Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Antkridshang Sutra

Sudharma., Abhaydev Suri · 2011/01

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घी खरतरगन्छीय ज्ञान मन्दिर, जयपुर
श्री अन्तुगडदशा सून
(हिन्दी काव्य में)
ज्ञान विना करनी वृथा, बिन भाषा नही ज्ञान ।
म धर्म का गर लखे, स्वयं ही श्रद्धावान ।
इसोलिने सत शास्त्र की, लो हिन्दी में जान ।
पढो लिखी करनी हो.निश्चय केल्यान ।'
तिन्छा।
1-अ-50
प्रकागक
चन्द्रकुमार
जैन
सम्पादक व प्रकाशक
जैन ज्योति, अजमेर

प्रकार- चन्द्रकुमार जैन 'मम्पादक जैन ज्योति अजमेर FEELE 5) द्वित्तीयानि पर्युपण पर्व भाग दो हजार २०२४ ४३ वा प्राप्ति स्थान- जैन ज्योति कार्यालय नया बाजार, अजमेर ( राज० ) मुद्रक चोपडा प्रिन्टिग प्रेम, नया बाजार, अजमेर श्री संतगडदशा सूत्र हिन्दी काव्य में क्यों ? प्रिय पाठमगरण। जव तक किसी भी शास्त्र, ग्रन्थ एव साहित्य को हम अपनी भाषा मे नही जानते तब तक केवल अधि श्रद्धा और स्टी के आधार पर भन्ने ही उनका पाठ किया जाय पर बिना उसके मर्म को समझे हम उसकी वास्तविकता से दूर ही रहेगे । अत' इन प्रागमो को अव हिन्दी माहित्य मे लाकर साधारण से साधारण मनुष्य को भी लाभ उठाने का अवसर दिया जाय, यह परम आवश्यक हो गया है। श्री भक्तामर कन्यारणमन्दिर, पुच्छिस्सुण व अनेक स्तोत्रो का हिन्दी काव्य में अनुवाद करने पर समाज ने उसे जिस ग्रादर भाव से अपनाया है एवं अब तक हजारो प्रति मे योछप जाने पर जिनकी निरन्तर माग पा रही है, यही हमारी इस दूरदर्शिता का जीता जागता प्रमाण व इसकी उपयोगिता का सही नमूना है श्री गुलाब चोगीमो मे २५ वोल के थोन डो की काव्य मे रचना करके जो एक नया मोड लिया हे चह भी ग्राशा में अधिक गफन बना एव ग्राज भी उसकी सर्वत्र माग है समाज की इम आदर भावना को ही ध्यान में रख कर श्री अन्तगटदशा मूत्र को हिन्दी काव्य मे रचना करने का माहस किया है, हमे आशा है,हमारे पाठक वन्द इमकी उपयोगीता को लक्ष्य मे रग पर ही इसका पठन पाठन करगे एव हमारी नटियो के लिये हमे माग-दर्शन कराके भविष्य के लिये चेतना प्रदान कर हमारे महायक बनेंगे।

(२) अनेक कठिन परिस्थितियों के कारण इसेको प्रकाशन भी देरी से हुअा, जल्दि में हुअा एव प्रफ सशोधन व सम्पादन में भी प्रमाद रह गया है इन सारी श्रुटियो के साथ आपके कर- कमलों में 'फल सारु पाकडी' रखते हुए प्राशा है आप अपनायेंगे, साहस देंगे ताकि आगामी रचनामा के लिए हमारा प्रयास जारी रहे एव हम अबकी बार अधिक से अधिक सतर्कता के साथ अपनी सेवायें सही रूप में दे सकें। . इस अतगडदशा मूत्र का वाचन पर्युषण पर्व के आठ दिनो मे निश्चित रूप में होता ही है। अत आप स्वय भी कर सकेंग, विराजित सन्तो से सुन सकेंगे तथा जिस ग्राम, नगर में सन्तो के चातुर्मास नहीं हो तो वहा की जनता भी बडी सरलता के साथ इसका वाचन करके धर्म लाभ ले सकेगी, इसी आशा और सद्प्रेरणा के माथ जैन ज्योति -- जैन ज्योति के सह-सस्थापक- जैन जगत के चमकते सितारे समाजभूषण धर्मप्रेमी, उदारहृदय दानवीर सेठ स्वरूपचंदजी सा० तालेरा, ब्यावर

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- जैनरत्न, समाजभूषण, धर्मपरायण, उदारहृदय, धर्मवीर सेठ स्वरुपचन्दजी सा. तालेरा, ब्यावर का साना-परिचय व्यावर के प्रमुख ऐव सुप्रसिद्व श्रीमन्त' सेठे स्वरुपचन्दजो तालेग से जिसने एक बार भी भेट की, वह अपने जीवन में कभी नही भूल सकता, यही सेठ सा के अटूट प्रेम, स्वागत सत्कार व वात्सल्य भावना को अपनी निजो विशेषता है आपका जन्म स० १९४८ मे भवरों (मारवाड) में हुआ, अपने पिता श्री कुनणमलजो की छत्रं छाया मे बाल्यकाल सुख पूर्वक व्यतीत करें माप स० १९५६ मे व्यावर पधारे एवं यही विद्याध्ययन प्रारम्भ किया। शिक्षा की ओर विशेष रुचि न हो के कारण अपने कुछ वर्ष बाद ही नौकरी करलो और व्यापारिक क्षेत्र की विशेष जानकारी करने में दिलचस्पी रखो । सन् १९१८ मे पिने ऊन का व्यापार शुरु किया। भाग्य ने आपकी साथ दिया, लक्ष्मी ने अपको रंद हाथो से वरा'और इस प्रकार आपने आशातीत सफलता प्राप्त की। बम्बई से आपने वेडे पैमाने पर ऊन का कारोबार बढाया और भारत ही नहीं विलायतो मे भी अपनी प्रमाणिकता और कार्य कुशलता को छाप जमाई। इस प्रकार लाखो की सम्पत्ति को उपार्जन कर आप पूर्ण वैभवशालो वनें। स्वर्गीय जैन दिवाकर गरे चौथमलजी मसा के प्रापें परम भक्त है । गुरुदेव के ति आपकी प्रगाढ श्रद्वा एव'ग्रेट स्नेह था धर्म गुरु के प्रति अपनी सच्ची श्रर्द्धा का परिचय, आपने पौमिक व सामाजिक क्षेत्र में विशाल हृदय से लक्ष्मी को सदुपयोग कर मम्यानो को ऊंचा उठाने एवं धार्मिक प्रचार' करने में पूर्ण सहयोग दिया जो युग २ तक सदैव चिरस्मरणीय रहेगा।

सेठ स्वरूपचन्दजी तालेरा
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वा भावी श्रीमंत हैं और हृदय के बडे उदार,
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स ठसे कर जिनके जीवन में भरे हुए हैं वर्म विचार।
रचाभिमान मदा ही रखा, मूके नही विपदाओं में,
वरद किया लक्ष्मी ने अबके खेल रहे सम्पदाओं में,
चिं. जिनागम में जिनकी अति, खूब ही कर रहे धर्म प्रचार,
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पनप रही है जिनके योग से कई सन्थाये इम वार ।
अंदा मम निर्मल मन जिनका रखते सदा सत्य व्यवहार,
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दया दान जनहित सेवा में तन मन धन करते न्योछावर ।
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जीव
विनं वड़ा सादगी मय है, नहीं किसी से खार किया
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तात मात और अपने कुल का जिनने गौरव बढा दिया।
लेवे खूब ही लावा धर्म का, यही भावना रखते हम,
दिवस हीवढे तुम्हारी, "जीत" यशो फिर्ती हरदम् ॥
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"जैन ज्योति”

श्री अंतगड़ दशा सूत्र
( हिन्दी काव्य मे )
दोहा-
शासनपति श्री वीर जिन, प्रणम् बार हजार ।
चौथे पारे अवतरे, अपसर्पिणी मझार ।।
तर्ज-राधेश्याम
श्री महावीर के समय मे एक, चम्पानगरी सुखकारी थी,
औपपातिक सूत्र मे बतलाया, वो देवो की प्यारी थी ।
उस नगरी के ईशान कोण मे, यक्षायतन एक अति प्रिय था,
पूर्ण भद्र था नाम जहा, वनखण्ड भी सुन्दर रमणीय था ।।
जहा कोणिक राजा राज्य करे, जो प्रभावशाली महेन्द्र था
मेरू ममान था शक्तिमान, जन २ का प्रिय नरेन्द्र था।
जैसे महा हिमवान शिखर, मर्यादा लोक की रखता है,
वैसे ही राजा स्वय प्रजा के, नियम का बन्धन करता है ।।
महामलय शिविर का पवन सदा, चहूँ और सुगन्धि फैलाता,
उस ही प्रकार नरेश्वर की, यश कीति सारा जग गाता ।
मेरू सम रहता अडिग सदा, कर्तव्य मार्ग के पालन मे,
देवो मे जैसे इन्द्र बडा राजा महान मारे जन में।

[२] पूर्णभद्र में , N । दोहा-उमो ही काल उस नगर में, आर्य सुधर्मा म्वामी । शिष्प पांच मो माथ में, विचरत ग्रामो ग्राम ॥ उद्यान श्रा ठहरे अणगार । सुनकर पाये दर्शको, नगरी के नर नार ।। तर्ज-राधेश्याम दर्शन कर जनता प्रसन्न हुई, और धर्म कथा सुन लौट गई, उस समय सुवर्मा स्वामी के, एक प्रमुख शिष्प अति अनुग्रई । काश्यप गोत्र के उजियारे, श्री जम्बू स्वामी नामी थे, भर यौवन मे सयम लीना, जो मोक्ष मार्ग अनुगामी थे श्री गुरुदेव के चरणो मे, जम्बू । एक ये अर्ज धरी, वर्तमान शासन में वीर ने, जैन धर्म की आदि करी। माधु साध्वी श्रावक श्राविका, चार तीर्य को स्थापन कर, यावत् सिद्धि गति को पहुंचे, जो अनन्त ज्ञान के थे सागर । वीर ने उपासक दशा सूत्र, के सातवें अग मे फरमाया, आनन्द कामदेवादि दस, जिन श्रावक का वर्णन पाया । वी सुना आपके मुख से प्रभू. म झको भी बडा आनन्द आया, अब और सुनू आगे भी कुछ, इसलिये अर्ज एक गुरूराया। अन्तगड दशाग आठवा अग, हे प्रभू म झे अब फरमावो, श्री वीर ने क्या दर्शाया है, कर कृपा मुझे सब वतनाओ ।। दोहा-प्रबल भाव लख शिष्य के बोले सुधा स्वामी । आठ वर्ग जिसमें कहे, अन्तगड़दशा है नाम || अध्ययन पहले वर्ग में, हैं कितने गुरूराय । दस अध्ययन इसमें कहे, सुनो जम्बू ! चितलाय ।।

[३] चौथे गम्भीर, - . ११ तर्ज-राधेश्याम पहले गौतम दूजे समुद्र, तीजे सागर पचम स्थिमिन छ? हे अवल, और सातवे श्री कम्पिल गुणधोर । पाठवे अक्षोभ नवम प्रसेनजित और दसवे है विष्ण कुमार, जम्बू पूछे अब प्रभू बतायो, पहले अध्ययन का अधिकार । प्रथम अध्ययन पहले अध्ययन मे हे जम्बू ? गौतम का जीवन बतलाया, मै भी तुमको समझाता हूँ, जिस तरह प्रभू ने दरसाया। इस अवसर्पिणी काल में ही, ओर इस ही अन्तिम पारे म, वाइसवे श्री अरिष्ट नेमि, विचरत भू मण्डल सारे में। सौराष्ट्र देश की राजधानी, उस समय द्वारिका नगरी या, वारह योजन की लम्बी थी, चौडी नौ योजन जवरी थी। उसको कुवेर ने स्वय अति. बुद्धि कौशल से बनवाई जिसके परकोटे बने हुये थे, स्वर्णमयी चहु दिश माई। इन्द्र, नील, वैडूर्य आदि, आदि, मणियो के कगूरे प्रियकारी नगरी की शोभा अनुपम थी, अलकापुरी के सदृश भारी। थे नगर निवासी सुखी बहुत, प्रमुदित हर्षित क्रीडा कारी, आमोद प्रमोद के माधन से, नगरी की छवि थी अति न्यारी। दर्शक के मन को हरलेती, जो देव लोक उरिणहारिका थो सर्वोत्तम और असाधारण, दै दोप्यमान द्वारिका थी। नगरी के उत्तर पूर्व मे, था पर्वत रैवतक भारी, नन्दन वन था उद्यान जहा, सूत्रो मे महिमा है जारी। प्राचीन था यक्षायतन एक, सुर प्रिय यक्ष का प्यारा थो बन खण्ड से घिरा हुआ जहा पर, एक अशोक वृक्ष भी न्यारा था। उस द्वारिका नगरो के स्वामी, श्री कृष्ण ये वासुदेव नामी १ -

--
+
[४]
महा हिमवान् शिखर जैसे, मर्यादा पालक गुणधामौ ।
समुद्र विजय मे दस दशाह महावीर पाच बलदेव जहा ,
ये साडे तान करोड प्रिय, प्रद्युम्न आदि कुमार वहा ।
वो साम्ब मे साठ हजार शूर, शत्र से पराजिन नहीं होते
सेनापतियो को अधीनता म, छप्पन हजार सेनिक सोहते।
वीर सेनादि कार्य कुशल, इक्कीस हजार थे वीर बडे ,
उग्रसेन सम सोलह सहस्त्र, हाजिर में राजा रहते खडे ।
रुक्मणी आदि सोलह हजार, यो राणिया जिनके प्रियकारी
और चौसठ कता में प्रवीण, थी जहा अनेक गणिकाये न्यारो।
यश कीर्ति शाली नागरिक, थे। सेठ सेनापति सार्थ वाह ,
सीमान्त राजा नगरी रक्षक, और वडे २ थे नगर शाह ।
भन्त क्षेत्र के तीन खण्ड में, जिनको आण सहु लाज घरे ,
ऐसे ही प्रतापी श्री कृष्ण जी, एक छत्र जहा राज करे ।
दोहा-उस ही द्वारिका नगर में, राजा रहते एक,
अन्धक वृष्णि अति बली, रखे सत्य की टेक ।
महारानी प्रिय भारिणी, अति सुन्दर गुणान्त,
उत्तम लक्षण युक्त थी, मत्रही लख हरपन्त ।।
* तर्ज-राधेश्याम २
एक समय घारिणी महारानी, ऊत्तम शय्या परसोई थी ,
कुछ जगी हुई थी मन ही मन, और कुछ निद्रा में होई थी।
शुभ स्वप्न एक देखा उसने, झट जागृत होकर उठ आई,
राजा के पास झट आकर के वो स्वग्न सुनाया सुखदाई।
शुभ फन बतलाया स्वप्ने का, रानो ने हर्ष से मरघ लिया
फिर यथा समय रानी ने एक, सुन्दर वालक को जन्म दिया।
बाल्य काल बीता सुख में, फिर कला बहतर सिखलाई ,
-

[५] , . पाठ राज्य कन्याये जिनको, यौवन वय मे परणाई । भगवती सूत्र में महावल के वैभव का जो वर्णन पाया उस ही प्रकार इस गौतम ने, भोगो का सब साधन पाया। आठ पाठ कोटि सुवर्ण, चादी की चीजें अति भारी दहेज मे सब ही वस्तु थी, आठ आठ न्यारी न्यारी। दोहा-उम ही काल उस समय में, अरिष्टनेमि भगवान् , धम प्रवर्तक जो हुए, उस युग के दरम्यान । विचरत आये द्वारिका, नन्दन वन उद्यान, सुरनर आ सेवा कर, कथा सुने धर ध्यान ॥ * तर्ज-राधेश्याम :- भवन पति और वारणव्यन्तर, ज्योतिपी वैमानिक आये थे नरनारी और तिर्यन्च भी थे, सब कथा में ध्यान लगाये थे। श्री कृष्ण जी पहुचे महलो से, गौतम भी सुनकर हर्षाया , सूत्र मे मेघकवर सम, धर्म कथा सुनने आया। भगवन् की वारणी सुन करके, वैराग्य भाव हृदय छाया , गौतम ने प्रभू के समीप आ, अपने भावो को दरमाया। मैं मात पिता की आज्ञा लू, तब दीक्षा दे उपकार घरो, भगवन ने तरत ही फरमाया, जिसम सुख हो वही शीत्र करो। वहा से चल आये महलो मे, फिर मात पिता को बतलाया प्रभू वाणी सुन वैराग्य हुआ, मै प्राज्ञा लेने को पाया। सुनकर धारिगी अति द खी हुई, एक ग्राह भरो मूर्छा पाई ज्ञाता सूत्र के मेघकवर सम, सारी लीला दरषाई। गौतम ने बहुत ही समझाया, जीवन क्षणभगुर बतलाया , ससारो सुग्व तब नश्वर है, और झूठी है जग की माया । इस तरह प्रेम से समझा के, मारे वैभव को छोड दिया ज्ञाता . - . .

।६ ]
१
फिर नेमि नाय के समीप श्रा, गीतम ने सयम भार लिया ।
निगन्य वचन पर श्रद्धा को, इर्या भाषा का ध्यान रखा ,
सावध निरवद्य योग समझा, अविश्यक छ अग ग्यारह लखा।
उपवाम बेला तेला, चोला, अर्घमाम मास खमण कीने
तपस्या मे तन को लगा दिया, पीर आत्म भाव मे लीन बने ।
दोहा-नगर द्वारिका से किया, प्रभू ने पाद विहार ,
देश विदेश विचरण किया, लेय शिप्य परिवार !
एक समय श्री नेमि प्रभू, बैठे थे तिणवार
कर अर्ज एक भाव से, श्री गौतम अणगार ।।
तर्ज—राधेश्याम
श्रादक्षिण प्रदक्षिण तीन बार, करके प्रभू को वन्दन कोना
फिर विनय भाव में अपने मन के भावो को यू कह दीना।
हे प्रभो अाज्ञा हो अापकी तो, भिक्खु पडिमा स्वीकार करू ,
जिम मे सुख हो नैसा ही करो, शुभ काम को शीत्र ही करो शुरू।
आज्ञा पा हर्पित हो गौतम, पहले मम्यक् अराधन किया ।
जिस प्रकार स्कन्दक मुनिवर का, भगवती सूत्र मे हाल दिया।
वस उनी तरह गुरगरत्न सवत्सर तप को भी पूर्ण कोना
शग्रुजय पर्वत पर पहुँचे, स्कन्दक ज्यू हो व्रत लीना।
वारह वप दीक्षा पाली,
मासिक सलेखना धार मुवे ,
कर्मा को चपाकर यो गौतम, फिर सिद्ध
बद्ध
और मुक्त हुये।
दोहा-मुधर्मा म्वामी कहे, सुन जम्बु धर ध्यान
मातगति को प्राप्त जो, महावीर भगवान ।
प्रथम अध्ययन में कहा, जिनने सारा मार;
रही ढरमाया है तुम्हे, गौतम का अधिकार ।।
-

[७]
,
.
--: तर्ज-राधेश्याम :--
इसी तरह हे जम्बू तुम, बाकी के नौ अध्ययन जानो,
नाम से है सब अलग-अलग पर क्रिया से एक ही मानो।
उन्ही अन्धक वृष्णि राजा, और धारिणी के नौ नन्दन है
मव इमो तरह वैरागी हुये, सव ही का एक सा वर्णन है ।
समुद्र कुमार, सगार कुमार, तीजे गम्भीर कुवर जानो,
स्तिमित, अचल और कम्पिल जी, सातवें अक्षोभ कुवर मानो ।
प्रसेन चित है पाठवे ग्रौर, नवमे है श्री विष्ण कुमार ,
शेष नौ अध्ययन मे जम्बू, इन नो हौ का सारा अधिकार ।
पहिले गौतम और शेष ये नौ, यो दस अव्ययन बतलाये
अन्तगड दशा के प्रथम वर्ग मे, यही भाव दरशाये है।
द्वितीय वर्ग
टोहा-मामी सुधा से कहे,
कहे, श्री जम्बू अणगार
श्री मुख से मैने सुना, प्रथम वर्ग अधिकार ।
अब मैं दूसरे वर्ग का, सुनना चाहूँ मार ।
'श्री वीर ने क्या कहा, फरमायो करतार ।।
तर्ज-राधेश्याम
स्वामी सुधर्मा फरमावे, जम्बू ने भी झट चित्त दीना
दूसरे वर्ग मे पाठ अध्ययन का, प्रभू ने प्रतिपादन कोन!!
अरिष्ठ नेमि भगवान ही जब, द्वारिका मे विचरते थे,
महा प्रतापी अन्धक वृष्णि, राजा एक जहा रहते थे।
धारिणी नाम की रानी थी, उनके ही साठ कवर नामी,
जो धर्मवीर गुणशाली और, सब ही थे धर्म के अनुगामी।
अक्षोभ, सागर, समुद्र और, हिमवान, अचल पाचवें मानो ,
.

[८]
.
.
वरण छह सातवे पूरण, और अभिचन्द पाठवें जानो।
प्रथम वर्ग मे जम्बू जो, गौतमादि दस अध्ययन प्राये
वैसे इन पाठ कुमारो के, ये पाठ ही अध्ययन दरसाये ।
जैसे उन दस ही कुमारी ने, तप जप सयम के रस लीने
यमे ही इन पाठो ने करके, कर्म शत्रु को वश कीने।
सोलह वर्ष सयम पाला, फिर शत्रु जय पर्वत पर जा ,
एक मास सलेखना करके, सिद्ध बुद्ध हुये मत्ति पा।
पहले वर्ग के दस कुमार, और दूसरे वर्ग पाठ मानो,
एक ही माता के है ए लाल, ये अठ्ठारह भाई जानो।
अक्षोभ आदि ये पाठ अध्ययन को, दूसरे वर्ग मे बतलाया ,
श्री वीर ने जैसा कहा हे जम्बू, वैमा ही तुमको दरसाया ।
तृतिय वर्ग
दोहा-जम्बू कहे कर जोड के, कृपा करो हे स्वामी।
भाव तीसरे वर्ग के, फरमायो गुणधामी ।।
सुधमां स्वामी कहे, सुनो जम्बू चितलाय ।
अंग पाठ त्रिय वर्ग में, है
तेरह अध्याय॥
तर्ज-बाधेश्याम
अरणीय मेन, अनन्त सेन, तीजे अजित अति प्रियकारी
भनिहत रिपु, और देव सेन, श्री शत्रु सेन, सारण भारी ।
आठवें गज नवमे मुमुख, और दसवे दप गुणधारी ,
ग्यारहवे कूपक बारव दारूक, तेरहवे अनादृष्टी जारी।
जम्बू कहे हैं नाय ? वताओं, पहले अध्ययन का अधिकार,
श्री अरणीयमेन कु वर ने कैसे, किया है इस जग से उद्वार ।

"TITI मा गरिमा, भीमामे, पार मे mi, Infमा । मे प्रागन काम समान गरी प्रभा . TIAAY PATTI माग गाम गा मामntr Trnीनी -17 था। - TARATी पनि गुमान, मुका पार पाग मा. पोगरम। पान पाय माताग र नी, aft पामारी थी, 4.1, पी रमाय 1-7 भी। गम प्रयोग कार में निम पा मापन गगीय मनमन। qrinी गुप में मानता, plan १ मे जी. मी गरम में मगे गुर, गपोm दौर-पाट वर्ष की उम्र, लाचार्य पं. पान . जिला नको गये: गौरी कनन्य माम। पागल कर हो गया. मी कन्या के मा५ परावस्या दस कर. मान पिना पागा || नई-गवराम . 1 . rai - 1 41 Tim' -- - it 7 दर । माम. म. iii ... - - - .

- . " [१०] भगवती सूत्र मे महाबल का, जिस तरह से वर्णन माया उमी तरह से ऋद्धि मिली, नैसा ही सब सुख पाया है। महलो मै निरन्तर बजे मृढग, वत्तीस रमीरिगया भी बलिहार , पुण्यो पाजित मनप्य सम्बन्धी, भोगो को वह भोगे अपार । उस ही काल उम समय मे आये, अरिष्ट नेमि भगवान वहा भद्धिलपुर के बाहर ही विराजे, श्री वन था उद्यान जहा। अवग्रह लेकर विचरते थे जो, नित मर्यादा के अनुसार, धर्म कथा, दर्शन हित पा रहे, नगरी के सारे नरनार । जन मम दाय कोलाहल सुन, श्री अरणीय सेन भी हुये तैयार गोतम कुमार के समान ही, महलो से आये कथा मझार । भगवन की वाणी सुन कर के, नैराग्य चढी छोडा ससार, मात पिता की प्राज्ञा ले, श्री अरणीय सेन बन गये अणगार । गीतम कुमार के समान ही, इनने भी ज्ञानोपार्जन किया मामायिक यादि चवदह पूर्व का, और भी ज्यादा अध्ययन किया। वीम वर्ष दीक्षा पाली, फिर माम सलेसना सहित सिद्व और बुद्ध, मक्त हुये कर्म खपा। तीसरा वर्ग पहना अव्ययन, श्री अरणीय सेन का दरसाया , स्वामी मुधर्मा कहे हे जम्बू, प्रभू ने कहा सो बतलाया। दोहा-अणीयसेन ममान ही, आगे पांच अध्ययन । अन्नतसेन, अजितसेन, अनिहत रिपु, देवसेन ॥ शत्रु सेन है पांचवें, ये मत्र मिल छह भ्रात । श्री नाग के पुत्र थे. सुलसा के अंग जात ।। बत्तीस करोड की मम्पदा, सनकै सहु सुख चैन । वाणी सुन मन त्यागकर, वन गये साधु जैन ॥ - शत्रु जय पर्वत पर जा,

[११]
निधान ।।
वीस वर्ष दीक्षा पली, चउढह पूर्व ज्ञान ।
एक माम संलेंसना, पाया पद
वर्ग तीसरा छह अध्ययन, पूर्ण हुये यो जान ।
नम्बू कहे अव सातवां, फरमात्रओं भगमान ।।
* तर्ज—राधेश्याम *
स्वामी सुधर्मा कहे सातवा, अध्ययन अव बतलाता हूँ
जो श्री वीर न फरमाया, वही प्रा1 तुम्हे दरसाता हूँ
उसी ही काल उस समय मे जम्बू, द्वारिका नगरी सु
कारी
वसुदेव थे राजा जहा, और रानी धारिणी गुणधारी ।
सुख सैया पर सोये एक दिन, रानी को मिह स्वप्न पाया ,
और गर्भ काल पूरा होने पर , सुन्दर पुत्र रत्न जाया ।
सारण कुमार दिया नाम पुत्र का, बहत्तर कलाये सिखलाई
यौवन वय मे मात पिता ने, योग्य कन्या भी परणाई।
पचास करोड सोनया जिनके, कन्यादान मे आया या
श्री अरिष्ट नेमि की वाणी सुनकर, सव वैभव छिटकाया था।
सारण कुमार ने दीक्षा ले, चवदह पूर्व का ज्ञान किया ,
बीस वर्ष दीक्षा पाली, तप जप सयम मे ध्यान दिया।
गोतम कुमार की तरह ही सारण, शत्रुजय पर्वत पर जा
एक मास सलेखना
करके, सिद्व वुद्ध हुये मुक्ति पा ।।
दोहा-वर्ग तीसरे के हुये, अध्ययन सात समाप्त ,
जम्बू कहे अब आठवां, फरमानो जगनाथ ।
स्वामी सुधर्मा यू कहे, सुनो जम्बू चितलाय ,
अति र रोचक वर्णन कहा, आठवें अध्ययन माय
-

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[१३]
,
तर्ज-राधेश्याम
वन्दन करके छ हो मुनिवर फिर सहग्नान बन बाहिर श्रा,
दो दो मुनि के कर तीन सघाडे, पहुँचे द्वारिका नगरी जा।
शीव्रता रहित चपलता रहित, न लाभालाभ की चिन्ता है
सम्भ्रान्ति रहित, उद्वेग रहित, भावो में अति निर्मलता है।
ऊच नीच मध्यम फुल से, निर्दोप आहार को लाने मे
एक सघाडा जा पहुचा, फिर, सीधा राज घराने मे।
वसुदेव की रानी देवकी ने, जब देखा पाये मुनिराई ,
प्रासन से उठकर सात पाठ, घर कदम सामने झट आई।
हूँ धन्य आज मेरे घर पर, ये सन्त पधारे सुखदाई ,
सन्तुष्ट चित आनन्दित हो, वो अन्त करण से हरषाई ,
मन मे अत्यन्त प्रसन्नता थी और प्रेम भाव था उर माई।
फिर विधी पूर्वक वन्दन कर, मुनियो को रसोई घर लाई ,
वहा सिंह केसरी मोदक का, भर थाल हाथ से बहराया ।
फिर विनय पूर्वक वन्दन कर, मुनियो को वाहिर पहुचाया ,
उसके बाद ही दूजा सघाडा, नगरी मे घूमता यहा पाया ,
महारानी ने भी उसी भाव से, उनको मोदक वहराया।
दोहा-देवयोग से तीसरा, पहुचा संघाडा श्राय ।
उसी भाव से देवकी, झट मोढक बहराय ।।
चन्दन कर कहे देवकी, एक शंका मन मांय ।
अाज्ञा हो गर आपकी. तो पूछू मुनिराय ।।
शंका मन में मत रखो, प्रकट कयो हरपाय ।
आज्ञा पा मुनिराज की, रानी कहे सिरनाय ।।
-

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[१५]
-
नल कुबेर
मयोग वशात् हे महारानो ?, वे तीनो सवाडे यहा आये।
मत एक ही तम सबको समझो, है अलग २ सव मुनिराये ,
नहीं हम हो पाये वार २, वे न्यारे थे हम न्यारे है।
इस तरह देवको को समझा, मुनि अपने स्थान पधारे है ।
दोहा-मुनि गये पर देवकी, छोड़े नही विचार ।
संकल्प विकल्प उठे, मन में अति अपार ।।
उस समय में आगई, बचपन की एक याद ।
पोलासपुरी में जो कही, अतिमुक्तक मुनि वात ।।
आठ पुत्र होंगे तेरे,
समान।
आकृति वय और कान्ति में, एकही सम सब जान ।।
तेरे सम हे देवकी, ?, भरतक्षेत्र मंझार ।
जन्म न देगी कुख से, कोई ऐसे सुकुमार ॥
तर्ज-राधेश्याम
मुनि वाणी असत्य नही होती, पर आज असत्य क्यो हो रही है
दूसरी मता के देख लाल, जो स्वय देवकी मोह रही है ।
अतिमुत्तक सत्य के भाषी है, प्रत्यक्ष असत्य नजर आता ,
केवल ज्ञानी के सिवा सेरा यह, सशय कौन मिटा सकता।
भगवान अरिष्ट नेमि के पात, जाने की करी है तैयारी
झट धामिक रथ तैयार करो, सेवक को आज्ञा दे डारी।
घोडो को जोत सारथी सहित, उस रथ को पास मेरे लाना ,
सेवक ने वैसा ही तुरत किया, रानी का था जो फरमाना।
जिस तरह मात देवानदा, महावीर के दर्शन को धाई,
बस उसी तरह से अरिष्ट नेमि के, दर्शन को देवकी आई।
१
-

.
[१६]
भगवन के पान या दर्शन कर, फिर बन्दन नमस्कार कीना ,
रानो बोले उग परने हो, भगवन् गे यू कह दीना।
अरणगार को दे। ग्राम, तेरे मन गणराया
और पोलामपुरी में अतिमत्तक, मनि ने भी भेद यह बतलाया।
नल कुबेर के मम तीबगे, पाठ पुग तेरे अगजान ,
भरत क्षेत्र में तेरे मम, नहीं होगो और कोई भी मात ।
पर दुमरी माता में जन्मे, ये कैगे मुन्दर छह भाई.
असत्य हो रहे प्रत्ता मे जो वचन कहे ये मनिगई।
प्रभू पास जा का दूर करू, यही नारोग्य चट धाई हो,
सच कही देयकी । यहा भार, या मन में ने यहा प्राई हो।
टोहा-
-देवकी कहे प्रभ आपने, जो फरमाया नाथ,
मंशय मेरे मन बही, सत्य है मारी पात ।
अब समाधान भी पापही, करिये दीनदयाल ,
प्रभृ कहे देवानु प्रिये !, सुनो सत्य सन हाल ।।
तर्ज-गधेश्याम -
उमही कान उस समय में एक, भद्दिलार नगर या मुखकारी
और नाग गायापति रहना था, जो अन्न धन मे सम्पन्न भारी।
सुपलि सुलमा थी जिगके, उसको एक यात नुनो घर ध्यान ,
वो वाल अवस्था में थी तब, एक नभिक्तिक ने किया निदान।
उस भविष्यवक्ता ने, उसके, यू मात पिता को दरसाया ,
यह कन्या मृत वध्या होगी, मुनमा के हित यू बताया।
फिर हरिणगमेपो देवको उम, वालिका ने की नित्य पूजा
पहले प्रतिमा की मेवा थो, सर काम पोछे होता दूजा।
प्रतिदिन स्नान आदि करके, भीगी साडी को धारण कर ,
-
१

[१७] हुया भारी, . - फल चढा घटनो को टेक, वन्दन करती थी भावना घर । उमको पूजा सुश्रुपा से, वह देव प्रसन्न अनुकम्पा ला एक करी योजना, जिसकी यह लीना सारी। उस ही प्रभाव से महारानी, तूम और सुनसा दोनो नारी एक साथ ही ऋतु मती होती और साय ही होती गर्भ धारी। एक साथ गर्भ पालन करती, बच्चे भो साथ जन्मते थे, तेरे तो मुन्दर होते लाल, उसके मृत बच्चे होते थे। उसके मृत बच्चो को लाकर, वो तुरत तेरे यहा पहु चाता तेरे बच्चो को ले जाकर, वो देव सुलमा के रख पाता । नौ महिना साढे सात रात, के बाद प्रसव होता था माथ , अनुकम्पा ला सुलसा पे देव ने,, काम किये सब अपने हाथ । अति मुक्तक मुनि के वचन सत्य, कहे प्रभू, देवकी सच मानो सुलमा गाथा पत्नि के नहीं, ये सभी पुत्र अपने जानो । दोहा:-प्रभू के मुख से देवकी, सुन सारा विस्तार , हृदय धारण किया, हर्पित हुई अपार । वन्दन कर प्रभ को गई, जहां थे छः अणगार, पुत्र प्रेमवश स्तनों से; वही दूध की धार ॥ नैना ऑसू हर्ष के, प्रफूलित सारा अंग । कस टूटी कंचुकी की; * तर्ज-राधेश्याम वर्षा की धाग पडने से, ज्यो कदम पुष्प विकसित होता, उन छह पुत्रो को देख २, त्यो रोम २ हर्षित होता। बहुत काल तक रही निरखती, मुनियो को देवकी महारानी फिर वन्दन कर वापिस पहुंची, जहा बेठे थे भगवन ज्ञानी - . में ; आभपण हुये तंग ॥ ।

-- - . [3] ग्रादक्षिण प्रदक्षिा, तीन बार रा को कोना नमार फिर घामिहार पर चद्र देवी सरदारगानगर र# बाहरी शाला के पास में प्रा घोमिाथ गः 37, और ग्रेपने दमयन में या, फिर चंठी गोमर या पर। मन में,मिन्ताम्यान, ग्री- दिनाको प्रमा, प्राकृति पानिपौर पर में गर्ग गात पुती को मेम.. नन और सरी जाये पुष, मि भी मैं अभागिन नानी नही लाट पटाय! रिमा भी. नत्री श्रीटा नैन मित्राने है। ये रानी माता व.दापोर हम दाद पर, उसको भी देवर जन्म दिय , २पन उगाहा निारहा। वो।माग्यशागेमा जो सही : नो, मन मोहनी तोतली बोसी मुने, और तन-पान की है। मा मा फे शब्द वोमो मन में गत माने, वे भोने बाता - मीठं बोल, तुनते, शब्दा में समझाने । पोमन में मन हायों में, 2 मोती की मेलिनी नहलाती, नागे गाती हैगरि निल बर देतो ।। मै अधन्या '; मायामा हार नही पा' इस तरह की जिप दही पान न करे मनु माः। टोहा:-रतने में ही स्नान कर, बन्ना भूपग धार । चरण वन्दने प्रागरे, पाश्री- मुता ॥ चिन्तित देवी मान को, चिन्मय हो नदलान्न । प्रथम चाग पन्दन किया.फिर पछतत्काल ॥ अबतक मुझको देसकर, हर्षित होती मान । अाज उठानी यो रही, प्रस्ट, महो मा बान-11-. ३ . - । [१६] . AIDIEI RAMA IPTIMIN TE r . FATातर्ज राधेश्यामाका देवकी। कहे हे पुत्र ! सुनो। मुझसे जन्मे है सोत बाल प्राकृति कान्ति वय मे समान, नल कुवेर से है सारे लाल । उनमे से एक का भी मोहन, नहीं वाल, क्रीडा, से नाता है त स्वयं चरण, वन्दन को कृष्ण, छह छह महिने मे आता है। इमलिये समझती हूँ कि धन्य वे माताए, पुण्यशाली हैं। बाल क्रीड़ा के ग्रीनाद का जो पुण्य से अवसर पाली है। माता होकर अवन्याहू पुण्य कम, से, हेटो बम इसी बात के सोच में हूँ, और उदासान हो वठी ह..। श्री कृष्ण कहे चिता डो, मैं आनध्यान मिटाऊगी मेरे एक छोटा भाई, मै ऐसा उपाय लगाऊंगा। "प्रिय मधुर वचनो से फिर, माता को, धर्य बधाया है, वहा से चलकर फिर, श्री कृष्ण, पोपधशाला, मे आया है, अष्टम भक्त तप, जिस प्रकार की अभयकु वर ने ठाया था.. अपने मित्र का किया सराधना देव, लोक, से पाया था। बस इसी तरह श्री कृष्ण ने भी यहा तप तेले, का ठाया है., और हरिणगमेषिदेव के हित, आराधन मे चित्त लाया है। हो गया तुरत हाजिर प्रा देव, श्री कृष्ण से बोले क्या चहिये,, क्यो याद किया, मैंहू हाज़िर, अब मन का मनोरथ झट करिये।।। श्री कृष्णः कहे कर जोडा केतिब, 'हे देव, मेरी , चिता चूरो), मेरे हो सहोदरा भाई। एक , इस इच्छा को। जल्दी पूरो।। दोहा-मदेवलोक से देव. एक करके आयु समाप्त, । यहां सा होगा आपका, लघु"सहोदर " भ्रात । T-बाल अस्था पूर्ण कर, युवा अवस्था मांय, {{ अरेष्टनेमि प्रभू पास में मुंडित होगा जाय । 11TET -- - - -

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[:.]
पुनः पुनः कह शब्द ये. में वांछित बग्दान,
हरिणगमपी देर फिर, पहचा अपन म्यान ॥
र तन-गवेश्याम -
तेले का तप पूर्ण के पीपणाला मे चल पाये;
महारानी देवकी नगी तो, वन्दन कर बताये।
माताजी चिना यो छोटी, नधु ब्राता मेरे होगा ,
मन इच्छिन फन नुम पायोगी, वा जन जन का मन मोवेग ॥
इस तरह उष्ट और प्रिय मनाहर, वचनो न मतार दिया ,
मनोनुकून ग्राशा को पूर्ण कर श्री गण ने अपना स्थान किया।
पुण्यशालो जिम पर गोते हैं, रोगी मुग भय्या नामानी ,
मोत मे मिह का पान नगा झट जागत हो गई महागनो ॥
वसुदेव ने मारा हान पहा, इन्टिन फन का मोन मिना ,
वो गभं का पालन करने लगी, हष्ट तुष्ट मन अति सि ।
नौ महिने मारे मात दिवम, के बाद एक न बन जाया ,
जपा कुमुम, बन्धुत पुष और पारिजात मा मुपदाया ।।
जो मुर्योदय को प्रभा ने मम, पीर लक्षा रस के गम जानो ,
गज तान के मम नु मन, वो नयन हरण मुन्दर जाना।
मेघ पु वर ममान ही, दनरा भी जन्मोत्सव पीना,
गज तालु मम लय मुकामल, गजमुमाल नाम दाना ।।
बचपन मे गायन नप का हान, बम मेघावर सम जानो
मव विद्या में परिपूग हुए, ज्यू चटनी ज्योति कला मानो ,
दोहा-उसी समय उम काल में, द्वारिका नगर मंझार .
सोमिल ब्राह्मण एक था, वैभर पति अपार ।
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद लिया जान ,
अथवेट टन चारों का मांगोपांग निधान ॥

[२१]
-: तर्ज-राधेश्याम :-
उस ब्राह्मण की पत्नि का नाम, था सोमश्री अति सुन्दर थी
एक कन्या थी सोम। उसके, उससे भी अधिक सुन्दर थी।
प्राकृति और लावण्य मे तो, उत्कृष्ट ही रूपवतो मानो ,
यो पाचो इन्द्रिया परिपूर्ण, अव्वय से शोभा वति जानो।
एक रोज वह सोभा वालिका, स्नानादि कर सज सिणगार ,
वस्त्र भूपण से अनकृत हो अनेक दामियो को ले लार ।।
राज मार्ग पर चलकर आई, म्वर्ण गेद को रही उछाल
मभी दासिया खिला रही है, य. भी फेक रही तत्काल ।
उसी काल उस समय मे देखो, नगर द्वारिका के दरम्यान
अहोभाग्य से आ गये विचरते, श्री अरिष्ट नेमि भगवान ।।
धर्म कथा सुनने को परिषद, चहु दिशा से दौडी आई ,
श्री कृष्ण ने सुना आगमन, लगन लगी दर्शन ताई।
स्नान करो वस्त्राभुषण से अलकृत हो गज असवार ,
लघु भ्राता गजसुखमाल को, भी ले 1 अपने लार ।।
कोरण्ट फुलो की गले माल, और छत्र चामर शौभा पाये ,
दर्शन करने को श्री कृष्ण, अव नगर बीच होकर जाये ।
उस राज मार्ग मे खेल रहो सोमा को कृष्ण ने दे । लिया ,
रूप लावण्य कान्ति यौवन ने हरीजी के मन को हरण किया ।
तिर तुरत बुलाया सेवक का, हे देवानुप्रिय ! झट जावो,
कर कन्या याचना सोमिल से इसको अन्त पुर पहु चानो।
कहना कि आपकी यह कन्या, यादव कुल मे जा सोवेगी
गजसुकुमाल कु वर की वहा, यह जाके भार्या होवेगी ।
प्राज्ञा पाते ही चला तुरत, सेवक श्राया सोमिल के पास ,
श्री कृष्ण ने जैसे कहा था, वैसे ही करदी अरदास ।
-

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[२३] भासन अरिष्टनेमि के पासमे, दीक्षा ही लेना चहाता हूine टोहा:-श्री कृष्ण, वसुदेव जी, और देवकी 'माय :-TGHT PIRTFFIF प्रतिकूल अनुकूल सन, मात बता समझाय IF 187 पर नही मानी-एकाभी, गनसुकुमाल जी,बात, ETTE साताव्होके अममर्थफिर, यू बोले अब तात ।। ही मार तज-राधश्याम * ही PFF हे पुत्र ! हमारी एक इच्छा, वो तुमको, अव बतलाते है , राज सिंहासन- बिठा तेरी. राज्य श्री - देखना चाहते हैं। इसनिये एक दिन ही के लिये, तुम रापय लक्ष्मी को स्वीकारो, यही हम सबकी इच्छा है, इसको तुम हरगिज मत=ट रो माता-पिता, भाई-- का. जब- अनुरोध- देख. चुप - रहते है, बडे समारोह से इनका फिर, राज्याभिपक कर देते है गज सुकुमाल वने राजा, तुम सबही के मन . भाते हो... अब माते पिता पूछे हे पुत्र ।, बोलो तुम अब क्या चाहते हो। मैं दीक्षा लेना चाहता हूँ , यही प्राज्ञा झट तैयारी करी महाबले के सम दीक्षा धारी और त्याग यो वैभव सगरो'। ईर्या समिति आदि से युक्त, तप जप संयम के धारी गज सुकुमोल जी इन्द्रियवश कर , हुये गुण्त ब्रह्मचारी है। जिस दिन दीक्षा ली उस दिन ही , मुनि चौये पहर मे आते हैं, तीन बार वन्दन कर प्रभ को , मन के भाव -दरमाते है। भगवन-!-मापकी प्राज्ञा-होतो मम इच्छा चरणो मे धरू: महाकाल-श्मशान मे - जा , भिक्षु प्रतिमा स्वीकार करू :-- अरिष्ट नेमि भगवन, बोले , देवानुप्रिय .. यही, है कहना जिसमे सुख हो वही शीध्र करो, शुभ काम में देरी नहीं करना । याज्ञा पा वन्दन' किया तरत उद्यान से बाहर चल आये हे क [२४, - . . श्मशान मे या प्रामुक भुमि को , प्रतिलेखना भट ठाये ! कायोत्सर्ग करके सटे हुये , काया से कुछ नीचे नम कर , चार अ गुल अन्तर पर रो , और दृष्टि रही एक पुद्गल पर ! एक रात्रि का भिक्ष पडिमा , स्वीकार करी है शुद्ध भावे , ध्यानस्थ सडे है अाडग मुनि , नहीं और कही दृष्टि जावे ! मनि के श्मशान में आने से , पहले सोमिल ब्राह्मण पाया , समिध सामग्री लाने को, इस रास्ते से आगे घाया। हवन के हित कुश, डाभ लिये, इम और ही वो वापिस पाया जब दृष्टि पटी श्मशान और तो , देख मनि आश्चर्य पाया । फिर पास में प्राके देसा ता , वो गज मुकुमाल खडा यहा पर जागृत हो गया पूर्व 41 वर , वो बोला क्रोध मे झट पाकर । अरे । यह तो वहा है निर्लज्ज, श्री कान्ति रहित मृत्यु का ग्राम पूण्य हीन दुर्लक्षण है , दे दिया सुता को व्यथ ही ग्रास । अग जात मेरी मोमा , यावन वय मे और है निष्पाप निष्कारण ही उसे छाड दा, और बन गया साधू पार । है उचित मुझे बदलालू इससे , यो विचार लगाता है चारो दिशाग्रो मे देखा , कोई इधर न प्राता जाता है। पास ही तालाब मे जा कर के , गीलो ट्टिी लाया तत्काल , गजमुकुमान्न मुनि के सिर पर , उम मिट्टी को वाची पाल । पास मे एक चिता जल रही थी, उसमे से अ गारे लाल , एक ठोकरे मे भर लाया , दिये मुनि के सिर पर डाल । मझको कोई देख न ले , फिर इस भय से भागा उस वार, जिम दिशा से आया था बम उमो दिशा में पहुचा जार। खीचडी. सीजे हाडी माय अस्य अनंती वेदना, सह रहे हैं मुनिराय । - - दोहा-खढवट २ - [२५] नसें फटी तड तड कटी, वो सुकुमाल शरीर , जान्युल्य मान और दुःखमपी, उत्पन्न हो गई पीर !! तर्ज-राधेश्याम पहचान लिया था सोमिल को, फिर भी ममता का रस पीना , समभावो मे रमण किया , नही कोच लेश मात्र कोना । शुभ अध्यवसाय परिणामो से फिर काट दिया कर्मों का जाल , अनन्त, अनुत्तर, निरावरण फिर , पाया केत्र न ज्ञान विशाल । गजसुकुमात कर्म क्षय करके , उमो समय विशुद्ध हुये , लोका लाक को देख लिया फिर , सिद्व बद्व और मुक्त हुये कम विकार से दूर हुये , ओर सभी दुखो का कीना नाश , एक दिवस को सयम पाला , मोक्ष पुरो कर दीना वास । वहा समीपवर्ती देवो ने, उस समय विचार लगाया है , चारित्र का सम्यक् अराधन इन , गजसुकुमाल ने ठाया है। यो सोच सुगन्धित और अचित , जल से भूमि सरसा दोनी पाच वरण के अचित फल , और वस्त्रो की वर्षा कीनी । दिव्य मधुर गायन हो रहे है ओर वाध्य की ध्वनि अपर वैक्रिय शक्ति थी देवो की, गूज उठा नभ म झनकार । ईधर दूसरे दिन दीक्षा के सूर्योदय हा जाने पर सानादि कर श्री कृष्ण , अलकारो से स कौरप्ट फूलो की माला युक्त वो , छत्र शीस 7र सोहता हे बीजाते है सुभट का दल सग होता है। श्री कृष्ण द्वारिका नगरी के , उस राज मार्ग से चल पाये , अरिप्ट नेमि भगवन के दर्श को , आज चले हे हरपाये । तर नगर बीच देखा उनने , एक वृद्ध टु खी अति जरजर था, ओर विशाल ई टो का ढेर पडा , एक उसो मार्ग के अन्दर था। , धज कर। - . श्वेत चामर [२] वार, . फिर प्रभू वह वृद्ध उठाकर एक ईट , अन्दर घर में ले जाता था एक उठा रख आता या , फिर पाकर एक उठाता था। श्री कृष्ण को अनुकम्पा आई , एक ई ट उठा रथ दी निज हाथ , अन्य लोग सब लगे उमी क्षण , सभी ई ट उठ गई एक साथ । इस प्रकार श्री कृष्णचन्द्र के , ईट उठाने से उस वृद्ध पुरुष के चक्कर बच गये , दूर हो गया कप्ट अपार । फिर द्वारिका नगरी मे होकर , भगवन् के पास मे आये है अरिष्ट नेमि प्रभु को वन्दन कर , अपने भाग्य सराये है। नव दीक्षित गजमुखमान मुनि पार ल सहोदर भ्राता को वन्दन करने को इच्छा से , अब देख रहे है इत उत को से बोले हे स्वामी । गजमुखमाल को देख न पाता हूँ कर कृपा बतावे वह कहा है ? मै वन्दन करना चाहता हूँ। तव प्रभू कहे हे कृष्ण सुनो , उन गजमुखमाल मुनि जन ने जिस आत्म अर्थ हित दीक्षा ली , उसको सिद्ध कर लीना उसने आश्चर्य चकिन हो पूछ कृष्ण हे प्रभ । कृपा कर बतलायो कैसे अर्थ को सिद्ध किया मुनिवर ने, मुझको फरमायौ। इस तरह पूछने पर हरि को, भगवान् ने फिर यू फरमाया। कल दीक्षा लेने वाद मुनि यहा, चौथे पहर वन्दन पाया । वन्दन कर इच्छा प्रकट की यो भगवान् जो प्राज्ञा पाता हूँ । एक रात को भिक्ष प्रतिमो हित, श्मशान मे जाता हूँ। 'जिसमे सुग्व हो वैसा ही करो' ये वचन कृष्ण जब मैंने कहे। श्मशान मे जाकर वे मुनिवर फिर, ध्यान नगा कर खडे रहे ।। हे कृष्ण उस समय एक पुरुप, आया ओर देखा जव अरणगार। पूर्व भव का बैर जग गया, उसे क्रोध झट चढा अपार ।। तालाब से मिट्ठी लाकर के मुनि के सिर पर फिर बाबी पाल । मिठ्ठो के ठोकरे मे डाले, एक चिता से ले अग रे लाल ।

[२७] , उन अत्यन्त लाल अगारो को, उमने झट सिर पर डाल दिया अत्यन्त वेदना सही मनि ने, पर नही किंचित रोष किया। शुभ परिणामो से पा केवल, फिर गजमुखमाल ने मोक्ष लिया ।। इसलिए ही मैने कहा कृष्ण, उनने निज कार्य को सिद्ध किया ।। कहे कृष्ण बतायो नाथ मझे, वो पुरुप कोन सिने मारा । लज्जा रहित वह पापा कोन, जि-ने मृत्य को ललकारा॥ मेग सहोदर लघु भ्राता, गजसुखमाल मुनि का घात । अकाल मे ही प्राण लिये हे, कौन बताया जल्दी नाथ । भगवान वाले उस पुरुष के ऊपर, कोध करो मत गिरधारी । मोक्ष प्राप्त करने मे मुनि को, उसने सहायता दी भारी ॥ दोहा-किस प्रकार दी सहायता, शीघ्र बतायो नाथ । श्री कृष्ण यू पूछते, प्रभू से जोडी हाथ ।। प्रभू कहे तू आ रहा, मुझ बन्दन हित आज । दूल वृद्ध की ई ठ रख, दिया ज्यों उमको साज ।। तर्ज-राधेश्याम हाथी पर बैठे बैठे ही, एक ईट एक ईट रखा अनुकम्पा ला। सारी ई टो का ढेर उठा, उस वृद्ध का सारा दुख टला ।। बस इसी तरह लाखो भव मे, सचित कर्मों के बन्धन का। क्षय करने मे दया योग, उस भाई ने इन मुनिजन का।। श्री कृष्णचन्द्र फिर यू पूछे, हे प्रभू । इतना तो दरसायो। उस पुरुष को कैसे जान सकू गा, मुझको यह तो फरमायो ।। हे कृष्ण अभी यहाँ, से जाकर, जेव नगर प्रवेश करागे तुम । तुम्हे देखते ही जो पुरुष वम खडा खडा हो जावे गुम ।। आयु की स्थिति क्षय होने से, होगा प्राप्त मृत्यु पो वह । 1 -- ॥

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[२६]
फिर वहा से चल कर श्री कृष्णचन्द्र, अपने महलो मे पाया ।
सिद्धि गति को प्राप्त वोर ने, अतगड दशा सूत्र के अठवे अग।
तीजा वर्ग अष्ट अध्ययन मे, कहा हे जम्बू ? सारा प्रसग ।।
दोहा:-किर सुधर्मा स्वामी से, कहे जम्बू अरणगार ।
पाठवें अध्ययन का सुना, आप से सब विस्तार ॥
और कृपा करो नाथ जी, दो मुझको बतलाय ।
प्रभू वीर ने क्या कहा, नवमें अध्ययन मांय ।।
तर्ज-राधेश्याम !
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सुधर्मा स्वामी कहे हे जम्बू ? बस उसही काल उस समय मे जाना
नगर द्वारिका विचरत पाये , श्री अरिप्ट ने म भगवान ॥
वल देव नाम क रामा जहा , जि के श्री धारिणी पटरानी।
अत्यन्त सुकोमन सुन्दर वो , रभा ज्यू रूप मे अगवानी ॥
एक रोज सुकोमल शय्या पर, रानी ने सिह स्वप्ना लखकर ।
पति के समीप जा स्वय कहा, पुण्यवान जन्म लेगा पाकर ॥
गर्म पूर्ण होने ही स्वप्न सम, पुत्र जन्म उत्तम मानो ।
पीर बाल्य काल आदि का वर्णन, गौतम कुमार के सम जानो।
बालक का रखा नाम सुमुख, फिर यौवन अवस्था आने पर।
पचास राज कन्यानो के सग, पाणिग्रहण किया हरपाकर ।।
पचास पचास करोड सोनया, ससुराल से मिला जिन्से ।
सभी वैभ. से परिपूर्ण थे , कभी नहीं थी कोई उन्हे ॥
भगवान् आये है, तो दर्शन को पहु
चे उसवार ।
वाणी सुन वैराग्य हो गया, भट दीक्षा की अगिकार ।
चौदह पूर्व का ज्ञान किया, और बीस बरस की सयम रिद्ध ।
शत्रुजय पर्वत पर जाकर, सयारा कर हो गये सिद्ध ।।
जब सुना
कि

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[३१] उसी द्वारिका नगरी मे , वसुदेव नाम के राजा एक। उनके धारिणी थी रानी, सुन्दर सुकुमाल सुशीला नेक ॥ एक समय मुकोमल शय्या पर, सिंह स्वप्न देख झट उठ आई। पति देव को सारा हाल कहा. पोर गर्भ पालती सुखदाई ।। गौतम कुमार के समान ही, तेजस्वी पुत्र का जन्म हुप्रा । जालि कुमार दिया नाम हर्ष से यवा अवस्था प्राप्त हुआ। पचास कन्यानो के संग मे, विवाह कर दिया उस बारी। पचास पचास करोड सोनैया, मिला डायजे मे भारी ।। एक समय फिर आये वहा पर, श्री अरिष्ट नेमि भगवान । जालि कुमार गया दर्शन को, वाणी सुन कर पाया ज्ञान ।। माता पिता की आज्ञा लेकर, लिया तुरत हो सयम भार । बारह अगो का अध्ययन कीना, सौलह वष दीक्षा सुखकार ॥ गौतम कुमार के समान ही, फिर एक मास सथारा धर । जालि कुमार ने सिद्धि पाई श्री शत्रजय पर्वत पर ॥ दूजे मयालि तीजे उवयालि, पुरूप सेन चौथे अध्ययन । पाचवें मे श्री वारि सेन, इन सबका है एक ही वर्णन ।। पाचो ही श्री देसुदेव और, धारिणी मा के थे अग जात । सव ही ने शुद्व सयम पाला, सिद्धि गति पहुचे सब भ्रात ।। छट्टे अध्ययन मे प्रद्युम्न का, ऐसा ही वर्णन आया श्री कृष्ण के पुत्र हुये थे मा रूक्मिणी ने जाया है ।। सातवे मे श्री शाम्ब कु वर, इनने काटे कर्मो के जाल । श्री कृष्ण के पुत्र थे ये, और माता जामवती सुखमाल । आठने मे अनिरुद्ध कुमार, जो प्रद्युम्न के पुत्र हुये । माता वैदर्भी के नन्दन जो, कर्म काट कर सिद्ध हुये ॥ नवमे अध्ययन मे सत्यनेमि, दसवे मे दृढ नेमि जानो । दोनो के पिता थे समुद्र विजय, और माता शिवा देवी मानो ।। .

इन दश अध्ययनो का वर्णन, जम्बू । एक समान हा है।
कहे सुधर्मा चौथे वर्ग, बीरा में फरमान ही है।
-: पचम वर्ग:
टोहा:--जम्बू कह प्रभू मूत्र ही, दया करी मगरन् ।
चौथ वर्ग के गापसे. मुने है दम अध्ययन ।।
पांच वर्ग के भाव श्रय. दीजे प्रभृ फरमाय ।
स्वामी सुधाक, सुन जम्म! चितलाय ।।
-: तर्ज-राधण्याम :-
इम पाचवे वर्ग में महावीर ने, दम अध्ययन का यहा अधिकार ।
पद्मावती, गौरी, गान्धारी, चौथी लक्ष्मण है मुपपार ।।
सुमोमा, जाम्बवती छट्टो, और सत्यभामा की मानवी जान ।
रूक्मिणी, मूलश्री नवमी, और दमयो मूलदत्ता गुणवान ।।
जम्बू कहे हे नाथ ! यहो अब, पहले अध्ययन वा अनिार।
श्री वीर प्रभू ने जो फरमाया , कहे मुधर्मा अब विस्तार ।
उम ही काल उस समर मे जम्बू ! द्वारिया नगरी के माय ।
राज करे श्री कृष्ण जहा पर, पद्मावती रानी मुखदाय ॥
एक समय वहा आये विचरने, श्री अरिष्ट नेमि भगवान।
श्री कृष्ण दशन को पहुंचे, और करे प्रभू के गुण गान ।।
भगवान् का आगमन सुन करके, हुई हष्ट तुप्ट पदमावती नार।
देवकी के सम आई दर्शन को, धार्मिक रच पर हो असवार ॥
भगवान् ने धर्म देशना दी, सुन रहे राजा रानी नरनार ॥
परिपद् सुनकर लौट गई, पर बैठे हैं श्री कृष्ण मुगर ।।
प्रभू को वन्दन करके कृष्ण जी, एक प्रश्न पूछे यो वाम ।
देव क सम द्वारिका का, किस कारण से होगा विनाश ।।
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[३३] भगवन कहे श्री कृष्ण ? सुनो, यह बारह योजन लम्बी जान ! नौ योजन की चौडी द्वारिका, प्रत्यक्ष है देवलोक समान ॥ इसी द्वारिका का विनाश, तुम सुरा सुन्दरी से जानो । दीपायन ऋषि का क्रोध और अग्नि ही मुख्य कारण मानो। भगवन् से भविष्य जानकर कि होगा द्वारिका का सहार । वासुदेव श्री कृष्ण के मन मे, हुये ऐसे उत्पन्न विचार ।। वो जालि, मयालि, उवयालि, ग्रादि महापुरुष धन्य है आज 11 प्रभू समीप आ दीक्षित हो गये, छोड जगत के सारे साज ॥ मैं अधन्य हू अकृत्य पुण्य जो फसा हुआ हूँ राज्य मझार । मन्त पुर मे मनुष्य सम्बन्धी, काम भोग मे फसा अपार ॥ क्या मैं दीक्षित नही हो सकता, यो हरि ने मन मे विचार किया। अपने ज्ञान से अरिप्ट नेमि ने, कृष्ण भावो को जान लिया ।। थी कुष्ण को सम्बोधित कर, बोले अरिष्ट न मि भगवान ।। यह विचार क्या प्राये मन मे, जिसका हो रहा प्रार्तध्या तुम सोच रहे हो मन मे कृष्ण, वे जालि मयालि धन्य हुये। जो कि सब सम्पत्ति को तज कर, प्रभू के समीप अरणगार हुये ॥ मैं अधन्य हू अकृत्य पुण्य, जो विषय भोग मे नित रमता। राज काज मे फसा हुआ, क्या मे दीक्षा नहीं ले सकता । बोलो कृष्ण ! क्या सत्य है ? यह, यही भाव तेरे मन मे आये। नही छिपो पाप से वात प्रभो 1 , सर्वज्ञ प्राा हरि फरमाये ।। जो कहा आपने सत्य है वो, यही भाव मेरे मन मे अ या । फिर श्री कृष्ण के भाव को लख भगवन् ने ग्रागे फरमाया 11 हे कृष्ण ! सुनो ऐसा तो कभो, न हुआ न होता होवेगा वासुदेव सम्पत्ति तजकर, दीक्षा नहीं ला, नहीं लेवेगा । तव कृष्ण कहे हे प्रभू बतामो, इसका क्या कारण है नाथ । प्रभू कहे हे कृष्ण ? सुनो, हे निदान कृत्य यह सारी बात ।। - ,

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[३५] वही 'अमम' नाम के बारहवे तिर्थ वर का पद पावोगे ।। केवल पर्याय का पालन कर, वर्षों तक सयम ठाओगे। अन्त समय हे कृष्ण चन्द्र ! तुम सिद्ध युद्ध हो जानोगे । यह भविष्य सुन भगवन् मे, श्री कृारण प्रति हप्ट तुष्ट हुये। भूजा ठोक्ने लगे हर्ष मे, अति जोर २ से शब्द किये ।। तीन कदम पीछे हटकर , फिर मिहनाद कीना भारी। प्रभू वन्दन कर चले, परी, अभिषेक हस्ती की असवारी ।। नगर द्वारिका बिचो विच हो, पहुंचे अपने महल मझार । हस्ति से उतर उपस्थान शाना मे, बैठे सिंहासन पर जार । पूर्व की ओर मुख कर बैठे, कोम्बिक जन को बुलवाया। देवान प्रियो ! यह काम करो यू कृष्ण चन्द्र ने फरमाया ।। द्वारिका के चारो ओर. सब चौराहे और स्थानो पर । मेरी एक इस आज्ञा को उद्घोषित करदो झट जाकर ।। हे देवानु प्रियो ! यह द्वारिका, जो देवत्तोक मम दिखती है। वारह योजन की लम्बी है, नौ योजन चौडी बस्तो है ॥ इसका विनाश होगा देखो, अव सुरा, अग्नि मे जल करके । दीपायन ऋषि का होगा कोप, नही सशय जानो तिल भरके ।। इसलिए द्वारिका का कोई, चाहे वो प्राणी नरेन्द्र हो । यवराज हो, स्वामी, मत्री हो, राजा का प्रिय पुरेन्द्र हो । छोटे गाव का हो स्वामी , या दो तीन कुटुम्ब का मुखिया हो। हो रानी, कु वर या कु वरी हो,कोई सेठ हो,दु ग्विया,सुखिया हो । जो भी व्यक्ति श्री अरिप्ट नेमि प्रभू पास जा दीक्षा लेते है। उनको श्री कृष्ण वासुदेव, दाक्षा को प्राज्ञा देते है ।। दीक्षार्थी के पीछे कोई भी , रोगी, बाल , वृद रहेगे। उनके पालन पोषण का भार, श्री कृष्णचन्द्र निज पर लेंगे ।। दीक्षा लेने वालो का दीक्षा, महोत्सव होगा गुग्वकार । अपनी ओर से समारोह का, कृष्ण उठावेगे सब भार ॥ १ -

[३६]]
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इस आज्ञा की दो तीन बार, सब जगह घोपणा कर पावो ।
देवानु प्रियो ? फिर वापिस आ, मेरी आज्ञा को सभलावो ।।
दोहा:--राज सेवकों ने चहु दिशि, उदघोपित किया जाय ।
वापिस आदी
आदी सूचना, श्री कृष्ण हरयाय ।।
इधर रानी पद्मावती, सुना धर्म सुखदाय ।
हष्ट तुष्ट अति भाव से, प्रभू को यू दरसाय ।।
तर्ज—राधेश्याम
हे नाम ! मेरी श्रद्धा ही पूर्ण, निर्ग्रन्थ वचन पर भारी है।
और सत्य आपकी वाणी है, वह तत्व कहे अनुसारी है ।
इसलिये हुई इच्छा मेरी, श्री कृष्ण से आज्ञा ले श्राऊ ।
श्री चरणो मे आकर भगवन् , मैं अब दीक्षित होना चाऊ ॥
प्रभू कहे देवानु प्रिये !, जिसमे सुख हो वही शीघ्र करो।
धर्म कार्य के करने मे, क्षरण का प्रमाद भी नही धरो॥
মমু
को वन्दन कर रानी, फिर धार्मिक रथ पर हुई सवार ।
महल पास आ रथ से उतरी, पहुची जहा थे कृष्ण मुरार ॥
कर जोड कहे हे नाथ ! सुनो, एक अजध्यान मे लाती
भगवन अरिष्ट नेमि के पास, मैं दीक्षित होना चाहती हूँ।
धी वासुदेव ! दो अाजा , मुझे अति हर्प सहित उपकार धरो।
श्री कृष्ण कहे पदमावती से, जिसमे सुख हो वही शीव करो।
कौटुम्बिक पुरुषो को वूलवा श्री कृष्ण कहे फिर समझाकर ।
पद्ममावती के दीक्षा महोत्सव की, करो तयारी झट जाकर ।।
विशाल तैय्यारी करके फिर, मुझे सूचना दो लाकर ।
सब तरह तैयार करके पूण, सेवक ने बतादी भट आकर ॥
इसके बाद पद्ममावती को , हरिजी ने पार पाट बिठलाया ।

[३७]] - - . - एक सौ आठ स्वर्ण कलशो से. स्नान रानो को करवाया ॥ दीक्षा का अभिषेक किया, और सभी सजाये अलकार । पाल्खी मे बैठाया जिसको, पुरुष उढाते एक हजार ॥ द्वारिका के बीचो बीच हो , रैवतक पर्वत पर पाये । सहस्नाम वन था जहा पर , बस वही पालखी उतराये। पद्ममावती पालखी से उतरी, श्री कृष्ण ने अपने आगे लिया। श्री अरिष्ट नेमि के पास फिर, तीन बार या वन्दन किया। फिर कृष्ण कहे हे प्रभो । यह मेरी पद्मावती पटरानी है । इष्ट, कान्त, प्रिय, मनोज्ञ है, और सुन्दर अति सयानी है। मेरे जीवन मै श्वासोस्वास सम , प्रिये और प्रान्नद दाता। गूलर के फूल ज्यो स्त्री रत्न, ऐसा दुलर्भ ही नजर आता। ऐसी पद्मावती देवी पर , हे नाथ ! आप उपकार घरें । शिष्या रुप भिक्षा मेरी , हे नाथ ! आप स्वीकार करें । सुनकर के प्रार्थना हरीजी की , प्रभू ने फरमाया है उस वार । हे देवानुप्रिय ? जिसमे सुख हो, वही काम शीघ्र करने मे सार ।। दोहा:-फिर पद्मावती देवी ने, ईशान कोण में जार । अपने हाथ से वस्त्र और, भूपण दिये ऊतार ॥ पच मुष्टक लोचन किया, केशों का निज हाथ । वहां से आ भगवान को, तुरत नमाया माथ ॥ तर्ज-राधेश्याम मरिष्टनेमि को वन्दन कर, पद्मावती बोली उस वारी। इस जग मे जन्म, जरा औ,मरण दु,ख को अग्नि जल रही भारी॥ इस दुख से छटने को रवामो , मैं दीक्षा करती हैं स्वीकार। कर कृपा प्रवजित करे मुझे, प्रभू चरित्र धर्म सुना इसवार ।। - -

[2]
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३
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प्रभू ने पद्मावती देवी के, लय भाव म्प प्रजित किया।
और मुद्रित करो तुम्त वहीं , यक्षिणी प्रार्ग को मोर दिया।
महा मतियों ने प्रनित कर, पद्मारती को अपन मग लो।
सयम प्रिया मे मावधान रहने की, फिर हित दिक्षा !!
गुरुणी जी की प्रानानुगार , पद्मावती मयम में चलती।
ईर्या और पान नमिति युक्त वर, ब्रह्मचर्य पालन करती ।।
ग्यारह अग का अध्ययन पर, नपस्या में तन को लगा दिया।
उपवाम में पन्द्रह तक कीने, गई माम मगनी पूर्ण किया ।
वीन वर्ष ता पद्मावती, प्रार्या ने , रायम पानन पर।
एक माम सवेलना की, और माठ भक्त अनगन का घर ।
जिस मोक्ष के हित सयम लीना, उमा हो वस पागधन र ।
अन्तिम श्याम के बाद, मिद्ध पद पाकर वह हो गई मर ॥
यो प्रथम अध्ययन के भावो को, मुधर्मा जी ने बनाया।
जम्बू मुन कृत कृत्य हुये, और फिर आगे 7 दरमाया ।
वीर वचन सुन श्री मुन ने हे प्रभो ! बहुत आन्नद प्राया
कहे कृपा दूसरे अव्ययन मे, हे नाथ ! कहा क्या फरमाया ।
स्वामी सुधर्मा फिर बोले, हे जम्बू ! मुनो लगाकर ध्यान ।
वही काल वही नगर द्वारिका, जहा रेवतक पर्वत जान ।
उस पर्वत पै नन्दनवन , उद्यान विशाल मनाहर था ।
श्रो वृपण जहा पर राज्य करें, रानी, गौरी का प्रियवर या।।
एक नमय श्री अरिष्ट नेमि, उन नन्दन वन मे आये ये
भगवन के दर्शन वन्ने, को श्री नागण भी वहा पटाये ये ॥
दर्शन की प्यामी परिपदा के, मन मे प्रति छाई उमाई थी।
पद्मावती सम गोरी रानी भी, दर्शन करने ग्राई थी।
धर्म कथा सुनकर प्रभू में फिर जनता लौटी हरपाकर।
वासुदेव श्री कृष्णचन्द्र भी , महलो मे पहुचे पार ।।

[३६] 1 रिद्ध। , ? पर गौरी रानी ने प्रभू को , सयम की भावना दूरसाई । पद्मावती सम प्रवजित हो, निज कर्म काट शिव गति पाई। दोहः-गान्धरी, लक्षमणां, सुसीमा, जाम्बवती सत्यभाम । रुक्मिणी आदि कृष्ण की, थी पटरानी तमाम || आठो ही पटगनियां, त्यागी सारी प्रवजित हो एक सम, अन्त हुई सब सिद्ध ।। तर्ज-राधेश्याम पाठो रानी के आठ अध्ययन , इस तरह प्रभू ने फरमाये। स्वामी सुधर्मा कहे हे जम्बू !, वही भाव यहा दरसाये ॥ फिर जम्बू कहे नाथ कृपाकर, नवमा अध्ययन फरमायो। श्री वीर ने क्या फरमाया है, कर कृपा मुझे भी बतलायो । हे जम्बू ? था वही काल और उसी द्वारिका नगरी वाहर । रैवतक पर्वत वही नाभी , वही नन्दनवन था सुखकार ।। श्री कृष्ण ये राजा जहा, थो जाम्बवति रानी गुणवर । शाम्ब फुवार थे पुन जिन्हो के, जो सर्वाड ग से अति सुन्दर ।। उस शाम्ब कुवर की रानी एक, थी मूल श्री अति सुखकारी। सुन्दर थी और कोमलागी यो, सब ही को इष्ट और प्रियकारी ।। एक समय श्री अरिष्ट नेमि, वहा विचरत विचरत आये थे। मूल श्री भी गई दर्शन को , श्री कृष्ण भी धाये थे ॥ वाणी सुनकर सब लौट गये , पर मूल श्री प्रभू पै पाई। श्री कृष्ण की आज्ञा लेकर के, सयम की भा-ना दरसाई ।। शाम्ब कुवर ने पहले ही , दीक्षा लेली मन चाई थी। इसलिये श्वसुर श्री कृष्णचन्द्र की, याज्ञा को दरसाई थी।। जिसमे सुख हो वही शीघ्र करो, प्रभू ने यो तुरत ही फरमाया। - .

(४० - - देख जम्बू पद्मायती राम श्री मल श्री ने, गयम जिव पर पाया ॥ शाम्ब कुवर पो एक पौर, श्री मात्र दत्ता हमरी नारो। मूल श्री मम गयम ले, उगने करती उगने करगे मुक्ति प्यारी॥ इस तरह पाचवे वर्ग के तुम, ये दम प्रध्य न पूरे मानो। जो भाव प्रभू ने रमाये, है जम् अाज की नुम जानो।। छटा वर्ग दोहाः-पंचम वर्ग के भार मुन, जम्मु अति हरपाल । छड़े वर्ग में क्या कहा, म्वामी दो फरमाय ।। की मारना; चोले सुधमा बाम । मोलह अध्ययन इसमें कहे जिन नाम ।। * तर्ज-गधेश्याम * मवाई, किदूम, मुद्गरपाणि, काश्यप, क्षेमक, ति घर जानी। फलाम, हरिचन्दन, वारत्त, सुदर्शन पूर्णभद्र मानो।। सुमनभद्र मुतिष्टित, मेघ अतिमुक्त प्रलक्ष्य सुनान । यो सोलह अध्ययन दरमाये, छठे वर्ग में किया बयान ।। जम्बू कहे हे नाथ ! प्रथम अध्ययन में , या वणन पाया। श्री सुर्यमा पहे मुनो, प्रा चोर ने ऐमा फरमाया ।। उसी समय उस काल मे जम्बू राजगृही नगरी दरम्यान । घोरिएक राजा राज्य करे, गुग मोलक नामक था उत्यान ।। उस नगरी में मट्वाई नाम का , गाथा पनि रहता था एक । अन्यो से अपरा भूत था, समृद्धिशाली बहत हो ने ॥ उस ही काल उग र मय में प्राये, धर्म ग्रादि करने वाला गुण शोलक उद्यान में ठहरे, वीर प्रभू ग उजियाले ॥ भगवान का प्रागमन सुनकर के, दर्शन को मक्का मन पिघला। . , .

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[४१]
भगवती सूत्र मे गगदत्त ज्यू , मकाई दर्शन को निकला।
वाणी सुन वैराग्य हुमा, घर बार पुत्र को सभलाया।
हजार पुरुष की शिविका मे वो , वैठ के सयम हित पाया ।।
भगवन् के पास मे आकर के, अरणगार बन गये मकाई।
अध्ययन किया ग्यारह अङ्गो का , स्थविर जनो मे चित लाई ॥
स्कन्दकजी के समान ही , गुण रत्न, तप, सथारा धार ।
सोलह वर्ष दीक्षा पालन कर, विपुल गिरि गये मोक्ष मझार ।।
इसी तरह दूसरे अध्ययन मे, किड्डम का वर्णन आया ।
श्री म काइ सम दीक्षित हो, विपुल गिरि शिव सुख पाया ॥
दोहाः -~-अध्ययन सुनकर कहे, श्री जम्बू अणगार ।
श्री वीर ने जो कहा, सुना वही अधिकार ॥
अब तीसरे अध्ययन के प्रभ, देखो भाव फरमाय ।
स्वामी सुधर्मा यू कहे, सुन जम्बू ! चितलाय ॥
तर्ज-राधेश्याम
उस ही काल उम समय मे जम्बू , राजगृही नगरो सुखकार ।
गुणशीलक उद्यान जहा पर, राजा श्रेणिक बडे उदार ।।
जिनके थी चेलना महारानी, सुख वैभव सदा बरसता था।
उस ही नगर मे अर्जुन नाम का एक माली भा रहता था ।
बन्धुमती पनि उसके , जो अत्यत ही सुन्दर सुकुमार ।
विशाल बगीचा एक था उस, अर्जुनमाली के नगरी बहार ॥
नीले पत्तो से आच्छादिता था, घन घोर घटा ज्या लगता था।
पाच वर्ग के फुल खिले, लखते ही प्रसन्न मन करता था ।।
उस बगीचे के पास मे ही एक यक्षा यतन अति प्रियकारी ।
कुल परम्परा से सब ही जिसकी , सेवा भी करते भारी ।।

[४२]
वह पूर्णभद्र के ममान पुराना, दिव्य, मत्य अति मुन्दर था ।
मुदगरपाणि नामक था यक्ष, कर मे एक भारी मुदगल था ।।
अर्जुन माली बात्य काल से, उसमक्ष की मेा करता था।
कत की छाबड़ी लेकर नित नगरी बाहर निकलता था।।
उपवन मे ग्रा फुनो को चून, वह छावडी मे भर लेता था।
उममे मे अच्छे श्रेय फल चटा यक्ष के देता था।"
दोनो घूटनो को टेक नमे , नित पूजन करता था भारी।
फिर राजमार्ग में फल बेचकर, जीवन विताता सुखकारी ।।
उस राजगृही नगरी मे थी, एक लनिता नामा मित्र मण्डली ।
अत्यन्त समृद्वि शाली, और, पापम मे प्रति मिली जली ॥
एक समय राजा का काय कोई , मण्डली ने पूर्ण कर दिया।
राजा ने प्रसन्न होकर तब मे, इनको स्वतन्त्र स्वच्छन्द किया ।
इच्छानुमार करते थे पाय, नहीं राज्य दण्द को पाते थे।
इलिये बढ़ा माहम उनका, अपनी मनमानी चलाते थे।
एक समय गजगृही नगरी मे, उत्सव की घोषणा हुई उस वार ।
क.. खूब होगी फलो की विश्री, यो अर्जन ने किया विचार ॥
प्रात कान होते ही पहुँचा , बन्दुमती पनि ले संग।
दोनो ही चुन रहे फल छाबडी मे, थी मन मे अति उगम ।।
उम ममय उस लरिता गोष्ठा की ,छ मित्रो की टोली ग्राई।
मुद्गर पाणि के यक्षायतन मे, क्रीडा कर रहे मन चाई ।।
इधर से अर्जुन माली भी , उत्तम फूलो को ले उस वार ।
पूजा करने पाया यक्ष की, ले अपनी भार्या को लार ।।
उन छ ही गोष्ठी पुरूपो ने, फिर इनको देख यू किया विचार।
अर्जुन को लुढकादें वाधकर , और भोगें
यह सुन्दर नार ॥
टम तरह सोच कर छ ही मित्र , उस द्वार के पीछे पाते है।
श्वास रोक निश्चल मे हो, चुपचाप खटे हो जाते हैं।

[४३]
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दोहा:-बन्धुमती को संग ले, आया यक्ष के धाम ।
दोनों घुटने टेक कर, अचुन को प्रणाम ।।
मोका देव छहों मित्र ने, किया अर्जुन पे वार ।
औंधी मुश्की बांधकर, एक तरफ दिया डार ।।
तर्ज-राधेश्याम
फिर अर्जुन के सामने ही , उस बन्धुमती को पकड़ लिया।
छही मित्रो ने मिलकर के , उससे मन माना भोग किया ।
बन्धा हुमा होने से अर्जुन , परवश हा रहा था उम वार ।
दे 1 देख हो रहा दुखी, और मन मे पाया एक विचार ॥
इस मुद्गर पाणि यक्ष की मे, बचपन से ही सेवा करता हू ।
सव काम वाद , मे करता हूँ पहले या इसको नमता है ।।
सन्देह है ऐसे दु.ख मे भी, नही इसका मिला सहारा ह ।
इससे नहीं हाजिर यक्ष यहा, यह तो बस काष्ठ का मारा है ।।
जब मुद्गर पाणि यक्ष ने जाने, अर्जुन के मन के ये विचार ।
तड तड तोड़ दिये सब बन्धन, प्रवेश हुआ अर्जुन मे जार ॥
प्रविष्ट यक्ष के होते हो , अजु न म वह शक्ति आई ।
एक हजार पल के मुदगर को , लिया तुरत हायो माई ।।
बन्धुमति के सहित छ ही , गोष्ठिक पुरूषो को मार दिया ।
राजगृही के वाहर सात नित , मनुष्य म रना शुरू किया ।
नगरी में भय चर्चा फैली राजा के कानो तक पाई।
सेव , पुरूपो को बुला तुरत ही, फिर यह डू डी पिटवाई ।।
यक्ष से अाविष्ट हो अजुन, नित सात व्यक्ति के प्राण हरे ।
उसके हाथ से कितने ही , इस नगरी के नरनार मरे ॥
इसलिये अगर हो जीवन प्रिय, तो नगरी बाहर मत जावो ।

[४४]
उम
1
घास, काष्ठ, फल, फूल, और पानी जगल मे मत लायो।
यदि कोई निकला बाहर तो, तुरन्त ही होगा देह विनाश
यही घोपणा कर देवानु प्रियो ! प्रावो झट मेरे पास ।
राजा की आज्ञा पाकर के, चहुँ दिशि मे घोपरगा करवाई,
सूचित किया राजा को वापिस, राज्य पुरुप ने भट पाई।
राजगृही नगरी मे
एक, थे सेठ सुदर्शन गुणधारी
ऋद्धि सम्पन, अपराभूत, श्रमणोपासक श्रावक भारी।
जीवादिक नव तत्वो के जो, थे ज्ञाता प्रात धुद्विमान ,
उसही काल उस समय मे पाये, विचरत वहा वीर भगवान ।
गुणशिलक उद्यान मे टहरे, जनता सुनकर हरपाई
राजमार्ग प्रादि स्थल पर सब, चर्चा करें आपस माई।
जिनका गोत्र श्रवण ही सबको, सदा महाफल दाता है
फिर दर्शन वाणी सुनने का , पार कहा तक आता हैं।
लोगो मे यह फैली बात , जब सेठ सुदर्शन ने जानी
भगवन् के प्रति अनुराग जगा . और दर्शन की मन में ठानी।
फिर माता पिता के पास मे आये, हाथ जोड कर कहे उसवार ,
महावीर भगवान पधारे गुणशिलक उद्यान मझार ।
हे माता! पिता । आज्ञा दो मुझे , दर्शन करने जाऊगा ,
वन्दन और नस्कार कर के, मै प्रभू को शोश नमाऊ गा।
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दोहा:-माता पिता कहे प्रेम से, सुनों पुत्र एक बात ।
नगर बाहर अर्जुन न करे, नित जीवों की घात ।।
न जाने कोई विपत्ति;
आ जावे तत्काल ।
अतः यहीं से वीर को, वन्दन करलो लाल ।।

- [४५, * तर्ज—राधेश्याम * सुदर्शन कहे हे मात ! पिता ? , जब भगवन् यहा पधारे है यही विराजित है स्वामी , और समवशरण भी धारे हैं । तव यह कैसे हो सकता यही से वन्दन करू वहा न जाऊ इसलिये अाज्ञा देदो मुझको , वही जा सेवा करना चाऊ । अनेक युक्ति से मात पिता ने, बहुन पूत्र को समझाया , पर ही माना मुदर्शन तब , अनिच्छा से यू फरमाया। जिसमे सुव हो वैसा ही करा , यह आज्ञा सुदर्शन ने पाकर स्नान किया शुद्व वस्त्र धार , वो चला दर्शन को हरषा कर । राजगृही के बीचो बीच हो, पै.ल पैदल जा रहे थ यक्षायतन के पास पास हो , गुणशिलक मे पा रहे थे। यक्ष मे अाविष्ट अर्जुन ने , जब देखा सुदर्शन को उसवार , मुद्गर धुमाता पाया सेठ ढिग, तन मे छाया क्रोध अपार । अपनी ही तरफ आता है यक्ष , यह सुदर्शन ने देख लिया , पर नही हुये भयभीत जरा न बास, क्षोभ, उद्वेग किया। सम्भ्रान्त और विनित न हुये, निभय हो वस्त्र का अचल धर , भूमिका प्रमाजन कान, मुख पर उत्तरासग धारण कर । पूर्व दिशा को मुख कर के, वाये घुटने को ऊचा लिया हाथ जोड कर मस्तक पर अजलि पुट रख य ध्यान किया। नमस्कार अरिहन्तौ को जिन मोक्ष मे डेरे कर डाले और नमस्कार महावीर को हो, जो मोक्ष मे हे जाने वाले । जिन से पहले ही लिये हुये , मैं पाच अगवत पालता हूँ , उन महाबोर को माक्षी से, यावज्जीवन व्रत ये धारता हू । प्राणातिपात, मृषा, अदत्त, मथुन, परिग्रह आदि सताप क्रोध, मान माया और लोभ , मिथ्या आदि अठारह पाप । प्रशन, पान, खादिम, स्वादिम, यावज्जीवन त्यागू चारो आहार, . ~ . - [४६] . - . मरण पाऊतो त्याग मेरे और बच जाऊ तो मत्र ग्रागार। इस तरह से उपसर्ग पाने पर , मागारी अनशन धार लिया , मन मे निश्चय करके बैठे, प्रभू के चरणो का ध्यान किया। इसके बाद अर्जुन माली , एक हजार पल के मुद् गर को पाया घमाता हुया सेठ पर हाथ उठाया ऊपर को। मुदर्शन अमरणोपासक का , लख तेज यक्ष हो गया मुरदार. खूब घुमाया मुद गर उसने पर न हुआ उन पर काई वार । लाचार हो सन्मुख खडा हुया , अनिमेष दृष्टि से देख रहा , अपना मुद गर ले भागा यक्ष , जिम दिशा से आया उधर गाह। म द गर पाणी के जाते ही , अर्जुन अति प्राशक्ति पाता , एक "धम" शब्द के माथ वहो , वह उन पृथ्वी पर गिर जाता। जव मेठ सुदर्शन ने जाना , उपनग दूर हो गया यहा , प्रतिना पाल फिर अर्जुन को मचेप्ट करने लगे वहा । स्वास्थ्य लाभ पाते ही देखा, मेठ जी होश मे ला रहे हे अर्जुन पूछे देवानु प्रिय , हो कौन । आप कहा जा रहे है । सुदर्शन श्रमरणोपामक हूँ , जीवादि तत्वो का ज्ञाता, गुणशिलक बाग मे आये प्रभू , मैं वन्दन करने को जाता। दोहाः-अर्जुन कहे देवानु प्रिय !. मैं भी करूंगा दर्श । पर्युपासना कर मुझे, होगा अत्यन्त हर्प । जिसमे सुख हो ग्रामो सुर्दशन सङ्ग चल रहा, अर्जुन धरि उमङ्ग ।। तर्ज-राधेश्याम.. गुणशिलक उद्यान मे आ ,,फिर दोनों प्रभू पाम आये तीन बार आक्षिरण प्रदक्षिण , वन्दन करके- हरपाये। वही करो, मेरे सगा [४७]] - . भगवन् महावीर ने दोनो को , फिर धर्म कथा वहा फरमाई , सुदशन सुनकर चले गये , वादपिस अपने घर के ताई। अर्जुन ने धर्म कथा सुनके , अपने हृदय धारण को, हृष्ट तुष्ट हृदय से प्रभू को, मनकी वात उच्चारण को। हे प्रभो ? आपके वचनो पर मै श्रद्धा, रूचि करता हूँ , निर्गयो के प्रचवना पर , मैं पूरी आस्था मैं पूरी आस्था धरता हूँ। इसलिये अापके पास मे हो , दीक्षित मे करलू मन चाया दवानु प्रिय । जिसमे सुख हो वही करो प्रभू ने फरमाया। भगवन् के वचन सुनकर अर्जुन , ईशान कोण में जा उसबार , पच मुष्टि कर लोच स्वय , अब अर्जुन बन गये है अरणगार । प्रवजित हुये । स दिन अर्जुन, उसही दिन, प्रभू को अर्ज किया वन्दन और नमस्कार करके, फिर ऐसा अभिग्रह धार लिया। हे बगवन ! मैं यावज्जीवन तक, वेले, वेले का पारणा कर , आत्मा को लगा तप मै विचरू', नही इसमे कभी होगा अन्तर। यो अभिग्रह को धारण कर अब, विचर रहे। अर्जुन अरणगार वेले के पारणे प्रथम पहर मै , स्वाध्याय कोना मुखकार । दूसरे पहर में ध्यान किया, और तोसवे पहर मे पात्र सभार गौतम के सम चले गाचरी ।राजगृही गाचरी ।राजगृही नगरी मभार । ऊच, नीच, मध्यम कुल मे, सामुदानिक भिक्षा हितकार, नगर निवासी देख रहे है, फिरते हुये अर्जुन अरणगार । स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढे , सब लोगो ने पहचान निया अर्जुन को देख कर के सवने , वहा पर यू कहना शुरू किया। इसने मेरे पिता को मारा, 'इसने ही मेरी माता को इसने ही मेरी बहन को मारा, इसने ही मेरे भ्राता को। कोई कहे पनि को मरा , कोई कहे मम सुत प्यार। , कोई कहे पुत्री, पुत्र वयु , मेरे सम्बन्धी को मारा । १ .

- - - कम नन्द र बनना मे र अर्जुन का तिरस्कार नान्ते , निदान, दोषी रहतं नाईट, पाठी , पन्धर देते। दोहा:-स्त्री पुरुष चचे तमग, वृद उडाये यन्न । अर्जुन महे समभाव में. ढेप न ला ल !! सहन पिच परिह मनी..मा भाव उधार | निर्जग पीनी भार से, म यम्य भाव विचार ।। * तर्ज-गधन्याम is मह गामुदायिक निक्षा हिन , ऊच, नीच, मध्यम कुन जा, ममा मृला जो पुरा मिलता , वही पा ते अर्जुन ना। पही पाहार मिल जाता तो , पही पानी ही गिर पाता था , पाना मिल जाता हार नहीं, म तरह का उपसगं प्रातापा। पविमन, प्रानुग, प्रक्षोभित , विषाद भाव को दर निवार तन मनाट विक्षोप न गाते, जो मिलता करते स्वोकार । पाहार रे राजगृही में चल , गुग्गशील उदान में प्राते थे भगशन महावीर :रामी को, यो नाया शाहार दिगाते थे। प्रभू मामा पा करने प्रहण , योद्धपन हपं रहित को धार जिन नाना दिन में जाना , गमभार से करते मयम मार । गुगामी-7 उमान में वन जनपद में विनर भी भगवान इन महाभाग अटुंन ने भी, जो पाया प्रम में गरम दान । उगगनिर सट मावीमे . पालन मीनाप्रति उदार, प्रभान कामी, पिन और उग प्रमान तप में रमे प्रबार । 37 माग्ने ना नयम पारा, पिर प्रमाग गगना कर , सोग मत गन, अर्जुन मुनि ने पनगन घर। ITTEन मनमो ने निदरिया. पापी र प्रगन्न गुपो नी , गान प्राप्त कर मोक्ष लिया। . , - (४६] . १ - . यो तीसरा अध्ययन पूर्ण हुग्रा , जम्बू स्वामी सुन हरपाये फिर कहे सुधर्मा स्वामी से , प्रभू चौथा अध्ययन फरयाये । उस ही काल उस समय मे जम्बू ? रोजगृही नगरी दरम्यान , गुण शिलक उद्यान जहाँ पर , राजा श्रीणिक थे 'गुणवान । 'काश्यप' नाम का गाथापति , एक रहता था उस नगर मझार, 'मह्वाइ' गाथापति सम उसने, प्रभू पास लिया सयम भार । सोलह वर्ष तक श्रमण धर्म का , उसने पालन कर सुखकार , अन्त समय में विपुल गिरी पर, सिद्ध हो पहुँचा मोक्ष मझार। अब आगे पचम अध्ययन जम्बू ! 'ओमक' गाथा पति का जान , काकाली नगरो के वासी, दीक्षा लेकर किया कल्याण छ? मे काकन्दी के ही 'धृतिधर' गाथा पति का है हाल । सातवे मे साकत नगर के 'कैलाश' गाथापति सुखमाल , आठवे अध्ययन मै गाथापति 'हरिचन्दन' का वर्णन आया ! साकेत नगर के रहने वाले कर्म काट किया मन चाया , राजगृह के 'बर वत्तक' का , नवमा अध्ययन तुम जाना। बारह वष का सयम पाला विपुलगिरि पर सिद्ध मानो, रसवे मे है वाणिज्य ग्राम के , बाहर धुपिलश उद्यान । पाच वर्ष का सयम पाल , कर लिया सुदशन' ने कल्याण , गायापति पूणभद्र' का वणन , ग्यारहव अध्ययन में पाया। प्रभू पास मे सयम लेकर , अन्त समय शिव पद पाया , वारहवें मे श्राम्वती नगरी के , 'सुमनचन्द्र' गाथापति जान । इसी नगर के 'मुप्रतिष्ठ' का , तेरहवा अध्ययन लो दुम मान । चौदहव अध्ययन मै जम्बू ?. हुये गायापति मेध' सुग्वकार ! दीक्षा लेकर संयम पाला , विपुल गिरि गये मोक्ष पधार इस प्रकार सहु गाथापति ने, ' प्रभू ' पास ले यिम भार । चारित्र धम का पा न क के , विपुल गिरि गये म क्ष सिधार । . - . - .

धोसर [५०] - -- १ . टोहाः-चौदहवें अध्ययन को सुना, जन्यू ने घर ध्यान । कर जोड़ी फिर निवे, सुनिये कृपा निधान ! || पन्द्रहवें अध्ययन का, प्रभू फरमायो भाव । श्री वीर ने जो कहा, है सुनने का चार ।। तर्ज-राधेश्याम उस ही काल उस समय मे जम्बू ?, पोलासपुरी नगरी मझार , 'श्री वन उद्यान जहा पर , गजा 'विजय' अति सुखकार । रानी थी। श्री देवी' जिनके , रुपवती सुन्दर सुखमाल , आत्मजात अति धीर वीर था , 'अतिमुक्तक' जिनके एक लाल । उमी समय महावीर प्रभू , श्रीवन उद्यान मे आये थे ज्येप्ठ, श्रेष्ठ, अतेवासी, सग में गौतम मन भाये थे। भगवन् को पूछ भिक्षा के हित, भगवती सूत्र वर्णन अनुसार, पोलासपुर के ऊच, निच, मध्यम कुल मे जा रहे अरणगार। इसी समय कु वर अतिमुक्तक , स्नान कर सज अलकार अपने बाल वालिकामो सग , क्रीडा स्थल पर खेले जार। उसी समय भिक्षा हित जा रहे , इसी स्थान के होकर पास , श्री गौतम को देख कुवर ने, समीप प्रा यू की अरदास । अतिमुक्तक कहे हे भगवन ! , है आप कौन यह बतलायो , किस कारण से घूम रहे हैं , मुझे कृपा कर समझावो । गोतम कहे देवानु प्रिय ! , तुम हमे श्रमण निग्रन्थ जानो पाच समिति युक्त हमे अब , पूर्ण ब्रह्मचारी मानो। कच, नीच, मध्यम कुल मे , भिक्षा के हित हम फिरते हैं गृह सामुदानिक भिक्षा पा, उस ही की गोचरी करते हैं । प्रतिमुक्तक कहे हे भगवन् ? फिर मेरे साथ चलिये इस वार , . . , १ .

, . . . [५१] मै भिक्षा दिलगऊ आपको , यू कह हुये गोतम के लार। अगुली पकडी गौतम जी की , लाये अपने घर के द्वार, श्री देवी ने देख प्रसन्न हो आगे आ कीना सत्कार । सात-आठ पा कदम सामने , विधि वतू वन्दन किया त्रयवार , उच्च भाव आदर से मुनि को , चारो तरह का दिया आहार । अशन, पान, खादिम ओर स्वादिम , देके आवश्यकतानुसार , मुनिवर को पहुँचाने आई, वापिस अपने भवन द्वार । फिर अतिमुक्तक - हे गौतम से , प्रभू आप कहा रहते हैं श्री गौतम स्वामी यू कुमार को , अपना परिचय देते है। धर्माचार्य और धर्मीपदेशक , मोक्ष मार्ग के जो कामी, धम आदि के करने वाले , मेरे गुरू महावीर स्वामी। पोलासपुरी नगरी के बहार , श्री वन उद्यान मे है इसवार कल्पानुमार अवग्रह ले करते , ता सयम से प्रात्म उद्धार । मै भो वहो पर हे अतिमुक्तक । उन्ही के पास मे रहता हूँ, अतिमुक्तक कहे क्या मै भी वहा , दशन को चल सकता हैं। देवानुप्रिय | जिसमे सुख हो , वही करो यू गौतम जी ने कहा, अतिमुक्तक पहु। सग-सग , भगवन् विराज रहे ये जहा । विधि पूर्वक' वन्दन कर , फिर उपासना मे चित लाया , गौतम स्वामी ने प्रभू पास आ , आहार पानी दिखलाया । फिर आहार पानी कर गौतमजी,ने आत्म भावो मे किया विहार, ऊधर सुनी है धर्म कथा को , प्रभू पास अतिमतः कुमार। धर्म कथा सुन हृष्ट तुष्ट हो , अतिमुक्तक ने की अरदास , माता पिता की आज्ञा ले , दीक्षा लेऊ गा पापके पास। जिममें 'सुर्ख हो वैमा ही करो मत धर्म कार्य मे करो प्रमाद, प्रभू ने 'यू फरमाया उसे , अतिमुक्तक 'ने भी रखा याद । -- ।

[५]
टोर: --मात पिता पार पा.योन पाय ।
जमिप्र वीर ने पीनी विनलार ॥
साता। म मुमें, नंगा नयम भार ।
पिन र मदिरा नियं. पतिमुक्ता रमा !
राज-गवाम
मुना पो मार Eि बोरे पत्र : पनी मोटो,
Tria सर , न में ।
का अमर ही जाना .
नामेनी जान 3', मान - RIT |
माNिT, TAY 1: सवानिमाय
मिन दान में जा गिजा में नाराय।
जागेर अगर fonufIT बोरे मार,
* जान जो नाग म गेमा यही TTA
पर या मागन मी 17 में गामा पांगा
FA में बार Ert, ETE गी 'पता मार
जोगी न , TT पर पार
दाम, नर , "गा पीरा ।
गर निगम पर
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- . . Tो नो पा
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को मार माम. पाम , entim मा II
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१

[५३] . - . . पर सयम के दृढ भाव से , कु वर न विचलित हो पाया। विवश हो बोले मात पिता , एक मन की बात हम दरसाते एक दिवस के लिये हो तेरी , राज्य श्री देखना चाहते । रहे कु वर तब मौन , हप फिर , मात पिता के दिल छाया और महाबल के समान ही राज्यभिषेक भी करवाया। इसके बाद श्री अतिमुक्तक ने , प्रभू पास दीक्षा धारी, सामाजिक ग्यारह अग लखे , और वर्षो. साधना की भारी। गुरण रत्न सवत्सर तप करके , अोर अन्त समय सथारा कर , फिर सिद्ध बुद्ध और मुक्त हुये , श्रीप्रतिमुक्तक विपुल गिरिपर। यह पन्द्रहवा अध्ययन पूण हुआ, व हे स्वामी सुधर्माजी उसवार , जम्बू कहे हे नाथ ! कहो अब , सोलहवे अध्ययन का अधिकार । उस हा काल उस समय मे जम्बू, वारणारसो नगरी मझार , 'काम महावन' उद्यान था जहा , 'अलक्ष' राजा थे सुखकार । एक समय महावीर प्रभू , फिर उस उद्यान मे आये थे, कोणिक सम राजा अलक्ष भी , दर्शन के लिये पठाये थे। आ वन्वन नमस्कार कीना , और सेवा करते सुखदाई , जनता और राजा सभी को प्रभू ने धर्म कथा फिर फरमाई। वाणी सुन वैराग्य हुआ , हुआ, राजा अलक्ष ने तज ससार', 'उदायन' राजा समान ही , प्रभू पास लिया सयम भार । दिया रापय भानजे को अपने , राजा उदायन ने जानो ज्येष्ठ पुत्र ने दिया मलक्ष ने, इतना ही अन्तर मानो। ग्यारह अगो का अध्यकन कर , और बहुत वर्ष 'चारित्र पाल विपुल गिरि पर निद्ध बुद्ध हो , अलक्ष मुनि हो गये निहाल । यो सोलहवा अध्ययन फरमाया , हुआ छठ्ठा वर्ग पूर्ण सारा, स्वामी सुधर्मा, कहे जम्बू । से , प्रभू ने कहा सो कह डारा। - ३. - [५४] - -: वर्ग सातवां :- दोहा- -जम्बू सुन हर्पित हुये , लट्टा वग-तमाम । श्री सुधा स्वामी से बोले करि प्रणाम ।। वर्ग सातवे मे प्रभू ! क्या फरमाया वीर । सुधा कहे प्रेम से , सुण जम्वृ । गुणधीर ।। -: तर्ज-राधेश्याम :- नन्दा, नन्दवति, नन्दोत्तरा, नन्द श्रेणिक , मरुता जान , सुमरूता और महामरूता , महादेवा, भद्र गुरगवान। सुभद्रा और सुजाता जानो, मुमनानिका, मलदना, श्रोणिक राजा की सब रानो , अध्ययन ते दिये बता । जम्बू कह कर कृपा नाथ ! अब, पहला अध्यपन देवो बनार, स्वामी सुधर्मा कहे हे जम्बू । उस ही काल उस समय के मॉक । राजगृही नगरी सुन्दर , ओर गुणशिलक नामा श्रीणिक राना राज्य करे जहा , रानो नन्द' अन गुणवान । एक, समय श्री वीर पधारे, परिषद् चनो दन क ताय , सुना आगमन हृष्ट तुष्ट हो , महागनी नन्दा हरपाय । सेवक को आज्ञा दी यो सजाकर, धार्मिक स्थ लावो जाई, पद्मावती रानी सम नन्दा भी, प्रभू दर्शन के हित आई। प्रभू ने धर्म कथा फरमाई , रामी को चढ़ गया वैराग श्रेणिक राजा की ले अाज्ञा , दीक्षा ली सब सुख को याri ग्यारह अग का अध्ययन कोना , बोस प चारित्र पर्याय अन्त समय मे रानो नन्दा , मोक्ष पुरी में पहुचो जाय । इसी तरह से है जम्बू ! तुम नन्दवति प्रादि जानो, शेप बारह रानियो के , वारह ही अव्य पन मानो। उद्यान, ! - - - - [५५ सब हो ने समार छोडकर सयम ले कीना उद्धार । वर्ग सात का वीर प्रभू ने , यू 'फरमाया है अधिकार । आठवां वर्ग दोहा-जम्बू को कर जोड के, सुनिये स्वामी नाथ । अन्तकृत दशा का पाठवां, अंग जो है विख्यात || उसमें सातवे वर्ग के, भार सुने चित लाय । श्रागे आठों वर्ग के वर्ग के , दीजे भाव फरमाय ॥ हे यायुमान जम्बु ! सुनों, बोले सुधर्मा स्वाम । ग मे पाठ यू कहे , दस अध्ययन के नाम ॥ -> तर्ज-राधेश्याम = काली, सुकाली, महाकाला ओर कृष्ण, सुकृष्णा जान महा कृष्णा,श्री वीर कृष्णा, और रामकृष्णा थी अति गुरगवान । पितृसेन कृष्णा नवमी , और महासेन कृष्णा जानो इन दसो रानी के दस अध्यन , इस वर्ग पाठवे मे मानो। जम्बू कहे हे नाथ ! प्रथम , अध्ययन के भाव दोजे फरमाय , स्वामी सुधर्मा कहे हे जम्बू । , सुनो प्रथम अध्ययन चितलाय । उस ही काल उस समय मैं जम्बू । चम्स नामक नगर सिरे, पूर्ण भद्र उद्यान जहा पर , कोणिक राजा राज्य करे । थोणिक राजा की रानी , कोणिक की लघुमाता काली , रानो नन्दा ज्यू प्रभू पास मैं , इसने भी दीक्षा पाली। मामायिक आदि ग्यारह अग का , फिर अध्ययन कीना उसवार , उपवास, बेला, तेला आदि का , तप करके विचरे सुखकार । १ - [५]] - . . एक समय वह काली आर्या, श्री च दनवाला के पास हाथ जोड कर विनय पूर्वक , अाकर यू कोनी अरदास । रत्नावली तप करना चाहूँ . हे पूज्य । अापकी प्राज्ञा लेर जिसमे सुख हो वही शीव्र करो, नही धर्म वार्य मे करना देर । चन्दनवाला महासती की य ग्राज्ञा पाकर उसमार , काली आर्या ने यू कोना , फिर रत्नावली तप सुखकार । पहले उपवास किया उसने , फिर दिया पारणा वगय मझार , फिर तेला कर किया पारणा, फिर तेला कर लिया आहार । पाठ वेले फिर किये निरन्तर , पारणा कर किना उपवास पारणा कर किया वेला तेला, नो सोलह तक चढ गई खास । फिर सोलह का पारणा करके , चौतीस बेले कोने साथ , अन्तिम बेले पारणा कर के , फिर सोलह पच्चखे धन्य मात । इस प्रकार पन्द्रह चौदह कर , एकोपवा : तक पहुँची जार उपवास का पारणा कर के फिर पाठ वेल क्येि लगातार । पारणा करके तेला कोना, फिर वेला कर किया उपवास इस प्रकार रलावलि तप की , एक परिपाटी हुई है खाम । इस एक लडी की आराधना , रत्नावाल तप मे सोहता है, एक वर्ष और तीन महीना बाईस बाईस दिन की होती है। तीन सो चौरासी दिन तप के, अठ्यामा दिन का पारणा जान , चार सौ बहत्तर दिन का सारा , यू इसमे हाता है निद न । इस तरह से काली प्रार्या ने , पहली परिप टी पूर्ण कर , दूसरी परिपाटी प्रारम्भ की, फिर उसी तरह से तपस्या घर। उतने ही दिन की तपस्या , उतने हो दि पारणा जानो, पाच विगय का त्याग पारणो मे विशेषता यह मानो। इसी तरह से तीसरी परिपाटी में , इतनी हो तपस्या धर" , १ [५७] - . और पारणे मे विगय के , लेप मात्र का त्यागन कर। पूरण कीनी महासती ने , तीसरी परिपाटी सुखकार , दूध, दही, घो तेल और मोठा, पोच विगय यह दिये निवार । चीया परिपाटी को भी की, फिर इसी तरह तपस्या घर के , सभा पारणे पूर्ण कोने आय विल का व्रत कर के। इस प्रकार रत्नावली तप की , चारो परिपाटी सुखकार , पूर्ण कोनी पाच बर्प दो मास , अट्ठाईस दिवस मझार । 'रत्नावनी तप' कर पूर्ण हप से , काली आर्याजी उसवार , चन्दनवाला जी के पास प्रा कीना वन्दन नमस्कार। फिर उपवास वेला और तेला , आदि तपस्याये नित कर , श्रात्मा को भावित करनी करनी , काली आर्या रही विचर। इम तरह प्रधान तप करने से , काली प्रार्या जी का शरीर मास, लोही से रहोत हा गया , दिखने लगी नाडिया फिर। अस्थि पज्जर देह हो गई , कड-कड हड्डियां करती आज , सूखे काण्ट, कोयले, पत्तो की , भरी गाडी ज्यो करे आवाज । मास, लोही के न होने से , यद्यपि रूक्षता अधिक बढ़ी, पर भस्म से आच्छादित अग्नि सम, तप से तेज की शोभा चढी। एक समय उम काली आर्या , के हृदय मे पिछली रात , स्कन्दक के समान मन मे, उत्पन्न हुई अचानक बात । तपस्या के कारण यह मेरा , अत्यन्त कृश हो गया शरीर, इसलिये उचित है आज मुझे, यो सोचे मन मैं हो गम्भीर । जब तक मुझ मे उत्थान कर्म , बल, वीर्य और पुरूषाकार, श्रद्धा, पराक्रम धृत और सवेग , आदि का है आधार । तब तक मुझ को उचित है कि, सलेखना भूषणालू सूर्योदय होते ही कल , ही कल , श्री चन्दनवाला से पूछ जार। उन्ही की आज्ञा लेकर फिर , सलेखना भूषण सेवित करू , - स्वीकार,

[५८]
भक्त पान का प्रत्यास्यान कर , मृत्युन चाहती हुई विचरू ।
सूर्योदय होते ही तुरत , आई चन्दन वाना मति पास ,
वन्दन नमस्कार कोना फिर, हाय जोड यू की अरदास ।
हे पायें ! सलेखन। भूपण की , मुझको दे अाज्ञा कृपा धरा ,
चन्दना बोली देवानु प्रिये !, जिसमे सुख हो वैसा ही करो।
धर्म कार्य मे देर न हो
, यू चन्दना को प्राज्ञा पाके ,
तुरत ही उम कालो प्रार्या ने , सलेखना की हरपा के।
सामायिकि आदि ग्यारह ही , अगो का अध्ययन करके खास ,
आठ वर्ष का सयम पाला , महामति चन्दना के पास ।
अन्त मे महासती काली ने , एक मास मलेखना घर,
आत्माकर सेवित अनशन से, माठ भक्तो का छदन कर ।
जिस अर्थ हित सयम लीना , फिर अन्तिम उच्छवामो के माय ,
उसे प्राप्त कर लिया सति ने , सिद्ध गति मे पहुची जाय ।
दोहा:-प्रथम अध्ययन पूर्ण हुआ, जम्बू सुन हरपाय ।
फिर कर जो डी बोलवे, करो कृपा गुरूराय ।।
आठवें वर्गका दुसरा , अव्ययन दो फरमाय ।
सुधर्मा म्वामी कहें, सुन जम्बू ! चित्त लाय ॥
-: तर्ज-राधेश्याम :-
उस ही काल उस समय मे जम्बू । , चम्पा नामा नगरो जान ।
पूर्ण भद्र था चैत्य जहा पर , कोणिक राजा थे गुरगवान ,
पौणिक राजा की थी पलि, और कोगिर की छोटी मात ।
मुकाली रानी गुणवती , जिसका यह वर्णन सुखदान ,
काली रानी के सम इसने भी सयम वृत को धारण कर ।
उपवाम, वेला, तेला आदि, तपस्या करके रही विचर,
-

[५६] यू . - एक समय सुकाली प्रार्या , ग. चन्दनवाला के पास वन्दन नमस्कार कर के फिर हाथ जोड की अरदास । 'कनका वलि' तप करना चाहूँ , हे महामार्ग १ दया घरो, चन्दनवाना जा कहे तुम्हे , जिसमे सुख हो वही शाब करो ! इसके बाद सुकाली सति ने , कनकावलि तप किया मुमन जिस प्रकार कालो रानी के रतनावलि तप का है वर्णन । 'रतनावलि' कनकालि' तप मे , बस इतना ही अन्तर जानो, पाठ पाठ चोनोस जहा वेले , वहा यहा पर तेले मानो। रतनावलि मे बेले होते , और कनकावली मे तेले जान , एक वप और पाच महिने , वारह दिन का है निदान । इसी एक परिपाटी , मे अठ्ठयासी दिन पारणे पाते , एक टर्प और दो महिने , चऊदह दिन तपस्या मे जाते। इसकी भा चार परिपाटी होती , उसे जो पूरा करते है , तो पुरे पाच वर्प नौ महिने दिन अठारह लगते है। महामति श्री सुकाली ने चारो परिपाटी पूर्ण को, और शेष वणन जानो सव , काली आर्या के 'सम ही। नौ वर्ष शुद्ध सयम पाला अन्त समय गई मुक्तिधाम दूसरे अध्ययन का हे जम्बू ? तुझे ये वर्णन कहा तमाम । जम्बू कहे हे नाथ । बताओ तीसरे अध्ययन का अधिकार, महाकाली रानी का वर्णन , सुन जम्बू ? अव ध्यान लगाकर । कोणिक भी छोटी माता थी , पोर श्रणिक राजा को वह नार , सुकालो रानी के सम ही, इसने भी लिया सयम भार । 'लधुसिह' निष्कोडित' तप का , इसने अाराधन कीना किस प्रकार होता है तप ये , सुन वर्णन तू रग भीना। मर्व प्रथम उपवास किया फिर पारणा विगय सहित उपवास , विगयो का सेवन नही वजित , पहलो परिपाटी मझार।

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, . [१] लसिह और महासिह तप मे , बस इतना ही अन्तर जानो। नौ तक चढते लघुसिह मे , सोलह तक महासिह मे मानो, सर्व प्रथम उपवास किया, फिर पारणा कर वेला ठाया। करके पारणा वापिस उसके, फिर उपचास का व्रत या फिर तेला वेला, चोला तेला पाच चार छ पाच को धार । सात के बाद किये छ. उसने , पाठ सात नौ पाठ विचार , यो एक आगे एक पीछे करते , सोलह तक पहुची है जार। सोलह के बाद पिर पन्द्रह कीने , पुन किये सोलह उमवार , सोलह, चऊदह, पन्द्रह, तेरह , फिर चऊदह फिर बारह जान । तेरह ग्यारह, बारह से दस , इस तरह एक का अन्तर मान , यो क्रम से पाये तेले तक, करके पा गा किया उपवास । वेला कर उपवास किया, फिर , यू परिपाटी हुई खलास , एक वर्ष छ महिने और , अठारह दिन का है प्रमान । इकसठ दिन के पारणे, बाकी सब तपस्या के जान , इसका भी चार पारिपाटी पूर्ण, की कृष्ण प्रार्या जो हरपाय । छ वर्प दो मास लगे ऊपर बारह दिन जिसके माय महासिह निष्कीडित' तप को , विधि पूर्वक कर उसवार । अन्त समय संथारा कीना, कृष्णा पहुँचो मोक्ष मॅझार अब पाचवे अध्ययन मे जम्बू ! सुकृष्णा का वर्णन प्राता। श्रोणिक राजा की रानी थी, वो कोणिक को लधु माता , इसने भी प्रभू की वाणी सुन दीक्षा ली श्री चन्दना पास । फिर 'सप्त सप्तमिका' भिक्षु पडिमा को श्राज्ञा भी लो है खास इस तप की आराधना पुर्ण , सात सप्ताह मे हो जाता । प्रथम सप्ताह मे एक-एक दत्ति , अन्न पानी की ली जाती, दूसरे सप्ताह दो ो दत्ति , ताजे मे तीन तीन जाना। चौधे मे है चार चार , पचम मे पाच पाच पाच मानो, [३२] मुर " . बढे में भी ६८ दत्ति , यो गुन्य पर ने ने पाते , मात पल को मात पानी पो , माता सप्ताह में लात उन पजाम दिन दी यह नपन्या, सप्त मनगिका महलातो, मे मो टियानये पुन , भिक्षा को दनिया पाती। यह नर करके नागा मनि , फिर नन्दनाा पं जाती , 'ग, अटमिका' भिक्ष पदिमा ता की भावना दरसाती। बामनो बन्दना की बोती , देवानु प्रिये ! जिनमे हो वती का पर। तुम जत्दि मे और धर्म कार्य में देर न हो। य प्रभा ले मुटणा ने, 'अट अष्टमिका' ता कोना, प्रथम पाठ दिवन गे गेन एम . त्ति अन्ना लोना। दूज अप्टक में दो दो दान , इस प्रकार पाठ अप्टस कोने , मादन पाटा में गन्न पाना पाठ पाठ दत्ति लीने। नौगठ दिन गन म पूर्ण हुप्रा, यह 'प्रष्ट अप्दमिका तप उगवार, दोनो अठ्यामो दात मे लोना , जमने पानी और प्राहार । नमारगार विधी पूर्ण कर फिर पाई चन्दन वाला पान, 'न. नवमिका' भिवपरिमा को , ग्राभा लोनी घर उनाम । पहले नो दिन नवक ने लिया , एक दात अन्न एकादत्त पाती दुजे नवफ में दो दी दत्त , यूपम ता सीना ठानी। नमें नवक मैं नौ नीति, अन्न पानी पी ले उसयार, समानी दिन में पूर्ण वीना, 'नय नयमिका' प्रत सुरातार । यो तर गुटणा ने फिर , चन्दना को को पाना धार, उनो याद फिर 'दश दशमिका', मिक्ष पदमा नी स्योकार। दम दिन पहीं दाक मे , अन्ग पानी का एक एक दार हुने दशक में दो दो दान, यो पिया निरन्तरता दिन रात । उमर पाक में प्रल पानी की, दगदग दान कारीचौकार गोवि में पूर्ण कर पीना , 'दश दमित प्रत उसवार। - - , । - - , ने जब , प्रभू वचन . इस प्रकार भिक्ष पडिमाये विधि से कर सूत्रानुसार, अति दुर्वल हो गई सती 'जी , फुटकर तप भी किये अपार । अर्ध मास और मासखमण तप कर किया आत्मा का उद्धार, अन्त समय सथारा घर कर , मुकृष्णा गई मोक्ष मझार । दोहाः-छठे अध्ययन में सुनो , हे जम्बू ! चितलाय । श्रोणिक की ही भार्या, कोरिक की लघु माय || महा कृष्ण सुने , हितकार। चन्दन वाला पास में , लीना संयम भार ॥ तर्ज-राधेश्याम फिर आज्ञा ले गुरूणी जी से , 'लघु सर्वतो भद्र' तप कीना जिसकी विधि मे सब से पहले, उपवास धार पारणा लोना । पहली परिपाटी पारणो मे , नही विगय का वर्जित बतलाया , पारणा करके वेला कीना , फिर पारणा कर तेला ठाया। इस प्रकार चार ओर पाच किये, फिर तेला कर चोला उस पार पाच किये पारणा कीना, फिर उपवास और वेनावार । फिर पाच किये उपवास किया, वेना तेला चीला सुग्वकार . फिर बेला तेलाचीला पचोला , और उपवास सुत्रानुसार ) अव चौला पचो ना फिर कीना , उपवास प्रो वेला तेला पूर्ण यू पहला परिपाटी करके , किया कई कर्मों का चर्ण । सौ दिन को यह परिपाटी , पच्चीस दिनो का कुल पाहार , पचहत्तर दिन को हुई तपरया , महा कृष्ण सति के उसवार । इसी तरह दूसरी परिपाटी , कीनी कर विगयो का त्याग तीजी परिपाटी पर विगयो के ,लेश मात्र पर नहीं अनुगग । . .

[६४] . - चौथो परीपाटो के पारणे , प्रायविल अत कोना उसवार , म प्रकार में नघु नवंतो भद्र , तपस्या की हितकार। एक वर्ष एक महिनी घोर, दम दिन में ये परिपाटी चार, पुरां सोनी महामती ने . मुत्रो को महामती ने , मुमो को विधि के अनुसार । प्रन्त समय सवाग सीना मब पर्मों का करके नाग, गती महा वृष्णा जी ने फिर , मोक्ष पुरी में पीना चाग । परमातवे अध्ययन में जम्बू, तू वीर कृष्णा कावर्णन जान प्रोणिक गजा को ही गनी , कोरिणक की लतमाता मान । प्रभू वचन सुन दोधा लोनी, आई चन्दन वाला पाग , 'महा मब नो भद्र' तपस्या की, माज्ञा ली घर उल्नान । इनको विधि में नरमे पहने, उपवाम किया फिर पारणा धर, विगयो । मेवन नही वजित , इस परिपाटी के अन्दर । फिर वेना क्यिा तेला चौला, फिर पचोला छ मोर मात किये, प्रथम नता हुई पूर्ण यहा , फिर चोला पचोला चार लिये। द और नात किये उसने फिर उपवाम और वेना तेला, लता दूगरो पूर्ण हुई अब , लता तीगरी को भेला। मात किये उपवान किया, किया फिर वैवा तेता चोला धर, फिर पात्र और द कर के, दीनी लता तोमरी पूरण कर। भव तेलाचौतापचोला किगः फिर छ और सात कीना उपवान, बला कर यो चोयो लता भो पूरी को घरके विश्वास । दो म त, उपवान प्रो वेना , बेला चोला पचोला धार, लता पानी पूर्ण कोनी फिर वेना तेना उसवार। नाराये फिर पाच किये, अब छ मो मात फिर कर उपवान , हो लता को पूर्ण उगने , अब सातवी का यर्गन गान । पाच किये 7 सात किये, फिर उपावास श्री चेला धर नना करके गोला मीना लता गातया के अन्दर । . .

[६५] - इस प्रकार इन सात लता की, परिपाटी हो गई एक खास उनपचास दिन हुये पारणे, तप सोलह दिन और छहमास । इसकी दूसरी परिपाटी मे , सब विगयो का त्याग किया तीसरी परिपाटी के अन्दर , लेप मात्र नही विगय लिया। चौथी परिपाटी के पारणे, आय बिल वृत कीने सुखकार , इस प्रकार दो वर्ष आठ माह , बीस दिवस का है अधिकार । सुत्र विधि से कर आराधन , अन्त समय सथारा लिया वीर कृष्णा ने कर्म कोटकर , मोक्ष पुरी मे वास किया। रामकृष्णा देवी का हाल है , आठवे अध्ययन के दरम्यान , भेणिक राजा को ही रानी , कोणिक की लघु माता जान । दोक्षा लेकर प्राज्ञा लीनी, चन्दन वाला सति के पास 'भद्रोत्तर प्रतिमा' तप को फिर शुरू किया है धर उल्लास । इसकी विधि मेस बसे पहले , पचोला व्रत लीना धार, विगयी का सेवन नही वर्जित , इसके पारणो मे उसवार । फिर छह, सात ओ पाठ किये , फिर नौ कोने हैं एक ही साथ , एक लता यो पूर्ण' कीनी, कीनी, दूजी लता मे कोने सात । पाठ, नौ, पाच ओ छ कोने , अब तीसरी लता बताता हूँ , नौ, पाच, छह, सात किये , फिर पाठ का थोक गिनाता हूँ । अब छः ओ सात कर आठ किये, नो, पाच, लता चौथी मझार , पाठ, नौ, पाच, छ. सात किये तब लता पाचवो हुई सुखकार । यो एक परिपाटी पूर्ण हुई , छ मास बीस दिन के मझार , इस प्रकार पूर्ण की चारो परिपाटी सूत्रानुसार । दो वर्ष, दो मास, बीस दिन , कर चारो परिपाटी पूर्ण, राम कृष्णा जी सिद्ध हुई फिर , सभी कर्म का करके चूर्ण . , . -

-
[६]
दोहा:-या नाना अध्ययन गुनी, हे जम्यू! विनार।
पिनमन कृष्णा मनी, का यहा पर वर्णन ग्राय ।।
रोगिक को घुमाउ थी, अंगिक नृप की नार ।
चन्दन याना पाम में , लीना मंचम मार॥
नज-राधेश्याम
जिर बाज गुरुगो जी का , 'मुनावनो' ता गोना भागे
गोद मे 7 नवं प्रथम , उपजाम दिया उसने जारी।
फिर पगा किना है, उसने , मवहीं विगयों का सेवन घर,
का -२ र दिया, फिर उपवान निया है पर।
भरणा कर दे तेता गोना , फिर वापिस पीना उपवान
सनम बीच मे पर उपवास , वो पन्द्रह ना पहुंची है गाम ।
फिर अगरिया ने , और अब मोलह का घोक गिया.
उपवान पर गिर गवान कीना, तिर पन्द्रह को पन्चन लिया।
उपरान कर फर चांद हिरे, म तन्ह बीच में कर अवास
पर मे फिर नीचे उतरी वो, पाम तर पहुँची है साम।
एर पनिटी पूर्ण दृश् यो, ग्यारह माह पन्द्रह दिन मे ,
चागे परिपाटी पूर्ण जीनी, तीन पं दम महिने में।
मूगनार कर तप को पूर्ण, और अन्न समय मयारा धार,
पितृमन पणा जा पायर्या , ५ मं बाट गई मोन भार ।
मात्र दनवा अध्ययन है जम्। महामेन प्गा का है जारी
योगिन काजा को उथु मान , णिक की गनी प्यारी।
प्रनू को वागी मुन इमन भो , बन्दन बाना पे दीक्षा लो,
फिर पाना लेकर 'वमान प्रायविर' नाम की तपस्या की।
अगरी विधि में ममे पहले , पायबिल कर पीना उपवास ,
इनो बाद में दो प्रायचित कर फिर उपवास किया है बास ।
-

[६७] 1 - तोन प्रायविल कर उपवास कीना , फिर प्रायक्लि कीने चार इस तरह वोच मे उपवास करते, सौ प्रायविल नक पहुँचा जार। आयविल वर्षमान' तपस्या, इस तरह से पूर्ण कर लीनी चौदह वर्ष और तीन महिने , बीस दिनो मे सव कोनी। पाच हजार पचाप दिन प्रायबिल, उपवास के सौ दिन होते है इस तप मे नीचे नही आते , दिन दिन ऊचे ही चढते है। तपस्या पूर्ण करने के बाद , चन्दनबाला सती पं पाई वन्दन औ नमस्कार करके , महासेन कृष्णा जी हरपाई। उपवास और तरस्या करके , आत्मा को निर्मल करती है धम ध्यान मे लान सतो सयम मे सदा विवरती है। अत्यन्त दुर्बल हुई देह पर प्रातरिक्त तेज बढ़ा भारी सोने के ताप ज्यू तर वल से , वो शोभित लगती अतिप्यारा। एक दिन की पिछली रात्री मे , हृय मे एक विचार बना, स्कन्दक के समान ही यो सोचे , वह महासेन कृष्णा । तपस्या से मेरा यह शरीर , यद्यपि कृश हो गय। भारी, फिर भी मुझ मे उत्पन और बल वीर्य पराक्रम है री। इसलिये सुर्योदय होते हो , चन्दन बाला सती पै जाऊ और उनकी आज्ञा लेकर के , मैं तो अव सथारा ठाऊ । यो सोच सूर्योदय होते ही चन्दन वाला पै चल अई वन्दन और नमस्कार करके सयारे की प्राज्ञा चाई। प्राज्ञा पा सथारा कीना , पर नहीं मरण को चाहती है धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान मे , सती लीन हो जाती है। सामायिक, ग्यारह अग करके, श्री सतरह वर्ष सयम पाला एक मास सलेखना की आत्मा को उज्जवल कर डाला। साठ भक्तो को अनशन से , छेदन कर अतिम श्वास मझार , सम्पूर्ण कर्म को काट हो गइ, महासेन कृष्णा भव पार । - , १ - -

-
.
[६८]
इस दसही अध्ययन मे दस हो , सतियों का वर्णन अाया है ,
प्रथम कालो प्रार्या ने सयम आठ वर्ष का पाया है।
दूजो नौ, तीजी ने दस , इस तरह वढा क्रम से एक माल ,
अन्तिम ती महासेन वृष्णा ने, सतरह साल f-या सयम पाल ।
कोणिक की छोटी माता और, श्रेणिक राजा को थी सब नार,
सयम ले सव करी तपस्या , सव ही पहुँचा मोक्ष मझार ।
दोहा:-बत्तीमान शामन चरण
धर्म आदि करतार ।
श्रम भगवत वीर जित , पहुंचे
मोक्ष मंझार ||
पैसा कहा प्रभू ने मुझे , तुम्हें कहा इस बार ।
बाठो अग अतगड्दशा , सूत्र का अधिकार ।।
-: तर्ज-राधेश्याम :-
इस अतगड दशा सूत्र में जम्बू १ श्रु त स्कन्ध एक, वर्ग है पाठ,
पर्युपण के आठ दिनो मे , इमका ही होता है पाठ ।
पहले वर्ग मे दम अध्ययन दूजे मे पाठ बतलाये हैं।
तीजे मे तेरह चौथे और पचम में , दस दस आये हैं।
छठे में सोलह और सातवें, मे तेरह अध्ययन जानो
वर्ग आठवे में दस है , इस तरह निव्वे अध्ययन मानो।
इम सूत्र में नगरादि वर्णन , सक्षेप मे ही बतलाया है,
बोधिलाभ और अन्त क्रिया का , सूक्ष्म वर्णन पाया है।
शाता धर्म कथाङ्गसूत्र में, हैं इनका सारा विस्तार,
सुधर्मा स्वामी कहे हे जम्बू ? पूर्ण हुअा सारा अधिकार ।

[६६]
दोहा
--
,
"
स्क्रिम मंवत दो हजार , ऊपर तेइस जान !
अनुवाद किया काव्य मे , बुद्धि के परमान ।।
शुरू किया अजमेर से , चम्बई हुआ मुकाम ।
जेष्ठ कृष्ण की तीज को , पूर्ण किया तमाम ॥
गुरू कृपा से लिख दिया , मन में घर हुन्लास ।
महमकरण सुत जीतमल , चोपडा गुण का दास ।।
भृल-चूक जो होय सो,
गुणी दरसाजो जोय ।
अधिका पोछाजे कहया, मिच्छामि दक्कड़म मोय ।।
शरण सद। वितराग की , मेटे भव दुःख भय ।
सब मिल चोलो प्रेम से, जैन धर्म की जय ॥
(ओ३म् शान्ति )
॥ श्री अन्तगडदशा सूत्र समाप्तम् ।।

[७०]
रात और दिन का जो समय जा रहा है वह पुन लौट कर किमी
तरह भी नहीं आ सकता ऐसा ममझ कर जा व मिक जीवन बिताते
है , उनका जीवन सफल है ।
-- भगवान महावीर
पर्व-पर्युषण
(तर्ज - जब तुम्हो चले परदेश, "रतन")
अव आये पर्वाधिराज, पर्युपण आज,
जैन जगमाई, घर घर मे खुशियाँ छाई ।। टेर ।।
है भाग्य परम ए सौभागी, जिन चरणो मे अब लौ लागी,
परमाद परिग्रह, तजें सभी मिल भाई। घर ॥ १॥
मास वारह फसे रहे माया मे, नही पाये धर्म को छाया मे,
पर आठ दिवस रहे धर्म ध्यान के माई ।। घर ॥ २ ॥
दीन दुखियो और सस्थागो हित,जीव रक्षा और विधवावो हित,
जी भर दे दान सुयश की करे कमाई । घर ।। ३ ।।
हम ब्रह्मचर्य व्रत लेवेंगे, नित्य शील व्रत शुद्ध सेवेंगे,
प्रभू ने फरमाया शीयल सदा सुख दाई । घर ।। ४ ।।
करके तप कर्म हटावेगे, निज प्रात्म ज्योति जगावेंगे,
फिर जनम मरण दुख दूर करेंगे भाई ।। घर ॥ ५ ॥
नित्य शुद्ध भावना भावेगे, आपस मे प्रेम बढावेगे,
नित्य शास्त्र सुनेगे व्याख्यान मे आई ॥ घर ॥ ६ ॥
सत गुरु की सेवा वजावेंगे, नही पल भी व्यर्थ गमावेंगे,
ले लावा 'जीत' मगल की वेला आई। घर ॥ ७॥

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[७२]
चोरासी लाख जीवायोनी से क्षमायाचना की उसवार
चद्रप्रद्योतम से भी बोला क्षमायाचना बारम्बार ।
बन्दी बना रखा हैं मुझको राज्य लट कर दिया पेमाल
क्षमा नही यह मजाक मेरी रहे जले पर मिर्ची डाल ।
तू स्वतन्त्र मैं बन्दी तेरा दुखा हृदय क्या देगा क्षम
पहले अपने सम कर मुझको फिर हे राजन मुझे खमा ।
दासी को मेरे सग नहदे मेरा राज्य दे वापिस सूप
सच्चे खमद खामणा मैं तो तव ही करू गा तुझ मे भूप ।
राजा उदायो पडा सोच मे जो ही मेटू इसका राष
लक्ष चोरासी मे यह भी है मेरे वृत मे लागे द.प।
अपनो से तो क्षमा मागलू और द्वेषी से तजू न खार
समकित में बट्टा लग जावे डूब जाऊगा काला धार ।
सोहन गुलिक दासी जैसो मिली नारिया केई वार
नही मिलेगा धर्म हमेशा नही मिले समवित सुखकार
खड़ा आज तो मेरे सन्मुख कल इसका मिलना दुश्वार ।
फिर न मालुम किस भव माही यह मेरा उतरेगा भार
प्रात काल होते ही उदायी दासी को दीना परणाय
बन्धन से कर दीना मुक्त और राज्य दिया वापिस हरपाय ।
कनक कामनी दोनो त्यागो सच्ची क्षमा याचना ताय
सुखी हुमा जीवन दोनो का मिले गले से गना लगाय ।
मिले चन्दगी शीश झुकादो जानो झट दस कोसा दौड
प्रतिकुल सन्मुख आजावे तो झट मुडो लेवो मोड ।
प्रतिकुल ने अनुकूल करबा की ही राह बताऊसा
शुद्ध हृदय से कहो आपतो बारम्बार खमाउसा ।
थारा सब पातक झड जासी और निमल हो जासी मन
ऐसाख मद खगवणा करम्यू 'जीत' वही दिन होसी धन ।

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Antkridshang Sutra

Author
Sudharma., Abhaydev Suri
Title
Antkridshang Sutra
File name
Antkridshang Sutra
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/01
Publisher
Ajmer., Jain Jyoti Karyalay Naya Bazar
Language
Sanskrit
Pages
82
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
446205
Barcode
99999990027824.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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