Sanmati Library, Jaipur
Ath Rishi Panchami
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मल शान्ति. भा० टी० जनेऊ पद्धति ८) बासिष्ठी हवन पति समंत्रक ग्रहशांति प्रयोग ॥) चौविस गायत्री . .) पार्थिवपूजा मा : तिथिनिर्णय तर्पण ওৱাৰ অৱনি in) प्रेत मम्री. मल I) सूचीपत्र। पार्वण मा०टी० श्रीमद्भगवद्गीता भारी. अशोचनिर्णय दोहा सहित .. होम पद्धति Sir श्रीमद्भगवद्गीता गुटका हरद्री मार पूजा m शनिश्कर कथा गीता गुटका १२ पेजी ११) यजुर्वेदी सन्ध्या भा. टी० ) मुहूर्त मंजरी भा० टी० सिद्धान्त पटल रस्नोद्योत. भा. टी. सामवेदी सन्ध्या सांची ।) पिण्ड दर्पणःमर्थात् गृह गर्भपीता । पस्नः विवाह पदाति मून a) गृहभूषण पिण्ड दर्पण मा०टी० 10) भूषण मा० टी. भाटी प्र पार्वण मल ॥ मृत्युका पूर्वरूप ६७ " सूचीपत्र। -- संगरत्न गुटका गणेश पुराण काशी माहात्म्य अनन्त व्रतकमा भा०टी० ॥ सूर्य पुराण :) श्रीपदभगवत्गीता .... ८) ऋषिपंचमी व्रत कथा मूल )m अक्षयनवमी भा०टी० ॥ तस्तबोध । महामारत:सपलसिंह कृत | योगवासिष्ठ m सूर्य पुराण पड़ा.साइज . .m)| बेदान्तसार । चित्रगुप्त कथा भा० टी. ) पाकेट साइज -) नारद गीता। प्रेमसागर २) गरुड़ पुराण भाषा टीका १) मीन गीता. बृजपिलास ::..... एकादशी माहात्म्य नित्य कर्म पदति ... विश्रामसागर ३). भाषा टीका १. एकोदिष्ट श्राद्ध मूल सत्यनारायण व्रत कथा मूल..) प्रयाग:माहात्म्य सटीकः भा. टी.) रामचन्द्र केवट सम्पाद D गौदान संकटचतुर्थी मल 1) | श्रीमद्भगमवगीता भा० टी०, २) ) . . क) -- " गणपति पूाज का | लघुदपण-कर्मकाण्ड ग्रन्थ । जिस पुस्तक की वर्षों से धूम मची हुई थी और माँगें प्रारही यों वही लघुदर्पण पुस्तक अब सुन्दर स्वच्छ कागज़ पर छपकर तैयार होगई है। और धड़ाधड़ बिक रही है। इस कर्मकाण्ड के सम्पूर्ण विषयों को दर्पण ही समझिये जैसा नाम है, वैसा ही गुण । इसमें कर्मकाण्ड सम्बन्धी प्रायः सभी विषयों को बड़ी योग्यता के साथ विशद विवेचन किया गया है और उनकी पूरी विधि लिखी गई है। इसके रचयिता कर्मकाण्डी. पं.. जगन्नाथ मालवीय । इसका संशोधन भी काशी के प्रसिद्ध धर्मशास्त्री पं. गोपालशास्त्री ने ने, (व्याकरणाचार्य ) और पं. अम्बिकाप्रसादशर्मा व्याकरणाचार्य ने किया है। पुस्तक की छपाई में शुद्धता का पूरा ध्यान रखा गया है। इस पुस्तक की पद्धति को काशी के प्रायः सब प्रगिद्ध पण्डितों ने ( जिनके नाम ग्रन्य में दिये गये हैं) स्वीकार इसकी प्रशंसा की है। अबतक इस विषय पर इससे अच्छी कोई पुस्तक नहीं निकली पुस्तक मिलने का पता- 18 menter for ft करती है और इसलोक में अपने पति के साथ विलाश कर पुत्र पोत्रादिकों के संयुक्त रमणीय भोगों को भोग कर पाप से रहित हो अक्षय गति को पानी है ॥ १६ ॥२०॥ सर्वपापविनिर्मुक्तास्वर्गलोकेमहीयते ॥ इहलोकेचिरंकालं भासहशुचिस्मिता ॥ १९ ॥ पुत्रैःपौत्रैःपरिवृताभुक्त्वाभो गान्मनोहरान् ॥ निष्पापासुभगानित्यं लभतेचाक्षयांगतिम ॥ २० ॥ इति उद्यापनविधिः समाप्तः । ... बाबू काशीप्रसाद भार्गव द्वारा भार्गवभूषण प्रेस, विलोचन-कायो में मुद्रित तथा प्रकाशित किया २७ ऋ० करें ॥ ९ ॥ मध्यान में श्रद्धापूर्वक भक्ति से पूजन करे ॥ १० ॥ कश्यप १ अत्रि २. भरदाज ३० विश्वामित्र ४ गौतम, ५ जमदग्नि ६ वसिष्ठ ७ साध्वी अरुन्धती ८ इन ऋषियों की प्रतिमा.पर पंचवर्णचफलपुष्पसमन्वितम् । बध्नीयादुपरिश्रीमत्सभारां संविधायच॥ ९ ॥ मध्यान्हेपूजयेद्भक्त्याऋषीञ्छ्रद्धासम न्वितःकश्यपोत्रिभरद्वाजोविश्वामित्रोथगौतमः॥१०॥जम दग्निर्वसिष्ठश्चसाध्वीचैवाप्यरुन्धती ॥मन्त्रणानेनराजेन्द्रक त्वापूजांसमाहितः॥११॥रात्रौजागरणंकुर्यात्पुराणश्रवणादि आवाहन पूजन करे ॥ ११ ॥ गत्रिमें जागरण करें। अच्छे २ पुराणों को सुनें फिर प्रातःकाल स्नान करके तिल घृत का हवन करे ॥ १२ ॥ १ हजार भाठ अथवा १ सौ ८. माहुति दे ॥ १३ ॥ फिर व्रत करनेवाले अपने गुरु की पूजा करके वस्त्र याभूषण दे सुन्दर पक्वन भिः॥कृतनित्यक्रियःपातजुहुयात्तिलसर्पिषा॥१२॥ वैदिकोवा थपौराणंअधिकारान्मनुस्मृतः ॥ अष्टोत्तरसहस्रवाशतमष्टो त्तरंतुवा ॥ १३ ॥ पुनःपूजांततःकृत्वागुरुंसंपूजयेत्वती ॥ स्वर्णाङ्गुलीयवासोभिःकुण्डलामृतभोजनैः ॥ १४ ॥ दद्या देकांसवत्सांचगुरवेगांपयस्विनीम् ॥ पूजयेदृत्विजःसप्तवासो बाह्मणको भोजन करावे । १४॥ एक दुधार गौ भावार्य को दे और होम करनेवालों को वस्त्र पं० २७ ऋ० करै ।। ९ ॥ मध्यान में श्रद्धापूर्वक भक्ति से पूजन करैः ॥ १० ॥ कश्यप १ अत्रि २ भरद्वाज । विश्वामित्र गौतम ५ जमदग्नि ६ वसिष्ठ ७ साधी अरुन्धती ८ इन ऋषियों की प्रतिमा पर पंचवर्णचफलपुष्पसमन्वितम् । वनीयादुपरिश्रीमत्सभारां संविधायच॥ ९ ॥ मध्यान्हेपूजयेद्भक्त्याऋषीच्छ्रद्धासम न्वितः॥कश्यपोत्रिभरद्वाजोविश्वामित्रोथगौतमः॥१०॥जम दग्निर्वसिष्ठश्वसाध्वीचैवाप्यरुन्धती ॥मन्त्रणानेनराजेन्द्रक त्वापूजांसमाहितः॥११॥रात्रौजागरणंकुर्यात्पुराणश्रवणादि. आवाहन पूजन करें ॥ ११ ॥ गत्रिमें जागरण रै ॥ अच्छे २ पुराणों को सुनै फिर प्रातःकाल पूपपात्र कलश पर धरै ॥ ६ ॥ उसके ऊपर अष्टदल ककुम अबीरसे बनीव उस पर स्वर्ण प्रतिमा अपियों की रखें ॥ ७॥ एक पल प्रणाम की प्रतिमा अथवा प्राधा वा चौथाई पल शक्ति नवा ॥ वंशमृन्मयपात्रेणयवचूर्णेनचैवहि ॥ ६ ॥ आच्छा दयेतंचैलेनलिखेदष्टदलंततः ॥ सौवर्ण्य प्रतिमाकार्याऋषी णांभावितात्मनाम ॥७॥ पलेनवातदर्धेनतदर्धार्धेनवापुनः॥ शक्त्यावाकारयेत्तत्रवित्तशाट्यविवर्जितः ॥ ८ ॥ वितान के अनुसार बनांव ॥ ८ ॥ पांच रंग का चंदवा मंडप में बांध के तोरण आदि से सुशोभित --
पं०.
करे ॥ ३ ॥ घर में गोबर से लीप के सर्वतो भद्र मंडल बन ,वै उस पर ताम्र अथवा
मट्टी के अच्छे कलश में 'जल पूरित रखें ॥ ४ ॥ कलश के कंठ में सफेद वस्त्र
क्त्यासमन्वितः ॥ ३ ॥ शुचौदेशसमालिप्यसर्वतोभद्रम
एडले ॥ अवणंसजलंकुम्भंतामंमृन्मयमेववा ॥ ४ ॥ सं
स्थाप्यवस्त्रसंवीतकण्ठदेशेसुशोभनम् । पञ्चरत्नसमायुक्तैः
फलगन्धाक्षतैर्युतम् ॥५॥ साहिरण्योसमाच्छाद्यतामेणपटले २६
लपेटे और उसके भीतर पंचत तथा मोषध्यादिलोड ॥
फिर भरे के
.
उसको समति ने सि विधि से किया था सो भी कहिये ॥२॥ तच श्रीकृष्ण भगवान बोले कि पहिले दिन १ बखत भोजन करे दस दिन स्नान करके गुरु के घर जाय ॥ २ ॥ और गुरु से पूर्णफलप्रदम् ॥ सुमतिनविधिनाचकारवेदतत्वतः ॥१॥ श्रीकृष्णउवाच ॥ पूर्वस्मिन्दिवसकुयादेकभुक्तंसमाहितः ॥ पातरुत्थायसुस्नातस्ततोगुरुगृहंब्रजेत् ॥ २॥ प्रार्थयेत्तम- माचार्योभवोद्यापनकर्मणि ॥ पूर्वोक्तेनैवविधिनास्नात्वाभ प्रार्थना करें कि भाप याचार्य होकर उद्यापन विधि से कराइये फिर विधि के अनुसार स्नान २५ ऋ० धन यश स्वर्ग तथा पुत्रादि सुख को देने वाला है। इसकी कथा सुनने से पाठ करने से प्राणी.|| पं. मात्र का कल्याण होता है ।। ७२ ॥ इति भविष्योत्तरपुराणोक्तऋषिपंचमीव्रतकथाभाषा धन्ययशस्यं स्वयंचपुत्रदेवैयुधिष्ठिर ॥ पठतांशृण्वतांचापि सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ७२ ॥ इति श्रीभविष्योत्तरपुराणे ऋषिपंचमीव्रतकथासंपूर्णम् ॥ अथोद्यापनम् ॥ युधिष्ठिरउवाच ॥ किमस्योद्यापनप्रोक्तंवत टीकासम्पूर्णम् ।। अथ उद्यापनविधिः । युधिष्ठिर बोले कि पंचमीके व्रतको पूर्ण फल देनेवाला उद्यापन क्या है २५ - - पंचमी के व्रत से प्राप्त होता है ॥ ६९ ॥ जो स्त्री इस व्रत को विधिवत् करती है वह अनेक सुख भोगकर पुत्र एवं पौत्र से सम्पन्न होती है ॥७२॥ इस लोक में सुख भोग करके उत्तम गति को चारणात् ॥ ६९ ॥ कुरुतेयावतंनारीसाभवेत्सुखभागिनी ॥ पलावण्ययुक्ताचपुत्रपौत्रादिसंयुता ॥ ७० ॥ इहलोके देवस्यात्परत्रेचपरांगतिम् । एतत्तेकथितराजन्वतानामुत्त- मंवतम् ॥ ७१ ॥ सर्वसम्पत्प्रदचैवनारीणांपापनाशनम् ॥ प्राप्त होती है । हे युधिष्ठिर इस प्रकार ऋषिपंचमी व्रत तुमसे कहा ॥ ७१ ॥ यह स्त्रियों का सुख तथा(संपति, एवंपुत्रपौत्रादि को देनेवाला और संपूर्ण पापों को नाश करनेवाला है, यह व्रत .
इस व्रत के प्रभाव से प्राणी का स्वर्ग में वास होता है । मन वाणी का किया जो पाप स्वर्गप्राप्तोमहाराज व्रतस्यास्यप्रभावतः॥कायिकंवाचिकंवापि मानसंयच्चदुष्कृतम् ॥६७॥ तत्सर्वविलयंयांति व्रतस्यास्य प्रभावतः।तस्ययज्जायतेपुण्यं तच्छृणुष्वनृपोत्तम ॥६८॥सर्व बतेषुयत्पुण्यं सर्वतीर्थेषुयत्फलम् ॥ सर्वदानेषुदत्तेषुतदेतद्वत होता है ॥६७। वह सब नाश होता है । हे युधिष्ठिर ! इस व्रत से जो बड़ा पुण्य होता है उसका २४ फल सुनो ॥ ६८ ॥ संपूर्ण तीर्थ का फल संपूर्ण दान का फल संपूर्ण वो का फल केवल इस , नाश करनेवाले ऋषिपञ्चमी के व्रत को यथोक्त प्रकार से. करके सुमति ने उसका फल. अपने माता पिता को दिया ॥ ६ ॥ हे धर्मराज इस व्रत के पुण्यसे सुमति के माता पिता शनम् ॥ कृत्वासर्वयथोक्तंच मातापित्रोः फलंदहौ ॥ ६४॥ व्रतपुण्यप्रभावेणमातातस्यश्वयोनितः॥ मुक्तानृपतिशार्दूल विमानवरसंस्थिता ॥३५॥ दिव्याम्बरधराभूत्वा गता स्वमै च भारत ॥ पितापिसमतोमुक्तः सुमतेः पशुयोनितः ॥६६॥ पशुयोनि से मुक्त होकर विमान पर बैठ के स्वर्ग को जाते भये । हे युधिष्ठिर सुन्दर दिव्य रूप वस्त्र धारण किये लोकमें यश छोड़ कर ब्राह्मण और ब्राह्मणी स्वर्ग को गये ।। ६५ ।। ६६ ॥ ॥
२३ ऋ०.६७ ॥ हे सुमते इस प्रकार ऋषिपंचमी का व्रत करने से रजस्वला संपर्क जन्य दोष नाश होताहे | पं० इसमें सन्देह नहीं है॥६॥ परमात्मा कृष्ण बोले कि ऋषियों के वाक्य को सुनके सुमति अपने वाप्यरुन्धती॥मंत्रेणानेनसप्तर्षीन्पूजयेत्सुसमाहितः ॥६१॥ व्रतेनऋषिपंचम्याःकृतेनैवद्विजोत्तम ॥ ऋतुसंपर्कजोदोषः क्षयंयाति न संशयः ॥६२॥ श्रीकृष्णउवाच ॥ तच्छुत्वा सुमातर्वाक्यं परमंऋषिभाषितम् ॥ गृहमेत्यवतंचक्रे सभा र्यः श्रद्धयान्वितः ॥६३॥ व्रतंतुऋषिपञ्चम्याः सर्वपापप्रणा घा आकर के स्त्री समेत श्रद्धा पूर्वक उत्तम प्रत को करने लगें ।। ६३: । सम्पूर्ण पापों को २३ --
आंवला आदि से केशको शुद्ध कर स्नान करके स्वच्छवस्त्र धारण कर ।। ५६ ॥५७॥५८५९॥
ष्ठीवनायचगात्राणंकुह दन्ताधावनम्॥अनेनदन्तान्संशोध्य
स्नायान्मृत्स्नानपूर्वकम्।५८ातिलामलककल्केनकेशान्संशो
ध्ययत्नतः। परिधायनवेशुद्ध वाससीचसमाहितः॥५६॥पूज-
यस्वऋषीन्दिव्यानरुन्धत्या समन्वितान् ॥कश्यपोत्रिभरद्वा
जोविश्वामित्रोथगौतमः॥६॥जमदग्निर्वसिष्ठश्चसाध्वीचै
अरुन्धती सहित सप्तऋषिका पूजन करे ।। कश्यप १ अत्रि २ भरद्वाज ३ विश्वामित्र ४ गौतम
५ जमदग्नि ६ वासष्ठ -७ अरुन्धति ८ इन बाठो का एकाग्र चित्त से पूजन करो ॥६॥
० २२ भोजन ब्रत में कंगे ॥५३॥ अथवा कन्द मूल फल खाकर भाद्र शुक्ल पंचमी का वा करों ॥५४॥ पदेमासि शुक्लपक्षस्यपञ्चमीम् ॥५४॥ तस्यांमध्यान्हस मयेनद्यादौविमलेजले॥ कृत्वापामार्गसममिधा दन्तधावन- मादितः॥५५॥ आयुर्बलंयशोवर्चःप्रजापशुवसूनिचाब्रह्मप्रज्ञा चमेधांचत्वन्नोदेहिवनस्पते॥५६॥संप्रार्थ्यानेनमन्त्रण कुर्याद्वै दन्तधावनम्। मुखदुर्गन्धिनाशायदन्तानांचविशुद्धये॥५७॥ मध्यान्हकाल में नदी के तट पर जाकर आयुर्बलं० इस मंत्र से चिचिड़ा की१०८दतुअन करक॥५५॥ २३.
और पिता भी उसी के पाप से बैलयोनि को प्राप्त भये इनके मुक्ति के लिये ऋषिपंचमी का बलीवर्दोबभूवह ॥ एतयोर्मुक्तिकामार्थ कुरुष्वऋषिपंच ॥५१॥ भार्ययासहविप्रेन्द्रऋषीन्संपूज्ययत्नतः ॥ आचरस्व व्रतंतत्रसप्तवर्षद्विजोत्तम ॥५२॥ अन्तेचोद्यापनं कुर्याद्वि शाट्यविवर्जितः ॥ शाकाहारस्तुकर्तव्योनीवारैःश्यामकैस्त था॥५३॥ कन्दैथिफलैर्मूलहलष्टंनभक्षयेत् ॥ प्राप्यभ बत करो ॥ ५१॥ अरुन्धती सहित सप्तऋषि का सात वर्ष पर्यन्त स्त्री सहित पूजन करो ॥४२॥ बाद उद्यापन करें। साँवा (तिन्नी) का चावल बिना जोते बोए जो वस्तु उत्पन्न होती हो उसका
ऋ०
के त्रिकालज्ञ ऋषि बोले ।। ४८। तब सुमति से उसके माता पिता की मक्ती के लिये यह बनन || पं.
२१ स्तस्यसुमतेर्दुःखितस्य च ॥ ऋषिःसर्वतपानाम सर्वज्ञःकरु
णान्वितः ॥ ४८ ॥ सुमतिप्रत्युवाचेदं तत्पित्रोमुक्तये तदा
॥ ऋषिरुवाच ॥ तव माता पुराविप्र स्वगृहे वालभावतः
॥ ४६ ॥ प्राप्तंऋतुविदित्वातु संपर्कमकरोद्विज ॥ तेनकर्म
विपाकेन शुनियोनिमुपागता ॥ ५० ॥ पितापिस्पर्शदोषेण
बोले, ऋषि बोले कि हे विप्र ! तेरी माता ने पूर्वजन्म में अपने घर में अज्ञानता से ॥ ४६॥||२१
मासिकधर्म होने पर स्पस्पर्श का विचार नहीं किया उसी दुष्कर्म से वह कुतिया भई ॥५०॥
वन में तेजपुञ्ज सप्तऋषियों का दर्शन भया ।। १५ । उनको नमस्कार करके कहा कि हे तेजो राशि ऋषि लोग हमारे दुःख को एकाग्र होकर सुन उसके उद्धार का उपाय हो सो कहीं ॥४६॥ प्रणिपत्याब्रवीद्वाक्यं हितचैवतदातयोः॥ सुमतिरुवाच॥कथ यध्वंविपूवर्याः प्रश्नमेकंसमाहिताः ॥ ४६॥ केनकर्मविपा केन पितरौ मे तपोधनाः ॥ इमामवस्था संप्राप्तौ मोक्ष्यते पातकात्कथम् ॥ ४७ ॥ श्रीकृष्णउवाच ॥ तदाकर्ण्य वच हे तपोधन किस पाप के कारण मेरे माता पिता पशुजन्म को प्राप्त भये और अब उनका उद्धार किस उपाय से होगा सो कहिये ॥४७॥ श्रीकृष्ण धर्मराज से बोले कि सुमति का ऐसा दोन बचन सुन ० पं. ॥ सुनकर ॥ ४२ ॥ यह मान लिया कि हमारे यही माता पिता हैं तब उनको उसी समय भोजन विदित्वातु दत्तवान्सुमतिस्तदा ॥ तस्यां रजन्यां तत्कालं ददौ ताभ्यां च भोजनम् ॥ ४३ ॥ तदाऽसौ दुःखितः पुत्रो ज्ञात्वाऽवस्थांतथातयोः ॥ मातापित्रोऽस्तुराजेन्द्र द्रुतंसंभ स्थितोवनम् ॥४४॥ ज्ञातुमिच्छामिवैकष्टमितिनिश्चित्यभार त ॥ तत्रगत्वाज्ञानवृद्धान्ऋषीन्परमधार्मिकान् ॥ ४५ ॥ करायो ॥ ४३ ।। और अत्यन्त दुखी हुए और मन में संकल्प किया कि विना माता पिता को उद्धार किये अन्न न खोयंगे ऐसा विचार तत्काल बन को चले गये ।। ४४ ॥ हे युधिष्ठिर ।
जन्म लेकर हमको भी बोझा ढोना पड़ता है हम भी अशक्त हैं क्योंकि भोज हमारा भी दिन ह्यशक्तोऽहं भारवाहत्वमागतः । अद्याहमात्मनः क्षेत्रवाहि तः सकलंदिनम् ॥ ४० ॥ मारितश्चात्मजेनाहं मुखंबद्ध्वा बुभुक्षितः॥ वृथाश्राद्धंकृतंतेन जाताऽद्यममकष्टता॥ ४१॥ कृष्णउवाच । तयोःसंवदतोरेवं मातापित्रोश्चभारत ॥ श्रुत्वा पुत्रस्तथावाक्यं यदुक्तं च तदोभयोः॥ ४२ ॥ पितरौतौ भर मुख बांध करके मार मार के दिन भर हर में जोता है इसने वृथा श्राद्ध किया ॥४०॥४१॥ श्रीकृष्णभगवान् बोले कि हे युधिष्ठिर सुमति ने अपने माता पिता को परस्पर यह बातें करते हुये . --
।
ऋ० केवल इतना ही है कि पक्वान्न जो ब्राह्मण भोजन के लिये रखा था उसमें सर्प ने
दिया। यह देख के उससे न बचाती तो ब्रह्महत्या होती इससे जाकर छू दिया तब हमारी पतोहू ने
द्यगरलंसर्पसंभवम् ॥ ३७॥ मयाविचिन्त्यमनसा मरिष्य
न्तिद्विजोत्तमाः॥ संस्पृष्टपायसंगत्वा वध्वाऽहंताडिता'
शम् ॥ ३८ ॥ दुःखितंतेनमेगात्रं कटिभग्नाकरोमिकिम् ॥
तत:पाहसचानड्वान् भद्रेतेपापसंग्रहात् ॥३६॥ किंकरोमि
जलती लकड़ी से मारा । ३७॥३८॥ इससे हमारे शरीर में बड़ी पीड़ा है । कुतिया क यह बचन
सुन के बैल बोला कि यह पूर्वजन्म के पाप से दुःख होता है !३९॥ देख तेर पाप से ही बैल का
१६
--- जब अर्धरात्रि का समय पाया तब कुतिया क्षधा के मारे दुखी हो ॥ ३४ ॥ बैलरूपी पति के ततोरात्र्यांप्रवृत्तायां सशुनीक्षुधिताभृशम् ॥ ३४ ॥ बली वर्दमुपागत्य भारमिदमत्रवीत् ॥ बुभुक्षितोऽद्यहंभर्तनदत्तं भोजनादिकम् ॥ ३५ ॥ग्रासादिकंचनप्राप्तक्षुधामांवाधतेभृ शम् ॥ अन्यस्मिन्दिवसपुत्रो ममलेांददात्यसौ॥ ३६॥ अछामांकिमप्येष उच्छिष्टमपिनोददौ ॥ पायसनिपपाता पास जाकर कहने लगी कि हे नाथ अोज मैं भूखी कलपरही हूं आज हमको जूठा तक नहीं मिला मेरा पुत्र नौ दिन तो ग्रासादि देता था ॥ ३५ ॥ ३६ ।। आज वह भी नहीं दिया। हमारा दोष ...
. के खाने से ब्राह्मण मर जायंगे और हत्या होगी ऐसा रिचार के छू दिया।॥२१॥ चन्द्रावती ने यह देख पं०. उस कुतिया को जलती हुई लकड़ी से माग कि उसकी कमर टूट गई। फिर चन्द्रावती ने भोजन की १८ द्विजभार्याचतां दृष्ट्वा उल्मुकेन जघानह ॥ भाण्डादीनिच प्रक्षाल्यत्यक्त्वापाकं सुमध्यमा ॥ ३२॥पुर:पाकचकृत्वातु श्रांत्यविधानतः॥ ततोमुक्तेषुविशेषूनोच्छिष्टंचददीबहि: ॥ ३३ ।। भूमौक्षिप्तंतयाशून्या उपवासस्तदाऽभवत् सामग्रो शुद्धता से बनाया । ३२॥ सुमतीजी ने विधिवत् श्राद्ध करके ब्राह्मणों को भोजन कराया. १८- तव चन्द्रावती ने क्रोध करके ब्राह्मणों का जूठा उस रोज कुतिया को नहीं दिया ।। ३३ ॥ फिर का दिन पड़ा ॥ २८ ॥ उस दिन अपनी चन्द्रावती स्त्री से उसने कहा कि हे प्रिये भाज हमारे पिता की श्राद्धतिथि है ॥ २६ ॥ भाज ब्राह्मणों को भोजन कराना है सो तू मच्या २ वत्सरदिनं पितुर्मचारुहासिनी ॥२९॥ भोजनीयाद्विजाभी रुपाकसिद्धिविधीयताम् ॥ तयाकृतापाकसिद्धिः सुमतेर्तु राज्ञया ॥ ३० ॥ मुक्तंपायसभाण्डेवैसणगरलंततः । दृष्ट्वा ब्रह्मवधाभीताशुनीभाण्डानिसाऽस्पृशत् ॥ ३१ ॥ पकवान बना । सुमती की. माज्ञा पाकर चन्द्रावती ने सुन्दर परवान तैयार किया॥ ३० ॥ उसी समय जोखीर पात्र में रखी थी उसमें उपर से सर्प ने विष उगल दिया तबकुतिया ने देखा कि इस १७ ३० का भया । हे युधिष्ठिर 1 इस प्रकार वे दोनों अपने कर्म के वश हुए ।।२० ऋतुसंपर्क दोष से पशु. योनि भोगते भये। परन्तु उन दोनों को अपने पूर्वजन्म का वृत्त और जाति का स्मरण था॥२६॥हे तथा ॥२६॥ सुतस्यैवगृहेराजन्स्मरन्तौ पूर्वपाकम् । सुमि त्रस्यच पुत्रोऽभूद गुरुशुश्रूषणेरतः॥२७॥सुमति मधर्मज्ञो देवतातिथिपूजकः ।अथक्षयाहे संप्राप्ते पितुस्तुसुमतिस्तदा ॥२८॥ भार्याचन्द्रवतींपाह सुमति:श्रद्धयान्वितः। अद्यसां राजन् ! वे दोनों अपने ही पुत्र के घर अपने पूर्वजन्म का स्मरण करते हुए जीवन बिताने लगे। १७ सुमित्र का पुत्र जिसका नाम सुमती था वह अपने गुरु की सेवा में रहता था ।। २७ ।। सुमति देवना का पूजन और भतिथि का सत्कार करने वाला था। उसके पिता का क्षयाह (वार्षिक) श्राद्ध जयत्रा पार सुामत्र को मृत्यु भई ।। २२ ।। तब हे युधिष्ठिर वह ब्राह्मण और ब्राह्मणी दोनों मरने दंपतीराजस्वकर्मवशगौतदा ॥२३॥ भार्यातस्य जयश्रीः साऋतुसंपर्कदोपतः ॥ शनियोनिमनप्राप्ता सुमित्रोऽपिनरे श्वर ॥ २४ ॥ तस्याः संपर्कदोषेण बलीबर्दोबभूवह ॥ एवं तौ दम्पतीराजस्वकर्मवशगौतदा ॥२५ ॥ ऋतुसंपर्कदोषेण तिर्यग्योनिमुपागतौ । स्वधर्माचरणाज्जातावुभौ जातिस्मरौ पर ऋतुसंपर्कदोष से अपने कर्मों के वश हो फिर जन्मे ।।२३। ओर ऋतुसंपर्क से दूसरे जन्म में जयश्री का कुतिया का जन्म भया और सुमित्र अर्थात् उसके पति का ॥ २४॥ दूसरा जन्म बैल २ पं० ऋ० १६ एक समय वर्षा समय में गृहस्थी का काम अधिक करके थकी हुई वह चंचल मन बोली ॥२०॥ क्षेत्रादिपुरतासाध्वी व्याकुलीकृतमानसा ॥२०॥ एकदा सात्मन: प्राप्तमृतुकालं व्यलोकयत् । रजस्वलाऽपिसाराज न्गृहकर्म चकारह ॥ २१ ॥ भाण्डादीन्यस्पृशद्राजन्नती प्राप्तेपिभामिनी । कालेनबहुनासाध्वीपञ्चत्वमगमत्तदा ॥२२॥ तस्याभापि विप्रोऽसौकालधर्ममुपेयिवान् ।एवंती उसी समय ऋतुवती हुई। वह ऋतु प्राप्त होने पर भी अपने घर का सब काम किया करती थी ॥२१॥ १६ हे राजन् ! ऋतुकाल प्राप्त होने पर भी उसने भाण्डादिकों को स्पर्श किया । बहुत दिन बाद .. ।
करताया। उसके देश में वेद और वेदाङ्गों में प्रवीण मित्र नामक एक ब्राह्मण वास करता था॥१७॥हे राजर्षिश्चतुर्वानुपालकः । तस्यदेशेऽवसद्विषो वेदवेदाङ्ग पारगः ॥१७॥ सुमित्रोनामराजेन्द्र सर्वभूतहितेरतः। कृषि वृत्या सदायुक्तः कुटुंबपरिपालकः ॥१८ ॥ तस्य भार्यासु साध्वीच पतिशुश्रूषणेरता । जयश्रीनामविख्याता बहुभृत्य सुदृजना॥१६॥अतिचिंतान्विता साचपावट्काले सुमध्यमा राजन् सुमित्र ब्राह्मण अपने सब प्राणियों के सुखार्थ खेती प्रादि में लगा रहता था, कुटुम्म पालन करता था ॥१वाउसकी स्त्री नयश्री नामा बढी पतिव्रता थी किन्तु घरमें धनादि से दुखी थी. १६). भ ऋ० १५ पोण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे दिन धोबिन के समान और चौथे दिन शुद्ध होती हैं ॥१३॥ जान के अथवा अजान से स्पर्शास्पर्श का जो पाप है सो ऋषिपंचमी का व्रत करने से छूट पसंक्षयार्थ वैकार्येयं ऋषिपंचमी ॥१४॥ सर्वपापप्रशमनी सर्वोपद्रवनाशिनी । ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रैः स्त्रीभिः कार्या विशेषत: ॥१५॥ अत्रार्थे यत्पुरावृत्तं प्रवक्ष्यामि कथानकम् पुराकृतयुगे राजाविदर्भायां बभूवह ॥१६॥ श्येनजिन्नाम जाता है ।। १५ ।। संपूर्ण पापों को दूर करने वाला भोर सब उपद्रव का नाश करने वाला ऋषिपं१५ चमी का व्रत चारों वर्ष की स्त्रियों करें ॥ १५ ॥ इसकी एक कयासतयुग की यह है कि विदर्भ देश में एक राजा था ॥ १६ ॥ उसका नाम श्येनजित नाम राजर्षि था वह चारों वर्ष का पालन ..
जगह बाँट दिया ॥ १०॥ पहिला भाग अग्नि की पहिली ज्वाला में, दूसंग नदी के पहिले । बाद में, तीसरा भाग पर्वत में और चौथा भाग स्त्रियों के रजोधर्म में छोड़ दिया॥११॥इससे चारो प्रथमोदके । पर्वतेषुच राजेन्द्र नारीरजसिपार्थिव ॥ ११॥ अतारजस्वलानारी प्रोत्सार्याचप्रयत्नतः । ब्रह्मणः शासना त्पार्थ चातुर्वर्ण्यन सर्वदा ॥ १२॥ प्रथमेहनिचाण्डाली द्वितीयेब्रह्मघातकी।तृतीये रजकीप्रोक्ता चतुर्थेहनिशुध्यति ॥ १३॥ अज्ञानाज्ज्ञानतोवापि जातं संपर्कपातकम् ।तत्पा वर्ण की रजस्वला स्त्री को छूने को ब्रह्माजी ने मना किया है ॥१२॥ रजस्वला स्त्री पहिले दिन पं. समय में वृत्रासुर राक्षस का जब इन्द्र ने वध किया तब उसे ब्रह्महत्या लगी ॥७॥ हे युधिष्ठिर उस हत्या से दुखी होकर राजा इन्द्र ब्रह्मा के पास गये और अपनी हत्या छुटाने की प्रार्थना तयावैराजशार्दूलबीडितो वृतसूदनः। ब्रह्माणंसमुपागच्छदा त्मनः शुद्धिकारणात् ॥ ८॥ ततोदेवैः समं ब्रह्माक्षणंध्यानं चकारवै । शुद्धिंशक्रस्यराजेन्द्र प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥६॥ विभज्यब्रह्महत्यांतु चतुर्धाच चतुर्मुखः ॥ प्राक्षिपद्राजशा र्दूलचतुःस्थानेषु वैतदा॥ १० ॥ वन्हौप्रथमज्वालाषु नदीषु किया । तब ब्रह्माजी ने ध्यान कर देखा और विचार किया कि देवेन्द्र की शुद्धि कैसे होनी चाहिये || || ऐसा विचार करके ब्रह्म त्या का चार भाग कर दिया और उसको चार १है ।
के पापकर्म बन पड़ते हैं ऋषिपंचमी व्रत करने से किस प्रकार के पाप से स्त्रियाँ छूटती हैं ॥४॥ कृष्ण भगवान् बोले कि जो स्त्री गृहकार्य में लगी हुई रजस्वलावस्था में जानके अथवा अजान जाता रजस्वला।दुष्टास्पृशतिभाण्डानि गृहकर्मणिसंस्थिता ॥५॥ प्राप्नोति च महापापं सत्यं सानरकं ब्रजेत्।शृणु तत्का रणं यस्माद्वजनीया रजस्वला ॥६॥ प्रोत्सार्या गृहतो दूर चातुर्वर्ण्यनभारताब्रह्महत्यांपुराशक्रोवृत्रहत्वाह्यवापच ॥७॥ से भाण्डादिकों का स्पर्श करती हैं।॥५॥ वह इस पाप से नरकवास करती हैं रजस्वला के त्याग करने को कारण सुनो ॥६॥ चारों वर्णो की रजस्वला को गृहस्थी के कामों से अलग रहना चाहिये पहिले .
पं०
ऋ० हो जाता है ॥२॥ फिर युधिष्ठिर ने कहा कि हे कृष्ण वह पंचमी कौन है और ऋषिनामक क्यों
१३ युधिष्ठिर उवाच ॥ कीदृशी पञ्चमी कृष्ण कथं च
ऋषिसंज्ञिता । पातकान्मुच्यते कस्मात्तत्सर्वं कथ
यस्व मे ॥ ३ ॥ पापानि च बहून्यत्रविद्यन्ते किल
केशव । कथं वा ऋषिपञ्चम्यां नारी कस्मात्प्रमु
च्यते ॥४॥ कृष्णउवाच ॥ अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि या स्त्री
है चौर स्त्रियों के किस प्रकार के पापों का नाश होता है सो,कहिये ॥३॥ हे केशव अनेक प्रकार
१३
.
एक समय वन में युधिष्ठिर ने श्रीकृष्णभगवान् से पूछा कि हे प्रभो मैंने बहुत से व्रत सुने अथ भविष्योत्तरपुराणोक्त ऋषिपंचमीकथाप्रारम्भः ॥ युधिष्ठिरउवाच ॥ श्रुतानि देवदेवेश व्रतानि सुबहूनि च साम्प्रतं मेऽन्यदाचक्ष्व व्रतं पापप्रणाशनम् ॥ १ ॥ श्री कृष्णउवाच ॥ अथान्यदपि राजेन्द्र पंचमीऋषिसंज्ञितम्। कथयिष्यामि यत्कृत्वा नारीपापात्प्रमुच्यते ॥ २ हैं भर आपसे संपूर्ण पापों का नाश करने शला व्रत सुनने की इच्छा है सो आप कहिये॥१॥ तब श्रीरप्पजी बोले कि हे राजेन्द्र ऋषिपंचमी एक व्रत है जिसके करने से स्त्रियों को पाप नष्ट - - प० +gnikaner १२ असे जो फल होता है.सो सब इस व्रत के करनेवाली स्त्री इस संसार में धन पुत्रारूप लावण्य आदि का सुख पूर्ण भोगती है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ और परलोक में परमगति को प्राप्त होती सर्वदानेषुयत्पुण्यं तदस्यव्रतचारणात् ॥ ३३॥ कुरुतेयावतं चैतत्सानारी सुखभागिनी॥रूपलावण्यसंयुक्ता पुत्रपौत्रादि संयुता ॥ ३४॥ इहलोकेसदेवस्यात्परत्राप्यक्षयागतिः॥व्रत स्यास्यप्रभावेण जातिं स्मरति पौर्विकीम् ॥ ३५ ॥ इति हेमाद्रिब्रह्माण्डे ऋषिपञ्चमीकथासमाप्ता । और इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को पहिले जन्म की जाति का ज्ञान भी होता ह३५|| ति हेमादि ऋषिपंचमी कथा समाप्सा | side १२ कश्यप १ अत्रि २ भरद्वाज-३ विश्वामित्र गोतम जमदग्नि वमिष्ठ ७ ये सप्तऋषि हैं इनको अर्घ्य दे ।। ३३.० : मन में चिन्तना करे कि ग्रंध्य ग्रहण करके मेरे ऊपर प्रसन्न होवे हे त्रिभरद्वाजोषिश्वामित्रस्तुगौतमः॥ जमदग्निर्वसिष्टश्च सप्तै तेऋषयः स्मृताः॥३०॥गृह्णन्वयमयादत्तंतुष्टं भवेतुमेसदा॥ श्रोतव्यमिदमाख्यानंशाकाहारं प्रकल्पयेत् ॥३१॥ स्थातव्यं ब्रह्मचर्येण ऋषिध्यानपरायणः ॥ अनेनविधिनासम्यग्वतभेत समाचरेत् ॥३२॥ तस्यतज्जायतेपुण्यं सर्वतीर्थषुयत्फलम् ॥ सुशीले ! इस कथा को सुनकरशाकाहार करे।।३१॥ ऋषियों के चरण का ध्यान करके सदाचार से रहे इस प्रकार उत्तम रीति से व्रत करे ॥३२॥ तो सम्पूर्ण तीर्थों के करने से संपूर्ण दानादिक ------ : يتيمه لي - ऋ० उसी दिन तार्थनदी आदि में स्नान करके नियम सहित यज्ञशाला में जाकर ऋषियों का ॥२७० यममेवच। विधायनित्यकर्माणिगत्वा द्वारवतीमृषीन्॥२७॥ स्नापयेद्विधिवद्भक्त्या पञ्चामृतरसैः शुभैः ॥ चन्दनाग रुकविलिप्यच सुगन्धिभिः ॥ पूजयेद्विविधैः पुष्पगन्धधूपा दिदीपकैः॥२८॥ समाच्छाद्यशुभैर्वस्त्रैःसोपवीतैयथाविधिः।। ततो नैवेद्यसंपन्नमयं दद्याच्छुभैः फलैः ॥ २९ ॥ कश्यपो विधि मे पूजन करें पंचामत से स्नान करावै चन्दन ! पुष्प धूप दीप आदि से अर्पन करें ॥२७॥ शुद्ध वस्त्र जनेऊ अतर आदि नैवेद्य कन्दः ल फल पक्वान्नादि अर्पण करै ।। २६या .. कथाः कहिये ॥ ऋषिली बोले ॥ हे सुशीले सम्पूर्ण बनको चित्त लगा कर सुनः॥ २४ ॥ जिस के करने से शीघ्रही पाप से छूट कर स्त्रियाँ सौभाग्य को प्राप्त होती हैं ॥ २५॥ और कल्याण तंकथयस्वमे ।। ऋषिरुवाच ॥ सुशीले शृणुतत्सम्यग्वताना मुत्तमं व्रतम् ॥२४॥ येनचीर्णेन सहसा पापादस्मात्प्रमुच्य ते॥दुःखत्रयाद्विमुच्येत नारीसौभाग्यमाप्नुयात् ॥२५॥ क ल्याणानि विवद्धते संपदश्चनिरापदः ॥ नभस्येशुक्लपक्षेतु यदाभवति पंचमी ॥ २६॥ नद्यादिपुतदा स्नात्वाकृत्वानि की बृधि धन संपत्ति की प्राप्ती होती है। भादों महीना में शुक्लपक्ष की जिस दिन पंचमी हो-२६॥
१०, इसका शर कीड़ों से पोड़ा हुआ है ॥ २१ ॥ हे प्रिये इसके दुःख का कारण जो था शुः सो मैंने तेरे से कहा । तब फिर कन्या की माता सुशीला बोली कि जिस व्रत कृमिराशिमयीधुना॥२१॥एतत्तकथितं सर्वकारणंदुष्कृतस्य च॥सुशीलोवाच ।।दर्शनादपि यस्यास्य विप्राणां निर्मलेकुले ॥२२॥जन्मयुष्मद्विधानांहि जायते ब्रह्मतेजसाम् । अवज्ञया प्रजायन्तेनिशीथेकृभिराशयः ॥ २३ ॥महाश्चर्यकरंनाथतद्र के दर्शनमात्र से ब्राह्मणवंश में ।। २२ ॥ भाप सदृश तेजस्वी के यहां जन्म लिया उस व्रत का निरादार करने से सोती हुई कन्या का शरीर कीड़ों से भर गया ॥ ॥ २३ ॥ उस उत्तम व्रतकी १० पाप से इसके शरीर में कीड़े पड़ गये हैं ||१८|| रजस्वला नारी प्रथम दिन चाण्डाली दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी ।। १९ ॥ तीसरे दिन, धोबिन के समान होती है, चतुर्थ दिन शुद्धि को प्राप्त होती स्वलायाः पापेनयुक्ता भवतिसाऽनघे ॥ प्रथमेहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी॥१६॥ तृतीयेरजकी प्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शध्यति ॥ तदातयासखीसङ्गाद्रुतंदृष्टाऽवमानितम् ॥२०॥ दृष्टंवतप्रभावेण जालाद्विजकुलेऽमले॥ अवमानाठूतस्यास्य है अपनी सखियों को व्रत करते देख करके भी इसको विचार एवं श्रद्धा नहीं भई ॥ २० ॥ अतः तावरण देखने से इसका उत्तम ब्रह्मकुल में जन्म भया । परन्तु ऋा के निरादर से - है सो कृपाकरके कहिये ॥१५॥ महाप ने इस वाक्य को सुनके ध्यान करके विचार किया ॥१६॥ तब मालूप भया कि पूर्वजन्मानित पाप है, सातवें जन्म में यह ब्राह्मणी थी ॥ १७ ॥ रजस्वला निशीथसंप्रसुप्तेय जायते कृमिसंकुलाः ॥ एतच्छ्रुत्वाततो वाक्यमृापानपरायणः॥१६॥ज्ञात्वानिवेदयामास तस्याः प्राग्जन्मचेष्टितम्।ऋषिरुवाच।प्रागियं सप्तमेऽजीवजन्मनि ब्राह्मणीधभूत् ॥१७॥ रजस्वला चसंजाताभाण्डादीन्यस्पृश त्तदा ॥ अस्यास्तुपाप्मनातेन जायतेकृषिवद्वपुः ॥१८॥ रज धर्म के समय इसने घरका सब सामान छूने का विचार नहीं किया और संपूर्ण स्पर्श किया उसी के पास जल्दी से गई उसको कीड़ों से इस देखकर बड़ा विलाप पीटती हुई मूर्छित हो गई, जब उसको हार गया तब पुत्री को उठाकर रुदीरितम् ॥१२॥ साभान्तमनसाशीघ्रतत. सातां तथाविधांदृष्ट्वा विललापसुदुःखिता ॥१३॥ उरश्चताड यामाससुतरांमोहमापच ।। क्षणेन चेतनां प्राप्यतामुत्थाप्य प्रमृज्यच ॥१४॥ समालम्ब्य च बाहुभ्यामित्येतत्पितुरन्ति कम् । स्वामिन्कथयमे साध्वीकेनदुष्कृतकर्मणा ॥ १५॥ पास हाथ पकड़ के लेगई और उनसे पूछा कि हे स्वामिन् किस पाप से इसकी ऐसी दशा होगई ....
J रात्रि में शयन करन पर उस कन्या के सींग में कीड़े पड़ गये तब वह दुःखी वस्त्रहीन एक पत्थर पर पठी थी ।। १० ।। उसके पिता के शिष्य लोग उसको देखके उसकी माता के पास गये और -- यत ॥ तथाविधांचतांदृष्ट्वाविवस्त्रांप्रस्तरस्थिताम् ॥ १० ॥ शिष्यानिवेदयामासुस्तन्मातुःकरुणान्विताः ॥ नजानीमोव यंकिंचिदेविसाध्वीं तथाविधाम् ॥११॥ कृमिराशिमयीजाता मातः सम्प्रति दृश्यते ॥ वजपाच्छदृशं वाक्यं श्रुत्वाशिष्यै बड़ी करुणा से करने लगे कि हे माना किस कारण साची की ऐसी दशा होगई ।।११।। इसका सोंग कीड़ों का देर होगया है। इनके ऐसे दुखादाई वचनों को सुनके माता विकल होकर कन्या .
. A1 से कर दिया था भाग्यवश वह कन्या वैधव्य को प्राप्त भई । तब वह कन्यो अपने पिता के यहाँ विवाहितवैसा देवाद्वैधव्यं प्राप सत्तम ॥ ६॥ सतीत्वंपाल यन्तीसाास्ते निजपितुर्ग्रहे ॥ तस्यादुःखेनसंतप्तः सुतंसं स्थाप्य वेश्मानि ॥७॥ गंगातीरवनं प्राप्तो सकलत्रस्तयासह ॥ सतत्राध्यापयामास शिष्यान्वेदं द्विजोत्तमः ॥ ८॥ सुताच कुरुते तस्य पितुः शुश्रूषणं परम् ॥ पितुः शुश्रूषणं कृत्वापरि श्रान्ताकदाचन ॥६॥ निशीथेकिलसंसुप्ताकृमिराशिरजा रह कर धर्म । नवह करने लगी। पिता की सेवा गृहस्थी का काम करके थक कर एक समय ht प. ७ i ऋ. से नरदेही नरक को कदापि नहीं प्राप्त होती है, इसकी एक प्राचीन कथा है सो भी कहते हैं ॥३॥ विदर्भ देशवासी उत्तंक नामक एक ब्राह्मणं सर्वगुण संपन्नथा, उसकी स्त्री सुशीला नाम से विख्यात तिहासं पुरातनम् ॥३॥ वैदर्भेचद्विजवर उत्तंकोनामनामतः। तस्यभार्यासुशीलेतिपतिव्रतपरायणा ॥ ४ ॥ तस्याअपत्य युगलं पुत्रोहिसुविभूषणः । अधीतवान्सुतस्तस्य वेदान्साङ्ग पदक्रमान् ॥ ५॥ समानेच कुलेलेन सुताचापि विवाहिता। बड़ी पतिव्रता थी ४॥ उसको दोसन्तति थी, एक पुत्र सुविभषण नाम का था जो वेदशास्त्र पढ़ता था और एक कन्या थी जिसका विवाह उत्तंक न एक उत्तम कुल के विद्वान ब्राह्मणं के सुन्दर कुमार - अथ कथामारंभः ॥ सिताश्व नामक राजा ने ब्रह्माजी से कहा कि हे ब्रह्मन् मैंने अनेक बत- माहात्म्य सुना है अब श्रीमुख से सब प्रकार के पापों का नाश करनेवाला ब्रतमाहात्म्य सुनने अथ कथाप्रारम्भः ॥ सिताश्वउवाच ॥ श्रुतानिदेवदेवेश व्रतानि सुबहूनिच । साम्प्रतंमे समाचक्ष्वव्रतंपापप्रणाशनम् ॥ १॥ ब्रह्मोवाच ॥ शृणुराजन्प्रवक्ष्यामि व्रतानामुत्तमम् व्रतम् ॥ ऋषिपञ्चमीति विख्यातं सर्वपापहरं परम् ॥ २॥ येनचीर्णेनराजेन्द्रनरकं नैव पश्यति॥अत्रैवोदाहरन्तीममि- ऋषिपंचमी का व्रत है सो तुम्हारे स्नेह से कहते हैं सुनो ॥ २॥ हे राजेश्वरऋषिपंचमी व्रत करने | की इच्छा है ।।१॥ ब्रह्मा न कहा कि हे.गजन ब्रतों में श्रेष्ठ पापों का नाश करनेवाला सप्तर्षि, ६ ऋ० से दक्षिणा चढ़ाना। यानि से (प्रदक्षिणा) फेरा करनो ॥ नमोस्तु० मंत्र से नमस्कार करना एतेसप्तर्प०. से प्रार्थना करना। वायनदानका सङ्कल्प कर ओवाहनकरे और ऋग्यजुः मन्त्रसे ब्राह्मण वायनदानविधिः।न्यूनातिरिक्तकर्माणिमयायानिकृतानिचा क्षमध्वंतानिसर्वाणियूयसैवतपोधनाः ॥ यान्तुदेवगणाःसर्वेपू जामादायमामकीम ॥ इष्टकामासमृध्यर्थे। पुनरागमनायच।। एवंसंपूज्यविधिना भक्तियुक्तेनचेतसा॥तेषामग्रेचश्रोतव्यं शुभंचैवकथानकम् ॥ इति पूजा विधिः ॥ पूजन करें। फल घृत पक्वान्न दक्षिणा समेत वायन ब्राह्मण को दे लिखे मंत्रों से प्रार्थना करें। फिर कथा सुनके कपूर आर्ति करके यान्तुदेव० मंत्र से विसर्जन करदे ॥ इति पूजाविधिः ॥
फिर ३ आचमनी जल गिरावना । श्रोचमन और पान करने के बाद हाथ धोने को जलदे नमो एतेसप्तर्षयःसर्वेभक्त्यासंपूजितामया।सर्वपापंव्यपोहन्तु ज्ञा नतोऽज्ञानतःकृतम् ॥प्रार्थयेत्॥अथवायनम् ॥ कृतायाःपूजा याःसांगतासिध्यर्थब्राह्मणायवायनंदातु०॥ तथा ब्राह्मणपूज नं करिष्ये॥वायनंफलसंयुक्तं सघृतंदक्षिणान्वितम्॥द्विजव यदास्यामिवतसंपूर्तिहेतवे। भवन्तःप्रतिगृह्णन्तुज्योतिरू पास्तेपाधना उभयोस्तारकाःसन्तुवायनस्यप्रदानतः॥ इति वेद० मंत्र से फल समर्पण करना । पूगीफल० मंत्र से पान सुपारी चढ़ाना ।। हिरण्यगर्भः इस मंत्र ५ ० शुभ्राक्षताक्ष० मंत्र से अक्षत. चढाने । मालनी चंपकादिक मंत्रसे फूल चढाने॥ वनस्पति मंत्र पं. व्यंनागवल्लीदलैर्युतम्॥ कर्पूरेणसमायुक्तं ताम्बूलंपतिगृह्यता म्ताम्बूलंस०॥हिरण्चगर्भगर्भस्थं हेमबीजविभावसोः॥अन न्तपुण्यफलदमतःशान्तिप्रयच्छमे॥दक्षिणांस०॥यानिका निचपापानिब्रह्महत्यासमानिच। तानिसर्वाणिनश्यति प्रदक्षि णपदेपदे॥प्रदक्षिणांस०॥नमोस्तुऋषिवृन्देभ्योदेवर्षिभ्योन मोनमः॥सर्वपापहरेभ्योहिवेदविदभ्योनमोनमः॥नमस्कारः॥ से धूपाति करना। साज्यं च० मंत्र से दीपार्ति करना। नाना पक्वान्न मंत्र से नैवेद्य लगावना ।
इससे पंचा तस्नान करावे । मन्दाकिनि० मंत्र से जल से स्नान करावै ॥ सर्वे नित्यं मंत्र से जितंमया।दीपंगृहाणदेवेशत्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥ दीपम् ॥ नानापक्कान्नसंयुक्तं रसैःषभिःसमन्वितम्॥ गृह्णन्तुऋषयः सर्वमयानैवेद्यमर्पितम॥ नैवेद्युसमर्पयामि ॥ मध्येपानीयम् स०॥उत्तरापोषणस०॥हस्तप्रक्षालनं०॥करोद्वर्तनार्थेचन्दनं स०॥नमोवेदविदःश्रेष्ठाऋषयःसूर्यसन्निभाः॥गृहणंत्विदंफलं तुष्टामयादत्तं हि भक्तितः॥ फलंसमर्पयामि॥ पूगीफलंमहद्दि वस्त्र चढ़ाने। नाना मन्त्रः० इस मंत्र से यज्ञोपवीत चढ़ावैकुंकुमागुरु० मंत्र से चन्दन चढ़ावै।।
ऋ० ऋग्यजुः मन्त्र से सन दे । गन्धपुष्पाक्षः० मंत्र से पार्याघ चढ़ वै ॥ नमस्ये शुक्ल. चंदनंदिव्यंगृहन्तु ऋषिसत्तमाः॥ गन्धम् ॥शुभ्राक्षताश सं पूर्णाःप्रक्षाल्यचनियोजिताः॥ शोभायैवोमयादत्ता गृह्यन्तां मुनिसत्तमाः॥ अक्षताः॥मालतीचंपकादीनि तुलस्यादीनिवै द्विजाः॥मयाहृतालिपुष्पाणिपूजार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ पुष्पाणि। वनस्पतिरसोद्भूतोगन्धाढ्यःसुमनोहरः॥आप्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥धृपम् ॥ साज्यंचवर्तिसयुक्तंवह्निनायो इससे गन्धादिसहित जल अयं चढ़ानै । लोकानां इस मंत्र से आचमन करावे । पयोदधिः .
करै कराड़ा सूर्य के समान तेजस्वी जटावल्कल धारण किये भस्म लगाये कुशो कमण्डल हाथ में लिये सत्तमाः॥पंचामृतम्॥मन्दाकिनीगोमती च यमुना च सरस्व ती।कृष्णा चनर्मदातापीताभ्यःस्नानार्थमावृतम्॥स्नानम्॥ सर्बेनित्यंतपोनिष्ठा ब्रह्मज्ञाः सत्यवादिनः॥वस्त्राणि प्रतिगृह्न न्तुमुक्तिदाःसन्तु मे सदा॥वस्त्राणिनानामन्त्रैःसमुद्भुतंत्रि वृत्तं ब्रह्मसूत्रकम्॥प्रत्येकं चप्रयच्छामिऋषयःप्रतिगृह्यताम्॥ उपवीतानि॥कुंकुमागुरुकर्पूरसुगन्धैर्मिश्रितं शुभम् ॥ गंधाढ्यं अरुन्धती परम सती सत्यवती सहित ऋपिवृन्द का चिन्तन करै श्रागच्छन्तु० इस मंत्र सेआवाहन करके पं० ३ ० पात्र को कलश पर रखके कुश के सप्त ऋषि और अरुन्धती जो की स्थापना करना फिर संकल्प गन्धपुष्पाक्षतैर्युक्तंपाद्यगृहन्तुभोद्विजाः॥ प्रसादंकुरुत पीता स्तुष्टाः सन्तु सदामम। इ० पाद्यम् ॥ नभस्येशुक्लपंचम्यां अ चिंताऋषिसत्तमाः॥दहन्तुपापंस मेगृह्णन्त्वयं नमोनमः॥ इ० अर्यम् ॥लोकानांतुष्टिकर्तारोयूयंसर्वेतपोधनाः॥नमोयो धर्मविज्ञेभ्यो महर्षिभ्योनमोनमः॥इ० आचमनम्।पयोदाधि घृतंचैव शर्करामधुसंयुतम्॥पंचामृतेन स्नपनं करिष्ये ऋषि करके विधिवत् पूजन आवाहन करै।। अथ पूजाविधिः ॥ हाथ में फूल लेकर ऋषियों का ध्यान ३.
अवीर से अष्टदल बनाय के जलपूरित तामे के कलश में केसर पंचरत्न पंचपल्लव छोड़ के वस्त्र न्धतीसहितकश्यपादिसप्तर्षिप्रीत्यर्थं सप्तर्षिपूजनमहमाच रिष्ये।मूर्तब्रह्मण्यदेवस्य ब्रह्मणस्तेज उत्तमम् । सूर्यकोटिम तीकाशं ऋषिवृन्दं विचिन्तये॥इतिध्यानम् ॥आगच्छन्तुम हाभागाश्चतुर्वेदंपरायणाः । यावद्तमिदंकुर्वे कृपया भवताम हम् ।। इत्यावाहनम् ॥ ऋग्यजुः सामेवदानां स्वरूपेभ्योनमो नमः।पुराणपुरुषेभ्योहि देवर्षिभ्योनमोनमः॥इत्यासनदानम्॥ कलश के गले में लपेट कर ऊपर १ चौड़ी रिकाबी में श्वेत वस्त्र विछाय के अष्टदल बनाना उस
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अथ ऋषिपंचमी
भाषा टीका सहितः।
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