Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun
Purusarth Siddhupay
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1
केनोपनिषद्
सानुवाद शाङ्करभाष्यसहित
[पद-भाष्य एवं वाक्य-भाष्य]
प्रकाशक.
गीताप्रेस, गोरखपुर
मुद्रक तथा प्रकाशक
घनश्यामदासं जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर
श्री हंसराज बच्छराज नाहटा
सरदारशहर निवासी
द्वारा
जैन विश्व भारती, लाडनूं
को सप्रेम भेंट
सं० १९९२
प्रथम संस्करण
मूल्य ॥) आठ आना
३२५०
निवेदन केनोपनिषद् सामवेदीय तलवकार ब्राह्मणके अन्तर्गत है। इसमे आरम्भसे लेकर अन्तपर्यन्त सर्वप्रेरक प्रभुके ही खरूप और प्रभावका वर्णन किया गया है। पहले दो खण्डोमे सर्वाधिष्ठान परब्रह्मके पारमार्थिक स्वरूपका लक्षणासे निर्देश करते हुए परमार्थज्ञानकी अनिर्वचनीयता तथा ज्ञेयके साथ उसका अभेद प्रदर्शित किया है। इसके पश्चात् तीसरे और चौथे खण्डमे यक्षोपाख्यानद्वारा भगवान्का सर्वप्रेरकत्व और सर्वकर्तृत्व दिखलाया गया है। इसकी वर्णनशैली बड़ी ही उदात्त और गम्भीर है । मन्त्रोके पाठमात्रसे ही हृदय एक अपूर्व मस्तीका अनुभव करने लगता है । भगवती श्रुतिकी महिमा अथवा वर्णन- शैलीके सम्बन्धमे कुछ भी कहना सूर्यको दीपक दिखाना है। इस उपनिषद्का विशेष महत्त्व तो इसीसे प्रकट होता है कि भगवान् भाष्यकारने इसपर दो भाष्य रचे है । एक ही ग्रन्थपर एक ही सिद्धान्तकी स्थापना करते हुए एक ही ग्रन्थकारद्वारा दो टीकाएँ लिखी गयी हो—ऐसा प्रायः देखा नहीं जाता । यहाँ यह शङ्का होती है कि ऐसा करनेकी उन्हे क्यों आवश्यकता हुई ? वाक्य-भाष्यपर टीका आरम्भ करते हुए श्रीआनन्दगिरि खामी कहते है-'केनेषितमित्यादिकां सामवेदशाखा- भेदब्राह्मणोपनिषदं पदशो व्याख्यायापि न तुतोप भगवान् भाष्यकारः शारीरकैायैरनिर्णीतार्थत्वादिति न्यायप्रधानश्रुत्यर्थसंग्राहकैवाक्यैर्व्या- चिख्यासुः..........."अर्थात् 'केनेपितं' इत्यादि सामवेदीय शाखान्तर्गत ब्राह्मणोपनिपद्की पदशः व्याख्या करके भी भगवान् भाष्यकार सन्तुष्ट नहीं हुए, क्योकि उसमे उसके अर्थका शारीरकशास्त्रानुकूल युक्तियोसे निर्णय नहीं किया गया था, अतः अब श्रुत्यर्थका निरूपण करनेवाले न्यायप्रधान वाक्योंसे व्याख्या करनेकी इच्छासे आरम्भ करते है। - ( २ ) इस उद्धरणसे सिद्ध होता है कि भगवान् भाष्यकारने पहले पद- भाष्यकी रचना की थी। उसमे उपनिपदर्थकी पदशः व्याख्या तो हो गयी थी; परन्तु युक्तिप्रधान वाक्योसे उसके तात्पर्यका विवेचन नही हुआ था । इसीलिये उन्हे वाक्य-भाष्य लिखनेकी आवश्यकता हुई। पद -भाष्यकी रचना अन्य भाष्योके ही समान है। वाक्य-भाष्यमे जहाँ- तहाँ और विशेषतया तृतीय खण्डके आरम्भमे युक्ति-प्रयुक्तियोद्वारा परमतका खण्डन और खमतका स्थापन किया गया है। ऐसे स्थानोमे भाष्यकारकी यह शैली रही है कि पहले शङ्का और उसके उत्तरको एक सूत्रसदृश वाक्यसे कह देते है और फिर उसका विस्तार करते हैं; जैसे प्रस्तुत पुस्तकके पृष्ठ ३ पर 'कर्मविषये चानुक्तिः तद्विरोधित्वात्' ऐसा कहकर फिर 'अस्य विजिज्ञासितव्यस्यात्मतत्त्वस्य कर्मविपयेऽवचनम्' इत्यादि ग्रन्थसे इसीकी व्याख्या की गयी है। इस प्रकार हम देखते हैं कि पद-भाष्यमे प्रधानतया मूलकी पदशः व्याख्या की गयी है और वाक्य-भाष्यमे उसपर विशेष ध्यान न देकर विपयका युक्तियुक्त विवेचन करनेकी चेष्टा की गयी है । अंग्रेजी और बँगलामे जो उपनिषद्-भाष्यके अनुवाद प्रकाशित हुए है उनमे केवल पद-भाष्यका ही अनुवाद किया गया है, पण्डितवर श्रीपीताम्बरजीने जो हिन्दी-अनुवाद किया था उसमे भी केवल पद-भाष्य ही लिया गया था। मराठी-भापान्तरकार परलोकवासी पूज्यपाद पं० श्रीविष्णुवापट शास्त्रीने केवल वाक्य-भाष्यका अनुवाद किया है। हमे तो दोनों ही उपयोगी प्रतीत हुए; इसलिये दोनोहीका अनुवाद प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवादोकी छपाईमे जो क्रम रक्खा गया है उससे उन दोनोंको तुलनात्मक दृष्टिसे पढ़नेमे बहुत सुभीता रहेगा । आशा है, हमारा यह अनधिकृत प्रयास पाठकोको कुछ रुचिकर हो सकेगा। विनीत, अनुवादक . श्रीहरिः विषय-सूची विपय १. शान्तिपाठ प्रथम खण्ड . २ १४ २० ... ३१ ... ४५ ... ६३ ६८ २. सम्बन्ध-भाष्य ३.प्रेरकविषयक प्रश्न ४. आत्माका सर्वनियन्तृत्व ५. आत्माका अज्ञेयत्व और अनिर्वचनीयत्व ६. ब्रह्म वागादिसे अतीत और अनुपास्य है द्वितीय खण्ड ७. ब्रह्मज्ञानकी अनिर्वचनीयता ८. अनुभूतिका उल्लेख ९. ज्ञाता अज्ञ है और अज्ञ ज्ञानी है १०. विज्ञानावभासोमे ब्रह्मकी अनुभूति ११. आत्मज्ञान ही सार है तृतीय खण्ड यक्षोपाख्यान १२. देवताओका गर्व १३. यक्षका प्रादुर्भाव १४. अग्निकी परीक्षा १५. वायुकी परीक्षा १६. इन्द्रकी नियुक्ति १७. उमाका प्रादुर्भाव ८७ १०४ : :: १०५ ११२ :: ११५
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( २ )
चतुर्थ खण्ड
१८. उमाका उपदेश
१९. ब्रह्मविषयक अधिदैव आदेश
२०. ब्रह्मविषयक अध्यात्म आदेश
२१. वन-संज्ञक ब्रह्मकी उपासनाका फल
२२. उपसंहार
२३. विद्याप्रासिके साधन
२४. ग्रन्थावगाहनका फल
२५. शान्तिपाठ
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Delalik उमा और इन्द्र तत्सब्रह्मणे नमः केनोपनिषद् मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाप्यार्थसहित येनेरिताः प्रवर्तन्ते प्राणिनः स्वेषु कर्मसु । तं वन्दे परमात्मानं वात्मानं सर्वदेहिनाम् ॥ यस्य पादांशुसम्भूतं विश्वं भाति चराचरम् । पूर्णानन्दं गुरुं वन्दे तं पूर्णानन्दविग्रहम् ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बल- मिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्व ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्या मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिपत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! मेरे अङ्ग पुष्ट हो तथा मेरे वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, बल और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ पुष्ट हो । यह सब उपनिपद्वेद्य ब्रह्म है । मै ब्रह्मका निराकरण न करूँ । ब्रह्म मेरा निराकरण न करे [ अर्थात् मै ब्रह्मसे विमुख न होऊँ और ब्रह्म मेरा परित्याग न करे ] इस प्रकार हमारा परस्पर अनिराकरण हो, अनिराकरण हो । उपनिपदोमे जो धर्म है वे आत्मा ( आत्मज्ञान ) मे लगे हुए मुझमे हो, वे मुझमे हो । त्रिविध तापकी शान्ति हो। or- १ प्रथम खण्ड सम्बन्ध-भाष्य पद-भाष्य 'केनेषितम्' इत्याद्योपनिपत् । अब 'केनेपितम्' इत्यादि पर- ब्रह्मविपयक उपनिपत् कहनी है परब्रह्मविपया वक्तव्या उपक्रमणिका इसलिये इस नवम अध्यायका * इति नवमस्याध्यायस्य | आरम्भ किया जाता है। इससे पूर्व सम्पूर्ण कोंके प्रतिपादनकी आरम्भः। प्रागेतसात्कर्माणि सम्यकपसे समाप्ति की गयी है, अशेषतः परिसमापितानि समस्त- | तथा समस्त कर्मोके आश्रयभूत प्राणकी उपासना एवं कर्मकी अङ्गभूत कर्माश्रयभूतस्य च प्राणस्योपासना सामोपासनाका वर्णन किया गया न्युक्तानि, कर्माङ्गसामविषयाणि | है । उसके पश्चात् जो गायत्रसाम- वाक्य-भाष्य समाप्तं कर्मात्मभूतप्राणविपयं इससे पूर्व-ग्रन्थमे कर्मोंके आश्रयभूत प्राणविज्ञान तथा अनेक प्रकारके कर्मका विज्ञानं कर्म चानेक- उपक्रमणिका निरूपण समाप्त हुआ, जिनके विकल्प प्रकारम्, ययोर्विकल्प- और समुच्चयके अनुष्ठानसे दक्षिण समुच्चयानुष्ठानाइक्षिणोत्तराभ्यां | और उत्तर मार्गाद्वारा क्रमशः आवृत्ति' (आवागमन) और अनावृत्ति सृतिभ्यामावृत्त्यनावृत्ती भवतः। (क्रममुक्ति) हुआ करती है । इसके आगे अत ऊवं फलनिरपेक्षज्ञानकर्म- देवता-ज्ञान और कौके समुच्चयका निष्काम भावसे अनुष्ठान करनेसे समुच्चयानुष्ठानात्कृतात्मसंस्कार- जिसने अपना चित्त शुद्ध कर लिया है, स्योच्छिन्नात्मज्ञानप्रतिवन्धकस्य जिसका आत्मज्ञानका प्रतिबन्धकरूप * यह उपनिषद् सामवेदीय तलवकार शाखाका नवम अध्याय है। १. दोनोंमसे केवल एक । २. एक साथ दोनों।
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ३ पद-भाष्य च । अनन्तरं च गायत्रसाम- विपयक विचार और शिष्यपरम्परा- रूप वंशके वर्णनमे समाप्त होनेवाले विषयं दर्शनं वंशान्तमुक्तकार्यम्। ग्रन्थसे कहा गया है वह कार्यरूप वस्तुका ही वर्णन है। सर्वमेतद्यथोक्तं कर्म च ज्ञानं सम्पूर्ण कर्म और ज्ञान सम्यक् च सम्यगनुष्ठितं निष्कामस्य प्रकारसे सम्पादन किये जानेपर निष्काम मुमुक्षुकी तो चित्त- मुमुक्षोः सत्त्वशुद्धयर्थ भवति । शुद्धिके कारण होते है। तथा ऊपर बतलाया हुआ यह वाक्य-भाष्य द्वैतविषयदोपदर्शिनो निर्माताशेष- | दोष नष्ट हो गया है, जो द्वैतविषयमे दोष देखने लगा है तथा सम्पूर्ण बाह्य वाह्यविषयत्वात्संसारवीजमज्ञान- विपयोका तत्त्व जान लेनेके कारण जो मुच्चिच्छित्सतः प्रत्यगात्मविषय- | संसारके वीजस्वरूप अज्ञानका उच्छेद करना चाहता है, उस आत्मतत्त्वके जिज्ञासोः केनेषितमित्यात्म- जिज्ञासुको आत्मस्वरूपके तत्त्वका ज्ञान खरूपतत्त्वविज्ञानायायमध्याय करानेके लिये 'केनेषितम्' आदि आरभ्यते। तेन च मृत्युपदम् मन्त्रसे यह (नवॉ) अध्याय आरम्भ किया जाता है। उस आत्मतत्त्वके अज्ञानमुच्छेत्तव्यं तत्तन्त्रो हि ज्ञानसे ही मृत्यु के कारणरूप अज्ञानका उच्छेद करना चाहिये, क्योकि यह संसारो यतः। अनधिगतत्वाद् ससार अज्ञानमूलक ही है । आत्मतत्त्व अज्ञात है, इसलिये उसका ज्ञान प्राप्त आत्मनो युक्ता तदधिगमाय करनेके लिये आत्मविषयक जिज्ञासा तद्विपया जिज्ञासा। उचित ही है। कर्मविषये चानुक्ति, तद्वि- कर्मकाण्डमें आत्मतत्त्वका निरूपण नहीं किया गया क्योंकि यह उसका विरोधी है । इस विशेपरूपसे जानने- विजिज्ञासितव्यस्य योग्य आत्मतत्वका कर्मकाण्डमें आत्मतत्त्वस्य कर्मविषयेऽवचनम् ।। विवेचन नहीं किया जाता । यदि कहो शानकर्मविरोधः रोधित्वात् । अस्य केनोपनिषद् [खण्ड.१ पद-भाष्य सकामस्य तु ज्ञानरहितस्य केव- | ज्ञानरहित सकाम साधकके केवल लानि श्रौतानि सार्तानि च श्रौत और स्मार्त कर्म दक्षिण कर्माणि दक्षिणमार्गप्रतिपत्तये मार्गकी प्राप्ति और पुनरावर्तनके हेतु होते है । इनके सिवा पुनरावृत्तये च भवन्ति । खाभा- अशास्त्रीय स्वच्छन्द वृत्तिसे तो पशु- विक्या त्वशास्त्रीयया प्रवृत्त्या से लेकर स्थावरपर्यन्त अधोगति ही पश्वादिस्थावरान्ता अधोगतिः होती है। "ये [खच्छन्द प्रवृत्ति- स्यात् 1"अर्थतयोः पथोर्न कतरेण | वाले जीव उत्तरायण और चन तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदा- दक्षिणायन] इन दोनोंमेसे किसी मार्गसे नहीं जाते; वे निरन्तर वर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व आवर्तन करनेवाले क्षुद्र जीव होते म्रियस्वेत्येतत्तृतीय स्थानम्" है; उनका 'जन्म लो और मरो' (छा० उ०५।१०।८) इतिश्रुतेः; | यह तीसरा स्थान (मार्ग) है" वाक्य-भाष्य कस्मादिति चेदात्मनो हि यथा- | कि क्यो ? तो उसका कारण यह है कि वद्विज्ञानं कर्मणा विरुध्यते । आत्माका यथार्थ ज्ञान कर्मका विरोधी है, क्योंकि जिसका ज्ञान कराना अभीष्ट निरतिशयब्रह्मस्वरूपो ह्यात्मा है वह आत्मा तो सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मस्वरूप विजिज्ञापयिषितः, ."तदेव ब्रह्म | ही है, जैसा कि "तदेव ब्रह्म त्व विद्धि त्वं विद्धि नेदं यदिदम्०" | नेदं यदिदमुपासते" इत्यादि श्रुतिका कथन है। जो पुरुष स्वाराज्यपर (के० उ०१।४) इत्यादि श्रुतेः। अभिपिक्त होकर ब्रह्मभावको प्राप्त हो न हि खाराज्येऽभिषिक्तो ब्रह्मत्वं गया है वह किसीके भी सामने झुकने- गमितः कञ्चन नमितुमिच्छत्यतो | की इच्छा नहीं करता । अतः जिसने ब्रह्मास्मीति सम्बुद्धो न कर्म | यह जान लिया है कि 'मै ब्रह्म हूँ' उससे कर्म नहीं कराया जा सकता। कारयितुं शक्यते । न ह्यात्मानम् | अपने आत्माको आप्तकाम ब्रह्म मानने- अवाप्तार्थ ब्रह्म मन्यमानः प्रवृत्ति वाला पुरुष किसी भी प्रवृत्तिको प्रयोजनवतीं पश्यति। न च प्रयोजनवती नहीं देखता और कोई भी खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ५ पद-भाष्य "प्रजा ह तिस्रोऽत्यायमीयु" | इस श्रुतिसे और "तीन प्रसिद्ध (ऐ० आ०२।१।११४) इति च प्रजाओने धर्मत्याग किया" इस मन्त्रवर्णसे भी [ यही बात सिद्ध मन्त्रवर्णात् । होती है । विशुद्धसत्त्वस्य तु निष्कामस्य जो इस जन्म और पूर्व जन्ममें शानाधिकारि-एव बाह्यादनित्यात् किये हुए कर्मोके संस्कारविशेपसे निरूपणम् साध्यसाधनसम्बन्धाद् उद्भूत बाय एवं अनित्य साध्य- इह कृतात्पूर्वकृताद्वा संस्कार- साधनके सम्बन्धसे विरक्त हो गया है उस विशुद्धचित्त निष्काम पुरुप- विशेषोद्भवाद्विरक्तस्य प्रत्यगात्म- को ही प्रत्यगात्मविपयक जिज्ञासा विपया जिज्ञासा प्रवर्तते ।। हो सकती है । यही बात तदेतद्वस्तु प्रश्नप्रतिवचनलक्षणया 'केनेपितम्' इत्यादि प्रश्नोत्तररूपा वाक्य-भाष्य निष्प्रयोजना प्रवृत्तिरतोविरुध्यत | प्रवृत्ति बिना प्रयोजनके हो नही सकती, अतः कर्मसे ज्ञानका विरोध एव कर्मणा ज्ञानम् । अतः कर्म- | है ही। इसीलिये कर्मकाण्डमे आत्म- विपयेऽनुक्तिः,विज्ञानविशेपविषया ज्ञानका उल्लेख नहीं है; अर्थात् जिज्ञासा किसी विज्ञानविशेषके सम्बन्धमे ही एव जिज्ञासा। होती है। कर्मानारम्भ इति चेन्न यदि कहो कि तब तो कर्मका आरम्भ ही न किया जाय तो ऐसा. निष्कामस्य संस्कारार्थत्वात् । कहना ठीक नहीं, क्योकि निष्काम कर्म पुरुपका संस्कार करनेवाला है। यदि ह्यात्मविज्ञानेनात्माविद्या पूर्व०-यदि आत्माके अज्ञानका विषयत्वात्परितित्याजयिषितं कर्म, कारण होनेसे आत्मज्ञानद्वारा कर्मका परित्याग कराना ही अभीष्ट है तो ततः "प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूराद- 'कीचडको धोनेकी अपेक्षा तो उसे स्पर्शनंवरम्" (म० वन०२।४९) | दूरसे न छूना ही अच्छा है" इस - ६ केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य श्रुत्या प्रदर्श्यते 'केनेषितम्' | श्रुतिद्वारा दिखलायी जाती है। कठोपनिषद्मे तो कहा है- इत्याद्यया । काठके चोक्तम् | "स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोको "पराश्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भू- बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है; इसलिये इन्द्रियाँ बाहरकी ओर स्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्त- ही देखती है, अन्तरात्माको नहीं देखती; किसी-किसी बुद्धिमान्ने रात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मा- ही अमरत्वकी इच्छा करते हुए नमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्" अपनी इन्द्रियोको रोककर प्रत्यगात्माका साक्षात्कार किया है" (क० उ०२।१।१) इत्यादि। | इत्यादि । तथा अथर्ववेदीय (मुण्डक) "परीक्ष्यलोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो उपनिपझे भी कहा है-"ब्रह्मनिष्ठ पुरुप कर्मद्वारा प्राप्त होनेवाले वाक्य-भाष्य इत्यनारम्भ एव कर्मणः श्रेयान् । | उक्तिके अनुसार कर्मको आरम्भ न करना ही उत्तम है क्योकि वह अल्प अल्पफलत्वादायासबहुलत्वात् फलवाला और अधिक परिश्रमवाला तत्त्वज्ञानादेव च श्रेयाप्राप्त है तथा आत्यन्तिक कल्याण तत्त्व- इति चेत् । विज्ञानसे ही होता है सत्यम्। एतदविद्याविषयं सिद्धान्ती-ठीक है, परन्तु चित्तशुद्ध? अविद्यामूलक कर्म "जो भोगोकी कर्माल्पफलत्वादि- कामना करता है" तथा "इस प्रकार कर्मावश्यकम् दोषवद्वन्धरूपं च जो कामना करनेवाला है" इत्यादि प्राप्तशानस्य तु सकामस्य “कामान् श्रुतियोके अनुसार सकाम पुरुषके लिये यः काममते"(मु०० ही अल्पफलत्यादि दोषोसे युक्त तथा ३।२।२)"इति नु कामयमानः" बन्धनकारक है; निष्काम पुरुषके लिये नही। उसके लिये तो कर्म अपने इत्यादिश्रुतिभ्यः न निष्कामस्य । निर्वर्तक (निष्पन्न करनेवाले) और तस्य तु संस्कारार्थान्येव कर्माणि आश्रयभूत प्राणोके विज्ञानके सहित ! यह तदनारम्भः खंण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ७. पड़-भाष्य निर्वेदमायानास्त्यकृतः कृतेन ! | लोकोकी परीक्षा कर वैराग्यको प्राप्त तद्विज्ञानार्थ स गुरुमेवाभिगच्छेत् द्वारा अकृत (नित्यस्वरूप मोक्ष) हो जाय, क्योकि कृत (कर्म) के प्राप्त नहीं हो सकता। उसका समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्" विशेप ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तो (मु० उ० १। २ । १२) उस (जिज्ञासु) को हाथमें समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके ही इत्याद्याथर्वणे च । पास जाना चाहिये" इत्यादि । एवं हि विरक्तस्य प्रत्यगात्म केवल इस प्रकारसे ही विरक्त निवृत्ताशानस्य विषयं विज्ञानं श्रोतुं पुरुपको प्रत्यगात्मविषयक विज्ञानके विज्ञातुं च श्रवण, मनन और साक्षात्कारकी प्रदर्शनम् सामर्थ्यमुपपद्यते, क्षमता हो सकती है, और किसी नान्यथा । एतस्माच्च प्रत्यगात्म-तरह नही । इस प्रत्यगात्माके कृतकृत्यता- मन्तुं वाक्य-भाप्य भवन्ति तन्निर्वर्तकाश्रयप्राण- सस्कारके ही कारण होते है। "देवयाजी विज्ञानसहितानि । “देवयाजी | श्रेष्ठ है या आत्मयाजी" इस प्रकार श्रेयानात्मयाजी वा" इत्युपक- आरम्भ करके वाजसनेय श्रुतिमे कहा म्यात्मयाजी तु करोति "इदं है कि आत्मयाजी अपने सस्कारके मेऽनेनासंस्क्रियते इति"संस्का- कि "इससे मेरे इस अगका सस्कार लिये ही यह समझकर कर्म करता है रार्थमेव कर्माणीति वाजसनेयके। होगा"। "यह शरीर महायज्ञ और "महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं यशोद्वारा ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके योग्य क्रियते तनुः (मनु० २।२८) | किया जाता है ।" "यज्ञ, दान और तप- "यज्ञो दानं तपश्च व पावनानि ये विद्वानोको पवित्र करनेवाले ही है" मनीषिणाम्" (गीता १८ । ५) | इत्यादि स्मृतियोसे भी यही बात सिद्ध इत्यादि स्मृतेश्च । होती है। प्राणादिविज्ञानं च केवलं कर्म अकेला या कर्मके साथ मिला हुआ समुच्चितं वा सकामस्य प्राणात्म- होनेपर भी प्राणादि विज्ञान सकाम ८ केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य ब्रह्मविज्ञानात्संसारबीजमज्ञानं ब्रह्मत्वविज्ञानसे ही कामना और कामकर्मप्रवृत्तिकारणमशेषतो कर्मकी प्रवृत्तिका कारण तथा संसारका बीजभूत अज्ञान पूर्णतया निवर्तते, "तत्र को मोहः कः निवृत्त हो सकता है। जैसा कि शोक एकत्वमनुपश्यतः" ( ई० "उस अवस्थामे एकत्व देखनेवाले उ० ७) इति मन्त्रवर्णात्, पुरुपको क्या मोह और क्या शोक "तरति शोकमात्मवित्" (छा० | हो सकता है" इत्यादि मन्त्रवर्ण उ०७।१।३) इति, "भिद्यते तथा "आत्मज्ञानी शोकको पार कर हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। जाता है" "उस परावरको देख लेनेपर उसकी हृदय-ग्रन्थि टूट जाती क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तसिन्दृष्टे है, सारे सन्देह नष्ट हो जाते है परावरे" (मु० उ०२।२।८) और समस्त कर्म क्षीण हो जाते है" इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । इत्यादि श्रुतियोसे सिद्ध होता है । वाक्य-भाव्य प्राप्त्यर्थमेव भवति । निष्कामस्य | पुरुषके लिये तो प्राणत्व-प्राप्तिका ही स्वात्मज्ञानप्रतिबन्धनिर्माष्टय कारण होता है, किन्तु निष्काम पुरुष- भवति आदर्शनिर्मार्जनवत् । के लिये वह दर्पणके मार्जनके समान आत्मज्ञानके प्रतिबन्धकोका निवर्तक उत्पन्नात्मविद्यस्य त्वनारम्भो होता है। हॉ, जिसे आत्मज्ञान प्राप्त निरर्थकत्वात् । “कर्मणा वध्यते | हो गया है उसके लिये निष्प्रयोजन जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते ।| होनेके कारण कर्मके आरम्भकी अपेक्षा तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः | नहीं है । जैसा कि "जीव कर्मसे बँधता है और आत्मज्ञानसे मुक्त हो जाता है, पारदर्शिनः" ( महा० থা इसलिये पारदर्शी यतिजन कर्म नही २४२ । ७) इति । "क्रिया- करते" "पूर्वकालमे कर्ममार्ग और पथश्चैव पुरस्तात्संन्यासश्च तयोः | संन्यास [ दो मार्ग] थे उनमे संन्यास संन्यास एवात्यरेचयत्" इति । ही उत्कृष्ट था" "किन्हीने त्यागसे खण्ड १] शाङ्करभाण्यार्थ पद-भाष्य 2 कर्मसहितादपि ज्ञानादेतत् पूर्व०-यह बात तो कर्मसहित सिध्यतीति चेत् ? ज्ञानसे भी सिद्ध हो सकती है न न; वाजसनेयके तस्यान्य सिद्धान्ती-नही, क्योकि समुच्चयवाद- कारणत्ववचनात् । वाजसनेय (बृहदारण्यक) श्रुतिमे खण्डनम् "जाया मेस्यात्"(वृ० | उस (कर्मसहित ज्ञान) को अन्य उ०१।४।१७) इति प्रस्तुत्य फलका कारण बतलाया है । "मुझे स्त्री प्राप्त हो" इस प्रकार आरम्भ "पुत्रेणायं लोको जय्यो नान्येन | करके वाजसनेय श्रुतिमे "यह लोक कर्मणा, कर्मणा पितृलोको पुत्रद्वारा प्राप्त किया जा सकता है विद्यया देवलोकः" (वृ० उ० | और किसी कर्मसे नही; कर्मसे पितृलोक मिलता है और विद्या १।५।१६) इत्यात्मनोऽन्यस्य (उपासना) से देवलोक" इस लोकत्रयस्य कारणत्वमुक्तं प्रकार उसे आत्मासे भिन्न लोकत्रय- वाजसनेयके। का ही कारण बतलाया है। वाक्य-भाज्य "त्यागेनैके." (कै० उ० ११२) [अमरत्व प्राप्त किया]" तथा "नान्यः पन्था विद्यते." ( श्वे० | "[इसके सिवा] और कोई मार्ग नही है" इत्यादि श्रुतियोसे भी सिद्ध उ० ३।८) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । | होता है । न्यायाच; उपायभूतानि हि युक्तिसे भी [कर्म ज्ञानके साक्षात् कर्माणि संस्कारद्वारेण ज्ञानस्य । साधन नहीं है।] कर्म तो चित्तशुद्धिके द्वारा जानके साधन है । अमृतत्वकी ज्ञानेन त्वमृतत्वप्राप्तिः, "अमृ- प्राप्ति तो ज्ञानसे ही होती है जैसा कि तत्वं हि विन्दते" (के० उ०२१४)| "[ज्ञानसे] अमृतत्व ही प्राप्त कर "विद्यया विन्दतेऽमृतम्" (के० लेता है" "विद्यासे अमृतको पा लेता है" इत्यादि श्रुति-स्मृतियोसे प्रमाणित उ०२।४) इत्यादिश्रुतिस्मृति- | होता है। जो मनुष्य नदीके पार भ्यश्च । न हि नद्याः पारगो नावं पहुंच गया है वह अपने अभीष्ट - केनोपनिषद् [खण्ड १- पद-भाष्य तत्रैव च पारिवाज्यविधाने वहाँ (उस बृहदारण्यकोपनिपद्- हेतुरुक्तः "किं प्रजया करिष्यामो में) ही संन्यास ग्रहण करनेमें यह हेतु बतलाया है-"हम प्रजा- येषां नोऽयमात्मायं लोका" को लेकर क्या करेंगे, जिन हमे (बृ० उ०४।४ । २२) इति । कि यह आत्मलोक ही अभीष्ट तत्रायं हेत्वर्थः प्रजाकर्मतत्सं- है ?" उस हेतुका अभिप्राय प्रकार है--'मनुष्यलोक, युक्तविद्याभिर्मनुष्यपितृदेवलोक- पितृलोक और देवलोक-इन त्रयसाधनैरनात्मलोकप्रतिपत्ति- | तीन लोकोके साधन अनात्म- कारणैः किं करिष्यामः । न चा- लोकोकी प्राप्तिके हेतुभूत प्रजा, कर्म और कर्मसहित ज्ञानसे हमे साकं लोकत्रयमनित्यं साधन- क्या करना है; क्योकि हमलोगोंको साध्यमिष्टम्, येषामसार्क स्वाभा- | जिन्हे कि, स्वाभाविक, अजन्मा, वाक्य-भाष्य आत्मनः न मुञ्चति यथेष्टदेशगमन प्रति | स्थानपर जानेके लिये स्वतन्त्रता प्राप्त स्वातन्त्र्ये सति। होनेपर भी नौकाको न छोड़े-ऐसा कभी नही होता। न हि स्वभावसिद्धं वस्तु जो वस्तु स्वतः सिद्ध है उसे कोई सिपाधयिषति सा- भी पुरुप साधनोसे सिद्ध नही करना धनैः। खभावसिद्ध- चाहता । आत्मा भी स्वभाव-सिद्ध है; अविकार्यत्वादि- और इसीलिये वह प्राप्त करने की इच्छा निरूपणम् श्वात्मा, तथा न करने योग्य नहीं है, क्योकि आत्मस्वरूप आपिपयिषितः, होनेके कारण वह नित्य-प्राप्त ही है। आत्मत्वे सति नित्याप्तत्वात् । इसी प्रकार उसका विकार भी इष्ट नापिविचिकारयिषितः;आत्मत्वे नही है क्याकि आत्मा होनेके साथ ही सति नित्यत्वादविकारित्वात् वह नित्य, अविकारी, अविषय तथा अविषयत्वादमूर्तत्वाच्च । अमूर्त भी है।
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य विकोजोजरोऽमृतोऽभयो न | अजर, अमर, अभय और जो कर्मसे घटता-बढ़ता नही है वह नित्य- वर्धते कर्मणानो कनीयान्नित्यश्च लोक ही इष्ट है, साधनद्वारा प्राप्त लोक इष्टः । स च नित्यत्वान्ना- होनेवाला अनित्य लोकत्रय तो इष्ट है नही । और वह ( आत्मलोक ) विद्यानिवृत्तिव्यतिरेकेणान्यसाधन- तो नित्य होनेके कारण अविद्या- निवृत्तिके सिवा अन्य किसी मी निष्पाद्यः । तसात्प्रत्यगात्म- साधनसे प्राप्त होने योग्य है नहीं। ब्रह्मविज्ञानपूर्वकः सवैषणासंन्यास अतः हमको आत्मा और ब्रह्मके एकत्वज्ञानपूर्वक सब प्रकारकी एव कर्तव्य इति । एपणाओका त्याग ही करना चाहिये। वाक्य-भाप्य " श्रुतेश्च "न वर्धते कर्मणा" इसके सिवा श्रुतिसे "आत्मा कर्मसे (६० उ०४।४।२३) इत्यादि। बढता नही है" इत्यादि और स्मृतिसे भी "यह आत्मा अविकार्य कहा स्मृतेश्च "अविकार्योऽयमुच्यते' जाता है" इत्यादि कहा गया (गीता २१ २५) इति । न च है। "शुद्ध और पापरहित" इत्यादि सश्चिकीर्षितः श्रुतियोसे [प्रकट होत है कि] शुद्धमपाप- आत्माका संस्कार करना भी अभीष्ट विद्धम्" (ई० उ०८) इत्यादि- नही है । इसके सिवा अपनेसे अभिन्न होनेके कारण भी वह सस्कार्य श्रुतिभ्यः, अनन्यत्वाच्च, अन्ये- नही है क्योकि सस्कार अन्य वस्तुके नान्यत्संस्क्रियते । न चात्म- द्वारा अन्यका ही हुआ करता है। आत्मासे भिन्न कोई क्रिया भी नही है। नोऽन्यभूता क्रिया अस्ति, न च और स्वय आत्माके योगसे ही आत्मा- स्वेनैवात्मना स्वमात्मानं सञ्चि- | के सस्कारकी इच्छा कोई न करेगा। कीत् । न च वस्त्वन्तराधानं एक वस्तुका दूसरी वस्तुपर आधान करना अथवा एक वस्तुको दूसरी नित्यप्राप्तिर्वा वस्त्वन्तरस्य वस्तुका प्राप्त होना नित्य नही हो १२ केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाज्य कर्मसहभावित्वविरोधाच्च प्रत्य इसके सिवा आत्मा और ब्रह्मके शानकर्मविरोध- गात्मब्रह्मविज्ञानस्य । एकत्वज्ञानका कर्मके साथ-साथ प्रदर्शनम् होनेमे विरोध भी है। जिसमे न छुपात्तकारकफल- | [कर्ता-कर्मादि] कारक और भेदविज्ञानेन कर्मणा प्रत्यस्त- | [वर्गादि ] फलका भेद स्वीकार मितसर्वभेददर्शनस्य प्रत्यगात्म- किया गया है उस कर्मके साथ सम्पूर्ण भेददृष्टिसे रहित ब्रह्म और ब्रह्मविषयस्य सहभावित्वम् आत्माकी एकताके ज्ञानका रहना उपपद्यते, वस्तुप्राधान्ये सति संगत नहीं है, क्योकि ब्रह्मज्ञान अपुरुषतन्त्रत्वाद्ब्रह्मविज्ञानस्य । तो वस्तुप्रधान होनेके कारण पुरुष (कर्ता) के अधीन नही है । तसादृष्टादृष्टेभ्यो बाह्यसाधन- अतः इस 'केनेपितम्' इत्यादि साध्येभ्यो विरक्तस्य प्रत्यगात्म- श्रुतिके द्वारा यह दृष्ट और अदृष्ट विषया ब्रह्मजिज्ञासेयम् 'केनेषि- | बाह्यसाधन एवं साध्योसे विरक्त तम्' इत्यादिश्रुत्या प्रदर्श्यते । हुए पुरुपकी ही प्रत्यगात्मविषयक ब्रह्मजिज्ञासा दिखलायी जाती है। शिष्याचार्यप्रश्नप्रतिवचनरूपेण | शिष्य और आचार्यके प्रश्नोत्तररूपसे कथनं तु सूक्ष्मवस्तुविषयत्वात् यह कथन वस्तुका सुगमतासे ज्ञान सुखप्रतिपत्तिकारणं भवति । करानेमें कारण है क्योंकि यह विपय सूक्ष्म है। इसके सिवा केवलतर्कागम्यत्वं च दर्शितं केवल तकद्वारा इसकी अगम्यता भवति । | भी दिखलायी गयी है। वाक्य-भोप्य नित्या। नित्यत्वं चेष्टं मोक्षस्य । | सकता, और मोक्षकी नित्यता ही इष्ट है। इसलिये जिसे आत्मज्ञान हो गया है अत उत्पन्न विद्यस्य कारम्भो- उसके लिये कर्मका आरम्भ नही बन ऽनुपपन्नः, अतोव्यावृत्तबाह्यबुद्धः | सकता। अतः जिसकी बाह्य-बुद्धि निवृत्त हो गयी है उसे आत्मतत्त्वका ज्ञान आत्मविज्ञानाय केनेषितमित्या- करानेके लिये 'केनेषितम्' इत्यादि द्यारम्भः। उपनिषद् आरम्भ की जाती है। १. अर्थात् आत्मापर परमानन्दत्व आदि गुणोका आधान या उसका ब्रह्माण्ड- बाह्य ब्रह्मको प्राप्त होना नित्य नहीं हो सकता।
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य "नेषा तर्केण मतिरापनेया" "यह बुद्धि तर्कद्वारा प्राप्त होने (क० उ०१।२।९) योग्य नहीं है" इस श्रुतिसे भी यही गुरूपसत्ति. इतिश्रुतेश्च । “आचार्य- | बात सिद्ध होती है । अत: “आचार्य- वान्पुरुषो वेद" (छा० उ०६। वान् पुरुष [ब्रह्मको] जानता है" १४ । २) "आचार्याद्वैव विद्या "आचार्यसे प्राप्त हुई विद्या ही उत्कृष्टताको प्राप्त होती है।" "उसे विदिता साधिष्ठं प्रापदिति" साष्टाङ्ग प्रणामके द्वारा जानो" (छा० उ०४।९।३) "तद्विद्धि | इत्यादि श्रुति-स्मृतिके नियमानुसार किसी शिष्यने प्रत्यगात्मविपयक प्रणिपातेन" (गीता ४ । ३४) ज्ञानके सिवा कोई और शरण इत्यादिश्रुतिस्मृतिनियमाच्च कश्चि- ( आश्रय ) न देखकर उस निर्भय, द्गुरुं ब्रह्मनिष्ठं विधिवदुपेत्य | नित्य, कल्याणमय अचल पदकी प्रत्यगात्मविषयादन्यत्र शरणम् इच्छा करते हुए किसी ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास विधिपूर्वक जाकर अपश्यन्नभयं नित्यं शिवमचलम् पूछा—यही बात [आगेकी श्रुतिसें] इच्छन्पप्रच्छेति कल्प्यते कल्पना की जाती है- वाक्य-भाष्य. प्रवृत्तिलिङ्गाद्विशेपार्थः प्रश्न [मन आदि अचेतन पदार्थों की ] प्रवृत्तिरूप लिङ्गसे [उनकी प्रेरणा उपपन्नः। रथादीनां हि चेतना- करनेवाले ] किसी विशेष तत्त्वके वदधिष्ठितानां प्रवृत्तिदृष्टा न विषयमे प्रश्न करना ठीक ही है, क्योकि रथ आदि [अचेतन पदार्थों ] की अनधिष्ठितानाम् । मन आदीनां प्रवृत्ति भी चेतन प्राणियोसे अधिष्ठित च अचेतनानां प्रवृत्तिदृश्यते । होकर ही देखी है, उनसे अधिष्ठित हुए बिना नहीं देखी । मन आदि तद्धि लिङ्गं चेतनावतोऽधिष्ठातुः | अचेतन पदार्थों की भी प्रवृत्ति देखी अस्तित्वे । करणानि हि मन ही जाती है। यही उनके चेतन अधिष्ठाताके अस्तित्वका अनुमापक आदीनि नियमेन प्रवर्तन्ते । लिङ्ग है । मन आदि इन्द्रियॉ.नियमसे केनोपनिषद् [खण्ड १ प्रेरकविपयक प्रश्न ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः । केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केनेपितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥ यह मन किसके द्वारा इच्छित और प्रेरित होकर अपने विपयोमे गिरता है ? किससे प्रयुक्त होकर प्रथम (प्रधान) प्राण चलता है ? प्राणी किसके द्वारा इच्छा की हुई यह वाणी बोलते है ? और कौन देव चक्षु तथा श्रोत्रको प्रेरित करता है ? ॥१॥ पट-भाप्य केन इपितं केन का इपितम् इप्टमभिप्रेतं सत् मनः पतति केन इपितम्---किस कर्ताक द्वारा इच्छित अर्थात् अभिप्रेत हुआ मन अपने विपयकी ओर जाता वाक्य-भाप्य तन्नासति चेतनावत्यधिष्ठातरि प्रवृत्त हो रही है उनकी प्रवृत्ति विना किसी चेतन अधिष्ठाताके बन नहीं उपपद्यते । तद्विशेपस्य चानधि- | सकती । इस प्रकार सामान्य चेतनका गमाञ्चेतनावत्सामान्ये चाधिगते | ज्ञान होनेपर भी उसके विशेष रूपका ज्ञान नहोनेके कारण यह विशेप-विपयक विशेपार्थः प्रश्न उपपद्यते । प्रश्न उचित ही है। केनेपितम् केनेष्टं कस्येच्छा केन इपितम्-किससे इच्छा किया हुआ अर्थात् किसकी इच्छामात्रसे मन मात्रेण मनः पतति गच्छति | अपने विपयोकी ओर गिरता अर्थात् खविषये नियमेन व्याप्रियत | जाता है ? यानी वह किसकी इच्छासे अपने विपयमे नियमानुसार व्यापार इत्यर्थः । मनुतेऽनेनेति विज्ञान- करता है ? जिससे मनन करते है वह विज्ञाननिमित्तक अन्तःकरण मन है। निमित्तमन्तःकरणं मनःप्रेपितम् यहाँ किसके द्वारा प्रेषित हुआ-सा'- इवेत्युपमार्थः । न विषित- ऐसा उपमापरक अर्थ लेना चाहिये ।
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य गच्छतिखविपयंप्रतीति सम्बध्यते है यहाँ 'पतति' क्रियाके साथ 'स्वविपयं प्रति' का सम्बन्ध इषेराभीक्ष्ण्यार्थस्य गत्यर्थस्य चेहा- (अन्वय) है । यहाँ आभीक्ष्ण्य और गत्यर्थक * 'इप्' धातु सम्भव सम्भवादिच्छार्थस्यैवैतद्रूपमिति न होनेके कारण यह इच्छार्थक 'इप्' धातुका ही [ इषितम् ] रूप 'गम्यते । इपितमिति इट्प्रयोग- है-ऐसा जाना जाता है। [ 'इष्टम्' के स्थानमे 'इपितम्'] यह इट-प्रयोग स्तुच्छान्दसः । तस्यैव प्रपूर्वस्य छान्दस (वैदिक) है। उसप्रे-पूर्वक नियोगार्थ प्रेपितमित्येतत् । 'इप धातुका ही प्रेरणा अर्थमे 'प्रेपितम्' रूप हुआ है। यदि तत्र प्रेपितमित्येवोक्ते प्रेपयित- | यहाँ केवल 'प्रेपितम्' इतना ही प्रेषणविशेषविषयाकाङ्क्षा स्यात् कहा होता तो प्रेपण करनेवाले और उसके प्रेपण-प्रकारके केन प्रेपयिवृविशेपेण, कीदृशं सम्बन्धमे ऐसी शङ्का हो सकती थी कि किस प्रेपकविशेपके द्वारा और वा प्रेषणमिति । इपितमिति तु किस प्रकार प्रेपण किया हुआ ? विशेषणे सति तदुभयं निवर्तते, अतः यहाँ 'इपितम्' इस विशेपणके रहनेसे ये दोनो शङ्काएँ निवृत्त हो कस्येच्छामात्रेण प्रेपितमित्यर्थ- | जाती है, क्योकि 'इससे किसीकी इच्छामात्रसे प्रेपित हुआ' यह विशेप विशेषनिर्धारणात् । अर्थ हो जाता है। वाक्य-भाप्य प्रेपितशब्दयोराविह सम्भवतः।। 'इपित' और 'प्रेपित' शब्दोके मुख्य अर्थ यहाँके लिये सम्भव नहीं है, 'न हि शिष्यानिव मन आदीनि क्योकि आत्मा मन आदिको विषयोकी * इप् धातुके अर्थ आभीक्ष्ण्य (बारम्बार होना) गति और इच्छा है। +व्याकरणका यह सिद्धान्त है कि 'छन्दसि दृष्टानुविधिः' वेदमें जो प्रयोग जैसे देखे गये हैं वहाँके लिये उनका वैसा ही विधान माना गया है ।
१ केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य यद्येषोऽर्थोऽभिप्रेतः स्यात् , शङ्का- यदि यही अर्थ अभिमत था तो 'केनेषितम्' इतनेहीसे मन्त्रार्थ- केनेपितमित्येतावतेव सिद्ध हो सकनेके कारण 'प्रेषितम्' मीमासा सिद्धत्वात्प्रेषितमिति न ऐसा और नहीं कहना चाहिये था। वक्तव्यम् । अपि च शब्दाधि- | इसके अतिरिक्त शब्दोकी अधि- कतासे अर्थकी अधिकता होनी क्यादर्थाधिक्यंयुक्तमिति इच्छया उचित है इसलिये 'इच्छा' कर्म अथवा कर्मणा वाचा वा केन प्रेषित- वाणी इनमेसे किसके द्वारा प्रेपित, इस प्रकार प्रेपकविशेपका ज्ञान मित्यर्थविशेषोऽवगन्तुं युक्तः। प्राप्त करना आवश्यक होगा। न, प्रश्नसामर्थ्यात्ः देहादि समाधान-नही,प्रश्नकी सामर्थ्य- से यह बात प्रतीत नही होती; क्योकि संघातादनित्यात्कर्मकार्याद्विरक्तः, इससे यह निश्चय होता है कि जो पुरुप देहादि सङ्घातरूप अनित्य कर्म और कार्यसे विरक्त हो गया है वाक्य-भाष्य विषयेभ्यःप्रेषयत्यात्मा। विविक्त-। ओर इस प्रकार नही भेजता जैसे गुरु शिष्योको । वह तो सबसे विलक्षण नित्यचित्खरूपतया तु निमित्त- और नित्य चित्स्वरूप होनेके कारण मात्रं प्रवृत्तौ नित्यचिकित्सा- नित्य चिकित्साके अधिष्ठाता [चकोर पक्षी] के समान उनकी प्रवृत्तिमे धिष्ठातृवत् । केवल निमित्तमात्र है। १. राजा लोग जब भोजन करते है तो उसमे विष मिला हुआ तो नहीं है इसकी परीक्षाके लिये उसे चकोरके सामने रख देते हैं। विषमिप्रित अन्नको देखकर चकोरकी ऑखोंका रग बदल जाता है। इस प्रकार चकोरको केवल सन्निधिमानसे हो राजाकी भोजनमें प्रवृत्ति हो जाती है । इसके लिये उसे और कुछ नही करना पडता ।
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ सात् । पट-भाष्य अतोऽन्यत्कूटस्थं नित्यं वस्तु | और इनसे पृथक् कूटस्थ नित्य वस्तुको जाननेकी इच्छा करनेवाला वुभुत्समानः पृच्छतीति साम- | है वही यह बात पूछ रहा है। अन्यथा इच्छा, वाक् और कर्मके •दुपपद्यते । इतरथा इच्छावा- द्वारा तो इस देहादि सङ्घातका प्रेरकत्व प्रसिद्ध ही है [अर्थात् कर्मभिर्देहादिसंघातस्य प्रेरयितृत्वं इच्छा, वाणी और कर्मके द्वारा यह देहादि सद्दात मनको प्रेरित प्रसिद्धमिति प्रश्नोऽनर्थक एव किया करता है-इस बातको तो सभी जानते है] । अतः यह प्रश्न निरर्थक ही हो जाता। एवमपि प्रेपितशब्दस्यार्थों न शङ्का किन्तु इस प्रकार भी 'प्रेपित' शब्दका अर्थ तो प्रदर्शित प्रदर्शित एव । हुआ ही नहीं। न; संशयवतोऽयं प्रश्न इति नहीं, यह प्रश्न किसी संशयालुका है इसीसे प्रेषितशब्दस्यार्थविशेष उपपद्यते। 'प्रेपित' शब्दका अर्थविशेप किं यथाप्रसिद्धमेव कार्यकारण- | जिसे ऐसा सन्देह है कि ] यह उपपन्न हो सकता है [अर्थात् संघातस्य प्रेपयितृत्वम्, किं वा | इन्द्रियोके संघातरूप देहमे है, प्रेरक-भाव सर्वप्रसिद्ध भूत और संघातव्यतिरिक्तस्य स्वतन्त्रस्य अथवा उस सद्धातसे भिन्न किसी स्वतन्त्र वस्तुमे ही केवल इच्छामात्रसे इच्छामात्रेणैव मनआदिप्रेपयित्- | मन आदिकी प्रेरकता है ? इस समाधान- वाक्य-भाग्य प्राण इति नासिकाभवः यहाँ प्रकरणवश 'प्राण' शब्दसे नासिकामे रहनेवाला वायु समझना प्रकरणात् । प्रथमत्वं प्रचलन- चाहिये । चलन-क्रिया प्राण-निमित्तक क्रियायाः प्राणनिमित्तत्वात्वतो होनेसे प्राणको प्रधान माना गया है।
केनोपनिषद्
[खण्ड १
पद-भाष्य
पारतन्त्र्य-
त्वम्, इत्यस्यार्थस्य प्रदर्शनार्थ प्रकार इस अभिप्रायको प्रदर्शित
करनेके लिये ही 'किसके द्वारा
केनेषितं पतति प्रेषितं मन इति | इच्छित और प्रेपित किया हुआ मन
[अपने विपयकी ओर जाता हैं ऐसे
विशेषणद्वयमुपपद्यते । दो विशेपण ठीक हो सकते है।
ननु खतन्त्रं मनः स्वविषये
यदि कहो कि यह बात तो
प्रसिद्ध ही है कि मन स्वतन्त्र है
मन.प्रभृतीनां स्वयं पततीति प्रसि- और वह स्वयं ही अपने विपयोकी
द्धम् तत्र कथं प्रश्न ओर जाता है; फिर उसके विषयमे
प्रदर्शनम्
उपपद्यत इति, उच्यते- यह प्रश्न कैसे बन सकता है ?
तो इसके उत्तरमें हमारा कहना है
यदि स्वतन्त्रं मनः प्रवृत्ति-
कि यदि मन प्रवृत्ति-निवृत्तिमे
निवृत्तिविषये स्यात्, तर्हि सर्वस्य स्वतन्त्र होता तो सभीको अनिष्ट-
चिन्तन होना ही नहीं चाहिये था ।
अनिष्टचिन्तनं न स्यात् । अनर्थं किन्तु मन जान-बूझकर भी अनर्थ-
च जानन्सङ्कल्पयति । अभ्यग्र- चिन्तन करता है और रोके
वाक्य-भाष्य
विषयावभासमात्रं करणानां । इन्द्रियोकी स्वतः प्रवृत्ति तो केवल
विषयोका प्रकाशनमात्र ही है। मन
प्रवृत्तिः। चलिक्रिया तु प्राण-
आदिमे चलन-क्रिया तो प्राण-
स्यैव मनआदिषु । तस्मात्प्राथम्यं | हीकी है; इसीलिये प्राणकी प्रधानता
प्राणस्य । प्रैति गच्छति युक्तः । है । वह प्राण किससे युक्त अर्थात्
प्रेरित होकर गमन करता यानी
प्रयुक्त इत्येतत् । वाचो वदनं किं
चलता है। वाणीका भाषण भी किस
निमित्तं प्राणिनां चक्षुन्श्रोत्रयोश्च निमित्तसे होता है ? प्राणियोके नेत्र
को देवः प्रयोक्ता । करणानाम् | और श्रोत्रोको प्रेरित करनेवाला कौन
देव है ? अर्थात् जो चेतन तत्त्व
'अधिष्ठाता चेतनावान्यः स कि-
इन्द्रियोका अधिष्ठाता है वह किन
'विशेषण इत्यर्थः॥१॥ विशेषणोसे युक्त है ? ॥१॥
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ १९ पद-भाष्य दुःखे च कार्ये वार्यमाणमपि प्रव- | जानेपर भी अत्यन्त दुःखमय कार्यमे भी प्रवृत्त हो ही जाता है । तत एव मनः । तसायुक्त एव अतः 'केनेषितम्' इत्यादि प्रश्न केनेषितमित्यादिप्रश्नः। उचित ही है। केन प्राणः युक्तः नियुक्तः किसके द्वारा नियुक्त यानी प्रेरितः सन् प्रति गच्छति स्व- प्रेरित हुआ प्राण अपने व्यापारमें प्रवृत्त होता है ? 'प्रथम' यह प्राणका व्यापार प्रति । प्रथम इति प्राण- विशेषण हो सकता है, क्योंकि विशेषणं स्यात्, तत्पूर्वकत्वात् समस्त इन्द्रियोंकी प्रवृत्तियाँ प्राण- सर्वेन्द्रियप्रवृत्तीनाम् । पूर्वक ही होती है। केन इपितां वाचम् इमां लौकिक पुरुप किसके द्वारा शब्दलक्षणां वदन्ति लौकिकाः। इच्छित यह शब्दरूपा वाणी बोलते है ? तथा कौन देव-द्योतनवान् तथा चक्षुः श्रोत्रं च खे खे (प्रकाशमान् ) व्यक्ति चक्षु एवं विषये क उ देवः द्योतनवान् श्रोत्रेन्द्रियको अपने-अपने व्यापारमें युनक्ति नियुक्त प्रेरयति ॥१॥ | नियुक्त प्रेरित करता है ॥१॥ पद-भाष्य एवं पृष्टवते योग्यायाह गुरुः। इस प्रकार पूछनेवाले योग्य शिष्यसे गुरुने कहा-तू जो शृणु यत् त्वं पृच्छसि, मनआदि-| पूछता है कि मन आदि इन्द्रिय- समूहको अपने विपयोंकी ओर करणजातस्य को देवः स्वविपयं प्रेरित करनेवाला कौन देव है और वह उन्हे किस प्रकार प्रेरित करता प्रति प्रेरयिता कथंवाप्रेरयतीति। | है, सो सुन- २० केनोपनिषद् [खण्ड १ आत्माका सर्वनियन्तृत्व श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्मा- ल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २॥ जो श्रोत्रका श्रोत्र, मनका मन और वाणीका भी वाणी है वही प्राणका प्राण और चक्षुका चक्षु है [-ऐसा जानकर ] धीर पुरुप संसारसे मुक्त होकर इस लोकसे जाकर अमर हो जाते है ॥२॥ पद-भाग्य श्रोत्रस्य श्रोत्रं शृणोत्यनेनेति श्रोत्रस्य श्रोत्रम्-जिससे श्रवण श्रोत्रम्, शब्दस्य श्रवणं प्रति करते है वह 'श्रोत्र' है अर्थात् शब्दके श्रवणमे साधन यानी करणं शब्दाभिव्यञ्जकं श्रोत्र- शब्दका अभिव्यञ्जक श्रोत्रेन्द्रिय है। मिन्द्रियम्, तस्य श्रोत्रं सः उसका भी श्रोत्र वह है जिसके विषयमे तूने पूछा है कि 'चक्षु यस्त्वया पृष्टः 'चक्षुः श्रोत्रं क और श्रोत्रको कौन देव नियुक्त उ देवो युनक्ति' इति । वाक्य-भाप्य श्रोत्रस्य श्रोत्रम् इत्यादिप्रति 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि उत्तर वचनं निर्विशेषस्य निमित्तत्वार्थम्। देना निर्विशेष आत्माका निमित्तत्व बतलानेके लिये है। इस 'श्रोत्रस्य विक्रियादिविशेषरहितस्यात्मनो श्रोत्रम्' इत्यादि रूपसे उत्तर देनेका मनआदिप्रवृत्ती निमित्तत्वम् यही तात्पर्य है कि विक्रिया आदि समस्त विकोपोसे रहित आत्माका मन आदि- इत्येतच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादिप्रति- की प्रवृत्तिमे कारणत्व है। यही इससे वचनस्यार्थः; अनुगमात् । तदनु- जाना जाता है, क्योकि इस श्रुतिके अक्षर गतानि ह्यत्रास्मिन्नर्थेऽक्षराणि। भी इसी अर्थमे अनुगत है। १-अर्थात् वह सर्वथा निर्विकार और निविशेप होनेपर भी मन आदिको प्रेरित करनेवाला है। करता है।
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ २१ पद-भाष्य असावेवंविशिष्टः श्रोत्रादीनि | शङ्का-प्रश्नके उत्तरमे तो यह बतलाना चाहिये था कि इस नियुक्त इति वक्तव्ये, नन्वेत- प्रकारके गुणोवाला व्यक्ति श्रोत्रादि- दननुरूपं प्रतिवचनं श्रोत्रस्य को प्रेरित करता है; उसमे यह कहना कि वह श्रोत्रका श्रोत्र है- श्रोत्रमिति। ठीक उत्तर नही है। नैष दोषः, तस्यान्यथाविशेषा समाधान-यह कोई दोप नही है, क्योकि उस प्रेरकका और नवगमात् । यदि हि श्रोत्रादि- किसी प्रकार कोई विशेषरूप नही व्यापारव्यतिरिक्तन स्वव्यापा-जाना जा सकता । यदि दराँती रेण विशिष्टः श्रोत्रादिनियोक्ता श्रोत्रादि व्यापारसे अतिरिक्त किसी आदिका प्रयोग करनेवालेके समान अवगम्येत दात्रादिप्रयोक्तृवत् , अपने व्यापारसे विशिष्ट कोई तदेदमननुरूपं प्रतिवचनं स्यात् । श्रोत्रादिका नियोक्ता ज्ञात होता तो यह उत्तर अनुचित होता । किन्तु न विह श्रोत्रादीनां प्रयोक्ता यहाँ खेत काटनेवालेके समान कोई श्रोत्रादिका खव्यापारविशिष्ट प्रयोक्ता खव्यापारविशिष्टो लवित्रादि- ज्ञात नही है। अवयव-सहयोगसे वदधिगम्यते । श्रोत्रादीनामेव तु उत्पन्न हुए श्रोत्रादिका जो चिदा- संहतानां व्यापारणालोचन- आलोचना, सङ्कल्प एवं निश्चय भासकी फलव्याप्तिका लिङ्गरूप सङ्कल्पाध्यवसायलक्षणेन फलाव- [ आदिरूप व्यापार है उसीसे यह वाक्य-भाष्य कथम् शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम् कैसे ? [सो इस प्रकार कि] जिससे प्राणी सुनते हैं उसे 'श्रोत्र' कहते है । तस्य शब्दावभासकत्वं श्रोत्रत्वम्। उसका जो शब्दको प्रकाशित करना है शब्दोपलब्धृरूपतयावभासकत्वंन वह 'श्रोत्रत्व' है । श्रोत्रका जो शब्द- के उपलब्धारूपसे प्रकाशकत्व है वह स्वत, श्रोत्रस्याचिद्रूपत्वात्, स्वतः नहीं है, क्योकि वह अचेतन आत्मनश्च चिद्रूपत्वात् । है. और आत्मा चेतनरूप है । .
केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाग्य सानलिङ्गेनावगम्यते-अस्ति हि । जाना जाता है कि गृह आदिके श्रोत्रादिभिरसंहतः, यत्प्रयोजन- | समान जिसके प्रयोजनसे श्रोत्रादि कारण-कलाप प्रवृत्त हो रहा है प्रयुक्त श्रोत्रादिकलापः गृहादि- | वह श्रोत्रादिसे असंहत (पृथक् वदिति । संहतानां परार्थत्वाद् कोई तत्त्व अवश्य है। संहत पदार्थ परार्थ (दूसरेके साधनरूप) हुआ अवगम्यते श्रोत्रादीनांप्रयोक्ता। करते है; इसीसे कोई श्रोत्रादिका तसादनुरूपमेवेदं प्रतिवचनं प्रयोक्ता अवश्य है—यह जाना जाता है। अतः यह 'श्रोत्रस्य श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादि। श्रोत्रम्' इत्यादि उत्तर ठीक ही है । कः पुनरत्र पदार्थः श्रोत्रस्य शङ्काकिन्तु इस 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि पदका यहॉ क्या अर्थ आत्मन. श्रोत्रमित्यादेः ? न अभिप्रेत है ? क्योंकि जिस तरह श्रोत्रादि- ह्यत्र श्रोत्रस्य श्रोत्रान्त- एक प्रकाशको दूसरे प्रकाशका रेणार्थः, यथा प्रका- | प्रयोजन नहीं होता उसी तरह एक श्रोत्रको दूसरे श्रोत्रसे तो कोई शस्य प्रकाशान्तरेण । प्रयोजन है ही नहीं। । प्रकाशकत्वम् घाक्य-भाज्य यच्छ्रोत्रस्योपलब्धृत्वेनाव श्रोत्रका जो उपलब्धारूपसे अवभासकत्व है वह आत्मनिमित्तक भासकत्वं तदात्मनिमित्तत्वा- | होनेसे आत्माको 'श्रोत्रका श्रोत्र' च्छ्रोत्रस्य श्रोत्रमित्युच्यते; यथा ऐसा कहा जाता है, जैसे क्षत्रिय जातिका [नियामक कर्म ] क्षत्र क्षत्रस्य क्षत्रं यथा वोदकस्यौष्ण्य- | कहलाता है, अथवा जैसे [उष्ण] जलकी उष्णता अग्निके कारण होती मग्निनिमित्तमिति दग्धुरप्युदकस्य है; इसलिये उस जलानेवाले जलको भी जलानेवाला अग्नि कहा जाता दग्धाग्निरुच्यते; उदकमपि ओर अग्निके सयोगसे जल भी अग्नि यग्निसंयोगादग्निरुच्यते, तद्वद् ' कहा जाता है, उसी प्रकार [प्रमाता खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ २३. पद-भाष्य नैष दोषः। अयमत्र पदार्थः समाधान—यह भी कोई दोष श्रोत्रं तावत्स्वविषयव्यञ्जनसमर्थ नहीं है। यहाँ इस पदका अर्थ दृष्टम् । तत्तु स्वविषयव्यञ्जन- इस प्रकार है-श्रोत्र अपने विषय- सामथ्र्य श्रोत्रस्य चैतन्ये ह्यात्म- को अभिव्यक्त करनेमे समर्थ है- यह देखा ही जाता है। किन्तु ज्योतिषि नित्येऽसंहते सर्वान्तरे श्रोत्रका वह अपने विषयको अमि- सति भवति, न असति इति । व्यक्त करनेका सामर्थ्य नित्य, अतः श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्याधुप- असंहत, सर्वान्तर चेतन आत्म- पद्यते। तथा च श्रुत्यन्तराणि- ज्योतिके रहनेपर ही रह सकता है, न "आत्मनैवायं ज्योतिपास्ते" रहनेपर नही रह सकता । अतः (वृ० उ०४।३।६) "तस्य भासा | उचित ही है । “यह अपने ही उसे 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि कहना सर्वमिदं विभाति" (क० उ० प्रकाशसे प्रकाशित है" "उसके २।२।१५, श्वे०६।१४, प्रकाशसे ही यह सब प्रकाशित मु०२।२।१०) "येन सूर्यस्त- होता है। "जिस तेजसे प्रदीप्त हुआ पति तेजसेद्ध" (तै० वा० ३। सूर्य तपता है" इत्यादि श्रुतियाँ भी १२ । ९ । ७) इत्यादीनि ।। इसी अर्थकी द्योतक हैं। तथा वाक्य-भाप्य अनित्यं यत्संयोगादुपलब्धृत्वं । आत्मामे ] जिनके संयोगसे अनित्य तत्करणं श्रोत्रादि । उदकस्येव उपलब्धृत्व है वेश्रोत्रादि करण कहलाते है। जलके दाहकत्वके समान आत्मामे दग्धृत्वमनित्यं हि तत्र तत् ।। उपलब्धृत्व अनित्य ही है। जैसे अनिमे नित्य उष्णता रहने के कारण यत्र तु नित्यमुपलब्धृत्वमन्ना- वह दग्धा कहलाता है उसी प्रकार विवौप्ण्यं स नित्योपलब्धिखरूप- जिसमे नित्य-उपलब्धृत्व रहता है वह नित्य उपलब्धिस्वरूप होनेके कारण उप- त्वाद्दग्धेवोपलव्धोच्यते । श्रोत्रा- लब्धा कहा जाता है। श्रोत्रादिनिमित्तोके होनेपर जो आत्मामे श्रोतृत्वादिकी उप- दिपु श्रोतृत्वाद्युपलब्धिरनित्या लन्धि होती है वह अनित्य है और केवल नित्या चात्मन्यतः श्रोत्रस्य । आत्मामे वह नित्य है, अत: 'श्रोत्रस्य केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य "यदादित्यगतं तेजो जगद्भा- | गीतामे भी कहा है-"जो तेज सयतेऽखिलम्" (गीता१५।१२) सूर्यमें स्थित होकर सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है" "हे भारत ! "क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्यं प्रकाशयति इसी प्रकार सम्पूर्ण क्षेत्रको क्षेत्री भारत" (गीता १३।३३) इति प्रकाशित करता है।" कठोप- निपतमे भी कहा है-"वह च गीतासु। काठके च "नित्यो नित्योका नित्य और चेतनोका नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्" | चेतन है" इत्यादि । श्रोत्रादि (२।२।१३) इति । श्रोत्रायेव । इन्द्रियवर्ग ही सबका आत्मभूत चेतन है—यह बात [लोकमे ] सर्वस्यात्मभूतं चेतनमिति प्रसिद्ध है। उस भ्रान्तिका इस प्रसिद्धम् तदिह निवर्त्यते । अस्ति | पदसे निराकरण किया जाता है । अतः श्रोत्रादिका भी श्रोत्रादि किमपि विद्वद्भुद्धिगम्यं सर्वान्तर- | अर्थात् उनकी सामर्थ्यका निमित्त- तमं कूटस्थमजमजरममृतमभयं भूत ऐसा कोई पदार्थ है जो आत्मवेत्ताओंकी बुद्धिका विषय, श्रोत्रादेरपिश्रोत्रादितत्सामर्थ्य- | सबसे अन्तरतम, कूटस्थ, अजन्मा, निमित्तम् इति प्रतिवचनं शब्दार्थ अजर, अमर और अभयरूप है- इस प्रकार यह उत्तर और शब्दार्थ श्वोपपद्यत एव । ठीक ही है। वाक्य-भाष्य श्रोत्रमित्याद्यक्षराणामानुगमाद् । श्रोत्रम्' इत्यादि अक्षरोके अर्थके उपपद्यते निर्विशेषस्योपलब्धि अनुगमसे नित्योपलब्धिस्वरूप निर्विशेष आत्माका मन आदिकी प्रवृत्तिमे कारण खरूपस्यात्मनो मनआदिप्रवृत्ति- | होना ठीक ही है । इसी प्रकार [जैसा कि 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम् ' के विषयमे कहा निमित्तत्वमिति । मन आदिप्वेवं गया है ] मन, वाक् और प्राणादिके यथोक्तम् । सम्बन्धमे भी समझ लेना चाहिये ।
खण्ड १]. शाङ्करभाष्यार्थ २५ पद-भाष्य तथा मनसः अन्त:करणस्य इसी प्रकार वह मनका-अन्तः- करणका मन है,क्योकि चिज्ज्योति- मनः । न ह्यन्तःकरणम् अन्त- के प्रकाशके बिना अन्तःकरण रेण चैतन्यज्योतिषो दीधिति अपने विषय सङ्कल्प और अध्यवसाय खविषयसङ्कल्पाध्यवसायादि (निश्चय ) आदिमे समर्थ नहीं हो समर्थ स्यात् । तस्मान्मनसोऽपि सकता । अतः वह मनका भी मन है। यहाँ बुद्धि और मनको एक मंन इति । इह - बुद्धिमनसी मानकर मनका निर्देश किया एकीकृत्य निर्देशो मनस इति । गया है । यद्वाचो ह वाचम् यच्छन्दो यद्वाचो ह वाचम्-यहाँके 'यत्' शब्दका 'यस्मात्' अर्थ यसादर्थे श्रोत्रादिभिः सर्वेः (हेत्वर्थ ) मे 'क्योकि वह श्रोत्रका सम्बध्यते-यसाच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रम्, श्रोत्र है, क्योकि वह मनका मन है' इस प्रकार श्रोत्रादि सभी पदोसे यसान्मनसो मन इत्येवम् । सम्बन्ध है। 'वाचो ह वाचम्' इस पदसमूहमे 'वाचम्' पदकी वाचो ह वाचमिति द्वितीया द्वितीया विभक्ति प्रथमा विभक्तिके प्रथमात्वेन विपरिणम्यते, प्राणस्य रूपमे परिणत कर ली जाती है, जैसा कि 'प्राणस्य प्राणः' मे देखा प्राण इति दर्शनात् । वाचो ह । जाता है । यदि कहो कि 'वाचो वाक्य-भाप्य वाचो ह वाचं प्राणस्य प्राण यहाँ 'वाचो ह वाचम्' तथा 'प्राणस्य प्राणः' इस प्रकार [ पिछले पदमे] इति विभक्तिद्वयं सर्वत्रैवद्रष्टव्यम्। सर्वत्र ही [प्रथमा और द्वितीया] दो विभक्ति समझनी चाहिये,क्यो? क्योकि आत्मा-विषयक प्रश्न होनेके कारण कथम् !? पृष्टत्वात्स्वरूपनिर्दशः, उसके स्वरूपका निर्देश किया गया है और निर्देश प्रथमा विभक्तिसे ही प्रथमयैव च निर्देशः। तस्य च | किया जाता है; तथा आत्मा ही २६ केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य ? प्राणः' स्यात् । वाचमित्येतदनुरोधेन प्राणस्य , ह वाचम्' इस प्रयोगके अनुरोधसे प्राणमिति कसाद्वितीयैव न 'प्राणस्य प्राणम्' इस प्रकार द्वितीया ही क्यों नही कर ली जाती तो क्रियते ? न; बहूनामनुरोधस्य | ऐसा कहना उचित नही क्योकि बहुतोंका अनुरोध मानना ही युक्तत्वात् । वाचमित्यस्य वागि- युक्तिसङ्गत है । अतः ‘स उ प्राणस्य त्येतावद्वक्तव्यं स उ प्राणस्य इस पदसमूहके [स और प्राणः] दो शब्दोंके अनुरोधसे प्राण इति शब्दद्वयानुरोधेन एवं 'वाचम्' इस शब्दको ही 'वाक्' इतना कहना चाहिये। ऐसा हि बहूनामनुरोधो युक्तः कृतः करनेसे ही बहुतोका अनुरोध युक्त (स्वीकार) किया समझा जायगा। पृष्टं च वस्तु प्रथमयैव निर्देष्टुं इसके सिवा, पूछी हुई वस्तुका निर्देश प्रथमा विभक्तिसे ही करना युक्तम् । स यस्त्वया पृष्टःप्राणस्य उचित है। [अभिप्राय यह कि] प्राणाख्यवृत्तिविशेषस्य प्राणः | जिसके विपयमे तूने पूछा है वह प्राणका यानी प्राण नामक वृत्ति- तत्कृतं हि प्राणस्य प्राणन- विशेषका प्राण है । उसके कारण सामर्थ्यम्। न ह्यात्मनानधिष्ठितस्य ही प्राणका प्राणनसामर्थ्य है, क्यो- कि आत्मासे अनधिष्ठित प्राणका प्राणनमुपपद्यते,"कोह्येवान्यात्का प्राणन सम्भव नहीं है, जैसा कि वाक्य-भाष्य शेयत्वात्कर्मत्वमिति द्वितीया । | ज्ञेय है, इसलिये उसमे कर्मत्व रहनेके कारण द्वितीया भी ठीक है। अतः वाची अतो वाचो ह वाचं प्राणस्य ह वाचम्' तथा 'प्राणस्य प्राणः' इस कथनके अनुसार सभी जगह दो प्राण इत्यस्मात्सर्वत्रैव विभक्ति- | विभक्ति समझनी चाहिये । - [अर्थात् सभी पदोमे ये दोनो विभक्तियाँ रह द्वयम्। सकती है।]
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ २७ पद-भाष्य प्राण्यायदेष आकाश आनन्दो | "यदि यह आनन्दखरूप आकाश न होता तो कौन जीवित रहता न स्यात्" (तै० उ०२।७।१) और कौन श्वासोच्छास करता" "ऊर्ध्व प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्य- | "यह प्राणको ऊपर ले जाता है तथा अपानको नीचेकी ओर छोड़ता गस्यति" (क० उ०२।२।३) है" इत्यादि श्रुतियोसे सिद्ध होता इत्यादिश्रुतिभ्यः । इहापि च है। यहाँ (इस उपनिषद्भे) भी वक्ष्यते येन प्राणः प्रणीयते यह कहेगे ही कि जिसके द्वारा प्राण प्राणन करता है उसीको तू तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि इति । ब्रह्म जान । श्रोत्रादीन्द्रियप्रस्तावे घ्राण शङ्का-परन्तु यहाँ श्रोत्रादि इन्द्रियोके प्रसङ्गमे घ्राणको ही ग्रहण स्यैव ग्रहणम् युक्तं न तु प्राणस्य । करना युक्तियुक्त है, प्राणको नहीं । सत्यमेवम् । प्राणग्रहणेनैव तु समाधान——यह ठीक है। घ्राणस्य ग्रहणं कृतमेव मन्यते किन्तु श्रुति, प्राणको ग्रहण करनेसे ही घ्राणका भी ग्रहण किया मानती श्रुतिः । सर्वस्यैव करणकलापस्य | है । इस प्रकरणको यही अर्थ यदर्थप्रयुक्ता प्रवृत्तिः, तब्रह्मति बतलाना अभीष्ट है कि जिसके लिये सम्पूर्ण इन्द्रिय-समूहकी प्रवृत्ति प्रकरणार्थो विवक्षितः। है वही ब्रह्म है। वाक्य-भाज्य यदेतच्छ्रोत्राद्युपलब्धिनिमित्तं यह जो श्रोत्रादिकी उपलब्धिका श्रोत्रस्य श्रोत्रमि- आत्मज्ञानेन निमित्तभूत तथा 'श्रोत्रका श्रोत्र त्यादिलक्षणं नित्योप- इत्यादि लक्षणोवाला नित्योपलब्धि- लब्धिखरूपं नि- निरूपणम् विशेपमात्मतत्त्वं स्वरूप निर्विशेष आत्मतत्व है उसे तबुद्ध्वातिमुच्यानववोधनिमि- जानकर, अज्ञानके कारण आरोपित ताध्यारोपिताद् बुद्धयादिलक्ष- बुद्धि आदि लक्षणोवाले संसारसे णात्संसारान्मौक्षणं कृत्वा धीरा छूटकर-उससे मुक्त होकर, धीर- अमृतत्व- केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य तथा चक्षुषश्चक्षुरूपप्रकाश- तथा [वह ब्रह्म] चक्षुका चक्षु है। रूपको प्रकाशित करनेवाले कस्य चक्षुषो यद्रूपग्रहणसामर्थ्य चक्षु-इन्द्रियमे जो रूपको ग्रहण तदात्मचैतन्याधिष्ठितस्यैव । अतः | करनेका सामर्थ्य है वह आत्म- चैतन्यसे अधिष्ठित होनेके कारण ही चक्षुपश्चक्षुः। है । इसलिये वह चक्षुका चक्षु है । प्रष्टुः पृष्टस्यार्थस्य ज्ञातुमिष्ट प्रश्न-कर्ताको अपने पूछे हुए आत्मविदो- त्वात् श्रोत्रादेः श्रोत्रा- पदार्थको जाननेकी इच्छा हुआ ही ऽमृतत्व- दिलक्षणं यथोक्तं | करती है; अतः 'अमृता भवन्ति' निरूपणम् (अमर हो जाते है) ऐसी फल- ब्रह्म 'ज्ञात्वा' इत्यध्या- श्रुति होनेके कारण उपर्युक्त हियते; अमृता भवन्ति इति श्रोत्रादिके श्रोत्रादिरूप ब्रह्मको जानकर इस प्रकार यहाँ 'ज्ञात्वा' फलश्रुतेश्च । ज्ञानाद्धयमृतत्वं क्रियाका अध्याहार किया जाता है, प्राप्यते । ज्ञात्वा विमुच्यते इति क्योकि ज्ञानसे ही अमरत्वकी प्राप्ति होती है, जैसा कि '[ब्रह्मको] जानकर सामर्थ्यात् । श्रोत्रादिकरणकलाप- मुक्त हो जाता है' इस उक्तिकी सामर्थ्यसे सिद्ध होता है। जीव मुज्झित्वा-श्रोत्रादौ ह्यात्मभावं श्रोत्रादि करणकलापको त्यागकर -श्रोत्रादिमे ही आत्मभाव करके कृत्वा, तदुपाधिःसन्, तदात्मना उनकी उपाधिसे युक्त होकर जायते म्रियते संसरति च । | जन्मता, मरता और संसारको प्राप्त वाक्य-भाष्य धीमन्तःप्रेत्यास्माल्लोकाच्छरीरात् | बुद्धिमान् लोग इस लोकसे जाकर प्रेत्य वियुज्यान्यस्मिन्नप्रति- | अर्थात् इस शरीरसे पृथक् होकर दूसरे सन्धीयमाने निनिमित्तत्वादमृता | अन्य कोई प्रयोजन न रहनेसे अमृत शरीरका अनुसन्धान न करनेके कारण भवन्ति। हो जाते है।
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ २९ पद-भाष्य अतः श्रोत्रादेः श्रोत्रादिलक्षणं होता है। अतः श्रोत्रादिका श्रोत्रादि. ब्रह्मात्मेति विदित्वा, अतिमुच्य | रूप ब्रह्म ही आत्मा है ऐसा जानकर श्रोत्राद्यात्मभावं परित्यज्य- और अतिमोचन करके अर्थात् श्रोत्रादिमे आत्मभावको त्यागकर धीर श्रोत्राद्यात्मभावं परित्यजन्ति, ते पुरुप 'प्रेत्य' अर्थात् पुत्र, मित्र, धीराः धीमन्तः, न हि विशिष्ट- कलत्र और बन्धुओमे अहंता-ममताके धीमत्त्वमन्तरेण श्रोत्राद्यात्म- व्यवहाररूप इस लोकसे विलग हो भावः शक्यः परित्यक्तुम्-प्रेत्य यानी सम्पूर्ण एषणाओसे मुक्त व्यावृत्य असात् लोकात् पुत्र- होकर अमृत-अमरणधर्मा हो जाते है । जो लोग श्रोत्रादिमे आत्म- मित्रकलत्रवन्धुषु ममाहंभाव- भावका त्याग करते है वे धीर यानी संव्यवहारलक्षणात्, त्यक्तसर्वै बुद्धिमान होते हैं। क्योकि विशिष्ट पणा भूत्वेत्यर्थः अमृता बुद्धिमत्वके बिना श्रोत्रादिमे आत्म- अमरणधर्माणो भवन्ति । भावकात्याग नहीं किया जा सकता। वाक्य-भाष्य सति हज्ञाने कर्माणि शरी अज्ञानके रहनेतक ही कर्म दूसरे शरीरकी खोज किया करते है। रान्तरं प्रतिसन्दधते । आत्मा- आत्मज्ञान हो जानेपर तो सम्पूर्ण कोके आरम्भक अज्ञानसे विपरीत सर्वकर्मारम्भनिमित्ता- ज्ञानरूप अग्निद्वारा कमाके दन्ध - ज्ञानविपरीतविद्याग्निविप्लुटत्वात् हो जानेपर फिर प्रारब्ध निःोष हो जानेके कारण वे अमृत ही हो जाते कर्मणामनारम्भेऽमृता है । [अनादि संसारपरम्परासे 'मै एव शरीर हूँ' ऐसे अध्यासके कारण] भवन्तिा शरीरादिसन्तानाविच्छेद- 'पुनः पुनः शरीरप्राप्तिरूप परम्पराका विच्छेद न हो ऐसा अनुसन्धान करते प्रतिसन्धानाद्यपेक्षयाध्यारोपित रहनेके कारण अपने ऊपर आरोपित ववोधे तु
३०
केनोपनिषद्
[खण्ड १
पद-भाष्य
"न कर्मणा न प्रजया धनेन "कर्मसे, प्रजासे अथवा धनसे
त्यागेनैके अमृतत्वमानशु'
नहीं, किन्हीं-किन्हीने केवल त्यागसे
ही अमरत्व लाभ किया है" "खयम्भू-
(कैवल्य० १ । २) "पराश्चि | ने इन्द्रियोको बहिर्मुख करके हिसित'
खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तमात् । कर दिया है इसलिये जीव बाह्य
वस्तुओंको ही देखता है, अपने
परापश्यति नान्तरात्मन् ।
अन्तरात्माको नही देखता। कोई
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदा- | बुद्धिमान् पुरुष अमरत्वकी इच्छासे
वृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्"(क०उ० इन्द्रियोंको रोककर अपने प्रत्य-
गात्माको देखता है" "जिस समय
२।१।१) “यदा सर्वेप्रमुच्यन्ते इसके हृदयकी कामनाएँ छूट जाती
कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
है"इस अवस्थामे वह ब्रह्मको प्राप्त
अत्र ब्रह्म समश्नुते" (क० उ० | कर लेता है" इत्यादि श्रुतियोसे
भी यही सिद्ध होता है । अथवा
२।३।१४) इत्यादिश्रुतिभ्यः।
एषणात्याग तो 'अतिमुच्य' इस
अथवा, अतिमुच्येत्यनेनैवैषणा- | पदसे ही सिद्ध हो जाता है, अतः
त्यागस्य सिद्धत्वाद् असाल्लोकात् 'अस्माल्लोकात्प्रेत्य' का यह भाव
समझना चाहिये कि इस शरीरसे
प्रेत्य असाच्छरीरादपेत्य मृत्वे- अलग होकर यानी मरकर [अमर
त्यर्थः ॥२॥
हो जाते है ॥२॥
-
यसाच्छ्रोत्रादेरपि श्रोत्राद्यात्म-
भूतं ब्रह्म, अतः।
क्योकि ब्रह्म श्रोत्रादिका भी
श्रोत्रादिरूप है, इसलिये-
वाक्य-भाष्य
मृत्युवियोगात्पूर्वमप्यमृताः सन्तो| की हुई अज्ञानरूप मृत्युका वियोग
होनेसे पूर्व भी नित्य आत्मस्वरूप
नित्यात्मवरूपवत्त्वादमृताभवन्ति होनेके कारण यद्यपि अमृत ही रहते
है तथापि अमर होते है-ऐसा
इत्युपचर्यते ॥२॥
उपचारसे कहा जाता है ॥२॥
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ आत्माका अज्ञेयत्व और अनिर्वचनीयत्व न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्वयाचचक्षिरे ॥३॥ वहाँ ( उस ब्रह्मतक) नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती, वाणी नही जाती, मन नही जाता । अतः जिस प्रकार शिष्यको इस ब्रह्मका उपदेश करना चाहिये, वह हम नहीं जानते-बह हमारी समझमे नही आता । वह विदितसे अन्य ही है तथा अविदितसे भी परे है-ऐसा हमने पूर्व- पुरुपोसे सुना है, जिन्होने हमारे प्रति उसका व्याख्यान किया था ॥३॥ पद-भाष्य न तत्र तस्मिन्ब्रह्मणि चक्षुः वहाँ उस ब्रह्ममे नेत्रेन्द्रिय गच्छति, स्वात्मनि गमना- नही जाती, क्योकि अपनेहीमे अपनी गति होनीअसम्भव है। और न वाणी सम्भवात् । तथा नवाग गच्छति। ही पहुँचती है । जिस समय वाणी- वाचा हि शब्द उच्चार्यमाणोऽभि- | से उच्चारण किया हुआ शब्द अपने वाच्यको प्रकाशित करता है उस धेयं प्रकाशयति यदा, तदाभि- समय ही, अपने वाच्यतक वाणी धेयं प्रति वाग्गच्छतीत्युच्यते । पहुँचती है—ऐसा कहा जाता है। वाक्य-भाष्य न तत्र चक्षुर्गच्छति इत्युक्तेऽपि यद्यपि आचार्यने तत्वका निरूपण कर दिया तो भी न समझनेके कारण पर्यनुयोगे हेतुरप्रतिपत्तेः। शिष्यके पुनः प्रश्न करनेमे 'वहाँ नेन्द्रिय नही जाती' इत्यादि कारण श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्येवमादिना । है । अर्थात् 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि श्रुतिसे आत्मतत्त्वका निरूपण कर उक्तऽप्यात्मतत्त्वेऽप्रतिपन्नत्वात् दिये जानेपर भी आत्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्मत्वहेतोर्वस्तुनः सूक्ष्म होनेके कारण समझमे न आनेसे पुनः शिष्यको जो पुनः पूछनेकी इच्छा पुनः पर्यनुयुयुक्षाकारणमाह-न हुई उसका कारण 'न तत्र चक्षुर्गच्छति' ३२ केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य तस्य च शब्दस्य तनिर्वर्तकस्य च | किन्तु ब्रह्म तो शब्द और उसका व्यवहार करनेवाले इन्द्रियका आत्मा करणस्यात्मा ब्रह्म । अतो न है। अतः वाणी वहाँ उसी प्रकार वाग्गच्छति यथाग्निर्दाहक नही पहुँच सकती, जैसे कि अग्नि प्रकाशकश्चापि सन् न ह्यात्मानं दाहक और प्रकाशक होनेपर भी अपनेको न जलाता है और न प्रकाशयति दहति वा, तद्वत् ! प्रकाशित ही करता है। नो मनः मनश्चान्यस्य और न मन ही [वहॉतक जाता है] । मन भी अन्य पदार्थोका सङ्कल्पयित अध्यवसायितृ च सत् सङ्कल्प और निश्चय करनेवाला नात्मानं सङ्कल्पयत्यध्यवस्थति होता हुआ भी अपना सङ्कल्प या निश्चय नहीं करता है, क्योकि ब्रह्म च, तस्यापि ब्रह्मात्मेति । इन्द्रिय- उसका भी आत्मा है । इन्द्रिय और मनोभ्यां हि वस्तुनो विज्ञानम् । मनसे ही वस्तुका ज्ञान हुआ करता है। उनका अविपय होनेके कारण तदगोचरत्वान्न विद्मः तद्ब्रह्म हम यह नहीं जानते कि वह ब्रह्म ईदृशमिति । ऐसा है। वाक्य-भाष्य तत्र चक्षुर्गच्छतीति। तत्र श्रोत्रा- । इत्यादि श्रुतिसे बतलाया गया है । श्रोत्रादिके आत्मस्वरूप उस आत्म- द्यात्मभूते चक्षुरादीनि वाक्- | तत्त्वके विषयमे चक्षु आदि इन्द्रियाँ चक्षुपोः सर्वेन्द्रियोपलक्षणार्थ- | जान उत्पन्न नहीं कर सकती, क्योंकि यहाँ वाक् और चक्षु सभी त्वान्न विज्ञानमुत्पादयन्ति । इन्द्रियोका उपलक्षण करनेके लिये है। सुखादिवत्तर्हि गृह्येतान्तःकर [इसपर सन्देह होता है तो फिर सुखादिके समान अन्तःकरणसे ग्रहण हो सकता होगा? पोनात आह-नो मनः । न । [इसपर कहते हैं- मन भी उसतक उसका खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ पद भाष्य ऐसा इसका अतो न विजानीमो यथा येन अतः जिस प्रकारसे इस ब्रह्मका अनुशासन-शिष्यके प्रति उपदेश प्रकारेण एतद् ब्रह्म अनुशिष्यात् किया जाय-यह हम नहीं जानते अभिप्राय है । जो वस्तु उपदिशेच्छिण्यायेत्यभिप्रायः । इन्द्रियोका विषय होती है उसीका याद्ध करणगोचरं तदन्यस्मै जाति, गुण और क्रियारूप उपदेष्टुं शक्यं जातिगुणक्रिया- विशेपणोद्वारा दूसरेको उपदेश किया जा सकता है। किन्तु ब्रह्म विशेषणैः। न तज्जात्यादिविशेषण- उन जाति आदि विशेषणोवाला नही है । अतः शिप्योको उपदेश- वह्म तसाद्विपमंशिष्यानुपदेशेन द्वारा उसकी प्रतीति कराना बहुत प्रत्याययितुमिति उपदेशे तदर्थ- कठिन है इस प्रकार श्रुति उपदेश और उसके अर्थका ग्रहण ग्रहणे च यत्नातिशयकर्तव्यतां करनेमे अधिक प्रयत्न करनेकी दर्शयति । आवश्यकता दिखलाती है। वाक्य-भाप्य सुखादिवन्मनसो विपयस्तत् । | नहीं पहुंचता । वह सुखादिके समान मनका भी विषय नही है, क्योकि वह इन्द्रियाविषयत्वात् । इन्द्रियोका अविषय है। न विझोन विजानीमोऽन्त: यह ब्रह्म मन आदि इन्द्रियसमूहका करणेन यथैतद्ब्रह्म मन आदिकरण- अर्थात् जिस प्रकार उनकी प्रवृत्तिका जिस प्रकार अनुशासन करता है जातमनुशिष्याद् अनुशासनं , कारण होता है-इन्द्रियोका अविषय होनेके कारण इस सम्बन्धमे अपने कुर्यात्प्रवृत्तिनिमित्तं भवेत्तथा- अन्तःकरणद्वारा हम कुछ नही जानते विपयत्वान्न विद्मोन विजानीमः। अर्थात् कुछ नहीं समझते ।
केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य 'न विद्मोन विजानीमो यथै [पूर्वोक्त श्रुतिके] 'न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्' तदनुशिष्यात्' इति अत्यन्तम् इस वाक्यसे उपदेशके प्रकारका एवोपदेशप्रकारप्रत्याख्याने प्राप्ते अत्यन्त निषेध प्राप्त होनेपर उसका तदपवादोज्यमुच्यते । सत्यमेवं यह अपवाद कहा जाता है। यह ठीक है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैन पर: परमात्माकी प्रतीति नहीं करायी प्रत्याययितुं शक्यः; आगमेन तु | जा सकती, किन्तु शास्त्रसे तो उसकी प्रतीति करायी ही जा शक्यत एव प्रत्याययितुमिति सकती है अतः उसके उपदेशके तदुपदेशार्थमागममाह लिये शास्त्रप्रमाण देते है- वाक्य-भाष्य अथवा श्रोत्रादीनां श्रोत्रादि अथवा शिष्यके यह कहनेपर कि 'श्रोत्रादिकेश्रोत्रादिरूप ब्रह्मको विशेष- लक्षणं ब्रह्म विशेषेण दर्शयेत्युक्त रूपसे दिखलाओ' आचार्य कहते है आचार्य आह न शक्यते दर्श- | कि 'उसे दिखाया नहीं जा सकता।' क्यो ? 'क्योकि उसतक नेत्र नहीं पहुँच यितुम् । कस्मात् ? न तत्र चक्षुः | सकते' इत्यादि प्रकारसे सबका आशय गच्छति इत्यादि पूर्ववत्सर्वम् । अत्र | पूर्ववत् समझना चाहिये । यहाँ 'यथैतदनुशिष्यात्' इस वाक्यका तु विशेषो यथैतदनुशिष्यादिति । विशेष तात्पर्य है; अर्थात् जिस किसी यथैतदनुशिष्यात् प्रतिपादयेत् । अन्य विधिसे कोई अन्य गुरु अपने शिष्योको इसका अनुशासन- अन्योऽपि शिष्यानितोऽन्येन | प्रतिपादन कर सकता है [वह हम विधिनेत्यभिप्रायः। नही जानते]। सर्वथापि ब्रह्म बोधयेत्युक्त 'परन्तु मुझे तो किसी भी तरह ब्रह्मका बोध करा ही दीजिये- आचार्य आह, अन्यदेव तद्वि- शिष्यके ऐसा कहनेपर आचार्य कहते है-'वह ब्रह्म जाने हुएसे अन्य है दितादथो अविदितादधीत्या- तथा बिना जानेसे भी परे है' जाने और न जाने हुएसे भिन्न होना यही गमम् विदिताविदिताभ्यामन्य-! उपदेशकी परम्परा है। इसके सिवा - खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ . पद-भाष्य अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- 'वह विदितसे अन्य ही है और अविदितसे भी परे है।' यहाँ जिस दितादधीति । अन्यदेव पृथगेव प्रकरणप्राप्त श्रोत्रादिके श्रोत्रादि और तद् यत्प्रकृतं श्रोत्रादीनांश्रोत्रा- उनके अविषय ब्रह्मका उल्लेख किया गया है वह विदितसे अन्य-पृथक् दीत्युक्तमविषयश्च तेषाम् । तद् ही है । वेदन-क्रियासे अत्यन्त विदिताद् अन्यदेव हि । विदितं व्याप्त अर्थात् वेदन-क्रियाकी कर्म- नाम यद्विदिक्रिययातिशयेनातं भूत जो कुछ [नामरूपात्मक] वाक्य-भाष्य त्वम् । यो हि ज्ञाता स एव सः, जो कोई भी उसको जाननेवाला है सर्वात्मकत्वात् । अतः सर्वात्मनो वह स्वय वही है, क्योकि ब्रह्म सर्वात्मक है । अतः सबके आत्मारूप ज्ञातुर्मानन्तराभावाद्विदितादन्य- | उस शाताके सिवा अन्य ज्ञाताका अभाव होनेके कारण वह, जितना त्वम् । “स वेत्ति वेद्यं न च कुछ जाना जाता है उससे भिन्न है। तस्यास्ति वेत्ता" (श्वे० उ० जैसा कि मन्त्रवर्ण भी कहता है- "वह सम्पूर्ण ज्ञेयको जानता है तथा ३ । १९) इति च मन्त्रवर्णात् । उसका ज्ञाता और कोई नही है" "विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" | तथा वाजसनेय-श्रुतिमे भी कहा है- (बृ० उ०२।४।१४) इति च "अरे !उस विज्ञाताको किससे जाने?" इसके सिवा व्यक्तको ही विदित कहा वाजसनेयके । अपि च व्यक्तमेव | गया है, उससे भिन्न [यानी अव्यक्त] है यही इस [अन्यदेव विदितात् ] विदितं तस्मादन्यदित्यभिप्रायः। का तात्पर्य है जो विदित अर्थात् व्यक्त यद्विदितं व्यक्तं तदन्यविषय- | होता है वह दूसरेका विषय होनेके कारण अल्प और सविरोध होता है त्वादल्पं सविरोधं ततोऽनित्यमत | ऐसा होनेसे अनित्य होता है, अतः एवानेकत्वादशुद्धमत एव तद्वि- अनेक होनेके कारण अशुद्ध भी होता है। इसलिये सिद्ध हुआ कि ब्रह्म उससे लक्षणं ब्रह्मोति सिद्धम् । भिन्न प्रकारका ही है। .
३६ केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य विदिक्रियाकर्मभूतं क्वचित् | वस्तु कही-न-कहीं किसी-न-किसी- को ज्ञात है उसीको 'विदित' कहते किञ्चित्कस्यचिद्विदितं स्यादिति। है। अतः सम्पूर्ण व्याकृत वस्तु सर्वमेव व्याकृतं विदितमेवः 'विदित' ही है। उस [विदित वस्तु] से ब्रह्म पृथक् ही है—यह तस्मादन्यदेवेत्यर्थः। इसका तात्पय है। अविदितमज्ञातं तहाँति प्राप्ते तो फिर ब्रह्म अज्ञात है-ऐसा प्राप्त होनेपर कहते है---'वह आह-अथो अपि अविदिताद् अविदित-विदितसे विपरीत व्याकृत विदितविपरीतादव्याकृताविद्या- | पदार्थोंकी बीजभूत अविद्यारूप वाक्य-भाष्य ब्रह्मणः ताविदितम् । पूर्व०-तो फिर ब्रह्म अज्ञात हुआ ? नविज्ञानानपेक्षत्वात्। यद्धय- सिद्धान्ती-नही, क्योकि उसे विज्ञान विदितं तद्विज्ञाना- (ज्ञात होने) की अपेक्षा नहीं है। जो वस्तु अज्ञात होती है उसके विज्ञान- पेक्षम् । अविदित- स्वीय प्रकाशने की अपेक्षा हुआ करती है। अज्ञात विज्ञानाय हि लोक- अन्यानपेक्षत्वम् वस्तुको जाननेके लिये ही सम्पूर्ण प्रवृत्तिः । इदं तु लोकोकी प्रवृत्ति है, किन्तु ब्रह्मको विज्ञानानपेक्षं। कस्मात् विज्ञान- | अपने विज्ञानकी अपेक्षा नहीं है। क्यो १ क्योकि वह विज्ञानस्वरूप ही है। खरूपत्वात् । न हि यस्य यत्स्वरूपं | जिसका जो स्वरूप होता है वह उसीकी दूसरेसे अपेक्षा नही रखता और तत्तेनान्यतोऽपेक्ष्यते । न च खत अपनेसे तो अपेक्षा हुआ ही नही एवापेक्षा अनपेक्षमेव सिद्ध- करती, क्योकि अपना-आप तो सिद्ध (प्राप्त) होनेके कारण अपेक्षासे रहित त्वात् । प्रदीपः खरूपाभिव्यक्ती ही है। दीपक अपने स्वरूपकी अभिव्यक्तिके लिये अपनेसे अथवा प्रकाशान्तरमन्यतोऽपेक्षते किसी अन्यसे प्रकाशान्तरकी अपेक्षा खतो चा। यद्धयनपेक्षं तत्स्वत नहीं रखता । इस प्रकार जो अपेक्षा नही रखता वह स्वतः सिद्ध ही है। एव सिद्धम् प्रकाशात्मकत्वात् । दीपक प्रकागखरूप ही है; अतः अपने स्वरूपकी अभिव्यक्तिके लिये प्रदीपस्यापेक्षितोऽप्यनर्थका स्यात्,। यदि वह प्रकाशान्तरकी अपेक्षा करे खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ३७ पद-भाष्य लक्षणाद्वयाकृतबीजात्, अधि | अव्याकृतसे भी अधि' है।"अधि' का इति उपर्यर्थे, लक्षणया अन्यद् अर्थ ऊपर होता है; परन्तु लक्षणासे इसका अर्थ 'अन्य' करना चाहिये, इत्यर्थः । यद्धि यसादधि उपरि क्योकि जो वस्तु जिससे अधि- भवति, तत्तसादन्यदिति | ऊपर होती है वह उससे अन्य हुआ प्रसिद्धम् । करती है यह प्रसिद्ध ही है। वाक्य-भाग्य प्रकाशे विशेषाभावात् । न हि ] तो व्यर्थ ही होगा, क्योकि प्रकाशमे कोई विशेपता नही हुआ करती। एक प्रदीपस्य खरूपाभिव्यक्तौ प्रदीप-दीपकके स्वरूपकी अभिव्यक्तिमे किसी प्रकाशोऽर्थवान् । न चैवमात्म- | अन्य दीपकका प्रकाश सार्थक नही होता। इसी प्रकार आत्मासे भिन्न नोऽन्यत्र विज्ञानमस्ति. येन ऐसा कोई विज्ञान नहीं है जो उसके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये खरूपविज्ञानेऽप्यपेक्ष्येत। अपेक्षित हो। विरोध इति चेन्नान्यत्वात् । यदि कहो कि इससे विरोध प्रतीत होता है तो ऐसा कहना ठीक नही, क्योकि [ आत्मा] इससे भिन्न है । स्वरूपविज्ञाने विज्ञानस्वरूपत्वाद् पूर्व०-तुमने जो कहा कि आत्मा विज्ञानान्तरंनापेक्षत इत्येतदसत्। विज्ञानस्वरूप है, इसलिये उसके दृश्यते हि विपरीतज्ञानमात्मनि स्वरूपको जाननेमे किसी अन्य विज्ञान- की अपेक्षा नहीं है-सो ठीक नही, सम्यग्ज्ञानं च । न जानाम्यात्मा- क्योकि आत्मामे भी विपरीत ज्ञान नमिति । श्रुतेश्च "तत्त्वमसि' और सम्यक् ज्ञान होता देखा ही जाता है। जैसा कि "मैं आत्माको नहीं (छा० उ०६। ८-१६) "आत्मा- जानता" इत्यादि कथनसे तथा "तू वह नमेवावेत्" (वृ० उ०१।४।१०)। (ब्रह्म) है" "आत्माको ही जाना" केनोपनिपद् [खण्ड १ पद-भाष्य ब्रह्मण त्मक यद्विदितं तदल्पं मयं दुःखा जो वस्तु विदित होती है वह चेति हेयम् । अल्प, मरणशील एवं दुःखमयी होती है, इसलिये वह हेय (त्याज्य) है। आत्मभिन्नत्व- तस्माद्विदितादन्यद्रह्म ब्रह्म उस विदित वस्तुसे भिन्न है- प्रतिपादनम् इत्युक्ते त्वहेयत्वमुक्तं | ऐसा कहनेसे उसका अहेयत्व बतलाया गया। तथा 'वह अविदित- स्यात् । तथा अविदितादधि से भी ऊपर हैं' ऐसा कहनेपर उसका इत्युक्तेऽनुपादेयत्वमुक्त स्यात् । अनुपादेयत्व प्रतिपादन किया गया । वाक्य-भाष्य "एतं वै तमात्मानं विदित्वा" | "उस इस आत्माको निश्चयपूर्वक जान- (वृ० उ०३।५।१) इति च । कर" आदि श्रुतियोसे सिद्ध होता है । सर्वत्र श्रुतिष्वात्मविज्ञाने विज्ञा- ही विज्ञानान्तरकी अपेक्षा देखी जाती श्रुतियोमे आत्माके ज्ञानके लिये सर्वत्र नान्तरापेक्षत्वं दृश्यते । तस्मात् है । इसलिये [उपर्युक्त कथनका] प्रत्यक्षश्रुतिविरोध इति चेत् । प्रत्यक्ष ही श्रुतिसे विरोध है । ना कस्मात् ? अन्यो हि स सिद्धान्ती-ऐसा कहना ठीक नहीं। क्यो? क्योकि बुद्धि आदि कार्य और आत्मा बुद्धयादिकार्यकरणसङ्घा- | करणके सघातमे जो अभिमान है उसकी ताभिमानसन्तानाविच्छे दलक्षणी- परम्पराका विच्छेद न होना ही जिसका लक्षण है, नित्य चित्स्वरूप आत्मा ही ऽविवेकात्मकोबुद्धयवभासप्रधानः जिसका आन्तरिक सार है और जिसमे अनित्य विज्ञानका अवभास हुआ चक्षुरादिकरणो नित्यचित्वरू- करता है वह अविवेकात्मक, चिदाभास- पात्मान्त:सारोयत्रानित्यं विज्ञानम् प्रधान तथा चक्षु आदि करणोवाला अवभासते।बौद्धप्रत्ययानाम् आ- भिन्न ही है । बौद्ध प्रतीतियोका आत्मा (जीवात्मा) [शुद्ध चेतनसे] आविर्भाव-तिरोभाव उसका धर्म है। विर्भावतिरोभावधर्मकत्वात्तद्धर्म- अतः अपने उस धर्मके कारण वह उस- तयैव विलक्षणमपि चावभासते । से पृथक् दिखलायी भी देता है।
खण्ड १] হাসাগ্রাথ ३९ पद-भाष्य कार्यार्थं हि कारणमन्यदन्येन | किसी कार्यके लिये ही किसी अन्य पुरुपद्वारा एक अन्य कारण यानी उपादीयते । अतश्च न वेदितुः साधनको ग्रहण किया जाता है; अतः वेत्ता (आत्मा) को किसी अन्य अन्यस्मै प्रयोजनायान्यदुपादेयं प्रयोजनके लिये कोई अन्य साधन उपादेय नही है । इस प्रकार वह भवतीति । एवं विदिताविदिता- विदित और अविदित दोनोसे भिन्न भ्यामन्यदिति हेयोपादेय- है-इस कथनद्वारा हेय और उपादेयका प्रतिपेध कर दिया जाने- प्रतिषेधेन स्वात्मनोऽनन्यत्वाद् से [ज्ञेय वस्तु] अपने आत्मासे अभिन्न सिद्ध होने के कारण शिष्यकी ब्रह्मविषया जिज्ञासा शिष्यस्य ब्रह्मविषयक जिज्ञासा पूर्ण हो जाती वाक्य-भाष्य अन्तःकरणस्य मनसोऽपि [किन्तु वह शुद्ध चेतन तो] मनोऽन्तर्गतत्वात्सर्वान्तरश्रुतेः । 'आत्मा सर्वान्तर है। ऐसा बतलाने- अन्तर्गतेन नित्यविज्ञानस्वरूपेण वाली श्रुतिके अनुसार अन्तःकरण यानी मनका भीमन है। उस अन्तर्गत, आकाशवदप्रचलितात्मनान्तर्गर्भ- नित्यविज्ञानस्वरूप, आकाशके समान भूतेन वाह्यो वुद्धयात्मातद्विलक्षणः अविचल और अन्तर्गर्मभूत चिदात्मासे अचिभिरिवाग्निः प्रत्ययैरावि- | बाह्य और विलक्षण अनित्य विज्ञानयान् र्भावतिरोभावधर्मकैर्विज्ञानाभास- विज्ञानात्मा ही, आविर्भाव-तिरोभाव धर्मवाले विज्ञानाभासरूप अनित्य रूपैरनित्यविज्ञान आत्मा सुखी प्रत्ययोके कारण लौकिक पुरुपोद्वारा दुःखीत्यभ्युपगतो लौकिकैः । आत्मा सुखी-दुःखी है-ऐसा माना अतोऽन्यो नित्यविज्ञानस्वरूपादा- जाता है, जैसे ज्वालाओके कारण अमि। अतः वह नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मा- त्मनः। तत्र हि विज्ञानापेक्षाविप से भिन्न है । उसीम विज्ञानकी अपेक्षा रीतज्ञानत्वं चोपपद्यते न पुन तथा विपरीत ज्ञानत्वकी सम्भावना है- नित्यविज्ञाने। नित्यविज्ञानस्वरूप चिदात्मामे नही ।
केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाव्य निर्वर्तिता स्यात् । न ह्यन्यस्य | है, क्योकि अपने आत्मासे 'भिन्न स्वात्मनो विदिताविदिताभ्याम् | किसी और वस्तुका विदित और अविदित दोनोसे भिन्न होना सम्भव अन्यत्वं वस्तुनःसम्भवतीत्यात्मा नही है । अतः आत्मा ही ब्रह्म ब्रह्मेत्येष वाक्यार्थः; "अयमात्मा है—यह इस वाक्यका अर्थ है । ब्रह्म" (माण्डू० २) “य आत्मा- | यही बात “यह आत्मा ब्रह्म है" पहतपाप्मा," (छा० उ०८1७१)| "जो आत्मा पापसे रहित है" वाक्य-भाष्य तत्त्वमसीति बोधोपदेशो न पूर्व०-[ ऐसा माननेसे तो] उपपद्यत इति चेत् । "आत्मानमे- | उपदेश भी नहीं बन सकता और न "तत्त्वमसि" (वह ब्रह्म तू है) यह वावेत्" (बृ० उ०१।४।१०) "अपने आत्माको ही जाना [कि मै ब्रह्म हूँ]" इत्यादि वाक्य ही सार्थक इत्येवमादीनि च नित्यवोधात्म- हो सकते है क्योकि ब्रह्म तो नित्य- कत्वात् । न ह्यादित्योऽन्येन | बोधस्वरूप है । सूर्य दूसरेसे प्रकाशित कभी नहीं हो सकता । इसलिये प्रकाश्यतेऽतस्तदर्थबोधोपदेशः आत्माके विषयमे ज्ञानका उपदेश अनर्थक इति चेत् । करना व्यर्थ ही होगा। न; लोकाध्यारोपापोहार्थत्वात्। सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, क्योकि वह उपदेश लोगोद्वारा किये हुए सर्वात्मनि हि नित्य- वोधोपदेशस्य अध्यारोपकी निवृत्तिके लिये है। विज्ञाने बुद्धाद्यनित्य- लोगोने आत्मतत्त्वके अज्ञानवश उस निरासार्थत्वम् नित्यविज्ञानस्वरूप सर्वात्मापर बुद्धि धर्मा लोकैरध्या- आदि अनित्य धर्मोका आरोप किया रोपिता आत्माविवेकतस्तदपो- हुआ है । उसकी निवृत्तिके लिये ही उस ज्ञानस्वरूपके ज्ञानका उपदेश हार्थों बोधोपदेशो बोधात्मनः। किया जाता है। तत्र व वोधावोघौ समञ्जसौ, तथा उस बोधस्वरूपमे बोध और अबोध समीचीन भी है, क्योकि जैसे अन्यनिमित्तत्वादुदक इवौष्ण्यम् | अमिके कारण जलमे उष्णता रहती है अध्यास- खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य "यत्साक्षादपरोक्षाह्म" (वृ० "जो साक्षात् अपरोक्षरूपसे ब्रह्म ही उ०३।४।१) “य आत्मा है" "जोआत्मा सर्वान्तर है" इत्यादि सर्वान्तरः" (वृ० उ०३।४।१) अन्य श्रुतियोसे भी प्रमाणित इत्यादिश्रुत्यन्तरेभ्यश्चेति । होती है। वाक्य-भाष्य अग्निनिमित्तम् रात्र्यहनी इवादित्य- तथा सूर्यके कारण दिन और रात हुआ करते है, वैसे ही उनका कारण निमित्त । लोके नित्यावौष्ण्य- भी अन्य ( आरोपित धर्म ) ही है। उष्णता और प्रकाश-ये अग्नि प्रकाशावग्न्यादित्ययोरन्यत्रभावा- और सूर्यके तो नित्य-धर्म है, किन्तु भावयोनिमित्तत्वादनित्याविव लोकमे अन्यत्र अपने भाव और अभावके कारण वे अनित्यवत् उपचरित उपचर्यते । धक्ष्यत्यग्निः प्रकाश- होते है; जेसे-'अभि जला देगा', यिष्यति सवितेति तद्वत् । एवं 'सूर्य प्रकाशित करेगा' इत्यादि वाक्योमे, वैसे ही [आत्माके विपयमे च सुखदुःखवन्धमोक्षाद्यध्यारोपो समझना चाहिये। इस प्रकार लोकका लोकस्य तदपेक्ष्य तत्त्वमस्यात्मा- जो सुख-दुःख एव वन्ध-मोक्षरूप अध्यारोप है उसकी अपेक्षासे ही नमेवावेदित्यात्माववोधोपदेशेन 'तत्त्वमसि' 'आत्मानमेवावेत्' इत्यादि श्रुतियाँ आत्मजानके उपदेशसे केवल श्रुतयः केवलमध्यारोपापोहार्थाः। अध्यारोपकी निवृत्ति के लिये ही है । यथा सवितासौ प्रकाशयति जिस प्रकार यह सूर्य अपने-आपको प्रकाशित करता है। [इस वाक्यसे आत्मानम् इति ब्रह्मणो विदिता- प्रकाशस्वरूप सूर्यमे प्रकाशकर्तृत्वका तद्वत्, वोधावोध- उल्लेख किया जाता है] उसी प्रकार विदिताभ्या- कर्तृत्वं च नित्य-नित्यत्रोधस्वरूप आत्मामे भी ज्ञान वोधात्मनि।तस्मात्- और अज्ञानका कर्तृत्व माना गया है। अन्यदविदितात् । अधिशब्दश्च भी अन्य है। यहाँ 'अधि' शब्द 'अन्य' इसलिये वह अविदित (अज्ञात) से अन्यार्थे । यद्वा यद्धि यस्याधि | अर्थमे है। अथवा जो जिससे अधि . मन्यत्वम् केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य एवं सर्वात्मनः सर्वविशेष इस प्रकार सर्वात्मा सर्वविशेप- रहितस्य चिन्मात्रज्योतिषो | रहित चिन्मात्रज्योतिःखरूप वस्तुका ब्रह्मत्वप्रतिपादकस्य वाक्यार्थस्य | ब्रह्मत्व प्रतिपादन करनेवाले वाक्यार्थ- वाक्य-भाष्य , । , . तत्ततोऽन्यत्सामर्थ्यात् । यथाधि । (ऊपर) होता है वह उससे अन्य ही हुआ करता है, क्योकि उस शब्दकी भृत्यादीनां राजा । अव्यक्तमेव | शक्तिसे यही बोध होता है। जिस प्रकार सेवक आदिसे ऊपर राजा अव्यक्त अविदितं ततोऽन्यदित्यर्थः। ही अविदित है, उससे यह आत्मा पृथक् है-यही इसका तात्पर्य है। विदितमविदितं च व्यक्ताव्यक्त विदित और अविदित यानी व्यक्त और अव्यक्त ही क्रमशः कार्य कार्यकारणत्वेन विकल्पिते | तथा कारणभावसे माने गये है उनसे भिन्न वह ब्रह्म है जो सम्पूर्ण विशेषणोसे ताभ्यामन्यद्रह्म विज्ञानखरूपं रहित विज्ञानस्वरूप है-यह इस समस्त सर्वविशेषप्रत्यस्तमितम् इत्ययं | वाक्यसमुदायका तात्पर्य है। अतः आत्मस्वरूप होनेके कारण वह त्याज्य समुदायार्थः । अत एवात्मत्वान्न या ग्राह्य भी नही है। अन्य वस्तु ही किसी अन्यकी त्याज्य या ग्राह्य हुआ हेय उपादेयो वा । अन्यद्धयन्येन करती है; स्वयं आप ही अपनी कोई हेयमुपादेयं वा । न तेनैव | भी वस्तु हेय या उपादेय नहीं होती। आत्मा ही ब्रह्म है और सबका तद्यस्य कस्यचिद्धेयमुपादेयं वा | अन्तर्यामी होनेसे वह किसी इन्द्रियका विषय भी नही है । इसलिये वह किसी भवति । आत्मा च ब्रह्म सर्वान्त- ! अन्यका भी हेय या उपादेय नही है। इसके सिवा आत्मासे भिन्न कोई और रात्मत्वादविषयमतोऽन्यस्यापिन वस्तु न होनेके कारण भी [वह हेयमुपादेयं वा । अन्याभावाच।। हेयोपादेयरहित है ] । १. जिस प्रकार सेवकोके ऊपर होनेके कारण राजा उनसे मिन है उसी प्रकार अविदितसे ऊपर होनेके कारण आत्मा उससे मिन्न है। 1
खण्ड १]
शाङ्करभाष्यार्थ
४३
पद-भाष्य
आचार्योपदेशपरम्परया प्राप्त- | का 'इति शुश्रुम पूर्वेपाम्' इत्यादि
त्वमाह इति शुश्रुमेत्यादि । वाक्यद्वारा आचार्योंके उपदेशकी
ब्रह्म च एवमाचार्योपदेशपरम्परया परम्परासे प्राप्त होना दिखलाया गया
एवाधिगन्तव्यं न तर्कतः प्रवचन-
है। इस प्रकार वह ब्रह्म आचार्योंकी
उपदेश-परम्परासे ही ज्ञातव्य है,
मेधावहुश्रुततपोयज्ञादिभ्यश्च,इति तर्कसे अथवा प्रवचन,मेधा, बहुश्रुत,
एवं शुश्रुम श्रुतवन्तो वयं पूर्वे- तप एवं यज्ञादिसे नही—ऐसा हमने
पाम्
आचार्याणां
वचनम्। ये पूर्ववर्ती आचार्योका वचन सुना है।
आचार्याः नः असभ्यं तद् ब्रह्म जिन आचार्योने हमारे प्रति उस
व्याचचक्षिरे व्याख्यातवन्त: ब्रह्मका व्याख्यान-स्पष्ट
कथन
वाक्य-भाज्य
इति
शुश्रुम पूर्वेषामित्यागमो 'इति शुश्रुम पूर्वेषाम्' (यह हमने
पूर्व आचार्योंके मुंहसे सुना है) ऐसा
पदेशः । व्याचच कहकर यह दिखलाते है कि यह
यथोक्तस्य आप्त-
क्षिर इत्यस्वातन्त्र्यं [ परम्परागत ] शास्त्रका उपदेश है ।
प्रामाणिकत्वम्
हमसे [शास्त्रीय मतका ] व्याख्यान
तर्कप्रतिषेधार्थम्।ये किया था [यह उनकी स्वतन्त्र कल्पना
नही है] ऐसा कहकर जो उन
नस्तब्रह्मोक्तवन्तस्ते नित्यमेवागमं | आचार्योंकी अस्वतन्त्रता दिखलायी
है वह तर्कका प्रतिपेध करनेके लिये है।
ब्रह्मप्रतिपादकं व्याख्यातवन्तो
जिन्होने हमसे उस ब्रह्मका वर्णन किया
था । अर्थात् उन्होने ब्रह्म का प्रति-
न पुनः स्ववुद्धिप्रभवेण तर्कण
पादन करनेवाले नित्य आगमका ही
उक्तवन्त इत्यागमपारम्पर्या- | व्याख्यान करके बतलाया था अपनी
बुद्धिसे ही प्रकट हुए तर्कद्वारा नहीं
विच्छेदं दर्शयति विद्यास्तुतये । कहा। इस प्रकार जानकी स्तुतिके
लिये
शास्त्रपरम्पराका अविच्छेद
तर्कस्त्वनवस्थितो भ्रान्तोऽपि | दिखलाया है, क्योकि तर्क तो
अनयस्थित और भ्रमपूर्ण भी
भवतीति ॥३॥
होता है ॥ ३॥
केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य विस्पष्टं कथितवन्तः, तेषाम् । किया था, उन्हीके [वचनसे हमे उसे जानना चाहिये] यह इसका तात्पर्य इत्यर्थः ॥३॥ है ॥ ३॥ 'अन्यदेव तद्विदितादथो 'वह विदितसे अन्य है और अविदितादधि' इत्यनेन वाक्येन अविदितसे भी ऊपर है' इस वाक्य- द्वारा आत्मा ही ब्रह्म है—ऐसा आत्मा ब्रह्मोति प्रतिपादिते प्रतिपादन किये जानेपर श्रोताको श्रोतुराशङ्का जाता-कथं न्वात्मा यह शंका हुई—आत्मा किस ब्रह्म । आत्मा हि नामाधिकृतः । प्रकार ब्रह्म है ? आत्मा तो कर्म और उपासनामे अविकृत संसारी कर्मण्युपासने च संसारी कर्मो- जीवको कहते है, जो कर्म या पासनं वा साधनमनुष्ठाय ब्रह्मादि- उपासनारूप साधनका अनुष्ठान कर देवान्स्वर्ग वा प्राप्तुमिच्छति । ब्रह्मा आदि देवताओ अथवा स्वर्गको प्राप्त करना चाहता है । अतः तत्तसादन्य उपास्यो विष्णु- उससे भिन्न उसका उपास्य विष्णु, रीश्वर इन्द्रः प्राणो वा ब्रह्म | ईश्वर, इन्द्र अथवा प्राण ही ब्रह्म होना चाहिये-आत्मा भवितुमर्हति, न त्वात्मा लोक- नही, क्योकि यह बात लोक-विश्वासके प्रत्ययविरोधात् । यथान्ये विरुद्ध है । जिस प्रकार अन्य तार्किका ईश्वरादन्य आत्मा तार्किक लोग आत्माको ईश्वरसे भिन्न बतलाते है उसी प्रकार कर्म- इत्याचक्षते, तथा कर्मिणोऽमुं| काण्डी भी 'इसका यजन करो- यजामुं यजेत्यन्या एव देवता इसका यजन करो' इस प्रकार अन्य उपासते । तसायुक्तं यद्विदित- देवताकी ही उपासना करते है । अतः उचित यही है कि जो उपास्य मुपास्यं तद्ब्रह्म भवेत्, ततोऽन्य विदित है वह ब्रह्म हो और उससे उपासक इति । तामेतामाशङ्कां | भिन्न उसका उपासक हो । शिप्यके व्याज अथवा उसके वाक्यसे उसकी शिष्यलिङ्गेनोपलक्ष्य तद्वाक्याद्वा इस आशंकाको उपलक्षित कर आह-मैवं शतिष्ठाः, कहते है--ऐसी शंका मत करो, . ।
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ब्रह्म वागादिसे अतीत और अनुपास्य है यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥४॥ जो वाणीसे प्रकाशित नहीं है, किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती है उसीको तू ब्रह्म जान, जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है॥४॥ पद-भाप्य यत् चैतन्यमानसत्ताकम्, जो चैतन्यसत्ताखरूप ब्रह्म वाणी- वाचा वागिति जिह्वामूलादिष्वष्टसु से[अप्रकाशित है]-जिह्वामूल आदि आठ स्थानोमे* आश्रित तथा अग्नि- स्थानेषु विपक्तमाग्नेयं वर्णानाम् देवतासे अधिष्ठित वर्णोको अभिव्यक्त अभिव्यञ्जकं करणम्, वर्णाश्वार्थ- करनेवाली इन्द्रिय एवं अर्थ-संकेतसे सङ्केतपरिच्छिन्ना एतावन्त एवं परिच्छिन्न और इतने तथा इस क्रमप्रयुक्ता इति; एवं तद- 'क्रमसे में प्रयुक्त होनेवाले है, ऐसे वाक्य-भाप्य यद्वाचा इति मन्त्रानुवादो 'यद्वाचा' इत्यादि मन्त्रोका उल्लेख दृढप्रतोतेः । अन्यदेव आत्मतत्त्वकी दृढप्रतीतिके लिये किया तद्वि- गया है। यह विदितसे भिन्न है। ऐसा दितादिति योऽयमागमार्थो जो गास्त्रका तात्पर्य इस ब्राह्मण-ग्रन्थने ब्राह्मणोक्तोऽस्यैव द्रबिन्ने मन्त्रा ऊपर कहा है उसकी पुष्टि के लिये ही. यद्वाचेत्यादयः पठ्यन्ते । ये 'यद्वाचा' इत्यादि मन्त्र पढ़े जाते हैं। *जिह्वामूल,हृदय, कण्ठ, मूर्धा, दन्त, नासिका, ओठ और तालु। + यह मीमासकोंका मत है, जैसे 'गौ.' यह पद गकार, औकार तथा विसर्ग- इस क्रमविशेपसे अवच्छिन्न वर्णरूप ही है। - ४६ केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य भिव्यङ्गयः शब्दः पदं वागिति | नियमवाले वर्ण 'वाक्' कहे जाते हैं । तथा उनसे अभिव्यक्त होनेवाला उच्यते;"अकारोवैसर्वावाक्सैषा शब्द भी 'पद' या 'वाक्' कहा स्पर्शान्तस्थोष्मभिर्यज्यमाना जाता है । श्रुति कहती है- "अकार* ही सम्पूर्ण वाक् है, और वह्वी नानारूपा भवति" यह वाक् ही अपने स्पर्श अन्तस्थे और (ऐ० आ०२।३।७।१३) इति | ऊष्म आदि भेदोसे अभिव्यक्त होकर अनेक रूपवाली हो जाती है।" श्रुतेः । मितममितं स्वर: इस प्रकार मित अमित खरं एवं सत्यानृते एप विकारो यस्यास्तया सत्य और मिथ्या-ये जिसके विकार वाक्य-भाष्य यद्रह्म वाचाशब्देनानभ्युदितम् जो ब्रह्म वाणीसे अर्थात् शब्दसे अनभ्युदित-अनुक्त अर्थात् अप्रकाशित अनभ्युक्तमप्रकाशितमित्येतत् । है। और जिससे वाणी अभ्युदित होती है—ऐसा कहकर उसे वाणीके प्रकाश- येन वागभ्युद्यत इति वाक्प्रकाश- का हेतु बतलाया है। जिससे वाणी प्रकाशित होती है। ऐसा कहकर वाणीके अभिधान (उच्चारण) के हेतुत्वोक्तिः। येन प्रकाश्यत इति अभिधेय (वाच्य) को प्रकाशित करनेमे ब्रह्मको हेतु बतलाया है [अर्थात् चाचोऽभिधानस्याभिधेयप्रकाश- यह दिखलाया है कि वाणीम जो अर्थको अभिव्यञ्जित करनेका सामर्थ्य कत्वस्य हेतुत्वमुच्यते ब्रह्मणः । है वह ब्रह्मका ही है । * अकार प्रधान ॐकारसे उपलक्षित स्फोट नामक चिच्छाक्ति । १.कसे म तक सभी वर्ण। २. य र ल व|३. श ष स ह ।४. जिनके पादका अन्त नियत अक्षरोंवाला है उन वाक्योंको मित (ऋग्वेद ) कहते हैं । ५. जिनके पादका मन्त नियत अक्षरोंवाला नहीं है उन वाक्योंको अमित (यजुर्वेद) कहते है । ६. गायन- प्रधान सामवेद 'स्वर' कहलाता है ।
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य चाचा पदत्वेन परिच्छिन्नया | है उस पदरूपसे परिच्छिन्न एवं वागिन्द्रियरूप गुणवाली वाणीसे करणगुणवत्या-अनभ्युदितम् जो अनभ्युदित-अप्रकाशित अप्रकाशितमनभ्युक्तम् । अर्थात् नहीं कहा गया है-- येन ब्रह्मणा विवक्षितेऽर्थे बल्कि जिस ब्रह्मके द्वारा वागिन्द्रियसहित वाणी विवक्षित सकरणा वाक् अभ्युद्यते चैतन्य- अर्थमे बोली जाती अर्थात् अपने ज्योतिषा प्रकाश्यते प्रयुज्यत | चैतन्य-ज्योतिःस्वरूपसे प्रकाशित इत्येतद्यद्वाचो ह वागित्युक्तम्, यानी प्रयुक्त की जाती है, जो 'वाणीकी वाणी है। इस प्रकार "वदन्वाक" (वृ० उ० १। बतलाया गया है जिसके विपयमे] ४।७) “यो वाचमन्तरो यम- | बृहदारण्यकोपनिषद्म "बोलनेके यति" (वृ० उ०३ । ७ । १७) कारण वाणी है" "जो भीतरसेवाणी- का नियमन करताहै" इत्यादि कहा इत्यादि च वाजसनेयके । “या है, तथा "चेतन प्राणियोमे जो वाणी वाक् पुरुषेषु सा घोषेषु प्रतिष्ठिता | (वाक्शक्ति) है वह घोपो (वर्णो) मे वाक्य-भाष्य उक्तं च केनेपितां वाचमिमां ऊपर 'लोग किसकी प्रेरणासे इस वाणीको बोलते हैं। इस प्रश्नके उत्तरमे वदन्ति यद्वाचो ह वाचमिति । 'जो वाणीका वाणी है' इत्यादि कहा तदेव ब्रह्म त्वं विद्धात्यविपयत्वेन भी जा चुका है । 'तू उसीको ब्रह्म जान' यह आगम ब्रह्मको अविषय- ब्रह्मण आत्मन्यवस्थापनार्थ रूपसे बुद्धिमे बिठानेके लिये है। 'जो वाणीसे प्रकट नहीं होता बल्कि आम्नायः । यद्वाचानभ्युदितं वाणीके प्रकाशित होनेका हेतु है' वाक्प्रकाशनिमित्तं चेति ब्रह्म- इस कथनसे ब्रह्मका अविषयत्व सिद्ध करता हुआ शास्त्र पुरुषको णोऽविपयत्वेन वस्त्वन्तरजिघृक्षां । अन्य वस्तुके ग्रहण करनेकी इच्छासे ૪૮ केनोपनिषद् [खण्ड १ पद-भाष्य श्रुतेः। कश्चित्तां वेद ब्राह्मणः" इति | स्थित है, उसे कोई ब्रह्मवेत्ता ही प्रश्नमुत्पाद्य प्रतिवचनमुक्तम् जानता है" इस प्रकार प्रश्न उठा- "सा वाग्ययास्वप्ने भाषते" इति। कर यह उत्तर दिया है कि "जिसके द्वारा जीव स्वप्नमे वोलता है वह सा हि वक्तुर्वक्तिनित्या वाक् चैतन्यज्योतिःस्वरूपा, "न हि शक्तिही चैतन्य-ज्योतिःखरूप वाक् वक्तुर्वक्तेत्रिपरिलोपो विद्यते" है जैसा कि "वक्ताकी वाचन- (बृ० उ०४।३।२६) इति | शक्तिका लेप कभी नही होता" इस श्रुनिसे सिद्ध होता है। तदेव आत्मस्वरूपं ब्रह्म उस आत्मस्वरूपको ही तू बृहत् निरतिशयं भूमाख्यं वृहत्त्वाद् | होनेके कारण 'ब्रह्म' यानी भूमा- ब्रह्मति विद्धि विजानीहि त्वम् । संज्ञक सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म जान । जिन वाक् आदि उपाधियोके कारण, वाणीका यैर्वागाद्युपाधिभिर्वाचो ह वाक् वाणी, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र, चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनका मन, कर्ता, भोक्ता, विज्ञाता, मनः कर्ता भोक्ता विज्ञाता नियन्ता, शासनकर्ता, तथा ब्रह्म नियन्ता प्रशासिता विज्ञान- विज्ञान और आनन्दवरूप है- मानन्दं ब्रह्म इत्येवमादयः इत्यादि प्रकारके व्यवहार उस संव्यवहारा असंव्यवहारे नि- अव्यवहार्य निर्विशेप सर्वोत्कृष्ट विशेषेपरे साम्ये ब्रह्मणि प्रवर्तन्ते, समस्वरूप ब्रह्ममे प्रवृत्त होते है, वाक्य-भाष्य निवर्त्य खात्मन्येवावस्थापयति | निवृत्त करके अपने आत्मस्वरूपम ही जोड़ता है और 'उसीको तू ब्रह्म जान' आम्नायस्तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीति | इस वाक्यद्वारा वह उसे अन्य प्रयत्नसे उपरत करता है तथा 'नेदं यदिद- मुपासते' इस कथनसे भी ब्रह्मका यत्तत उपरमयति । नेदमित्युपा- उपास्यत्व निषेध करनेके कारण [वह अन्य सब ओरसे उसे निवृत्त स्यप्रतिषेधाच्च ॥४॥ करता है ] ॥४॥ -
४९
खण्ड १]
शाङ्करभाष्यार्थ
पद-भाष्य
-
तान्व्युदस्य आत्मानमेव नि- [ उन सब उपाधियोका बाधकर अपने
निर्विशेप आत्माको ही ब्रह्म जान-
विशेष ब्रह्मविद्धीति एवशब्दार्थः। यही एव' शब्दका अर्थ है । जिस
नेदं ब्रह्म यदिदम् इत्युपाधिभेद- इस उपाधिविशिष्ट अनात्माईश्वरादि-
की उपासना-
-ध्यान करते है यह
विशिष्टमनात्मेश्वरादि उपासते ब्रह्म नही है । 'उसीको तू ब्रह्म
जान' इतना कह देनेपर भी
ध्यायन्ति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि [ अनात्मवस्तुमे ब्रह्मभावनाका
निषेध हो ही जाता] पुनः 'यह
इत्युक्तेपि नेदं ब्रह्म इत्यनात्म- | ब्रह्म नहीं है' इस वाक्यके द्वारा
जो अनात्माका अब्रह्मत्व प्रतिपादन
नोब्रह्मत्वं पुनरुच्यते नियमार्थम् किया है वह आत्मामे ही ब्रह्म-
अन्यब्रह्मवुद्धिपरिसंख्यानार्थ
बुद्धिका नियमन करनेके लिये अथवा
अन्य उपास्य देवताओमे ब्रह्म-बुद्धि-
वा ॥४॥
की निवृत्ति करनेके लिये है ॥४॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं
यदिदमुपासते ॥५॥
जो मनसे मनन नहीं किया जाता, बल्कि जिससे मन मनन किया
हुआ कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [देश-कालावच्छिन्न
वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥५॥
६० केनोपनिषद् खण्ड १ पद-भाष्य यन्मनसा न मनुते; मन जिसका मनके द्वारा मनन नही इत्यन्तःकरणं बुद्धिमनसोरेकत्वेन एकत्वरूपसे यहॉ मन शब्दसे अन्तः- किया जाता; मन और बुद्धिके गृह्यते । मनुतेऽनेनेति मनःसर्व- करणका ग्रहण किया जाता है। जिसके द्वारा मनन करते है उसे करणसाधारणम्, सर्वविषय- मन कहते हैवह समस्त इन्द्रियोके व्यापकत्वात् । “कामः सङ्कल्पो | बिपयोमे व्यापक होनेके कारण विचिकित्सा श्रद्धाश्रद्धा धृतिर- | सम्पूर्ण इन्द्रियोंके लिये समान है। "काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, धृतिहीं/रित्येतत्सर्व मन एवं" अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि (वृ० उ०१। ५ । ३) इति और भय-ये सब मन ही है" इस श्रुतेः कामादिवृत्तिमन्मनः । तेन श्रुतिके अनुसार मन कामादि वृत्तियोवाला है । उस मनके द्वारा मनसा यत् चैतन्यज्योतिर्मनसः यह लोक जिस मनके प्रकाशक अवभासकं न मनुते न सङ्कल्प- चैतन्यज्योतिका मनन--संकल्प यति नापि निश्चिनोति लोकः, अथवा निश्चय नही कर सकता, क्योकि मनका प्रकाशक होनेके मनसोऽवभासकत्वेन नियन्त- कारण वह तो उसका नियामक त्वात् । सर्वविपयं प्रति प्रत्य- है । आत्मा सव विपयोंके प्रति गेवेति स्वात्मनि न प्रवर्ततेऽन्तः- प्रत्यक्रूप (आन्तरिक) ही है; अतः करणम् । अन्तःस्थेन हि चैतन्य- उसमे मन प्रवृत्त नही हो सकता। अपने भीतर स्थित चैतन्यज्योतिसे ज्योतिषावभासितस्य मनसो प्रकाशित हुए मनमे ही मनन करनेका मननसामर्थ्यम् । तेन सवृत्तिकं सामर्थ्य है । उसके द्वारा वृत्तियुक्त हुए वाक्य-भाष्य यन्मनसा इत्यादि समानम् । 'यन्मनसा' इत्यादि श्रुतियोका तात्पर्य समान ही है। 'मन मनन मनोमतमिति येन ब्रह्मणा मनोऽपि किया जाता है' अर्थात् जिस नित्य विषयीकृतं नित्यविज्ञानवरूपेण | विज्ञानस्वरूप ब्रह्मद्वारा मन भी विषय खण्ड १] शाङ्करमाप्यार्थ पद-भाष्य मनो येन ब्रह्मणा मतं विषयीकृतं | मनको ब्रह्मवेत्तालोग जिस ब्रह्मके व्याप्तम् आहुः कथयन्ति ब्रह्म- द्वारा मत-विषयीकृत अर्थात् व्याप्त बतलाते है उस मनके प्रत्यक्चेतयिता विदः। तस्मात् तदेव मनस आत्माको हीत् ब्रह्म जान । 'नेदं...." आत्मानं प्रत्यक्चेतयितारं ब्रह्म इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पूर्ववत् विद्धि । नेदमित्यादि पूर्ववत् ॥५॥ साझनी चाहिये ॥ ५॥ यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षू षि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नै युक्मुिपासते ॥६॥ जिसे कोई नेत्रसे नही देखता बल्कि जिसकी सहायतासे नेत्र [अपने विपयोको ] देखते है उसोको त् ब्रह्म जान । जिस इस [देश- कालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥६॥ पद-भाप्य यत् चक्षुषा न पश्यति न लोक जिसे अन्तःकरणकी वृत्ति- विषयीकरोति अन्तःकरणवृत्ति- विषय नहीं करता किन्तु जिस से युक्त नेत्रद्वारा नहीं देखता अर्थात् संयुक्तेन लोकः, येन च पि चैतन्यआत्मज्योतिके द्वारा चक्षुओ अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तियोके अन्तःकरणवृत्तिभेदभिन्नाश्चक्षु- भेदसे विभिन्न हुई—नेत्रेन्द्रियकी वृत्तीः पश्यति चैतन्यात्म- | वृत्तियोको देखता—विपय करता यानो व्याप्त करता है उसीको तू ज्योतिपा विपयीकरोति व्या- ब्रह्म जान इत्यादि पूर्ववत् समझना मोति । तदेवेत्यादि पूर्ववत् ।।६।। चाहिये ॥६|| वाक्य-भाय इत्येतत् । सर्वकरणानामविषयम्, किया जाता है । जो सब इन्द्रियोका तानि च सव्यापाराणि सविषयाणि अविपय है और नित्य विज्ञानस्वरूपसे "नित्यविज्ञानस्वरूपावभासतया अवभासित होनेके कारण जिससे वे ५२ केनोपनिषद् । [खण्ड १ यच्छोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिद श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥७॥ जिसे कोई कानसे नही सुनता बल्कि जिससे यह श्रोत्रेन्द्रिय सुनी जाती है उसीको तू ब्रह्म जान जिस इस [देशकालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नही है ॥७॥ भाज्य यत् श्रोत्रेण न शृणोति लोक जिसे मनोवृत्तिसे युक्त 14 आकाशके कार्यभूत तथा दिशा- दिग्देवताधिष्ठितेन रूप देवतासे अधिष्ठित श्रोत्रेन्द्रियद्वारा कार्येण मनोवृत्तिसंयुक्तन न नहीं सुन सकता अर्थात् जिसे विषयीकरोति लोकः, येन श्रोत्रम् श्रोत्रसे विपय नही कर सकता, इदं श्रुतं यत्प्रसिद्धं चैतन्यात्म- बल्कि जिस चैतन्यआत्मज्योतिद्वारा यह प्रसिद्ध श्रोत्र सुना यानी विपय ज्योतिषा विषयीकृतं तदेव किया जाता है वही ब्रिह्म है] इत्यादि इत्यादि पूर्ववत् ॥७॥ पूर्ववत् समझना चाहिये ॥७॥ आग यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ८ ॥ जो नासिकारन्ध्रस्थ प्राणके द्वारा विपय नहीं किया जाता बल्कि जिससे प्राण अपने विपयोकी ओर जाता है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है।॥ ८॥ वाक्य-भाष्य येनावभास्यन्त इति श्लोकार्थः।। सभी इन्द्रियाँ अपने व्यापार और विपयोंके सहित अवभासित होती है- "क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्स्नं यह इन मन्त्रोका तात्पर्य है । तथा प्रकाशयति" (गीता १३ ॥३३) क्षेत्रज्ञ सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता
खण्ड १]
शाङ्करभाष्यार्थ
पद-भाण्य
यत् प्राणेन घ्राणेन पार्थिवेन अन्तःकरणकी और प्राणकी
वृत्तियोके सहित नासिकारन्ध्रमेशित
नासिकापुटान्तरवस्थितेनान्तः-
एवं पृथिवीके कार्यभूत प्राण यानी
करणप्राणवृत्तिभ्यां सहितेन यन्न घाणके द्वारा जो प्राणन अर्थात् गन्ध-
प्राणिति गन्धवन्न विषयीकरोति, युक्त वस्तुओको विपय नही करता,
चल्कि जिस चैतन्यआत्मज्योतिसे
येन चैतन्यात्मज्योतिषावभास्य- प्रकाश्यरूपसे प्राण अपने विपयकी
वेन स्वविषयं प्रति प्राणः प्रणी- ओर प्रवृत्त किया जाता है वही
ब्रह्म है झ्यादि शेप सब अर्थ पहले-
यते तदेवेत्यादि सर्वसमानम् ।।८॥ हीके समान है ॥ ८ ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥१॥
वाक्य-भाष्य
इति स्मृतेः। "तस्य भासा" । है" इस स्मृतिसे और "उसीके तेजसे-
(मु० उ० २।२।१०) इति [यह सब प्रकाशित है ]" इस आथर्वणी
चाथर्वणे । येन प्राण इति क्रिया- श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है ।
शक्तिरप्यात्मविज्ञाननिमित्तेत्ये-
'यन प्राणः' इस श्रुतिका यह तात्पर्य है
कि क्रियाशक्ति भी आत्मविज्ञानके
तत् ॥५॥६॥ ॥७॥ ॥८॥ कारण ही प्रवृत्त होती है ।। ५-८॥
इति प्रथमः खण्डः॥१॥
५४ केनोपनिपद् [खण्ड २ द्वितीय खण्ड . ब्रह्मज्ञानकी अनिर्वचनीयता पद-भाष्य एवं हेयोपादेयविपरीतस्त्व: इस प्रकार हेयोपादेयसे विपरीत त् आत्मा ही ब्रह्म है-ऐसी प्रतीति मात्मा ब्रह्मोति प्रत्यायितः शिष्यः कराया हुआ शिष्य यह न समझ अहमेव ब्रह्मति सुष्ठु वेदाहमिति बैठे कि 'ब्रह्म मै ही हूँ, ऐसा मै उसे अच्छी तरह जानता हूँ' इस मा गृह्णीयादित्याशयादाहाचार्यः अभिप्रायसे उसकी बुद्धिको [इस शिष्यबुद्धिविचालनार्थम् यदी- निश्चयसे ] विचलित करनेके लिये त्यादि। आचार्यने 'यदि मन्यसें'इत्यादि कहा। नन्विष्टैव सु वेदाहम् इति पूर्व०–मै उसे अच्छी तरह जानता हूँ-ऐसा निश्चित ज्ञान निश्चिता प्रतिपत्तिः। तो इप्ट ही है। सत्यम्, इप्टा निश्चिता प्रति सिद्धान्ती---ठीक है, निश्चित पत्तिः, न हि सु वेदा- ज्ञान तो अवश्य इष्ट ही है, परन्तु ब्रह्मणोऽवेद्यत्वे 'मै उसे अच्छी तरह जानता हूँ' हेतु. हमिति । यद्धि वेचं ऐसा कथन इष्ट नहीं है । जो वेद्य वस्तु वेत्ताकी विपय होती है वही वस्तु विपयीभवति, तत्सुष्टु अच्छी तरह जानी जा सकती वेदितुं शक्यम्, दाह्यमिव दग्धुम् जिस प्रकार दहन करनेवाले अग्नि- के दाहका विपय दाह्य पदार्थ ही अग्नेर्दग्धुः न त्वग्नेः स्वरूपमेव । हो सकता है उसका स्वरूप नही सर्वस्य हि वेदितुः स्वात्मा ब्रह्मति हो सकता। 'ब्रह्म सभी ज्ञाताओंका सर्ववेदान्तानां सुनिश्चितोऽर्थः । आत्मा (अपना-आप) ही है। यह समस्त वेदान्तोंका भलीभॉति निश्चय इह च तदेव प्रतिपादितं प्रश्न- | किया हुआ अर्थ है । यहाँ भी ।
खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य प्रतिवचनोक्त्या 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' | 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि प्रश्नोत्तरों- इत्याद्यया । 'यद्वाचानभ्युदितम्' है। उसीको 'यद्वाचानभ्युदितम्' द्वारा उसीका प्रतिपादन किया गया इति च विशेषतोऽवधारितम् । इस वाक्यद्वारा विशेषरूपसे निश्चय किया है। 'वह विदितसे अन्य है ब्रह्मवित्सम्प्रदायनिश्चयश्चोक्तः और अविदितसे भी ऊपर हैं' इस 'अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- वाक्यद्वारा ब्रह्मवेत्ताओके सम्प्रदाय- का निश्चय भी बतलाया गया है; दितादधि' इति । उपन्यस्तमुप- तथा इस प्रकार उल्लेख किये हुए संहरिष्यति च 'अविज्ञातं वि- प्रकरणका 'अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्' इस वाक्यद्वारा जानतां विज्ञातमविजानताम्' उपसंहार करेंगे । अतः 'मै अच्छी इति । तसाधुक्तमेव शिष्यस्य सु तरह जानता हूँ' ऐसी शिष्यकी बुद्धिका निराकरण करना उचित वेदेति बुद्धिं निराकर्तुम् । ही है। न हि वेदिता वेदितुर्वेदितुं जिस प्रकार जलानेवाले अग्नि- द्वारा स्वयं अग्नि नहीं जलाया जा शक्यः अग्निर्दग्धुरिव दग्धुमग्नेः ।। सकता उसी प्रकार जाननेवालेके वाक्य-भाज्य . यदि मन्यसे सुवेद इति 'यदि मन्यसे सुवेद' इत्यादि वाक्यसे, शिष्यवुद्धिविचालना गृहीत- जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करना है वह उसके ग्रहण किये हुए अर्थको स्थिरतायै विदिताविदि- स्थिर करनेके लिये ही है। शिष्यकी ताभ्यां निवयं बुद्धि शिष्यस्य बुद्धिको ज्ञात और अज्ञात वस्तुओसे हटाकर 'तदेव ब्रह्मत्व विद्धि' (उसीको स्वात्मन्यवस्थाप्य तदेव ब्रह्म त्वं तू ब्रह्म जान) इस कथनसे अपने चिद्धीति स्वाराज्येऽभिपिच्य आत्मस्वरूपमे स्थिर कर तथा उपास्यके प्रतिषेधद्वारा उसेस्वाराज्यपर अभिषिक्त- उपास्यप्रतिपेधेनाथास्य बुद्धि कर अब उसकी बुद्धिको विचलित विचालयति। करते है।
केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य न चान्यो वेदिता ब्रह्मणोस्ति । द्वारा स्वयं जाननेवाला नहीं जाना जा सकता । ब्रह्मका जाननेवाला यस्य वेद्यमन्यत्स्याब्रह्मा "नान्य- कोई और है भी नही जिसका वह दतोऽस्ति विज्ञात" (बृ० उ० उससे भिन्न ब्रह्म ज्ञेय हो सके। "इससे भिन्न और कोई ज्ञाता नहीं ३।८।११) इत्यन्यो विज्ञाता है" इस श्रुतिद्वारा भी ब्रह्मसे भिन्न ज्ञाताका प्रतिपेध किया गया है। प्रतिषिध्यते । तस्मात् सुष्टु वेदाहं अतः 'मै ब्रह्मको अच्छी तरह जानता ब्रह्मोति प्रतिपत्तिमिथ्यैव । तसाद् हूँ' यह समझना मिथ्या ही है। इसलिये गुरुने 'यदि मन्यसे युक्तमेवाहाचार्यों यदीत्यादि । इत्यादि ठीक ही कहा है। यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनम् । त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपं यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमास्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥१॥ यदि तू ऐसा मानता है कि 'मै अच्छी तरह जानता हूँ, तो निश्चय ही त् ब्रह्मका थोडा-सा ही रूप जानता है । इसका जो रूप तू जानता है और इसका जो रूप देवताओंमे विदित है [वह भी अल्प ही है ] अतः तेरे लिये ब्रह्म विचारणीय ही है। [तब शिष्यने एकान्त देशमे विचार करनेके अनन्तर कहा-] 'मै ब्रह्मको जान गया—ऐसा समझता हूँ ॥१॥ पद-भाष्य यदि कदाचित् मन्यसे सु यदि कदाचित् तू ऐसा मानता वेदेति सुष्टु वेदाहं ब्रह्मोति । हो कि मै ब्रह्मको अच्छी तरह वाक्य-भाष्य यदि मन्यसे सुवेद अहं यदि तू यह मानता है कि मै ब्राको ब्रह्म ति त्वं ततोऽल्पमेव ब्रह्मणो अच्छी तरह जानता हूँ तो तू निश्चय १'दभ्रमेव' ऐसा भौ पाठ है।
खण्ड २1 शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य कदाचिद्यथाश्रुतं दुर्विज्ञेयमपि जानता हूँ। जिसके दोप क्षीण हो गये है ऐसा कोई बुद्धिमान् पुरुप क्षीणदोषः सुमेधाः कश्चित्प्रति- कभी सुने हुएके अनुसार दुर्विज्ञेय पद्यते कश्चिनेति साशङ्कमाह विषयको भी समझ लेता है और कोई नहीं भी समझता-इस यदीत्यादि । दृष्टं च “य एषोऽ- आशयसे ही [गुरुने ] 'यदि मन्यसे' क्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति | इत्यादि शंकायुक्त वाक्य कहा है। ऐसा देखा भी गया है कि "यह होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म" जो नेत्रोके भीतर पुरुप दिखायी देता है यही आत्मा है, यही अमृत (छा० उ० ८।७।४) इत्युक्ते है, यही अभयपद है और यही ब्रह्म है-ऐसा ब्रह्माने] कहा" इस प्राजापत्यः पण्डितोऽप्यसुरराड्- प्रकार ब्रह्माजीके कहनेपर प्रजापति- विरोचनःस्वभावदोपवशादनुप- भी असुरराज विरोचनने अपने की सन्तान और पण्डित होनेपर स्वभावके दोपसे, किसी प्रकार सिद्ध पद्यमानमपि विपरीतमर्थं शरीर- न होनेपर भी शरीर ही आत्मा है, मात्मेति प्रतिपन्नः । तथेन्द्रो ऐसा विपरीत अर्थ समझ लिया । तथा देवराज इन्द्रने भी एक, देवराट् सद्विनिरुक्तं चाप्रति- | दो तथा तीन बार कहनेपर भी इसका भाव न समझकर अपने पद्यमानः स्वभावदोषक्षयमपेक्ष्य ! स्वभावका दोप क्षीण हो जानेके वाक्य-भाप्य रूपं वेत्थ त्वमिति नूनं निश्चितं । ही ब्रह्मके रूपको बहुत कम जानता है ऐसा आचार्य समझते है । परन्तु मन्यत इत्याचार्यः। सा पुनर्वि- आचार्य जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करते है वह किसलिये है-इसपर चालना किमर्थत्युच्यते-पूर्व- कहते है कि [उनका यह कार्य] शिष्यद्वारा पहले ग्रहण किये हुए अर्थमे गृहीतवस्तुनि बुद्धः स्थिरतायै। बुद्धिकी स्थिरताके लिये है। [इसी केनोपनिषद् [खण्ड.२ " पद-भाष्या चतुर्थे पर्याये प्रथमोक्तमेव ब्रह्म | अनन्तर चौथी बार कहनेपर पहली ही बार कहे हुए ब्रह्मका, ज्ञान प्राप्त प्रतिपन्नवान् । लोकेऽपि एकसान किया । लोकमे भी एक ही गुरु- से श्रवण करनेवालोमे कोई तो. गुरोः शृण्वतां कश्चिद्यथावत्प्रति- ठीक-ठीक समझ लेता है, कोई पद्यते कश्चिदयथावत् कश्चिद्विप- ठीक नहीं समझता है, कोई उलटा समझ बैठता है और कोई समझता रीतं कश्चिन्न प्रतिपद्यते । किमु ही नही । फिर यदि अतीन्द्रिय वक्तव्यमतीन्द्रियमात्मतत्त्वम् ? आत्मतत्त्वको न समझ सकें तो इसमे कहना ही क्या है ? इसके अत्र हि विप्रतिपन्नाः सदसद्वादि- सम्बन्धमे तो समस्त सद्वादी और असद्वादी तार्किक भी उलटा ही नम्तार्किकाः सर्वे । तस्माद्विदितं समझे हुए है । अतः 'ब्रह्मको जान ब्रोति सुनिश्चितोक्तमपि विषम- | लिया' यह कथन सुनिश्चित होनेपर भी विषम प्रतिपत्ति (ज्ञान) होनेके प्रतिपत्तित्वाद् यदि मन्यसे कारण आचार्यका 'यदि मन्यसे इत्यादि साशकं वचनं युक्तमेव सुवेद' इत्यादि शंकायुक्त कथन उचित ही है । [अतः आचार्य आचार्यस्य । दहरम् अल्पमेवापि कहते है यदि तू 'ब्रह्मको मैने जान लिया है। ऐसा मानता है तो] नूनं त्वं वेत्थ जानी ब्रह्मणो निश्चय ही तू ब्रह्मके अल्प रूपको ही जानता है। वाक्य-भाष्य देवेष्वपि सुवेदाहमिति मन्यते यः । उद्देश्यको लेकर आचार्य कहते है- देवताओमे भी जो कोई यह मानता है सोऽप्यस्य ब्रह्मणो रूपं दहरमेव | कि मै ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ वह भी निश्चय ही उस ब्रह्मके रूपको वेत्ति नूनम् । कस्मात् ? अविषय- बहुत कम जानता है। क्यो ?क्योकि ब्रह्म स्वात्कस्यचिद्रह्मणः। किसीका मी विषय नही है । ' : . . रूपम् । - J खण्ड र शङ्किरभाार्थ ५९ नह्मण पद-भाष्य "किमनेकानि ब्रह्मणो रूपाणि पूर्व o-क्या ब्रह्मके बड़े और महान्त्यर्भकाणि च, येनाह दहर- छोटे अनेको रूप है, जिससे कि मेवेत्यादि गुरु तूं ब्रह्मके अल्प रूपको ही जानता है ऐसा कह रहे है ? बाढम् अनेकानि हि सिद्धान्ती-हॉ, नाम-रूपात्मक नामरूपोपाधिकृतानि उपाधिके किये हुए नो ब्रह्मके अनेक औपाधिकभेद- ब्रह्मणो रूपाणि, न रूप है, किन्तु स्वतः नहीं है । खतः निरूपणम् स्वतः । स्वतस्तु "अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथा- तो “जो अशब्द, अस्पर्श, रूपरहित, रसं नित्यमगन्धवच्च यत्" (क० | अव्यय, रसहीन, नित्य और गन्ध- उ०१।३।१५, नृसिंहोत्तर० हीन है" इस श्रुतिके अनुसार ९, मुक्तिक० २। ७२) इति शब्दादिके सहित उसके सभी रूपो; शब्दादिभिः सह रूपाणि प्रति- पिध्यन्ते । का प्रतिपेध किया जाता है। ननु येनैव धर्मेण यद्भूप्यते पूर्व-जिस धर्मके द्वारा जिसका तदेव तय स्वरूपमिति ब्रह्मणोऽपि निरूपण किया जाता है वही उसका येन विशेषेण निरूपणं तदेव रूप हुआ करता है; अतः ब्रह्मका भी तस्य स्वरूपंसात् । अत उच्यते- जिस विशेपणसे निरूपण होता है वही उसका स्वरूप होना चाहिये। अतः चैतन्यम् पृथिव्यादीनामन्य- कहते है-चैतन्य पृथिवी आदिका , तमस्य सर्वेषां विपरिणतानां वा अथवा परिणामको प्राप्त हुए अन्य वाक्य-भाप्य अथवाल्पमेवास्याध्यात्मिक अथवा इसका इस प्रकार सम्बन्ध मनुप्येषु देवेषु च आधिदैविक- लगाना चाहिये कि इस ब्रह्मका जो मनुप्योमे आध्यात्मिक और देवताओमे मस्य ब्रह्मणो यद्रूपं तदिति | आधिदैविक रूप है वह बहुत तुच्छ ही है।, 'अथ नु' ऐसा कहकर ब्रह्मके सम्बन्धः। अथ न्विति हेतु- विचारमे हेतु प्रदर्शित करते है। क्योकि मीमांसायाः। यस्माद्दहरमेव, सु 'ब्रह्म विदितसे पृथक् ही है!-ऐसा कहे जानेके कारण ब्रह्मका अच्छी प्रकार विदितं ब्रह्मणोरूपमन्यदेव तद्विद्वि-जाना हुआ रूप तो अल्प ही है। ।
६० केनोपनिषद् [खण्ड २ पद-भाष्य धर्मों न भवति, तथा श्रोत्रादी- | समस्त पदार्थोमेसे किसीका धर्म नहीं नामन्तःकरणस्य च धर्मो न है और न वह श्रोत्रादि इन्द्रिय अथवा भवतीति ब्रह्मणो रूपमिति ब्रह्म अन्तःकरणका ही धर्म है, अतएव रूप्यते चैतन्येन ।तथा चोक्तम् । वह ब्रह्मका रूप है, इसीलिये "विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" (वृ० उ० ब्रह्मका चैतन्यरूपसे निरूपण किया ३।९।२८) "विज्ञानधन एव" | जाता है । ऐसा ही कहा भी है- "ब्रह्म विज्ञान और आनन्दवरूप है" (वृ० उ०२।४।१२)"सत्यं "वह विज्ञानघन ही है" "ब्रह्म सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (ते० उ० ज्ञान और अनन्तस्वरूप है। "प्रज्ञान २।१।१) "प्रज्ञानं ब्रह्म" ब्रह्म है" इस प्रकार श्रुतियोमे भी (ऐ० उ०५ । ३) इति च ब्रह्मके रूपका निरूपण किया ब्रह्मणो रूपं निर्दिष्टं श्रुतिः । गया है। सत्यमेवम् तथापि तदन्तः- सिद्धान्ती-यह ठीक है, तथापि करणदेहेन्द्रियोपाधिद्वारेणैव वि- वह अन्तःकरण, शरीर और इन्द्रिय- रूप उपाधिके द्वारा ही विज्ञानादि ज्ञानादिशब्दैनिर्दिश्यते, तदनु- शब्दोसे निरूपण किया जाता है, कारित्वाद् देहादिवृद्धिसङ्कोच- | क्योकि देहादिके वृद्धि, संकोच, . वाक्य-भाप्य तादित्युक्तत्वात्। सुवेदेतिच मन्य- और तू यह मानता ही है कि मै उसे अच्छी सेऽतोऽल्पमेव वेत्थ त्वं ब्रह्मणो स्वरूपको ही जानता है । क्योकि ऐसी तरह जानता हूँ। इसलिये तू ब्राके अल्प रूपं यस्मादथ नुतस्मान्मीमांस्यम् | बात है, इसलिये जबतक तुझे विटित और अविदितका प्रतिपेध करनेवाले एवाद्यापिते तव ब्रह्म विचार्यमेव शास्त्रवचनका अनुभव न हो तबतक तो अब भी मै तेरे लिये ब्रह्मको मीमांसा यावद्विदिताविदितप्रतिषेधागमा- यानी विचारके योग्य ही समझता हूँ, र्थानुभव इत्यर्थः। यह इसका तात्पर्य है।
खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ६१ १ पद-भाष्य . च्छेदादिषु नाशेषु च, न स्वतः।। उच्छेद और नाश आदिमें वह स्वतस्तु “अविज्ञातं विजानतां उनका अनुकरण करनेवाला है परन्तु खतः वैसा नहीं है। खतः विज्ञातमविजानताम्" (के० उ० | तो वह "जाननेवालोंके लिये अज्ञात है और न जाननेवालोंके लिये ज्ञात २।३) इति स्थितं भविष्यति । है" इस प्रकार निश्चय किया जायगा। यदस्य ब्रह्मणो रूपमिति पूर्वेण 'यदस्य' इस पदसमूहका पूर्व- वर्ती 'ब्रह्मणो रूपम्' के साथ सम्बन्ध सम्बन्धः। न केवलमध्यात्मो- है। केवल आध्यात्मिक उपाधिसे पाधिपरिच्छिन्नस्यास्य ब्रह्मणो | परिच्छिन्न हुए इस ब्रह्मके ही रूपं त्वमल्पं वेत्थ; यदप्यधि- अधिदैवत उपाधिसे परिच्छिन्न हुए अल्प रूपको नहीं जानता बल्कि दैवतोपाधिपरिच्छिन्नस्यास्य इस ब्रह्मके भी जिस रूपको तू ब्रह्मणो रूपं देवेषु वेत्थ त्वम् | देवताओमे जानता है वह भी निश्चय तू इसके अल्प रूपको ही तदपि नूनं दहरमेव वेत्थ इति जानता है-ऐसा मै मानता हूँ। मन्येऽहम् । यदध्यात्मं यदपि इसका जो अध्यात्मरूप है और जो देवेषु तदपि चोपाधिपरिच्छिन्न- परिच्छिन्न होनेके कारण दहरत्व देवताओंमे है वह भी उपाधि- त्वादहरत्वान्न निवर्तते । यत्तु | (अल्पत्व ) से दूर नहीं है । किन्तु वाक्य-भाष्य मन्ये विदितमिति शिप्यस्य 'मन्ये विदितम्' यह शिष्यकी मीमांसा (विचार) करनेके अनन्तरकी मीमांसानन्तरोक्तिः प्रत्ययत्रय- | उक्ति है क्योकि ऐसा माननेपर ही तीन प्रकारकी प्रतीतियोकी सङ्गति सङ्गतेः । सम्यग्वस्तुनिश्चयाय | होती है। सम्यक् वस्तुके निश्रयके विचालितः शिष्य आचार्येण | लिये विचलित किये हुए शिष्यसे जब आचार्यने कहा कि 'तुम्हारे लिये अभी मीमांस्यमेव त इति चोक्त एकान्ते. ब्रह्म विचारणीय ही है' तब शिष्यने
”
६२
केनोपनिषद्
[खण्ड २
पद-भाष्य
विध्वस्तसर्वोपाधिविशेष
शान्तम्
जो सम्पूर्ण उपाधि और विशेपणोसे
रहित शान्त अनन्त एक अद्वितीय
अनन्तमेकमद्वैतं भूमाख्यं नित्यं भूमासंज्ञक नित्य ब्रह्म है वह
सुगमतासे जाननेयोग्य नही है-
ब्रह्म, न तत्सुवेद्यमित्यभिप्रायः। यह इसका अभिप्राय है ।
यत एवम् अथ नु तस्मात्
क्योकि ऐसी बात है इसलिये
मन्ये अद्यापि मीमांस्यं विचार्यमेव अभी तो मै तेरे लिये ब्रह्मको
ते तव ब्रह्म । एवमाचार्योक्तः विचारणीय ही समझता हूँ।
आचार्यके ऐसा कहनेपर शिष्यने
शिष्य एकान्ते उपविष्टः समा- एकान्तमे बैठकर समाहित हो
हितः सन्, यथोक्तमाचार्येण | आचार्यके बतलाये हुए आगमको
आगममर्थतो विचार्य, तर्कतश्च अर्थसहित विचारकर और तर्कद्वारा
निर्धार्य, स्वानुभवं कृत्वा, निश्चयकर आत्मानुभव करनेके
आचार्यसकाशमुपगम्य उवाच- अनन्तर आचार्यके समीप आकर
मन्येऽहमथेदानी विदितं कहा- मै ऐसा मानता हूँ कि अब
'ब्रह्मोति ॥१॥
मुझे ब्रह्म विदित हो गया है ॥ १॥
वाक्य-भाष्य
.
समाहितो भूत्वा विचार्य यथोक्तं | एकान्त देशमे समाहित चित्तसे पूर्वोक्त
प्रकारसे ब्रह्मको विचारनेके अनन्तर
सुपरिनिश्चितः सन्नाहागमाचा-
भलीभॉति 'निश्चय ' करके शास्त्र,
त्मिानुभवप्रत्ययत्रयस्यैकविषय- आचार्य और अपना अनुभव-इन
तीनो प्रतीतियोकी एक ही विषयमे
त्वेन सङ्गत्यर्थम् । एवं हि सुपरि- सगति करनेके लिये कहा [ मै ब्रह्मको
निष्ठिता विद्या सफला स्थान ज्ञात हुआ ही मानता हूँ ] | इससे यह
न्याय दिखलाया गया है कि इस
अनिश्चितेति न्यायः प्रदर्शितो प्रकार खूब निश्चित किया हुआ ज्ञान ही
भवतिः मन्ये विदितमिति सफल होता है-अनिश्चित नहीं,क्योकि
'मन्ये विदितम्' इस उक्तिसे परि-
परिनिष्ठितनिश्चितविज्ञानप्रतिज्ञा- निष्ठित निश्चित विज्ञानकी प्रतिज्ञाके
हेतूतः ॥१॥
हेतुकाही प्रतिपादन किया गया है॥१॥
खण्ड २.] शाङ्करभाष्यार्थ (६३ । पद-भाग्य । कथमिति, शृणु- कैसे विदित हुआ है सो सुनिये- अनुभूतिका उल्लेख नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥२॥ मैं न तो यह मानता हूँ कि ब्रह्मको अच्छी तरह जान गया और 'न यही समझता हूँ कि उसे नही जानता । इसलिये मै उसे जानता हूँ 'और नहीं भी जानता । हम शिप्योमेसे जो इस प्रकार [ उसे विदिता- विदितसे अन्य ] जानता है वही जानता है ॥२॥ पद-भाष्य न अहं मन्ये सुवेदेति नैवाह मै अच्छी तरह जानता हूँ- ऐसा नहीं मानता अर्थात् ब्रह्मको मन्ये सुवेद ब्रोति । नैव तर्हि अच्छी तरह जानता हूँ-ऐसा भी मै निश्चयपूर्वक नही मानता । 'तब तो तुझे ब्रह्म विदित ही नही 'विदितं त्वया ब्रह्मत्युक्ते आह हुआ'--ऐसा कहनेपर शिष्य कहता है-'मै नही जानता, सो भी वात नो न वेदेति वेद च । वेद नहीं है, जानता भी हूँ। मूलके 'वेद च' इस पदसमूहके 'च' शब्दसे 'नही चेति चशब्दान्न घेद च। भीजानता' ऐसा अर्थ लेना चाहिये । वाक्य-भाष्य परिनिष्ठितं सफलं विज्ञानं आचार्यका और अपना निश्चय समान ही है-यह दिखलानेके लिये प्रतिजानीत आचार्यात्मनिश्चययोः शिष्य अपने अच्छी प्रकार निश्चित तुल्यतायै यमाद्धेतुमाह नाह किये हुए सफल विज्ञानकी प्रतिज्ञा करता है, क्योकि 'नाह मन्ये सुवेद'- मन्ये सुवेद इति । ऐसा कहकर वह उसका हेतु बतलाता है। * यहाँ 'नाह' ऐसा भी पाठ है, वाक्य-भाष्य इसी पाठके अनुसार है। .
६४ केनोपनिषद् [खण्ड २ पद-भाष्य ननु विप्रतिषिद्धं नाहं मन्ये गुरु-'मै ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ-ऐसा नही मानता' सुवेदेति, नो न वेदेति, वेद च तथा 'मै नही जानता–सो भी बात नहीं है बल्कि जानता ही हूँ' इति । यदि न मन्यसे सुवेदेति, | ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है। यदि त यह नहीं मानता कि 'उसे कथं मन्यसे वेद चेति । अथ अच्छी तरह जानता हूँ तो ऐसा कैसे समझता है कि 'उसे जानता मन्यसे वेदैवेति, कथं न मन्यसे | भी हूं और यदि तू मानता है कि 'मैं जानता ही हूँ' तो ऐसा क्यो नहीं सुवेदेति । एक वस्तु येन ज्ञायते, | मानता कि 'उसे अच्छी तरह जानता हूँ' । संशययुक्त और तेनैव तदेव वस्तु न सुविज्ञायत | विपरीत ज्ञानको छोडकर एक स्तु जिसके द्वारा जानी जाती है इति विप्रतिपिद्धं, संशयविपर्ययो | उसीसे वही वस्तु अच्छी तरह नहीं जानी जाती-ऐसा कहना तो वर्जयित्वा । न च ब्रह्म संशयित- ठीक नही है । और ऐसा भी कोई नियम नहीं बनाया जा सकता कि त्वेन ज्ञेयं विपरीतत्वेन वेति ब्रह्म संशययुक्त अथवा विपरीतरूपसे वाक्य-भाज्य अहेत्यवधारणाओं निपातो 'अह' यह निश्चयार्थक निपात नैव मन्य इत्येतत् । यावद- | है। इसका यह तात्पर्य है कि मै [ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ] ऐसा परिनिष्ठितं विज्ञानं तावत्सुवेद | मानता ही नही । जबतक मुझे सुष्टु वेदाहं ब्रह्म ति विपरीती ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था तबतक ही मुझे 'मै ब्रह्मको अच्छी तरह जानता निश्चय आसीत् । हूँ'-ऐसा विपरीत निश्चय था। आपके द्वारा [उस निश्चयसे] विचलित किये स उपजगाम भवद्भिर्विचालितस्यः । जानेपर अब मेरा यह निश्चय दूर हो गया, मम + खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ६५ पद-भाष्य नियन्तुं शक्यम् । संशयविप- | ही जाननेयोग्य है, क्योकि संशय र्ययौ हि सर्वत्रानर्थकरत्वेनैव | और विपर्यय तो सर्वत्र अनर्थकारी प्रसिद्धौ। रूपसे ही प्रसिद्ध है। एवमाचार्येण विचाल्य आचार्यद्वारा इस प्रकार विचलित मानोऽपि शिष्यो न विचचाल, किये जाने पर भी 'वह विदितसे अन्य ही है और अविदितसे भी 'अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- ऊपर है' इस आचार्यके कहे हुए दितादधि' इत्याचार्योक्तागम- | शास्त्रसम्प्रदायके बलसे तथा उपपत्ति और अपने अनुभवके बलसे शिप्य सम्प्रदायवलात् उपपत्त्यनुभव- विचलित न हुआ; बल्कि वह ब्रह्म- वलाच; जगर्ज च ब्रह्मविद्यायां विद्यामे अपनी दृढनिश्चयता दिखलाते दृढनिश्चयतां दर्शयन्नात्मनः । हुए गर्जने लगा। किस प्रकार वाक्य-भाप्य यथोक्तार्थमीमांसाफलभूतात् क्योकि वह पूर्वोक्त अर्थकी मीमांसा खात्मब्रह्मत्वनिश्चयरूपात्सम्यक्- (विचार) के फलस्वरूप अपने आत्मा- के ब्रह्मत्वनिश्चयरूप सम्यक् प्रत्ययके प्रत्ययाद्विरुद्धत्वात् । अतो नाह विरुद्ध है। अतः 'मै अच्छी तरह मन्ये सु वेदेति । जानता हूँ ऐसा तो मानता ही नहीं। यस्माचैतन्नैवन वेदनोन वेदेति तथा, उस ब्रह्मको मै नहीं जानता-ऐसा भी नहीं मानता मन्य इत्यनुवर्तते; अविदित- | क्योकि अविदित ब्रह्मका प्रतिषेध किया गया है। यहॉ'नो न वेदेति' इस ब्रह्मप्रतिषेधात् । कथं तर्हि | वाक्यके आगे 'मन्ये' इस क्रिया-पदकी अनुवृत्ति होती है। फिर यह पूछनेपर कि 'तुम किस प्रकार मानते हो १ मन्यसे इत्युक्त आह-वेद च । शिष्य बोला-'वेद च । यहाँ'च' शब्दसे' 'वेद च न वेद च' अर्थात् चशब्दावेदच न वेदचेत्यभिप्रायः | जानता भी हूँ और नहीं भी जानता;
केनोपनिषद् [खण्ड २ पद-भाष्य कथमित्युच्यते-यो यः कश्चिद् | गर्जने लगा, सो बतलाते है- नः असाकं सब्रह्मचारिणां मध्ये ब्रह्मचारियोके सहित 'हम शिष्योंमे जो-जो मेरे कहे हुए उस वचनको तन्मदुक्तं वचनं तत्त्वतो वेद, तत्त्वतः जानता है-वही उस स तद्ब्रह्म वेद । ब्रह्मको जानता है। किंपुनस्तद्वचनमित्यत आह अच्छा तो वह वचन है क्या? ऐसा प्रश्न करनेपर [शिष्य] कहता नो न वेदेति वेद च इति । है-'मै नही जानता--ऐसा भी यदेव 'अन्यदेव तद्विदितादथो नहीं है, जानता भी हूँ।' जो बात [ आचार्यने ] 'वह विदितसे अन्य अविदितादधि' इत्युक्तम्, तदेव | ही है और अविदितसे भी ऊपर है' इस वाक्यद्वारा कही थी उसी वस्तु- वस्तु अनुमानानुभवाभ्यां को अपने अनुमान और अनुभवसे वाक्य-भाष्य विदिताविदिताभ्यामन्यत्वाब्रह्मणः ऐसा अभिप्राय है । क्योकि ब्रह्म विदित और अविदित—दोनोसे ही भिन्न है। तस्मान्मया विदितं ब्रह्मति मन्य अतः'ब्रह्म मुझे विदित है-यह मानता इति वाक्यार्थः। हूँ'--यही इस वाक्यका अर्थ है । अथवा वेद चेति नित्यविज्ञान अथवा 'वेद च' इसका यह अभिप्राय है कि मैं नित्यविज्ञान-ब्रह्म- ब्रह्मखरूपतया नो न वेद वेदैव स्वरूप होनेके कारण 'नही जानता' चाहं स्वरूपविक्रियाभावात् । -ऐसी बात नही है बल्कि जानता ही हूँ, क्योकि अपने स्वरूपमे कोई विशेषविज्ञानं च पराध्यस्तं न विकार नही है । तथा विशेष विज्ञान भी दूसरोका आरोपित किया हुआ ही खत इति परमार्थतो न च है स्वरूपसे नहीं है इसलिये वेदेति । परमार्थतः नही भी जानता।
शाङ्करभाष्यार्थ खण्ड २] ६७ पद-भाष्य संयोज्य निश्चितं वाक्यान्तरेण | मिलाकर निश्चित करके आचार्यकी बुद्धिको सम्यक् प्रकारसे बतलाने नो न वेदेति वेद च इत्यवोचत् और मन्दबुद्धियोकी बुद्धिकी पहुँचसे बचानेके लिये एक दूसरे वाक्यसे आचार्यबुद्धिसंवादार्थ मन्दबुद्धि- 'मैं नहीं जानता—ऐसा भी नहीं है जानता भी हूँ' ऐसा कहा है। ऐसा ग्रहणव्यपोहार्थ च । तथा च होनेपर ही 'हममेसेजो इस [वाक्यके गर्जितमुपपन्नं भवति 'यो नस्त- मर्म ] को जानता है वही जानता है' यह गर्जना उचित हो सकती द्वेद तद्वेद' इति ॥२॥ है ॥२॥ वाक्य-भाष्य योनस्तद्वेद तद्वेदेति पक्षान्तर- 'यो नस्तद्वेद तद्वेद' यह आगम उपर्युक्त अर्थका अनुवाद होनेके निरासार्थमानाय उक्तार्थानु- कारण इससे अन्य पक्षोका निषेध करनेके लिये है । हममेसे जो वादात् । यो नोऽस्माकं मध्ये स उस ब्रह्मको इस प्रकार विदित- अविदितसे भिन्न जानता है वही जानता एव तद्ब्रह्म वेद नान्यः। उपास्य- है, और कोई नहीं; क्योकि जैसा ब्रह्मवित्त्वादतोऽन्यस्य यथा मै जानता हूँ उससे अन्य प्रकार जानने- वाला तो उपास्य अर्थात् कार्यब्रह्मको ही वेदेति । वेद चेति पक्षान्तरे ब्रह्म- | जाननेवाला है। 'वेद च' इस पदसे अन्य पक्षवालेमे ब्रह्मविश्वका निरास वित्त्वं निरस्यते । कुतोऽयमर्थोऽ- किया जाता है। किस कारण यह निष्कर्ष निकाला जाता है ? सो बतलाते वसीयत इत्युच्यते । उक्तानुवा- है। ऊपर कहे हुए अर्थका अनुवाद दादुक्तं ह्यनुवदति नो न वेदेति | करनेके कारण; क्योकि यहाँ 'नो न वेदेति वेद च' इस वाक्यसे पूर्वोक्तका वेद चेति ॥२॥ ही अनुवाद करते है ॥२॥ . 0000 ६८ केनोपनिपद् [खण्ड २ पह-भाप्य शिष्याचार्यसंवादात्प्रतिनिवृत्य अव शिप्य और आचार्यके स्वेन रूपेण श्रुतिः समस्तसंवाद- संवादसे निवृत्त होकर श्रुति समस्त संवादसे सम्पन्न होनेवाले अर्थको निवृत्तमर्थमेव बोधयति-यस्या- ही 'यस्यामतम्' इत्यादि अपने ही मतमित्यादिना- रूपसे बतलाती है- ज्ञाता अज्ञ है और अज्ञ ज्ञानी है यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥ ब्रह्म जिसको ज्ञात नही है उसीको ज्ञात है और जिसको ज्ञात है वह उसे नहीं जानता; क्योकि वह जाननेवालोका विना जाना हुआ है ओर न जाननेवालोका जाना हुआ है [क्योकि अन्य वस्तुओके समान दृश्य न होनेरो वह विपयरूपसे नहीं जाना जा सकता] ॥३॥ पद-भाष्य ब्रह्म यस्य ब्रह्मविदः अमतम् जिस ब्रह्मवेत्ताका ऐसा मत- अविज्ञातम् अविदितं अभिप्राय अर्थात् निश्चय है कि ब्रहोति अमत-अविज्ञात यानी मतम् अभिप्रायः निश्चयः, तस्य अविदित है उसे ब्रह्म ठीक-ठीक मतं ज्ञातं सम्यग्ब्रह्मत्यभिप्रायः। मत अर्थात् ज्ञात हो गया है---ऐसा इसका तात्पर्य है। और जिसे 'मुझे यस्य पुनः मतं ज्ञातं विदितं ब्रह्म मत-ज्ञात अर्थात् विदित हो वाक्य-भाष्य यस्यामतम् इति श्रौतम् 'यस्यामतम्' इत्यादि श्रुति-वचन आख्यायिकार्थोपसंहारार्थम् इस आख्यायिकाका उपसंहार करने के लिये है। शिष्य और आचार्यकी शिण्याचार्योक्तिप्रत्युक्तिलक्षणया उक्ति-प्रत्युक्ति ही जिसका लक्षण है अनुभवयुक्तिप्रधानया आख्यायि- ऐसी इस अनुभव और युक्तिप्रधान कया योऽर्थः सिद्धः स श्रौतेन | आख्यायिकासे जो अर्थ सिद्ध हुआ है खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ६२ पद-भाष्य मया ब्रह्मोति निश्चयः, न वेदैव | गया है'—ऐसा निश्चय है वह जानता ही नहीं-उसे ब्रह्मका सा-न ब्रह्म विजानाति सः। ज्ञान नहीं है। विद्वदविदुषोर्यथोक्तौ पक्षौ अब 'अविज्ञातं विजानताम्' ऐसा कहकर विद्वान् और अविद्वान्- अवधारयति -अविज्ञातं विजान- के उपर्युक्त पक्षोका अवधारण तामिति, अविज्ञातम् अमतम् (निश्चय ) करते है--जाननेवालो अर्थात् भली प्रकार समझनेवालो. अविदितमेव ब्रह्म विजानता को वह ब्रह्म अविज्ञात-अमत सम्यग्विदितवतामित्येतत् ।। यानी.अविदित ( अज्ञेय) ही है; वाक्य-भाष्य वचनेनागमप्रधानेन निगमन वह सवका उपसंहार करनेवाले इस शास्त्रप्रधान श्रौतवचनसे सक्षेपमे कहा स्थानीयेन संक्षेपत उच्यते। यदुक्तं | जाता है । जिसे वागादि इन्द्रियोका अविषय होनेके कारण जाने हुए विदितादन्यद्वागादीनामगोचर- पदार्थोंसे भिन्न बतलाया था तथा त्वात् मीमांसितं चानुभवोप- | अनुभव और उपपत्तिसे भी जिसकी मीमांसा की थी उस ब्रह्मको वैसा ही पत्तिभ्यां ब्रह्म तत्तथैव ज्ञातव्यम् । जानना चाहिये। कस्मात् ? यस्यामतं यस्य किस कारणसे ? [ सो बतलाते विविदिषाप्रयुक्तप्रवृत्तस्य साधकस्य है- जिज्ञासासे प्रेरित होकर प्रवृत्त अमतमविज्ञातमविदितं ब्रह्म | हुए जिस साधकको ब्रह्म अविज्ञात- इत्यात्मतत्त्वनिश्चयफलावसानाव- अविदित है अर्थात् आत्मतत्त्वनिश्चय- बोधतया विविदिषा निवृत्ता रूप फलमे पर्यवसित होनेवाले ज्ञानरूप- से जिसकी जिज्ञासा निवृत्त हो गयी इत्यभिप्रायः; तस्य मतं ज्ञातं तेन | है उसीको वह विदित-ज्ञात है । विदितं ब्रह्म। येनाविषयत्वेन | तात्पर्य यह कि जिसने ब्रह्मको - केनोपनिषद् [खण्ड २ पद-भाष्य विज्ञातं विदितं ब्रह्म अविजान- | तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय, मन और ताम् असम्यग्दर्शिनाम्, इन्द्रिय- | बुद्धि आदिमे आत्मभाव करनेवाले असम्यग्दर्शी अज्ञानियोंके लिये ब्रह्म मनोवुद्धिष्वेवात्मदर्शिनामित्यर्थः; विज्ञात यानी विदित (ज्ञेय) ही है।* वाक्य-भाप्य आत्मत्वेन प्रतिवुद्धमित्यर्थः। स | अविपयरूपसे आत्मभावसे जाना है सम्यग्दर्शी यस्य विज्ञानानन्त- | उसीने उसे जाना है । जिसे विज्ञानकी प्राप्तिके अनन्तर ही सब ओर ब्रह्मात्म- रमेव ब्रह्मात्मभावस्यावसितत्वात् भावकी प्राप्ति हो जानेके कारण सर्वतः कार्याभावो विपर्ययेण | कर्तव्यका अभाव हो जाता है वही सम्यग्दर्शी है । इससे विपरीत समझने- मिथ्याज्ञानोभवति । कथम् ? मतं वाला मिथ्या ज्ञानी होता है। कैसे ? [सो कहते है-] जिसका ऐसा विदितं ज्ञातं मया ब्रह्मति यस्य विज्ञान है कि ब्रह्म मुझे विदित-जात विज्ञानं स मिथ्यादी विपरीत- | अर्थात् मालूम है वह विपरीत विज्ञानो विदितादन्यत्वाब्रह्मणो विज्ञानवान् मिथ्यादी है, क्योकि ब्रह्म विदितसे भिन्न है। इसलिये वह न वेद स न विजानाति । ब्रह्मको नहीं जानता नहीं समझता । ततश्च सिद्धमवैदिकस्य विज्ञा इन कारणोंसे अवैदिक विज्ञानका नस्य मिथ्यात्वम् , अब्रह्मविपय- | मिथ्यात्व सिद्ध हुआ, क्योंकि वह ब्रह्म- तया निन्दितत्वात्तथा कपिल- | विषयक न होनेसे, निन्दित है । कणभुगादिसमयस्यापि विदित- | यही नही, कपिल और कणाद ब्रह्मविषयत्वादनवस्थिततर्कजन्य- आदिके सिद्धान्त भी ज्ञातब्रह्मविषयक, त्वाद्विविदिपानिवृत्तेश्च मिथ्या- अनवस्थिततर्कजनित और जिज्ञासाकी त्वमिति । स्मृतेश्च "या वेद- | निवृत्ति न करनेवाले होनेसे मिथ्या ही बाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च | है । "जो वेदबाह्य स्मृतियाँ हैं तथा * इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि जिन्हे ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ बोध हो गया है वे तो उसे मन-बुद्धि आदिसे अग्राह्य होनेके कारण अशात यानी अशय ही मानते है । और जो अशानी है वे मन-बुद्धि आदिको ही आत्मा समझनेके कारण ब्रह्मका उनके साथ अमेद समझकर यह मानने लगते है कि हमने उसे जान लिया है।
खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य न त्वत्यन्तमवाव्युत्पन्नबुद्धी- | हाँ, जिनकी बुद्धि अत्यन्त अव्युत्पन्न (अकुशल ) है उनके लिये ऐसी, नाम् । न हि तेषां विज्ञातम् बात नहीं है, क्योकि उन्हें तो असाभिर्ब्रह्मोति मतिर्भवति । | 'हमने ब्रह्मको जान लिया है। ऐसी बुद्धि ही नही होती । किन्तु जो इन्द्रियमनोवुद्धयु पाधिष्वात्म लोग इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि दर्शिनां तु ब्रह्मोपाधिविवेकानु- उपाधियोमे आत्मभाव करनेवाले है उन्हे तो, ब्रह्म और उपाधिके पलम्भात वुद्धयाधुपाधेश्च पार्थक्यका ज्ञान न होने तथा बुद्धि वाक्य-भाष्य कुदृष्टयः । सर्वास्ता निप्फलाः | और भी जो कोई कुविचार है वे प्रोक्तास्तमोनिष्ठा हि ताः | सभी निष्फल कहे गये है और सब-के-, स्मृताः " (मनु० १२ । ९५) | सब अज्ञाननिष्ठ ही माने गये है" इस इति विपरीतमिथ्याज्ञानयो- | स्मृतिवाक्यसे भी विपरीत ज्ञान और नष्टत्वादिति। मिथ्याज्ञानको नष्ट बतलाया गया है । अविज्ञातं विजानतां विज्ञात 'अविज्ञात विजानतां विज्ञातम- विजानताम्' यह मन्त्रके पूर्वार्धमे कहे मविजानतामिति पूर्वहेतूक्तिरनु हुए अर्थका हेतु-कथन है, क्योकि वादस्यानर्थक्यात् । अनुवाद- उसीका अनुवाद करना तो व्यर्थ होगा । अनुवादमात्रके लिये कोई बात मात्रेऽनर्थक वचनमिति पूर्वो- | कहना कुछ अर्थ नहीं रखता, इसलिये तयोर्यस्यामतमित्यादिना ज्ञाना- 'यस्यामतम्' इत्यादि पूर्व पदसे कहे हुए जान और अज्ञानके हेतुरूपसे ही शानयोर्हेत्वर्थत्वेनेदमुच्यते । यह कहा गया है। अविज्ञातमविदितमात्मत्वेन क्योकि विज्ञानियोको ब्रह्म आत्म- अविपयतयाब्रह्मा विजानतां यस्मात् स्वरूप होनेके कारण इन्द्रियोका विपय न होनेसे अविज्ञात-अविदित है, तस्मात्तदेवज्ञानम् । यत्तेपां विज्ञातं इसलिये वही ज्ञान है। और जो विदितं व्यक्तमेव बुद्धयादिविपयं| अज्ञानी है, जो ऐसा नहीं जानते कि " केनोपनिषद् [खण्ड २ पद-भाष्य , विज्ञातत्वाद् विदितं ब्रह्मेत्युप- ] आदि उपाधिके ज्ञातरूप होनेसे 'ब्रह्म विदित है' ऐसी भ्रान्ति होनी पद्यते भ्रान्तिरित्यतोऽसम्य- उचित ही है। अतः यहाँ 'विज्ञात- ग्दर्शनं पूर्वपक्षत्वेनोपन्यस्यते- | मविजानताम् इस वाक्यद्वारा विज्ञातमविजानतामिति । अथवा असम्यग्दर्शनका पूर्वपक्षरूपसे उल्लेख किया गया है। अथवा 'अविज्ञातं हेत्वर्थ उत्तरार्धोऽविज्ञात- विजानताम्' इत्यादि जो मन्त्रका मित्यादिः ॥३॥ उत्तरार्द्ध है वह* हेतु-अर्थमे है ॥३॥ वाक्य-भाज्य ब्रह्माविजानतां विदिताविदित- | ज्ञात ओर अज्ञात पदार्थोसे रहित, अपना आत्मा, नित्यविज्ञानस्वरूप, व्यावृत्तमात्मभूतं नित्यविज्ञान- आत्मस्थ, अविक्रिय, अमृत, अजर, खरूपमात्मस्थमविक्रियममृतमज- अभय और अनन्यरूप होनेके कारण ब्रह्म किसी इन्द्रियका विपय नही है- रमभयमनन्यत्वादविषयमित्येवम् उन्हीको ब्रह्म विज्ञात-विदित-व्यक्त अविजानतां बुद्धयादिविषया- | अर्थात् बुद्धि आदिके विषयरूपसे हो प्रतीत होता है, उन्हे सर्वदाबुद्धि आदि- स्मतयैव नित्यं विज्ञातं ब्रह्म । के विषयरूपसे ही ब्रह्मका ज्ञान है । अतः तस्माद्विदिताविदितव्यक्ताव्यक्त विदित-अविदित अथवा व्यक्त-अव्यक्त आदि धर्मोंके आरोपसे [उनका जाना धर्माध्यारोपण कार्यकारणभावेन हुआ ब्रह्म] कार्य-कारणभाव रहनेसे सविकल्पमयथार्थविषयत्वात् । सविकल्प ही है क्योकि वह अयथार्थ- विषयक है । उनका वह ज्ञान शुक्ति शुक्तिकादौ रजताद्यध्यारोपण- आदिमे आरोपित रजत आदि ज्ञानोके ज्ञानवन्मिथ्याज्ञानं तेषाम् ॥३॥ समान मिथ्या ही है ॥३॥ * हेतु यों समझना चाहिये--ब्रह्म अशानियोंको इसलिये शात है, क्योंकि विज्ञानियोंको वह अज्ञात है।
खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ७३ जाना - पद-भाग्य 'अविज्ञातं विजानताम्' 'ब्रह्म जाननेवालोको अविज्ञात है। ऐसा निश्चय हुआ । इस प्रकार इत्यवधृतम् । यदि ब्रह्मात्यन्तम् | यदि ब्रह्म अत्यन्त अविज्ञात ही है एवाविज्ञातम्, लौकिकानां ब्रह्म- तो लौकिक पुरुप और ब्रह्मवेत्ताओमे कोई भेद नहीं रह जाता; इसके विदां चाविशेषः प्राप्तः । 'अवि- सिवा 'जाननेवालोको अविज्ञात है' ज्ञातं विजानताम्' इति च यह कथन परस्पर विरुद्ध भी है। फिर वह ब्रह्म सम्यक् प्रकारसे कैसे परस्परविरुद्धम् । कथं तु तद्ब्रह्म जाता है-यही बात सम्यग्विदितं भवतीत्येवमर्थमाह- बतलानेके लिये कहते है- विज्ञानावभासों में ब्रह्मकी अनुभूति प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्य विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४॥ जो प्रत्येक बोध (बौद्ध प्रतीति) मे प्रत्यगात्मरूपसे जाना गया है वही ब्रह्म है—यही उसका ज्ञान है, क्योकि उस ब्रह्मज्ञानसे अमृतत्व- की प्राप्ति होती है। अमृतत्व अपनेहीसे प्राप्त होता है, विद्यासे तो अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका सामर्थ्य मिलता है ।। ४ ॥ पद-भाप्य प्रतिबोधविदितं वोधं वोधं | 'प्रतिबोधविदितम्' यानी जो वोध-बोधके प्रति विदित होता प्रति विदितम् । बोधशब्देन बौद्धा- है । यहाँ 'बोध' शब्दसे बुद्धिसे होनेवाली प्रतीतियो (ज्ञानों) का प्रत्यया उच्यन्ते । सर्वे प्रत्यया कथन हुआ है । अतः समस्त वाक्य-भाग्य प्रतियोधविदितं मतम् इति 'प्रतिबोधविदितम्' यह द्विरुक्ति है, वीप्सा प्रत्ययानामात्मावबोध- क्योकि प्रतीतियाँ ही आत्मज्ञानकी द्वारत्वात् । वो, प्रति । द्वार है । 'बोध प्रति बोधं प्रति' (बोध- , ।
केनोपनिषद् [खण्ड २ पद-भाष्य विषयीभवन्ति यस्य स आत्मा सर्व- | प्रतीतियाँ जिसकी विषय होती है बोधान्प्रति बुध्यते । सर्वप्रत्यय- वह आत्मा समस्त बोधोंके समय जाना जाता है । सम्पूर्ण प्रतीतियों- दर्शी चिच्छक्तिस्वरूपमात्रः का साक्षी और चिच्छक्तिखरूपमात्र प्रत्ययैरेव प्रत्ययेष्वविशिष्टतया होनेके कारण वह प्रतीतियोंद्वारा सामान्यरूपसे प्रतीतियोंमे ही लक्षित लक्ष्यते नान्यद्वारमन्तरात्मनो होता है । उस अन्तरात्माका ज्ञान विज्ञानाय । प्राप्त करनेके लिये कोई और मार्ग नहीं है। अतः प्रत्ययप्रत्यगात्मतया अतः जिस समय ब्रह्मको प्रतीतियोंके अन्तःसाक्षीखरूपसे प्रत्ययसाक्षितया विदितं ब्रह्म यदा, ब्रह्मणोऽमेद- जाता है उसी समय तदा तन्मतं तत्- प्रतिपादनम् वह ज्ञात होता है, अर्थात् यही सम्यग्दर्शनमित्यर्थः उसका सम्यक् ज्ञान है । सम्पूर्ण सर्वप्रत्ययदर्शित्वे चोपजनना- प्रतीतियोका साक्षी होनेपर ही जाना वाक्य-भान्य उस बोधं प्रतीति वीप्सा सर्वप्रत्यय- | बोधके प्रति) यह द्विरुक्ति सम्पूर्ण प्रतीतियोमे [ब्रह्मकी] व्याप्ति सूचित व्याप्त्यर्था । बौद्धा हि सर्वे प्रत्ययाः| करने के लिये है। बुद्धिजनित सम्पूर्ण प्रतीतियाँ तपे हुए लोहेके समान नित्य तप्तलोहवन्नित्यविज्ञानवरूपात्म- विज्ञानस्वरूप आत्मासे व्याप्त रहनेके विज्ञानस्वरूपसे ही व्याप्तत्वाद् विज्ञानखरूपावभासाः, कारण अवभासित है तथा उनसे पृथक् उनका तदन्यावभासश्चात्मा तद्वि- अवभासक आत्मा [लोहपिण्डमें व्याप्त हुए] अनिके समान उनसे सर्वथा लक्षणोऽग्निवदुपलभ्यत इति तेन विलक्षण उपलब्ध होता है। अतः वे ते द्वारीभवन्त्यात्मोपलब्धौ । बौद्ध प्रत्यय आत्माकी उपलब्धिमे द्वारस्वरूप है। इसलिये प्रत्येक बौद्ध तस्मात्प्रतिबोधावभासप्रत्यगात्म- प्रत्ययके अवभासमे जो प्रत्यगात्म- खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य पायवर्जितहक्स्वरूपता नित्यत्वं | उसका वृद्धिक्षयशून्य साक्षित्व, नित्यत्व, विशुद्धखरूपत्व, आत्मत्व, विशुद्धस्वरूपत्वमात्मत्वं निर्वि- निर्विशेषत्व और सम्पूर्ण भूतोमे शेषतैकत्वं च सर्वभूतेषु सिद्धं [अनुस्यूत ] एकत्व सिद्ध हो सकता है, जिस प्रकार कि लक्षणोमे भेद न भवेत् : लक्षणभेदाभावाद्वयोम्न होनेके कारण घट, पर्वत और गुहादि- में आकाशका अभेद है । इस प्रकार -इव घटगिरिगुहादिषु । विदिता- 'ब्रह्म विदित और अविदित- विदिताभ्यामन्यद्रोत्यागम- दोनोहीसे भिन्न है' इस शास्त्रवचनके अर्थका ही भली प्रकार शोधन करके वाक्यार्थ एवं परिशुद्ध एवोपसंहृतो यहाँ उपसंहार किया गया है । इसके सिवा "वह दृष्टिका द्रष्टा है, श्रवण- भवति । "दृष्टेष्टा श्रुतेः श्रोता का श्रोता है, मतिका मनन करने- मतेमन्ता विज्ञातेर्विज्ञाता" इति वाला है और विज्ञातिका विज्ञाता है" ऐसी एक दूसरी श्रुति भी है । हि श्रुत्यन्तरम् । i [उससे भी यही सिद्ध होता है । वाक्य-भाप्य 1 तया यद्विदितं तब्रह्म तदेव मतं | स्वरूपसे जाना जाता है वहीं ब्रह्म है, ज्ञातं तदेव सम्यग्ज्ञानवत्प्रत्यगा- वहीं माना हुआ अर्थात् ज्ञात है तथा वहीं सम्यग्जानके सहित प्रत्यगात्माका त्मविज्ञानम्, न विषयविज्ञानम् । ज्ञान है विषयज्ञान सम्यग्जान नही है। आत्मत्वेन प्रत्यगात्मानमैक्ष 'प्रत्यगात्माको आत्मस्वरूपसे देखा' दिति च काठके । काठके ।। ऐसा कठोपनिपो कहा है। 'अमृतत्वं आत्मशानं हि विन्दते' (आत्मज्ञानसे अमरत्व 'अमृतत्वं हि विन्दते' अमृतत्व. ही प्राप्त होता है) यह हेतुसूचक वाक्य निमित्तम् इति हेतुवचनम् विपर्यये है, क्योकि इससे विपरीत ज्ञानसे मृत्युप्राप्तेः । विपया- । मृत्युकी प्राप्ति होती है । बुद्धि आदि त्मविज्ञाने हि मृत्युः प्रारभत ! विप्रयोमे आत्मत्व बोध होनेसे ही ७६ केनोपनिषद् [खण्ड २ पद-भाष्य यदा पुनर्योधक्रियाकर्तेतिबोध जिस प्रकार, जो वृक्षकी शाखाओंको चलायमान करता है क्रियालक्षणेन तत्कर्तारं विजाना- उसे वायु कहते है उसी प्रकार- जिस समय 'प्रतिबोधविदितम्' तीति,बोधलक्षणेन विदितं प्रति- इसका ऐसा अर्थ किया जाता है कि बोधविदितमिति व्याख्यायते, आत्मा बोधक्रियाका कर्ता है; अतः बोधक्रियारूप लिङ्गसे उसके यथा यो वृक्षशाखाश्चालयति स कर्ताको जानता है, इसलिये बोधरूप- से विदित होनेके कारण वह वायुरिति तद्वतः तदा बोधक्रिया- 'प्रतिबोधविदितम्' कहलाता है उस समय-आत्मा बोधक्रियारूप शक्तिमानात्मा द्रव्यम्, न वोध- शक्तिसे युक्त एक द्रव्य सिद्ध होता है, साक्षात् बोधखरूप ही सिद्ध नही स्वरूप एव । बोधस्तु जायते | होता । बोध (बुद्धिगत प्रतीति ) तो उत्पन्न होता है और नष्ट भी विनश्यति च । यदा बोधो | तो उत्पन्न होता है हो जाता है। अतः जिस समय जायते, तदा बोधक्रियया स- बोध उत्पन्न होता है उस समय तो वाक्य-भाव्य इत्यात्मविज्ञानममृतत्वनिमित्तम् । मृत्युका आरम्भ होता है, अतः इति युक्तं हेतुवचनममृतत्वं हि | आत्मविज्ञान अमरत्वका हेतु है, इसलिये 'अमृतत्वं हि विन्दते' यह विन्दत इति। हेतुवचन ठीक ही है । आत्मज्ञानेन किममृतत्वमु पूर्व०-क्या आत्मज्ञानसे अमरत्व त्पाद्यते? उत्पन्न किया जाता है? सिद्धान्ती-नही। कथं तर्हि ? पूर्व०-तब कैसे? सिद्धान्ती-अमरत्व तो आत्मासे- आत्मना विन्दते स्वेनैव नि- अपने नित्यात्मस्वभावसे ही प्राप्त करते त्यात्मस्वभावेनामृतत्वं विन्दते। है, किसीके आश्रयसे नही। 'विन्दते' नालम्बनपूर्वकम् । विन्दत इति इससे यह समझना चाहिये कि उसकी .
खण्ड.२] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य विशेषः। यदाबोधो नश्यति, तदा| वह बोधक्रियारूप विशेषणसे युक्त होता है और जब उसका नाश हो नष्टबोधो द्रव्यमानं निर्विशेषः । जाता है तो वह निर्विशेप द्रव्यमात्र तत्रैवं सति विक्रियात्मकः साव- रह जाता है। ऐसा माननेसे तो यवोनित्योऽशुद्ध इत्यादयो दोषा वह विकारी, सावयव, अनित्य और अशुद्ध निश्चित होता है, और उसके न परिहतुं शक्यन्ते । इन दोपोका किसी प्रकार परिहार नही किया जा सकता। यदपि काणादानाम् आत्म- तथा वैशेषिक मतावलम्बियोका कणादमत- मनः संयोगजो बोध जो मत है कि 'आत्मा और मनके संयोगसे उत्पन्न होनेवाला बोध समीक्षा आत्मनि समवैति अत आत्मामे समवाय-सम्बन्धसे रहता आत्मनि बोद्धृत्वम्, न तु है, इसीसे आत्मामे बोद्धृत्व है, विक्रियात्मक आत्मा; द्रव्य- | वस्तुतः आत्मा विकारी नहीं है, मात्रस्तु भवति घट इव रागसम- | वह तो नीलपीतादि वर्णोके समवायी घटके समान केवल द्रव्यमात्र है' वायी; असिन् पक्षेऽप्यचेतनं -सो इस पक्षमे भी ब्रह्म अचेतन द्रव्यमानं ब्रोति "विज्ञान- द्रव्यमात्र सिद्ध होता है और "ब्रह्म मानन्दंब्रह्म" (बृ०उ०३।९।२८)| विज्ञान एवं आनन्दखरूप है" वाक्य-भाष्य आत्मविज्ञानापेक्षम् । यदि हि । प्राप्ति आत्मविज्ञानकी अपेक्षा रखने- विद्योत्पाद्यममृतत्वं स्यादनित्यं वाली है। यदि अमृतत्व विद्यासे उत्पन्न भवेत्कर्मकार्यवत् । अतो न किया जाने योग्य होता तो कर्मफलके समान अनित्य हो जाता। इसलिये वह विद्योत्पाद्यम् । विद्यासे उत्पाद्य नहीं है। यदि चात्मनैवामृतत्वं विन्दते। यदि कहो कि जब अमृतत्व स्वतः ही मिल जाता है तो विद्या उसमे क्या किं पुनर्विद्यया क्रियत इत्युच्यते। | करती है, तो इसमें हमे यह कहना है केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य "प्रज्ञानं ब्रह्म" (ऐ० उ०५।३)। "प्रज्ञान ब्रह्म है" इत्यादि श्रुतियाँ इत्याद्याः श्रुतयो बाधिताः स्युः। बाधित हो जाती है। निरवयव होने के आत्मनो निरवयवत्वेन प्रदेशा- है; और उससे मनका नित्यसंयोग है; कारण आत्मामे कोई देशविशेप नही भावात् नित्यसंयुक्तत्वाच्च मनस: इस कारण उसमे स्मृतिकी उत्पत्तिके स्मृत्युत्पत्तिनियमानुपपत्तिरपरि- नियमकी अनुपपत्ति अनिवार्य हो हार्या स्यात् । संसर्गधर्मित्वं जाती है तथा श्रुति, स्मृति और युक्तिसे विरुद्ध आत्माके संसर्गधर्मी चात्मनः श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धं होनेकी कल्पना भी होती है। "असङ्ग कल्पितं स्यात् । “असङ्गो न हि [आत्मा] का किसीसे संग नही सञ्जते" (वृ० उ०३।९।२६) | होता” “संगरहित और सबका पालन "असक्तं सर्वभृत्" (गीता १३। करनेवाला है" ऐसी श्रुति और स्मृति प्रसिद्ध है । युक्तिसे भी जो वस्तु १४) इति हि श्रुतिस्मृती । सगुण होती है उसीका गुणवान्से न्यायश्च-गुणवद्गुणवता सं- संसर्ग होता है; विजातीय वस्तुओ- सृज्यते नातुल्यजातीयम् । अतः | का संयोग कभी नहीं होता । अतः निर्गुणं निर्विशेषं सर्वविलक्षणं केन- निर्गुण निर्विशेप और सबसे विलक्षण आत्माका किसी भी विजातीय चिदप्यतुल्यजातीयेन संसृज्यत वस्तुसे संयोग होता -ऐसा इत्येतत् न्यायविरुद्धं भवेत् । मानना न्यायविरुद्ध होगा। अतः तसात् नित्यालप्तज्ञानस्वरूप- | नित्य अविनाशी ज्ञानस्वरूप प्रकाश- वाक्य-भाष्य अनात्मविज्ञानं निवर्तयन्ती सा | कि वह अनात्मविज्ञानको निवृत्त करती हुई उसकी निवृत्तिके द्वारा तन्निवृत्त्या खाभाविकस्यामृत- स्वाभाविक अमृतत्वकी हेतु बनती है, त्वस्य निमित्तमिति कल्प्यते । क्योकि [अगले वाक्यसे] 'विद्यासे [अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका] यत आह 'वीर्य विद्यया विन्दते। । सामर्थ्य प्राप्त होता है ऐसा कहा भी है।
खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य ब्रहाणः खपर- ज्योतिरात्मा ब्रह्मत्ययमर्थः सर्व- | मय आत्मा ही ब्रह्म है-यह अर्थ ' बोधबोद्धृत्वे आत्मनः सिध्यति, आत्माके सम्पूर्ण बोधोंके बोद्धा होनेपर ही सिद्ध हो सकता है, नान्यथा । तसात् 'प्रतिबोध- और किसी प्रकार नही । इसलिये विदितं मतम्' इति यथा- 'प्रतिबोधविदितम्' इसका- हमने जैसी व्याख्यात एवार्थोऽमाभिः । व्याख्या की है-वही अर्थ है। यत्पुनः स्वसंवेद्यताप्रतिबोध- इसके सिवा 'प्रतिवोधविदितम्' विदितमित्यस्य वाक्य- इस वाक्यका-जो स्वप्रकाशता अर्थ सवेद्यताया स्यार्थो वर्ण्यते, तत्र बतलाया जाता है वहाँ आत्माको औपाधिकत्वम् सोपाधिक मानकर उसमे बुद्धि भवति सोपाधिकत्वे आदि उपाधिके रूपसे भेदकी आत्मनो बुद्धयुपाधिस्वरूपत्वेन | कल्पना कर 'आत्मासे आत्माको भेदंपरिकल्प्यात्मनात्मानं वेत्तीति जानता है' ऐसा व्यवहार हुआ संव्यवहारः--"आत्मन्येवात्मानं करता है, जैसा कि "आत्मामे ही आत्माको देखता है" "हे पुरुपोत्तम ! पश्यति"(बृ० उ०४।४।२३) तुम स्वयं अपनेसे ही अपनेको "स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं जानते हो" इत्यादि वाक्योद्वारा कहा पुरुषोत्तम" (गीता १०।१५) | गया है। किन्तु निरुपाधिक आत्मा इति । न तु निरुपाधिकस्यात्मन | तो एक रूप होनेके कारण उसमे एकत्वे वसंवेद्यता परसंवेद्यता स्वसंवेद्यता अथवा परसंवेद्यता वा सम्भवति । संवेदनखरूप- सम्भव ही नहीं है । जिस प्रकार वाक्य-भाष्य वीर्य सामर्थ्यमनात्माध्यारोप विद्यासे वीर्य-सामर्थ्य यानी अनात्माके अध्यारोप तथा माया और मायाखान्तध्वान्तानभिभाव्य- अन्तःकरणके कारण प्राप्त हुए अज्ञानसे लक्षणं बलं विद्यया विन्दते । तच्च जिसका पराभव नही हो सकता ऐसा बल प्राप्त होता है। वह किस विशेषणसे किंविशिष्टम् ? अमृतमविनाशि ।। युक्त है ? वह अमृत यानी अविनाशी है ।
८० केनोपनिषद् [खण्ड:२ पद-भाष्य त्वात्संवेदनान्तरापेक्षा च न प्रकाशको किसी अन्य प्रकाशकी अपेक्षा होना सम्भव नहीं है उसी सम्भवति, यथा प्रकाशस्य प्रका- प्रकार ज्ञानखरूप होनेके कारण शान्तरापेक्षायान सम्भवःतद्वत् । उसे [ अपने ज्ञानके लिये] किसी अन्य ज्ञानकी अपेक्षा नही है। बौद्धपक्षे स्वसंवेद्यतायां तु तथा बौद्धमतानुसार तो विज्ञानको क्षणभङ्गुरत्वं निरात्मकत्वं च | खसंवेद्यताखीकार करनेपर भी उसकी विज्ञानस्य स्यात्, “नहि विज्ञातु- | क्षणभङ्गुरता और निरात्मकता सिद्ध विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेवि- होने लगेगी । [ऐसा होनेपर] नाशित्वात्"(बृ० उ०४।३।३०) "अविनाशी होनेके कारण विज्ञाताकी "नित्यं विसुं सर्वगतम्" (मु० | विज्ञातिका लोप नहीं होता" उ०१।१।६) “स वा एष | "नित्य विभु और सर्वगत है" "वह महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽ- | यह महान् अज आत्मा अजर अमर भयः" (वृ० उ०४।४।२५) अमृत और अभयरूप है" इत्यादि इत्याद्याः श्रुतयो बाध्येरन् । श्रुतियॉ बाधित हो जायेंगी। यत्पुनः प्रतिबोधशब्देन इसके सिवा जो लोग प्रति- प्रतिबोधार्थ- निनिमित्तोबोधःप्रति- बोधशब्दसे, जैसा कि सुषुप्त पुरुपको होता है वह निनिमित्त बोध हो प्रतिबोध है—ऐसे अर्थकी कल्पना इत्यर्थं परिकल्पयन्ति, सद्वि- करते है अथवा जो दूसरे लोग विचार बोधः यथा सुप्तस्य वाक्य-भाष्य अविद्याजं हि वीर्य विनाशि। | अविद्यासे होनेवाला बल नाशवान् विद्ययाविद्याया बाध्यत्वात् । न होता है, क्योकि अविद्या विद्यासे बाधित हो जाती है। किन्तु विद्याका बाधक तु विद्याया वाधकोऽस्तीति और कोई नही है, अतः विद्याजनित विद्याजममृतं वीर्यम् । अतो वीर्य अमृत होता है । इसलिये विद्या विद्यामृतत्वे निमित्तमात्रं भवति । तो अमृतत्वमे केवल निमित्तमात्र होती है। आथर्वण श्रुतिमे भी कहा है-"यह "नायमात्मा बलहीनेन लभ्य" आत्मा बलहीनसे प्राप्त होनेयोग्य नहीं इतिचाथर्वणे (मु० उ०३।२।४) । है" जो अक्यिासे होता है खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य मुमुक्षुगण उपर्युक्त प्रतिबोध- ज्ञान प्रतिवोध इत्यपरेनि- [मुक्तिके कारणभूत ] एक बार होनेवाले विज्ञानको ही प्रतिबोध निमित्तःसनिमित्तःसकृद्वासकृद्वा समझते है---[वे कुछ भी माना करे ] बिना निमित्तसे हो अथवा प्रतिबोध एव हि सः। अमृतत्वम् | निमित्तसे तथा एक बार हो अथवा अनेक बार वह सबका सब प्रति- अमरणभावं स्वात्मन्यवस्थानं बोध ही है [ इसका विशेप विवेचन करनेसे हमे कोई प्रयोजन नही है। मोक्षं हि यसाद् विन्दते लभते क्योकि यथोक्तात् प्रतिबोधात्प्रतिबोध- होनेवाले आत्मज्ञानसे हीअमृतत्व- से अर्थात् प्रत्येक बौद्ध प्रत्ययमे विदितात्मकात, तस्मात्प्रतिवोध- अमरणभाव अर्थात् अपने आत्मामे स्थित होनारूप मोक्ष प्राप्त करते है। विदितमेव मतमित्यभिप्रायः । अतः वह (ब्रह्म) प्रत्येक बोधमे अनुभव होनेवालाही माना गया है- बोधस्य हि प्रत्यगात्मविषयत्वं । ऐसा इसका अभिप्राय है। क्योकि बोधका प्रत्यगात्मविषयक होना ही चमतममृतत्वेहेतुःन ह्यात्मनोऽ- अमरत्वमे कारण माना गया है। आत्माकी अनात्मरूपता उसके नात्मत्वममृतत्वं भवति । आत्म- अमरत्वका कारण नही हो सकती। आत्माका अमरत्व उसका खरूप- वादात्मनोऽमृतत्वं निर्निमित्तमेव, भूत होनेके कारण अहैतुक ही है। - वाक्य-भाष्य लोकेऽपिविद्याजमेव बलमभि- भवति न शरीरादिसामर्थ्य यथा लोकमे भी विद्याजनित बल हीदूसरे बलोका पराभव करता है, शरीर आदि- का बल नहीं; जैसे हाथी-घोड़े आदिके शारीरिक बल [ मनुष्यके ] विद्याजनित बलको नही दवा सकते । हस्त्यादेः। مون ८२ केनोपनिषद् [खण्ड २ पद-भाष्य प्राप्तिप्रकारः एवं मर्त्यत्वमात्मनो यद- | इसी प्रकार आत्माको मृत्यु भी अविद्यावश उसमे अनात्मत्वकी विद्यया अनात्मत्वप्रतिपत्तिः। उपलब्धि ही है। कथं पुनर्यथोक्तयात्मविद्यया तो फिर उपर्युक्त आत्मज्ञानसे किस प्रकार अमरत्व लाभ कर ज्ञानेनामृतत्व-मृतत्वं विन्दत इत्यत लेता है ? इसपर कहते है-- आह-आत्मना स्वेन [मुमुक्षु पुरुप ] आत्मा अर्थात् अपने स्वरूपके ज्ञानसे वीर्य-वल रूपेण विन्दते लभते वीर्य बलं यानी [अमरत्व-प्राप्तिका ] सामर्थ्य सामर्थ्यम् । धनसहायमन्त्रीपधि- प्राप्त करता है । धन, सहाय, मन्त्र, ओपधि, तप और योगसे प्राप्त तपोयोगकृतं वीर्य मृत्यु न होनेवाला वीर्य अनित्य वरतुका किया शकोत्यभिभवितुम् अनित्यवस्तु- हुआ होनेसे मृत्युका पराभव करनेमे कृतत्वात् आत्मविद्याकृतं तु वीर्य- समर्थ नहीं है; किन्तु आत्मविद्यासे . होनेवाला वीर्य तो आत्माद्वारा ही मात्मनैव विन्दते, नान्येन इत्यतो प्राप्त किया जाता है—अन्य किसीसे ऽनन्यसाधनत्वादात्मविद्यावीर्यस्य नही । इसलिये आत्मविद्याजनित वीर्य किसी अन्य साधनसे प्राप्त तदेव वीर्य मृत्युं शक्नोत्य- | होनेवाला नहीं है; अतः वही वीर्य वाक्य-भाप्य अथवा प्रतिबोधविदितं मत अथवा 'प्रतिबोधविदितं मतम्' इस मिति सकृदेवाशेषविपरीतनिरस्त- वाक्यका ऐसा अर्थसमझना चाहिये कि स्वप्नसे जागे हुएके समान जिसके सम्पूर्ण संस्कारेण खनप्रतिवोधवद्यद्वि- विपरीत संस्कारोका एक बार ही बाध हो दितं तदेव मतं ज्ञातं भवतीति । गया है, उसोसे जो जाना जाता है वही मत अर्थात् ज्ञात होता है । अथवा गुरु- अथवा गुरूपदेशः प्रतिवीधस्तेन का उपदेशही प्रतिबोध है, उससे जाना .
खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ८३ पद-भाष्य भिभवितुम् । यत एवमात्म- । मृत्युका पराभव कर सकता है । क्योकि [ मुमुक्षु पुरुप] इस प्रकार विद्याकृतं वीर्यमात्मनैव विन्दते, आत्मविद्याजनित वीर्यको आत्माद्वारा अतः विद्यया आत्मविषयया ही प्राप्त करता है, इसलिये आत्म- सम्बन्विनी विद्यासे ही अमरत्व प्राप्त विन्दतेऽमृतम् अमृतत्वम् । करता है । अथर्ववेदीय (मुण्डक) "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः" | उपनिपर्दो कहा है-"यह आत्मा बलहीन पुरुपको प्राप्त होने योग्य (मु० उ० ३।२।४) इत्या- नही है" । अतः यह आत्मविद्यारूप थर्वणे । अतः समर्थो हेतुः अमृ- समर्थ है क्योकि इससे अमरत्व हेतु [ मृत्युका निवारण करनेमे] तत्वं हि विन्दत इति ॥४॥ प्राप्त करता है ।।१॥ अज्ञानवश कष्टा खलु सुरनरतिर्यक्प्रेता- जिनमे सांसारिक दुःखोंकी बहुलता है उन देवता, मनुष्य, तिर्यक् और दिषु संसारदुःखबहुलेषु प्राणि- प्रेतादि प्राणियोमे निकायेषु जन्मजरामरणरोगादि जन्म, जरा, मरण और रोगादिकी प्राप्ति होना निश्चय ही बड़े दुःखकी संप्राप्तिरज्ञानात् । अत: बात है। अतः- - वाक्य-भाष्य वा विदितं मतमिति । उभयत्र । हुआ ही मत (जाना हुआ) है। सोनेसे जागा हुआ तथा गुरुद्वारा प्रतिवोधशब्दप्रयोगोऽस्ति सुप्त- प्रतिबोधित-दोनो जगह प्रतिबुद्धो गुरुणा प्रतिवोधित 'प्रतिबोध' शब्दका प्रयोग होता है। परन्तु इन तीनोमे सबसे पहला अर्थ इति । पूर्व तु यथार्थम् ॥ ४॥ ही ठीक है ॥४॥ ही .
केनोपनिपद् [खण्ड २ आत्मज्ञान ही सार है इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकाद- मृता भवन्ति ॥५॥ यदि इस जन्ममे ब्रह्मको जान लिया तब तो ठीक है और यदि उसे इस जन्ममे न जाना तब तो बडी भारी हानि है । बुद्धिमान् लोग उसे समस्त प्राणियोमे उपलब्ध करके इस लोकसे जाकर (मरकर ) अमर हो जाते है॥५॥ पद-भाष्य इह एव चेत् मनुष्योऽधिकृतः यदि किसी अधिकारी पुरुपने समर्थः सन् यदि अवेदीद् | सामर्थ्य लाभ कर इस लोकमे ही आत्मानं यथोक्तलक्षणं विदित- | उपर्युक्त लक्षणोसे युक्त आत्माको वान् यथोक्तेन प्रकारेण, अथ | पूर्वोक्त प्रकारसे जान लिया, तब तदा अस्ति सत्यं मनुष्यजन्म- तो उसके इस मनुष्यजन्ममे सत्य- न्यसिन्नविनाशोऽर्थवचा वा अविनाशिता-सार्थकता-सद्भाव वाक्य-भाष्य इह चेदवेदीत् इत्यवश्यकत- 'इहचेदवेदीदथ सत्यमस्ति' यह श्रुति आत्मसाक्षात्कारको अवश्य- व्यतोक्तिर्विपर्यये विनाशश्रुतेः। कर्त्तव्यता बतलानेवाली है, क्योकि इसकी विपरीत अवस्थामे श्रुतिने इह मनुष्यजन्मनि सत्यवश्य- विनाश वतलाया है । इह अर्थात् इस मात्मा वेदितव्य इत्येतद्विधीयते । मनुष्य-जन्मके रहते हुए आत्माको अवश्य जान लेना चाहिये-ऐसा कथमिह चेदवेदीद्विदितवान्, अथ | विधान किया जाता है। किस प्रकार कि यदि इस जन्ममे आत्माको जान सत्यं परमार्थतत्त्वमस्त्यवातं लिया तो ठीक है, उसे परमार्थतत्त्व तस्य जन्म सफलमित्यभिप्रायः । प्राप्त हो गया; अभिप्राय यह कि उसका जन्म सफल हो गया । और न चेदिहावेदीन्न विदितवान् | यदि उसे इस जन्ममे न जाना-न - खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ८५ पद-भाष्य सद्भावो वा परमार्थता वा सत्यं । अथवा परमार्थता विद्यमान है । विद्यते । न चेदिहावेदीदिति, न और यदि न जाना अर्थात् इस चेद् इह जीवंश्चेद् अधिकृतः । लोकमे जीवित रहते हुए ही उस अधिकारीने आत्मज्ञान प्राप्त न अवेदी न विदितवान्, तदा किया तो उसे महान्- -दीर्घ यानी महती दीर्घा अनन्ता विनष्टिः अनन्त विनाश अर्थात् जन्म, जरा विनाशनं जन्मजरामरणादि- और मरण आदिकी परम्पराका प्रबन्धाविच्छेदलक्षणा संसार- विच्छेद न होनारूप संसारगतिकी गतिः। ही प्राप्ति होती है। तसादेवं गुणदोषौ विजा अतः इस प्रकार गुण और दोषको नन्तो ब्राह्मणाः भूतेषु भूतेषु जाननेवाले धीर- बुद्धिमान् ब्राह्मण- लोग प्राणी-प्राणीमे अर्थात् सम्पूर्ण सर्वभूतेपु स्थावरेषु चरेषु च एक- जीवोमे एक ब्रह्मस्वरूप मात्मतत्त्वं ब्रह्म विचित्य विज्ञाय आत्मतत्वको 'विचित्य'-जानकर चराचर वाक्य-भाग्य वृथैव जन्म । अपि च महती समझा तो उसका जन्म वृथा ही गया । विनष्टिमहान्विनाशो यही नहीं, जन्म-मरणपरम्पराकी अविच्छिन्नतारूप बडी भारी हानि भी मरणप्रवन्धविच्छेदप्राप्तिलक्षणः है। अतः उस परम्पराके विच्छेदके स्याद्यतस्तस्मादवश्यं तद्विच्छेदाय लिये आत्माको अवश्य जान लेना ज्ञेय आत्मा। चाहिये। ज्ञानेन तु किं स्यादित्युच्यते । आत्मज्ञानसे होगा क्या सो [भूतेषु भूतेषु आदि वाक्यसे] बतलाते है । भूतेषु भूतेषु चराचरेषु सर्वेषु | भूत-भूतमे अर्थात् सम्पूर्ण चराचर इत्यर्थः । विचित्य पृथनिष्कृष्य प्राणियोमे आत्माका शोधनकर---उसे उससे अलग निकालकर यानी ससार- एकमात्मतत्त्वं संसारधभैरस्पृष्ट- | धर्मोसे अस्पृष्ट एकमात्र आत्मतत्त्वको
८६
केनोपनिषद्
[खण्ड २
पद-भाष्य
साक्षात्कृत्यधीराः धीमन्तः प्रेत्य | अर्थात् साक्षात् कर यहाँसे लौटने-
व्यावृत्य ममाहंभावलक्षणाद- पर अर्थात् ममता-अहंतारूप इस
अविद्यात्मक लोकसे उपरत होकर
'विद्यारूपादस्माल्लोकाद् उपरम्य
सबमे आत्मैकत्वरूप अद्वैतभावको
सर्वात्मकभावमद्वैतमापन्नाःसन्तः
प्राप्त होकर अमर अर्थात् ब्रह्म ही
अमृता भवन्ति ब्रह्मैव भवन्ती- हो जाते है, जैसा कि “जो पुरुप
त्यर्थः। “स यो ह वै तत्परं ब्रह्म निश्चयपूर्वक उस परब्रह्मको जानता
वेद ब्रह्मैव भवति" (मु० उ० है वह ब्रह्म ही हो जाता है" इस
३ । २।९) इति श्रुतेः ॥५॥ | श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ ५॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥२॥
वाक्य-भाष्य
मात्मभावेनोपलभ्येत्यर्थः अनेका- । आत्मभावसे उपलब्ध कर धीर-
बुद्धिमान् अर्थात् विवेकी पुरुष--
र्थत्वाद्धातूनां न पुनश्चित्वेति जिनकी बाह्य विषयोकी अभिलाषा
सम्भवति विरोधात्; धीराः | निवृत्त हो गयी है—मरकर अर्थात्
इस शरीरादि अनात्मस्वरूप लोकसे
धीमन्तो विवेकिनो विनिवृत्त- जिनका ममत्व और अहकार निवृत्त
बाह्यविषयाभिलाषाः प्रेत्य मृत्वा-
हो गया है ऐसे होकर अमृत-अमरण-
धर्मा यानी नित्यविज्ञानामृतस्वभाववाले
माल्लोकाच्छरीराधनात्मलक्षणात् ही हो जाने है । धातुओके अनेक अर्थ
व्यावृत्तममत्वाहंकाराः सन्त होते है [इसीलिये यहाँ 'विचित्य
क्रियाका उपर्युक्त अर्थ ठीक है ] यहाँ
इत्यर्थः। अमृता अमरणधर्माणी
इसका 'चयन करके' ऐसा अर्थनही हो
नित्यविज्ञानामृतत्वस्वभावा एव
सकता, क्योकि आत्माके सम्बन्धमे ऐसा
भवन्ति ॥५॥
अर्थ करनेसे विरोध आता है।॥ ५॥
.
इति द्वितीयः खण्डः ॥२॥
खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८७ कृतीय खण्ड: 500--- यक्षोपाख्यान वाक्य-भाष्य ब्रह्म ह देवेभ्य इति ब्रह्मणो 'ब्रह्म ह देवेभ्यो' इत्यादि वाक्यसे [ आरम्भ होनेवाली आख्यायिकाके दुर्विज्ञेयतोक्तिर्यना- यक्षोपाख्यानस्य द्वारा] जो ब्रह्मकी दुर्विज्ञेयता बतलायी धिक्यार्था समाप्ता प्रयोजन गयी है वह, ब्रह्मप्राप्तिके लिये अधिक ब्रह्मविद्या यदधीनः यत्न करना चाहिये-इस प्रयोजनके विकल्पा पुरुषार्थः । अत लिये है। जिसके अधीन पुरुषार्थ है ऊर्ध्वमर्थवादेन ब्रह्मणो दुर्विज्ञेय- वह ब्रह्मविद्या तो समाप्त हो गयी। अब आगे अर्थवादद्वारा ब्रह्मकी तोच्यते । तद्विज्ञाने कथं नु नाम | दुर्विज्ञेयता बतलायी जाती है, जिससे यत्तमधिकं कुर्यादिति । कि उसे प्राप्त करनेके लिये मनुष्य किसी-न-किसी तरह अधिक यत्न करे। शमाद्यों वाम्नायोऽभिमान- अथवा यह श्रुतिभाग अभिमानका शातनात् । शमादि वा ब्रह्म नाश करनेवालाहोनेसे शमादिकीप्राप्ति- विद्यासाधनं विधित्सितं तदर्थोऽय- ब्रह्मविद्याका साधन बतलाना इष्ट है, के लिये हो सकता है । या शमादिको मर्थवादाम्नायः। न हि शमादि- अतः उसीके लिये यह अर्थवाद-श्रुति साधनरहितस्याभिमानरागद्वेपा- है । जो पुरुष शमादि साधनसे रहित तथा अभिमान ओर राग-द्वेषादिसे युक्तस्य ब्रह्मविज्ञाने सामर्थ्य- | युक्त है उसका ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिम मस्ति।व्यावृत्तवाह्यमिथ्याप्रत्यय- सामर्थ्य नहीं हो सकता, क्योकि ब्रह्म बाह्य मिथ्या प्रतीतियोके निरसनद्वारा ग्राह्यत्वाद्रह्मणः यमाञ्चा- ही ग्रहण किया जाने योग्य है। यह ग्न्यादीनां जयाभिमानं शातयति। आख्यायिका अग्नि आदिके विजय- सम्बन्धी अभिमानको नष्ट करती है, ततश्च ब्रह्मविज्ञानं दर्शयत्यभि. इसलिये अभिमानके शान्त होनेपर ही मानोपशमे । तस्साच्छमादि- ब्रह्मजानकी प्राप्ति दिखलाती है। साधनविधानार्थोऽयमर्थवाद इत्य- अर्थवाद शमादि साधनाका विधान अतः इसका सारांश यह हुआ कि यह वसीयते । करनेके लिये ही है। - केनोपनिषद् [खण्ड ३ वाक्य-भाष्य सगुणोपासनार्थो वापोदित अथवा यह सगुणोपासनाका विधान करने के लिये भी हो सकता है, क्योकि त्वात् । नेदं यदिदमुपासत इत्युः | पहले ब्रह्मके उपास्यत्वका निषेध कर चुके है। पहले 'नेदं यदिदमुपासते' पास्यत्वं ब्रह्मणोऽपोदितमपोदित- इस श्रुतिसे ब्रह्मके उपास्यत्वका निषेध त्वादनुपास्यत्वे प्राप्त तस्यैव | हो चुका है। इस प्रकार निषिद्ध हो जानेसे ब्रह्मकी अनुपास्यता प्राप्त ब्रह्मणः सगुणत्वेनाधिदैवमध्यात्म | होनेपर उसी ब्रह्मकी सगुणभावसे अधिदैव या अध्यात्म उपासना करनी चोपासनं विधातव्यमित्येवमर्थों चाहिये इसीको बतलानेके लिये यह वा । इत्यधिदैवतं तद्वनमित्युपा- अर्थवाद हो सकता है, जैसा कि आगे चलकर 'तद्वनमित्युपासितव्यम्' इस सितव्यमिति हि वक्ष्यति । [४।६ मन्त्र] से उसके अधिदैवरूप- के उपास्यत्वका वर्णन करेगे । ब्रह्मेति परो लिङ्गात् । न 'ब्रह्म' इस शब्दसे यहाँ परमात्मा (ईश्वर) समझना चाहिये, क्योकि ह्यन्यत्र परादोश्वरात् यहाँ उसीकी सूचना देनेवाले लिंग ब्रह्मपदाभिप्रायः नित्यसर्वज्ञात् परि- (चिह्न) देखे जाते है । नित्यसर्वज्ञ परमेश्वरको छोड़कर और किसीमे भूयान्यादींस्तुणं वज्रीकर्तुं । अमि आदि देवताओका पराभव करके तृणको वज्र बनादेनेकी शक्ति नहीं हो सामर्थ्यमस्ति तन्न सकती। अतः 'तन्न शशाक दग्धुम्' (उसे अनि नहीं जला सका) इत्यादि दग्धुमित्यादिलिझाब्रह्मशब्दवाच्य लिगसे ब्रह्मशब्दका वाच्य ईश्वर ही ईश्वर इत्यवसीयते । न ह्यन्यथा- है-ऐसा निश्चित होता है। इसके सिवा और किसी कारणसे अमि तृणको ग्निस्तृणं दग्धुं नोत्सहते वायुर्वा जलानेमे और वायु उसे उड़ानेमे 'असमर्थ नहीं हो सकते थे । हॉ, यह दातुम् । ईश्वरेच्छया तृणमपि ठीक है कि ईश्वरकी इच्छासे तो तृण वज्रीभवतीत्युपपद्यते । तत्सिद्धि- भी वज्र हो जाता है। उस ईश्वरकी सिद्धि ससारकी नियमित प्रवृत्तिसे जगतो नियतप्रवृत्तेः। होती है। शशाक खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ वाक्य-भाष्य श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धिमिर्नित्य- यद्यपि नित्यसविज्ञानस्वरूप, सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् सर्वविज्ञान ईश्वरेसर्वात्मनिसर्व- श्रुति, स्मृति और प्रसिद्धिसे सिद्ध भी है तो भी शास्त्रके अर्थको शक्ती सिद्धऽपि शास्त्रार्थनिश्च- निश्चय करनेके लिये यहाँ यह यार्थमुच्यते । तस्येश्वरस्य सद्भाव- [अनुमान] कहा जाता है । उस ईश्वरके सद्भावकी सिद्वि किस प्रकार होती सिद्धिः कुतो भवतीत्युच्यते। है ? इसपर कहते है- यदिदं जगहेवगन्धर्वयक्षरक्षः- स्वर्ग, आकाश, पृथिवी, सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रोके कारण पितृपिशाचादि विचित्र दीखनेवाला तथा नाना ईश्वरस्य लक्षणं द्युवियत्पृथि- | प्रकारके प्राणियोके उपभोगयोग्य नगन्नियन्तृत्व- निरूपणम् व्यादित्यचन्द्रग्रह- स्थान और साधनोसे सम्बन्ध रखने- वाला यह जितना देवता, गन्धर्व, नक्षत्रविचित्रविविध- यक्ष, राक्षस, पितृगण और पिशाचादि- प्राण्युपभोगयोग्यस्थानसाधन- रूप जगत् है वह अत्यन्त कुशल शिरिपयोद्वारा भी बनाया जाना कठिन सम्बन्धि तदत्यन्तकुशलशिल्पि- है। अतः यह देश, काल और निमित्त- भिरपि दुर्निर्माणं देशकाल- | के अनुरूप नियमित प्रवृत्ति-निवृत्तिके क्रमवाला जगत् भोक्ता और कर्मके निमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्ति- विभागको जाननेवाले किसी चेतनके -क्रममेतद्भोक्तृकर्मविभागक्षप्रयत्न- प्रयत्नपूर्वक ही हो सकता है, क्योकि कार्यरूप होनेके कारण यह उपर्युक्त पूर्वकं भवितुमर्हति; कार्यत्वे | लक्षणोवाला है । जैसे कि गृट, प्रासाद, रथ, शय्या और आसन आदि [ सभी सति यथोक्तलक्षणत्वात् । गृह- कार्यरूप अनित्य पदार्थ देखे जाते हैं]; प्रासादरथशयनासनादिवत् । तथा इसके विपरीत [व्यतिरेकी दृष्टान्तस्वरूप] आत्मा आकाश आदि विपक्ष आत्मादिवत् । [नित्य पदार्थ है ] ।
केनोपनिषद् [खण्ड ३ वाक्य-भाष्य कर्मण एवेति चेत् ? न । पर यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति कर्मसे ही है तो ऐसा कहना ठीक तन्त्रस्य निमित्तमात्र- कर्मणाम- नही, क्योकि कर्म परतन्त्र होनेके त्वात् । यदिदमुपभोग- कारण केवल उसका निमित्त हो सकता, स्वातन्त्र्यम् वैचित्र्यं प्राणिनां | है । [ मीमांसककी युक्तिको स्पष्ट करके तत्साधनवैचित्र्यं च देशकाल- दिखलाते है] यह जो प्राणियोके उपभोगकी विचित्रता है तथा उनके निमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्ति- साधनोकी विभिन्नता और देश, काल तथा निमित्तके अनुरूप प्रवृत्ति-निवृत्ति- क्रमं च तन्न नित्यसर्वज्ञकर्तृकम् । का नियमित क्रम् है वह किसी नित्य किं तहि ? कर्मण एव तस्या- | सर्वज्ञका रचा हुआ नही है । तो चिन्त्यप्रभावत्वात् सर्वैश्च फल- किसका रचा हुआ है ? [इसपर कहते है-] यह केवल कर्मका ही फल है हेतुत्वाभ्युपगमात् । सति कर्मणः | क्योकि वह अचिन्त्य प्रभाववाला है तथा सभीने उसे फलके हेतुरूपसे फलहेतुत्वे किमीश्वराधिक- स्वीकार किया है। इस प्रकार फलके कल्पनयेति न नित्यस्येश्वरस्य | हेतुरूपसे कर्मके रहते हुए ईश्वरकी नित्यसर्वशशक्त अधिक कल्पना करनेसे क्या लाभ है ? फलहेतुत्वं अतः नित्य सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् चेति चेत् । ईश्वरम फलका हेतुत्व नहीं है । न कर्मण एवोपभोगवैचिच्या- सिद्धान्ती-केवल कमसे ही उपभोग आदिकी विचित्रता सम्भव नही है। धुपपद्यते । कस्मात् ? कर्तृतन्त्र- | किस कारणसे ? क्योकि कर्म कर्ता के अधीन है । चेतन पुरुपके यत्नसे त्वात्कर्मणः । चितिमत्प्रयत्न- निष्पन्न होनेवाला कर्म उसके प्रयत्नके निर्वृत्तं हि कर्म तत्प्रयत्नोपरमात्- | निवृत्त होनेसे निवृत्त होकर देशान्तर या कालान्तरमे किसी नियत निमित्त- उपरतं सद्देशान्तरे कालान्तरे विशेषकी अपेक्षासे ही कर्ताको फलकी 'नियतनिमित्तविशेपापेक्षं प्राप्ति करावेगा-ऐसी व्यवस्था होनेके कारण यह कहना उचित नहीं कि वह कर्तुः फलं जनयिष्यतीति न युक्त- अपने किसी दूसरे प्रवर्तककी अपेक्षा मनपेक्ष्यान्यदात्मनः प्रयोक्तु । न करके ही फल दे देता है । यदि वा खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ वाक्य-भाग्य काल और कतव फलकाले प्रयोक्तेति | कर्म करनेवाले जीवको ही फलकालमे उसका प्रवर्तक माना जाय तो [उस चन्मया निर्वतितोऽसि त्वां समय वह कमसे कहेगा-]'अरे प्रयोक्ष्ये फलाय यदात्मानुरूपं कर्म । मैने तुझे किया था, अब मै ही तुझे फल देनेके लिये प्रवृत्त करता फलमिति । हूँ; अतः मुझे अपने अनुरूप फल दे।' न । देशकालनिमित्तविशेपान किन्तु ऐसा होना सम्भव नही है, क्योकि जीव देश, भिज्ञत्वात् । यदि हि कर्ता देश- निमित्तविशेषसे अनभिज है । यदि कर्ता ही देशादि विशेषका ज्ञाता होकर विशेषाभिज्ञः सन्वातन्त्र्येण कर्म स्वतन्त्रतापूर्वक कर्मको प्रवृत्त करता नियुञ्जयात्ततोऽनिष्टफलस्याप्र तो अनिष्ट फलके लिये तो उसे प्रेरित ही न किया करता । इसके सिवा, योक्ता स्यात् । न च निर्निमित्तं किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा न तदनिच्छयात्मसमवेतं तञ्चम- | रखकर कर्ताके इच्छाके बिना ही, आत्माके साथ नित्यसम्बद हुआ कर्म वद्विकरोति कर्म। अपने-आप ही चमड़ेके समान विकार- को प्राप्त नही होता। न चात्मकृतमकर्तृसमवेतमय अणिक-विजानरूप आत्माका किया हुआ कर्म कर्तासे नित्यसम्बद्ध न होकर स्कान्तमणिवदाकृष्ट भवति चुम्बक-पत्थरके समान अपने-आप ही फलका आकर्षण नही कर सकता, क्यो- प्रधानकर्तृसमवेतत्वात्कर्मणः । कि कर्मका प्रधान कर्तासे नित्यसम्बन्ध है। यदि कहो कि कर्म भूतोके आश्रयसे भूताश्रयमिति चेन्न साधनत्वात् । रहता है तो ऐसा कहना ठीक नही, क्योकि वे तो केवल उसके साधन है। कर्तृक्रियायाः साधनभूतानि कर्ताकी क्रियाके साधनरूप भूत, जो भूतानि क्रियाकालेऽनुभूतव्यापा- | केवल क्रियाकालमे उसके व्यापारका अनुभव करते है और व्यापारके राणि समाप्तौ च हलादिवत्का | समाप्त हो जानेपर हल आदिके समान ९२ केनोपनिषद् [खण्ड ३ वाक्य-भाष्य परित्यक्तानि न फलं कालान्तरे । कर्ताद्वारा त्याग दिये जाते हैं, कालान्तर- मे उसका फल देनेमे समर्थ नहीं हो कर्तुमुत्सहन्ते न हि हलं क्षेत्राद् । सकते । हल धान्योको खेतसे ले जाकर ब्रीहीन्गृह प्रवेशयति । भूतकर्म- घरमे नहीं पहुंचा सकता । अतः अचेतन होनेके कारण भूत और पोश्चाचेतनत्वात्स्वतःप्रवृत्त्यनुप- कोंकी स्वतः प्रवृत्ति असम्भव है । पत्तिः। वायुवदिति चेन्नासिद्ध- यदि कहो कि [ अचेतन होनेपर भी] वायुके समान इनकी स्वतः प्रवृत्ति हो त्वात् । न हि वायोरचितिमतः सकती है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योकि वह असिद्ध है । अचेतन स्वतःप्रवृत्तिः सिद्धा रथादिष्व- वायुकी स्वतः प्रवृत्ति सिद नहीं हो सकती, क्योकि रथादि अन्य अचेतन दर्शनात् । पदार्थों मे वह देखी नहीं जाती। शास्त्रात्कर्मण एवेति चेच्छास्त्रं मीमासक-गास्त्रानुसार तो कर्मसे हि क्रियातः फलसिद्धिमाह ही फल मिलता है, क्योकि 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि शास्त्र कर्मसे ही फलकी नेश्वरादेःस्वर्गकामो यजेतेत्यादि। सिद्धि बतलाता है, ईश्वरादिसे नही । न च प्रमाणाधिगतत्वादानर्थक्यं इस प्रकार जो बात प्रमाणसिद्ध है उसको व्यर्थ बतलाना भी ठीक नहीं है, युक्तम् । न चेश्वरास्तित्वे प्रमा- और ईश्वरकी सत्तामे भी [अर्थापत्तिको णान्तरमस्तीति चेत् । छोड़कर और कोई प्रमाण नहीं है। न । दृष्टन्यायहानानुपपत्तेः । सिद्धान्ती-ऐसा कहना ठीक नही, क्योकि दृष्ट न्यायको त्यागना उचित क्रिया हि द्विविधा दृष्ट- | नहीं है । क्रिया दो प्रकारकी है- क्रियामेद- निरूपणम् फलादृष्टफलाच, हष्ट दृष्टफला और अष्टफला । फलापि द्विविधानन्तर- फलाके भी दो भेद है-अनन्तरफली और आगामिफलों । फलागामिफलाच, अनन्तरफला भोजन इत्यादि क्रियाएँ अनन्तरफला गतिभुजिलक्षणा। कालान्तरफला है तथा कृपि और सेवा आदि गमन और १. तत्काल फल देनेवाली। २. भविष्यमै फल देनेवाली खण्ड ३1 शाङ्करभाष्यार्थ ९३ वाक्य-भाष्य चकृषिसेवादिलक्षणातत्रानन्तर- | कालान्तरफला है । उनमे जो जो अनन्तरफला है वे फलोदयके समय फला फलापवर्गिण्येव कालान्तर- ही नष्ट हो जाती है तथा कालान्तर- फला तूत्पन्नप्रध्वंसिनी। फला उत्पन्न होकर [ फल देनेसे पूर्व ही] नष्ट हो जानेवाली है। आत्मसेव्यावधीनं हि कृषि क्योकि कृषिका फल अपने अधीन सेवादेः फलम् यतः । न चोभय- है और सेवा आदिका फल अपने सेव्यके अधीन है। इस दो प्रकारके न्यायव्यतिरेकेण खतन्त्रं कर्म न्यायको छोडकर कर्म या उससे प्राप्त ततो वा फलं दृष्टम् । तथा च होनेवाला फल स्वतन्त्र देखा भी नही कर्मफलप्राप्तौ न हटन्यायहान- जाता; तथा कर्मफलकी प्राप्तिमे इस स्पष्ट दीखनेवाले न्यायको छोड़ना मुपपद्यते । तस्माच्छान्ते यागादि उचित भी नहीं है, इसलिये यागादि कर्मणि नित्यः कर्तृकर्मफल- कर्मोके समाप्त हो जानेपर उन यागादि- विभागज्ञ ईश्वरः सेव्यादिवद्या- के अनुरूप फल देनेवाला तथा कर्ता, कर्म और फलके विभागको जाननेवाला गाद्यनुरूपफलदातोपपद्यते । स ईश्वर सेव्य आदिके समान होना ही चात्मभूतः सर्वस्य सर्वक्रिया- चाहिये, और वह सबका अन्तरात्मा, फलप्रत्ययसाक्षी नित्यविज्ञान- सम्पूर्ण कर्मफल और प्रतीतियोका साक्षी, नित्यविज्ञानस्वरूप खभावः संसारधऑरसंस्पृष्टः। सांसारिक धर्मोंसे अछूता होना चाहिये। श्रुतेश्च । “न लिप्यते लोक- दुःखेन यही बात श्रुतिसे भी सिद्ध होती वाह्य" ईश्वरास्तित्व- (क० उ०२।२।११) है । "सम्पूर्ण लोकोसे विलक्षण परमात्मा साधनम् "जरांमृत्युमत्येति" लोकके दुःखसे लिप्त नही होता" (वृ० उ०३१५१) "विजरो विमृत्युः" । ( छा० "वह जरा और मृत्युको पार किये हुए ८।७।१) "सत्यकामः सत्य- है" "जरा और मृत्युसे रहित है" "वह सङ्कल्प' (छा० उ०८1७११) सत्यकाम सत्यसङ्करप है" "यह सर्वेश्वर "एष सर्वेश्वर" (मा० उ०६) "साधु कर्म कारयति" (कौषी है" "वह शुभ कर्म कराता है" "दूसरा उ०३१९) "अनननन्यो अभि- [पक्षी] कर्मफलको न भोगता हुआ तथा उ० केनोपनिषद् [खण्ड ३ वाक्य-भाष्य चाकशीति" (श्वे० उ०४।६) केवल उसे देखता है" "इस अक्षर- "एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने" | ब्रह्मको आज्ञामे [ सूर्य और चन्द्रमा स्थित है ]" इत्यादि श्रुतियॉ ससार- (६० उ०३।८1९) इत्याद्या धर्मासे रहित एक नित्यमुक्त आत्माकी असंसारिण एकस्यात्मनो नित्य- सिद्धिमे ही प्रमाणभूत है। इसी प्रकार मुक्तस्य सिद्धौ श्रुतयः। स्मृतयश्च | सहस्रो स्मृतियाँ भी मौजूद है । ये सब सहस्रशो विद्यन्ते। न चार्थवादाः | अर्थवाद है-ऐसी कल्पना भी नहीं शक्यन्ते कल्पयितुम् । अनन्य- की जा सकती, क्योकि वे किसी अन्य विधिके शेपभूत न होनेके कारण योगित्वे सति विज्ञानोत्पादक- स्वतन्त्र ज्ञान उत्पन्न करनेवाले है और न चोत्पन्नं विज्ञानं | उनसे उत्पन्न हुआ ज्ञान [ किसी बाध्यते। प्रमाणान्तरसे बाधित भी नहीं होता। त्वात् । अप्रतिषेधाच्च । न चेश्वरो [ईश्वरका] निषेध न होनेके कारण भी [पूर्वोक्त श्रुतियॉअर्थवाद नहीं है । नास्तीति निषेधोऽस्ति । प्राप्त्य- | ईश्वर नही है-ऐसा निषेध कही भी नहीं मिलता । यदि कहो कि भावादिति चेन्नोक्तत्वात् । न ईश्वरकी प्राप्ति (सिद्धि) न होनेके कारण निषेध नहीं है, तो ऐसा कहना उचित नही, क्योकि उसके विषयमे कहा हिंस्यादितिवत्प्राप्त्यभावात्प्रति- जा चुका है। अर्थात् यदि ऐसा कहो कि [शास्त्रमे ] ईश्वरका कोई प्रसङ्ग षेधो नारभ्यत इति चेन्न । हीनही आता, इसीलिये 'न हिंस्यात्सर्वा भूतानि' इस वाक्यके समान ईश्वरके ईश्वरसद्भावे न्यायस्योक्तत्वात् । | निषेधका भी आरम्भ नहीं किया गया, तो ऐसी बात भी नहीं है, क्योकि अथवाप्रतिषेधादितिकर्मणः फल- ! ईश्वरकी सत्तामे उपर्युक्त न्याय कहा गया है। अथवा 'अप्रतिषेधात्' इस हेतु दान ईश्वरकालादीनां न प्रति- | का यह तात्पर्य समझना चाहिये कि कर्म का फल देनेम ईश्वर और काल आदिका षेधोऽस्ति । न च निमित्तान्तर- प्रतिपेध नहीं किया गया है। कर्मको, खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९५ वाक्य-भाष्य . निरपेक्ष केवलेन कत्रैव प्रत्युक्तं । किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा न करके केवल कर्तासे ही प्रेरित होकर फल फलदं दृष्टम् । न विनष्टोऽपि देते देखा भी नहीं है। सर्वथा नष्ट हुआ याग कालान्तरमे फल देनेवाला यागः कालान्तरे फलदो भवति । कभी नहीं होता। सेव्यवुद्धिवत्सेवकेन सर्व जिस प्रकार सेवककी सेवासे सेव्य श्वरवुद्धौ तु संस्कृ- | (स्वामी) की बुद्धिपर सस्कार पड कर्मफलप्रदाने जाता है उसी प्रकार यागादि कर्मसे तायां यागादि- ईश्वरस्य सर्वज्ञ ईश्वरकी बुद्धिके सस्कारयुक्त कर्मणा विनऐऽपि प्राधान्यम् हो जानेसे, फिर उस कर्मके नष्ट हो कर्मणि सेव्यादिव | जानेपर भी, जैसे सेवकको , स्वामीसे ईश्वरात्फलं कर्तुर्भवतीति युक्तम्। वैसे ही कर्ताको ईश्वरसे फल मिल न तु पुनः पदार्था वाक्यशतेनापि | जाता है-ऐसा विचार ही ठीक है। पदार्थ तो, सैकड़ो प्रमाणभूत वाक्य देशान्तरे कालान्तरे वा खं खं होनेपर भी, देशान्तर या कालान्तरमे स्वभावं जहति । न हि देश- अपने स्वभावको नहीं छोड़ते। अमि कालान्तरेषुचाग्निरतुण्णोभवति। किसी भी देश या कालान्तरमे शीतल एवं कर्मणोऽपि कालान्तरे फलं नही हो सकता। इस प्रकार कर्मोका भी कालान्तरमे दो ही प्रकार फल द्विप्रकारमेवोपलभ्यते । मिलता देखा जाता है। वीजक्षेत्रसंस्कारपरिरक्षावि कृपि आदि कर्म ऐसे कर्ताकी अपेक्षासे फल देनेवाले है जिसे बीज, ज्ञानवत्कर्षपेक्षफलं कृष्यादि वि- क्षेत्रसस्कार तथा खेतीकी रक्षा आदिका जान हो, और सेवा आदि कर्म ज्ञानवत्सेव्यवुद्धिसंस्कारापेक्षफलं विज्ञानवान् सेव्यकी बुद्धिके सस्कारकी च सेवादि । यागादेः कर्मणस्त- | अपेक्षासे फलदायक है । यागादि कर्म कालान्तरमै फल देनेवाले है थाविज्ञानवत्कञपेक्षफलत्वानुप- | इसलिये उनकी फलप्राप्तिको अज्ञानी कर्ताकी अपेक्षासे मानना तो ठीक पत्तौ कालान्तरफलत्वात्कर्मदेश- नही है; अतः उनका फल कूर्म, देश, कालनिमित्तविपाकविभागवुद्धि- काल, निमित्त और कर्मविपाकके विभागको जाननेवाले किसी चेतनकी संस्कारापेक्षं फलं भवितु- | बुद्धिके सस्कारकी अपेक्षासे ही हो ।
केनोपनिपद् [खण्ड ३ वाक्य-भाष्य मर्हति; सेवादिकर्मानुरूपफलज्ञ- । सकता है, जैसे कि सेवा आदि कर्मोका फल उसके अनुरूप फलको जाननेवाले सेव्यवुद्धिसंस्कारापेक्षफलस्येव । सेव्यकी बुद्विपर हुए संस्कारकी तस्मात्सिद्धः सर्वज्ञ ईश्वरः सर्व- अपेक्षासे मिलता है। इससे सम्पूर्ण जन्तुवुद्धिकर्मफलविभागसाक्षी जीवोकी बुद्धि कर्म और फलके विभागका साभी, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ सर्वभूतान्तरात्मा। “यत्साक्षा- ईश्वर सिद्ध हुआ। "जो साक्षात् दपरोक्षाब्रह्म य आत्मा सर्वा- | अपरोक्ष ब्रह्म हैं जो सर्वान्तर आत्मा न्तर? (बृ० उ०३।४।१) है" इस श्रुतिसे मी यही प्रमाणित होता है। इति श्रुतेः। । स एव चात्रात्मा जन्तूनां और वही इस सृष्टिमे जीयोका नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा आत्मा है। उससे भिन्न और कोई ईश्वरस्य श्रोता मन्ता विज्ञाता सार्वात्म्य- द्रष्टा, श्रोता, मन्ता अथवा विज्ञाता "नान्यदतोऽस्ति वि- स्थापनम् नहीं है, जैसा कि "इससे भिन्न और ज्ञात" (बृ० उ०३। कोई विजाता नही है" इत्यादि भिन्न ८।११) इत्याद्यात्मान्तरप्रति- आत्माका प्रतिषेध करनेवाली श्रुतिसे, षेधश्रुतेः । "तत्त्वमसि" (छा० तथा "तत्त्वमसि" इस महावाक्यद्वारा उ०६।८-१६) इति चात्मत्वोप- ब्रह्मका आत्मत्य उपदेश करनेसे सिद्ध देशात् । न हि मृत्पिण्डः | होता है। मिट्टीके ढेलेका सुवर्णरूपसे काञ्चनात्मत्वेनोपदिश्यते । कभी उपदेश नही किया जाता । ज्ञानशक्तिकोपास्योपासक- यदि कहो कि ज्ञान, शक्ति, कर्म, उपास्य-उपासक शुद्ध-अशुद्ध तथा मुक्त शुद्धाशुद्धमुक्तामुक्तभेदादात्मभेद | अमुक्त इत्यादि भेदोके कारण आत्माका भेद ही है, तो ऐसा कहना ठीक नही, एवेति चेन्न । भेददृष्ट्यपवादात् ।। क्योकि भेददृष्टिकी निन्दा की गयी है । , खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ . 'जो वरतु पद-भाज्य 'अविज्ञातं विजानतां विज्ञात 'ब्रह्म जाननेवालोके लिये वक्ष्यमाणा- मविजानताम्' इत्यादि- अविज्ञान है और न जाननेवालोके लिये ज्ञात है' इस श्रुतिसे मन्दबुद्धि ख्यायिकाया श्रवणाद् यदस्ति तद्वि- प्रयोजनम् पुरुषोको ऐसा भ्रम न हो जाय कि ज्ञातं प्रमाणः यन्नास्ति है वह तो प्रमाणोसे तदविज्ञातं शशविषाणकल्पमत्य- जान ही ली जाती है और जो नहीं है वह अविज्ञात वस्तु तो न्तमेवासदृष्टम् ; तथेदं ब्रह्मा- खरगोशके संगके समान अत्यन्त विज्ञातत्वादसदेवेति मन्दबुद्धीनां अभावरूप ही देखी गयी है, अतः यह ब्रह्मभी अविज्ञात होनेके कारण व्यामोहो मा भूदिति तदर्थेय- असत् ही हैं। इसीलिये यह माख्यायिका आरभ्यते। आख्यायिका आरम्भ की जाती है। वाक्य-भाज्य यदुक्तं संसारिण ईश्वराद पूर्व०-तुमने जो कहा कि ससारी जीवोका ईश्वरसे अभेद है सो नन्या इति तन्न। ठीक नहीं। किं तर्हि ? सिद्धान्ती-तो फिर क्या बात है ? भेद एव संसात्मनाम् । पूर्व०-ससारी जीव और परमात्मा- का तो परस्पर भेद ही है। कस्मात् ? सिद्धान्ती क्यो? लक्षणभेदादश्वमहिपवत् । कथं पूर्व०-घोडे और भैसके समान उनके लक्षणोमे भेद होनेके कारण लक्षणभेद इत्युच्यते-ईश्वरस्य और यदि कहो कि 'उनके लक्षणोमे किस प्रकार भेद है तो बतलाते हैं 'तावन्नित्यं सर्व विषय ज्ञानं [सुनो, ] सूर्यके प्रकाशके समान ईश्वरको सब विषयोका सर्वदा जान रहता सवितप्रकाशवत् ।' तद्विप- है, उसके विपरीत संसारी जीवोको रीतं संसारिणां खद्योतस्येव। खद्योत (जुगनू ) के समान अल्पशन है। इसी प्रकार दोनोकी शक्तियोमे भी तथैव शक्तिभेदोऽपि । नित्या | भेद है । ईश्वरकी शक्ति नित्य केनोपनिषद् [खण्ड ३ पद-भाष्य तदेव हि ब्रह्म सर्वप्रकारेण वह ब्रह्मही सब प्रकारसे शासन करनेवाला, देवताओका भी परम देव, प्रशास्तू देवानामपि परोदेवा, ईश्वरोका भी परम ईश्वर, दुर्विज्ञेय ईश्वराणामपि परमेश्वरः, दुर्विज्ञेयः, तथा देवताओकी जयका कारण देवानां जयहेतुः, असुराणां | और असुरोकी पराजयका हेतु है । वाक्य-साध्य सर्वविषया चेश्वरशक्तिविपरीते- ओर सर्वतोमुखी है तथा जीवकी तरस्य । कर्म च चित्स्वरूपात्म- उसके चित्स्वरूपकी सत्तामात्रसे ही इसके विपरीत है। ईश्वरका कर्म भी सत्तामात्रनिमित्तमीश्वरस्य । औ- होनेवाला है जैसे कि उप्णतारूप [सूर्यकान्तमणि आदि] द्रव्योकी रुण्यस्वरूपद्रव्यसत्तामात्रनिमित्त- सत्तामात्रसे दहनकार्य निष्पन्न हो जाता दहनकर्मवत् । राजायस्कान्त- अथवा जैसे राजा, चुम्बक और प्रकाशसे होनेवाले कार्य [उनकी प्रकाशकर्मवच्च स्वात्माविक्रिया- | सन्निधिमात्रसे] होते है उसी प्रकार ईश्वरके कर्म उसके स्वरूपमे विकार रूपम्। विपरीतमितरस्य । उपासी- उत्पन्न करनेवाले नही है, किन्तु तेतिवचनादुपास्य ईश्वरो गुरु- | जीवके कर्म इससे विपरीत है। "उपासीत" इस श्रुतिके अनुसार राजवत् । उपासकश्चतरः ईश्वर गुरु एवं राजाके समान उपासनीय शिष्यभृत्यवत् । अपहतपाप्मादि- है तथा जीय शिष्य और सेवकके समान उपासक है। "अपहतपाप्मा" आदि श्रवणानित्यशुद्ध ईश्वरः । श्रुतियोके अनुसार ईश्वर नित्यशुद्ध है पुण्यो वै पुण्येनेतिवचनाद्विपरीत | तथा "पुण्यो वै पुण्येन" आदि श्रुतिवाक्योसे जीव इसके विपरीत- इतरः। स्वभाववाला है। अत एव नित्यमुक्त एवेश्वरी अतः ईश्वर तो नित्यमुक्त ही है नित्याशुद्धियोगात्संसारीतरः । किन्तु जीव नित्य अशुद्धिके योगके कारण ससारी है। तथा जहाँ ज्ञानादि अपि च यत्र ज्ञानादिलक्षणभेदः | लक्षणोमे भेद रहता है वहाँ सर्वदा भेद खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ पद-भाष्य पराजयहेतुः तत्कथं नास्तीत्येत- | तब वह है किस प्रकार नहीं ? स्यार्थस्सानुकूलानि युत्तराणि [ अर्थात् अवश्य ही है ] । इस अर्थके अनुकूल ही इस खण्डके आगेके वचांसि दृश्यन्ते । वाक्य देखे जाते है। वाक्य-भाष्य " "वे नाशवान् अस्ति तत्र भेदो दृष्टः, यथाश्व- ही देखा गया है; जैसे घोडे और महिपयोः । तथा नानादिलक्षण- । भैंसमे । अतः इसी प्रकार ज्ञानादि भेदादीश्वरादात्मनां भेदोऽस्तीति | लक्षणोमे भेद रहनेके कारण ईश्वर और चेत् । जीवोमे भेद ही है। न। सिद्धान्ती-यह वात नही है। कस्मात् ? पूर्व० कैसे ? अन्योऽसावन्योऽहमसीति सिद्धान्ती क्योकि "यह (ब्रह्म) न स वेद" (वृ० उ०१।४।१०) अन्य है और मै अन्य हूँ-ऐसा जो "ते क्षय्यलोका भवन्ति' (छा० जानता है वह [ब्रह्मके यथार्थ स्वरूप- को] नहीं जानता उ०७ १२५/२) "मृत्योः स लोकोको प्राप्त होते है" "वह मृत्युसे मृत्युमामोति" (क०उ०२।१।१०) मृत्युको प्राप्त होता है" इत्यादि इति भेददृष्टिॉपोहाते। एकत्व- वाक्योसे भेढदृष्टिका निषेध किया जाता प्रतिपादिन्यश्च श्रुतयः सहस्रशा | है और एकत्वका प्रतिपादन करने- विद्यन्ते । वाली तो सहस्रो श्रुतियाँ विद्यमान हैं । यदुक्तं ज्ञानादिलक्षणभेदादि तथा तुमने जो कहा कि ज्ञानादि लक्षणोमे भेद होनेके कारण जीव और त्यत्रोच्यते-न ईश्वरका भेद ही है, सो इस विषयमे शानादिमेदस्य औपाधिकत्वम् अनभ्युपगमात् । मेरा यह कथन है कि उनमे कुछ भी भेद नहीं है, क्योकि हमे उनके ज्ञानादि- वुद्धयादिभ्यो व्यति- का भेद मान्य नहीं है। बुद्धि आदि रिक्ता विलक्षणाश्वेश्वराद्भिन्न- उपाधियोसे व्यतिरिक्त और विलक्षण लक्षणा आत्मानो न सन्ति । एक ऐसे कोई जीव नही है जो ईश्वरसे मिन्न लक्षणवाले हो । एक ही नित्यमुक्त एवेश्वरश्वात्मा सर्वभूतानां । ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोका आत्मा माना १०० केनोपनिषद् [खण्ड ३ पद-भाष्य अथवा ब्रह्मविद्यायाः स्तुतये। अथवा इस (आख्यायिका) का आरम्भ ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके कथम् १ ब्रह्मविज्ञानाद्धि अग्न्या- लिये है। किस प्रकार ? क्योकि दयो देवा देवानां श्रेष्ठत्वं जग्मुः। ब्रह्मज्ञानसे ही अग्नि आदि देवगण दयो देवा देवानां श्रेष्ठत्वं जग्मुः। देवताओम श्रेष्ठत्त्रको प्राप्त हुएथे और ततोऽप्यतितरामिन्द्र इति । उनमे भी इन्द्र सबसे बढकर हुआ । वाक्य-भाष्य नित्यमुक्तोऽभ्युपगम्यते । बाह्य जाता है; क्योंकि चक्षु और बुद्धि आदि संघातकी परम्परासे प्राप्त हुए श्चक्षुर्बुद्धयादिसमाहारसन्तानाहं- | अहकार और ममतारूप विपरीत ज्ञानका विच्छेद न होना ही जिसका कारममत्वादिविपरीतप्रत्ययप्र- लक्षण है, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त बन्धाविच्छेदलक्षणो नित्यशुद्ध- | विज्ञानस्वरूप ईश्वर ही जिसका अन्तर्यामी है, जो स्वयं नित्यविज्ञानका वुद्धमुक्तविज्ञानात्मेश्वरगर्भो नित्य- अवभास (प्रतिविम्ब) चित्त, चैत्य विज्ञानाभासश्चित्तचैत्यबीजबीजि- (सुखादि विषय), बीज (अविद्यादि) और बीजी (शरीरादि)से तादात्म्यको खभावः कल्पितोऽनित्यविज्ञान | प्राप्त होकर तद्रूप हो गया है तथा जो कल्पित, अनित्य विज्ञानवान् और ईश्वरलक्षणविपरीतोऽभ्युपगम्यते, ईश्वरके लक्षणसे विपरीत है वही बाह्य जीव माना गया है। जिसके इस यस्याविच्छेदे संसारव्यवहारः | औपाधिक स्वरूपका विच्छेद न होनेसे संसारका व्यवहार होता है तथा विच्छेद विच्छेदे च मोक्षव्यवहारः। हो जानेपर मोक्षव्यवहार होता है। अन्यश्च मृत्प्रलेपवत्प्रत्यक्षप्र इसमे जो देव, पितृ और मनुष्यरूप ध्वंसो देवपितृमनुष्यादिलक्षणो | लेपके समान प्रत्यक्ष नष्ट हो जानेवाला भूतोका सघातविशेष है वह मृत्तिकाके, भूतविशेपसमाहारो न पुनश्चतु- और [चेतन आत्मासे] सर्वथा भिन्न है; किन्तु जो [स्थूल, सूक्ष्म और र्थोऽन्यो भिलक्षण ईश्वरादभ्यु- कारण तीनो प्रकारके शरीरोसे] विलक्षण चौथा आत्मा है वह ईश्वरसे पगम्यते । भिन्न लक्षणोवाला नही माना जा सकता। .
खण्ड ३ शाङ्करभाष्यार्थ १०१ पद-भाष्य अथवा दुर्विज्ञेयं ब्रह्मेत्येतत् । अथवा इससे यह दिखलाया प्रदश्यते गया है कि ब्रह्म दुर्विज्ञेय है, क्योकि -येनाग्न्यादयोति- अग्नि आदि परम तेजस्वी होनेपर तेजसोऽपि शेनैव ब्रह्म विदित- | भी कठिनतासे ही ब्रह्मको जान सके थे तथा देवताओका स्वामी वन्तस्तथेन्द्रो देवानामीश्वरोऽपि होनेपर भी इन्द्रने उसे बड़ी सन्निति । कठिनतासे पहचाना था। वाक्य-भाप्य बुद्धयादिकल्पितात्मत्यतिरे यदि कहो कि वुद्धि आदि कल्पित आत्मासे [निरुपाधिक चेतनस्वरूप] काभिप्रायेण तु लक्षणभेदात् आत्मा भिन्न है इस अभिप्रायसे हमने 'लक्षणभेद होनेके कारण ऐसा हेतु इत्याश्रयासिद्धी हेतुः ईश्वरात दिया है, तो तुम्हारा यह हेतु आश्रयासिद्ध* है, क्योकि ईश्वरसे भिन्न अन्यस्यात्मनोऽसत्त्वात् । और किसी आत्माकी सत्ता नहीं है। ईश्वरस्यैव विरुद्धलक्षणत्वम पूर्व०-[यदि ईश्वरसे भिन्न और कोई आत्मा नहीं है तो] ईश्वरमे ही विरुदूलक्षणत्व तथा सुख-दुःख युक्तमिति चेत्सुखदुःखादियोगश्च । आदिका योग होना तो ठीक नहीं है। न । निमित्तत्वं सति लोक सिद्धान्ती-ऐसीवात नही है क्योकि आत्मा सूर्यके समान केवल निमित्तमात्र विपर्ययाध्यारोपणात्सवितृवत् । है; लोकोकी उसमे जो विपरीत बुद्धि है वह केवल आरोपके कारण है । जिस यथा हि सविता नित्यप्रकाशरूप-! प्रकार सूर्य नित्यप्रकाशस्वरूप होने के * जहाँ पक्षमै पक्षतावच्छेदकालका प्रभाव होता है वहाँ आश्रयासिद्ध हेत्वाभास माना जाता है, जैसे-'आकाशकुसुम सुगन्धिमान है, कुसुम होनेके कारण, अन्यकुसुमवत्, इस अनुमानमें 'आकाशकुसुम' जो पक्ष है उसमें पक्षतावच्छेदकाल यानी कुसुमत्वका अभाव है, क्योंकि आकाशकुसुम कमी किसी ने नहीं देखा। इसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये।
१०२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३ पद-भाष्य वक्ष्यमाणोपनिषद्विधिपरं वा अथवा आगे कही जानेवाली सर्व ब्रह्मविद्याव्यतिरेकेण प्राणिनां समस्त उपनिपद् विधिपरक है । और ब्रह्मविद्यासे अतिरिक्त प्राणियो- कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यभिमानो मिथ्या का जो कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिका अभि- वाक्य-भाष्य त्वाल्लोकाभिव्यक्त्यनभिव्यक्ति कारण लौकिक पदार्थोकी अभिव्यक्ति निमित्तत्वे सति लोकप्टिविपर्य- और अनभिव्यक्तिका निमित्तमात्र होता है तथापि लोकोकी दृष्टिमे विपरीत येणोदयास्तमयाहोरात्रादिकर्तृ भाव आ जानेके कारण इस अध्यारोप- का पात्र बनता है कि वह उदय-अस्त स्वाध्यारोपभाग्भवत्येवमीश्वरे और दिन-रात्रि आदिका कर्ता है, उसी नित्यविज्ञानशक्तिरूपे लोकज्ञाना- प्रकार नित्यविज्ञानशक्तिस्वरूप ईश्वरमे भी लोकोके जानका विनाश तथा सुख, पोहसुखदुःखस्मृत्यादिनिमित्तत्वे दुःख और स्मृति आदिकी निमित्तता सति लोकविपरीतबुद्धयाध्यारो- उपस्थित होनेपर लोकोकी विपरीत बुद्धिसे विपरीतलक्षणत्व तथा सुख- पितं विपरीतलक्षणत्वं सुख- दुःखाश्रयत्वका आरोप कर लिया जाता है, उसमे स्वतः ऐसा कोई भाव दुःखाश्रयश्च न स्वतः। नहीं है। आत्मदृष्ट्यनुरूपाध्यारोपाच्च । इसके सिवा सभी जीव अपनी- अपनी दृष्टिके अनुरूप ही उसमे यथा धनादिविप्रकोणेऽम्बरे येनैव आरोप करते है। इसलिये भी वह उन सब आरोपोसे अछूता है ] । जिस प्रकार सवितृप्रकाशो न दृश्यते स दृश्यते स आकाशके मेघ आदिसे आच्छादित हो जानेपर जिस-जिसको सूर्यका प्रकाश आत्मदृष्ट्यनुरूपमेवाध्यस्यति दिखलायी नहीं देता वहीं-वही अन्यत्र प्रकाश रहनेपर भी भ्रान्तिवश अपनी सवितेदानीमिह न प्रकाशयतीति । दृष्टिके अनुसार ऐसा आरोप करता है कि इस समय यहाँ सूर्य प्रकाशमान सत्येव प्रकाशेऽन्यत्र भ्रान्त्या।। नही है। इसी प्रकार इस आत्मतत्त्वमे खण्ड ३] ব্লুমস্যা पद-भाष्य इत्येतद्दर्शनार्थ वा आख्यायिका, | मान है वह देवताओके जय आदिके अभिमानके समान मिथ्या यथा देवानां जयाघभिमानः है—यह बात दिखानेके लिये ही तद्वदिति । प्रस्तुत आख्यायिका है। वाक्य-भाष्य एवमिह चौद्धादिवृत्त्युद्भवाभि- | भी बुद्धि आदिकी वृत्तियोके उदय और अस्तसे वैचित्र्यको प्राप्त हुई भवाकुलभ्रान्त्याध्यारोपितः सुख- भ्रान्तिसे आरोपित सुख-दुःखादिका दुःखादियोग उपपद्यते । योग हो सकता है। तत्स्मरणाच्च । तस्यैवेश्वरस्यैव इस विषयमे उसीकी स्मृति भी है हि स्मरणम्-"मत्तः स्मृतिर्ज्ञान- | अर्थात् उस ईश्वरके ही स्मृतिवाक्य भी है; जैसे-"मुझहीसे प्राणियोको मपोहनं च" (गीता १५ । १५) स्मृति, ज्ञान और अज्ञान प्राप्त "नादत्ते कस्यचित्पापम्" (गीता होते है" "ईश्वर किसीके पापको ५।१५) इत्यादि । अतो नित्य- स्वीकार नहीं करता" इत्यादि । अतः मुक्त एकस्सिन्सवितरीव लोका- सूर्यके समान एक ही नित्यमुक्त ईश्वरम विद्याध्यारोपितमीश्वरे संसारि- लोकने अविद्यावश ससारित्वका आरोप त्वम् । शास्त्रादिप्रामाण्यादभ्युप-उसका अससारित्व जाना गया है, कर रखा है, तथा शास्त्रादि प्रमाणो- गतमसंसारित्वमित्यविरोध इति। इसलिये इसमे कोई विरोध नहीं है। एतेन प्रत्येकं ज्ञानादिभेदः इससे प्रत्येक जीवके ज्ञानादि भेदका प्रत्याख्यान होगया, क्योकि उन समीमे प्रत्युक्ता सौदभ्यचैतन्यसर्वगत्वा- सूक्ष्मता, चैतन्य और सर्वगतत्वादि धर्म द्यविशेषे च भेदहेत्वभावात् । समानरूपसे रहनेके कारण भेदके हेतुका अभाव है। यदि उन्हे विकारीमाना जाय विक्रियावत्त्वे चानित्यत्वात् । तो वे अनित्य हो जायेंगे। इसके सिवा मुक्तावस्थामे किसीने मी आत्माका मोक्षेचविशेपानभ्युपगमादभ्युप- कोई विशेष भाव नहीं माना, यदि गमेचानित्यत्वप्रसङ्गात्। अविद्या- कोई मानेगा तो अनित्यत्वका प्रसग उपस्थित हो जायगा। तथा भेद तो वदुपलभ्यत्वाञ्च भेदस्य ।। केवल अविद्यावान्को ही उपलब्ध होता;
१०४ केनोपनिषद् [खण्ड ३ देवताओंका गर्व ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त ॥ १॥ यह प्रसिद्ध है कि ब्रह्मने देवताओके लिये विजय प्राप्त की । कहते है, उस ब्रह्मकी विजयमें देवताओंने गौरव प्राप्त किया ॥ १ ॥ पड़-भाष्य ब्रह्म यथोक्तलक्षणं परं हैं यह प्रसिद्ध है कि उपर्युक्त लक्षणोवाडे परब्रह्मने देवताओके किल देवेभ्योऽर्थाय विजिग्ये जयं लिये जय प्राप्त की । अर्थात् देवता लंब्धवत् देवानामसुराणां च और असुरोके संग्राममे संसारके वाक्य-भाष्य तत्क्षयेऽनुपपत्तिरिति सिद्धम् | है, अविद्याका क्षय होनेपर उसकी एकत्वम् । सिद्धि नहीं होती । अतः [जीव और ईश्वरका] एकत्व ही सिद्ध होता है। तस्माच्छरीरेन्द्रियमनोवुद्धि अतः अहंकारके सम्बन्धसे अज्ञानके बीजभूत शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, विषयवेदनासन्तानस्य बन्धमोक्ष- विषय और इन्द्रियज्ञानके प्रवाहका, अहङ्कारसम्बन्यादज्ञान जो नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मासे भिन्न बीजस्य नित्यविज्ञाना- किसी अन्य निमित्तसे स्थित है, आत्म- तत्त्वके यथार्थ ज्ञानसे उस निमित्तके न्यनिमित्तस्यात्मतत्त्वयाथात्म्यवि- निवृत्त हो जानेपर जो अज्ञानके बीजका ज्ञानाद्विनिवृत्तावज्ञानवीजस्य वि- उच्छेद हो जाना है वही आत्माका च्छेद आत्मनो मोक्षसंज्ञा विपर्यये | मोक्ष कहलाता है और उससे विपरीत- च बन्धसंज्ञा, स्वरूपापेक्षत्वा- | और मोम] दोनो ही [बुद्धयादि का नाम बन्ध है, क्योकि वे [बन्ध दुभयो। उपाधिविशिष्ट ] स्वरूपकी अपेक्षासे है। ब्रह्म ह इत्यैतिह्यार्थः । पुरा 'ब्रह्म ह' इसमे 'ह' ऐतिह्य इतिहास) का द्योतक है। कहते किल देवासुरसंग्रामे जगत्स्थिति- | है, पूर्वकालमे देवासुरसग्राममे ब्रह्मने परिपिपालयिषयात्मानुशासनानु- जगत्-स्थिति (लोक-मर्यादा) की रक्षाके लिये अपनी आज्ञामे चलनेवाले वर्तिभ्यो देवेभ्योऽर्थिभ्योऽर्थाय | विजयार्थी देवताओके लिये असुरोको व्यवस्था खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ १०५ पद-भाष्य संग्रामेऽसुराञ्जित्वा जगदराती- शत्रु तथा ईश्वरकी मर्यादा भङ्ग नीश्वरसेतुभेत्तॄन् देवेभ्यो जयं करनेवाले असुरोको जीतकर जगत्- तत्फलंचप्रार्यच्छज्जगतःस्थेने की स्थितिके लिये वह जय और तस्य ह किल ब्रह्मणो विजये उसका फल देवताओको दे दिया। देवाः अग्न्यादयः अमहीयन्त कहते है, ब्रह्मकी उस विजयमे अग्नि महिमानं प्राप्तवन्तः॥१॥ आदिदेवगण महिमाको प्राप्त हुए॥१॥ यक्षका प्रादुर्भाव त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति । तहषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥२॥ उन्होंने सोचा हमारी ही यह विजय है, और हमारी ही यह महिमा है। कहते है, वह ब्रह्म देवताओंके अभिप्रायको जान गया और उनके सामने प्रादुर्भूत हुआ । तब देवतालोग [यक्षरूपमे प्रकट हुए] उस ब्रह्मको 'यह यक्ष कौन है ? ऐसा न जान सके ॥२॥ वाक्य-भाष्य विजिग्येऽजैपीदसुरान् । ब्रह्मण | जीत लिया । अर्थात् ब्रह्मकी इच्छात्प इच्छानिमित्तो विजयो देवानां निमित्तसे देवताओकी विजय हो वभूवेत्यर्थः । तस्य ह ब्रह्मणो | गयी । ब्रह्मकी उस विजयमें देवताओ- विजये देवा अमहीयन्त । यज्ञा- को महत्ता प्राप्त हुई। लोककी स्थितिके हेतुभूत यज्ञादिको नष्ट करनेवाले दिलोकस्थित्यपहारिप्वसुरेपु परा- असुरोके पराजित हो जानेपर देवताओ- जितेपु देवा वृद्धिं पूजां वा ने वृद्धि अथवा खूब सत्कार प्राप्त प्राप्तवन्तः॥१॥ किया ॥१॥ त ऐक्षन्त इति मिथ्याप्रत्यय- 'त ऐनन्त' इत्यादि शास्त्रवाक्य, मिथ्याप्रत्ययत्प होनेके त्वाद्धयत्वख्यापनार्थमानायः। [अभिमानका] हेयत्व प्रतिपादन करनेके लिये है । कारण १०६ केनोपनिषद् [खण्ड ३ पद-भाष्य तब, तदाआत्मसंस्थस्य प्रत्यगात्मन अन्तःकरणमे स्थित, ईश्वरस्य सर्वज्ञस्य सर्वक्रियाफल- | प्रत्यगात्मा, सर्वज्ञ, प्राणियोके सम्पूर्ण कर्मफलोका संयोग कराने- संयोजयितुः प्राणिनां सर्वशक्तेः । वाले, सर्वशक्तिमान् एवं जगत्की जगतः स्थिति चिकीर्षोः अयं रक्षा करनेके इच्छुक ईश्वरकी ही यह सम्पूर्ण जय और महिमा है यह जयोमहिमाचेत्यजानन्तःतेदेवाः न जानते हुए आत्माको अग्नि ऐक्षन्त ईक्षितवन्तः अग्न्यादि आदि रूपोसे परिच्छिन्न माननेवाले स्वरूपपरिच्छिन्नात्मकृतोऽसाक- | देवता सोचने लगे कि हमलोगो- मेवायं विजयः अस्माकमेवायं की ही यह विजय हुई है, और इस विजयकी फलभूत अग्नित्व, वायुत्व महिमा अग्निवास्त्रिन्द्रत्वादि- एवं इन्द्रत्वरूप यह महिमा भी लक्षणो जयफलभूतोऽस्माभिरनु- | हमारी ही है; अतः हमारे द्वारा ही इसका अनुभव किया जाता है; यह भूयते; नासत्प्रत्यगात्मभूतेश्वर- विजय अथवा महिमाहमारे अन्तरात्म- कृत इति । भूत ईश्वरकी की हुई नही है। एवं मिथ्याभिमानेक्षणवतां इस प्रकार मिथ्या अभिमानसे तत् ह किल एषां मिथ्येक्षणं | विचार करनेवाले उन देवताओके इस मिथ्या विचारको ब्रह्मने जान विजज्ञौ विज्ञातवद्रह्म । सर्वेक्षित | लिया, क्योकि समस्त जीवोके वाक्य-भाष्य ईश्वरनिमित्त विजये स्वसाम जो विजय ईश्वरके निमित्तसे प्राप्त हुई थी उसमे 'यह हमारी सामर्थ्यसे यनिमित्तोऽस्माकमेवायं विजयोऽ- प्राप्त हुई हमारी ही विजय है, हमारी शाङ्करभाष्यार्थ १०७ खण्ड ३] पद-भाष्य हि तत् सर्वभूतकरणप्रयोक्त- | अन्तःकरणोका प्रेरक होनेके कारण वह सबका साक्षी है। देवताओके त्वात् देवानां च मिथ्याज्ञान- इस मिथ्या ज्ञानको जानकर 'इस मुपलभ्य मैवासुरवदेवा मिथ्या- मिथ्या ज्ञानसे असुरोंकी ही भॉति देवताओंकाभी पराभव न हो जाय' भिमानात्पराभवेयुरिति तदनु- इस प्रकार उनपर अनुकम्पा करते कम्पया देवान्मिथ्याभिमाना- हुए यह सोचकर कि 'देवताओंके मिथ्याज्ञानको निवृत्त करके मै उन्हे पनोदनेनानुगृह्णीयामिति तेभ्यः अनुगृहीत करूँ वह उन देवताओ- देवेभ्यः ह किलार्थाय प्रादुर्वभूव | के लिये प्रादुर्भूत हुआ अर्थात् वाक्य-भाप्य स्माकमेवायं महिमेत्यात्मनो | ही महिमा है' इस प्रकार [ अभिमान करके ] अपनी विजय आदि कल्याणके जयादि श्रेयोनिमित्तं सर्वात्मा- हेतुभूत सर्वात्मा सर्वकल्याणास्पद नमात्मस्थं सर्वकल्याणास्पदमी- आत्मस्थ ईश्वरको ही आत्मभावसे न श्वरमेवात्मत्वेनाबुवा पिण्ड- जानकर पिण्डमात्रके अभिमानी होकर उन्होने जो मिथ्या प्रत्यय कर लिया था मात्राभिमानाः सन्तो यं मिथ्या- वह केवल पिण्डमात्रसे सम्बन्ध रखने- प्रत्ययं चक्रुस्तस्य पिण्डमात्रविपय- | वाला होनेसे मिथ्या ज्ञानस्वरूप था | अतः सर्वात्मा ईश्वरके यथार्थ स्वरूपके त्वेन मिथ्याप्रत्ययत्वात्सर्वात्म- बोधसे उसका हेयत्व प्रकट करनेके श्वरयाथात्म्यावबोधेन हातव्यता- 1 लिये ही यह 'तद्वैपाम्' (वह ब्रह्म उन
१०८
केनोपनिपट
[खण्ड ३
पर-भाष्य
स्वयोगमाहात्म्यनिर्मितेनात्यद्भु- अपनी योगमायाके प्रभावसे सबको
तेन विस्मापनीयेन रूपेण देवाना- | विस्मित करनेवाले अति अद्भुतरूपसे
मिन्द्रियगोचरे प्रादुर्वभूव प्रादु- | देवताओकी इन्द्रियोका विषय होकर
भृतवत् । तत् प्रादुर्भूतं ब्रह्म प्रादुर्भूत अर्थात् प्रकट हुआ । उस
न व्यजानत नैव विज्ञातवन्तः | प्रकट हुए ब्रह्मको देवतालोग यह
देवाः किमिदं यक्षं पूज्यं | न जान सके कि यह यक्ष अर्थात्
महद्भूतमिति ॥२॥
पूजनीय महान् प्राणी कौन है ? ||२||
चाक्य-भाप्य
ख्यापनार्थस्तद्ध पामित्याद्याख्या- । देवताओके अभिप्रायको जान गया)
आदि आख्यायिकारूप आम्नाय
यिकाम्नायः
(गास्त्र) है।
तद्ब्रह्म ह किलैषां देवानामभि कहते है, वह ब्रह्म इन देवताओके
प्रायं मिथ्याहवाररूपं विजज्ञा | मिथ्या अहंकाररूप अभिप्रायको समझ
गया-उसे इसका ज्ञान हो गया ।
विज्ञातवत् । ज्ञात्वा च मिथ्याभि- | उसे जानकर उस मिथ्याभिमानके
मानशातनेन तदनुजिघृक्षया | छेदनद्वारा देवताओपर अनुग्रह करने-
देवेभ्योऽर्थाय तेपामेवेन्द्रियगोचरे | की इच्छासे वह देवताओके ही लिये
उनकी इन्द्रियोका विषय होकर उनसे
नातिदूरे प्रादुर्वभूव । महेश्वर- थोड़ी ही दूरपर प्रकट हुआ। वह
शक्तिमायोपात्तेनात्यन्ताद्भुतेन महेश्वरकी मायागक्तिसे ग्रहण किये हुए
प्रादुर्भूतं किल केनचिद्रूपविशेपेण। | किसी बड़े ही विचित्र स्पविशेषसे
तकिलोपलभमाना अपि देचा प्रकट हुआ, जिसे देखकर भी देवता
लोग यह न जान सके-न पहचान
व्यजानत
न विज्ञातवन्तः | सके कि यह यक्ष अर्थात् पूज्य
किमिदं यदेतद्यक्षपूयमिति॥२॥ | कौन है ? ॥२॥
१०९ खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ अग्निकी परीक्षा तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति ॥ ३॥ उन्होने अग्निसे कहा-'हे अग्ने ! इस बातको मालूम करो कि यह यक्ष कौन है ? उसने कहा-'बहुत अच्छा ॥३॥ पद-भाष्य ते तदजानन्तो देवाः सान्त उसे न जाननेवाले देवताओने र्भयास्तद्विजिज्ञासवः अग्निम् भीतरसे डरते-डरते उसे जाननेकी अग्रगामिनं जातवेदसं सर्वज्ञ- | इच्छासे सबसे आगे चलनेवाले सर्वज्ञकल्प जातवेदा अग्निसे कहा- कल्पम् अब्रुवन् उक्तवन्तः । हे 'हे जातवेदः! हमारे नेत्रोके सम्मुख जातवेदः एतद् असद्गोचरस्थं स्थित इस यक्षको जानो--विशेप- यक्षं विजानीहि विशेषतो चुध्यः रूपसे मालूम करो कि यह यज्ञ स्व त्वं नस्तेजस्वी किमेतब- कौन है; क्योकि तुम हम सबमे क्षमिति ॥३॥ तेजखी हो ॥३॥ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्य- ब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥ अग्नि उस यक्षके पास गया । उसने अग्निसे पूछा, 'तू कौन उसने कहा, 'मै अग्नि हूँ, मै निश्चय जातवेदा ही हूँ' ॥ ४ ॥ 2" पद-भाष्य तथा अस्तु इति तद् यक्षम् तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर अग्नि उस यक्षकी ओर अभिद्रुत अभि अद्रवत् तत्प्रति गतवा- हुआ अर्थात् उसके पास गया । नग्निः । तं च गतवन्तं इस प्रकार गये हुए और धृष्ट न होनेके कारण अपने समीप चुपचाप पिपृच्छिघु तत्समीपेप्रगल्भत्वा- खड़े हुए प्रश्न करनेकी इच्छावाले तूष्णीभूतं तद्यक्षम् अभ्यवदद् | उस अग्निसे यक्षने कहा—'तू
केनोपनिषद्
[खण्ड ३
पद-भाष्य
अग्निं प्रति अभापत कोऽसीति ।। कौन है ' ब्रह्मके इस प्रकार
एवं ब्रह्मणा पृष्टोऽग्निः अब्रवीत्- | पूठनेपर—'मै अग्नि हूँ मै अग्नि
अग्नि अग्निर्नामाहंप्रसिद्धो जात-
नामसे प्रसिद्ध जातवेदा हूँ'- इस
प्रकार ‘अग्निने दो नामसे प्रसिद्ध
वेदा इति च नामद्येन प्रसिद्ध- | होनेके कारण अपनी प्रशंसा करते
तयात्मानं श्लाघयनिति ॥ ४ ॥ हुए कहा ॥ ४ ॥
तस्मि स्त्वयि किं वीर्यमित्यपीद सर्व दहेयं यदिदं
पृथिव्यामिति ॥ ५॥
[फिर यक्षने पूछा-1 'उस [जातवेदारूप] तुझमे सामर्थ्य क्या
है ? [अग्निने कहा---] 'पृथिवीमे यह जो कुछ है उस सभीको जला
सकता हूँ' ॥५॥
पद-भाष्य
एवमुक्तवन्तं ब्रह्मावोचत् इस प्रकार बोलते हुए उस
तसिन् एवं प्रसिद्धगुणनामवति | अग्निसे ब्रह्मने कहा—'ऐसे प्रसिद्ध
गुण और नामवाले तुझमे क्या
त्वयि किं वीर्य सामर्थ्यम् इति । वीर्य-सामर्थ्य है ?' वह बोला-
सोऽब्रवीद् इदं जगत् सर्वं दहेयं 'पृथिवीपर जो यह चराचररूप
जगत् है इस सबको जला सकता
भसीकुर्या यद् इदं स्थावरादि हूँ-भस्म कर सकता हूँ।' 'पृथिवीमे'
पृथिव्याम् इति | पृथिव्यामि- | यह केवल उपलक्षणके लिये है,
क्योकि जो वस्तु आकाशमे रहती
त्युपलक्षणाथम्, यतोऽन्तरिक्षस्थ-
है वह भी अग्निसे जल ही
मपि दह्यत एवाग्निना ॥५॥ जाती है ॥ ५ ॥
खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ १११ तस्मै तुणं निद्धावेतबहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशक विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥ तब यक्षने उस अग्निके लिये एक तिनका रख दिया और कहा- 'इसे जला' । अग्नि उस तृणके समीप गया, परन्तु अपने सारे वेगसे भी उसे जलानेमे समर्थ नही हुआ । वह उसके पाससे ही लौट आया और बोला, 'यह यक्ष कौन है-इस बातको मै नही जान सका' ॥ ६॥ पद-भाष्य तस्मै एवमभिमानवते ब्रह्म इस प्रकार अभिमान करनेवाले तृणं निदधौ पुराने स्थापितवत् । उस अग्निके लिये ब्रह्मने एक तृण रखा अर्थात् उसके आगे तृण डाल ब्रह्मणा 'एतत् तृणमात्रं ममाग्रतः दिया । ब्रह्मके ऐसा कहनेपर कि दह न चेदसि दग्धुं समर्थः, 'तू मेरे सामने इस तिनकेको जला; मुश्च दग्धृत्वाभिमानं सर्वत्र' | यदि तू इसे जलानेमे समर्थ नहीं है तो सर्वत्र जलानेवाला होनेका इत्युक्तः तत् तृणम् उपप्रेयाय अभिमान छोड़ दे' वह अपने सारे तृणसमीपं गतवान् सर्वजवेन बल अर्थात् उत्साहकृत सम्पूर्ण वेगसे उस तृणके पास गया । सर्वोत्साहकृतेन वेगेन । गत्वा किन्तु वहाँ जाकर भी वह उसे तत् न शशाक नाशकद्दग्धुम् । जलानेमे समर्थ न हुआ । इस प्रकार उस तिनकेको शक्तो वीडितो हतप्रतिज्ञः तत होनेके कारण लज्जित होकर उस एव यक्षादेव तूष्णीं देवान्प्रति यक्षके पाससे चुपचाप देवताओके निववृते निवृत्तः प्रतिगतवान् न प्रति निवृत्त हुआ- अर्थात् उनके एतत् यक्षम् अशकं शक्तवानह पास लौट आया [ और बोला- विज्ञातुं विशेषतः यदेतद्यक्ष- नहीं जान सका कि यह यक्ष 'इस यक्षको मै विशेषरूपसे ऐसा मिति॥६॥ कौन है ? ॥६॥ सः जातवेदाः तृणं दग्धुम- जलानेमे असमर्थ वह अग्नि हतप्रतिज्ञ - केनोपनिषद् [खण्ड ३ वायुकी परीक्षा अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥ ७॥ तदनन्तर, उन देवताओने वायुसे कहा-'हे वायो ! इस बातको मालूम करो कि यह यक्ष कौन है ?' उसने कहा-'बहुत अच्छा' ॥ ७॥ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्य- ब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ ८ ॥ वायु उस यक्षके पास गया, उसने वायुसे पूछा--'तू कौन है ? उसने कहा- 'मै वायु हूँ—मै निश्चय मातरिश्वा ही हूँ' ॥ ८॥ तस्मियस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदर सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ६ ॥ [तब यक्षने पूछा-] 'उस [ मातरिश्वारूप] तुझमें क्या सामर्थ्य है ? [वायुने कहा-] 'पृथिवीमे यह जो कुछ है उस सभीको ग्रहण कर सकता हूँ॥९॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥१०॥ तब यक्षने उस वायुके लिये एक तिनका रखा और कहा- 'इसे ग्रहण कर' । वायु उस तृणके समीप गया । परन्तु अपने सारे वेगसे भी 1
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