमेक्स पर लात से भरपूर ठोकर मारी । एक हाथ से शामियाने की रस्सी को इस बुरी तरह से खीचा कि वह बाँसो के साथ चरमराकर धराशायी हो गया। अधकार के बीच प्रो० कुणाल का दमकता हुआ स्वर सुनाई दिया-"अब यहाँ मेरी ओर से कोई कार्यक्रम नहीं होगा।" कोलाहल धुध और भगदड । दूसरे दिन सुबह लक्ष्मणसिंह सुकीर्ति को उठा रहे थे--"बस का समय होनेवाला है। नाश्ता तैयार है। उठो बेटी तैयार हो जाओ।" "ऐ।" कहती हुई सुकीर्ति उठकर बैठ गई और आँखे मलने लगी। उसकी समझ मे कुछ नहीं आ रहा था। वह लक्ष्मणसिंह की तरफ देखने लगी। लक्ष्मणसिंह कह रहे थे-"तुम्हारे सर तो रात को ही मुबई चले गए। वहाँ वे शुद्धप्रिया की प्लास्टिक सर्जरी कराएंगे। वह मुझ तुम्हें तुम्हारे घर तक पहुँचाने का आदेश दे गए हैं । माफ करना बेटी" शिखर मार्ग] 23
"तो
रही शर्त?"
"हाँ, हाँ, लगा ले।"
"कितने-कितने की?"
"शर्त
तू ही लगा रहा है। तू ही
बोला"
दो किशार चायघर मे बैठे-बैठे जाने
किस बात पर तश में आ गए थे आर शर्त
शर्त चिल्लाने लगे थे।
चन्द्रकिशोर का चेहरा यकायक
खौफजदा हो गया।
मेरे प्याले मे अभी थोडी चाय बाकी
थी। मैने चन्द्रकिशार का कधा थपथपाया तो
वह उठ खड़ा हुआ।
हम दानों कपनी बाग की तरफ चल
दिए। वहाँ आकर एक ठेलेवाले से फिर चाय
पी। में वहीं हरी दूब पर बैठ गया परन्तु
चन्द्रकिशार नहीं रुका। शायद यह जगह
उसके लिए चायघर स भी भारी पड़ गई थी।
स्मृतियाँ जय मनुष्य को कुरेदती हैं ता वह
बेहाल हो उठता है।
हारते
हुए
याद नही बात किस मासम की है।
दिन सर्दिया के थे या गर्मिया के।
यात का तअल्लुक मौसम सर्दी या
गर्मी से नहीं हाता। बात का तअल्लुक जबान
24हारते हए
- से होता है। जबान आदमी की जबान। जबान की कीमत होती है और शर्त की। नहीं। शत की कीमत नहीं होती। वैसे सोचता हूँ। याद करता हूँ। बात लगभग दो साल पहल की है। हाँ दो साल तो गुजर हो चुके हाग। आफ्, बात-बात पर झगडा पर साचता हूँ, यही झगडे ता पुख्ता सबूत थे हमारी दास्ती के, और ले-देकर यही दास्तां है हमारी दोस्ती की। यही माटे-माटे हाठावाला चन्द्रकिशोर ज्यादातर यही मैदान-ए-जग का हीरो होता। जैसे हर किसी को ललकारता रहता। इसके बार-बार जलने-भुनने से हम सब खूब मने लेते। ता आज किसकी बारी है ? इशारे होते रहते। बस मासम की बात यूँ कर दी कि मौसम के मुताबिक ही हमारा समय निश्चित हाता रहता था। उसी निश्चित समय पर हम सभी दास्त शाम का मिला करते थे। कपनी बाग की इस दूब से बढकर हमारे लिए, दूसरी जगह नहीं थी। अपनी थोडी कुबडी चाल से उस दिन चन्द्रकिशार ललित की तरफ बढ़ गया-शर्त-शर्त । बरौनक चेहरे पर रखे मोटे-माटे हाठ फडफडा रहे थे। लगभग सभी मौजूद थे-~में शौकत, प्रेमनाथ केदारदास। उलझने का कारण प्रीति थी-ललित को नई-नवेली स्पवती दुल्हन जिसके खयाला में वह रात-दिन खोया रहता था। हम लाग आपस में फुसफुसाते थे-यह साला सिफ अपने का 'दिखान' ही हमारे बीच आ पहुँचता है। वरना यारा का छाडकर 'उसी की' गादी में पड़ा रहे। वेसे तो हर कोई हर एक से रस्सा-कशी को तैयार रहता था पर ललित से उलझना प्राय सबका अनायास हो उठता । कारण ललित बाकायदा अपना ही सुर निकालता था। वह सुर जब बाकिया से ज्यादा जुदा हाने लगता ता दूसरे 'आए आए' करते, झपटते, उलझत। ललित बस हल्के-हल्के मुसकराता रहता बदमारा। शरारती, भोला-धमडी अलग पहचान बनाने का सनक पालनेवाला। कुल मिलाकर यही था ललित हमारी निगाहा मे। यह सब तभी से चला आ रहा था जब हम पढते थे और कुंआरे थे। हम सबका शौक ज्ञानार्जन था। दिक्कत तब होती जब यह ज्ञान का शोक हर किस्म की हदे फाँदने लगता। हर कोई हर सब्जेक्ट्स मे ज्यादा से ज्यादा टाँग अडाने में विश्वास रखन लगा था। अपने इसी नॉलेज के बलबूते पर एक दूसरे का पछाडने पर आमादा। हालांकि यह बीमारी ललित मे कुछ कम थी फिर भी वह अदर ही हारते हुए 125 अदर अपने को किसी से कम भी नहीं समझता था। यदा-कदा दो टूक बात कहता ता सबको लगता हमे पछाडकर गिरा रहा है साला। पढाई के साथ-साथ हम लोग लिखाई भी करने लगे थे। लिखाई से मुराद कविता-कहानी से है। जिसकी जो भी चीज छपती, वह डींग मारने से बाज न आता और बाकी सब उसे गाली देने से बाज न आते । सबमे जलन उठती जिसे उस दिन का लेखक कवि चाय से ठडा करता। साथ ही वह भाषण भी देता रहता 'इस रचना से कुछ सीखो। यह भावी पीढियो के लिए एक लाजवाब और मार्गदर्शक चीज है।' चाय और भाषण पी चुकने के बावजूद तीन-चार किस्म के इल्जामात उस दिन के लेखक' पर लादने की कोशिश जारी रहती कि इस रचना को सपादक ने गलती से या नासमझी से या फिर दया करके या फिर इरके छाप दिया है। (लोकल अखबार के छोकरे या बूढ सपादका को हम लोग धमका भी आते थे।) मगर ललित को आखिरी इल्जाम से हमशा वरी रखा जाता--यह कमसिन किसी को क्या डराएगा। हाँ इसकी सूरत पर लट्टू हाकर, कोई कुछ भी कर सकता है। कमेट्स कमेटस सभी तालियाँ बजाने लगते। ललित थाडा शरमाकर मुसकराने लगता शरीर और तबीयत से नाजुक, एकदम गोरा-चिट्टा रग, साफ-सुथरे सलीके से कपडे पहननेवाला निहायत स्वाभिमानी युवक-यही ललित था। वक्त के सरकत पाँव। पढाई खत्म। फिर नौकरी। एक के बाद दूसरा अपने पाँव गृहस्थी के प्रागण में थिरकान लगा। रह गया ललित। आपम मे हर तरह के मजाक पहले भी हुआ करते थे। अब कुछ और तरह के हो चले यानी थ्यारिटिकल से प्रैक्टिकल। बडी बेहयाई से कुरेद-कुरेदकर एक दूसर से 'अनुभव' पूछते और खिड-खिड हंसते । ललित सरककर दूर जाने लगता तो पकड लेते-"फिर तू साले बुजुर्गों मे आकर बैठता हो क्या है? इसके लिए भी कोई दूध का इतनाम करो भाई" फिस्स पिम्स अपने-आपको पूरा मॉडर्न दिखाने के लिए हम लाग अपनी बीविया का भी 26Jहारते हुए अक्सर अपनी महफिले गर्माने के लिए ला बेठाते। "देखते नहीं, भाभिया की टालिया मे कैसा रमता है। किसी भाभी को आब्लाइज करने के लिए उसे पानी पिला रहा है। किसी भाभी का प्यारा बनने के लिए उसकी तश्तरियाँ उठा धुलवा रहा है।" "हाँ, पूरा रसिक। बनने को बडा शरीफ फरमाबरदार बनता है। वक्त निकालने को इतनी सारी हैं भाभियाँ। इसको किसका डर! हम बदला ले ता किससे? इसकी कोई हो तो ।" 'इसका बदाबस्त हम कर दगी।" राधिका भाभी के पतले गले से निकला मीठा स्वर कितन ही क्षणा तक, हरी-भरी घास को और हरा-भरा करता रहा। ऐसे मधुर स्वर का प्रभाव कम न हा, चन्द्रकिशार के माटे होठा न पिचकारी छोडी-"बिल्कुल राधिका भाभी जेसी हो। आपसे ही चिपका रहता है, इसीलिए।" "ठीक अपनी ही तरह की ले आऊँगी। यह कौन-सा कम सुन्दर है।" बात आई-गई नहीं हुई। सचमुच राधिका भाभी जी-जान से जुट गईं। छह महीने गुजरते न गुजरते, प्रीति को ले आई। ललित को दिखाया तो उसकी नजर फिसल-फिसल गई। भाभी ने पूछा तो बोला-"मुझे कुछ पता नही। आप जाने।" सभी जान गए और फैसला हो गया। बस कुछ अर्से के बाद ही ललित को भी दोस्ता की बराबरी का रुतबा हासिल हो गया। वह सब मे खुलने की कोशिश जरूर करता पर फक्कड शब्दावली का प्रयाग न कर पाता। दोस्त कुरेदते तो वह धीरे-धीरे प्रीति के रूप- गुणो की महक से जैसे लबरेज हो उठता। उसकी प्रशसा मे जैसे कविता करने लगता। एक दिन केदारदास बोला-"वैसे दोस्त तो दोस्त होते हैं पर दोस्त हर तरह के होते हैं। इसलिए ऐसे नाजुक मसला को सब के सामने उधेडा नहीं जाता।" ललित गोला-"आखिर दोस्त ही ता राजदान होते हैं। दास्ता स कैसा पर्दा।" 'मान गए नन्हे मियाँ तुम्हारी रूप की रानी का।" शौकत ने अंगडाई लेते हुए कहा। पेमनाथ बोला-"ललित छोडा इन्हें यह बताओ तुम क्या-क्या करते हा उसके लिए?" ललित जवाब मे मुंह खालने ही वाला था कि न जाने क्या चन्द्रकिशार इस " हारते हुए 127 प्रेम-प्रसग से खीज उठा-"यह क्या बताएगा मैं बताता हूँ। ये प्यार-प्रेम के किस्से रहने दा। लगा ला मेरे साथ शत।" "शर्त?"ललित असमजस मे पड गया-"आखिर यहाँ शर्त की क्या बात है भाई" " "है शर्त की वात । शर्त की बात तो है ही।" कुछ-कुछ ईर्ष्या-युक्त स्वर था चन्द्रकिशार का। इतना कहा और चुप हो गया। लेकिन तब भी उसके माटे- माटे हाठ काँप रहे थे। किसी ने कुछ नही कहा। चारा आर मौन छा गया। फिर से चन्द्रकिशोर ही बोला-"शर्त इसी बात की वह जरा रुका ओर फिर से वाक्य घसीटता हुआ आगे ले गया-"शर्त इसी बात की कि तमाम लाग सकट की घडी म अपनी बीवी को छाडकर भाग खड़े होते हैं इसे तो हम शुरू से ही जानते हैं। इसकी तो औकात ही क्या? हाँ ललित सिर्फ तुम्हारी नजाक्त पर ही फ्दिा हुआ जा सकता है बस।" "छाडो यार व्यक्तिगत आक्षेप लगाने की क्या जरूरत है।" में वाला था। मैं ऐसे मौका पर जरूर बालता था। इससे मेरा नाम सबने बीच-बचाव मास्टर रख छाडा था। " 'तुम चुप रहो जी बीच-बचाव मास्टर। इनको निपटने दा।" प्रेमनाथ ने टॉग अडाई। 'माना मेरे समेत सभी दब्बू हैं, पर फैसला कैसे 2" छाती के मामूली उठाव के बावजूद ललित का स्वर सयत था। अब तक चन्द्रकिशार का स्वर भी शान्त-"कौन-सी जल्दी है बरखुर्दार। धैर्य रखा और थाडी प्रतीक्षा करा । युद्ध के आसार चल रहे हैं। गुडे भाई भी आए दिन तुम शरीफों के घरा पर छापे मारते ही रहते हैं। मैं तो दो टूक बात करनेवाला म से हूँ। रही एक-एक हजार की।" ललित ने झट हथेली आगे दी-"मजूर है शर्त।" वक्त के पाँव और सरके शौकत और ललित को हमने विदाइ-पार्टी दी। दाना एक ही दफ्तर मे काम करते थे। दोना ही का स्थानान्तरण दौलतापुरा म हा गया। घर-वार, अपना शहर सगी-साथी भाभिया के साथ छूटने की तकलीफ को ललित ने तकलीफ न कहकर अपनी खुशनसीवी कहा-"चलो, एक भाई और 28 हारते हुए भाभी का ता साथ ले जा रहा हूँ। कभी लौटगे ता इकट्ठे ही । एक-एक करके नही।" "बाहर भैंसा बनकर रहना।"चन्द्रकिशार भरे गल से कह रहा था। 'फिक्र मत करो। मुझे तुम्हारी शर्त याद है।" 'अब बक-बक मत कर । लगाऊँगा झापड। जरूरत पडे ता तार दे देना। सभी यमदूत हाजिर हो जाएंगे।" " अपना ओर शौकत का कुछ बकाया सामान लेने ललित आया था। सबम बैठा सुख-दु ख बॉट रहा था-"भाइ साहब दालतापुरा जगह ही ऐसी हे जहाँ संभल-संभलकर पग रखने की जरूरत है। हमे किराए पर दा मकान चाहिए थे या एक बडे मकान मे हम दाना एक-साथ रह लते। मगर मुहल्ल पूरी तरह जुदा- जुदा बंटे हुए हैं । मुझे हिन्दू मुहल्ले मे हो मकान मिल सकता था और शोकत को मुस्लिम बस्ती म। इसी मे हम दाना की सेफ्टी है'-स्थानीय लाग यही समझाते हैं। आखिरकार हमे इस मायने में सफलता मिली कि हम दाना के मुहल्ले एक- दूसरे के बहुत करीब हैं । जैसा कि कुछ पुराने पोखर-बावडिया के बारे में बताया जाता है कि वह हर साल एक-दो की बलि लेकर ही मानती है उसी तरह ही समझो। दौलतापुरा का काला पहलू यही बताया जाता है कि साल म एक-दो बार दगा हो जाता है। दा-चार को लील जाता है।" "आखिर क्या हागा इस देश का?"कदारदास जसे ललित और शौकत को ही पूरे देश की सज्ञा दे रहा था-' -"ऐसी जगह कौन रह सकता है" "हमे तो नौकरी करनी है, भाई साहब।' "लात मार आआ ऐसी नोकरी का। यार लाग अभी जिन्दा हैं।" चन्द्रकिशोर झट से बोल पडा। 'क्या करेगे यार लाग?" मैंने उसकी आर देखा। "तू चुप रहा कर बीच-बचाव मास्टर। हम सभी मिलकर काइ बिजनस कर लगे।" चन्द्रकिशार ने सबकी ओर देखा। चारा ओर से 'हाँ-हाँ' हा उठी। एक ने कहा-"सब-कुछ बदमजा हा गया, इन उल्लुआ के बगैर तो बनाआ प्लान।" " . वक्त ने अपने पैर और पैलाए ललित का छेडने से जा रौनक बनी रहती थी वह नहीं रही। ऊपर से शक्ति की कमी। फिर घर-गृहस्थी के जजान्न भी बढ चले थे। पहल की तरह हारत हुए। 29 बाग में पहुंचना नियमित नहीं रहा था। इन दिना शोकत अपने अय्यू की योमारी की वजह से यहां आया हुआ था। वे आज कुछ मंभल थे। लिहाजा हम अपने पुराने मृड में आकर उसो पास पर हुल्लड मचा रहे थे। तभी एक लडका भागा-भागा आया। घबराए हुए स्वर में शाकत स वाला-"भैया घर चलो। तुम्हार नए शहर म दगा हा गया है। भाभी किसी तरह आई हैं। बार-जार से रो रही हैं।" आर ललित?" शौकत ने चिंतित स्वर म पूछा। "वह दग वाली रात घर से निकले थे। उनका पता नहीं। भाभी रोए जा रहा है। ठीक से सुनाई नहीं देता। भीड है वहाँ।" चन्द्रकिशोर का भारी-भरकम आकार जैसे हिल गया। हाठ कॉप। जोर लगाकर बाला-"देखा सबने मैं शत जीत गया अब इसम मैं क्या कर सकता " हम सभी भागत हुए शोकत क घर पहुंचे। बहू के जिम्म को खराचे देखकर अब्बू बेहोश हा गए थे। हम डॉक्टर को बुलाने चले गए। दूसरे रोज शौकत ने सारा माजरा कह सुनाया। हुजूम का हुजूम भूखे भेडिया की तरह उनके घर पर टूट पड़ा था। आग के शाला और पत्थरो का खेल चल रहा था। चीखा से बस्ती दहल रही थी। उसकी बीवी को घसीटा जा रहा था। उसके ऊपर छीना-झपटी चल रही थी। अर्धमूछित अवस्था मे उसे कोइ परिचित-सा दहाडता हुआ स्वर सुनाई दिया--"छोड दो इसे हमारे लिए। एक हम भी तो चाहिए।" उसे कधे पर लादकर बह बिजली की पुर्ती से बाहर निकल भागा। "हिन्दू हा तो ले जाव।" वेबस-सा स्वर धुध को पार करता हुआ सुनाई दिया। डक के किनारे उसे ला खडा किया-"घबराआ नहीं भाभी। मैं ललित हूँ, तुम्हारा देवर।" तब तक वह संभल गई थी। एक बस को रोका। उसम बैठ। बाद मे पिछला सीट पर दत्ता आटी को देखा। दत्ता अकल भी साथ थे। उसे उनक हवाले कर ललित मोटर से उतर गया। चौथे रोज जब शौकत दौलतापुरा के लिए चलने लगा तो चन्द्रकिशार भी साथ तैयार हो गया। कहने लगा-"मैं भी तो देखू, तुम्हारा दौलतापुरा । मुझे तो उस छाकर से रुपए वसूल करन हैं।" दमय दिन चन्द्रकिशोर वापस आ गया। ललित का काई पता-ठिकाना नहीं 30 हारते हुए था और न ही उसकी पत्नी पीति का। मकान-मालकिन बतलाती है-"हमने उसे बहुतेरा रोका। पीति का वास्ता दिया तो कहने लगा-'इतना बड़ा हिन्दुआ का मुहल्ला है । फिर यहाँ आप सब तो हैं । पर मेरी भाभी अकेली है।' इतना कहते हुए ललित भाग खडा हुआ था। उसके जाने के बाद हमारे ही मुहल्ले पर भयकर हमला हुआ जैस सब-कुछ तहस-नहस हो गया। सभी अपनी-अपनी राह में दुबक गए। तब से हमारी बहू और प्रीति का कुछ पता नहीं। दूसरी सुबह ललित आया था। फिर प्रीति को ढूँढन वापस निकल गया था। फिर नहीं लौटा। आग अभी ठडी कहाँ हुई थी।" वक्त कुबड़ा हा गया है। समय-समय पर शौकत के खत आते रहते हैं। वह उसे ढूँढ रहा है। पुलिस में रिपाट दज करा दी है। पुलिस ने उसे कुछ चिन दिखाए हैं। उनमे ललित का चहरा नही है। इसलिए ललित जिंदा है। ललित जैसे लाग कभी नहीं मरत। चन्द्रकिशार जब-तब विक्षिप्त-सी हँसी हँसता है~"ललित जिन्दा है, पर मिल नहीं रहा। सामने आने से कतरा रहा है साला। पैसे जा देने पड़गे।"कभी कहता है--"दखा तुम सब दोस्त उसी की तरफ हो जाना। कहना-नहीं-नहीं चन्द्रकिशोर ही हारा है । ललित तुमने चन्द्रकिशोर को ही नहीं, हम सरको पछाड दिया है। फिर देखना वह पिद्दी कैसे मुसकराता है।" शाकत क खत आते रहते हैं। वह उसे अब भी ढूँढ रहा है। वह उसे जरूर ढूँढ लेगा। उसका स्थानान्तरण वापस यहीं का हो गया है। सूची मे ललित का भी नाम है। मैने आदेश स्थगित करा रखे है। हमारा वायदा इकट्ठे साथ लौटने का था। म अकेला कैसे आ सकता हूँ। जब तक वह नहीं मिलता में नहीं आऊँगा। शौकत, ललित को ढूंढ रहा है। और इधर हम सब प्रतीक्षारत हैं। अनवरत प्रतीक्षा। किसी दिन हम देखगे- शौक्त और ललित साथ-साथ लौट रहे हैं- एक दूसरे का हाथ थामे। कारते हुए
आध गज आध इच।
चार-छह क्या, बीसिया बार नापा । पर
वही का वही-ठीक आध गज आध इच।
जमीन का इतना-भर टुकड़ा।
चख-चख।
कुलदेवता।
इन्हीं पर पहले विवाद, फिर दुश्मनी ।
पैमाइश अपनी जगह कायम।
जीतसिंह और फतेहसिंह अपनी-
अपनी जगह जमे हुए।
सगे भाई।
भाइया जैसा पुख्ता प्यार।
मगर हिसाब तो हिसाब ठहरा।
बपोती हिसाब
याप मर गया।
जायदाद का बंटवारा।
सब-कुछ सहज बँटता गया।
बडे आँगन के पिछवाडे दो बडे
कमरे। दोना तरफ दा-दा छोटे कमरे। फिर
रसाई नहानघर, शौचालय बैठक भी
वरावर-बराबर।
काई झझट नहीं।
अब आँगन के ठीक बीच दावार
खडी कर, अपनी-अपनी तरफ कुछ और
निमाण करने की सूझी।
सरहद
पर
सुलह
32
गपद पर पुन:
। बस अड गया-आध गज आप इच। आँगन के ठीक बीचोबीच बना शिवजी का चबूतरा । कमर-भर ऊँचाई । लबाई मे कुछ अधिक, चोडाई वही आध गज आध इच। मूर्ति के दोनो आर छोर पर तुलसी के पौधे। दोनो आस्था के पुष्प चढाने लगे। "मेरी तरफ रहेगा।" "मेरी तरफ रहेगा।" "मेरी तरफ "तो लात मारता हूँ, पिद्दी-भर जमीन पर।" "मैं मूतता हूँ। मेरे तो मूतने के काम भी नहीं आएगी।" लेकिन छोडने का नहीं कोई। इत्ती-भर जगह मैदान-ए-जग हो गई। दोना भाई जीतसिंह वर्सेस (बनाम) फतहसिंह हा गए। पार्टी बन गए। बहुएँ सिसकती। सासे डपटतीं। अडोसी-पडोसी हँसते। अधिकारो और प्रतिष्ठा की लडाई-कोन झुकता है? "क्यू झुकूँ " "क्यूं झुकू " "तू अपने खसम को समझा।" "तू अपने खसम को समझा।" देवरानी-जठानी एक-दूसरी का कोसती आँसू बहाती, बहुआ को कोसती। झगडत हुए आदमियो का कासती अपन-आपका कासती मरे हुए ससुर को कोसी कुलदेवता को कोसी। कुलदेवता हर समय आँगन के बीचोबीच आध गज आध इच चबूतरे पर विराजमान बड़े निरपेक्ष भाव से मुसकरा रहे होते। चखाचख को चखते दिन महीना में बदलने लगे। पुलिस, थाने कचहरी तक पहुंचने को लामबद हो गए दोनों लवे कद के बूढ, फौजी जवान अपनी पुरानी वर्दियों में लैस होकर। मुहल्ले की इज्जत का सवाल पैदा हो गया। तमाशबीना से लेकर, दानिशमदा की जमाअत आ गई। सरहद पर सुलह 33 सभी समाधान ढूंढने समझाने और भले के लिए धमकाने में एक दूसर से आग आरत दरवाजा के पल्ला को आट लिये चुपचाप फैसला सुनने को आतुर। सभी को हमदर्दी, दानो ही के साथ रगने लगी। साइस के नौजवान प्रोफेसर शौकत अली ने आग लगा दी। जमीन हमवार करने की सलाह दे दी। नौ-नौ इच चार-चार सूत यार खाने की ताकीद कर दो। दाना भाझ्या से मुहब्बत बनाए रखन की गुजारिश कर दी। प्रापेसर भरी बारादरी म वहशी हो गया। ललकारने लगीं बहुत-सी आवारा-सभी का अपना धर्म प्यारा होता है। कोन ताडता है अपने धर्म-प्रतीको को? आम मसरूफ सडका और रास्ता पर बनी मजारे या समाधियाँ अमूमन मौत का बाइस बन जाती हैं। हट जाएँ तो खलकत सुखी खुदा राजी। सब्जी का गाडा लगानेवाला शेरू खाँ उबल पडा, "आए भाग जा मास्टर पूरे शहर म मजहवी दगे हो जाएंगे। जा-जा नहीं तो मैं मालवी से कहकर पतवा जारी करवाता हूँ।" प्राफसर साहब के खिलाफ माहौल गरमाया ता दाना भाई एक हा गए, मुकाबला करने को। "कैसे तोड दूं अपने आराध्य देवता का चौरा?" "यह चौरा हमारी आत्माओ, भावनाआ स जुडा है।" प्रोफेसर साहब ने माथा पकड लिया। कान पकडते हुए, जुनून से अलग हो गए। प्रोफेसर अली के अलग होते ही फिर से दोनो भाई भी अलग-अलग हा गए। भिड गए याद्धाआ की तरह । "तू आधे के पैसे ले ले और दफा हो।" "तू आपके पैसे ले ले और फुट जा।" "ता फिर वक्त आने दो। चुटक्यिाँ जाते ही वैस ही पूरा कब्जा करक दिखाऊँगा।" "तू या मैं?" "म जीतसिंह हूँ।" "तो मैं फ्तहसिंह हूँ।" "ता सडने दे।" 34 सरहद पर सुलह "गलने दे। बलने दे।" जीतसिंह की घरवाली उस अपनी तरफ खींच ले गई। फ्तेहसिंह की भरवाली अपन आदमी को समझाने लगी। लोग-बाग चले गए। चद रोज की चुप्पी। मगर अदर ही अदर खिच-खिच। फिर से शुरू हो गया चखचख-सवाद । महीना चला। मुहल्ले के सेवानिवृत्त मजिस्ट्रेट, वकील एस० आई० ने बीच-बचाव किया। आध गज आध इच जगह छोडकर, दोनो तरफ दो दीवारे खडी करवा दी। विचित्र-सा अस्थायी समाधान । आध गज आध इच की लवी खोखली पट्टी बीच म बन गइ-जगबदी-लाइन, सुरक्षित क्षेत्र। यानी दोनो ही परिवारो के लिए वर्जित क्षन । बीच में शिवजी का चौरा दाना की तरफ से दिखता रहता। बाद मे कभी-कभी वे सोचते भी-अच्छे लोगा ने अच्छा बेवकूफ बनाया। दा दीवारा की क्या जरूरत थी? एक से भी तो काम चल सकता था। सर अय अड गए सो अड गए। साझी दीवार कैसे बनती? 2 अच्छे दिना की आस म निमाण-कार्य स्थगित। बाल-चाल बद। एक दूसरे की तरफ देखना-झाँकना बद। हाल-चाल कौन पूछे? पर बहुएँ ता सगी बहने थीं। बडी बहन वदना जीतसिंह के लडके शोभासिंह से ब्याह कर आई थी । वाद में अच्छा घर समझकर, मां-बाप ने छोटी लडकी चदना जा अभी मुश्किल से अठारह साल को ही हुई थी, की शादी फतेहसिंह के लडके शवावसिंह से कर दी। चदना खुश थी। माँ-बाप-भाइया की जुदाई हुई पर दोदो तो मिल गई। हर वक्त दीदी-दीदी करती बच्चा की तरह फुदकती हुइ दीदी की बगल म जुड जाती। वदना भी खुश । गुडिया बहन के याला का सहलाती उसस खलती रहती। उसके लिए ता जैसे अपना घर, अपना बचपन लौट आया। सर-कुछ ता ठीक चल रहा था। पर बीच मे आ गया था, आध गज आधइच। शाभासिंह नफ लडका था। शवारसिंह भी शरीप। सरहद पर गला |35 कुछ लोग तो उन्हे सगा भाई हो समझते थे। ज्यादा शराफत की वजह से कुछ लोग उन्हे मट्टी के माधो भी कह देते थे। मगर इससे क्या? वदना-चदना के मां-बाप ने सोचा-ऐसे लोग किसी को तग नहीं करते। पिछली लडकी सुखी है दूसरी भी सुखी रहेगी। दोनो ही लडके वालदेन के निहायत फरमाबरदार हैं । आजकल के जमाने में यह एक दुर्लभ गुण है। अब इसी फरमाबरदारी के तहत बापो की हिमायत मे आपस मे बोलचाल बन्द हो गई। दोना ने वीविया के भी आपस मे मिलने पर पाबदी आइद कर दी। दोनो सिसकती। सिसकती रह। आखिर घर की इज्जत का सवाल है। बहुएँ घर की इज्जत होती हैं। वदना मैके आती। उन दिनो चदना का नहीं जाने दिया जाता। चदना मैके जाती। उन दिनो वदना को नहीं जाने दिया जाता। चाचाजी वदना के घर आए-यहीं बुला लो चदना को। एक ही समय में दोनो भतीजिया से मिल ले। नहीं जाने दिया चदना को। मामाजी चदना के घर आए। नहीं आने दिया वदना को वहाँ। फिर लुका-छिपी का खेल शुरू हो गया। दोनो यहने कभी मुख्य द्वार पर गुपचुप करती तो कभी शिवजी के चबूतरे मे रुआंसी शक्ल में एक दूसरी को देखकर मुसकरा-भर देतीं। अकसर पफडी जाती, शामत आ जाती। -तुम्हारी यह हिम्मत --तुम्हारी यह जुर्रत। -वैरिया से मेल-जोल। --पर हम ता सगी बहन हैं। -इस घर मे रहना है ता घर के हिसाब से ही चलना होगा। धरना पिरवाना पहनें प्रेमी-प्रेमिकाआवाले रिवाज की तरह एक दूसरी की तरफ कागग के पुर्ने गिराने लगी। गार पर लह दिन सर्दियों के अमावस की रात जबर्दस्त पाला पड़ा था। सब लोग अपने-अपने कमरो को जहां-तहाँ से पूरी तरह बद किए हुए, भारी रजाइयो में दुबके सुबह तक पडे रहे थे। सबसे पहले जीतसिंह अपने कमरे से बाहर आया। स्लीपरो के तले कुछ चुभने का आभास हुआ। आंखो से कुछ कम दिखलाई देता था। धुंधलके मे झुक- झुककर देखा। इधर-उधर ककर बिखरे हुए दिखे। फिर दीवार के निकट मलवे का ढेर। "सत्यानाश! हाय यह क्या हो गया, मेरे रब्बा?" आवाज खासी ऊँची थी। विलापयुक्त। दो मिनट बाद फतेहसिंह भी आँगन के उस छोर सामने आकर खडा हो गया, "उजाड दिया? नहीं छोडूंगा तुझे जीते।" "काली करतूत तेरी, पाप मेरे मत्थे ?" "बनो नहीं उस्ताद।" लडाकू स्वर । एक दूसरे से बुलद। बहुओ को छोडकर, एक-एक कर सभी अपने-अपने कमरा से बाहर आकर जगबदी लाइन के सामने से झुक-झुककर मुड-मुडकर, एक दूसरे को ललकारने लगे। गालियां बकने लगे। "पाप चढेगा।" "उजड जाओगे।" "देख लेना भगवान की लाठी में आवाज नहीं होती।" शोर बढा तो मुहल्लेवाले भी आ इकट्ठे हुए गली मे। "अजीब है। क्या माजरा हुआ?" 'आप ही को पता होना चाहिए।" "ऐसी ओछी हरकत। कोई बाहरवाला तो कर नहीं सकता।" "तो घरवालो ने नरक में जाना है, पूजा-घर तोडकर।" "पता तो आप लोगा को ही होना चाहिए।" "हमे क्या पता? आधी रात बाद, थोडी खट-खट की आवाज आई थी, जैसे सपने में।" "तो उठाया क्यो नहीं कजरिए"जीतसिंह ने पत्नी का झाटा पकड लिया। "हाए। सोचा, पता नहीं पडोसवाले रात को भी मकान का काम करा रहे " Ay सरहद पर सुलह | 37 है। फिर कॉन कहे इतनी ठड मे सब था या सपना।" "इसे छाडो। अपनी बहुओ को बुलाओ।" "हाँ वह क्यो नहीं आई? दाल मे कुछ काला है।" शोभासिंह और शबाबसिंह दोना ही फुर्ती दिखाते चप्पला की छप-छप करते वदना और चदना को घसीट लाए। "सच-सच बोल खातिए" "ऐ। क्या हुआ?" वदना आँखे मल रही थी। "तू बोल सच-सच नहीं तो हड्डियाँ तोड दूंगा।" "ऐ ॐ क्या हुआ?" चदना दूसरी तरफ देखने लगी। "तुम दोना अधी हो गई हो? नजर नहीं आता कुछ?" जीतसिंह गरजा। "पूरे घरवाला की मिलीभगत है। मुहल्लेवालो को चरा रहे हैं। चला भाइयो।" " . जीतसिंह और शोभासिंह एकाएक वदना पर लात- त-घूसे बरसान लगे "सच-सच बक रडिए, नहीं तो "मत मारो मेरी दीदी को। मैंने तोडा है।" अब चदना की मार खाने की बारी थी "कुत्तिए। कमीनिए!" "छोडो जी उसे । मैं कहती हूँ, मैंने तोडा है।" दाना बहुएँ मार खा रही थीं। लोग-बाग अब उन्हे छुडवा रहे थे। "तुम लोग कौन हो? भगवान सजा देगा।" ऊँची आवाज मे राती हुई चदना ने कहा 'भगवान ने तो खुद ही कहा था सजा क्या देगा।" "छोडो इस छोटी-सी बच्ची को। मुझे सच-सच बता।" वकील साहब की आरत ने चदना का अपने से सटा लिया। सिर पर हाथ फेरा बाल मेरी बच्ची।" "हर रात सपने में शिवजी आते थे गला रुंध गया चदना का। "है। सच?" "कहते थे मेरे बच्चे नादान हैं। आपस लडत-झगडते हैं। तुम तो सगी वहर्ने हो । सय मेल-जाल से रहो तू अपनी बहन से मिलकर मुझे बीच से हटा "सिसकिया से आवाज दब गई। अब . द "मर झूठ परेव वक्यास!" "नहीं-नहीं ऐसा मत कही। ऐसा हाता है।" सरर पर गुना
"कई बार ऐसा सुना तो है।"
"छोडिए साहब, यह पट्टी गवारी को पढाइए।"
"मुझे तो इस साजिश मे उस प्रोफेसर का हाथ लगता है।"
"लेकिन क्या? हमने उसका क्या विगाडा था, क्या तोडा था जो उसने इस
तरह से बदला लिया है।"
"हुँ उस बेचारे ने तो उस दिन के बाद कभी इस तरफ का रुख ही नही
किया।"
आप बडे भोले हैं। उस दिन सबके सामने इन बच्चिया को प्रेरित तो कर
गया कि रास्ता के अवरोधो को धराशायी कर देना चाहिए।"
"हूँ बात तो पते की है।"
"क्यो एस० आई० साहब, उस पर इस्टीगेट करने का मुकदमा नहीं चल
सकता"
"क्यो नहीं। क्यू वकील साहय कोई ता दफा लगती होगी दुप्रेरणा की?"
"हाँ-हाँ जैसे धारा 107, 109 या 125 वक्त हो गया पेशा छोडे। खैर
वह तो हम ढूँढ ही लेगे।"
"मैं अभी मास्टर को ढूंढकर लाता हूँ।"
"शाबाश शेरू खाँ, तू शेर है।"
"रहने दो। हमे किसी से झगडा मोल नहीं लेना। क्या फतेहसिंह?"
"हाँ-हाँ, यही हरि-इच्छा थी। उसी ने खुद देविया को हुकम दिया। इसम
हम क्या कर सकते हैं?"
'अब झगडने से मतलब नहीं निकलेगा कोई।"
"तो फिर एक सीधी दीवार खडी करा लो बीच में।"
"जाओ वीरो और देवियो अपने-अपने घर"
..
सरहद पर सुलह139
मृदुला, तुम कैसी हा? 'तुमने थाडी देर भी मुझसे याते करना मुनासिब नहीं समझा और चली गई। जानता हूँ तुम मुझे गुनाहगार ठहरा नहीं सकतीं और न ही मैं खुद अपने का कटघरे में ला सकता हूँ, फिर भी यहां बैठा- बैठा मैं, कभी अपने को और कभी तुम्हें मुआफ नहीं कर पाता। और पड्यनकारी? यह अभी तुम्हारे लिए दूधधुला भरोसेमद है इसी तरह के कितने ही वाक्य मैं अपने दायरे पुसफुसाकर मृदुला तक पहुंचाता रहा अपने को कुछ हल्का अनुभव करने का यत्न करता रहा। मृदुला दुबारा मुझ तक आई नहीं-और सारा वक्त इतजार समेट ले गया। मैं डायरी नहीं लिखता। फिर भी हिसाब लगाकर तुरन्त बता सकता हूँ, दा साल पाँच महीने और छ दिन के बाद आज मृदुला ने हमारे घर की दहलीज मे पाँव रखे थे। वही तुम-मृदुला-जिससे मैं प्राय हर राज मिलता था। और कुछ न सही तो पढने में सहायता के बहाने भी मेरे सान्निध्य के मोह म आ जाया करती थी हम एक दूसरे से बंधने के विषय मे जाल- मुक्त 40 जाल-मुक्त कुछ नहीं कहते थे, फिर भी मौन की भाषा, दिन-प्रतिदिन नवीन, पुष्ट एव बलवती होती चली जा रही थी, हम दोना के अन्दर ही अन्दर। इस भाषा को हम दोनो ही अपनी आयु, सामाजिक परिवेश की सीमाओ-वश शायद पढ नहीं पा रहे थे। किन्तु माताजी ने खूब गहराई से उसे पढ लिया था। स्पष्ट अर्थ निकाल लिया था। नफे-नुकसान का हिसाब लगा लिया था और निष्कर्ष की आखिरी सीढिया तक बडी सफाई से जा पहुंची थीं। अतत उन्होन अपने अनुकूल, रास्ता हमवार करने मे बड़ी आसानी से सफलता हासिल कर ली थी। मृदुला के पिता एक ठीक-ठीक-से सरकारी पद पर नियुक्त थे। लेकिन दिक्कत यही थी कि वे बार-बार बीमार पड़ जाते और शायद ही कोई महीना ऐसा आता हो जब पूरी तनख्वाह ले पाते हो। मृदुला की मां बहुत ही नेक, भगवान् की अधी भक्त और साथ ही बहुत भोली महिला हैं। इधर माताजी मेरी, उन मां-बेटी से ऐसे ही प्यार जताते-जताते अपने घर का कितना सारा काम ले लिया करती थीं और परोक्ष रूप से उन पर अपने दयावान होने की छाप भी लगाती रहतीं। दोनो मां-बेटी हमारे इतने बड़े प्रतिष्ठित ठाट-बाटवाले घर से थोड़ी सुविधा सहानुभूति और जुडाव पाकर ही जैसे अपने को धन्य समझतीं। और मैं, अगर कभी मृदुला के घर जाने की कोशिश करता तो माताजी मेरे ऊपर 'अपने स्तर' की अलिखित धारा आयद कर देती। मैं तो बस कभी-कभार हिम्मत करके माताजी से चोरी-छिपे उनके यहाँ हो आता। मेरे द्वारा वे अपनी नियत्रण-रेखा के उल्लघन के कारण उन माँ-बेटी से कुछ रोज तक रूखी-रूखी-सी हो जाती। और साथ ही वे अपना जाल बुनने में तेजी लाने लगी थीं। उधर वे महिला, माताजी से घबराई, मुझे सम्मान देने के बावजूद, बन पडता मुझे अपने यहाँ से 'दूर-दूर' किए रहतीं। मगर मृदुला की शक्लो-सूरत देखने लायक हाती। वह तो हर ख्वाबो-खयाल मे अन्दर ही अन्दर मेरी हो चली जहाँ तक थी। हाँ, उसी मृदुला को आज पूरे दो साल पांच महीने और छ दिनो बाद अचानक अपने घर पर खडे पाया। अब मैं उसे ऐसे देखे चला जा रहा था जैसे वह मृदुला न होकर ससार का कोई महान् आश्चय हो या मेरी जिन्दगी में पहली दफा देखी गई जवान लडकी हो। नहीं कह सकता मैं मृदुला पर, कुछ क्षणो मे ही ऊपर से नीचे कितनी मर्तबा नजर दौडा गया था बिना विचार किए कि इससे मृदुला क्या सोचेगी। एक औपचारिक नमस्ते के बाद वह सीधी माताजी के पास एक मूढा लेकर रसोई में जा बैठी थी और मैं प्रत्येक क्षण में स्पदन अनुभव करने लगा था। मुझे उसकी चाल में वैसी तेजी के बावजूद कुछ शिथिलता और सूरत मे जाल-मुक्त-41 । काफी बदलाव महसूस हुआ। मुझे मालूम है उम्र के साथ-साथ चेहरे की बनावट में ढीलापन आ जाता है। मगर मैं यह भी जानता हूँ कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ सुशियो की मिकदार में इजाफा होता रहे तो चेहरे की रौनक आप-से-आप जाहिर होती रहती है। मैं रोजमर्रा के ढरे पर लगभग तैयार खडा था। शाम घिर आई थी। छह बजनेवाले थे। छह बजे हर रोज, चाहे दो मिनट के लिए ही सही में मि० मनीप एडवोकेट के यहाँ हाजिरी देने जरूर जाता हूँ। मनीष शहर के माने हुए एडवोकेट है । जरूर किसी ने माताजी को परम गोपनीय सुझाव दिया होगा। माताजी ने एक राज मनीष साहब व उनकी पुत्री कामिनी के लिए घर पर अच्छी टी-पार्टी का आयाजन किया था। मेरा परिचय कराया कि इस वर्ष इसने एल-एल० बी० पास की है। फिर माताजी के सुझाव या निर्देश का पालन करता हुआ मैं हर राज शाम छह बजे मनीष साहब के दौलतखाने जाता हूँ। प्राय वे मिल जाते हैं। जो पूर्छ, बडे प्यार से बताते-समझाते हैं। मेरा कैरियर, उनके और माताजी के हाथ आ लगा है। कभी-कभी वे नहीं मिलते पर हिदायत के मुताबिक मेरी हाजिरी पूरी हो जाती है। तय उपस्थिति अकित करनेवाली उनकी लाडली बेटी कामिनी होती है। वह अगर अपनी सहेलियो से घिरी नहीं हो तो बैठने को जरूर इसरार करती है। मुझे बैठना पडता है। एक कप चाय प्राय हो जाती है। में बार-बार हाथ-घडी को देखता रहा-छह बजने में कितनी देरी है? फिर मैं जैसे नए सिरे से तैयार होने लगा। फिर से बाला में पानी लगाने वाथरूम गया। कदमो मे हल्की-सी फुर्ती महसूस हुई। कान रसोई की तरफ लगे रहे । धीमे-धीमे जैसे कोई गुप्त मत्रणा हो रही है। अस्पष्ट स्वर के साथ जैसे रसोई से मात्र अँधेरा निकल रहा है, मेरे लिए। मैं अंधेरे मे क्या करूँ मुझे अपने कमरे मे प्रतीक्षा करनी चाहिए। बाला मे तेल लगाया कधी की और फिर से अपने कमरे मे आकर धीरे- धीरे अलमारी के शीशे के सामने खडा होकर क्रीम-पाउडर से चेहरे को दुरुस्त करता रहा। माताजी से बिना पूछे बडी मुश्किल से अलमारी की चाबी तलाश की। कभी एक साल पहले महेन्द्र की शादी के अवसर पर क्षणिक पुलक में बहकर एक टाई खरीद लाया था परन्तु उसे खोला तक न था। वही टाई निकाली। मगर फिर कुछ सोचकर उसे रख दिया। मृदुला को आता न पाया तो कुछ देर के लिए साफे पर निढाल-सा पडा 42 जाल-मुक्त -पति, । रहा। साथ ही जरा-जरा-सी आहट पर चॉकता रहा। रसाई से आवाज आनी बन्द होती तो चौकन्ना हा उठता । बस अब मृदुला इधर आती ही होगी। मन मे खूब सारी उत्सुकता ओर प्रश्न इकट्ठे हाते चले जा रहे थे। हालांकि जानता था ये सारे प्रश्न मरे लिए सन्दर्भ-विहीन हा चुके हैं परन्तु हर उत्सुकता, जिज्ञासा का कोई ठोस आधार या उपादेयता हो ही, यह आवश्यक ता नहीं। मैं जानना चाहता था, उससे पूछना चाहता था-मृदुला, तुम कैसी हो? फिर परोक्ष रूप से सब-कुछ पता लगा लेना चाहता था ससुराल वाला के साथ कैसा निवाह हो रहा है। वह कितनी सुखी है ? काई बच्चा भी हुआ या नहीं क्या पता बच्चा होने से ही सहत गिर गई हो। पर साथ ता है नहीं। हा सकता हे जान-वृझकर घर पर छाड आई हो । बच्चे के विषय मे साचकर मन म एक क्षण के लिए वितृष्णा-सी उपजी तो दूसरे ही क्षण बच्चे को देखने की लालसा भी जागृत हा उठी। फिर अपने दिमाग पर झुंझलाहट भी-ये सर अटकले मेरे अन्दर क्या पैर रखे चली आ रही हैं ? फिर यही झुंझलाहट मृदुला की आर बढने लगी- आखिर इतनी देर से वहाँ क्या कर रही है। कुछ देर म माताजी कमरे मे आइ। मैं हडवडाकर खडा हो गया। माताजी पूछ रही थीं-"क्या, आज वकील साहब के यहाँ नहीं जाना क्या?" मैंने घडी देखी सात बज चुके थे। मैंने चाहा माताजी मृदुला के बारे में कुछ कहें। इधर-उधर से आहट ली। मैंने अनुमान लगा लिया-मृदुला जा चुकी है। इस तरह से फिर बाजी मर हाथ से जाती रही है। मैं एक बार नए सिरे से मृदुला को देखना चाहता था। माताजी से पूछना चाहता था-मृदुला कैसी है ? सुखी तो है ना? उसने ता अपनी कभी कोई खैर- खबर नहीं भिजवाई। आखिर मुझसे मिले बिना चली कैसे गई? "फिर आज रहने दो। देर ता हो ही चुकी है। तैयार तो हो ही चाहा तो कहीं और घूम-फिर आआ। उधर वकील साहब के मत जाना।" दिमाग भन्ना गया। आखिर उसे यहाँ आने की क्या जरूरत थी? माताजी से सटकर क्या बैठी रही उसे यदि किसी कारणवश काई सकोच था तो माताजी ही उसे चन्द लम्हो के लिए मेरे पास भेज सकती थीं। वे क्या मेरी मन स्थिति का नहीं समझती थीं। किन्तु अपने सम्मुख तो सदा-सर्वदा केवल 'वे स्वय' ही रहती हैं। अपने से बढकर उनके सम्मुख कोई दूसरा महत्त्वपूर्ण हो ही नहीं सकता। मैं बिना एक शब्द बाले सडक पर आ गया था। आने से पूर्व छत पर लघुशका के बहाने हो आया था। रसोई और कमरा मे भी आँखे फैला आया था। कहीं कुछ नही था जो नजर आता। ट्रक डबल बैड जैसा बडा सामान तक नहीं जाल-मुक्त [43 दीखा था। रसोई में ठीक हर वक्त आँखो से टकरानेवाली, नई चमक मारनेवाली अलमारी भी नहीं। आटे का ड्रम भी नहीं । आँगन में रखा टब भी नहीं। पूरे घर मे खालीपन व्याप गया था। मृदुला चलो गई थी। सब-कुछ जैसे खत्म होता चला गया था मरे लिए। सडक पर ज्यादा देर मुझसे चला नहीं गया। घर के पासवाले छोटे-से साधारण पार्क की बेच पर जा बैठा। मृदुला तुम कैसी हो? नाराज या खुश? अगर मुझसे नाराजगी हो तो सुन लो। तुम अपने-आपसे ही नाराज हो। क्याकि जहाँ तक मेरी इकाई का प्रश्न है यह इकाइ तो कहीं भी डांवाडोल नहीं हुई थी। तुम्हारे अभिभावक ही माताजी के शानदार जाल में फंसते चले गए थे। उन्हें अपने अह की तुष्टि हेतु, यह कबूल नहीं था कि उनके लडके की अपनी इकाई स्वतत्र निर्णय लेकर अपना मार्ग प्रशस्त करे। लडका ही क्या उनका बस चले तो पूरे ससार को ही अपने हाथ की सूक्ष्म डोरी से हाँकती रहें। फिर उनका अपना रुतबा, सेन्ट्स साडियों किटी, तबोला, टिफन- पार्टी । वे तो क्लयो मे जाती-आती हैं। समधी कम से कम ऐसे तो हाने ही चाहिए जिनका परिचय आसानी से, जानी-मानी हस्तियो से कराया जा सके। उन्होने अपने एकमात्र लडके के आलसीपन, घटिया स्वास्थ्य एकातप्रियता आदि-आदि गुण-दोषो का ऐसा ताना-बाना बुना था कि तुम सब लोग एकबारगी घबरा उठे थे। मेरे हाथ की कमजोर डोरी से तुम्हारे घरवालो का मोह-भग हो गया कि इसके सहारे पूरी जिन्दगी कैसे चला जा सकता है ? कभी भी टूट सकती है यह । तत्र माताजी ने ही अपने गांव के एक निकट सम्बन्धी का घर आप लागी को दिखाया था जिसके पास अपने बहुत सारे खेत थे कुएँ थे गाएं-भैंसे थीं शुद्ध वायु थी। हवा के उसी रुख की ओर तुम बहने लगी थीं। शायद तुम डरती थीं या तुम सब हमार घर की चकाचौंध से हीन भावना से ग्रसित हाने लगे थे। माताजी की इन बातो से और तुम्हारे ऐसे आचरण से मैं आहत हुआ था। मैंने चाहा था तुम्हारे सम्मुख पहुंचकर तुम्हे समझाऊँ, माताजी के मनसूबा को धराशायी करने का प्रयत्न करूँ न हो तो तुम्हारे सामने गिडगिडाऊँ। मगर मेरे व्यक्तित्व के प्रति तुम्हारे अन्दर जो अनास्था का पौधा पनपने लगा था उससे मैं छिल-सा गया था। और फिर मेरे स्वाभिमान ने बहुत ऊँची गर्दन निकाल ली थी। इस तरह माताजी की योजना सफल हो गई थी। तुम्हे उधर लगाकर माताजी ने मुझे दूसरी राह लगा दिया था और इधर- उधर की सारी राहा से होते हुए अब वकील साहब के घर के चक्कर लगाता हूँ। बकौल माताजी क इसी राह से मैं राजकुमार-सा कुछ बन जाऊँगा और वे चिरयुवा 44 जाल-मुक्त " उधर क्या राजमाता-जैसी कुछ कहलाएंगी। वैसे इस वक्त भी वे क्या कम हैं। राजमाता की उपाधि ही ठीक। माताजी' जैसे सबोधन से उन्हें चिढ है-मम्मा कहा करो क्या मजाल किसी सफेद बाल की, जा किसी कोने से झाँकने की हिमाकत करे। घण्टा ब्यूटी पार्लर मे बैठना उनका शगल है। मैं वहाँ पार्क मे ज्यादा देर तक बैठा न रह सका। मृदुला ने मेरी उपेक्षा की थी। क्या न मैं भी उसकी उपेक्षा करूं? इस वक्त ता मनीप साहब जरूर घर से बाहर होते हैं । मैं उन्हीं के बंगले की ओर चल दिया। मैं बुरी तरह से चौंका । दूर से देखा-गेट से बाहर पहले से खड़े रिक्शा मे मृदुला चढ रही थी। थाडी देर पहले शायद वह इसी रिक्शा से आइ होगी। रिक्शा मेरे पास से गुजर गया। मृदुला की आँखें झुकी हुई थीं। मैं द्रवित-सा हो उठा। मैं उधर ही देखने लगा जिधर रिक्शा गया था, जैसे पीछा करूँगा। 'आइए, अन्दर आइए।" कामिनी की जबान पर शरारत थी देख रहे हैं" में चुपचाप अन्दर चला गया और बैठ गया। हमेशा की तरह बात की शुरुआत माताजी से-"सुनाइए माताजी का क्या हाल है?" हमेशा की तरह माताजी की निन्दादिली का बखान । मैं चुप रहा तो वह हमेशा की तरह मेरे चेहरे को खास अदाज से निहारने लगी और बिना वजह मुसकराने लगी। कामिनी की तरह माताजी भी मुझसे कामिनी का हालचाल पूछती रहती हैं। आए दिन बिना बात उसी की चर्चा कि बहुत-बहुत अच्छी लडकी है खानदानी । बीमारी की वजह से बेचारी ज्यादा नहीं पढ़ पाई। बचपन मे माँ के प्यार से वचित । बाप की लाडली बेटी है। इकलौती सतान। वही सारी जायदाद की वली- वारिस बनेगी। सयानी इस कदर कि किसी का भी मार्गदर्शन कर सकेगी। ऐसी ही लडकियां सुचारु रूप से गृहस्थी चला पाती हैं। मैं हैरान होता--एक या दो दफा कामिनी से मिली होंगी और उसके छोटे से छोटे गुण से भी वाकिफ। और मैं ? मुझे क्या समझती हैं ? अब तक मुझे उनके मार्गदर्शन की जरूरत है और आगे कामिनी के मार्गदर्शन की जरूरत होगी। 'चाय लीजिए।" कामिनी ने मेज पर ट्रे रख दी थी। 'ओह!" मैं चौका-"यह हर रोज क्या तकलीफ करती हैं?" 'कब तब मुझे आप कहते रहेंगे।" उसने कुछ-कुछ शरमाने का अभिनय किया। सब-कुछ बनावटी और रटा-रटाया। फिर भी कुछ क्षणो तक मैं उसके यूँ शरमाने आवाज की तरग और जिस्म को खास तरह से लोच देने के अदाज से मन लगाने का यल करता रहा। किन्तु . जाल-मुक्त 45 जल्दी ही ध्यान सामने बैठी कामिनी से हटकर मृदुला का पीछा करने लगा। मैंने जैसे-तैसे पूछ लिया-"क्या वह आपकी सहेली है।" कान" " " 'वह जा आपक पास आई थी?" 'मरे पास? अच्छा अभी-अभी जो रिक्शा से गई है?" "हाँ वही।" "मेरे पास नहीं आई थी। आपकी माताजी ने ही तो भेजा था पिताजी के पास। " . क्या" "अपने पति से तलाक लेना चाहती है।" मेरा सम्पूण मानस पिछले डेढ-दो घण्टा से अपने आवेगा से उथल-पुथल हो रहा था। इस सूचना ने मुझे हिलाकर रख दिया-मृदुला को लेकर किंचित् कटुता की पर्ते दबने लगी। उसके प्रति मन द्रवित-सा उठा और साथ ही न जाने कसी भावना से मेरा शरीर सहल गया जैसे बेहद गर्मी के बीच सहसा कुछ क्षणा के लिए हवा का ठण्डा झाका आया हो। 'आपने उससे पूछा नहीं, क्या?" भने कामिनी से पूछा ता शायद वह कुछ उत्तर दे रही थी परन्तु में और कहीं भटकता हुआ किसी दूसरी राह मे खाने लगा था। मुझे एक बार ऐसा भी लगा जिस राह का फाटक मैं हमेशा-हमेशा के लिए बन्द समझता था अकस्मात् मरे सम्मुख खुलना चाहता है। "आपने कुछ कहा?" मैंने फिर से कामिनी को सबोधित किया। 'आपने कुछ पूछा था?" वह हँसने लगी-"पिताजी को कहकर यह केस आपका दिलवा दूं? आखिर आपने कचहरी मे पैर जमाने हैं।" 'आप क्या चाहती हैं मैं शुरुआत तोडने से करूँ"कुछ क्षणा के मोन के बाद मैंने उत्तर दिया। कामिनी फिर से नाटकीय ढग से हँसने लगी "इतनी भावुकता से कहीं वकालत हाती है? आप दा-दो मिनट मे कहाँ खा जाते हैं उसे जानते तो हागे। उसी के पास जाना चाहते हैं ता चले जाइए, हम नहीं राकेगे।" मैं सचमुच वहाँ से फोरन चल दिया। कामिनी जार-जोर से हँसती चली गई फूहड-सी हंसी। किसी भी जारी की हँसी किसी पुरुष का आकृष्ट करती है माहती है। मैं हँसी को 'स्थायी अनुगूंज' के विषय म सोचता चला गया जिससे मर भीतर का पुरुष स्थायी प्ररणा पाता रहे। " 46 जान-मुस्त फिर से वही घर के नजदीकवाला छाटा पाक। वही बच ओर मैं। फिर से वही पुरानी मृदुला और मैं। कई-कई पुरानी राहा से गुजरते, उलझते नइ राहा की तलाश म छटपटाते हम दाना, बीच-बीच में झांकती दा माताएं, वकील मनोप साहब उनकी सुपुत्री कामिनी। ये आकृतियाँ हमार अनस्तित्व को परिचायक बनती जैसे इन सब लागा के बीच मे मैं आर मृदुला फालतू-से उग आए हैं । परन्तु नहीं। इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं हमी दाना । मुझे मृदुला का बताना हागा कि वह समझे कि वही बहुत महत्त्वपूर्ण है। अपने साथ सिप मुझ महत्त्व दे। सिफ मुझे। काई आदमी उम बडी हाने पर भी, पढ़-लिखकर भी, क्या दूसरे की अंगुली पकडे रहता है। अपने लिए स्वय काई निणय नहीं ले पाता। हमेशा सही विकरपा का अभाव अनुभव करता रहता है और दूसरा के सुझाए रास्ते ही उसे ठोस नजर आने लगते हैं। अपक्षित लक्ष्य के प्रति एक उदासीनता का भाव भी ढोता चलता है। यही सब ता उससे और अपने से पूछना है। दूर कही से टन-टन की आवाज। एक के बाद एक घटा बाल रहा था। नौ या दस बजे थे। चारा आर खूब अंधरा फैला था। अनजाने ही मुझे एक स्फूर्ति-रेखा राह दिखाने लगी। मैं पिछली सडक पर आ पहुंचा। एक टैक्सी का राका । मृदुला के घर से कुछ दूर उसे छाडा । मृदुला क घर पहुंचा। कहा-"जल्दी चला माताजी बुलाती हैं।" जैसे-तैसे उसे बाहर निकाला। टैक्सी म डाला आर फिर सिविल लाइन्न के निकट एक बडे होटल मे अपने हाथ से धकेल ल गया। एक अलग केबिन में हम दाना एक-दूसरे के आमने-सामने थे। थोडी देर पहले मुझ एसा लगा था कि मृदुला के बैठते ही में उस पर सकडा प्रश्ना की वर्षा कर दूंगा। परन्तु नही । ऐसा कुछ नही हुआ। लगा कि शायद कुछ गलती हुई है हम स्वाहमख्वाह हाटल के इस कविन के फर्श का देखने के लिए यहाँ चले आए हैं। और काइ काम नहीं है तो बस धीरे-धीरे चाय का एक-एक छूट गले के नीचे उतारे चले जा रहे है। फिर यदा-कदा अपरिचिता की भाँति नजर उठाकर एक दूसरे पर डाल देते हैं कि यदि किसी के पास कुछ पूछने को हो तो पूछ ले। "साहब कुछ ओर?" बेयरे ने आकर पूछा ता मैंने मृदुला की आर इशारा कर दिया। वह कुछ न बोली तो मैंने बहुत सारी चीजा का एक-साथ ऑर्डर दे दिया। "किस खुशी म यह पार्टी दे रहे है।" उसकी आँखे छलछला आइ- 'क्या लाए यहाँ?" 'अपने प्रति तुम्हारी क्रूरता का कारण जानने।" जाल-मुक्त 41 " "मैंने तो कुछ कहा नहीं, जिससे आपको कटुता का अहसास हो।" "निरपेक्षता कटुता से अधिक मारक होती है मृदुला।" मैं बहुत भावुक हो चला था। अपने तई द्रवित था या उसके आसू देखकर पसीज उठा था--' "तुम तलाक लेनेवाली हो?" "हाँ" "किसलिए?" "मेरी किस्मता वह चाहते हैं। और आपकी माताजी "तुम इसके लिए बाध्य नहीं हो।" मेरा स्वर तेज था। 'अब मैं भी चाहने लगी है, बल्कि उनसे ज्यादा। कहीं पर जबर्दस्ती चिपटें रहने से आदमी अपनी ही नजरो से गिर जाता है।" "वह तो ठीक है, पर उनकी तरफ से, कारण?" "नैतिक मूल्यो की और पवित्रता की दुहाई। किसी ने आपका नाम मेरे साथ जोड दिया। बस, मैं कुलटा हो गई। कभी देवर के पास बैठा पा लिया न जाने कैसी नजरो से देखने लगे। फिर मेरा अतीत कुरेदना और मुझे बात-बात पर अपमानित करना उनका शगल हो गया है।" "मैं भी उसे थोडा जानता था पर माताजी तो सब-कुछ जानती थी और अब मेरी बात बीच में काटते हुए मृदुला फिर बोलने लगी-"अब मैं ही सबसे क्यादा जानने लगी हूँ उन्हें। वे स्वय क्या हैं? न दग की सोच न ढग का जिस्म। चारो ओर से यदनाम। ऐसे हाथा उजडने से अच्छा है अपने हाथो अपने दिनो को संवार ले जाऊँ।" मेज पर पडे उसके हाथो को स्वत मेरे हाथो ने घेर लिया-"थोडी देर पहले तुम किस्मत को दोष दे रही थीं। हमारा भाग्य-नियामक सदा अदृश्य ही क्यो रहता है? यहुधा किस्मत विगाडनेवाला हमारे सामने है, फिर भी हम उसे पहचान नहीं पाते। तुम्हारे साथ यही ट्रेजेडी है। पहले तुम्हें मुझसे अलग कर गाँव भेज दिया अव अपने उसको' डॉटने-समझाने की यजाय सिर्फ अपने वकील साहय को मामूली-सा केस देने के लिए तुम्हें उनके पास धकेला जा रहा है।" "ओह!" मृदुला के मुंह से चीख-सी निकली, जैसे पटाक्षेप के हटते ही उसने भयकर दृश्य देखा हो। 'अय?" लगा हमारे योच जो कुछ अपरिहार्य था वह अय धीरे-धीरे हमारी चेतना में भाना राह हो रहा है। 0 48 जाल-पका लंबा रास्ता था जिसे मैं पैदल तय कर रहा था। अब दूर से मुझे जो दृश्य दिखाई दिया, उससे राहत मिली कि मजिल के करीब आ लगा हूँ। सामने बहुत भीड थी। सुबह-सवरे इतने सारे लागा की एक-साथ उपस्थिति यही दर्शा रही थी कि भक्तजन है। मन्दिर पास ही होगा। दरअसल मुझे मन्दिर नही जाना था। मुझे ता सुन्दरजी का मकान ढूंढ निकालना था। हसन भाई ने जिस तरह से रास्ता समझाया था उसके मुताबिक पहले मन्दिर मिलेगा। फिर मुझे मन्दिर से आगे सीधा बढना होगा। जब तीसरी गली आए तो उसमे मुड जाना। तब कोई भी तुम्हे सुन्दरजी का घर बता देगा। मैं जहाँ पर भी होता हूँ, अकसर अपने से पूछता हूँ कि मैं यहाँ पर क्यो हूँ? यही प्रश्न-राग जब-तब लबा खिंचने लगता है तो मैं यहाँ तक पूछने लगता हूँ कि मैं इस ससार मे ही क्यो हूँ? यही प्रश्न मैं, केशवचन्द्र जी की मैरिज एनिवर्सरी पार्टी मे अपने से पूछ रहा था कि यहाँ जहाँ पर न मेरी कोई जान- पहचान है न कोई औकात मैं यहाँ पर क्या हूँ? क्यो हसन भाई मुझ यहाँ खींच लाया? कारोबार कारोबार49 औरते ओर मर्द फिल्मी दृश्यो की नकल करने की कोशिश मे फूहड तरीके से नाच-गा रहे थे। झुड बनाकर आपस म चुहलबाजी और घटिया मजाक कर रहे थे। मै सबसे कटा अलग-थलग एक कोने मे दुबका खडा था। कुछ देर बाद हसन भाई, मुझे कधे से आहिस्ता-से पकडकर एक तरफ ले गया। तब वही सुन्दरजी मुझे बडे तपाक-से मिले थे। मेरा आगा-पीछा पूछा था-और फिर जेसे कोई नतीजा निकालते हुए जाशीले स्वर मे बोले थे--'ओह माई गॉड। तब तो तुम हमारी मिसेस के भाजे लगे। दूर के ही सही, पर भाजे हो। ऊपर से हसन भाई की सिफारिश। किसी भी दिन आकर हमसे मिलो।' तब उस दिन मैं थोडा आश्वस्त हुआ था कि मैं वहाँ पर क्या था। मैं भीड के नजदीक पहुंचा, तो वहाँ पर कोई मन्दिर दिखाई नहीं दिया। एक आदमी सबसे अलग यूँ ही गफलत मे आसमान की जानिब निगाहे उठाए खडा था। मैंने उसी से पूछा-"क्या यहाँ पर कोई मन्दिर नहीं है?" उस पतले आदमी ने जिसके कधे और गालो की हड्डियाँ साफ दिखाई दे रही थीं एक उखडी हई साँस ली। फिर न जाने कैसे जबान में जोश भरते हुए उत्तर दिया-"हाँ-हाँ भाईजी, सामने ही तो है। भला इससे बड़ा कौन-सा मन्दिर होगा। जरा-सा आगे सरका ता एक भभका मेरी नाक मे आ घुसा। समझ गया यहाँ कौन-सा मन्दिर है। मदिरालय मे सुबह ही से समर्पण-भाव से आनेवाले भक्ता का रेला-पेला है। इसी प्रकार, थोडा आगे बढने पर लाटरीबाजो का हुजूम था। यहाँ पर भी वैसा ही जोश हिलोर मार रहा था। अतत रास्ता भटकते और पूछते-पुछाते सुन्दरजी के ठिकाने पर जा पहुंचा। कॉल बेल बजाई। दरवाजा एक महिला ने खोला। उसकी खाल खुश्फ थी और सिर मे एकाध ही कोई काला बाल नजर आता था। मैंने बताया-"मैं विशाल हूँ। शायद आप ही "हाँ-हाँ बैठो।" उन्हाने इधर-उधर देखा। "यह सुन्दरजी का ही घर है ना?" "हाँ-हाँ नहा रहे हैं। अभी आते हैं।" 'आपका बताया तो होगा। उस दिन एक पार्टी म मिले थे। आप ही शायद मरी मौसी लगता हैं।" "हाँ-हाँ वतात रहते हैं। आप किधर रहते हो?" "मुहल्ला चाँद खाँ। यहाँ स काफी दूर पड़ता है। आप आइएगा।" " - 50 कारोबार "हमे इस शहर के बारे में कुछ पता नहीं। यहाँ ट्रासफर पर आते ही अपनी उलझना मे लगे रहे। इससे तो यह अफसरी नहीं मिलती।" उनकी क्या परेशानी हो सकती है मैं इसकी तरफ ध्यान नहीं दे पाया और अपनी धुन म बोल गया-"अच्छा अफसरी कौन-से दफ्तर मे? तब तो कुछ काम बन सकता है।" "अरे कहाँ!" व धीरे-धीरे खुलने लगीं-"छह महीने पहले आबकारी से रिटायर कर दिए गए तो बोले-फिर से बेरोजगार हो गया हूँ।" "क्यो, ऐसा क्या आपको भला क्या कमी हो सकती है।" "यही तो बात है। चाहते तो औरा की तरह लाखा बना लेते। एक से एक अच्छी पोस्ट, सीट पर काम किया। मगर अपने सिद्धान्तो को दुलारते रहे। तीनो हो लडकियों को खूब पढाया-लिखाया पर किसी की भी सिफारिश नहीं की। अब कहते हैं करूंगा। वाह नौकरी छूट जाने के बाद । यह कौन-सा तरीका है। अब नौकरी भी लगवाएंगे और शादियां भी करगे।" मैं भी एक के बाद दूसरा प्रश्न करने लगा और उत्तर सुन-सुनकर उलझने लगा। लडकियाँ किन्हीं प्राइवेट स्कूलो मे मामूली पैसो पर काम कर रही हैं। इससे क्या बनता है। वाते चल रही थीं कि मौसाजी मेरे पीछे आ खडे हुए-"यह तो यूं ही बोलती रहती है। चलो मेरे साथ । देखना अब, हमारे क्या ठाट हैं । सच तो यह है कि सर्विस मे हम-जैसो के पास कुछ नहीं होता।" मौसीजी नाश्ता बनाने लगी तो बोले-"रहने दो। वहीं कहीं कर लेगे। देर हो रही है। सर इतजार कर रहे होगे। कई रोज से पहुंच नहीं पाया।" "तबीयत ठीक न हो तो कोई क्या करे। आज और रैस्ट कर लो।" आवाज मे शिथिलता थी। बिना मौसी की बातो की तरफ ध्यान दिए मौसाजी, मुझे लिये, बाहर निकल पडे। रास्ते मे मैं सोचने लगा-अब इस उम्र मे मौसाजी ने कौन-सा काम पकड रखा है ? मुझे अपने कौन-से ठाट दिखाने ले-जा रहे हैं ? उनके 'ठाट' बोलने पर मुझे कुछ आढा हुआ-सा उत्साह लगा। ठाट' के अदर की परतो में मुझे हताशा का आभास हुआ। मौसीजी की जबान में तो हताशा स्पष्ट थी। परन्तु स्थिति दोनो की समान लगती थी। लबे-पतले सफेद बालोवाले, स्त्री-पुरुष। शायद मेरी ही तरह समय के साथ जूझ रहे थे। तन-मन से समान। फिर भी मेरी परेशानी मेरी परेशानी थी। पढ़-लिखकर वर्षों से बारोजगार कारोबार 51 न बन पाने की टूटन मेरे दिलो-दिमाग का हिस्सा बन गई थी। इसी तल्खी के आलम में मैं अदर ही अदर तिलमिला उठा-यह वुड्ढा अब मुझे क्या काम दिलवाएगा किन्तु ऐसी सोच पर मुझे तत्काल अपन पर खीज और शर्मिन्दगी हुई। आदरयुक्त स्वर मे बोल उठा "मेरे पहुंचने में थोड़ी देर और हो जाती तो आप घर से निकल चुके होते। मेरे भाग्य अच्छे थे जा आप मिल गए। दरअसल इतना कहने के बाद मैं जरा-सा अटका और फिर जल्दी-जल्दी रास्ते के सब पडावा का जिक्र करने लगा। "अच्छा," वे बोले "तब तो मैं यूँ हो तुमको मिल गया होता।" "मैं आपका मतलब नहीं समझा 'अपन उधर ही तो चल रहे है।' मैंने जिज्ञासा प्रकट की-"किधर?" या तो उन्हाने सुना नहीं, या जानकर टाल गए। हवा फर-फर बहने लगी थी। वे भी उसी दिशा मे अपने शरीर को गति देकर जरा और तेजी से चलने लगे थे। में भी अपने कदम उनके बराबर रखता रहा। फिर सकोच छोडकर पूछ ही बैठा-"मेरे लिए कुछ हुआ?" हवा में उडते अपने सफेद बालो को हाथ में लेते हुए मौसाजी ने फिर से जोश से कहा-"देखते चला।" 'क्या रहस्य हे?'-मैंने सोचा और फिर से चुपचाप उनके साथ चलता गया। मन्दिर से काफी बाद वही मोड आया, जहाँ लॉटरी के टिकटो के वार-न्यारे हो रहे थे। "सुन्दरजी सुन्दरजी" हवा मे कई स्वर एक-साथ सुनाई दिए, जैसे मुख्य अतिथि या निरीक्षक के आने पर कार्यकर्ता/कर्मचारी एक-दूसरे को सचेत करते हैं। देखते ही देखने कई लोग होड की मुद्रा मे एक-दूसरे से आगे बढ आए। कुछ उनसे हाथ मिलाने लगे। दो-तीन बुजुर्ग लोगो ने उन्हें गले लगाया। इसी प्रकार कई युवक उनके पाँव छूने लगे। सभी वारी-बारी से उन्हे रुपए गिनवा रहे थे-"यह रहा चार रोज का हिसाब। और काई सेवा?" "इस लडके को काम चाहिए।" उन्होने मेरी ओर इशारा किया। मेरे पास मेरे पास की रट लग गई-"जितने रुपए आप जायज समझें दे दिया करगे। आप तो जानते हैं हमार पास और भी बहुत-से काम हैं।" "ठीक है । अभी चलते हैं।" कहते हुए उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और हम आगे बढ गए। 52 कारोबार रास्ता वही था जिधर से मै आया था। शराबखाना आने पर वे वहाँ भी रुके। वहाँ पर भी वही आलम । सुन्दरजी के सम्मान मे बहुत सारे सिर झुक रहे थे। उन्होने भी सुन्दरजी का रुपये दिए। इन लोगों ने भी मुझे काम देने का पक्का आश्वासन दिया कि जब जी चाहे आ जाए दरवाजे खुले हैं। परन्तु मैंन ऐसे लोगा के पास काम करन स साफ इन्कार कर दिया-"इससे तो आप मुझे कहीं पर भी क्लास फोर्थ म भरती करवा दे।' "मुझ ही देखा, मन क्लास वन अफसरी म क्या पा लिया? कुछ बात आदमी के जेहन मे बहुत बाद मे आती है। प्रशासन जितनी चीजों पर प्रतिबंध लगाता हे-वही, कई लोगा की आमदनी का जरिया बनती है। सर्विस मे रहते हम इस सच को झुठलाते रहे।" अपने ही खयालो म वे जैसे मुझे नही, अपने ही का भाषण पिला रहे थे। मन उदास ओर उचाट हो चला था। मौके की तलाश मे था कि खिसक लूँ। तभी हमारी बगल म एक कार रुकने की आवाज के साथ ही अपनत्वभरा स्वर सुनाई दिया-"बैठिए।" कार से निकला हाथ उनके कधे पर था। हम दोना कार में बेठ गए। सुन्दरजी न उनका परिचय दिया-"बहुत बड़े रेस्टारेट के प्रोपराइटर हैं। हम इन्हे शाहजी कहते हैं।" मेरा परिचय देते न देते रस्टारट आ गया। उसी रेस्टारट के सामने 'यग क्लब' का एक मटमैला-सा बार्ड झूल रहा था। शाहजी की कार से सुन्दरजी को उतरते देख एक लडका इधर ही को लपका-"शुक्र है सर आप आ गए। यहाँ रेड पड गई है।" "चलो देखता हूँ। चार रोज से, मेरे न आने का यह नतीजा है। शाहजी, आप इसे विठाइए। अभी मामला सैट-र -राइट करके हाजिर हुआ।" यह कहते हुए सुन्दरजी तत्परता से यग क्लब की तरफ चले गए। शाहजी ने मुझे एक केबिन मे बिठाया। खुद पानी लेकर आए और मेरे सामने बैठ गए। अपने और सुन्दरजी के पुराने सबंधों की चर्चा छेड दी। फिर सुन्दरजी के बारे मे बताने लगे-"निहायत इमानदारी से नोकरी करते रहे। न खाएँ, न खाने दे। कहते रिटायर होने पर असली कमाइ से इतना तो मिल ही जाएगा जिससे परिवार किसी तरह संभलता रहेगा। मगर साथिया को लगता कि उनके रिटायर हाने तक ता उन लागा का काफी नुकसान हो चुकेगा। इसीलिए ऐसी रचना रची कि इन्हे नौकरी से बरतरफ हाना पडा। नाकरी छूटो सो अलग। ग्रेचुटी वगैरह-वगैरह भी रुक गइ। चार महीने तक ता गुममुम पडे रहे. -क्या कर क्या न कर। कोट कोन-से जल्दी फैसले देता है। हम लागा क । कारोबार53 ma " कहने पर अब यह फील्ड-वर्क करने लगे में अपने को रोक नही पाया। शाहजी को बीच मे टाकते हुए बोल पडा-- "मुझे तो मोसाजी का व्यवहार कुछ असामान्य-सा लगता है।" "ऐसा तो नहीं है।" शाहजी फिर कहने लगे-"अगर किसी को ऐसा लगा हो तो कौन-सी बडी बात है। जरा सोचो, जिस शख्स ने जिन कुर्सियो पर बैठकर अपने लिए कुछ न बनाया हो अब उन्हीं कुर्सिया के माध्यम से इस परेशानी की हालत मे घरवालो के साथ-साथ दूसरा का भी पेट भर रहा है। कानूनी दाँव-पेच की बारीकियां इससे क्या छिपी हैं। किसी को परेशान नहीं देख सकता। किसी को भतीजा किसी को साला या भाजा बनाकर कोई न कोई काम दिलवाने की फिक्र करता रहता है। ओह, अब समझा तुम भी शायद मैंने घडी पर निगाह डालते हुए शाहजी का वाक्य काट दिया-"हाँ-हाँ पर अभी किसी को टाइम दे रखा है। कह दीजिएगा, फिर आऊँगा। सामने का क्लब शायद जुआघर है।" "हाँ लोग-बाग ऐसे ही जरा शगल कर लेते हैं । तुम बैठो तो, अभी आते होगे।" "उधर ही देख लूंगा।" कहता हुआ मैं बाहर आकर एक दीवार के कोने में छिप गया। सामने से वे आ रहे थे। साथ म कोई वर्दीधारी था। नजदीक की शाडी के पीछ आकर दाना रुक गए। उन दोना की धीमी आवाजे किसी तरह मेरे काना की गिरफ्त मे आ रही थीं। "ऐसे कैसे काम चलेगा?" "हम भी तो कुछ बचना चाहिए, वरना "ठीक है मगर आजकल के हालात आपसे छिपे नहीं हैं। ऊपर मत्रियो तक पहुंचता है।" 'भाई साहब फिर भी इतनी डिमाड मत कीजिए कि सब के सब बेरोजगार हो जाएँ।" आवाज मे कपन और गिडगिडाहट थी। में बड़ी सफाई से छिटककर दूर जा पहुंचा। एक बार मुडकर देखा व रेस्टोरेट की तरफ बढ़ रहे हैं। तेज हवा के झोको से उनके सफेद बाल उलझ रहे 54कारोबार तीसरा नवर मरा था। सरा नबर मरा था। "मेमरा काश।" मेरे मुंह से धीरे से यही नाम निकला। मीटिंग बखास्त हुई। ममरा काशू का नाम चीफ इजीनियर के स्टेनो ने भी नाट कर लिया था। तीसर या चौथे दिन साहब ने मुझे अपने चम्बर में बुलवाया। मेमरा काशू का पता लिखाने को कहा। मैंने दिलीपनगर बताया। 'क्या वह यहीं आपके साथ नहीं रहता?" साहब ने पूछा। "जी नहीं।" साहब दुबारा फाइल में पढते हुए बुदबुदाए-"कैसा अजीब-सा नाम है।"फिर थाडा सोचते हुए पूछा-"क्या यही तुम्हारे भतीजे का नाम है ?" "जी नही।" साहब आश्चर्य प्रक्ट करते हुए बाले-"आप तो अपने भतीजे को लगवाने की बात कह रहे थे ना?" "जी, कह तो जरूर रहा था लेकिन ।"वाक्य मैं पूरा न कर सका आर जैसे किसी सोच में डूब गया। "लकिन क्या हो गया?" मुझे रुकते देख फिर से पूछा। मेमरा काशू उर्फ सुलगती हुई याद "मेमरा काशू "अच्छा साहब ने मैमरा काशू उर्फ सुलगती हुई याद 55 " काशू" "हो सकता है साहब, मैंने यही सोचा हो कि यह मेरा भतीजा तो अपने ही फालतू लफडा मे पडकर नहीं पढ़ पाया हो, जबकि " मैं फिर अटक्कर रह गया। 'आर यह क्या नाम लिखवाया भैमरा "हाँ, मेरा ही ईजाद किया हुआ नाम मेमरा काशू। यह मेरी ही नालायकी की वजह से पढाई म पिछड गया।" "वह कैसे?" साहब ने पूछा। तभी टेलीफोन को घटी बज उठी। उन्हान कुछ देर तक बात करने के बाद कहा-"चीफ इंजीनियर बुला रहे हैं। चलिए, आप भी साथ चलिए। अब तो छुट्टी का वक्त हो चला है।" बंगले पर चीफ इंजीनियर आर बडे साहब कई मसलो पर बातचीत में मसरूफ हो गए। मैं साइड-सोफासैट पर बैठा चुपचाप कुछ पत्र-पत्रिकाओ के पृष्ठ पलटता रहा। वे उठे तो मैं भी उठ खडा हुआ। अब चीफ इंजीनियर ने मेरी तरफ गौर किया। जैसे कुछ याद करते हुए फिर से बडे साहब से मुखातिब हुए-"हाँ भई इनके आदमी का काम हुआ? वाकई हम इन तीन जना के काम स निहायत खुश हैं। पिछल पूर साल में इन तीना को कान्फिडशियल रिपार्ट में 'आउटस्टेडिंग' हैं। हमने पिछले साली भी यही पॉलिसी अडॉप्ट की थी कि ऐसे लोग, अपनी मर्जी के आदमियो को, अपने विभाग म लगवा ले।" "जी हाँ, आज के जमाने मे यह बहुत बडा इनाम है। इससे स्टाफ एन्कॉरिज होता है। बाकी दो ने तो अपने अति निकट सबधिया के पत भी लिखवा दिए हैं।" बडे साहब ने अपनी टाई पर हाथ फेरते हुए उत्तर दिया। 'आर इन्हान भी तो नाम दिया था ना" चीफ साहब ने मेरी तरफ देखते हुए कहा-"कुछ अजीब-सा नाम लिखवाया था आपने क्यो?" "जी हाँ।" बड़े साहब ने उत्तर दिया-"आज डिटेल्ज लेने बैठा था। साहब यह मेमरा काशू इनका काई रिश्तेदार तो है नहीं।" "ओह मेमरा काशू" चीफ साहब हल्के-से मुसकराए। "हाँ साहब यह का नाम भी नहीं। हमारे इन्ही का डाला हुआ नाम है मेमरा काशू" बडे साहब ने अपनी हँसी दबाने की कोशिश की। "वाह क्या नाम दिया है मेमरा काशू।" चाफ साहब सुनकर हँसने लगे। में एकदम गभीर और उदास हो गया। 'क्या बात है। अरे क्या हुआ आपको?" शायद चीफ साहब ने मेरे चेहरे के भाव पढ लिये थे। । - 56 मैमरा काश उर्फ सुलगती हुई याद बड साहब बाल-"यह कहते हैं कि इन्हीं की वजह से मेमरा काशू पढ नही पाया। ममरा काशू का नाम आते ही यह उदास परेशान हाने लगते हैं। यही सब जानने के लिए इन्हे आज अपने साथ ले आया। आज घर पर हमारे कोई है नहीं। साचा इन्हीं से गपशप मारी जाए।" "ता आप लाग हम ही कपनी दीजिए ना। आज हमारी मेम साहब भी आउट ऑफ स्टेशन हैं। यहीं सब इतजाम हुआ जाता है।" उन्हाने यावर्ची का बुलाया। पहले चाय फिर कुछ पीने आर खाने की फहरिस्त बता गए। हम लॉन में थे। बीच में बेत की टबल । आसपास गाडन चयस । इत्मीनान ओर सुकून का माहौल जुटाने में मशगूल। वेफर्ज उठाते । चाय सिप करते। हल्की- फुल्की बात । कभी टूटी-फूटी सडकों पर हँसते तो कभी हर किस्म की शहरी गदगी को कासते। ढिशू-ढियूँ फिल्मा पर तरस खात । दाना साहब मूड में थे। मरी उदासी देखकर एकदम मुझ पर काई वजन वाली बात नहीं डाल रहे थे। लेकिन खुद ही समझ रहा था कि बाकी की सब याते अपनी जगह, मगर असल मे दाना के ही आस-पास जरूर कहीं मेमरा काशू मँडरा रहा है। अब व्हिस्की के पैग के अपर पहुँचते ही चीफ साहब अपने का राक नही पाए। उनके मुँह से जसे आप-से-आप निकल पडा-"ओह मेमरा काश।" "कह भी जाआ मेमरा काशू को।" बडे साहब ने एक पेग बनाकर मेरी तरफ सरकाते हुए कहा। फिर आसमान की तरफ देखने लगे जैसे वही से ममरा काशू का ढूँढ लाने में व्यस्त हो चल हो। "हाँ-हाँ तो सुन लीजिए मेरी नीचता की कहानी।" मैं दूसरा पैग गले से नीचे उतारते हुए जेसे नशे में चीख-सा पडा-"सुनकर, आप मुझे क्या जलील करग, जितना जलील म खुद ही अपनी नजरा म हा चला हूँ।' अब वे दाना खामाश हो गए थे और मैं भी चुप हो गया। कुछ देर बाद एक और पैग तैयार करता हुआ मैं बोझिल स्वर मे धीर- धीर बालने लगा-"ता सुन ही लीजिए किस्सा-पिछले नवबर ही की बात है। हम लागा न दिलीपनगर मे जा-जान से काम किया था जिसके एवज मे आपने यह महरबानी की कि मैं भी अपनी मर्जी के एक आदमी को खलासी भरती करवा सकता हूँ।' "हूँ-हूँ। ठीक है, यह तो हमारी तरफ से होना ही चाहिए।" चीफ साहव पर भी खुमारी छाने लगी थी। 'भूलिएगा नहीं साहय, आपन यह भी वायदा किया है कि आप उन्हें कुछ I मेमरा काशू उर्फ सुलगती हुई याद 57 "हो सकता है साहब मैंने यही सोचा हा कि यह मेरा भतीजा ता अपने ही फालतू लफ्डा मे पडकर नहीं पढ़ पाया हो, जबकि "मैं फिर अटककर रह गया। "और यह क्या नाम लिखवाया ममरा काशू?" 'हाँ मेरा ही इजाद किया हुआ नाम मेमरा काशू। यह मेरी ही नालायको की वजह से पढाइ म पिछड गया।" 'वह कैसे?" साहय ने पूछा। तभी टेलीफान को घटी यज उठी। उन्हाने कुछ देर तक यात करने के बाद कहा-"चीफ इंजीनियर युला रहे हैं। चलिए, आप भी साथ चलिए। अब तो छुट्टी का वक्त हा चला है।" बंगले पर चीफ इंजीनियर और बड साहब का मसला पर बातचीत मे मसरूफ हो गए। मैं साइड-सोफासैट पर बैठा चुपचाप कुछ पत्र-पत्रिकाआ के पृष्ठ पलटता रहा। व उठ ता मैं भी उठ खडा हुआ। अब चीफ इंजीनियर ने मेरी तरफ गौर किया। जैसे कुछ याद करते हुए फिर से बड़े साहब से मुखातिब हुए--"हाँ भई इनके आदमी का काम हुआ? वाकई हम इन तीन जना के काम से निहायत खुश है। पिछले पूरे साल में इन तीनो की कान्फिडेशियल रिपोर्ट म'आउटस्टडिंग' हैं। हमने पिछले साला भी यही पॉलिसी अडॉप्ट की थी कि ऐसे लाग, अपनी मर्जी के आदमियो को, अपने विभाग में लगवा ले।" 'जी हाँ, आज के जमाने में यह बहुत बडा इनाम है। इससे स्टाफ एन्कॉरिज होता है। बाकी दो ने तो अपने अति निकट सबधिया के पते भी लिखवा दिए हैं।" बडे साहब ने अपनी टाई पर हाथ फेरते हुए उत्तर दिया। "ओर इन्हाने भी तो नाम दिया था ना?"चाफ साहब ने मेरी तरफ देखते हुए कहा-"कुछ अजीब-सा नाम लिखवाया था आपने क्या?" "जी हाँ।" बड़े साहब ने उत्तर दिया-"आज डिरेल्ज लेने बैठा था। साहब यह मेमरा काशू इनका कोई रिश्तेदार तो है नही।" "ओह, मेमरा काशू" चीफ साहब हल्क-स मुसकराए। "हाँ साहब, यह कोई नाम भी नहीं। हमारे इन्हीं का डाला हुआ नाम है मेमरा काशू।" बडे साहब ने अपनी हँसी दबाने की काशिश की। "वाह क्या नाम दिया है मेमरा काशू।" चीफ साहब खुलकर हँसने लगे। में एकदम गभीर और उदास हो गया। "क्या बात है। अरे क्या हुआ आपका?" शायद चीफ साहब ने मेरे चेहरे के भाव पढ लिये थे। " 56 मैमरा काशू उर्फ सुलगती हुई याद बडे साहव बाले-"यह कहते हैं कि इन्हीं की वजह से मेमरा काशू पढ नही पाया। मेमरा काश का नाम आते ही यह उदास, परेशान होने लगते है। यही सब जानने के लिए इन्हे आज अपने साथ ले आया। आज घर पर हमारे कोई ह नहीं। सोचा इन्हीं से गपशप मारी जाए।" "ता आप लोग हम ही कपनी दीजिए ना। आज हमारी मेम साहब भी आउट ऑफ स्टेशन है। यही सब इतजाम हुआ जाता है।" उन्हाने बावर्ची का बुलाया। पहले चाय, फिर कुछ पीने आर खाने की फहरिस्त बता गए। हम लॉन में थे। बीच म बेत की टेबल। आसपास गार्डन चेयर्स । इत्मीनान और सुकून का माहौल जुटाने म मशगूल। वेफर्ज उठाते। चाय सिप करते। हल्की- बाते। कभी टूटी-फूटी सड़कों पर हँसते ता कभी हर किस्म की शहरी कासते । दिरों-ढि फिल्मो पर तरस खाते । दानो साहब मूड मे थे। मेरी , एकदम मुझ पर काई वजन वाली बात नहीं डाल रहे थे। लेकिन रहा था कि बाकी की सब बाते अपनी जगह मगर असल मे कहीं मेमरा काशू मँडरा रहा है। अदर पहुँचते ही, चीफ साहब अपने का राक नहीं से-आप निकल पडा-"ओह मेमरा काशू।" को।" बडे साहव ने एक पैग बनाकर मेरी की तरफ देखने लगे जैसे वही से मेमरा हा। नीचता की कहानी।" मैं दूसरा पैग गले से पडा-"सुनकर, आप मुझे क्या जलील नजरो मे हा चला हूँ।" ये और मैं भी चुप हो गया। करता हुआ मैं बाझिल स्वर म धीर- किस्सा-पिछले नवबर ही की बात है। किया था जिसके एवज मे आपने यह एक आदमी का खलासी भरती करवा तरफ से होना ही चाहिए।" चीफ भी वायदा किया है कि आप उन्हें कुछ काशू उप सुलगती हुई याद 57
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मैंने किसी कदर सँभलत हुए उसी आकृति से इल्तिजा को-'आप ही थाडी मदद कर दीजिए ना जनाव में किनारे-किनारे पार हो जाऊँगा। आप वाद में साइकिल पकडा देना।' 'क्या मुफ्त मे?' 'क्या मतलब 'मैं चाका। 'किराया लगेगा वायू, किराया। समझे कि नहीं पूरे पचास रुपए।' में तो जैसे अपने-आपको खदेडे गए पिल्ले की तरह पा रहा था। गुस्से म चीख पडा-'बडे नीच हो। अच्छा यह तुम्हीं ता हा जा बच्चा से पानी डलवा- डलवाकर मेरो नाक म दम कर रहे हा।" 'नीच' आह-हा-हो।' वह ऊँचे स्वर म हँस रहा था-'नीच' "तुमसे वढकर तो नहीं।' उसने हिकारत से मेरी जानिब देखा और नगर घुमा दी- 'पहचाना कि नहीं मुझे?' वह फिर से अपन भयावने चेहरे का तानकर एकदम मेरे सामने खडा हा गया -'तुम्ही जिम्मेदार हो मेरी इस हालत के लिए, तुम्हीं।' हें मैं? यह कसे? मैं मन ही मन जैसे बुदबुदाया। उसे फिर से गोर से देखा। इतनी बडी उम का नहीं ह । होगा बस मेरी ही उम्र का। वक्त की मार से मारा हुआ। बेवक्त का बूढा। पहले कहीं देखा हुआ। शायद पिछले किसी जन्म का। इस बार उसने जैसे जबर्दस्ती साइकिल पर हाथ से खींच ली। उसे कीचड़ और पानी से लथपथ करता गली के उस पार फक आया। तब मैं भी दीवार के उभरे हुए हिस्सा का किसी तरह पकडता हुआ किनारे-किनारे, पार आ गया। साइकिल को जमीन पर मारता-झाटता जैस-तैसे सवार हा बैठा। मेरा दम बुरी तरह से फूल रहा था। 'मेमरा काशू हा-हा-हा।' अजीब-सी हँसी पूरी फिजाँ म गॅज गई- 'तुम्हारा ही दिया हुआ नाम मेमरा काशू हा-हा-हा में साइकिल चलाता जाता। सिफ कपड़ा से नहीं बल्कि अदर तक लथपथ। अपन-आपका मथता गया। मैंने दाना कनपटिया को हथेलिया से कसा। मेज की तरफ चहरा झुका लिया। आवाज जैसे धरती मे समा गई। दाना ही साहब समझ गए कि कहानी का पूवार्द्ध हो गया है। पाँच-सात मिनट के वक्फे के बाद एक लबी साँस खींचते हुए में फिर से शुरू हो गया। 'सात साल पहले "वह मेरे सामने गिडगिडाया था। मैंने उसकी फीस भरने की हामी भरी थी। डेट निकल गई। मैंने कहा-फिक्र न कर यार मेमरा| लेट फीस " मेमय काशू उर्फ सुलगती हुई याद 59 1" - अर्से वाद आर्टिजन-स्टाफ म प्रमोट कर दगे।" "हाँ-हाँ हम सब याद है फिक्र मत करो। बस तुम तो कहते जाआ।" "हुआ यह था कि एक दिन मैं दिलीपनगर सब-स्टेशन पर अकेला काम कर रहा था। दोपहर को ए० ई० एन० आ गए। काम-काज के पेपर्ज देखते रहे और अगले प्राजेक्ट के बारे में बताते रहे । शाम होने का थी। वे जाने लगे तो मुझे अफसोस हुआ कि इस सुनसान-से इलाके में उन्हे चाय तक नहीं पिला सका। सहसा वहीं के एक केजुअल लेवर का सामने पाकर कहा-"क्या भैया, कहीं से चाय का इतजाम नहीं हो सकता?" "यहाँ तक आते-आते तो ठडी हो जाएगी साहव । उधर ट्रासफार्मर से जरा आगे एक खोखेवाला चाय बना देता है। आप लोग वहीं से पी आइए ना। दफ्तर वद हाने का वक्त तो हा ही चला था अत दफ्तर को ताला लगाया। साइकिल निकाली और हम उधर ही चल दिए। चाय पीकर ए० ई० एन० साहब तो जीप से चले गए। मुझे गांववाला ने घर लिया। सभी जानना चाहते थे कि कब तक गाँव से पानी साफ हो जाएगा। सभी परेशान थे कि यदि जल्दी से पानी नहीं हटा तो उनक कच्चे मकान ढह जाएंगे। मैं उन्हे बडी सहानुभूति से समझाता रहा कि हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, दिनभर काम कितने जोरा से हाता रहता है । पाँच पम्प ता काम कर ही रहे हैं जल्दी ही तीन आर लगवा दगे आदि-आदि। इन्हीं बातो में अंधेरा हो चला था। पानी आने लगा था। पाइप-लाइने टूटी पड़ी थीं। चारा ही तरफ पानी फैलने लगा था। मैंने साइकिल उठाई और चल दिया। जिस गली से भी गुजरने की कोशिश करूं पानी ही पानी। "लाट जाओ बाबू। साइकिल पार करता तुम्हारे बस की बात नहीं है।" एक डरावनी-सी खरखराती आवाज ने मुझे रोक दिया। मैं दूसरी गली की तरफ मुड गया, जिसके किनारे अपेक्षाकृत कुछ कम पानी था। मैंने वहीं से निकलने की काशिश की मगर फंस गया। लिहाजा भीग गया। आर वापस। 'ऐमे मारे जाओगे बाबू।' वहीं आवाज सुनाई दी। ऐसी आवाज हर मोड पर। मैं पीछे हटता फिर पार निकलने की कोशिश करता। भीगता। बच्चे मुझ पर पानी डाल-डालकर और परेशान करने लगे थे। "ऐसे ता तुम मार जाओगे बाबू। आगे गड्ढे ही गड्ढे हैं।" अब की उस धुंधलके म उस आवाज हो की तरह भयावनी-सी आकृति भी उभरी। पिचक हुए गाल। अट-शट सफेद-काली दाढी। सिर के बाल बुरी तरह से उलझे हुए। 58] मेमरा काशू उर्फ सुलगती हुई यार मैंने किसी कदर सँभलते हुए उसो आकृति से इल्तिजा की--'आप ही थोडी मदद कर दीजिए ना जनाब। मैं किनारे-किनारे पार हो जाऊँगा। आप बाद में साइकिल पकडा देना।' 'क्या, मुफ्त मे 'क्या मतलब?' में चौका। "किराया लगेगा बाबू, किराया समझे कि नही? पूरे पचास रुपए।' मैं तो जैसे अपने-आपको खदेडे गए पिल्ले की तरह पा रहा था। गुस्से मे चीख पडा-'बडे नीच हा अच्छा यह तुम्ही ता हा जो बच्चा से पानी डलवा- डलवाकर मेरी नाक में दम कर रह हो।' "नीच? आह-हो-हा।' वह ऊँचे स्वर में हँस रहा था-'नीच' 'तुमसे बढकर तो नहीं।' उसने हिकारत से मेरी जानिब देखा और नजर घुमा दी- "पहचाना कि नहीं मुझ' वह फिर से अपने भयावने चेहरे को तानकर एकदम मेरे सामने खडा हा गया -'तुम्ही जिम्मेदार हा मेरो इस हालत के लिए, तुम्ही ।' हैं में यह कसे ? में मन ही मन जेसे बुदबुदाया। उसे फिर से गोर से देखा। इतनी बडी उम का नहीं है। हागा बस मेरी ही उम्र का। वक्त की मार से मारा हुआ। बेवक्त का बूदा। पहले कहीं देखा हुआ। शायद पिछले किसी जन्म का। इस बार उसने जैसे जबर्दस्ती साइकिल मरे हाथ से खींच ली। उसे कीचड और पानी से लथपथ करता गली के उस पार फेक आया। तब मै भी दीवार के उभरे हुए हिस्सा का किसी तरह पकडता हुआ, किनारे-किनार पार आ गया। साइक्लि का जमीन पर मारता-झाडता जैसे-तसे सवार हा बैठा। मेरा दम बुरी तरह से फूल रहा था। "मेमरा काश हा-हा-हा।' अजीब-सी हँसी पूरी फिजाँ मे गूंज गई- 'तुम्हारा ही दिया हुआ नाम मेमरा काशू हा-हा-हा ।' मैं साइकिल चलाता जाता। सिर्फ कपडा से नहीं बल्कि अदर तक लथपथ। अपने-आपको मथता गया। मैंने दाना कनपटिया का हलियो से कसा। मेज की तरफ चेहरा झुका लिया। आवाज जैसे धरती मे समा गई। दाना ही साहब समझ गए कि कहानी का पूर्वार्द्ध हो गया है। पाँच-सात मिनट के वक्फे के बाद एक लवी साँस खींचते हुए मैं फिर से शुरू हो गया। 'सात साल पहले वह मेरे सामने गिडगिडाया था। मैंने उसकी फीस भरने को हामी भरी थी। डेट निकल गई। मैंने कहा-फिक्र न कर यार मेमरा लेट फीस । मेमरा काशू उप- सुलगती हुई याद 59 के साथ जमा करा देगे तुम्हारा फॉर्म । यारा के होते फिक्र किस बात की। जाकर सो जा। लगातार इतने भीठे आश्वासन इतने मीठे कि वह किसी और से भी सहायता न ले सका। उसके हमेशा बेहद अच्छे नबर आते थे। हाजिर-जवाब इतना कि उसक कारण मुझ क्लास में नीचा देखना पड़ता था। ईर्ष्या से उसके प्रति दिन-रात जलता रहता था। और कुछ बस न चलता ता 'ममरा काशू मेमरा काशू' कहकर चिढाया करता समय गुजरा। मुझे यह अच्छी नौकरी मिल गई। थोडा सघर्ष किया। मिसेस की भी नोकरी लग गई। ओर वक्त गुजरता गया। मैं उस गरीब का असली नाम तो क्या अपने द्वारा मजाक मे दिया गया नाम 'मेमरा काशू' तक भी भूल गया। उस दिन मैं बुरी तरह से व्यथित-उद्वेलित जरूर हुआ था। फिर भूल गया, जस भयानक दुघटना से बचने के बाद, आदमी उस भूल जाता है। भाभी से मैने वायदा किया कि उनक लडके यानी अपने भतीज को इस नौकरी पर लगवा दूंगा। फिर वह आगे निकल जाएगा। में फिर थाडा रुका और कुछ सोचता हुआ उन दोना की आर देखने लगा--"अच्छा साहब, आप ही मर लिए जरा सोचिए ओर बताइए कि जेसे ही मीटिग में आपने मुझसे अपने कॅडिडेट का नाम लिखवाने को कहा, क्यो मेरे मुँह से अपने भतीजे का नाम न निकलकर भेमरा काशू निकला?" "तुम कुछ ज्यादा ही सेंसिटिव हो। लडकपन में एसी घटनाएँ अक्सर हो जाती है। जिसे तुम अपना पापबोध समझते हो वैसा है नहीं। वह दरअसल व्यवस्था का शिकार है। तुम्हारा मारा हुआ नहीं है वह मेमरा काशू।" चीफ साहब मुझे तसल्ली दे रहे थे। यडे साहब ने कहा-"अब भी कुछ नहीं बिगडा। चाहा तो नाम बदलवा सकते हा।" उन्हाने स्वीकृति के लिए चीफ इजीनियर को तरफ देखा। इसस पूर्व कि चीफ साहब काइ निणय सुनाते, में भावावेश मे बोलने लगा- 'सवाल ही पैदा नही हाता, नाम बदलने का। यही सही नाम है । पर मेमरा काशू सही नाम नहीं है उसका। उसका सही नाम ठीक पता-ठिकाना में पता लगाकर आपका नाट करा दूंगा। इस बीच आप मेरा यहाँ से ट्रासफर कर दीजिएगा। वह मुझमे ज्यादा याग्य तथा निपुण लडका था। मैं नहीं चाहता कि वह यहाँ मरे अधीन काम को आर इस बात का पता भी उसे कतई नहीं चलने दूंगा कि मेरी वजह से उससी नौकरी लगी है।" "वैरी गुड वैरो गुड" चीफ साहब ने गिलास को भेग की सतह से जाया। BOमरा काशू उर्फ सुलगती हुई याद बेयरा बुलाने आ गया था। अदर डाइनिंग टेबल सज चुकी थी। खाने के दौरान मैं फिर से दुविधा में पड़ गया।आखिर यह सब होगा कैसे? मैं दिलीपनगर जाऊँगा। मैमरा काशू से बातचीत करूँगा तो उसे सब रहस्य आखिर पता चलेगा ही कि आज के जमाने में नौकरी यूँ ही नहीं लगती। इस स्थिति से भी मुझे इजीनियर साहब ने उबारा, कहा -"मिस्टर आदर्शवादी आप इस बात की बिल्कुल फिक्र न करे। हमारे पास एक जासूस- टाइप बदा है। वह सब पता लगा लेगा। एक अच्छे स्टशन पर जगह खाली हुई है। दो-चार रोज में ही आपका वहीं भेज देगे। नहीं तो जहाँ चार पैसे का फायदा होता है, वहाँ के लिए खूब सिफारिशे आने लगती हैं। ठीक?" ऑर्डर होते ही मैंने फौरन नए स्टेशन पर ज्वाइन कर लिया। किसी तरह कोशिश कर मिसेस का भी वहीं ट्रासफर करा ल गया। लगभग चार महीने के बाद मुझे इत्तिला मिली कि अब वैकेसी फ्रािअप हानी हैं, लेकिन आपके कैंडिडेट मेमरा काशू की ठीक से शिनारद्रत नही हो पा रही। इसके लिए आपको स्वय ही कष्ट करना पड़ेगा। और कोई चारा नहीं है। दिलीपनगर आने से पहले ही मुझे कई मेमरा काशू नजर आन लगे थे। जिस दिशा में बढता, उधर ही मेमरा काशू। असमय के बूढ़े। ऊलजलूल हुलिया। अजीबोगरीब वेशभूषा । दाढी धंसी हुई। मूंछ की नोक किधर को निकली हुई। धूल मे लोटते टूटी दीवारो का सहारा लिये हुए, मेमरा काशू। दिलीपनगर में जाकर जिससे भी उसका नाम पूछा वही जवाब देता मेमरा काशू। मुझे वहाँ वही डरावनी-सी आकृति हर गली के मोड पर दिखती। वही डरावनी-सी या मजाक उडाती हँसी-हा-हा-हा मेमरा काशू। इससे मैं घबरा उठता। आखिरकार मैं परेशान होकर लौट चला। मैं तो सिर्फ एक ही मेमरा काशू की नौकरी लगवा सकता था। मेमरा का उर्फ सुलगती हुई याद 61 हमारे गांव से वास्ता रखते थे ऋषिनाथ। इसी रिश्ते का में लाभ उठा लेना चाहता था। हाल ही में उनका नाम राज्यमत्री की सूची मे आया था। विभाग की घोषणा होती थी। उनसे याग्य सेवा पूछ आता । राजनीति की दीक्षा देने को कहता रहता। उस दिन ऋपिनाथ जी थोडी फुर्सत थे। मेरे इसरार पर कहा-"एक लत है यह राजनीति। अच्छे लोगो के लिए बुरी बला समझे। । रास्ता किधर थोडी देर के लिए रुके फिर सस्मरण सुनाने लगे-"ता सुनो। उन्हीं दिनो स्वतन हुए एक छोटे-से द्वीप पैरिया मे मेरी नियुक्ति राजदूत की हैसियत से हुई थी। वहाँ एक हिंदी के विद्वान् थे मि० कैरियूट। यदा- कदा किस्से-कहानियाँ लिखते थे। हिंदी मे बात करते हुए उन्हे अच्छा लगता था। विदेशा की सस्कृति से परिचित होने की लालसा पालते थे। इन्हीं सब कारणा से मेरे करीय कुछ ज्यादा आने-बैठने लगे थे। एक दिन उनका स्वर ठडा था। प्लाटा के अभ मैंने . लिया। थाडी से . नए 4d है? 62] रास्ता विथर से है?
- थे। हलक को तर करने में मैं सीमा लाँघन लगा था। उन्होंने मुझे रोकते हुए कहा-'अव छोडिए इसे। आज अपने जीवन-अनुभव की ही कोई बात सुना डालिए ऋपि जी। मै पूरी खुमारी मे उतर चुका था। मि० कैरियर पर दया-सी आई। उन पर उपकार करने की सूझी। चलो आज इन्हे एक बना-बनाया प्लॉट थमा दूं, एक गिफ्ट की तरह 'ता फिर सुन लीजिए मि० कैरियूट आज में आपको रास्तो के बारे में बताऊँगा। आई एम ए सैल्फ-मेड मेन।' 'हाँ-हाँ जरूर बताइए।' मि० केरियूट न हल्की-सी ध्वनि के साथ अपना गिलास मेज पर रख दिया था। आँखा म जिज्ञासा भरी थी। शाम घिर आई थी। में उठ खडा हुआ। खिडकियो-दरवाजा के पर्दे दुरुस्त किए। पहले खडे-खडे एक व्याख्याता की तरह उन्हे समझाने लगा। बाद म निहाल-सा कुर्सी पर पड़ गया। जबान बरकरार जारी रही- 'रास्ते दुगम स्थलो की ओर जाते है । पहाडो, बीहड जगला, समुद्री की गहराइयो, कहीं से भी गुजरने की हममे कुव्वत होनी चाहिए। तभी हम अपना सही रास्ता इतिहास में दर्ज करा पाते हैं।' 'बहुत खूब।' मि० कैरियूट मेरे वक्तव्य से अभिभूत हो उठे। मरा उत्साह बढा, 'मि० कैरियूट। एक उक्ति के अनुसार मनुष्य अपना रास्ता अपने दम से तय करता है यानी पैरो द्वारा चलकर मजिले-मकसूद तक पहुँचता है। मगर दरअसल मै कहना यह चाहता हूँ कि इस तरह से आदमी पहुँचता बहुत कम है लटकता ज्यादा है।' 'हूँ-हूँ, कहते जाइए।' 'तब मैं दम साधे उन्ह एक किस्से को तरह अपनी प्रगति-गाथा सुनाने मे मरागूल हो गया था। उसे ही अब तुम्हारे लिए फिर से दोहरा रहा हूँ। तुम इसे सुनने के बाद जैसा चाहो निष्कर्ष निकालो ओर अपने लिए जो वाजिब लगे रास्ता चुना। मेरी बात समझ रहे हो ना, ऐ लडके।" "ठीक है। आप यस कह डालिए अब।" मैं भी ऋपिनाथ जी से यह सब जानने को उत्सुक हो उठा था। कहानी के माध्यम से जिन्दगी का कोई गृढ राज खुलनेवाला था मेरे सामने जा शायद मरे लिए सीढी सिद्ध हो। तय ऋपिनाथ जी ने, जो कुछ भी बताया, वह एक कहानी की ही शक्ल म मरे सामा उभरता रहा- "काइ बडी बात नहीं थी आर मैं उससे कह देता-पिक्र मत करो दोस्त " गरता किधर से है। 63 तुम्हारा काम हर हालत मे हा जाएगा। बस इतना-भर ही ता कहना था मुझे। इसके बाद कुछ भी न करता, तो भी क्या। ऐसा ता हम लाग दिन में दसा बार कहते ही हैं आर लाग प्राय खुश हा जाते हैं। धन्यवाद या थेंक्स कहते हैं। हाथ जाडते, झुकते हुए चले जाते है। परन्तु जोशी मेरा दोस्त था। बचपन का दास्त। साथ-साथ खेला-पढा हुआ। मेरी नसीहता पर चला होता तो उसकी ऐसी गति न होती। मेरे सामने एक फरियादी की शक्ल लिये खडा न होता। बल्कि मौका लगता तो मुझे ही या किसी को भी उखाड फेकता खैर कह देता-दोस्त फिक्र मत करो, तुम्हारा काम हर हाल मे हो जाएगा। उसका कधा थपथपा देता। और बदले मे दोस्त के मुरझाए हुए चेहरे पर किंचित् चमक के लक्षण ता देख ही सकता था। लेकिन मैं खुद सुबह से काफी परेशान था। ओर यह तय है कि मरी यह परशानी एक बहुत बड़ी परेशानी थी। एक-दो इन्क्रीमण्ट्स या इस शहर स उस शहर में तबादला जसी प्रॉब्लम नहीं थी। ये मामूली प्रॉब्लम्स होती हैं, जो आए दिन मामूली आदमियो के साथ झुलती दिखलाई देती हैं । यही प्रॉब्लम जोशी की थी। में ता जिन्दगी की दौड मे बहुत आगे पहुँच चुका था। कोई मुझे सुपरसीड करे करने का यत्न करे, मेरे बर्दाश्त से बाहर की चीज है। मेरे अन्दर खून के कतरे उबलने लगते हैं। उन दिनो ऐसी ही झलक मुझे व्यग्र किए हुए थी। यह झलक उस आदमी से उभर रही थी जो कभी जोशी ही की तरह मेरे इर्द-गिर्द चक्कर काटता दिखाई दिया करता था वही आज सुबह मुझे दर-किनार करता हुआ पिलखुआ रोड की तरफ मुड गया था। मेरा ड्राइवर उसे जानता है--आज के सन्दर्भ मे भी पहचानता है। कहने लगा-करिहाल साहब के पर उग आए हैं सर। सुना है उन्हे पार्टी का टिकट मिलने वाला है। ॐह कहकर खिडकी से बाहर मुंह निकाल थूक दिया मैंने। पर अन्दर ही अन्दर दाँत पीसकर रह गया। उसी समय से रह-रहकर दाँत पीसे जा रहा हूँ। खा जाऊँ उसे, जिसने मुझे अपने ड्राइवर के सामने छोटा कर दिया जाशी से कहा 'मिस्टर तुम्हारा काम बहुत मुश्किल है। तुम किससे टक्कर लेने चले हो" ऐसा दो टूक जवाब सुनकर जाशी असमजस मे पड गया। अपने निचले तिलवाले हाठ को चबाता रहा 'मैं मैं क्यो किसी से टक्कर लेने लगा? आप बडे आदमी हैं। आप ले सकते हैं। मेरा ट्रासफर रुकवा सकते हैं । आपका ता पता - 64रास्ता किधर से है?
- - - है। मेरी पत्नी इसी शहर में नियुक्त है। कायदे से पति-पली का एक ही जगा रखन का नियम है 'देखा जोशी,' मैंने उसे बीच में टोकते हुए समझाया, 'नियम कानून- कायदे धाराएं-उपधाराएं, बहुत-कुछ हैं। सय माथा-पच्ची। अपने दश की आयादी इतनी ज्यादा है कि ये गिनती के कानून र एक को खुश नहीं कर सकत समझे जोशी फिर से निचला तिलबाला हाट चयाने लगा और मैं अपने हाठा का कुछ देर के बाद आराम की स्थिति म ले आया मुझ जाशी से ही पता चला था कि कटिहाल के हो एक आदमो की खातिर उसे (जाशी को) उखाडा जा रहा है। कटिहाल मेरे और जोशी के सम्बन्धो से भी बखूबी वाकिफ है । मैं समझता हूँ यह पृष्ठभूमि कटिहाल ने यही सोचकर तैयार की हागा कि मैं अपने जिगरी दोस्त को बचाने के लिए, उसके पास दौडा जाऊँगा। इस तरह मैं हो उसका रास्ता हमवार बना दूंगा। इस तरह वह जोशी को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल करने म कामयाब हो जाएगा। तव में भी आप-से-आप, जोशी को उसी यानी कटिहाल के अन्दाज स देखने लगा था। अपनी दोस्ती-सहित उसके तमाम सामाजिक-पारिवारिक रिश्ता से अलग जाशो को नई सूरत-सपाट और गाल-झलकने लगी थी, जिसे मैं भी इस्तेमाल कर सकता था इस समय यदि मैं भावुक हो उठता तो बचपन की दोस्ती को अहमियत देता अतीत के सपना का ताना-बाना बुनता सोचता-बचपन की रगीनिया से सिर्फ दास्त ही ता दो पला में हमारा साक्षात्कार करा सकते हैं। यह सामर्थ्य किसी और म नहीं होता। इस सोच-प्रक्रिया में मेरा और जाशी का सवेदना-ससार तो चमकने लगता, लकिन मैं खुद अपने कर्म-क्षेत्र मे पिट जाता। एक गोटी की मानिंद। जोशो अब भी अपने निचले तिलवाले होठ का चबाए जा रहा था। इससे थाडी चपवप उभरने लगी थी। मैंने कहा-'देखा जोशी, मैं तुम्हे इस वक्त कोइ कच्चा-पक्का आश्वासन नहीं देना चाहता। मेहनत करना इन्सान का पर्ज है। मेहनत हम करेगे। तुम भी करोगे, तुम्हारी पन्नी भी। कल इसी समय उसे भी लेकर आओ।' जोशी उठ खडा हुआ। जात-जाते कुछ पूछने के लिए फिर से खडा हो गया। क्या कैसे पूछे असमजम में पड़ गया। म मुसकरा दिया। एक खास रास्ता मेरे दिमाग मे विस्तार लेने लगा था जो 2 रास्ता किधर से है? 65 जाता ता पचायत-मत्री की ही हवेली को था लेकिन आम रास्ता नहीं की तरती टाँगे हुए था। इस रास्ते से केवल मरे-जैसे लोग ही गुजर सकते हैं। इस रास्त के विषय में जाशी का हल्का-सा सकत किया था कि वस्त आने पर तमाम रास्ता का उल्लघन हो जाता है ताजाशी अपने हाठ के तिल को अनामिका से छूने लगा था जैसे दशनशास्त्र के किसी गूढ प्रश्न में डूबने लगा हा। 'अभी नहीं समझागे। कल इसी वन फिर यात हागा। भाभीजी भी आएँगी।' जाशी चला गया। पत्नी सामने आकर खडी हो गई नैतिक शास्त्र का पाथा थामे--'सब सुन रही थी में। चुटकी भर का काम और पहाडा की यात्राएँ करा रह हा उस बेचारे से। अगर माना ता दोस्त से बढकर काइ दूसरा जिगर का टुकडा नहीं होता।' "सुना मडम! औरत सजग होती हैं समझ रखती ह। परन्तु जब उनम अधिक सद्भावना जागृत हा जाती है ता वही ओरत नादान हो जाती है। तुम उन औरता की तरह मत सोचो। बात दिना की न होकर चुटकिया का हा जाएगी। जाशी क कस की परिधि सिमटकर मेरी ही ता मुट्ठा मे आओवाली है। तच मुझम सामर्थ्य होगी। जाशी स यह नहीं कहूँगा-दास्त तुम्हारा काम हो जाएगा, बल्कि कह सकूँगा--ला दोस्त तुम्हारा काम हो गया।' पली मुँह सिकोडते हुए मर सामने से हट गइ। मैं अपने ही चेहरे की मुसकान मे खा गया। दूसरे राज सुबह से ही घनघोर बादल छा गए थे। आसमान का रंग काला बदरग हा गया था। शाम होते-हाते बादला ने धरती को पूरी तरह बेढगा बना दिया था। आना ही था जाशी को। पत्नी का लेकर आया। दाना हा पाचडगे कपडो को झाडते हुए गैरेज के काने म खडे दिखाई दिए थे। कुछ देर तक ड्राइगरूम के बडे शोशा से उन्हें न दस पानवाला काण बनाए रहा। जूते-चप्पल वजने की ध्वनि यार-बार सुनाई देने लगी। तब मैंने जैसे चौंककर सिर घुमा दिया 'आर जाशी। अरे भाभीजी आप! बडी कृपा की। किसी बहाने धन्य ता किया। खड़े कस हैं? सीध चल आइए ना। काच-कालान का कुछ नहीं बिगडना।' चाय के लिए आवाज लगाई। चाय लेकर स्पय मेरी पत्नी आइ। प्रेमपूर्वक चाय चलता रही। दाना महिलाएं स्वभावानुकृत अधिक घनिष्ठ हाने लगा तो मैंने 661 यस्ता विथर से है?
पली का टाका 'बाद में खूब बात करती रहना पहले जरा पत्नी ड्राइगरूम से बाहर चली गई। मैने अपने-आपको पूरी तरह मोडा 'अब आप कहिए भाभीजी आपके स्कूल म ओर भी ता ऐसे केस हागे जिनक हस्बेड्स को जबरदस्ती बाहर भेज दिया गया है या वे अडर ट्रासफर-ऑर्डर हैं। पति या पत्नी काई भी हो सकता है।' 'हाँ ह । झूठ क्या बालूँ ? हमारा पहला केस ता नही है यह - मेरे इस लम्बे 'हूँ' से वह बेचारी अटककर रह गई कि जसे में उन्हे अब दा-टूक जवाब द दूंगा-ता इस केस में ज्यादा दम नही, क्याकि ऐसा ओरा के साथ भी हुआ है। प्रक्टिस इन ए हाफ रूल। थाडी चुप्पी के बाद मैंने मिनाचित स्वर उभारा, 'भाभीजी, आप घबराइए नहीं। याद कीजिए एसे कितने केस हैं या हो सकते है ? या कुछ एसे कपल भी ता हा सकते हैं जा तबादले के भय-तले जी रहे हैं' श्रीमती जाशी ने साचते हुए धीरे-से कहा 'चार-पाँच 'चार-पाँच से काम नहीं चलगा भाभीजा बल्कि आपको घूम-घूमकर पूछ-पूछकर सभी विभागा के ऐसे खूब सारे लागा का इकट्ठा करना हागा। तभी बात बनेगी। बची-खुची कसर हम पूरी करगे। जाशी यही काम तुम्हे भी करना है। भाभीजी की मदद करनी है। इससे गलत नियमा की दलदल में फँसे तमाम लागा का भला होगा।' 'सभी अपना-अपना रास्ता निकालते ह भाइ साहव। कुछ दे-दिलाकर कुछ बडे लागा से मिलकर।' 'यही ठीक है। यही हाता है। मैं काई बडा आदमी नहीं हूँ। पर इतना जानता हूँ कि सगठन म ताकत हाती है। यहां मेरा विश्वास है। यदि वे सब मिलकर मेरे पास आएंगे ता सबका काम आसान हा जाएगा। इस तरह मिलकर व मरी मदद करगे।' एक-एक प्याला चाय, बर्फी नमकीन फिर से साथ-साथ लिया। उन दाना का अपनी कार से घर छोड़ आया। सपक वनाए रहा। पाँच-सात राज गुजरे थे। पचायत-मनी का भगव हुआ। नारेबाजी। नाद- हराम आन्दालन आए दिन यह सिलसिला वढने लगा। पुलिस जाती लाट आती। मैं पुलिस-समेत हर छोटे-बड महकमा मे आता-जाता रहा। अखबारवाला का बुलाता रहा। अहिंसक आन्दालन गाधीजी का देन ह । नागरिका क अधिकारा पर लाठी- -प्रहार नहीं। रास्ता किधर से है? | 67 मगर कब तक? आखिर तो यह होना ही था। दो लाशे उठीं। सुना, एक औरत की थी। वही सबसे आगे बढ-चढकर बडे उत्साह से आन्दोलना में भाग ले रही थी। फिर पता चला-श्रीमती जोशी थी। ओह बदनामी के इश्तहार। ऊपर से कई तरह के दवाव। आन्दालन की अधिक व्यापकता का डर। जवान लडखडा गई मत्रीजी की। किसी तरह जैसे पिंजरे से निकलकर मेरे पास पहुंचे। मौसम से शुरू हुए। राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय मसला तक पहुँचे। बीच-बीच में अपने-मेरे निजी रिश्ता का बखान । पचायती राज पर भाषण, जो उन्हें एक बहुत बडी सभा मे देना था और प्रस्तुत आन्दोलन की वजह से रुका पडा था। पचायती कार्य-प्रणाली मे हर मत्री का बेवजह हस्तक्षेप का रोना। यदि कार्यकर्ताआ के पारिवारिक जीवन मे विघ्न पडते रहे तो कार्यकुशलता आएगी कहाँ से? वृत्तान्त बढता जा रहा था। में उनके स्वर मे स्वर मिलाए रहा। सहानुभूति दशाता रहा-'इतने बड़े कायक्षेत्र मे कुछ न कुछ गलत या चूक ता होती ही है इसमे आपका क्या दोष।' जाते-जाते बाले, 'आपके पास इतना समय कहाँ है। ऊपर से फालतू लाग आ-आकर माथा चाटते रहते है। कटिहाल का ही देखा। रात-दिन आकर जमा रहता है। सोचता हे तुम्हारी बजाय जैसे मैं उसे ही टिकट दिला दूंगा।' मैं गेट से लाटा तो मन ही मन मुसकरा उठा। जोशी का पता चला। चुपचाप अपने-आपको उसी दूर-दराज के इलाके में घसीट ले गया। मुझे फुर्सत नहीं थी। इलेक्शन सिर पर था। तब से मेरी पली अकसर गाँव रहने लगी है मरे ऐसे कर्मों तथा मेरी भाग-दौड़ से तग आकर। मैं चुनाव जीत गया था। देखा आपने मि० कैरियूट? पेरा की बजाय रास्ता दिमाग से तय किया जाना चाहिए। खुद अपने शरीर को घिसा-घिसाकर रास्ता बनाने की बजाय दूसरो से अपने लिए रास्ता बनवाना चाहिए। यही करिश्मा है। क्या हुकार नहीं मिली। पता नहीं कितनी देर से नहीं मिली थी। सिर उठाया। देखा-मि० कैरियूर जा चुके थे न जाने कब से। कुर्सी खाली थी। इसके बाद में पैरिया द्वीप मे कम से कम सवा साल और रहा। मि० कैरियूट मुझे नहीं दिखे। दिखने पर भी अनदिखे हा गए वे। किस्सा पूरा कर पहले ऋषिनाथजी ने भरपूर अंगडाइ ली फिर माथा पकडकर बैठ गए, थका-उदास चेहरा लिये। मैंने तत्काल प्रतिक्रिया व्यक्त को "आपको क्या परवाह एक कैरियूट को। 68 गरसा विधर से है?
अब तो सैकडा-हजारो की तादाद मे लोग आपको घेरे रहते हैं।" मैंने उन्हे
उबारना चाहा।
"ठीक है, मगर इस सब के बावजूद कभी-कभी ऐसा हो जाता है। बहुत
बडी भीड में से अचानक एक चेहरा उभरता है। सारी भीड धराशायी हो जाती है।
अकेला मि० कैरियूट मुसकरा रहा होता है।"
टेलीफोन की घटी बजी। वे अन्दर चले गए। मे उठ आया। रास्ता तलाश
रहा था। मेरी नियति कैरियूट जैसी हो नहीं सकती थी। मुझे ऋपिनाथ बनना था या
फिर जाशी-जैसी जिन्दगी जीनी थी।
रास्ता किधर से है?
69
इस सफर के 'वाद' वह नहीं, बल्कि वही नेकीराम' अपने पूर वजूद के साथ मुझे कुछ- कुछ वक्फे के बाद दिखलाइ दे जाता है जैसा कि उस कहानी में वर्णित था-लबा-पतला शरीर, लबा सफेद या भूरा कुर्ता-पायजामा पहने, पीछे का कढे पतले खिचडी बाल, चहरे पर झुर्रियाँ आँखा म अनाखी चमक के साथ-साथ कहीं उपेक्षित हाने की टीस भीड-भरी सडको पर या सुनसान डगर पर गली-कूचा मे या किसी छोटे-बड़े घर या मदिर म प्रवेश करते-निकलते। मेरा खयाल है अगर आप थाडा गौर करे ता मेरी तरह आपका भी वही नेकीराम' अपने आसपास जरूर दिखाई दे जाएगा भले ही उस कहानी में वर्णित कदबुत-वेशभूषा मे कुछ अतर हा। लवा सफर हा बर्थ रिजव हा आर साथ में एक-दा सुरुचिपूर्ण किताबे हा तो अकेले सफर का मजा ही कुछ अलग हाता है। ठीक ढग से कुछ सोचने का अवसर मिलता है। खिडकी से बाहर खत-खलिहान पेड-पोधे पशु-पक्षी सभी मिलकर सुप्त भावनाआ का जागृत कर देते हैं। शाम इलाहाबाद से गाडी म बेठते समय चार्ट देख लिया था। मेरेवाले कूपे मे पुनरागमन 10 पुनरागमन कटनी से काई नकीराम नाम के शख्स चढगे। मन म वितृष्णा लिये हुए फालतू-सा विचार उभरा-नेकीराम आर फस्टक्लास! फिर साचा-कोई हो, तब तक आधी रात बीत चुकी होगी। किताव पढते-पढते म सो चुका हूँगा। बस थाडा दरवाजा खालने का झझट हागा। चिटखनी खालकर में फिर से सो जाऊँगा। आगे वह नेकीराम नाम का यात्री सब संभाल लगा। सुबह नेकीराम इटारसी स्टेशन पर उतर लेगा अपन रास्ते ओर मै अपने रास्ते बढता रहूंगा। यह गर्मिया का मौसम था। अधखुली खिडकिया से ठण्डी-ठण्डी हवा आ रही थी। मेरी नींद में बैंड-बाजे को लवी ताना से खलल पडा जा लगातार मेरे खयाल से बहुत देर तक गाडी की रवानगी तक पडता रहा। दस्तक हाने से पहले ही दरवाजा खाल दिया। पहले, दा अर्दली अदर सामान रख गए। बाद मे हाथा मे बहुत-स हार सहेजे नेकीरामजी ने प्रवेश किया। जाहिर था कि यह पतली-लम्बी कद-काठी के नेकीरामजी फौज के कोइ आला अफसर थे। पर मेरे सामने काई कुछ भी --- नींद उड चुकी थी। मैं दुबारा किताब खोलकर बैठ गया। गाडी गति पकड चुकी थी। वे अपना सामान आर ऊपर की बर्थ पर लगे बिस्तर को दुरुस्त करने लगे। फिर एहसा मेरी बगत में थाडे फासले पर बेठ गए। हा सकता है मेरे चेहरे पर खीज का भाव कुछ ज्यादा ही उभर आया हा, या वैसे ही आपचारिक्तावश वे वाल-"मॉफ कीजिएगा मेरी वजह से आप डिस्टब हुए।" भने थाडा सीधे ही कहना उचित समझा-"कोई बात नहीं। रस्मारिवाज का ता निभाना ही पड़ता है। देवी की चोकी, जागरण जैसे जश्ना पर कोन किसी की नीद का ध्यान रखता है। फिर चाहे अनपढा की श्रेणी हा या पढे-लिखा की, क्या फर्क पड़ता है नेकीरामजी।" मरी आवाज में वोखलाहट और व्यग्य दाना थे। खासतौर से 'नकीराम' का लेकर। पता नहीं क्या, मै अपने सामने सबका उपेक्षित किए रहता हूँ। भीड मे से अपने का छाँटकर अलग कर लेने की कला म माहिर हूँ। मुझे ज्यादा बालनेवालो सचिढ़ है। उन्हाने जैसे सब-कुछ समझते हुए कहा "जीवन मे वहुत-कुछ ऐसा है जिसे हम बदल नही सकते। यहाँ मेरा आशय विशेष रूप से नाम से है।" 'क्या-क्यों?" मै सचमुच उनके ओर बालने से चिढ गया था। उन्हाने ब्रीफकेस खोला एक पत्रिका निकाली। उसी शात तथा कुछ अलसाए स्वर मे कहा-"आप कुछ देर के लिए अपनी पुस्तक मुझे दे दीजिए पुनरागमन 11 और इस पत्रिका की यह कहानी पढ आइए।" उन्हान गित करते हुए मरी ओर पत्रिका बढाई। मैने उसी असतुलित अवस्था में उनके हाथ से परिका खींच ली-'तो ऐसा हो सहा' वाले भाव के साथ कि चलो इस प्रकार यातचीत से पिण्ड छूटेगा। कहानी का शीर्षक था 'फिर से लिखक का नाम नहीं था। साचा-शायद जत में होगा। मैंने कहानो पढनी शुरु की और वैधता चला गया। कहानी का सार- सभेप कुछ इस प्रकार था-~- वशी आर अनिता सवर बहुत दर तक रजाई में पड़े रहे थे-फुसफुसाते हँसते खुशी जाहिर करते आपस मे लिपटने। एक दूसरे को शादी की सालगिरह की मुबारकबाद दे रहे थे। 'य दिन बार-बार आए' जैसे औपचारिक वाक्या से किसी अज्ञात रिक्तता को ढक रहे हा। दिसबर के आ दिन था टण्ड पूरे सारा पर थी। आज उनकी शादी की सातवी सालगिरह आ पहुंची थी। सातवी ? आदमी कभी-कभी चौक पडता है। फिर अंगडाई लेता हुआ जैसे अपने से ही सवाल करता है--"क्या सचमुच इतना अरसा बीत गया है ?" साचते-साचते वशी बतियाने लगा-"अनिता लगता है, जैसे कल ही की बात हा। आज ही क दिन हमारी शादी हुई थी। कितनी रौनक थी हमारी शादी पर। दूर-दूर तक के तमाम रिश्तेदार दास्त शादी में शरीक हुए थे। उन दिना मास्टर नेकीराम बगाल के किसी दूर-दराज के इलाम मे नौकरी कर रहे थे। वह भा आ पहुँचे। पिताजी ने धन्यवाद कहा तो बोले-'आता कैसे नहीं ? वशी ता मर लडक स भी बढकर है। मुझे याद है 'कहते-कहते व हैस थे और पिताजी का पीठ पर धौल जमा दिया था। यह उनकी शुरू की ही आदत है और आज " तक पति को बीच में टोकते हुए अनिता कुछ तिलमिलाए स्वर में बाली-~ "सुबह-सुबह फिर उसी बूढे को चर्चा छेड बैठे।" "शुरू से ही वे हमारे घर के सदस्य की तरह रह हैं।" अनिता ने फिर टाका-"रहे हागे। कई बार सुन चुकी। पर मुझे तो जरा भी नहीं भाते। पोपले गाल, टूटे हुए दांत मुंह से निकलती झाप। जब देखा बिना आवाज-खटके के लम्बा झोला लटकाए चल आते हैं-एक खिलौना तो चाहिए ही।" कहत-कहते अनिता के मुखमडल पर अवसाद की रेखाएं खिंच गई। फिर यलपूर्वक उन रेखाआ तो हटाती हुई लापरवाही से ही हंस दी ह। 72 पुनरागमन । "अजी छोडो यह सब "वशी का लहजा भी लगभग वैसा ही था जैसा 'दिल खराब करनेवाली बाता' को आदमी दूर पकने के लिए निकालता है। 'अब उठा और तैयार हो जाओ।" यही एक वाक्य दाना ने एक-दूसरे से पाँच-सात बार कहा। एक-दूसरे का कसते रहे और आखिर बडी मुश्किल से एक-दूसरे से अलग हुए। अब अनिता ने एक दूसरा शगूफा छड दिया-"यह तो कोई बात न हुई कि आपको दफ्तर से छुट्टी नहीं मिली। सालभर म एक ही दिन आता है। पिडले साल भी छब्बीस दिसबर की छुट्टी कहाँ मिली थी।" "तुम्हारी ता मौज रहती है, तुम्हारे कॉलेजवाले इन दिना बडे दिनो की छुट्टियाँ कर देते हैं, पर हमारे यहाँ इन्हीं दिना, समझो साल के अतिम दिना काम की जैस वाढ आ जाती है। पर सबने कह रखा है-साहब, आप तो जरूरी-जरूरी कागजा पर साइन करके चले जाइएगा, बाकी हम सब संभाल लेगे। सभी को शाम का पार्टी भी तो मिलनेवाली है।" "ठीक है, जल्दी आना।" "तुम तैयार होकर बैठना। मेरे आते ही चल दगे। शॉपिंग करगे। साथ-साथ फोटो खिंचवाएँगे। पार्टी मे खाने-पीने की तमाम चीजो का ऑर्डर देते आएँगे। तुम्हे कुछ ज्यादा काम करना पडा ता कहोगी-थक गइ।" दुपहर साढे ग्यारह का समय था । अनिता अपने घर के चोडे आँगन में एक चारपाई पर बैठी थी। खुले आकाश से बादला से छन-छनकर धूप अनिता तक पहुँच रही थी। वह शोख लाल रंग की साडी पहने हुए थी और इसी रग के धागे से आसमानी रग के रूमाल पर कढाई कर रही थी। लगभग अपने बताए समय पर ही वशी आ पहुँचा और बाला--"ला डार्लिग, अब सिर्फ तुम्हारी ही हाजरी मे।" उत्तर मे अनिता ने थैक्यू बोला। फिर वशी की तरफ रूमाल बढा दिया। "वाह खूब वशी वशी वशी वशी।" वशी ने रूमाल परखते हुए उत्साह से कहा। चारो कोनो मे बडे कलात्मक ढग से छोटा-छोटा वशी अकित था। थोडा स्ककर वह फिर बाला-"मजा आ गया। आज धूप भी कितनी उजली-उजली खिली है।" "पर ये बादलो के टुकडे रह-रहकर सब गडबड कर देते हैं। मक्खियाँ भिनभिनाने लगती हैं।" कहते-कहते अनिता ने मुँह दूसरी ओर मोड लिया। "तुम तो जरा-जरा-सी बात पर परेशान हा उठत्ती हो। वैसे सब ठीक तो है नावशी ने पत्नी क हाव-भाव की ओर लक्ष्य किया। पुनरागमन 23 छूटी। "हाँ आपके चाचा नेकीराम जी आए थे।" 'चाय-वाय ता पिलाई थी?" "पूछा तो वाले रहने दा बेटी। शाम का ही एक वार पिऊँगा। चला जान यह फूला का गुलदस्ता रख गए।" वशी ने देखा--सामने एक कान मे ताजे फूला का एक गुलदस्ता उपेक्षित-सा पड़ा हुआ है। वह अनिता को मन स्थिति को समझता था इसलिए उसने इस विषय म आर काई बात नही की। दाना बाजार गए। एक अच्छे होटल मे खाना खाया। एक-दूसरे के लिए उपहार खरीदे। याजनानुसार शाम की पार्टी के लिए ऑर्डर देते हुए वापस घर पहुच गए आर मेहमाना के स्वागत की तैयारी करने लगे। शाम से रात तक दावत चलती रही। गाना-बजाना भी हुआ। वधाई दन वाला का ताँता बंधा रहा। कुल मिलाकर सब-कुछ उत्साहवर्धक। प्राय सभी लाग आए थे। नहीं आए ता मास्टर नेकीराम । इससे अनिता ने चन की साँस ली। इससे अगले दिन की बात है। शाम को दफ्तर की ड्यूटी निपटाकर वशी पूरे उत्साह से पर पहुँचता है। अभी तक कल शाम की पार्टी की मीठी याद मत- मस्तिष्क का तरगित किए हुए है । वह सब बाते जल्द से जल्द अनिता के पास बेठकर दाहराना चाहता है। और आज उस पार्टी को लेकर दफ्तर में जा प्रतिक्रियाएँ हुई वह भी बताना चाहता है। परन्तु देखता है, अनिता पलंग पर मुंह आमा किए लेटी है-अवसादग्रस्त। वशी घबरा जाता है। यार-यार पूछने पर अनिता बहुत धीमे परन्तु चुभनेवाले स्वर में कहती है-- "उन्ह रोकिए प्लीज। अय मुझसे नहीं सहा जाता।" घशी एकाएक कुछ नहीं समझ पाता। सिर्फ सुनन-समझने को चप्टा म अगिता की ओर देखता रहता है। उसकी पीठ थपथपाता है। थोडा रफकर अनिता एक लकडी का गुड्डा उठा लाती है। "आग तो हद हो गई। यह देखिए अपने मास्टर साहव की करतना नही पुरारी रट-घर मे एक खिलोना ता हाना ही! यह अपना माथा पकडकर बैठ जाती है। वशी गौर करता है। बहुत ही खूबसूरत खिलौना जैसे सचमुच का बच्चा चहरे पर का ही निहार रहा है । कुछ से अनिता की आर दखत * 74|पुनरागमन वह अनिता को आश्वस्त करता है-"इसम बुरा मानने का क्या है। बड़े- बूढे आदमो ठहरे। अपने मन को भावनाएँ व्यक्त कर देते हैं।" "ह भगवान, भूलते भी तो नहीं।" अनिता के स्वर मे पूववत् चिडचिडापन है। हर साल उन्हें हमारी मरिज-एनिवसरी की तारीख याद रहती ह । कहन लग--कल शाम खाँसी का दारा बहुत बुरी तरह उठा इसलिए नहीं आ पाया। साचा आज ही विटिया का बधाइ दे आऊँ। अहँ।" वशी ने तत्काल काई उत्तर नही दिया था। वह गहरी साच म डवा रहा था। रात का उसने खिलोना अपनी स्टडी में रखा ता अनिता ने देख लिया। बाला- "हाँ यही जंचता है।" उसे किचित् शात दखकर वशी ने कहा-"जरा साचा आज के जमान म भला कोन याद रखता है किसी का जन्मदिन या मरिज-डे। सबका बार-बार न्याता देना पडता ह।" सुनकर अनिता फिर से थाडा-थाडा खीजन लगी-"ह तो विरोधाभास जिस हम नहीं चाह वही आ टपके जब-तब कभी भी झाला लटकाए चले आत है-ला वटी तुम्हारे लिए केले लाया हूँ, सिघाडे लाया हूँ। चला काइ वात नहीं । मगर यह क्या बात हुई-एक खिलौना तो होना ही चाहिए।" "वूढे आदमी है। मन म माह ह। अपना समझकर चले आते हैं। एक कप चाय ही ता पी जाते है। असीम दे जाते हैं।" "नहीं चाहिए मुझे उनकी एसी असीस। नहीं चाहिए मुझे औलाद । कइ बार ता उनका स्पष्ट बता चुका। आजकल की महंगाई में बच्चे पालना आसान काम नही। फालतू का झझट।" वशी बोला-"पुरान आदमी पुराने विचार। मुझसे भी कहते हैं--पर म फुलवारी खिलनी चाहिए। तब मैंने उन्हे एक बार बताया था कि हम दानों न ही दा-तीन बार डॉक्टरी जाँच करा ली है। सब ठीक है। बाल-अच्छा। ता फिर कुछ और यल-उपाय करो। मैं समझ गया यज्ञ-व्रत आदि की बात करना चाहत है। मैं टाल गया। पर इसम बुरा मानने की क्या जरूरत है।' 'पता नही " अनिता तेश मे बोली-"इस बूढे का हमारी इतनी फिक्र क्या खाए जाती है। हमे नहीं, इसे ही ओलाद चाहिए। मैं किसी दिन साफ कह दूंगी- अपने काम से काम रखे। आफ्फ आज ता हद ही कर दी। यह खिलौना ही ला पटका। कहने लगे- इसका असर होगा। मै अपने कुलदेवता से प्रार्थना करूँगा।" वशा बाला-"तुम कुछ भी कह-समझ सक्ती हा पर पुराने लोगा के अपने विश्वास अडिग हाते है। एक बार मैं बीमार पडा था। जीवन की आशा प्राय पुनरागमन 175 क्षीण हा चली थी। माँ रोती। हर राज यही चाचा आते। परिवार का ढाडस धाते-कुछ नहीं हागा इसे । जवान म विश्वास भरा होता। वहीं मेरो चारपाईक निकट पालथी मारकर बैठे रहते अपने कुलदेवता से मरे जीवन की दुआएं मांगते। मैं भला-चगा हा उठ बैठा। माता-पिताजी, इसके अतिरिक्त, और भी इनके क्तिन एहसान मानते।" "मैं ऐसी बात नहीं मानती। मुझसे और वरदाश्त नहीं होता। उन्हे रोकिए। मत आया कर।" "मैं ऐसा नहीं कह सकता।" 'आप नहीं कहगे ता मैं ही कह दूंगी।" वशी प्रार्थना के स्वर मे बाला-"ऐसा कुछ मत कहना कि उस देवता को भावनाआ को ठेस लगे।" परन्तु नहीं। अनिता नहीं मानी। । आप कुछ दिनों बाद की बात है। उसकी कमर बुरी तरह से दुख रही थी। पेडू मे भी दद था। उसी शाम मास्टर नेकीराम अपनी चिरपरिचित मुद्रा में आ उपस्थित हए। स्वय ही एक मूढा खीचकर बहू की चारपाई के निकट जा बैठे-"ठीक हो जाओगी बेटी। चिन्ता मत किया करो। मेरी दुआ असर लाएगी। जल्दी ही एक फूल ता होना ही चाहिए।" "नहीं मुझे नहीं चाहिए।" अनिता गर्म हो उठी। चाचा बुरा न माने इसलिए वशी ने कहा-"इसकी तबीयत जरा ढीली है। मैं आपके लिए चाय बनाकर लाता हूँ।" रसाइघर से वशी का अनिता का कर्कश स्वर सुनाई दिया-"आप क्या चले आते हैं यहाँ? मुझे आपको दुआ नहीं चाहिए। मैं मैं आपके कुलदेवता को नहीं मानती।" "ऐसा नही कहते बेटी।" चाचा उसी शात स्वर मे अनिता को तसल्ली देने की चेष्टा कर रहे थे-"हमारे कुलदेवता हर एक पर कृपा करते हैं।" "आपके मुंह से झाग आती रहती है-क्या कुलदेवता को धिन न आती हागी? आगे से आप यहाँ मत आया कीजिए।" 'अच्छा बेटी जैसी तुम्हारी इच्छा । सुखी रहा।" सब बात सुनता हुआ वशी जब तक चाय की ट्रे लेकर आया मास्टर नकीराम चल दिए थे। शमसार वशी की सारी हिम्मत पस्त पड़ चुकी थी कि उन्हे वापस बुला सके मनाकर लोटा लाए। । 76 पुनरागमन पली को मन ही मन कासने के अलावा कोई चारा नहीं था। भला कौन किसी का बदल सका है। ऐसे में किसी के पास कोई रास्ता या तजवीज वाकी नहीं वचती। सब मुकद्दर के खेल हैं, जिन्हे बदला या पलटा नहीं जा सकता। सारी रात इन्हीं खयाला म वशी अधमुंदी आँखा से मास्टर नेकीराम का सहज निश्छल साथ ही अपमानित लटका हुआ चेहरा देखता रहा। कुछ रोज तक तो पति-पत्नी मे अबोलापन बना रहा। वशी साचता था कि अपने-आप अनिता को पश्चात्ताप होगा। तब दोना जाकर उस देवतुत्य बूढे से क्षमायाचना करेंगे। लेकिन बाद में भी अनिता टस से मस न हुई। उसके अनुसार अच्छा हुआ । वे हमेशा हमारे जम्मो को कुरेदते रहे हैं । अब उस बूढे की मनहूस शक्ल न दीखेगी। वशी बार-बार अपने प्रयासा में विफल और दुखी हाता रहा। अगली शादी की सालगिरह से पहले वशी-अनिता सचमुच का हँसता- खेलता खिलौना पा गए थे। पडित/ज्यातिपी ने छब्बीस दिसबर से पूर्व बच्चे का कोई भी रीति-विधान वर्जित बताया। नव शिशु के आने की सूचना बस आसपास के थोडे-से परिचिता को थी। शादी के पौने आठ साल के वाद, घर फूल-से बच्चे की मोठी सुगध से महकने लगा। दाना को ही जीवन में पहली बार अपनी आतरिक स्फूर्ति का अहसास हुआ। हर समय वे दोना जैसे अपने का हवा में उडत हुए पाते। दाना ने मिलकर तय किया कि इस वर्ष शादी की सालगिरह खूब बढ- चढकर मनाई जाए और उसी दिन सुबह के वक्त बच्चे के नामकरण-सस्कार का आयाजन रखा जाए। अव छब्बीस तारीख आन मे बहुत दिन बाकी नहीं थे। अत बहुत जार- शार से दाना ही कार्यक्रमा की तैयारियां होने लगी। निमत्रणपत्र छपवाए गए और तुरन्त बाँटे जाने लगे। परन्तु न जाने क्या, अनिता को लगता कि उत्साह को इस अद्भुत तरग को आरभ से ही बीच-बीच में आकर कोई अव्यक्त-सा अवरोधक छिन्न-भिन्न कर जाता है। तभी एक दिन उसके मन में चावा नेकीराम का सौम्य चित्र कौंध गया। तदुपरात वह जब-तब चाचा के विषय में विचारने लगी। क्या इतने भव्य समारोह के अवसर पर वे नहीं आएंगे? पता तो उन्ह चल हो चुका होगा। वे तो हमारे घर की हर गतिविधि को दूर से ही सूंघ लेत हैं। पर क्या आएँगे वे? क्या बूढे आदमी का पुनरागमन 177 . कोइ आत्मसम्मान नहा हाता घर का काई-सा दरवाजा जरा-सा भी बजता ता वह उधर ही का भागन को चेष्टा करती। उसने कई बार साचा कि किसी प्रकार उन तक सूचना पहुँचाइ जाए। परन्तु कैसे? पति से कहना चाहा, पर हिम्मत नहीं पड़ी। साचा-हा न हो मुझस डिपाकर वशी उन्ह निमत्रण दे आए हाग और वह उसा प्रकार अपने कधे पर झाला लटकाए सहज पापली मुसकान विधरते प्रकट हा जाएँगे-ला आ गया ना खिलोना । मैं कहता ना था। लेकिन यह कैसे सभव है? वशी म वह साहस कहाँ कि मुझे विना विश्वास म लिय उन्हे बुला लाएँ। ता भी क्या वह उदारमना महापुरुप हमारी भूल-चूक माफ कर जरूर किसी दिन आकर हमे सरप्राइज दगे ओर हम दाना झट से उनके पाँव छूने दाड पडगे। हर दिन इसी प्रकार की आशा से शुरू हाता और बेताबी-भरे इतजार मे खत्म हाता रहा। नेकाराम नही आए ता नही आए। पर नहीं चाचा का ता हर सूरत में आना ही चाहिए। हम न सही इस नन्हे फूल-से बच्चे का उन्हें असीस देनी ही चाहिए। मगर इस नटखट आस आर खाखली प्रतीक्षा का खेल अत तक चलता रहा। ओर आखिरकार पच्चीस दिसवर आ पहुँचा। शाम ढलने लगी। किसी प्रकार साहस बटारती अनिता पति के पास आकर बाली-"अपनी गाडी खराब पडी है। जाकर टैक्सी ल आइए। हम दाना जाकर चाचाजी का ल आएँ।" सुनकर वशी खुश हुआ। जल्दी-जल्दी कपडे बदले और टेक्सी लेने चला गया। जब तक वे मास्टर नकीगम के ठिकाने तक नही पहुँचे अनिता एक ही सपना बार-बार बुनती रही-स्ठेगे मना क्रेगे-ऐसे जिद्दी नहीं है वे। चाहे कितना रूठे उनका हक ह। पर हम छोडगे नहीं। किसी भी तरह माफा मांगकर उन्हे मना लाएँगे। कहगे आपके ही प्रताप से यह खिलाना आया है। आपका ही है। आज की रात हमारे यहाँ गुजारनी हागी। सुबह मुन्ने का नामकरण-सस्कार और शाम को हमारी शादी की सालगिरह-उत्सव आपकी देखरेख में हागे। व कहगे-अच्छा अच्छा ता यह बात है। जरा ठहरा। फिर व तयार हान कमरे में चले जाएंगे। थाडी ही देर में अपना सफेद कुर्ता-पायजामा पहने, कथे पर लम्बा झाला लटकाए तैयार । ता चलो। घर से बाहर निम्लते ही कहेगे-अरे तुम लाग ता गाडी ले आए। नाहक तकलीफ की। मैं काइ पराया थाडे ही हूँ। परन्तु यह क्या वहाँ तो दरवाजे पर एक मामूली-सा ताला झूल रहा था। व सोच में पड़ गए। फिर उन दाना ने इधर-उधर देखा। काइ नगर नहीं आया। अत में पडासी के दरवाजे पर दस्तक दी। धुंधलका छा रहा था। हल्क-से । खाँसी शिथिल-सा स्वर सुनाइ दिया--"काना " 78 पुनरागमन मास्टरजी। मास्टरजी की ता मात हो चुकी है।" सुनकर दाना स्तभित रह गए। "हैं कब?"वशी ने किसी तरह पूछा। पडासी ने अब उन्ह पहचानते हुए बडी हरत से कहा-"आप? आपका ता पता हाना चाहिए। मैं खुद यहाँ पर मोजूद नहीं था। सुना है नवम्बर की पहली तारीख को वह दवता देवात्माओ के साथ जा मिला।" अनिता फफक-फफककर रो पडी। सारे रास्ते ही सिसकियाँ भरती रही। सारी रात आँसू बहाती रही। सुबह नामकरण के समय मन्त्राच्चारण के बीच पडितजी ने बच्चे का लग्न निकालने के लिए कहा-"हाँ ठीक है जन्म-स्थान समय हाँ अब जन्म- तिथि बालिए जन्म-तिथि।" वशी धीर से बोला-"पहली नवम्बर।" पडितजी न पाथी खाली । हिसाव लगाया। नाम के लिए जो राशि निकली वह 'न' अक्षर पर थी। दाना ही के मुँह से एक-साथ निकला-"नेकीराम।" कहानी समाप्त हा चुकी थी किन्तु फिर भी मैं कुछ देर के लिए उसी म खाया-सा अनुभव करता रहा। बहुत-कुछ था जो अनसुलझा-सा लगता रहा । गोर किया--कहानी के अत मे भी लेखक का नाम नही छपा था। कहानी पढने के दोरान एक-दा बार मन साचा था कि ज्या ही मै कहानी पढकर गर्दन उठाऊँगा वह फौजी अफ्सर मेरी प्रतिक्रिया जानने के लिए, मेरी ओर देख रहा हागा। किन्तु मैंन पाया--जनाब अपनी ऊपर की बर्थ पर पडे खर्राटे ले रहे थे। मेरी किताव उनऊ सिरहाने के नीचे दबी पड़ी थी। साचा-अब सवेरे ही उनसे बात हो पाएगी। देर तो बहुत हो चुकी थी। मने रोशनी बन्द की और फिर से उन्हीं पात्रा और स्थितियों मे डुबकी लगाता-लगाता जाने कब नींद की गिरफ्त में आ गया खूब धूप चढ आई तब जाकर नींद खुली । नेकीरामजी नहीं थे। उस पत्रिका के स्थान पर मेरी किताब रखी थी। ठीक हे वे इटारसी ही उतर गए थे। मुझे ता बहुत आगे तिरुपति तक जाना था अफले। जिंदगी म पहली बार अकले यात्रा करना अखरने लगा था। - पुनरागमन 79
नई-नई शादी हुई थी सुनहरे की।
फूल-सी नाजुक लडकी उन्ना। नख
से शिख तक शृगार रस म लिपटा हुई,
अथवा शृगार रस की ही साक्षात् नायिका-
छन्नो।
सास ससुर देवर चावा-ससुर-सास
आदि सभी छन्नो के मोहपाश मे आ बँधे ।
दिन रात पुकारते न थकते छन्नी छन्नी
छन्ना भी हाजिर-जवाब। जवाव देत
न थकती-जी जी जी। अभी आई। हाँ
जी।
सुनहरा ता कुछ कह नहीं पाता।
सबके सामने उसका नाम लक्र ता क्या
पुकारता छन्नो को कमनीय देह पर दृष्टि
पडते ही लज्जा-जल में भीग जाता।
दरअसल छन्ना का सुनहरे का यही
रुप-गुण मुग्ध कर गया था। वह उस पर मर
मिटो थी। लेकिन मर मिटने से ऊपर, दूसरा
ही कारण था। उसे 'वहाँ' पूर्ण सरक्षण को
व्याप्ति दिखाई दे गई थी।
बात पुरानी नहीं है। सुनहरा अपने
एक मित्र की वरात म शामिल हाकर छन्नो
के शहर यागाडारी गया था। यह शहर
मुनहर के गांव तिरमित के पास हा पडता है।
कबूतरी
60 योग
मौसम भी क्या। फुल्ला दी बहार (फूला की बहार)। वहाँ तोरण-द्वार रोके कई चुलबुली नवयोवनाएँ सजी-धजी खडी थीं। अपने हाव-भाव और तरह-तरह के हास्य-स्वर निकालकर वरपक्ष की 'खबर' लेने लगी थीं। नखर दिखा रही थी और दूल्हे से प्रवेश पाने से पूर्व ही करीचड़ियाँ (अंगूठियाँ) और दो-दो सौ रुपए देने का तकाजा कर रही थीं। तकरार म ज्यादा समय लगते देख अकस्मात् सुनहरे का लज्जालु-रूप मित्र क पक्षधर के रूप में उभर आया, "यह कैसा स्मागत हो रहा है? सीधे से रास्ता छोडा।" 'अरे बडा आया दूल्हे का नवाब । जब तू घोडी पर चढकर आएगा तुझ कजूस से कुछ नहीं लेगे।' क्षणभर को सुनहरे की नजरे सामने खडी रूपसी पर ठहर गई। ऊपर से चुहल-भरे हँसी के समवेत स्वर । सामना नहीं कर सका वह । शरमाकर कही दूर " जा दुबका। वहाँ बरात डेढ-दो दिना तक ठहरी थी। सुनहरा छन्नो से बचता फिरा। साथ ही उसकी आँख, उसे पलभर पा लेने की कामना मे व्याकुल बनी रही, लेकिन सामना करने की हिम्मत नहीं होती। हाँ जब-तव छन्नो ही सुनहरे का सामना करती। उसके, झुकी हुई पलकोवाले रूप को अपने मे समेटती। थाडा एकात पाते ही मोठे स्वर मे फुसफुसाती, 'कहो दूल्हे के राजा।' परन्तु इस तरह की बहादुरी दिखानेवाला छन्नो का यह अलग ही रूप था। अन्दर से वह बहुत डरी और हिली हुइ लडकी थी जो विवाह के नाम से दहशत खाती थी। । पिछले तीन साला के दौरान वह अपनी एक अतरग सहेली आर एक मौसेरी वहन खो चुकी थी। उनकी याद मे वह सदा पीडित रहती थी। आदमी जालिम होते हैं। जितना भी दहेज दो, ससुरालवाला का लोभ नही जाता और लडकिया को जला मारते हैं। इसलिए छन्नो ने एक तरह से विवाह न करने का फैसला कर लिया था। "सभी ऐस नहीं होते। बुआ की लडकी केतकी को देखा। दूसरी मौसी की लडकी पारो का देखो। सभी सुखी गृहस्थ-जीवन जी रही हैं।" माँ-बाप-भाइ समझा-समझाकर थक रहे थे। परेशान थे। छन्ना ने केतकी और पारो का भी टटोला था और पाया था कि उनके पति भी यदा-कदा रौब जमाने के लिए हाथ उठा बठते हैं। इसीलिए वह अपना विवाह न करने की जिद पर कायम थी। कबुतरी 81 अब सुनहरे से साक्षात् होने के बाद छन्नो की भावनाएं नई करवट लेने लगी थीं-इतना विनम्र और लज्जालु युवक कभी क्रूर नहीं हो सकता। अगल तीन-चार महीना में उसने अपनी नवविवाहिता सहेली के माध्यम से सुनहरे तथा उसके घर-परिवार के विषय मे सब पता लगा लिया। सब-कुछ उसके मनानुकूल था। छन्नो के घरवाला ने छन्नो का प्रस्ताव मुना ता खुश हुए-पला मानी तो। परन्तु जब छन्ना के बाप शाह गुरजीतसिंह ने, सुनहरे के बाप यते चाचा सते के नाम सुने ता माथा पीट लिया "कहाँ हम खानदानी लाग और कहाँ वह कगाला का घर। इस झल्ली (ववकूफ लडकी) ने कहाँ जा मुँह मारा। रिश्ता ता हमेशा बरावरवाला स चलता है।" "मगर बराबरवाला को ता यह हर बार नकार देती है। चलो कहीं ता हाथ रखा। लड़की अपना भाग लेकर समुराल जाती है।" छन्नी की माँ ने पति और लडके को ऊँच-नीच समझाकर लवी बहस के बाद किसी तरह राजी कर लिया कि अब आर देरी करना फजूल है। सुनहरे आर छन्नो की शादी किसी तरह से हो गई। लेकिन सेठ गुरजात- सिंह और तडक हुकमसिंह को यह शादी शुरू स आखिर तक कभी रास नही आई कि समधी जाड क नही मिले जिन्हे साथ बिठाया जा सके। लन्की की जिद के सामने यह साचकर झुक गए थे कि चला उन्हे मालामाल कर दगे और नहीं तो एक-दो फैक्ट्रियाँ सुनहर के नाम कर देगे। यहाँ कौन-सी कमी है। परन्तु जब सुनहरे ने दहेज तक लेने से इन्कार कर दिया तो उन्ह सदमा पहँचा। बाद में यह सदमा नफरत की हद तक बढ गया। इस तरह सारे सराकार लगभग खत्म हा गए। फिर भी माँ का दिल। यदा-कदा छन्नो को अकेली बुला लेती। तब सब मिलकर उसे खूब खिलाते-पिलाते, मानो मासूम बच्ची मुद्दता से भूखी-प्यासी है। मगर छन्ना पर बेचैनी काबिज रहती। उसके लिए अब सुनहर-बत-सते- परिवार के बिना जीने की कल्पना निराधार थी। वह जल्दी से जल्दी कपडे-लत्ते सागात लिये बिना ससुराल जा पहुंचती। इससे भाई हुकमिया और सेठ गुरजीत शाह अपमानित अनुभव करते। इधर सुध-बुध खाए छन्नो घर मे घुसते ही सीधे सुनहरे से जा चिपटती और सिसक रही होती। सब देख-देखकर हँस रह हात । सुनहरा लजाकर जिधर रास्ता मिलता भाग रहा हाता-कित्था पल्ले पै गई (कहाँ से पल्ले पड़ गई। यहाँ पर प्यार के बँटवारे की व्याख्या या उसको सीमा-रेखाएं सींचना आसान नहीं । सुनहर का अपना हिस्सा। तमाम घर के सदस्यो का अपना-अपना हिस्सा। । 82] कबूतरी छन्नो बिना लाग-लपेट अपना प्यार सबको ही लुटाती फिरती।इधर से उधर, उधर से इधर छिटकती फिरती।'जी आई' के साथ हर एक की सेवा मे हाजिर। अब यह उन सबके सोचन का अदाज बना रहता कि छन्नो कब किसकी ज्यादा लाडली बन चली है। सुनहरे की सुनहरे के बाप बते की? चाचा ससुर सते की? चाची सास लाली की देवर राज को, इसकी या उसकी, या एक-साथ सभी की। बते से ज्यादा सते को ही जैसे छन्नो के आने की खुशी हुई थी। एक रोज भी न गुजरता-घर पर खाने का न्यौता "आना छन्नो। सुनहरे को लेकर।" "हम क्या बुरे हैं?"घर के दूसरे सदस्य कहते। "नहीं-नहीं छन्नो। तुम सभी को लेकर आना। कोई रह गया तो तेरी गिच्ची (गर्दन) पकडी जाएगी।" कुछ वर्ष पूर्व बते और सते दोना भाइया मे मनमुटाव पैदा हुआ था और सता अपने परिवार के साथ रेलवे लाइनो के पारवाले मकान मे जाकर रहने लगा था। अब छन्नो के आने पर दोनों ही परिवारों को इसका मलाल होने लगा। छन्नो ने चटके हुए घरा को फिर से जोड दिया था। सभी जने आज सते के घर तो कल बते के घर मिलकर खा-पी रहे हैं, गा- बजा रहे हैं। किसी प्रकार की कोई औपचारिकता नहीं। कोई-सी भी दाल या सब्जी बना ली जाती। कभी लाली चाची अपने घर से रोटियाँ बना लाती सब्जी का इतजाम बते के घर। जिसको जैस सुविधा होती दुकानो स मिठाई-फल ले आता। गुड-शक्कर, घी, मूंगफली, मूली, गाजर झोला मे डालकर कभी-कभी मौसम के मुताबिक रेत क टोला पर जा बैठते, तो कभी अपने घरो में रग जमता। हीर गाई जाती। सस्सी-पुन, मिर्जा-साहिबा की दास्ताने होती। हँसी- मजाक चुटकुला से पूरे वातावरण से महक फूटती। कहकहो के अनवरत सुरो का अपना ही सगीत सबको बाँधे रखता। इन महफ्लिा मे हर कोई छन्नो को खींच-खींचकर अपने पास बिठाना चाहता। छन्नो चहकती। फिर छिटककर कभी इसके तो कभी उसके साथ सट-- कर बैठ जाती। चाहे काई हो, बडी बेतकल्लुफी से पेश आती। सबको बारी-बारी से छेडती, छकाती और मुसकराती रहती। फिर सब मिलकर सुनहरे को छेडने लगते-"जवान ता जवान यहाँ तो बूढे तक तुम्हारी छम्मकछल्लो को ले उडने की फिराक में हैं।" सुनहरा भी बडा मस्त मौला। थाडा शरमाकर कह देता "सबकी हो ता है यह। आपकी और तरीके से, मेरी और तरीके से। क्या छन्नो?" कबृतरी 183 छन्ना धीरे-से हाँ के भाव से मटक्ती। सुनहरा कहता, "इस छन्नो ने तो आप सय पर गीत लिख रखे हैं। हाँ ता छन्ना सुना दे काइ फडकती हुइ चीज!" उन्ना बेहिचक, कोयल-सी कूकने लगती- मैं रश्के-हर (स्वगागनाआ के सौन्दर्य को लज्जित करनेवाली) मानो मेरा एहसाने-रब्त (लगाव, दोस्ती) धृत है सोरा (ससुर) यता निकलिआ काइयाँ सता दिराणी जिठानी भैडी (बुरी) सखियाँ देउर (देवर) मेरे दियाँ मैलियाँ अखियाँ खसम मेरे । कुझ ना आदा दूर दूर ता जफियां पाँदा (गलबहियाँ डालता है) उस दिन यह सब बते के घर पर ही चल था।'हो-हो'"हो-हो' के साथ ठहाके लग रहे थे। किसी का पता भी न चला हुकमसिंह यह सारा तमाशा दरवाज के बीचावीच खडा देख रहा है। पहले-पहल छन्ना की नजर उस पर पडी ता वह दौडकर भाई का हाथ पकड अन्दर खींच लाइ। सभी ने मिलकर उसका गर्मजोशी से स्वागत किया। घरवाला का हालचाल पूछा। प्रतिक्रिया मे हुकमसिंह जैसे शून्य में डोल रहा था। बहन से मिलने की भी काई खुशी नहीं । निर्जला एकादशी के अवसर के लिए जो-जो सामान लेकर आया था छोड़कर जाने लगा तो बते-सते ने हाथ जोडकर बैठने और कुछ खाने-पीने का इसरार किया। "बहन के घर का पानी पीना हमारी गैरत के खिलाफ है।" इतना कहकर वह फिर चलने को हुआ तो बते ने कहा, "बरखुर्दार हम पहल भी गुजारिश कर चुके हैं ये चीजें लान की तकलीफ न किया करे।" सता भी बाल पड़ा, "हम जाट लोग अपनी खेती-बाडी और अपने मे खुशहाल ह। आप तो आते-जाते रहा करे। हमारे साथ बैठकर खाआ-पियो। आपकी लाडली अब हमारी धी (बेटी) है इसे किसी चीज की कमी नहीं है।" "वह सब तो मैंने अपनी आँखा से देख लिया है।" बडबडाता हुआ हुकमसिंह चला गया। इसके काई चार रोज बाद उन्नो को शाह गुरजीतसिंह का बुलावा आया। छन्ना के वहाँ पहुँचते ही बाप ने उन सबका लात-मलामत देनी शुरू की "घर 84 कवृतरी " " को कजरखाना बना रखा है। तुम्हे भी किसी के सामने शम-हया नहीं? बड मगरूर बनते हैं। जेब में टक्का नहीं जापिता बहुत बोल चुके तो छन्ना ने धीरे-धीरे सबको अपना दशन समझाना चाहा "वे मगरूर नहीं-स्वाभिमानी हैं, हर आदमी का अपना-अपना नजरिया और रहन-सहन का तरीका । मैं वहाँ सुखी हूँ। मैं बचपन से ही साचा करती थी कि सुखी जीवन का सबध बगलो और बढिया पकवाना से नहीं छन्ना साचती थी शायद काई तो उसकी बात समझेगा, मगर वह बीच मे ही टाक दी गई। हुकमसिंह वही पुरानी रट लगाने लगा, "वस-बस सबका देख लिया। हमसे ही पैसे लेकर थोडा हमारे बराबर दिखाई देने लगते, तब भी काई दिक्कत नहीं थी। यहाँ कौन-सी कमी है। लेकिन नहीं। वह तो हमारी नाक काटने पर उतारू हैं। ऐसी हालत मे हमे उन्हे समधी कहते भी शर्म आती है।" माँ भी उसकी बात नहीं समझ रही थी पर उसकी सहानुभूति सच्ची थी "यटी अब तुम यहीं आराम करा । इस हाल म छोट-स गाँव में तुझे वहाँ कौन सँभालेगा?" पर छन्ना रुकी नहीं। तीसरे ही दिन चल दी। छन्ना के लौटते ही सूने घर म जैसे फिर से पहलेवाली बहार लौट आई। वही कायत की चहक। सभी मदहोश। नशे मे चूर। तभी अचानक एक दिन उस रहस्य का पता सबको चलता है जिसका पता उन्ना की माँ का पहले ही लग चुका था कि एक नया मेहमान धीरे-धीरे उनके परिवार को आर बढ रहा है। मारे खुशी के किसी के पाँव नही टिकते। उठते- बैठते साते-जागते उसी अनदेखे मेहमान की बाते । गुणा की प्रशसा। जितनी नाजुक कोमल हमारी छन्नो वैसा ही राजा बेटा या रानी बिटिया होगी। ॐहुँ यह नहीं, यह नाम ठीक रहेगा। अनवरत प्रतीक्षा। महफ्लिा का सिलसिला फिर से चल निकला था। एक शाम चाचे सते के घर हँसत-खेलत छन्ना का पाँव सीढिया से फिसल गया। छन्नो क साथ जैसे सब का दम निकल गया। हकीम ने सलाह दी-"शहर के अस्पताल मे काशिश कर दखा। वैस अब कुछ बाकी नहीं दीखता।" भाग-दौड शुरू हो गई। छन्नो की साँस बहुत धीरे-धीरे चल रही थी। देवर मोटर साइकिल से शहर गया, भाभी के मैके इत्तिला दी। हुकमसिह का साथ लेकर अस्पताल से एम्बुलेस ले आया। अब हुकमसिंह सवका गालियाँ निकाल रहा था। फिर वह एम्बुलेस से छन्नी को ले गया और किसी का साथ नहीं चलने दिया। दूसरे ही दिन दोपहर को शाह गुरजीतसिंह का सदेशा मिला-छन्नो अव - कबूतरी (85 नहीं रही। अगर अपना भला चाहते है तो इथर को मुँह मत करना, नहीं तो सारी उम्र कचहरिया और जेल की सैर करते नजर आओगे। छन्नी के इस ससार म न रहने से सुनहरे के साथ सबका ही ससार उजड गया। सभी बिलखने लगे। कौन किसको तसल्ली दे। चौथे दिन बडी हिम्मत जुटाकर चे बोगाडोरी गए। आसपास वालो से पता चला-अस्पताल से वे सीधे छन्नो को अतिम संस्कार के लिए पजार में अपने पुश्तेनी गाँव ले गए थे। नौकर घर संभाल गया है। अब वे यहाँ लौटेगे नहीं । मन नहीं टिकेगा। पटना साहिब से आगे, जहाँ उनके कारखाने चलते हैं वहीं रहेगे। तुम लोगो ने उन्हे उजाड दिया। 'मौत का काई इलाज नहीं। मगर छन्नो, तूने हमे इलाज का कोई मौका तो दिया होता। तू देखती हम सब अपने जिस्म की आखिरी बूंद तक निसार कर देते। मगर तू तो इतनी अच्छी थी कि किसी को कष्ट देना जानती ही नहीं थी। न तू हमे इतनी खुशियां देती, न हम इतना कष्ट पाते। हम तो तुम्हारे होकर भी अतिम समय तुम्हारे न हो सके।' सभी विलाप करते। दो बार पटना साहिब पहुंचकर आगे की मजिल पूरी भूल-भुलैया साबित हुई। फिर परायेपन के आलम मे हासिल भी क्या होना था! वहाँ इनके शोक को समझनेवाला था ही कौन? इसी प्रकार एक साल गुजर गया। आज छन्नो की पुण्य-तिथि थी। सध्या-समय बते के घर दोनो परिवार इकट्ठे हुए। कभी रो-रोकर तो कभी मलिन हँसी के साथ छन्नो की छोटी से छोटी बातो को याद कर रहे थे। अतीत के उन सपना-से लगनेवाले दिना को ताजगी देने की चेष्टा कर रहे थे, छन्नो के बनाए गीत-मैं रश्के-हूर। मानो मेरा एहसाने-रब्त गाना मे रुदन है। उनको हँसी मे रुदन है। महसा इस रुदन में किसी नवजात शिशु का रोना भी सुनाई दे जाता है। सब चौंककर देखते हैं। सामने दरवाजे से छन्नो बढी चली आ रही है। गांद में बच्चा रो रहा है। छनो पीली पड़ गई है। डरी हुई और बहुत थकी हुई छन्नी। सभी एक साथ उसे गले लगाने को आतुर--कहाँ थी तू? "कैद में। माँ ने मदद की। भाग आई।" छन्नो सिसक रही है। "हाय, तुझे क्या हो गया मेरी बच्ची"सते-बते और सास के भीगे स्वर। सभी उसे अपने में समा लेना चाहते हैं। छोटी छन्नो अब होंठों में मुसकराकर सबको हँसा रही है। 86 कबूतरी दोघटे बीत चुके थे, लियाकत बाबू का घर लौटे हुए। उनकी कनपटी की नसे अब तक बज रही थी -चक-चका टपकता गर्म लहू। जैसे छुरा का प्रहार उन्हीं पर हुआ हा। पत्नी से विशेष बात नहीं की। उसको किसी बात की भनक न पडे इसलिए बेदिली से खाना तो खा लिया और आदत- मुताबिक आराम करने का भी लेट गए, लेकिन जल्द ही बजारी के आलम मे उठकर आँगन-कमरा के चक्कर लगाने लगे। फिर टैरिस पर जा पहुंचे। अपने-आपसे कहने लगे-उम्रदराज और तजुर्बेकार आदमी वह नहीं होता और न ही यह उम्र और अक्ल का तकाजा है कि जो मुँह मे आया अट-शट बक दिया। वे अपने पर खोजने लगे। कुछ घटे पहले अपने सामने देखा सारा दृश्य रह-रहकर साकार होने लगा-चक-चक। मन द्रवित हाने लगा-बेचारा। मगर मैं ही क्या? बुरा मत देखो' बुरा मत सुनो! बुरा मत बालो। अगर मैं भी औरा की तरह बुरा न देखता तो काहे को बुरा बालता और इस वक्त शायद मेरी हालत दूसरी तरह की होती । खैर अब उम्र के शुरुआती दौर से नजात पानी होगी और हौसला बुलद रखना होगा। लपटें लपटें|87 लियाफत वायू ने अपनी कनपटिया पर दोनों हथेलिया का दवाव डाला- चफ-चका तो गलती कहाँ पर हुई? झूठ कहाँ योला? अपनी आँखा के सामने जा कुछ भी दूर से देखा था, उसे साफगोई से बयान-भर कर दिया था बस। क्या बुरा किया? किसी को जानता नहीं हूँ। अब भी किसी को पहचान नहीं सकता। निष्पक्ष निष्कलक। कैसे सह सकता था उस वेबस इन्सान की चीख का जा एकाएक सरे- बाजार तीन- न-चार जना द्वारा पकड लिया गया था। उसकी निरीह चीखा को सुनकर अंगुलियाँ काना में चली गई थीं। फिर भी दूर से 'हाय मार डाला। बचाओ, काई बचा लो' की गुहार सुनाई देती रही थी। मगर कौन बचाता? मैं भी कहाँ बचा पाया? "खटाक-खटाक' दुकाना के शटर बंद होने की आवाजे “सरपट भागते लोगा की आवाजे, घाडा की टापो की तरह सडक का हिला रही थीं-टप-टप- । जब तक नजदीक पहुँचा कुछ लाग चाकुआ से लथपथ घायल का खींच ले गए ओर मारनेवाले भी वहाँ से रफूचक्कर। बस यही कुछ हुआ था वहाँ। थोडी देर बाद पुलिस को जीप आ पहुँची थी। वहाँ पर कोई नहीं था। अगर कोई था ता महज लियाकत बाबू । हाँ मैं लियाकत बाबू। अपने-आपका उम्रदराज और तजुर्बेकार कहनेवाला। अपने नागरिक कर्तव्य का पालन करनेवाला। क्या बुरा किया? जा मजर आँखो के सामने गुजरा था पुलिस को कलमबद करा दिया। काँपते हाथा से नीचे दस्तखत कर दिए। मुकम्मल पता दर्ज करा दिया। कराना ही टप था। ता घबराहट किस बात की? अपने लबे कद का तानते, टापी को उतारते- पहनते आहिस्ता-आहिस्ता कदम उठाते हुए घर पहुंच गए। अब भी उनके काना मे उस कत्ल किए जाते आदमी की चीखे बरकरार थीं-कोइ बचाआ। फिर वही चक-चका अब धैर्यपूर्वक फिर से पूरे माहौल का जायजा लेना चाह रहे थे। अपने का आश्वस्त कर रहे थे तसल्ली दे रहे थे। आज तक गुडा को करीब से नही देखा था। पुलिस के नजदीक नहीं फ्टके थे। तो क्या हुआ? अपना किसी से क्या लेना- देना। कसे मुमकिन है एक तरफ ता सच के पेरोकार बने दूसरी तरफ सच से आँख फेर ल। इस सोच के बावजूद एक डर, एक दहशत उनको घेरती रही। बुरा हुआ। अच्छा होता एक घटा पहले या बाद मे घर से निकलते। टरिस पर से ही देखा तीन लडका को। गली के माड से पूछते-पुछाते इधर 88 लपटें ही चढ आए हैं-उनके मकान के सामने । काई नहीं बाला। बस इशारे से लियाकत बाबू को नीचे आने को कहा। पैरा को कॉपने से बचाते हुए लियाकत बाबू सीढियाँ उतर आए। बाहर गली में आकर गौर किया। तीना बीस-बाइस साल के मजबूत कद-काठी के युवक । एक ने गहरे नीले धब्बा वाली पैंट पहन रखी ह ओर चौडी बैल्ट कधे पर झूल रही है। बत्ट पर माटे-मोटे नुकीले कील जडे हुए है। वही लडका सबसे पहल लियाकत बाबू के एकदम मामने आ खडा हुआ। बाला कुछ नहीं । चुपचाप खडा उन्हे घूरता रहा। दूसरा लडका देहाता पाशाक पहने था। उसने कुछ झुकते हुए विनम्रता से पूछा-"क्या ऐ ही लियाकत जी रा ठिकाना हो?" लियाकत बाबू ने जवाब दिया-"जी हाँ । फरमाइए?" तीसरा लडका इस गरमी म भी लव झूलते हुए कोट म था। उसने झट स जवाब तलब किया--"ता आप ही लियाकत अली हो?" लियाकत बाबू ने गरदन के इशारे से हामी भरी-हाँ। पहलवाला लडका, अब भी उन्ह उसी अजीब ढग से मूर जा रहा था। उसकी लबी-लबी मूंछे थी हाठा का लपेटे हुए। कधे से बल्ट हाथ मे आ गई थी। उसे धीरे-धीरे झुलाने लगा। लियाकत बाबू उन सबका समझ-परख रहे थे। एक-एक के हाव-भाव और नाटकीयता का जायजा ले रहे थे। दिल की धडकन माभूल पर आ गई थी। इतजार म थे कि अब इनमे से कोन मुँह खालता है आर क्या फरमाइश रखता है। तब उन्ह क्या उत्तर देना होगा आर किस टान मे? घर मे इस वक्त कोइ बटा नही था। दानो ही अपने-अपन ऑफिस गए हुए थे। पली आँगन के पिछवाडे गेहूँ साफ करने म व्यस्त थी। वे उसे इस प्रत्याशित या अप्रत्याशित स्थिति की झलक दूर ही रखना थे। आह बेचारी "सहम जाएगी। 'क्या खिदमत कर सकता हूँ?" किसी का भी न बालता देख आखिरकार उन्हान ही जवान खाली। स्वर यथासभव नियत्रित आर विनम था। इस पर देहाती वेशभूषा वाला युवक ऐस बाला जैसे मुद्दत से जान-पहचान हा-"चाचाजी ता अब हम यह समझ ले कि आप दुश्मन से मिल गए हैं?" लियाकत वायू में अब तक काफी दम लौट आया था। उस छोकरे के अजीयागरीब अदाज जल्दी-जल्दी पलटते स्खे लहज का देखकर मुसकरा पड-"भतीजे जब रिश्ता हो कायम हो गया ता सकाच कैसा? सबको लेकर तपटें189 बठक म आ जाआ। वहीं बठकर बात करा । वैसे बता दूं-यहाँ पर नया आया हूँ। यहाँ या कही पर मेरा काई दुश्मन नहीं है।" "सच कहते हागे जनाब। अव तक तो काई नहीं होगा।" पहले लडके ने वैल्ट का अपन हाठा से चूमा--चड। आवाज जस हाठा स नहीं मूंछा से आ रही हा-"मगर यह जरूर समझ ले अगर आपने अपना स्टेटमेट नहीं बदला तो हम ही आपके दुश्मन हो जाएंगे।" "आपको हक हे वरखुर्दार। में फिर भी किसी को अपना दुश्मन नहीं समझंगा।" अब काटवाले युवक को हस्तक्षेप करने का मौका मिला। उसने देहाती वेशभूपा वाले लडके की तरफ इशारा करते हुए कहा-"अभी लतीफ ने जा रिश्ता कायम किया वही कायम रहे। कसम खुदा की आप हम तीना ही चाचा बने हैं। आपका किसी तरह की आँच नहीं आने दगे।" इससे पूर्व कि लियाकत वाबू कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते में बढती हुई पुलिस-जीप को घरघराहट सुनाई दी। वडी फुर्ती से तीना हो लडके ड्योढी के रास्ते लियाकत बाबू की बैठक मे चले गए। पुलिस का एक सिपाही साथ ही कोई इस्पेक्टर था। आप ही लियाकत अली हैं। "जी हाँ।" 'आप ही का बयान बाजार में दज हुआ था?" 'बेशक।" "आपसे कुछ पूछना है।" एक बार फिर से लियाकत बाबू के सामने उस रक्त-रजित चिलखते हुए शख्म का चेहरा साकार हा उठता है बचाआ। काई बचा ला थाडी देर पहले लडका से बातचीत के दौरान वे उस भूल-से रहे थे। अब फिर से पुलिस का सामना हाने पर तडप-से उठे--"उसका क्या हाल है।" "हमे क्या मालूम। किस-किस का ध्यान रखे? अगर वह मर गया तो हम 325 धारा को बदलना पडेगा।" थाडा रुककर साचते हुए जाडा-"फिर धारा 302 लगानी हागी।" फिर जरा रुककर हाँ-हाँ हूँ-हूँ की ध्वनियां निकालने लगा। चिमटीवाली तख्ती पर नजर डालते हुए, जैसे धाराआ म उलझ गया-- कौन-कौन-सी कितनी धाराएं। "बेचारा "लियाकत वाबू फुसफुसाए। "छोडिए उसे। क्या आप उसे जानते हैं।" 190लपटें
'बिल्कुल नहीं।"
"कोई बात नहीं । उसी केस पर आपसे कुछ सवाल पृछने हैं। सही-सही
बताना होगा।"
"गलत क्यो बताऊँगा
"ज्यादा बनिए नहीं। आपको हमारे साथ थाने चलना होगा । गमलहजे
मे एक नर्म लफ्ज जोड दिया-"भाई साहब"
"जितना कुछ जानता था, वहीं मौका-ए-वारदात पर ही सर बना दिया
था।" लियाकत बाबू थोडा अटके-"अब वहाँ पर क्या पूढंग
'यह दस्तखत आप ही के हैं ना?" इस्पेक्टर ने वीसकाशनिकानने
हुए उनकी ओर बढ़ा दिया-"पहचानिए।"
"जी हाँ, मेरे ही हैं।"
"तो फिर चलिए हमारे साथ।"
गली सुनसान थी, एकदम गर्मी थी। कभी-कभी हनौकाजर
आ जाता था जैसे उसी झोके के साथ हाथ में झोनाल्न नियाद
दिए। शायद सब्जी वगैरह लेने जा रहे थे। लदा टाइट हुआ जिम्म।
छह-आठ महीने पहले पुलिस-विभाग से दिकेन्द्र में अन्न हुए 4।
मुसकराते हुए सबको हाथ उठाकर अभिवायनेलियन वायू शे
एक तरफ ले गए। लियाकत वायू ने एकदंर सन्म काटी और
वापस मुडने लगे।
"ऐसा नहीं होता।" डपट-भरा स्वर था। "नही चलूँ ता?" लियाकत बाबू ने सुन रखा था कि दवने से ये लोग ज्यादा परेशान करते हैं। "चलगे कैसे नहीं 7 जितनी चार बुलाएंगे आपको आना पडेगा। फिर कचहरी मे भी ता आप ही का गवाही दनी पड़ेगी। आप ता पढे-लिख मालूम देत " " . "जा कुछ मेरी तरफ से आपके लाग लिखकर ले गए हैं वह "वह महज सरसरी तार पर है। पक्की कारवाई तो इचार्ज साहब के सामने हागी। आप शरीफ आदमी हैं इसीलिए आपको बहुत वक्त दे चुके हैं भाई साहब । वरना हमारी आँखा स काई छुपकर जा नहीं जा सकता। सच-सच बताइए, हमार यहाँ पहुँचने से पहले कोन लाग आपके पास खडे थे?" "आपके भतीजे।" 'क्या मजाक ह भाई साहब!" इस्पेक्टर ने इधर-उधर झांकते हुए आश्चर्य प्रकट किया। लियाक्त बाबू ने तटस्थ भाव से उत्तर दिया-"जैस आपने मुझे भाई साहब मान लिया उसी तरह उन्हाने चाचा मान लिया है। इस तरह वे आपके भी तो भतीजे हुए ना।" "बुलाइए उन्ह पोरन।"दोना पुलिसिए एक-साथ पूरे तेवर में आ गए-- 'लगता है आप भी साजिश मे शामिल हैं।" इतनी देर तक ताना ही खिडकी के पल्ले से सब-कुछ सुन रहे थे। एकदम आ प्रकट हुए। आते ही उन दाना के पाँव छूने लगे-"प्रणाम चाचाजी।" वही लडका फिर से अपनी कीलदार बैल्ट घुमाने लगा। दूसरे ने अपना कोट उतार दिया। तीसरे ने मूंछो पर ताव देते हुए कहा--"अच्छा अकल जरा दिखाइए ता इनवाला कागज।" पुजा तो इस्पेक्टर के हाथ मे ही था जिसे दिखा-दिखाकर वह लियाकत बाबू का चेतावनी दे रहा था। लडके ने फौरन पुर्जा झपट लिया। बडे धैय से पढा, फिर चिंदिया मे तब्दील कर दीवार के सहारे पक दिया और उस पर पेशाब करने लगा। "तुम सुबूत नष्ट करने को धारा धारा म धर लिये जाआगे। धारा अभी बताता हूँ। हवलदार साहब। जरा उठाइए सारे पुर्जे।" "मैं ता ब्राह्मण हूँ महाराज। आप ही जरा शटअप " 92 लपटें "विवाद किस बात का?" एक लडके न स्प्रिट की शीशी कागजा पर छिडकी ओर दियासलाई दिखा दी-"वैसे हमारे उस मे भी काफी अल्कोहल हाता है। अगर आप चाहेगे तो नया रुक्का लिखवा देंगे। इस बात से आप भी वाकिफ हैं कि वागीश पक्का गुडा दस नवरी चार सौ बीस है । कई चोरियो आर बलात्कारा में उसका नाम आपके यहाँ दर्ज है।" "यह एक अलग पहलू ह।" इस्पेक्टर बाला-"कानून सुबूत इकट्ठे कर रहा है। आपक लागा न तो उसकी नाक और कान ही काट डाले।" "हाँ उस जगह स भी छेडछाड कर दी। अब कोन-सा मुँह लेकर किसी लडकी के पास जाएगा साला? उस वक्त बाजार के सब लोग खुश-खुश थे। इसीलिए भाग खड़े हुए कि बदमाश का सजा मिल रही है। यह चाचाजी तो यहाँ नए-नए आए है सा भालेपन की वजह से फंस गए। बस इन्सानियत के नाते। होगा यह किसी क लिए जान का सवाल किसी के लिए केस और बदला।" वह तैश मे बोले जा रहा था। लडके के लबे भाषण पर साचते-साचते लियाकत बाबू की कनपटी फिर से बजने लगी-चक-चका गिरे कि अभी गिरे। उन्हे लेकर सब जन बठक मे आ गए। कोटवाला लडका बोला-"चाचा बेफिक्र रहिए। इन साहब लोगो की लडकियाँ यानी हमारी बहन हमार ही मकान के आगे से कॉलिज जाती हैं।" तभी वहाँ पर बुरका पहने बेगम आ गइ--"इतनी देर से क्या गुफ्तगू चल रही है?" पुलिस को देखकर बेचारी घबरा रही थी। लियाकत बाबू थाडा संभलकर बेगम का संभालने लगे-"बेगम यह मेरे स्कूल के पुराने साथी के लडके जलालुद्दीन हें।" उन्होने सिपाही की तरफ देखते हुए हडबडी मे कह दिया--"और यह सब इनके साथी । जरा चाय-वाय ता तैयार करो।" बेगम के वहाँ से हटते ही ध्यान आया-"यह क्या बोल गए अभी थोडी देर पहले यह अपने को ब्राह्मण बता रहा था। और ये सब साथी कैसे हुए निगाह उठाई तो सब मुसकरा रहे थे। चाय पीते हुए कोटवाला लडका कह रहा था-"चाचा आपको रैस्ट को जरुरत है। ये तो बड़ी ही मामूली बाते हैं, हाती रहती हैं। दरअसल बदला लनेवाले की मौसी की लडकी से वागीश ने बुरा काम किया था। बजाय कानूनी चक्कर के उसने अपने साथियो के साथ मिलकर हाथोहाथ बदला ले डाला। यह सब तो इन लोगो के लिए खेल है।" फिर इस्पेक्टर की ओर देखकर झुकते हुए बाला-"हमारे लायक और कोई काम हो तो वताएँ । उस हिस्ट्रीशीटर को सजा लपटें1931
"अबे चुप। भा
.
मिल गई। आपका काम आसान हो गया।"
मूंछावाले युवक ने कहा-"यकीन मानिए, हमारा इस मामले में कुछ भी
लेना-देना नहीं है। पर बुरा भी क्या हुआ।"
उस देखकर सिपाही हंसा-"हाँ, न उन लोगो ने एफ० आई० आर० दर्ज
ही कराई ओर न अभी तक इचार्ज साहब ही दफतर आए थे।" विस्कुट का चाय
म डुबाता हुआ वह चहकने लगा।
इस्पेक्टर ने उसे एक भारी गाली दे मारी। पूरा कप
हलक म उडलत हुए लियाकत बाबू की तरफ देखकर पसोपेश मे मुसकराया-
"ठीक है, जरूरत पडी ता फिर तकलीफ देगे।"फिर से सिपाही को डॉट मारी--
'चला जीप चला।"
सामने काफू काजल खडा था। सभी एक-साथ बाहर हो लिये काकू
काजल को उपेक्षित करते हुए।
लियाकत बाबू से काकू ने पूछा-"कितना दिया? तो ठीक है। अब किस
चीज की जरूरत पडेगी। आप खुद कुछ देते हुए डरते हैं तो मुझे दे देना। आपकी
तसल्ली के लिए मैं ही उन्हें दे दूंगा और फिर रंग हाथा पकडवा भी दूंगा। फिक्र
न करे। आपके सारे पैसे वापस मिल जाएंगे। आपने गौर किया? मुझे देखते ही
कैसे दुम दबाकर भाग खड़े हुए। हा-हा।" वह हंसने लगा-"यह तो इनका हर
राज का धधा ह।"
लियाकत बाबू ने माथा पकड़ा। तेजी से अदर आकर दरवाजा बंद कर
लिया।
चाहर अब भी हंसने की आवाज आ रही थी। हा हाऽऽ।
|94 लपटें
प्रतिष्ठित अग्रवाल प्रगतिशीत विचार- सपन्न युवक 251 SA सरकारी सवारत आय 7000/- मासिक हेतु याग्य सरल स्वभाव कन्या चाहिए।उपजातीय यथन नहीं। लिख-यॉग्सन 203 काट-केसरी गढी। आखिर क्या पुराफात है या? खानी दिमाग। जन-तर जिधर से काइ अयमार खींचा-मैट्रिमानियला हाना-सवा कुछ नहीं और न ही फिर युछ रोना-दा। पूरी परे पट न पढ, यह साला मैट्रिमारियल। वाइस यप से उपर के सुन्दर पुयर की तलाश किसलिए? किसक लिए? मारजन या यया? हाँ यर भी मूयिन है। और तं एक यत्याला भी । तो पिर अणयार यद पर या पर वसकर पवलाष्ण राय कुछ भूल जान कोपिगर में और-और पामा में रानगा। कभी पारदमाशीपाल पर MITUn ता उसी में मिरगतसगोपापा मित्र आनयनाउमाकाणा मपार नीरा माआआपतिपादन Trair TatamTEST Harristmarn. चलती- फिरती प्रतिमा । शुरू हुई थी। उसी डार के हाथ से छूट जाने पर आदमी को कैसा लगता है। आजकल नाकरी मिलती कहाँ है। मगर देखते ही देखते दोना लडका देवेश ओर मुकेश की नौकरी लग गइ। नौकरी लगते ही घर मे शानदार बहुएँ आ गई। जैसे फूला की महक आर सगीत के स्वरो से घर में बहार आ गई। जितना पैमा चाहिए, उसस कहीं ज्यादा घर म मोजूद है। पाँच साल खुद को नौकरी क पड हैं। बहुत अच्छी पशन मिनेगी। पत्नी सामा ने सरको सेवा विशेष रूप से केवल बाबू की सुख-सुविधा के लिए स्वैच्छिक सवानिवृत्ति ले ली है। सब-कुछ पैसा ही ता नहीं होता। फिर कौन-सा घाटा है इस सोदे मे। बेटे अपने-अपने स्टेशना पर काम कर रहे हैं। समय-समय पर आत-जात रहत हैं। सभी की नजरा मे केवल, केवल बाबू ही हैं जो एक तरह से खुशनसीबी के प्रतीक हैं। न काई फिक्र न कोई फिक्र का खाता। फिर कान-सी फिक्र कौन-सा हिसार लगाते रहते हैं। हमेशा से साला की गिनती करत रहत हैं। इतवार का दिन है। बहू और बडा लडका आए हुए हैं। दो साल के गुड्डे के साथ खूब उछल कूद मचाए हुए हैं। दोपहर के भोजन के बाद सभी बारी-बारी से सा गए है। वे भी सो गए थे। लेकिन जल्दी उठकर टेबल पर आ बड़े हैं। लिखने लगे ह उसी ववाहिक विज्ञापन का उत्तर। मेरी देखने में सुन्दर। व्यवहार-कुशल इसी साल एम०ए० साच-सांचकर रुक-रुककर, धोर- धीरे सब डिटेल्ज तिखे जा रहे हैं, अपने लैटर हैड पर। पोछे गाँव का नाम "यानदान। लडकी की आयु बाईस वर्ष । फिर वह हिसाब लगाने लगे। हाँ-हाँ, ठीक है। बाइस वप ही की तो हुई । लिफाफा बद किया। एक जोरदार ठहाका लगाया। व्हाट ए फनी गली के मोड तक लैटर बॉक्स तक चले गए। लौटे तो आँखा को अंगुलियो से रगड़ते हुए। न जाने क्या फंस गया है जिसे कुरेद रह हैं। साहवे दिन केवल बाबू के मुँह से स्वत फिर से वैसा ठहाका तो नहीं परन्तु आश्चर्य से भरपूर जोर से हँसी फूट निकला। इस तरह के ठहाके मे से छन- छनकर कहीं क्रदन स्वर भी गूंजता है। खूब । क्या मजे हैं और क्या गजब। कमाल कर दिखाया तुम डाकवालो ने। सामा को पास बुलाते हैं--"देखो मैंने उस दिन ऐसे ही एक विज्ञापन का प्रत्युत्तर लिख मारा। समझ रही हा ना? देखो तो उसने भी कहाँ दूर-दराज क किस इलाके मे जाकर कौन-से दरवाजे पर दस्तक दी। वधपन का वेली। सुनो लिखता है- 96 चलती-फिरती प्रतिमा । प्रिय मित्र केवलकृष्ण तुम्हारी जय हो मेरा यह पत्र पाकर तुम भी मेरी ही तरह अचम्भे से उछल पडोगे। मैं तो सचमुच यारवार उछल रहा हूँ। तुम्हारी भाभी सुनदा जिसे तुम नहीं जानते वह भी मेरे साथ बहुत खुश है। ऐसा भी कभी-कभी हा जाता है क्योकि युजुर्गों से सुना था कि रिश्ते हमेशा आसमानो से तय होते हैं। साफ कहूँ तो मैं एक तरह से तुम्ह भूल ही चुका था।" सामा ने अधीरता से रोका--"सीधे से बताआ क्या झमेला है?" "हाँ है तो फर्स्ट क्लास किस्म का झमेला हो। चुपचाप सुनती जाओ। बचपन का यार आगे लिखता है-'मेरो तरह तुम भी मुझे भूल ही चुके होगे। इस खत का पढकर अब तुम भी मुझे अच्छी तरह से याद कर सकते हो। याद करो जरा--कहेडी टेबला जहाँ हम दोनो तीसरी जमाअत से सातवीं तक साथ-साथ पढे थे। है कि नहीं याद? सांझी पतग । गिल्ली-डडे। डडो को हाकियाँ बैट। हाथा म हाथ लेकर दूर तक निकल जाना। रात दर तक साथ-साथ सबक रटना। अच्छे नवर लाना। दास्ती ऐसी कि दूसरे सारे लडके जल उठे। 'लगता है सामा, तुम ऊब रही हो। बहुत लषा खत है-बचपन की तमाम तफसीला से लदा हुआ। खुशगवार यादा को खराच-खराचकर चमका रहा है तुम सिर्फ आगे की बात सुनो। लिखता है-'अव अगर सयाग से इस पर के माध्यम से अथवा लडकी-लडके के जरिए हम दाना के परिवार मिल रहे हैं तो इससे बढकर अच्छी बात भला क्या हा सकती है। मै तो बल्कि यह कहूँगा कि इससे अच्छी किस्मत किसी किस्मतवाले की भी नही हो सकती। 'आग लडक क वार म लिखा है-'उमग अग्रवाल। यहाँ से कोई डेढ सौ दूर पी० डब्ल्यू० डी० मे अभी जूनियर एकाउंटेट है। जल्दी ही प्रमाशन हानेवाला है। देखागे तो खुश हो जाआगे। हमारी तरफ स रिश्ता पक्का ही समझो यचपन को पक्की दास्ती की तरह । तुमसे बढकर मरे लिए कौन हो सकता हे । घर में और कोन-कौन हैं ? सबके बारे मे खूब विस्तार से लिखना फोरन। बहुत पतीक्षा रहेगी यार के खत को फिर से तुम्हे पाने को उत्कठा लिये तुम्हारा वही अपना -प्रेमकृष्ण पत्र सुनकर सोमा भावशून्य चुप है। किन्तु केवलकृष्ण फिर से बालन लगे है-"साली यह भावुकता भी क्या चीन है। नाम भी हम दाना के एक ही टोन के-प्रेमकृष्ण केवलकृष्ण । जैस सग भाई। मगर वक्त बहुत-कुछ विखैरकर रख देता है। समझ लो, ऐसे दोस्त को भी किलामीटर चलती-फिरती प्रतिमा 91 लगभग भूल ही बैठा था। किन्तु प्रकृति का एक नियम है कि जब दूर से पुरानी आवाज घटिया की तरह गूंजती हैं ता तमाम वही यादे, तमन्नाएं समेटती हुई साथ ले आती है जो चाहते हुए भी पीछा नहीं छोडती कुरेदती रहती हैं, उनभर।" सामा अब भी कुछ नहीं बोल रही। थाडी चुप्पी के बाद वे फिर से शुरू हो जाते है, टीस से उबरने के लिए- "प्रेमकृष्ण अपने याप के साथ अपनी जमीन-जायदाद और व्यापार संभालने आसाम चला गया था। पहलेपहल, महीने मे दो-तीन खत। फिर छह महीने में एक-आध। फिर मरे जीवन-सघर्षों के साथ खत गायव। वह खुद ही पूरा तरह से मायब। पक्की बात है उसके दिमाग से उसी तरह मैं भी भाग निकला हूँगा। ओर अब मरे हाथ मे एक लिफाफा है । मुझे झूले की तरह कभी आगे की आर ता कभी पीछे की ओर झुला रहा है-'तुम्हारे खत से भविष्य की सभावनाएँ चमक मार रही हैं । यह इबारत है प्रेमकृष्ण के खत की। मेरी इयारत क्या हो सकती है-आइरॉनिकल ‘या भाग्य की विडम्बना।" अब की सामा एक ठडी आह के साथ हंस देती है-"अपने साथ-साथ खूब बेवकूफ बनाया उस वेचारे को । मगर यह कैसी हँसी है जो आँखा में गीलापन लिये है ?" थाडा रुककर कहती है-"तुम्हारी ही भावुकता देखकर कभी-कभी दुखी हो जाती हूँ, वरना मैं तो सब-कुछ भूल चुकी हूँ। तुम्हारी इस बेवकूफी का पता अगर लडका-बहुआ को चल जाए तो क्या कहगे-बाबूजी अभी से सठिया गए। बस अब एकदम से चुप मार जाआ।" मगर चुप्पी को ताडता प्रेमकृष्ण का यह तीसरा खत है-'तुम कुशल से तो हो न? क्या मेरे पहले खत नहीं मिले। फिर से वैसे ही विवरण, प्यार याद, भविष्य और सुखद सपने। इस पर केवलकृष्ण कुछ ऐसा लहजा अपनाते हैं कि प्रेमभाव भी बना रहे । न किसी किस्म का शक-शुब हो न मलाल बल्कि मामला आप-से-आप धीरे- धीरे दाखिल-दफ्तर हो जाए-'ठीक हूँ प्यारे दोस्त । बस जरा ज्यादा बिजी चल रहा हूँ। तुम्हे उसी गहराई से चाहता हूँ। प्यार के साथ याद करता हूँ। तुम ता वाकई मुझ पर अहसान कर रहे हो। फिर भी एक मिनट जरा स्ककर साचो। रिश्ते चाहे कितने करीबी दास्ता या सबधिया के बीच तय करने का बात चलाई जाए, हमारे शास्त्रा म लिखा है किंचित् धैर्य का परिचय देता उत्तम कार्य हाता है। जल्दबाजी कभी-कभी आदमी का मुश्किल मे डाल देती है। हमारा क्या है। अत तक गुजारा ता लडके-लडकी ने ही करना होता है। एक-दूसर का देख-समझ लगे ता हमारा 98 चलती-फिरती प्रतिमा सर बचा रहेगा। है ना? मगर क्या कर। एक तो रास्ता भी दूर का है। वक्त तो लगेगा। इसी बीच तुम लाग भी थाडा आर साच लो। सुना है कभी-कभी नए रिश्ते बनते ही पुरानी दास्तियाँ दरक जाया करती हैं।' अब की जो प्रत्युत्तर आया जैसे लिफाफे मे अगारा रखा हुआ था-'साले वहाँ बैठा-बैठा किसका नखरे दिखा रहा है? तुम्हारी ऊलजलूल बकवास सुनने को नहीं बैठा हूँ। यह शास्त्रा की दुहाई देना कव से सीख लिया? कहीं ऐसा तो नहीं साचता कि लडक म काई नुक्स होगा तभी मिन्नत कर रहा हूँ? विश्वास की जमीन पर पैर रख। सीधे से अटैची के साथ भाभी का भी उठा ले और चला आ और देख ले अपने हानेवाले दामाद को। नहीं आते तो फिर हम ही आते हैं।' अजीब भूत पीछे लगा बैठा। बदले मे केवलकृष्ण का थोडे लफ्ना के हेर- फेर से वैसा ही उपदेश--'धरती अगर टिकी हुई है तो सिफ विश्वास का आधार पाकर। ऐसी कोई बात नहीं है, विश्वास रखो। लेकिन कुछ और ठहरना लाजमी हा गया है। मैं दो महीने के रिफ्रेशर कार्स मे चदौसी जा रहा हूँ। तुम्हारे खता से ऊर्जा प्राप्त हो रही है, उसके लिए शुक्रिया। तुम्हारा केवलकृष्ण'। मुश्किल से दा महीन पूर हुए कि वैसा ही खत । खत या बला?- 'इस बीच जब-जव उमग घर आया उसे सब-कुछ अपने-तुम्हारे बारे में विस्तार से बताया था। बहुत खुश हुआ सब कुछ जानकर। तुम्हारी ही तरह कविताई करता है। कहता है-रूप-रग पर क्या जाना। लडकी कैसी होनी चाहिए-इसकी व्याख्या मानदड उसक अपन हैं, सुसस्कृत भावुक, कल्पनाशील ओर उदार । मैं जानता हूँ, ये सब आजवाले यथार्थ बोध से थोडी अलग बात हैं, करपनाआ मे उडान भरने जैसी। पर यह आयु ही ऐसी हाती है । इसमे भावनात्मक स्तर पर जा हलचल चल रही हो उसके सामने जीवन के सार यथार्थ फीक होते है। वह तो मेरी ओर तुम्हारी बचपन की अप्रतिम मित्रता को आधार मानकर, लडकी क सस्कारयुक्त हाने की ठोस कल्पना मे खा गया। हा सकता है यही तुम-जैस लागो को कविताई हो। इसलिए तुमसे भी यही कहूँगा कि बहुत आगा- पीछा साचने से भी क्या मिलनवाला है। कुछ भी कहा, अतत शादी हाती ता लॉटरा ही की तरह है। मुझ पर भरासा रखकर भी 'हाँ' कह दा तो यकीन रखो घाट में नहीं रहोगे । वैसे तुम मालिक हा।' केवलकृष्ण सोचत है-यह साली भावुकता भी किसी बला से कम नही होती। मै तो मैं वह बेटा भी बाप का बाप निकला। लोगा का लडका ढूँढने म चलती-फिरती प्रतिमा 99 सौ-सौ पापड बेलने पड़ते हैं, और यहाँ इतनी दूर से कोई राजकुमार चला आ रहा है। उन्हे दफ्तर के रामवाबू का ही नहीं और भी कितने साधारण तो क्या रुतबेदारा तक का खयाल आता है, जो हर एक के सामने एक तरह से गिडगिडाकर यही कहते फिरते हैं--भाई जरा ध्यान रखना। कोई जान-पहचान का वारोजगार खानदानी लडका सूझे तो बताना। फिर अपनी लडकी की आयु, पढाई, कढाई, गृह-कुशलता आदि का बखान करने लगत हैं। वाकई आजकल ढग का वर ढूँढ निकालना दिन-ब-दिन अजब मसला होता जा रहा है। औरा को छोडो, अपनी पडोस की विनय बाबू की बिटिया सुधा को ही देखो। अपने रूप-रग ओर सद्व्यवहार से सभी को आकर्षित करने की क्षमता रखती है। वह वी० ए० करके घर मे बैठी है। छोटी-मोटी ट्युशने करके कुछ कमा लेती है। विनय बाबू बीमार रहते हैं, तनखा कट जाती है। न तो बेटी को आगे पढ़ा सकते हैं न लागो की दहेज की मांग पूरी कर सकते हैं। दिन-रात की परेशानी । सुधा कभी-कभी उनके घर आलू, चीनी या दाल जेसी चीजें उधार मांगने आ जाती है कि अँधेरा हो रहा है, बाजार बद हो गया होगा परसो तक लौटा देगे। दुनिया एसी ही रग-रगीली है। कहीं पर बाढ हे तो कहीं पर सूखा । इन्सानियत की कमी नहीं है। फिर भी कदम-कदम पर धोखो फरेबों के जाल बिछे हुए हैं। केवलकृष्ण सोचते-सोचते एक दिन उठ खडे होते हैं। देखू तो सही आखिर यह माजरा क्या है ? नौकरीशुदा लड़को को लडकिया की क्या कमी। क्या धोखा दिया जा रहा है या धोखा खाया जा रहा है ? था तो पट्ठा जबरदस्त दिलदार । मस्त तबीयत। मगर क्या अब तक भी वैसा ही है? मगर यहाँ तो बात वाप की नहीं बटे की है। चलो चलकर देखते हैं। सैर-सपाटा ही सही। छुट्टियाँ भी लैप्स हो रही हैं। कुछ लेना-देना न सही पुराना जिगरी दोस्त तो मिलेगा। उस जब पूरी स्थिति स्पष्ट करूंगा तो मेरे साथ वह भी ठहाका लगाएगा। उसकी पत्नी और लडका भी जोर से हंसेगे। हो सकता है, मेरी सनक और भावुकता को लेकर दुखी भी हो उठे पर दुनिया बनी ही रोने-हंसने के संगीत मे है। प्लेजर दूर क नाम पर कवलकृष्ण लबी यात्रा पर निकल पड़ते हैं। देखू तो सही प्रेम को अब कैसा लगता है। थल-पल शरीर, हँसता था तो गाल भी अदर- बाहर हात था अब कैस हंसता है? उसकी पली कैसी है? लडका कैसी कविता करता है? अपन तो सब छोड चुके फिर भी यह साली अदर की कविताई ता पीछा नहीं छाडती। लया वात लया समय याता। कहीं एक दूसरे का पहचान न सफ इसलिए 100चलती-फिरती प्रतिमा - भूरी फैल्ट पहने प्लेटफॉर्म पर उतरे और सीधे बीचवाले टी-स्टाल पर जा खडे हुए। यही तय था। वही गोलमटोल शरीर, वही जजबाती रूप लिये प्रेमकृष्ण आ लिपटा तो छोडने का नाम न ले। खीं-खी हँसी और आँखा म गीलापन। कोन कहता है भावुकता का जमाना लद गया। साथ खडी उसकी पत्नी भी मुसकरा रही थी और उमग भी आँखे झपका रहा था। पहले वहीं, उसी टी-स्टाल मे चाय पी-"साला अकेला आ मरा। भाभी के साथ चलते शर्म आती है? चल निकल बाहर।" स्टेशन के बाहर ड्राइवर ने कार के दरवाजे खोल दिए। बड़े-बडे पेडा और फूला से लदे मार्ग से होकर तलहटी मे अवस्थित बंगले मे पहुंचते ही केवल बाबू यात्रा की सारी थकावट भूल गए। बचपन मे रटी हुई प्रकृति-सौंदर्य की कविताएँ याद हो आई। दोना को बचपन की अजीब-अजीब-सी सनके, दूसरो को चिढानेवाले नाम याद आ गए। पिनको ड्रिल-मास्टर मॉनीटर हटका ठिहाका की गूंज के बीच, थोडी-थोडी दर मे श्रीमती प्रेम कुछ अलग-अलग किस्म की चीने परोस लाती-"खाइए ना भाई साहब। "साले खाना मत! लडकी के घर का नहीं खाते। शास्त्रो म लिखा है। हा- हा-हा-हा "तू तो कहता था, साथ पढनेवाली मोटे-मोटे काले हाठोवाली पुई से शादी करेगा फिर इन्हे कहाँ से फंसा लाया? वाह क्या नाम! पुई 'पुई। याद तो आती होगी पुई ॥ हू' हू हू दोनो के स्वरो से एक-साथ गूंज पैदा हो उठती। चुहलवाजी थोडी थमती कि उमग अपनी लिखी नई-पुरानी कविताएँ ले आता। अद्भुत प्राकृतिक चित्रण और स्वप्न-परी के गुण-गान । क्या सधा हुआ मीठा स्वर। चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक। ऐसे घर को कैसे मना किया जा सकता है। मगर हाय, अगर सब-कुछ अनुकूल ही चलता रहे तो जिंदगी को झमेला ही क्यों कहा जाए भाग्य की विडम्बना किसी को कहाँ पर लाकर केस डुबो देता है। " तीसरे दिन बडे उदास मन से केवलकृष्ण वापसी की यात्रा आरभ करते हैं। प्रेमकृष्ण भी अपने मुरझाए चेहरे पर हँसी की परते लादता हुआ कहता है- "फिक्र मत करो अब तो मिलते ही रहा करेगे।" "हाँ-हाँ, पहुँचते ही तार दूंगा। फिर विस्तार से चिट्ठी लिखूगा। ओ०के०, चलती-फिरती प्रतिमा] 101 -- । । ओ०के० बाय।" पैंट की जेब से रूमाल का निकलकर झूलना, फिर आँखा तक पहुँचना। रास्तेभर गाडी म अवसाद छाया रहा। कुछ भी अच्छा न लगा। बहुत सारा खाना बाहर फेकना पड़ा। खिडकी से बाहर देखा-डूबते सूरज की निस्तेज, वुझी- बुझी-सी लाली । अपने-अपने पेडा की ओर लौटते हुए पक्षी । ऊँचे-ऊँचे पहाडा पर पहुँचने की कशमकश पर सोचते रहे। उमग का फोटो तो उन्हाने चलने से पहले ही थमा दिया अब मुझे कोन-सा वाला फोटो भेजना होगा? बाहर यह दूर तक फैली केसी हरियाली है जो शरीर की नसो को सोख रही है। थके-हारे घर पहुंचे। किसी शिशु की भाँति पत्नी की गोदी मे सिर देकर बिलख पडे । सोमा दुलारती रही। बालो मे अंगुलियाँ फेरती रही। समझाती रही। सब-कुछ भूलकर वर्तमान मे जीने की सीख देती रही। हल्के-से डाँटती भी रही-प्यार-भरी डाँट-"क्या ता उम हो गई और क्या बचकानी हरकते। हँसी आती है। हँसो हँसो प्लीज। मेरी कसम' केवल बाबू धीरे-धीरे मुसकराते हुए हाठ खालते हैं-"सचमुच सामा। अगर तुम भी साथ चलतीं। घर-बार, खासतौर से लडके को देख लेती तो लाड आ जाता।" अब सोमा भी उनके साथ दुखी हो जाती है-"जो किस्मत मे था। किस्मत को हम क्या कोई भी हो बदल नहीं सकता। पहले लडका हुआ। गुडिया की चाह अगली आशा की कडी बन गई। दूसरा भी लडका। फिर आगे देखने लगे। फूल-सी बिटिया की आस। लडकी हुई मगर मरियल-सी। मुझको तुमन किसी तरह बचा लिया। डॉक्टर ने कहा था-आगे यह खेल वद वरना अनर्थ हो जाएगा। ऑप्रेशन किए देते हैं । उस मरियल-सी लडकी को लेकर भी रौनक छाई रही मगर मुश्किल से पद्रह दिन का साथ। खतरे की घटी तो शुरू से ही वज रही थी। इतनी ही अगर चाह थी तो हिम्मत रखते। नही होने देते ऑप्रेशन । ज्यादा से ज्यादा में ही तो न रहती।" "कौन-सा जरूरी था कि फिर बिटिया आती? और अगर तुम्ह ही खा बैठता तो किसके सहारे अब तक जिंदा रहता?" "ता फिर मुझ देखकर लडका-वहुआ का देखकर सतुष्ट रहिए। अब पोतो आएगी। जितना कुछ हमे मिला है उतना विरला को ही प्राप्त होता है।" "तुम क्या समझती हा मैं अनभिज्ञ हूँ? मै भावुक नही हूँ। फिर भी शुरू से ही यस ऐसे ही यदा-कदा विचार आ जाता है। स्कूल जाती नन्हीं बालिकाआ का देखकर कि हम भी उसे दाखिल करा रहे हाते। अब तीसरी म पढ रही हाती। 102|चलती-फिरती प्रतिमा - ग्राउंड की तरफ से कभी निकलना होता है तो अनायास एन सी सी की पोशाक पहने लडकिया को देखने खडा हो जाता हूँ। अगर वह हाती ता इनके बीच कैसी लगती ? सलोनी गुडिया रानी।" "हाँ हाँ जो हमारी नहीं थी जा है नहीं, फिर भी वडी हो रही है। आयु, सन्, क्लास बी०ए०, एम०ए० मैरिजेबिल और फिर मैट्रिमानियल। सचमुच आप भावुक नहीं है।" "सोमा देखो ता खता में भी जान होती है। कहाँ आ पहुँचा? कौन मानेगा इस पागलपन के खेल का?" "यह यथार्थवादी विचारधारा का युग है। बिल्कुल चुप मार जाइए। समझ जाएगा कि रिश्ता आपको पसद नही।" "बिल्कुल यही होगा। चैप्टर क्लाज्ड।" कहते हुए केवलकृष्ण पीछे आई डाक देखने लगते हैं। ऑफिस पान करने लगते हैं-"आ गया हूँ, पर कुछ रोज और छुट्टी पर रहूँगा।" नहा-धोकर सोमा के साथ शाम का घूमने-फिरन बाजार स कई तरह के सामान लाने के कार्यक्रम बनाते हुए, आराम के मूड में आ जाते हैं। बहुत-से विषय है पति-पत्नी के पास, चर्चा क लिए, जैसे आपस मे नव विवाहित दपती, बालते ही रहते हैं, पुरानी-नई बात। पीछे उनके कौन-कौन आया ? किस-किस का फोन ? पिछली गली के मोहन बाबू के लडके की शादी थी। बहुत बुरा मान रहे थे कि केवल बाबू इन्हीं दिनो शहर मे निकल गए। पर उसी विषय पर जा दोनो के दिलो-दिमाग पर छाया हुआ था उससे दोना ही बचते फिरे । एक प्रकार से सब-कुछ कहते-बालते हुए भी जबान बद रख्ने रहे। उस दिन बॉस की लडकी का विवाह था। बरात आने से पहले ही शगुन का लिफाफा पकडाकर दोना जल्दी लौट आए-किसी दूसरे विवाह म भी शामिल होना है। सोते समय केवलकृष्ण बोले-"हमारी चुप्पी से क्या होगा? तुम उस पट्टे का नही जानतीं, किसी दिन आ धमकगा। लडकी तो क्या अपना मुंह दिखाने लायक ही नही रहूँगा। लीचड है साला। कहगा-कहाँ है मेरा बच्ची ?" 'कहूँगी-ससुर से शरमाकर चारपाई क नीचे छिप गई है।" केवलकृष्ण हा-हा कर उठत हैं-"ता तुम्ही निपट लेना।" सामा भी जार से हँसती हुई कहती है-"कहो तो पडास का सुधा को बुला लेगे।" "हाँ यही करगे-देख साले अपनी बहूरानी का।" सहसा वहाँ कुछ देर के तिा मौन छा जाता है। फिर केवल बाबू धीरे से मुँह चलती-फिरती प्रतिमा 103 खोलते हैं--"यह वच्ची मुझ कई बार अपनी ही बच्ची की तरह लगी है--भोली मृदुभाषी गुडिया-सी सुदर।" "तो चला यही सही। कर दो कन्यादान शास्त्रा में लिखा है, कन्यादान विना जीवन सार्थक नहीं होता। अपनी लडकी न हाने पर बहुत-से लाग ऐसा करते हैं।" कवलकृष्ण जंभाई लते हुए बोल उठते हैं..."कई बार मन में ऐसा ही विचार सुधा को लेकर कौंधता रहा है। उस विचार का सही स्वरूप तो तुम ही दे रही हो। वैसे मेरे सामने ही देखते-देखते बच्ची से जवान हुई है। प्रेमकृष्ण का इस लड़की की गारटी भी दे सकता हूँ।" "ओर विनय बाबू को प्रमकृष्ण के लडके की।" "हाँ, वह भी।" "तो बुला लाऊँ विनय बाबू को सुबह फोन करने आए थे। उस वक्त डायलटोन नही आ रही थी, अव ठीक हो गया है।" "पागल हा गइ हो क्या?" 'आपके साथ बनना ही पडेगा।" " प्रेमकृष्ण का खत। चार-पाँच दिन बाद वे विनय बाबू और उनको पली से सविस्तार सब-कुछ कह डालते हैं कि अगर यह सबध हा जाता है तो सुधा बिटिया राज करेगी। सातव दिन विनय बाबू कह उठते हैं-"जैसा आप मुनासिब समझ आप ही की बच्ची है । मरी हालत आपमे छिपी नहा है। पर क्या यह आपके मित्र के साथ धाखा नहीं होगा?" "वह सब मुझ पर छोड दीजिए। आप तो देखते रह जाएंग-कैसे शानो- शौक्त से शादी करता हूँ। हमारी चाँद-सी विटिया को देखते ही आँख मूंदकर धाखा खाने को लालायित हा जाएगा।" घर में घुसते ही उछल-से पडे । ठहाका लगाते हुए बोले-"सोमा उधाइ हो। विनय बाबू मान गए हैं।" अव की सामा गभीर हो गई है-"खूब साच-समझ लो। यात बिगड़ गई ता चारसौ-बौसी का मुकद्दमा भी चल सकता है।" "भई मैं उसे कहां धोखा दे रहा हूँ। जब वह साला खुद ही धोखा खाने पर तुला हुआ है तो इसम मैं क्या कर सकता हूं।" सोमा उन्ह घूरती है ता वे फिर से ठहाका लगाते हैं-"साली यह सारी fhotचलती-फिरती प्रतिमा जिंदगी ही क्या धोखा नहीं है? उस गुडिया ने हमारे घर आत-आते क्या पूरे आठ साल नहीं लगाए थे? आई भी ता सिर्फ पद्रह दिना के लिए। क्या उसने हमे धोखा नहीं दिया? धोखे से ही मुझसे खत लिखा गया। धाखे से ही खत उस फरेबी के घर जा पहुँचा। बिना ज्यादा सोचे-समझे माँ-बाप ओर बेटा धोखा खाने का आमादा हो रहे हैं। मैंने 'मेरा तो पूरा रिकॉर्ड देख लो-आज तक किसी को धोखे में नहीं रखा। तुम जरा धैय रखो और देखती चला। उस प्रेमकृष्ण गधे की गर्दन पकडकर सब-कुछ साफ-साफ बता दूंगा-ले साले खा धाखा आर ल-जा चाँद-सी बहूरानी को। तून खुद ही कहा था कि उस इलाके में अपनी कल्चर की लडकी मिलना मुश्किल हो रहा है, इसीलिए तेरी मदद की। पडोस की लडकी को अपनी बेटी बनाया सिर्फ दोस्ती का फल अदा करने को।" पति क लये हाते जाते भाषण के बीच सोमा नम आँखा से एकटक देखती जाती है, पति के चेहरे के हाव-भाव । "इट इज नॉट धोखा बट ए ग्रेट फन, रादर एडवचर। कहूँगा--तू अपनी कमजारी की वजह से धोखा जानबूझकर खाना चाहता है, फायदेमद धोखा । तो कोन राकता है?" "आपको तो बिना पिए नशा चढ गया।" "जब कन्यादान ही मेंने करना है तो फिर कैसा धाखा? तुम देखना तो सही। सारा किस्मा जानकर वह केसे हँसगा-हा हा हा हा चलती-फिरती प्रतिमा |105
स्वर्ग
की
खोज
कृत्हा पर पटतो है-"फिर जबान खाली?" राजा अव को कुछ नहीं बोलता। निरीह आँख झुक जाती हैं-नरक म से स्वर्ग को आस लगाए। शाम तजी स अन्तिम सांस ले रही है। लॉन के दरखता के पत्त कटकड करते हुए टूटते हैं। पक्षी फडफडाते हुए अपने घासला मे दुबकन लगते है। मालिक कुछ देर के लिए सब चीजा पर सरसरी नजर दौडाता है। फिर बेदम नश की-सी हालत मे अपने बड-हॉल में जाकर उन्हीं कपडा से पड़ जाता है। क्या पता सचमुच ही हा मेरी ओलाद। याद नहीं आता। उम की किस दहलीज से जहाँ-तहाँ टाँग फंसाने की लत पड गई थी। बाप मना न करता । पख करता। यह सब पहली बार नहीं हुआ। एसी आर इसी तरह की घटनाआ क अशा का क्रमवद्ध नहीं किया जा सकता। मुसलसल दो-ढाई साला का ऐसा सिलसिला आपस म गडमड है। न जाने क्या पहले घटा और क्या बाद मे। आह। चन्द साला से जैसे ढलान पर आ गया हूँ। इधर इस हरामखार का चेहरा मस क्व से दिखने लगी हैं। तभी वह साली हरामजादी । कितना खिलाआ कितना पसा लुटाआ। वेगेरत वदजात कहीं पर भी जाकर सूंघन लगेगी कुतिया की तरह । धाखेबाज बेवफा । काई भी आज भरासेलायक नहीं रहा। दीवारा आर पेडा स भी चाकस रहने की जरूरत है। न जाने ऐसी छिनाल कब से बटाइम आ मरती हागी। आर यह दामन का साँप। मेरे ही पलंग पर छि । ठोक ही कहता हागा राजा कि वही पहले झपटी थी। मगर यह बार-बार अपनी ओकात क्या भूल जाता है ? अपनी काठरी मे क्या नही बना रहता? महल के हर काने म कदम जमाता जाता है, जैसे यही नवाब हा । कब तक माफ करूँ? अब तो आप माफ न करूँ तो क्या करूँ? कुछ राज पहले खेतचन्द बाबू मिलकर गए है। फकीरा सरदार खेतचन्द का खास दोस्त भी बाजार मे दिखा था जरूर किसी तरह राजा से सम्पक कर गए हागे मेरी जूती से। साइड-टेबल की तरफ हाथ बढाकर वडा पैग तैयार कर गटक जाता है। इधर राजा जैसे सव-कुछ भूलकर या सिर्फ भूलने की गरज लिये जा भी काम सामने सृझता है, करन लगता है। वाशिंग मशीन मे कपडे डालकर चालू कर देता है-घर-घरी । आधुनिक उपकरणा से घर की सफाई करने लगता है। रात को क्या पता मालिक का फिर किसी पार्टी या क्लब में जाना हो। पॉलिश से जूते चमकाने हैं। कसे-कस कपड़े पहनाकर मालिक को एकदम जवान बनाना है। मशीन की घर-घरी आवाज कुछ ज्यादा ही दुखदायी हाकर काना से टकराए जा रही है। मगर यह सब आज पहली बार ता हुआ नहीं। अब ता कई बार ऐसी । स्वर्ग की खाज | 107 घटनाएँ एक अलग तरह का रस देने लग गई हैं। फिर क्या कभी-कभी यह स्वर्ग, नरक लगने लगता है आखिर कब तक ऐसा खेल चलता रहेगा? उसे लगता है घर-घरी के बीच कही खट-पट की ध्वनि गूंजी है। शायद मालिक उठ हैं । मालिक अगर फिर से निकल गए ता फिर कोई ठिकाना नहीं । देर रात तक बिना किसी भूल-चूक के जागना होगा। गिलास बातले जग चमका-चमकाकर टेवल सजानी हागी। बीच म गुलाबों का दो वक्षावाला गुलदस्ता बैठाना होगा। जरूर कोई गुलाबी गालावाली मेम लेकर आएंगे। इमे तो साले तूने जूठा कर दिया, कहने से पहले उस पतली- दुबली खूबसूरत नौजवान औरत की कमर पर लात मारकर उसे बाहर कर दिया था। फिर मुझ पर पिल पडे थे। मालिक जो ठहरे। मगर कव तक? मालिक को अगर मालिक समझना छाड दूं तो ? तब इस नरक मे से स्वर्ग । घर-घर के बीच राजा का माथा भन्नाता है. इससे पहले चाहे जितनी जगह जूठी हुई हो पर अपने ही नौकर के मुंह से हाजमा चरमरा जाता है। सवाल वही मालिक और नाकर का है। सवाल गैरत का है । उस गेरत का जिसके मादिड सिर्फ शासक के पास होते हैं। जाने से पहले वह कटाक्ष कर हँसी थी- आप तो सुना है अपनी पहली औरत को भी रखैल बनाकर ले आत हैं। अब आपको हाथ लगाऊँ कि न लगाऊँ? आपके काबिल नहीं रही। पर मेरी फीस मालिक ने तिलमिलाकर पैट की जेब मे जितने भी नोट थे उसकी ओर उछाल दिए थे। वदनात औरत गाड दूंगा। मुँह बन्द रखना वरना तू नहीं तेरी लाश हागी। किमने तुझमे कहा था मेरी गेरहाजिरी मे इतनी जल्दी आने को? कहते- कहते वे हकलाने लगे थे। वह झुक-झुककर नोट समेटने लगी थी। अपने ढीले ब्लाउज में से एक झलक दिखाते हुए फिर मुसकराई थी और तेज कदमा से रवाना हा गई थी। तेरह साढे-तेरह का था तब से आ बसा था इस अजूबी दुनिया मे। धीरे- धार आँख खालता रहा और तरह-तरह के नजारे देखता रहा। धीरे-धीरे सब कुछ और-और स्पष्ट होता चला गया। तिलिस्मी व्यापार-जगत । मगर वह नगरी भी कोन-सी जादूगरनी से कम थी। पिशाच नगरी हरियाणा और पजाब की सीमा-रेखा पर बहुत अन्दर की तरफ एक गाँव है किंदरिया। मुडू का सब-कुछ याद है । वह उसी किंदरिया गांव का बाशिंदा है । पर एक के बाद एक लाख ठाकर खाने के बावजूद उसो कभी वहां लौट जाने को नहीं साची । साचना तो दूर की बात उसने भूल से भी कभी किसी से उस गाँव का 1108] स्वर्ग की खोज । जिक्र तक नहीं किया। अगर मालिक का पता चल जाए तो क्ल को बजाय आज ही गाडकर रख दे। बस बहुत बाद में एक दफा खतचन्द बाबू के सामने मगर पहले तो खेतचन्द बाबू न ही किंदरिया का नाम लिया था तब। वाले थे-'मरे बाप-दादाआ ने किंदरिया का पानी पिया हुआ है। वहाँ के हाकिमा के जुल्मा- सितम सहे हुए हैं। बाद में मेरे बाप ने एक-एक से ढग से बदला लिया था। मुझे माँ को और छोटे भाई को उन जालिमो से बचाने के लिए शहर रवाना कर दिया था और उनका लूट-लाटकर उनकी असली ओकात दिखा दी थी और खुद भी वहाँ से निकल लिये थे। मैं भी कहूँ, अपन दाना की शक्ल गोरा-लम्बा कद क्या एकसार है। हाँ हाँ हई।' वे जोर से हँसे थे-'अपन दोनो ने ही किंदरिया का पानी पी रखा है वहाँ के उत्पात सह रखे हे ।' हाँ, इससे आगे नहीं बोला था मुडू। जानते होंगे द्वारका पटेल और उसके लाडले का। बेशक एक के बाद एक कई नरको से बहते हुए उसने इस मजिल म शरण ली थी। मगर अब भी उसके मन मे यही ठोस धारणा घर किए हुए है कि अगर पूरी दुनिया में सबसे बडा नरक कोई है तो वह किंदरिया ही है, जबकि वह यह भी नही भूला कि किंदरिया की धरती ढेरा अनाज उगलती है। शीशे के मुआफ्कि पानी की नदी उसी गाँव मे बहती है। पेड-पौधो पर जिस तरह का सगीत पक्षियो को सुनाते वह अब कभी-कभी वी सी आर /टी वी मे देख-सुन लेता है वैसा असली सगीत पेडा की डालिया का झूमना-गाना उसी के गाँव क सहज-सुलभ दृश्य हैं। सठा, जमींदारो महाजना, पटवारिया की वहाँ बडी-बडी हवेलियाँ- चौपाल हैं, बाग-बगीचे हैं, यानी किंदरिया गाँव हर तरह से भरा-पूरा स्वर्ग है । मगर हर स्वर्ग में जरूर एक नरक निवास करता है। द्वारका पटेल जैसे लोगा के लिए किंदरिया पुश्त-दर-पुश्त स्वर्ग बना हुआ है। वही किंदरिया मुडू जसे खानदानी के लिए हमेशा नरक ही रहेगा। उसी की आँखो के सामने बापू का कोडे लगे। मामू अपनी जमीन छुडवाने की परियाद लेकर पटवारी के द्वार गया तो गर्मीदार के कारिंदो ने जजीरा से बाँधकर चार रोज तक भूखा-प्यासा रखा। कन्हैया भैया की बरात लौटी तो डोली द्वारका पटेल के दरवाजे पर क्या राक दी गई? वजह वह नहीं समझता था। अब समझने लगा है। साथ ही इसी प्रकार के दूसरे परिदृश्य उसके दिमाग के रास्ते स्पष्ट होते रहते हैं। भले ही तब व्याख्याआ- ब्यौरा को कह पाने में असमर्थ था लेकिन यह गाँव उनके रहने लायक नहीं, पग- पग पर जलालत है-यह ता वालमन में बैठ ही गया था। माँ बेगार करते-करते सूखकर काटा हो गई थी। जो छोटा भाइ पैदा हुआ था लंगडाकर चलता था। उसने बापू से कहा था इस नरक का छाड देन के लिए। बापू का जवार था-'बहुत स्वर्गकी पोज 109 उधार है सेठा का काई निकलने नहीं देगा! फिर अपनी धरती माता को छाडकर जाने का मतलब नरक का जाना हाता है। भगवान गरम क्डाहे म डाल देते हैं।' मुडू क पास शब्द नहीं थे। वह दूसरी-तीसरी कक्षा म पढता था जहाँ उसे मास्टर और खाते-पीत घरा क दूसरे वच्च हिकारत से देखते थे। फिर भी उसने अपनी बुद्धि पर जार डालकर बाप को तक दिया था। आशय यही था कि काल्पनिक नरफ से यह नरक भयकर है। जो साहूकार हम पग-पग पर रॉद रहे हैं, उनसे वफादारी कैसी? परन्तु याप और मामू भी टस से मस नहीं हा रहे थे। धरती माँ ता धरती माँ साक्षात् सगी माँ भी दगा कर गई थी। माँ चल बसी थी। अधकार छा गया था। दीघ अधकार भी अपन से घबरा उठता है। राशनी की तलाश करता है। अँधेरी रात में विलीन मुड़, सबकी नजरा से बचता-बचाता भाग निकला नरक नगरी स किसी अनजान स्वग की इच्छा सहजे। निकट के किसी शहर म नही, बल्कि एकदम दूर-दराज के इलाका म पड़ाव डालता चला गया। एक जगह दूसरी जगह तीसरी पाथी अपने-आपको आजमाने की धुन लिये। साफ-सफाई घरा की दुकाना की होटल-ढाबा पर साइकिल वाला के यहाँ। हर जगह अपने को घिसाता-खपाता रहा। जहाँ-तहाँ मिले अखवारा के टुकडा मे आँख गाडता रहा। रद्दी में आई किताबा मे से अपने मतलब की खुराक खोजता-निकालता सात से साढे दस साल का हो गया। नाइया की दुकाना पर बाल साफ करते-करते बाल बनाने लगा। कुछ शराफ्जादे उस घर पर बाल धनवाने ले जाते । हर जगह के बाल साफ कराते। देर रात तक सतो-साधुआ के प्रवचन सुनता, नरक से स्वर्ग की राह ले-जानेवाले। राजनेताआ के भाषण सबकी झाली में रामराज उँडेल रहे होते। जैसे हर जगह स्वर्ग-नरक, नरक-स्वर्ग नाक-झाक कर रहे हाते। तब उसकी भेट खेतचद वाबू से हुई। खेतचद बाबू अकसर साथ की दुकान से मासम के मुताबिक आइसक्रीम खाने जूस या कॉफी पीने चल आते थ आर इसी तरह पद्रह-बीस दिन मे बाल बनवाने, उसी नाई की दुकान म आ बैठते । मुडू उनके बाल ऐसे सलीके से बनाता दाढी-मूंछों का ऐसा सहजता कि खेतचद बाबू शीश के सामने अपन-आपको राजकुमार पाते । एकदम तराताजा। खेतचद बाबू को मुलाकात मुडू के सृनेपन का कम करने लगी। उसम थोडी तरग भरने लगी। वे उसे कलाकार मित्र की सज्ञा से सम्मानित करते। थोड ही समय वाद आर खुल गए। उसकी बात सुनकर दग रह गए। पिद्दी-सी उम्र और इतना ज्ञान-अनुभव। वे उसे हॉस्टल ले जाने लग। दूसरे बहुत-से मेल- 110/स्वर्ग की खोज मुलाकातिया के यहाँ भी। वहाँ मुडू कभी हजामत भी बना देता और अच्छा मुआवजा हासिल कर लेता। खेनचद बाबू एम०ए० के छात्र थे। छात्र नेता थ। राजनीति मे अच्छा- खासा दखल भी रखते थे। और भी जाने कहाँ-कहाँ किस-किस जगह आना- जाना, उठना-बैठना, पीना-पिलाना था। अखबारनवीस, प्रेसवाते वकील, डॉक्टर, लेडी डॉक्टर सब उनके अपने आदमी थे। कभी-कभी किसी से जितने पैसे चाहते उठा लेते। काई उन न करता।'ले यह सब तू रख ले।' वह मुडू से कहते-'झोली भर ले। मैं इन सबकी पोल जानता हूँ। हाँ, तू हर तरह का पढना-लिखना जारी रख। तू तो यार कमाल का उस्ताद है। एक दफा सुना हुआ, पढा हुआ सब दिमाग मे एकदम माफिक फ्टि। तू ता वकील होता। तू तो स्मगलिंग-मास्टर हाता। तू ता राजनेता होता। तू ता पूरे देश क्या कहते हैं अपने राष्ट्र को इन कधों पर उठाकर अच्छे-अच्छो को नचा सकता है। जिसे चाहे झटका दे सकता है। तेरी काबलियत हमने शुरू से ही पहचान ली थी तभी ता दास्ती हो गई अपने से। थोडा-सा और वक्त चाहिए तुझे। हम तुम्हारे पीछे हैं । तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड सकता।' समय गुजरता गया। एक-दो साल फेल होकर खेतचद बाबू ने एम० ए० पास कर लिया। बोले-'हम बाईस से ऊपर के हुए। बस इतने कि शादी लायक। बाप ने बुला भेजा है। माँ ने कहलवा भेजा है । एक लॉडिया शादी के लिए तैयार बैठाए हैं। तू तेरह का नही साढे तेरह का। मगर नहीं तू तीस से ऊपर का है। तू सधा हुआ जवान । तू प्रेत है। एकदम इसी दुनिया के काबिल । मौका-शिनाख्ती घाहिए तुश। फिक्र मत करना। तुझे यूँ फालतू लागा के बीच झुलता नहीं छोड जाएंगे। ठीक-ठिकाने बैठाकर ही हम तुष्टि हागी । यारी निभाएंगे पूरी । रम जाए ता ठीक नहीं ता आएंगे बीच मे, अगर तुम्ह जरूरत हुई तुमने आवाज लगाई। मगर भरोसा है कि तुम खुद ही अकेले युद्ध लड लागा पकत कितावे पढ़-लिखे लाग, सब घास काटते हैं। तुमने जो-जो पदा है, उस विद्या से सबको घास खिलाकर जमीन चटवा दोगे। जब कोई अच्छा मोका हाथ आए, हमे भी दावत देना।' 'आपक पैरा को जूतो हूँ खेतचद बाबू। कहाँ चढा रहे हैं ? गुब्बारे में इतनी हवा न दे कि फट पडे।' कहते-कहते आँसुआ से सराबोर मुँह उसने खेतचद वाचू कक्दमा से लगा दिया था। 'तरा पावर का तुमसे ज्यादा हम जानते हैं। हो वक्त लग सकता है। धैर्य रखने में कोई नुकसान नहीं होता। जल्दी का काम शैतान का काम। हथोडा वक्त स्वर्ग की खोज पर चलाया जाता है समझे द्वारका पटेल का लडका हमे नहीं पहचानता। वहीं चलना होगा।' 'जी कुछ समझा नहीं?" अवसर आन पर सब पहचान लागे। हम भरासा है। गाँववाल कपड पहनी ओर चला हमार साथ। और नाट कर ला यह-यह पते और फान नबर।' तब खेतचद बाबू मुडू का लेकर गाडी का लबा सफर तय कर मालिक के पास जा पहुंचे थे। मालिक के कई उर्फ थे-नवाबे-हिन्द शहशाह, गुरुदेव, और भी जाने क्या-क्या। उन्होने बैठे-बेठे हाथ ऊँचा उठाकर खेतचद बाबू का स्वागत किया था और चकित भाव से ग्रामीण बालक का अध्ययन कर रहे थे-'यह कोन ॥ खेतचद वाबू ने मुडू से कहा था-'पैर छु । आज से यह तेरे मालिक हैं । हर तरह से राजी रखना। गलती करेगा तो खाल खीच ली जाएगी। खुश रखेगा तो जिंदगी बन जाएगी रे।' फिर वे नवाब साहब की तरफ देख मुखातिब हुए थे- 'यह मुडू है खौफजद लडका। वेचारा मुसीवत का मारा है। आपने कभी जिक्र किया था बिल्कुल वैसा ही। भोला पछी ढूंढ निकाला आपके लिए। साचा आप ही की रिआया के काबिल है। जो दे दे उसी में राजी । मुंह में जबान नहीं।' 'बस-बस यही-यही।' पान-इलायची से भर मुंह से बहुत-सी हवा छाडत हुए, उन्हान लफ्ना को कील की तरह ठाका-'जबान को ही काबू मे रखने की ताकीद करते जाओ। यहाँ खाने-पीने-आढने की कमी नहीं। हाँ आँख भी ज्यादातर बद रखनी हागी जा हमारे मुँह के इशारे से रत्तीभर खालनी होगी वरना यद।' फिर उन्हाने अपनी सख्त हथेली से मुडू का कधा दवाया था-'हमारी बात को अच्छी तरह से समझ गया तो तेरी मोज ही माज नहीं समझा ता आफ्त। बेहतर हा इसी दम वापस चला जा। बाद में कोई गुजाइश नही। काइ गुस्ताखी कोई गैरजिम्मेदाराना हरकत काबिले-माफी नहीं होगी। नतीजा अभी से जान ले-यहीं पर मौत। तू तो क्या तेरी लाश भी इस बंगले से बाहर नहीं जा पाएगी। सोचने के लिए वक्त चाहिए तो बाल।' 'नहीं।' 'क्या मायने इस नहीं के ?' कहकर वे स्के-'तू उधर क्या देखे जा रहा है।" गलती से पहली बार आगे का दरवाजा खुला रह गया था। अपने भारी शरार क साथ छलांग लगाई। दरवाजा बंद कर दिया-'हाँ क्या याला नहीं स्कना है।" आवागम वही चपचप- -भा मुडू की समझ में आ गया था वही मालिक से ज्याला दानिशमत है। तर 112 स्वर्गीयाज उसने कद्रे झुकते हुए स्पष्ट किया था-' 'नहीं, मुझे साचने का वक्त नहीं चाहिए। फैमला आपके कदमा में बने रहने का है।' नवाब साहब ने अर्थभरी दृष्टि खेतचद वायू पर डाली। उनकी बाँह पकड़कर बगल के कमरे म बडी मेज के सामने जा बैठे। शीशे की वडी अलमारी से बोतल निकाल लाए थे-'लौंडा है तो भरासेमद। मेरा मतलय है “पी०ए० और राजदाँ हागा हमारा। 'एकदम भगसेमद आर फरमाबरदार। वेफिक्र रह।' पीने-पिलाने के बाद वे वहीं पर पहुंचे जहाँ मुडू बैठा था। 'तो फैसला पक्का 'जी सरकार' 'आज से तू राजा हुआ। भूल जा मुडू को।' 'पैर छू।' खेतचद बाबू ने फिर से पैर छूने को कहा। राजा ने दोना के पैरा पर हाथ रखकर माथे पर लगाए थे। खेतचद बाबू चल गए थे। अजीब-सी दुनिया में पहुँच गया है मुड, राजा बनकर। चारा तरफ नान- अर्धनग्न आरता की तसवीरे माटे-माटे वडे फ्रेमा मे जडी हुई। बीच मे इसी तरह की सगमरमर की चिकनी-चिकनी आदमकद प्रतिमाएँ, झरने मे खडी स्नान कर रही हैं। साथ सडे कलात्मकता से गढे नुकीले खभे, यहुत बडी स्क्रीन का टीवी० सैट वी०सी०आर० अनगिनत कैसेट । दीवारा के सहारे बडी-बड़ी अलमारिया मेजा पर कई रगा की बोतल । एसे लागा या घरा के बारे मे, उमने भले लागा और साधु-सता से सुन रखा था-नरकद्वार होते है । अनाप-शनाप पैसा ईमानदारी से नहीं मिलता। औरत शराब यूँ ही बहती नदिया नहीं है। यह सुन्दर उपवन । शीशे की तरह चमकता तालाब, झरना से उड-उडकर स्पर्श करती सुगध पूरे वातावरण को सुखद बनाता यह सब-कुछ। अगर कही स्वर्ग है ता यहीं है। फिर जीवित मूर्तियाँ भी आती हागी यहाँ। इन्द्र-सभा जैसा स्वर्ग। अगर यह सब किसी की नजर मे नरक है तो वही बात-हर स्वर्ग मे एक नरक होता है और नरक म स्वर्ग। तब इस नरक मे मालिक ने स्वर्ग बसा रखा है। अजूबा ससार। स्वर्ग-नरक का विचिन सम्मिश्रण। नौकर देखता है। मालिक ठाट-बाट से रहता है। नौकर डरा-डरा भयभीत है। जिनासा लिये देखता है।
मालिक शान के साथ मुंह मे खुशबू भरता रहता है। नौकर की नजर मालिक को नजरा से मिलती हैं। सहम जाता है। मालिक विना यात डांट दता है। नौकर नगर झुका लेता है। मालिक कार बदलता रहता है। मालिक कार में जा रहा है। मालिक कार से आ रहा है। दिन में एक से दस चक्कर। नाकर चुपचाप हुक्म की तामील मे खडा रहता है। मालिक आए दिन नया सूट सिलवाता है। मालिक के साथ गहना से लदी खवसूरत मासल औरत है। राजा के लिए एक और चीज जो इस अजूवे ससार का अग है वह हे ट्रका का काफ्लिा । ट्रका का काफिला कुछ दिना या महीना के अतराल से आता-जाता रहता है। घर-घरी चूं-धूं, ची-ची की आवाजा से राजा के कान खडे हो जाते हैं। मगर यह टका का रहस्यमयी खेल महल के बाहरी इलाके के गोदामा मे चलता रहता है। क्या उतरता है, क्या चढता है, राजा कुछ ललचाई नजरा से जानना चाहता है। समझना चाहता है इस तिलिस्म को। लेकिन उस तरफ उसका आधा कदम भी मालिक को बर्दाश्त नहीं। इन क्रिया-कलापा की देखभाल मालिक स्वय ही करता-कराता है। ट्रक के साथ आए लोगा तथा लगभग सभी के लिए महल का अन्दरूनी भाग निषिद्ध हे वहीं राजा के लिए बाहरी इलाका निषिद्ध है। मालिक के पास तरह-तरह के लोग आते हैं--पैसा पहुँचानेवाले शतरज खेलनेवाले राजनीति पर चर्चा करनवाले पीने-पिलानेवाले, अपना हिस्सा माँगनेवाले। ये सब महल के शुरूवाले कमरे मे बैठते हैं जहाँ पहले-पहले दिन राजा का एक तरफ बिठाकर मालिक खेतचद बाबू को ले गए थे और शराब पिलाई थी। बहुत कम हैं मगर हैं धमकी देनेवाले छापा मरवाने की। रंगे हाथों पकडवा देने को । इज्जत की लुटिया डुबो देनेवाला की। राजा को अपना हिस्सा मांगनेवाले धमकियां देनेवाले ही भाते हैं। वे अपना हक मांगते हैं। यानी कि इस नरक से स्वर्ग चाहते हैं। मगर राजा ता कुछ भी नहीं सुनता । कुछ भी नहीं देखता। चाहकर भी कुछ नहीं चाहता। । 114] स्वर्ग की खोज यहाँ पर जिंदा टिके रहना है। स्वर्ग का इतजार करना है। और अब धीरे-धीरे, लबे समय बाद, आए दिन मालिक की समझदारी सटपटानं लगती है, छटपटान लगती है। आए दिन वजह-बवजह राजा को पीट देता है। साला जासूसी करता है। हर चीज पर, हर बात पर बारीकी से निगाह रखता है, एकदम मासूम बनकर। राजा खूब-खुब काम करके दिखाता है। सवा-सुविधा पर ध्यान देकर मालिक का मन जीतना चाहता है। बुद्धू बनकर, बुद्धू बनाता है। लेकिन नहीं जानता मालिक को। महान् राजा या शहशाह कह देने से मालिक झाँसे म आनेवाला नहीं। सब-कुछ पोशीदा रखने के वास्त ही तो एक ही नोकर रखता है मालिक । पहले भी, अब भी। एक स आराम से निपटा जा सकता है । भेदी हुआ, और गाडा गया। तू कौन- से बाग से आया है ? तू डाल-डाल मैं पात-पात। अब मालिक ही जासूसी करने लगा है। आवृत्ति । पुनरावृत्ति- अचानक लौटा। रंगीन किताबा के पन्ना मे खोया हुआ पाया-'हजार बार मना किया, मेरी चीजा को छूने की जरूरत नहीं। ले-ले ठक-ठक । किसी दिन वी० सी० आर० पर फिल्मे देखते धर दबोचा । झापड । लाते। पहले एक बार मेरा ही नया सूट पहने, राजा बना बैठा था-तो बनाऊँ राजा?' चाकू की नाक' हाय। 'जब-तब फोन मिला रहा होता है हरामजादा। मिला दूंनवर यमदूत से" सब-कुछ आ पहुँचता है इस वर्जित क्षेत्र मे-कापियाँ-किताबे।व कमीनियाँ ला देती हागी। उस दिन वह लाल चुन्नी वाली कैसे आंख फंसाए बैठी थी। नमक हमारा खाए, अडे किसी और को दे। सारी चतावनियाँ बकार। मारनेवाला थक जाए। खानेवाला ताप्तादम। अचानक एक नया पुलिस अफसरो का दल। पी चुकने के बाद-आपको हमार साथ चलना होगा। कुछ पूछताछ होगी। जो कुछ होना-हवाना है आपसे छिपा नहीं। हमारी ड्यूटी है। कागज तो भरने हैं हमे। तीन रोज तक हमार मेहमान। वक्त पर आ पहुंची जिसे टाइम दे रखा था मालिक ने। कामिनी सुन्दरी माहिनी। हाठो पर लिपस्टिक। चेहरे पर लाली। गालो पर फूटता लावा। दोला हरी छीट का ब्लाउज। ऊपर के दो बटन खुले हुए। सवत्र मादकता। हमी-"क्या देखता है रे? घबराहट कैसी? आ जा तू फिट है। तेरा मालिक कभी टिच्च - स्वर्ग कीयोज 115 ज्यादातर टिच्च-फिस्स । मुँह पान की पीक स भरा हुआ-चप-चप भू-भो। अपना औरता को घर से निकालने, बाहर करने की बात तो आम है। लेकिन अपनी ही आरत का फिर रखत की तरह बुलाने की बात तो शायद किस्से- कहानिया में भी न हो। डाली रुकवा दी थी अपने दरवाजे द्वारका पटेल ने। वाप से पहले यही “यही लम्पट झपट लिया था मुझ रुपवती पर। फिर घर मे ही विधिवत् विवाह। फिर और दूसरी सुन्दरी मै बाहर। न माँ-बाप की न पहले ससुरालवाना की। तब सरकी। कभी-कभी इसकी भी। शायद पहचानकर भी अनजान बन अजनबी रस चूसता है। में चली आती हूँ कुछ साचकर । आज पूरी तयारी के साथ आइ हूँ।" तभी दरवाजे पर तक की आवाज होती है हल्की-हल्की। जैसे बाहर से ताली गुमाइ जा रही है। "तू उधर मत देख। तू इधर दख। आज सब ता उस ही दिखाना है । जल मरे। तू ही असली राजा। शरमाता क्या है?" आर राजा वह मब-कुछ दख रहा है जा आँख मूंदकर देखा करता था। आज सब उलट-पलट है। आज यह सब मातिक दख रहा है। शायद एक अलग लुत्फ है। काम-पिपासु दृष्टि बरसा रहा है मुँह से लार टपकी जा रही है और न जाने कहाँ-कहाँ से। कपडे सुधार रहे थे, तब मालिक भै मालिक पैदा हो गया। नवाचे-आलम पैदा हो गया। मालिका में बादशाहे-हिन्द आ बसा। कसाई। जल्लाद। यमदूत। सब-कुछ बन गया मालिका लगता है आज मालिक कुछ परेशानी के आलम मे लोटा है, और इसी परेशानी के तहत कुछ ज्यादा ही चढा रखी है। हाशा-हवास खा चुका है। "हरामजादी हरामखोर बेटी के " गालिया की बौछार और तावड- तोड हमले। एक जिस्म पर दूसरे जिस्म पर। बारी-बारी से मुँह म बसी तमाम गदी गालियाँ उगलता जाता है। एकाएक यत उठाकर राजा की तरफ लपकता है। राजा बचाव करता हुआ तालाब के किनारे चढ जाता है। मालिक अपने जिस्म का सतुलन खोकर नुकाल खभे से जा टकराता है। मुँह मे झाग । जवान घुर-धुर करती तालू से जा चिपकती है। सिर और कधे से लहू बहने लगा है। निढाल बदन विफन फर्श पर जा गिरा है। बेदम बेहोश। राजा के हाथ में पानी का गिलास है--"मालिका 'मालिक!" मुंह पर छोटे डाल रहा है। फिर टेलीफान को आर बढता है। -- स्वर्ग की योज -- " 'झटक दो अब यही पर गुलामी को, और मरने दो अपनी मौत। कहा ना, सब-कुछ सोच-समझकर आई थी, तुम्हारे साथ बदचलनी करने नही ।" राजा आँख उठाता है। एक नजर मालिक पर डालता है फिर प्रौढ सुन्दरी पर। 'अब तू ही यही पर मालिक बनकर रह। तुम्हारे साथ खेतचद बाबू है। उनके साथ पुलिस है। डॉक्टर है । इजेक्शन, दवाई, मृत्यु-प्रमाणपत्र सब-कुछ।" "नही रहना । जान गया हूँ सब रास्ते। अपने लिए खुदता कब्र । उधर रहा चाबियो का गुच्छा। सॅभालिए यहाँ का राजपाट । असली हकदार आप ही है।" सहसा बाहर ट्रका की घुरै-धुरै सुनाई देती है और फिर भाग-दाड। ऊँची कद-काठी का आदमी एकाएक छलाँग लगाता हुआ इधर ही पहुँच जाता है। पीछे-पीछे पुलिस। वह पुलिस पर गाली चला देता है। पुलिस-टोली बडी फुर्ती से बचाव करती हुई उसे धर दबाचती है। 'ओह यह ता वही देत्य है।' राजा के सामने शक्ल कौंधती है-द्वारका पटेल। पानी के छींटा का असर हुआ है या शोर की वजह से मालिक आँखे खालता है। मुश्किल से हाथ उठाकर पुलिसवाला को रोक रहा है। वालने से लाचार। पुलिसवाले मिलकर उस आदमी (द्वारका पटेल) के हाथ-पाँव जेसे शिकजे में जकडते चले जाते ह-"कब से चल रहा है यह खोटी चीजा का व्यापार?" राजा एक अँधेरे काने मे जा खडा होता है। देखता है-बेटे के सामने बाप पर बरसते ताबडतोड डडा के प्रहार-हाय, मार डाला। मगर बेटा बेबस आँख मूंद लेता है या फिर से बेहोश हो गया है। बीच के इस दृश्य पर पडती रोशनी के अतिरिक्त, चारा ओर अँधेरा छा चला है । उस अँधेर मे अजब-सी गूंगी गूंज व्याप्त है। उसी अँधेरे में राजा धीरे-धीरे दूर-दूर खिसकता जाता है। फिर से एक बार राजा मुडू बनकर सबको नजरा से बचता-बचाता अंधेरी रात म विलीन हो जाता है। उसके कदमा म जैसे चिंगारियाँ हैं। कदम किंदरिया की तरफ बढ़ रहे हैं। स्वर्ग की खोज [117 हॉस्टल मे धीरे-धीरे सारी चहल-पहल खत्म हो गई थी। होते-होते समझिए सारा हॉस्टल ही बयाबानी का शिकार हो गया था। रह गए थे दो प्यारे-से नन्हे लडके- हबीब और शमीम। तब पता चला दोनो चचाजाद भाई थे। गारे-गोरे नाजुकमिजाज । स्टाफ के कुछ लोग इन्हे अग्रेज बच्चे कहा करते थे। खैर, थे तो वे ऊँचे खानदान से ही। इन दो के अलावा वहाँ जो और दो जने बचे थे उनमे एक पुराना मझोले कद का पक्के रगवाला बेयरा था। उसे सभी भाटी- भाटी कहकर पुकारते थे। पता नहीं वह अब तक वहाँ कैसे था। मुझे हर वक्त वहम या डर बना रहता कि वह कभी भी अचानक हॉस्टल छोडकर रफूचक्कर हो जाएगा। इसलिए मैं उसे हर तरह से खुश रखने की कोशिश करता-खुशामद से लेकर पैसा तक से। दूसरा वहाँ अब तक बने रहनेवाला मैं ही था यानी हॉस्टल का सीनियर वार्डन- प्रीतपाल। लाहौर का किस्सा बयान कर रहा हूं, और उन्हीं दिना की मामूली-सी तफ्सील के साथ जब मुल्क आजाद हानेवाला था। और अगर इस लिहाज से देखा जाए ता लुटे हुए दिन 18 लुटे हुए दिन कोई भी तफसील मामूली न होकर गैरमामूली हो जाती है। कहने का ता कह गया कि मुल्क आजाद होनेवाला था, लेकिन यह कहना कही मोजूं लगता है कि एक मुल्क के दो मुल्क बनने जा रहे थे, जिन्ह दो अलग-अलग मुल्का की आजादी का जामा पहनाने म हमारे बडे-बडे लीडर दिन-रात मुशक्कत कर रहे थे। तब तक पूरी तरह तय नहीं था कि लाहौर किधर जाता है। कभी किसी कौम का पलडा भारी नजर आता तो कभी दूसरी का। देखा यह भी जाता कि मार-काट मे कोन माहिर हो चला है। इस प्रकार धीरे-धीरे सूक्ष्म निरीक्षण दृष्टि से कुछ बाते जरूर उसी धीमी गति से साफ होती दिखाई देने लगी थी। बिना स्पष्ट घोषणा के सभी अपनी-अपनी जगह कभी शेर और साथ ही कभी सहमे हुए थे। अब हाता यह था कि रात, सान से पहले लोग अपने अल्लाताला या भगवान से उन्ह शातिरा से महफूज रखने की दुआ मांगकर सोते थे। फिर भी मजा यह कि साते कम जागते ज्यादा थे। पहले हमारे हॉस्टल मे होता यह था कि सान से पहले हम लोग, सुबह के नाश्ते के अपने-अपने मीनो, किचन-स्टाफ को लिखवा दिया करते थे। में तो ज्यादातर वैजिटेरियन डिशेज का ऑर्डर दिया करता और वे दोना चचाजाद भाई, हबीब और शमीम नॉन-वैजिटेरियन खानो का। बताया करते कि उनके वालिदैन ने कहा है कि इससे आदमी मजबूत होता है। खैर इसी तरह अपने-अपने हिसाब से हर कोई खाता-पीता था। क्या तो वे दिन थे जा सुवह से रात तक अपनी गरमाहट कायम रखते थे। यह गहमा-गहमी स्कूल-कैम्पस की जान हुआ करती थी। कितने चुस्त-दुरुस्त चपरासी, बेयरे माली चाकीदार। अपने-अपने सब्जैक्ट के माहिर अध्यापक अपने कामा को सरअजाम दिया करते थे। कुल मिलाकर विद्यार्थियों से लेकर प्रिसिपल, सभी उत्साही जीव । ओह अब यह सारा सिलसिला सिकुडकर एक छोटी-सी डाइनिग-टेबल पर आकर महदूद हो गया और समूचे वातावरण की महक उडकर न जाने कौन से मुल्क मे चली गई। चूँकि पढानेवाला सारा स्टाफ और स्टूडेट्स-इन दा बच्चा को छोडकर- रह ही नहीं गए थे, सो पहले की तरह मेजा या जगहा का बटवारा भी खत्म हो गया था (यहाँ मरी बोत बटवारे को लेकर किसी को अप्रासगिक लग सकती है, लेकिन क्या करूँ। मुझे माफ करे, मेरा ध्यान तो उस बटवारे की तरफ आप-से- आप खिंच जाता था जो बटवारा-मुल्क के साथ हम सबका होने जा रहा था)। सा हम तीना एक ही छोटी मेज पर नाश्ता लेने लगे थे और फिर बेयरा को भी लुटे हुए दिन 119 अपन साथ बिठा लिया करते। खाने के वक्त भी उससे ताकीद करते कि वह पहले पूरा खाना तयार कर ले ताकि चारा ही एक-साथ बैठकर खा-पी ले। काम ही क्या रह गया था सिवाय खाने-पीने के वक्तो की प्रतीक्षा के, या ज्यादा से ज्यादा बेदिली स कैरम या पिगपाग खेल लेना। कई बार सोते वस्त, खाने या नाश्ते के दौरान गोलियाँ चलने की आवाग और कभी-कभी दूर आग की लपटा का ऊँचा उठना हमारे इस दूर-दराज बसे हॉस्टल से दिखाई दे जाता। तब हम चारा खामोश रहकर एक-दूसरे को तसल्ली का वाइस बने रहते जैसे इसी तरीके से मारी मुसीबत टल जाएगी। पहले भी शमीम और हबीब मुझे बहुत प्यारे लगते थे और उसी की प्रतिक्रिया-स्वरूप ही शायद मै भी उन्ह अच्छा लगने लगा हूँगा । बडी जिज्ञासा से मेरी और मेरे नाश्ते की आर दखा करत आर थाई सकोच के साथ मेरी रकानी म से कुछ हासिल कर लिया करत। उनका मन रखने के लिए, मैं भी इसी प्रकार उनसे कुछ ले लिया करता। एक दिन महबूब अली पुराना बयरा, अचानक वहाँ पर आ पहुँचा (वहाँ शुरू से शमीम-हबीब की देखभाल करता हुआ देखा जाता था)। उस वापस आया हुआ पाकर हम सब बहुत खुश हुए, जैसे महबूब अली का आना पुराने दिना के आने का शुभ-सकेत हो। हम सब सिर्फ इसी बात के तो मुतजर थे। मगर यह सब ऊपर की स्थिति थी। हरदम अदर ही अदर विचलित कर देनेवाले हालात करवट लत रहते थे। हम हताश थे और निराश हा चले थे कि अब पहले-सा पुरगार रानक-भरा माहौल ताउम देखने का नहीं मिलेगा। इसके बावजूद आदमा की फितरत ही, उम्मीदा के सहारे सारी उम काटना हाती है। इसीलिए शायद एक निकम्मी ओर नामाकूल आस सिर्फ एक महबूब अली के जरिए देखने लगे कि जैसे महबूब अली लौटा है, वैसे एक न एक दिन तमाम अध्यापक चाकीदार खानसामे विद्यार्थी लोट आएंगे। उनकी देखा-देखी या सुन-जानकर प्रिंसिपल करनारसिंह भी जो बेठे-विठाए, लबी छुट्टी की अर्जी मेज पर डालकर चले गए थे शायद इसी हफ्त वापस आ जाएंग। प्रा० रियाज अहमद इगलैंड स तो लाट चुके है फिर भी इस्टाट्यूशन क्या नहीं आ रह? हो सकता है, दा-चार राज रुककर थकावट मिटा रहे हो। वक्त आने पर सभी जरूर आएँगे पुरानी रोनक का साथ लेकर। यह सब सोचते हुए मैं शायद वक्त से खिलवाड कर रहा था या वक्त हो मुझ वेवकूफ बना रहा था। कोन-सा वक्त ? कैसा वत' किस वक्त का इतजार? मुझे किसी न आनेवाले का इतजार था। और तीसरे ही दिन सुबह उठकर पाता हूँ, भाटी चुपक-से गायब हा गया 1120 लुटे हुए दिन है। मुझे पता है वह खुद तो इस हॉस्टल से रिहाई चाहता ही था और मुझसे भी वह कइ राज पहल से इसरार कर रहा था कि यह जगह छोड दूं। पर मेरा कहना था कि इन दो मासूमो को किसके सहारे छोडूं? रजिस्टरा को टटोलकर मने उनके वालिदन को फ्रास तार तो दे ही रखा था। महबूब अली ने बताया कि कोई न कोई आकर इन बच्चा को जल्दी ले जाएगा। आप जाना चाहे तो हिन्दुस्तान चले जाएँ । अब तो पक्का फैसला हो चुका है कि लाहोर पाकिस्तान मे रहेगा। मगर में न माना और कहा कि मैं थोडा और इतजार कर सकता हूँ। आखिरकार एक दिन एक ओरत, जो हबीब और शमीम में से किसी एक की माँ आर किसी दूसरे की चाची थी, आ पहुंची। दोना बच्चा को मन मसासकर उसके सुपुर्द कर दिया । सब-कुछ भूल जाने का उपक्रम करता हुआ एक कडवा चूंट पीकर अमृतसर आ गया। बच्चे ता सभी मासूम होते हैं । थाडे रद्दाबदल के साथ उनके क्रिया-कलाप, स्वभाव हरकते एक-जेसी लगती है (इसके बावजूद इक्के-दुक्के बच्चे हम बेहद अजीज हाते है। हम उन पर हरदम अपनी जान निछावर करने को तैयार रहते हैं। हबीब और शमीम को ही ले और मेरे अदर की सचाई की बात कर तो मैं शमीम पर कुछ ज्यादा ही फिदा था)। अपनी आदत के मुताबिक में मस मे बच्चा के बीच ही खाता-पीता हूँ (इससे खाने के स्तर का भी पता चलता रहता है)। यहाँ भी सुशील, असीम जेसे बच्चा की आवाज के साथ हबीब-शमीम दिखलाई देने लगते हैं-'सर आप यह आमलेट लेगे? यह लीजिए ना सर। जरा अपनी प्लेट तो इधर कीजिए। इन आवाजो और शक्लो से बचने की खातिर मैं कई बार अलग से साना लेने लगा हूँ। एकबारगी सब-कुछ भूल जाना चाहता हूँ। भरसक काशिश में लगा रहा कि भीतरी जख्मा का हवा न लगे। विभाजन के जख्म तो ऐसे थे जिसके भी हुए थे हर वक्त ही रिसते रहते थे और आज तक सालोसाल बीत जाने पर भी इस पीडा से आहत लाग अपनी-अपनी या दखी-सुनी रामकहानी ले बैठते है। मगर मेरी कहानी थोडी अलग किस्म की थी जिसे भूलने मे कुछ-कुछ कामयाब भी हो चला था कि दो साल पहले मुझे एक ऐसा शख्स मिला जो दगो के दोरान लायलपुर से निकलकर आया था। उसने मुझे एक नीम-पागल का किस्सा सुनाया। सच मानिए, अगर यह किस्सा मेरे सामने न आया हाता ता मैं अपनी दुखातिका का आखिरी वक्त तक सीने में ही लिये खत्म हो जाता। अब उस घटना का मैं लुटे हुए दिन [121
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'देखा हे ना मुसलमान?" "जाओ बच्चो । भगवान तुम्हे हमेशा राजी-खुशी रखे।" "देखा हिन्दू है। है ना?" "मर जाआ। तबाह हो जाओ। जा भी पर शक तो न करो। मेरा क्या उस शख्स ने आगे बताया। सब चले गए। मगदूडिया सुवक-सुबककर रो रहा था। मै अपने दो दास्ता के साथ वहाँ मौजूद था। भीड को नहीं समझाया जा सकता। हम तीना ने मगदूडिया को उठाया। उसे चाय-नाश्ता कराया। उसे फिर से हँसाने की कोशिश करने लगे। इस छोटी-सी घटना को सुनने के बाद मेरे समूचे शरीर मे बवडर पैदा हो गया। अपना आपा खो बैठा। मेरे अन्दर जैसे मगदूडिया ने प्रवेश पा लिया। थाडा सतर्क होकर साचता तो यहां खयाल आता कि हिन्दू या मुसलमान की बनिस्बत आदमी पहले वाप होता है। फिर से मुझ पर पागलपन का दौरा पड़ने लगता । मुझे अपनी पोशाक निहायत दुलमुल और मैली लगती। बाल गुत्थमगुत्था जिन्हे में अनजाने अपने हाथा से नोचता रहता। इसी तरह अपने हाठ मोटे-मोटे और झूलते-झूलते जान पड़ते। मुझ ऐसा भी लगने लगा कि अगर यही सूरते-हाल रही तो सचमुच एक दिन म पागल हो जाऊँगा। करीब दस दिन बाद मैंने उसी, लायलपुर से विस्थापित शरीफजादे को बुलाया। शुरू से आखिरी दिनो तक की दास्तान कह डाली जिसके मुतअल्लिक पहले मै यह मानकर चल रहा था कि ऐसे तकलीफदेह वाकियात को पूरी तरह भुला देना ही जीवन जीने की जरूरी शर्त है। मैंने उस शरीफजादे को यह भी बताया कि दो-तीन बार ता दगई हमारे उस सुनसान इलाके मे भी आ पहुंचे थे। हम कैसे बच पाए, हमीं जानते हैं। क्या मेरे लिए यह बेहतर न रहता कि औरा की तरह मैंने भी शुरू मे ही लाहार छोड दिया होता? जब वक्त हर तरफ से सुलग रहा था तो ऐसी खौफजदा फिजा मे मैं उस भुतहे हॉस्टल मे पाँव फंसाए मौजूद था तो इसकी असल वजह दीगर रही होगी, जिसे पूरी तरह दूसरे तो क्या मै खुद ही आसानी से नहीं समझ पा रहा था। उन बच्चो के साथ अब ज्यादा हेल-मेल हाने से मेरे सामने किसी धुध मे से उभरकर कोई चीज सामने आना चाहती थी, पर सब-कुछ गोलमाल और अस्पष्ट । कौन- लुटे हुए दिन |123
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" 'दखा, है ना मुसलमान "जाओ बच्चो । भगवान तुम्ह हमेशा राजी-खुशी रखे।" "देखा हिन्दू है। है ना?" "मर जाओ। तबाह हो जाओ। जो भी हूँ, पर शक तो न करो। मेरा क्या उस शख्स ने आगे बताया। सब चले गए। मगदूडिया सुबक-सुबककर रो रहा था। मैं अपने दा दास्तो के साथ वहाँ मौजूद था। भीड को नही समझाया जा सकता। हम तीना ने मगदूडिया को उठाया। उसे चाय-नाश्ता कराया। उसे फिर से हँसाने की कोशिश करने लगे। इस छोटी-सी घटना को सुनने के बाद मेरे समूचे शरीर मे बवडर पैदा हो गया। अपना आपा खो बैठा। मेरे अन्दर जैसे मगदूडिया ने प्रवेश पा लिया। थोडा सतर्क होकर सोचता तो यही खयाल आता कि हिन्दू या मुसलमान की बनिस्बत आदमी पहले बाप होता है। फिर से मुझ पर पागलपन का दौरा पड़ने लगता। मुझे अपनी पाशाक निहायत दुलमुल और मैली लगती। बाल गुत्थमगुत्था, जिन्हे म अनजाने अपने हाथा से नोचता रहता। इसी तरह अपने होठ माटे-मोटे ओर झूलते-झूलते जान पडते। मुझे ऐसा भी लगने लगा कि अगर यही सूरते-हाल रही तो सचमुच एक दिन मैं पागल हो जाऊँगा। करीब दस दिन बाद मैंने उमी, लायलपुर से विस्थापित, शरीफजादे को बुलाया। शुरू से आखिरी दिनो तक की दास्तान कह डाली जिसके मुतअल्लिक पहले मैं यह मानकर चल रहा था कि ऐसे तकलीफदेह वाकियात को पूरी तरह भुला देना ही जीवन जीने की जरूरी शर्त है। मैंने उस शरीफजादे को यह भी बताया कि दो-तीन बार तो दगई हमारे उस सुनसान इलाके मे भी आ पहुंचे थे। हम कैसे बच पाए, हमी जानते हैं। क्या मेरे लिए यह बेहतर न रहता कि औरो की तरह मेंने भी शुरू में ही लाहौर छोड दिया होता? जब वक्त हर तरफ से सुलग रहा था तो ऐसी खौफजदा फिजा मे में उस भुराह हास्टल मे पाँव फैसाए मौजूद था तो इसकी असल वजह दीगर रही होगी, जिसे पूरी तरह दूसरे तो क्या मै खुद ही आसानी से नहीं समझ पा रहा था। उन वच्चा के साथ अव ज्यादा हेल-मेल होने से मेरे सामने किसी धुध मे से उभरकर कोई चान सामने आना चाहती थी, पर सब-कुछ गोलमाल और अस्पष्ट। कौन- लुटे हुए दिन 123 सा अमीर ओर कौन-सा बच्चा। साचता-अगर यह सब सच न निकला, तो भी क्या ? आखिर इन्सानी फर्ज भी तो काई चीज हाती है। फिर मेरा क्या था। अकेली जाना हाँ अकेली जान। सात-एक साल पहले मरी तगहाली से और मेरी टाका-टाकी के बीच सरला ने मुझे छाड दिया था। तब वह पेट से थी। मैं दा-तीन जगह पार्टटाइम काम करके बमुश्किल गुजारे लायक कमा पा रहा था। इतने कम पेसा को लेकर हम दाना म चिक-चिक चलने लगी थी। मैं उस बताता कि वक्त आने पर मुझे बडी नौकरी मिलेगी जरूर । उसका जवाब हाता-नवाबी ता नहीं? सरला अपूर्व सुन्दरी थी ओर महारानिया की तरह रहना चाहती थी। बाप उसका किसी जमान का मशहूर उद्यागपति था मगर घाटा खाकर निचले स्तर पर आ पहुँचा था, इसलिए मजबूरी म मुझ पढे-लिखे होनहार पर लगभग बेरोजगार युवक से अपनी लडकी की शादी कर दी थी। लडकी कुछ समय तक ता आदशवाद सिम्पल लिविंग हाई थिकिग की बात करती हुई अपनी शारीरिक भूख मिटाती रही मगर वक्त थोडा आगे सरका तो उसकी पुरानी महत्त्वाकाक्षाएँ उभरकर सामने आने लगी। बचपन मे लाड-प्यार से पली-खेली लडकी मुझे निकम्मा, जमान क साथ न दाड पानेवाला आलसी कह-कहकर ताने देने लगी। फिर मेरे मना करने के बावजूद सऊदी अरब के एक अमीर के व्यापार मे खुद को पार्टनर कहकर दूसरे मुल्का के दौरा पर जाने लगी। फिर मेरे पास लोटकर नहीं आई। एक शाम की बात है। मैं ऐसे ही बेदिली से टेवल-लैम्म जलाए मेज पर झुका काई पुरानी फालतू फाइल देख रहा था कि तभी अचानक एक ओरत की आवाज सुनाई पडी। वह दरवाजे की आट लिये बोल रही थी-"आप तो बडे आहदेदार ओर दानिशमद है। सुना है आप तो बच्चा के साथ खाना भी तब्दील कर लेते है। इतनी मुहब्बत कहाँ से जाग गई।" "ऐसे ही ।" मैं अटककर रह गया। 'आपका असती प्लान क्या है सब समझती हूँ। महबूब ने मुझे तार दिया ता सारे के सारे काम बीच मे छाडकर भागी आई।" 'तार तो मैंने भी दिया था फ्रास "वनिए मत। हम ता कब से फ्रास छोडकर कराची आ गए थे पर वेहद मसरूफ थ। लेकिन आप बताएँ, अब तक किस फिराक में यहाँ पर टिके हैं।" "सिफ बच्चा की खातिर।" "वच्चा का पुलिस या कलैक्टर के हवाले कर सकते थे। हमने उनसे वात 124लुटे हुए दिन कर ली थी। अब यह हमारा मुल्क है।" "मैं ऐसा नहीं कर सकता था।" 'असली मशा में समझती हूँ। कोन अपनी जान को जोखिम में डालता " दिल किया नाच खाऊँ उस अहसान-फ्रामाश औरत का जा नवावी लिबास में धीरे-धीरे मेरे सामने आकर खडी हो गई थी। कमरे में अँधेरा था। मैने झट बटन दबाकर बडा बल्ब जला दिया। एक विजली-सी कौंध गई। उसने भी मुझे पहचान लिया पर अनपहचाना कर दिया-"अब जाइए अपने मुल्क।" वह चीख पड़ी। वह आगे बरामदे की तरफ बढ़ गई। बच्चा को सख्ती से पकडकर साथ ले जाने लगा। "रहम कीजिए और बताइए कि आप किस वच्चे की माँ है और किसकी चाची ?" मै गिडगिडा रहा था। उसने कोई जवाब न दिया बल्कि हिकारत-भरी निगाह, मुझ पर डालकर पर ली। बच्च लगातार मुझसे चिपटे ऊँची आवाज मे रोए जा रहे थे-"सर हमारे साथ रहेगे।" वह बडबडाती हुई उन्ह और मुझे कास रही थी और बेदर्दी से बच्चा का खींच-खींचकर मुझसे अलग कर रही थी। फिर भद्दी गालिया तक उतर आई थी। मैंने रुआंसी आवाज म एक दफा फिर कोशिश की-"कौन-सा मेरा है। मरे जिगर का टुकडा? बता दीजिए प्लीज। वैसे मुझे दानो ही प्यार लगत हैं । फिर भी प्लीज।" "शट अप यू वास्टर्ड । गो टु हेल" वापस दनदनाती हुई आवाज गिरतो हुइ विजली की कौंध की तरह । सामान तो वह पहले ही महबूब से बँधवा चुकी थी। दाना मिलकर बच्चा का घसीट ले गए। मैं सारी रात बिलखता रहा। सुबह डाइनिंग टयल पर अकेला था। खाली प्लट और वही आवागे-यह लीजिए न सर। सर, अपनी रकायो जरा इधर सरकाइए ता। मैं चाहता था कि में पाकिस्तान में हो बस जाऊँ ताकि मौके-यमोंक हबीच और शमीम का देखभर लिया करं। क्या पता कभी हवस पूरी हाने पर या का लुटे हा दिन [125 ठोकर लगने पर उस औरत का दिल पिघल जाए। लेकिन अब अफरा-तफरी का आलम, और आग उगल रहा था। मेरे लिए वहाँ पर और टिके रहना गैरमुमकिन हो उठा था। किसी तरह खुद को बचाता हुआ यहाँ अमृतसर आ पहुंचा था। यहीं से मुझे बहुत पहले से बुलावे आ रहे थे। जिस दास्तां को लम्बो मुद्दत तक दामन तक आने की इजाजत नहीं देता था, वही सारी दास्ताँ सर आप-से-आप वेग-गति से उस नेकदिल इन्सान के सामने बह निकलो। गर्दन उठाकर देखा तो वह मेरी पीठ सहला रहा था और दूसरा हाथ मेरे चश्मे के नीचे रखे हुए था। मुझे हौसला देते-देते उसका स्वर द्रवित था- "सोचिए, अब यह वाली तकसीम आपके लिए क्या मायने रखती है ? यहाँ पर बहुत सारे प्रीतपाल हैं और बहुत सारी सरलाएं मिलेगे।" 126 लुट हुए दिन
देखा जाए तो पाँच बरस कुछ भी नहीं
अंदर
शोर
कैसा
होते लेकिन सैन्य जीवन के लिहाज से गौर
करे तो पाँच बरस बहुत-कुछ होते हैं।
निरतर आगे बढ़ने की चाह थोडा
रिस्क, थोडा एडवेचर और जिंदगी को
चराबर बारीकी से जानने-समझने की मेरी
उत्कट इच्छाशक्ति ही शायद मुझे इस ओर
खींच लाई थी। मेरी नियुक्ति ब्रिगेडियर के
पी०ए० के रूप मे हो गई।
हर अफसर का मनोविज्ञान समझने
की मेरी अद्भुत क्षमता के कारण मैं हमेशा
उनका विश्वासपात्र बना रहा इसी कारण
अपने साथिया के लिए ईर्ष्या का कारण भी।
सभी यही कहते कि इसके पास जादू-टोना
है जो सभी अफसर इसी का अपने साथ
रखना चाहते हैं। अदर से जले-भुने लोग
ऐसी-ऐसी बाते भी कह डालते जो खुलेआम
शालीनता का उल्लघन होती-हाँ भाई
शरीर ही ऐसा नाजुक है अफसर को साथ
बैठाने को लडकी नहीं मिली, इसे ही ले
लिया।
-वाह प्रियरजन। सख्त से सख्त
अफसर भी तेरे आगे-पीछे रहते हैं। भई हमें
भी सिखाओ यह मोहिनी-मत्र।
--अरे छोडो यार, यह ठहरा अव्वल
de
अदर शोर कैसा है|127
- दर्जे का चापलूस। इतने नीचे हम हरगिज नहीं गिर सकते। उक्त को तब्दीली के साथ उतराव-चढाव आर तरह-तरह के दौर चलते हो रहत है। फिर अचानक एक दिन 'बिगडियर एस० एन० सुखानी यहाँ आ रहा है' इस खबर के साथ पूरी रेजीमट का माहौल सहम-सा गया। ब्रिगेडियर एस०एन० सुखानी हिटलर का पयाय था। सहमने के बावजूद, मुझे लेकर, कुछ साथी खासे खुश थे-~ला वन्य, खूब ऐश कर ती। अब हागी असली परेड। इस पटाकर दिखाना ता तरा सिक्का मान लगे। अल मजा आएगा। साहय का अपना आदमी। मने भी सुन रखा था किसी यमदूत का अवतार है एस० एन० । मशहूर यह भी था कि भृत की तरह है। न एक मिनट खुद चेन से बेठता हे न दूसरे को बैठने देता है। आरा का परेशान देखकर उसे लुत्फ आता है। सैडिस्ट। मेंने अपने-आप से कहा तो क्या हुआ बेटा। तू तो नित-नए अनुभव चाहता था। एडवेचर का तलबगार है। पहले खूब ऐश कर देखी। अब किसी कसाई की खिचाइ ही सही। घवराता क्यो है? ये बडे अफसर जल्दी-जन्दी ट्रासफर हाते रहते है। तेरा भी तो इस बीच ट्रासफर या प्रमोशन हो सकता है। चिन्ता की क्या बात है। परड-ग्राउंड म बैंडबाजा को धुन। सेल्यूटा की अनुगूंज । सलामी गारद का निरीक्षण { अटेशन । राइफ्ला पर हथेलिया की थप-थप। मैदान मे बूटो की उक- ठका मगर अदर से सबकी बालती बद। एक दहशत। तूफान आने से पूर्व की सामाशी। कैंपकंपी। सर्दी मे भी वर्दिया में चिपचिपाहट। फिर पूर्व-ब्रिगेडियर दादू स्वामीनाथन को भी विदाई हुई। तोपा का रस्मी सलामी। कई-कई पार्टियो का आयोजन। पूरी ब्रिगेड के सभी कर्मचारिया का वास्ता तो एस०एन० सुखानी से समय- समय पर पडना ही था परन्तु मेरा साथ तो चौबीस घटा का था। मैं ऊपर से पूरी तरह होशियार सतर्क मजबूत, लेकिन अदर से थोडा- थाडा हिला हुआ भी जरूर था। पर किसी को शिकायत का मौका ही क्या दिया जाए? चौडा माथा फूले हुए लाल-लाल हात । गाला पर माता के कुछ दाग। खूखार होगा अपने काम मे ढिलाई बरतनेवाला के लिए। समय पर आआ समय पर जाओ। जरूरत पड़ने पर फौरल रिपोर्ट करो। शॉटहैंड की स्पाड वढिया है। टाइप सिर्फ अच्छी ही नहीं मातिया-सी चमकती है। फिर डर किस बात कारखा ता नहीं जाएगा। तो भी मरे सामन ही नहीं दुनिया के र सिविल और [128 अंदर शोर कैसा है आर्मी का अतर शीशे की तरह स्पष्ट है। एक बार तो यहाँ सारे कायदे-कानून धरे रह जाते हैं। तब क्या नौकरी छोड़ भाग जाऊँ? यहाँ यह भी इतना आसान काम नहीं है। अगर हमारी रेजीमट में बवडर ही आन पहुँचा है तो मुझे इसका मुकाबला बहादुरी से करना होगा। साफ है कि इतनी सारी सोच, अपने से तर्क-वितर्क ही किसी का दिमाग खराब करने के लिए काफी होते हैं। और किसी पर पडा हो न पडा हो, मुझ पर एस०एन० का दौरा पड़ा हुआ था। कस-कसकर माजे पहनता । बूटा पर पॉलिश खुद करता । वर्दी-प्रेस का निरीक्षण करता। बेल्ट-बकल्ज को वासा से चमकाता। साहब के चैम्बर मे जाने से पहले छह बार अपने बैजा-बटना को परखता। 'मे आई कम इन सर' के साथ जरा-सा रुकता-झुकता। 'आह प्लीज कम' उत्तर मिलते ही पाँव अदर रखता। सैल्यूट लगाता। वे मुसकराते । बैठने के लिए कहते । डिक्टेशन लेता। हर कायदे-कानून का पालन करता हुआ, अपने कमरे में आ काम में लग जाता। जब तक काम खत्म न हो, वहाँ से हिलता नहीं। इजाजत लेकर ही घर जाता। ब्रिगेडियर साहब कभी-कभी घर पर भी फान कर दते। कुछ हिदायत देत । काम की प्रगति पूछत। अगल रोज क कायक्रम समझात ओर फिर कुछ समय बीतन पर यूँ ही फोन कर देत। मेरा तथा बच्चा का हाल-चाल पूछ लत। मैं धीरे-धीरे तनावमुक्त होने लगा। फिर भी सतर्क हरदम तो रहता ही। कहीं काम मे ढील न हो। अनुशासन भग न हो। कभी वे विगड गए तो किए- कराए पर पानी फिर जाएगा। मैं टु द प्वाइंट बोलता। यस सर, यस सर! एज यू प्लीज' जैसी शब्दावली का प्रयोग करता। वे मुसकराते रहते। आदमी कोई काम करेगा तो गलतियां होती ही हैं। मैं जब भी कभी अपनी किसी चूक से अवगत होता तो थर्रा जाता कि शुक्र है ब्रिगेडियर साहब की नजर इस पर नहीं पडी। उनकी गिरिफ्त से मेरी तमाम भूले छूटी जा रही हैं। मगर एक रोज मैंने पाया कि कुछ टाइप की अशुद्धियाँ तथा कुछ तथ्यात्मक आँकडा को उन्हाने अपनी कलम से ठीक किया हुआ है। जरूर ऐसा पहले भी कई बार हुआ होगा। परन्तु उस कच्चा चबा जानेवाले दैत्य ने मुझे एक लफ्ज भी नकहा। धीरे-धीरे मैं बहुत सहज होकर पहले की तरह जीने लगा। सबने कहा 'लो इसे भी कब्जे मे कर लिया। तब मैंने उनसे पूछा-"बताइए, उन्हाने और किस-किस को तग या परेशान किया है?" एकबारगी सभी सोच में पड़ गए। अदर शोर कैसा है|129 सूबेदार भडारी बोले-"बात तो ठीक कहता है। कोई शान नहीं, किसी किस्म का घमड नही। हमारी तमाम पार्टिया में आत हैं। सबसे हाथ मिलात है। हँसते-मुसकराते है। एक बार तो सबसे गीत या गजल सुनने के बाद प्यानो की धुन पर खुद एक गमगीन नगमा गाकर सुनाया था- पता कहाँ था हमें, क्या होनेवाला है। हसी ख्वाबो का बाग उजडनेवाला है। कहाँ तो साचा था यूँ ही बढे जाएंगे। नहीं खबर थी, कारवाँ ढहनेवाला है।" जैसाकि अकसर होता है, बडे लोगा के बारे में सुनी-सुनाई बातो या अफ्वाहा का सैलाब अधीनस्थ कर्मचारिया को घरे रहता है। जब-तब जहाँ-तहाँ ऐसी चचाएँ, परिचर्चाएँ सुनाई देती-'सुना है कि भाई, हमने तो यह भी सुन रखा है कि घरेलू परेशानिया मे मुलला हैं। मेम साहब बीमार रहती हैं, इसीलिए किसी फाशन-पार्टी मे साथ नहीं लाते। ऊँह किसी की नजर न लग जाए। सुना है बहुत सुदर हैं । ज्यादा बटर-शटर मत किया करो। किसी ने अगर चुगली खा ली और उनका गुस्सा लौट आया तो बच्चू, किसी की भी खैर नहीं। फिर बहस- मुबाहिसा ठडा पडने लगता। धीरे-धीर मरे साथ उनक सबध एकदम दास्ताना हो चले थे। हाथ मिलाना व्यग्य कसना बदले में मेरे व्यग्य के जवाब में उनका 'हा-हा' कर हँसना मुझे बहुत भाता। फिर एक दिन सुबह सात बजे बुलाया था। मैं कुछ लेट हो गया तो याले- 'क्या रात का लगता है कुछ ज्यादा हो जश्न मनाते रहे।" इस पर मेरे मुंह से निकला-"सर आप तो मेम साहब का रात तक की पार्टिया में नहीं लाते । कहीं हवा न लग जाए।" सहसा वे मौन हो गए। मैंने प्राथना क स्वर में कहा-"कभी हमारे यहाँ लेकर आइए ना" अय की उनका चेहरा उतर गया। थोडे वक्फे से बोले-'तुम नहीं समझाग मिस्टर।" और फिर चुप्पी। मैंने ज्यादा कुरेदना उचित नहीं समझा। उन्हाने कॉफी मंगवाई। हम दाना बिल्कुल चुपचाप कॉफी सिप करते रहे। अफसर शाम को जय खाली होते मुझे फान करता कभी पहले से हो शाम का मिलना तय राता। एक दिन को यात है। उस शाम भी हम दाना को कुर्सियां मैस-लॉन म रागा 130अदा शारजाई " थीं। थोडी-थाडी देर मे बेयरा तली हुई मछली और भुनी हुई कलेजी ला रहा था। साथ ही चल रहे थे पैग दर पैग। आज उन्हाने कुछ ज्यादा ही पी ली थी। "सर, अब चला जाए।" 'क्या सर-सर लगाए रहते हो। तुम हमारे पक्क यार हा। नौजवान, इमानदार हाशियार, सबका भला चाहनेवाले नेकदिल इन्सान, अपनी कपनी देकर हम आब्लाइज करते हा 'यह तो आपका वडप्पन है । पर एक बात "मैं रुक गया। "डरते हो पूछते हुए अब भी हमसे सभी डरते हैं, क्या ? पूछो-पूछो, जा जी म आए।" 'क्या आप ही ब्रिगेडियर एस०एन० सुखानी हैं जो दक्षिण भारत की कई छावनिया मे रहकर श्रीलका चले गए थे। आपके नाम से पूरी रेजीमेट के लोगा के दिल दहल जाते थे। अब यहाँवाले कहते हैं जरूर व काई दूसरे एस०एन० सुखानी हागे।" "मै ही वही कमीना सुखानी हूँ।" और साथ ही अपने आपको एक ओर भद्दी गाली। "ऐसा कैसे बोल रहे हैं साहब?" "बिल्कुल ठीक बोला हमन । आआ मर साथ तुम्ह अपनी हरामजदगी दिखाऊँ।" ठीक इसी वक्त उन्हाने मेरा हाथ पकडा। लगभग घिसटता-सहमता हुआ मै उनके साथ सीध उनके बेडरूम तक जा पहुंचा। सिरहाने पर मुंह औंधा किए औरत की मिसकी को-सी आवाज सुनाई दे रही थी। "लो देख लो अपनी माँ को।" मैं ओपचारिकतावश उनके निकट पहुँच गया तो वे उठकर मुझे चूमने लगी-"आ गया रे मेरा सुधाकर। बैठ जा मेरी गोदी मे।" "बहुत हा लिया लाड । अब बस करा।" फिर से मेरा हाथ पकडे वे बाहर आ गए। पीछे से बहुत दर्दनाक सिसकियाँ सुनाई पडीं-"मेरे पास क्या नहीं रहता सुधाकर? कहाँ चला जाता है?" वे मुझे रात एक बजे तक सुनसान घाटियो और पहाडिया पर घुमाते रहे । रुक-रुककर थोडी उखडी हुइ साँस के साथ अपने अतीत की तरफ लोटते रह- "सुन रहे हो ना यगमैन । आज तुमसे कुछ नहा छिपाऊँगा। आह कितना बडा बाझा है मन पर। आज उतार दूंगा। ठीक कहती है पावती । मैं हा उसको दुगति का कारण हूँ।" अदर शोर कैसा है। 131 न चाहते हुए भी मेरे मुंह से निकला-"तब तो वे भी आपकी क्रूरता की शिकार रही हागी?" "नहीं। उसे, सिर्फ उसे ही मैं पागलपने की हद तक चाहता था। उसे कहीं भी साथ न ले जाता । कोई उसकी सुदरता को नजर-भर देख न ले। मेजर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल कोई भी आएं-जाएँ, उसकी बीमारी का कहकर माफी मांग लेता और ट्रेजेडी देखा, आज उसको विक्षिप्तता के कारण उसे घर मे बद रखता हूँ।" फिर से वे पावती के गुणो, सुन्दरता और अपने अनुराग-आसक्ति का वखान करते-करते रोमाटिक-से होने लगे-"हाय इतनी सुन्दर हूर परी, मगर जो चेहरे पर झुर्रियाँ देखते हा वह उम की वजह से नही झझावात के कारण से आई तभी दूर से शाति भग करती हुई गिरजाघर को बारह घटियाँ सुनाई दी। मैंने भी अपनी कलाई-घडी की तरफ निगाह डाली। "होसला रखो। बस अव मेन स्टोरी पर आता हूँ-हाँ, मेन स्टोरी, ओर आज ही खत्म कर डालता हूँ। कल का क्या भरासा कह पाऊँ या न कह पाऊँ। श्रीलका की ही घटना है। तब हमारी वटालियन ने वहाँ पडाव डाल रखा था। बहुत याद में हिन्दुस्तानी फौज को वापस बुलाया गया था। तब भी मुझे वही कई इन्क्वायरीज वगैरह की वजह से रुकना पड़ा। मेरे खिलाफ होना- हवाना तो क्या था, इस बात को मैं भी समझता था और सारा स्टाफ भी। औपचारिकताएं पूरी करनी थीं। कर ली और अब यहाँ हूँ। खैर, वहाँ पर भी मेरा पहले जैसा ही आतक था। एक दिन जब दफ्तर से लौटा तो बहुत सकोच के साथ पार्वती ने कहा-'इस सतरी को गेट से हटा दीजिए।' वजह पूछी तो उसने टालने की कोशिश की। मैं गरम हो उठा तो वह डर गई। बड़ी मुश्किल से उसने बताया-'जब मैं कभी लॉन मे होती हूँ या बरामदे मे आती हूँ ता दूर गेट पर खडा-खडा वह हाथ के इशारो से अश्लील हरकते करता है। पहले भी एक-दो बार' और आज भी।' उसकी बात बीघ मे छोडकर में उसी दम दनदनाता हुआ फाटक पर जा पहुँचा। झापडो और बूटा से उसका कचूमर निकालने लगा। वह कहता रह गया- 'आपके पाँव को धूल ही तो हूं। पर कसूर ता पता चले।' मैंने गालिया की बौछार के बीच उसके हाथा को भी झटका कि इनसे क्या इशारेबाजी किया करता है? घडी मुश्किल से वह कुछ समझने की स्थिति में पहुंचा-'ऐसे कैसे कर सस्ता हूँ साहब । वह मेरी मां हैं वहन हैं हम सबकी इज्जत हैं। यह ता सिर्फ [132] अंदर शोर कैसा है सत्यानाश हो जर्दे-चूने का। हथेली पर कभी फाँक तैयार कर लेता हूँ।' मेरा गुस्सा ऐसा था ही नहीं जो ठडा पड जाए। सब-कुछ सुन चुकने के बावजूद, मैंने उसका कोर्ट मार्शल करा दिया। इतना कह चुकने के बाद एस०एन० कुछ देर के लिए चुप हो गए, आसमान के तारो का देखने लगे जैसे उस सतरी को ढूंढ रहे हा। फिर वे आगे बोले-"उस सतरी का नाम नेतराम था। उसका इकलौता बेटा कई रोज से बीमार चल रहा था। बाप के बारे में सुनकर उसकी दशा और शाचनीय हो गई। बापू-बापू चिल्लाते- चिल्लाते एक दिन उसका गला बैठ गया और वह चल बसा।" ब्रिगेडियर साहब ने लबी साँस खींची। वे टुकडो-टुकडा मे अपनी बात पूरी कर रहे थे जैसे कहते हुए तकलीफ हो रही हो। नेतराम आखिरी वक्त बेटे को न देख पाया था। इसका उसे इतना मलाल हुआ कि वह दीवाना की तरह इधर-उधर डोलता फिरता। इतना ही नहीं, उसकी घरवाली टी०बी० की मरीज थी। इस हादसे के बाद दीवारो पर सिर दे मारती। या तो वह अपने या पति की रिहाई के दिन गिन रही थी। नेतराम का कोर्ट मार्शल खत्म हुआ तो दूसरे रोज वह भी चल बसी। फिर क्या था। नेतराम सरेआम मुझे गालियाँ देता फिरता। थूकता और चिल्लाता-और करो मेरा कोर्ट माशल। पाँचव रोज की बात है। हमारा लडका सुधाकर नजदीक के बंगले से अपने किसी साथी की वथडे-पार्टी अटैण्ड करके रात को पैदल टहलता हुआ घर लौट रहा था कि पीछे से किसी ट्रक ने टक्कर दे मारी । वह वहीं खत्म हो गया। सुनसान रात। हमारा अपना कैंटोनमेट एरिया। पर कौन-सा ट्रक था जो हवा की रफ्तार के साथ हवा हो गया? रहस्य। पर कैसा रहस्य ? मेरा पूरा शक नेतराम पर था। पर सुबूत? वह तो दीवानगी की वजह से अस्पताल मे भरती था। हो सकता है डॉक्टर भी साथ मिला हुआ हो। मेरे सताए हुओ की गिनती कम न थी। हा सकता है, सारे जवान भी उसके साथ मिले हुए हो। जैसे पूरा का पूरा जहा यहाँ तक कि इश्वरीय सत्ता भी नतराम के साथ मिल गई हो सबने एक-साथ मरे खिलाफ बगावत छेड दी हो। का रोज तक सवेदना प्रकट करनवाला का तांता बंधा रहा । मुझे और मुझसे ज्यादा पावती को लगता कि यह सब ढाग है तमाशा है। मन ही मन सव खुश हैं, मुसकरा रहे हैं--'अच्छा हुआ। अच्छा हुआ। इसके साथ ऐसा ही होना चारिए' की रट लगा रहे हैं । नेतराम भी आकर बैठा। आंसू बहाता रहा। नाटक करता है साला। पर पार्वती ने कहा-'नाटक किस बात का? इसके घर तादा-दो मौते हुई हैं।' - अंदर शोर कैसा है/133 'मैं इसे फांसी पर चढा दूंगा।' 'अय की बिना सुबूत के कुछ मत करना। सुधाकर के असली कातिल तो आप हैं। उसे क्या, अपने को सजा दीजिए, अपने को पुत्र-वियोग मे ऐसा विलाप करने लगती कि मुझ सदिल का कलेजा भी फटने लगता। मामले की तह तक जाने के लिए मैंन पूरी लामबदी कर दी।" फिर आगे क्या हुआ-यह मैंने नहीं पूछा। ब्रिगडियर ने ही मेरे मुँह की तरफ गार करते हुए कहकहा लगाया। वे अपने कोट की जेब मे छोटी बोतल संभाले हुए थे जिसमे से रह-रहकर थोडी-थाडी चूस लेते थे-"तुम्हे मजा आ रहा है ना सुनने में कितनी इट्रस्टिंग स्टोरी है। क्लाइमक्स तक पहुंचते-पहुंचते और मनोरजक कथा बन जाएगी, देखना।" "मैं जानता हूँ। अब घर चलिए।" मैंने उनके हाथ से बोतल खींचकर दूर नीचे घाटी में फेक दी। फिर उनके हाथ को जोर-जार से झटके देता हुआ खींचने लगा--"अब लौट चलिए।" "अरे देखो तो सही आगे घटनाएं कैसा शानदार मोड लेती हैं। पाँचवे या सातव दिन की बात बताता हूँ। रात को पूरे कैम्पस की विजली एकाएक गुल हो गई। मैस मे चहल-पहल बहुत कम हो चली थी। एमरजेसी लाइट जली इसा बीच सन्नाटे को चीरती अजीबागरीब रोने या हँसने और धडाम से कुछ गिरने की भयानक आवाजे पेदा हुईं, और सव शात । मैस की तीसरी मजिल से नेतराम ने छलाँग लगा ली थी। और इसके तीसरे रोज डाक से मुझे एक लिफाफा मिलता है-अब जीने का काई मकसद वाकी नहीं बचा। जब बीवी भी साथ छाड गई ता मकसद कैसा? हाँ एक चाह थी-तुम्हे और तुम्हारी बीवी को, अपनी और अपनी घरवालो की हालत मे देखने को। देख लिया बिलखते हुए। मन खुश हो गया। मन रो उठा। मकसद पूरा हुआ। एक बहादुर की मौत मर रहा हूँ। हिम्मत हो तो ऐसी बहादुरा तू भी करके दिखा। सचमुच रश्क हुआ नेतराम की बहादुरी से। मगर मेरो बुजदिली मेरी पार्वती मेरे सामने थी। बस अव यहाँ पर आकर सोचता हूँ किसके लिए जोना है? उसके लिए जो मुझसे नफरत करती है? मेरी सूरत तक देखना पसद नहीं करतो? मुझे कातिल-कातिल कहकर पुकारती है ? गश खाकर गिर जाती है ? उसके लिए मेरा हाना न हाना बराबर है। देखा जाए तो मैं कौन-सा जिंदा हूँ। और बताऊँ? प्राय दूसरे-तीसरे दिन अचानक किसी भी वक्त दिन मे या रात मे मुझे खाली देखकर, नेतराम आ उपस्थित होता है और पूछता है-क्या अभी तक जिंदा हा? । [1341 अंदर शोर कैसा है
इससे पहले कि कोई माकूल जवाब ढूँढूँ, वह विलुप्त हो जाता है, ठहाका लगाता
हुआ हा हा, हा। मैं उसे यही तो कहना चाहता हूँ कि मैं जिंदा कहाँ हूँ। है
ना"
मुझे सब पता चल गया था कि आगे क्या होने वाला है। इसके लिए सतर्क
था। इस नाटक का पटाक्षेप, दु खातिकी में परिवर्तन न हा, इसकी पूरी तैयारी कर
चुका था।
अपनी बात खत्म करत ही वे, जैसे ही पहाडी से कूदन को हुए, मैन फौरन
आगे बढकर उन्हे अपने मजबूत हाथा मे जकड लिया। एक साथ चार-छह झटके
दे मारे।
लौटते हुए उनका नशा खत्म हो चला था-"
"अरे, मैं यह क्या करने जा रहा
थाm
"फिर से एक अच्छे इन्सान की हत्या । यकीन रखे, पार्वतीजी को सुधाकर
मिल गया। उन्हे अब कुछ नहीं होगा।"
आगे बहुत-सी रोशनी दिखाई देने लगी थी।
अंदर शोर कैसा है|135
बेशमार भीड। सडक के इस पार उस
पार। हुजूम का हुजूम उमडा पड रहा था।
नाराज चिंघाड थी। होसले बुलद थे।
तमाम खतरा को उठा लने की कुव्वत थी।
जान पर खेलकर कुर्बानी देनेवाले जवा-मर्द
थे।
देखते-ही-देखते, हर तरह के लागे
आ धमके थे-शरीफ बदमाश मजा
लेनेवाले।
कुछ लोगो के मुताबिक तो ये
चिंघाडनेवाले नारे लगानेवाले लडके मजा
वेमजा करनेवाले थे। काले दिल के। मैले
दिल के, नालायक निकम्मे, लफगे, फालतू
फड के कत्लेआम तक की धमकिया से
माहौल को गर्मा देनेवाले बेमुरव्वत
अडगेबाज।
दूसरी तरफ ऐसे फतवे जारी करनेवाले
लोग जाबाजा की नजरा मे चापलूस बिके
हुए, नामर्द हिजडे वगैरह-वगैरह थे।
इस टूटी-फूटी लखड बडी-बडी
खरोचा से भरपूर सडक के किनार कोलतार
से भरे ड्रम और बाल्टियां पड़ी थीं। ढेरा
छोटी-बडी लकड़ियाँ और कुछ केरासिन
के पीपे भी लावारिस-से पडे हगामे का
देख रहे थे। नजारा साफ था कि जलती हुई
फ़क़त
तुम्हारे
लिए
136
फकत तुम्हारे लिए
1 आग को पानी डालकर ठडा कर दिया गया था। मगर हर किसी के मिजाज तो गरमा रहे थे। एक तरफ थोडा फासला किए, दो रोड-रोलर किंकर्तव्यविमूढ खडे थे। लाठियाँ थीं। लाठीमार थे। बीच-बचाव करनेवाले। सत कयीरिया को लेकर नारे लगानेवाले । जिदावाद कहनेवाले। मुर्दाबाद कहनेवाले। --इतना ही बड़ा सत था ता मत्री काहे को बना? भगती करता। राजनीति में क्या कूदा सत कबीरिया की जय-जयकार करनेवाला की आवाजे उठ-बैठ रही थीं नेता हो तो ऐसा हो, सत कबीरिया जैसा हो। सभी एक-दूसरे की नजरो मे, निहायत चालाक थे। राजनीति करनेवाले। राजनीति मे भविष्य ढूँढने-बनानेवाले। महाधूर्त। किरकिरी करनेवाले। पक्के बेइमान थे। दश को छीलकर खा जानेवाले। बडे आए न्याय के लिए लडने-मरनेवाले। वाह सडक नहीं बनने देगे। वाप का राज है। मजदूरा की दिहाडी पर लात मारेगे। साले मादर के । इल्जाम-दर-इल्जाम । दोनो तरफ स-एक-दूसरे पर। अडगेबाज। ताडी देनेवाले। रगभग करनेवाले। लफगे। कानून से खिलवाड करनेवाले। नीच कमीन। वहाँ पर मौजूद कई नस्ले थीं। कई किस्मे थीं। कई पीढियाँ थीं । परेशान । पशेमान । गमगीन । नाचीज। नामुराद । नशेडी। तमाशबीन । हाठा के ऊपर खिंची कमान-सी मुसकान । अजामे-सफर ताकनेवाले-जैसे मेले-ठेले में आ खडे हुए हो। अपने-आपका नितात निष्पक्ष, नि स्मृह कहलानेवाले-'अपना क्या है।' दाना ही पक्षा का अपनी-अपनी जगह सही ठहरानेवाले। रोलर ही की तरह कभी इधर ता कभी उधर लुढक जानेवाले। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर । न इस पक्ष मे न उस पक्ष में। न सडक न बनने देनेवालो से हमदर्दी, न सडक बनवानेवाला सत क्बोरिया के पक्ष मे नारे लगानेवाला की हिमायत । सब ठीक ही है। कर लेने दाजो कर रहा है। -सडक का क्या है। इसके लिए काहे का झगडा? बन भी गई तो बारिश पडेगी फिर टूट जाएगी। ---कैसी भी हा सडक तो हर रोज यूँ ही पार हो जाती है। कीचड हो धूल हो चिथडा, पत्तो, टहनियो, रबड टायरो, टूट शीशो, हर तरह के गद-मुद से भरपूर हो या फिर एकदम से चमचमाती चमकीली, मुंह देखने लायक शीशे की मानिंद फकत तुम्हारे लिए 137 -टन-टना - हाँ हाँ, साजन के या सजनी के घर तक हर सूरत तक पहुंचा देती है। सुख मे दुख मे, एक-समान-कबीर-वाणी -बक-बक वद। इनको ठिठाली सूझती है उधर से वे मरने-मारने पर उतारू हैं। - साले खुद चैन से बैठेगे न दूसरा का ढग से साँस लेने देगे। -चुप साले बुढऊ । तुझे भडवे ले जाएँ। -ह-हऽ-हाऽ । झिक-झिक म से निकलती हँसी की पाक । दूर मन्दिर मे बजती घटियाँ-ट साथ मे हवा के चद झाके, जो मोहित करनेवाली स्वर-लहरियो को ढा-ढो कर इधर ला पटकते-मगल-भुवन अमगल-हारी कीर्तन के सुर से सुर मिलाती, पुलसी 'पी-पी' सीटियाँ। साथ ही जीपा के हॉर्न-'पा-पा' हटो। आखिरी चेतावनी। एस० पी० ० साहब । म्युनिसिपिल चेयरमैन । मजिस्ट्रेट । ठुक ठुक अटेनशन । सैल्यूट। ठक-ठक। धाँय-धाय ठॉय-ठाय। हवाई फायर । यह चौथी जमाअत थी, प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त कबूल करवाने वाली- भागा-भागो, भो भो 'बहन के । उस मन्दिर की तरफ से ठडा झाका-सबको सन्मति दे भगवान् ! --मेरे नोजवान दोस्तो। मै यहाँ पर पुलिस अफसर की हैसियत से नहीं आया। आप सय भाई लोग इन चेयरमैन साहब की डिफिकल्टी को भी समझे । हम लोग अदने-से सरकारी कर्मचारी हैं। ऊपर से आए आदेशा का पालन कराना हमारा फ्ज बनता है। फिर आप आप सबकी भी भलाई 'फर्ज बनता है। -हमारी भलाइ या उस -पहले इनकी पूरी बात तो सुन -आला अफसरो और बडे लोगा नेताआ के नाजुक गला को हम हरगिज तकलीफ नहीं होने देगे। ही दोना आप सबकी तरफ से भी कह-सुन लेते हैं। भीड का कूदते-फांदते दा लवे कद के युवक रोड-रालरा पर आमने- सामने खडे दिखाई दिए। --अहाभाग्य। आज खुशनसीबी का दिन । डामर के ड्रम । राड-रालर। अफ्सरा इजीनियरा की चहल-पहल। तामझाम। ठाट-बाट। शानो-शौकत । एफौशसी। प्रमाण-पना, प्रमाशना का झपट लेने की जगत। [138 फकत तुम्हारे लिए - --वाह साथ में कोतवाल साहब सिपाही, यदूक । -जरूरत नहीं थी। तुम्हारे ही घटिया कारनामा की वजह से सबका आना पडा। समझ ला-शराफत नहीं, तो बदमाशी भी नहीं चलेगी। शम आनी चाहिए। -शम-वम बद्तमीजी, बदसलूकी ऊपर नीचे आती है। -तीन साल हो गए, सडक-मरम्मत के लिए गिडगिडा रहे थे। वह मशा आज पूरी हो रही है। अब सडक बन रही है ता खुद ही राह के राडे बनकर खड हा गए। खूब। -हमारी क्या औकात। यहाँ ता छुटभैये नेताआ की गहमागहमी है। शान है। नाम है। नाम नहीं है तो नाम कमा लेने की ललक है। कहते हैं बेइमानी हमसे कोसा दूर है। बदमाशी पर अगर हम उतर आएँ तो दो गेज से ज्यादा नहीं लगेगे पूरे देश का बेड़ा गर्क करने मे। अगर कुछ खाते हैं तो खिलाते भी हैं। फिर भला बचता ही कितना है। भुक्खडा को तो यह बहुत-कुछ दीखता है। अनपढ हैं। जाहिल हैं। -हाँ हाँ यह सब बकवास है। गपशप है। समय-काटू मिक्स्वर है। पीते रहो। जीते रहो। -~अब बद करो बकवास। दोना नीचे उतरो । होश मे आआ। जानते हो हमारा वक्त कीमती है। बहुत ड्रामा हा लिया। अपना भला चाहते हो तो मनी के हाथ मजबूत करो। प्रशासन के काम मे बाधा डालने का नतीजा अच्छा नहीं होता। अब फालतू बोलना बद। -चेयरमैन साहब। इन्हे कह लेने दीजिए। हल्के हो ले। डैमाक्रेसी है। कहो भैया कहा। लकिन मत भूलना कि सडक-मरम्मत जनहित में हो रहा है। --यह सामती-डैमोक्रेटिक दरबार-पूजा है। सत कबीरिया मन्दिर में जाकर पूजा-अर्चना करगे। नई बनी प्याऊ का उद्घाटन करेंगे। उनकी कार खस्ताहाल सड़क से क्या नहीं गुजर सकती? कार मे गद्दे हाते हैं। मत्रीजी के नीच के गद्दे क्या इतने नाजुक हैं कि हिचकाला से पट जाएंगे? हम नही होने देगे यह सब । बाद मे हम सडक पर चलेगे तो लगेगा मत्रीजी की जूठन खा रहे हैं। --इन नोजवाना से तो भगवान बचाए। न जाने कहाँ-कहाँ से मगज-खाऊ विचार लाद लाते हैं। -तीन साला से हर दफ्तर के चक्कर काट-काटकर, फरियाद कर-करके थक गए। कभी बजट का राना। कभी लेबर का राना। कभी मौसम की मार का राना। आज सब राने बद। बस मत्री-गान हा रहा है। -सत कबीरिया-जिंदाबाद! फकत तुम्हारे लिए 1139 । --सत कबीरिया-मुर्दावाद। हाय-हाय। -उस छोटे-से प्याऊ मे रखा ही क्या है। पब्लिक चालाक हा गई है। वाह, यह सडक ठीक करवाने का लासानी नुस्खा। यह तो खैर प्याऊ है गटर तक के उद्घाटन के लिए नेताआ को बुला लेते हैं। वे चले आते हैं। रास्ते-सडक सही हो जाती हैं। अखबारा टीवी मे फोटो। रेडियो मे नाम, नाम, नाम। -राम नाम सत्य है। सत्यानाश हो। --मत्रीजी, लोट जाओ लौट जाओ लौट जाओ। --कैसे लाट जाएँ ? तालियाँ नहीं पिटवानी ? तब जयगान लडकिया से तिलक हार-वार का क्या होगा? -लोट जाओ। लौट जाओ। ~अवसर-कुअवसर को पहचानो। आज सडक ठीक नहीं हुई तो फिर कभी नहीं होगी। पछताआगे। चुनाव अभी दूर हैं। -देखी जाएगा, तीन साल और सही। -तीन साला में कितनी दुघटनाएँ हुई हैं। अगले तीन साला मे ओर क्तिनी हा? सोची 'सोचो। यह वक्त बार-बार नहा आता। दर आई गगा का फायदा उठाआ। --उद्घाटन समाराह, या फिर सडक। एक ही काम-एक वक्त पर एक। बस एक काम। -इनका दिमाग चल गया है एम० पी० साहब। ये लॉडे डैमोक्रेसी का नाजायज फायदा उठा रहे हैं। मजिस्ट्रेट साहब आप ऑर्डर दीजिए। हमे तीन घटा में काम पूरा करना है। बस एक चेतावनी आर। -ख़ब, तीन साल का काम तीन घटा में। -फालतू चीचप्पड बद करा। -यहाँ ता हर एक को हर तरह की आजादी है। हो-हुल्लड मचाने की। गाली देने को। अगले को बालती बद कर देने की। भीड में भगदड मचाने को। गडे मुर्दे निकालने की। कद्र वार करने की। इतनी छूट ता हानी ही चाहिए। डैमाक्रेसी है। लरजती आवाज- रस्मा-रिवाजा म वदलाव क्या न हो। उद्घाटन किसी बूढ पुजारी या पानी पिलानेवाले वाटरमैन वगैरह के हाथा क्या न हो। 140कत तुम्हारे लिए खबरा की सब्जी न सही चटनी ही सही। फोटोग्राफर कदम न रखे। हम तो सही कदम रखने की ताकत रखे। -बस-बस बहुत हो लिया। हमारी शराफत का नाजायज फायदा उठा रहे हो।आप सबका दोस्त बनकर आया था।अपन का पुलिस का अदना-सा सिपाही समझता हूँ। लेकिन एस० पी० समझने के लिए मजबूर कर रहे हो। मजिस्ट्रेट साहब सब देख रहे हैं । लॉ एड ऑर्डर तो मेनटेन होगा ही। आखिरी बार कहता हूँ-लौट जाओ। कपy लगनेवाला है। बदूके हैं। उनमे गोलियाँ हैं। धाय-धाय। --देखो तुम भी इन परिन्दा की तरह उड जाओ। अभी हवाई फायर हुआ -यह सरकार निकम्मी है। -मनी-सतरी वापस जाओ। -नहीं तो टूटी सडक पार कर जाओ। पक्ष-प्रतिपक्ष की नजरा म। हया की दुहाई थी। बेहयाई थी। बेशरमी थी। दगा करनेवाले थे। दगा भडकानेवाले थे। दगा रोकनेवाले थे-दिल से। बेदिली से। बेहिसाब तमाशबीन थे। प्रेस फोटोग्राफर थे। खबरनवीस थे । बाँछे खिल रही थीं। फिर भी सहमे हुए थे। एक-दूसरे से पहले मैटर भिजवा देने की होड थी। डर था--दमा, फसाद न बन जाए। कयूं से खबरे ठडी न पड़ जाएँ। कपy की खबर ही मुख्य खबर होकर न रह जाए। । दूसरे दिन के समाचार-पत्र इन्हीं खबरा से अटे पडे थे। एक से बढकर एक शीर्षक चमक रहे थे-- शहर में रिकॉर्ड-तोड दगा-एक मरा छत्तीस घायल। उनमे से चार पुलिसवाले। तीन सडक-कर्मचारी। बेजान जानो मे जान फूंकने की कोशिश सफल। शर्म का तकाजा-गरमाया माहौल। सडक बेहाल। विवरण कुछ इस प्रकार से छपे थे- फकत तुम्हारे लिए 141 मडक-मरम्मत-काय म याधा पहुंचाने फ जुम म योस लागा का गिरफ्तार किया गया है। इनमें दा यूटे और तीन महिलाएं भी शामिल हैं। प्रशासन के अनुसार गाली चलन से एक की मृत्यु हुई है जयकि आम लागा ने यह सख्या चार पताई है। प्रशासन और आदालनकारिया के योच पाल यहस हाती रही। प्रदशनकारिया का कहना था अगर सडक पतरनाक है तो आज चद मिनटा क लिए मनीगा भी जाखिम उठा सा दूसरी तरफ प्रशासन अपनी जगह अडा हुआ पाकि या उनको तथा मत्रीजी की प्रतिप्ता या प्रश्न है। सइफ टाफ इसी वक्त यन क रहेगा। आखिरकार नहीं समझन पर पुलिस का गाला घलानी पड़ी। एक सपादक महोदय जा अपने को सपादक से ज्यादा सयाददाता मानते थे सवाददाता से ज्यादा कहानी-लखक कहानी-लखक से ज्यादा अपने आपका व्यायकार क प म तरजाह दते ने लिखा था- नगारा देखते ही यनता था। भीड पर भाड घड़ रही थी। येअसरी का आलमा पान की फुहार जैस हाली के रग यदरग। लाठी का रग-ढग। मारा-मारी । ताड-फाइ। पुलिस क नर्म-नम यत। लागा के जिस्म सख्त। उछल-कूद। लाठियां खाते-खात लाठिया पर से यूद जाना। दूर जास्र पत्थर बरसाना। सभी अपन मोचों पर डटे थे। सभी के अपने-अपने निशाने थे अपने-अपने टार्गेट्स जिन्हे वे जल्द से जल्द हासिल कर लेना चाहते थे। अपने-अपन तर्फ थे और अपनी-अपनी व्याख्याएँ। प्रशासन धीरे-धीरे नाप-तालकर एक-एक कदम बढाता हुआ अपने कतव्या का पालन कराता है ताकि किसी इन्चवायरी को जवाबदेही आसानी से कर सकर वह किसी की धौंसपट्टी या चौधराहट चलने की गुजाइश नहीं चलने दे सकता। यहाँ घुडदौड भी हुई थी। स्पीड-नकर ताड डाल गए थे। उधर एक पुलिसमैन भी भीड का उनका भविष्य समझाने पर आमादा था- अगर आप सज्जन मनीजी का दिमाग खराब कर देगे ता तुम लोगा के उलझे कामा, समस्याआ का निवारण कैस होगा? होश में आओ। अगर अपना इस्पात का खयाल नहीं ता मीजी की इज्जत का खयाल क्रो। देश के जितन बड़ मत्री होते है, उतनी ही बडी उनको इज्जत होती है। अगर उनकी इज्जत की लुटिया डूब गई तो तुम सब डूब जाओगे। एम० पी० माहब ने उसे चुप कराया था। दुसरा तरफ कुछ मनचल भागडा नाच रह थ-गारी का गगरिया पतली कमरिया पनघट का डगरिया। आ जा-आ जा-आजा इसी सडक से। - 1342] फकत तुम्हारे लिए । अन्य स्वर चहक रहा था- -बदहवासो बदमिजाज हल्काए हुओ होश मे आआ। जयकारा मारो। अपना कल्याण चाहते हो तो मत्रीजी के हाथ मजबूत करो। ताकि मजबूत हाथा से कैंची चला सक। -~जा जा जा गारी जा. मत्रीजी को तिलक लगा। झापडी का महल बना। एक अखबारनवीस ने एक लीडर के हवाले से लिखा था-- शहर की इज्जत का तकाजा था-पीछे हट जाओ। निष्ठा-सघर्ष का तकाजा था-भिड जाआ। भागो मारो। फिर वापस भागो। चिढाआ। अगले को भागने, हमला करने पर मजबूर कर दी। उन्हे अपनी ही कब्र खोदने पर विवश कर दा। अगर दोना ही तरफ से शमसारी सिर से गायब थी ता बहयाई कैसी? सुना हे इस लीडर को दगा भडकाने के जुर्म मे गिरफ्तार कर लिया गया है। मगर खुलासा यह कि सडक वैसी की वैसी धरी रह गई। सुरक्षा-कारणा से मनीजी का दौरा स्थगित कर दिया गया है। बाद मे एक सक्षिप्त सवाददाता सम्मेलन मे मत्रीजी ने बताया कि कुछ लोग भीतरी तौर पर जलते हैं। लालफीताशाही-कर्म से भी इन्कार नहीं किया जा सकता । एसे नामुराद मारा-कुट्टी के माहौल में न जाकर उन्हाने अधिक खन- खराबे को राकने मे मानवोचित भूमिका का परिचय दिया है। कपy में भाषण सुनने कौन आता? वैसे वे इस नगर के हित मे बहुत सारी लाभप्रद घोपणाएँ करनेवाले थे। जब उनसे पूछा गया कि क्या अब वे घाषणाएँ प्रस के माध्यम से नहीं करगे? तो उनका उत्तर था--नहीं। बिल्कुल नहीं (ले लो मजे)। । फकत तुम्हारे लिए (143
मैं सस
सिर्फ रास्तारी नहीं भटका था बल्कि
कहा यह जा सकता है कि इस विराट ससार
म, मेरी अपने अन्दर की जो इकाई का अश
है, उसके ही काइ पाँव नहीं रह गए थे।
इस हालत में, मैं औरा को चलता
हुआ जरूर दिखता हूँगा, मगर असलियत मे
मैं सासारिक वायुमण्डल को सूक्ष्मतम तरगा
मे तैरता हुआ अपना आधार तलाश रहा
था।
हुआ यह था कि जिस वायरलैस
रिसीविंग स्टेशन पर मैं काम करता हूँ, वही
वहाँ से उठ गया था। वहाँ पर हमारे स्टाफ
का कोई भी व्यक्ति मौजूद नहीं था। हड्डियो
का एक ढाँचा वहाँ खडा था। उसने मुझे
बताया कि वह सिर्फ मेरी ही खातिर वहाँ
खडा है। उसे कट्रोल रूम से भेजा गया है
ताकि मुझे सिर्फ इतना बताए कि ट्रासमिटिंग
रिमोट-लाइन खराब हो चुकी है। यहाँ पर
कम्युनिकेशन सम्भव नही है। इसलिए
फौरन, (फौरन पर उस ढाँचे ने विशेष जोर
दिया था) उस पार के गाँव में-ट्रासमिटिंग
स्टेशन पर मेरी उपस्थिति अपेक्षित है।
एमर्जेंसी लग चुकी है। जरा भी ढोल-ढाल
मुझे जेल तक में डाल सकती है। इतना-भर
तिलिस्म
से
बाहर
144 तिलिस्म से बाहर
कहते ही मुझे किसी सवाल का मौका दिए बिना ढाँचा हवा हो गया था। सक्षेप मे-मेरी मजिल न मालूम किस कोने म जा दुबकी है। मेरी मौजूदा जरूरत और मजबूरी जल्द-अज-जल्द उस मजिल को तलाश करना है वरना मैं इस एमर्जेंसी मे धर लिया जाऊँगा। वास्तविक कार्यालय मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं है। अतएव पैदल ही चलकर पहुंच जाता हूँ। अब नए दिशा-निर्देशा के अनुसार, नए कार्यस्थल की ओर बढने लगा। अननुमानित लम्बी दूरी ऊबड-खाबड रास्ता। आँखा के सामने धुंधली मजिल की केवल कल्पना। बिना आर-छोर के भला कोई कहाँ कैसे पहुंचे। सिगनल इडीकटर या डायरेक्शनल फाइँडर भी ता नहीं मेरे पास । में जमीन नहीं आसमान देख रहा था। शायद कहीं कोई एरियल दिख जाए या फिर कहीं से शॉट-लाग व्हिसिल ही सुनाई पड जाए। देर ता हो ही रही थी पर इन्साफ के लिहाज से इसके लिए मुझे कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता था । वक्त रहते मुझे इस बदलाव और ठिकाने की इत्तिला नहीं मिली थी। में तो बस अँधेरे मे इम्तिहान म, डाल दिया गया था। मैं हालत में कर क्या सकता था। मैं सिर्फ चल सकता था। मै चल रहा था-अपनी मामृल रफ्तार से कद्रे तेज। कोई हमसफर नहीं कोई रहबर नहीं। मने रफ्तार का और तज करने की काशिश की। सहसा उस धुंधलके मे एक चमक पदा हुई। एक लेखक-टाइप, पुराना मिलनेवाला बेरानक शक्लो-सूरत का एक लम्बा शरस कन्धे पर भूसला बदरग, दा परादियावाला थैला झुलाता मेरी जानिब चला आ रहा है। काल माथे से शुरू होते घने काले बाल खडे-खड लहरा-से रहे हैं। पता नही चलता, माथा कहाँ से शुरू हाता है आर सिर कहाँ से। छूटते ही बाला-"पहचाना कि नहीं पहचाना? वारह-पन्द्रह साल पहले परेश सनी के साथ मेरे यहाँ आए थे, फिर एक-दा मत्तबा म अपनी याद का खराचने लगता हूँ। खराचते-खराचते में अन्दर तक हिल जाता हूँ। परेश खत्री अब इस ससार म नही था। मरे हिल जाने का सबब यह था कि मरने से चन्द महीन पहले परेश खत्री ने, मुझे इसी लेखक-टाइप मित्र के बारे म ही तो (शायद) बताया था कि वह (यही) एक एक्सीडेंट में मारा जा चुका है। मै यह साचते हा फिर से रामाचित हा उठा। इस विचित्र-सी स्थिति से अपने का उबारने की गरज से मैंने अपने से कहा-यह भला कसे हो सकता है। परेश खत्री ने शायद इसी मित्र के मरने की बात न हो कही ह जरूर किसी ओर के बारे में कहा होगा। मुमकिन है मेरे " तिलिस्म से बाहर 145 सुनने-समझने मे फ्र्क रहा हो। मैं तेज सांस के साथ अपने-आपको तसल्ली देने लगा। मगर अपनी इस तसल्ली को चिकनी मछली की तरह अपनी कनपटी में फ्डफडाते पाया। किसी मरे हुए का जीता-जागता अहसास 'मेरी टाँगे काँपने लगीं। एक अजीव-से रस में डूबन-उतराने लगा। अपने ऊपर काबू पाने के लिए पहले सायास पुरानी यादा में घिरने लगा। फिर एक के बाद दूसरी चीज यारी-बारी से मरे जेहन में कूदने लगी -यह जादू भी है, हिप्नोटिज्म भी और जिन्दगी की सबसे ऊपर की सचाई भी। यह सब एकदम वैज्ञानिक है। अभी हम प्रयाग की स्थिति में है। हम लोग प्रयोग कर रहे हैं। हमारे प्रयोग सफल हो रहे हैं। आनेवाले समय में हमारे ये कार्यक्रम सामान्य मानव के लिए हितकारी सिद्ध हाग। यह सब नीतिशास्त्र के सिद्धाता पर आधारित है-नैतिक मूल्या को हासिल करने का तरीका । सत्यमव जयते । ये लोग यही सय कहते थे। वहुत पतली-पतली कितावे थीं जिन्हे ये लोग आए दिन लाते थे। उस सस्ते जमाने में भी उनकी कीमते तीन से चार सौ रुपए तक की होती थीं। मेरे काना मे कुछ मन्त्र भी गुंजने लगे जिन्हे यह परेश खत्री कैप्टन के० के० वासवदत्ता और उनके साथी-मित्र मिलकर कुछ विशेष प्रकार के उच्चारणा के साथ विधिवत् गुनगुनाते थे। इस रीति-नीति के द्वारा सिद्धि-प्राप्ति की बात किया करते थे। यह भी कहते थे कि यह सिद्धि अपनी परम्परागत सिद्धि से बहुत अलग है और आधुनिक स्टेटिसटिक (सारियको) पर आधारित है। उद्देश्य स्टेटिज्म (राज्य नियत्रणवाद) के अधिगम पर जनहित की कल्याणकारी भावनाआ को सुपर-इम्पात करना है। दिन-प्रतिदिन की अधेरगर्दी आपा-धापी पर अध्यात्म द्वारा विजय प्राप्त करना है। एक गहरे अँधेरे बंगले के किसी अति जगमगाते बड़े कमरे में मुझे भी ये लाग तीन-चार मर्तबा ले गए थे। वहीं कैप्टन (डॉ०) के० के० वासवदत्ता का बँगला था। डॉ० वासवदत्ता वहाँ पर अपने दो-एक नौकरा के साथ रहते थे। उन्हाने विवाह नही किया था। शायद अपने इन्हीं अन्वेषण-कार्यों के कारण। मेंने स्वयं को मजबूत किया फिर भी जवान थोडी लडखडा गई। अन्तत मैं पूछने मे सफल हुआ-"परन्तु मुझे तो परेश खत्री ने मुआफ कीजिएगा अगर मुझे काई गलतफहमी नहीं हो रही तो और सचमुच अगर आप बुरा न माने "मैंने साँस छोड़ी और आगे जोडा-"उस (परेश खत्री) ने आप ही के बारे मे एक बार बताया था " यहाँ आकर मैं फिर अटक गया। "कि मै एक एक्सीडेंट मे मारा जा चुका हूँ," उसने पूरी गम्भीरता के साथ अपना वक्तव्य जारी रखा "बिल्कुल ठीक बताया था परेश खत्री ने।" [1461 तिलिस्म से बाहर मैंने सोचा- इतना कहकर वह मुसकराएगा। किन्तु नहीं। वह अधिक गम्भीर दिखने लगा। वह आगे बोला "सच के अलग-अलग स्तर होते हैं। यह डॉक्टर का सच था। डॉक्टर ने मेरा डेप-सर्टिफिकेट इशू कर दिया था।आप समझ सकते हैं तब तो यह यहुत-से लोगो का सच हो गया और परश खनी का भी यही सच बना। उसने मेरी मौत पर दा आँसू यहाए और चला गया। दरअसल मुझे अदरूनी चोटे आई थीं। रिश्तेदारा की प्रतीक्षा मे, मेरी लाश को सहेजकर रख दिया गया था। कैप्टन डॉ० वासवदता को भी सूचना दी गई थी। वे आए थे तो उन्हाने खुशी जाहिर की थी-'कुछ नहीं बिगडा है। शुक्र है आपने अन्तिम संस्कार नहीं किया।' आध-एक घण्टे के मन्त्रोपचार के बाद वह मेरी लाश का उठवाकर अपनी प्रयागशाला मे ले गए थे। स्क्रीन पर मेरी नाडिया का हिसाब-किताब कर रहे थे। अन्त मे सब हिसाव ठीक-ठाक बैठाकर रेसिपरेटर (सांसयन्त्र) के द्वारा मुझे जिलाकर खड़ा कर दिया था। अब यह कैप्टन साहब का सत्य था जिस आप अब देख रहे हैं।" सहसा मेरे मुँह से घबराहट के साथ निकला, "हाँ, कभी-कभी ऐसी घटनाएं अखबारा म पढने को मिल जाती हैं।" "बिल्कुल यही हुआ था मेरे अपने साथ। इस बहाने मैं दूसरा लोक भी देख आया। कोई इसे बेशक न माने। साइटिस्ट भी कहाँ मानते थे। अब कुछ-कुछ मानने लग हैं। इस विषय में डॉ० वासवदत्ता ने जो प्रगति की है, उसका उल्लेख करना कठिन है। असम्भव-सी लगनवाली समस्या को सुलझाया है। आप सोचिए, उस जमाने से आज तक समय भी कितना गुजर चुका है। तभी से डॉ० साहब लगभग चौबीसा घण्टे अपनी प्रयोगशाला में बडी स्क्रीन के सामने बैठे तजुर्बे पर तजुर्वे कर रहे हैं-तजुर्बे सितारो से लेकर चींटिया तक के।" "हम लोग जिस अंधेरे बंगले मे जाया करते थे, क्या उसी मे जमे हुए हैं?" मैंन जिज्ञासावश पूछा। उसने मुझे बीच मे टोकते हुए कहा-"वह दखा। यह रहा' 'यही था ना? गौर किया?" सामने एक लम्बा-गहरा बंगला दीख रहा था। मैंने उसे पहचाना "हाँ-हाँ उसी बँगले मे आकर कैप्टन डॉ. वासवदत्ता के रेडियो से भविष्यवाणियाँ सुना करत थे हम लोग।" मैं फिर से एकबारगी दहशत से भर जाता हूँ-तो यह लेखक-टाइप महोदय इसी बँगले के आसपास क्या मैंडरा रहे हैं? यह सचमुच खुद वही हैं या उनकी रूप-छाया तिलिस्म से बाहर 147 वह कह रहा था, "हाँ-हाँ अब भी। मैंने बताया ना अब तो बहुत प्रोग्रेस कर ली है उन्होने। बल्कि यह कहना अच्छा होगा कि क्लाइमेक्स (चरम बिन्दु) पर हैं आजकल। चल अन्दर चलकर देख खुश होंगे कैप्टन साहब, तुम्हे देखकर।" "पर और देर हो जाएगी। ओह, मेरा दफ्तर कहाँ चला गया? इस वक्त यही मेरी समस्या है।" मैं फुसफुसाया। "तो चलो, उन्हीं का लाभ ले।" उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। तब उसकी शात बर्फीली अंगुलियो के सहारे मैं धीरे-धीरे उसके साथ चलने लगा। हमे आते देख दूर से ही अर्दली ने हमे सैल्यूट लगाया। कहा-"चलिए अन्दर। साहब बुला रहे हैं।" "तुम्हे गलतफहमी ता नहीं हुई?" में थोडा तन चुका था, "हम लोग तो इधर आनेवाले नहीं थे। 'साहब को सब-कुछ मालूम हो जाता है कौन-कौन कब, कहाँ आने-जाने वाला है।" अर्दली विनम्नता से उत्तर दे रहा था। मेरी जबान म हैरत तैरने लगी "क्या मेरे दफ्तर का अता-पता भी बता देगे? नहीं तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा। ओह, कहाँ चला गया मेरा दफ्तर?" वाक्य पूरा करते न करते मैंने माथा पकड लिया। हताश और अदना हो चला था मैं उस अर्दली के सामन। "यह ता वही जाने " अर्दली प्रत्युत्तर दे रहा था जरा-सा रुककर बोला "वैसे उनके लिए कठिन क्या है।" "चलो।" मिन बाला। मैंने ससकोच अपने पैर डॉ० वासवदत्ता के चैम्बर मरखे। अपनी मजिल का तलाश के मेरे सारे विकल्प शायद इसी चैम्बर मे आकर जैसे सिमट गए थे। मैंने उन्हे अपती पुरानी याद दिलाई तो कैप्टन के० के० वासवदता हैसने लगे। खनक पैदा करती एक जवान ताजातरीन हंसी, "मैं इतना भुलक्कड नहीं हूँ दोस्त। यह तो कुछ भी अर्सा नहीं बीता अगर पवास साल भी गुजर गए होते तो क्या मैं तुम्हे इसे और तुम्हारी तमाम मित्रमडली को भूल सकता हूँ? एक ता शिंदादिल इन्सान कभी भुलाए नहीं जा सकते दूसरे यर (उन्हाने अपने उपकरणो की आर इगित किया) सब-कुछ तराताजा रखते हैं हमारे लिए।" "शुक्रिया कैप्टन साहया यहुत-बहुत शुक्रिया" मैंने गला साफ किया 'दरअसल इस वक्त थात यह है कि "मुझमें सिहल तैरने लगी और मैं गरा भरका। 148तिम्म से बाहर - "कि तुम अपना दफ्तर खो चुके हो, यही ना?" उन्होने ठहाका लगाया- "इसका भी समाधान ढूंढ निकालेगे। घबराओ नहीं। तुम्हे कुछ और करिश्मे दिखाएंगे। मगर इससे पहले कुछ नाश्ता-पानी तो ले लो।" उन्होने अर्दली को पुकारा। गला सूखा होने के बावजूद मैंने पानी वगैरह के लिए मना किया--"इस तरह और देरी हो जाएगी और मेरे खिलाफ उन्हें पशासनिक कार्रवाई करने का मौका मिल जाएगा।" "पर इस देरी के लिए तुम कतई जिम्मेदार नहीं हो।" "यह एक हकीकत सही, पर आजकल किसी बात का कोई भरोसा नहीं। खासतौर पर मैं तो निशाना बन हो सकता हूँ।" "इत्मीनान के साथ बैठो। हम पूरी मदद करेंगे। इस स्क्रीन पर डाटाज तो फीड करने पडेगे। तुम्हारे पास तुम्हारे दफ्तर का कोई चित्र है?" "वायरलैस बिल्डिग प्रतिबधित क्षेत्र और गोपनीय विभाग होता है। वहाँ का चित्र लेन का मतलब अपराध करना होता है।" "खैर, इससे अधिक फर्क पडनेवाला नहीं। हम विस्तृत-पटल पर आएँगे और उसमे तुम्हारा फेस कुछ देर के लिए एडजस्ट करेगे। फिर तुम्हीं अपना दफ्तर देख लेना।" वे बोले और नजर घुमा ली। तब तक नाश्ता आ चुका था। वे एक के बाद एक बटन दबाते रहे। बडी स्क्रीन पर बहुत-स दृश्य बारी-बारी प्रतिबिंबित होने लगे। पहले बहुत फीके, फिर गहरे रगो मे उभरने शुरू हो गए। हम नाश्ते के साथ-साथ एक फिल्म का आनद लेने लगे। किन्तु यह आनन्द शीघ्र ही जुगुप्सा में परिवर्तित होने लगा। पहले जो मधुर संगीत वीणा तानपूरा शहनाई आदि वाद्ययन्त्रो द्वारा सुनाई दे रहा था और जिन्हे बजानेवाले कोमल और गोरे हाथ थे वे क्रमश काले-काले मोटे हाथो मे तब्दील हाने लगे। वीणा, तानपूरा शहनाई के स्थान पर बडे-बड ड्रम और उलजलूल ढोल आ गए, जिन्हे भारी-भरकम टेढी लकडी के हथौडो से पीटा जा रहा था। कहीं कोई तालमेल नहीं था। सगीत के नाम पर चीख-चिल्लाहट और डॉक-डॉक थी। बजानेपालो के चेहरो पर क्रूरता थी। सारी शालीनता ध्वस्त हो रही थी। कोई किसी के ब्लाउज में झाँक रहा था तो कोई ड्रम पीटते-पीटते किसी के नितम्बो पर ही थप-थप की ध्वनि निकालने लगता। लडकियाँ गोलाकार चक्कर काट-काटकर अपनी मिनी स्कर्ट लहराकर ऊँचा और ऊँचा करने लगी थी। इसका ठीक से नजारा लेने के लिए दो बूढे आकर फर्श पर बैठ गए थे। उन दो बूढो के साथ एक बूढी औरत भी थी। वह भी यही सब-कुछ पूरी ठसक के तिलिस्म से बाहर - माथ देख रही थी। सब के साथ, यसकर बूढा के साथ, मसखरी कर रही थी। अपनी छातिया को अपने हाथो से दुलार रही थी। देखते ही देखते वहाँ और बहुत-सी लडकियां आ गई थी जो अब नृत्य के नाम पर अश्लील हरकते कर रही थीं। बूढे उन्हें ललचाई, येयस नजरो से ताक रहे थे। उनके मुंह से झाग आने लगा था। मुझे उबकाई हुई। बडी मुश्किल से मैंने किसी तरह उलटी रोकते हुए पूछा "यह सब क्या है ? मेरा दफ्तर बताइए प्लीजा" "धीरज रखिए। वह भी आएगा।" कैप्टन वासवदत्ता ने बूढो की ओर इगित करते हुए उत्तर दिया-"अभी इन्हे एज्वॉय कीजिए।" "यह कौन-सी एज्वॉय करने की चीज है।" मेरो अकुलाहट बढ रही थी। "यह सब सामती जिन्दगी की सदाबहार सचाई है। इन बूढो के अतीत की सचाई भी दिखलाता हूँ। इन्हें अभी यहीं बुलवाए लेते हैं---टेलीपैथी।" यह कहते हुए उन्हाने तीन स्विचा को बारी-बारी से दबाया। फिर स्क्रीन सेट बन्द कर दिया। "तो आपके स्टेटिज्म पर अध्यात्म की विजय का क्या हुआ जो आपका असली मकसद था?" मैं पूछे बिना न रह सका। "होगा, होगा प्रभाव पडेगा। धीरे-धीरे हम प्रगति की ओर अग्रसर हैं।" कहन को उन्होंने कहा परन्तु मुझे उनकी वाणी मे पहले-जैसे आत्मविश्वास का अभाव लगा। दस और पन्द्रह मिनट के बीच का समय, जैसे वसन्त ऋतु के आगमन का आभास। वायुमण्डल शीत-शान्त और हल्की-हल्की लुभावनी हलचल। बाहर जैसे दरख्ता की टहनियाँ आपस मे छेडखानी कर रही हैं। पक्षियो के कलरव स्वर। कोयल की लहराती लम्बी मीठी गूंज। वही बूढी औरत बीच मे है और दोनो बूढे अपनी-अपनी छडी टेकते हुए वहाँ दाखिल होते हैं। डॉ० वासवदत्ता उनकी ओर देखकर मुसकराते हैं। बदले में वे तीना भी मुसकराते हैं। तीनो के चेहरों पर जिज्ञासा लिये एक ही भाव है- "कहिए कैसे याद किया?" "हमारे पास एक दवा है," डॉ. वासवदत्ता ने कहा "कहो तो तुम तीना का जवान बना दूं?" "यह कैसे मुमकिन है हुजूर?" लम्बी दाढीवाले ने जरा झुककर कहा। "मुमकिन तो है। देखना यह होगा कि क्या यह मुनासिव भी होगा या नहीं? अभी देखते हैं।" इतना कहकर डॉ० साहा ने अपने टेबल के दराज से एक मोटी किताब निकाली। किताब के पन्ना में एक चपटा पोले गुलाब का फूल 150 तिलिस्म से बाहर पड़ा था। उन्हाने उसे मेज पर रखा। फिर लकडी की बडी अलमारी से एक बोतल निकाल लाए। बोतल मे रखे द्रव्य की दो-तीन बूंदे उन्होने उस फूल पर छिडकी। देखते ही देखते फूल फिर तरोताजा होकर महक उठा। उन्होंने कहा-"यही" और उन तीना पर उसी द्रव्य का हल्का-सा छिडकाव कर दिया। फिर क्या था। तीना ही जवान होकर नाचने लगे। जवानी का खुमार इतना बढा कि वे पिछले कई वर्षों मे लौट गए। दोनो ही उस जवान लडकी को अपनी-अपनी गिरफ्त में लेने के लिए खींचने लगे-बेकरार, अलमस्त और मदहोश। लडकी भी अजीब-अजीब हाव-भाव से सारी हया छोडकर, कभी इधर तो कभी उधर मटक-मटककर दोनो को रिझाने लगी। इस लडकी को लेकर कुछ देर तक ता इन दानो लडका में पहले नोकझाक चलती रही, फिर वे दोनो एक-दूसरे से बुरी तरह से उलझ गए। गाली-गलौज करने लगे और अन्तत कमरे का सामान उठा-उठाकर एक-दूसरे को मारने लगे। "बस-बस इतना ही काफी है।" इतना कहकर डॉ० वासवदत्ता ने उन पर कोई राख छिडक दी। वे तीनो वापस बूढे हो गए। हताश, निराश होकर सोफे पर बैठ गए और हॉफने लगे। 'अब हो लिया आराम " कहते हुए डॉ. वासवदत्ता ने उन तीनो के सामने कसकर हाथ जोड दिए-"बडी खतरनाक होती है आप लोगो की जवानी । अब तशरीफ ले जाइए।" वे अपनी-अपनी छडियाँ टेकते हुए वहाँ से चले गए। डॉ० वासवदत्ता मुझे कहानी सुना रहे थे, "इसी औरत को लेकर पैंतालीस साल पहले इन दोना म झगडे होते रहते थे। दोनो ही नवाबी ठाटबाटवाले घरानो के लडके। ऊपर से पूरी तरह राजनैतिक रगत चढी हुई। लडकिया पर बेतहाशा पैसा पानी की तरह बहाते थे। इस लडकी को लेकर तो दोनो ने एक-दूसरे पर इरादा-ए-कत्ल के मुकद्दमे दायर कर रखे थे। लडकी भी कम लम्पट नहीं थी। कभी इधर तो कभी उधर सुनहरी मछली की तरह फिसलती रहती। बाद मे एक डी०एस०पी० से शादी कर ली। दानो ही टापते रह गए। दस साल गुजरे, डी०एस०पी० साहब को किसी न मार डाला था। पता नहीं चला किसने । तब से यह औरत अपने पुराने आशिको के बीच उठती-बैठती है।" "मान गए डॉ० साहब आपको" मैं आजिज आ चुका था नहीं। मेरा दफ्तर मैने पहली मर्तबा डॉ. वासवदता की पेशानी पर फिक्रमन्दी की लकीरे देखीं मगर उन्होने अपने स्वर को सयत रखा-"हाँ-हाँ लो अभी लो।" कहते हुए उन्हाने फिर से स्क्रीन का बटन ऑन कर दिया। अब की दृश्य अधिक 'अब और यह तिलिस्म से बाहर]151 भयावह एव वीभत्स हा उठे। कोइ गुण्डा सरआम रिवॉल्वर लिये बाजारा म लूटपाट मचा रहा है। राजनैतिक दला के लाग रथा पर खडे चुनाव प्रचार के नाम पर दहला देनवाल नार लगा रहे हैं। भाषण के नाम पर दूसरे दलवाला का गन्दी से गन्दी गालियां धर्म के नाम पर धमकियाँ! बूथ कैप्चरिंग जजीरा के साथ एक- दूसर पर जानलेवा हमले । सरेआम यच्चियों के साथ बलात्कार। "वस कीजिए, डॉक्टर साहब यसो" मैंने अपनी हथेलिया से अपनी आँख ढंकते हुए कहा, "और नहीं देखा जाता । अव तो यस कृपया मेरा दफ्तर दिखला दीजिए।" "जो यथार्थ हागा वह गैरहाजिर ता नहीं हो सकता। इससे घबराकर हम- तुम जिन्दा नहीं रह सकते।" "पर बिना आधार कौन जीता है। मेरा दफ्तर मेरा लहजा रऔसा और साथ ही किसी वेवस बच्चे की तरह सख्त हो चला-"मेरा दफ्तर दिखलाइए नहीं ता "(नहीं ता के आगे मेरे पास कुछ नहीं था) उन्हाने स्क्रीन पर एक भूरी स्क्रीन और चढा दी। दृश्यावली एनलार्ज हा उठी। उन्हाने मुझसे कहा-"अब दूंद लो इसमे से जो कुछ ढूँढना है। मैं अभी दस मिनट म प्रेश होकर आता हूँ।" वे चले गए तो मैने देखा-अपना हो शहर। उसका एक-एक घर। उन घरा मे से मेरा घर टेढा शुका हुआ। ककरीला रास्ता । सूखी पहाडी। तालाबा का कोचडयुक्त मटमैता पानी। मैं चौका। परा पूर्व कार्य-स्थल धीर-धीरे सुलग रहा है। उसम से आग की लपटे उठ रही है। धुआँ इधर-उधर फैलता जा रहा है। फिर दूर तक फेली बहुत-सी पिल्डिग। छोटे-बडे कई मकान बंगले, दफ्तर । हाँ बहुत-से नए दफ्तर भी। लेकिन मैं अपने नए दफ्तर को तो पहचानता नही था। कौन-सा हे मेरा दफ्तर ? कोई फायदा नही घूर-घूरकर देखने का। हाँ किसी दफ्तर के दरवाजे पर या आसपास हमारे स्टाफ का कोई-सा आदमी ही दिखाई दे जाए-इसी आशा में फिर से आँख फाडने लगा। आँखा में पानी भर आया। काश, वहाँ पर जहूर नजर आ जाता। वह बाबुओ अफ्सरा को पटाकर या चापलूसी करक राज की बात ले आता। फिर एक कप चाय दो कचौडियो से अपने उपकार का भूल जाता। जादूगर मैकेनिक पूनम होता तो जोड-ताड करता रहता। (हालाँकि जादू के कई करिश्मे तो देखे-परखे जा चुके थे मगर फिर भी मेरे लिए कुछ करता तो। मुझे कोई तो चाहिए था) साला वसल हा मिल जाता और कुछ नहीं हाता ता 'भाई' कहकर दिलासा तो देता चला चलकर देखते हैं 1521 तिलिस्म से बाहर अगर कोई मान जाए तो। रमेश करीम, किशोर, भीम, जयन्त, ओम की भी याद आई। ऐसे मौके पर यह गीदड-पक्ति दगा न देती। अन्दर से जडे काटनेवाले भी अकसर आँखों को शर्म खा जाते हैं। शब्बीर तो जी-जान लगा देने की फसमे खाता। मगर सम्भावना मेरे विरुद्ध विद्रोह की भी तो हो सकती थी। मेरे साथ सहानुभूति के बावजूद वे सब यह भी कह सकते थे कि माहब, अब भुगतो। बडे साहब के कहने पर दस्तखत क्या नहीं किए थे? बडे साहब भी क्या करते । उन पर भी तो राजनैतिक दबाव था। राष्ट्रहित की सिर्फ आपको ही पडी थी कि इतनी बडी तादाद में नए सेट्स नहीं खरीदने चाहिए। मजूर कहता-आपका एक्शन ठीक था, पर हम सब बेवस हैं। आजकल कौन पडता है इन झमेलो मे। इसीलिए झमेलो की बजाय सभी को कमीशन की मिठास भाती है। पर आप थे कि पोल तक खोलने की बात करने लगे। यह सब सोचते-साचत जैसे सारी सभावनाओ, सारी कल्पनाआ के आधार ही पतले-पतले धागे वनकर विलुप्त होते चले जा रहे थे। वैसे मुझे रह-रहकर यह एहसास भी होता कि ये सब लोग यहीं कहीं मेरे आसपास हैं, किन्तु असहाय हैं ओर उससे ज्यादा अफसरा से खौफजदा। डॉ० साहय मुझे चार-पाँच डाटाज-प्लेटे भी बता-समझा गए थे। उन्हे भी मैं बारी-बारी से उत्तावलेपन के साथ बदल-बदलकर ट्राई कर रहा था। मगर कुछ नहीं था अब वहाँ। स्क्रीन पर धुआँ छा गया था। यहाँ तक कि कमरे में भी उसी धुएँ का असर शुरू हो गया था। धीर-धीर कमरा धुएँ से भरने लगा। इस पर भी मैंने फिर एक बार प्रयल किया। डाटा-प्लेट बदली। स्क्रीन पर कुछ शब्द उभरे जिन्हें पढकर मैं स्तब्ध रह गया-'शटअप' तभी जोर-जार से टेलीफोन को घण्टी घरघराने लगी। मैंने आधा मिनट तक इन्तजार किया। वासवदत्ता अभी तक नहीं लौटे थे। तग आकर मैंने ही रिसीवर उठाया। मुझे 'हैलो' कहने का अवसर दिए बिना उधर से धमकाता स्वर सुनाई पडा, "अपने उपकरणो को सिर्फ खेल-तमाशो तक ही सीमित रखा। उस हमारे पास आकर गिडगिडाने दो। उसके भविष्य का फैसला आप नहीं, हम करगे । हम" यह सुनकर मरी घिग्घी बंध गई। आगे सुनाई दिया, "उसे हमारी खिलाफत का रस चूसने दा, ओर आप भी अब हमारे काम में हस्तक्षेप का थोडा फल चखिए।" टेलीफोन की लाइन कट गई और तुरन्त बाद स्क्रीन के शीशे टूटकर इधर- तिलिस्म से बाहर 153 उधर बिखर गए। पूरा चैम्बर चरमराने लगा। यडी फुर्ती के साथ में चैम्बर से बाहर आ गया। मुख्य द्वार की ओर बढा। मुडकर देखा चैम्बर गिर चुका है। वहां खडे वासवदत्ता का चेहरा शमसार है। वह लखक-टाइप शख्स तो न जाने कय का खिसक चुका था। मैं वापस बाहर सडक पर हूं-अकेला। मैं फिर से अपने पांवा की तलाश करने लगा जिनके बलबूते पर ईमानदारी का वास्ता देते हुए प्रतिपक्षी राजनैतिक तथा प्रशासनिक शक्तिया से लोहा लेने का दम भरा करता था। अब मुझे वासवदत्ता नहीं-मजूर वहीद, रमेश, जयन्त श्रीकृष्ण, भीम शब्बीर जहूर बसल और कुछ ऐसे लोगों की दरकार थी। मगर देखा-वासवदत्ता भरे साथ चल रहे थे-"मैंने अपना रास्ता बदल लिया है दोस्त। तीस साल बेकार गवाए।" जरा रुककर वे आगे बोले-"मेरे कदम अब तुम्हारे साथ इसी जमीन पर चलेगे।" देखते ही देखते वह लेखक- टाइप मित्र और उनके दूसरे साथी हमारे मराही वन गए थे। जिन्हें मैंने गीदड- पक्ति कहा था वे भी अब हमारे साथ थे। आसमान से नहीं अब इसी सख्त जमीन से मोर्चाबन्दी करनी थी। सब को आभास हो चला था-जमीनी रास्ते ही लम्बे कठिन किन्तु सच्चे रास्ते होते हैं। 1154) तिलिस्म से बाहर नंदनी को गए सिर्फ दा ही दिन हुए थे। दा बच्चे पहले ही से ननिहाल जा चुके थे। पीछे रह गए अकेले योगेश बाबू। आज शनिवार था। सुबह ही से योगेश बाबू अपने को उदास-उदास और खोया-खोया हुआ-सा पा रहे थे। शनिवार वाला बाबा टेर लगाता हुआ, उनके दरवाजे से सीधा आगे निकल गया था। हर दरवाजे पर उसकी दबग आवाज गूंजती थमती, फिर गूंजती और दूर-दूर होती हुई अतत वायुमण्डल मे विलीन हो गई प्रतीत होती रही। इसके बावजूद 'शनि महाराज की जय हो' का आरोह-अवरोह- युक्त स्वर उनके काना के पर्दो मे झनझनाहट पैदा करता रहा। इस तेल-दान से योगेश बाबू को हमेशा ही अरुचि रही है, चिढ की सीमा तक। चार रोज पहले नदनी अडोस-पडोस के घरा से होकर घर लौटी थी। दोपहर का समय था। योगेश बाबू ने भी तभी, लच- आवर्ज मे, घर मे प्रवेश किया था। नदनी ने उनसे कहा-"मैं तो उन्हे साफ मना कर आई।" इस वाक्य से योगेश बाबू जरा चोंके क्याकि इस वाक्य को वे किसी सदर्भ से स्मृति- गीत स्मृति-गीत 155 " जाड सकने में असमर्थ बने रहे। वे एकटक नदनी की आर देखने लगे थे। तब नदनी को अपनी भूल का आभास हुआ। वह झट से आगे बाली "सखी-सहेलियाँ मथुरा-वृदावन आदि तीर्थ-स्थलो का कार्यक्रम बना रही हैं। कहन लगी-'नदनी तुझे भी चलना पडेगा। तेरे बिना हम वहाँ कुछ नहीं सुहाएगा।" योगेश बाबू समझ गए। नदनी का चेहरा साफ ही बता रहा था कि वह भी जाना तो चाहती है, किंतु सकोचवश अपनी सखिया का मना कर आई है कि पति अकल पड जाएँगे। अत योगश बाबू ने नदनी का भेज दिया था। गर्मिया की छुट्टिया के दिन थे। कैलाश और महेश पहले ही अपने मामो के घर जा चुके थे। आज शनिवार का अवकाश था। वक्त धीरे-धीरे आगे रग रहा था। दोपहर को मेहरी खाना बनाकर खिला गई थी। वे कुछ देर तक अखबार देखते रहे और परिवारजना के विषय मे कल्पना की उडान भरते रहे कि इस वक्त कौन कहाँ, क्या कर रहा होगा? उन्ह हल्की-सी झपकी आई किन्तु शीघ्र ही उठ बैठ। अंधेरा छाने लगा तो मन-बहलाव के लिए नजदीक के कपनीबाग और सड़क का चक्कर काट आए, परन्तु मन पर एक बोझा-सा था जिसे वे ठीक से सपझ नहीं पा रहे थे और बार-बार उसे झटकने की कोशिश कर रहे थे-'जय हो शनि महाराज की' की टर भी जैसे उनका पीछा कर रही थी, और इस टेर से सटी-सी एक पदचाप । वह पदचाप बेटी रजनी की थी। नदनी ने जाने से पूर्व उन्ह जस चताया भी कि पीछे वे कही उदास-परेशान न हा जाएँ। कहा था-'बच्चो को भेजकर गलती की। अब उनका कोई भरोसा नहीं । उसका दिल लग गया तो पूरे दो महीने की छुट्टियाँ बिताकर ही लौटेगे।' 'तो क्या हो गया? नाना-नानी क लाड से ही तो बच्चो की हेल्थ बनती है। मुझे क्या तकलीफ है। तुम खुले मन से जाओ। इस तरह की कपनी मिलती कहाँ है। वाह । माधुरी मेनका और रूपवती "वे हंसने लग थे 'हमारे साथ थाडे ही न जाएंगी। इस पर नदनी ने थोडा मुँह मिकोडा-अह। नदनी अच्छी तरह से जानती थी कि वास्तव में योगेश बाबू को विशेष अतर पड़नेवाला नहीं। अपनी विनादप्रियता के साथ-साथ वे अपने म विविध व्यक्तित्व समेटे हुए हैं-बहुत ही भावुक बहुत चिंतनशील गम्भीर एव एकातप्रिय हैं ! पढने-लिखने में मन लगाए रहते हैं। दूसरे-तीसरे दिन कोई न कोई मिलने-जुलनेवाला मित्र भी आया रहता है। अतएव वह उनके खाने आदि का प्रबंध करके वृहस्पति के दिन चली गई थी। 1156 स्मृति-गीत शनि के याद इतवार को भी उनका मन नहीं लगा। मेहरी दोना समय खाना बनान, पर का झाडने-पाछन आ रही थी। दापहर का भाजा कर उन्हाने सरसरी तौर पर अखयार देखा। फिर कोई किताव उठाइ । पडी की आर दृष्टि गई ता ऐसे ही काई फिरम दसन ढाई बजे घर से निकल गए। फिल्म म एक विवाह-दृश्य को यहुत लया खींचा गया था। ये उठकर घर लौट आए। सध्या को कुछ ठडक हुई। हवा चलने लगी थी। वे फोरिडग घेयर लेकर लॉन म आ बैठे। फ्रिम के विवाह-दृश्य ने उनके सम्मुख रजनी यटो को ला खडा किया। ढाई माह पूर्व बडी धूमधाम से उन्होने रजनी को शादी की थी। अब वह अपने पति के सधिया से मिलने, पति के साथ अमेरिका चलो गई थी। उसके शीघ्र वापस आने की सभावना नहीं थी। और अव आने पर उसे यहाँ थोडे हो रहा है ! उन्होंने सोचा। विवाह-पूर्व ही बेटी की विदाई की कल्पनामात्र से ही योगेश यायू बहुत भावुक हो उठते थे। वास्तविक विदाइ के उपरान्त एक यार तो वे जैसे ढह हो गए थे। तव पली के अनुरोध पर उसे (नदनी को) भी अपने विभागीय कार्यक्रमा के निमित्त दा-तीन स्टेशन साथ लेकर घूम आए थे। इस तरह अब जाकर ये कहीं धीरे-धीरे संभलने लगे थे। योगेश बाबू सोचने लगे और कोई घर पर हो न हो, पर बिना बेटी रजनी के, घर एकदम सूना-सूना हो उठता है। वही घर की असली रौनक थी। रजनी के साथ विचार-विमर्श । कई बार तो वह इतना बोलती और अपने प्वॉइट्स पर अड जाती कि योगेश बाबू उसके तर्क-वितर्क को कुतर्क की सज्ञा दे देते कि तूने तो मेरा माथा चाट डाला। इसके बावजूद वे उसका सिक्का मानते । राजनैतिक सामाजिक तथा औषध-विषयो पर रजनी की पकड खासी गहरी थी। इतना सब होते हुए भी एक बात रजनी उन्हे कभी समझा नहीं पाई। बस इसी एक बात को लेकर पिता और पुनी मे झडप होती थी। रजनी हर शनिवार को बाबा को तेल डालती थी। योगेश बाबू इसके सरत खिलाफ थे। वे कहते-'तूने पूरी एम०एस-सी० तक विद्या पढी है । बताओ इस तेल-दान की क्या जरूरत है।' रजनी कहती-'सभी देते हैं हमारे घर से क्या खाली जाए?' योगेश बाबू की जबान हल्की-सी तत्ख हो उठती-'यह तो कोई जवाब न हुआ। कुछ रोज बाद रजनी कहीं से कोई फटे-पुराने पील पृष्ठोवाला एक गुटका उठा लाई जिसमे तेल-दान की महिमा का वर्णन था। स्मति-गीत 157 इससे योगेश बाबू और चिढ गए। कहा-'यह तो मांगनेवाला के दिमाग का उत्पादन है ताकि उनकी पोढियाँ-दर-पीढियाँ मुफ्त म खाती चली जाएं। इतने मोटे मुस्टडे आम जनता को कैसे उल्लू बनाने हैं।' इस पर रजनी रूठ जाती। वे उसे मनाते। यागेश बाबू सोचते हैं, यहीं आकर रजनी उनसे हार-सी जाती। कनविस नहीं कर पाती। फिर भी अपनी जिद पर कायम थी। इसलिए न चाहते हुए भी बाप-बेटी भे यदा-कदा नोक-झाक चलती रहती। नदनी बीच-बचाव करती। पति से कहती-'इससे घर में क्या फर्क पड़ता है ?" 'सवाल उस फर्क का नहीं । दिमाग के फर्क का है। मैंने अपने तमाम विद्वान् साथिया से पूछ देखा है। किसी के पास भी इसका विज्ञान-सम्मत उत्तर नहीं है।' इसलिए न चाहते हुए भी मैं उसे टोकने से बाज नहीं आता। रजनी क विवाह स चार मास पूर्व सचमुच योगश बाबू न रजनी का टोकना कतई बद कर दिया था। हाँ एक बार उन्हाने बाबा से अवश्य कहा था--'बाबा कुछ सप्ताह की बात और है । ल ला यह दान-दक्षिणा । फिर तो बिटिया पराइ हो जाएगी। 'जैसी आपकी इच्छा भगवन्। कहकर बाबा तल समेटता हुआ चला गया था। तब कितनी ही देर तक योगेश बाबू मुंह औंधा किए बेडरूम में पड़े रहे थे। शादी से अगले शनिवार बाबा उसी प्रकार अपने चिर-परिचित स्वर से टेर लगाता हुआ योगेश बाबू के दरवाजे पर आ खडा हुआ था-'शनि महाराज की योगेश बाबू नाहर आए थे-'बाबा बिटिया चली गई।' कहते-कहते उनका गला भर आया था कि अभी रो देगे। जल्दी से नदी कटारे म तल भर लाई थी-'लो बाबा इस बार ता ले जाओ।' दाना पति-पली ऑगन म आकर सीढिया के पास बैठ गए थे-नि शब्द । कुछ देर बाद योगेश बाबू आँखा को रूमाल से दबाए अपने कमरे में चले गए थे। शनिवार दफ्तर की छुट्टी होती। वे सैर करने सुबह-सवेरे दूर तक निकल जाते। देर से घर लोटते तो भी प्राय बाबा की घरघराती आवाज कानो मे कोई खट्टा-मीठा घोल घोल देती। बाबा की यह आवाज सुनाई न भी दे तो भी शनिवाले दिन शनि महाराज की जय हा' का संगीत सुबह से शाम तक यागश बाबू पर छाया रहता। सोमवार से यागरा बाबू दफ्तर जान लगे थे और हर प्रकार स अपने को व्यस्त 158 स्मृति-गीत रखने लगे थे। शुक्रवार को मित्रमडली के साथ गई रात तक घूमते-घामते रहे थे। शनिवार सुबह देर तक साते रह गए कि एकाएक बाबा की आवाज से चौंककर उठ बैठे थे। दहलीज म जाकर देखा-याया आसपास के घरो से हाता हुआ आगे निकल रहा था। याया से उनकी आंख मिली थी। दोना ने एक-दूसरे को अभिवादन किया था। योगेश यायू खुद दा कदम आगे बढकर बाबा के साथ वतियाने लगे थे। बाबा येटी रजनी का ही हाल पूछ रहा था। यार-यार ठसके गुणो का बखान कर रहा था। उसके सुखद गृहस्थ-जीवन की कामना करता हुआ असीस दे रहा था। तीसरे रोज दोना बेटे कैलाश और महेश अचानक आ पहुंचे थे। रह-रहकर नाना-नानी की बात करते। मामा-मामिया की खुशमिजाजी का वणन करते- "खूब मन लगा! मगर आपके लिए, मम्मी के लिए दिल उदास हा गया। अब हम इधर आए तो मम्मी गायवा" इसके दूसरे दिन नदनी भी आ पहुंची थी। घर फिर से रौनक से भर गया। बार-बार सभी रजनी की बात करते । कैलाश कहता-"दाना मामियाँ एक ही बात वालती तुम्हारे घर मे कोई है ता रजनी। रजनी का कोई जवाब नहीं। लडकी हा तो बस रजनी जैसी" यागेश बाबू साचने लगे--पर अब रजनी यहाँ कहाँ है ? हाँ, अब इस घर से नहाकर भी यहीं कहीं आस-पास मौजूद है । पूरे मुहल्ले में उसकी चर्चा होती है। वह यहाँ-वहाँ सभी जगह व्याप्त है विशप रूप स बाबा के सुर में। अगले शनिवार को यागश बाबू सैर मे शीघ्र ही लौट आए। कुछ देर बाद बाबा की चिर-परिचित टर सुनाई दी-'शनिवार महाराज की जय हो।' और धीरे-धीरे पदचाप उन्हीं के दरवाजे पर आकर ठहर गई। कैलाश ने कुडी खोलते हुए कहा-'तुम्हे तो मना कर रखा है न वाबा?" पीछे से योगेश बाबू का स्वर सुनाई दिया-'नहीं, ठहरा।' नदनी ने उनकी आर देखा। योगेश बाबू ने भी उसकी आर स्मित-भाव से देखने का प्रयास किया। नदनी ने उनस अधिक सबाद की अपेक्षा नहीं की। उनके कहे दो शब्दा मे ही उसने आर्द्रता को लक्ष्य कर लिया था। नदनी कटारे मे तेल लेने चली गई ता आहिस्ता-आहिस्ता वे अपने कमरे की आर बड़ गए। स्पति-गीत| 159
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