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Ratna Kar Aur Unka Kavy

Jayswal,usha · 2010/12

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रत्नाकर और उनका काव्य
उपा जायसवाल
एम० ए०, पल०टी०
हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय
पाराणसी-१

मकारक
मोम्मकाश पेरी
हिन्दी प्रचारक पुस्तकाबप
न ज्ञानवापी, पायमी-1
पो.बाक्स
शिवीय संस्मर-11..
मूल्य पार पपे
मुद्रक
५०शिवनापयण उपाप्याय, बी. ए.
मया संसार प्रेस
मनी, पराधमी।

दो शब्द
प्रदत पुसर मेरी एम. ए. परीक्षा के लिए प्रस्तुत निरी
पोहाबाद परिबति सका। मीनार का 'उर-रात माधुनिक
मामापा काम्पा भेटतम ताहिदी साहित्य में, पुरानी पामरा :
अनुसार चित, प्रश्न का महाप्रप। सो पर के प्रावण ने मुम
रानावर कमन्य प्रमों को पढमे प्रावादी, विवके पाकम्प पर दाटा
सम्मान प्रल हो सका।
परिरिपतियों का पौरन पर सपा भीरनमा काग्य पर भरपेतस्प में
प्रत्यक्ष प्रभाव पाठात सर्वप्रथम रानाहा गोको उनी परिस्थिति
बीब रनर, उना मति न्वारपूर्ण वातावरण उत्पम करने का प्रपात
१। सो उपरान्त उनए कार का पर्यावरण पर उनकी मामी प्रतिमा
वमा पारी का परिपय देने का प्रदान किया गया। पुना उन पर
एशोषनामा शितगई।पन्द्र में रामारीतीरिवारपारा
प्रकार पारिश करते र उनका हियोनालिय में उचित स्थान
निर्धारित करने पास है। नासर बी + समसामपि मापाक
परिपो कामी मैदस परिपप दिया गया है।
भय मापार्य रीमनार रिपेदी जी मे एम. ए. में प्राप
लिपने ही मरी भापति का मुझ प्रसर प्रदान किया तथा मदेस
7. भीमपलानी ने निपर का उपरपापिल्प लार मुझ
मनुरीत दिया, इसके लिए में भामारो है । उनी, गम्म, सद्
नियन एकामता में ही प्रल हा पूर्ण सेटो मराना प्रत्युष्टि
नहीं है। ममें रायास म्पनतम रुपा गुरुमनोरा घाग्रीयर पियाम
है। उप रामों में सार र परवा :ट परने का वाम मुझमे
नही।रप मा दीपरी यरता है।
भी एनापरी रेटार पत्र भी समाप्र मोकोमी में अनुहोस
नारीशीन से सम्पपिसिएका शान ना मेर

परारी प्राप्त हो सका। सोने मापूर्वक मुझे एव समय या सामग्री प्रदान परके सहायता प्रदान की है। परि प्रस्तुत पुस्खा से रजाकर जीदी सोचनी एवं उनके काम पर कुछ मी प्रकार पाने हो मैं अपने इस प्रयास को उस समगी। प्रस्त पुस्तक में दुटियों का होना सम्म, पाया है उदार पाल मा रणे। सपा मापसपाल भूमिका किमी मममुन विप स्तुपा पप से प्यार किसी नूतन पि, पस्तु पा पपी पोर माहए ने लिए उपयश-बनों का प्रायः सप्प ही माना है कि ग्मा पा परम्परा अधुन म पस्तु किंवा पय दोषों का पाा पार पा समम स्पित दीपों की उद्माणमा परक रसस लोगों समिरत करें। हिंदी मारिप गोत्र में पड़ी पोटी प्रतिस्ति हो जाने पर मनी- दियों का मान काय की मोर मी गया और गाने गवतमा परी भाषा में परस्मता साम सिप परियों का माहाम किया। मिम मा मे पाच- मीन अपने ग्रामन यात में सम-मन पर अमिमा पर सिया मा रामक मति मासादिरनिहाला सदर नहीं था। किं स्कूलों में सिपापा मापम तही पोसी हो जाने से समाज के संसर्ग से मा पनी उत्तरोत्तर दूर हटी गई, बस पाठ्य-गुलमें में निपारित प्राचीन कपिपों की पविना पार समय ही मयमारा का मापापार हो पाता था। प्राचीनमम खा पाता हुमा अप्पाम्पास पयसाम्याप नापसी से प्रायः दूर होमे ला था। पसी स्थिति में प्यपदार-प पे रहने वाली माश पाप्म का ममत्रा भी सपके नि माय मर्सपा। इमीच माहिपिक मतानों में पीबासी मही अपनामे बामबार भी प्रारम्भ कर दिया। निशाना स्थान पर लगा पार बहुत मे भरशिक्षित मस्युषा भाषाय में प्रम-भाग से घिोर भोक में पूर्वनिर्मित पम्मारा-पाप रे मी पिाही दो गए। सिनिम्दाने प्रजमापा की रम-मरिता में प्रपगारमा मानद प्राप्त पर लिपा पा, में पा उपचा शिपमे भयरी। नपीनना का कहना गविसमा म पाता है सर, पिंगसो र प्राचीन ग्पा पपपा परित्याग मी पिसम परिणाम दीपा सापगा।ग्री पिरामिप्रतिमाम पर पद पोर ना मपामपाल पता- पुण्पमित्यय न मापु मय, नपेनि फायनपमित्यपदम् ।

- सन्सा परीश्याम्यतरदमयन्ये, महः परमस्ययनेयबुद्धिः॥ मामापा ममा उपेक्षीय भर उसमें रचित हिंदी का मधुर साहित्य, यो हमारी पार्षसीन संसाति मम्मता और विचारमाशि अपने में ममेरे प रममें मना है बामना प्रविषेक का प्रकारान है। वास्तव में जो अपने साहिवरा भानुअमिक गंभीर समयन नहीं पता पा सहचिकमानी मोदी सारिस्पिक नहीं है। स्वर्गीय बापू जगमावदासगी रपामबास्तबमें अमात्राषयाम्पस विपप प्रतिमा-मम्मच श्रमिथे। अपि-मतिमा कमी भी पेपवीप ना होती। साप-मजत अप्प-यमुम की स्पेशा नहीं कर सकते।हा, रसभमाहत दोना प्रार।गर मम गरे तिमा ही भावनिक मयों न हो मतों को बापपा मोर माहारने में भाम से सिर रोगा। हम देखते कि निस प्रविश विसपने प्रेम प्रम्-भाग की मत्सना की गई, सीमापर माधुप हो गराई भावनाएँ शारक्त यो। प्रस्तुत पुस्लरो प्रस्तुत गतिका अपर प्रशंसर्गम साहित्य-मेम का परिषय निमासिका पाप्रपम मपास रखामामामामाथि जीवनात उपस्थित करने के माप दो मोसम्यगत शिस्य की मीनी सम्परता म पान-ग की गई । माम जी के मन शममि और पार-भूमि में भी मापपानी से प्रस्तुत किया गया पीच माताप्प कवि पूर्व काम्पसमा मिस से मिला और उमर पापानिय जी पारमीपता और मारता से रवान-प्रण पर विचार निा। मुझे विशम ६ भिरमार की मम्मा भयपन मेवानी के लिए इस प्र. में पर्याप्त महायता मिलेगी और सामनी पर सिली गई पूर्वी पाचोमामाँ से पय मानो में मलन सामग्री मी इसमें उपसाप रोगी। पेचमाय-माम कमवा मासपर प्रिपाटी 'परासी बाराममी। कार्तिक १.१.११ ॥ } आधुनिक ब्रजकाव्य-परम्परा हिंदी साहित्य इतिहास पर एक विहंगम सिने से हाल होता दिपारम्म से ब्रममा विशेष माल रहा है। पिंगट एवं रिंगत मी प्रणमानिस की माग । मनिकाह में हरामनिसा माया समी वि तमा राममधि शाखा के पपरियों मे प्रमाणही अपनी माषाभि प्पनिका माध्यम होने मय दिपा । तिबार में भी पद की विशेष मापा सदी रही। पायनिक माह में प्रभाविप बी माही में प्रा । मारत पुग में अप्पा मारा प्राचारही रही पयपि सदी बोली में पाना का अम्मास दामा पारम्म ऐ पुष था। दिदी बी साहित्य क्षेत्र में पापण बाते ही पीबाहीमा राम्पो गया या रसाम्प देश पर मीषि कार ममा सिया। रि मीमा माइप - सालिप में प्रामी पांस भारपण पा । मम-सर-पारा मारप पर गई कि एपरम परम गई। पप तर मी समे वियर मान माठ या तया में अम्पसपना गौरव समुपी। प्रामापा भनेर भेटतम प्रयसी पुगी । एनाम जी रा रात को सपमयम स्थान माठमावा रामचन्द्र या जीका पुर परिस' 'रिपागी हरि' की पीर सनर्मा', भपाप्मा के रामनाफ- स्पोनिका रामनोरम रापप्य राम श्री प्रसारमाधुनिक काहीही समापि संस्था, मेधी पुस्तक सम्म मनुवार मा। पापा मिदायत जी रसम्सप रखनीय है। प्रपरकाम्प पर ग्राममी पानिक युग में पपात मान था। रमाम मास म ममम माग मारतंतु सपा दिनीय माग गिदी पुगम सर्वपित। रमा मम मामपिक मा-पियों में प्रधान रूस मे. पाप्या मिर पामाप, भीरपामरिधारी सिम भी मुना गिरी मिम, श्री मानापम मिमतया बिपीगीरिजीत पनि चिहाला मीताम्म, पर पारक, पयमार पर तपा मापाप रामा मनारमनीय न्द मगरे। । -

रत्नाकर नी फा पश-वृत
बाराम
में
भाए
पे
संगमहास
सयौ बरे गए
पुष्पोच्मदाम
हरिदास
प्रगनापास रणगार
रहबाम
(भागपुर)
सहायशम
बिनोरमार
नारायणदास
पोपीय
माम मी.
रामस्वाम
एम.पू.
१ रानापानी पोर मी रामप्यास, एम. ए.द्वारा प्राम ।

अनुक्रमणिका
पृष्ठ
१७-१४
५५-१११
५२
म०
पिपय
१ सीपनी तया व्यचित्य
युग तया परम्परा
३
काव्य-कृतिया
(1) निबन्ध पाम्प
(स) प्रबाप मुलक
(ग) मुन्धक
४ नागरी प्रचारिणी पत्रिका में प्राशित
2. भापण
६ सम्पादित मन्य
पान्य रूप, मापा पर्यमा
()न-शैसी और मला
( H) माश और पन्न
८. विचार-धारा
पसंहार
२० परिशिष्ट
१००
१०५
११३-१५६
१५७-१६६
१६-१७२

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नज-काव्य परम्परा असमाषा का संबंप प्राचीनतम भाप मापानों है। पार्य-सम्पता के बिम्नार साप ही निमिड प्रांतों की पोसियों में अन्तर होनेगा। फसव मारा तीन पपा तीन प्रकार- र-(1) शौरसेनी () मागपी (1) पैशाची शौरसेनी का निस्तार रत्तर में हिमाप की सराई, रषिय में मप्पपदेश पूप में प्रबाग ता परिचम में दिल्ली तक मा। गौरसेनी के पक्ष में मागपी सविस्तार पा और शौरसेनी परिम्म पुर्व पश्चिमोत्तर में पैशाची का निम्तार था। इस प्रोती की बोरियों में पर्याप्त मेद पा पा प्रत्येक मौत में मापारप बमता की बोली तपा एक साहित्यिक माशापन गई। पे मारिधिक भाग मप-मपने स्पान के नाम से धौरसेनी मास, मागपी- माहव तया पशाची-मात पाताई। साहित्यिक रचनाओं में मरम्यापी पनान * पप से महाराही मास का निमाण प्रा। पिक विस्तार पूर्व मोरे दाप में सने के कारण शौरमनी की दी ममानता रही। रामे रामः माहिथिर मारा बमसापारपरेसिए कटित होती गई । बत वासियों में ही साहित्यिक रचना भारम्भ हो गई। परिणाम-मरूप जिम प्रभार तीन माल माराएँ बनी ची गती मारता मीन पाशिफ मारा मन गई। भाग प्पामप से प्पुन पी मत प्रपत्र राकहसार । पुनः एक मा सर्वप्पापी सस, इम पेय से तीनों प्रपमरा से मिलकर एक साप मादिपिक अपम य बनी। हममें मी पोरमेनी (मागर पमरा) मपानता रही। पर प्रपनर मीनसापाररा से दूर पहुँतब फिर पम्पक पाशिक भाषा पासप्पागोप साहिरिपर मारा बनी। पद मागर मागो, मंगत मात, राप मादिपिर प्रपत्र व्या हामी प्रपन ग, मे मिसर पनी इमसिए पारा महा। पाग में भी गौरपेनी सही पापापरता।

[ २ ] सोऽपिपता चाइमे बारे श्री परमास में ही काम्परमा करते पण उसके प्रांतों के अनुसार (उनी भाग में) विशेषता मा पाती थी। गुरसेन प्रदेश में पिक काप्परचमा ई। प्रत पारा मे मरिस्थिक पौरसेनी पास पारण म सिपा। भावान्तर में प्रम में अपिम्तम बिनाप र भीर मारित्विक शीरमनी में दो मौका पास हो गया । म प्रमा पद सादिग्विक मापा दी मुत्प भाषा बन गई। इस मभर हम देखते पारम्म से ही प्रममा मदिर सभा समपम स्वाम प्राप्त रहा तपा मस्ते रहने के कारन इममम्म नियर पापा। रिबी साहित्य के प्राधिकार में लिंग पिंगत मारा रममा प्रा ही निकट पी पीर इसमें बम का ही महाप रहा। इसमें पापम्ता से. १५० विक्रमी सेरा गदप श्रीपसमाचसी हमा भीर गोरम-पर्वत-स्थित भीमाप के मंदिर में मम एवं मौतनका उत्तरदानी र उपर पड़ा। रातादीदम माराम सयपुग मानापा मम्बा है। पामिरमामय साप ही इसे मुगलमत में रामाभय भी प्रास तुमा और परमागमसम्परेड में प्राय गप्प गप हो गया। परपि इस समए इसमा सम प्रम्पबस्मित मा। इस पुग में करपी में भी रमा शेती सा कि इसमें तहसोहनामचरित मातम तमा जापास्त पदमाक्त पे दतियाँदी प्रपान । मनिमस में हरपामा समी बिपीने सभापतः मन ही अपनी पाम्पमा का मेष रिपा मा राममति पानामी पपाप्त गरियो मे घर में होनाएँ। शास्पाप होने पर गरमा फो परि मानित जमानेम प्रयास किया। ति-बात में भी मापः ममी अपिपी मेमपमापा। पिारी मे मारिपिकासमाग के मुग यह म्प कासग रिपर कर ममापी के प्रमुमार शाम प्रयाग रिसा। पिपरि पुरानी परिणाम के भनुमार दरिया बरते हिममे उन मरमाग शियिती रही। विदारी परात् मापन जीने पर एपं सम्म सम्पड माराममपोगम्पिा । माधुनिक युग में मारनेर युग प्राप- ममी पियो म पगमारा ही भरनी सप्य-भारा मारा। पप्पी हमी युग स ग साप पप-रचना मी बासी में मरे या पाम पाराम दो धुमपा।

माइनिफ पुग में प्रम-काम्प परम्परा' में निम्नसिसित पनि है-सेपक, महा- राब रसुराम सिंह का नरेश मरहार, बाबा रघुनासदास 'रामसनेही', लसित- विारी, बसित मापुरी, रामासमय सिर सविराम, गोपिय गिस्सामा, शाखा सीताराम बी 1, नवनीत भोये, मारवेन्तु परिरपन्य, ५० प्रतापनारायण मिम, पाप्पत्य पदरीनारायस कीपरी 'प्रेमवन', मर जगमोहन सिंह का अम्बिका वत्त प्पाम, बा रामकृष्ण वर्मा, रामहप दास, द. अयोपासिंह पायाप मीपर पाटक, बगपाप वाम 'राम', राप देवीप्रसाद पूण, राबरावा पाम- बिहारी मिम, रापबहादुर सुखदेव विहारी मिभ पं. सत्पनारापण 'पबिरब' वियोगी परि, सारेशास मार्गप रामनाय ज्योतिपी हाता भगवानल, ना राम शंकर पमा तयागया प्रसाद ण्ड सनेही भादि । इनमें पाप वियप रूम सपही पोठी में भावा है किन्तु इमर मरकाम्प कमी दिदी सारिम्प में गम महाय नहीं । रपपुर परियों का सरित परिचय यहाँ पर दे दमा अपित दोगा पचपि प्रायम्म की रिस पयामहा सभा मत दो। १० भयोम्पासिह, नपाध्याय 'हरिपोध' 'हरिमापनी समम्म पैगास प्य । सं० ११२२ वि० (सन् १८१५ ६.) में तमसा नदी के किनारे निगमापार में हुभा । इनके पूर्वम बदा रहम वासे थे किन्तु पाल में भाममगारे पाम निजामाबाद में भाम रहने सगे। इसके रिता का माम, मौसासिंह सीरपाप्पाप पा । मनास्प मामा थे । इमार-परम्परागत प्पवसाय पम्तिए पर्व समीदारी पा। ५ पम्पा में परिचीप बी के वा मामिह बीम इनकी शिक्षा पर पर दी पारग्म की 1.41 की प्रस्या में प निमामाबार तदसामी पायासा में मरि दुप। • वि. (सन् १॥ई.) में भापम मिति परीक्षा पास काम मीका भी मिलने सगा। अंगरेमी पान लिए पशि बनारम कीस पात्र में प्रपिर हुए पा रही दिनों बार सम्यम्यता पारग ए पाए न लिसादिम पर मोरना पडा। इस पार पर-परित पर पर ही पारसी पर्व सम्रा का प्रम्पयन रतराम. (मन् १८८१) में प्रारम विगाह मी हो गरा। म. (मन् 11.) में पानूनगोई की परीश पाप पर पानमगो निपुट पनपार तक निरंतर पाप करने से। इस पर म

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। [ १५ ] हम जैसी पर परगतने पर जात होता है कि हनी मे विशिष्ट ही नहीं मान गई मगर फी धियों पर भारका समान अधिकार है। हिन्दी में संहत पदों मप्रपाग भापने सफरताप किया है जिससे हिन्दी में मनिता मा गई है। मीही मुसबरी का तो प्रयोग पपात र में पिसा जिमसे रोमी में स्वाभाषिता या चमकार की उत्पत्ति ह। स्मपियर रे 'माफ बनिस' का अनुवाद 'बनिस काम माम स मेसहस्तमय बौसी में है। हिन्दी का अर' जैसी संसठमप देती सिट पिता मीन रक्तियाँदने में पे पथ समर्थ है। मासिकता पर इसका रािप मान रहता है। अपि परिपाली में पाई हुई रचिया प्राचीन मतप्त होती थी। रोमी केही समान हम मापा मी चिणिमही है परन् गैसी के अनुसार मारा पदस गाती है। प्रस्पेक प्रसर श्री भारा सिखने में पह मिसदस्त। रामप्रसपापोप इसके पाम या तपास एवं सदी मोसी पर ममान अधिकार प्राप्त था। बामग्पराप्त मानिक मारा-पम्प में भाप मासपूण स्थान मास ।रिपोगी दम स्पान मी इनके पास ही माना गया ह। हिनी-मारित्व में प्रापम गौरवपूरा स्थान तया पापी प्रसिदि दिदी- साहिप रे साप दी प्रमर।। रामराजा रायबहादुर सार श्यामषिरारी मिम एम० ए०,पी. लिट. रारारारा. स्पामविहारी मिल भी पा सम्म ५ अगस्त सन् 1.4 १. में सम्पन्न मामण प्रतिक्षित रा में ग (मिठा सपना) में मापा । भापके पूरणों में ममि एवं सम्मानित साहिस्पिर तपा निशान भी पितामपि मिड एवं श्री मरिसेप्प मित्र जी पाहिए। भार र माई । के अतिरिक्त मी शिरिहरी मार मिश्री गग्रणि मि तपाभी मुखदेव पिहारी मिल थे। भी पिपरिधारीलाल मिभनिरिस्त प्रम्प तीनों माई मिसार मारित्य-नारा मारिस्पसपना सात मुनाप मते पे। रापरदार मुष गिरी मिम हिंदी के पिनों में से मिप्र-युगम से रिली-मादित्य में विकात । -रीपास्या में इनके पिता भी पासदती मिभ में इन शिका मारम्म रायसिमामी सभी माने तो तथा पर पर मैसी मारप मे गप्पयन मी पारम्भ हो गया। एदने दामियन धारम, पस्ती में भी गिपा प्राप्त की। फिर अपने दो माई के पास मम् 11.मैं पाने में सिप समारमा गए । सन् 141.मैं ठरली पाईरह से पर्मस की पीरा रतौर की। उसके बाद मिग अमर से पन् १५. परमपीण्य, मन् सन् 14. में दी १८० में एम. मयम प्रेणी में उत्तीर स्पिा तपा प्रिंसिपस रा रिटरी-बार बुरे गए। लिपीर, मोर, मनिस,पुलिस मुपरिमेकम पाई रियासतों कदापान मा रोटरी मादि प्रविरित पड़ों पर पनि कार्य किया। सरभरी परों पर पद प्रापः समस्त मारत अमरामपापमे सीपन में रिमिह मनु मा मत लिपे धमा सरमा प्रध्यान प्रिमित मुशारों की भोर मार दिया। सन् १५1.Anct. सक समिक्ष पॉर रमान मेम्पर पा सन् ११३८६. में रायमार क पपपी मास में अब तक पराग पदवी बेस रामपुत्रों में प्राप्ठ ईपी किन्नु सन् १. में साई महारामा भोरवा ने प्रारमे इस पा से भी मुसोमित किया। मन् १५...मैं इसी साहित्य मेरा एक विचारेमाम माग बिरपरिवातप मेटी• सि.की भामरेरी रपापि प्रदान की। भार व पानी पनि रिपबिधाहपों की सीमेर मेम्बर भी रदे । इसकी समार-मेगा मी मयंसनीय है। पासिर पिवेतन में अमित मारतीय हिरी मारिप मम्मेलन के परमप्पा भी है। सन् १३. ई. में रि-सिमाम किया। स्वापाप पूर्व पारिपारिक प्रदिप पानापारा पास ही पाप दिल्ली पिका अपम्पने पकोई भी मिश्री से सम्पनाकी मरमा मिनी पी । प्रमाग में मिप्रकशा पदाको रमाएँ । मिस शराबगमग ३५ मप ममारित पूर्व ए । 'मिम-मानिोद सरिमादित्य में विशेष स्थान है। इसी के मापार पर दिसारिक विभिप्र इतिहास हि ग । रायपहादुर पनि मुपदेष विहारी मिभ पी० ए प मुख गिरी मिन जीप सम्म दबंग (गिता सनमर) में सन् १८... में मापात पार पूतों का परान भी पास रपाम- पित मिभवन में दिया गपुम। पारम शिक्षा गॉप एम पारम्म म मैगपा पर पर निगरमी गिता सपा मी सपने से माना [.] पाम पामे के लिए सबबळ मा गए । सन् १८५ई. में इन्होंने गुबती राई स्ट से मिटिस मेथी में पाई किया जिसमे इमं पीपा मी प्राप्त होने सगा। हाई-सस समा एम. ए. में भी भापने ममम श्रेणी ही प्राप्त की। सम् १० में निंग कान में दी० ए० में सर्व मपम पाए चौर वीर स्वर्ण पाक प्राप्त हुए। सन् १.ई. में मापने पासत की परीक्षा रचीस भी वक इन्होंने बाबत मी की, किन्तु यह कार्य इन वियर चिमममा। भी रपामारी मिश्र जी की ही मावि इन पर भी अपने बहनोई श्री भैरव प्रसार वामपेयी दिशाम पवित्र प्रभाव पड़ा। श्री सावरार पर्व प्रम- राम से भी मापने साहित्य-ज्ञान प्राप्त किया था। सन् १९.८ में प्रापमे मुम्मिती की। पर पहले साम-पान में कमर पे मिन्तु पाद में वह कारता रिपित हो गई। मापने मारठ प्रमग विमाता कामा प्राकृतिक सौन्दर्प सभी ग्रामद ग्यपा। सन् 1. ई. में साम्प-साम के सिए योरप-प्रमग (इरसी, पासिया, सममा, हार गया मांस और स्विटवासैपा) मी रिया। सन् 1. मैं सस्तापुर में होनेवाले काम्याप काम सोपे प्रया रहे थे। रापपरेसी में सारे पर पर तपा पवरपुर सम्म में दोबान पर पर मापने कार्य किमा। सन् १९०० में भारो रापमाादुर श्री ग्पथि मात । सन् 1. में इन्होंने रान मास र पी पी। दसनर एवं मसाग मिपविधासप के सेमेरो मा मीह पुर। स्वास्म्प की मोर इनका रिशेप पान रहता था। साप दी रामनैतिक एवं सामारिक कार्यम मी मागते थे। 'मिम-बाबुरा सम्पादित एवं सिमित मम्मो का रसोग भी श्पाम बिहारी मित्र जीदी जीपनी में दो बुम है। एम्होंने अपन मताने भी मतारमारापण मिभनी साप अविना-सामरण की टीम एप माहित्य पारिशसममयम पर बिनाया। पटना विश्वविद्यालय में नारा 'भारतीय इविदाम पर दिखी-सरित्व प्राममाप' विएप पर व्यापानमामारी गां मी पुस्सममा प्रमशित। भारम देशापमान सन् १४५. में पा सानपाए सरिप समारोने पर भी मी रिम्पी सहाय-सेवा समीप 16 - 4 सत्यनारायण कपिरस्न पिलीम मार ॥ सोमवार . पि. (सन् १८...) मरान पामक प्राम में पापा। इनकी माता वसको एक मिनुपी स्त्री अपने बचन बीवन प्राय बीच- मिद सिप रवि भारतीया भारि स्थानों में अध्यापन का कार्य मीना। लिहाबार में मामा पती । सीमाम्म से कपिरत्व की बारा वरदानी र प्रांभर मिझापा। उनके पास सैमो सिसिथित पुस्तक पी दिनमें माधीन हिन्दी वाम्म सम्म भी गावाम चिरनजी मेरमा । बापापा मैं पेपर प्रामक पन में बार बाय सापता र मामीब बीस से इसका प्रेम जीवन-पर्पस बना रहा। समसमाप पर पर में बने इस प्रामीवा पूर्व मामीचशम्पा का परिणाम मी मोगना पाया। सर १५... गमग इन्होंने भागो में सारस्पत पाना प्रारम्म किया कि विपिपूर्वक इस मिसा पर में प्रारम्भ है। मप्रथम पार मदरसे में परी। वहीं अंगरेजी पायेसमा असर मिण । तामगज कवि बनी तबिमा से इनोवे बक्समा मस्ती । पावाचि परीभारतीय महिर के पम्प में प्रपिटाए। बदा अनवारजी राम अम्परया मेरमा मिठो। इतिहास, भूगोष प्रारि पार करने हि मी पेपम्प पे । समी से पर समम्पाति भीमने सगे। इन दिनों इस हरि गाररसी भोर पी नि पानी बार परियों के लिए म गार रस की रचनाएँ नही। सर ant. दोने मेगा पिम में हिनदी मिसि चा किसा। सन् 16t. सोमा मिति ता कि पाविसमा ... में सेन्स पाभिएर हामि से पमेन्स परीक्षा तीन.. में पर.प. पेरेरा रिवीमन में तीर । सन् १. में पी... परीक्षा में सम्मिसित र अनुतीय ए। 11.01.. में परापा समान शाम शातिर मार सपनारामएकीका पाता। मम् .... में पामिना पा ....से बकाम्प मेरेगमनिसपा दीपनाम पापित feोता।सम् ॥...मैं तोपानर-नामदन' इस्लामी तिची की।

[१] स्वामी रामतीय प्पाश्मानों से ये पिणेप मासे प्रभाषित पपे तया नभमेरिधो जाना चाह रोपेि बागारपुवादासमी बोरकर मग सके। सन् १ ई. में पाबाबी मृत्यु मे में और दुखी बना दिया। बासमुकर गुप्त बी ने इसकी प्रतिमा पहचानी थी। 4. मावीरमसार हिदी बी से सन् 1.1 में भारका परिचय कुमा। पीपर पास प्रम्प पे प्रेमी थे। १.५. में हपके द्वारा सिता मोटो 'स्वदेश यांपर पमित्र पर पता रहा, बार में इस पत्र पर-विमाग में सम्पादक हो गए। पुर्वेदी पारसमसाद पांवी हारा प्रमशित 'रापापविम में इनकी कविताएँ प्राव पपती भी । स-मास प्रवेष में सबई उत्सव अपवा अध्यापक विदाई दोवा पी तो अमिनवमयन प्रादि पिसमा भापकर ही कार्य होता था। सरेपणा विधापी जीवन से ही इनकी काम्प-मतिमापरत्तरोत्तर किलाम हुमा । एस. प. * परीषा दिन वर्ग:अनुके मावि-सीम्पूर्व पर मुग्प से काम्भवना में त धे मापा फितारों कोने पर ही पचानाम अपने विचार प्रश्न करते गाव थे। रामजी 'समाहापनादर्शकाम्प पर मी पम्मामाकी श्री। मन् १५से.ई. में पे रवास की बीमारी से पारित गरिनु प्रकार की साधारण वा से हमाराम हो गया। तिरी-साहित्य-सम्मेसन के रिवीय, पंचम तपा अष्टम अभियन में पे सम्मिलित एप पे और अपने पितापार मे जनता को मुग्प पिया या । प्रागरा मातीप-सम्मेसन की स्वागत-बारिणी-समिनिपासमारठि मी । शिपिन स्वास्प पारगमपितविपामाय बिगहनासीर दिसा तया .पारी 1. को, ग्यासापुर (परिहार) बिया महारन मुनराम गोम्पा सावित्री देवी के सम्पमा विवाद सत्ता भा। इसम पारिवारिम्जीवन मापक उपाय । रिकामास पारी पीजी अपनी सदसी के पहारती गई दी। मी मयुरेश्य एक दिन पासे पर माहापुर में पाई पी। उसाई रे मावास्यत्र पर । प्रगत सन् L भागामस्व में महापरमप्यारक निपुनाए । ११ प्रेम में नियमापना में सोनम अममप मापुस गई। गोली पास पम्पयन मने पर मीनराजीस प्रतिम . पीजी सिजो बागरी मारिन-मत्रा II मेशिका पर मिलेगादियाममे मम्मी ' मामपाल मी ममिततसमें मनधिषा बलप मरमुन मरम 4 मागे पग नवा माराया। दाना मिली नया गम में पागोडाइमनी मागिता पोता। बार-सरहता दोहराम मनर पीननाद साह निमरपा मगतिमा स्प-मिना र मागी पीर मी मुन्ना बना देती की। पा कमी नहीं रहा। समापन पग मन्परिक संबर मा गिसमें रोमा बदुतों का पौने रचरनामचरित मानती-माम भार वक्त से पापा किया और 'रमेशम' अंगरेजी मे में चार किया। पोस सागसमदप-कांग। सो पपादों * पिणापाई। नाम-परित में कि भूमिका मी पोररी गई। पिनापन भाकि जिसने मनमुनि- हनना नहीं पड़ी रसम्म मादिपापपन पनि मपति में भारमरतापामे रचित तमा पदप ममता-सारस्ता, मयमा तथा विता भादि में उसे महान् मिद रिमा गया है। भपतिमा प्रति नि त पापामा उपरात मित्रा। पित्य म-मति । भन्ने का भवति हामार गुप इन अप में भी अपित होने है। पनुवार भनुपरहीरता सममें सीन रोगका एक दोगी। ये मूह मारपीति समतेप। इनमें राम जी ने अपना एक सपा कारमा वाम' या भोमारास गरे में ले त सपनारायणीमा सामे हो। मचमारायण की सिए पाबमा सामुगाप पीनाम पर मसाप नदी पा। मामाग में रंग-रोगी मामपिसभाप मम त समसमें कितनमा में ही नही पर निप बनन शैली में भी ये मामा इस भय स्निायों प म र म भारतीय पारण माण hिles मध्या [11 म में रहते थे क्या रमापा पर इन अपिमर या प्रतः हलकी मापा मैं बोल-चास देशमा प्रयोगशवपन करने में ये हुए थे। इनके काम्प में अहंकार स्वाभाविक रूप में प्राए । तपा इनाकाम्बोधित असनाशीसता एवं प्रति प्रेम पापे रवानगी के समकाधीष कवियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रहते । 4. हरिप्रसाद द्विवेदी 'वियोगी हरि' दियोगीहरिबीका सम्म कान्यकुम्न प्रापण गुल में सं० १५५ कि. (सन् १६.) पापुर राम में मार मार पिता का नाम भी पावरेव मसाद हिदी या । सन्म ५ माम मार दी इनके पिता का सन्त गया । अत इनका पालन-पोषन इनके माना मी प्रणेताह निवारी जी के द्वारा ली भाषा में इनमें हिन्दी पूर्व संस्कृत की शिक्षा पर परी भारम्म गास्वामी तुलसीदास श्री दिनप-पत्रिका एवं श्रीमदमागक्त से गपिरोष प्रेम पा। अंगरेजी की शिका पाठ करने के लिए पत्रपुर पारिश में प्रविएप पा सन् 14. में मेट्रबेरान भी परीक्षा पास की। । पारपाचस्पा से हीरे गम्भीर प्राति के थे। बास-मुहम पपसवा इसमें पीसारस से र काम्व स्पाय इन पिप था ।दाचित् मी गम्मार स्थमा के कारण ही भारी रविराम-सा में विरोपाई। भी गुसापराप पम. ए. च्या या मोहाताप. प. मी इनके साथ ही पर्यनम अप्पपन किराते थे। प्रारम्म मैं पे भाईतवादी थे, किम्नु पमपुर की मनानी श्रीमती महामारी रेगी सम्पर में पाम पादरी बन गए । महारानीभारम्म से ही इनके प्रति पुत्रम प्रेम पा। इनके सार में कई भारती-पात्रा पर गए । पद इनि तर मारत का दीपारन किया। अपाग में बापुरातमहामनी ने पपने पास र सिपा। कि पुनः महारानी हारा भावित होने पर पारम माप ती-पात्रा पर गए और न में मापारी मापी पिश हाव-म्पानों में मी प्रमग मिना) लगेशन पर महाराणा प्रदेशापमान होगा गिमप मे पान गुम एसपने प्रपना भामही हिशी दरि म हिपा। महारानी गोगामार हिन्दी मे प्रयाग में विनीसर पर स पाम प्रहा मसिा।

बरे सम्पाम कामाम हरिती है। पिपदमने से म्हारे सा काम दिवा मामासम्म अविवाहित रहने का मतसिपा। की प्राणु में ही इन्होंने प्रेमपर्म पर तीन पुल लिखी थी। प्रथम में tी हिंदी-साहित्य सम्मेशन पत्रिगमकराना मार बार दिया । परबतर पर इस पत्रिम सम्पादन म रहे और इसी समय संविष्ठ सूरसागर का भी समापन दिमागमा योग पर इन्होंने मी शुकदेव सरासम्म सिखा है। गिनी नामर एक सुन्दर गएकाम की मामी उसी ममपी। देशप्रेम पहायता की भावना इनमें पार गरी पी। मता राय पुरत मी पनि विपीपीस' प्रमभाग में मरस का एक भन्दा प्राय है। इस पर मंगताप्रसाद पारितोपिक मी माठ मा किनु पारवार पर महोबे सम्मान को भमर्पित कर दिया। सन् १५ मवम्बर में पारदरिय सेवा संप में सम्मिलित र तया सम् .. में गांधी सेवा-सब के सबस्स भी बने। परिवन मेवा पत्रिम सम्पारक निपुलाम वा मन् ५० से परिम-मय में ही उत्पारिती की हारिखम बस्ती पेम्पपल्पाप। २.१ पास ही रगम | सर साहित्य-क्षेत्र से अपने सिपाहै। मारा सिमित समादिव य मार है। प्रत्रमापासा प्रसिर वास चीर-सवल। 'रिपोगी-रिजीमा में दो सम्परमा प्रवे रो, खड़ी बोही भ ग-मिभिवामी परमसंघलगता कामा इनमे शान पनि वीररस प्रति गि, या बारवा पा श्रेष समीर रस साप नहीं माना और रमपम साततार हिप में हमारपसंगा। भारतमा मपी में लम्पल पलमा पिएगहों पर अतिरिक्त, हार मी भर विपनपाती सैसी की परी प्रपनापा परिनस के पनिरित मन्,ि प्रेम एवं चिरा चिरा मा पदी। प्राचीन वैचारिक सामान दास मी मधि- किरमार है। पो माग पनि सामनार पर पूर्व परिमालिनी गापि भारत में मापुर एवं प्रपा । पास पर योग है। मिलि प्रारम्भमन निभाने का प्रयास नहस ।

[ २ ] प्रयोपसिंह उपाध्याय के सही पासी पेत्र में आने के बाद प्राधुनिक बरसाम्प-परम्परा में रवानगी के बाद भी वियोगीहरि' मी महीभाम निरोप सिया माता। माधुनिक समय परम्परा में रवान'३ समभान करियों में कवियों की रचनाम् मी रसोगनीप है- साला सीताराम वी० ए० (सन १८५८-१६३६ ई.) पावासी मन या मादित्यानुरागी सम्म पाएन्टीने संसद के प्रति बाम एव पुषण, इमारसम्मब तया मेपत पद्यानुसार सपा मेशी । शासपिपर इस मारने का मापानुगर रिया है। अनुपद सरस एवं एर एप तपासेना के मापारिभर म परिचप देता है। पर पाठक ( सम १८५-१६२८०) पर प्रहरी पाली में सपप्रयम मो क्या विम्यूत परिमाण में रमा प्रने पासों में १, किन पत्रमाग मी ममी ५। इन्होंने महत के मनु-संता तया बीरे गास्मिपरा रचित सिर विम'मा प्रामा नाम से पणनुसार पिया। इसी मारा प्रापिट महोत्रमारा है ममपा मारा परिममिंद पर प्रान्होंने प्रसकारों का प्रयोग मपिकमही म्यिा। इसमें सीवादिता न पी। इनके विषय मनुप्प के कार्य-परमारों तदा ममित बीर बरम् महति सदस्य पनावरप में भी विचरण है। समाम्मुपार, ऐरा-प्रेम मागमाराम पादि भाव परे पप्प में है। गयदेवीप्रसाद पूर्व (सन १८-१४) कानपुर रमिम्ममार की राप रेप्रमाद पूरा जी मे पाठ सेवा। सत्ययाय परपुर प दिनों तरसम्पमत्र बना रहा। एहोने मी पाहिदाम मेघना पारा-पर पान' नाम से प्रकार लगद मिला। इस पर उमा सिंह वंगा नगमान मिरची अनुरारो बुके थे जिनमें मनी परसता कामास है। पारमे परमा-मानामार मामा मास में प्रामारामबर पता की रममा एशिप भाति राम मगार मनि एप ररानि से मम्मपित है। गैसी तमा माग रोगों पर होहलप पपिमा।। मी मे लकीर मायों में मामना मा गई। इन माग संपत। रपमा एवं रोषा

[७]
अारिसर यह अपनी दो बसमा पूर्व निरीपम्प में पाए।
परम्परा पाए नही।
भाचार्य रामपट मुक्स (सम् १४-१६५०६०)
पापि पा राम या जीवात्र सो बोली रे मा पेभापोन
के ममें माल, क्यापि एमाले प्रारम्भ में समापा में मी सार
रचनाएँ की दी।
मेवी के पापिय भामरा 'हारमा धिमा' के मापार पर
एहोने पर परित' शिया मादि का पुफ अनुपम प है। इसी प्रपनी
परी भाषष्वा पर भारता र परित में परिभक्ति दोती है। मातिम संर
एक सप समापने हमारे समा म्पस्थित किया है। निमकान होने
कार इसमें प्रसार भी कम भार है। इसकी मारा एय, परिमारित एवं
प्रवा-युको

जीवनी तथा व्यक्तित्व . । हिमीरति परम्परा के अन्तिम महावि भगवायदास रमाकर पी० ए. एषम पंजाब के पानापत मिसे में सफादा (मक माम सर्पएम) नामक माम के निवासी और उनका सम्म विस्तीबाट प्रयास स्पो के एक परि कार में हुमा था। पहाँ से पर परिवार विसी भा गया और मुगल दरबार में प्रतिष्टित पदो पर काम करने लगा ममान्दर में मुगस स प प्रत पतन हो गया तथा बेलीप पा सुमस होने लगी। प्रान्तीय सरकार प्रबत होने लगी और सपमठ, परना मुर्शिदाबाद का भव प्पसायियों, सामरों और साहित्यमरों को अपनी ओर पापित करने भगा। प्राचार्य रामचन्मबी मशयों में- दिएसी पागरे पानि पचाहीं पहरो दी सपरि मर हो चसी पी पीर समनऊ पटना, मुमिदाबाद आदि नई रामपानिपा चमक ग्रीयी। जिस प्रकार जाती रिली पार समर या भादि धमे उन शापर पूर्व पार पाने हग उसी प्रमर रिस्ती रेपास पास के प्रों पी दिम्मू प्रसा- रिफ मातिया (अगरवावे, मी प्रादि) आपिा के लिए ललानरू, फेसावार, मपाग, पाणी, परमा पारि पूर्ण रिलो या पदरों में फैससे भगी। एदी पापरिफ जातियों में राम मा के पूपा भी थ जो समनऊ पाकर बार गा । साम्न में इन पर दावा सेठ तुलारम्म 'तुत सम्पसियासी पाममाम्पापसाला तुसाराम महादार गा के दरबार में काम नते थे और सपना बहुत बोगम मामे गाते थे। पर महानी का परमाय मी करते धे तपा महाजनों चीपरी मी थे। बायो मे पिता 'एक बार मानस कर नाब साहब ने तुसाराम जी मे मत करोष म्पपे उपार मांगे थे। एस पाजात पातन पाने में पीर पपया रायने में इस सम्पत्ति भएक पहुत पसा अंग पता गपा।' पपपि इस वरना परम इसी सम्पत्रिका मनपारा चला गया, मिगुरमके एन-सहन में अन्तर नहीं पापा । एक पर मारामनी गागर सार सापकणी भाप | काचिद मय मन परम पपा पानपदी रहने लगे। १०८पम संहार। Ref भारम भी पुप संगमसार भीम। जंगमहार भी मे पिता की सम्पचमसम्बन किया। परिचय पारपार में पूरी पार तया पर मंदिर मो बमपाये । सविन शिपाहामार मुहरा के निष्प निवाम प्रने मारे। संगमसातदोदो पुष पुष्पोत्तमदास जी तथा हरिदास जीए हरिताम जी प्रसापुरता समय में ईमही। पुरतमदास मी परसौके महा रस समर देश में भारतीय दीवार भिकपा । घरमी परित रोने पर मी श्री पुरोगामजी दिनबाप्प में अनुरक्ति रखते थे। एदान पापार पावामी मी प्रचामान। साहिल प्रेमी एवं सम्पन्न होने पारपसाने अपने पदा कम्मर कवि के लिए महान का मा, बार हिम्मकमान दानों पियामिए सामान रहता। इनके समानुसार पुमदार कवियों मेधापरपम्वानुसार सामनी रेशिपाते । मतम पारिश्री स्वामोरहा रहता था। पुपपोतमाम मी मारतेमु पार परिरण और समर्थन । पयपि भारतेन्तु पाप परिचय एमी पापु में विरोष हरपा पारि इनमें पनिर मित्रता पी। बिनोवभिपता मारत मारतेंदु वा प्रापारा में इम पदाचा प्रावे । कमि मान-मर मिटाप में पार एक पमा माँग लगे। पपेश प्रम्स भी हो नि मे ही पान सिस गरे और होगा ममोरंगमा मात्र मी पापा फोन विष पनी । मारतेन्दु बापू रस समय सी का परम पो मारतेनु मास सपरिणती सनी तथा साहित्यमों से रिपी की मोर माता पा। पस्तुतः पुरवोत्तमाम जी भी इम प्रमार से पेमस थे। मा पर मौन एपिगारिया तथा साहित्यमरीकी प्रतिषियाला बनामा मा। पुग्योत्तमाम पी को अपने पमन्य मित्र भारती की पाँ पिपरन् ५ (मन् ) भावर रास पंचामे पुपर माम मा । पद परिचमी मन नैमिपी दपा पारितोपिर दोनास दिन पिपा मि मा पत पुरन पाई। इसी दिन गिण रवारासम्म एणपराया मरियमें अधिरा राम नाम में - प्रगिरमा मलिग famtो गता।

[] सहिन्धामिष या प्रतिमा तो हमें पैक सम्पत्ति के कप में मिसा थी, साप ही गं पोदित वातावरण मी प्रासपा | भी पुपोचमदास की भाष अपमे पहा साहित्यिक गोरिपा परवाया मते थे। पास्पकाल सदी पर गुम बातावरण इनधी प्रतिमा निसित करने में सहायक सिरमा भी बापदास रमान की दास्यासम्या कामी में 1 पीपी। इनकी प्रारम्भिापा पर पारसी स प्रारम्भ हुई। ५५ बार इन्होंने भगाजी पाना प्रारम्भ रिया पार बंगाही येता दासत में प्रगिट एए । प्रारम्भिक कार्यों में एनिवार कप में दो कसा पास की। प्रथम विचको मद मुरिपा प्राप्त होती है। श्रत पर है किरपावरती प्रतिमा- सी वा धे। मारम्मिफसामों में भो पुम्त पारि पुरस्कार स्वरूप प्रसारण मी रनके पात्र भी रामप्य के पाम सुरस्ति । १८ बपी सस्था में इन्दौने एन्ट्रम की परीक्षा पास की। वत्पमात ए मे वाम भाग में प्रवेश मिमा चार १५ प की अवस्था में हिताय श्रेणी में देने पी.प.की पहा पाम इनके पी. पु.पो पिप जो अंगानी और फारसी ५, नृतं य विषय मम्मपन परान अपना इतिहास पा। सम्बर (मन् १८८४ "मैं पी. ए. परी पाम भरमा पात पपी वाण समी बली पी। पिर प्राय समीर परपणे म्ममावतः पिसाती प्रतिके रोते , वालम इतनी ग्प गिमा प्राप्त करना और भी शुल्प मताव होता है। पेमी भनुतीय म हुए थे और प्रारम्म सदी इनकी रवि सादिप की और साहमि चारमी में पम पारा रिमु पारित परिस्पितिवरा परीपा में मम्मिरित दो मरे। पठ. पम०पी०परा भी हमी पारपारा हस। नाशिद पटना क पर मपर परिमार में हुमा पा। भत गृपापीका भी मार स्यमा पा रहा था। पिर मी सादियामिचि होने कारपरगस्त मुगार व प्रपयन मते .. है " पनाम म पारमी में पाम्पसमा परम पाएमाने पगमा गरते पिकास वि में पा समान एम विय बाप्प-गुण मिना गुदम्मद इमर शत पाइनर मति मार जी के मन मेरपदा पीत फरसी मात्रा में विधमान रदी, एस पुग गुरमति के मरदाना न फम रेलम में हैं। परनी पुग्न PRम RIT Ent- . .

फैज फाज - के तसम्मम चहा बप से "ज" "मानी मुखन में असागर रहने मगा। - एम म । सम्मुग - शागिर्दी। किमी पामर पर दोन डगमप सिी भी पर अहारा बिना गुरु विनाप मर पाए थे। गुरुजी का घर रमाम यो पर से पोषी ही दर पापा । रपार नी म मिहने के लिए समय पुपमापा इस पर वे स्वयं पमाम जी के पाम पा गए जिससे रपार पीये हानि ई और बनाने इनसमा पाचना की। एक कारण भीर मी पा कि गुरु पाप्ठ पर पीर सम्मान में कामा मा । रमाम जी की गबस में रमोने मुपार कर दिए। सरदार कपिइसका काप्प-गुरु मायातालीने स्वयं सिखा- सरहार कि हमने सर्प पनी शस्पास्मा में रेता पा। 'मी ममी मुहल्स में दमारे पर से बाहीर पारेरते थे और हमारे पूरप पिता भी पास माय मापा काते पाहम कमी-कमी रमसे इस पा भीती राम तिरिन इन्होंने स्पक मुमान मावि कवियों के सत्संग से प्रा. भाग तपा मप्रमापा राप्प सपनयम प्रारम्भ रिया। मारतेन्दु पर पर दोभा भवनम्त सास गुती समम परिश्च भासपा सम पनिाव का इन पर अधिक प्रभाष पर पा. रपाममुन्दर पास जी सपा भी हम शस्त धीम इनको वाम जीभकाम्प-गुप माना है।' भी अनूप जी ने भी निपानिवनीत जी रसामीको अपना शिप्प मानते थे, किन्तु स्वयं पारणी मे मुगान-मागर श्री भूमिका में पवनीन जी से अपना मित्र सिया है। गुर को मिप्र पहने की मुत्ता कम मे म राम मोन पर सस्ते थे।' मर्मल जी मधुरा निवासी थे मतः रमसे पाने का भामर स्पामजीको सम्भपा प्राप्त ममा होगा। पर पारागा रिपापन में राप्पा पर पर मामीन पर प्रापःमपुरा मते पे चीर पहा पर भी मपर्वत जी साप १ परिषर गिरी:भी बगभाप दास रानाकर'. । २ मा.वि हिलका इतिहास पम्पहर एक .नान नागर भूमिका। प दिन हुए कि मुझे खिमान् पगदारयादीराम मा पता लगा कि मेरे एक मित्र काम्पसमा भी मनीत पीये मपुरा निवामी उसको पचाये हुए है।।

बमुना-ता बैटम ग प किया करते थे। पर सैया जी को पर स्तिा पवे पर साहित्यानुरागी) मसग मे रमाकर जी में प्रामपातली भाग का नाम प्राय छिया। इसी के प्रसम्वरूप रमाकर जो मारा में पास गरको प्रम-माश कापुरमा गया है। प्रमेट पोरये सात सगमग ३.३२ प्रारया में रसाम सीपरी भागाविमरेसिपे सपश्पन भरवानीकाप पारग्म किया। उसकी सतकता का माहरण इम पटमा सट ह। एक बार की परवाली काम का एक प्रेट मेनपगो माग गया और रगम जो उसका पता तगाते हुमत पर गय, सी परम मित्र भी दुगामसार की की सहायता से उस प्रेरक प्रस पिा।' जगमग १३प की प्रवस्मा में ये पावागा रियासत में भेगप्पर के पद पर निपुर। पर यहाँ अहवायु इस मदत सिदन हुई, मत पोदी पर पादपदोस पुनः पाबासी भाग। दि-साहित्य की पोर ली अभिषि भावेनसी पद गोष्टियों से भापितो। इन प्रकि-पारियों में समस्या पति मारती पी। पता इमामी हिन्दी साहित्य में प्रदेश समस्पा-पूर्ति के साथ ही मा भीर इमम उपनाम 'साम' मधय में पान बगामा हमके पिता भीपुष्पोत्तम राप बीमाम्ब- पिपरप हलके पर पर भी दिल्ली एवं पारमी दोगे भाशोपियामाहाता सगा पापा । पास्पायम्या मेदी भि. मामेतों में मापीर यो प्यान में विताएँ मुमा मते मी इस सअनुरनिएर कापता पर पान देम मारठेम जी मे मा बाकि पर पाशर मरिमें महार पनि होगा। भारवेन्तु जी की इस भरिप्पानी की माचा हमे पार पान बनो । मारवेतुना इन प्रोमादिव भी किरात भरम शोमान हम बात मन पर एम पर्व मनाबजानिक प्रमाण पाहता गातारपा से ही एक मार वि पनीर भाभामा पर में सो मं घो। इसी मागर पेल्समर साप प्रममा दो सगे पनि परिशिविरों मेहमी सम्पपणा में गति मैं पापा पागाई पर परमर पावे ही पर पुनः प्रमीत रोती रही। पापा रामद शहरे अनुमार मधयमारा पम्पनना १८८t में प्रारम्म 'परा-बीच १पनाएमा पास बरी देगारित्र. ११५ ॥ १.दि. मा. निदान । प्रापा रामचंद्र सक। -- - में प्रारममा मग रोती रही। भागमा रियामत के पाप्पर-सरदारन के उपरान्त इसी पम्पम्प की रचना प दिनों तक पाप गति म पली । इनकी प्रथम ममति हिंडोला सन् १५५१ (सन् १८.) में प्रमाणित हुई। सन् १८६४. में होने सारिप-सुपामिपि' मासिक पत्रिम भी निमसी मिमग मन्पादन पे स्पर्य एष बापू रेसनादन सही पर्व में इमर-दठ तपा मुनाममागरमप्रमय इन्दीवारामा। सन् १८५ १. में रमामी मम्स्पापूर्ति-संग्रह का ममम भाग प्रमशित किया। सायही माम परियों की प्रतिया सक्सापारसको मुगम बनानदेखिये पे प्रारंम पपिपों का पप्पपन पके रस मप सन्पारित करते रहे। १m ई. में उसका भिस-कामरा तथा नुप शंभु-नव पशिस और है मैं रुपाराम-न दिसतरंगिणी तया मशेताकत हम्मीर-दर का इन्दीमे प्रकारामराया। १६ लाई में मिज माग निसिपे नागरीमचारिणी ममा की स्थापना हुई थी। मरे वर्ष १.रवरी को मारतेन्दु मी माई सपा ममिर बेपरवानगपाहगाम मे ममा का प्रधान पर एपियर रिसा और भामरण रममें सेवा करत । इमी पर रापपदार पति सार्मराम मित्र पम ए. पारनारायण मिर म ए बार रामहरण बर्मा 4.मिशाला गोस्वामी पारपति प्रसाद नत्री पारसम्मनारप्री पार गदापर गिद प्रभूति हिन्दी प्रतिक्षित पफ समा में सम्मिलित ए. भोर पासवामी रमीपर ग्ममें सम्मिलित हुए । मागरम्पचारिणी-ममा की मर्म बाजनामी में राम जी का पूरा सहयोग पाला था। कामता ममार गुरुप्पामा बमापा बा भिम पर रिसर परमपि ममा में एक स-ममिति बनाई गपी पी। ग्समें अन्य प्रतिीित शिमा में महामार हिरड़ी वारपासमुन्दर दास भाषाय रामाम गुष्ट पं. फार रार्मा गुमरी माप दो भाइरपूर परमामामी माम पामगोपन परत पर पामा प्रसारित मा । मन् 14 १. मेमपारितामहिम का प्रकाराम प्रारम्भ हुमा। मेयी पुनार मिण पररारम्पमिनि माई गई निमरे गरम में गरबार मामी गम मिम पार रामान पाम गा मातिम्प्रमार नत्री बार सर्मननम पपीता गहापाम बाम । नागरी-मानी पापा जाता राम जीग प्रभागितामा । १५ मैं अममा बायपान [ . ] मैं मरम्पनीका प्रमरान प्रारम्म मातम रसाम घी का माम मी सम्पादक में था। ११.१.रजीका अध्ययन म्यापकहो न पा र गो प्रम में प्रतिमा पार्म पी। प्राचीन हिन्दी-काम्प के साप ही माप रमाम श्री मास्व-साहित्य पर्व परस्त सम्प-शामका मी प्रम्पपम परते रहे। मारत व अपम काम्प का भी अप्पपन पदोंने किया। nt. में 'सादित्य मुपानिधि पह में साहित्यमालान (काप्प विस्मय मा ५) प्रका गित मा। इसमें समाचार्यों के मतों की संक्षिप्त समीक्षा की गई थी। मन में दाम्प की परिभाषा मी दी गई पी। रससे रतलाम बीरे भम्प. शाम-मी भान का पता चाहता है। १५. में 'पनापरी नियम- रलाम' प्रकाशित भा। इसकी रचना श्री १. बामप्पा जी महाराज कौगराती जरा सस्थापित काकवि-समाय तया सवसापारय रिवार्य की गरपी। उसमे सरकि रत्नामबी मे गित गाएका अप्पन पपास मात्रा में पाया। बनापरी पर इनका पूरा परिकार भी पाने को नियम निपारित किये अप्पपिक समीचीन है। संहत दिदीमाप होसाय पे मंगरजी मी प्रापपरम रहे। जिसके ममसरूम १८१८ में पोर मे भान सिम्ममा अनुवाद 'ममासोचनापर्य के नाम से मागरी-मचारिणी-पग्रिम में प्रकाशित भा। राम जी सादिपिकावर दो भागों में बिमामित रिमा सम्वा है। प्रथम माग १.. में ही समाप्त हो जाता है। १... मैं रमाम सीजीवना कमा पटवा। पुना १९९१ में इनके साहिप्पिर पिपरिताप भाग प्रारम्भ होता है। १५.११.में माम भी अयोध्या के रामा प्रतारनारायण सिंहदी मार सेकसी नियुए। पीसी वाणी में प्रपोप्पा रामप्ररयः साहित्यानुरागी । विगोष (रामा मानमि) प्रोपाही राग गरी प्रत के अन्तिम पिए। शिव मन्त्र मुरमेय का भी प्रसिर पनि हो गए हैं। सर मवासनारायण सिंद जी तुमा माइप मी रिमी परम भनुरागी थे। महारामा पन पर्यम्त पलाम मरे साप कार्य करते हैं। पही में स्नान जी जीवन और गोपिकमा- पण दो गया.. मैं तुपा साप का म्पगबाम से गपा। पुरानी मादि में स्वामी अपना मारेपी यमा सिपा। इम काठ पना रिमामी प्रपने कार्य में इस एप पर पे। तुमा सादर [ . ] निमिवार पे। प्रवा रचराधिमाका मादा रखा हानी माविका प्रपने माई पुनको पोद सिपा। किन्तु प्रपोमानरेग परिवार केही पर सम्पन बिनका नाम विभुपम सिहपा अपमा उतामिकार ममारित पारे हंगे। इस पर मुफ्यमा पहा। रानी मारिया की वापसे सारा का रवान की को ही रमा परवा पा। प्रतामांग इस मगरे के कारण साम जी हम बीच पपिपस्त हे पिसके फारसा रिली-सादिपको पात पति रटानी परी । पचपि रपाम बीकी सदिय प्रति प्रगाए पिपी मोर पे शव पम्पो चार भी डावे पे भि जैसा एहोने का कहा किम कात (१६ से ११t) में सारापपरहरी की सेवारो मत सत्पनातापरा 'कविरल बी से मियते। मप माराम भी कम मा प्रण पही पा, भयः पदोंमे साबणारातरा जी को - इम पीच मेंबर पे अपने मित्रों से मिक्षवे तो इन माहिम की रपमा हि पापम्म दिया। इस पर रानाम जो भी मेरा। मता एम पा. श्यामसुन्दर दास जी के भामा पा लिहारी सताका सम्पादन पूर्व कार्य प्रारम्भ कर रिपा पैसा तिरमलान की भूमिका मेने शिक्षा मी- 'सर 1.5 जारी में मपोपण महीने में महीने मुझे अपनः में एमापा मारे विप मित्र मा. पामसुन्दर सभी . इस समप पीरस होस माघर पे। गम्दी भनुरोपकार्य का भीगण भा।" मता ११.से साहित्य में पुमा प्रवेश पते । १३१॥ में समारोमाशा प्रमाणित १५.५ से १५१५ पयपि समकी कोई भीति हमारे समा उपस्थित मिनु निमय दर कब कब एक-दो पदों में रचना मात पर रनामी ने पुनः साहित्य में पदार्पय म्पिा रस समय इनकी प्रबला प्राय: दो दी। उस समय की बालीका प्रचार पदो पुम था। 'निमा बी नादि भनि की पोडी में पुम्दर जिलाएं प्रस्तुत थे। पर इलाम बीबी रि-भाषा में रही। सीमोडी अपिता 'वानुम्मीन, अंग-मंग परिहाना सममः। १ पनारदीरात पतुरी, रेलापिष, पर १९. - [१] मुमिरत सारदा हुससि हसि हंस पड़ी, विपि सौ कइति पुनि मो धुनि प्पा में। वाम तुमहीन अंग-मंग परिधीन मई, कविता विषारी पाहि रुपि रस प्याऊँ में। नन्ददास देर पनमानंद विहारी सम, मुकषि पनापन , तुम मुधि चाऊँ मैं। मुनि रतनाकर' की रपना रमीसी रंच, रीली परी पीनहि सुरीली फरि स्याऊँ मैं॥ पपि सम्पभचना एनाम भी हिपे मुष्पत स्वाम्ता मुखाप पी, तथापि इस से पेमा प्राभास होता है कि काचित् सी बाती की रमहीन कवितामों को रेसम सामिषरा विता विचारीको रसपूर्ण बनाने हेतुपे प्रम्प-पेन में पुना पाए। पर में रिहसित मषि इनके भाव ? निमसम्म समान पे अपनी रचना करना चाहते थे। रणाम जीके प्रपोम्पावास के समय पुप रहने के कारण भी मदनवास अनुभवी उम पर प्रारोप मी फिमा - "रलार से मुमति २.५१ वर्ष तक पुप रहने में उमड़ी पराम्प सम्मम्मी मम मितने अंरा में कारई दीगो शायद रखने की अंश में चारों भोर का स्पेशयुक्त पापुमरस मी कारण हुआ होगा।" रमाकर जी का समाग पर मोह होना भी सामाविकीपरण उस पर इसम पूप अपिमर पा तपा रसके पद स्वरूप का निपारण एनि पर्याप्त अप्पयन पूर्व मबरबाद किया था । मत, सर 1. में रत्लाम मी प्रापद पर दी श्री रामनाप जी स्पाविपी' जसपुर मेरे गपे। वहा से बिहारी सतसई के हस्तलिखित प्रम्प एवं सम्मान्यी पम्प सामग्री संकलन सके ११९. पापमपा गपे। सर १११. से स्लाम जी ने बिहारी सतसई का सम्पादन मना प्रारम्भ मदिपा जो ॥११. में पूर्ण पारसके उपरान्त नामसी की मेवनी पाप गति से पहपी पधपि परमार के पाप से भर मी इमपण मुनिम मिती पी। १ पिणात मारत गुप्ताई १६२८ एनाकर जी और उनका गंगापरा तग । मदनलाल पनुदी, प. १.६ । २ रामनाप को प्रपोप्पा-पुरतातप के अप्प में।

। [.] १४ मा परिण मर-भाषक इतिहास में स्माशीव गा, मा मानबीन 'गगापारण समयमा प्रारग्म की गगाताप की रमा अपारी की प्रेरणा के प्रस्सम पी! १५ई. में या ममास हो गया। ई में 'रोजा वाण' भामा ना. मा. पग्रिम में प्रकाशित भा।' इस प्रेस से समापी रत्माम जी हाप बोर होता है। मन् १९३.ई. से १९५म विषय बब तक नागरी-मचारिधी पत्रिका भादि परिणामों में प्रति ए। वा पुग रादीप सागरण कामा। पुग पूर्व वातावरण के प्रमाव से ईमी पति अपये मेरा पाने में समर्म गोठामा समी प्राचीन एप नवीन पाराकपि गोयता रंग में गे गाहरणार्थ मगवानदीन बी पीर पंच राम शिबरी ोिगी हरि पीर सत्ता की मात्र रहे थे। पं.बरीनाप बी मा तयापा. मैथिमिारी गुप्त प्रादि मौ गीयतापूर प्रयों की रचनाम भतारणाम जी भी अपनी माझ्माओं परोक सके और एमोने शिवा। भारत रोटु न मारत बासी सैंमारत दुम्म सबै ठिमिजावी। स्पो 'रतनाकर' हाय प्रोमाप शिखा हिमाचल ( हिलि बाव। धान होत आइन सो सूदु कोटा पाइन मिमि बात भारत स्यागि वारस म्हें सुपारम पारस मिमि बात है। सन् १. मान्दोलन में प्रमाक्ति होकर गान्दी जी की प्राप्ति में होने लिया था। सानि पन पोसस विपीन दीन मीन मयो, मापने विगाने है कटाई माति कधीरे। कई 'रफ्नाफर' यो मवि गति सापी मपी, साधावि बेग सौ मसाति महा भाँधी है। कुटिन कुमारी के निगीरन मुसारी पर, पक्रपारि पाक-परमे की फाश पाँधी। प्रसित गुररमार भारत भयाह परे, मारव-गयन्द भै गुदिन्द भयो गाँधी है। । १ मियाज माप्त, इसाई १६५८१.१.५। २ ना. म. पथिका माग ५, संवत् १६८१,१. 11 । [ "] इसी काम में पीरारक की रचना र तपाइसी फार में होंमे प्रम्प भरने की भी रचना की। इसो पुग में प्राचाप रामपयनीया मे बिपी को प्रतिमोर मोरने का प्रयास किया है। प. श्रीबर पाठक कामहति प्रिय इम पुगीस देन है। पंत का भी प्राविवि दो पुम था। एनाकर घी मी प्रति विश्यक प्रमिति विनाई और इसी के परिणाम स्वरुप रबारक मन्तिम भाटको की रचना दुई। रमाम मी परपि पकी बोली मात्र से पिरनिधी, ममापि काम्म को गतिपिधि में ऐ मी परिक्सन चाहते थे। जैप्ता किनके प्रथम प्रमिस भारतीय क्सिम्मान में हिरे गए मारय समास होता है। पोगोरसप स्मारक-समद में मम्-मापा प्पामत पर इन्होंने पयाप्त प्रकार पासा | पिंगा प्रन्या प्य मी इन्होंने गहन अप्पपम दिपा पा । सया और पनाहरी इनके मिय पद । पे इन पदों के रचना में सपभेट पियों में से थे या रेष एवं पनानन्दको घोरर पे समी कपियों का प्रति 'वर शतनको मात्र रचना है। इसके पदों की रचना प तब हा गाती पी। हरिद्वार में पगार हमी एक परी बारी चली गई पी। उसी में 'उस रातमीदर पसे गप थे। पिना नामजी मे अपनी स्मरण मित्रो सराप द पोंके त्यों सिख सिपे, वा पद पता नहीका गरे। मूर-सागर सम्पादन कार्य सदमे सन् १८ई. में प्रारम्म किया । मिन्त दुमाग्यबरा इनहारा पर पाप सम्पम न हो सका। पयपि रसम सग केवरीयाई माग बम पे उसका सम्पादन कर चुके थे। नवम सम्प तक तो प रसे प्रमाणित मी करपा पुमे थे। इसके दावों और मी पई पापा ममापन समय-समय पर हुमा । 10. मैं 'मुनान-सागर फम सम्पादन । पनामद पर पर समपम पंप प्रकाशित हुा । 'रम्मोर-रठ परोगा रचित मा म.ममा मे सरगति म प्रमशित रिपाकक्किम-मरण का भी सपाइन इन्होंने स्पिा और मी प्रमेयो म सम्पादन मिसा। शिपाती पत्र जो पारमी में या प्रेमी सम्पादित मिया गया। निरालाही १ अपम मिम मारतीय ऋषि सम्मलन रा दिये गये माषण में शिमा १नरमा वियों का वर्तमरिचे अपनी कविता के रंग-गपा एपना प्रणाली में समय की धापना सपा समारोगनि फे अनुसार पुष परिपतन प्रारम्म१०, १८ ।

[१] ये गार में भी पत्र प्राधार पर अपनी शिरमा 'शिवानीका पत्र विवीपी। १५-११-मैं ये ममम भक्षित भारतीय र सामेशम प्रधान पमापति पर पर प्रासीबपुर । भुर्व मान सम्मेलन में हिंदी-दिमाग समापति को बुमे गये । सर १५.ई. में बीमालिक- भारतीय सीम-सम्मेलन मी मभापति पुने गये थे। इस सम्बन्ध में एक पिरोपमा पतिकी मातीपा समापति- पर प्राय मखिये गए सब अपने राममी पपा में गए। सम्मेलन के कार्यपामा की शारवा योनि परामाशी दुपट पीय म्मति सभापति गे पर राम पर पहुंचने पर उनकी प्रापित लाकर बीटा- बारदेवास भारपा पक्ष पश और सागता पार पादि सारे वर्नेहरारे पपे। विस्तार व रामाभों एक ताइवारों पगारमा सामान्य अमवा इस बगबिरोप घेणो गईभी। मा पनि नबोगी में ऐमा दिपा तो पारासर रणामबीर-साप एवं रोमाम किसी राग मातामा सेमपा। कि साहिरपत्र में उन्होंने कमी भातस्प कही दिलाया। प्रीम बम्पतीच करने के लिये पे प्रति अनुसार १ मी पशिस गए.की धास्पा शामरोग गपापा। पर पैसे से पूर्व सरप थे। वार्य करने की मालम गुती सादिक से अपनी पूर्व सन्ति में करते थे। १५१९. में १ को ला सारसार अचानक ही होगा। पके मित्र इनकी रमा मुनये के सिपे मुकदो रहे थे। लि . पूनमे सपा ममता पर नमे पात माफि लम भी प्रतिम पात्राम युवापसी सिम र निम्नलिवित पा दो ११न को 'यति परिमोरी के पिता राज की रानी की बारवा की मासा मेरा गपापा। रानी बिरामी निहारति सिंगार-हाट, पारति मीठि गम विविध पिसाती पे। पहे 'पनामाफिरी स्पो फैमी पर नीच, सक्यो नगीनीष परम प्रपती पै।। परसव पनि भनपान परपूठी भानि, पोषक पएक पाव कीनी पूमि पानी में।

(१) मनफि मगक र पफि धरा पे परी, कावी नोक गप्पर प्रफम्पर की छाती पे॥ रणाम जी रमा शरीर के थे। मन मुत-मएस कान्तिमा पूर्ण पोपपूर्ग पा। पास में किसी को भी इनके तानुसार होमेका प्रम हो मम्मा पा। मा दिइनकी सभापति सम्म भी परमा से स्पष्ट है जो इनके सापसाचा स्याम पर पर्यघी । नानी में मिस पुग में जन्म लिया पा पा मम्पनसीम सस्कृति का पा शिममें सामन्ती प्रमृत्ति प्रमुप पी। रत्नास जीका परिवार भावारी समई पारण सता मामन्ती प्रति प्रपान पा। नामजीव मी पापागा रियासत एवं प्रयोपा परबार के प्रभार मे पता रोगुण प्रपान हो गपे दी धारचर्य ही पा। किन्तु इसका धर्म पर मी मना रजिन होगा कि विधामी धे अपना कार्य भने में पासस्य इनाम जी के पास भी रापास्य । दावन में गोपासमामा स्पारित किया हुआ पारमय प्र मन्दिर है। गौदीय माय सम्पाप में इसम सम्पप है। नाम जी पूर्ण स स भक्ति मागणे थे । बिस प्रमर सूर रास जी मे मन्धि धर्म का अनुमाइन बिपा। उसी प्रमर रहने भी किया नरेश गोपियाँ वर्क में किसी भी बीस परास्त करम में समर्थ होगी। पसीचाची नेमाते भगवान् राम पर इनामी प्रहाका दोमा सामा- विदरबारजी मी शिब जीया पापि परम परतेप। पर्म पिरप में एलाम जी भवपिरगार थे। कि पिप भी माम्प्रदामिरवा रनमें पररा में प्रारी गई थी। गंगावतरण की रचना से गंगा जी के प्रतिमा उनकी रामपामास में मिस गाता है। समाम मीही परिप्रम में रमिमा नामस्म-माता पि-समास श्रीपापना ई गिम में बराबर माया मते पपा प्रम-माग गरिमामे मस्मादित मिा रखपगी में गाराप्त मदिर में पषि-समाररोग देर भारती भी। इसमें भी ये प्रति दिन गापा मते । मे भी १०० गौग्यमी पासहप] महारार, यो पोमोती मठ पुरमिपति धे, स्पापित म्पिा पार में मारोगाने पर नहाने इम मिमारी सम्पना भोर दाधीन मी जप तप परेबापापरते। पद ममार सम्मोपियों तथा समापारण रितार्थ पापित म्यिा पाया। रमाम जीजी महारारा में प्रगाा मित्रता पीपारेगनुमार पारी- . ।

(1) विरम सनाका की रचना की थी। नतीभावानुसार इसे कवि-समास के हित के लिए भी रामहरा पो ये भारत मीचन प्रम से मुद्रित किया था। माषा स्वामी पर से बाहर ही रहा मते थे। भीष्मकाहो सब पक. वीप प्ररंगों में ही पतीत करते थे। पर पे पाँचते थे अपना सारा सामान पते थे और साहित्यमा निरन्तर हा बरती थी। पेम्मी पप रेसिचे ििततमोते । प्रामा हरार में पे गर्मियों में बाते प। इसके साप इनके सिपिक भी बाते पे। प्रतिम वियों में पे सूरसागा का सन्पाय कर हथ । भाने शिपिकों को भी पे कई बिमागों में पटि खते में। हर दिमाग के शिपिक को भी प्रमग-प्रसग कर देते प। प्रयाग भी मावार। प्रायः बालों में पे बबन मस्ते और घोप्पा-भवन में टिका करते थे। रस्मार बीम पारस दो समुहम चित्र है उसमें ये प्रमा सीवार पापनामा पम्प पू गोस रोपी बारव किए और पाप में पतसी पीसिपे हुए है। पर रलारजी की सदेव मे पहील-मूपाब पी। भरने जीवन के प्रारम्भिक दिनों में पे पारसी म्य-भूपा पसन्द करते थे। धोती स्तों और पत्ती येपी पारप पिया करते थे। कमी-कमी अपने समान में पे पगली मी पहनते थे। इसम पगली पदसामा चित्र रनाम-भल में पार मी पुपम है। मामले से और शुभ दिपे मी इमाम पकनिक, इस चित्र में ये बसी हुई पापी पार पडी पहने हुए है। पोती के सपने माम रेशमी दुपहा मी गाज सिपामते थे। इस में भी इन पकसि। साचित् अपाप्यावास के बाद से इनाने स्थानी रूपम पीबार पानामा, को और अचम्न परिवान अपना लिपा और जीवन पर्यन्त पे पेही पवार करते है। पर पर मी पे माल पर इसी बप में रा। एलानी सम्पप्रता पूर्व सरिके वातावरण में परे स्वतः वो सामन्ती समारपेही पा स्पोमावास से मकान में पिरोप स्म से परिवर्तन से गपा पा। प्रब पे दीवार के पद पर थे। प्रतः अपने सम्मान में कमी न साना समते । रेशमी पत्रों का उपयोग अधिक करने बगे। माप चादी पात्रों का उपयोग भी पर्याप्त म से होने लगा। बालों में मर्मा भी गाते थे। ग्न दिनों इसम भान पा । पान मीथे पादा पाते और सपने में ये पर्वम अनुभव करते थे। सर्वसाधार अपने सनिम्नस्तरका समाने लगे। पहले की तरह अब समी से दास्प- बिनोद मीभ करते।

। रमामजी भोजन मी संपमित स्म से मते । ये सब एक ममम रोपहर में मौसम मवे पे। हमें अत्यधिक मिस थे। दिन मर प पद्ध पापा करते थे। इनका समाप इसी पा निर्मर था, कारण मोमन तो पे एक ही समप पिया करते थे। राम्रि में नियमित रूप से पदूम पिया करते प। रयान बीमत्पषिक सरस, स्निोमिप एई बार महति पन्दिये। पान प्रेमी साहित्य का भी पर्याप्त पप्पयन किया था। पोप का 'पसम मॉम परिसिम्म' का तो मे समाषामार्ग' नाम म अनुवाद भी म्पिा है। निमन को अधिक पसन्द नवे थे। ये पारसी में एम० ए० करना चाहते थे। फारसी में तो पिता भी परवे थे, हिन्दी में तो इनका चार में प्रकारा उभा । पाहाण बास हल 'महाराणा प्रताप' माममारक में एक गहल मामी की की सहायता सेरीगा गयी थी। १ सपासम्म रासमी मे नोट में लिखा है। "या गमत मिपवर पा पगमारास पी.ए. 'रानापर' की सहायता से बनी।" राम गुमराह दिदगी मर इलाही दोषा लाही सोपा । वसा में मेवी दीवार पर परसादी वाराही ठोमा ।। दी इसलिये मुभा पादशाही कि तेरेपदों को पईचे पाहत । बले विसा मने पुरम इन पर इलाही साता इलाही योगा ॥ पा सगा नपसरवरी में न रिल दिया दाद गुरवरी में। पड़े मरी मन पर पर परपर साही तोबा पताही ठोया। पहराना गालिम पशी का परके किये बहुत मुत्य पतद हमने । यो स्यि और उनपे पावर इवारी तोरा इलाही होगा। मला रो रस हर पारसा का साया प्रोगास जिसने पाता। रिम्स एमास मरे घातर इसाही तोपा इसादी सोगा। पुया है दामन गुनार यो वर गिर निचा सारमा ममी पर । ठो वार्ड में उसमें या सर इलारीमा लाही हावा प्रपन नरे पापणीसो परम पाए मासा मुझे मुरमा । नही मोर पसार इमाही पोरालाही तोया ॥ नसा को रिपार पर मरे की तो पोमुशीराम मुगलिसी है। निपार मरनी करम पर सादी टोपा रखादी शोमा । रापाराप्रपामी, १५ १६२९३।।

। [१] इनकी विभिध मना पनि प्याप इनके मित्र मी पिमित्र प्रकार के पे। इनकी सरबता से समी इनकी ओर भाति रोमाने पे। इनके मित्रों में समी मरम्पदिये-शाबर मंत्री पो-सिव पुपर हिन्दी कवि ममी सम्मिलित ये सपनर में जब पे पावे ये तो प्रापः बिगा शेिष रूप से पाये थे। एक या रसाममुना साप्तमी पर दूसरे मिभका मन । १.हप्पणिहारी मिनी से इनकी अपम्प मैत्री पी। बामना गर्ने अपने पर मनापा मते थे। माधुरी का सम्पावन बोरम गबीसी पर गपे तब भी रमात्माजी अपये बसनल भाने की सूचना उन्हें पकनार रे पिपा समरमा बायाप्रवे । रमाकरसी अपनी बना पनाम सेमवे पे भाभा पनाम में दो पदी रपट होते पलाकर तोरल उत्पन्न होते है। इस पर मिममी के गम्मार दीमापा कितनाम में तो और मी गुरुवा, पनाका तो पता पही परतेपेपर प्रहालयवाद। पंचग स्पिर पर एबारीसमाव की मिसा न TB मसर के पदों से प्रथम होती है मेरी प्याक इसम में पथराधि सारूप से सम्बका यपि इस पिपप पर विसने मेरे एक मति के प्रयाप्त होने से शिमबासी म रसीदोभाने सम्भावना है समापि पा समपार रिमा मताकि परिमी मेरी समय में मूत होगी और ई माराम सा मुमे तिरंगे दो इसी बात से समे शिवा मिलेगी। लिनु र मिना साथ ही साप पलामी में गर्व की मात्रा भी पास पी पपि इस गई ने बमगाम नही चार विमा मा। पोका पावर व विनवास प्रामात मिन्न मरना ये सारी बालगा। अपामा मै दिन बमदेव जी भाप ए में रत्नामबीच पनौविस्प बात मा और इनाने ग्ने साम ये सो समाम दिया। पपि रतामनी मे सहन समाव से दीमापा मितुपासी उसे सनम गम्भीर रोगे और रलामी समर खगे। इस पर मारपी समय परयों पर गिर परे । रप्त समय शिव परदेसी बम प्रतिधि भी चे मता काचित् पहिये रत्नाममी को और मी यानि होगी कि प्रतिषि का सम्मम् सम्मान को सम।। १ तारिप-रनाकर की भूमिका ।

रवार बीमे गंगावतरण सम्म प्रारम्म में अपनी तुसमा बाल्मीकि मे परियों से की- "प्रेम जुग मुनि पासमीकि द्वापर पारासर, फसि में यह सुनि परिव चारु गैहे रवापर" इसी प्रकार से अपने की रपार मयात् काम्पमयों से पूर्ण पिणात सागर मानते थे। पमाम से अपने को प्रेम में उगम्भी संकोच म एमा। यस कापी में कहते है- भाव प्रभेद परम भेदी गनेस से, रस-म्योग मापार्य थारुमति प्रिंयकेस से। सुचि सौम्प साहित्य सलिलधर गंगाधर से, रोपक कवितारत रुचिर गृह रवाकर से। मनुष्य में प्रामाभिमान पोना प्रत्वपिक मापरपक है। प्रतः पति तामसी में पा तो पति ही मा। इमी इन गोंदियों में अनुचित करना रीफ मारोगा। पैसे सामाम्प सप से तो पे भरपपिक मरस समाप धे। पे किमी का प्रामद टाउने का साहस म करते थे। हिन्दी साहित्य सन्मान में मार राजेन्द्र प्रसाद जी मानेवासे थे। पता इस सोर्ग मे रमसे पर पारग करके जाने का प्रामद मिया और राहीने इस मामर सादर स्वीमरर सिया । इस पर किये मत्पपिकवान पे। किसी भी परिकी काम्पतियों पर ग्सको प्यगत शिका पर्याप्त ममाप पड़ता है। प्रतः बाम जीबी एव पर भी परि सपना पित दी रोगा। रमार जी को पन में कर पातमे का शौक था। भनेक प्रकार र रमाम जी पाठा म ये, गिनन चित्रय रवासी नंगापवरख में इस मगर रिया- खल सौ सल टफार , सच्छलत उमंगत। पुनि मीपे गिरि गाजि पक्षात सत्तंग तरंगत ।। मनु फगदी मोठ गोव के गोत सहाए । सरि प्रति घटसरि गोति गुपि पलत सुधार IREL (सहम सगे) पुरसगरी मी इहें पाठ पोक पा, मापा पे पोरे पर निश्मा पारे । मानस दौरे पर एस पसे गाते थे । साम्पा पाने पर प्रपम माग पृ. २० २.१८॥

[" शमीम मुसवारी दो पी। गत मा नेपाल यामितार परंग तपाबीन पात पपी हरममावे थे। परत वासना मी इन्हें पसापा। बम बनेकी स एवं गति अ अनुभाग इम इस बात से तया सकते हैं कि कई बार पे ऐरान से मी वर पैदल पते गपे पे। पयपि अपोषापास बार सूत शरीर हो जाने पर प्रतिरीरिक परिणाम करने में मममभोग सशपि इनमें रिकी कमी न पी। मात्रा में प्राय पदद दी दस जापा मते पपि भार में सपनापनबाने से होने पर पलना पोष शिपा पार कर दसते एमाले पनि सारी साम वीपी और से तो ममाही पर ही। सन् 1.1 में एक बार पे गोपे थे। उन दिनों मोय मापापा मार मारप में हुमा पा) या एहीने ही एक मोर परीर बी भी पापी सी लिया । पाये वोससान का दीवा, परकी भर आने पर बाद में हार रस किया। प्रायः मां मोगरे पर सिबा बावे थाना-नई मोटरी सR चिोप पी। '' में इमामे मोय पिप में पिता- पौन पेग प्रति मौत गौन मोटर मनभाए । ध्या फलित गौरी देश के विस्य पनाए । रन विमौ परे पास भारि बरोरवालों पर रिखमा या रिख पातामा मधि मानी बादीबी। मी इस मामति प्रेम पा धीर बने पर एई मेरे पारयोरहित रिपामते । सम्म सारिका हिपे पा मारत हो पा मारतोस पास पर विचास मी ममा पनि क्या पसम्मव-सा मत होता है। पाये बात हम परमपुर। रसम इन इतना पारा घोर पाकि मा ताकिम ला दिनमात का साथी बना पार में, Sawar में, मे में-ताप या मिर स्पाम पर इसके साथ रोमा रोना भामपामा। पाकिबोरे पर सपने पे दो पापाय पर भी इमरवा राता पार HANTE से शाम पीते थे। मीनभलि कुले साप प्रीन बेप-मपा में है। यह रिप मुझे उनके पौत्र भी रामागे की हा से ऐवरे को प्रम एका एकरस समय मा इस पार मारे लिये निधुर पा । बपि अपने नाम में इन्होंने ही १ रानाकर मा. ११४१ [१५] अभी रोग नहीं किया है पानि पुरके मे काम्बनचना की मेरया मिस मानी पी पमा अपरम प्रतीत होता है। मातील शिलालेखाको पाने की फिरनी पड़ी परत पी। सबाट ममुराए वा बारे परमपम प्रसारण पर मैं क्या दूसरा समापन समारत में मिले थे। इन पायों के बारका खेत परल में नाम सीही समस पपसलमर बार अरव पर या क्षेप या प्रप्रय विद्वानों में संग मात्र चित्रपारी समम पर ही दोर दिया या म्नि लामजी की सौम मे मे सब माना धीर । पाने में मी पण सफल हुए। इनके सत्ता भी पेश 'शिवारिक सासार्टी जनस में सपा 'इपिायन रियरिम्स धारको पारि में प्रकाशित हुमा मते थे। रमार की मास, सस्कृत पूर्व अपम श में पर्याप्त चि रमले थे। इनमें भी सगाने की मम विलपग शान्ति थी। ५०पर गमा गुसरीजी ने पुरानी रिपी' मामा पेन में अपना रिपा और सिका। रिसमा रचित प्रर्य रमान जी से हात मा पनि मोना पिार मी रममा पर्प मसगासमा मदन कानुनी अपने टेप में सिसा है- 'रस्माम भी देगल कविही महीप बस्कि माहस, सहयअप्रेमी, भारती, ग. पौर अन्य भागों के पति भी है। भाषा विज्ञान के सा है। पुराने प्रेपी का उनका अपदस्त पम्पयन है। कविता रे बाप ने पति सामसुन्दर दस जी में भी रबार सीरम की मता सिपे हि "पंरी या पीपाइपों और दोदों का विवरण भयपने में पर बरेदी नियुग। पम्पिमात प्यास ने मोरीगाम की मशंसा की पौर • गगामाप मामे मा विहारीरनामसपाहिला है, "इस प्रयमलने से ही करमामास सरपर ही नहीं बरिस बरेमरस रीसमर भी है।इना पत्र में रहने मागे काया कि मरिक- मापने प्रविशा की कि भापकवान भी बोगिचौर मनाएर १ ना.प्र.पत्रिका माग २. १६८.४१२ २ एनापर मोर उनका गंगापवरण सलमाई १९२८ रियाल मारत शिरिद माता श्यामसुंदर राग ४रिदारो पिस, १.१८. पम्मिाम पाठ । ..पिारी एनार समापुरी। १२ नाम, १६२६६.।

J I ..] एक भी शिलंगे। इसी पूर्वि रलाली ने इस बारे मस्तिनाब रकीहो। दोहे वारमईम हो सकते हैं पर रलाम जी ने अपने से मोह में गति भर्प विहारीमानाम में अपनाना है। इलाम जी की इस हिमाल इस हि पर पिपास नहीं होगा कि सीन करने की शनि एवं अश्विा शकि पदमरेलिय। कबिता कर एषभरने की गति रलाल बी में समान भी। रमतरी के शासन मी शक था। शामिद का न थी। प्रस्पोन्म रस की भी बैकका प्रभावाम रहते थे। पपगी मनाई श्रीपवियाँ मुरति १ बो भावुद के रंग से बनाई गई थी। इनके इस बात अमके काम में या तत्र पर्गन है। पप UP में सभा पर इस माहरण रस के प्रयोगनि के मुखर मुगोगनि के, जैते धार पार मनु सुखराई है। विनके पसारन की परचा भावे न, देव ना सुदर्शन है यो धि सिर्ण है। करत माय ना मुमाय लखि नारिनि धे, माय गणें अनामिनि में मरद फाई। गाँठो विपम पर-वियोगी पपाई मा, पाठी न पेग पयपद हैं। रसार मनाने की विपि निम्मरमें मीसा साप बबीता पापित-पारदी दम्म पुगी पूरि अज-मग-पूरि प्रेम-भूरि सुभ सीमी है। थे मनाकर मु बोगनि विधान भावि, अमित प्रमान माननाम्मा गुनीनी है। मारि पट-मन्ती मनाम पारि समे, गोपी दिशागिनि निरम्पर गीली है। पाए टि अपर पिमूति मध्य भावनिकी, प्रयनिधेपिर रसायन रसीसी से 100 १ रानाकर ममम माय, पृ. ११४। रशला । ११ ] इसी प्रवर 'गार सहरी निम्न पंचमी उन परशान मक पता:- बाल बाल परी है विहान नंदलाल प्यारे व्याम सी लगी है अंग देखें दीठि जारे देवि । प्रेम लोक माम मिनि विरह त्रिदोप मयो, कई रखनाकर' मुनन नीर सारे ऐति ।। सत्तर घनचर से हारि रहे पामि मुम्य, पन्द्रोदय माजिरी इसान है पुनरे पेवि ॥ झोपरी मइ है दुखि यापरी माई मति, भौरहा है मुपि राबरी विसारे देवि ॥' स्मारजी गरि यो पपपाती । कदाचित् पह माधुनिक प्रमाव मापसमारकेसारा रम पर पहरा हो । बम विचार या पाकि मुसलमानों को पुनः दिन्न बना लिपा मापे और सारा पगडा समास दी गापे । पिटम गाती में माप सम्प्या ममप निफालत थे। फिटम का प्रत्यधिक सौरा। पुगबम्पा में पद शारीरिक म्पापाम करते थे। मुग्दर मी मांगते थे। बोरी धुमाने का विशेष रूप म इनशर पा। पापम्पा पाने पर मे मे पोर दिया पर कमरन मईव रिया फरसे थे। रनाम पीके कई मिप्र थे। प्रपाग में रामनमार मी पो तया. रमाकर या राम इनके पनिर मित्रों में में थे। हप्पकर में पा रपाम मुमपाप जीतमा • कृष्णविहारी सी मिझ भी रनके परम मित्र थे। इसके भनिरिटप. रपमारापय पाएषय, प. सुमारेतात मागम तपा पं. मरीनाप मामी मारपमिप पा । मी में परिमीप मी, हासा मगवान दीन, पा रापाहरााम पा.पसम दाम, प.रामनारायण मिश्र पारि नई मिप्र . रामचम यह जी पासी पान पर सपमपम र निवाम-पान पर परे थे। परबार नारी अपने सर रोग पा इलामबराने दिल्ती गप मे। पीएम मर ५. पमिद शमां से हो गइ। रही पामर पर मदप मारी मापदमाग पपे। राग की परा पम सम्प- भी प्रारम्म हो गई । सविदारी म पिराइ उन दिनी मादिपिक में कमिप रिप बन गया था। रमाम जी पूर्व प. नापामगर रामा दामों १ राना,दि. मा, मार मारी, पृ. १५८.१४।

हो विहारी के पास मत देव प्रतंग में संकर बी ने लिम्बना कर सुना रिपा- न जी आज की बसना से मरे, स्मा सत्य के भूठ से क्यों मरें। विहारी भागे परी देय की, मही नापसी दोघो क्या। इस पर सब सौगों मे मा भानन्द विपा । एसी भीमा पर्मा से भी नाम भी प्रयास था। श्री रामहर बर्मा मास्तमाल प्रेस के परम्परा की कविामा मेर गित करना चाहते थे। किन्तु पबनेग मी विच पटिरता से मास होते ।यादीनि मर पोरयार दी कि मी कि परमेशजीवित देता रमे मवि विच एकसया पुरस्कार सम्म मिसंगा। माम बामे स्वयं 11.पिच पण मीयाम मे जोपन बना गावित बनेगा श्री मी न पार। सब मिहाम नामे रामान्य या की शिऔर रनसे सर बमबम सिपे। रामझप पा सप पप्प मर्मेश पे, चिन्तरलामी की अनुप्रा माता कापलामनगि रिती कोरसाद सके और पुरता-सम्म पाप रेरिपे। पारमें लालबीरे सये पास और मामेव सा बिगा। रलारी सिाद-पियाममा एक मुम्पर उदाहर। सपने में तो 'मसार ही मिन । प्रसाद की और नामी में सीबापता पी। माय-साम बैरम वर्ण काम्पस में day समते। परपीको नामबी सारा पूर्व मुखमसर मासपा पा। भयोमा में इसके साथ ही दिनों सलामी FIRE पाए कमी प्रम्प बी पी पास ग्राम रो पीर मार अपम पवित मारतीय वि-सम्मेहमी पर मार गए। जनपकी से पास हुआ है कि स्वामी भी रेसमी पेन मा भने गससे महाले । मम-समय पर साजन मुप से कामपारा मसीव हो परती की। इसमें प्रपदी मीरा अनुभव म्मिा लाम भी गारतमा नपुगोंधी साहिवरमा दोपों पर पार नहीं है, १ माप विहारामनार, मगमा १८२९.प.५०० २. रेशा पितापनारसी पास ...।

[ २ ] परितु पाममने पे कि सप समय पाम सोको मागौ। सबसप अपने काप्यारी मेम स्तर पर काम्पसमा पाप समयो । रनाम भी रमिक पन्थेि। उसी सिम्या पर प. गिरिगरचण्ड 'गिरा में विज्ञा: "पा जगताप पाम मी० विगपास के मगमग दो माम पहले रनमे मिलने का सीमाम्प प्रासमा मा। रमकी सरसता एवं सरोजिनके मबयुषा प्रेमियों के सम्मुन मी उनकी रसिकता की प्रतिका सपा कर मन बरती पौ। नारी हापम के प्रति भयव प्रमुराग रमः प्पकिनकी पहुत बड़ी विरापता भी भाप मेटा मी पदि मापने उनके पास पैर हिमा तो इस विशेषता की प्रमिर पाप ने अपने इस पर अंकित होने देवर दी श्राप रर सकेगे। पचपि इस पन में प्रतियानि है। एमाग बी से भी दुलारसात मार्ग मे भारसी कह सा है। बरि पर हा पारोप मीमा का सम्मा। प्रयोम्पावाम के कारण पलानी एक सामन्ती प्रति भवरप घे पर माहसी ये।दा सप निरने की भारत उनकी एन गनी पी। मम्मरना तो करते में न्नुि पासपमा प्राविपिना प्रत्य लिपिक मनपाते थे। विधारम्भलाम में एमामीको पवितम्बमा पाइसी पर ५. दुसारेशास मागम ने उन पासमा की रपाधि देसी। पास्वप में भी प्रयोप्पा-पार मे दिदी-सादिस्प को भार पनि सानी पी पी सरी और साम मी मा । पदिये अपपा में महोते तो पिदारीमानामा सम्पादन सम्मपथा। समाम बीमारिरिसना से मुर। नामापीन दीप तन-मन-पान से बाम्ना में मादप-सेवा करते थे। गंगावतरण पर १३.. सपे का मगलम्सार पुरम्मर मिसापा। राहोंने मापती-मचारिरी-समासे २ दिया था। मा अतिरिरमो पना पर हिन्दुस्तानी-पडेमी से मी.. पपे का पुरस्कार प्राप्त पा । 'मूर सागर' का मापः एम म्म्प तक पा-मीन शिरिफ गमपमेही म्पप पर सम्पारण पूर्व महान पिसा। पास में परिनामजी अपधेरपरी म मेरपा मिसती हो गगायतरणपरिमाए पुमा दोता। एमामी ने गो पर समर्पित रिया सममे प्रतिभा माम पुरस्मरी पपस्या की गई है। लामाका पुमारासप भी म पुपति में सरगरपान के पमा समा मैदान म दिपाया। इस १ मा हरिप्रोप, . २८ ।

[ २ ] पुस्तमप में सूरसागर की एल-विजित १५ प्रतिपाँ, ' गिरी ससा हस्तलिखित प्रतियाँ तथा अनेक प्राय पुस्तमी । एलाम बी में अपार वगन एवं पूर्व पै पा। पापावाची लेख पाने के साहस से रमकी सपना पता पता है। सूर-सागर से महार प्रम्प प सम्पादन, यह भी बिखरी हुई सामग्री को पत्रित करके, महान् बर्ष की अपेक्षा रखता था। एलान बी में पुस्म पराए की राशि पी। इनके सामायिक एष मनोवैज्ञानिक विप्रस से इन परस-किस पता चतता है। रलासपी ने च भारत के प्रापः सभी प्रसिर पर बने पात्रा करने में पर्याप्त पुष थे। पचपि बाबर बीबपी बोसी पिरोपी पे किन्तु फिर भी गन्दने सही पोखी में दो रचनाएँ की है। जिससे अनुमान होता है कि परिये और दीपायु होम स्वर्गवासी होते तो सभी मोदी मैं मी मुन्दर रचनाएँ कर जाते । क्या पित् ग्न्होंने इस दो बन्दों की रक्षमा रके बनी बोली में मी समागका बासिय पूर्व माधुर्व जोगा। रखाम बी तुलसीहत रामापर की टीम मना पदवे पे, पर पर कार्य उसके असामयिक रिबन पेमही हो सका। बिहारी पर मी एक पुस्तक समीला के रूप में सिखने का विचार पा। इसी गोरप मे प्रायः बिहारी-सम्पन्धी जब तक सिखा करते थे। परिनीको पुस्तकमका पाप किन्तु अब समय पौत्र नीरामहप्स बी में पिारी पर उनके समी जी को एका के पिवर विशारी नाम से पुस्तक मशित है। रमामबी अपने जीवन मा में रिमित मस्पानी में रति पमि- समय पर मिले पेनिमें तो ना दो पुरे पर अब भी पई अभिनन्दन पत्र माम-मबन के पास में पगे हुए है। इस मान पहों में ग्ने ग्पाधि मी प्रवान की गई है। मापा मात्र पत्रम् सम्बत् ११.०, पौर मास, सपा पर परमी को भारत पर्म महामात बारा मदाम रिमा गपा, दिसम भाप हिन्दी माश की निपुरका पूर्व गीरप पाने के गुणों परण की मुकाम बाम पापि मे भर्मत किया जा रहा है। संत विद्या मान पत्रम्' प्रपोपा की वित् समिति समाहारा सम्बत् ११८५ प्रतिक यह पामी दिन प्रदान बिमा गरा मिसग भाव मिम्मतिपित। रात विधा में बोम्पसारे मरण समयता से सनिया और साम्पास एवं सम्मान परि दिये 'साहितापामारी की रपाधि से मल प्रमे में दम ममुदित होते १सपा सचिमात् परमेरमा से प्रार्थना मते है कि इनके पाम्बाप और । [२५] पापारिमा राशि में प्रतिरापदि होती है। इस प्रकार पियर मुपाम एवं 'मारिपाच मी' मामक इनकी उपापियाँ पी। भर मी गरियो मिती पी पर बने मूही भाभ। "पनि अपनी प्रतिों से माधुनिक हिन्दी साहित्य के तीनों का देगे पे पर एमारे साहित्य में गो-यो वाम पापे उनमें से प्राह पबत का मांति गरेर.एन इस कपन की सत्यताही सामजी म्पनियमहता है। से रहामनी रतिमन कापरे पम्तिम परि मान गप है। वास्तव में पूर्ण दिदी कहासिक कवि थे सिम मार मानना की दुदार देना । पं. गामार वामयी जी का मिस कसम उनके रिएप में गोसनीय है- "पणन जी की मनोति मप्प पुग की-सी थी। ये मम्पयुग केही सारण मैं रस्ते में और अंग्रेजी पाम मी उभाऽमिकता मे कोई विशेष रपिमधी प्रन दमदमसे 2 प्राचीमता पपपता थे। उनकी प्रति प्रचभिर बिनम्र प्रतिसकीयाममा महीन पी। उनका सपना गरप मी मना मन मुनापही पायरी एन्टि की मदचा मानन पाये मतप। पर ग्नी पाप्याना में भक्ति के साप दी गारिक भाग्ना उम पुग की देन पी। पास्तव में रति स एवं भावनिक काबीचको पीस ममम पवागी पुचर गंग रही थी। रपारी का दिन गति गौरव प्रगप था। मारतवामियों को रन्दोंन प्रभाव भी दिया है। पौराशिमा मे ग मोर पा। रिमी रहन-सहन तपाबर भूषा स रयार जीपापुनि मास मी परन् सात्मीय नगरे मम्पपुगीन पति नन दो पौर तिमाहान पिप स्मरण दिलाते थे। रवार की पवि ही नहीं पे परन् गम्मोर विज्ञान मा पे । प प्रापान मारिया मशाग्नंगानव में रामसरमा मा ममा । मकी दिय पगीन पी। पारपे। रनमें गिनामा पी और हमी दुरि गरप्ति रोम सरसता मेरते थे। रन्दौर दिदी मादिय अनुपम रप प्रदान मच्या भरने पक्षिय की गम्भीरताप्रापार पर परमाम रवासमार्पटपरिपा। - । ६.पर मापा इतिहास, पर। रिलीमारिय: बोमनीग्रताग्री पृ. ।

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युग तथा परम्पराएँ

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रणाम बी की प्राविविधतीम परिस्थितियों मा सम्प पप्पयन मये सि पर गपित होगा कि हम ग्नें प्रापरपा प्रमों में पिमानित का है। राजनीति, समाम, पर्म ज्या प्रर्म के प्रपान पेत्र निमकी भूमि पर पदाप मते हुए मनुप्प को पागे परना पड़ता है। अतः इन पेनों की तत्कालीन स्पिति रम प्रतिम निर्माण करने में बहुत अप मरण यमती है। इनके प्रति रिम पतिगत परिस्थितियाँ भी होती है जिनपर पति की सफलता प्राधित रहती है। दम पहो इन परिस्पिप्तिपों पर एक सामान्य परिशसमे का प्रपास करेगे। राजनैतिक परिस्थिति १०ी शवाप्पी में ईस इंडिया कम्पमी प्पागरिकसे राजनैतिक संस्का पन गई। इसी रपरान्त पासिंपामेय का नियत्रण कम्पनी पर पाता गया। १५ शवादी रेपूर में पार्मिक स्वतत्रता भी पोपित हो गई। किन्तु भारतीप अपनी पराधीनता का अनुभव करते हुए राममैतिक अपिमरों की पौर विशेष सजग होते जा रहे थे। सा मप्र और राजा राममाहन राप के प्रपाम से भोली यि की स्वीकृति दी गई पी मिससे मारतीप अपनी मनारोडीय स्थिति समते बाहे।१५ वी शताम्दी के माप तक गदर के पू गुम्-सौ पैमी परनाएँ ई मिन्होंने भारतीयों को असन्तुष्ट किया । पंगार और सिपी साधीनता का अपहरण एमा। मंसी की रानी को अपना उत्तरापिमरी पोर पेने की मनाही की गई। मिपिस मसि की परी रामों में भारतीयों के विश्व अनुचित पपात स्पिा गया । भारतीय सैनिकों मरसाद पार भेगा गपा प्रादि। पद सब नियता भारतीयों को प परतो गई। यातायात सापों का प्रचार हो जानेवारण विचारीके ममार में भी महापता मिही । रेस, वार, सर, महर इत्यादि विचारों के ममार में बात पप सापक पदमरणों से १८५.ा मिपा-पिोर पुषा । पर पिोह हिंदी-मानी मावों में प्रमुख रहा। मारतेंदु हरिराम ममता। पपपि पिोरसानी मा तपापि रसके पासस्स्स म्पनी प्रशासन एनः समठ हो गया । मारत प्रणमन-सूप पासिंपार के साप में पर [ ५० ] गपा। पदडी पबम्बर सन् १0४ को महारानी विमोरिपा प्रपोपरा- पा प्रमशित हुआ। इस घोपमापन से भारतीयों के पप में पात हा पिरषास उत्पादो गया । ग्यारवा, धार्मि-सरिता भाप इसमें पिरोप थे। बत पगभग २ वर्ष तक देश में राजनैतिक प्रोजन गत से। मम से र सहब अंग्रेजी शासन बोप मी रिसवाते से और रानी प्रेरणा कोमेस की भी मापना हुई। अन्य बाइसरायों हारा भेना पुलिस अपि इत्यादि से सबप रमने बारे सुधार होते है। १५ वापी रतराव में पि सेना पुषिस और प्रापिक म्पपल्या संबपी पुमार बार निग समप में हुए । इसके बाद सारं सारस के समय में मी जाहिवार पर एर । सन् १५ तथा १५. हमरा 4 महाबीरपसार दिपी तपा रवान बी का धम्म मा । पर पुग बात ३६ गति पूर्ण रहा फिर भी भयेक पुराना भी पी जिसकी ओर मम पैसे मारत रिमारियों में हासो ममान पार्पित किया। १५ भी पताम्मी के प्रतिम भाग के प्रारम्भ में बार चिरन पामराब होनभाए। इनके समय में सिमाम का भी प्रचार था। बिटम प्रविष्पिापाली समान वित्ती पर पार पापोजिम विस्येरिमा मारत को सत्रही मोपित किया और मारत को इसका एक उपविध माना। इसमें भारत की पी बिवी ममता सरांक हो सटी। दूसर पिस्वी रागार की शाम से किया गना । एक भोर यसका सा वा दूसरी और देश मा दुर्मि। इसम कोई प्रपा ममात्र यही पदा। भारत पर अनेक धार्मिक उतरदायित्व मी साप दिए गए। भारतीयों पौर अंग्रेजों में मेर-माना का दी गई। भारतीयों को सच इत्यादि रखने +सिए वापसेन्स पावरदिए गए और भी अमेव प्रकार प्रतिषण मारतीयों पर गा पिपे गए। मिसमें मारतीयों की मालाएँ विमोहपर्व ही पर्स। पम महोरप इन मापनामों को शांत करने का प्रयत्न मते रहते थे। तत्कालीन हिंपी पी में ग्पाहरणाय मारत मिा' या 'सार सुभानिषि पत्रों में सामावादी नीति पपा मारत पर पाये गए पुरसबपी जप पर पापा। भारवेंदु हरिरथ प्रतापनारामय मिन, रापाहम्मदास मेमचम भादि की रचणामों में हमें ग्स समय की परिस्थिति का मामास पात समिता है। इसी समय बर्माक्पा मेस पैकर भी पास हुआ। ममता ने पापि गमका गिरोप बिना परंतु बाबिय ने उसकी न सुनी। इस प्रमर वासियों के प्रति एकरपेशा माष णसम की मार स मन हो रहा। इस पुग में साहिबा राममधि तया ऐग-मसिमे दो विमित्र - पम्नु समम् । प्रप्रेनी सुपारमेन रनपर महिस्स प्रभार पहा पा और इसमे ये प्रसार थे। परतु रामद और राममकि दामों ही में मारिषर में पेशी मरेको तथा बीदारों के उपर मार दिया और एए-महिनी घोर प्रेरित किया। साई मिस पमात् सार रिपन भारत में पापे, एनम शामन ठार निगम की अपक्षा प्रपिकलोमिप और उदार हा इनि स्पानीय स्वायत्त मापन स्थापित भने म प्रपन किया। भारतीय उनी उदारवा से प्रभावित " और भारतेंदु परिरहन मी प्रसंसा में सिला। इसपर वित गिरीप में भारतीयों में पद मांगी थी कि भारतीय ममित प्रापियन भीर अमेरिन पपरपिपों मुफ्रमे पर सरें। इसमें सफरता नदी मिसी। मारनापो को इममे पोम गुण भीर रनमें सकता की भावना मारन । गिरि मी प्रेम की स्थापना से पूर्व पर इस बार शामन देश में प्रा गा। स्पिन अपुग गपारी में सर्ग-युग मामा मावा है| १५८. में परिन बाइसाप प और एसी के समय में कांग्रेस की स्थापना प्रम की मात्रा से पूर्व मी स्पान-पान पर राष्ट्रीय समाओं की स्थापना हाती रागात में लिया रिपन पतोपियेरान, माम में हिस पाय मोसिन सागर में सीमा पमासिशन, ममास में कि तवा महार में महान समा, बम्बई में बाम मीरमी एममिपराम एपनि समारी द्वारा देश बोबारे विसर का प्रवत्ता निरसर अपने पिच पर करवाई. में बंगास में दीपा पमामिपेगन' स्पारनाई। मिविस सर्विस से प्रथम प्राप्त होने पर नाम पनी मे सर मारव की सगति संस्था स्पापित परमेपपिचार मिला। प्रतियोगी पराओं के लिए इस समय ग. नाना पाता था और समर भिए १५२री भाषु निमित कर दी गई थी। मारतीपोंसिप पहरोमो पात भरित पड़नी भी इमरे दिन भादासरो की मेणा मी मरहमान पनी ने । पम महौरव अपर से १४५ में बम्बई में रिबन मेशमाह मसरे भपिपेन का पापोजन हुमा। इस मगर देय श्री राजनैतिर पम्पिति मतसार राहीप अपम भ सूत्रात पा] जमश्री प्रनिगदी पति का विरोपी अन्न ससस म भनिरिक तमामगिम मा पर ममा-मस्याओं के समम मामा भि पनि। माना मुग तमाशी मदिरों में मो इस प्रमा मा राविक परिस्पिनिया मसाला साप मिटती है। राम [१] मकि भी वैरा मधि दोनोस प्रमा समानांतर पता रिचाई पारे। गुग की सातोमुली गधि शनिक प्रशिकार इवानिकी मेरा से साहिस्पिक राजमफिरे भाव से सब रखे थे। परत परिस्थितियो क्या परागता प्रमाल मेरममें रामकिी भावना भारत दौती पी सिके प्रसम्म बागमति मग गावे दिवाई पड़ते थे। इस समय दिनों में राशीप एति भार फिर से सामने है। माद, बाहर मा भोवर पाठक मादि पत्रकारों बीर रेलों में इस प्रकार रिचर मधुरता माम मिखते हैं। देश सारी विचार-मारा गीति साप मिलन काही पी और इस पुग में निर्मित साहित्य उससे पूर्णतया प्रमाक्ति है। अतः हमारे पासोमपि भी बगवायदाम वाम मी जातीन राजनैतिक परिस्थिति से पर्याप्त प्रमापित थे। परिस्पेय राहीमविरेसोपा भीमना पति दोगासन यता का प्रमाप पा। भार्थिक परिस्थिति मनुष्य जीवन के तीन प्रमुख बौगि तप माने गए ।पर्म, अर्थ और काम । समानुसार भगवान इनमें रिलीप पाएष का मान उसमें सपा से समयमा ममता है। पांसारिक जीवनमा सिप प्रयापार निवांत भापक है। मामरिक पीसे रेशसdि उस समलि पर निर्भर करती है। संसति और मालविमस परब समर पतारण में है।गरण पुम पसारा गीर्य परमदीन मरिसे ही प्रेरणा पाणमा। मुगड मर में मी ऐशी समरिक सरीपरी मेकाम्यामा सकी और पार युग दो मिम पपीहारा माम पुगोमागर। भारमितामा ने दीप भीर माओर से बनमावार रिमुभम रिपारे। मा परि पैसाकि देश पारिपिक सय सामा सपरिक मल में भई प्रगान पो पति र होगा। रगामजी प्रापिमा प्रख की पार्पिक परिस्थिति गुरु का अंग्रेजों कीमापारिकवि पामित पी।स.बाहानाम- "जी पम्प मापारिक माम मा और सम्म इम पुग में मेरमा और समप्रमुख स्थापित होगा, जिससे पीन मादित्य में पीप दुनाबारम्ममा १ 'मानिक रिरी हिप का विव-ग. मौहम्मदाब 1 [५] ११ पती परमात परिचम में प्रौद्योगिक मावि म पुग था। इस पुग में विदेशी एवं पारारिक परिवार प्रेम प्रमुख पाहुत कम स्थापित । गवा पा। अप मारतवर्ष का शमन ईस्टडिया कम्पनीले पाम से इंगता कशाप्त के पाप में प्रापा अपनी सालापवादी नीति के अनुसार भनी ने भारतपपमपुर एमास साम इससे बार-बार पर पसूत्र करने प्रारम्म रहिए। पर्मा और सिक्स पुओं के प्रसस्वम्प, मो समया मन् १८. भार ८५५० में , मारवर्ष पर बरे ही प्रतिकूल प्रार्षिक प्रमार परे। इसी के उपरान्त रैप वार, सा, महरों इत्यादि का निमायो ग्राम पर धीरे म्यापारियों का व्यवसाप मा पर गया और पोबारे प्यापारी समुपत होमे सग १८५. सिपाहीविदोह में भारतवर्ष की विरोप हामि दुई। पार्मिक परि से सम्पति पाठ एप पिक-मिप हो गई। मामतगं सपरि पतनोम्मुताई। मदर्शन के लिए ये बरे-बरे पण सेमे बगे । पिबार बार मनिकों की मानीविका मी दिन गई। देश में भारी पर गई। सिडिया कम्पनी पार निम्ति पार्विपरिमो ममता एमा उसका भी प्रापिरमर भारतवर्ष परदीपदा। भारत को बरेन्यो भा चुकाने पर निमसे रस स्थिति पीर भी बिगड़ गई। मम् १८५८ में 'केर गवर्नमेंट रिया पर पाम भा। इमक अनुमार मारत अपन रमी सीमानों के बाहर नही मप दोना चाहिये था पर पमा पीर प्रगमिस्तान के पुरों में इस पर मान नहीं दिया गया और भारत को ही इन पुओं का पन-याप पहन प्रना पर पाई गितमा चारम के गवर्नरी कार में पि-मुधार नपा नर-परिषम समा मावि-निमारण बस बनहित के म एप, परन्ट मैं उसीमा में गा दुर्मिक पा रसने जनताको पीरित्र म दिपा।१८. में बीमारियों पुर वमा महामारी प्रकार साथ-साय तुमा । 1041 में फिर एमिट पा सा मया का समय मा । म्हॉन प्रति प्राविण्याकरण किया और गौपसम-मग आप प्रदान भिकमी होम के कारय मावों पर मगर सग। हमें मग्नम पदापार प्रापा हिस्सा पा रसम मी पिक दिम्मा सिपा जाने सगा। इन द बिगर गइ । १४ में स्पेन मदर का बिमाण मा । पारोप म म्यापार या और भारत का प्यापार और मी मा पर गपा । गिपा स्पादि के लिए सस्तन मसगाए गए । उगान मिपारन की मानि मी पास गई। गानसगार निरिणाममेकबाद इमाम फा लगान रिति भिमा भाने लगा। तो इसमें पूरिस गई। ..में पगास में दुभि पराम, पारस पा सिटम दुनिया में ममासन में सस ।

(1) नहीं हुए। इन गर्मरों की प्रतिक्रियावादी नीति से इनकी सासामवादिता सर सक्ति होती थी और नवा इस सानाम्पापिता में परिवार्य का सापन मात्र बन रही थी। १०. और .८ में किन दुर्मिष पर, हम प्रथा बनता पाप होठो। १५.. दिल्ली दरबार में देगी बरेली में अपनी सपनिम प्रारम्बर प्रवर्तित किया। १८.८ में अप्रगान गरम म्पय-मार पिर भारत के माथे प्रामा। १५८० में भी पदो स्पिति सि रपव । बार रिपन समप में (१८८.०) पिपार तमा पुगेकी गति परत ऐप में पति उत्पाई। पर इस्तमरारी-शेषस्त मी पाना चाहते थे परतु रसकी स्वीकृतिमही मिली। अग्रेजों की प्रानिक मीति के पडसम अपि और रोग- नारी पुरेसे सर से दुर्मियों की मार दी। अमिताभ मीपत परिणाम इतना प्रनाधिपाय होता था जितना प्रमों की प्रापिकनीति से। सपका पार्मिक रिसे पर पुग विपत्तियों का पुगवा । अप्रेमी की योपरा नीति रानी म्पक्सासमधीस्थान-माषमा माग्नम मासबबी सामान्य पाशी पोश बना लिए पुन समति की सिद्धि न कर समापि-संबंधी प्रमों के प्रति पास सब ग्यासीन रे। किसान इस तिपरस पब समस्त से। इस प्रति माग अंग्रेजों की पसाप सिरि पर माप होता था। इसी ताद शाम पतरों में काम मन की पोम्यता मास करणापा । शानिक माविम्भर तमा मन उपयोग मी प्रमों अपनी सिदि लिए मारतवर्ष में किया। अंपेगो श्री गोपक-नीति का शिकार भारत रस समच चारों ओर निरागहीवर्गम महापा। ममता दुधी भी धीर सामन्तवादी वर्ग के योग बो प्रों की गोपन नीति के माम थे, सी बता पाटिल पर भामम ममा । भारत बीरे अपने युग की सारी पिय अपने मारने में पताक दिना मा दुर्मिक भारि कालिग भी बड़ी समतापूर्वक किया है। तीन पुनाव प प्रा निघ निज विपदा रोइ मनायें। मौसी फूटी भरा न फे में सलि मात्रन नदिअंग्रे॥ संपत उनास मो सतरपंच पड़ा हिप में महा भया । पर-पर फोके होने वागे, परस्पर प्रानी फिरें पहात ॥ सामामिक परिस्थिति शतामा सीमा पूर्णर हिन्दू समाज के लिए बात मस्त था। सम्पमानों के समय में गौ पत्पागा ना दासता दुख भोगन ।

[५] एरे। अंगों में अपना योपण नीति द्वारा उमें पीर भी असहाय बना दिपामा अमेर प्रकार के प्रप-पिपास सीया त्या भीविर्मा उनले घरे हए पी पीर रन मैतिक पतन हो रहा था। उसके पास देश सिरोव और उपशी मरतु पम पर गये थे। उनने अपमे शासन के सिांत या उपदेशों को विमा रोय प्राय सना परवा पा और इस प्रकार उनका रानमन, भापार-व्यापार देशमूनाइत्पादि एक मिमित रूम प्रहय कर रो थे। मृत मिति में अमितापूर्वक मी प्रहल करने पड़ते थे और इस ममा मस्तच विचारपारा तुम हो रही थी। अंमेलो भागमन रही समप याद रेरा में प्रेमेसी RTI का प्रमार पारम्म मा । मेयर न म मिार प्रगर प्रदान किया । राजा राममाहनाय अंपनी के पास पो समयंक तमा प्रार। इस प्रमर इस गिरी माग माध्यम परा भारतवामी साव समुम पार की संतान म पर प्रमर रह। मा म्पति मिनाही अधिक रम संस्कृति समा सभ्पनाको प्रदयता पा पारतमादी पाकिमा सामाजिक रिसे पक्ष माला माता पा। सिक्सि सर्विस की परीक्षा में महीने लिए पानी मति तया सम्मवा मे प्रपिक से अधिक बागमा पारका गया पा। नदी तर सदियों म मुन रोमेम सम्पम्मी ममा शिकाम प्रास्प मालगामि परिसी तक हित पिपा । यि सम्पूर्ण मपाशावादी पनी पिराममेकी मचिरो शिकारण दुई रसे बाइप नहीं मागमा । ग्मो परन समान में पता की परिभाई। समा राममोहनगर मय में सती-माना पिया पिया विवाह-सम्मम्मी अनून प निमारा परमप ममाप दिवका पप पा सकते हैं। किन्तु पह मन्पर मम पिक महसपा विदवा दिवम प्रमा पाप में मच्छिी सिगा- परमिशन ममप सामाजिक प्रार पार्मिस पेन में न ता परिचम पेपमाणित परिधीयों मार पा र मे म्मभिमों का प्रभार मा जा पारनीपना नाम परिचम दो पदी पानं भरना देन में थे। मिमार में मापमान सीप गदहा में नम हुए पनिट की मामला भी दी। १ "पानिक हिसमारियादित नाणेप (2.६४) इस समय महारानी रियरिया का प्रचारित मार्मिक मविप्पुवा पोरयामा भर मी पिकासा! पानापास के सामनो म निर्माण सेवाने माप विदेशी पम्प मी परास अपना प्रभाव मारतीयों पर सता रहा। दिवशी शान-निशान समरे पपि सांस्कृतिक प्री से मारतकोशनि ई, पापि मारतीपी पप में एक मीन रेखा मी मागतमी तपता मुश्प को पाव पर इसी के भाभार पर 1८८५ ई. में पिस की स्थापना भगों अपनी प्रविधिमापानी नीतिशास्स माठीप मागविपर्मी में इशाप करमा एकर रिमा पा हिंदू और मुसममान गई स्वपेप से असर मुसहमानी में धार्मिग वासर सपा पर अपने धर्म में रिमो सभापति स्वीकार नहीं माहवे। माप की साम अंगों में समा राजपाका या निमसे प्रयों से प्रसनही थे। अप्रमों के गम्पोबारम् दरच पोफ्ति मिा परम्भ मे पनी नीति में अपने को पालन इम्वाम पोषित किया । ये बरावर सिंदू-मुस्लमान में प्रापस में लाने समय परते थे। बदी सनके शासन मूल मंत्र मा। मुस्लिम पुरा में विमुसलमान सम्बर गुरु र सौदा पूर्व दो गया था। ने की मानि मे गमको मापस में सारा हि पम्मी पनि से पर रसित हो रहे थे। समसमतों के समय में ही उनके समान में कितने अप- विसवास एस पुरेभर प्रयों के समय में मी भाभा की सम्मानित वाविपी में बनाए रम पम माहिन्द धर्म-सा इस सीमावि मुरमित रकमेप प्रपा प्रेजों द्वारा मा भि भी माया या पार्मिक शान्ति कारय दिनबर्ग ने अपनी मुटियों को परमार सिपा पार भनेक सुपातबादी भागमोक्षम प्रारम्म पु ममताव अपने गौमति साधे और अन्य नागरिक समान पा मापन समकोई ममाति मनिहागों की भाचोक भामा पीपारित ईपी। पचपि पापाठोमा पाहो परोष होली की पारस नः विवर का में। अपये संसारी के अनुसार रिन्यू बता रामारिएका प्रतिनिपि मानती पी इमसिए राममतिको बामपना अम समयटी मी अमेजने सपनिमा-सापना के लिए नही बगिता में काम दिया। समनि गरे सम्पा परिपत्र प्रापिर मदापता पर इस पर बाबा भारिपत्य जमा किया। बोयरे मे मारा मानव पवार मैं [ ३.1 म गए और रमग्नका प्राभित होगा पड़ा। प्रमों मे इसक बस उनके इसाकों में मनिक नियंत्रण स्पापित कर दिया। मित्रता के नाते उन्हें यह दासता माप्त हुई। इसके बाद अप्रेमी राम में पशिमग अंग्रेजी सांस्कृतिक जीवन प्रभाश्रयदाता बना। पहत माहित्य में इस बगी रुचि, प्रदर्श पुरमाबापामों का प्रस्मस होने लगा। १४ी शतापी उत्तराय का मादित्य पिकास में इसी वणिक वर्ग में सर्वप रमता।' जमीदारी के जन्मदाता अप्रेजही जमींदारों का पामय संसहति तमा मम्पना से प्रहम परमा स्वामाविक ही या। उमके प्रति लता मदर्शित करने म पदी पक उपार पा। किमान ती अंग्रेजों की छोपण-माति के कारण सब प्रभार से पति दी। ग्न संस्कृति का पिनास ता असम्भव पा। परत इस दुरणास्वरूप बनमापारण ने अपनी वास्तविक स्थिति का ज्ञान दो गया। यातायात के सापनों सपा शिक्षा में देश में पप स्थापित किया । सनमापारण में समानता का मार तथा सरियों के प्रति दिमाद मावना रत्पप । माहिप में इस प्रकार के विचार सपाहीन कवियों सपा साहित्यारों में मधुरता साप प्यत मिण है।' इसमें संकर नहीं कि पापाप प्रमाव मे मारतापों ने मंतिकवादी बना विपापा । नापारम्बर तया पालाप प्राचार-विचारों से सपा सतियाँ ता ममाम में घर पर गई पी। मधपान इत्यादि पाश्राप सामामिफ शिधवार ममद भारतीय समाज में नोवपुरीति ही पगडंगे। इस प्रमर * दुगुना की भोर भारत प समता मजग हो गई पी और एमके सत्पारन का मपान होये मगा पावापर्प पर कि परम समास की सीगत पुराइपो भार पापाप रेरा से मार भावनिक पुराइयों की भार रम युगमा सादिपगार मत पा पार रम मुधार कमिप प्रपनीत पा। ममाम-निर्माग में शिक्षा प्रस्थान यात महापाप होता है। इस पुग मैं भरती, पासी तया ग शिपा ही प्रगान रूप में प्रतित थी। मएन का १ प्रापुनित दिदी साहित्य का इतिहास-दा. बाप्य । ..। ९ मारतेंदु हरिएप ररपन का पुरो रहापे, गिनती मार पाये। मंदर हसन महागी, सामगि साबन नदिनगरेजी।

[ १८ ] बुग का पक्षमा वा । व शिक्षा कानापर्य पार्मिक मात्र पा, परत पर अब पावरकामा निसियाद्वारा सामान्य शाम की मन्दि बीमार। पठा शिकविमाग में परिवर्तनप। प्रमों में पर्याप पहले पम प्रचार के लिए ही गितमपपोग किमा बा किंतु भो म मी सासम में मनिपा होने बगी और ग्न अपये पम्तों में प्रर्म प्रो. हिप मारतीयों की अंग्रेजी शिवा देनी पड़ी। पर शिक्षा भारतीयों को मानसिक दासता से उन्मुख करने वाली थी। राजा राममोहन राव इत्यादि देशमीतपित्रों में पर्याप अंग्रेजी-शिषा में प्रोप्साहप दिया, किंतु समका गस ऐयसियों को प्रशिस्ति पा मार बबामा पा। प्रेग्नं पासता नहीं सिमाना चाहते किंतु दुर्माम्प से परिमाम ठण्य प्रा। पाहा.पोषणापत्र द्वारा सरकारी नौकरियो पिए भप्रेती प्रापरवा हो गई। पयपि महोम देवी भागों की शिक्षा मी सही मान सपा और पिया परत देशी भाषाओं की गति इसीलिए हाई कि एक तो सरकारी नौकरियों के लिए अनुपयोगी पी और दूसरे उनमें भन्म शिक संरची पुस्व नहीं थी। वपि प्रारम्भिक तमा माध्यमिक शिका- सपी न पाये गये परंतु मारा मी पामाप विचारी प्र प्रसार किया बारामास्तावीत्तर में मारतवर्ष में मिशेप विचारो की स्पापमाशिलाप प्रभार मा फिर मी शिक्षा का भाव मारतीय भावामा अनुहन बन सका । लिपिकी अतिरित सम्पूर्व पसाय पिय-भिन्न रोगपे। साधतिक पहिसे मारतार अपने पूर्व गीरप को भूलने गमपति इन विधासपिठ पा गया । बाममोहन राम से पनि पम का एक साहतिक स्म समाव में पसाना पाते थे। किन भपस प्रपात में सो सकेप-शिस्ति मारवीप पपनेोदान सम- भने भगा और उसमें पहलवान भाष पर पगपा। इस ममा पामाल विमाने समार पित्तयाधी गिरावा पचपि ही तमा मीयों कर वानिक का पारि सत्पा मी इस पामाप सिके परिणाम पिन इम मे अपिता हमें अवनति की और की माता । पुपक साहित्यारों में अपने साहित्य में ऐसे सियतों मतिपावन बिमा निमो द्वारा प्राचीन गौरव मसाल्या पाच शिक्षा का सत् प्रभाष परुम पार इस शराबनवाने पुननिर्मातम पसर मि सके। बाहर में इस पुस में समान एक मन म प्राय मने पाम कर रहा या मिसमै मर्माप्त भाति और अम्बास्पा श्री। मन्ति का धुप मा और ऐस पुप में पम्प । [१] पस्या का होगा सामाविकही। मिमी देश में नवागाय पण प्रत्यारिगोचर मेहगे थे। धार्मिक परिस्थितियों १ शवाम्दी में हिंदू-समात्र में प्रपानतपा भम की ही प्रधानता रही, पापि परम्परागत प्रामण-पर्म व सीवादी होपत्र रह गया था। पापामार पड़ गया था और भमरे प्रातरिक प्रायन प्राधि म से गई पी। बोनस पार्मिक मम्प्रदायों के सम्म मदिरों में मेर तपा पैमा र पौर जितमा प्यान दिया जाने सगा या स्तना साविक उपासना मोर नहीं। पुमारियों और पते में गुरम का माय गागृत हो गया था और बारिताप और मवर दास बन जाते थे। सामाजिक परि म पर्मम हमारत बप-म्पमा मान-पान मिपाष सिद्धांतों में शर गपा या। ममुर-पामा और विश्स-गमन सामाजिक पीस निमिडी रहा और इमनिए दिन्दुमो में श्रीमै मारता र मास समक पन रो महीपा ममात्र में प्रचलित पी। मुसहमानों के प्रभाव भरण मोतिपम नमसीपादिता महरा भनी पड़ी पी।से- पने पम-सपी मिांतों प धम्-दिप र पाहम कर बने में ही दिर पर्मी रपा पममन सगे। संवेरठः सम ममपा एम पत इस विवादी सया समापन गवा पा अमेजपान साप माय नहीं मारतीपों में राष्ट्रीय, सामाजिक तथा पनिक भागृति स्पाई, हा धर्म के वास्तविक स्वप पो मी गमकी गा।मायो दिनुपान धर्म में दीपित यो समयल किया, इस मनिश्मिाई मार प्रणिरित अनवा म धम-परिम्तम बचने के सिप राग राममान राप असे म्पनियों में ममात्र में मुपार मन पारम्प निगार मन् १८२.१. में प्रमममात्र की म्याना की। म उपरान्त मारमा मम मरजगाशरा प्रामातीय विवार की सहति कराई । म मोदप बाज-विवाद मिरेप कराने का प्रपण रिसा yि समर्मस्पाम ही गिह पात्यावस्या में गम भरग ममममा. शिरो में मनमा पपगपा भार 'मापन सममा'माम समय ममारपरपर पायापापना। बानरमाइन पमु इसके मता। मम मारन में प्रचरित । पासा में रामार महोदय के मे मैं मापना ममार सम्म से ही समाप्रपादासन प्रारम्म मा। 104.

- [१०] में पार्व-समास की मी स्थापनाई। इस संस्था वैदिक संस्कृति की पुनः स्थापना भीर बेदों की प्रपौरपदा सिरपने प्रपत्र भारम्म विमा | साप दी समार-पार के प्रयत्न मी मासम्म ए सूति-मगा या प्रपतारपार पर में पे गोगनीपसिाह इत्यादि को भी समान से प्यने का प्रमान मा। भागे इसमें भी दो दम हो गए। एक दो पुरुषस पपी, बो मl पया पार्मिकों के लिए मेरो प्रमाण मापवे घे दूसरे भावी, यो पामान्य प्रारमाय प्रमाणवे। स्थामा प्रशानद या हारा सामएक- राप दोनों पी के प्रवर्तक थे। बाद बी ने स्थान-पान पर पुष्पों की मापना की। मा १०. में श्रीमती ऐनीमार ने मारतवर्प में पियोप्तोपीर भाव प्रापी में पिपोशोपियाडेट की स्थापना। इसमें सब पर्म-समन्वयको माया पो और मुवि सम्बकम्' मोरा स्वीडन मा। पाप संहति मा पूर्ण प्रति इसमें पामता मी। इस प्रभर इस सम्प्रदाय में भारतीय अन्यात्मवादम महत्व विशेष सापीर मारत इसकामपा गया। विदेगी बनेक विद्वानों में यहाँ पाम इस प्रकार हिए कार्य किया। चंगार में श्री रामायण परमात तमाम गिप्प स्वामी विमनबने पूर्व और पश्रिम दोनों में भी परमादम मरेश सुनाया। हम मनापा स्पट होचावा है किपाबाब सम्पता पचपि अपनी पूर्व पदिसे देश में प्रचारित हो रही थी फिर भी स्वामिमामी और दूरपर्ण मारतम्य अपनी मान सरपति मुगम से अपने पूर्व सरप गाय माप रतवा चाहते थे। पार्य समाय ममान मादि मविधिमा स्वस्म सन् 646 में भारत पर्म महामरत' # स्पापमा मासम्पर्म में मुसंगटित पर गोरप से पं दीपरपावजी दे। मदनमौरन माकरीमनपा मार मसाद पौमिम इसके सदस्थ इम पार्मिक नपुग में मामयप पचान पवित्र मी में धर्म । पसिए प्रपास होगा स्वामानिकीमागी महापानबम-समाकी स्थापया इमी गरेप हुई। इमो समोसा तपा झोपावर मारतेमुभी मिपुन्टए । मन् १1. में मारतेनुबीने भयम्म पार पाव' परी सीमा। मातु भी येता पम-संबपीकम मी हि और प्यार गतामखिए पस पास मी पिपा मारतो मीभीमा पुगत स्वरूप पामधे। - [1] इस पुग साहित्यमरों ने अपने रंग की परिस्थितियोम पहुत कम महाविय किया है, मिस पार्श बोक्मेवा अप्पामबार और समाज मुपार है। उसके साहित्य में मार्मिक प्रतिमा संदेश है। भारतेंदु जी •मतापमापण मिझ भीर प. पम्मिवारच प्यासीच सुपारपाची दया पर परायत पौराशिक पम प्रेम गाव-विवार मी मा। एतः पार्मिक साहित्य- गोडी का निमाल भारपानन्द मी रे'मायार्थ प्रकाश" और 'पांग मकरा की पार्मिक प्रतिनिपा में भी निमार म्याम श्री ने पसार भीमामा पानम पापविमान प्रादि चिये। राशाप्य वाम जी मे ममताम नारक सिखा जिसमें पम्प पमा समर सब धम की पता सिर की गई। रणाम श्री गौड़ीय मापप सम्प्रदाय के मइस्प तया देवा धम की मान्यतामा २ पमपम् । मारतहु की प्णता का उन पर पूर्व प्रभाष पापा। साहित्यिक परिस्थिति सन् १८५.१. मे १९.०६. तपा ममप मारवेन्तु पुग और ग्मी शामि रेस में प्राण किया जा समाई। मारतेन्दु का रसमा-कास मन ८. मन् १. ना रखा। 10 से पहरे पक प्रमा पुग रदा माफि पर उ मानवा पाय पा! रिएप-रासी तया भाषा र साहित्य क्षेत्र में बहुत पुरातनविता विषमान पी। पाप मासी प्रमुप पी । गपकी घोर विराप प्पान नहीं दिया गया । मार सेन्तु पुरा में पारिप की मन पगारिमई, युग प्रति परण धन कपिमित्र पी में निदोरही पी। ममा मादिन्य-देय में भी मीन विश्प मरीन निगरपाग मीन रीमी नया माग प्रदान की जा रही पी । मादिग्यार रामनामुगी रपति परमा साइते प पर इमरे तिए पनि प्रक मगर महिप-शनियों में प्रत पिया फसम्पस मानिक काल में जो परिरमा हुए उनम मसराम इसी पुग में मापा निमित रूपमा मम्मा. सारसी में- दिदी माहिम पापुनिर राम पिसम तौर परिपतन का युग ।। दमार मापक इतिहास में पपा कमी युगमपा जिमने पाये यापी विमम पर ली मगुर प्रतिमा परिचय दिपा दो। इस पास में प्रयक पिमाग सफाम पर पाप में परिणामी त म रिदमे माहिरिन पुगएमने। पास की प्रमुग पिगेपना मा मैं भाई-समान की मौ स्थापनाम सन्या विक संस्कृति को पुनः समामा और मयों की पौरपेक्ता सिमम मम माम्म किया। सत्य ही प्रमा-पार प्रश्न मी प्रारम्मए । भूमि-पूना वश मातारा में पेयोग नही विवाद इत्यादि को मी समाज से स्यने का सफर । भामे इस मी दो पक्ष हो गए। एक तो गुसह पपी मो समय वया भामिक माहिए और में अपार मानते थे इमरे पोपी को पामाम प्राय प्रममावे। स्वामी मानव तसा मासा सायपत- राम पीपक पदानंद भी स्थान-पार पाएष्यमी की स्पास्ना की। मर १८...मैं श्रीमती ऐनीमर ने भारतवर्ष में रिवोसोका भार्ग प्राय , l मैं बिपोसामिन प्रग की स्थापना की। इसमें सधर्म-समयपी भाक्ना दी और सुबकम्' म संरेत सीता पा। पायाप ससहति के अपर पूर्वी संपति की इसमें प्रधानता दी। इस मचा इम सम्पाप में मारतीय परमवादका महत्व निरोप पा धीर भारत इसका विदेशों के बने विशानी पे पद पाम इस प्रचार के लिए कार्य किया। बगास में भी रामस्य पामास या लिप स्वामी वियर में पूर्ण और पत्रिम दानों में बमबार सरल सुनापाहम पर मारोता सम्मता पचपि अपनी पूर्व सति में देश में प्रचारित हो रही पी गिर मी लामिमानो और दूरदगी मरम्म भरनी प्राश्रम संसति का मुशार मा अपने पूर्व गौरवको मत बनाए रखना भारते थे। प्राय समाय, म समारपालि के प्रतिषिमा सम्म सर ter में 'भारत धर्म महामास में स्पापना मनपर्म को मुसंगठित भने गोरप दीनवपारी मोहन मालवीय वपा मापन प्रसादबी मिमम मरस्स। हम धार्मिक प्रति के पुग में मामगधर्म-मपान पवित्र पसी में पर पाहिए मपास दोना सामामिक दीपाकापी महाराज पर्म-ममा श्री पापवासी गोरप ! इसके संयोजक तपा पापा मालेमगी विदुर । सर ११. में मारवेन्यु जी ने 'पन्म वीर रेम्सद की पाली सीपार । मादी ने सत्र वर्म मपीस भी दिमे भार पर म पारसिप पास पाम भी विणा | मारी प्रतापपुगत स्पसमा - ।

. इस पुग • साहित्यारों ने अपने पुगी परिस्थितियों का बहुत पर सय पिया पिया, निमसभा कोममेरा, मध्यात्मवाद और समान- सुमार है। उसके साहित्य में पार्मिक महति का संदेश है। मारतेंदु जी 4. प्रतापम मिश्र और प. अम्बिमात प्याम के पांच सुपारपाली तथा पर मरम्मत औरफि पर्म भरेर माद-विवाद मीमा का पार्मिक साहित्य. गोपी पिपिएमा । दयानन मी "सत्यार्थ प्रकाप" पार "पेदांग परा श्रीपार्मिक प्रतिध्यिा में भी पबिभारत पास बी मे प्रसार मीमांसा रपान पर विम्बन भादि खिन्न । हाल पाम बीने पमठाम मारक हिमानिसमें अन्य पाँचमा की मेडता मिरी गई। राम जी गौदीय मापद सम्प्रशव मत्स्य तथा पेय पम की मान्यताओं के समर्थक थे। भारत की प्यताम पर पूर्ण प्रभाव पाया। साहित्यिक परिस्थिति मम् १८५.ई.से.. ० तक समप मारकेन पुग और उसकी पभूमि रेस में प्राण किपाबासमता है। भारतेन्दु रमा-बारू सन् १८. सन् 140 ई. तक रस। १८५. से पाये पर पेमा पुग रहा मो कि प्राचीनता का पापक मा। विपपीती तया मापा की से साहित्य क्षेत्र में गत उप पुरातमाविया धिमाल भी। सम्म बमारी मालदी। चोर ोि माल नहीं दिया गया। मा केन्द्र पुग में साहिल की नबीम पीपारित एई पुग प्रति के कारण बीपन मिमित प्रमविदोही पी। प्रतः मरियर में मीथीम विषय नवीन विचारभारा मीन गैही तया माया प्रदा की जा रही थी। साहित्यकार र की सवयोमुनी प्रति ममा साइव पे और इसके लिए उन्होंने पत्र प्रभार दी साहित्यौलिपा प्रदम म्मिा ससम मानिक मास मेंगे परिक्रए उमथ सूत्रपात इसी पुग में पा पर निर्मित स्म सफा मम्मा.मों में- 'हिंदी साहित्य का प्राइमियर पिस और परिवर्तन का पुग। हमार मार द्विार में पेमा एक मी पुगनपा निसने हनने पपी निमा और इतनी प्रवर प्रतिमा का परिचय दिपा हो। इसमें प्रत्येक दिमागमा विना और प्रदेश पेट में परिक्वन इतनी धीमता र किसे मादिपिकनिपुग बद सम्मे। इस काम की प्रमुल पिता माधि [] में प्रार्षसमाव की मी लापमाई। इस संस्था में विष संद, स्थापना ग्रीन मेषों की अपौरपता सिदमा प्रस पारम्म में दी समार-मुमार के प्रयत्न मी पारम्मए । मृति-सूना तथा प्रसार, में पे घोग नहीं है। पारिवाद इत्यादि को मी समाव से स्यने हुमा । माो इसमें मी पो दर हो गए। एक तो गुरुकत पभी को स्पा मार्मिकों के लिए मेरो प्रमाण मानते थे दूसरे काग पासात्व पादरी पापममा चाहते थे। स्वामी महार वा मासा राब समता रोगों पयों के मर्सक थे। मवानर बी ने स्थान-स्थान पर की स्थापना की। सन् १.nt में श्रीमती पेनीकमर ने मारतवर्ष में रिपोसार भादर्ण ग्रहण करके काशी में पिपोसोफिया कालेज की स्थापना की। सर्व पर्म-समयसीमावना बी और पैव अम्बकम्' म संदेश पा। पामात्य संस्कृति पर पूर्वी सरुति की इसमें महामता पी। मगर इस सम्मवाव में मारतीप भम्पाथमाया महत्व विशेष सा और मा इमका कम गवा। पिणों के अनेक विद्वानों ने गा पार इसके म सिप प्रर्य किया। बात में श्री रामाय परमास तपास शिप स्मार विरमद से पूर्व और पश्मि वानों में ही प्रारमवार का संदेश सभामा । ई प्रबार पर स्पारोबाता है कि पाबाप सम्यता पचपि अपनी पूर्ण शदिर देश में प्रचारित हो रही थी कि मी स्वामिमानो और रावती मारतीच अपनी प्राचीन संसति का मुषार म अपने पूर्व पीरप में प्राण बनाए रखना पाते। बार्प समान मम समाम पानि के प्रतिषिमा स्वरूप सम् 16cc में 'मारत धर्म महामनी स्थापना मासयम मे मुसंगठित करने के गोख पं.दीनदयास जी ने की। पं मदनमोहन मालवीय नपा मापन प्रसादबी मिम इसके सपल थे। इस पार्मिक तिर युग मैं प्रसवपर्म-महान पतिपी में धर्म के उन्मान के लिए प्रयास होगा स्माभिक ही बा । ममी महाराज बम समा स्थापना हमी गोप से । इसके संयोग या कोपामा मारतेमुबी पिपुष हए । सन् १८०॥ई में मारपेन सीने 'अननस वीर राव की पानी सपर की। भारतेंदु जी ने रेप स-सपी रेडमी हि पार पर बम के महामपि पांस प्रयास भी किया । मारवा मी भीड़प्प भुगत स्वरमग्पामधे।

[. एम पुग - साहित्यमरों में अपने युग की परिस्थितियों मन पर मा चित्रण मि: शिममार्ग लोमा प्रपामगदी मनार मुगार है। रमा मारिच में पार्मिक प्रतिम मंश है। मानी प.सारमारापप मिमर.मिसन पापमुपारवहीनया पर मापन पनि पमय सेमवाद-विवाद मीमामा पार्मिक मान्य. निमार जापानमा मचाय म" और 'पदोगमा पनि प्रतिक्रिया में श्री शनिमार पास ही में लार मामा, दपस पानापानम पानि दिन] राणापापी में पमठाम मारक तिबाम पर मेरे मम पम को भला पिर रमामयी गोपि मा मदाप रे मदस्म तमा पर मी मान्यताओं के समयर। पारा परम पर प प्रभार पराया। मादिन्यिक परिस्थिति मा १०५..म...नाम ममप माठेनु युगाप पामिरेकर ये प्रातरिया रापमा। मारतन्दुमा रमाबात मन् 4.स मन् १८८11. सपा १. परत पत्र प्मा पुग गरा दिन का प्राचीनना भ पा था। रिय-राटी तपा मापा तल पारित्व पत्र में गुन ९ पुरातादिता विद्यमान पी। पम्प पना प्रमुख पी। गत पार निर प्पानमा दिसा गाामर बन्न पुरा में मारपीसम सिमरिन युग पनि पारगमन ििमत प में निरही पा र मारिद-पत्र में मील yि REETरमारा,मन गैसामण मारा प्रदान गरदीपी।सारिपार मई मनमुर्दा पनि कम्मा भारत प पर परे हिप रनले पर प्रसार मदिवालियाप्रत किया सम्म पनि में परिमन ए रस्म पानी दुगम समिति पाया ममा.साका- "दि मरिचम मधुनिक सम रिम्पर परिपतन म पुग। मा मापक इतिहास में एपा एक मी पुगम या टिमन ने बानगी रिमरा मधुर प्रतिमा का पहिया । इस कार में पर रिमाप प्रमिस कर रकम परिसर सनी मसि परिसिनि नपुग र पपई मनुन पिता मारी - स्पिक रूपों और मचिपों की विषिषता है। सामान्यतया राम नीम इतिषों भनिभावन इन निम्मासिखित दीप के अन्तर्गत र सन्त: समाशस्थात परमबोसी मदए। . साप विषय पर अभिाबना गैही या विधान में परिवर्तन । गच या उसके पिपिप प्रोमानी, नाक उपन्यास ममाडोचना गयाम्प भादिविग्रस । , साममिम्मादिपका बारम्म तथा मिस । पापविमों का प्रचार। उपर्युत सभी प्रकार के माहिरबांगों का पारम्म तो मारतेंदु युग में ही दो उका पा। भावनिक युग में हमी पियेष सति पान इनमें प्राचीन विचारों तपारोती भर पर विद्यमान रही। मफि और ग्यार अपना बीरत-पितामों की रमा परम्परागत शैली में समा काम्प- भाषा म-मापारी ही। इठने पर मी पैश-भकि समाज पार बानादिव मानमारा प्रमाल भारि विपी को अपर परवाना होने बागी। स्वं मारतेंदु जी मे पेस पिपों पर बार जसितापा। सम्पप नवीन मातिलों के प्रतिनिमिपा सकते हैं। परिर्वन स्पस्थित परमेशप प्रभामा उनी। भाविक पुग में अप्प-विषय नबानाए । सामाजिक जीवन से संबंप रमने पाये विपर पारा किस गए। समाज पुननिर्माम लिए उसे रसकी पुराइयों व दिग्दरममाया गया। इतिहास राबर्गति, दर्शन तथा समाज- सुपार संबंधी कितने ही विपप इस युग मी ने मारा किए पीर न पर उपोपन मे पूर्ण कवितामों की रमाकी पा । राममा बर्मा मतापमापक मित्र भीर पाइन्पादियों ने इस सभा को बार-सी कविताएँ । प्राचीन परम्पराबविताएँ मी सार-सायातीही और उनमें भी पर्याप्त मुपार ए। मदि, तर बाबीर रस की कविताएं इस प्राचीन परम्परा से विशेष संवरती और उनके लिए अभिषों बेनपान विपण मी जोर बिम् । गपशपों में- frपमधीमे मारनीकी पिता मोका गई परंतु पुषी रीतिकालीन काम्प बाप्प-सौभमन का सम ।। १ पृ. १२ मा.हि.सा कामविहाछ।

[१५] पास्तव में पाचीन शेखी पर रचा भासम्म रीति-मनीन सम्म के प्रमान ही पुनर बन पड़ा है। यह बात परपनवीन पिपयों में मध्य सौन्दर्य व पास मो विमापीन सम्म विषयों में सेम श्री सत्पर देत । सा की रिसे तिनतीन परोसी में विच, सपा, मनापरी, पोहा, पीप भाविका प्रयोग तो मिलता ही है साप दी संस्त-मत्तोम पयोग प्रचलित होता दिखलाई पड़ता है। समस्मा-पर्व इस युग की एफ पिरोप पहा थी । गीत-बाप का प्राविमा पारचाप हीरिक के प्रमाव से हुमा । पर रोती हिन्दी में परम्परागत पी। प्रबन्ध सम्म इस पुग में प्रायः महीं लिय गए। इस पुग में गीत काम, मुन्न भयमा नियम पाप की रसमा पिरोप म्स से हुई। इन कविताओं में प्रापः सभी रमों का परिपाक दिवई परवाह जगार और हास्प मधुर मात्रा में मिलते हैं। वास्प में मनवीन उवापरक भासम्बन मी पा गए । पाममवावा के स्थान पर राहीप मेता अपना पेविन- सिक महाउस मायकत्व प्रासामे अगे। सापपत्र में नवीन विचार-मारा और भाव स्थान प्रहयारोप। पसमा ममा रम्मत रूम में हो रहा था । यस सी ममता ही प्रब रुपी सीमा रह गई थी। परम्परा से प्रचलित रपमान अब इतरे मिप पदी रह गए पे और उमा स्पान पर नवीन उपमानों का प्रहम स्वतंत्रता पूर्णामियाना रहा था। प्रकृतिक प्रतिषियों की परमिप सजगई प्राम-मापा इस समय तक समापा ही रही है। किन्तु पी बोटी की मोर दिया गया हो रहा था। त्रि मी मचना बड़ी बोली में श्रीर पच प्रामारा में ही बिता जा रहा पा। पह मापा-मोर मोगों में अधिक परिकर नहीं था। मारतेन्दु परिमन इस ओर पिप प्रपरि गमे इस प्रकार की कम्दिा भारम्म कर दी थी मिनसे कही बानी कविता सूत्रपात होता। इम मभर से उन्होंने इन पत्तों हारा प्रयोग प्रारम्म पिप । पकी एक पानी मन् 161 में 1 सितम्बर के 'भारत मित्र' में पीपी, जो इस प्रकार है। सोन मोह नावा पान, लोग साफ पीच । कीचा में जूता फैसे बैर मभ्य में नीच ।। पहनुमगन्दी नाँने प्रयोगात्मक रूप में दिखी थी। राहीने सम्पादक पर भी सिखाया- 'प्रतित सामापा में पर पिता मेगा ।। रेसिपगा कि इममें स्पा कमर और किस स्पाप प्रायम्बरमाने से इसमें प्रम-सीवर्ष सम्वा [४] है । इस संगम में ससाबारगी सम्मति ज्ञात होने से भागे से रेसा परिणम किया जाएगा। मोग चिपका करेंगे तो और भी सिखने का प्रपत्र गा। भीपर पाम माराम संग मा पानि पगियों में इस नवीन परिपाटी प्रामाशिषा पपि प. प्रसारमारपर मिम अम्बिकाप म्यास प्रार कवि प्राचीन सी रे अपनाए एम थे। संक्षेप में पाया जा सकता है कि १५ शवादी प्रतिम चरण की बोली पदों में पिरोप माता सपा प्रम्प-सीवर्ष म समाय नहीं हो सका। पाबाप साहित्य प्रभाव दिखी साहित्य पर पाना पारम्म हो गया था। इसके पासप धि में पापता या ग्वारवा पा गई थी। समार और साहित्य का स्थापी संगम स्मपित होने लगा पा, कीमों की पेरामबासन पिक तपा ममाहारिक जीवन और परि ग्न्मुल दो पडी पी । नवीन और पुरातन समिप्य इस युग में गित होता था। वास्तव में इम पुग साहिर-मधि, माप एपसमा गय में मिहार रामी रीतिमान कबिता भीर बीपन दमा कम में विश्राम करनेवाचे पावादी भावनिक साहित्य की की। 'भारत की तिामों में पार और स्वदेश-प्रम पापानकी मन्दि और सीमारी मापापी मानापास प्राचीनता धीर नवीलता एकमा ग्पर्युट फमन विरोपी-मा प्रतीत होता बिन पान में स्थिति बदी पी। पिशिता दी पुगको विशेषता पी। बदि परपनी से प्रपी पर रहर सीधे। राजनैतिक पार्षिक पार्मिक सपा सामाजिक परिस्थितियों में ममावित होकर वीर विषय प्रहण कर और बीप-संबधी मंबेर पारमाया भी नाम। प्रतीय राजनीतिक सम्पर्क में गाने कारण भारतीयों की प्रपये गौरवाशाम होगापा। भविप्यारा पूर्व म सोधे। उस सभे सब पनाने की प्राst सके सम में पपरती ने ग्म पी और उसके सिए रम्दीने निरंतर प्रबाम प्रारम्म मरत पुगो पारे पापा अप्प पप्पा की ही प्रपारका दी। मप्र मगमगप प्रयोग में माल होता है पता पिर मारतेंदु पुग १ भारत पुग, म. रामविलास शर्मा, प्र. १५ से १८ । २. महाराणसाद द्विवेदी और उनका युग: उदयमान निर [ ५ ] भारम्म में समाचार-पत्रों में गप का मबहार दोमे सगा। साहिस्मोन में मी गवा पारम्म प्रमानवपा मारतेन्दु भी की ही देन है। मारा उपम्पाम मामी निबरों पारि की रस्मा गम-पेन्द्र में प्रचुरता के साथ हाये क्षगी। मार पेन्द्र सपा सम सापोगियों मे मापनमा क और पिशेष मान दिया क्योंकि भार साहित्मा एक र प्रग साय ही प्रचार का एक प्रचा सापन भी। मारतुरे पिता गिरपरदास ने 'महुप माम का एक नाक १८५६ ई में सिवा पीर इसके उपरान्त मारतेंदु हरिरचंद ने अनेक भेट नाटक लिङ्ग । मार ताप साहिप में माध्य-परम्परा को बहुत बड़ी निधि उपक्षम्म पी। इसी के साथ-साम भारतीय भाषाओं में मारा की इतनी कमी नहीं पी मितनी दिदी में । इस कमी को पूरी करने की भाषा भारतेन्दु के समय से उत्पन हुई और राने सतत बंगला सपा प्रत्री से प्रमुबाद पिप और मौलिक नाम भी लिमे । बदरीनारापर भोपरी "प्रेमपन', फियोरीलाल गोस्वामी भी नियाम- रस्म अम्बिामवच प्यास पारि मितने ही देखने मे इस समप समाज लिए उपयोगी मामी रमापपि इनमें से पात से नारक पेमे मी थे जिसमें पमिनपारमकताम्रपान नहीं रपा गया था। पानाटक पारचात्य वरा समय दोषों सैपियों से प्रभाक्ति ५। ग्स समय पारसी थियेटर कम्प नियों बार बा और पे कम्पनियाँ बसपा की पति को पिगार रही थी। इम परय मी मारवम् मी तया ग्म सामियों ने मारी और निहोर पान दिपा । पारसी मारने की मापा गुत जम् प्रधान होती भी फसत रस समप के मायने में मी इमान प्रमाव परे बिना न रह सका। पता माश का रम्पान इस युग में पोरसार के साथ भारम्म गुमाया परन्तु उसके सस्म में भी स्थिरता नहीं पाई थी। उपन्यास-कहानी उप पास भी रथमा भारम्म पनपि इस पुग में हो गया था किम्त ग्मम सस्स नाम से भी प्रपिक स्पिर पा। ईणहारा रवि रानी ताकी की कहानी को हिन्दी समपम रपम्पास दाबा सस्ता है। इसमें उप पाम तपा कहानी दोनों प्राप्त होते हैं। मदस मिन का मासितो पारमान मी भानी ऐसी की रमा है। मारपेन्द्र युग में खासा श्री निवास राम, प्रतापनारायण मिश्र रापागादास किशोरीलाल गोस्वामी भारि ऐसी * पन्यासों भरमा की। शिवम से रुष तो प्रमदित और समीक्षिक। इस पुग में उपन्यासों पर 'सान रखनी परिज की रहस्यमयी ही प्रभाग - तरित होता है। लीनदम सत्री एमारी और वितस्मी उपन्मास इसी भेवी में पाते हैं। बंगाम प्रमाव मी इस युग उपन्यासों पर विप शिवसाई देता है। पारिवारिक पावापान का सारा समाव-भुषार की प्रवृत्ति इन उपन्यासों में मिखती है। पेपारी पपा बासूसी रपम्पास इस पुग मिफता है। किम पे उपन्यास मिशत खबमभाष । सरी और सामामि उपन्यासों में पादर्शवादिता इवमी अधिक किमत सिहरात प्रतिपादन विप जिसे आप पाते हैं। संरतः इस ग्रुप के म्पम-मादित्य की स्थिति मी सावरपी 1 वास्तव में साहित्यम प्रय सपमा निकामना पारम्म ही पाया। तापी राजार में प्रमेडी गमन की नीति के पास पू की प्रभामता मम्स हो गई थी। अदावतों और FIVE-संस्पत्या में इसका मामापो गया था। मा मिसाल सितारहिंद ने अपनी नुरपशिंता पारस नागरी लिपि में हिन्दी और ग्लूकीमिती-पी पपाती कामयोप भारम्म मावा और माराइसी स्पोमो शिवा-संस्थानों में भी स्थान विधाने मरना। किंतु मारनेम्नु से दिदा प्रेमी को पद बात सामन हुई भीर रमाइपम मिोष किया। मारणेनु ने भपणे मिरन्तर प्रयास में हिंदी की सरकार प्रमय निमासाहित्य निमित्र मंगों को दोंने परिपूषा विमा धीर गाना सिए मार्ग प्रशस्त किया। पत्र-पत्रिममा समान द्वारा भी एने ग-पवार पप्रपा म्यिा । मात्पन्दु-मार म साह व प्रमहा प्रवापनारायण मिझ प.बरी माराम पीपरी 4. पाय मा मौरिणामदास मुशाम हिदी इत्यादि मारतेंदु के सापोगियों और अनुपापियों में हिंदी की विस्तार्थ भाव से सेवा की भोर गळ- मादित्य के प्रभार में योग दिपा । लामी रामद सामग्री में भी रिवी केही माध्यम से पर्म प्रचार किया। इन मप पेव मारा सिप परिमावि नदी पी मारम्मिफ मापास्म में गुरम समर्थ बहीनासम्ती है। पाप माने पापेमबिएप पयरसिका बन गयी। मा. म. समा और महामना माया प्रपत्री से 14 अपर १६. महिदी मी पपास की एक माग समेत किन इमे रिण पावहारिष्वा प्राप्त नहीं। नियन्ध एवं मालोचना इम पुग मारिप में नियम स्थान पर महत्वपूर्ण है। पत्र धिमी में मिरी विचार पताका प्रमुख माध्यम बनता है। प्राइस युग में 1 [.] मायः सभी पेलों में मियो ही प्रधानता प्रदान की। 1. उदयमानु सिंह प्रपाकपन पास ही उपयुको-'यस युग फस, हस्पमिप, मिलनसार और सजीव प्रेस ने पाठकों के प्रति मिप्र स्म और मुहट से अपनी मापमिम्पतिरने के लिए कविता, ना पा रपम्पास की अपेश निपको दीपिकपा माध्यम समम्म।" पास्तव में पर पुग पाडोसो, समा-समायों और माल्यामों स पुग था। पारपस्ता पीक इम पुग में पैसे पाहित्यिक माप्पम प्रहय किए गाय को इस गरेय के लिए वपबुक ममारित हो । पपपि इस पुग के नियों में माता माया और शैली का सगा और न ने पुमसत हो, बिनु सपके पर की गहरी भावना और वास्तविक प्रयास इम नियों में बड़ी स्परता के साम सिगोचर रोमों की पार तया मापक रिमामास इम इन नियमों में स्पष्ट स मे मिता। समाज, पम, राबर्माति और प्पति सभी विषयों पर स्त्री नरेनमें में सुभार गोरप सम्पग-पिनावरण समा मार्मिक सन दिए । निर्माता तथा उनकी सचाईका बात पर प्रामास इन पेयों में मिलता है और नियमों का प्रमुख तत्व प्पल्टिस की प्रधानता भितमी इन नियमों में मसीवनी सम्ममतः भाग निबंधों को प्राप्त नहींई। नियरफ्योगप पर भोर अपने विचारों का प्रचार करने के लिए मा पो दूसरी भोर रसम उपमोग सारित्रिक माहोचमा रिपे भी किया गपा । साहिपिक पासोमा म में इम पुग में पण परान मरान का पिशप प्रचर देस गया है। गणुग प्रागमन के साप विचारों से स्परस्म में अमिम्पमित करने की प्रापि मबार और पासोचना सन्वन्मी विक्रम सपा प्रत्य रचे गाने धगे। मारवेन्दु पुग इन सूत्रपातमा पा। परीनारापस चौपाल में हस्ता प्रीमिपासवास रचित माय सपागिता स्या की विस्तृत प्रासोना की पी। इस प्रभार पाटोपमा काममिक निमस इस युग में प्रारम्ममा । मारतेन्द्र पुगकी पासालाबाद निवेदी पुग में दीपाशीचमा का सर एवं मिक्सिस प्रष्टिगत होता है। धाक्षाना और सिदान सम्बन्धी मन्यों की रचना होने लगी। मममी से सिदात सम्बभी प्रम्पों का अनुपात मी इमा। पोप के पेने। भान सिलिप्सिम्म का अनुमान रत्वामी ने 'भार मार्ग नाम से किया पा। १ महागीर प्रसार शिवदी पोर उनपा उग, पृ. १५ ।

[४] हिन्दी काम्प की प्राचीन परम्परामे मुम्म पाप पारामों में बॉय या सकता है। ममम बीर मम्मी पारा मापा ११ -१वादी से प्रारम्भ होकर पास तक मिमी बारिसी कप में पढती मानिदि पास में पापारा प्रमाग स भोना। परन्तु महिमा विकास पर मारतेन्दु-युग में पापारा शिपिय होती गई। बीपी ततापी में हिसार रस की धारा रग पम पहा। दूसरी निर्गुप-प्रम्प की बारा मामवेष और पनीर के समय से प्राप १५-१०ी तादी से मारम्भ हुई। १५-१५ मतमी में इसका पचा प्रचार प्रा और मारक, बार भावि संतों से इस पारा बाबर मिया । परन्तु १. शवाम्बी से इसी मारा पीर होने की चार सय ताप्रापापीय दोपही था ही। हिन्दी अम्ब की तीसरी बारा प्रेमाम्मायक प्रमो की है। से प्राप १. भवानी से, मूर चंदा मेमान्यानों से प्रारम्म होती है। १. सवादी में बम मापसी भावि की मामी से परमप-बारा पदी सोक- मय हो गयी। ममास्पाम भविमण मुमतमाम विरों में ही वाया एपीपाई की डी में दिये। सचिन्द्र अपिया के प्रमापानी प्रमी पणा anti भाइपिम्-युग में प्रमापमान पर पारा पात शिक्षित हो गई। सगुग मधि-सम्मका पारम्म शिमला में "श्री-१५ की राताप्पी से यो 4ग से हुमा भीर इस बारा में हिन्दी वम पि सूर, सी, विवापति, मरादित परिका दरिदास नामादास मावि मेम रस की पूर्व परिकी समास मी के उपरांत इस पारा का बगम शिपिच पर गया । परन्तु मात्र मी पर हिन्दी का प्रमुप पाय । प्राविक उपम मारवन्न बाम सत्यनारापरा 'बरल हरिमाप वियरस गुस भाव मक मिइसा परम्परा में भात परिम्बाका परमारा समाप एषामप मार को परम्परा मर रसम परम्परा साहित्य में प्रयन्त माधीन है। इम इस पो मी कर सकते है कि पारी परम्पराम प्रारम्म मान माप दुचा। पिस प्रचर बिय में ग्वार श्री माक्मा अपना प्रमुख स्थान की सी प्रकार भारिप में भी उसका महत्वपूर्त स्थान है। हिन्दी साहित्य के प्राविधान में मी सप्प पा विस्त पुर तथा इन पुर्य में समाप्ति पर प्रम-इम म्पबार देखने [] में आता है। प्रवीराय रासा, मारहरा, बौसमदन रामो इस्पादि इस पुग के एमप्य, बार की मायना से परिपूर्ण है। भधिकार में भी कभीर और बापती बैसे मिगुर्ववादी पक्षिों में अनेक महारिक रूपमें राप्रपने मधि-सम्पपीगगारों को प्पत किया था। मन्ति परम्परा के कवियों में मी म्बार रस का पर्याप्त समाग पपये पप्प में प्रिया । मधुर महिनासो भापमही प्रकार मापना, परवती मधि-साहित्य मिससे भोट-पोत है। इस प्रकार प्रकार की पर परम्परा अपना बड़ा पापक रूप मेकर हमारे सम्मुख भातीहै। मति पुगध प्रम्प प्रपातपा माबुवाकोम पता था। मत कमि मगवान् के प्रति अपनी प्रान्तरिक रागात्मक मावना मे पर करना चारवा था। रस मिम्मम्मा में परमम्ब बाय स्म की भार इवना प्यान नहीं रेता का तात्पर्य पर कि रसन्न काप्य अनुमति पान था, कक्षा-पान महाप्स काम्प की पाम्परा पापि भकिसी मूवापार को और बढी पी मित एप्प की माइपमपी सीमाओं के चित्रण में कार समाव ही प्रमुख दिखाई देता था। मचि होगह नीमों पर सीमित रह बळी पी, जो उसके बाकि तप का अमुमन र सम्वे । भएपरिची साहित्य में पार पुग का पारम्म हा कृष्ण की मेम-सीतामों अपार कर सा पा परन्तु समय परती पियों में भक्ति की भावना मूह पेन्त्रिपवा की भोर पियेप छ गई । इस समर पम्प में मानमच्चियों की प्रधानता तेरी। मलि पुग के अनुपापी रविनतीन श्रीयों का मार्ग पम्प के करा पारमचरित मात्र पा। विपी का एक वर्ग भागोपिया कीबोब में अनेक राम महाराणामी दरवारों का प्राध्य ग्रहण करवा पान, बगनिक प्रादि कपि मो इसी वर्ग के पे। विद्यापति से मचनिने मी महाराजा शिसिरमा मामी सिमा ईनाम का बार-बार उसे के समके प्रति अपनी भावर-मारमा प्रयकीन्हीं के परवार में राम इनकी बीविभ पक्षी पीर पुग केपि प्रभामठपा परमासी थे। वास इसके मपम बाहरण प्रेा सकते हैं। प्रागे सभी मि इसी परबारी प्रतिम बो, मिसन परिणाम भाभपडावानों की भरि-मरि प्रसंसा में मनाया। भाभपदम्तायों में मापा मारो गया और पनवे पर हीसा-पितालों में बम हरकीपा समान किया जाने गाना पार पपर्यन पुतहा प्रमादित तया परती भी हो उमप ममरसम्मम मंगार प्रवासरेबीयन पर मारोपित

[ ५. ]
होकर साहित्य में पा सामने लगा, जिसके माप समात्र नैतिक
पतन और न्याया।
परो भविमलयारी मामाची में परिवर्तित होनेसमाप मा।
सीकीसी से संत सम्पणावि प्रमुभप मेधोर हिन्दी
अपियों की चिया गरीबी। मिसमान मापा भीर मा महत
भने पपा सकसपनावि का मनुसार ममेक और चिप रहापा।
माराका सकार मटियुग देवियों में भी बात पर सिवा पारगार
कोमो समय गुल का संता उमपा और पा
कोमड से कोमट पा सुस्म से सम्म मार की पोरमा-ममिका भने में
समय ही बुध पीगार पुग में लिप्त प्रमर की रसपूर्ण काम्पसमा मडा
मात्रा में होने सौ सम्म परम व एए भाशय गारपसार ही इस
मम : "दो मभर से इस मसर सरमोश्री रमाको
पोसना मिनी पर ममता पर विवाभार रिमाल
विचमा पनिम्मच पन्त समान पा मालपूर्व प भापर
पापिकामामा मेष-उपयों की परमो और सोबादी पर महार्य
की शाम । दूसरी पाव भार कपिकों में प्राषि विकी।
इस मगर इस मशाली की भोर भने परमगार मन में ति
सामाविर्भावधा।
सतत साहित्य चिमिा भाषापों के मतानुसार सारित में प्रवेश
सिक सम्मान प्रचार से गा मास संपाप, अमेधा समदास
पत्ति संप्रदाय फोलि संपदाप, पपिसाप पा लि घमवार ।
प्रमा-गापायुमर मानेका परियों की संख्या ही पिक
पी। इसमें जैसी की पीरियर पररमा का मापन्य होने के कारण
xगार पम्प नाम रीतिमा गरा। वास्तव में काम पूरा भाषित
राममा दो इस पुगी विपि । सामा
प्रम में रस पिति सीमा गई और इस माप इस पुग के अण
मनाम विनष पर गया। यहाँ पर सिमम्म सक्ति परिचय देना
ममुक्ति मोपा।
हिन्दी पाहिल की भूमिका, पारागारीमा ११८

[1] रीति संप्रदाय रीति सम्पराल सम्मावा पाचार्य पामन पे, हिन्दी विशिष्ट पर रचयाको रीतिमा और परमाको गुगों के स्सा भामिव मना । गुण मनके प्रमुसार काम्बको गोमित भनेवाये मर्म है और पाएको स्थायी चता पोर्पो प्रविवारस पते प गुदों पौर भगारों के पास से ही काम्प में पुत्परता सपा होती है। अहो ममरी से अपने काम्यापर्श में इस सम्भबाप सिवादों घे योगा परिवगम हिमा, उन्होंने प्रयास बागुपदोनों को विए भावस्पक मान लिया। नोंने मुन्दा मानों की मिनाति सिए धनर शम्याक्सी च प्रयोग प्रापरमक माना चौरासीमावली पपोगको मात्र तिमा। रीति मम्मदाय के पूर्व रस समाप पमा अपार सम्प्रयापम मचान दीपसाबा। भरता माणात रम-सम्मराबर सर्वप्रथम प्रम्पया। इसमें कविता का मुसार रस ही स्वीकार किया गपापा । किन्तु भागेर बरजर पीर पर मावि मारमाथिों में यह प्रकार की सम्प की पम्मा माना और अप में इसी की स्थिति में प्रमुख स्वीकार किया। स्प पति को मनाये गा मा उपयुक्त माना, काम्पासोचना चिप गीबर को ही सीरी पर किया। कोधि भोर भतिशयोकिको मी बन्होंने म स में ही सोकर किमा। दिनों में माप सम्म बाम से सबसे अधिक प्रमाणित है। रस और प्रबार अपरान्त ति सम्पदाप भामा, जिसमें पुणे को मपालता मिली। 'दिएको विषमिव पीर संपरित प्रबोगरेपर। प्रस्तित्व में ही ति की प्रति होती इस प्रभार राति सम्मदाप मैं मार सम्मवाय से प्रति गारवा मिबती । इसमें गुयौ म समान इस वियर पापकता प्रबल प्रतापपि पा सत्वगुणा ससस्स शुत कम किया और पिता परम में भरिका मापस स्थापित कर देती है किन्तु नि मी मा विशेष विमसियों में मेची बाट का एक ही प्रकार की होती है। इन ऐतियों में रस, पर और गुबममा समान मालित पा परम्परायता समन्वय मेथी में प्रोमा स्पा १ हिंदी साहिष्म, वा सामसुपर पाय, toms 1 T [१] ध्वनि संप्रदाय पनि समय रस सम्परापमही पाकिस्मा, मिस प्रा ER रीति और गुणे गरेरित स्थान पर नियुष मिार पा में रस-निम्पति सिए रस सम्प्रदाय मे ई मार्गबही विविध किया था। पनि सम्पदाप मे इस सिदान्त का प्रतिपाल मा बि सर सम्म में म भारपूर्व मार्य होता है। इस प्रभर पसरों में भी पी बिति सुगमता प्रमासिक पा सकती है। प्रनिगाही ग्स प्रबो पर्ष मानवाजिसमें रस-सिदिमही होती भीम अस्पार, गुपयादिबास- सिनि में सहापक मात्र मानता है। इस पर मि सम्पप सम्म समीक्षा की एकमालपूर्व खासगमा । पर्युक परम्परामों पर परगने के उपरांत पापामा ताकि Pाति पुगभारम्म एक प्रकार से मासे मभरमारियों में होगा। तामवि भूगर वा मठिरामपान रीठिपुग में मालपूर्ण मितामपि तवा मतिराम पोषोंदी समपान सपना र मसिर । मतिरामा भाप मोडल, प्रसाद वा माइप गुप प्रशंसनीम है। मिारी म पास रोकि- पुग में पपुर।रे दोहोंचे भरीपरी सपा माती प्रामा विए मस्ति । सौर और मेम के मनोरम जिनके मन में मियते है। प्रभासतमा प्रभावादी कपि पे । अविमा व अपनी मौखिक मानामों, मारमिप प्राति मनवा पापकता पा भाम्मास्मिता लिए प्रसिर गुप्त रचे रसगड़ी वा मनिषादी विरामी (मिक्षारीबास) पामोवि भले ही रो पति में बायोमा पि पूषा निसित की और इस पुगरे अन्तिम भोकपि पपाम। मापारिभर भनुपासनिपता, सिप राति या मारपी से पधाम गुल ही मम पनि ममति । अस्विर साम इससे भाा मानना हो। बम, पादपोमा, मन, अभिराम, सेपक इलाविम अपि मौए मोमविपार तमा मुट रसपा मापार पर सम्परामरो। म ममम ममन्वित मात्र सामी इस पुप मतदार केस में अपने सम्पमापा। गारसम्म पापा ममील में पारम्म ममम ताम्दी (मी से प्रमरम में मालाबा साहै। मारत में रचित श्री सत्ता में पर पेपे मिस्बो मधि अपमा मारिममता प्रमाणाचीपया ई संबंध नही र पार नि सम्म मेरो मनमा से एही पिप से मापिम मेह, मशिन, पद स्याबमा परम्परामरम्म स्वीकार सिमा बासमता। OHIN पी से हारी 'सस समा गोपनाचार्य रचित 'प्रायो- माती में मेम बाप्प मना मिल ही में मिलते हैं। बामियों विमाव, भागर-मवार, शमूपा प्रपद प्रचित नायिनी मार, पाप नपा परिस्थिति पी मेमों की स्थापना का मूल आधार माना Tiwartसमभर सिरों प्रशासीय या रिसिवम भाव पाय में अपरम्प होता है। रंगमय पर मिाय प्रोबारे मयेकी भूपर, समसगीपांग पसबार सपा अगों सौरमा पिप नाम- समें प्रस्तुत किया गमा है। सानो साप रेगाव-महि परम्परा है भाभार र रष्टि मदिसंबपी "मीसमपियों में भी गोपियों के माष सपा सीप प्रबनमवे एए मोरे मापिका मैच काही सारा पर इस प्रकार पर परम्परा एक और दो से पारमारियों के मम से सौपी भाग परम्परा मेन निदी-साहित्य में आई.पी * माम्पम से मचिदी परम्परामहराको मारिल मेने कामाचल सिपा और नायिका मेमकिपरराम पिपय माम सामने भाषा। ति पुरा में विशेषठमा पा राय संधी नापिन्ममेव गस परम्पराका पारमा मा देशमा समासा परी शाली सामग बासापर प्रामसूद की रपमा हुई। इसमें मापिमा सूक्ष्म येदों का विवर किया गया। इस भापार पर मी र पार पुग के कवियों ने नापिनमे सपा प्रतमयाब मिन्दी पारियों के साविधात मनमोके साप साप कवियों ने गोपन- में पापपर्णव मी भिमा । भनेक कानुन मसित परम्परागत समिबियों में रस-मरिपास में सहापठा। इस ममा नाविम मेह, बगिचा, पन तमा प्रोमा पापरास पााम एक पाप पा एमालाचा समता है। कार युग के कवियों में से पलिया भागात राती सयभर शास्त्र कापसाप पिपि भी ना मते है। संकर में प्रचसित प्रदेश प्रवाोपी रेखने पर विवश कवियों को भित्री १ हिंदी साहित्य की भूमिका, हे प्राचार्य हजारीप्रसार मेरी, १. ११२,१५। । 1 विमारकम [1] संप्रदाप शिपमधमुपापी मी मामा माता । इनमें मापा ममी समदायों केसार मिसरी माह । इस समर माम-सम्बन्धी विमित पाम्पाराव से पनात्मक और पामरे परत परता करियों से स्वारमिरवर पती रहीं। साल पाक्ति मेद, अमर, परमत- परंब, मसिमरि सभी परम्परा सलपाखोबा सती है।

काव्य-कृतियाँ

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रचनाकाल
रना नी रचमामलने दम सस्ता मागों में बिमानित
सकते है। इनके रचनाम्ट का प्रसार सन् १८५९t. से १५.११. उक
सपा रचार सन् 1. से १५. (ग्नी मत्यु सन् )क
मानमा गतिरे। सन् 1.ई. स .कराकर जी सादिपिक
देश में पूरा स से मान रहे। प्रतः सगमग १५पर तर हिंदी-साहित्य को
रमका मामी रस प्रासको सम। पचपिका पुरस पन्नो रचना
प, मिनु रमक रचनामवरचार में दो प्रभा में पाए ।
पूर्वार्द की रचनाएँ
हिन्दी साहित्य में स्वामी म भागमन प्रचारपा ममस्मापूर्तियों के
शरामा। सम्पयर में हमें सम्प्रपम ई. में सिसाका
परांन दोता । पर 'परिरचन्द्र पम्प तपा रमः परक के रूप में
'प्राण' का निर्माय मा। सन् 11. मैं हरपार भी
'साहित्य
रहाम' (थप निमय दर) साहित्य-मुपानिमि' पत्र में प्रमशित भा,
जिस बार में मारी-मचारिची-ममा ने पुम्मसभर प्रकाशित किया। नागरी-
मचरिणी-पत्रिम के पपम पर नृतपक में समाचारमा काम
माग प्रमशित पा, मिण पूरा पनुवार राम राम रचरा में प्रका
पित हुमा। 'पनारी मिपम रहाम" नामक मेल 10 में प्रमण्ठि
दुमा तपा .. में 'बस समान्द' नामक मेड 'सरस्वती पत्रिम में
।
प्रमशितमा
रबान बीपी पवार की रमामा में भारत की प्रमालय प्रबम्प
प्रय श्री प्रधानता। मुमत पदों भरना समप-समप पर रोती रही
तया समन्यातियाँ मी पवास म्म में । राम जी रामहम
पूर्वाद मामी की पी रहार की अपेपाल कम महत्वपूरा है। कि
इम ग्रह के संपादित प्रयोलने से पल ताकि पूर्वार में प्राम
प्रपों अम्मपन पूर्व संपादन में पित। पूषा में उन्हेंमि ११ मेपा
मसम्पादन विपा।

. [ ५८ ] पप्रपम ८८.० में पुषासार प्रपम भाराभा संपादन एमा। 14 में पूछ मित प्रति प्रयाग, मुबरा "मना अगा" वामपश्य वाप प्रय' प्रकाश में भाए। १. में शशि एवं बरोबर पासपी रव एम्मीर संपादन सन्दीप परिपत किया। मन 14. में कामयशेवर परस्पी सिक क्लिोद तप समस्यापति' माग समान भा। २. मग 'पासोमा पासाराम दिवा गिनी' प्रकाशित सम् १५. में समाधिपादनावर व सुगम- सागर'मसाप मा। मपरिव प्रबोधरेखने से होता है बिबाल मी साहिरि में पदार्पण करने के साथ ही प्राचीन प्रीम गम्मारवाए बचपन हामा- लिए वे पे। इसी गान ममम ममममी रमानों में रीतिमा पूर्व मधिमारियों का पर ममता। स्तम से पके संपादित की पर पिने से पतरोताममें अपि का मलनिक, पमा रम आदि पपा पुस्तकासार बीमपणास पर पूर परिमासी गान पर्व पम्मीर अमर स्वस्म सम्पमा पथपिनन् ।...सामीभावोस बारे इमार समा पस्थित नहीं होता तिमिरचय ही सग्रह में रपमनी से पातालावी बोरमले निम्म स्पा सेसxt- 'सम्बत्..भारम्भ में मेरा एक परिवार में मेरी सागपा, जिसमें न्याय सामग्री साप मेरे पिता की एक चौपतिया मी माती रही, इसमें ५..पेसर कविता-विश्वम, म्पकता । इस artk सम्बत् ११० स्मात् पदये बात अपोषागास में मी विचों की रमा अब सब मिमा मठेपे। उचाई की रचनाएँ रमामटकीपी से पामबीरमानावार पि माम पूर्ण। समग 11, ", पित मौष ने बार बाम बोस [ ५१ सारिविकास में पुनः भागमन मा और निदे जौनपर्पत साहिन्प सेप में रव है। साम्पमतियों को एक सा-सी पगई तथा समफ- समप पर पतियों में उनके सभी प्रकाशित होने सगे, जिससे उनके विचार बालेवास। सनबीम के प्रतिम दस वर्षों को ही उपके रसागर पासपुग मामामा । सर मैं 'समासोचना' कायम मा। १ मा १t. मे गयवतरवा भारम्मतवा में समाप्त । सन् १९९१ ई. में सिविषो समापारी में मिलने की सुगम रीति, नामक तथा पर पारी, पद प्रकाशित । सर, सारी प्रब की रचना भारम्म से तुमयी तथा "मारास शिवानीपक पापमा.प्र.पत्रिम में मकाशित । सन् १९५० मापुरी में धारदाद प्रात होवे ।। सन् १९ ५० में पागरी-मचारिणी-पत्रिम में "रोड पर बाय", परिवार एकनपा गिता देव प्राम्यममाए। १५.की मापुरी में सम्पराकम्प, पाराला पारा पापना, मुचीप', तपा पद पर्यन प्रwिa gy| २५ दिसम्बर सन् १९१५. में प्रपम विद्या भारतीय कवि सम्मेव पमापति के पद पर प्रतिक्षित पतबा इस पर से दिया गया भापण सिमापा मारी में बड़ी मापय ११५१. में प्रतितपा। १५३५ की मारी में पप्पेशवनगा" भवनम", बीपी भाषि परिवाएँ प्रमाणित पवाबर ११ गावार में होने वाले भी रिमा प्रेस में बात की यि मैं मापन दिपा, बापमारे मापपमाम से ममागितामा १.की माइरो में 'गोपी संवाद, पमुपान, हरिपाती मेहासी हरा पाप प्रमोद मामक पप गवाए। १ मारी, २८२९, २. माग २, पृ. १४१।३ नवम्बर के कमें। ४ माग ... माग, प. २०६७ २१ जनवरी, प.१। ८.८ साई | तिम्बर १ भम्पए, पृ. ४५। ११ १४ मई, १५।१९ १९ अगस्त । १५.१२ नवम्बर। १४१.धमगरी ११. २८ फरवरी १९२७ । ११ अगस्त १९२०,110 माई १६२७।

. [१०] पम् १५.. की मा.प्र. पश्मि में विधारी की बारी', एक ऐति- हसिक पापापा की प्राप्ति, तपा एक प्राचीन मूर्ति, मामाक समय-समय पर मसित समनी मिमिव बन्दों से अनुमाप होता। किनिषिष प्राश्री पूति से ११३८ मैं माधुरी में भी वि, रामलागमन गया गौरव ममा बीर सादिया प्रतिर। सम् १५५. परस्पती में वियपदो पर सपा विमाव में शारदा पति, साम दोन वमा समिमापुलपिता पी । सा ११४ को माधरी में श्रीरला कपि प्रमितमाम पवित्र में विधारी सतसई सम्बन्धी समि' या समुपसापाचार माम मुश्कि सम् १५५. में परमाता प्रकाशित भा। माधुरी में अनि मापति विगी के न प्रमशित । पा. ४ पत्रिम में मिली-सासर सम्पदा सहिप त्या 'साहित्यिक मा-मामा पारसले बालर की सामग्री बामदेवाए। १५ मई १५. सौ प्रति भारतीय हिन्दी माहिमाम्मेडान सभापति-पर से नि मापक दिपा। में मनी परसागर के सम्पादन में सपथे। मई तिा भाव में पानी विचित्र संचप' में और इसी वर्ष बासुरी' नाम पर भी प्रपिताम्। रमामारचार में मेरत पो प्रम्पी म सम्पादन- मा, किन्त मी माग पूस में सम्पारित मन्धी से मिरपती प्रति। पितारी समान सम्मान में समाना। सा-सागर पबम सर्गक पूर्वतया राम प्रर्गम तीन चौथाई माग से सम्मारिवमये। जोपर पन्तिम विषयों में थे इसी पप में पति । सामनी की १ भाग ८.पा १११ । २ माम ८.१२ ही प. २९01 रनगरी, १५१८ फरवरी, १९२८।। १९२८, १.७१। . १९२८ अगस्त 1८. सितम्बर, १९८1८बनवरी १.१ १. अगस ११ परसरी, १२ माग , पृ.१६, १२१ पा १२९ | ११ वही प.१। १४ मासिक, १८१1१५. माप १.,.wil [1] रमाओं, मापसों पूर्व सम्पादित प्रन्पो ने देवम उनी सवयोमुली पतिमा का मामास मितता। रचना का उदेश्य पापमानाविभाविक अनुमति दी घोटिका है। पर कवि अपने मगत मायों में अपने शवप में रोकमही पाता तब प्रमुभूतिपूर्णमाप्यों में पा यम पदमता। सम्परमा का मूल मरण यही हावा सकता है किन्तु मध्यममा मातीम एमपना प्रेरणा पाती है। अपना पातावरण, S बनैतिक सामारिक पार्मिक एपमा प्रार्षिक वा सदतिक परिस्थितियों कपि किमी मिप प्रमर सम्म रखने के सिए पाप कम देती है। प[क परिस्थितियों से प्रेरित होम बि पिसी सिमीप मभर श्रीप्रम्मरमा मता है। इस सामान्य सिमान्तको परि में रखकर दम रत्नाम की रचना-गोरप पर विचार कर सकते हैं। रखावर मी सातावरण में अपर पतबा सम्पन्नता तारण में पाए थे। उसके लिए जीवन में मीषिन की समस्या कमी विपम नहीं मिमी सारसम्दी पति कमाल रेबीपिपान मिमी पसार । पावागत भीर अयोध्या के दरबारों में राते हुए उन्होंने अपने सारिलिजमावावरण पाए रखा। रामदरबारों में रहने भरण गर्न मव पीर स्विस पामोद-प्रमोद इमारिस मातापरयसीसीच उपमप्प सामनपुग संग्रन्तिका युगमा। नवीनताका पका भारों और प्राचीनता कामापक प्रभाष अपनी पूर्ण शक्ति A-मन पर चक्षिकभर किए हुए पा। आपके में तत्वाधीन कपि बीन रिचरों पारी भी मातीपताको बोर महीं पाए। बार बी वो अपने पायरय तपा शिषा-दीपा में प्राचीनता-प्रेमीपे होता उसी पम्प रामगोप मनोरजन तपा पावर्ण-स्थापन ही मा बाम तो अनुचित गावाम की प्रेरणा रन पर-पुर्गन दियो से मिसी। रेसर में मी मम्मरमा मते थे और म्यूरियों की रसिम्ता गर्ने मी प्रह मापा । ऐसी स्थिति में रपये काप्प समूब पाइ मापनपति की प्रमि- संसाप्रामाला लिए । अपनी प्रारम्भिक मामों में भारतेने विचारों एवं सिमानों को ही परिपए प्रना चाहते थे। मारपतु 'सलामी भामा पस्मार 'परिमन है, सपा गती मारपि ममापित [१] रमार जी की प्रारम्भ की रपमामा पार मुसीरमा पो ही मशागृति रस पुग में राम जी नवीन नागरण की माया से प्रम- मामिले ये भारतेन्दु हरिबन्द के दरबार में मेगा बाबा केस में से पिता नब सम्देश भरते रहे। इस साल गये मारतीप मापा गोषणा दिमा। गो मारों में ऐशिया- सिक पावों पास सारेली पा सती है। पामा सता है कि गमकी धारवादी मनोवृत्ति रिन्यू पिताको सापडेम सी प्रथा न पार्मिक विश्वासी को माकार सम्मान करने से प्रपत्र में रम भार पाद को साबिमा । बारबीने हिंगेपा में अपनी पार्मिक माना पर किया है। परमात में शान एवं पोग अपेका मडिपा निर्णय के ममप सगुपोसिबम्मिा गया है। रिंगेहा परिबानी पंगापवरच गमावर सपा पौराणिक पामों से सम्बन्ध रखने वाले प्रश्न रमपाकिमिमों में मामा म प्रभाप करते। इस प्रभा पद पर दोभावा किरबर बीरबलामीका प्रमुख गोरप अपने पर राषा- सम्म के प्रति मणि-मापना सासामुसाप सामाग से चरितार्य मार दो किसी पर शिप में पाम बापनमात्र भारत मी गिरामाचारधीन म परे-धि पार करके धर्म ममार-पार नवि भरि प्रत्यक मधार परमापते थे। वैसे विधर्म की पाप तामे देख मारे गये प्रम में स्या समापिएको गप, मितही तो मेम सम्पनमा में प्राच नाही उनका राममोहन र प्रचार-साहित्य मात्र रामा।

कृतियों का संक्षिप्त परिचय रणाम भी की रमानों का वर्गीकरण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि इन्होंने महालाम्प की रचना मने का प्रपन नहीं किया । इनके दरिमन्न तया मग्पतरस प्रम्प बरा-पप्प के अन्तर्गत ही प्राते हैं। इन हतियों का संवित परिचपरेना अनुचित न रोगा। १-रिपन्द्र परिमाद रसायनी की हिप काम्प इति । सपमपम मापा-सार संपर नामक काममाह में इस प्रभाराम पुत्रा। इस सम्म में । सगर तमा पारम्म से पन्त तक रोजाब का प्रयोग किया गया। मंगताचाय हमा समाति-विवि महीं दी गा। इसका निर्माय भारवन्न परिमय मानक मापार पर है। यह मी मना संगठन होगा कि यह मारतेमुगीक नाटक का पयामा मा ता। भारतेन्दु बी ने हरिरकन नाटक का रचना प्रार्यस्मेस्वर संमत नाटक शिक' के प्रापार पर लिपारि एवं पन्तको पटनापी मैं निराप मन्तर भी । सगिक के ही संकत रसाप को मारवेन्द्रीय रख दिपा। पा. रामय यह ने इस एक बंगला नाक 'मत्पररित्या का अपरमा है। पर बंगहा मात्र मी संस्कृत पाक प्रशिक प्रापार पर ही निर्मित मारे। पर रिपुमी रामामों में हरिराम का नाम मी अप्रगल्प है। रखाम के अनुसार परिमण इस रारा पे तमा रामपंरपी मे १५ पीतील प्रवतीय हुए। इस म्या के वो मरे। पाता विकरपारपान प्पा एसरा पौराणिक। वैविक उपाम्पान में हरिष स्वार्ग बस के में । हरिमाण की। पबिपी पी किं पुत्र किसी के पारमले पहा मारए पूर्व पर्षद नामको अपिथे। माए अपि पारेणासार गलने पुस्-माप्ति पापा बस की तपस्पा की। पाप ने पुष तो प्रदान किया किंतु ग्नहोंने इसके बम के पूर्व ही में पति रूप में प्राप्त करने कापण A L राबरिमन से पिया। राधा परिक्षण पे भाषातिरेक में पिना समोर दी पुपो. शिव पार पति ने प्रण रेपिपा । रोहित काम एमापामा पुनम रेशीमूत र परन प्रापमा स्मरण माने पर ति निमामाने पर बपिने पुकाम एम संस्मरों बाव बधि रेकी मात हायब गरे। रोरिव मामा और उसके अपनी पहिला प्रस्तीमा करा लिये प्रस्पात मरिगा। हरिचय महोदर रोग से मस्त हो गये। वह समाचार हात होने पर पोहित पर पापप्त भाने के लिये प्रस्तुत । ति माह में पांच दी में परम पेय में प्रकट होम रोक दिया। विवाद सासर में रोहित की मैरीगत परिवार से। मिर्पनता-पा म्सने अपने पुत्र रामारोप 1. गावों के बारे रोपित को दिपा । रोहित से अपने सापापा और पप से इस बार पर राजी कर लिया कि एमीप की पति रोपित पान पर प्राय। एमरोप में बल्यो प्रर्थना की। पाय मसर म से भी मुकर दिया। श्रीमनगपत में मी इसी पाल्पान की प्रापालनु साहित्यमरों में इस व्या में पाम्पम पद मिला । रिबन्द परिव परिका में निखर रम। सममाविषपाल्पा परिपरिष में गई विशेष माना। पौराजिम्पा मैं मा परि सवादी कम में सर्वसिद दिये गए। सत्पपारिवण पर्व दानवीरता पौरसि मा में सीमा पार भगा और वही भवि माहिलपरों पे भाव कम गई है। पिपमित्र पुर्व बारपाक रेसन परीपर्व इस हत्या करना। सभी पुराव इसकी से एक मानस पियामि रेमियनेमोमा गत मता सस वा मनिप्प पुस में ही मालिक ग में विचरण गरे । सो मरिणामों के मार्ग सा सुनने पर पीपा पापाचे वाडा-मा मते इपीमनी परे। तुहीमा मात्र भी और सिपामिन रम में परिगए, जिसके प्रत्तम भोसम्म फा विखार मन्त्र शाम भिषामित्र सर पानी में पान मा म पामा मते रिबन सम्म में पतिमा मी पारारिकमा मापार र रसिबो निम्न मासे - मथम सर्प में मामी ने राग हरिरामापन स्मिा है। मा बारपार में अपने प्रसारित होने मरपानरागाने पालनहारिकन मसाप्रयास 1 काग्नहोंमे समापान किया कि स्वर्ग के प्रमिसापी महा। किन्तुम स्पमावता विनराहना रचित समम र परीपाने की बात करते है। इस पर मारव जी कुल उत्साहित होम पोपपूण दो नावे और परपस के तुप्पता पताते हुए कहते हैं कि हरिरण का मत स्वयं गारवा भी महीं पदस सकती। इसी स्पप पर सिपामित्र र प्रदेश होता है। पारय मस्पान करते है। शिवामित्र के पूछने पर हर भोलेपन तसा सरसतापूर्वक घरमा पर्षित करते हैं। समाव से ग्रेपी विरपामित्र भी सादित होटर पावे १ परिरण में ऐसे कौन से गुण है जो मुनिपों के मन को मोहते है। सहारा पाय इन्द्र ने अपने ममोनिशान शान का रचित प्रयोग करके प दिया- हमई यो इदि मापद। २ मिप्यामापी भौचित्य विवेक न राखत॥ तुमसे महानुभावनि हूँ के होठे बग में। एक सामाग्य गृहस्म भूप को प्रत किति मग में ॥३१॥ । -- -प्रथम सर्ग विस्वामित्र का स्वाभिमान बात हो रहा है और ये स्वप पकाने के सिपे प्रस्तुत हो पाते हैं। रितीय सग में विवामिन परिये अपपुरी पाये हैं। सिवामित्र र पर "यरि चन्द पूरब भी यदि मेप गिरि सागर, परिन दरिषद भूप को सत्य सागर" पापर पौर मी रखि रो पटखे । रामा परिणः सम्मानित करने पर अपना परिचय देर सका महीप बने की प्रमिसापा प्रते हैं। परिज सहर्प देते हैं। रान-मदिरा मांगने पर मन्त्रीको साब स्वयं मुमा लाने की माला र है। विश्वामित्र प्ररपति र पर प्रति विशेष प्र प्रपोगमते ए ग्वावनी देते कि सनम राम- मेप पर गई प्रषिपर नहीं है। प्रतिक्रिया मापाचपा पवे ए परिरम्य, "पारा धन समेत पारित किया हो। मित बमुग शिवामित्र कीपी में किसके मन में गि। तब समिमा--"श्री और सी र भनिन पुर कि विभामिन्न असा मी पर सम्मन होवाणी संगबिगूल पर बसी और घोडबाहर, बदा पारा मुभम समेत विम्म, एक माप्त की अवधि में रस भने कहा। एक मास में नरेने पर विवामिपाते हैं "सी तोहिं पुलमि संग सार पराम।। मी पारि मे मा याचना का परिणम का पूर्व -- । रोहिताय को पका रविगत रामपागमा सिपे मसात ते। नवीय वर्ग में मप्स एमस दीने ही दिन विधाभिरबी परम समे अनुचि रामदते हैं। हम में सोच पर है। इस पर मा परे पते र अपमे मामी में बासमति पानाने में मनामी है और पहले सकिनक्षिपे पछी । पुनील पापा र रालीमा एवं रोसिसि। रबर रामी पामस्म है शिष्य न्य रे साप जाता है, पर सिमिप होम पम्पिक पापी विधा देने पर विवामिम मस्तीपरीष भाषाबाप- िसर तप, 40, हार या लिा मुक्ताई। जो परिचय भुगामी मा दुर्दसा दिखाई।" विवामिपित होगा १. भागवणे दोन गिरते है। हम अपने से मा समAM शिवमित्र ही दिया। इसने में हम बीपी पाए और परिमन को बरी विष प्रदरिमय दिया- मित्र से पया की मिसामगि नासीय परिषदको हसकिने रिपेमाशा। परिमा-महार। समसमाज निवामिन की बाते है। पर राम मरकर बने भावी पापामाप पहा पामी-अप करने जाती है। धे मर्ग में, हसिन्नबी सरपर की जाती है। रमणाप देवी प्रसोती। गर्म मौदरियरने सामी भोपा मारते मासिककाष मारपर्म भोर विर-मसि लिये माणिों में वापते है। पर सिदिहम विपि वा रेमी- स्वामी दक्षिण भी है। भागमग मरने गे। माम भागार में । सूर्प सत्र पर परोसिये सगुल्ला में भामरणापोशारा सारपायो। नारी हिार पुर उपर पाठे। बस मेगा मुनरो । पार से कधी पारिदिया ये जानी-सी परिस्थितियों प्रभाव है। रामपि सिपादाय, मात्र पोलिस माम विदारी। विसस्थिर गोपिक दुसरया गाला पार ,नि पाम विगा पाते हो मे समझ पाये। मा को मी मम या पिर प्रो पराजमान - [.] मांगये । भारावादी हरा दरिष की प्रशंसा सुन बह रती है, "मि परत सब साम मावि अपना मिप्या पह॥ हरिप उसे सा पण प्रते। ग्रसर या प्राति से जैप्पागा पाचान बासी है। सपा और भी रीम्न हो रही है। निराशा अपने पम स नहीं डिगठे। पर रेमे के सिपे सेम्पा अपना पसम पाना चाहती है तमी पप्पी काप ठी रे मा घोर विस्मयरी गम होता है। अनेक बामे सुनाई पाने लगते १, मुमनों की पामेलगती है। हरि ममुरारी प्रकोपा हाप पकावे ३। रामा दाम पर मारापय कर पर ग्लानि मदति परते। भारापग ऐप्पाको ऐसे सत्यवादी पति पाने के सिपे बनाए हैं। रोहित घरम नारापय प्रणाम कर मातापितापरयों का स्पर्शाता- सस्प, धर्म, भैरप, गौरी, सिप, बेसिक, मुरपति । सप भाये तिहि अम प्रसंसा करत समामति ।। विश्वामित्र मी मापामा करते है। हम अपनी पुस्ता स्वीकार करते हैं। परिर ने प्रापद प्राप्त किया। बारापण गर्ने र मांगने दिपे हते हैं। ये अपनी प्रमाकासास माग पुना बर मांगने के लिये भामर करने पर भारत की महिमादिके रिपे मार्यना मवेमा रोहि तर रामरेम पत्नी सहित विमान पर हरठ माते है और पुप्पों की होती है। इस कमा में राम-धीरता मात्र के साप पदण रस प्रधान है। इसी परय साहित्यारों के रिपे पर पौराणिक मापान भार्पण का विषय बमा । रसामधीभम में पिरोपवाएं मी है। स्वामी ने पायों का परिचित्रय पथिक सामापिर स्म से किया है। रिप में माननीय दुबताएँ भी है किंतु सत्य पर भय्य राते है ईसा गरे रोहित की पत्यु पर विस्तार पूर्व कॉपी हगाोसिये प्रगत होने से ज्ञात होता है। रसमजी मे मत्स रसपाही सजीव चित्रय रमान- वन में किया है। इसी सर्य में पमा मम सीमा पर पांच पर समाप्त होती है। परिस्पाप आमा भारवेंदु हरिरणाचित सत्पमरिण गार में साम्प होते हुए मी ममै पपास मित्रता मान है। १ स्पाम बी हरिरचम्न अत्यधिक मानव स्म में दीपित्रित पद, रेता-सरूस में नहीं। मारवेमु नो परिवरि पाते हैं। से वन में दियएनको भी साप मानना।

[१८] १ पगीरच से पूर्व होने पर भी हरिमन्त्र शारा पार गाणे 'मगीरय भूपति पुष्प पर पाया है वो अनुचित है। सिरदी में पैसी मूब नहीं की। । मारतंदुरीप्पा-पिताप प्रत्पषिक विस्तारपूर्वकामा की सीमा मे पार पाता है। किंतु रवाना शैम्पा-पिशाप बसस भ मुना गाारस तपा नि सामालिस में भा है। मार अंत में माना पदिपे । मारतेंदु र हताय को मादि में रपट पाण्यास्त्र की प्रममिकता प्रकट की। सामसे समाप्ति पर रिया। ५मरचरोचरम्य दोषादी रखिहै। पिराणिक कीरता पाने सर्गको माग ने नोगिया है और पेसा ही मार जी में मी समधनुरग पर किया है कि राम सीमा सर्ग पखवा माहीं। १ भारतेंदु के माया में नारद पुरपति समा में आते- पम्न रे सूरत टर, टरै अगत व्यवहार । पैक भी हरिचन्द को, टर न सत्य विधार ।। किंतु बाम बी सेशर पर विचा विचार मिषामित्र मानि मत प्राप्रम सियाdि -- 'टप पन सूरज भो टर मेरु गिरि सागर । टरविन पै हरिप भूप को सत्य उमागर ।' मारतु मे पाशिवाय अनुवाद करने का प्रयास किया बार बी पेसापही किया। • मारतेंद्र ने पिरामित्र अन्तर तक प्रदेश मापा, रलार की में ऐसा नहीं दिखताना। । भारतु मे -महिमा म पिस्तारपूर्वक पर्यन किया है लाम कीने हिमहोप समासमरिया है। १. लाम बीमे मिपाकी या कोरी। " रत्नाम श्री सूत पिशापेठारापन रमशार में नहीं किया। हरियाप में लामबी क्यारस का परिपार प्रचपिक सुपर समरपा। पाति ममी माचा प्रकार मिता मापपी। पापापामा पक रहा सपाय।

1 [1] २ गंगावतरण गंगाधरण रचना भरपेयरी की प्रेरणा सक्षम र पान बी ने बरे रत्साहपूर्वक इस प्रत्य की रचना है। "मई१५.. इसी रमा पारम्म पषा ११. में इसकी समाप्ति हुई। पार श्री पुरस्मा-स्वरूप महारानी ने १... समाप्तिानी परेडमी ने ५०० पप प्राप दिये। रमान जीने पहप नागरी-मचारिणी समा, कभी को राम-समर दिया। गंगारतरस के भारम्भ में पप्पप में मंगलाचरण है जिसमें क्रममा गगा, सरस्वती पपा गणेश बी की जनता की गई है। तदुपट सर्ग सात मसिर एपी राजा सगर के परान से प्रारम्भ होता है। क्या रोपात में पति है। प्रत्येक सब मंतिम व साठा है। समासि विपि दोहा में है। गायतरयकीमा अत्यधिक मसित एवं प्रारीमपाल्मीकि रामायण इसम भापार माना ग सकता, वैसा भी इसी में भी अविर रबार में माना, वैसे तो श्रीमद्भागस्त, पप-राप क्या पाप-पुराण में मी इस पाप बनी। पास्मीभीमामापसे मग तक इस मामविस्तार है। हाफर बीमे स्मा- वा भुग मुनि बाल्मीकि प्रपर पारासर । कमि में पासुविपरित पार गैह रतनाकर ।' गंगावतर पाम सर्गी या बीमागपत के पगम स्न्य बार अम्पाप से प्रमाविक मापदी बार बीमे अपनी सपना मी दौडापा । जिसके पसलस्म म्या में मौसिया मा गई है। पणामों के पत्र में भारपवानुसार माल एवं समास वोपयों की बिपी का प्रमोगमा मामय रामाषण में मारप में प्रभा की तपस्सा। इससे कमा में पनाएपरिवार दोतारामी मरभागवत मैं गाामी स्वप - - १ मी मनधास चदी बी ने शिक्षा " म ११ का दिन जम्मापारविहार में भरगीप रोगा, पर रलावर बी मे गंगा- कारण काय की रचना प्रारम्भ की। विद्यात मात, साई १९२८ । "नारी और उनका गंगापवरण हेत) २ १२ सयंका. पर।

। . 1 [..] पामे चिये उपस्थित होती है। मामलामी भीमनागमन भादर्श महरा रिमा किन्तु क्यान्म स्थान पास्मीभीप रामापन से ही प्रमा पित प्रन्ति हो। गाापतरस की क्या इस प्रकार है। मबम सर्प में सगरमे, अपनी परिधी सरित मुगु भाभम में दी तपसाड़ी। अपि पाशीर्वाद से गर्ने एक रानी पे असमय तथा पूसरी से .. • पुत्र रसाप। असमग मना- बारी पा। व महाराज ने उसके स्थान पर उसके पुम मामान की पुषराम बनाया और स्वयं प्रत्वमेध हमने सगे। इन पहम पाप पुराम पाताहपुरी में पिरपि भासम में बाप विषा । सगर.. पुमो मे रखे सम्पूर्ण पप्पी पर खोगीर असफल हुए। सपर स्वयं उसे मोजमे गा हे थे किन्तु गुरु प्रावि ने गमे रोदिया। शिर्ट पसर्ग में सगर में अपने पुत्रों को पाठास से भोपाबीज खाने का भादेश दिया। सगर पुषों ने पथ पपरपए पूीको निय-मिपमा गया। जिससे सारे जी-मन्न पेपमुख भास होगे। अन्त में प्रप्ती बोरवे वे अपित के प्रामम में परमभीर बोदे हा पार पन्नों पिपुलमिसके प्रसस्सस्प अपि की पानि मे पर कर गर्ने भध्माबाबा पता। नृतीय सर्ग में बहुत समय बीतने पर सगर भागानुसार मान अपने पितों को योग निम्मे। पात रोग म्परान्त गरेंगसरा गम मस्म होने असमाचर मिया। बहुत दुखी हुए। गाने कहा कि कपिरोप परत मापी सके पुलों का गरम समता है। नव गणा की महिमा का गान किया। चतुर्म सर्ग म, गलबारा गा प्रेमदिमा तपा सम्म का गाम और राम प्रपद रूप इस प्रकार पास्वाद-सामरा रापाहप्य का मेम-पूर्वर गुस्मान और रससे प्रवित रोम रामप्पा दोना पुमा पठायों की स्तुति पर बारी म्म गरी मरित प्रमोना तया ग्पा भरापा पिपरमें बीन दो बाबा। उसके उपरान्त गाएमाल को प्रषी पा पासाने मारा दिया। पंचम सप में प्रमुमान म सदिय वीरता है। पर पूर्ण होता है। समर गगा-प्राप्ति लिपे पपस्मा पर है। सबके उपरान्त प्रमान जिसके पुप दिप गगा सिपे तपस्या मते ए अपना जीवन समास परवे। और इसके परान्त मगीरय गंगावतरस रेसिपे वपस्सा प्रारम्म मते । - पपप में, भगीरप म गोपए-पान-गमन, समये मीपण उपस्था, पसका प्रसर होना और भगीरप म उमसे मंगा मांगमा पर्मित है। संभाजी ही गंगा को पपने माथे पर समाव सप्रेस मनीकी सपम्पा रमे का मिरे पान मगीरप रमकी तपस्मा मेसीन हो जाते। राम दी गंगापार करने परदान देते हैं। समम सर्म में मपीरप की प्रार्थना पर साहारा गा पूी पर भोपा माला, गमके स्तरमे मशिद पर्यन, मगवान् शमशा अपनी अगों मैं गदापारगममा तमा स्थानों में ही उनका गुस हो जाना बर्षित, निमो फलाम्प मगीरम को पुनःविा उत्पा हो गई। भरम खग में भगीरथ शरा गाम की मार्यमा तया भगवान् र द्वारा सामगगापूपी पाहोदना सिंत भगीरप की धमना पूरा होती है और वे गंगा का प-प्रदर्शन प्रते हुए भागे-पाटो परते हैं। माग में राबपियर पश-मामी बहा देने मरण प्रगति में भर कर उनका पान पर देते हैं। मारपब स्नी माना दी तब ने अपने पर मेरबादर रिया। परम पम पम पर श्री प्री पर पपिठा कमा पागल उप प्रगाहा सप वा गारिद्वार तक भनेक ममर की पहा मसी पाने कान है। राम सर्प में, गहा मानो मे पया अनेक प्रकार की पानवममी मगर पारा में पार करके टन प्रपाग तक मागमनम। पमा मर्म में, मापसुना पाम, पिम्प्यावर, पुनार, कासी इत्यादि तीयों से पडाका प्रबार, मसी में गल की शेमा वा महिमा, परपु, सोन, पोसी इत्यादि पनेक परिणामों के माप गया का सम्म, प्रवास में भागमम पीर सागर स्पा पर पागर-सामप्रसपन। बारा सग, गारा सगर-कुमारों के पार भमबार और मकी मुनि गाारा पम्मी के निवासियों पर पाबा राम और मात मैं मरत पास में भगीरब ३ पितरों धाराप्रपापसामना । अपोवरा वर्ग में, माप मारा गास्नान, पाति दमा गाा के सरा संसार के साथ का पापा। इसके उपरांत भगीरप मबार पत्तम, सिंधमक-अपग, भारमोधर तथा पमा समाति। रस्मीय समापार में पा सगर के पुनो हरा ममम मोदा बाना, ऐनमुनीका पाना, साहारा यह भविष्यवाणी कि भगायन [..] अपिस हार मस्म किसे पाएंगे, परित है। खाम बी ने मो इसे प्रारमिा है। फिर गाण्मान को पह परामक पका ही समई पितरों मुजरेंगी और गदा पूणो पर जाने की प्रेरणा गम द्वारा हो पास्मोकीप रामापण में मी बस्ति।गडापतमापद भी भयेक स्तों पर पास्मीकीय रामापर वर्शन से प्रेरित है। बाम्ममि का परीन सूत्र म्म में एसा और रबार बी मे उस विस्तारपूर्ण अपनी प्रविमा भावार पर माननीष पावापाव रेम चित्रित किया है। इसी में इनकी प्रतिमा क्या महान होवे। भारतमा-मापा में ग्रेई मी सुन्दर तथा मौखिक प्रकाम्य महत महाभा बा। मेमसागर, सुधपापर मम्-विहार विपपपीतो प्रमानाम पे सिम्प-सौवर्ष में गया । ममम मन्द्रक्षित एवं सर्मगुफ- सम्परामबमापासवाष गामवरण ही है। इस पागमन से - मापा-ममी भानन्द-विमौर हो रहे और रमी पाठिोक में गबह महाधम मी प्रतीत होने बगा। श्रीमदनबार भतुवा बीमा "मर्गपो महायसम्" भारि मनुसार गापा मालपम्प की श्रेणी में आता है। पराधमान दोपहरबानी ततम मारमा है। इसमें चार पीर मामय रसौमसार सामगस्प है।या में प्रारम्म मे अन्त तक एक उत्साहपूर्ण मर मिसमें पीर रस की ही समावण मालमा रचित मदीत होता है। सोमवन अत्यधिक मा पर्व पीठापूर मा । मम सर्ग में गंगा जीरे ग्वर का बना दीपमादी। दिदी साहित्य में व्यामो का प्रमासा हा । रामचरित मानस, पमास, मम्मपन्ती मा गुमान विपरित मानिस कमाष्मण बाप्पी की परम्परा में गातर मी अन्दर मामक सम्म स में है। रणमा रोता मैं संगीवरमा समाप प वासरूप में राता वाममो पर मिारी पपांत प्रमान पा । गमावरब में मी निरी मुपदरी वादों म प्रयोग में स्थान-स्मान पा मम्स होता है। गाहावा शुमी, शिपीरब, पाम प्रादि । विहाँ पिारी, पाल एवं पिके माप भी पा गए, भिन्न मार्यों में साम बी में मवीनताका की है। । १ मियान मारत गुमाई १९२८ भीमरनमाह पदी, लालार और उनका मंगापदर १८।

[३]
रलाम, सम्पदाम के रोहा दर से बितने प्रभावित है उतने ही पान
की प्यास-रोती से । रोला पदास, प्पास-गैसी के सबसे बड़े साकार
पचार तथा समास-शैली में भारतीय विहारी माने जाते हैं।
गपावतरण के विरप में प्रीमवमवारजी चतुर्वेदी ने लिखा है, "
मारा निरादर अपुग बीत गवा, भय रसके अम्पुरुष के दिन भामेबारे
भीर गगावतरण इस रिसे पुगौतमी प्रम्प व्हा बासमता"
नि-सन्द पदि मदनसासनी गुपदी की माता पूर्ण होती वो गंगावतरण
पुतिपरी अन्य होता, किंतु बर है किम्-मारा का अम्पुरपनामा और
गंगारतरग पुगोवारी प्रत्यक वन सम्रा चिन्नु नदी बोपी के इस पुग
में
गंगावतरणको बोभित गौरव और सम्मान न मिसन फिर भी पुग
पिरोप की स्पेशा से किसी अन्य की माता कम मही होती। पुग बदस गया
नि गंगावतरसा स्थान अब भी बर-भाषासम प्रमों में है।
हिंदी-साहित्य में नाद-प्पाना की पीसे पह अमितीप प्रप। नाद
सौवर्षअपन हम कान्तर्गत मंगे।
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sh
१ पिशाह मारत पुजार १६५८ मदनलाह पतुर्वेदी, हेम्ब
ता.१.८

निर्वन्ध काव्य . । १ हिंगोला रिता लामनी की सपमपम फाम्य- तिबो सन् १८५० में प्रमाशिव। सर्वप्रथम बनारी तवा पर वाहे में मानावरगई पुनः •पयों में मुम्म रिफ्प बस्ति है। प्रथा एक एम-पार्मिक परम है। गोपालमन्दिर में महाका पप देसमदी रजाम बीपप में मगवान् ने अपनी प्रम्प-सभापना में समाये की उत्तर मिसारा पाठ ईपी। रिक्षा में संयोग-मार का प्रिय है। इस रचना में रनार जीने अपनी पनि पूर्व पार्मिक मामानों का समारत मिलाई निरास मान्य गत बारा-बर्मन यार मात्र राम अपारम श्री मोर पसरा है। उनलेवानिक एवं धार्मिकरियरों का विवरण दम बागेगे। एषाम भी विनतीय कवि होवे एप मी मठ । मधिप्राप्तीय दिपों मैं मम्स मे पास प्रभाविध पे। दिसा में मन्बास के रास पर प्पापी' की सरकापमा दोनों में पर्याप्त माम्य भी है। मरम्स ET स पाप्मामी' मी रोबा में है और गिता भी। पास पक्षाप्पापी और रिपेक्षा रोगों में ही गोप-सतनामों पूर्व मम प्रिय पदावन में मारे। पास में अपने साम्प्रदायिक विषारोपपाता सिर करने की पेश की है जिरणाम भी पे इसके विपे मिप मपास नदी बिमा । पचपि म सामामिला इस प्रति में परिवपित है। पलामी में माधुर्य मात्र की पूर्ण भमिमाना है और रमे पात्रोमेचर पानन्द की प्राप्ति रोती है। रलायर मी भाव पर मारा में नाम समार लाप्रपी पर प्रथम पती चीर मन्यापाठ पा राम पतम्यापी सनकी प्रेमनाति वा उसमे इस साबमा रचित नाही, निधि भी रनार जी मनहास की महा से रिसी मी पत्र में फम नहीं। पारप-चिर प्रत पर निबन्य-काम्पसतर्गत पाता है।

[.५ ] २ फसफाशी कसकसी पीरमा की प्रेरणा इन हरिचन्द काम्प की रचना के समय ही ईपी। मारवेन्द्र बी ने अपने सत्प-हरिमन माटक में कमी का पर्यन अपने पिता के सपो सपा पने पदों में किया है किन्तु रबार भी मे बह दो पतियों में ही कसीम मियामपनी मम्म-मृमि के प्रति प्रपनी पासचिो पचाने , हिपे माह हो उठे और कसकाशी की रचना हुई। पचपि रचना पर ज्ञात नहीं है तथापि हरिमन के बाद ही इसको स्माल ऐना रठि प्रतीत होता है। यात सम्भव ६ पे परिमन्न के साप ही इसकी रचना पते रहे हों और इसी भरय इन्दमि भपने हरिमय बाम्प में कामी का विस्तारपूर्वक बर्यप नहीं किया। या श्यामसुन्दर पास ने अपने रलार में सवाशी परिमय काम के उपराव ही स्थान दिया है। सभी पा विस्तार ७१यों में रेतमा ११२३ रोखा में तीन ही पतिमा रह गई। पता नहीं क्यों चौथी पछि नहीं बोदी। इसके जीवन पास में यह मकारा में पाया था। पर वह वन मात्र है। माचीन माम पिनाने की परति में इसकी रमाई।वह इस बद से स्पष्ट - पासमती धे मास रमुनियां दास सारी। घी पनेरी परी कपारी मोयन पारी॥ रभि मीने बरपरे परी सहसाग निमोने । पापर अप्ति परपरे पने परपरे ससोने सपना नीय भाम प्रचार पम्न मीठे सपिकचरी । पटनी घटपट भ-रस सरस मटपट तरधरी।। मोरक मोतीपूर वाम-जुत मामपुषा पर। मेयामय भीखण फेसरिया स्त्रीर मनोहर INE || ऐसे पन में पवित्र एक गश्ता ही परितषित रोती है। प्रेमस, मरस शाकि अनुमतिपों प्रइसमें सर्वपा प्रमाण है। मपि काग्री का इसमें रिण एवं चमामापूर्ण वन पिन मी रसोरेक कामे में पूर्णस्म से पर समर्म नही बिनु पर्मन की विग्यता प्ररण मीरसता मी नहीं उत्पप होती | बारबीर पर पुष्पर नियन्पारमकप्प।

बिधारीहाट कम,
[ 1]
३ समालोचनादर्श
सर्वप्रपम पम माप मा.प्र.पनिमममम व तृतीय भा में
हुमा बा । प्रन्य प्रारम्म में पानुबाब मात्र, समारणाम पीतमपीब
करियों तमा समायोपिया है।
पद काम्प-ति मौखिनहीं। मत्युत् पोप के ऐसेग मान भिरिसिम्म'
का प्रमुपाप है पचपि अनुपात में भारतवपि कपिपी के बाम रख दिपे गए
है। भरत बास्मीकि, कासिम्स मोहर्ष परितराम बगवाय, योग, पचार
नागेश मा मयास भारतेंदु इत्यादि मामो परमोच
कर दिया गया। इस प्रकार या पूर्वमसे मारतील सांचे में बरिया
गपापीर मीसिक प्रतिम होते हुए भी अनुपात में ही मौरिया है।
रखाम बी रस पही प्रत्य मधुमाल किया है। अनुपाव की पी से
पर पूर्ण सफलति ।अनुवाद गाबिकरने या रोग किया गया था
पीपक सितोपदी इसमें समय हुआ है। पवाकर पीने समातोमा
में पोप के सिांतों को ही मार माता है। वमी इस नाम समाचाचमाहरी
पुग
में पाबाब समीला पर्याप्त महलमा। सर्वप्रथम
बारबीरेदीदमें पाप समारोच्चा सिरान्तों से परिचित माया।
श्रीमान के नामों में पाबात्प समातोचवा-सिरों से परिचित कराने
का भीगा रनार बीमा
प्रता रवान बी के इस प्रबुपासप्रसि-साहित्य के इतिहास में पम्स
महत्व है। पीसी की पुस्तक पिर-साहित्य' इसी सपहल की दूसरी
मी
१ माधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, प.पाय।

प्रवन्ध मुक्तक उदयशवक परीकी मार्मिक अनुभूतियों की कलापस अमिम्मझिकी सहर पमा ।इसकी रचना कम से नहीं है। रलाम मी रम्गापी-सबाद सम्बन्धी पर तब दो-एक विवा करते थे। भूमिका में रत्नाकर जी मे सिवा सम्मत् प्रारम्म में मेरा एक सन्ना हरिद्वार में चोरी पहा गपा, जिसमें प्रन्पान्य सामग्री के साथ मरे परित्तों ई एक पीपतिया मीबाती रही। उसमें ५०. से ऊपर कवित थे। इन्हीं में ग्यता के कवित मी सम्मिलित थे। उसमें से दो गई सौ प्रविध तो मौके पो स्मरण करके दूसरी चीपतिया पर सित रिपे गपे"। ग्दरता में प्रमर पति-परम्परा में ही रखा गमा। पपि उर- माता में प्रमर का संवर्म पमान नहीं है, बस एक घर में गुनगुन पनि उपस्पित हो गई, समापि भीममागत करण्म सम्पपा .. प्रमापी रे पापार पर पदगोपी-सपाद में प्रमरर्गत मा गया। पूरबम्स वपास हित वाम दास, रीवानरेश रहराब सिंह, साफ- बारामय दिन प्राति की रचनाएँ इत्ती कति में पाती है। मतिराम, पचार भावि ने मी इस परम्परा पर मप रहे। इसमें १८ पनारिया ।। पद्यपि इसमें एक-एका प्रपद मस्तिाव एक महत्व र स्पापि ममपर समपि स्म में इसी में मामबाद भी प्रास होता है। परम्यक करम्प की कमा लाम बी मे निम्नलिखित शीपमें मैं बिमामित किया। . ग्रस का मपुरा से मरवाना। हप् पिबाग प चित्रण है। २ .। २ग्दरमा-पाया। मरममा में पहुंचना ।।। परमारियों से बना। १ उपयवा की मित्र।

- ५ ग्राम प्रति गोपियों पर । एका। र र विई।५। • ग्रप का मधुरा बोटमा ।। पवन भी भगवान प्रदिन। इस मकार शो को देखन मी यही मिमिव होता है सम्पर्म का सेवा की परिगी। रणब में भी पार्मिक मामा को पत्र किया है। इसमें मिल मति अपेक्षा सपुष महिनी घेता का मविपारन है। ग्राम लिक प्राकी पा कामे असुनुपरेरा गोपिभो बा-मधि-पूर्म मिपास समय विरपिरोया है। सर्व परब, यो सरेसममा सवा दोभी परमही मानव- पावस कुटीर रम्प यमुना के पीर गौन रोन-रेती सौ करापि करते नहीं। कर रखनाकर' विदाइ प्रम-गामा गा, लोन रसना में रस और मरते नहीं। गोपीम्माल पाशनि के समय बास् वेलि, ससि प्रमपागम हूँ मैडरत नहीं। होठोचित पापोनराबरे विपन, विवरगाँव इवे पांग भरते नहीं मा निगुंए में बही पराबर माग बी के सन्याय 2 मिant और वही रसातक की माचा है। रत्वामी ने पान-मधि, मिर-मगुर प्राचीन वर्ष में मामला में विनित मतिम सोपासना मेला प्रदान की। सर मषि-मामा सपुर में एक भारी मागासी रमाकर -पाव पबमपर है। मत महिपनी तोब मसीमित हो पाती है और ज्ञान पुष्प गम्पर पूर्व गाम बोर पर स्विट, पमहिमाहरों में इस मारेय रोकने में समर्थ बास रंग में वाया है। जाम मगरम- यसको गम्भीर गाल पर्वत, योपिपी राम बम्मर मरिकी ममीम सागारों में वरन हो रहा है। इस तमको भमिम्बधि बाम भी मोदीमामा, इसविपर्ण तया मर्मसी ग से की है। १मानत पन, रा.प.के.सात, १.१.१

हिन्दी साहित्य की प्रमुख एवं समिति सदास की मी पाम
भटि मिक्सगुस इस विमेव सम्पद रंग मे पस्मित भने में
मसमर्म रहे। पर शाम-मति निमुख-मगुप या बीकाम में प्रमेय
स्थापित किया और बार में मेन स्थापित महान से मार गिय में
सगुपको, समाधीब से मस श्रेष्ठ मर किया है कि इसके पत सेने
में गर्म कप भूरी और तर मी कंपनदोर मालदारिक-सा हो
गया है।"' इसके विपरवा रनार जी ने मोदी मुनर रंग मे इस संघर्ष में
मणि एवं सगुरो माया माग्नका व परिपुर। ग्यसे
विर्षिभर विन्ति निमाड़ी के दरर मा सगुस सरमसा का सा
मार्मिक प्रमाम विवादार निम्ममितित बन्द में बर:-
बुम मुल प्रीपम मौ सिमिर न व्या चिन,
अपेशा एक हि प्रम मान-सान में।
की रसनाकर गैमर सोई अप करे,
पीर सघपन्पो पानि पर मिपाने में।
मोरे मुम्करंग ममा सिविलित अंग मपो,
बैन पनि दंग भयो गर गथाने में।
पुलकि पसीमि पास पापि मुरमाने कपि,
जाने धेन पति पयार बरसाने में २५
रामबी माको प्रेम की अधिशाली देवी माना है। दरका
विमिर सपा माननादीन महममप पातापरख के ममा मात्र
ममीमत । मही पापामार उदय RABE गोपियों की
अनन्य मचि सदि में सम पवा सूर्यकात मनि बाबावे ।
रसी मचिसापासपी अन्तिम परिवा-
मानबियोग गप बटिम मुली मार,
माग सों सुधग के प्रयाग पिमझाय है।
पहे 'एनाफर मच प्रेम सपि माहि,
ये मेम संयम निधि के रपये है।
भर परि पीच सीषि विन-मरीपि विय,
देव माप माग गुपिद र पये हैं।
१ मानत पणेन ग.एम.साह१.१.१ ।

[ ..] गोपी साप तस्न परनि मिरवशि उपप निवाम्त कान्स-मनि पनि भाये ॥१९या ग्यशतक में प रस का सरस परिपार मा । प्रावि मत सब मिसम्म पारोमिय। मिसमें प्रत्यन्त सामाविक पूर्व प्रेम मापयामी की सम्पर अमिम्बनाई है। मामूति का सही प्रभारता वे । पारिरि मादि काम परमस में ही मन माया। पी. जी.बी मीमा Our rretest songs are those that tell of addest thoughts प्यार से भी अधिक मरमस मावन्ताको प्रमापित प्रमे में समर्थ होता परम में भी पदी पिता है। उसे मिनी बार भी पा जागा उसमें नीरसता म मामासन माने पापगा, परन् प्रत्येक वारपीन अनुभूति- पूर्णानन मास होता रहेगा। मामा कवियों ने पौपिकाची रिपोग-पर कारि किया है। रिलाकर बी ने हत्या के वियोग-परमार करके अपने सम्म सपोरगी झालम परिप मिण है। के यस पोपियों के पाचम्म को पुप-बाप सुनवे गावे? जो वास्तविम्वा से दूर जा परतारलाम अपुग व मकान बामालामवीमे पाकि परोपरी प्राण किया और इनके पर पाय वास्तविक जगत् . पुरा सिकाए । काय रस प्रधान होतेर मौ ग्रस्य में गोपिकामा पासम्म मेहास्परसमी परिपार हो गया। पाव ही विमा समीगो पर पमान पीरखी । ग्रा प्रति गोपिनी पन में : भीर पदी मसंग वास्तव में सबसे भपिर मर्मती होये में समर्म भइसी का निस्तार मी है। इससे मन में सोहर भागा। मी मामला है माली साहित्य पर पशुपम मप। पोवो रत्लाम बी गवार-परमरा दिये किंग रखापरी मारे समात्ये मरिमतीन कविधी से मी पौधे नही रो। उसपर मैं दोनों परमरामा म मुन्दर पम्मिमयसरमा 'रलामक पतिमा सफो गई। पर हम में स्वामी ने रिली-सातील अनुपम रलास मगर मदान मिलासपी की सबसे बड़ी समसता पाकिइनामाचीन विपप होपे पर भी इन्होंने इस मास महार मिपा है। पापविना मार मौषिणा भा गई है। लामबीने मार मीनीयाँ प्रयोग मिा। नामी सबमे बड़ी -

[1]
विशेषता चिोपमता है और इस सम्म म बिग्रेप सखे प्रपति।
MAI सकी मुल पिरोक्ता है।
घरमागरम कपा-माम परोपको विहारी-मनसा में माम्मारिमस्या
प्रमाण में स्पों पर प्रस्थीरता मा गई, किन रव-गतब मैं पे
रोपनी
१

मुक्तक
लहरी प्रय
बामग्री की मुषा रणामों में सर्वप्रथम पारी अब सोलान
पाता है। इन मारिमों रमा-गरम पार्मिक मासा है।
पार पहरी में अपने बारे की भानन्दमयी-सीचा प्रवर्सन पार्मिक माला
की प्राणा से ही सम्भब भा है। इसम मापस प्रयास है।
सितम्बर १५१५कीमारी में गगा पारी पर ममणिकाए।
बोरवना-पास के ग्रा प्रारम्भ से रिपों की रचना मारम्म
ग. रमाबर या रग मे अपने दिदी साहित्य के इतिहास में
समरलाम म प्रति दीवार दो प्रमों का गरिपा।
पार-रावर सपा गंगा-विनु पवार मार दी रसासनी के मिड।
मिन की बात अपयरमी साचित अपनी असमम पापारय दी
artमशित न कर सके। मा वामसुतरासामे या परी एवं
गंगा-
बिसरी नाम गपित ही रिपे है। रमापी गंगा-कोरस
ही मिवाम ग रूप प्रदान किया जा रति मी मान दोनों की
५५५५परकी सम्मिनित संस्था शतामा पाने में समर्थ ही है।
पारपारी में 1.बमारी मा २९ सवाद
पर गमग ...की संस्था को शतनाम मा गति नहीं। yिam
बारी में पाई ५१ समस्या पूतियों सलामर कीरा सम्पादित समस्यापूति
माग १ में भारी भी। धता परि मार-सदरी में समाप्त
न सम्मिन्ति में (और जो रचित मी)ो सारा माते है।
हलो प्रविधि र संम्मा 11-1मी समस्याति प्रदीप
म्मरल मारवजी ने भी इस एति की। समस्या प्रथम समायम की
परी उमपे ति। ...वामी समसावि ही भार वा
* शिसम, 'ह मत बानी र म बिदर , समसा कि
समान मादी गई थी किंतु पर सममा-पूर्वि-समर में त्रिी पाराय
समशित मामा", पर प्रपूस ही हैं। इस प्रमा

म इन पदों को भी प्रग दिमाग सवा शेप.क्य अवकस्म पा सकते हैं। यार एक सय शव सापम पर ही गगा एवं मिसारी मे मिटाम रूप प्रदान भने मात्र निहित प्रतीत होता, मि पा. स्माममुम्बर बस ने इनका 'वारी' सापनाममरा दिया। शृंगार लहरी पाम से ही स्पष्ट है कि पापबार पति की हाति है। भारम्भ से त परिक मायनामों सदी पिपिप रूम में विल स्मिा गया है। गार रस के संयोग मा वियोग दोनों ही पनों का चित्रण है। बारिमोग पर भी प्रति है पा संमोग-पत्र का मनोरम चित्रय भी। गारमा माकेबो पर बा सकते हैं- सागत न नेई हाय प्रोपध उपाय कोक, मुठी म्बर फट फधरी परी बाति है। कई रस्नाकर' न रहू विलोकि सके, ऐसी दसा माहि सो महीरी परी मावि है ।। रारोहू नाम लिएँ नैननि उपारे नाहि, भाइ श्री कपद सयै धीरी परी मावि है। पीरी परी वाति वियोग मागिह मो भय, विरान विधाम पाल सीरी परी बाधि है ॥१०॥ नम स्था वरष घमेली पारु पम्पक पे भोप देति, होति नवेली हुती सदन-बगीची मैं। को रखनाकर सुदुषि मुपमा की जाकी, दमकि रही है दिव्य पूष प्रवीची मैं ॥ मुज मरि सीनी रसदानि भानि भौयक ही, सरजि सरमि परी पाम खींपासीधी में। हिरकि रही है स्याम भक मैं ससक मनी, भिरकि सी है विस्नु पादर-दरीषी मैं ॥१४॥ प्रभार पारी का प्रत्येक एक सुदर चित्र उपस्थित प्रवाही पापिम जी के मार स्वरों से पास हो इपासपर मती है कहीं पापिन की ती नामक की पीलारत्या चित्रसम उससे मिप लिये प्रेरित [1] मतीनी नायक मापिका नाम सुनम रोल रम्ता है, तो मी पापित पियोग में प्रतिम सांसें गिम ही है। होती और हिरोखोत्सव गारिक मागायों को प्रोत्सादिवरपे। प्रता इप उत्सों मवर्गव नामापिनी माों प्रपन किया गया। जगार-बारी में रीतिमशीन कपिों के समान ग्वात मंगारिक भावनाओं माह मही है और मधि-प्रदर्शन प्रपों के समान मर्यादित का मी बी, पोनों की प्रप्यगत निम्तामों की मुनर मिश्रित मापा इसमें उप स्थित है। बिहारी और पभामा सर ममाव इस पर गरिव होता है। सोम समापिकाका विजय होये इन कवियों के समान किया है। अगर हरी का हिंदी साहित्य में पर्याप्त महम गगा तथा विप्पु लहरी इन बारियों की रचना परितराम बगताप सहितकी प्रेरणा से सम्भव परिवारले पणभारी, प्रमत बरी गंगा बारी भारि की रचना की है। पस्तुकारनामजी पानी गंगा सहरी से भी ममाप्ति हुए थे। परनार बी में प्राइम की भावना दी। इन मामों में उनकी मित्रता की पुम्बर अभिन्नति।प मात्र से प्रारम-विभेदम इसमें नसभा। काशी में गंगा पपांस माय । प्रत गंगा प्रवि पदा-माफि होगा सामायिक दीपा । गंगावतरस ११२. में ही माणित दो उममा किनुपर मयंप मपान इति पी। उसमें कपि मुक्त म पे अपना प्रारम-निवेदन न कर सके। इसी पूर्ति गगा पहरी में हुई। भवः गंगा सारी को गंगामताप का पूरक मानवा अनुचित होगा। पर पर्म से प्रमावित नाम जी इस एप्प पर विष्णु में मेरे भवर पापता विष्णु के प्रति महामहि भापामिम्पति वियरी में मुन्ट रूप से है। उसके पर राम मति मुन्वर गारद है। रत्नाटक पराली का मावानुमतिपूर्ण पणन रवाल मै मा है। शाररा परेर भीड़प्प, गोत्र, पमुना, मुवामा प्रीपर्श सपी पसंत प्राप्म गए, मन्त, शिशिर, प्रमाठ पर्व समापन । एप्पापफ में । श्रीपदी मेसी में-पर।मिनु , मी पास में दीपा है एमालो गरा पर बन पवन, दो भाग संप्पा पर्व ममाव मारपी ।

तमा में पार्मिक एवं पौराशिमापदा चित्रपालामरसी की पार्मिक
मावना से ही र पाम परिव एतमान भाषा रानी की प्रेरण
मावि सम्पंधी इस भात निर्माणमा।
सिमित समयों में, मित्र पत्रिमों में इस पर प्रभागित हो रहे
सिमरत रपरा-कास मन्तर्गत रामसे सपकिन सलामें
की रचना स १५ २.६. कई रोगी पे पास अप्प एवं
भाभीपी से सहानमार है। माठि-चित्र रीति-असीम परिपाटी
होम भाषिक पुगका पुर सिमे पदचित् सेनापति के महति
पनाममाव इस पर पा मा। किंतु हासों पर रलार बी की माता
पीराटक
इसमें १३ ऐतिहासिक वीर तया बीसीयमानों का पर्यन । रचनामस
awrat किन्तु और अभिमन्यु १५८ में पिणास मारत में प्रकाशित भा
पाप नाव होता है कि लाल साप-साथ वीरारों की रचना मी दुई।
राष्ट्रीय पारेख प्रादि प्रसार से स्पारनी की राष्ट्रीयता प्राचीर से
के गौरमान रामचरिख। इसमें शाहस प्रवत्व मम प्रविशा बब
अपप साप पर पमिमन्यु, महापहा प्राप, पति शिवाजी, श्री गुरु
गोदि मद, मासाठ, महारानी दुर्गावती, मुमति, वीरमारामध
पीबी, मालनी सम्मलाई पनि बार पर्व मामला है। पापि
इसरार माम विबर गवारे व्यापि मारमें.८ पंद पूरी नहीं है।
इसे भारी मानना रवि मतीत वापरए मुमति में और
पाराषय में समा मा नारावाई में हैं। पप पर वनामा
राश प्रताप में 1111 और गुरु गोविंद सिंह में प्रयुगए।
इस बार में में पीर रस का परिर पी मुमरवा साप मा।
भीर रस परिपार में मान परति अनुसार परिषों ससा
संयुका बाहुल्य रति माया माता, बिमले भारतसम्म में
और रसम परिपास सटक्षित हावापा, रिलामी कावा इसी
में किलोमसयों को नहीं अपनाया। मारप्वनियों के मापन
से ही इसान वीरास पूर्वस्प से परिपाक मसत या दिवा है। इसमें
मदर मनियाँ साहब मैं सदासर सिर । लो मार मो रसार
। अम्माशा में बीर रस सुन्दर माती में लिया

। [A] प्रकीर्णक पपापली निमिा समपो में विमित्र पमियमों में प्रगशित समाग्रिताको सामूहिक प्रम में एस ससे पा• रसामसम्बर दास श्री में प्रकीर्य पचापती बाम मदान किनारे। म पदों का समय मी दिपा गपा है। मसको विमिन पत्रिमों में प्रकाशित हुए मका गलेग चिमा-भव में हुआ अनुमान से इसम्म मामास मी सम् १५से रन सत्पु पन्त मामा जा सकता है। इन सर पत्रों में से कुछ में पदीय प्रापि प्रमी समाय दुमा। पदाहरणार्य सतपार गांभी भी विषयक पुग की बात भी पी गई है। भारत सर्पक में प्रापए बदों में समीपता ही है। सम्पूर्ण पचासी १८ गोपों में बिमक है। श्री रामा पिप , श्रीब-मदिमा १, श्रीराम विनय , श्रीप्रयीणा-महिमा 1, भौतिक पंदना , श्रीखणी महिमा ५ मीहनुमर महिमा ६, श्रीहरिरात, मातामुनी विप ३, पीसदी महिमा "पीपक भारत ४ यदि , अन्योति १, व रस 1, गगा गौरव और मन काम्प ।।(इनमें हर का समप रिपा गया)। सन् १५. से ११ म समप इसके प्रवर्गत पाता है। रमन प्रतिम १५-1-11दिता पा भी इनके प्रवर्गत पोहावनी में पोडे। पामिक विचार में सवारतारा पाने राम, अमोप्पा, शिव की मुमा मदिमा, सती महिमा, गंगा गौरव प्रादिपएवं पिपयों को प्रपनापा है।रिधारी के अनुमय पर पोहों का निर्माण गरे। कारक पचासी में संगठम्त र मुनर सुतार मारे जा सकते है।

नागरी प्रचारिणी पत्रिका में प्रकाशित लेख
साहित्यिक लेख
१ रोला छन्द के सपण
पर नागरी पगारिपी पब्रिग माग ५, प्रम में प्रमशित भा
पा। इसकी मेरा बयभारम्भ इस पर से पट !
मासी साहित्य शिवालय (भप, ममानवीय साहित्य विष्णसय) मे
मागरी-मचारिणी सभा से पाया कि रासा पद में 10 मात्रा पर पिरति
होनी चाहिए पानदी । समामे विधामम पापा श्रीपुत् जगणायाम
रामप.प.के पास भेज दिया था। रसामधीमे उस पानी
बता मेडा, मसापायी माहिए वह बाजारिसी-
पप्रिम में प्रसारित किया गया है।
इस पस में यह सिद्ध भने प्रवास रिमा गया रोखा में मास्त
पसार । मात्रामों पर पिरति का होना भावरपाक है। इसी
पुटिदिए ममम रगहोंने भारत पिंगस स्मासि एमसी मूगम के मापार
पर विचार किया है। प्रास्त के भम्प पिंगम प्रयों में रोता सपनदी
दिप गए १ मारपा-भुवयोप, पिंपस सब इत साम वीमारी मावि ।
रिलीपिंग प्रग में वात-रिवार' या मास के पांच के
विकसको सिप रिशराम पानापान की निपम इस प्रमा
पारे
"रोग कम मात्राओं पर विरतिपादोबा पामयाबी पर पति
सेतो की इस पेज में उनके पास भार पर्ने प्रश्न
माम मामास मिलता है।
२. महाकवि बिहारी लाल मी की भीवनी
मामी-
मरिसी-पत्रिका माग में प्रभावित पारेख, पर मैं शिारी-
गम की भूमिमम और दिया गया। दीपा से सटीक
पर माविमाtaasीधीनी।
-
1

[ 0] ३ पिहारी सतसई-सम्बन्धी साहिस्प पाल बागरी-प्रचारिसी-पत्रिम रे माय । और • में मकाशित माया बगमग १०.प में इस पविस्तार है। सम्पूर्ववर्य विषय ३ धाप में निमामित है। सतसई म, . बिहारी सतसई की का सपाबिहारी पर पेठ । ४ साहित्पिफ प्रजमापा तथा उसके व्याकरण की सामग्री परख नागरी-मचारिसी-पत्रिम के भाग १. में प्रकाशित भा था, मित पर रामबहादुर ग गौरीशंकर हरीषद प्रोग्य द्वारा सपारित कोपोस स्मारक संग्रह में मी है। मारम्म में पौरसेनी, पणाची एवं मागवी से मापा कम पिमत विचापा गया है। पा सम्मता विस्तार पर पिमित्र प्रान्तों की बोशिलों में अन्तर हो गया। मापामा प्रकार बमे, १ चौरसेवी . मागमी, भौर । पारी कासान्तर में इनकत्रों के मान्तों की गोलियों में अन्तर पाया। परियों की प्रति समी प्रान्तों में पड़ी पास इस गरेप मों में एक- एक साहित्यिक मापा सपा पोसिपी बन गई । महाराही मान प्रविमान तीनों को मिमित कर फिमा गया। इन सब में नहाने वीरसेपी को दी एक महत्वपूर्ण बताया है। रानैः शनः साहित्यिक भाषा पसाभार लिए पनि होती गई और अपनी मात्र मोती में साहिब-रचना प्रारम्भर वा तीन माईशिक मापात्रों का निर्मापदुमा। परचि, स्मन ठपा विक्रम मास्व मामगों द्वारा प्रान्त किस का पता पता है। इसी म्पामग से प्मुत होने के प्राय प्राणिक मापापों से अपम शया गया। पामा शवः महाप प्रात के अंग की एक साहित्यिक भामरा बनी मिसम्म मुख ग शोरमेनी होबा, मिस गाव मे मात्र से अपमय बनी उसी भारत से अपम से मो एक मादेशिक पूर्वीय मापा का निर्माण मा। पामाश संकट मारनामी प्रपन शतमा तीनों प्राविधिक मापामों मिसबा बनी थी। इस पारण मी तौरसेमी के अनुरूम मा पा सिर . । . मिमा बाम - विहारी सतसई की टीकाएँ सपा विहारी पर छट लेख सलाम बी भिारी पर एक पुम्साशा का भार समीर इप्पा बीपुर रामाय बी (नई पौत्र) में पूर्वमा वास्तव में मजदीक में विमलये व प्रचग-प्रहग सतत मी है।

- भारम्म में सवार बी इसे, विद्यारीरला' भूमिका के रूप में विप रोति विस्तार पाया ही गया पीर विहारीमत्वाम पर प्रकाशिव म होसमा इसके विस्तार म प्राय साप्रसीव रेमविवारी की प्रताप विवादमा रमी वेश्यामर एवं प्रतिपासिक रपि पी। साथ ही इस्लाम विदारी अपना भाई कवि भी मापदे थे। 'वसईम में सामनी में 'बिहारी लामो प्रमही बिहारी जम सिरभने प्रयास किया। इसकी पुष्टि में रोग सात मतियों की विस्तृत शिक्षा की निगार पर बिहारलार' में निर्मित किया गया है। मोहया की संरदिव यंग, 'मानसिपकी बिहारी सनी और माडीमा बोशी जी की प्रतिमाम बी में शिर महल दिमा। १.६ पाइस ऐश में सलामती सपमास पर सिरसा में गिरी बास्तविक मममी धनुसरण एमा। 'बिहारी सतसा का नमक खेल में सन्देनि ५५ यमों का गत किया,निममें ससस गन-पय म गुजराती मारी, समौ भाषामा में की गई मनोसाम-विरेब भी राम बी ने दिया। इस शो में मिले मए रिती पर सूरत में स्वामी रिमिस समयो एपिान बारा जिले परी मनिषाय मी दिपाय रबी र समर्थकों एवं विदररी शिमिरों का परिच्य विप्पा मार से मिला। इस बाम जी गाता परिच मितल है और सामाठोपा होने में परेश महारावा। इस प्रकार पारम्मतीशीरपनी की प्रधानता रही व्या भावान्तर में में पिता का नामपि मगर बना। पर मारिपिा पम-मापा मुख्य साहित्यिक चौरसेनी भाग बन गई। प्रहार + कपि, स्थमी दिक परिस, रिदास जी, पासी, भगतरसिमी तपा विदारी और दास एस भाग प्रमुख पवित्र बाडीन प्रामापा मामिफ या पण वातावस्या के कारण दोपपुर भी, उन्हीं दोषों का विवाद माशापामसनममारमा। मामा साहित्यिक माशों अनुसहर पुलिस १ प्रयोग बाइस प्रा. मि पोम प्राण । ३ सोक म्पबहार माणम। चारोग परित्याग । १ बाष्पयोपायुमर - - परिपाग । • सरिम्प मनोग परित्याग। • सांसर्गिक परम परित्याग तपा बापच प्रपोग परित्याग । सूर समय की भाषा अम्पस्थित थी और ई नियम स्पसायम इलामबी मे हिमा-पिवमा भम भविषों में रीतिमा निर्माण में ग्मया, परि उसका पाय मो मापा सिर्वात पनामे में रखा तो पात पीपासचा परिमार्जित तथा शो पाती। रणाम घी मे शव की माग परिमार्जित माना पचपि इसमें भी उपपत्तता पी। नाव समासान पवियों को भापा की प्पबस्था प्रसारी, तुरे भेए पपियों मपुक प्रमाण के कारण पाद एक बैज्ञानिक प्रभाग करने में समर्म रहे। विकारी श्रीमापारलार जी ने परिमारित पूर्व भार माना। उनके अनुसार पिारी ने पप में सदिपिक-मापा केमुपस मा स्थिर र ममपूर्वक उसी अनुसार राम्या के रूप प्रपोग किया पचपि परात्पपिक श्रम, गोपयात्मपतया पापियरक- पूर्व मा। बिहारी सदा पैसे प्राप प्रेग रहते हुए भी मानव अमाव पाय माहित्यिक -भाषा मस्थित हो सकी। बिहारी परचात् मानन्दपन जी की प्रपिवानी में ममयमापा का प्रपोग मानवी मानन्दनि मिता - "मारी समय में बिहारी तपा भाग बम बी बीमिता मैं घर साहित्यिक समागका एक पुनर और उपणेगी बार बार पाने पोम्म पर्याय सामग्री विधमान है। पदि काई प्यार-पिपरा इस विषय मेहयोग तो रमापा मिपों को पूर्णतपा र प्रेमा कारा सापित कर सकी है। परि किसी ऐसे दी मम पिरोन का निपम इन प्रमों से निर्धारित पदो सगा तो इसके लिए अन्य मोरपितको रसमा में पे- पाच कामी परेगी। सामनी स्वयं विहारी-पप-मागर की रणामरो। राम्दों म विममम देते परम भई सिपने कीबोगमा इसमें की। इस देश में भापा-विहार में उनके पारिवान दम होता है।

- बी.ए. ऐतिहासिक लेख महाराज शिवाबी का एक नया पत्र मा०प्र० पबिग' में प्रधारित इस लेख में सममम इसम प्राप्ति-स्मान रखताना गावाला में रबार सी विदारी सवा स सम्बपित सामग्री रही समाप्रमाम मुनपर विरारी प्राभपाता पार पान पपे इस पत्र की पार पातिए थे। एतिहासिम्पया से सम्बन्धित रोने भरप इसे मुररित रखासी पास इसे प्रमरित रिया गया। उन्होंने सिता "इस शिप में हमार मित्रों मे मी पियपतः पा रपाममुम्बादास मापा लिया। पारसकेमागरी प्रति सपा मारा अनुमार सहित मा.प्र. पत्रिम हारा प्रकाशित किया जाता । प्राप्ति- स्थान के बाद उसनी प्रामारिता एवं प्रप्रामायिकता का विचार बर मूब पारसी सिपि वा रेषनागरी लिपि प्रमुख दिपा गया। पर सिम्सार मदिर में मामा संगति के मरम्त भी मुमेसिनी सादिरमा के पास से गुरमुखी अपरों में प्राप्त पापा। महाराज शिवामी मे पार पा रामा अपसिंह के पाम लिखा था। मीशामके कारपइस पत्र एक पाम राम भार पर हा गए जिनकी पति रसायर मी सपं शप्प मोरम प्रदी। रवामपी में इस कार्य में पानी विपिपास खत्महीन परसी-माम्यापर भीपुत मिया मुहम्मद सन 'पापा जी से पर्याप्त मापवासी भी। श्री पर इसे प्रामाणिक विगु दबी प्रसार मी प्रमामासिक मानवे ये। २ भंग पेश का एक शिलालेख बामनीमे इसे रिशर से भेगा पा प्रत माने पिप विवमा पुनः पोसिए पापा। इस देश साप इस ऐप की प्रतिलिपि एवं मुपारी १ नागरी प्रचारिणी पत्रिका, माग १, सं. १९७५ र १४१ । २. नाग-प्रचारिणी-पत्रिका, माग पूरा

मसिसिपि मारे। तेत में एक पपुमा दाप सपा पूसरा रिता
बीसा पा पामे देसाई सदित रमान सिम रिमा। भागरी-Atar
मी कर विधा है।
३ शुगवश का एक नया शिलालेख
पर पिक्सेल का
पान्दगि हिवा.
'इस पवित्र ग म रम गया एक शिलाम प्रकाशित
विपापा और पनी समम अमुमार रसम बागरी अपरावर स्वाyि
प्रमुखद मी दिपा पा। मिस मंदिर पर तो उसके विवरण श्रृंगा
पी पेतिहासिक वा पीररिक पिसि पिप में हमने फिर मिले
विधर प्रश्न किया था। म्यामाब से मसपमा सहकार तो पूरा
नदी र को, पर रस प्रेस के विषय में इस पावरपर बातें हिते।"
उक्त बम से इस बार सरोवावास में शिया
माहि-स्पान सिमस। बचा के नीचे दो पाप और मस एप
धर्म धममिडेर परम पग में मिड एप्प परस्परम
रवारकीपनामिगरीशधि माना।
४ एक ऐतिहासिक पापाणाय की प्राप्ति
ठीसमो में एक पापाचापको प्राति की। उसमे पार
पर प्रति प्रो प्रयास को पीपणास' पर पाप पे सवारसम
अनुमान पालि त रिवीमप्रमेप प्रस्मा होगा। इस देश
समातिर इम्मिा रिम्येरिमारती में मी प्रमाणित एमापा।
५ एक प्राचीन मूर्ति
प्रयोमा निट
१R300 .. पीली पीएम
बीती सदिय एक मूर्ति प्राप्ति की। रथारबीको विपास मा कि
उसी स्थान पर पदि पशाई हो तो गपा की मूर्ति मी प्राप्ति होगी हानि
मारे पब से मुगभाने की काममकी दी।
१0, सम्बत् १९८५ १. १०८
२. नागरी-ममारिणी परिका, माग ६ नम्पद १५, १.२६ ।
1.सी. २६.1

[1] ६ समद्रगुप्त का पापाणाश्वः पह १५ पूर्णका सचिवहै। पपमा भूमिपम में पुरवित इस पापाप की पीठ पर फिट प्रेस को क्यूर एवं स्मिय पैसे विद्वानों ने पाने र प्रयास दिया था और प्रीवा पर भक्ति मेसो पा भी था। 'गुचप्स रेष सम्म' तया व ममुर गुचस देवपम्म' मानम उसका पमै 'समुन का पाई वाम गापा या किंतु उसके पीर पर परिवेश को मसीगा मेगा चित्रकारी माम मममम, वर पोही भोर दिया था, लि पानी की टीपी बह मेख चिप सका। अपने प्रयक परिमम सस्वरूप रे पीठ पर पति देव को परमे में भी समर्थपगन्होंने ग्से "मों मी पास फि" पापा। इस प्रकार प्रीवा एवं पीठ पर ममा मास एवं समस्त में हो पाते हैं। इस पर से नए उत्पर होती है। रणकर दीरे इस विपय पर कई मुस्थर दिप है, जो मात्प एवं उचित प्रवीत होते है। सारथी की माता इस सेवा को परमे में समर्प होने में सनर मद का अनुसरण कोई करे अपना। anीन ऐतिरसिकों से इमको इतिहास के प्रति समिक्षय मा रमकी सम विवेचन एकिन मामास मिशता है। उस समय अंग्रेजी भोतमासा मा। परिपेदीनेश प्रेमी में मिले गए तो इनकी माम पिप स्मदोती, किंतु रखाकर बीमे मा.-म-पत्रिका में ही प्रति म अपने दिदी-प्रेम का परिचप विपा है। गुंग इतिहास पर इनके रेली में पास न परता है। अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित साहित्यिक लेख , सादिस्व रबर (पप निम्मपरा) सन् 16t. मैं सादिर अषानिषि पत्र में पर सर्वप्रथम प्रकाशित गा। इसके पापा.. सभा में इसे पुस्तकामर मुनिव लिपा था। इसी में सर्वममम वाम बी 'काम्पमालाम' (चो माघीम भणी) रा निर्धारित कारयों पर निगा म्मिा है। साप दी सूक्ष्म पिण. अपर अपना मत विपा। समीपा-सिरती रिवी सादिल में सर्वप्रथम इसी बाम्म समीक्षा-सिरतों पर विषम दुपा है। रीतिमाही ठिप संस्थत मावर एवं नापा मादी थे, कि लामबी ने हिन्दी १ही माम ६, सम्मत् १९८५, ६.१ । 1 । [1] पापापों द्वारा पतिपादित मिती काही सान-मपान किया है। भार- पता होने पर संपवारों का मी रसेन किया है। प्रति मिरे 'साहित्य परिचय' में रिपे गए चार यारों में प्राधार रूम में सेम पुनः मम्मयमा पर इसरति मिमी परिमाशों पर विचार किया गया है। तुर्व सा विश्व में परिष्तराम जगताप पा साहित्यकार शिलाप परिमारी गई रस-विषा विमा व्या परे अपलों पर भी विचार प्रा किये गए हैं। पम्त में निभा पा साहित्य पवई अम्प रखिों पर विचार किया गया है। रत्लाम की ने अपना मत पो दिया दोय पाक्य रमीय लो पान्य साये सोय। रनाकर समय पास यह बहु पयन योय ।। सर १४.०६. में दिसम्बा माप्त सरस्वती में रामरामा रमाम गिरी जी पासोमा सिसी पी, बियोत्पुपर में बात रपाममुपा रस बी मे दूसरे मास की सरस्ठी में शिक्षा पा पार पगार रास 'राम' साहिप-म (अप्प निरूपण पग) में परेपपार्यवाही को पूर्ण रीति से विपरित परिपाको नि मिनीपा मसा भाग्य पोषण तक पापि पूर्व स्म मे स्मा पिठनमुक्ति है। ग सस्मीसागर पाष 'प्राविक हिन्दी साहिप इविकास' में इसम तोप रिमा । पप खिरा इसम मास म्बा मेर इमे प्रायपोस पापि दिगो पारिप के लिए नही मल प्रब है। इसमें विपरित विषय मिपी सीप पा समपम अप माना बादा मिनु फिर भी हमे पूर्व महत्व नहीं मास । मधी भी मारतेन्दुली मे पासशास्त्र पर मसिया कि रसम पान-मरान मिति निर्धारित मोबी नहीं पाए गई बीरिक पर पेचित भीम भाविक पुग में इस प्रकारका साम्य में है। मीन मिन गुहा राव सेठ पातास पार, पति महोसार साम्पाप भी अप्पारणे, सम्प, स्प, सिमीर पम्मपन कापसाम, मातपि सारिप णा भारि इसी पापराप। - । पनापरी नियम रसाफर इमोजीरमा मी १.८ पासणस जी महाराजामौली पुराधिपति समापित भयो-कवि-समात्र हा सपमाभास के रिवार्म ए भी पा रह माराम भाशानुसार ही इसे १५... में श्री रामक्ष बर्मा में मार-पीन मेस से मुमिण किया था। रमोचम प्रवियों के न्द मी दोपयुक्छ। पपि कमी-कमी प्रार सम्मा रवि रोती पी पिन मी कस-पही उदोमा दादर होसे पे। सासरी हिरे- "एक दिन वर पा से एरपात ऐसी बार में पाई बिससे भली- मोति मिररोगा कि पदि इस रीति पर हा भार वो निम्सरेर निपम स्पिर कर सकते है। िमने पाकिम करवा पारंम कर रिमा और सपंतिमान जगईमरीमा से निपम पे र सिए सिम संठोप प्रास दुधा" कापसास्त्रयों में सामानतः पयों से प्रपिफर को पफ पा गया है। पपपि बनाक्षरी के लिए मी काको प्रयोग में पारा गा, किन र मार से इसे बनाबरीपरि पाना ही उचित होगा। ऐम सम्म रसार एवं प्रसवंत न 'मारा भूपच' या पम्प प्रयों के भापार पर ३० से १५ पर्व पर ही विरेचन शिपा पवादरी मे चार प्रसर के नियमित पंप मान है जिरो ही प्राचीत में। . पमाषा मगारय और पर्समासा 'पमापरी' मा गया है। शुष पाई निपम न पा व इसे अनियत कहा है। इसम्म प्रय मा भीर २१ गुरु होरापदिर। पिर नियम बना देना पित नदी प्रावि में फम करने से ३.पा २२ में एक और खे होते किंग में प्रतिम सपा पिर पर्यन हो। परि तमो मिहम सप पायुधम होगा। भररस, प ६१, ११, मोर व १५१.दोता है। वापरी सामाम्म निरम पर- पाठ पाठ पै तीन अप्ठि, हरि मात पे एफ। अन्त माहि नियमित गुरु कहि धन्धधरी टेक ॥ वापि का सिपही पा । रामाम बी का मत था, इस विषमरे मंग हाने थे बोम्म पष्टियों के मामलों में पी, बो कि सम्म के निमित्त भोतम इस । [५] माने बाईकमही रोती। इसके अतिरिक पर बात मी देवी गई कि उन नियमों के अनुसार ये पर भी अपित भएर रह सकता है। इस भूमिम भाग में समस्या उठाई गई है। विनी- पकविस पचिस वईको पनापरी एग्द । प्रयम कहावत मनहरण द्वितिय रूम मुमकन्द ।। सोलह पर अति कोविए, पटुमा करिके प्रेम भस्त माहि मनारण के गुरु पनो करि मेम ।। तत्पमा मनावरी में राम मरे पर निपम मिरियप्पा रहको विना की गई है। अधिक गुबसे अधिक बम मायने पादिए। १. गुरुपए तक के बाहरण प्रसाए । रलाम बी में की उपयुक्ता पषि की मिपुरता पर पोर दी है। मोर मिपम निर्धारित बाना उचित नहीं समस्य। म् फारसी के शिर होने के भय इनि सप पर दिप प्यार दिया।ग में सपा प्रमास माया बावा है। पुस्क की समाधि-विधि मापपद या पचमी दी गई है। पातल पर गप माणम से किया गपा बामबम विवेचनामकोख है। परन्तरशिपा इस होता है। मय पर प्रति रामक बी के पास सेि देखने का सीमाम्ब मुझे मी पास भा है। वर्ण सपैया छंद पाष मार्च 1. सरस्पती में प्रकाशित हुमाया। इसमें गः- हरण सहित बाम बी सिरमो का मपास किया है कि सरमाया में पापस्म स्माव पर गुरु स्म पाने की पोम्पाता और समाप्रम पिप और पर्यसमा पर निर्भर है, सर्वमा स्मान षि स्थान समासे इसम सम्मेब नहीं है। पास स्थान पर गुरु माने से पति विपर जाती है और पापही बिगरती है। इसके बाद पर सपा भेदों के नाम पाण एवं उदाहरण सहित दिपे गए है। भुरंग, स्मा- पंपा भामार बों को दासी ने सबैया के हो भन्तर्गत माना, इनस खेत रत्माम बीमे म्पिा है। मागे पकने सिवा है, और यो बानी गई है मसे सिर वा हैकि सपा क्वी में मिपत पु पो गुरास के प्रत्येक स्थान का नियमित पर मन में भाम या पाना सम्ता और 4 पही विपम है कि मविपाप में से अधिक गुरु सप में ही पोगसम्ये।

नई एक निरोप रणामों में बन पर्म गुरु कप मे भान पो बाने में प्रथम है।माणे पाएं भी दुई- , पति किसी निपट गुरु भस्मा का वर्ष और उसके पूर्वपर दोनों एक ही गम में परें और उस निपट गुरु स्थानमा गुमसे जाये तोरकी पति वियर बागी पदा- 'मेव परा में पाई से गिर्ने सपि मोर * पोर मचायत । मम्मीचीन म, मेष पाए र मोदि बिन गरि मोर पोर मचायत । . पदियो एसा महा भीर दोनों एक ही ग्रम पासपुरप से पारेको प्रति बिगारेगा। बार- हैकमरे बार अम्बर पर कि समि मोर पोर मचान। समीचीन स्प, माक्स पावर अम्बर बार, मिन सठि मोर शोर मचत । बोमा सबैमावत में छे। गुरुसा सेभ मानेपर। उदारणा- ग मश्वाप पुषी जब मे क्या परीन बसा प्रमाण। रोकी सोदाहास विमा सम्पम रलामारा ही में मम्स रोटी हमले पर मौधिक मा इममें सर विशेषमा । नाम बी सपन एवं नियम-रिपरिण मात्र ही मान समय पर पदों के न पर भी विशेष भान विरार दियो सहिप में गप- काम्म दिनेमा में नाम की मेग एम-सरकार। मप एमोशी समानुसार भरपुर में होनेरी भलिस भारतीय मयि सम्मेशन में पानी मी भापे और सब मामीकार किया था जिसम र ममार' मार दीरमामों से हो प्ररित है। रीतिमतीय भाषा दिन एक विषम-रिवार मात्र सवा पानुरामामबी निपम निवारण में सायबर प्रादि का पासवान रा और वही गम पिता। ४ सिपियों सया पारों को मिलाने की सुगम रीति एलान बीके nिth माचीन संस्थ, प्राय कामापा सपा भवाव मारतीम मापात्रो मेघों में रम निर्माबीसिपि शिमीपत्र एक संत मास, पर, तिमि व्यापार सिवे मिलते हैं। विविध विषय में मामी पन्देह होने पता है कि मषित। परमव बौने विदिखाई गई है। .

[८] रो रिपिता से लिपि रपार माम विमा पा सकता है। प्रमुखोम विधि समा मतिमोम विपि । मनुतोम में सिवि से पकी किसी विपि प्रमा गत रोगपित द्वारा विभिमाबार मिळावा मवाप्रविसोम में जिस दिन गपमा परे बैट उसी दिन घे तिमि तथा पारगामा की पीपथात् नवेभपये किरीसमाम परिचय पीपल में किसी बम विषय में दिए गए मोदी को पानी दोनों मितिमा समय दिया। उनम पात प्राचीन चिपियों का नाम पराये में निमय दी सदापक सिरदो सवा। दोनों ही पिपियों में देखने से बार बीना पहित्य का दिन होता है। ५ श्री देवदव कवि का शिपाटक देवकीरता पाहत्या पास पास मुषित पापका विवाह ती एकासिक्ति प्रतियो। रत्वानी मिला- "उप दियाए मारे समिरा सम्बपी रि-संसार से परिचित सीपुर राबाहम्प सभी महोपपके पास रविकिप दस्तलिखित परिबाई यौ।" इसपर नारी पति की प्रक्षिमिप में पापि +4 . मातादीन श्री दुनिता मैनपुरीसमा तापम पते थे। इन्दी मे पर दाहिचित प्रति प्राप्त कशि के दिपप में सा, देव जी पूरे इयरे के सिमरिता प्रपात काम । हम पिता विहारी मार भी इस हममरा, पिता मेवपुरी में नाम बने । सीबम सन् 1.1. में असमरा में कमा पातमा पशु सन् १.01. में होगा अनुमान-सिर। यपि में मामालीनी मे विषा- एमप "दु विझरी माम भए, निज गुण मंद दीपक, तिनके मे कपिदेश फपित में भनुपम ऐषक। पुसोपम के पति पापा स मेलाक, मये सुसासीपन पुत्र पुषसेना बी तक॥ । दिन रागम मुत, पिछ हमरे भविमान, ब मुर मातादीन, पा रास पपरो बान।

[1] स्वार, देवमवि परारमय मातादीन शिवेवी स्मान अमुमरा, विद्या मैनपुरी, ता २९ जून सन् १९९५६०।" पवि की सारी पौड़ी में मातापि बीएए। एखाकर जीने प्रमापा के अगियों में रोष का स्थान ब बताया सपा समभी पिता को पड़ी ममूटी पति की या बाग्मय शम्प सररि, रचना-पातुर्म समीको समर्माप मानावपनि मेसे. की प्रस्पा हिन्दी साहित्य की सेवा की। शिवारका ३५ यपपय से पूर्व की कृति है। उन्होंने लिखा: "मिस प्रस्वामें मनुष्य को स्वमावत: ही यमाहारों पर विरोप पनि राती है।" वत्पमा पर एक-एकपको पर उसका प्रम सममाना है। हाति समाठि तिथि मी गई। पुनः रस्माम जी मे नम्र निवेदन किया * 'बदि किसी गिण पाठक महाशय मे और गई गद- विपर अममा पर्य स्कृति हो पोरे रसीपमा माने और हमभेषमा करें। कविवर विहारी रस मिनी में बिहारी सम्पी अनेक व दिले थे, उन्हें एक समारो पमा का स्मरे की उनकी पाभी। रामहप्स बी मे विदारी-सम्पन्मी समीको पकाम निम्न सीपको पतर्गत रखा-1 विषम- प्रमेण (इसमें काम्म सम्बन्धी १ पेत १) १ मापा का सरिष्ठ इति रस (इसमें मारत से समय तक के भाषा के विकास सम्बन्पी" १) साहित्यिकामापा और पितारी की माग (२१ मामय प्रमान ख) विधारी का सम्मत (विप्रायन सम्मदापी सम्पन्पी । मेल) ५. सत्मा का क्रम (विमित्र अमियों एवं प्रतियों के प्रम सम्बन्धी न) पिहारी सतसई पर की गई ५४ रीमानों का रोल तपा इसमें बिहारी की जीवनी सम्बन्धी सेव। इसमें से विधारी से सम्बन्मित समागरी-मचारिणी पविधा में मका- मित थे। कहीं-कहीं कोई मानव श्री रामहम्य बी को अपनी उरक भी मोड़ने परे। लामबी बों से बम प्र पारिप एवं गार अम्मर पता है।

भाषण पीर प्रयम अखिल भारतीय कवि-सम्मेलन के प्रभान सभापति पद से दिया गया मापन २५ दिसम्बर ५५ पा सम्मेखम भरपुर में शुमा बा। लाम जी मे अपने भापर में सर्वप्रथम दिनसम्मेवन गरेप पर मय शता है।रमा विरमा किविता की गति का पर सुपर स्म ऐना चाहिए तमा बसता मनोरंजन मे दर रखना चाहिए । होने से प्राचीन कवि-सम्मेलनी बार किया है। एक कवि-सम्मेत प्रापर ममप में मा मा तथा दूसरे पर प्रति मिमके मरस-रस नामक काम- मेय संदर्भ में । प्रखरी ताम्दी हारत में पिता में भव्यपस्पा ग्रता मा गई थी,ग्मे पर कोसिएही एकम-सम्मेलन बा मिस सरसम्म पुरवि मिले अन्य विधायक सरावामान पूर्व नवीन मेदी को दूर करने के लिए सरपरस प्र निर्माण किया पारिक दोनों पतिरसिक कवि-सम्मेहनों प्रपरेप अप में सीरसाने मा। रखाम भी इस कपि-सम्मतम कमरेप भी यही बताया। बनाने अस्तिा तथा उसके रेय की परिभाषा भी बताई। मारिस्थित जगमापा तथा पपी मोडी काग, मिस भादि पर ममरा महापा अयापा-प्रदियों अपने प्रम में उप परिवर्तन ममे की सब मी दी। पही नहीं, वो बोली सदियों को मी गन्होंने सबार दी गन्होंने उनसे मनमापाने बाप-पासा-मन्पों पेमप रीति पूर्व विनामयाबी मसिबेसिएमा। रपद सोवापर यूनों प्रमुकामे में गमती सपा सरमने की ति बताई। पुमा टन्होंने कवितासति तपाइमे मुम्पस में रखने के लिए समा म्पापित का पा पर्वमापता परकी। एमी समा स्थापिठ समा गाले सिमें मि- मिमा कवि बम्मिलित हो या ऐसे नियमो एवं सिरसीम प्रतिपादन हो यो समी भाषामों के मम्मों में समान स्म से प्रमुख पिया जापा [...] पोस बखिन मारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति-पद से दिया गया मापण रानीपरिष गापा मारय . मैं पुस्खममा प्रमशित मा पा। मई सन् ६. दिन में सार हल र ससे सीर में पद सम्मेशन चारमा पा। पारे एक रोगव्या करित परत रन्दोंने धरने समावि धुने पाने के लिए पत्यधिक पता 4 पत्यचार दिया। सरसर पार साहिन्य-पियों के देहावसार पर कि यो च्या समवेदना मारी। से श्री हासा मगानीमजी, श्री गणेश गार जो विधायी, श्री परिमास जी मिन मा हम्य पाप मापस माम्म पनी हिन्दी- साहित्य की उत्पति हामिस के विषय में बताया है। हमे कहा, मेरी समय में भाविक हिंदी पर बड़ी बोली की रपति प्रामापा उपा पंगाली मेल से है। इसे हाने गार सरित सामिल है। पुन: समायोरिटी में प्रयाग भारय होना से प्रसन्म भा, इसमें बवावा है । ग्ननिमा किपमय पर दो मारा सस्प पाया। प्रपम टीमनी तमा सर्रामोसी सवामी के राप्रपात मुमतमानों पितो गाने पर बोली श्री शिकगाति वा प्रभार पाच, समसमानों समा मारवामियों ने परसर विचारविनि भर के लिए पर मापा की पावरवा रशिये प्रसस्वार सी बाबी पमारे समय स्पस्थित हुई। मी पोची मनिमम विधागा। पापी मन अमीर अमरो पोतिर्वा पोवादी नवा परी शहाप्पी में भीर एवं मन्य संत श्रमियों द्वारा समारपी पताब्दी में भी बोधीही स्मार हो गए। मुसलमानो हारा मरिदिपावन्द समीर दी पोही में मी प्रप्पी अविचार ही निविषमता नहीं। समाप्दी में मार बिरी गम मुम्प मर्वक पवार । पारमारिचीमामा सवा सास्कली' पत्रिम धामपारिरी माश मनपार भो में महारपसार पेडी बीपमा श्रीमई सन् 111.. 4-माहिप-सम्मेहर पापा की रात्रि के समुपये होगामापा । ममम बपिमार समापति महाममा माप [...] बीए, मो प्रारिपन नबराम में सोमवार, सप्तमी १० पावर सर .. उत्पमा सिंधी समीय सम्मेसन के गत बीस वर्षों के इतिहास पर ममण गमा गया है।दीर सम्मेहम में गांधी जी द्वारा अब मम्ती में भाषा के प्रचार के लिए प्रवेश संस्माएं स्थापित करने की योजना बनाई गईमा गांधी बीमे मसा करते हुए बताया कि मास में मीथे प्रचार गरे। पर्म पाशाखाए तथा शिकार स्पापिताए। पंगासरी वमा माची- प्रकाय नामक साताहिक पत्रिगम संवर्म देव प दिदी में एक दिन राग- मारा यम पाये की यम भासा मसकी जो भाग पूर्ण हो गई है। ये जिसकी तब तक ईरपति से ही संतुर नहीं थे। साहित्य-सम्मेलन द्वारा और महलमा बिए भामा किया सभा नागरी-मचारिणी-समा पापा का विररणरेप सीमामा श्री। सम्मेतर परीषा विमाने फिरोप महत्त्व प्रदान किया। शियि भारत की म्यूनिसिपैत्रिी तया विज्ञापोर, सी-समाय मुसलमान विधा तथा रिपा- सो बारा र परीणामों को महत्व रेपे पासपी। संवत् १ मे १.. परीप पे । रन्हान चिनियापीठ की किोप शातिरने के लिए प्रामा किया । संस्था के सदस्ती वा रिपियों की संख्या पर नि सम्पा' रत्ता होने की बात कही। मारतीसमोरमसमाने पर पाराको मेमे में संस्था होने पर भी उसके सदस्य १८ मत पहली हि. पिनों को सम्मामा सिप भाप्राविमा गत पपी विकास पर संतोप प्रा किया। उत्पबार पर, पाक, पन्यास, मालापिनों के विमस में पता इस पारवाहीपने मा सारिप में परतीमतानबारे पिएपदा । समालोचना सहित प्रभाष पर र प्रमरिया। जि मार तंबाम से ही इसका प्रमाण मापन इसके मिस पर भी परी। पर पविमों कातील बस्पा संतोमर पापा । पप-पत्रिकामों में सरको बासी पात तपा गरें पात्रात्य देशों के पत्र-पत्रिमयों के सम्मान पाम हुए प्रम करने के उम्हाने दोकावताए १ पुकारन्होंने मा, भार प्स जितनी पापी पुस्तके मकान की मोरवनीम दोभी राहिए। पुराने मे ऊपर दोषाही पदा। प्रापे र पारिपिता एक समित मारे। परंतु काम्य मनुष्य को पपीपिका पाद-वाबी हो तपा पाने का प्रपा होना चाहिए । मम मा, प्रम में माधुर्य प्रपा मोर गुग बोपनीय है उनमें मी N [10] मसार गुवन दौमा मापस्परपिता माया प्रेमविएनेमि- प्रा से हिली पक्षीमहि रस हमाम्बर पटक में विपाने सिप, पर बम विपकि इस युग पिकसर नवीन श्री अपने गम्भीर माग को सरमता से दोपपम्प पये देने में अपनी प्रविधा मानते हैं। इसे सम्होंने भाषित बताया। पम्प हो प्रभा पाप्मका पधारमक हो। प्रसाद गुरु माप रसक। भारी रम्हगिर और मापामा बीमाचा बताई। पांच से सा- कप बाप्प सुदर पक्षापा । प्रजमापा के सपा पतरामार यति बताई, 'इस समय हमारे देश में सतोमुखी प्रति को मामा हो रही है। इस प्रति गमाचीता विमल सातिथि सामाजिक पार्मिक अपना राबवितो, मोर प्रदोलन बारमा है। में भी अट हो रही थी तपाति मत में भाषा में परिवर्तनीयता मिनती है, पेमा विलम्स में भोरमदेखते हैं। समाज से सने प्रेम पा, उसके प्रपा पवन परर मरर दुए न्दौरे कदा, बोपी पक्षपाती दिनों को अपने प्राचीन साहित्य अचात् मजमा की ऐसा करते, रसेशन-दोन या सर्वथा परिवारलाई पुझे प्रोतरिफ पमा होती है।' मामा पास सबा नरसी की महचा पर पान बार्पित करते हुए पनि बताया कि अन्य देशों में भी प्रार्थीब सहिप रसके प्राचीन साहित्य में पत्रिक माणसी।प्रयमाण मन्त्र पापाटी पा समर्थक १२ पिने को बड़ी बोली वादों में मानने पर संपा। मनमापा परम धमारे पास होने ममापा साहित्य से प्रपरि वा सम्मेहमसंपादों प्राचीन पोकापसम्पामा भवाया। ससम्मेवन में समापारसमस मेन्स बिना गापा बिनु भयोप महाभा पारा एक मामालियामामाने की मारपाधिरा। मन्त में भागहरी- पिव-विपि रोम्बबहायासंस्था में रसारम प्रभाव और फिर प्यूमता बताई या विवा-प्रमियों से प्रार- स्था सुधार की प्रार्थना की। समाप्ति पर परम समावस्या पण दरिया बापी और परिपत समारों समर सरिती-रिपियों और से जोवे माना मोरयापय समयमा

[...]
चतुर्थ माय सम्मेलन
पद नबम्बर इसाराबाद में बम्पर पारलामी
इपके हिंदी-विमा के प्रप्पा निपुष्प थे। सम्मेतब मैं ग्लोमे अपनी में
भारय दिया गया। प में पर मकाशित एमा।

सपादित अन्य
१ सुधासागर, प्रथम माग
रखामबी ने सन् 10t. में इसे श्रीयुत् परमोदार नामापीय श्री
१.८ सिह-पत्य सम्पादित माशिमा प्रेस से प्रभागित
पाया। इस प्रम में रापाको मानवीप सम प्रदान गरे मताशित का
पर किया गया।
२ कपिल कंठामरण
पर पधार र एक प्रसिर ग्रंथ इसकी रचना व कवि थे,
रवारबीके अनुसार, सन् 1.1 गमग संमत अंग यासोक तमा
अवमानंद को भागार मानकर १२. प्रकारों को संप में पपप बाय स्प
में प्रति भने लिए की थी । भटभर प्रयों में इस विशेष महत्व है।
बाम बी मे सन् १८५ में इसे सम्पादिता मारत बीवन प्रेस से
प्रभावित प्रमापा।
३ दीपप्रकाश
पामा श्रपिकी रमा , बो एक बाप परे। पापिका मेद,
परम प्रसार मा गुसदोपों पर्वन ३५ शो में विमा वाम
बी इसम सम्पादन काशीनरेण प्राणामुपार सन् १८. में किया।
शिपाते रवान बी भूमि में अपनरेश प्रसंसा की है और
'मामूर की पूनता भाइस प्रेम प्रकमा गया है।
४ सुन्दर भंगार
पर धन्दर एक श्वारिक प्रय है। इसमें माविम मेव, बिमाष
अनुमान समारी मात्र इत्यादि की पिवेश्या या संबोग-वियोग फारम
विसे सामनी ने श्रीमामहप्स पापाप मिसन सम्पादित
बिमा सा मारत बीवन प्रेस से ही प्रशिपाया।

५ नपशम रुस नखशिख
इसम्म सम्पादन रामबी ने पन् १0. में किया मा, मायापुर
नारायण प्रेस से पाप मुमित एमा । जैसा कि इसके नाम से सही
यह एक मशिष प्रेम है।३. में इसम पितार। ममिन्म में
बार जी ने इसके विपप में सिहा, 'लकी पिता अपने गी।
बाहरी पातासापर्यन पर बिग्रेप मते१पराप का चित्रपा ममीमति
महा पगति । इसकी उपमा में खूब धीर प्रत्या पल विप भाती है।'
६हम्मीर छ
पर पोबर परपेपी की बीररस सम्बपी एक मपिर रखा है।
प्राचार्य रमण ने इसे कि-साहित्य म एक रब माना है।
सन् १५. में इसका मन साहित्य अपमिनि मेस से गुचपा।
पुषा पद मापरी-मचारियी-समा रारा प्रमाणित पा। इसमें भी की बीमा
या भूमिका भी है। भूमिम में रवान बी में शिक्षा पर भी
गोरकन बीवन परिखमा में विमान थे।
७ रसिक विमोद
इसी मामी. परोबर बाजपेयी जी महराज मायरमसिंह
बीलिए की थी। सन् १८१०. में रामबी इसे सम्पादित म
मारतीय प्रेस से मागितमाया।
८ समस्पापति, भाग १
काणी सिमाज के विगत १५ अपिस्तनों में ये समस्यापतियाँ
पी ने संगीतमा लामो मे गोपाबमदिर मत मी १.०
मागीलामी जनमार भी मारे भाशाणुसार सन् १t. में
मात जीवन प्रेस से प्रभावित पाई।
है पासोरते मला
इसके पिता व मसिर पर ' है। इस पुस्तक
साप पाशिक मापौष लारी सर
१५. में इसम्म मपाइन मसागरी लिपि महरिममा शाप से
अपय माया

[...] १०हित तगगनी माराम पर एकबार रस मप प रणाम वि० में ईपी। एमासजी इस 'पास' सीति मालवाई। इसम सम्पादन म सन् १. में भारत संचन सस से प्रसारित करवाया। ११ शवाम-क्व नखशिख भाग रामप यही में इस प्रप का रस कपन इतिहास में परी किमा पा पर य मकश में भी नहीं ६ नित. हीरालाच दापित में इममा पस्तित्व संकर किया है। मामी ने भी इसमा म्पनर पम्मिच मरमस सन् १८. में मारतवन प्रस, सम्मावितरप्रमा- शिवराया। १२ मुनान सागर पर मनाने का एक प्रसिर प्रेय है। सर्वप्रथम साहित्य मुपानिधि-पत्र में पद प्राशित हुमा मा सिंग सन् १.ई. में इसे स्वामी ने पुस्तक बास्प प्रदान किया। रवानी पे इस सम्पादन प्रत्पषिक सुभाष से किया इनके सम्पादन-रात इस प्रप में पूरा विपन होता। इसकी पर अनुपम पिरोठा परिणाम बी ने संदिग्ध स्थानों को मरमबारक चित्र सहित उस स्वरको प्रश्नमाया ही रहा। साप निम्ति म से मना कि रति समा। १३ विहारी-रत्नाकर विदारी सतसई दिदी साहित्य की सराम रचनामों में है। स्मारपी की सक्से पविक प्रामाणिक पातोरलानी ने भएकामों मस मिनिसरीमों में प्रेम का 'बिहारी रमाकर' सर्वमान्य नाम बी नगि पिम में गान गम्भीर अपयम पापविनर गिरी प्रपणे रेकार ही बात हो जाता है। रामजी में मिनी मन्तव में मापा सिचापा। पहीनही प्रममापा भी पनि एवं मर्म पेशगाने में मी समर्थ महा-विरोप भी। गाने १ प्राचार्य केशवदास, सरून सिरियालय, विपी-विभाग से प्रकाशित पी. एप.ग.कीपौसित । २ पपिर गिभारी कामठा प्रकार ।

[...]
५ नृपशम त नखशिख
इसका सम्पादक राम बी ने सर १. में विमा पा, मुबम्पर
के मारापर प्रेम से परप्रय मुक्ति मा । *सा कि इसके पाम से सारे
पर पर मबशिष व प.पों में इसन मिस्वार। ममिम में
रमाकर जी मे इसके विषय में विचा, एसपी अमिता अपमे है।
पारी पातो का पहन पानिप रते है पर पर काचित्र पर महामटि
नहीं पाते । इनकी उपमा में स्पूत और प्रत्यक पस्त विशेप पाती है।
६हम्मीर हठ
पर परोखर पचपेपी की वीररस-सम्बपी एक पसिर रमा ।
पाचार्य राम या ने इसे रि-साहित्म प्र पक रल माना है।
सन् १८. मैं इसम ममपान समिम सशनिपि प्रेस से माना।
का परमागरी प्रथरिणा-समा द्वारा प्रमाणित भा। इसमें कवि कीबीचको
पमा भूमिका मी है। भूमि में राम बीमे सिवा इनके पुत्र मी.
गौरीनबी व परिवाया में विमान।
७ रसिक विनोद
इसी रथा भी पोखर पासपेपी बीमे माराम पौनरेंसिर
पीलिप थी। स . में राम भी ये इसे सम्पादित कर
मारत पावन प्रेस से प्रकाशित भाषापा ।
८ समस्यापति, माग १
मशी कवि-समान के वियत १५ भपियों में दो समस्यापतिपाँई
या की संगीत र लाम बीमे गोपासमंदिर के मत मी१.०
महागोस्वामी बीमारी महाराज के प्राधानुसार सन् १rt में
मारत बीवन मेस से माणित मचाई।
६ पासोते कलक
मोरपिता महर के प्रसिर ग गापर 'सा है। इस पुस्तक
परम पाशिफ माएर । रत्लाम श्री ने पर
१५. मैं इसम सम्पादन परेसागरी शिपि मैं दरिमामा से
मुपित मारा।

१०हित तरंगिनी
माराम पर एम्पार रसाय। इसकी बिना. १५८
वि० में हुई पी। रजाम मी इसे 'पणावत से पूर्व की प्रति मान।
इसम सम्पादन म सन् १८४५६. में मारव जीवन प्रेस से इसे मप्रशित
,
११ केशवदास-कत नखशिख
भागवं रामय राजवीरे इस मंपस नलोप अपने विधान में नहीं
दिया हया परप प्रकाश में भी यही है किंतु ग. हीरासात दीति में
इसका पतित कर यिा।' रपाम बी ने भी इमन पत्रिपक्षिय
सभर इसे सन् १६० में भारवर्गवन प्रेस से सम्मानित प्रम
पितराया।
१२ सुजान सागर
पहपमानंद का एक प्रसिर प्रेम । सर्वमपम धादिस्य सुषामिपिन
मैं पद प्रकाशित भाषा किंतु सन् १0ई. में इसे स्वारगमे इस्ता
माम प्रयास किया। रवाकर जी मे इसम सम्पम प्रापिफ सुचार
से किसान सम्पादम-गरम इस प्रप में पूरा विपरीन शेखर
इसकी पर अनुपम पिपता मह किनारबी में मंदिय स्थानों को
प्रलापकन्दि सदिव रस स्पट मरवाही रक्षा समिति
मसेबा ननरचित ना समय।
१३ विहारी-रत्नाकर
विहारी सतसई दिदी साहित्य की सततम रमानों में है। लारबी
की सबसे अधिक प्रामाणिक कामों तो पलामी ५५ पम्प यसो
प्रत्येक किया है। निकामी में प्रेसम मेम मिारी र
सम्मायी। रजामबी 'सिपी मिरप में गहम गम्भीर ध्यान
पाहब पिचर विहारी' प्रथमे कर दी जात होता है। स्वामी
में विहारीले अन्तताह में प्रदेशमा सिपापा। पदोपदी रमापा मी
परित पूर्व मशाप बगाने में मील पमवार-विरोष पी। गनीम
१ भाचा पदास, लसनक विश्वविधालय, दिदी-विमाग से प्रकाशित
पी. एच.की थीसिस ।
२ पिचर विहारीकामा प्रकाश।

[10] जयपुररामपाय पुस्तपसप में विहार-सवला की हस्तशिस्ति प्रतियों में भपी प्रभार वा पा। इस ग्रंप के संपारण के समय में प्रपोपी से सहायता मिठी दी। सान सी ये एप सुमसर पूर्ण साम राया। पर सम्दी मा परिमम समा गहन प्रमपन मन कि भाग में पिहारी-सतसई की एक प्रमासिक प्रति प्रम्स हो सकी है। पा. १५ मा सन् 1. प. रामनाय पोविपी परमेवरी पाशानुसार पपुर गए और पहल से बिहारी-संबंपी भाषा सामग्री प्रा संभारकर साए । इसम संपादन परमार मांत मियत बाग में सन् ११११. में समाप्त पारपान बी में ही हगम तया यो परिमम के साब इसका संपादन किना। वहाँ तक सम्मय हो सपोहीम रनि बिहारीप्रमानुसार रखने का प्रयास किया है। बिहारी बालविपप में प्रयाग विविधालय तलाशीमबारस सिखर महामहोपाचापरा गंगामाय मा, पम. ए. सी म्नेि विशारी- रणाम प्रभसम पर हर्ष प्रकार पाए तिहाई-चार बगवासास मेरे परेमाचीन मित्र है। इनसे मेरा परिसा परिचप सर 100 में जमा पा। जब परमेस सापेट, बनारस में परस में परदे पे और मैं दरभंगे से परस पास करकेपर्स ईपर झम्म में पावा पा। मरिनो तो पापा दम लोगों को बहीबाठ पी पर इतना अब मी स्मरदिप साप में मीकि प्रतिमा और बस्ती में पूर्व परखता पी मोलाचबी विश्व में पागेमा "प्राचीन महसे वित्माति और नागादिपरस्पर वित समझ गई। इस बोदेबरे से साकिरालाका बीड सरस कपिदी महापरे सरसामर मी रोतिमा समीकर एवं मर्मत 4. पिहारी जी मिले विधारीवार पर अपनी सम्मति परीसियते? बबेडरचार होने पर भी इसके (पिहारी सवसई ) माष बोगी मे सापही रोते थे। पहा सककिसिमभापरित सर बार्य प्रिपर्सन में भी इस सममले में पड़ी बसम्म परी, सिमी रमी कितनी ही संमयों प्रपामाधार सी बारी एमा। पर मैं मार गयावास पलाम' जीबी.ए.भासदाचारिप, मिन्दबाने भपत प्रपताप, प्रवर दि, ममा पॉपि पीर पानी । १ माधुरी, १९ नवम्मा १५.५००। १. मापुरी, १२ नवमर १९५०1०८ [...] साहिरिब सब पीर प्रकृति मुसार इसकी बिहारी रलाम'माम की जो ऐम प्रकाशित भाई है बदममय ऐसी है, जिस देवर स. प्रियसबको मा दिलास्त से इस भाग्य 4 पर सिखना पा, Your edition ho davipated all my doubts इसम्म प्राय पही किरनि विहारी समी रपम्प प्रतिपों से पाठ संशापन किया,म का संगम रिया और माषों का पता सगापा, नि मर्म में क्या भाषन रही सपने मार दी सर हो गया। पर पामरस प प्रगाव परिममकाया। रनाम बीके सपाइन का रंग देनम मरे मार हिन्दी मही सीमोनी रस परिप्रमप्राप्पप समई पर रस पयोगिता भर रसमा महत्व गरें परीके सादर में प्रकाशित पर पनियों से होगा, सिप माष पर No Guman scholu can be so patrostaking and daborate alb flert etc. मिामिलाप पर भी विशमी-मनमा मामार मगर है। इसके लिए परि दम रमाम भी मे मणिः पन्चार मी सब मी बह कम ही होमा। सन्मारिकपार म स म कामर पा रोगा। . । १४ सूरमागर पूरक पर हिंदी साहित्य के ममम एन । एलामा अपम रन मन्तिम दिनों में एमों को जोमम मम एक प्रमुप पर्व अनुपम सर मार सिंगी सपदिय को पपंग परमापद ५, कि उसकी पर प्राण पूबनो भी और 'को मन की ममहि रही अनुसार पर पूर्ण होतेदो रही गपा। सर एक साल पा रचयिता को गाते है। इसमें कोई समेहनही सूरसागर एक शिस प है। इसके सम्पावन में अपूर्व सास, एक मर्म पावरपकता दी। विदारीमलाप से निवृत्त होम रत्नाकर बी इसी महक पूरा कायम हो। मम सर्ग तक पूर्ण तया पराम सर्ग का दान पाई माग सम्पादित रोपे सबा माग प्रकाशित भी। पुरे बार में 4.मनसुमारे अनपेयी जी ने उनके इस भरे कार्य की पNि बीजियते "सूस्सागर के इस संस्मत मे प्रगलप्रमा . मापुरी, अप्रैश, १३ - [ . ] प्रकम स्वर्गीय श्री बमप्राप्त 'रस्मामी के मन में हुईबी बो प्रबमापा पौर माचीव काम्प के अन्य प्रमी पीर मर्मम पिश थे। समय इस संकास को पूरा करने के निमिच अनेक स्थानों से सूरसागर श्री स्वसिमित प्रतियो माप्त कभी और सम्पावन कार्य की प्रारंमिक स्मनेता भी बनाई मी । गम्दीमे अबमापा-मामष सम्बन्धी प्रामपक गोप मी की पी और अपने इन विचारों, नियंपों को सिपियर मी रसिपापा। समापा की प्राचीन पुस्तमें सपा सूरसागर की पुरानी प्रतिसिपियों के पामार पर उन्होंने प्रस्तुत संस्मय देखिए एक सामान्य सिपि पति का भी निर्माण यिा पा, परत इस मारंभिक सामामी को ऐम सम्पादक पर्य में संसम्म ए इतने में रमका असामयिक शरीरान्त हो गपा र सी पोजना मतका दीर गई। "न्होंने कासाम्प गमप सामी पीर दुसम प समा को समर्पित यिा बिसरे विमा उमा को इस संस्मस को इसने मिथर भीर विश्वस्त रूप में उपस्थित करना सम्मबहीबा। प्रसिद्ध साहित्यिक मासिक पत्रिम मापुरी के भूतपूर्व सम्पादकमा हिंदी विकास-साहित्य मर्मश पं. अपविहारी दी मिझ रलामा श्री के सूरसागर सम्पादन पिपप में वियते। इस पर्व में पोटाई से मापने दो धीच ऐसा मी विपुजारा बो सदा रमर साब राखे । और मीत रेत म म प्रादेशानुसार सब प्रतियों के पदों की साखिम दिपार करते है। भिरखामबी र सब प्रतिषों पर मुमार समित सब नौ मनिवारण करके घर पाठविसमा इसमें कोई सहमही फिरलमबी ने अपने म्पब एवंभमसे इस माम पूर्ण कार्य को करने से बीमारठाम दिनी साहित्य का महा रपार किया है। मरेरी अब सकी इस महता प्रेम सममे, किन्नु पद हिन्दी सपी पिके लिए उचित नहीं प्रतीत होता। प्राचार्य मनकुमार बामपेपी बीने बमम सर्ग तमा वीच चौपाई पराम सर्ग समारने 'मारमिक- स्मरेता' मारमा बोल्प भी दो फिल इसमा तो निश्य रूप समा जा सकता है कि पति परनाकर जीनेस कार्य में इतना सरस बना रिणा होता तो भार हमें प्रसागर कोई भी प्रामाबिर पास अप्राप्य होता। १ सूर-सागर श्री सम्पाएकीय मिति स । १ मापुरी, अप्रेस, १६३१, - ["] रत्नाकर बी ने 1-प्रवियों पसंकसन किया था । पद गीतकाम्म होने के मरण प्रपिक पितरे हुए थे, मत ग्ने एक माना और मी परिममा कार्य पापितु लाकर जीने पैर्य नहीं बता पा मिसन्दो माया सम्ता है कि पदि उनकी असामपिक मृत्युम हो जाती तो 'बिहारी लाम' की सह पार सूरसागर की टीम भी हिन्दी साहित्य में जगमगाठीत अपना शिशिर स्पान सती।

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काव्य रूप, भाषा एवं कला

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-काव्य रूप की दृष्टि से वर्गीकरण विपत व्या दिवशी पुगी प्रवृत्तियों का समम्बप करने बारेमपि रखाम भी परि एक पोर मुखा-परम्परा का पासर पवेता इसरी भोर में इतिचारमा प्रतिसती मी पाया है। रीतिकाम को मुखक परम्परा राम पियप पिप इसमें संदेह नही, jि प्रकप मम्य की बिना मे मी नाम मार्पित महीं किया है। संरूप और रचना की पटिस साम्प केदा मेव माने गए हैं। मम्म अन्य २ एपम्प । हामी म क मी एप पाप 4 रचना नहीं की। प्रम-वाम्म निरन्पपिचार से तीन मेर मान गए हैं। , मभन्म, २ निबन्ध तपा। निबन्ध पम्प । रस्लाम की ने प्रबन्ध पो मनुषमवों महा- काम्प तथा संस्काम्प में से साधम्मोही अपनी रचना के लिए चुना था। हम सारा रचित सरकाम्पों पर विचार करेंगे। खासम्म में किसी परत कमा सेबी गई प्रपाम पटना परसेन वा फया तारतम्य में सती मिनु महासम्मकी अपेक्षा इसमात्र सीमित रहता है या भीषन की भयेकापता मोम पकस्मता माप्त होती है। कमी-कमी समय में गीता- ममता कामी समाय बापो तो नाप्रम्प की परम्परा अत्यन्त माचीन मिल पाइनिक प्रम में सभी विशप सति । पौराणिक पुर ऐतिहासिक मानों पर पाभित तमा सतप भिारमा से नि-पत दोनों रूपों में लगानभ्य की रचना है। हमारणार्य रामपंचाप्यापी, प्रमरम्ति परिबन्द, गंगावतरण प्राधि साम्रप्प पारारिक पत्र पतिहासिक मामों पर प्रामिवर मा 4 रामनरेश त्रिपाठी "पपिर' और 'मिसन' करिछसना बिपत है। बाम भी दा नापाप्पी की सपा की विमान रख पाना रचित रोगा। खंगकाम्य, १-हरिश्चन्द्र परिचम स्पास्मान पौरासिक उपाप्मान है। श्री मदमागक्त में इसका मूब म मिस्ता है। रागा रिप पफ सत्पमिय तपा त्यागी यामाप में चित्रित किये गए हैं। प्रीमहागपत मतिरिक मविप्यपुराण में भी पोरे - - [1] भगत परिपतन से परिरममा मिशती है। हिन्दी में मारतेंदु हरिश्च मे पामेवा शिकभापार पर समरिरण मामी रमाकी बी और इसी पौरातिमा सभाधार विपापा। स्वामी मे मारतेमुके भारत के प्राधार पर ही इस प्रम की रस्मा की है। सीमा मेरला- कर बीमा सम्मानकात इप मिता-खता। २ खंरकान्य, गंगारकरण गंगावतरण मी बरामण प्रवर्गत बिया बाला रचित है। गंगा पवरण में लामबी की सका प्रतिमा के पायो । मपि पर कमा भीममताकत तमा सम्म पुरायों में मीपसम्म होती है किन्तु ममानवया पास्मीकीय रामापय से ही यस्कर बी में इसे प्राय किया है। पार, पीर पपा कम रसों का परिपाल इस प्रम्प में पिषम से मिटता है। कपा- प्रबन्धकी पी से पर एक संगठित रमा।पर्यन की विपता के भाभार पर इसे महाफम्प की प्रेती में सबसे अमल मी बिना बाता है, परन्ट बास्मीकीय रामायबापुक मात्र दोमे भार से प्रधानसपा सपा- अपमानावा चाहिए । इस सम्म में भी निम्मामलेग से अधिक पर्यों पर नाम दिया है। गंगा मगरमन पनि भनेक रसों में पदी विनामक पी में किया है। सप्तम सर्ग से दो-एक गारप लिए बासले वृती पुदी की फम्प फाती फारति प्रविपाई। यो परवत पर परत मीन बावर परसाई। वरनि-किरन पर विचित्र बहु प्रभसे। इम्पनुप की प्रभा विम्म दस दिसि मासै ॥ २३॥ मनु दिगंगना गंग नाइ की निज अंगी। नव-पषित सारी सत-गी। गंगागम-पप माहिं भानु कैयौ प्रति नीकी। पापी पम्पनबार विविध पाहु पटापटी की ॥ ३४ ॥ बातावरच रत्ता मर्म में रस्माकर श्री प्रभाव मारतेन्दु हरिरथ समान इन्होंने मागरिका गंगास्वान पोहो मनोरमग चिषित किया है। मम सर्ग के पश्चिम अंग को पाम मारतेनहरिरथ गंग-पकिन पनपा स्मरण हो पाता है। प्रेमापताप लामीभीमाप और मचन्म काम्पो मन्तगत इसम स्पान सर्यो। . नब भूपन [-] । निवन्ध-काव्य पियर वामप्य निबन्ध प्रम अन्तर्गत स्थान प्रम्स होता है। बोहो पायस में महासम्म तमा सरसम्म दोनों ही पर्यन प्रधान हो सकते है, फिर निर्दप-याप्प पहना भितम दोगा। मापुनिक श्रत गए-साहित्य में पिम्प का भाविनाष ठया मार्प दोमसाप ही पघामक विषयों सभी प्रापिाय हुमा, पो तो इसम मचतम रीतिगत में होगमा या। प्राचार्य रामचन्दनी ग्रह ने लिला:- "मामा प्रबन्पो म मित्र एक और प्रभारी रचना मी त देलन में पानी, जिसे हम बणनामा समय कह सकये हैं। मानसीसा मानसीहा, बसविधार, परमिार, सगपा, मसा, होलीपयन, बहोरसम्मपन, मात वर्षब, रामसेवा इत्यादि इसी प्रमर की रचनाएँ ।" मनीष-बारा प्रारम्म में दर-दोरे पधारमा निबन्म दिने गए। अपम मार में पं. प्रतापनारायण मिम इस और भूरे या होने इति पचामा सम्प पिन । दिदी युग में सरकी प्रेरणा से सीधी-सादी मापा में इतिवारमा पप सिम्हने की एक परम्परा-सी पर गई और इसम प्राप होने लगा। रनाम की रिसोसा, हमी, समायोमार्ग इसी की केसम्म १ हिंडोला इसमें पाकम्प नापस बिहार और रमले महोत्सवका बारा मना रम पर्व कवि ने किया है। मात्र कमी नही रस बम की दी प्रधानता है। इस प्रमर काप्रम्प प्रमुख स से सामही कहा माना पारिए। रस परिपार दी से सम्म का प्रमुख गरम होता है। क्षिा में कर एप सपा वातावरण मिभय से अधिक रसाप्मकता मा कला रमम्ता समर समथर पिया। २ फ्लफाशी प्राप महापाप्यों में पर्यन अन्तगत पशुओं की सूची ने की परति भी। निरोप सम मापसी ने एमावत में मोप-पदापी प्रादिका पालन पसातरिया । पारातपर्णन में हमारों प्रकार के मोदकमाम गिमाए १। महामप्प पन्तपठ इधी भाषीन बनारमा पेटी में प्राएमके पलामनीने प्रावणी में पानी वितत रेमरको प्रति विपा। इसमें बर्यमामा पाप्यनुसार एक पनामात्र पर्यन है।

[१] ३ समालोचनादर्थ पद प्रदेण्डर पोप पासोलारमा निबंधों (Essays on Criticism) का पचाकुपारपर्यनारमा निबरो के प्राय इसे मी निबम्प-सप्प की प्रेटि में स्थान विधा गया है। निर्वन्ध काव्य नियम-काम्म मचामतवा मुका मार गति में मिभक फिमा वा सम्मा। मुक्तक इस पदी में तारतमा सम्भव नहीं होता तमा प्रत्येक पर अपने में पूर्ण पर्व रसोरेक माने में समर्थ होता है। मुख्य पाव्य एवं गेम दो प्रकार के रोते १। पाम्म में समि खस्प होकर पर्यन पता है किन्तु गेप में विमानों पि म प्रमिपंचना होती है। एक्सी और भूपबपित सबैचे, वमा विहारी दोहे प्रादि मुजज मेवी में भाते है। एलाम जी प्रश्न सारीमप, प्रकीर्द-पथावती मावि भी मुचम्पाप है। गीत मापतिरेक मैं ताब, सब एवं स्वर संपुर स्वामाविक प्रचार गीत-सम्प सापाता है। गम्तकाब में मात्र तमा रागारिमता मामनिवेवन के रूप में प्रकार होती. परवपमा प्रभाव पाता है। ये गीत पम्मा प्रेरित होते है। गीत मी प्राम्पमीत और साहित्यिक गति दो प्रकार से १। ऐसी, प्रास्ता प्रावि प्राम्पत के अन्तर्गत सपा पूर, मारामावि पद साहित्यिक गीतों के अन्तत पाते हैं। साहित्य में साहित्यिक गीतों का दीपिप स्पान होता। सरिपिगात सावित भी हो सकते हैं। इनमें प्राम-मिवेदन मिमी पात्र मानम से होता है। प्रमरगीत की परमरा इसी साहिस्पिक गौत- बाम्बर्गत मानी जाती है। मुनगइसी साहित्यिक गति के प्रवर्गत पनाचा सकता है। नाम बीमा व्यपरास प्रबन्प-मुका मामा पाता । इसममरण पद है कि इसमें प्रवन्यात्मता होते हुए भी भावों को वात तर पर सर सर प्रसिपमा प्राप्त होती और प्रत्यक पर पूर्ण सामाठि महानपने में समर्थ। मुक्तक मुना काम्प की रथमा सिए पपि परिस्थितियाँ अपेशित दोती १। या तो अपि मापनातनी पतली होनी चाहिए कि पारम ।

[m] पैडी में पले मावों की भमिप्पना बरे अपय रसम वाम्म मन्थर में मावि यमे की प्राधा रा हो। हाति, उपरेय की प्रासि भी मुद्धा रमाको प्रोमा प्रदाय वो वीरगाथा-1 में पपुठ मारी प्राधियों पीपर रोषीरसौम्य में सपा भीर गीतों में बापि या प्रबपी और प्पान हा चिमुकली की प्रतियाँ मी इस काम्प में हपित होती ११ मधि-समंत्री सताइस पाम्प में बिखरे परो मागमूति की गई औपक परमात्माधि मी पास मात्रा में रखा शिमें श्री वितरण समाओं सवा सूधिया राहाका मन तामासि रपदेश सदी दोभी इस काम्प में मिटते हैं। मनिपुग विति स्म से भसी प्रारपियो म पुर। एष इस पुग में साथ निपराएमा सलवामा समापि मचो में मी चमबार,सिका प्रभाव नहीं पा । मापसी के पर समाहरण मति, परेरा भाना से पुक पत्र भी इस पुग में प्रा । संदिगार, मापीरमा पुगपाही प्रधर लाम श्री के सम्मुख एक पर पामरा विमान मी। जिसमा उपयोग आन्दगि सघातासा मिमा। रखामा काय म्ह रप से दम दो भागों में पद सकी १ पिप परम बरारी रिसे। विरपरे अनुसार इनके मुका म पिप गात या दिसला पती शिनाने प्राप समी रसों को अमि- मापने मुकाया में की । मुरम्पर भhिeta समठ रमा रमा ही करते है। सर रेमप्प में पसासों का माया प्रमार है। मुखधी की बिमपत्रिम में मी शांत या रस कारी माप । र, , भापक शमादि सो ममी स पर पारलारीमुरी में मिला है। गार , पादिम सहि मे ही मनुस्म 2 नोति, मग इपसमा समावरा सान स्थाल र किमा गया। जगार रलार जीम प्रमुख रस। सिप्रठीन परिणाम पा इम्सने नगारमपरिको भपिका कमाएका पत्न पर पहा स्वर मी किमा। मान समाप्त पा पन रसिम सप में मन अपमा माति-अन, श्यापक मधुमान पाकिसंगी मा कासिम नो अप्प मे मिहता - - - [.] भासमय प में मप्र मिप्रतिक्षित पर्दव रीतिकालीन परिपारी अनुसार है- सोतोको शिव प्रश्नस 4 सोए मो, याम पास ममित मानि चौगुनी है। में 'खनार मुशाफर कहा यह, पादि सो जगत मुगा स्वाद की है। समय सुधारि भी विसमता विधारि मी, पारि र पारि जो रिसर प्रस्टीको है। पार पाबनी नीचे नायक निघरी हो, पॉपनी नी इमारोपाप नीचे है l -गार धारी इसी प्रा निम्नलिमित पदम विपोग रगत रीपन विमापा मार्मिक पर्यन बिमा गया- हाय हाय करत विहार दिन रैनि सात, कटिमो सात सवा सैननि सिरोही सौ। कद रखनाकर उदासी मुख छाइ वाति, हाँसी शिनसाह बावि भानन विछोरी सौ।। भूस प्यास पूर्ति मेंपात मयत गाठ, धार विक्षात मुस-सार सप रोही सौ। एय प्रति भोप ही देग-भगि अग वाति, जब मन मागि जाव पर निरमोही सोn पगार दरी नकार की पर परम्परा बदापोर र तिमीन परम्परा से प्रमापिस 40 मरी और हम पर भनिनवीन माला म प्रमार भी सरित होता मारमारी प्रथम पपि मामान्य परि से पार के मासम्म मनमियो एलपन , मियपत्रिी क्या प्रमा वो भवदी और भाम्य मम से सगाम सिफारिशमा, उसमें होमिम्मा का प्रामास BEOIN मिमा मा इटाव नन्द-मदर-सी परिस, पापा ममा-मीर मति माप है।

[ ११ ] रूपरस-माती चार पपक्ष पिठोनि एमा, गैज गहिये मैं हटि हटकति भावे है॥ मानि-मनस-मध्य पूरि दिगमोरनि की धारि वीसी च्या घटकति भाये है। मटका मापे मंजु मोर नै मुट मायें, पदन समोनी सट मटकति माये है ॥१॥ पार हारी इसी प्रमर बार-बारी का रितीच बन्द राम को पप र शिता गपा है। राम-विकार अक्सर पर मिपितावासिबी नारियों के द्वारा उनके पर पर बड़ी मौत्सुष्पपूर्ण शैली में किया गया - पाए भवपेस के कुमार समार पारू, मनु मिपिता की दिव्य देखन निकाई है। मुनि रमनी-गन रसीली बहु मोरनि है, मोरनि की मर दौरि गरि समगाई है। विनके मनोले भनिमेप गपातिनि पे, उपमा ति पुर की प्राकि मुकराई है। समव भटारिनि पे सिरकी सुवारिनि पे, मानो का पुजनिी तोरन सनाई RI कार सहरी जगारवारी महतीव माय मी माहमा पार पवार, मिसमें पवि भपमी अनन्य मकि सम्मुख सम्पूर्व सांसारिक बत्मनों प्रेरित का देना चाता , सब तम हरि मनमसिद्धान्त इस मद में है- प्रय न हमारो मन मानस मनाएँ नेक, टेक करि पापुरो विवेक नलि लेन दे छहै 'रतनाकर' सुपाकर-सुपा को घाई, इपिठ पकोरनि अमाइ पलि लेन बेहु ॥ संक गुरु मोगनि के पक तकिये थे वधि, भक मरि सिगरो कसक ससि लेन देहु । तमि त अनि के समाज पर गार गेरि, भाप प्रमरान की सुनाई लखि लेन देहु ॥३॥ कर सारी - र गारविषयक इन मुफकों में पवि की अमुमनि, चिया, पम- कमाएचि समा गमता का मुन्दा समन्वप मिखता है। मुका-सम्म भसंस्तित्व मी इनकी में अनुप्राप्त की सहायता से सिर पर सिपा गपा। गारपुगान कवि अपने भाभपदाता की प्रशंसा में प्रशस्ति-सम्मको रचना विमा करते थे। रत्वामी के सम्मुख देसी गे समस्पान पी। गगावतरसत में इनाने अपमेरपरी भीजगदम्बा रेपी के प्राणानुसार सन्त प्रपरमा की बात कही है इस प्रस्तिकाम्म काम लाल श्री पूमा कम में महसम विपा है। इसके माल मारतीय गौरव पौरारिक प्रपमा ऐतिहासिक सम्म ऐम पिरपित हुए। मार और मारा की पिसे रखाम बीके काम पर मंगवाही भोगपूर्ण पर पारे। पमिमन्न-सम्बन्धी निम्नलिखित र माप क्या मापा दोनों दी रियों से पूर्णतया पुसंगम्ति - 'घरम-सूपत की रबार चितचाही पाइ, पायो पारि हससि हप्यार इरपर में। फो रखनाकर' सुभद्रा को प्रसो यश, प्यारी सतह की सम्मो न सरवर में। सारसूल-सापक पितुर-झुर में म्यों, स्पों ही, पेठ्यो चक्रव्यूह की भनूह भरकर में। लाग्यो हास करन हमास पर वैरिनि के, मुख पन्द-हास पन्दहास करबर मैं ॥१॥ -पीराल, वीर भमिमन्यु पीर काम्प के नमी में परि हिंदुत्व-भाषना बात का पर परिवरित होती है और पा प्रवृत्ति रसे भूपण मा मारवेन्यू रिबन से मिपाई गाल पाती है। शिवानी की पुर-औरता का वर्णन मते! परिषदा, "साहसी शिवाकिस्ता पाता पि, पत्ता पत्ता करठ मुसरता भोगावे 'हब ससा भूपण स्मरण दो माता मौसपी पी पीरवापर्यन ने की प्रेरखा भपि मारतेन्दु परिचय मांसपी मार से मिली है, ऐसा गण इष सम्भाषित जान परता। निम्नलिपिक पर बीर सभामुना गार है- . [५] "दुर्ग से सहर्षि वदिता सी सरके ही कली, पाकि न पाए असाहूँ भये मुरगा। को 'रतनाकर घमापन नगी यों पान, मानो फर फैश मुकारी मारि उरगा ॥ मासाबादि प्रान की भमान की दुरसा मॉषि, भागे नात गम्बर भवाम्यर के गुरगा। देवी दुरगामी मलेछ-पल गेरे देखि, मानो पैत्य-दनि दरेर दसि दुरगा ॥१॥ -बीर महारानी दुर्गावती शिपदी दुग के इतिवृतास्मक काम्य में बार बीके इस पीर काम्प भलिोप भाल है। दोन इतिथच में भावुकता सपा कसा का समावेश परवेप मागे पपियों को प्रसंगठित मुका रचनामा पफमवर्णन किमा इसमें संदेर नहीं। रोष और मयानक रसों का समावेश पीर के साप साल हो गया है हाल्पकाम अपि पवियर स्वतता रूस में मरो सापकस मैं ही किया है। कार अपमा मधिसचारी रूम में कपि मे इस रस का पर्यन किया है। भकिसहायक स्प में चिपक मनोरंबा पपका यि किया है। भगवान् शंकर भणीवावन पर इतने मुगोपाठे १कि मंग भावना कोषम तथा रोत-मता साप बम उसी को मार स्वर- पदरी पुरने के लिए नदी पर सवार होम बम।मि की फसमा मैं एकसारीकास्पप्रभाष पिचमामt:- पेठे मैग मानत अनंग-भरि रंग रमे, अंगभंग भानव-तरंग पघि लाये है। को रखनाकर' काक रंग ढंग भोरे, एचएफ मच रे मुसंग वरसाव है। तूंपादोरि साफी छोरि मुख विजया सौमोरि, बैसे कमपि पै मसिन्द मंजु घाव है। वैन पै वियदि संग सैमसनया ने गि, प्रत पले यो क्सन पासुरी पमा २५|| गारमहरी [११] तसरे अन्तर्गत दिने बीवनी भनित्पता मोर पाका म्मान प्रापित करते हुए परि-माल की परमगुरता म ग्लेख किया है। पथपि सेकसनों में भीडाहामक माना ही प्रपान विषलाई परती। सपापि कवि पारकप में निदेव की भाषमा बारात मने में समा है इसमें मई सरेर नहीं। भीति पररा के प्रवर्गव भी मे अपमे पोपों में रहीम, गिमारी पा सब के समान इष पसारमा सी में नीति समन किया है। इन उपदेगा में कवि जीवन की सामान्य पणामी पपा मान्यतामा प्रापार पर संत अपना मारय पसंपर भापार पर जीवन का भार मिमित करने का प्रपत्म किया।बप्रस्त पति की एपनीव गाना पसन पनि मे हम अमर किया- "नी पनी सौर परत यो पहिरत उदोत, देमस दिनकर दरस प्यों चन्द मन्द मुबहोत ।" -गोदावली मनुप्प को पति है कि सपम और मुबहते हुए अपने पड़ोसी कोमी मुली बनाए रखने का मपान करें। इसी में दानों को पुन मिडेगा । माहरणार्य गरि काता'भम कहानी मुमते है पीर मिया (मुस) मी से प्राप्त होती जन परोसी-मैन को करियो भति मुख देत। मुनत करानी कान म्यौं नैन नींद के देव ॥ ४ ॥ नोवती मासिमपरेण प्रदूसरा स्वरूप मपान रोम परोप। इसमें किसे पम्पोजिका सहारा प्रदाय किया है। पर अपोति मते उसने अमिमावियों को वानी दी है कि पोरा-गुत सम्मान पाम मस्ति धर्मात स५ पुप सम्मुन भरपरम प्रमा- "मायमुरे टेरि पनि पायस सवेर स्थिन, निम गुन स्म की हमायस पदाचे ना। पर रखनाकर स्यों पायरी वियोगिनिक, पिन महाए चम्धु पाम पित त्याचे ना॥ निम पन पारे इन्द्र मन्द मतिमन्द बानि, मानि रग-शनि दिय शंस हुममा ना। - [१५] सपी रिसावे ना मसस गति गर्व हक, परे चफ कोकिल को अपनी सुनाये ना॥ - इसी मसापक पर अमोतिर हुए इन्होंने उस सत्पुरुष का गुणगाम कियाको सबको समान स्म से प्रमरा प्रदरममता है- "कविपरित में पाम होत भादर भपिचरी। सुजन-समा में रवि प्रमा की जियारी ॥ प पा सहि सनमान ना निख पानि न त्यागत । सपही के सपनर रेत एकहि सो वागत ॥३॥ नीच पद्रिी मू ल मूरत पापी । देव प्रनस समान रूप रुपि सौ सपही को n स्वर्न रसस के पात्र माहि नहि भधिक प्रश्नसे। नहिं माटी के पटित दिया मैं का पदि मासे ॥ अब रोम-रोम इमि नेह भरि गुनमपसबको हिस करे। व सहि पदवीइस वीपीप-दीपदीपति भरे | -दीपक पोप में सामनी में अपने मकरें अपांशससे प्यापक बनाने ममल किया, इनमें पीनवा भीर माता स समयप लावा समाप्रामवारेमापार पर परिये बबरमा शिप माप देते। वो पानिकता टि से अपने सच में अनुमपि पूर्ण जमाने का मामी को है। वित्त का गुथ तो प्राचीन सपा भावनिक मुक में समान रूम पे विद्यमान है। स्वामी मुख-माम्म करके भनुसार बिमारित मने पर पर साताको प्रमानववा मरिच (पमारी), सरैया दावा दोधार पर मालपपमप्रपोग सिमा है। इस सब यो में भी रित भय पनामसापी प्रमुख है। इसके पास सपा व्या तीसरे वाम पर पोम प्रपोग किया गया है। एकाकी पीसे बनापरी पर पीए हम इसके द्वारा अमि मबि माषपति प्रामस्ता, ममति मागेबाव पर पि संगे। मापापुमति मुगामा एक किलो गुरु।। पर रात में रिपोग की गोनुमति सचिप बार बीमे शापिक ही शरामी ममतता [१] साप भिया है। अनुमारिके हारा मी इमनि मागत गहरी अनुभूपिनो भासत मिरा किया है। माये बौरि पौरि मी प्रवाई मुनि ऊसय की, और ही विलोकि वसा ग मरि लेता है। की 'रसनाकर' विलोकि-पिससात उगहें, येक कर कापत करमें परि लेख भापति कठुक पूषित भौ पहिले को मन, परत न साहस मै दोक परि लेता है। भानन उदास साँस भरि उकसौई करि, सौह करि नैननि निचों करि लेत हैं ॥१०॥ स १ उपपुर में दिख बा हम्य दोनों को करस मिरामापूर्ण शिस मन:स्पिति मानिस कवि ने बस अनुमानों के प्रदर्शन से पनी समता- पूर्वर पिमा है। इस पर की गहरी प्रमुपतियों की रचना मुम काम पिता और स्वाभाबी इसमें सिवास है। सोमम्ता पम्तर्गत कमिसनाएं सूलिपा प्रारमरिता इत्यादि कोवा सम्वा रयत में इस संसारममता मधुरताप दर्शन होता है। उचाप से बना पीर भारों मोर पर बाला एक माहतिर मापार रामास में योगाप्ति प्रक्षित होने से उसके पेत्रों में मरा हुमा हाम-सीन मह उत्तम होकर जैत बापगा, जिसके पतसम्म सम्पूर्ण संसार में मतब से बापेगी। पाश्री निकाय इरि-चन पानिप के माजन रंगवस, पमगि पन ते पाक घर पाये ना। को रतनार त्रिशोकमोफ मास में, गि प्रमद्रय उपाप मचा ना॥ र समेत हर-गिरि के गुमान गारिद पक्ष में पासपुर पैटन पर मा। फेले बरमान में न रापरी कहानी पह, पानी गपाप मन मुनि पार्षे ना sul -रारावर [५२.] उवातक में सपना सम्पुस र ऐनी दी माला से परिपूर्ण है। म सपा पावागायम विनय सलामी बसी साता सास किया है। भौटते समय ग्रभी माम-पिस्पतिवणम सामनोरम पति ने उप पोडमा बिनोदाम वापिया। अनुमति मिता, भारों की सहमारता तथा सामामिम्पति | समी तामा सामस्प इस घर में रेषा मा सम्मा- प्रेम-मर-मारे पग परस यहाँ के का, थाके अंग नैननि सियिमता मुई है। को रतनाकर' यो आवठ पात उधो, मानौ मुधियात को भावना मुस्पाई है। पारस पय पे ना-उपार भति भावर मर्मा, सारत पोलिनि सो माँस अधिभई है। एक र प नवनीय समुदा को दियो, एक र पेसी पर राधिका पाई॥१०चा काम में मप्र प्रयोग मा पर मिम्बना लिए किया want ! राम बी ने उपमा, ला, पति रसेप, पोधि इत्यादि पापठित प्रयास सरस प्रपोग अपने मुना में किया है। पापिही ही पर रोप भादि प्रोगके कारपसभाम्प मापार-मपान ग्य नुिचि मी पसंपरों की सहायता से उन्होंने एक विशेष भारपण हया अपमादिका एक ही मार से मामिव पान पो सिप सकका रपयोग व सामेता है। ग्वारप-परिमन सपा सगुण के प्रति सममें पावादी गतिका बरामनिम पारा-मस्म करमा- बर-निर्माण करा यिा है। भरि भापुर जा भाभार पर इस मकासार किया गया। मालकारिया पर एक 1" 1 1- पान्यो प्रेमनैम गुममागि गुन स्पष को यि सी हमेस्माइ पहिण के को खनार त्यों पन पन्या प्रय, मान अमिमान की समादिनमा। पावनि फी शौक सौ पाईप कोनि सो निज पिझाना पार पपिश्या है।

[३.] खि बाति स्याही सेन्षनी ने कार्ग, भक मागै कागद पररि परि माव है॥१००। - - इसमें गीरिक रत्ताप रामनी की नोक से स्पाही सूब चाना तपा कागर'पररि बरि बामा सामापिस्ता की सीमा पार की बाते इस प्रकार पाकारिता के प्रापार पर महामन्ता नपा चमत्पर पोगों की परिनाम दीपप्प में सम्सवापूर्वक हलके मुनमें कार इस पर प्यापक कहा जा सकता है। सपा कम मी मुसा एक पप-मसित सपा पोषामिण बन रहा है।इस बप में सम्वित्वपमापी से अधिक प्रास वाद। बमारी में भी गेपत्त्व गुण विद्यमान है, किन्तु सपा प्रषिक मापूर्ण वा मार से पुक होता।बापी प्रषिक सरयों की रमा नहीं है, किन्तु यो अमरना गन्होंने की रसमें सम मापधिकार, कलामता, सपा मार- मता स्पा परिक्ति होती है। सवानि की मधुरवामपामास में रखाम जीसी में मिता- जोग को मोग न मैहे इमै सो संयोग की मावना टारीन है। रामसुपा-वनाकर बाँकि तूपा मृग-नीर निषारी न हो। रन बाइ पाइणे, परी अषय सो अब हारीन है। भारी न रहे बिहारी ही यह मूरति ममु विसारी न है ॥१०॥ -पर्ग पचासी पर काम सिम्बन्धी स्पासम्म मा वाम बी में रसवानि के समान ही दिपे- माय नए पिठ पाव नए भनुमाव नए उपराजति दी है। मौसमों ने उसास सो मानन गाँस सों माननि पानति दी ए॥ की पहा रवनावराय प्रधम सागनि सामठिवीरह। घनन में विन पाडे क्रेरिन घनन में नित पाजति ही है । -मम पचापती पुरसम्म राम जी वितरीके मठ । इन्होंने बिहारी सतसई का गम्भीर पम्मम किया पालेरीमा पास बाल बा। एहीने सस्प मी इन पारे मे दोही औरणा है। इन दोही में समाम गुप कसा मामी भारपिमर में समता पाव पत प्रती है। इसके - [] निम्मतिविन गोरे में विकास गदिमा और ग्रेजी स्पोक त्यो मानी रिपाई देवी- मौ पिबनि गरे पनि, असिस्टार तीर । फ्टव ष्टत पाँधम पिषत, जिय हिप मन हन पीर ॥१॥ -योबापती भागार में नए माय-सी पिकाता का चित्रय ने अपनी शप्प-गनिमारा ही मार्मिमता साप निमा। भास-पास में परि रो, प्रान-पतरू पा । आय करत जर गरठ, परत न 8 रमाइ ॥१०॥ - . - अपुमास उपा पमर मे सहापवा में इन्होंने मामा रूप चित्रण भी प्रस्तुत किया। पद मुखिनी के इन्व-विष निरस्म माद । स्ते पार क्लिोकि मो पन्न पमित-चित मंडप -नोदापी सम्म तमा तुसी भी बरगती घे भी रनाम श्री प्रमाक्ति एप में और हम चार पाने मी रामनिया ममर का मुबर समन्वय समें पीमत दोवा सऐप मैं राम जी एण्ड मुनसभर । मम अपमे पुग की पर बी प्रचिया संमेत स्म में मिला पाती है। हाइममी पाम्पतलाप प्रागों मामा पर्याप्त मात्रा में प्रम्परित पर है। आप रापमा पर समनितना अधिभर समसदी अधिक मुनाममा पर है। उदवशक पर विग्रेप विचार इस स्पाप पर हमें रात में समापसी पर पील घेना पापा। रात में मुन्ना और मप बोनों ही मम्पो का मुना समयप पपप होता। मामा पत पाक में मुनादी मेशी में रखा मा सहा! मारपुगी अविर्षों में मकगापी मार को पत्र उसके रिरिप एपों पिपराएर सी में, प्रामा मापा और मनापरी में किया है। ममोपी मम्बार पीपा की और मकर मनी इतनी प्रामापूर्ण नहीं रही मिती पनि अपवा भागविवापता और सो वा कपाइपी होमसिन म रम शिव किमी समर का समय [1] कलित करसवर माहि कटुक माहूर फल मायो। विधि कनक की पंक विममा-पिघु अंक लगायो ॥१६॥ बकी कीड़ा विषम माई पीडा वग पावत। पुर मालन बहु पकरि सदा सो सरित वापत ।। पीन प्रधा दुख पाइपाइ नूप-गर गुपरति । सहत भूप संताप बहत तिनी पनि भारति जा मुनि पुनरि इक पार नीर नैननि नूप डार्यो। तुरत ताहि पनि नेह गेह सौ पूरि निकार्यो । बैसे बर बहु करि उपाय भोपधि, हिय हारत । सब भगनि दुख देत सुपित उखारस ॥१॥ गाको मुल सुभ अंमुमान फस-औरतिपाये। प्रियवादी प्रियरूप भूप-परिजन-हिसकारी ।। मयो उषा भीर पीर परिषर प्रतापी । परम मिनीत पुनीत नीसि मरजावापानी ॥ दियो को काज ताहि मुबराज पनायो। मस्समेध के करन माहि मूप निम मन मायो ।। पोखि सापनी-पुज मनु मप रषपायो। गध सोभा निरखि बिम्पकमा सकुपायो IPo|| धमी सम्म में मुर्व सग में दान का पर्यन अपि पास ही में पिपासम्मान के बीच गोवर्धन पर्वत मनोरम प्रहति गोपियों सविदार, गापासको प्रगाना सपा ग्नम सौवर्ष और इन साहबीच में सपा. अप्प का समन्फित सुन्दर प इन समगा ही विस्तृत वर्तन पनि में विराटी प्यास बीसा मुन्दर ग्वार। ग्रामसी अपना तिमाहीन श्री सूहम की शैली पर करिने पशुओं की मूची गिनायेगासी परम्परा को भी अपमापा है। इस रोसी पारा अपनी भारताका परिचय देना ही मामों बषि को प्रमोट । मोपल भाग्य रन इत्पारिमाने मिावी पनगिनत पलों की कसम्बी पुत्री पपिरे प्रस्तुतीमा हमारे मन में सवा चमब रात्पर प्रती, परन्तु इसमें कोई सिप मापन नही होता - सोतीपुर मदराम नागपुर कीपक पोती। इमिण पाटमय पार निपुनता की अनु मोती ॥

- [11]] डाके की मममम 'मु रोरिया राधानगरी। मिस्नुपूर मुरसिदामाद पाटवर पगरी ॥ 1 - करकापी मसिव मायपा दरियाई घ्योली पंजाबी । वियत के संपूर बाल रूपी संजावी ।। साम इसाले फमित पारामी कस्मीरी। जिनके मरें मात सीत नहि सिसिर समीरी || - - मुना में भी इन दोनों शैधियों न प्रयोग अपने समतापूर्वक किमा । समास जैसी पप्रमोग मुनाने में निरोप पारित है। यहाँ पर मि एप पिता पहा इस गैसी भी समता मिश्रित होती है। बीरार में पाठी समततापूर्वक प्रयुकाई। मीप्म के साप पुरमसे ए-रुपय- महम के एक सरिक कार्य-कलाप का चित्रण मि ने बड़ी समयतापूर्वक निम्न शिक्षित बम में विपा- छूपो भवसान मान सकस पनजय को, पाक पी धनु में म साह रही सर में । को 'खनाकर निहारि कानाकर के, मा कुटिलाई कडू मौहनि फगर में। रोकि मर रचक भरोक पर पाननि की, मीपम पों-माप्यो मुसबा मंद स्वर में पारत विग्रेको सारथी यो फियो सारय मो, का को टी न, पा करो मैं || -भीमप्रतिज्ञा बीरारक दिम स्पों में अदि मातापरम तथा सीमम जिय करमे उगता, पहा पर मुना में मी या पाप्त सीप रपयोग मता है। एक-एक कप एम्पक मानविलव रूप में हमारे सम्मुख उपस्क्ति करता है। रला में अधिकांशतः रसी पास गैसी का उपयोग विमा गया है। तुबमी की गुणा- पति द्रौपदी प्रकरणादन अपवाओं का प्पापम्प्रभाव पमिम्मकम में अपने पास-शैडी प्रयोग ही प्रमुख प से रिपा दोरी मैं ब्दही समास शैली में सुन्दर बारिया टिगोचर होता । 1 कई रतनीकर बदन दुति मोरे माँ, मूद गई दसक गनि मेह-नाचे पे। धाएं पठि पार म उबारन में पाई राख, पपय पति पग-सापे। भामव वितुणी पुकार मग पा मिमी मौटतमित्यो त पविराजमग भाये ॥११॥ ---मेम-मोपक निमधिनियमभीरे ममा प्रकार प्रमोपरिमा भाभव निहारे गुणाम एक माम अकी, साम्यो मा मैं कवि विद सम्म है। वस्न दिनेस दिम्य मरून अमोल पाय, धीन काट घेरि भी गठि गजपज है। सम कुच मुल पदमार दिमाक देव, नापे पनमानद पनेरी कप साम है। धषि तरंग खनार हे अंग मुस निगम पानिपानि मातम निवा॥१॥ पगार सारी पर में माविम के सौदर्प-मर्थन के साप ही पाय दिम प्रमुख दिपों का नाम मी थापे । निम्नलिखित में पति ने पिमाना, प्रवीप, सम अम पनि प्रकारों एक साप समम्मरिया पमा भोर भनुमास यो विषमाष th- "भप्रन बिनाई मनमक निधरि १, गंशन जन-गुमान सटे पास है। को रखनाकर' विमोकि इन स्यों नौक, पंपान पाननि पानी पट बात है। सप्प मुन्नमा भी ममता अहमदा मौ दिने, विविध मरोइनि सौ पट वाव है। ग है री रंग वेरे मैननि मुरंग देम्पि, भूमि भूम्ति पौली गई बात है | I ग्वाचिमा गुओं पर सिमटे एमबि रहल पमर परा उसकी महिमा प्रवर्ग म प्रभार दिया है। "विपि परक्षामक की माति-मठिमति, समु मुरनायक की सिद्धि की मुनाम है। का रतना विलोक सोरु नासन को, अतुल विविक्रम के विक्रम की सान है। सम-मर-मारी-मोम-निरमारन को गंग यह परी तरंग तुंग राम है। मगर-मारनि रे वारम की सेनी मुम, भूपति मगीरय के पुन्य की पताका है ॥१० -गंगाधरी ही प्रकार सीएमवा वा रस प्रसार धार गुगर गणER पय उसी पारामा रुपा म रमण पवाद पाते हुए श्री मे महा मैं मगीरप सरप रखा। सरिता सामाविक माप मुन्दर बन चोपपने माति-ममममी परिचम विधा। इमर्म रस सम्म पर्याय परिचम मी मिशता- "सम की वटा त कहि पद की पा सी फेली, दिम के पटा प्रमानि पसार है। कर रखनासिमिट पहुँचा पनि, चोटे-बो सोशनि के गो पर है। मिलि मिलि मोतनि । नारे पहु पगि वन, धार है अपार पुनि पर रोर पर है। सगरमारनि के पारन मैं भाषा किए, माना भगौरय पुस्य सनाचरे । --ांग्पहारी मरेर रस निरीबापास पानि सबार स्वामी प्रिप प्रसभर पोर मया सामाणिक प्रयोग इन प्रम्प में अपने पार करवा या पाना। सम्बाईमरी में अनुपम पम और मामे संपर प्रिम। निरामभा-माम तो निरन्तर प्रदेही : RE- रों दो-हमारग इस प्रमा- -- [m] रामो मारमा प्रपोग के द्वारा गदि ने अपने प्रियको हार ममाषणामी तपा मार्मिकपमा दिपा है। बीवन पदबह पया माय पोमें लिए प्रपुटामा। चारमी मारि गई। बाप प्रे मुरारे रूप में प्रण लिया गपा है। सम्पूर्ण पर्यन में विवाहममता पुत सोच रोम उपस्थित है। दीपन के रूप में मेघों के गर्मन की अनुमणबाही गाम्यावसी का निर्माच पर पिने करियर सूपम की शमापसी यस्मरण बिगा दिया है। कामरे नगारों के समान मेवगना पर्यन अवि ने दी भोगपूप भाषा में किया। सकिहम बर्मन मैं शप्प पर की पहा ही ममुई- पाए पहुँ भोर हैं पुमरि पनघोर भेरि, टहरन संत सो मसंग मारे है। को रतनाकर' परापर भनस पण, एफमेक मभार रंग धारे है ।। कत्तकान माम माम घेरोम हमान, पपकवान पपकवान पधसान पारे । मनसा मान-विस्व-विजय-विधान पानि, पाजत ये मवन-महीप के नगारे ।।१५३॥ -पारसदरी शुभएन प्रवर्गत अनुल्लारपुर रामामी रा भगिने पर मनोरम संगवामा गपप्रीमत के पितासपूर्व वापर पर्यन कवि ने इस प्रकार विमा है- मौम भरि साजन मनोज-सेज मौन गी', भातुर तुही तुलाई न गी है। औ खनाकर रंगीन पीर बोअनि की, परदे प्रमोशनि की घोस पित पागी है। भारत हिमत दूरि पंदन कपूर भए, फेसर रंग-सार माहि रपि रागी है। मुमिरि मनर रेमि मंदिर को मुरीनि, ममित ममंग भी तरंग अंग आगी है ॥१४॥ -भाारसरी पार का विसप रमामजीभ अपना लिया। उसनपिस्त बन प्रमसिए पर्याप्त स्थान बीएप पर दम मस इतने परिपपमा से +4 . . [ [m] री संदीप मरियोग ग्यारस एक संवेदवाहमा चित्रण रेल दम पहा संदीप कांगे। अंतक लौ विरही जन को मुनि पायु पसंद की दागन झागी । फागनि के हित प्रग की पानी नए फ्टरागनि गगन मागी । इंजनि गुंज ममुनत भी षिप के रस की रुषि-पागन मागी। पो पलास भागनि सौंपनमाग पवाग सी स्वगन स्मगी ॥ ११२ ॥ -मरबहरी नाद-व्यजना समालोचनावर्ग में ररमाम बी बी बिम्नलिखित पकिरी अमित 1 T " "एसोही नहिं ट सपा कविता में, भाई, पैकळससा सादय कोन होहि सुखदाई, परमावस्यक धर्म, परन, यह मुमति प्रचसे, के रचना के शप मम प्रतिपनि से भासे । चाहियत प्रेमन परन पचन नरें मेव पहत पर, सरिता सरन पान परनन हित बन्द सरससर, पे मैरल तरंग आहे रोरिव द इयर्षे, कट, स्वत मरन, प्रवन प्रवाह लो भा ।" पर्नु पहिला सामनी अप्प में नापारमा अनुकरण को पूत मच सरम देती है।प्रावावरण के प्रमुख पद-म्पयना का सगठम साम जी की विशेषता है। अविवर सा, नपवास, विमारी, धनानन्द प्रामी कवियों ने इस मारनववा भी विम पाहन समय-समय पर किया है। मन्तवास की (इस प्रणा में ), इन कवियों से मेला मानी गई है। सचा प्पापी में रास, नप का यि कवि में ऐसी भाषा में किया है सिसो भाग Its not toough ho barshes given offence Tho Spand most Seem an echo to tho Senso Soft is the strain when Zephyr gently blown and the imooth ta emoother ganbers Flors But when Lond Surgerlah the Sonodlog shore, The boarne rough verse should like the torrent you IF , - म '- [1] सम्पूर्ण पप समय हो ग्यौ। नृत्य के पूर्व वार-पत्रों की पनि नमसर- पूर्ण मोमर्यन कवि ने इस प्रकार किया है- मपर कैकन रिफिन परतत मकुछ मुखी । साल मुरग अपंग पंग बीना पनि जुरक्षी ।। १५ ।। मुटुल मुरब टेघर वाम मार मिशी धुनि । ममुर मंत्र श्री बार भैपर गुंगार रखी पुनि ॥ १४ ॥ मिनि मुमई इक भाव धुनि तिहि मुनि मुनि मोहे । मुर नर गन गन्धर्व हुन बानत हम है ।। १५ ।' इसी प्रकार मृत्ष के अन्तगत तास का पाभास निम्नलिखित पधिपों बाराबी सभ्यता साप दिया गया। का किकिन गुजार पर पीना पुनि खुरा मुरज टेघर मवर घर मिसी पुनि ॥ २६॥ पद पटकानि भू परकनि घटकनि कठ तारनी। गर-गति मुसनि मसकनि कम खरन की ॥२०॥ रोखावी प्रवाहमयी सैती या बारमक भाषामिप्यममा मनरास पिरोपकारे। रमान बी भी पौर सिरान्त अनुसार गास्वरब में नगारे प्रयास पवित्र बदी सत्रावासाय मसुत किया है। सम्पूर्व अपम-मर्ग इसी प्रकार के शपाइप से परिपूर्ण है। ही गगा की एमवा तमा प्रकारामपी गोमा प्रपन, दौसके प्रसारका मोबपूर्ण चितवी पत्रे पाने का बोर व समाई परता है और भी पर उसमेधाराकीबरबरादर, मरमार वा पमा प्रतिष्पमित पाए पए हो जाती है। बारपाय :- राई रोकनि उचाइ निज गवि भवरोपति, पुनि रकेसि दुरमा तिरै पकयो मन सोपति ॥ काहुँ पसति साइबर नद बाट पटि गरि। कबहुँ पूरि उस-पूर हा उपर समरि परि र रएराति र हार सरिम पाटी सौ निति । मर-मम मेक भनेक एक संगहि सब निगरति ॥ १ पपपानी, भम्पारनगरा, । २ .

[५] पक्षिज स बरक्स घेरि सॉफर घर धारे। मरमराह क संग कात्त मनु कुलत रियार ! का कोई गहर गुहा माहिं पहरति धुमि पूमति । अमन पग सौ धमकिसि दमई विसि दुमति ।। करति फोरि इक भोर पोर घुनि प्रतिधुनि पूरति । मानहु इति मुरग गृह गिरि धानि पूरति RE|| -पम-सा गारतरण के इस भोगपूर्ण पापारण प्रासपाम दिने प्रतिभा गांठ पर तमा मनोरम प मी जित किया है। बसन्त पनाममा पासावरच मी हारा या ममर-भार भस्म अनुनासिक प्पनियों की सहायता से पिजी सwwarबित किया:- "पर पस्मिनि के -पुरा सुमित को मोहैं । गुरव मत मशिन्द-पूर्व दिन पर मन मोहे। मनी मुगिनि सन अंग बहुरंग दुक्तानि । गावति मंगम मोद मरी पाजे सिर फूलनि ।। -गंगापवाय राम-सग . नाभत मनुन मोर मोर सानत सारंगी। रवि कोक्मिा गान सान सानाति बारगी।" स्मामा सीरी देवि घटक जुटी पुटकामप्त । पूमि भूमि मुकिस-कपोव पप गुटमस ।।१४) नांतरण पारा सिम परियों में परिमों में माइममि समापही घरा दिये पर स्प में उपस्थित है। सारी गामाता मरियमी वि मे बाम मालवीर हो ससा साप दिया। * परिन पर चोरी से गाने में विस नम्बर तया अनिस्पक बागा रत्वचि पयावा में होती है, , म शादि गम्भीर प्या मामा-निकोबारा उसम्म सम्म तिर पिपा गया है :- परयार न पाई घपल मानन ल्यमाप । विष्टी असक बैंक शादी ममगर ।। १ [LJ मरि गमीर म्वर भाष भूप सौ कियो निवेदन । गयो पर्व दिन अस्व ममो मारी हित-कशन ॥३१॥ --पम-सर्ग भोगपूर्ण चित्रों के लिए रस्लामी मे परम्परागत माव-माना का भाषार मी प्राण किया है। जिस प्रकार पारय समीति तथा सेबुयारों की मदाता से पम्प-भाषी की पमिम्पशना किया मते अपने छतों में रानामबीने मी मी प्रमयोग किया। मीम उपर मुदर्शनचा प्रसार कामे सिप पा रक्त होने और पर पर स्मि भी है। रसके प्रमापका जिमिम्मलिलिट यमो में प्रस्तुत पारे- पक्र सुकुटी के पक भोर पप फेरत ही , स: मये अक घर पमि पहरत है का रतनाफर फसाकर भखर मंति, पाकर मानि प्रलय संड ठारत है। कोस कच्छ कुपर करनि इनि का सस, फ्लनि फनीस + पुझिंग फहरत है। मुद्रिस पवीय एग व मुल मीडि पद्रित समुद्र प्रति मा महरस है। -पीराल-मीम-मतिका शपापतीहारा इस प्रकार भाव-पक्षमा रमा कति असम्म भाषा- पिगर को प्रर करता है। लामजी के पूर्व गुट कम कपि इस ममर की मान-प्पजमा कर सके थे ऐसा पाने में प्रवौजिया नहीं है। पारलब में पानी न पिमर में भी और चे ग्मे पानुसार इमाने बिराने में समर्प । पर अपिमा पर्याप्त सापनाथरारी प्राप्त होता है और इस दिशा में रखाम जी श्री सापमाण भी, इसमें सम्पनहीं।

भापा और छन्द कवि की मारा, ठमके मानों का प्रमिम्पनिका साधन । माषा की अमिमन्दिी भाषा मिनी गहरी शेती इसे केरल कविही समम सवा और पनि निरन्तर इस बात का प्रयास करता है कि वह अपनी अनुभूतिपों का पपाम्प बक्षम र सके। इन बयनों का प्रमाणाती सपा ममसी बनान के सिप रम समन्द मात्रा की प्रापरपम्ता दोती है, जिसके विमा टप्समा सिम सफा र गाठा। पठण पद समय मामा मापाप्रकवि सिए पिना अधिक महत्व। माम जीपाापना-मपान और कला ममान के शिष माग-मोटर स बह- पसरा रा नहीं हो मम्मा। एमाम दी श्री भाषा में बद सौष विधमानगो पाठ* मन को मुग्प करता, इरिको रचना रवा और एपकोठा। रनाम बीकी भारा पर दो स्पिों में विचार किया ग सना है। एक तो इसकी प्रमिप्पामा पति और दूसरे इसका भाइ । अमिपक्षमा पति पर विचार करने के लिए मापा में सावणिकता पालारिष्ठा तपा रायपन की और पर गडी गा सकी है। साणिक माग विस सम्पा प्मता मेम उपस्थित होठो ६ मामाकरण एप पर एस से प्रमाव गती है। हमणा में माम प्रमुभूति की पभियानारे लिए म्पूत अनुमतियों का माध्यम प्राण किया जाता है। मधुर वचन सीपी पाठ, कोपापी इत्यादि योगों में मधुरता सीपारन प्रपा कमरता का पमु मन में सा से होगा। मिनुपम इत्यादि ममसी प्रभाव में म्पन भो के लिए और ग्स सूक्ष्म अनुभूति श्री अमिप्पजना के लिए इस स्पल उपमान मे प्रण विपा गया है। रलावर जीन इस प्रकार में सपना प्रयोगसी सालतामा किया। "प्रेम के पाप ताप पाणपके मात कह, पानी माहि पारय-सपूत की सानी के।" ।

। [ 1 ] दर्प और बाप का पार्यपुत्र अभिमन्यु की मायके पानी में पाना सा दी मनोरम बाधिक प्रयोग है। पिम सम्पर्प पहकि अभिमन्यु की ससबार की पार सब गानों का मन मा रही है। इस ममा मन गिमत प्रमोग बाम बी मे मि है। रक्या मैं मरमार-सिरि पात इम तापसिकता के द्वारा ही हुई है। भवि ने केवल पाणी ही में वही परन् मतों में मी पारिता का मयोग किया है । गापिमा कहती है:- भोसर मिल भीर सर-साव का पूलहिता, कहियो कयू न दसा देवी सो विमाश्यो । माह फै करावि नेन न र अपगाहिक, कहिप की पारि हिचकी सै रहि खाइयो ।। प्रयया नाम को पताइ भो जवाइ गाम यो पस, स्याम सौ हमारी राम-राम कहि पीमिया ॥ इत्पादिग्दरों में संकेत तमा हरे-गिने समों के बारा गोपिकामों के मनोमानों प्रसीब विपरमेस रिवाया। किसी एक सण मात्र में सर्व मावना में भर देना रत्वावर जी की पा की विशेषता है। "सहित तिहारे को साँसति सब पै बस, पती कहि दहु के कर्मया मिलि जायगो ॥२॥ १,मोर पंसिया को मार-मारो भार पाहन को, म्धी नियों पर न मोर पॅसियाँ है॥ २, मी सममान को पसान करते न नक, दखि मास कसरी इमारी लिपनि त।। उपर्युत गहरण में कपा एमारा भरने प्रम की मामीपतास निश गोपिनी ही मामिकता के साय विमा । 'मार पतिया' पाप मेनो की तमामता पार नियता और मारी सिमाना तत्पप अनुराग से पूरा मेमो से है। इस प्रनरी सापणिम्मा एमाम जी आप मार्मिक पमनाप्प समा प्रामक बना देती है। बाया मन्तगतीमुदागिप्रयोग भी किया जा सका है। सर के समान लाम जीभ मुराविरों का प्राण सामामिमा ममाम्याही बन पराई रात मामुरी पारी में पागोमुरी मोहम मुन्न बागी में बोमुरी परत मा पमपसित मुरारिरा। महारानी दुगानी श्री पीरता [१४] समुन मायाँ श्री पिसता का वर्णन बीमाणिकरंग से गिने सिपा:- 'पानी सव मुल को उतरि हिय पानी मयों, पानी गयो रोज को विसाइ ग पानी में। इस मम्मर मापिकता की परि से लार मी की भाषा बहुत प्रांत है। इसकी मापा पर सूर विहारी और पारस भाषामिग्री कवियों की दाप स्वार-स्थान पर दिमसाई पाती है। प्रसार ता रमान भी काम्प प्रमुख पति है। रमकी प्रपम पी प्रासारिपता पर ही परती है। महधार का विस्तृत विरस या अन्तर्गत विपाना बुन्न है। अतः इस विपप पर पुषा ज्याना पुनरनिही होगी। इसके अतिरिन रमाकर भी रेसम में म स्कोलियों, सोनियों इत्यादि भी दम होते हैं। नये अपमे प्रम्प को पसपूर्वक पाएर प्रकारों का प्रवापरबर बनाने का प्रयत्न पहीं किया परन् ग्समें प्रकार समाक्त पाएरिपके करपये मायोका रल के साप सम्म चित्रण जाने में समाए है। मापाप्रसौन्दर्य तपा उसकी ममायासिता पात पण पपन पर मामित रहती है। मिस श्री राम-भगा गितना ही अधिक प्यापक रतमा ही पपिक सप्रस म्हावा सकता। कवि की सपक्षता इसी में है कियह पोरे से बोरे मास में अमितपेसिए एक्सब सम्मो का उपयोग करे। शम्म तत्सम, काय देशब अपना विदेशी वर्ग से प्रदय पिये जाते और हम प्रयोग रसों के अनुहा पदप प्रभवा कोमट रोटी का निर्माण करने सिप होता है। इलाम जी प्रखमापा के पतिथे। इनके सम्मुख सूर से पेम पभाकर तकदी भाषाप्रमिक पिसित स्प विधमाप था। पूर का प्रान्तीप मौन्दर्य पनामान शारा ममापी सदों भ प्रयोग रससानि का मापुर्व और पपाम की सामना समी प्रादर्श रमाग बी के सम्मुम पे और इन्होंने सरला नाम भी उठाया है। इनके अप्प में मापा की प्रातीयता तपा साहिबिक दोनों विधमान है। इलाम भी अधिसर प्राप मान्त में ही है। काशी में मी पूर्ण मापा ही बोगी बाती है।समापा ममयोग इन्होंने के मम्मगत परम्परा मे पापा पा, प्रतएव इनकी मापा में अपपी प्रथा पापी समों के प्रपोप पपाठ मात्रा में मिरते हैं। एक सतो मापान ।

[१५.] भादप पस्थित करने के प्रयास में इन्होरम सब मसित रानाको पमा लिपाईनो विदेशी भारामों से भा गप प्रपा मोगा मामीम माणों में ही प्रत होते है। इस प्रथा इन्होंने अपनी भाषा को एक माहित्यिक सा प्रशान किया है। इनके पारमा प्रयापामा भयो में रमम पासी प्रपोग का भिक मात्रा में दिखा पाता है, मिनु ममता से सनम और तप्सम रामों के मिश्रण से न परवा और मरसता सपना मन्थर मिश्रय लिया गदाहरणा- "मग्यो एक समुद्र मा विप्लुत मसरामा, पावागिनि-सी लगन ही सम्पागिन माना।" यो मार निकाय माहि सुपमा सुपर्ण, दस के परम वी के मुम ॥ उत्त समारों में इस सम एक्वा सम है और उपसा रिहत बरो तलब मा दिए गए हैं। का सोक मशित सम्पारखीका प्रमोय मी रलारी में मिला है। गोपिन को भारत मास भाग है कर रवमानता। । कामाम संगर बगार है। . हम मनन सिहागिरेहका है। मानिमारनिमरत अमेहास्पादि पर सकिइन मोके प्रयोग स अप में स्थानामिता श्रीर मार निराी है। भोर प्रमाद और मारता मापा ममुन्न पुष । मोर गुग का गप सप mm आपों में समासयुत पो गारोती। ममासपुर पदापी प्रयोग सामफ अपना बर्ग सैनी गावाम यु काप्प में प्रि म्प होता में रमामीने भोगगुणा हा मुग्दर संगटम दिया है। बाप-प्रा. विहितितर पर समापही रुपा द्वित्ता मानता मे कपि, भोरमदा परिपार मिपा- दान परी की पात्रण पुधर म्योही, मंत्र पिन मार मनतंत्र पिजुरीनि । पदरतानाधर या पदमा की अनि, भानि सी पातुरी-विहीन भातुनि पै।।

- [11 अंग पप्यो पहरि सहरि ग रंग पयो, संग परयो दसन मुरंग पैमुरीनि । पाचवन्य धूमन हुमसि ऐंठ पक्र माग्यो, चक्र साम्यो पूमन उमगि भंगुरीनि पे॥ किन्तु रवाकर बी ग्रेरित मोगगुप्त उत्पामने सिए इस समास पुन्ठ पदापसी की ही प्रापपता नहीं पा परती, मम पा भी पर भोस म प्रपा संगनमते सुपर महीपति की पंचपति । की झाय, १च पति ई पति की पति जानी। गगातर में भगवान् श्रम की गोमा का पर्वन करते हए कवि में पोरगुण को सिरिकी हेम-परन सिर वटा पंद-बविमटा माल पर, फलिस स्सा की कटा-पटा सोपन विसाल पर । फनि-पतिमार-विहार-भूमि पच्चस्वक्ष रामे, मा-प्रवनय प्रसंग मुमनि फरकति छविया ॥३॥ (पा मर्ग) रबर का मन प्रसारगुप मे परिपूर्ण है पापि स्थान-स्थान पर पौराणिक वर्म इत्यादि से रममा प्रम्प परिपूर्ण है, जो कि उनके गम्भीर सम्पबन परिचायक है, परतु ऐसे सदमों का रपयोग प्रापः न किया गया मिनक प्राय काम्प में दुरावा मा बाप । रातको समेत वो सिमो पसाप मिीप से सब रखने भरस का एकपेशीय हो गए, सिके भरत रममें उप दुमका मा गई, मनमा कसकी शम्पापडी सरवावारिकोप मी सारे। बाहरए- और सौ हिटेहरी के बैरजू विक पहि, फेरि महिय की पाक सनक न पा है। या वा सिन्मु नाही सोनिया भगस्त लियो, ऊपौ मा गोपिनि के प्रेम को प्राप दे ॥६॥ उन् पचियों में महामारत की रस विम्मात या रस पिसमें सागर हरा एक पीके प्रसंगा दिए गए थे, और जिसकी HINण पाहिए अगष्ट पपि ये सम्पर्ग सागर र पाय मचिपा पा । पहम्मा इसनी चिम्पस लिदम समबे लिए और विशेप प्रयत्न पहा करमा पठा।

. - [२] मापु म प्रमो रसपुन्हा रस से सम्पपता पा शप्पत सपा प्रगत दौरे से दो समर कावासमत मापुर वाररवतो वापरली में मधुर मात्रा में मिरामाननुमास के मडर प्रयोग हारा इन्दोरे अपने प्रम्प प मा प्रदान मिा है। विमहिलित व सम्पमत मात्र मुन्दर बाहरण- रंग स्म-रहन समाव सही हैं इमें, पैसो एक मोर पाइ पीर परि था। में रखना इरी. विरहानल में, पौर मव बोति अगाइ आदि कहा। यसो परि ज्यो र मसस भरूप यम, तासो घर कठिन हमारे सरिया एकभनंग सामि साथ सब पूरी भय, और अंग-रहित पराधि फरिया ॥४६|| सरपा प्रपोगों यापुर्व में ही रहता पाव उपस्थित पिा गया। भगव माधुर्य राम मी पपार सम्प में मधुरता साप पाए जाते है कि इन गाण भी ग्वागतम से भारत समावि को पिप्रित परमेदार बाप मिले। गंगा सम्मुत या मार्मना अमेवाती और प्रयोगार कामेची मानमसिम सपयन कपि बरे प्रमाण तपा मापुर्व रत्ता भोपाचे तारण में पिया मांगति भपत मुशाग मंजु बलि कोर भार, कमर सता मनु बदति परम-फान पानि पमार। इदि निधि विपिप विधान टानि विपिषत सा पूर्ति, मंग-गीत पुनीत प्रीति-संजुत समति ॥२३॥ (एका मर्ग) हरिणम जी एरपोर माग सम्पूर्ण अपम्त मीन से सेपुनपने का प्रपत्र दिया मी मोर सम्हाने रसम मसार करने मी प्रपाम पिा । बाम गौ मे अपने पुग में प्रचमित माहिपित प्रममा मपोग ता अरप किया नमारे रिमजिनिों में पुष १ मावीय वाहिणार, १. १५५, बजारेर उपगप्पाप ।

मातीवदा पप मने पर भी दिया। सी में, मैं इस्पादिवि भक्ति- किन मारा सम्म मातायता मोर मचाने वाले हैं। किराम बीयप प्रयोग पूर्व स्प से पितहास के स्थान पर ममममा, प्रोस्थान पर दीप प्रयोग मिटता हो कि रसो प्रापार पर माण-पेयपी गई मिरिक्त सित नहीं बनाया जा सकता । 'सोई भव भास् गिरिमो परे में गिरिपी प्रदूसरा मप गिरिको' मी प्रान्त होता और प्रशित भीसी प्रथा 'सो' स्थान पर 'सी' और 'स्मान परभ मी प्रयाग पिया गा सकता है। प्रत इस मभर के सिनि म सो गार हानिक समषित हुए पोर न सोनिप से सके। इसी प्रगर की रखना न मिशन इम' में 'एम्पा मोग प्रक्ष कारा में मार इस पेविसिक माव। समय की मिलि ' एमा मोरशानिकले ए मी पेठे प्रयोग मचार र रामके स्वर सायिक सभा स्थल सिर दोषपा भीर रस, सपना रहामनीपत महीपरावर ticar प्रचार के लिए असर भी मामी वामगाता और गन्दगि पभासाप मापा मेस्सरमा प्रपल किया। मम प्रयव प्रशंसनीय दीपदाबाबगा। संक्षेप में पानी की मापा सब प्रकार से सीप-रमा प्रमुष्ट है।ममें सूक्ष्म अभिमाति मामला संगठन या प्रवाह एक भाय विधमान है।समा पुग में प्रवृत्तियों एक साल पमम्बप हमारी भाषा में पागवता। व-सम्प की विशेष प्रतिभा छ । भाचार्य हमारप्रसाद गिरी केनुसार "मापा र मनोमा मुना देती है, क्योंकि बा-जय भाम माति म जातिी सई में भाती है पर उसमें नई सिया मादी ।मी भावार पापरा प्रासप वापसे मप रूपी की साडीवी रे चार नपे में वित्त मुलाको सागम बी में आपके लिए दो प्रमुक पा मेयर मिया रोगापा पनारी। मोतिरिक पप समा सबैका तारोहीप्रमाग भी इन्दाने किपा किंतुीमापकता तया समग इन रोहा या मारी में मिली वह प्रमों में नहीं खापत्र अम्पों में ममता साप प्रधुन १ रिवी साहित्य समाविकात, मारामारीपाप दिवेरा.प.९० [1] भाभोरगुपमा प्रदराम इस करारा बदी समता के मार किमा वा सम्वासी सा-साप इसका माइप मामक सम्प लिए पपुट प्रमापिस पाता है। रिंगे', 'परिमल मशी' या दातर भाप बाम श्री ने इस पंव में हैं। इस काम्पोम प्रपा, रसा:ममता तथा प्रमाणारिता पुरा हो। मगार पीर पका काय रसों की सह अभिप्पबना श्रमिन इसी एक सरारी है। रुसवा परिपत रिचरब में बड़ी माता साप पारे। नेप्मा-विहार इसमकाही सनीष पारस - एप हमाचे काम लिया इमि खुटि विपाता। भय घो मुख बोहि मोहि जी यह माता। पठि स्यागें है ये पान तब शोर सहारे । सो तुमई भय हाम मिपति में मोहि सिधारे rem भयहि समि को तो तुम ये मझी विधि ससव । मोपच्छा मुरमार पर मम भुग मुल मेमन्त ।। शाय न पान परि तोती सत्तर दीन्यो । पूस लेत गुरु त साँप हम सम क्षीयो भीमा मर्ग पार काम पिप्प में स्मारपरा सद्विानों दीप में समता साप मारे। स्प- भिम पास रोड पाप्प भारम्म में पाबा सकता है। दर्श-पतु वा सूक्ष्म तपा प्रभावन करिने मन्ट स्मिारवारमा " दिसि त धन मोरि पोरि नम मणाम हाए, पूमत, भूमत, मुफति भौनि प्रतिमय नियराए। दामिनि दम रिस्माति, दुरति पुनि दौरत, पाह, दुटि पीसी पटा-बार दिन धिन पिति पदर ॥१३॥ रुपवरपर चिप बी मामाही में पि पिप्रिवरिए । मिसिमित पो म रम सम-न्धिा भा में पहुंच होने दिमा पूर्वाम्म में विधमान मिला। पीव नीम-पापाज परन मनन मुहाए, मम ममस अमोल गोल गाननि धषि याम । सम्न-पस्न-पारिज घिमास लोचन धनियार, " म बोरन अनूप र मद-मवारे ॥३७॥ । - माय भेद-भरपूर पारु पियनि भति पक्ष, पस्नी समन फोर- कसर ससक पक्ष !! सष्टी झटिल कमान सान सौ परमति धननि, नै माफि मुझे भूकमाव के परसति पाननि ॥३॥ पनाम ही में उप प्रने के लिए रोधात्र प्रयोग पनि समतापूर्ण स्मिा है। इसम ममरस सामग्री में समाहोना में अपये अनुपार दारा मस्त सिा है। प्रम्पचोपर प्रादौ वन भएप सी प्रवाहपूर्ण शैली में इस काम में बाहोरमा-सिवाद दिए प्पर पोग रणमा प्रषिक नहीं किया। पिना रममा प्रयोग इसकी रोश-पिपमा २ अरहो मामित है। रोहा के प्रति हमा प्रमहरले पर पंजे प्रयोग धीर मी मरित प्रदेवा। गंगावतर मराव असम मन्द रस्ताबा और इस एक रोहा मिडन पाएक पर निमाप महा है। मुल में भारत समापी पप्पर रखामी लिने । रामजीभ प्रमुख र पवाली है। इस पर विश्व में प्राचार्य रमप्रसाद दिया की बात, सपा में मार ही पर पाना मी पठिन है। पम्पमा परेव। सवैध का संभावना प्राचित् मघतली में मिड मी सता, पर परिसर मचानक था चमकता है। पर यदि मकवाये पर ममाषा: मिसिह-मरोज में मिस किया पन्नू पा लिपप गाना हैं। भाचपनी मनुसार मारी और सबैया “भूक्षत पन्दीसमन सम्मा गसी परम्परा में इसका सा मी मिm सर में गेसमी तुलपीदास समप से बनापरी एभग मिपावतापही में इस पर बहुत ही मिना और भगा माम पीत होता है। विभव इसमें प्रमुमताभ पुग गवान जी मी एप परो इसी पापरा से प्राप्ठ सिमारे और इस पर नया विमा। सपालतमा मरना मुना रानी के लिए लो इसी परम प्रयोग किया है। पतरसे प्रान्म-मुग में म इसी पर बोपनाया गया है। - - - १हिला भाषि दा प्रादि काम, से. भावाम नारा प्रमार शिवेदी ।

1
-
[1]
विचार-मपान मया इतिहमा मुकी रमा के लिए मनावरी
पर पान उपपोगी सिरहता है। राम की माने में इस पर
ममता सपही कारण है कि पनामक गैती पर सिम गए प्रम्प इस
परम बात करते हैं। और इस निरोप गुराई और पौरप अपना
तबानता र रचे गए प्रपों से पहली बात समन्ह होता
है। पर पिप मिोपतमा पर माम। वाशिषता म पर
मी इस घर में गिोप समाता के साथ होता। रबराक में इस पर
की समता या पदी पर है। समस्यापति रीतिमा पिता दी।
एमाम भी निरसर समस्यापूर्तिका किया मते थे। इस मसाने मी हमें
इस मय पर अभिसर प्रदान कर दिया। महावारी वा मर्मर
पहाटी में हम सभा की समस्यापूतियों के मारय विम्मान ।
सारी इस पद पर प्रसम्म प्रधिमर है। अविर रेव बगानन्य
मारतेन्दु परिभन्न भारि मा पनि प्रमाक्ति है और इन सब
जीरोटीको पनापरीर में विक्मान है। वास्तव में इस घर में हमी
काप्प सापमा सामर शिगोचर होती है।
सपा और पोशोपाल और सिपका पोरापात उपयोग रयार
जीमे सिा कि इन गयों में बाल मी पति ऐसी बहारमीसी
पनापरी में और इसहिए रमाम श्री का प्रमुख पन पगारीमा जाना
-
पारिये।

विचार-धारा

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विचार-धारा रसार बीके काप मैं कृप्यम भासम्बन स्प में पावे। इनके फाम्म कात्र स्पट ही साबिफ सपा प्रसाकि दोनों पों में मिता। सीमित पाके पीछे मारपुगीन साहित्य की परम्परा है और प्राप्मामिक पप पीच भीमभागवत से पनी पापी दुई वर्मामिक परम्परा। इस पर का प्रस्फुटन सबसे अधिक ग्रातक में माहै पापि अपने हिंगला-म्प में भी रमान भी रुपयक प्रतीविषा तया भावामिक स्पस्म का त्रिय रिमापा । दिशा में कवि ने बत्तीय सिद्धान्तों के अनुसार वातवादी परिमेय से सम्पूर्ण प्रभास का चित्रण किया है। मो इप्य सोलही सानी से पुक १, पाणमा के सामर पर रापा ममी भानवमर्मा शकि है। वाम ग्रोसोकी और गोप ग्यास इवारि जीवात्मा बो अपी पाप्मार्पयारिके कारय मगवान् में भामममपी सीता में भाग लेने की भपिकारिणी हो सकी है। प्रसारमूति मगवाम् इप्य श्री पानवमपी अनन्त जीता गोलोक में निरन्तर चलती रहती है। उसमें भाग भनेका अपियर पर भगवा रुप्प से ही प्राप्त होता है। बार बी में इमार मूति हप्तम चित्रस मते हुए ग्नके ममेक बीमा-पिकासों का मान किया है। इस प्राय भित्रया मापार दीकिता सस्र्य मीनही दोष समा। परन्त सिंगेमा में कवि की प्रामास्मिक प्रत्ति बाल अस्पर होम हमारे सम्मुख पाती है। हिंसा के मासापरल में तमा साल में इस प्राप्पा मिसा मामास बड़ी स्पस्ता साम मिलता आकी एक रको विरनि विषुषेस सेस, सारद, मोस है पपीत रसव हैं। को रखनाकर रुपिर रूचि ही मैं बा, मुनि-मन-मोर मेजु मोर सरसव महमही होति र मानव-सवैगमता, मासों दुख-दुसह क्यासे मरसव हैं। -

H.]
मिनी मुशामिनी ममेत एनस्याम सोर,
मुरस-ममा प्रज-बीच परसव २॥
निम पातक माफी मात, होत सप्रन-काम ।
मापारि परसत दिमस, बे जैमीपनस्माम ।
हिमेसा में परि पैहाहिक माधुम्हारे दो ग्वष मातब मैं पारिक
वर्षका उपपोग मिसागपाहिंसा में छपी पाया में सो
प्रमर की शिनिया उत्पा नहीं होती। व्रता में निगुप भीर माप
के विमेर म निर्गुण और सगुण में प्रेममा अनियम की
प्रति दिवाई देती है। निर्गुण मार्ग जाम मार्ग , रस मास ने लिए
भनेक प्रकार की और सामानों की भापकता पड़ती है। माथिली
भास्कर से प्रमा: पिंगा और मुगुम्न के मम्म-स्थित पिमिमी
बीच से रस्ता मा मासार तर समसयारा सा knा ।
इसके लिए रसे समी चौकि मागों प परित्याग पर पूर्ण निकाम भाप से
प्रमाथाम समापारे। निgh पर बिमाम मरवर चियाको
पुकाम किस पग पायव रोम एप में निर्गुण पाति जगाने का
प्रबासमता। इस साप पूर्ण को गाने पर इसे बीच और मी
ज्या कामास दौगाता और बापहम् म्यास्मि' '
मोहलादिमितों
मैं पिवास करणे at रसके लिए एम्मा यो सत्य तया जगत्
मिप्पा गाठारे। ऐमा का माम प्रोपरान्त सापक बागीकरण
में रिपोग भाति सीपिन अनुमतिपों नही माती । वह एप और योक में
मारोपावर सदों में विशाम सातामा
ही मी समिक्षाप भी विधारमा मौर पर मिप्या तुलनुप सब परी
mumएकसागी भरने अतिथी पस्तिपसार परे।
से अपने जीवन सा समता। समर्म रनिम्ता बाप
पदी लागी मे हो सारमें प्रतिबिपि। गोपियों
की भा'मा पामा'मा में ऐसा पाने का भाग देवे मिसस निरन्तर
-विनाम विसिव होता । अगिराह मिहार रेसिप योग
गति की मापता मे जान-पनको समिपमा दिएपछि मन में
माया के पचही मी भामत भर सो
पप फसनि यो भनफ एक माई है।
दो भ्रम परस पारि मान-मोसिन साँ,
पान्द सभी में पन्दी में सपणे ॥३२॥

किंतु मषि-मानी रानिकपी इस मौरष्ठ सपा प्रा-साम्य-परहिरे for पिप है। गाँवो सारी विपिपा लिमिलापतके अनुसार पालमाचार्य रा स्थापित मार्ग में यह प्रेमसाया महिमपाव रही मम पर मगवसमामे ही मदिशति है। मंग निराम और भरपास्मान प्रापार पर उस परम माननम्म मक्ष होती। पथपि प्राचार्य में समोस स्कीमा किए। एसमान सनिधि-मगुरु और रसायंका विािर निव, निगो हमरे मदीपास्वमि प्रमका पारमार्मिक स्वीकार किया था। प्ररम में उन्होंने यह भावहारिक मल माना मानो यो मता मठिपारित प्रोम प्रपल रम्गोपी संपाद रेती में बाबा साहै। इस मार मलिकी वा परमवश्य रसहीसा-माधी पारगमय सम्म 2 बानिया अपने शाप बीबी में अपने पापको वितरित करता रहा। सीसी रमा मा बाघों क स में अपना प्राधिमाष और विरोमान करता एषा सविस्तर अपने सामन्दस्वम्म को परिवार्म महा। म स्वयं भारत और अपनी थी मैं मी मणिक मसे नाम का विवरण मारा। मासिक स में परमात परमेबारे पीपर पापमप्रस के लिए मोटे है। इस अमर अपने पापको रमले विश पांगामे की विमा में बौध निरन्तर बगा रहता। तर मी पाशिक परे माम्पसमा प्रदुषितही भर मामा और परमारमा पाँच जमावा प्रतिपादन मएसमस्वामी कामे मतको एबमारमा। मधि में पही व्यापार रिमाय aarti पसमत्वामी समयमा बगास में सब मामले मी प्रपणे अम्मच की स्थापना की। सम समदार में समाप्त दुगसम्पप श्रीपासमा होती है। दो प्रमुख शिच बीबगोस्वामी तपा गोषाधमा मुप्पस्म से प्रयास्वामीगोपाबमहरे लावन में मीराबारमा बीका मन्दिर पसराना। पर मन्दिर प्लान में मम पियमान सपा * पावित रोकिठिन महामाही मणि भाषा नेपाचे बीमारी गोस्वामी को मारी गोस्लामा शिम्म । मामा नाम समसम्पदम्म बागों में पाया है। मारवारी मधि-मरठि जिला गोस्वामी पिसमाप प्रेमी मिथी। इस प्राप्त पतष और पिचाश-मार्ग में साम्ब होगा सामायिक 11

[]
है। हमाचई और तय की मामी पी पीर पोनी पर मरे।
मषि से भी प्रभावित
इलमाचार बंगावी पाली लागी
सेप में मौ रखा था। इस प्रभा पोषों सम्मपापों की उपासना-परति
कर दूसरे पे ममाति दी और रबान बी पारमप में समाप
पित हुए। इस सन्याय मान-समन्धी अंक पम पम भकिसित
के समय पर सिले गए है और नापिन भेद इत्यानिमिठोर
मेमकी पापक तपा गम्भीर मामा मधिसे रिशाम किया गम
है। मपुर माष पर तब सम्माप में निरोप पर दिपा गया है। महम
सम्माप में पासमाव पर विशेष और विवागा। वम्म सम्प्रदाय
परमता परिपापा भेर से पग-पग पर से अनुभूत होता
है। पाम एवं श्री। समा मातीचा रूप
पूर्वतम है।
न्य इस प्रचित्य मेदाभेषवादी सम्पदाप में बीच उसकी सत चिन्,
और प्रामन सापिसी परगा कि से असमी रोवा। मद भगवान्
सरस्म कि म रती का प्रमाt मिस पण पूर्ण भि निम्ही
है। बार मगवान् की रित्व पकिसे प्रभ होने पर सपं मी नित्य
पत्तम-मम्मदाप में बीच भगा की पिए-पकि सपा मापा गया है।
पप सम्माप में सत्य, मामतीबा लाम यमूर्षिक पूग-मेरा
सार सोमा किए गए और समी गा रेसिपे पर सम्माप राणा
मप्रसर म्पामरिक पीये पपि एलाम बी गोपीय मानसम्मान
दुपापी पापि माया तम्बो सिमसमलित
परिगोपा दोदा।
बार्मिपीलामी रामायगातकपा मा। मरे
प्रमों में पैगम्मकि पासपा-मरतिम विस्तृत सबने मिहता
। महर-मतिमापार परस्परमामन म मति मामी-
पा मार स्थापित मनास मनो पासमा परदिप
१पाप और प्रम सम्पाप, मायगर रोनापास एम, 27
नाभापार पर।

से किसी प्रमर मरिमेव-माष मकमही रमता। अपने पर सपाटम वह अपने सम्मुख मुल्स मे देवा है। अपने शादेव की सेवा सपने हाय प्रताहै। सेब सा मी मा और न ऐसे बोगों सम्मुक पपपपपास करता है मगरमच्छ नहीं। भरवेशदेवमान पर परम सुपर स्म में पता है। इस रिलिम भातर, प्रसारम भादि बा मी यह अपना समझता है। कोई भी बस्तु पिता शर्पित किए पर प्रसनही करता। प्रत्येक वस्त भगवा पंचममा पापमा सममा। मगर मति के लिए पापाय कर्मकार पारि पर मिप पर पी दिपा बता देबत परिसर, सम्प, सहनशीलता -परिहार इत्यादि सिरान्त मन में प्रधान रहते है। प्रसव हमादि नई स्थानल मा अपम में वही हा भीर भ स्वान्याम परत रिपा पदाता इस सम्मबाप के मक विशेष मिशन नहीं हुए । बार बी में इन सित्तों के प्रमुरम या साप को देखने की प्रापि मिटती है, मिलने पर मोर दिसप्षका यह भारम्दमय सम्म प्रति किया है वो दूसरी भोर राम, शिव पगाल्मादि रेपी, रेणामों से भी गुव मधि-मारमा पूर्व प्रमाणी विनय किया। ममार्मिक विश्वास में पलत प्रभार बही दिवसाई पाता । प्रयोमा और कमी में निरंतर निवासमा परय राम, शिव और पंगाको मनि रे समान रूप से में ममापित किया था। हद-महको परम्परा से में । म कम्योपासना में दार्शनिक-सिद्धान्तों प्रममाय गदरावक में गत सोम पाता है। वही रमका पता परम्पराग धर्म पा। इसमा रहने प्रणापूर्णक पावर निया, फिन्त इससी के समान होने अन्य रक्तामा तिमी अपनी गहरी प्रास्पा प्रमी । माइनस पार्मिकपीस बनाया गया है।मास्तर में हिमसमाज में प्रब पमा मनाप मरममा मागह-मम विशेष प्रभाव पणा पंचोपासना प्रचपित हो गई। राम मी रससे पूर्ववका ममायिनी श्री इसी मास इसके बाण में समोसायी के प्रति समार मार अपर प्राप्त रोगा। साहित्यिक विचार-धारा बाताबी जाषिक रि-बारा बहुत ३१ पाना निम प्रभार मलि पा रापान भक्तिों का मान स्लिम 1 [ ] पता साहित्यकारों पपनुगमन मना मात्र हा ग्ती समा रामबी मीधम्म व्या साहित्यको परम्परा पावन मासमा अपमा माप समान सम्म परेप पदि पिसी सीमा तक भातिक नाम: सिपमा वा समता ६ तो पर अधिक से प्रतिपरा-माप्ति के लिये ही समता, पम्पया इनकी रमा सान्ता मुलाय म्हो मा सती । इस मान्त-मुवार पम्प-रमाके मूड में मकि पीर मा पोनों प्रतिमा काम करती हुई दिखाई पड़ती हैं। दोनों ही अधियों को सम्मा कमाने के लिए इन्होंने अप्परमा । भारणे मनुष्य औपनप पनिवार्य है। बिना पावर्ग ममुप्प पर पग मी भाग नहीं कर सकता। पर प्रश्न दूसरा कि उस भाव में उपपोगिता की मात्रासिनी।बामनीमे मीमादित्य सम्बन्धी स्वार भावीपी गहराई माप पाहन मिा माहित्य के क्षेत्र में इन मबसे गा मार्ग अपने मापों एम-प्रमिपंखना। मम पीर मीद से भारों से प्राय का उमें बम साविक प्रमा सस कप प्रदान कर समान किया है। यहाँ तक कि मानीपता स्वर सम्र प्रम और मीमा साप प्रतीकित हो सके। सम ममुन बारच ली मायामक पति मी है। दूसरी ओर बदायरस मामा पर से प्रेम और सौन्दर्य पाहम जिप रही रस्त सपा मापबीप बार पाते हैं। ऐसे स्पनों पारे प्रेम और सौन्दर्य पपानी कपि गन पाते हैं और इस परम्परा पारपुगीच मी बामली। पाम जी काम पर पतात प्रने से दमासे व मिलते हैं मिनके पापार पर दम इस साहिपिक विपर-पारा रिमामन पर - माम भी सामना को अपने काम में विशेष रपान । कममा म पावादी विमा गा सम्मा है। लिइनका शाहरिस्ता पुरुष होम म पयामम्तानी भोर मुगमा सिमपान र माना गया जिसस रम-मिरिमही रोती। पतष पर काम्प में सा और रसामना सुपर ममम्पप रिमलाई पतामहा म सम्पतमाप हम गिनि, । इनके भाषा-सौष, माप-सीन, या प्रमा पाप में देखा जा सकता है। रमानुभूति वो एपीपस्त है और वा मनुष्य को वातावरण से भी प्राप्त हो समतो और अम्मपम से भी। मा सिरि साथमा से ही सम्मबई और रबार बी का काम बहुत सापना के पापा पर परिपुम्दुमा इसमें संदेह नहीं। इस साबमा के लिए इन्होंने अपने मस्तिक वपा अपनी दप दोनों को सबग बनाए रखा है। इसम्म पम्पयन पिस्तूत रहा है। प्रम्य तिवादों से पे बात पवगत और उनके उचित उपपोग को मी मानते हैं। सरी भोर पे सम्मवर्गी है। इस माम मात ही प्यापक है। चीन पिमित्रो सम्बन्ध में इनकी पानभरी बात विस्तृत है। मान- साभाव के परिवार और दैनिक जीवन की सामान्य से सामान्य भटनाको अपमे काम्प की समय सामग्री वा घेते है। वास्तव में ऐसी प्यापक हि रकमेबारे साहित्यकार ही मवि कहनावे के अधिकारी हो सकते है। भाषा की पी रवानगी प्पनेसम्म में मौधिक पावरों का परिचय ते। इन्होंने मबमापा का एक बना ही सौम्म तपा मुरम प्रस्तुत किया है।मन्नास की संतामस्ता तया मापुरो, पनानंद की गहरी अनुमति, रेष की परपमा तपा निरीकी महात्मा प्राधार पर इन्होंने पनी ही पुस- गठिन सपा मोर-मापा भनिमाव किया। विरचा भावार पर इने रस्स्तर की मापा का निर्माण कमी रलाकर जी ने उसे दोष-पक्षितम ने का प्रथम पिया बो उनकी बहार-पति का परिचायक है। ठानियों के समान प्रपमा रीति पुगकवि के पापी पर देखता मीदों पर अधिकार करना प्रपिक उपयुक समम है। इस एप्प के पीछे भी इसकी साबनात्मक पति का पता सता है। बनासरी पर इन्होंने पफ पारिपत्य मम्स पिया या प्रबन्धनमा सिप इन्हषि रोता को पूरा तमा अपना बना सिपामा। इन क्यों रेसर इमानो अधिकार पा उसके फहस्सस्म इनपमानन्द देव पणा वामनवास से भक्तिों की समकाता मात करने में कोई कठिनाई नही हो सकती। बाम मी काम्प को भाषामि प्मनाम मापन मानते हैं। पेसकी उपयोगिता पर ग्तमा प्यान नहीं देखे । सम्मन है इनके इस स्प्रेिस के कारण इस पुग म इनके काम की माता मोती गई बाब परे ति सलामी में माइनिता श्री पर राही पता धर्म-संस्थापना मामकतापाव ममागरर पीमादि सब मीपसम्म होते हैं। प्रतएप पेसा नहीं माना सवा किम स्थिर अपने पुणे -

[1]
पूरावपा उपा। पर अप किये परापरमारी सामीलमा पे
और काम विचारधारा ही इसम भाव था। एष इन्दीमे ग्सी को
अपमापा और रसीको अपरा पापबमापा।
बषेप में स्तारी माहित्विक विचारपारा शिपूर्ण, सरमा
एसप तथा चामविर-सम्मपवार यौ। अपये भारी-मालन में में पूर्ण
ममता पास हुई। इसमें संबह नहीं।

उपसंहार

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हिन्दी साहित्य में रत्नाकर का स्थान . पिके गौरव की पीपा हम उसकी प्रभावशासिमी पनि तया रस संदेश प्रापार पर प्रते।विहमारे मर्म का परी वितमी मध्यता साय कर सकता है अथवा बद हमें मयागृति अपना पम्-निर्माण प्रतिमा सफल सरेरा रे सवारी तप्यों पर कवि महल भामित । इसे को भी कर सके कि कवि की माता पापस्तु-विपय स्तिपी सश। रत्नाम बी की परीक्षा परिन सिटी के प्रापार पर बाए वा यह पता पखेगा कि प्रमम सतो पूर्ण अधिकारी है नि रितीय तत्वको पे मत्पषत: मेकर महीपत ससिपालका सरकार का रूप बिना विकसित रोम हमारे सम्मुख मापा , रतना संवेगमारकका बस। इस तप्प पर विचार करने से पर सर रोता कि रबार नो सि-साहित्प कई युगों की परम्परा के स्पसंहार-स्वरूप हमारे सम्मुख प्रपती इए। पीर-बसम्म मटियाम्प तपा रीति-बाप श्री परम्पराएं तो अपना भरमा प्रमाप साहित्य गोत्र में घोष ही की पी। मारटम्मु पुग की राय-माबमा मनिमायमति सजगता पपा मानवसागर की प्रवृत्तिा मी जन-जीवन को प्रमापित कर रही थी । रत्मामबी इन सम्पूर्ण प्रचिो के पुष समन्वित रूप बनकर हिंदी-साहित्यकार में प्रवती हुए। एस्लाम का पुग भारतम्प समान में विषमता नपुग था। अंग्रेजी शामन मनुष्परिणाम वर्ग-मेर केस में पक होरख या। एक पोर गर्मी पारो पीर तावयारों की सम्पचता और पिणसितापी दूसरी और सम-सापारय मुरा और पीरा । शिलाम सम्म ससत के प्राचार पर निर्मित नहीं दुमा पा। महा मबीन पिता हमें अपनी संस्कृति से गिगाठी ही प्रकिपी! प्रगत सामाविक रीतिमीबारी में मनतापर्य समम मलागा बापा। धर्मरेत्र में पी पही दण पी। ऐसी स्थिति में प्राचीनतामाथि प्रयागर, (इन विषमताओं के प्रपिक से अधिक र प अपनी परम्परामा बम में सामा)गित मार्ग को परेर एकही रास्ते से असता पता बता सलाम जी इसी प्रकार के पिये। मति - - । [...] रीवि सपा मारवेन्दु-युग की परिस्थितियों से ममाप्ति थे। मठ-मनियों में सूर मेलाम, रसबानि पवाबमानंद से पिपों के समापन सागा सम्या रतिभाप्तीन विषों में भूपय, मतिराम, दिली व पास पदमाम और द्विव से प्रदियों से इन्दौर पहुत इष मास किया। मारतेन्दु-मुग । मामा या प्रामक प्राधियों का समन्वित कम इन हरिराय तपा गगावास कायों में मिला है। इस प्रमर पंडित मददगारे पासपी के पायों में एनामबी रिपप में पर मत दिपामा सवाt-'म की प्रपेश सापारपपा अधिक मापनापार, अविर पर और गदन मंगीत के अपामीराम कह सकते कि मदों और परिवादीची लामम्स में प्रकार थी | सकी रसमा में रमका नपा अम्पास, नमा मरम्प-कोरस धीर गए परिमादी पुगसम्पचिव मी दिखाई देता है।" इस प्रकार सलाम सम्पचिवरिन्दी सारिष्य में अपना एक मात्र स्थान मिता| पे एक पोर मादी दो एसरी पार बुरिवार की महकमी हनम विमान है। तारे अपये तुम से पूर्णतया परस्प६ पैसा महापयामासम्ता । प्रैली की प्राचीनता में मी एहोंने सिर की सीमता समान रहा है और इसलिए विभागर परम्परामान करते हुए भी ये रस का पोषक बसमा सम्भोगबहीन बना देवा। माज * प्रक्षित नहीं है और इनिपती होते पर भी इसम सरमहा।महीन प्पनिय की विशेषता है रिली साहित्य क्षेत्र में एक महावरण स्थान प्रदान प्रती है। असिम में जीवन झिर नम्-सरेश सोमासर गौरव प्र पार पह परमानाम। इस समीरी पर मी दम रमाग बी की परीक्षा करने पमपम रंग। लामची पिय में पीत घुसारे पासपपीजीमान विगत पुगरे संस्मरों की स्मापना नम्पतर पुग मेरा एक त्रिम पास है। पर काममुणेमम और गारवासार दो समता फिर पुगका विरा बाप्प मी मा दा सम्वा । तर मादिप मदा परिणाप हो मा पाता मिनरलारपणे पम्प में प्रीपर ऐमो कोई मसिम्ता और अनिवार्पता मेम नहीं भारm • सिप, पोसवारी, 1.1 २ सिमाधिव, बोसमी पतारी ।

[11 पारपीजीकी मह पासोमा पद्यपि ममेक अंगों में साथ ही या सजी है, किन्तु पाइसके प्रतिमा पर में मी उपस्थितीमा सम्सी १। पासपी जी प्रपम भाप पर कि रकार श्री ने विगत पुग सम्परा म्पापनाम का प्रपन किया। विरासर में रनामसी प्रचारक स्म में संसार की स्थापना मते ए मान भी किए बाप तो इस सस्तपा लगे कि मक्कि सपा मर के संस्कारों का स्पापन बना पाठे । सम्मवतः मति के संस्मरों को इस पम-भाग भारतवर्ष में निपुगीन पदमा विशेष उपपुर होगा। कार पीर प्रम-सम्मम्मी हत्याको तरमापी में शापत मामा परिमपा मी स्वीकार बापती श्री का दाप बामनामप पार के शिव से, जो मप्प- पुगीन समाज की पिता पी वो मी पद मामा पोगा कि इस प्रकार की रिशासिता का समाज से उस समय तक होप भी नहीं हो गपापा। बार मी रबबालों में पड़े थे और 4 रबमारे विलासिताओं के न इसमें सम्बरकरारतियुग में मी ग्याप सपो केन्द्र पी रोपे पापा रए गास्प-नविन नहीं। इस मभर बान बीके लिए परमिट इनके अपने दी पुग में सम्मिलित थे। अत्रिमता में शैती म सम्सी श्रीर इस बामपपीबी ने लानी के काम को भुगोमन और गौरमास्पद स्वीकार शिपाया ऐसा नहीं कहा जा सकता शिगे मगोभम और गौरवासरा सता भादर्श है। इसमें देर मन पदभार समापौरपा पाव पाप रे पापार पर पतिमा गरामी हो सकता किमो सीवाभावा परप ही में अमित पाने की एक रaat और पही इनकी माता है। समीर की चमवारमपी पारा में पास अनिवार्यता इणों एि मिमकि ना दवा है। क्या दमारे मनोमाषों एए-मपम पसिनाकी सम्मा का पहुँचने के लिए पद काम्प पपात नहीं है और पपा पेस सम्प को सहारनदीमामा पता। भगवान् इत्य के होसिसभ प्रजापिस मिग विद्यापति सूर और मीरा ने भन्द करियों में भी किया था। इसको पाबम्बम मारम इन पति ने मो मानवसप मपोरेशानिर चिरा हमारे मम्मुख उपस्थित शिवा। मार भी लदोनों के समन्वित म १ मार इस पम्प से परि एक और रमें मति में पति बारा प्रचारित रोती

[]
विषलाई पाती है तो दूसरी ओर मान-सभावम सिउपस्पित करे
हमारे सम्मुन एक पावादी साहित्यमा स्म में उपस्ति हो।
दम पर भी दुसती उसकी गुडना मना प्रापा नहीं समम् । मिन
पापमों ने भा और गुससी में किसी भी बर्ग अपना मेगा से भमर माना
पहारमा लामो मुल्याम को गति रिपोर
में रखा होना चाहिए जो मानव दुवामा को विस्ति करने में मी
इसलिए नहीं हिचको पहिरनमा समा।
1
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परिशिष्ट

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परिशिष्ट
सहायक ग्रन्यों की सूची
, हिन्दी साहित्य प्रतिमाम, भाग पं. रामपय यात
१ भापुनिक हिन्दी मादित्य भविमल रा०पीकालात
लिप्रमादिगार प्राचार हजारी प्रसाद रिमेकी
. हिन्दी साहित्य की भूमिम,
५माधुनिक हिन्दी साहित्य प्राइविहास रा. समासागर पाप
पाचोरमारमा रिली-साहित्य का इतिहास, रा.रामामार वर्मा
•विवारी माता.मिनाप मसाद मिश्र
सम्मापाम, पावाब पोपर
। महायर प्रसाद दी और समय पुण ग. उपपमानु सिंह
१. पपइविसस बी हरिमार पापार
" अपोप्मा पाइतिहास, नाता सीताराम
१५ दिनदी-साहित्य, बीसी-पताम्दी, भाग पन्दुमारे बाबपेची
१६मातकी भूमिम ग. रामबापमा'
मपम बागुलाबराव
अप्परय. रामददिन मिय
पहिली-साहित्य, पारस्पामसुनाराष
१. मावाप चौर परचम-सम्मदाब, ग.दीनपात पुस
१८ भाचा दास, रा. रामार दीरित
रेखा-पिण, श्री बनारसीदास नगरी
२. बहमास प्रत्यासी,
२१ मारतेन्दुमपारसी,
११ मागम-वर्णन ए.पीपबाट
२५ भारतीय साहित्य-गार बहरेप पाप्याप
१॥ विपर रनामीप्यम पद,
१५. राता परिणत, भौगोक

[1]
५६ विशारीरलावर' की भूमिम, श्री बगवायदास रत्नाम'
२.पिवर गिरी, मी बगडाबदएम रमाकर'
१४ोपोत्सव स्मारक संग्रह, बापू पामवर दास
१. पररास प्राचार्य रामबाण पह
३. लामो प्रभावती, भामरी प्रचारिणी-समा पती-(पा लाम
मुनादास रा सम्पादित)
। प-पत्रिका | सास्ती मावी, पिणार-मारत उभा नागरी प्रचारिती-
समा की पवित्र की वाइ।

Ratna Kar Aur Unka Kavy

Author
Jayswal,usha
Title
Ratna Kar Aur Unka Kavy
File name
Ratna Kar Aur Unka Kavy
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2010/12
Publisher
Varanasi,hindi Pracharak Pustakalay
Language
Sanskrit
Pages
199
Library
Bharatiy Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514790
Barcode
4990010022473.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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TMyI9fzAQJw
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