Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Mahatama Martin Luthar Ka Jeevan Charitra

Tandhan,lalta Prasad · 2011/01

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ma महात्मा मार्टिन लूथर ।

भोकार आदर्श चरित माता की ३ थीं पुस्तक
महात्मा मार्टिन लूथर
का
जीवन चरित्र
लेखक
लालता प्रसाद टंडन
एम० ए०एल० पल० बी०
स्वर्गीय पण्डित शोकारनाय बाजयी
तथा
पं० रामप्रसाद त्रिपाठी एम० ए०
द्वारा
सम्पादित
१.पानाप शनपेयी के मरपसार ग, भाग सकरपासित
मयमाधि
[मूल्य 19)

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समर्पण
जिनका उत्साह अदम्य, जिनका चरित्र स्वच्छ और पवित्र,
जिनके विचार उच्च और उदार जिनके उद्देश्य
और नि स्वार्थ
ऐसे श्रीमान् पडित ओढारनाथ वाजपेयी जी
की
स्मृति मे ग्रथकार की यह तुच्छ भेट
सादर समर्पित है।

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भूमिका
प्रकार
।
-
धर्म नदी के स्रोत की भाति, प्रारम्भ में स्वच्छ और पविन
होता हुआ भी कुछ दूर आगे पद, कुछ समय के उपरान्त,
अनेक अन्य गुणयाले सहकारी स्रोतों के सगम से, भनेक
के स्वभाव और गुणवाली जातियों को स्वीकार करने
के कारण गदला और मेला होजाताहै । उसकोमादि निर्मलता
नष्ट हो जाती है और उस निर्मलता का स्थान जघन्यकायो
ग्रहण करती हे ससार के सब धर्मों के इतिहास से प्रमाणित
धर्मों की उत्पत्ति उत्थान और प्रलय का यह एक साधारण
नियम है। धर्म के अशुद्ध हो जाने और आदि पवित्रता स
गिर जाने पर, उस धर्म की कुछ महान् आत्माए उस धर्म
को सुधारने का उद्योग करती है क्योंकि "यदा यदाहि धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मोन सजा-
म्यह" इति ।
महात्मा मार्टिन लूथर भी ससार के अनेक धार्मिक सुधा.
रकों में से एक है। ईसाई धर्म के लिये मार्टिन लूथर ठीक
वैसे ही हुए हैं जैसे आधुनिक हिन्दू धर्म के लिये स्वामी दया.
नन्द। जिस समय. मार्टिन लूथर ने जन्म लिया था उस
समय की ईसाई धर्म की अवस्था (जिसका सविस्तार वणन
पुस्तक में किया गया है ) आधुनिक हिन्दू धर्म की अवस्था
से इतनी अधिक मिलती है कि कुछ आश्चर्यान्वित सा हो
जाना पड़ता है। धर्म पुरोहितों का धनले पाप प्रतिशोध

का आश्वासन देना, साधुसघों को नि सीम धनी और फलत व्यभिचारी होना, धर्म के वाह्य कर्म कांड पर मुग्ध हो धर्म के तत्वों का भूल जाना, वर्म के श्रादि ग्रन्थों का स्वार्थ लोलुप भाष्यकारों द्वारा मनमाना अर्थफियाजाना,जनताका अधिकाश रूप में बहमी और भूत प्रेतों में विश्वास करनेवाला होना, धर्मकृया का सत्यनारायण की कथा तथा तीर्थ यात्राओं की रेल पेल तक ही परिमित होना, प्रत्येक तीर्थ स्थानों पर, गयो प्रयाग के पडे, मयुग के.चौवे, काशी के सन्यासी, श्रीनाथ के गोसाई आदि के रूप में ए5 के स्थान पर अनेक पापों फा होना, एक विचित्र तुलनात्मक चित्र हृदयाक पर चित्रित करता है। यह एक सामान्य अनुभव की बात है कि अपने दोष अपने आप को नहीं दिखायी पडते । परतु वे ही दोप यदि किसी अन्य में दीख पडते है तो बडे घृणास्पद विदित होते हैं । दूसरों के दोषों की समालोचना करते हुए कभी २ ध्यान हो पाता है कि कहीं येही दोप मेरे में भी तो नहीं है। इस सदेह का उठना कि मनुप्य अपनी परीक्षा करना प्रारम कर देता है । हमें आशा है कि हमारे हिन्दू पाठक पाठिकाये गण तत्कालीन ईसाई धर्म की अवस्था का ज्ञान फर फिर एक दृष्टि अपने धर्म की ओर भी करेंगे और यह सोचने का उद्योग करेगे कि कहीं वेही दोप हमारे धर्म में भी तो नामानर से उपस्थित नहीं हैं। यदि यह जीवनी किसी श्रश में भी हिन्दुओं की समालोचना घुद्धि उनके निज के धर्म की त्रुटियों की ओर प्रेरित कर सफी तो अपने उद्देश्य में बहुत कुछ सार्थक समझी जानी चाहिये। . ३ , . यद्यपि जीवनी अल्पकाय है परतु तब भी यह यात हदता के साथ कही जा सकती है कि मार्टिन लूथर सरधिनो कोई घटना या विवेचना पेसी नहीं है जो किसी महत्व की हो और इस पुस्तक में स्थूल या सूदम रूप से उसका समावेशन किया गया हा। दूसरी उल्लेखनीय पात यह है कि इसमें कोई भी ऐसी बात नहीं तिमो गयी है जो किसी न किमी प्रमाणिक प्रघ के अधार पर नहो। यह जीवनी थीमान् स्वर्गीय पडित ओंकारनाथ पाजपेयी जी के जीवनकाल ही में समाप्त कर उन्हें दे दी गयी थी और पडित जी ने इसे स्थय देगने की कृपा भी की थी। यद्यपि यह जीपनी उनके सामने प्रेस में नहीं जा सकी परतु इसका और सय प्रकार कासपादन कार्य पडित जी स्वय समाप्त कर चुके थे। श्रीमान् पडित ओंकारनाथधाजपेयीजी द्वारा सपादित आदर्श चरित माला का यह अंतिम प्रसून है। उनकी हिन्दी साहित्य सेवा का यह अतिम फल है, उनकी समाज सेवा सम्बन्धि नी वान्छायों का यह अतिम उद्गार है। मुट्ठीगज-प्रयाग निवेदक- लालता प्रसाद टण्डन नाट -पथपि अभी अन्य कई एक पुस्तके स्वर्गीप पं० जी के द्वारा मम्पादित की हुई पड़ी हैं जो यथा समय मकाशित कीनायगी-सं. . ,

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स
IMES
ardinen, es
BIKANER:
--
महात्मामाटिनलूया
प्रथम परिच्छेद
जन्म और बाल्यकार
ससार के अधिकांश महापुरुषों ने, शिमकी विराril
ने मानुपिक जीवन प्रवाह के एक नयीन मालन
को धाधित किया है बहुधा अपनी पालीमा विवाद
माम ही म पेली है । किसी तुच्छ यन गरी fe
कुल को ही उच्चतम और प्रसिद्ध पनाना मानो इन महापुरुषों
को अभीष्ट है । महात्मा मार्टिन लूथर का जन्म मी एक पारस
सामान्य कुल तथा अज्ञात स्थान में दुधा या
४८३ ई० में ईसलीयन नामक स्थान पर मापा जाम
हुआ। इनके पिता का नाम हैन्स लूथर और माना या गा.
गरेट था । लुथर के माता पिताका पैतृकरियाम स्थान
नी (जर्मनी) प्रात में थुरजियन धन के निकट मोहगावाम ग्रा
लुथर के जन्म समय के कुछ ही पूर्व उनके पिता म
सलीवन में आकर बस गये थे । मार्टिग बघर के पित
मोहरा क्यों त्यागा इसके यारेमें कई
N
है। किमीर
जागना रोल
.

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महात्मा मार्टिन लुथर बडी निराशा हुई और इन्हें जीविका निर्वाहार्थ मैन्सफील्ड जाना पंडो । यहाँ श्राकर प्रथम तो इस कुल को दरिद्रता से घोर युद्ध करना पडा। लूथर कहता है "मेरा गरीन पिता एक स्नान का काम करने वाला थां, मेरी माता को सव लकडी अ पनी पीठ पर ढोरे लानी पडती थी" । परतु 'उद्योगिन पुरु- पमिहमुपेति लक्ष्मी के अनुसार हेस की अवस्थाशीघ्र सुधरने लगी और थोड ही दिनों में यह कुल, गटी दाल से खुश हो गया। धन प्राप्ति के साथ ही साथ पदोन्नति भी होतीगई यहाँ तक कि हैस लूथर नगर की सभा (Oty Council) के सभासद हो गये। हेस लूथर के सात लडकी लडके थे उनमें मार्टिन लूथर ज्येष्ठ था। हम लूथर संतति की शिक्षा दीक्षा के विषय में चा रणक्यका शिष्य था। उसका भी यही मिद्धातथा कि लाडने बहुवो दोषा तान्ने घहुचो गुणा तस्मात् पुत्रञ्चशिष्यञ्च ताडये न तु लालयेत्” । यद्यपि बड़े होने पर मार्टिन लूथर भी उपरोक्त सिद्धान्त के पक्ष में हो गया था और उसके बहुत से एसे वचन उद् त किये जा सकते है जिससे यह स्पष्ट है कि उनकी परि- पक्क बुद्धि ने 'चटकन मुप भजन' से पढकर दूसरी यालरोगौ- पध नहीं दृढ पायी थी परतु तर भी जब ये श्रापध उन्हें स्वय पीनी पडती थी तर या इसे बडी असहनीय और कडु इमानते थे। जो कुछ भी हो मार्टिन लुथर के माता पिता तनिक २ से दोषों के उपमदार में इनकी (लगुडिमुष्टिकाहस्तपादप्रहारेण) अच्छी स्वयर लेते थे। यहाँ तक कि मार्टिन लुथर लिखते है कि "चाल्यकाल के ऐसे कठोर जीनन ने आगे चलकर साधु होने में मुझे अधिक सहायता दी" । - . - १० महात्मा मार्टिन लूथर wnNM . श्रान्त पथिक को मोहरा ग्राम वृद्धके अब भी वहयेत दिखाते हैं जहाँ हेन्स लूथर के मोटे लट्ठ ने येत में अनधिकार प्रवेश करने वाले किसी गडरिये को जीवन मुक्त किया था। कहते हैं कि इसी हत्या के भय से इस लूथर मोहरा छोड भागा।कुछ लोगों का कथन है कि ईसलीवन में एक बडा मेला लगता था और मार्टिन लूथर की मा मेला देखने गई थी और वहां ही लूथर का जन्म हुआ । परतु यह असभव सा प्रतीत होता है। इस लीवन मोहरा मे १० जर्मन मील है। इतनी दूर एक कठोर गर्मा स्खी मेला देखने जायगी। वास्तविक बात यह है कि ईसलीवन के भूगर्भ में कच्चे तॉये की-अच्छी पाने थी और हंस लूथर सान का व्यवसायी था । ऐसी अवस्था में भूगर्भस्थसपत्ति की पोज ही हेस लथर के देश त्याग का पर्याप्त कारण विदित होता है। जापान को उन्नतिशील देख, तथा प्रतिद्व दता में बराबर की टक्कर मारते पा, कुछ पाश्चात्य विद्वानों को उसे पुरखिन यौरोपा का नाती सिद्ध करने की बडी लालसा होगई है। मा र्टिन लूथर को भी लोथाएर नामक निकटस्थभारीसामन्तकुल का पुत्र सिद्ध करने का बडा उद्योग किया गया है परन्तु महा स्मा लथर स्वय अपनी हीन अवस्था का यो प्रमाण देते हैं "मैं कृपक का पुत्र हु, मेरे पिता, पितामह, प्रपितामह सब ही एक सीधे कृषक थे"। उसे उसके गरीव पिता की गोद से छीन एक अमीर खानदान का ( गोद लिया ) पुत्र मिद्ध करने के और कई प्रमाण भी दिये जाते हैं परतु चे सर सारहीन हैं। हेस लुथर का काम ईसलीवन में न जमा । मारगेरट के गर्भोत्यपनरत्न को छोड ईसलीवन के पृथ्वी गर्भ से हैंस को - Ary - 4 महात्मा मार्टिन लुथर पडी निराशा हुई और इन्हें जीविका निर्वाहार्थ मैन्सफील्ड जाना पटा । यहाँ आकर प्रथम तो इस कुल को दरिद्रता से घोर युद्ध करना पड़ा। लूथर कहता हे "मेरा गरीव पिता एक खान का काम करने वाला था, मेरी माता को सब लकडी अ पनी पीठ पर ढोष लानी पडती थी" । परतु 'उद्योगिन पुरु- पमिहमुपेति लक्ष्मी के अनुसार हैंस की अवस्था शीघ्र सुधरने लगी और थोडे ही दिनों में यह कुल, गेटी दाल से खुश हो गया' । धन प्राप्ति के साथ ही साथ पदोन्नति भी होतीगई यहाँ तक कि हेस लूथर नगर की सभा {City Council) के सभासद . हो गये। हेस लूथर के सात लडकी लडके थे उनमें मार्टिन लूथर ज्येष्ट था । हैम लूथर सतति की शिक्षा दीक्षा के विषय में चा रणनयका शिष्य था। उसका भी यही सिद्धातथा कि"लाडने यहुयो दोषा तारने यायो गुणा तम्मात् पुत्रञ्चशिष्यञ्च ताडये न तु लालयेत्” । यद्यपि बड़े होने पर मार्टिन लूथर भी उपरोक्त सिद्धान्त के पक्ष में हो गया था और उसके बहुत से ऐसे बचन उद्धत किये जा सकते हैं जिससे यह स्पष्ट है कि उनकी परि- पक बुद्धि ने 'चटकन मुख भजन' से पढकर दूसरी यालरोगी पध नहीं हूढ पायी थी परतु तर भी जय ये श्रोषध उन्हें स्वय पीनी पडती थी तब वो इसे बडी असहनीय और कडुरमानन थे। जो कुछ भी हो मार्टिन लुथर के माता पिता तनिक २ से दोपों के उपसहार में इनकी (लगुडिमुष्टिकाहस्तपादमदारण) अच्छी खयर लेते थे । यहाँ तक कि मार्टिन लयर लिनन है कि "वाल्यकाल के ऐसे कठोर जीवन ने भाग चलकर साधु होने में मुझे अधिक सहायता दी। .

महात्मा मार्टिन लघर . मार्टिन लूथर ग्राम पाठशाला को भेजे गये। इस पाठशाला का वर्णन मार्टिन लूथर स्वय यों करते हैं, ' पाठशाला क्या थी छोटी मोटी कारागार थी यदि नरकशाला या पापशोधन स्थान (Pargatory) कहें तब भी अत्युक्तिन होगी। गुरु जी तो साक्षात् यम के यशज थे। सारी शिक्षा मारने पीटने ही तक परिमित थी इत्यादि "विद्यार्थियों को मार्टिन लूथर सच्चे धर्मार्थ प्राण त्यागियो (Genuine Martyrs) की उपाधि देते है। इस सर शरीर कष्ट के बाद भी लडका जो कुछ पढ पाता था वह "बिलकुल नहीं के बराबर था । क्या यह वास्तव में कष्ट की बात नहीं है" महात्मा लूथर कहते है "कि चीस या इससे भी अधिक वर्षों तक परिश्रम करने के बाद लडके को केवल इतनो गलत पलत लेटिन ( सस्कृत) आजाय कि वह एक पादडी होकर येन केन 'प्रकारेण 'मास' कहता फिरे । १४ वर्ष की अवस्था लूथर मैजवर्ग के स्कूल में भेजे गये और इसके एक वर्ष बाद इसनैक के स्कूल भेजे गये । इन उत्तरोत्तर अच्छे स्कूलों में आने से इनकी मानसिक शक्ति का अच्छा विकाश होने लगा और धीरे २ उनके हृदय में ये प्रश्न उठने लगे “कोऽह कस्य च ससारो" इत्यादि । मैजवर्ग का एक वर्ष घटना रहित है। यहां इनको खाने के लिये घरघर जाकर भीख मागनी पडती थी। लूथर का हमी को नहीं वरन् अमरों के लडकों को भी यही करना पड़ता या। कहा जाता है कि एक रोज फठिन ज्वर से पीडित लूथर अकेले अपने कमरे में थे। पिपास लगने पर ये रेंगते २ बड़े के पास पहुंचे। टढा पानी सूब पेट भर के पिया। पाकर कथन है कि - महात्मा मार्टिन लूथर - सो रहे, पाते ही नीद ने धर दबाया। जय उठे तो पाते हैं कि रोग दोष का कहीं नाम नहीं है। ईसनैक के स्कूल के के विषय में कहा जाता है कि जब वह पाठशाले में आता तो टोपी उतार लेता था। पूछने पर उत्तर देता कि हमें इन बालको की गुप्त शक्तियों का आदर करना चाहिये। इनमें से कोई तो एक दिन जज कोई मजिस्ट्रेट और कोई दूसरे ऊचे पर्दो पर होगा। सन् १५०१ ईसवी में १८ वर्ष की अवस्था होने पर मार्टिन लूयर परफट के विश्वविद्यालय को भेजे गये जो उस समय जर्मनी के सर्वोत्तम विश्वविद्यालयों में से था। लूथर के पिता की यह तनिक इच्छा न थी कि लूथर पादडी हो । उसने इन्हे - एरफर्ट कानून सीखने को भेजा था । कानून में इन्होंने बहुत उद्योग किया बहुत कुछ सफलता भी प्राप्त की परन्तु इनकी आत्मा कानून की सूखी एडियों से शात न होती थी। परफर्टमे लथर की जीवनी मैथीसियस यो वर्णन करता है "यद्यपि वह ( मार्टिन लुथर ) प्रकृति से एक प्रसन्नचित्त हृदयनाही युवक था तब भी वह सदा प्रार्थना करके गिरजा जाकर और फिर मात काल हो से अपने पठन पाठन में लग जाता था क्योंकि उसका सिद्धान्त यह था कि अच्छी तरह ईश्वर प्रार्थना करना मानो आधे से अधिक सबक याद कर लेना है" लूथर न तो कभी अधिक देर तक सोता रहता था न नागा करता था । गुरु से प्रश्न बहुत पूछता था और पाठशाला के संमयोपरात पुस्तकालय में पुस्तके देखा करता था।उसने लैटिन भापा के प्रसिद्ध ग्रन्थकार जेसे सिसरो, पर्जिल, लिपी आदि की पुस्तकें पढौं थी। अभी तक ग्रीक भाषा में मार्टिन लूथर ने 1 महात्मा मार्टिने लूथर - प्रवेश नहीं किया था। इसके बाद भी मार्टिन लूथर को ग्रीक भाषा का वैसा शान न था जैसा लैटिन का। अरस्तू ही एक ऐसा ग्रीक ग्रथकार है जिससे मार्टिन लूथर को विशेष परिचय था ।मैथोसियस कहता है कि "एक दिन जय वह पुस्तके लौट रहा था, शायद इस मतलर से कि भली धुरी कितावों का भेद जान सके, कि अचानक उसे एक लैटिन भाषा की वाइवित मिलगई जिसे उसने अपने जीवन में पूर्व कभी भी नहीं देखाथा लूथर भी उपरोक्त विषय का यों समर्थन करता है "आज के तीस वर्ष पूर्व बाइबिलों को काई जानता न था जब तक मैं बीस वर्ष का न था मैने बाइबिल देखी भी न थी। *पुस्तक छापने की विधि प्रथम २ जान गुटेन्वर्ग ने १४३६ ईस्वी में शावि प्कृत किया। इससे भी पूर्व लकडी पर सुद्री तम्वीरें और लिखे हुए वाक्य के वाक्य छापने का उद्योग किया गया था परन्तु अलग अलग अक्षरों को जोडकर (जो हटाये बैठाये जासक ) छापने की विधि किसी ने नहीं सोची थी। जान गुटेन वर्ग एक दरिद्र मनुष्य था अत उसने जान फास्ट और पीटर शाफर की सहायता मागी। पीटर शाफर बहुत सुन्दर लिखता था श्रत उसे' तो अदर बनाने का काम दिया गया और फास्ट को रुपया जुटाने का काम दिया गया। इन्होंने छापने की स्याही भी श्राविकृत को। १५५७ ईस्वी में प्रथम लैटिन पुस्तक छपी और १४६२ में प्रथम वार वइपिल छपी। फास्ट ने गुरेनें वर्ग को गहरा धोसा दिया । फास्ट को जन छापे का भेद ज्ञात होगया ते उसने अपना उधार दिया रुपया गुटे वर्ग से ,मागा। गुटेन्वर्ग देने में असमर्थ था। फास्टने नालिश कर छापाखाना आदि फुडुक करा लिया । गुटेन्वर्ग को भाग जाना पड़ा । तव फास्ट और शाफर ने मिलकर वाइविल, छापना प्रारंभ किया। बहुत शोग्रता मे एक दूसरे से मिलती जुलती याइपिलें विकते देश लोगों ने गप उड़ा दीनि फास्ट तो भूता से मिला है और उनके द्वारा पाइपित यनवा धन कमाता है ।

महात्मा मार्टिन लुथर १५ अंत में मुझे * पुस्तकालय में एक बाइबिल मिलगई, उसे मैं पढता था और डाकर स्टोपिज, को बड़ा अचभा होता था। AN Riots . सूधर का . * श्राम कल जब कि गुदड़ी बाजार में सारी पुस्तकें एक तरफ और पाइपिल अकेली एक तरफ वाली दशा होरही है तब मार्टिन उपरोक्त कथन एक गल्प मात्र सा मालूम पडता है परन्तु बात यह है कि वास्तव में एक समय था जब लूथर का कथन अक्षरश सत्य था। यद्यपि छापे की विधि का आविष्कार हो, चुश था परन्तु तब भी खूथर के ममयतका छपी पुस्तके उतनी ही कम थी जेसे श्राज पख हाथ की लिखी पुस्तके वो गिरजा धन्य समझा जाता था जहाँ एक हाथ को लिसी चाइविल जजीर मे वधी, बीच टेगिस्त पर रक्खी रहती थी। इस तरह से सुरक्षित पाइविल का एक वाक्य भी पढ़ लेना मानो हरड़े के स्टेशन पर थर्ड क्लास का टिकट खरीदना था। एक अधकार यों लिखता है "I have in my youth seon an nogerman German Bible without doubt translated from the Latin dark and obsoare For at that time learned men set almost no store by the Bible Aly father had a German book of homilus (Posthile) in wbicb besides the Saadays Gospels some passages of the Old Testament were expounded , out of it I have often read to lim with pleasure " How gladly," sard my father "should I see a complete German Bible" 7 it was -

दूसरा परिच्छद
मार्टिन लूथर का संन्यासी होना
-
.
लूथर एकयार अपने माता पिता को देखने मेसफील्ड गये।
कुछ लोगों का कहना है कि इस पितृ दर्शन का वास्तविक
कारण यह था कि एरफर्ट में एक प्रकार कीमहामारीने आकर
अपना अड्डा जमाया था । मार्टिन लूथर परफर्ट को लौट रहे थे
कि पीच ही में स्टाट रहीम ग्राम के पास इन्हें एक घोर'
विपत्ति का सामना करना पड़ा। बडी भयकर आधी ने उठ
कर अधेरा फर दिया इद्रदेव एक गरीब पथिक के प्राण लेने
को यहां तक उतारू होगये कि जल वृष्टि के साथ ही साथ
पाषाण वृष्टि भी करने लगे। निकट कोई शरण योग्य स्थान न
था। मृत्यु मुह बाये सामने खडी थी । पुराने जीवनी लेखकों,
का कथन है कि इसी समय विजली गिरी और
लूथर
के निकट
'ही उसका नवयुवक मित्र अलकसियम इद्रयज का आखेट
हुआ । लूथर स्वय घोडे से गिर पडा। परन्तु आधुनिक
प्रथकार अलकसियस की मृत्यु की घटना असत्य, मानते है ।
जो कुछ भी हो सत्य यह है कि मार्टिन
लूथर
सकट में फस गये थे कि उन्हें जीवित परफर्ट लौटने की
आशा न रही थी। इसी घबडाइट में मार्टिन लूथर कह उठे
"पवित्र एन । वचानो बचायो यदि आज बचा तो सन्यासी
हो जाऊगा।
मार्टिन
लूथर के प्राण बच गये । ये सकुशल एरफर्ट पहुंचे।
।
के प्राण ऐसे

महात्मा मार्टिन लूथर
Mun
wwww
इन्हें स्वस्थ होते ही अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण श्राया। स्मरण
पाते ही इन्हें अपनी प्रतिज्ञा पर बडा पश्चात्ताप हुआ क्योंकि
लूथर जानते थे कि उनके माता पिता को इस प्रतिक्षा के पूरी
करने से बड़ा फप्ट होगा। एक ओर तो निराशामय और अश्रु
पूर्ण पिता का मुख और दूसरी ओर ईश्वर के सम्मुख की
हुई प्रतिशा दोनों का व्यान पाते ही लूथर की भी 'भई गति
साप छू दर केरी'। अत में
लूथर
ने निश्चय कर लिया कि
प्रतिज्ञा निचाहनी होगी।
एक पक्ष (पसवार) तक हृदय से युद्ध कर लूथर ने अपना
प्रण निवाहने का दृढ संकल्प कर लिया। अन्त में लूथर ने
अपने सर प्यारे मित्रों का निमत्रण किया । सगीत जो लूथर
को इतना प्रिय था आज अन्तिमवार मित्रो कसाथ सेलागया।
लूथर ने सर को अभिवादन कर उन से विदा ली। लूथरके सर
मित्र उसे भागस्टाइन मठ तक पहुचाने गये ।नतमें लूथर ने यह
कहकर उन से विदा ली, मित्रो ! आज आप लोग मुझे देखते
हैं फिर कभी न देखियेगा । सप निरुत्तर पडे राते रहे
। आगे चलकर लूथर कहते हे "मुझे कभी आशा न थी कि मठ
मैं कभी त्यागू गा । ससार के लिये धास्तर में में मृत हो चुका
था । परन्तु ईश्वर की इच्छा थी, टटेजेन श्रोर उसके इन्डल
जेन्सी* (Indulgence) ने मुझे सदेर निकाला" !
जय यह समाचार हम लधर को मिला तो उसके मोर
और दुम्स का ठिकाना न रहा । जय से लूथर एम० ए० पास
दुमा प्रा तय से उसका पिता उसे 'तुम' कह के सयोधन
* दस से सौ का प्रकरण भयत्र
૨

पाया।
-
था
महात्मा माटिन लूथर
करता था। परन्तु इस समाचार को पाते ही उसने फिर वही
पुरानी परिपाटी तू' द्वारा सवोधन, करना प्रारम्भ किया
मानो हंस लूथर ने मार्टिन लूथर को ऐसी मूर्खता करते देख
उचित समझा कि लूथर का एम० ए० का प्रमाण पत्र
छीन लिया जाय । हैस लूथर का यह क्रोध फिर तवही शांत
हुश्रा जब उसने महन्त लूथर को 'सुधारका लूथर में परिवर्तित
आगस्टियन मठ लूथर जिसके महन्त हुए थे, अपनी
प्रथा के अनुसार किसी पत्ति का प्रभु नहीं हो सकता था ।
इगलिस्तान में 'मार्टमेन' कानून के अनुसार किसी मठ को
स्थावर संपत्ति को अधिकारी होने का अधिकार न
'ये
महन्त घोर दरिद्रता में अपना जीवन व्यतीत करने का श्रादर्श
रखने वाले थे। लुथर को अभी वर्ष डेढ वर्ष तक अपनी दृढता
की परीक्षा देना पडी । हँस लूथर को दृढ़ आशा थी कि लूथर
इस परीक्षा से घबडा कर लौट 'श्रावेगा। लूधर कोमठ का नीच
से नीच कार्य करना पडता था और शहर भर में जाकर भिक्षा
मांगनी पडती थी। लूथर भी घोर से घोर तप करने लगा।
वह निराहार रहता,दिन भर प्रार्थना किया करतो, पत्थर की
शिलानों पर सोता, सदा अपने को पापी स्वीकार करता था
और अनेक अनेक प्रकारकोयत्रणाओं से अपना शरीर* मुखाया
करता था। लूथर को इतने से भी संतोप न हुआ । अथ चंद
केयता पाल की बीनी कमीच पहिनते और घंटों अपने शरीर
* शरीर आरमोन्नति का वाधा है त शरीर सुखा डालना आत्मो
न्नति की प्रथम सीदी है इन विचारों ने माध्यमिक काल के इसाईयों को
पेताद सता क्खा था।

महात्मा मीटिन लूघर
.
-
की सोटों से पूजा किया करते थे। लूघर के अन्य सहवासी
समझते थे कि वास्तव में बहुत दिनों के बाद एक सच्चा
महन्ट उनके मठ,मैं आगया है।
लूथर की परीक्षा अवधि समाप्त हुई। दीक्षा का दिन
आया । हंस लूथर को मार्टिन लूथर की दीक्षा के दिन निम.
प्रण गया। हस किती प्रकार भी उस ,उत्सर में सम्मिलित
होना स्वीकार न करता था-परन्तु मित्रों के यहुत अनुनय
विनय करने पर किमी प्रकार राजी हुश्रादीक्षा वाले दिन २०
घोडसवारी सहित हैस लूपर मठ को पहुचा और मार्टिन
लूथर को यहुत से रुपये उपहार स्वरूप में दिये। लूथर अपने
पिता को इस प्रकार प्रसन्न देख बडेमसन हुए और भोज के
समय सव के समक्ष अपने पितासेपूछने लगे कि भगवन्! आपने
इसके पूर्व हमारे महन्त होने में इतने विने क्यों डाले थे 1 अर
तोपिता से न रहा गया। उसने तुरत पूछा "पयों ! विद्वानो।
क्या आपने धर्ममयों में यह नहीं पढा कि पुत्र को अपने माता
पिता की आशा माननी चाहिये। महन्तों को कोई उत्तर न
सुझा। सर एक स्वर हो कह उठे "ईश्वर की इच्छा ऐसी ही
थी ईश्वर को प्राशा यही है । इस लूथर-"परम् पिता कहाँ
ऐसा न हो कि यह शैतान का,यहकावा हो"।।
इसके बाद१५०८ में लुथर को विटेनवर्ग के विश्वविद्या-
लय में एक प्राचार्य का पद मिल गया। विटेनवर्ग का विश्व.
विद्यालय सैक्मनी के राजा फेडरिक 'धुद्धिमान' ने १५०२ में
स्थापित किया था। इस समय तक लयर कहता है कि "मैं
पक्का यहां तक कि पागलपोप भर था। मैं अभी तक पोप
•पोप के इतिहास के लिये तीसरामकरण रेखो
।
।

।
महात्मा मार्टिन लूथर
,
मत्रों से ऐसा मुग्ध था कि यदि कोई तनिक भी उनकी (पोप
मन्त्रों की) सत्यता में सदेह करता तो मरने मारने को उत्ताक
हो जाता" । फ्रेडरिक इलेकर * भी सच्चा रोमन कैथलिक था
और उसे यह स्वप्न में भी विचार न था कि यही विश्वविद्या
लय पोप लीला को भस्म करेगा, यहीं उस कुल्हाड़ी पर शान
। रपेस्त्री जायगी जो पोप वृक्ष को कीट गिरायेगी। परन्तु यह
सदा का नियम है कि मनुष्य सोचता कुछ और है परमात्मा
करता कुछ और है।
सन् १५११ ई० में अगस्टाइन मठ का पोप के पास अपने
दो प्रतिनिधि भेजने की आवश्यकता हुई । मार्टिन लूथर और
जानवान मिचलिन इस कार्य के लिये चुने गये । दोनो मनुष्य
"पवित्र नगर" रोम पी और चल पड़े। उन दिनों न रेल थी
न तार । सडक एक तो बहुत कम थी और जो थी वे भी रोमी
टूटी फूटी कि उस पर चलनेवाल सदा अपने अग भग भय
से कपित रहते थे। बैलगाडी घोडागाडी निश्चय चलते थे
परन्तु उनका किराया सामान्य स्थिति के मनुष्य के लिये देना
असभव था।इन दोनों गरीय महतो को अपने पैरों का भरोसा
कर पैदल ही चलना पडा । ये लोग दिन भर चलते सध्या
को किसी गरीव किमान के झोपडे या ग्राम-गिरजे में श्राश्रय
लेते और उन्हीं लोगों का आतिथ्य स्वीकार करते मार्ग के
कठिन कष्टों को सहन करते हुए ये लोग मिलन नगर पहुचे ।
मिलन के गिरजे में इन्हें पूजा करने का अधिकार न 'मिला
1
• इलेकटर का प्रकरण अन्यत्र मिलेगा।

महात्मा मार्टिन लूपर
पयोंकि ये अनोसियनसप्रदाय के न ये। लूथर को मिलन
श्राकर यह प्रथम पार मालूम हुआ कि ईसाई धर्म ऊपरही से
देखने को एक है, भीतर ही मोनर हमके अनेकों टुकडे होते
जाते है । अत में छ सप्ताह के रावर परिश्रम के बाद पवित्र
नगर' की उच्च अट्टालिकायें दिखाई पड़ने लगी, गिरजों की
चोटियां दृष्टिगोचर होने लगी । भक्ति पूर्ण लूथर इस दृश्य को
देखते ही घुटने टेक पृथ्वी पर बैठ गया और “पविन नगर"
को बारम्यार प्रणाम करने लगा।
-
* हिन्दनों की तरह ईसाइयों में भी अनेक मतमता तर और समदायें
। मुसलमान धर्म भी इस रोग से नहीं पचा है ।
-

,
तृतीय परिच्छेदः
पोपों की महिमा
लूथर की जीवनी का महत्व समझने के लिये, उसके कार्य
की गुरुता का ज्ञान प्राप्त करने के लिये हमें थोडा सा शान
उसके समय की धार्मिक तथा राजनैतिक स्थिति का भी होना
चाहिये । हर एक सुधार जो पुराने समय में हुए हैं, वे व्यर्थ से
प्रतीत होते हैं यदि हम उन्हें उनके समय की आवश्यकताओं
के अनुसार न देखकर अपने समय की आवश्यकताओं के
अनुसार देखे । हर एक वस्तु को समझने के लिये यह पर
मावश्यक है कि हम उन कारणों को समझे जो उस वस्तु की
उत्पत्ति के पूर्व विद्यमान थे और जिन कारणों से वह वस्तु
कार्य स्वरूप में उत्पन्न हुई है।
हम इस प्रकरण में अति सक्षेपत यह दिखाने का उद्योग
करेंगे कि पोपों की उत्पत्ति किस प्रकार हुई, किस प्रकार
इन्होंने अपना प्रभाव धीरे २ वढाया और श्रत को किस प्रकार
इनके अत्याचारों के कारण इनका पतन प्रारभ होगया। लूथर
और लुथर जनित प्रोटेस्टेंट धर्म वास्तव में उन सब कारणों
का मुखिया है जिनके द्वारा पोपलीलाइस संसार से उठगई ।
ल थर का पोप लीला से इतना घनिष्ट सबन्ध है कि पोप
तोलाका वर्णन किये बिना लूथर की जीवनीसमाप्त करनामानो
रावण कानास लिये बिना हीरामायणलिखना है। यही कारण
है कि ल थर को प्रणाम करते छोडाहमे थोडी देर के लिये
-

महात्मा मार्टिन लुथर WAmnew Auravina , अपना ध्यान दूसरी ओर खींचना पड़ता है। रोमन कैथालिकों का कथन है कि ईसामसीह ने स्वयम अपने पीटर नामक शिष्य को अपने सब शिष्यों में श्रेष्ठ माना। पीटर ही में ईसाने धार्मिक विश्वास अधिक पाया पीटर ही में प्रात्मोनित अधिक पाई। पीटर सब शिष्यों में श्रेष्ठथा अत पीटर द्वारा स्थापित गिरजा भी सव गिरजों में मुख्य है । ईसा मसीह की मृत्योपरान्त पीटर रोमनगर गया और वहा उसने एक गिरजा स्थापित किया । इस गिरजे की मुख्य महन्ती पीटर स्वयम् २५ वर्ष तक करता रहा । ६७ ईस्वी में उसे अपन धर्मार्थ प्राण त्यागने पडे । पीटर के बाद अन्य महन्त उसके गिरजे के महन्त होते गये । इन सब महन्तों को अपने धार्मिक विश्वास के लिये बडे बडे कष्ट उठाने पडे औरवहुधायहा तक नौरत आती था कि पीटर का तरह इनको भी अपन प्राणों से हाथ धोना पड़ता था। रोमन लोगों के पुराने धर्म और ईसाई धर्म के बीच ५०० वर्ष तक घोर युद्व हाता रहा। इस धर्म-युद्ध । में लक्षहों मनुष्यों के व्यर्थ प्राण गये। ईसाई धर्म की जीत हुई और पूर्वीय रोम का सम्राट कांस्टेंटाइन स्वयम् ईसाई होगया! । यही पहला ईसाई सम्राट् था। इसके बाद से ईसाई धर्म राज धर्म होगया। पीटर के उत्तराधिकारी पोपों न इस धर्म- युद्ध में घडे २ कष्ट उठाये परन्तु सहिष्णुता धर्य तथा दया * धर्म युद्ध से हमारा तात्पर्य वास्तविक युद्ध से नहीं है जैसा ३० वर्ष वाल युद्ध में हुआ था। हमारा मारपर्य इतना सा है कि इसाइ लोगों की सण्या परापर बढ़ती भोर पुराने धर्म के अनुयायियों की संख्या घरावर घटती जाती यो। जिसमा पदला ये लोग ईसाइयों को सता करते हैं। - .

महात्मा मार्टिन लूथर -- - न त्यागी। इन्हीं लोगों के सद्गुणों तथा त्याग का यह फल था कि ईसाई धर्म.की जीत हुई । जा ईसाई धर्म राजधर्म हो गया तव पोपों का भी प्रभाव बहुत बढ गया और उस समय के पोप इसके मर्वथा योग्य भी थे । पोपो ही के सतत् उद्योग का यह फल है कि सारा योरप आज ईसाई है। कांस्टेंटाइन ही के समय में रोम साम्राज्य की राजधानी रोमनगर से उठ कर विजैरियम् गई । विजैटियम् उस समय से सम्राट् कांस्टेंटाइन' के नामानुसार फास्टैंटीनोपुल कहा जाने लगा। राजधानी के उठ कर कांस्टैंटीनोपुल चले जाने से रोम नगर में अवेरा सा होगया। ऐसी अवस्था में प्राकृतिक था कि रोम में रहने वाले पोपों का प्रभाव प्रजा पर और यढे।। कांस्टैटाइन के वशज दिन शनि शक होते गये अतः इतने बडे साम्राज्य का सगठित रहना असभव होगया । जर्मनी की असभ्य जातियां जो सदा से रोम साम्राज्य हडपने के उद्योग में लगरही थी और पश्चिमी रोम साम्राज्य को निशक्त और अकेला पा उम पर टूट पडी और इस तरह पूर्वी रोमन साम्राज्य पश्चिमी रोमन साम्राज्य से सदा के लिये प्रथक होगया। पश्चिमी रोमन साम्राज्य, सारा योरप जिसके अन र्गत था, अब जर्मनी की भिन्न २ जातियों में विभक्त होगया । ये जातियां मर्वदा परम्पर लडा करती थी और एक दुसरे का नाश किया करती थीं। यद्यपि रोमन साम्राज्य नष्ट हुया परन्तु, ईसाई धर्म की जीत हुई। जर्मनी की सब असभ्य जातियों ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। १२ घी सदी तक सारा योरप ईसाई होगया । ये सय नय शिप्य पोप ही एक ऐसा व्यक्ति था . ।

महात्मा माटिन लूथर २५ V जिसका सम्मान करते थे। इस तरह पीप एक प्रकार से सारे योरप के मान्य होगये। इस ही पीच में ईसाई ससार में एक यडा विवाद खडा होगया। कुछ लोगों ने कहा ईश्वर और ईसामसीह में फुर भेदही नहीं है कुछ ने कहा किया और ईसा में भेद है। फल यह हुभा कि सारा ईमा ससार दो भागों में विभक्त होगया - (१) रोमन चर्च ( २ ) और ग्रीक चर्च । पोप के अनुयायी रोमन चर्च वाले यारोमन कैथ लिक कहे जाने लगे। इस धर्म विभाग का फल भी यही हुआ कि पोप लोग धार्मिक विषय में भी सर्वोपरि भोर स्वतन हो गये । यहाँ तक तो पोप पद की उन्नति प्राकृतिक "टनाओं घश हुई जिसमें पोपों का कुछ भी वश न था परतु श्रय पोपो को अपनी उन्नति करने की चाट पड गई। आठवी सदी में ( sharlemagne ) शार्लमेन नामक एफ.यहा पीर राजा योरप में हुअा। इसने सय छोटी २ परतु परस्पर लड़ने वाली जातियों को वश में कर एक महान सा म्राज्य स्थापित किया । इस ही धीच में (सन् 200 में) पोप लियो तृतीय को, उसके शनुनों ने जब पोप रडी धूमधाम से रोम नगर में होकर जा रहा था, घोडे से उतार कर पृथ्वी पर पटक दिया और आप निकाल कर जीभ काट लेनाचाहा। रुधिर से लथ पथ पोप पास के मठ में पहुचाया गया। शार्ल । मेन ने जब ये बात सुनी तो बडा क्रोधित हुआ श्रोर तुरत इटली की चल पडा । इटली पहुच कर उसने अपने धर्म गुरु के शत्रुओं की खून खबर ली। ईश्वर की कृपा वश पोप भी' अच्छा हो गया और उमने शार्लमेन का अपने हाथ से राज्या भिषेक कर उसे सारे योरप का सम्राट बनाया और उसके - - - ।

२६ महात्मा मार्टिन लूथर MN . साम्राज्य को पवित्र रोमन साम्राज्य के नाम से विभूषित किया। योरप के इतिहास पर इस घटना का घडा प्रभाव पड़ा है। इस घटना के बाद से पोप की पटवी साम्राट् से भी ऊची मानी जाने लगी और पोपों का यह अधिकार हुआाकि भविष्य में जिसे वे अपने हाथों राज्याभिपिक्त करें वही वास्तविक जर्मन सम्राट है। पोपों ने अपने इस अधिकार को धर्म शास्त्र सम्मत् बनाने का उद्योग करना प्रारभ किया। वाइविल में लिखा है कि ईसा ने एक बार कहा कि "जिसके पास असि न हो उसे चाहिये कपडे बेचकर असि क्रय करें। तव शिष्य ने कहा "भगवन् ! यहां तो दो असि हैं" ईसा ने उत्तर दिया "वस ये पर्याप्त है" । इन याइविल वाक्यों का यह अर्थ किया गया कि" भग- वान् ईसामसीह ने अपने गिरजेका अत. उस गिरजे के नायक पोप को, दो प्रकार की असि दोहै (१) धार्मिक (२) सांसा रिक । धार्मिक असि के प्रभाव से पोप समस्त ईसाई ससार का धार्मिक विषय मे सर्वोपरि गुरु हुना। सांसारिक असि के प्रभार द्वारा पोप समस्त ईमाई ससार का सम्राट हुश्रा । अत सब भौतिक सम्राट पोप से नीचे है और पोप सम्राटों, का सम्राट है । पोप ऐसे धार्मिक व्यक्ति के लिये यह अनुचित जान पडता है कि वह सासारिक विषयों में लिप्त हो श्रत , पोप ने अपनी प्रसन्नता पूर्वक अपना सासारिक अधिकार ससार के सम्राटों को सैप दिया है जो पोप के प्रतिनिधिवत् ससारे का राज्यकार्य चलाते हैं । अत पोप को पूर्ण अधिकार है कि जब चाहे वह जिस सम्राट को राज्यच्युत कर दें और अब चाहे जिसे किसी देश का सम्राट् बना दें क्योंकि पोप ही -

महात्मा मार्टिई लूथर
-
।
एक मात्र प्रभु ईसामसीह का प्रतिनिधि है।
उपरोक्त सिद्धान्त निरा' पुस्तकस्थ सिद्धान्त मात्र न
था। जैसा आगे चल कर दिखाने का उद्योग किया जायगा
पोप सदा इस सिद्धान्त के कार्यपरिणत होने के उद्योग में
'लगे रहते थे और रहुत कुछ सफल मनोरथ भी होगये थे कि
इतने में लूथर महाशय रणागन में कूद पड़े और पोपों के पैर
फिसल गये
हमने ऊपर सचोपत यह दिखाने का उद्योग किया है कि
किस प्रकार पोप पद धीरे २ ईसाई ससार में सर्व मान्य
होता गया। श्रर श्रागे चल कर हम यह दिखावेंगे फि सासा
रिक वैभव और शक्ति का मदिरा पीकर पोप किस प्रकार
उन्मत्त हो उठे और किस प्रकार उन्होंने योरप की भिन्न २
जातियों के स्वतन्त्र सम्राटों को अपनी प्राज्ञा मानने के लिये
अपमानित करना प्रारम्भ किया ।
। जर्मनी के सम्राट हेनरी चतुर्थ ओर उनके कुछ सामन्तों
में मत भेद हुआ । सामन्तों ने पोप के पास अपील की कि
आप हमारी रक्षा कीजिये । उस समय पोप था ग्रेगरी सप्तम् ।
उस का अभिमान पोप होने के कारण आकाश चूमता था ।
कोई सम्राट क्यों नहो, होगा अपने देश का सम्राट होगा, पोप के
आगे तो उसका कोई मूल्य हे नहीं। उसने तुरन्त हनरी चतुर्थ
केनाम सम्मन भेज दिया किश्राप रोम आइये आप और आपके
सामन्तो के बीच हम न्याय करेंगे। इनरी चतुर्थ इस सम्मन को
पा हसने लगा और उसने कहा कि एक दिन वो था कि जय
हमारे पूर्वज शार्लमेन न पोप और उसके शत्रुभों का न्याय किया
था आज पोप का यह घमड है कि वह उस ही शार्लमेन के

महात्मा मार्टिन लुथर प्रजा का दमन करने ही में जर्मन सम्राट की शक्ति नाश हुआ करती थी। पोप ने फ्रेडरिक को सेड नामक युद्ध पर जाने को विवश किया । पोप की आशा कब लांघी जा सकती थी। फ्रेडरिक को विवश हो क्रूसेड के लिये तय्यार होना पड़ा। परन्तु बीचही में फ्रेडरिक बीमार पड गयो, क्रूसेड में देर होते ही, पोप के क्रोध का कुछ ठिकाना न रहा । उसने तुरत फ्रेडरिक को बहिष्कृत कर दिया । फेडरिक ने तीन बड़े पादडी पोप के पास यह विश्वास दिलाने को भेजा कि मैं घास्तव में बीमार । परन्तु पोप ने जिसकी हार्दिक इच्छा मम्राट को नीचा दिखाना मात्र थी, इन पहाडियों से मिलना अस्वीकार किया। यह घटना सन् १२२७ फी है। पोपों की यह क्षमता जर्मनी तक परिमित न थी। समस्त ईसाई योरप के मम्राट् पोपों के श्रागे मस्तक झुकाते थे। इन लेन्ड के राजा हेनरी द्वितीय को+टामस बेकेट की समाधि के प न " . १२ और १३ वीं सदी में इसाई योरप को जेरुसलम नामक स्थान तुरकों से छीन लेने की बड़ी इच्छा हुई । सात बार योरप ने एशिया पर पढ़ाई की परन्तु तुर्क सदा विजयी हुए और ईसाई जेरुसलम न ले पाये। इन्हीं युद्धों को फूड कहते हैं। +पादड़ी लोगों का विचार समान न्यायालय नहीं कर सकते थे। यदि एक घर गृहस्थ किसी को प्रो को भगा ले जाय, व्यभिचार करें या किसी को हन्या करे तो राजा द्वारा स्थापिन न्यायालय से उसे दड मिलता था और निप्पक्ष न्यायाश पूरा दर मिलता था । परन्तु यदि येही उपरोक्त पाप किसी 1 पादडी या महन्त से बन पडे तो उसका न्याय अन्य पादड़ी तथा महन्तों की सभा धारा होता था। पादड़ियो की, सभा ने यदि बहुत कदह दिया तो कई इसको एक सप्ताह तक पश्चाताप करना पड़ेगा अथवा एक महीना तक - महात्मा मार्टिन लूथर ३१ MMw सामने घुटने टेक कर पश्चाताप करना पडा था जब कि खुली पीठ पर पादडी लोग धडाधड चाबुक लगा रहे थे। इसही तरह इह लेन्ड के राजा जान ने पोप के भेजे हुए पादडी को अपने यहाँ (Archbishop) सब से बडा पादडी बनाना अस्पो कार किया। पोप का कोई राजा कहा न माने ! पोपने अपना ग्रह्मास्त्र चला दिया । जान को बहिष्कृत कर दिया और मास के राजा को श्राशा दी कि वह जान को सिहासन से उतार कर स्वयम् इगलैंड का राजा बन जाय । फ्रास के राजा फि लिप द्वितीय इगलैंड जीतने चल पडे । इधर अगरेज वहिष्कृत' राजा जान का मुख देखने से भी घृणा करने लगे कि कही नर्फ न जाना पडे। विचाग जान तुरत पोप के प्रतिनिध के पास फोठरी म बैठफर इश्वर के सामने पाप म्बीकार कर उससे क्षमा मागनी पड़ेगी। { यही नहीं वरन् पाप के भहा फोड होने के पहिले ही यदि पापी पादडियों के मठ में सम्मिलित हो जाय ता भी वह बच जाता था और राज कर्मचारी सिसिया के रह जाते थे-(मम्पादक) ऐसे घोर पापों का एसा सीधा दई मिलने के कारण पादड़ी तथा महन्तों में पाप करने की प्रति दिन २ बढ़ती जाती थी । हेनरी दितीय ने इस प्रथा के विरुद्ध पादडी तथा महन्तों को भी राज न्यायालय द्वारा दहित होने की आशा निक्ली। पादडिया ने टामस चेकैट की नायकता में। इसका घोर विरोध किया। एक दिन हेनरी टामस वेकेट की उह इत्ता पर यहा कोषित हुया और चिरला २ कर कहने लगा कि "इस दुष्टपादडी से हमारा कौन पिड खुडायेगा।' दो सिपाहियों ने उसे यह कहते सुन लिया और सुरन्त जापर टामस येकेद का वध कर डाला । पादड़ी जो अपने को पोपही के नीचे मानते थे और राजा को कुछ न गिनते थे निगड खड़े हुए। धर्मान्ध मेजा ने भी उनका साथ दिया और हेनरी को अपना सिहासन बचाने के लिये सरे बाजार चाबुक मानी पड़ी। - " ३६ महात्मा मार्टिन लुथर - -। । दौडा गया । अपना मुकुट उतार कर उसके पैरों पर रख दिया और बोला श्राज से हम पोप ही द्वारा प्राप्त मुकुट पहिनेगे, पोपको सय आशाये गिना हिचकिचाये मानेंगे और प्रतिवर्ष बहुत साधन रोम को उपहार स्वरूप भेजा करेंगे। जव पोप ने इस तरह राजा का घमड चूर कर लिया तव उसे क्षमा प्रदान की। पोप की सर्वश्रेष्ठ क्षमता के उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त प्रत्येक योरोपीय देशों में यहुन बडे , पादडी सौतथा महन्तो के मठों का होना भी एक प्रधान कारण था। ये पादडी सगत और महन्ता के मठ सदा यही सिखाया करते थे कि पोप राजा से भी श्रेष्ठ है। वह ईश्वर का प्रतिनिध है। उस समय में पादडी ही लोग अधिकतर पढ़े लिखे होते थे-श्रत राज्य भर में ये लोग बहुत बडे २ पदों के अधिकारी होते थे । यद्यपि नोकरी तो ये राजा की करते थे परतु मानते सब से बडा पोप को ये। ये लोग सदा पोप की महिमा बढाने के उद्योग में लगे - रहते थे क्योंकि पोप पदोन्नति के साथ ही साथ पादडी.समु दाय का भो दवदवा बढता जाता था। पोप भी लदा इन पाडियों की रक्षा तथा उन्नति का ध्यान रखता था । पाद 'डिया झगडो की अपील रोम जाती थी, पादड़ियों की नियुक्ति का अधिकार पोप अपने हाथों में ले लिया चाहते थे और बहुत कुछ ले चुके थे -1 पाप का पद पैतृक न होकर चरन् चुनाव पर निर्भर था। कुछ परिमित सस्या के कारडिनलों द्वारा पोप चुना जाता था। 'अत योरप का प्रत्येक चालाक तथा उच्चाभिलाषी पुरुष एक दिन पाप होन को श्राशा कर सकता था। केवल उसे पादडी 1 1 २

महात्मा मार्टिन लूथर
३३
का वेश धनाने की आवश्यकता थी फिर क्या था यिना असि
छुए ही भाग्यशाली मनुष्य उस पद को पहुँच सकता था
जिसके पद पर सम्राटों के मुकुट लोटा,करते थे। हॉ उस पद
को पहुँचने के लिये धूर्तता, चालाकी, घूस सोरी आदि गुणों
की बडी आवश्यकता थी। कहने को तो पोपों का पदसाधुओं
फा पद था परंतु पोप वास्तव में कमी साधु न होते थे। उनके
धन वैभव तथा सौख्य सामग्री की तुलना कोई सम्राट् न कर
सकता था । उनका वस्त्र, उनका भोजन, उनकी रहन सहन
विधि सब सम्राटों को मात करती थी। सिद्धान्तानुसार ये
विवाह नहीं कर सकते थे परतु वास्तव में वे अपने को किसी
सासारिक सुग्न से घचित नहीं रखते थे।
,

महात्मा मार्टिन लूथर
अमानुपिक पाप से न हिचकिचाता था। पोप के सिकरेटरी
की हत्या करन के लिये उसक पुत्र सीजर यारजिया ने उसे
दौडाया। वह इत भाग्य पोप कीशरण म भागा। सीजर वार
जिया ने वहीं जाकर उसकी हत्या की यहां तक कि उस गरीब
के रुधिर से धर्म पिता धर्म गुरु अलेक्जेंडर पोप के पवित्र
कपडे विलकुल भीज गये। सीजर को अपने बड़े भाई का
हिस्सा हडपने की इच्छा हुई । इच्छा की देरी थी कि गांडिया
का ड्यूक (सीजर का यडा माई ) ससार से उठा दिया गया।
लुकेशिया का पति नेपिरस का राजा था । नेपिल्स का राज्य
सीजर की आखों में चढा था। श्रत भाई और यहिन ने मिल
कर अपने घहनोई तथा पति को खुले याजार १८०० सन् के
जुलाई मांस में मरवा डाली । सामयिक इतिहास लेपकों का
कथन है कि सीजर और लूकेशिया में भाई बहिन होने पर भी
पति पत्नी का सा सम्बन्ध था । सीजर चारजिया छिपे छिपे
विष प्रयोग द्वारा अपन शत्रुओं के मारने के लिये प्रति प्रसिद्ध
है। १२ वीं अगस्त को एक भोज दिया गया जिसमें विप द्वारा
कई शत्रुओं के प्राण लिये जाने वाले थे। ये विष सीजर स्वयम्
इसमें कुछ सन्देह नहीं कि सीजर चोरजिया घडा दुष्ट और नीच वृत्ति का
मनुष्य था परन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से उसके सम्पध में कही हुई अनेक पाते
सशय ग्रस्त होने से स्वीकार नहीं की जा सकती। उपन्यासकारों तथा पूर्व'
काख के अन्यान्य लेखकों ने इसके जीवन चरित्र को और भी कलुपित और
भयानक यना दिया है। यह भी विचार लेना उचित है कि तत्कालीन इटली
की राजनैतिक स्थिति से और सीजर की करतूतों से बहुत कुछ सम्बध
इटली में ही कुछ ऐसे विज्ञान भी थे जो सीजर को ज्यादा वुरी रष्टि से नहीं
देखते थे। ( सम्पादक)
-
।

महात्मा मार्टिन लूथर
R
तय्यार करना था और उनके तो भी यही जानता था। धीमे
से विष का पियाला यदल गया और अजेक्जेंडर नोर मीजर
दोनों ने विष पी लिया। दोनों उसो गत को धीमार पड़े।
सीजर तो यच गा परतु पोपी अगस्त को चल यसा।
प्रभो पिता का शरीर टढा भी न हुआ था कि सीजर के मेज
लुटेरों ने पाकर पोर का कोप लूट लिया । पोपचिप मे मरा
यह बात किमी को शात न हो इस कारण उसका मृत शरीर
किमो का दिनाया न गया। परन्तु इंश्यर फोरच्छा विचित्र है।
पोप की रत्यो के माथ जाने वाले पादडियों ओर सिपाहियों
में झगधा होगया । त्यो ले जाने वाले पोप की शर को छोड
अपने प्राण रचाने में लग गये । पोप का शर खुल गया और
याही अफेला यहां पड़ा रहा। इस काले काल अत्यन्त घोर
दुगंध देते हुए नया फोडा पडे हुये शर को जिसने देखा उसही
को विश्वास होगया कि पोप विप से मरा है । इसके बहुत देर
बाद कुछ लोगों ने श्राकर उस मृत पोप को ( गाली द देकर
तथा उस पर थूक थूक कर ) एक गड्ढे में एक दरी में लपेट
कर फेंक दिया।
यह तो हुई पवित्र नगर श्रोर रोम उसके पवित्रधर्म पिता
पोप की दशा !प्रय पोप के सैनिक पादडी और महन्त गण भी
पोप से कुछ घटकर नये । सिद्धान्तानुसार तो इन्हें विवाह
करना मना या और स्पष्ट रीति से कोई भी किसी बी से
विवाह न करता था परन्तु स्त्री सुख से वंचित कोई रहना न
चाहता था । फल यह था कि मठों में व्यभिचार अत्यन्त फैल
गया था । यह पाए कहा तक फैल गया था इसका प्रमाण उस
समय के साहित्य हीसे यथेष्ट मिल जाता है। ऐसामालूम होता
N

1 । महात्मा मार्टिन लूथर AAAA । था मानों इन्द्रिय निग्रह करते करते पादडी गण उविया उठे थे अत अव थोडे दिनों के लिये इन्द्रियपरायणता ही उन्होंन अपना धर्म मान लियाथा। प्राय मदन्त और पादडीअपने पास खिया रसते थे, उससे लडके होतथे औरमय जानते थे कि यह किस के लडके हैं परन्तु यदि कुछ भेद था तो इतना कि ये स्त्रियां धर्मानुसार व्याही न थी। लूथर कहना है "जिस स्त्री ने पादडी के साथ व्यभिचार किया यह धारोधार रह गई फिर उसे कभी पापमुक्त होने की आशा नहीं रहती। पादडी की रखैल से घढकर बुरी अवस्था में और कोई तो नहीं होती।" इस पोप लीला से भले मनुष्य नितान्त दुखी हो उठे धे परन्तु किस की शक्ति थी जो धर्मपिता पोप के विरुद्ध अगुली उठावे और यदि किसी 1 उठाई भो तो उसे नास्तिक की उपाधि सदित जीते जी अग्नि में प्रवेश करना पड़ा। कामट्रेस नामक स्थान में पादड़ियों की एक सभा हुई कारण कि उस समय एक नहीं तीन तीन पोप श्रेपने को पोप कह रहे थे और इस तरह से ईसाई समार तीन भागों में चॅट रहा था। सभा इस लिये फो गई थी कि सभा तीनों पापों को पदच्युत कर एक पोप चुने और इस तरह ईसाई समार' को तीन भागों में बढ़ने से रोके । इन सभा में एकजानइस नामक विद्वान भी आया जो प्रेग के विश्वविद्यालय में प्राचार्य के पद पर था । हम ने अपनी पुस्तकों द्वारा लोगों को यह बनाने का उद्योग किया था कि किस प्रकार पादरी ससार पाप में लिप्त है । हस का विचार था कि पादडी समार के सारे पापों की जड उसका धन, वैभव है। अत हम के मतानुसार पाद डियो कोयन कदापि न. मिलना चाहिये । पादडियो से ये .

महात्मा मार्टिन लूथर
याते का सही जा सकती थी। उस गरीय को बिना अपने
पचाय का मौका दिये ही नास्तिक सिद्ध कर जीते जी ही
जलाये जाने की आशा देवी गई और यह जीते जी ही जला
दिया गया । यद्यपि हस जला दिया गया परंतु उसका सिखाया
सत्य ने जलाया जा सका और धीरे २ लोग पोप लीला का
भेद जानते गये और जैसे जैसे जानते गये वैसे ही गोप लीला
का नाश करने को भी उद्यत होत गये।
जय से पश्चिम में ईसाई धर्म का प्रचार हुआ और विशेष
कर १० घी म १४ वी सदी तक, रोमन ओर ग्रीक लोगों की
मभ्यता लुप्त प्राय सी हो रही थी। प्रोक और रोमन विद्वानों
मार उनके प्रयों को पढना एक प्रकार से पाप सा समझा
जाता था कारण कि ईसाई धर्म ने उनके हाथ बडा कष्ट उठा.
या था। दूसर, पुराने ग्रीक बार रोमन लोग थे विधर्मी फिर
भला यहाकर संभव था कि ईसा के भक्त विधर्मी विद्वानी
की पुस्तकें पढ कर उन्हें अपने में बडा मानने पर विर्घश होते।
पादडी लोग जिनका सारा चैमव जनता को मूर्यता पर निर्भर
था मदा उनके कान उन विधी विद्वानों के विरुद्ध भरा करते
थे। अईसाई धर्म' की स्वयम् जो' पुस्तकें थी उनमें व्यर्थ के
धार्मिक गद विवाद भरे थे । वैसी पुस्तकों से किसी प्रकार
का मानसिक विकाश होना असंभव था। अत पश्चिम के
इतिहास का यह मूर्सनामय काल इतिहासकों द्वारा (Dark
7
।
1
*यह सब होने पर भी पादरी लोग ही अभिकाश में इन पुस्तकों की नारी
होने से रहा करते और पढ़ते थे। (सम्पादक)

५० महात्मा माटन लूथर सदा ages ) "अधकारमय काल" *के नाम से पुकारा गया है। और यही,अधकारमय काल पोपों की पदोन्नतिका काला है। इस समय की ईसाई जनता महा मूर्ख और घोर अध विश्वासी थी। पादडी लोग सदा अपना ऐश्वर्य यह बात कह कर सिद्ध किया करते थे कि हमारे पास स्वप्नों में, अकेले में, स्वर्ग दत श्रीया करते हैं। और सब लोग इसे बिलकुळ सत्य मानते थे । ठीक इसके विरुद्ध पादडी प्रथा के शत्रुओं के पास (पादडी, लोगों को, ऐसा विश्वास दिलाते थे) भूत प्रेत और शैतान आया करते थे । इस बात में भी लोग पूरा विश्वास करते थे। पादडियों ने यहाजनरव फैला दिया कि लूथर की मा ने स्वीकार किया है कि मेरे पास रात को शैतान आता और लूथर को गर्भ शैतान ही से रहा है । अत लूथर शैतान पुत्र है और लूथर की बात'मानना मानो शैतान कीयांत मानना श्रत में रात के उपरान्त प्रात काल होता ही है। एक ओर छापे की फल के आविष्कार ने पुस्तकों को छाप, विद्या का मार्ग सुगम कर दिया दूसरी ओर कान्स्टैन्टीनापुल पतन के कारण भागे हुए ग्रोक, विद्वानों ने आफर पश्चिम में शरण ली और पुरातन ग्रीक और रोमनसभ्यता का लोगों में प्रचार किया। इस काल का नाम इतिहास वेत्ताओं ने 'पुनरुत्थान काल' ( Renaissance period ) रक्खा है। ग्रीक तथा ले. टिन भाषा के ज्ञान, पुराने विद्वानों की पुस्तकों के परिशीलन भय आधुनिर एतिहासिका निरीक्षण द्वारा इस काल पर बहुत कुछ प्रकाश पड़ चुका है श्रत यपि इस काल के साथ उपरोक्त विशेषण का अपिक प्रचार होने से प्रयोग होता है परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। +- म्पादक -- ।

महात्मा मार्टिन लुथर
AM
आदि ने 'ईसाई जनता के चक्ष खोल दिये। इस ही समय
लूथर
और केलविन श्रादि दृढ प्रतिज्ञ विद्वानों ने धर्मसुधार
का कार्य अपने ऊपर लिया। योरप की जातियों में धीरे २
जातीयता का भाव उत्पन्न होने लगा और उनके लिये यह
असह्य हो गया कि उनका राजमुकुट एक विदेशीय पोप के
पैरों पर लोटे । धर्म और राजनीति, धर्म और सासारिक कार्यो
का अन्तर ईसाई जातियों को समझ पड़ने लगा । अत अय
पोप के लिये धर्म के नाम पर लूट करना असभव हो गया।
जातीयता के भाव में पग कर उस ही अंगरेज जाति ने जिसने
राजा जान को पोप की आज्ञा के कारण त्याग दिया था, पर
अपने राजा हेनरी अष्टम को ही अपना धार्मिकनेता माना,
और पोप मे नाता तोड दिया । योरप की जनता ने ३० वर्ष
तक घोर युद्ध करके यह सिद्ध कर दिया कि अब पाप की
महिमा अधिक नहीं टिक सकती अब पापो का अत्याचार
अधिक नहीं सहा जा सकता ।
उन अनेक शक्तियों में जिनके समूह ने पोप लीला का
नाश किया लूथर की श्रात्मशक्ति तथा एढता एक विशेष महत्व
की शक्ति थी। या यों भी कहना अनुचित न होगा फि लूथर
की शक्ति उन मय शक्तियों की मुस्त्रिया थी। पोप लीला की
उत्पत्ति स्थिति तथा प्रलय का वर्णन करने से ( जो अत्यन्त
सक्षप में किया गया है) हमारा मुख्य उद्देश्य यही है कि
लूथर के कार्य का महत्व पूर्ण रीतिसे समझा जाय और इसका
झान हो जाय कि लूथर ने किन घोर को और शक्तिशाली
पोपों से युद्ध कर ससार में अक्षय कीर्ति प्राप्त की है।
।

1
4
पंचम परिच्छेद
-
-
7
लूथर
रोम मे
लूथर अपने चिरवांछित पवित्र नगर में आ उपस्थिताया।
उमने यहाँ जो देखा सुना उसका वर्णन यहुन स्थानों में किया
है । लयर कहा करता था कि रोम नगर देखने से जो अनुभव
मुझे प्राप्त हुआ है उसे में सहला स्वर्ण मुद्राओं के लिये
भी बेचने को नय्यार नहीं हूँ। ५३० ईस्वी में लूथर यो लि
खता है "रोम नगर देसफर मेरक प्रकार से उन्मत्त हो उठा
था। सर गिरजी, सय स्थानों को पागलों की भांति देखता
फिरा था। सर कुत्सित और असत्य बातों को सच्चे भक्त
की भाति बिना सदेह किये विश्वास कर लेता था । मैंने इतनी
वार गेम में मास (Miss ), कहे कि किसी रोम" नगरस्थ
महन्त ने भी न कहे होंगे। मुझे यदि कुछ शोक था तो यही
कि मेरे माता पिता जीवित है अन्यथा मैने रोम नगर में इतने
पुरयमय कार्य किये थे इतनी प्रार्थनायें कहीं थी, इतने मासो
में भाग लिया था कि यदि मेरे माता पिता नर्फ में होते तो
उन्हे मीधा स्वर्ग मिल जाता । रोम में एक कहावत है कि वों
माता निश्चय धन्य है जिसका पुर्व महात्मा जान के गिरजे में
शनैश्चर की मास पढता है। मैं भी अपनी माता को धन्य
भनाने का शितना उत्तयुकथा (अर्थात् शनैश्चर को जोन के
*मास रोमन फधालिकों की एक प्रकार की प्रार्थना विशेष का नाम
4

महारमा मार्टिन लूथर 200N - गिरजे में मास पढना चाहता था) परतु करू पया उस दिन रसी भीड थी कि मैं घेदी तक पहुँच ही न सका" रोम सी उच्च २ अट्टालिकाओं और विशाल गिरजों ने लुथर के ऊपर बडा प्रभाव डाला। लूथर ने राज मी ठाठ बाट से पोप को एक गिरजे से दूसरे गिरजे को जाते देखा । यद्यपि जिस कार्य के लिये लूथर रोम भेजे गये थे उममें तो उन्हें सफ लता न हुई तर भी उन्हें पोप दर्यार देखने का सोभाग्य मिल गया । लूथर को पोप के न्यायालयो, की कार्य प्रणाली बड़ी दूषित देय पडी । रोम नगर की पुतोम के विषय में लूथर का कहना है कि यद्यपि वो थी तो बडी कडी परन्तु उसमें योग्यता का नाम न था। अलेकजेंडर पष्ठ तथा उनके पुत्र सीजर चार- जियाके अमानुषिक अत्याचारों की कहानियो संशमी तक सारा रोम नगर गूज रहा था । लूथर ने स्वयम् श्रपनी आखों पोप जूलियम द्वितीय को इटली देश में घोर अत्याचार करते देखा। लूथर तो पवित्र नगर देखने की आशा रोम गया था परन्तु घहा जो उसने देसा सुना उससे तो रोम नास्तिकों के नगरी मे भी धोरनर प्रकट होता था। उस समय का पोप जूलि- यस छितीय ठीक उसो,समय पेनिस नगर जीत कर लौटा था जहा सेना सचालन कार्य उमने स्वयम किया था। लूथर ने ऐसे २ कार्डिनलों को गेम में 'महात्मा को पदची से भूपित देखा जिन में यदि कोई गुण था तो यही कि वे अपनी मां रेटियों को कुष्टि से नहीं देगते थे। जनता खुरलम खुल्ला कहा करती थी कि यदि नर्क कहीं पृथ्वी पर है नो रोम उसके उपपदके पादरी मो पोप के धर्म के प्रचारक और उसके प्रति निधि अथवा दूत होते थे। स० +

४४
महात्मा मार्टिन लूथरा
।
ऊपर बसा है। दूसरे इममें इतना और जोड देते थे कि बस
अब शीघ्र ही इस नगर का नाश होगा। लूथर एक स्थान पर
लिखता है कि रोम में पवित्र से पवित्र वस्तु की हसी उडाई
जाती है और यदि किसी को ऐसी अश्लीलता से दुरा होता है
तो लोग उसको ( Bron Christian ) 'मूर्ख' की उपाधि देते हैं
"मानो ईसाई होना ही मूर्तता है। यह सब देनने सुनने पर
भी यह कहना अत्युक्त होगा कि लूथर रोम से कैथलिक धर्म
द्रोही होकर लोटा पयोकि जन्म जन्मांतर के ससार कही
महीनों में नहीं पलटते ।
लूथर उसही वर्ष रोम से लौट आया और श्राफर विटेन्वर्ग
के विश्वविद्यालय में धर्म शास्त्रों की शिक्षा देने लगा। सन्
१५१२ से सन् १५१७ तक लूथर इस ही स्थान पर अपना
कर्तव्य करता रहा । इन पाच वर्षों में उसे कठिन मानसिक
परिश्रम करना पडा । कभी २ उसे एक ही दिन में ४
चार तक धार्मिक विषय पर उपदेश देना पड़ता था। इस
"ही समय में उसने बहुत कुछयहदी भाषा का भी अभ्यास
कर लिया । उन दिनों लूथर को इतना कठिन परिश्रम करना
पडता था कि उन्हें बहुत कम अवकाश अपने गिज के
कार्यो के लिये बचता था।
धीरे २ करके लूथर की ख्याति इतनी बढी कि लूथर
सेक्मनी के राजकुल के शिक्षक नियत होगये और यही
उनको उन लोगों से मित्रता करने का अवकाश मिला
जिनकी सहायता विना स्यात् लूथर पोपयुद्ध में सफल न
होते।
-

१ J - . छठवाँ परिच्छेद ' लूथर और पोप की प्रथम मुट भेड पोप तृलियम द्वितीय की मानवलीला समाप्त हो चुकी है। उसके स्थान पर अब पोपलियो दशम् पोप हुया है । इस पोप कासाई धर्म पर फिनना अोठा विश्वास था वह इसके इस ही कशन से स्पष्ट है कि "ईमाई धर्म तो वास्तव में एक धनोपार्जन की कहानी" । यद्यपि उसको इसाई धर्म पर कुछ भी विश्वास न था तोभी वह सासारिक सुखों का दृढ भक्त था । मासारिक सुखों में यदि कोई ऐसा सुस हे जो उच्च पद प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी भर पेट नहीं मिलता तोच है नाम की इच्छा । आज करत के धनी लोग "राय यहादुरी” की यहादुरी के पीछे दुयले रहते हैं पुराने समय के धनी लोग मदिर धर्मशाला आदि बनवा कर अपना नाम प्रमर करने का उद्योग करते थे। पोपलियो भी इसो विचार में था कि किस प्रकार उसका नाम श्रमर हो कि इतने में उसे सूझीकि लायो मैं एक ऐसा गिरजा वनवाऊ जिसका प्रतिद्वन्दी समीर में ननिकले। सेंट पीटर काएक गिरजा धनना चाहिये। प्रश्न यह था कि इतना धन कहाँ से आवे परन्तु इसके लिये अधिक मोच विचार करने की आवश्यकता न थी। पोप ने इम्डलजेंसो की दुकानें अपने सारे साम्राज्य में खोल दी।इन्ड- लजेन्स कुम्भ मेले के टिकट की तरह विकने लगे। .

४६
महात्मा मार्टिन लूथर
प्रश्न होता है कि इन्डलजेन्स थे पया ? इन्द्वलजेन्सों को
सिद्धान्त मचा था या झूठा इस विवाद में हमें न पडना
चाहिये सिद्धान्तानुसार उन्हें बहुत से कैथलिक बिलकुल
निरापद सिद्ध कर सकते है परन्तु पोप लोगों ने जिस प्रकार
इन्डलजेन्सो को धन पैदा करने की कल बना रक्सा था
इसे कोई पोप भक्त भी निरापद नहीं सिद्ध कर सकता। सारे
ईसाई ससार में करोडां पोप भक्त नित्यप्रति पाप करते हैं।
इन पापों के कारण इन सर पापियों को नरक में पास, करना
पडेगा । परन्तु ये पागी यदि चाहें तो नर्क यातना से उसी
प्रकार साफ बच सकते है जैसे एक हत्यारा दशहजार पेशी.
का एक वारिस्टर कर हाई कोर्ट अपील से साफ बच पाता
है। पापी का सीधे पोप के पास जाना होगा, पोप से पाप
कहना होगा । पोप तव कहेंगे कि तुम्हें इतना रुपया देना
होगा तब तुम्हें क्षमा प्रदान की जायगी। पापी रुपये की चोरी
पोप के सामने करता है, पोप उसे क्षमा प्रदान का पत्र देता
है। पापी विश्वास कर लेता है कि यस अब उसे नर्क का
कष्ट न उठाना पड़ेगा । उदाहरण के लिये मानलो जान न
अपने भाई पीटर को मार कर उसकी एक लास की सम्पत्ति
हडप करली। हर समय उसे भय रहता है,कि यद्यपि हाई
कोर्ट में तो वारिस्टर की बहस ने प्राण घचालिये परन्तु नर्क
की भाग में तो पडना ही होगा। जान ने बीस हजार पोप की
बजर किये, पोप ने उसे क्षमा प्रदान करदी। इस ही का नाम
है।इन्डलजेन्स । अब जान सुन की नींद सोता है। न नर्क की
। यातना का भय हैन राजा की-मार का। यद्यपि उसको रुपये,
यहुत खर्चने,पडे तब भी पोप की जय बनी रही-रोजगार
-

महात्मा मामि
लूथर
घुरा नहीं है । अय भी पीटर के साठ हजार जान की टेंट में है
नान को कभी सदेह भी नहीं होता कि पोप की क्षमा प्रार्थना
खरीदने के बाद भी उसे नर्क की आग में पडना पडेगा। और
संदेह करने का कोई कारण भी नहीं दिखाई पडता । ईसाई
धर्म ही ने सिखाया है कि मृत्योपरान्त पापी को नर्क मिलता हे
उस ही धर्म के सचालक प्रभु ईशुमसीह का सर्वोपरि प्रतिनिध
पोप कहता है कि पापी इन्डलजेन्स खरीदने के उपरान्त नर्क
नही जाता । यम इसमें सदेव करने की कौन यात है। ईसाई
धर्म ही ने नर्क का भय पैदा किया था ईसाई धर्म ही उस भय
को रुपया ले निवारण करता है । जान सत्यता में सदह नहीं
करता।
यह तो सदा की प्रथा थी। अब पोपलियो ने पापियो की
सुगमता के लिये एक नया उपाय निकाल दिया है। पापियो
को अर रोमें जाने की आवश्यकता नहीं है। पोपलियो ने
शहर शहर ग्राम ग्राम इन्डल जेन्स चेचने की दुकाने खोल दी
है मानो महात्मा लियो ने एक दम सारे समार को
निष्पाप करने की कल आविष्कृत करली है। कहीं ऐसा नहीं
कि निधन पापी पोप की इस क्षमा पदान का लाभ न उठा
सके इस कारण पोप ने दया वश अपनी क्षमाप्रदान का मूल्य
सर से एकसा न लेकर सवसे उसकी धन सामर्थ्य के अनु-
सार (मूत्य) लेना निश्चय किया है। राजा महाराजा तशा
राजकुमार इत्यादि को इन्डलजेन्स क्रय करने के लिये २५
सुवर्ण मुद्रायें देती होती थी। ऐवट वेरन इत्यादि पडे जमी
न्दारों को दस, जिनकी वार्षिक आय-५०० - सुवर्णमुद्राएं हो
उन्हे छ , सामान्य दुकानदारो तथा उन व्यक्तियों को जिनकी
.
।

महात्मा मार्टिन लूथर
१-
।
वार्षिक आय दो सौ सुवर्ण मुंद्रा हो उन्हे तीन सुवर्ण मुद्रायें
देनी पडती थी। यद्यपि विल्कुल निर्धन मनुष्य को कवल ।
पश्चात्ताप और व्रत करने के उपरान्त इन्डलजेन्स प्रदान करने
का नियम या परतु ऐसा वास्तव में कभी होता नहीं था ।
माइकानियम कहता है कि अनावर्ग मे एक नवं युवक ने बिना
धन दिये इन्डलजेन्स प्राप्त करने की प्राथना की परन्तु उसकी
प्रार्थना किसी ने न सुनी।
ये इन्डलजेन्स सारे योरप मे बेचे जाते थे। इन्डलजेन्स
बेचने के लिये सारा जर्मनी तीन भागों में विभक्त किया गया
था। उन तीन भागों में से वह भार जिसमे लूथर रहते थे
मेएस के बडे महन्त (archbishop)अलर्वट को सौंपा गया है ।
यह केवल बडा महन्त ही न था वरन् जर्मनी के दो और उच्च
पदों का भी अधिकारी था । इसकी आयु अभी केवल सत्ता
इस वर्ष की थी। कहने को तो यह धर्म पिता था परन्तु
वास्तव में इससे बढकर पाप पिता स्यात् ही दूसरा महन्त
होगा। यह महा स्त्रीलंपट और व्यभिचारी था । यदि कुछ
गुण था तो यही कि विद्वानों तथा कलाकुशलों का अच्छा
मान करता था। इसने बडे महन्त का पद प्राप्त करने के लिये
पॉप की बडी भारी रकम उत्कोचरूप में दी थी। और ये सब
रकम उस समय के प्रसिद्ध महाजन फगर्स से उधार ली गई
थी। फगर्स आग्सवर्ग में रहता था। कासलिन नामक एक
विद्वान ने जर्मन भाषा में लुथर की एक जीवनी बडी 'पोज
परताल से लिखी है। उसका अगरेजी मे मी उरथा हो चुका
है) कासलिन अपनी पुस्तक में अलवर्ट का चित्र यो खाँचता
है। अलपर्ट का चित्र भी उसकी पुस्तक में दिया गया है।

महात्मा मार्टिन
लूथर
४६
"उसके ओठ मोटे मोटे, चेहर भारो, भासे निष्प्रभ, नाक
लयो और मुकी हुई थी
उधार ली हुई रकम के लिये तकाजे पर तकाजे आने
लग। अलबर्ट के पास द्रव्य कहाँ जो फगसं का कर्जा पाटे।
ठीक इसही ममय पाप लियो को इन्डलाजेन्सों को विक्री के
लिये पर सुयोग्य व्यक्ति की आवश्यकता हुई । अलपर्ट से
बाह कर श्रच्छी तरह इस काम को स्यात् ही अन्य कोई कर
मयता : पोप और अलवर्ट में तुरन्त समझौता होगया।
जर्मनी के एक भाग में जितने इन्दलजेन्स पिक उन सरका
ठेका अलर्ट को मिल गया। टे की शर्त यह थी कि उस
भाग में इन्डलजन्स घेत्रने से जितना वसूल हो उसका आधा
पोप का भेजा जाय और आधा अक्षधर्ट स्वयम् लेले ।
फगर्स भी चुप बैठने वाला महाजन न था। फगर्स को
ज्याही पता लगा कि अलवर्ट को एक आय का मार्ग मिल
गया त्योही उसने अपने सिपाही अलवर्ट के पास भेजे । तय
यह हुआ फिफगर्स के इन दूतों के पास सदूक की दूसरी ताली
रहे और प्रत्येक दिन की आमदनी को आधा ये लोग तुरन्त
अपने अधिकार में कर लिया करें। इस तरह इन्डलजेन्स
भचारको के पीछे पीछे फगर्स के दूत भी लगे रहत थे। अल
वर्ट में टटजेल नामक एक महन्त को सैक्सनी में इन्डलजेन्स
बेचने को भेजा था। यह निर्विवाद प्रमाण से सिद्ध होचुका
है कि टटजेल न खयम् इतना द्रव्य हडप किया कि वह
धनी होगया।
जिस नगर में इन्डलजेन्स घेचना होता था उस नगर में
पहिले से बड़ी धूम धाम की जाती थी । झुड के झुडपादडी
।

महात्मा मार्टिन लूथर ANARAN पुरोहित और महन्त नियमानुसार एक पंक्ति में होकर उस नगर मे निकलते थे। ये सब हांथो मे मोमयती और बड़े बडे झडे लिये रहते थे। धर्मगान और भजनों के साथ साथ घंटे बजते जाते थे। ये सय मुड बडे गिरजे के निकट ठहर जाता था। गिरजे में वेदी के ऊपर एक रक्त वर्ण * फूस रक्ला जाता था। गिरजे के ऊपर बडे भारी भारी रेशमो झडे जिनमें पोप के अस्त्र का चिन्ह बना होता था फहरात थे। सब के नीचे एक चडा भारी लोह का तगला रफ्ता जाता था । इसही तसले में करोडों वो की नरकाग्नि से बचाने वाली औषध का मूल्य रक्खा जाता था। यडे बडे सुमुख वक्ता उपमा अल फार पूर्ण बडे बडे धर्मव्यारयान देते थे। उन व्यारयानों द्वारा लोगों को यह बताया जाता था कि किस प्रकार अल्पमूत्य में वे अपने को घोर नरकाग्नि से बचा सकते हैं । व्याख्यान के अन्त होने पर वे सब हत्यारे लुटेरे डाकू जो पूर्व ही से इस कार्य के लिये एकत्रित किये गये थे आगे बढ बढ कर इन्डल जेन्स क्रय करते थे। बीच बीच में वक्ता महाशय यह भी कहे जाते थे कि यह कुछ अत्यावश्यक नहीं है कि पापी ही मनुष्य इसे मोलले । यदि किसी व्यक्ति को सदेह है कि उसके पूर्वजो में किसी ने कुछ पाप दिया है और यह नरक में है तो उस व्यक्ति का यह धर्म है कि वह एक इन्डलजेन्स मोल लेकर अपने पूर्वजों का नरक से उद्धार करे और उसे स्वर्ग भेजे। *पूस पुराने समय की एक प्रकार की सूली का, नाम है । इस ही पर ईसा को फाली दोगई थी। तब से ईसाई बोग उस चिन्द को पवित्र मानने - महम्मा मार्टिन लुथर MOO2004 - डिलजेन्स रूपी औषध की अमोघता पर हजारों शपथ सायी जाती थी। और इस पर भी यदि कोई मदेह प्रकट करता था तो तुरत उसे नास्तिक को उपाधि देवी जाती थी और कहा जाता था कि यदि वह इन्डलजेन्स पर अपना विश्वास न लायेगा तो धर्म से बहिष्कृत कर दिया जायगा । यहुधा यह काम मेले तमाशों में भी किया जाता था जहाँ लोग श्रापही मेले तमाशे के लिये जमा होते थे। यही नहीं था कि इन्डलन्जेस केवल नरकाग्नि बचाने ही के लिये बेचे जाते हो । कैथालिक मतानुसार मनुष्य दिन भर में सैकड़ों पाप करता है । प्रत्येक पूजा का, प्रत्येक देनिक कर्म का सूक्ष्म से सूक्ष्म भी विस्तार निश्चित है ।यदि एक शब्द जिस प्रकार से कहना चाहिये उस प्रकार से नहीं कहा गया, यदि मत्र पाठ करते समय जिस तरह श्राख मूदना चाहिये उस प्रकार प्रास्त्र नहीं मुदी, यदि हाय हृद्य तक न उठ कर कमर ही तक उठे, बस पाप लग गया। लूथर कहता "जिस पात्र से पहिले ईश्वर का प्रसाद नहीं लगाया गया है। उस पान से यज्ञ करना पाप है, अपवित्र माईकोनियस जो उस समय अनावर्ग के मासिस्कन मठ मे रहता था इस मकार लिखता है। "So highly honoured was the sodulgence that where the commissary was brought in the town the Bull'uvas tornc aloft on a velvet or golden: cushion and all priests monks Councillors, School Masters scholars dien women virgins and children marched in Procession with banners and tapers and singing, then all bells were rung, all organs played है . - - - --

૧૨
महात्मा माटिन लूथर
1
वस्त्रों को पहिन कर पूजा करना पाप है, मत्र पढ़ते समय
दूसरी बात बोल उठना पाप है, यदि मत्र का उच्चारण करते
समय जिह्वा तुतला उठे तो पाप है। परंतु इन सब भिन्न २
पापों से रुपया देकर छुटकारा मिल सकता था। पाएको एक
पुल बनाने को रुपया चाहिये । पोप ने वटर-ब्रीफ ( butter
(brief) नामक इन्डलजेन्स वेचना प्रारभ किया। इस इन्डल
जेन्स को मोल ले लेने के उपरान्त यदि व्रत के दिन मनुष्य
मक्खन साय तो उसे पाप नहीं लगेगा। यदि एक पोप भक्त
से सारे दिन विभुक्षित रह कर व्रत नहीं किया गया
और
सध्या के निकट आने पर भूख से व्याकुल हो उसने थोडासा
मक्सन सा लिया-उसने पाप किया । वस उद्धार तर ही
होगा जब वह उपरोक्त नामक इन्डलजेन्स मोल ले।
धीरे २ जान टटजेल महाशय विटेन्वर्ग के निकट पहुचने
लगे। जैसे २ टटजेल महाशय निकट अाते गये वैसे ही वैसे
स्टजेल के विषय में अनेक किम्बदतिया लूथर के कान तक
पहुँचती गई । लोग आ आ कर लूथर से कहने लगे कि टट.
जेल तो अपने उपदेशो में कहता है कि "यदि किसी मनुष्य
ने ईशू की'मा मरियम् के साथ भी घोरतर व्यभिचार किया
हो तो उसका भी उद्धार इन्डलजेंसों द्वारा हो सकता है,
इन इन्डलजेसों द्वारा जितने पापियों को तार दिया है उतने।
पापी तो कभी पीटर स्वयम् अपने उपदेशों द्वारा न तार सका ।
होगा। इन्डलजेन्स क्रय करने वाले एक ओर तो किये हुए
पापों से मुक्त हो जाते हैं दूसरी ओर यदिभविष्य में पाप बन
' पढे तो उसका भी दंड'उन्हें नहीं मिल सकता टटजेल कहा
करता था कि ज्योंही मुद्रा गिरने से तसला यजा कि बस उसी
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महात्मा मार्टिन लूथर પૂરે s- Aiinnr क्षणं पापी की प्रात्मा नरक को त्याग तुरत स्वर्गधाम को चली जाती हे। इनमें सरह नहीं कि इन उपरोक कथनो में बहुत कुछ अतिशयोक्ति मिली नई होमक्ता हे परतु तप भी जर ये ध्यान प्राता है कि किस नगह के निलोलुप इस कार्य को कर रहे थे नर भी हो विश्वास का पडता है। महाजा के दूत जिसके पीछे २ उडालिये फिरते थे ऐसे प्रल नर्ट से क्या उचित 'अनुचित कारनाइयॉ इन्डलजेन्म वेंचने के लिये न की गई होगी यह पक मोचने की बात है। टटजेल ने तो मानों इन्डलजेन्स पचने के लिये अवतार ही लिया था। इन्डलजेम |चते २ टेटनेत के १७ वर्षीत चुके थे जब उसने अलर्ट की नोकरी धोकार की। टरजेत का गिज का चरित्र भी चेमा ही था जैमा कि में उग से आशा की जानी माहिये। व्यभिचार में पकडे जाने पर उसे डुनाये जाने का दड मिला परतु फिर यह दउ पदल कर उसे आजन्म कारागार का ढड दिया गया। वह लीपजिग कारागार से भाग निकला और इन्डलजेंस चेचने का काम करने लगा। लथर के मिन श्राश्रा कर उसस यह सब कहते थे और पूछते थे कि आपके विचार में यह न्याय है या अन्याय । इन अनेक अन्याय पूर्ण गातों को सुनने २ लुथर की अन्तरात्मा टुपी हो उठी। उमसे न रहा गया । १५१७ इसवी की ३१ वीं अस्टूबर का दिन योरप के इतिहास में यह महत्व का इस ही दिन घिटेनवर्ग के गिरजे के दरवाजेपर' लूधर दाग लिखित एक चिट्ठा दिखाई पडा । इस चिट्ठ लूथर ने इन्डलजेंसों के विरुद्ध ५ पातेप किये थे और - - ५४ महात्मा मार्टिन लूथर - श्राद्वान किया था कि जिसका जी चाहे यह आकर लूथर से उन विषयों पर शास्त्रार्थ कर ले। लूथर इस समय चौतीस वर्ष के थे। एक तरह से विचार करने पर लुथर के इस कार्य में कोई विशेषता नहीं दिखाई पडती क्योंकि उन दिनों यह एक सामान्य प्रथा थी कि विद्वान लोग परम्पर शास्त्रार्थ करने के लिये एक दूसरे का श्राहान फरें । यदि अमुक मनुष्य ने अमुष पक्ष लिया तो इससे यह कभी नहीं समझा जाता था कि वास्तव में वह उस पक्ष पर विश्वास करता है। बहुधाही विद्वान अपने निश्चित विश्वास के प्रतिकूल पक्ष का समर्थन करते थे और इस तरह ख्याति कमाते थे। जब ईसाई धर्म के निश्चित् सिद्धान्तों के ऊपर भी शास्त्रार्थ हश्रा करते थे और लोग उनके विरुद्ध पक्ष को ग्रहण कर सत्यासत्य का निर्णय किया करत थे तब फिर इन्डलजेन्लों पर आक्षेप करना कौन यडी कठिन बात थी, क्योंकि इन्डलजेन्सों का विषय तो उस समय तक निविवाद सिद्ध भी नहीं हो चुका था और ईसाई विद्वानों का उस विषय पर बहुते मतभेद था। लूथर ने ६५ श्राक्षेपों का बहुत शीघ्रता में लिखा था ओर उसने कभी स्वप्न में भी न सोचा कि यही "श्राधाताव" कागज, सारे यौरप में भाग लगा देगा। वो चिट्ठा यो प्रारम्भ होता हे * इसाइ धर्म के विद्वानों का इन्दलजेन्स पोप के इन्दलजेन्स से बिलकुल विपरीत था । इन लोगों ने तो तत्वज्ञान दृष्टि से यह बताने का उद्योग किया था कि मनुष्य किन २ उपचारों द्वारा पाप निमुक्त हो इश्वर के सम्मुख जा सकता है। हमने उनक मत को इस पुस्तक में सविस्तर वर्णन करने की आयश्यकता न समझा क्योंकि वह पद्धत रुचि कर न होता । - 1 महात्मा मार्टिन लूथर । "सत्य को स्पष्ट करने की इच्छा और प्रेम के कारण माननीय धर्म पिता मार्टिन लूथर की अध्यक्षता में नित लिखित विषयों पर विटेनवर्ग में शाखा होगा । पोप लियो को जा पन लथर ने लिया उसमें वो कहता है "ये विवाद विषय है, न सिद्धान्त है न आदेश" । लूथर को पूरा विश्वास था कि यदि यह इन्डलजन्स की बुराइयों को यडे पद क पादडियों को सममायेगा तो निश्चय है कि इसका सुधार करेंगे। और इसी विचारानुसार उमने एक पत्र अलर्वट को भी लिखा जिसके उत्तर में अलवर्ट न केरल इतना लिख भेजा कि तुम्हारी रिपोर्ट पाप क पास भेज दी गई है और तुम्हें राम से आन घाली आशा की प्रतीक्षा करनी चाहिये।चाह लूथर का विचार कुछ भी क्यों न रहा दो ईश्वर कोयहीइच्छा थी कि यही आधा ताव" कागज योरप को पोप पाप से निमुक्त करे । दोही समाह के भीतर उस "आधेताव" कागज की सहस्रो प्रतियों। छपकर पॅटन लगी । उसफा जर्मन भाषा में उल्यामुादिखतेही देनत उमका इतना प्रचार होगया किधर उन विषयोपर चर्चा दोने लगी। पोपों का प्रताप इस समय सूमोशामका ढेर मात्र था उसमें दिया सलाई लगा दी गई श्रय उसे स्वाहा होने से कोन रोक सकता था। माइकोनियस कहता है कि घे विवाद विषय घर • इतनी शीघ्रता से फैल गये "मानो स्वर्गदूतों ने उनके प्रचार करने का भार अपने ऊपर स्वयम् लिया था। उस निद्वे का मूल्य समझाने के लिये उसमें से कुछ महत्व शील विवाद विपर नीचे दिये जाते हैं । (५) पोप केवल उन्हीं 1 *विषयों के नम्बर है।

" . । ૫૬ महात्मा मार्टिन लूथर दडों की क्षामा दे सकता है जो उसने स्वयम् अपनी इच्छा से दिये हों या जिनकी क्षामा का विधान बर्मशास्त्रों में हो और अन्य किसी प्रकार के पाप की क्षोमा न तोपोप दे सकता है न उसे देना चाहिये । (४२) ईसाइयों को यह मिसाना चाहिये कि यह पोप की कमी इच्छा नहीं है कि इन्डलजेन्स क्रय करना। दया धर्म से भी बढकर मानाजाचे । (४३) ईसाइयों को मियाना. चाहिये कि दरिद्रों और दुखियों की सहायता करना 'चामा क्रया से कही अधिक श्रेयस्कर है। (५०) इसाइया को लिखाना चाहिये कि यदि पोपःको इस बात का ज्ञान हो कि उसको भेडों* का रुधिर मांस अस्थि किस प्रकार उपदेशकों द्वारा इन्डलजेन्म रूपमें चूसा जा रहा है तो वो अपना गिरजा कदापि न बनवायेगा । (२)यदि पोष दयावश वन ले पापियों को नरक से मुक्त कर सकता है तो वह उमी दयावश नरक ही का नाश कर सब को नरक यातना से मुक्त क्यों नहीं कर देता । (६) पोप स्वयम् काम की तरह धनवान् हे अत उसे चाहिये कि पीटर का गिर ग स्वयम अपने निज के द्रव्य से बनवाये और अपने हरिद भेडो को न चूसे । इन उपरोक्त उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि लूथर ने उस चिट्ठ में कहीं यह नहीं लिखा था कि पोप की कोई प्राशा न माने या पोप धर्म के विरुद्ध एक नया धर्म चलाया जाये। लूथर ने उस चिट्ठे द्वारा केवल इन्डलजेन्स कय का नौचित्य मान दिखाया था। पोप पद पर किसी प्रकार का साक्षेप नहीं पोप के भक्तों की उपमा बहुधा भेडा से दी जाती है और पोप.म्वयम् मेपपाल समझा जाता है। । पशिया माइनर के एक बहुत पुरातन गना का गम है जो अत्यन्त पनी मानाजाता था।

महात्मा मार्टिन लूथर ५७ । 1 किया था । यदि लूथर ने टटजेल द्वारा वेचे जाने वाले इन्ड- सजेन्सों कापिरोध किया था तोवह विरोध केवल एक कर्मचारी द्वारा किये हुए एक कार्य विशेष के प्रति या। पोप पद के विरुद्ध यह विरोध कदापि न था। परन्तु उन अर्थ यही किये गये कि लूथर पोप का विरोधी है। इसमें आश्चर्य की कोई यान नहीं है । यह भेद इाना सूदम है कि इसकी सीमा का शान वीसवीं शताब्दी में भी बहुत कम लोगों को है । अनेको घटनाओं में समालोचना मात्र ही प्रराजक्ता,का पूरा प्रमाण मान ली जाती हैं। लूथर ने कभी स्थान में भी यह न सोचा था कि इसही 'श्राधे ताव' कागज के लिखने के कारण उसे पोप ऐसे महोबल- शाली व्यक्ति का सामना करना पडेगा । जब उसे यह स्पष्ट 'होगया कि यह श्राधातार फागज घोर अान्दोलन का कारण बन चुका हे तप भी उसकी इच्छा उस शान्दोलन में भाग लेने की न थी। लूथर ने इस घटना के कई वर्षोपरान्त कहा कि "मला मुझ ऐसे तुच्छ और नीच महन्त में यह साहम कहा कि में पोप ऐसे महा प्रतापी पुरुप के विरुद्ध सडा होऊ" । पोप लियो जिसके पास लूथर की रिपोर्ट गई थी उन व्यक्तियों में में था जो ससार को अपने प्रानद का उपवन समझते खूधर पोपलिया के प्रति अपनी नम्रता इस प्रकार दशाता है-है परम पवित्र पिता मैं श्रापरे चरण कमलों में साग प्रणाम करता। आप मेर तन मन धन सय के प्रमु है। श्राप (चाहे) घटायें बढ़ायें, युलायें, पुचा दुस्कारे, माने, न माने, जो आपकी इच्छा हो कर । मैं आपकी श्राना प्रभु इशु की अानानव मान् गा । यदि मैंने मृत्युके योग्य कार्य किया है तो में मरन से मुप न मोडगा। - महात्मा मार्टिन लुथर লুথ कष्ट नहीं उठाना पडा। 'अभय पत्र मिलने के उपरान्त लूधर पोप के कार्डिनल ने मिला । लूथर के मित्रों ने समझा दिया था कि कार्डिनल के साथ बडे आदर सम्मान से मिलना ! लूथर अकेला मिलने नहीं गया थ बग्न् दो या तीन मित्र उसके साथ थे। लथा कार्डिना के निवाम स्थान पर पहुचा । लाक्षान होते ही लयर ने कार्डिनल को साष्टॉग प्रणाम किया। कार्डि नल ने भी वश्त शिष्टता से लूथर को उठने की आशा दी। इसके उपगन्त क्षेम फुशल पूछी गई । जव ग्रह सय हो चुका तो वास्तविक विषय सामने आया । कार्डिनल निश्चय लूधर के साथ वडों का मा वार करना चाहता था और छोडना भी स्वीकार करता था परन्तु प्रतिक्षा यह कराना चाहता था कि लूथर उलो समय उसहो की उपस्थिति में अपनी पूर्व की नव समालोचनायें लौटालने और अपनी मूर्पता स्वीकार करे । कार्डिनल की तीन आशायें थीं --(१) लूथर अपना नास्तिकता को लौटाल ले और पश्चात्ताप करे (२) लूथर प्रतिमा करे कि भविष्य में वह ऐनी समालोच- नायें कभी न करेंगा (३) लूथर कोई ऐसा अन्य कार्य न । करेगा जिससे रोमन कैथालिक धर्म में अशांति फैले । लूथर ने इन सब का उत्तर यही दिया कि यदि हमारी समां लोचनाओं में कोई प्रमाद दिखा दिया जाय तो हम उमे तुरत स्वीकार कर लेंगे। इस पर दोनों में थोड़ी देर तक अच्छा शास्त्रार्थ हुआ परन्तु लूथर को विदित हुआ कि ऐसे शास्त्रार्थ से उसका कोई भला न होगा यदि कुछ फल होगा तो यही कि कार्डिनल और चिढ जायगा। अत: लूथर ने उस दिन --

महात्मा मार्टिन लूथर
जारगा।
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।
घर जा की प्रार्थना किया और कहा कि कल हम अपनी
स्थिति को लिख लावेंगे 'प्रोर तर परस्पर समझाना शीघ्र हो
दूसरे दिन लुथर तीन राज सचिया का भी साथ लेता
आया। आज डाकर स्गपिज भी साथ थे । लूथर का चिट्ठा
जिस पर वह अपना स्थिति लिप लाया या कुछ ताम्ग या
परन्तु सोपन उसका तात्पर्य यह था कि "में तन मन धन
से पोप का सेवक ह परन्तु सत्यान्वेषण करना कोई ऐसा पाप
नहीं है कि मुझे विना पचार का समय दिये दड दे दिया
जाय । मुझे पूरा विश्वास है कि मने कोई ऐसा कार्य नहीं
किया है जो शाखविगहित हो । यद्यपि में स्वीकार करता हूँ
कि मुझसे प्रमाद हो सकते हैं परन्तु विना प्रमाण में कोई
दोष स्वीकार नहीं कर सकता। इस पर कार्डिनल ने कहा "पुत्र!
में तुमसे शास्त्रार्थ करने नहीं आया हू और न ऐसा करने की
मेरी इच्छा है 1 में तो इसलिये आया है कि सहानुभूति तथा
सहिष्णुता सहित तुम्हारी बातें सुनू और तुम्हें फूल उपदेश
तीसरे दिन लूथर उससे भी बडा चिट्ठा लेकर उपस्थित
हुआ और उस चिट्ठे में उसने स्पष्ट कहदिया कि नाइविल
का प्रमाण ही उसके लिये मान्य है। पोप की आज्ञाओं को
यह याइबिल की अाशानों के अन्तर्गत समझता है । पोप की
आशायें बाइबिल की श्राशाओं के अनुसार होने पर माननीय है
विरुद्ध होने पर त्याज्य है। लूथर घाइयिल के अर्थ जैसे वास्तव
में हैं वैसे किया चाहता था। कार्डिनल कहता था कि बाइबिल
अर्थ जेसे पोपों को सम्मत होते आये हैं, और सम्मत हों

महात्मा मार्टिन लूथर
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तक लूथर नास्तिक सिद्ध नहीं किया गया है अत उसे अभी
अपनी शरण से नहीं हटाया जा सकता । यदि लूथर
नास्तिक
प्रमाणित हो चुका होता तो वह बिना किसी सकोच तथा
घहिप्रेरणा के ही उसे निवार्सित करना अपना परम धर्म
समझता।
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।

- ילדה .. । . . 1. सप्तम परिच्छेद पोप की चाले 1 यह तो निश्चित था कि पोप फ्रेडरिफ ओर लूथर की पर. रूपर जो स्थिति थी उसमें कुछ परिवर्तन होगा परतु प्रश्न यह था कि यह स्थिति परिवर्तन किस नीति द्वारा होगा--दड या साम । पोप को अभी साम नीति की सफलता में बहुत कुछ प्राशा थी और उसने उस ही नीति का अवलय लिया ।पोपने अपना एक मिलटिज नामक दून फ्रेडरिक के पास एक पत्र सहित भेजा। उस ही पत्र के साथ २ पाप ने 'सुवर्ण गुलाब' (Gold Rose) भी फ्रेडरिक को भेजा । सुवर्ण गुलाब' उसे दिया जाता था जिसका पोप सर्वोपरि मान करता था और फेडरिक को इसे पाने की बहुत दिनों से घडी उत्कट इच्छा थी। यही नहीं कि केवल सुवर्ण गुलाव ही भेजा गयाथा वरन पत्र भी वडी नम्रता से लिया गया था । उस पत्र द्वारा पोप ने बडा आश्चर्य प्रगट किया था कि उसके धर्म साम्राज्य में एक मृत्युनदन नास्तिकता का प्रचार कर रहा है । उसने लिखा कि मुझे पूर्ण श्राशा और विश्वास है कि मेरा प्यारा पुत्र तया न्यायाधीश सेक्सनी का राजा फ्रेडरिक इस शैताना त्मज (लूथर) का मुस बद कर देगा। १५१८ के नवम्बर मास में चार्ल्स हान मिलटिज इटनी से जरमनी के लिये चल पहादिसम्पर मास तक उसके प्रस्थान का समाचार उन सब लोगों को विदित होगया जिनसे उसका 1 ५ --

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महात्मा मार्टिन लूथर
कुछ सम्बन्ध था । नूरेन्वर्ग तक पहुंचते २ जो उसने देखासुना'
उससे उसे विदित होगया कि जर्मनी में यदि तीन मित्र लूथर
के हैं तो एक पोप का । इन सब बातों को देन मुन उसने भो
अपना भाव बदल दिया और सरल,उपायों द्वारा काम निका
लना निश्चित किया। मिलटिज को विदित हुआ कि सब से
पहिले यह आवश्यक है कि वह टटजेल की धुर्तिता के दोष से
पोप को बचाये । उसने टटजेल को लीपजिगसे अलटेन वर्ग
आने की आज्ञा दी। परन्तु टटजेल ने एक पडे और नम्र पत्र
द्वारा वहा न पाने के लिये क्षमा मांग भेजी। उसने लिख
कि "लीपज़िग छोडने से हमारे प्राणों पर श्रावनेगी क्योंकि उस
आगस्टियन महन्त लूथर ने ऐसी आग लगाई है कि सार
जर्मनी हमारे रुधिर का प्यासा हो रहा है। अत में मिलटिक
स्वय लीपजिग गया और वहाँ पहुचकर उसने टटजेल
अपने सामने बुलाया। मिलटिज को टटजेल की परीक्षा
उपरान्त विश्वास होगया कि टटजेल ने बडी २ धूर्तता में
दुष्टताये की है । उसे यह भी विदित हुआ कि टटजेल बह
सा रुपया स्वय हडप गया है। इसके छ. महीने के उपरा
जेल बडी दुर्दशा के साथ मर गया।
६ जनवरी को मिलटिज लूथर से मिला । उस अव
पर फ्रेडरिक का एक सचिव भी साथ था । दोनो ने व
आव भगत और मित्रता दिखाई । कुछ मिलटिज ढोलाप
कुछ लुपर और निश्चित हुआ कि लूथर भविष्य में इन्ड
जेन्मों के विषय में कुछ न लिखेगा और पोप लूथर को कि
विद्वान् पादडी के पास भेजकर उसको उसके दोपस्पष्ट
देगा। इस प्रकार दोनों, व्यक्ति परस्पर आलिङ्गन कर
-

महात्मा मार्टिन लुथर NN AAM - । दूसरे से विदा हुये। लूथर की इच्छा न थी कि वह पोप के विरुद्ध कुछ और अधिक आन्दोलन करे परन्तु कुछ घटनाएं ऐसीई कि लूथर को विवश हो मिलटिज़ द्वारा सम्पादित शान्ति तोडनीपही। जानईफ नामक विद्वान् से लूथर को एक घोर शास्त्रार्थ लीप जिग नामक नगर में करना पडा । लोपजिग में भी एक निश्व- विद्यालय था जो कट्टर कथालिक पोप भक्तों का दुर्ग था । इस शास्त्रार्थ का अध्यक्ष जार्ज ड्यूक मी कट्टर कथालिक था । इस ही ड्यूक के दुर्ग में यह शास्त्रार्थ हुआ । जैसा बहुधा होता है इस शास्त्रार्थ में भी असबद्ध प्रलाप दोप बहुत किये गये। ईक ने लूथर को हस का अनुगामी बनाया । लूथर ने हसको सचा ईसाई सिद्ध करते हुये अपने को बचाने का उद्याग किया इस पर ईक ने उसे यह स्वीकार करने पर विवश किया कि समायें भी भ्रम में पड प्रमाद कर सकती हैं। इतना मुह से निक खना था कि ईक ने अपन को विजयी मान लिया । लूथेर २५२० ईस्वी की फरवरी को यो लिखता है 'आज तक म विना जाने बुझे हस ही के सिद्धान्त सिखातारहा, उसहो तरह अज्ञानवश डाकर स्टापिज भी हस ही की शिक्षा देते रहे, सक्षेप में यह कि हम सब इस के शिष्य है यद्यपि अभी तक इसे जानते नहीं घे " उस विवाद के उपरान्त लूथरने हस की पुस्तफै पढी तो इसे विदित हुआ कि इसक और इसके विचारों में बडा ऐक्य है। यह शास्त्रार्थ कई दिन तक होता रहा और इसका कुछ निर्णय नहीं हुया कि फोन विजयी है। लीपज़िग पाले मर एक स्वर से ईक को विजयी स्वीकार करते थे। अध्यक्ष व्यक का भी यही निर्णय था । लीपजिग में ईक की बड़ी ख्याति ।

"महात्मा मार्टिन लुथर
फैली । घर २ में उसका सम्मान होने लगा । दिन प्रतिदिन
उसे बडे २ कुलों से भोज के लिये निमग्रण मिलने लगे। लूथर
ने भी ऐसे शत्रु नगर से बहुत शीघ्र अपना प्रस्थान किया ।
इम शास्त्रार्थ के विषय में ईक ने मन.मानी यात फेलाना
प्रारंभ किया जिसका प्रतिवाद करने में लूथर को बहुत कुछ
परिश्रम करना पड़ा, और कई लघु पुस्तक प्रकाशित करनी
पडी । लूथर को ईक ही मे थकेले युद्ध न करना-पडा नित्य
ही कोई न कोई विद्वान् लूथर पर आक्षेपकरताथा और भरला
लूथर उन सबकी पुस्तकों का उत्तर पुस्तक तथा पत्रिकाओं
में देता था। इस तरह उसे एक प्रकार से अकेले ही
चतुर्दश सहन राक्षसों से युद्ध करना पड़ रहा था पर धन्य है
उसका साहस कि वह सब ही को चाहे स्वर हो त्रिशरा, हि
दूपण, पुस्तकाकार याणों से विद्धही कर छोडता था।
इधर महात्मा ईक रोम पहुचे । रोम क्यों गये इसके विषय
में मत भेद है। ईक स्वयं तो यही कहता है कि हमें रोम से
निमत्रण आया था परतु उसके शत्रुओं का कथन है कि निम
प्रण आदि की बात सब बहाना है. लीपजग का विजेता ईक
पोप से अपनी विजय के प्रतिफल में कोई उपयुक्त उपहार
प्राप्त करने स्वय ही गया था। रोम में ईक का घड़ा सम्मान
किया गया। पोप और उसके कार्डिनलों ने उसकी बडी श्राव
भगत की यहाँ तक कि पोप ने उसका सर्व साधारण,
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है,प्रकाशित करते उसके चत्मल हृदय में घोर कष्ट हो रहा है घुसा पडा है, पोप जो अभी तक लूथर की नास्तिकता को क्षमाशील पिता की भाति सहन करता चला आया है, जर्मन महात्मा मार्टिन लूथर रहा था कि इतने में इंक महाशय यहाँ पहुंच गये । ईक भी उस अंतरंग सभा के सदस्य बना लिये गये जो लूथर का' अदिभार पन तय्यार करने में लगे थे। ईक एक स्थान पर बडे गर्व के माथ लिखना हे कि "परम पवित्र पोप, दो कार्डिनल, एक स्पेन का विद्वान और में" एक- चार वरार पाच पटे तक इस ही विषय पर विचार करते रहे"। इसमे यहम्पट विदित हाता है कि पाप लूपरका विषय महत्व का समझना था और उसके ऊपर हाथ उठाने से उमे कितना भय हाग रहा था। स्यात् ही ग्रेगरी सप्तम ने हेनरी चतुर्थ का बहिष्कार करते समय इतनी माथापच्ची की हो। अतरंग सभा में पकडा मतभेद था। कुछ लोग चाहते थे कि सूथर गेम तुलाया जाय और रोम में बुलाकर उस पर नियम पूर्वक नास्तिताअभियोग लगाया जाय और उसे भानी रक्षा का समय दिया जाय। दूसरे कहते थे यह सप होगा क्यायि लूशर यहा आयेगा ही नहीं अत यही उचित है कि उसका यों ही वहिष्कार कर दिया जाय । गदुन वाद विवाद के उपरान्त यही निश्चित हुआ कि लूथर का बहिष्कार विना न्याय किये ही किया जाय और इस ही सिद्धान्तानुसार १५ जून सन् १५२० को के घहिकार का आज्ञा पत्र प्रकाशित हुआ। इस श्रामा पत्र को, पोप कहता परतु क्या किया जाय वन्य शूकर प्रभु ईशु के द्राक्षाक्षेत्र में 11, देशवामी अपने अन्य पुत्रों के नास्तिक हो जाने के मय से, व्यय लघर महात्मा'मार्टिन लूथर उस भर्भकती हुई चिंता में, पोप को ज्ञापत्र तथा पोप की प्रमुता का समर्थन करने वाले अन्य बहुत से प्रेथ झोक दिये गये। अग्नि में स्वाहा करते समयं लूथर ने मंत्रवत् लैटिन भापा में यह पढा "तूने ईश्वर के पवित्र भक्त को दुखाया हैप्रत. तुझे अनंत अग्नि चट कर जाय" । यह 'करने के उपरान्त लूथर तो तुरत अपने स्थान को लौट गया परत विद्यार्थीगण जिनके लिये यह एके शानदमय उत्सवे था वहाँ डटे रहे। उन्होंने उस चिता के चारों ओर प्रदक्षिणा करना और अपनी जातीय गान गाना प्रारम किया। जब यह सब करके उन्होंने छुट्टी पाई तब तक मध्यान्ह हो पाया था। मध्याह्न के उपरान्त पोपके चहिफारवाले श्राक्षापत्र को अपमान करने के लिये वि. धार्थियों ने एक जुलूस निकाला । जो किताये, लूथर ने जलाई थों उनकी जितनी प्रतियॉनगर में मिलो घे भी सब जला दी गई । ये सब कृत्य उस दिने प्रात काल से सध्या तक होते रहे। दूसरे दिन लूथर ने दर्शकों को उपदेश में बताया कि बिना पोप से नाता तोड मुक्ति कदापि नहीं मिल सकती । इस तरह धो जो चार दिन पहिले पोप के कार्डिनल को साष्टांग प्रणाम था आज पोप की पूरी वैरी बन बैठा । -- 4.

- अष्टम् परिच्छेद लूथर के धार्मिक विचार मानसिक क्रान्ति अथवा विचारों क परिवर्तन विशेष करें धार्मिक विचारों के समूल परिवर्तन कमी भी किसी व्यक्ति विशेष मात्र की शिक्षा से नहीं होते । व्यक्ति विशेप जेसे बुद्ध या ईसा, जिन को ससार के विचारों को समूल परिवर्तन करने का सौभाग्य प्राप्त है, केवल एक केन्द्रमान थे जिसमें। उनक समय की विचार प्रवृत्तियाँ, समाज के हृदय में दूर तक फैली हुई भावनायें, (जो यद्यपि उस समय सर्व साधार रण को अध्यक्त थी परन्तु तय भी अनुभवा विद्वानों को सुस्पष्ट थी) एकन्नित हो, अव्यक्त से व्यक्त, अरन्ट से हष्ट,नि शता से शाक्त, मकसे वाचाल, चन, इतने अनियनित प्रवाह से बह निकली कि शिवजटा नष्ट भागीरथी के प्रवाह की माति फिर उनका रोकना नितान्त श्रेमभव हो गया। चे भावनायें, वे विचार प्रवृत्तिया यद्यपि निकली, उस व्यक्ति विशेष के शरीर से परतु तब भी उस व्यक्ति विशेष का मानसिक क्षोत्र उन प्रवृत्तियों तथा उन भावनाओं का श्रादिगर्भ कभी नहीं माना जा सकता। उनका गर्भाधान अध्यक्त रूप से निश्चय उस समाज में पूर्व ही हो चुकता है जिस समाज का यह व्यक्ति विशेष मे विचार तया भावना रूपी ससति को व्यकि में खाने वाला एक अग विशेष होता है। अतएव यह प्रश्न कि सुधारक के युग का ७३ महात्मा मार्टिन लूथर M । उस भकती हुई चिंता में, पोप की आज्ञापत्र तथा पाप की प्रभुता का समर्थन करने वाले अन्य बहुत से प्रथ झोक दिये गये। अग्नि में स्वाहा करते समय लूथर ने मंत्रवत् लैटिन भाषा में यह पढा “तूने ईश्वर के पवित्र भ'को टुसाया हेत तुझे अनत अग्नि चट कर जाय" । यह करने के उपरान्त लूथर तो तुरत अपने स्थान को लौटं गया परतुं विद्यार्थीगण जिनके लिये यह पक आनदमय उत्सवे था वहाँ डटे रहे। उन्होंने उस चिता के चारों ओर प्रदक्षिणा करना और अपनी जातीय गान गाना प्रारम किया'! जब यह सब करके उन्होंग छुट्टी पाई तब तक मध्यान्ह हो पाया था। मध्याह्न के उपरान्त पोपके वहिष्कारवाले आशापत्र का अपमान करने के लिये वि. धार्थियों ने एक जुलूस निकाला । जो कितावे, लूथर ने जलाई थों उनकी जितनी प्रतियॉ नगर में मिला घे भी सव जला'दी गई । ये सब कृत्य उस दिन प्रात काल से सध्या तक होते रहें। दूसरे दिन लूथर ने दर्शकों को उपदेश में बताया कि बिना पोप से नाता तोडे मुक्ति कदापि नहीं मिल सकती । इस तरह धो लथर जो चार दिन पहिले पोप के कार्डिनल को साष्टांग प्रणाम करता या आज पोप का पूरा वैरी बन बैठा ।

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अष्टम् परिच्छेद
'लूथर के धार्मिक विचार
मानसिक क्रान्ति अथवा विचारों क परिवर्तन विशेष करें
गर्मिक विचारों के समूल परिवर्तन कभी भी किसी व्यक्ति
मोप मात्र की शिक्षा से नहीं होते । व्यक्ति विशेष जेसे बुद्ध
। ईसा, जिन को ससार के विचारों को समूल परिवर्तन
रने का सौभाग्य प्राप्त है, केवल एक केन्द्रमान थे जिसमें
नके समय की विचार प्रवृत्तियाँ, समाज क हृदय में दूर
क फैली हुई भावनायें, (जो यद्यपि उस समय सर्व साधा
- को अव्यक्त थी परन्तु तय भी अनुभवा विद्वानों को सुस्पष्ट
नो) एकत्रित हो, अव्यक्त से व्यक्त, अष्ट से इष्ट, नि शत्त से
मूकसे वाचाल, वन, इतने अनियनित प्रवाह से यह निकली
के शिवजटा भ्रष्ट भागीरथी के प्रवाह की भाति फिर उनका
रोकना नितान्त असभव हो गया। वे भावनायें, ये विचार
वृत्तिया यद्यपि निकली, उस व्यक्ति विशेष के शरीर से परतु
जय भी उस व्यक्ति विशेष का मानसिक क्षेत्र उन प्रवृत्तियों
था उन भावनाओं का आदिगर्भ कभी नहीं माना जा सकता।
उनका गर्भाधान व्यक्त रूप से निश्चय उस समाज में पूर्व
की हो चुकता है जिस समाज का यह व्यक्ति विशेष उन
पेचार तथा भावना रूपी संगति को व्यक्ति में खाने वाला एक
अग विशेष होता है। रात पदमा फि सुधारक के युग का
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७४ महात्मा मार्टिन लूथर - सुधारक पर कितना प्रभाव था-अर्थात् सुधारक ने युग को सुधारा या युग,ने सुधारक को सुधारा, पूर्णतया हल नहीं किया जा सकता यदि हम यह सिद्धान्त मान के चले कि जो जिसका कारण है वह उसका कार्य नहीं हो सकता और जो जिसका कार्य है वह उसका कारण नहीं हो सकता। सभव है कि नैयायिक इस सिद्धान्त की सर्वत्र अप्रति इतगति माने परन्तु ऐतिहासिक गवेषणा करते समय तो इस सिद्धान्त की लगाम बहुत कसकर थामनी पडती है। प्रत्येक फ्रान्तिकारी ऐतिहासिक व्यक्ति में और उसके युग की ऐतिहा सिक अवस्था में इस प्रकार से घात प्रत्याघात का सबन्ध है कि प्रत्येक को बारी बारी एक दूसरे का पिता पुत्र मानना पडता है। दोनों ओर की शक्तियों में घात प्रत्यानात प्रारम्भ होता है, युग सुधारक को बनाता है सुधारक युग को बनाता है । यदि एक न होता तो दूसरा, असंभव था । एक था, अत “एव दूसरा भी हुआ या यों कहना चाहिये कि एक के होने पर दूसरे को होना अवश्यम्भावी था। लूथर जिस समय पैदा हुया वह योरप का परिवर्तन काल था योरप की जनता शताब्दियो तक श्रधेरै में टटोलने के उपरान्त फिर ज्ञान के प्रभात में वढ रही थी । क्रूसेड के युद्ध, नवीन और अज्ञातपूर्व देशों का ज्ञान, छापे की कल, यौनानी और रूमी सभ्यता का प्रादुर्भाव, पोपों के अत्याचार, बढती हुई जातीयता का भाव, साम्राज्यों का सगठन, फ्यूडल प्रथा का भाश, विज्ञान के प्रति बढती हुई रुचि, व्यापारिक प्रतिद्वंदता फा समावेश, श्रादि अनेक नवीन शक्तियाँ उस समय के संकु 'चित वधनों को प्रयल शक्ति से तोडमरोड रही थीं । जनता + - मामा मार्टिन लूथर को एक अव्यक्त सा शान था कि वह एक नवीन युग की ओर बद रही है। ऐसे समय में यदि पुराना ईसाई धर्म भी ममय के अनुसार चलने को तय्यार होना, यदि नवीनफाल के आने की सूचना देने वाले अरुणशिवानों का गला नास्तिकता के अग्निसरकार द्वारा न घोग जाना तो लूथर लथर ही रहता सुधारक कभी न बन पाता। ऐसा नहीं हुआ फल यह हुआ कि अधिक उन्नति शील ईमाईजाता पुगने धर्म से अलग हा गई । लूथर की सफलता का मुख्य रहस्य यही था कि वह अपने युग की आवश्यकता पूरी कर रहा था जो याते लोगों के हृदय में थीं उन्हें यह मुंह से निकाल मूर्तिमान बना रहा शालूथर की पुस्तके छापेसाने से राहर आते ही धूलि की तरह उड जाती थी कारण कि उनमें अपने युग के रोग की जैसा कि अभी तक के वर्णन से विदित हुआ होगा, लूथर एक दमही सुधारक नहीं होगया था। पोपप्रतिष्ठित ईसाई धर्म में धीरे २ उसे दोप दिखाई पडने लगे और उनके सुधार का यह उद्योग करने लगा।प्रारम्भ में जब उसने इन्डलजेन्सों पर आक्षेप किये थे, तब उसका केवल तात्पर्य इतना था, कि टटजेल ऐसे दुष्ट व्यक्ति मन मानी रीति से इन्डलजेन्स 'बैंच कर ईसाई धर्म को दुपित न करनेोपा । लुथर लियो के पत्र में एक स्थान पर लिखता है, परम पवित्र पिता ! वे लोग जिनका मैं विरोध करता हु आपके पवित्र नाम पर धमालगाने का उद्योग करते है आपके नाम से मन मानी मूर्खता की बातें कमाते हैं और जब उनका विरोध करता हूँ कि ये सप यापकी आशायें नहीं है तो उलटे मुझ ही को आपका श्रोपधि थी। - " धन -

७६
महात्मा मार्टिन लूथर
शत्रु सिद्ध करने का उद्योग करते हैं " लुधर की यह कभी
इच्छों न थी कि वह कोई नया धर्म स्थापित करे। लूथर अपर्ने
ऊपर लगये हुये नास्तिकता के आक्षेप की घोर विरोध करता
था और वरायर सफलता पूर्वक सिद्ध करके दिखा देता थी
कि जो कुछ वह कहतो या लिखता है वह सर्व वाइग्लि
संम्मत है । लूथर की यह इच्छा थी कि उनके समय का ईमाई
धर्म इस तरह से सुधारा जावे कि वह अपनी प्रोदि पवित्रता
और स्वच्छता को फिर पहुच जावे । पोपों को और पोर्प भक्तो
को ये सब अति कटु मालूम पड़ता था और इन विचारों
को वे नास्तिकता के विचार कहते थे और कहें भी: क्यो
न; क्योंकि कहावत ही है कि "अर्थी · दोपं न पश्यति"
पोपभक्त पोष को ईशु का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि मानते थे।
उनका विचार था कि पोप की सत्ता समार की सव सत्ताओं
के ऊपर है और अपने कार्यो के लिये ससार में वह किसी
को उत्तरदाई नहीं है। बाइबिल का अर्थ जो पोपों को सम्मत
हो वही माननीय है । अन्य किसी को यह अधिकार नहीं हे
फि वह किसी नवीन रीति से बाइबिल का कोई नवीन अर्थ
फरे । पोप मत पोप की सत्ता को अपरिमित सिद्ध करने की
लालसा में इतने मुग्ध होगये थे कि वे कहने लगे थे कि सत्य
कोई वस्तु नहीं है जो पोप कहे यही सत्य है। सच तो यों है
कि पोपों ने याविल को तो उठाकर अन्यत्र रख दिया था
और अपनी स्वार्थ सिद्धि की यातों को याइबिल सम्मत का
कर प्रचलित करते थे। यदि कोई महापुरुप इन दोपों के
वियद कुछ कहता सुनता था तो जॉन इस या प्रेग नगरवासी
जीरोम की तरह उसका भी अग्नि सस्कार कर दिया
।

महात्मा मार्टिन लुथर 99 . बडा मत जाता था। ईसाई धर्मानुसार मनुष्य के मात* सस्कार होते है । इन सम्कारों के विषय में लयर के सिद्धान्त और पुराने ईसाई धर्म (अर्थात् वर्तमान रोमन कैथालिक धर्म) भेद है । लूथर के विचारानुसार मनुष्य एक खतत्र जीव है मत यलपूर्वक, उससे किसी प्रकार का मुकृति करना व्यर्थ और निर्रथक है। जिन धर्म कृत्यों को मनुष्य स्वतत्र चुद्धिवश और अपने अन्तरात्मा की प्रेरणा से करता है उन्हीं से वह लाभ उठाता है। अत उसके लिये किसी प्रकार के धर्म संस्कार निश्चित कर देना जिन्हें करने को वह विवश हो, व्यर्थ का शक्ति अपव्यय मात्र है। जिन जिन धर्मों में सस्कार निश्चित कर दिये गये हैं उन धर्मो में यह देखा गया है कि उन २ धर्मों के अनुयायी थोडे ही दिनों में यह बात भूल गये किहन सस्कारों का वास्तविक आधार हृदय की पवित्रता है न कि.पाट कर्म काड़ों की अक्षरश पूति । ईसाई धर्म में पाप का मायश्चित्त पश्चाताप पाप स्वीकृति, शारीरिक दड इत्यादि माने गये है। अब प्रश्न यह है कि पश्चात्ताप पाप स्वीकृति इत्यादि के अर्थ केवल रोना योना या ओरों के सामने अपने को पापी स्वीकार कर लेना मात्र है या इनका पापी के हृदय को अवस्था से भी कुछ सबध है । लूथर कहता था कि गिों में जाना तीर्थयात्रा करना माला फेरना शारीरिक कष्ट उठा कर तप करना निराहार व्रत करना, अपने पो पापी स्वीकार * वे'ये है, यपटीजम् (Baptism), फनफरमेशन (Confirmation) यरिस्ट (Eucharyst)पेस(Penancey sक्स्ट्रीम अंक्शन(Extreme unction) that stet (Holy order) #utarat (Matrimony) . - .

७ AWNP महात्मा मार्टिन लूथर करना, इत्यादि जय धर्म द्वारा निश्चित कर दिये जाते हैं तब प्रत्येक पापी की ऐसीधारणा होजाती है कि पापमोचन के लिये यह पर्याप्त है कि उसने किसी पादरी के सन्मुख पाप स्वी कार कर लिया है, दसरोज निगाहार व्रत कर लिया है, सो 'चार माला फेर, पवित्र स्थान गिर्जे में हो पाया है, या किसी तीर्थस्थान की यात्रा कर आया है इत्यादि २। इन वाह्य कर्म काड के प्रांडवरों में फंसे होने के कारण उस पापी को कभी स्वम में भी यह सोचने का अवसर नहीं मिलता था कि 'जब तक उसका हृदय पश्चात्ताप से पूर्ण नहीं है, जब तक उसके हृदय में ईश्वर की भक्ति का प्रकाश नहीं फैला हे, जय तक पह भविष्य में सच्चे हृदय से पाप न करने का प्रण नहीं करता हे तब तक उसे घाघ पाडवरों से कोई लाभ नही होसकता। लूथर के विचारानुसार इन सर यातों से पापी के पाप की निवृत्ति तबही हो सकती है जब वह इन्हें स्वय अपनी स्वतन बुद्धि से स्वीकार करे । रोना अनुताप पूर्ण हृदय कावाह्य लक्षण है। यदि हृदय अनुताप पूर्ण नहीं है तो रोने से कोई लाभ न होकर वरन् बहुत कुछ हानि ही है। ठीक इसी सिद्धान्त का फल रूप लूथर ने यह भी सिसाया कि पश्चात्ताप आदि कृत्यों के लिये किसी पादडी इत्यादि अन्य व्यक्ति के उपस्थित की आवश्यकता नहीं है । पश्चाताप आदि हृदय की अव स्थायें है। इनकी पर्याप्तता या अनपर्याप्तता का ज्ञान पापी को "हो सकता है या उस ईश्वर को जिसके सम्मुखं वह पश्चा- ताप करता है । पादडी विचारा किसी के हृदय को क्या जाने। अत उसकी उपस्थिति की कोई आवश्यकता नहीं हे। ११ अक्टूबर सन् १५३३ ईस्वी को लूथर एक मित्र को यों लिखता + महात्मा मार्टिन लूथर ७६ है, "यह सत्य है कि मैने कहा है कि पाप स्वीकृति एक अच्छा कार्य है। इसी तरह में किसी को निराहार व्रत करने या तीर्थ यात्रा करने से भी नहीं रोकता । मेरे सब कहने सुनने का तात्पर्य केवल इतना ही है कि में इन कार्यो को व्यक्तियो की विवेक बुद्धियों पर छोड देना चाहता हु ( चाहे वे करें चाहे न करें) और इनका न करना में कमी घोर पापों में गिनने को प्रस्तुत नहीं है। मैं सर मनुष्यों की अतरात्मा को बिलकुल स्वतत्र कर दिया चाहता है." पोपो का ईसाई धर्म सारा ध्यान मनुष्य के घाघ कृत्यों की ही ओर देता था। यदि धर्म विहित कर्म काडी को मनुष्य करता जाये तो वह धार्मिक है यदि न करे तो वह पापी है। लूथर कहता था कि धर्मोपदेशको का कर्तव्य है कि वे सारा जोर इस बात के सिखाने पर दें कि धर्म का सम्बध हृदय की पवित्रता तथा स्वच्छतासे है। यदि मनुष्य का हृदय - पवित्र हे तो वह धार्मिक है यदि उसका हृदय पवित्र नहीं है तो वह अधार्मिक है। "तुम पूछते होश लथर लिखता हे "कि "मामा पूजा किस प्रकार की जाय।मैं प्रार्थना करता हू मुझ से इन विवरणों और विस्तारों को न पूछो । मेरा कहना यही है कि हा सव विपयों में अन्तरात्मा को सता रखो। किसी भी पूजा करने की विधियाँ इतने महत्व की कभी नहीं हो सकती फि हम अपनी आत्मा को उन विधि विशेषों का दास बना डाले। जितने नियम उपनियम अभी तक यन है मेरी बुद्धि में तो वे ही प्रापश्यकता स अधिक है।" लूघर के पूर्व सारे धार्मिफ एत्य लेदिन भाषा में होते थे . 1 - लैरिन . न फुलइने गिने पादड़ियों को छोड भोर किसी को महात्मा मार्टिन लूथर . आदी थी। लूथर ने सिखाया कि प्रत्येक धार्मिक कृत्य प्रत्येक पूजा उस भापा से होता चाहिये जो उन धर्मानुयायियों की मातृ भाषा हो। ऐसा करने से उसका तात्पर्य यह था कि प्रत्येक व्यक्ति जो करें उसे समझे और परमात्मा के सम्मुख जाने के लिये लैटिन भाषा विश किसी प्रादडी की घकालत की उसे कोई आवश्यकता न रहे। लूथर लिखता है "पतिस्मा हम भी करते हे भेद इतना है कि वह मातृभाषा (जमनी भाषा) में होता है। पोपों के युग में महन्तो के मठ मोर साधुओं के सघं घर- साती मेढकोको भाति बढते जाते थे। इन सब साधु महन्तीको आजन्म अविवाहित रहने की शपथ खानी पडता थी। लूथर यद्यपि स्वय महन्त था परन्तु तर भी वह इन साधु मठ और सघों मे वडा घडाता था । अविवाहित रहने की शपथ तो उसे विशेषकर काटे की भांति चुभती थी क्योंकि उसने महन्त होकर सून अनुभव प्राप्त कर लिया था कि यह शपथ हो मठों और सघी के बढ़ते हुए व्यभिचार का कारण है । लूथर ने ग्रह शिक्षा दी कि विवाह करना सरका धर्म है चाहे साधू हा चाहे गृहस्थ लूथर लिखता है "यह परमात्मा की आशा के विरुद्ध है कि हम मनुष्यों से ऐसे प्रण करा लेफिजिन्हें मानुषिक स्त्रमाव सदा तोड़ने को तयार रहता है यदि मेरे घोर शत्रु इस प्रात को जानते कि मठा में कैसे २ व्यभिचार होते हैं तो मुझे पूर्ण आशा है कि मठ और साधु सघ की प्रथा नाश करने में घे मुझे पूर्ण सहायता देते "रोमन, फैधानिक साधु होने को एक संस्कार मानता था अत साधु होने के उपरान्त सदा साधु रहता था वह फिर मरने के पूर्व गृहस्थ नहीं -

महात्मा मार्टिन लूथर
सकता था। लूथर साधु होना सस्कार नहीं मानता था । उस
फे विचारानुसार प्रत्येक साधु जय चाहे साधु कर्म छोड
गृहस्थ यन सकता है। लूथर,फहता था कि साधु और कृपक
में यही भेद है कि साधु का कर्म धर्मोपदेश है और कृपक का
फर्म कृषी है। कर्म भेद को छोड इन दोनों में सरकार भेद
कुछ भी नहीं है, अत. साधु जब चाहे गृहस्थाश्रम को लौट
सकता है।
चाइविल के विषय में लूथर का विचार था कि बाइबिल
समझने के लिये किसी कोमी घडे भाष्यों के पढने तथा अनेकों
पाइबिल अध्ययन के नियमों को जानने की कोई आवश्यकता
नहीं है। पाइरिल के अर्थ सीधे और सरल हैं। यदि मनुष्य
पास्तव में पाइपिल समझना चाहता है तो बिना भाष्यकारों को
सहायता के भी वह बाइबिल समझ सकता है। बाइबिल के
भाष्यकारों पर लूथर को बहुत कम अक्षा थी।
न
।

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महात्मा मार्टिन लुथर
३
हुआ और यह चार्ल्स से घडी रग्रने लगा। दोनों चार्ल्स
और गैसिस पोप को अपना मित्र पनाने का उद्योग कर रहे
ये कारण कि जिसकी ओर पोप होता था उसकी तलवार
दुधारी हो जाती थी और यह अपने शत्रु से स्पर
'कह सकता था कि "मोधस्य ज्वलितु झटित्यवसरश्चापेन
शापेन था।
पोप अपने शा लूथर से बहुत घयडा गया था अत पोप
लूथर को चारर्स की सहायता से कुचलना चाहता था ।
पोप को चास की सहायता लूथर के नाश के लिये चाहिये
थी और चाल्र्स को पोप की सहायता प्रेसिस को नोचा
दिखाने के लिये चाहिये थी। दोनों स्वार्थियों में समझोता
हो गया । पोप चाहता था कि चार्ल्स लूथर को योही
दंड दे दें। चारर्स भी पाप को प्रसन्न करने के लिये सब
कुछ करने की प्रस्तुत था । परतु लूथर की रक्षा सारा
जर्मनी करने को प्रस्तुत था । श्रत चार्ल्स का यह साहस
ना कि वह पोप की प्रसन्नता के लिये सारे जर्मनी में
विद्रोहाग्नि भडकारें। चार्स को सबसे अच्छी विधि यही देख
पड़ी कि वह लूथर को धर्स की राजसमा में बुलाकर कम से
कम न्याय का दिखावा निश्चय करे ।
"अलीयन्डर पोप की ओर से इस बात का यडा उद्योग कर
रहा था कि लथर को वर्स को सभा में आने का अवकाशान
मिले पयोंकि उसे भय था कि ऐसा करने से लूथर को अपने
बचाये का समय मिलेगा और उसकी उपस्थिति और उपदेश
को देख सुन उसके पक्षवालों की उत्साद द्विगुणित हो जायगा।-
अस्लीयन्सरचार्ल्स से मिला उसने चार्ल्स से स्पष्ट का
10

४ महात्मा मार्टिन लूथर दिया कि नास्तिको, का न्याय करने का अधिकार एक मात्र पोप ही को है क्योंकि वह समस्त ईसाई ससारका धर्मपिताहै भौतिक सम्राटों का तो एक मात्र इतना ही कर्तव्य है कि योय जिसे नास्तिक कहे उस वे अपनी भोतिक शक्ति की सहायता से पोप की इच्छानुसार दंड दे। अलीयन्डर ने कहा कि लूथर को राजसभा में बुलाकर उसका न्याय करना मानो पाप का धार्मिक अधिकार छीन कर उसका अपमान करना है । जब पोप ने लूथर को नास्तिक कह दिया तब किसी भौतिक शक्ति सो पोप के न्याय में सदेह करने का साहस कैसे हो रहा है। - अलीयन्डर ने बडी भारी वक्तृता दी और लूथर को पूरा ना.. स्तिक सिद्ध करने में कुछ उठा न रक्खा । वक्तृता समाप्त होने के उपरान्त उसने चार्स से कहा, "मुझे केवल दो प्रार्थनायें करनी है-प्रथम तो श्राप घोषणा करा दे कि लूथर लिखित जितने न थ मिलें सब जला दिये जावें, दूसरी यह कि या तो आप स्वय लूथर को प्राण दड दें या आजन्म कारागार दे । या उसे पोप के हवाले कर दें। । इस धर्मोपदेश का यह फल शुआ कि चार्ल्स अलीयन्डर की इच्छा पूरी करने को प्रस्तुत हो गया। लूथर के हितेपी घडे घबडाये। उन सब ने मिल कर ऐसी नीति का घोर विरोध किया। श्रत में चारर्स को अपने. सामन्तों का कहना मानना पड़ा और लूथर को बुलाने के लिये उसके नाम निम्नलिखित श्राक्षा पन निकाला गया। "मान नीय, प्यारे भक्त लूथर ! हमने और पवित्र रोम साम्राज्य की सभा ने जो इस समय पर्स में एकत्रित है यह निश्चित किया' है कि तुमसे तुम्हारे धर्म,तथा धार्मिक प्रथों के विषय में कुछ स्पष्टीकरण कराया -जाय । अत तुम्हें यह 'अभयदान पत्र' .

५
महात्मा मार्टिन लूथर
भेजा जाता है कि तुम अपने को अभय समझो इस अभयदान
पत्र के पाते ही तुम तुरतरवाना होजाओ, क्योंकि ऐसी ही हमारी
इच्छा है और हमारे आज्ञापत्र के पाने के घोस दिवन उपरान्त
राजसभा में श्रा उपस्थित हो । तुम्हें किसी प्रकार के वला.
स्कार अथवा गुप्तपशि का भय न करना चाहिये। हमारी
इच्छा है कि तुम हमारी राज प्रतिज्ञा का विश्वास करो और
हमारी तीव्र इच्छा का अनुगमन करो"। जिसे पोप ने नास्तिक
कह कर दड देने को कहा है उसे "माननीय प्यारेभक लूथर
सोधित करके साम्राज्य सभा इतने मान से युला रही हे
यह अलीयन्डर को असह्य प्रतीत हुआ । उसने इसका घोर
प्रतिवाद किया । परतु विचारा करे क्या पाप का प्रताप सूर्य
अस्ताचल को मोर रह रहा था इसके आगे का वर्णन लूथर
स्वय यो करता हे "राजदूत ने मुझे मगल पार को बुलाकर
अभयदान पत्र दिसाया। यह अभयदान पर सम्राट तथा ओर
राजे महाराजा को भोर से था। परतु उम ही के दूसरे दिन
अर्थात् सुद्ध ही को उस राजपत्र की प्रतिज्ञाये वर्स में तोडी
गई । वस में में नास्तिक स्थिर किया गया और मेरी लिखी
पुस्त के जलाई गई । इन घटनाओं का सवाद मुझे धर्स पहुँ.
चने पर मिला । यही नहीं, मेरी दड आशा पूर्व ही सर नगरा
में प्रकाशित हो चुकी थी यहा तक कि राजदूत ने मुझ से
पछा भी कि पया में यह मय देख माकर भी वसं जाने को
प्रस्तुत है। मैंने उत्तर दिया कि वर्स जाऊगा चाहे यहाँ
इतने शैतान क्यों न हों जितने इस सपरैल पर संपडे हे। जय
मैं वर्म के निकट श्रोपेनहीम के पास पहुचातो यहाँ का रहने
चाला मास्टर वूमर मुझे वर्स जाने से यडा निषेध करने
-

महात्मा मार्टिन लूथर
woman
लगा । उसने कहा कि सम्राट के पादडी ने मुझ से कहला
भेजा है कि आप चर्स कदापि न जायें नहीं तो आपको वे
लोग जला देंगे। यह सब करने से उन दुष्टों का तात्पर्य
ग्रह था कि मैं अपने मार्ग में देर करू और अभयदान पत्र की
अवधि बीत जाय । वे जानते थे कि यदि में इन सब सोच
विचारों में पड तीन दिन और ठहर जाऊँगा तो मेरा श्रमय
दान पत्र मुझे न पचा सकगा। मैं घर्स में न घुसने पाऊगा
और बिना मेरी सुनवाई हुए ही मुझे दड दे दिया जायगा।
परतु में निर्दोष था और अपनी निदोपता के भरोसे मैं वरावर
चलता ही गया। मैं वर्स पहुँच गया और मैंने फ्रेडरिक के
मत्री को ममाचार भेजनाया कि मैं आगया हू और मुझे समा.
चार दे कि मुझे कहाँ ठहरना होगा। मेरे आने का समाचार
सुन सब को वडा अचमा हुश्रा क्योंकि उनको विश्वास था कि
मेरा भय मुझे दुष्टोंके जाल में फसा देगा और मैं निश्चित समय
के भीतर वर्क्स कदापि न पहुच पाऊगा।
फेडरिक के भेजे हुये दो सभ्य पुरुष मेरे पास आये,
और
मुझे उस गृह को ले गये जहा मेरा ठहरतो निश्चित हुआ था।
उस समय तो मेरे पास कोई राजे महराजे मिलन न पाये
लेकिन ने मेरो ओर बडी दृढ़ता से देखा । ये चे राजे
महाराजे थे जिन्होंने पूर्व ही से सम्राट को एक विज्ञप्ति देख
रखीथी। इस विज्ञप्तिमें पोप के प्रति लगभग ४०० दोष लगाये
गये थे और सम्राट से प्रार्थना की गई थी कि श्राप पोप को
इन सय दोपों का सुधार करने के लिये विवश करें; और यदि
ऐसा न होगा तो हम अपने अपने रोग की औषध आप कर
लेंगे
1

महात्मा मार्टिन लूथर
'पोप ने सम्राट को लिखा था की आप को अमयदान
पत्र की लाज रखने की कोई आवश्यकता नहीं है । पादडी
लोग सम्राट को पोप की प्रार्थना पूर्ण करने के लिये उत्साहित
कर रहे थे। परन्तु राजे महागजे ऐसा करने को प्रस्तुत न थे
और बहुत कुछ सभव था कि यदि ऐसा किया जाता तो बहुत
बड़ा गोल माल सडा हो जाता । इन सब घटनाओं ने
जनता में मेरी ख्याति और भी बढ़ा दी । और मेरे शत्रु
जितना में उनसे नहीं डरता था उससे कहीं ज्यादा मुझसे
डरने लगे।
लूथर संध्या को ४ बजे सभा में बुलाया गया । लूथर को
इस समय अपने मारे धैर्य को एकत्रित करने की आवश्यकता
पड़ी। लूथर राजसभा में पहुवा । राजसभा में स्पेन, इटली
आस्ट्रिया, जर्मनी आदि देशों के बडे २ राजे महाराजे और
उच पदस्थ पादडी गए यडे ऐश्वर्य से अपने दिव्य बसन
भूपण पहिने हुये यथा स्थान बैठे थे। लूथर ने यद्यपि बड़ी
धीरता के साथ पुस्तकों द्वारा पोप और उसके अनुयायिण से
युद्ध किया था परन्तु उस कृपक पुत्र को ऐसी ऐश्वर्यमय
राजसभाओं में जाने , का अभ्यास न था। वह इस महा-
सभा के सामने आने पर एक प्रकार से घबड़ा गया ।
उसके सामने ही नवयुवक सम्राट अपने स्पेनी पादडी
और सामतो से घिरा हुमा यैठा था .। सारी राजसभा
गंभीरिता की मूर्ति बनी हुई थी। यद्यपि सयकी दृष्टि उसही
की ओर थी परन्तु लूथर उन दृष्टियों में न तो किसी प्रकार
से उसे उत्साहित करने की इच्छा न भर्सना देने का लक्षण
पाता था। उसके एक ओर एक मेज पर कुछ पुस्तको का ढेर

EE महात्मा मार्टिन लूथर AAMA AnAMMA . - लगा था। संभा का कार्य प्रारभ हुा । सम्राट के दूतने खड़े होकर लूथर को श्राज्ञा दी कि जब तक तुम्हें बोलने का कोई अधि कार नहीं है जब तक तुम से कुछ पूछा न जाय । दूत के बैठने के उपरान्त ट्राएर का बडा पादडो खडा हुआ। उसने पहिले लैटिन और फिर जर्मन भाषा में लूथर से कहा कि सम्राट की आशा से मैं प्रश्न पूछता हू । “प्रथम क्या तुम स्वीकार करते हो कि सामने ढेर लगी हुई पुस्तकों के रचयिता तुम्ही हो? द्वितीय क्या तुम इन पुस्तकों के सिद्धान्तों से भविष्य में विमुख होने को प्रस्तुत हो १, इतने में डॉक्टर जीरोम जो लूथर का एक प्रकार से वकील था। वीच ही में वोल उठा । कृपा कर इन पुस्तकों के नाम पढ डालिये । इसके उत्तर में एक एक करके पुस्तकों के नाम पढे गये । इसके उपरान्त लूथर ने जो बहुत भयभीत होगया था वडे धीमें स्वर में कहा "मैं इन पुस्तकों का रचयिता होना अस्वीकार नहीं कर सकता। पर न्तु दूसरे प्रश्न का उत्तर देना कठिन है,, । ( इस बीच में लूधर ने अपना वेर्य एकत्रित कर लिया था और अब साहस के साथ बोल रहा था) 'इस प्रश्न के उत्तर और मेरे धार्मिक विश्वास तथा प्रात्मा की मुक्ति से वडा घनिष्ट सयन्ध है। यह प्रश्न याइविल से सबन्ध रखता है जिससे बढ कर महत्व की वस्तु न स्वर्ग में है न इस ससार में, यदि मैं बिना सोचे विचारे बोले तो बहुत कुछ सभव है कि मैं अति साहस वश प्रभु ईशु की इस आशा का उरलधन कर जाऊ कि "जो कोई "मुझे मनुप्यों के मम्मुस अस्वीकार करेगा उसे में अपने स्व. गीय पितों के सामने अस्वीकार करू गा,, अत में दयानिधि - .

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अपनी ये प्रक्तता जो न बहुत लम्बी थी न छोटी, बडी दृढता
६०
महामा मार्टिन लुथर
यो लिखता है, "लेकिन मैं एक अक्षर से भी विमुख न होकगा"
प्रभु श्शु मेरे अनुकूल रहे । सध्या तक अपने को इस तरह
दृढ़ बना लूथर दूसरे दिन की प्रतीक्षा करने लगा।
अट्ठारवी तारीख की सभा जिस स्थान पर, हुई थी वह
पहुत अधिक घडा था। परन्तु उस दिन भीड इतनी अधिक
थी कि घडे घडे राजा महराजाओं को भी स्थान मिलना
दुष्कर होगया। लूथर नियत समय पर सभा में उपस्थित
हुआ । परन्तु सभा उस दिन कुछ कारणों वश नियत समय
से अपना काम प्रारम्भ न कर सकी।४ बजे का समय नियत
था परन्तु सभाने लगभग ६ बजे अपना काम प्रारम्भ किया
पूर्व दिन का द्वितीय-प्रश्न उससे फिर पूछा गया । अव की
पार लूथर ने बडी दृढता से उत्तर देना प्रारम्भ किया। उसने
अपने सारे ग्रन्थों को तीन यिधि के वताये। उसने कहा
कुछ नथ तो ऐसे है जिनमें केवल वे ही याने लिखी हे जो
पाइविल में लिखी है ,प्रत ईसाई होता दुधा, उनसे मैं कैसे
विमुख हो सक्ता है। दूसरी विधि के वे अथ है जिनके द्वारा
मेने पोप के कृत्यों पर आक्षेप किया है, वे श्राप इतने सत्य
ससार-विदित पौर स्पष्ट है कि उनसे विमुख होना मेरी
शक्ति के बाहर है। याँकी रहे वे प्रथ जिनमें उसने अपने प्रति
द्वन्दियों के ऊपर आक्षेप किये हैं। उसने कहा मैं मानता
कि इन आदोपों को करते समय में आवश्यकता से अधिक
फटु हो गया था परन्तु तब भी मैं उनको, तर तक लौटा नहीं
साता जब तक उनमें कोई त्रुटि न दिसा दी जाय । लुथर ,
-
और सौन्दर्य के साथ दी थी।
4

महात्मा मार्टिन लूथर, MAMNxnvwani NwAN इसके उपरान्त उसका पूर्व का प्रतिद्वन्दी "ईक" उठ खडा हुआ उसने कहा लूथर के प्रथा में भी घेही दोप है जो बार- किफ,, या "हस" के प्रथों में थे और फिर उसने लूथर की ओर मुख करके कहा "दो शब्दों में उत्तरदोहा' या'नहीं मुझे लल्लो चप्पो नहीअच्छी लगती। इतना सुनते ही लथरभडक उठा और बोला"लीजिये यदि आप लोग सरल उत्तर चाहते हैं तो सरल ही उत्तर लीजिये । जब तक पाइविल से या सरल और स्पष्ट कारणों द्वारा मेरे दोष मुझे न दिया दिये जाये तब तक मैं अपने कहे और लिए एक शब्द से भी विमुख नहीं हो सका है। न होना चाहता है। क्योंकितरात्मा से विमुख होनान उचित है न धर्म है ईश्वर मेरी सहायता करें। ये सुनकर सभामदगण लोग विचार करने के लिये अला चले गये और उन्होंने लौटकर यो फहना प्रारभ किया "मार्टिन | तुम एक ऐसी बात कह रहे हो जो तुम्हारे ऐसे पुरुष को कहना उचित नहीं है । जो प्रश्न तुम से किया गया था उसका उत्तर तुमने कुछ नहीं दिया । तुमने उन विनाद विषयों को पुन जीवित किया है जो कान्स्टेन्स की ममा द्वारा सदा के लिये दडित मान जा चुके हैं। तुम चाहते होकि वेही दोष वाइबिल के प्रमाण से पुनर दिखाये जायें। लेकिन यदि प्रत्येक मनुष्यों को यह स्वतत्रता दी जाय कि यह उन विषयों को जो धर्म सभाओं द्वारा सदा के लिये निर्णीत हो चुके है अपनी इच्छानुसार जब चाहे उठा सक्ता है तो प्रश्न यह होता है,कि फिर क्या काई धर्म सिद्धान्त निधित कहा जासक्ता है? उदाहरण के लिये आज तुम फास्टैन्स को धर्मसभा का निर्णय मानने को प्रस्तुत नहीं हो। कल तुमसमस्तधर्मसभाओं ।

-- महात्मा मार्टिन लूथर को अप्रमाणिक कह सक्त हो । फिर बनायो प्रणाम कौन वस्तु हो सकेगी। अतः सम्राट तुम से सक्षिप्त और सरल उत्तर चाहते हैं कि तुम अपने सब सिद्धान्तों की रक्षा करने को प्र स्तुता हो या उनमें से किसी के विमुख होना चाहते हो। लथर ने इसके उत्तर में कहा कि जो कुछ मैंने कहा है उससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता । "जब तक बाइबिल के स्पष्ट प्रमाणों द्वारा मेरे दोष न दिसाये जायें मैं अपने एक अक्षर से भी फिरने वाला नही हू" । यदि धर्म सभाओं की बात च लाते हो तो धर्म सभाओं के निर्णयकोई धार्मिक सिद्धान्त नहीं है । धर्म सभाओं के निर्णय बहुधा परस्पर विरोधी ओर प्रमाद पूर्ण हुए हैं। अत वे प्रमाण नहीं माने जा सकते; और यह फि घोचाइयिल में लिखी वातों से कभी विमुख नहीं हो सकता" । इस पर सभा की ओर से कहा गया कि क्या तुम धर्म सभाओं के दोष दिखा मकते हो । लूथर ने पडे आवेश से कहा कि ऐसा करने को में हर समय प्रस्तुतह । सम्राट ने यह समझ कर कि अधि वाद विवाद से कुच लाभ नहीं है ममा बिमर्जित कर दी। लूथर अपने निवास स्थान को लौट आया । स्थान पर पहुँचते ही उसो हाथ ऊपर उठा कर बडे श्रानद से कहा "मेरी अग्नि परीक्षा पूरी हो गई । मै अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया । उम ही दिन उसने फ्रेडरिक के मत्री से कहा-"यदि मेरे सहस्र मस्तक होते और एफ २ कर काटे जाते तव भी मैं अपने मिद्धान्तों से विमुख होने वाला न था। फ्रेडरिक ने अपने मत्री से कहा कि 'आज लधर की एढता से मैं बहुत सतुष्ट हुमा' । सतुष्ट होने की बात भी थी लूथर ने दृढता पूर्वक यह दिखा दिया

उपरोक्त विचार पर शुक्र और शनिश्चर को घरायर याद,
कि ममी लूथर को और समय मिलना चाहिये । सम्राट के
महात्मा मार्टिन लूथर
६३
था कि याइविल, अतरात्मा और बुद्धि के प्रमाणों के आगे
पोप, पाददी और धर्म ममाओं के निर्णय कोई वस्तु नहीं है।
। उन्नीस अप्रैल के प्रांत फाल सम्राट ने फिर सगा की।
लूथर को यया घड दिया जाय इस विषय पर विचार होने
वाला था। ममा ने कहा कि निश्चित करने के लिये हमें
थोडाममय चाहिये । मन्नाट ने इसके उत्तर में कमा-फि पहिले
मेरा विचार मा लो। यह कह कर सम्राट ने एक बडा चिट्ठा
निकाला जिसमें लिया था कि सम्राट नथा उसके पूर्वज सदा
से सच्चे पापभक्त होते चले आये है । अत जो कुछ उसके
पूर्वजों की सम्मति और जो धर्म सभानों की श्रामा है वही
यह भी करेगा। लूथर ने अपने विचारों से स्पष्ट कर दिया है,
विवाह सारे ईसाई संसार का शनु है। समस्त समाने फल
जान लिया किलूथर कैसा हठी नास्तिक हे । अत अब उससे
कसी प्रकार का सरन्ध रसना व्यर्थ है। हमारी इच्छा है कि
उसके अभयदान की अवधि २१ दिन के लिये ओर बढ़ा दी
जाय और इस अवधि के पूर्व ही, लूथर अपने स्थान को
पाचा दिया जाय । परन्तु इस प्राधि के भीतर उसे किसी
प्रकार का उपदेशादि देने का अधिकार न होगा। "पोर जैसा.
कि मैंने पूर्व कहा है ये हमारी राजेन्छा है इसके उपरान्त
उसको यही दड दिया जाय जोकि सच्चे और प्रमाणित
यधपि सम्राट ने अपनी इच्छा को इतना स्पष्ट कह दिया
या परन्तु तव भी बहुत ऐसे सभासद ये जिनका विचार था
नास्तिक को दिया जाना चाहिये।
.

महात्मा मार्टिन लूथर विवाद होता रहा । अंत में यही निश्चय हुआ कि लूथर को अभी और समय दिया लाय। सब सभासदों ने मिलकर' सम्राट से प्रार्थना की कि बहुत धडे बडे विद्वान् पादडियों का एक कमीशन लूथर के पास भेजा जाय। और वे लयर से शास्त्रार्थ फर उसे उपदेश देने का उद्योग करें। यदि तव' भी लूथर अपनी नास्तिकता पर दृढ़ रहे तो उसे समुचित दंड दिया जाय । सम्राट ने अपना विचार ऐसा दृढ़ कर लिया था किायद्यपि यह प्रार्थना बहुत सहल थी यदि कुछ विचित्र घटनायें उसे विवश न करती तब भी वह उसे कदापि न मानता उन्नीस और चीस अप्रैल की रात को राजद्रोह के स्पष्ट लक्षण दिखाई पडने लगे। उसके शयनागार में एक पत्र मिलाजिसमें लिखा था, कि "उस देश के भाग्य फूट गये हैं जिसका राजा बच्चा है। नगर में यत्रतत्र विज्ञापन चिपके हुए मिले जिनके द्वारा लगभग ओठ सहस्त्र योद्धाओं ने यह सूचना दी थी कि यदि' लूथर को कुछ कष्ट पहुचाया गया तो उस पोपको विरुद्ध घोर युद्ध फरेंगे । ब्रौडन वर्ग और सेक्सनी के राजाओं ने बहुत दवाव डालो। इन सब घटनाओं वश सम्राट चास पचम ने समा की बात मान ली। सम्राट ने कहा कि हमारा विचार पलट नहीं संकता परन्तु तव भी हम तीन दिवसों का समय, को तैयार हैं। यदि इन तीन दिवसों के अदर लूथर अपनी नास्तिकता स्वीकार कर. उसेत्यांगने को प्रस्तुत होजाय तो बहुत अच्छी बात है और नहीं तो उसको दंड दिया जायगा । मोठ उच्च पदस्थ व्यक्तियों का एक कमीशन लूथर के पास गया। उनके बाद विवाद का विवरण देना व्यर्थ है । लूथर ने पूर्ववत् केवल एक चाईविल होको प्रमाण मानने की हठ की M देने 17 " महात्मा मार्टिन लूथर पाइपिल के अतिरिक्त यदि उसके लिये और कोई वस्तु प्रमाण थीतोष बुद्धि और तर्क था। भला ऐसी अवस्था में सम- झोता होना कब समय.या। कमीशन लौट आया। पूर्व इसके कि क्रमीशन अपनी रिपोर्ट राजसभा को दे, कमीशन के अध्यक्ष ने लूथर को अपने निज के कमरे में धुलाकर बहुत कुछ समझाया। घुमाया। परन्तु लूथर अपने विचारों से न डिगा । यह सय हो जाने पर समाको फमीशन की असफ लता कीरिपोर्ट की गई। इसके बाद राजसमा ने अपने और कार्य करना शुरू किये जिनके लिये वास्तय में समा की मई थी ओर जो अभी तक लूथर के कारण रुके पडे थे । राजसभा की अतिम बैठक २५ मई को हुई। यद्यपि लूथर मी दहाशा पर सम्राट के हस्ताक्षर २६ मई को हुए ये परन्तु उसमें तारीख आठ मई की डाली गई थी उस राजाशा से पहले तो लूथर की नास्तिकता का बड़ा जुगु- प्सित वर्णन किया गया था। उसके उपरान्त सम्राट के न्याय और पोप की नि सीम दयालुता की शेपी वधारी गई थी। इसके उपरान्त ये लिया गया था कि आज से लूथर और उसके अनुयायी राज-रक्षा तथा कानून की शरण से वचित किये गये । (जिस तात्पर्य यह होता था कि लूथर तथा उनके अनुयायियों के मारने तथा लूटनेवाले को राजदंड का कोई भय नहीं है और उसकी सारी पुस्तके जहां पाई जा जला दी जायें। लूथर २६ अप्रैल को रिटेनवर्ग के लिये लोट पडा । उसकी रक्षा के लिये ही लोग उसे विटेन्वर्ग से लाये थे। लुथर उचित २ दूरी पर पडाव डालता हुआ विटॅन्वर्ग को ओर

महात्मा मार्टिन लूथर
घट रहा था कि शनिश्चर के दिन ४ मई को एक छोटे से नाले
के करीब थुरिजियन वन के बीच उसके ऊपरी कुछ अश्वा
रोहियों ने आक्रमण किया और इतनी सफाई से लूथर को
पकड ले गये कि किसी के किये कुछ न बन पडा। लूथर
के
पकड ले जाने वाले शत्रु थे या मित्र यह बात किसी को मालूम
न थी। लोग लूथर के विषय में मनमानी गप्पे लडाने लगे।
कोई कहता था लूथर कहीं छिप रहा है दूसरे कहते थे कि
लुथर मार डाला गया है परन्तु वास्तविक घटना, का किसी
को कुछ पता
-
था।
ܚܚ
-
--

जोवनी लेखको का इस विपय में मतभेद है ।लूथर को इस
बदला न ले सके। लूथर के मित्र और उदासीन व्यक्ति भी इस
की अवधि के भीतर ही लूथर को पकड फरवंदी कर लिया
। दशम परिच्छेद
लूथर का अज्ञातवास
मेक्सनी के प्रभुफ्रेडरिक को विश्वास होगया था कि लूथर
को अपनी हठवश घोर दड सहना पडेगा। फ्रेडरिक ने सोचा
कि राजसमा के यहुमत द्वारा दडित किये जाने पर उसके
लिये यह असभव होगा कि वह पूर्वपत् लूथर को अपनी शरण
में रख सके और यदि यह लूथर को अपनी शरण से वचित
करेगा तो लूथर के शत्रु उसे विना नाश कियेन मानेंगे । यही
सब सोचकर फ्रेडरिकन यह निश्चित किया कि लूथर को
'छिपाकर रखना चाहिये । यही कारराथा कि फ्रेडरिक न लूथर
को यहुत शीव विटेन्वर्ग की ओर जाने की श्राशा दी थी।
पेसा करने से फ्रेडरिक की हार्दिक इच्छा यह था कि वह लूथर
को दंडित होने के पूर्व ही छिपा सके । लुथर को छिपा रखने
की यात इतनी गुप्त रक्खी गई थी कि यह मडरिक के भाई
जान तक को अविदित थी। सच पूछिये ता लूथर सय
अपन छिपाये जाने के विषय में कुछ नहीं जानता था । यद्यपि
मकार छिपा रखने से कई लाभ हुए। लूथर के शत्रु लूथर से
पिचार से कि पोप पवाले ऐसे दुष्ट हैं कि उन्होंने अभयदान
.

ह
महात्मा मार्टिनलूथर
और मार डाला, पोप पक्षवालों से इतने रुष्ट हो गये थे कि
मरने मारने को कटिबद्ध होगये।
अपने बदी होने का वर्णन लूथर स्वयं यो करता है "मैन
अपने माता पिता से मिलन के लिये धन पार किया और
उनसे मिलकर वाल्टरहासेन जाने की इच्छा से आगे बढा ही
था कि थाल्सटेन्हीन दुर्ग के निकट वदी कर लिया गया ।
मेरे मित्र ने अश्वाराहियों को आते देख विना पूछे जांचे तुरत
गाडी स कूद अपनी जान बचाई और पीछे से मुझे मालम
हुना कि वह पैदल ही वारटरहासेन पहुंचा। मेरे वस्त्र उन लोगों
ने उतार लिये और पल्टनियाँ कपडे पहग दिये । मेरे झूठी
दाढ़ी लगाई गई । मैंने भी अपना दाढी बढाना प्रारम्भ किया
अब तुम मुझे पहिचान नहीं सकते हो। सच बात तो यह है
कि मैं स्वय अपन को नहीं पहिचान पाता। यहां में ईसाईचत्
स्वतन रहता है। यहां मुझे किसी प्रजा पीडकाराजा के दड का
भय नहीं है" । लूथर के यदी करने वाले उसे चार्टवर्ग के दुर्ग
को ले गये। यह दुर्ग का दुर्ग और राजमहल काराजमहल था।
यहा लूथर का नया नाम रिटर जार्ज रखा गया । निकट के
लोग समझते थे कि कोई योद्धा यदी है क्योंकि लथर ने यहा
महन्तों के से वस्त्र,पहिनना छोडकर भले घर गृहस्थी के समान
कपडे पहिनना प्रारम्भ किया था। लूथर ने दाढी बढाई और
असि धारण करना प्रारम्भ किया। दुर्ग के सब लोग उसका
बहुत मान करते थे। वह किले ही में न घुसे रहते थे परन्तु
पहुधा वेष बदल कर थोड़ी दूर तक धूम भी आया करते थे।
कमी २आखेट खेलने भी जाया करते थे।
इस भक्षातवास में लूथर ने एक ऐसा कार्य किया
-
-

1
'महात्मा मार्टिन लूथर
E8
जिसमें जर्मन साहित्य और धार्मिक जीवन में एक नया युग
भारम्भ गया । लूथर न यारथि को ( Nen 'Pest trient)
जर्मन भाषा में उल्या किया। इसके पूर्व याइयित जर्मन भाषा
मैन थी । यह न समझना चाहिये कि लूगर न यह काम केरल
अपना समय पिताने के वास्ते किया था । लूथर की हार्दिक
इच्छा थी कि वाइरिल का उल्था जमंग भाषा में हो परतु
अपन मया तारा सिम्मी पुस्तकों आदि का उत्तर देने में घह
ऐमा फमा माफि उमइस बहमूल्य कार्य के करने का समय ही
नहीं मिलता था । जय हम यह नोचते है कि लूधर की सारी
धार्मिक शिक्षा तथा उपदेश श्री जद यारिल थी और यह
पोप के विरुद्ध होने का मय से रक्षा कारण यह बताता था
किमयाइयिल की शिक्षा को पोप की शिक्षा के विरुद्ध पाता
E, नय हमें स्पष्ट पता लग जाता है कि लूथर जर्मन भाषा
की राइबिल जमा सर्वसाधारण के हाथों में रखने को कितना
उत्मक होगा। यही नहीं लूथर इस बात का सदा विरोध
परता था कि जितने धार्मिक कृत्य होते है सर लटिन भाषा
महोन है जामि लेटिन मापा को कुछ इने गिने पादडियो को
छोड़ और कोई नहीं जाता सर्वसाधारण जिस भाषा को
मममें उस ही भाषा में सब धार्मिक कृत्य हो लूथर इस बात
का यहा पक्षपाती था। लूथर इस बात से एडी घृणा करता
था कि तोते की भाति लोग लेटिन भाषा की प्रार्थनाये गिरजों
में पढा करते हे जय कि उनकी समझ में उनक एक अक्षर
भी नहीं पाते । लूथर नहीं समझ पाता था कि जिस भाषा
का जो समझ नहीं सकता उस भाषा में की हुई प्रार्थना भी
या ईश्वर प्रार्थना है। अत इन सब कारणों से वाइयिल का

१००
महात्मा मार्टिन लुथर
M
भाषा में उल्था फरना खूथर ने अपने जीवन का एक बहुत बडा
उद्देश्य मान लिया था। पार्टवर्ग के चंदीपाने में उसे अय.
काश मिला और उसने बाइबिल काजर्मन अनुवाद कर डाला।
खूधर ने कई कारणों से अधिक दिनों तक अशातचास
फरमा उचित न समझा और ६ मार्च सन् १५२२ को वह
विटेन्वर्ग के सर्व साधारण में प्राकर उपस्थित होगया। इस
भांति अज्ञातवास त्यागने की सूचना लूथर ने सैक्सनी के
राजा को भी न दी थी परन्तु विटेन्वर्ग पहुंच कर लूथर ने एक
"पत्र फ्रेडरिक को लिख भेजा कि कहीं वह अप्रसन्न न होजाय।

-
एकादशवाँ परिच्छेद
लूथर के तत्कालीन मनमाने
शिष्य और प्रतिद्व दी
खूथर पोप का घोर विरोधी था परन्तु राजद्रोही न था।
पर असिद्वारा संपादित धार्मिक सुधार का बडा विरोधी
। लूथर कृन पोपद्रोह धीरे२ यूरुप के अनेक देशों में फैल
गा। मारा यूरुप पोप के अत्याचारों से दुखी था बडुन से
ग पोप से अपना नाता तोडना चाहते थे। लूथर और
नी को पोप के विरुद्ध होते देख यूसर की अन्य देशीय
ता भी पोप विरोध के लिये तत्पर होगई । यद्यपि सारा
प इस समय पोप विरोध में तत्पर था परन्तु इससे यह
समझना चाहिये कि लारा यूरुप लूथर का शिष्य था अथवा
पर की आज्ञा मानता था । अन्य देशों में अन्य धार्मिक नेता
जिनका लूथर से बडा मतभेद था और यदि कुछ सामा
ता थी तो यही कि ये सर लूथर सदृश पोप विरोधी, थे
र धार्मिक सुधार चाहते थे।
। लूथर की वसं राजसमा की विजय अद्वितीय थो । यद्यपि
तहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि, लोगों ने अपने प्राण
देये परन्तु अपना धर्म न छोडा तब भी लथर को ऐसों से
पता नहीं की जासकती । प्राण दे देना एक यात है ओर मुख
८

૨૦૨ महात्मा मार्टिन लूथर . । सम्मुख एक निस्सहाय कृपक पुत्र का समस्त राजसभा में निर्भीक सडे हो उस सभा का विरोध करना दूसरी बात है। लूथर ने ऐसा ही कर दियाया। ऐसी अद्वितीय भात्मिक शक्ति' और धार्मिक क्षमता रखनेवाले पुरुप के अचानक गुप्त हो जाने से जर्मनी में बड़ी गडवडी मचगई । मास जर्मनी असि वल से धार्मिक सुधार, और पोप धर्म-नाशार्थ प्रस्तुत था परन्तु नायक की कही सबर न थी। इन नवीन धार्मिक पात ताइयों में इतनी सहिष्णुता कहाँ कि ये समय की अपेक्षा करें? इन्होंने जिसे पाया उसही को अपना नायक बना पोप' की जड काटना प्रारम्भ कर दिया । इन धार्मिक सुधारको ने भी कुछ कम अत्याचार न किये । अत्याचार तथा असिवल द्वारा धार्मिक सुधार करना लूथरको अभीष्ट न था। ऐसे मनमाने नायकों की नायकता में धार्मिक 'सुधार होते देख लूथर को अज्ञातवास छोडना पडा । दूसरे लूथर को अपना अज्ञातवास त्यागने के जाने का तनिक भय न रह गया था। जर्मन सम्राट अपने शन्नु ओ से युद्ध करने में व्यग्र था । तुर्क सारा हॅगरी हड़प कर ह्वाएना लेन का उद्योग कर रहे थे। पोप संदा की भाति नारर्स की बढती शक्ति को घटाने का उद्योग कर रहा था । मास पीछे से आक्रमण करने के लिये सदा प्रस्तुत रहता था। ऐसी घटना चक्रों में फंस होने के कारण जर्मन सम्राट लूथर का कुछ न बिगाड सकते थे। अत. लूथर के लिये अक्षातवास में छिपे रहने का कोई कारण न था, फिर जय कि उसके मनमाने शिप्य उसके नाम पर मनमाने धर्म चला रहे थे। - लूथर का पुराना शिष्य कार्लस्टैड लघर के गुप्त होते ही कारण प्राण - महात्मा मार्टिन लघर १०३ मन माने धार्मिक सुधार करने लगा। उसने सैक्सनो के से लोगों को एकत्रित कर गिग्जों में लूटमार मचाना प्रारम्भ कर दिया मूर्तियाँ तोद साली, मास कहना य द फरा दिया. और अनेकों कार्य ऐसे किये जो लूथर को बहुत पुरे मालूम पड़े । जय डाफर स्टापिज म लूथर का पत्र दिया उसे ऐमा करने से रोका तो उसने इसकर कह दिया "मनुष्य की प्राक्षा मानने संईयर की भाशा माना कहीं अधिक उचित हे"। इस पर स्थापित ने उससे कहा कि उसके इस प्रकार गिर जात्रों तथा मूर्तिया फे तोडन में लूथर को यहा फष्ट होता है। उसने उत्तर दिया कि ये कोई नवीन यात तो है नहीं कि ईश्वर की आशा पालनवश ससार को कुछ कष्ट उठाना इन सर चाता का लूथर को पता लगा और उसमें और उसके पुराने शिष्य कार्लस्टेड में घोर शत्रुता होगई । इसी प्रकार ज्विगील और कालविन ने स्विटजरलैंड के व्युरिक ओर जनेवा नगर में पोप के विरुद्ध अस्त्र उठाये। इन दोनों में मोर लघर में मित्रता का भाव नथा कारण कि यद्यपि सय पोप के शत्रु और नवीन सुधरे हुये धर्म के पक्षपाती ये परन्तु कोई भी किसी का शिष्य न था और सव अपने २ स्व- तन्त्र विचार रखते थे। ऐसी अवस्था में यह बहुत सभन है कि कल यातें एक दूसरे की न मिले भोर धार्मिक मतभेद 'शीघ्र शत्रुता में बदल जाय । इन सर से कहीं अधिक भयंकर शिष्य पा अल्पड का पादडी मन्जर । इसने कहा केवल वार्मिक सुधार से काम न चलेगा केवल पोप ही दोपी नहीं है बड़े २. नमीन्दार तथा सामन्तों में सुख लिप्सा पढ गई है। मारे कर मार के कृपक बनता रसातल को चली जारही है।महन्तो ये ।

महात्मा मार्टिन लूथर .में जितनी ही सुखसामग्री यढ़ रही है रुपकों में उतनी ही दरि द्रता बढती जाती है । इसने कहा लूथर ने केवल धार्मिक सुधार का उपदेश दिया है सो ठीक किया परन्तु इतने से काम न चलेगा हमको आर्थिक सुधार भी करना होगा। इसने उपदेश देना प्रारम्भ किया कि ईश्वर ने उसे आदेश दिया है कि वह इस मसार के शत्रुओं नया पीडको को मार कर धर्मगज स्थापित करे, जिस धर्मगज में सब भ्रातृवत् रहेंगे, न कोई दरिद्र रहेगा न कोई धनी । इस धार्मिक आतताई ने एक "प्रभु ईशु की सैन्य भी एकत्रित करलीयोर अपने मनमाने विचार के अनुसार कार्य करने लगा। नगर ग्राम उजाड डालता था । बहुत से मनुष्यों को "प्रभु ईशु का शत्रु "कहकर इसने बध कर डाला । अनावपटिस्ट नामक एक और धार्मिक मातताइयो। का झुड या जिनके अत्याचार पूर्ण कृत्यों के वर्णन करने का न अवसर है न रुचि । यह अत्याचार धर्म के सुधार के नाम पर किया जा रहा था। लूथर रन मातताई धर्म सुधारको का वैसा ही घोर विरोधी था जैसा पोप का । लूथर ने जर्मनी के सामन्त कुलों से आग्रह करना प्रारम्भ किया कि आप अपना बलसमाह कर जर्मनों को इन धार्मिक आत इयों से बचावें। पोपलियो का देहान्त होगया और उसके स्थान परपड्रिपन षष्ठ पाप हुआ । यह बहुत शीघ्र मर गया और इसके उपरान्त क्लिमेन्ट सप्तम पोप हुआ। ये सब पोप उइंडता से घबडा २ कर जर्मनी के सम्राट को लूथर के प्रति की धार्मिक युरुप धर्स की सभा द्वारा निर्धारित दड को कार्य में परिणित करने फे लिये उत्साहित और उत्तेजित करते थे परन्तु सम्राट अपने शत्रुओं से निपटने में ऐसा व्यग्र था कि उसे लूथर के विषय

महात्मा मार्टिन लूपर
हाय उठाने का असर ही न मिलता था । पाल्नं अच्छा
तरह जानता था कि लूथर को दड देने के लिये टमेनीन माग
जर्मनी से युद्ध करना पड़ेगा । परन्तु घर पुराने धर्म का पहर
पक्षपाती भी था और यह उसकी आन्तरिक इच्छा थी कि
सारा जर्मनी पूर्ववत् फिर धर्म विषय में एक हो जाय ।
लूथर की अपील सुन लूथर के पन के राजाओं ने जमे
सैक्सनी का राजा जान फ्रेडरिक (क्योंकि बुद्धिमान फ्रेडरिक
भर चुका था और उसका भाई उसके स्थान पर गजाया )
हेस का फिलिप, नेसविक का ट्यूक और ममफी पाईट
इत्यादि अपनी २ सैन्य एकत्रित कर मन्जर और अनारप्टिम्टों
श्रादि धार्मिक आततायो का मत करना निश्चित कर लिया।
कृषक लोग हर स्नाकर इधर उधर भाग गये,मना पकह कर
फासी पर चढ़ा दिया गया।
राजाओं भौर मामन्तों ने लूथर के कथनानुसार पोर
अत्याचार करके विद्रोह शान्त कर लिया अनेम इतिहास
कारोंने इन अत्याचारों के पाप का मार श्रशन
माथे मदा हे । इन लोगों ने भी छपको का दमन किया
ही था कि इन्हें मन्देह होने लगा दि जर्मन सम्राट को
बहुत शीघ लथर के पक्षपातिया को सतान के लिये प्रयाग
मिलनेवाला है। ये मय यह निश्चय जानते कि जय तर
सम्राट अपने शत्रुओं से घिरा है तय हो ना मानीग (पया
के पक्षपाल ), सुख की नीद मोरा झिम दिन अमंग
सम्राट अपने बाहरी शत्रुओं से निश्चिन्त दुमा उमदी दिन हम
लोगों को दो में से एक काम करना पडेगा या नो पुन. पांच
धर्म स्वीकार करें या अपने धर्म की रक्षा के लिये न उटा'

१०६ . महात्मा मार्टिन लूथर पोप का धर्म स्वीकार करना किसी को भी अभीष्ट न था अतः सब लोगों ने जो पोप के विरोधी थे एक मित्रसंघ स्थापित किया। इस सघ का उद्देश्य यही था कि यदि कोई शक्ति घल पूर्वक हम अपना धार्मिक विश्वास त्यागने पर विवश करेगी तो हम अपनी रक्षा अपने शस्त्र द्वारा करेंगे। फरासीसियो को पैविया में हार हुई और उनका सम्राट फेसिस बन्दी हो गया । इस समय ऐसा मालूम होने लगा कि मानो सारा यूरुप जर्मन सम्राट के करतल में है । परन्तु फैसिस बहुत शीवू स्वतत्रता पा गया और पोप से मित्रता कर फिर चार्ल्स से लड़न की तैयारी करने लगा। चार्ल्स ने इस मित्रता से रुष्ट हो रोम पर आक्रामण किया। लूथर का काम चारर्स स्वय कर रहा था। यह सच झगडा १५३० तक चलता रहा। १५३० में चार्ल्स और फ्रास तथा पोप में सधि हो गई। तुर्क लोग भी हाएना के द्वार से कडो हार खाकर लौट गये । चार्ल्स अपने घर के शत्रुओं का सामना करने के योग्य हुना। चार्ल्स इधर स्वस्थ हुआ उधर उमने लूथर के पक्ष- पातियों को अपने धर्म त्यागने के लिये विवश करना प्रारम्म फिया । ये सय पूर्व ही से तय्यार थे। इस युद्ध के कुछ पूर्व दी लूथर का देहान्त हो चुका था-श्रत इस युद्ध की घटनाओं। के वर्णन और लूथर की जीवनी से कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। इस सधि में अन्य राजनैतिक बातों के साथ २ धार्मिक प्रतिक्षा यह थी कि पोप, लूथर और कालविन के अनुयायी समान दृष्टि से देखे जायगे और कोई भेदभाव न" किया जायगा । इस युद्ध में जर्मनी की घडी हानि हुई ।। .

द्वादश परिच्छेद
लूथर का विवाह और गृहस्थो
चर्स की समा के दहाना के उपरान्त घहुत दिनो तक
लूथर को दरिद्रता से बडा कष्ट उठाना पड़ा। विटेन्वर्ग के
आगस्टाइन मठ में अब भी लुथर रहते थे परन्तु यहाँ न अव
कोई महन्तही रहे गये थे न कुछ आय ही थी । लूथर की निज
की भी याय कोई नहीं थी। एक जोडी कपडे से लूथर को
दो वर्ष काटने पडे । दो वर्षा के उपरान्त इलेकर से थोडा
सा कपडा, नये वस्रो के लिये मिला । पुस्तक बेचनेवाले
उसकी पुस्तके वेच २ कर धनी हो रहे थे परन्तु लूथर को
उनसे एक कोडी न मिलनी थी।
अब हम लूथर के ही मुख से उसकी दरिद्रता की दशा
का वर्णन करते है -"स्टापिज़ ने हमारा रुपया अभी तक
नहीं भेजा है और में दिन प्रति दिन अधिक ऋणी होता जाता
E। मेरी समझ में नहीं आता कि में क्या करू, । इलेकर से
फिर
मागू या जै दिन इस तरह चले चलाकर देखू और
अधिक से अधिक कष्ट उठाता जाऊ । परन्तु अत में नितान्त
कष्ट और भूख से, ऐसा मुझे विदित होता है, एक दिन मुझे
विटेन्वर्ग त्यागना पडेगा ओर पोप और सन्नाटसे सधि करनी
पडेगी। ( नबर १५२३.)। "मैं दिन प्रति दिन अधिक २
श्रणी होता जाता, मुझे एक दिन गली ,२ भिक्षा मागनी
.
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-
.

१० महात्मा मार्टिन लूथर । पड़ेगी। (२४ अपरैल १५२४)। "ऐसी अवस्था अधिक दिन तक नहीं चल सकती । राजा की देरी निश्चय मेरे हृदय चडी शहीयें पैदा करती हैं। मैंने तो बहुत दिन पूर्व ही यह मठ त्याग दिया होता और अन्यत्र जाकर अपने हाथों के परिश्रम से जीता ( यद्यपि ईश्वर जानता है मैं यहा भी कुछ फमपरिश्रम नहीं करता) यदि मुझे ऐसा करने से यह भय न होता कि इस भांति मेरे गजा के धार्मिक सिद्धान्तों पर धव्या लगेगा। "तुम मुझ से आठ रुपये मागते हो। भला घतानो तो मैं कहाँ से लाकर तुम्हें पाठ रुपये द जैसा कि तुम्हें विदित है में वहुतही मितव्ययतासे रहताह तव भी मेरा खर्चा नहीं चलता। धीरे२ करके मे लगभग सौ रुपये का ऋणी होगया है जो मुझे किसी न किसी प्रकार चुकाना होगा। मुझे तीन प्याले पचास रुपयो के लिये गिरमी रखने पडे हैं और एक तो १२ रुपये के लिये बेचही डालना पडा । निकलस इन्डे सेस से कहो कि श्रादमी भेजकर मेरी लिको कुपुस्तके मगा लेवें। अपने (पुस्ता) प्रकाशकों के ऊपर इसका मेंने अधिकार रख छोडा है। करू क्या यद्यपि मैं इतना दरिद्र हू तब भी ये (प्रकाशक ) मेरे परिश्रम के लिये मुझे एक कौडी नहीं देते । यदि बहुत किया तो मेरे ग्रंथ की मुझे एक दो प्रतियां भेज देते हैं। ये भी क्या कुछ देना हुमा, जब कि दूसरे प्रथकार यहाँ तक कि केवल उल्था करने वाले भी एकरुपया पन्ना पाते हैं।” (५ जुलाई १५२७), "मेरे प्यारे मत्री । कौन ऐसी बात होगई है कि आप ऐसा घुडक कर और धमकाते हुए लिखते हैं । मैं पूछताछ आर्थिक " - .

महात्मा मार्टिन लुथर
१०६
" (२७
कि क्या यह घाइविल से प्रेम करना है, कि आप उसही बाइ
विल पूजक को पेट भर अन्न देने से भी मुसमोडते है। में फिर
कहता हु कि यह घोर अन्याय हे, चडी विगर्हित तुच्छता है कि
अकेले में तो मुझे चले जाने के लिये श्राशा दी जाती है और
सय के सामने ऐसा भाव दिसाया जाता है मानों ऐसी अाशा
कभी दी ही नहीं गई थी । क्या आप यह समझते है कि श्राप
की ये चाल परमात्मा भी नदेख पावेगा। मुझे पूरी भागा
है कि यदि आप भोजन न देगें तो ईश्वर दे होगा।
नवयर १५२४)।
परन्तु धीरे२लूथर की आर्थिक अपस्या कुछ सुधरने लगी।
सैक्सनी के राजाने अपने विश्वविद्यालय का पुन सुधार किया
ओर लूथर को लगभग ५०० रुपया वार्षिक वृत्ति की एक जगह
देदी। इसी बीच में सैक्सनी की अवस्था सुधरने लगी और
लोग लूथर को उपहारादि भेजने लगे। विटेन्वर्ग में केथराइन
हान वोरा नामक एक स्त्री रहती थी । वह उच्चकुल की थी
परन्तु उसके मा याप निर्धन थे। जर केथराइन नव वर्ष की
थी तब ही उसके मा धाप ने दरिद्रता वश उसे एक मठ को दे
दिया था। १६ वर्ष की होने पर उसे साधु होने की शपथ खानी
पडी। यद्यपि भाग्य चक्र में फसकर उसे साधु होना पडा
परन्तु, यह इस साधु जीवन से यडी घणा करती थी । जय
लूथर को शिक्षा के प्रभाव से साधुगण पुन गृहम्ध होने लगे
और मठ टूटने लगे तो केयराइन ने भी अपने मित्रो को लिखा
कि मुझे इस अवस्था से निकाल लो । मित्रों ने उसकी इस
प्रार्थना पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया। १५२३ के अपरैल मास
में यह माय नौ मनुष्यों के साथ अपने मठ से भाग निकली।

११० महात्मा मार्टिन लूथर monwwwx AAAA - . गया। इसके उपरान्त ये सब के सर भूखों मरनोलगे। लूथर ने दयाँ घश इन लोगों के लिये चदा कराया। धीरे २ करके लूथर और केयराइन* में प्रेम हो गया। केथराइन उस समय चौबीस वर्ष की था और बहुत कुछ सुन्दर भी थी । अत में १३ जून सन १५२५ को इन दोनों स्त्री पुरुपों का एक निकटस्थ ग्राम गिरजे में विवाह होगया। इस विवाह के विषय में बडा आन्दोलनमचा । कुछ लोगों ने लूथर की बड़ी निन्दा करना प्रारभ किया । लूथर का मित्र मिलकथन कहने लगा कि यस अर लूथर वि लूथर स्वय बण्डा गया और लिखता है "इस विवाह ने मुझे ऐसा घृणा का पात्र बना दिया है " ! बहुत लोगों का यह विचार था कि ऐसे ममय में जब कि सारा जर्मनी घराऊ युद्ध के भय से विहल या और वह भी लूथर द्वारा प्रचारित धर्म के लिये, लूथर का इस प्रकार अचानक मौर वाध विवाह करना बहुत अनुवित था । कुछ लोग कहते थे कि ४२ वर्ष के पुरुष के लिये २० वर्ष की युवती के सग विवाह करना सर्वथा अयोग्य था । लूथर स्वय स्वीकार करता है किवह केथराइन को वहुत चाहता था और उसे "मेरी फेट, कहा करता था। इन सय प्रेम सवोधनों को सुन तोगों ने मनमानीजनरव फैलाना १ ऐसा मालूम होता है कि इसके पूर्व कैथराइन रेम्वर्ग में एक नयुक 'विद्यार्थी जीरोम वामगार्टनर से प्रेम करती थी क्योंकि लूथर उसे १२ श्रक्ट पर १५२४ इसयो को यो लिखता है "यदि तुम्हे अपनी केधराइन पाने “की इच्छा है तो सुरन्त चले श्रावो। नहीं तो वह किसी अन्य की संपत्ति हो जायगी यह अभी तक तुम्हे भूली नहीं है। हमे पहा श्रानद होगा यदि आप मा विवाह धाम के साथ होजाय क्योंकि आपका अधिकार पूर्व का है।' .

महात्मा मार्टिन लूथर +n N A AAMAnn u भारभ किया । लूथर लिम्वता है" मैने अचानक विवाह कर लिया कि मुझे लोगों की मनमानी यात न सुननी पडें और उन लोगों का मुख भी बन्द होजाय जो मुझे पूर्व ही से भला बुरा कहने लग गये है।" मेन पूर्व के प्रकरण में यह दिखाया है कि लूथर साधु होने और विशेष कर आजन्म ब्रह्मचारी रहने की प्रथा के बहुत ही विरुद्ध था कारण कि उसे निज का अनुभव था कि प्रेसे अना कृतिक प्रण लोग करने को तो कर बैठते हे परन्तु निवाह नहीं पाते, अत मठों में घोर व्यभिचार फैलता है । लथर के विचा रानुसार विवाह एक ईश्वर सम्मन धर्म शास्त्र विहित अत्यन्त पवित्र सस्कार है जो प्रत्येक मनुष्य को स्वीकार करना चाहिये । बहुत से लोग जो लूथर को यह उपदेश देते सुनत थे कि साधू पुन गृहस्थ हो सकता है और विवाह कर सकता है तथा विवाह प्राइबिल विहित है लूथर को स्यय विवाह करने को विवश करते थे और कहते थे कि अापको स्वय श्रादर्श बनना चाहिये । इसके अतिरिक्त लथर उदार भोर सच्चे दृदय से स्वीकार करता है कि उसके भी मनुष्या स्वभावोचिन सर ही इच्छाएं थी "ईश्वर की शपथ में यह कभी नहीं कहता कि रुधिर मास का मुझ पर कुछ प्रभाव ही नहीं है और में ईटा पत्थर है परन्तु तव भी मुझे अभी विवाह करन की इच्छा नहीं है क्योकि प्रति दिन मुझे यह भय लगा रहता है कि जाने कर में नास्तिश्वत् चिता पर चढा कर यमालय मेजदिया जाऊ"। लुथर आगे चल कर लिखता है "मुझे और कुछ अधिक दिन जीवित रहने की आशा वध गई है प्रत अर में अपने पिता को इसचिरसंचित इच्छा को किअप में दिया।

११२
महात्मा मार्टिन लूथर
-
फर कुल चलाऊ नहीं रोक सकता । इसके अतिरिक मेरी
इच्छा है कि में अपने उपदों का स्वय आदर्श बन सकें
इस विषय में ईश्वर की ऐसी ही इच्छा हे । मेरा
अपनी पत्नी के प्रति कोई व्यभिचार या कामुकता भाव नहीं
है। हाँ मैं उससे निरपेक्ष प्रेम अवश्य करता है।
यदि लूथर का विवाह इन सब अपवादों के कारण कुछ
कष्टप्रद होगया था तो लूथर को इन सब कष्टों का प्रतिफल
बहुत शीघ्र अपनी नववधू के सद्गुणों में मिल गया । लूथर
लिखता है कि मेरी पत्नी मेरी अाशा के बाहर आज्ञानुकारिणी
है । सदा मेरी इच्छानुकूल कार्य कर मुझे प्रसन्न रसती है ।
पकवार लूथर ने कहा "मैं अपनी पत्नी को कास के राज्य
अथवा घेनिस के धन सम्पत्ति के लिये भी न बदलू गा और
बोभी नीन कारणों घश-प्रथम, मुझे ईश्वर ने इसे ऐसे समय में
दिया है जिस समय में ईश्वर से एक स्त्री के लिये प्रार्थना कर
रहा था, दूसरे, यद्यपि उसमें अवगुण है परन्तु और स्त्रियों से
कही कम हैं, तीसरे, कि वह अपने सतीत्व की सच्ची हे" ।
नूथर कहा करता था कि "वाइविस्त से उतर कर यदि
इस संसार में कोई दूसरी निधि है तो वह है पवित्र विवाह
सम्बन्ध । पविन, प्रसन्नवदना, ईश्वर भक्त, गृहकार्यकुशला
पत्नी,* जिसे तुम विश्वास पूर्वक अपना तन, मन, धन सौंप
भत सुसदु सपोरनुगत सास्ववस्था यत ।
विश्रामो पदयस्य यत्र मरसा यस्मिन्नहार्या रस ।
कालेनावरगात्ययास्परिणते पत में मसारेस्थिम् ।
मर प्रेम सुमापत्य कथमप्पे दिसत प्राप्यते।
-भवभूति
.

महात्मा मार्टिन लूथर
----
।
नको । श्विर के सव उपहारों में श्रेष्ठ है। ऐसे भी श्री पुरुष
जो न अपनी सन्तति का ध्यान रखते है न परस्पर प्रेम करते
हैं, ऐसे लोग मनुष्य नहीं कहे जा सकते । वे अपना घर नरक
मना लेते हैं।"
विवाह के समय तो लूथर अकिञ्चन था परन्तु शीघ्रही
जैसा पहिले बताया गया है उसे रोटी दाल का ठिकाना हो
गया । लूथर का छोटा मोटा गृह एरव नदी के किनारे घना
हुआ था। यह यद्यपि यहुत वडा न था परन्तु तर भी सुन्दर
और हवादार था। धीरे २ करके लूथर ने एक सेत और गृह
कय करलिया। लूथर की मृत्योपरान्त इसही गृह में उसकी
पत्नी जाकर रही थी । फेथराइन सय काम करने में बडी
चतुर थी। वह खेत का काम करती, सुअर और मुर्गियों को
पालती, शराव धनाती, अपने निकटस्थ मछली पकड़ने वाले
तालाय से मछली पकड लाती-सक्षेप में गृहस्थी के सय कार्य
पडो चतुरता और उत्साह से करती था। घर को साफ
सुपरा रपना वह अपना मुरय कर्तव्य मानती थी।
लूथर का कुटुम्ब एक प्रकार से बडा था। लूथर के सय
मिलाकर पाच लडकी लडके हुए । इनमें तीन लडके और
दो लड़कियों थी। हेंस, एलिजथ मेगडलेन मार्टिन और
पाल उनके नाम थे। केधराइन फी चाची जो केथराइन के ही
मठ में रहती थी ओर फेथराइन के माथहा चसी भाई थी
लूथरही के साथ रहती थी । लथर इस स्त्री का बडा सम्मान ।
करता था । इसके अतिरिक्त हो मतोजिया और थी जो
लूथर
के साथ रहती थीं, कुछ विद्यार्थी भी लूथर के साथ रहते थे
अपने लडके लड़कियों से लूथर को पडा प्रेम था । लूथर अपनी

महारमा मार्टिन लूथरर . सतति को प्रसन्न रखने तथा यथाशक्ति उनकी संग्ल इच्छाओं को पूर्ण करने का बडा उद्योग करता था। लूथर ने कोवर्ग'से अपने ज्येष्ठ पुत्र हैम को निम्नलिखित वत्सलतापूर्ण-पान लिया था । "मेरे छोटे प्यारे पुत्र ईशु की जय । में यह देखकर बहुत प्रसन्न कि तुम अपना पाठ खूब पढते हो और ईश्वर की प्रार्थना करना भी नहीं भूलते हो। इसी तरह कार्य करतेरहो। मेरे प्यारे बेटे ! जब म घर लौट गा तो तुम्हारे लिये बहुत अच्छा खिलोना लाऊ गा । मैं एक सुन्दर उपवन: जानता हू जहा यहुत से प्रसन्न चित्त लडके सच्चे काम के कुरते पहिने अच्छी २ नारगी घेर आदि तोडा करतोहे । नाचते हे गाते हैं और सुन्दर घोडों पर सुनहली 'लगाम और चादी को जीन महित चैठते है । मने माली से पूछा किसका उपवन है किसने लड़के हैं। माली ने उत्तर दिया "ये वे लडके हे जो पढ़ते हैं प्रार्थना करते हैं और सिधाई से रहते है" । तर में उत्तर दिया "मेरे भी एक लड़का है। उसका नाम हैस लूथर है क्या वो भी इस उपवन में आकर नारगी तोड सकता हे, घोडे पर चढ़ सकता है और सब के साथ पेल --सकता है । तब उसने कहा "हां यदि वह अपना । पाठ पढता,हो, प्रार्थना करता हो और अच्छा लडका हो तो प्रा.सकता " तब उसने मुझे एक स्थान दिमाया जो नाचने के लिये यहुत चिकना बनाया गयाथा और जहाँखेलने को नीर धनुप रिपसी थी। मैंने कहा मै अभी जाकर अपने लड़के को लिसना हूँ। उमने कहा "हॉ" "हॉ जाकर भी लियो। अनी मेरे प्यारे , घेटे मन लगाकर पढ़ा करो और र 1 . - ++ न महात्मा मारिन लूथर -- + मार्था किया रो। लियस और नोस्ट से भीयही करने को कहो । नप तुम सब के सब इस सुदर उपवन को या सकोगे। सर्वशक्तिमान ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे तुम्हारा ममी पिता मार्टिन लूथर । "लघर बैठा था और उसके सामने उसका छोटा मार्टिन तन, मन, धन से गुडिया फोकपडा पहिनाने में व्यग्र था। लूथरा' फहने लगा "स्वर्ग में हम लोग भी ऐसे ही मीधे सादे होंगे. जैसे कि या छोटा बच्चा । देसो ईश्वर के विषय में यह फैसा।' यातचीत करता है और तनिक भी सदेह नही करता मन माना स्नेल ही यशी का सर्वोत्कृष्ट भोजन है। मच तो यों हे किस्मग्रसर्वोत्तम खिलौना है। वे (बच्चे) जो कुछ भी करते या कहते है उसमें एक हार्दिक सचाई मिली रहती है। यद्यपि उनकी बुद्धि छोटी रहती है परन्तु धार्मिक विश्वास अधिक होता है। ये लोग हम ऐसे मूर्ख वृद्धों से कहीं अच्छ। । अत्राहम की गडी बुरी दशा हुई होगी जा उसे आइसफ को मारने की आशा मिली थी। यदि ईश्वर ने मुझे ऐमी श्राशा दी होनी तो में निश्चय उससे भगड पडा होता । इतना सुनने। ही केधराइन (जिसे लूथर सदा केट या फेटी कहा करता था) तुरन्त बोल उठी "मैं सात जन्म न विश्वास करूगी ईश्वर किसी को अपने पुत्र की हत्या करने की आशा देता है । लूथर -ने उत्तर दिया "प्रभु ईशु म ढकर. ईश्वर का कोई प्यारा नहीं है। पर उसे भी उसने फासी चढने दिया देस के याल मिया के नाम है होते हे. । N Hin

महात्मा मार्टिन लूथर
.
इस प्रकार के आनद में इस सुखी कुल का जीवन पतीतर
होता था । लूथर को अपनी 'केट' को चिढ़ाने चिराने और
मनमाने तथा नित्य नवीन नाम रखने में बड़ी प्रसन्नता होती
थी। लूथर ने कभी भपनी केट को गुस्सा होकर कुछनहीं कहा
लूथर उसके सद्गुणों का अच्छा परीक्षक था और उसका पूरा
सम्मान करता था । एकबार लथर ने कहा "केट यदि तुम
सारी पाइबिल पढ जावो तो मैं तुम्हें पचास सुवर्ण मुद्राये
पारितोषिक द्" । प्रथकार को यह पता नहीं है कि इसपारि
तोपिक के लालच में केट फसी थी या नहीं।
'कस्यात्यन्तं सुसमुपनत दुःखमेकान्ततो वा ! नोचैर्गच्छ
स्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण' । के कथनानुसार लूथर
फे
गार्हस्थ्य सुन के आकाश में भी कालिमा के बादल दिखाई
पड़ने लगे। इस बहुत छोटी अवस्था में मर गया । इसके
उपरान्त उसकी पहिली लडकी एलिजवेथ भी बहुत छोटी
अवस्था में मर गई। लूथर कहता है "आश्चर्य है। इस लडकी
के मरने से मेरा हृदय इतना सुस्त हो गया। तयसे मेरा उदय
ऐसा घयराया करता है कि में स्त्री तुल्य हो गया है। मैं कमी
स्थममें भी न सोच सकताथा कि मनुष्य का उदय अपनीसतति
के लिये इतना प्रेममय हो सकता है। इसके उपरान्त उस
की सब से प्यारी लडकी मैगडलेन भी १४ वर्ष की अवस्था
में मर गई । लूथर को इससे यष्टुत कुछ अाशा थी।उसके मरने
से लूथर का हदय टूट गया। जब उसका शव समाधि से
गाडने को ले जाया जा रहा था तब लूथर ने उठानेवाले
ध्यालयों से पहा "मैंने एक देवता स्वर्ग भेज दिया है। यदि
उसके सश मेरी भी मृत्यु हो सकतो मैं अभी मरने को
-

महाला मार्टिन
तूबर
तय्यार "। लूथर ने अपने मित्र को डिना कि "प्राकृतिक
प्रेम इतना शक्तिमान हे कि मैं उसकी (मैगरेलन) मृत्यु बिना
हार्दिक धोर पीस के नहीं सह पाता ! जब मुझे उसके शब्द
मौर हावभाषों की याद भाती है तव ईशु की मरण स्मृति भी
मेरेदुखको नहीं भरा पाती।
-
* इसकी समापि पर लूथर ने निम्न खिचित पप स्वयं बनाकर पर
पाया था । यसमा अंगरेजी बल्या इस प्रकार है।
Hero do I'Lén, Luther's daughter tost
Sleep
in my little bed with all the bloot
In sin end trespass was I born
Por cyor yani thus forlorn
But yot I live and all 19 good
U "Thoa Cbr161, redeemtst me with iby blood

-----
HAPA
त्रयोदश परिच्छद ।
V
"
17
।
लूथर की मृत्यु,
710:11
१५३७ की फरवरी में मालकाल्ड में युद्ध के सबध में एक
धर्म सबंधी सभा की गई । लूथर भी यहां उपस्थित हुआ।
परतु यहां आने पर उसे वडा भयकर रोग हो गया । अश्मरी
या मूत्रकृच्छ रोग हो जाने के कारण एकादश दिवसों तक
लूथर मूत्र त्याग न कर सके । यद्यपि ऐसी भयकर श्रवस्था
थी कि जीवन से उमके मित्र निराश हो चुके थे परतु लूथर
ने अपनी यात्रा न तोडी। फल भी अच्छा हो दृश्श्रा भोर चलने
के कारण लूथर रोग मुक्त हो गये । इसी प्रकार एकबार
लूथर के हृदय के निकट कुछ रुधिर के जम जान से भी लूथर
' को वडा कष्ट उठाना पड़ा था। लूथर कान पोर दात की पीडा
से बहुत हैरान रहते थे।
इस ही साल रोम ने यह देखा कि प्रोटेस्टेंट असिवल से
नहीं दवाये जा सकते, पुन सामनीति का प्राश्रय लिया। इस
समय पोप था पाएस तृतीय । यह पोप कुछ अच्छे स्वभाव
की भी था । इसन यहा कि लथर की बहुत सी बाते सत्य हैं,
श्रत हम लोग लूथर की उन सब बातों को मानने तथा अपना
सुधार करने को प्रस्तुत है । उमते मभाका, स्थान भी
निश्चित किया जहा उमय पक्ष मिलकर परस्पर समझोता
फर सकते थे। लथर उनकी इन चालों में कर फसनेवाले थे।
सूपर ने पई पुस्तके पोप की धूर्तता प्रकट करने के लिये लिथी।
।

महारमा मार्टिन लूथर
उनका सा का फल यह हुआ कि पोप की चाल न 'चलो
इसाही माति पोप पक्ष से युद्ध करते परते लूथर की लीयन
भवधि समाप्त हो चली ओर १५४६ का वर्ष आउपस्थित हुआ।
मैंसफील्ड के सामन्त कुल में परस्पर पटवारे के विषय
में कुछ भगडा खंडागा। उन लोगों न लूथर को निमश्रण
दिया कि लथर पाकर सोमा का विवाद निश्चित करदें
यद्यपि लघर को इन विषयों का बहुत कम शान था परन्तु तय
भी उन्हें ईसलीवन जाना पडा । अत' विटेनर्ग में १७ जनवरी
को अपना अतिम उपदेश दे लथरने २३ जनवरी को अपनों
जन्मभूमि के लिये प्रस्थान किया। लूथर के सार उनपर
मिन जोना और उनक दो पुग्न थे। मेसफील्ड की सीमा पर
इन्हें शत अश्वारोही मिले जो इनकी अगवानी के लिये भेजे गये
थे।ामा प्रकार लूथर बिडे सम्मान सहित अपनी जन्मभूमि
पहुचे । परन्तु, मार्ग हो से उनका स्वास्थ्य निगड चलाया
और,ईसलीवन पहुचने पहुंचते उनकी शारीरिक अवस्था ।
घडत गिढ गई। लूथर को विश्वास होगया कि मग समयो
अब आगया हे पान उन्हें घर लोटने ४ी इच्छा होन लगी
परन्तु इश्वर की इच्छा न यी कि यह सजीर विटेवर्गोटे
१७ फरवरी को सूथर के हृदय म पीडापरन्तु
थोडी ही देर में अच्छी होगई । लूथरा ने सबके साथ भोजन'
किया और सदा को भाति सूय बार्तालाप किया। इसके उप
रान्त लूथर सोने के लिये अपने कमरे में चले गये । अर्धरात्रि
के निकट लथर ने अपने सेवक को बुलाया । लुभाने का
'मुझे नडी मुस्ती मालुम होती है, मेरी पीडा बढनी जाती है।
इसके उपरान्त कुचेनी मासूम हुइ और सूधर उठकर कमरे
.
-

orm is TET . Aman ६४ 11 her P-- --- ४ "- + त्रयोदश परिच्छेद लूथर की मृत्यु १५३७ की फरवरी में मालकाण्ड में युद्ध के सबध में एक धर्म संवधी सभा की गई । लूथर भी यहां उपस्थित हुआ। परतु यहां आने पर उसे बडा भयकर रोग हो गया । अश्मरी या मूबकच्छ रोग हो जाने के कारण एकादश दिवा तक लूथर मूत्र त्याग न कर सके । यद्यपि ऐसी भयकर अवस्था थी कि जीवन से उसके मित्र निराश हो चुके थे परतु लूथर ने अपनी यात्रा न तोडी। फल भी अच्छा हो हुना और चलने के कारण लूथर रोग मुक्त हो गये । इसी प्रकार एकवार लूथर के हृदय के निकट कुछ रुधिर के जम जान से भी लूथर ' को घडा कष्ट उठाना पड़ा था। लूथर कान ओर दात की पीडा सं बहुत हैरान रहते थे। इस ही साल रोम ने यह देखा कि प्रोटेस्टेंट प्रसिवल से नहीं दाये जा सकते, पुन सामनीति का श्राश्रय लिया। इस समय पोप था पाएस तृतीय ! यह पोप कुछ अच्छे स्वभाव की भी था । इसन कहा कि लूथर को बहुत सी बाते सत्य हे अत हम लोग लूथर की उन सब बातों को मानने सुधार करने को प्रस्तुत हैं । उसने सभा को स्थान भी निश्चित किया जहा उभय पक्ष मिलकर परस्पर समझौता कर सकते थे। लूथर उनकी इन चालों में का फंसनेगाले थे। लूथर ने फई पुस्तके पोप की धूर्तता प्रकट करने के लिये लिपी । तथा अपना -

महारमा मार्टिन लुथर
उनका सिम का फल यह हुआ कि पोप की चाल न चलो में
इसही भाति पोप पक्ष से युद्ध करने करते लूथर की जीयन
अवधि समाप्त हो चली ओर1५४६का वर्षाउपस्थित हुआ।
,मैंसफील्ड के सामन्त कुल में परस्पर पटवारे के विषय
में कुछ मंगडा खेडाहुआ । उन लोगों न लूथर को निमन्त्रण
दिया कि लथर श्राकर सीमा का विवाद निश्चित करदें
यद्यपि धर को इन विषयों का बहुत कम शान था परन्तु तय
भी उन्हें ईसलीवन जाना पडा। श्रत विटेन्वर्ग में १७ जनवरी
को अपना अतिम उपदेश, दे लथरने २३ जनवरी को अपनो
जन्मभूमि के लिये प्रस्थान किया। लूथर के साथ उनपर
मित्र जोना और उनक दो पुत्र थे । मैंसफील्ड की सीमा पर
इन्हें शत अश्वारोही मिले जो इनकी अगवानी के लिये भेजे गये
थे। इस प्रकार लूथर बडे सम्मान सहित अपनी जन्मभूमि
पहुचे। परन्तु, मार्ग हो से उनका स्वास्थ्य बिगड ला धा
और, ईसलीवन पहुचने पहुचते उनकी शारीरिक अस्था
बहुत निगड गई । लूथर को विश्वास होगया कि मेरा समयो
अघ आगया है अन उन्हें घर लोटने की इच्छा होनालगी।
परन्तु इश्वरी इच्छा न थी कि यहासजीन विटेवर्ग-लोट
१७ फरवरी को लूथर के हृदय में पीडा परन्तु
थोडो ही देर में अच्छी होगई । लथर, से सबके साथ मोजन
किया और मदा को भाति यूर चातालाप किया। इसके उप.
रान्त लथर सोने के लिये अपने कमरे में चले गये। अर्धराति
फे, निकट लयर न अपने सेवक को घुलाया । लूशा ने कहा,
मुझे बडी सुम्ती मालुम होती है, मेरी पीडा पहना जाती है।
इसके उपरान्त कुछयेचेनीम
-
लूथर उठकर

महरमा मार्टिनरबर
।
-
-
में टहलने लगे। दो एकबार टहल के फिर पलंग पर सो रहे।
इस लमय लूथर के पास उनके दो पुत्र और उनका मित्र जोना
था। लूथर ने कहा "मृत्यु भागई, हम जाते हैं। श्वर!
अपनी आत्मा तुम्हें सोपते हैं। जोना ने पूछा "पवित्र पिता!
पना आप अपने जीवन के धार्मिक विचारों में पूरा विश्वास
रख कर मरते हैं" लथर ने कुछ भाले मोल कर उत्तर
दिया "हाँ"। इसके उपरान्त लूथर फिर सो गये। निक
रस्थ लोगों ने देखा कि लूथर का मुख पीला पडता जाता
है। लूथर का शरीर उडा होने लगा । स्वॉस धीमी पड़ने
मगी। अंत में एक दीर्घ निश्वास निकली और 'सुधारक'
संसार से उठ गया ।
लूथर का शरीर एक दिन वहीं (ईसलीवन में)रहा । कई
मूर्तियां बनाई गई और तस्वीरें उतारी गई। जान फ्रेडरिक
समाचार सुनते ही अन्तिम भेट करने को दौड, पड़े । मैस
फील्ड के सामन्त कुलवालों ने अपना झगडा बिना किसी
विवाद के तय कर लिया। पीस तारीख को लूथर का शव
गारी पर चढाकर विटेग्वर्ग भेजा गया। अश्वारोहियों की
एक पल्टन सम्मानार्थ साथ थी। ईसलीवन नगर की जनता
नगर के फाटक तक शव के साथ गई । दो दिनों तक चलने
के उपरान्त सघ विटेन्वर्ग पहुँचे और वहीं गिरजे में लूथर को
समाधि # दी गई।
* पोप के मतों ने लूथर की मृत्यु के विषय में मन मानी मंडी पक्रया
कैसा कर अपनी मीच प्रकृति का पूरा परिचय दिया है। कुछ ने कहा पर
की अचानक मृत्यु होगई, कुछ ने कहा शैतान ने उमका गला,घोट दिया । एक..
महाशय बिनते हैं कि थर का शव इतनी दुर्गन्धि ताया कि या मार्ग
.

महात्मा मार्टिन लूथर
१२१
।
लूथर की वसीयत कासक्षेप में अर्थ यह था कि उसकी
मारी सम्पत्ति की उत्तराधिकारिणी उसकी प्यारी केथराइन
हो। लूथर ने अपनी घसीयत में केथगइन की बडी प्रशसा
को है । लूथर को 'मृत्योपरान्त लूथर के सारे प्रन्य
एकत्रित किये गये और सान भागों को एकापुस्तक में छापे
गये। फेथराइन लुथर के उपरान्त घोडे ही दिन जीवित रही।
१५४७ तक फेथराइन विटेवर्ग ही में रहती रही परन्तु जव
चास पचम ने नगर घेर लिया तो फेथराइन यहां से अन्यत्र
चली गई। चलते समय कई राजे महाराजों ने उसे अन्ये
उपहार दिये । लूथर की मपत्ति ओर इन सय उपहारों को
मिलाकर धराइन के पास इतना होगया कि यह प्रानन्द
से जीरन बिना सके . जय विटेन्वर्ग फिर इलेकर के अधि
कार में प्रागया तय थराइन फिर विटेन्वर्ग लौट आई ।
१५५२ में पिटेन्वर्ग में बडी महामारी फैल गई और केधराइन
फो विवश हो चिटेन्वर्ग त्यागना पड़ा । केधराइन के पास
पर सूब
में फेंक दिया गया । लुधर जव जीवित पा सर भी उसकी मृत्यु की झूठी २
फैलाई जाती थीं। इन समाचारों में लूथर की मृत्यु का ऐसा
भयकर विवरण दिया जाता था कि लोगों के हृदय काप उठते थे। परन्तु
यहा पर एक घटना उल्नेखनीय है । १५४७ में ( लूया की मृत्यु के एक
वापरान्त ) चाम पंचम ने रिटेवग जीत लिया और नगर में प्रवेश
किया । सैनिकों ने लूथर को एक प्रतिमा जिसमें दो सग विधे थे चाल्स
को दिखाया। स्पेनवासी पोपभक्त घालत को बहुत दबाने लगे कि खूधर
को समाधि सौद कर उसके शव 7 अपमान किया जाय और शव को
फासी दी आय । परतु चाल्र्स ने उत्तर दिया " मैं मृत के साथ युद्ध नहीं
फरता। परन्तु शोक सस समय इस प्रकार मनस युद्ध बहुत होता था।

१२२
महात्मा मार्टिन लुथर
.
।
जो कुछ था सब उसने बेच डाला और टरगांऊ में अपने
अतिम दिवस:विताने का निश्चय कर टरगाऊ के लिये चल
पडी । परन्तु मार्ग में घोडे विगड गये और तोडा कर भागने
लगे। फेधराइन ने कूदने का उद्योग किया, कूदने में गिर
पड़ी और गहरी चोट लागई । इस ही चोट से तीन महीने
तक बीमार रहने के उपरान्त २० दिसम्बर सन् : १५५२ में
मर गई।
लूथर के विषय में एक निष्पक्ष विद्वान् को सम्मति उद्धृत
कर यह सक्षिप्त जीवनी समाप्त की जाती है । "ईश्वर की
इच्छा थी कि लूथर एक बहुत बडा ओर सुन्दर धर्म सुधा
रक नेता हो । यही कारण है कि उसका चरित्र. दो विरोधी
परतु घोर अतिशयोक्ति पूर्ण रगो से रगा गया है । लूथर के
विपक्षी यह देखकर कि किस निर्दयता के साथ वह उनके
शताब्दियों के धार्मिक विचारो तथा पवित्र भावों को तोड़
मरोड़ रहा है, उसे दुष्ट मनुष्य ही नहीं वरन् राक्षम समझते
थे। उनके अनुयायी यह समझ कर कि लथर ही की कृपा से
उन्हें सत्य मार्ग तथा सत्य वर्म का ज्ञान हुआ है उसकी कृत
शता तथा भक्ति में ऐसे पग गये थे कि वे उसमें दोप देखना
तो दर रहा मनुष्यातीत गुण और भाभा देखते और उसे
साक्षात् देवता का औतार मानत थे। परतुह हमें न शत्र की
घृणा न मित्र का प्रेम अपना पथ दर्शक बनाना चाहिये., हमें
उसके चरित्र की ओर ध्यान धरकर लूथर की समालोचना
करनी चाहिये । यह तो उसके शगु भी स्वीकार करेंगे कि
तूथर गुण भरपूर थे अर्थात् अपने निर्धारित सत्य' के
लिए उत्साह, अपनी कार्य प्रणाली की रक्षा में निर्भीक धीरता,

महात्मा मार्टिन लुथर १२३ MuAMMALA - अपने सिद्धान्तों की रक्षा करने की योग्यता, उन सिदान्तों के प्रचारार्थ सतत उद्योग आदि । इन गुणों के साथ ही साथ यह भी कोई अस्वीकार नहीं कर सकता कि लूथर एक यदुत सदाचारी और सद्या तथा निस्वार्थी पुरुप था । स्वार्थमय विचारों से परे, विषय भोग रहित, ससार के सुखों से धचित लुथर की जीवनी एक अपूर्व प्रादर्श थी। परन्तु इन सदगुणों के साथ ही साथ् लूथर में कुछ मानुषिक स्वभाव के दोष भी थे। लूथर बहुधा इतना श्रावेश पूर्ण हो जाता था जिता कि यहुत से शाति प्रिय मनुष्यों को अच्छा न लगेगा । कभी २ लूथर अपने विचारों की सत्यता में ऐसा घोर विश्वास दिखाता था कि अभिमान की झलक आने लगती थी। उसकी ढ़ता में पक प्रकार को हठ और धैर्य में अविमृश्यकारिता फा दोप मिला रहता था । हुधा यह अपने शास्त्रार्थों में क्रोध दिखा पैठता था। लूथर अपने आवेश में आने पर किसी की योग्यता या पद का ध्यान नहीं रखता था। परन्तु ये सय दोप जो लूथर में दिखाये जा सकते थे मय उसके स्वभाव ही के दोष न थे। उनमें बहुत से दोप ऐसे हैं जो उसके युग की अवस्था के फल थे। उस समय की अर्ध सभ्य समाज में नम्रता के ने नियम प्रचलित न थे जो मनुष्य को अपना क्रोध रोकनेको विवश करते हैं और जिनसे समाज में सुजनता का प्रचार होता हे। उस समय के शास्त्रार्थ में मनमाना शोध, भाषा को 'कटुता, व्यक्तिगत थालेप, अश्लील याते, कोई आश्चर्य का विषय नहीं समझी जाती थी। हम प्रत्येक मनुष्य के धरित का न्याय करते समय उसके समय की सभ्यता और नियमो पर ध्यान अवश्य रखना चाहिये। यह महात्मा मार्टिन लूथर - । जो कुछ था सब उसने बेंच डाला और टरगांऊ में अपने अतिम दिवसाबिताने का निश्चय कर टरगाऊ के लिये चल पडी । परन्तु मार्ग में घोडे बिगड गये और तोडा कर भागने लगे। केथराइन ने कूदने का उद्योग किया, कूदने में गिर पड़ी और गहरी चोट स्वागई। इस ही चोट से तीन महीने तक बीमार रहने के उपरान्त २० दिसम्बर सन १५५२ में मर गई। लूथर के विषय में एक निष्पक्ष विज्ञान की सम्मति उद्धत कर यह मक्षिप्त जीवनी समाप्त की जाती है । "ईश्वर की इच्छा थी कि लूथर एक बहुत बडा और सुन्दर धर्म सुधा रक नेता हो । यही कारण है कि उमफा चरित्र दो विरोधी परतु घोर अतिशयोक्ति पूर्ण रगो से रगा गया है । लूथर के विपक्षी यह देखकर कि किस निर्दयता के साथ वह उनके शतान्दियों के धार्मिक विचारों तथा पवित्र भावों को तोड मरोड रहा है, उसे दुष्ट मनुष्य ही नहीं वरन् राक्षस समझते थे। उसके अनुयायी यह समझ फर कि लथर ही की कृपा से उन्हें सत्य मार्ग तथा सत्य धर्म का ज्ञान हुश्रा है उसकी कृत शता तथा भक्ति में ऐसे पग गये थे फिचे उसमें दोष देखना तो दूर रहा मनुष्यातीत गुण और भाभा देखते और उसे साक्षात् देवता का श्रौतार मानते थे। परतु इ ने शत्रु की घृणा न मित्र का प्रेम अपना, पथ दर्शक बनाना चाहिये,, हमें उसके चरित्र की ओर ध्यान परकर लूथर की समालोचना करनी चाहिये । यह तो उसने शन भी स्वीकार करेंगे कि लूथर में ये गुण भरपूर थे अर्थात् अपने निर्धारित सत्य के लिए उत्साह, अपनी कार्य प्रणाली की रक्षा में निर्भीक धीरता, . -- .

महात्मा मार्टिन लूथर
१२३
अपने सिद्धान्तों की रक्षा करने की योग्यता, उन सिद्धान्तों के
प्रचारार्थ सतत उद्योग आदि । इन गुणों के साथ ही साथ यह
भी कोई अम्वीकार नहीं कर सकता कि लूथर एक यहुत
सदाचारी और सच्चा तथा निस्वार्थी पुरुप था । स्वार्थमय
विचारों से परे, विषय भोग रहित, ससार के सुखों से बचित
लूथर की जीवनी एक अपूर्व आदर्श थी। परन्तु इन सदगुणों
के साथ ही साथ लूथर में कुछ मानुषिक स्वभाव के दोष भी
थे। लूथर बहुधा इतना प्राधेश पूर्ण हो जाता था जितना कि
बात से शाति प्रिय मनुष्यों को अच्छो न लगेगा । कभी २
लूथर अपने विचारों की सत्यता में ऐसा घोर विश्नान
दिखाता था कि अभिमान की झलक पाने लगती थी। उसकी
ढ़ता में एक प्रकार, को हठ और धैर्य में अविमृश्यकारिता
का दोप,मिला रहता था । बहुधा वह अपने शास्त्रार्यों में शोध
दिखा पैठता था । लूथर अपने आदेश में श्राने पर किसी की
योग्यता या पद का ध्यान नहीं रखता था।
परन्तु ये सब दोप जो लूथर में दिखाये जा सकते थे सय
उसके स्वभाव ही के दोप न थे। उनमें बहुत से दोप ऐसे में
जो उसके युग की अवस्था के फल थे। उस समय की अर्थ
सभ्य समाज में नम्रता के के नियम प्रचलित न थे जो मनुष्य
को अपना क्रोध रोकने को विवश करते हैं और जिनसे समान
में सुजनता का प्रचार होता है। उस समय के शास्त्रार्थ में
मनमा क्रोध, भाषा को कटुता, व्यक्तिगत भादोग, मातील
यातें, कोई आश्चर्य का विषय नहीं समझी जाती
प्रत्येक मनुष्य के धरित का न्याय करते समय उसके ममय
की सभ्यता मोर नियमों पर ध्यान प्रमश्य र
।
चाहिये।
"

१२२ महात्मा मार्टिन लूथर ' . जो कुछ था सब उसने बैंच डाला और दरगाऊ में अपने अंतिम दिवसायिताने का निश्चय कर टरगाऊ के लिये चल पडी । परन्तु मार्ग में घोडे विगड गये और तोडा फर, भागने लगे। केथराइन ने कुदने का उद्योग किया, कुदने में गिर पड़ी और गहरी चोट स्वागई । इस ही चोट से तीन महीने तक धीमार रहने के उपरान्त २० दिसम्बर सन् १५५२ में मर गई। लूथर के विपय में एक निष्पक्ष विद्वान् को सम्मति उद्दत फर यह सक्षिप्त जीवनी समाप्त की जाती है । "ईश्वर की इच्छा थी कि लूथर एक बहुत बडा और सुन्दर धर्म सुधा रक नेता हो । यही कारण है कि उसका चरित्र दो विरोधी परतु घोर अतिशयोक्ति पूर्ण रगो से रगा गया है । लूथर विपक्षी यह देखकर कि किस निर्दयता के साथ वह उनके शताब्दियों के धार्मिक विचारी तथा पवित्र भावों को तोड मरोड रहा है, उसे दुष्ट मनुष्य ही नहीं वरन् राक्षस समझते थे। उसके अनुयायी यह समझ कर कि लथर ही की कृपा से उन्हें सत्य मार्ग तथा सत्य धर्म का भान हुआ है उसकी कृत भता तथा भक्ति में ऐसे पग गये थे कि वे उममें दोष देखना तो दूर रहा मनुष्यातीत गुण और श्राभा देखते ओर उसे साक्षात् देवता का औतार मानत थे। परतु हमें न शन की घृणा न मित्र का प्रेम अपना पथदर्शक बनाना चाहिये, हमें उसके चरित्र की ओर ध्यान धरकर लूथर की, समालोचना करनी चाहिये । यह तो उसके शन, भी स्वीकार करेंगे कि लूधर मैं ये गुण भरपूर थे अर्थात् अपने निर्धारित सत्य ।। के लिए उत्साद, अपनी कार्य प्रणाली की रक्षा में निर्भीक धीरता, .

महात्मा मार्टिन लुथर
१२३
VAN
अपने मिद्धान्तों की रक्षा करने की योग्यता, उन सिद्धान्तों के
प्रचारार्थ सतत उद्योग श्रादि । इन गुणों के साथ ही साथ यह
भी कोई अस्वीकार नहीं कर सकता कि लूथर एफ यहुत
सदाचारी और सन्चातया निस्वार्थी पुरुप था । स्वार्थमय
विचारों से परे, विषय भोग रहित, समार के सुयों से वचित
लूथर की जीवनी एक अपूर्व आदर्श थी। परन्तु इन मदगुणों
के साथ ही साथ लूथर में कुछ मानुषिक स्वभाव के दोष भी
थे। लूथर बहुधा इता यायेश पूर्ण हो जाता था जितना कि
अष्टुत से शाति प्रिय मनुप्यों को अच्छा न लगेगा । कभी २
पर अपने विचारों की सत्यता में ऐसा घोर विश्वास
दिखाता था कि अभिमान की झलक पाने लगती थी । उसकी
पद्धता में एक प्रकार को ६४ ओर धैर्य में अविमृश्यकारिता
का दोष मिला रहता था। गहुधा वह अपने शास्त्रार्थों में क्रोध
दिवा बैठता था। लूथर अपने आदेश में आने पर किसी की
योग्यता या पद का ध्यान नहीं रयता था।
परन्तु ये सय दोष जो लूथर में दिनाये जा सकते थे सब
उसके स्वमाय ही के दाप न घे। उनमें बहुत से दोप ऐसे है
जो उसके युग की अवस्था के फल थे। उस समय की अर्ध
मभ्य, समाज में नम्रता के ये नियम प्रचलित न ये जो मनुष्य
को अपना क्रोध रोकनेको विवश करते है और जिनसे समान
में सुजनता का प्रचार होता है। उस समय के शास्त्रार्थ में
मनगाना क्रोध, भाषा को कटुता, व्यक्तिगत प्रायोप, अश्लील
यात, कोई आश्चर्य का विषय नहीं समझी जाती थी। हम
प्रत्येक
मनुप्य
के धरित का न्याय करते समय उसके समय
की सभ्यता और नियमों पर ध्यान अवश्य रखना चाहिये। यह

.
महात्मा मोर्टिन लूथर
बात ठीक है कि धर्माधर्म का शात सब समय में था परतु'
चाल ढाल रीतिरसम में बड़ा परिवर्तन हो सकता है। बहुत
से दोप जिन्हें आज हम दोष कहते हैं, उस समय में किसी
को दोपवत् नहीं मालूम होते थे । वे ही बहुत से गुण जिन्हें
आज हम चुरा समझते हैं स्यात् लूथर की सफलता के कारण
थे। मूर्सता में मग्न, धार्मिक छल कपट से श्राच्छादित,
जनता को उत्साहित करने के लिये, असि सम्पन्न कट्टर धर्मा-
धता से युद्ध करने के लिये स्यात् वैसे ही उत्साह तथा उद्द
एडताको श्रावश्यकता थी। यदि लूथर बहुत मोठी और सुरोस्ती
तान अलापता तो उस समय की जनता की निद्रा कदापि
मग न होती। अपने जीवन के अन्तिम भाग में लूथर को अपनी
सफलता देख बहुत कुल अभिमान हो गयाथा। बात भी सही
है अपने ही जीवनकाल में सारे
यूरुप
को अपना अनुयायी
होते देख, राजा महाराजाओं को अपना पक्षपाती होते पा,
पोपों का सिहासन डोलते देस, मदि लूथर को थोडा सा
अभिमान न हो पाता तो मानना पडता कि लूथर मनुष्य न
होकर देवता था।
.

- ओकार चुकडिपो (पुस्तक भडार )--प्रयाग । सय सज्जनों की सेवा में निवेदन है कि ओंकार चुकडिपो नामक एक वृहत् पुस्तकालय प्रयाग में स्नाला गया है। जिस में हिन्दी साहित्य की मय प्रकार की पुस्तके विक्रयार्थ रफ्त्री जाती है। कन्याओं तथा नियों के लिये ता जो सग्रह इस पुस्तकालय में किया गया है वसा शायद सार भारतवर्ष भर में न हागा । यालक और पालिकाओं को इनाम दनके लिये सब प्रकार की उत्तम और शिक्षाप्रद पुस्तकं यहां मिलती है उच्च कक्षा के हिन्दी माहित्य प्रेमियों के लिये नो यह पुस्तका- लय मण्डार ही है। यही नहीं इस पुस्तकालय का अपना प्रेस भी है । अग्रेजी हिन्दी और उर्दू का मय प्रकार का टाइप मौजूद है। इसमें हिन्दी भाषा की उत्तमोत्तम पुस्तके छापी जा रही हैं। हिन्दी भाषा के लेखक जो उत्तम पुस्तक स्वतत्र लिखें या अनुवाद करें और प्रकाशन का भार ओंकार धुकडिपो को देना चाहे, च कृपा करके मेनेजर से पत्रव्यवहार फरें । कमीशन एजेंट जो हमारी पुस्तके बेचना चाहते हैं वे भी पत्र व्यवहार कर उनका उचित कमीशन दिया जायगा । मेनेजर प्रोकार बुकडिपो, प्रयाग कन्या-मनोरज्जन एक अनोखा सचित्र मासिक पत्र कन्याओं नधा व पधुप्रो के लिये कन्या मनोरखन एकही अद्वितीय सचित्र मासिक पत्र है। यदि आप को अपनी पुत्रियों घहिनी तथा नवयधुओं को विद्यावती गुणवती, मधुर भापिणी और सदाचारिणी बनाना है तो आप कन्यामनारसन अवश्य भंगाइये । मूत्य भी ऐस उत्तम मासिक पत्र का केवल १०) साल है हाकमहसूल सहित = पैसे मासिक पहते हैं । मेनेजर कन्या-मनोरन्जन प्रयाग । - - । ।

प्रोकार यादश-चारतमाला प्रयाग के है 2 निम्नलिखित जीवन चरित तयार जीवन चरित स्त्री शिक्षा की पुरु १-स्वामी विवेकान-द -कमला सजिल्द २-स्वामी दयानन्द २-भीम नाटक ३-महात्मा गोखले २) ३-राई का पर्वत नाटक ४-समर्थ गुरु रामदास ) ४-शान्ता सजिल्द 4-स्वामी रामतीर्य ५-सरोजसुन्दरी मजित ६ -महागणा प्रतापसिह 12) ६-आदर्श परिवार ७-यात्मवीर सुकरात ७-सुकुमारी ८-गुरु गोविन्दमिद 1) -सरला -नेपोलियन बोनापार्ट 8- लक्ष्मी 10-धर्मवीर प० लेखराम ) १०-कन्या सदाचार .१-महात्मा गान्धी -कन्या पाकशाख १२-भि० ग्लैडस्टन १२-कन्या दिनचर्या १३-पृथिवीराज चौहान 4) '१३-महाराणी सीता १४---महात्मा टारस्टाय १४ -महागणी दमयन्ती- १५-दादाभाई नौरोजी १५. महाराणी सावित्री १६-श्रीमती एनी बेसेन्ट ६-महाराणी शैव्या १७-ईश्वरचन्द्र विद्यासागरा). १७-महाराणी शकुन्तला १०-रमेशचन्द्र दत्त =):--पभावतो १६-छत्रपति शिवाजी 12)। १8-सौन्दर्य युमारी २०-राजा राममोहनराय -स्वदेश प्रेम सजिल्द २१-जे०एन० टाटा' 1): २'होमर का इलियड २२-ताना साअपरागीय ८) - - - 1 लार मिलने का पता-मोकार चळद्धिी प्रा

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Mahatama Martin Luthar Ka Jeevan Charitra

Author
Tandhan,lalta Prasad
Title
Mahatama Martin Luthar Ka Jeevan Charitra
File name
Mahatama Martin Luthar Ka Jeevan Charitra
Text
OCR done
Citation
1922
Published
2011/01
Publisher
Onkar Press Allahbaad
Language
Sanskrit
Pages
128
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546429
Barcode
4990010024905.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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