Sanmati Library

Pramadhyatmatrngini (samayasar Kalash)

Bhattarak, Shubhchandra · 2009/11

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

१०५ धार्यिका विद्यामति माता जी का मामान्य परिचय लालगढ़ माग्याड में एक समृद्ध नगर है। यहा बनवाल जना अनक घर है यहां ही सेट नेमिचंद जी बाकलीवान के एक पुत्रों का जन्म विक्रम म० १६६२ फाल्गुणवदी ११ मंगज़ वार को हुआ नाम शान्ति गाई रखा गया। बालकपन में ही आपमें यथा नाम तथा गुण थे। श्रापको शिना हिंदी मायाकी दी गई जिमम धर्म-शास्त्रों का स्वाध्याय कर आमन्यागा के माथ लोकिक कार्य करनी गाहस्थ जीवन मुविधापूर्वक व्यनीत कर सकें। आपकी उम्र जब १३ साल की हुई तब माता पिता ने विवाह हंह (राजस्थान) निवामी कुवरजी मूलचंद जी नठी को सर्व प्रकार योग्य देखकर उनके साथ कर दिया कु. मूलचंद जी का जन्म वि० म० PEC कागुण वदी ११ शुक्रगार को दृश्रा था इम नगद १३ माल की कन्या और १८ वर्ष के वर का विवाह विक्रम नं० २००५ोमाय की कृष्ण चतुर्थी के दिन कर दिया गया। परन्तु देव को वाई शानि का गृहस्थ जीवन में समय बिताना मंजूर न था। अकस्मान ही कुचर मुल चंद जी कलकत्ता में गुम हो गये । वह दिन शाम्ब मुदी शनिवार विक्रम मंवत् २००८ था। दोनों पक्ष के माना पिना आदि कुटु'वियों ने बहुत प्रयत्न किया परन्तु मूलचन्दजी का कहीं पर भी पता नलगा। इस नन्ह, विवाह के चल नीन माल वादही पनि वियोग का पहाड आप पर टूट पड़ा। इमे प्रापन बढी शानि और गर्य माथ महने हुए धर्मध्यान में ममय विनाना उचित समझा। वदनुमार आपने अपने धार्मिक ज्ञान बढान की नग्फ मन लगाया। जब पुग्य का उदय माना है, नव दीर्भाग्य भी सौभाग्य में बदल जाता है। आपके पुगयोदय ने आर्यिका माना इन्दुमनाजी नथा मुपाली मनि जी आर्यिका का मुयोग मिला दिया। श्राप मदुपदश मे शानि बाई का मन चारित्र वृद्धि करने की नग्फ मुन्न हुआ और इनके पास बान बढाने के लिय मस्कृत व्याकरण काव्य व्याय धर्म शास्त्र के अन्य पढना प्रारम्भ कर दिया करीव १ एक माल ही शायि माताश्री महवाम में नही होगी कि-त्री पर्याय के उच्च चारित्र याचिका के धन प्राण भन्ने कारच्या श्रापकं ज्ञागृत हुई। जब अच्छा होना हाना है नब निमित्त भी बीम ही मिलने लगते हैं। श्राचार्य श्री १०८ शिवसागर नी महागज के मंयका चनुमाम मुजानगढ में :मी ममय हुश्रा । अब संघन्धित महामती मुनिरानों और वान ब्रह्मचारिणी श्रावक शायिकाको माक्षान देग्यकर इनका मन आर्यिका पनकर मनुष्य स्त्री पीय मपन्न करने के निधन हो गया । जब हनने अपने विचार आयिका बनन के व्यक्त क्रिये नो श्वसुर पक्ष नथा पितृपक्ष ने उनकी छोटी उम्र, कोमल शरीर देगार विगय करना प्रारम्भ किया, दीक्षा देने बाल आचार्य महाराज के पास भी प्रार्थना की कि-अभी इन्हें आर्थिा की दीक्षा न द । परन्तु शांति बाई का निश्चय हट था, क्रिमी भी प्रकार वे गृहस्थी में रहकर जन्म गंवाना न चाहती थीं इमलिये ममान टुम्बियों मम्बंधियों को अपना विरोध वापिम लेना पड़ा दीक्षा ग्रहण के पहिले जो रीति रएम विधि विधान होन है उनमें मवही नाते रिस्तेदागे तथा नगरनिवामियों ने उमाहपूर्वक भाग लिया थपकी दीक्षा का शुभदिन कार्तिक सुदी १३ मंगन बार मं० २०१७ नियन किया गया । इमों शुम दिन में मंघ के दो नन्ना भी महावनी मुनि बने ।

. . (ख) शांति वाई जिस समय आचार्य महाराज के समक्ष दीक्षा देनेकी प्रार्थना करने खडी हुई और जो संसार का स्वरूप वर्णन किया वह बडा ही महत्त्वशाली था । इसके बाद आचार्य महाराज ने संघ के साधु साध्वियों, उपस्थित जनों तथा शाति वाई के माता पिता और श्वसुर पक्षके लोगों से अनुमति प्राप्त कर आर्यिका वनने की प्रथम परीक्षा केश लोच करने की आज्ञा दी। अब शांति बाई ने चारित्र धारण करने में अपना उत्साह दिखलाते हुये अपने कोमल हार्थीसे चिकग श्याम लवे अपने मस्तक के केश उखाडने प्रारम्भ किये उस समयको गभीर शात मुख मुद्रा देखते ही बनती थी । उपस्थित जैन अजैन १५-१६ हजार जनता जय जयकार बोलते तृप्त न होती थी। इसके बाद अन्य सस्कार किये गये और नाम विद्यामति रखा गया। आर्यिका का चारित्र निर्दोष निर्विघ्न पलता रहं इसलिये अनेक वर्षोंकी तपस्विनी आर्यिका इन्दुमति माता जी के ऊपर इनकी सरक्षकता का भार सोपा गया और तवसे इनकी छत्र छाया में शातिवाई पूज्य विद्यामति बन कर आत्मकल्याण कर रही हैं और आर्यिका सुपार्श्वमति जी से पढकर विदुपी वनने में दत्तचित्त हैं। अंतराय विजय दीक्षा के दिन उपवास करने का नियम है इसलिये उसदिन मिंगलवार को तो उपवास था ही परन्तु पारणा के दिन अन्तराय आजाने से आहार न हो सका, इस तरह लगातार ६ दिन तक अन्तराय वरावर आते रहे और आप धैर्य शाति के साथ उस अन्तराय को पालती रहीं। लोगों के पूछने पर आपका उत्तर होता था कि-समाधि के लिये ही तो दीक्षा ग्रहण की है, अन्तराय कर्म को श्राहार में बाधा देनी है तो दे, मैं अपने नियम से विचलित न होऊगी। आखिर सातवें दिन आपका आहार निरन्तराय हुआ तब सब लोगों की चिन्ता दूर हुई। इस तरह आप दृढतापूर्णक आर्यिका के व्रत पालने की परीक्षा में सफल हुई। ज्ञान दान और धन्यवाद शांतिवाई के पिता सेठ नेमिचंदजी वाकलीवाल धार्मिक प्रवृत्ति के उदारचित्त संपन्न गृहस्थ हैं । नमिचन्द माणिकचन्द एण्ड को० नामसे आप का व्यापार शिवसागर (आसाम) में है। आपने अपनी पुत्री शांतिबाईकी आर्यिकादीक्षा के समय १०००) एक हजार रुपया का दान देनेकी घोषणा की थी परन्तु उसके बाद आपने उसे बढाकर १५००) पंद्रहसौ रुपया करदिया इसके बाद आचार्य श्री १०८ शिवसागरजी महाराजके सदुपदेशसे समयसारकलश (परमाध्या- स्मतरंगिणी ) को संस्कृत और हिंदी टीका सहित प्रकाशित करने का कुल व्यय (१५ सौ से अधिक व्यय हो तो भी) देना स्वीकार किया (यह कुल व्यय उनीस सौ तीस १६३०रु० हैं) आपकी इसी उदारतासे 'श्रेयोमार्ग' मासिक पत्रके ग्राहकों को यह ग्रन्थ उपहार रूपमें दिया जारहा है अतः धन्यवाद है। ज्ञानावरणी कर्मका क्षय सम्यग्ज्ञानके दानसे होता है । जिनवाणी से उत्तम अन्य कोई सम्यग्ज्ञान नहीं है इसलिये आपका अनुकरण प्रत्येक दानीको करना चाहिये। -ब्रह्मचारी श्रीलाल जैन काव्यतीर्थ - --

URAT
ॐ
प्राचार्य श्रीशान्तिसोगरजैनग्रन्थमाला।
६
श्रीअमृतचन्द्रसूरिविरचित
परमाध्यात्मतरंगिणी ।
(समयसार कलश)
[भट्टारक श्री शुभचन्द्र कृत संस्कृत और पं० जयचन्द्रजी कृत हिंदीटीकासहित ]
जिसको
गांधी हरिभाई देवकरण एंड संस शोलापुर द्वारा संरक्षित
श्रीशान्तिसागर (भारतीय) जैनसिद्धातप्रकाशिनी संस्थाके महामंत्री
गृहविरत ब्रह्मचारी श्रीलाल जैन काव्यतीर्थने
सुजानगढ [ लालगढ ] निवासी सेठ नेमिचन्दजी वाकलीवाल द्वारा
अपनी पुत्री शांति वाईकी
आर्यिका दीक्षा के समय ज्ञानावरणीय कर्मक्षयार्थ
प्रदत्त द्रव्यसे प्रकाशित किया ।
सावन वीर नि० सं० २४६४
जुलाई १९६३ वि० सं० २०२०
मुद्रक-ब्रह्मचारी सेठ हीरालालजी पाटणी निवाई वालोंके मंत्रित्वमें
श्रीशान्तिसागरजैनसिद्धान्तप्रकाशिनी संस्था के पवित्र प्रेस श्रीमहावीरजी (राजस्थान) में छपा

No text on this page.

१०५ पार्यिका विद्यामति माता जी का सामान्य परिचय लालगढ़ मारवाड में एक समृद्ध नगर है । यहा खडेलवाल जैनों के अनेक घर हैं यहां ही सेठ नेमिचंद जी वाकलीवाल के एक पुत्री का जन्म विक्रम स० १६६२ फाल्गुणवदी ११ मंगल वार को हुआ नाम शान्ति वाई रखा गया । बालकपन मे ही आपमे यथा नाम तथा गुण थे। आपको शिक्षा हिंदी भापाकी दी गई जिसमे धर्म-शास्त्री का स्वाध्याय कर आत्मकल्याण के माथ लोकिक कार्य करती गार्हस्थ जीवन सुविधापूर्वक व्यतीत कर सकें। आपकी उम्र जब १३ साल की हुई तब माता पिता ने विवाह डेह (राजस्थान) निवासी कुवरजी मूलचंद जी सेठी को सर्व प्रकार योग्य देखकर उनके साथ कर दिया कु मूलचंद जी का जन्म वि० सं० १८८ सागुण वदी ११ शुक्रवार को हुआ था इस तरह १३ माल की कन्या और १८ वर्ष के वर का विवाह विक्रम सं० २००५ के साख की कृष्ण चतुर्थी के दिन कर दिया गया। परन्तु देव को वाई शाति का गृहस्थ जीवन में समय चिताना मंजूर न था। अकस्मात् ही कुवर मूल चंद जी कलकत्ता में गुम हो गये । वह दिन वैशाख सुदी ६ शनिवार विक्रम सवत् २००८ था। दोनों पक्ष के माता पिता आदि कुटु'वियों ने बहुत प्रयत्न किया परन्तु मूलचन्दजी का कहीं पर भी पता न लगा । इस तरह विवाह के केवल तीन माल वाद ही पति वियोग का पहाड आप पर टूट पडा । इसे प्रापने बडी शाति और धेर्य के साथ सहते हुए धर्मध्योन में ममय विताना उचित समझा। तदनुसार आपने अपने धार्मिक ज्ञान बहाने की तरफ मन लगाया। जब पुण्य का उदय आता है तब दौर्भाग्य भी सौभाग्य में बदल जाता है । आपके पुण्योदय ने आर्यिका माता इन्दुमतीजी तथा सुपार्शा मति जी आर्यिका का सुयोग मिला दिया। श्राप सदुपदेश से शाति वाई का मन चारित्र वृद्धि करने की तरफ उन्मुख हुआ और इनके पास ज्ञान बढाने के लिये मस्कृत व्याकरण काव्य न्याय धर्म शास्त्र के प्रन्थ पढना प्रारम्भ कर दिया करीव १ एक माल ही आर्थिरा मानाओ के महवास में रही होगी कि-स्त्री पर्याय के उच्च चारित्र आर्यिका के व्रत प्रहण करने की इच्छा श्रापके जागृत हुई। जब अच्छा होना होता है तब निमित्त भी बेसे ही मिलने लगते हैं। प्राचार्य श्री १०८ शिवसागर जी महाराज के सघका चतुर्माम सुजानगढ मे इसी समय हुआ । अब सघस्थित महामती मुनिराजों और वाल ब्रह्मचारिणी अल्पवयस्क अार्यिकाओंको साक्षात् देखकर इनका मन आर्यिका बनकर मनुष्य स्त्री पर्याय मफल करने के लिये रद हो गया। जब इनने अपने विचार आर्यिका बनने के व्यक्त किये तो श्वसुर पक्ष तथा पितृपक्ष ने इनकी छोटी उम्र, कोमल शरीर देखकर विरोध करना प्रारम्भ किया, दीक्षा देने वाले आचार्य महाराज के पाम भी प्रार्थना की कि-अभी इन्हें आर्यिका की दीक्षा न दें । परन्तु शाति बाई का निश्चय उढ था, किसी भी प्रकार वे गृहस्थी में रहकर जन्म गवाना न चाहती थीं इमलिये समस्त कुटुम्बिया सम्बंधियों को अपना विरोध वापिस लेना पड़ा। दीक्षा ग्रहण के पहिले जो रीति रश्म विधि विधान होते हैं उनमें सवही नाते रिस्तेदारों तथा नगरनिवासियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया आपकी दीक्षा का शुभदिन कार्तिक सुदी १३ मंगल वार सं० २०१७ नियत किया गया । इमी शुभ दिन में मघ के दो तुल्लक भी महारती मुनि बने ।

+ (ख) शांति वाई जिस समय आचार्य महाराज के समक्ष दीक्षा देनेकी प्रार्थना करने खडी हुई और जो संसार का स्वरूप वर्णन किया वह बडा ही महत्त्वशाली था । इसके बाद आचार्य महाराज ने सघ के साधु साध्वियों, उपस्थित जनों तथा शाति वाई के माता पिता और श्वसुर पक्ष के लोगों से अनुमति प्राप्त कर आर्यिका बनने की प्रथम परीक्षा केश लोच करने की आज्ञा दी। अब शांति वाई ने चारित्र धारण करने में अपना उत्माह दिखलाते हुये अपने कोमल हार्थोसे चिक्कग श्याम लवे अपने मस्तक के केश उखाडने प्रारम्भ किये उस समयकी गंभीर शांत मुख मुद्रा देखते ही बनती थी । उपस्थित जैन अजैन १५-१६ हजार जनता जय जयकार बोलते तृप्त न होती थी। इसके बाद अन्य संस्कार किये गये और नाम विद्यामति रखा गया। आर्यिका का चारित्र निर्दोष निर्विघ्न पलता रहे इसलिये अनेक वर्षोंकी तपस्विनी आर्यिका इन्दुमति माता जी के ऊपर इनकी सरक्षकता का भार सौंपा गया और तवसे इनकी छत्र छाया में शातिवाई पूज्य विद्यामति बन कर आत्मकल्याण कर रही हैं और आर्यिका सुपार्श्वमति जी से पढकर विदुषी वनने में दत्तचित्त हैं। अंतराय विजय दीक्षा के दिन उपवास करने का नियम है इसलिये उसदिन मंगलवार को तो उपवास था ही परन्तु पारणा के दिन अन्तराय आजाने से आहार न हो सका, इस तरह लगातार ६ दिन तक अन्तराय बरावर आते रहे और आप धैर्य शाति के साथ उस अन्तराय को पालती रहीं। लोगों के पूछने पर आपका उत्तर होता था कि-समाधि के लिये ही तो दीक्षा ग्रहण की है, अन्तराय कर्म को आहार मे बाधा देनी है तो दे, मैं अपने व्रतनियम से विचलित न होऊंगी। आखिर सातवें दिन आपका आहार निरन्तराय हुआ तव सव लोगो की चिन्ता दूर हुई। इस तरह आप दृढतापूर्वक आर्यिका के व्रत पालने की परीक्षा में सफल हुई। ज्ञान दान और धन्यवाद शांतिवाई के पिता सेठ नेमिचंदजी वाकलीवाल धार्मिक प्रवृत्ति के उदारचित्त संपन्न गृहस्थ हैं । नेमिचन्द माणिकचन्द एण्ड को नामसे आप का व्यापार शिवसागर (आसाम) में है। आपने अपनी पुत्री शांतिबाईकी आर्यिकादीक्षा के समय १०००) एक हजार रुपया का दान देनेकी घोषणा की थी परन्तु उसके बाद आपने उसे बढाकर १५००) पंद्रहसौ रुपया करदिया इसके वाद आचार्य श्री १०८ शिवसागरजी महाराजके सदुपदेशसे समयसारकलश (परमाध्या- स्मतरंगिणी ) को संस्कृत और हिंदी टीका सहित प्रकाशित करने का कुल व्यय (१५ सौ से अधिक व्यय हो तो भी) देना स्वीकार किया (यह कुल व्यय उनीस सौ तीस १६३०रु. है) आपकी इसी उदारतासे 'श्रेयोमार्ग' मासिक पत्रके ग्राहकों को यह ग्रन्थ उपहार रूपमें दिया जारहा है अतः धन्यवाद है। ज्ञानावरणी कर्मका क्षय सम्यग्ज्ञानके दानसे होता है। जिनवाणी से उत्तम अन्य कोई सम्यग्ज्ञान नहीं है इसलिये आपका अनुकरण प्रत्येक दानीको करना चाहिये। -ब्रह्मचारी श्रीलाल जैन काव्यतीर्थ प्रस्तावना + अध्यात्म रहस्यके परिपूर्ण वेत्ता स्वनाम धन्य भगवान कुन्दकुन्द जैन समाजके एक प्रसिद्ध आचार्य होगये हैं। इतना ही नहीं, बल्कि- मंगलं भगवान वीरो मंगलं गौतमो गणी। : मंगलं कुन्दकुन्दाों जैनधर्मोऽस्तु मंगलं ।। इस वचनानुसार गौतम स्वामीके बाद अपनेको मंगलस्वरूप कहलबानेका श्रेय भगवान कुन्दकुन्दको ही है । इनके बनाये हुए पंचास्तिकाय प्रवचनसार आदि आदि अनेक प्राकृत ग्रंथ हैं परन्तु उन सबमें इनके अनुभवका सर्वस्व समयसार प्राभृत ही है। इस ग्रन्थकी यद्यपि कई टीका हैं परन्तु जैसी अनुपम और गाथासूत्रांका स्पष्ट तात्पर्य बतलानेवाली श्रीमान् अमृत- चंद्राचार्य कृत आत्मख्याति टीका है वैसी अन्य नही । बल्कि न्यायस्वरूपके वेत्ता भगवान अकलंकके विपयों जैसी यह किंवदंती है कि 'तदभिप्रायसाकन्यं तु स्याद्वादविद्यापतिर्विवेद' अर्थात् भगवान् अकलंक देवका पूर्ण अभिप्राय स्याद्वादविद्यापति आचार्यप्रवर विद्यानंद प्रभु ही जानते हैं उसीप्रकार भगवान कुन्दकुन्दके ग्रंथों के रहस्यके ज्ञाता आचार्यबर अमृतचंद्र सरि ही थे यह कहना अत्युक्त नहिं हो सकता। पाठक महोदय ! जो अनुपम ग्रंथ आपके कर कमलोम विराजमान है वह उन्ही अमृत- चंद्रमरिकी कृति है। उन्होंने जो आत्मख्याति टीका लिखी है उसीमें गाथा सूत्रोंके भावको इन श्लोकोसे भी प्रकट किया है जो एक स्वतंत्र ग्रन्थस्वरूपमें परिणत हो गया है। यह ग्रन्थ नाटकसमयसारकलशके नामसे प्रसिद्ध है इसग्रन्थके इम नामके रखनेसे यह जान पडता है कि जिसप्रकार विशाल भी मंदिरकी विना कलशोंके शोभा नहिं होती उसीप्रकार समयसार वा आत्मख्याति टीकाकी शोभा भी इस ग्रन्थके विना नहिं हो सक्ती अर्थात् समयसार भी पढिये परन्तु जब तक इस ग्रन्थको-आत्मख्याति टीकामें दिये हुये इन श्लोकोंको नहिं पढ़ा जाता तब तक पूर्णरूपसे आत्मा आत्मिक अनुपम आनन्दका अनुभव नहिं करसक्ता । इस ग्रन्थका संस्कृत टीकानुसार परमाध्यात्मतरंगिणी नाम भी है जोकि विषयानुकूल है। आचार्य अमृत- चन्द्रसूरिक पुरुषार्थसिद्धथु पाय तत्त्वार्थसार आदि स्वतंत्र मी अनुपम ग्रन्थ हैं जो इनकी लोको- त्तर विद्वत्ताका भान कराते हैं। इन्होंने किसी ग्रन्थमें अपना परिचय नहिं दिया, न गुरु आदिका नाम लिखा इमलिये ये अमुकके शिष्य, अमकके गुरु, अमुक देश वा पत्ननके निवासी ।

(घ) . . अमुक कालमें हुये इसयातका उल्लेख करनेके लिये हम सर्वथा असमर्थ हैं तथापि इनको काल दशमी शताब्दी अनुमानसे माना जाता है परन्तु उममें भी कोई पुष्ट प्रमाण नहीं । इस ग्रन्थकी संस्कृत टीका भी इसीके साथ प्रकाशित है जो कि मूलको भलप्रकार लगाती है। इसके कर्ता भट्टारक शुभचन्द्र हैं जो १५ वीं शताब्दीमें हो गये हैं यद्यपि 'यह ग्रन्थ दो मंस्कृतटीकाओंसे युक्त संस्कृत समयसारके माथ.और भापाटीका युक्त समयसारके माथ मय भापाटीकाके निकल चुका है. इसलिये इसके प्रकाशित करनेकी आवश्यकता न थी तथापि स्वतंत्र न प्रकाशितकर साथमें प्रकाशित होनेसे और विना संस्कृतटीकाके जैसा, इस ग्रन्थका महत्त्व है वैसा लोगों को जल्दी ज्ञान नहिं हो सक्ता' इसलिये इसका जुदा प्रकाशित करना उचित समझा गया। संस्कृत टीकाकी दूसरी प्रतिके बहुत प्रयत्न करनेपर भी न मिलनेसे लाचार हो एक ही प्रतिके आधारसे इसकी संस्कृत टीका प्रकाशित करनी पडी इसलिये जहांपर स्खलना हो गई हो पाठक उसे शोधनेकी कृपा करें । विना संस्कृत टीकाके लोगोंपर महत्त्व नहि प्रकट हो सक्ता था दुसरे एकप्रकारसे भाषाटीका सहित यह ग्रन्थ गापाटीकासहित समयसारमें निकल भी चुका था इसलिये संस्कृतटीकाकेलिये हमारा इतने दिनोंतक प्रयत्न करना उचित ही था इस थकी कविताके सौंदर्य के बारेमें लिखना व्यर्थ है । पाठक इसका आस्वादनकर स्वयं अनुभव करलेंगे तथापि हम इतना जरूर लिख देते हैं कि जिसप्रकार वीर श्रृंगार आदिकी कवितामें मनुष्यका उमीकी ओर ध्यान खिच जाता है, उसीप्रकार इस अध्यात्मरसकी भी कविताक पढ़ते समय चित्त इसी में लीन हो जाता है बडा मिठास मालूम पडता है, आरंभकर फिर जल्दी छोडनको जी नहिं चाहता। . - निवेदन- हमै भापा और. संस्कृनटीकामे कहीपर अर्थमें विलक्षणता मालूम हुई थी इसलिये उसे, विशेपमें लिखदिया है कहींपर भाव में भी कठिनता जान पडी थी वह भी विशेषमें खुलासा करदिया है यदि कहींपर त्रुटि किंवा भूल हुई हो तो पाठक क्षमा करें । निवेदक ईश्वीमन् १९१७ गजाधरलाल न्यायतीर्थ - करता परमाध्यात्मतरंगिणी के श्लोकों की अकारादि क्रम सूची श्लोक पृष्ठ अ १७ ६३' § १२० २९ १६६ १६० १६२ अकर्ता जीवोऽय अखडितमनाकुल अचित्यशक्तिः अच्छाच्छा' स्वय अज्ञानतरतु अज्ञानमयभावाना अज्ञानमेतदधिगम्य अजानान्मृगतृप्णि का अज्ञान ज्ञानमय अज्ञानी प्रकृति अतो हता. प्रमादिनो अतःशुद्धनयायत्तं अत्यत भावयित्वा अत्र स्याद्वादशुद्धयर्थ अथ महामद अहताऽपि हि अध्यास्य शुद्ध अध्यास्यात्मनि अनंतधर्मणस्तत्त्वं अनवरतमनते अनाद्यनंतमचल अनेनाध्यवसायन अन्यभ्यो व्यतिरिक्त अयि कथमपि मृत्वा अर्यालवनकाल एष अलमलमतिजल्पै पृष्ठ श्लोक आत्मा ज्ञान स्वय ज्ञान १३३ आत्मान परिशुद्ध १७ आत्मानुभूति ६८ आससारत एव ६६ आससारविरोध ५१ प्रासमारात् प्रतिपद ५६ ११६ इति परिचिततत्त्व १ इति वस्तुस्वभाग सा ५३ इति वस्तुम्वभाव नाज्ञानी १३३ इति सति सह सन १२८ इतीदमात्मनस्तत्व १० इतः पदार्थप्रयना •१५६ इतो गतमनेकता १६७ इत्थ जानक्रकच ७६ इत्य परिग्रहमपास्य १२४ इत्यज्ञानविमूढाना ८० इत्याधनेकनिज १५१ इत्यालोच्य विवेच्य ४ इत्येवं विरचय १.७ इदमेकं जगच्चतु ३८ इदमेवात्र तात्पर्य ५१७ इन्द्रजालमिद १६१ २३ उदयति न नयश्री १७६ उन्मुक्तमुन्मोच्य १६५ उभयनयविरोध ए १६४ एकज्ञायक्रभाव ४१ एकत्व व्यवहारतो एकत्वे नियतस्य ६२ एकमेव हि तत् २० एकश्चितश्चिन्मय ५० एक ज्ञानमना १४ एकः परिणमति ६६ १५४ १०० १२० १६६ २१ ६१ उ १३ १६२ ६ अवतरति न यावत् ६५ २६ - ६ अविचलचिदात्म अस्मिन्ननादिनि आ आक्रामन्नविकल्स आत्मनश्चिन्तयैवाल आत्मभावान् करोत्यात्मा प्रात्मस्वभाव परभाव १२५ १०६ (ख. . पृष्ठ श्लोक ४३ कर्म सर्वमपि ६८ कमैव प्रवितर्व्य १६३ कपायकलिरकत' १६२ कान्त्यैव स्नपयंति ५८४ कार्यत्वादकृत ५८ कृतकारितानुमननै ५८ क्लिश्यन्ता स्वयमेव ५८ कचिल्लसति मेचक ६६ १३८ १६२ २४ ५३७ १६१ श्लोक एकः कर्ता चिदह एको दूरात्त्यजति एको मोक्षपथो एवं ज्ञानस्य शुद्धस्य एव.तत्वव्यवस्थित्या एकस्य कर्ता एकस्य कार्य एकस्य चेत्यो एकस्य चैको एकस्य जीवो एकस्य दुष्टो एकस्य दृश्यो एफस्य नाना एकस्य नित्यो एकस्य बद्धो एकस्य भानो एकस्य भावो एकस्य भोक्ता एकस्य मूढो एफस्य रक्तो ५८ घृतकुम्भाभिधानेपि ३७ च - ५६ चिच्छक्तिव्याप्त ' ५६ चित्पिण्डचण्डिम ५६ चित्रात्मशक्ति ५७ चिरमिति नवतत्त्व ५९ चित्स्वभावभर ५६ चैद्र प्यं जडरूपना ३६ १८ १८६ १० ६१ . ज : १६३ ११६ एकस्य वस्तुन इहा ५८ जयति सहजतेजः ५८ जानाति यः स न १३६ जीवः करोति यदि ५६ जीवाजीवविवेक ५६ जीवादजीवमिति ३३ एकस्य वाच्यो एकस्य वेद्यो एकस्य सातो एकस्य सूक्ष्मो एकस्य हैतुन एष ज्ञानधनो ट टंकोत्कीर्णविशुद्ध टंकोरकार्णस्वरसानचित १५३ ११० १८ एकैव हि वेदना त कथमपि समुपात तद्ज्ञानस्यैव २८ २२ तदथ कर्म कथमपि हि लभन्ते कर्ता कर्ता भवति कर्ता कर्मणि नास्ति कारं स्वफलेन कतु वेदयितुश्च कत त्वं न स्वभावा तथापि न निरगल शुभाशुभ ६६ त्यक्त येन फलं ६५ त्यक्त्वाऽशुद्धिविधायि १०३ त्यजतु जगदिदानी १५५ ६८ १०३ १२६ २२ . ko १३२ दर्शनज्ञानचारित्र १६३ (ग) श्लोक दर्शनज्ञानचारित्रास्त्रित्वा दर्शनज्ञानचारित्रौस्त्रिभिः दूर भूरिविकल्पजाल द्रव्यलिंगममकार द्विधाकृत्य प्रज्ञा ध धीरोदारमहिम्न्यनादि पृष्ठ 1५६ १२६ २५ १८२ न १३० १४५ १७३ १७१ ७६ १२४ न कर्मबहुल न जातु रागादि ननु परिणाम एव नम. समयसाराय न हि विदधति नाश्नुते विपयसेवन नास्ति सर्वापि सबंधः निजमहिमरताना मित्यमविकारि नियंते येन यत्र नि शेपकर्मफल निपिद्धे सर्वस्मिन् नीत्वा सम्यक् प्रलय नेकस्य हि कर्तारी नैकान्तसंगतशा नोभौ परिणमतः खलु पृष्ठ श्लोक १८ प्रत्याख्याय भविष्यत् १६ प्रमादलित' कथ રૂ प्राकारकलितावर १६५ प्राणोच्छंद मुदाहरन्ति १२२ प्रादुर्भावविराम व ८१ बंधच्छंदाद् बहिलु ठति ११३ बाह्यार्थग्रहण ११६ वाहार्य परिपीत १४५ भ १ भावयेद् भेदविज्ञान १५ भावावाभाव ६१ भावो रागद्वपमोहै १३६ भित्वा सर्वमपि ८६ भिन्नक्षेत्र निषण्ण २६ भूत भान्तमभूतमेव ३७ भेदज्ञानोच्छलन + १५८ भेदविज्ञानतः सिद्धा ७० भेदोन्माद भ्रमरस १३१ भोक्तृत्व न स्वभावोऽस्य ४४ म १८६ मग्नाः कर्मनयावलवन ४८ मज्जन्तु निर्भरममी मा कर्तारममी स्पृशन्तु - मिथ्याप्टेः स एवास्य १२६ मोक्षहेतुतिरोधानात ५ मोह विलासविजृम्भित ४४ मोहाद् यदहमका १६ य १५२ य एव मुक्त्वा नय EE यत्तु वस्तु कुरुते १७६ यत मन्नाशमुपैति ८० यदि कथमपि धारा १२३ यदिह भवति रागद्वेप १७५ यदेतत ज्ञानात्मा ८८ ७४ १३३ प ३१ १३६ ११७ ७१ १५६ १५५ पदमिद ननु कर्म परद्रव्यग्रह कुर्वन् परपरिणतिहेतो परपरिणतिमुज्झत् परमार्थेन तु व्यक्त पूर्णेकाच्युतशुद्ध पूर्वपद्धनिजकर्म पूर्वालवितबोध प्रच्युत्य शुद्धनयतः प्रज्ञाछेत्री शितेय प्रत्यक्षालिखित ५६ १४६ १०६ ८६ १५० (घ) पृष्ट ७६ ३४ ५८० श्लोक यत्र प्रतिक्रमणमव यस्माद् द्वैतमभूत् य. करोति म करोति च. परिणमति स य. पूर्वभावकृत याहताहगिहास्ति यावन पाकमुपैति ये तु कर्तारमात्मान ये तु स्वभावनियम ये त्वन परिहत्य ये ज्ञानमात्र निज १७२ ७१ ७१ १४२ पृष्ठ श्लोक १२७ विजहति न हि मत्ता १६५ विरम किमपरेणा ६४ विश्रातः परभाव ४७ विश्वाद विभक्तोऽपि १५६ विश्व ज्ञानमिति । १०१ वृत्त कर्मस्वभावेन ७२ वृत्तं ज्ञानस्वभावेन १३५ वृत्त्यशभेदतोऽत्यन्त १३७ वेद्यदकभाव १६४ १८७ व्यवहरणनयः १६० व्यवहारविमूढ व्याप्य व्यापकता १५१ व्यावहारिक शैव १४८ शुद्धद्रव्यनिरूपणा १५३ शुद्धहव्यस्वरसभवना ७६ १४१ सकलमपि विहाया १५० समस्तमित्येवमपास्य ११६ व्यतिरिक्त परद्रव्या १६२ योऽयं भावो ज्ञान र १६५ ४५ १४४' श स ३५ रागजन्मनि निमित्तता रागद्वे पद्वयमुदयते रागढ पविभाव रागद्वेप विमोहानां रागद्वपाविह हि रागद्वेषोत्पादक रागादयो बधनिदान रागादीनामुदयमय रागादीना झगिति रागाद्यासवरोधतो रागोद्गारमहारसे रुन्धन् वध नवमिति १२१. सन्यसन् निजबुद्धि संन्यस्तव्यमिद संपद्यते संवर एव है. ११२ सम्यग्दृष्टय एव ल १०४ ६.२ ६१ २६ ११८ लोकः कर्मततोऽस्तु लोक शाश्वत एक व १७६ वर्णादिसामय वर्णाद्या वा राग पर्णाद्यः सहितस्तथा वस्तु चैकमिह विकल्पक. परं कर्ता विगलन्तु कर्मविष सम्यग्दृष्टिः स्वयमहम सम्यग्दृष्टर्भवति सर्वत' स्वरसनिर्भर ११४ सर्वत्राध्यवसानमेव १०५ सर्वद्रव्यमयं प्रपद्य सर्वस्यामेव जीवन्त्या ३७ सर्व सदैव नियत ३६ सिद्धान्तोऽयमुदात्त ३८ स्थितेति जीवस्य १४६ स्थितेत्यविन्ना खलु ६३ स्याद्वादकौशल १५८ स्याद्वाददीपित ११६ १२६ ५५ १८७ १८६ - ड स्वशक्तिसमूचित स्वक्षेत्रस्थितये स्वेच्छासमुच्छलद स्व रूपं किल . १५४ ५२ hc ५२ हेतुस्वभावानुभव १६६ ज्ञानमय एव भावः १७८ ज्ञानवान स्वरसतोऽपि ६० ज्ञानस्य सचेतनयैव १८७ ज्ञानादेव ज्वलनपयमो ज्ञानाद् विवेचकनया जानिन् कर्म न जातु ६६ ज्ञानिनो ज्ञाननिवृत्ता ज्ञानिनो न हि परिग्रह १४० ज्ञानी करोति न जानी जानन्नपीमां ६४ जयाकार कलक क्ष १०२ ५६ १०० १३४ क्षणिकमिदमि हैकः ज्ञ ज्ञप्तिः करोती नहि 1 १७४ परमाध्यात्मतरंगिणी की विषय सूची विपय पृष्ठ ५४ प्रथम अंक पुद्गल है १-३७ दो नयोंकी दो दृष्टि १ ५ cd मंगलाचरण ज्ञान ज्ञान रूप है और पुद्गल पुद्गल रूप व्याख्या करनेका कारण है। एक दूसरे को बनाते नहीं है ६६ स्याद्वाद पद्धति से स्वाध्याय करनेका उपदेश ६ ३। पुण्यपापाधिकार ६७-७४ निश्चयसम्यग्दर्शन का लक्षण है विमाव भावों से होने के कारण पुण्य साध्य साधक आत्मा ही है पाप निश्चयसे समान है १८ कर्म नय और ज्ञान नय दोनां नय अनादिकालीन मोह को छोडनेका उपदेश २२ कार्यकारी है आत्मा और शरीर भिन्न है ७३ २६ निश्चय सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र ४। श्रास्रवाधिकार ७५-८२ आत्मामें लीन होना है ३० ज्ञानी के आस्रव नहीं होता ३३ ज्ञानी रागद्वेप रहित होता है इसलिये पुद्गल शरीर और चेतन आत्मा का बंध नहीं होता ৩৪ परिज्ञान कैसे हो सकता है ? ३४ ५ । संवराधिकार ८३-८८ वर्णादि और रागादि आत्मा से भिन्न पौद्गलिक कर्म और चेतन आत्मा का ३७ भेद विज्ञान ही शिव सुख-दाना है ८६ २ द्वितीय अंक ४३-६६ ६ । निर्जराधिकार ८६-११७ निश्चय नय से क्रोधादि भावोंका कर्ता ज्ञान और वैराग्यकी सामर्थ्य जीव नही है ४३ सम्यग्दृष्टि के ज्ञान चारित्र अवश्य होता है ११ ज्ञानावरणादि कर्मोका का ( वनानेवाला) स्वयंसंवेद्यमान मोक्ष ज्ञानसे होता है | ज्ञानका विलास पुद्गल के हैं च है सम्यग्दृष्टि के सात भय नही होते १०४ ही रागद्वप है १४८ आठ अंग वाले सम्यग्दर्शन से कर्मोंकी ज्ञेयसे ज्ञान विकृत नही होता संवरसहित निर्जरा होती है ११० निश्चय आलोचना प्रतिक्रमण और ७। बन्धाधिकार ११२-१२१ प्रत्याख्यान १५५ रागदप आत्मा में होने से बंध होता है ११३ सम्यग्दशन ज्ञान चारित्रकी परसंगसे रागद्वैप होते है ११६ एकता मोक्षमार्ग है १६३ '८ । मोक्षाधिकार १२२-१३६ आत्माका तत्व ज्ञान ही है चेतना सामान्य और विशेष दोनों स्याद्वाद की शुद्धि के लिये उपाय गुण युक्त होती है १२४ उपेव भावका वर्णन १६७ प्रमाद छोडकर चारित्रवान बनो १२६ एकांती मतोंका निराकरण १७१ ६ । सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार १३.१ स्याद्वादपद्धति से आत्म चिंतन कर्ता भोक्ता आत्मा नही है १३२ करने वाला मुक्त होता है १८७ एक वस्तु अन्य वस्तु रूप नही होती १४५ ग्रन्थकर्ताका लघुता प्रदर्शन १६६ कुत्सित और मलिन ज्ञान का नाम संस्कृत टीकाकार की प्रशस्ति १६८ श्री शांतिसागर जैन सिद्धान्त प्रकाशिनी संस्था का परिचय । यह सम्था वाराणसी ( काशी) मे स्वर्गीय पडित पन्नालाल जी सुजानगढ़ निवासी ने ईस्वी सन् १९१३ में ( आजसे ५० पचास साल पहले ) सर्व साधारण में दिगम्बर जैन धर्म का प्रचार करने के लिये स्था- पित की थी। उस समय इसका नाम' श्री जैनधर्मप्रचारिणी सभा था। इसके कुछ मास वाद ही उस्मा नावाद (धाराशिव ) वासी शेठ वकील नेमचन्दजी वालचन्दजी का तीर्थ यात्रा करने के लिये आगमन- हुआ, वारलीवालजी ने संस्कृत प्राकृत के प्राचीन दिगम्बर जैन शास्त्रीको मुद्रित कर प्रकाश में लानेकी आवश्यकता उनको बत्तलाई तब वकील साहबने अपने पिता बालचन्द कस्तूरचन्दकी स्मृति चिरस्थायी करने के लिये दो हजार एक २००१ रु० की सहायता दो। अव सभाका नाम भारतीयजैनसिद्धान्त प्रकाशिनी संस्था कर दिया गया और सर्वा प्रथम समयसाप्राभृत जैनेंद्र प्रक्रिया तत्त्वार्थराजवार्तिक आदि संस्कृत प्राकृत भापाके मूलग्रन्थ प्रकाशित किये गये । इसके बाद सन् १६१५ मे संस्था कलकत्ता आगई और शोलापुर वासी शेठ गांधी हरी भाई देवकरण एण्ड सन्स्के 'मालिक शेठ वालचन्दजी हीराचन्दजी फूलचन्दजी ने अपनी पूज्य माताजीकी स्मृत्यर्थ १३००१) तेरह हजार एक रु प्रदान किये । आपकी इस सहायता से हरिवंशपुराण ( नवीन अनुवाद) अर्थ.. प्रकाशिका महाग्रन्थ श्री गोम्मटसार जो दो सस्कृत टीका और हिंदीवचनिका सहित तथा तत्त्वार्थ राज- वार्तिकालकर भाषा टीका सहित प्रकाशित किये गये। इसके वाद संस्थाका स्थान कलकत्ता से सन् १६५६ में श्रीमहावीरज राजस्थान) परिवर्तित हुआ ओर नाम श्री शातिसागर जैन सिद्धान्त प्रकाशिनी सस्था होगया। अव इसका निजी भवन है और सतत , अन शास्त्रोंका अपने प्रेसमे प्रकाशन कर रही है । A । ।

श्री चन्द्रसोगरजी महाराज
श्री वीरसारजी महाराज
स्व. आचार्यकल्प
स्व. श्री दिगम्बर जैनाचार्य
“น* นน 3
--
AL
।
.
NOT"
a
karne
1
५
-
--
4
१
+
t
1.
+
.
nadimirmirmussainin.........

No text on this page.

श्री वीतरागाय नमः श्रीमद्-अमृतचंद्रसूरिविरचित परमाध्यात्मतरंगिणी (समयसारकलश) शुद्धं सच्चिद्पं भव्यांवुजचंद्रममृतमकलंकं । ज्ञानाभूपं वंदे सर्व विभावस्वभाव संमुक्त ॥१॥ सुधाचंद्रमुनेर्वाक्यपद्यान्युद्धृत्य रम्याणि । विवृणोमि भक्तितोऽहं चिद्रूपे रक्तचित्तश्च ।। अथ श्रीमदमृतचंद्रसूरि. श्रीकुदकुदाचार्योक्तसमयसारप्राभृत-व्याख्यान कुर्वाणः संस्तदतरे चित्स्वरूपप्र- काशकानि-चिन्नाटकर गावनि-वितीर्णानि पद्यानि परमाध्यात्मतरगिण्यपरनामधेयानि रचयन् प्रथमतः परमात्मादिनमस्कृतिरूपमगलमाचप्टे- नमः समयसाराय स्वानुभूत्या चकासते। चित्स्वभावाय भावाय सर्वभावांतरच्छिदे ॥१॥ समयसाराय भावाय नमः सं० सम्यक् त्रिकालावच्छिन्नतया अयंति-गच्छत्ति प्राप्नुवंति स्वगुणपर्यायानिति समयाः-पदार्थाः, तेषां मध्ये सार. सरति-गच्छति सर्वोत्कृष्टत्वमिति सारः परमात्मा, तस्मै । भूयते सत्स्व- रूपेणेति भावः-पदार्थस्तस्मै परमात्मरूपपदार्थाय, नमः-त्रिशुद्धया नमस्कारोऽस्तु । किं लक्षणाय ? चकासते- देदीप्यमानाय । कया ? स्वानुभूत्या-स्वस्य आत्मन., अनुभूतिः-अनुभवन तया, स्वानुभवप्रत्यक्षण चकासते पुनः किंभूताय ? चित्स्वभावाय-चित् ज्ञानदर्शनरूपा सैव स्वभावः स्वरूप यस्य तस्मै । पुन' किंलक्षणाय ? सर्वभावांतरच्छिदे-आत्मनो भावात् अन्ये भावाः-स्वभावा. पदार्था वा भावातराः, सर्वे च ते भावातराश्च, मर्वभावांतरा., तान् छिनत्ति स्वस्वभावात् पृथक्करोतीति सर्वभावातरच्छित् तस्मै । सामान्यपक्षोय । जिनपक्षे. -समयसाराय सं-सम्यक् यथोक्तरूपेण, अयंति जानति स्याद्वादात्मक वस्तु निश्चिन्वति, ते समयाः सातिशयसम्यग्दृष्टिप्रभृतिक्षीणकपायपर्यंता जीवा तेपा पूज्यावेन सारो जिनस्तस्मै नमः । स्वानु- भूत्या-स्वस्यानुभूतिः विभूति' समवसरणादिलक्षणा तया चकासते-प्रकाशमानाय, चित्स्वभावाय-घातिकम- क्षयात्माक्षात् चित्स्वभावाय, भावाय-भानि-नक्षत्राणि, उपलक्षणात् चतुर्निकायदैवतानि अवति-रक्षति- पातीति भावस्तस्मै । सर्वभावानां, अंतरं भेद-'जीवाजीवादिकं भिन्नमित्यादिरूप विचार' छित्ति-परिछि- नचि जानातीति सर्वभावांतरच्छित् तस्मै । ? १ ।

२ परमाध्यात्मतरंगिणी सिद्धपक्ष-परमात्मवत्प्रक्रिया । मम-साम्यं याति प्राप्नुवंतीति समया योगिनस्तेषां मध्ये ध्येयनया सारः सिद्धपरमेठी । स्वानुभूत्वा सु सुष्छ ( ठा ) जगत्त्रयासभान्निी, आ-अतिशयनानुभूति द्धिः-अगुरुलचा- दिगुणानां पबृद्धि, तया । भूधातुईद्धियर्थे वर्तत, तथा चोक्त- सत्ताया मंगले वृद्धौ निवासे व्याप्तिमपदो. । अभिप्राये च शक्तौ च प्रादुर्भावे गतौ च भूः ।। इति । चकासते । चिस्वभावाय, पूर्ववत । भावाय-भा.दीप्ति:-ज्ञानज्योति , नया वाति प्राप्नोति जगदिति भावः- सकलस्य जगनः ज्ञानांनर्गतत्वात, वा गतिगधनयो., ये गत्यर्थास्ते प्राप्त्यर्थाः. 'आतोऽनुपमर्गाक' इनि कप्रत्ययेन सिद्ध। सर्वेत्यादि-सभावानामंत.-अभ्यतरं तेपा अच्छिन-अविच्छेदोऽविनाशो यस्मात्म तथो- तस्तस्मै, सिद्धपरमेष्ठिनः पांचित पदार्थाना विनाशाभवात् । आचार्यपक्षे-स-सम्यक, अयन-गमनं यतं चरेदित्यादिलक्षणं चरणं चेषा ते समया योगिनस्तेपु सार:- आचार्यः, तत्मै । त्वानुभूत्या यत्रिंशद् गुणलक्षणया * चकारूत-प्रकाशमानाय । चिस्वभाशयभावाय- चित्सु चिद्पु, स्वम्य आत्मनः मानः परिणतिः स एव श्रयभावः शुभावहभावो यस्य स यथोक्तस्तस्मै । सर्वभावत्यादि पूर्ववत् । उपाध्यायपक्ष-समयः-सिद्धात'-नियते, प्राप्यते येन स तथोक्तस्तन्मै स्वानुभूत्येति पूर्ववत । चित्स्वमा- वायभावाय-चित्सु चेतनपु पदार्थेषु, उपलक्षणादचेननेपि अभावः स्यान्नास्तित्वं तेन सह आयः भणन कथनमिति यावत्-इड अव्ययतेऽस्य थातो वे घञ्प्रत्ययविधानात, भावस्य त्यादस्तिलरुपम्य यस्योपा- ध्यायस्य तथोक्तस्तस्मै पदार्थेष्वस्तित्वं नास्तित्वेनोपलक्षितमिति क्थकायेत्यर्थः। साधुपचे-समयेपु कालावलिपु नारः साधुः शेष पूर्ववत्त । मयो-गति', मय गतावम्य धातो प्रयोगः, तेषु सार-रत्नत्रयं, तेन सह वर्तत इति समयसार, माधुरित्यरों या । रत्नत्रयपक्ष नं सन्यक्त्वंअयो जानं, सरण भारः चरित्र', दृढकत्वं, तस्मै. शेषं पूर्ववचयासंभव व्याख्येयं । एवमर्थाष्टकं व्याख्यातं अत्याक्षिप्यमाणं वहशोऽर्थेन व्याख्यायते, विन्तरभन्यान्नेक्षितं पद्य । अय मरस्वतीमभिष्टौति- स्वर्गीय-40 जयचन्द्रजीकृत हिंदीवचनिका । अर्थ-समय कहिये जीव नाम पदार्थ, ताविर्षे मार जो द्रव्यकर्म भावक्रम नोकर्म रहित शुद्ध आत्मा नाकै अथि मेरा नमः नमस्कार होऊ । कया है ? 'भावाय' कहिये शुद्ध सत्तारूप वस्तु है। इस विशेषणकारि सर्वथा अभाववादी जो नास्तिक ताका परिहार है । बहुरि कमा है ? 'चित्स्वभावाय' कहिये चैतनागुणरूर है स्वभाव जाका । इस विशेपणकरि गुणगुणी के सर्वथा मंद माननेवाला जो न्यायिक, ताका निषेध है । बहुरि कैसा है ? 'स्वानुभृत्या चक्रामते' कहिये अपनी ही अनुभवरूप क्रिया, नाकरि प्रकाश करता है-आपकू' आपहीकरि जानहै, प्रगट करे है । इस विशेषणकरि आत्मा तथा ज्ञान सर्वथा परोक्ष ही माननेवाले जे जैमिनीय भट्ट प्रभाकर मतके मीमांसक तिनिका व्यवच्छेद है । तथा ज्ञान अन्यजानकारि जान्या जाय है आप १ पचंडीमंचरणो नवविवभचेगुत्तिधरो । चविच सायमुक्को ए अट्ठारस गुणसंजुओ ।। १ ॥ पंच- महन्वयजुत्तो पचत्रिकायापालगसमत्यो । एंच ममिओतिगुत्तो छत्तीनगुणो अ हग्इ मृग ।।२।। , ३ . . प्रथम अङ्क आपकू जानै नाहीं ऐसे मानते जे नैयायिक तिनिका प्रतिपेध है। बहुरि कैसा है ? 'सर्वभावा- न्तरच्छिदे' कहिये सब जीव अजीव जे आपत अन्य चराचर पदार्थ तिनिकू सर्वक्षेत्रकालसंबंधी सर्वविशेपणनिकरि सहित एककाल जाननेवाला है । इस विशेपणकरि सर्वज्ञका अभाव मानने- चाले जे मीमांसक आदि तिनिका निराकरण है। ऐसे विशेषणनिकरि अपना इष्ट देव सिद्ध करि नमस्कार किया है ॥१॥ भावार्थ-इहां मंगलके अर्थि शुद्ध आत्माकू नमस्कार किया है, मो कोई पूछ है-इष्टदेवका नाम ले नमस्कार क्यों नहीं किया १ ताका समाधान-जो यह अध्यात्मग्रन्थ है, तातै जो इष्टदेव का सामान्यस्वरूप सर्वकर्मरहित सर्वज्ञ वीतराग शुद्ध आत्माही है । सो समयसार कहने में इष्टदेव आगया, एक ही नाम लेनमै अन्यबादी मतपक्षका विवाद करे हैं, तिनि सर्वका निरा. करण विशेषणनित जनाया । अन्यवादी अपने इष्टदेवका नाम लेहें, ताका तो अर्थ वाधासहित है । बहुरि स्याद्वादी जैनीनिकै सर्वज्ञ वीतराग शुद्ध आत्मा इष्ट है, ताके नाम कथंचित् सर्व ही सत्यार्थ संभव है । इष्टदेवकू परमात्मा भी कहिये, परमज्योति कहिये,परमेश्वर कहिये, शिव कहिये, निरंजन कहिये, निष्फलंक कहिये, अक्षय कहिये, अव्यय कहिये, शुद्ध कहिये, बुद्ध कहिये, अविनाशी कहिये, अनुपम कहिये, अच्छेद्य, अभेद्य, परमपुरुष, निराबाध, सिद्ध, सत्या- त्मा, चिदानंद, सर्वज्ञ, वीतराग, अर्हत्, जिन, आप्त, भगवान्, समयसार इत्यादि हजारा नामकरि कहिये । किछू विरोध नाहीं । सर्वथा एकांतवादीनिकै भिन्न नाममैं विरोध है, अर्थ यथार्थ समझना ऐसें जानना ॥ दोहा-प्रगटै निज अनुभव करें, सत्ता चेतनरूप । सवग्याता लखिकै नमो, समयसार सिवभूप ।। १ ।। आगै सरस्वतीकू नमस्कार करे है- विशेप-यद्यपि ग्रन्थकारने यहां किसी विशेष इष्टदेवका उल्लेख न कर सामान्यरूपसे समय सार-परमात्माका उल्लेख किया है तथापि अहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय साधु और सम्यग्द- र्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रस्वरूप रत्नत्रयको भी इस श्लोकसे नमस्कार हो जाता है जैसे अहंत परमेष्ठीके पक्षमें-'सम' वास्तविक रीतिसे ( अय) पदार्थों को जाननेवाले जो सातिशय सम्य- ग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकपाय गुणस्थान पर्यंतके जीव उनमें 'सार' मुख्य, समवसरणादि लक्ष्मीसे प्रकाशमान,घातिया कर्मोंके नष्ट हो जानेसे साक्षात् ज्ञान दर्शनरूप चेतनाके धारक, 'भाव' चारो प्रकारके देवोंके रक्षक और समस्त पदार्थोंके भेदाभेदको जाननेवाले अहंत परमेष्ठीको नमस्कार है। सिद्ध परमेष्ठी के पक्षमें,जो सिद्ध परमेष्ठी अगुरुलघु आदि निजगुणोंकी वृद्धि के धारक हैं। चैतन्य स्वमावसे भूपित हैं, जिनके ज्ञानमें तीनोंलोक प्रतिफलित है-झलकते हैं और जिनके किसी भी ज्ञान आदि पदार्थका कभी नाश नहिं होता ऐसे समताको धारण करनेवाले-समय-योगियों में मुख्य सिद्धपरमेष्ठीको नमस्कार है । आचार्यके पक्षमे-जो आचार्य पांचो इन्द्रियों का दमन करना, - ఇం . परमाव्यात्मतरङ्गिणी नौ प्रकारके ब्रह्मचर्यका पालन करना, चारो कपायोंका जीतना आदि छत्तीस गुणोके धारक है, सम्यग्ज्ञान अर्हत सिद्ध आदि चेतन शुभ पदार्थोंमे अपनी परिणति लगानेवाले हैं और जीव अजीव आदि समस्त पदार्थोंका भेद समझते हैं ऐसे सम्यकचारित्रको भलेप्रकार पालन करने- वाले योगियों में मुख्य श्रीआचार्य परमेष्ठीको नमस्कार है। उपाध्यायपरमेष्ठीके पक्षमें जो उपाध्याय परमेष्ठी स्वानुभवप्रत्यक्षसे प्रकाशमान है, चेतन अचेतन दोनों पदाथोंमें स्यादस्तित्व स्यान्नास्तित्व आदि सप्तभंगीका स्वरूप बतलानेवाले हैं और भिन्न भिन्न रूपसे जीव अजीव आदि पदार्थोके ज्ञाता हैं ऐसे सिद्धांतको प्राप्त होनेवाले-सिद्धांतका अध्ययन करने करानेवाले उपाध्याय परमेष्ठीको नमस्कार है। साधुके पक्षमे-जो साधु, स्वानुभवप्रत्यक्षसे प्रकाशमान, चैतन्यस्वभावके धारक, सत्स्वरूप और जीव अजीव आदि पदार्थोंका भेद जाननेवाले हैं ऐसे सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रस्वरूा रत्नत्रयसे भूपित साधु परमेष्ठीको नमस्कार है । रत्नत्रयके पक्ष में-स्वस्वरूपसे प्रकाशमान चैतन्य और सत्स्वरूप, जीव अजीव आदि पदार्थोंके ज्ञान श्रद्धान आदि करानेवाले सं-सम्यक्त्य, अय-सम्यग्ज्ञान, सार-सरण-सम्यक्चारित्रस्वरूप रत्नत्रयकेलिये नमस्कार है । इसप्रकार इस श्लोकके आठ अर्थ किये गये है ॥ १॥ अनंतधर्मणस्तत्त्वं पश्यंती प्रत्यगात्मनः । अनेकांतमयी मूर्तिनित्यमेव प्रकाशतां ॥२॥ सं० टी०-अनेकातमयी मूर्ति-अनेकातेन स्याद्वादेन निवृत्ता स्याद्वादात्मिका मूनियन्याः सा अनेकांत- मयी मूर्तिः-जिनवाणी, जिनवाण्या अनेकातात्मकत्वादनुक्तापि सामाजिनवाणी लभ्यते । नित्यं सदैव, त्रिकाल प्रकाशता-नित्योद्योतं कुरुतां । किंविशिष्टा सा ? प्रत्यगात्मनः-परमात्मन:-अथवा आत्मनः-विद्र- पस्य, प्रत्यक तत्त्वं पश्यती-भिन्न तत्त्व-स्वरूपं अवलोकयती-प्रकाशयतीत्यर्थः । किंविशिष्टस्य तस्य अनतधर्मण'-अनंता द्विवारानतप्रमाणा अस्तित्वनास्तित्वनित्यत्वानेकत्वादिरूपा धर्मा.-स्वभावा यस्य स तथोक्तस्तस्य । धर्मशब्दोत्र स्वभाववाची, “धर्मा. पुण्यसमन्यायस्वभावाचारसोमपाः” इत्यनेकार्थः । अथ स्वचित्तविशुद्धयर्थ प्रार्थयनि- अर्थ-अनेक है अंन कहिये धर्म जामैं ऐसा जो ज्ञान तथा वचा तिसमयी मूर्ति है सो नित्य कहिये सदा ही प्रकाशतां कहिये प्रकाशरूप होऊ । कैमी है ? अनंत हैं धर्म जामैं ऐसा अर प्रत्यक् कहिये परद्रव्यनित तथा परद्रव्यके गुणपर्यायनितै भिन्न अर परद्रव्यके निमित्त भये अपने विकारनित कथंचित् भिन्न एकाकार जो आत्मा ताका तच कहिये असाधारण सजातीय विजातीय द्रव्यनितें विलक्षण निजस्वरूप ताहि पश्यंती कहिये अवलोकन करती है ।। भावार्थ-इहां सरस्वतीकी मूर्तिकू' आशीर्वचनरूप नमस्कार किया है, सो लौकिकमै सर- स्वतीकी मूर्ति प्रसिद्ध है, परन्तु यथार्थ नाही, तात ताका यथार्थ वर्णन किया है | जो यह सम्यग्ज्ञान है सो सरस्वतीकी सत्यार्थ मूर्ति है, इहां संपूर्णज्ञान तो केवलज्ञान है, जामै सर्व ॥ . प्रथम अङ्क पदार्थ प्रत्यक्ष प्रतिभासे हैं, सोही अनंतधर्मनिसहित आत्मतत्वकू प्रत्यक्ष देखे है । बहुरि नाही का अनुसारी श्रुतज्ञान है सो परोक्ष देखे है, तातें यह भी ताहीकी मूर्ति है । बहुरि द्रव्यश्रुत वचनरूप है, सो यह भी ताही की मूर्ति है, जात वचनद्वारकरि अनंतधर्मा आत्माकू' गह जनावे है। ऐसें सर्वपदार्थनिके तत्त्व जनावती ज्ञानरूप तथा वचनरूप अनेकांतमयी सरस्वती की मूर्ति है,याहीते सरस्वतीका नाम वाणी,भारती,शारदा,वाग्देवी इत्यादि अनेक कहिये है । अनं- तधर्मनिकू स्यात्पदतै एक धर्मावि अविरोधरूप साधे है,नाते सत्यार्थ है । अन्यवादी केई सरस्वती की मूर्ति अन्यथा थापे हैं, सो पदार्थकू सत्यार्थ कहनहारी नाही । इहां कोई पूछे आत्माका अनंतधर्मा विशेषण किया, सो ते अनंतधर्म कौन कौन हैं ? तहाँ कहिये-जो वस्तुमैं सत्पणा, वस्तुपणा, प्रमेयपणा, प्रदेशपणा,चेतनपणा,अचेतनपणा,मूर्तिकपणा अमूर्तिक पणा इत्यादिक तौ गुण हैं । बहुरि तिनि गुणनिका परिणमनरूप पर्याय तीनकालमंबंधी समयसमयवर्ती अनंत हैं ।। बहुरि एकपणा,अनेकपणा,नित्यपणा,अनित्यपणा भेदपणा,अभेदपणा,शुद्धपणा,अशुद्ध पणा आदि अनेक धर्म हैं, ते सामान्यरूप तो वचनगोचर हैं,अर विशेष वचनते अगोचर हैं, ते अनंत हैं ज्ञान गम्य हैं । ऐसे आत्मा भी वस्तु है, तामै भी अपने अनंतधर्म है । तिनिमै चेतनपना असाधारण है, अन्य अचेतनद्रव्यमे नाहीं । अर सजातीय जीवद्रव्य अनंत हैं, तिनिमे है तोऊ अपना अपना जुदा जुदा निजस्वरूपकरि कहा है । जाते द्रव्य द्रव्यनिके प्रदेश भेद है, तात काहूका कार्टूमें मिलता नाहीं । सो यह चेतनपणा अपने अनंतधर्मनिमै व्यापक है, तात याहीकू' आत्मा का तत्व कहा है, ताकू यह सरस्वतीकी मूर्ति देखे है, अर दिखावे है, तात याकू आशीर्वादरूप वचन कह्या है जो, सदा प्रकाशरूप रहौ, यात सर्वप्राणीका कल्याण होय है ऐसें जानना ॥२॥ आगें टीकाकार इस ग्रन्थका व्याख्यान करनेका फलकू चाहता संता प्रतिज्ञा कर है- परपरिणतिहेतोर्मोहनाम्नोऽनुभावादविरतमनुभाव्यव्याप्तिकल्माषितायाः । मम परमविशुद्धिः शुद्धचिन्मात्रमूर्तर्भवतु समयसारव्याख्ययैवानुभूतेः ॥३॥ स० टी०-मम-मे,भवतु-अस्तु । का' परमविशुद्धिः-परमा उत्कृष्टा-कर्म मलकलकरहिता, सां चासौ विशुद्धिश्च-विशुद्धता, कुत. ' अनुभूतेः-अनुभवात्, कया ? समयसारव्याख्ययैव-समयेपु-पदार्थेषु सार:- परमात्मा, तस्य व्याख्या-विशेपेण वर्णन, एव-निश्चयेन, परैमात्मव्यावर्णनात, अनुभूतिः, ततो विशुद्धिर्भ- वतु । अथवा-समयसारास्यमिद शास्त्र तव्याख्यया कृत्वा अनुभूति. ततः शुद्धिश्च । कस्याः ? शुद्धत्यादि शुद्ध कर्मकलकरहितं, चिन्मात्र-ज्ञानमात्र तदेव मूर्तिर्यस्याः सा तथोक्ता तस्याः, व्यवहारदशाया तु किल- क्षणा ? अविरत-निरतर, अनुभेत्यादि-संसारिणा, अनुभवितु योग्याः-अनुभाव्याः-विषयाः, तेषा व्याप्तिः प्राचुर्य तया कल्मापिता-कश्मलीकृता या सा तथोक्ता तस्याः, कुतः १ अनुभावात्-प्रभावात्, कस्य ! मोह- नाम्नः शनोरित्याध्याहार्य, किलक्षणस्य तस्य ? परेत्यादि-परभ्यः पुत्रमित्रकलत्रशत्रुभ्यः, उत्पन्ना परिणतिः परिणामः । अथवा परा आत्मस्वरूपाद्भिन्ना विभावरूपा परिणतिः सैव हेतुः कारण यस्य स तथोक्तस्त स्य ॥३॥ अथ जिनवचसः समयसारस्य प्राप्ति दृढयति- ? ? १ ६ , ॥ परमाध्यात्मतरङ्गिणी याका अर्थ-श्रीमान अमृतचंद आचार्य कहे है, जो इस समयसार कहिये शुद्धात्मा तथा यह ग्रन्थ, ताकी व्याख्या कहिये कथनी तथा टीका, ताहीकरि मेरी अनुभूति कहिये अनुभवन- 'क्रियारूपपरिणति, ताकै परमविशुद्धि कहिये समस्त रागादिविभावपरिणतिरहित उत्कृष्ट निर्म- लता होऊ। कैसी है यह मेरी परिणति ? परपरिणतिकू कारण जो मोहनामा कर्म, ताका अनुभावकहिये उदयरूपविपाक, तातै अनुभाव्य कहिये रागादिक परिणाम तिनकी जो व्याप्ति ताकरि निरन्तर कल्मापित कहिये मैली है। बहुरि मैं कैसा हूं ? द्रव्यदृष्टिकरि शुद्धचैतन्यमात्र मूर्ति हूं। भावार्थ-आचार्य कहै है-जो शुद्धद्व्याथिकनयकी दृष्टिकरि तो मैं शुद्धचैतन्यमात्र मूर्ति हूं। परन्तु मेरी परिणति मोहकर्मके उदयके निमित्त करि मलिन है रागादिरूप होय रही है । 'सो इस शुद्ध आत्माकी कथनीरूप यह जो समयसार ग्रन्थ, ताकी टीका करनेका फल यह चाहूंहूं, जो मेरी परिणति रागादिकतै रहित होयकरि शुद्ध होऊ, मेरै शुद्धस्वरूपकी प्राप्ति होऊ, अन्य किछु ख्याति, लाभ, पूजादिक नाही चाहुँ हों। ऐसे आचार्यने टीका करनेकी प्रतिज्ञा 'गर्मित याका फलकी प्रार्थना करी है ॥ ३॥ उभयनयविरोधध्वंसिनि स्यात्पदांके जिनवचसि रमते ये स्वयं वांतमोहाः । सपदि समयसारं ते परंज्योतिरुच्चैरनवमनयपक्षाचण्णमीक्षंत एव ॥ ४ ॥ सं० टी-ते पुरुषाः, सपदि-तत्कालं, एव-निश्चयेन, ईक्षते-अवलोकयंति, साक्षात्कुर्वतीत्यर्थः । कि तत् परज्योतिः-पर उत्कृष्ट अतिक्रांतसूर्यादि, तच्च तज्ज्योतिश्च-ज्ञानतेजः-परब्रह्मत्यर्थः । किलक्षणं तत् ? समयसार-सर्वपदार्थेपु सारं, पुन किभूत ? उच्चै. अतिशयेन,अनव-न नवं अकृत्रिम पुराणमित्यर्थः, अनादिनिधनत्वात् । पुनः किंभूतं ? अनयपक्षाचरण-नयो नैगमादि. स्याद्वादसापेक्षः, ततो विपरीत:-एकात- रूपोऽनयस्तेपु पक्षोऽभिनिवेशो येपा तेऽनयपक्षा,एकातवादिनः, तैरक्षुण्ण-श्राक्षुभितं श्रध्वस्तमित्यर्थः 'सूक्ष्म जिनोदितं तत्त्वं हेतुभि व हन्यते' इति वचनात् । ते के ? ये स्वयं-स्वत एव वातमोहाः सत -वांतो वमितो मोहो रागद्वेषरूपो गैस्तथोक्ताः, रमते-क्रीडंति एकत्वं भजंत इत्यर्थः । क्व ? जिनवास-जिनोक्तसिद्धात- मूत्रे, किंलक्षणे तस्मिन् ? उभयेत्यादि-उभये नया द्रव्यपर्यायार्थिकाः-अस्तित्वनास्तित्वां, एकत्वानेकां, नित्यत्वानित्यत्वमित्येवमादय., ? तेषां विरोध:-परस्परं विरोधिया, यत्रास्तिका तत्र नास्तित्वस्य विरोधः, यत्र नास्तिता तत्रास्तित्वस्य विरोध इत्याचे कातवादिना विरोध., त छांसते इत्येवंशीलं तस्मिन् तथा चोक्तमष्टसहस्र था-'विरोधान्नोभयेकात्म्य स्याद्वादन्यायविद्विपा' पुन. विभूते ? स्यात्पदाके-कथंचित्पदेन लक्षिते, जिनवचसः स्याद्वादात्मकत्वात् । तथा चोक्त सोमदेवसृरिणा-स्थाच्छन्दमंतरेण उन्मिपितमात्रमपि न सिद्धिरधिवसतीति। अर्थ-निश्चय व्यवहाररूप जे दोय नय तिनिक विषयके भेदते परस्पर विरोध है, तिस विरोधका दूर करनहारा स्यात्पदकरि चिन्हित जो जिनभगवानका वचन तिसवि जे पुरुष स्मै है-प्रचुरप्रीतिसहित अभ्यास कर हैं ते स्वयं कहिये स्वयमेव विनाकारण आप आप वम्या ? ? .

प्रथम अङ्क - है मोह कहिये मिथ्यात्वकमका उदय जिनिने ते पुरुप इस समयसार जो शुद्ध आत्मा अतिशय- रूप परमज्योति प्रकाशमान ताहि शीघ्र ही अवलोकन करे हैं । कैया है समयसार १ अनव कहिये नवीन उपल्या नाहीं है, कर्मत आच्छादित था सो प्रगट व्यक्तिरूप भया है । वहॅरि कैसा है ? अनय जो सर्वथा एकांतरूप कुनय ताकी पक्ष ताकरि अक्षुण्ण कहिये खंड्या न जाय है ।। भावार्थ-जिनवचन स्याद्वादरूप है। सो जहाँ दीय नयकै विषय का विरोध है,जैसे-सद्रूप होय सो असद्प न होय, एक होय सो अनेक न होय, नित्य होय सी अनित्य न होय, भेदरूप होय सो अभेदरूप न होय, शुद्ध होय सो अशुद्ध न होय इत्यादि नयनिके विषयनिवि विरोध है । तहां जिनवचन कथंचित् विवक्षात सत् असर प, एक अनेकरूप, नित्य अनित्यरूप, भेद अभेदरूप शुद्ध अशुद्ध रूप से विद्यमान वरतु हे नैस कहिकरि विरोध मेटे है, झूठी कल्पना नाही करे है। तार्ते द्रव्यार्थिक पर्यायार्थिक दोय नयमै प्रयोजनके वशतै शुद्ध द्रव्यार्थिकक' मुख्यकरि निश्चय कहे हैं । अर अशुद्ध द्रव्यार्थिकरूप पर्यायार्थिकक गौणकरि व्यवहार कहे हैं। ऐसे जिनवचनवि जे पुरुप रमे है ने इस शुद्ध आत्माकू यथार्थ पावे है । अन्य सर्वथा एकांती सांख्यादिक नाही पावे हैं। जातै सर्वथा एकांतपक्षका वस्तु विपय नाहीं । एक धर्ममात्रही ग्रहणकरि वस्तुकी असत्यकल्पना करे है सो असत्यार्थही है, वाधासहितमिथ्यादृष्टि है ऐसे जानना ॥ ४॥ आगें आचार्य शुद्धनय प्रधानकरि निश्चयसम्यक्त्वका स्वरूप कहे हैं जाते अशुद्धनय जो व्यवहारनय ताकी प्रधानतामैं जीवादितत्त्वनिका श्रद्धान सम्यक्त्व कया है । तिनही जीवादिककू भूतार्थ जो शुद्धनय तिसकरि जान सम्यक्त्व होय है ऐसे कहे है। तहां टीकाकार नाकी सूचनिकारूप तीन काव्य कहे हैं। निनिमें पहले काव्यमै कहे हैं जो व्यवहारनय कथंचित् प्रयोजनवान् कहा तोऊ. यह कडू वस्तुभूत नाहीं है- व्यवहरणनयः स्यायद्यपि प्राक्पदव्यामिह निहितपदानां हंत हस्तावलंबः । तदपि परममर्थ चिच्चमत्कारमानं परविरहितमंतः पश्यता नैप किंचित् ॥५॥ म.टी.-प्राथमिकाना व्यवहारनयोपयोगिला प्रदर्घ्य निश्चयात्मकानां निश्चयं निश्चिनोति हत इति वाक्यालकारे, इह जगति, यद्यपि व्यवहरणनय.-व्यवहारान्यो नयः, हस्तावलबः करावलंबन, स्यात्-भवति, केपा निहितपदाना-निहिन आरोपिन, पद-स्थान सन्मार्ग औरते तथोक्ता तेषां, 'पद-व्यवसितत्राणस्थान- लक्ष्मानिवन्तुपु' इत्यनेकार्थः । कदा ? प्राक् पदव्या शुद्धचिद्रूपप्राप्तितम्तत्समुखत्वे मति पूर्व-प्राथमिकाव; स्थाया, तदपि व्यवहारनय पूसुपयोगी यद्यपोऽस्ति तथापि एप व्यवहारनय., न किंचित्कार्यकारी । केषां ? पश्यता-अवलोकयता, क परमय शुद्धचिद्रपलक्षण पदार्थ, क्य अतः अभ्यतरे चेतसि,किंभूत' चिच्चमत्कार- मात्र-चित्त दर्शनज्ञानलक्षणा, तस्याश्चमत्कारः आश्चर्योद्रे कः, स एव मात्रा-प्रमाण, यस्य स तथोक्तस्तं । भूय किंभूतं ? परविरहित-परे:-पुद्गलादिद्रव्यः, विरहित-त्यक्त', तथा चोक्त-कुन्दकुदाचार्यवरैः 'वय- हारोऽभूयायो भूयत्थो देसिदो दु सुद्धणो' इति । अथ आत्मन एकत्वं वितनोति- . ? ?

परमाध्यात्मतरङ्गिणी - . अर्थ-व्यवहारनय है सो यद्यपि इस पहिली पढ़वी जो शुद्धस्वरूपकी प्राप्ति जेतें न होय तेते तिसविपै स्थाप्या है अपना पद जानें ऐसे पुरुषनि हस्तावलंबतुल्य कह्या है। सो "हंत" कहिये यह बडा खेद है । तथापि जे पुरुष चैतन्यचमत्कारमात्र परम अर्थ शुद्धनयका विपयभूत परद्रव्यमावनिम्म् रहिन अन्तरंगवि अवलोकन करे हैं, ताका श्रद्धान करे है,तथा तिसस्वरूप- लीन होय चारित्रभाव प्राप्त होय हैं तिनकै यह व्यवहारनय किछूभी प्रयोजनवान् नाहीं है । भावार्थ-शुद्ध स्वरूपका ज्ञान, श्रद्धान तथा आचरण भये पीछे अशुद्धनय किछूभी प्रयोजनकारी नाहीं है ।। ५ ॥ अब दूसरा काव्यमै निश्चयसम्यक्त्वका स्वरूप कहे हैं- विशेप-रलोकमें जो ' निहितपदानां ' यह पद है वहाँपर पं० जयचंद्रजीने पद शब्दका पैर अर्थकर और प्रापदव्यां निहितपदानां, ऐसा अन्वयमें संघटिनकर 'शुद्धस्वरूपकी पहिली श्रेणीम पैर रखनेवाले मनुष्योंको यद्यपि व्यवहार नय कार्यकारी है। यह अर्थ प्रगट किया है और संस्कृतटीकाकार भट्टारक शुभचंद्रजीने पदका अर्थ-स्थानकर और सन्मार्गका अध्याहार कर निहितपदानां प्राक्षदव्यां, इत्यादि अन्वय संगठनकर 'जिनके हृदयमें सन्मार्गकी न्यू जम- चुकी है ऐसे मनुप्योको शुद्धस्वरूपकी पहिली श्रेणी में यद्यपि व्यवहार नय कार्यकारी है। यह अर्थ किया है परंतु भावांशमें उनमें किसी प्रकार का विरोध नहीं । यद्यपि संस्कृतटीकाकारके अर्थमें चमत्कारी है परन्तु उन्हें 'सन्मार्ग' शब्दका अध्याहार करना पड़ा है। वास्तवमें 'सन्मार्ग' का अध्याहार पं० जयचंद्रजीको भी अभिमत होना चाहिये क्योंकि सन्मार्ग शब्दसे सम्यग्दर्शन मम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रका ग्रहण है और अंतके आधे श्लोकमें जिन्होंन चैतन्य चमत्कार का भलेप्रकार ज्ञान श्रद्धान करलिया है और उसके स्वरूप में लीन हो चारित्र भावको भी प्राप्तकर लिया है उनके लिये व्यवहार नय जरा भी कार्यकारी नहीं यह अर्थकर उन्होंने स्पष्टरूपसे यह आशय प्रगट करदिया है कि जबतक अखंड सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र प्राप्त न हो तबतक व्यवहार नय कार्यकारी है किंतु उनके प्राप्त होते ही उसकी कोई आवश्यकता नहीं । तथा-भट्टारक शुभचंद्रजीने हंत इति वाक्यालंकारे, ऐसा कहकर हंत अव्यगका प्रयोग वाक्यकी सुन्दरताके लिये बतलाया है परन्तु पं० जयचन्द्रजी ने हंत अव्ययका अर्थ खेद किया है । हम पंडित जयचन्द्रजी के अर्थ से सहमत हैं क्योंकि व्यव- हार नयको हेय माना है इसलिये हंत शब्दसे ग्रंथकारने यहाँ खेद प्रगट किया है कि शुद्धस्वरूप की प्राप्तिके पहिले उमकी प्राप्तिकेलिये मैं जबरन व्यवहारनयका अवलंबन करना पडता है यदि हमारा वश चलता अर्थात् बिना व्यवहारके अवलंबन किये ही शुद्धचिद् पकी प्राप्ति हो जाती तो हम व्यवहार नयकी ओर झांककर भी न देखते ॥ ५ ॥ - प्रथम अक है ? . एकत्ये नियतस्य शुद्धनयतो व्याप्तुर्यदस्यात्मनः पूर्णज्ञानघनस्य दर्शनमिह द्रव्यांतरेभ्यः पृथक् । सम्यग्दर्शनमेतदेव नियदात्मा च तावानयं तन्मुक्त्वा नवतत्त्वसततिमिमात्मायमकोऽस्तु नः ॥६॥ सं० टी-इह-जगति नियमात-निश्चयनयमाश्रित्य, एव-निश्चयेन, एतत्सम्यग्दर्शन शुद्वसम्यक्त्वं, एतत् कि ? यत् अस्य जगत्प्रसिद्धम्य, आत्मनः चिपस्य, दर्शन-अवलोकन, ध्यानेन आत्मनः साक्षात्करण मित्यर्थः । कथं द्रव्यांतरेभ्यः शुचिद्रूपद्रव्यादन्यद्रव्याणि,द्रव्यातराणि, पुद्गलादिद्रव्याणि तेभ्य पृथक्- भिन्न भवति, तथा फिविशिष्टस्यात्मन: ? शुद्धनयतो निश्चयनयात, एकत्वे-अहमात्मा, आत्माहमित्येत- लक्षणे एकत्वे,नियतस्य रति प्राप्नस्य, पुन: कि भूतस्य ' व्याप्तु' स्वगुणपर्यायव्यापकस्य, व्यवहारनयाहा लोकालोक व्यापकस्य, ज्ञानेन ज्ञानत्वात्सर्वस्य, तथाचोक्तमकल कपादैः स्वदेहप्रमितिश्चात्मा ज्ञानमात्रोऽपि समत । तत. सर्वगत सोऽपि विश्वव्यापी न सर्वथा ।। इति पर्णज्ञानघनस्य-पूर्ण परिपूर्ण , नानस्य-बोधस्य घनो यत्र स तथोक्तस्तस्य, च-पुन. अय-प्रत्यक्षीभूत आत्मा-चिद्रूपः, तावानमात्रः सम्यग्दर्शनमात्र इत्यर्थः । तत्-तस्मात् कारणात्, अय-अात्मा चिद्रूप., नः अस्माक, एक. अद्विनीयः, अन्तु भवतु । किं कृत्या ? इमा प्रमिद्धा, नवतत्त्वसहति-जीवादिनवतत्त्वाना समूह, मुक्त्वा-त्यक्त्वा कर्मकलकितजीवादितत्त्वानि विहाय एक प्रात्मा, नः शुद्धयेऽस्तु सदेति यावत् ॥६॥ अथात्मनः प्रकाशो द्योतत इति द्यातयति- अर्थ-जो इस आत्माका अन्यद्रव्यनित न्यारा देखना श्रद्धान करना सोही यह नियमतें सम्यग्दर्शन है ।। कैमा है आत्मा ? अपने गुणपर्यायनिवि व्यापनेवाला है । बहुरि कैसा है ? शुद्धनयत' एकपणावि निश्चित कीया है । वहुरि कैसा है ? पूर्णज्ञानघन है, बहुरि जेता यह सम्यग्दर्शन है तेताही आत्मा है । तात आचार्य प्रार्थना करहैं जो इस नवतत्त्वकी परिपाटीकू छोडि यह आत्माही हमारे प्राप्त होहू ।। भावार्थ-सर्व जे स्वाभाविक तथा नैमित्तिक अपनी अवस्थारूप गुणपर्यायभेद तिनिमें व्यापनेवाला जो यह आत्मा शुद्धनयकरि एकपणाविपै निश्चित कीया,शुद्धनयतें ज्ञायकमात्र एक आकार दिखाया,ताका सर्व अन्यद्रव्य अर अन्यद्रव्यनिके भाव तिनित जो न्यारा देखना श्रद्धान करना सो यह नियमतें सम्यग्दर्शन है,व्यवहार नय आत्माका अनेक भेद रूप कहि सम्यग्दर्शनकू' अनेक भेदरूप कहे है तहां व्यभिचार आवै, यात नियम न रहै । शुद्धनयकी हदपहुंचे व्यभिचार नाहीं है । तातै नियमरूप है । कैसा है ? शुद्धनयका विषय- भूत आत्मा पूर्णज्ञानधन है सर्व लोकालोकका जाननहारा ज्ञानस्वरूप है, बहुरि याका श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन है सो किछु न्यारा पदार्थ नाही है आत्माहीका परिणाम है तात आत्मा ही है तातै सम्यग्दर्शन है सोही आत्मा है, अन्य नाही है ।। भावार्थ--इहां एता और जानना जो नय हैं ते श्रतप्रमाणके अंश हैं ताते यह शुद्धनय है सोऊ श्रुतप्रमाणहीका अंश है। अर श्रुतप्रमाण है सो , - है १० ब परमाध्यात्मतरङ्गिणी परोक्षप्रमाण है वस्तुन सर्वज्ञके आगमके बचनते नाणे है। सो यह शुद्ध नय है सो यह परोक्ष सर्वद्रव्यनित न्यारा असाधारण चैतन्यधर्मक्त सर्व आत्माकी पर्यायनिविर्षे च्याप्त पूर्ण चैतन्य केवलज्ञानरूप सर्व लोकालोकका जाननहारा दिखावै । तिस यह व्यवहारी छमस्थजीव आग- मर्चे प्रमाण करि पूर्ण आत्माका श्रद्धान कर सोही श्रद्धान निश्चयसम्यग्दर्शन है । जेतें व्यव- हारनयके विपयभृत जीवादिकभेदरूप तत्वनिका केवल श्रद्धान रहे,ततै निश्चयसम्बन्दर्शन नाही, याते आचार्य कहे हैं जो इस तच्चनिकी संतति परिपाटीकू छोडिकरि यह शुद्धनयका विषयभृत एक आत्मा है सोही हम प्राप्त होऊ । अन्य किछु न चाहे हैं । यह वीतराग अवस्थाकी प्रार्थना है, किछु नययक्ष नाही, जो सर्वथा नयनिका पक्षपात होऊही करें नो मिथ्यात्व ही है । इहां कोई पूछ-यह अनुभवमैं चैतन्यमात्र आर्य एता ही आत्मामानि श्रद्धान कर नो सम्य. ग्दर्शन है कि नाही ? नाका समाधान-जो चैतन्यमात्र तो नास्तिकविना सर्वही मत आत्माकू माने है, सो एताही श्रद्धान सम्यक्त्व कहिये नौ सही सम्यक्त्व ठार नाने सर्वत्रकी वाणीमें जैसा पूर्ण आत्माका स्वरूप कह्या है तैसा श्रद्वान भये निश्चयसम्यन्त्र होय है ।।६।। अब तीसरा काव्यमें कहे हैं जो सूत्रकार आचार्य ऐसे कई हैं जो याके आगे शुद्धनयके आधीन जो सर्वद्रच्यनित भिन्न आत्मज्योति है सो प्रगट होय है- अतः शुद्धनयायत्तं प्रत्यग्ज्योतिश्चकास्ति तत् । नवतत्त्वगतत्वेऽपि यदेकत्वं न मुचति ॥ ७ ॥ स टी-अनः यतो नवतत्त्वेष्वपि,अयमेवः आत्मान्तु नः,अतः कारणात, कास्ति-चोनते । तत्प्रसिद्ध प्रत्यग्ज्योतिः परंधाम, शुद्धनयायत्तं, निश्चयनयस्य, आयत्तं अर्धनं, शुद्धनिश्चयनयनेति यावत् । यत् पर ज्योति. एकलां अद्वितीयत्वं, न मुचति नो जहाति,क्य सनि ? नवनत्वगतत्वेऽपि नवतत्त्वयु गतत्वं प्राप्तवं तस्मिन् सत्यपि । अपि शब्दात्तेषु, अगतत्वेऽपि सिद्धात्मनो नवतत्त्वेवगतत्वान, गंगार्यात्मनः, नवनत्त्वाय नलगन्नवगतत्वं ॥ ७॥ अथात्मैव श्य इति प्ररयति- अथ-इहात आगै जो शुद्धनयके आधीन मिन्न आत्मज्योनि है सो प्रगट होय है। जो नवनवमै गत हाय रह्या है, तोऊ आफ्ना एकपणा नाहीं छोडे है ।। भावार्थ-जो नवतचम आन्मा प्राप्त हुवा अनेकरूप दीखे ह, सो याका भिन्नस्वरूप विचारिये तो अपना चैतन्य- चमत्कारमात्र ज्योति छोडे नाहीं है, सोही शुद्धनयसरि जानिये है सोही सम्यक्त्व है। चिरमिति नवतत्वच्छन्नमुन्नी मानं कनकमिव निमग्नं वर्णमालाकलापे। अथ सततविविक्त दृश्यतामकरूपं प्रतिपदमिदमात्मज्योनिरुद्योतमानं ॥८॥ सं०टी-अथ परंज्योतिषः प्रवाशक्यतादनंतरं. इर्द, आत्मज्योतिः-परमात्मज्योतिः दृश्यता-अंनरह घ्या अवलोक्यनां. इति-अमुन्न प्रकारेण, कोऽसौ प्रकार: ? एकस्मिन् नमार्गमनि, जीगलीवादिनवतत्त्व !

प्रथम अङ्क ? सद्भाव इति । चिर-आससार-पूर्व पश्चाच्च, नवतत्त्वच्छन्न नवतत्त्वै -जीवाजीवादिभिः, छन्न-आच्छादित, किमिव ? कनकमिव, यथा स्वर्ण, वर्णमालाकलापे-वर्णस्य सप्ताष्टादिरूपवर्णस्य, माला-पक्ति., तस्याः कलापः ‘समूहस्तस्मिन्, निमग्न-अत.पतित । ननु च तत्त्वाच्छादित परंज्योतिः, वर्णमालाच्छादित-स्वर्णं च कथम- स्तीति ज्ञायते ? उन्नीयमान-नयप्रमाणादिभिर्निश्चीयमानं, निघषणच्छेदनादिभिर्जायमानं, सतत-निरतर कि दिशेपेण-निश्चयनयेन, वि [वि]क्त द्रव्यभावमलाद्भिन्न, स्वर्णं च निजक्टिकालिकादिमलात् परमार्थतो भिन्नं, एकरूप-सर्वत्र पर्यायपु चिद्विवर्तत्वेनैक्स्वरूप, लव्थ्यपर्याप्तादिपु लब्ध्यक्षादिचिद्विवर्तस्याऽपरित्य. कत्वात् । स्वर्णं च पीतत्वादिस्वरपेण सर्वत्र वर्णे, एकस्वरूप प्रतिपर्द-एकेंद्रियादिपदेपु ज्ञानादिशक्तितः, उद्योतमान-प्रकाशमान, स्पर्शनेद्रियज्ञानात् द्वींद्रियादिपु रसनेद्रियादिज्ञानाना वृद्धिस्वभावत्वात्, कनकमपि- प्रतिपद-सप्ताष्टकादिवर्णकारस्थानेपु उद्योतमान, इति छायार्थ, कनकध्वपि ज्ञातव्य।। अथ परज्योतिषि प्रकाशिते सति नयादीना वैयर्थ्य स्पष्टयति- अर्थ-ऐसे नवतत्वनिविपं बहुतकालत छिप्या हुवा यह आत्मज्योति शुद्धनयकरि निकाशि प्रगट कीया है, जैसै सुवर्णकी मालाके समूहमें सुवर्ण का एकाकार छिप्याकू निकाशै तेसै । सो अब भव्यजीव याको निरंतर अन्यद्रव्यनित तथा तिनौं भयो नैमित्तिकमावनिरौं भिन्न एकरूप अवलोकन करो। यह पदपदप्रति कहिये पर्यायपर्यायप्रति एकरूप चिच्चमत्कारमात्र उद्योतमान है ।। भावार्थ-यह आत्मा सर्व अवस्थामै नानारूप दीखेथा सो शुद्धनय एक चैतन्यचमत्कार- मात्र दिखाया है । सो अव सदा एकाकारही अनुभवन करो पर्यायबुद्धिका एकांत मति राखी यह श्रीगुरुनिका उपदेश है ।। अब टीकाकार फेरि कहे है, जो, जैसौं नवतत्व में एक जीवहीका जानना भूतार्थ कह्या, तैसे ही एकपणाकरि प्रकाशमान जो आत्मा ताका अधिगमनके उपाय ये प्रमाणनयनिक्षेप हैं तेभी निश्चयतै अभूतार्थ हैं । तिनिविणें भी यह एक आत्माही भूतार्थ है। जातै ज्ञयकै अर वचनके भेद ते अनेक भेदरूप होय हैं ।। तहां प्रथमही प्रमाण दोय प्रकार है परोक्ष अर प्रत्यक्ष । तहां उपात्त कहिये इंद्रियनितें भिडिकरि प्रवर्ते अर अनुपात्त कहिये विना- भिडे मनकरि प्रवर्ते ऐसे दोय परद्वारकरि प्रवर्तमान सो परोक्ष है । बहुरि केवल आत्माहीकरि प्रतिनिश्चितपणाकरि प्रवर्तमान होय सो प्रत्यक्ष है । भावार्थ-प्रमाण ज्ञान है, सो ज्ञान पांच- प्रकार है मनि, श्रुत, अवधि, मनापर्यय, केवल । तिनिम मति, श्रुत तौ परोक्ष हैं । अर अवधि, मनःपर्यय विकलप्रत्यक्ष है। केवलज्ञान सकलप्रत्यक्ष है । सो ये दोऊही प्रमाण है । ते प्रमाता प्रमाण प्रमेयके भेदकू अनुभव करते संते नौ भूतार्थ हैं सत्यार्थ हैं। बहरि गौण भये है समस्तभेद जामैं ऐसा जो एक जीवका स्वभाव ताका अनुभव करते संते अभूतार्थ है असत्यार्थ है । बहुरि नय हैं सो द्रव्यार्थिक है, पर्यायार्थिक है । तहां वस्तु है सो द्रव्यपर्यायस्वरूप है । तामै द्रव्यकू मुख्यपणाकरि अनुभवन करावे ऐसा तो द्रव्यार्थिक है । बहुरि पर्यायकू मुख्यपणाकरि अनुभवन करावै सो पर्यायार्थिक है । सो ए दोऊही नय द्रव्यपर्यायकू' भेदरूप पर्यायकरि अनुभवन करते संते तो भूतार्थ हैं सत्यार्थ हैं ।। बहुरि द्रव्यपर्याय दोऊहीकू नाही आलिंगन करता ऐसा शुद्ध ॥

१२ परमाध्यात्मतरङ्गिणी वस्तुमान जो जीवका स्वभाव चैतन्यमात्र ताक् अनुभव करते संत मंद अभूतार्थ असत्यार्थ हैं। बहुरि निक्षेप है सो नाम स्थापना द्रव्य भाव भेदकरि चारि प्रकार है। तहां जामैं जो गुन तो न होय अर निसके नाम वस्तुकी सज्ञा करीये सो तो नामनिक्षेप है। बहुरि अन्यबस्तु विप अन्यकी प्रतिमारूप स्थापना करना जो यह वह वस्तु है सो यह स्थापनानिक्षेप है । बहुरि वन- मानपर्यायतें अन्य अतीत, अनागत पर्यायरूप वस्तु होय ताकू वर्तमानवस्तुमै कहिये मो द्रव्यनिक्षप है । वर्तमानपर्यावरूप वस्तुकही वर्तमान कहिये सो भावनिक्षप है सो ए चारोही निक्षेप अपने अपने लक्षणभेटते न्यारे न्यारे विलक्षणरूपकार अनुभवन करने संते भूतार्थ है सत्यार्थ हैं । बहुरि भिन्नलक्षण रहित एक अपना चैतन्यलक्षणरूप नीवके स्वभाव अनुभवन करते संते चारोही अभूतार्थ हैं असत्यार्थ हैं । ऐसें इनि प्रमाणनयनिक्ष पनिविर्ष भृतार्थपणाकरि एक जीवही प्रकाशमान है ।। भावार्थ-इहां इनि प्रमाणनयनिक्षेपनिका विस्ताररूप व्याख्यान इनिके प्रकरणकै ग्रंथनिमें है, तहांसें जानना । इनित वस्तु द्रव्यपर्यायात्मक साधिये है। सो माधक अवस्थामै ती ए सत्यार्थही है जाते ए ज्ञानहीके विशेष है, इनिविना वस्तूकू यथाकथ- चित् साधे तब विपर्यय होय है ।। अवस्थाकै व्यवहारके अभावकी तीन रीति हैं। एक तो यथार्थवस्तूकू जानि ज्ञानश्रद्धानकी सिद्धिकरना सो ज्ञान श्रद्धान सिद्धि भये पीछे इनि प्रमाणा- दिक श्रद्धानके अथि तो किछु प्रयोजन नाहीं ।। बहुरि दूजी अवस्था विशेष ज्ञान अर राग द्वेष मोह कर्मका सर्वथा अभावरूप यथाख्यात चारित्रका होना है, याहीत केवलकी प्राप्ति है। सो यह भये पीछे प्रमाणादिरका आलंबन नाही है ।। तापीछे तीमरी साक्षात् सिद्ध अवस्था है, सो तहां भी किछू आलंबन नाहीं है । एस सिद्ध अवस्थामैं प्रगणनयनिक्षपनिया अभावही है इस अर्थका कलशस्य काव्य कहे हैं- विशेष -यद्यपि पं० जयचंद्र ने इस श्लोकका अर्थ किया है भावार्थ मी विस्तृतरूपसे ममझाया है परंतु श्लोको जो दृष्टांत है उसका बिलकुल स्पष्टीकरण नहीं किया, भट्टारक शुभ- चंद्रजीन श्लोकी टीका यद्यपि स्पष्ट लिखी है परंतु अधिक दृष्टि लगानेस श्लोकका असली तात्पर्य समझमे आता है इसलिये हमारी समझसे इस श्लोकका मुगम और स्पष्ट अर्थ इस- प्रकार हैं- यह जगत्प्रसिद्ध बात है कि मुवर्णको तपोकर शुद्ध किया जाता है और ज्यों ज्यों उसमें अग्निक ताव दिये जाते हैं त्यो त्यो उसके कीट कालिमा आदि मल दूर होते जाते हैं इसरीतिसे उसके असली स्वरूप प्राप्त करनेकेलिये एकसे लेकर सोलह ताब दिये जाते हैं और वह हर एक ताश्में कुछ २ कीट कालिमा आदिसे रहित होना हुआ उत्तरोत्तर प्रकाशमान होता चला जाना है जिससमय उसके सोलही ताव समाप्त हो जाते है उससमय वह सोलहवानी प्रथम अङ्क १३ अर्थात् निखालस सोना कहा जाता है और सुवर्णकी परीक्षा करनेवाले मनुष्य उस सोलह- वारके तपाये हुये सोनेको कसोटीपर घिसकर उसके असलीस्वरूपको देखते हैं तो यद्यपि वह सुवर्ण एक शुद्धस्वरूप है तथापि कीट आदिके संबंधसे उसके तावा ( उनरोत्तर अवस्थाओ) के भेदसे उसमें भेद होता जाता है वह अनेक स्वरूप जान पड़ने लगता है परंतु कीट आदिके नष्ट होजानेपर वह ज्योका त्यों प्रकट होजाता है उसीप्रकार यह आत्मा भी एक चतन्यमात्र शुद्ध स्वरूप है और जैसा जैमा वह एकेद्रियसे दो इंद्रिय,दो इंद्रियसेते इन्द्रिय,ते इंद्रियसे चौ इंद्रिय, चौइंद्रियसे पंचेंद्रिय,पंचद्रियों में मनुग्य,मनुष्योंमें अणुव्रती श्रावक, ऐलक, क्षुल्लक क्षल्लकसे मुनि, मुनियों में भी सानवेसे लेकर वारहवें गुणस्थानत्री और केवली आदि होता जाता है त्यो त्यो वह कर्म मलसे रहित होता हुआ प्रत्येक पर्यायमें प्रकाशमान होता जाता है और अनेकाकार दिखता है परन्तु सिद्ध अवस्थामे यह अकेले शुद्ध चतन्यमात्र स्वरूपका धारक ही रहता है इस- लिये विद्वानोंको चाहिये कि वे इस प्रकारके चैतन्यमात्रस्वभावके धारक शुद्ध सिद्ध स्वरूपका अनुभव करें ॥८॥ उदयति न नयश्रीरस्तमेति प्रमाणं कचिदपि च न विमो याति निक्षेपचक्र' किंमपरमभिदध्मो धाम्नि सर्वकपेऽस्मिन्ननुभवमुपयाते भाति न द्रुतमेव : स टी०- अस्मिन्-परात्मलक्षणे, धाम्नि ज्योनिपि, सर्वकपे-लोकालोक, कपनि त्रासमान करोति जानातीति लक्षणया धातूनामनेकार्थत्वात् मर्वकपः 'सर्वकूलाभ्रकरापेपु कप. ' इति खश्प्रत्ययविधानात् । अनुभव-स्वानुभवप्रत्यक्ष, उपयाते-प्राप्ते सति, नयश्री' नया द्रव्यायिकपर्यायार्थिकाः नैगमादयः, तेपा श्रीः, न उदयति-न प्राप्नोति नयाना परमात्मन्यधिकाराऽयोगात वाह्यवस्तुप्रकाशकत्याच, पुनरतस्मिन् प्रकाशिते, प्रमाणं-प्रमीयते परिच्छिद्यते वस्तु तत्त्व येन तत्प्रमाण-स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं, तच्च द्वैध-प्रत्यक्षपरोक्ष- भेदात् । तत्र विशदं प्रत्यक्ष, तञ्च द्वेधा साकल्यवैकल्यभेदात् । साकल्यां केवलज्ञान सामग्रीविशेषविश्लेपिता- खिलावरणत्वात् । वैकल्यं-अवधिमन पर्थयभेदाद द्वेवा । इन्द्रिय प्रत्यक्षं साव्यवहारिक स्पर्शनादींद्रियभेदात् पोढा । तच प्रत्येक-अवग्रहाबायधारणाभेदाच्चतुर्धा, तच्च वहुवहुविधादिद्वादशविपयभेदात, पत्रिंशदधिकत्रि शतभेदभिन्न । परोक्ष-स्मृतिप्रत्यभिज्ञानतर्फानुमानागमभेदाद् बहुधा, एतद्विविधलक्षण प्रमाणमस्तं गतमेति प्रमाणाना तत्प्राप्तिनिमित्तत्वात् तत्प्राप्ते यांच । च पुन., निक्षेपचक्र'-निक्षेपस्तु नामस्थापनाद्रव्यभाव- भेदतश्चतुर्या तत्रातद्गुणे वस्तुनि सज्ञाकरणं नाम, अन्यत्र सोयमिति व्यवस्थापन स्थापना, वर्तमानतत्प- र्यायादन्यदन्यं, तत्कालपर्ययाक्रात वस्तु भावोऽमिधीयते, तस्य चक्र समूह. कचिदपि कुत्रचिदपि, आत्मनोऽन्यत्रालये स्थाने, याति गच्छति, नद् वया न चिन. न जानीम' | अतिशयालकारकथनमेतत् । प्राथमिझानां निक्षेपस्योपयोगित्वात अत्रापरम् निर्देशवामित्वसाधनाधिकरणस्थितिविधानलक्षणं सत्संख्याक्षेत्र स्पर्शनकालांतरभावाल्पवहुत्वलक्षण, च किमभिदध्मः किं कथयाम. ?, तत्र तेपामनुपयोगित्वात् । एव निश्चयेन द्वैव द्वाभ्यां नयनेय प्रमाणप्रमेय निक्षेपनिनप्यादिलक्षणाभ्या इतं प्राप्त द्वीतं, द्वीतमेव द्वैवं स्वार्थि- काऽणप्रत्ययविधानात् । न भाति न प्रतिभासते, तथा चोक्त- प्रमाणनयनिक्षेपा अर्वाचीनपदे स्थिता. । केवले च पुनस्तस्मिस्तदेकं प्रतिभासतां ।। अथ स्वात्मस्वभान प्रकाशयतं शुद्धनगं व्यनक्ति- , 1 है १४ परमाध्यात्मतरंगिणी अर्थ-आचार्य शुद्धनयका अनुभवनकरि कहे हैं, जो, इस सर्वभेदनिका गौण करनहारा जो शुद्धनयका विपयभूत चैतन्यचमत्कारमात्र तेजःपुज आत्मा ताकै अनुभव आये संते नगनि की लक्ष्मी है सो उदयकू नाहीं प्राप्त होय है। चहुरि प्रमाण है सो अस्त प्राप्त होय है। बहुरि निक्षेपनिका समूह है सो कहूं जाता रहै है सो हम नाही जाने है । इससिवाय और कहा कहै द्वतही नाही प्रतिभासे है।। भावार्थ-भेदकू अत्यंत गौण करि कहा है जो प्रमाणनयादि- कका भेदकी कहा चली है ? शुद्ध अनुभव होते द्वैतही नाही भासे है,एकाकार चिन्मात्रही दीखे है इहां विज्ञानातवादी तथा वेदांती कहै जो परमार्थ तौ अद्धतहीका अनुभव मया सोही हमारा मत है, तुमने विशेप कहा कह्या ? ताक् कहिये जो तुमारा मतमै सर्वथा अद्वैत माने हैं, सो सर्वया माने तो बाह्यवस्तुका अभाव होय है, सो ऐसा अभाव प्रत्यक्षविरुद्ध है। बहुरि हमारे नयविवक्षा है सो बाद्यवस्तुका लोप नाहीं करे है । शुद्ध अनुभवतै विकल्प मिटे है, तब परमा. नन्दकू आत्मा प्राप्त होय है, ता अनुभव करावने ऐसा कहा है। अर वाह्यवस्तुका लोप कीये तो आत्माकाभी लोप आवै तब शून्यवादका प्रसंग आवे है, सो तुम कहो तैसे वस्तुस्वरूप सथै नाही, अर वस्तुस्वरूपही यथार्थश्रद्धाविना जो शुद्ध अनुभव भी करे तो मिथ्यारूप है, शून्य का प्रसंग आया तव आकाश के फूलका अनुभव है ।। ६ || आगें शुद्धनयका उदय होय है ताकी सूचनिकाका काव्य कहे हैं- बिशेप-५० जयचन्द्रजीने सर्वकपे पदका अर्थ सब पदार्थीको गौण करनेवाला किया है और भट्टारक शुभचन्द्रका अर्थ,सव पदार्थोको जाननेवाला यह है, यद्यपि ये दोनो ही अर्थ अनुकूल है तथापि खुलासा अर्थ परद्रव्य और उनके विकारोंसे रहित यह है । पं० जयचन्द्रजीने किमपरमभिदध्मः इस वाक्यका अर्थ इसके सिवाय और क्या कहै ? और भ० शुभचन्द्रजीने प्रत्यक्ष परोक्ष प्रमाण पदसे उल्लेखकर अपर शन्दसे निर्देश स्वामित्व आदि ग्रहण किये है और यह आशय प्रकट किया है कि शुद्धचिन्मात्र तत्त्वके अनुभव होनेपर जब वलवान से बलवान भी प्रत्यक्ष परोक्ष आदि प्रमाण लापता होजाते है न कुछ शक्तिके धारक निर्देश स्वामित्व आदि तो ठहर ही कैसे सकते हैं ? इन दोनों अर्थों में भट्टारक शुभचन्द्रजीका अर्थ चमत्कार पूर्ण है ॥ ६॥ आत्मस्वभावं परभावभिन्न मापूर्णमाद्यतविमुक्तमेकं । विलीनसंकल्पविकल्पजालं प्रकाशयन् शुद्धनयोभ्युदेति ॥ १०॥ स० टी-अभ्युदेति उदयां गच्छति, कोसौ ? शुद्धनयः शुद्धपरात्मप्राहकद्रव्यार्थिकः किं कुर्वन् प्रकाशयन् व्यक्तीकुर्वन् ,कं ? त,आत्मस्वभावं शुद्धचिद्रूपस्वरूप,कीहक्ष त ? परभावभिन्न परे च ते भावाश्च परभावा स्वात्मान्यपदार्थाः, अथवा परेषा अचेतनादोना भावा सभावा तैमिन्न । भूयः, कोदो ! आपूर्ण आ अतिश- - तव प्रथम अङ्क १५ १ , - शुद्ध नय ? येन परिपूर्ण, नानाद्यनतगुणपूर्णानात्तस्य,पुन, कि भूत ? आद्यतविमुक्तं अनारिनिधनमित्यर्थ. पुन' कीशं एक अद्वैत अखाडदव्यत्वात, विलीनेत्यादि परद्रव्ये ममेदमिति मतिः संकल्प., अह, सुखी दुग्बीत्यादिमतिः विकल', संकल्पश्च विकल्पश्च सकल्पविकल्पी, विलीन संकल्पविकल्पयोर्जाल समूहो यस्य सं । १० । अथात्मनोऽनुभवन भावयति- अर्थ है सो आत्माके स्वभाव प्रगट करता संना उदय होय है। कैसा प्रगट करे है ? परद्रव्य तथा पर द्रव्यके भाव तथा परद्रव्यके निमित्ततै भये अपने विभाव ऐसे परभावनिते भिन्न प्रगट करे है । बहुरि कैया प्रगट करे है ! आपूण कहिये समस्तपणाकरि पूर्णस्वभाव समस्त लोकालोकका जाननहारा ऐसा स्वभावकू' प्रगट करे है । जात ज्ञानमें भेद तो कम- संयोगते है,शुद्धनयमें कर्म गौण है। बहुरि कैमा प्रगट करे है ? आदि अन्तकरि रहित, जो कछू हुँ आदि लेकरि काहुँते भया नाही,तथा कवहूं काहुकरि जाका विनाश नाहीं ऐसा पारिणामिक भावकू प्रगट करे है। बहुरि केसा प्रगट करे है ? एक हैं सर्व भेदभाव त भावनै रहित एकाकार है, बहुरि विलय भये हैं समस्त संकल्प अर विकल्प के समूह नामें संकल्प तौ द्रव्यकर्म, भावकर्म, नोकर्म आदि पुद्गलद्रव्यनिवि आपा कल्पै सो लेणे अर विकल्प जे जयनिके भेदतै ज्ञानमै भेद दिखै ते लेणे एसा शुद्धनय प्रकाशरूप होय है । सो इस शुद्ध नया जानना नहि विदधति पद्धस्पृष्टभावादयोमी स्फुटमुपरि तरंतोप्येत्य यत्र प्रतिष्ठां। अनुभवतु तमेव द्योतमानं समंताज्जगदपगतमोहीभूय सम्यक् स्वभावं ॥११॥ स० टी०-भो लगत भोजगन्निवासिलोक | आधारे आधेयस्योपचार.,लोकोक्तिरपीक्षास्ति मालवो देशः समागतोऽत्र,इत्युक्त तत्र त्या भूमिर्नागना किंतु तत्रन्यो लोकः नया जगदित्युक्ते जगन्निवामिलोका,अनुभवतु अनुभवगोचरीकरोतु, क ? नमेव स्वभाग,शुद्धनिश्चयनयोक्तत्वात, यथोक्तस्वभाव, अथवा स्वभाव स्वपदार्थ स्वशुद्धचिद्रूपमित्यर्थ मम्यक यक्तितया,विभूत ? ममंतात् सामन्यन द्योतमान,लोकप्रकाशमान, अपगतमोहीभूय अपगतमोहोभूत्वा विनप्टमोहो भूत्वेत्यर्थ यत्र आत्मनि, अमी, बद्धन्यादि वद्ध. कर्मनोक- मभ्यां सश्लेषरूपेण बंवेन बद्ध स्पृष्टः विस्रमोपचयादिपरमाणुभिः अन्यैश्च सयोगमात्र तया स्पृष्टः,बद्धश्च स्पृष्टश्च वद्धस्पृष्टी ताववादिर्येषामन्ययुनादीना ते च ते भावाश्च ते तथोक्ता , एन्य श्रागत्य प्राप्येत्यर्थः प्रतियां स्थिति माहात्म्या वा, नहि विद वति नैव दधते, स्फुट व्यक्त यया भवति तथा, जगदुपरि सर्गतःतरन्तोऽपि सर्वातः स्कृप्टा भवनाऽपि व्यवहारहाट्या घ्यमाना अपि र वहारिभि. कथ्यमाना अपीत्यर्थः, उक्त च- अपृष्टमवद्वतन्यमयुतमवशेषमविभ्रमोपेत य. पश्यत्यात्मान म पुमान् खलु शुद्धनयनिष्ठ ॥ १॥ इति अथ पूर्वापरताधविनाशकत्वेनात्मानमुबोधयनि- अर्थ-टीवाकार उपदेश कर हैं, जो जगतके प्राणीसमूह सो तिस सम्यक्स्वभावकू अनुभवन करौ । जावि ए बद्ध स्पृष्ट आदि भाव है ते प्रगटपणें इस स्वभावके उपरि तरते हैं, तोऊ प्रतिष्ठाकू' नाहीं प्राप्त होय हैं, जाते' द्रव्यस्वभाव नो नित्य है एकरूप है अर ए भाव अनित्य हैं अनेकरूप हैं । पर्याय है मो द्रव्यस्वभावमै नाहीं प्रवेश करे है उपरि ही रहे है ।। कैसा है १ कि कृत्वा है ? १६ परमाध्यात्मतरङ्गिणी यह शुद्ध स्वभाव ? सर्व अवस्थामै प्रकाशमान है ।। कैसे होयकरि अनुभव करो ? अपगत- मोहीभूय कहिये दुरि भया है मोह जाका ऐसा होयकरि । जातै मोहकर्मके उदयजनित मिथ्या- स्वरूप अज्ञान जेते है तेते यह अनुभव यथार्थ नाहीं होय है । भावार्थ-शुद्ध नयका विपयस्वरूप आत्माका अनुभव करो यह उपदेश है । आगे इसही अर्थके कलशरूप काव्य फेरि कहे हैं, नो, ऐसा अनुभव कीयें आत्मदेव प्रगट प्रतिभासमान है- भूतं भातमभूतमेव रभसा निर्भिद्य वंध सुधी- यद्यन्तः किल कोप्यहो कलयति व्याहत्य मोहं हठात् ।। आत्मात्मानुभवैकगम्यमहिमा व्यक्तीयमास्ते ध्रुवं । नित्यं कर्मकलंकपंकविकलो देवः स्वये शाश्वतः ।। सं. टी.-किल-इति आगमोक्तो,अहो इति आश्चर्ये । यदि कोऽपि सुधी:-धीमान, अतः अभ्यंतरे,शुद्ध. चिद्रूपं कलयति अनुभवति,अवलोकयति-साक्षात्करोतीत्यर्थः । व्याहत्य निश्शेपमुन्मूल्य,कं ? मोह अष्टाविंश- तिप्रकृतिभेदभिन्न मोहनीयं कर्म,कथं ? हठात् वलात्कारेण तपोध्यानादिभिः, पुनः किंकृत्य ? निर्भिद्य निशेप भेदयित्वा,बधं प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशलक्षण चतुर्धा कर्मबंध,रममा शीघ्र शुक्लध्यानावाप्त्यनतरं अंतर्मुहूर्तत कीहक्ष वध ? भूतं पूर्व संसारावस्थायां समयप्रबद्धस्वरूपेण वद्ध निर्जरावशान्निर्जीय, भांतं वर्तमान, योगा- दिभिरागमकर्मसमयप्रवद्ध', अतः संवरवशान्निरुदध्य, अभूतं अनागतं अप्रे बध्यमानं निरुद्ध्य, नत्कारणगो- गकपायानामभावात ' कारणाभावे कार्यस्याप्यभावादिति' न्यायात्, एव निश्चयेन, तदिति, अध्याहार्य अयं प्रत्यक्षीभूतः, आत्मा शुद्धचिद्रूपः, व्यक्तः, साक्षात् अनतचतुष्टयापन्नः, ध्रुवं निश्चित, आस्ते तिष्ठति कीहक्षः ? आत्मेत्यादि आत्मनश्चित्स्वरूपस्य, अनुभवः, तेन एकः अद्वितीयः, गम्यः ज्ञयः, महिमा माहात्म्य यस्य स., नित्य सदैव, परमावस्थाया कर्मेत्यादि कर्म एव वलकपकः, संसारस्य कालंक्यहेत्वात्, तेन विकलः रहितः । पुनः किंभूतः १ देवः दीव्यति क्रीडति एकलो( स्लो )जोभावमनुगच्छति परमात्मपद द्योतते वा देवः । स्वय कर्माद्यनपेक्षत्वेन शाश्वत. नित्यः ।। १२ ।। श्रथात्मानुभूतिमेव समर्थयति- अर्थ-जो कोई सुवुद्धि, सम्यग्दृष्टि, भूत कहिये पहले भया अर भांत कहिये वर्तमानका अर अभूत कहिये आगामी होयगा ऐसा तीन कालसंबंधी कर्मका बंध अपने आत्मा तत्काल शीघ्र न्यारा करि, बहुरि तिस कर्मके उदयके निमित्तत भया जो मिथ्यात्वरूप अज्ञान ताकू अपने वलपुरुषार्थतै न्यारा करि, अंतरंगविर्षे अभ्यास करै देखें तो यह आत्मा अपने अनुभव ही करि जानने योग्य है प्रगट महिमा जाकी ऐसा व्यक्त अनुभव गोचर निश्चल शाश्वत नित्य कर्मकलंकवर्दमतै रहित ऐसा आप स्तुति करनेयोग्य देव तिप्ले है। भावार्थ-शुद्ध नयकी दृष्टि करि देखिये तो सर्वकर्मनितै रहित चैतन्यमात्र देव अविनाशी आत्मा अंतरंगविप आप विराजे है यह प्राणी पर्यायबुद्धि बहिरात्मा याकू वाह्य हेरे है सो वडा अज्ञान है || आगें शुद्धनयका विषयभूत आत्माकी अनुभूति है सोही ज्ञानकी अनुभूति है ऐसा आगली गाथाकी सूचिनिकाके अर्थरुप काव्य कहे हैं:- , . - प्रथम अङ्क ? अात्मानुभूतिरिति शुद्धनयात्मिका या ज्ञानानुभूतिरियमेव कि लेति बुद्ध्वा । अात्मानमात्मनि निवेश्य सुनिष्प्रकंपमेकोऽस्ति नित्यमवबोधघनः समंतात् १३ स. टी-क्लि इति निश्चित, इति पूर्वोक्तप्रकारेण, या शुद्धनयात्मिका-शुद्वनय एव आत्मा-स्वरूपं यस्या सा, आत्मानुभूनि -आत्मन. शुद्ध चैतन्यस्य, अनुभूति उपलब्धिर्वा पारमार्थि की आत्मोपलब्धिरित्यर्थ इयमेव-शात्मानुभूनिरेव, ज्ञानानुभूति -ज्ञानस्य सम्यग्बोधस्य, अनुभूति -अनुभव -उपलव्धिर्वा, इति-इत्थ बुद्ध्वा-मत्वा, एफ.-अद्वितीय , अस्नि-वर्तते, समतात-सामस्त्येन, किंभूत ? नित्य-निरतर, अवबोधन केवलज्ञानपिंड., किंकृत्वकोऽस्ति ? निवेश्य-श्रारोप्य, सुनिष्प्रकपअविचल यथा भवति तथा आत्मनि स्वस्थ- रूपे, आत्मान स्व-स्वभाव ॥ १३ ॥ श्रथ परमात्मस्वरूपप्रकाशन नः आशास्ति- अर्थ-ऐसे जो पूर्वोक्त शुद्धनयस्वरूप आत्माकी अनुभूति कहिये अनुभव है सोही यह ज्ञान की अनुभूति है एसे प्रगट जाणिकरि, बहुरि आत्माविप आत्माकू' निश्चल स्थापिकरि, अर सदा सर्वतरफ एक ज्ञानधन आत्मा है ऐसा देखना । भावार्थ-पहिले सम्यग्दर्शनकूप्रधानकरि कहा था अब ज्ञानकू प्रधानकरि कहे हैं जो यह शुद्धनयका विषयस्वरूप आत्माकी अनुभूति है सोही सम्यग्ज्ञान है ॥१३॥ अखंडितमनाकुलं ज्वलदनंतमंतर्वहिर्महः परममस्तु नः सहजमुद्विलासं सदा । चिदुच्छ्वलननिर्भरं सकलकालमालंबते यदेकरसमुल्लसल्लवणखिल्यलीलायितं १४ सं० टी०~अस्तु-भवतु, कि त ? परम मह -जगदुत्कृष्ट' ज्योति.- जगत्प्रकाशवत्वात् , केषा ? न:- अस्माकं, किं भूतं ? अखडित-न खडित-अध्वस्त, केनापि प्रमाणेन कैश्चिद्विवादिभिस्तत्स्वरूपम्य खडयितु. मशक्यत्वात्, “ सूक्ष्मं जिनोदित तत्त्व हंतुभि व हन्यते इति वचनात् , अनाकुल न केनापि व्याकुलीकृत तत्स्वरूपस्य केनापि पुद्गलादिसयोगेनास्पृष्टत्वात् , जलेन विशनीपत्रवत् , भूयः किंभूत न विद्यते, अतो विनाशो यस्य तत् , तद्गुणाविर्भावेन विनाशरहितत्वात् , अतः अभ्यतरे वहिः वाह्य ज्वलत्-देदीप्य- मान वहिरंत. स्वरूपप्रकाशकत्वात् सहज-स्वाभाविक, केनापीश्वरादिनाऽकृत्रिमत्वात् सदा-निरंतर, उद्वि- लासं-उत्-ऊर्ध्वं तनुवातवलये विलास.-सुखानुभवन अथवा उदयमानो विलासो यस्य तत् , चिदुच्छ्वलन- निर्भर-चितश्चैतन्यस्य, उच्छवलन तेन निर्भर प्रवर्धमानचित्स्वभावत्वात् यत-परज्योति -सकलकाल- पूर्वापरवर्तमानकालं एकरस शुद्वपरमात्मरस आलबते-अवलंवयति लवणरसवत्-यथैव हि व्यजनलुब्धा- नामवुद्वाना लोकानां विचित्रन्यजनसंयोगोपजातस्य सामान्यविशेषाविर्भावतिरोभावाभ्यामनुभूयमान लवण स्वदते न पुनरन्यरायोगशून्यतोपजातसामान्यविशेषाविर्भावतिरोभावाभ्यां तथैव जयलुब्धानामबुद्धानां विचित्रप्रमेयाकारकरवितसामान्यविशेषतिरोभावाविर्भावाभ्यामनुभूगमान ज्ञान स्वदते न पुनस्तदन्यमयोग- शून्यतोपजातसामान्यविशेपाविर्भावनिरोभागाभ्या ज्ञानिना-केवललवणरमिकाना तु तदेकं स्वदते । भूय. किं भूतमिति पद सर्वत्र विशेषणे योज्या उल्लसदित्यादि-उल्लसन्-उल्लास गच्छन् म चासौ लवणखिल्य- श्च लवणखाडं तस्य लीला तद्वदायत-विस्तृत । यथा-अलुब्धबुद्धाना केवल. सैंधवखिल्य. परदन्यसपर्करा- हत्येनैवानुभूयमान. मर्वतोऽप्ये कलवणरसत्वाल्ल पणत्वेन स्वदते तथात्मानि सकलपरद्रव्यबैकल्येन केवल एव कल्पमानः सर्वतोप्यद्वितीयविज्ञानघनत्वाद् बोधत्वेन स्वदते ।। १४ ॥ अथ तस्यैवोपासन सधत्ते- , ३ - ? है - १६ परमाध्यात्मतरङ्गिणी अर्थ-आचार्य कहे हैं, जो, तत् कहिये सो परम उत्कृष्ट मह कहिये तेज प्रकाशरूप हमारे होऊ, जो सदाकाल चैतन्यका उछलन कहिये परिणमन ताकरि भरया, जैसे लूणकी डली एक क्षाररसकी लीलाकू आलंबन कर है, तैसे एक ज्ञानरसस्वरू'कू आलंबन करे है। बहुरि सो तेज कैसा है ? अखंडित है, जामै ज्ञयनिके आकाररूप नाहीं खंडते है । बहुरि कैसा है ? अनाकुल है, जामैं कर्मके निमित्ततै भये रागादिक तिनिकरि भई जो आकुलता सो नाहीं है । बहुरि कैसा है ? अंतर्बहिरनंतं ज्वलत् कहिये अंतरहित अविनाशी जैसे होय तैसे अंतरंग तौ चैतन्यभावकरि दैदीप्यमान अनुभवमें आवे है अर बाह्य वचनकायकी क्रियाकरि प्रगट दैदीप्यमान हो है, जान्या जाय है। बहुरि सहज कहिये रवभावकरि भया है, काहूने रचा नाहीं है । बहुरि सदा उद्विलास कहिये निरंतर उदयरूप है विलास जाका एकरूप प्रतिभासमान है । भावार्थ-आचार्यने प्रार्थना करी है,जो,यह स्वरूप ज्योतिर्ज्ञानानन्दमय एकाकार हमारे सदा प्राप्त रहो,ऐसा जानना ।१४। एष ज्ञानघनो नित्यमात्मा सिद्धिमभीप्सुभिः । साध्यसाधकभावेन द्विधैकः समुपास्यतां ॥ १५ ॥ सं० टी०-एष आत्मा-चिद्रूपः, नित्यं-सदा, समुपाग्यता-सेव्यत्ता-ध्यायतामित्यर्थः, कैः ? सिद्धि- स्वात्मोपलब्धि, 'सिद्धिः स्वात्मोपलब्धिरिति' वचनात अभीप्सुभिः प्राप्तमिच्छभिः, किंभूतः बोधपिंडः, एकः योऽद्वितीयः साध्यसाधव भावेन साव्यश्च साधकश्च तौ, तयोर्भावेन,स एव आत्मा ध्येयरूपतया साध्यः, स एव ध्यायकरूपतया साधकः । न त्वन्यः साध्यः न वन्यश्च साधकः, तेन स्वरूपेण द्विधा-द्विप्रकारः ॥ १५॥ अथात्मनस्त्रित्वमेकत्वमाह- अर्थ-यहू पूर्वोक्त ज्ञानस्वरूप नित्य आत्मा है, सो सिद्धि जो स्वरूप की प्राप्ति ताके इच्छक पुरुपनिकरि साध्यसाधकभावके भेदकरि दोय प्रकारकरि एकही सेवनयोग्य है सो सेवो भावार्थ-आत्मा तौ ज्ञानस्वरूप एकही है परन्तु याका पूर्णरूप साध्यभाव है और अपूर्णरूप साधकभाव है ऐसे भावभेदकरि दोय प्रकारकरि एक ही सेवना ॥ १५ ॥ दर्शनज्ञानचारित्रैस्त्रित्वादेकत्वतः स्वयं । मेचकोऽमंचकश्चापि सममात्मा प्रमाणतः ॥१६॥ सं० टी०-श्रात्मा परमात्मा, समं-युगपत, मेचक:-विचित्रस्वभावः, कुतः १ दर्शनज्ञानचारित्रः कृत्वा त्रित्वात-त्रिस्वभावत्वात् । अपि च, मेचक -विचित्रस्वभावरहिनः, कुतः स्वयं-स्वतः-एकत्वतः- एकस्वभावत्वात्, । ननु यः एकस्वभावः सोऽनेकः कथं स्यात् एकानेकयोः परस्पर विरोधात् ? इति चेन्न प्रमाणतः-प्रत्यक्षपरोक्षप्रमाणतः, एकानेकस्वभावत्वसाधनात् । तानि पुनस्त्रीण्यपि परमार्थेन, आत्मैक वस्त्वतराभावात् । देवदत्तस्य यथा श्रद्धानं, ज्ञानं, श्राचरण, तत्स्वभावानतिक्रमात् तत्स्वभाव एव, न वस्त्वंतरं, तथात्मन्यपि तत्त्रितयं तत्स्वभावानतिक्रमात आत्मा एव, न वस्त्वंतरं, मेचकचित्रज्ञानवद्वा एकरवा- नेकत्वं ॥ १६ ॥ अथ मेचकामेचकत्वमात्मनः पद्यद्वयेन विवृणुते- ज्ञानघन:- 1 . . एव, प्रथम सङ्क १६ अथ-यहु आन्मा प्रमाणदृष्टिकरि देखिये नव एकैकाल मेचक कहिये अनेक अवस्थारूप भी है अर अमेचक कहिये एक अवस्थारूप भी है । जातें या दर्शनज्ञानचारित्रकार तो तीनपणा है बहुरि आपकरि आपकै एकपणा है । भावार्थ - प्रमाण दृष्टि, त्रिकालात्मक वस्तु द्रव्य- पर्यायरूप तेखिये है,तात आत्मा भी युगपत् एकानेकस्वरूप देखना ।१६। आगे नयविवक्षा कहेहें विशेष-आत्माकै मेचकत्वअमेचकत्वम देवदत्तके दर्शन आदि वा चित्रज्ञान भी दृष्टांत समझ लेना चाहिये अर्थात् जिसप्रकार देवदत्त दर्शन ज्ञान चारित्र पदार्थ भिन्न २ प्रतीत होते हैं परन्तु वास्नयमें वे देवदत्त स्वभाव होनेसे दूसरे पदार्थ नहीं उसीप्रकार आत्माके दर्शन आदि जुदे जुदे मालुन पडते हैं और उनसे वह तीन स्वरूप जान पडना है परन्तु ये उसके स्वमात्र ही हैं भिन्न पदार्थ नहीं इसलिये वह एकही स्वरूप है । तथा हरा पीला काला आदि रंगोंका समूह चित्र (चितकबरा ) कहा जाता है तो जिस प्रकार वहां जुदे जुद रंगांकी अपेक्षा की जाय तो अनेक स्वरूपता और समूहकी अपेक्षा की जाय तो एक रूपता सिद्ध हाती है उसीप्रकार दर्शन आदिकी भिन्न २ विवक्षासे आत्मा अनेकरूप सिद्ध होता है और वे आत्मासे जुदे पदार्थ नही उसीके स्वभाव हैं ऐसा निश्चलरूपसे विचारनेपर आत्मा एकरूप ही निश्चित होता है ॥१६॥ दर्शनज्ञानचारित्रस्त्रिभिः परिणतत्वतः। एकोऽपि त्रिस्वभावत्वाद् व्यवहारेण मेचकः ॥ १७ ॥ सं० टी-आत्मा, एकाऽपि चतन्यकस्वभावेनाद्विताय., व्यवहारेण-व्यवहारदशाया, मेचक:-नाना- स्त्रमावः, निस्वभावत्वात्-त्रयः-दृशनादिलक्षणा , स्वभावा यस्य तस्य भावस्तत्व तत्मात् त्रिस्वभावना । कि कृत्वा ? त्रिमिः- त्रिख्याकै, दशनज्ञानचारित्र.-प्रात्मश्रद्धानावनाधानुचरण.।। १७ ॥ अर्थ-व्यवहारष्टिकरि देखिये तब आत्मा एक हे ताऊ तीन स्वभावरणाकरि मेचक कहिये अनेकाकाररूप है । जाते दर्शन ज्ञान चारित्र इनि तीन भावनिकरि परिणमे है ।। भावार्थ- शुद्धद्रव्यार्थिकनयकरि आत्मा एक है इस नया प्रधानकरि कहिये तब पर्यायार्थिक नय गोण भया, सो एक क् तीनरूप परिणमता कहता सोही व्यवहार भया, असत्याथ भी भया ऐसे व्यवहारनयकरि दर्शनज्ञानचारित्रपरिणामकार मेचक कहा है ॥१७॥ अब परमार्थनयकरि कहे हैं- परमार्थेन तु व्यक्तज्ञातृत्वज्यातिपैककः । सर्वभावांतरचसिस्वभावत्वादमचकः ॥ १८॥ संकटो-तु-पुन., आत्मा एक-एक इति मज्ञा यस्य स , सज्ञ या काव्ययात्रवानात् । अयवा एक "एत्र, एककः, परमार्थेन-द्रव्यादेशउया, अमेच.-मखार्ड स्वभाव. । केन ? यत त्यादि-यक्त-पट, नत्र तज्ज्ञावृत्तां-बोधकन्नं तदेव व्यानिमइस्तेन कृत्वा । कुन. ? सत्यादि-पर्व च ते भावातराश्च अन्यादा तान् सयति विनाशयति ततो विविक्तो भवनोत्येश शाल. स्वभावा यस्य स, तस्य भावस्तरां तस्मात् ॥ १८॥ अयात्मनः साध्य प्रतिफलत- २० - परमाध्यात्मनरङ्गिणा अर्थ-परमार्थ जो शुद्धनिश्चयनय ताकरि देखिये तब प्रगट ज्ञायकज्योतिमात्रकरि आन्मा एकस्वरूप है। जाते याका शुद्धद्रव्यार्थिकनयकरि सर्वही अन्यद्रव्यके स्वभाव तथा अन्यक निमित्ततं भये विभाव, तिनिका दुरि करनेरूप स्वभाव है, यारौं अमेचक है, शुद्ध एकाकार है। भावार्थ-भेददृष्टिक गौण करि अभेददृष्टिकरि देखीये तब आत्मा एकाकार ही है, मो ही असेचक है ।। १८ ।। आगे प्रमाणननकरि मेचक अमेचक कह्या सी इस चिंता मेटि, जैसे साध्य की सिद्धि होय तैस करना यह कहे हैं- विशेष-स्पष्ट भाव इस श्लोकका यह है कि अखंड ज्ञानका धारक, समस्त कमांसे रहित, एक, शुद्ध ही यह आत्मा परभाव और परभावोंक विकारोंसे रहित होने के कारण शुद्धनिश्च- यनयस अमेचक कहा जाता है ।। १८ ॥ आत्मनश्चिंतयैवालं मेचकामेचकत्वयोः । दर्शनज्ञानचारित्रैः साध्यसिद्धिर्न चान्यथा ॥ १६ सं टो-आत्मनः-चिद्पत्य,मेचकामेचकन्वयो-एकत्वानेकत्वयों-शुद्धाशुद्धन्लो, चिन्त्याव-चिन्त- नेनैव, विचारणेनेत्यर्थ ,ल पूर्वनां नद्विचारणे न क्रिमपीत्यर्थः । तर्हि कुतः माध्यमिद्धिः' दर्शनज्ञानचरित्रः- आत्मश्रद्धानावबोवानुचरणैः माध्या मोक्षो भत्र्यात्मना मुक्तेरेव माध्यत्वात् तस्य सिद्विदर्शनजानचारित्रर्भव. तीत्याध्याार्य अन्यथा तत्-प्रदानादिनंतरेण माध्यसिद्धिर्न च-नेत्र रमांगवन्-चया उपान्यमानो रसागस्त- द्गुगश्रद्वानतत्सेवनानुच णविधानतो रोगी वनीवच्यते नान्यथा तथात्मनो दर्शनादिकं ॥ १६ ॥ श्रथात्म- नबिकत्वाभ्यामभिन्नन्न समुपपनीपद्यते- अर्थ-यह आत्मा मेचक है भेदरूप अनेकाकार है, तथा अमेचक है, अमेदरूप एकाकार है। ऐमी चिनाकरि नो पूरी पडी, माध्य आत्माकी तो सिद्धि है सो दर्शन जान चारित्र इनि तीनि भावनिहरि ही है, अन्यप्रकार नाही है यह नियम है। मावार्थ-आत्माकी शुद्ध द्रव्यार्थिकनय- करि सिद्धि भया ऐमा शुद्धग्वभाव याध्य है, मो पर्यायार्थिकम्बरुप व्यवहारनयहीकरि साधिये है, तातै एमै कया है, जो मंदाभेदकी कथनी करि कहा, जैसे साध्यकी सिद्धि होय तैसे तैसे करना, व्यवहारी जन पर्याय ही में समझे हैं। तातें दर्शनज्ञानचारित्र तीन परिणाम हैं मोही मान्मा है। ऐसे मंद प्रधानकार अभेदकी सिद्धि करनी कही ।। १६ ॥ कथमपि ममुपातत्रित्वमप्येकताया अपतितमिदमात्मज्योनिरुद्गच्छदच्छं । सततमनुभवायोऽनंतवतन्यचिह्न न खलु न खलु यस्मादन्यथा साध्यसिद्धिः २० मं:-की-अनुभवामः-अनुभवविधयीकुर्म.. कि तन् ? इद-सवेद्यमानं नुखादिभिः, आत्मज्योति:- पा.महः. क्यिन कालं ? मनतं-निरतरं, किंभूनं तत् ? कथमपि कनचित्प्रकारण-रत्नत्रयात्मलक्षणेन; समु. पात्तत्रित्वमपि न मम्यक् , व्यात्त गृहीनं, सम्यग्दर्शनशानचारित्ररूपण त्रित्वं त्रयान्मकत्वं येन तत्. ईक्षमपि एकत्ताया. चैतन्यैकम्वभावावा. सकाशात्, अपतितं-अभिन्न, आत्मनस्त्रित्वैकत्वसमर्थनान- पुनः कि भूतं ?

लक्षणस्य, ? प्रथम अंक उद्गच्छत्-ऊर्ध्वगमनस्वभावं, उद् ऊर्य-अमेऽ गच्छति जानातीति, उच्छत् विशुद्धकर्मक्षयादनतर, अर्ध्वगमनस्वभावत्वात् विशुद्धिविशेषाद ज्ञानस्य प्राचुर्याच । पुन. किं भूत ? अच्छं निर्मल कर्मकर्द र- हितत्वात्, अनंतेत्यादि-अनत-विनाशरहित, चैतन्य-चेतनस्वभाव , तदेव चिन्हें लक्ष्म यस्य, तत् । कुत एतत् अनुभवामः ? यस्मात्-यत कारणात् अन्यथा आत्मानुभवमतरेण, साध्यसिद्वि-साध्यस्य-चिद्रूप- सिद्धि -प्रान्तिः, न सलु न खलु (न खलु ) निश्चयेन नैव भवतीत्यर्थः । वीप्सार्थोयमतिशयेन निपेधकः । अधिकवचन च किंचिदभीष्ट ज्ञापयत्याचार्यस्तथोपपत्त्यान्यथानुपपत्त्या चात्मनः साध्यसिद्धिर्ना- न्यथा, आत्मानुभवनेनैव मुक्तिप्राप्तिरिति तथोपपत्ति', तदनुभवनमतरेण कदाचित्कचिदपि कस्यचित् न तस्मिद्धिरित्यन्यथानुपपत्ति ॥ ५० ॥ अथ तल्लाभलमन स्तौति- अर्थ-आचाय कहें हैं, जो यह आत्मज्योति है, ताहि हम निरन्तर अनुभव है कैसा है ? अनंत अविनश्वर जो चैतन्य सो है चिन्ह जाका, काहेते अनुभवे हैं ? जाते याके अनुभवविना अन्य- प्रकार साध्य आत्माकी सिद्धि नाहीं है । ऐमा नियम है । कैसा है यह आत्मज्योति ? कथंचिन्मकार अंगीकार किया है तीनपणा जाने, तौऊ एफपणातै च्युन न भया है । वहुरि कैसा है ? निर्मन जैसे होय तैसे उदय प्राप्त होता है । भावार्थ--आचार्य कहे हे कोई प्रकार पर्यायदृष्टिकरि जाकै तीनपणा प्राप्त है, तोऊ शुद्रव्यदृष्टिकरि जो एक्पणात नाही च्युत भया है, ऐसा आत्मज्योति अनंत चैतन्यस्वरूप निर्मल उदय प्राप्त होता, ताहि हम निरंतर अनु- भवे हैं। ऐसे कहनत ऐमा भी आशय जानिये, जो सम्यग्दृष्टि पुरुष है, ते ऐसे ही अनुभव करौ, जैसे हम अनुभवे हैं ऐसे जानना । आगे कोऊ तर्क करे है, जो आत्मा तो ज्ञानते तादात्म्यस्वरूप है, जुदा नाही, तातै ज्ञानको नित्य सेवै ही है । ज्ञानका उपासने योग्यपणाकरि याकू काहेत शिक्षा दीजिये है ? तहां आचार्य कहे है, जो-यह ऐसे नाही है, तातै आत्मा ज्ञानकरि तादा त्भ्यरूप है, तोऊ एक क्षणमात्र भी ज्ञान नाही सेवै है । जाते स्वयंबुद्धत्व-कहिये आपहीकरि जाननतें तथा बोधितबुद्धत्व कहिये परके जनावनेकरि याकै ज्ञानकी उत्पत्ति होय है । के तौ काललब्धि आत्रै तब आप ही जाणि ले, कोई उपदेश देनेवाला मिले तब जाणे, जैसे सूता पुरुप कै तो आप ही जागे, के कोई जगावै तव जगेगा । ऐसे इहाँ फेरि पूछ हैं, जो ऐसे हैं तो, जाननेका कारण पहली आत्मा अज्ञानी ही है। जातें सदा ही याकै अप्रतिबुद्धपणा है। आचार्य कहे हैं, यह ऐसे ही है, अज्ञानी ही है ॥२०॥ बहुरि फेरि पूछे हैं, जो यह आत्मा के एककाल अप्रतिबुद्ध है सो कहौ ? तहां आचार्य कहे हैं- विशेप-पं० जयचन्द्रजीने उद्गच्छदच्छं इन पदोका अर्थ उत्तरोत्तर निर्मल होता हुआ उदयको प्राप्त होता है ऐमा किया है और भ० शुभचन्द्रजीने उद्गच्छत्-इसका अर्थ 'ऊर्ध्वगमन स्वभाववाला वा उत्तरोत्तर विशेष ज्ञानवान होता चला जाता है क्योकि जिस समय समस्त काँका क्षय हो जाता है उस समय स्वभावसे ही यह ऊर्ध्वगमन करता है अथवा विशुद्धि विशेषसे उत्त रोचर ज्ञानमें अधिकता होती जाती है। यह अर्थ किया है एवं अच्छका अर्थ कम - ? परमाध्यात्मतरंगिणी मलने रहिन बनलागा है। तया ग्रन्थकारने न खलु न खलु' पदांसा दो बार उच्चारण क्रिया है उनसे भट्टारक शुभचन्द्रजीने-अधिकका फल अधिक होता है इस न्यायकै अनुमार साध्य- सिद्धि और आन्मानुभत्रमें तथोपनि और अन्यथानुपपत्ति-अन्वय व्यनिरेक भी बतलाया है अर्यान् आत्माके अनुभवसे ही मात्र प्राप्त होता है विना उपसे अनुभव मोक्षप्राप्ति नहीं हो सकती ॥ २० ॥ कथमपि हि लभंत भेदविज्ञानमूलामवलितमनुभूतिं ये स्वतो वान्य नो वा। प्रतिफलननिममाऽनतभावस्वभावमुकुरबदविकारा खूनतं स्युस्न एव २१ स टो-ति--तुमने-साप्नुनेि, बे-भञ्या, कां ? अनुभूनि-प्रात्म.नुमवन-यात्ममाहात्म्य का, ' अलि निव व. भवति नया कलमावे ?- मासे मना कटेन, भाव्या बहरप्रा. तर्नुनप्रदयात् । कुनः प्राप्तिः ? त्वना बा-स्वयमेव, अन्वतरालमनावर वनगाकारणान, जानिम्मरण- देवगन-नि-विचारशरीरादिग्विटनदर्शनाद्वा, अनित्यायनुनाचिननं 17 यात्मस्वलाप्राप्नेः 'गमो नम बुद्धाणं, इगगनवचनात् । ग-अयग, अन्यतः-गुरूपदेशाने: । कि भूना ता? भद्रेत्यादि- मात्नशरीरभद्र-भिन्नत्र, वन्य वि-विशिष्ट योक्त जानमुपलब्धि., नदेव मूलकारण यस्याः ना दांव एव-ये अनुभूतिभावुकारते एव भव्या नान्यं । म्यु-भत्रनि. सनतं-निरनरं, अविकारा:-मानस भावादिविकृ. तिरूपविकारहिताः, "विक्रारी मानमो भात्र." इत्यमरः । कः ? प्रनीत्यादि-प्रतिमननं प्रनिविनं. नामनि प्रतिभानवमित्यर्थः, तन निमन्ना-अपमानर्गता, प्रतिभासवधर्मेणात्मनिर्गतत्वं, न तु तदुत्पत्ति-वादास्य व्यवमायत्वेन, तं च तं भवारच, नेपः स्वमागः-जानू नागुलबुत्वादिल ज्ञवाः मुकुरवत्-यया मूर्तस्य मुकुरस्य स्पराकारावच्छेदिका सच्चन यदिलान नस्तत्र प्रतिभावा आला, आख्य च तथा नाह- पत्त्यात्मनः रूपगाराच्छेत्री बातें पुगताना कर्मनाकद्रियादाना च ॥ ५ ॥ अथ माहादानस्यति- अर्थ-यं पुरुष आपहीत नथा परके उपदेशन कोई प्रकारकरि भेदविज्ञान है मूल उत्पत्ति कारण जाका एसी अविचल निश्चल अपने आत्माविप अनुभूतिक्कू पात्र है, तेही पुरुष आरसे की क्ष्यों आपनं प्रतिबिंबित भये जे अनंतभावनिक स्वमात्र तिनिकर निरंतर विकाररहित होग हैं, ज्ञानमें शेयनिक आकार प्रतिभासे तिनिकरि रागादिविकारकू' नाहीं प्राप्न होय हैं ॥२१॥ विशेष-इस रोकता बुलासा भाव यह है कि जिस प्रकार स्वच्छ दर्पण में अग्निका प्रति- वित्र पडता है परन्तु अग्निही माला और उन्णता अग्निमें ही रहती है उनमें दर्पण विकृत नहि बनना उर्माप्रकार जिस मनुष्य, भेदविज्ञान है कारण जिसमें ऐसी अनुभूति प्राप्त होगई है उस मनुषर्क अन्तरंगमें यद्यपि इष्ट अनिष्ट पदार्थ प्रतिनिबित होते हैं परन्तु उनसे उसकी आत्मा रागद्वेप आदि विकार नहि होते ।। २१ ॥ त्यजतु जगदिदानी मोहमाजन्मलीदं रसयतु रसिकानां रोचनं ज्ञानमुद्यत् ।

प्रथम अङ्क इह कथमपि नात्मानात्मना साकमेक: किल कलयति काले कापि तादात्म्यवृत्ति २२ ॥ सं० टी-इदानी-आत्मस्वरूपप्रकाशनध्यानाले, जगत विष्टप, मोह-ममेट, अहं अस्य, श्रासीन्मम पूर्वमिट, अहमेतत्याम, भविष्यति पुनर्ममैतत् एतस्यामपि भविष्यामि, इत्यादिस्प मोर त्यजतु-जहातु, विभूत ? आजन्मलीढ-श्रासमाराप्रवृत्त । ज्ञान भेदविज्ञानं, ग्मयतु-आस्वादचतु-गानष्पिीकरोत्वित्यर्थ । किभूत तत् १ रमिकामां-शुद्धचिद्रूपरसास्वादकाना, रोचनं रुचिकर, उद्यत-उदय गच्छत । इह-जगति, कापि काले-कम्मिश्चित्ममये, क्षयोपशमविशुद्धयादिलब्धिपंचक सामग्रीमद्भावसमये, गिल इति-निश्चित-एक: श्रात्मा-जीव', अनात्मना-परद्रव्येण-शरीरादिना, माक-सह, तादात्म्यवृत्ति एकत्ववृत्ति, न कलयति-नागी- करोति-तन्मयो न भवतीत्यर्थः कथमपि फेनचित प्रकारेणापि ॥२॥ अथ मोहापनार्थ देहहापन रयाप- यति- अर्थ-जगत् कहिये लोक है सो अनादिसंसारतें लेकरि आस्वाद्या अनुभूया जो मोह ताहि अब तो छोडो । बहुरि रसिकजनको रुचनेवाला उदय होता जो ज्ञान, ताहि आस्वादो । जाते इस लोकवि आत्मा है सो अनान्मा जो पर द्रव्य ताकरि सहित काही काल विप प्रगटपणे तादात्म्यवृत्ति करिये एकपणा ताहि वाह ही प्रकार व रि नाहीं प्राप्त होय है, जात, आत्मा एक है, सो अनात्मा जो दुजा अन्यद्रव्य, ताकरि एक्तारूप नाहीं होय है । भावार्थ-आत्मा पर द्रव्यतै काहु प्रकार कोई काल दिपै एकताका भाव नाहीं प्राप्त होय है । तातै आचार्यने ऐसी प्रेरणा की है, जो, अनादित लग्या जो परद्रव्यतै मोह ताका भेद ज्ञान बताया है सो याका एकपणारूप मोह अवही छोडो, अर ज्ञान आरवादी, मोह है सो पृथा है, झूठा है, दुःखका कारण है । आगे अप्रनिबुद्ध के प्रतिबोधन के अर्थी व्यवसाय कहिये व्यापार उपाय कहे हैं अयि कथमपि मृत्वा तत्वकौतूहली सन्ननुभव भवमूर्ते : पार्श्वी मुहूर्त। पृथगथ विलसंतं स्वं ममालोक्य येन त्यजसि झगिति मूर्त्या साकमेकत्वमोहं २३ स० टी-श्रयीति-कोमलालापेऽव्यय, तत्त्वयातूद ली-त-परामलक्षण, तस्यावलोकने कौतूहली, सन-भवन ह मित्रत्य-रहार्य कथमपि कनचित प्रकारेण मायादिप्रकारेण, मृत्वा-च्युत्वा, माक्षान्मरणे तद- नंतर तत्क्षण माक्षात्तत्त्वावलोकनाभावात् । मुहूर्त-द्विनालिकापर्यत, मूर्त.-शरीरस्य, पार्श्ववर्ती-नकट्यवर्ती, भव, तच्छर्गरम्वभावावलोकनार्थ । अथ मृत्या पार्श्ववर्तिभवनानंतर, स्व-परमात्मान, अनुभव-अनुभवगो- चरीकुम-स्यध्यानविषय कुर्वित्यर्थ । किं कृत्वा ? समालोक्य-दृष्ट्वा पृथग भिन्न, विलसत-स्वस्वरूपे विज्ञास कुर्वत आत्मव्यतिरिक्ताचेतनादिशरीरावस्थानानादिपरिणतावस्थामवलोक्य स्वस्वस्पे स्थिरीभववित्यर्थ, येन पृथक् स्वानुभवनेन, मूल्-शरीरेण माक, सह एकत्वमोह 'ममेदं शरीर, शरीरस्याहमित्येकत्वलक्षण मोह, त्यजमि जहामि झगिति नत्काल दिलवमतरणेत्यर्थ. । ननु शरीरमेयात्मा, तद्व्यतिरिक्तस्य कस्य चिदात्मनोऽनुपलभ्यमानत्वात , अन्यथा महामुनीना तीर्थकरशरीराचतिशयवर्णनानुपपत्तिः, इति युक्तिमु- भाव्य भिन्नात्मवादिन योगिनं प्रति कश्चिदप्रतिबुद्धः शिष्यः, इति पद्यमुतालवते- , ? , २४ १ परमाध्यात्मतरङ्गिणी अर्थ-अयि ऐसा कोमल आमन्त्रण संवोधन अर्थमैं अव्यय है, ताकरि कहे हैं-भाई ! तू कथमपि कहिये कोई ही प्रकारकरि वडा कष्टकरि तथा मरिहुकरि तत्त्वनिका कौतूहली हुवा संता, इस शरीरादि भूतद्रव्यका एक मुहूर्त दोय घडी पाडोसी होऊ, अर आत्माका अनुभव करि । जाकरि अपने आत्माकू विलासरूप सर्वपरद्रव्यतै न्यारा देखिकरि इस शरीरादिमूर्तिक पुद्गलद्रव्यकरि सहित एकपणाका मोहकू' शीघ्रही छोडेगा। भावार्थ-जो यह आत्मा दोय घडी पुद्गल द्रव्यतै भिन्न अपना शुद्धस्वरूपकू अनुभवै तामैं लीन होय,परिपह आये चिगै नाही, तौ घातिकर्मका नाशकरि केवलज्ञान उपजाय मोक्ष प्राप्त होय । आत्मानुभवका ऐसा माहात्म्य है नो मिथ्यात्वका नाशकरि सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होना तो सुगम है । तातै श्रीगुरुनिने यह ही प्रधानकरि उपदेश कीया है। विशेष-कथमपि मृत्वा यहांपर पं० जयचन्द्रजीने कथमपि अर्थात् किसीप्रकारसे-बडे कष्टसे चा मृत्वा अर्थात् मर कर भी यह अर्थ किया है और भट्टारक शुभचन्द्रजीने कथमपि अर्थात् किसी प्रकार से माया छल कपट आदिसे मृत्वा अर्थात् च्युत्वा-रहित होकर यह अर्थ किया है । मृत्वाके च्युत्वा अर्थ करनेमें यह युक्ति भी दी है कि साक्षात् मरणके होजाने पर उसके बाद तत्व का अवलोकन होना असंभव है इसलिये यहां च्युत्वा अर्थ ही युक्तियुक्त है। इन दोनों अर्थों में पं० जयचन्द्रजीका अर्थ जरा खटकता है क्योकि उन्होंने कथमपि और मृत्वा पदको आपसमे न मिलाकर अर्थ किया है जो प्रकृतमें असमंजस सरीखा जान पडता है परन्तु उसका असली भाव 'संसारमें मरणके समान अन्य कोई कष्ट नहीं यह मानकर ग्रन्थकारने मूर्तिक शरीर आदि पदार्थों के विचार करने में और आत्माके अनुभव करने में अन्य कष्टकी तो क्या 'वात ? 'यदि किसी प्रकारसे मरण भी हो जाय तथापि' यह है ।। २३ ।। कात्यैव स्नपयंति ये दश दिशो धाम्ना निरुंधति ये धामोद्दाममहस्विनां जनमनो मुष्णंति रूपेण च । दिव्येन ध्वनिना सुखं श्रवणयोः साक्षात्क्षरंतोऽमृतं बंद्यास्तेऽष्टसहस्रलक्षणधरास्तीर्थेश्वराः सूरयः ॥२४॥ स० टी०-ते-प्रसिद्धा', नाभेयादग्रस्तीर्थेश्वरा-ब्रुतज्ञानलक्षणतीर्थनायकाः बंद्याः, नमस्करणीयाः, ये- भगवतः, कात्यैव-च त्या एव-केवलं दश दिशः-ऋकुभ', स्नपगंति प्रक्षालयंति, स्वकांत्यैव समस्ता दिशः प्रकटयतीत्यर्थः । ये-जिनाः धाम्ना-धातिकर्मक्षयोत्पन्नकोटिसूर्याधिक शरीरतेजसा, उहाममहस्विना-अम- यादीभूततेजस्विना, स्वर्ण-रत्न-मुक्ताफलनक्षत्र-विमान-सूर्य-चढ़-दीपाग्न्यादीनां, धाम-तेजः, निरु' धति-निवारयति, स्वल्पीकुर्वतीत्यर्थः । नथा धोक्तं- , ~ - २५ ? ? ? प्रथम अङ्क आकस्मिकमिव युगपदिवसकरसहस्रमपगतव्यवधानं । भामडलमिव भावितरात्रिंदिवभेदमतितरामाभाति ।। १ ।। इति । ये स्पेण कृत्वा जनमन.-त्रिलोकनिवासिप्राणिचित्तं, मुगति हरति, तञ्चित्ताकर्पण कुर्वतीत्यर्थः । किंभूतास्ते ? सुस उभयो. शर्म यथा भवति तथा, अप्रणयो -कर्णयो., साक्षात्-प्रत्यक्षं, अमृत-वर्मसुधा ससारदुःखापहारित्वात् क्षरत.- सनात', केन ? दिव्येन-अन्यजनातिशायिना, ध्वनिना-तीर्थंकरपुण्यकर्मा- तिशयविज भमाणध्वनिना. पुन. किभूता. ? अष्टत्यादि-अष्टाभिरधिकानि सहस्राणि नानि च तानि लक्ष- णानि वन कुशेशय तोरण छत्राकारादीनि तेषा घरा धारका', ते तथोक्ताः नवशनगाजनोपलक्षिताष्टशत- लक्षणलक्षितत्वात तथा च सूरयः आचार्या., बद्या ॥ २४ ॥ अथ कथ कात्येत्यादिशरीरस्तवनेन तदधिष्ठा- तृत्वादात्मनो निश्चयेन स्तवन न युज्यते, इत्युक्ने प्रत्युत्तरयति पधद्वयेन- अर्थ-ते तीर्थंकर आचार्य वंदिये योग्य है कैसे हैं ते ? अपनी देहकी कांतिकरि तो दश- दिशानि स्नपन को हैं, थोवे है, निर्मल करे है। बहुरि अपने तेजकरि तेजतै उत्कृष्ट जो सूर्यादिक तेजस्वी निनिका तेजकू रोके हैं। बहुरि ते रूपकरि लोकनिके मनफू हरे हैं। बहुरि दिव्यध्वनिवाणीकरि काननिविपे साक्षात् सुख अमृत वर्षावे हैं । बहुरि एक हजार आठ लक्षणनिको धारे हैं । इत्यादिक तीर्थकर आचायनिकी स्तुति है सो सर्वही मिथ्या ठहरे है । तातै हमारे तो यह ही एकांतकरि निश्चयप्रतिपत्ति है, जो आत्मा है सो ही शरीर है पुद्गल द्रव्य है, ऐसा अप्रतियुद्धने कह्या । तहां आचार्य कहे हैं, जो ऐसा नहीं है-तू नयविभागका जानने वाला नाहीं है ॥२४॥ प्राकारकवलितविरमुपवनराजीनिगीर्णभूमितलं । पिवतीव हि नगरमिदं परिखावलयेन पातालं ॥ २५ ॥ सं० टी-इद प्रसिद्ध, नगरं पत्तनं, पिबतीव पानं करोति गलतीत्यर्थः, इत्र उपमाया, किं ? पातालं अघोभवन, केन ? परिखावलयेन, अतिमात्रं निम्नत्वात, किभूतं ? प्राकारेत्यादिः प्राकारेण शालेन, कवलित कवलीकृत, व्याप्तमित्यर्थ., अम्वर नभ, येन तत्' अत्युच्च स्तरत्वात् । उपेत्यादि-उपवनाना वाटिकाना, राति: पक्तिस्तया निगीणं व्याप्त, भूमितलं पृथ्वीतल, येन तत् । इति नगरे वर्णितेऽपि राज्ञस्तदधिष्ठातृत्वेऽपि प्राकारादिस्वरूपाभावात वर्णनं नो भवति । तथैव- अर्थ-यह नगर है सो कैसा है ? प्राकार कहिये कोट, ताकरि तो ग्रस्या है आकाश जाने ऐसा है। भावाथ-कोट ऊंचा बहुत है । वहुरि उपवन कहिये वाग, तिनिकी राजी कहिये पंक्ति, तिनिकरि निगल्य है भूमितल जाने ऐसा है, भावार्थ-सर्वतरफ बागनितें पृथ्वी छायरही है। बहुरि कैसा है ? कोटके चौगिरट खाईका बलयकरि मानू पाताल पीवै ही है। ऐसे नगरका वर्णन करते संते, राजा याकै आधार है तोऊ कोट वाग खाई आदि सहित राजा नाही हैं । तारौं राजाका वर्णन याकरि नाहीं होय है। तैसेही तीर्थकरका स्तवन, शरीरका स्तवन कीये नाही होय है, ताका भी काव्य है। है ४ - ? 1 २६ परमाध्यात्मतरंगिणी नित्यमविकारसुस्थितसागमपूर्वसहजलावण्यम् । अक्षोभमिव समुद्र जिनेंद्ररूपं परं जयति ॥२६॥ सं टी-जिनेंद्ररूप-सर्वज्ञरूपं जयति सर्वोत्कर्पण वर्तते, किं भूत ? नित्यं यावच्छरीरभावित्वात् स्थिरमित्यर्थः, अबीत्यादि अविकारेण-नेत्रहस्तादिविकृत्यभावेन, सुस्थितानि सर्वशरीरांगानि सर्वावयवा यस्य तत, पुन' विभूत ? अपूर्वेत्यादि-अपूर्व अन्यजीवासभवि, सहज अकृत्रिमं, स्वाभाविकमित्यर्थः, लावण्यं लवणिमा यस्य तत्, समुद्रमिव अक्षोभं न केनापि तुभ्यत इत्यक्षोभ । इति शरीरस्तूयमाने तीर्थकर-केवाल पुरुषस्य तदधिष्ठातृत्वेऽपि सुस्थितसागादिगुणाभावात स्तवन न स्यात् ॥ २६ ॥ यद्येन तीर्थंकराचार्य स्तुतिः समस्ताप्यप्रशस्ता स्यात् ततः शरीरात्मनोरैकातिकी प्रतिपत्तिः ? नैनं नयविभागाभावात् । तं नयम- ल्लेखयति- अर्थ-जिनंद्रका रूप है सो उत्कृष्ट जैसा होय तैसें जयवंत वर्त है-कैसा है ? नित्य ही अविकार अर भलैप्रकार सुखरूप तिष्ट्या है सर्वांग जामैं, बहुरि कैमा है ? अपूर्व स्वाभाविक है अर जन्महीतै लेकरि उपजा है लावण्य जामे । भावार्थ-सर्वप्रिय लागे है, बहुरि कैसा है ? समुद्रकी ज्यों क्षोभरहित है, चलाचल नाही है। ऐसे शरीरका स्तवन करते भी तीर्थकर केवलीपुरुपके शरीरका अधिष्ठातापणा है, तोऊ सुस्थित सागपणा अर लावण्यपणा आत्मा का गुण नाही । तातें तीर्थंकर केवलीपुरुष के इनि गुणनिका अभावते याका स्तवन न होय । अब जैसे तीर्थंकर केवलीकी निश्चयस्तुति होय तैसे कहे है-तहां प्रथम ही इयज्ञायककै संकर- दोप आवे ताका परिहार करि स्तुति कहे हैं। अब इहां इस निश्चयव्यवहाररूप स्तुतिके अर्थक कलशरूप काव्य कहे हैं- एकत्वं व्यवहारतो न तु पुनः कायात्मनोनिश्चया- न्नुःस्तोत्रं व्यवहारतोऽस्ति वपुपः स्तुत्या न तत्तत्वतः । स्तोत्रं निश्चयतश्चितो भवति चित्स्तुत्यैव सैवं भवे- न्नातस्तीर्थकरस्तवोत्तरवलादेकत्वमात्मांगयोः ॥२७॥ सं० टी०-कायात्मनोः देहदहिनो, एकरला काचिदेकना, व्यवहारतः, व्यवहारनयमाश्रित्य, लोकव्य- वहारं वा 'श्रात्मकर्मवशान्नोकर्मरूपेण पुद्गलस्कंधबंधो देहः, कनकलधौतयोरेकस्कंधव्यवहारवत् नीरक्षी- रवद्वा, पुनः निश्चयात निश्चयनयमाश्रित्य नैकरां, नयोः परम्परं भिन्नत्वात् । वित्यधिकपद विशेषज्ञापके, निश्चयाद्धि देहदेहिनोः अनुपयोगोपयोगरूपयो, कनककलधौनयोः पीतपांडुत्वस्वभावयोरिव, अत्यंतव्यति- रिक्तत्वेनैकार्थत्वानुपपत्तेर्नानालां, एक किल नयविभाग इति अतः कारणात् वपुषः शरीरस्य स्तुत्या स्तवनेन, शरीरगुणवर्णनेन, नुः श्रात्मनः, स्तोत्रं स्तवन, अस्ति भवति, कुतः व्यवहारत व्यवहारनयात् तत् स्तोत्र निश्चयात्-परमार्थतः,न हि । ननु आत्मस्नोत्र कथ' निश्चयत:-परमार्थतः चित:-चिपस्यात्मनः,स्तोत्र स्तवनं गुणवर्णनमित्यर्थः भवति-अस्ति, कया ? चित्स्तुत्यैव चिद्रूपस्यामू खंडज्ञानदर्शनाद्यनंत्तगुणस्त- बनेन, एन निश्चयस्तुतिरेव,आत्मस्तुतिः,एवं सति सा-निश्चयस्तुतिः स्तुत्तिर्भवेत । अतः आत्मशरीरयोनि- - , - ? कृष्टः-आकृष्टः, प्रथम अङ्क २७ न्नत्वसमर्थनात, एकरना अभिन्नता न भवतीत्यर्थः कयो ? आत्मागयोः चिद्रूपदेहयो, कुतः १ तीर्थत्यादि तीर्थकरस्य नाभेयादिजिनस्य, स्तव. अष्टप्रातिहार्यादिगुणवर्णन, तीर्थकरशरीरगुणवर्णनमेव परमार्थ- स्तवनमिति प्रत्युत्तरबलाधानात् एकत्वं न कदाचन ।। २७ ।। अथैकत्वनिरासमुपसहरति- अर्थ-कायकै अर आत्माकै व्यवहारनयकरि एकपणा है। बहुरि निश्चयनयकरि एकपणा नाहीं है । याहीतें शरीरके स्तवनतें आत्मा पुरुपका स्तवन व्यवहारनयकरि भया कहिये, अर निश्चयतें न कहिये, अर निश्चयतें तौ चैतन्यके स्तवनते ही चैतन्यका स्तवन होय है । सो चैतन्यका स्तवन इहां जितेंद्रिय, जितमोह, क्षीणमोह ऐसे कह्या तैसे होय है । तातै यह सिद्ध मया-जो अज्ञानीनै तीर्थकरके स्तवनका प्रश्न कीया था ताका यह नयविभागकरि उत्तर दिया, ताके चलते आत्माकै अर शरीरके एकपणां निश्चयतें नाहीं है ॥ २७ ॥ फेरि याही अर्थके जाननकरि भेदज्ञानकी सिद्धि होय है ऐसे अर्थरूप काव्य कहे है- इति परिचिततत्त्वैरात्मकायैकतायां नयविभजनयुक्त्यात्यंतमुच्छादितायां । अवतरति न बोधो बोधमेवाद्य कस्य स्वरसरभसकृष्ट प्रस्फुटन्नेक एव २८ सं० टी--अद्य-इदानीं, एव-निश्चयेन, कस्य-पुरुषस्य, बोधः भेदविज्ञान, बोध-बुध्यते-जानातीति बोधः-श्रात्मा, अथवा गुणे गुणिन उपचारः, त न अवतरति-न प्रादुर्भवति ? अपि तु प्रादुर्भवत्येव । किंभूतः सः ? स्वेत्यादि -स्वस्य-आत्मनः, रस. ज्ञानशक्तिविशेषः, तस्य रभसः-वेगः, तेन 'विशदीकृत इत्यर्थः । भूयः किंभूतः ' प्रस्फुटन्-प्रकर्षण निर्मलोभवन्-प्रकटीभवन्वा, एक एव नान्यः, बोध विना आत्मान प्रत्यवतरयितु न कश्चित्क्रमः, इत्यर्थः । क सत्या-आत्मेत्यादिः-आत्मा च कायश्च आत्मा. कायो वयोरेकना-ऐक्य, तस्यां, उच्छादिताया-निराकृतायां सत्यां, कया ? नयेत्यादि नयस्य-निश्चयव्य. वहारलक्षणस्य विभजन-विभागः, तस्य युक्ति-दर्शनोपन्यास', तया, कैः ? इति पूर्वोक्तप्रकारेण परिचितं, परिचयीकृतं तत्त्व-शुद्धचिद्रूपलक्षण यैस्ते, इति परिचिततत्त्वास्तै. ॥ २८ ॥ अथ यावत्पर्यंत परभाषा- भावस्तावत्स्वानुभव इति सतन्यते- अर्थ-ऐसे परिचयरूप कीया है वस्तूका यथार्थस्वरूप जिनि. ऐसे मुनीने आत्मा अर शरीरके एकपणाकू नयके विभागकी युक्तिकरि अत्यंत उच्छादन कीया निषेध्या है। याकै होते तत्काल.ज्ञान है सो यथार्थपणा कौन पुरुपके अवतार न धरै, अवश्य अवतार धरैही धरै ।। कैसा होयकरि १ अपना निजरसका वेगकरि खेंच्या हूवा प्रगट होता एक स्वरूप होयकरि ॥ भावार्थ-निश्चयव्यवहारनयके विभाग करि आत्माका अर परका अत्यंत भेद दिखाया,सौ याकू' जानिकरि,ऐसा कौन पुरुष है जाकै भेदज्ञान न होय, होय ही होय जातै ज्ञान है सो अपना स्वरस करि आप अपना रूप जाने, तब अवश्य आप न्यारा ही अपने आत्माकू जना है। इहां कोई दीर्धसंसारी ही होय तो ताका कछू कहना है नाही । ऐसे अप्रतिबुद्धने कहा था, जो "हमारे तो यह निश्चय है, जो देह है सो ही आत्मा है ' ताका निराकरण किया । आगैं कहे हैं, जो,ऐसे यह अप्रतिबुद्ध अज्ञानी जीव अनादिके मोहके संतानकरि निरूपण कीया जो आत्माका ? - ?

- । परमाध्यात्मतरङ्गिणी अर शरीरका एकपणा, ताका संस्कारपणापारि अत्यंत अप्रबुद्ध था, सो अव प्रगट उदय भया है तत्त्वज्ञानस्वरूप ज्योति जाकै "जैसे कोई पुरुषके नेत्रमैं विकार था, तब वर्णादिक अन्यथा दीखे थे, अर जब विकार मिट, तव जैसाका तैसा दीख्या तैसे प्रगट उघड्या है पटलस्थानीय आव- रणकर्म जाका, ऐसा भया संता प्रतिवुद्ध भया, तब साक्षात् देखनेवाला आपकू आपही करि अर ज्ञान श्रद्धान कर अर तिसकू आचरण करनेका इच्छक भया संता पूर्छ है,जो, इस आत्मा- रामके अन्यद्रव्यनिका प्रत्याख्यान कहिये त्यागना, सो कहा होय ? ऐसे पूछते संते आचार्य कहे है जो ऐौं कहना- विशेष-बोधं इस द्वितीयांत पदका यथार्थपना अथकर पं० जयचंदजीने कस्य वोधः बोधं न अवतरति-इस वाक्यका अर्थ 'ज्ञान है सो यथार्थपणाकू कौन पुरुषके अवतार न धरै अवश्य अवतार धरै ही धरै' यह किया है और मट्टारक शुभचंद्रजीने 'वोध' इसका आत्मा अर्थ कर किसकी आत्मामें सम्यग्ज्ञान अवतार नहिं लेता'उस वाक्यका यह अर्थ किया है । हमे भट्टारक शुभचंद्रजी का वोथं ' का आत्मा अर्थ प्रकृतोपयोगी और विशेप महत्त्वका जान पडता है ॥ २८ ॥ अवतरति न यावद् वृत्तिमत्यंतवेगादनवमपरभावत्यागहष्टांतदृष्टिः । झटिति सकलभावैरन्यदीयैर्विमुक्ता स्वयमियमनुभूतिस्तावदाविर्बभूव ॥२६॥ सं० टी०-यावत्-यावत्पर्यतं, अनव-सत्यं यथा भवति तथा, अत्यतवेगात्-अतिशीघ्र', अपरेत्यादिः अपरे च ते भावाच अपरभावाः-अन्यपदार्थाः, तेषां त्यागः-त्यजन, तदुल्लेखाय यो दृष्टांतः, तत्र दृष्टिः, यथाहि कश्चिन्नरः, रजकात परकीयमंवरमादाय सभ्रात्यात्मीयप्रतिपत्त्या परिधाय शयानः स्वयमज्ञानी सन्, अन्येन तद्वस्त्रस्वामिना तदरलमालव्य बलान्नग्नीक्रियमाणो मन प्रतिबुद्ध्यस्त्र, अर्पय परिवर्तितमे- तद्वस्त्र मामिकमिति असकृद्वचः शृण्वन्, अखिलैश्चिन्हैः सुपरीक्ष्य परकीयमिति निश्चित्याचिरात, ज्ञानी सन् मुचति तथा ज्ञातापि परभावान् सभ्रात्या स्वप्रतिपत्यात्मसारकुर्वन् शयानः स्वयमज्ञानी सन् गुरुणा परभावे विवेकं कृत्वकोक्रियमाणो मनु प्रतिबुध्यस्व, एकः खल्वयमात्मा,इत्यसकृत् श्रुति औती शृण्वन् अखि. लैश्चिन्हैः सुपरीक्ष्य सर्वान् परभावानिश्चित्य ज्ञानी सन् मुचति परभावानिति दृष्टांतदृष्टिः, वृत्ति परभाव प्रवृत्ति प्रति न अवतरति-अवतरणं न करोति तावत्पर्यंत इयमनुभूति -आत्मानुभवज्ञान, स्वय-स्वत', आविर्वभूव-प्रकटीबभूव, झटिति-शंन । विभूता' विमुक्ता त्यक्ता, कै. ? अन्यदीयै',परकीयैः संकलभानः सकलचेतनाचेननपदार्थ., ॥ २६ ॥ अथ स्वरसं रसामीति रचयति- अर्थ-यह परभावकै त्यागके दृष्टांतकी दृष्टि है सो " पुरानी न पडे ऐसे जैसे होय तैसें" अत्यंत वेगत जेते प्रवृतिकू' नाहीं प्राप्त होय ता पहलैही तत्काल सकल अन्यभावनिकरि रहित आपही यह अनूभूति तो प्रगट होती भई । भावार्थ-यह परभावका त्यागका दृष्टांत कह्या तापरि दृष्टि पडै ते पहले समस्त अन्यभावनितै रहित अपना स्वरूपमा अनुभवन तो तत्काल नोय गया, जाते यह प्रसिद्ध है-जो, वस्तूकू परकी जाने पीछे ममत्व रहै नाही ॥ आगें या , - , ५ प्रथम अ - २६ अनुभूति से परभावका भेदज्ञान कौन प्रकार भया ऐसी आशंकाकरि प्रथम तौ भावक मोह कर्मका उदयरूप भाव ताका भेद विज्ञानका प्रकार कहै हैं- विशेष-अन्यभावका दृष्टांत यह है- कोई पुरुप धोबीसे अन्यका वस्त्र लाकर और भ्रमसे उसे अपना मान ओढकर सो रहा था और उसे जरा भी इमवातका ज्ञान न था कि यह किसी दूसरेका है, इतने ही मे जिसका वह वस्त्र था वह पुरुष आया और वस्त्रका पल्लड खीचकर और सोते हुये पुरुषको जगाकर इसप्रकार कहने लगा-जल्दी उठो इसवस्त्र को मुझे दो यह वस्त्र मेरा है, वदल गया है। तो जिसप्रकार वह सोता हुआ मनुष्य उसके बार बार उठो उठो ये वचन सुनकर और समस्त चिह्नोमे भले प्रकार परीक्षापूर्वक जानकर कि यह वस्त्र दूसरेका है तत्काल छोड देता है उसीप्रकार यह आत्मा भी परपदार्थोंको अपना मानकर अज्ञानी है मोहकी नीदमे सो रहा है जब श्रीगुरु मोहभावका विवेक कराकर इसे परपदार्थोंसे रहित एकाकी बताते है और यह उपदेश देते है कि जल्दी प्रतियुद्ध हो, यह आत्मा परभावोसे रहित एक है तब वह 'आत्मा एक है ' आत्मा एक है । ये शब्द वार बार सुनकर और परीक्षापूर्वक परपदार्थोंको निश्चय कर पूर्ण ज्ञानवान हो पर पदाथोको छोड देता है ॥ २६ ॥ सर्वतः स्वरसनिर्भरभाव चेतये स्वयमह स्वमिहैकम् । नास्ति नास्ति मम कश्चन मोहः शुद्धचिद्घनमहोनिधिरस्मि ॥ ३० ॥ स० टी०-इह-जगति, अह-आत्मा, स्वय-आत्मना, स्व-आत्मान चेतये-अनुभवामि, उपलभे जानामीत्यर्थ. । किभूतमात्मान ? सर्वतः-सामस्त्येन, स्वेत्यादि -स्वस्य-श्रात्मनः, रसः-रुचि.-अनुभव- नमिति यावत, तेन निर्भरी भावः स्वभावो यस्य त, मम-श्रात्मनः कश्चन-कोऽपि, शरीरादौ मोहः-ममत्वं नास्ति नास्ति-पुनः पुनर्न विद्यते, श्रास्म-भवाम्यह, कीहक्षः ? शुद्ध त्यादि शुद्धा निर्मला कर्मकलकराहित्यात् सा चासो चित चेतना तस्या. घनो-निविड म चासौ, महोदधिः महासमुद्रश्च, घनरसानामिव नि.शेषगुणा- नामाधारत्वात् ॥ ३० ।। अथात्मपरद्रव्ययोविवेक तंतन्यते- अर्थ-मैं इसलोकमें आपहीकरि अपने एक आत्मस्वरूपकू' अनुभवू हूँ । कैसा है मेरा स्वरूप सर्वतः कहिये सर्वांगकर अपने निजरस जो चैतन्यका परिणमन, ताकरि पूर्ण भया ऐसा है भाव जामैं , याहीरौं यह मोह है सो मेरा किछू भी लागता नाही है । याके अर मेरे किछू भी नाता नाही है । मैं तो शुद्ध चैतन्यका 'घन' कहिये समूहरूप तेजःपुंजका निधि हूँ | मावक- भावका भेदकरि ऐसे अनुभवन करे ।। ३० ॥ इति सति सह सर्वैरन्यभावविवेके स्वयमयमुपयोगो विभ्रदात्मानमेकम् । प्रकटितपरमार्थैर्दर्शनज्ञानवृत्तः कृतपरिणतिरात्माराम एव प्रवृत्तः ॥३१॥ ? - - - सह . . . - ३० परमाध्यात्मतरङ्गिणी सं० टी०-अयं-उपयोग:-ज्ञानदर्शनोपयोगः, स्वयं-स्वरूपेण आत्मा-चिद्रूप एव प्रवृत्त'-प्रवृत्ति प्राप्तः, क्व सति १ इतिपूर्वोक्तप्रकारेण, सर्वैः-समस्तैः, अन्यभावः-धर्माधर्मादिलक्षणैः परपदाथैः, सह-सार्क, विवेक-पृथग्भावे जाते सति, किंभूतः आत्मा ? विभ्रद्-दधद्, क ? एक-अद्वितीयं, आत्मानं-स्वस्वरूप, कैः भूयः किंभूतः ? कृतपरिणतिः-कृता परिणतिः-परिणमन-एकता, यस्य सः, १ दर्शनज्ञानवृत्तः तच्छ्रद्धानबोधचरित्रैः, आत्मनस्तन्मयत्वात्, कीहक्षस्तैः ? प्रकटितपरमाणैः-परमः उत्कृष्टः, सर्वप्रकाशकन्वात् स चासौ अर्थश्च परमात्मलक्षणोऽर्थ इति यावत्, प्रकटितः प्रकाशं नीतः परमार्थो येन स तथोक्तः, भूयः किंभूतः ? रामः-रमणीय., मनोज्ञः, जगच्छ्रेष्ठत्वात् ॥ ३१ ॥ अथ ज्ञानसमुद्र मज्जनादिना जगदुद् युज्यते- अर्थ-ऐसे पूर्वोक्तप्रकार भावकभाव अर ज्ञयभावनितै भेदज्ञान होते, सर्वही जे अन्यभाव तिनि” भिन्नता भई, तब यह उपयोग है सो, आपही अपने एक आत्माहीकूधारता संता प्रगट भषा है परमार्थ जिनिका, ऐसें जे दर्शनज्ञानचारित्र तिनिकरि करी है परणति जाने, एसा हवा संता, अपना आत्माराम जो आत्मारूपी बाग क्रीडावन, ताहिविर्षे' प्रवर्ते है, अन्य जागा न जायगा न जाय है । भावार्थ-सर्वपरद्रव्य तथा तिनि” भये जे भाव तिनि भेद जान्या तय 'उपयोगकू' रमनेकू' आत्मा ही रह्या, अन्य ठिकाना रह्या नाहीं । ऐसे दर्शनज्ञानचारित्रते एक- रूप भया आत्माहीविौं रमे हैं ऐसा जानना ॥ आगें ऐसे दर्शन ज्ञान चारित्र रूप परिणया जो आत्मा ताके स्वरूपका संचेतन कैसा होय है ऐसा कहता संता आचार्य इसकथनकू संकोच है समेटे है- विशेष-मूलमें 'प्रकटितपरमार्थैः ।' यह पद 'दर्शनज्ञानवृत्तेः' का विशेषण है, संस्कृत 'टीकाकारने भी ऐसा ही किया है परन्तु जिससमय वे इस पदका समासपूर्वक अर्थ करने लगे हैं उससमय उन्होंने उसे प्रथमांतपद मान 'आत्मा' का विशेषण कर दिया है । नहि जानपडता ऐसा क्यों हुआ ? अथवा उन्है प्रथमांत पद ही मिला था तो 'आत्मा' का ही विशेषण करना योग्य था फिर ' दर्शनज्ञानवृतैः' का विशेपण क्यो किया ? यदि दोनों पाठ मिले थे तो उन्हें पक्षांतर लिखकर स्पष्ट लिखदेना चाहिये था फिर ऐसा क्यों नहिं किया क्योंकि " प्रकटितपरमार्थैः' इस पदको तृतीयांत वा प्रथमांत दोनोंके मानने में दोप नहिं आसकता। इसलिये हमारी समझमें लेखक महाशय ही यहां एक दो पंक्ति भूल गये हैं। क्योंकि इतनी छोटी अशुद्धि भट्टारक शुभचंद्रजी सरीखे विद्वानसे होना असंभव मालूम पडती है पं० जयचंद्रजीने तो प्रकटिनपरमार्थैः को ' दर्शनज्ञानवृत्त' काही विशेषण किया है । दूसरे भट्टा० शुभचंद्रजीने ' आत्माराम एव ' यहांपर आत्मा पदको जुदाकर और राम को प्रथमौत मान उसका रमणीय अर्थ कर दिया है और पं० जयचंद्रजीने 'आत्मारामे ऐसा सप्तम्यंत पद मानकर आत्मारूपी क्रीडावनमें यह अर्थ किया है यद्यपि यहां पदोंकी ओर ध्यान देनसे पं०.जयचंद्रजीका अर्थ उत्तम प्रतीत होता है और भवारक शुभचंद्रजीका अर्थ खटकतासी है परंतु भट्टारक शुभचं- - -- -- प्रथम अङ्क - ? ? द्रजीका अर्थ वडा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने ' उपयोगः, राम आत्मा एव प्रवृत्तः' अर्थात् उपयोग अतिशय सुन्दर आत्मस्वरूपही हो गया इसप्रकार निश्चयनयका अवलंबन किया है जोकि प्रकरणमें सर्वथा कार्यकारी है। और पं. जयचंद्रजीने ' उपयोगः, आत्मारामे' अर्थात् उपयोग आत्मारूपी क्रीडावनमें प्रवृत्त हुआ इसप्रकार व्यवहार नयका आश्रय किया है क्योंकि उपयोग और आत्माकी इन्होने यहां भेदविवक्षा मानी है ।। ३१ ॥ मज्जंतु निर्भरममी सममेव लोका आलोकमुच्छलति शांतरसे समस्ताः । प्राप्लाव्य विभ्रमतिरस्करिणी भरेण प्रोन्मग्न एष भगवानवबोधसिंधुः ३२ स०टी०- उन्मग्नः-उच्छलितः,प्रक्टीभूत इति यावत् कोसौ ? एषः-अवबोधसिंधु'-अवबोधो ज्ञान । स एव सिंधु', अनंतगुणाधारत्वात । विकृत्वा ? आप्लाव्य-प्लावयित्वा, निराकृत्येत्यर्थ.,का? विभ्रमेत्यादिः- विभ्रमो ममेदमिति मोहः, मद्यवद्धूमकारकत्वात्, स एव तिरस्करिणी-यवनिका ता कटकादिभिदु:स्पर्श- त्वेन, उभयोरुपमानोपमेययो सादृश्यत्वात् जलेन सस्यविनाश्यत्वात, कथ ? भरेण-अतिशयेन, मजतु- मज्जन कुतु, कर्ममलक्षालनहेतुत्वात् तस्य, के ? अमी समस्ताः-सर्वे लोकाः भव्यजनाः, कथं ? निर्भर- भत्यथै, सममेव-युगपदेव, क्व ' शातरसे-शात.-उपश• त्वं, स एव रसः-पानीयं, शाम्यस्य पापप्रक्षालन- शीलत्वात्, आलोक त्रिलोकशिखरपर्यंतं, उच्छलति-ऊर्ध्वगमनं कुर्वति सति-पालोक व्याप्ते सति, इत्यर्थः । अन्यवारिधिजलस्योच्छलनशीलत्वात् ।। ३२ ।। अर्थ-यह ज्ञानसमुद्र भगवान आत्मा है सो विभ्रमरूप आडी चादर थी ताकू समूलते डवोयकरि दुरि करि, आप सर्वांग प्रगट भया है । सो, अब समस्त लोक हैं ते याके शांतरस- विणे एकैकाल ही अतिशयकरि मग्न होऊ । कैसा है शांतरस १ समस्तलोकतांई उछल्या है ।। भावार्थ-जैसे समुद्रके आडा किछू आवै तव जल दीखे नाही, अर जब आड दूरी होय, तब प्रकट होय लोक प्रेरणा योग्य होय, जो या जलविणे सर्व लोक स्नान करौं । तैसें यह आत्मा विभ्रमकरि आच्छादित था, तब याका रूप न दीखे था, अब विभ्रम दूरि भया तब यथार्थस्व- रूप प्रगट भया अव याके वीत ग विज्ञानरूप शान्तरसविण एककाल सर्व लोक मग्न होऊ। ऐसे आचार्य प्रेरणा करी है अथवा ऐसा भी अर्थ है-जो आत्माका अज्ञान दूरि होय तव केवलज्ञान प्रगट होय है, तब समस्त लोकमें तिष्ठते पदार्थ एकैकाल ज्ञानवि- आय झलके हैं ताको सर्व लोक देखो , ऐसे इम समयप्राभृतथवि पहला जीवाजीवाधिकारविण टीकाकार पूर्वरंगस्थल कया । इहां टीकाकारका आशय ऐसा, जो इस ग्रंथकू अलंकारकरि नाटकरूप वर्णन कीया है, सो नाटकविपै पहलै रंगभूमि अखाडा रचिये है । नहाँ देखनेवाला नायक तथा सभा होय है, अर नृत्य करनेवाले होय हैं ते अनेक स्वांग धरे हैं । तथा शं गारादिक आठ रसका रूप दिखाचे हैं। तहां श्रृंगार, हास्य, रौद्र, करुणा, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत ए आठ रस हैं ते परमाध्यात्मतरङ्गिणी लौकिकरस हैं । नाटकमें इनिहीका अधिकार है। नवमा शांतरस है सो अलौकिक है। सो नृत्यमें ताका अधिकार नाहीं है । इनि रसनिके स्थायीभाव, मात्विकभाव, अनुभाविकभाव, व्यभिचारिभाव तथा इनिकी दृष्टि आदिका वर्णन रसग्रंथनिमें है सो तो तहांते जान्या जाय अर सामान्यपणे रसका यह स्वरूप है-जो, ज्ञानमें जो ज्ञय आया, तिसत ज्ञान तदाकार भया, ताः पुरुपका भाव लीन होजाय, अन्य ज्ञेयकी इच्छा न रहै सो रस है सो आठ रसका रूप नृत्यमें नृत्य करनेवाले दिखाये हैं। अर इनिका कवीश्वर वर्णन करें जब अन्यरसकू अन्यरसके समान करि भी वर्णन करें तव अन्यरसका अन्यरस अंगभूत होनेते, तथा रसनिके भावं अन्यभाव अंग होनेते, सवत् आदि अलंकारकरि नृत्यका रूप करि वर्णन किया है । तहां प्रथम ही रंगभूमिस्थल कीया, तहां देखनेवाला तो सम्यग्दृष्टि पुरुप है, तथा अन्य मिथ्यादृष्टि पुरुष हैं तिनकी सभा है, तिनकू दिखावे है । अर नृत्य करनेवाले जीव अजीव पदार्थ है । अर दोऊका एकपणा तथा कत कर्मपणा आदि तिनिके स्वांग हैं। तिनिमें परस्पर अनेकरूप होय है । ते आठ रसरूप होय परिणमे है, सो तो इनि सर्व स्वांगनिकू कर्मकृत जाणि शांतरसहीमैं मग्न है, अर मिथ्यादृष्टि जीवाजीवका भेद न जाणे हैं । यातै इनि स्वांगनिहींकू सांचे जाणि इनिवि लीन होय हैं । तिनिकू सम्यग्दृष्टि यथार्थ 'दिखाय तिनिका भ्रम मेटि शांतरसमें तिनिकू लीन करि सम्पदृष्टि करे है । ताकी सूचनारूप रंगभूमिके अंतमें आचार्यने "मज्जंतु निर्भर०" इत्यादि यह काव्य रचा है । सो आगै जीव अजीवका स्वांग वर्णन करसी ताकी सूचनारूप यह काव्य है ऐसा आशय सूचे हैं। सो इहांताई तो रंगभूमिका वर्णन भया । नृत्य कुतूहलतत्त्वको निजानंदरसमें छको अान सवे छिटकाय ॥ इति समयसारवृत्ति अस्याः परमाध्यात्मतरगिण्यपरनामधेयाया व्याख्यायामात्मख्यातौ पूर्वरंगः समाप्नः । इसप्रकार पं० जयचद्रजीकृत परमाध्यात्मतरगिणीकी भाषा वचनिकामें पूर्वरंगस्थल समाप्त हुआ ॥१॥ 1 P4 r मरियवि देखो धाय । S 5 ३ अथ ज्ञानविलासमाख्याति । आगै जीवद्रव्य अर अजीवद्रव्य ए दोऊ एक होय करि रंगभूमिमें प्रवेश करे हैं । तहां आदिवि मंगलका आशय लेकर आचार्य ज्ञानकी महिमा करे हैं । जो सर्ववस्तुका जाननहारा यह ज्ञान है सो जीव अजीवके सर्वस्वांगनिको नीके पहिचाने है, ऐसा सम्यग्ज्ञान प्रगट होय है, इस अर्थरूप काव्य कहे है- प्रथम अक ? ? ? जीवाजीवविवेकपुष्कलदृशा प्रत्याय्य (य) यत्पार्षदा- नासंसारनिबद्ध बंधनविधिध्वंसाद्विशुद्धं स्फुटत् । आत्माराममनंतधाम महसांध्यक्षेण नित्योदितं धीरोदात्तमनाकुलं विलसति ज्ञानं मनो हादयत् ॥३३॥ सं. टी.-ज्ञान-शुद्धात्मबोधः, विलसति-विलास कुरुते, तदित्याध्याहारः, यत् ज्ञान विशुद्ध-निर्मल, कुन: ? आसंसारेत्यादि.-आससार-पचससारमभिव्याप्येत्याससारं निबद्धानि-बंधन प्राप्तानि, तानि च तानि बधनानि च प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदशलक्षणानि, तेषां विधि-विधान तस्य ध्वस.-विनाशः, तस्मात्, पुन' किंभूतं ? स्फुटत्-प्रादुर्भवत्, किंकृत्य ? प्रत्याय्य प्रतीतिगोचरान्कृत्वा, कान् ? पार्पदान-सभापतीन्, कया ? जीवेत्यादि-जीवश्चाजीवश्च जीवाजीवौ तयोविवेकः-पृथक्करण, स एव पुष्कला विस्तीर्णा, दृक्- दृष्टिस्तया, किंभूतं ' आत्माराम-आत्मा-चिद्रूपः, स एव आरामः-क्रीडावन-निवासस्थानं, यस्य तत्, पुनः किभूतं १ अनंतधाम-अनंत-श्रतातीत धाम-तेजः, यस्य तत्, नित्योदित-नित्य-निरनरं, उदितं उदय- प्राप्त, केन अध्यक्षण सकलकेवलालोकप्रत्यक्षेण, महसा-तेजसा, लोकातिक्रांनप्रकाशेन, धीरोदात्त-धीरे निष्कर्ष धैर्यादिगुणयुक्तत्वात् तच्च तदुदात्त च-उत्कटं, धीरोदात्त, अनाकुलं-श्राकुलतारहित, मन'-भव्यचित्रा, ल्हादयत्-हर्षोद्रेक कुर्वत् ॥ ३३ ॥ अथ परविवेकनोत्साहयति- अर्थ-ज्ञान है मो मनकू आनंदरूप करता संता प्रगट होय है। कैसा है ? 'पार्षद' कहिये जीवाजीवके स्वांग देखनेवाले महंत पुरुप तिनिकू, जीव अजीवका भेद देखनेवाली जो वडी उज्ज्वल निदों प दृष्टि, ताकरि भिन्नद्रव्यकी प्रतीति उपजावता संता है । वहुरि अनादिसंसारते दृढ बंध्या है बंधन जाका ऐसा जो ज्ञानावरण आदि कर्म, ताके नाशते विशु भया है, स्फुट भया है। जैसे फूलकी कली फूल तैसें विकाशरूप है। बहुरि कैमा है ? आत्मा ही है आराम कहिये रमनेका क्रीडावन जाकै, अनंतज्ञानका आकार आनि झलके है, तोऊ आप अपने स्वरूपहीमें रमे है बहुरि अनंत है धाम कहिये प्रताप जाका । बहुरि प्रत्यक्ष तेजकरि नित्य उदयरूप है । बहुरि कैसा है ? धीर है, उदात्त कहिये उत्कट है, याहीत अनाकुल है, सर्व वांछातै रहित निराकूल है । यहां धीर उदात्त अनाकुल विशेषण है, सो ए शांतरूप नृत्यके आभूपण जानने, ऐसा ज्ञान विलास करे है ॥ भावार्थ-यह ज्ञानकी महिमा करी, सो जीव अजीव एक होय रंगभूमिमें प्रवेश करे हैं तिनिकू यह ज्ञान ही भिन्न जाने है। जैसे कोई नृत्यमें स्वांग आवै ताकू यथार्थ जाने ताकू स्वांग करनेवाला नमस्कार करि, अपना रूप जैसाका तैसा करिले, तैसें इहां भी जानना, ऐसा ज्ञान सम्यग्दृष्टि पुरुषनिके होय है मिथ्यादृष्टि भेद जाने नाही ॥ ३३ ॥ अब इहां पुद्गल भिन्न जो आत्माकी उपलब्धि,ताप्रति विप्रतिपन्न कहिये अन्यथा ग्रहण ५.

, . ३४ परमाध्यात्मतरंगिणी करनेवाला पुद्गलहीकू आत्मा जानता जो, पुरुष, ताकू साम कहिये ताके हितरूप मिलापकी वार्ता कहिकरि, समभावहीत उपदेश कहना सोही काव्यमें कहे हैं- विरम किमपरेणाकार्यकोलाहलेन स्वयमपि निभृतः सन् पश्य षण्मासमेकं । हृदयसरसि पुसः पुद्गलोद्भिन्नधाम्ना ननु किमनुपलब्धिर्भाति किंचापलब्धिः सं० टी०-ननु शब्दोत्र आमंत्रणे, विरम-विरक्तो भव संसारदुखादेः, परावचोव्यापाराच्च, अपरेण- परकीयेन,अकार्यकोलाहलेन-कार्यादन्योऽकार्यः, तदभावे निषिद्ध च स्वरूपार्थेऽप्यतिक्रमे । ईषदर्थे च सादृश्यात्तद्विरुद्धतदन्ययोः । इति ननशब्दस्य तदन्यवाचित्वात्, अकार्यश्चासौ कोलाहलश्च स, तेन-तथाहि-नैमर्गिकरागद्वेषकर्मक- ल्माषितं, अध्यवसानमेव जीवः, तथाविधाध्यवसानादगारस्येव कात्यात्तदातरिक्तन्वेनान्यस्यानुपलभ्यमान- त्वात् इति केचित् ॥ १ ॥ अनाद्यनतपूर्वापरीभूतावयवैकसंसरणक्रियारूपेण क्रीडन् कमैच जीव;, कर्मणाति- रिक्तत्वेनान्यस्यानुपलभ्यमानत्वात् इति केचित् ।। ।। तीवमंदानुभवभिद्यमानदुरंतरागरसनिर्भराध्यवसान- संतान एच जीवस्ततोऽतिरिक्तस्यान्यस्यानुपलभ्यमानत्वादिति केचित् ॥ ३॥ नवपुराणावस्थादिभावेन वर्तमानं नोकमैव जीवः शरीरादतिरिक्तत्वेनान्यस्यानुपलभ्यमानत्वादिति केचित् ॥ ४॥ विश्वमपि पुण्यपा- परूपेणाक्रामन् कर्मविपाक एव जीवः शुभाशुभभावादतिरिक्तत्वेनान्यस्यानुपलभ्यमानत्वादिति केचित् ॥शा सातासातरूपेणाभिव्याप्तसमस्ततीव्रगुणाभ्यां भिद्यमान कर्मानुभव एव जीवः सुखदुखातिरिक्तत्वेनान्यम्या. नुपलभ्यमानत्वादिति केचित् ।। ६ । मन्जितावदुभयात्मकत्वादात्मकर्मोभयमेव जीवः काय॑तः, कर्मणोऽति- रिक्तत्वनान्यस्यानुपलभ्यमानत्वादिति केचित् ॥ ७ । अर्थक्रियासमर्थः कर्मसयाग एव जीवः, कर्मसंयोगात् खवाया इव काष्ठसयोगादतिरिक्तत्वेनान्यस्यानुपलभ्य नित्वादिति केचित् ।। एवमेव प्रकारेण कोलाहलेन किन किमपि, तर्हि कि कर्तव्यं ? एक षण्मासं षण्मामपर्यंत, पश्य-अवलोकय, किंभूय सन् ? स्वयमपि स्वत एव-परनिपेक्षो भूत्वा, निभृतः सन् निश्चलः सन्-समस्तव्यापारतन्वादिचितां विहाय, क ? हृदयसरसि हृदयं चिचमेव, सर:-सरोवरं, तम्मिन्, पुसः आत्मनः,तदा अनुपलब्धिः अप्राप्तिः, कि भाति, प्रतिभासते, च पुनः,पक्षांतरे-उपलब्धिः-प्राप्तिः,कि भाति,निश्चल स्वात्मस्वरूपेऽवलोक्तेि सति षण्मासाभ्यंतरे आत्मनः, अनुपलब्धिः उपलब्धिर्वा भवति इत्यर्थः, किंभूतस्य पुस: ? पुद्गलात-परमारवादिद्रव्यात् भिन्नधाम्नः भिन्न अतिरिक्त, धाम-तेजो यस्य तत् ।। ३४ ॥ अथ सकलद्रव्यव्यतिरिक्तमात्मद्रव्य विचकास्ति- अर्थ-हे भव्य, तेरे अन्य जे विनाकार्य निकम्मा कोलाहलकरि कहा साध्य है ? तिस कोलाहलत तू विरक्त होऊ अर एक चैतन्यमात्र वस्तुकू आप निश्चल लीन होय देखि । ऐसें छह महिना अभ्यास करि । ऐसे कीये,अपना हृदयसरोवविणें पुद्गलतै भिन्न है. तेज प्रताप प्रकाश जाका ऐसा जो पुरुष आत्मा, ताकी कहा प्राप्ति न होय है ? ऐसा नियम है, जो प्राप्ति होय ही होय || भावार्थ-जो अपने स्वरूपका अभ्यास करें, तो, ताकी प्राप्ति होय ही होय । जो परवस्तु होय, तौ, ताकी तौ प्राप्ति न होय । अपना स्वरूप तौ विद्यमान है, भूलि रह्या है सो चेतकरि देखे तो पासही है । इहां छह महिना अभ्यास कहा सो ऐसा न जानना जो एतेहीमैं होय, याफा होना तौ मुहूर्तमात्रही है । परन्तु शिष्या बहुत कठिण भासे तौ ? ? ? - है -- प्रथम अङ्क ताका निषेध है, जो बहुतकाल समझने लागेगा, नौ छह महिना सिवाय न लागेगा। ताते 'अन्य निष्प्रयोजन कोलाहल छोडि याम लागे शीघ्र रूपकी प्राप्ति होयगी ऐसा उपदेश है ।। विशेष- अकार्यकोलाहलेन किं' अर्थात् व्यर्थक कोलाहलमें क्या रक्खा है यहाँपर संस्कृत टीकाकारने कोलाहल शब्दका इसप्रकार स्पष्टीकरण किया है-कोई मानते हैं कि-स्वाभाविक राग द्वेप कमाँसे मलिन अध्यवयान ही आत्मा है क्योकि अंगारके समान जाज्वल्यमान इस अध्यवसान ( ज्ञान ) से अतिरिक्त कोई नीव पदार्थ अनुभवमें नहिं आता। १ । किन्हींका मत है- अनादि अनंत जो पूर्वापर अवयव ( परमाणु पुज) उनमें सदा संसरण रूप क्रियाका कर- नवाला कर्म ही जीव पदार्थ है क्योकि मित्राय कर्मक अन्य कोई भी जीव पदार्थ उपलब्ध नहि होता ॥ २॥ किन्दीका सिद्धांत है कि जिसके तीन अनुभव और मंद अनुभव भेद हैं और जो परिणाममें दुःखदायी है ऐसे रागरसमे परिपूर्ण अध्यवसानसंतान ही जीव है किन्तु इससे भिन्न मंसारमें कोई जीव पदार्थ नही क्योंकि दि होता तो उपलब्ध होता ॥ ३ ॥ अनेक ऐसा मानते हैं कभी नवीन कभी पुराना होनेवाला नोकर्म (शरीर ) ही जीव है क्योंकि शरीरसे मिन्न कोई जीव पदार्थ नहिं प्रतीत होता ॥ ४ ॥ बहुतोंका मत है कि समस्त लोकको पुण्य- पायरूपसे व्याप्त करता हुआ कर्मविपाक ( अनुभव ) ही जीव है क्योकि शुभ अशुभ भावसे अतिरिक्त कोई भी जीव पदार्थ नहीं ॥ ५ ॥ कोई २ यह मानते हैं कि-जिसके तीन और मंद- गुण सात और असात रूपसे व्याप्त हैं अर्थात् सात असात स्वरूप हैं एवं इन गुणोंके भेदसे जिसका भेद है ऐमा काँका अनुभव ही जीव पदार्थ है क्योंकि मुख दुःखसे मिन्न कोई मी जीव पदार्थ अनुभवम नहिं आता ।। ६ ।। अनेकोंका यह मत है कि-परस्परमें एकमएक आत्मा और कर्म दोनों ही जीव हैं क्योंकि कर्मसे अतिरिक्त कोई भी पदार्थ अनुभवम नहिं आता ! तथा कोई २ यह मानते हैं कि अर्थक्रियासमर्थ कर्मसंयोग ही जीव है क्योंकि-जिसप्रकार काष्ठके संयोगसे खाट कोई अतिरिक्त पदार्थ नहीं-काष्ठका समूह ही खाट है उसी प्रकार कर्मका संयोग ही अात्मा है कर्मसंयोगको छोडकर अन्य कोई भी आत्मा पदार्थ दृष्टिगोचर नहिं होता ॥ ॥ इमप्रकारके आन्मस्वरूप विषयक व्यर्थ कोलाहलकी क्या आवश्यकता है कुछ समय अपने हृदयमें उसके स्वरूपका विचार करो जैसा आत्मा है वैसा तुम्हें अपने आप उपलब्ध हो ही नायगा और तब तुम भलेप्रकार उसके स्वरूपको जान जावोगे ।। ३४॥ सकलमपि विहायाह्नाय चिच्छतिरिक्त स्फुटतरमवगाह्य स्वं च चिच्छक्तिमात्र इममुपरि चरंतं चारु विश्वस्य साक्षात् कलयतु परमात्मात्मानमात्मन्यनंतं ३५ म.टी, कलयतु ध्यायतु, पश्यतु बानातु ग कलिवलिकामधेनुरिति वचनात्, कः आत्मा चिद्पः, के ? इमं प्रत्यक्षीभूत स्वानुभवादिमिः प्रात्मानं स्वस्वरूप, क्व ? आत्मनि स्वस्वरूपे, किभूत १ साक्षात ३६ परमाध्यात्मतरहिणी प्रत्यक्ष, विश्वस्य जगतः, उपरि चरंच अग्रिमभागे परिस्फुरंत लोकातिशायिमाहात्म्य, लोकालोकपरिच्छेदक वा चरघातोर्ज्ञानार्थवाचकतात, परं उत् अनन्तं अन्तातीतं किं कृत्वा ? स्वं आत्मानं अवगाहा अनुभूय किभूतं न्वं? चिच्छक्तिमात्र नानशक्तिमानं स्फुटतरं अतिव्यक्तं च पुन, किंकृत्य ? विहाय त्यक्त्वा सकलपि ममत्तमपि परदन्या नोकदेशनेत्यपिशव्दार्थः किंमूत तत् ? चिच्छतिरिक्त ज्ञानशक्तिमुक्तं अचेतनमिति यावत् अह्नाय शीघ्र 'शीतवाच्यव्यगं वाग्मगित्यजसाहाय इत्यमर. ॥ अथ चेतनाचेतन विमनि अर्थ-भव्य आत्मा है सो अपने एक केवल आत्मा आत्माही विर्षे अभ्यास करो, अनुभव करो, कैसा आत्माका अनुभव करो ? जो सकलही चिच्छक्तिनै रीते रहित अन्यभाव हैं तिनिक सर्वही मूल छोडिकरि अर प्रगटपणे अपने चिच्छक्तिमात्र भाव अवगाहन करि अर यह समस्त पदार्थसमूह जो लोक ताकै उपरि प्रवर्तना संता है, ताका साक्षात् अनुभव करो। कैसा है यह ? अनंन है, अविनाशी है ॥ भावार्थ--यह आत्मा परमार्थतें समस्त अन्यभावनितै रहित चैतन्यशक्तिमात्र है, ताका अनुभवका अभ्यास कगे, ऐसा उपदेश है। आगें चिच्छक्तिते अन्य जे भाव हैं, ते सर्व पुद्गलद्रव्यसंबंधी हैं ऐसा कहे हैं- चिच्छक्तिव्याप्तसर्वस्वसारो जीव इयानयं । अतोऽतिरिक्ताः सर्वेऽपि भावाः पौद्गलिका अमी ॥३६॥ सं० टी०-अयं जीव:-आत्मा, इयान् एतावनमात्र,चिच्छक्तीत्यादि-चिच्छक्त्या-बानाविभागप्रति- च्छेदेन,व्याप्तं सर्वस्वसारं सर्वतः सामन्त्येन,मारं-अंतर्भागो यस्य स,अमी प्रत्यक्षाः-शरीरादयः, सर्वेऽपि- समस्ता अपि, भावा-पदार्थाः. पौडलिकाः पुढ्ने मत्राः पौगलिकाः, अनः एतस्मान् चैतन्यान्, अतिरिका:- भिन्ना:-कानन्या इत्यर्थः ।। ३६ ॥ अथ वर्णादीना विविक्तं वमण्यते- अर्थ-यह जीव है सो चैतन्यशक्तिकरि व्याप्त है सर्वस्व सार जाका ऐसा एतावन्मात्र है, इस चिच्छक्ति रीत जे भाव है ते सर्वही पुद्गल जन्य हैं, ते पुद्गलकही हैं ।। वर्णाद्या वा रागमोहादयो वा भिन्ना भावाः सर्व एवास्य पुंसः । तेनैवांतस्तत्वतः पश्यतोऽमी नो दृष्टाः स्युह प्टमेकं पर स्यात् ॥३७॥ संभ टी-श्रस्य-प्रत्यक्षत्य, पुमः-श्रात्मन', वर्णाद्या वा-वर्णगधरसस्पर्शरूपशरीरसस्थानसंहननादयो बहिर्भावा , वा-पुन:-रागमोहादयः-रागषमोहप्रत्ययकर्मनीकर्मवर्गवगंणास्पर्वकाध्यात्मस्थानानुभागस्थान- योगस्थानगंधस्थानोदयस्यानमार्गणास्थानस्थितिबंधस्यान क्लेशस्थानविशुद्धिस्थानसंयमलब्धिस्थानलावस्था- नादयः, सर्वे समस्ताः, एक-निश्चयेन, भावाः पदार्थाः, भिन्ना:-अतिरिक्तः, अात्मातिरिक्त इत्यर्थः, तनैव वर्णादीना भिन्न कारणेनैव, तत्वतः-परमार्थतः, अंत:-अभ्यंतरे स्वत्वरूपे, पश्यतः-अवलोकग्रतः-स्वध्यानं कुन्तइति भावः, अमा-वर्णरागादयः,नो दृष्टाः-नावलोकिताः, स्युः-भवेयुः । अवलोकनेऽनः सति कि हवं एक- अद्वितीयं परं-उ-कृष्ट-परमात्मानमित्यर्थः, हष्ट-प्रवलोकितं, अंतः पश्यतः पुंसः स्याद्-भवेत ।। ३७ ।। अथ पुन निवृत्तस्य पौलिक पिपति- अर्थ-वर्णादिक अथवा रागमोहादिक सर्वही भाव कहे ते सर्वही या पुरुषके भिन्न हैं -

प्रथम अंक
३७
तिसही कारणकरि अंतदृष्टिकरि देखतेकू' ए सर्वही नाही दीखे । केवल एक चैतन्यभावस्वरूप
अभेदरूप पुरुपही दीख्या । भावार्थ-परमार्थनय अभेदही है, ताते तिसदृष्टिकरि देखतें भेद
नाही दीखे है, तिसनयकी दृष्टिमैं चैतन्यमात्रही पुरुप दीखे है । तात ते सर्वही वर्णादिक तथा
रागादिक पुरुषके भिन्न ही हैं। अर इनि वर्णकू आदि लेकरि गुणस्थानपर्यंत भाव हैं, तिनिका
स्वरूप विशेपकरि जान्या चाहै, सो गोमटसार आदि ग्रन्थनितै जाणियो ।।
निर्वय॑ते येन यदत्र किंचित्तदेव तत्स्यान्न कथं च नान्यत् ।
रुक्मेण निवृत्तमिहासिकोशं पश्यंति रुक्मं न कथंचनासिं ।। ३८ ॥
स टी०-अत्र-जगति, यत-शरीरादि, किंचित-किमपि, येन-पुद्गलादिना, निर्वय॑ते-निष्पादयते,
तत्-शरीरादि, तदेव-पौलिकमेव, स्याद्-भवेत, कथाचन केनापि प्रकारेण सस्कारादिना अन्यत् पुद्गला-
तिरिक्त' न भवेत अथवा अन्यत्-आत्मादिद्रव्य कनापि प्रकारेण पौद्गलिक न हि, इममर्थ इष्टातयति-इह-
जगति, रुक्मण-कार्तस्वरेण निवृत्त-निष्पन्न, असिकोश कनकपत्रनिष्पन्न खड्गपेटारकं, रुक्म सौवर्ण,
पश्यति अवलोकयति सर्व व्यवहारिण., काचन केनापि प्रकारेणाधाराधेयादिग, असिं खडग न सौवर्ण
पश्यति ।। ३८ ।। अथ वर्णादीना पोद्गलिकरला पूरयति-
अर्थ-जिस वस्तुकरि जो कियो भाव वणे सो वह भाव वस्तुही है, किछू अन्य वस्तु नाहीं
॥ जैसे रूपेसोनेकरि खड्गका कोश बन्या, ताही लोक रूपा, सोना ही देखे हैं, तिसकू
खड्ग तो कोई प्रकार भी नाही देखे हैं ।। भावार्थ-वर्णादिक पुद्गलते बने हैं, ते पुद्गल ही
हैं, ते जीव नाहीं हैं।
वर्णादिसामध्यमिदं विदंतु निर्माणमेकस्य हि पुद्गलस्य ।
ततस्त्विदं पुद्गल एव नात्मा यतः स विज्ञानघनस्ततोऽन्यः ॥३॥
सं० टी०-विदतु-जानतु, दक्षाः, इत्याध्याहार्य, इद-प्रत्यक्ष, वर्णादिसामय वर्णादीनि-वर्णगंधरस-
स्पर्श शरीरसंस्थानसहननादानि तेपा सामाग्य-समग्रस्य भाव. सामग्र्य, निर्माण, एकस्य धर्मादिपचद्रव्य-
निरपेक्षस्य, पुद्गलस्य, पुद्गल-परमाणुद्रव्यस्य, हीति-निश्चितं, नान्यन्निष्पादितं तत. तस्मात् कारणात्
वर्णादिनिर्माणस्य पुद्गलस्वसाधनात, इद तु-वर्णादि पुद्गल एव वर्णादिनामप्रकृतिनिष्पादितत्वात्
नारमा-चिद्रूपो नहि । वर्णादि चिद्पः कुतो न ? यतः-यस्माद्ध तोः, सः-आत्मा, विज्ञानधनः-विशि-
प्टेन ज्ञानेन बोधेन, धनो-निविड , विज्ञानस्य घनो यत्र स तथोक्तः, तत!-वर्णादीमा विज्ञानाभावात्,
अन्यः-वर्णादेभिन्न एव ।। ३६ ॥ अथ जीवानां वर्णादिप्रतिपादन मिथ्येति मध्नाति-
अर्थ-अहो ज्ञानी जन हो,ए वर्णादिक गुणस्थानपर्यंत भाव हैं, ते समस्त ही एक पुद्गलकै
रचे तुम जाणू, तातै ए पुद्गलही होहू, आत्मा मति होहू, जातै आत्मा तौ विज्ञानघन, है,
ज्ञानका पुज्ज है तातै इनि वर्णादिकतै अन्य ही है ।।
घृतकुम्भाभिधानेऽपि कुम्भो घृतमयो न चेत् ।
जीवो वर्णादिमज्जीवजल्पनेऽपि न तन्मयः ॥ ४० ॥

- ३ परमाध्यात्मतरगिणी सं० टी०-चेत-यदि,कुभः-कलशः घृतमयः घृतेन-आज्येन,निर्वृत्तः घृतमय',न भवेत् घृतकुभाभि- धाने-घृतस्य कुभ इत्यभिधानेऽपि न केवलं, अनभिधानेऽपि इत्यपिशब्दार्थः तर्हि जीवः-आत्मा, तन्मयः वर्णादिमयो नहि, व सति ? वर्णेत्यादिः-मुग्धं प्रति वर्णादिमानय जीवः, इति सूत्रे लोकव्यवहारे च जल्पनेऽपि, यथैव हि कस्यचिदाजन्मप्रसिद्ध कघृतकुभस्य तदन्यमृण्मय' भानभिज्ञस्य प्रबोधनाय योय घृत. कुंभः स मृण्मयो न घृतमय इति तथा कुभे घृतकुभ इति व्यवहारः, तथाऽस्याज्ञानिनो लोकस्याससार- प्रसिद्धाशुद्धजीवस्य शुद्धजीवानभिज्ञस्य प्रबोधनाय योयं वर्णादिमान् जीवः स ज्ञानमयो, न वर्णादिमय इति तत्प्रसिद्धया जीवे वर्णादिमद् यवहारः॥४०॥ ननु वर्णदीनां रागादीना च जीवत्वाभावे को जीवः इति वावच्यते-- अर्थ-जो घृतका कुभ है ऐसे कहते भी, कुभ है सो घृतमयी नाही है, मृत्तिकाहीका है। तो तैसे जीव है सो वर्णादिमान् है एसैं कहते भी, वर्णादिमान् नाही, ज्ञानधनही है ।। भावार्थ- जो पहलेही घटकू मृत्तिकाका जाण्या नाहीं अर घृतके भरे घटकू लोक घृका घट कहते सुणे तहां यहही जाण्या जो घट घृतहीका कहिये है, ताकू समझावनेकू' मृत्तिकाका घट जानने- वालामी घृतका घट कह करि समझावे है ।। तैसै ज्ञानस्वरूप आत्माकू जानै जान्या नाही, अर वर्णादिककै संबंधरूपही जीवकू जानें, ताकै समझावनेकू सत्र मेंभी कहा है-जो यह वर्णा- दिमान है सो जीव है ऐसा व्यवहार है, निश्चयरौं वर्णादिमान पुद्गल है, जीव है नाहीं, जीव तौ ज्ञानघन है ऐसा जानना।। अनाद्यनंतमचलं स्वसंवेद्यमिदं स्फुटं। जीवः स्वयं तु चैतन्यमुच्च श्चकचकायते ॥ ४१ ॥ सं० टी०-इद-प्रत्यक्ष चैतन्यं चेतनत्वं स्वयं-स्वतः पुद्गलाद्यनपेक्षत्वेन,तु इति-निश्चितं, जीवः-आस्मा, चैतन्यमंतरेण अन्यस्यानुपलभ्यमानत्वात, उच्चैः-सकलश्रेष्ठत्वात, चकचकायते-चाकचक्यतया शोभते, कि भूतं ? अनादि-कदाचिदपि तस्योत्पत्तेरभावात्, अनंत-अंतातिकात विनाशरहितत्वात् ? अनादिनिध- नत्वे तर्हि कीदृशं ? अचल विनाशरहितत्वात् तह्य स्तीति कथ ज्ञायते ? स्वसवेद्य-अह सुखी, दुःख्यहमि- त्यादिरूपस्वसंवेदप्रत्यक्षा, स्फुट व्यक्त, धर्मादिद्रव्याणामचेतनत्वेनास्फुरत्वात् ॥४१॥ अथाजीवभेद विकाश्य जीवतत्त्वमालम्बते. अर्थ-जीव है सो यह चैतन्य है, सो यह आपै आप अतिशयकरि चमत्काररूप प्रकाशमान है। कैसा है ? अनादि है, काहू कालविणें नवीन नाहीं उपजा है । बहुरि अनंत ह, जाका काह कालविणे विनाश नाहीं है। वहुरि अचल है, चैतन्यपणारौं अन्यरूप चलाचल कबहू न होय है । बहुरि स्वसंवेद्य है, आपहीकरि जान्या जाय है। बहुरि स्फुट कहिये प्रगट है, छिप्या नाहीं है । आगै दूसरा लक्षणका अव्याप्ति अतिव्याप्ति दूषण दूरि करनेकू काव्य कहे है- : वर्णायः सहितस्तथा विरहितो द्वधास्त्यजीवो यतो नामृतत्वमुपास्य पश्यति जगज्जीवस्य तत्त्वं ततः ॥ ? , प्रथम अङ्क ३ - ३६ इत्यालोच्य विवेचकैः समुचितं नाव्याप्यतिव्यापि वा व्यक्त व्यंजितजीवतत्त्वमचलं चैतन्यमालव्यतां ॥४२॥ सं० टी०-तत्तः तस्मात् कारणात्, जगत्-गच्छति-जानातीति जगत् द्युतिगमोथै च इति विवप् । ज्ञानवत्प्राणिसमूहः, अमूर्तत्व-मूर्तन्वरहितं, उपाम्य-आश्रित्य, जीवस्य, आत्मनः, तत्त्व-स्वरूप, पश्यति अवलोकयति, नहि यद्यदमूर्त तत्तज्जीवतत्त्वमिति जीवेनामूर्तत्वस्य व्याप्त्यभावात् । कुत. ? यतः कार- णात अजीव:-अजीवपदार्थ., द्वेधा-द्विप्रकार, अस्ति-वर्तते । एको भेदः-वर्णाद्य:-रूपगंधरसस्पर्शाये, सहित-युक्तः, परमाएवादिपुद्गलपिंडाना वर्णात्मकत्वेन मूर्तत्वात्, 'तथा-तेनैव प्रकारेण, द्वितीयो भेदः, तैर्विरहितः-धर्माधर्माकाशकालानां वर्णादिरहितत्वेनामूर्तत्वात्, इति-अमुना प्रकारेण, अमूर्तला जीवस्वरूप न आलोच्य-निश्चित्य, आलव्यतां सेव्यता, कि ? चैतन्या-चेतन , व्यजितजीवतत्त्वं व्याजित जीवस्य स्वरूप येन तत्, अचल-परलक्ष्येऽभावाच्चलनारहित, समुचित-सम्यक् प्रकारेण तवोचित युक्त । लक्ष. णस्य त्रीणि दूपणानि-अव्याप्त्यतिव्याप्त्यसभवरूपाणि तत्राव्यापि नैतल्लक्षणं स्वलक्ष्ये जीवे सर्वत्र विद्य- मानत्वात् । गोः शावलेयत्ववदव्यापि नच । वा-पुन:-अतिव्यापि न च स्वलक्ष्यं जीवलक्षणं विहायान्यत्र गो: पशुत्ववद्विद्यमानत्वाभावात् । पुन.-गव्ये कशफत्ववदसभनं न च यतः, व्यक्त-तत्रैव तत्र सर्वचैव विध- मानत्वात् । अथवा समुचितपदेनासभवपरिहारः ॥ ४० ॥ अथ जीवाजीवयोमिन्नत्वमनुभवति- अर्थ-जो जीवका लक्षण अमूर्तिकपणा कहिये तो अजीवपदार्थ दोयप्रकार है । धर्म, अधर्म, आकाश, काल, ए तौ वर्णादिकभावरहित हैं, अर पुद्गल है सो वर्णादिसहित है । तातें अमूर्ति- कपणाकू ग्रहणकरि लोक जीव का यथार्थस्वरूपकू नाही देखे, यामै अतिव्याप्तिदूपण आवै ।। बहुरि वर्णादिकमै रागादिक भी आगये ते रागादिक जीवका लक्षण कहिये, तौ तिनिकी व्याप्ति पुद्गलहीरो है, जीवकी सर्व अवस्थामै च्याप्ति नाहीं । तातै अव्याप्तिदुपण आवै । ऐसें भेद- ज्ञानीपुरुष आलोचना करि परीक्षा करि अनिव्याप्ति अव्याप्तिदूपणौँ रहित चेतनपणा लक्षण कह्या है, सो भलैप्रकार योग्य है । प्रगट जीवका यथार्थ स्वरूप जाने व्यक्त कीया है । बहुरि कैसा है ? जीव वह चलाचल नाहीं है, सदा विद्यमान रहे है । सो जगत इसही लक्षणकू अवलंबो, याहीरौं यथार्थ जीवका ग्रहण होय है ।। आगै,जो ऐसा लक्षणकरि जीव प्रगट है, तोऊ अज्ञानीलोककै याका अज्ञान कैसा रहे है ? ताका आचार्य आश्चर्य तथा खेदसहित वचन कहे है- विशेष-अव्याप्ति अतिव्याप्ति असंभत्रके भेदसे लक्षणमें तीन दोष आते हैं । जीवका लक्षण वर्ण आदिवाला वा अमृतत्व मानने में ये अव्याप्ति अतिव्याप्ति दोप आकर उपस्थित हो जाते हैं किंतु चैतन्य लक्षण माननेमें कोई दोप आकर उपस्थित नहिं होता । लक्ष्यके एकदेशमें लक्षणका रहजाना अव्याप्ति दोष है जिसप्रकार गौका लक्षण शावलेयत्व (चितकवरा पना ) अर्थात् चितकबरापना थोडी गायोंमेंही रहता है लक्ष्यमात्र समस्त गायोंमें नहीं । जो लक्षण अपने लक्ष्यमें और लच्यको छोडकर अलक्ष्यमें भी रहै वह लक्षण अतिव्याप्त है जैसे गौका लक्षण पशुपना, अर्थात् यह पशुत्व लक्षण, समस्त गायोमें भी रहता है और गायोंके सिवाय भैंस -- परमाध्यात्मतरहिणी वकरी आदिमें भी पाया जाता है-वे भी पशुके नामसे पुकारे जाते हैं। जो लक्षण लक्ष्यमें सर्वथा असंभव हो वह असंभव है जैसे गौका लक्षण एकशफत्व-एक खुरवाली अर्थात् एक शफत्व- किसी गौमें देखने में नहिं आता। यहांपर जीवका चैतन्य लक्षण स्वीकार करनेपर कोई भी दोष नहीं क्योंकि यह चेतनत्व समस्त जीवों में रहता है इसलिये तो इसमें अव्याप्ति दोष नहीं आता । सिवाय जीवके अन्यपदार्थ-धर्म आकाश आदि में नहिं रहता इसलिये अतिव्याप्ति एवं.. जीवमें इसका असंभवपना नहीं इसलिये असंभव दोप भी नहिं आता । यद्यपि ग्रंथकारने मूलमें अव्याप्ति और अतिव्याप्ति दोही दोपोंका उल्लेख किया है एवं क्रमसे उनके वर्णादिमत्व और अमूर्तत्व ये दो उदाहरण भी दिये है । अर्थात् यदि जीवका लक्षण वर्णादिमन्च, माना जायगा तो अव्याप्ति और अमूर्तत्व माना जायगा तो अतिव्याप्ति दोष आवेगा, तथापि सहचरित न्यायसे अर्थात्-अव्याप्ति अतिव्याप्ति और असंभव तीनों ही लक्षणके दोप समान हैं-असंभव दोष भी सहचारी है इस न्यायसे असंभव दोप भी जान लेना चाहिये और अव्याप्ति आदिके समान जीवके चेतनत्व लक्षणमें इसका भी परिहार समझना चाहिये । संस्कृत टीका. कारने यहां व्यक्तपदसे वा समुचित शब्दसे भी असंभवका परिहार किया है व्यक्त अर्थात् चैतन्य लक्षण जीवमें स्पष्ट रूपसे जान पडता है इसका जीवमें असंभव पना नहीं ।। ४२॥ जीवादजीवमिति लक्षणतो विभिन्नं ज्ञानो जनोऽनुभवति स्वयमुल्लसंतं । अज्ञानिनो निरवधि प्रविजृम्भितोऽयं मोहस्तु तत्कथमहो वत नानटींति॥४३॥ सं टी-इति-चेतनत्वाचेतनत्वयोभिन्नत्वकथनेन, अनुभवति-निश्चिनोति, अनुभवाविषयं करोती- त्यर्थः, कः ? ज्ञानी भेदविज्ञानयुक्तः, जनः-भव्यलोक,: लक्षणतः-असाधारणधर्मतः, जीवात-पात्मनः, अजी-धर्मादिद्रव्य, विभिन्न-अतिरिक्तं, कीहक्ष अजीन ? स्वयं-अचैतन्यस्वरूपेण, उल्लसत-ऊर्ध्व विलसतं, वत इति-खेदे, तत्-तस्मात्, जीवाजीवयोः परस्परं भिन्नत्वात् अयं मोह-पुद्गलात्मकं मोहनीयं रागढ आत्मकं च कर्म, अहो इति आश्चर्ये, कथं ? केन प्रकारेण ? नानटीति-अत्यर्थं नाटयति न कथमपि, तयोः परस्परभिन्नत्वसाधनात्, किंभूतो मोहः? अज्ञानिनः-भेदज्ञानरहितस्य मूढप्राणिनः, निरेत्यादिः- मर्यादारहितत्वेन व्याप्त, अज्ञानिनस्तन्मयत्वात् ।। ४३ ।। अथाविवेकनाटये नटनपटुतां प्रकटयति- अर्थ-ऐसे पूर्वोक्तलक्षणते जीव” अजीव भिन्न है, सो ज्ञानीजन है, सो या आपआप प्रगट उघडता अनुभवन करे है। तौऊ अज्ञानीजनकै यह अमर्यादरूप मोह अज्ञान प्रगट फैलता संता कैसे अतिशयकरि नृत्य कर है ? हमारै वडा आश्चर्य है तथा खेद है । फेरि याका प्रति- पेध करे है जो, मोह नृत्य करे है तौ, करौ, तथापि ऐसे है- विशेष-इस श्लोकका भाव पं० जयचंद्रजीने अपने "अचैतन्यस्वरूपसे उल्लासमान लक्षणसे जीवद्रव्यसे भिन्न अजीव द्रव्यका भेद ज्ञानी स्वयं अनुभव करता है अमर्यादरूपसे बढा हुआ यह मोह अज्ञानीके नृत्य करता है-अज्ञानीको चक्रमें डालता है यह बडा आश्चर्य और खेद है।' ॥ ? ।

प्रथम अङ्क . ? ? यह लिखा है । भट्टारक शुभचंद्रजीने-भेदज्ञानी अपने अचंतन्यस्वरूपसे उन्लसित, लक्षणसे जीवद्रव्यसे भिन्न अजीवद्रव्यको अनुभव करता है इसलिये उमके जीव और अजीवमें परस्पर भेद होनेके कारण मोह जो अज्ञानी जीवके अमर्यादरूपसे व्याप्त है, खेद और आश्चर्य है कैसे नृत्य करसकता है ? कभी भी ज्ञानीको मोह अपने चक्करमें नहिं डाल सकता' यह अर्थ किया है परन्तु हमारी समझसे यद्यपि भेदज्ञानी अपने चैतन्यस्वरूपसे उल्लासमान दोनोका भिन्न भिन्न लक्षण होनेसे जीवसे सर्वथा भिन्न अजीवका अनुभव करता है तथापि अज्ञानीके वृद्धिको प्राप्त यह मोह इसे भी अपने चक्रमें घुमादेता है यह महान् खेद और आश्चर्य है' इसका भाव यह होना चाहिये ।। ४३ ॥ अस्मिन्ननादिनि महत्यविवेकनाट्य वर्णादिमान्नटति पुद्गल एव नान्यः । रागादिपुद्गलविकारविरुद्धशुद्धचैतन्यधातुमयमूर्तिरयं च जीवः ॥ ४४ ॥ स० टी०-नटति नृत्य करोति, नारकादिपर्यायसूक्ष्मस्थूलादिरूप भवतीत्यर्थ , कः ? पुनल', वर्गवर्गणा- स्पर्धकगुणहान्यादिरूप', एव-निश्चयेन, विभूत ? वर्णादिमान, वर्णो-रूप, स एव आदिर्यस्य स्पर्शरसग- धादेः स वर्णादि विद्यते यस्य स. 'स्पशेरसगंधवर्णवत. पुद्गला' इति वचनात् , क ? अस्मिन्-जगत्प्रसिद्ध, अविवेकनाट्ये 'ममेद' अहमस्येति लक्षणोऽविवेकः,तथा चाक्त-चिदचित्त्वे परतत्त्वे विवेकस्तद्विवेचनमिति' तद्विपरीतोऽविवेकः स एव नाट्य-लास्य, तस्मिन्, किंभूते ? अनादिनि-आदिरहिते, पुन' किभूते ? महति-पाससारजीवव्याप्तत्वात्, चेति भिन्नप्रक्रमे, अन्यः-अजीवाद्भिन्नः, अय जीवः-आत्मा, न नट- ति, कुतः ? हेतुगर्भितविशेषण दर्शयति-रागेत्यादि'-रागो-रतिः, आदिशब्दात् द्वपमोहाध्यवसायादयः ते च ते पुद्गलाना विकाराश्च विकृतय. तेभ्यो विरुद्ध-विपरीतस्वरूपत्वाद्भिन्न तञ्च तत् शुद्ध-द्रव्यभावनो-- कर्मरहितं चैतन्य च तदेव धातु.-द्रव्यविशेषः, अथवा दधाति स्वगुणपर्यायानिति धातुः-ज्ञानशक्तिः, तेन निर्वृत्ता मूर्तिलक्षणया स्वरूपम् यस्य सः ॥४४॥ अथोपसंहारमाजेहीयते- अर्थ-यह अनादिकालका बडा अविवेकका नृत्य है तिसवि वर्णादिमान पुद्गलही नृत्य करे है अन्य कोई नाहीं है । अभेदज्ञानमैं पुद्गलही अनेकप्रकार दीखे है, किछू जीव तो अनेक- प्रकार है नाहीं। यह जीव है सो तो रागादिक जे पुद्गल” भये विकार तिनि” विरुद्ध विलक्षण शुद्ध चैतन्य धातुमयी मूर्ति है ।। भावार्थ-रागादि चिद्विकारकू देखि ऐसा भ्रम न करना, जो, एभी चैतन्य ही है, जाते चैतन्यकी सर्व अवस्थामै व्यापै, तौ चैतन्यके कहिये । सो ऐसे हैं नाही, मोक्ष अवस्थामै इनिका अभाव है ।। तथा इनिका अनुभव भी आकुलतामय दुःखरूप है ।। चैतन्यका अनुभव निराकुल है,सोही जीवका स्वभाव है ऐसें जानना ॥४४|| आगे भेदज्ञानकी प्रवृत्तिपूर्वक यह ज्ञाताद्रव्य आप प्रगट होय है, ऐसे महिमा करि अधिकार पूरण करे हैं, ताका कलशरूप काव्य कहे हैं- . ६ ४० परमाध्यात्मतरंगिणी इत्थं ज्ञानक्रकचकलनापाटनं नाटयित्वा जीवाजीचौ स्फुटविघटनं नैव यावत्ययातः । विश्वं व्याप्य प्रसभविकसद् व्यक्तचिन्मात्रशक्त्या ज्ञातृ द्रव्यं स्वयमतिरसात्तावदुच्चैश्वकाशे ॥ ४५ ॥ सं० टी०-तावत्-तावत्कालपर्यंत, ज्ञातूद्रव्य-ज्ञायकद्रव्यं, श्रात्मद्रव्यमित्यर्थः, स्वयं-स्वभावादेव, अतिरसात-रसातिशयतः, उच्च-ऊर्ध्व, चकाशे-शुशुभे, किंभूत ? प्रसभविकसत्-अत्यर्थ विकास गच्छत् , कया ? व्यक्तेत्यादि-चिन्मात्रस्य ज्ञानमात्रस्य, शक्तिः-अविभागप्रतिच्छेद समूह', व्यक्ता चासौ चिन्मात्र. शक्तिश्च तया, कि कृत्वा विश्न-जगत, व्याप्य-परिच्छेधेत्यर्थः, यावत् यावत्पर्यतं नैव प्रयातः-निश्चयेन न प्राप्नुत', किं ? स्फुटविघटन-स्फुटं व्यक्त-विघटनं-पृथग्भवन, कौ ? जीवाजीवो-जीव:-आत्मा-चेतनः, अजीबः-अचेतन -कर्मपुद्गलाटिः, 'वः, तौ, वि-कृत्वा ? इत्थं पूर्वप्रकारेण, पुद्गलस्यैव नार्तनादिकथनल- क्षणेन, नाटयित्वा-नृत्यविषयं कृत्या, इतस्ततश्चालयित्वेति यावत् , कि ? ज्ञानेत्यादि-ज्ञानं शुद्धात्मज्ञानं तदेव कचः करपत्र 'क्रकचोऽखी करपत्रं स्यात, इत्यमरः तस्य कलना-ग्रहणं, स्या पाटनं पटुत्वं तत्पटुत्वं जीवाजीवयोर्मध्ये कृत्वेत्यर्थः । तावत् ज्ञातृद्रव्यं ममत्रा समय प्रति अधिकतया अचकात्, यावन्नि- शेषगंधध्वसो न याति तस्मिन्कृते अधिकतया प्रतिभासनाभावान्तस्य स्वस्वरूपेऽवस्थानात् कृतकृत्यत्वा- दिति तात्पर्य ॥ ४५ ॥ व्याख्यानमिदं जयतादात्मविकाशिप्रकृष्टनिजमानं । शुभचंद्रयतिव्यक्त शुद्धार्थ समयसारपद्यस्य । इति समयसारपद्यस्य परमाध्यात्मतरंगिणीनामधेयस्य व्याख्याया प्रथमोंकः ॥ १॥ अर्थ-याप्रकार ज्ञानरूप करोतकी क्लनाका पाटन कहिये वारंवार अभ्यास करना ताकू, नचायकरि जीव अर अजीब दोऊ प्रगटपणे जेते न्यारे न भये तेरौं यह ज्ञाद्रव्य आत्मा है सो समस्त पदार्थनिवि व्याप्यकरि अर प्रगट विकासरूप व्यक्त होती जो चैतन्यमात्रशक्ति ताकरि आपै आप अतिवेगते अतिशयकरि प्रगट होता भया । भावार्थ-जीब अजीव दोऊ अनादित संयोग रूप हैं । सो अज्ञानतें एकसे दीखे हैं । वहां भेदज्ञानके अभ्यासकरि जैते प्रगट न्यारे न भये, जीव कर्मनित छूटि मोक्ष प्राप्त न भया, तेते यह जीव ज्ञाता द्रव्य है, सो अपनी ज्ञान- शक्तिकरि समस्त वस्तुकू जानिकरि अतिवेगतै आप प्रगट भया ।। इहां तात्पर्य यह, जो सम्यग्दृष्टि भये पीछे जेनै केवलज्ञान न उपजे है, तेतै तौ सर्वज्ञ के आगमतै भया श्रुत्तज्ञान ताकरि, समस्त वस्तूका संक्षेप तथा विस्तारकरि परोक्षज्ञान होय है, तिस ज्ञानस्वरूप आत्मा का अनुभव होय है, सोही याका प्रगट होना है । बहुरि जव धातिकर्मका नाशते केवलज्ञान उपजे है, तब समस्तवस्तूकू साक्षात् प्रत्यक्ष जाने है, ऐसे ज्ञानस्वरूप आत्माकू साक्षात् अनुभवे है, मोही याका प्रगट होना है। ऐसे मोक्ष भये पहलेही आत्मा प्रकाशमान होय है, यह भी जीव अजीवका न्यारा होनेका प्रकार है। ऐसे जीव अजीवका पहला अधिकार पूर्ण भया ।। 1 प्रथम अङ्क तहां टीकाकार पहले रंगभूमिका स्थल न्यारा कहि पीछे कही थी-जो नृत्यके अखाड़ेमें जीब अजीव दोऊ एक प्रवेश करे हैं, दोऊ एकपणाका स्वांग रचा है | तहां भेदज्ञानी सम्यग्दृष्टि पुरुष अपने सम्यग्ज्ञानते दोऊळू लक्षणभेदत परीक्षा करि दोय जाणि लिये, तव स्वांग होय चुका दोऊ न्यारे न्यारे होय अखाडामैसू बाहिर भये, ऐसा अलंकार करि वर्णन कीया ।। इसप्रकार स्वर्गीय प० जयचन्द्रजी कृत परमाध्यात्मनरगिणीकी भाषा वचनिका पहिला अंक समाप्त हुआ द्वितीयोऽकः ॥२॥ कर्ताकर्मविभावकू', मेटि ज्ञानमय होय ।। कर्म नाशि शिवमै बसे, तिन्हें नमूं मद खोय ॥१॥ अब टीकाकारके वचन है जो, जीव अजीब ढोऊ एक कर्ता कर्मका वेप फिरि प्रवेश कर है जैसे दोय पुरुप आपममें किछू एक स्वांग करि, नृत्यक आखाडामैं प्रवेश करें, तैमे इहां अलंकार जानना ॥ तहां प्रथमही तिस स्वांगहू ज्ञान है सो यथार्थ जानी ले हैं, ताकी महिमा करता संता काव्य पढ़े है- एकः कर्ता बिदहमिह मे कर्म कोपादयोऽमी इत्यज्ञानां शमयदभितः वर्तृकर्मप्रवृत्तिं । ज्ञानज्योतिः स्फुरति परमोदाचमत्यंतधीरं साक्षात्कुर्ननिरुपधि पृथग्द्रव्यनिर्मासि विश्वं ॥१॥ सं० टी०-स्फुरति द्योतते, किं' ज्ञानज्याति बोधतेज , पृथक् समस्तद्रव्येभ्यो भिन्न, किभूर ? परमो- दात्त परमं उत्कृष्ट, सर्वव्यविकाशकत्वात् अथवा परा उत्कृष्टा, मा लक्ष्मी , अनंतचतुष्टयलक्षणा यस्य नृत्परमं, तञ्च तदुदात्त उत्कृष्ट च नत्, पुन' अत्याचार प्रतिरायेन धार निका, घोर्धारणा तां जगद्ग्रह- णाय गति आदत्ते इति धीरमिति वा, निरुपधि वाह्याभ्यतर द्रव्य भावकर्म ग उपाधेनिष्क्रान्तो निरुपधि, निरादयो निर्गमनाद्यर्थे पचन्या , इति पचमीतत्पुरुप , नत्वव्ययीभाव., व्यनिर्भासिसमस्तगुणपर्याय नयोपनयप्रकाशकं नयोपनयमतरेणान्यस्य द्रव्यस्याभावात् तथा चोक्तमष्टसहरुया- नयोपनयकाताना त्रिकालाना समुच्चय. । अविभ्राद् भारसनधो द्रव्यमेकमनेकधा ॥ विश्व-पड्व्यसमुदायसप्तरज्जुक्नत्रिलोक, उपलक्षणादलाकं च साक्षात्कुर्वत्-प्रत्यक्षीकुर्वत् इति पूर्वार्धोक्तप्रकारेण प्रवृश्चि-कर्मक प्रवृत्रि, तदन्त्र क्रोधादौ यायमात्मा स्वयमज्ञानभावेन ज्ञानभवनमानसह- लोदासीनावस्थात्यागेन व्याप्रियमाणः प्रतिभाति स वर्ता, यत्तु अज्ञानमवनव्याप्रियमाणत्वेनातरुप्लवमान प्रतिभाति क्रोधादि तत्कर्म, एवमियम नादिरनानजा कर्मक प्रवृत्तिः, कर्ता-आत्मा, कर्म-ज्ञानावरणादिः, ह', तयोः प्रवृत्तिः-प्रवर्तन, ता, अभितः साकल्येन शमयत् उपशम-शातता नयत्, किं भूता तां? अज्ञानां न विद्यते ज्ञान यस्यां सा तां, इति कि ' इह-जगति, एक., अहं चित् आत्मा, 'चिच्छन्दोऽत्र पुल्लिंगे, कर्ता करोतीत्येवं शोल. कर्ता, कोपादयः, क्राधादयो द्रव्यमावरूताः, मे-ममात्मनः कर्तृ तापम्नस्य, कर्म-क्रियमाणं कार्य, ॥ १॥ ननु ज्ञाने कथं न कर्तृकर्मप्रवृत्तिरिति चेत्- ? , - - %3D - परमाध्यात्मतरङ्गिणी अर्थ-ज्ञानज्योति है सो प्रगट स्फुरायमान हो है। कहा करता संता ? अज्ञानी जीवनिक ऐसी कर्ताकर्म की प्रवृत्ति है, जो इस लोकविषे मैं चैतन्यस्वरूप आत्मा हूं, बहुरि ए क्रोधादि भाव है ते मेरे कर्म हैं, सो ऐसा कर्ताकर्मकी प्रवृत्तिकू साक्षात् यह ज्ञान शमन करता संता है भेटता है ॥ कैसा है ज्ञानज्योति ? उत्कृष्ट, उदात्त है, काहुके आधीन नाहीं है ।। बहुरि कैसा है ? अत्यंत धीर है काहू प्रकारकरि आकुलतारूप नाही है ॥ बहुरि कैसा है ? विना परके सहाय न्यारे न्यारे द्रव्यनिक प्रतिभासनका जाका स्वभाव है, याही तै समस्तलोकालोय कू साक्षात् प्रत्यक्ष करता है जानता है ।। भावार्थ-ऐसा ज्ञानस्वरूप आत्मा है सो परद्रव्यका अर परभावनिका कर्ताकर्मपणाका अज्ञानकू दूरि करि आप प्रगट प्रकाशमान होय है ।। बिशेष-अज्ञानां इसपद का अर्थ संस्कृत टीकाकारने कत कर्मप्रवृत्ति का विशेषण कर जिसमें ज्ञान न हो ज्ञानशून्य अर्थ किया है और पं० जयचन्द्रजीने 'अज्ञानां अर्थात् अज्ञानियोंकी' यह अर्थ किया है। परपरिणतिमुज्झत् खंडयद्धेदवादानिदमुदितमखंड ज्ञानमुच्चंडमुच्चैः । ननु कथमवकाशः कर्तृ कर्मप्रवृत्तेरिह भवति कथं वा पौद्गलः कर्मबंधः २ स० टी०-इद-प्रत्यक्ष, ज्ञान-बोधः, उच्चैः-अतिशयेन, उदितं-उदय प्राप्त, किंभूतं ? उज्झत्-त्यजत परेत्यादि-परेषु क्रोधादिपु, परिणति-परिणाम, पुनः कीदृशं ? खडयत्-निराकुर्वत् , कान् ? भेदवादान भेदाना वर्मकरणादिरूपाणा, वादा:-कथनानि, तान् , अखंड-न खड्यते केनापि तदसड, परिपूर्ण, उच्चड-उत्स्ट, द्रव्यानवनिराकरणहेतुत्वात् नन्विति वितर्के, इह ज्ञानात्मनि, अवकाशः-स्थान, कलं? न केनापि प्रकारेण, कस्याः ? कत्रेत्यादिः-कर्ता च कर्म च कर्तृ कर्मणी तयो. प्रवृत्तिः-प्रवर्तन, आत्मा, कर्ता क्रोधादि कर्म ईदृग्विविकल्परूपा, तस्याः भावकर्मणा नावकाश इति यावत्, वा-अथवा भवति-जायते, 'प्रादुर्भावे गतौ च भू' इत्यभिधानात् , कथं ? न केनापि प्रकारेण, पौद्गलः-पुलेभ्यः-त्रयोविंशत्तिवर्गणाना- मन्यतमाभ्यो वर्गणाभ्यस्तदुचिताभ्यो भवः पौद्गलः, कर्मबधः-कर्मणा ज्ञानापरणादिद्रव्यकर्मणां बंधः ॥ २॥ द्रव्यमबाधो निरस्तः, अथ चेतनश्चक्रास्तीति प्रकाशते-- अर्थ-यह ज्ञान है सो प्रत्यक्ष उदयकू प्राप्त भया । कैसा भया ? अखंड कहिये जामै ज्ञयके निमित्त तथा क्षयोपशमके विशेपते अनेक खंडरूप आकार प्रतिभासमें आवें थे तिनिरी रहित ज्ञानमात्र आकार अनुभवमैं आया, याहीरौं ऐसा विशेषण है । कैमा है ज्ञान ? " भेद- वादान् खंडयत् " कहिये मतिज्ञानादि अनेक भेद कहावै थे, सो तिनिकू' 'दुरि करता संता उदय भया, याही” " अखंड" विशेषण है । बहुरि कैसा है ? परके निमित्तौं रागादिरूप परिणमै था तिस परिणतिकू छोडता संता उदय भया, बहुरि कैसा है ? 'उच्च, उच्चड कहिये अतिशयकरि प्रचंड है, परका निमित्तौं रागादिरूप नाहीं परिणमे है, बलवान् हैं तहां आचार्य कहे है-जो, अहो, ऐसा ज्ञानमैं परद्रव्यकै कर्ताकर्मकी प्रवृत्तिका अवकाश कैसे होय ? तथा ? ? - . . , .. -- ? . कुत. . प्रयम भर पौद्गलिककर्म बंध कैसा होय भावार्थ-कर्मबंध तो अज्ञानने भई कोकर्मकी प्रवृत्ति था । अब भेदवादकदूरि करि अर पर परणतिकू दूर करि एकाकार जन प्रगट मया । तब भेदरूप कारककी प्रवत्ति मिटी, तर काहे वन्ध होय ? नहीं होय । इत्येवं विरचय्य संप्रति परद्रव्यानिवृत्तिं परां स्वं विज्ञानघनस्वभावमभयादास्तिनुवानः परं । अज्ञानोत्थितकर्तृकर्मकलनाक्लेशान्निवृत्तः स्वयं ज्ञानीभूत इतश्वकास्ति जगतः साक्षी पुराणः पुमान् ॥३॥ स० टी-इत ज्ञानस्य माहात्म्यकथनादनतर, चकास्ति-द्योतते, क. ? पुराण-जीर्ण. अनादिरित्यर्थ. पुमान्-आत्मा, किभूत ? जगतः-त्रिलोकस्य, साक्षी-अनति-रापातीकरोति पूर्णत्तरपर्यायानित्येन शील: अक्षी, अथवा अक्ष्योति-व्याप्नोति-परिछि नत्ति, सर्वगुणपर्यायानित्येशील. अक्षी-ज्ञायकः तेन सह वर्सत इति साक्षी, अथवा जगत साक्षी साक्षिक.- जगत्स्वभावज्ञायकत्वात् , स्वयं परस्वरूपमतरेण, जानीभूनः मंसारदशायामनान प्रतिवुद्धावस्थाया ज्ञान भूयते स्मेति ज्ञानीभूत , निवृत्त-विनिवृत्ति प्राप्तः, ? अजेत्यादिः-अज्ञाना-म्बय चैतन्याभावलक्षणा, उत्यिना प्रादुर्भूता, कर्तृ कर्मणो कलना-प्रवृत्ति- विक्रम्पो वा सैव क्लेश , द खदायित्वात् तस्मात् , पुन किभूतः । श्रास्तिनुवान'-ष्ट्रिय आस्कंदने अस्य धातोः प्रयोगात्, पर-कंबल, स्व-स्वरूप, कुन. ? अभयात्-निर्भयत्वमाश्रित्य, कि भूतं स्त्र ? विज्ञाने- 'त्यादि-विज्ञानस्य विशिष्ट निर्मलज्ञानस्य घनो-निरंतर स एव स्वभावो यस्य तत् , इति हेतोः-आत्मप्रकाश नस्वभावात् , एव-पूर्वोक्तप्रकारेण, वर्तृकर्मावकाशाभावे सति,विरचय्य-रचयित्वा,का ? परा-उत्कृष्टा निवृत्ति परावृत्ति, संप्रति-इदानी कुत परद्रव्यात पुनलादिपरद्रव्यत्वात् । ३।। अयात्मन. कर्तृत्वशून्यत्व ससूचयति- अर्थ-इहात आगै पुराणपुरुष जो आत्मा सो जगतका साक्षीभूत, ज्ञाता, द्रष्टा आपही ज्ञानी भया संता प्रकाशमान होय है । सो पूर्व कहाकरि कैसा भया संता सो कहे हैं। ऐसे पहले कह्या तिस विधानकरि, परद्रव्यतै उत्कृष्ट सर्वप्रकार निवृत्ति करि, अर विज्ञानधनस्वमावरूप जो केवल अपना आत्मा, ताही निशंक आस्तिक्यभावरूप स्थिरीभूत करता संता, अज्ञानते भई थी जो कर्ता कर्मकी प्रवृत्ति, ताका अभ्यासतै भया था जो क्लेश, तिसत निवृत्त भया संता प्रकाशमान होय है ॥३॥ विशेष-संस्कृत टीकाकारने 'अज्ञानोत्थितक कर्मकलनाक्लेशात्' यहाँपर अज्ञानस्वरूप उत्पन्न हुई जो कर्ता कर्मकी प्रवृत्ति वा विकल्प उससे उत्पन्न हुये क्लेशसे यह अर्थ किया है और पं० जयचन्द्रजीने अज्ञानसे उत्पन्न जो कर्ताकर्मकी प्रवृत्ति उससे उदित क्लेशसे, यह अर्थ किया है। संस्कृत टीकाकारने यह चमत्कारी बतलाई है कि कर्ताकर्मकी प्रवृत्ति ही अज्ञान स्वरूप है अज्ञानको कारण और प्रवृत्तिको कार्य क्यों मानना ? व्याप्यव्यापकता तदात्मनि भवेन्नैवातदात्मन्यपि ?

म
?
,
परमाध्यात्मतरङ्गिणी
व्याप्यव्यापकभावसंभवमृते का कर्तृकर्मस्थितिः ।
इत्युद्दामविवेकघस्मरमहोगारेण भिंदंस्तमो
ज्ञानीभूय तदा स एप लसितः कर्तृत्वशून्यः पुमान् ॥४॥
स० टी०-तदा कतृत्वशून्यत्वसूचनसमये,स एष-प्रत्यक्षीभूतः पुमान्-चिद्रप. लसित.-उल्लासं प्राप्त:
परमप्रक्रपत्वं प्राप्तः इत्यर्थः, किं कृत्वा ? ज्ञानीभूय ? अज्ञान ज्ञान भूत्वा संसारदशात इति ज्ञानीभूय
" समासे भाविन्यनन स्कौ यप्" इति कौमारसूत्रेण यप, 'डाच्चूर्याधनुकरणं चेत्, इति चिंतामणीयसूत्रेण,
निष्पादनाच, * तदा लसित , यदेत्यध्याहारः, कर्तृत्वशून्यः-यदाहमात्मा कर्ता, कर्मनोकर्मपरिणामरूपकम-
णामिति विकल्पेन-शून्यः-रहितः, किं कुर्वन् ? तमः-अज्ञानं, ज्ञानदृष्टिनिवारकत्वात्, भिंदन-छिंदन,
निवारयन्निति यावत्, केन इति-पूर्वार्धोक्तयुक्तया, उद्दामेत्यादिः-उद्दामः-उत्कृष्टः, स चासौ विवेकश्व, चेत-
नाचेतनभिन्नत्वकरणलक्षणः, तथा चोक्त'-'चिदचित्त्वे परतत्त्वे विवेकस्तद्विवेचनमिति' स एव घस्मर
जगदज्ञानग्रसकं, महः-तेजः, अथवा विवेकेनोपलक्षित घस्मरमहः-जगदतः कारकं ज्ञानं तस्य भारस्तेन,
इनि किं ? तदात्मनि-तावेव-स्वभावस्वभाविभावावेव आत्मा-स्वरूपं यस्य स तदात्मा तस्मिन्, भवेत-
स्यात्, का ? व्याप्यव्यापकता-व्याप्यतेऽनेनेति व्याप्य कार्य, व्याप्नोति स्वकार्यमिति व्यापकः, धूमधूम-
ध्वजयोः, घटमृत्तिकयोर्वा व्याप्यव्यापकभावसद्भावात्, पुद्गलद्रव्येण कर्ता-स्वतंत्रव्यापकेन कर्मत्वेन क्रिय-
माणं कर्म व्याप्यं तयोस्तद्भावत्वव्यवस्थानात् कुभमृदारिव, अपि पुनः, अतदात्मनि-अतत्स्वरूपे नैष
व्याप्यव्यापकता कुभकारकुभयो रिव, अन्यथा पर्वतधूमध्वजयोरपि तत्प्रसंगात्, स्वभावस्वभाविनोः
कार्यकारणयोश्च शिशपावृक्षत्वयोधू मध्वजयोश्च यथा व्याव्यव्यापकता न चान्यत्र, तथा ज्ञानात्मनोःपुद्गलक-
मणोरेव व्याप्यव्यापकता न च पुद्गलपरिणामात्मनोः कुभतत्कारकयोरिवास्ति, व्याप्येत्यादिः-व्याप्यं च
व्यापकं च व्याप्यव्यापके तयोर्भावस्तस्य संभवस्तं, ऋते विना, 'ऋते योगे द्वितीयापि भवति पचमीचर्तेः'
द्वितीया चशब्दात् इति शाकटायनात, वर्तृकर्मस्थिति.-कर्मात्मनोः क वर्मावस्थान कापि-न कापि भव.
तीति ॥ ४॥ श्रथानयोाप्यव्यापकत्व पुना रुणद्धि-
अर्थ-व्याप्य व्यापकपणा है सो तदात्मा कहिये तत्स्वरूपही होय ताकै होय, अतस्वरूप
विषे नहीं होय है । वहुरि व्याप्यव्यापकभावका सम्भवविना कर्ताकर्मकी स्थिति कौनसी?
कछुभी नाहीं, ऐसा उदार विवेकरूप अर घस्मर कहिये समस्तकू ग्रासीभूत करनेका जोको
स्वभाव ऐसा जो ज्ञानस्वरूप तेज प्रकाश, ताका भारकरि अज्ञानरूप अंधकारकू भेदता संता
यह आत्मा ज्ञानी होय, तिस काल कर्तापणाकरि रहित भया सोभे है ।। भावार्थ-जो सव
अवस्थामै व्यापै सो तो व्यापक, अर जे अवस्थाके विशेष ते व्याप्य । एसे होते द्रव्य तौ
व्यापक हैं, अर पर्याय व्याप्य हैं, सो द्रव्य पर्याय अभेदरूपही हैं। जो द्रव्यका आत्मा सोही
पर्यायका आत्मा, सो ऐसा व्याप्यव्यापकभाव तत्स्वरूपवि ही होय,अतत्स्वरूपवि. नाही होय
तहां ऐसा सिद्ध होय है जो व्याप्यव्यापकभावविना कर्ताकर्मभाव न होय ऐसे जो जाने सो
पुद्गलकै अर आत्माकै कर्ताकमभाव नाहीं जान, तव ज्ञानी होय, कर्ताकर्मभावकरि रहित
होय, ज्ञाता, द्रष्टा, जगतका साक्षीभूत होय है ॥४॥

द्वितीय अङ्क ४७ , ज्ञानी जाननपीमां स्वपरपरिणति पुद्गलश्चाप्यजानन व्याप्तृव्याप्यत्वमंतः कलयतुमसहौ नित्यमत्यंतभेदात् । अज्ञानात्कर्तृकर्मभ्रममतिरनयोर्भाति तावन्न यावत् विज्ञानार्चिश्चकास्ति क्रकचवददयं भेदमुत्पाद्य सद्यः ॥५॥ सं० टी०-ज्ञानी-आत्मा,च-पुन -पुद्गल -परमाण्वादिपुद्गलद्रव्य व्याप्यव्यापकत्व प्राप्य विकार्य निर्वृत्य च व्याप्यलक्षणा' तत्र-प्राप्य-कर्मपर्याय प्राप्तु योग्य, यथा स्वभाविनि वहावुष्णत्व, पूर्वावस्थापरित्यागेन चावस्थातरप्राप्ति. तद्विकार्य-यथा मृत्पिडस्य घटः, पर्यायस्वरूपेण निवर्तितु-निष्पादितु योग्य निर्वयं, मृद. स्थासोशकुशूलघटादिवत्, व्यापकत्व-उप्णावे वह्निव, घटे मृत्पिडा स्थासादौ मृत्त्व,पुद्गलकर्म- परिणामयोः, श्रात्माजानपरिणामयोप्प्यव्यापकत्व, नत्वात्मकर्मणोः, अत्यत विलक्षणत्वात्-अंत. अभ्ग- तरे वहिस्तयोाप्यव्यापकत्वे दृश्यमानेऽपि क्लायतु-स्वीकत, असहौ-असमर्थों, अत्यतविलक्षणत्वमु. द्घाटयति तयोः, किंभूतः सन्नात्मा ? जानन्नपि-परिदिन्नपि, अपिशब्दात् लब्ध्यपर्याप्तादौ साकल्येना- जानन्, कां ? इमा-प्रत्यक्षा, स्वपरपरिणति-स्वपरयो-आत्मपुद्गलयो परिणति. परिणाम'-पर्यायः, ज्ञानकर्मलक्षणस्ता, पुन. पुद्गलस्ता, अजानन् अपरिच्छिदन् अज्ञानस्वभावत्वात्, असहौ, कुतः १ नित्य-सदैव, अत्यंतभेदात्-चेतनाचेतनस्वभावेनात्यतं विलक्षणत्वात्, यावत् विज्ञानाचिं.-ज्ञानज्योति , न चकास्ति-न द्योतते, किं कृत्वा ? सद्यः-तत्काल, उत्पाद्य-निष्पाद्य, क ? भेद,आत्मकर्मणोभिन्नत्वं, कथं ? अदय-ध्याना- दिना निष्ठुरत्व यथा भवति तथा, क इव 'क्रकचवत-यथा क्रकच'-करपत्र काष्ठयोर्भेदमुत्पादयति, ताव- काल, भानि-शोभते, का ? कर्रेत्यादि.-कर्मणोभ्रंमस्तेनोपलक्षिता मति -बुद्धिः, कयो. १ अनयो- जीवपुद्गलयोः, कुत: १ अज्ञानात्-ज्ञानावरणादिकर्माच्छादितचैतन्यात ॥ ५ ॥ श्रथ वकर्मादित्रय पृथगु- पदिशति पद्यचतुष्टयेन- अर्थ-ज्ञानी है सो तो अपनी अर परकी दोऊकी परिणति जानता संता प्रवर्ते है। बहुरि पुद्गल है सो अपनी अर परकी दोऊ ही की परिणतिकू नाहीं जानता संता प्रवर्ते है तौऊ ते दोऊ परस्पर अंतरंग व्याप्यव्यापकभावकू' प्राप्त होने असमर्थ हैं जातै दोऊ भिन्न द्रव्य हैं । सो मदाकाल तिनिकै अत्यंत भेद है । सो ऐसे होते, इनिकै कर्ताकर्मभाव मानना भ्रमवुद्धि है सो यहु जेते इनि दोऊनिकै करोतकी ज्यौं निर्दय होय तत्काल भेदकू उपजाय भेदज्ञान है ज्वाला प्रकाश जाकै ऐसा ज्ञानप्रकाश न होय, तेतही है । भावार्थ-भेदज्ञान भये पीछे पुद्गलकै अर जीवकै कर्तृ कर्मभाषकी बुद्धि न रहै । जाते जेतें भेदज्ञान नाही होय तेतेही अज्ञानतै कत कमभावकी बुद्धि है। यः परिणमति स कती यः परिणामो भवेत्तु तत्कर्म । या परिणतिः क्रिया सा त्रयमपि भिन्नं न वस्तुतया ॥६॥ स० टी०-य:-आत्मा, पुद्गलो वा परिणमति-स्वपर्यायान् प्रति परिणाम प्राप्नोति यथोत्तरगनिस्तर- गावस्थयो. समीरसंचरणसिंचरणयोरपि समीरसमुद्रयो, कर्तृकर्मत्वाभावात् पारावार एवादिमध्यातेपूत्तर- . .

परमाच्यात्मतरङ्गिनी
गनिस्तरंगास्ये व्याप्य उत्तरंगनिम्तरंगत्वात्मान कुर्वन का नया संसारनित्संदारयोः पुलकर्मविपाकम-
भवानभनिमित्तचोरपि कर्मलाभागत् जीव एवादिमध्यानेछु ते अवस्थे च्याप्य, उभयस्वरूपमात्मानं .
कुन् कता, एव पुदतऽपि चान्यं, तु-गुन., ः परिणामी भवन ननर्मा, चया दम्यैवोचरंगनिस्तरंगत्वारमा-
नमनुमन्तः न एक परिणामः नी तया नन्य सारं निमारं लनुभवतः म एव परिणाम: की, या
परिगतिः स्त्परिणाम परिगमनं मा क्रिया वस्तुपया बस्तुपेण ऐश्चात् त्रयमपि कर्तृकर्मपरिणतिरूपं भिन्न
अन्यत् न भवत् क्रिया हिताखिलापि परिणामलक्षणत्या न नाम परिणामतोऽस्ति भिन्ना, परिणामोऽपि
परिणामपरिणामिनारमिन्नवन्तु वात्परिणामिनो न भिन्ना, परिणान्यपि क्रियापरिणामयोरभिन्नत्वात्परि-
णामतोऽभिन्न. ॥६॥
अथ-जो परिणम है सो कर्ता हैं, बहार जो परिणम्या नाका परिणाम है सो कर्म है,
बहुरि जो परिणनि है सो क्रिया है ए तीनही प्रस्तुपणाकरि भिन्न नाही है। भावार्थ-द्रव्य-
दृष्टिकरि परिणाम अर परिणामीका अभेद है अर पर्यायदृष्टिकरि भेद है। नहां भेददृष्टिकरि ना
कर्ता, कर्म, क्रिया तीन कहिये है, अर इहां अभेद दृष्टि परमार्थ कहा है जो को कम क्रिया
तीनही एक द्रव्यको अवस्था में प्रदेशभेदरूप न्यारे बस्तु नाहीं है ॥६॥ फेरि कहे हैं--
एक: परिणमति सदा परिणामा जायते सदैकस्य ।
एकस्य परिणतिः स्यादनेकमप्येकमेव यत्तः ॥ ७॥
गंटी-अनकत्वेऽपि एकलामिति फुटयति-एकः आत्मा, सदा-निय परिणमनि-परिणामयुक्तो
भति, सदा-निरंतरं, एकस्य अत्मनः, परिणामः-शुभाशुमलक्षणः, जायते-उत्पद्यते, एकस्य-आत्मनः
परिणतिः-परिणमनलगा क्रिया च्यात, यथा क्रिल कुलालः क्लश मवानुकूलमात्मत्र्यापारपरिणाममा-
स्मनोऽव्यनिरिक्तमात्मनोऽध्वनिरिनचा परिणनिमाया प्रिया क्रियमाणं कुशंग प्रतिभाति, न पुनः
घटादिन्दप नृत्तिया क्रियमाण प्रति अभिन्नतामनुभवति त्य-आत्मापि पुलपरिणामानुकूलमनानादा-
त्मपरिणाममात्मनोऽव्यनिरिचमात्मनोऽव्यतिरिक्तया परिणतिमात्रया क्रियया क्रियमाणं कुर्गणः प्रतिमाति,
न पुनः पुद्गलक्रियया नियमाणं कर्म प्रत्यभिन्नतामनुभवति यत्त:-अभिन्नत्वं तेषां त्रयाणां, अनेकमपि-
कर्मनियाल्पणानेकमपि एकमेव नुतन्लेषामभिन्नत्वेनैश्यं ॥ ७ ॥
अर्थ-वस्तु एकही सदा परिणमै है, बहुरि एकहीकै सदा परिणाम उपज है, अवस्था
अन्य अवस्था होय है। बहुरि एकीक परिणनिक्रिया, होय है । जाने अनेकरूप भया दौऊ
एकही वस्तु है । भेट नाहीं है। भावार्थ-एक बस्तुकै अनेकपर्याय होय हैं, तिनिक परिणाम भी
कहिये अवस्था भी कहिये । ने संत्रा, संख्या, लक्षण, प्रयोजनादिकरि न्यारं न्यारे प्रतिमासरूप
है। नौऊ एक वस्तुही है, न्यारे नाहीं है, ऐमाही भेद अभेदस्वरूप वस्तुका स्वभाव है ||७||
फेरि कह हैं-
नाभी परिणमतः खलु परिणामा नाभयाः प्रजायत ।
उभयान परिणतिः स्याद्यदनेकमनेकमेव सदा ॥ ८ ॥

द्वितीय भक ४६ , सं० टी०-उभौ-जीवपुद्गलो, खलु इति निश्चितं, परिणमत'-परिणाम गच्छतः न-नहि, एक एव हि परिणमति यथा कुलाल घटनिष्पादनाभिमानपरिणाम प्रति परिणमति न तु घटभवनक्रियाया, तथा जीव' कर्मनिष्पादनाभिमानपरिणाम प्रति परिणमति, न पुद्गलद्रव्यनिष्पादितवर्गक्रिया प्रति, उभयोः जीवपुद्गलयोः परिणामः,-परिणति न जायते-नोत्पद्यते, परस्पर भिन्नम्वभावत्वात, उभयो.-परात्मनो , परिणति -परि- णमनलक्षणा क्रिया न स्यात्-न भवेत, परस्पर स्वस्वभावे भिन्नपरिणतिसद्भावात्, यत-यस्मात कारणात्, अनेक-न एक अनेक जोवपुदली मदा-नित्य, अनेकमेव भिन्नमेव । ८॥ अर्थ-दोय द्रव्य हैं सो एक होय परिणमै नाहीं है बहुरि दोय द्रव्यका एक परिणाम नाहीं होय है बहुरि दाय द्रव्यकी परिणतिक्रिया एक नाही होय है जाते जो अनेक द्रव्य है सो अनेक ही है, पलटिकरि एक नाही होय है। भावार्थ-दोय वस्तु है ते सर्वथा भिन्नही हैं प्रदेशभेदरूपही है, दोऊ एक होय परिणमै नाही, एक परिणाम उपजावै नाही, क्रिया एक होय नाहीं । ऐसा नियम है । जो दोय द्रव्य एक होय परिणमै तो सर्व द्रव्यानका लोप हो जाय । फेरि इसही अर्थकू दृह करै हैं- नैकस्य हि कतारौ द्वौ स्तोव कर्मणी न चैकस्य । नैकस्य च क्रिये द्वे एकमनेकं यता न स्यात् ।। ६ ॥ स० टी०-एकस्य-परिणामस्य चेतनालक्षणस्य कर्मलक्षणस्य वा हीति निश्चित द्वौ-जीवपुद्गली, कर्तारौ-कारकी, न स्त-न भवतः, चेतनाया जीव एव कर्ता, कर्मणः पुद्गल एव कर्ता, चेति भिन्नप्रक्रमे । एकस्य जीवस्य पुद्गलस्य वा द्वे कर्मणी चेतनाकर्मलक्षणे न स्तः, च-पुनः, एकम्य क्तु -जीवस्य पुद्गलस्य वा द्वे किये-परिणती हो, न स्तः, जीवस्य चेतनाक्रिया प्रति परिणतत्वात्, पुद्गलस्य कर्मक्रियां प्रति परि- गतत्वात् : यथा कुलाल स्वपरिणतिक्रिया प्रति परिणतः, मृद्रव्य तु कलशक्रिया प्रति परिणतं, अन्यत् मृगव्यं वस्त्रक्रियां प्रति हेतुर्न स्यात्, यत:-पूर्वोक्तकारणात, एक-अखडं द्रव्या जीवादि अनेक-परपरि- णामक क्रियाभावात् अनेकरूपं, न म्यात-न भवेत्, अथवा-एक-जीवादि, अनेक स्वकर्तृ कर्मक्रियारूपं यतः कुतो न भवेत्, अपि तु भवेदेव ॥ ६ ॥ अथाज्ञानमाहात्म्यवि निरूपयति- -एकद्रव्यका दोय कर्ता न होय, बहुरि एक द्रव्यका दोय कर्म न होय, बहुरि एक द्रव्यकी दोय क्रिया न होय । जात एकद्रव्य है सो अनेक द्रव्य होय नाही || भावार्थ-यह निश्चयनयकरि नियम है सो शुद्धद्रव्यार्थिकनयकरि कह्या जानना 18। अब कहे हैं,जो आत्माकै अनादितै परद्रव्यका कर्ताकर्मपणाका अज्ञान है सो जो यह परमार्थनयका ग्रहणकरि एकवार भी विलय होय तौ फेरि न आवै ।। विशेप-इन चार श्लोकोंमें जो संस्कृत टीकाकारने कुलालका दृष्टांत देकरि आत्माके स्वरूपको समझाया है वह अति उत्तम है टीकाकारकी लेखन शैली सरल है इसलिये कुलाल दृष्टांतका भाव हमने नहिं लिखा ।। || अर्थ- परमाध्यात्मतरङ्गिणी , -- प्रासंसारत एव धावति;परं कुर्वेऽहमित्युच्चकै- दुरिं ननु मोहिनामिह महाहंकाररूपं तमः । तद् भूतार्थपरिग्रहेण विलयं यद्येकवारं व्रजेत् तत् किं ज्ञानघनस्य वंधनमहा भूयो भवेदात्मनः ॥१०॥ सं० टी-ननु इति वितर्के, इह-जगति, इति-अमुना प्रकारेण धावति-अत्यर्थ प्रसर्पति व्याप्नोतीति यावत् । किं ? महाहंकाररूप-महान-सक्लपाण्यतिश यी स चासौ अहंकारश्च मयेदं कृतमित्यादिरूपो गर्वः, स एव रूपं स्वरूपं यस्य तत, तमः अज्ञान, केपा ? मोहिना-मोहग्राहप्रस्नानां देहिना, किभूतं ? उच्चकैः-अत्यर्थ, दुर्वार-वारयितुमशक्य, वियत्पर्यतं धाति ? प्रासंसारत एच-यावत्पर्यंत पंचपरिव- तनरूपसंसारस्तावत्पर्यतं प्रसर्पत्येव । इति किं ? कुर्वे-निप्पादयामि करिष्ये वा ' वर्तमानसामप्ये वर्तमान- वदिति ' सूत्राद्भविष्यदर्थे वर्तमानात्, अहं-कर्ड भूतः, किं ? परं-पन्द्रव्यं गृहपुत्रविवाहशरीरकर्मादिरूपं । यदि-यदा, ब्रजेत्-गच्छेत्, विलय-विनाश तत् तमः वत', एकबार-सकृद्वारं, केन । भूतेत्यादि-शुद्धद्र- व्याधिनियेन, तत्तर्हि, कि ? तावत् किं स्थात्, अपि तु न स्यादित्यर्थः, भूयः पुन., अहो, कि ? बंधन- कर्माश्लेषणं, कस्य पात्मन-चिद्रूपस्य विभूतस्य ? ज्ञानघनत्य-बोधनिरतस्य ॥ १०॥ अथात्मपरभावं वामन्यते- अर्थ-इस जगतवि मोही अज्ञानी जीवनिका यह मैं परद्रव्यक्करौ हों ऐसा परद्रच्यका कर्तृत्वका अहंकाररूप अज्ञानांधकार अनादि संसारत लगाय चल्या आवे है । कैसा है ? अति- शयकरि दुर्वार है निवारथा न जाय है । सो आचार्य कहै हैं-जो, शुद्धद्रव्यार्थिक अभेदनय परमार्थ है सत्यार्थ है,नाका ग्रहणकरिके जो एकवार भी नाश हो जाय तो यह जीव ज्ञानधन है सो यथार्थज्ञान भये पीछे कहा ज्ञान जाता रहै ? नाहीं जाय, अर ज्ञान न जाय, तब कहां फेरि अज्ञानते बंध होय : कदाचित् नाहीं होय || भावार्थ-इहां तात्पर्य ऐसा, जो अज्ञान तो अनादिकाही है, परन्तु दर्शनमोहका नाशकरि एकवार यथार्थज्ञान होयकारि क्षायिक सम्यक्त्व उपजे तो फेरि मिथ्यात्व नाहीं आवै तब मिथ्यात्वका बंधन होय अर मिथ्यात्व गये पीछे मंसारका बंधन काहेकू रहै ? मोक्ष ही पावै ऐमा जानना || फेरि विशेषकारि कहै हैं- आत्मभावान् करोत्यात्मा परभावान मदा परः । अात्मैव ह्यात्मनो भावाः परस्य पर एव ते ॥११॥ सं० टी०-श्रान्मा चेतनः, करोति-विदधाति वेदयते वा, कान ? आत्मभावान् मतिश्रुतावधिप्रमुखवि. भावपर्यायान. क्वलनानदर्शनसुखबीर्यल्पशुद्धपर्यायाश्च, परः पुद्गलपदार्थः. परभावान् झानादन्यान् स्वभावविभावपर्यायान् करोतीति संवधः । कुतः ? हीति यतः, आत्मनो भावा पर्यायाः आत्मैव द्रव्यादेशात् पर्यायाणामात्मस्वभावत्वात, अत एव न ते परपर्णयाः । परस्य-पुलस्य ते भावः पर एव पुद्गल एव ततोड़- व्यतिरिक्तत्वात् , इति ये स्वभावास्ते तदीयाः.न परकीया इति विभागः स्फुटः ॥ ११ ॥ अथ ज्ञानरागयोयु: गपन्नुष्ठिानचति- .

द्वितीय अङ्क ? ? १ १ अर्थ-आत्मा है सो तो अपने भावनिकू करै है बहुरि परद्रव्य है सो परके भावनिकू करें है। जातै अपने भाव हैं ते तो आपही हैं, परभाव ते परही हैं यह नियम है ।। अज्ञानतस्तु सतृणाभ्यवहारकारी ज्ञानं स्वयं किल भवन्नपि रज्यते यः । पीत्वा दधीतुमधुराम्लरसातिगृद्धया गां दाग्धि दुग्धमिव नूनमसौ रसाला १२ सं० टी०-तु-पुन. य.-आजन्माभ्यस्तसुतत्त्वशास्त्र. पुमान, रज्यते-वाह्यलाभादिकारणकलापाद्राग गच्छति, कुतः ? अज्ञानत.-भेदविज्ञानविलक्षणबोधाद्धेतो., किं कुर्वन् ? स्वयं स्वतः, ज्ञान-शुद्धात्मज्ञान, भवन्नपि--चितयन्नपि, अनुभवन्नपि वा, तान् भवन् वा, किल इत्यागमोत्तौ, स पुमान् , सेत्यादि-तृणेन सह वर्तमानः सतृण , अभ्यवहार,-उत्तमाहारः पायसशर्कराज्यादिरूप., सतृणश्चासावभ्यवहारश्च त करो- तात्येव शोल. स तथोक्त. तृणसहितोत्तमाहारभोजीत्यर्थः, यथा तृणादिकमनिष्ट पायसाहार इष्ट , तयोरे- कत्रास्वादन कस्य चित्पु सः शुभाशुभ, तथा रागस्य तृगस्थानीयत्वात् अशुभत्व, ज्ञानानुभवस्य शुभाहार- स्थानीयत्वात् शुभत्वं । नून-निश्चितं, असौ ज्ञानगगयोरेकत्वानुभावुक. पुमान् गा धेनु दुग्ध-क्षीर दोग्धीव प्ररूपयात यथा । कया ? दधीत्यादि दधि-दुग्धविकारमाम्लरसापेत, इतुः मधुररसोपेतः इक्षुदडः, द्वद्वः तयोः मधुराम्लरसस्तयोरतिगृद्धि.-अत्याशक्ति., तया, किंकृत्वा ' पीत्वा-पान कृत्वा, का? रसाला रसनाविषयासक्तजना वस्त्रगालितदधिशर्करा मृष्ट्वा कमपि रसातर प्राप्य रसालामिति भणति शिखरिणीति देशभाषाया, यथा कश्चित् रसाज्ञामास्वाद्य तद्भदमजानन् गोर्दोहनक्रियाया मधुराम्लरसातिगृद्ध्या प्रवर्तते तथा परात्मभेदमजानन् क्रोधादौ कर्तृ त्वेन प्रवर्तत इति तात्पर्य ॥ १२ ।। अथानानविलास विजुभते- अर्थ-जो पुरुष आप निश्चयतै ज्ञानस्वरूप होता संता भी अज्ञानतै तृणसहित अन्नादिक सुन्दर आहारकू मिल्या हुवा खानेवाला हस्ती आदि तिर्यचकीज्यौं होय प्रसन्न होय है, सो कहा करै है, ताका दृष्टांत कहे हैं जैसे कोई रसाला कहिये शिखरिणीकू पीयकरि तिसके दही- मीठेका मिल्या हुवा खाटा मीठा रस, तिसका अति चाहिकरि तिसका रसभेदकून जानिकरि, द्धके अर्थि गऊकूदोहै । भावार्थ-कोई पुरुष शिखरिणी तीयकरि ताके स्वादकी अतिचाहित रसका ज्ञानविना ऐसा जान्या-जो, यह गऊका दूधमे स्वाद है । सो गऊळू अतिलुब्ध होयकरि दोहै तैसे अज्ञानी पुरुप आपापरका भेद न जानि विषयनिमैं स्वाद जानि पुद्गलकर्मकू' अतिलुब्ध होय ग्रहण करे है, अपना ज्ञानका अर पुद्गलकर्मका स्वाद जानि भिन्न नाही अनुभव है। तिर्यचकीज्यौं अन्नकू घासमे मिल्या एक स्वाद लेहै ॥ १२॥फेरि कहे हैं, जो, ऐसे अज्ञानते पुद्गलकर्म का कर्ता होय है। अज्ञानान्मृगतृष्णिको जलधिया धावंति पातु मृगा अज्ञानात्तमसि द्रवंति भुजगाध्यासेन रज्जौ जनाः । अज्ञानाच विकल्प चक्रकरणादातांचरंगाधिवत् शुद्धज्ञानमया अपि स्वयममी कीभयंत्याकुलाः ॥१३॥ .

- . १ ? ? जना.. , ॥ ५२ परमाध्यात्मतरंगिणी स० टी०-अमी एते लोकाः, स्वय-स्वत एव, कीभवति-मया कर्म कृतमिति कर्मणा ,कर्तारो भवरि, कीहक्षा अपि ? शुद्धज्ञानमया अपि-निर्मलभेदबोधप्राचुर्याः, अमंदनानिनः, कथं कर्मकर्तारो न स्युरित्यपि- शब्दार्थः, आकुलाः संत', कुतः १ अनानात भेदनानाभावात् । पुनः ? विवल्पेत्यादिः-विकल्पानां चक्र- समूह , तस्य करणाञ्च कृताञ्च हेतो., अत्रैवार्थांतरन्यासमाह बातोदित्यादि वातेन-वायुना, उत्तरगः-उवार्मि- मय., स चासावब्धिश्च तद्वत् यथोत्तरंगरहितोऽचितिनोत्तरगीयते तथा शुद्धज्ञानोपि अज्ञानाकर्ता भव- तीत्यर्थः । लौकिकनिदर्शनेनाज्ञानस्य माहात्म्यमाह-मृगाः-हरिणा. , धावति-प्रसपंति, किमर्थ १ पातु पानार्थ, का ? मृगतृष्णिकां-मरीचिका, कया ? जलधिया-पानीयाभावेऽपि पानीयवुद्धया, अनानात-ज्ञाना- भावमाश्रित्य, ज्ञानिनश्चेत्तर्हि तत्र कथ धावति ? तथा ऽज्ञानिनो भोगसुखे शरीरादौ च सुखधिया~मम. त्वधिया च वर्तते इति भावार्थः । पुनः-द्रवंति-पलायन कुर्वति, क ' तमसि-तिमिस्र, के ? पुरुषाः, केन १ रज्जीवराटके 'शुल्वो वराटक. स्त्री तु रज्जुः स्त्रीपु वटी गुण.' इत्यमरः । भुजगाध्यासेन भुजगोयमित्यारोपबुद्धया कुतः १ अज्ञानात-अज्ञानमाश्रित्य यथा रज्जी भुजग इति कृत्वा वर्तते तथा स्वे परकीयं परशरीरादी स्वमिति कृत्वा वर्तते अज्ञानिनः ।। १३ ।। श्रथ ज्ञानविलासमाविष्करोति-' अर्थ-ए लोकके जन है ते निश्चयकरि शुद्ध एक ज्ञानमयी हैं, तोऊ आप अज्ञानतें व्याकुल होय परद्रव्यका कर्तारूप होय हैं । जैसैं पवनकरि कल्लोलनिसहित समुद्र होय है, तेसैं विक- ल्पनिके समूह करे हैं यातें कर्ता बने हैं। देखो-अज्ञानहीत मृग हैं, ते भाडलीकू जल जानि पीवनेकू दोर्ड है, बहुरि अज्ञानहीत लोक अन्धकारमें जेवडेवि सर्पका निश्चय करि भयकरि भागै हैं ॥ भावार्थ-अज्ञानतें कहा कहा न होय ? मृग तौ भाडलीकू जल जानि पीवन . दौडि खेदखिन्न होय है। लोक अंधारे) जेवडेकू' सर्प मानि डरिकरि भाग है ॥ ऐसेंही यह आत्मा, जैसे वातकरि समुद्र क्षोभरूप होय तैसें अज्ञानकरि अनेकविकल्पनितै क्षोभरूप होय है । सो परमार्थते' शुद्धज्ञानधन है, तोऊ अज्ञानते' कर्ता होय है ।।१३।। फेरि कहै है ज्ञानते' कर्ता न होय है-- ज्ञानाद्विवेचकतया तु परात्मनोर्यों जानाति हंस इव वाःपयसोविशेषं । चैतन्यधातुमचलं स सदाधिरूढी जानीत एव हि करोति न किंचनापि सं० टी-तु-पुनः, अज्ञानविज भणविकचानंतरं, जानाति-वेत्ति, कं ? विशंप-भेद, कयोः ? परा- मनो:-पुद्गल कर्मजीवयो. ज्ञानात्-भेदबोधमाश्रित्य, कया ? विवेचकतया-ज्ञानात्मनो दकस्वरूपतया, इम- मर्थ निर्दर्शयति-हस इव-यथा मरालः वापर सोः-नीरक्षीरयो', भेदं वेत्ति तथा ज्ञानी पुद्गलजीवयोः, स पुमान् जानीत एव वेत्त्येव, ? चैतन्यधातु-चेतनास्वरुपधातु आत्मानं वेत्यर्थ , किंभूत ? अचल-स्वस्व- भावान्न चलतीत्यचलं, सदा-नित्य, अधिरूढः सन्-गुणसमूहमाश्रितः सन् हीति निश्चित किंचनापि-किमपि, न करोनि-क कर्मक्रि [ न विदधाति ॥ १४ ॥ अथ ब्रानादेव भेदमुज्जृम्भते- अर्थ-जो पुरुप ज्ञानतै बहुरि विवेकी भेदज्ञानीपणात परका अर आत्माका विशेष भेद करि जाने है "जैसे हम, दूधजल मिले हुये हैं, तोऊ निनिका भेदकार ग्रहण कर है तैसें" सो पुरुष चैतन्यधातु अचलकू सदा आश्रय करता संता जान ही है-ज्ञानाही है, किछूभी नाही ? . ? -- ।

द्वितीय अ , १ ? १ कर है। भावार्थ-आपापरका भेद जानै सो ज्ञाताही है, कर्ता नहीं है | आर्ग' कहै है, जो, जानिये है सो ज्ञानहीत जानिय हैं- ज्ञानादेव ज्वलनपयसोरोष्ण्यशत्यव्यवस्था ज्ञानादेवाल्लसति लवणस्वादभेदव्युदासः । ज्ञानादेव स्वरसविकप्तन्नित्यचैतन्यधातोः क्रोधादेश्च प्रभवति भिदा भिंदती कर्तृ भावं ॥ १५ ॥ सटी-प्रभवति-जायते, भिदा-मंद , अस्य म्वेत्यादि स्वस्य आत्मन , रस -अनुभव., तेन विक- सन्-विकासं गच्छन् स चासौ नित्य शाश्वन , चैतन्यधातुश्च-चेतनालक्षणो धातुस्तस्य, क्रोधादेश्च कोप- मान-माया-लाभ-मोह-राग-द्वप-कर्म-नोकर्म-मनो-वचन-काय-श्रोत्र-चक्षुर्घाण-रसन-स्पर्शनादेश्च परस्पर, कुतः १ ज्ञानादव-शुद्धात्मपरिज्ञानात्, नान्यत एव । किंभूता भिदती-विदारयती, क ? भाग- आत्मनः कर्मणां कर्तृत्वस्त्रमानं, लौकिकज्ञानादेव सर्वमिति प्रकाशयति-श्री एयशत्यव्यवस्था-शीतोष्ण- योर्व्यवस्थिति' भवति कयो ? चलनपयसो-वह्निनप्तनीरयो , कुत. १ ज्ञानादेव-बोधादेव, यथा कश्चिल्ली- किकन्यवहारज्ञः, एकत्रीभूतयो पावकपयसोभेंट निश्चिनोति, अभेदज्ञस्तयोरभेदमेव तथा ज्ञानी एकत्रीभू. तयोः परात्मनोभेंद निश्चिनोति नाज्ञानी । तथा उल्लसति-उल्लास गच्छति, क. १ लवणेत्यादिः लवणस्वा- दस्य-क्षारलवणस्य कटु काम्लन्यजनस्वादात भेद. विशेष , तस्य व्युदास.-ज्ञान, कुत. १ ज्ञानादेव यथा कश्चिद्भोजनभेदज्ञो व्यजनलवणयोर्भेद व्यक्त वंचि, अभेदन इद क्षारस्वाद व्यजनमेव तथा नानी क्रोधा- दिज्ञानयोरेकत्रीभूतयोः पृथक् स्वभान परिच्छिनत्ति, अज्ञानी तु क्रोध्ययमात्मैवेति वेत्ति इति तात्पर्य । प्रतिवस्तूपमालकारोशं यदाह वाग्भट्ट अनुपातविवादाना वस्तुनः प्रतिवस्तुना । यत्र प्रतीयते साम्य प्रतिवस्तूपमा तु मा । ॥ १५॥ अथात्मन. स्वपरभावयो. कर्तृत्व निवेद्यते- अर्थ-अग्निकी अर जलकी उष्णपणाकी अर शीतपणाकी व्यवस्था है सो ज्ञानही जानिये है। बहुरि लवणका अर व्यंजनका स्वादका भेद है सो ज्ञानहीतै जानिये है । बहुरि अपने रसकरि विकासरूप होता जो नित्य चैतन्यधातु, ताका अर क्रोधादिकभावका भेद है सोभी ज्ञानहीते जानिये है । कैसा है यह भेद ? कर्तापणाका भाव है ताकू भेदरूप करता संता प्रगट होय है । फेरि कहे है, जो, आत्मा कर्ता होय है, तौऊ अपनही भावका है- अज्ञानं ज्ञानमप्येवं कुर्वन्नात्मानमंजसा। स्योकर्तात्मात्मभावस्य परभावस्थ न कचित् ॥ १६ ॥ सं० टी०-आत्मा-चिद्रूप., आत्मभावस्य-स्वस्वरूपस्य, कर्ता स्यात्-भवेत् । किकुर्वन् १ अजसा- परमार्थतः आत्मान-स्वस्वरूप, बान-बोध, अपि-पुन , एव-निश्चयेन, अज्ञान बोधविपर्यय, कुर्वन् निष्पा- दयन् यस्किल क्रोधोहमित्यादिवत्, वा मोहोहमित्यादिवशे परद्रव्याण्यात्मीकरोति, आत्मानमपि परद्रव्या - ५४ परमाध्यात्मतरङ्गिणी करोत्येवमात्मा तदायमज्ञानकर्ता, कचित्-कदाचित्-परभावस्य-पुद्गलपर्यायस्य न कर्ता, स्थात् ॥ १६ ॥ अथात्मनो व्यवहारिणा कर्तृत्वमति व्युपदिशति- अर्थ-ऐसे अज्ञानरूपभी तथा ज्ञानरूपभी आत्माहीकू करता संता आत्मा प्रगटपणे अपनेही भावका कर्ता है परभावका कर्ता तो कहही नाहीं है । अात्मा ज्ञानं स्वयं ज्ञानं ज्ञानादन्यत्करोति किं । परभावस्य कर्तात्मा मोहाय व्यवहारिणां ॥१७॥ स० टी०-आत्मा-चिद्रूपः, ज्ञान-बोध, करोति स्वयं-ज्ञानमेवात्मा, आत्मज्ञानयोध्यादेशादेकत्वात्, ज्ञानात्-बोधं विहाय अन्यत्-घटपटमकुटलकुटशकटादि किं करोति ? अपि तु न विधात्येव । नन्वात्मनोऽ कन वे गृहमिदमात्मना कृतमित्यादि व्यवहारः कथमिति चेत् ? न, आत्मनः परभावस्थाकर्तृत्वात् । आत्मा- जीवः, परमावस्य-परपर्यायस्य घटादेः कर्ता, व्यवहारिणां-व्यावहारिकपुरुषारणां, अय-आत्मा कर्तेत्यादि- लक्षणः, मोहः-विभ्रमः । ये खलु पुद्गलद्रव्याणां परिणामाः-गोरसव्याप्तदधिदुग्धमधुराम्लबत् पुद्गलद्रव्य- व्याप्तत्वेन भगतो ज्ञानावरणादीनि भवति तानि तटस्थगोरसाध्यक्ष इव न नाम करोति ज्ञानी ॥७॥ अथ साक्षेप जीवस्य पुद्गलकतत्वं प्रतिबध्नाति- अर्थ-आत्मा ज्ञानस्वरूप है, सो आप ज्ञानही है, ज्ञानते अन्य कौनकू करै ? काहूकून, करें। बहुरि परभावका कर्ता आत्मा है यह मानना तथा कहना है सो व्यवहारी जीवनिका, मोह है-अज्ञान है ।। जीवः करोति यदि पुद्गलकम नैव कस्तहि तत्कुरुत इत्यभिशंकयैव एतर्हि तीव्ररयमोहनिवर्हणाय संकीर्त्यते शृणुत पुद्गलकर्मकर्तृ ॥१८॥ सं० टी०-यदि-ननु, जैनं प्रत्याक्षिपति कश्चित्-जीवः-आत्मा, पुद्गलकर्म-पुद्गलमयज्ञानावरणादि कर्म, नैव करोति-न निर्मापयति तर्हि तत् पुद्गलकर्म कः कर्ता कुरुते १ पुद्गलानां स्वयमचेतनत्वात्क त्वानु पपत्तेः, अतएव श्रात्मैव कर्ता लक्ष्यते दक्षः, इति अमुना प्रकारेण अभिशफया पूर्वपक्षाशंकया, एव-निश्चि- येन एतहि-इदानी, संकीत्यते-निरूप्यते । किमर्थ ? तीव्र त्यादि-तीत्ररयः-तीव्रतीव्रतरानुभाग: स चासो मोइश्च विभ्रमः, तस्य निवर्ह-विनाशन, तस्मै शृणुत-पाकर्णयत, पुद्ग नकर्म-पुदलात्मकं कर्म,, द्रव्यभाव. रूपं कर्तृ-पुद्गलपर्यायाणां कर्तृ-निष्पादक, श्रात्मा तु नैमित्तिको हेतुरस्तु आत्मना कृतमिति तु व्यवहारः राज्ञा देशे गुणदोषौ कृतावित्यादिवत योधैयुद्ध कृते राज्ञा कृतमित्यादिवद्वा ॥ १८ ॥ अथ पुद्गलपरिणा- मित्त पूर्वपक्षक्षेपेण साक्षेपमाक्षिपति- अर्थ-जो जीव पुद्गलकर्मकू नाहीं करें है, तो तिस पुद्गलकर्मकू कौन कर है ? ऐसी आशंका करिक अर इस कर्ताकर्मका तीनवेगरूप मोह अज्ञानके दूरि करनेकू, पुद्गलकर्मका जो कर्ता है सो कहीये है । सो हे ज्ञानके इच्छुक पुरुप हौ ! तुम सुणु ॥ १८ ॥ स्थितेत्यविना खलु पुद्गलस्य स्वभावभूता परिणामशक्तिः । तस्यां स्थितायां स करोति भावं यमात्मनस्तस्य स एव कर्ता ॥१६॥ १ .

द्वितीय अ - सं० टी०-खलु-इति वितर्के इति-पूर्वपक्षप्रकारेण, ननु पुद्गलद्रव्या स्वयमबद्ध-सज्जीवे कर्मभावेन न परिणमते तस्य सर्वथैवस्वभावत्वात् इति चेन्न, अपरिणामिनो नित्यायार्थक्रियावारिस्वविधान् । अर्थ क्रिया च क्रमयोगपद्याभ्यां व्याप्ता ते च नित्यानिवर्तमाने स्वव्याप्यामर्थवि यामादायापि निवर्तते, सापि स्वच्याप्यं सत्त्वमादाय निवर्तते जीवस्याबधे च ससाराभावात्, इति युक्त्या सांख्यादिना कूटस्थनित्यवादिना विघ्न कतुं न शक्यते वस्तुस्वभावस्य निपेधुमशक्यत्वात् ज्वलनीष्ण्यवत् । नन्वात्मा पुद्गलद्रव्य कर्मत्वेन परिण- मयति ततो न ससाराभावः, इति चेत् तात्मा स्वयमपरिणममान परिणममान वा तत्परिणमयेत् ? न तावत्प्राक्तनः पक्षः कक्षीकर्त-य. प्रेक्षादक्षः, अपरिणममानस्य तस्य परेण परिणमयितुमशक्यत्वात् , नहि स्वतोऽसती शक्ति वर्तु मन्येन पार्यते । अथोत्तर पक्ष', तदा तस्य स्वयमेव परिणमनात् परापेक्षणायोगाच्च । तस्यां परिणामशक्ती, स्थिताया-व्यवस्थिताया, सोय-पुद्गल., आत्मनः-स्वरूपस्य, भार्व-परिणाम, करोति- निष्पादयति, तस्य-भावस्य, स एव पुद्गल एव कर्ता-कारकः, नान्य ॥ १६ ॥ अथ सारयवादिन प्रति जीवस्य नित्यत्व निरस्यति- अर्थ-ऐसे उक्तप्रकारकरि पुद्गलद्रव्यकै परिणामशक्ति स्वभावभृत निर्विघ्नसिद्ध भई ठहरी ता' ठहरते संते सो पुद्गलद्रव्य जिस भावकू आपकै करै है, ताका सो पुद्गलद्रव्य ही कर्ता है। भावार्थ-सर्वद्रव्यनिकै परिणामस्वभावपणा सिद्ध है तातें जाका भावका जोही कर्ता है । सो पुद्गलद्रव्य भी जिस भाव आपके करें है, ताका सोही कर्ता है ।। स्थितेति जीवस्य निरंतराया स्वभावभूता परिणामशक्तिः । तस्यां स्थितायां स करीति भावं यं स्वस्य तस्यैव भवेत्स कती २० मं० टी-नवपरिणामी जीवस्तदा कूटस्थत्वादकारक. स्यात् यदि सोस्त्वकारको विक्रियश्चेति चेन्न, प्रमाणादीनामक कत्वात्तत्फलाभावप्रसंगात्, न ह्यकारकः कश्चित् प्रमाता, प्रमातृत्वाभावादात्मनोऽप्यभावः, गुणाभावे हि गुणिनीप्यभावात् । ननु स्वयमवद्व सन् क्रोधादिभावेन न परिणमते, इति कश्चित्सांख्यः, सोऽपि न विपश्चिहक्ष', तपरिणामित्वे ससाराभावप्रसगात् । यदि कोधादिसंयोगभावन परिणमत्यसौ जपाजातरक्तसयुक्तम्फटिकादति न संमागभावः, इति चेतर्हि वोधादि. स्वयमपरिणममान परिणममान वा परिणामयेत् ? न तावदाद्य पक्षो लक्ष्यो विपक्षः, स्वयमपरिणममानस्य प. कारणांतरसहस्रनावगा- हवत्परिणमयितुमशक्यत्वात् । अथोत्तरस्तर्हि मिद्ध न. समीहित, इत्युक्तयुक्या जीवस्य-आत्मनः, या परि- जामशक्तिः-ज्ञानावरणादिपरिणमनसामयं मा स्थिता, किंभूता १ निरतरा-विघ्नवर्जिता, पुन कीहक्षा ? स्वभावभूता पारमार्थिकी परानपेक्षत्वात् । तथा चोक्तमण्टसहस्र या " कारणस्य कार्यात्मनो भवत. क्षेपायो- गात् स्वभावांतरानपेक्षणात्" इति, तस्यां-स्वभावभूताया परिणामशक्नी स्थिताया सत्या, स.-जीवः, य-ज्ञानादि लक्षणा स्वम्य आत्मन. भाग-स्वभानं करोति सजति स जीव तस्यैव ज्ञानादिलक्षणस्य भावस्य न पुनरम्यस्य कर्ता-कारक , भवेत्-स्यात् ॥ २० ॥ अथ ज्ञानाजानयोर्ज्ञानानानत्व कुतः १ ईति पद्यद्वयेना- भिलपति- अर्थ-जीवके अपने स्वभावही” भई ऐसी परिणामशक्ति है सो पूर्वोक्तप्रकार निर्विघ्न ठहरी ताठहरते संत सो जीव जिस भाव आपके करै, ताहीका सो कर्ता होय है। भावार्थ-जीवभी परिणामी है, सो आप जिसमावरूप परिणमै ताका कर्ता हाय है। ज्ञानमय एव भावः कुता भवेत् ज्ञानिनो न पुनरन्यः ।

1 . परमाध्यात्मतरङ्गिणी अज्ञानमयः सर्वः कुतोऽयमज्ञानिना नान्यः ॥२१॥ सं० टी०-ज्ञानिनः पुस , ज्ञानमय एव-बोधनिवृत्त एच,-कुतः-कस्माद्ध तो: ? भवेत्-स्यात , पुनः अन्यो भावः कुतो न स्यात् । अज्ञानिना-जानत्यक्तस्य तु अयं प्रसिद्धो ममत्वादिलक्षणः सर्व:-समस्त:, अज्ञानमय.-अज्ञाननिवृत्तो भावः कुतो हेतोर्भवेत , न पुनरन्यः-ज्ञानादिलक्ष्णः ।। ६१ ।। अर्थ-इहां प्रश्नवचन है-जो ज्ञानीक तो ज्ञानमयही भाव होय है अर अन्य नाही होय है, सो यह तो काहेनें है ? बहुरि अज्ञानीकै अज्ञानमय ही सर्वभाव होय है अर अन्य नाहीं होय है, सो यह काहे होय है ? ज्ञानिनो ज्ञाननिर्वृत्ताः सर्वं भावा भवंति हि । सर्वेऽप्यज्ञाननिर्वृत्ता भवंत्यज्ञानिनस्तु ते ॥ २२ ॥ सं० टी०-हीति-यस्मात् कारणात् ज्ञानिन:-पुसः, सर्वे-निखिलाः, भावाः-परिणामाः, ज्ञाननिवृत्ताः ज्ञाननिष्पन्ना,: भवंति-जायते, ज्ञानाद् ज्ञाननिवृत्ता एव भावा, यथा जावूनदजातितो जांबूनदपात्रकुडला. दयः । तु-पुनः, अज्ञानिनः पुसः, ते प्रसिद्धा. अहकारादयः, सर्वेऽपि-समस्ता अपि अजाननिवृत्तिा ये अज्ञानमया एव भवंति जायते यथा कालायसमयाभावात् कालायसपात्रचलयादयः, ततोऽज्ञानतस्तु अजा- ननिवृत्ता एव भावाः, तथा चोक्तं- द्वैताद् द्वैतमद्वैताद्वैत खलु जायते । लोहाल्लोहमयं पात्र हेम्नो हेममयं यथा ।। इति ॥ २२॥ अज्ञानत एव कर्मणा बंधमिति प्रतिज्ञानीते- अर्थ-ज्ञानीकै सर्वही भाव हैं ते ज्ञानकरि निपजै हैं । बहुरि अज्ञानीकै जे सर्वही भाव हैं ते अज्ञानकरि निपजै हैं ।। अज्ञानमयभावानामज्ञानी व्याप्य भूमिकां । द्रव्यकर्मनिमित्तानां भावानामेति हेतुतां ॥२३ ॥ मं० टी-अनानी-ज्ञानच्युत' पुमान् , एति प्राप्नोति, कां ? हेतुतां-कारणतां, केषां द्रव्येत्यादि- दव्यकर्मणां ज्ञानावरणादीनां निमित्तानि-कारणानि तेषां भावानां पर्यायाणा-मिथ्यात्वाविरतिकपाययोग- प्रमादादि रुपाणां, किकृत्वा ? व्याप्य-प्राप्य, कां ? भूमिकां स्थानं, केपां ? अज्ञानमयभावानां-मिथ्यात्वा- विरतिकषाययोगलक्षणानां ।। २३ ।। अथानयपक्षपाते सुखमावेदयति- अर्थ-अज्ञानी है सो अज्ञानमय अपने भाव, तिनिकी भूमिका व्याप्यारि आगामी द्रव्यकर्मक कारण जे अज्ञानादिक भाव, तिनिका हेतुपणाकू प्राप्त होय है । य एव मुक्त्वा नयपक्षपातं स्वरूपगुप्ता निवसंति नित्यं । विकल्पजालच्युतशांतचित्तास्त एव सानादमृतं पिबंति ॥२४॥ सं० टी०-य एच योगिन', निवसति-तिष्ठति, नित्य-निरंतर-आजन्मपर्यतं, किंभूताः संतः ?' स्वरू- पगुप्ताः स्वरूपे-निजचिपे गुप्तिर्गोपनं येषां ते 'अभ्रादिभ्यः' इति मैनेद्रसूत्रेणात्यर्थे अः, किंकृत्वा ? १ द्वितीय अङ्क ४७ - मुक्त्वा-हित्वा, कं ? नयपक्षपात-नयाना-अपि कर्म बद्धमबद्ध चेत्यादिरूपाणां नयेषु वा पक्षपातः-ममत्वा- भिनिवेशस्तं, त एव पुरुपा., नय मुक्त्वा पिवति पान कुर्वति आस्वादयतीत्यर्थः, माक्षात्-प्रत्यक्षं, किं ? अमृतं न म्रियते येन परात्मध्यानेन तदमृतं परमात्मध्यातुमुक्तिनिवासित्वेन मरणनिवर्हकत्वात्, किंभूताः सन्तः ? विकल्पेत्यादि विकल्पाना जालं समूह , तेन च्युत रहितं, शात उपशमं प्राप्त, चित्त मानम येषा ते ॥ २४ ॥ श्रथ वद्वमूढ रक्तदुष्टकत्रितरादिनयविभाग जेगीयते- अर्थ-जे पुरुष नयका पक्षपात छोडि अपने स्वरूपवि गुप्त होय निरंतर बसे हैं, तेही पुरुष विकल्पक जालते रहित शांत भया है चित्त निनिका ऐसे भये संने माक्षात् अमृता पीत्र है ।। भावार्थ-जेतै कछू पक्षपात हैं तत चित्तका क्षोम मिटे नाही, जब सर्वनयका पक्षपात मिटि जाय, नव बीतरागदशा होय स्वरूपकी श्रद्वा निर्विकल्प होय अर स्वरूपविपे प्रवृत्ति होय है ।। २४ ॥ अव नयपक्ष प्रगटकरि कहै हैं, अर तिसकू छोडे है सो तत्त्वज्ञानी है स्वरूप पाये है। ऐमा अर्थके कलशरूप वीम काव्य कहै हैं- एकस्य बद्धो न तथा परस्य चिति द्वयोविति पक्षपाती यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥२५॥ सं० टी०-एकस्य-व्यावहारिक नयस्य पर्यायार्थिकसजकस्य नयस्याभिप्रायेणात्मा बद्ध'-कर्मभिर्निवद्ध, तथा तेनैव प्रकारेण, परस्य निश्चयनयस्य द्रव्यार्थिकसंबकस्य नयस्याभिप्रायेणात्मा न बद्धः कर्ममि , इति अमुना प्रकारेण, चिति चिद्रूपे, द्वयोः उभयोनययोः द्रव्यपर्यायार्थिकयोः, द्वौ उभौ, पक्षपाती अभिनिवेशौ स्तः, यः कश्चित, तत्त्ववेदी परमार्थवेत्ता सन्,च्युतपक्षपात. बद्ध तरयोर्नययो पक्षपातरहितः भवती.याध्या- हाय, तस्य तत्त्ववेदिन., खलु इति नियमेन, नित्य निरतर, चित् चैतन्या, चिदेव ज्ञानस्वरूपमेव, अस्ति- भवति, साक्षात्केवलज्ञानी भवतीति यावत् ।। २५ ।। अर्थ-यह चिन्मात्र जीव है सो एक नयका तौ कर्मकरि वंध्या है ऐसा पक्ष है । बहुरि दूसरे नयका कर्मकरि नाही बंध्या है। ऐसे दोऊही नयके दोऊ पक्ष हैं । सो ऐसे दोऊ नयका जाकै पक्षपात है सो तो तत्ववेदी नाहीं है । बहुरि जो तत्त्वका स्वरूप जाननेवाला है, सो पक्षपातरहित है । तिस पुरुषका जो चिन्मात्र आत्मा है सो चिन्मात्र ही है। यामैं पक्षपातकरि कल्पना नाही करे है || भावार्थ-इहां शुद्धनय प्रधानकरि कथन है । तहां जीवनामा पदार्थ शुद्ध नित्य अभेद चैतन्यमात्र स्थापित कर कहे हैं, जो इस शुद्ध नयका मी जो पक्षपात करेगा, सो भी तिस स्वरूपका स्वाद नाही पावेगा । अशुद्धपक्षकू तौ गौणकरि कहतेही आवै हैं। अर कोई शुद्धनयका भी जो पक्षपात करेगा, तो पक्षमा राग न मिटेगा । तब वीतरागता नाही होयगी । तातै पक्षपातकूछोडि चिन्मात्रस्वरूपविपे लीन भये समयसार पाये है। अर चैतन्यके परिणाम परनिमित्तते अनेक होय हैं । तिनि सर्वनिकू गौण कहतेही आवै हैं। तातै मर्वपक्ष परमाध्यात्मतरङ्गिणों छोडि शुद्धस्वरूपका श्रद्धान करि. पीछे स्वरूपविपे प्रवृत्तिरूप चारित्र भये वीतरागदशा करना योग्य है ।। २५ ।। अब जैसे बद्ध अवद्धपक्ष छुडाई तैसेंही अन्यपक्षकू प्रगट कहिकरि छुडावै हैं- एकस्य मूढो न तथा परस्य चिति द्वयोाविति पक्षपातौ। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव (२६! अर्थ-एकनयके तौ जीव मूढ है मोही है, बहुरि दूसरे नयके मूढ नाहीं है यह पक्ष है। ऐसे ये दोऊही चेतन्य वि पक्षपात हैं। बहुरि जो तत्त्ववेदी है सो पक्षपातरहित है, ताका चितही है, मोही अमोही नाहीं है। एकस्य रक्तो न तथा परस्य चिति द्वयो विति पक्षपाती। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं विलु चिच्चिदेव ॥ २७॥ अर्थ-एकनयके तौ यह जीव रक्त कहिये रागी है ऐसा पक्ष है, बहुरि दुसरे नयके रक्त नाहीं है ऐसा पक्षपात है । सो ए दोऊही चेतन्यविनयके पक्षपात है ।। बहुरि जो तत्ववेदी है सो पक्षपात नाहीं है, ताकै जो चित् हैं सो चित् ही है ।। एकस्य दुष्टो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपाती। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिचिदेव ॥ २८ ॥ . एकस्य कर्ता न तथा परस्य चिति द्वयोाविति पक्षपातौ । यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥ २६ ॥ एकस्य भोक्ता न तथा परस्य चिति द्वयोाविति पक्षपातौ। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥३०॥ एकस्य जीवो न तथा परस्य चिति द्वयो विति पक्षपातौ। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥ ३१ ॥ एकस्य सूक्ष्मो न तथा परस्य चिति द्वयो विति पक्षपातौ । यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥ ३२॥ एकस्य हेतुर्न तथा परस्य चिति द्वयोाविति पक्षपाती। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिचिदेव ॥ ३३॥ एकस्य कार्यं न तथा परस्य चिति द्वयोविति पक्षपातौ ।

५४ द्वितीय अङ्क यस्तत्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥ ३४ ॥ एकस्य भावो न तथा परस्य चिति द्वयोविति पक्षपातौ। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥३५॥ एकस्य चैको न तथा परस्य चिति द्वयोविति पक्षपातौ। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥ ३६ ।। एकस्य सांतो न तथा परस्य चिति द्वयोहाविति पक्षपातौ। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥ ३७॥ एकस्य नित्यो न तथा परस्य चिति द्वयोाविति पक्षपातौ । यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥ ३८ ॥ एकस्य वाच्यो न तथा परस्य चिति द्वयोद्वाविति पक्षपातौ । यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥ ३९ ॥ एकस्य नाना न तथा परस्य चिति द्वयोविति पक्षपाती। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिचिदेव ॥४०॥ एकस्य चेत्यो न तथा परस्य चिति द्वयो विनि पक्षपातौ । यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥४१॥ एकस्य देश्यो न तथा परस्य चिति द्वयो-विति पक्षपातौ। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥ ४२ ॥ एकस्य वेद्यो न तथा परस्य चिति द्वयो विति पक्षपातौ। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ॥ ४३ ॥ एकस्य भातो न तथा परस्य चिति द्वयोाविति पक्षपाती। यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नेत्यं खलु चिच्चिदेव ।। ४४॥ सं. टी.-पूर्ववद् व्याख्येयानि मूढरक्त तरादिपदपरिवर्तनेन ॥२६-४४ ॥ अथ नयातिक्रमण स्वानुभूतिमुपदर्शयति- अर्थ-एक नयकै तौ दुष्ट कहिये द्वेपी है,बहुरि दूसरे नयके दुष्ट नाहीं है । ऐसें ए चैतन्यवि दोऊ नयकै दोय पक्षात हैं एक नयके का है दूसरे नपके कर्ना नाही है ए ऐसे चेतन्यवि दोऊ

--
हैं
परमाध्यात्मतरङ्गिणी
नयके दोऊ पक्षात हैं। एक नयके भोक्ता है, दूसरे नयके भोक्त नाहीं है । ए चैतन्यवि दोऊ
नयके दोऊ पक्षपात हैं,एक नयके जीव है,दूसरे नयके जीव नाहीं है । ऐ चैतन्यविपैं दोऊ पक्ष.
पान हैं । एक नयके सूक्ष्म हैं,दूसरे नयक सूक्ष्म नाहीं । ऐसे ए चैतन्यविर्षे दोऊ नयके दोऊ पक्ष-
पात हैं । एक नयके हेतु है,दूसरे नयके हेतु नाहीं है ए दोऊ नयके चैतन्यविणें दोऊ पक्षपात हैं ।
एक नयके कार्य हैं, दूसरे नयके कार्य नाहीं । ए दोऊ नयके चैतन्यविणें दोऊ पक्षपात
एक नयकै भावरूप है दूसरे नयके अभावरूप है। ए दोऊ नयके चैतन्यविर्षे दोऊ पक्षपात हैं।
एक नयकै एक है,दूसरे नयकै अनेक है। ए दोऊ नयके चैतन्यविणें दोऊ पक्षपात हैं। एक नयके
सांत कहिये अन्तसहित है,दूसरे नयके अन्तसहित नाही है। ए दोऊ नयके चैतन्यविणे दोऊ पक्ष-
पात हैं। एक नयके नित्य है, दूसरे नयके अनित्य है । ए दोऊ नयके चैतन्यविणे दोऊ पक्षपात
हैं । एक नयके वाच्य कहिये वचनकरि कहने में आये है, दूसरे नयके वचनगोचर नाही है। ए
दोऊ नयके चैतन्यवि. दोऊ पक्षपात हैं। एक नयके नानारूप है, दूसरेके नानारूप नाहीं है । ए
दोऊ नयकै चैतन्यवि. दोऊ पक्षपात हैं एक नयके चेत्य कहिये जानने योग्य है,दूसरेके चितवनेयोग्य
नाही है । ए दोऊ नयके चैतन्यविणे दोऊ पक्षपात हैं। एक नयके दृश्य कहिये देखनेयोग्य है,
दुसरेके देखनेमें नाहीं आवै है । ए दोऊ नयके चैतन्यवि. दोऊ पक्षपात हैं। एकनयके वेद्य
कहिये वेदनेयोग्य है, दूसरेके वेदनेमें न आवे है ए दोऊ नयके चैतन्यविणे दोऊ पक्षपात हैं।
एक नयके भात कहिये वर्तमानप्रत्यक्ष है, दूसरेके नाहीं है। ए दोऊ नयकै चैतन्यविणे दोऊ
पक्षपात हैं। ऐसे चैतन्यसामान्यविणे ए सर्व पक्षपात हैं । बहुरि तत्त्ववेदी है सो स्वरूपकू यथार्थ
अनुभवन करनेवाला है । ताका चिन्मात्रभाव है सो चिन्मात्रही है पक्षपातसू' रहित है । भावार्थ
जीवक परनिमित्तते अनेक परिणाम हैं, तथा यामै साधारण अनेक धर्म हैं । तथापि असाधारण-
धर्म चित्स्वभाव है सोही सामान्यभावकरि शुद्धनयका विषय है, तिसहीकू' प्रधानकरि कथन है,
सो याके साक्षात् अनुभवके अर्थि ऐसा कह्या है, जो यामै नयनिके अनेक पक्षपात उपजै हैं
बद्ध अबद्ध, मूढ अभूढ, रागी विरागी, द्वेपी अद्वपी, कर्ता अकर्ता, भोक्ता अभोक्ता, जीव
अजीव, सूक्ष्म स्थूल, कारण अकारण, कार्य अकार्य, भाव अभाव, एक अनेक, सांत असांत,
नित्य अनित्य, वाच्य अवाच्य, नाना अनाना, चेत्य अचेत्य, दृश्य अदृश्य, वेद्य अवेद्य भात
अभात, इत्यादि नयनिके पक्षपात हैं । सो तत्वका अनुभव करनेवाला पक्षपात नाहीं कर है।
नयनिक तौ यथायोग्य विवक्षारौं साधे है । अर चैतन्यकू चेतनमात्रही अनुभवन कर है ।
॥ २८-४४ ॥ इसही अर्थका संक्षेपकरि काव्य कहैं हैं-
स्वेच्छासमुच्छलदनल्पविकल्पजालामेवं व्यतीत्य महतीं नयपक्षकक्षा।
अंतर्वहिःसमरसैकरसस्वभागं स्वं भावमेकमुपयात्यनुभूतिमात्रं ॥ ४५ ॥

द्वितीय अक्क सं टी-एक, स्व-आत्मीय, भावं-स्वभान, अनुभूतिमात्र अनुभवमेव, उपयाति प्राप्नोति, किंभूतं स्व ? अंतरित्यादि. अत' अभ्यन्तरे, बहि. वाह्ये, य. समरस' साम्यरसः, स एव एक अद्वितीय , आस्वाद्य. मानरसस्वभावः स्वरूप यस्य तत् किं कृत्वा ? एव उक्तविंशतिपचोक्तनयप्रकारेण नयपक्षकक्षा नयपक्षागी- कारं, व्यतीत्य हित्वा, किंभूता ? स्वेच्छंत्यादि स्वेच्छया समुच्छलंतश्च तेऽनल्पविकल्पाश्च तेपा जाल समूहो यस्या सा ता, महती महाप्रसरप्राप्ता ।। ४५ ॥ अथ विकल्पनाल धिककृत्य स्वरुप ततन्यते अर्थ-जो तत्त्वका जाननेवाला पुरुप है सो पूर्वोक्तप्रकार आपै आप उठते हैं वहुत विकल्प- निके जाल जामै, ऐमी जो बडी नयपक्षरूप बनी ताकू उल्लंध्यकरि अर समरस जो वीतरागभाव सोही हैं एकरस जामें ऐसा है स्वभाव जाका ऐमा जो आत्माका भाव अपना स्वरूप अनुभूति- मात्र, ता प्राप्त होय है ॥ ४५ ॥ फेरि कहैं हैं- इंद्रजालमिदमेवमुच्छलत् पुष्कलोच्चलविकल्पवीचिभिः यस्य विस्फुरणमेव तत्तण कृत्स्नमस्यति तदस्मि चिन्महः ।। ४६ ॥ स० टी-यस्य चिन्महम , विस्फुरणमेत्र प्रकाशनमेव, इर्द प्रसिद्ध , ममैनदस्याहमित्यादिरूप, कृत्स्न समस्त, इन्द्रजाल महेदादिशास्त्रत्रणीतविद्यासाश्यत्वादसद्पत्वाबद सर्वमिन्द्रजाल,-तत्क्षण-उदयकाल, भस्यति-निराकरोति. किंभूत ? उच्छलत् अधिकं प्रापयत् , काभि ? पुष्कलेत्यादि-विकल्पममत्वादिरूपा. सक्ल्पास्त एव वीचयः कल्लोलाः बहुलास्ताश्च ता उच्चसत्य.-ऊचं प्राप्नुमात्यश्च ता विकल्पवीचयस्ताभिः तत्-प्रसिद्ध , चिन्मह चित्स्वरूप धाम, अस्मि-भवामि ।। ४६ ॥ अथ समयसारचेतनामाचिंतयति- अर्थ-तत्ववेदी ऐमा अनुभवन करे हैं जो मै चिन्मात्र मह-तेजका पुज हूँ | जाका स्फुरा- यमान होनाही, बडी बडी पुष्ट उठगी चंचल जे विकल्परूप लहरी, तिनिकरि उछलता इनि नयनिका प्रवर्तनरूप इन्द्रजाल, तत्काल समस्तनिहीकू दूर करे है । भावार्थ-पैतन्यका अनुभवन ऐमा है, जो याकै होते समस्त नयनिका विकल्परूप इन्द्रजाल है सो तत्काल विलय हो जाय हैं ॥ ४६॥ चित्स्वभावभरभावितभावाभावभावपरमार्थतयैकं । बंधपद्धतिमपास्य ममस्तां चेतये समयसारमपारं ॥ ४७ ।। स० टी०-चेतये-चिंतयामि-ध्यानविषयीकरोमीत्यर्थ, कं? समयसार सम्यक् अयति-गच्छति निजगुणपर्यायानिनि समयाः-पदार्था., अथवा समयति-जामति स्वरूपमिति आत्मान., तेषा मध्ये सारः श्रेष्ठस्तं, किंभूत अपार-गुणपाररहित पुन. एक-अद्विनीया, कया ? चिदित्यादि-चिदेव स्वभावो यस्य स चित्स्वभावः-आत्मा, तस्य भरः-अतिशय. प्रतिक्षण त्रिलक्षगोपादानलक्षणः तेन भाविता-निष्पादिताः, भावाभावभावा -भूयत इति भाव उत्पाद., अभाव.-पूर्वपर्याय , भवम भावः द्रव्यरूपेण ध्रौव्यता, द्वंद्व , तेपा परमार्थता-सत्यता-एकार्थता तया, किंकृत्वा ? अस्य-छित्त्वा, का ? अघाति-कर्मबधनेगी, समस्ता- निखिला, प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशरूपा ॥४७॥ अथ समयसार पापठीति- - + - ६. परमाध्यात्मवरङ्गिणी अर्थ में न हों तच्चका जाननेवाला सो समयमार जो परमात्मा ताही अनभव' हूं। कैसा हैं समयसार ? चैतन्यस्वभावका भार कहिये पुज, ताकरि भया है भाव अभावस्वरूप जो एकमात्र स्वरूप परमार्थ तिसपणाकरि एक है । भावार्थ-परमार्थकरि विधिप्रतिषेधका विकल्प जाम नाहीं है । बहुरि पहले कहा की अनुम ? समस्तही जो बंधकी पद्धति कहिये परपाटी, ताकू', दूर करिकै । भावार्थ-परद्रव्यके का कर्म भावकरि बंधकी परपाटी चाले थी, ताक पहले दूरी करि समयसार अनुभव हाँ बहुरि कैसा है, अपार है जाके केवलज्ञानादिगुणका पार नाही है ॥४७|| आगे ऐसा नियम करि ठहराव हैं जो पक्षत अनिक्रांत दरिबत्ती ही समयसार है- विशेष-संस्कृतटीकाकारने श्लोकके पूर्वार्धमागका अर्थ यह किया है कि आत्मामें प्रनिसमय उत्पाद व्यय और धौव्य अवस्था हुआ करती है इसलिये इमरूप से वह अनेक कहा जा सकता हैं परंतु ये तीनो अवस्था परमार्थस्वरूप हैं आत्मामें ही इन अवस्थाओंकी उथल पुथल हुआ करती है.इसलिये उत्पाद व्यय और धोन्य स्वरूप होनेपर भी यह आत्मा एक स्वरूप ही हैं । परंतु पं. जयचन्द्रजीका अर्थ इससे भिन्न हैं ।। १७ ॥ अाक्रामन्नविकल्पभावमचलं पर्नयानां विना सारी यः समयस्य गाति निभृतैरास्वाद्यमानः स्वयं । विज्ञानकरसः स एष भगवान पुण्यः पुराणः पुमान् ॥ ज्ञानं दर्शनमप्ययं किमथवा यत्किंचनकोप्ययं ॥ ४ ॥ सं०टी०-चः समयस्य-पदार्थस्य मध्य सारः-उत्कृष्टः आत्मेत्यर्थः, स्वयं-परप्रकाशाद्यभावेना भाति-शोभते, नयानां वद्धमूढादीनां पतेः-अंगीकारैः, विना-अंतरेण, निभृतैः-निश्चलै , एकाग्रता- गतैर्योगिभिः, आस्वाद्यमान.-ध्यानविषयोक्रियमाणः अचल-निश्चलं यथा भवति तथा, अथवा-अविकल्प- भावत्य विशेषः (?) अविकल्लभाव-विकसरहितमा, आक्रामन्-स्वीकुर्वन, पुनः किभूतः १ विज्ञानकरस: विनानस्य-विशिष्टबोधत्य, एकरसः, चः सः, पुमान्-आत्मा, भगवान्-ज्ञानी, पुण्यः प्रशम्तः. पवित्रो वा पुराण:-चिरंतनकालीनः-पुरातन इत्यर्थः, अयं-आत्मा, ज्ञानं-बाघः, नानव्यतिरेकेण तस्यानुपलभ्य. मानत्वात्, अपि-पुनः, अयं, दर्शनं-सक्षालोचनमात्र, सम्यक्त्वं वा आत्मैव, अथवा किंबहुना १ विकल्सेन कि साध्य ? न किमपि, यत्किंचन चारित्र सौख्यं किचित् एकोप्ययं-अद्वितीय श्रात्मैव-आत्मव्यनिरेकेण तेषामनुपलभ्यमानत्वात् आत्मस्वरूपत्वाच स्वरूपस्वरूपिणोरे मत्वात ॥४८ ॥ अथात्मनो गतानुगतता साचयनि- अर्थ-जो नयनिका पक्षविना निर्विकल्यभाव प्राप्त होता, निश्चल जैसे होय तैसे समय कहिये आगम अथवा आत्मा, ताका सार है सो शोभे है। सो कैसा है ? जे निश्चितपुरुष हैं - द्वितीय अङ्क ६३ तिनिकरि स्वयं आस्वाद्यमान है,तिनिने अनुभवतै जाणि लीया है। मोही यह भगवान् विज्ञानही एकरस जाका एसा है, सो पवित्र पुरागापुरुप है, याकू ज्ञान कही अथवा दर्शन कही अथवा किछू और नाम करि कहो जो कछु है सो यह एक ही है,नाना नाम कहा है ॥४८॥ अब कहै हैं, जो यह आत्मा जानते च्युत भाया था मो ज्ञानही आय मिले हैं- दृरं भूरिविकल्पजालगहने भ्राम्यन्निजौघाच्च्युतो दूरादेव विवेकनिम्नगमनान्नीतो निजौघं वलात् । विज्ञानकरसस्तदेकरसिनामात्मानमात्माहर- न्नात्मन्येव सदा गतानुगततामायात्ययं तोयवत् ॥ ४६ || सं. टी-तदेकरसिना-तस्मिन्-आत्मनि-एक.-अद्वितीय, रसः, येषा तेपा योगिना, अयं- प्रमिः, आत्मा-चिद्रूपः, आत्मन्येव-स्वस्वरूप एव गमनागमनता, आयाति-प्राप्नोति, सदा-निरंतर, आत्मानं स्वस्वस्पं, बाहरन्-म्चीकुर्वन , विभूत ? विज्ञानकरस-विशिष्टवोधैकरसास्वादकः, निजौघात विज्ञानकरसममूहात, च्युत्त.-परिच्युन. मन भूरीत्यादि -भूरिविकल्पाना जालं-समूहस्तदेव गहन-वन, अवगाहयितुमशक्यत्वात तस्मिन् , दूर-श्रात्मस्वरूपादनिकट यथा भवति तथा भ्राम्यन्-भ्रमणं कुर्वन् , दूरादेव-स्वस्वरूपादसमीपत एव, बलात-हठात , वहिव्यममत्वादिपरीत्यागस्पात् , निजौघ-विज्ञानकरस समूह, नीतः प्राप्तः, कुतः ? विवेकनिम्नगमनात- विवेक -परात्मनोभेदेन विवेचकत्वं, स एव निम्न-गभीरं गमन-गनिः,तस्मात् , वहि, मन विकल्पे विवेकवशात् स्वस्वरूपे आयाति । किमिव । तोयवत् यथा पानीयं स्वस्थाने गतानुगतता करोति निजीघाच्युत्त वने भ्राम्यत् , निम्नगमनविशेपनिलम्थान प्राप्नोतीति, उक्तिलेश ४ ॥ अथ विकल्पस्वरूप विकल्पयति- अर्थ-यह आत्मा अपने विज्ञानघनस्वभावते च्युत भया संता, प्रचुरविकल्पनिकै जालके गहनवनम अतिशयकरि भ्रमण करेगा, तिस भ्रमते विकरूप नीचे मार्गके गमनकरि जल- कीज्यौं अपना विज्ञानघनस्यमावविर्षे दूरने' आणि मिलाया। कमा है ? जे विज्ञानका रसहीके एकरसीले हैं, तिनिकू एक विज्ञानरसस्वरूप ही है । सो ऐसा आत्मा अपने आत्मास्वभावही विण समेटता संताजैमा बाह्य गया था तेसे ही अपने स्वभाववि आय प्राप्त होय है । भावार्थ इहां जलका दृष्टांत हैं । जैसे जल है मो जलके निवासमें कोई मार्गकरि बाह्य निसरे है सो बनमें अनेक जायगा भ्रमै, फेरि कोई नीचामार्गकरि ज्योका त्यौं अपना जलके निवासमें आय मिले । तेसे आत्माभी अनेक विकल्पनिके मार्गकरि स्वभावते' च्युत भया भ्रमण करता संता कोई विवेक भेदज्ञानरूप नीचा मार्गकरि आपही आपकू खेचता संता, अपने स्वभाव विज्ञान- धनविणें आय मिले है ।। ४६॥ अव कर्ताकर्म अधिकार पूर्ण कीया हैं' सो कर्ताकर्मका संक्षेप अर्थका कलशरूप श्लोक कहैं हैं- विकल्पकः परं कर्ता विकल्पः कर्म कैवलं ।

, - ६४ परमाध्यात्मतरंगिणी न जातु कर्तृकर्मत्वं मविकल्पस्य नश्यति ॥ ५० ।। सं० टी०-पर-केवल, विकल्पक:-परद्रव्ये ममेदमिति, अभिनिवेशो विकल्पः स्वार्थे कप्रत्ययविधानात, कर्ता-कर्मणा कर्तृत्वेन प्रतिभवति, केवल-परं, विकल्पः कर्म, भावकर्मणां विकल्पस्वरूपत्वात् कर्महेतु- स्वाद्वा विकल्पस्य कर्मल कारणे कार्योपचारात, जातु-कदाचित, सविकल्पस्य-देहिनः, कत कर्मत्वं न नश्यति-न निरस्यति ।। ५० ।। अथ जीवपुद्गलयोः क वेतृल भिनत्ति- अर्थ-विकल्य करनेवाला तो केवल कर्ता हैं। बहुरि विकल्प हैं सो केवल कर्म हैं । अन्य किछु कर्ताकर्म नाही हैं,याते जो विकल्पसहित है, ताका कर्ताकर्मपणा कदाचित् भी नष्ट नाही होय है । भावार्थ-जहां तांई विकल्पभाव है, तहां ताई कर्ताकर्मभाव है । जिस काल विकल्पका अभाव होय, तिस काल कर्ताकर्मभाव का भी अभाव होय है ॥५०॥ अब कहै है, जो करे हैं सो करही हैं जाने सो जानेही है- यः करोति स करोति केवलं यस्तु वेत्ति स तु वेत्ति केवलं। यः करोति नहि वेत्ति स क्वचित् यस्तु वेत्ति न करोति स वचित् ॥ ११ ॥ सं० टी०-य.-पुदलः करोति-द्रव्यभावनोकर्म विदधाति स पुद्गलः केवल-परं, करोति कर्मादि सज. त्येव । तु-पुनः, य:-श्रात्मा-वेत्ति स्वपरस्वरूपं परिच्छिनत्ति, सः-आत्मा, केवलं-परं, वेत्त्येव-जानात्येव तु शब्दः एवार्थे । ननु यत्प्रधानं महदादि करोति तदेव वेत्ति नत्वात्मा- प्रकृतेर्महास्ततोऽहंकारस्ततश्च गणः षोडशकः । तस्मादपि षोडशकारपंचभ्यः पंच भूतानि ।। इति वचनात, एकस्यैव कर्तृत्ववेतृत्वोपपत्तेः, नत्वात्मनः किंचिदुपपन्नं तस्य सकलजगत्साक्षिकत्वात् ? इति चेत्तन्न तस्याचेतनत्वान्मृदादिवत् अन्यथा पुमान्निष्फलः स्यात् चेतनेतरस्वभावत्वे तस्य चेतनेतरत्व. विभागानुपपत्तिः, अत आत्मनश्चेतनता तस्याचेतनला हीति यस्मात् कारणात् । यः-पुद्गलः, करोति कर्मा- दिकं, स-पुद्गल., कचित्त-कदाचित् न वेत्ति-न जानाति तस्य सर्वथाऽचेतनत्वात् । तु-पुनः, यः-आत्मा वेत्ति सः-आत्मा कचिद्देशे कस्मिंश्चित्काले न करोति कर्मादि, तस्य कर्माकर्तृकत्वात् ।। ५१ ॥ अथ ज्ञप्ति- करोत्योभिन्नत्वमुद्भासते. अर्थ-जो करै है, सो केवल करही है। बहुरि जो जानै है, सो केवल जानैही है। बहुरि जो करै है, सो कछू ही नाही जानै है । अर जो जाने, सो कछूही नाही कर है ।। भावार्थ-कर्ता है सो ज्ञाता नाही, अर ज्ञाता है सो कर्ता नाहीं । अब कहै है ऐसेही करनेरूप- क्रिया अर जाननेरूपक्रिया दोऊ भिन्न हैं- कर्ता है वह कुछ जानता नहीं । आत्मा जानता है वह कुछ करता नहीं इसलिये कर्ता पुद्गल कर्ता ही है और ज्ञाता आत्मा ज्ञाता ही है। संस्कृतटीकानुसार यह इसका तात्पर्य है और इस श्लोकका उल्लेख खासकर खंडनार्थ किया है । ५१ ।। ज्ञप्तिः करोतौ नहि भासतेंऽतः ज्ञप्तौ करोतिश्च न भासतेंऽतः। ज्ञप्तिः करोतिश्च ततो विभिन्ने ज्ञाता न कर्तेति ततः स्थितं च ।। ५२ ।। - विशेष-पुद्गल द्वितीय पक्ष . ॥ मं० टी-हीति-स्फुट, करोती-कर्तृ क्रियायां सत्या, अंत'-मध्ये, ज्ञप्तिः-ज्ञातृता, न भासते-न प्रति. भामते, च-पुन:, ज्ञप्ती-ज्ञातृताया प्रतिभासमानायां अतः-अभ्यानरे, करोतिः-आत्मन. कत स्वभाव, न भासते-न चकास्ति, तत. कारणात् परस्परपरिहारेण व्यवस्थानात्, ज्ञप्ति.-ज्ञातृता च-पुन', करोति-कर्तृता च विभिन्ने-पृथकस्वभावे, तत. परस्पर भिन्नस्वभावत्वात्, इति च स्थित-इति सुप्रतिष्ठ-यो नाता चिद्पः स कर्ता न भवेदिति ।। ५२ ॥ अथ व कर्मणो. परस्परमैक्ग निराचेक्रीयते- अर्थ-जाननेरूप क्रिया है, सो तो करनरूप क्रियाविणें अंतरंगमें नाही भास है। बहुरि करनेरूप क्रिया है, सो जाननेरूप क्रियाविौँ अंतरंगमे नाही भासै है । तारौं ज्ञप्तिक्रिया अर करोतिक्रिया दोऊ भिन्न है। ताते यह ठहरी जो जाता है सो कर्ता नाहीं है | भावार्थ जिमकाल ऐसे परिणमै हैं, जो मैं परद्रव्य करू हो, तिसकाल तिस जाननक्रियारूप ज्ञाता ही है । इहां कोई पूछे हैं, अविरतसम्यग्दृष्टि आदिके जेसे चारित्रमोहका उदय है तेते कपाय- रूप परिणमै है। तहाँ कर्ता कहिये कि नाही ? || ताका समाधान-जो अविरतसम्यग्दृष्टिादिके श्रद्धान ज्ञानमय परद्रव्यों स्वामीपणारूप कर्तापणाका याकै नाहीं, अर कपायरूप परिणमन हैं सो उदयकी वरजोरीसू हैं, ताका यह ज्ञाता है ।। तातै अज्ञानसंबंधी कापणा या नाही है। अर निमित्तकी वरजोरीका परिण मनका फल किंचित होय है । सो संसारका कारण नाही है । जैसे वृक्षकी जड कटे पीछे किंचित्काल रहैं तैसें है ।। फेरि दृढ कर हैं- कर्ता कर्मणि नास्ति नास्ति नियतं कर्मापि तत्कर्तरि द्वंद्व, विप्रतिषिभ्यते यदि तदा का कर्तृकर्मस्थितिः। ज्ञाता ज्ञातरि कर्म कर्मणि सदा व्यक्तेति वस्तुस्थिति-- नॆष्प (प) थ्ये वत नानटीति रभसान्मोहस्तथाप्येष किं ॥५३॥ सं० टी०-कर्मणि-ज्ञानावरणादिकमरूपपरिणतपुद्गलपर्याये, कर्ता-श्रात्मनः कलां, नास्ति-न विद्यते, नत् तस्मात् कर्मणि कर्तृत्वाव्यवस्थानात् नियत-निश्चित । यदि कर्मणि कर्ता न तर्हि कर्तरि कर्म भविष्यति ? तन्निपेधार्थमाह-कर्मापि-ज्ञानावरणादिपरिणतपुद्गलपर्यायः, कर्तरि-आत्मनि, नास्ति न विद्यते, यदि चेत् ? विप्रतिपिध्यते-निराक्रियते,किं ? द-युग्म-कत कर्मरूप,तदा तर्हि कर्तृ कर्मस्थिति:-कर्तृकर्मणोः आत्मा कर्ता पुद्गलपर्यायः कर्म इति व्यवस्था का नाम ? न कापि । इति अमुना प्रकारेण वस्तुस्थिति:- वस्तुव्यवस्था व्यक्ता-स्पष्टा, इति किं ? ज्ञातरि-आत्मनि, ज्ञाता-ज्ञातृस्वभाव', नान्यत्र न पुनः कर्तृस्वभावः, सदा-निरतर कर्मणि-कर्मपर्यायपरिणतपुरले कर्म कर्मेति व्यपदेशः नान्यत्र ज्ञातरि, वत इति खेदे परस्परं तयोभिन्नत्वे वेदयत्याचार्य. एप मोह.-ममत्वकारकमोहनीयं कर्म, तथापि-परस्परमात्मरमणोभिन्नत्वेऽपि रभसात्-शीघ्र, नेपथ्ये-निर्गतः पथा मार्गो यत्र स्थाने तत् निष्पथं तस्य भावो नैप्पथ्या तस्मिन् अमार्ग- स्थानत्वे इत्यर्थः कि कश, नानटीति शतिशयेन नाटयति कर्मक विकल्पानवकाशे मोह' कथं कर्तृकर्मवि- कल्पान कारयतीति यावत् ।। ५३ ।। अथ ज्ञानज्योतिर्जाज्वलीति- ६

.
-
परसाध्यात्मतङ्गिणी
अर्थ-कर्ना है सो नौ कर्मविपैनिश्चयकरि नाहीं है, बहुरि कर्म है सो भी कावि निश्चय-
करि नाही है । ऐसें दोऊही परस्पर विशेषकरि प्रतिधिये, तब कताकमकी कहा स्थिति होय ?
नाहीं होय । तब वस्तुकी मर्यादा प्रगट व्यक्तरूप यह ठहरी, जी, ज्ञाता तो सदा ज्ञानविहीं
है। अर कर्म है सो सदा कर्मविही है । नाऊ यह मोह अज्ञान है, सो नेपथ्यविय कैसे नाच
है ! सो यह बडा खेद है ।। नेपथ्य कहिये शांत ललित उदात्त धीर इनि च्यारि आभरणनि
सहित जो यह तत्वनिका नृत्य, तावि- यह मोह कैसे नाच है ? कर्नाकर्मभाव तो नपथ्य-
स्वरूप नृत्यका आभूपण नाहीं, ऐसे खेदसहित वचन आचार्यने कहा है। भावार्थ-कर्म तो
पुद्गल है, ताका कर्ता जीवकू कहिये, नौ तिनि दोऊनिकै तौ बज भेद है, जीव तो युद्गलमें
नाही अर पुद्गल जीवमें नाहीं । तब इनिक क कर्मभाव कैमा बने ! ताने जीव तो जाता
है, सो ज्ञाता ही है, पुद्गलका कर्ता नाही । बहुरि पुद्गलकम है सो क्रमही है। तहां आचार्य
खेदकार कह्या है-जो, एसें प्रगट भिन्नद्रव्य है, तोऊ अन्नानीकै ए मोह कैसे नाचे है ! जो
मैं तो कता हूं अर यह पुद्गल मेरा कम है, यह वडा अज्ञान है ॥ ५शा फेरि कहे हैं , जो एसें.
मोह नाचे है, तो नाचो, वस्तुस्वरूप तो जैसा है तैसाही तिष्टै है-
विशेष-श्लोकमें 'नेपथ्य' और नेप्पथ्य दोनों पाठ मिलते हैं जिसमें पं० जयचंद्रजीने
नेपथ्य पाठ रख रंगभूमि अर्थ किया है और भट्टारक शुभचंदजीने नेपथ्यकी जगह नैप्पथ्य पाठ
रख उमका अर्थ कुमार्ग किया है। ५३ ॥
कर्ता कर्ता भवति न यथा कर्म कापि नैव
ज्ञानं ज्ञानं भवति च यथा पुद्गलः पुद्गलोऽपि ।
ज्ञानज्योति+लितमचलं व्यक्तमतस्तथोच्चै-
श्चिच्छक्तीनां निकरभरतोऽटांतगंभीरमेतत् ॥५४॥
सं० टी०-एनन् प्रन्यन, ज्ञानज्योति:-बोधमहः, तथा नेनैव प्रकारेण, उच्चैः-अतिशयेन, अंत:-अभ्यं-
नरं, उपलक्षणाद्वाऽपि वलितं-ददीप्यमानं जात, कुतः ? चिच्छतीना-जानाविभागप्रतिच्छेदानी, निकर-
मात्रः निकरो हिच्चारानंतभावः, तस्य भरः अतिशयः, तस्मात्, किंभूतं ? अचनं न चाल्यते यच्छक्ति.
पर.
पुज्ञादिभिः इत्यचलं. पुन. कीडच ? व्यक्त-सष्टं, नमस्तवस्तुप्रकाशकत्वात् पुनः अत्यंतगंभीर-
अत्यध-अनुलमर्श, ज्ञानशक्तरनंतत्वात् नयति कशं? चया कृता पुनतः कर्ता मणा निष्पादकः, न भवति
न जायत्ते अशुद्ध ज्ञानं निमिचीकृत्य पुनः कर्मणां ऋता मधुना तानञ्चलनाचच्छुद्ध नातं तया यथा
पुनलस्य सत्वेन निमित्तन निमित्तामात्रे नैमित्तकस्याप्यभावात् ! अपि पुनः कर्म ज्ञानावरणादिकर्न
उपेग ने निश्चयेन न व्यवतिष्ठने समर्थे विनाशके गिनाश्ययाव्यस्थानात प्रश्नाशे मुति तमोवन, च
पुनः या येन प्रकारेण बानं कर्नवनवतंक्तिं ज्ञानं ज्ञान-निर्मलवान, मति जाग्ने अपि-युनः, पुद्गल:-
पुद्रलपरमाणुः पनन्द एव स्वनि न भर्नरपेण परिणमनि ॥ ५४॥

" पुण्यपापाधिकार ६७ अर्थ-यह ज्ञानज्योति है सो अंतरंगविप अतिशयकरि अपनी चैतन्यशक्तीके समूहके भारत अत्यंत गंभीर,जाका थाह नाही,सो ऐसे निश्चल व्यक्तरूप प्रगट भया । जैसे अज्ञानविणें आत्मा कर्ता था,सो तो अब कर्ता न होय अर याके अज्ञानतें पुद्गल कर्मरूप होय था,सो अब कर्म रूप न होय बहुरि जैमैं जान तो ज्ञानरूपही होय अर पुद्गल है सो पुद्गलरूपही रहै,ऐसे प्रगट भया भावार्थ-आत्मा ज्ञानी होय तव ज्ञान तो ज्ञानरूप ही परिणमै,पुद्गलकमका कर्ता न बने, बहुरि पुद्गल है सो पुद्गलरूपही रहे कर्मरूप न परिणम ऐसे आत्माकै ज्ञान यथार्थ भये दोऊ द्रव्यक परिणामके निमित्तनैमित्तिकभाव नाही होय है,ऐसा सम्यग्दृष्टिके ज्ञान होय है। ऐसे जीव अर अजीब दोऊ कर्ता कर्मके वेपफरि एक होय नृत्यकै अखाडे में प्रवेश कीया था, सो सम्यग्दृष्टिका ज्ञान यथार्थ देखनेवाला है,सो दोऊ न्यारे न्यारे लक्षण दोय जानि लिये,तब वेप दूरि करी रंगभूमि बाह्य नीसरी गये । बहुरूपीका वेपका यह ही प्रवर्तन है-जो, देखनेवाला जेते पहि- चाने नाही, तेते चेष्टा किया करें, अर यथार्थ पहिचानि ले तब निजरूप प्रगट करी चेष्टा न करता वैठि रहै, तसे जानना ॥ ऐसें कर्ताकर्म नामा दूसरा अधिकार पूर्ण भया । जीव अनादि अज्ञान वसाय विकार उपाय वर्ण करता सो। ताकरि बंधन आन तणू फल ले सुख दुःख भवाश्रमवासो ॥ ज्ञान भये करता न बणे तब बंध न होय खुलै परपासो। आतममाहि सदा सुविलास कर सिव पाय रहे निति थासो॥ इति श्रीसमयसारपद्यस्यात्मतरगिण्यपरनामधेयस्य व्याख्यायां द्वितीयोंकः ॥२॥ ऐसें इस अध्यात्मतरंगिणीनामा टीकाकी वचनिकाविप दूसरा कर्नाकर्मनामा अधिकार पूण भया ॥ २॥ अथ पुण्यपापाधिकारः॥३॥ पुण्य पाप दोऊ करम,पंधरूप दुर मानि । शुद्ध आत्मा जिन लह्यो,नमूचरण हित जानि ॥ अब टीकाकारके वचन हैं। तहां कर्म एकही प्रकार है, सो दोय जो पुण्यपाप रूप तिनि- करि प्रवेश कर है । जैसे नृत्यके अखाडेमै एकही पुरुप अपने दोय रूप दिखाय नाचे, ताकू यथार्थज्ञानी पहिचान, तब एकही जाने । तेसैं सम्यग्द्रष्टीका ज्ञान यथार्थ है । सो यद्यपि कर्म एक ही है, सो पुण्य पाप भेदकरि दोय प्रकारका करि नाचे है, ताकू एकरूप पहिचानि लै ।। तिस ज्ञानकी महिमारूप इस अधिकारके आदिवि काव्य कहै हैं- जीयादमृतहिमाशुप्रणीतमध्यात्मविशदपद्यमिदं । शुभचद्रदेवविवृत्त सुकृत चरा कुन्दकुन्दपरं ॥ १ ॥ अथैकमेव द्विपात्रीभूय पुण्यपापरूपेण प्रविशति- . - .

१ knor ६८ परमाध्यात्मतरंगिणी तदथ कर्म शुभाशुभमेदतो द्वितयतां गतमैक्यमुपानयन् । ग्लपितनिर्भरमोहरजो अयं स्वयमुदत्यवबोधसुधाप्लवः ॥ १ ॥ स. टी--अथ-जीवाजीबयोः कर्तृ कर्मत्वनिराकरणादनतर, अय बोधसुधाप्लवः-ज्ञानामृतपूरःस्वयं- स्वत एव-कर्मनिरपेक्षत्वेन, उदयति-उदय प्राप्नोति, किंभूतः १ ग्लपितेत्यादि-ग्लपित-विनाशितं निर्भर निर्विशेष भुवनं बिभर्ति-धारयतीति निर्भरं समस्तमोहाक्रातत्वात् मोह एव रजो धूलिर्येन सः, अन्योऽपि सुधासवः रेणु' ग्लपयति इत्युपमोपमेययोः साम्य, तत्-प्रसिद्ध कर्म ऐक्यं-एकता, उपानयन्-कुर्वन्, किंभूत तत् शुभाशुभभेदतः पुण्यप्रकृतिः शुभायुर्नामगोत्ररूपा, पापप्रकृति.-घातिचतुष्काशुभायुर्नामगोत्ररूपा तयो- मेंदतः प्रभेदात्, द्वितयतां-द्विरूपता गत-प्राप्त शुभाशुभभेदेन द्विधापि ज्ञाने भवतः, संसारदायकत्वात् सर्व कर्मसमित्येकमिति भावः ॥ १ ॥ अथ शुभाशुभकर्मणोष्टातेनैक्यमुररीकराति पद्यद्वयेन- अथ-अथ कहिये कर्ताकर्म अधिकारके अनंतर, यह प्रत्यक्ष अनुभवगोचर सम्यग्ज्ञानरूप चंद्रमा है, सो स्वयं आपै आप उदयकू प्राप्त होय है । कैसा है तत् कहिये सो प्रसिद्ध कर्म है सो कर्म सामान्यकरि एकही प्रकार है । सो शुभ अर अशुभके भेदतै दोयरूपपणाकू प्राप्त भया है, ताकू एकपणाकू' प्राप्त करता संता, उदय होय है । भावार्थ-अज्ञानते एक कर्म दोय प्रकार दीर्ख था, सो ज्ञान एकाकार दिखाय दिया। बहुरि कया है ज्ञान १ दूरी किया है अतिशयरूप मोहमयी रज जानें,भावार्थ-ज्ञानविपैं मोहरूप रज लागि रह्या था,सो दूरी किया, तव यथार्थ ज्ञान भया । जैसे चंद्रमाकै बादला, तथा पालाका पटल आडा आवै, तब यथार्थप्रकाश होय नाही, आवरण दूरी भये यथार्थ प्रकासै तैसें जानना ।१। आगें पुण्यपापका स्वरूपका द्रप्टांतरूप काव्य कहै है- एको दूरात्यजति मदिरां ब्राह्मणत्वाभिमाना- दन्यः शूद्रः स्वयमहमिति स्नाति नित्यं तयैव । द्वावप्येतौ युगपदुदरान्निर्गतौ शूद्रिकायाः शूद्रों साक्षादपि च चरतो जातिभेदभ्रमेण ॥२॥ स० टी०-दृष्टात तावद् वक्ति-यथा एकः-कश्चित, सदाचरणः मदिरा-सुरा, दूरात-बारात्-त्यजति परिहरति, कुत. ? ब्राह्मणत्वाभिमानात्-एवं 'वय ब्राह्मणाः, ब्राह्मणैस्तु सुरा न पेया' ईहाविधाभिप्रायस्त- स्मात, अन्यः कश्चिदसदाचरणः 'अह स्वय शूद्रः' इति कृत्वा तया-मदिरया, एव-निश्चियेन, नित्य-निरतर, स्नाति-स्नान करोति पानस्य का वार्ता ? अतिशयालंकारोयं, द्वावपि सदसञ्चारिणौ,एतौ-ब्राह्मणशूद्रौ, साक्षात् प्रत्यक्ष, शूद्रौ-अवरवर्णी, शुद्रत्वमनयोः, कथं ? यतः युगपत् सकृत, शूद्रिकायाः-शूद्रभार्यायाः, उदरात- जठरात, निर्गतौ-निष्क्रातो, अथ च अनु च पश्चादित्यर्थः, जातिभेदभ्रमेण-जाते.-सतानस्य भेदः तस्य भ्रम'-भ्राति:, तेन, एको वेत्त्यह द्विजः, एको वेत्त्यह शूद्रः, इत्यभिप्रायत: चरतौ भिन्नाचारमाचरतः, तथा एकपुद्गलनिष्पन्ने शुभाशुभकर्मणी एक शुभ स्वर्गादिदायि, अशुभमपरं नरकगत्यादिदायि, पुनः उभे बधन- हेतुके ॥२॥ . ? 1 1 , . ? पुण्यपापाविकार ६. अर्थ-काहू शूद्री स्त्रीके उदरत युगपत् एकही काल दोय पुत्र निसरे जन्म, तिनिमें एक तो ब्राह्मणके वर पल्ण, ताकै ब्राह्मणपनाका अभिमान भया जो में ब्राह्मण हो, सो तिस अभिमानते मदिराकूदीहीत छोर्ड है, स्पर्श भी नाही है । बहुरि दुजा शूद्र हीके घर रह्यो, सो मैं आप शुद्ध हो ऐसें मानि तिम मदिराकरि नित्य साँच करे है, शुचि माने है। मां याका परमार्थ विचारियं तव दाऊही शूद्रीके पुत्र है जात दोऊ ही शूद्रीके उबरने जन्म हैं सो साक्षात् शूद्र हैं ते जाति भेदक भ्रमकरि प्रगत है, आचरण कर हैं । ऐमैं पुन्यपाप कर्म जानने, विभावपरिणतीतै उपजै, दोऊही बंधरूप हैं, प्रवृत्तिभदकरि दोय दीखे हैं, परमार्थदृष्टि करि कर्म एक ही जानने ॥ हेतुस्वभावानुभवाश्रयाणां सदाप्यभेदान्नहि कर्मभेदः । तद् बंधमार्गाश्रितमेकमिष्टं स्वयं समस्तं खलु बंधहेतुः ॥३॥ स० टी०-हीति-स्फुट, कर्मभेद:-शुभाशुभप्रकृत्योर्भेदो न, कुत. ' हेत्रित्याडि-हेतु:-कारण, स्वभावः- स्वरूपं, अनुभवः-अनुभूति., श्राश्रय, द्व द्व. तेपा सदाप्यभेदात्-शुभाशुभयो केवलाज्ञानमयहतुत्वादेकत्वं, केवलपुद्गलमयहेतुत्वात तयो. स्वभावाभेद' शुभोशुभो वा फलपाक केवलपुद्गलमयः इत्यनुभवाभेदः, केवलपुद्गलमयबंधमार्गाश्रितत्वात् तयोरभेदः, इतिचतुर्विधस्वभावाभेदादेक्य, तत्-तस्मात् चतुर्मि. प्रकार- रेकत्वसंभवात् एक कर्म, इष्ट', पूर्वाचायत कथितमित्यर्थ , स्वय-स्वतः, खलु इति निश्चित, समस्त शुभाशुभं कर्म बंधहेतु:-चतुर्विधवधानां कारण, हेतुगभितविशेपणमिदं, पुनः किंभूत ? वधमार्गाश्रित- मोक्षबंधमागों द्वौ तत्र वधनदशानमाश्रित ॥ ३ ।। अथ सर्वस्यापि कर्मणो बंधहेतुत्वमुशति- अर्थ-हेतु स्वभाव अनुभव आश्रय इनि च्यारीनिके सदाही अभेदतें कर्मविपे भेद नाही ताते बंधका मार्गकू आश्रय करी कर्म एकही इष्ट किया है, मान्या है। जाते शुभरूप तथा अशुभरूप दोऊही आप स्वयं निश्चयते बंधहीका कारण है ॥ ३॥ कर्म सर्वमपि सर्वविदो यद्वन्धसाधनमुशंत्यविशेषात् । तेन सर्वमपि तत्पतिपिद्धं ज्ञानमेव विहितं शिवहेतुः ॥ ४॥ स, टी-यत्-यस्माद्ध तोः उशति-वदति, प्रतिपादयतीत्यर्थ. के ? सर्वविद'-सर्वज्ञभट्टारका. जिनेंद्रा इत्यर्थ , कि ? सर्वमपि समस्तमपि, कर्म-शुभाशुभ कर्म, वधसाधनं-चतुर्विधकर्मवधनकारण, कुतः अविशंषात-शुभाशुभयो. कर्मवधनकारणत्वाभेदात् तेन कारणेन, तत-कर्म, सर्वमपि-समस्तमपि, शुभाशुभ प्रतिपिद्ध-निराकृत, तर्हि किमाइतं ? ज्ञानमेव भेदबोध एव, शिवहेतु शिवस्य-मोक्षस्य, हेतु'-कारण, विहित कथितं, परमागमकोविदः॥४॥ अथ कर्ममार्गनिराकरणे मोक्षावाप्ति विचकयति- अर्थ-सर्वज्ञदेव है ते, सर्वही कर्म, शुभ तथा अशुभकू अविशेपते बंधका कारण कहै है, तिसही कारणकरि सर्वही कर्म प्रतिपेध्या है । मोक्षका कारण तो एक ज्ञानहीकू कहा है अब कह है, जो कर्म सर्वही प्रतिपेध्या है, तो मुनि हैं ते कौनके शरण आश्रय मुनिपद पालैंगे, याके निर्वाह काव्य कहे हैं। ? .

- परमाध्यात्मतराङ्गणों निपिद्धे सर्वस्मिन् सुकृतदुरिते कर्मणि किल प्रवृत्त नैष्कम्यं न खलु मुनयः संत्यशरणाः । तदा ज्ञाने (ते) ज्ञान प्रतिचरितमेषां हि शरणं स्वयं विदंत्यते परमममृतं तत्र निरताः ॥ ५ ॥ संकटो-किल-इति आगमोती, खलु-इति निश्चित मुनयः-मननमात्रभावमात्रतया मुनय.-यती. श्वरा., अशरणाः-शर एयपथवजिताः, न सति-न जायते क सति सर्वस्मिन्-समस्ते, सुकृतदुरिते-शुभाशुभे कर्मणि प्रकृतो, निपिद्ध-निवृत्ते सति, पुनः नैष्कर्ये-कर्मण निष्कातं निष्कर्म, तस्य भावः नैष्कर्म्य, तस्मिन् प्रवृत्त कर्मातीत पथि विजृभिते सनि, हीति-व्यक्तं तदा कर्मधादिममये, एपां योगिना, ज्ञान भेदयोध एव, शरां-आश्रयः, किंभूतं जान जाने-चेतनास्वभावे, प्रतिचरिन-प्रवृत्तं व्यापृतमित्यर्थ., एते-योगिनः, स्वयं-प्रयासनतरेण. विदति-लभते, कि ? परम उत्कृष्ट, परा-उत्कृष्टा मा-बानाधतिशयलक्षणा लक्ष्मीर्यत्र तत्परममिति का अमृत-अपवर्ग, किंभूता. सत ? तत्र-तस्मिन् नाते इनि जाने इति पदमत्र ग्राह्य वा निरता.- निश्शेषमासक्ताः संतः ॥ ५ ॥ अथ ज्ञानस्य शिवहेतुत्वं विध्यापयति- अर्थ-सुकुन कहिये शुभ आचरणरूप कर्म, बहुरि दुरित कहिये अशुभ आचरणरूप कम, ऐसा सर्वही फर्मका निषेध करते सन, बहुरि नैष्फर्म्य कहिये कर्मरहित निवृति अवस्थाकू प्रवर्तते संते, मुनि है ते अशरण नाही है । इहां ऐमी नाही आशंका करनी-जो ए मुनिपद काहै के आश्रय पालेंगे । जिसकाल निवृत्ति अवस्था प्रवृत्ते, निसकाल इनि मुनिनिके ज्ञानविपे लीन भये संते परम उत्कृष्ट अमृत आप स्वयं भागये है। भावार्थ-सर्व कर्मका त्याग भये ज्ञान का वडा शरण है। तिस ज्ञानम लीन भये सर्व आकुलतारहित परमानन्दका भोगना होय है, याका स्वाद ज्ञानीही जाने हैं । अज्ञानी कपायी जीव कर्महीकू' सर्वस्त्र जानि तामें लीन है, ज्ञानानंदका स्वाद नाहीं जान है। - यदेतज्ज्ञानात्मा ध्रुवमचलमाभाति भवन शिवस्यायं हेतुः स्वयमपि यतस्तच्छिव इति । अतोऽन्यवधस्य स्वयमपि यतो वंध इति तत् ततो ज्ञानात्मत्वं भवनमनुभूतिर्हि विहितं ॥६॥ स. टी-न-निश्चितं, यत्-यस्मात्कारणात एतत्-प्रसिद्ध, शिवस्य साकल्याणरूपस्य मोक्षस्य, भवन-गृहं स्थानमिति यावत् । किंभूतं ? अवलं-निश्चल-अनंतकालस्यायित्वान् स इत्यध्याहारः, ज्ञानात्मा- नानमयात्मा, आमाति-चकास्ति-शोभते, अपि-पुनः यतः यस्माद्धेतोः अयं-ज्ञानात्मा, स्वयं-स्वभावतः हेतुः-शिवस्य कारणं, तत् तस्मात्-स्वयं शिवात्मकत्वात्, शिवहंतुत्याच शित्र इति कीर्तितः, तथाऽज्ञानम- भिधत्वे यतः-यम्मादतोः, अनः-ज्ञानात्मन., अन्यत्-भिन्न-अज्ञानात्मा, बब-ब-कर्मबंधस्य, भवनम् आमाति, अपि-युन, स्वय-वन., अवस्य हेतुने भज्ञादं वत्-उस्मात् बंधारमयात्-धहेतुत्वाच्च गंध ?

- - है . पुण्यपापाधि कार इति अज्ञानात्मा बध इति कीर्तित , हीति स्फुट तत -तस्मात् कारणात, स्व-स्वकीयं, भवन-प्रवर्तनं, जाना- रमजानस्वरूप, विहितं प्रतिपादित, परमार्थपडित किंभूत अनुभूति'-स्वस्थानुभवन अनुभूति', अजह- ल्लिगवृत्तित्वात्पुल्लिगे ॥ ६॥ अथ ज्ञानस्य वृत्तत्वमनुवर्ण्यते- अर्थ-जो यह ज्ञानम्वरूप आत्मा ध्रुव है सो जब निश्चल अपने ज्ञानम्वरूप होता सोहे है, सोही यह मोक्षका कारण है। जाते आप स्वयमेव ही मोक्षस्वरूप है। बहुरि या सिवाय अन्य है सो बंधका कारण है । जातै सो आप स्वयमेव बंधस्वरूप है, ता” ज्ञानस्वरूप अपना होना सोही अनुभूति है, ऐसे निश्चयौं बंधमोक्षका हेतुका विधान किया है ॥६॥ वृत्तं ज्ञानस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं सदा । एकद्रव्यस्वभावत्वान्मोचहेतुस्तदेव तत् ॥७॥ सं० टी-सदा-निरंतरं, वृत्त चारित्र , ज्ञानस्वभावेन-रागादिपरिहरणलक्षणबोधस्वरूपेण, ज्ञानस्य- भेदबोधस्य, आत्मनो वा भवनं-प्रवर्तन, अवस्थानं वा, स्वात्मनि स्थिति -श्रात्मनि चारित्रमिति वचनात् । ननु ज्ञानचारित्रयोरेषत्व कथं तयो परस्पर भिन्नत्वात् १ इति चेत्सत्य एकद्रव्यस्वभावत्वात्-एकद्रव्य- मात्म द्रव्य, ज्ञानचारित्रयोस्तस्य स्वभावत्वात् ज्ञानभवनतत्स्वभावेन भवनात् , ज्ञानपूर्वक त्वाच्च तस्य, तत् तस्माद्धतोः, तदेव-निश्चयचारित्रमेव नान्यत् मोक्षहेतु-मोक्षकारणं ।। ७ ॥ अथान्याभिमतक्रियाकाडस्य वृत्तत्वं निरुणद्धि- वृत्तं कर्मस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं नहि । द्रव्यांतरस्वभावत्वान्मोतहेतुर्न कर्म तत् ॥८॥ सं० टी-कर्मस्वभावेन-बनतप प्रभृतिकर्म-क्रियाकाडं तत्स्वभावेन वृत्त-चारित्र ज्ञानस्य- भवन,प्रवर्तन अनुचरण न भवन् ज्ञानभवनस्याभवनात् , कुतः द्रव्यातरस्वभावत्वात् दृव्यातरस्य-श्रात्मद्र- व्यादन्यद्रव्यम्य स्वभाव-स्वरूप तस्य भावस्तत्व तस्मात् तत क्रियाकांड कर्म-आचरण, मोक्षहेतुः, मोक्षस्य हेतु -कारण न भवेत् ॥ ८ ॥ श्रथ क्रियाकाडस्य मोक्षहेतुत्व कुतो नेनि जजलप्यत- अर्थ-जो ज्ञानग्बभावकरि वर्तना जानका होना है सो ही मोक्षका कारण है । जाने ज्ञान के एक आत्मद्रव्यका स्वभावपणा है। बहुरि जो कर्मस्वभावकरि बनना है, सो ज्ञानका होना नाही, सो कर्मका वर्तना मोक्ष का कारण नाही जातै कर्मक अन्यद्रव्यका स्वभावपणा है । भावार्थ-मोक्ष आत्माकै होय है, मो आत्माका स्वभावही मोक्षका कारण है ।। बहुरि कर्म है सो अन्यद्रव्य जो पुद्गलद्रव्य ताका स्वभाव है, सो आत्माकै मोक्षका कारण नाही होय है, यह निश्चय है ।। ७-८ ॥ मोक्षहेतुतिरोधानाद्वंधत्वात् स्वयमेव च । मोचहेतुतिरोधायिभावत्वाचन्निषिध्यते ॥ ६ ॥ -बोधस्य, - है ७२ परमाध्यात्मतरङ्गिणी - सं० टी०-तत-क्रियाकांड, निषिध्यते-निवार्यते, कुतः ? मोक्षेत्यादि-मोक्षस्य-मुक्तेः, हेतुः-कारणं स्वात्मध्यानादि, तस्य तिरोधानं-अपवारणं, तस्मात् क्रियाकांडपरिणतस्य ध्यानानवकाशात्, स्वयमेव-स्वत एव, बंधत्वात्-कर्मबंधस्वभावत्वात्, च-पुनः, मोक्षेत्यादि-मोक्षस्य हेतुः-कारण-शुद्धध्यानादिः नम्य तिरोभावं दधातीत्येन शीलो भावः स्वभावो यस्य तस्य भावस्तत्व तस्मात् शुभकर्मकारकपरिणामात्रि- र्भावात् ।। ६ ।। अथ समस्तामपि कर्मतितिक्षा सलक्षयति- अर्थ-कर्म है सो मोक्षके कारणका तिरोधान है-आच्छादन करनेवाला है अर आप स्वयमेव बंधस्वरूप है। बहुरि मोक्षका कारणका तिरोधायीभावपणा याकै है । ऐसे तीन हेतुते सो कर्म निपेधिये है ॥ संन्यस्तव्यमिदं समस्तमपि तत्कर्मैव मोक्षार्थिना संन्यस्ते सति तत्र का किल कथा पुण्यस्य पापस्य वा। सम्यक्त्वादिनिजस्वभावभवनान्मोक्षस्य हेतुर्भव- न्नैष्कर्म्यप्रतिबद्धमुद्धतरसं ज्ञानं स्वयं धावति ॥ १० ॥ सं० टी०-तदिद-प्रसिद्ध, समस्तमपि-निखिलमपि, कर्म-ज्ञानावरणादि प्रकृतिः, संन्यस्तन्य-त्याज्य मेव निश्चयेन, केन ? मोक्षार्थिना-कर्मणां मोचनं-मोक्षः, स एवार्थः प्रयोजन पदार्थो वा यस्य स तेन क्लेित्यागमोक्तौ पुण्यस्य-शुभकर्मणः, का कथा-का वार्ता ? न कापि वा-अथवा पापस्य-अशुभकर्मणः -कर्मणि, सम्यस्ते-त्यक्ते सति, पुनस्तथा सति ज्ञानं-भेदबोधः, स्वयं-स्वतः, धावति-शुद्धयति--शुद्ध भवति, उल्लसति वा धावु गतिशुद्धयोरेतस्य धातो. प्रयोगः, किभूतं ? उद्धनरसं उत्कटस्वभाग, पुनः-नैष्कर्म्यप्रतिबद्ध-नैष्कhण कर्मातीतत्वेन, प्रतिवद्ध संबंद्ध, पुनः-मोक्षस्य मुक्त, हेतु कारण भवत्-जायमानम, कुतः १ सम्यक्त्वेत्यादि-सम्यक्त्वां नत्त्वश्रद्धान, आदिशब्दात् ज्ञानचारि- त्रादि स एव निजस्वभाव.-श्रान्मस्वरूपं तेन भवनं-आत्मस्वरूपेण जायमानत्वमित्यर्थः तस्मात् ।। १० ॥ अथ कर्मणामभावे ज्ञानभाव इति प्ररूपयति-- अर्थ-मोक्षके अर्थी पुरुपकू यह सक्षस्त कर्म त्यागने योग्य है, ऐसे तिससमस्तही कर्मक छोडे संते पुण्य अथवा पापकी कहा कथा है ? कर्मसामान्यमें दोऊ आय गये । ऐसे समस्तकर्मका त्याग भये ज्ञान है सो सम्यक्त्व आदिक जो अपना स्वभाव, निसरूप होनते मोक्षका कारण होता संता कर्मरहित अवस्थासे प्रतिवद्ध उद्धत है रस जाका ऐसा आप आप दौड्या आत्रै है। भावार्थ-कर्मको पटकि ज्ञान आप आप अपना मोक्षका कारणस्वभावरूप भया संता प्रगट है, फेरि कौन रोकै ? आगै आशंका उजै है, जो अविरतसम्यग्दृष्टि आदिके जेने कर्मका उदय रहै, तेतै ज्ञान मोक्षका कारण कैसे ? कर्म अर ज्ञान दोऊ लार कैसे रहै ? ताका समा; धानकू काव्य कहै है- यावत्पाकमुपैति कर्मविरतिर्ज्ञानस्य सम्यङ न सा का . .

. ॥ पुण्यपापाधिकार ७३ कर्मज्ञानसमुच्चयोऽपि विहितस्तावन्न काचित्वातिः ॥ किं त्वत्रापि समुल्लसत्यवशतो यत्कर्म बंधाय त- मोक्षाय स्थितमेकमेव परमं ज्ञानं विमुक्त स्वतः ॥ ११ ॥ सं० टी०-यावत्पर्यंत सा प्रसिद्धा, कर्मविरति:-कर्मणा विरतिः विरमण, सम्यक्-यथोक्त', पाक-परि- पूर्णतां न उपैति न याति, तावत्पर्यतं कर्मेत्यादि कर्म च ज्ञान च कर्मनाने तयो समुच्चयः समुदायः, विहितः कथित', अपि-पुनः, तावत्-ज्ञानकर्ममेलापपर्यंत काचित् क्षतिः-कर्मणां क्षयो न भवेत, अपि-पुनः, किमु विशेषोऽस्ति ? अत्र-वर्मनानसमुच्चययोर्मध्ये यत् कर्म तत् अवशतः-अवश्यभावात् बाधाय कर्मब- धनकृते समुल्लसति समुल्लासं गच्छति, विजृ भत इति यावत् , पुनरत्रापि यदा एकमेव कर्मनिरपेक्ष-केवलं यत्-ज्ञान-बोधः, तत् , मोक्षाय-मुक्तये स्थित प्रतिष्ठं, किंभूतं ? परम-उत्कृष्ट स्वतः-स्वभावेन विमुक्त' कर्मभिः ॥ ११ ॥ अथ नयावलवित्वमुपशाम्यति- अर्थ-जेतै कर्मका उदय है अर ज्ञानकी सम्यक विरति नाहीं है तेतै कर्मका अर ज्ञानका समुच्चय कहिये एकट्ठापणा भी कह्या है, तेतै यामै कछू हानि नाहीं है । इहां विशेष ऐसा जो इस आत्मावि जो कर्मके उदयकी बरजोरीत आत्माके वशविना कर्म उदय होय है, सो तो बंधक ही अर्थी है । बहुरि मोक्षके अर्थि एक परमज्ञान है, सोही है। कैसा है ज्ञान ? कर्मतै आपहीत रहित है कर्मके करनेवि आपका स्वामीपणारूप कर्तापणाका भाव नाही है ।। भावार्थ-जेते कर्म उदय है तेतै कर्म तो अपना कार्य करें है, अर तहाँही ज्ञान है, सो अपना कार्य कर है, एक ही आत्मामै ज्ञान अर कर्म दोऊ एकटे रहनेमेभी विरोध नाही है । मिथ्याज्ञान सम्यग्ज्ञानकै जैसे विरोध है, तैसे कर्मसामान्यकै अर ज्ञानकै विरोध नाही है ॥ ११ ॥ आगै कर्मका अर ज्ञानका नयविभाग दिखावै है- मग्नाः कर्मनयावलंबनपरा ज्ञानं न जानति ये मग्ना ज्ञाननयैषिणोऽपि सततं स्वच्छंदमंदोद्यमाः। विश्वस्योपरि ते तरंति सततं ज्ञानं भवंतः स्वयं ये कुर्वति न कर्म जातु न वशं यांति प्रमादस्य च ।। १२ ॥ स० टी०-मग्नाः-भवार्णवे निमग्नाः, के ? कर्मेत्यादिः-कर्म व्रततपश्चरणादिक्रियाकाडं, तदेव नयः पक्षः कर्मणैव मोक्षसाध्यत्वात इति पक्षः-तस्य अवलंबन अगीकार', तत्र परास्तत्परा-सावधानाः क्रियावा- दिन इत्यर्थः, तथा चोक्त- क्रियाश्च शतधाशीतिश्चनस्रोऽशीतिरक्रियाः । अज्ञाना. सप्तपष्टिश्च द्वात्रिंशद्विनयाश्रिताः । इति कुतः ? यत्-यस्माद्ध तोः ते ज्ञानं भेदबोध, न जामति न विदति, अपि पुनः, ज्ञानेत्यादि ज्ञानं बोधस्तदेवत नयः, ज्ञानव्यतिरिक्त न किंचिदस्ति यथा इष्ट चरेत् तिष्ठेदित्यादि. ज्ञानाद्वैतवादिपक्ष , ज्ञाने सति साध्यसिद्धिर्न तु तत्र ध्यानमिति वा पक्षः नमिच्छतीत्येव शीलाः, जाननगेषिणः, मग्ना भवार्णवे, कुतः ? १० ?

७४ - परमाध्यात्मतरङ्गिणी यत--यस्माद्ध तोः, अतीत्यादिः यं अति-स्वच्छंदेन-स्वेच्छाचारेण प्रमादमांधकरणे मंदः उद्यमः उद्योगो येषां ते, स्वं ज्ञात्वा ध्याने मंदा इत्यर्थः, तर्हि के उन्मग्नाः १ ते-पुरुपा, विश्वस्य जगतः, उपरि तरंति. जगदतिशायिनो भयंतीति तात्पर्य, ते के ? ये पुरुषाः, जातु वदाचित, कर्मक्रियाकांड न कुर्वति न विद्धति किंभूता' सत्त. १ स्वयं कालक्षेत्रादिनिरपेक्षत्वेन, सततं प्रतिक्षणं, ज्ञानं भेदविज्ञानं, भवंत' अनुभवंतः, बोधमयाः-जायमाना वा, च-पुनः, वशं-अधीनत्वं न यांति-न प्राप्नुति, कस्य-प्रमादस्य, सदा ज्ञानानु. भवनं कर्मप्रमादपरिहरणं मोक्षार्थिन उक्त ॥ १२ ॥ अथ ज्ञानज्योतिषो विजृभण बंभणीति- अर्थ-जे केई कमनयके अवलंबनविपे तत्पर है, ताक पक्षपाती हैं, ते डूब जाते, जे ज्ञानकू जानही नाही बहुरि जे ज्ञाननयके इच्छक है पक्षपाती हैं, तेभी डूबे जाते, जे-क्रियाकांडको छोडि स्वच्छंद होई प्रमादी होय स्वरूपविपे मंद उद्यमी हैं । बहुरि जे आप निरंतर ज्ञानरूप होते कर्मकू तौ नाही करै हैं अर प्रमादके वश नाही होय है स्वरूपमें उत्साहवान हैं ते सर्वलोकके उपरि तरै है। भावार्थ-इहां सर्वथा एकांत अभिप्रायका निषेध कीया है, जातै एकांतका अभिप्राय है, सोही मिथ्यादृष्टि है । तहाँ जे परमार्थभूत ज्ञानस्वरूप आत्माकू तो नाहीं जाने हैं अर व्यवहार-दर्शनज्ञानचारित्ररूप क्रियाकांडके आडंबरहीकू मोक्षका कारण जाणि, तिसहीविपे तत्पर रहै हैं, ताका पक्षपात करै है यह कर्मनय है याके पक्षपाती ज्ञानकू' तौ जाने नाही अर इस कर्मनयहीविषे खेदखिन्न है ते संसारसमुद्रमें डूबे है । बहुरि जे परमार्थ- भूत आत्मस्वरूपकू यथार्थ तो जान्या नाही अर मिथ्यादृष्टि सर्वथा एकांतिनिके उपदेशकरि तथा स्वयमेवही किछू अंतरंगविषे ज्ञानका स्वरूप मिथ्या कल्पि तिसविपे पक्षपात करै हैं अर व्यवहारदर्शनज्ञानचारित्रका क्रियाकांडकू निरर्थक जानि छोडि स्वेछाचारी रहै हैं स्वरूपविषे मंद उद्यमी रहै हैं । तातै जे पक्षपातका अभिप्राय छोर्ड निरंतर ज्ञानरवरूप होते कर्मकांडकू छोडे हैं, अर निरंतर ज्ञानस्वरूपविषे जेतै न थाम्या जाय तेतै अशुभकर्मकू छोडि स्वरूपका साधन रूप शुभकर्मकांडविपे प्रवर्ते हैं ते कर्मका नाश करि, संसारतै निवृत्त होय है, ते सर्व लोकके उपरि वर्ते है, ऐसा जानना ॥ आगै इस पुण्यपापाधिकारकू सम्पूर्णकरि अर ज्ञानकी महिमा 1 भेदोन्मादं भ्रमरसभरान्नाटयत्पीतमोहं, मूलोन्मूलं सकलमपि तत्कर्म कृत्वा बलेन । हेलोन्मीलत्परमकलया सार्धमारब्धकेलि, ज्ञानज्योतिः कवलिततमः प्रोज्जभे भरेण ॥ १३ ॥ सं० टी०-भरेण-अतिशयेन, ज्ञानज्योतिः समस्ताखडज्ञानज्योतिः प्रोज्जजभे रूपकालकारोय । पुनः हेलोन्मीलत्-हेलया-लीलया, उन्मीलत्-उत्प्रकटयत , पुन. आरब्धकेलि-श्रारब्धा-प्रारंभविषयीकृता केलिः क्रीडा येन तत् , साधु-सम, कया ?. परमकलया परमा-उत्कृष्टा चासौ क्ला च दर्शनाद्यशः, मुक्तिकला वा ।

? " - - आनेवाधिकार ७५ तया, किं कृत्वा ? बलेन-हठात्कारेण, व्यानलक्षणेन, सकलमपि समस्तमपि, प्रकृत्यादिचतु स्वभावमपि, तत् प्रसिद्ध कर्मज्ञानाचरणादिप्रकृति', मूलोन्मूलं-मूलेन बुध्नेन,, उन्मूल-मूलतलनाश कृत्या, किंभूत ? भेदोन्माद भेटेन पुण्यपापविशेपेण, उन्माद-उन्मत्त पुन. पीतमोह-पीत -पानविपयीकृतः मोह.-मोहनीयं कर्म येन पुरुपेण त प्राणिन नाटयत्-भवरंगावनौ मनुष्यतिर्यगादिविशेषेण नृत्या कारयत् , कुतः ? भ्रम रसभरात्--ममेद, हमस्येत्यादि भ्रातिरसवेगात् । अन्योऽपि नट भ्रमणादिरसादपरं नाटयनि इत्युक्तिलेशः ।। १३॥ अर्थ-ज्ञानज्योति है सो अतिशयकरि उदय प्राप्त होता भया सर्वत्र फैल्या । कैसा है लीलामात्रकरि उघडी जो अपनी परमकला केवलज्ञान, तिससहित आरंभी है क्रीडा जाने, इहां भावार्थ ऐमा, जो जेते सम्यग्दृष्टि छद्मस्थ है तेते तो ताका ज्ञान परमकला जो केवलज्ञान, तिससहित शुद्धनयके बलतें परोक्ष क्रीडा कर है वहुरि केवलज्ञान उपजे तव साक्षात् है । वहुरि कैसा है ? ग्रासीभूत किया है दूरी किया है अज्ञानरूप अंधकार जाने । सो यह ऐसा ज्ञानज्योति पहले कहा करि प्रगट भया है ? पूर्वोक्त शुभ अशुभरूप समस्तकर्म, ताकू अपना बल जो वीर्य- शक्ति, ताकरि मूलतै उन्मूल कहिये उपाडिकरि । कैसा है यह कर्म ? पीया है मोह जाने । याहीत भ्रमके रसके भारत शुभ अशुभका भेदरूप उन्मादकू नचावता संता है। भावार्थ-ज्ञान- ज्योति है सो अपना प्रतिबंधक कर्म था सो भेदरूप होय नृत्य करे था, ज्ञानकू भुलावा दे था, ताकू अपनी शक्तिकरि विगाडि आप अपना सम्पूर्ण रूपसहित प्रकाशरूप भया। इहां आशय ऐसा जानना-कर्म सामान्यकरि एक ही है, तथापि शुभ अशुभ दोय भेदरूप स्वांग करी रंग- भूमि में प्रवेश कीया था, ताकू ज्ञान यथार्थ एक जान लिया, तब कर्म रंगभूमि निकसि गया, ज्ञान अपनी शक्तिकरि यथार्थप्रकाशरूप भया, ऐसे जानना ।। एसे कर्म है सो नृत्यके अखाडेमैं पुण्यपापरूपकरि दोय नृत्यकारिणी वनी नाचे था,सो ज्ञान यथार्थ जानि लिया-जो,कर्म एकही है, तब एकरूपकरि निकसी गया, नृत्य करता रह गया । आश्रय कारण रूप सवादसुभेद विचारि गिने दोऊ न्यारे। पुण्य रुपाप शुभाशुभभावनि बंध भये सुखदुःख करारे ॥ ज्ञान भये दोऊ एक लखै बुध आश्रय आदि समान विचारे । बंधके कारण हैं दोउरूप इन्है तजि श्रीजिन मोक्ष पधारे ॥१॥ इति श्रीसमयसारपद्यस्याध्यात्मतरगिणीनामधेयस्य व्याख्याया पुण्यपापैकत्वनिरूपकस्तृतीयोकः ॥ ३॥ ऐसे इस अध्यात्मतरंगिणीनामा टीकाकी वचनिकाविर्ष तीसरा पुण्यपाप नामा अधिकार पूर्णभया प्रास्त्रवाधिकारः॥४॥ शुभचंद्रामृतचंद्रो भिनत्ति यत्तामसं सुतच्चेषु । पुण्येतरेषु च तद्धि न भिद्यते दीपचंद्राः ।।

॥ १ ७६ परमाध्यात्मतरंगिणी शुभं-प्रशस्तं पुन्यादि चंद्रयति--आह्लादयति इति शुभचंद्रः स चासौ अमृतचंद्रश्च इति व्याख्यानं विधेयं । अथास्तवमाश्रयति- दोहा-द्रव्यास्रवतें भिन्न ह, भावात्रव करि नास | भये सिद्ध परमातमा, नमू' तिनहि सुखास ॥ अब इहां आस्रव प्रवेश कर है ।। जैसैं नृत्यके अखाडेमैं नाचनेवाला स्वांग करी प्रवेश करें तैसे इहां आस्रवका स्वांग है तहां इस स्वांगकू यथार्थ जाननेवाला सम्यग्ज्ञान है , ताकी महि- मारूप मंगल कर है- अथ महामदनिर्भरमंथरं, समररंगपरागतमात्र । अयमुदारगभीरमहोदयो, जयति दुर्जयबोधधनुर्धरः॥ १ ॥ सं० टी०-अथ-पुण्यपापतत्त्वकथनानंतर, अयं-प्रसिद्धः दुर्जयबोधधनुर्धर.-दुखेन जीयते इति दुर्जयः स चासौ बोधश्च ज्ञान स एव धनुर्धर:-धानुष्कः, जयति, क ' आस्रवं, आस्रवर्ति कर्म येन स प्रास्रवरत निराकरोतीत्यर्थः, किंभूतः ? उदारेत्यादिः-उदारः-उत्कटः स चासौ गभीरश्च-अलब्धमध्या,- महानुदयो यस्य स., किंभूतं त ? महेत्यादिः महांश्चासौ मदश्च-अहंकारस्तस्य निर्भरः अतिशयः, तेन मथर:-मेदुरः तं, पुनः कीदृक्ष ? समरेत्यादि.-समरः सग्रामस्तस्य रगः-अगणं, तत्र श्रागतः-समुपस्थितः त, ज्ञानपराभवार्थमुद्य क्तमित्यर्थः ॥ १॥ अथ ज्ञाननिवृत्त भानं समुत्साहयति- अर्थ-अथ शब्द तौ मंगल तथा प्रारंभवाची है । सो इहांते आगे कहै है। जो काहकरि जीत्या न जाय ऐसा यह अनुभवगोचरज्ञानरूा सुभट धनुपधारी है, सो आस्रव है ताहि जीते है । कैसा है ज्ञानरूप सुभट ? उदार कहिये अमर्यादरूप फैलता अर गंभीर कहिये जाका छन्- मस्थ थाह न पावे ऐसा है महान उदय जाका ।। बहुरि आस्रव कैसा है ? महान जो मद ताकरि अतिशयकरि भरचा मंथर है उन्मत्त है बहुरि कैसा है समररंग कहिये संग्रामभूमि ताविप आया है । भावार्थ-इहां नृत्यके अखाडे मैं आश्रव प्रवेश कीया सो नृत्यमें अनेकरस वर्णन होय है, तातै रसवत् अलंकारकरि शांतरसमै वीररस प्रधानकरि वर्णन कीया है । जो ज्ञानरूप धनु- पधारी आस्रवकू जीते है, सो आश्रव सर्व जगतकू जीति मदोन्मत्त भया संग्रामकी रंगभूमीमें आय खडा रह्या, तब ज्ञान यास भी बलवान् सुभट है, सो तत्काल जीत है, अंतर्मुहूर्तमें कर्मका नाशकरि केवलज्ञान उपजा है। ऐसा ज्ञानका सामर्थ्य है । भावो रागद्वीपमोहैर्विना यो जीवस्य स्याज्ज्ञाननिवृत्त एव । रुंधन सर्वान् द्रव्यकर्मास्रवौघानेषोऽभावः सर्वभावात्रवाणां ॥२॥ स० टी०-एष:-कथ्यमानः, अभावः स्याद् भवेत,-केपां ? सर्वेत्यादि-सर्वे च ते भावात्रवाश्च रागद्वेष- मोहाचाः तेषा,एप कः ? यः,एव-निश्चयेन,जीवस्य-प्राणिनः, ज्ञाननिवृत्तः-ज्ञानमयः,भाव.-चित्परिणामः, राग- ? - ७७ ? क ? , नवाधिकार द्वपमोह:-राग:-रतिः, द्वेष.-अरतिः, मोह.-ममता, द्व द्व', तैर्विना-अतरेण, कि कुर्वान् ? रु धन्-निवा- रयन, कान ? सर्वान्-समस्तान्, द्रव्येत्यादि -द्रव्यकर्मणा-ज्ञानावरणादिप्रकृतीना, आसवौधान्-मिथ्यात्वा. विरतिकपाययोगसमूहान् । रागद्वपमोहानामिह स्वपरिणामनिमित्तत्वात् अजड़त्वे सति चिदाभासत्वात् भावास्रवला, मिथ्यात्वाविरतिकपाययोगाना पुद्गलपरिणामानां ज्ञानावरणादिपुगलकर्मास्रवणनिमित्तत्वाद् द्रव्याखवला ॥२॥ अथ ज्ञानिनो निराश्रवली प्रहधीति- अर्थ-जो जीवका रागद्वपमोहविना भाव होय है, सो भाव ज्ञानहीकरि रचा हुआ है सो यह भाव है सो सर्व द्रव्यास्रवनिक रोकता संता है, तातै सर्वही भावास्रवनिका अभाव कहिये भावार्थ-पूर्वोक्तही जानना ॥ इहां सर्व भावास्रवनिका अभाव कह्या सो संसारका कारण मिथ्यात्वही है तिस संबंधी रागादिकका अभाव भया, सो सर्वभावासवका अभाव भया ।। भावाखवाभावमयं प्रपन्नो द्रव्यास्रवेभ्यः स्वत एव भिन्नः । ज्ञानी सदा ज्ञानमयैकभावो निरास्रवो ज्ञायक एक एव ॥ ३ ॥ स० टी०-श्रय-ज्ञानी-भेदज्ञ', निरास्त्रव एव-द्रव्यभावात्रवेभ्यो निवृत्त एव, एक:-अद्वितीय नायकः, किंभूत. १ मदा नित्य,ज्ञानमयैक्भाव.-ज्ञानेन निवृत्तः ज्ञानमय. म एव एको भावः स्वभावो यस्य स',किंभूतः भावासवाभान-भावात्रवाणा रागद्वपादीना, अभाव प्रपन्न -प्राप्त , यावत्पर्यंत रागद्वेपास्तावान ज्ञायकला अतः ज्ञायत्वे मति रागढ पलक्षणभावास्रवाभाव., पुनस्तत एव-स्वभावत एव, द्रव्यास्रवेभ्य -मिथ्यात्वा- दिभ्यो भिन्नः पृथग्भूत', ये पूर्वमज्ञानेन मिथ्यात्वादयो द्रव्याखवा बद्धास्ते ज्ञानिनो द्रव्यातरभूता अचेतन- पुद्गलपरिणामत्वात् पृथ्वीममा अचेतनास्ने तु स्वत. कार्मणशरीरेणैव सबद्धा नत्वात्मना, अतः सिद्ध. स्वभावतो जानिनो द्रव्याखवाभाव', वुद्धिपूर्वकरागद्वेषमोहस्पावभावाभावान्निराश्रव एव ॥ ३ ॥ अथ ज्ञानिनो निराम्रयता नियम्यते- अथ-यह ज्ञानी है सो भावासबके अभावकू ती प्राप्त मया है । बहुरि द्रव्यास्रवनि” स्वयमेवही भिन्न है जात जानी है, सो सदा ज्ञानमयीही है केवल एक भाव जाका ऐसा है, या निरास्रवही है, एक ज्ञायक ही है। भावार्थ-भावास्रव जे राग द्वप मोह तिनिका तौ ज्ञानीकै अभाव भया। अर द्रव्यास्रव हैं, ते पुद्गल परिणाम है तिन” सदाही स्वयमेव ही भिन्न है तारौं ज्ञानी निरासव ही है।। संन्यस्यन्निजबुद्धिपूर्वमनिशं राग समग्न स्वयं वारंवारमवुद्धिपूर्वमपि तं जेतुं स्वशक्तिं स्पृशन् ।। उच्छिंदन परवृत्तिमेव सकलां ज्ञानस्य पूर्णो भव- नात्मानित्यनिरास्रवो भवति हि ज्ञानी यदा स्यात्तदा ॥ ४ ॥ म०टी०-हीति व्यक्त, आत्मा-चिद्रूप., यदा-यस्मिन काल नित्य निरास्त्रवः-निरतरमानवभा. वातीतः, भवति-जायत, तदा तस्मिन् समये, ज्ञानी सकलवस्तुपरिच्छेदकज्ञानयुक्तः स्याद्-भवेत्, ननु ७८ ? परमाध्यात्मतर्राणी ससारदशायां कथ निरास्रवत्वमिति चेत् ? अनिश नित्य स्वय वर्तृत्वेन समग्र-समस्त, रागद्वेषमोहग्राम भावासभ संन्यस्यन्-त्यजन्-परिहरन्, निजबुद्धिपूर्व-स्वबुद्धपूर्वक-स्वाभिप्रायपूर्वकं रागं त्यजन्नित्यर्थः, अपि-पुनः,तं-द्रव्यरूपमिथ्यात्वाद्यास्रा,अबुद्धिपूर्व पूर्वनिबद्धाचेतनास्रा-स्वाभिप्रायातिरिक्त, सूक्ष्म-अज्ञान- स्वरूप, अकपायिणामानवसहक्षा वा अबुद्धिपूर्व, वारं वार-पुनः पुनः, जेतु-जयार्थ-नाशार्थमित्यर्थः, स्वश- क्ति स्वस्य आत्मनः शक्ति-सामर्थ्य,स्पृशन्-स्वसाकुर्वन् ,पुनः किंकुर्वन् ? उच्छिदन-उद्भिदन् ममूल कर्पनि. त्यर्थः, कां ? सकला-समस्तां एव-निश्चयेन, परवृत्ति--परेपु-यात्मव्यतिरिक्तपदार्थेपु वृत्ति -प्रवर्तना तां, तत्रानुचरणमिति भावः, पुनः पूर्ण:-परिपूर्णः समग्र इत्यर्थः, भवन-जायमानो भावः कस्य ? ज्ञ. नस्य वस्तु. विशेषग्राहकस्य ॥ ४ ॥ अथ ज्ञानिनो द्रव्यप्रत्यय सति न निरासवत्वमिति पूर्वपक्षपूर्वकं पद्यद्वयन प्रत्युत्तरयति- अर्थ-यह आत्मा जव ज्ञानी होय है तब अपने बुद्धि पूर्वक राग तो समस्तकू' आप दूरि करता संता निरंतर प्रवत्त है, वहुरि अबुद्धिपूर्वक रागभी जीतनकू वारंवार अपनी ज्ञानानुभवनरूप शक्तीकू स्पर्शता संता प्रवर्ते है बहुरि ज्ञानकी पलटनी है ताकू समस्तहीकू दूरी करता संता ज्ञानकू स्वरूपविणे थांमता पूर्ण होता संता प्रवर्ते है। ऐसा ज्ञानी होय तब शाश्वता निरास्रव होय है ।। भावार्थ तो सुगम है-जब समस्तराग हेय जान्या तव ताका मेटनेहीका उद्यमी भया प्रवते हैं । तब सदा निरानव ही कहिये जाते आस्रव के भावनिकी भावनाका अभिप्रायका याकै अभाव है। बहुरि इहां बुद्धिपूर्वक अधुद्धिपूर्वक दोय सूचना है । एक नौ जो आप कीया न चाहै अर परनिमित्त जबरी होय ताकू आप जाणेभी तोऊ ताक् बुद्धि पूर्वक कहिये । बहुरि दुजा जो अपने ज्ञानगोचरही नाही प्रत्यक्षज्ञानी जाने है। तथा ताकै अविनाभाविचिन्हकरि अनुमान” जानिये सो अबुद्धिपूर्वक है ऐौं जानना ।। ४ ।। आगें पूछे है जो सर्वही द्रव्यास्रवकी संततीकू जीवते ज्ञानी निरास्रव कैसे ? ऐसे प्रश्नका श्लोक है विशेप-संस्कृत टीकाकारने " जिससमय यह आत्मा निरंतर आस्वभावसे रहित होजाता है उससमय ज्ञानी-संसारके समस्तपदार्थों का भलेप्रकार जानकार होता है। यह अर्थ किया है और पं० जयचंद्रजीने-'जिससमय यह आत्मा ज्ञानी हो वुद्धिपूर्वक राग आदिको दूरकर प्रवृत्ति करता है उससमय इसके शाश्वत निरास्रव होता है। यह अर्थ किया है यद्यपि यहां विरोधसा तो प्रतीत होता है परन्तु वास्तबमे कुछ विरोध नहीं है क्योंकि संस्कृत टीकाकारने ज्ञानीका केवल ज्ञानी अर्थ अभीष्ट रक्खा है और भापाटीकाकारने ज्ञानीपदसे भेदविज्ञानी अर्थ लिया है तथा प्रकृतमें दोनोंही अर्थ उत्तम हैं ॥ ४ ॥ सर्वस्यामेव जीवंत्यां द्रव्यप्रत्ययसंततौ । कुतो निरासवो ज्ञानी नित्यमेवेति चेन्मतिः ॥ ५ ॥ सं० टी०-ननु ज्ञानी-भेदज्ञ., नित्य, निरासवः-आस्रवरहितः कुतः ? न कुतोऽपि । क सत्यां ? सर्वस्यां समस्ताया अपि, द्रव्यप्रत्ययसततौ-द्रव्यप्रत्ययाना-पुद्गतरूपनिबद्ध मथ्यात्वादोना, संततिः-संतानं - ७६ . , श्रास्त्रवाधिकार तस्यां जीगत्या-विद्यमानाया मत्यामव । अथ तदा तदुदयाभावान्निरानव इति भएयते तदप्यमत, यतः सदवस्थायां पूर्वमनुपभोग्यत्वेऽपि तदात्वपरिणीतवालस्त्रीवत, विपाकावस्थायामुपभोग्यत्वात उपभोगप्रा- योग्यं पुद्गलकर्म प्राप्तयोवनपूर्वपरिणीतस्त्रीवत् इति न निरास्त्रवत्वमिति चेत ते मति-मनीपा ॥ ५ ॥ तत्रा- तरयति- अर्थ-ज्ञानीकै सर्वही द्रव्यास्रवकी संततिकू जीवते संते ज्ञानी नित्यही निरास्रव है ऐसा काहेते कह्या १ जो शिप्यकी ऐसी आशंकारूप वुद्धि है, ताका उत्तरका श्लोक कहै है- विजहति न हि सत्ता प्रत्ययाः पूर्ववद्धाः समयमनुसरंतो यद्यपि द्रव्यरूपाः । तदपि सकलरागद्वपमोहव्युदासादवतरति न जातु ज्ञानिनः कर्मबंधः ॥ ६॥ स० टी०-हि-स्फुट, यद्यपि ज्ञानिनः पुस', द्रव्यरूपा'-पुद्गलकर्मरूपमिथ्यात्वादय , पूर्वबद्धा-पूर्व रागद्वपादिभिः वद्धाः-निवद्धाः-आत्मसात्कृता इत्यर्थ , प्रत्ययाः-उत्तरकर्मवध कारणानि, सत्ता-अस्तित्व, न विजहति, न त्यजति समय-उदयकानं, अनुमरतःप्राश्रयत, उदयमागच्छंन इत्यर्थः, तदपि-तथापि, जातु कदाचित, कर्मवध'-कर्मणा बंध , न अवतरति-अवतार न प्राप्नोति-न भवतीत्यर्थः, कस्य ? ज्ञानिन , कुत. सकलेत्यादि.-सकलाः समम्तास्ते च ते रागढ पमोहाश्च तेषा व्युदास-परि.यागस्तस्मात् रागद्वपमोहाना आनवभावानामभावे द्रव्यप्रत्ययानामवघहेतुत्वात कारणाभावे कार्यस्याप्यभावात् ॥ ६ ॥ अथ पुनर्वधाभावो विभाव्यते- अर्थ-यद्यपि पूर्वं अज्ञान अवस्थामै बंधरूप भये थे, ते द्रव्यरूप प्रत्यय कहिये द्रव्यास्रव, ते सत्तामै विद्यमान हैं । जाते तिनिका उढय अपनी स्थितिके अनुसार है, तातै जेते उदयका समय नाहीं आवै नेते सत्ताहीमें रहैं ऐमें व्यास्रव सत्तामै रहैं ते अपनी मत्ता नाहीं छोडै हैं। ताऊ ज्ञानीके समस्त गद्वेपमोहका अभावते नवीनकर्मका बंध कदाचित् ही अवतार नाही धरै है ।। भावार्थ-रागद्वे पमोहमावविना सत्ताका द्रव्यास्रव बंधका कारण नाहीं है। इहां सकल रागद्वीपमोहका अभाव बुद्धि पूर्वक अपेक्षा जानना ।। रागद्व पविमोहानां जानिनो यदसंभवः । तत एव न बंधोऽस्य ते हि बंधस्य कारणं ॥७॥ स. टी.-तन एव-तस्मातो., निश्चयेन, अस्य-ज्ञानिन.-मुन , वध -कर्मणा वध., न, कुन ? यत्-यस्मात्कारणात, बानिनः ज्ञान-आत्मनान, विद्यते यस्यासी तम्य, अमभव.-न सभव , केपा ? रागढ- पविमोहाना-रागश्च द्वे पश्च विमाहश्च रागद्वे पविमोहास्नेपा, ननु तेपामभावे कथ वधाभाव. हीति यस्मात् तं रागढ पादय., ववम्य-कर्मवयस्य कारण हेतु , हेतुत्वाभावे हेतुमदभावस्य सुप्रमिद्धत्वात् ॥७॥ बंधविधुरत्व विधीयते- अर्थ-जानैं ज्ञानीक रागद्वपमोहका असंभव है, ताहीत ज्ञानीकै बंध नाही है । जाते गग द्वैप मोह हैं ते ही बंधके कारण हैं ।। ७ ।। , अथ परमाभ्यात्मतरङ्गनी अभ्याम्य शुद्धनयमुद्धनबोधचिह्नमेकाम्यमेव कलयंति सदैव ये ते। रागादिमुक्रमनमः मततं भवंतः पश्यंति वंधविधुरं समयस्य सारं ॥८॥ संटी- योगिनः, ममयस्य-पदार्थत्य सिद्धांनस्य वा सार-श्रात्मानं पश्यदि-इने, विभूत ? वचिरं- प्रनिन्थित्यादिचर्मवैधुिरं-नहितं, शन्यमित्यर्थः निभूताः ? रागादिमुक्तमन्स-चग- हेपोहचनि-रहितानि, मनांसि चनदियां ने, मतः-जायनानाः संतः, सततं-निरंतरं, ते के ? ये पुनगः सदा-नित्यं, एक निश्चयन, कलयति-कलनांकुनि, वारश्चंतीत्यर्थः, कि? एकान्यं एकाग्रता जगत्मना म एकता .निवृत्त अध्यात्य-आश्रित्य-अंगीकृत्य-ध्यारवेत्यर्थः शुद्धनयं शुद्धर्मम- लकतंकहिल्प न्यनि-प्राप्नोति शुद्धनयः-आत्मा, लं, अथवा शुद्धनब्याकिनन्नाभिन्य. विभूतं ? वनत्यादि-द्धतः-उः कर्मविनाशकात्म वाली बोय. ज्ञानं च न एक चिह-लक्षणं चस्य स तं ॥ ॥ अथ बलमनुवाति- अर्थ-जे पुरुष शुद्ध नया अंगीकार करी निरंतर एकाग्रपणाका अभ्यास कर हैं कैसा है शुद्धनय ? उद्धोध कहिये काइका दाव्या न दवे ऐमा उचलबान सौ ई चिन्द जाका सो इसका अवलंबन कानवाले युरुप रागादिक्रकरि रहित है मन जिनिका ऐसे निरंतर होते मंते, बंधभरि रहिन जो समयसार-अपना शुद्ध आत्मत्त्वरूप, ताहि अवलोकन करें हैं ।। भावार्य- इहां शुद्ध नयकरि एकाग्र होना कया सो माक्षान् शुद्धनयका होना तो केवलज्ञान भये होय है। अर शुद्धनय है या श्रुतज्ञानका अंश है मो इसके द्वारे शुद्धस्वरूपका श्रद्धान करना तथा ध्यान- शरि एकाग्र होना है सो यह पोक्ष अनुभव है। एकदेश शुद्ध की अपेक्षा व्यवहारकरि प्रत्यक्ष भी कहिये !! = || फेरि कई है गर्ने चिग है । कर्म बांध है- प्रच्युन्य शुद्धनयतः पुनरेव ये तु रागादियोगमुपयांति विमुक्तयोधाः । ते कर्मवंधमिह विभ्रति पूर्ववद्धद्रव्यान्नवैः कृतविचित्रविकल्पजालं ( है। संकटो-ह-जानित-नि, कर्मबंब ग्भ्रिति-नबन किंभूताः? निमुक्तचोधा:-विमुन्तो बोबो दानं यद बोवाहिका इनिग 'कृत उनास चियूनिपानः विभूतं ? नेत्यादिः-विचित्राः शुभाशुभन्नाले च विकल्परच नेमण जाल समूह, कृनं-निम्मानित, निचित्रविक्लनलं चेन तं, के ? पूबद्धदम्मान:-कनादिनिन्द्धपूर्वमिथ्यात्वा निद्रव्यानवैः, ते के ? तु इगि विशेषः, ये पुनपाः, रागादि- चोन गावादीनं -योग, उपांदि-प्राप्नुवंति, पुनरंट-पूर्वज्ञानास्थागत् पश्चाईव. शुद्धनयतः शुद्धसत्पात्मनः प्रयुष्य च्युत्रा, ।। ६ । श्रथ यायोजावयं पंहुल्यते- अर्थ-बहुरि जे पुनय शुद्धनयन जूटिकरि फेरि रागादिक योग कहिये मुंबंध प्राप्त होय है. ने छोच्चा है ज्ञान निनिन एने नये मन कर्मधार हैं। कया क्रमवाधार हैं ? पूर्वे घनन्यायव निनिकरि कीया ई विचित्र अनेक प्रकार विकल्पनिका जाल जाने ।। गावार्थ- फेरि शुद्धनयने विगै नौ गमाविकके संबंध इव्याचवके अनुसार अनेक भेद लिये कर्मनिक् , . ? पानवाधिकार बांधे है । नयतै चिगना यह जो फेरि मिथ्यात्वमा उदय आय जाय तव बंध होने लगिनाय । जात इहां मिथ्यात्वसंबंधी रागादिकतै बंध होनेकी प्रधानता कही है अर उपयोगकी अपेक्षा गौण है । शुद्धोपयोगरूप रहनेका काल अल्प है। तातै ताका छूटने की अपेक्षा इहां नाही। अन्य ज्ञ यतै ज्ञान उपयुक्त होय तोऊ मिथ्यात्वविना रागका अंश है, सो ज्ञानीके अभिप्राय- पूर्वक नाहीं । तातै अल्पबंध संसारका कारण नाहीं। अथवा उपयोगकी अपेक्षा लीजिये तव शुद्धस्वरूप चिगे सम्यक्त्वतै न छूटे । तब चारित्रमोहका रागतै किछू बंध होय है, सो अज्ञान की पक्षमें नाहीं गिनिये,अर बंध है ही। ताकू मेटनेकू शुद्धनयतै न छूटनेका अर शुद्धोपयोगमें लीन होनेका सम्यग्दृष्टि ज्ञानीकू' उपदेश है ऐसे जानना ।। इदमेवात्र तात्पर्य हेयः शुद्धनयो न हि । नास्ति बंधस्तदत्यागात्तत्त्यागाद् बंध एव हि ॥१०॥ सं० टी०-अत्र-वधाववविचारणे-इदमेव-वक्ष्यमाणलक्षणमेव तात्पर्य-रहस्य, इद किं ? हीति यम्मात, शुद्धनयः शुद्धात्मा-शुद्धद्रव्यार्थिको वा, न हेयः-न त्याज्यो हितार्थिभिः । बधः-कर्मबंधः, नास्ति-न जायते, कुत. तदत्यागात् तस्य-शुद्धनयस्य, अत्यागः-अत्यजन, तस्मात् , हि-पुनः, बंध एव कर्मबंधो भवत्येव, कुतः ? तत्त्यागात्-तस्य-शुद्धनयस्व त्याग'-त्यजन तस्मात ॥ १० ॥ अथ शुद्धनयस्या- त्यागमामनुते- अर्थ-इहां पहले कथनविपै यह तात्पर्य है, जो शद्धनय है सो त्यागने योग्य नाहीं है यह उपदेश है जात तिस शुद्धनयके अत्यागतै तौ कर्मका बंध नाहीं होय है । बहुरि तिसके त्यागतै कर्मका बंध होय ही है ॥ १० ॥ फेरि तिस शुद्धनयहीके ग्रहणकू' दृढ करते संते काव्य कहै है- धीरोदारमहिम्न्यनादिनिधने बोधे निबध्नन् धृति त्याज्यः शुद्धनयो न जातु कृतिभिः सर्वकषः कर्मणां । तत्रस्थाः स्वमरीचिचक्रमचिरात्संहत्य निर्यद्वहिः पूर्णज्ञानघनौघमेकमचलं पश्यंति शांतं महः ॥११॥ सं० टी०-जातु-फदाचित् , न त्याज्य.-न हेय , ध्यानतः क्षणान्न मोक्तव्यः, कः शुद्धनय:-शुद्ध- परमात्मा, शुद्धद्रव्यार्थिकनयो वा, कैः ? कृतिभिः-संसारदशाचक्र परिपूर्ण कृत विद्यते येपा तै अथवा कृत-सुकृतं विद्यते येषां तैः योगिभि., किंभूत' स.? सर्वकप.-सर्व-समस्त, कपति-निहंतीति सर्वकपः, 'सर्वकूलाभ्रकरीपेषु कपः ' इत्यनेन सूत्रेण सिद्धः, केषा ? कर्मणा-ज्ञानावरणादि प्रकृतीनां, किकुर्वन् , नियनन् कुर्वन् , का ? धृति-सतोपं, क ? बोधे-ज्ञाने, किंभूते ? धीरोदारमहिम्नि-धीर'-अक्षोभ्यत्वात् , उदारः उत्कटः कर्मविनाशे वद्धकक्षत्वात् धीरश्चामावुदारश्च वा द्व' महिमा,महिमानौ वा यस्य तस्मिन् पुनः ११ है ? , परमाग्यात्मतरङ्गिणी किभूते ? अनादिनिधने-श्राद्यतरहिते द्रव्यरूपेण नित्यत्वान , तत्रम्या:-तत्र-शुद्धनये, तिष्ठन्तीनि तवस्याः योगिनः, महः-घाम, पध्यंति-ईदते, किंकृत्य ? चियत-शीन, संहत्य-तृत्वा, विनाश्येत्यर्थः, कि? स्वेत्यादि-स्वस्य-आत्मन. स्वस्मिन् ग मरीचिऋ-मृगतृष्णासमूह, किंभूतं महः ? वहिः बाह्य'. निर्यत् प्रकटीमात् पूर्ण-परिपूर्ण निरापरणत्वात , बानेत्यादि-ज्ञानेन बनो-निरंतरः श्रोधः-समूहः, यत्र तत्, एक-अद्विनींचं-द्वानसहत्तस्यापरस्याभावात अचल-अक्षोभ्यं. शान क्रोधादरभावात् ॥ ११ ॥ अथ रागादीनामभावे किं स्यादित्यध्येति- अर्थ-पुरुपवान् महंतपुरुषनिकरि शुद्धनय है मो कदाचिन्भी छोडनयोग्य नाही है । कैमा है शुद्धनय ? ज्ञानविषे थिरता अतिशयकरि चांधना संता है। कैमा ज्ञानविष थिरता बांध है ? धीर कहिये चलाचलपणेते रहित अर उदार काहिये सर्वपदार्थनिमें आप विस्तरता है महिमा जाकी । बहुरि कैसा है जान १ अनादिनिधन है-जाका आदि अन्त नाहीं है । बहुरि कैसा है शुद्धनय क्रमनिका सर्वकप कहिये भूलतै नाश करनहारा है । ऐसे शुद्ध नयके विर्षे जे तिष्ठ हैं, ते पुरुष अपनी ज्ञानकी मरीचि कहिये व्यक्तिविशेष, तिनि तत्काल समेटिकरि कर्मके पटलते चाह्य निसरता अर संपूर्णजानधनका समूहम्वरूप निश्चल जी शांतरूप वाहिये ज्ञानमयी तेज प्रतापका पुञ्ज, नाही अवलोकन कर हैं।। भावार्थ-शुद्धनय है मो आत्माकू ज्ञानमय तेज प्रतापका पुंज नाहि एक चैतन्यमात्र समस्तज्ञानके विशेषनि गौण करि, अर समस्त- परनिमित्ततै भये भावनिक् गौण करि. शुद्ध निन्य अभेदरूप एकहू ग्रहण करें है ।। सो ऐसे शुद्धनयका विपयस्वरूप अपना आत्माले अनुभव है-एकाग्र होय तिष्ठे हैं, ते समस्त कर्मका समूहते न्यारा संपूर्ण ज्ञान जो केवलज्ञानस्वरूप अमूर्तिक पुरूषाकार बीनगग ज्ञानमूर्तिस्वरूप अपना आत्मा, ताहि अवलोकन करे है ॥ या शुद्धनयकं त्रिप अंतमुहर्त निप्छै शुक्लध्यानकी प्रवृत्ति होयकरि केवलज्ञान उपजै है, ऐसा याका माहात्म्य है ।। सो याकू अवलंबन करि फेरि जैन केवलज्ञान न उपज नेते यान चिगना नाही, ऐसा श्रीगुननिका उपदेश है। ऐसे आसवका अधिकार पूर्ण किया । अब रंगभूमिमें आखका च्यांग प्रवेश भया था, ना ज्ञान यथार्थ जाणि स्वांग दुरि कराय थाप प्रगट भया, ऐसे ज्ञानकी महिमाके अर्थरूप काव्य कह है- विशेष-40 जयचंद्र नीने यहां मरीविचक्रका अर्थ व्यक्तिविशंप किया है जिसका अर्थ मनिज्ञान श्रुतज्ञान आदि पर्याय हैं क्योंकि जिमममय केवलज्ञान उत्पन्न होता है उससमय मतिज्ञान आदिवानरूप पर्याय संकुचित हो जाती हैं ज्ञानकी अकेली कंवलशाना गरी विद्यमान रहनाती है शुभचन्द्रजीने उसका अर्थ मृगतृष्णा लिखा है ।। ११ ॥ रागादीनां झगिति विगमात् मुर्वतोप्याल वाणां नित्योद्योतं किमपि परमं वस्तु मंपश्यतोऽतः । - - , ? . संवराधिकार स्फारस्फारैः स्वरसविसरैः प्लावयत्सर्वभावा- नालोकांतादचलमतुलं ज्ञानमुन्मग्नमेतत् ॥ १२ ॥ सं० टी०-एतत्-ज्ञान-बोधः, उन्मग्न-प्रकटित, किमपि-अतिशायि, अनिर्वाच्य वस्तु-वसति गुणपर्या- यानिति वस्तु, कस्य अत.-मध्ये सपश्यत.-अवलोकयतो मुनेः, किभूत ? नित्योद्योत-नित्यं प्रकाशमान यद्यपि लब्ध्यपर्याप्तकस्य निगोदस्य महानुभागज्ञानावरणावृतस्य नित्योद्योतत्व न तथापि पर्यायाख्यस्य लब्ध्यक्ष- रापरनामधेयस्याक्षराननभागशक्ते निरावरणत्व-नित्योद्योतत्व आत्मनोऽस्त्येत्र, पुन.-परम-परा-उत्कृष्ट इन्द्राद्यतिशायिनी मा नानादिलक्ष्मीर्यम्य तत् , कुतोऽतरवलोकन ? झगिति शीघ्र, सर्वतोऽपि-सर्वरूपणापि रागादीना-रागढ पमोहलक्षणभावास्रवाणा प्रत्ययाना, विगमात्-अभावात् , किभूत ज्ञान ? आलोकातात्- अणिधनमात्रत्रिलोकमभिव्याप्य, सर्वभावान्-समस्तपदार्थान् , प्लावयत्-सिंचयत्-परिच्छिंददित्यर्थः, के, ! स्वरसविसर स्वस्य-श्रात्मनः, रस , तस्य विसरा-सदोहा , तैः, कि भूत' ? स्फारस्फारै.-स्फारात्- आकाशात् , स्फारै-विस्तीर्ण.--ज्ञानशक्त्यर्णवे व्योमादीना बिदुवदल्पत्वात् , पुन. अचल-अक्षोभ्य, अतुल-न विद्यते तुला-मान यस्य तत् , तुलामतिकातमिति वा । एकस्मिन् पार्वे धर्माधर्माकाशकालानुभाग योगकयायाध्यवसायादीना शक्तिस्तथापि ज्ञानशक्तेरनं तैकभागः । अर्थ-रागादिक आखवनिका तत्काल क्षणमात्रमें सर्वप्रकार दूरि होनेतै नित्य उद्योतरूप किछु परम वस्तुकू अंतरंगविर्षे अवलोकन करनवाला पुरुपके यह ज्ञान है सो उन्मन कहिये उद- यरूप प्रगट भया कैसा प्रगट मया ? अतिविस्तारका फैलते जे आने निजरसके प्रवाह, तिनिकरि सर्वलोकपर्यंत अन्यभाव, तिनिकू अन्तर्मग्न करता संता । वहुरि कैसा है ? अचल है-जैसेके तैसे सर्वपदार्थ जामै सदा प्रतिभास हैं चले नाही है बहुरि कैसा है, अतुलहै,जाकी वरावरी और नाही है ।। भावाथ-शुद्धनयकू अवलंबन करि जो पुरुष अंतरंगविर्षे चेतन्यमात्र परमवस्तूकू एकाग्र अनुभव है, ताके सर्व रागादिक आखवभाव दूरि होय, अर सर्वपदार्थनिकू जाननेवाला निश्च- ल अतुल केवलज्ञान प्रगट होय है।। सो यह ज्ञान सर्वते महान् हैं । ऐसे आस्रवका स्वांग रंगभूमिमें प्रवेश भया था, ताक् शान यथार्थरूप जानि लिया, तब निसरि गया । योग कपाय मिथ्यात्व असंयम आस्रव द्रव्य ते आगम गाये। राग विरोध विमोह विभाव अज्ञानमयी यह भाव जताये ॥ जे मुनिराज करें इनि त्याग, सुरिद्धि समाज लये सिव थाये । काय नवाय नमू चित लाय कहूँ जयमाल लहूँ मन भाये । इति श्रीसमयमारपद्यस्याध्यात्मतरगिएयपरनामधेयरय व्याख्याया चतुर्थोऽकः ॥ ४ ॥ एसे इस अध्यात्मतर गिणीनामा टीकाकी वचनिकाविप चौथा अधिकार पूर्ण भया ॥४॥ अथ संवराधिकारः ॥ ५॥ दोहा- मोहरागरुप दुरि करि समिति गुप्ति व्रत पारि। संवरमय आतम कीयो नमूताहि मन धारि ।। .

- ४ परमाध्यामतरङ्गिणी स जयतु जनघनसिन्धु ज्ञानामृतचन्द्र एव सपुष्यत् । शुभचन्द्रचन्द्रिकाप्तः सुकुन्दकुन्दोउज्वलः श्रीमान् ।। अं नमः, श्रय सवरं सूचयति- आसंसारविरोधिसंवरजयकांतावलिप्तास्त्रव न्यक्कारात्प्रतिलब्धनित्यविजयं संपादयत्संवरं । व्यावृत्ते पररूपतो नियमितं सम्यकस्वरूपे स्फुरत् ज्योतिश्चिन्मयमुज्ज्वलं निजरसप्राम्भारमुज्जृम्भते । १ । स० टी०--उज्जभते-विलसते-प्रकाशत इत्यर्थः, किं १ चिन्मय ज्ञानमय ज्योति.-तेजः, विभूतं ? सवर-कर्मणामागंतुकाना निरोधं, सपादयत-कुत्, किंभूत सवरं ? प्रतीत्यादि-प्रतिलब्धः-संप्राप्तः, नित्य-निरतरं, विजयो येन तं, कुतः १ आससारेत्यादिः ससरण-संसार',-द्रव्यक्षेत्रकालभवभावरूप', ससारमभिव्याप्य आससार कर्म विरोधयति-विनाशयति इत्येवं शील. आसंसारविरोधी स चासौ सवरश्च कर्मनिरोधस्तस्य जय एवैक.-अद्वितीयः, अंतः-स्वभावः, तेनावलिप्तः-संयुक्तः स चासौ श्रास्रवश्च तस्य न्यकार:-तिरस्कारः-धिकार इत्यर्थः, तस्मात्, पुन. किभूत संवर ? पररूपतः-परः-द्रव्यादि., रागादिर्वा तस्य रूप स्वरूप तत्, व्यावृत्तं-निवृत्तं, तथा चोक्तमाप्तपरीक्षाया- तेषामागमिना नून विपक्षः सबरो मतः ।। १४१ ॥ इति पुनः नियमितं-कर्मनिरोधे नियमो जातो यस्य त, किंभूतं ज्योतिः ? सम्यक्म्वरूपे-यथोक्तस्वरुपे आत्म- रवरूपे इत्यर्थः, स्फुरत्देदीप्यमान पूर्वोक्तौ व्यावृत्तमित्यादिविशेषणौ द्वी ज्योतिपो चा, पुनः उज्ज्वलं सदा- वदातं पुनः कीदृक्ष निजरस्प्राग्भार-स्वात्मानुभवरसेन प्राक्-पूर्व भारः भरणं यस्य तत् ॥ १॥ अथ ज्ञानरागयोः स्वरूपं वेभिद्यते- अर्थ-चैतन्यस्वरूपमय स्फुरायमान प्रकाशमान ज्योति है सो उदयरूप होय फैले है। कैसा है ? अनादिसंसारते लगाय अपना विरोधी जो संवर, नाकों जीतिकरि एकांतपणे मदकू प्राप्त भया जो आस्रव ताका तिरस्कारते पाया है नित्य विजय जाने ऐसा संवरकू निपजावता संता है ।। बहुरि परद्रव्य तथा परद्रव्यके निमित्तै भये भाव, निनितै भिन्न है ।। बहुरि कैसा है अपना सम्यक् कहिये यथार्थस्वरूप, ताविपैं निश्चित है ।। बहुरि कैसा है ? उज्ज्वल है ? निरा. वाध निर्मल दैदीप्यमान प्रकाशरूप है ।। बहुरि कैसा है ? अपना रस जो ज्ञानरूप प्रवाह, ताका है प्राग्भार जाके-अपना रसका वोझक्लीय है, अन्य बोझ उतारि धरया हे ।। भावार्थ-अनादि ते आस्रवका विरोधी संवर है। ताको आस्रव जीतिकरि मदकरि गर्वित तथा ताका तिरस्कार करी जीतिकू' प्राप्त भया जो संवर, ताकू प्राप्त करता, अर समस्त पररूपते न्यारा होय, अपना रूपविपे निश्चल होय, यह चैतन्यप्रकाश है, सो अपना ज्ञानरसरूप भारकूलिये निर्मल उदय- रूप होय है ॥ चेद्र प्यं जडरूपतां च दधतोः कृत्वा विभाग द्वयो- रंतर्दारुणदारुणेन परितो ज्ञानस्य रागस्य च । भेदज्ञानमुदेति निर्मलमिदं मोदध्वमध्यासिताः है ?

- सेवराधिकार ५ शुद्धज्ञानघनौघमेकमधुना संतो द्वितीयच्युताः॥ स० टी०-उदति-उदयं गच्छति चकास्तीत्यर्थ. ? कि भेदविज्ञान-क्रकचवद् द्विधाकारक ज्ञानं, स्य ज्ञानस्य रागस्य च, ज्ञानरागयो. परस्परमत्यतविलक्षणत्वाद्भिन्नला, विभूतं ? निर्मल-मिथ्यात्वादिकर्मका लुष्यराहित्यात, किंभूतस्य-चैद्य-चिदेव ज्ञानमेव रूप यस्य स तस्य भाव द्प्य चेतनत्वमित्यर्थः दधतः-धारयत , च पुन: रागस्य किंभूतस्य ? जडरुपता-अचेतनता दधतः, किंकृत्वा द्वयो -जीवक्रोधयो., भविभाग-अभेद, अकृत्वा-अविधाय, भेट कृत्वेत्यर्थ , येन ? श्रतरित्यादि -दारयति कर्मशत्रनिति दारुण ज्ञान, अत -अभ्यतरं, दारुण-द्विधाकारक तच्च तहारुण च तेन कारणभूतेन, सत' | अहो सत्पुरुषा.! मोदध्वं यूग प्रमोद कुरुध्व, अधुना इदानी भेदज्ञानोदय मति, किंभूत। सत. ' इद एक-अद्वितीय भेदज्ञान अध्याश्रिताः आरूढा. प्राप्ना संत. इत्यर्थ । पुन विभूता ? द्विनायच्युता -ज्ञानरागयोर्मध्ये द्वितीयेन रागेण च्युता रहिता , किंभूतमिढ ? शुद्धत्यादि -शुद्ध -निर्मल तच्च तज्ज्ञान बोधश्च तस्य धन-निरतर अस्य, श्रोध., समूह , यत्र तत् ।। २ ।। अथ शुद्वात्मोपलभात सवर विवृणोति-- अर्थ-यह निर्मल भेदज्ञान है सो उदय प्राप्त होय है । सो याका निश्चय करनेवाले सत्पु- पनिक संबोधन करि कहे हैं-जो,हे सत्पुरुष हो ! तुम याक्पायकरि,अर अवर द्वितीय जो रागा- दिक भाव, तिनित रहिन भये संते, एक शुद्धज्ञानघनका समूहकू आश्रयकरि, तिसमे लीन मये संते, बडा आनंद मानौ । जाते यह कहा करि, उदय होय है ! चैतन्यरूप ताकू धरता संता तो ज्ञान अर जडरूपता धरता राग,तिनिधोऊनिके अज्ञानदशाम एकपणासा दीखे है । तिनिका अंतरंगविणे अनुभवके अभ्यासरूप बलकरि उत्कृष्ट विदारण करी सर्वप्रकार विभागकरी उदय होय है। भावार्थ-जान तो चेतनास्वरूप है अर रागादि पुद्गलविकार जड है । सो अज्ञानते एक जडरूप भास हैं ।। सो भेदविज्ञान जब प्रगट होय है तव ज्ञानका अर रागादिकका भिन्न- पणाका अंतरंग अनुभवकै अभ्यासते प्रगट होय है । तब ऐसे जाने हैं जो ज्ञानका स्वभाव तो जाननेमात्र ही है अर ज्ञानमे रागादिककी कलुपता मलिनता आकुलनारूप संकल्प विकल्प भास हैं,सो ए सर्व पुद्गलफै विकार हैं जड हैं । ऐसा ज्ञानका अर रागादिकका भेदका आस्वाद आवे है । सो यह भेद विज्ञान सर्व विभावभाव मेटनेत कारण होय है, अर आत्माकू' परममंघरभाव प्राप्त कर है। तातें सत्पुरुषनिकू कहे हैं, जो या पायकरि रागादिकतै च्युत होय शुद्ध ज्ञानघन आत्माका आश्रय ले आनंदकू' प्राप्त होऊ ।। अव कहै हैं जो ऐसे यह भेदविज्ञान जिस काल ज्ञानके रागादिविकाररूप विपरीतपणाकी कणिकान प्राप्त करता अविचलित है, तिसकाल ज्ञान है सो शुद्धोपयोगस्वरूपपणाकरि ज्ञानहीरूप केवल भया संता किंचिन्मात्र भी रागढ़प मोहभावकू नाहीं प्राप्त होय है । तातै यह ठहरी, जो भेदविज्ञानते शुद्वात्माकी प्राप्ति होय है । बहुरि शुद्वात्माकी प्राप्तीतै राग द्वप मोह जे , आसूबभाव तिनिका अभाव हैं लक्षण जाका ऐसा संघर होय है ।।

परमाम्या तराजयो विशेष-संस्कृत टीकाकारको 'धनोऽकृन्वाऽविभाग यह पाठ मिला है इसलिये उन्होंने जड़ल्पको धारणकरनेवाले क्रोध आदिक और चेतनरूपको धारणकरनेवाले जीव विभागकै अभावको न कर अर्थात् विभाग करके 'यह अर्थ किया है तथा ग्रन्यारको भी यहां यही . अभीष्ट है परन्तु माधुपाठ-दृधनोः कृत्वा विभाग' चहीं है क्योंकि यहां अर्थमें चातानी नहि करनी पहनी श्लोकको पहने ही अर्थ हृदयर अंकित हो जाता है ! नया उपर्युक्त अर्थक बनजानेकेलिये प्रन्यकार कर्मा ग्लोमें ऐसे पद भी नहि जान्न मन ।।२ } यदि कथमपि धारावाहिना वोधनेन ध्रुवमुपलभमानः शुद्धमात्मानमास्तै । नदयमुदयदात्माराममात्मानमात्मापरणरिणतिरोधाच्छुद्ध मेवान्युपति ॥ ३ ॥ मंडी-दि-यदा, ऋयं-मि., आरमा-चिल्या, छाने-वनिम्ने, विभून धून-निश्चित ऋषि-रहता ऋष्टेन शुद्ध द्रव्यभावनेकारलंन्सिं मान-स्वलापं. ग्लममान:-श्रामादयन, ध्यानगिनार इत्यर्य.. रे ! वोधनन बोचने-जायते अन्ननदि ओवन-जागं दन, विभूतेन्द्र ? बाराहिना-अनवच्छिन्नरूपत्वेन बनीपारंव वहदीन्यवां शीलन्नन, नन् नहि. नवा आत्मान-चिद्रूप शुद्धनर-निलंबन, अन्युपैति-प्राप्नोति, कुनः परपरिणतिरोयान-परेयु अचंदन दिपदार्थेषु परिणदिः निवादितनगपरिणामः तत्व बिरोध: तन्नात्. त्रिभू ? न्यादि:-आमना-घासन-रमणीनं शन का उदयत्-उत्रं गच्छत् आत्माराम चत्रासो त, इलेवं संबन्प्रकारः ॥ ३ ॥ अथ कनमा चीकोटि- अय-जो आत्मा कोई प्रकार घडे भाग्यनं धागवाही जानकरि निश्चल शुद्ध आत्मा प्राप्न होता संता लिच्छ है, वो यह आन्मा, उदय होता है आन्मारूप क्रीडावन लाकै, ऐमा अपना आमा परिणनि ने राग द्वेष मोह, तितिका निरोधन शुद्धहीं पात्र हैं। ऐसे शुद्ध शान्माक्री प्राप्नात नंबर होय है ।। इहां धारावाही ज्ञान कह्या, नाका अर्थ-यह जो एक प्रवाहल्प ज्ञान होय, मो धारावाही है ।। सो या दोय मीनि है-एक तौ मिथ्याज्ञान वीचिमन आत्र ऐसा सम्यग्ज्ञान मी धागवार्ता है ।। बहुरि दृजा उपयोगका यह उपयुक्त होनी अपेक्षा है, सो जहानाई एक शेया उपयोग उपयुक्त होय रहे नहां नांई धारावाही कहिये मां यानी स्थिति अंतर्मुहनती है। पीछे विच्छंद्र होय है । सो जहां जैर्मा विवक्षा होय, नहां सैमा जानना श्रेणी के नत्र शुद्ध आत्मा उपयुक्त होय धारावाही है । निजमहिमरतानां भेदविज्ञानशक्त्या भवति नियतमेपां शुद्धतत्वोपलंभः । अचलितमखिलान्यद्रव्यदूर स्थितानां भवति सति त्र तस्मिन्ननयः कर्ममोक्षः संबी-निय-निश्चितं. गुद्धत्यादिः-शुद्धतत्मा-परमात्मवांइत्योरलंमः-प्राप्तिा,मवति जायते. ऋषां? येश निजमाहिमरदानां-निज-स्वात्मा, नत्य महिमा-माहावं दर्शनहानादिलशरा, नत्र रकानां संघराधिकार . आसक्ताना, अचल-निश्चलं यथा भवति तथा, स्थिताना-प्रविष्टाना, क ' अखिलेत्यादि.-अखिलानि सम. स्ताति, तानि च तानि अन्यद्रव्याणि च आत्मन्यतिरिक्तधर्मादिपचद्रव्याणि तेभ्यः दूरात्-दविष्ठे, कया ? भेदे त्यादि.-भेदवारकविज्ञानस्य शक्निः-सामर्थ्य तया, चेति भिन्नप्रक्रमे, सति-विद्यमाने, तस्मिन् शुद्धत- स्वोपलभे, अक्षयः-क्षयातीत', अनतकालस्थायीत्यर्थ , कर्ममोक्ष.-कर्मणा-प्रकृतिस्थित्यादिरूपतया विश्ले- पणं-मोक्ष' भवति जायते ॥ ४॥ अथ सवर विवृणोति- अर्थ-जे पुरुष भेदविज्ञानकी शक्तिकरी अपना स्वरूपकी महिमावि. लीन है, तिनिकै नियम” शुद्धतत्वकी प्राप्ति होय है ।। बहुरि तिस शुद्धतत्त्वकी प्राप्ति होते संते जे निश्चल जैसे होय से समस्त अन्यद्रव्यौ दूरि तिष्ठे हैं, तिनिके कर्मका मोक्ष कहिये अभाव होय है, सो अक्षय होय है-फेरि कर्मबंध नाही होय है ।। संपद्यते संवर एव साक्षाच्छुद्धात्मतत्त्वस्य किलोपलंभात् । स भेदविज्ञानत एव तस्मात्त दविज्ञानमतीव भाव्यं ॥ ५ ॥ सं० टी०-तस्मात्-आत्मक्रमणोर्भेदविज्ञानात, आस्रवभावहेतूनामध्यवसानाना मिथ्यात्वादीनामभावः, तदभावे च रापमोहरुपास्रवभावस्याभाव', तदभावे च कर्माभावः, तदभावे च नोकर्माभावः, तदभावे च संसाराभावः इति कारणात् तत् प्रसिद्ध'-प्रात्मकर्मणोर्भेदविज्ञानं, अतीवभाव्य-अत्यतं, भावनीयं, तत् कुत. ? यत.-स-प्रात्मोपलभ भेदविज्ञानत एव नान्यत', किलेत्यागमे श्रूयते । शुद्धात्मतत्त्वस्य-अमलपर- मात्मस्वरूपस्य, उपलभात-प्राप्ते., एप-प्रसिद्ध , साक्षात्-प्रत्यक्ष सवरः-श्रागतुककर्मनिरोधः, सपद्यते जायते, ॥ ५॥ अथ-भेदविज्ञानमाजापयति- अर्थ-जाते यह संबर है सो निश्चयते साक्षात् शुद्धात्मतत्वका उपलंभ कहिये पावने” होय है ।। बहुरि शुद्धात्मतत्वका उपलंभ है, सो आत्मा अर कर्मका भेदविज्ञानौं होय है-कर्म अर आत्माकू न्यारे जाने तब आत्मा अनुभवै । तारौं सो भेदविज्ञान अतिशयकरि भावनेयोग्य है।। फेरि कहै हैं, जो, मेदविज्ञान कहां ताई भावना ? भावयेदविज्ञानमिदमच्छिन्नधारया। तावद्यावत्पराऊच्युत्वा ज्ञानं ज्ञाने प्रतिष्ठते ॥६॥ सं० टी०-यावत्पर्यंत, ज्ञान-परमात्मबोधः, ज्ञाने-स्वस्वरूपप्रतिमासके बोधे, प्रतिष्ठते-स्थितिं करोति, स्वस्वरूपे-स्वस्वरूपावस्थाने इत्यर्थ किंकृत्वा ? च्युत्वा-त्यक्त्वा, कान् ? परान् अचेतनादिपरपदार्थान्, तावत्कालपर्यंत इद भेदविज्ञान-त्मिकर्मणोर्भेदकारकभावनाज्ञान, अच्छिन्नधारया अनवच्छिन्तरूपेण, भाव- येत-ध्यायेत्, लब्धे म्वरूपे स्वरूपप्राप्तिनिमिचकस्य भेदज्ञानस्थानुपयोगात, निष्पन्ने पटे तसाधनस्थ तुरीवेमाकुविदादेरनुपयोगित्ववत् ॥ ६ ॥ अथ भेदज्ञानाज्ञानयोः सिद्धि प्रति हेतुकत्वाहेतुकत्वे निर्ण- यति- - - -- परमाध्यात्मतरंगिणी अर्थ-यह भेदविज्ञान है ताहि निरन्तर धाराप्रवाहरूप जामै विच्छेद न पडे ऐसे तेते भाव जेते ज्ञान है सो परभावनितै छूटि करि अपने स्वरूपज्ञानही विणे प्रतिष्ठित होय ठहरी जाय। भावार्थ-इहां ज्ञानका ज्ञानविण ठहरना दोय प्रकार जानना ।। एक तो मिथ्यात्वका अमात्र होय सम्यग्ज्ञान होय, फेरि मिथ्यात्व न आनै बहुरि दूजा यह जो शुद्धोपयोगरूप होय ठहरे, ज्ञान अन्यविकाररूप न परिणमै । सो दोऊ प्रकार न बने तेसै निरन्तर भेदविज्ञानकी भावना राखनी ।। फेरि भेद विज्ञानकी महिमा कहे हैं- भेदविज्ञानतः सिद्धाः सिद्धा ये किल केचन । अस्यैवाभावतो बद्धा बद्धा ये किल केचन ॥ ७॥ ० टी०-क्लेित्यागमोक्ते निश्चये ये-केचन पुरुपसिंहाः, सिद्धाः-सिद्धिं स्वात्मोपलब्धिलक्षणां प्राप्ताः, उपलक्षणात् सिद्धयति-सेत्स्यते, ते सर्वे भेदविज्ञानतः-आत्मकर्मणो दज्ञानात् नान्यतस्तपश्चर- णादेः सिद्धपदं प्राप्ताः प्राप्नुगति-प्रापयिष्यति, किलेति-निश्चितं । ये-केचन ससारिणः पुरूपाः बद्धाः-कर्म- बधनबद्धाः, त एव अस्य भेदविज्ञानस्य, अभावतः, बद्धाः-बांधनं प्राप्ताः, नात्र विचारणा ||७॥ अथ ज्ञाने ज्ञानव्यवस्थाकारणं कलयति- अर्थ-जे केई सिद्ध भये है, ते इस भेदविज्ञाननै भये हैं । बहुरि जे कर्म बंधे हैं, ते तिसही भेदविज्ञानके अभाव ,बंधे है । भावार्थ-संसार है सो आत्मा अर कर्म के एकताकी माननेते है सो अनादित जे भेदविज्ञान नाही है, तेरौं कर्म बंधे ही है तातें कर्मवंधका मूल भेदविज्ञान का अभावही है जे बंधे हैं, ते याहीके अभाव बंधे हैं बहुरि जे सिद्ध भये है,ते भेद विज्ञान भये ही भये हैं, तातै प्रथम भेद विज्ञान ही मोक्षका कारण है ।। इहा ऐसा भी जानना, जो, विज्ञाना- द्वतवादी बौद्ध तथा वेदांती वस्तूकू' अद्वत कहै हैं, ते अद्वतका अनुभवहीतै सिद्धि कहैं है, तिनिका भी इस भेदविज्ञान सिद्धि कहनेते निषेध भया । जातै सर्वथा अद्वैत वस्तुका स्वरूप नाही, अर जे माने हैं, तिनिका भेदविज्ञान कहना बने नाही । भेदविज्ञान तो वस्तु द्वैत होय तव कह ना बने । सो जीव अजीव दोय वस्तु माने, अर दोयका संयोग माने, तव भेदविज्ञान बने, यातै स्याद्वादीनिकै सर्व निर्वाध सिद्धि होइ है । ७।। आगै संवरका अधिकार पूर्ण भया, सो या संवरको भये ज्ञान कैसा है ऐसे ज्ञानकी महिमाका कलशरूप काव्य कहै हैं- भेदज्ञानोच्छलनकलनाच्छुद्धतत्त्वोपलंभाद् रागग्रामप्रलयकरणाकर्मणां संवरेण। विभ्रत्तोष परमममलालोकमम्लानमेकं ज्ञानं ज्ञाने नियतमुदितं शाश्वतोद्योतमेतत् सं० टी०-नियत-निश्चितं, एतत् ज्ञान, परमात्मज्ञान, ज्ञाने-स्वरूपप्रतिभासे, उदितं-उदयं प्राप्त, किंभूतं ? तोय-परमानंद विभ्रत्-धारयत्, पुनः किंभूतं? परम-परा-उत्कृष्टा, मा-सर्ववस्तुपरिच्छेदिका शानशक्तिरूपा लक्ष्मीविद्यते यस्य तत्, कुतः-भेदेत्यादिः-भेदज्ञानस्य उच्छलग-प्राकट्य प्रकाशनमित्यर्थः, , बह ? - निर्जराधिकार तस्य कलन-अभ्यमन तस्मात्, पुनः अमलालोकं-अमल.-निर्मल., आलोक -जगत्प्रकाशकप्रकाशो यस्य तत्, कुतः ? शुद्धत्यादि-शुद्वतत्त्वस्य-परमात्मन., उपलभ:-प्राप्तिः तस्मात्, अम्लान-कश्मलताच्युतं, कुतः ? रागेत्यादिः-रागस्य-रतेः,ग्रामः-समूहः,तस्य प्रलयकरण-विनाशकरण तस्मात,पुन' एक कर्मादिव्य- तिरिक्तत्वेनाद्विनीय,केन ? कर्मणा मवरेण-आगतुकार्मनिरोधेन अत एव शाश्वतोद्योत--नित्यप्रकाशं ॥८॥ अर्थ-यह ज्ञान है सो ज्ञानहीवि निश्चल नियमरूप उदय प्राप्त भया । कैसे अनुक्रम उदय भया १ प्रथम तौ भेदविज्ञानका उदय होना,ताका अभ्यास भया । बहुरि तिस भेदज्ञानके अभ्यासतें शुद्धतत्वका उपलभ भया । बहुरि तिस शुद्धतत्व के उपलभते रागके समूहका प्रलय किया । बहुरि रागग्रामका प्रलय करने आस्रवके रुकनेते कर्मनिका संवर भया । बहुरि कर्म का संवर होनेकरि परम उत्कृष्ट संतोपर्फे धारता संता, ज्ञान प्रगट भया । बहुरि कैसा है ज्ञान निर्मल है आलोक कहिये प्रकाश जाका, क्षयोपशमक दोपौं मलिनता थी सो अब नाही है। बहुरि अम्लान है, रागादिकतै कलुपता थी सो अब नाही है, तारौं निर्मल है । बहुरि कैसा है एक है, क्षयोपशमकरि भेद थे, ते अब नाही हैं । बहुरि शाश्वता हैं उद्योत जाका, क्षयोपशम- ज्ञानमैं क्रम” होना था, सो अब नाही है। ऐसा रंगभूमीमैं संवरका स्वांग प्रवेश भया था ताज्ञान जानि लिया, सो नृत्य करि रंगभूमिरौं निकसि गया । विशेष-संस्कृत टीकाकारके अनुमार इस श्लोकका अर्थ इसप्रकार है-जो ज्ञान] भेदज्ञानके अभ्याससे परमानन्दको धारण करनेवाला है शुद्धस्वरूपके उपलंभसे निर्मल प्रकाशका धारक समस्त जगत्को जाननेवाला है। रागसमूहके नष्ट होजानेके कारण मलिनतारहित है और काँकी संवर अवस्था होनेसे अद्वितीय सदा प्रकाशमान है ऐसा परमात्मज्ञान उदित होता है भेदविज्ञानकला प्रगटै तब शुद्धस्वभाव लहै अपना ही। राग द्वेप विमोह सवै ही गलि जाय इमै झठ कर्म रुका ही ॥ उज्ज्वल ज्ञान प्रकाश करै बहु तोप धरै परमातममाही। यों मुनिराज भली विधि धारत केवल पाय सुखी शिव जाहीं ॥१॥ इति श्रीसमयसारपद्यस्यात्मतरगिण्यपरनामधेयस्य व्याख्यायां पचमोऽकः ॥५॥ ऐसे परमाध्यात्मतरंगिणीकी बचनिकावि पांचमा संवर अधिकार पूर्ण भया ॥ ५ ॥ अथ निर्जराधिकारः।६। संवरनिकरविचारोऽमृनचन्द्रो भानुभुवनद्य वः (१) । श्रीकुन्दकुन्दशाली शुभचन्द्रकरः प्रशस्तेद्धः ।। ॐ नम. अथ निर्जरानिरूपणमुज्जभते- रागादिक मेटि कर, नवे बंध हति संत । पूर्व उदयमें सम रहे, नमू निर्जरावंत ॥ इहां निर्जरा प्रवेश करै है।। भावार्थ-जैसे नृत्यके अखाडेमै नृत्य करनेवाला स्वांग १२ है . परमाध्यात्मतरंगिणी बनाय प्रवेश कर है,ऐसे यह तत्त्वनिका नृत्य है तहां रंगभूमिमैं निर्जरा का स्वांगका प्रवेश है,तहां प्रथमही सर्व स्वांग देखिकरि यथार्थ जाननेवाला सम्यग्ज्ञान है नाक टीकाकार मंगल जानि प्रगट कर हैं रागाद्यास्रवरोधतो निजधुरां धृत्वा परः संवरः कर्मागामि समस्तमेव भरतो दूरान्निरुधन स्थितः । प्राग्वद्धं तु तदेव दग्धुमधुना व्याजम्भते निर्जरा ज्ञानज्योतिरपावृतं न हि यतो रागादिभिमूर्च्छति ॥ १ ॥ • •सं०डी-संवर:-गवरनामतत्वां स्थितः-वस्थितः, किं कृत्वा ? वृत्वा-उद्धृत्य. निघुगं-स्वयो- ग्यधुर्य, किंभूतः ? परः-उत्कृष्टः कर्मागमनिरोधकत्वात. विन ? दृगन-आरान, निधन, भरन:-प्रति- शयन. कि? समस्तमेव-निखिलमेव,आगामि आगंतु कर्म ज्ञानावरणादिप्रकृति, कुन ? रागेत्यादिः-रागा- चा:-रागढपमाहाः ते च ते श्रास्त्रवाः, तु पुनर्भिन्नप्रक्रमे, प्रत्यया, तेषा रोधः-निरोकः, तस्मान् । अधुना संवरानंतर निर्जरा-निर्जीर्यते पूर्वनिवद्ध चया सा भावनिर्जरा पूर्वनिबद्धर्मणां निर्जरगं निर्जरा इनि द्रव्यनिरा सूचित्ता, मिल भते-विलसति, किंतु ? दग्धु भस्मीतु विनाशयितुमित्यर्थ. । किं ? प्रारबद्ध पूर्वमानाचे र्निबद्ध, तदेव-द्रव्यभावकमेव सम्यग्दृष्ट्याचे कादशाननरया मणो निर्जीयम् णत्वात् । तथा चोक्त गोसटमारे- सन्मत्तुप्पचीये सावयविरदे शणनकम्मसे ! दंसणमोहनबगे कमाय समामगे च उसते ।। खवगे च खीणमोह लिणेसु दन्ना अखगुणिदकमा ! तबिवरीया काला स्वेन्ज गुणकमा हॉति IPell इति [जीकाडे ] चतः निर्वरादिभिः कर्मविनाशकरणान् हीत्ति न्फुटं न सूर्छति-न मोह प्राप्नोति, कै? रागादिमिः-रागढ पमोहैः किं ? वान व्योतिः-बोधतेजः, विभूतं ? अपावृत-निगमरैर्निरावरणं १.५॥ प्रय ज्ञानसामध्ये समुत्यापयति- अर्थ- प्रथम तो उत्कृष्ट संबर है, सो रामादिक जे आसय तिनिकै रोकनेते,अपनी धुग जो सामर्थ्यकी हह, ताहि धारिकरि आगामी समस्तही कर्म, ना मूलते दुरीही रोकना संता तिष्ठया। अब इस संवर भये पहले बंधरूप भया था जो कर्म, नाहि दन्ध करने निर्जरारूप अग्नि फेल है, सो इस निर्जराके प्रगट होनेते, ज्ञानज्गेनि है सो आवरण रहिन भया फेरि रागादिभावनिकरि मछिन नाही होय है, सदा निरावरण रहै ! भावार्थ-संवा भये पीछे नवीन कम बंधे नाही अर पूर्व बंधे थे, ने निजरे, तब ज्ञानका आवरण दूरि होय, तब ज्ञानका आवरण कैसा है ? सो फेरि रागादिरूप न परिणमै, सदा प्रकाशरूप रहै ।। तज्ज्ञानस्यैव सामर्थ्य विरागस्यैव वा किल । यत्कोऽपि कर्मभिः कर्म भुंजानोऽपि न बद्ध्यते ॥२॥ संदी-विजेत्यागमोक्तो. यन् कोऽपि-ज्ञानी न बद्धयत-आयनं न प्राप्नोति, कैः कर्मभिः, विभू- तोऽपि ?नुजानोऽपि-वेदयनानोऽपि. किंकर्न-पूर्वोपात्तं कर्म, सुख-दुःखपेण उदीर्ण वेदयन्नपि तत्- - , ६१ 1 - ? . निर्जराधिकार सामाथ्य-समर्थता कस्य ? ज्ञामस्यैव, वा-अथवा विरागस्यैव । यथा विण भुजानोऽपि विपवैद्यो न याति मर तथा कर्मोदीर्यमानमपि मु जानो न बद्ध्यते ज्ञानी ।। २ ॥ अथ ज्ञानिनो विषयसेवकत्वेप्यसेवकत्व सिंचयति- अर्थ-जो कर्मकू' भोगवता संताभी कर्मकरि नाही बथै है सो यह कोई आश्चर्यरूप सामर्थ्य ज्ञानका ही है, अथवा विरागका ही है। अज्ञानीकू तो आश्चर्य का उपजावनहारा है, ज्ञानी यथार्थ जान है । नाश्नुते विषयसेवनेऽपि यत्स्वं फलं विषयसेवनस्य ना। ज्ञानवैभवविरागताबलात्सेवकोऽपि तदसावसेवकः॥३॥ स० टी०-तत्-तस्माद्धे तो , असो-ज्ञानी, सेवकोऽपि-विपय सेवयन्नपि सेवकः-विपयसेवको न भवेत् कश्चित् प्रकारेण व्याप्रियमाणोऽपि तत्स्वामित्वाभावादप्राकरणिकवत्, यत्-यस्माद्ध तोः, नाश्नुते-न भु जत, किं स्व-स्वकीय फल-मनधरूप क. ? ना आत्मा कस्य ? विषयसेवनस्य-सुखदुःखाद्यनुभवस्थ, क सति ? विपयसेवनेऽपि, कुतः ? ज्ञानेत्यादि -ज्ञानस्य वैभव-सामर्थ्य तेन उपलक्षित विरागताया बला-शक्ति- स्तस्मात् ॥ ३ ॥ श्रय सम्यग्दृष्टे' शक्नि' सयुज्यते-- अर्थ--यह पुरुष है सो विषयनिकू सेवते संतेभी जो विषयसेवनका निजफल है, ताको नाही पात्र है । सो ज्ञानके विभावका अर विरागताका चलते यह विपयनिका सेवनहारा है, तौऊ सेव- नहारा नाही है। भावार्थ-ज्ञानका अर विरागताका कोई अचिंत्य सामर्थ्य ऐसा ही है, जो इन्द्रि- 'यनिकरि विषयनिकू मेवै है, तोऊ ताकू सेवनहारा न कहिये। जात विषयसेवनका सामान्य निजफल संसार है । सो ज्ञानी वैरागीके मिथ्यात्वके अभावतै संसारका भ्रमणरूप फल नाही होय है । आग इसही अर्थ प्रगट दृष्टांतकरि दिखा है- सम्यग्दृष्टेर्भवति नियतं ज्ञानवैराग्यशक्तिः स्वं वस्तुत्व कलयितुमयं स्वान्यरूपाप्तिमुक्त्या। यस्माज्ज्ञात्वा व्यतिकरमिदं तत्त्वतः स्वं परं च स्वस्मिन्नास्ते विरमति परात्सर्वतो रागयोगात् । ४ । .१० टी०-नियत-निश्चित, ज्ञानवैराग्यशक्तिः-ज्ञानवैराग्ययो. सामर्थ्य, भवति-असिस, कस्य ? सम्य- ग्दृप्टे:-स्वतत्त्वश्रद्धायकस्य, किंतु स्व-आत्मान, वस्तुला-वस्तुस्वरूप, कलयितु'-अनुभवितु ध्यातुमि- त्यर्थः, तत्कुत' ? यस्माद्धेतो., अय सम्यग्दृष्टि., स्वस्मिन्-आत्मनि, आस्ते-अतिष्ठते-विरमते च-विरक्ति भजति, कुत.? सर्वतः-समस्तात, परात् प्रात्मनः परस्वरूपात, गगयोगात-रागद्वपमोहसयोगात्, कया स्वेत्यादिः स्वः-आत्मा, अन्यः-परद्रव्यादिः, तयोः रूपे-स्वरूपे तयोर्यथाक्रम, आप्तिः प्राप्तिः, मुक्तिः मोचग-स्वरूपप्राप्ति:-परस्वरूपमुक्तिरित्यर्थः, तया, किं कृत्रा ? ज्ञात्वा-अपवुव्य, तत्त्वत.-परमार्थात:, कि इदं स्व-आत्मीयं-स्वात्मलक्षणा, च-पुनः पर परद्रव्य, व्यतिकर-अन्योन्यस्य भिन्न ।। ४ ।। अथ रागिणः सम्यक्त्वयाहित्यमुच्यते- - - ? .

७ परमाध्यात्मतरङ्गिणी अर्थ-सम्यग्दृष्टिके नियमते ज्ञान अर वैराग्यकी शक्ति होय है जातें यह सम्यग्दृष्टि अपना वस्तुपणा यथार्थ स्वरूप ताका अभ्यास करने कू अपना स्वरूपका ग्रहण अर परका त्यागकी विधिकरि यह तो अपना आत्मस्वरूप है अर यह परद्रव्य है ऐसे दोऊका भेद परमार्थ करि जानि अर आप वि. तो तिष्ठै है अर परद्रव्यतें सर्वप्रकार रागके योगते विरक्त होय है सो यह रीति ज्ञान वैराग्यकी शक्ति विना होय नाहीं ॥ सम्यग्दृष्टि : स्वयमयमहं जातुबंधो न मे स्या- दित्युत्तानोत्पुलकवदना रागिणोऽग्याचरंतु। प्रालंबा समितिपरतां ते यतोऽद्यापि पापाः प्रात्मानामावगमविरहात् संति सम्यक्त्वरिताः ॥ ५ ॥ सं० टी०-रागिणोऽपि पुरुपाः, न केवलं तत्त्वविदः, इत्यपिशव्दार्थः, आचरंतु पंचमहानतशास्त्राध्य- यनादौ प्रवर्तता, पुनः समितिपरता-समितयः-ईर्थाभापैपणादयः समितिस्वभावा', तत्र परता तत्परतां-उत्कृ- gar वा आलंचंता आलबनं कुर्वतां, किभूतास्ते इति-उक्तप्रकारेण, उत्तानोत्पुलकवदनाः-उत्तान-ऊर्ध्वावलो. कित्वं महाहंकारत्वात्, उत्-ऊर्ध्वा., पुलकाः-रोमांचाः, यस्य तत्, उत्तानं-उत्पुलक, वदन वक्त्रं येषा ते इति किं ? स्वय-स्वत एव-अग-प्रत्यक्षोहं सम्यग्दृष्टि:-तत्त्वदर्शी, मे-मम, जातु-क्दाचित् , बंधः कर्मणां गंधः न स्यात्-न भवेत् इत्यहंकाररूपं वाक्य, इति ये दधति ते अद्यापि-इदानीमपि न तु पूर्वमित्यपिशब्दार्शः सम्यक्त्वरिक्ताः-तत्त्वश्रद्धानमुक्ताः सति-वर्तते, कुत' ? आत्मेत्यादिः-आत्मा च अनात्मा च आस्मानात्मानौ स्वपरद्रव्य तयो. अवगमः-परिज्ञान, तस्य विरहः-अभावः तस्मात, सम्यक्त्यरिक्तत्व कुतः १ यतः कार- णात् ते पापाः पापकर्मयुक्ताः अहकाराद्यशुभकर्ममयत्वात ।। ५ ।। अथ रागिणो भ्रांति थीभास्यते- अर्थ-जे पर द्रव्यके वि रागद्वपमोहभावकरि तौ संयुक्त है,अर आपकू ऐसे मान है जो,मै सम्यग्दृष्टि हौं, मेरे कदाचित् कर्मका बंध नाही होय है, शास्त्रमें सग्यग्दृष्टिकै बंध नाही कह्या है, ऐसे मानिकरि उत्तान कहिये गर्वसहित ऊंचा किया है अर हर्पसहित उत्पुलक कहिये रोमां- चरूप भया है मुख जिनिका ऐसे है, ते महाव्रतादि आचरण करो तथा समिति कहिये वचन विहार आहारकी क्रियाविर्षे यत्नः प्रवर्तना, तिसकी परता कहिये उत्कृष्टता, ताकू भी आलंबन करो, ते ऐसे प्रवर्तते भी पापी मिया॑दृष्टि ही है । जाते आत्माका अनात्माका ज्ञानते रहित हैं, तात' सम्यक्त्वतै रीते है, तिनिकै सम्यक्त्व नाही है। मावार्थ-जो आपकू' सम्य- ग्दृष्टि मान अर परद्रव्यते रागी होय, नौ, ताकै सम्यक्त्व काहेका १ व्रतसमिति पाले तोऊ आपापरका ज्ञानविना पापीही है । अर आपकै बंध न होना मानि स्वच्छंद प्रवत, तौ काहेका सम्यग्दृष्टि ? जात चारित्र मोहका रागौं बंध तो यथाख्यातचारित्र जे न होय तेत होय ही है। सो जेते राग रहै तेते सम्यग्दृष्टि अपनी निंदा गर्दा करता ही रहै है, ज्ञान होनेमात्रतें छूटना नाही, ज्ञान भये पीछे तिसहीमें लीनरूप शुद्धोपयोगरूप चारित्रते बंध न कह है । ताते राग - ~ निराधिकार ६३ छतें बंध न होना मानि स्वच्छंद होना तो मिथ्यादृष्टिही है । इहां कोई पूछे व्रतसमिति तो शुभकार्य है, तिनिकू पालत पापी क्यों कहे ? ताका समाधान-जो, पाप सिद्धांतमें मिथ्यात्व- हीकू कह्या है, जहां ताई मिथ्यात्व रहै, तहां ताई शुभ तथा अशुभ सर्वही क्रियाकू अध्या- त्मवि परमार्थकरि पापही कहिये, अर व्यवहारनयकी प्रधानतामै व्यवहारी जीवनिकू अशुभ छुडाय शुभमें लगावनकू कथंचित् पुण्य भी कहिये है,स्याद्वादमतविगै विरोध नाही । बहुरि कोई पूछे परद्रव्यसू राग रहै जे मिथ्यादृष्टि कहै, सो या मैं समझो नाही, अविरत सम्यग्दृष्टि आदिकै चारित्र मोहका उदयतै रागादिभाव होय है, ताकै सम्यक्त्व कैसे है ? ताका समाधान जो इहां मिथ्यात्वसहित अनंतानुबंधीका राग प्रधानकरि कया है । जाते आपापर का ज्ञान श्रद्धान विना परद्रव्य तथा तिसके निमित्ततै भये भाव,तिनिविपै आत्मबुद्धि होय तथा प्रीति अप्रीतिहोय तब जानिये याकै भेदज्ञान भया नाही । जो,मुनिपद लेकरि व्रतसमिति भी पाले है,तहां परजीव- निकी रक्षा तथा शरीरसंबंधी यत्नते प्रवर्तना अपने शुभमाव होना इत्यादि परद्रव्यसम्बन्धी भावनिकरि अपने मोक्ष होना माने,अर परजीवनिका घात होना अयत्नाचार प्रवर्तना अपना अशु- भभाव होना इत्यादि परद्रव्यनिकी क्रियाहीत अपने बंध माने तेतै जानिये-याकै आपापरका ज्ञान नहीं भया बंध मोक्ष तौ अपना ही भावनित था, परद्रव्य तो निमित्तमात्र था याम विपर्यय मान्या ताते ऐसे परद्रव्यही भला बुरा मानि रागद्वप कर है, जेते सम्यग्द्रष्टि नाहीं है, अर जेते चारित्रमोहसंबंधी रागादिक रहै हैं । तिनकू तथा तिनिका प्रेरचा परद्रव्यसंबंधी शुभाशुभ क्रियामै प्रवत है तिस प्रवृत्तिकू ऐमैं माने जो, यह कर्मका जोर है, याते निवृत्त भये मेरा भला है, तिनिकू रोगवत् जान है, पीडा न सही जाय तव तिनिका इलाज करनेरूप प्रवते है । तोऊ तिनि” याकै रागन कहिये, रोग मा. तिनित काहेका राग, तिसका मेटनेहीका उपाय करें। सो मेटना भी अपनेही ज्ञानपरिणामरूप पणिमनंत मानें । ऐसें परमार्थ अध्यात्मदृष्टिकरि इहां व्याख्यान जानना || मिथ्यात्वविना चारित्रमोहसंबंधी उदयका परिणाम इहां राग न कह्या है । जाते सम्यग्द्रष्टिकै ज्ञानवैराग्यशक्ति अवश्य होना कह्या है ।। तहां मिथ्यात्वसहित ही राग राग कहे हैं सो सम्यग्दृष्टिके है नाही, अर मिथ्यात्वसहित राग होय सो सम्यग्द्रष्टि नाही, ऐसा विशेष सम्यग्द्रष्टिही जाने है ।। मिथ्यादृष्टिका अध्यात्मशास्त्रमें प्रथम तौ प्रवेश नाही अर जो प्रवेश करें तो विपर्यय समझ है, व्यवहारकू' सर्वथा छोडि भ्रष्ट होय है, अथवा निश्चयकू' नीके नाही जानि व्यवहारहीते मोक्ष माने है, परमार्थतत्त्वविणे मृढ है। तातै यथार्थ म्याद्वादन्यायकरि सत्यार्थ समझ सम्यक्त्वकी प्राप्ति होय है । प्रासंसारात्प्रतिपदममी रागिणो नित्यमत्ताः सुप्ता यस्मिन्नपदमपदं तद्विबुध्यध्वमंधाः।

1 ? -- परमाध्यामतरङ्गिणी एतैतेतः पदमिदमिदं यत्र चैतन्यधातुः शुद्धः शुद्धः स्वरसभरतः स्थायिभावत्वमेति ॥६॥ सं० टी०-भो अंधाः । हे रागिणः । ज्ञानदृष्टिपराड मुखत्वात् विबुध्यध्वं-यूयं जानीध्वं,अमी रागिणः- परद्रव्येपु रागो रतिर्विद्यते येषां ते यस्मिन्-चिद्रूपे-परद्रव्ये वा सुप्ताः-निद्रायमाणाः, तत्स्वरूपानभिज्ञ- त्वान्निद्रात्वं स्थिता वा तत् अपदं चिद्रूपे शयनमयुक्त परद्रव्ये स्थितिः-स्थानं किभूतं ? अपद-न विद्यते पदं-रक्षण-स्थान लक्षण वा यतः-यत्र यस्य वा तदपदं, कि भूतास्ते ? आससारात् पंचप्रकारसंसारम- भिव्याप्य, प्रतिपदं,-पद पदं प्रतीति प्रतिपदं, एकेंद्रियद्वींद्रियादिस्थाने परद्रव्यलक्षणे पढ़े वा नित्यमत्ता:- नित्यं हप्ताः-हर्ष गता वा स्वस्वरूपानभिज्ञत्वात्, इतः-परस्थानात् एत एत-पुनः पुनरागच्छत यूयं, इद- शुद्धचिद्पल क्षण इदमेव नान्यत् इति निर्धारणार्थ वीप्सा, पद-स्थान ज्ञानिना स्थितियोग्यत्वात्, अथवा इदमिद एकपद, अरय चिद्रूपस्यइदं इदमिद पदं, इतः-आगच्छत, यत्र पदं चेतन्यधातुः चेतनालक्षणों धातुः स्थायिभावता-स्थैर्य, एति-प्राप्नोति, कुतः ? स्वरसभरतः स्वानुभवातिशयात् , किंभूतः । शुद्ध.- निर्मलः, पुनः विभूतः ? शुद्धः-परद्रव्यादतीवनिर्मल., प्रथमशुद्धपदेन इतरद्रव्येभ्यः शुद्धत्वमावेदितं, द्वितीयशुद्धपदेन स्वसंसारिद्रव्याच्छुद्धवं चावेदित ।। ६ ।। अथ तत्पदास्वादन स्वदते- अर्थ-संसारी भव्यप्राणीकू श्रीगुरु संवोध हैं-जो हे अंधे प्राणी हो, ए रागी पुरुष हैं, ते अनादि संसार” लगाय जिस पदवि सूत हैं-निद्रामै मग्न है, तिस पदकू तुम अपद जानो, यह तुमारा ठिकाना नाही । इहां दोय वारंवार कहनेते अतिकरुणाभाव सूचे हैं ।। फेरि कह है. जो तुमारा ठिकाना यह है यह है । जहाँ शैतन्यधातु शुद्ध हे शुद्ध है। अपने स्वाभाविक रसके समूहते स्थायीभावपणाकू प्राप्त है । इहां दोय शुद्धपद है, सो द्रव्य अर भाव दोऊकी शुद्धताके अर्थिं हैं सो सर्व अन्यद्रव्यनित न्यारा सो तौ द्रव्यशुद्धता हैं । अर परनिमित्ततै भये अपने भाव तिनितै रहित भाव शुद्ध कहिये सो इतः कहिये इस तरफ आवो-इहां निवास करौ भावार्थ- प्राणी अनादिसंसारतें लगाय रागादिकई भला जाणि, तिनिहीकू अपना स्वभाव मानि, तिनिहीविगै निश्चित तिप्ठ है-सोवै हैं । तिनिकू श्रीगुरु दयालु होय संवोध है-जगावै हैं सावधान करे हैं जो, हे अंधे प्राणी हौ, तुम जिस पदविर्षे सोवौ हो, सो तुमारा पद नाही है, तुमारा पद तौ चैतन्यस्वरूपमय है,तिस प्राप्त होऊ,ऐसे सावधान करे है जैसे कोई महंत पुरुष मद पीयकरि मलिन जायगां सोता होय ताक कोईही आय जगावै कहै है-तेरी जायगा तो सुवर्णमय धातुकी अतिदृढ शुद्ध सुवर्ण रची अर वाह्य कजोडाकरि रहित शुद्ध करी ऐसी है । सो हम नतावै हैं, तहां आव, तहां शयनादि करि आनंदरूप होऊ । तैसे इहां भी श्रीगुरु उपदेश करि सावधान किया है, जो बाह्य तौ अन्यद्रव्यनिका मिलाप नाही, अंतरंग विकार नाही ऐसा शुद्ध चैतन्यरूप अपना भावका आश्रय करौ । दोय वार कहनेकरि अतिकरुणा अनु- राग सूचे है॥ है हैं - -- ।

निर्जराधिकार . -- एकमेव हि तत्स्वाद्य विपदामपदं पद । अपदान्येव भासते पदान्यन्यानि यत्पुरः ॥ ७॥ सं० टी-दीति व्यक्त,एक्मेव तत्-प्रसिद्ध',पदं चैतन्यस्थान,पद्यते-गम्यतेज्ञायतेऽनेनेति पद-ज्ञान वा स्वाद्य -श्रास्वाद्य ध्यानविषयीकर्तव्यमिति भावः, विपदा-ससाराशर्मणा-अपद-अस्थान, दुःखरहितत्वात् यत्पुरःचैतन्यधातुलक्षणस्थानान , अन्यानि-पराणि, अनात्मस्वभावानि पदानि-व्रतादीनि, अपदान्येव अस्थानानि-अज्ञानस्वरूपाणि निश्चयेन भासते चकासति ॥ ७ ॥ अथात्मज्ञानयोरेकत्व नेनीयते- अर्थ-सोही एक पद आस्वादने योग्य है। कैसा है ? विपद जो आपदा, तिनिका पद नाही है, जिस पदमें किछु भी आपदा प्रवेश नाही करे है । जाकै आगे अन्य सर्वही पद हैं ते अपद प्रतिभासे हैं । भावार्थ-एक जान ही आत्माका पद है, यामैं किछूभी आपदा नाही, याके आगे अन्य सही पद आपदास्वरूप आकुलतामय अपद भासे हैं ॥ फेरि कहै है, जो आत्मा ज्ञानका अनुभव को है, तब ऐसे करे है- एकज्ञायकभावनिर्भरमहास्वादं समासादयन स्वादं द्वन्द्वमयं विधातुमसहः स्वाऽवस्तुवृत्ति विदन् । प्रात्मात्मानुभवानुभावविवशो भ्रश्यद्विशेषोदयं सामान्यं कलयन किलैष सकलं ज्ञानं नयत्येकतां ॥८॥ स० टी०-किल-इत्यागमोक्तौ, एप आत्मेत्यादि.-आत्मनश्चिद्पस्य-आत्मना-स्वरूपेण सहा- नुभव:-अनुभवन, तस्य अनुभाव.-प्रभाव', तेन-उपलक्षितोविशिष्टो वशः-ज्ञातृता, "वशा स्त्री करिणी च स्यादृग्ज्ञाने ज्ञातरि त्रिपु" इत्यनेकार्थः, सकल ज्ञान-आभिनिवोधिकश्रुतावधिमन.पर्ययकेवलं ज्ञान एकना एकत्व, नयति-प्राप्नोति, ज्ञानमात्मा चैक एव पदार्थ इत्येकता प्राप्नोति, किंभूत. १ समासादयन्-प्राप्नुवन्, क ? एकत्यादिः-एक -अद्वितीयः, ज्ञायकभाव:-ज्ञातृस्वभाव', तस्य निर्भरः-अतिशयः, स एव महास्वादः, त । पुन. किंभूतः ? असह-अक्षम , किंवतु द्वद्वमय-आत्मक्रोधयोयुग्मनिवृत्त स्वादं विधातु-आस्वा- दयितु, किं कुर्वान् ? स्वावस्तुवृत्ति-स्वे-आत्मनि, अवस्तुन. क्रोवादे-वृत्ति-वर्तना, विदन्-जानन् म्वा, वस्तुवृत्तिमिति च क्वचित्पाठ -स्वकीया वस्तुचि-यथाख्यातचारित्रवृत्तिं जानन , पुन. किंकुर्वान् ? सामाग-पूर्वोत्तरविवष्रत्येकत्वलक्षण ज्ञानत्वरुपमूर्ध्यातासामान्य, क्लयन्-कलना कुछन्, किभूत तत् ? भ्रश्यद्विशेषोदय-भ्रश्यन-गलन् विशेषाणा मतिश्रुतावधिमनःपर्यय केवलरूपाणा, उदय -प्राकट्य यत्र तत् , सामान्ये विवक्षिते विशेपाणा विवक्षाभावः ॥ ८ ॥ अथ सवेदनव्यक्तिमवनीस्वद्यते- अर्थ-यह आत्मा है सो ज्ञानके विशेपनिका उदयकू गौंण करता संता सामान्यज्ञानमात्रकू अभ्यास करता संता समस्तज्ञानकू एक भावकू प्राप्त करें है। कैसा भया संता ? सो कहै हैं,एक ज्ञायकमात्र भावकरि भरया जो ज्ञानका महास्वाद ताकू लेता संता है। बहुरि कैसा है ? बंदमय जो वर्णादिक रागादिक तथा क्षायोपशमरूपज्ञानके भेदरूप स्वाद,ताही करनेकू लेनेकू . १ - . १ - ६६ परमाध्यात्मतरङ्गिणी असमर्थ है । ज्ञानहीमें एकाग्र होय तब दूजा स्वाद नाही आवै । बहुरि कैसा है ? अपनी जो वस्तूकी प्रवृत्ति ताही जानता है,आस्वादै है । जातै कैसा है ? आत्माका जो अनुभव,आस्वाद, ताके प्रभावकरि विवश है, तिसही स्वादके आधीन है-तहातै चिगने असमर्थ है । अद्वितीय स्वाद लेता वाहरी कारकू आवै ? भावार्थ-इस एकस्वरूप ज्ञानके रसीले स्वादके आगै अन्य- रस फीके हैं । अर भेदभाव सब मिटि जाय है। ज्ञानक विशेष ज्ञयके निमित्त है सो जव ज्ञानसामान्यका स्वाद ले तब सर्व ज्ञानके भेद भी गौण होय जाय हैं । एकज्ञानही ज्ञयरूप होय है । इहां कोई पूछ, छमस्थकै पूर्णरूप केवलज्ञानका स्वाद कैसे आत्रै १ ताका उत्तर तो पूर्व कथन शुद्धनयका किया तहां ही भया । जो शुद्ध नय आत्माका शुद्ध पूर्णरूप जनावै है, सो इस नयके द्वारे पूर्णरूप केवलज्ञानका परोक्ष स्वाद आनै है ऐसे जानना ||८|| विशेप-संस्कृत टीकाकारने 'स्वां वस्तुवृत्ति' का अर्थ 'अपनी निज चारित्रवृत्तिको किया है भौर 'स्वावस्तुवृत्ति' का 'अपनेमैं परपदार्थ क्रोध आदिकी विद्यमानताको' यह अर्थ किया है। अच्छाच्छाः स्वयमुच्छलंति यदिमाः संवेदनव्यक्तयो निष्पीताखिलभावमंडलरसप्राग्भारमत्ता इव । यस्याभिन्नरसः स एष भगवानेकोऽप्यनेकीभवन वल्गत्युत्कलिकाभिरद्भुतनिधिश्चैतन्यरत्नाकरः ॥ ६ ॥ सं. टी-वल्गति-उल्लसति, चैतन्यरत्नाकर:-चैतन्यमेव रत्न-मणिः तस्य आकरः-स्थान आत्मा पक्षे समुद्रः,काभिः ? उत्कलिकाभिः-ऊवाशैः-ज्ञानलक्षणैः, पानीयलक्षणैर्वा सवेदनशक्तिभिः,अन्यत्र अर्मिभिरित्यर्थः, किभूतः १ अद्भुतनिधिः-अद्भुनाः, आश्चर्यदाः, निधयः ज्ञानादिरूपा वा यत्र सः, पुनः- अभिन्नरस -अभिन्नः भेत्तुमशक्यः, रसो यत्रोभयत्र स भगवान्-भग ज्ञान पक्षे लक्ष्मीविद्यते यस्य स भग- वान् ‘भगं श्रीज्ञानमाहात्म्यवीर्यप्रयत्नकीर्तिषु' इत्यनेकार्थः, एकोपि-आत्मत्वसामान्येन समुद्रत्वेन चाद्विती- योऽपि, अनेकीभवन्-मतिश्रुतादिज्ञानेन मतिज्ञानीं श्रुतज्ञानी पक्ष पूर्वापरादिभागेन-पूर्वसमुद्रः पश्चिमस- मुद्रः इत्यादिरूपेणानेकतां भजन, कुतः ? यत् यस्मात्कारणात् यस्य- आत्मनः संबंधिन्यः इमाः-संवेदनव्य- क्तयः, ज्ञानविशेषाः-मतिज्ञानादयः, स्वयं स्वतः, उच्छलति-उत्कर्ष गच्छति, अम्या अपि जलव्यक्तयः उच्छलति, किभूताः १ अच्छाच्छा:-निर्मलपदार्थ नर्मल्याग्निर्मलाः, उत्प्रेक्षा दर्शयति-अत उत्प्रेक्षते-निष्पी- तेत्यादि-निष्पीतं-क्रोडीकृत ज्ञायकस्वभावेन अखिलभावाना-समस्तज्ञानज्ञेयपदार्थानां मंडल समूहः स एव रसः-अनुभवस्वभावः, पानीयं वा स चासौ रसश्चेति वा मदिरारूपो रस मदहेतुत्वात् तस्य प्राग्भारः- पूर्वातिशयः, तेन मत्ताः-मदं नीता', इव-यथा केचित् मैरेयमत्ता उच्छलंति तथा एता अपि ॥ ६ ॥ अथ ज्ञानान्येषां कर्मणां क्लेशत्वमाकर्णति- अर्थ-जिस आत्माकी जो ए संवेदनकी व्यक्ति कहिये अनुगवमें आवते ज्ञानके भेद हैं, ते निर्मलतै निर्मल आपैआप उछल है-प्रगट अनुभवमें आवै हैं । कैसे हैं ते ? निष्पीत कहिये पीया जो समस्तपदार्थनिका समूहरूप रस, ताका प्राग्भार कहिये बहुतभार, ताकरि मान कः स एषः, ?

६७ , निर्जराधिकार मांतीही है । सो यह भगवान् चैतन्यरूप रत्नाकर समुद्र, सो उठती जे लहरी तिनिकरि आप अभिन्न है रस जाका ऐमा एक है तोऊ अनेकरूप होता दोलायमान प्रवर्ते है। कैसा है ? अद्भत है निधि जाका ।। भावार्थ-जमा समुद्र है सो बहुत रत्ननिकरि भरथा होय है, सो एक जलकरि भरया है, नौऊ तामैं निर्मल छोटी बडी अनेक लहरी उठे हैं, ते सर्व एकजलरूपही हैं। तैमा यह आत्मा ज्ञानसमुद्र है सो एकही है, यामैं अनेक गुण हैं अर कर्मके निमित्तातै ज्ञानके अनेक भेद आपै श्राप व्यक्तिरूप होय प्रगट होय हैं,ते व्यक्ति एकज्ञानरूपही जाननी-खंडखंडरूप नाही अनुभव करनी ।। ६ ।। अब और विशेषकरि कहे हैं- क्लिश्यतां स्वयमेव दुष्करतरैर्मोक्षोन्मुखैः कर्मभिः क्लिश्यतां च परे महाव्रततपोभारेण भग्नाश्चिरं । साक्षान्मोक्ष इदं निरामयपदं संवेद्यमानं स्वयं ज्ञानं ज्ञानगुण विना कथमपि प्राप्तु' क्षमते नहि ॥१०॥ स० टी.-केचित् स्वयमेव गुरुपदेशादिना बिना क्लिश्यता-क्लेश कुळतां, के ? दुष्करतरैः-दु' माध्यौ., धर्मभि'-शीतातापनवर्षायोगप्रतिक्रमणादिक्रियाभि , किंभूतै ? मोक्षोन्मुख -कर्ममोचन प्रति सन्मुखै.-निर्जराहेतुत्वात, च-पुन , परे--पुरुपा , चिर-दीर्घकाल, क्लिश्यता-कायादिक्लेश कुर्वता, किंभूताः मत' ? भग्ना मंस , केन ? महत्यादि -महात्रतानि-अहिंसादोनि, तपासि-अनशनादीनि, तेपा भारः, तेन, कर्मणा महाव्रतादिभि निर्जरासद्भावेऽपि ततो बहुतरकर्मास्रव ज्ञानाभावात , हीति-यस्मात कथमपि-केनापि प्रकारेण ज्ञानगुण-ज्ञान महात्म्य विना, प्राप्तु -मोदनवाप्तु', न क्षमते-न समर्था भवति । ततः साक्षात्-प्रत्यक्षं, इन ज्ञान आत्मपरिज्ञान मोक्ष' तदन्यतमस्य तत्रानुपलभ्यमानत्वात् किंभूत ? निराम- यपद-निर्गत श्रामय -रोग, उपलक्षणात् जुत्तष्णाजन्मजरामरणाधिदु'शर्मास्वाथ्योद्वेगादिगृह्यते यस्मा- तत्पद स्थान, स्वय स्वेर-आत्मना सवेद्यमान स्वसवेदनप्रत्यक्षेण ज्ञायमान ॥ १० ॥ अथ मुक्त प्राप्यत्व प्रथयति- अर्थ-केई तो कठिन दुःखकरि करे जाय ऐसे मोक्षतै पराङ् मुख कर्म तिनिकरि स्वयमेव जिन आज्ञाविना क्लेश करो, अर कई पर कहिये मोक्षके सन्मुख कथंचित् जिनाजामै कहे ऐसे महावन तथा तपके मारकरि बहुतकालपर्यंत भग्न भये पीडिन भये कर्मनिकरि क्लेश करो, तिनि कर्मनित ती मोक्ष होय नाही । जाते यह ज्ञान है, सो साक्षात् मोक्षस्वरूप है अर निरा- मय पद है-जाम किछू रोगादिकका क्लेश नाही है अर आपहीकार आप वेदनेयोग्य है सो ऐसा ज्ञान तौ ज्ञानगुणविना कोईही प्रकारके कप्टकरि पावनेतू समर्थ न हुजिये है । भावार्थ-जान है मो साक्षात् मोक्ष है, सो ज्ञानहीने पाइये है अन्य किछ क्रियाकर्मकांडते न पाइये है ॥१०॥ विशेप-पं० जयचंद्रजीने 'मोनोन्मुखैः' को कर्मभिः' का विशेपणकर मोक्षक पराङ मुख , - ? - -- १३ परमाध्यात्मतरङ्गिणी कर्मोंसे' यह अर्थ किया है और भट्टारक शुभ चंद्रजीने कर्मका शीत आतप आदि खुलासा अर्थकर और उसका मोक्षोन्मुखैः विशेपणकर मोक्षके सन्मुख, यह अर्थ किया है तथा जिन आज्ञाके वाह्य शीत आदि कर्म मोक्षके सन्मुख कैसे हो सकते हैं ? इसका समाधान भी यह दिया है कि शीत आदि दुखोंके सहनेसे कर्मोंकी निर्जरा होती है । पदमिदं ननु कर्मदुरासदं सहजबोधकलासुलभं किल । तत इदं निजबोधकलाबलात्कलयितुं यततां सततं जगत् ॥११॥ सं० टी०-ननु-इति वितर्के, किलेति-निश्चितं इदं पदं मोक्षलक्षणं फर्मदुरासदं कर्मणा क्रियाका- डतपश्चरणादिना दुरासदं दुप्न प्यं ततः-तस्मात्कारणात् जगत्-त्रिभुवनं, इदं पदं, कलयितु-अवगाहयितु यतता-यत्नं कुरुतां, कुतः ? निजेत्यादि:-निजबोधः-स्वात्मज्ञानं, तस्य कला-कलनं, तस्य बलं-सामर्थ्य, तस्मात्, कुतस्तत्र यत्नं ? यत्त इदं पदं सहजेत्यादि-सहजबोधः- स्वस्वरूप ज्ञानं तस्य कला-कलनं- अभ्यसनं तया सुलभं सुप्रापं ॥ ११ ॥ अथ ज्ञानिनोऽपरस्याकिंचित्कर त्वं युनक्ति- अर्थ-अहो भव्यजीव हो ! यह ज्ञानमय पद है सो कर्मकरि तो दुष्प्राप्य है, वहुरि स्वाभाविकज्ञानकी कलाकरि सुलभ है,यह प्रगटकरि निश्चय जाणौ । तातें अपने निजज्ञानकी कलाके बलते इस ज्ञानका अभ्यास करनेकू समस्त जगत् अभ्यासका यन्न करी ।। भावार्थ- सकलकर्मकछुडाय ज्ञानका अभ्यास करनेका उपदेश कीया है । वहुरि ज्ञानकी कला कहने करि ऐसा सूचै ई, जो, जेते पूर्णकला प्रगट न होय, तेतै ज्ञान है सो हीनकलास्वरूप है-मति- ज्ञानादिरूप है। तिस ज्ञानकी कलाके अभ्यासतै पूर्णकला जो केवलज्ञान संपूर्णकला सो प्रगट होय अचिंत्यशक्तिः स्वयमेव देवश्चिन्मात्रचिंतामणिरेप यस्मात् । सर्वार्थसिद्धात्मतया विधत्त ज्ञानी किमन्यस्य परिग्रहेण ।। १२ ।। सं० टी०- अन्यस्य-पद्रव्यस्य परिग्रहेण-ह.मत्वरूपांगीवारेण, ज्ञान -सुज्ञः, किं विधत्ते ? न विमपि तत्र ममत्वाभावात् , कुतः ? यस्मात्कारणात एप ज्ञानी-श्रात्मा, सर्वेत्यादिः-सर्वार्थः सिद्धः-निप्पन्नः, आत्मा स्वरूपं यस्य तस्य भावः तत्ता तय, विधत्ते विकार्य करोतीत्यर्थः, किंभूतः ? अचिंत्यशवितः- अचिंत्या-चिंतितुमशक्या शक्ति:-सामर्थ्य यस्य सः, रवयमेव-स्वरूपेणैर, देवः दीव्यति- इति स्वस्वरू : पेणेति देवः, पुनः किंभूतः ? चिदित्यादिः-चेतन्यनिवृत्तचिंतामणिः ॥ १२ ॥ अर्थ-जाते यह चैनन्यमत्रही है चितामणि जाकै ऐमा ज्ञानी है । सो स्वयमेव आप देव: है । कैसा है ! अचिंत्य कहिये काहूके चितवनमें न आवै ऐसी है शक्ति जामैं । सो ऐसा ज्ञानी.. सर्व प्रयोजन जाकै सिद्ध हैं एसे स्वरूप भया अन्यके परिग्रहरि कहा करै ? किछूही करना नाही ॥ भावार्थ-यह ज्ञानमूर्ति आत्मा अनंतशक्तिका धारक वांछितकार्य की सिद्धि करनेवाला , आपही देव है । तांते सर्व प्रयोजन के सिद्ध पणाकरि ज्ञानींके अन्यपरिग्रहके सेवनेकरि कहा .

निर्जराधिकार ६ साध्य है ? यह निश्चयनयका उपदेश जानू। इत्थं परिग्रहमपास्य समस्तमेव सामान्यतः स्वपरयोरविवेकहेतु। अज्ञानमुज्झितुमना अधुना विशेपाद भूयस्तमेव परिहर्तु मयं प्रवृत्तः१३ मं• टी-भूय -पुनः, अधुना-इदानी,--सपति, ४ य-ज्ञानी तमेव-परिग्रहमेव, परिहतु-त्यक्तु, प्रवृत्त.-मोद्य क्तो बभूव, विशेपात्-पूर्व ज्ञानभावेन विमुक्तोपधिरपि इदानी पुनर्विशेपत , किभूत: ? उडिझतुमना.-उज्झितु त्यक्तु , मन -चित्त, यस्य स , कि ? अज्ञान-अहमस्य ममेट रुपमनान, किंभूत ? स्वपरयोः-जीवपुद्नयो अविवेकहत-अविवेरस्य-प्रविवेचनस्य, हेतु -कारण, पिकृत्वा ? इत्थ-नाहमस्य नेद मम, अहमेव मम स्त्र, अहमेव मम स्वामीत्यादि पूक्तिप्रकारेण, सामान्यत -स्वपरपरिग्रहस्य भेदविवक्षा- मतरण, समम्नमेव-चेतनाचेतनादिक, उपधि अपास्य पग्ग्रिह त्यक्त्वा, ॥ १३ ।। अथ ज्ञानिनामपरिग्रहत्व- , . मुल्लिखनि- अर्थ-पा प्रकार परिग्रह सामान्यकरि ममस्तहीकू छोडिकरि, अब आप अर परका अविवेकका कारण अज्ञान छोडनेका है मन जाका, ऐमा जो यह ज्ञानी, सो तिस परिग्रहकू विशेषगरि न्यारा न्यारा रिसार करने फेरि प्रवते है। मावार्थ-जाते स्वपरका एकरूप जाननेका कारण अज्ञान है, नाहीत परद्रव्यका परिग्रहण है । तातें ज्ञानीकै परिग्रहका त्याग करनो कह्या ॥ १३॥ पूर्ववद्धनिजकर्मविपाकाज्ज्ञानिनो यदि भवत्युपभोगः । तद्भवत्वथ च रागवियोगात नूनमेति न परिग्रहभावं ॥ १४ ॥ सं० टी०-यदि-यदा, ज्ञानिन पु म , उपभोग:-कर्मोदयजनिनसुखदु खादिनोवाद्य पभाग', भवति- अस्ति, कुत ? पूर्वेत्यारि.--पूर्व-ज्ञानावस्यात. प्राग्वद्धानि-योगक्पायवशादात्मसात्कृतानि तानि च तानि कर्माणि च तेपा विपाक -उदयः, तस्मात् तत्-तर्हि, भवतु-अस्तु, उपभोग', अथ च उपभोगकथनादनंतर नून-निश्चित मानिन उपभोग इत्याध्याहार्य, परिग्रहभाव कर्मवधनायु पाधिस्वभाव नैति-न प्राप्नोति, कुतः ? रागवियोगात-राास्य-ममत्वादिपरिणामम्य वियोग.-राहित्य तस्मात , कर्मोदयोपभोगस्तावत् ज्ञानिन. अतीतो न स्यात् प्रनष्टत्वात् प्रत्युत्पन्नानागतौ न स्तः, तत्र ममत्वाभावात् इति तात्पर्य ॥ १४ ॥ अथ विरक्ति गृहाति- अर्थ-ज्ञानीकै जो पूर्वं बंध अपने कर्मका विपाक कहिये उदयतें उपभोग होय है, सो होऊ परंतु रागकै वियोगत निश्चयतै मो उपभोग परिग्रहभावकू' नारी प्राप्त होय है ।। भावार्थ-पूर्वे पंधे कर्मका उदय आवै तव उपभोगसामग्री प्राप्त होय, ताकू अज्ञानमय रागभावकरि भोगवै तब तो सो परिग्रभाव प्राप्त होय सो ज्ञानीकै अज्ञानमय गगभाव नाही है। उदय आया है, बाकू भोगवे है । यह जान है-जो पूर्व बांध्या था उदय आय गया, पिंड छूटचा, आगामी बाही वांछू हैं। ऐसे तिनि रागरूर इच्छा नाहीं, तब ते परिग्रह भी नाही ।।

- परभाध्यात्मतरङ्गिगी विशेष-संस्कृत टीकाकारने इस श्लोकका भाव यह लिखा है कि-ज्ञान के अतीत काँका उपभोग इगलिये नहिं होना कि वे नष्ट होगये और वर्तमान एवं भविष्यत् कमों का उपभोग उनमें ममत्व न होनसे नहिं होता ॥ १४ ॥ वेद्यवेदकविभावचलत्वाद्वेद्यते न खलु कांक्षितमेव । तेन कांक्षति न किंचन विद्वान सर्वतोऽप्यतिविरक्तिमुपैति ॥१५॥ स० टी-तेन-कारणेन, विद्वान्-धीमान्, किंचन-क्रिमपि, शुभाशुभ न कांक्षति-आकांक्षाविपयं न करोति, अपि पुन. विद्वान सक्तः-संसारदेहभोगतः, अतिविरक्ति-अतिवैराग्य, उपैति-भजत-प्राप्नांनीति यावन, तेन केन ? येन खल्विति वाक्यालकारे काक्षित-त्राछित भावं, न बंधने-नानुभूयते, कुन' ? बंधे. त्यादि. बदनयोग्यो वेद्य., बंधत अनेनेति बंदक, तौ च ती विभावी च नयोश्चल-क्षणिकाचा तत्मान् । तथाहि-यौ बंद्यबंदकभावों तौ क्षणिको स्त. विभावभावानामुत्पन्नप्रभामिनात अथ च यो भाव. वैद्य भाग वेदयते स वेदको यावद्भवनि तावकाक्ष्यों वेद्यो भावो नश्यति तद्विनाशं वेदकभाव कि वदयंत ? अथ काक्ष्य- वद्यभावानन्तरभाविनमपरं भावां वेदयते तदा तद्भवनात्पूर्व स बंदको नभ्यनि त को बयत ? अथ बदक- भागनतरभावी भावोऽपरस्त वनयते ताना-पूर्व स वेद्यो नश्यति स कि वेदयते इति चलत्वान्न कांक्षति ॥ १५॥ अथ ज्ञानिनोऽपरिग्रहित्वं चेतति- अर्थ-बंद्यवेटकभाव है ते यमक निमित्ततें होय है। तात ते स्वभाव नाही, विभाव हैं, बहुरि चलायमान हैं, समय समय विनसे हैं । ताते वांछितभाव नाही वेदीय हैं । तिस कार- एफरि विद्वान ज्ञानी है सो किकृमी आगामी भोग नाहीं वांछ है । सर्वहीत अनिविरक्तभाव वैराग्यभाव प्राप्त होय है ।। भावाथ-अनुभवगोचर जो वेद्यवेदक विमान तिनिहींक कालभेद है, नात मिलाप नाही, विधि मिले ना तब आगामी बहुत कालसंबंधी की बांछा ज्ञानी काहंक कर ? ज्ञानिना नहि परिग्रहभावं कर्मरागरमरिकतयति । रंगयुक्तिरकपायितवस्त्रे स्वीकृतेव हिं बहिर्जुठतीच ॥ १६ ॥ सं० टी-हि-निश्चितं. जानिन.-पुस, कर्म पग्ग्रिहभाव उपविभाग नैनि-न प्राप्नोति, कया? रागेत्यादि.-रागः-रसिकवं, तेन रिक्तम्तस्य भावस्नया होत्यत्रार्थानरोपन्याम इह-लौकिक्रयुक्ती,रंगयुक्ति:- तोहितादिरागयोग, अपायिनवन्त्र-विभीतकादिकपाचव्यै रकथायीकृत चीवर स्वीकृता-गृहीना-आरो- पिता. रगयुनि.-लोहिनरागयोगः, बहिर्तुति अतर्भत्तुमशक्यत्वालपायरामादिकारणभावान् ॥१६॥ अथ शानिन' अर्मन लिपति- अर्थ-ज्ञानी तिनि परिग्रहभावनिकरि रिक्त है रहित है अर ज्ञानी रागरूपी रसकरिमी रिक्त है रहित है। निमपणाकरि कम है सो परिग्रहभाव नाही प्राप्त होय है । जैसे लोद फिटकाडी- करि कसायला न किया जो वस्त्र नाविप रंगका लगना है, मो अंगीकार न भया संता बाह्यही ॥

॥ - - - निर्जराधिकार १०१ लुठे हैं, वस्त्रमाही प्रवेश नाही कर है ।। भावार्थ-जैसे लोद फिटकडी लगाईविना नस्त्र के रंग चढे नाही, तैसे ज्ञानीक रागभावविना कर्मका उदयमा भोग नाही, सो परिग्रहपणा नाही प्राप्त होय है ||१६|| फेरि कह हैं- ज्ञानवान स्वरसताऽपि यतः स्यात्सर्वरागरसवर्जनशीलः । लिप्यते सकलकर्मभिरंप कर्ममध्यपतिताऽपि तता न ॥ १७ ॥ सं. टी.तत-तस्मात्कारणान, एप.-ज्ञानी, मकलकर्मभि -समस्तदन्यभावनोमभि , न लिप्यत. नोपदह्यते, नामयत इत्यर्थ , कीडनाऽपि कर्ममध्यपनितोऽपि-वर्मणा-उदयादिस्पाणा मध्य-श्रत पतितोऽपि अपिशब्दात्तत्रापतितस्य क्थ वधः । यथा वनकस्य वर्दममथ्यगतस्य न लप । कुन. ? यन: यस्मात्कारणात, स्वरसतोऽपि-स्वभावत एत्र, ज्ञानवान पुमान् सर्वत्यादि-सर्व च तं रागाश्च रागद्वे पमोहा. तथा रम., तस्य वर्जने शील स्वभावो यस्य स , ईमिव स्यात-भवत् ।। १७ ॥ अथ वस्तुस्वभाव निर्णेनेक्ति- अर्थ-जात ज्ञानवान है सो अपने निजरसहीत सर्व रागरसकरि वर्जित स्वभाव है । ताते कर्मक मध्य पड्या है तोऊ समस्तकर्मकरि नाही लिपे है । यादृक् तागिहास्ति तस्य वशता यस्य स्वभावो हि यः कर्तुं नैप कथंचनापि हि परैरन्यादृशः शक्यते । अज्ञानं न कदाचनापि हि भवेज्ज्ञानं भवत् संततं ज्ञानिन भुक्ष्व परापराधजनितो नास्तीह बंधस्तव ।। १८ ॥ स. टी:-ह-जगति, यस्य-वस्तुन., याक्-याहश., स्वभावः-स्वरूप अस्ति-वर्तत, होति स्फुट तस्य वस्तुनः, वशतः-ज्ञानस्य नियमवशाद्वा ताहक-ताहक्ष एव स्वभावो भवेत-नान्यथा। हीति-यस्मात य:- एप स्वभाव स परे.-अन्यपदार्थ., कय पनापि-केनापि प्रकारेण देशातरे कालातरे द्रव्यातरमयोग, अन्या- दृश.-अन्यस्वभावसहश., कर्तुं न शक्यते । होति यस्मात सनत-निरंतर, कदाचनापि-कस्मिन्नपि काले भवत-विद्यमान, ज्ञान-बोधः, अनान न भवत-न जायत, ह ज्ञानिन् । मुक्ष्य-परद्रव्यमनुभव, कुत ? यतः, इह-जगति परेत्यादि -परेपी-युगलद्रव्याणा, अपरायः-आगः तेन जनितः-उत्पादिन , तव-ज्ञानिना बंध.-कर्मवध.-नाम्नि न भवत्येव ॥ १८ ॥ अथ ज्ञानिन. कर्मक्रिया प्रतिरुणद्धि- अर्थ-जिस वस्तुका जैसा इसलाकमे जो स्वभाव है, ताका तैमाही स्वाधीनपणा है, यह निश्चय है । सो तिसस्वभावा अन्य कोऊ अन्यसारिखा कीया चाहे, नी कदाचिवह अन्यसा- रिखा करिसके नाही । इस न्यायतै ज्ञान है सो निरंतर ज्ञानस्वरूपही होय है। ज्ञानका अज्ञान कदाचित भी होय नाही है, यह निश्चय है । नाते हे ज्ञानी, ते कर्मके उदयजनिन उममोगहू भागि । तरै परकं आराधरि उज्या ऐसा इस लोकमे बंध नाही है। भावार्थ-वस्तुस्वभाव मंटन कोई समर्थ नाही, यह निश्वानय है । तात ज्ञानी' कहा है, जो, तर पर कीये १०२ परैमाध्यात्मतरंगणी - - . अपराधत तौबंध नाही है, तो तू उपभोग भोगि । उपभोगनिके भोगनकी शंका मति करें। शंका करेगा तो परद्रव्य बुरा होना माननेका प्रसंग आवेगा । ऐसें परद्रव्यतै अपना चुरा, माननेकी शंका मेटी है । ऐमा मनि जानू-जो, भोग भोगनेकी प्रेरणाकरि स्वच्छंद कीया है। स्वेच्छाचारी होना तो अज्ञानभाव हैं, सो आगे कहेगे ॥१८॥ ज्ञानिन् कर्म न जातु कर्तुमुचितं किंचित्तथाप्युच्यते सुंदये हंत न जातु मे यदि परं दुर्भुक्त एवासि भोः । वंधः स्यादुपभोगतो यदि न तत्किं कामचारोऽस्ति ते ज्ञानं सन्वस बंधमध्यपरथा स्वस्यापराधाद् ध्रुवं ।। १६ ॥ स० टी०-हे ज्ञानिन् । जातु-कदाचित्, तव किंचित्-किमपि, नर्म-शुभाशुभलक्षणं कार्य, क्तु- विधातु , उचित-युक्त न तथापि-कर्मावर्तृत्वेऽपि, उच्यते-अस्माभि किचित् प्रतिपाद्यते यदि-चेत्, जातु- क्दाचित्, मम कर्म न हत इति निश्चयेन भु ये कर्मफलं भुक्ष्यामि तर्हि भो ज्ञानिन् । पर-केवलं, दुभुक्त एव बधनमतरेण तत्फलानुभवनाद् दुर्भोजक., असि भवसि न तु अस्माक तत्फलानुभवनात्कर्माध इति यदि-उपभोगतः-कर्मफलानुभवनात्, बंधः-कर्मसश्लेपः, ते न स्यात्-न भवेत्, तत् तर्हि ते तव कामचारः काम चरतीति काम चारः-स्वेच्छाचारः किमस्ति अपि तु नास्ति, हे ज्ञानिन् । ज्ञानं सन्-ज्ञानस्वरूपेण भवन् सन्, वस-तिष्ठ, अपरथा-अन्यथा-ज्ञानस्वरूपेण न स्थास्यसि चेत ? तदा ध्र वं-मिश्चित, गचं कर्म- संश्लेष-एपि-प्राप्नोपि कुन. ? स्वस्य-प्रात्मनः-अपराधात्-ज्ञानाभावलक्षणदोपतः ॥ १० ॥ अथ कर्मयो- जन वियोजयति- अर्थ-ज्ञानीकू संवोथै हैं, जो, हे ज्ञानी, तो कर्म कदाचिन् किछू भी करना योग्य नाही है । तोऊ तू कहै, जो पर द्रव्य मेरा तो कदाचित् भी नाही है, अर में भोगऊ हौं । तो आचार्य कहै है-यह बडा खेद है, जो तेरा नाही ताकू तू भोगवै है ! ऐया तो तू दुर्भुक्त है-खोटा खाने- वाला है ।। रे भाई, जो तू कहै-परद्रव्यके उपभोगत बंध न होय है ऐसा कह्या है, तातै भोगऊं हौं । तहां तेरे कहा कामचार है ? भोगनेकी इच्छा है ? तू ज्ञानरूपहुवा संता अपने स्वरूपमें निवास करें तो बंध नाहि हैं अर भोगने की इच्छा करेगा, तो तू आप अपराधी भया, तव अपने अपराधत नियमकरि बंधकूप्राप्त होयगा ।। भावार्थ-ज्ञानी कर्म तो करना ही उचित नाही हैं । अर जो परद्रव्य जानिकरि भी ताकू भोगवे, ती योग्य नाही । परद्रव्यका भोगनेवालाकू तौ लोकमें चोर अन्यायी कहैं। बहुरि उपभोगते बंध न कह्या है, सो तो ज्ञानी विनाइच्छा परकी बरजोरीम उदय आयाळू भोग ताकै बंध न कह्या है । अर आप जो इच्छाकरि भोगवेगा तौ आप अपराधी भया, तत्र बंध क्यों न होयगा ? ॥१६।। आगै फेरि इसही अर्थको दृढ करने काव्य कहे है- . 1.

निर्जराधिकार ? कर्मण'-शुभा- कर्तारं स्वफलेन यत्किल बलात्कमैंव नो योजयेत् कुर्वाणः फललिप्सुरेव हि फलं प्राप्नोति यत्कर्मणः । ज्ञानं संस्तदपास्तरागरचनो नो वध्यते कर्मणा कुर्वाणोऽपि हि कर्म तत्फलपरित्यागैकशीलो मुनिः ॥२०॥ स० टी-रिल-इत्यागमात्ती रत- प्रसिद्ध र्म, बलात्-हठात्, एव-निश्चयेन, स्वफलेन-स्वस्य स्वकायस्य, फलेन-सुखदु स्वरूपेण, कर्तार-पुरुष, न योजयेत्-न मयोजयेत्-स्वफलभाजिन न कुर्यात इत्यर्थं , तर्हि का फल प्रान्नाति ? हीति स्फुट, यत्कर्म, कुर्वाण -चेक्रीयमाणः सन् पुरुष., शुभप्रकृतेः, फल-सुखदुःखरूप, प्राप्नात-लभते, हेतुगर्मितविशेषणमाह-फललिप्सुरेव,-फ्ल कर्मणः सुखदुःखरूप फल, लिप्सु.-लन्धु'-प्राप्तुमिच्छुरेव, नान्य , तत्-तस्माद्ध तो ज्ञान-ज्ञानस्वरुप सन् भवन् कर्मणा न वध्यते, किंभूत सन्, अपास्तेत्यादि अपास्ता-निराकृता रागस्य रचना येन स', हीति स्फुट कर्म क्रियाकार, ज्ञानावरणादि-बा, कुर्वाणोऽपि वा निर्मापयन्नपि अकुर्वाणस्य का कथा' मुनिः-ज्ञान- वान् यतिः, तदित्यादि:-तेर्षा कर्मणा फल अनुभाग , तस्य परित्यागे एक-अद्वितीय, शीला-स्वभावो यस्य सः, रागद्वे पाभावात ।।२०|| अथ ज्ञानी न कर्म कुरुते- अर्थ-निश्चयकरि यह जानी-जो कर्म है सो अपने करनेवाले काकू अपना फलकरि परजोरी तो नाही जोडै है जो मेरा फलकू तू भोगि । जो कर्मकू करता संता तिस फलका इच्छुक हुवा करे है, सोही तिस कमका फल पावै हैं । तातें ज्ञानरूप हुवा संता कर्मविर्षे दूरी भया है रागकी रचना जाकी ऐसा मुनि है, सो कर्मकू करता संता भी, कर्मकरि नाही बंधै है। जाते कैसा है यह मुनि ? तिस कर्मके फलका परित्यागरूपही है एकस्वभाव जाका ।। भावार्थ-कर्म तो वर्ताकू जबरीतै अपना फलते जोडे नाही । अर जो कर्म करता संता, ताका फलकी इच्छा करे, सोही ताका फल पावे है । तातै जो ज्ञानी ज्ञानरूप हुवा प्रवते कर्मके करने वि राग न करें अर तिसके फलकी आगामी इच्छा न करे सो मुनि कर्मकरि बंधै नाही है। अब इहाँ आशंका उपजी है-जो फलकी बांछाविना धर्म काहे करै ? ऐमी आशंका दुरि करनेकू काव्य कहे हैं- त्यतं येन फलं स कर्म कुरुते नेति प्रतीमो वयं कित्वस्यापि कुतोऽपि किंचिदपि.तत्कर्मावशेनापतेत् । तस्मिन्नापतिते त्वकंपपरमज्ञानस्वभावे स्थितो ज्ञानी किं कुरुतेऽथ किं न कुरुते कमें ति जानाति कः ॥२१॥ - अर ।

? परमाभ्यामनरङ्गिणी स० टी०~-इनि-ए, वश-ज्ञानार्थिन , प्रतीम -प्रनाति कुर्म , इति किं ? येन जानिना पुमा, फलां- कर्मानुभाग', त्यक्त ज्ञानभावाद्विमुक्त, स:-ज्ञानी, म क्रियाकार ज्ञानावरणादि वा न कुमते न विधत्ते, किन्तु विशेषोऽरित अस्यापि ज्ञानिनोपि, कुतोऽपि बहिरमातर कारणकलापात्, श्रयशन अनीहितवृत्त्या, तत्प्रसिद्ध किंचिदपि अनिर्दिष्ट, शुभाशुभ, कर्म, आपतेत् आगच्छेन, तु पुनः तस्मिन् कर्मणि, आपतिते उदयागते सति, बानी पुमान् तत्परिहारार्थं कि कम क्रियाकाड, कुरुते विधत्ते अथवा किं न कुरुते किन विधत, इति एका, कर्तव्यातव्या, कः अपर, पुरुष जानाति वेत्ति तत्म्वरूपस्य नातुमशक्यत्वात्, किभूतो ज्ञानी ? अकपेत्यादिः अकप केनापि चालयितुमशक्यत्वात अचला, परम उत्कृष्ट, तच्च तज्ज्ञान च तस्य स्वभावे म्वरूपे स्थितः लय प्राप्त ॥ २१ ॥ अथ सम्यग्हप्टे. माहम कलयति- अर्थ-जाणे कर्मका फलकू छोड्या अर कर्मकू कर है यह तो हम नाही प्रतीतिरूप करें हैं, परन्तु यामैं किछू विशेष है-जो,या ज्ञानीकै भी कोई कारणनै किछू जो कर्म याके वशविना आय पड़े हैं, ताकू आय पडते संते भी यह ज्ञानी निश्चल परमज्ञानस्वभावविप तिष्ठया किछु कर्म कर है कि नाही कर है यह कौन जाने ? भावार्थ-ज्ञानीक परवशते कम आय पडे हैं, ताविणे भी ज्ञानी ज्ञानरौं चलायमान न होय है । तहां यह ज्ञानी है सो, न जानिये कर्म करें है कि नाही कर है, यह कौन जाने ? ज्ञानीही ज्ञानीकी जाने । अज्ञानीका ज्ञानीके परिणामकू जाननेकूबल नाही इहां एसा जानना, जो ज्ञानी कहनेते अविरत सम्परदृष्टी लगाय ऊपरके सर्वही ज्ञानी हैं, तहाँ अविरतसम्यग्दृष्टि तथा देशविरत तथा आहारविहार करत मुनि, तिनिके वाह्यक्रियाकर्म प्रवर्ते हैं, तोऊ अंतरंगमिथ्यात्वके अभावौं तथा ते यथासंभव कपायके अभावरौं उज्वल है। तारौं तिनिकी उजलाईकू तेही जाने हैं। मिथ्यादृष्टि तिनिकी उजलाईकू जाने नाही मिथ्यादृष्टि तौ बहिरात्मा है, बाह्यहीकू बुरा मान है अंतरात्माकी गति मिथ्यादृष्टि कहा जाने ? आगै ज्ञानीकै निःशंकित नामा गुण' होय है, ताकौं कहै है- सम्यग्दृष्टय एव साहसमिदं कर्तुं क्षमंते पर यद्वब्रेऽपि पतत्यमी भयचलत्रैलोक्यमुक्ताध्वनि । सर्वामेव निसर्गनिर्भयतया शंकां विहाय स्वयं जानन्तः स्वमवध्यबोधवपुर्ण वोधाच्च्यवंते न हि ॥२२॥ स० टो-क्षमते-सहते-समर्या भवतीत्यर्थः, किकतु ? इदं वक्ष्यमाणलक्षण साहसं-लक्षणया धैर्य, के ? सम्यग्दृष्टय'-निश्चय सम्यक्त्व प्राप्ताः एव-निश्चयेन, किभूतं साहसं ? परं उत्कृष्ट पर केवलमिति व्याख्येव वा यत्-यस्मात् कारणात, अमी-सम्यग्दृष्टयः, हि-निश्चितं, न गवाते न क्षरते, कुतः ? बोधात. जानात् उपलक्षणात् न्यानतपोऽनुष्ठानादेः ज्ञान मुक्त्वा नान्यत्र वर्तते क सति ? वजे अशनी, पतत्ति मूनि पास कुर्वति सत्यपि किभूते ? भयंत्यादि. भयेन तद्घोषपाताा स्थभीत्या, चलत् स्वस्थानात् इतस्ततः परिलुठत च तलैलोक्यं च भुवनत्रयवासी जनः, तेन मुक्त'-त्यनः, अध्या-मार्गः, स्थानं च यस्मिन् तस्मिन्, किंभूना श्रमी स्वयं-स्वेन आत्मना,स्व-आत्मार्ग,जानन्तः-निश्चिन्तः, कीडन स्वं ? अबध्यत्यादि:-अथव्याः ? -- - 3 निराधिकार १०५ न केनापि तु शक्यते, शाश्वन इत्यर्थ. स चासो बोधश्च स एव वपुः शरीर यस्य त । किंकृत्वा विहाय, त्यक्त्वा, को १ मा-समरतां, इहलोकादिभवा, एव-निश्चत शका-पराशका, कया ? नीत्यादि. निमर्गेण स्वभावेन निर्भयता-साध्वमाभावता तया ॥ २२ ।। अथ भयमातकनिवारणार्थ बानिन इहपरलोकभयमु, त्रस्यति-. अर्थ-यह माहस केवल एक सम्यग्दृष्टि हैं तेही करनेकू' समर्थ है । जो भयकरि चलाय मान भया जो तीन लोकका जन, तिनने छोड्या है अपना मार्ग ज्याकरि ऐसा बज्रपात पडते संते भी अपने ज्ञानत नाही चलायमान होय है। कैसे है सम्यग्दृष्टि ? स्वभावहीकरि निर्भय-' पणात सर्वही शंका छोडिकरि अपना आत्माकू ऐसा जाने हैं-जो नाही वध्या जाय है ज्ञान- रूप शरीर जाका ऐसा आपहीकरि जानते सते प्रवतें हैं ।। भावार्थ-सम्यग्दृष्टि, निःशंकितगुण- महित होय है । सो ऐसा बज्रपात पडै, जो, जाके भयकरि तीन लोकके जन-मार्ग छोडि दें ताऊ सम्यग्दृष्टि अपना स्वरूपकू निर्वाध ज्ञानशरीर मानता ज्ञानतें चलायमान न होय है। ऐमी शंका नाही न्याय है, जो, इस वज्रपाततै मेरा विनाश होयगा पर्याय विनसै तौ याका विनाशीक स्वभावही है ॥२२॥ लोकः शाश्वत एक एष सकलव्यक्तो विविक्तात्मन- श्चिल्लोकं स्वयमेव केवलमयं यं लोकयत्येककः । लोकोऽयं न तवापरस्तदपरस्तस्यास्ति तद्भीः कुतो निश्शंकः सततं स्वयं स महज ज्ञानं सदा विंदति ॥ २३ ॥ •मंटी०-एप-शास्त्रादिना प्रसिद्ध', लोक'--श्रेणिघनप्रचयरूपस्त्रिलोक , शाश्वत-नित्र इतीश्वरक ला निरस्त, अविनाशिता च सूचित, एक.-अद्वितीय , इत्यनेन ब्रह्मण प्रतिलोमानेक्ब्रह्माडप्रति पादन प्रत्याख्यातं, विविक्तात्मनः-सर्वज्ञस्य, सकलव्यक्त -समस्तो विशद', इत्यनेन तस्य गहनत्व अपास्त, अय चित-ज्ञानं स्वयमव-स्वभावादेव य प्रसिद्ध लोक-भुवनत्रय, केवल-पर-लोकयति-पश्यति, कीहक्ष.? एकक'-शरीरदारदरकागाराहारादिनिरपेक्षः एक एव अग-प्रत्यक्षः-चराचररुपो लोकः-लोकनिवासी जन', त्रिलोको वा, इहलोक इत्यर्थ., अपरः-त्वत्तो भिन्न., तव-ते, न भवेत् , तदपर'--तस्मादिह लोकादपर:- परलोकः तस्य-आत्मन. नास्ति तदी-ताभ्यामिहपरलोकाभ्या, भी-भय, कुत -कस्मात न कुतोऽपि तयोः रात्मनो भिन्नत्वस्यापनात, स ज्ञानी, सदा-नित्यं स्थय स्वरूपेण, सहज-स्वाभाविक, ज्ञान-बोध, विदति--जानाति, सतत निरतर, निश्शक -इहपरलोकभयशंकारहित. इति भयद्वयस्य जानिनों निराम ॥ २३ ॥ अथ वेदनाभयं बध्नाति- अर्थ-यह भिन्न आत्माका चैतन्यस्वरूप लोक है सो शाश्वत है, एक है, मकलजीवनिकै प्रगट है,जा यह ज्ञानी आत्माही स्वयमेव एकाकी केवल अवलोकन कर है। तहां ज्ञानी ऐसे विचार है, जो यह चैतन्यलोक है मो तेरा है बहुरि तिसौं अन्य लोक है मो परलोक है, तेर १४ --- wd . - । - -- १०६ . परमाध्यात्मतरंगिणी नाही । ऐमा विचारता तिस ज्ञानीकै इसलोक अर परलोकका भय काहे होय ? नाही होय। तारौ सो ज्ञानी है सो निःशंक भया संता निरंतर आपकू स्वाभाविक ज्ञानस्वरूप अनुभव है। भावार्थ-जो इस भव” लोकनिका डर होय, जो यह लोक मेरा न जानिये कहा विगाड करेगा सो ऐसा तो ईहलोकका भय है । बहुरि परभवमें न जानिये, कहा होयगा ? ऐसा भय रहै सो परलोकका भय है । सो ज्ञानी ऐसें जानै है-जो मेरा लोक तौ चैतन्यस्वरूपमात्र एक 'नित्य है यह सर्वकै प्रगट है बहुरि इस लोक सिवाय है सो परलोक है सो मेरा लोक तौ काहूका विगाडया विग. नाही। ऐसे विचारता ज्ञानी आप स्वाभाविक ज्ञानरूप अनुभवै ताकै इसलोक का भय काहे होय ? कदाचित् न होय ।। २३ ।। वेदनाका भयका काव्य । एकैव हि वेदना यदचलं ज्ञानं स्वयं वेद्यते' निर्भदोदितवेद्यवेदकवलादेक सदाऽनाकुलैः ।। नैवान्यागतवेदनैव हि भवेत्तद्धीः कुतो ज्ञानिनो निश्शंकः सततं स्वयं स सहज ज्ञानं सदा विंदति ॥२४॥ सं० टी-यत्-प्रसिद्ध ज्ञान स्वयं वेद्यते-ज्ञायते; कैः ? अनाकुलैः-छाकुलतारहितैः-शानिभिः एषा- प्रसिद्धा, एका-अद्वितीया, वेदना-वेद्यते ज्ञायते आत्मा अनया -इति -वेदना आत्मानुभनं एव नान्या, किभूतं ? अचलं-निश्चलं, पुनः कीदृशं ? एक-द्रव्यार्पणात तत्कुतः ? निरित्यादिः वेद्यते झायत इति वेद्य, स्वरूपं वेदयतीति वेदकः आत्मा, दद्वः, निर्भेदेन यो वेद्यः स एव वेदकः, इत्येकत्वेन उदितौ उदयं प्राप्तौ वेद्यवेदको तयोर्बल तस्मात्, हि-स्फुट, अन्य आत्मनः सकाशात् एत्र-निश्चयेन, आगतवेदना-पुद्गला. दागतवेदना रोगः, न भवेत् आत्मनो भिन्नत्वादेव ज्ञानिनः-पुसः, तद्धी:-वेदनाभयं कुन: ? न कुतोऽपि, तुर्य चरण पूर्ववत् ॥ २४ ॥ अथात्राणभयं निरस्यति- अर्थ-ज्ञानी पुरुपनिकै याही एक वेदना है जो निराकुल होयकरि आप अपना एक ज्ञान- स्वरूपकू अपना ज्ञानभावही वेदनेयोग्य अर आपही वेदनेवाला ऐसा अभेदस्वरूप वेद्यवेदक मायके चलते निरंतर निश्चल वेदिये है-अनुभवन कीजिये है । बहुरि ज्ञानीकै अन्य” आई ऐसी वेदना ही नाही है.ता” तिसकै तिस वेदनाका भय काहेरौं होय ? नाही होय । यार्स ज्ञानी निःशंक भया संता अपना स्वाभाविक शनभावकू सदा निरन्तर अनुभवै है । भावार्थ- वेदना नाम सुखदुःख भोगनेका है सो ज्ञानीकै एक अपना ज्ञानमात्र स्वरूपका भोगना ही है। यह अन्यकरि आई वेदनाकू ही नाहीं जान है। तात अन्यागतवेदनाका भय नाही है ताते सदा निर्भय भया ज्ञानका अनुभवन करै है ॥२४॥ अब अरक्षाका भयका काव्य कहै यत्मन्नाशमुपैति तन्न नियतं व्यक्तति वस्तुस्थिति- مد हैं- . , निर्जराधिकार १०७ ज्ञानं सत्स्वयमेव तकिल ततस्त्रातं किमस्यापरैः । अस्यात्राणमतो न किंचन भवेत्तोः कुतो ज्ञानिनो निश्शंकः सततं स्वयं स सहज ज्ञानं सदा विंदति ॥ २५ ॥ तं. टी-इति-मुना प्रकारेण, वस्तुस्थिति-वस्तुव्यवस्था, व्यक्ता-स्पष्टा, इति किं ? यत्-वस्तु सत्- द्रव्यरूपेण सत्ताप्रतिवद, तत्-वस्तु नियत निश्चित, नाश-विनाश, न उपैति-न प्राप्नोति, द्रल्यार्पणया वस्तुनों नित्यत्वाभ्युपगमात, तत् प्रमिद्ध, ज्ञ न, स्वयमेव-स्वरूपत एव-स्वस्वरूपचतुष्टयापक्षयैव न परचतुष्ट- यापेक्षया सत सत्त्वरूपं-विद्यमान फिल-अहो तन. स्वरुपेगास्तित्वात् अपरै -कोने यककुतमुद्राश्वगज- पदातिस्वजनादिभिः पुदलपर्याय, अस्य-ज्ञानस्य, किंवातं-जाण, कि रक्षण न किमपोत्यर्थः अत. कार• णात्, अस्य जानस्य किंचन-किमपि अत्राण- कुतोऽपि रक्षण न भवेत् , ज्ञानिन. तभी-अत्राणभय कुतः न कुतोऽपि शेप पूर्ववत् ।। २५ ।। अथास्यागुदिनभय गोपयति- अर्थ-ज्ञानी ऐसे विचार है, जो, सत्स्वरूप वस्तु है, सो नाशक प्राप्त नाही होय है, यह नियमते वस्तूकी मर्यादा है ।। बहुर ज्ञान है सो आप सत्स्वरूप वस्तु है, ताका निश्चयकरि अन्यकरि कहा राख्या १ तात तिस ज्ञानकै अरक्षा करनस्वरूप किछू भी नाही है । तातै विस अरक्षाका भय ज्ञानीकै काहेतै होय है । ज्ञानी तो अपना स्वाभाविक ज्ञानस्वरूप निःशंक भया संता सदा आप अनुभव है ।। भावार्थ-ज्ञानी ऐसे जाने हैं, जो सत्तारूपवस्तूका कदाचित नाश नाही अर ज्ञान आप सत्तास्वरूप है । सो याका किछ ऐसा नाही है-जाकी रक्षा कीये रहे, नातरी नष्ट होय जाय । तातै ज्ञानीकै अरक्षाका भय नाही, निःशंक भया संता आप स्वाभाविक अपना ज्ञान सदा अनुभव है ॥२५। अब अगुप्तिभयका काव्य है- स्वं रूपं किल वस्तुनोऽस्ति परमा गुप्तिः स्वरूपेण य- च्छक्तः कोपि परः प्रवेष्टुमकृतं ज्ञानं स्वरूपं च नुः । . अस्यागुप्तिरतो न काचन भवेत्तद्धीः कुतो ज्ञानिनो निश्शंकः सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विंदति ॥२६॥ सं० टी.-किल-इत्यागमोक्ती. वस्तुनः-आत्मादिद्रव्यस्य, यत् स् आत्मीय, रूपं स्वरूप, अस्ति- विद्यते, मा परमा निस्सीमा, गुप्निः गोपन स्वरुपातेरण गोपनाभावात्, कोऽपि-कश्चिदपि, पर:-पुद्गलादिः प्रवेष्टु-ज्ञानस्वरूपे प्रवेश कर्तु, शक्त.-समर्थ , अपि तु न समर्थः, स्वस्पे स्वरूपातरस्य प्रवेशाभावात् , प-पुन:,ज्ञान नुः-प्रात्मनः अकृत स्वाभाविक-स्वरूपं स्वभार., स्वरुप द्वधा-कृनमकृतं च कृतं तावन्मति- मानादिस्वरूपमात्मनः दंडी देवदत्त इत्यादिवत् पुनलादिभि. क्रियमाणत्वात् , अकृतं-मानसामान्य, अग्नेरीएयं च अत. कारणात् अस्य-आन्मन., काचन-कापि, निर्दिष्टा वा, अगुप्ति -अगोपनं न भवेत तदोपकस्य चिदभावात् तद्रीः-तस्या अगुप्तेः, भोः भय, कुतः- कुतोऽपि शेपं पूर्ववत् ॥ २६ ॥ अय कानिनो मरणभग हरति- , - ? १ परमाध्यात्मतरङ्गिणी अर्थ-ज्ञानी विचार है,जो वस्तुका निजरूप है सो ही परमगुप्ति है सो ताविप पर है सो कोई भी प्रवेश करने समर्थ नाही है बहुरि ज्ञान है सो पुरुपका स्वरूप है सो अकृत्रिम है, याने या अगुप्ति किछ भी नाही है तातै तिस अगुप्तिका भय ज्ञानीक नाही हैं । याहीत ज्ञानी निशंक भया संता निरंतर आप स्वाभाविक अपना ज्ञानभावकू सदा अनुभवें है || भावार्थ-गुप्ति नाम जामैं काहुका प्रवेश नाही ऐसा गूढ दुर्गादिकका है। तहां यह प्राणी निर्भय होय वेस एमा १. गुप्त प्रदेश न होय चौडा होय ताकू अगुप्ति कहिये । तहां बैठ प्राणीक भय उपजै॥ तहां ज्ञानी ऐसा जान है, जो वस्तूका निजस्वरूप है, तामै परमार्थकरि दूजे वस्तूका प्रवेश नाही, यहही परमगुप्ति है । सो पुरुपका स्वरूप ज्ञान है। तामै काहुका प्रवेश नाही । तात ज्ञानीक काहते भय होय ? ज्ञानी अपना स्वाभाविक ज्ञानस्वरूप कू निःशंक भया संता निरंतर अनुभव है |२६| अब मरण भयका काव्य है- प्राणाच्छेदमुदाहरंति मरणं प्राणाः किलास्यात्मनों ज्ञानं तत्स्वयमेव शाश्वततया नोच्छिद्यते जातुचित् । : तस्यातो मरणं न किंचन भवेत्तद्धीः कुतो ज्ञानिनो निश्शंकः संततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विंदति ॥ २७ ॥ सं. टी-प्राणोच्छेद-पचेद्रियमनोवचनकायोच्छवासायुर्लक्षणाना उच्छेद-विनाश, मरणं-चला, उदाहरति-प्रतिपादयति पूर्ववृद्वा., श्राबालगोपालादयश्च, अस्यात्मन. चिद्रूपस्य, क्लि-निश्चितं, 'सत्ता- दिप्राणत्रयाहारकः क्लिशन्न., प्राणा:-असवः तत-ज्ञान-स्वयमेव-स्वरूपेणैव जातुचित बदा- चिदपि-कालत्रयऽपि, नाच्छिद्यन-नोच्छंद याति-द्रव्यार्पणया न विनश्यतीत्यर्थ., कया शाश्वततया-नित्य- त्वात् अतः कारणात तस्य-आत्मनः. किंचन-किमपि,-मरण-प्राणोच्छंद न भवन ज्ञान्लक्षणानां प्राणाना- मुच्छदाभावात् ज्ञानिन -पु स', नझी.-मरणभा कुतः, न कुतोऽपि, शंष पूर्ववत् ।। २७ ।। अथाकस्मिकभग अर्थ-ज्ञानी विचार है, जो प्राणनिका उच्छेद होना, तिसकू मरण कहै हैं । सो आत्माका ज्ञान है सो निश्चयकरि प्राण है सो स्वयमेव शाश्वता है,यात याका कदाचित् भी उच्छंद नाही होय है । यात तिस आत्माकै मरण किछूभी नाहीं है सो ज्ञानीकै ऐसे विचारत तिस मरणका : भय काहे होय ? तातै सो ज्ञानी निःशंक भया संना, निरंतर अपना स्वाभाविक ज्ञानभावक । आर सदा अनुभव हे । भावाथ-इन्द्रियादिक प्राण बिनसे ताकू लोक मरण कहे हैं सो आत्मा- कै इन्द्रियादिक प्राण परमार्थस्वरूप नाही, निश्चयकरि ज्ञान प्राण है, सो अविनाशी है, नाका विनाशं नाही.। तात आत्माकै मरण नाही, यातै ज्ञानीक मरणका मय नाही । यान ज्ञानी अपना,ज्ञानस्वरूप निःशंक भया संता निरंतर आप अनुभव है ॥२७॥ अव आकस्मिक भयका , नान-बोवः कुथति- - - काव्य है- - - , , - - निराविकार ice एक जानमनाद्यनंतमचलं. सिद्ध किलेतत्स्वतो, यावत्तावदिदं सदैव हि भवनात्र द्वितीयोदयः । तनाकस्मिकमत्र किंचन भवेत्तद्धीः कुता ज्ञानिना ' निश्शंकः सततं स्वयं स सहज ज्ञान संदा विंदति ॥ २८ ॥ स.टी.-किल इत्यागमाती यावत्पयंत, तत्-प्रमिद्ध, एक कर्मादिद्वितीयरहित, नाग-चीव , स्वन. स्वभावन, सिद्ध निष्पन्नं कृतकृत्ला च, कि भूतं १ अनाद्यनर्व-उत्पत्तिविनाशरहित, अचल-अक्षाभ्यं, हि स्फुटं, नावत्पर्यत इद-ज्ञान, मदेव-अविच्छिन्न भवत्, अत्र-जाने, द्वितीयोदय.-सहमा द्वितीयस्य द्रव्यभ- बनायननाहिदर्शनादियौलिक्स्योदयः, न भवत्, तत् तस्मात् कारणात् अत्र-आत्मनि किंचन-किमपि, आकस्मिक-अकस्मात-सहमा भत्र आकस्मिकं भय न भवेत् ज्ञानिन. पु स, तद्भी.-नस्य-आकस्मिकस्य, 1 भी:-भग कुत.; न कुतोऽपि, म.-मानी, निशक:-मप्नभयशकारहित 'मन, 'मतर-नित्यं, महज स्वाभा- 'विक, बाग, मदा नित्यं, विनि-जानाति । इति मानिन , इहपरलोकवंदनाऽत्राणागुप्तिमरणाकस्मिक्रमय- सप्तकाभावात् सदा निर्जरैव ॥ २८ ॥ अथ सम्यग्हाटनिर्जराप्रकारं प्रणीते- अर्थ-ज्ञानी विचार है जो ज्ञान है सो एक है, अनादि है; अनंत है, अचल है, सो यह आपहीत सिद्ध है । सो जेते है ततै सदा सो ही है, या विपै दूजेका उदय नाही, है, तात । याविन अकस्मात् नवा किळू उपजे ऐसा किछू भी नाही है । ऐसे विचारत' तिस अक- !'स्मात् होनेका' भय काहते होय ? नाही होय है यात सो जानी निःशंक भया संता निरंतर अपना स्वाभाविक ज्ञानस्वभावकू सदा 'अनुभव है । भावार्थ-जो कबह अनुभवमें न आया एसा किछू अकस्मात् प्रगट हुआ भयानक पदार्थ, ताकरि प्राणीक भय उपजे, 'सो आकस्मिक- भय है । सो आत्माका जान है सो अविनाशी 'अनादि अनंत अचल एक है । सो याविषे दूजेका प्रवेश नाही, नवीन अकस्मात् कछू होय नाही, सो ऐसा ज्ञानी आपकू जान, तातें अकस्मात् भय काहेत होय । तात ज्ञानी अपना ज्ञानभावकू निःशंक निरंतर अनुभवे हैं। ऐसे सप्त भय ज्ञानीक नाही है । इहां प्रश्न-जो अविरतसम्यग्दृष्टि आदिकू' मी ज्ञानी कह्या है-भयप्रकृतिका उदय हैं, ताके निमित भय भी देखिये है । सो ज्ञानी निर्भय कैसा है ? ताका समाधान-जो, भयप्रकृतिक उदय निमित्तनै भय उपजे है ताकी पीडा नासही जाय है नात अंतरायके प्रचल उदयतै निर्बल है, तात निस-मयका इलाज भी करे है । परन्तु ऐया भय नाही-जाकरि स्वरूपका ज्ञान श्रद्धान चिगि जाय । बहुरि भय उपजे है सो मोहकर्मकी मयनामा प्रकृतिका उदयका दीप है,ताका आप स्वामी होय,कर्ता न बने है बाता ही है ॥२८ । आगे कहे है सम्यग्दृष्टि के निःशंकित आदि चिह्न हैं ते कर्मकी निर्जरा करे हैं । शंकादिकारि कीया व नाही होय है 'ताकी सूचनिकाका काव्य' है- . - 1 __१७ T परमाथ्यात्मकमी टंकोलाम्बरसनित्रितज्ञानसर्वस्वभाजः मुम्बरहटेर्यदिह मकलं नंनि लक्ष्माणि कर्म । तत्तस्यास्मिन्पुनरपि मनाकर्मणो नास्ति वन्धः पृवोपात्तं तदनुभवतो निश्चितं निर्जरव ।।२६ ।। गंटी-यन्-यस्मात्कारगात, इह-जगनिमन्ति-विनाशयंति, कि ? समस्य-सतं. कम-मिथ्या- त्लादि, कानि ? समावि-चिनि-विगनिन्दिागरशमभक्तिवान्मल्यानुकंपानमानि-चिशंकिता- दीनि कन, क्त्य! मन्यन्य:-निश्चयसन्धधारिण: किभूतस्य ? कादित्यादिः- टंकारनामा स्वश्व-मात्मा, नन्य सः-ऋनुभः, तेन निति-युक्त व तदनं ३ तन्य सस्म-त्वं मदि संवत, इनि कोलीवरचनिविज्ञानसत्रमा वन्य उत्-तन्मात्कारतान् नयागनाइननरं वन्य शान्तिः पुनः भूयः अस्मिन पूक्तिस्वरूपं मनागपि-एकांशेनापि, कर्मणः थः-रतेयः, नास्ति-न विद्यते न्त छन, पूर्वोपात्तं-पूर्व-सन्यादृष्टः प्राक् झाचं-बद्ध चानुमवतः मुखदुःखादिरूपंगाहमुजन, निचित्र नियमन निवि-तनु नि भन्य कर्मणा ॥ २ ॥ अथ सन्याटेगानि लयति- अर्थ-जाते सम्यग्दृष्टिकं निःशक्ति आदि चिन्ह है ने समस्तकसं हनै ई-नित्ररा कर हैं नाने फेरि भी इसका उदय होत नवीन कर्मका क्तिचिन्मात्रभी बंध नाही होय है । जिस कर्मका पहले बंध भया था, नार्क उदय भोगत्रता सेनाकै ताकी नियमकरि निर्जराही होय है !! कैसा है सम्यग्दृष्टि : टंकाकाणवन्.एकस्वभावरूप जो अपना निवास, निमकरि परिपूर्ण भया जो ज्ञान, ताका सबस्वका भागनहारा है-आस्वादक है ।। भावार्थ-सम्यग्दृष्टि - पहले भयादि प्रकृति बांधी थी नाका उदय भाग है, नाऊ नाक निशकिवादि गुण प्रवते हैं, पूर्वकमी निर्जरा कर है । अर शंकादिककनि कीया बंध नाही होय है ।।२६।। अब निर्जरा अधिकार पूर्व क्रीया, सो निराका स्वरूप यथार्थ जाननेवाला अर कमका ननि बंध रोकि निजरा करने वाला जो सुम्यादृष्टि, नाकी महिमा कई हैं- रुन्धन बंध नवमिति निजेः मंगतोऽष्टाभिरंग: प्राग्वद्धं तु क्षय मुपनयन् निर्जरोज्जृम्भणेन । सम्यग्दृष्टिः स्वयमतिरमादादिमध्यांतमुत्र ज्ञानभृत्वा नटति गगनाभोगरंग बिगाह्य ॥ ३० ॥ टी-मन्याष्टि-भान्द्वात्मसन्यतारिश मुनिः, सयं-बानहरए, झान भूता हान्मयो मूत्रा, ननि मुलं करोनि-बानेन सह तन्नयन प्राप्नोनीत चान्त, किन? गानामोगरंग गगनम् व्योम, नस्य अभोग-परिपूसेवा स एव रंग: माल्यावदारंगभूमिः, विगहाहयित्वा-मानेन सरं गगनमंडलमभिशाप्य, हर्षदो नृत्याविरंधान कुन: : अनिरसाद-स्वानु सकनास्थरोनेकेण, भन्योऽपि . .

निर्जराधिकार यो नटतिःस रंगमवगाध शृगाराधिनयरमोदेकन एव इन्युक्तिक्षेश' तु-पुन:, प्राग्बद्ध-प्राक्-सम्यक्त्वोत्पत्तः, पूर्व वद्ध -कमरूपेणात्ममात्कृतं, क्षय-विनाश, उपनयन प्रापयन् मन्, केन ? निर्जरोसम्भरणेन असंख्यात- गुणनिर्जगया उज्जु भण-उत्सर्पण-प्राकट्य तेन, अष्टाभिः-वसुसंख्य., अगै -निशकितादिमम्यक्त्वाव- यवैः सगाः युक्त', किंभूतै ? निजे -निश्चयसम्यक्त्वसबंधीयैः, इति-पूक्तिप्रकारेण नव-नवीन, बन्ध धर्मबंध, रवन्-निवारयन् । प्रत्यविकार नटतीत्यादिशब्दः नाटकत्वमुद्योतयति ॥ २० ॥ अर्थ-सम्यग्दृष्टि जीव है सो आप स्वयमेव अपने निजरसमें मग्न भया संता आदि मध्य अंतकरि रहित सर्वव्यापक एकप्रवाहरूप धारावाहीज्ञानरूप होयकरि अर आकाशका मध्यरूप जो रंगभूमि अतिनिमल ताबि अवगाहन करि नृत्य कर है। कैमा सम्यग्दृष्टि ? नवीन बंध कूती.पूर्वोक्तप्रकार रोकता संता है, वहुरि,पहिली बांध्या था ताकू अपने अप्ट अंगनिकरि सहित मया संता निर्जराके प्रगट होनेकरि नाशकू प्राप्त करता संता है ।। भावार्थ-सम्यग्दृष्टि के शंकादिककरि कीया नवीन बंध तो होय नाही अर 'आर्ट अंगनिकरि सहित है, ताने निर्जरा का उदय होनेकरि पूर्वबंधका नाश होय है । सो एकप्रवाहरूप ज्ञानरूप रसका आप पान करि, जैसे कोई मदकरि मग्न भया नृत्यके आखाडेमें नृत्य कर है तैसे निर्मल आकाश रूप इस, भूमिमें नृत्य करै है ॥ इहां कोई कहै-सम्यग्दृष्टिकै निर्जरा होना तो कहते आये,अर बंध होना न कह्या । सो गुणस्थाननिकी परिपाटीमै सिद्धांतमे अविरतसम्यग्दृष्टित लगाय बंध कया है, अर बातिकर्मनिका कार्यः आत्माका गुण धान करना है, सो दर्शन ज्ञान मुख वीर्य इनि गुणनिका घातभी विद्यमान है, सो चारित्रमोहका नवीन बंध भी करे ही है, और मोहके उदयमें भी बंध न मानिये तो मिथ्याप्टिक मिथ्यात्व अनंतानुबंधीका उदय होते. मी बंधका न होना क्यों न मानिये ?' ताका समाधान-जो, व होनेमे प्रधान मिथ्यात्व अनंतानुबंधीका उदयही है मम्यग्दृष्टीकै तिनिका उदयका अभाव है, सो चारित्रमाहक उदयसे यद्यपि सुखगुणका धान है अर अल्प स्थिति अनुभाग लिये मिथशव अनंतानुबंधीविना तथा तिनिका लारकी अन्यप्रकृति- विना घानिकर्मकी प्रकृतिनिका तथा अघातिकर्म की प्रकृतिनिका बंध भी होय है। तोऊ जैसा मिथ्यात्व अनंनानुबंधीमहित होग, तैया होय नाही। अनंतमंमारका कारण तो मिथ्यात्व अनंतानुबंधी है, निनिका अभाव भये पीछे र्तिनिका बंध होय नाही'| अरं आत्मा ज्ञानी मया तब अन्य बंध की कौनगिनती करे ? वृक्षत्री-जड कटै पीछे, हरेमान रहनेका कहा अवधि ? तात इम अध्यात्मशास्त्रवि तो सामान्यपणे ज्ञानी अज्ञानी होनेका प्रधान कथन है। ज्ञानी भये पीछे छूि कर्म रहे ते सहजही मिटते जायगे। जैसे कोई पुरुप दरिद्री था, सो झपड़ीमें वस था, ताक् भाग्य उदयकरि बडा महलकी धनसहित प्राप्ति भई । तामै बहुतदिनका कजोडा भर्ग था, सो या पुरुषने आय प्रवेश किया तिसही दिनतै यह तो महलका धनी संपदावान वणीगया । अब कजोडा झाडना है, सो अनुक्रमतें अपना बलके अनुसार झाडै है । जब सब . ?

- , , . 14 - - 1 . । 1. , 4. ११२ परमाध्यात्मतक्षिणी झाडि जायगा उज्ज्वल होय जायगा,तब परमानंद भोगेहीगा,ऐमा जानना |३०| ऐसे रंगभूमी मैं निर्जराका प्रवेश भया था मो अपना स्वरूप प्रगट दिखाय निकसि गया ।। सम्यक्रवंत महंत सदा समभाव रहै दुख संकट आये। कम नवीन बंधे न त अर पूरव बंध झड़े बिन भाये || प्रपत्र अंग मुदर्शनरूप धरै नितिज्ञान व निज पाये। यो शिवमारग साधि निरंतर आनंदरूप निजानम थाये ॥१॥ इति भी समयमारपद्यस्याध्यान्मतरंगिण्यपरनामधेयस्य व्याख्या पष्ठोऽक ||१|| इस प्रकार । परमाध्यात्मनरंगिणीकी बचनिकावि छठा निर्जरा अधिकार पुग भया॥६॥ अथ बंधाधिकारः ॥७॥ वारयति निर्जगत्यं तामस्यं भव्यजीवनिचयस्तु । अमृतेंदुबाड मर्यमयूग्वैः श्रीकुदसमैः परैः गारैः ।। ननु मंवरनिर्जरे निरंतर ज्ञानिनो निरुपिने पुनः कस्य तु ते द्वे ? प्रतिपयस्य विधिपूर्वकत्वान् इति विचित्र गंधतलां निवध्यत। दोहा-रागादिकत,कर्मको बंध जानि मुनिराय ।। ।। त तिनहि समभाव करि नम सदा तिनि पाय ॥ , अब टीकाकारके वचन हैं, जो, अब बंध प्रवेश करें है। जैसे नृत्यके अखाडेमें स्वांग प्रवेश कर हैं, तमे रंगभूमिमै बंधतच्चका स्वांग प्रवेश कर है। वहां प्रथमही सर्व तत्वका यथार्थ जाननेवाला जो सम्यग्ज्ञान, मो. बंधक दरि करता संना प्रगट होय है ऐसे अर्थक् ले मंगल रूपकात्य कह हैं- रागोद्गारमहारसेन मकलं कृत्वा प्रमत्तं जगत् क्रीडतं रसभारनिर्भरमहानाट्यन बंधं धुनत् । आनंदामृतनित्यभोजि सहजावस्थां स्फुट नाटय- द्धीरोदारमनाकुलं निरुपधि ज्ञानं ममुन्मज्जति ॥१॥ स० टी-समुन्मज्ञ्जनि-ममुच्छलति चकाम्तीत्यर्थः, किं ? ज्ञान-आत्मबोधः, किंभूतं ? निरुपधि निर्गत उपाधि:--ममत्गदिविकृतिर्यस्मात्तत, पुनः बोहचं ? अनाकुल-उपाधिविजृमितचिताच्युतं, धीरं धैर्यगुणयुक्त तत्र तदुदारमुत्स्ट च, महनावस्था-स्वाभाविक्दशा, म्फुटं व्यक्त यथा भवति तथा नाटयत प्रकाशयत् धातूनामनेकार्थत्ववचनात् द्योतकत्यमत्र । पुन:-आमदत्यादिः, आनन्द-स्वात्मानं सुख नदेयामने' सुधां नित्यं-अनवच्छिन्नतया, भुनक्तीन्येवं शीलं । पुन -बंध-मश्निपं, धुनत् स्फोटयन, किंभूतं बन्धः? । 7 १ .

वाघाधिकार ११३ क्रीटर-स्वेच्छया मर्वत्र क्रीडया परिणतं, केन ? रसेत्यादि:-रमस्य-कर्मानुभागस्य मार'-अतिशयः स एव निर्भरं-अतिमात्र, महानाट्य महानटन, तेन, विकृत्वा ' सकलं-समस्तं, लगत्-लोकनिवासिलन- द, प्रमत्त मदाकात कृत्वा-विवाय, केन ? रागेत्यादि.-रागस्य उदार.-हिरणं, स एव महारम: मेरेयादिरूपः तेन, अन्योऽपि य. पर मदिरया प्रमाद्य नाट्य नाटयत्तीत्युक्तिलेशः ॥ १॥ अथ कथं मुच्यते जगतः कर्मात्मरत्वादिति वदत प्रत्यंचष्टे- अर्थ-ज्ञान है सो उदय होय है। कहा करता संता उदय होय है ? बंध है ताही उडा- वता संता उदय होय है। कैसा है बंध ? रागका उद्गार जो उगलना उदय होना सोही भया महारस ताकरि समस्त जगत प्रमत्त-प्रमादी मतवाला करिकै अर रसके भारकरि भया जो वडा नृत्य, ताकरि नाचता है ऐमा बंधा उडावता है | बहुरि आप ज्ञान कैसा है ? आनं- दरूप अमृतका नित्य भोजन करनेवाला है बहुरि अपनी जाननक्रियारूप स्वाभाविक अवस्था ताप्रगटरूप नचावता संता उदय होय है । बहुरि धीर है, उदारतें निश्चल है, बडा जाका विस्तार है । बहुरि अनाकुल है-जाम किछू आकुलताका कारण नाही रहे है । बहुरि निरुपधि है-परिग्रहते रहित है-किछु परद्रव्यसंबंधी ग्रहणत्याग नाही है । ऐसा ज्ञान उदय प्राप्त होय है भावार्थ-बघतच रंगभृमिम प्रवेश कर है, ताक् ज्ञान उडायकरि आप प्रगट हो नृत्य करेगा, ताकी महिमा या काव्यमें प्रगट करी है । ऐसा अनंत ज्ञान स्वरूप आत्मा सदा प्रगट रही ।। आर्ग बंधनचका स्वरूप विचार हैं || तहां प्रथम बंधका कारण प्रगट कहै हैं- न कर्मवहुलं जगन्न चलनात्मकं कर्म वा न नैककरणानि वा न चिदचिद्वधो बंधकृत् । यदैक्यमुपयोगभूः समुपयाति रागादिभिः स एव किल केवलं भवति बंधहेतुर्गुणां॥२॥ सं० टी-ननु, जगत-त्रिभुवन, कर्मबहुलं-कर्मयोग्यपुद्गलवहुलं-प्रचुर तत्र वधकृत-बंधं करोतीति गंधकृत बाघकारणं न भवेत् अन्यथा मिद्धानामपि तत्प्रसंगात् तत्र कर्मपुद्गलानां अवस्थानाविशेषात् । अर्थ कायबाई मनमा कर्म वयकृन रलात्मकानां कर्मणां बंधहेतुत्वाभावान् अपरथा यथाख्यातमयवानामपि कर्मबंधप्रसंगात् । ननु वा अथवा, तत्कारण मा भवतु नैककरणानि अनेकस्पर्शनादींद्रियाणा वधहेतुत्व, तन्न अन्यथा केवलिनामपि तत्प्रसंगात् तम्य तत्सझावात, ननु चिचिद्वध.-चिदचिता सचिचाचिचाना वस्तूनां क्या-घातः वंवकृत्, तन्न तस्य तन्निमित्तत्वावटनात् अन्यथा समितितत्पराणामपि तत्प्रसगात, ननु सर्वस्य बंधनिमित्तनिपेघे जगतो निर्वघत्वमेवेति चेन्न तत्मभावात् तथाहि-क्लि इत्यानमोत्तौ, एव-निश्चयेन, नृणा-प्राणिनां, केवलं परं, स-रागयोग , अनिर्दिष्ट, बंधहेतुः-बन्धस्य कारण, भवति-अस्ति, स कः ? य. उपगेगमू-उपयोगस्य-ज्ञानदंशनलक्षणम्य भूः[मिः ] स्थान,प्रात्मेन्यर्थ., रागादिभिः-रागद्वपमोहै: सह ऐक्यं-एकता, उपयाति प्राप्नोति, स एव ववकारणं ॥२॥ अथ कर्मबहुलादीनां कर्महेतुत्व मीमामते- १५ - परमाध्यात्मतरङ्गिणी अर्थ-कर्मबंधका करनेवाला कर्मयोग्य पुद्गलनिकरि बहुत भरथा जो जगत कहिये लोक सो कारण नाही है । बहुरि चलनेस्वरूप जे काय वचन मनकी क्रिया कर्मरूप योग, ते भी कारण नाही है। बहुरि अनेक रीतिके कारण, ते भी कारण नाही हैं । वहुरि चेतन अचेतनका वध कहिये घात सो भी कारण नाही है । तो कहा है जो उपयोगभू कहिये आत्मा, सो रागादिकनिकरि सहित एकताका भाव प्राप्त होय है, सोही एक पुरुपनिकै बंधका कारण है। भावार्थ-इहां निश्चयनयकरि एक रागादिकही बंधका कारण कया है ।। विशेष-संस्कृत टीकाकारने निकारणानि' का अर्थ स्पर्शनादिक इंद्रियां किया है और भापाकारने 'अनेक रीतिके कारण यह किया है॥२॥ लोकः कर्मततोऽस्तु सोऽस्तु च परिस्पंदात्मकं कर्म तत् तान्यस्मिन्करणानि संतु चिदचिव्यापादनं चास्तु तत् । रागादीनुपयोगभूमिमनयन ज्ञानं भवन्केवलं बंधं नैव कुतोप्युपैत्ययमहो सम्यग्हगात्मा ध्रुवं ॥३॥ सं० टी०-सः-प्रसिद्धः, लोकः श्रेणीधनप्रदेशमात्र त्रिभुवनं, कर्मततः-कर्मयोग्यपुद्गल स्ततो व्याप्त:- अस्तु भवतु, तथाप्यात्मनः कर्मबंधो न, च-पुनः, तत्-प्रसिद्ध', कर्म-कायवाइ मनोयोगः, परिस्पंदात्मक- आत्नप्रदेशपरिस्पंदस्वरूपं, अस्तु भवतु तथाप्यात्मनो न बंधः, अस्मिन्-मात्मनि,तानि-प्रसिद्धानि,करणानि- इंद्रियाणि संतु भवंतु, च पुनः, तत्-प्रसिद्ध, चिदित्यादिः, चित-सचित्तः, अचित्-मासुकः, चिनाचित्र तयोापादन, पीडन, विनाशनं, अस्तु, अहो इति आश्चर्ये तथापि श्रय सम्यग्हगात्मा-सम्यग्दर्शनपरि- णतश्चिद्रूपः, कुतोपि जगत्कर्मकरणचिदचिद्घातादेः- अन्यतरादपि ध्रुव-निश्चितं, बधं-वर्मबध, नैव स्पैति-न -न प्राप्नोति, किंभूतः सन् ? केवलं-रागादिनिरपेचं नान-बोधमयो, भवन् अयमानः, पुनः उपयोग- भूमि-उपयोगस्य-ज्ञानदर्शनस्य भूमिः-आत्मा, उपयोगो लक्ष्णमिति मूत्रकारवचनात, न, रागादीन राग- द्वेषमोहान् अनयन-अप्रापयन्-रागमयमात्मानमकुर्वन् न कुतोऽपि वध्नाति अयमात्मेति तात्पर्य.।। ३ ।। अथ तथापि ज्ञानिनां निरर्गलत्वं विद्वेषयति- अर्थ-निस कारणते सो कर्मनिकरि भर्या पूर्वोक्त लोक है सो होह बहुरि सो मन वचन कायके चलनस्वरूप कर्मरूप योग है सो होह, बहुरि पूर्वोक्त करण होह बहुरि सो पूर्वोक्त चैतन्य अचैतन्यका व्यापादन कहिये घात करना होह यह सम्यग्दृष्टि है सो रागादिक उपयोगभूमिमै नाही प्राप्त करता संता अर केवल एक ज्ञानरूा होता संता, तिनि पूर्वोक्त कोईही कारण बंध प्राप्त नाही होय है, यह निश्चल सम्यग्दृष्टि है, अहो देखो! यह सम्यग्दर्शनकी अद्भुत महिमा है ।। भावार्थ-इहां सम्यग्दृष्टिका अद्भुत माहात्म्य कहा है। अर लोक, योग, करण, चैतन्य अर्चतन्यका घात ए बंधके कारण न कहे हैं। तहां ऐमा मति जानू-जी, परजी- वकी हिंसातें बंध न कया, तात स्वच्छंद्र होय हिमा करना इहां अवुद्धिपूर्वक कदाचित् परवी- , . এখান্ধা ५१५ वका घात भी होय , तातें बंध न होय है । अर जहां बुद्धिपूर्वक जीव मारनेके भाव होहिंगे तहां तो अपने उपयोगमें रागादिकका सद्भाव आवैगा, तहां हिंसात बंध होयहीगा । जहां जीवकू जीवावनेका अभिप्राय होय, ताकू भी निश्चयनयमें मिथ्यात्व कहै हैं, तो मारनेका अभिप्राय मिथ्यात्व क्यों न होगा ? तातें कथनकू नयविभागकरि यथार्थ समझि श्रद्धान करना, सर्वथा एकांत तो मिथ्यात्व है ॥ ३ ॥ अब इस अर्थ· दृढ करने व्यबहारनयकी प्रवृत्ति कराने काव्य कहै हैं- तथापि न निरर्गलं चरितुमिष्यते ज्ञानिनां तदायतनमेव सा किल निरर्गला व्यापृतिः। अकामकृतकर्म तन्मतमकारणं ज्ञानिनां द्वयं नहिं विरुध्यते किमु करोति जानाति च ॥ ४ ॥ स० टी०-तथापि-कर्मबहुलकर्मकरणादीनामबधकत्वे, रागादीना वधहेतुकत्वे च सत्यपि, ज्ञानिना- पुसा, निरर्गलं-निरकुशं, चरितु-प्रवर्तयितु, न इध्यते-न वाच्यते, किलेति कस्मात्, सा-प्रसिद्धा, निर. गेला-निरंकुशा, व्यापृति:-सर्वत्र कायादिव्यापारे प्रवृत्तिः, तदायतन-तस्य-बंधस्य, आयतन स्थान, एव निश्चयेन , ज्ञानिना-पुसां, तत् प्रसिद्ध, अकामत्यादि -अकामेन-अवाछया, कृतं-निष्पादितं, कर्म-क्रिया, कायवाड मनसा कर्म च अकारण-बधाहेतुकं, मत कथित पूर्वाचार्य , हीति यस्मात् करोति क्रिया जाना- तिलक्षणाक्रिया एतद्वय च किमु-कथ न विरुध्यते-विरोध प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ ४॥ अथ कर्तृ ज्ञात्रो. पृथ- कृत्वं विधीयते- अर्थ-तथापि कहिये लोक आदि कारणनितें बंध कह्या नाही अर रागादिकही बंध कडा तोऊ ज्ञानीकू निरर्गल कहिये मर्यादारहित स्वच्छंद प्रवर्तना योग्य न कह्या है जात निरर्गल प्रवर्तन है सो बंधकाही ठिकाना है, ज्ञानीनिकै विनावांछा कर्म कार्य होय है, सो बंधका कारण न कहा है जात जाने भी है अर कर्मकू करें भी है यह दोऊ क्रिया कहा विरोधरूप नाही है ? करना अर जानना तो निश्चयरौं विरोधरूपही हैं ।। भावार्थ-पहली काव्यमें लोक आदि बंधके कारण न कहे तहां ऐसे मति जानिये-जो वाह्य व्यवहारप्रवृत्ति बंधके कारणनिमें सर्वथाही निषेधी है, जो ज्ञानीनिकै अबुद्धिपूर्वक वांछाविना प्रवृत्ति होय है तातै वध न कह्या है तातें ज्ञानीनिकू स्वच्छंद प्रवर्तना तो न कह्या है वेमर्याद प्रवर्तना तो बंधकाही ठिकाना है । जान- नेमें अर करनेमें तो विरोध है, ज्ञाता रहेगा, तो बंध न होगा, कर्ता होयगा तब तो बंध होय- होगा ।।४।। अब कहै है-जो जान है सो कर नाही है अर जो कर ईं सो जानै नाही है,जो कर है सो कर्मका राग है अर राग है सो अज्ञान है अर अज्ञान है सो घंधका कारण है । ऐसे काव्यमे . - - ११६ परमाध्यात्मणी जानाति यः स न करोति करोति यस्तु जानात्ययं न खलु तत्किल कर्मरागः। रागं त्ववोधमयमध्यवसारमाहुर्मिथ्यादृशः स नियतं स च बंधहेतुः ॥ ५ ॥ स० टी०-खल्विति निश्चयार्थे, यः-चिद्रूप', जानाति-स्वपरस्वरूप वेत्ति, सः-चिद्पः न करोति कर्मादि न विधत्ते यस्तु कश्चित ज्ञानादन्य. करोति-कर्म निर्मापयति, तु-विशेपे,अय-कर्मकर्ता न जानाति न परिच्छिनत्ति, तस्याज्ञानरूपत्वात् क्लि इति निश्चितं, तत्-करोतिक्रियावच्छिन्न-कर्म रागः, राग एव करोतीत्यर्थः, तु-पुन., राग अध्यवसाय आहुः रागस्य कषायानुभागाध्यवमायेति संज्ञा प्रतिपादयति जिनाः, इति स्वरूपविरचितत्वं सज्ञाया निरस्तं, कीदृक्ष रागं ? अबोधमय-अज्ञानस्वरूप, हन्मि-हन्य जीवामि-जीव्येऽहमनेनेत्यादीनामज्ञानरूपत्वात् , सः रागः, नियतं-निश्चितं, कस्य भवति ? मिथ्याशः- मिथ्याहण्ट', नत्वन्यस्य सम्यग्दृष्टेः, च-पुनः, सः-रागः, बंधहेतुः-कर्मवधकारणं ॥ ५॥ अथाह मरणादीनां कारक इत्यभिप्रेतस्य मिथ्याष्टित्वं दरीदृश्यते पद्यद्वयेन- अर्थ-जो जाने है, सो करे नाही है । बहुरि जो करे है, सो जाने नाही है । बहुरि जो करे है, सो निश्चयतै यह कर्मराग है बहुरि जो राग है, ताकू मुनि हैं ते अज्ञानमय अध्यवसाय कहै हैं । सो यह मिथ्यादृष्टिकै होय है, सो नियमतें बंधका कारण है ।। सर्व सदैव नियतं भवति स्वकीयकर्मोदयान्मरणजीवितदुःखसौख्यं । । अज्ञानमेतदिह यत्तु परः परस्य कुर्यात्पुमान्मरणजीवितदुःखसौख्यं ॥ ६ ॥ स० टी-इह-जगति, एतत्-वक्ष्यमाण-अज्ञान ज्ञानभावव्यनिरिक्त, एतत्कि ? यत्तु पर:- छन्यः । पुमान्, परस्य ततोन्यस्य कस्य चिदिष्टानिष्टस्य पुसः, मरणेत्यादिः-मरण-प्राणवियोजन मरण च जीवित च दुख च सौख्य च तेपा समाहारो मरणजीवितदुःखसौख्य कुर्यात्-यो मन्यते हिनस्मि, जीवयामि, दुःखिन करोमि, सुखिन करोमि इति क्रिया निर्मापयेत्, एतत्-अज्ञान, कुतः ? नियत-निश्चितं सर्व- समस्त, मरणजीवितदु खसोख्य सदैव-ससारदशायां, भवति-जायते श्वेत्यादिः स्वकीयस्यात्मोपार्जितस्य कर्मण उदयात् आयुःक्षयेण जीवानां मरणं, सत्यायुपि जीवितव्यं, आयुहरणाभावात कथं तत्परेण कृतं । शुभाशुभकर्मोदयात् सुखदुःखिता जीवा भवति तत्कर्मदानाभावात् कथ ते तादृशाः कृताः परेणेति भावः ६ अर्थ-इस लोकमे जीवनिके मरण जीवित दुःख सुख हैं ते सर्वही सदा काल नियमतै अपने अपने कर्मके उदयतै होय है ।। बहुरि जो परपुरुप है सो परके मरण जीवित दुःख सुख करे है यह मानना है सों अज्ञान है ।। ६ ।। फेरि इसही अर्थकू दृढ करतें संते अगिले कथनकी सूचनिकारूप काव्य 'कहै हैं । अज्ञानमेतदधिगम्य परात्परस्य पश्यंति ये मरणजीवितदुःखसौख्यं । कर्माण्यहंकृतिरसेन चिकीर्षवस्ते मिथ्यादृशो नियतमात्महनो भवंति ॥७॥ स० टी०-ते-पुरुषा., नियत-निश्चित, मिथ्याश'-मिथ्यादृष्टयः, भवंति-जायते, किंभूताः १ आत्म- आन्मान प्रतीदि आत्महनः स्वरूपातकाः स्वस्वरूपाद्विपर्यस्तत्वात् पुनः कर्माणि-शुभाशुभानि, चिकी. ५ , 1 । - , धाधिकार ११७ पत्रः-स्वमात्कर्तुमिच्छवः, न ? अहकृतिरमन-मयायं इतो जीवितश्चेत्यादिरूपणाहकारग्मन, ते के ? ये-नराः, परात्-भिन्नात, परस्य-ततान्यस्य, पति-उक्षत, किं ? मरणजीवितदुःखसौरस किं कृत्वा ? एतत्-पूर्वोक्त, मयागं हत इत्यादिरूपमत्रान, अविगम्य-प्राप्य ||५|| अथाव्यत्रमायस्य बाधहेतुलां पापठ्यते- अर्थ-यह पूर्वोक्त मानना अज्ञान है, ताही प्राप्त होयकरि जे पुरुप परत परके मरण जीवित दुःख सुख होना देख है, मान हे, ते पुरुष मैं इनि कर्मनिक करु ९ ऐमा अहंकाररूप रसफरि कर्मनिकू करनेके इच्छक है, कर्म करनेकी मारने जीवावनेकी मुखी दुःखी करनेकी वांछा कर है, ते नियमकरि मिथ्यादृष्टि हैं | आपहीकरि अपना बात जिनिकै पाइये है ऐसे हैं ॥ भावार्थ-जे परकू मारने जीवावनेका तथा मुख दुःख करनेका अभिप्राय कर है, ते मिथ्याप्टि है । अर अपना स्वरूपत च्युत भये रागी पी माही हाय आपहीकरि आपका घात करे है,तात हिंसक हैं ॥ ७॥ मिथ्यादृष्टः स एवास्य बंधहेतुर्विपर्ययात् । य एवाव्यवसायोयमज्ञानात्मास्य दृश्यते ॥८॥ सं० टी०-अस्य मिथ्याहट., य एव प्रसिद्धः अध्यवसाय' अह परान् हन्मीत्यादिरूप. परिणाम. म एव अध्यवसाय एव, बाघहेतुः -कर्मचधकारण, कुतः ? विपर्ययात ज्ञानाद्विपर्ययस्वभावत्वात् अस्य मिथ्याहशोऽ ध्यवसाय बंधहंतुः कां ? यत:-अय अध्यवसायः अज्ञानात्मा-अज्ञानमेव आत्मा रवरूप यस्य स. दृश्यते- अवलोक्यते ॥ ८॥ अथाध्ययमायमाहात्म्यमारभते- अर्थ-मिथ्यादृष्टीका जो यह अध्यवसाय है जो अज्ञानरूप प्रत्यक्ष दीख है, सोही यह अभि- प्राय मिथ्या विपर्ययस्वरूप है तातै बंधका कारण है । भावार्थ-झूठा अभिप्राय सो मिथ्यात्व है सो ही बंधका कारण है ऐसें जानना ।। अनेनाध्यवसानेन निष्फलेन विमोहितः । तस्विंचनापि नैवास्ति नात्मात्मानं करोति यत् ॥ ६ ॥ ० टी०-एव-निश्चयेन, तत-वस्तु, किंचनापि-किमपि, महदल्प वा नास्ति-न विद्यते, यत् आत्मा- जीवा,आत्मागं स्वकीयं अध्यवसायनैव नकराति न विधत्त,किंभूतः १ अनेन हन्मीत्यादिरूपेण,पूर्वोक्त न अध्य- वसानेन पायाध्यवसायन, बिमोहितः-मोह प्राप्तः, किंभूतेन ? निष्फलेनाधमोक्षलक्षणफलरहितेन, जीवस्य सरागवीतरागयो स्त्रपरिणामयो. सद्भावे बंधमाक्षसझावात् तदभावे तयोरभावात् अतस्तयोरेव स्वार्थक्रियाकारिता, अनध्यवसायस्याकिंचित्करत्वात् ॥ ६॥ अथ नथाप्यध्यवसाय बीभत्सने- अर्थ-आत्मा है सो इस निष्फल निरर्थक अध्यवसायकरि मोह्या हुआ आपकू, अनेकरूप कर है । सो एसा पदार्थ कोई जगतम नाही है-जिसरूप आपनाही कर,सवहीरूप करें है। भावार्थ-यह आत्मा मिथ्या अभिप्रायकरि भून्या हुवा, चतुर्गतिसंसारमें जेनी अवस्था हैं, नेते पदार्थ हैं, तिनिसनस्वरूा आपकू भया मान है । अपना शुद्धस्वरूा नाही पहिचाने है ।। १ - + M परमाध्यात्मतररांगणी विश्वाद्विभक्तोऽपि हि यत्प्रमावादात्मानमात्मा विदधाति विश्वं । मोहेककंदोऽध्यवसाय एष नास्तीह येषां यतयस्त एव ।। १० ॥ संटी:-इह-जगनि, त एव-प्रसिद्धाः, अतयः-यतते कर्मादीनीति यन यः-मुनयः, यपां यतीना, एषः इदानीमुक्तः, अध्यवसायो नास्ति, किंभूतः मोहैककंदः-मोहस्य गगढपस्य एक:-अद्वितीयः, कंदः-मूल- कारणं च. सः, मोहनीयक्रमत्पिादकत्वात, हीतिस्फुट, यत्प्रभावात्-यस्य-अध्यवसायस्य, प्रभावः माहात्म्य तस्मान् विश्व-चेतनाचेतनं लोकालोकं शुभाशुभ-चराचर आत्मानं-स्त्रक्रीयं, करोति-विधत्ते यथा हिंसा- ध्यवसायात हिंसका. तथा विपच्यमाननारकतियन्मनुष्यदेवपुण्यपापाध्यवसायान्नरकं तिथंचं मनुष्यं देवं पुण्यं पापं चात्मानं करोति,किभूनः ? विश्वात् चेतनाचेतनादिपदार्थात् विभक्तोऽपि भिन्नोऽपि वध्यवसा- यवशात्तन्मयो भवति । विश्वशब्दस्य त्रिलोकार्थवाचकस्वाभागत् चेतनादिपदार्थवाचकदाच न मादिगणत्वं अयाव्यवनायस्य व्यावहारिक्वं व्यवहरति- अ-यह आत्मा समस्नद्रव्यनित भिन्न है, तोऊ जिस अध्यवसायके प्रभावत आपच समस्तस्वरूप करें है, सो यह अध्यवसाय कैसा है ? मोह है एक कंद जाका । सो यह अध्यव- साय जिनिकै नाही है, त यति हैं मुनि हैं। सर्वत्राध्यवसानमेवमखिलं त्याज्यं यदुक्त जिन- स्तन्मन्ये व्यवहार एव निखिलोप्यन्याश्रयस्त्याजितः। सम्यक निश्चयमेकमेव तदमी निष्कंपमाक्रम्य किं शुद्धज्ञानधने महिम्नि न निजे वनंति संतो धृतिं ॥११॥ सं० टी०-जिनः केवलज्ञानिभिः उक्त-प्रतिपादितं.किं सर्वत्र-निखिलपरवस्तुनि यत् अखिल-समस्तमेच, अध्यवसानं व्यवसाय:, त्याज्यं-स्यजनीगं, नत्-व्यवसायहापन, मन्य-अहं जाने, निखिलोऽपि, समस्तोषि व्यवहार एव व्यवहारनय एव त्याजितः, हेतुगर्भितविशेषणमाह-अन्याश्रयः-पराश्रितः निश्चयनयेन पराश्रि. रमध्यवसाचं बंधहेतुत्वेन मुमुक्षोः प्रतिषेधयता व्यवहारनय एवं प्रतिषिद्धः, तस्यापि पराश्रितत्वाविशेषात् तत्-चर्हि किंकर्तव्य ? अमी-एत, सतः-सत्पुरुषाः. निजं आत्मीये, महिम्नि-माहात्म्ये, वृति-संतोष, स्थिरतां वा, किं-किमु न वनंति ? अपि तु कुर्वतीत्यर्थः । किंभूते ? शुद्धज्ञानधन-कर्ममलकलंकरहित वोधनिरंतरे, किं कृत्वा ? याक्रन्य-संप्राप्य, कि ? एक अन्यनिरपेक्ष, एव-निश्चयेन, सम्यन्निश्चयं- शुद्धनिश्रयननं किंभूतं ? निष्कप-अचलं, स्वरूप स्थिरत्वात् ।।११।। अथ रागादीनां किंकारणं ? इति साक्षेपं प्रश्नोत्तर पद्यद्वयन निमिमीत- अर्थ-सर्वही वस्तुनिविप जो समस्त अध्ययसान है उनकू' जिन भगवान् त्यागने योग्य ऋह्या है । सो आचार्य कई हैं,हम ऐसे माने हैं जो परके आश्रय प्रवर्तता जो व्यवहार सो सर्वही छुडाया है तातै हम उपदेश करे हैं-जो सत्पुरुष हैं, ते सम्यकप्रकार एक निश्चयहीकू निष्कम्प जैस होय तैसे निश्चल अंगीकार करिक अर शुद्धज्ञानघनस्वरूप अपना महिमा आत्मस्वरूप, ता चि थिरता क्यों नाही धार हैं ? भावार्थ-जिनेश्वर देव अन्यादानविय आत्मबुदिरस ? . 1 .

बधाधिकार ११६ अध्यवसाय छुडाया है, सो यह पराश्रित सर्वही व्यवहार छुडाया है ऐसे जानू, तात शुद्धज्ञान- स्वरूप अपना आत्मा, ताचि थिरता राखियो, ऐसा शुद्धनिश्चयका ग्रहणका उपदेश है आचार्य आश्चर्य भी किया है-जो भगवान् अध्यवसानकू छुडाया, तौ अब सत्पुरुष याकू छोडि अपने स्वरूपविष क्यों नाही तिष्ठं हैं ? यह हमारे अचिरज है । रागादयो बंधनिदानमुक्तास्ते शुद्धचिन्मात्रमहोऽतिरिक्ताः । आत्मा परो वा किमु तन्निमित्तमिति प्रणुन्ना पुनरेवमाहुः ॥१२॥ सं० टी-इति-साक्षेप, प्रणुन्नः शुद्धनयावलविनः पृष्टाः सत', पुन -भूय , एवा- अग्रे वक्ष्यमाण, परं उत्तरं, आहुः कथयति, इति कि ? ते प्रसिद्धा', गगादय - रागद्वे पमोहा धनिदान-कर्मबधकारण, उक्ताः-प्रतिपादिता" किभूतास्ते 'शुद्ध'त्यादिः-शुद्धचिदेव मात्रा प्रमाण यस्य तत् तच्च तन्महः परज्योतिः तेन तस्माद्वा, अतिरिक्ताः-भिन्ना', तन्निमित्त-रागादीना निमित्त-उत्पादकारण, किमु-अहो, आत्मा- चेतना, रागादीनामुत्पादकः, वा पर पुद्गल', तद्धतु' इत्युक्ते आहु. अर्थ-इहां शिष्य फेरि पूछ है, जो रागादिक हैं, ते तो बंधके कारण कहे, बहुरि ते शुद्ध- चैतन्यमात्र यह जो आत्मा तातें अतिरिक्त कहिये भिन्न कहे-न्यारे कहे, तहां तिनिके होने में आत्मा निमित्त है, कि पर कोई निमित्त है ? ऐसे प्रेरे हुये आचार्य फेरि आगाने याका उत्तर दृष्टांत पूर्वक कहैं हैं- न जातु रागादिनिमित्तभावमात्मात्मनो याति यथार्ककांतः । तस्मिन्निमित्त परसंग एव वस्तुस्वभावोयमुदेति तावत् ॥ १३ ॥ सं० टी-जातु-कदाचित, आत्मा-चिदुपः, आत्मनः-स्वस्य, रागेत्यादिः-रागादीनां-रागद्वे पमो- हानां, निमित्तभान उपादानकारणत्न न याति-न प्राप्नोति तर्हि तन्निमित्त किं तिस्मिन्, आत्मनि परसग परेषां-पुद्गलादीना, संग-सयोग', एव निश्चयेन, तन्निमित्-तेषा-रागादीना निमित्त-कारण इममेवार्थमु- पमीयते-अर्ककांत:-स्फटिकोपल:-यथा-इव, तथाहि-यथा स्फटिकोपलः परिणामस्वभावत्वे सत्याप स्वस्य शुद्धस्वभावत्वेन रागादिनिमित्तत्वाभावात् स्वा न परिणमते परद्रव्येणैव रागादिनिमित्तभूतेन स्वरूपा- पच्याव्य संगादिभि परिणम्यते तथा केवलः आत्मा परिणामस्वभावत्वे सत्यपि रागादिनिमित्तत्वाभावात् स्वय न परिणमते परद्रव्येणैव तन्निमित्तभूतेन स्वस्वरूपाच्याव्य तैः परिणम्यते इति तावत्-प्रथम, अय, पूर्वोक्त एव, वस्तुस्वभावः-समस्त वस्तुस्वरूप, उदेति-उदय गच्छति ॥ १३ ॥ अथ ज्ञानिनस्तदक्तत्व- मुद्धावति- अर्थ-आत्मा है सो आपके रागादिकका निमित्तभाव कदाचित् न प्राप्त होय है, तिस आत्मावि रागादिकका निमित्त परद्रव्यका संगही है,इहां सूर्यकांतमणिका दृष्टांत है जेसे सूर्य- कांतमणि आपहीं तौ अग्निरूप नाही परिणमै है, तिसविर्षे सूर्यका विच अग्निरूप होनेकू निमित्त है, तैसे जानना । यह वस्तूका स्वभाव उदयप्राप्त है काहुका किया नाही है ॥ १३ ॥ आगै परमाश्यात्मतरनिगो - कहै हैं, जो ऐसा वस्तूमा स्वभावकू जानता संता जानी रागादिक आपके नाही करें है ऐसा सूत्रनिकाका ग्लोक है- इति वस्तुस्वभावं स्वं ज्ञानी जानाति तेन सः। रांगादीन्नात्मनः कुर्यान्नानो भवति कारकः॥ १४ ॥ सं.वी.-दि-पूर्वोत्तप्रकारण, ज्ञानी-पुमान् स्व-आत्मीयं, स्तुभावं-रागादिव्यतिरिक्त स्ववन्तु- स्वरूपं, जानाति-वेति येन कारणेन बत्ति नेनैव कारणेन. सः-ज्ञानी, रागाडीन-आत्मनः-म्वन्य, न कुर्यात समान न करे नि ? यतः, अतः कारकः कर्मणा र्ता न भवति । १४ ॥ अथाहानं स्फूर्णति- अर्थ-जैसे अपने वस्तुभाव ज्ञानी है मो जो जाने है, विस कारणकरि सो बानी रागा- दिक आपकै नाही करे है, ताने रागादिकका कारक नाही है ॥१४॥ · इति वस्तुस्वभावं स्वं नाज्ञानी वेत्ति तेन मः । रागादीनात्मनः कुर्यादतो भवति कारकः ।। १५ ॥ म.टी.-इई पद्य पूर्वनो पिस्तं व्याख्येयं सुगनं च ॥ १५ ॥ अथ परद्रव्यमुद्धर्तुकानं समभिष्टौति- अर्थ-अनानी है सो ऐसा अपना वस्तुभावकू नाही जाने है, तिस कारणकरि मो अज्ञानी रागादिकभावनिक आपके का है, याने तिनिका कारक होय हैं ।। १५ ॥ इत्यालोच्य विवेच्य तकिल परद्रव्यं समग्रं वला- तन्मूलां बहुभावसंततिमिमामुद्धर्तुकामः समं । आत्मानं समुपैति निर्भरवहत्पूर्णैकसंविद्युतं यनोन्मूलितबंध एष भगवानात्मात्मनि स्फूर्जति ॥ १६ ॥ मंटी-ए:-.-आत्मा-चिन्प. को, श्रात्मनि-स्वस्वस्पे अधिकरणभूने, स्फुति-ति-प्रकटी- भवति डा. विभूतः ? उन्नृसितबंध:-उन्नूलितः-निराकृतो बंबा चेन मः, पुनः भगवान-मानवान, पुन क्रीन ? अत्तान्-ध्यानादिलक्षणात् ठान्, इमां प्रसिद्धा बहित्यादि-बहूनां भावानां-निभावपरिणा- मानां संततिः परंपरा ना, हे पमोहपरंपामित्यर्थः, समं-युगपत. उद्धत कामः उद्धत निराकर्नु, नमः बांबा, यस्य सः, इनः? बन्मान् इत्यनुमिप्यपादानं नेलं, विभूनां ? तन्मून्नां तदेव परद्रव्यमेव तस्यैव वा नन चार चा नां, न क.? येन बानपेण वरणनून्, बागनं कर्मानापन्न समुपैति प्राप्नोति, किंभून रियादिः निर्माण अतिशयन, व्हती मगन्तवस्तुनहगार प्रवर्तमानमा चानौं पूर्णा अखंडा'मा पानावेचा नबित् ानं या युतं संयुत. किंवा ? किलेति निश्चिन. चत प्रनिद्ध समत्र निखिलं, परद्रव्यं न्यत्यज्ञार्शवन्येति नंगेऽनुक्तोऽप्यूह',विवेच्य पृषकृत्य,विकृत्वा ? इति पूर्वोत्तप्रकारेण आलोच्य मन्यविचार्ग किमी? बन्न इत्यष्यत्र देयं ॥१६॥ अथ रागादीनां दारक दिशनि- - ? १ १२१ - बन्याधिकार अर्थ-जो ऐसे परद्रव्यके अर अपने भावके निमित्तनैमित्तिकपणा विचारिकरि, तिस पर- द्रव्यसमस्तकू अपना बल-पराक्रम उद्यमकरि, त्याग करिके,अर सो परद्रव्य है मूल जाका ऐसी बहुत भावनिकी संतति-परिपाटीकू दूरि युगपत् उडावनेकू चाहता संता अतिशयकरि वहता प्रवाहरूप धारावाही पूर्ण एक स्वसंवेदन, तिसकरि युक्त जो अपना आत्मा, ताहि प्राप्त होय है। जिसकारणकरि उन्मूलित कीये है-मूलतै उपाडे हैं कर्मके बंधन जाने ऐसा भगवान् यह आत्मा आपहीवि स्फुरायमान प्रगट होय है । भावार्थ-परद्रव्यके अर अपने भावके निमित्त नैमित्तिकभाव जानि, समरत परद्रव्य त्याग, तब समस्तरागादि भावनिकी संतति कटिजाय तब आत्मा अपनाही अनुभव करता संता कर्मके बंधनकू काटि आपहीवि प्रकाशरूप प्रगट है। तातें अपना हित चाहै है ।। अब बंध अधिकार पूर्ण कीया, ताके अंतमंगलरूप ज्ञानकी महिमा का अर्थरूप कलशकाव्य कहै हैं- रागादीनामुदयमदयं दारयत्कारणानां कार्य बंध विविधमधुना सद्य एव प्रणुध । ज्ञानज्योतिः क्षपिततिमिरं साधु सन्नद्धमेतत् तद्वद्यद्वत्प्रसरमपरः कोऽपि नास्या वृणोति ॥१७॥ स० टी०-तद्वत-तथा एतत् ज्ञानज्योति'-बोधतेजः, अपरं-न विद्यते परं अन्यत् यस्य तत् , प्रसरं प्रस्तारं विस्तार यातीत्याध्याहार्य यद्वत्-यथा,अस्य-ज्ञानज्योतिषः, विस्तर कोऽपि अपर:-कर्मादिः, नावृणोति नाच्छादयति, कीहक्षं तत् ? क्षपिततिमिर-क्षपित निराकृतं तिमिरं- अज्ञान, येन तत् अपरमपि ज्योतिः नाशिताधकार पुनः साधुसन्न माधुभिः-योगीश्वरैः, पदो साधुपुरुषैः सन्नद्ध-आरूढ, स्तुत च साधुभि. स्तूयमानत्वाज्ज्योतिष', पुनः रागादीना रागद्वेषमोहाना, उदयं-प्राकट्य अदयं-निर्दयं यथा भवति तथा, भवति तथा सद्य एव-तत्कालमेव, दारयत-विदारणं कुर्मत , अन्यदपि ज्योतिः प्रातर्जाना रागादीनां दारफ- मित्युक्तिलेश', किं कृत्वा ? अधुना-इदानी, विविध-प्रकृतिस्थित्यनुभागादिभेदेनानेकविधं बन्ध, प्रणुध- निराकृत्य, किभूत ? कारणाना-उपादानरूपपुद्गलाना कार्य-फल कर्मरूपं ॥ १७ ॥ अर्थ-यह ज्ञानज्योनि है सो क्षेप्या है-दूरि किया है अज्ञानरूप अंधकार जाने सो तैसे सम्यकप्रकार सज्या जैसे याका प्रसर कहिये फेलना अपर कोई आवरे नाही सो यह ऐसा पहले कहा करिकै सज्या सो कहे हैं। पहले तो बंधके कारण जे रागादिकभाव, तिनिका उदय हूँ'जैसे निर्दयी काकू विदारे तैसे तिनिकू विदारता संता प्रगटया ,पीछे जच कारण दूरी भये, तव तिनिका कार्य जो कर्मका ज्ञानावरण आदि अनेक प्रकार बंध, ताकू अब तत्कालही दूरि करके अर सज्या है ।। भावार्थ-ज्ञान प्रगट होय है जब रागादिक नरहै, तिनिका कार्य बध न रहै, तव फेरि याकू आवरणेवाला कोई न रहै, सदाकाल प्रकाशरूप रहै ।। ऐसे रंगभूमिमैं १६ १ ? " १२२ परमाध्यात्मतर्राङ्गणी . ॥ बंधता स्वांग प्रवेश कीया था, सो ज्ञानज्योति प्रगट भया, तब बंध स्वांग दूरिकरि निकसिगया जो नर कोय पर रजमाहि सचिकण अंग लगे वह गाढ़े। त्यौं मतिहीन जु राग विरोध लिये विचरै तच बंधन वा॥ पाय सभै उपदेश यथारथ रागविरोध तजै निज चार । नाहि बंधै नव कर्मसमूह जु आप गहै परभाव निकारै ॥ १ ॥ विशेष म. शुभचंद्रजीने 'कारणानां कार्य इस वाक्यको 'बंध का विशेषण किया है एवं 'उपादानरूप पुद्गलोंके फलरूप बंधको' यह अर्थ किया है किंतु पं० जयचन्दजीन 'कारणानां को रागादीनां का ही विशेषण कर कारणरूप जोराग आदि यह अर्थ किया है तथा 'साधुसन्नई'. इस पदका अर्थ इस संस्कृत टीकामें साधुओंसे स्तुत यह अर्थ किया है किंतु पं० जयचन्दजीने बछी तरह सजाहुना यह अर्थ किया है ॥ १७ ॥ इति श्रीतमयतारस्थपत्याध्यात्मतरंगिएचपरनामधेयस्य व्याख्या सप्तमोऽकः ॥ ७॥ इस प्रकार परमाध्यात्मतरंगिणीको यचनिकाविर्षे सातवां बंधाधिकार पूर्ण मया ॥ मोनाधिकारः॥८॥ नानाधध्वंसनसनकेलिः कुन्दकुन्दविधुवाः । विधिविविधामृत चन्द्रदो भात गुरनिभूयाक्ष्यः । अय मोन क्रमप्राप्तमानामति- द्विधाकृत्य प्रज्ञानकचक [दालनाद्वधपुरुषौ नयन्मोचं साक्षात्पुरुषमुपलभैकनियतं इदानीमुन्मज्जसहजपरमानंदसरसं परं पूर्ण ज्ञानं कृतमकलकृत्यं विजयते ॥१॥ टी-इवानों-अधुना, मोड़तत्त्वक्यनावसरे, ज्ञानं विजयते-सर्वोत्कर्षेण वर्तते, किंभूतं ? कृतचादित-निष्पादित वसं कृत्य-संसारावस्थातव्यं न नत , पुनः पूर्ण-सपूर्ण, प्रकर्षाप्तवान्, पर-स्कृष्ट, सप्राशरतात , हजेत्यादिः सहतः-कृत्रिम.. परमानंद:-परमसुख, तेन सरस- रमा मानन्-डयं गच्छन्. पुनर्ण-आत्मानं. सज्ञात-अक्रमेण, मोक्ष मुक्तिसंपद, नयत्-प्रापयत् , निभूतं यादिः-उरलभ स्वस्वरूपप्राप्ति तत्र एन स्वभावेन नियन-स्थित नत्र लोनमित्यर्थः, विहिवाय-पृथक्वा. कौ ? बंधपुस्पो-चंवः करिनेः, पुरुष:-आत्मा, हृदः, तौ परस्पर नितिन पृथविधायेत्यर्थः कुतः ? प्रनेत्यादिः-प्रज्ञा-भेडरिज्ञाां नैव ऋकरारपत्र, तेन दल नमान् !! ? | अय प्रजात्रीममिठौति- अर्थ-ऋत्र वंश्वपदार्थके अनंतर पूर्णज्ञान है सो प्रज्ञारूप करोंतकरि दलन कहिये विदारणत बंजर मुक्ता द्विधा कहिगे न्यारे न्यारे दोय करि अर पुरूपकू साक्षान् मोक्ष प्राप्त करता संता जयवंत प्रवते है। कैसा है पुरुष ? उपलंभ कहिये अपना स्वरूपका साक्षात् अनुभवन, नाहीकरि निश्चित है । बहुरि ज्ञान कैसा है ? उदय होता जो अपना स्वाभाविक परम आनंद नामरि नरम है रम भर्या है, बहुरि पर कहिये उत्कृष्ट है, बहुरि लिये हैं समम्न करने न्य ? ? मोक्षाधिकार १२३ कार्य जाने-अब कछु करना न रहा है | भावार्थ-ज्ञान है सो बंध पुरुप जुदे करि पुरुपकू मोक्ष प्राप्त करता संता अपना संपूर्णरूप प्रगट करि जयवंत प्रवते है, याका सर्वोत्कृ- ष्टपणा कहना यह ही मंगलवचन हैं । प्रज्ञाछेत्री शितेयं कथमपि निपुणैः पातिता सावधानः सूक्ष्मेंऽतःसंधिवंधे निपतति रभसादात्मकर्मोभयस्य । प्रात्मानं मग्नमंतःस्थिरविंशदलसद्धाम्नि चैतन्यपूरे वंधं चाज्ञानभावे नियमितमभितः कुर्वती भिन्नभिन्नो ॥२॥ सटी:-इन-प्रसिद्धा,प्रनाछत्री-बुद्धिछेत्री, शिता-अतितीक्ष्णा, रभसात-वर्गक, निपति- भिन्नकरणार्थ पतन करोति, क्व ? सूक्ष्मे-अत्यत प्रत्यासन्नत्वाच्चैतन्यचेतकभावनैकाभूतत्वन सूक्ष्मे, अन्त. सवित्रधे-अत.-अभ्याटरे, वर्मात्मना सधिबन्धे सन्धानश्लेप, कस्य ? श्रात्मकभियस्य-चिद्रूप यु- समस्य, कीहक्षा मा' कथमपि महताग्रहेण पातता तयोर्मध्ये भिन्नकरणकृते मुक्ता सती, के.? निपुणे.- धीमद्भि., मावधाने.-एकाग्रचित्त , अभित.-सामस्त्येन, लक्षणभेदात् भिन्नभिन्नों परस्पर तो द्वी भिन्नौ भिन्नी, कुर्मती-निर्मापयती, क ? आत्मान--चिद्रूप, च पुन , बन्ध-कर्मवन्ध कीदृक्ष-चिद्रूप- चैतन्यपूरे समस्तशेषद्रव्यासाधारणत्वाच्चै नन्या स्वलक्षण,तस्य पूर. समूहः,तन्त्रमग्न-तन्मयमापन्न ,प्रतरित्यादिः अतः-अभ्यंतरे चिद्रूपे स्थिर-अन्यत्र गमनाभावात् तत्रैव स्थितिमत् तच्च तद्विरद च निर्मल, लसत् देदीप्यमानं घाम-महो यस्य तस्मिन्, कोहनं बन्ध ? अनानभावे-अज्ञानस्वरुपे रागादो स्वलक्षणे, नियमित-निश्चीभूत,-तन्मयत्वमापन्नमित्यर्थः । अन्यापि छेत्री द्वयार्धात्वो. स्वलक्षणभिन्नयो. अंतः पातिता सती भिन्नत्वं चर्करीति तथा प्रज्ञाछेत्रीति विनेयम् ॥ २॥ अथ तयोर्भेदक प्रलपति- अर्थ-आत्मा अर बंधकू भिन्न करनेकू यह प्रज्ञा है सो तीच्ण छैनी है । सो जे प्रवीण पुरुष है ते सावधान प्रमादरहित भये संते आत्मा अर कर्म इनि दोऊनिका सूक्ष्म जो अंतः कहिये माहिला संधीका बंधन, ताविर्षे या कोई प्रकार यत्नकरि ऐसे पटकै हैं सो यह बुद्धिरूपी छैनी तहां पडी हुई शीघ्रही समस्तपणे भिन्न भिन्न करती पडे है । सो आत्माकू तो अंतरंगविणे स्थिर अर विशदलसत् कहिये स्पष्ट प्रकाशरूप दैदीप्यमान है धाम कहिये तेज जाका असा जो चतन्यका पूर प्रवाह, ताविप मग्न करती संती पड है। बहुरि बंध अज्ञानभाववि निश्चल नियमते करती संती पडे है ॥ भावार्थ-इहां आत्मा अर बंधका भिन्न भिन्न करना नामा कार्य है। ताका कर्ता आत्मा है। अर करणविना कर्त्ता काहेकरि कार्य कर ? तातें करण चाहिये । अर निश्चयनयकरि कति भिन्न करण होय नाही । तातें आत्मात अभिन्न यह बुद्धि ही, इस कार्यवि करण है । सो आत्माकै अनादि बंध ज्ञानावरणादि कर्म हैं तिनिका कार्य भाव कर्म ती रागादिक हैं । अर नोकर्म शरीरादिक हैं। सो बुद्धिकरि आत्माकू शरीरतें तथा ज्ञाना- वरणादिक द्रव्यकर्मत तथा रामादिक भावकर्मत भिन्न एफ चैतन्यभावमात्र अनुभव करि ज्ञान 1

-
-
--
,
,
१२४
परमाध्यात्मतगणी
हीमें लीन राखना, यहही भिन्न करना याहीते सर्व कर्मका नाश होय, सिद्धपदक प्राप्त
होय है, ऐसे जानना ॥
भित्त्वा सर्वमपि स्वलक्षणबलात्तु हि यच्छक्यते
चिन्मुद्रांकितनिर्विभागमहिमा शुद्धश्चिदेवास्म्यहं ।
भिद्यते यदि कारकाणि यदि वा धर्मा गुणा वा यदि
भियंतां न भिदास्ति काचन विभौ भावे विशुद्ध चिति ॥३॥
सं० टी० -हि स्फुट, अह-अहक, शुद्धः-द्रव्यभावनोकर्ममलमुक्तः, चिदेव-चेतनास्वरूपमेव, अस्मि
भवामि, किंभूतः ? चिदित्यादिः-चिदेव मुद्रा-चिह्न, तथा अक्तिः-चिह्नितः, निर्विभाग:-भेत्तुमशक्यो
दुर्लक्ष्यत्वात्, महिमा-माहात्म्य यस्य सः, विकृत्वा ? यत् पुद्गलादिकं कर्म, भेत्तु -द्विधातु, शक्यते-शक्या-
नुष्ठान भूयते स्वलक्षणाना भेत्तुमशक्यत्वात् शक्यानुष्ठानाभावः, परल क्षणाना भेत्तु शक्यत्वात् शक्यानु-
ष्ठान तत मर्वमपि-समस्तमपि कर्मबंध भित्त्वा-द्विधा विधाय, कुत' ? स्वेत्यादि'-स्वस्य-आत्मनः, पुद्ग-
लस्य च लक्षण असाधारणस्यरूपं चैतन्यमचैतन्यं च तस्य चलात-सामर्थ्यात्, यदि कारकाणि वर्तृकर्मा-
दीनि-चेतयमानः एव चेतये, चेतयमानेनैव चेतये, चेतयमानाय चेतये, चेतयमानादेव चेतये, चेतयमान-
एव चेतये, चेतयमानमेव चेतये इति कारकाणि भिद्यते तर्हि भिद्यतां-भेद प्राप्नुातु वा-अथवा, यदि धर्माः-
स्वभावाः-चैतन्याचेतन्यादयः, भेदं प्राप्नुवन्ति तहि भिद्य तां, यदि वा गुणा.-मतिश्रुतादयः अनतज्ञानादयो
वा भिद्यते तर्हि भेद प्राप्नुवंतु पुन: चिति-चिद्रूपे, भावे-पदार्थे, काचन कापि, भिदा-भेदः, नास्ति-कारक
धर्मगुणभेदो न, विभूते चिति ' विभौ-वि-विशेपेण भवति ज्ञानादिस्वभावेनेति विमुः तस्मिन् विभौ,
'भुवो डुर्विसप्रेषु च, इति डुप्रत्ययः, विशुद्ध-कर्ममलातीते, ॥ ३ ॥ अथ चेतनाया एकाने करूप विवक्षति
अर्थ-ज्ञानी कहै है जो-भेदनेकू न्यारे करने समर्थ हुजिये, तिस सर्व निजलक्षणके
बलत भेदकरि अर मैं चैतन्यचिह्नकरि चिह्नित विभागरहित है महिमा जाकी ऐसा शुद्ध चैतन्यही
हौ ॥ बहुरि जो कर्त्ता कर्म करण सम्प्रदान अपादान अधिकरण ये पट्कारक अर सच्च असच्च
नित्यत्व अनित्यत्व एकत्व अनेकत्व आदिक धर्म अर ज्ञान दर्शन आदिक गुण ए भेदरूप है,
तौ भेदरूप होऊ । विशुद्ध समस्त विभावनित रहित एक अर विभु कहिये सर्व गुणपर्यायनिमें
व्यापक ऐसा चैतन्यभावविष तौ किछू भेद है नाहीं ॥ भावार्थ-जो इस चैतन्यभावतें अन्य
अपने स्वलक्षणकरि भेदे गये ते तो भेदरूप कीये अर कारकभेद अर धर्म भेद हैं,तो होऊ । शुद्ध
चैतन्यमात्रविर्षे ती किछू भेद है नाही । शुद्धनयकरि आत्माकू ऐसा अभेदरूप ग्रहण करना ।।।।
प्रतापि हि चेतना जगति चेद् दृग्ज्ञप्तिरूपं त्यजेत्.
तत्सामान्यविशेषरूपविरहात्सास्तित्वमेव,त्यजेत् ।
तत्त्यागे जडता. चितोऽपि भवति व्याप्यो विना व्यापका- ।
दात्मा चांतमुपैति तेन नियतं दृग्ज्ञप्तिरूपास्तु चित् ॥ ४ ॥

---- - 1 १ मोक्षाधिकार १५ सं० टो-हीति-ननु, जगति-भुवने, चेतना-प्रतिभासरूपा अद्वैता-एकरूपा, सर्वेपा प्रतिभासांत: प्रविष्टत्वेन एकरूपत्वसाधनात् तथाहि यत्प्रतिभासत-यत्प्रतिभासातः प्रविष्ट यथा प्रतिभामस्वरुप प्रतिभा- सते चामी विवादापन्नाः पदार्थाः । सर्व वै खल्विद ब्रह्मोत्यादि वाक्यानामेकत्वसाधना कैव चेतना इति चेत्तदा हम्ज्ञप्तिरूप सा दर्शनमानस्वभान त्यजेत् अथ तत्स्वभान त्यजतु का नो हानि. ? इति वदन्तम तिम निराकरोति-सा-चेतना तत-प्रसिद्ध अस्तिला-सत्ता, एवं त्यजत, कुतः ? सामान्येत्यादि -सामान्य दर्शन, विशेषों-ज्ञान, तयो रूपं तस्य विरह तस्मात-सामान्य विशेषात्मकत्वात् सर्वस्य वस्तुनः 'सामान्य- विपात्मा तदर्थो विपय ' इति वचनात हग्ज्ञानयो मामान्यविशेषात्मकत्वात् तदभावे तदभावात् अपि दूषणद्वय । तत्त्यागे-तस्य अस्तित्वम्य, त्यागे-भावे, अथवा दर्शनज्ञानस्याभावे चित --चिद्रूपस्यापि जडता-अचेतनता, चेति दूपणातरे व्यापकात् अस्तित्वरूपात दर्शनरूपाद्वा, विना ऋने, व्याप्य.-आत्मा, अ-विनाश, उपैति-प्राप्नोति, व्यापकभाव व्याप्यस्याप्यभावात् प्रकाशाभावे प्रदीपवत् तन जडत्वात्मा भावदूषणसद्भावेन चित्-चेतना, नियत-निश्चित, दृग्ज्ञप्तिस्पा-दर्शनज्ञानस्वरूपा, अस्तु भवतु ॥ ४ ॥ अथ चेतनाचेतनयो. परत्वापरत्व प्रपूर्यते- अर्थ-जगतविप निश्चयकरि चेतना अद्वैत है तोऊ जो दर्शनज्ञानरूपकू छोडे तो सामान्य- विशेषरूपके अभावतै सो चेतना अपना अस्तिपनाहीकू छोडे । बहुरि जव चेतना अपना अस्ति- स्वछोडे, तव चेतनके जडता होय है । बहुरि व्याप्य जो आत्मा, सो व्यापक जो चेतना तिसविना अंत प्राप्त होय, आत्माका नाश होय । तात नियमतें चेतना है सो दर्शनज्ञान- स्वरूपही होऊ ।। भावार्थ-वस्तुका स्वरूप सामान्यविशेषरूप है, सो चेतनाभी वस्तु है, सो दर्शनज्ञान विशेपकू छोरें, तो वस्तुपणाका नाश होय, तब चेतनाका अभाव होत, कै तौ चेतनकै जडपणा आवे, के चेतना आत्माकी सर्व अवस्थामै पावै तातें व्यापक है अर आत्मा चतना ही है ताते चेतनाके व्याप्य है सो व्यापकके अभावतें व्याप्य जो चेतन आत्मा ताका अभाव होय है । ताते चेतना दर्शनज्ञानस्वरूपा ही माननी ।। इहां तात्पर्य ऐसा-जो सांख्यमती आदि कई सामान्यचेतनाहीकू मानि एकांत कह है, तिनिका निषेध करने वस्तुका स्वरूप सामान्य विशेषरूप है, सो चेतनाकू सामान्यविशेषरूप अंगीकार करनी ऐसा जनाया है ॥४|| आगे कहै हैं, चेतनाका तो चिन्मय एक भाव है अर अन्य परभाव है, सो चिन्मयभाव तो उपादेय है अर परभाव हेय है, सो यह सूचनिका अगिले कथनकी है, ताका श्लोक है - एकश्चितश्चिन्मय एव भावां भावाः परे ये किल ते परेषां । ग्राह्यस्ततश्चिन्मय एव भावो भावाः परे सर्वत एव हेयाः ॥५॥ स० टी०-चित. चिद्रूपस्य,एक-चिन्मयः-तदर्शनज्ञानमय एव भावः-स्वभाव.,य-प्रसिद्धा.,परे-टग्ज्ञप्तेः परे, भावाः-रागादयः क्लेिति निश्चित परेपा कर्मणां ते भावाः ततः आत्मीयस्वभावत्वात् चिन्मय एव दृग्ज्ञप्तिनिवृत्त एव स्वभावः, ग्राह्यः-आदेय. परभावाः-रागद्वे पादयः, मर्वत एव-सामस्त्येनैव, हयाः-त्याज्याः ॥ ५॥ अथ रहस्य सिद्धात साधयितुमुपक्रामति- अर्थ-चैतन्यका तो एक चिन्मयी ही भाव है, र अन्य भाव है ते प्रगटपणे परके भाव परमोध्यात्मतरङ्गिणी हैं। तात एक चिन्मयभाव है सोही ग्रहण करनेयोग्य है, बहुरि जे परभान सर्वही त्यागनेयोग्य है सिद्धांतोयमुदात्तचित्तत्ररितैर्मोक्षार्थिभिः सेव्यतां शुद्धं चिन्मयमेकमेव परमं ज्योतिः सदैवास्म्यह। एते ये तु समुल्लसंति विविधा भावाः पृथग्लक्षणा- स्तेऽह नास्मि यतोऽत्र ते मम परद्रव्यं समग्रा अपि ॥६॥ सं० टी-श्रयं सिद्धातः सिद्धः-निष्पन्नः, अंत:-धर्मः स्वभावो वा यस्य स. तात्पर्य वा सेव्यता आश्रियता, कै ? मोक्षार्थिमि.--मुमुक्षुभिर्गेनिभिः, किंभूतैः ? उदात्तचित्तचरितैः-उदात्त-उत्तम, यत् चित्तं-ज्ञानं तदेव चरित-आचरण येषां तैः, अशं क' सदैव-नित्यमेव अहं परमं ज्योति:-परंधाम, अस्मि भवामि, किंभूतं तत् ? शुद्ध कर्ममलरहितत्वात् चिन्मयं ज्ञप्तिरूपत्वात, एकमेव परभावरहितत्वात् तु पुनः, एते-प्रसिद्धाः, विविधा:-नानाप्रकारा, असंस्थातलोक्मात्रत्वात, भावा:-रागद्वे पादयः परिणामाः, समुल्ल- भति-प्रादुर्भगति ते-भावाः, अह चिद्र पः, नास्मि-ज भवामि, कुतः ? यतः-यस्मात्कारणात् पृथग्लक्षणाः- आत्मनः विपरीतलक्षणाः अज्ञानस्वभावत्वात् अत्र इह स्वस्वरूपविचारणे ते-भावः, समग्रा अपि-समस्ता अपि कषायाध्यवसाया. मम-चिद्रूपस्य, परद्रव्यं पुगलकर्मोत्पादितत्त्वात् अतः सर्वथा चिद्भाव एव गृही. तव्यः, शेषाः सर्वे भावाः प्रहातव्या इति सिद्धातः॥६॥ अथ सापराधिनो बंधं द्योतते- अर्थ-उज्ज्वल है उत्कट है चित्तका चरित्र जिनिका ऐसे मोक्षके अर्थि पुरुष हैं, ते यह सिद्धांत सेवन करो-जो, मैं तो शुद्ध चैनन्यमय एक परमज्योति ही सदा ही हों, अर ए जे अनेक प्रकारके भिन्नलक्षणरूप भाव हैं, ते मैं नाही हौं। जाते ते समग्र कहिये सारेही मेरे परद्रव्य है । भावार्थ सुगम है ।६। आगे कहे हैं, जो परद्रव्यकू ग्रहण कर है,सो अपराधवान है, बंधमें पडे है। अर जो निजद्रव्यमें संतुष्ट है सो निरपराधी है, बंथे नाही है। ऐसी सूचनिका का अगिले कथनका श्लोक है- परद्रव्यग्रह कुर्वन् वध्यते चापराधवान् । वध्येतानपराधो न स्वद्रव्ये संवृतो यतिः ॥७॥ २० टी०-अपराधवान्-सापराधः पुमान्, एव-निश्चयेन, बध्येत-कर्मचधर्म प्राप्नुयात्, सापराधों लक्षांत-परद्रव्यग्रह-परद्रव्याणां ममेति बुद्धया ग्रह-ग्रहणं, कुर्वन चिंतयन्, अन्योपि परद्रव्यग्रहणं कुर्वन् प्राप्नोति पुनर्नान्य इत्युक्तिलेशः अनपराधः-परद्रव्यग्रहणलक्षणापराधरहितः, यतिः-स्वयत्नचारित्वात् योगी न बध्येत न बंधनं याति । स्वद्रव्ये चिद्रूपे संवृत्तः संवरणं कुर्वन् स्थितः तदपराधरहितः न याति बंधनं ।। ७ ।। अथ सापराघापरावयो.बवावधी विभर्ति- अर्थ-जो परद्रव्य ग्रहण करता संता है, सो तो अपराधवान् है, सो बंधमैं पडै है । बहुरि अपने ही द्रव्यवि संवररूप है संतुष्ट है परद्रव्या नाही ग्रहण कर है सो यतीश्वर अपराध रहित है, सो बर्थ नाही॥

१२७ मोक्षाधिकार अनवरतमनंतैर्बध्यते सापराधः स्पृशति निरपराधो बंधनं नैव जातु। नियतमयमशुद्धं स्वं भजन सापराधो भवति निरपराधः साधु शुद्धात्मसेवी ८ सं० टी.-सापराध.-परद्रव्यपरिहारेण शुद्धस्यात्मन:-सिद्धि साधनं वा राधः अपगतो राधो यस्य चेतयितुर्भावस्य वा सोऽपराधस्तेन सह वर्तत इति सापराधो यति , अनवरतं निरतरं-प्रतिसमगं, अतः अनंतसंख्यावच्छिन्न धने , बध्यते बधनं याति, ननु कर्मणां ज्ञानावरणादीनं पायाध्यम याना चासं- ख्यातलोकस्वघटनादनंतत्ववचन विरुध्यते ? इति चेत्सत्य कर्मणामध्यवसायानामसंख्यातत्वे सत्यपि कर्मप- रमाणनामनंतत्वघटनात्, निरपराध'-उपयोगोन्मुख -परद्रव्यग्रहणापराधरहित , जातु-कदाचित, वधन फर्मबंधन, नैव स्पृशति-न प्राप्नोति । श्रय-यतिः, नियत-निश्चित, अशुद्ध रागद्वपक्लुपीकृतं, स्व-श्रात्मान भजन सन् सापराधो भवनि-स्वस्वरूपपराइ मुखत्वात-साधु-ममीचीनं यथा भवति तथा, शुद्धात्मसेवी शुद्धमात्मानं मेवत्त इति शुद्धात्मसेवी-मुनिः, निरपराध'-परद्रव्यग्रहणापराधरहितः, स्वव्यसेवित्वादा- राधक एव ॥ अथ प्रतिक्रमणाप्रतिक्रमण विवेचयति- अर्थ-जो आत्मा सापराध है, सो ती निरंतर अनंतपुद्गलपरमाणुरूप कर्मनिकरि बथै है बहुरि जो निरपराध है, सो बंधनकू कदाचित् नाही स्पर्श है । वहुरि यह सापराध आत्मा है, सो तो अपने आत्माकू नियमकरि अशुद्धही सेवता सापराध ही होय ॥ बहुरि जो निरपराध है, सो भलेप्रकार शुद्ध आत्माका सेवनेवाला होय है || आगे व्यवहारनयका आलंची तर्क करें है जो, ईस शुद्ध आत्माका सेवनका प्रयास कहिये खेद, ताकरि कहा है ? जाते प्रतिक्रमण आदि प्रायश्चित्त हैं, ताकरि ही आत्मा निरपराध होय है। जात सापराधके तौ अप्रति- क्रमणादि हैं, सो अपराधके दूर करने वाले नाही हैं, तातै तिनकू विपकुभ कहै हैं । वहुरि निरपराधके प्रतिक्रमणादिक हैं, ते तिस अपराधके दूरि करनेवाले हैं, तातै तिनिकू अमृतकुंभ कहै हैं । सोही व्यवहारका कहनेवाला आचारसूत्रवि कह्या है ।। उक्त च गाथा-अप्पडि कम- णमप्पड़िसरणं अपड़िहारो अधारणा चेव ।। अणियत्ती य अजिंदा गरहासोही य विसकुभी १ पडिकमणं पडिमरणं परिहारो धारणा णियत्ती य || णिंदा गरहा सांही अट्टविही अमियकुभो दु ।। २ ।। अर्थ--अप्रतिक्रमण, अप्रतिशरण, अपरिहार, अधारणा, अनिवृत्ति, अनिंदा, अगर्दा, अशुद्धि ऐसे आठ प्रकार करिके लगे दोपका प्रायश्चित्त करना, सो तो विपकुभ है जहरका भरथा घडा है बहुरि प्रतिक्रमण, प्रतिशरण, परिहार, धारणा, निवृत्ति, निंदा, गर्दा, शुद्धि ऐसे आठ प्रकार लगे दोपका प्रायश्चित करना सो अमृतकुम्भ है । ऐसे व्यवहारनयके पक्षीने तर्क किया, ताका समाधान आचार्य निश्चयनय प्रधान करी कहै हैं- यत्रप्रतिक्रमणमेव विष प्रणीतं तत्राप्रतिक्रमणमेव सुधा कुतः स्यात् । तत्किं प्रमाद्यति जनः प्रपतन्नधोधः किनोर्ध्वमूर्ध्वमधिरोहति निष्प्रमादः ।। - - १२० । ॥ परमाध्यात्मतरङ्गिणी स० टी०-पत्र शुद्धात्मस्वरूपे, प्रतिक्रमणमेव-द्रव्यरूपः प्रतिक्रमणादिरेव अज्ञानजनसाधा णोऽप्रति- क्रमणादिम्तावदानामित्येवशब्दार्थः, विपं-इलाहल प्रणीन-स्वकार्यवरणासमर्थत्वात ताप शुभगधनकार्य- कारित्वाच, नत्र-आत्मस्वरूपे अप्रतिक्रमणमेव पूर्वोक्तप्रतिक्रमणानतिक्रमणद्वयरहिततृतीयशुद्धात्मोपयोगरूप- प्रतिक्रमणं सुधाकुटः-अमृतकुंभः, स्यात स्वकार्यकारित्वात् , तत् तस्माद्ध तोः, जन'- लोकः, प्रमाद्यति कि कथ प्रमाद फरोति, अधोध.-प्रतिक्रमणेतरद्वयाधोभूमौ प्रपतेन् सन् , निप्प्रमादः-प्रमादरहित: सन् ऊर्ध्वमूर्ध्व-उपर्युपरि, 'अप्रतिक्रमणरूप तार्तीयकं कि-कथा, नाधिरोहति न चटति इति स्वरूपव्यतिरिक्तस्य न किमपि प्रतिक्रमणादिनेति सूचितं ॥ ॥ अथ प्रमादमापाद्यति- अर्थ-अहो भाई, जहां प्रतिक्रमणहीकू विप कह्या, तहां काहेत अप्रतिक्रमण अमृत होय तातें यह जन नीचे नीचे पडता संता प्रमादरूप क्यो होय है ? निष्प्रमादी भया संता ऊंचा ऊंचा क्यों नाहीं चढ़ है ॥ भावार्थ-आचार्य कहै हैं, जो अज्ञानअवस्थामैं जो अप्रतिक्रमणा- दिक था, ताकी तौ कथाही कहा १ इहां तौ निश्चयनयकू' प्रधान करि अर द्रव्यप्रतिक्रमणा- दिक शुभप्रवृत्तिरूप थे, तिनिकी पक्ष छुडावने तिनिकू तौ विपकुम्भ कहै हैं ।। जाते ए कर्मचंधके ही कारण है, बहुरि अप्रतिक्रमणप्रतिक्रमणते रहित तीसरी भूमि शुद्ध आत्मस्वरूप है सो प्रतिक्रमणादित रहित है। तात तहाँके अप्रतिक्रमणादिककू अमृतकुम्भ कहा है। तीसरी भूमिविष चढावने उपदेश किया है सो प्रतिक्रमणादिककू विपकुम्भ कहै सुणिकरि जो प्रमादी होय ताकू कहै है यह जान नीचा नीचा क्यों पडे है ? तीसरी भूमिमैं ऊंचा ऊंचा क्यों नाही चढे है ? जहां प्रतिक्रमणकू विषकुम्भ कसा, तहां तौ तिसका निषेधरूप अप्रतिक्रमणही अमृत- कुम्भ होगया। सो यह अप्रतिक्रमणादिक अज्ञानीकै होय सो न जानना तीसरी भूमिका शुद्ध आत्ममयी जानना || आगै इस अर्थकू दृढ करते संते काव्य कहै है- विशेप-पं० जयचन्द्रजीने सुधा कुतः स्यात् यह पाठ मानकर जहांपर प्रतिक्रमण भी हलाहल विष है वहां अप्रतिक्रमण अमृत कैसे हो सकता है यह अर्थ किया है और भट्टारक शुभचन्द्रजीने सुधाकुटः स्यात् यह पाठ रखकर 'प्रतिक्रमण तो विपस्वरूप है एवं अप्रतिक्रमण द्रव्यप्रतिक्रमण तथा प्रमावी अज्ञानीके अप्रतिक्रमणसे भिन्न शुद्धात्मोपयोगरूप प्रतिक्रमण अमृत कुम्भ है,यह अर्थ किया है परंतु भावांशमें कही कोई भेद नहीं क्योंकि पं० जयचन्द्रजी ने जो भाव लिखा है वही एव पदकी सामर्थ्य से संस्कृत टीकाकारने भी स्पष्ट किया है ॥ ॥ अतो हताः प्रमादिनो गताः सुखासीनता प्रलीनं चापलमुन्मीलितमालंबन श्रात्मन्येव चालानितं चित्तमासंपूर्ण विज्ञानघनोपलब्धेः ॥१०॥ चूर्णिः । नोट-इस श्लोक की सस्कृतटीका उपलब्ध नहीं हुई। अर्थ-इस कथनत सुखकरि बैठनेपणा प्राप्त भये ऐसे प्रमादीजीवनि तौ ता. है। जे निश्चयनयका आश्रय ले प्रमादी.होय प्रवर्ते, तिनिक ताडिकरि उद्यम विषैलगा हैं वहरि ?

१२६ मोक्षाधिकार चपलपणाका प्रलय किया है। जं स्वच्छन्द वर्तं तिनिका स्वच्छंदपणा मेव्या है । बहुरि आल. म्बनक' सपाड्या है । जे व्यवहारकी पक्षकार परद्रव्यका तथा द्रव्यप्रतिक्रमणादिका आलम्बन ले संतुष्ट होय है, निनिका आलम्बन छुडाया है। वहरि चित्तक आत्मा ही विप आलानित किया है, थाम्या हैं । व्यवहारके आलंबनम अनेक प्रवृत्तिमें चिन भ्रमे था, सो शुद्ध आत्मा ही चिप लगाया है। जहांनाई मंपूर्णविज्ञानधन आत्माकी प्राप्ति न होय, तहाताई चैतन्यमात्र आत्मावि चित्त लग्या रहे ऐसे थाम्या है, ऐसें जानना ||१०||* प्रमादकलितः कथं भवति शुद्धभावोऽलमः कपायभरगौरवादलसता प्रमादो यतः अतः स्वरसनिर्भरे नियमितः स्वभावे भवन्मुनिः परमशुद्धतां व्रजति मुच्यते चाचिरात् ॥ ११ ॥ संकटों.-प्रमादकलित:-मार्धमप्तत्रिंशत्महनभेदप्रमादयुक्तो-मुनिः, अलस.-बालस्यवान् मन, शुद्ध- भाव:-शुद्धो भावः स्वभावो यम्य म.-परमात्मा कथ भवति ? न कथमपि । कुत ? कपायेत्यादि-कपायाणां क्रोधादीना, भर.-समूह , तस्य गौरवः माहात्म्य, तस्मात-व पायेंद्रियविक्थादिपरावृत्तिजत्वात प्रमादाना । यत: कारणान अलमता-आलस्यमेव प्रमाद., तयोरेकार्थत्वात, अतः कारणात परममननात् मुनि.-योगी परमशुद्धता-अत्यनविशुद्धि, बजनि-प्रानोति । च-पुन', अचिरात-शीघ्र', मुच्यते गमारबन्धनात मुक्तो भवति, किभूतः ? नियमित -निगत्रिन सन, क ? स्वेत्यादिः-स्वस्य-आत्मन', ग्म' तस्य निर्भर:-अति- शयः तस्मिन, पुन. स्वभाव-श्रात्मस्वरूपे भवन्-स्थित सन् ।। ११ ।। अथ सवोपराध च्योतनि- अर्थ-जात कपायका भर कहिये भार, ताका गौरव कहिये भारयापणा, तातें अलसता कहिये अलसपणा नाकू प्रमादकरि युक्त अलसभाव होय, सो शुद्धभाव कैसे होय १ ताते आत्मिकरसफरि भरया म्वभाववि निश्चल होता संता मूनि है सो परमशुद्धता प्राप्त होय है । बहुरि शीघ्रहीं थोरे ही कालमे कर्मबंधौं छूट है ।। भावार्थ-प्रमाद तो कपायका गौरवते होय है, सो प्रमादीकै शुद्ध भाव होय नाही। जो मुनि उद्यमकरि स्वभाव में प्रवते है सो शुद्ध होयकरि मोक्ष प्राप्त होय है ॥ ११ ॥ आगै मुक्त होनेका अनुक्रमके अर्थरूप काव्य कहै हैं अर मोक्षका अधिकार पूर्ण कर है-- त्यक्त्वाशुद्धिविधायि तकिल परद्रव्यं समग्रं स्वयं स्वद्रव्ये रतिमेति यः स नियतं सर्वापराधच्युतः । वन्धनसमुपेत्य नित्यमुदितः स्वज्योतिरच्छोच्छल- -यह श्लोक न. पर है जो कि समयसार गाथाश्रीकी टीकाके अनुसार ठीक है परतु यहा प्रकृतमें नं पर ठीक न हो १० पर ठीक वैठना है इमलियं हमने नम्बर बदल दिया है। ॥

. , -- . ॥ १३० परमाध्यात्मतरङ्गिणी च्चैतन्यामृतपूरपूर्णमहिमा शुद्धो भवन्मुच्यते ॥ १२ ॥ ० टी०-किल इत्यागमोक्तौ, यः-योगी, स्वय स्वरूपेण कृत्वा, स्वद्रव्ये-स्वात्मद्रव्ये, रति-रमणं, एति-गच्छति, किंकृत्वा ? तत्-प्रसिद्ध', समप्र-निखिल, परद्रव्य-कर्मादिद्रयं त्यक्त्वा-हित्या, विभूतं ? अशुद्धिविधायि-रागाद्यशुद्धिकारक, सः-मुनिः, मुच्यते कर्मबंधनात् । कीदृक्षः सन् ? नियत-निश्चितं, सर्वेत्यादिः-पूर्वोक्त:-समस्तापराधैः, च्युतः-रहितः सन्, किंकृत्या १ धासमुपेत्य, स्वेत्यादिः-स्वस्थ आत्मनः ज्योति:-प्रकाशः तेन अच्छ-निर्मल, उच्छलत्-उदयं गच्छत् तच्च तच्चतन्य च तदेवामृतपूरः सुधा- समूहः, तेन पूर्ण:-संपूर्णः, महिमा-माहात्म्यं यस्य सः ॥ १२ ॥ अथ मोक्ष महते- अर्थ-जो पुरुष, निश्चय करि अशुद्धताका करनेवाला जो परद्रव्य, ताकू सर्वकू छोडिकरि अर आप अपने निजद्रव्यवि रतीकू प्राप्त होय है-लीन होय है, सो पुरुप नियसतै सर्व अप- राध” रहित भया संता, बन्धका नाश प्राप्त होयकरि नित्य उदयरूप भया संता, अपना स्वरूपका प्रकाशरूप ज्योतिकरि निर्मल उछलता जो चैतन्यरूप अमृतका प्रवाह, ताकरि--पूर्ण है महिमा जाकी ऐसा शुद्ध होता. संता कर्मनितें छूट है ।। भावार्थ-पहले समस्त परद्रव्यका त्याग करि अपना निजद्रव्य आत्मस्वरूपविणें लीन होय है, सो सर्व रागादिक अपराध रहित होय आगामी बंधका नाश कर है अर नित्य उदयरूप केवलज्ञानकु पाय शुद्ध होय सर्व कर्मका श करि मोक्ष प्राप्त होय है, यह मोक्ष होनेका अनुक्रम है ।। ऐसे मोक्षका अधिकार पूर्ण भया, नाके अंत मंगलरूप ज्ञानकी महिमाका कलशरूप काव्य कह हैं-- बंधच्छेदात्कलयदतुलं मोक्षमक्षय्यमेत- नित्योद्योतस्फुटितसहजावस्थमेकांतशुद्धं । एकाकारस्वरसभरतोऽत्यंतगंभीरधीरं पूर्ण ज्ञानं ज्वलितमचलं स्वस्य लीनं महिम्नि ॥ १३ ॥ सं० टी०-एतत पूर्ण-संपूर्ण ज्ञान, ज्वलितम्-दीपित, प्रकाशं प्राप्तमित्यर्थ.,कीहक्षा ? स्वस्य-आत्मनः, महिम्नि-माहात्म्ये, लीन-एकतामापन्न , भूिते ? अचले-निकपे, पुनः कीदृक्ष ? अत्यतेत्यादिः-अत्यता गभीरं अतुलस्पर्श तच्च तद्धीर च, कुतः ? एकेत्यादिः-एकाकारण, सर्वत्र ज्ञानाकारण, स्वस्य-श्रात्मन , रसः, तस्य भर:-अतिशयः, तस्मात्, पुनः मोक्ष कर्ममोचनमोक्षं, पुनः नित्येत्यादि.-नित्योद्योतेन-निरावर- णज्ञानप्रकाशेन, स्फुटिता-प्रकाशिता, सहजा-स्वाभाविकी, अवस्था-दशा, लक्षणया रवरूपं यत्र तं, पुन: एकांतशुद्ध एकांतेन- एकधर्मेण-कर्ममुक्तिलक्षणेन शुद्ध'-निर्मल समस्तपदाधिक्यादत्यंतविशुद्ध ॥ १३ ॥ अर्थ--यह ज्ञान है सो पूर्ण भया संता देदीप्यमान प्रगट भया । कहा करता संता प्रगट भया ? कर्मका बंध था ताके छेदतें अविनाशी अतुल जो मोक्ष, ताकू प्राप्त होता संता । बहुरि कैसा प्रगट भया ! नित्य है उद्योत प्रकाश जाका ऐसी प्रफुल्लित भई है स्वाभाविक अवस्था , ? , - सविशुद्ध ज्ञानाधिकारी जाकी। बहुरि कैसा प्रगट भया ? एकांतशुद्ध कहिये ताकै कर्मका मैल न रह्या अत्यंत शुद्ध 'भया प्रगट भया । बहुरि कैसा प्रगट भया ? एक जो अपना ज्ञानमात्र आकार,ताका निजरसका भारते अत्यंत गंभीर है धीर है जाकी थाह नाही अर जाम किछू आकुलता नाही। बहुरि प्रगट होयकरि कहा कीया : अचल जो कोई प्रकार चले नाही ऐसी आपकी महिमा, ता विप लीन भया । भावार्थ-यह ज्ञान प्रगट भया सो कर्मका नाशकरि मोक्षरूप होता अपनी स्वाभाविक अवस्थारूप अत्यंत शुद्ध समस्त ज्ञ याकार गौण करि ज्ञानका प्रकाश "जाका थाह नाही जाम आकुलता नाही" ऐमा प्रगट देदीप्यमान होयकारि अपनी महिमावि लीन भया । ऐसे रंगभूमिविपै मोक्षतचका स्वांग आया था, सो ज्ञान प्रगट भया, मोक्षका म्यांग निसरि गया। ज्यो नर कोय परयो दृढबंधन बंधस्वरूप लखै दुसफारी । चिंत कर निति कम कट यह तोऊ छिदे नही नैक न टारी ॥ छेदन गहि आयुध धाय चलाय निशंक करै दुय धारी । यों बुध बुद्धि धसाय दुधा करि कर्म रु आतम आप गहारी ।। इति श्रीसमयसारस्थपद्यस्याध्यात्मतरगिएयपरनामधेयस्य व्याख्यायां अष्टमोऽकः ।।८।। इसप्रकार परमाभ्यात्मतरंगिणीकी वचनिकाविण आठवां मोक्षाधिकार पूर्ण भया ||८|| अथ सर्वविशुद्धज्ञानाधिकारः ॥६॥ सकनाशर्मविमुक्त युक्त सुज्ञानसपदा सार । भजते मुक्ति वचसाऽमृतचन्द्रोऽमृतमयो अंतुः (१)॥ दोहा-सर्वविशुद्ध सुज्ञानमय, सदा आतमाराम || परकू कर न भोगवै, जाने जपि तसु नाम ।। इहां मोक्षतच्चका स्वांग निकसनेके अनंतर सर्वविशुद्धज्ञान प्रवेश करें है ।। रंगभूमिचिपै जो जीवका, कर्ता, कर्म, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, मोक्ष ये आठ स्वांग आये तिनिका नृत्य भया । अपना अपना स्वरूप दिखाय निकसि गये । अब 'सर्व स्वांग दूरि भये एकाकार सर्वविशुद्धज्ञान प्रवेश कर है। तहां प्रथम मंगलरूप ज्ञानपुज आत्माकी महिमाका काव्य कह है- 'अथ सर्वविशुद्ध ज्ञानमुदति- नीत्वा सम्यक् प्रलयमखिलान्कर्तृभोक्त्रादिभावान दूरीभूतः प्रतिपदमयं बंधमोक्षप्रक्लृप्तेः । शुद्धः शुद्धः स्वरसविसरापूर्णपुण्याचलार्चि- प्टकोत्कीर्णप्रकटमहिमा स्फूर्जति ज्ञानपुजः ॥ १ ॥ - ? ? है परमाध्यात्मतराङ्गणी सं० टी०-अयं ज्ञानपुञ्ज'-बोधस्यानन्तसख्यावच्छिन्नाविभागशुद्धः सन् प्रतिच्छेदसमूहः प्रतिपद-ए- द्रियादिस्थान प्रथमद्वितीयादिगुणस्थानं गुणस्थान प्रति, स्फूर्जति-गर्जति-द्योतत इत्यर्थ. । विकृत्वा ? नीत्वा प्राप्य, क ? सम्यकप्रलयं-निश्शेषविनाश, कान ? निखिलान-समस्त न करॆत्यादिः-कर्ता कर्मकारकः भोक्ता कर्मफलभोक्ता, कर्ता च भोक्ता च कर्तृ भोक्तारौ तावेवादिर्येषामुत्पाद्योत्पादकादीनां ते तथोक्ता', ते च ते भावाश्च परिणामाः तान्, किभूतः १ दूरीभूतः, कुतः १ बधेत्यादि-कर्म बधमोचनयोः प्रक्लप्तिः-कल्पना तस्याः, पुन: शुद्धः-निर्मलः, पुनः कीदृक्षः ? स्वेत्यादिः स्वस्थ-आत्मनः, रस. अनुभवः तस्य विसरं समूहः स एवापूर्ण:-सपूर्णः पुण्याचलः प्रशस्ताचलः-उदयाचलस्तत्रार्चि-तेज , यस्य सः, टकेन उत्कीर्ण. प्रकटः, महिमा माहात्म्यं यस्य स ,स्वरसेत्यादिरेकपद वा स्वरसविसरापूर्णपुण्याचलाश्चिासौ टंकोरकीर्शप्रकटमहिमा च ॥ १ ॥ अथात्मनः कर्तृत्वभोक्तृत्व कीर्तयति- अर्थ-ज्ञानका पुञ्ज आत्मा है, सो स्फुरायमान प्रगट होय है । कहाकरी प्रगट होय है समस्तही कर्ता अर भोक्ता इत्यादिक भाव है तिनि सर्वहीकू' भलै प्रकार प्रलय कहिये नाशक प्राप्त करि प्रगट होय है ।। बहुरि कैसा है १ प्रतिपद कहिये वारंवार नाशकू प्राप्त करि प्रगट होय है । कर्मके क्षयोपशमकै निमित्त अनेक अवस्था होय हैं, तिनिप्रति बंधमोक्षकी जो कल्पना प्रवृत्ति तातै दूरीभूत है-दूरवर्ती है ।। बहुरि शुद्ध है शुद्ध है । दोय.वार कहने रागादिक मल अर आवरण दोऊौ रहित है। बहुरि कैसा है ? अपना निजरस जो ज्ञानरस, ताका विसर कहिये फैलना, ताकरि आपूर्ण कहिये भरथा ऐसा पवित्र अर अचल है अचि कहिये दीप्ति प्रकाश जाका । बहुरि कैसा है ? टंकोत्कीर्ण है प्रगट महिमा जाकी। भावार्थ-शुद्धनयका विषय ज्ञानस्वरूप आत्मा है सो कर्ताभोक्तापणाका भाव रहित है । वहुरि बंधमोक्षकी रच- नाकरि रहित है, अर परद्रव्यतै अर सर्व परद्रव्यके भावनि” रहित है, तारौं शुद्ध है । अर अपने, निजरसका प्रवाहकरि पूर्ण देदीप्यमान ज्योतीरूप टंकोत्कीर्ण जाकी महिमा है। सो ऐसा ज्ञानपुज आत्मा प्रगट होय है । १॥ अब सर्व विशुद्धज्ञान प्रगट करै हैं । तहां प्रथम ही जो कर्ता भोक्ताभाव हैं तिनक्क न्यारा दिखावै है, ताकी सूचनिकाका श्लोक है- कर्तृत्वं न स्वभावोऽस्य चितो वेदयितृत्ववत् । अज्ञानादेव कर्तायं तदभावादकारकः ॥ २ ॥ सं० टी०-अस्य चितः-चिद्रूपस्य, कतृत्व-कर्मकारकत्वं, न स्वभावः-न स्वरूप, किमिव ? वेदयि- तृत्ववत-यथा वेदयितृत्व-भोक्तृत्व, आत्मनो न सभवति तथा कतृत्वमपि । अय-आत्मा, कर्ता कर्मणां कारकः इति प्रतीतिहश्यते तत्तथ ? आत्मा कारकः-कर्मणां कर्ता भवेत्, कुतः ? तदभावात् तस्य ज्ञानस्य, अभावः-विनाशस्तस्मात् अज्ञानतो मया कृतमिति मनुते तदभावादव त्वमेव ॥२॥ श्रथाकरी कर चिन्तयति- अर्थ-इस चित्स्वरूप आत्माका' कर्तारणा स्वभाव नाही है जैसे वेदयितृत्व कहिये भोक्तापणा स्वभाव नाही है, तैसे । सो यह आत्मा कर्ता मानिये है, सो अज्ञानतें मानिये है । अर जब अज्ञानका अभाव होय है, तब अकारक कहिये कर्त्ता नाही है। - - ? . . सर्वविशुद्धज्ञानाधिकारी अकर्ता जीवोयं स्थित इति विशुद्धः स्वरसतः स्फुरच्चिज्योतिर्भिश्चरितभुवनाभोगभवनः । तथाप्यस्यासौ स्याद्यदिह किल बंधः प्रकृतिभिः स खल्वज्ञानस्य स्फुरति महिमा कोऽपि गहनः॥३॥ सं० टो-अमुना प्रकारेण स्वपरिणामैरुत्पद्यमानस्य जीवस्य तेन सह कारणभावाभाव सवद्रव्याणा द्रव्यातरेणोत्पाद्योत्पादकभावाभावात् इति प्रकारेण, श्रय जीव.-चिद्रूपः, अर्ता-धर्मणामकारक. सन् स्थितः सुस्थः, किभूतः ? स्वरसत. स्वभावतः कर्मोपाधिनिरपेक्षत' विशुद्धः निर्मलः, स्फुरदित्यादि -रफुरति प्रकाशमानानि तानि च तानि चिज्योतींषि च ज्ञानतेजासि च तैः, छुरितेत्यादिः-छुरित-प्रकाशित, भुव. नमेव-विष्टपमेव, भोगभवन-परिपूर्णगृहं येन स , तथापि आत्मन समस्तविज्ञानमयत्वेनावकत्वे सत्यपि, किल इति निश्चित, इह-जगति, ज्ञानावरणादिकर्ममि , स्यात्-भवेत् खलु-इति निश्चितं, यत् यस्माद्ध तो. अस्य-मात्मन., असो अधः-सश्लेप., प्रकृतिभि. स.-कोऽपि- र्दिष्ट', गहन अज्ञातातः स्वरूपः, अज्ञानस्य ज्ञानाभावस्य, महिमा-माहात्म्य, स्फुरति विजृभते, अतिशयालकारोय ॥ ३ ॥ अथ भूय. कर्तृ- स्वभोक्तृत्वमामनति- अर्थ-ऐसे जीव है सो अपने निजरसतै विशुद्ध है । यातै परद्रव्यका तथा परभावनिका अर्ता ठहरथा। कैमा है जीव ? स्फुरायमान होता-फैलता जो चैतन्यज्योति, तिनिकरि व्याप्त भया है भुवन कहिये लोकका आभोग कहिये मध्य जाकरि, ऐसा है भवन कहिये होना जाका । ऐसा है तौऊ याकै इस लोकपैि प्रगट कर्मप्रकृतिनिकरि बंध होय है, सो यह निश्चयकरि अज्ञानका कोई ऐसा ही महिमा है, सो बडा गहन है-ताका थाह न पाइये ॥ भावार्थ-शुद्ध- नयकरि जीव परद्रव्यका कर्ता नाही अर सर्व ज्ञयनिविष जाका ज्ञान व्यापनेवाला है तोऊ याकै कर्मका बंध होय है सो यह कोई अज्ञानका बडा महिमा है ॥ ३॥ भोक्तृत्वं न स्वभावोऽस्य स्मृतः कर्तृत्ववञ्चितः । अज्ञानादेव भोक्तायं तदभावादवेदकः।४। स० टी०-अस्य चितः चिदुपस्य, भोक्तृत्व-कर्मफलभोक्तृत्व, न स्वभावः, न स्वरूप स्मृतः कथितः, अज्ञानादेव-परात्मनोरेकत्वाध्यासकरणलक्षणादनवबोधादेव, आय-चेतयिता, भोक्ता-कर्मफलानुभोजकः, तदभावात-प्रतिनियतस्वलक्षागनिर्ज्ञानात् , अवेदकः-कर्मफलानभोजकः ॥ ४॥ अथ ज्ञान्यज्ञानाभिस्वरूपं सूत्रयति- अर्थ-इस आत्माका कर्तास्वभाव जैसे नाही है, तैसेही भोक्तापणा भी स्वभाव नाही है, यह अज्ञानहीतै भोक्ता होय है ॥ बहुरि जब अज्ञानका अभाव होय है तब अवेदक है, भोक्ता नाही है ॥४॥ अज्ञानी प्रकृतिस्वभावनिरतो नित्यं भवेद्वदको t 4 - ? - १५४ परमाध्यात्मसरीक्षणी ज्ञानी तुःप्रकृतिस्वभावविरतो नो जातुचि दकः ।, इत्येवं नियमं निरूप्यं निपुणैरज्ञानिता त्यज्यतां : शुद्धैकात्ममये महस्यचलितैरासेव्यता ज्ञानिता ॥ ५ ॥ स० टी-अज्ञानी-पुमान्, प्रेत्यादिः प्रकृतेः वर्मणः, स्वभावः-वरूप, तत्र निरतः-निःशेप रक्तः सन् शुद्धात्मज्ञानाभावात् स्त्रपरयोरेकत्वज्ञानेन तयोरेकत्वदर्शनेन तयोरेकत्वपरिणत्या च प्रकृतिस्वभाव स्थितत्वात प्रकृतिस्वभावमपि अहंतयानुभवन्, नित्यं वेदक:-कर्मफलभोक्ता भवेत, तु-पुन', 'जानी पुमान प्रेत्यादिः-प्रकृतेः स्वभावात् वरत:-विरक्तः संन् शुद्धात्मज्ञानसद्भावात्स्त्रपरयोविभागज्ञानेन तयोविभागदर्शनेन तयोविभागप. रिणत्या च प्रकृतिस्वभावादपमृतत्वात् शुद्ध त्मस्वभावमैकमेवाहतयानुभवन् जातचित्त वदाचिपि न वंदकः उदितकर्मफलभोक्ता न, निपुणैः भेदः पुरुपै , अज्ञानिता-प्रज्ञानस्वभावाः, त्यज्यता-मुच्यता, किंकृत्वा .' इति-अमुना प्रकारेण, एव-पूर्वोक्त ज्ञान्यज्ञानिनोबंधाबंधलक्षणं नियम निरूप्य-ज्ञात्वा, पुनः आसेव्यता ध्यायतां, का ? ज्ञानिता-ज्ञानित्वं, के ? अचलितैः-अचलत्वं प्राप्तः, क? महसि-तेजसि, किंभूते ? शुद्ध- कात्ममये-शुद्धः निष्कलकः स चासौ एकात्मा च तेन निवृत्तस्तस्मिन् ।। ५ ।। अथ ज्ञानिनो ज्ञातृत्वमध्याप- यति- अर्थ-अज्ञानी जन हैं सो तौ प्रकृतिस्वभावविय रागी है-लीन हैं, ताहीकू अपना स्वभाव जाने है, तातै सदाकाल ताका वेदक है-भोक्ता हैं । वहुरि ज्ञानी है सो प्रकृतिस्वभाववि विरागी है--विरक्त है, ताकू परका स्वभाव जाने है ताः कदाचित'भी वेदक नाही है भोक्ता नाहीं है सो आचार्य उपदेश करै है-जो, 'जे निपुण प्रवीण पुरुष हैं, ते ज्ञानीपणाकी अर अज्ञानीपणाका ऐसा नियम निरूपणकरि विचारिकरि अज्ञानीपणाकू' तो छोडौ अर शुद्ध आत्मामय 'जो एक मह-तेज प्रताप, ताविप निश्चल' होयकरि ज्ञानीपणाकू सेवन करो ।। ५ ।।. 'ज्ञानी करोति न न वेदयते च कर्म जानाति केवलमयं किल तत्स्वभाव । जानन्परं करणवेदनयोरभावाच्छुद्धस्वभावनियतः स हि मुक्त एव ॥६॥ स० टी० -ज्ञानी-पुमान् शुभाशुभं कर्म न करोति-न विधत्ते, नवेदयते-कर्मफलं न भुजति, किलेवि निश्चितं, अय-ज्ञानी, केवल कर्तृत्वभोक्तृत्वरीहित्येन परं, तत्स्वभानं तस्य कर्मणः विभाग स्वरूपं मधुरक- टुकादि जानाति-तत्स्वभावपरिच्छेदको भवति हि-पुनः सः-श्रात्मा, मुक्त एक-कर्मफलरहित एव, पर-केवलं, जानन् विश्वं परिच्छिदन् सन्, शुद्धन्यादिः, शुद्धश्चासौ स्वभावः स्वरूपं च, नत्र नियतः-निश्चलत्वमापनः, कुतः ? करणवेदनयोः करण-कर्मक त्वं च, वेदन-कर्मफलभोक्तृत्वं च तयोरभात्रात कर्तृत्वभोक्तृत्वस्वभा- वराहित्यात् ।। ६ ॥ अथात्मनः कर्तृ त्वं दूषयति- -- अर्थ-ज्ञानी है सो कर्मकू स्वतंत्र होय करै नाही है । तैसेही वेदै, नाही है। केवल तिस कर्मस्वभावकू जानैही है। ऐसे केवल जानता संता करनेका अर वेदनेका अभावतै शुद्धस्वभाव के विपै निश्चयकरि मुक्त ही है-कर्मनित छुटया ही कहिये ।। भावार्थ-ज्ञानी कर्मका स्वाधीन: पणे कर्ता भोक्ता नाही, केरल, ज्ञाता ही है । तात; शुद्ध स्वभावरूप भया संता मुक्तही हैं। जो ? 7 -- 1 -- मर्गविशुद्धज्ञानाधिकार कर्म उदय आवे भी है तो ज्ञानीका कहा करे ? जेते निवलाई रहैं तेते कर्म जोर चलावो सब- लाई क्रम वधाय कर्मका निर्मूल नाश करेहीगा ॥ ६ ॥ ये तु कर्तारमात्मानं पश्यति तमसावृताः। सामान्यजनवरोपां न मोनोऽपि मुमुक्षतां ॥७॥ मं० टी० -ये तु-जिनसिद्वातामासाः, तमसावृता. अज्ञानव्याप्ना, विचारराहित्यात, आत्मान, क्तार कर्मका क, पश्यति ईक्षाने, नेपां-जैनाभासाना, मुमुक्षतामपि मोक्षमिच्छतामपि न मोक्ष.-कममोचनलक्षणो मोक्षो न त्यात आत्मन. कर्तृत्वाभ्युपगमात तदभ्युपगमे च सदैव चद्धत्वप्रमंग क इव सामान्यजनवत् मामा- न्यजनाना-वैशेपिकादीना यथा 'कर्ना शिवस्त्रिजगना' तथा च प्रयोग -सर्व उर्वीपर्वततस्तन्वादिक धीमद्ध- तुक कार्यत्वात् अचेतनोपादानन्यात सन्निवंशविशिष्टत्वात् वा वस्त्रादिवदिति यन्तु धीमान स ईश्वरः। तस्य विचार्यमाणस्य मुक्तन्यायोगात् म हि--अशरीर सशरीरो वा करोति ? न तावदाद्य अशरीरस्य तत्व- व्याघातात् मुक्तात्मवत । सशर रमात्रक त्वं उप क्षीणशक्तिकत्वात् तदकारणे साधनस्य व्यभिचारात, सक्र- मक्रत्वे संसारिजनवदकर्तृकत्वाच नद्वदमुक्तत्व ॥ ७॥ अथ तथैव तत्व व्याहन्ति- '' अर्थ-जे पुरुष अज्ञान अधकारकरि आच्छादे हुये आत्माकृ' कर्ता मान हैं, ते मोक्षक चाहते है, तोऊ तिनिकै सामान्यजन-लौकिकजनकीज्यौं मोक्ष नाही होय है ।। ७ ।। विशेष-वैशेपिक आदि ईश्वरको जगतका कर्ता मानते हैं। ईश्वर कर्ता है इस वातकी सिद्धिके लिये वे यह अनुमान भी बतलाते हैं कि जिसप्रकार वस्त्र कार्य है उसके उपादान कारण तंतु अचेतन हैं और उसकी विलक्षण, रचना है इसलिये उसका कर्ता निश्चित है उमी प्रकार पृथ्वी पर्वत वृक्ष और शरीर आदि पदार्थ भी कार्य हैं इनके भी उपादान कारण अचेतन हैं और ये विलक्षण रचनाकं धारक हैं इसलिये इनका भी कोई शक्तिमान विद्वान कर्ता होना चाहिये और जो ग्ह कता है वही ईश्वर है। परन्तु जिम समय हम कर्ताके सिद्ध करनेवाले अनुमानपर विचार किया जाता है उसममय वह ईश्वर, मुक्त-समस्त कर्मवासनाओंमे रहित अनुभवमें नहिं आता क्योंकि यहां पर दो विकल्प आकर खडे होने हैं-वह पृथ्वी आदिको बनाने वाला शरीर महिन है किं वा शरीर रहित ? यदि शरीर रहिन माना जायगा तो झूठ है क्योंकि जिसप्रकार सिद्वात्मा शरीरहित है इसलिये वे कर्ता भी नहीं, उसीप्रकार यदि ईश्वर शरीर रहित होगा तो कभी कर्ता नहिं हो सकता । यदि उस का माननके लिये उसको शरीर सहित मानोगे तो यहांपर भी दो विकल्प उठने हैं कि वह केवल शरीरको ही बनाता है वा अन्यपढार्थी को भी'? यदि केवल शरीरका ही बनाने वाला है तो उसकी समस्त शक्ति तो उसी में क्षीण हो जायगी फिर वह वनावेगा क्या ? और ऐसा करनेमे कार्यत्व आदि हेतु भी दुष्ट हो जायेगा-क्योंकि तुम्हारी व्याप्ति तो यह है कि जितने कार्य हैं उनका कोई न कोई कर्ता अवश्य - १ । - ? १३६ परमाध्यात्मतरंगिणी है सो कार्य तो पृथ्वी आदि भी है उनका कोई कर्ता निश्चित न हुआ। कहोगे कि वह शरीर आदि सबका कर्ता है तो जिसप्रकार ईश्वरसे इतर शरीरधारी संसारी सब कार्योके कर्ता नहि हो सकते उसीप्रकार उनके समान ईश्वर भी कर्ता न ठहरेगा तथा संसारी जीवोंके समान वह भी मुक्त न हो सकेगा इसलिये किसीभी आत्माको कर्ता न मानना यही पक्ष समीचीन है। नास्ति सर्वोऽपि संबंधः परद्रव्यात्मतत्वयोः । कर्तृकर्मत्वसंबंधाभावे तत्कर्तृता कुतः ॥८॥ सं० टी०-परेत्यादिः-पुद्गलद्रव्यजीवद्रव्ययोः सर्वोऽपि-तादात्म्यादिलक्षणः संबंधः, नास्ति, कत्यादिः तयोर्मध्ये आत्मनः वतृत्व, कर्मणां कर्मत्व, एतल्लक्षणसांबांधाभावे सति, तत्कत ता-तेषां कर्मणामात्मनः कत त्वं कुत: १ न कुतोऽपि स्यात् ।। ७ ।। अथ परद्रव्यात्मतत्त्वयोः संवन्धं निवारयति- अर्थ-परद्रश्यका 'अर आत्मतत्वका सर्वही संबंध नाही है, ऐसे कर्ताकर्मपणाका संबंधका अभावकू होतै परद्रव्यका कर्तापणा काहे होय ? भावार्थ-परद्रव्यका अर आत्माका किछूभी संबंध नाही, तव कर्ताकर्मसंबंध काहे होय ? ऐसे होते कर्तापणा काहे होय ? आगे व्यव- हारनयके वचनकरि कहिये है, जो, परद्रव्य मेरा है सो जे व्यवहारहीकू निश्चय माने हैं, ते अज्ञानतै माने है, या दृष्टांतपूर्वक कहै है- एकस्य वस्तुन इहान्यतरेण साधू संबंध एव सकलोऽपि यतो निषिद्धः । तत्कर्तृकर्मघटनास्ति न वस्तुभेदे पश्यत्वकर्तृ मुनयश्च जनाः स्वतत्त्वं ॥६॥ सं. टी.-इह-जगति, यतः कारणात्, एकस्य वस्तुनः-चेतनस्य, अचेतनस्य वा अन्यतरेण सार्ध-सह, सकलोपि-समस्तोऽपि, सबंधः-तादात्म्यलक्षणः, गुणगुणिभावलक्षणः, लक्ष्यलक्षणभावः, वाच्यवाचकभावं- लक्षणः, विशेष्यविशेषणभावलक्षणः इत्यादिः सनधो भिन्नवस्तुनोः निषिद्ध एव-प्रतिषिद्ध एव, तत् तस्मात्का- रणात् वस्तुभेदे-वस्तुनोः-जीवपुद्गलयोः भेदे-पृथक्त्वे सति, व कर्मघटना-वर्मणोः-जीवपुद्गलयोः, कर्तृत कर्मत्वमिति घटना-संभावना, नास्ति च-पुनः मुनयो जनाः-मुनीश्वरलक्षणा लोकाः, अकत-कर्तृ . त्वव्यपदेशरहितं, स्वतत्त्व-स्वात्मस्वरूपं पश्यतु-अवलोकयंतु ॥ ६ ॥ अथाज्ञानिस्वभाव नेनेक्ति- अर्थ-जा कारणनै एकवस्तुकै अन्यवस्तुकरि सहित इस लोकमैं संबंध हैं, सो समस्तही निपेध्या है तातें जहां वस्तुभेद है तहां कर्ताकर्मकी प्रवृत्तिही नाही है । तातै लौकिकजन भी अर मुनिजन भी वस्तुका तत्व कहिये यथार्थस्वरूप ऐसाही देखो जो कोई काहूका कर्ता नाही परद्रव्य परका कर्ताही श्रद्धानमै ल्यावो ।१०। आगें कहै हैं,जो पुरुप ऐसा वस्तुस्वभावका नियम नाही जानै है, ते अज्ञानी भये कर्म कर है, ते भाषकर्मके कर्ता होय हैं, ऐसे अपने भाषकर्मका कर्ता अज्ञानतें चेतन ही है, ताकी सूचनिकाका काव्य है- . - -- 11 .

१३७ १ सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार ये तु स्वभावनियमं कलयंति नेममज्ञानमग्नमहसो वत ते वराकाः । कुर्वति कर्म तत एव हि भावकर्मकर्ता स्वयं भवति चेतन एव नान्यः ।१०। स. टी.-तु-पुन', ये-सारयादयो वादिन. इम प्रसिद्ध, स्वभावनियम-स्वभाव -चेतनत्वं अचेतनत्वं तस्य नियम न कलयति न मन्यते सांख्यादीना प्रकृत्यादितत्त्वानामे त्वघटनात, कीदृक्ष'स्ते ? अज्ञानेत्यादिः अज्ञाने मग्न-अन्नानाच्छादित, मह ज्ञानज्योति येषां ते वतेति खेदयति ते-वादिन', वराका:-स्वतत्त्वव्या. घातात् स्वस्वरुप स्थापयितुमसमर्था सत. केवल कर्मज्ञानावरणादिप्रकृति उपार्जयंति हीनि स्फुट तत एय अज्ञानादेव भावकर्म करोति न द्रव्यकर्म करोति यतः तत एव स्वयं अज्ञानादि: भावभकर्ता भावफर्मणां रागद्वपादीना कर्ता-कारक भवनि, अ य अज्ञानादिस्वभावाद्भिन्नः चेतन एव-चेतयति स्वस्वरूपमिनि चेतन एव भावकर्मकर्ता न भवति ।। १०॥ अथ कर्मणः कार्यन्वं कीर्शयति- अर्थ-जे पुरुप वस्तुका स्वभावका पूर्वोक्त नियमकू नाही जान हैं तिनि आचार्य खेद करि कहै हैं-अहो अज्ञानविपैं मग्न भया है मह कहिये पुरुषार्थ-पराक्रमरूप तेज जिनिका, ते चराक कहिये रांका भये संते कर्मकू करै हैं, ज्ञान तै छूटि गये हैं, तातें दूसरी तीसरीभावकर्मका आप चेतनही कर्ता होय है अन्य नाही है । भावार्थ-जो अज्ञानी मिथ्यादृष्टि है सो वस्तूका स्वरूपका नियम तो जानै नाही अर परद्रव्यका कर्ता वन, तब आप अज्ञानरूप परिणम, तय अपना भावकर्मका कर्ता अज्ञानीही है, अन्य नाही है ।। कार्यत्वादकृतं न कर्म न च तज्जीवप्रकृत्योद्धयो- रज्ञायाः प्रकृतेः स्वकार्यफलभुगभावानुषंगाकृतिः । नैकस्याः प्रकृतेरचित्त्वलसनाज्जीवोऽस्य कती ततो जीवस्यैव च कर्म तच्चिदनुगं ज्ञाता न यत्पुद्गलः ॥११॥ सं० टी० -कर्म भावकर्म पक्ष., अकृत न भवितुमर्हति इति साध्यो धर्मः, कार्यत्वात् हेतु तत्रान्धय- व्याप्तिः यद्यत्कार्य तत्तदकृत न भवति यथा-घटादि कार्य च भावकर्म तस्मादकृतं न । व्यतिरेकच्याप्तिश्च यदकृतं तन्न कार्य यथा व्योमादिः न च तथेद तस्मान्न तथेति । कस्य कार्यमिति प्रश्ने तच्च कर्म जीवप्रकृत्योः जीवश्च प्रकृतिश्च तयोः,द्वयो.,कार्य न,कुत' ? अज्ञायाः अचेतनायाः प्रकृते,स्वेत्यादिः-स्वस्य स्वभावकर्मण कार्य सुखदुःखादि तस्य फल-इष्टानिष्टावाप्तिपरिहारपूर्वक सुखदुःखानुभवन भुनक्तीति स्वकार्यफलभुग तस्य भावस्तस्यानुपगाकृति सपर्कप्रसग स्यात् । ननु योर्मा भवतु कार्य एकस्याः प्रकृते द्रव्यकर्मणः साख्यपरि- कल्पिताया सत्वरजस्तमसा समावस्थायाः प्रकृतेर्वा कार्य ? इति चेन्न, अचित्वलसनातः,प्रकृते' अचेतनन्व स्वभावात् तत्कार्यवे च तस्याचेतनत्वानुपंगात् ततो द्वयोरेकस्याः कार्यकरणायोगात,अस्य भावकर्मण' जीवति दशभि प्राणरिति जीवः ससात्मिा कर्ता-कारक , च-पुनः, तत्-कर्म, तत-प्रसिद्ध , भावकर्म जीवस्यैव नान्यस्य किंभूत ? चिदनुग-चेतनासहित तथा चोक्त श्रीमदाप्तपरीक्षायां- १८ । १३८ परमाध्यात्मङ्गिणी भावकर्माणि चैतन्यविवर्तात्मानि भाति नुः । क्रोधादीनि स्ववेद्यानि वचिञ्चिदभेदतः ।। यत् यस्मात् कारणात् पुद्गलः ज्ञायको न अचेतनत्वात् ॥ ११ ॥ अथ प्रकृतिवादिनं सांख्य प्रतिक्षिपति- अर्थ-कर्म है सो कार्य है, तातै विना किया होय नाही । बहुरि सो कर्म जीवका अर प्रकृतिका दोऊवा किया नाही । जातें प्रकृति तौ जड है, ताकै अपने अपने कार्यका फलका भोगनेका प्रसंग आचै है बहुरि एक प्रकृतिकीही कृत कहिये कार्य नाही हैं जातें प्रकृति तौ अचेतन है अर भावकर्म चेतन है । तातै इस भावकर्मका कर्ता जीव ही है यह जीवहीका कर्म है । जातें चेतनके अनुग कहिये चेतनतै अन्वयरूप है-चेतनकै परिणाम हैं। अर पुद्गल है सो. ज्ञाता नाही है ताते पुद्गलके नाही है || भावार्थ-चेतनकर्म चेतनहीकै होय, पुद्गल जड है, ताकै चेतनकर्म कैसे होय ॥११॥ आर्गे जे केई भावकर्मका भी कर्ता कर्महीकू माने हैं, तिनि समझावनेकू स्याद्वादकरि वस्तुकी मर्यादा कहै है । ताकी सूचनिकाका काव्य है- कमैव प्रवितयं कर्तृहतकैः क्षिप्त्वात्मनः कर्तृतां कर्तात्मैष कथंचिदित्यचलिना कैश्चिच्छुतिः कोपिता। तेषामुद्धतमोहमुद्रितधियां बोधस्य संशुद्धये स्याद्वादप्रतिबंधलब्धविजया वस्तुस्थितिः स्तूयते ॥१२॥ सं० टी-कैश्चित--सांख्यमतानुसारिभिः इति पूर्वोक्ता अति:-जिनोक्तं सूत्र कोपित्ता-विराधिता किंभूता श्रुतिः ? अचलिता प्रमाणादिभिश्चायतुमशक्या, किंभूतैस्तैः हतके:-श्रात्मनोऽक्तृत्वप्रतिपादकैः मात्मा-चेतायता, कर्ता तु प्रकृतिः, विकृत्वा ? कमैव-प्रकृतिरेव कर्तृ-सुखदःखादिकारक, प्रवितक्य-प्रवि- चित्य, कमैवात्मानमज्ञानिन करोति ज्ञानावरणाच्यकर्मोदयमतरेण तदनुपपत्तः, कमैय ज्ञानिन करोति तत्कर्मक्षयोपशममंतरेण तदनुपपत्ते, तथैव निद्रासुखदुःखमिथ्याट्यसयतोधिस्तिर्यग्लोक्शुभाशुभ- प्रशस्ताप्रशस्तादिकं तत्तत्सबन्धि मोदयमतरेण तदनुपपत्त तथा च जेनी श्रुतिः-पु वेदाख्यं कर्म स्त्रियम- भिलपति स्त्रीवेदाख्यं कर्म नर च तथा यत्पर हंति येन च परेण हन्यते तत्परघातकर्मेति वाक्येन जीवस्या- ब्रह्मपरघातादिनिपेधात् पर्मण एव तत्समर्थनात् आत्मनः-जीवस्य वक्तृतां-भावकारित्वं क्षिप्त्वा- निराकृत्य, प्रकृतेरेव कर्तृत्वे तस्य सर्वेषा. जीवानामक वे भोक्तृत्वादीनामपि कर्तृत्वाभावात् अकिंचित्क: रत्वमेव पुरुपत्वव्याघातात् इति किं ? एप आत्मा कथाचित् कर्ता केनचित् कारणेन कारकः अन्यथा मुक्ता- त्मना कर्तृत्वप्रसगात् । तेपा प्रकृतेः कर्तृत्ववादिना, बोधस्य ज्ञानस्य, संशुद्धये-निर्मलीकरणाय, वस्तुस्थितिः। वस्तुनः व्यवस्था स्तूयते-प्रशस्यते किंभूता सती ? स्यादित्यादि स्याद्वादन-कथंचिद्वादेन प्रकृत्यादीना नित्य-, त्वादेः, प्रतिबन्धः-प्रतिपेघ. तत्कथं ? प्रधान व्यक्तादति नित्यत्वनिराकरणात् अपेतमप्यरित विनाशप्रतिपे- धात् इत्येकातनिषेधः तेन लब्धी विजयो यया सा, अथवा स्याद्वाद एत्र प्रतिबन्धः-कारणं वस्तुस्थितेः, तेन लब्धो विजयो यया सा, कीदृशाना तेषां ? उद्धतेत्यादिः-उद्धतः-उत्कटः चासौ मोहश्च मोहनीयं कर्मः तेन मुद्रिता श्राच्छादिता, धी:-धारणावती बुद्धिर्णेयां तेपा ।। १२ ।। अथ निश्चयेनाकर्तृत्वमात्मनो वक्ति- अर्थ-केई आत्माकं घातक सर्वथा एकान्तवादी तिनि. कर्महीकू का विचारि अर ? ? १ ?

।' सर्गविशुद्धज्ञानाधिकार ५३१ आत्माके कर्तापणा दूरि करि अर यह आत्मा कथंचित् कर्चा है ऐसे कहनेवाली निर्वाध श्रुति कहिये जिनेश्वरकी वाणी है, ताकू कोप उपजाया ऐसे सर्वथा एकांतवादी हैं ते कैसे हैं ? उद्धत उत्कट तीन उदय भया जो मोह मिथ्यात्य ताकरि मुद्रित भई हैं बुद्धि जिनकी, तिनिका बोध कहिये ज्ञान, ताकी सम्यक्प्रकार शुद्धिके अर्थ वस्तुकी मर्यादा कहिये है .1 कैसी कहिये है ? स्याद्वादके प्रतिबंध कहिये प्रवन्ध, ताकरि पाइये हैं विजय कहिये निर्वाधसिद्धि जानै॥भावार्थ- कई वादी सर्वथा एकांतकरि कर्मका कर्ता कर्महीकू' कहै हैं । अर आत्माकू अकर्ताही कहै है ते आत्माका स्वरूपके घातक हैं । अर जिनवाणी है सो स्याद्वादकरि वस्तुकू निर्वाध साधे है, सो वाणी आत्मा कथंचित् कर्ता कहै है, सो तिनि सर्वथा एकांतिनिपर वाणीका कोप है तिनकी बुद्धि मिथ्यात्वारि मुदि रही है । तिनिके मिथ्यात्वक दृरि करनकू. आचार्य कहै है,स्याद्वादकरि जमी वस्तुसिद्धि होय है, तसे कहिये हैं । "" विशेप-इम श्लोकका उल्लेख सांख्यमतके खंडनकेलिये किया है क्योंकि सांख्यमतमें यह वात मानी है कि कर्म-प्रकृति कर्ता है पुरुष नही यह चेतनस्वरूप है । संस्कृतटीकामें स्पष्टरूपसे इस श्लोककी व्याख्या की गई है ।। १२ ।। मा कर्तारममी स्पृशंतु पुरुषं सांख्या इवाप्याहताः कर्तारं कलयतु तं किल सदा भेदावबोधादधः । ऊवं तूद्धतबोधधामनियतं प्रत्यक्षमेनं स्वयं पश्यतु च्युतकर्तृभावमचलं ज्ञातारमेकं पर ॥१३॥ स० टी०-अमी आर्हताः-अहंत -भगवत इमे, अहंन्देवो येषां ते आर्हता., पुरुप-आत्मान, कर्तारं- भावकर्मकार, मा स्पृशतु मागीकुर्वतु, के इव ? साख्या इव यथा सास्या आत्मनोऽक व प्रतिपादयति तथा साक्षात् ज्ञानरूपेण जेना अपि,किल इमागमातो,भेदावबोवाद्-भेदज्ञानाद् अध.अभेदज्ञावस्थाया त-आत्माग, तदा संसारावस्थापर्यंत, वार-भावकर्मकारक, व लगतु जानतु, तु-पुन., ऊर्ध्व-अज्ञानादुरि-भेदविज्ञाना- वस्थायां, एन-आत्मानं, स्वयं-स्वभावत. प्रत्यक्ष अध्यक्ष यथा भवनि यथा च्युतक भाव-त्य तवंत 'स्वभान पश्यतु-अवलोकयतु मुनय किंभूत ? उद्धतेत्यादि'-उद्धत च तद्वोधधाम-ज्ञानज्योतिः तत्र नियत नियंत्रित, अचल निष्कप, ज्ञातार-ज्ञायक एक कर्मद्वैतरहित्वादद्वैत परं जगच्छ्रेष्ठ, ॥ १३ ॥ अथ क्षणक्षयम्वलक्षणवादिन सौगत निगचष्टे- 1: अर्थ-आर्हत कहिये अहतके मतके जैनी जन हैं ते आत्माकू सर्वथा अकर्ता सांख्यमती- निकीज्यों मति मानु । तिस आत्माका भेदविज्ञान भये पहले कर्ता मानु अर भेदज्ञान भये ताके उपरि उद्धत ज्ञानमंदिरवि निश्चित नियमरूप कर्त्तापणाकरि रहित निश्चल एक ज्ञाता ही आपै आप प्रत्यक्ष देखो। भावार्थ-सांख्यंमती पुरुपकू सर्वथा एकांतकरि अकर्ता शुद्ध उदासीन चैतन्यमात्र मान है सो ऐसे मानने मैं पुरुकै संसारका अभाव आवै है प्रकृतिकै संसार मानै तौ ? १ १४० परमाध्यात्मतरंगिणी प्रकृति तो जड हैं, ताकै सुखदुःख आदिका संवेदन नाही । ताकै काहेका संसार ? इत्यादि दोष आवै हैं । यात सर्वथा एकांत वस्तूका स्वरूप नाहीं । ताते ते सांख्यमती मिथ्यादृष्टि हैं, तारौं तैसें जैनी भी मान है तो मिथ्यादृष्टि होय है ॥ ता, आचार्य उपदेश करै है-जो, सांख्यमतीनिकीज्यों जैनी आत्माकू सर्वथा अकर्ता मति मानू । जहांताई आपा- परका भेदविज्ञान न होय, तहांताई तौ रागादिक अपने चेतनरूप भावकर्मनिका कर्ता मान । अर भेदविज्ञान भये पीछे शुद्ध विज्ञानधन समस्तकर्तापणाके अभावकरि रहित एक ज्ञाताही मानू ऐौं एकही आत्माके विषै कर्ता अकर्ता दोऊ भाव विवक्षाके वशी सिद्ध होय है। यह स्याद्वाद- मत जैनीनिका है अर वस्तुस्वभाव ऐसाही है । कल्पना नाही है । ऐसें माने पुरुपकै संसार मोक्ष आदिकी सिद्धि है । सर्वथा एकांत माननेवि सर्व निश्चयव्यवहारका लोप होय है ऐसे जानना ।१३। आगै बौद्धमती क्षणिकवादी हैं, ते एसैं मान है, जो कर्ता तो अन्य है अर भोक्ता अन्य है। तिनिके सर्वथा एकांत माननेमे दूपण दिखावै हैं । अर स्याद्वादकरि जैसे वस्तुस्वरूप कर्तामोक्तापणा है तैसें दिखावै है। तहां प्रथम ही ताकी सूचनिकाका काव्य है- क्षणिकमिदमिहैकः कल्पयित्वात्मतत्वं निजमनसि विधत्त कर्तृ भोक्त्रोविभेदं । अपहरति विमोहं तस्य नियामृतौधः स्वयमयमभिपिचंश्चिञ्चमत्कार एव ११४॥ स० टी०-इह भरतक्षेत्रं, भावमिथ्यात्वापेक्षया सर्वत्र वा एकः सौगतवादी क भोक्त्रोविभेदं-कर्ता च भोक्ता च तयोविभेद-भिन्नत्वं 'सौगतानां कर्ताऽन्यः, भोक्ता अन्यः' निजमनसि-स्वचेतसि, विधत्ते करोति, किकृत्वा ? कल्पयित्वा प्रकल्प्य, किं ? इद प्रसिद्ध, आत्मतत्त्व-जीवतत्त्व, क्षणिक-क्षणस्थायि 'सर्व क्षणिक सत्त्वात् प्रदीपवत्' इत्यनुमाने सर्वथा नित्यादिपक्षे 'अर्थक्रियाभाचं प्रकल्प्य दूपति-अयं प्रमिद्ध , प्रत्यभिज्ञानादिलक्षणः, चिचमत्कार एव चितः-ज्ञानस्य, चमत्कारः, तस्य-सौगतस्य विमोह-क्षणि- कत्वं बुद्धिव्यामोह अपहरति-निगकरोति, स्वयं-स्वभावात एव, नित्यामृतीधे-आत्मादी यन्नित्यावं तदेवा- मृत तस्य ओधैः समूहः, अभिपिचन्-अभिपेकं कुर्वन् सर्व नित्यस्वरूपं प्रतिदर्शयन सन् इत्यर्थः सर्व कथ- चिनित्य प्रत्यभिज्ञायमानत्वात , न चैतदसिद्ध य एव बालः स एव युवा स एव च वृद्धः इत्यबाधितायाः प्रतीतेः सद्भाधार तथा व्यवहाराच्च क्षणिकत्वेऽर्थक्रियाविरोधाच क्षणिकं यदि स्वसत्तायामपरक्षणोत्पादलक्ष- णामाक्रियां करोति तदा सकलस्य जगतः क्षणिकत्व रुणद्धि कार्यकालं प्राप्नुवतः क्षणिकत्वविरोधात् स्वयं अविद्यमान सत करोति यदा तदा कालांतरे पूर्व पश्चाच्च तत्कुर्यादसत्वाविशेषात् इत्यर्थक्रियाविरोधः ॥ १४ ॥ अथ क्षणिकैकातान् छिनत्ति पद्यत्रयेण- अर्थ-एक कहिये बौद्धमती क्षणिकवादी है सो आत्मतत्वकू क्षणिक कल्पिकरि अर अपना मनविय कर्ता अर भोक्तारिफैं भेद मान है । करें और है, भोगवै और है ऐसे माने है । ताका विमोह कहिये अज्ञानकू यह चैतन्यचमत्कार सोही आप दूर कर. है, कहा करता संता ? नित्य- रूप अमृतका ओषनिकरि सिंचता संता। भावार्थ-क्षणिकवादी कर्ताभोक्ताविप भेद माने हैं, प्रहिले क्षण था सो जै क्षण नाही, वैसैं मान है । सो आचार्य कहैं हैं-जो हम ताक्' कहा " ? 1 ।

, - - सौविशुद्धज्ञानाधिकार १४१ समझा ? यह चैतन्यही ताका अज्ञान दूर करेगा जो अनुभवगोचर नित्यरूप है । पहिले क्षण आप है सोही दूजे क्षणमें कहै है । मै पहले था, सोही हौं, ऐसा स्मरणपूर्वक प्रत्यभिज्ञान ताकी नित्यता दिखाई हैं । इहां बौद्धमती कहै, जो पहिले क्षण था, सोही मैं दुजे क्षण हो गह मानना तो अनादि अविद्यात अम है, यह मिट तव तत्व सिद्ध हो समस्त क्लेश मिट। "ताकू कहिये, जो, हे बौद्ध ! ते प्रत्यभिज्ञानकू भ्रम बताया, तो जो अनुभवगोचर है सो भ्रम टहरथा तो तेरा मानना क्षणिक है । सो भी अनुभवगोचर है । सो यह भी भ्रमही ठहरया जात अनुभव अपेक्षा दोलही समान हैं तारौं सर्वथा एकांत मानना तो दोऊ ही भ्रम है-वस्तु- स्वरूप नाही । हम कथंचित् नित्यानित्यात्मक वस्तुस्वरूप कहै हैं, सो सत्यार्थ है ॥१४।' आगै ऐसेही क्षणिक माननेवालेकूयुक्तिकरि निषेधै हैं- वृत्त्यंशभेदतोऽत्यंतं वृत्तिमन्नाशकल्पनात् । अन्यः करोति भुङ क्तेऽन्य इत्येकांतश्चकास्तु मा ॥१५॥ स० टी-इति-ईवृक्ष. एकातः-सौगतोपकल्पित क्षणिकैकात , मा चकास्तु-मा प्रतिभासता, इति कि ? अन्य-भिन्न क्षण , करोति-कार्य निष्पादयति, अन्य -तदनतरभावी अन्य., भिन्न क्षणः पूर्वक्षणकृतं कार्य भुक्ते-मुनक्ति, कुत' ? वृत्त्यमित्यादि वृत्ते वर्तनाया', अंशा.-ज्ञानादिपर्याया , तेषां भेदात् , द्रव्या- भावे सति पूर्वोत्तरपर्यायाणामत्यतभिन्नत्वात्, कुतो भेद.'? अलाा अर व्यादिस्वरूपेणापि, वृत्तीत्यादिः वृत्ति-वर्तना अस्ति येपा ते वृत्तिमत -पर्याया', तेपा नाश. -अत्यतमुच्छेद, तस्य कलनात् इत्येकाते यो हिंसाभिसधाता स न हिनस्ति सोऽहिमक. सन् बध्नाति पापकर्मणा यस्तु बध्यते स न मुच्यते अन्यो ध्याता अन्णे ध्यानचिंतक अन्यो मुक्त. इति पूर्वोत्तरपर्यायाणामत्यतभेदात् ॥ १५ ।। अर्थ-वृत्त्यश कहिये क्षण क्षण प्रति अवस्थाभेद है तिनकू वृत्त्यंश कहिये तिनिके अत्यंत कहिये सर्वथा भेद न्यारे न्यारे वस्तु माननेते वृत्तिमत् कहिये-जामै अवस्था पाइये ऐसा आश्र- यरूप वृत्तिमान् वस्तु, ताका नाशकी कल्पना” ऐसे मान है जो करे और है अर भोगवै और है सो आचार्य कहे है जो ऐसा एकांत मति प्रकाशो' ! जहां अवस्थावान पदार्थ का नाश भया, तहां अवस्था कौनके आश्रय होय १ ऐसा दोऊ का नाश आवै है, तब शून्यका प्रसंग होय है । आत्मानं परिशुद्धमीप्सुभिरतिव्याप्तिं प्रपद्यांधकैः कालोपाधिबलादशुद्धिमधिकां तत्रापि मत्वा परैः । चैतन्यं क्षणिक प्रकल्प्य पृथुकैः शुद्ध सूत्रेरितै- रात्मा व्युज्झित एष हारवदहो निस्सूत्रमुक्तेचिभिः ॥१६॥ टी०-अहो-अाश्चर्ये, परै.-स्याद्वादानवद्यचिद्याविचारचोरकैः, अधकै:-बौद्ध ., आत्मा-आत्माख्य व्य, व्युज्झितः-त्यक्त , ज्ञानपर्यायमतरेगात्मनोऽभावात् 1 किकृत्वा १ अनिव्याप्ति-अतिव्याप्तिनामदूषण, स० . - १४२ परमाध्यामितक्षिणी प्रपद्य-अगीकृत्य, तथाहि-यदेव वस्तु स्यावादिनामात्मादि तदेव अनेकपर्यायानात-गुणपर्यायानात 'गुरुप- र्ययवद् द्रव्य' इतिसूत्रकारवचनात् । .. नयोपनयकाताना त्रिकालानां समुच्चयः । अविभ्राभावसंबंधो द्रव्यमेकनेकधा ॥१०॥ इति स्वामिसमंतभद्राचर्यवर्यवचनाच्च । नर्नु त एव पर्याया अवस्तुभूताः, वस्तुभूता वा ? प्रापक्षे अव- स्तुभूतैः पर्यायैर्जीवस्य वस्तुत्वाघटनात् कृत्रिमस्फुटत्वतोवस्तुभूततानवघटनात् । अथ वस्तुभूताश्चत. तेऽपि पर्यायानाताः अन्यथा वस्तुत्वाघटनात, पुनरुत्तरपर्यायाणा वस्तुत्वापत्तावनवस्था, एकस्मिन्ननेकवस्तुत्वाप- त्तिश्च ततोनैकद्रव्यव्यवस्था । अतिव्याप्तिसद्भावात् इति चेन्न प्रदीपक्षणस्यैकस्य शैलाकर्षणवर्तिकामुखदाहा- द्यनेककार्य कुर्वतः कार्यस्यासत्यत्वे कार्यकारित्वाद्वस्तुव्यवस्थानायोगात्त सत्यत्वे प्रतिकार्य क्षणिकवस्तुत्वा- पत्तिरिति कथमेकक्षणिकवस्तुत्वस्थितिरिति । कीदृशैः १. श्रात्मान-स्वयं चैतन्य, परिशुद्ध संसारदशांतो ध्यानादिभिर्निर्मल, ईप्मुभिः वालकैः क्षणिकरवे कस्याशुद्धित्व कस्य पुननि वस्य च मुक्ताव रथाया शुद्धि- रिति सर्व गगनारविंदमिव निर्विपयत्वादसदाभाति, श्रात्माभावात् शुद्धिरशुद्धिश्च कस्य पुनः एकक्षणस्य द्विधर्माधारस्वाघटनात् अन्यथा निरंशत्वपक्षघातप्रसक्त, अपि-पुन, विकृत्वा १ तत्र-आत्मनि, अधिकां दूषणाधानाद्वहुतरा, अशुद्धि-अशुद्धता, मत्वा ज्ञात्वा, कुतः वालोपाधिबलात्- कालः समयादिस्थायित्व- रूपः स एव उपाधिः-विशेषण तस्य बल-सामर्थ्य तस्मात, तथाहि एक वस्तु अनेकक्षणस्थायि सदनेकक्षण- विशिष्ट भवेत्तविशिष्ट वा ? प्राक्तने पक्षे प्रथमक्षणेऽक्षणविशिष्टत्वं भवेत् अन्यथा अनेकक्षणविशिष्टत्वा- भाबप्रसंगात् एवं द्वितीयादिक्षणेष्वपि द्वितीयपक्षे काला टं वस्तु क्रमयोगपद्याभ्यां व्यतिरिक्तमवस्त्वेव स्यात् । पुनः कि विधाय ? प्रकल्प्य-कल्पयित्वा, कि ? क्षणिक-क्षणस्थायि चैतन्य ज्ञान सन क्षणिक सत्त्वात् प्रदीपवत् नित्ये क्रमाक्रमाभावादर्थक्रियाभावात्सत्त्वाभाव. इति । कोहश्च ? पृथुकैः-बालिशैः,वस्तुनः क्वचित्कदाचित्क्षणिकत्वाभावात् । पुन: कीहः १ तैः-रक्तः क्व ? शुद्धर्जुसूत्रे-शुद्ध'-द्रव्यनिरपेक्षा,स बासौ ऋजुसूत्रश्च-अर्थपर्यायग्राहको नयः, तत्र कैः क इव ? निरसूत्रमुक्तेक्षिमिः अप्रोतसूत्रे ईहितहारमुक्ताफला- वलोकिभिः पुरुङ्गः हारवत् यथा हारस्त्यक्तः अवयिसूत्रद्रव्यानगीकारात् ॥ १६ ।। अर्थ -आत्माकू समस्तपणे शुद्ध इच्छक जे पृयुक कहिये बौद्धमति तिनिने तिस आत्मा विर्षे कालके उपाधिके चलते अधिक अशुद्धता, मानिकर अतिव्याप्तिपायकरि अर शुद्ध ऋजूसूत्रनयके प्रेरे हुये चैतन्य क्षणिक कलपि करि अधेिनिने आत्माकू, छोड्या जा” आत्मा तो द्रव्यपर्याय स्वरूप था सो सर्वथा क्षणिकपर्यायस्वरूप मानि छोडि दिया तिनिकै आत्माकी प्राप्ति नभई इहाँ हारका दृष्टांत है। जैसे मोतीनिका हारनामा वस्तु है। तामैं सूत्रविण मोती पोये है।। ते भिन्न २ दीरौ हैं सो जे हार नामा वस्तूकू सूत्र सहित मोती पोये नाही देखे है अर मोतीनिहीत न्यारे २ देखि ग्रहण करै हैं तिनिकै हारकी प्राप्ति नाही होय है तैसे ही जे आत्माका एक नित्य चैतन्यभावकू नाही ग्रहण कर है अर समय समय' वर्तना परिणामरूप उपयोगकी प्रवृत्तिकू देखि तिसकू सदा नित्य' मानि कालकी उपाधित' अशुद्धपना' मानि ऐसे जान है जो नित्य मानै कालका उपाधि लागै तब आत्माके अशुद्धपणा आवै); तब अतिव्याप्ति दूपण लागै सो इस दुपणके भयते ऋजु सूत्रनयका विषय जो शुद्ध वर्तमान समयमात्र क्षणिकपणा तिसभाव मानि आत्माकू छोडि दिया ।। भावार्थ-बौद्धमती आत्माकू समस्तपणे शुद्ध माननेका इच्छुक - - २ - -- मर्गविशुद्धाज्ञानाधिकार होय अविचारी जो आत्माकू नित्य मानिये तो नित्यमें तो कालकी अपेक्षा आवै ताते उपाधि लागै तब बडी अशुद्धता आवै तब अतिव्याप्तिपण लागै इस भयरौं शुद्ध ऋजु सूत्र नयका विषय वर्तमान समयमात्र था तिसमात्र क्षणिक आत्माकू मान्या तव आत्मा नित्या; नित्यस्वरूप द्रव्यपर्याय स्वरूप था तिसका ग्रहण ताके न भया, केवलपर्याय मात्रवि आत्माकी कल्पना भई सो सत्यार्थ आत्मा नाही असे जानना ॥१६।। अब फेरि इसही अर्थके समर्थनरूप वस्तुका अनुभवन करने काव्य कहै हैं- कर्तुर्वेदयितुश्च युक्तिवशतो भेदोऽस्त्वभेदोऽपि वा कर्ता वेदयिता च मा भवतु वा वस्त्वेव संचिंत्यतां । प्रोता सूत्र इवात्मनीह निपुणे तु (भर्तुं न शक्या कचि- चिचिंतामणिमालिकेयमभितोऽप्येका चकास्त्येव नः ॥१७॥ 1। सं० टी-कर्तु:-कारकस्य, वेदयितुश्च-कर्मभोजकस्य च, भेद'-परस्परं कथचिद्भिन्नत्वमस्तु सर्वथा भेदे तयोः केवल कर्तृत्वं भोक्तृत वा स्यात् यः कर्ता स एव भोक्ता इति जीवांतरवेदकसंतानेऽपि न स्यात् कुतः ? युक्तिवशतः-नयप्रमाणामिका युक्ति. तस्य वशत. द्रव्यार्थादेशादेकत्वप्रतिभासनात् अहमहमिकात्मा. विवन्मिाननुभवन् सर्वलोकाना स्वलक्षणप्रत्यक्षत्वप्रतिभासनाञ्च चित्रज्ञानवत्सर्गथा भेदाघटनात्, तु-पुन' कथचिदभेदो वास्तु सर्वाथाऽभेदे तयोरुभयव्यपदेशाभावः केवल क्तव भोक्त्व वा स्यात ततस्तद्वतस्ताभ्या परस्परं व्यावृत्तिरेकानेकस्वभावत्वात् घटरूपादिवत् ततः य एव करोति स एव अन्यो वा वेदयते य एव वेदयते स एव अन्यो वा करोति इति नास्त्येकातः । कर्ता वेदयिता भोक्ता चात्मा भवतु वा-अथवा मा भवतु कर्ता भोक्ता मास्तु वस्त्वष शुद्धात्मकद्रव्यरूप.वस्तु वसति गुणपर्यायानिति वस्तु पर्यायानपेक्षया द्रव्यमेव शुद्ध सचित्यता-ध्यायता-विचार्यता ग निपुणैः भेद: पुरुषैः इह-श्रात्मनि चिद्पे, क्वचित्-कस्मि- श्चित् काले भतु धतु, कर्ता भोक्ता चेति चतुन शम्यस्तस्यैकरूपत्वात दृष्टातयती यत्र इव- यथा सूत्रे, गुणे ततो प्रोता अनुस्यूनो हारो मुक्तामणिगित, भतुं न शक्य , अपि-पुन., न -अस्माक-स्याद्वादिना,, अभित.-सामरत्येन इय-प्रसिद्वा, एका अद्वितीया चिदित्यादि.-चित्-चेतना सैव चितामणि',तस्य मालिका पंक्ति., अनुग्यूतमुक्ताफलाना पक्तिरिय चक्रास्त्येव-द्योतत एव क्षणक्षणिकपक्षदूषणैरप्रसहरु या क्षणिक ज्ञानस्थ निराकृनत्वात् ।। १७ ॥ अथ व्यावहारिकशा तयोभिन्नला चिंत्यते- अर्थ-कर्ताक अर भोक्ताके युक्तिके वश” भेद होऊ 'अथवा अभेद होऊ अथवा कर्ता भोक्तों दोऊ ही मति होऊ वस्तुहीका चितवन करो ॥ जाते निपुण जे चतुर पुरुष तिनिकरि सूत्रवि पोई हुई मणिनिकी माला जैसे भेदी न जाय तैसे आत्मा विषे पोई हुई चैतन्यरूप चिंतामणी की माला है सो कहूही कोईकरि भेदनेकू समर्थ न हूजिये ।। एसी यह आत्मारूपी माला समस्तपणे एक हमारे प्रकाशरूप प्रगट होऊ ।। वस्तु द्रव्य पर्यायात्मक 'अनंतधर्मा है ता विपै विवक्षाके वशतें कर्ता भोक्तापणाका भेद भी है अर भेद नाही है । अर कर्ता भोक्ता भी काहेकू कहना केवल * 4.

- 4 परमाध्यात्मतरांझणी शुद्ध वस्तुमात्रका असाधारण धर्मके द्वारे अनुभवन करना ऐसे आत्मा नामा 'वस्तु सो असा- धारण चैतन्यमात्र भावके द्वारे अनुभवन करते चैतन्यके परिणमनरूप पर्यायके भेदनिकी अपेक्षा कर्ता भोक्ताका भेद है ।। चिन्मात्रद्रव्य अपेक्षा भेद नाही है एसें भेद अभेद होऊ तथा चिन्मात्र अनुभवनमे काहेकू भेद अभेद कहना ।। कर्ता भोक्ता ही न कहना वस्तु मात्र अनुभव करना जैसे मणिनिकी मालामें सूत्रमोतीनिकी विवक्षारौं भेद है मालामात्र ग्रहण करनेमें भेदाभेदका विकल्प नाही ॥ तैसें आत्माविणे चैतन्यके द्रव्यपर्याय अपेक्षा भेद है।। तौऊ आत्मवस्तु मात्र अनुभव करते विकल्प नाही ।। सो आचार्य क्है है ऐसा 'निर्विकल्प आत्माका अनुभव हमारे प्रकाशरूप है ऐसे जैनीनिके वचन है । आगै इस दृष्टांतकरि स्पष्ट करै है ताकी सूचनिकाकू नय विभागका काव्य कहै हैं- विशेप-संस्कृत टीकाकारने भतु न शक्या ऐसा पाठ निश्चितकर आत्मा एक स्वरूप है इसलिये वह सर्वथा कर्ता और भोक्ता नही ऐमा अर्थ लिखा है और पं. जयचंदजीने भेत्त' न शक्या ऐसा पाठ रखकर चैतन्यरूप चिंतामणिकी माला किमीके द्वारा भिद नहिं सकती यह अर्थ किया है यद्यपि भावांशमे दोनों अर्थ अभिन्न हैं परन्तु पाठ जोपं० जयचंद्रजीने रक्खा है वही तात्त्विक प्रतीत होता है ।। १७ ॥ व्यावहारिकदृशैव केवलं कर्तृ कर्म च विभिन्नमिष्यते । निश्चयेन यदि वस्तु चिंत्यते कर्तृ कर्म च सदैकमिष्यते १८ स० टी०-च-पुन' क-कारक, कर्म च-कार्ग, विभिन्न-परस्पर भिन्न', इप्यते, कया ? केवलं-परं व्यावहारिकदृशैव-व्यवहारदृष्ट्य व यथा सुवर्णकारादिः कुडलादिपरद्रव्यपरिणामात्मक कर्म करोति तत्फलं च भुक्ते न तु तन्मयो भवति तथात्मापि पुण्यपापादिकं पुद्गलात्मकं कर्म करोति, तत्फलकुलं च कवल यति न तु तन्मयः मीमास्यते । यदि-चेत्,निश्चयेन-निश्चयनयेन वस्तुद्रव्यमानं केवलं,इप्यते तदासदा-नित्य कत कर्म च आत्मनः कर्तृत्वकर्मत्वयोरैक्यमिप्यते यथा च स नाडिंधमादि चिकीपुः, चेष्टारूपमात्मपरि- णामात्मकं कर्म करोति आत्मपरिणामात्मकं दुःखलक्षणं चेष्टारूप कर्मफलं भुक्ते ततोऽनन्यत्वे सति तम्म. यश्च भवति तथात्मापि चिकीपुश्चेष्टारूपं स्वपरिणामात्मकं कर्म करोति चेष्टारूपमात्मपरिणामात्मकं दुःख- लक्षण फलं च भु क्ते ततोऽनन्यत्वे सति तन्मयश्चैव स्यात् ।। १८ ।। अथ वस्त्वंतरप्रवेशं वस्तुनो न निलु- ठति पद्यत्रयेण- अर्थ-व्यवहारकी दृष्टिमै तो केवल कर्ता अर कर्म भिन्न दिखें हैं अर जब निश्चयकरिः देखिये वस्तूकू विचारिये तब कर्ता अर कर्म सदाकाल एकही देखिये है ॥ भावार्थ-व्यवहार नय तो पर्यायाश्रित है सो यामें तो भेदही दीखे । बहुरि शुद्ध निश्चयनय है सो द्रव्याश्रित है तामें अभेदही दीखे ताते व्यवहारमैं तो कर्ता कर्मका भेद है, निश्चयमै अभेद है ।।.१८ ॥.. . 1 १४५ सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार ननु परिणाम एव किल कर्म विनिश्चयतः स भवति नापरस्य परिणामिन एव भवेत् । न भवति कर्तृशून्यमिह कर्म न चैकतया स्थितिरिह वस्तुनो भवतु कर्तृतदेव ततः ॥१८॥ 'अर्थ-ननु कहिये अहो मुनि हों, तुम यह निश्चय करौ, जो यह प्रगटपणे परिणाम है, सो तौ निश्चयतै कम है । बहुरि सो परिणाम अपना आश्रय जो परिणामी द्रव्य, ताहीका होय है, अन्यका नाही होय है । जातै परिणाम हैं ते अपने अपने द्रव्यके आश्रय हैं, अन्यके परिणामका अन्य आश्रय होय नाही । बहुरि जो कर्म है, सो कर्ताविना होय नाही। बहुरि वस्तु है सो द्रव्यपर्यायस्वरूप है । तातै ताकी एक अवस्थारूप कूटस्थस्थिति आदि होय नाही, सर्वथा नित्यपणा बाधासहित है। ताः अपना परिणामरूप कर्मका आपही कर्ता है, यह निश्चयसिद्धांत है ।। अब इसही अर्थक समर्थनरूप कलश काव्य कहै हैं- विशेष-इम श्लोककी संस्कृतटीका उपलब्ध न हुई । वहिढुंठति यद्यपि स्फुटदनंतशक्तिः स्वयं तथाप्यपरवस्तुनो विशति नान्यवस्त्वंतरं। स्वभावनियतं यतः सकलमेव वस्त्विष्यते स्वभाव चलनाकुलः किमिह मोहितः क्लिश्यते ॥ १६ ॥ संन्टी-यद्यपि स्वय-स्वभावत., वहिबाह्य , स्फुटेत्यादि-स्फुटती व्यक्ता चासावनतशक्तिः द्विकवारानं- ताविभागप्रतिच्छेदश्च लुठति-फुटीभवति, यथा सेटिकायाः सेटिकत्वादिः तथापि अन्यवस्त्वंतरं सेटिकादि परवस्तुनो मध्ये न विशति-कुड्यादिलक्षणस्य मध्ये न प्रविशति यतः यस्मात् कारणात्, सकलमेव-समस्तमेव वस्तु-चेननलक्षण द्रव्य स्वभावनियत-स्वस्य भावे स्वस्वरूपे, नियत-स्थितं जीवस्य ज्ञानात्मक लक्षण अजीन- स्य अचेतनस्य अचैतन्य तद्वीपरीत इज्यते--अभिलप्यते अतः इह जगति, मोहितः मोहाक्रांतः पुमान्, कि लिश्यते किं वृथालशं करोति पराभिप्रायपरिवर्तनेन, किंभूतः सन् ? स्वेत्यादिः--स्वभावस्य-वस्तुस्व. रूपस्य, चलना- चापल्यं कर्तरि कर्मप्रवेशत्व कर्मणि कर्तृ प्रवेशत्वमित्यादिलक्षणं तत्राकुलः-व्याकुलतां गतः सन्, 'स्वरूपस्य ज्ञानादे स्वरूपिणि जीवादी व्यवस्थितत्वात अन्यथा द्रव्योच्छेदः स्यात् ।। १६ ।। अर्थ-यद्यपि वस्तु है सो आप प्रकाशरूप अनंतशक्तिस्वरूप है, तथापि अन्यवस्तु है, सो अन्यवस्तुनिविर्षे प्रवेश नाही करे है, बाहरि ही लोर्ट है । जातै समस्तही वस्तु अपने अपने स्वभाववि नियमरूप है ऐसे मानिये है ।। सो आचार्य कहै हैं-जो, ऐसे होतेभी यह जीव' अपने स्वभावतै चलायमान होय, आकुल हुवा मोही भया संता, क्यौं क्लेशरूप होय है १ ॥ भावार्थ-वस्तुस्वभाव तो नियमरूप ऐसा है, जो, काहू वस्तूने कोई मिलें नाही अर यह प्राणी - १४६' - - परमाध्यात्मतरंगिणी अपने स्वभावसू 'चलायमान होय व्याकुल क्लेश रूप होय है, सो यह वडा अज्ञान है ॥१६॥ फेरि इसही अर्थक् दृढ करनेकू कहै हैं- वस्तु चैकमिह नान्यवस्तुनो येन तेन खलु वस्तु वस्तु तत् । निश्चयोयमपरोऽपरस्य कः किं करोति हि वहिलु ठन्नपि ॥२०॥ सष्टी-इह जंगति, येन-कारणेन, एक,चेतनादिलक्षणं, वस्तु द्रव्यं, अन्यवस्तुनः अपरवस्तुनः चेतनादेः स्वरूपं न भवति खल्विति निश्चितं, तेन वस्तुनः- परवस्तुस्वभावाभावेन कारणेन, अयं प्रसिद्धः,निश्चयः-पर- मार्थः, अयं कः ? यद्वस्तु स्वगुणपर्यायैव्यं तत्स्वगुणपर्यायैरेव वस्तु चेतनादि द्रव्यं नान्यथा परस्वरूपेण वस्तु भवत्यतिसगात् हीति-तस्मात् कारणात् कः अपर', अन्य पदार्थः सेटकादिर्जीवादिश्च अपदस्य कुड्यादेः कर्मपुद्गलस्य च,कि श्वेतत्व ज्ञानित्वं च करोति अपि तु न करोतीत्यर्थः । वहिर्वाह्य ,लुठन्नपि भित्त्यादीनां श्वेत- त्वं कुर्वन्नपि परस्वरूपेण न भवति अन्यथा स्वद्रव्योच्छेदः, आत्मापि परद्रव्यस्य जेयस्य ज्ञायकः वहिर्भवनपि तत्स्वरूपेण न भवति ।। २० ।। अर्थ-जातै या लोकविर्षे एक वस्तु है सो अन्यवस्तुका नाही है, तिसही कारणकरि वस्तु है सो वस्तु है, ऐसे न होय तौ वस्तुका वस्तुपणा न ठहरे, निश्चय है । ऐसे होते अन्यवस्तु के बाहिर लौटे है, तौऊ ताका कहा करे ? किछू भी न करिसकै है ।। भावार्थ -वस्तुका स्वभाव तो ऐसा है, जो अन्य कोई वस्तु पलटाय न सकै, तब अन्यके अन्य कहा किया ? किछूभी न किया । जैसे चेतनवस्तुके एकक्षेत्रावगाहरूप पुद्गल तिष्ठ है, तौऊ चेतनका जडकरि आप- रूप तो परिणमाय सक्या नाही, तव चेतनका कहा किया ? किछू भी न किया, यह निश्चय- नयका मत है ।। २० ।। बहुरि निमित्तनैमित्तिकभावकरि अन्यवस्तुके परिणाम होय है, सो भी तिस वरतुहीका है, अन्यका कहना व्यवहार है, सोही कहै हैं- यत्तु वस्तु कुरुतेऽन्यवस्तुनः किंचनापि परिणामिनः स्वयं । व्यावहारिकदृशैव तन्मतं नान्यदस्ति किमपीह निश्चयात् ॥२१॥ सष्टी०-यत्तु तत् मत कथितं कया व्यावहारिकदशैव व्यवहारष्टयव न तु परमार्थतः तत् कि ? विशेपे यद्वस्तु सेटिकादिः, परिणामिनः परिणमनशोलस्य, अन्यवस्तुनः कुड्यादः स्वय स्वभावतः किंचन धवलत्वादिक कुरुते विदधाति,तथारमापि परद्रव्यं स्वकेन भावेन ज्ञातापि, जानाति पश्यति विजहाति श्रद्धत्ते पैतत्सर्व व्यवहारतः इह जगति, निश्चयात परमार्थतः,किमपि सेटिकादि द्रव्यं चेतनद्रव्य वा अन्यत् कुड्यादेः श्वेतकत्वं, श्रात्मनः परद्रव्यज्ञातृत्वं च नास्ति ॥ २१ ॥ अथ द्रव्ये द्रव्यांतरनिपेचं निधत्त- १. अर्थ--जो कोई वस्तु अन्यवस्तूकै किछू कर है ऐसा कहिये है सो वस्तु आप परिणामी है, अवस्थातै अन्य अवस्थारूप होना वस्तूका पर्यायस्वभाव है, याही परिणामी कहिये है। ॥ है f शिद्ध ज्ञानाविचार मो ऐसे परिणामी वस्तुकै अन्यके निमित्तत परिणाम भया ताकद, यह अन्यनं काया सो यह व्यवहारनपर्का दृष्ट्रिकरि कहिये है ॥ बहुरि निश्चयनै तौ अन्य किट्ट किया है नाही, परिणाम मया सो आपटीका मया,अन्यने नौ नामें किछूमी न्याय श्रथा नाही एम जानना ।। शुद्धद्रव्यनिरूपणार्पितमनेस्तत्त्वं समुत्पश्यतो नकद्रव्यगतं चकास्ति किमपि द्रव्यांतरंजातुचिन् । ज्ञानं ज्ञेयमवनि यत्तु नदयं शुद्धस्वभावोदयः किं द्रव्यांतरचुंबनाकुलधियस्तचाच्च्यवते जनाः ॥ २२ ॥ संद-नानुचित कदाचित . किर्मा--जननमचंदन वा ब्यांदर, चनचंतनं स्वंतर, अचंदनादन का स्वंतरं एकमां-एचन्मिन तव्य चेन चन्न न च चंन्न का चवनमत्र- तनं च गन-प्राप्न.न चन्दिन बनन.न्य ? नतं-अनुयायानं समुत्पश्यत:-विटांनी सुनः विभूतस्य ? गुदत्यादि-शुद्ध निन्याधिवारमादि हवं. नस्य न्दिपले प्रतिपादन, अर्पिता- भारोपिना, मनि:-बुद्धि यन टन्य, तु-पुनः, यत्-यानातो, बान ने पदार्थ, अनि-जानाति न तु हे स्वत्वत्पण करोति नलिई स्वल्पर भर्गत विनु केलं परिधिचि दन स्मान् कारणात भत्र देयपरिच्छंदवलल्गः शुद्धयादि-शुद्धः-कर्मोपाविनिरपः स्वभाव हप, दम्य उद्यः- प्राश्ट्य, ददा, जना:-जिनगमानमिना: नीचः. तत्वाद-वानुयायान्या किंच्यचंद-कथं चलति, कीटनाः नं.? न्यमिन्यादिः-नन्गद् हन्यांतर-परदन्ये. दुबम् परा देनाइताः संश्किया कयं वतः कुड्यावहानन कथं च बात नियादिन्दपा यी:-बुद्धिः येषां ने यांचा संतः॥२२॥ श्रय स्मारस्वभाविनामई उचास्ति- अर्थ-आचार्य कई है जो शुद्ध द्रव्य निरूपणविप लगाई है त्रुद्धि जाने वहरि तत्व अनुमवता है ऐसा पुन्यन्नै एक पविष प्राप्त भया अन्य द्रव्य किमी न कदाचित प्रतिमा है। गुरि जान है सो अन्य ज य पदार्थ जाने है सो यह जानका शुद्ध स्वमावका उदय है, मो यह जन लोक है ने अन्यद्रव्यकं ग्रहपविष आकुल है बुद्धि जिनकी ऐसे भये संत शुद्धधल्पने क्यों चिरी है ? भावार्य-शुद्धनयी वृष्टिकरि तत्वका स्वरूप विचारत अन्यद्रव्यका अन्यद्रव्य- विष प्रवेश नाही है । अर बानविय अन्यद्रव्य प्रतिभास है सो यह ज्ञानकी स्वच्छताका स्वमार है । सो जान तिनि ग्रहण न कीये है ।। अर यह लोक अन्य द्रव्यमा ज्ञानविय प्रति- मास देलि अर अपना ज्ञानस्वरुप बूटि अर बेयके ग्रहण करनेकी बुद्धि कर है माँ यह अज्ञान है। ताको आचायने करुणाकरि क्या है जे ए लोक नुचते क्यों चि, हैं ॥ २२ ॥ फेरि उसही अर्थ दृढ़ कर है- शुद्धद्रव्यस्वरमभवनास्ति स्वभावस्य शेष- MPA १४८ परमाध्यौरमतर्राणी मन्यद् द्रव्यं भवति यदि वा तस्य किं स्यात्स्वभावः । ज्योत्स्नारूपं स्नपयति भुवं नैव तस्यास्ति भूमि- निं ज्ञेयं कलयति सदा ज्ञेयमस्यास्ति नैव । २३ । स० टी०-शुद्ध त्यादिः-शुद्धद्रव्य-दर्शनज्ञानचारित्रात्मकनिरुपाधिजीवद्रव्यादि, तस्य स्वरसः स्वभावः, तेन भवनात् स्वभावस्य-चैतन्यादिलक्षणस्य स्वरूपस्य, शेपं द्रव्यात्परं अन्यद्रव्यं चेतन वा किं भवति अपि तु परद्रव्यस्य स्वभाविनस्तदन्यद्रव्यस्वभावः स्वरूपं न भवति, परद्रव्यां तस्य स्वभावि न भवतीति तात्पर्य । यदि वा-अथवा सः स्वभावः चेतनादिलक्षणः तस्य-श्रचेतनाद्यन्यद्रव्यस्य स्वरूप कि स्यात् १ अपि तु न स्यादेव । अथ स्वरूपस्वरूपिणोः परस्वरूपस्वरूपिभ्यां संकरव्यतिकरादिदोपापत्तः न किंचिच्चेतनमचेतनं वा स्यात् । इममेवाएं दृष्टांतयति-ज्योत्स्नारूपं सेटिकादिद्रव्यस्य श्वेतस्वरूप भुवं भूतलं स्नपयति-धवलीकरोति, एव निश्चयेन, तथापि भूमिः-विश्वभरा तस्य-ज्योत्स्नारूपस्य स्वभावी नास्ति तस्य स्वभाविनो ज्योत्स्ना स्वरूपं न, ज्योत्स्नायाः सेटिकास्वभावत्वात् । दृष्टांतेन स्पष्टं दाष्टांत दर्शयति ज्ञान-स्वपरावभासः ज्ञयं कर्मतापन्न परपदार्थ, कलयति-परिच्छिनत्ति--जानाति, सदा-नित्य', तथापि अस्य ज्ञानस्य ज्ञयं स्वरूप नैवास्ति, ज्ञयस्य स्वरूपस्य ज्ञान स्वरूपि नैवास्ति तयोः परस्परमत्यंतभेदात ॥ २३ ॥ अथ ज्ञानस्वभावं वावच्यते-- अर्थ-जिस द्रव्यका जो निजभाव होय सो स्वभाव है । सो आत्माका ज्ञानचेतना स्वभाव है। ताकै शुद्ध द्रव्य जो शुद्ध आत्मा ताका निजरस ज्ञानचेतना है । ताके होते ते अन्य बाकी जो द्रव्य हैं सो कहा होय ? किछूभी न होय । परमार्थकरि संबंध नाही ।। अथवा अन्यद्रव्य है ताकै यह स्वभाव' कहा होय ? किभी न होय । परमार्थकरि संबंध नाही ।। जैसे ज्योत्स्ना जो चांदणी ताका रूप पृथ्वीकू उज्वल करे है,तो कहा पृथ्वी चांदणीकी होय जाय ? किछूभी न होय । तैसे ज्ञान है सो ज्ञयपदार्थकू सदाकाल जाने है, तौ ज्ञय ज्ञानका किछू कहा होय जाय ? किछूभी नाही है ।। भावार्थ-शुद्ध नयकी दृष्टिकरि देखिये तब कोई द्रव्यका स्वभाव काहू अन्यद्रव्यरूप होय नाही । जैसे चांदणी पृथ्वीकू उज्ज्वल कर है परन्तु चांदणीकी पृथ्वी किळू होय नाही है। तैसे ज्ञान ज्ञयकू जाने है परन्तु ज्ञानका ज्ञय किछू होय नाही आत्माका ज्ञान स्वभाव है सो याकी स्वच्छतामें ज्ञय स्वयमेव झलक है । तौऊ ज्ञानमै तिनि ज्ञयनिका प्रवेश नाही है ।।२३।। अब कहै हैं, जो ज्ञानमैं रागद्वेपका उदय कहां ताई है ? ताका काव्य- रागद्वषद्वयमुदयते तावदेतन्न याव- ज्ज्ञानं ज्ञानं भवति न पुनर्बोधतां याति बोध्ये । ज्ञानं ज्ञानं भवतु तदिदं न्यक्कृताज्ञानभावं भावाभावो भवनि तिरयन् येन पूर्णस्वभावः । २४॥

सोविशुद्धज्ञानाधिकारी १४६ सं०टी०-यावत्पर्यत शान-बोध', ज्ञान-ज्ञायक स्वपरावभासक शुद्ध न भवति न जायते, तावत्काल, एतत्--जगत्प्रसिद्ध, रागद्वे पश-रागद्व पयोदय उदयते अनुभागरूपेणेदयं धत्ते उदिते ज्ञाने तस्योदयाभावात् , पुनः यावज्ज्ञानं ज्ञानम्-प्राकट्यप्राप्त न, तावत् बोध्ये-ज्ञेय वहि: पदार्थ बोवता- ज्ञाहता न याति-न प्राप्नोति ज्ञाते जाने स्वपरबोध्यप्रकाशरत्वात् , येन ज्ञानेन कृत्वा आत्मा, पूर्णस्वभाव. भवति-जायते । कीहक्षः सन् ? तिरयन् आच्छादयन्, को ? भावाभावो-अस्तिनास्तिस्वभावौ--विभाव- पर्यायो उत्पादविनाशौ वा, तत् इदं प्रसिद्ध, ज्ञान-ससागवस्थासभवात रागद्वपक्ल्मपीकृत ज्ञान शुद्ध स्वभाववोधो भवतु-अस्तु, कीहक्ष ? न्यगित्यादिः न्यवकृत.-तिरस्कृतः, अज्ञानलक्षणो भावः--स्वभावः, येन तत् ॥२४॥ अथ सम्यग्दृष्टेस्तक्षयमाशसति- अर्थ-यहु ज्ञान जेते ज्ञानरूप न होय है,अर बोध्य कहिये ज्ञथ सो झं यभावकू प्राप्त न होय है, तैते रागद्वप दोऊ उदय होय है । तातें यह जान है सो ज्ञानरूप होऊ । कैसा होऊ ? दूरि कीया है अज्ञानभाव जानें ऐसा होऊ ।। तिस कारणकरि भाव अभाव ज्ञानमै हाय है । तिनिकू दरी करता संता पूर्णस्वभाव होय । जैते ज्ञान ज्ञान रूप न होय, ज्ञ यज्ञ यरूप न होय तत राग- द्वेष उपजे है । तातै यह ज्ञान अज्ञानभावकू दूरि करि ज्ञानरूप होऊ । जिस कारणत ज्ञानमै भाव अभाव ये दोय अवस्था हो तो मिटि जाय अर ज्ञान पूर्ण स्वभाव प्राप्त होय जाय यह प्रार्थना है। विशेप-संस्कृतटीकाकारने 'बोधतामेति बोध्ये' यह पाठ मानकर जबतक ज्ञान प्रकटित नहि हो जाता तबतक वह स्वपर ज्ञय पदाथोंको प्रकाशित नहिं करता किंतु प्रकट होनेपर ही प्रकाशित करता है यह अर्थ किया है और पं० जयचन्द्रजीने 'वोध्यतां याति बोध्या' यह पाठ मान कर 'जबतक ज्ञेय पदार्थ ज्ञयलासे प्रतिभासित नहिं होता' यह अर्थ किया है ॥ २४ ॥ रागद्दोपाविह हि भवति ज्ञानमज्ञानभावात् तौ वस्तुत्वप्रणिहितहशा दृश्यमानौ न किंचित सम्यग्दृष्टिः क्षपयतु ततस्तत्त्वदृष्टया स्फुटं तौ ज्ञानज्योतिलति सहजं येन पूर्णाचलार्चिः ॥ २५ ॥ स टो-हि-फुट, ज्ञान-बोधः, इह-जगति, रागद्वपस्वभावौ भवत्ति-जायते कुत.? अज्ञानभावात- मज्ञानमयस्वभावत्वात् । ननु का ज्ञाम रागद्वेपो भवति ? ज्ञानस्य ज्ञानावरणकर्मण. क्षयोपशमात् तयो- मोहनीयकर्मविवर्तत्वात् । कथ जानं रागद्वपसद्भाव इति चेत् सत्य रागद्वे पयोर्भावकर्मणोश्चैतन्यविवर्त- स्वात् ज्ञानस्वभावत्वं तथा समर्थयिष्यमाणत्वात् तदप्यभ्यधायि श्रेमद्विद्यानन्दिसूरिणा- भावकर्मणि चैतन्यविवर्तात्मानि भांति नु. । क्रोधादीनि स्ववेद्यानि कथचिञ्चिदभेदतः ।। ११४ ॥ इति । तो रागद्वे पो दृश्यमानौ-अतष्ट्यावलोक्यमानौ सतौ न किंचित् न किमपि ज्ञानिना दृश्येते, कया वस्त्वित्यादि.-वस्तुत्वे चनग्यलक्षणे वस्तुस्वरूपे, प्रणिहितहशा-समारोपितहटया ततः श्रन प्याऽदृश्यमा- - ? . - १५० परमांध्यात्मतराङ्गणी नत्वात् स्फुट-निश्चितं,सम्यग्दृष्टिःतत्त्वदर्शीपुमान् तौ-रागद्वपी,क्षपयतु-निर्जरादिभिर्निराकरोतु तत्त्वदृष्टवा- वस्तुयाथात्म्यदर्शनेग,येन-रागद्वपक्षपणेन, सहज-स्वाभाविकं ज्ञानज्योतिः-ज्ञानविभागप्रतिच्छेदसमूह धाम, ज्वलति प्रकाशते । किंभूत तत् ? पूर्णाचलाचिं. पूर्ण निरावरणत्वात्संपूर्ण, अचलं अक्षोभ, प्रतिपक्षक माभावात् अचिं-ज्ञानशक्ति , यस्य तत् 'स्त्री नपुसंकयोरर्चि.' इति भट्टिः ॥ २५॥ अथ रागद्वपोत्पादकका- रणं सगच्छते- अर्थ-इस आत्मावि ज्ञान है सोही अज्ञानभावतें रागद्वपरूप परिणम है । बहुरि ते रागा- दिक वस्तुपणाविषे स्थायिदृष्टिकरि देखे हुये किछू भी नाही है, द्रव्यरूप न्यारे वस्तु नाही हैं तातै आचार्य प्ररणा करै हैं, जो सम्यग्दृष्टि पुरुप है सो तत्त्व दृष्टिकरि निनि प्रगट देखि अर देगो नाश करो। ज्यौं स्वाभाविक ज्ञानज्योति पूर्ण है प्रकाशरूप अचल दीप्ति जाकी एसी देदीप्यमान प्रकाशै । भावार्थ-रागद्वेप न्याराही तो द्रव्य नाही । जीवके अज्ञानभावत होय है । तातें सम्यग्दृष्टि होय तत्वदृष्टिकरि देखिये, किछूभी वस्तु नाही ऐसे देखे घातकर्मका नाश होय केवलज्ञान उपजै है ॥२५।। आगे कहै हैं जो, अन्यद्रव्यकरि अन्यद्रव्यके गुण नाही उपजाइये हैं, ताकी सूचनिकाका काव्य है- रागद्वपोत्पादकं तत्त्वदृष्टया नान्यद् द्रव्यं वीक्ष्यते किंचनापि । सर्वद्रव्योत्पत्तिरंतश्चकास्ति व्यक्तात्यंतं स्वस्वभावेन यस्मात् ॥२६॥ संन्टी-रागढ षोत्पादक-रागद्वपयोरुत्पादकं कारणं, अन्यद्रव्य-आत्मद्रव्यं विहाय परदव्यमचेतना- दि न वीक्ष्यते-नावलोक्यते,कया-तत्त्वदृष्ट्या-वस्तुयाथात्म्यदर्शनेन, कुतः ? यस्मात्कारणात् सर्वेत्यादिः-सर्वे- पा द्रव्याणा-चेतनाना, उत्सत्ति.-उत्पादः अन्तः-अभ्यतरे, स्वस्वभावेन स्वस्वरूपेण, अत्यंत निश्चित व्यता स्फुटा, चकास्ति--द्योतते । ननु सर्वद्रव्याणा नित्यत्वात् कथमुत्पत्तिः अन्यथा सौगतमतस्यागतिः ? इति चेन्न स्वस्वभावेनेति वचनात् स्त्रपरिणामेन स्वपर्यायेणैवोत्पत्तिर्न तु व्यरूपेण यथा मृत्तिका कुभभावनोत्पद्यमाना किं मृत्स्वरूपेश ? यदि प्राक्तनः पक्षः तदा कुभकाराहकारनिर्भरपुरुषाधिष्ठितप्रसारित करतच्छरीराकार: कुभः स्यात्, न च तथास्ति अत एवोत्तरः पक्षः श्रेयान् मृदेव कुभस्योत्पादिका न तु कुभकारः । तथा रागद्वेषौ पुद्गलस्वभावेनानुत्पद्यमानौ केवलमात्मनः स्वभावौ अन्योऽन्यस्योत्पादकत्वे तत्त्वव्यवस्थानाभागत सर्वोच्छेदः स्यात् ।। २६ ।। अथ तद्धतुत्वमात्मनः सगिरते- अर्थ-रागद्वेपका उपजानेवाला तत्वदृष्टिकरि देखिये तब अन्यद्रव्य किछूभी नाही देखिये है ।। चेतनहीके परिणाम हैं । जाते यह न्याय है-जो सर्व द्रव्यनिकी उत्पत्ति है सो अपनेही निज स्वभावविर्षे अंतरंगविर्षे अत्यंत प्रगटरूप शोभे है । अन्यद्रव्यवि अन्यके गुणपर्यायनिकी उत्पत्ति नाही है ।। यदिह भवति रागद्वपदोषप्रसूतिः कतरदपि परेषां दूषणं नास्ति तत्र। स्वयमयमपराधी तत्र सर्पत्यबोधो भवतु विदितमस्तं यात्ववोधोऽस्मि बोधः .

? सोविशुद्धशानाधिकार १५१ मा० टी०-यत्-यस्मात्कारणात, इह-आत्मनि रागेत्यादिः-गगश्च द्वेषश्च रागद पौ तावेव दोषी स्वस्वरूपाच्छादकत्वात् तयोः प्रसूतिः-उत्पत्तिः स्यात् तत्र तथा सत्ति परेषा अचेतनद्रव्याणा, पतरदापि किमपि, दूषण-दोप', नास्ति अचेतनद्रव्यस्य तदुत्पादकत्वाभावात् न तस्य दूपण केवलमात्मनो दूषण। सत्र-रागद्व पे, आत्मनि सर्पति-व्याप्नुवति सति आत्मा स्वय-स्वरूपेण, अपराधी दोषवान् भवतु-अस्तु किंभूतः सः ? अबोध. चोधरहित. सन् विदितं मया जात अयं अचोध:-अज्ञान, अस्त-विनाश, यातु प्राप्नोतु पुनः बोधः-अहं ज्ञानं, अस्मि-भवामि ॥२७॥ अथान्यनिमित्तला तयोस्तीर्यते- अर्थ-जो इस आत्माविर्षे रागद्वेष दोषोंकी उत्पत्ति है तहां परद्रव्यकू किछूभी दूपण नाही है। तिस आत्मावि यह अज्ञान आप अपराधी फैले है । यह कथन प्रगट होऊ,अर यह अज्ञान है सो अस्त होऊ । जाते मै तो ज्ञानस्वरूप हो, ऐसे मानना सम्यग्ज्ञान है । भावार्थ-अज्ञानी जीव रागद्वपकी उत्पत्ति परद्रव्यतै मानि परद्रव्यतै कोप करें है। जो मेरे परद्रव्य रागद्वप उपजा है । नाव दूर करू ताईं समझानेकू कहै है-जो रागद्वैपकी उत्पत्ति अज्ञानते आपही- केविष होय है ते आपहीके अशुद्ध परिणाम हैं || सो यह अज्ञान नाश प्राप्त होऊ अर सम्य- ज्ञान प्रगट होऊ, आत्मा ज्ञानस्वरूप है ऐसा अनुभव करौ । रागढ पके उपजनेमैं परद्रव्य उपजावनहारा मानि तिसपरि कोप मति करौ । ऐसा उपदेश है ॥२७॥ अव इसही अर्थक दृढ करनेकू अर अगिले कथनकी सूचनिकारूप काव्य कहै है- रागजन्मनि निमित्ततां परद्रव्यमेव कलयंति ये तु ते । उत्तरंति न हि मोहवाहिनी शुद्धबोधविधुरांधबुद्धयः ॥२८॥ सं० टी.-ये-वस्तुस्वरूपानभिज्ञपक्षा' साख्याः, रागजन्मनि-रागद्वे पोत्पत्ती, परद्रव्यमेव-आत्मान्य द्रव्य रागोत्पतौ मणिकनककामिनीप्रमुखा, द्वीपोत्पत्ती-विषविपक्षकर्कशकटकादिद्रव्य, एव निश्चयेन, निमि- तता-हेतुता, कलयंति-प्रतिपादयति कलि बलि कामधेनु' इति कामधेनावुतत्वात्क्ले. प्रतिपादनार्थ. । तु पुनः, ते जडधियः हि-निश्चित, मोहवाहिनीं-महामोहनिम्नगा, नोत्तरति-उत्त न १ क्नुवति स्वरूपानभि- ज्ञत्वात्, कीहक्षाः संत' ? शुद्वत्यादि'-शुद्धबोधेन-कर्ममलकलकरहितेन ज्ञानेन, विधुरा रहिता अधा, स्वरूपदर्शनाभावात् बुद्धिर्मतिः येपा ते, तत्कशन कारण ' तथाहि-यद्धि यत्र भवति तद्धातेन तद्धन्यते एब यथा प्रदीपघाते प्रकाशो हन्यते, न हन्यते च स्त्र्यादीनां विनाशे रागादि तम्मात्तथा न, तथा च यत्र हि यद्भवति तत्तद्घाते हन्यते एव.यथा प्रकाशघाते प्रदीपो हन्यते एव, न हन्यते च रागादीना विनाशे कमनी- यकामिन्यादिः तस्मान्न तत्तथा, यत्तु न यत्र भवति तत्तद्घाते न हन्यते यथा घदधाते घटप्रदीपो न हन्यते, न हन्यते स्त्रीधाते रागादि , यत्र हि यन्न भवति तत्तदाते न इन्यते यथा घटप्रदीपवाते घटो न हन्यते, न रागादिधाते च स्यादिहन्यते तस्मान्न तत्तथेनि ।। २८ ।। अथ बोधावोधयोरन्यत्वमुन्नीयते- अर्थ-जे पुरुप रागकी उत्पत्तिविर्षे परद्रव्यहीका निमितपणा मान है, अपना किछूभी हेतु न माने हैं, ते मोहरूप नदीके पार नाही उतरै हैं ।। जाते शुद्धनयका विषयभूत जो आत्मा का स्वरूप ताका ज्ञानकरि रहित अंध है बुद्धि जिनिकी ते ऐसे हैं ॥ भावार्थ-शुद्धनयका विषय आत्मा अनंतशक्तिकू' लीये चैतन्यचमत्कारमात्र नित्य अभेद एक है । तामै यह स्वच्छता है, . ? परमाग्यात्मतरङ्गमी जो जैमा निमित्त मिल तैसे आप परिणम है। ऐसा नाही, जो पन्ना परिणामाचे नैस परिणम है अपना स्ट्टि पुरुषार्थ नाही है मो ऐने आत्माका स्वरूपका जिनिक ज्ञान नाही है, ने मेने मान है, जो आत्मा परद्रव्य परिणमात्र है । एसे माननेवाले मोहकी वाहिनी जो सेना, अथवा नदी, रागढ पादि परिणाम निनित पार नाही हो हैं । निनिक रागढूप नाही मिटे हैं। जाते अपना पुरुषार्थ निनिकं होनम होय तो निनिके मेटनममी होय । अन परीके क्रीय होय तो पला कीया करें ! अपना मंटना काईका ? नान अपना क्रीया होय अपना मेट्या मिते, ऐसें कथंचित् मानना सम्यग्ज्ञान है ॥२!! विशेष-नाग आदिकी उन्पचिमें परद्रव्य कारण नहीं इस सिद्धांतको दृढ़रूपस मंडन करन- लिये संस्कृत टीकाकारने ये व्याप्तियां वनलाई है-जो जहां रहना है उसके ( आधारके ) नाश होना उसका [भाधेयका ] नाश हो जाता है जिसमकार प्रदीप नाश होनेपर प्रकाश नहिं रहना । परन्तु स्त्री आदिक नाश होनयर राग आदिका नाश नहि होता। नया जाना होता है वह उनके नष्ट होनेपर नष्ट होजाता है जिमप्रकार प्रकाश के नाश होत्रानेयर प्रदीय । परन्तु राग आदिके नष्ट होजानपर स्त्री आदिका नाश नहिं होना इसतिय स्त्री आदि गग आदिकी उन्यत्तिमें कारण नहीं । जो जहाँपर नहीं होता वह उसके नष्ट होनेपर नप नहिं होना जिसप्रकार घटक नाश होनानेन उसके भीतर रहा हुआ दीपक नष्ट नहिं होना उनीप्रकार स्त्री के नष्ट होजानेसे राग आदिका भी नाश नहिं होता जहां जो नहि होता उमर नाशसे उनका मी नाश नहि होना जिमप्रकार दीपकक नष्ट होनेनर घटका नाश नहि होता उपीप्रकार राग आदिक नाश होनमें स्त्री आदिका भी नाश नहि होता इस- रीनिन राग आदिची उत्सनिमें प्रान्मान मिन्न परद्रव्य ही कारण है मांख्यका ग्रह सिद्धांत मिथ्या हा ॥२८॥ पूर्णकाच्युतशुद्धबोधमहिमा वाधा न बोध्यादयं यायाकामपि विक्रियां तत इता दीपः प्रकाश्यादिव । नम्तुस्थितिबोधव्यधिपणा एते किमज्ञानिना रागह पमया भवंति महजां- मुञ्चत्युदासीनतां ॥ २६ ॥ टी-इन-यया, इन:-अन्नातकमयान्-प्रचाशचिर्नु योन्याद यादः पिः कम्जनलमा, नति विक्रिगंन यानि ईन्दोहि क्षमिव हस्तं गृहीत्वा मां प्रचानि वादिः स्वकाशने दशेचा प्रयोगात प्रहापोऽपि न चायः ऋांटोपनाकृष्ठाय: लूत्रीवत् न्यादान्प्रच्युच्च दो प्रकाशदिना चादि बहुबमास्य परसोत्यायनुनाञ्च वाद् नमुत्पारिनुशञ्चाबाद टन्निवाने नुमनिवाने जवन प्रकाशन । तथा ऋयं रोकः-बान. उदउम्गन् बहिरांत शब्दरूपगंबरनस्पर्शगुन्द्र- गई. बयान-टुं-ज्ञानु गेयान पि विक्रिया देदलो दमित्र कोन्ही वा मां शृणु म 1 ? - सर्गविशुद्ध ज्ञानाधिकार मां पध्ये त्यादिनि स्वक्षाने नास्मान प्रेरयनि न चात्माप्ययः सूचीवत् स्वस्थानात नान ज्ञातुमायाति कि तु स्वभावत एव जानानि इति विक्रिया न यायात्-न गच्छेत् । कीहक्षो बोध. ? पूर्णवेत्यादि -पूर्णः स्वगुण- पर्यायैः सपूर्ण एकः अच्युत-अक्षोभ्य, शुद्धः कर्ममलरहित. म चामो बोधश्च तस्य तन वा महिमा माहात्म्य यस्य सः तत -तस्मान् एते-प्रसिद्धा वौद्वानानेन तदाकार-तदुत्पत्ति-तदध्यवमायवादिनः प्रज्ञा- निनः कि-किमु रागद्वेपमया भति, कीहक्षाः ? वस्त्वित्यादि.-वस्तुनः-स्थिति:-नयोपनयकांतसमुच्चयरूपा तस्या वोवेन बांध्या-रहिता धिपणा मतिर्येपां ते, पुन सहजा-स्वभावजां उदामीनता-रागद्वेषभावल- क्षणा माध्यस्थ्य का मुचन्ति ।। | अथ निश्चयप्रतिक्रमणप्रत्याख्यानालोचनाचारित्र विदति- अर्थ--यह योद्धा कहिये जानी है सो पूर्ण अर एक जो च्युत नाही होय अर शुद्ध-विकारत रहित मा जो ज्ञान तिसस्वरूप है महिमा जाकी ऐमा है। सो ऐसा ज्ञानी बोध्य कहिये शेयपदार्थ तिनित किभी विक्रिया नाही प्राप्त होय है । जैसे दीपक है सो प्रकाशनेयोग्य घटपट आदि पदार्थ है तिनित विक्रिया प्राप्त नाही होय है तैसे || सो ऐसे वस्तूकी मर्यादा का ज्ञानकरि रहित है विपणा कहिये बुद्धि जिनकी ऐसे भये संते.ए अज्ञानी जीव अपनी स्वा- भाविक उदासीनता क्यों छोड़े हैं ? रागढ पमय क्यों होय हैं ? ऐसा आचार्यन शोच किया है। भावार्थ-ज्ञानका स्वभाव जयकू जाननेहीका है । जैमा दीपकका स्वभाव घटपट आदिकू प्रकाशनका है। यह वस्तुस्वभाव है । ज्ञया जाननेमात्र ते ज्ञानमें विकार नाही होय है। अर ज्ञेय जानिकरि मला चुरा मानि आत्मा रागी दूपी विकारी होय है । सो यह अज्ञान है । सो भाचार्य शोच किया है-जो वस्तुका स्वभाव तो ऐसे, अर यह आत्मा अज्ञानी होयकरि राग परूप क्यों परिणम है ? अपनी स्वाभाविक उदासीनता अवस्थारूप क्यो रहे नाही। सो यह शोच आचार्यका शोच युक्त है, जात जैत शुभ राग है तेत प्राणीनिकू अज्ञानतें दुःखी देखि करुणा उपजे तव शोच होय है ।।२६।। अब अगिले कथनकी सूचनिकारूप काव्य कह हैं- रागढ पविभावमुक्तमहसो नित्यं स्वभावस्पृशः पूर्वागामिसमस्तकर्मविकला भिन्नास्तदात्वोदयात् । दूरारुढचरित्रवैभववलां चंचच्चिदर्चिर्मयों विदंति स्वरसाभिपिक्तभुवनां ज्ञानस्य संचेतनां ॥३० ।। सं० टी.-रागेत्यादि.-रागद्वे पो नोच ती विभावी च विभावपर्यायी ताभ्या मुक्त महो येपा ते पुरुयाः, ज्ञानस्य सचंतना-सम्यग्न्नायकत्व, विदन्ति-लभते, कीक्षा ता ? चदित्यादिः चचत्-देदीप्य- माना चित्-दर्शनज्ञान, मैवार्चि-प्रकाश.-तेन निर्वृता स्वेत्यादि.-स्वस्य रसेन-स्वभावन, अभिषिक्त' सिंचित, लक्षगाया ज्ञान, भुवन-त्रैलोक्य यया ता, कीहक्षारते । नित्य-अवच्छिन्नतया निरतर, स्वभाव- स्पृशः-स्वभाव-चतन्यस्वरूप, नित्यस्वभावमिति पाठः नित्यचासी स्वभावश्च शुद्धज्ञानस्वभाव. त स्पृशति भ्यानविषयीकुर्वति इति पूर्वेत्यादि -पूर्वसमस्तकर्मभिर्विक्लाः यत्पूर्वकृत शुभाशुभ कर्म तस्मान्निवर्तय- , परमाध्यात्मतरङ्गिगी त्यान्मानं तु य: म निकम, ममिप्यत्ममस्तक विवला: बनविप्यच्छुभाशुभं कर्म तस्मानिदर्तते य आत्मा प्रत्यास्थान, अनेनाम्न प्रतिक्रमणप्रत्यास्याने निगदित, तनावोदयान-तदातनोदीगकर्मणः, भिन्नाः अनेनालोचन्मुच रच्छमाशुमं मादीरा नंप्रति चानविन्द्ररविषयं यह नित्वमालोचति म ललोचना वेतननि । कुनः त्मने नां? दूरेत्यादिः-दूगदढे नियं प्रचास्यान्यन्त्रिमणालोचना- लमान दून-शनिशयन, आन्ढे-ग्रनं. चरित्र नविनतनयं तस्य मार-माहारन्यं, वन्य बल्लान मामऔत. इनिरूपं चारित्रं निमित्तं ॥ ३० ॥ ज्ञानसंघटनां चनयने- अर्थ-ज्ञानी हैं ने कैसे है ? रागढेप जे विभाव तिनिकर रहित है मह कहिये नेज जिनिका बहुरि कैस है ? नित्यही अपना चैतन्यचमत्कारमानस्वभाव है ता स्पर्शनेवाले हैं। बहुनि कमे है ? पूर्व किये जे समस्त कर्म अर आगामी होयगे जे समस्त कर्म निनित रहिन हैं। बहुरि कैसे हैं ? तदान्व कहिये वर्तमानकालमें आवै जो कमका उदय तातौं मिन्न हैं। एमैं ब्रानी है अतिशयशरि अंगीकार किया जो चारित्र ताका जो विभत्र समस्तपरद्रव्यका त्याग ताके वत ज्ञानसम्यप्रकार चेतना का अनुभव हैं। कैसी है जाननना ? कञ्चन् कहिये चिमका जागी जो गैतन्यरूप ज्योति तिसमचर्चा है बहुरि कैसी है ? अपना ज्ञानरूप रस तारि मिच्या है भुवन कहिये तीन लोक जाहि ।। भावार्थ-जिनिका रागडेर गया अर अपने चैतन्यस्वभाबका अंगीक्षार भया अर अनीन अनागत वर्तमान कर्मका ममन्य गय ऐसे ज्ञानी सर्व परद्रव्य न्यारे होय चारिन अंगीकार कर हैं। नाके बलत कर्मचतना अर कर्मफल- चेतनात न्यारी जो अपनी नौतन्यके परिणामस्वरूप ज्ञानचनना ना अनुभवन कर हैं । इहां तात्पर्य यह जानना-जो पहले नौ कर्मचनना अर कर्मफल चननाने मिन्न अपनी ज्ञानचेतनाका स्वल्प आगम अनुमान मंदन-प्रमाणनें जाने अर ताका श्रद्धान-प्रनानि दृढ करे, सो यह नो अविरत देशविन प्रमन अवस्थामै भी होय है । बहुरि जर अप्रमन अवस्था होय है, तब अपना वादीका ध्यान कर है । नत्र बानचेतनाया जैसा श्रद्धान किया तिमविप लीन होय ई ना श्री. चहि केवलज्ञान उसजाय मात्रात् ज्ञानचेतना होय है । एमें जानना ।। ज्ञानम्य मंचतनयेव नित्यं प्रकाशते ज्ञानमनीव शुद्ध। अज्ञानमंत्रतनया तु धावन् बोधस्य शुद्धि निरुणद्धि बंधः ३१ १ टी-जानग-महान गुरं गुरिक उपचारः नत्रनन्या-सम्माच्यानन, मद नियन, ज्ञान बोषः निर्य-निरंव, प्रकाशन-शान्ति, कि? अतीव शुद्ध-अवंत निराकरा, तु-युनः नानचेत- नया नात्य इन्द्रनिति चंदनं वान्चंदनामा दिवा कनवना नन्त चेतना च ।न्त्र ज्ञानादन्यत्र इन्, ननाघा. वेदगई दनोऽन्यत्रमिटि चेतनं द्वितीयानाचंधा-अश्विकर्नमा बंबा घावन-लंदन नन बोवन्य ज्ञानस्य शुद्धि दिरादि-आच्छान्यति अओ मोनार्थिना सा इया ३१ संक- अय . साविशुद्धज्ञानाधिकार अर्थ-ज्ञानकी संचेतनाफरि ही ज्ञान है सो अत्यंत शुद्ध निरन्तर प्रकाशै है। बहुरि अज्ञानकी चेतनाकरि बंध है सो दोडता संता ज्ञानकी शुद्धताकू रोक है, न होने दे है | भावार्थ-संचेतना कहिये जो जहां जिमतें एकाग्र होय तिसही और अनुभवानरूप स्वाद लीया कर सो तिस स्वरूप चेतना कहिये । सो जब ज्ञानहीते एकाग्र उपयुक्त होय तिसही ओर चेत राको सो तौ ज्ञानचेतना है । सो याते तो ज्ञान अत्यंत शुद्ध होय प्रकाशे है, केवलज्ञान उपजि आवै है तब संपूर्ण ज्ञानचेतना नाम पावै । बहुरि अज्ञान जो कर्म अर कर्म का फलरूप उपयोग करना सो तिसही ओर एकाग्र हो अनुभव करना सो अज्ञानचेतना है । सो यातें कर्मका बंध होय है सो ज्ञानकी शुद्धताक्रोक है । ३१|| कृतकारितानुमन स्त्रिकालविषयं मनोवचनकायैः। परिहत्य कर्म सर्वं परमं नैष्कर्म्यमवलंबे ॥ ३२ ॥ स. टी.-परम-उत्कृष्टतम, नैष्का-कर्मस्वभावातिकात स्व अवलवे-अहमवलबयामि । किंकृत्वा ? त्रिकालविषय-अतीतानागतवर्तमानम्पिय सर्व वर्म, कृतकारितानुमननै -कृतं स्वय, कारित परै., अनु- मनित-परकृतानुमोदित मनोवचनकारी परिहत्य निराकृत्य मनोवचनकायै. कृतकारितानुमननै. यदतीत- कर्मनिराकरणं तत्प्रतिक्रमण, यत्त वर्तमानकर्मनिराकरणमालोचना, यद्भविष्यत्कर्म सैस्तै निराकरणं, तत्प्रत्याख्यान, तदक्षराचारिणा नीयते 'पढमक्खो अतगतो आदिगदो सक्मेदि विदियक्खो' इति सूत्रेण, तयाहि-यन्मनसा कृत दुष्कृत मे मिथ्येति, यन्मनसा कारित मिश् या मे दुष्कृतमिति, यन्मनसानुमानित मिथ्या मे दुष्कृत्तमिति यन्मनसा कृत कारित मिथ्या मे दुष्कृत इति एकसयोगद्विसयोगविसयोगोत्पन्न भेदा एकान्नपचाशत्प्रतिक्रमणभेदा जायते ॥२॥ अथ स्वस्वरूपप्रतिक्रमणे चक्रम्यते- अर्थ-अतीत अनागत वर्तमानकालसंबंधी सर्वही कर्म है ताहि कृत, कारित, अनुमोदना अर मनवचनकायकरि परिहारकरि छोडिकरि उत्कृष्ट निष्कम अवस्था है, ताही मैं अवलंबन करी हो। ऐसे सर्व कर्मका त्याग करनेवाला ज्ञानी प्रतिज्ञा कर है ।। अव सर्वकर्मका त्याग करनेका कृत कारित अनुमोदना मरवचनकायकरि गुणचास भंग होय हैं। तहां अतीतकाल- संबंधी कर्मके त्याग करने प्रतिक्रमण कहिये ||३२।। मोहाद्यदहमका समस्तमपि कर्म तत्पतिक्रम्य । प्रात्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्ते ॥ ३३ ॥ सं० टी.-आत्मनि-चिद्रूपे, आत्मना-ज्ञानेन कृत्वा, नित्य वर्त-सततमह प्रवर्तयामि कीहशे ? चैतन्यात्मनि-चेतनास्वरूपे, पुन' कीदृशे ? निष्कर्मणि-कर्ममलातीते, किंकृत्वा ? तत-पूर्वनि- बद्ध समस्तमपि कर्म प्रतिक्रम्य-निराकृत्य, तत्किं १ यत्-वर्भ, अह अहक, मोहात्-भ्रातिविजभणारा, अकार्ष कृतवान् यदहमचीकर यदह कुर्वतमप्यन्यं समन्वज्ञास मनसा वचसा वपुषा च एतत्स्वस्वरूपप्रतिक- मरा ।। ३३ ॥ इति प्रतिक्रमणकल्पः समाप्त' । अथालोचनामालोचयति- - ।

-
--
१५६
परमायारमतरङ्गिणी
अर्थ-जो में मोहते अज्ञानतें, अतीतकालधि कर्म कीये, निनि समरतही प्रतिक्रमण-
रूपकरि अर समस्त कर्म” रहित चैतन्यस्वरूप जो आत्मा तावि. आपढीकरि निरंतर वती
हौं । ऐसें ज्ञानी अनुभव करें | भावार्थ-अतीतकालमै किये कर्मका गुणचास मंगरूप मिथ्या-
कार प्रतिक्रमणकारि ज्ञानी ज्ञानस्वरूप आत्माविणें लीन हाय निरंतर अनुभव करे । ताका
यह विधान है। मिथ्या कहनेका प्रयोजन यहु जो, जैसे कोई पहलै धन कमाय घरमै घरचा
था, पीछे तास् ममत्व छोड्या। तब ताका भोगनेका अभिप्राय नाही { कमाया था जैसा
न कमाया तैसें कम वांध्या था, ताक् अहित जानि ममत्व छांब्या । ताका फलमें लीन न
होयगा, तब बांध्या मिथ्या ही है। ऐसा जानना || ऐसा प्रतिक्रमणकल्प है ।। ३३ ।। अब
आलोचनाकल्प है-
मोहविलासविजृम्भितमिदमुदयत्कर्म सकलमालोच्य ।
आत्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्ते ॥ ३४ ॥
सं०टी०-आत्मनि आत्मना नित्यं वर्ते चैनन्यात्मनि निष्कर्मणि च,किंकृत्वा ? इद-प्रसिद्ध सकल-समस्त,
उदयत्-उपयनिषेकावस्थापन्नं कर्म ज्ञानावरणादि. आलोच्य-सम्यग्निवेच्य, विभूत ? महित्यादि:-
मोहस्य-रागद्वपरूपस्य, विलासः-विलासनं तेन वितृ भि-निष्पादित, त्राक्षांचार:-रोमि यारामि
समनुजानामि, मनमा वचसा कायन । मनसा कर्म न करोमि, मनमा न कारयामि, मनसा कुर्वतमप्यन्यं न
समनुजानामि, मनसा न करोमि न कारयामि, मनसा न करोमि कुर्वतमप्यन्यं न समनुजानामि एवमेक-
द्वित्रिसंयोगेन आलोचनभेदा एकानपंचाशत् शंवोभुवन्ति ॥४॥ इत्यालोचनाकल्पः समाप्तः ॥ अथ
स्वप्रत्यख्यानमाख्याप्यत.
अर्थ-निश्चयचारित्रकू अंगीकार करनेवाला कहै है-जी, मोहक विलासकरि फैल्या यह
उदय प्राप्त होता जो वतमान कम ताकू समस्तकू आलोचनामें लेकरि समस्तकर्मसू रहित
चैतन्यस्वरूप जो आत्मा ताविमें मैं आपहीकरि निरंतर वर्तो हौं ।। भावार्थ-वर्तमानकालमें
कर्मका उदय आवै, ताकू' ज्ञानी ऐसे विचार है-जो, पूर्व बांध्या था ताका यह कार्य है ।
मेरा तो यह कार्य नाही । मै थाका कर्ता नाही । मैं तो शुद्ध चैतन्यमात्र आत्मा हो । ताकी
दर्शनरूप प्रवृत्ति है । ताकरि या उदय भये कर्मका देखन जाननेवाला हौं। मेरा स्वरूपहीम में
वतों हौं । ऐसा अनुभवन करना ही निश्चयचारित्र है । ऐसें आलोचनाकल्प समाप्त श्रीया
॥३४|| आगें प्रन्याख्यानकल्प कहै हैं-
प्रत्याख्याय भविष्यत्कर्म समस्तं निरस्तममोहः ।
प्रात्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वत्तं ॥३५॥

सविशुद्धशानाधिकार १५७ संन्टी-चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि आत्मनि, निलां, आत्मना कृत्वा वर्ते ध्यानरूपेणाह । कीहक्षोह ? निरन्तसमोह. दूरीकृतरागद्वपः । किं विधाय १ समस्त भविष्यकर्म प्रत्याख्याय निराकृत्य-करिष्यत् करियमाण समनुज्ञास्यन्मनोवचनकाये. निरुध्य, इति प्रत्यारयान समाप्त,तथा चाक्षराचारोऽत्र-करिष्यामि कारयिष्यामि समनुजास्यामि मनसा वचसा कायेन । मनसा कर्म न करिष्यामि, मनसा न कारयिष्यामि मनसा कुर्वतमन्य न समनुज्ञास्यामि, मनसा न करिष्यामि न कारिप्यामि, मनसा न करिष्यामि कुर्वतम- प्यन्य न समनुजास्यामि एवमेकद्वित्रिशयोगजा. एकोनपचाशत्प्रत्यारयानभेदा जायते ।। १५ ।। इति प्रत्या- ख्यानरल्पः समाप्तः । अथैतत्त्रय नायते- अर्थ-प्रत्याख्यान करनेवाला ज्ञानी कहै है-जो आगामी समस्त कर्मनिकू में प्रत्याख्या- नरूप त्याग करि, अर नष्ट भया है मोह जाका ऐसा भया संता कर्मम रहित चैतन्यस्वरूप जो आत्मा ताविपं आपही करि वो हो । भावार्थ-निश्चयचारित्रम प्रत्याख्यानका विधान ऐसा है, जो, समस्त आगामी कर्मसू रहित अपना शुद्धचैतन्यकी प्रवृत्तिरूप जो शुद्धोपयोग तावि वर्तना है । सो ज्ञानी आगामी समस्त कर्मका प्रत्याख्यान करि अपना चैतन्यस्वरूपविणे वर्ते है । इहां तात्पर्य ऐसा जानना-जो व्यवहारचारित्रमे तो ज्यौं प्रतिज्ञामैं दोप लागे ताका प्रतिक्रमण, आलोचना, प्रत्याख्यान होय हैं । अर इहां निश्चयचारित्रका प्रधानपणे कथन है। सो शुद्वोपयोगसू विपरीत समस्त ही कर्म आत्माके दोष स्वरूप हैं तिनि सवही कर्मचेतनस्वरूप परिणामका ज्ञानी तीन कालके कर्मका प्रतिक्रमण आलोचना प्रत्याख्यानकरि ममस्तकर्मचंतनासू न्यारा अपना शुद्धोपयोगस्वरूप आत्माका ज्ञान श्रद्धान करि, अर तिममै थिर होने का विधान करि निष्प्रमाद दशाकू प्राप्त होय । श्रेणी चढि केवल- ज्ञान उपजानेके सन्मुख होय है । यह ज्ञानीका कार्य है । ऐसा प्रत्याख्यानकल्प समाप्त कीया ॥ ३५ ॥ आगै सकलकर्मका सन्यास कहिये क्षेपणा-पटक देना, ताकी भावनाकू नृत्य कराय कथन पूरण करनेका काव्य है- समस्तमित्येवमपास्य कर्म त्रैकालिकं शुद्धनयावलंबी। विलीनमोहो रहितं विकारैश्चिन्मात्रमात्मानमथावलवे ३६ स० टी-प्रय प्रतिक्रमणादिकथनादनतर, चिन्मात्र-चेतनामग, आत्मान-स्वचिद्रूप, अवलवे ध्यायामि अह, कीदृश ? विकारै.-कर्मोत्पन्नप्रकृतिभि. रहित, कीटक्षोह ? शुद्धत्यादिः-शुद्ध स्वस्वरूप, नयति-प्राप्नोति, इति शुद्धनयः, आत्मान अवलबत इत्येगशील., पुनः कीहत.? विलीनमोह-विनष्टराग- द्वपमोहः, किंकृत्वा ? इत्येा पूर्वोक्त प्रतिक्रमणादिकथनरूपेण समस्त-निखिल, त्रैकालिक-त्रिकाले-अतीता- नागतवर्तमाने मात्रैकालिक, कर्म-ज्ञानावरणादि, अपास्य-निराकृत्य ॥ ३६ ॥ अथ सकलकर्म फलसन्यास. भावना नाटयति- अर्थ-शुद्धनयका अवलंबन करनेवाला कहे हैं, जो इत्येवं कहिये पूर्वोक्तप्रकार तीनकाल- अतीतवर्तमानमविण्यत्संबंधी कर्मक् निराकरणकरि छोडिकरि अर शुद्धनयका अवलंबन कर- ?

- १५६ परमां यात्मतरंगिणी नेवाला ज्ञानी मैं हो । सो बिलय भया है मोहमिथ्यात्वकर्म जाका ऐसा भया संता अब समस्त- विकारते रहित चैतन्यमान आत्माकू अवलंब हों ।। ३६ ।। अब सकलकर्मफलका संन्यासकी भावना नृत्य करावे हैं- विगलॅतु कर्मविपतरुफलानि मम भुक्तिमंतरेणैव । संचेतयेऽहमचलं चैतन्यात्मानमात्मानं ॥३७॥ स. टी:-मम आत्मन. वर्मेत्यादि-गर्म एव विपतरु -विपवृक्षः चननाच्छादकत्वात् तस्य फलानि शुभाशुभानि गिलतु-बिया गलित्वा पततु-प्रलय यात्वित्यर्थः वथ भुत्तिमतरेण-स्दयदान्म दिना, १६ आत्मान सचेतय-ध्यायामि, कीदृशं ? अचल- अक्षम्य, चैतन्यात्मानं दर्शन्नानचेतनास्ट स्पं तथाहि-नाई मतिज्ञानावरणीयफल भुजे चैतन्यात्मानमात्मानमेव सचंतये, नाहं श्रुत्वानावरणीयपल मुझे पैरन्यात्मान- मात्मानमेव सर्चतय एन जानावरणचक्र दर्शनावरणनवके, वंदनीयहिके, दर्शनमोहन त्रिकं, चारित्रवेद- नीयास्यमोहनीयपचशितिके, आयुश्चतुष्कं, नामवर्मणस्त्रयोनवत्तिप्रकृती, गोत्रदिवं, अतरायपक योज- नीशं विस्तरभयात् सुगमत्वाच न लिखितमत्र ।। ३७ ।। अथात्मतत्त्वे कालावलीं सफलामभिरमयति- अर्थ-सकलकर्मफलकी संन्यासमावना करनेवाला कहै है, जो, कर्मरूपी विपका वृक्षके फल हैं ते मेरे भागनेविनाही खिरि जायो । मै चैतन्यस्वरूप जो मेरा आत्मा ताकू निश्चल चेतू हो-अनुभव हो । भावार्थ-ज्ञानी कहै है, जो कर्मका फल उदय आव है, ताक् मै ज्ञाता द्रष्टा हुवा देखू हों, ताका फलका मोक्ता नाही बनू' हो, तातै मेरे भोगे विनाही ते कम खिरि जायो । म मेरे चैतन्यस्वरूप आत्मामैं लीन भया तिनिका देखने जाननेवालाही हो ॥ इहां इतना विशेष और जानना जो, अविरतदशाम तथा देशविरत प्रमत्तसंयतदशामै तौ ऐसा ज्ञान- श्रद्धान ही प्रधान है अर जब अप्रमत्तदशा होयकरि श्रेणी चढे है तब यह अनुभव साक्षात् होय है ॥३७॥ निश्शेपकर्मफलसन्न्यसनान्ममैवं सर्वक्रियांतरविहारनिवृत्तवृत्त:। चैतन्यलक्ष्म भजतो भृशमात्मतत्त्वं कालावलीयमचलस्य वहत्वनंता ३- सं० टी०-मम-मे इय-प्रसिद्धा, कालावलो-कालसमयपक्तिः, अनंना-अनतसमयावच्छिन्ना, वहतु यातु, कीहक्षास्य मे ? भृशं-अत्यर्थ, आत्मतत्त-स्वस्वरूपं, भजत:-श्राश्रयत', कीदृशं १ चैतन्यलक्ष्म चैतन्यमेव लक्ष्म लक्षणं यस्य तत, ए-पूर्वोक्तप्रकारेण, निरित्यादिः-निश्शेपाणि-समस्तानि तानि च तानि कर्ममलानि च अज्ञानत्वशुभाशुभादीनि नेपां सं-सम्यक् प्रकारेण न्यसन-परित्यजनं तस्मात, पुन: किंभूतस्य मे ? सर्वेत्यादिः-स्त्रक्रियाया अन्या क्रिया क्रियांतरं सर्वस्मिन् क्रियांतरे विहारः विहरण, तत्र निवृत्ता वृत्तिः प्रवर्तन यस्य तस्य ॥ ३८ ॥ अथ कर्मफलभुक्ति भनक्ति- अर्थ-सकलकर्मके फलका त्यागकरि ज्ञानचेतनाकी भावना करनेवाला ज्ञानी कहे है-जो, एवं कहिये पूर्वोक्त प्रकार सकल कर्मका फलका सन्न्यास करने में कैसा हों ? चैतन्य है लक्षय -- .

१५४ . साविशुद्धज्ञानाधिकार. नाका ऐसा आत्मतच, नाही अतिशयकरि भोगवता हो । अर इस सिवाय अन्य जो उपयोगकी तथा बाह्यली क्रिया, ताविप विहार कहिये प्रवर्तना ताते रहित है वृचि जाकी ऐसा अचल हो। सो मेरे यह कालकी आवली प्रवाहरूप अनंत है सो इसही भोगनेरूप जावो । उपयोगकी प्रवृत्ति अन्यविप मति जावो । भावार्थ-ऐसी भावना करनेवाला ज्ञानी ऐसा तृप्त भया है, जो भावना करते मान साक्षात् केवली ही भया । सो ऐमा ही रहना अनंतकाल चाहै है । सो सत्य है । याही भावना केवली होय है । केवलज्ञान उपजनेका परमार्थ उपाय यही है । बाह्य न्यवहार चारित्र है सो इसहीका साधनरूप है । अर इस विना व्यवहारचारित्र है सो शुभ- कर्मकू बांधे है। मोक्षका उपाय नाही है । फेरि काव्य कहे हैं- यः पूर्वभावकृतकर्मविपद्रुमाणां भुक्त फलानि न खलु स्वत एव तृप्तः । आपातकालरमणीयमुदरम्यं निष्कर्मशर्ममयमेति दशांतरं सः ॥ ३६॥ स. टो०- खलु-निश्चित, य.-पुमान् स्वत एव स्वस्वभावत एव, तृप्त -सतृप्त', पूर्वेत्यादि-पूर्वभावै. पूर्वादयितविभावरिणामै. कृतानि कर्माणि तान्येव विपदमाः-विपवृक्षा , तेषा फलानि-सुखदु खादीनि, न भुक्ते ततो भिन्नत्वेन तत्फलास्वादको न भवति । स.-योगी, दशातर-समारावस्थात अवस्थातर मोक्षा, एति प्राप्नोति । कीदृश ? आपातत्यादिः-आपातकाले तत्प्राप्तिकाले रमणीय-मनोज, ननु प्राप्तिकाले भोगसुखवद्रमणीय तदानादरणीयमित्याकाक्षायां उढर्करम्य-उद-उत्तर काले, रम्य मनोज्ञ निरित्यादिः कर्म-धर्मातीत तम तच्छर्म च तेन निवृत्त, ।। ३६ ॥ अथ प्रशमरसपान पाययति- अर्थ-जो पुरुष पूर्व अज्ञानभावकरि कीये जे कर्म तेही भये विपके वृक्ष तिनिका फल उदय आया ताताका स्वामी होय न भोग हैं । अर निश्चयकरि अपने आत्मस्वरूपहीत तृप्त है। अन्य किछु तृष्णा नाही कर है। सो पुरुष वर्तमानकालवि ती सुन्दर रमनेयोग्य, अर आ- गामी कालवि जाका फल सुन्दर रमने योग्य ऐसा कर्मनित रहित स्वाधीनसुखमयी दशांतर कहिये ऐसी दशा संसार अवस्थामै पूर्व कवह न भई ऐमी अन्यस्वरूप दशाकू प्राप्त होय है भावार्थ-इस ज्ञानचेतनाकी भावनाका यह फल है । याके भावनात अत्यन्त तृप्त रहै है, अन्य तृष्णा न करें है । अर आगामी केवलज्ञान उपजाय सर्वकर्मनित रहित मोक्ष-अवस्थान प्राप्त होय है ॥३६॥ अत्र उपदेश करै हैं,जो,ऐसे कर्मचेतना अर कर्म फल चेतनाका त्यागकी भावनाकरि अज्ञानचेतनाका अभाव प्रकट नचाय ज्ञानचेतनाका स्वभावकू पूर्ण करि, ताक् नचाव संने शानी जन हैं ते सदाकाल आनन्दरूप रहै । इस अर्थक कलशरूप काव्य हैं- अत्यंतं भावयित्वा विरतिमविरतं कर्मणस्तत्फलाच प्रस्पष्टं नाटयित्वा प्रलयनमखिलाज्ञानसंचेतनायाः ।

१ १६. परमायामावहिनी पूर्ण कृत्वा स्वभावं म्वरमपरिगतं ज्ञानमंत्रतनां स्वां मानंदं नाटयनः प्रशमनममिनः सर्वकालं पिवंतु ॥४॥ मंदी-इन-कनिमहडिरतिमन्नन्तरं, मर्दकहां-मुट्टा. प्रशमन-मान्यपान, पितु स्वादनु नितानास्त ? स्वकीयां वन्दना कान में बानत्य हमि मानना, जान खें मन कमान्न:-बुना. कित्ता १ स्लादि-बन्य-धानतः रात्र पनि अन्न, उन-नन पूरीपत्रा-विवाय नपि विकृत्व ? अषष्ठं व्यर यानि दमा अतिदादिः अतिना-मन्न्न बनवद्वान्ना रचना कन्चनना च न्याः प्रनयन विता- अनगिन, विवाय. विकृया ? अविन-निरंतर. ऋग-बानावर, च-पुन.. बन्लान् तेषां कल लगट्टेण्ड बन्यं निमंत्र, मिति-विरवि, भावचिना-भर कृवियर्स: reall अयटहान विश्वयादि- अर्थ-डाना जन है । कर्मन अकर्मक पतन अन्यन बितमादनाई निम्नर भावकरि, नहरि मान्नु चानचेतनाका नाश सष्ट प्रगटपणे नृत्य ऋगय अर अपना निजरसन पाया समावका को ज्ञानना ना, आनंइमाहित जैसे होय नैन पूर्ण करि नृत्य करार मंने इहान भाई प्रमत्म मा कर्मका अमावस्य शामिकरस अमृत नाही महाकान्त पाया। यह ज्ञानी जननि ॥ मावाय-यह पहल तो नीन कालमधी कमा कतापाप कर्म चंदना गुपत्राम गहा न्याचा भावना काई। पीछे एकमा अडतालीम क्रमप्रवनिया उदयन कर्मका का त्यागी भावना काई । एमे जान्नना का प्रलय कनय र झानचंतना में प्रजननका शकीया है। यह डानचेतना मदा शानन्द का अपना खभावका अनुनबहा है! ना जानी जन सदा मांगी। यह श्रीगुरुनिका उरदेश है।।१०॥ आर्ग यह सर्व विशुद्धानका अधिकार है मो जान कर्तामातापनि भिन्न दिखाय अर अन्यद्रव्य जर अन्यद्रव्यनि मात्र निनि जान न्याग दिखाई है। नाकी मूत्रनिकाका काव्य ई- इतः पदार्थप्रथनांवगुंठनान् विना कृनेरेकमनाकुलं ज्वलन् । ममम्तवस्तुव्यतिरेकनिश्वयाद्विवेचितं ज्ञानमिहावतिष्ठते ।। ४१ ॥ -इ-निजगन्निनं-बोचा. विवेचिन-मिन, वरिष्ठद-माद. वृतः । इन: हि:शाति-वर्याना मलमन्दारमाबदरीवर धमाधर्मकताकाशाव्यवसायादीनं. प्रयन-हिन्दार र वन्न अवान् ऋचनना नदोहाना नरोनिक शहादिषु चो.कृति- काल चिना-धंतरक्रियामा अंतरेक स्वगात्रादि: एक-अद्वितच पुनः कोई का-ककृतनाहि, पुनः बन्द-दीयमान, कुदः : ममत्यादि:-मस्तानां निखिलाना, बननांगागदादीनांदिरक-मिन्न, कनान्यायंघोमिन्न तन्य निश्च:-नियः, ठम्मान IZZEE मम्मानसहिल्लन्हत १६१ ? साविशुद्धज्ञानाधिकार अर्थ-इहात आगे इस ज्ञानकै अधिकारवि समस्तवस्तुनित व्यतिरेक कहिये भिन्नका निश्चयते विवेचित कहिये न्यारा कीया जो ज्ञान सो अबस्थान कर है, निश्चल तिष्ठ है। कैमा हुआ तिप्ठे है ? पदार्थका जो प्रथना कहिये फैलना ताका अवगुण्ठन कहिये नेयज्ञानसं- बंधकरि एकसे दीखना, तातै भई जो अनेकरूप कृति कहिये कर्तृत्वभावरूप क्रिया, ताविना एक ज्ञानक्रि यामात्र सर्व आकुलताते रहिन दैदीप्यमान होता तिष्ठ है ।। भावार्थ-सर्ववस्तुनिने न्यारा ज्ञान प्रगट दिखा हैं ।। ४१ ॥ अन्येभ्यो व्यतिरिक्तमात्मनियतं विभ्रत्पृथग्वस्तुता- मादानोभनशून्यमेतदमलं ज्ञानं तथावस्थितं । मध्यावंतविभागमुक्तसहजस्फारप्रभाभासुरः शुद्धज्ञानघनो यथास्य महिमा नित्योदितस्तिष्ठति ॥ ४२ ॥ सं. टी-तथा-तेनैव प्रकारेण, एकत-प्रमिद्ध , ज्ञान-बोध , अवस्थित व्यवस्थित, कीहक्ष ? अन्येन्यः सर्वपरद्रव्येभ्यः, व्यतिरिक्त -भिन्न, अनेनातिव्याप्ति. परिहता, आत्मनियत-सर्वदर्शनादिजीव स्वप्रतिष्ठ, भनेनाव्याप्तिः परिहना ज्ञानस्य । पुनः पृथग्वस्तुता परपदार्थेभ्यो भिन्नस्वभाव परिच्छेदकलक्षणं विभ्रत् दधतू अनेन असंभवः परिहतः, आदानोझनशून्य-परवस्तुन. श्रादान ग्रहणं उडमन त्यजन च ताभ्या शून्य रहितं, अमलं-कर्ममलातिकात, तथा पथ ? यथा अस्य-ज्ञानस्य नित्योदित:-नित्यमुदीयमानः-प्रकाशमान', महिमा माहात्म्यं तिष्ठति, कीन. म. ? मध्येत्यादिः-मध्य च आदिश्च श्रतश्च मध्याद्यना. तेषां विभाग , भेद, तैः मुक्ता रहिता सा चामो सहजा-स्वाभाविकी, स्फारा विस्तीर्णा, प्रभा-दीप्तिश्च लक्षणया ज्ञायकत्व तया भासुर:-प्रकाशनशीलः, पुन' कीदृशः ? शुद्धत्यादि-शुद्धज्ञानेन धन निरंतरः ॥ ४२ ॥ अथात्मधार. णामनुमोदते- अर्थ-यह ज्ञान है सो तेमे अवस्थित भया है, जैसे, याका महिमा निरंतर उदयरूप तिष्ठे, प्रतिपक्षी कर्म न रहै। कैसा अवस्थित भया है ? अन्य जे परद्रव्य तिनित व्यतिरिक्त कहिये न्यारा अवस्थित भया है। बहुरि कैमा है ? आत्मनियतं कहिये आपहीवि निश्चित हैं । यहुरि कैसा है ? पृथक् कहिये न्याराही वस्तुपणा धारता संता है । वस्तूका स्वरूप सामान्यविशे- पात्मक है, सो ज्ञानभी सामान्यविशेषपणाकूधार्या है । बहुरि कैसा है ? आदानोझन कहिये ग्रहणत्याग निनिकरि शून्य है-रहित है । ज्ञानमें किछू त्याग ग्रहण नाही है । बहुरि कैसा है ? अमल कहिये रागादिक मलने रहित है ऐमा है बहुरि याका महिमा नित्य उदयरूप तिष्ठ है सो कैसा है ? मध्य अर आदि अर अंन जे विभाग विनिकरि मुक्त कहिये रहित,अर सहज कहिये स्वाभाविक, अर स्फार कहिये फेल्या विस्तरचा जो प्रभा कहिये प्रकाश ताकरि दैदीप्यमान है ? ? - २१ . है . . . " १६२ परगाप्यात्मतरङ्गिणी बहुरि शुद्धज्ञानका धन कहिये समूह है ऐसा जाका महिमा सदा उदयमान है । तैसे अवस्थित भया है ठहर्या है ॥ भावार्थ-ज्ञानका पूर्णरूप सर्वकू जानना है । सो जब यह प्रकट होय है तब तिनि विशेषणनिसहित प्रकट होय है। सो याकी महिमाकू कोई विगाडि सके नाही सदा उदयमान रहे है ॥४२॥ अब कहे है, ऐसे ज्ञानस्वरूप आत्माका धारणा सोही कृतकृत्यपणा है- उन्मुक्तमुन्मोच्यमशेषतस्तत्तथात्तमादेयम रोपतस्तत् । यदात्मनः संहृतसर्वशक्त पूर्णस्य संधारणमात्मनीह ॥ ४३ ॥ सं० टी-इह अस्मिन् आत्मनि चिद्रूपे, आत्मनः ज्ञानस्वरूपस्य, तत्-प्रसिद्ध, संधारण- धारणं, एकाग्रतापणं । कीदृशस्य ? संहृतेत्यादिः-संहृता-निवारिता, सर्वा कर्मोपाधिजा शक्तिः सामर्थ्य येन तस्य, पूर्णस्य-सपूर्णज्ञानशक्तिविशिष्टस्य तत् यत् संधारणं तदेव अशेषतः-सामस्त्येन, उन्मोच्च उन्मोस्तु त्यक्तु योग्य, शरीरादि उन्मुक्त-त्यक्तं, तथा-येन प्रकारेण सर्व त्यक्त' तेनैव प्रकारेण तत् आत्मसंधारणं, अशेषतः आदेय-गृहीतु योग्यं दर्शनज्ञानादि आत्त-गृहीतं, आत्मन उपादानमेव हेयो- पादेययोः परित्यागग्रहणाभिप्रायः ।। ४३ ॥ अथास्यानाहारकत्वं शक्यते- अर्थ-जो समेटी है सर्व शक्ति जानैं ऐसा जो पूर्णस्वभाव आत्मा, ताका आत्माहीविष धारण करना सो धारण किया अर उन्मोच्य कहिये जो छोडनेयोग्य था, सो तौ सर्व उन्मुक्त कहिये छोडथा अर जो आदेय कहिये लेनेयोग्य था, सो समस्त लीया ॥ भावार्थ-जो पूर्ण- ज्ञानस्वरूप सर्वशक्तीका समूहस्वरूप आन्मा, ताक् धारणा सोही धारण किया अवर त्यागने योग्य तौ सर्वही त्यागा अर ग्रहण करनेयोग्य था सो ग्रहण कीया। यह ही कृतकृत्यपणा है ॥४३।। आगे कहै हैं, जो, ऐसे ज्ञानकै देह भी नाही है ताकी स्वचनिकाका श्लोक है- व्यतिरिक्त परद्रव्यादेवं ज्ञानमवस्थितं । कथंमाहारक तत्स्यायेन देहोऽस्य शंक्यते ॥४४॥ सं० टी०-तत्-ज्ञान, आहारक-आहार्शवस्तुपाहकं कथं स्यात् ? केन प्रकारेण स्यात् ? न केनापि, तस्यामूर्तत्वात आहारकस्य मूर्तत्वात् । तत् किं ? यत्-ज्ञानं, एवं-अन्येभ्य इत्यादि पूर्वोक्तयुक्त्या, परद्रव्यात् व्यतिरिक्त-भिन्न', अवस्थित सुप्रतिष्ठं । अस्य-ज्ञानस्य, देहः-शरीर येन कणं शक्यते- पारेक्यते संभाव्यते ? न कथमपि अस्यानाहारकत्वात् ।। ४४ ॥ अथालिंगमालिंग्यते- " भावार्थ-एवं कहिये पूर्वोक्तप्रकार परद्रव्यतै न्यारा ज्ञान अवस्थित भया ठहरथा ।। सो ऐसा ज्ञान आहारक कहिये कर्मनोकर्मरूप आहार करनेवाला 'कैसा होय १ अर जव आहारक नाही तव याके देहकी शंका कैसी करिये ? नाही करिये ॥४४॥ एवं ज्ञानस्य शुद्धस्य देह एव न विद्यते। ततो देहमयं ज्ञातुन लिंगं मोक्षकारणं ॥ ४५ ॥ . " . - - 1 , མར . . संगविशुद्धझानाधिकार १६३ सं०टी०-एवं-मूत्वामूर्तत्वप्रकारेण यत' शुद्धस्य निष्पल्मपस्य ज्ञानस्य, देह एव निश्चयेन न विद्यते--नास्ति, ततः तस्माहाभावात् ज्ञातुः-ज्ञायकस्य, पु स लिंग पाणंडिलिगं गृहिलिग वान मोक्षकार-न मुक्तेर्मार्गः, हेतुगतिविशेषणमाह देहमय-देहनिवृत्त , यदि देहः स्वकीयो न तर्हि तदा- श्रित लिंगं स्वकीय कण स्यात् ।। ४५ ।। तर्हि को मोक्षमार्गः ? इति चेत् अर्थ-एवं कहिये पूर्वोक्तप्रकारकरि शुद्धज्ञानकै देह ही नाही विद्यमान है, तात ज्ञाताके देहमयी लिंग है, चिन्ह है, भेष है सो मोक्षका कारण नाही है ।। दर्शनज्ञानचारित्रत्रयात्मा तत्त्वमात्मनः । एक एव सदा सेव्यो मोक्षमागों मुमुक्षुणा ॥४६॥ सं० टी०-मुमुक्षुणा-मोक्तुमिच्छुना पुसा एफ एव-जिनोपदिष्ट एव न मिथ्योपकल्पितः, मोक्षमार्गः मोक्षसाधनोपायः सदा-नित्या, सेव्यः-आश्रयणीय., कीहक्षः १ दर्शनेत्यादिः-विश्रद्धान-स्वज्ञान-रूचरणत्रय- स्वरूप', एतत्त्रयमतरेण नस्यानुपलब्धेः पुन. आत्मनः तत्ता-स्वरूप, दर्शनादित्रयमतरेणात्मस्वरूपाभावात मोक्षमार्गस्य दर्शनादित्रयात्मकत्वात् च ॥ ४६ ।। अथ तमेव मोक्षमार्ग मार्गयति- अर्थ-जाते आत्माका तत्व कहिये यथार्थरूप दर्शनज्ञानचारित्र का त्रिकस्वरूप है ताते मोक्षके इच्छक पुरुपनिकरि एकही यह मोक्षमार्ग सदा सेवने योग्य है । ४६ ॥ एको मोक्षपथो य एष नियतो दृग्ज्ञप्तिवृत्त्यात्मक स्तत्रैव स्थितिमेति यस्तमनिशं ध्यायेच्च तं चेतति । तस्मिन्नेव निरंतर विहरति द्रव्यांतराण्यस्पृशन् सोऽवश्यं समयस्य सारमचिरान्नित्योदयं विंदति ॥४७॥ सं०टी०--य.-सर्गजनप्रसिद्ध , मोक्षमार्गः-नानामिथ्यामतिविजृम्भितः, अनेकतां दधानोऽपि स एपः मोक्षपथः, इगित्यादिः-दर्शनज्ञानचारित्रत्रयात्मकः सन्, एकः-न त्वनेकधा नियत.-अनेकप्रमाणन- योपन्यानिश्चितः, य.-पुमान् , तत्रैव-मोक्षपथे दर्शनादिरूपे, स्थिति-निश्चलता स्वात्मनः, एति-प्राप्नोति च-पुनः, अनिशं-निरंतर-त-रत्नत्रयरूप मोक्षपण एकाग्रो भूत्वा, ध्यायेत्-ध्यानविषयोकुर्यात् , पुनः यः संमोक्षपी, सकलकर्मफलचेतनासन्यासेन शुद्धज्ञानचेतनामयीभूत्वा चेतति-मुहुर्मुहुरनुभवति निरतर-प्रतिक्षणं, तस्मिन्नेव-दर्शनादित्रयात्मके मोक्षपथे, विहरति-अनुचरति । कीदृक्षः सन् ? द्रव्या- तराणि-पर-द्रव्याणि, अस्पृशन्-अनाश्रयन मनागपि स्वकीयान्यकुर्वान् , स:-पुमान्, अचिरात-शीघ्र तद्भचे तूंतीयभवादौ वा अवश्य-नियमतः, समयस्य-पदार्थस्य-सिद्धांतशासनस्य वा सार-परमात्माग कोत्की. स्वभाग विदति-लभते, साक्षात परमात्मा भवतीति यावत् । कीदृश' नित्योदयं-नित्यमुदीयमान H४|| भय लिगस्य वैयर्थ्य सार्थयति- - अर्थ-जो दर्शनज्ञानचारित्रस्वरूप यह एक मोक्षका मार्ग है सो जो पुरुष - तिसही विष 1 - २ T .

- १६४ परमाध्यामवक्षिणी स्थिती प्राप्त होय है तिष्ठे हैं,बहुरि जो तिसहीकू निरंतर ध्यायें है, बहुरि जो तिसहीकू' चेते है, अनुभव है, बहुरि जो तिसहीवि निरन्तर विहार कर है प्रवत है, कैसा भया संता, अन्य- द्रव्यनिकू नाही स्पर्शता संता, सो पुरुष थोरेही काल में अवश्य समयसार जो परमात्माका रूप जाका नित्य उदय हैं ऐसा अनुभव है पावै है । भावार्थ-निश्चयमोक्षमार्गके सेवनते थोरेडी कालमें मोक्षकी प्राप्ति होय' यह नियम है ।। ४७॥ आगे कहै हैं,जो द्रव्यलिंगहीकू मोक्षमार्ग मानि ता वि ममत्वभाव राखे है ते मोक्ष नाही पा हैं । ताकी सूचनिकाका काव्य है- ये त्वेन परिहत्य संवृतिपथप्रस्थापितेनात्मना लिंगे द्रव्यमये वहन्ति ममतां तत्त्वावबोधच्युताः । नित्योद्योतमखंडमेकमतुलालोकं स्वभावप्रभा- प्राग्भारं समयस्य सारममलं नाद्यापि पश्यति ते॥४८॥ सं० टी०-ते-पुरुषाः, अद्यापि-इदनीमपि, साक्षात्स्वरूपप्रकाशनावसरेऽपि, समयस्य सार- आत्मान,न पश्यति-नेक्षते, कीहक्ष नित्योद्योत-सदा प्रकाशमान, अखंडं-सपूर्ण, एकं-कर्मतरहित, अंतुलालोक-अनुपमेयप्रकाशं, तत्प्रकाशसशस्थापरस्याभावात् , स्वत्यादिः-स्व एव भावः-- पदार्थः, तस्य प्रभा-ज्ञानं, अथवा स्वभावज्ञानस्य प्रभा-द्योतकरणं तया प्राग्भारं-पूर्व भृतं, अमलं-निर्मलं, ते के ? ये पुरुषा आत्मना कृत्वा द्रव्यमये-नाग्न्यविडिप्रमुखद्रव्यनिर्मापिते लिंगे-वेपे, ममता 'श्रहं श्रमणः, अहं श्रम- णोपासकश्च इति ममल हंति,-कुति, कीहक्षा.? ये तत्त्वेत्यादिः-तत्वस्य-वस्तुयाथात्म्यस्य, अवबोधः परिज्ञानं, तेन च्युता., कीदृशेनात्मना ? समित्यादिः-संवृतिपथे-कल्पनापथे,प्रस्थापितेन--आरोपितेन, किंकृत्वा ? एन-दर्शनज्ञानचारित्रलक्षणं भावलिंगं परिहत्य-मुक्त्वा, इतस्ततो व्यलिगे प्रवृत्तस्य न मुक्ति रित्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ अथ व्यवहारं यिमूढर्यात- अर्थ-जे पुरुष यह पूर्वोक्त परमार्थस्वरूप मोक्षमार्ग ताकू छोडिकरि अरे व्यवहार मार्ग- विपें चलाया स्थाप्या जो अपना आत्मा ताहीकरि द्रव्यमय जो यह वाह्यलिंग भेप ताविर्षे ममता करें हैं, जाने हैं कि यह ही हमकू मोक्ष प्राप्त करेगा,ते पुरुष तत्त्वक यथार्थ ज्ञानते रहित भये संने मुनिपद लिया है तोऊ इस समयसार नाही अवलोकन करें हैं, नाही पावै । कैसा है समयसार ? नित्य है उदय जाका, कोई प्रतिपक्षी होय ताका उदयका विच्छेद न करि सके है। बहुरि कैमा है ? अखंड है, जामै अन्य ज्ञेय आदिके निमित्तनै खंड नाही होय है बहुरि कैसा है एक है पर्यायनिकरि अनेक अवस्था होय हैं, तोऊ एकरूपपणा नाही छोडें है बहुरि कैसा है ? अतुल कहिये जाके बरावरी अन्य नाही ऐसा है आलोक कहिये प्रकाश जाका, सूर्यादिकका प्रकाशकी ज्ञानप्रकाश उपमा नाही लागै । बहुरि अपने स्वभावकी जो प्रभा ताका प्रारभार है जाका भार अन्य सहारी सकै नाही । बहुरि अमल है, रागादिक विकारमलकारः रहित है । ऐसा परमात्माका स्वरूप द्रव्यलिंगी नाही पावे है ||४|| , R ? ॥ सनविशुद्ध ज्ञानाधिकारी १६५ व्यवहारविमूढदृष्टयः परमार्थ कलयंति नो जनाः। तुषवोधविमुग्धबुद्धयः कलयंतीह तुपं न तंडुलं ॥४६॥ सं० टी०-व्यवेत्यादिः-व्यवहारेण-भ्रमणश्रमणोपासक लक्षणद्विविधेन लिंगेन मोक्षमार्गः इति स्वरूपेण विमूढा-मोहिता दृष्टि]षा ते, जनाः-लोका. परमार्थ-निश्चयं, न कलयति-न प्राप्नुवंति-न जागति वा तस्य स्वयमशुद्धद्रव्यानुभवनात्मकत्वे सति परमार्णत्वाभावात । अत्र दृष्टांतोपन्यासः-इह-जगति, तुपेत्यादिः तुपबोधः-तंडुलाच्छादकत्वज्ञानं तेन विमुग्धा सर्वमिदं तुषमेवेति विमुग्धा-विमोहिता बुद्धिर्येपा ते जनाः तुप-तंटुलाच्छादिका त्वच कलयति-जानति पुनस्तत्र स्थितं तंडुलं-अक्षत न जानति तत्र तस्य परिज्ञाना- भावात् । वैतालीयनाम छदः । पट विपमेऽष्टी समे कलास्ताश्च समे म्यु। निरतरः । न ममात्र पगश्रिता कला चैतालीये रलौ गुरु' । ॥ १॥ इति छद उक्तलक्षणसद्भावात् ।। ४६ ॥ द्रव्यलिगिना कुतः स्वरूपाप्रामि: ? इति चत्- अथ-जे जन व्यवहारहीवि विमूढ मोही है बुद्धि जिनकी ऐसे हैं ते परमार्थकू, नाही जान हैं । जैसे लोकवि जे तुसहीकं ज्ञानविष विमुग्धबुद्धि जन है ने तुसहीकू' तंदुल जाने हैं अर तंदुलकू तंदुल नाही जान हैं ।। भावार्थ-जं परमार्थ आत्माका स्वरूप नाही जाने हैं अर व्यवहारविष मूढ होय रहे हैं शरीरादि परद्रव्यहीकू आत्मा जाने हैं ते परमार्थ आत्मा नाही जाने हैं। जैसे तुप तंडुलका भेद तो जाने नाही अर परालकूकूटै तिनिके तंडुलकी प्राप्ति नाही तुस तंडुलका भेदज्ञान भये संते तंडुल पावै ॥४६।। आगै इसही अर्थकू दृढ कानकू कह हैं- द्रव्यलिंगममकारमीलितैई श्यते समयप्तार एव न । द्रव्यलिंगमिह यत्किलान्यतो ज्ञानमेकमिदमेव हि स्वतः ॥५०॥ स० टो०-समयसार:-समयेपु पदार्थेषु सारः, एव निश्चित न दृश्यते-नेक्ष्यते, कैः । द्रव्यलिंगे-श्रम- मोह, श्रमणोपासकोहमिति य. ममकार अहकारः तेन मोलित -श्राच्छादितैः, पुम्भिः, कुत. ? यत् यस्मा- कारणात-किल इति स्पष्ट, इह-जगति, व्यलिंग-वेपधारणादिचिन्ह, अन्य त. परद्रव्याच्छरीरादे.'भवति, हीति-निश्चितं इदं-प्रसिद्ध एक-अद्वितीय ज्ञानमेव-परमात्म-ज्ञानमेव, स्वतः-स्वरूपात् , जायते नान्य- तस्तत-नान्यत्ततः ॥ ५० ॥ अथ शास्त्रे परमामन्यते- - अर्थ-द्रव्यलिंगकं ममकारकरि मीलित हैं मोही आधे हैं तिनिकरि समगसार है सो देखियही नाहीं है । जाते इस लोकवि द्रव्यलिंग है सो तो अन्यद्रव्यतै होय है अर यह जान है सो आप आत्मद्रव्यतेही होय है । भावार्थ-जे द्रव्यलिंगकूही आपा माने है ते आंधे हैं। तिनिक आपा पर सूझ्या नाही १५०|| अलमलमतिजल्पैटुर्विकल्पैरनल्पेरयमिह परमार्थश्चेत्यतां नित्यमेकः । स्वरसविसरपूर्णज्ञानविस्फूर्तिमात्रान्न खलु समयसारादुत्तरं किंचिदस्ति ५१ . - ?

A H ३ . . पम्मीध्यात्मतरङ्गिणी स० टी-अजमलं-पूर्यतां-पूर्यतां, कैः १ अतिजल्पैः-इद मोक्षहेतुः, इदं नेत्यादि वचोजल्पः पुनः अनल्पेः-प्रचुरैः, दुर्विकल्पैः-नत्तमानससकल्पैः, अलमलं, अथवा तद्विशेषण दुर-दुष्टा विकल्या यत्राति- जल्पे तैः, जल्पस्य विकल्पपूर्वकत्वात्,इह जगनि, नित्यं, एकः अयं परमार्थ:-परा-उत्कृष्टा, मा-शानादिल- क्ष्मीर्यस्य.स चास वर्थः, कुतः 'आत्मार्थः, चेत्यता-ध्यायतां ? खलु निश्चित, समयसारात्-परमात्मनः सकाशात, उत्तरं-अपर, किंचित्-किमपि ध्येय नास्ति । कोशात् तस्मात् ? स्वेत्यादिः-स्वस्थ-आत्मनः, रसः तस्य विसरः-समूह., तेन पूर्ण-परिपूर्ण तञ्च तत् ज्ञान च विस्फूर्तिमात्रं-विस्फुरणकात्या यत्र तस्मात् 1.५१ ॥ अथ शास्त्र परिसमापयत् तन्माहात्म्यमावर्ण्यते- अर्थ-आचार्य कहै है जो अति बहुत कहनेकरि अर बहुन 'दुर्विकल्पनिकरि पूरी पडो । इस अध्यात्मग्रंथविणें यह परमार्थ है, सोही एक निरन्तर अनुभवन करना जातै निश्चयकर अपने रसका फैलावकरि पूर्ण जो ज्ञान तामा स्फुरायमान होनेमात्र जो समयसार परमात्मा तिस शिवाय अन्य किछूभी सार नाही है। भावार्थ-पूर्णज्ञानस्वरूप आत्माका अनुभवन करना । निश्चयकरि इस उपरांति किलूभी सार नाही है। आगें इस समयसार ग्रंथक् पूर्ण करै है। ताकी सूचनिकाका श्लोक है- इदमेकं जगचक्षुरक्षयं याति पूर्णतां । विज्ञानघनमानंदमयमध्यक्षतां नयत् ॥ ५२ ॥ सं० टी-इद-अध्यात्मतरंगिणीनाम शास्त्रां, समयसाराभृतं वा, एक-सकलशास्त्रातिशायित्वात.. परमात्मस्वरूपप्रकाशकत्वात्, अक्षयं-आचंद्रार्क :शाश्वतं, सत्, पूर्णतां-भव्यता- पूर्णता-सपूर्णतां याति प्राप्नोति, कीदृशं 'जगचतुः-जगन्नेत्र, तत्प्रकाशकत्वात्, पुनः कीदृशं ? विज्ञानधन- आत्मानं अध्यक्षता नयत्-प्रापयत्, कोश वं? आनंदमयं-आत्यंतिकसुखनिवृत्त, इद शास्त्र ब्रह्मप्रकाशकत्वात् शब्दब्रह्मायमा- णमंधीत्योत्तमं सौख्यं विदति इत्यभिप्रायः ॥ ५० ॥ अथात्मतत्त्वोपसंहारं दध्वन्यते- अर्थ-इदं कहिये यह समयमाभृत है सो पूर्णता प्राप्त होय है । कैसा है ? अक्षय कहिये जाका विनाश न होय ऐसा जगतके अद्वितीय नेत्रसमान है । जातें कहा करता है ? विज्ञानधन जो शुद्ध परमात्मा समयसार आनन्दमय ताकू प्रत्यक्ष प्राप्त करता.संता है। भावार्थ-यह समयमाभृत ग्रंथ है सो वचनरूप तथा ज्ञानरूप दोऊही प्रकार करि नेत्रसमान है। जाते जैसे नेत्र घटपटादिका प्रत्यक्ष दिखा है तैसे यह शुद्ध आत्माका स्वरूप प्रत्यक्ष अनुभवगोचर दिखावै है ॥५॥ इतीदमात्मनस्तत्त्वं ज्ञानमात्रमवस्थित। : अखंडमेकमचलं स्वसंवेद्यमबाधितं ॥ ५३॥ । सं० टी०-इति-उक्तयुक्त्या, ज्ञानमात्रं-ज्ञानमयं, इदं श्रात्मनस्तत्त्व-स्वरूपं, अवस्थित-सुप्रसिष्ठ शाभादपरस्थ तत्राभावात् वस्य ' तन्मयत्वाच अन्यथा अचेतनत्वप्रसंगात् अखण्डम्-परवादिभिः प्रमाणैः - 7 1 1 - 1 - . ॥ साविशुद्धज्ञानाधिकार खयितुमशक्यत्वात्, एक-क्रोगाधिनिरपेक्षत्वात्, अचां-शाश्वतत्वात्, ' स्वशवेद्य-स्वानुभवप्रत्यक्षत्वात् अबाधितं-तत्स्वरूपवाधकस्य प्रमाणस्य कस्य चित्परमाणोश्चामभवात् ॥ ५३ ।। अथ स्वरूपनिरूपणानतर विशदस्याद्वादविद्यानवद्यवादविनोदवेदनाय पातिकापद्य निगद्यते- अर्थ-इति कहिये या प्रकार आत्माका तत्व कहिये परमार्थभूत स्वरूप ज्ञानमात्र अवस्थित भया निश्चित ठहरया। कैसा है ज्ञानमात्रतत्व ? अखंड है अनेक ज्ञयाकारकरि खंड खंड दीखे है, तौऊ ज्ञानमात्रविप खंड नाही है । बहुरि याही ते एकरूप है । बहुरि अचल है। ज्ञानरूपते चल न होय अर ज्ञेयरूप नाही है । बहुरि स्वसंवेद्य है आपहीकरि आप जाननेयोग्य है । बहुरि अबाधित है काह खोटी युक्तिकरि बाध्या नाही जाय है ।। भावार्थ-इहां आत्माका निजस्वरूप ज्ञानही कह्या है जातें आत्मामै अनन्त धर्म हैं, तिनिमें केई तौ साधारण हैं, ते तो अतिव्याप्ति- रूप हैं । तिनित आत्मा पिछाण्या नाय नाही। बहुरि केइ पर्यायाश्रित हैं, कोई अवस्थामै है, कोईमैं नाही हैं,ते अव्याप्ति रूप हैं । तिनितै भी आत्मा पिछान्या जाय नाही । वहुरि चेतनता है सो यद्यपि लक्षण है तथापि शक्तिमात्र है, सो अदृष्ट है। तातै ताकी व्यक्ति दर्शन ज्ञान हैं । तिनिमें ज्ञान साकार है, प्रकट अनुभवगोचर है । ता" याहीके द्वारै आत्मा पहिचान्या जाय है ।। नाते या ज्ञानहीकू प्रधानकरि आत्मतत्त्व कह्या है ॥ एसा मति जानू जो आत्मा- कू ज्ञानमात्र तच्च कया है। सो एताही परमार्थ है अन्य धर्म झूटे हैं आस्मा नाही हैं ऐसा सर्वथा एकांत कीये मिथ्यादृष्टि होय है । विज्ञानातवादी वौद्धका मत आवै है । तथा वेदांत का मत आवै है । सो ऐसा एकांत बाधासहित है। एसा एकांत अभिप्रायकरि मुनिव्रतभी पाल, अर आत्माका ज्ञानमात्रका ध्यान भी करें तो मिथ्यात्व कट नाही । मंदकपायनिके वश स्वर्ग पावै तौ पावौ,मोक्षका साधन तो होय नाही । तातै स्याद्वादकरि यथार्थ समझना । ऐसे इहाताई गाथाका व्याख्यान अर तिस व्याख्यानके कलशरूप तथा सूचनिकारूप काव्य टीकाकार कीये। अब इहां टीकाकार विचारे है-जो इस ग्रन्थमै ज्ञान प्रधानकार ज्ञानमात्र आत्मा कहते आये । तहां कोई ऐमा तर्क कर, जो जैनमत तो स्याद्वाद है, ज्ञानमात्र कहने में एकांत आया, स्याद्वादतै विरोध आया। तथा एकही ज्ञानमै उपायतत्त्व' अरे उपेयतत्त्वं ऐ दोय कैसे वर्ण १ एसे तर्कके निराकरणके अर्थि किछू कहिये हैं | ताका श्लोक है- अत्र स्याद्वादशुद्धयर्थं वस्तुतत्त्वव्यवस्थितिः । उपायोपेयभावश्च मनाग्भूयोऽपि चिंत्यते ॥ ५४॥ सं० टी--अत्र-समसारपद्यपूर्णताप्रस्तावे भूयोऽपि-पुनरपि पूर्ण तत्त्वस्वरुपमुक्त ततोऽपि पुन. 'चित्यते ग्नाग राक्षेपतः किचित्, वस्त्वित्यादि -वस्तुनः तत्ता-स्वरूपं, तस्य व्यवस्थिति:-व्यवस्था, वेचायते च । उपेत्यादि-उपाय' स्वप्रापये दर्शनज्ञानचारित्रप्राप्नये, उपाय'-तेनोपायेन , प्रायः आत्मा - - १६८ ' . -- --- ܢ परमाध्यात्मतरङ्गिणी तयोर्भावः स्वरूप, चिंत्यते, किमर्थं ? स्यादित्यादिः स्याद्वादः अनेकांतवादः, तत्र यदेव तत् तदेवातत्, यदेकं तदेवानेक द्रव्यपर्यायार्पणात् यदेव सत् तदेवासत् स्वपरद्रव्यक्षेत्रकालभावविवक्षातः यदेव नित्य तदेवानित्यं द्रव्यपर्यायार्पणात् इत्याद्यनेकांतस्य युक्तितोऽष्टसहरू या निरूपणात् तस्य शुद्धयर्थं प्रतिपाद्यचि- सध्वांतनिवारणात् तस्य स्वतः शुद्धत्वाञ्च ।। ५४ ।। अथ तत्र ज्ञानस्यातदात्मकत्ववादिवादमन्ध तत्समाधान- संधानमादधते-- । अर्थ-इहां इस अधिकारविष स्याद्वादके शुद्धताकै अर्थि वस्तुतत्त्वकी व्यवस्था है'सो विचारिये है तथा एकही ज्ञानमें उपायभाव अर उपेयभाव किछू एक फेरिभी विचारिये हैं । भावार्थ-यद्यपि इहां ज्ञानमात्र आत्मतत्व कहा है तथापि वस्तुका स्वरूप सामान्यविशेषात्मक अनेक धर्मस्वरूप है, सो स्याद्वादतै स है । सो ज्ञानमात्र आत्माभी वस्तु है, ताकी व्यवस्था स्याबादकरि साधिये है । अर इस ज्ञानहीमै उपायभाव अर उपेयभाव कहिये साध्यसाधकमाघ विचारिये है । अब याकी व्यवस्था कहै हैं-स्याद्वाद है सो समस्तवस्तूका,साधनेवाला एक निर्वाध अर्हत्सर्वज्ञका शासन हैं मत है । सो स्यादाद सर्ववस्तु अनेकांतात्मक हैं ऐसे कहै हैं । जातै सर्वही वस्तुका अनेकांतात्मक कहिये अनेकधर्मरूप स्वभाव है। असत्यार्थ कल्पनाकरि नाही कहे है । जैसा "वस्तूका स्वभाव है तैसाही कहै है ।। सो इहां आत्मा नामा वस्तू ज्ञानमात्र पणाकरि कहते संत स्याद्वादका परिकोप नाही है । ज्ञानमात्र आत्मव- स्तुकैभी, स्वयमेव अनेकांतात्मकपणा है। सो कैसा है सोही कहै हैं ॥ तहां अनेकांतका ऐसा स्वरूप है, जो, जोही वस्तु तत् स्वरूप है, सोही वस्तु अतत्स्वरूप है । बहुरि जोही वस्तु एकस्वरूप है सोही वस्तु अनेकस्वरूप है । बहुरि जोही वस्तु सत्स्वरूप है सोही वस्तू असत्स्व, रूप है वहुरि जोही वस्तु नित्यस्वरूप है सोही वस्तु अनित्य स्वरूप है ऐसे एकवस्तुविर्षे वस्तुपणाको निपजावनहारी परस्परविरुद्ध दोय शक्तिका प्रकाशना सो अनेकांत है। सो ऐसी विरुद्ध दोय शक्ति , अपना आत्मवस्तूकै ज्ञानमात्रपणा होतेभी पाइए है । सोही कहिये है। आत्माकै ज्ञानमात्रपणा होतैभी अंतरंगवि चिमकता प्रकाशमान जो ज्ञानस्वरूप ताकरि तौ तत्स्वरूपपणा है । बहुरि वाह्य जेते अनंतज्ञयभावकू प्राप्त अर ज्ञानस्वरूपतै भिन्न ज़े परद्रव्य- निके रूप, निनिकरि अतत्स्वरूपपणा है । तिनि स्वरूप ज्ञान नाही है ।। बहुरि सहभूत प्रवर्तते अर क्रमरूप प्रवत्तते जे अनंत चैतन्यके अंश तिनिका समुदायरूप अविभागरूप जो द्रव्यपणा ताकरि तौ एकपणा है बहुरि अविभाग एकद्रव्यत्रि व्याप्त जे सहभूत प्रवर्तते अर क्रमरूप प्रवर्तते चैतन्यके अनंत अंश, तिनिरूप पर्याय, तिनिकरि, अनेकपणा है ।। बहुरि अपने द्रव्य क्षेत्र काल भावरूप होने की शक्तीका स्वभावपणाकरि सत्त्वरूप हैं ।। बहुरि परके द्रव्य क्षेत्र काल भावका होनेकी शक्तीका स्वभावपणाकै अभावकरि असत्वस्वरूप है ॥ बहुरि अनादिनिधन अविभाग एकवृत्तिरूप जो परिणमन तिसपणाकरि नित्यपणा म्वरूप है । बहुरि क्रमकरि, - । । - - , सर्गविशुब्रज्ञानाधिकार १६६ प्रवर्तते जे एकरामयपरिणाम अनेकवृत्तीके अंश तिनिकरि परिणमनेपणाकरि अनित्यपणा स्वरूप है एमे तत्पणा, अतत्पणा एकपणा अनेकपणा, मत्पणा असत्पणा, नित्यपणा अनित्य- पणा प्रकट प्रकाशेही है । इहां तर्क, जो, आत्मवस्तूके ज्ञानमात्रपणा होतेभी स्वयमेव अनेकांत प्रकाश है, तौ, अर्हत भगवान् तिसके साधनपणाकरि अनेकांत कौन अर्थी अनुशासन करें हैं उपदेशरूप करै है ? ताका समाधान-जो अज्ञानी जन हैं तिनिके ज्ञानमात्र आत्मवस्तूका प्रसिद्ध करनेके अर्थी कहै हैं। निश्चयकरि अनेकांतविना ज्ञानमात्र आत्मवस्तुही प्रसिद्ध नाही होय है । सोही कहिये है । स्वभावही थकी वहुत भावनिकरि भरया जो यह लोक ताविप सर्वभाव- निकै अपने स्वभावकरि अद्वतपणा है। तीऊ दूतपणाका निषेध करनेका असमर्थपणा है। ताते समस्तही वस्तु है सो स्वरूपवि प्रवृत्ति अर पररूपते व्यावृत्ति इनि दोऊ रीतिकरि दोऊ भावनिकरि आश्रित है, युक्त है, यह नियम है, सोही ज्ञानमात्र भावविष लगावना । तहां ज्ञानभावं है सो अन्य चाकीके ज्ञयभावनिकरि सहित अपना निजज्ञानरसका भरकरि प्रवा जो ज्ञाताज्ञयका संबंध तिसपणाकरि अनादिहीत ज्ञयाकार परिणमताही दीखें है। ताते जो अज्ञानी जन हैं सो ज्ञान तत्वकूज्ञ यरूप अंगीकार करि अज्ञानी होयकरि अर आप नाशकू प्राप्त होय है । तिस काल यह अनेकांत है, सो अपना ज्ञानस्वरूपकरि ज्ञयतें भिन्न ज्ञानतत्वकू प्रक्ट करि अर इस आत्माकू ज्ञातापणाकरि परिणमनत ज्ञानी करता संता तिस आत्माकू उदयरूप कर है । नाश न होने दे है ॥१॥ वहुरि अज्ञानी जन जिस काल ऐसे मानें हैं, जो यह सर्व जगत् है सो निश्चयकरि एक आत्मा है । ऐसें अज्ञानतत्वकू अपना ज्ञान- स्वरूपकरि अंगीकार करि अर समस्त जगतकू आपा मानि ग्रहण करि, अपना भिन्न आत्मा का नाश करें है । निस काल परभावस्वरूपकरि अतत् कहिये सर्व जगत् एकही आत्मा नाही है, ऐसे भिन्न आत्मस्वरूपपणा प्रकट करि अर यह अनेकांत है सो समस्त जगत् भिन्न ज्ञानकू दिखावता संता आत्माका नाश नाही करने दे है ॥ २ ॥ बहुरि जिस काल अनेक ज्ञयनिके आकारनिकरि खंड खंड रूप कीया जो एक ज्ञानका आकार ताकू देखि एकांतवादी ज्ञानतत्त्व कू नाशप्राप्त कर है । तिस काल यह अनेकांत है सो ज्ञानतत्त्वके द्रव्यकरि एकपणाक् प्रकट करता संतो ताकू जीवात्रै है। नाश नाही होने देवै है ॥ ३ ॥ बहुरि जिस काल एकांती ज्ञानका एक आकारका ग्रहण करनेका अर्थि अनेक ज्ञयनिके आकार ज्ञानमैं आवै हैं, तिनिका त्याग करि अर ज्ञानस्वरूप आत्माका नाश कर है । तिस काल यह अनेकांत है सो ज्ञानके पर्यायनिकरि अनेकपणाकू प्रकट करता संता आत्माका नाश नाही करने दे है ।। ४ ।। बहुरि जिस काल एकांती है सो ज्ञायमान ज्ञानमैं आते जे परद्रव्य तिनिके परिणमनतै ज्ञाताद्रव्य- पर द्रव्यपणाकरि अंगीकार करि आत्माका नाश कर है तिसकाल अपना स्वद्रव्यकरि आत्मा २२ - सद्रप - १७० যায়ামবলী का सत्वकू प्रकट करता संता अनेकांत है सोही तिस आत्माकू जीवाचे है नाश नाही होने दे है ५ बहुरि जिस काल एकांती है, सो, सर्वद्रव्यनिकू ज्ञाताद्रव्यकरि अंगीकार तै मैंही हों, ऐसे परद्रव्य करि आत्माका नाश करै है, तिस काल, परद्रव्यरूप आत्मा नाही है, ऐसे परद्रव्यकरि आत्माका असत्त्वक् प्रकट करता संता अनेकांतही नाश करने नाही दे है॥६॥ बहुरि परक्षेत्र- विष प्राप्त जे ज्ञेय पदार्थ तिनिके आकार तिनिसारिखा परिणमनतै परक्षेत्रहीकरि ज्ञान अंगीकार करि एकांती नाशकू प्राप्त कर है, तिस काल अपना क्षेत्रकरि अस्तित्वई प्रकट करता संता अनेकांतही जीवाचे है, नाश नाही होने दे है ॥ ७ ॥ बहुरि अपने क्षेत्र वि होनेके अथि परक्षेत्रवि प्राप्त जे ज्ञय तिनिका आकार ज्ञानका होना ताका त्यागकरि ज्ञान ज्ञयाकाररहित तुच्छ करता संता एकांती आत्माका नाश करें है तिस काल अनेकांत है सो ज्ञानकै अपना क्षेत्रवि परक्षेत्रविर्षे प्राप्त जे 'ज्ञय तिनिके आकाररूप परिणमनेका स्वभावपणा है, ऐसे परक्षेत्रकरि नास्तिपणाकू प्रगट करता संता नाश करने न दे है ॥ ८ ॥ बहुरि जिसे काल पूर्व आलंबे थे ज्ञेय पदार्थ तिनिका विनाशका कालवि ज्ञानका असत्यकू अंगीकार करि एकांती ज्ञानकू नाशकू प्राप्त करें है, तिस काल अपना ज्ञानहीका कालकरि 'अज्ञानका सत्वकू' प्रगट करता संता अनेकांतही ज्ञानकू जीवावै है, नाश न होने दे है ॥ ६॥ बहुरि जिस काल अर्थका आलंबनका कालहीवि ज्ञानका सत्याग्रहणकरि एकांती आत्माका नाश करै है तिस काल परके कालकरि असत्त्वकू प्रकट करता संता अनेकांतही नाश होने न दे है ॥ १० ॥ वहरि जिस काल ज्ञायमान जानने में आवता जो परभाव ताके परिणमनके आकार दीखता जो ज्ञायकभाव ताकू परभावकरि ग्रहणकरि अर ज्ञानभावकू एकांती नाशक प्राप्त करै है, तिस काल स्वभावकारि ज्ञानका सचकूप्रकट करता संता अनेकांतही ज्ञान जीवावे है नाश न होने दे है ॥ ११ ॥ बहुरि जिस काल एकांती है सो ऐसा मनावै है जो सर्व भाव हैं ते मै हौं, ऐसे परभावकू ज्ञायकपणाकरि अंगीकार करि, अर आत्माका नाश करें है, तिस काल परभावनिकरि ज्ञानका असत्य प्रकट करता संता अनेकांत है सोही आत्मा का नाश न होने दे है ॥ १२ ॥ बहुरि जिस काल अनित्य ज ज्ञानके विशेष तिनिकरि खंडित भया जो नित्यज्ञानसामान्य, सो नाश प्राप्त होय है ऐसा एकांत स्था, तिस काल ज्ञानका सामान्यरूपकरि नित्यपणा प्रकट करता संता अनेकांत है सोही नाश करने न दे है ।। १३ ॥ बहुरि जिसकाल नित्य जो जानसामान्य ताका ग्रहण करनेके अर्थि अनित्य जे ज्ञानके विशेष तिनिका त्यागकरि एकांत है सो आत्माकू नाशकूप्राप्त कर है, तिस काल. ज्ञानके विशेषरूपकरि अनित्यपणाकू प्रकट करता संता अनेकांत है सोही तिस आत्मा जीवावै है, नाश होने न दे है ॥ १४ ॥ ऐसें चौदह भंगनिकरि ज्ञानमात्र आत्माक एकांत- - १७१ १ सौविशुद्ध ज्ञानाधिकारी करि तो आत्माका अभाव होना अर अनेकांतकरि आत्माका ठहरना दिखाया। तहां तद अतत्, अर एक अनेक, नित्य अनित्य, ऐसे तो छह भंग भये । अर सत्त्व असचके द्रव्य क्षेत्र काल भावकरि आठ भंग कीये, ऐसे चौदह भंग जानने !! अव इनिके कलशरूप १४ काव्य हैं, सो कहिये हैं- वाह्याङ्कः परिपीतमुज्झिननिजप्रव्यक्तिरिक्तीभव- द्विश्रांतं पररूप एव परितो ज्ञानं पशोः सीदति । यत्तत्तत्तदिह स्वरूपत इति स्याद्वादिनस्तत्पुन- दूरोन्ममघनस्वभावभरतः पूर्ण समुन्मज्जति ।। • सं० टी०-पशो. पश्यते बध्यते कर्मेति पशु , अज्ञानी तस्य अतत्स्वभाववादिनोऽनानिन , ज्ञान बोधः, सीदति विशीर्णतां याति युक्तिबलामावात, कीदृश तन् ? वाह्याथै अचेतनपदायें परिपीतं तत समुत्पत्त- स्तदाकारधारित्वात्तत्स्वरूपेण ज्ञान उझितेत्यादि उस्मिता त्यक्ता, निजप्रव्यक्तिः स्वप्राकटय, तया रिक्ती- भवत् स्वरूपावेदकत्वात् पुनः परित. समतात् पररूपे परात्मकं अचेननादी द्रव्ये विश्रात एत्र निश्चयेन न स्वस्वरूपे । ज्ञानस्यार्थप्राकटय न तु स्वप्राकट्य ज्ञान तु ज्ञायते खलु अर्थप्राकट्यान्यथानुपपत्त्या इत्यतदा- स्मकलां वदतो ज्ञानाभावप्रसगात् अनवस्थादिदोषदुष्टत्वात् । ननु स्वात्मनि क्रियाविरोधात्स्वरूपप्रकाशात्म- को कथं तदभावात् परस्वरूपेण व्यवस्था इति चेन्न, प्रदीपस्य स्वपरप्रकाशनवत् ज्ञानम्यापि स्वपरप्रकाशा- स्मकत्वात्, का स्वात्मनि क्रिया विरुद्धा ? न तावद्धात्वर्थलक्षणा भवनाभावप्रसगात्, उत्पत्तिलक्षणायास्तस्या अनंगीकाराच ज्ञप्ति लक्षणाया विरोधाभावात् । पुन. भूयः, इनि युक्तया स्यावादिन अनेकातमतावलयिनः तत् ज्ञानं पूर्ण स्वगुणपर्यायैरभिन्न सत् समुन्मजात सर्वत्र स्वप्रकाशकत्वेन समुच्छलति । इति किं ? इह जगति, यत् ज्ञानादि, तत् तत्स्वरुपं म्बपरप्रकाशात्मक, तत् जानादि, स्वरुपत. स्वभावत. ततः तदात्मक स्यात् । कुतः १ दूरोदित्यादि. दूर अनतकाल, उन्मग्नः स्वगुणिनि लय गन. धन. निरतर, यः स्वभावः स्वरूपं, तस्य भर. अतिशयः तस्मात् स्वरूपस्य स्वरूपिणि लोनत्वात्तदात्मत्वमेव ।। ५ ।। अयामिन्नवादिनी मतमाशंक्य स्याद्धिन्नत्व समाचेप्टते- अर्थ-पशु कहिये अज्ञानी तिर्यंचसमान सर्वथा एकांती, ताका ज्ञान है सो बाह्य ज्ञेय पदार्थनिकरि समस्तपणे पीया गया ऐसा होता संता छोडि जो अपनी व्यक्ति तिनिकरि रीता भया संता समस्तपणेकरि पररूपहीकेवि विश्रांत भया रहि गया । अपना रूप किछू भी न रह्या, सो नष्ट भया । बहुरि स्याद्वादीका ज्ञान है सो जो अपने स्वरूपत जो है सो तत्स्वरूपही है, ज्ञानस्वरूपही है, ऐसे तत्स्वरूप भया संता अतिशयफरि प्रगट भया जो ज्ञानका समूहरूप स्वभाव ताके भरत संपूर्ण उदयरूप प्रकट होय है ॥ भावार्थ-कोई सर्वथा एकांती तो ज्ञानक ज्ञयाकार मात्रही मान है । ताके ती ज्ञान ज्ञेय पीय गये आप कळू न रझा । बहुरि स्या- द्वादी ज्ञान अपने स्वरूपकरि ज्ञानहीं है, ज्ञयाकार भया तोऊ ज्ञानपणा नाही छोड़ें है। ऐसे मान है । तातै तत्स्वरूप ज्ञान प्रकट प्रकाशमान है ।। ? ?

१७२ परमाध्यात्मतरङ्गिणी विश्वं ज्ञानमिति प्रतयं सकलं दृष्ट्वा स्वतत्त्वाशया भूत्वा विश्वमयः पशुःपशुरिव स्वच्छंदमाचेष्टते.। यत्तत्तत्पररूपतो न तदिति स्याद्वददर्शी पुनर्वि- श्वाद्भिन्नमविश्वविश्वघटितं तस्य स्वतत्त्वं स्पृशेत् ।। सं० टी०-ननु यदुक्तं स्याद्वादिभिरभिन्न तदिष्टमेव तथाहि प्रतिभास एवेदं यत प्रतिभासते तत् प्रतिभास एव यथा प्रतिभासस्वरूपं प्रतिभासमान चेदं जगत् , न चात्र जगतः, प्रतिभासमानत्व- मसिद्ध साक्षादसाक्षाच्च तस्य प्रतिभासमानत्वे शब्दविकल्पगोधरातिक्रांतत्वेन वक्तुमशक्तेः प्रतिभासचिप एवान्यथा प्रतिभासाविरोधात् तस्य पुरुषाढतत्वात इति विश्व ज्ञान प्रतयं विचार्य कया ? स्वतत्त्वाशया- स्वप्रतिभासांतःप्रवेशाशया, सकलं दृष्ट्वा-प्रतिभासमयं सर्ग विलोक्य पुरुपाद्वैतमनन तस्य च देशकालाका- रतो विच्छेदानुपलब्धेः नित्यत्व सर्वगतत्वं निराकारत्वं च व्यवतिष्ठते । न हि कश्चिद्देशः कालः आका- रश्च प्रतिभासशून्यः प्रतिभासविशेषाणा नीलमुखादीना विच्छेदात् तेपामसत्यस्यात् यदि ते न प्रतिभासते तहि संनीति कथं ज्ञायते ततो न तैरनकातिकः । यच्च कारकक्रियभेदकर्मफललोक दविद्याविद्याबंधमोक्षद्वयं तद्वाधकमभ्यधायि तदपि निरस्त तेपा प्रतिभासस्वभावत्वादन्यथा व्यवस्थानायोगात् । यदपि पक्षहेतुष्टांता- नामुपनिपद्वाक्यानां च प्रतिभासनमप्रतिभासनमिति दूपणोद्भावन तदपि प्रत्याख्यातं । प्रतिभासमात्रात्म- स्वात्तपा पचविंशतिसाख्योपकल्पितानां प्रकृयादाना तथात्वे हेतुत्वे दोषाभावात् स्याद्वादिनामनेकांन !. रमकत्वे साध्ये सत्वादिसाधनवत् , तत्त्वानां यमनियमानशनादाना सप्रज्ञातासंप्रज्ञातयोगफल वर यादीनां च प्रतिभासात्मकत्वेन नदंत.प्रविष्ठत्वसिद्ध नैयायिकोपकल्पितप्रमाणप्रमेयादिपोडरातत्त्ववतू एवं मीमांसो- पकल्पिताना भट्टप्रभाकरोपकल्पितानां चात्मजनफलादोना योगाचारसीत्रातिकवैभाषिकाध्यमांगीकृतानां क्षणक्षयलक्षणाना च चतुरार्यसत्यानां च वैशेषिकागोकृतद्रव्यगुणकर्मादीनां पष्णां पदार्थानां लोकायितकष्ट प्रथ्व्यादीना चतुर्णा नास्तिकाध्यासितनास्तीतितत्त्वस्य च गगनकुसुमादीनां च प्रतिभासमानत्वेन प्रति- भासांन:प्रविष्टत्वासद्धः । अप्रतिभासमानत्वे तद् व्यवस्थाविरोधात् तथापि तदगीकारेऽनिष्टतत्वसिद्धिप्रसं- गात् न केषाचित्स्वेष्टतत्त्वसिद्धिरतः प्रतिभासमानत्वमेष्टव्यां तथा चोक्तं- सर्च नै खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन । आरामं तस्य पश्यति न तत्पश्यति कश्चन ॥१॥ इति विश्वमयी भूत्वा कश्चिद्वतवादी पशुः-पशुरिव-अज्ञानीव, स्वच्छंद--निरकुशत्वेन, आचे. प्टते-स्वेच्छयहते प्रतिभासविशेषणां पररूपत्वेन सत्यत्वात् । पुनः स्याद्वाददर्शी कश्चित् युक्त्या तस्य वस्तुनः स्वतत्वं-स्वस्वरूपतः स्वरूप स्पृशेत् । इति किं ? यत् ज्ञानादि स्वरूपेण तत् तत्त्वं, तत्-ज्ञानादि पररू- पत्त:-परस्वरूपतः तत्त्वं न भवति,अन्यथा सर्वस्योभयरूपत्वे तद्विशेषनिराकृतेः- नोदितो दधि खादति किमुष्ट चाभिधावति । इत्यतिमसंगस्य दुर्निवारत्वात् । की तत्त्व ? विश्वात्-समस्तपदार्थाद्भिन्न पृथक् पुनः अविश्व- त्यादि-अविश्व-अविश्वस्वरूप तच तद्विश्वेन विश्वपदार्थेन घटितं च निष्पादित विश्वपदार्थपरिच्छेदक- स्वात् ॥ ५६ ।। अथानेकत्ववादमारेक्यैकत्वमारेकते- "। - . - है - है सौविशुद्धशानाधिकार अर्थ-पशु कहिये अज्ञानी सर्वथा एकांतवादी है सो, समस्त ज्ञयपदार्थ हैं सो ज्ञानमय है, ऐसे विचारि करि, अर सकलजगतकू' निजतत्वकी आशाकरि देखि आप समस्तवस्तुमयी होय । अर तिर्यचकी ज्यों स्वच्छंद चेष्टा कर है ।। बहुरि स्याद्वादका देखनेवाला है सो तिस ज्ञानका निजस्वरूपकू ऐसा देखे है, जो अपने ज्ञानस्वरूप तत्स्वरूप है । सो पर जे ज्ञेयस्वरूप तिनित तत्स्वरूप नाही है ऐसे समस्तवस्तुतै भिन्न अर समस्तज्ञयवस्तुनिकरि घज्या तोऊ समस्त ज्ञयस्वरूप नाही, ज्ञयाकाररूप भया तोऊ न्यारा ऐमा ज्ञानका स्वरूप अनुभवै है ।। भावार्थ -जो वस्तु अपना स्वरूपते तत्स्वरूप है सोही वस्तु परका स्वरूपते अतत्स्वरूप है ऐसे स्याद्वादी देखें है । सो ज्ञान अपना स्वरूपतें तत्स्वरूप है । तैसही पर शेयनिका आकाररूप भया हैं तोऊ तिनितें भिन्न है तातै अतत्स्वरूप है । अर एकांतवादी समस्तवस्तुस्वरूप ज्ञानकू मानि आपातिनि ज्ञयमयी मानि अज्ञानी होय पशुको ज्यौ स्वच्छंद प्रवर्ते है। ऐसा अत- स्वरूपका भंग है। विशेप-इस श्लोकसे ग्रन्थकारने ज्ञानाद्वैतवादियोंके सिद्धांतका स्वरूप.बता कर उसपर घृणा प्रकटकी है तथा जैन सिद्धांतम ज्ञानका जो स्वरूप बतलाया है उसकाभी कुछ वर्णन किया है क्योंकि ज्ञानाद्वैतवादीका मत है कि जिस प्रकार ज्ञानका निजस्वरूप ज्ञानमें 'प्रसिद्ध है उसीप्रकार जो पदार्थ प्रतिभासित होते है देखनेमें आते हैं वे भी ज्ञान प्रविष्ट हैं ज्ञानस्वरूप हैं यहांपर ऐसी शंका न करनी चाहिये कि यदि सब ज्ञान स्वरूप है तो घट पट आदि व्यवहार क्यों और कैसे होते हैं? क्योंकि ये सब व्यवहार अवास्तविक मिथ्या हैं सबको ज्ञानस्वरूप मानने में कोई प्रकारका दोप नहिं आसकता तथा नैयायिक जो प्रमाण प्रमेय आदि सोलह तव मानते हैं मीमांसक आत्मा जन फल आदि छ, सांख्य प्रकृति पुरुष आदि पच्चीस, लोका- यतिक पृथ्वी आदि पांच और नास्तिक नास्तितत्व मानता है वे भी सब ज्ञानस्वरूपही हैं ज्ञानसे भिन्न नहीं । परन्तु यह ज्ञानाद्रतवादीका सिद्धांत प्रत्यक्षवाधित है घट पद-आदि कभी ज्ञानस्वरुप हो नहिं सकते इसलिये जैन सिद्धांतम जो ज्ञानको ज्ञानस्वरूप और जडपदार्थोंसे भिन्न माना है वही यथार्थ है ॥५६॥ वाह्यार्थग्रहणस्वभावभरतो विश्वग्विचित्रोल्लस- ज्ज्ञेयाकारविशीर्णशक्तिरभितस्त्रुट्यन् पशुनश्यति एकद्रव्यतया सदाप्युदितया भेदभ्रमं वंसयन्नेक ज्ञानमबाधितानुभवनं पश्यत्यनेकांतवित्॥५७ ।। A ।

परमाध्यात्मतक्षिणी सं० टी-पशुः सौंगताख्योऽज्ञानी नश्यति-नाशं याति,-तत्कल्पितो ज्ञानक्षणो युक्तया न व्यवस्था- मेतीत्यर्थ., कीहक्षः सः ? अभितः-समंतात्, तुट्यन्-विनश्यन् पूर्वक्षणस्वलक्षणनिमूलं विनश्यदुत्तरमुत्पा- क्ष्यति । पुनः कीदृक्षः ? विश्वगित्यादि:-विश्वक् सामस्त्येन, विचित्रा-नीलपीताद्यनेकप्रकाराः, उल्लसंतः स्वीकारार्पणेनोल्लसंतः-गच्छंतः, ते च ते ज्ञयानां-ज्ञानविषयभूतानां नीलादिक्षणानां आकारा झाने स्वाका- रापकरला तैः विशीर्णा-अनेकधा जाता शक्तिः-सामर्थ्य यस्य नीलपीतादीनां क्षणिकत्वात् तदुत्पत्तितस्त- दाकारमनुकुर्वाण ज्ञानं तदध्यवसायतः प्रमाणं क्षणिक कारकगुणानां कार्यसद्भावात क्षणिकं हि सर्व यत्सस- क्षणिक यथा घटः संति च नीलपीतानि च । घटाद्यवयवो न कपालांशमंतरेणोपलभ्यते । सहि अवयवी अश्यवेषु वर्तमानः प्रत्यवया सावल्यन वर्तते एकदेशेन वा । यदि साक्पेन तदा यानंतोऽवयवास्तानंतो- ऽवयविनः । तत्रापि चावयवकल्पनायामनवस्था । एकदेशेन चेत् भंगित्वप्रसंगात एकरलां न स्यात इत्यादियु- क्तया नीलपीताद्यवयवा एव । वाह्यत्यादिः-क्षणिकलक्षणानां वाह्यार्थाना ग्रहण नदेव स्वभावः-स्वरूपं यस्य भवतोऽतिशयात् ज्ञानमपि क्षणिक तदप्ययुक्तं यतः अनेकांतत्रितस्याद्वादी, एक पूर्वापरविवर्तव्यापितया अद्वितीयं ज्ञान पश्यति, कीदृशं तत् ? अबाधितेत्यादि:-अबाधितं प्रमाणैरनुभवनं यस्य तत, न च कस्या- पीहशी प्रतीतिर्मया क्षणिक वस्तु लब्धमिति सर्वेपां साधारणस्थूलघटादीना प्राप्तेः, एकद्रव्यतया अहं मसिज्ञानी स एवाहं श्रुतज्ञानी यदेव मया दृष्टं तदेव मया लब्धमित्येकद्रव्यत्वेन भेदभ्रमं-मिन्नज्ञानभ्रांति छांसयन्-विनाशयन् अन्यथा जीवांतरवत् स्वात्म-याप भेदप्रसंगात् स्याद्वादी कीहक्षया तया? सदा व्युदि. तया-सदा-नित्य, आवालगोपालचांडालाबालादीनां प्रसिद्धया विद्यमानतया ।। ५७ ॥ अथैकज्ञानमतमति निराचिकीपुरनेता ज्ञानस्य चिकीपति- 'अर्थ-पशु कहिये अज्ञानी सर्वथा एकांतवादी है सो ज्ञानका स्वभाव'बाह्य शेयपदार्थको ग्रहणला है ताके भरतें समस्त अनेक उदय भये प्रकट ज्ञानमैं आये जे ज्ञयनिके आकार तिनि- करि खंड खंड बिगडी है शक्ति जाकी ऐसा भया संता समस्तपणकरि तूटता खंड खंड होता आप नाशकू प्राप्त होय है । बहुरि अनेकांतका जाननेवाला है सो सदा उदयरूप जो मानका एकद्रव्यपणा तिसकरि ज्ञेयनिके आकार होनेतै भया जो सर्वथा भेदका श्रम ताही दरि करता संता निर्वाध अनुभवनस्वरुप ज्ञानकू एक देखें ।। भावार्थ-ज्ञान है सो शेयनिके आकार परिण- मनसे अनेक दीखे है । ताक् सर्वथा एकांतवादी अनेक खंडखंडरूप देखता संता ज्ञानमय जो आया ताका नाश करें हैं। अर स्याद्वादी ज्ञानकू ज्ञेयाकार भया है तौऊ सदा उदयरूप द्रव्यपणाकरि एक देखै है । यह एकस्वरूप भंग है ।। ज्ञेयाकारकलंकमेचकचिति प्रक्षालनं कल्पयं- काकारचिकीर्षया स्फुटमपि ज्ञानं पशुर्नेच्छति । वैचित्र्येऽप्यविचित्रतामुपगतं ज्ञानं स्वतः क्षालितं पर्यायैस्तदनेकता परिमृशन् पश्यत्यनेकांतवित् ॥ ५ ॥ 2 १ m . सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार सं० टी०--पशुः-अज्ञानी सारयादिः कश्चित्, स्फुटमपि-अनेकाकारतया व्यक्तमपि जागं नेच्छति, कीहक्षः सन् ? एकत्यादि:-ज्ञानस्य एकाकारं-एकला, चित्रीर्पया-ऋतु मिच्छया,ज्ञ येत्यादि:-जेयस्य-पदार्थस्य, भाकार:-शाने तदाकारः, स एव क्लक:-कालिमा, ज्ञाने तदाकारस्याभावात् एक स्वभावत्वात्तस्य कूटस्थनि- त्यत्वात् तेन मेचक:-चित्रितः, चित्-ज्ञानं, तत्र प्रक्षालन अनेकाकारनिवारणं, क्ल्पयन्-कुठन्, तत्राह भने- कांतवित् तत-ज्ञान, पश्यति-ईक्षते, कोश तत् १ पर्यायैः-मतिश्रुतादिज्ञानविवतैः, अनेकता-कांचिदने- कला परिमृशन्-अंगोकुर्छन् , सर्वथैकत्वे नानाज्ञ यग्रहण न स्यात् एकाज्ञानस्य नित्यमामवात् तदभावः स्यात् । तदुक्तमष्टसहस्यां- प्रमाणकारकैर्व्यक्तं व्यक्त चेदिद्रियावत् । ते च नित्ये विकार्य किं साधोस्ते शासनातहिः ॥शा इनि ननु ज्ञानं पर्यायैरनेकत्व दधदशुद्ध' स्यात् पर्यायस्याशुद्धत्वस्यापनात् इति चेन्न, स्वतः-स्वभावतः, जालित-निर्मला, यतः । ननु ज्ञानस्यानेकत्वमेवेष्ट दृष्टेप्टाना तद्विषयानामिष्टत्वात् जगतो विचित्रत्वान् ? इति चेन्न कुत.? पर्यायापेक्षया मैचित्र्येऽपि एकज्ञानद्रव्यतया अविचित्रतां-एकस्वरूपतां, उपगत-प्राप्त', अतः कथंचिदेकं द्रव्यार्पणात, कथाचिदनेक पर्यायार्पणात् ॥५८।। अथ परद्रव्यास्तित्वन्यस्तं जान निराकृत्य स्वास्तित्वास्तिक्यमागम्यते- अर्थ-पशु अमानी सर्वथा एकांतवादी है सो ज्ञेयनिकै आकारनिकरि कलंककरि अनेका- काररूप मलिन जो चैतन्य ताविप एक चैतन्यका मात्र आकार करनेकी इच्छा करि प्रक्षालन कहिये धोवना कन्पता संता मान अनेकाकार प्रकट है तोऊ ताकू नाही मान है एकाकारही मानि जानका अभाव करै है। बहुरि अनेकांतका जाननेवाला है सोज्ञ याकारकरि ज्ञानका विचित्रपणा है तौऊ एकपणाकू प्राप्त ज्ञान है सो आप स्वयमेव प्रक्षाल्या हुवा शुद्ध है, एका- कार है अर पर्यायनिकरि ताके अनेकता अनुभव है ।। भावार्थ-एकांतवादी तो ज्ञानविय ज्ञेयाकारकू मैल जाणि एकाकार करने ज्ञेयाकारकू धोय दुरि करी ज्ञानका नाश कर है । बहुरि अनेकांती ज्ञान• स्वरूपकरि अनेकाकारपणा मानें है। सो ऐसा वस्तुस्वभाव है मो सत्यार्थ है ऐसा अनेकस्वरूप भंग है ।। विशेष-इस श्लोकमें ज्ञानको कथंचित् एकाकार और कथंचित् अनेकाकार,बतलाया है यहांपर यह शंका करना अनुचित है कि यदि ज्ञान पर्यायोंकी अपेक्षा अनेकाकार है तो पर्यायों के अशुद्ध होनेमे ज्ञानभी अशुद्ध होगा ? क्योंकि यह ज्ञान स्वभावसे ही निर्मल है वह अशुद्ध नहिं हो सकता। यदि कहो ज्ञानका विषय समस्त जगत है और यह विचित्र अनेकाकार है इसलिये ज्ञानके भी सर्वथा अनेकाकार ही मान लेना चाहिये सो ठीक नहीं क्योंकि उसकी ज्ञानद्रव्य एक ही है इसलिये द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा यह एक पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा अनेक है ।। ५८॥ प्रत्यक्षालिखितस्फुटस्थिरपरद्रव्यास्तितावंचितः स्वद्रव्यानवलोकनेन परितः शून्यः पशुनश्यति । ?

- 4 r ? परमात्यात्मतरङ्गिणी स्वद्रव्यास्तितया निरूप्य निपुणं सद्यः समुन्मज्जता स्याहादी तु विशुद्धबोधमहसा पूर्णो भवन जीवति.॥ ५६ ॥ • सं० टी०-पशुः-परद्रव्येण सदिति प्रतिपद्यमानः कश्चित् नश्यति स्वपक्षाचं लक्षयति-परितः-साम- हत्येन स्वत्यादिः-स्वस्य-श्रात्मनः, द्रव्या द्रवति द्रोष्यति अदुद्रवत् स्वगुणपर्यायान् इति द्रव्य, तस्यान- चलोकनेन-स्वामित्वानीक्षमाणेन शून्य, पुनः कीदृक्षः ? प्रत्यक्षेत्यादिः-प्रत्यक्षेण-वैद्यज्ञानेन आलिखिता भाज्ञाता, स्फुटा-व्यक्ता, स्थिरा-अनेककालस्थायित्वात् सा चासौ परद्रव्यास्तिता चं, न च घटास्तित्व पटारिस्वेऽस्ति सर्वस्य सर्वार्थक्रियाकरणात, नहि पटादयः घटादय इव पय आहरणलक्षणामक्रिया कुति घटादिज्ञाग वा इति परास्तित्वाभावेपि तया वचित्तः । स्सद्वादी तु कथं व्यवतिष्ठते-अनेकांतमतमतिः स्व- तत्त्वं जीवति स्थिर स्थापयतीत्यर्थः । कीदृक्षः १ विशुद्धत्यादि-विशुद्धनानतेजसा पूर्णो भवन्-स्वमनोरथ पूर्णीकुर्वन्, कोहशेन तेन समुन्मज्जता-समुच्छलता, जगति प्रकाशं गच्छता, किंकृत्वा ? सद्यः-तत्काल, स्वेत्यादिः-स्वस्य-श्रात्मनः द्रव्यास्तित्व तया निपुणं यथोक्त अस्तित्व निरूप्य अवलोक्य ।। ५६ ॥ अथ परद्रव्यस्वरूप ब्रह्म तिवादिन प्रति परद्रव्येणासदिति संन्यस्यते- अर्थ-पशु अज्ञानी एकांतवादी है सो प्रत्यक्षप्रमाणकरि आलिखित कहिये चितारथा हुवा दीखता स्फुट प्रकट स्थूल अर स्थिर कहिये निश्चल ऐसा परद्रव्यकू' देखि तिसका अस्तित्व- करि ठिग्या हुवा अपना निज आत्मद्रव्यका अस्तित्व नाही देखनेकरि समस्तपणे सर्वथाशून्य होता आपका नाश कर है । बहुरि स्याद्वादी हैं सो आना निजद्रव्यका अस्तिपणाकरि निपुर्ण जैसे होय तैसे निज आत्मद्रव्यका निरूपणकरि तत्काल प्रकट होता जो विशुद्धज्ञानरूप तेज ताफरि पूर्ण होता जीवै नष्ट न होय है। भावार्थ-एकांती बाह्य परद्रव्य प्रत्यक्ष देखि ताहीका अस्तित्व मान्या । अर अपना आत्मद्रव्य इन्द्रियप्रत्यक्षकरि दीख्या नाही। जाई शुन्य मानि आत्माका नाश करें है । बहुरि स्यादादी ज्ञानरूप तेजकरि अपना आत्मद्रव्यका अस्तित्वके अवलोकनकर आप जीव है, आपका नाश नाही कर है । यह स्वद्रव्यअपेक्षा अस्तिस्वका भंग है। सर्वद्रव्यमयं प्रपद्य पुरुष दुर्वासनावासितः स्वद्रव्यभ्रमतः पशुः किल परद्रव्येषु विश्राम्यति । स्याद्वादी तु समस्तवस्तुषु परद्रव्यात्मना नास्तितां जाननिर्मलशुद्धबोधमहिमा स्वद्रव्यमेवाश्रयेत् ॥ ६० ॥ सं० दी.-पशुः अवकांतावलंबी, स्वेत्यादिः :-स्वस्य द्रव्यं तस्य भ्रमत:-भ्रांते, परद्रव्येषु समस्तरे- सनाचेतनेष्वपरद्रव्येषु, किल-निश्चितं, विश्राम्यति-विश्राम याति, परद्रव्यां सर्च स्वद्रव्यमिति कृत्वा तिकृति, किकृत्वा ? पुरुष-ब्रह्म, सर्वद्रव्यमां--समस्त-चेतनेतरवस्तुमयं प्रपो-अंगीकृत्य, तदभ्युपगमे वेदवाक्य . । - - सर्गविशुद्धज्ञानाधिकार १७७ "पुरुष एवेद यद्भूतं यच्च भाव्यं स एव हि सकललोकप्रलयस्थितिहेतुरिति” सर्वेषा प्रतिभासमानत्वेन प्रतिभा सात.-प्रविष्टत्वं तस्ौक्त्वे घटपटलकुटमुकुटशक्टादीना भेदस्तु दुर्वासनावासित - दुर्वासनया अविद्यया सद सन्नित्यानित्यैकानेकादिरूपेण प्रतिभासमानया वासित:-कल्पित' इति वदन् अद्वैतदुर्वासनावासित' दुर्वासनया-अनादिकालभूतमहामोहाख्ययाऽविद्यया वामितः-वासनाविषयीकृतः । स्याद्वादी तु समस्तवन्तु- सर्वपदार्थेषु स्वद्रव्यमेव स्वद्रव्येणास्तित्वमेव आश्रयेत्-भजेत् । किंकुर्वन् ? तेपु परद्रव्यात्मना-परस्त्र- रुपेण नास्तितां जानन् प्रमाणबलान्नास्तित्वमभ्युपगच्छन्, कीहक्ष सः ? निर्मलेत्यादिः-निर्मल.-द्रव्यमल- कलंकरहितः, शुद्धः-भावकर्मविक्ल , स चासौ बोधश्च तेन महिमा-माहात्म्य यस्य स. ॥६० ॥ अथ परक्षेत्रास्तित्वं निराकुर्वन् स्वक्षेत्रास्तित्वं तुदति- अर्थ-पशु अज्ञानी एकांतवादी है सो पुरुष जो आत्मा ताक् सर्वद्रव्यमयी एक कल्पिकरि अर कुनयकी वासनाकरि वासित हुआ प्रकट पाद्रव्यविप॑ स्वद्रव्यका भ्रमकरि विश्राम करै है । बहुरि स्याद्वादी है सो समस्तही वस्तुविर्षे परद्रव्यस्वरूप करि नास्तिता' जानता संता- निर्मल है शुद्ध ज्ञानकी महिमा जाकी ऐसा हुवा स्वद्रव्यहीकू आश्रय करें है। भावार्थ-एकांत- वादी तौ सर्वद्रव्यमय एक आत्माकू मानि परद्रव्य अपेक्षा नास्तिता है ताका लोप कर है । अर स्याद्वादी समस्तवि परद्रव्य अपेक्षा नास्तिता मानि अपना निजद्रव्यमें रमै है। यह पर- द्रव्य अपेक्षा नास्तिताका भंग है ।। भिन्नक्षेत्रनिषण्णवोध्यनियतव्यापारनिष्ठः सदा सीदत्येव वहिः पतंतमभितः पश्यन् पुमांसं पशुः । स्वक्षेत्रास्तितया निरुद्धरभसः स्याद्वादवेदी पुन- स्तिष्ठत्यात्मनिखातबोध्यनियतव्यापारशक्तिर्भवन् ॥ ६१ ॥ सं० टी०-कश्चिन्न यायिकादि. पशु.-अज्ञानी, सीदत्येव-स्वस्थित्यभावाद्विषाद यात्येव । किंकुर्वन ? अभितः-समतात वहिः पततस्वक्षेत्रात्परक्षेत्रे पतत, पुमास-आत्मन, पश्यन्-अवलोकयन्, सदा-नित्यं आत्मनः व्यापकत्वागीकारात, कीदृश. सः ? भिन्नेत्यादि.-भिन्नं च तत् क्षेत्र तत्र निपएण-वर्तमाग तप तनोध्य-ज्ञातु योग्य द्रव्य च तत्र नियत:-निश्चितः. व्यापारः सन्निकर्षादिक्रिया-आत्मा मनसा सयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियं अर्थेन इन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वनियमात् इतिसान्निकर्षादिव्यापार. बोध्यक्षेत्रगमनल- क्षणः तत्र निष्ठः, तत्पशावलवी स्वव्यवस्थानाभावात्सीदत्येव । स्याद्वादवेदी पुनः कश तिष्ठति ? स्वेत्यादिः स्वस्य क्षेत्रे अस्तिता-अस्तित्ला तया निरुद्धरमसः सन्निकर्षादीना निरुद्धो रभसः-वेगः, येन सः, प्रमाणप- क्षादौ सन्निकर्पस्य गतादावतिप्रसगेन दूषितत्वात् । नायनसग्निकर्पस्य घटरूपयोः समवेतयोः सद्भावे समवेतयोर्भटरसयोः स क न स्यात् इति निरस्तत्वात् । तर्हि कचिदपि बोध्ये आत्मनो व्यापित्वं न स्यात् इति वदंव प्रति स्याद्वादवादी कीहक्षो भवस्तिष्ठति ? आत्मेत्यादिः-प्रान्मनि स्वस्मिन् निखार व्यवस्थित तच्च योध्या च स्वरुपलक्षण बोध्यमित्यर्थः तत्र नियता-निश्चिता व्यापारशक्तिः, येन स ईदृक्षो भवन् सन ॥ ६१ ॥ अथ परक्षेत्रे नास्तित्वामान वदन प्रति परक्षत्रे नास्तित्व कणति- २३ १७ परमाध्यारमतरङ्गिणी अर्थ-पशु अज्ञानी एकांतवादी है सो भिन्नक्षेत्रवि तिष्ठया जे जयपदार्थ तिनिवि ज्ञयज्ञायकसंबंधरूप निश्चितव्यापारवि तिष्ठया संता पुरुपकू समस्तपणे वाह्यज्ञयनिविषही पडना संता ताकू देखता संता कष्टहीकू प्राप्त होय है। बहुरि स्याद्वादका जाननेवाला है सो अपने क्षेत्रवि अपना अस्तिपणाकरि रोक्या है अपना रभस ज्यान ऐसा भया संता आत्मा- हीवि आकाररूप भये जे ज्ञय तिनिका निश्चितच्यापारकी शक्तिरूप होना संता अपने क्षेत्र- हीवि अस्तित्वरूप तिष्ठ है || भावार्थ-एकांतवादी तो मिन्नक्षेत्रवि ज्ञेय पदार्थ तिष्ठे हैं तिनिके जाननेके व्यापाररूप होता पुरुषको वाह्य पडताही मानि नष्ट कर है । बहुरि स्यावादी अपना क्षेत्रविही निप्टया पुरूप अन्यक्षेत्रचि तिष्ठते ।यनि जानता संता अपने क्षेत्रही वि अस्तित्व धार है, ऐसा मानता संता आत्माहीविष तिष्ठ है। यह स्वक्षेत्रवि अस्तित्वका भंग है ॥६१॥ स्वक्षेत्रस्थितये पृथग्विधपरक्षेत्रस्थितार्थोज्झना- तुच्छीभूय पशुः प्रणश्यति चिदाकारान् सहाथूर्वमन् । स्याद्वादी तु वसन् स्वधामनि परक्षेत्रे विदन्नास्तितां त्यक्तार्थोऽपि न तुच्छतामनुभवत्याकारकर्षी परान् ॥ ६२ ।। सं० टी०-पशुः कश्चिदज्ञानी प्रणश्यति-स्वक्षगं नयति, किंकृत्वा ? पृथगित्यादिः पृथग-भिन्न, विधि: प्रयोजनं येषा त ते च ते परक्षेत्र-स्वदोत्रादपरोत्रे, स्थितार्थाश्च तेषा उज्मा-परिहरणं तस्मात् तुच्छभूय निस्स्वभावं भूत्वा, किमर्थ स्वक्षेत्र स्थित्तये-स्वक्षेत्रे भवनाय । स्याद्वादी तु पुनः परान् परिच्छेचपदार्थान, आकारकर्षी आकारग्राही सन्. न तुच्छतां-न तुच्छभावता, अनुभवति । ननु पराकारकर्षी स्याद्वादिबोधः परार्श्वग्राही स्यादित्याशकायामाह-त्यतार्थोऽपि त्यत्परदन्योऽपि परिच्छिनत्ति । त्यक्तार्थत्वं कथं ? पर- चेत्रे स्वक्षेत्राइपरक्षेत्रे नास्तितां वदन्-प्रतिपादयन् । ननु परक्षेत्र इव स्वक्षोत्रो मारित्वति चेन्न यतः स्वधामनि स्वचेचे वसन्-अस्तित्वं भजन, पुनः किं कुर्वन् ? चिदाकारान-चित्पर्यायान, वमन् उद्विग्न, कैः सह ? अथैः-पदाथैः । ६२॥ अथ स्वकालास्तित्वं प्रीणाति- अर्थ-पशु अज्ञानी एकांतवादी है सो अपना क्षेत्रवि तिष्ठनके अर्थी न्यारे न्यारे परक्षेत्र- विर्ष तिष्ठे ज्ञेय पदार्थ तिनके छोडनेते तुच्छ होयकरि अपने चैतन्यके ज्ञेयरूप आकारनि परने य अर्थकी साथि रमता संता जैसे अर्थनिकू छोडे तैसे चैतन्यके आकारनिकू भी छोड़े। तव आपा तुच्छ रह्या । ऐसा आपका नाश कर है । बहुरि स्याद्वादी अपने क्षेत्रविष वसता संता परक्षेत्र वि अपनी नास्तिताक् जानता संता यद्यपि परक्षेत्र ज्ञेय पदार्थनिकू छोडे है नौऊ अपने चैतन्यके जयरूप आकार मये निनिकू परत खेचनेवाला होता तुच्छताएं नाही साविशुद्धज्ञानाधिकार १७ अनुभवै है नष्ट नाही होय है ।। भावार्थ-एकांती तौ परत्रवि तिष्ठते ज्ञेयपदार्थनिके आकार चैतन्यके आकार भये तिनिकू जैसे अर्थनिकै छोड़े है तैसे चैतन्यकै आकारनिकू भी छोर्ड है ऐसें जान है ।चैतन्यके आकारनिकू अपना करूंगा तो अपना क्षेत्र छुटि जायगा । तातें आप चैतन्यके आकाररहित तुच्छ होय है, नष्ट होय है। बहुरि स्याद्वादी ज्ञयपदार्थनिकू छोडे है, तौऊ चतन्यके आकारनिकू छोड़े नाही है। अपने क्षेत्रवि वसना परक्षेत्र वि अपनी नास्ति ताकू जानता तुच्छ नाही होय है, नष्ट नाही होय है ।। यह परक्षत्रनास्तिताका भंग है ।। पूर्वालंवितवोध्यनाशसमये ज्ञानस्य नाशं विदन सीदत्येव न किंचनापि कलयन्नत्यंततुच्छः पशुः । अस्तित्वं निजकालतोऽस्य कलयन स्याद्वादवेदी पुनः पूर्णस्तिष्ठति वाह्यवस्तुषु मुहुर्भूत्वा विनश्यत्स्वपि ॥ ६३॥ सं० टी०-पशु.-कश्चिदज्ञानी, सीदत्येव-विनश्यत्येव, किं कुर्गन् ? पूर्वेत्यादिः-पूर्ण-स्वोत्पत्तिक्षणे, बालवितं-नेयस्वरूपेण अवलवित तच तद्वोध्यं च ह ग तस्य नाशः क्षय. तस्य समये-क्षणे, ज्ञानस्य बोधस्य, नाश-विनाश विदन्-जानन अत्यततुच्छः अत्यत-निश्शेष तुच्छः-निस्स्वभावः सर्वेषा तुच्छस्व- भावत्वात् निरन्वयविनाशात् । मोऽपि वादी तुच्छस्वभावः तन्मध्ये पतितत्वात् किंचनापि-किमपि, चेतना- चेतनं स्थिर न कलयन् । पुन स्य द्वादवेदी पूर्ण:-पूर्वापरकालस्थायित्वेन पूर्णमनोरथस्तिष्ठति आस्ते । किंकुनि ? अस्य-ज्ञानस्य, निजकालत:-स्वकालत , अस्तित्व क्लयन विकृत्वा ? मुहु-पुन., वाद्यवस्तुपु वहि.पदार्थेपु, भूत्वा-तग्राहकस्वरूपेणोत्पद्य, कीडशेपु तेषु ? यिनश्यत्स्वपि-पर्यायापेक्षया प्रतिक्षण विनाश गच्छत्सु अपि शब्दात् दध्यादेशादविनश्यत्सु । वाह्यपदार्थेषु विनश्यत्स्वपि, ज्ञान न विनश्यति स्वकाले सत्त्वात् ।। ६३ ।। अथ परक ले नास्तित्वमाविभृने- अर्थ-पशु अज्ञानी एकांतवादी है सो पूर्वकालमै आलंबे जे ज्ञयपदार्थ तिनिका नाश होनेके समयवि ज्ञानका भी नाशकू जानता संता किछू भी नाही जानता संता तुच्छ भया नाशप्राप्त होय है । बहुरि स्याद्वादका वेदी है सो इस आत्माका अपने कालते अस्तित्वकू जानता संता वाह्यवस्तु बारम्बार होयफरि नष्ट होते संते भी आप पूर्णही तिष्ठे है ।। भावार्थ- पहिले ज्ञेय पदार्थ जाने थे उत्तरकालमैं विनसि गये तिनिकू देखि एकांती अपना ज्ञानकाभी नाश मानि अज्ञानी हुवा आत्माका नाश करै है। बहुरि स्याद्वादी ज्ञयपदार्थनिकू नष्ट होतभी अपना अस्तित्व अपनाही कालत मानता नष्ट न होय है । यह म्बकालअपेक्षा अस्तित्वका भंग है ॥६॥ अर्थालंवनकाल एव कलयन ज्ञानस्य सत्त्व वहि- ज्ञेयालंबनलालसेन मनसा नाम्यन् पशुनश्यति । ?

-- -- AAPATI- - ? ? १८० परमाध्यात्मतरङ्गिणी नास्तित्वं परकालतोऽस्य कलयन् स्याद्वादवेदी पुन- स्तिष्ठत्यात्मनिखातनित्यसहजज्ञानकपुजीभवन् ॥ ६४ ॥ सं० टी०-पशु:-कश्चिदज्ञानी, परकाले वस्तुनोऽस्तित्ववादी नश्यति-स्वपक्षक्षयण स्वयं क्षयं याति । कीहक्षः सन् ? मनसा-चित्तेन कृत्वा भ्राम्यन्-अन्यथार्थस्यान्यथार्थकल्पनया भ्रमं गच्छन्, कीडशेन तेन ? वहिरित्यादिः-वहि-वाह्याचेतनादिद्रव्यं तदवालंबन-अवलंबनं तत्र लालसं यत्तेन, पुनः कीहक्षः सः अर्थेत्यादिः-अर्थस्य-ज्ञयस्य आलबर्न तदुत्पत्यादिवशादवलंबनं तस्थ काले-समये एव ज्ञानस्य सत्तां अस्तित्व, कलयन्-अगीकुर्वन् तदुक्त तन्मते- अर्थस्यासंभवे भावात्प्रत्यक्षे च प्रमाणता । प्रतिबद्धस्त्रभावस्य तद्धेतुत्वे समं द्वयं ।। इति ।। अर्थालंबनलक्षणे परकाले सत्त्वे सादा सत्त्वप्रसंगात् । स्याद्वादवेदी पुनः अस्य-ज्ञानस्य परकालतः परकालेन, नास्तित्व-असत्त्वं कलयन-अगीकुर्वान्, तिष्ठति-आस्ते, ननु यथा परकालेन नास्तित्वं स्याद्वा- दिनां तथा स्वकालेऽपि तदस्तु इति चेन्न यतः आत्मेत्यादिः-आत्मनि-चिद्रूपे, निसात-आरोपितं तब तन्नित्यं-द्रव्यरूपतया शाश्वतं, सहजज्ञानं च चिद्रूपस्य शाश्वतिकत्वे ज्ञानस्यापि शाश्वतिकत्वात् तत्काले तस्य सद्भावः तस्य एकपुजीभवन्-अद्वितीयसमूहः सन् ।। ६४ ॥ अथ स्वभावास्त्विमनुभूयते- अर्थ-पशु अज्ञानी एकांतवादी है सो ज्ञयपदार्थके आलंवनकालही ज्ञानका अस्तित्व जानता संता वाह्यज्ञयका आलंबनवि चित्तअनुरागसहित करि अर बाह्य श्रमता संता नाशप्राप्त होय है । बहुरि स्याद्वादका वेदी है सो परकालतें अपना आत्माका नास्तित्वकू जानता संता आत्माविपै उकिरथा जो नित्य स्वाभाविक ज्ञानपुज तिस स्वरूप होता संता तिष्ठे है नष्ट न होय है। भावार्थ-एकांती तौ ज्ञेयके आलंपन के कालही ज्ञानका सच जाने है सो ज्ञयके आलंबनवि मन लगाय बाह्य भ्रमता संता नष्ट होय है । बहुरि स्यादादी ज्ञयके कालतें अपना अस्तित्व नाही जान है, अपनेही कालते अपना अस्तित्व जान है तात ज्ञयतै न्यारा ही अपना ज्ञानका पुज्जरूप होता नष्ट न होय है यह परकाल अपेक्षा नास्तित्वका भंग है ॥६॥ विश्रांतः परभावभावकलनान्नित्यं वहिर्वस्तुषु नश्यत्येव पशुः स्वभावमहिमन्येकांतनिश्चेतनः । सर्वस्मिन्नियतस्वभावभवनज्ञानाद्विभक्तो भवन स्थाद्वादी तु न नाशमेति सहजस्पष्टीकृतप्रत्ययः॥६५ ।। सं० टी०-पशुः-परभावेनात्मानं मन्यमानः कश्चिदशाता, नश्यत्येव कीदृशः ? नित्यं-निरंतरं वहिर्ग- स्तुघु-नीलादिज्ञ यक्षणेषु, विश्रातः-स्थितः, कुतः १ परेत्यादिः-परे च ते भावाश्च नीलपीतादयस्तेषां भावः स्वभाव., तस्य कलना-ग्रहां, श्रारमसात्करणं तस्मात् । स्याद्वादवेदी तु न नाशमेति-विनाशं न प्राप्नोति मनविशुद्धझानाधिकार १८५ कीहशः ? सहजेत्यादिः सहजः-स्वाभाविकः स्पष्टीकृतः प्रत्ययः-ज्ञान, येन सः, स्वस्वभावनियतत्वात् सर्ग. स्माद् ज्ञेयाद्विभक्त:-भिन्नः, भवन-सन् परभावस्वभावग्राहक्त्वाभावात् । कुतः ? नियतेत्यादिः नियतः निश्चितः, स्वभावः-चैतन्यादिस्वरूप, तेन भवनं यस्य तब तज्ज्ञान च तस्माद्, कीदृक्ष' स: ? स्वेत्यादि स्वस्य भावः पर्याय:, ज्ञानादिलक्षण', तस्य महिमा-माहात्म्यं यत्र तस्मिन्नात्मनि, एकातेत्यादिः एकांतत् 'सर्मथास्तित्वनास्तित्वादेः निर्गतं चेननजान, यस्य सः, आत्मनि एकातनानाभावात् अनेकांतज्ञान ।। ६५ ॥ भधापरपर्यायपरं ब्रह्म निपेधयन् परस्वरूपेण सदित्युद्धाटयति- अर्थ-पशु अज्ञानी एकांतवादी है सो परभावकूही अपना भाव जाननेते वाह्यवस्तुनिविर्षे विश्राम करता संता अपना स्वभावकी महिमावि एकांतकरि निश्चेतन भया जड होता संता आप नाशकू प्राप्त होय है । बहुरि स्याद्वादी है सो सर्वही वस्तुविप अपना निश्चित नियम- रूप जो स्वभावभावका भवनस्वरूप ज्ञान तात सर्वते न्यारा होता संता सहजस्वभावका- स्पष्ट प्रत्यक्ष अनुभवरूप कीया है प्रत्यय कहिये प्रतीतिरूप जानपना जान ऐसा भया नाशक् नाही प्राप्त होय है भावार्थ-एकांती तो परभाव निजभाव जानि वाह्यवस्तूवि विश्राम करता संता आत्माका नाश कर हैं। वहुरि स्याद्वादी अपना ज्ञानभाव यद्यपि ज्ञयाकार होय है, तथापि ज्ञानहीकू अपना भाव जानता संता आपका नाश नाही कर है । यह अपना भावकी अपेक्षा अस्तित्वका भंग है ॥६॥ अध्यास्यात्मनि सर्वभावभवनं शुद्धस्वभावच्युत्तः सर्वत्राप्यनिवारितो गतभयः स्वैरं पशुः क्रीडति । स्याहादी तु विशुद्ध एव लंसति स्वस्य स्वभावं भरादारूढः परभावभावविरहव्यालोकनिष्कंपितः ॥६६॥ सं० टी०-सर्गभावमयं पुरुण कल्पयन् पशु'-कश्चिदज्ञानी, स्वैरं-स्वेच्छया, यमनियमासनाद्यभावात्, क्रीडति-विहरति इतस्ततः । कीदृक्षः ? गतभयः-रातः-नष्टः, भयः-इहपरलोकादिलक्षणो यस्य सः, सर्वस्य ब्रह्ममयत्वादिहपरलोकाद्यभाव , पुनः सर्वत्रापि-निषिद्धानुष्ठानेऽपि अनिवारितः अलावूनि मङदि । ग्रावाण. प्लवते, अंघो मणिमविदत् तमनंगुलिरावतत् उत्ताना वै देवगावो वहतीत्यादीना वेदवाक्याना पूर्वापरविरुद्धानां मातृगमनादिप्ररूपकाना च सद्भावान्न तेषा कश्चिन्निवारकः । पुन' शुद्धत्यादि.-शुद्धस्व- भावे च्युतः शुभाशुभपर्यायमयत्त्वात्, किंकृत्वा ? आत्मनि-चिद्पे, सर्वेत्यादि-सर्वभावानां-समस्तस्व- भावानां, भवन-अस्तित्वं, अध्यास्य-अध्यारोप्य । स्याद्वादी तु विशुद्ध एव-निर्मलस्वज्ञाननियत एव लसति विलासं करोति हटेष्टविरोधाभावात् । कोहक्ष ? भरात-अतिशयेन, स्वस्य-आत्मनः, स्वभाव-स्वरूप, भारुढः-विश्रांतः, स्वभावेन सत्वात् तर्हि परस्वभावनाप्यस्तु तन्निवारणार्थमाह-परेत्यादि-परे च ते भावाश्च घेतनाचेतनादयश्च तेषा भावाः पर्यायाः रागद्वपनीलपीतादयः तेपा विरहेण-अभावेन, व्यालोकः-स्वतत्त्वा- बलोकन तेन निष्कंपितः-निश्चल., प्रमाणप्रसिद्धत्वात् ।। ६६ ॥ अथ सर्वस्य क्षणभंगाभोगभंगिसंगतस्य तस्वस्य निरसनन्यसन नित्यरन पजायते- , - . 1 । १२ परमाध्यात्मतक्षिणी अर्थ-पशु अज्ञानी एकांतवादी है सी अपने आत्मावि सर्वज्ञेयपदार्थनिका होना निश्चय करि अर शुद्धज्ञानस्वभावतै च्युत भया संता सर्वपदार्थनिवि निःशंक वर्जनारहित स्वेच्छा- चारी भया क्रीडा कर है । अपना भावका लोप कर है । बहुरि स्याद्वादी है सो अपनाही भावविपैं सर्वथा आरूढ भया परभावके अपने भावविय अभावका प्रकटपणा है ताकार निश्चय भया शुद्धही शोभायमान है ॥ भावार्थ-एकांती तो परभावनिक आपा जानि अपने शुद्ध स्वभाब च्युत भया सर्वत्र निःशंक स्वेच्छात प्रवते है। बहुरि स्याद्वादी परभावनिक जाने है तोऊ तिनित न्यारा अपना आत्माकू शुद्ध ज्ञानस्वभाव अनुभवता संता शोभ है । यह परभाव अपेक्षा नास्तित्वका भंग है ।। प्रादुर्भावविराममुद्रितवहद्ज्ञानांशनानात्मना निर्ज्ञानात्क्षणभंगसंगपतितः प्रायः पशुनश्यति स्याद्वादी तु चिदात्मना परिमृशंश्चिद्वस्तु नित्योदितं टंकोत्कीर्णघनस्वभावमहिमज्ञानं भवन जीवति ।६७। सं० टी०-प्राय:-बाहुल्येन, पशुः-सर्वाक्षणिकवादी कश्चिदज्ञानी नश्यति-सीदति, कोक्षः ? क्षणे- त्यादि:-क्षणे पदार्थानां भंगः-विनाशः, तस्य संग:-संगतिः. तत्र पतित:-तदंगीकारपरकशीभूतः, कुतः निर्ज्ञानात्-स्वपक्षसिद्धदृष्टष्टप्रमाणनिर्णयात् कल्पनापोढमभ्रांत प्रत्यक्षं स्वलक्षणमनियमित्यादिलण- सद्भावात, ज्ञानांशेत्यादिः-ज्ञानानामशा:-पर्यायाः, सुखदुःखाई कारादयः, तेषां नानात्मना-परस्परं सर्वथा भिन्नस्वभावेन, प्रादुरित्यादिः-पीतादिज्ञानक्षणानां प्रादुर्भाव उत्पत्ति', नीलादिज्ञानक्षणाना निरामः- विनाशः, तेन मुद्रितं-लांछितं वस्तु वदतीति । ननु स्याद्वादिनां प्रतिक्षणं क्षणिकाना पर्यायाणां सद्भावा. सुगतगतिगमनमारमणमेव विभावपर्यायाणां तु नरकादीना तु स्थायित्वाभ्युपगमेऽपि तेषामसत्त्वात् ? इति चेन्न यतः स्याद्वादी तु जीवति-समस्तमतमानखंडनेन विलासित्वात् उज्जीवति । कीदृशः १ चिदात्मना चेतनास्वरूपेण सर्वत्रावग्रहहादो चैतन्यस्वभावेन नित्योदित-नित्यम्वरूपेणोदितं चिद्वस्तु-तम्यद्रव्य, परिमृशन्-कलयन् प्रमाणवलादनुभवन्नित्यर्थः । पुनः टंकोदित्यादिः-टंकन उत्कीर्णधनस्वभाव:-निरंतर- काशमानस्वरूपं स एव महिमा-माहात्म्यं यस्य तत् टंकोत्कीर्णं च धनस्वभावमहिमा च तच तजशागं च भवन-जायमानः सन् ॥ ६७ ।। अथ सर्वथा सत्यनित्यचित्तशातनमनित्यत्वमात्मनो ज्ञानस्य विज्ञापयति- अर्थ-पशु अज्ञानी एकांतवादी है सो उत्पादव्ययकरि लक्षित प्राप्त होता जो ज्ञान ताक अंशनिकरि नानास्वरूपका निर्णयका ज्ञानते क्षणभंगका संगमै पड्या बाहुल्यपणे आपाका नाश कर है। बहुरि स्यादादी है सो चैतन्यस्वरूपकरि चैतन्यवस्तूकू नित्य उदयरूप अनुभवता संता टंकोत्कीर्ण घनस्वभाव है महिमा जाकी ऐसा ज्ञानरूप होता संता जीवे है । आपका नाश नाही कर है ।। भावार्थ-एकांती तौ ज्ञयके आकारवत् ज्ञानकू उपजता विनसता देखी अर ? " - १८३ साविशुद्ध ज्ञानाधिकार क्षण भंगकी संगतीवत् आपका नाश कर है । बहुरि स्याद्वाही है सो ज्ञान ज्ञयकी साथि उपज विनशै है तोऊ चैतन्यभावका नित्य उदय अनुभवता संता ज्ञानी होता जी है आपका नाश नही कर है यह नित्यपणाका भंग है ।। ६७ ॥ टंकोत्कीर्णविशुद्धबोधविसराकारात्मतत्त्वाशया वांछत्युच्छलदच्छचित्परिणतेभिन्न पशुः किंचन । ज्ञानं नित्यमनित्यतापरिगमेप्यासादयत्युज्ज्वलं स्थाहादी तदनित्यतां परिमृशंश्चिद्वस्तुवृत्तिक्रमात ॥६॥ सं० टी-पशुः कश्चिन्नित्यकांतवादी शठ , किंचनापि-किमपि ज्ञान भिन्न-पृथक्, वाछति-ईहते, कुतः । उच्छलदित्यादिः उद्-ऊर्ध्वमुच्छलती, अच्छा-निर्मला, सा चासी श्चचित्परिणति चित्पर्यायः तस्याः, पर्यायपर्यायिणोः परस्परं भेदात् ज्ञानस्य नित्यत्व, कया ? कोदित्यादि'-टकनोत्कीर्ण पर्यायाभावात् नित्य- त्वात् स चासौ विशुद्धश्च पूर्वापरविवर्तकालिकाविश्लत्वात् स चासौं वोधञ्च तस्य विमरः-निवह', स एवाकारः तेनोपलक्षितं आत्मतत्त्वं तस्य वाठा-नित्यत्वात्मक्षानाकाक्षा तया । स्याद्वादी स्याव-कथचिच्छ- देनोपलक्षितो वादः-जल्पन, विद्यते यस्य सः, वस्तुनस्तथात्वात् तथा काक्षायाः समुत्पत्तः, तथा विवक्षायाः सहावात अनेकांतात्मकं सर्व एकातस्वरूपानुपलब्धरित्यनेकांतवादी ज्ञाम नित्य-पूर्वापरावग्रहेहादिपु व्याप्त- ज्ञान.वसामान्येन स्यान्नित्यं, आसादयति-प्राप्नोति, कीहक्षं ? उज्ज्वलं-अवदातं, अनित्यतापरिगमेऽपि वस्तुनोऽनित्यतापरिज्ञाने अपिशब्दान्न केवल नित्यमेव अनित्यतापरिज्ञाने सत्यपि, नन्वनित्यतापरिज्ञानमा- प्रस्तुशुक्तिकायां रजतपरिज्ञानबन्न पुनस्तथा वस्तुनः प्राप्तिरिति तदपि स्वमनोरथमात्र यत: अनित्यतां वस्तुगतानित्यला परिमृशन् अर्थक्रिययोपलभमानः कुतः ? चिदित्यादिः चिद्वस्तुनः-चेतनास्पवस्तु- पर्यायस्य वृत्तिः-उतना तस्या. मात्-अनुक्रमात्, ।। ६८ ॥ अथानकातमतव्यवस्था सुधरति संजाय- टीति इति पद्यद्वयेन- अर्थ-पशु अचानी एकांतवादी है सो टंकोत्कीर्ण निर्मलजानका फैलावरूप एक आकार जो आत्मतच, ताकी आशाकरि अर आपवि उछलती जो निर्मल चैतन्यकी परिणति, तास न्यारा किछू आत्माकू चाहै है । सो किछू है नाही ॥ बहुरि स्याद्वादी है सो नित्यज्ञान हुए सो अनित्यता प्राप्त होतभी उचल दैदीप्यमान चैतन्यवस्तुको प्रवृत्तिके क्रमते ज्ञानके अनित्यता अनुभवता संता ज्ञानकू अंगीकार कर है ।। भावार्थ-एकांती तौ ज्ञानकू एका- कार नित्य ग्रहण करने की बांछा करि अर ज्ञानचैतन्यकी परिणति उपजै बिनशे है तात भिन्न किछु माने है, सो परिणाम मित्राय परिणामी किछू न्यारा ही है नाही । बहुरि स्याद्वादी है सो यद्यपि ज्ञान नित्य है, तोऊ चैतन्यकी परिणति क्रमत उपजै विनशै है, ताके क्रम ज्ञानकी अनित्यता मान है, वस्तुस्वभाव ऐसाही है,यह अनित्यपणाका भंग है ॥६६॥ अब कहै हैं, जो, ऐमा अनेकांत है, सो जे अजानकरि मोही मृह है, तिनि आत्मतत्वज्ञानमात्र साधता संता १८४ परमाध्यात्मतरङ्गिणी . . स्वयमेव अनुभवनमें आवै है ।। इत्यज्ञानविमूढानां ज्ञानमात्रं प्रसाधयन् । अात्मतत्त्वमनेकांतः स्वयमेवानुभूयते ॥६६॥ सं० टी०-इति अमुना प्रकारेण, स्वयमेव-स्वय प्रकाशमानत्त्वादिस्वरूपेण, आलोकाद्य पायेन च आत्म- तत्वां-आत्मस्वरूपं अनेकातः-स्याद्भिन्नाभिन्नत्वसत्त्वासलौकानेकत्वनित्यत्त्वादयः अनुभूयते-स्वानुभवप्र- त्यक्षीक्रियते, किंकुर्वन् ? अज्ञानेत्यादिः-अज्ञानेन-अनादिकालविज़ भितमोहाज्ञानेन विमूढानां-मोहिताना, ज्ञानमात्रं-मानसाकाल्य, प्रसाधयन्-स्वरूपप्रकाशनादिभिर्दर्शयन् ।। ६६ ।। अर्थ-ऐसे पूर्वोक्तप्रकार अनेकांत है सो जे अज्ञानकरि प्राणी मूढ भये हैं तिनिकू समझा- बनेकू आत्मतत्त्वज्ञानमात्र साधता संता आपै आप अनुभवगोचर होय है ।। भावार्थ-अना- दिकालके प्राणी स्वयमेव तथा एकांतवादका उपदेशकरि आत्मतत्त्व ज्ञानका अनुभवनत अनेक प्रकार पक्षपातकरि आत्माका नाश करै हैं। तिनिकू समझायनेकू आत्माका स्वरूप ज्ञानमात्रही कहिकरि, अर तिसकू' अनेकांतस्वरूप प्रकटकरि स्याद्वादत दिखाया है, सो यह असत्कल्पना नाही है । ज्ञानमात्र वस्तु अनेकधर्महित आपै आप अनुभवगोचर प्रत्यक्ष प्रतिभा- समैं आवे है। सो.प्रवीण पुरुप अपना आपाकी तरफ देखि अनुभवकरि देखो । ज्ञान तत्स्वरूप अतत्स्वरूप, एकस्वरुप, अनेकस्वरूप, अपने द्रव्यक्षेत्र कालभावतें सत्स्वरूप नित्यस्वरूप परके क्षेत्र काल भावत असत्स्वरूप अनित्यस्वरूप, इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभवगोचरकरि अनेकधर्मस्वरूप प्रतीतीमै ल्यायो । यह ही सम्यग्ज्ञान है । सर्वथा एकांत मान मिथ्याज्ञान है, ऐसा जानना ॥६६॥ अव अनेकांतकी महिमा कर हैं- एवं तत्त्वव्यवस्थित्या स्वं व्यवस्थापयन स्वयं । अलंध्यशासनं जैनमनेकांतो व्यवस्थितः ॥ ७० ॥ सं. टी.-अनेकांत:-कथाचिद्धर्मः, व्यवस्थितः, प्रमाणनयोपन्यासैः सुप्रतिक, कया ? एवमित्यादिः एवमुक्तप्रकारेण पूर्व स्याद्वादममर्थानेन, तत्त्वस्य-वस्तुयाथात्म्यस्य आत्मतत्त्वस्य वा व्यवस्थितिः-व्यवस्थानं, तया । किंकुनि, स्वर्ण-आत्मना कृत्वा, स् आत्मनं, व्यवस्थापयन सस्थिरीकुर्वान् पुनः चैनं सर्वज्ञभट्टारक- प्रणीतं, शासनं-मतं, व्यवस्थापयन अथवा यतोऽनेकांतात् इत्याध्याहार्य चैनं शासनं अलाध्य-एकांतम- तमतिविज भितमिथ्यादृष्टिकोटिभिन लंधितु शक्यं ।। ७० ॥ अयानंतशक्तियुक्तितां संवक्ति- अर्थ-या प्रकार तत्व कहिये वस्तुका यथार्थ स्वरूपकी व्यवस्थितिकरि अपने स्वरूप आपही स्थापना करता संता अनेकांत है सो व्यवस्थित भया निश्चित ठहरया। सो कैसा है यह ? लंध्या न जाय जीत्या न जाय ऐसा जिनदेवका शासन है मत है, आज्ञा है । भावार्थ- यह अनेकांत है सोही निर्याध जिनमत है । सो जैसे वस्तूका स्वरूप है तैसै स्थापता आपै आप सविशुद्धज्ञानाधिकार १५ ? सिद्ध भया है । असत्कल्पनाकरि वचनमात्र प्रलाप काहने न कह्या है । निपुण पुरुपनिके विचारि प्रत्यक्ष अनुमानप्रमाणकरि अनुभवकरि देखो । इहां कोई तर्क करें है, जो आत्मा अनेकांतमयी है, अनंतधर्मा है, तोऊ ताका ज्ञानमात्रपणाकरि नाम कौन अर्थी कीया ? ज्ञानमात्र कहनेमैं तो अन्यधर्मनिका निषेध जान्या जाय है, ताका समाधान-जो, इहां नक्षणकी प्रसिद्धिकरि लच्यके प्रसिद्धिके अर्थी आत्माका ज्ञानमात्रपणाकरि नाम कीया है, जो आत्मा ज्ञानमात्र है सोही कहै हैं, आत्माका ज्ञान लक्षण है ।। जात तिस आत्माका सो ज्ञान असाधारण गुण है । यहु ज्ञान काहू अन्यद्रव्यमै पाइए नाही, तिस कारण करि इस ज्ञानलक्षणकी प्रसिद्धि करि, अर ताकरि लक्ष्य कहिगे लखने गोग्य जो आत्मा ताकी प्रसिद्धि होय है । लक्षण होय जाकू वाहुल्यपणेकरि सर्व जाणे सो होय । अर लक्ष्य होय सो जाकू प्रसिद्ध न जानिये सो होय । यात लक्षण कहने लक्ष्य प्रसिद्ध होय है । इहां फेरि तर्क कर है, जो, इस लक्षणकी प्रसिद्धि करि कहा साध्य है ? लक्ष्यही साधने योग्य है, आत्माहीकू साधना था । ताका समाधान-जो अप्रसिद्ध लक्षण जाके ऐसा अज्ञानी पुरुपकै लक्ष्यकी प्रसिद्धि नाही होय । अज्ञानीकू' पहले लक्षण दिखाइये तब लच्या ग्रहण करै । जाते जाके लक्षण प्रसिद्ध होय ताहीके तिस लक्षणस्वरूप लक्ष्यकी प्रसिद्धि होय है। फेरि पूछ हैं, जो वह लक्ष्य न्यारा ही कहा है, जो ज्ञानकी प्रसिद्धिकरि तिस न्याराही सिद्ध होय है । ताका उत्तर-जो ज्ञानते न्यारा ही तो लक्ष्य आत्मा नाही है जाते द्रव्यपणाकरि ज्ञानके अर आत्माके भेद नाही है-अभेदही है ।। उहाँ फेरि पूछे है, जो ज्ञान आत्मा अभेदरूप है तौ लच्यलक्षणका मेद काहेकरि कीया हुवा होय है ? ताका उत्तर-जो प्रसिद्धिकरि प्रसाध्यमान- पणा है ताकरि कीया भेद है । ज्ञान प्रसिद्ध है । जाते ज्ञानमात्रके स्वसंवेदनकरि सिद्धपणा हैं। सर्व प्राणीनिके स्वसंवेदनरूप अनुभवमै आवै है । तिस प्रसिद्धिकरि साध्या हुवा तिस ज्ञानते अविनाभावी जे अनंत धर्म तिनिका समुदायरूप अभिन्नप्रदेशरूप मूर्ति आत्मा है । तातें ज्ञान- मात्रवि अचलित निश्चल लगाई उकीरी जो दृष्टि ताकरि क्रमरूप अर अक्रमरूप युगपद्र प प्रवतता जो तिस ज्ञानतें अविनामृत अनंत धर्मका समूह जेता जो कछू लखिये है, तेता सो कछू समस्तही एक निश्चयकरि आत्मा हैं। इसही प्रयोजनके अर्थी इस अध्यात्मप्रकरणविप इस आत्माका ज्ञानमात्रपणाकरि व्यपदेश कीया है, नाम किया है । फेरि पूछे हैं, जो, क्रमरूप अर अक्रमरूप प्रवर्ग हैं अनंत धर्म जा वि ऐसा आत्माके ज्ञानमात्रपणा कैसा है ? ताका समाधान-जी परस्पर व्यतिरिक्त कहिये न्यारा न्यारा स्वरूपधारे जो अनंत धर्म तिनिका समुदायरूप परिणई जो एक ज्ञप्ति कहिये ज्ञानक्रिया तिसमान भावरूपकरि' आपै आप, स्वयमेव ? - ?

- परमाध्यात्मतरनिंगी होनेते आत्मा के ज्ञानमात्रपणा है । आत्माके जेते धम है तेते सर्वही परिणमनरूप हैं। यद्यपि तिनिके लक्षणभेदकरि भेद है, तथापि प्रदेशभेद नाही है । तातै एक असाधारण ज्ञानकू कहते सर्व यामें आय गये । याहीत इस आत्माका ज्ञानमात्र जो एक भाव ताकै अन्तः-पातिनी कहिये याहीमें आय पडनेवाली अनंतशक्ति उदय होय है उघडे है। . इत्याद्यनेकनिजशक्तिषु निर्भरोऽपि यो ज्ञानमात्रमयतां न जहाति भावः। एवं क्रमाक्रमविवर्तिविवर्तचित्रं तद् द्रव्यपर्ययमयं चिदिहास्तु वस्तु ॥७१॥ स०टी०-यः भावः-पदार्थः, ज्ञानेत्यादिः ज्ञानमात्रक्ल्परूपता न जहाति न त्यजति । ननु क्रमाक्रमवृत्तान- तधर्ममयस्यात्मनः कथं ज्ञानमात्रत्वमिति चेदुच्यते-परस्परव्यतिरिक्तानंतधर्मसमुदायपरिणतैकज्ञप्तिमात्रभाव- रूपेण स्वयमेव भवनान् ज्ञानमात्रत्वं । कीहक्षोऽपि ? इत्यादीत्यादिः-गत्याद्याः-भिन्नाभिन्नत्वाद्याः,ताश्च ता अनेकनिजशक्तयस्तासु सतीषु, निर्भरोऽपि अतिशयं गतोऽपि ज्ञानमात्र एव । इद जगति,-तत्-चित्त चेतना वस्तु द्रव्य, अस्ति-विद्यते कीहक्षा ? द्रव्यपर्ययमय द्रव्यपर्यायात्मकं, एवं-पूर्वोक्तप्रकारेण क्रमेत्यादिः- क्रमः-कालकृतः, अक्रमः-युगपत्, क्रमश्चाक्रमश्च क्रमाक्रमौ, ताभ्या विवर्तिनः वर्तनशीलाः विवर्ता:- पर्याया', तैः चित्रं-चित्रता नीतं यथा दोपः क्रमेण अक्रमेण तमोनाशपदार्थप्रकाशादिपर्यायात्मकः तैलशो. पणवृत्तिमुखदाहको ज्वालोत्पादनादिपर्यायात्मकस्तथाल्मादिः ।। ७१ ।। अथ स्याद्वादतः शुद्धि दीव्यति-- अर्थ-इति कहिये ऐसे भिन्न अभिन्नत्वादि अनेक अपनी शक्तिनिकरि भले प्रकार भया है तौऊ जो भाव ज्ञानमात्रमयीपणा नाही छोड है सो चैतन्य आत्मा द्रव्यपर्यायमयी इस लोकमैं वस्तु है । कैसा है ? क्रमरूप अक्रमरूप विशेष वर्तनेवाले जे विवर्त कहिये परिणमनके विकाररूप अवस्था तिनिकरि चित्र कहिये नानाप्रकार होय प्रवर्ने है ।। भावार्थ-कोई जानेगा कि ज्ञानमात्र कडा सो आत्मा एकस्वरूप ही है सो ऐसे नाही है। वस्तुका स्वरूप द्रव्य- पर्यायमयी है, अर चैतन्य भी वस्तु है; सो अनंतशक्तिकरि भरथा है। सो क्रमरूप अर अक्रम- रूप अनेक परिणामके विकारनिका समूहरूप अनेकाकार होय है। अर ज्ञान असाधारण भाव है। ताकू नाही छोडे है। सर्व अवस्था परिणामपर्यायी हैं ते ज्ञानमय हैं ।।७१।। अब इस अनेक- स्वरूप वस्तूकू जे जाने है श्रद्धं है, अनुभवै हैं तिनिके बडाईके अर्थ कलशरूप काव्य कहै हैं- नकांतसंगतदृशा स्वयमेव वस्तुतत्त्वव्यवस्थितिमिति प्रविलोकयंतः । स्याद्वादशुद्धिमधिकामधिगम्य संतो ज्ञानीभवंति जिननीतिमलंघयंतः ॥७२॥ सं० टी०--संत:-सत्पुरुपाः, ज्ञानीभवति-संसारवर्ति अज्ञान'ज्ञानं भवंतीति ज्ञानीभवंति, किकृत्वा ? इति-पूर्वोक्तप्रकारेण, स्याद्वादशुद्धि-अनेकातशुद्धि, अधिका-विचारत' प्रकर्षप्राप्तां, अधिगम्य-ज्ञात्वा, निश्चित्य वा । कीहक्षास्ते ? स्वयमेव-स्वात्मना कृत्वा, वस्त्वित्यादिः-वस्तुनः 'तत्त्व-स्वरूपं-अनेकांतात्म वस्थ व्यवस्थितिः-व्यवस्था, तां अविलोकयन्तः-ईक्षमाणाः, कया ? नैकातेत्यादिः-न एकातो नैकांस.. , 1 - --- सविशुद्ध ज्ञानाधिकार ५८७ स्याद्वादः, कचिदस्य नाकादिमध्यपाठान्न नकारलोप' तत्र सगता-सम्यक् प्राप्ता दृक् दृष्टि', तया, पुन. कीहक्षा ? जिननीति-सर्वज्ञप्रकाशितमार्ग, अलघयत:--अनुल्लघयत. ॥७॥ अथास्योपायोपेयभाव. सभाव्यते- अर्थ-बस्तु है सो स्वयमेव आपै आप अनेकांतात्मक है ऐसे वस्तुतच्चकी व्यवस्थाकू अनेकांत- विपै संगत कहिये प्राप्तकरी जो दृष्टि ताकरि निलोकते देखते संतै सत्पुरुप हैं सो स्याद्वादकी अधिकशुद्धिकू अंगीकार करिकै अर ज्ञानी होय हैं । कैसे भये संते ? जिनेश्वर देवका स्याद्वाद- न्याय ताकू नाही उल्लंघन करते हैं। भावार्थ-जे मत्पुरुष अनेकांता लगाई दृष्टिकरि ऐसे अनेकांतरूप वस्तुतत्वको मर्यादाकू देखते हैं, ते स्यद्वादकी शुद्धि पायकरि ज्ञानी होय हैं । अर जिनदेवके स्याद्वादन्याय नाही उल्लंधै हैं । स्याद्वाद न्याय जैसै वस्तु तैसें कहै है। अमत्कल्पना नाही करै है । ऐसे स्याद्वादका अधिकार पूर्ण कीया ।। ७२ ।। अब ज्ञानमात्र भावके उपाय अर उपेय ए दोऊभाव विचारिये है- ये ज्ञानमात्रनिजभावमयीमकंपां भूमि श्रयनि कथमप्यपनोतमोहाः । ते साधकत्वमधिगम्य भवंति सिद्धा मूढास्त्वमूमनुपलभ्य परिभ्रमति ॥ ७३ ॥ स. टी०-ये-साधव'-कथमपि-केनापि प्रकारेण, महता कष्टेन वा ज्ञानेत्यादिः-ज्ञानमात्रः-ज्ञानेन साकल्य., स चासो निजभावश्च-स्वात्मपरिणाम , तेन निर्वृत्ता भूमि-शुद्धोपयोगभूमि, अयंति भजन्ते, कौरशा ता ? अकपां-निश्चला, अपनीतमोहा. अपनीत.-निराकृत., मोहः रागद्वेषाज्ञानादियः ते योगिनः, साधकत्वं रत्नत्रयादिलक्षणमुपायत्व, अधिगम्य-आश्रित्य, सिद्धाः, उपेयाः-साध्याः, भवति-जायन्ते, आत्मनो ज्ञानमात्रत्वे उपायोपेयभावो विद्यत एव तस्यै कस्यापि स्वयसाधकसिद्धरूपोभयपरिणामित्वात् । मूढाः-अजानिनस्तु अमू अन्तर्नीनानेकातज्ञानमाौकभावरूपा भूमि, अनुपलभ्य-अप्राप्य परिभ्रमति ससारापारभूमिमण्डलीमाक्रमन्ते ॥ ७३ ।। अथ शुद्धापयोगभूमिप्राप्त्युपाय लक्षयति- अर्थ-जे भव्यपुरुप कोई प्रकारकरि कैसेही दूरी भया है मोह अज्ञान मिथ्यात्व जिनिका ऐसे हैं, ते ज्ञानमात्र निजभावमयी निश्चलभूमिकाकू आश्रय करै हैं । ते पुरुप साधकपणाक् अंगीकारकरि सिद्ध होय हैं ! बहुरि जे मूढ मोही अज्ञानी मिथ्यादृष्टि हैं, ते इस भूमिका न पाय अर संसारमै भ्रम हैं। भावार्थ-जे पुरुष गुरुके उपदेश तथा स्वयमेव काललब्धीत पाय मिथ्यात्वसू रहित होय है ते ज्ञानमात्र अपना स्वरूप पाय साधक होय, सिद्ध होय है अर जे ज्ञानमात्र आत्मा नाही पाचै हैं, ते संसारमैं भ्रमै हैं ।७३। अब कहै हैं, जो वह भूमिका ऐसे पाये हैं- स्याद्वादकौशलसुनिश्चलसंयमाभ्यां , यो भावयत्यहरहः स्वमिहोपयुक्तः । ज्ञानक्रियानयपरस्परतीचमैत्रीपात्रीकृतः श्रयति भूमिमिमां स एकः ॥ ७४॥ है ३ परमाध्यारमत गणी सटी०-स एव एकः अद्वितीयो मुनिः इमा-प्रत्यक्षा, भूमि शुद्धोपयोगस्थानं, श्रयति-भजति, कीहक्षः ? ज्ञानेत्यादिः-ज्ञान -स्वात्मज्ञानं, क्रियां-स्वात्माचरणलक्षणां चारित्र त्रयोदशप्रकारलक्षणं वा नया-नयति- प्राप्नोति स्वात्मस्वरूपमिति नयः प्रमाणैकदेशो नैगमादि । दर्शन वा ज्ञान च क्रिया च नयश्च तथा परस्परं अन्योन्या, तीवभत्री-प्रत्यतसखित्वम् तया, अपात्र पात्र कृत इति पात्रीकृतः, स कः ? य.-योगो भाव- यति-ध्यानविषयीकरोति,'कथ? अहरहः-दिने दिने, तत्सामर्थ्यात्प्रतिक्षणं, के ? स् आत्मानं, क ? इह-प्रात्मनि, स्वस्वरूपे काभ्यां स्यादित्यादिः-स्याद्वादः श्रुतनानं । तथा चोक्तं देवागमे- स्याद्वादकेवलज्ञाने सर्वतत्त्वप्रकाशने । भेदः साक्षादसाक्षाच वस्तु ह्यन्यतमं भवेत् ॥ १ ॥ तत्र कौशल्य, निपुणता, सुनिश्चलः-सुष्ठु अक्षोभ्यः, स चासौ संयम:-चारित्र च द्वन्द्वः ताभ्यां । कीहक्षः सः ? उपयुक्तः-शुद्धोपयोगे सावधानः ।। ७४ ।। अथात्मोदयमावभ्यति- अर्थ-जो पुरुष स्याद्वादन्यायका प्रवीणपणा अर निश्चलनतसमितिगुप्तिरूप संयम इनि दोऊनिकरि अपने ज्ञानस्वरूप आत्माविर्षे उपयोग लगावता संता आत्माकू निरंतर भाव है, सोही पुरुप 'ज्ञाननय अर क्रियानयकरि इनि दोऊनिकेविपैं परस्पर भया जो तीव्र मैत्री भाव तिसका पात्ररूप भया इस निजभावमयी भूमिकाकू पावै है ।। भावार्थ-जो ज्ञाननयहीकू ग्रहणकरि क्रियानयकू' · छोडे है, सो प्रमादी स्वच्छन्द भया इस भूमिकून पाये हैं। बहुरि जो क्रिया नयकू ग्रहणकरि ज्ञाननयकू नाही जान है सो भी शुभकर्ममें संतुष्ट भया इस निष्फर्मभूमिकाकू नाही पावै है। वहुरि ज्ञान पाय निश्चल संयमकू अंगीकार करै हैं तिनके ज्ञाननयके अर क्रियानयके परस्पर अत्यंत मित्रता होय है ते इस भूमिकाकू पावै हैं । इनि दोऊ नयनिका ग्रहणत्यागका रूप वा फल पंचास्तिकायग्रन्थके अन्तमैं कह्या है, तहातै जानना ॥ अब कहै हैं, इस भूमिकाकू पावै है सोही आत्माकू पावै है- चिलिंडचंडिमविलासिविकासहासः शुद्धप्रकाशभरनिर्भरसुप्रभातः । आनंदसुस्थितसदास्खलितैकरूपस्तस्यैव चायमुदयत्यचलार्चिरात्मा ॥७५॥ सं० टी०--तस्योव मुनेः शुद्धोपयोगभूमिनतस्य न पुनरन्यस्य, अगं-आत्मा-चिद्रूपः, उदयति उदयं प्राप्नोति-साक्षाद्भवतीत्यर्थः, कीदृक्षः सः ? चिदित्यादिः-चिपिडः-ज्ञानपिंडः तस्य चडिमा-प्रौढत्य, नेन विलसतीत्येन शीलो विकासः स एव हासः-झर्भरं यस्य सः अन्योप्युदये विकासहासो भवतीत्युक्ति- लेशः पुनः कीदृशः ? शुद्ध त्यादिः शुद्धः-क्रममलकलङ्करहितः स चासौ प्रकाशश्च ज्ञानोद्योतः तस्य भरः- समूहः स एव निर्भरप्रभातः-सातिशयप्रातःकालो यस्य सः अन्यस्याप्युदये प्रातः कालो भवति । पुनःकीदृशः, आनन्देत्यादि -आनन्दे-अकर्मशमणि सुस्थितं सुप्रतिष्ठं सदा नित्यं, अस्खलितकरूप' स्खलितरहित एक अद्वितीय स्वरूपं यस्य स',अन्यस्याप्युदयस्यास्खलितस्वरूपं भवनीत्युक्तिलेशः ॥ ७५ ।। अथ स्वस्वभा- वविस्फुरणं काम्यति- अर्थ-जो पुरुष पूर्वोक्त प्रकार भूमिकू पावै है तिसही पुरुपके यह आत्मा उदय होय हैं।' कैसा है आत्मा ? चैतन्यका-जो पिंड ताका निरर्गलविलास करनेवाला जो विकास प्रफुल्लित .

। . 1 , सर्गविशुद्धज्ञानाधिकार Ve -होना तिसरूप है हास कहिये फूलना जाका,बहुरि कैसा है, शुद्धप्रकाशका भर कहिये समूह ताकरि भला प्रभातसारिखा उदयरूप है । वहुरि कैसा है ? आनंदकरि भलै प्रकार तिष्ठया सदा नाही. -'चिगता है एकरूप जाका ऐसा है बहुरि कैसा है ? अचल है अर्चि कहिये ज्ञानरूप दीप्ति जाकी ।। भावार्थ-इहां चिपिड इत्यादि विशेषणतै तौ अनंतदर्शनका प्रकट होना जनाया है । बहुरि कैमा है ? अचल है शुद्धप्रकाश इत्यादि विशेपणते अनंतज्ञानका प्रकट होना जनाया है । अरु आनंदसुस्थित इत्यादि विशेषणकरि अनंत सुखका प्रकट होना जनाया है। अर अचलार्चि इस विशेषणकरि अनंतवीर्य का प्रकट होना जनाया है । पूर्वोक्त भूमिके आश्रयतै ऐसा उदय हो है ॥७५|| अब कहै हैं, ऐमाही आत्मस्वभाव हमारे प्रकट होउ.- स्याद्वाददीपितलसन्महसि प्रकाशे शुद्धस्वभावमहिमन्युदिते मयीति।। किं बंधमोक्ष पथपातिभिरन्यभावैनित्योदयः परमयं स्फुरतु प्रभावः ७६ स० टी०-इति-हेतोः, अय-प्रमिद्ध , स्वभाव.-आत्मस्वरूप स्फुरतु-प्रकाश यातु, पर-केवल, कीडश: सः नित्योदयः नित्य सदा उदयो यस्य सः । इति कि ? मयि शुद्धभावे आत्मनि उदिते उदय प्राप्ते सति, अन्यभावः-शुभाशुभोपयोगैः किं ? न किमपि स्यात् । कीदृशैस्तैः ? गंधेत्यादिः-कर्मणां बन्धश्च , मोक्षश्च अर्घमोचौ तयो. पंथाः-मार्गः, तत्र पातिभिः पतनशीलै. अयं बंधहेतुः, अयं मोक्षहेतु', इत्यादीना भावानां प्रयोजनाभावात् । कीहक्षे तस्मिन् १ स्यादित्यादिः-स्याद्वादः-श्रुत-भावश्रुतं, तेन दीपित, लसन्महः- उल्लसत्तेजः यस्य तस्मिन्, प्रकाशे स्वपरप्रकाशात्मके, पुनः शुद्धत्यादिः-शुद्धस्वभावे महिमा-माहात्म्य यस्य तस्मिन् ॥ ७६ ।। अथ चिन्महो रोचते- अर्थ-मोवि. स्याद्वादकरि दीपित कहिये प्रकाशरूप भया है.लहलाट करता तेजःपुज जामैं, बहुरि शुद्ध स्वभावकी है महिमा जामें ऐसा ज्ञानप्रकाश उदय होते बंधमोक्षके मार्गमें पटकनेवाले जे अन्यभाव तिनिकरि कहा साध्य है ? मेरे तो केवल अनन्तचतुष्टयरूप यह अपना स्वभाव सो निरंतर उदयरूप भया स्फुरायमान होउ ।। भावार्थ-स्याद्वादकरि यथार्थ आत्मज्ञान भये पीछे याका फल पूर्ण आत्माका प्रगट होना है सो मोक्षका इच्छक पुरुष यह ही प्रार्थना करै है, जो मेरा पूर्णस्वभाव आत्मा उदय होऊ । अन्यभाव बंधमोक्षमार्ग की कथारूर है, तिनिकरि कहा प्रयोजन है ? अब कहै हैं, जो, नयकरि आत्मा साधिये हैं, परन्तु नयहीपरि दृष्टि रहै तौ नयनिके परस्पर विरोध भी है । तातै मैं नयनिकू अविरोध करि आत्माकू अनुभवूहों। चित्रात्मशक्तिसमुदायमयोयमात्मा सधः प्रणश्यति नयेक्षणखंडयमानः। तस्मादखंडमनिराकृतखंडमेकमेकांतशांतमेचलं चिदह महोऽस्मि ॥ ७७ ॥ - " - .

परमाध्यात्मतरी जो सं. टी-अयमात्मा-चिदप, नय इत्यादिः-नयानां-दव्यपर्यायाणा ईचणं-अवलोकन, तन खड्य- मानः-मिद्यमानः, प्रणश्यति व्यक्षेत्रकालभावन सरड्यते इत्यर्थः । कीरतः ? चित्रेत्यादि.--चित्रा:-नाना. प्रकारा.. ताच ता अत्मशजयश्च-जीवशक्तिचितिशक्तिशिशक्तिवानशक्तिमुम्बशतिवायशक्ति प्रभुत्वशक्तिचि. भुत्वशक्तिमबर्शिवशक्तिमजयशक्तिसत्त्वशक्तिप्रकाशशक्तिसंकुचितविकाशवशक्तिकार्यकारणशक्तिपरिणा- न्यपरिणामिकत्वशत्तियागोपादानशून्यत्सागुलबुवोत्पादव्यच धृवत्यपरिणाममूर्त-वाकवाभोक्तृत्यनि- क्रियानियसप्रदेशत्ववधर्मव्यापकत्वसाधारणासावागणाधनत्यानंतधर्माविरुद्धधर्मत्यतत्वानकत्वा- नकलभागभावाभावामागमात्रमारभावाभावाभावाभावनिया कर्मक करणसंप्रदानापादानाधिक- रणवसंबवादयः-शक्तयः, तासां ममुदायेन निवृत्तः, अस्माकारणात, अई-चित चेतना नहा-धाम, अस्मि-भवामि कीनं महः ? अन्नई-न खड्यते केनापीत्यखंड.अनिरित्यादि.-अनिगना- दूरीकृता व्यवहारनयापेक्षया खण्डाः पर्याया यस्य तन एक-अद्वितीय कर्म व्यतिरित्तवात एकांनशांत-एकांतन अद्वितीयन स्वभायन शांद-समाहढं पुनः अपलं स्वस्वभावाबग्निश्वरत्वान्निश्चल ।। ७ ।। अथ नान- मानत्वं मंच्यते आमन- अर्थ-यह आन्मा है सो चित्र कहिये अनेक प्रकार जे अपनी शक्ति निनिकं समुदायमय है। सो नयनिकी दृष्टिकरि भेदरूप कीया हुवा तत्काल खंडखंडस्प होय नाशक्त प्राप्त होय है। तात में मेरा आत्मा ऐसें अनुभव हों जो,मै चैतन्यमात्र मह वस्तु हो सो कैसा हाँ नाही निराकरण कीये है खंड जाम तौऊ खंड-भेद रहित अखंड हों, एक हों बहुरि एकांतशांत रूप हौं । जाम कर्मका उदयका लेश नाही ऐमा शांतभावमय हो । अर अचल हौं, कमका उदयका चलाया चलू नाही हौं ॥ भावार्थ-आत्मामें अनेकशक्ति है, अर एक एक शक्तीका ग्राहक एक एक नय है, मो नयनिकी एकांत दृष्टिकरिही देखिये तो आत्माका खंड खंड होय नाश होय जाय । तात स्याद्वादी नयनिका विरोध मेटि चैतन्यमात्र वस्तु अनेकशक्तिसमूहरूप सामान्यविशेपस्वरूप सर्वशक्तिमय एकज्ञानमात्र अनुभव कर है। ऐसा वस्तुका स्वरूप है तामै विरोध नाही ।। अब अखंड आत्मा का ऐसा अनुभव कर सो कह हैं जो ज्ञान तो मै हो,. ज्ञेय ज्ञेय है- योयं भावी ज्ञानमात्रोहमस्मि ज्ञेयो ज्ञयज्ञानमात्रः स नैव । ज्ञेयो जे यज्ञानकल्लोलबलगन ज्ञानज्ञ यज्ञातृमद्वस्तुमात्रः ।। ७८ ॥ मटी-चायं-प्रसिद्धः, शानमात्रः ज्ञानस्य मानं जास्यं यत्र स भाव:-पदार्थःन एवाई अस्मि भवामि, यः यज्ञानमात्र ने यानां-पदार्थानां, जानमात्रः-तदुत्पत्त्यादिना पदार्थाकारमात्रः मोह नैव बेयः ज्ञातव्यः, तहिं कीनोहं ? येत्यादिः-वेचच ज्ञानं व उत्परिच्छेदकं ज्ञवज्ञान तयोः कल्लोला: वीचया, अाहिस्तित्र वलान्-वलानं कुर्बन तद्ग्रहणं कुर्वदित्यर्थः तच तज्ज्ञानं च तदेव जयं-परि- च्छेच, तस्य यो ज्ञातुमत-वायत्र-त्रपरपरिच्छंदकं तब तवस्तु च तदेव मात्रं-प्रमा यस्य सः यः-बात- चः ॥ ७८ || अथाम्नः प्रतिमानमेई नंपूरयति- This साविशुद्धज्ञानाधिकार अर्थ-जो यह ज्ञान मात्र भाव मै हौं सो ज्ञयका ज्ञानमात्र ही नाही जानना । तो यह ज्ञान- मात्रभाव कैसा जानना १ ज्ञयनिके आकार जे ज्ञानके कन्लोल तिनिकू विलगता ऐसा ज्ञान,सोही ज्ञान सो ही जेय सोही ज्ञाता ऐसें ज्ञान,ज्ञय, ज्ञाता इनि तीन भावनिसहित वस्तुमात्र जानना भावार्थ-अनुभव करते ज्ञानमात्र अनुभवै । तब बाह्य जय तौ न्यारेही ज्ञानमैं पैठे नाही वहुरि ज्ञयनिके आकारही झलके ज्ञानमैं है । सो ज्ञान भी ज्ञयाकाररूप दीखे है, ए ज्ञानके कल्लोल हैं। सो ऐसा ज्ञानरूप भी ज्ञानका स्वरूप है । अर आपकरि आप जाननेयोग्य है तातै ज्ञ यरूपभी ॥ अर आपही आप जाननेवाला है यात ज्ञाताभी है। ऐसे तीनू भावस्वरूप ज्ञान एक है। याहीत सामान्यविशेपस्वरूप वस्तु कहिये तिसमात्रही ज्ञानमात्र कहिये । सो अनुभव करने- चाला ऐसैंही अनुभव करै, जो, ऐसा ज्ञानभाव यह मै हौं । अव कहै हैं, अनुभवकी दशामैं अनेकरूप दीखे हैं तोऊ यथार्थज्ञाता निर्मल ज्ञानकू' भूल नाही है- कचिल्लसति मेचकं कचिन्मेचकामेचकं कचित्पुनरमेचकं सहजमेव तत्वं मम । तथापि न विमोहयत्यमलमेधसां तन्मनः परस्परसुसंहतप्रकटशक्तिचक्र स्फुरत् स० टी०-ममात्मन. तत्ता-ज्ञानस्वरूप, कचित्-कस्मिन् क्षणे, वहि.-पदार्थग्रहणसमये, मेचकं चित्र- स्वरूप पक्षांतरे रागद्वपकलुपीकृत वा लसति-विलास करोति ' पचवर्ण भवेद्रत्न मेघकास्यमिति-वचनात् तद्वत् ज्ञानमपि चित्राकार मेचक भएयते । पुनः-भूयः, कचित् महजशुद्धटकोत्कीस्विरसस्वभावालबन- समये अमेचक-बहिश्चित्राकाररहित रागद्वे पमोहमलमुक्त वा विलसति । कीदृक्ष ? सहज-यहमेच स्वरूपं तत्स्वरसज, एव-निश्चयेन, परेपामन्योपाधिसापेक्षत्वात् पुन. क्वचित-स्वपरग्रहणोन्मुखसमये, मेचकामेचक परस्वरूपग्रहणोन मेचक, स्वरूपग्रहणेन अमेचक प्रतिभासते तथापि मेचकामेचकस्वरूपप्रतिभासेऽपि, तत आत्मतत्व कत, अमलमेधसा-निर्मलज्ञानिना, मनः चित्त, कर्मतापन्न न विमोहयति मोहं न प्रापयति, सहेतुविशेषगमाह परस्परेत्यादि-परस्पर-अन्योन्यं, सुसहता-सम्यगमिलिता सा चासी प्रकटशक्तिश्च स्फुटसामा, तेपा चक्र समूहो यत्र तत्, पुनः स्फुरत्-देदीप्यमान ।। ७ ।। अशैकत्वाने कत्वादिप्रतिभासन याभायते- अर्थ-अनुभवन करनेवाला कहै है-जी, मेरा आत्मतत्व है सो कई तौ मेचक लखै है अनेकाकार दीखे है । बहुरि कहें अमेचक कहिये अनेकाकाररहित शुद्ध एकाकार दीखै है बहुरि कहुँ मेचकामेचक कहिये दोऊ रूप दीखे है । तोऊ ने निर्मलवुद्धि हैं तिनिका मनकू भ्रमरूप नाही करै है । जातं कैमा है ? परस्पर भलै प्रकार मिली जे प्रकट अनेक शक्ति तिनिका समूह स्वरूप स्फुरायमान होता है । भावार्थ-आत्मतत्व है सो तो अनेक शक्तीकूलीये है । ताते कोई अवस्थामें तौ अनेक आकार कर्म उदयके निमित्तकरि अनुभवमें आवै हैं । बहुरि कोई अवस्था में शुद्ध एकाकार अनुभवमें आवै है बहुरि कोई अवस्थामें शुद्धाशुद्धरूप अनुभवमे आये है।

- - अद्भुतं १ परमाध्यात्मतरङ्गिणी तौऊ यथार्थज्ञानी स्याद्वादक वलकरि भ्रमरूप न होय है । जैसा है तैसा मान है ज्ञानमात्रसू च्युत न होय है। अब कहै हैं, जो, अनेकरूप धरता यह आत्माका अद्भुत आश्चर्यकारी विभव है- इतो गतमनेकतां दधदितः सदाप्येकतामितः क्षणविभंगुरं ध्रुवमितः सदैवोदयात इतः परमविस्तृतं धृतमितः प्रदेशैनिजैरहो सहजमात्मनस्तदिदमद्भुतं वैभवं ॥८॥ सं० टी०-अहो-महाश्चर्ये, तदिद, आत्मनः-चिद्रूपस्य सहज-स्वाभाविक, मन-माहात्म्यां, आश्चर्यकारि, तत् किं ? यदिदं इत:-अस्मात् शुद्धपर्यायार्पणात, अनेकता-ज्ञानदर्शनस्ववीर्याद्यनेम्वरूपं गतं--प्राप्तं, अपि-पुनः, यत् 'इत:-अस्मात् संग्रहनयात्, सदापि-सदापि, एकता-आत्मद्रव्येणैकत्तां गन-प्राप्तां । ननु यदनेक तदेकं कथं स्यात् अन्यथा घटपटादीनामनेकत्वेऽप्येकलां स्यादिति चेन्न, नयार्पणा- देकत्वानेकत्वघटनात् सदात्मना घटादीनामनेकत्वेऽपि एकत्वघटनाञ्च अन्यथाऽभावप्रसगात् यत् इन:-ऋजु- सूत्रनयात् क्षणविभंगुरं-प्रतिक्षण विनश्वरं पुन:-यत्, इतः-द्रव्यार्थिकनयात्, सदैव-नित्यमेव,-नित्यं, सदैवोदयात-उत्पादाद्यभावे मदा प्रकाशमानत्वात् । ननु यत्क्षणिकं तत्कथं ध्रुवं शीतोष्णवत्तयोरन्योन्यं विरोधात् इति चेन्न नयविवक्षासद्भावात मृद्रव्यवत् यथा मृद्रव्य मृत्पिडाकारेण विनष्ट तद्घटाकारणो- त्पद्यते मृद्रव्यम्य ध्रुवतां च तथात्मद्रव्यस्यापि यत् पुनः इतः-द्रव्यार्पणात् पर केवलं, अविस्तृतं-विस्तारा- भावविशिष्टं, इत:-पर्यायविवक्षातः, निजैः-आत्मीयैः प्रदेशैः असख्यसंख्यावच्छिन्नधूत-भृतं, विस्ता. रिद्रव्यमित्यर्थः ॥ ३० ॥ श्रथात्मनः स्वभावो विजयते- अर्थ-अहो वडा आश्चर्यकारी ! सो यह आत्माका स्वाभाविक अद्भुत विभव है जो इतः कहिये एक तरफ देखिये तो अनेकनाकूधारता है, यह पर्यायदृष्टि है । बहुरि एकतरफ देखिये तो सदाही एकताकूधारता है, यह द्रव्यदृष्टि है । बहुरि एकतरफ देखिये तो क्षण- भंगुर है, यहभी क्रमभावी पर्यायदृष्टि है । बहुरि एक तरफ देखिये तो ध्रुर दीखे है, यह सह- भावी गुणदृष्टि है । जाते सदा उदयरूप दीखे है । बहुरि एकतरफ देखिये तो परमविस्तारस्वरूप दीखै है यह ज्ञान अपेक्षा सर्वगतदृष्टि है । बहुरि एकतरफ देखिये तो अपने प्रदेशनिकरि धारिये है, यह प्रदेशनिकी अपेक्षा दृष्टि है। ऐसा आश्चर्यरूप विभवकू आत्मा धार है ।। भावार्थ-यह द्रव्यपर्यायात्मक अनंतधर्मा वस्तूका स्वभाव है । सो जो पूर्वे अज्ञानी हैं, निनिके ज्ञानमें आश्चर्य उपजावै है । सो असंभवती वार्ता है । बहुरि ज्ञानिनिके वस्तुस्वभावमें आश्चर्य नाही है । तोऊ अद्भुत परम आनंद ऐसा होय है, ऐसा कबहु पूर्वे न भया यह आश्चर्य भी उपज है । फेरि इसही अर्थरूप काव्य है- कषायकलिरेकतः स्खलति शांतिरस्त्येकतो भवोपहतिरेकतः स्पृशति मुक्तिरप्येकतः।

. . - । . - . - सर्गविशुद्धझानाधिकार जगत्रितयमेकतः स्फुरति चिच्चकास्त्येकतः स्वभावमहिमात्मनो विजयतेऽद्धतादद्वतः॥८॥ सं० टी-विजयते-सर्वोत्कर्पण वर्तते, कः? स्वभावमहिमा, ज्ञानस्वरूपमाहात्म्य, कस्य ?, आत्मनः चिपस्य, अद्भुतः-आश्चर्योद्रेककारी, कुतः अद्भुतात् आश्चर्यकारिजगतपदार्थात् , तत्कथमित्याह, एकतः-एकस्मिन्नशे, कपायकलि'-रागद्वे पमोहकलह. स्खलति । एकतः-शुद्धनिश्चयनयावलंवनांशे, शांतिः परमसाम्य, अस्ति-विद्यते। एकत:-व्यवहारनयावलयनांशे भवोपतिः भवस्य-द्रव्यादिपंचासँसारस्य उपहतिः प्राप्तिरस्ति, एकतः-शुद्धनयांशे, मुक्तिरपि-कर्ममलमोचनमपि स्पृशति-आश्रयति । आत्मान, एकतः एकस्मिन्नंशे जगत्त्रय गच्छत्तीति जगति गम्ल गती, इत्यस्य धातो. यति गमोर्वेचेति किप्प्रत्यये नेति सिद्ध, जगतागं अधोमध्योलभेदेन त्रिक स्फुरति-चकास्ति, एकता-एकांशे, चित-ज्ञानं, चकास्ति द्योतते ॥१॥ अथैकत्व तस्य जेगीयते- अर्थ-आत्माका स्वभावका महिमा है सो अद्भुततें अद्भुत विजयरूप प्रवौं है काहुकरि वाध्या नाजाय है। कैसा है ? एकतरफ देखिये तो कपायनिका कलेश दीखे है। बहुरि एकतरफ देखिये तो कपायनिका उपशमरूप शांत भाव है । बहुरि एकतरफ देखिये तो संसारसंबंधी पीडॉ दीखे है । बहुरि एकतरफ देखिये तो संसारका अभावरूप मुक्ति भी स्परौं है । बहुरि एक. तरफ देखिये तो केवल एक चैतन्यमात्रहीं सोभै है। ऐसे अद्भुततै अद्भुत महिमा है | भावार्थ-इहांभी पहले काव्यके भावार्थरूपही जानना । यह अन्यबादी सुणि बडा आश्चर्य करें हैं । तिनिके चित्तमें विरुद्ध भासे, सो समाही सके. नाहीं । अर तिनिकै कदाचित् श्रद्धा आयें तौ प्रथम अवस्थामै बडा अद्भुत दीखे, जो, हमने अनादिकाल यौहीं खोया ।, यह जिनवचन पड़े उपकारी है, वस्तुका स्वरूप यथाथ 'जनावै हैं । ऐसें आश्चर्यकरि श्रद्धान कर हैं।श आगे टीकाकार इस सर्व विशुद्ध ज्ञानका अधिकार पूर्ण करै हैं ताके अंतमंगल अर्थी इस चिञ्चमत्का. रहीकू' सर्वोत्कृष्ट कहै हैं- विशेष-सस्कृतटीकाकारने उपहतिका अर्थ प्राप्ति किया है। और भाषाटीकाकारने पीडा। यहां पीडा अर्थ उपयोगी जान पडता है। जयति सहजतेजःपुञ्जमज्जवत्रिलोकीस्खलदेखिलविकल्पोप्येक एव स्वरूपः। स्वरसविसरपूर्णाच्छिन्नतत्त्वोपलभः प्रसभनियमितार्चिश्चिचमत्कार एषः ॥२॥ स० टी०-एप:-प्रत्यक्षः चिच्चमत्कारः-चैतन्याश्चर्योद्रेकः, जयति--सर्वोत्कर्पण वर्तते 'कीहक्षः ? सहजेत्यादि.-सहज-स्वाभाविक तच्च तत्तेजश्च, ज्ञानज्योतिः- तस्य, पुजः द्विकारानंतशक्तिसमूहः तत्र मजति मज्जनं कुर्वती, प्रतिभासमानेत्यर्थः सा चामौ त्रिलोकी च-त्रयाणा लोकाना समाहारस्त्रिलोकी तया '५ . - , परमाध्यात्मतरङ्गिणी स्खलंतः-चलंतः, अखिलविकल्पा:-तद्विषयरूपेण समस्तविकल्पाः यत्र सः इदक्षोऽपि एक एव-अद्वितीय एव स्वरूपः-स्वस्य-आत्मनः, रूपं-स्वरूप यत्र सः, पुनः स्वेत्यादिः-स्वरसः-स्वभावः तस्य विसरः समूहः, तेन पूर्ण-सपूर्ण, तञ्च तदच्छिन्नतत्त्वं चाखडात्मतत्त्वं तस्योपलभः-प्राप्तियंत्र सः, पुनः प्रसभे- त्यादि-प्रसभेन-बलात्कारेण, नियमित लोकालोकप्रकाशकत्वेन निश्चयीकृतं, अपरप्रकाश्यस्याभावादर्चिः तेजः, यस्य सः ।।२२।। अथे कत तागर्मितमात्मज्योतिर्जाज्वल्यते- "अर्थ-यह प्रत्यक्ष अनुभवगोचर चैतन्यचमत्कार है सो जयवंत प्रयतॆ है । काहकरि बास्था न जाय ऐसे सर्वोत्कृष्ट होय प्रवते है कैसा है ? अपना स्वभावस्वरूप जो तेजः प्रकाशका पुञ्ज तावि मग्न होते ने तीन लोकके पदार्थ तिनिकरि होते दीखते हैं अनेक विकल्प भेद जामें ऐसा तौऊ एकस्वरूप ही है । भावार्थ-केवलज्ञानमैं सर्व पदार्थ झलके हैं. ते अनेक ज्ञेयाकाररूप दीखे हैं तौऊ चैतन्य रूप ज्ञानाकारकी दृष्टीमें एकही स्वरूप हैं । बहुरि कैसा है ? अपना निजरसकरि पूर्ण ऐसा नाही छिद्या हैं तत्वस्वरूपका पावना जाकै ।। भावार्थ-प्रतिपक्षी कर्मका अभाव भया, तति नाही पाया स्वभावका अभाव जाकै ऐसा है ।। बहुरि कैसा है ? प्रसभ कहिये प्रकट चला- कारे नियमरूप है दीप्ति जाकी । अपना अनंतवीर्य तो निष्कप तिष्ठै है ऐसा चिञ्चमत्कार जय- वंत है। यहां जयवंत कहने में सर्वोत्कर्षकरि वर्तना कह्या, जो यहही मंगल है ।।२।। आगे टीका कार अपना नाम प्रकट करते पूर्वोक्त आत्माही आशीर्वाद कर है- अविचलितचिदात्मन्यात्मनात्मानमात्मन्यनवरतनिमग्नं धारयद् ध्वस्तमोहें। उदितममृतचंद्रज्योतिरेतत्समंताज्ज्वलतु विमलपूर्ण निस्सपत्नस्वभावं ॥३॥ सं० टी०-समतात्-सामस्त्येन ज्वलतु द्योतता, किं ? एतत-प्रसिद्ध अमृतेत्यादिः-न नियते यत्र इत्य- मृतं-मोक्षः,तदेव चन्द्रः चन्द्रयति-आहादयति इति चन्द्रः,तस्य व्योतिः-ज्ञानतेजः इत्यर्थः अथवा अमृतचन्द्र- सूरेग्ज्यिोतिः, कीहक्षं मोक्षकानं ? आत्मना ज्ञानेन कृत्वा श्रात्मनि स्वस्वरूपे, आत्मानं-स्वस्वरूप धार- यत् दधत् कीहक्षे ? अविचलितेत्यादिः-अविचलितः-शाश्वतः, स चासौ चित्-चेतना च स एवात्मा-स्वरूपं यस्थ तस्मिन् तद्वाग्ज्योतिरपि स्वरवरूपे स्वरूपं धारयितु क्षमं । कोहनं पुनः ? आत्मनि अनवरतनिमग्न- निरंतरं तदंतःपातितं पुनः ध्वस्तमोह- ध्वस्तः-बिनष्टः मोहो यत्र यस्मात्प्राणिनां वा वत् अदित-उदर्भ प्राप्त वाग्ज्योतिरपि भव्यप्रतियोधनायोदयं गतं । पुनः विमलपूर्ण विगतो मलोऽनानादिरसत्यादिर्वा यस्मात्तत् पूर्ण ज्ञानादिगुण पूर्ण विविधार्थसंपूर्ण च विमलं च तत् पूर्ण च तत् । निरित्यादिः-निर्गताः, सपना:-कर्मवैरिणः-एकांतमतवादवैरिणश्च यस्मात्तत् तदेव स्वभावो यस्य तत् ॥८३ ॥ अथात्मकर्मणो- देतेऽपि ज्ञानोद्योतं नरीनृत्यते । अर्थ-यह अमृतचंद्रज्योति कहिये जामै मरण नाही तथा जाकरि अन्यकै मरण नाही सो अमृत, तथा अत्यंत स्वादरूप मिष्ट होय ताई लोक रूहिकरि अमृत कह हैं। ऐसा अमृतमयी जो चंद्रमासारिखा ज्योति प्रकाशस्वरूप ज्ञान, प्रकाशरूप आत्मा, सो उदयकू प्राप्त भया । . - . , - PAR MAA - सर्गविशुद्धज्ञानाधिकारी १६५ सो यह समंतात् कहिये सर्व तरफ सर्वक्षेत्रकालमें, ज्वलतु कहिये दैदीप्यमान प्रकाशरूप रहौ । कैसा है ? अविचलित कहिये निश्चल जो चित् कहिये चेतना सो है स्वरूप जाका ऐसा जो अपना आत्मा, ताविर्षे आपहीकरि आत्माकू निरंतर मग्न हुवा धारतासंता है, पाया स्वभाव ई कबहूं नाही छोडता है । बहुरि कैसा है.१ ध्वस्त कहिये नाशप्राप्त मया है मोह जाका अज्ञान अन्धकारकू' रि कीया है । बहुरि निस्सपस्न कहिये प्रतिपक्षी कर्मकरि रहित ऐसा है स्वभाव जाका । बहुरि कैसा ? निर्मल है.अर पूर्ण है। भावार्थ-इहां आत्माकू अमृतचंद्र- ज्योति कह्या सो यह लुप्तोपमा अलंकारकरि कह्या जानना । जात, अमृतचन्द्रवत् ज्योति ऐसा समासवि. वत् शब्दका लोप होय है तव अमृतचन्द्रज्योति कहिये । तथावत् शब्द ना करिये तब अमृतचन्द्ररूपज्योति ऐसा कहिये। तब भेदरूपक अलंकार है । तथा अमृतचन्द्रज्योति ऐसा ही आत्माका नाम कहिये तब अभेदरूप अलंकार हो है । अर याके विशेषण है 'तिनिकरि चन्द्रमात व्यतिरेक भी है । जाते वस्तमोह विशेषण तौ अज्ञान अन्धकार दूरि होना !जणावे है। अर निर्मल पूर्ण विशेषण लांछनरहितपणा पूर्णपणा जणावै है । अर निःसपत्नस्वभाव विशेषण -राहुविवतै तथा चादला आदिकरि आच्छादित न होना जणाचे है। समंतात् ज्वलन है जो सर्वक्षेत्र सर्वकालमें प्रकाश करना जणावै है । चन्द्रमा ऐसा नाही । बहुरि - 'अमृतचन्द्र ऐसा टीकाकार अपना नामभी जणाया है बहुरि याका समास पलटिकरि अर्थ कीजिये तव अनेक अथ होय हैं सो यथासंभव जानने ॥ यस्माद् हैतमभूत्पुरा स्वपरयोभूतं यतोऽत्रांतरं रागद्वषपरिग्रहे सति यतो जातं क्रियाकारकैः । भुजानी च यतोनुभूतिरखिलं खिन्ना क्रियायाः फलं तद्विज्ञानघनौघमग्नमधुना किंचिन्न किंचित्किल ॥४॥ सं० टी०-तत्-कर्म, विज्ञानघनौघमग्न-ज्ञाननिरतरसमूहांतः पतितं सत् अधुना-इदानीं, ग्रन्थोक्तस्वा- र्थानुभावे जाते सति किंचित्-किमपि कर्म किलेति-निश्चित, न किंचित्-न किम,क्रियाकारि अकिचित्क- रत्वात् तत्कि ? यस्मात्-कर्मणः पुरा-पूर्व, द्वैत-आत्माकर्मेति, वैविध्यं जात, 'पुनः अत्र-जगति यतः- यस्माकर्मणः स्वपरयोः-आत्मकर्मणो.-सिद्धस्वात्मनोर्वा, अतरं-भेदः-भूतः-समुत्पन्नः, क सति .? रागे- त्यादिः-रागद्वषयोः परिग्रहे अगीकारे जाते सति । पुनः यतः कर्मण. सकाशात क्रियाकारकैः आत्मनः क्रियाः कर्मफलानुभवनरूपगमनागमनरूपाश्च कारकाणि-आत्मनः कर्तृ स्वकर्मत्वकरणत्वादीनि तैः जातं उत्पन्न कर्मातरेणात्मनः क कर्मक्रियारूपेणाभवनात, 'च-पुनः, यतः 'यस्मात्कर्मणः,' अनुभूतिः-कर्मफलानु- भवन खिन्ना-खेदं गता, कीहक्षा सा क्रियायाः-गमनागमनरूपाया जुहोतिपचतीयादिरूपायाश्च, अखिलं समस्तं फल भुजाना मया गत मयाऽऽगत मया हुत मया पन ममेद कृतमित्यादिरूपफलां मुजाना ।। ८४ ॥ । . - , 1- । - - . - + ... M - 1 । परमध्यात्मतरङ्गिणी अथात्मगुप्तस्य स्वतत्त्वसंसूचकस्य समयसारकृतिकृतत्वमस्य कृतविशुद्धबुद्धचित्स्वरूपभूरेरमृतचन्द्रसूरेः कृतकृत्वत्ता कोय॑ते- . अथ-यस्मात् कहिये जिस परसंयोगरूप बंधपर्याय जनित अज्ञानते प्रथम तो अपना अर परका द्वैतरूप एकभाव भया, बहुरि जिस द्वैतपणात अपने स्वरूपविर्षे अंतरं भयां, बंधपर्यायही आपा जान्या, बहुरि तिस अंतर पडनेते रागद्वेपका परिग्रह भया; तिसके होते क्रिया अरं कर्ता -कर्म आदि कारकनिकरि भेद पडया, बहुरि तिस क्रिया कारकमें भेदकरि आत्माको अनुभूति है, सो क्रियाका समस्तफलकू भोगती संती खेदखिन्न भई सो ऐसा अज्ञान है, सो अब ज्ञान भया। तब तिस विज्ञानघनके समूहविर्षे मग्न होय गया सो! अब याकू देखिये तो किछू भी नाही है। यह प्रगट अनुभवमें आवै है । भावार्थ-अज्ञान है सो परसंयोगतै ज्ञानही अज्ञानरूप परिणया था। कछू दूजा तौ वस्तु था नाही । सो अब ज्ञानरूप परिणम्या तब किछूभी न रह्या । तब इस अज्ञान- के निमित्तौ राग, द्वेष, कर्ता, कर्म, सुख, दुःख आदि भाव होंय थे; ते भी विलाय गये। एक ज्ञान ही ज्ञान रहि गया। तीन कालवर्ती अपना परका सर्व भावनिकू आत्मा ज्ञाता द्रष्टा हुआ देखयो करौ ॥५४॥ आगै अमृतचंद्र आचार्य इस ग्रंथ करनेका अभिमानरूप कपायकं दूर करता संता यथार्थ कहै हैं-'-: स्वशक्तिसंसूचितवस्तुतत्त्वैर्व्याख्या कृतेयं समयस्य शब्दैः। . स्वरूपगुप्तस्य न किंचिदस्ति कर्तव्यमेवामृतचंद्रसूरेः ।।५।। t० टी०-येन-अमृतचन्द्रसूरिणा इत्याध्याहार्ग इयं व्याख्या-व्याख्यान, कृता-निर्मापिता, कस्य ? समयस्य सं-सम्यग् अयति-गच्छति प्राप्नोति स्वगुणपर्यायानिति समयः-पदार्थः तस्य, 4:? शब्दैः- अर्थप्रकाशकशब्दैः, कीदृशैस्तैः ? स्वेत्यादिः-स्वस्य शक्ति:-अर्थप्रकाशनसामर्थ्य तया सं-सम्यक, सूचित प्रकाशित, वस्तुना-पदार्थानां तत्त्वां-स्वरूपं पैस्ते, तस्य अमृतचन्द्रसूरे:-अमृतचन्द्राख्याचार्यस्य, किंचित किमपि, कर्तव्यं-करणीयं, एव-निश्चयेन, नास्ति समस्तवस्तुकृत्येन पूर्णस्य कीदृक्षस्य तस्य ? स्वरूपे- त्यादि.-स्वस्य शुद्धचिंद्रूपस्य रूप-स्वरूपं तंत्र गुप्तस्य एकतां प्राप्तस्य ॥ ८५ ॥ इति श्रीमन्नाटकसमयसारस्थंपद्यस्याध्यात्मतरंगिण्यपरनामधेयस्य व्याख्यायो नवमोऽकः ।। अर्थ-यह समय कहिये आत्मवस्तु तथा समय कहिये समयमाभृत नामा शास्त्र,ताकी व्याख्या तथा यह आत्मख्याति नाम टीका, सो शब्दनिकरि करी है । कैसे हैं शब्द ? अपनी शक्तिहीकर संसूचित कहिये भलैप्रकार कहा है वस्तूका तत्व कहिये यथार्थ स्वरूप जाकरि, अर मैं तो निज़ आत्मरूप अमूर्तिक ज्ञानमात्र, तिसविष गुप्त होय प्रवेशकरि रह्या हो । भावार्थ-शब्द है सो. तो पुद्गल है सो. पुरुपके निमित्त वर्णपदवाक्यरूप परिणम है सो इनिम वस्तूका स्वरूपके कहनेकी शक्ति स्वयमेव है जाः शब्दका अर'अर्थ का वाच्यवाचक संबंध है; सो द्रव्यश्रुत की रचना - . -" -- ? - सनविशुद्ध जानाधिकार शब्दहीकै करना संभव है । अर आत्मा है। सो. अमूर्तिक है, अर ज्ञानस्वरूप है, तातें मूर्तिक पुद्गलकी रचना कैसे करे । तात आचार्यने ऐसा कया है,सो यह समयप्राभृतको टीका शब्द- 'निकरि करी हैं। मैं मेरा स्वरूपमै लीन हो । मेरा कर्तव्य याम नाहीं है। एसे कहनेते उद्धृत- पणाका परिहार भी आव है अरं निमित्त मित्तिकव्यवहारकरि ऐसा कहियेही,जो विवक्षितकार्य फलाने पुरुषन किया इस न्यायकरि अमृतचंद्र आचार्यकृत यह टीका है ही । इसही न्यायरि पढन सुननेवालेनिक तिनका उपकार भी मानना युक्त हैं । जात याकै पढ्ने सुननेकरि परमार्थ आत्माको स्वरूप जान्या जाय है । तिसका श्रद्धान' आचरण भये मिथ्याज्ञान श्रद्धान आचरण दौर होय है । परंपरा मोक्षकी प्राप्ति होय है। याका निरंतर अभ्यास करना योग्य है । इस प्रकार परमाध्यात्मतरंगिणीकी चचनिकावि नवमा अधिकार पूर्ण भया ।। 7 : भापाटीकाकारका वक्तव्य।": : 'कुन्दकुन्दमुनि कीयो गाथाबंध प्राकृत है प्राभृतसमय शुद्ध 'आतम दिखावनू। सुधीचंद्रसूरि करी संस्कृतटीका. पर आत्मस्याति नाम यथातथ्य मन भावनू । देशकी बचनिकामैं लिखी जयचन्द पसंक्षेपं अर्थ अल्पबुद्धिा पावनू । पढो सुनो मन लाय शुद्ध आतमालखाय ज्ञानरूप गही चिदानंद दरसोचिनू । दोहा-समयसार अधिकारका वर्णन को सुनंत । 'द्रव्यभावनोकर्म तजि' आतमतत्व'लखंत।।' ऐसे समयमारनामृतनामा ग्रन्थकी प्रात्मख्याति नामा संस्कृतटीकाके पंद्यनिकी देश भाषा- मय पनिका लिखी हैं | सो यह ताका संक्षेप 'भावार्थरूपसा अर्थ लिख्या है। संस्कृतटीकामें न्यायतें सिद्ध भये प्रयोग है । तिनिका विस्तार करिये तक अनुमानप्रमाणक प्रयोग प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमरूप हैं, तिनिका स्पष्टकरि व्याख्यान लिखिये तो ग्रन्थ बहुत वः, तथा- आयु बुद्धि वल स्थिरता, अल्प, वातै जेता-वण्या.तेता-संक्षेपक्ररि प्रयोजन मात्र लिख्या है। ताकू वांचिकेरि भव्यजीव पदार्थ समझियो । अर किछू अर्थमे हीनाधिक-होय- सो बुद्धिमान् मूलग्रन्थतै जैसे होय,तैसें समझियो, कालदोपते इन ग्रन्थनिकी गुरुसम्प्रदायका व्युच्छेद होय गया है। तात जेता चणे तेता अभ्यास"होय' है । जैनमत स्याद्वादरूप है, सो जे जिनमतकी आज्ञा मान हैं तिनिके विपरीत श्रद्धान न होय है । कहूँ अथका अन्यथा समझना भी होय तो विशेष बुद्धिमानका निमित्त मिले यथार्थ होय है। जिनमतके श्रद्धानी हठयाही नाही होय हैं ऐसें जानना । अंतमंगलके अर्थ परमेष्ठी नमस्कारकरि ग्रन्थ समाप्त करिये हैं। .

. + -- ११- परमाग्यात्मतरङ्गिणी छप्पय-मंगल श्रीअरहंत बातियाकर्म निवारे । संगल सिद्ध महंन कर्म आ परजारे। आचारिज उवन्झाय मुंनी मंगलमय सारे दीक्षा शिक्षा देय भव्यजीवनिक् तारे। अठवीस मूलगुण धार जे सर्वसाधु अणगार हैं । मैं नमू पंचगुरुचरण मंगल हेतु करार हैं जैपुरनगरमांहि तेरापथशैली बडी बडे बडै गुनी जहां पहै ग्रन्य सार हैं। जयचन्द्र नाम मैं हुँ तिनिमै अभ्यास किछू किया बुद्धिसारू धर्मरागते विचार है | समयसारग्रंथ ताकी देशक वचनरूप भापा करि पदो सुनी करो निरधार है। आपापर भेद जानि, हेय त्यागि, उपादेय गहि शुद्ध आतमक्यही बात सार है ।।२।। दोहा-संवत्सर विक्रम तणु अष्टादश शन और । चौसठि क्रानिक बदि दशैं पूरण ग्रंथ मुठौर संस्कृतटीकाकारको प्रशस्ति । जयतु जितविपनः पालिताशेयशिष्यो विदितनिजस्वतचरचोवृतानकसवः । अमृतविधुयतीशः कुन्दकुन्दो गणेशः श्रुतसुजिनविवादः स्याद्विवादाधिवादः ॥ १॥ सम्यक्संसारवल्लीवलयविदलने मत्तमातंगमानी पापातापेमकुमोद्गमनकराकुंठठीरवारिः (१) विद्वद्विद्याविनोदाकलितमतिरहो मोहतामस्य सार्थी (1) चिपोद्भामिचेता विदितशुभयतिज्ञानभूपस्तु भूयात् ।। विजयकीर्तियतिर्जगतां गुरुचिकृतधमधुरोवृत्तिधारकः । जयतु शासनभासनभारतीमयमतिदलितापरवादिकः ।। शिष्यस्तस्य विशिष्टशास्त्रविशदः संसारमीताशयो भावाभावविवेकवारिधितरस्स्याद्वादविद्यानिधिः टीको नाटकपद्मजा वरगुणाध्यात्मादिस्रोतस्विनी श्रीमच्छीशुभचंद्र एष विधिवत्संचर्करीति स्म वै त्रिभुवनवरकीर्जातरूपातमूत्त : शमदमयममूर्तराग्रहान्नांटकस्य । .... : ...--- विशदविभववृत्तो वृचिमाश्चिकार गतनय शुभचन्द्रो ध्यानसिद्धयर्थमेव ॥ ५ ॥ विक्रमवर पालापंचत्रिशने त्रिसप्तति व्यधिके । वर्षेप्याश्विनमासे शुक्ले पचेऽथ पंचमीदिवसे । रंचितेयं वरटीका नाटकपद्यस्य पद्ययुक्तस्य । शुभचंद्रेण सुजयताद्विद्यासवलं न पांकात् ।।७ 'पातनिकाभिश्च भिन्नभिन्नाभिः । जीयादाचंद्रास्वाध्यायान्मतरंगिणी टीका ॥८॥ इति कुमतद्रु मन्लोन्मूलनमहानिर्भरणी श्रीमदध्यात्मतरंगिणी टीका समाप्तां । ॥ समाप्तश्चार्य ग्रंथः ।। ... 4 - - Ha-

No text on this page.

Pramadhyatmatrngini (samayasar Kalash)

Author
Bhattarak, Shubhchandra
Title
Pramadhyatmatrngini (samayasar Kalash)
File name
Pramadhyatmatrngini (samayasar Kalash)
Text
OCR done
Citation
1963
Published
2009/11
Publisher
Shrishantisagar Jainsiddhant Prakashani Sanstha
Language
Sanskrit
Pages
216
Library
Sanmati Library
Classification
Jain sahitya
DLI number
344427
Barcode
99999990234293.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
TApcD7eN3Es
Download PDF

Pramadhyatmatrngini (samayasar Kalash)