Adarsh Library, Jaipur
Sahasi Ghatha
Front matter
No text on this page.
साहसी गाथाएं
भारतीय नारियों की कहानियां
यिनोद पाला शर्मा
सामयिक प्रकाशन
No text on this page.
भूमिका बच्चे सहज युद्धियुक्त होते हैं। मैंने मनोवैज्ञानिक ढंग से बच्चों के समीप रहकर उनकी भावना को परसने का यत्न किया है । उस पाधार पर यह ययाय है कि भारम्भ में बच्चों को यदि शिक्षाप्रद सशक्त साहित्य पढ़ने हेतु दिया जाय तो ये योग्य बन सकते हैं । वर्तमान समय में बच्चों को बुद्धि के विकास के लिए हमें पहले सोचना है मोर उन्हें देश का ऐसा भाविनागरिक बनाना है जिससे भारत का भविष्य उज्ज्वल हो सके। इरा पुस्तक की लेखिका विनोद बाला शर्मा ने बच्चों की बुद्धि के विकास हेतु जो कहानियां लिखी हैं वे बच्चों के लिए अत्यधिक उपयोगी है। इस पुस्तक के पड़ने से ज्ञात होता है कि भारत में जहाँ वीरों ने अपनी देश भक्ति का परिचय दिया है वहाँ वीरांगनाएं भी पीछे नहीं हैं। बच्चों को ऐसी ही शिक्षापूर्ण कथाएं पढ़ने के लिए दी जानी चाहिए । इसी भावना को लेकर वालिकामो के लिए विनोद वाला दार्मा का यह कदम सराहनीय है। लेखिका को मैं उसके इस कार्य लिए बधाई देता हूँ। प्रस्तुत कृति 'साहसी गायाएं' बालक तथा बालिकामो में देश भक्ति की भावना का सचार करेंगी, मुझे पूर्ण विश्वास है । सुभ कामनामों सहित १४३६५/२८ बलवीर नगर -श्यामलाल 'मधुप' शाहदरा, दिल्सी-३२
No text on this page.
क्रम-विषय
क्रम संख्या
विषय
पृष्ठ संस्था
ए
२५
२०
१. महारानी दुर्गावती
२. रानी सारत्या
३. हाड़ी रानी
४. पमापाप
५. राजमाता जीजाबाई
६. महारानी महल्याबाई
७. महारानी करुणावती
८. सुल्तान पाद बीवी
९. महारानी लक्ष्मीबाई
पीर ताईवाई
११. देवी इन्दिरा
४
१०.
No text on this page.
महारानी दुर्गावती बच्चो ! पाज मैं तुम्हें भारत को उन वीर नारियों के विषय में बताऊंगी जिन्होंने अपनी मर्यादा को बनाए रखने के लिए अपने कर्तव्य का पूर्णरूप से पालन किया। अपने प्राणों की परवाह न कर जिन्होंने वीरता का परिचय दिया उनमें सबसे पहले मैं महारानी दुर्गावती का वर्णन करूंगी। महारानी दुर्गावती कनौज के राजा चन्दनराय की एकमात्र पुत्री पी। राजा चन्दनराय की इच्छा थी कि उसकी पुत्री फूल- सी कली और नोह-सी वली पर्ने । इसीलिए उसके पिता ने अपनी
१०
पुत्री के लालन-पालन के लिए सभी प्रकार की सुविधाओं का
आयोजन किया था। शिक्षा-दीक्षा का प्रवन्ध करने के बाद राजा
चन्दनराय ने अपनी बेटी को हर गुण सम्पन्न देखना चाहा।
ऐसा ही हुआ । वीर पिता की वीर पुत्री किशोर हुई और
तलवार, तीर-कमान, भाला आदि चलाने में वह निपुण हो
गई। यह देख राजा चन्दनराय को
बहुत प्रसन्नता हुई।
जव दुर्गावती हर गुण सम्पन्न हुई उसके पिता ने चाहा कि
अपनी पुत्री का विवाह भी वीर व तेजस्वी युवक से होना
चाहिए। अत: उन्होंने ऐसे ही वर की तलाश करनी शुरू
कर दी।
उधर गोंडवाना के राजा दलपतिशाह की वीरता की कहा-
नियाँ दूर-दूर तक फैली हुई थी। जव उसकी वीरता की चर्चा
कन्नौज के राजमहल में हुई दुर्गावती बहुत प्रभावित हुई और
उसने मन-ही-मन दलपतिशाह को अपना पति स्वीकार कर
लिया।
राजा चन्दनराय को अपनी बेटी की भावनाओं का जब
पता लगा वे रुष्ट हुए। उन्हें यह अच्छा न लगा कि उसकी
बेटी दलपतिशाह को अपनी इच्छा से वर स्वीकार करे। वे
गोंडवाना के राजा से अपनी पुत्री का विवाह करना नहीं चाहते
थे। अतः उन्होंने एक राजपूत राजकुमार से दुर्गावती का
विवाह कर देने का निश्चय कर लिया।
दुर्गावती को जब यह पता लगा वह बड़ी दुःखी हुई । अपने
पिता से कुछ कहने में वह असमर्थ थी अतः रात-दिन उसी
चिन्ता में रहने लगी।
उधर दलपतिशाह को जब ज्ञात हुआ कि दुर्गावती उसे
अपना पति स्वीकार कर चुकी है और पिता उसकी इच्छा के
विरुद्ध कहीं और शादी कर देना चाहता है तो उसे बहुत बुरा
११ लगा और उसने दुर्गावती का पाणि-ग्रहण करने के लिए एक बड़ी फौज लेकर कन्नौज पर चढ़ाई कर दी। राजा चन्दनराय को स्वप्न में भी ऐसी प्राशा न थी। दग- पतिमाह की सेना के हमला करते ही राजा चन्दनराय ने उसका डटकर मुकाबला किया। भयंकर युद्ध हुप्रा मोर अन्त में राजा चन्दनराय को हार माननी पड़ी। जीत कर राजा दलपतिशाह गोस्वाना पहुंचे। याजे-गाजे के साथ विजय दुन्दुभी वजा कर उनका भव्य स्वागत किया गया । वही उन्होने विधि-पूर्वक दुर्गावती से विवाह कर लिया। समय व्यतीत होता गया। दलपतिशाह और दुर्गायती गृहस्य-जीवन सुख से बिताने लगे। दुर्गावती ने एक पुत्र को जन्म दिया। राजमहल में सुशियाँ मना गई। बड़े प्यार से राजा दलपतिशाह ने अपने पुत्र का नाम वीर नारायण रखा। युवराज का पालन-पोषण मच्छी तरह से किया जाने लगा। युवराज जय तीन वर्ष के हुए, दुर्भाग्यवश पिता का साया उसके ऊपर से हट गया। अपने नादान बालक को छोड़ एक दिन दलपतिशाह स्वर्ग सिधार गये। दुर्गावती की खुशियों का बाग उजड़ गया। उसका सुहाग लुट गया और विधवा भेप धारण कर लिया। पति को मृत्यु के बाद राज्य को वागडोर सम्भालने का प्रश्न दुर्गावती के सामने माया। उसने अपने तीन वर्ष के पुत्र वीर नारायण को राजा बनाकर राज्य की बागडोर अपने हाथ में सम्माल ली और उसने राज्य का प्रवन्ध इस सुन्दर ढंग से किया कि चारों मोर ममन की बंशी बजने लगी। पव हर समय महारानी दुर्गावती भपने पुत्र पौर प्रजा के दुःस में ही १२ " जीवन व्यतीत करने लगी। समस्त प्रजा उससे बहुत प्रसन्न थी। उन दिनों मुगल सम्राट अकबर की धाक दूर-दूर तक फैली हुई थी । उत्तरी भारत उसकी आधीनता में तरक्की कर रहा था। वादशाह अकबर की हार्दिक इच्छा थी कि छोटी-मोटी सभी रियासतों को अपने राज्य में मिला कर समस्त.भारत पर मुगलिया झण्डा फहराया जाये। गोंडवाना छोटी-सी रियासत थी। वहाँ के शासन तथा रानी की निपुणता की खबरें दूर-दूर तक फैल चुकी थीं। बाद- शाह के सरदारों ने महारानी दुर्गावती के बारे में बताते हुए उसके राज्य पर अधिकार कर लेने की उन्हें सलाह दी ; किन्तु अकबर ने ऐसा करने से मना कर दिया। वे युद्ध से नहीं बल्कि सहानुभूति दर्शा कर उसके राज्य पर अधिकार कर लेने के पक्ष में थे। अवसर पाकर एक दिन सूवेदार आसफ ख़ाँ ने बादशाह को भड़काया। बादशाह पर उसकी नीति का प्रभाव पड़ा और उन्होंने पांच हजार घुड़ सवारों सहित आसफ खाँ को गोंडवाना पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। आसफ खाँ गर्व से ऊँचा सर किये सेना लेकर गोंडवाना की ओर चल दिया। उसे विश्वास था कि छोटे-से. राज्य की महा- रानी इतनी बड़ी फौज देखकर घवरा, जायेगी और उसके सामने आत्म-समर्पण कर देगी। लेकिन ऐसा न हुआ। प्रासफ- खां को अपने राज्य पर हमला करते गुम उस राखून खौल उठा। शेरनी की तरह गरज कर वह उठी और अपने राज्य की आजादी को भंग होते देख उसमें नयी शक्ति का संचार हुआ। उसने तुरन्त अपने सरदारों और फौजी अफसरों को एकत्र करके अपनी पान की रक्षा करने का अमर सन्देश दिया, जिससे प्रभावित होकर छोटे-से राज्य के मुट्ठी भर सैनिक । मातृभूमि की रक्षार्थ युद्ध के मैदान में कूद पड़े। महारली दुर्गावती भी पाठ हजार सैनिकों के साय रण- । चण्डी का रूप धारण करके सग्राम में कूद पड़ी। दुर्गावती का "तेजस्वी रूप मौर सेना का प्रोजस्वी तेज देख कर मूवेदार प्रासफ सा घबरा गया। उसने स्थिति को गम्भीर देख दिल्ली से कुमक मंगवाना चाहा, पर उसे सफलता न मिली। जय उसे और सहायता न मिली उसके पैर हिल गये और वह मैदान छोड़ कर भाग खड़ा हुप्रा । महारानी को सिंहवाहिनी रोना ने दामु दल के दांत सट्टे कर दिये। प्रासफ खां एक स्त्री के सामने मैदान छोड़ कर भागा । यह उसका बड़ा भारी अपमान था जिसे वह सहन न कर पा रहा था। उसने वादगाह मकबर के सामने नमक-मिचं लगा कर सारा वृतान्त सुनाया। फिर क्या था । मनायर को करंट-सा टू गया। एक औरत 'द्वारी दिल्ली के बादशाह के अपमान से मुगलो को गहरा धक्का लगा। अकबर मे बदले की भावना ने उग्र रूप धारण कर लिया और उसने एक बड़ी फौज के साथ भासफ सा को पुनः गोधयाना पर अाक्रमण करने के लिए भेज दिया। पासफसा महारानी दुर्गावती को मक्ति को देख चुका था। उसे विश्वास पा फि रानी फे जीते-जी गोंडवाना पर अधिकार करना उसके लिए कठिन है। फिर भी उमने आक्रमण कर दिया । अबकी बार उसने चालाकी से काम लेना उचित रामंगा। • • उसने कुछ देश-द्रोहियों से सम्पर्क बनाया। लालच देकर उसने उन्हें अपनी प्रोर मिला लिया । जव रानी को पता लगा उसे दु.स हुप्रा फिर भी उसने साहस से काम लिया। उसने 'अपने वीर सरदारों को एकत्र किया और अपने मोजस्वी १४ भाषण के साथ उसने कहा, 'वीर सैनिकों ! मातृभूमि अपनी रक्षा के लिए तुम्हें पुकार रही है। तुम्हीं उसके रक्षक हो। अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए जो वीर आगे आना चाहते हैं वह मेरे साथ युद्ध के मैदान में चलें।' वस, फिर क्या था, सभी महारानी के साथ हो लिए। और महारानी अपने वीर सैनिकों सहित फिर युद्ध के मैदान में आ गई। एक ओर मुगलों का बड़ी सेना, दूसरी ओर गोंडवाना के थोड़े-से सिपाही। दोनों में भयंकर युद्ध छिड़ गया। महारानी अपने पुत्र के साथ घोड़े पर सवार होकर मुगलों के दांत सट्टे करने लगी। घमासान युद्ध हुआ। प्रासफ खां को लगा जैसे अब की बार भी उसे मैदान छोड़ कर भागना होगा। अभी युद्ध हो रहा था । सूर्य अस्त होते-होते एकाएक अपनी मातृभूमि की रक्षा करते-करते महारनी दुर्गावती की प्रांत में एक तीर धस गया । उपर उसका पुत्र भूमि पर गिर पड़ा। महारानी यह व्याकुल हो उठी। लेकिन उसी क्षण उसने अपने आपको सम्हाल लिया। कुछ सैनिक वीर नारायण को सुरक्षित स्थान पर ले गये। महारानी दुर्गावती उसी तरह युद्ध के मैदान में मुगलों का मुकाबला करती रही। उधर उसके पुत्र की दशा चिन्ताजनक थी । सरदारों ने जब रानी से निवेदन किया कि वह अन्तिम वार अपने पुत्र का मुंह तो देख ले। लेकिन रानी ने साफ इन्कार करते हुए कह दिया कि इस समय मुगलों का मुकाबला करना है। अतः मैं युद्ध का मैदान नहीं छोड़ सकती। यदि मेरा वीर पुत्र वीर गति को प्राप्त हो रहा है तो इसका मुझे दुःस -- - १५ नहीं है । यदि दुःख है तो बस इस बात का कि इस लोक में मैं उससे न मिल सकूँगी। महारानी इतना कहकर रण-चण्डी की तरह विराट रूप धारण कर शत्रु की सेना को काट-काट कर पृथ्वी पर फैकने लगी। भयंकर युद्ध के बीच रानी ने पूर्ण वीरता दिखाई और लड़ते-लड़ते जब वह थक गई अपनी ही तलवार से उसने अपना सिर काट लिया। क्योकि वह जीवित मुगलों के हाथ नहीं पड़ना चाहती थी। शत्रुओं के अपवित्र हाथों में फंसने से अच्छा वह वीरांगना मरना अच्छा समझती थी। युद्ध के मैदान में अपने प्राणों की परवाह न करती हुई महारानी दुर्गावती परलोक मिधार गई। मुगलों की सेना ने उसका शव अपने अधिकार में लेना चाहा; किन्तु रानी के एक सच्चे सेवफ ने दुर्गावती का शव अपने कब्जे में कर लिया था। वह उसे राजमहल ले माया। एक बड़ी चिता बना कर मां और पुत्र के शव का दाह- संस्कार कर दिया गया। सारा गोंडवाना महारानी दुर्गावती और उसके पुत्र की मृत्यु पर आँसू बहा रहा था। उधर श्रासफ खाँ युद्ध भूमि मे दुर्गावती की लाश हूँढ़ रहा था। लेकिन उसे कुछ न मिला। गोंडवाना खत्म हो गया। लेकिन इस वीर वीरांगना महारानी दुर्गावती का नाम भारत के इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया।
:२: रानी सारन्धा बच्चो ! रानी लानन्या का नाम तो तुमने सुना होगा। भारत के इतिहास में जहाँ बीरांगनाओं का जिक्र आता है वहाँ वीर रानी नारन्या का नाम भी स्वयं अमरों में लिन्ता हुआ है। इस वीर गनी ने अपनी प्रान के लिए जिन वीरता का परिचय दिया वह हमेशा उसकी याद दिलाता रहेगा। अब तुम यह जानना चाहोगे यह वीरांगना कहाँ ही रानी थी। लीजिए, मैं इसके बारे में सब कुछ बता देनी हूँ। हाँ, तो सारन्या बुन्देलखण्ड के छोटे से राज्य ओरछा के राजा चम्पतराय की स्त्री थी। इसके भाई का नाम अनिरुख- सिंह था । वह बुन्देलव लण्ड के छोटे-रे पहाड़ी इलाके के राजा थे। बचपन से सान्या में वीरता की भावना कूट-कूट कर भरी थी। यह किसी की गुलान न रह कर स्वतन्त्र म्हना अधिक पसन्द करती थी। नव साल्वा युवा हुई अनिद्धसिंह ने उस विवाह के लिए वर की तलाश करनी प्रारम्भ कर दी। उन्हीं दिनों ओरछे के राजा चन्यतराय की वीरता की धाक दूर-दूर तक जनी हुई थी । यद्यपि राजा चन्यतराय के कई सानियाँ थीं फिर भी सान्या का विवाह उनसे कर दिया गया। चंपतराय सारत्वा को बहुत प्यार करने लगा। उस समय
१७
min
PRO
'वह गद्दी पर नहीं बैठा था।
कुछ समय बाद चंपतराय गद्दी पर यासीन हुए। उन्होंने
गद्दी पर बैठते ही मुगलों को कर देना बन्द कर दिया। वे नहीं
चाहते थे कि अपने राज्य को सम्पत्ति मुगलों को लुटाई जाये।
इससे मुगल उससे नाराज हो गये, किन्तु उसने कोई परवाह
न की।
उन दिनों शाहजहाँ मुगलो का वादशाह था उसने चंपतराय
को ऐसा करते देखा उस पर आक्रमण किया । मुगलों की फौज
• का उसने डट कर मुकाबला किया। उसमें मुगलों को हार
माननी पड़ी। उसके बाद चपतराय पोरखे का शासन अपने
भाई के हाथ में सौंप स्वय दिल्ली चला पाया।
चंपतराय के दिल्ली पाने पर शाहजहाँ ने उसका स्वागत
किया । भव तुम यह सोचोगे मुगलों ने उसका स्वागत क्यों
किया ? बच्चों ! यह शाहजहाँ की एक चाल. थी। उसकी
वीरता को देख उसने अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहा। मत- लब यह है कि कुम्हारगढ़ के किले पर वह अपना झण्डा फह- राना चाहता था। जब शाहजहाँ ने कुम्हारगढ़ को जीतने का प्रस्ताव चंपत- राय के सामने रखा वह तैयार हो गया और उसने मुगल सेना के साथ कुम्हारगढ़ के किले पर चढ़ाई कर दी। मुगल सेना की जीत हुई । उस समय प्रसन्न होकर वादशाह ने नौ लाख रुपये की वार्षिक जागीर चंपतराय को पुरस्कार के रूप में दे दी। लगी। चंपतराय को अब किस बात की चिन्ता थी । वह अपनी इच्छानुसार आनन्द से जीवन व्यतीत करने लगा। सारन्धा को यह अच्छा न लगा। वह मुगलों के ऐसे उपकार से घृणा करती थी। वह स्वतन्त्रता से जीवन विताने के पक्ष में थी। इसीलिए पति के इस ढंग को देख कर वह हमेशा बेचैन रहने एक दिन चंपतराय ने उसे उदास देख उससे इसका कारण पूछा तो उसने उत्तर दिया, 'वीर कभी किसी की गुलामी सहन नहीं कर सकता ! एक समय था जब मैं एक राजा की रानी थी, किन्तु आज एक मुगल बादशाह की सेविका हूँ।' 'रानी! तुम यह क्या कह रही हो ?' चंपतराय ने उसने कहा-'मैं जो कह रही हूँ वह ठीक है । आप विला- सिता में पड़कर अपने धर्म और कर्तव्य को भूल बैठे हैं। आप में एक राजपूत का खून है । उस राजपूत का जो अपनी प्रान के लिए अपना खून बहा देता है लेकिन किसी के सामने सिर नहीं झुकाता । वह भी राजपूती खून है जो अपनी मर्यादा के लिए मिट जाते हैं और एक आप हैं जो मुगलों की नौ लाख की जागीर के लालच में फंस कर बुन्देलों की आन को धब्बा पूछा। अपना
लगा रहे हैं। उन नन्हें-नन्हें बच्चों का खून होता देख रहे हैं
जिन्हें बड़े होकर अपनी मातृ-भूमि की रक्षा करती है । मैं
पूछती हूं क्या यही आपका धर्म है ? क्या आपका कर्तव्य यही
कहता है ग्रामसे ? क्या एक वीर अपनी मातृ-भूमि पर फलंक
लगते देख सकता है?
रानी सारन्धा की इन बातों का चंपतराय पर गहरा प्रभाव
पड़ा। उसकी आखें खुली और तब उसे ज्ञात हुमा उसने जो
किया अनुचित है और देश व धर्म के प्रति उठती हुई भावनाओं
ने उसमें नई रोशनी का संचार किया तो उसने मुगलों का
विरोध करना प्रारम्भ कर दिया।
शाहजहाँ के पुत्र दारा ने चम्पतराय को ममने विरुद्ध देसा
तो उसने अपने पिता द्वारा दी गई नौ लाख की जागीर वापिस
ले ली । चम्पतराय यह अपमान सहन न कर सका। और वह
पोरछ वापिस लोट माया ।
पोरछे भाकर चम्पतराय में जो ज्वाला भड़क रही थी वह
उग्ररूप धारण कर गई। और उसने मुगलों से बदला लेने का
फैसला कर लिया। दारा से अपने अपमान का बदला लेने की
योजना उसने बनानी शुरू कर दी।
उन्हीं दिनों दारा मोर औरंगजेब के बीच युद्ध छिड़ गया।
जब पोरराजेब को ज्ञात हुमा चम्पतराय दारा से बदला लेना
चाहता है उसने उससे सहायता मांगी। पम्पतराय तैयार हो
गया। और उसकी सहायता से औरंगजेब ने दारा को परास्त
कर दिया। इस युद्ध में रानी सारया ने भी अपनी वीरता का
अनोखा परिचय दिया था।
औरगजेब चम्पतराय से बहुत खुश हुआ। उसने राज्य का
कुछ भाग चंपतराय को दे दिया। चंपतराय फिर मुशी से
जीवन विताने लगा लेकिन रानी सारन्धा को इसकी कोई खुशी न थी। वह तो और भी कुढ़ने लगी। उसकी चिन्ता बढ़ती गई। वह नहीं चाहती थी कि मुगलों के वे आधीन रहें। क्योंकि वह स्वतन्त्र-प्रिय थी। किसी के आधीन रहकर जीवन विताना उसे अच्छा न लगता था। इसलिए कि वह राजपूतानी थी। उसमें राजपूती खून था। वह वीर थी स्वयं रणक्षेत्र में कूदकर दुश्मनों का सामाना करने को तत्पर रहती थी। ऐसी ही एक घटना है वीर रानी सारन्धा की । लो वच्चो.! वह घटना भी तुम्हें सुना दूं। एक बार जब दारा युद्ध का मैदान छोड़कर भाग गया था उस समय उसका सेनापति वली वहादुर घायल अवस्था में औरंगजेब की हिरासत में आ गया था। कुछ समय बाद और- गंजेव ने उसे अपनी सेना का नायक बना लिया था। उसका प्यारा घोड़ा चम्पतराय ने अपने अधिकार में ले लिया था। एक दिन की वात है चंपतराय का पुत्र उसी घोड़े को लेकर घूमने निकला कि बली बहादुर की उस पर दृष्टि पड़ गई। उसने घोड़े को पहिचान लिया। अवसर पाकर उसने लड़के से घोड़ा छीन लिया। लड़का रोता हुआ अपनी माँ के पास पहुँचा सारन्धा को जब यह पता लगा कि बली वहादुर ने उस घोडा छीन लिया तो वह पहले अपने बेटे पर गरजी। 3 बुरा भला कहा और फिर अपमान का बदला लेन के लिए त वार हाथ में लिए वह दरबार में जा पहुंची। उसे हाथ में नंगी तलवार लिये देख सभी हैरान थे। रांनी ने शेरनी की तरह गरजकर कहा-'अरे डरपो तुझे कौन बली कहता है। एक नादान बच्चे के हाथ से : छीनना ही क्या तेरी बहादुरी है। आ, यदि बहादुरी दिखा तो.सामने आ।'
3. रानी के इतना कहते हो मुगलों को तलनार खनक उठीं। औरंगंगेव यह देख चकित रह गया। उसने रानी से पूछा- "यह घोड़ा वली बहादुर का है तुम उसे क्यों लेना चाहती हो?" 'अपनी मान मर्यादा के लिए।' रानी ने गरज कर उत्तर दिया। पुन. बोली- राजपूत अपनी पान के लिए जान भी कुर्वान कर देते हैं इस तरह कायर वनकर किसी वस्तु पर अधि- कार नहीं करते।' , औरगजेब ने कहा-'हम वह मोड़ा तुम्हें एक शतं पर लौटा सकते हैं।' 'वह क्या ?' रानी ने पूछा। 'हमारी दी हुई जागीर तुम्हें लौटनी पड़ेगी।' -और मोरंगजेब द्वारा दी गई जागीर उन्होंने लौटा दी। अन्त में चम्पतराय रानी और अपने पुत्र सहित पोरछे चले गये.। मौरंगजेब को यह अच्छा न लगा। चम्पतराय को उसकी रानी का अभिमान चूर करने के लिए उसने बुंदेलखण्ड पर आक्रमण करने के लिए सेना भेज दी। जव चम्पतराय और सारन्धा को औरंगजेब के व्यवहार का पता लगा उन्होंने मर मिटने की ठान ली। मुगलों की सेना का उन्होंने डटकर मुकावला किया। अन्त में मुगलो की जीत हुई। हार कर चंपतराय और सारन्धा सहरा के जमीदार इन्द्र- मणि के यहां पहुँचे । वे मुगलों के हाथों मरना नहीं चाहते थे। लेकिन वहां भी मुगलों की सेना ने उन्हें घेर लिया। सहरा मे भीषण युद्ध हुआ। इन्द्रमणि उस युद्ध मे मोत का का शिकार हो गया। आखिर सहरा छोड़ वे अन्य स्थान के लिए भागे, लेकिन रास्ते मे मुगलो की फौज ने उन्हें घेर लिया। उस दिन चंपतराय वीमारी की दशा में था अत: दुश्मनों का सामना करमारा आखिर चंपतराय को चक्कर आ गया और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। रानी सारया ने अपने पति की दशा देखी। उसने उसे सहारा दिया । मुगल सेना समीप आती जा रही थी। चंपतराय यह देख घबराया और बोला-~~'रानी ! तुम मेरे सीने में तल- वार घोंप दो। मैं जिन्दा इन मुगलों के हाथों नहीं पड़ना चाहता।" इतना कहते ही रानी सारधा ने अपने पति की छाती में तलवार घोंप दी। मुगल सेना समीप आ चुकी थी। उसे देख वह चिल्लाई-'हमारी लाश हमारे पुत्रों को सौंप देना।' और इतना कह कर रानी ने स्वयं को भी पति के मार्ग का साथी वना लिया। मुगल सेना को हाय लगा उन का शव ! वाह ! धन्य है वीर सारन्धा, जिसने अपनी मान रक्षा के त्याग किया जिसे भारतीय इतिहास कभी न भूल सकेगा। ऐसी- ऐसी वीर नारियों ने अपना ही नहीं सारे देश का गौरव बढ़ाया है। ऐसा महान्
:३:
हाड़ी रानी-३
तुम में से बहुत से ऐसे होगें जिन्होने हाड़ी रानी के विषय
कुछ सुना होगा। हो सकता है इस रानी के बारे में पूरी
नकारी न हो । मैं यहां इस रानी के जीवन की ऐसी घटनामों
वर्णन करूँगी जिन्हें पढ़कर तुम यह समझ सकोगे कि हाड़ी
नी ने किस प्रकार वीरता का परिचय देकर भारतीय नारियों
नाम उज्जवल किया है।
हाड़ी रानी मेवाड़ के वीर सरदार धूमावत की पत्नी थी।
वीर चूड़ावत उदयपुर के राणा राजसिंह के यहाँ सरदार था। वह बड़ा वीर पराक्रमी और युद्ध नीति में कुशल था। एक वार की घटाना है रूपनगर की राजकुमारी चंचल राणा राजसिंह को अपना वर चुन चुकी थी, और बादशाह ओरगंजेव चंचल कुमारी की सुन्दरता पर मुग्ध होकर उससे जवरदस्ती विवाह करना चाहता था। जव चंचल कुमारी को औरगंजेब की नीति के विषय में पता चला उसने तुरन्त राज- सिंह के नाम एक पत्र लिखा और अपने दूत को देती हुई वोली, 'जाओ, राणा को मेरा यह पत्र देना और कहना कि चंचल कुमारी अपने सतीत्व की रक्षा के लिए आपकी सहायता चाहती है, और उसने साथ ही दूत को एक माला अपनी ओर से राज- सिंह को भेंट करने के लिए दी। राणा राजसिंह चंचल कुमारी का पत्र पाकर एक बार फिर हृदय में तूफ़ान-सा उठ खड़ा हुआ। औरगंजेव के व्यवहार से उसका खून खोल उठा था। एक मुगल राजपूतों की पान को कलंकित करे यह वह कैसे देख सकता था। वह आवेश से बड़वड़या-'चाहे कुछ भी हो मैं चंचल कुमारी से शादी करूंगा। वह मुझे अपना पति स्वीकार कर चुकी है।' दरवार के सरदार कुछ क्षण चुप रहे। वे जानते थे कि औरगंजेव की विशाल व शक्तिशाली सेना से टक्कर लेना कोई आसान काम न था। जव सरदारों ने मुगल फौज के बारे में जिक्र किया तो चूड़ावत गरजकर उठा और वोला-'औरंगजेब के नाम से सभी के चेहरे पीले क्यों पड़ गये ? क्या राजपूतों के नाम को तुम लोग वट्टा लगा देना चाहते हो ? हम राजपूत हैं। हमारा धर्म अपनी पान की रक्षा करना है।' और उसने दरबार में प्रतिज्ञा करते हुए पुनः कहा-'राणा चकित हुए। पत्र को पढ़कर उसके जी ! मैं प्रतिक्षा करता हूँ जब तक आप रूपनगर से चंचल कुमारी को विवाह कर न लौट आयेंगे मैं तब तक औरंगजेब को एक इंच भी आगे नहीं बढ़ने दूंगा। वम फिर क्या था । वीर सरदार की प्रतिज्ञा सुनकर सभी के चेहरे खिल उठे। सरदारों को निराशा आशा में परिवर्तित हो गई और वे औरगंजेव को विशाल सेना से टक्कर लेने को तैयार हो गये। राणा जी रूपनगर की ओर जा चुके थे। चूड़ावत अभी तक यहीं था । वह औरगंजेब की सेना का मार्ग रोकने की तैयारी करने के वाद घोड़े पर सवार हुमा । जैसे ही यह घोड़े पर सवार हो मल के समीप से गुजरा एकाएक उसकी दृष्टि हाड़ी रानी पर पड़ी । वह ठिठक गया। घोड़े से उतरा । अपनी रानी को देख उसमें प्रेम की भावना उमड़ आई थी। प्रेम ने उसे अपने पथ से विचलित करने का यत्न किया। चूड़ावत से रहा न गया । अपनी नव-वधु को देख वह उसके पास पहुंचा । चूड़ावत का अभी विवाह हुआ था। नववधु जिसके हाथ का कङ्गन अभी खुला भी न था अपने पति को युद्ध में जाते देख तनिक भी विचलित नहीं हुई। लेकिन चूडावत को चिन्ता थी कि उसके मरने के बाद उसकी वधु का क्या हाल होगा। हाड़ी रानी ने पति को व्याकुल स्थिति में देखा। उसने धैर्य से काम लिया। अपने पति को अपने प्रेम में फंसे देख वह बोली, प्राणनाथ ! वीर पुरुष हमेशा सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अपने प्राणों पर खेला है । अपनी प्रान के लिए हमेशा उसने युद्ध के मैदान में दुश्मनों को परास्त किय है। वीर पुरुष मिट जाता है; किन्तु कभी अपना सिर नहीं झुकाता और आप हैं जो प्रेम के जाल में फंसकर अपना कर्तव्य भूल रहे हैं । आपको २६ ने अपने एक - यह शोभा नहीं देता। आप मेरी परवाह न करके युद्ध के मैदान में जाइए। राणा को दिये गये अपने वचन का पालन कीजिए। चंचल कुमारी भी मेरी बहन है । उसके सतीत्व की रक्षा कीजिए नहीं तो नारी जाति का गौरव हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जायेगा।' अपनी नव-वधु के शब्दों को सुन चूड़ावत में उत्साह का लहर दौड़ गई और अपनी पत्नी को अन्तिम नमस्कार करके वह औरंगजेव की विशाल सेना से टक्कर लेने चल दिया। बस, एक चिन्ता थी उसे और वह थी शायद मेरे मरने के बाद हाड़ी रानी अपने धर्म-कर्त्तव्य का पालन कर भी सकेगी या नहीं। यही सोचकर उसने अपनी पत्नी की परीक्षा लेनी चाही। चूडावत सेवक को बुलाया और कहा- 'जायो रानी से कहना कि चूड़ावत तुम पर अटल विश्वास रखने के लिए कोई निशानी चाहता है जिससे उन्हें यह सन्तोष हो कि उनके मरने के बाद भी तुम अपने धर्म-पथ पर डटी रहोगी।' अपने सरदार की आज्ञा पाकर सेवक हाड़ी रानी के पास पहुँचा । उसने चूड़ावत के शब्द ज्यों-के-त्यों उसे कह सुनाये । हाडी रानी को दुःख हुआ, यही कि नाशवान शरीर के मोह में फंस कर एक वीर पुरुष अपने कर्तव्य को भूल रहा है। हाड़ीरानी ने एक बार सेवक की ओर देखा फिर कुछ क्षण सोचने के बाद बोली-~-यदि ऐसा ही है तो मैं अपना सिर काट कर उन्हें भेंट करती हूँ। जाकर उन्हें कह देना कि हाड़ी रानी अपने कर्तव्य का पालन कर चुकी । अव आप अपने कर्तव्य का पालन करें। इतना कह कर रानी के दाहिने हाथ में तलवार चमक उठी और क्षण भर में ही वीर नारी का सिर धड़ से अलग
हो गया।
यह देख कर सेवक काँप उठा । उसने रानी का सिर अपने
हाथों मे उठाया और डगमगाते कदमों के सहारे वह चूड़ावत
की ओर चल दिया।
'ज्यों ही सेवक ने चूड़ावत के सामने रानी का सिर रखा
उसकी आंखें फटी-की-फटी रह गईं। उसका हृदय कांप उठा।
होंठ फड़फड़ाये । वोला--"यह क्या है सेवक"
सेवक की प्रांखें आंसुओं से तर थी। वीर रानी का सिर
चूड़ावत के हाथ में देते हुए उसने कहा-"लीजिए, विश्वास की
निशानी । रानी अपना धर्म-कर्तव्य पूरा कर चुकी । अव आप
अपना कर्तव्य पूरा कीजिए।"
उसी क्षण चूड़ावत की आँखों से आंसू की दो बूदें हाड़ी
रानी के शीश पर टपक पड़ीं। वह पश्चाताप करने लगा।
और उसी समय उसमें कर्तव्य की भावना ने उग्र रूप धारण
कर लिया। उसने अपनी प्रिय पत्नी का सिर गले में लटका
लिया और युद्ध के मैदान मे कूद पड़ा।
बादशाह औरंगजेव और सरदार चूड़ावत में भीषण युद्ध
हुआ । अन्त में औरंगजेब को हार माननी पड़ी। उस समय
राणा जी चंचल कुमारी के साथ उदयपुर लौट चुके थे।
चूड़ावत ने औरंगजेब से वचन लिया कि वह कभी भी
मेवाड़ पर आक्रमण नहीं करेगा। और जैसे ही चूड़ावत वापिस
लौटा, मुगल सेनापति ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
चूड़ावत वीरगति को प्राप्त हुआ।
ऐसी थी वीर वीरांगना हाड़ी रानी जिसने अपने पति को
कर्तव्य पथ से तनिक भी विचलित नहीं होने दिया। मोह को
२८ छोड़ जिसने अपना सिर काट कर पति को भट कर दिया । ऐसी वीर नारियों के आदर्श की कहानी सदैव हमें उन्नति का मार्ग दिखाती रहेंगी। ऐसी नारियों का महान् त्याग सदैव के लिए अमर रहेगा। भारत का इतिहास इन्हें कभी नहीं भूल सकता ।
:४:
पन्नाचाय
बच्चो ! अब तुम्हें एक ऐसी नारी की कहानी सुनाऊँगो
जिसने अपनी आँखों के सामने अपने पुत्र का खून होते देखा;
किन्तु उसने उफ़ तक न की। क्योकि वह जानती थी यदि
उसने आँसू बहाये तो गुहिल का सर्वनाश हो जायेगा।
हाँ, तो वच्चो ! वह थी वीर नारी पन्नाधाय । मेवाड़ के
गुहिल-वंश को धाय जो बच्चों का पालन-पोषण करती थी।
पुत्र उदय- । छः वर्षीय वह पक्की स्वामी भक्त थी। करुणावती उससे बहुत स्नेह करती थी। महारानी करुणावती ने एक दिन अपने सिंह को बूंदी भेज स्वयं को चिता के सुपुर्द कर दिया था। माँ का प्यार लुट जाने के वाद उदयसिंह का पालन-पोषण पन्ना ने किया। उसने उसे माँ का प्यार दिया। अपने पुत्र से भी अधिक वह उदयसिंह का ध्यान रखती थी। क्योंकि वह चाहती थी बड़ा होकर उदय गुहिल-वंश का नाम उज्ज्वल करे। उन दिनों चित्तौड़ में राजा विक्रमादित्य राज्य करता था। वह सदा भोग-विलास में डूबा रहता था। इससे पहले वह चित्तौड़ का शासन गँवा चुका था। लेकिन हुमायु ने उसे चित्तौड़ फिर से दिलवा दिया था। इतना होने पर भी उसने अपने आचरण को बदल न सका। उसके आचरण से सभी सरदार रुष्ट थे। क्योंकि वे जानते थे यदि राजा ने अपना पाचरण न बदला तो एक दिन चित्तौड़ का शासन समाप्त हो जाएगा। हुआ भी ऐसा ही। चितौड़ की विगड़ती हुई दशा देखकर एक दिन बनवीर ने उस पर आक्रमण कर दिया। विक्रमादित्य हार गया और बनवीर ने चित्तौड़ की गद्दी पर अधिकार कर लिया। उन दिनों उदयसिंह चित्तौड़ में था । जब बनवीर को ज्ञात हुआ कि गोहिल-वंश का चिराग अभी जीवित है उसमें स्वार्थ की भावना ने भयंकर रूप धारण कर लिया। वह जानता था अगर उदयसिंह जीवित रहा तो एक दिन राज्य की बागडोर उसके हाथ से निकल जाएगी। इसलिए उसने गुहिल-वंश के चिराग को हमेशा-हमेशा के लिए वुझा देने का निश्चय कर लिया। बनवीर का व्यावहार दानवों का-सा था। सभी उसकी आदत से परिचित थे। लेकिन सब चुप रहकर उसके कुटिल ३१ व्यवहार को सहन करते रहे। लेकिन किसी को ऐसी पाशा न थी कि वह ऐसा कुकृत्य कर सकेगा जो एक रात उसने कर दिखाया। एक दिन रात की घटना यों है। चारों ओर रात का सन्नाटा छाया हुया था। रात अन्धकार में डूवी भयंकर रूप धारण किये हुए थी। वनवीर ने ऐसे प्रव- सर से लाभ उठाना उचित समझा। रात को वह अपने पलंग से उठा। हाथ में तलवार लो और धीरे-धीरे विक्रमादित्य के कक्ष की ओर बढ़ा। विक्रमादित्य सो रहा था। वनवीर आवेश पूर्वक आगे बढ़ा मोर निदर्यता के साथ उसने विक्रमादित्य का वध कर दिया। यकायक रात का सन्नाटा टूट गया। राजमहल में रोने-धोने की आवाज़ गूंजने लगी। पन्ना जो अभी तक उदयसिह के पलंग के पास बैठी थी राजमहल से रोने की ध्वनि सुन काँप कर रह गई। उसका दिरा धड़कने लगा। उसे विश्वास हो गया कि बनवीर ने विक्र- मादित्य का सून कर दिया है। अब वह उदयसिंह को कभी जिन्दा न छोड़ेगा। कुछ क्षण वह उसी तरह सोचती रही कि क्या करूं। लेकिन उसकी समझ में कुछ न आ रहा था। वह विक्रमादित्य की हत्या का अनुमान लगाती हुई कुछ सोच ही रही थी कि इतने मे बारी ने प्राकर धवराई स्थितिछास कहा-'अनर्थ ! घोर अनर्थ ! वनवीर ने विक्रमादित्य को कत्ल कर दिया। अब वह तेजी से इस ओर आ रहा है।' पन्ना घबरा उठी। उसके हृदय की गति और तेज हो गई। होंठ फड़ फड़ाये, वोलो-'अब क्या होगा? वह उदयसिंह को कभी जीवित न छोड़ेगा। क्या उदय का भी सून हो जायेगा? क्या गुहिल वंश का सूर्य सदा-सदा के लिए ग्रस्त पणा में
२
.
नहीं, ऐसा कदापि न होने दूंगी। अपना खून देकर मैं उदय के
प्राणों की रक्षा करूंगी।
और तब पन्ना अन्दर से एक टोकरा उठा लाई। नादान
उदय को उसने उसमें कुपा दिया और वारी से बोली-
'जाओ, जल्दी करो । इसे छुपाकर यहाँ से चित्तौड़ की सीमा से
बाहर ले जाओ। कहीं ऐसा न हो वनवीर ज़ालिम इसे भी...।'
बस उसने इतना ही कहा था कि वारी ने टोकरा उठाया
और तेजी से वाहर चला गया। जब बारी चला गया, पन्ना ने
सन्तोष की सांस ली।
अभी वह सोच ही रही थी कि किसी बात ने उसे चौंका
दिया । वह घवराई । सोचा, ठीक है बनवीर आते ही उदय को
पूछेगा। तव क्या उत्तर दूंगी। हो सकता है वह उदय का पीछा
करे। इतना सोच उसे एक युक्ति सूझी। उसने उदय के वस्त्र
अपने नादान पुत्र को पहना उसे पलंग पर लिटा दिया श्री
स्वयं समीप बैठ गई।
थोड़ी देर बाद आहट हुई। उसे बनवीर के आने का सन्
हुआ । जैसे ही वह उठी वनवीर ने तेजी से अन्दर प्रवेश किया
और आवेश पूर्वक चिल्लाया-- 'बताओ, उदयसिंह कहाँ है
पन्ना काँप उठी। कण्ठ रुंध-सा गया उसका। वह बोल
सकी। बस, अंगुली का संकेत उसने पलंग पर लेटे अपने
की प्रोर कर दिया। फिर क्या था। बनवीर क्रोध से आगे
और वोला-'ले, आज मैं तुझे हमेशा-हमेशा के लिए नी
गोदी में सुला देता हूँ।'
उसने तलवार के एक ही बार में कुम
दो टुकड़े कर दिये।
एक ओर खड़ी पन्ना की आँखों में आँसू थे और व
वह अपनी जीत पर खिलखिलाकर हँसा खूब हँसा;
श्रीर इतना कह
उसे क्या मालूम था कि कुमार की हत्या का बदला लेने वाला उदयसिंह अभी जीवित है। वह तुझसे एक दिन बदला जरूर लेगा। बनवीर हँसता हुआ लौट गया। जब वह चला गया पन्ना ने एक बार अपने पुत्र की ओर देखा। पलंग पर उसके शरीर के दो टुकड़े पड़े थे । सून से वस्त्र लाल हो चुके थे। एक बार तो उसका दिल रो उठा लेकिन तुरन्त बाद उदय- सिंह का ध्यान कर उसने सन्तोप की सांस ली। उदयसिंह को बचाने के लिए अपने पुत्र के प्राण देने में उसने अपना गौरव समझा। कुछ क्षण वाद अवसर पाकर पन्ना जंगल की ओर चल दी। काफी दूर जाने पर वारी उसे मिला। उसके साथ पना उदय को साय लेकर कई जगह पहुंची, किन्तु बनवीर के भय से किसी ने भी उसे सहारा न दिया । अन्त में निराश होकर यह कुम्भल मर पहुंची । प्राशागाह के सामने जब पन्ना ने स्थिति वयान की उसे उस पर दया मा गई और उसने उदयसिंह को अपना भतीजा कहकर अपने यहाँ रख लिया। देखो, बच्चो! पन्ना की वीरता । उसने महान् त्याग किया। नारीत्व का नाम उज्ज्वल करने के लिए उसने अपने पुत्र का बलिदान दे दिया। उदयसिंह के प्राणों की रक्षा करके उसने अपने पुत्र का बलिदान दे दिया। उसने गुहिला-वश के चिराग को दुझाने से बचा लिया । धन्य है वीर पन्ना ! जिसने उदय को जीवन दान देकर देश, धर्म व वंश पर बहुत बड़ा उपकार किया । ऐसी वीर नारी को भला कौन भूल सकता है।
वीर राज माता जीजाबाई शिवाजी का नाम तो तुम सबने सुना ही होगा ! उन्हीं की माता का नाम जीजाबाई था। जिस प्रकार शिवाजी वीर थे उसी तरह उनकी माता भी वीरांगनाओं में एक थीं। माता का ही तो प्रभाव सन्तान पर पड़ता है। वस, माँ की दीरता ने ही शिवाजी को वीर बनाया था। वीर नारी जीजाबाई का जन्म सन् १५६७ में अहमदनगर राज्य में हुआ था। वहीं इनके पिता लूखाजी यादवराव वहाँ के राजा के सेनापति थे। बचपन से ही जीजाबाई में पिता की भाँति वीरों की-सी भावना उत्पन्न हो चुकी थी। जब वह युवा हुई, उसका विवाह मालोजी के पुत्र शाह के साथ सन् १६०४ में हुआ। मालोजी एक मामूली घुड़सवार था । अतः जीजावाई की माता गिरिजावाई नहीं चाहती थी कि उनकी होनहार पुत्री का विवाह मालोजी के पुत्र शाहजी के साथ हो । लेकिन भाग्य की रेखा कौन मिटा सकता है। आखिर जीजाबाई का विवाह शाह जी के साथ ही हुआ। जीजाबाई बड़ी साहसी और वीर स्त्री थी। उसकी नस- नस में आत्म-गौरव तथा देश-प्रेम व भक्ति की भावनाएँ समायी हुई थीं। वह 'शिव-भवानी' की पूजा किया करती थी। वह ।
३५
एक सच्ची हिन्दू नारी की तरह अपने कर्तव्य पथ से कभी पीछे
न हटती थी।
इतना ही नहीं जीजावाई जिसे राजमाता के नाम से पुकारा
जाता था राजनीति मे भी निपुण थी। राज के हर काम काज
को वह भली-भांति समझती थी। अतः कोई ऐसा कार्य न होने
देती थी जिससे मातृभूमि को पान और शासन की शान को
कोई धब्बा लगे।
सन् १६२३ में जीजावाई ने एक पुत्र को जन्म दिया । इसका
नाम शम्भू जी रखा गया। उसके बाद दस अप्रैल १६२७ में
इस वीर राजमाता की कोख से शिवाजी ने जन्म लिया। उस
समय शाह जी वीजापुर के दरबार मे नौकर थे।
भगवान् की इच्छा, शम्भू जी अधिक दिनों तक जीवित न
रह सके। कनक गिरी के युद्ध में वे परलोक सिधार गये
वीरता इन वीरों की नस-नस में कूटकर भरी थी क्योंकि स्वर
जीजावाई अपने पुत्रों को वीरों की कहानियाँ सुनाया करत
थी। माता की शिक्षा का सन्तान पर गहरा प्रभाव पड़ता है
शम्भु जी और शिवाजी पर माता की शिक्षा का अमिट प्रभाव
था। रामायण, महाभारत, तथा वीरों की गाथाएं सुनाकर
जीजाबाई ने अपने पुत्रों में वीरता की भावनाएँ कूट-कूट कर
भर दी थीं।
जीजाबाई के जीवन में एक ऐसी घटना घटी जिसका उसे
दुःख होते हुए भी दुःख न हुआ। जिस समय शिवाजी की उम्न
सात वर्ष की थी उस समय शाहजी ने जीजाबाई को छोड़कर
तुकावाई से शादी कर ली। जीजावाई ने उसकी कोई परवाह
न की। वह अपने कर्तव्य पथ पर डटी रही और अपने पुत्र
शिवाजी को वीर बनाने की शिक्षा-दीक्षा में लगी रही।
एक बार शिवाजी के गुरु ने उनकी परीक्षा लेने का फैसला
किया। दर्द का बहाना बनाकर वे आसन पर लेट गये । जब
शिवाजी ने पूछा तो उन्होंने कहा---यदि मुझे शेरनी का दूध
मिल जाये तो मेरा दर्द ठीक हो सकता है। गुरु के इस प्रश्न
को सुनकर सभी शिष्यों का दम खुश्क हो गया। शेरनी का
दूध लाना कोई सरल काम तो न था। लेकिन राजमाता जीजा-
वाई के पुत्र शिवाजी ने उसे सरल कर दिखाया ।
गुरु की आज्ञा पाकर वह हाथ में बर्तन लिए अंधेरी रात
के समय जंगल में निकल पड़े। आँधी चल रही थी, वर्षा
भयंकर रूप धारण किए हुए थी। तूफान में भी शिवा के कदम
वीरतपूर्वक आगे बढ़ते चले गये। अचानक उसे शेरनी की गर्जना
सुनाई पड़ी। निडर शिवा उसके पास पहुँचा और अपने विश्वास
को मजबूत बना वह दूध लाने में सफल हो गया। जब शिवा ने
।
अपने गुरु के सामने दूध लाकर रखा मभी चकित रह गये।
गुरु ने शिवा की वीरता देखकर उसे पाशीर्वाद दिया।
एक दिन प्रातः जब जीजावाई सूर्य को अर्घ्य दे रही थीं
कि उस समय उनकी दृष्टि कोंडाना अर्थात् सिंहगढ पर पड़ी।
तभी उसके मन में एक भावना उठी और वह थी सिंहगढ़ पर
अधिकार करने की । जीजावाई ने अपनी भावना पुत्र के सामने
व्यक्त की और कहा-'शिवा ! जब तक तुम सिंहगढ़ नहीं
जीतोगे मैं अन्न तो क्या जल भी ग्रहण न करूंगी।'
माँ की प्रतिज्ञा का शिवा पालन क्यों न करता। उसने
तुरन्त तानाजी से सहायता मांगी अौर सिंहगढ पर श्राक्रमण
कर दिया। भयंकर युद्ध हुअा। गट आया लेकिन वीर तानाजी
सदा के लिए शिवाजी से अलग हो गए।
तानाजी की मृत्यु का समाचार जब जीजावाई को मिला उसे
दु:ख न हुआ। क्योंकि वीर नारियां मृत्यु पर आंसू नहीं वहाती ।
सच, बच्चों का भाग्य बनाना बिगाड़ना माँ के ऊपर ही
निर्भर करता है। यह जीजावाई ने सिद्ध कर दिखाया। यह
मां ही तो है जो अपनी कोख से वीरों को जन्म देती है और
हँसते-हँसते उन्हें युद्ध के मैदान में भेज देती है। ऐसी वीर
नारियों जिन्होंने हमारे सामने आदर्श प्रस्तुत किया है, उन्हें
हम कैसे भूल सकते हैं। भारत के इतिहास में इनका नाम स्वर्ण
अक्षरों में लिखा हुअा है।
।
: ६ : महारानी अहल्याबाई महारानी अहल्यावाई के नाम से कौन ऐसा होगा जो परि- चित न हो। जिस नारी ने विश्व भर में अपनी वीरता का परिचय दिया अपनी बुद्धिमत्ता और आदर्शराज प्रवन्ध से संसार भर में अपना नाम कमाया, वह यही तो है वीर महारानी अहल्याबाई जिसका आज हम गौरवगान करते हैं। जब अहल्यावाई ने जन्म लिया माता-पिता ने खुशियाँ मनाई। जब विद्वानों ने इस कन्या का जन्म लग्न देखा तो वे चकित रह गये। माता-पिता के पूछने पर उन्होंने बताया कि कन्या एक दिन महारानी बनकर अपने माता-पिता का नाम रोशन करेगी। अहल्यावाई का वचपन खेल-कूद और अच्छी बातों में बीता। जब वह जवान हुई, माता-पिता उसकी शादी की चिन्ता करने लगे। जब वक्त आया अहल्यावाई का विवाह मल्हारराव होल- कर के पुत्र तुकोजीराव होलकर से हो गया। मल्हारराव होलकर इन्दौर का राजा था । राजा मल्हारराव की भी एक अद्भुत कहानी है । कहते हैं जव किस्मत साथ देती है निर्धन भी राजा बन जाता है। मल्हारराव के साथ भी ऐसा ही हुआ था। मल्हारराव एक गड़रिया था। भेड़ें चराया करता था समय की बात । एक दिन वह भेड़ें चरा रहा था तभी उसवे - समीप से होती हुई एक सेना जा रही थी। वह उस ओर आकृष्ट हुआ और भेड़ें छोडकर फौज में जा मिला। वह फौज गुजरात पर चढाई करने जा रही थी। युद्ध के मैदान मे उसने ऐसी वीरता दिखाई कि सेना को एक छोटी टुकड़ी का वह सेनानायक बन गया और फिर वह बत्तीस पर- गनों पर अधिकार करके वह सुख पूर्वक जीवन विताने लगा। उसी मल्हारराव के यहां अहल्यावाई पुत्रवधू के रूप में आई और उसे महारानी के नाम से सम्बोधित किया जाने लगा। कुछ समय के बाद मल्हारराव का स्वर्गवास हो गया। पिता की मृत्यु से तुकोजीराव होलकर को बहुत दुःख हुआ। वह व्याकुल रहने लगा। पति की दशा देख अहल्यावाई ने उसका धीरज बंधाया। लेकिन तुकोजीराव के हृदय पर गहरा धक्का लगा था जिसे वह सहन करने में असमर्थ था ।
४०
।
-
आखिर राज्य की बागडोर रानी ने अपने हाथों में ले ली।
उस समय जव अहल्याबाई गद्दी पर बैठी राज्य की हालत
चिन्ताजनक थी। राजनैतिक व सामाजिक क्षेत्र में काफी
गिरावट आ चुकी थी। अत्याचारों का बोलबाला था। गरीब
पिस रहे थे। उनकी करुण पुकार सुनने वाला कोई भी न था।
राज्य के कर्मचारी जनता पर मनमाना व्यवहार कर रहे थे।
जब रानी ने यह देखा उसे बहुत दुःख हुआ और अपने पति की
सहायता से वह राज्य की बिगड़ी दशा सुधारने में लग गई।
रानी ने राजनैतिक व सामाजिक दशा को सुधारने के
लिए सबसे पहले राज्य में फैले हुए अत्याचारों का दमन किया।
गरीवी-अमीरी का भेदभाव मिटाया और प्रत्येक दु:खी व्यक्ति
को अपना दुःख कहले के लिए उसने दरवार में आने की अनु-
मति दे दी। इतना ही नहीं राज्य का कोई भी कर्मचारी अगर
उसके अनुशासन को भंग करता था तो उसे कड़ी-से-कड़ी सजा
दी जाने लगी। इस तरह रानी के नियमों का पालन सभी
भली प्रकार से करने लगे।
महारानी अहल्याबाई ने अशोक की भांति राज्य चलाया।
उसके शासनकाल में जनता प्रसन्न थी। किसी भी प्रकार का
कोई ऐसा कार्य न होता था जिससे राज्य पर किसी प्रकार
का धब्बा लगे। जगह-जगह रानी ने सड़कें बनवाई । जनता
को हर प्रकार कर की सुविधा देने का प्रवन्ध उसने किया था।
सचमुच रानी ने राज्य का संचालन ऐसे ढंग से किया कि
विदेशी तथा अन्य राज्यों के राजा उसकी शासन निपुणता देख
कर दाँतों तले अंगुली दबा गये थे। रानी ने यह सिद्ध कर
दिखाया कि एक कुशल राजा अपनी प्रजा की भलाई के लिए
बड़े-से-बड़ा त्याग कर सकता है।
४१ अन्य राज्यों से सम्पक स्थापित करना रानी उचित न समझती थी और न ही उसने किसी राज्य के कार्य में हस्तक्षेप ही किया। वह सभी को एक समान समझती थी। इसी कारण अन्य राजा उसे आदर की दृष्टि से देखते थे। महारानी अहल्या. वाई की बुद्धिमत्ता, न्याय गासन, सच्चरित्र व प्रादर्श राज- प्रवन्ध ने उसका नाम संसार में उज्ज्वल कर दिया और इसी प्रकार शान्तिपूर्वक राज्य का कार्य चलाती हुई महारानी चब्बन वर्ष की आयु में परलोक सिधार गई। इन्दौर राज्य की खुशियां छिन गई। रानी की मृत्यु का जनता के हृदयों पर गहरी चोट लगी और रानी के वियोग में जनता की मांखों से आमुनों के दरिया बहने लगे। महारानी ग्रहल्याबाई संसार से विदा हो गई लेकिन अपने पीछे आदर्श की एक ऐसी छाप छोड़ गई जो आज तक भी भारत के इति- हास में विद्यमान है। बच्चो ! तुम्हें भी ऐसी महान् नारियों के प्रादर्श जीवन से शिक्षा लेकर अपना तथा समाज र देश का भविष्य उज्ज्वल वनाना चाहिए।
।
महारानी करुणावती
मेवाड़ के राणा सांगा की सबसे छोटी रानी करुणावती
के नाम से कौन परिचित न होगा। इस वीर रानी ने जिस
वीरता का परिचय दिया उसे सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
बच्चो ! आज मैं तुम्हें इसी रानी की कहानी सुनाती हूँ
मेवाड़ पर महाराणा सांगा का आधिपत्य था। वह
शूरवीर व पराक्रमी राजा था। सभी उसका लोहा मानते थे।
राणा सांगा की मृत्यु के बाद उनका ज्येष्ठ पुत्र रत्नसिंह
मेवाड़ के राज्य सिंहासन पर बैठा। रत्नसिंह अपने पिता की
तरह निडर व साहसी था । युद्धकला में वह प्रवीण था । वाहरी
किसी भी आक्रमण की उसे चिन्ता न थी।
किन्तु भगवान् की मरजी। रत्नसिंह अधिक दिनों तक
जीवित न रह सका । क्योंकि बूंदी के हाड़ा सूरजमल ने उसे
कत्ल कर दिया था।
यह घटना भी अनोखी है। सूरजमल रत्नमिह से द्वेष
रखता था। उधर रत्नसिंह के मन में भी सूरजमल के प्रति
कोई अच्छी भावना न थी । एक दिन दोनों साथ-साय जा
रहे थे। रत्नसिंह ने अवसर से लाभ उठाना चाहा और दाँव
लगते ही उसने सूरजमल पर तलवार का वार कर दिया।
सूरजमल बुरी तरह घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा,
F
राजा और कर्मचारियो के बीच विवाद बढ़ गया। जब
पह सूचना गुजरात के वादशाह बहादुरगाह तक पहुंची उसने
पौर बहादुरशाह से मुकाबला करने के लिए बह'
लेकिन गिरते-गिरते उमने रनसिंह को भी मौत के घाट उतार
रलसिंह की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई विक्रमादित्य
गद्दी पर बैठा । वह बहुत ही हही और दुराचारी था। गद्दी
पर बैठते ही उसने राज्य की सारी सम्पत्ति को लुटाना प्रारम्भ
कर दिया। इसका राज्य के कर्मचारियों पर बुरा प्रभाव पड़ा।
वे नहीं चाहते थे कि राजा विक्रमादित्य चरित्रहीन होकर
राज्य की सम्पत्ति बर्वाद करे। सभी कर्मचारी विक्रमादित्य के
खिलाफ़ हो गये।
चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया।
अव राजा विक्रमादित्य की प्राख खुली
दिया।
वह पर
४४ में कूद पड़ा। उधर चित्तौड़ के बहुत से सरदार वहादुरशाह की सेना में जा मिले। यह देख विक्रमादित्य घवराया। उधर उसकी सेना भी साहस छोड़ चुकी थी। उस समय महारानी करुणावती भी युद्ध के मैदान में थी क्योंकि विक्रमादित्य पर उसे विश्वास न था। सैनिकों को घबराई स्थिति में देख करुणावती ने उनका साहस बँधाने के लिए चिल्लाकर कहा-'वीर राजपूतो ! यह तुम्हारी परीक्षा की घड़ी है। उठो, देखो मुगल सेना तुम्हारी आन को मिटा देने पर तुली हुई है। तुम्हारी मातृभूमि दुश्मनों की चोटों से कराह रही है। क्या अपनी मातृभूमि को इस तरह कराहते हुए तुम देख सकोगे ? नहीं, मेरे बहादुरों ! मातृभूमि के लिए । कुर्वान हो जायो । अपना खून बहा दो और दुश्मनों को यह दिखा दो कि चित्तौड़ का एक-एक वीर मातृभूमि के लिए अपना बलिदान दे सकता है-आगे बढ़ो मेरे जवानों, वहादुरों, आगे बढ़ो- बस, रानी के इन शब्दों से सैनिकों का खून खोल उठा। मातृभूमि की रक्षार्थ वे मर-मिटने के लिए वीरता-पूर्वक आगे वढ़े । तलवारें पुनः खनखना उठीं। खून की नदियाँ बहने लगीं। सैनिक कट-कट कर पृथ्वी पर गिरने लगे । चारों दिशाएँ हाहाकार कर उठीं। मुगलों की सेना अधिक थी। राजपूती सेना ने डट कर उनका मुकाबला किया। अन्त में वे थक गये। निराशा ने उन्हें पा घेरा । रानी ने यह देख साहस से काम लिया। उसने पुनः चिल्लाकर कहा-मातृभूमि पर कुर्बान होने वाले वीरो ! यदि आज तुमने अपनी मातृभूमि की लाज न बचाई तो हमेशा- हमेशा के लिए राजपूतों के नाम को कलंक लग जायेगा। वहा- दुरो! मरना एक दिन सभी को है फिर क्यों न शेर की मौत ।
मरा जाये । युद्ध के मैदान से भाग कर गीदड़ की जिन्दगी जीना क्या पसन्द करोगे तुम ? 'नही, नहीं' सभी सैनिक एक साथ चिल्लाये और वे पुनः शर की तरह गरजते हुए दुश्मनों की विशाल सेना पर टूट पड़े। फिर क्या था । सैनिकों का उत्साह दुगुना हो गया। युद्ध का भयानक देव मैदान में फिर से उतर आया। तलवारें फिर से चमकने लगीं। रानी यह जानती थी कि मुगलों की विशाल सेना का उसके चद सैनिक कैसे मुकाबला कर सकेंगे फिर भी उसे आशा थी। अाखिर सैनिकों का उत्साह वह कहाँ तक बढ़ाती । उसे एक युक्ति सूझी। उसे सम्राट् हुमायूं का ध्यान आया। उसे विश्वास था कि मुगल होते हुए भी हुमायूं उसकी सहायता अवश्य करेगा। उस दिन रक्षाबन्धन का त्यौहार था। रानी ने हुमायूं के पास अपनी रक्षा के लिए राखी भेजी। सम्राट् हुमायूं को रानी करुणावती को जव राखी मिली उसने राहपं उसे स्वीकार कर लिया। उगके हृदय मे करुणा- वती के प्रति स्नेह की भावना उत्पन्न हो गई । रानी करुणावती को बहन स्वीकार करके उसने उसकी रक्षा करने का प्रण कर लिया। उन दिनों हुमायूं शेरशाह से युद्ध लड़ रहा था। उसने तुरन्त उस युद्ध को वन्द कर दिया और बहन की रक्षा करने ने लिए चित्तोड़ की ओर चल दिया। लेकिन हुमायूं समय पर चित्तौड़ न पहुँच सका। रानी ने उनको काफी प्रतीक्षा की। नन्त मे यह निराश हो गई । सकट का पहाड़ टूट पड़ा उस पर। वह मुगलों के हाथो पड़कर राज- पूती शान को धन्दा न लगाना चाहती थी। निराश महारानी ने अस्ने सगी सरदारों को एकत्र ४६ अपनी पान के और कहा- 'वीर सरदारो ! राजपूत हमेशा लिए लड़े हैं। तुम लोगों ने जिस अद्भुत वीरता का परिचय दिया उसे मेवाड़ का इतिहास कभी न भुला सकेगा। मेरे वहादुरो ! अव मैं अपने धर्म-कर्त्तव्य का पालन करना चाहती हूँ । अत: तुम जोहर की तैयारी करो। जिस समय करुणावती अपने पाँच वर्षीय पुत्र उदयसिंह को बूंदी भिजवाने लगी वह अपनी माँ से लिपट गया और रोते हुए कहा-'माँ ! मैं भी तुम्हारे साथ ही मरूँगा। मुझे अपने से अलग न करो माँ, !' और वह अपनी माँ के गले से लिपट . गया। करुणावती की आँखें डवडवा आई। ममता जाग उठी। फिर भी उसने हृदय पर पत्थर रखकर कहा-वेटा ! 'राजपूत कभी दिल छोटा नहीं किया करते। मैं अपने धर्म-कर्त्तव्य का पालन कर रही हूँ। बड़े होकर तुम्हें भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करनी. है। जानो वेटा ! खुशी-खुशी जायो।' और रानी करुणावती ने अपने पुत्र को बूंदी भेज दिया। पुत्र के चले जाने के बाद नारित्व की रक्षा करने के लिए करुणा- वती विशाल चिता में बैठ गई। देखते-ही-देखते चिता चल उठी । रानी ने अपने देश, अपनी धरती और वीर सैनिकों को अन्तिम नमस्कार किया और हमेशा-हमेशा के लिए लाल-लाल लपटों के बीच सो गई और अन्त में वहाँ रह गई शेष राख जो मातृभूमि की मिट्टी में मिल गई। धन्य हे वीर करुणावती ! तुमने अपनी तथा राजपूतों की लाज बचाने के लिए स्वयं को अग्निदेवी की भेंट चढ़ा दिया । और-बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। कुछ दिनों वाद हुमायूं चित्तौड़ पहुँचा। जब उसे ज्ञात हुआ कि उसकी प्रतीक्षा करने के बाद निराश होकर रानी ने अपने
४७
आपको अग्नि को भट चढ़ा दिया तो उसे बहुत दुःख हुआ।
सबसे अधिक दुःख उसे अपनी बहन की रक्षा न कर सक ने
का था।
अाखिर हुमायूं ने चित्तौड़ पर माक्रमण करके वहादुरशाह
को हरा दिया और चित्तौड़ फिर से राजपूतों को वापिस दिलवा
कर उसने करुणावती की इच्छा पूर्ण की।
सचमुच, करुणावती आदर्श नारी थी। उसने अपना ही
नहीं चितौड़ का नाम उज्ज्वल किया। राजपूतों की शान
बढाई । भारत का इतिहास इस वीर रानी को कभी न भूला
सके।
सुलताना चाँद बीबी । बहुत पुरानी दात है ! अहमदनगर उस समय निजामशाही राजधानी था। वहाँ के वादशाह हुसैन निजामशाह थे। बड़े वीर योद्धा थे। उनकी एक चांद-सी पुत्री थी। उसका म था चाँद वीवी। अपने पिता की तरह वह भी योग्य सर्द- ण सम्पन्न-कुगल शासक व राजनीतिज्ञ थी। उस समय दिल्ली-सम्राट अकबर की धाक थी। बादशाह अकबर अपने राज्य का विस्तार करने की लालसा में रहत था। वह चाहता था कि सारे हिन्दुस्तान पर अधिकार करके वह अपने मन की इच्छा पूरी करे। इसलिए उसने एक विशाल सेना इकट्ठी करके समस्त भारत पर अधिकार करने की योजना बनाई। जव अकबर ने अवसर पाकर सबसे पहले दक्षिण पर पाक- मण करके उसे जीतने की तैयारी की थी उस समय दक्षिण में मुगल राज्य के साथ-साथ आदिलशाह और निजामशाह का शासन भी था। आदिलशाह वीजापुर के प्रथम राजा थे। उन्हीं के साथ चाँद बीबी का विवाह हुआ था। भाग्य की बात. आदिलशाह अधिक दिनों तक जीवित न रह सके। कुछ ही समय वा चांदबीबी का सुहान हमेगा-हमेशा के लिए मिट गया । विधवा हो गई और उस पर संकटों का बोझ आ पड़ा । च - वीवो यह ग़म सहन न कर सकी। पति की मृत्यु ने उसे प्रत्य- धिक व्याकुल बना दिया था। कुछ समय पश्चात् चाँद बीवी अहमदनगर वापिस लौट पाई; किन्तु वहाँ भी उसे प्राराम न मिला। क्योंकि सम्राट अकबर के पुत्र मुराद ने अहमदनगर पर पाक्रमण कर दिया था। चाँद बीवी जानती थी कि सम्राट की विशाल व ताकतवर सेना से मुकाबला करना कठिन है फिर भी उसने साहस से काम लिया। उसने दृढ़ संकल्प किया कि किसी भी कीमत पर वह मुगलों की प्राधीनता स्वीकार न करेगी। चाँद बीवी ने संकल्प करने के बाद अपनी फौज इकट्ठी को। किले के सभी द्वार बन्द करके उसने अपने सैनिकों को शहर की चहारदीवारी पर तैनात कर दिया। मुराद की सेना ने शहर को घेर लिया था; किन्तु शहर में प्रवेश पाना उसके लिए कठिन हो रहा था। क्योकि शहर की
५०
चहारदीवारी के समस्त रास्ते बंद कर दिये गये थे। दोनों ओर
से दनादन तो बरसने लगीं। आकाश धुंआधार हो गया।
हाहाकार मच गया। सैनिकों की भुजाएँ फड़क रही थीं। युद्ध
का दृश्य देख कर प्रतीत हो रहा था मानो युद्ध का भयानक
देव पृथ्वी पर उतर आया हो।
काफी संघर्ष के बाद मुगल सेना सफल न हो पाई तो उसने
परकोटा तोड़ कर किले में प्रवेश करने की योजना बनाई।
मुगल सेना ने शहर के चारों ओर सुरंगें खोदकर उनमें
वारूद भर दिया और उसमें आग लगा दी। वस, फिर क्या
था । बारूद ने अपना ऐसा प्रभाव दिखाया कि एक ओर का
परकोटा टूट गया।
परकोटा टूटते ही मुगल सेना अन्दर प्रविष्ट हो गई। जद
चाँद बीबी ने मुगल सेना को शहर में बढ़ते देखा वह तनिक
कॉपी लेकिन तुरन्त बाद उसने अदम्य साहस दिखाया। सैनिकों
में उसने उत्साह की लहर उत्पन्न कर दी और स्वयं सैनिक
का वेश धारण करके रणचण्डी बन युद्ध के मैदान में कूद पड़ी।
चाँदबीवी ने युद्ध में ऐसा पराक्रम दिखाया कि मुगल सेना
के छक्के छूट गये और वे मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए।
मुगल सेना के मैदान छोड़कर भाग जाने के बाद चाँदबीवी
ने पुन: रातों-रात परकोटा ठीक करवा दिया। अब उसे
प्रतीत होने लगा मुगल सेना उस पर फिर से आक्रमण न कर
सकेगी।
।
लेकिन ऐसा न हुआ। मुगल सेना शहर से बाहर डेरा
डाले पड़ी थी। प्रातः मुराद ने परकोटे पर दृष्टि दौड़ाई तो वह
घबरा गया । शहर में प्रवेश करने के रास्ते फिर से बंद हो चुके
थे। उसकी प्राशानों पर पानी फिर गया। पुनः आक्रमण करने
की उसकी योजनाएं निष्फल रहीं। उसका साहस टूट चुका
-
रा। अतः अपनी सेना सहित वह दिल्ली वापिस लौट आया ।
जव मुराद ने अकबर से चाँद बीवी को वीरता का वृत्तान्त
नाया वह मुगल सेना का अपमान सहन न कर सका । अतः
उसने फिर से मुगल सेना को अाक्रमण करने के लिए भेज
'दया ।
मुगलों ने अहमदनगर पर फिर से विशाल सेना के साय
प्राक्रमण किया। चांदवीवी घबराई नही बल्कि उसने हिम्मत
से काम लिया और डटकर मुगलों की फौज का मुकाबला
किया। खून की नदियां वह चलीं। सैनिक कट-कटकर जमीन
पर गिरने लगे। चांद बीवी के चन्द सैनिकों ने मुगलों की
विशाल सेना का अदम्य साहस से सामना किया। चांद बीवी
पुद्ध के मैदान में शेरनी की तरह गरजी और उसने काफी
सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।
अन्त में चाँद बीवी के थोड़े से सिपाही भी युद्ध करते-करते
रणक्षेत्र में सो गये । वीरांगना चाँद बीवी भी अन्तिम दम तक
मातृभूमि की रक्षा करती हुई शहीद हो गई। वीरांगना की
मृत्यु के साथ ही स्वतन्त्रता-प्रेमी नारी के राज्य का सूर्य प्रस्त
हो गया। मुगलों ने अहमदनगर पर अपना अधिकार कर
लिया।
कुछ भी हुआ; किन्तु चाँद बीबी ने अपनी मातृमूमि के
लिए वीरता का परिचय देकर नारी के नाम को उज्ज्वल
किया । ऐमी स्वतन्त्रता प्रेमी, मातृभक्ति से ओतप्रोत वीर नारी
को भारत का इतिहास कभी न भूल सकेगा।
--
खूब लड़ी मरदानी
महारानी लक्ष्मी बाई
झाँसी की रानी का नाम तो तुम सभी ने सुना होगा । जहाँ
वीरांगनाओं का नाम भारतीय इतिहास में आता है वहाँ भाँसी
की रानी लक्ष्मी बाई का नाम अपना एक विशेष स्थान रखता
है । अंग्रेजों के खिलाफ क्रान्ति के युद्ध में रानी भाँसी ने अद्भुत
वीरता का परिचय दिया।
झाँसी की रानी के विषय में एक कवि ने लिखा है-
"बुन्देले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी,
वह
तो झाँसी वाली रानी थी।"
वास्तव में वीर लक्ष्मी बाई ने मातृभूमि की रक्षा के लिए
अपना सर्वस्व लुटा दिया।
महारानी लक्ष्मी बाई का जन्म १६ नवम्बर सन् १८३५ को
काशीनगर में मोरोपन्त नामक एक ब्राह्मण के घर में हुआ था।
मोगे बलवन्तराव ताँबे एक मरहठा ब्राह्मण पेशवा-सरकार के
यहाँ फौजी अफसर था। उसके बड़े पुत्र का नाम मोरोपन्त
था। वे अपने पिता के साथ पूना में चिमाजीअप्पा की छत्रछाया
में रहते थे। कुछ समय बाद चिमाजी पूना छोड़ कर काशी
आ गये। उन्हीं के साथ मोरोपंत भी काशी प्राकर रहने लगा।
वहीं उसके घर एक दिन सुन्दर कन्या ने जन्म लिया। कौन
जान सकता था कि यह कन्या एक दिन झाँसी की रानी बन
कर विश्व में अपना नाम रोशन करेगी।
बचपन में इस कन्या का नाम मनू वाई था। प्रारम्भ से ही
मनू साहसी एवं चचल थी। धीरे-धीरे बचपन बीतने लगा।मनू
बड़ी होने लगी । जव वह चार वर्ष की हुई मोरोपत के सरंक्षक
चिमाजी अप्पा जी स्वर्ग सिधार गये । मोरोपत पर मुसीबतों
का पहाड़ टूट पड़ा। उसे चिमाजी की मृत्यु पर बहुत दुःख
हुआ। लेकिन करता भी क्या? होनी बलवान । है वह कभी
अपने अवसर से नहीं चूकती।
अधिक परेशान रहने के बाद मोरोपंत ने कागी छोड़ा
और वे वाजीराव के पास विठूर आकर रहने लगे।
पेश्वा बाजीराव के कोई सन्तान नहीं थी । अतः उन्होने
नाना साहव को गोद ले लिया था। उन्हीं नाना साहब के साथ
जिन्होंने १८५७ को क्रान्ति को जन्म दिया, खेल-कूद कर मनू
युवा होने लगी।
उन दिनों राजा-महाराजाओं के खेल-कूद विशेषतया हथि-
यार चलाना ही हुआ करते थे । मनुवाई ने थोड़ी-सी उम्र में
घुड़सवारी करना सीख लिया था। इतना ही नहीं वह हथियार
चलाने में प्रवीण हो गई।
मनुबाई के बचपन की एक घटना है। एक वार नाना
साहब हाथी पर बैठे हुए थे। उन्हें हाथी पर बैठे देख मनुवाई
ने अपने पिताजी से कहा-'मैं भी हाथी पर बैठूगी पिताजी !'
लेकिन मोरोपंत ने उसे मना कर दिया । वोले-'हम नौकर
हैं बेटी ! हमारे भाग्य में हाथी पर बैठना कहाँ लिखा है।'
मनुवाई को पिता की ये बातें अच्छी न लगीं। वोली-
'आप क्या कहते हैं पिता जी ! मैं एक नहीं दस हाथियों की
मालकिन वन कर दिखाऊँगी।'
और एक दिन मनुबाई ने वह कर ही दिखाया। उसकी
पत्री देख कर एक बार एक ज्योतिषी ने भी बताया था कि
यह कन्या राज-रानी बनेगी। लेकिन मोरोपंत को विश्वास
न था।
समय व्यतीत होता गया । मनू अाठ वर्ष की हुई । उन्हीं
दिनों उसकी माता भागीरथी संसार छोड़ कर चल बसी । माँ
की मृत्यु से मनुवाई के दिल पर गहरी चोट लगी। तभी से
उसने अपना हृदय कठोर कर लिया।
जव मनू जवान हुई उसके पिता मोरोपंत को पुत्री का
विवाह करने की चिन्ता लगी। समय की बात । झाँसी के
राजा गंगाधर राव की रानी का देहान्त हो गया। गंगाधर को
अपनी रानी से अत्यधिक प्रेम था। पत्नी की मृत्यु पर उन्हें
अत्यधिक दुःख था। उस दुःख को भुलाने के लिए राजकुल
हितैषी तथा अन्य सरदारों ने राव से दूसरा विवाह कर लेने
के लिए कहा । लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया।
।
गंगाधर राव निःसन्तान थे । अत. राजकुल चलाने के लिए
राजकुल हितषियों ने उन्हें शादी कर लेने को विवश कर
दिया।
इधर नाना साहब को जव ज्ञात हुया उन्होंने मनुवाई के
लिए गंगाधर राव को योग्य वर समझा । मोरोपंत के सामने
जब यह प्रश्न प्राया वे इस बात को मामने के लिए तैयार हो
गये । और ग्यारह वर्ष की आयु मे १८४६ को मनू का विवाह
झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ कर दिया गया।
अव मनुवाई झांसी की रानी बन गई। मरहठों की प्रथा
के अनुमार उसे लक्ष्मीबाई के नाम से पुकारा जाने लगा।
शादी के पाँच वर्ष बाद सन् १८५१ में लक्ष्मीबाई ने एक
पुत्र को जन्म दिया। युवराज की खुशी में झांसी हर्षोल्लास से
गूंज उठी । राजा ने दिल खोल कर दान चांटा। सभी के मुख
पर यही शब्द थे कि अब झांसी के राजकुल का दीपक नहीं
वुझेगा। लेकिन हुग्रा बिलकुल विपरीत । युवराज अधिक समय
तक जीवित न रह सका। पुत्र को मृत्यु ने वृद्ध गंगाधर राव के
हृदय पर गहरा ग्राघात पहुंचाया। झांसी की खुशियाँ ग़म में
वदल गयीं । राव पुत्र के दुःख मे बीमार रहने लगे और
बीमारी की अवस्था में तीन दिन के पश्चात् २१ नवम्बर
१८५३ को वे भी इस संसार से विदा हो गये। झांसी में
शोक छा गया। रानी लक्ष्मीबाई की मांग का सिन्दूर मिट
गया।
मृत्यु से पूर्व गंगाधर राव ने अपने एक निकट सम्बन्धी
दामोदर राव को गोद ले लिया था। गंगाधर राव की मृत्यु
के बाद अंग्रेजों ने दामोदर राव को उनका अवैध उत्तराधि-
कारी घोषित कर दिया। अंग्रेजों के बढ़ते अत्याचारो से
AST
रतीय जनता वैसे ही तग प्रा.
उधर जब भाँसी
को लक्ष्मीबाई के हाथ से निकल गई तो उसे बहुत दुःख हुआ।
जनता पर हो रहे अत्याचारों को देख कर वह बेचैन रहने
लगी थी। नाना साहब ने क्रान्ति की अग्नि जलाई तो लक्ष्मी-
वाई का उत्साह बढ़ां और वह भी क्रान्ति की धधकती ज्वाला
में कूद पड़ी।
नाना साहब और तात्या टोपे कान्तिः की योग के
निरन्तर उत्तेजित करने में लगे थे। रानी झांसी भी चैन
न वैठ सकी । अंग्रेजों के बढ़ते अत्याचारों से तंग आकर रान
ने गाँव-गाँव में जाकर सोये हुए भारतीयों को जगाया। उसने
महिलाओं को एकत्र करके एक ऐसा विभाग खोला जो अंग्रेजों
की प्रत्येक गतिविधि का पता लगा सके। स्वयं रानी ने इस
विभाग को सफलतापूर्वक चलाने का भरसक प्रयत्न किया।
: विद्रोह की ज्वाला दिन प्रति दिन जोर पकड़ती जा रही
थी। मेरठ में क्रान्ति की आग सुलगी। बहादुरशाह को भारत
का सम्राट् घोषित करके नाना साहब ने जगह-जगह विद्रोह
की आग को चेतन किया। रानी ने इस अवसर से लाभ
उठाया।
रानी की बढ़ती शक्ति को देख कर अंग्रेजों ने उसका दमन
करना चाहा । अतः मेजर डनलप को सेना के साथ उसे दवान
के लिए तैयार किया गया। लेकिन रानी डरने वाली कहाँ थी
डनलप के साथ उसका भयंकर युद्ध हुआ। मेजर डनलप रान
की युद्ध कौशलता से घबरा उठा। अन्त में वह हार गये
उसके हारते ही रानी ने पुनः झांसी के दुर्ग पर ६ जून १८
को अधिकार कर लिया।
जब अंग्रेजों को ज्ञात हुआ कि लक्ष्मीवाई ने फिर से भ
पर अधिकार कर लिया है तो उन्होंने झांसी लौटा देने
प्रस्ताय उसको पास भेजा। भला रानी अपनी नासो को कैसे
तौटा सकती थी। उसने अंग्रेजों के प्रस्तान को निर्भयता पूर्वक
ठुकरा दिया।
आखिर अंग्नेजों ने १० मार्च १८५८ को झांसी पर प्रामा
मण कर दिया। तो दनदना उठी। ग्राकारा धुआँधार हो
उठा । निरन्तर तेरह दिन तक तो गरजती रही । गोलियाँ
चलती रहीं, लेकिन लक्ष्मीबाई ने हिम्मत न हारी और उसने
जनरल रोजे के दांत खट्टे कर दिये।
उस दिन जनरल रोग हार कर पीछे हट गया। उसने
पुनः योजनावद्ध आक्रमण करने का निर्णय किया। उसने मुख्य
द्वार से तीन सौ गज के फासले पर मोर्चा लगाया। रानी को
उसके इस निर्णय के बारे कुछ भी पता न चला था। वह तो
समझती थी जनरल रोज हार कर भाग गया होगा। लेकिन
जब सुबह होते-होते दनदनाती हुई तोपों का भयानक स्वर
प्राकारा में गूंजा तो उसने पुनः हथियार संभाल लिये । भयंकर
युद्ध होने लगा। हाहाकार मच गया। आग को लाल लपटें
शहर को जलाने लगीं।
रानी वीरतापूर्वक दुश्मनों के दांत खट्टे कर रही थी।
झांसी के वीर सैनिक मातृभूमि पर मिट रहे थे। जनरल रोज
के पैर उखड़ने लगे। रानी की वीरता के सामने डटना उसके
लिए कठिन हो गया। उसे भय था कहीं अब की बार उसे
मैदान छोड़ कर भागना न पड़ जाय । वह सोच ही रहा था
कि एकाएक दुर्ग का द्वार खुल गया और अंग्रेजों की फौज अन्दर
प्रविष्ट हो गई।
रानी को जब पता लगा कि डलहौजी तोपची ने उसके
साथ विश्वासघात कर दुर्ग का द्वार खोल दिया है तो उसे
-
से काम - गहरा धक्का लगा। उसने तुरन्त सैनिक को उत्साहित किया । स्वयं घोड़े पर सवार होकर रानी ने चमकती हुई तलवारें अपने दोनों हाथों में सम्भाल ली। फिर क्या था । युद्ध का भयंकर देव रण के मैदान में कूद पड़ा । खून की नदियाँ बहने लगीं। झाँसी के वीर सैनिकों ने अदम्य वीरता दिखाई। आखिर अंग्रेजों की विशाल सेना के सामने डटे रहना उनके लिए कठिन हो गया। क्योंकि अंग्रेजों की शक्ति के मुकावले उनके सैनिकों की संख्या अधिक न थी। अपने सैनिकों को घबराये देख रानी ने साहस लिया। अपने वीरों को डगमगाते देख उसने साहस बंधाते हुए कहा, 'झाँसी के वीर सपूतो! मातृभूमि अपनी रक्षा के लिए तुम्हें पुकार रही है। देखो, दुश्मनों के पैरों से मातृभूमि का कलेजा काँप रहा है । आगे बढ़ो, दुश्मनों के छक्के छुड़ा दो।' फिर तो सैनिकों का उत्साह दुगुना हो गया। वीरतापूर्वक वे आगे बढ़े; किन्तु युद्ध करते-करते आखिर उनके कदम डग- मगा ही गए। विशाल व शक्तिशाली सेना का आखिर कव तक वे मुकवला कर सकते थे। अन्त में रानी युवराज सहित अंग्रेजों के चंगुल से निकल गई। क्योंकि अंग्रेजों ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। झाँसी छोड़ते समय उसने प्रण किया था---'या तो में प्राण दे दूंगी अथवा झाँसी वापस लूंगी।' रानी वेग से काल्पी की ओर बढ़ी। उसे विश्वास था कि काल्पी से सहायता लेकर वह पुनः झाँसी को अपने अधिकार में कर लेगी। लेकिन दुर्भाग्य की बात, रानी को मार्ग में ही दुश्मनों ने घेर लिया। नंगी तलवारें नाचने लगी। भीषण युद्ध में उसके शेष सरदार भी मारे गये। इस यद्ध में रानी का प्रिय घोड़ा भी घायल हो चुका था। घायल अवस्या में घोड़े ने अपनी टांगों पर पड़े हो मातृभूमि को अन्तिम नमस्कार किया और फिर हमेशा-हमेशा के लिए संमार से विदा हो गया। गनी घोड़े की पीठ से पहले ही उतर चुकी थी। अपने प्रिय घोड़े की मृत्यु पर उसे अत्यधिक दुःख हो रहा था। अब रानी के लिए काल्पी पहुँचना कठिन हो रहा था। उसने साहस न तोड़ा। पास-पास के गांव से उमने एक घोड़ा मँगवाया और वीरतापूर्वक वह काल्पी पहुंची। नानासाहब और तात्याटोपे उन दिनों काल्पी में थे । लक्ष्मी. पाई को देख वे पाश्चर्यचकित रह गये। जब रानी ने उन्हें सार वृत्तान्त मुनाया उन्होंने मिलकर झांसी को वापिस लेने फी योजना बनाई । रानी फिर झांसी की पोर चल दी। रास्ते में अंग्रेजों ने उसे फिर घेर लिया। इस समय उसके साथ चन्द सैनिक थे । वहाँ से बच निकलने के बाद रानी काल्पो छोड़कर वापिस पहुँची। वहाँ भी अंग्रेजों की फौज ने उसका पीछा किया। भयकर युद्ध हुमा । रानी के एक मुसलमान तोपची गोंस खां ने दुश्मनों का वीरता से मुकाबला किया। लेकिन अधिक समय तक रानी की सेना उनके सामने न डट सकी। । । रानी की सारी सेना युद्ध में काम पा चुकी थी। अब वह अकेली रह गई । अंग्रेजों की सेना के झुण्ड में धंसी होने पर भी उसने हिम्मत न हारी। वीरतापूर्वक उसने दुश्मनों के सिर काट-काट कर पृथ्वी पर गिरा दिए । यद्यपि उसका समस्त शरीर छलनी हो चुका था फिर भी मातृभूमि के लिए वह अन्तिम दम तक लड़ती रही। अन्त में १८ जून १८५८ में झांसी की वीर रानी लक्ष्मीबाई मातृभूमि के लिए शहीद
..
६०
हो गई।
महारानी लक्ष्मीबाई का नाम भारत के इतिहास में हमेशा
अमर रहेगा। उसने देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान
देकर भारतीय नारी के नाम को उज्ज्वल किया है, बच्चो!
तुम्हें भी रानी की तरह वीर एवं साहसी बनना चाहिए।
. .
वीर ताईबाई
भारतीय वीरांगनाओं में जहाँ महारानी लक्ष्मीबाई, रानी
करुणावती, दुर्गावती आदि नारियों का नाम माता है उसी
क्रम में वीर ताईबाई का नाम भी जुड़ जाता है । वीर ताई.
बाई ने अपनी वीरता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करके
भारतीय नारी के नाम को ऊंचा किया है। भारत में जिस
प्रकार महाराणा प्रताप, वीर शिवाजो प्रादि वीर पुरुषों ने
अपने देश की रक्षार्थ प्रागों का बलिदान दिया उसी प्रकार
१२ । नारियाँ भी मातृभूमि की रक्षा करने में पीछे नहीं रही हैं। वीर ताईवाई भी एक ऐसी वीरांगना है जिसकी वीरतो के सामने बाजीराव पेशवा को भी झुकना पड़ा था। ताईवाई का जन्म कराड़ा नामक प्रान्त में एक तेली के घर में हुआ था। वह अत्यधिक सुन्दर थी। जब वह युवा हुई और उसकी सुन्द.. रता की चर्चा दूर-दूर तक फैली तो कराड़ा के राजा परशुराम पन्त उस पर मुग्ध हो गये। वे उसे अपनी रानी बनाना चाहते थे। भाग्य की वात । ताईवई को रानी बनना था। अत: परशु- राम ने उसके साथ विवाह कर लिया। कराड़ा का राजा परशुराम पन्त विलासी व्यक्ति था। हर घड़ी वह विलासता में डूबा रहता था। ताईवाई को अपने पति की आदत अच्छी न लगी। वह नहीं चाहती थी कि विलाराता में डूबकर उसका पति प्रजा के दुःखों का ख्याल भी न करे । लेकिन वह करती क्या? ताईबाई अपने पति की दशा देख चिन्तित रहने लगीं। समय गुजरता गया। राजा परशुराम पन्त अपनी प्रजा का ध्यान तो क्या रखता, वह उनको और भी परेशान करने लगा। इससे कराड़ा की जनता अत्यधिक दुःखी थी। जब रानी ताईबाई ने प्रजा की हालत देखी तो उसने अपने पति को समझाया, पर उसने उसकी एक भी न सुनी और उसी प्रकार वह प्रजा पर अत्याचार करता रहा। एक दिन दुःखी होकर रानी ने उसे पुन: कहा-पापं विलासता में डूबे रहकर अपना भविष्य बिगाड़ रहे हैं । कम- से-कम अपनी प्रजा का तो ख्याल कीजिए।
। उसकी बात सुन राजा परशुराम ने कहा- मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ; किन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं कि तुम मेरे रंग में भंग डालो। यह एक रानी को शोभा नहीं देता। 'यह आप ठीक कहते हैं।' ताईवाई ने बड़े विनम्र भाव से उत्तर दिया-'पाप मेरे पति हैं। हृदय से मैं आपका स्वागत करती हूँ, मान करती हूँ लेकिन आप यह क्यों नहीं सोचते कि प्रजा अपने राजा के व्यवहार पर जिन्दा रहती है । राजा रक्षक होता है अपनी प्रजा का भक्षक तो नहीं होता। क्या अापको यह शोभा देता है कि आप तो राजशाही सुख प्राप्त कर और आपकी दुःखी जनता रो-रोकर दम तोड़ दे । आपको प्रजा का ख्याल रखना ही होगा। प्रजा के कष्टों का यदि पाप ध्यान रखेंगे तो राज्य का कार्य सुचारु रूप से चल सकता है। ताईबाई के इतना समझाने पर भी राजा परशुराम पन्त ने उसकी बातों पर कोई भी ध्यान नहीं दिया । वह उसी तरह ऐशो-पाराम में डूबा रहा । अपनी प्रजा पर उसी तरह अत्या- चार करता रहा । उसका परिणाम यह हुआ कि प्रजा पर दु.खों का पहाड़ टूट पड़ा। आखिर प्रजा कब तक राजा के अत्याचारों को सहन करती। प्रजा में अराजकता फैल गई। राजा के विरुद्ध कान्ति को ज्वाला भड़क उठी । प्रजा को अपने विरुद्ध देख राजा परशु- राम पन्त की प्रॉसें खुली। उसने क्रान्ति की आग को बुझाना चाहा; किन्तु सफल न हो सका। यह देख रानी ताईबाई ने बुद्धि से काम लिया। अपने पति से बोली-'कुछ समय के लिए राज्य की बागडोर पाप मेरे हाय में दे दीजिए । मैं प्रजा मे फैले भसन्तोप को समाप्त कर (गी।'
लेकिन परशुराम न माना । उसने दृढ़तापूर्वक कह दिया-
'यह कैसे हो सकता है । मैं राज्य की वागडोर किसी भी हालत
में तुम्हें नहीं दे सकता।
रानी को बहुत दुःख हुआ। उसे राज्य के न मिलने का
दुःख नहीं था बल्कि प्रजा में अपने पति के खिलाफ फैले
असंतोप का उसे. अत्यधिक दुःख था। पति की विलासिता
और प्रजा पर उसके अत्याचारों ने उसे अधिक व्याकुल बना
दिया था।
अन्त में अपने पति को हठ करते देख उसने प्रजा की भलाई
के लिए उसके विरुद्ध पग उठाया। उसने बाजीराव पेशवा से
सहायता लेकर कराड़ा राज्य की वागड़ोर अपने हाथ में
सम्भाल ली।
परशुराम पन्त ने इसको अपना घोर अपमान समझा।
ताईवाई को अपने पति से किसी प्रकार का द्वेष न था। उसने
जो भी किया प्रजा में फैली अराजकता को समाप्त करने के
लिए । परशुराम को पत्नी के हाथ में वागडोर चले जाने का
इतना दुःख न हुआ लेकिन बाजीराव पेशवा द्वारा हस्ताक्षेप
करना उसे रुचा नहीं था। अतः उसने सितारा के राजा से
सहायता लेकर वाजीराव पेशवा पर आक्रमण कर दिया।
दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। पेशवा की विशाल सेना का
सामना करना कोई सरल न था उसके लिए । आखिर वह हार
गया।
जब रानी ताईवाई को अपने पति को गिरफ्तारी का पता
चला उसे बहुत दुःख हुअा। उस समय रानी के व्यवहार से
प्रजा और सैनिक सन्तुष्ट थे । भत्तः उसने अपने पति को छुड़ाने
के लिए सैनिकों को मंमूरगढ़ के किले पर चढ़ाई करने के लिए भेज दिया। अवसर पाकर रानी ताईवाई भी सैनिकों सहित मंसूरगढ़ पहुंची । वहाँ ताईवाई और वापू गोखले के मध्य भीपण युद्ध हुा । खून की नदिया वही । काफी सैनिक मौत के घाट उतर गये । हाहाकार मच गया रणक्षेत्र में। अन्त में अपनी वीरता और साहस के बल पर रानी ताईबाई की विजय हुई। उसने मंसूरगढ़ के किले पर अधिकार कर लिया और अपने पति को मुक्त कर दिया। अव वीर ताईवाई ने अपने राज्य का विस्तार करना प्रारम्भ कर दिया। उसकी शक्ति बढ़ती गई। प्रजा उसके व्यवहार से बहुत प्रसन्न थी। अपनी प्रजा के हर दुःख को दूर करना वह अपना परम कर्तव्य जो समझती थी इसलिए कोई उरासे असन्तुष्ट न था। धीरे-धीरे रानी की शक्ति बढ़ने लगी। बाजीराव पेशवा उसकी बढती हुई शक्ति को देखकर बहुत वेचन रहने लगा। वह नहीं चाहता था कि ताईवाई जिसकी उसने एक दिन सहा- यता की थी राज्य का विस्तार करके अपनी ताकत बढाये। वह उससे जलने लगा था। अत. उसने वापू गोखले की विशाल सेना देखकर रानी ताईवाई पर अाक्रमण करने के लिए भेज दिया। उन दिनों ताईबाई ममूरगर के किले में थी । वस मसूर- गढ़ का मैदान युद्ध का अखाड़ा बन गया। तलवार चमक उठी। सिर कट-कटकर पृथ्वी पर लुढकने लगे । अनेकों नारियों का मुहाग उजड़ गया । यहाँ तक कि ममूरगढ़ की धरती वीरों
६६
के खून से लाल हो गई।
आखिर मराठों की शक्तिशाली सेना के सामने ठहरना
ताईवाई के लिए कठिन हो गया । वहादुर सैनिकों का खून होते
हुए वह अब देख न सकी और उसने आत्म समर्पण कर दिया।
यदि रानी चाहती तो मराठों के चंगुल से भागकर निकल
सकती थी लेकिन उसने ऐसी कायरता नहीं दिखाई । मैदान में
हथियार डालने के बाद बापू गोखले ने उसे बंदी बना लिया ।
वाजीराव पेशवा के सामने रानी ताईवाई को पेश किया
गया। सभी को यह उम्मीद थी कि वाजीराव पेशवा उसे कारा-
". गार में डाल देगा, पर उसने ऐसा नहीं किया। वीर
पुरुप
वीरता की कद्र करना जानता है। बाजीराव ने रानी से
कहा-मैं चाहूँ तो तुमसे अब अच्छी तरह बदला ले सकता हूँ।
लेकिन नहीं, वीर पुरुष को यह शोभा नहीं देता। वास्तव में
तुम वीर नारी हो । वीर हमेशा वीरता का सम्मान करना
जानता है । इसलिए तुम्हारी वीरता से प्रभावित होकर मैं तुम्हें
तुम्हारा राज्य वापिस लौटाता हूँ।
और उसने सहर्ष रानी ताईवाई का राज्य उसे वापिस
लौटा दिया। रानी वड़ी प्रसन्न हुई। उसने अपने राज्य का
कार्य
सुचारुरूप से चलाया और
एक दिन अपने कर्तव्य और
धर्म का पालन करती हुई वीर ताईबाई परलोक सिधार गई ।
रानी की मृत्यु पर प्रजा को अत्यधिक दुःख हुआ।
सचमुच वीर ताईवाई ने अपनी वीरता का परिचय देकर
अपना ही नहीं, अपने माता-पिता राज्य व देश के साथ-साथ
भारतीय नारी का मस्तक गर्व से ऊँचा किया है। जब तक
चाँद और तारे हैं तव तक वीर ताईवाई का नाम भारत के
इतिहास में अमर रहेगा।
बच्चा ! तुमने प्रारम्भ से अन्त तक वीर नारियों को कहा- नियां पढ़ीं । अब तुम्हे मालूम हो गया होगा कि हमारे देश में नारियों ने भी चीन्ता का परिचय देकर अपने देश का भाल उन्नत किया है। इसलिए तुम भी आज प्रण करो कि हम सब यहने मिलकर अपने कर्तव्य का पालन करती हुई मातृभूमि पर बलिदान हो जाएँगो मगर किमी के सामने मुझेगी नहीं । हमें अपने राष्ट्र का गौरव बढ़ाना है । यही हमारा परम कर्तव्य है जिसका अन्तिम दम तक हमें पालन करना है।
देवी इन्दिरा अब तक तुमने भारत की वीरांगनाओं के बारे में पढ़ा। उन वीर नारियों ने अपने कर्त्तव्य, धर्म और देश के लिए जो बलिदान दिया वह अद्वितीय है। भारत की नारियाँ भी वक्त आने पर पुरुषों से पीछे नहीं रही हैं । अपनी आन और मान- मर्यादा के पालन हेतु उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया है। उन्हीं नारियों की भाँति वर्तमान समय में भारत की प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी भी निस्वार्थ भाव तथा अपने अदम्य साहस से देश के शासन का संचालन कर रही हैं। देवी इन्दिरा भारत के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री स्वर्गीय जवाहर- लाल नेहरू की पुत्री हैं। इनके वावा मोतीलाल नेहरू अपने समय के प्रसिद्ध वकील थे। ब्रिटिश सरकार उनका लोहा मानती थी। उनके योग्य तथा प्रतिभाशाली सुपुत्र पं० जवाहर- लाल नेहरू ने भारत के स्वतन्त्र होने के बाद प्रधानमन्त्री का पद ग्रहण करके अपने पिता का नाम उज्ज्वल किया और अब प्रधानमन्त्री के पद पर रह कर देवी इन्दिरा अतीव साहस, लगन, धर्य एवं आत्मविश्वास के कार्य करती हुई अपने पिता तथा बाबा के नाम को चार चाँद लगा रही है। भारत का प्रत्येक नागरिक आज इसे सम्मान की दृष्टि से देखता है।
देवी इन्दिरा का जन्म १६ नवम्बर सन् १९१७ को हुआ
था। इनके पिता का नाम तो तुम भली-भांति जानते हो।
इनकी माता का नाम कमला नेहरू था। माता-पिता को इका-
लौती सन्तान होने के कारण पापका लालन-पालन बड़े ही
प्रेम और शान-गौकत से हुआ। किशोरावस्था में इन्हें 'इन्दिरा
प्रियदर्शिनी' के नाम से सम्बोधित किया जाता था, किन्तु
जवाहरलाल नेहरू प्यार से अपनी बेटी को 'इन्द्र' कहकर ही
पुकारते थे।
बच्चो! ऊपर जिम चित्र को तुम देख रहे हो वह देवी
इन्दिरा का ही है।
बचपन में इनकी शिक्षा 'शान्ति-निकेतन' में विश्व कवि
हूँ। यह --- रवीन्द्रनाथ ठाकुर की देख-रेख में हुई। वहाँ रहकर इन्होंने वंगला, कला व संस्कृति का खूब अध्ययन किया। इन्दिरा का प्रभाव रवीन्द्र वावू पर भी पड़ा । निकेतन से विदा करते समय उन्होंने नेहरू को एक पत्र भी लिखा था। उन्होंने लिखा था- में बड़े भारी मन से बेटी इन्दिरा को निकेतन से विदाई दे रहा मेरे स्कूल की अमूल्य निधि है ! मुझे आगा है कि इन्दिरा का भावी जीवन अच्छा रहेगा। इन्दिराजी ने स्वयं भी कहा है कि निकेतन में मुझे सुरक्षित और शान्ति का वातावरण मिला था। यह सत्य ही था। कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की देख-रेख में इन्दिरा ने बहुत कुछ अजित किया। राजनीति का भी इन्दिराजी पर विशेष प्रभाव पड़ा। आनन्द-भवन जो इनका घर है और इलाहाबाद में है, उन दिनों राजनीति का अखाड़ा बना हुआ था। इनके पिता जवाहरलाल नेहरू क्रान्ति में सक्रिय भाग ले रहे थे। जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ जलूस निकाले जा रहे थे। भारत को आजाद कराने के लिए देश-भक्त जी-जान की बाजी लगा रहे थे। उस समय इन्दिरा की आयु वारह वर्ष की थी। इन पर भी क्रान्ति का प्रभाव पड़ा। देश-भक्ति की भावना उजागर हो गई और इन्दिरा ने उससे प्रभावित होकर बच्चों की एक सेना एकत्र की । उसका नाम उन्होंने 'वानर' सेना रखा। वह सेना बड़े-बड़े कार्यकत्तांत्रों की सहायता किया करती थी। इस प्रकार 'बानर सेना' का इन्दिरा को संचालन करते देख सभी उसकी ओर आकृष्ट थे। सभी को उससे अपार स्नेह हो गया था। गाँधीजी का प्रभाव इन्दिरा पर गहरा पड़ा। सत्य-अहिंसा के मार्ग पर चलती हुई इन्दिरा पिता की तरह क्रांति के समर में पागे बहने लगी। उन दिनों श्रीमती मरोजनी नायडू ने पं० जवाहरलाल नेहरू को लिसा था कि इन्दिरा 'भारत की नई प्रात्मा' है। राच, उनका कहना प्राज प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने है। एक बार जब कागला नेहरू बीमार हुई उन्हें इलाज के लिए योरोप ले जाया गया । उस समय इन्दिरा भी अपनी माता के साथ वहां गई थी। कमला की दशा सोचनीय होती जा रही थी। एक दिन सन् १९३६ को स्विटजरलंण्ड में उनका देहान्त हो गया। पिता और पुत्री को कमता नेहरू के निधन से काफी दु.ख हुमा । एक पोर क्रान्ति का दौर चत रहा था दूसरी ओर नेहरू जी पर मुसीबतों का बोझ पड़ गया था। उन्होंने फिर भी साहस न तोडा। अपनी पुत्री को उन्होंने इंग्लैंड के एक समरविले कालेज आक्सफोर्ड में प्रविष्ट करा दिया। इन्दिराजी ने वहीं शिक्षा प्राप्त की । आप वही की ग्रेजुएट हैं। शिक्षा ग्रहण करने के उपरान्त इन्दिराजी भारत तोटी । उन दिनो देश के कोने-कोने में क्रान्ति की प्राग फैली हुई थी। पं. नेहरू व मोतीलाल नेहरू मे देश प्रेम की लहरे उठ चुकी थी। उन्होने क्रान्ति को सफल बनाकर भारत को स्वतन्त्र कराने का दृढ़ संकल्प किया हुमा या। गांधीजी के सम्पर्क में प्राकर इन्दिराजी में राष्ट्रीय भावना ने ऐसा रूप धारण किया कि २१ वर्ष की आयु मे स्वतन्त्रता-संघर्प के कारण उन्हें भी तेरह मास का कारावास भुगतना पड़ा। उन दिनों गांधीजी ने 'भारत छोड़ो' का नारा लगाया था। गांधीजी के आह्वान पर वे पुन: क्रान्ति के युद्ध में कूद पड़ी। सन् १९४२ में इन्दिराजी का विवाह फ़िरोज गांधी के साथ हुआ। जैसा कि पीछे बताया जा चुका है 'भारत छोड़ो' आन्दोलन में भाग लेने के कारण नव विवाहित को कारावास में जाना पड़ा था। उस समय अन्य नेतागण भी जेल में ठूस दिये गये थे। फिरोज गाँधी ने भी अपनी वर्षगाँठ जेल में ही मनाई। चौदह मास का कारावासी जीवन बिताया। फिर भी राष्ट्रीय भावना के प्रति आप में कोई कमी नहीं आई। एक बार की बात है कि इलाहाबाद में पानी के नल की कुछ गड़बड़ हो जाने के कारण घर में पानी आना बंद हो गया। इन्दिराजी ने दूसरे का सहारा न तका वल्कि स्वयं ही कीचड़ में बैठकर उन्होंने पाइप को ठीक कर लिया। जब उनसे पूछा गया तो बोली-गांधीजी ने ही तो बताया है कि श्रम करने से घबराना नहीं चाहिए। कवि रवीन्द्रजी, गांधीजी तथा जवाहरलाल नेहरू का इन्दिरा पर गहरा प्रभाव पड़ा था। नेहरूजी ने एक बार जेल से 'पिता का पत्र पुत्री के नाम' एक पत्र लिखा था। इसी प्रकार वे अपनी पुत्री में हर दृष्टिकोण से उच्च भावनाएँ भरा करते थे । क्रान्ति में भाग लेना भी इन्होंने अपने पिता व गाँधी जी से सीखा। सन् १९४७ में भारत स्वतन्त्र हुआ लेकिन साथ ही दो भागों में विभक्त हो गया । अंग्रेजों ने एक हिन्दुस्तान और दूसरा जिन्नाह के कहने पर पाकिस्तान घोषित कर दिया। देश में हलचल मच गई। हिन्दू-मुसलमानों में फ़िसाद हो गया। उसका देश के सभी नेताओं को दुःख हुआ । इन्दिरा जी नहीं चाहती थी कि इस तरह बँटवारा होने पर देशवासी इस तरह परस्पर खून की नदियाँ बहायें। देश की स्वतन्त्रता में इन्दिराजी ने अपना पूर्ण सहयोग प्रदान किया । योग्य पिता की योग्य पुत्री ने देश रक्षार्थ जो ।
पर कार्य किये उनकी सभी ने भूरि-भूरि प्रशंमा की थी। एक वार की घटना बड़ी दिलचस्प है इन्दिराजी की। सन् १९५० की बात है । एक दिन इन्दिराजी कनाट प्लेम घूमने आई । वही पटरी पर एक अपाहिज बालक कुछ चीजें बेच रहा था । इन्दिराजी ने बालक को देखा तो प्रभावित हुई । उससे छोटी उम्र में चीजें वेचने का कारण पूछा तो ज्ञात हुआ वह एक गरीब परिवार का है। इसी तरह चीजें वेच कर कार्य चलाता है। यहां तक कि वह किसी स्कूल में शिक्षा ग्रहण भी नहीं करता । इन्दिराजी ने अपंगों की दशा सुधारने के लिए कुछ सामाजिक कार्यकर्तामों से विचार-विमर्श किया। उसके बाद उन्होंने बाल सहयोग संस्था को स्थापना की। इस संस्था में अनाथ व सड़कों पर मारे-मारे फिरने वाले बच्चों को रखा जाने लगा । यह इन्दिराजी के परिथम का परिणाम है। इन्दिराजी अपने स्वर्गीय पिता पं. जवाहरलाल नेहरू के साथ इंग्लैंड, अमेरिका, रूस, फ्रांस आदि देशों की यात्रा कर चुकी हैं। पाप अमेरिका कई बार गई। सन् १९५५ में पाप कांग्रेस कार्यकारिणी की सदस्य बनीं। इसके अतिरिक्त कांग्रेस महिला विभाग और केन्द्रीय चुनाव बोर्ड, पालियामेंटरी वोर्ड और युवा कांग्रेस को भी प्राप सदस्य बनी। फरवरी १९५६ में पाप राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष निर्वाचित हुई । इसका अधिवेशन नागपुर में हुआ था । मन् १९६० में युनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि मण्डल की सदस्य रहीं। उसके बाद सन् १९६४ तक युनेस्को की कार्यकारणी की पाप सदस्य रहीं। अपने पिता की भांति इन्दिराजी ने हर क्षेत्र में ज्ञान प्राप्त किया और जो सीखा उसे प्रयोग में लाई। एक बार सन् १६५७ में जब कांग्रेस कार्यकारिणी के लिए महासमिति के सदस्यों में खुला मतदान हुआ तो श्रीमती इन्दिरा गांधी को सब से अधिक मत मिले थे। यह इनकी लोकप्रियता का प्रतीक है। नेहरूजी के जीवन-काल में कई बार उनके मन्त्रिमण्डल में लिये जाने की इन्दिराजी पर चर्चायें हुई लेकिन इन्होंने उचित न नेहरूजी के निधन के पश्चात् जव स्वर्गीय लालवहादुर शास्त्री प्रधानमन्त्री बनें तो उन्होंने इन्दिराजी को अपने मंत्रि- मण्डल में लेने का प्रस्ताव उनके सामने रखा। इससे वे सहमत हो गईं और उन्हें सूचना और प्रसारण मन्त्री के पद पर नियुक्त कर दिया गया। आपने अपने पद पर रहकर पूरी निष्ठा, तत्परता व कुशलता से अपने दायित्व को निवाहा । २७ जनवरी १९६५ में सूचना एवं प्रसारण मन्त्री की हैसियत से आपने कैनेक टिकट, इलियान आदि देशों का भ्रमण किया। न्यूयार्क में इसी बीच आपने 'नेहरू स्मारक प्रदर्शनी' का उद्घाटन भी किया था। देवी इन्दिरा गांधी अहम् भाव से बहुत दूर हैं । मानवता कूट-कूटकर भरी है इनमें । हर किसी बात को बड़े ध्यान से सुनकर अपना निर्णय देती हैं। राजनैतिक क्षेत्र में निरन्तर इन्होंने बड़ी लगन से कार्य को पूरा किया। जनवरी १९६६ में अचानक ताशकन्द में श्री लालवहादुर शास्त्री जी के निधन से आपको गहरा दुःख हुआ। समस्त राष्ट्र शोक में डूवा हुमा था। उनकी मृत्यु के बाद प्रश्न आया किसे प्रधानमंत्री बनाया जाये। सभी की आँखें इंदिराजी पर लगी थीं। अन्त में इंदिरा जी को प्रधानमन्त्री पद संभालना पड़ा। पिता की मृत्यु के बाद भी एक बार यही प्रश्न सामने आया था लेकिन इन्दिराजी ने ७५ उस समय स्वीकार न किया था। चाहती तो वे अब भी न थीं लेकिन भारत की वागडोर संभालने का दायित्व मापने सभी के कहने पर अपने ऊपर ले लिया। इन्दिराजी के प्रधानमन्त्री बनने पर सरोजनी नायडू के वे शब्द साकार हो गये जिन्हें उन्होने इन्दिराजी के जन्मकाल के समय लिस भेजा था। प्रधानमन्त्री बनने के बाद इन्दिराजी के सागने अनेक समस्याएँ आ खड़ी हुई । अहिंसा और विश्वास के वत पर इन्होंने उन्हें दूर करने का भरसक प्रयत्न किया। १० जून १९६६ में श्रीमती इदिरा गाधी ने निवेन्द्रम का दौरा किया। वहां वे प्रथम वार गई। अपने प्रधानमन्त्री के स्वागत के लिए त्रिवेन्द्रम की जनता उमड़ पड़ी । इसी प्रकार देश के विभिन्न-विभिन्न भागों का देवो इन्दिरा गांधी ने दौरा किया। देश की हालत को अच्छी तरह समझकर इन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जिसमे भारत की समस्त समस्याएं हल हो सकं । उन्होंने प्रजा से मिलने का समय भी निर्धारित कर दिया । इनका कहना है कि जनता का दुःख-दर्द सुनना मेरा परम कर्तव्य है । मैं अपनी जनता के दुःसों को दूर करने का सदैव प्रयत्न करती रहूँगी। प्रधानमन्त्री बनने के बाद इन्दिराजी ने विदेशों का दौरा किया। भारत को प्रतिष्ठा को बढाने हेतु अापने हर जगह अपनी कुशलता का अद्भुत परिचय दिया । जहाँ भी पाप गई वहाँ की जनता ने नापका हार्दिक स्वागत किया देवी इन्दिरा गाधी ने २४ जनवरी १९६६ को प्रधान- मन्त्री का पद ग्रहण करके भारतीय नारी का गौरव बढ़ाया है। इतना ही नहीं इन्होने झांसी की रानी की परम्परा को दोहराया है। देखा जाय तो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को जन्मतिथि भी वही थी जो इन्दिराजी की है। देश पर यदि कोई विपत्ति पड़ी तो यह निश्चय है कि देवी इंदिरा गांधी भी लक्ष्मीबाई को तरह अपना कौशल दिखायेंगी। धैर्य, आस्था और कर्म-पथ पर डटे रहने में इन्दिराजी दृढ़ हैं। पिता की भाँति हर कार्य को विश्वास के साथ सहर्ष करने का इन्दिराजी प्रयत्न करती हैं। इन्दिराजी नई पीढ़ी की प्रतिनिधि हैं। नई पीढ़ी की.भाशा और विश्वास को लिए वे अपने पथ पर दृढ़ है। राष्ट्र को 'राष्ट्र की बेटी' इन्दिराजी से वहुत कुछ आकाँक्षा है और विश्वास है कि जिस प्रकार फूलों का मार्ग छोड़कर वे काँटों के मार्ग पर उत्तरों, देश को स्वतन्त्र कराने में अपना पूर्ण योग प्रदान किया, उसी प्रकार अपने राष्ट्र को उन्नति की ओर अग्र- सर करने में सदैव अग्रणी हैं और भविष्य में भी रहेंगी। लोक- तन्त्रात्मक और समाजवाद के पथ पर देश को अग्रसर करने की हार्दिक इच्छा लिए इन्दिराजी पूर्ण निष्ठा से अपना कर्तव्य निबाह रही हैं । वे बड़े राष्ट्र की प्रधानमन्त्री हैं लेकिन स्वयं को वे प्रधानमन्त्री न कहकर राष्ट्र की सेविका कहती हैं । उनका कहना है कि राष्ट्र की सेवा से बढ़कर कोई सेवा नहीं है। जिस देश की मिट्टी में पलकर बड़ी हुई हूँ, उसकी रक्षा करना मेरा परम कर्तव्य है। देवी इन्दिरा में ऊँच-नीच की भावना नहीं है। वह सभी को समान दृष्टि से देखती हैं । निर्धनों से इन्हें अधिक स्नेह है। वे चाहती हैं कि भारत का प्रत्येक नागरिक सम्मान और खुशी से अपना जीवन व्यतीत करे। पारस्परिक स्नेह की भावना को वे अधिक महत्व देती हैं । उनका कहना है कि हमें समाज में एक होकर रहना चाहिए । एकता में वल है। यदि हम प्रापस में ही लड़ते रहेंगे तो हमारी एकता को शक्ति कमजोर हो जायेगी और फिर कोई भी दुश्मन हमारी पारस्परिक फूट से लाभ उठाकर हमें दबोच लेगा। उनका यह कहना यथार्थ है । यदि देश का प्रत्येक नागरिक चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई, आपस में सहानुभूति पूर्वक रहकर एकता की डोर में बंधा रहेगा तो दुनिया की बड़ी-से-बड़ी शक्ति भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती । इतिहास में ऐसे बहुत से उदाहरण सामने आये हैं। यदि हम भारत के इतिहास को उठाकर देखें तो हमे ज्ञात होता है कि जब भी देश गुलाम हुआ आपसी मतभेद तथा फूट के कारण ही हुमा । दुश्मनों ने पारस्परिक फूट का लाभ उठाकर बड़े-बड़े राज्य तबाह किए, मुल्क वरवाद किये। अंग्रेजों ने भी जब भारता पर अधिकार किया, अन्दरूनी फूट को देखकर वर्ना भारत की पवित्र धरती पर अंग्रेज कभी भी दुकूमत न कर सकते थे। भारतीय इतिहास को सामने रखकर ही इन्दिरा जी एकता में अधिक विश्वास रखती है। इतना ही नही देश की उन्नति के लिए देवी इन्दिरा ने हर पहलू पर विचार किया है। देश की गरीबी को दूर करने के लिए इन्होंने बहुत-सी योजनाएं चलाई है जिससे हर व्यक्ति को काम मिल सके । जहाँ तक सामाजिक सुधार करने का देवी इन्दिरा ने बीड़ा उठाया है वहां उन्होंने देश की पैदावार, प्रार्थिक सुधार तया देश को शक्तिशाली बनाने का भी ठोस कार्य किया है और कर रही है । वे चाहती हैं कि भारत विश्व में उच्नकोटि का सम्मान प्राप्त करे, किसी से पाछे न रहे और
७६
विपत्ति के समय इसे किसी का मुंह न ताकना पड़े। इसी उद्द श्य
को सामने रखकर देवी इन्दिरा देश की बागडोर को संभाले
हुए हैं।
आज के वैज्ञनिक युग में बड़े-बड़े राष्ट्र अणुशक्ति को बढ़ावा
देकर मानव-विनाश के लिए जो अस्त्र-शस्त्र तैयार कर रहे हैं,
इन्दिरा जी उसके पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि ऐसी
शक्ति को अल्प विकसित देशों के लिए अपनाना हानिकारक है,
जो कि हिंसा के मार्ग पर ले जाता है। राष्ट्र को उन्नतिशील
पथ से दूर कर देता है । इस समस्या को हल करने के लिए
इन्होने हमेशा राष्ट्र के सामने अहिंसा का मार्ग अपनाने पर बल
दिया है। क्योंकि वे जानती हैं कि मानव के कल्याण के लिए
अगर कोई श्रेष्ठ मार्ग है तो वह अहिंसा और शांति का है।
जब से इन्दिराजी प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुई हैं तव
से उन्होंने ऐसे ही अनेकों रचनात्मक कार्य किये हैं। हमें पूर्ण
विश्वास है कि इन्दिराजी के नेतृत्व में राष्ट्र समृद्धशाली होगा।
अगर कोई भी प्राक्रांता हमारे देश पर आक्रमण करने का
दु.साहस
करेगा तो
यह निश्चय है कि इन्दिरा जी झाँसी की
रानी की भाँति अपने रूप को दिखाकर ही रहेंगी।
बच्चो ! तुम्हें भी देवी इन्दिरा के जीवन से शिक्षा लेकर
अपने जीवन को उन्नति की ओर अग्रसर करना चाहिए । आज
तुम नन्हीं-नन्हीं कलियाँ हो । कल तुम्हें फूल बनकर सारे देश
को अपनी सुगंध से महकाना है । यही जीवन है जिसमें अच्छी
शिक्षा का सागर लहरायेगा और एक दिन तुम भी अपने देश
के महान् नेता बनोगे। इसलिए तुम वीर बनो, परस्पर प्रेम से
रहकर एकता कायम रखो जिससे भविष्य में अपने देश की
स्वतन्त्रता की रक्षा करने में पीछे न रह सको।
।
राष्ट्र को देवी इन्दिराजी पर गर्व है ! राष्ट्र का बच्चा- बच्चा प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी जी के साथ है । उन्हें गर्व है इन्दिराजी पर और इनसे बहुत-सी प्रागाएँ भी।