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Isavasyopanishad
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श्रीहरिर्जयति। प्रेक्षावदुपच्छन्दनम् । यत्तवर्षचतुश्शवादपि परेणाऽनेहसा न स्थितं व्याख्यानं प्रतिवर्णवर्णित- गुणोदारं भ्रमोत्सादनम् । यस्याऽभावत एव नैव विविदे पुष्टेः परैः प्रौढिमा तच्छ्रीवल्लभनन्दनाजि- रजसा सिद्धं समास्वाद्यताम् ॥
अभ्यर्थना ।
[१]
भवतः श्रीमदाचार्या भवदीयोऽहमाश्रये ।
मदीयोऽयं मदीयोऽयं विचारयत मामिति ॥
[२]
अज्ञानं विनिवर्ततां विगलतान्मिथ्याभिमानोदयः
सद्विद्याभ्यसनं जनस्य भवतात्मौदं च तेजस्वि च ।
सद्विद्यालयपूर्वकच भगवत्सेचादरो जायतां
मा भूत्कोऽपि कुतोऽपि कइमलकृशोऽसात्सम्प्रदाये जनः ॥
[३]
श्रीमत्पादसरोजरेणपु भवत्पुत्रेन्दुपादालयोः
श्रीगोपीजनवल्लभे च विततः सेवानुरागोदयः।
अस्माकं वितनोतु चेतसि मुदं कामप्यमन्दां सदा
सिद्धान्ताधिसुधा सुधाब्धिमधुराखादानुवादा च वः॥
श्रीहरिर्जयति।
उपस्थानम् ।
सस्ति श्रीमदमन्दमन्दरदरोन्मीलन्द्रयाघूर्णित-
क्षुभ्यरक्षीरमहोम्मिमालिविलसल्लीलापिलासश्रियः।
नानानिचनीयविभ्रमभृतः क्रीडन्ति यत्कीर्तय-
स्ते थीगोकुलनाथदेशिकमहाराजाः प्रथन्तेतमाम् ॥१॥
जयन्ति गोस्वामिगणानगण्याः श्रीवल्लभाचार्यकुलावतंसाः।
विशुद्धवेदाभ्यविधानसावधानाः श्रिया गोकुलनाथपादार ॥२॥
भाग्यानि भारतभुवो बदनारविन्द-
सिन्दूरविन्दुसदशा अपि मोहमय्याः ।
प्राणाः परावरपुपः परमार्थसृष्टे-
रप्याश्रया सुरूतिनां गुरुवस्तुबुद्धः ॥ ३ ॥
सौजन्यसोशील्यकृपाभिरामाः श्रीपुष्टिमार्गोदययकामाः।
सच्छात्रसंशीलनयातयामा भवत्तु भूयासुरमी प्रणामाः ॥ ४॥
सनातन वैदिकसम्प्रदायं श्रीपुष्टिमार्ग भुवि भासयन्तः ।
काले करालेऽपि फलौ जटाले सत्यं भवन्तोऽप्रतिमप्रभावाः ॥ ५ ॥
गोग्रामणप्राणपरायणानां प्रसाधिताशेपककुम्मुखानाम् ।
सदा सदाचारविचारकाणां पारं न यामो भवतां गुणानाम् ॥ ६॥
अग्रेसराणां सुधियां समाजे सद्धर्मपीयूपपयोधराणाम् ।
"भाचासिंहासनमास्थितानां प्राप्यते कोऽपि पर: प्रतापः॥ ७ ॥
श्रीयालकृष्णमुसचन्द्रसुधाचकोरा.
स्तत्सेवयैव सकलस्य निरस्तघोराः।
उघाटितासिलजगत्परमार्थचोराः
थोमस्वरूपनिदा फयम.मि.न.1.21.
विधांसः परिपोपिताः परिजनस्त्रातो हतो दुप्पथः
पाण्डित्यं परिपूरितं निजजने भूयो धनं घर्पितम् ।
सत्याचारविचारसारसरणिः सभ्यासमभ्यासिता
श्रीराणो हृदये न्यघायि सरसः पादस्पृशां मारशाम् ॥९॥
६ गोरक्षा विहिता हिता व्यवहिता मध्ये खलोपद्वैः सद्धर्मः परिवदितः प्रकटितः सम्पादितः पाठितः। सद्विद्याविनयादिसहुणगणांल्लोकोऽ ऽयमध्यापितः सन्मार्गः प्रचुरीकृतः परिहृतः पाटञ्चरोपद्वः ॥१०॥ व्याख्यानानि कृतानि तानि शतशः सहयातिगानां सतां यानीमानि मनः पिपासतितमाम्पपीयमानान्यपि । सद्विद्यालयमाचरय्य विविधा विद्यार्थिनोऽध्यापिता विद्वांसोऽप्यभिवर्द्धिता धनसमुत्साहादिदानै शम् ॥ ११॥ श्रीमद्भागवतस्य भूरि विदघे पारायणानां शतं यत्राऽभ्यर्चित एप चारु ववृधे विद्वज्जनानां गणः । सर्वोपक्षयवारणाय च महायुद्धाग्निनिर्वापण- प्रारम्भाय परुत्पराक्रमपरं चक्रे सहस्रात्परम् ॥ १२ ॥ निगमगदितं पन्थानं सं सुखादववोधय. मनु विजयते ग्रन्थवातः परो महितः श्रिया। तमिह विशदीकर्तुं कर्तुं द्विपां मुखभखनं पुरु परिकरश्चके मुद्रापणादिषु कर्मसु ॥ १३ ॥ तत्तद्भापानुवादप्रकटनविधिना ग्रन्थगूढाशयानां मर्मज्ञ मूढलोकं विकलमपि रुपाकर्मठत्याद्वितेनुः। तत्तगीर्वाणभापामयमधुमधुरप्रौढयन्धानिवन्धा. निर्माप्याऽपि समार्ग दिशि दिशि दिदिशुर्बुद्धये शुद्धये च ॥१॥ अनुजगृहुश्च मामविरलेन महामहसा भगवदनुप्रहेण सहसैव विधाय रूपाम् । उपनिषदां विधेहि शिशुभाप्यमिति क्षरता निजवचनामृतेन शिशिरेण शिवं सृजता ॥ १५ ॥ श्रीधीमदल्लभाधीश्वरकुलकमलोल्लाससूर्योदयानां श्रीश्रीमद्वालकृष्णप्रभुपदनलिनद्वन्द्वसेवापराणाम् । विद्वद्भिर्यन्दितानामगणितगुणगीगेंयगाथागुरूणां गीयन्ते गौरवाणि प्रतिदिशमनिशं श्रीमतां वर्षधूमिः ॥१६॥ + . तत्तदुस्सहदुर्विपतिदहनज्वालावलीढोऽपि यः श्रीमद्रोकुलनाथदेशिफद्यादृष्ट्या समुजीवितः । तेषामेव कपाविशेषविशदज्योत्स्नाचकोरायितो भश्रीग्लभद्रशर्मसुकृतीशावास्यभाष्यं व्यधात् ॥ १७॥ एपा मे परमश्रमेण विहिता चिन्तायता चेतसा श्रीमत्पादसमईणेकवदया रम्याकृतिाकृतिः। सानन्दं विनयावनम्रहृदयं चैयाऽपिता पादयोः सा श्रीमत्करपल्लवे चिलसिता फुलारविन्दायताम् ॥ १८॥ श्रीरुप्पाजीवनबुधैर्भवदीयपुन- पर्यः प्रशस्ततमपण्डितपुण्डरीकैः । दत्तादरा सहदयैरभिनन्दिता च सा का कृतिहदि चमतिमातनोतु ॥ १९ ॥ श्रीदीक्षितर्वस्तनयेदितीयैरशेषशास्त्राणि विदां वरेण्यः । कृपाभिवर्षाजनितप्रकर्षा हविहा यः कृतिनां कृतिः स्तात् ॥ २० ॥ जीवजीवं सुखयन् फुवलयमुल्लासयंस्तमांसि हरन् । विकिरनमतान्यभितः श्रीगोकुलनाथचन्द्रमा जयति ॥ २१ ॥ इत्युपहरति श्रीमत्समईणाभ्यासपद्धयहुमानः । नित्यानुफम्पनीयो बलभद्रः किइरो भवताम् ॥ २२॥ शुभम्।
श्रीहरिजयति । कृपा-कटाक्ष की प्रार्थना। "शास्त्रमवगत्य मनोवाग्देहैः कृष्णः सेव्य इत्यर्थः" । घेद वेदाङ्ग भादि घेदानुकूल शास्त्रों को पढ समझ कर मन पंचन और उनसे श्रीकृष्ण भगवान की सेवा करनी चाहिये । घेदों का यही तात्पर्य है। श्रीमदल्लभाचार्यचरण. श्रीमद्वल्लभाचार्यचरण-प्रदर्शित-प्रवर्तित श्रीपुष्टिमार्ग सम्प्रदाय एकदेशी नहीं। पर निर्विवाद विश्व-धर्म है । यह बात ऊपर दी हुई पंक्ति से परिस्फुट है। क्यों कि सभी आस्तिक वैदिक आचार्य-गण उक्त सिद्धान्त मे परिपूर्ण- रीत्या एकमत हैं। किसी का कोई वाद विवाद नहीं है । श्रीशङ्कराचार्यजी भी श्रीकृष्ण को परमेश्वर मानते हैं । अनादि-सिद्ध वैदिक धर्म की रक्षार्थ प्रकट हुए खीकार करते हैं । और उनकी सेवाको स्वधर्म समझते हैं। तभी तो श्रीकृष्ण-जयन्ती आदि जयन्तियों पर व्रतादि के सदाचार का परिपालन उनके सम्प्रदाय मे प्रचलित है। श्रीमद्भगवद्गीता पर उनने भाप्य किया है । श्रीमद्भगवद्गीता को प्रमाण मानने वाले श्रीकृष्ण को परब्रह्म परमेश्वर परमात्मा जगदीश परात्पर पुरुषो- त्तम माननेसे और तन धन मन से उनकी सेवा करनेके सिद्धान्त से विमुक्त नहीं रह सकते। शास्त्रज्ञ से बातचीत है । उद्धत की धृष्टता और निर्लज्जता का कोई उत्तर नही। साम्राज्य-शासन सर्वदेशी सर्वानुकूल सर्व-सुखद सर्व-मर्यादा-संरक्षक सर्वनिर्वाहक सर्वाश-पूर्ण होता है-सङ्घर्ष-रहित परस्पर-प्रेम-परिपूरित व्यव- स्थित सबके लिये सावकाश होता है । वही उदारता पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय भी रखता है।
घरेल्ल घुसपुस नहीं पर पंचायती बात है | और पंचायती फैसला है। बाडाबंदी नही गोलमाल नही पर विश्व-हित की चर्चा और सर्वदेशी दंगली सिद्धान्त है । सच्चा है स्वच्छ है प्रकाश से परिपूर्ण है । अन्धकार को वहां अवकाश नहीं है । प्रामाणिक और निस्संशय अनुसरणीय है। वैदिक ही नहीं वैदिक-मूर्धन्य है । वैदिक दो प्रकारके होते हैं । एक वह जो यथाविधि वेदाध्ययन-पूर्वक प्राप्त किया गया हो। दूसरा वह जो वयं वेद भगवान के ही हृदय का अभिप्राय हो किंवा वेद के प्रवर्तक स्वयं परमेश्वर के हृदय का माशय हो । दूसरे मत चेदानुकूल हैं तौ वैदिक हैं । पर श्रीपुष्टिमार्ग सम्प्रदाय तो स्वयं वेद भगवान का ही साक्षात् हार्द निर्णय है। और वेद-प्रवर्तक परमेश्वर श्रीकृष्ण भगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता आदि द्वारा दुहरा कर परिस्फुट किया है। वेद से अतिरिक्त व्यक्ति किसी वेदानुवर्ती का मत नहीं है । साक्षात् स्वयं वेद भगवान का ही मत है। उसे वैदिक मत न कह कर "वेदमत" कहना अधिक उत्तम है। क्यों जी! जब सभी मत शास्त्राध्ययन-पूर्वक श्रीकृष्णसेवा मे सहमत हैं तो सभी मत वेदमत और विधधर्म हुए? नहीं! यह बात नहीं! वे मत वैदिक हैं- वेदानुकूल हैं-वेदानुवर्ती हैं । पर वेदसत और विश्वधर्म नहीं। क्यों ? इस लिये कि चे इस सिद्धान्त से सहमत तो अवश्य हैं पर प्रवर्तक नहीं । अन्य किसी भी वैदिक मत में श्रीयशोदोत्सालालित श्रीनन्दराज- कुमार श्रीगोपीजनयल्लमके भावसे भगवदाराधनका प्रकार प्रचलित नहीं है । यही प्रत्यक्ष इसका पर्याप्त प्रमाण है । सहमत होते हुए भी कावा काट कर द्रविड प्राणायाम से सहमत होते हैं । श्रीवालकृष्णलाल आदि नाम और अनस्याराधन प्रफार को छोड कर पंचरात्रायुक्त आराधन प्रकार और नारा- यण वासुदेव आदि नाम से उनका आराधन प्रकार चलता है । श्रीमद्भग- गीता के "मत्तः परतरं नाऽन्यत्" इत्यादि वचनों के अनुसार तो श्रीकृष्ण- सेवा का प्रवर्तन ही श्रीकृष्णाराधन-प्रकार ही सर्वोत्तम है। और परतत्त्व परम- काष्ठापन्न वस्तु परब्रम परमात्मा पुरुषोत्तम परमेश्वर का मुख्य नाम भी श्रीकृष्ण ही है। दूसरा नाम मुख्य नही । यही सिद्धान्त विनिर्गलित होता है। २ ईशा प्रस्तावना.
१० नारायण वासुदेव श्रीकृष्ण की विभूतियां हैं। श्रीकृष्ण ही परम तत्त्व पुरुषोत्तम विभूतिमान है। यह श्रीमद्भगवद्गीता श्रीमद्भागवत का निर्णय है। श्रीमद्भगवद्गीता श्रीमद्भागवत से अधिक वेदार्थका निर्णायक अन्य शास्त्र नही है । वेदादि शास्त्र-समूह श्रीमद्भागवतान्त है। श्रीमद्भागवत सर्वसन्देह- चारक है । श्रीमद्भागवतके अनुसार ही सर्व शास्त्रों के आशय का वर्णन फरना साक्षावेदाशय है-वेदमत है । पंचरात्र आदि आगमों का प्रामाण्य श्रीमद्भागवतानुकूल है । स्वतन्त्र नही । इस बात के न जानने न मानने से तत्तन्मतप्रवर्तकों को वेदादि शास्त्रों का आशय भी अन्यथैव गृहीत हुआ है। यथार्थ नहीं । और भी अनेक बातें हैं । जिनसे अन्य मत वैदिक तौ हैं । पर वेदमत और विश्वधर्म नही हो सकते । ये सब विशेषतायें श्रीपुष्टिमार्ग सम्प्रदाय के तत्त्वदीप निवन्य आदि मूल अन्थों के गुरुमुख से अभ्यास करने पर और उन ग्रन्थों मे प्रदर्शित प्रक्रिया के अनुसार वेद वेदान स्मृति पुराणादिकों के अभ्यास करने पर ही परिस्फुट समझ मे आती हैं। अन्यथा नही । शीर्षक-स्थित पंक्ति तत्त्वदीप निबन्ध मे साक्षात् वेद के सिद्धान्त को निष्कर्ष के रूप मे प्रदर्शित करते हुए श्रीमदल्लभाचार्यचरण ने आज्ञा की है। फिर पढिये-"शास्त्रमवगत्य मनोवाग्देहैः कृष्णः सेव्य इत्यर्थः" । अर्थात्-धेद वेदाङ्ग आदि वेदानुकूल शास्त्रों को पढ समझ कर मन वचन और तन से श्रीकृष्ण की सेवा करो। यही वेदार्थ है। शास्त्र पढ समझ लेने पर प्रतीत होता है कि अपनी अपनी मर्यादा मे स्थित रह कर, और यदि समस्त मर्यादाओं से पतित है-मर्यादा से पुनरुद्धार होना असम्भव हो तो केवल स्वतन पुष्टिमार्गीय मर्यादा मे स्थित रह फर, भगवत्स्वरूप भगवत्सेवाप्रकार को समझे हुए भगवत्सेवा मे तत्पर होन' साक्षात् वेद का सम्मत मत है। समस्त मर्यादाओं को स्थापन करते हुए, और सुरक्षित रखते हुए भगवत्सेवा का आदेश, बडा मर्मस्पर्शी तलस्पर्शी है । और परम गंभीर है फिर भी पतितोद्धारक मी है । निर्दय नहीं है । प्रसाद-पूर्ण है । उस एक सूत्र मे सारे शास्त्र-राशि को और समस्त विश्व को पिरो लिया है। व्यापक रूप धारण कर लिया है । साक्षात् और परम्परा से ज्ञान कर्म उपासना सदाचार लौकिक अलौकिक सभी क्रिया कलाप का यथायोग्य समा. वेश उसमे होता है । भोग मोक्ष और शिष्टाचार-धर्म, तीनों का, उसमे, विज्ञान-मय, विनियोग है । देश फाल परिस्थिति अवस्था का विचार किये विना समी देश फाल परिस्थिति अवस्था मे एक-सा हितकर उपयोगी आवश्यक है । और अकुण्ठित कल्याण करने के कार्य मे कृतपरिकर है। विस्तीर्ण हृदय से उदार हृदय से और सावकाश हृदय से पढिये और परखिये कि यह क्या अद्भुत अलभ्य लोक-हित कर लोकप्रिय चास्तव खरा सचा अद्वितीय अतुलनीय अनुपम परमापेक्षित उपदेश है । अमूल्य है ! "शास्त्रमवगत्य मनोवाग्देहैः कृष्णः सेत्य इत्यर्थः" । वेद आदि सच्छास्त्रों का सम्पूर्ण परिज्ञान, और भगवत्सेवा, दोनो अविभक्त अपृथक्सिद्ध विशिष्ट एक कर्तव्य हैं । जुदे जुदे नही । इस विशिष्टकर्तव्य- परायणता के लिये ही उपदेश है। जिन्हे वेद आदि शास्त्रों के पढने समझने की शक्ति नही या अधिकार नहीं वे शास्त्रज्ञ भगवद्भक्त आचार्यादि की प्रेमानुवृत्ति से शास्त्राशय को समझ-चूड़ा कर भगवत्सेवा करें और उनकी भगवत्सेवा मे सहायक हों। पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय का स्वरूप समझमें आया? यह है श्रीपुष्टिमार्ग सम्प्र- दाय का स्वरूप महिमा वैभव वैदिकत्व वेदगतत्व साक्षाद्वेदाशयत्व प्रामाण्य आवश्यकस्य आदि आदि । क्या क्या कहैं और कितना कहैं। श्रीपुष्टिमार्ग संप्रदाय की प्राणतुल्य सर्वस्वमूत इस दिव्याज्ञा के अनुस- न्धान समय में निश्चय होता है कि उक्त दोनो विशिष्ट एक कार्य के प्रयोजन को लक्ष्य में रख कर ही श्रीपुष्टिमार्ग संप्रदाय में श्रीश्रीनाथजी महाराज आदि आचार्यपीठों की और भगवन्मन्दिरों की संयुक्त विशिष्ट स्थापना हुई है । मगवत्सेवाशून्य शाखाध्ययन आसुरावेश उत्पन्न करता है। निन्दित है। शास्त्राध्ययनशून्य भगवत्सेवा निर्बल है-गौण है दोनो ही श्रीपुष्टिमार्ग सम्प्रदाय को सम्मत नहीं । इस लिये ही शास्त्राध्ययनपूर्वक भगवत्सेवा का आदेश है। ।
आरम्म से बहुत समय तक तो इस विशिष्ट ध्येय को रक्ष्य मे रख कर इन पीठों और भगवन्मंदिरों के द्वारा बहुत ही वडा कार्य किया जा चुका है। जिसका शृङ्खलाबद्ध इतिहास तौ यद्यपि उपलब्ध नहीं है। पर शुभ परिणाम प्रत्यक्ष है। परन्तु अब इस ध्येय की ओर पूर्ण लक्ष्य देने-रखने का अवसर है। इसकी सविस्तर निवेदन की आवश्यकता नहीं । श्रीश्रीनाथजीमहाराज आदि आचार्यपीठों में पीठप्रतिष्ठानुरूप प्रतिष्ठित एफ एक साम्प्रदायिक विद्यालय की स्थापना हो जाम तो श्रीमदाचार्यचरणों की शुभाज्ञा का पूर्ण पालन किया जा सकता है। आचार्य-पीठों की शोमा प्रशंसा सुरक्षा उन्नति निर्वाह प्रतिष्ठा वैसे विद्यालयों से ही है । इन पीठों में वैसे साम्प्रदायिक विद्यालयों की बडी अनिवार्य परमापेक्षित परमावश्यकता है। इस विषय को कौन अप्रमच हृदय- से नही मानता: इन दिव्य पीठों में वैसे साम्प्रदायिक विद्यालयों के वर्तमान संभावने ही सृष्टिमात्र को उक्त शुमाज्ञा के परिपालन से वश्चित पिमुख बना रक्सा है। दूषित वातावरण उत्पन्न होने दे कर श्रीपुष्टिमार्ग सम्प्रदाय को खतरे मे डाल दिया है । न सुन सकने की-न सह सकनेकी बातें सुनवाया सहवाया है पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय नही पंथ है । वैदिक नही वेदानुकूल नही अवैदिक- है । वेद में श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण की लीला कुछ नही है । वेद श्रीकृष्ण को परब्रह्म नही कहता । श्रीवल्लभाचार्य वास्तव में आचार्य नही। अन्य आचायों ने उपनिपद गीता पर भाप्य किए । उनने नहीं किए । शक्ति होती तो करते । उनका मत वैदिक होता तौ करते । इस लिये ही उनकी विद्वत्ता में भी संदेह ही है । ब्रह्मसंबंध पापण्ड है । इत्यादि विविध दुराक्षेपो ने पुष्टिमार्गीय सृष्टि के हृदयों को छिन्न भिन्न विदीर्ण कर दिया है। पूर्वोक्त यथार्थ परिस्थिति के अपरिचय से और उत्तर देने की क्षमता न होने से आतंक और अन्धकार से छा दिया है। इस समय श्रीपुष्टिमार्ग संप्रदाय धूलिधूसर सूर्यकी भांति विच्छाय कान्ति.. रहित बन गया है। वैसा भी सूर्य रात्रि तो नही होने देता । दिन ही बनाये ।
रखता है। धूलिधूसर भी हमें ही प्रतीत होता है । सूर्यमंडल में धूल नहीं पहुंचती । बहुत ही नीचे रह नाती है। श्रीपुष्टिमार्ग संप्रदाय ने भी अभी दिन ही बना रक्खा है । कलिकाल की कराल काल रात्रि को फटकने नहीं दिया है। श्रीकृष्ण की प्रेमलक्षणा भक्ति और तदुपयोगी पवित्रता शास्त्रोक्त शुद्धि प्रायश्चित्तानुष्ठान शास्त्रामिप्रेत सदाचार गोरक्षा ब्राह्मणादर शास्त्रादर का प्रचार अब भी थोडा बहुत सर्वत्र ही है। वर्णाश्रमकी व्यवस्था और वेद का प्रामाण्य अभी लुप्त होने नही दिया है । सिद्धान्त के रूप में तो सूर्य-सदृश निरस्ततिमिर प्रकाशैकरस देदीप्यमान ही है । आक्षेपों की कक्षाओं से वस्तुतः सर्वथा परें ही है। पर वैसे सूर्य मे पूर्ण जागृति का संचार नहीं होता । जडता पीछा नहीं छोडती । प्रकाश मन्द हो जाता है । कही कहीं कुछ कुछ अन्धकार भी छा जाता है । यथार्थ प्रसन्नता प्रफुल्लितता प्राप्त नहीं होती। ठीक वही परिस्थिति इस समय श्रीश्रीपुष्टिमार्ग संप्रदाय की हो रही है। जनता मे जडता छा गई है । सजनों का मन अप्रसन्न अप्रफुल्लित है । जनता की जडता और श्रीपुष्टिमार्ग संप्रदाय की शिथिल-प्रकाशता को देख देख कर सज्जनों का मन उदास हो रहा है। शास्त्रज्ञ संशयच्छेचा विद्वान उत्पन्न होना बंद हो गया । वैसे विद्वान विद्यागुरु से संप्रदाय-ज्ञान प्राप्त करने की परिपाटीका परिचय भी नहीं रहा । सम्प्रदाय विद्वद्गम्य है । विना शास्त्रज्ञ संशयच्छेचा विद्यागुरु के परिज्ञान असम्भवही है । इस बात को लोग भूल ही गये । अब तो केवल भाषाग्रंथों के द्वारा थोडा बहुत चंचुप्रवेश पा कर अपने अल्पज्ञता-पूर्ण स्वच्छंद ऊहापोह से श्रीपुष्टिमार्ग संमदाय की स्वरूप-हानि हो रही है। आरंग में प्रदर्शित उसके विशाल खरूप का परिचय नष्ट हुआ है। चेद में शुति है कि-"नाऽयमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेघया न बहुना श्रुतेन । यमेवैय वृणुते तेन लम्यरतस्यैप आत्मा विवृणुते तनूर स्वाम् । इसका आशय है कि-कर्ममार्गीय ज्ञानमागीय और भक्तिमार्गीय वेदोक्त साधनों से गगवत्प्राप्ति नहीं होती । भगवत्कृपा से भगवत्प्राप्ति होती है । इत्यादि ।
जैसे "पढने से ही विद्या-माप्ति नही होती गुरुकृपासे होती है" इस कथन का यह तात्पर्य नही कि पढना छोड दो। पर यह तात्पर्य है कि गुरुकृपा प्राप्तिके लिये तत्परतापूर्वक अध्ययन करते रहो गुरु-चरणों मे भक्ति रक्खो। निष्कपट भाव से गुरु-शुश्रूषा करो। गुरु की आज्ञा का उल्लङ्घन न करो। गुरु-गृह की मर्यादा मे रहो । उसी प्रकार इस श्रुति के कथन का भी यह तात्पर्य नही कि कर्ममार्गीय ज्ञानमार्गीय भक्तिमार्गीय साधनों को छोड़ दो- वेद को श्रीपुष्टिमार्ग संप्रदाय में प्रमाण भी मानना छोड दो इत्यादि । पर यह तात्पर्य है कि भगवत्कृपाप्राप्ति के लिये तत्परतापूर्वक सय सत्कर्म भग- वत्परितोपार्थ करते रहो भगवचरणारविन्द मे भक्ति रक्खो निष्कपट भाव से भगवत्सेवा-शुश्रूषा करो । भगवदाज्ञा का उल्लङ्घन न करो। पुष्टिमार्गीग मर्यादा मे रहो। यह सब भगवत्कृपा से ही पनि आता है । अन्यथा नहीं। इस बात को समझो । भगवत्कृपा नही तो ये साधन पूरे पूरे वन ही नही 'सकते । और कुछ बन मी गये तो साधनाभिमान उत्पन्न कर भगवत्प्राप्ति के फल से वंचित ही रख छोडते हैं । इत्यादि । तथापि श्रीगोपीजनों के दृष्टान्त से वैदिक मर्यादा के उल्लङ्घन मात्र को ही अल्पज्ञ मंडली ने पुष्टिमार्गीय धर्म समझ लिया है। सम्प्रदाय मर्यादा के अनुसार वर्तन को तो छोड ही दिया है । यह नही जानती कि श्रीगो- पीजनों का दृष्टान्त भगवत्साक्षात्कार हो जाने के पीछे का है । पर श्रीमद- लभाचार्यचरण-अवर्तित श्रीपुष्टिमार्ग सम्प्रदाय भगवदन्तर्ध्यान-समय में भग- वत्साक्षात्कार कराने के अभिप्राय से प्रवृत्त है । इसमें उसमें बहुत से भेद है। श्रीगोपीजनों के दृष्टान्त से भगवत्सेवा करना तो में उपपन्न है- पर वेदोक्त मर्यादा का उल्लङ्घन नही । इत्यादि। ये सब निर्बलतायें साम्प्रदायिक विद्यालयों के अभाव से उत्पन्न हुई हैं। श्रीपुष्टिमार्ग सम्प्रदाय की नही । वेद वेदान्त आदि शास्त्र राशि मे उसका स्वरूप देदीप्यमान दमक रहा है। परम ऊर्जस्वल विराजमान है। किसकी शक्ति है जो उसके सामने आंख उठा कर भी देख सके। श्रीमन्मथुराधीश-मुख्य-सेवक वयोवृद्ध विद्वत्प्रवर पण्डित श्रीगोकुलदासजी महोदय बतलाते हैं कि शुक्ल यजुर्वेद-संहिता के तृतीय अध्याय मे अमि देव की स्तुति का उनतीसवां मन्न है कि-"यो रेवान यो अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । स नः सिपक्तु यस्तुरः॥" इस का आशय है कि-जो धनवान, पापों के नाश करने वाले, भगवत्सेवोपयोगी दैवी धन को देने वाले, पुष्टि- मार्ग के प्रचारक हैं, वे अमिदेव शीघ्र ही सेवक पर कृपा करने वाले हैं। चे हमारी रक्षा करें। इस मन मे अमिदेव को पुष्टिमार्ग प्रवर्तक यतलाया है। पुष्टिमार्ग-प्रव- क अमिदेय श्रीमद्वल्लभाचार्य चरण हैं । क्यों कि श्रीमद्वस्लभाचार्याचरण पुष्टिमार्ग-प्रवर्तक और अमि के अवतार प्रसिद्ध हैं। शास्त्रोल्लिखित गंगाजी की प्राप्ति जगत की प्रसिद्धि के सहारे ही होती है। और गंगा-दर्शन के समय प्रत्यभिज्ञा होती है कि-शास्त्रोल्लिखित श्रीगंगाजी ये हैं । इसी प्रकार प्रसिद्ध गंगा-तट-निवासी जव शास्त्रों मे श्रीगंगाजी की महिमा देखते हैं तो उन्हे प्रत्यभिज्ञा होती है कि इन श्रीगंगाजी की महिमा शास्त्रो में इस प्रकार वर्णित है। इसी प्रकार वेद वर्णित पुष्टिवर्धन अमिदेव श्रीमद्वल्लभाचार्य वरण हैं। और श्रीपुष्टिमार्ग-सम्प्रदाय और उसके प्रचारक श्रीमद्वल्लभाचार्य चरण का वर्णन वेद में है । यह निश्चय होता है । सन्देह की कोई बात नहीं । अमि से भोजन पच कर शरीर की पुष्टि होती है। पुष्टि-पद का यह अर्थ तो निरा गंवारू है। क्यों कि-अमि से भोजन यच कर शरीर-पुष्टि होना तो प्रत्यक्ष-गृहीत है। प्रमाणान्तर से सिद्ध पदार्थ का कथन शास्त्र नही करता । शास्त्र तौ प्रमाणान्तर से अगम्य पदार्थ का ही निरूपण करता है। इस लिये "पोपण तदनुग्रह - अर्थात्-भगवदनुग्रह का नाम पुष्टि है इस श्रीमद्भागवत के वचनानुरोध से पुष्टि-पद का भगवदनुग्रह-मार्ग पुष्टि. मार्ग ही अर्थ वैदिक है । यह बात विस्पष्ट है । ईशावास उपनिपद की समाति में भी हिरण्मयेन पात्रेण" इस मन्त्र से आरंभ फर "अमे नय सुपथा" इस मन्त्र तक चार मन्त्रों में श्रीमदल्लमाचा- Wचरण और उनके बताये हुए सुपथ श्रीपुष्टिमार्ग सम्प्रदाय का पूर्ण वर्णन .
विद्यमान है । यह वात ईशावास्य उपनिषद की व्याख्या "बालभाष्य" के निरीक्षण से समझ मे आ जायगी। प्रारंभिक प्रवृत्ति के लिये ये कुछ प्रमाण प्रदर्शित किये हैं। वैसे तो श्रीपुष्टिमार्ग-सम्प्रदाय-प्रदर्शित प्रक्रिया से वेद वेदान्त आदि का अभ्यास करने पर उनमे श्रीपुष्टिमार्ग संप्रदाय का देदीप्यमान दर्शन होगा। और उसकी सर्वोत्तमता का प्रत्यक्ष परिचय प्राप्त होगा। साम्प्रदायिक विद्यालयों के अभावने हम आधुनिक पुष्टिमार्गानुगत जनता को बहुत नीचा दिखाया है। और महाभयानक महामय के पंजे मे फंसा। दिया है। पुष्टिमार्गीय पीठों मे वैसे सांप्रदायिक विद्यालयों की स्थापना होने पर ही अब आगे कुशल क्षेम आनंद मंगल है । अन्यथा हिन्दू हिन्दी हिन्दोस्तान कुछ नही रहेगा । हिन्दू संस्कृति वैदिक-संस्कृति कुछ नही रहेगी। श्रीपुष्टि- मार्ग संप्रदायकी तो बडी बात है। राशन परमिट कंट्रोल जैसे दुनियन्त्रण जब जीवन मे ही संशय उत्पन्न कर रहे है तब फिर अन्य धर्म अर्थ काम मोक्ष इन पुरुषार्थों की सिद्धि के उप- युक्त स्वस्थता शांति की तौ चर्चा ही क्या रही ! अधर्म के परिणाम और फल ऐसे होते हैं। ये कराल कलिकाल के विकराल आक्रमणों की चुनौती है। सावधान रहने की आगाही है । धर्म-रक्षा करने पर ही गुजारा है । दूसरा सहारा नही है। विद्योजन विना धर्म-रक्षा नहीं होती। इस लिये श्रीपुष्टिमार्ग-संप्रदाय के पीठों में सांप्रदायिक विद्यालयों की स्थापना परमा- वश्यक है। इसमें संदेह नही । सांप्रदायिक विद्यालयों की स्थापना का ध्येय है-श्रीपुष्टिमार्ग संप्रदाय की निर्मल समुन्नति । श्रीपुष्टिमार्ग संप्रदाय विश्व-धर्म और वेद-मत है तो विश्व की समुन्नति का साधक है-वैदिक संस्कृति का संस्थापक है। वैदिक-संस्कृति का उद्देश्य है कि अवैदिक-संस्कृति से सर्वथा दूर रहते हुए विशुद्ध वैदिक-संस्कृति मे रह कर कलि-काल के कराल जालों से बचना और भगवत्सेवा के परमानन्द-सागर मे विहार करना । 1 .
कलि-काल के कराल जाल हैं-अविद्या आलस्य अनाचार भगवद्विद्वेष बहिर्मुखता दुराचार विविध धर्मों का उत्थान सधर्म-त्याग अधर्म-ग्रहण पुण्य- परामुखता पाप-प्रीति परतन्त्रता पराधीनता अन्न वस्त्र का भी केश इत्यादि इत्यादि। श्रीपुष्टिमार्ग-संप्रदाय इन अनों का विनाशक है-विश्वकी सुख-समुन्नति का साधक और वैदिक-संस्कृति का संस्थापक है तो साम्प्रदायिक विद्यालय ध्येय-निश्चय-पूर्वक ही स्थापित होने चाहिये। उनका द्वार-लेख "वेदाः श्रीकृष्णवाक्यानि" ये श्रीमदाचार्य-चरण-प्रोक्त ढाई श्लोक होने चाहियें। अवैदिक-संस्कृति के निवारण और वैदिक-संस्कृति के संस्थापन मे सहायक हो तो राजमापा के वैसे अध्ययन में दोष नहीं। पर वैदिक संस्कृति से हटा कर अवैदिक-संस्कृति मे ला गिराने वाली शिक्षा को उस में स्थान नहीं देना चाहिये। वैदिक-संस्कृति में ही स्वराज्य स्वतन्नता सब है । अवैदिक-संस्कृति सर्व- नाश का आमंत्रण है। चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था मे ही स्वराज्य स्वतंत्रता सब समाये हुए हैं । उस से अतिरिक्त नहीं। वैदिक-संस्कृति के सिवा भारत-बासिनी प्रजा का जीवन नही योगक्षेम नही स्वरूप-सचा नही । अवैदिक संस्कृति के स्पर्शसे भारत-वासिनी मजा के माग्य वैभव का निश्चय ही चौपट है। भग- वदाज्ञा है-"स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः" । ये आशायें भगवत्कृपा से ही पूरी होती हैं । जीव-प्रयत से नहीं । इस के लिये श्रीमदाचार्य-चरण के चरण कमलों में भूरि भूरि भक्ति-भाव से साष्टांग प्रणाम और कृपा-कटाक्ष की प्रार्थना । उक फटुतम दुराक्षेपों के अतिदारुण तीव्रतम विपसे पुष्टिमार्गीय जनता के केशों को देख कर उन्हें दूर करने के लिये करुणाप्लावित हृदय हो कर मंबई मे विराजमान गोस्वामिगणाग्रगण्य आचार्य-शिरोमणि बृहन्मन्दिरस्थित श्रीमदाचार्यसिंहासनासीन श्रीपुष्टिमार्ग-संप्रदाय प्रवर्तक श्री १०८ श्रीगो- कुलनाथजी महाराज महोदय ने कृपा कर इस तुच्छ नगण्य सेवक को उप- ३- प्रखामना.
निषदों के भाप्य लिखने की शुभाज्ञा दे कर अनुगृहीत किया। और अपनी सर्वथा असमर्थता निवेदन करने पर शुभाशीर्वाद दे कर भी प्रोत्साहित किया। उनकी परिपूर्ण असीम कृपा और संचारित दिव्य शक्ति से ही यह ईशा- वास्य उपनिषद की सांप्रदायिक व्याख्या उपनिषदुपोद्धात और साक्षाद्वेदा- शय ये तीन संस्कृत निबंध श्रीपुष्टिमार्ग सप्रदाय की सेवार्थ प्रस्तुत हैं। और चौथी यह हिन्दी-प्रस्तावना । ईशावास्य की इस व्याख्या के अध्ययन से पता लगेगा कि-वेद में श्रीपुष्टिमार्ग संप्रदाय का वर्णन है । अन्य चर्चा नही । और श्रीपुष्टिमार्ग- संप्रदाय मे साक्षाद्वेदाशय की चर्चा के सिवा दूसरी चर्चा कुछ भी नहीं है। दोनो एक मे एक परस्पर ओतप्रोत हैं। अभिन्न हैं। भेद का गंध भी नही। दोनो का तादात्म्य है। किंबहुना । श्रीपुष्टिमार्ग-संप्रदाय के आचार्य श्रीमदाचार्य-चरण के चरित्र भी वेदने वर्णन किये हैं। और उनका कुल मी वेदविदित है। इसका भी इशारा वेद मे मिलता है । यह बात समझ मे आ जायगी । उपनिपदुपोद्धात से वेदार्थ-निश्चय होगा । श्रीकृष्ण भगवान ही वेदार्थ हैं। यह निर्णय होगा। साक्षाद्वेदाशय मे श्रीपुष्टिमार्ग-संप्रदाय की वैदिक और दार्शनिक विशि- टता का वर्णन है। इन सब का मुख्य मुख्य निष्कर्ष इस हिन्दी-प्रस्तावना मे है। शेष कर्तव्य मे तत्परता प्राप्त करने के लिये श्रीमदाचार्य चरण के चरणकमलों में भक्ति- भर-निर्भर भूरि नि प्रणाम और कृपा-कटाक्ष की प्रार्थना । । .
श्रीहरिजयति। साक्षाद्वेदाशयः। पानि खल्यिमानि नानामतान्यास्तिकनास्तिकभेदविभिन्नानि सर्वतः संस्त्यायन्ते जगति तैः सम्भूय किमपि प्रगाढ़ ध्वान्तमेव सूचीमेचं समुद्भाव्य सचार्यते । साक्षाद्वेदाशयोऽपलप्यते । “फः पन्था उत्पथश्च क" इति दृष्टिब्ध तत्तत्पृथडमतपटिछानां गरिष्ठनिष्ठानां प्राप्तप्रतिष्ठानामपि बिदुपाम्प्रमुप्यते । किमुत गतानुगतिकानामविदुपां साधारणानां प्राय- तानां जनानाम् । तटस्थानां प्रेक्षावताश्च श्रेयोभिकाशिणाम् । संशया- स्मता च सरीसृज्यते । तेस्तैः स्वस्समताभिनिविबोध्यमानानामपि नाना- मतजालमत्तमताजसासन्धर्षिता धीस्तिमिरं न जहातीति । तदिमानि नानामतानि श्रेयोर्थिना त्याज्यानि । श्रेयस्साधनयोरनव- स्थापादकानि विवादपराणि प्रत्येकमतेन प्रत्येक्रमतथ्यार्थपूर्णतया प्रदश्य- मानानि नूनमप्रामाणिकान्येव सर्वाग्यपीति । साक्षादेवाशयस्तु समन्येष्टव्यः परीक्षणीयः परिचेतव्यः प्रदर्शिता. शेषदोषसमुत्सृएः साक्षात्सर्वानोपशमः साक्षात्सर्वार्थसमर्थका सक- लकल्याणपरम्पराप्रवर्तका प्रामाणिकमूर्धन्यः सर्वथा तथ्यार्थपरिपूर्णो ऽक्षरमात्रेऽप्यशफ्यशः सृष्टेः सर्वविधपुरपार्थसार्थसंसाधनाय सृष्टयारम्भ सृष्टयधीशेन सुटिफर्ता चेदवेयेन परेण पुंसा प्रजापतये ब्रह्मणे साक्षात्मदर्शिता सप्तौ संस्थापितः परस्तादपि तदा तदाऽचतारा. दिना परिरक्ष्यमाण इति । विदितवेदितव्या वस्तुविमर्शिनः सारदर्शिनस्तत्त्वैकधिया सत्पक्षपा- तिनो विचक्षणाः सर्वेऽप्यन कृतक्षणा। भाचार्याश्च ते ते मतैक्यमेवेच्छन्ति । न नानामतान्यनुमन्यते । ना. न्यथा परमतनिराकरणोपपत्तिः। भवतु तेषां भिन्न भिन्नं मतम् । मतैक्यं तूपगच्छन्ति सर्वेऽप्यावश्यकमित्यत्र न सन्देहः । लौकिका अपि नानामतैरुद्भावितेन निविडेन ध्यान्तेन व्याफुला नाना- मतजालमेव भारतस्याऽस्य घर्पस्य सर्चपुरुषार्थभ्यः परिधशर्फ विविधा. नर्थमूलं प्रतिकूलमातिष्ठमाना मिथ्याभिमानोदयमात्रविधायि वस्तुतो निस्सारममयोजन व्यर्थमनर्धमात्रपर्य्यवसायि तदिति विस्पाटमेवोद्धोप- यन्तः परिजिदीर्षन्ति ।
. २० तदेवमास्तिकनास्तिकोभयसम्मतायां नानामतजालस्य सर्वथा व्यर्थ- तायामैकमस्यस्य च सर्वथैवाऽऽवश्यकतायां सकललोककल्याणार्थना परमेश्वरेण सृष्ट्यादित एव एष्टी प्रवत्तितः कोटिशो वर्षाणि दृष्टापदा. नव साक्षाद्वेदाशय एच विवादं परित्यज्य पक्षपातं परिहाय सर्वेण श्रेयोर्थिना प्रेक्षावता निर्विशङ्कमनुरोद्धव्योऽनुसनव्यश्चेति सध्रीचीनो ह्ययं पन्थाः । सर्वथैव तु वेदप्रामाण्यवादिभिर्विद्वत्प्रयररित्यनुसन्धेयो. ऽयमर्थः सूरिभिः। युक्तञ्चैतत् । यथा खलु कान्ताकनकादिपु न कोऽपि कस्याऽपि मत. भेदस्तथा धर्मादायपि स निष्प्रयोजना प्रत्युत ध्यान्तावहथेति । संश- यापादनेन प्रणाशकत्वादप्ययुक्तश्चेति । केचित्तु सर्याणीमानि मतान्यनादितो नानर्पिगणप्रवर्चितानि वेदोप- एब्धानि घेदमूलानि प्रामाणिकानि नानाधिकारिगणसावकाशानि तत्त. त्पुरुषार्थसाधकानि नाऽस्पः क्षोदक्षमाणि विपुलोपपचिपपरिपूरित- प्रामाण्यफानि परिमितमतीनां मिथो विप्रतिपन्नवद्भासमानान्यपि सम. वितान्येवाऽनुसरणीयान्येयैकवाक्यतापमानीत्येव मन्तव्यानीत्याहुः । तदेकवाक्यताञ्च प्रदर्शयितुं प्रयस्यन्ति तथा तथा "कणभक्षमक्षवरणं जैमिनिकपिलो पतञ्जलिञ्च नुमः। थीमन्यासयचोम्बुधिनयसीकरवर्षिणो मुदिरानि"ति "व्यासचित्तस्थिताकाशादवच्छिन्नानि कानिचित् । गृहीत्वा व्यवहरन्त्यन्ये तन्मतं न विरुद्ध्यत" इति । "मानेऽक्ष्यविकणा. दयाक् कपिलवाक् त्वंशब्दवाच्ये तदो याच्ये शण्डिलजादिवाक् फणि- चचस्तात्पर्य्ययद्धीग्रहे । मीमांसा मतिशोधिकर्मनिचये वेदान्तशालो. कयस्तत्त्वलक्ष्यविनिर्णयेऽनभिमते का वा विरोधे क्षतिरि"ति च । अपरे यथाकथञ्चित्प्रयासातिशयेन संसाध्यमानामपि तामेकवाक्य- तामेकान्ततोऽसियन्ती प्रेक्ष्याऽपरितुप्यन्त: "श्रुतिविभिन्ना स्मृतयो विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्या" इति न्यायेन "येन नः पितरो याता येन याताः पितामहाः । तेन यायात्सतां मार्ग तेन गच्छन्न रिष्यती"ति न्यायेन च पुरुषार्थप्रेप्सोः प्रवृत्तिमनभिनिमन्तः सर्वसमयप्रवृत्त्यै नाना. धिकारोपपनायै नाऽभ्यस्यन्ति। उक्तं हि भगवता-"न बुद्धिभेदं जनयेद- शानां कर्मसङ्गिनाम् ।जोपयेत्सर्पकर्माणि विद्वान युक्तः समाचरनि"ति । परे तु परमवैदिकतयैव सर्वानर्थ निवृत्तिः सर्वपुरुषार्थलाभश्च ना. ऽन्यथेति साक्षावेदाशयमनुरुन्धानाः प्रतिपद्यन्ते- सर्पमिदं मतजालमाचीनं घेदोत्तरकालजातं तेषां तेषां जीवविशे- पाणां पथावुद्धि यथाशक्ति यथाप्रकृति यथाधिकारं यथाभगवदिन्छ २१ नाना प्रतिभातं साक्षादेदपुरपाभिप्रेताद्वैदिकमहासिद्धान्तात्पृथग्भूतमेव कलिकाल पवोत्पनं कलिकालविजृम्भितरूपमेव नाऽनादिन यथार्थ 'किन्तु यथार्यायथार्थोभयांशसंवलितं यथार्थाशमतिमातप्रामाण्यकत्ये- नैवोपतृभ्यमानायथार्थोशं तत एय परस्परं विरुद्धाविरुद्धम् । यदि सर्च यथार्थमेव । न मिथो विरुद्धयेत । न पण्ड्येत च । यदि सर्वथैचाऽयथार्थम् । न यथार्थवदासेत ।न प्रचारं लभेताज परिगृह्येत च पण्डितम्मन्यः। सत पवाऽपिरुद्धांशे प्रामाण्यं विरुद्धांशे स्वप्रामाण्यमिति गुणैकग्रह- यालुत्वस्वमावानामुदारचरितानां निर्मत्सराणां सतां व्यवस्थया फथ. चित्सर्पथा नानारतमपि वस्तुतो यथार्थ वेदार्थापलापेन सर्वपुरुपार्थ- परिभ्रंशायेय "बुद्धापतारे त्यधुना हरी तदशगाः सुराणा नानामतानि विप्रेषु भूत्वा फुर्वन्ति मोहनमि"त्यादि पचनानुसारेण भुवि लब्धप्रचार घेदाध्ययनावयोधायधारणाचरणेभ्यः प्रामसर्वथैवाऽमध्येयमस्पृश्य- च्छायम्। ततः परस्तादध्ययनेऽपि सहरुणाऽवधापनीयानर्थोशं दर्शितविरुद्धा. र्थस्थलं दूपितयोपं विवेचितविशेपं चेदाविरोधाधीनमामाण्यकमन्ययो- पेक्ष्यमेव । यद्यपि तर्फकोविदः प्रत्यक्षतर्याविरोधेनैव स्वीचिकीर्पितयेद- प्रामाण्यकम्। पस्तुतस्तु-"प्राणेन निष्कारणः पडलो वेदोऽध्येयो शेयश्चे"ति श्रुत्या वेदोपकरणेभ्यः पृथग्भूतं यावं वेदायिहितं घेदाशयलामाय शि. रपरिग्रदीतमनायश्यकं प्रत्युत विरुद्ध प्रतिपिद्धं साक्षाद्वेदाशयाच्छादकं विमोदकमममाणमेवेति । ननु मसिद्धेभ्यस्तेभ्यः फोऽयमन्या साक्षावेदाशयः।यो न प्रसिद्धयति सोऽप्रसिद्धा यथद्वारं स्वीकार्यो भवेदिति चेत् ? एतदिहाऽयधेयम् । घेदाशयो द्विविधः । विशिएजीवविचारितः साक्षावेदपुरुषाभिप्रेत- येति । यस्य निश्वासितं घेदास्तेन वेदवेधेन परमपुरुषेण भगवतैव साक्षाद्विचारितो वेति। तष विशिएजीवविचारितस्य घेदाशयत्वेऽपि न साक्षाददाशयत्वम् । जीवविचारद्वारकत्वात् । न च वैशिष्टयं प्रयोजकम् । वेदाशयत्ये तत्स्यान्न साक्षावेदाशयत्वे । वैशिष्ट्येऽपि जीवत्यानपायात् । वेदपुरुषस्य खतन्त्र- स्यात् । "वेदो नारायणः साक्षात् वेदा यथा मूर्तिधरात्रिपछे" "स्व. एपमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते योधयाञ्चकुस्तल्लि श्रुतयः परम् । यथा शयानं सम्म्राज घन्दिनस्तत्पराक्रमैरि"त्यादिभ्यः प्रमाणेभ्यः।
२२ जीवविचारितसाक्षावेदाशययोर्षिभेदादेव चैदिफेप्यपि नानामतमेदा उपलभ्यन्ते ।जीवानां नानाप्रकृतिकस्यात् । यथाप्रति विचारितत्वात् । तत पब साक्षाददाशयस्य पृथक्प्रतिपत्तिसिद्धः। मतभेदान्यथानुपपत्तेः। साक्षावेदपुरुषाभिप्रेतस्य नानात्यायोगात् । तत एव केचित्क्रियापरमन्ये शानपरमपरेऽनीध्वरमितरे सेश्वरं परे भगवत्परञ्चेत्यादि तथा तथा वेदमाहुः । या त्यप्रसिद्धिराशदिता सा पापण्डानां प्रायल्यात्कालयतात् । नका. न्ततोऽभावात्।तदुकम्-"निशामुखेपुसद्योतास्तमसाभान्ति न प्रहा। यथा पापेन पापण्डा न हि वेदाः कलौ युग" इति । साक्षाद्वेदाशयस्य सृष्टी सर्वथैवाऽभावे वेदप्रवृत्तिय॑र्था स्थादित्यन्यथानुपपत्त्यैव प्रसिद्धर- भ्युपगन्तव्यत्यात् । अन्तरङ्गेषु प्रसिद्धेः । यहिरहेप्वप्रसिद्धरिएत्वात् । न हि दिवान्धेरदृश्यमानोऽपि भगवानादित्यो नाऽस्ति न प्रकाशते न प्रसिद्धपति न लोकबन्धुर्न सर्वादरणीयः। नहि प्रागप्रसिद्धान्यपि सनेरुद्वानन्तरं न प्रसिद्धपन्ति न वास्त. वानि न प्रामाणिकानि नाऽऽद्रियन्ते या वैकटिकैः सुरतानि । यथा कर्मिश्चन राजपुरुपे समुपेते जानपदै नाऽभिप्राया हदि निय. ध्यन्ते । स तु येनाऽभिप्रायेण प्रविष्टो न तं कोऽपि वेद । स तेपामप्र- सिद्ध एव । न तावता राजपुरुषस्य फश्चिग्निजाभिप्रायो नाऽस्ति । न चाऽसौ नाऽन्तरङ्गेपुन प्रसिद्धयति । तस्मिन् स्वतन्त्रेऽपि ये ते तेऽभ्यूहा जानपदानां तेऽपि हेतुमद्भावेन प्रामाण्यं न किल न प्रतिपद्यन्ते प्रायः। एवमेव तापवेदपुरुषः स्वतन्त्रमेव स्वाभिप्राय विभर्ति। लोकैर्यथा तथा गृहीतस्तु तदप्यापाततोऽनुवर्तत एव । परं न वस्तुतः। अन्धह- स्तिवत् । यथा खल्वन्धैर्हस्तपरामर्शण शूर्पस्तम्भमुसलाद्याकारेण गृह्य- माणो हस्ती स्वतन्त्राकारोऽपि तेषां तेषां घुद्धिमप्यंशतोऽनुसरति। तथैव भगवदनुग्रहविहीनैः परिदृश्यमानो वेदोऽपि तनहुद्धिमंशतोऽनुसृत इच खतन्त्रण स्वाभिप्रायेणैव विराजत इति शेयम् । न तावता तेपामभि. प्रायाः साक्षावेदाशयः शक्या निगदितुम् । ननु नाऽनृतानि तानि । पुरुषार्थसिद्धेरिति चेन्मैवम् । वेदाभिप्रेतपुरु: पार्थसिद्धयभावात् । अर्थक्रियाकारित्वस्य पुरुषार्थत्वासिद्धः। कृपवत् । यथा सकललोकोपकाराय विनिर्मितः स्थितोऽपि कूपः कस्यचन दुर्म- रणेच्छोः पातेन मरणमपि साधयति । एवमेव बुद्धिदोपादन्यथा गृहीतो वेदोऽप्यर्थाभासमनथं साधयेत् । तत एय-"अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा पाणी नरश्च नारी च । पुरुपविशेष प्राप्ता भवन्ति योग्या अयोग्याचे". त्यभियुकोकिः। - ननु नाऽनों धमार्थकाममोक्षाः । त एव हि तत्तन्मतप्रतिपाद्या इति. चेन्मैवम् । नाममात्रसाम्येनाऽयम्भ्रमः । तेषां रूपन्तु वेदोक्तेभ्यस्तेभ्यो विभिद्यते च विरुद्धयते चेत्यन्यत्र विस्तर। अगर्थरूपत्वात्तादृशां धर्मा- दीनाम् । तदलमेकवाक्यतादिप्रयासेन । एकान्ततोऽनिप्पत्तेः । अशानफलहा. धनानुपशमाय । अशानकलहायनर्थोपशमामीप्सयैव हि "समादधति सज्जना" इत्युक्त्यनुसारेण विद्वत्सलनानामेकयाफ्यतार्थमुद्यमो नैक- चाफ्यताया वास्तवत्याभिप्रायेण । तस्मात्साक्षादेदपुरपाभिप्रेतो महासिद्धान्त एच सर्वानर्थोपशमः प्रचा. राहः। स एव विदुपाम्भूषणम् । दूपणं तु नानामतजालं विदुपामल्पश- त्वमेकदेशित्वमहावित्यमनृतम्भरत्यादिकञ्च परिस्फोरयदुपहासमेव जनयति । भानामतोद्भावनेनाऽऽध्यकलहादिप्रवृत्त्या प्रवृद्धापराध- भाजनत्वञ्च तदेकवाफ्यतादिप्रयासेनाऽनर्थवत्यञ्चाऽनर्थोपष्टम्भकत्वञ्च संसाध्य मानास्पदारपदात्मच्यावञ्चाऽपि जनयतीति । नन्येयं मसिदेभ्यः साक्षादेदाशयस्य पृथक्तिद्धावपि तस्याऽन्तरङ्गेपु प्रसिद्धायपि कथं तदर्थना स परिचेयः कथं तथात्वमवधाय॑मिति चेत् ? स्वयं साक्षाद्वेदेनैवेति गृह्यताम् । घेदाशयो हि वेदोकप्रक्रिययैव साक्षाल्लभ्यते । सा च सागवेवाभ्य' बनेन । “ब्राह्मणेन निष्कारणः पडगो वेदोऽध्येयो शेयश्चे"ति श्रुतेः। निष्कारण इति काम्यत्वनैमित्तिकत्वयोयुदासेन सागवेदाध्ययनस्य नित्यत्वं व्युत्पादितम् । पडङ्ग इत्यनुकूलत्वस्य प्रयोजकत्योफ्त्योपाहण पुराणेतिहासादिसतहः। अध्येय इत्यधीत विसरणं प्रतिपिद्धम् । सर्वस्य साकस्य वेदस्य प्रतिमानमावश्यकमुकम् । ज्ञेय इत्यनर्थशवैदिकयत्पाठ मात्र व्यावर्तितम् । सर्वात्मना सर्वथा वेदाशयाधिगम आवश्यक उत्तः। घफारेणाऽऽचारानुष्ठानादिना तद्धारणानुवृत्ती विहिते । सम्पूर्णेन विधि- चाक्येन शास्त्रान्तरपाटवं प्रतिषिद्धम् । दार्थविज्ञानादेनिधेियसाधिन गमहेतुत्यं दर्शितम् । “नेपा तर्केण मतिरापनेये" त्यानयनापनयनयो: प्रतिपेधात्तर्यस्य वेदाशयग्रहणेऽप्रयोजकत्वं दर्शितम् । तर्पस्य प्रत्यक्षोप- जीवित्वेन तदतीतार्थे प्रमाणत्वाभावात् । तेन तळ्याकुलीमार एवाऽभि- जायते न याथातथ्येन तद्रहणम् । “यस्तकेंणाऽनुसन्धत" इति तु वर्मा- गोचरत्वाग्छन्दकप्रमाणकत्याच स्थूणाखननयत्माशे दाढाथै दुर्युद्धातु सन्देहयारणार्थमपीत्यनुफूलस्य तस्याऽनुमतिमात्रमिति न त विरो धार्थ न तानुरोधार्थे न वर्मप्रामाण्यार्थे न तणाऽनुसन्धानावश्यक त्वार्य न तानुकूल्यान्वयव्यतिरेकाधीनवेदप्रामाण्यायें किन्तु सर्वथा प्रतिकूलतर्कप्रतिषेधार्थम् । अनिष्टानुयन्धित्वात् । मन्दानुग्रहायाऽनु- कूलतर्वाभ्यनुशार्थश्च । इटानुवन्धित्यात् । "अधिकं तनाऽनुप्रविष्टमि"ति न्यायेनाऽनुकूलतर्कस्य प्रतिपेधे प्रयोजनाभावात् । तदिदमाह-नेत। चेदविरुद्धतारूढ इत्यर्थः। वेदशास्त्राविरोधिना। यथा "ग्रीहीनवदन्ती". त्यवहनन एव धर्मों न नखविदलनादिना निस्तुपीकरण इति ग्रीवहन- नस्य नियमत्यस्थापनेन यथाश्रुतार्थस्यैव स्थापनम् । यथा वा "तदेजति तनैजती"त्यादिभिः थावितस्य 'विरुद्धधर्माश्रयत्वस्य प्रत्यक्षाद्यगोचरे ब्रह्मणि मन्दानुग्रहाय तर्काविरोधप्रदर्शनम् । किञ्च-"अलौकिको हि वेदार्थोनयुक्त्या प्रतिपद्यते। तपसा वेदयुक्त्या या प्रसादात्परमात्मन" इत्येपा च "अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनयीत तमध्याप- यीत। शौचाचारांश्च शिक्षयेत् । मा हिंस्यात्सर्वा भूतानि । ब्राह्मणं न दन्यान्नाऽयगुरेदि"त्येवमादिः सकलैव विधिनिपेघव्यवस्थात्मिका च प्रक्रिया साक्षाद्वेदाशयलाभाय तत्र तत्रोच्यते । "श्रुतिस्मृती ममैयाऽऽशे यस्ते उल्लइय वर्त्तते।आशाच्छेदी मम द्रोही मद्भक्तोऽपि न वैष्णप"इति "इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपधृहयेत् । विभेत्यल्पश्रुताउदो मामयं प्रहरिप्यती"ति "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि. भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् । परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युग" इति "वेदेव सर्वैरदमेव वेद्यो घेदान्तवेदविदेव चाऽहम् । मत्तः परतरं नाऽन्यत्किचिदस्ति धनसय । मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्पा. पोहाते त्वहम् । इत्यस्या हृदयं लोके नाऽन्यो मदद कश्चने"ति "कृष्ण. वाफ्यानुसारेण शास्त्रार्थ ये यदन्ति हि। ते हि भागवताः प्रोकाः शुद्धास्ते ब्रह्मवादिन" इति "घेदाः श्रीकृष्णवाक्यानि व्याससूत्राणि चैव हि । समाधिभाषा व्यासस्य प्रमाणं तचतुष्टयम् । उत्तर पूर्वसन्देहवारकं परिः कीर्तितम् । अविरुदन्तु यत्त्यस्य प्रमाण तश्च नाऽन्यथा। एतद्विरुद्धं यत्सर्व न तन्मानं कथञ्चने"ति "पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । घेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दशे"ति सा तत्र तत्र विशदी. क्रियते च । न्यायपदमत्र नीतिशाखपरं न काणादवैशेपिकपरमित्यन्यत्र विस्तरः। "प्रमेयं हरिरेबैका नाऽयमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया नमना ध्रुतेन । यमेवैप पृणुते तेन लम्पस्तस्यैप मारमा विवृणुते तनूर खाम् । यो चै ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तंह देवमा. मयुद्धिप्रकाशं मुमुक्षु शरणमहम्मपये। भयमेव महामोहो हीमेव २५ प्रतारणम् । यत्कृष्णं न भजेत्प्रातः शास्त्राभ्यासपरः कृती । मन्मना भर मद्भको मघाजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युफ्त्वैवमात्मानं मत्परा. यणः । सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं प्रज। अहं त्या सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुवः। येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् । अन्तरतु फलं तेपां तद्भय- त्यल्पमेधसाम् । यथा तरोर्मूलनिपेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपः शाखाः। प्राणोपहाराच यथेन्द्रियाणि तथैव सर्वाहियामच्युतेज्या। एफ शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव । मन्त्रोऽप्येफस्तम्य नामानि यानि कर्माऽप्येकं तस्य देवस्य सेवा । सर्वदा सर्यभावेन भज- नीयो प्रजाधिपः । स्वस्याऽयमेव धर्मो हि नाऽन्यः कापि कदाचन । एवं सदा म कर्चव्य स्वयमेव करिष्यति । प्रभुः सर्वसमर्थो हि ततो निश्चि- म्ततां ब्रजेत् । यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हदि । ततः किम- परं भूहि लौकिकैदिकैरपि । अतः सर्वात्मना शभ्यद्गोकुलेश्वरपादयोः। सरणं भजनञ्चाऽपि न त्याज्यमिति मे मतिः । क्षरः सर्वाणि भूतानि फूटस्थोऽक्षर उच्यते । उतमः पुरुपस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यस्सा- रक्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽसि लोके येदे च प्रथितः पुरुपोत्तमः । यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुपोत्तमम् । स सर्वमिङ्ग- जति मां सर्वभावेन भारते"स्येवमादिरूपेण प्रमेयतश्चापि प्रदर्यते । "ये धातुशब्दा यत्राऽर्थे उपदेशे प्रकीर्चिताः । तथैयाऽर्थों वेदराशेः कर्तव्यो नाऽन्यथा कचिदिति सा नियम्यते च । "लक्षणां नैव पक्ष्यामि न न्यूनादन्यपूरणम् । आर्थिकन्तु प्रवक्ष्यामि परोक्षकथनात" इति सा विवियते च । "प्रत्यक्षं चाऽनुमानञ्च शास्त्रज्ञ विविधागमम् । अयं सुविदितं कार्य धर्मसिद्धिमभीप्सते"त्यादिवचनानि त्यधार्मिकैर्विवादोपस्थापने धर्मसि- विप्रक्रियापराणि । चोदनैकलक्षणत्याद्धर्मस्या "मोत्पत्तिकस्तु शब्दस्या ऽथेन सम्बन्धोऽव्यतिरेकश्वाऽर्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं यादरायणस्याऽन- पेशत्वादिति सूत्राशन साक्षावेदाशयलामममियाप्रतिपादकानीति शेयम् । प्रक्रिययाऽनया साक्षाद्वेदेन साङ्गेनाऽध्ययनाचधानाभ्यामुपस्कृतेन बोध्यमानया साक्षादाशयविद्भिश्वोपदर्शितया साक्षादेवाशयपरिचयः सुलमोऽनयेच च का साक्षावेदाशयः कन्ध नेति तथात्वावधारणञ्च विविच्य सुलममिति नेह विशेषवेदिनां व्यामोहावसरः। तथा चोकाय महतोऽनर्थस्य निवृत्तये महतधार्थस्य प्रवृत्तये ४६.प्रम्बारना.
नानामतजालमिदं विहाय साक्षादाशयापलापारम्भपरिहाराय प्रेक्षा- न्मात्रेण साक्षावेदाशयः समन्वेष्टव्यः परीक्षणीयः परिचेतव्यःप्सित. व्यश्चेति सिद्धम्। अन्ये त्वेनाम्प्रक्रियां नैकान्ततोऽनुवर्त्तन्ते तेनैव तथा तथा विमिधन्ते चेति तु समन्वेषणपरीक्षणपरिचयः स्वयमेय भोत्स्यते । अश्रद्दधानेषु निस्सत्त्येषु दुर्मेधस्सु स्वयं समन्वेपणपरीक्षणपरिचयैर्विना श्रद्धोदयस्या- ऽसम्भवात् । अल्पवृथा पक्षपातित्यारोपभिया सत्पुरुषः प्रफ्रियोपदर्श. नमाणाऽऽस्मफरणीयस्य पर्य्यवसायितत्वात्। "बुधानेन गुणान् घूयाद साधु वेत्ति यतः स्वयम् । मूर्साग्रेऽपि न तान् घूयाधमोतं न ति स" इति सुभाषिताय। ननु गुरुपरम्पराप्राप्तोऽयमों न वा । न द्वितीयः। स्वयमन्येपणाय- शरच्छेदापत्तेः । अल्पज्ञत्यादिना भ्रमावश्यम्भावात् । प्रमाणाधिगत. त्वेऽपि जीवविचारस्पपित्तेर्दुरितया गुरुपरम्पराया आवश्यकत्वा. घेति चेत् । एवमेतत् । तथा हि-"सर्गादौ स्वमतं समस्य विधये यं ब्रह्म- घादं जगौ कौन्तेयोद्ध्वयोः प्रकाश्य च पुनर्वेदान्तसारं हरिः। तं व्यासा. शयगोचरं प्रथयितुं यैर्भाष्यमाभापितं तानाचार्यवरानमामि सततंधी- घल्लभाण्यान् प्रभून् । आदौ श्रीपुरुषोत्तम पुरहरं थीनारदाख्यं मुनि कृष्णव्यासगुरुं शुकं तदनु विष्णुस्वामिनं द्राविडम् । तच्छिप्यं किल पिल्लमङ्गलमहं पन्दे महायोगिनं थीमवलमनाम धाम च भजेऽस. सम्प्रदायाधिपमि"ति। दुस्सनादिना दुर्बुद्धयुदयेन थीमहुरुचरणेषु पक्षपातित्वसन्देहे तु यथोतया प्रक्रियया तदुक्तेऽर्थे साक्षाद्वेदाशयत्वं परीक्ष्याऽपि निर्धाय्यतां तदतिरिकं त्यज्यतामनुनियताञ्च यथार्थः साक्षाद्वेदाशयो धीमद्भिः। नन्यस्य का महासिद्धान्ततेति चेत्सकलानर्थप्रत्यनीकत्यादिरूपा सकललोककल्याणक्षमतादिरूपा च सा सा प्रदर्शितैवैतायता। अपरे च भक्तिमार्गत्यञ्च पुष्टिमार्गत्यक्ष प्रोशितकैतवधर्मरूपत्वञ्च सर्वाधिकारकत्पश्चाऽऽनुपङ्गिकशानकर्मफलकत्वे सति तदशक्यार्थ। सम्पादनसमर्थत्या स्त्रीशुदायुद्धतिक्षमत्वच कर्मशानादिभिरेकवाक्य- तापन्नत्वञ्च सर्वथा स्वतन्त्रत्यञ्चाऽघमाघमोद्धारकत्वञ्च स्वकुक्षि- कक्षीकृतसकलैफदेशिसमयत्यजेत्येवमादयोऽनन्ता एप विशेषा महा. सिद्धान्तताप्रयोजका इति कियदभिध्मः। पुष्टिमार्गीयाणां साक्षावेदाशयरूपाणां ग्रन्थानामेव श्रीमदाचार्यचर- णमोकानां श्रीमत्प्रभुचरणमोकानाञ्च सव्याख्यानामध्ययनावधानाच्या . .
२७ मेतत्सर्वमेकान्ततोऽवगम्यते नाऽन्ययेति । तनिष्कर्षविशेषलेशविशेष एवैष सल्पो नियन्यःनेह विस्तरः सावसरः सरसश्च स्यादिति । ननु मतान्तरे का नाम जीवविचारद्वारकतेति चेत् ? आगणिता एव । तनैको चूमः । स्वयं प्रत्यक्षादिविरोधमयेन तार्फिकभीत्या या स्वतःसिद्ध- प्रमाणभावेन सकलप्रमाणमूर्धन्येन भगवता वेदमानेणकप्रमाणके ब्रह्मणि तदुक्तस्य विरुद्ध सर्वधर्माश्रयत्वस्याऽनहीकारोऽविकृतपरिणामादिप्रत्या. ख्यानमवतारधर्माणां वाल्यकशोरादीनां तत्प्रयुक्ततत्तल्लीलाविशेषाणा- ञ्चाऽयथार्थत्वापादनं लीलाकैवल्योक्तिविरोधो मुरयमाहात्म्योच्छेदो भफ्त्यनुद्भयप्रसङ्गाक्तिमार्गोपप्लवस्तत्प्रतिपादकशास्त्रराशिविनाशारंम: प्रत्यक्षायपेक्षया वेदप्रामाण्यनैवल्यादरेण वेदापकर्पप्रस्ताव आस्तिकेप्यपि नास्तिक्यानुस्यूतभगवत्स्वरूपविशेषाद्यस्योपसर्गः साक्षावेदाशयापला- पप्रारम्भेण महानर्थकरनानामतजाल विस्तारावकाशदानं जगत्क्षयकरणे परिकरवन्धश्चेति। पुष्टिमार्गीयाणुभाष्यतत्वार्थदीपविद्धन्मण्डनादिनन्याध्ययनावधाना- भ्यामेय तु विशिष्य बुभुत्सोपशम इत्यलमतिप्रसङ्गेन । मनु वैदिकैराचार्यान्तरैः स्वविवक्षितस्य वेदाशयत्यायोपनिपदस्तास्ता व्याख्याता । भगवद्गीता च ब्रह्मसूत्राणि च । तेन ते वेदाशयविद इति सर्वेषां प्रतिपत्तिः । श्रीमदल्लभाचार्यचरणैस्तु नोपनिषदो व्यारयातान भगवद्गीताऽपि । श्रीमद्भागवतमेव तु प्राधान्येन व्याख्यातम् । तदनु- रोधेनैव यथाकथञ्चिद्रह्मसूत्राणि च । तेन ते चेदाशयविदो नेति लर्षे प्रतिपद्यामहे । तन्मतमवैदिकम् । पौराणिक कथश्चित्स्यादिति । ते हि परं ब्रह्म श्रीकृष्णमाहुः । तत्पौराणिकम् । श्रीमद्भागवतादौ तथा प्रसिद्धः। न वैदिकम् । वेदे श्रीकृष्णादिनिरूपणानुपलब्धेरिति चेदेतत्ते सोम्य व्युत्पादयिप्यामः। श्रीमदाचार्यचरणानां स्वविवक्षितं वेदातिरिकं नाऽस्ति । यस्य वेदा- शयत्वाय तैवेदो व्याख्येयो भवेत् । वेदाशयः साक्षात्तेषां विवक्षितः। तदर्थ विशिरा प्रक्रियेच विशोध्या । यस्सा अपरिहानात्साक्षादाशयंग लभन्ते घराकाः । न घेदो व्याख्येयः । हैतुकाः पापबुद्धयो न श्रद्दधी- रंस्तदिति। साक्षादाशयानुसारित्यादेव हि श्रीमदाचार्य्यचरणा वेदानुपनिष. दयन व्याचघुर्न च भगवद्गीताम् । साक्षाद्वदाशयत्वविश्वासाय स्वस्य रिलाभ एप प्रयोजको न व्यारयानादीत्यत एव "ब्राह्मणेन निष्फारणः पडलो वेदोऽध्येयो शेयश्चे"ति श्रुतिर्विशिष्टं वेदाध्ययनं तदर्थ विधत्ते।
२८ न टीकाध्ययनम् । प्रक्रिययाऽनया विशिष्टयैव लब्ध एव च वेदे साक्षा. वेदाशयत्वसिद्धिःप्रथमः पक्षः। स एव साक्षाद्वेदाशयानुसारिणाऽनु सरणीयः। प्रवर्तनीयश्च । तदर्थमेवाऽवतारः श्रीमदाचायंचरणाना- मित्याचार्यकृत्यं तदनुसरणप्रवर्तनाभ्यामेव कृतं भवति । तदर्थे सम्म दायप्रयन्धेषु प्रथमं विशिष्टप्रक्रियोपदेशस्ततस्तदनुसारिसाक्षाद्वेदाशयो. पवर्णन कालदोपादसम्मावनाविपरीतभावनासम्भवाभावाय कृतम् । न कृतं मुख्यपक्षप्रवर्तनाभीप्सया तयोर्व्याख्यानम् । सम्प्रति कालदोपाच्छपत्यादिहासेन विशिष्टया प्रक्रियया येदाधिगम- स्याऽसम्भवान्माभूत्साक्षाद्वदाशयोच्छेदः सर्पथाऽपीति करुणया निज. जनानुद्दिधीर्षवस्तादृशविशिष्टप्रक्रियासिद्धसाक्षावेदाशयमपि केवलं प्रचारयामासुरिति द्वितीयः पक्षः। तथाप्ययाधितप्रामाण्याधिगमायोप- निपद्भगवद्गीतयोरव्याख्यानमेव परमिति मत्वा तदुभयमव्याण्यातमेव ररक्षुः। सति सन्देहसम्भवे यथोक्तया प्रक्रियया तनिवारणस्याऽऽव. श्यकत्वात् । मन्दस्य हि टीकया प्रयोजनम् । टीकया च तादृशस्य दृष्टिरुपरज्यत इति यथार्थसाक्षाद्वेदार्थत्वावधारणाय व्याकरणादिव्युत्पत्तिरुपाया॑ । तया वेदार्थावधारणे साक्षावेदाशयत्वे सन्देहानवसरात् । टीकाभिः प्रत्युत सन्देहोत्पादनात् । तस्मात्प्रमाणग्रन्था अभिधया वृत्त्या व्याकरणादिव्युत्पत्तियलेनैव शेया नकादिनेति न व्याख्येयाः । इदानीं साक्षाद्वेदाशयावधारणाय प्रामा- णिकवाय च सर्वसम्मतौ द्वौ पन्थानौ । वेदोक्तप्रक्रियया साक्षावेदाध्य- यनावधानाभ्यामेकः। भगवद्गीतया वेदार्थावधारणञ्च द्वितीयः। तयो. व्याख्यादरे व्यारयान्तरः सन्देहाभिवृद्धिवत्सन्देहानपायावसर पव स्यात् । तदरं तयोरकरणमेय । नाऽन्यथा प्रामाणिकत्वं प्रकाशेतेति । मन्दानुग्रहोऽपि न किल नाऽनुरोद्धव्य इति ब्रह्मस्वाणि श्रीमद्भागव- तच प्राधान्येन व्याचख्युः। सन्देहवारके हि ते अवश्यमेव मन्दानुग्रहाय व्याख्यातव्ये इति। यद्यपि भगवद्गीताऽपि सन्देहवारिकैच तथाप्युपनिषनिर्णायिका चेति परमप्रामाण्यसंरक्षणायैव न व्याख्याता। ब्रह्मसूत्रान्तानुष्ठानेन ध्यासापरितोषस्य श्रीमद्भागवतेन च व्यासपरि. तोषस्य श्रीमद्भागवते वर्णनात्साक्षाद्वेदाशयलाभाय श्रीमद्भागवतमेव प्रधानतममिति तदेव प्राधान्येन व्याख्यातम् । तदनुरोधेनैव व्यास. सूत्राणि च ।
- २९ अधीतसावेदस्योपहणेष्वमिनिवितस्य तथा तथोक्तप्रक्रियायां उड़े श्रद्दधानस्य ब्रह्मसूत्रश्रीमद्भागवताभ्यां यथा व्याख्याताभ्यां सन्देहवि- लये साक्षादेन भगवद्गीत्तया च सुखेन स्वतः साक्षादाशयलामो निस्संशय इत्याशयवन्तो हि श्रीमदाचार्यचरणाः। तस्माच्छीमदाचार्यचरणमतमेव साक्षाद्वेदाशयः। तदेव यथार्थ परम चैदिकम् । अन्यत्तु गौणमित्यपाणिपिहितमेतत् । यत्तु श्रीमद्भागवतान्तत्वं वैदिकस्य मतस्याऽनयधार्य श्रीमद्भागवता- नुरोघस्य तात्पर्य्यमप्राप्य प्राधान्येन श्रीमद्भागवतव्याख्यानमान दृष्ट्वा पौराणिकत्वमाशयते तत्तावत्तत्तदुकप्रक्रियानभिज्ञताविजृम्भितं युद्ध - नामतजालोपरततामूलश्च । तस्मायतोऽपकर्षमुत्प्रेक्षसे जनस्तत्तु परमोत्कर्षविश्रान्त गूढः फटा- क्षश्च तेषु तेपु प्रक्रियान्तरमाथितेपु विद्वत्प्रयरेष्विति धीमद्भिरनुस- धेयोऽयमर्थः । भ्रमादेव तथा तथाऽन्यथा भानमव्युत्पन्नस्य । विदितवेदितव्यानां वस्तुविमर्शिनां सारदर्शिनां कदाचिदपि तथा मानं सम्भवतीति मार्मिकाः प्रेक्षावन्तोऽत्र प्रमाणम् । कि । व्यासमवृत्त्यनुसारित्याय व वेदगीतयोरव्याख्यानं व्याख्यानञ्च प्रस्मसूत्रधीमन्द्रागवतयोः भगवता व्यासेन हि सन्देहवारफयोर्ब्रह्मसूत्र- श्रीमद्भागवतयोःशाखयो प्रणयनं कृतम् । न वेदभगवद्गीते व्याख्याते। व्यासप्रवृत्त्यनुसारिणाऽपि न वेदभगवद्वीते व्यारयातव्ये । व्याण्यातव्ये तु ते एव सन्देहवारके शास्त्रे प्रामसूत्रधीमद्भागवते । इति । यदुक्तं वेदे श्रीकृष्णनिरूपणानुपलब्धिरिति । तदपि युद्धेनानामत- जालोपरकतामूलमेव तत्तदुतामियानभिशताविजृम्भितमेव च । उद्दे- शतो निरूपणाभावेऽपि पदार्थतो निरूपणं सदानन्दस्वादिना श्रीकृष्णस्यै- त्यन्न सन्देहाभावात् । वेदस्य परोक्षवादत्वात् । “परोक्षप्रिया चै देघा" इति श्रुतेः। "परोक्षवादो वेदोऽयम् । परोक्षवादा ऋपयः परोक्षं च मम प्रियमि"ति पचनाभ्याश्च।यथादर्शिताया विशिष्टायाः प्रक्रियाया अवगमे सर्वस्मिन्नपि येदे श्रीकृष्णनिरूपणोपलव्धेः । "कृषिभूचाचक शन्दो श्व निर्वृत्तिपाचकः । तयोरक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयत" इत्यादि- गोपालतापन्यादिश्रुतिसमुदायेन निरूप्यमाणत्याच प्रमाणप्रमेयसाधन- फलैः श्रीकृष्ण पव वेदार्थो नाऽन्य इत्युपपादितमनुपदमुपहियमाण उपनिषदुपोद्धाते । उपनिषद्भाष्यतश्चैतवर्गस्यते । किमिह यहुना। पपञ्च "शास्त्रमवगत्य मनोचाग्देवैः कृष्णः सेव्य इत्यर्थ" इति साक्षाद्वेदाशयस्य खऊर्य फलति । उपदिष्टमेतच्छ्रीमदावार्यचरणैः "एक शास्त्रं देयफीपुषगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव । मन्नोऽप्येकस्तस्य नामानि यानि कर्माऽप्येकं तस्य देवस्य सेवे"ति भगवदचनव्याख्यायां तदुक्तार्थनिष्कर्पकथनरूपेण तत्यार्थदीपे । विवृतञ्चतच्छ्रीमत्प्रमुचरण- रन्यैश्च विद्वद्भगवदीयः। तथा हि-"धीयलभाचार्यमते फलं तत्माका स्यमत्राऽव्यभिचारिहेतुः। प्रेमय तस्मिन्नयधोकभक्तिस्तत्रोपयोगोऽखिल- साधनानामि"ति । जीवस्य घणुता जनिश्च जगतो मायोजिशताब्रह्मण. स्ताप्यादथ सत्यताऽस्य निगमोक्तप्यादरः कर्मसु ।,सेव्यत्वञ्च सदैव गोकुलपतेः पुष्टया पुनः शुद्धया लीलामाप्तिरनुत्तमं फलमिति श्रीवल्ल- भानाम्मतमि"ति च। तमिमं नाऽन्ये जानन्ति । यथा ते जानन्ति तथा तन्मतादेव विस्पष्ट- मस्ति । श्रीमदाचार्याचरणा एवैके जानन्ति।तपय तमिममुपपादयन्ति स्वकीयेषु प्रवन्धेपु । तदपि तत्प्रयन्येषु विस्पष्टमेवाऽस्ति । प्रथमः पक्ष एव च "शास्त्रमवगत्य मनोवाग्देहैः कृष्णः सेव्य" इत्ये- तदूपः श्रीमदाचार्यचरणानां मुख्यत्वेनाऽभिमतः । एतदेय श्रीवल्लभः सम्प्रदायस्य साकारब्रह्मवादापरपर्यायस्य श्रीमत्पुष्टिमार्गस्य मुख्य खरूपम् । विशिष्टस्याऽस्य प्रयोजनस्य सिद्धय एय भन्यदिग्विजयपृथ्वी- परिक्रमादिकरणं सम्प्रदायस्थापनञ्च । प्रथमोऽप्यसौ पक्षः सम्प्रत्यव्यवद्वियमाण एवं केवलं अन्थेपु तिष्ठति। द्वितीयः पक्ष एव प्रचलति फालयलाच्छक्तिमान्येन यथोक्तविशिष्टा- ध्ययनासम्भवाद्यथोक्तविशिष्टाध्ययनसिद्धसिद्धान्तानुवर्चनपरम्परामव- निरूपः। अन्यथाचरणान्यथाग्रहणादिदोपसम्भयानाऽयं मुख्यः पक्षः। तथापि दुःस्सङ्गवर्जनादिना श्रद्धया चोज्झितदोपो देवस्य पुरुषार्था- साधयेदिति द्वितीयत्वम् । मुख्यपक्षप्रचारामावत एव साम्प्रदायिकेप्यन्यथाचरणं तटस्थानां विदुपां सम्प्रदाये तदाचार्यादौ चाऽन्यथा ग्रहणं जगति नानामतजाल- जनितध्यान्तानुच्छेदाद्यनर्थपरम्परा च प्रवर्धते । अनिष्टस्याऽस्य निवा- रणाय मुख्यपक्षप्रचारार्थमुक्तविशिष्टप्रक्रियोपपन्नानां साम्प्रदायिककेन्द्र- स्थलेपु साम्प्रदायिकानां विद्यालयानामावश्यकतायामभिनिवेश्यतां . मतिरामाफीना साक्षादाशयपरित्राणवद्धपरिफरेण परमेश्वरेण भग- पता थीरणेनेत्यभ्यर्थनीयमेवैतरखलु । तस्मानानामतजालात्पृथगेव साक्षाद्वेदाशयस्तदप्राफ्ट्येन तदनवरो- धेनैव च नानामतजालजनितं ध्यान्तं श्रेयस्साधने प्रमुष्णाति तल्लाभेन तत्समाश्रयणेन च प्रसकानर्थपरम्परापोहः स चेदानी श्रीमदल्लभाचा. -- M यंचरणकमदर्शितः साकारब्रह्मवादापरपायः पुष्टिमाग एवेति सर्वेण बिदुपा देवसर्गेण यथोक्तं परीक्ष्याऽनुवर्चनीयः समाधणीयश्चेति नेह विचिकित्सायसर उपजातप्रकाशस्य फस्यापि सहृदयस्य परमवैदि. कस्य सज्जनस्य। यदि तु साम्प्रतिकानां सुलभःलङ्गानां व्यारयाद्वारा साक्षादानु पूर्वयैव दर्शितसमन्वयया साक्षादाशयत्वप्रत्ययो नाऽन्यथेति वेदोप- निपट्यारयाऽप्यावश्यकीयते तर्हि प्रथमपक्षसिद्धसिद्धान्तानुसारिणी द्वितीयं पक्षमनुगता च सेयमीशावास्योपनिपधारया चालभाप्यं नाम श्रीमदाचार्यचरणानुग्रहेण हृदये प्रकाशिवा तावदादौ पुरस्कियते । अनुगृह्यतामेपा सादवलोकनेनाऽपि सात्त्यिकैः साक्षावेदाशयैक- रसिकैर्विद्वद्भगवदीयश्चेति शुभम् । श्रीकृष्णार्पणमस्तु । शुभम् ।.
धीहरिर्जयति। श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। धीगोबर्द्धनोद्धरणधीराय नमः । श्रीमदाचार्यचरणपादारविन्दमकरन्दविन्दुपरिस्पन्देभ्यो नमः । श्रीमत्प्रभुचरणचरणसरोव्हरेणुराजिभ्यो नमः । उपनिषदां वालभाष्यम् । उपोद्धातः। twaunu- प्रणम्य श्रीगोवर्द्धनधरपदाम्भोरुहसुधां तदासं यदासं दृढतरमुपास्सं सुकृतिनाम् । चिरं ध्यायं ध्यायं प्रभुचरणपादाब्जयुगलं यथार्थाख्यां च्याख्यामुपनिषदि भद्रोऽनुभवति ॥१॥ अथाऽत उपनिषदो व्याकरिष्यामः । तत्रोपनिषदां प्रतिपाद्यं दशलीलायुतं श्रीकृष्णाल्यं परं ब्रह्म । "कृपियाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः । तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयत" इति "अथाऽतो ब्रह्मजिज्ञासे"ति प्रक्रम्य "जन्माऽऽद्यस्स यतः शास्त्रयोनित्वादिति "नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति । सर्वे वेदा यस्पदमामनन्ति । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः । मां विधत्तेऽभिधत्ते माम्" । किच-सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीभोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् । निगमकल्पतरोर्गलितं फलम् । सर्ववेदान्तसारं हि श्रीभागवतमिप्यते । सारं सार समुद्धृतम् । निगमकृदुपजडे मृङ्गवद्वेदसारम् । यः खानुभावमखिलश्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपमतितितीरिषतां तमोऽन्धम् । संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तंव्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् । भारत- व्यपदेशेन हानायाांश्च दर्शिताः। चत्वार एकतो वेदा भारतं त्वेकमेकत" इति। "वेदान्तेषु यथासारं समय भगवान् हरिः । भक्तानुकम्पया विद्वान् सषिक्षेप यथासुखम्"।
उपनिषदां बालभाष्यम् । .. अपि च-- -"कृष्णवाक्यानुसारेण शास्त्रार्थ ये वदन्ति हि । तेहि भागवताः प्रोक्ताः शुद्धास्ते ब्रह्मादिनः । वेदाः श्रीकृष्णवाक्यानि व्याससूत्राणि चैव हि । समाधिमाषा व्यासस्य प्रमाणं तच्चतुष्टयम् । अविरुद्धन्तु यत्त्वस्य प्रमाणं तच नाऽन्यथा । एतद्विरुद्धं यत्सर्व न तन्मानं कथञ्चन"। अपरञ्च-"वन्दे श्रीकृष्णदेवं मुरनरकभिदं वेदवेदान्तवेद्यम् । यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैवेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । अयमेव महामोहो हीदमेव प्रतारणम् । यत्कृष्णं न भजेत्याज्ञः शास्त्राभ्यासपरः कृती । अर्थोऽयमेव निखिलैरपि वेदवाक्यै रामायणैः सहित- भारतपञ्चरात्रैः । अन्यैश्च शास्त्रवचनैः सह तत्त्वसूत्रैर्निीयते सहृदयं हरिणा सदैव । अधुना ह्यधिकारास्तु सर्व एव गताः कलौ । कृष्णश्चेत्सेव्यते भक्त्या कलिस्तस्य फलाय हि । सर्वेषां वेदवाक्यानां भगवद्वचसामपि । श्रौतोऽर्थों घयमेव स्यादन्यः कल्प्यो मतान्तरैः । वेदान्ते च स्मृतौ ब्रह्मलिनं भागवते तथा । प्रक्षेति परमात्मेति भगवानिति शव्यते । इत्यादिभिः परस्सहसैः श्रुतिस्मृतिपुराणवचनैः श्रीमदाचार्यचरणनिश्चितार्थ- वचनैश्च श्रीकृष्ण एव वेदवेदान्तादिसकलशास्त्राणां प्रतिपाद्यमिति प्रस्पष्टमेतत् । इदमुक्तं भवति । श्रीकृष्णवाक्यसमाधिभाषानारदपञ्चरात्रमहाभारताष्टाद- शपुराणानामानामुपाङ्गानामुपपुराणानाञ्च वेदार्थव्याख्यानत्वमिति तावज्ज्ञाने वेदार्थस्य हृदये खतः परिस्फूर्त्या सर्वतः सर्वथाऽपरिशेप्य प्रकाशस्याऽवश्यम्भा- ववैवश्यादनयैव प्रक्रियया वेदार्थो विज्ञातः सुविज्ञातो भवति । अपरोक्षत्वात् । भिन्नया प्रक्रियया तु टीकादिरूपयाऽऽपाततः परोक्षः प्रतीतो भवति । तस्माच्चैषैव प्रक्रिया वेदार्थविज्ञान आदौ स्थिता । प्राचो बधीतसागवेदवेदान्तगीतासूत्र- श्रीमद्भागवतादिपरिकराः श्रीमदाचार्यचरणोक्तप्रकारेण निवृत्तसंशयास्तत्पद- र्शितसरलसरण्याऽधिगतवेदवेदान्तायुक्तनिखिलशास्त्रजालैकवाक्यताकाः परमा- थतः प्रकाशमानवेदार्थयाथातथ्या बभूवुः । तेषां टीकादिरूपया प्रक्रियया गृहीतो वेदार्थो नोपयोगाय । सर्वथा ब्रह्मविद्याप्रचारप्सया च न गौणं मार्ग ते जगृहुः । अत्यन्तमुपयोगाभावात् । तथापि वैदिकसर्वार्थानी तथा प्रकाशामा- वेऽपि सर्वेषां शास्त्राणामयमर्थ इति निश्चयमाधाय तदुक्तमगवत्सेवासरणादौ .
उपोद्धातः। मंत्तः पुरुषार्थ साधयेदिति टीकादिरूपयाऽपि प्रक्रियया पुरुषार्थप्रात्या टीका- ऽप्युपयुज्यत इतिः सेयमारभ्यते । विशेषमात्रनिरूपणं हाचार्यकृत्यम् । सत्राऽप्युत्तमाधिकारिणं शब्दादिशास्त्रेषु सुव्युत्पन्न प्रति । तसादपि तैस्तद- करणमिति । तथापि तैस्तत्सरणिः सरलीकृतैयाऽस्ति । तथाहि-वेदाः श्रीकृष्णवाक्या- नीत्यत्र । "वेदा इति । शब्द एव प्रमाणम् । तत्राऽप्यलौकिकज्ञापकगेव । तत्स्वतःसिद्धपमाणभावं प्रमाणम् । वेदाः सर्व एव काण्डद्वयस्थिताः । अर्थ- पादादिरूपा अपि । स्मृतित्वेन कृष्णयावयानि वेदत्वेऽपि पृथगुक्तानि । व्याससूत्राणि । चकारामिनिसूत्राणि च । एक्कारेण व्याससूत्राविरोधेनेव तदङ्गीकरणम् । हि युक्तधाऽयमर्थः । उपजीव्यत्वात् । व्यासस्य समाधिभाषा भागवतम् । तत्रापि यन लौकिकरीत्या वदति । यथा -अथोपस्युपहचाया- मित्यादि । नापि परमतरीत्या । श्रुतं द्वैपायनमुखादित्यादि । यावत्समाधी स्वयमनुम्य निरूपितं सा समाधिभाषा । एतचतुष्टयमेकवाक्यतापन्नं प्रमाज- नकमित्यर्थ" इति । अत्र शब्दप्रामाण्यविचारं विना वेदप्रामाण्यविचारं विना चोपनिषदाम- र्थनिर्णयस्य तत्कथनस्य चाऽनवसरपराहतत्यादादी प्रत्यक्षादिषु प्रान्तेः साम- वातत्सम्भवरहितालोकिकज्ञापशब्दस्य सरूपसिद्धं प्रामाण्यं-प्रमाणान्तरापरा- हतमामाण्यकं प्रामाण्यं-अवस्थाप्य तच पूर्वोचरकाण्डसितानां सर्वेपामपि वेदानां तुल्यमर्थवादानामपि विधिसमकक्षमिति तदसङ्कुचितमित्युक्त्वा भगव- गीताया वेदत्वमेव भगवद्वाक्यत्यास्मृतित्वं त्वर्जुनाधिकारमनुसृत्य मग- वतीक्तत्वाचेन तदुभयात्मकं वेदवत्प्रमाणं चेति वेदार्थस्य श्रीकृष्णवाक्या- नुसारित्वाय कथयित्वा मीमांसात्वापासजेमिनिसूत्रानुसारित्वमप्यावश्यक तत्रापि व्यासाविरोधेनेव जैमिनेः प्रामाण्यं न स्वतनं तस्य व्यासशिप्य. खेन व्यासविरोधस्साऽसम्मवान्याख्यातदोपाद्विरोधः प्रतिमाति सोऽपहस्ति- तन्य इति निरूप्य ब्रह्मजिज्ञासान्ते शाखें विरचितेऽपि श्रीमद्भागवतेनैव व्यासपरितोषस्य श्रीमागवते निरूपणातदनुसारित्वमपि सर्वथैवाऽपरिहार्य- मिति निरूपितम् ।
उपनिषदां बालभाप्यम् । । एवञ्च भगवद्गीताब्रह्मसूत्रश्रीमद्भागवतैर्निरस्तसमस्वसंशयो व्याख्यातो निर्णीतश्च यो वेदार्थः स वेदार्थः । स च दशलीलायुतः श्रीकृष्णः । सोऽपि- "अपश्यत्पुरुषं पूर्ण मायाञ्च तदुपाश्रयाम् । यया सम्मोहितो जीव मात्मानं त्रिगुणात्मकम् । परोऽपि मनुतेऽनर्थ तत्कृतं चाऽमिपद्यते । अनर्थोपशमं साक्षा- शक्तियोगमधोक्षज" इत्येवम्प्रकारेण जीवानां समस्तानर्थपरम्पराप्रवाहनिवार- णायाऽनुग्रहवर्षाप्रावृषेण्यपयोदीभूतः केवलानुग्रहमानलभ्यः सततानुग्रहकातरश्च खतघ्रपुरुषार्थरूपश्च । नाऽन्यविधः । सर्वपुरुषार्थसाधकश्च । मायासावे प्रतीतानां धनधामधरादीनां पुरुषार्थत्वाभावेन मायानिवृत्त्यैव वास्तविकसर्वपुरु- पार्थावातिनिर्णयेन चाऽन्यथा तदसिद्धेः । “कोऽन्योऽर्थोऽस्साऽवशिष्यत" इति वचनात् । "तावद्भयं द्रविणगेहसुहृन्निमित्तं लोभःस्पृहा परिभवो विपुलश्च लोमः। तावन्ममेत्यसदवग्रह आत्ममूलो यावन्न तेऽशिममयं प्रवृणीत लोक" इति वच- नाच । “यत्कर्ममिर्यचपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् । सर्व मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽजसे"तिवचनाच । पूर्ण करुणया सामर्थ्यादिना च । तेनाऽनुग्रहकलम्यो भक्तियोगो भगवांश्च । अनुग्रहैकसाध्यैव च मायावत्कृतानर्थयोनिवृत्तिः । ततश्च भक्तानुग्रहन्यग्रो विविधलीलाविलासविराजितः पडैश्वर्य्यपरिपूर्णो भगवान् श्रीकृष्ण एव केवलो चेदार्थो नाऽन्य इति श्रीमदाचार्यचरणैर्निरूपितम् । न च "पुराणन्यायमीमांसे"त्यादिवचनविरोघ इति शश्यम् । उक्तमान- चतुष्टयाविरोधेन तत्मामाण्यस्य स्वीकारात् । “विरोधे त्वनपेक्षं स्वादसति धनुमा- नमि"ति सूत्रात् । ननु पूर्वतः कर्मण्येव वेदस्य तात्पर्य्यकथनादिह च श्रीकृष्णभकावेव तात्पर्य्यकथनास्कि युक्तमित्यत आहुः---उत्तरं पूर्वसन्देहवारकमित्यादि । तथा चोक्ते सन्देहे-"सर्व कर्माऽखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते । एतान्यपि तु फर्माणि सनं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चित मतमुत्तममिति भक्तावेव तात्पर्यनिर्णयः । “भक्त्या मामभिजानाती"त्यादिवाक्यात् । एवमेव वेदोकं परं ब्रह्म निर्विशे या सविशेष वा शिवाद्याकारं विष्ण्वा- थाकार कृष्णाकारं वेत्यादिसन्देहे-"अहं सर्वस्य प्रभवः । मत्तः परतरं नाज्य- किञ्चिदस्ति धनञ्जय । यसाक्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोचमः । अतोऽसि होके उपोद्वातः । ५ वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः । वैदैश्च सधैरहमेव वेद्यः । नाऽहं प्रकाशः सर्वस्ये"- त्यादिमिः श्रीकृष्णाकारं सर्वापाकृतविशेषरूपञ्चेति "येऽप्यन्यदेवताभका" इति वचनान्न देवतान्तररूपमिति निर्णयः । ननु पूर्वकाण्डे कर्मणां प्रतिपादनमुत्तरकाण्डे च ज्ञानप्रतिपादनमस्ति । श्रीगीतामागवतयोश्च श्रीकृष्णप्रतिपादनं तदत्तिप्रतिपादनश्च स्तः । कथमेपामे- कवाक्यतेति चेन्न । “यज्ञरूपो हरिः पूर्वकाण्डे ब्रह्मतनुः परे । अवतारी हरिः कृष्णः श्रीभागवत ईर्यत" इति श्रीमदाचार्य्यवचनात् । अत्राऽयम्प्रकाश:-"यः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति श्रुतेनिकियोमययुतः सर्वेपामर्थः । तत्र क्रियायां प्रविष्टः क्रियारूपो यज्ञात्मा पूर्यकाण्डार्थः । ज्ञाने भविष्टो ज्ञानात्मा ब्रह्मरूप उत्तरकाण्डार्थः । तनुशब्दः साकारब्रह्मप्रतिपादनाय ! परे उचरमिन् काण्डे । क्रिया ज्ञानं च द्वयं प्रकटीकृत्य योऽवतीर्णः कृष्णः स श्रीभागवते विशिष्टो निरूप्यते । अतः खण्डशो निरूपणं वेदे । भागवते तु समुदायेन निरूप्य सस्य लीला अनेकविधा निरूप्यन्त इत्येकार्थत्वेऽपि पृथवचनं युक्तमित्यर्थ" इति। तथाच वेदस्य पूर्वोत्तरकाण्डयोः श्रीगीताभागवतयोश्च सर्वत्र श्रीकृष्ण एवं निरूप्यते । तत्र पूर्वोत्तरकाण्डयोः क्रियात्मा ज्ञानात्मा च श्रीकृष्णः खण्डशो निरूप्यते । श्रीगीताभागवतयोश्च तदुभयविशिष्टस्तत्वरूपानुरूपा विविधास्त- लीलाच गोवर्धनोद्धरणादिरूपा निरुप्यन्त इति प्रकारभेदाद्विशेपेऽपि वेदार्थः श्रीकृष्ण इत्पन्न नास्ति स्तोकोऽपि सन्देहः । ननु वैदे सूर्याधुपासना निरूप्यन्ते । पुराणे च दुर्गागणपतिप्रभृतीनामुपा- सना निरूप्यन्ते । शिवादयस्तु जगत्कर्तृत्वादिरूपनामलक्षणवत्त्वेनैव प्रति- पाइन्ते । कथमेतर्हि श्रीकृष्णस्यैव वेदार्थत्वं प्रतिपचव्यमिति चेन्मैवम् । अत्रा- S: श्रीमदाचार्य्यचरणा:-"सूर्यादिरूपानझकाण्डे ज्ञानाङ्गमीर्यते । पुराणे- कपि सर्वेषु तत्तद्रयो हरिस्तथा" इति । अयच्चे मकाशावरणभङ्गयोराशयः- "इन्द्रं मित्रं वरुणममिमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गल्ल्मान् । एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्तीति श्रुतेः "येऽप्यन्यदेवताभक्ता" इति गीतावाक्याच यष्टन्य उपा- सच तत्तयो हरिरेव यागशेपत्वेनोपासनाशेषत्वेन च निरूप्यत इत्यङ्गानाम- निसापेक्षत्वात् "स्वार्थबोधेसमाप्तानामझाङ्गित्वायपेक्षया । वाक्यानामेकवाक्यत्वं - उपनिपदों वालभाज्यम्। पुनः संहत्य जायत" इत्यनिरूपकत्वेन तेषामेकवाक्यतैव न विरोधः । अन्यार्थप्रतिपादनप्रतिपत्तिर्मात्या । ननु तत्र नानादेवतानामुपासनानाञ्च निरूपणात्तेषां तृतीयकाण्डवेन जैमिनिना सकर्षणकाण्डाख्यतन्मीमांसाप्रणयनाच स्वतन्नार्थप्रतिपादनपरतैवा- ऽवसीयते नाऽननिरूपणपरतेति । उपासनानां मानसकर्मरूपतया कर्मका- ण्डान्तःपातो वा । उभयथाऽपि नानादेवतातदुपासनप्रतिपादनपरता प्रामोति नाकामिभावेन श्रीकृष्णप्रतिपादनपरतेति चेन्मैवम् । ब्रह्मकाण्डे ज्ञानसिद्धय- र्थमुपासना निरूप्यते । तथाच द्वितीयेऽवान्तरवाक्येपूपासनानां निरूपणान तृतीयकाण्डत्वं शक्यं कल्पयितुम् । पाशुकतन्त्रवत्कर्मकाण्डानन्तर्गतत्वाचन तदन्तःपातः शक्योपपादनः । जैमिनिकृतमेदस्तु उपेक्षणीयः। तस्मात्सूर्याधुपासनानामङ्गत्वं न स्वतन्त्रत्वम् । : सचित्तशुद्धिद्वारैवेति केचित् । तदसत् । फलदानद्वारा माहात्म्यप्रतिपादनेन भक्तिद्वारेति सिद्धान्तात् । यत उद्गीथादिसूर्याधुपासनया तवत्प्रकरणोक्तं फलं तेन तेनोपास्येन दीयते । तेषाञ्च प्रतीकत्वेन तत्कृतफलदानान्मूलरूपमा- हात्म्यमेव प्रतिपादितं भवति । ज्ञाते च माहात्म्ये तत्र भक्तिस्तया ज्ञानम् । "भत्त्या मामभिजानाती"ति भगवद्वाक्यात् । तथाच मूलरूपमाहात्म्या. यैव देवतान्तरतदुपासनानां तत्र तत्र निरूपणं न देवतान्तरप्राधान्यायेति । ननु भवत्वेवं वेदे। तथापि पुराणे तु नाऽयं न्यायः सङ्गच्छते । तत्र प्रति- पाघदेवताया मुख्यत्वस्यैव प्रतीतेः । मैयम् । पुराणोक्तानां दुर्गागणपतिप्रभृ. तीनां विशिष्टशेपत्वमावरणदेवतात्वेनाऽस्ति । न शेषित्वमस्तीति तदभावात् । नन्यस्त्वेवं दुर्गादिस्थले । शिवादिस्थले तु मुख्यत्वमेव निरूप्यते । जग स्कर्तृत्वादिरूपब्रझलक्षणवत्त्वेनैव तत्प्रतिपादनादिति चेत्सत्यम् । शिवादिरूपर हरेरेव तन्माहात्म्यं निरूप्यते । तस्यैव सर्वरूपत्वात् । "एकोऽहं बहु स्यामि" त्यादिश्रुतिशतेभ्यः । “अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते । इति मत्व भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता" इत्यादिभ्यः परस्सहस्राभ्यः स्मृतिभ्यश्च वयान विकृतिन्यायेन तत्र रूपान्तरप्रतिपादकत्वान्मुख्यप्रतिपादकशेषत्वेन मूलरूपमाहात्म्यमेव निर्वर्णितं भवति नाऽन्यदेवप्राधान्यमिति हरिरेव हि साध- उपोद्धात: नरूपः फलरूपश्चेति सर्वत्र श्रीकृष्णः शास्त्रार्थो नाऽन्यः। “सवें वेदा यत्पद- मामनन्ति । नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति । सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति । वैदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः । वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते । मां विधत्तेऽमियते माम् । सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तैर्युक्तः परः पुरुष एक इहाऽस्य धत्ते । स्थित्यादये हरिविर- ञ्चिहरेति संज्ञाः श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनोणां स्युः । पुरुप एवेदर सर्व यद्भूतं यच्च भाव्यम् । उताऽमृतत्वस्येशानः। पुरुपान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः । मत्तः परतरं नाऽन्यत्किश्चिदस्ति धनञ्जय । उत्तमः पुरुपस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यस्मारक्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽसि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः । यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत । एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव । मनोऽप्येकस्तस्य नामानि यानि कर्माऽप्येकं तस्य देवस्य सेवा । यो नरः पितरं द्वेष्टि तं विद्यादन्यरेतसम् । यो नरः श्रीहरि द्वेष्टि तं वेद्यादन्त्यरेतसम् । योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । किन्तेन न कृतं गपं चौरेणाऽऽमापहारिणेत्यादिः श्रुतिस्मृतिपुराणादिपरस्सहसवाक्यगणो- ऽप्यत्राऽनुसन्धेयः। ननु शिवपुराणादिषु भगवद्गीतादौ पारतम्यादिनाऽभिष्टुतस्य भगवतः श्री. कृष्णस्याऽपि शिवार्चनादिविधानेन शिवस्यैव पारतम्यं प्रतिपाद्यते । हरिवंशादिषु विष्णुशिवाभेदश्च भूयसा समारम्भेण निर्णीयते । “यस्त्वां द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्त्वामनु स मामनु । त्वदुपासा जगन्नाथ सैवाऽस्तु मम गोपते" इत्यादीनि वचनान्यपि भूयास्येवोपलभ्यन्त इति शिवपारतम्यमेव शास्त्रार्थों का विष्णु- शिवाभेद एव वा शास्त्रार्थः स्यान पुनः श्रीकृष्ण एव केवलः शास्त्रार्थ इति सुवचमिति चेत् । तदसत् । आसुरव्यामोहनार्थत्वात्तस्य । नरकैकोदर्कतया- ऽनादरणीयत्वाच्च । विभूतिपरतया व्यवस्थितत्वाच । तथाच वचनानि । वाराहे । "त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय । अतथ्यानि वितय्यानि दर्शयस्व महाभुज । प्रकाशं कुरु चाऽऽत्मानमप्रकाशश्च मां कुरु" 1 पाझे । लामाराध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा । द्वापरादौ उपनिषदां बालभाष्यम् । ८ . युगे भूत्वा कलया मानुषादिषु । स्वागमैः फसितस्त्वञ्च जनान्मद्विमुखान् कुरु । मां च गोपय येन सात्सष्टिरेपोचरोचरा" । पुनश्च तत्रैव गुणत्रयविव- रणाध्याये शिवेनोक्तम्-"शृणु देवि प्रवक्ष्यामि तामसानि यथाक्रमम् । येषां श्रवणमात्रेण पातित्यं ज्ञानिनामपि । प्रथमं हि मयैवोक्तं शैवं पाशुपतादिकम् । मच्छक्त्याऽऽवेशितैविप्रैः सम्प्रोक्तानि ततः परम् । कणादेन तु सम्प्रोकं शास्त्रं वैशेषिकं महत् । गौतमेन तथा न्यायं साहयं तु कपिलेन वै । विषणेन तथा प्रोक्तं चार्वाकमतिगर्हितम् । दैत्यानां नाशनार्थाय विष्णुना बुद्धरूपिणा । बौद्धशास्त्रमसत्मोक्तं नमनीलपटादिकम् । मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्ध- मुच्यते । मयैव कथितं देवि कलौ ब्रामणरूपिणा । अपार्थ श्रुतिवाक्यानां दर्शयलोकगर्हितम् । कर्मस्वरूपत्याज्यत्वमत्रैव प्रतिपाद्यते । सर्वकर्मपरिअष्टं विकर्मत्वं तदुच्यते । परेशजीवयोरैक्यं मयाऽत्र प्रतिपाद्यते । ब्रह्मणश्च परं रूपं निर्गुणं वक्ष्यते मया । सर्वस्य जगतोऽप्यत्र मोहनार्थ कलौ युगे । वेदार्थव- महाशास्त्रं मायावादमवैदिकम् । मयैव वक्ष्यते देवि जगतां नाशकारणात् । द्विजन्मना जैमिनिना पूर्व वेदमपार्थतः । निरीश्वरेण वादेन कृतं शालं मह- घरम् । शास्त्राणि चैवं गिरिजे तामसानि नियोघ मे" | पुनराहे रुद्रगीतासु विष्णुरुवाच-"सर्वज्ञस्त्वं न सन्देहो ज्ञानराशिः सनातनः । देवानाच परः सर्वदात्वं भविष्यसि । एवमुक्तः पुनर्वाक्यमुवाचौमापतिर्मुदा। अन्यं देहि वर देव प्रसिद्ध सर्वजन्तुपु । मूर्ती भूत्वा भवानेव मामाराधय केशव । मां वहस्व च देवेश वर मत्तो गृहाण च । येनाऽहं सर्वदेवेश पूज्यात्पूज्यतरो मवे । विष्णुरुवाच-देवकार्यावतारेषु मनुष्यन्नमुपागतः । त्वामेवाऽऽराधयिष्यामि त्वं च मे वरदो भव । यत्त्वयोकं वहखेति देव देव उमापते । सोऽहं वहामि त्वां देव मेपो भूत्वा शर्त समा" इति । किञ्च । श्रीभागवते । “सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणातैर्युक्तः परः पुरुष एक इहाऽस्य धते। स्थित्यादये हरिविरधिहरेति संज्ञा" इत्यादि । नारायणो- पनिपदि। "सहसशीप देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् । विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदमि"त्युपक्रम्य "स ब्रह्म स शिवः स हरिःसेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वरा- डि"ति । पुनश्च श्रीभागवते । "कीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत्कृतं ते खाम्यं तु उपोद्धातः। सत्र कुधियः पर ईश कुयु" । पाझोत्तरखण्डे पार्वती प्रति शिवः । “यस्तु नारायणं देवं ब्रझरुद्रादिदैवतैः । समत्वेनैव वीक्षेत स पाखण्डी भवेत्सदा"। तैत्तिरीये। नारायणः परं ब्रह्म तत्वं नारायणः पर" आथर्वणे। "एको ह वै नारायण आस" (नारदपञ्चराने द्वितीयरानतृतीयाध्याये शिवः । "गुणान्तरं तीर्थकीर्तेः को वा वक्तुं क्षमो मुने । नाऽहं नशा च शेषध धर्मः सूर्यास्तथैव चे"त्याद्युपकम्य-नैव कृष्णात्परो देवो नैव कृष्णात्परः पुमान् । नैव कृष्णात्परो ज्ञानी न योगी च ततः परः । नैव कृष्णात्परः सिद्धस्तत्परोऽपि नहीधरः । न तत्परश्च जनको विश्वेषां परिपालकः । न तत्परथ बलवान् बुद्धिमान कीर्तिमांस्तथा । न तत्परः सत्यवादी दयावान् भक्तवत्सलः । न तत्परश्च गुण- वान् सुशीलश्च जितेन्द्रियः । शुद्धाशयश्च शुद्धश्च न तस्माद्भक्तवत्सलः । न हि तलारपरो धर्मी प्रदाता सर्वसम्पदाम् । न हि तस्मात्परः शान्तो लक्ष्मी- कान्तात्परश्च कः" । इत्यादि । श्रीभागवते । “निरस्तसाम्यातिशयेन राघसा । श्वेताश्वतरे। न तत्समश्चाऽभ्यधिकच दृश्यते" । नारायणोपनियदि । “अम्भस्य. पार"इति प्रक्रम्य-"यमन्तः समुद्रे कवयोऽवयन्ती"त्यादिलिङ्गकथनपूर्वकं "तदेव ब्रह्म परमं कवीनामि"ति श्रावितम् । “सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुरि"त्यत्र शिवनामविवरणे विष्णुसहस्रनाममाप्ये शकराचा-:-"निस्वैगुण्यतया शुद्ध- स्वाच्छियः । स ब्रह्म स शिव इत्यभेदादेशाच्छिवादिनाममिहरिरेव स्तूयत" इति । हरिरपीति नोचुः । किन्तु हरिरेवेति । पदपद्याच्च न्यायमुदाजदुः- "सामुद्रो हि तरणः कचन समुद्रो न तारमः" । इति । एवञ्च शिवपारतम्यस्य व्यामोहनार्थत्वाद्विष्णुशिवाभेदस्य विमूत्येकविषय- स्वेन व्यवस्थितत्वादशाशिनौरभेदस्याऽपि तादाम्यमानगोचरस्वेन वस्त्वन्त- रस्वाभाववत्त्वेऽपि भेदानामाताभेदत्वेनाऽव्युत्पन्नतया परमताभिमतासाधक- खात्कार्याकारणाभेदस्य प्रमत्तमलपितत्वापत्या प्रेक्षावदपेशाविरहितत्वादे- कत्वलक्षणाभेदस्य व्यक्तिमेदरूपभेदनामभेदकार्यभेदादिभिः सत्प्रतिपक्षतया प्रत्यक्षबाधितत्वाइँदामावेऽमेदोक्तेरतिप्रसङ्गग्रस्तत्वादमेदान्तरस्य चाप्रसिद्धेश्व वचनान्तरेभ्यश्च व्युत्पन्नत्याच सर्वकारणस्य पुरुषोचमस्य श्रीकृष्णरस सर्वो- एकपः सर्वथैव दुरपलपः । अथाऽऽविद्यकलादिस्याऽभेद इत्युच्यते । तदे- तदन्यत् । उपासनापकरणे केवलाद्वैतसिद्धान्तस्याऽनुपस्थितिश्च । विष्णुशि- चाभेदासाधकत्वश्च । 2 ईशा उपनिपदा थालमाप्यम् । १० तस्माच्छ्रीकृष्णस्तल्लीलाप्राप्तिश्च फलं तत्सेवा च तत्साधनं तत्तदवान्तरसाध्य- साधनरूपोऽपि स एव नाज्य इत्यादिरर्थ एव वेदप्रतिपाद्यो ,नाऽन्य इति जीवैर्निश्चयेन दृढं बोद्धव्यम् । नेह सन्देग्धव्यम् । "संशयात्मा विनश्यती"ति वाक्यात। ननु "तत्त्वममी"त्यादिनिरूपिते ज्ञान एव सर्वानर्थनिवृत्त्या प्राप्यान्तरा- भावापुरुषार्थसमाप्त्या क भक्तौ वेदतात्पर्य्यमिति चेन्मैवम् । निरुपधिप्रियो खात्मा । “आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवती"ति प्रियत्वमुपक्रम्य हि "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्य" इति निस्प- घिप्रियत्वमात्मनः श्राव्यते । तदर्शनार्थमेव च श्रवणमनननिदिध्यासनानि साधनानि श्राव्यन्ते । प्रियश्चाऽदर्शनश्चेति महती हि खल्वियं दुःखोद्रेकिण्य- नर्थपरम्परा नूनं निवर्तनीयेति.। सा च श्रवणादिना ज्ञानद्वारा दर्शने सत्येव निवर्तते नाऽन्यथा । "मिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चाऽस्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावर" इति हि सहस्रश उपहणान्युपलभ्यन्ते। "आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवती"ति जीवोपक्रमेऽपि "आत्मा या अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्य"इत्युपसहारे सर्वकारणस्य परमात्मन एव दर्शनश्रवणादि विधीयते।न जीवाना परमात्मकार्याणाम् । यथा “सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपा" इति श्रुतेस्तेषामानन्त्याहहुवचनप्रसनात् । "आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदर सर्व विदितमि"त्येक- विज्ञानेन सर्वविज्ञानकथनलिङ्गात् । एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानस्य "यथा सोम्यकेन मृत्पिण्डेने"त्यादिमि श्रुत्यन्तरेः कार्यकारणभावात्मनैवोपपादनात् । "वावयान्वयात् । प्रतिज्ञासिद्धेर्लिनमाश्मरथ्यः। उत्क्रमिप्यत एवम्भावादित्यौडु- लोमिः । अवस्थितेरिति काशकृत्स्न" इत्येतेभ्यः सूत्रेभ्यः । तस्मादारत सर्वात्मा भगवान् हरिरीश्वरः। श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्चेच्छताऽमयमि". त्याद्युपवृंहणशतेभ्यश्च । तथाच जीवस्य निरुपधिप्रियत्वं न स्वतनं किन्तु परमात्मनोंऽशकृतम् । एवमेवाऽशाशिभावं कार्यकारणभावमेव वा पुरस्कृत्य जीवस्य परमात्माभेद- "स्तत्त्वमसी"त्यत्राऽप्युपदिश्यते । तत् त्वमसीति युपदिश्यते । तदभिन्नस्त्व. मित्यर्थः । न त्वं तदस्तीति । त्वदभिन्नं ब्रह्माऽस्तीत्यर्थः । त्वमेव ब्रह्म ।
उपोद्धातः। स्वद्वयतिरेकेण ब्रश नाऽस्तीति नोपदिश्यते । तथा सति वाक्यमुक्तरूपं भवेन्न यथा श्रुतम् । उद्देश्यविधेयभावेन तदेवोपदिश्यत इति चेदद्वैतासिद्धिः । अवच्छेदकमेदात् । भागत्यागलक्षणंया शुद्धचैतन्यवोधश्चेदुपदिश्यते । तद- सत् । विनिगमनाविरहात् । न च परमात्मामेदोपदेश एव जीवस्य का विनिगमनेति याच्यम् । श्रुत्य- न्तरानुमह इति प्रदर्शितम् । किञ्च । "सन्मूलाः सौम्येमाः सर्वाः प्रजा" इत्युप- कम्य “स य एपोऽणिमा । ऐतदात्म्यमिदर सर्व तत्सत्यमि"त्यन्तेन विवर्तोपा. यानफत्यनिरासेन सदुपादानकत्वं समन्वयादिति तत एव सर्वस्याऽस्य कार- गाभिन्नत्वं पनायविकारराहित्येनाऽऽविर्मावतिरोभावशालित्यमिति च व्युत्पाय जद्दजीक्योर्वलक्षण्ये सति कथमुभयोः सदात्मकत्यमित्याकादायां स "आत्मेति स परमेश्वरः सर्वस्य स्वरूपभूतो यथा सुवर्ण शकलकुण्डलादीनां तथा जीवाना- मंशानां कार्याणां घटपटादीनाश्च स्वरूपभूतः सः । तेनोमयरक्षण्येऽपि तयोः सदात्मकत्वं सूपपन्नमित्युपपाय जीवस्य तदात्मकत्यमाह-"तत्त्वमसी"ति । तथा सत्युपत्रमानुकूलत्वमत्र विनिगमना । "अपि या तमादेशमप्राक्षो येनाऽश्रुतं श्रुतं भवती" त्यादिना एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानमुपक्रमे प्रतिज्ञातम् । तदोपपद्यते यदि सर्वमध्येकमेव वस्तु भवेत् । सुवर्णमेव हि सुवर्णखण्डाः सुवर्णकार्यश्च । तत एव सुवर्णे ज्ञाते सुवर्ण समिति प्रत्यभिज्ञावसरः।न यस्त्वन्तरत्वेऽपि । यस्त्वन्तरत्याभा- वायेव "सदेव सौम्येदमम आसीदि"त्यारभ्य निरूपणम् । सन्मूला इत्यादिना समन्वयं प्रदर्यंतदात्म्यमिदं सर्वमिति सर्वस्य जडस सदभेद उपपादितः। सत्सत्यमिति समर्थितश्च । एवमेव तत्त्वमसीति जीवस्य सदभेद उपदिश्यते । उभयोरपि , निरुपधिप्रियत्योपपादनार्थ मध्ये स आत्मेत्युकम् । आत्मानात्म- कृतो भेदस्तद्वानवताम्मदानामेव । न ज्ञानिनाम् । तेषां सर्वत्राऽऽत्मदर्शनाना- ज्यत्र वैराग्यं दुःसदोपादिमानं च । किन्तु जीवे जडे चोभयत्राऽप्यात्मत्व- भानेन परमा प्रीतिरात्मत्वानुगता । विषयत्वानुगता हि परिहार्या न त्वात्मा- नुगता । तन्न फोऽपि कुचोद्यावसरः । यथेतदारयमित्यत्र न मागत्यागलक्षणा । तथैव तत्त्वमसीत्यत्राऽपि न भागत्यागलक्षणा । एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञायास्तदेवोपपत्तेः । एकवि- उपनिषदा पालभाप्यम् । १२ ज्ञानेन सर्वविज्ञाने अभिन्ननिमित्तोपादानता सृष्टिकरण सङ्कल्पमात्रेण च तदि. त्यसहायशूरता सृष्टेः स्वाभिन्नत्वेनाऽऽत्मरूपतया निरुपधिप्रियत्वं निर्दोषत्व- ञ्चेति भगवतो माहात्म्यमेव ग्राहितं भवति । महांधाऽसावात्मा चेति महात्मा । तस्य भावो माहात्म्यम् । महत्त्वमभिन्ननिमित्तोपादानत्वादिलक्षणं निरुपधि- प्रियत्वलक्षणचाऽऽत्मत्वमेतदुभयज्ञानमेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानस्य फलम् । आत्मत्वेन निरुपधिप्रियत्वात्तत्र भक्तिरेव स्वारसिकी तात्पर्य्यविषयश्च । न ज्ञानमुपसर्जनीभूतम् । भक्त्युत्पतावुपक्षीणत्वात् । तत एव "माहात्म्यज्ञान- पूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः । नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तयां मुक्तिर्न चाऽन्य- ये"ति निप्कृष्टवचनम् । भक्तिस्तावदशद्वयात्मिका । माहात्म्यज्ञानपूर्वकसुदृढसर्वतोधिकनेहरूप- त्वात् । तामेव श्रुतिः प्रतिपादयति । सहसशः सृष्टिभेदान्ब्रुवती माहास्यं ज्ञापयति । तदर्थमिह सदेव सौम्येत्यारभ्यैतदात्म्यमिद सर्व तत्सत्यं स आत्मेत्यन्तेन सृष्टिं निरूपयति । स .आत्मा स परमात्मा आत्मा स्वरूपभूतः सर्वस्येति जडस्य तदात्मकत्वमुक्त्वा जीवस्याऽऽप्यात्मत्वेन प्रति- पत्नस्य तदात्मकत्वं मूते-तत्त्वमसि । तेन जीवस्याऽऽत्मत्वेन स्फूर्ती परमात्मैव समन्वयात्कारणम् । नाऽन्यथा जीवस्याऽऽत्मत्वमुपपद्यते । तस्मात्परमात्मैव वस्तुतो जीवस्याऽऽत्मा न जीवस्य खात्मा आत्मेति स्वात्मनि जीवस्याऽऽत्मत्वप्रत्ययं न्यकृत्य, सर्वकारणे सर्वात्मनि पुरुषोत्मे भगवति श्रीकृष्णपरब्रमण्यात्मत्वं ग्राहयन्ती स्वात्मवत्तत्रैव निरुपधिप्रियत्वञ्च दर्शयन्ती तत्रैवाऽनन्यभक्ति साभाविकी पुरुषार्थ इति सिद्धान्तयति । ययात्मज्ञानमेव तस्सा विधित्सितं स्यान्न परमात्मभक्तिस्तदा सदेवेत्या- रम्य तत्कृतां सृष्टिमतदात्म्यमित्यादिना तदात्मकता तत्सत्यमिति निर्दोषतां स आत्मेति परमात्मन. सर्वस्वरूपमूतत्वमिति किमपि पूर्व न देतत्वम- सीत्येतावन्मात्रमेवोपदिशेत् । यस्मादशद्वयमपि श्रुतिनिरूपयति तस्मादतावेव स्यतात्पर्य प्रदर्शयतीति न कश्चित् सन्देहोदयसमय इति दिक् । इत्युपोदातः।
-श्रीहरिर्जयति।
श्रीकृष्णाय नमः।
थीगोपीजनवल्लभाय नमः।
श्रीगोवर्धनोद्धरणधीराय नमः।
श्रीमदाचार्यावरणपादारविन्दमकरन्दपरिस्पन्देन्यो नमः ।
श्रीमत्मभुचरणवरणसरोव्हरेणुराजिन्यो नमः।
ईशावास्योपनिषद् ।
श्रीमप्रभुचरणप्रथमापत्यश्रीशोभादेवीवंशलब्धजन्मना
श्रीमद्रामचन्द्राध्यरिश्रीहरिहरदीक्षितभीगणेशदीक्षितानुगृहीत-
निगृहतैलगवेल्लनाटीयफुलफलशोदधिकलानिधिना
पुष्टिमा विद्यानिष्णातमदृश्रीदेवकीनन्दनदेवशर्म-
तनुजनुषा
पण्डितभश्रीवलभद्रशर्मणा
ऋविकाव्यरत्नाकरकविचूडामणिशुद्धाद्वैतभूपणकविरत्नमहामहोपदेशक-
विद्यालद्वारवेदान्तविद्यानिधिसनातनधर्मामार्तण्ड-
भीसुयोधिनीसुधाधाराधरेण
विनिर्मितसाफारमहायादानुसारिवालभाष्यविभूपिता ।
नमः श्रीकृष्णदेवाय योऽद्वितीयोऽपि सर्वधा ।
ईशेशितन्यो रमते पूर्णानन्दधनायनः ॥१॥
सिद्ध ईशावास्य ईशः सुपथवाऽर्थिनामपि ।
योऽग्निस्ते श्रीमदाचार्यचरणास्तान्नमाम्यहम् ॥२॥
श्रीमदग्निकुमाराय कुमध्यान्तनाशिने ।
श्रीमते विझलेशाय तदीयेशाप ते नमः ॥ ३ ॥
२ । ईशावास्योपनिषद् । अथोपनिषदस्तास्ता व्याचिकीर्षस्तदिच्छया। तानहं करुणापूर्णाविर्भावाञ्छरणगतः ॥ ४ ॥ न लक्षणोच्यते नैव न्यूनत्वात्पूर्तिरन्यतः । आर्थिकन्तूच्यते यचाऽनुगुणं धुप,हणम् ॥ ५॥ मतान्तरनिरासेन वैरसं नाऽतिसृज्यते । तस्याऽऽकरेपु सिद्धत्वात्सरसं परिवेप्यते ॥६॥ अथ वेदानामुभयकाण्डस्थितानामपि "सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति । वैदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः । वासुदेवपरा वेदाः । नारायणपरा वेदाः । मां विधत्तेऽभि- धते मामि"त्यादिप्रमाणगणेन भगवत्परत्वमेव ब्रह्मवादिनो निर्णयन्ति । “यदेव श्रद्धया फरोति विद्ययोपनिषदा तदेवाऽस्य वीर्यवत्तरं भवति । ज्ञात्वाऽज्ञात्वा च कर्माणि जनोऽयमनुतिष्ठति । विदुषः कर्मसिद्धिस्स्यात्तथा नाऽविदुषो भवेदि"त्यादिभिर्वच विद्यायाः कर्मागत्वाकर्मणा वा विद्यासमुचितेन कर्मणा वा मोक्षादिपुरुषार्थसिद्धरुतरमीमांसायां तृतीयाध्यायतुरीयपादे "शेपत्वा- पुरुषार्थवादो यथाऽन्येप्निति जैमिनिरि"त्यादिषु सूत्रेषु भगरता श्रीवादरायणा- चार्येण जैमिनिमतरीत्या प्रदर्शनात् । श्रीभागवतादायपि प्रियव्रतोपाख्याना- दिना तत्स्थापनात् । “ज्ञानिनस्तदभिव्यक्तौ फर्मोक्षः क्रमाद्भवेदिति तत्त्व- दीपे सर्वनिर्णयारम्भे श्रीमदाचार्यचरणवचनामृताच । ज्ञानकाण्डस्थितानां तु भगवत्परत्वं प्राञ्जलमेव । साकारब्रह्मवादस्यैव तत्प्रतिपाद्यत्वात् । ईक्षत्यादि- निरूपणात् । ब्रह्मणो जगदुत्पत्तिकथनात् । तस्य तदनन्यत्वस्थापनाच । साध- नश्च फलञ्च ब्रह्मैवेति सिद्धान्तेन "पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति बादरायणः । अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनादि"ति तृतीयाध्यायतुरीयपादसूत्रा- म्याच वेदान्ता ब्रमपरा इत्यसन्देहमेतत् । इहाऽधिकोपदेशविषयवाक्ये "तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिपन्ति ब्रह्मचर्येण तपसा श्रद्धया यज्ञे- नाऽनाशकेन चैतमेव विदित्वा मुनिर्भवति एतमेव प्रवाजिनो लोकमभीप्सन्तः प्रव्रजन्ती"त्यत्र विविदिपाद्वारा चेदानुरचनादीनां भगवत्परत्वं भगवाञ्च्छी- बादरायणाचार्योऽप्यनुमन्यते । साक्षात्पुरुषार्थसाधकत्वमेव नाऽनुमन्यते । वरणाधीनत्वात्तस्य । श्रूयते हि-"नाऽयमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया 4 चालभाष्यविभूषिता। ३ न बहुना श्रुतेन । यमेवैष यूणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवणुते तनूर स्वामिति । तस्माद्वेदाश्च वेदान्ताश्च भगवत्परा इति निर्वियादमेवेति स्थितम् । तथा सति प्रपश्चासकिरहिता भगवदासक्तिः कार्येति सफलवेदत्तात्पर्य गोचरोऽर्थः सिद्धयति । सैव हि परमपुरुषार्थः । "एतावानेव यजतामिह निःश्रेयसोदयः। भगवत्यचलो मावो यद्भागवतसङ्गमः । शास्त्रेप्वियानेर सुनि- श्चितो नृणां क्षेमस्य सध्यम्बिमशेष हेतुः । असग आत्मन्यतिरिक्त आत्मनि हृढा रतिर्ब्रह्माणि निर्गुणे च या।भगवान् ब्रह्म कार्येन निरन्वीक्ष्य मनीपया। तदध्यवस्यत्कूटस्थो रतिरात्मन् यतो भवेदि"त्यादिवचनेभ्यः । यदप्यविद्या- दशायाममयं मुक्तिरिति प्रतिभातं पुरुषार्थस्वरूपं तदप्येतत्साध्यमेव । नाऽन्यथा विद्याविद्यापगगौ सम्भवतस्ताम्याञ्च तसिद्ध्यवसरः । अवान्तरव्यापाररूपश्च । भक्त्या विद्याविद्यापगमाभ्यां मुक्तौ भक्त्यैकपुरुषार्थत्वबुद्धेरुदयात् । “अनि. च्छतो गतिमवीं प्रयुते । स्वर्गापवर्गनरकेप्वपि तुल्यार्थदर्शिनः । सालोक्य- सार्टिसामीप्यसारूप्यैफत्वमप्युत । दीयमानं न गृहन्ति विना मत्सेवनं जनाः । मत्सेवया प्रतीतञ्च सालोक्यादिचतुष्टयम् । नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतो- - ऽन्यत्काल विप्लुतम् । इदमनुश्रद्धयोपचितयाऽनुशृणोत्याश्रावयति वाऽवहितो भगवति तस्मिन् वासुदेव एकान्ततो भक्तिरनयोरपि समनुवर्तते । यस्यामेव फवय आत्मानमविरतं विविधवृजिनससारपरितापोपतप्यमानमनुसवनं सापय- न्तस्तयैव परया निर्वृत्या घपवर्गमात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नो एवाऽऽद्रियन्ते भगवदीयत्वेनैव परिसमाससर्वार्थाः । राजन् पतिगुरुरलं भवतां यदूनां दैवं प्रियं कुलपतिः क च किङ्करो वः । अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो मुक्तिं ददाति कर्हिचित्म न भक्तियोगम् । एवं धर्मनुष्याणामुद्ध- याऽऽत्मनिवेदिनाम् । मयि सञ्जायते भक्तिः कोऽन्योऽर्थोऽस्याऽवशिष्यते । न योगसिद्धीरपुनर्भवं या समजस त्वा विरय्य काङ्के" इत्यादिवाक्येभ्यः । भत्तयैव चेयं भवति पूर्णा च । नाऽन्यथा । “माहास्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः । लेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया मुक्तिर्न चाऽन्यथेति वास्यात् । "भल्या मामभिजानाति यावान् यश्चाऽस्ति तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरमिति वाक्याच । भजधात्वर्थः सेवा । प्रत्ययार्थः प्रेमेति ईशावास्योपनिषद् । ४ तत्त्वार्थदीपे सर्वनिर्णये "प्रेमसेवात एव स्याद्विशिष्टव्यक्तिरुत्तमे"त्यत्र निर्णया. प्रेमपूर्विका सेवा भक्तिः । प्रेम च माहात्म्यज्ञानपूर्वकं ज्ञानानभिभूतं सर्वाति- शायि च निरुपाधिकम् । तत्र माहात्म्यज्ञानं "जडो जीवोऽन्तरात्मेति व्यव- हारस्त्रिधा मत" इति तत्त्वार्थदीपात्रेधाऽवस्थितस्य प्रपञ्चस्याऽमिन्ननिमिचो- पादानवादाविकृतपरिणामवादाभ्यां मगवत्कार्य्यतातदात्मकतातद्रूपतातदनन्य- तानां श्रवणमनननिदिध्यासनैर्दर्शनेन च भवति । प्रेम च निरुपघि सर्वातिशायि ज्ञानानमिभूतं भगवत आत्मत्वनिश्चयस्फूर्तिभ्यां भवति । तदर्थ श्रुतिषु नाना• प्रकारैः सृष्टिभेदैविविधं माहात्म्यं निरूप्यते आत्मत्वं चोपदिश्यते । आत्मत्वञ्च सर्वात्मत्वं परमात्मत्वमिति यावत् । आत्मनामप्यात्मा हि सर्वात्मा परमात्मा च। "तस्माद्भारत सर्वात्मे"त्यत्र श्रीमत्सुबोधिन्यामेतदुपपादितम् । परमश्चाऽसा- वात्मा च परमात्मा । आत्मनामपि स्वरूपसमर्पकत्वादात्मत्वाच्चेति । राजमत्रिणि राजत्वबुद्धिरिव जीवात्मन्यात्मत्वमतिरपि दृष्टान्तार्था तद्गुणसारत्वानुरोधिनी तन्मूलतातदनुप्राणितताख्यतदनुग्रहांशलेशमूला न परमेत्यन्यत्र विस्तरः । वस्तुत आत्मत्वादन्येषां तस्यौपचारिकत्वात्परं श्रुतौ प्राधान्येन व्यपदेशाय केवलोल्लेखः । मतान्तरोत्थाने बुद्धिमान्ये चाऽपि प्रमो मा भूदिति श्रीभागवते सर्वात्मपदेन तनिष्कर्पो विवृतः । तथा च परमात्मन एव मुख्यात्मत्वाचत्रा- ऽऽत्मत्वमहिला प्रेम्णस्तादृशस्य समुदयः स्वाभाविक इत्यात्मत्वमुपदिशत्युप- निषत् । सति प्रेग्णि सेवा नाऽन्तरीयकीति पारोक्ष्याय च परं तां कचिन्नोदि- शति । सेवायामपराधाद्यभावाय पदार्थसाधारण्यबुद्ध्यभावायाऽवज्ञादिदोषानुद- याय सर्वात्मत्ववत्सर्वेश्वरत्वबुद्धये च माहात्म्यं तस्य निरङ्कुशं वर्णयति नाना- सृष्टिप्रभेदैः। एवं सति माहास्यज्ञानपूर्वकसुदृढसर्वतोऽधिकस्नेहपूर्वकभगवत्सेवया प्रपञ्चविस्मृतिपूर्विको भगवदासक्ति सम्पादयितुं तत्साधनेषु गुरूपसत्यादिषु प्रयतितव्यं परमपुरुषार्थप्रेप्सावता पुरुषेणेति व्यवस्थितः शास्त्रार्थः । तत एव "श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य" इति साधनान्युपदिश्यन्ते । आवृत्तिश्च यावज्जीवं तेषामादिश्यते । “आवृत्तिरसकृदुपदेशादिति । तत्र श्रोतव्य इति श्रवणकीर्तनस्सरणादीनां नवविघानां भक्तीनामुपलक्षणार्थम् । मनननिदिध्यास- नयोरगत्वम् । मनननिदिध्यासनाभ्यामुपकृतं श्रवणं रुचिपदापरपर्य्यायं प्रेमा- बालभाध्यविभूपिता। कुरं प्ररोहयति । तन्महिमा कीर्चनस्सरणादीनि स्वतः सम्भवन्तीति श्रवणस्यैव मुल्यत्वात्कण्ठरवेणोपादानम् । अन्येषामुपलक्षणविधया । तदुपबृंहितम्- "श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं चन्दनं दास्यं सख्य- मात्मनिवेदनम् । इति पुंसाऽपिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नयलक्षणा । क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुचममिति । एवञ्च श्रवणेन प्रेमाऽङ्कुरितं कीर्चना- दिभिः परिपुप्यमाणं परिपाकावस्थायां प्रपञ्चासक्तिरहितभगवदासतिरूपं भव- यसनरूपतां धत्ते । तत्सुदृढं सर्वतोऽधिकं प्रेम । तत्स्वामाव्यात्स्यव्यसनतः क्रियमाणं श्रवणादित्रयं पादसेवनादिपटुं चेति नवकं प्रेमलक्षणा फलात्मिका सेवा । सोपाळ पुरुषार्थपरमार्थविदा । "तस्यैव हेतोः मयतेत कोविदो न लभ्यते यद्धमतामुपर्यघ" इत्यादिवचनात् । "कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मते"ति श्रीमदाचार्य्यचरणवचनामृताच्च । अत्रैतदवधेयम् । "तस्मा- द्वारत सर्वात्मा भगवान् हरिरीश्वरः। श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च सर्तव्यश्चेच्छता- ऽभयमि"तीत्यत्र श्रीसुबोधिन्याम् "आत्मा वा अरे श्रोतव्य" इत्याद्यानां श्रुतीनामेतच्लोकदर्शित एवाऽर्थो नाऽन्य इत्युपपादितम् । तत्राऽऽत्मपदस्य सर्वात्मा हरिरीश्वर इत्यर्थः । श्रोतव्य इत्यस्य श्रवणकीर्तनसरणानीत्यर्थः । "त्रयाणामन्योन्यनिर्वाहकत्वेन विधानमिति व्युत्पादनात् । कुतस्त्रयस्यैव विधानं न नवविघाया भक्तरित्याशङ्कायां त्रयोक्त्यैव शेपसङ्घहोऽनुक्तसिद्धो दर्शित इति श्रुतौ श्रोतव्य इत्येतदेकं पदं तस्माद्भारतेत्युपबृंहणोक्तत्रयस्य च श्रवणं कीनं विष्णोरित्युपश्रृंहणोक्तशेपषट्कस्य चोपलक्षणतया सद्धाहकमिति जापितम् । “फलन्तु प्रत्येकमेवे"ति फकिकया मनननिदिध्यासनाभ्यागुपकृतेन अवणेनैवाऽवश्यम्भावापेमारस्य तदुत्तरजातकीर्तनस्मरणयोतन्नान्तरीयफत्व- मपि न दुर्वचमिति प्रदर्शितम् । तेन न कश्चितिरोधगन्ध इति दिछ । श्रीसुबोधिन्यां त्रयस्य प्रेमजनकत्वं प्रत्येकमुक्तम् । तच पादसेवनादिपटक- प्रवृत्तिजनगोपक्षीणम् । प्रेमलक्षणा व्यसनामिका फलरूपा खतथा मानसी सेवा तु नवविधायाः फलात्मकतया गुरूपदेशानुसारेण कृताया एव पुष्टिमार्गी- यायाः फलम् । तदिदमखिलं भगवदनुग्रहमात्रमरोहणीयं न प्रमाणबलादिना खसामर्थ्यादिना च । तथा च श्रूयते-"नाऽयमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया ईशावास्योपनिषद् । हरिः ओम् । पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवाऽवशिष्यते । ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः । न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लग्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू स्यामि"ति । श्रुतार्थापत्या श्रुतानां साक्षात्पुरुषोत्तमप्रापकतया शास्त्रेषु प्रदर्शि- तानां साधनविशेषाणामनुग्रहोत्तरसम्भवल्लाभत्वाङ्गीकारोऽन्येषां प्रतिषेधनीयता वरणस्याऽसहायशूरत्वात्स्वतनताऽतोऽपि प्रेमलक्षणादानमवतारकालिकानामिवेति नाऽसमञ्जसं किंचित् । एतस्याऽर्थस्य सपरिकरस्य प्रतिपादनाय वेदानां वैदि- कानां च परिकरः । तन्न तत्फलपाप्तिपरम्पराप्रवाहप्रवृत्तये तमिममर्थ सपरिकर- मुपदेश्यन्तीशावास्योपनिषचत्राऽऽवश्यकत्वाद्गुरुशिष्यपरम्पराप्रवृत्रिं च प्रेप्सन्ती तदुभयसंवादेनोपक्रमते ब्रह्मविद्याम् । अत्राऽऽदावन्ते च ब्रह्मविद्यायाः पूर्णप्रचा- रसिद्धये प्रत्यूहव्यूहप्रशमाभिकामया श्रीमत्पूर्णपुरुषोत्तमस्वरूपनिरूपणलक्षणां शान्ति केचित्पठन्ति-ओं पूर्णमदः पूर्णमिदमित्यादि । अत्रेशावास्यो- तोऽर्थो वस्तुतस्तु सकलोऽपि वेदार्थः सङ्कलय्य निर्दिश्यते । ओमिति ब्रह्मनिर्देशो मालार्थः । "तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । भवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनामि"ति श्रीमद्भगवद्गीतावाक्याब्रह्मविद्याप्रवर्च- नार्थश्च । स्मरति च "ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादायन्ते च सर्वदा । स्रवत्यनो- वृतं पूर्व परस्ताच विशीर्य्यत" इति । सवति पूर्ति न गच्छति । विशीर्य्यते नश्यति । फलं न जनयति । नापि स्थिरीभवति । अदः क्षराक्षरातीतं परोक्ष- मव्यवहार्य भगवत्स्वरूपं पूर्ण आकाशवद्व्याप्तं निरन्तरं निरुपाधिकं निर्दोप- पूर्णगुणविग्रहं पूर्णपडैश्चर्यपूर्ण विविधया परया स्वाभाविक्या शत्त्या ज्ञान- बलक्रियया च परमया जीवकृतिनिरपेक्षया स्वाभाविक्या कृपया च पूर्ण पूर्णानन्दं पूर्णकामं स्वानन्दतुन्दिलं नित्यलीलाविशिष्टं किम्बहुना वेदतदनु- कूलनिखिलशास्रोक्तिजेगीयमानयावन्महिमपूर्ण सर्वानुपपत्तिभिरपरिस्पृष्टमसम्भ- वदवद्यगन्धसम्बन्धम् । अस्ति । इदं नामरूपाभ्यां व्यवहार्य प्रपञ्चाविर्भूत- मयताररूपञ्च पूर्ण पूर्वोक्तरूपमेव । युभवाद्यायतनत्वादेर्मुसाभक्षणोलूखल. बन्धादौ दृष्टत्वात् । एवं व्यवहा-व्यवहार्ययोः पूर्णत्वमुक्त्वा कार्यस्वरूपेऽपि बालभाध्यविभूपिता। ७ तथात्वमाह--पूर्णात्पूर्णमुदच्यत इति । पूर्णातादृशात्कारणात्मनः परिणम- तोऽपि विकारशून्यान्निरुपाधिकात् सकाशात् क्षराक्षरात्मकं कार्यरूपं पूर्णमुद् पूर्णानन्दं सत् अच्यते । पूर्ण सत् उदच्यते वा । अञ्च गतिपूजनयोः । अच इत्येक इति पाणिनिः । पूज्यते । उद्गच्छति वा । लीलार्थमाविर्भावितत्वात् । तदनन्यत्वात् । ब्रह्मविदां तत्साक्षात्काराच । तथा च श्रुत्यन्तरे--मृत्तिकेत्येव सत्यमिति । "ब्रसवेदममृतं पुरस्तादित्यादि चेति । सूत्रितं च भगवता श्रीमदादरायणाचार्येण-"तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्य" इति । "प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधादि"त्यादि च । तेनाऽविद्वत्प्रतीतिरप्रामाणिकीति ध्वनि- तम् । एवं स्थितिदशायां कार्य्यस्य ब्रह्मरूपतामुक्त्वा मलयदशायां तथात्वमाह- पूर्णस्य पूर्णमादायेत्यादिना । पूर्णस्य अव्यवहार्यस्वरूपे व्यवहार्य्यस्वरूपे कार्यरूपेऽपि च यथाव्याख्यातपूर्णतापूर्णस्य । पूर्ण । स्वभावमिति शेषः । सदैकरसत्वलक्षणमिति भावः । आदाय । कारणेच्छया स्थितं व्यवहार्यत्वं तिरोधाप्य तदिच्छयैवाऽव्यवहार्य्यत्वाधिगमेन प्राप्येत्यर्थः । अपरित्यज्येत्यों वा । ऐच्छिकपरिच्छिन्नलानानात्वयोः प्रातीतिकपड्भावविकारस्य च परित्यागे- नाऽपरिच्छेदैकत्ये लब्ध्वेत्यर्थों था। पूर्णमेव कारणात्मकब्रह्मस्वरूपमेवाऽशेषसंज्ञ सत् । अवशिष्यते । व्यवहार्यतां त्यक्त्वाऽव्यवहार्यब्रह्मरूपेण तिष्ठतीत्यर्थः । न तु विलीयते प्रपञ्चः । संसारबत् । प्रपञ्चस्य "पूर्णात्पूर्णमुदच्यत" इति ब्रह्मा- त्मकतायाः श्रवणात् । संसारस्याऽऽविद्यकत्वात् । “यथा मनोरथधियो विप- यानुमवो मृपा । स्वमदृष्टाश्च दाशाई तथा संसार आत्मन" इति वाक्यात् । मपञ्चसंसारयोः सर्वथैव भेदो नाउमेद इत्याकरेषु विस्तृतमिति ततोऽवधेयम् । एवं पूर्णे भगवत्स्वरूपे कथितेऽनुसन्धीयमानेऽवधारिते समुच्चार्यमाणे चैव प्रत्यूहन्यूहोपरमद्वारा पूर्णब्रह्मविद्योदयेन पूर्णपुरुषोत्तमसेवानन्दलाभेन च जीवस्य पूर्ण संसारशान्तिाऽन्यथेत्यभिप्रायेण त्रिवार शान्तिमाह-ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः । सर्वथार्था पूर्णतमत्वार्था च निरुक्तिः । “तमेव विदित्वाऽतिमृत्यु- मेति । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन । रस खेवाऽयं लब्ध्वा- ऽनन्दी भवतीति श्रुतिभ्यः । एवं शान्ति पठित्वोपनिपदमारभते । तत्र ८ , ईशावास्योपनिषद् । ईशाऽऽयास्यमिदं सर्व यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य सिद्धनम् ॥१॥ गुरुः शिप्यायोपदिशतीति श्रुतिराह-ईशावास्यमित्यादिना ईश ऐश्वयें । ईटे इतीद । तेन । ईशा । परमेश्वरेण पूर्णपुरुषोचमेन भगवता श्रीकृष्णेन परब्रह्मणा परमात्मना । स एव हीशः । अन्येषामीशितव्यत्वात् । न हि परमे- श्वराच क्षराक्षरातीतात्पूर्णपुरुषोत्तमाच समग्रेश्वर्यवीर्य्ययशःश्रीज्ञानवैराग्यविराज- मानाच सदानन्दाच जगजन्मादिकारणाचाऽखिलात्मनामप्यात्मनश्चाऽतिरिक्ता- नामवरेपाश्चेशता वास्तवी वा सम्भवति वा । उपचारः परमविप्रतिपिद्धः। ऐश्वर्या सामर्थ्यम् । तेन न कालकर्मस्वभावाधीनः सृजति । नाऽन्यप्रेरितः कारुवत् । न सहायशूरो न चोपकरणापेक्षी । नापि च जीवकृतसाधनसामर्थ्य- नियन्त्रितः । किन्तु स्वतन्त्रः खेच्छया सङ्कल्पमात्रेण स्वरूपेण अभिन्ननिमिचो- पादानो विनोदमात्रप्रयोजनः परिणामेऽप्यविकृतः प्रमाणप्रमेयोमयमार्गप्रति- छापको निलेपः । किञ्च । श्रीमद्भागवतेऽटमस्य प्रथमे "आत्माऽऽवास्यमिदं विधं यत्किश्चिज्जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य खिद्धन- मि"त्यत्रेशपदमात्मपदेन व्याख्यातम् । आत्मनो व्यतिरिक्तस्येशत्वानौचित्येन तन्मात्रस्यैवेशत्वात् । अनात्मनो नित्येशितव्यत्वात् । “आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवती"ति श्रुत्यन्तराच । स हीदं सर्वमावासयन्नाऽऽवासितस्य प्रेष्ठतमो भवति । परमनिःश्रेयसरूपश्च । "श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा एवधिर- र्थत" इति वाक्यात् । "आत्मा वा अरे द्रष्टव्य" इति "आत्मलाभान्न परं विद्यत" इति च श्रुतिभ्याम् । जीवस्य तदेतत्तस्य प्रेष्ठतमत्वं परमनिःश्रेयस- रूपत्वञ्च तदेकस्वभावाद्भवति न साधनसामर्थ्यात् । तत एव हि श्रूयते- "नाध्यमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैप वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैप आत्मा विवृणुते तनूर स्वामि"ति । एवञ्च निर्हेतुकेन पर- मानुग्रहेण सृष्टानां श्रेय:प्रेयोरूपस्वस्वरूपात्मकफलदानेन परमपुरुषार्थसाधनायैव भक्तिमार्ग स्वतत्रं प्रवर्तयन्नखिलं सृष्ट्वा क्रीडति । तेन खतघ्रभक्तिमार्गलाभ एव परमपुरुषार्थसिद्धिर्नाऽन्यथा केवलेन प्रमाणमार्गेणेति तल्लाभार्थ तत्सृष्टिस्थैरवश्य- मेव प्रयतितव्यमित्युक्तम् । दासमावेनेशपदोच्चारणाद्भगवत्युत्कर्षबुद्धिः खसिन्न- - थालभाष्यविभूषिता । पकर्षबुद्धिश्च दर्शितेति तदुपलक्षितः शीर्पावनामाञ्जलिबन्धरूपः महीभायात्यः कायिकव्यापारविशेपोऽपि व्यञ्जितः । तथा सत्यशक्यगमनातिरिक्तकर्तव्यान्त- रेण खयमनुग्रहशीलेन सष्टानां परमपुरुषार्थसाधनप्रेप्सया भक्तिमार्गमवर्तकेन स्वतघेणाऽभिन्ननिमित्तोपादानेन परिणामेऽप्यविकृतेन प्रमाणप्रमेयोभयमार्गप्र- तिष्ठापकेन निलंपेण परमेश्वरेण पूर्णपुरुषोत्तमेन भगवता श्रीकृष्णेन परब्रह्मणा परमात्मना खेच्छया सङ्कल्पमात्रेण स्वरूपेण विनोदमानमुख्यमयोजनायेतीशेति पदतात्पर्यम् । इदं सर्वं । सचराचरं दृष्टं श्रुतं भूतं भवद्भविष्यच्च । विश्व- मिति शेपः । आवास्यम् । आइपूर्वकस्य ण्यन्तस्य वसेर्यति रूपमावास्यम् । आइभिव्याप्तौ । "यन येन यतो यस्य यसै यद्यद्यथा यदा । स्यादिदं भग- चान् साक्षात्प्रधानपुरुषेश्वर" इति वाक्यात् । “कार्यादिभावः कश्चिदन्य इत्या- शय ब्रह्मस्वरूपमाह-यत्र येनेति । सर्वविगतीनां प्रकारस्य च गगवाने. वाऽर्थः । प्रकृतिपुरुपौ कालश्च स एवेति तत्त्वार्थदीपस्य शास्त्रार्थे श्रीमदा- चार्यचरणैर्व्याख्यानाच । उत्पाद्यं स्याप्यमुत्साद्यञ्चेत्यर्थः । उत्पत्तिपूर्वको हि यासः । नाऽनुत्पन्नो वसतीति । उत्पन्नोऽपि नोत्पादयितुरनुग्रहमन्तरेण वसती- त्युत्साद्यञ्च । “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ती"ति श्रुत्यन्तरात् । तदेकाधीनोत्पत्तिस्थितिसंहतिकमिति यावत् । एवञ्च तदेकस्यामिकं तदेकभोग्यश्चेति तदीयमिदं विश्वं नाऽस्मदीयम् । लीलार्थमाविर्भावितत्वात् । “स एकाकी न रमते । स द्वितीयमैच्छदि"ति श्रुतेः । "क्रीडाभाण्डं विश्वमिदं यस्य विभूमनि"ति स्मृतेः । “लोकवस्तु लीला- कैवल्यमि"ति सूत्राच्च । ईशो ह्यखिलस्य खामी भवति । स स्यसेवार्थमेवेद- मखिलमरमदादींश्चोत्पादितवानुज्जीवितवांश्च । तत्राऽसदादीनां स्वाम्यस्याऽह- न्ताममतयो वाऽवसरः । “क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत्कृतं ते स्याम्यन्तु तत्र कुधियः पर ईश कुर्युरिति वाक्यात् । किन्तु सपरिकर आत्मैव स्वामिने निवेदनीयः । तरखाग्यश्च सर्वदेव चिन्तनीयम् । “त्वमेव शरणं ममे"ति । "कृष्ण तवाऽसि न चास्मि परस्येति । तदुक्तं श्रीमदाचार्य्यचरणैः-"चिन्ता काऽपि न कार्या निवेदितात्मभिः कदाऽपीति । भगवानपि पुष्टिस्थो न करि- प्यति लौकिकीच गतिम् । निवेदनं तु मर्तव्यं सर्वथा तादृशैर्जनः । सर्वेश्व- २ देशा.
ईशावास्योपनिषद् । रश्च सर्वात्मा निजेच्छातः करिप्यती"त्युपक्रम्य "अतः सेवापरं चित्तं विधाय स्थीयतां सुखम् । चित्तोद्वेगं विधायाऽपि हरिर्यद्यत्करिष्यति । तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिन्तां द्रुतं त्यजेत् । तस्मात्सर्वात्मना नित्यं श्रीकृष्णः शरणं मम । वदद्भिरेव सततं स्पेयमित्येव मे मतिरिति । नन्वेवं भगवदेकस्वामिकं मगरदेकभोग्यञ्चाऽखिलं विश्वं न स्वोपयोगार्ह कथं तर्हि वर्तितन्यमित्याकाहा- यामाह-यत्किञ्चेत्यादि । स्वस्खामिसम्बन्धालिङ्गितं शास्त्रोपदेशं विना भगव- द्भोग्यतयाऽनमिमातं स्वभोग्यतयैव सिद्धं गृह्यमाणञ्च जगत्यां प्राणिनामुपभोगं गच्छन्त्यां पृथिव्यां जगत् जीवनार्थमवश्योपभोग्यतां गच्छत् वस्तुजातम् । जगतीतलवर्तिनामहरहर्मोजनादिभोग विना सर्वथैवाऽशक्यजीवितव्यानामपरि- हार्यस्वखामिसम्बन्धमनिवार्योपमोगश्च यत्किञ्च विशेषतो नाना निर्देष्टुम. शक्यमानन्त्याद्वस्तुजातं यदस्तीति यावत् । तेन तादृशेन अहन्ताममतास्पदेन वस्तुजातेन आत्मना परिकरेण च । त्यक्तेन भगवतेऽर्पितेन निवेदितेन । भग- वता च महाप्रसादतया दत्तेन । भुञ्जीथा मोगं सम्पादयेथाः। अयमाशयः । स्वरूपतः प्रयोजनत उत्पत्त्योपपत्त्या च सर्वमिदं भगवदीयम् । अविद्यावशादेव सकीयतयाऽभिमानविषयीकृतम् । तदिदं तस्यैव । न मम । दासोऽहम् । सेवकोऽहम् । स्वसेवार्थमेव भगवता मह्यं दत्तमिदं मदीयम् । मयतेन भगव- त्सेवैव विधेया । न मम भोगार्थमिदं मदीयम् । नैतेन खमोगः सम्पादनीय इत्यहर्निशमनुसन्धाय भक्तिसमुल्लासविलासपुरस्सरं ससमधिकोत्साहं सदैन्या- तिशयमद्भीकर्तुं साभ्यर्थनासहस्रञ्च पूर्व भक्तिमता भगवते सर्ववस्तूनां निवेदनं विधेयम् । पश्चाद्भगवता भक्तार्थ महाप्रसादतया समुत्सृप्टेनाऽन्नवस्त्रसग्गन्धा- लक्षारादिना निर्वाहः कर्तव्य इति । तदुक्तं श्रीमद्भगवद्गीतासु-"यत्करोपि यद- नासि यनुहोपि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुप्य मदर्पणम् । अहं हि सनयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनाऽत- श्यवन्ति ते । यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः । भुञ्जते ते स्वयं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् । यज्ञशिष्टामृतमुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रय• तात्मनः" इति । श्रीमद्भागवते-"कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्या बुद्धयाऽऽत्मना पालभाष्य विभूपिता। ११ वाऽनुसृतस्वभावात् । करोति यद्यत्सकलं परमै नारायणायेति समर्पयेत् । तपस्विनो दानपरा यशखिनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमोनमः । पार्गिक जिप्रति पड्गुणेशः । इष्टं दत्तं व्रतं जप्तं वृत्तं यच्चाऽऽत्मनः प्रियम् । दारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यत्परसै निवेदनम् । तस्मात्त्वमुद्धयोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम् । प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च । मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् । या- हि सर्वात्मभावेन यास्यसे ह्यकुतोमयम् । रसनां तदर्पिते । स्वयि धृतासवस्त्यां विचिन्वते । मदर्थेऽर्थपरित्यागो भोगस्य च मुखस्य च । मदर्थे धर्मकामा- र्थानाचरन्मदपाश्रयः । लभते सुदृढां भक्तिं मय्युद्धव सनातने । यद्यदिएतमं लोके यचाऽतिप्रियमात्मनः । तत्तनिवेदयेन्मयं तदानन्त्याय कल्पते । सर्व- लामोपहरणं दास्येनाऽऽत्मनिवेदनम् । त्वयोपभुक्तवागन्धवासोलारचर्चिताः । उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेम हि । दृष्टं श्रुतं भूतभवद्भविष्य- स्थास्तुश्चरिप्णुमहदरपश्च । विनाऽच्युताद्वस्तुतरां न वाच्यं स एव सर्वं परमार्थगृतः" इति । श्रीमन्महाभारते-"कृष्णस्य हि कृते सर्व जगदेतचरा- चरम् । एको विष्णुमहद्भूतं पृथग्गूतान्यनेकशः । श्रील्लोकान् व्याप्य भूतात्मा मुझे विश्वभुगन्ययः" इति । महोपनिषदि-"एक एव नारायण आसीन्न ब्रह्मा न द्यावाथिवी सर्वे देवाः सर्वे पितरः सर्वे मनुष्या विष्णुनाऽशितमन्नन्ति विष्णुनाऽऽघातं जिघन्ति विष्णुना पीतं पिबन्ति विष्णुना रसितं रसयन्ति तस्माद्विद्वांसो विष्णूपहृतं भक्षयेयुरिति । पाझे-"विष्णोनिवेदितं चाऽनं योऽभाति भुवि मानवः । स याति परमं स्थानं पुनरावृत्तिवर्जितमि"ति । गारुडे-"नैवेद्यं तुलसीभिश्च घण्टाधैजयनिःस्वनैः । नीराजनैश्च हरये दद्यादा- पोशनं तत" इति । ब्रह्माण्डे-"पत्रं पुप्पं फलं तोयमन्नं पानीयमौषधम् । अनिवेद्य न भुञ्जीत यदाहाराय कल्पितम्" इति। फौर्मे-"अनर्पयित्वा गोविन्दे यैर्मुक्तं धर्मवर्जितम् । शुनो विष्ठासमं चाऽन्नं नीरञ्च सुरया सममिति । पाझे-"भात्या लोगात्कौतुकाता क्षुधासंशमनेऽपि वा । आकप्ठं भक्षितं यद्वै पुनाति सकलादधात् । ममाऽन्नं निक्षिपेद्यस्तु मम निन्दा करोति यः । मद- र्शनेन यत्पुण्यं तत्सर्व तस्य नश्यति । विष्णोनिवेदितानं यो नाइनाति स्पर्श- ईशावास्योपनिषद् । १२ शङ्कया। वायसो विड्राहश्च विष्ठायां जायते कृमिरिति । परमेष्ठिसंहिता. याम्-"सन्त्यज्य विष्णुनैवेद्यं यः कुर्य्यादन्नभक्षणम् । स याति नरकं घोरं यावच्चन्द्रदिवाकरावि"ति। स्कान्दे-"तीर्थैः पवित्रितो वापि तपस्वी वा जिते. न्द्रियः । नारायणस्य नैवेद्यमभुक्त्वा पतितः क्षणादिति । वाराहे-"मदन्न- त्याजिनं मूढं तथा मद्भक्तदूपकम् । कल्पकोटिशतेनाऽपि न क्षमामि कदाच- नेति । श्रुतयश्च-"अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अमन्नादोऽहमन्नादोऽहम- नादः । अन्नं न परिचक्षीत । अन्नं न निन्द्यादिति । अन्नं भगवनिवेदित- मेव । तस्यैव प्रत्याख्यानादौ दोषस्मरणानामुदाहृतत्वात् । नैवेद्यातिरिक्तस्य निषेधे सति तदखीकारस्य वैधत्वाचेति । तथा च भगवदीयं वैभवं भगवते निवेद- नीयमेव । भगवदर्पितान्नादिनैव देहादिनिर्वाहोऽपि सेवकेन विधेयः। सोऽपि भगवत्सेवार्थमेवेत्यनुक्तसिद्धम् । नेन्द्रियप्रीतिनिमित्तं तद्भोगो विधेयः। तदु- क्तम्-"कामस्य नेन्द्रियप्रीतिभो जीवेत यावता । जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नाऽर्थो यश्चेह कर्मभिः । अर्थेन्द्रियारामसगोष्ठयतृष्णया तत्सम्मतानामपरिग्रहेण चे"त्यादिवाक्येभ्यः । तदनिवेद्य तदुपयोगे त्वीशातिक्रमदोषाः स्वधर्मातिक्रम- दोपाश्च दर्शिताः । अनिवेदितोपयोगे दोपातिशयं भयातिशयप्रदर्शनद्वारा फैमु- तिकेनाऽऽह-मा गृधः कस्य सिद्धनमिति । साधारणस्याऽपि धनेऽभिकाशिते परुपातिपरुपा राजादिकृता दण्डाः प्रत्यक्षतो दृष्टाः । शास्त्रतश्चाऽवगम्यन्ते । तत्र भगवदीयस्य धनादिवस्तुनोऽनिवेदने स्वकीयत्वाभिमानेऽनिवेद्यैव चोपयोगे दण्डानां काष्ठा का याच्याऽपराधानाञ्च काष्ठाऽपरिगणनीयैव । अक्षम्यता च तेषामसाधारण्येव । तेन बुभूपुणा केनाऽपि फस्याऽपि धनं नाऽभिकाङ्क्षणीयं सर्वथैव त्वीशस्येति सर्वथैव निवेदनावश्यकतां विदधाना श्रुतिस्तदर्थ निषेधार्थ- वादमाह-मा गृधः कस खिद्धनमिति । अनिवेदितं सर्वथैवाऽनुपयोज्यमिति । अन्यदीयस्य धनस्याऽभिकाहायामपि फठोरा राजकृता दण्डाः प्रत्यक्षाः । शास्त्र- दण्डाश्च श्रूयन्ते । तदीशस्य स्वकीय वस्त्वनिवेद्योपयुज्यमानं कियन्तमपराधमा- दध्यादिति सर्वथैव ततो भेतव्यमनिवेदितोपयोगः कदापि सर्वथाऽपि न कार्य इति । यस्मात्परस्याभिकाहणं भयावह तस्माद्भगवदीयं वस्तु भगवते निवेद्यै- वोपयोज्यमिति । धनमिति प्रलोमकवस्तुमात्रोपलक्षकम् । अप्रलोभके वस्तु- ।
१३ बालभाष्य विभूपिता ! कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविपेच्छत समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२॥ न्यभिकाहाया अनुदयादेव तदनुक्तिः । सर्वस्याऽपि जगतो भगवदीयत्वेनाs- न्यदीयस्याऽपि भगवते खेनाऽर्पणे प्रसक्तेऽर्पणोचरं तदुपभोगे च प्रसक्त तन्नि- पेधार्थमनिवेदितोपयोगनिषेधार्थञ्च तन्त्रेण लिप्टोक्तिः ॥ १॥ भगवत्सेवार्थमेव निवेदितेन देहादिनिर्वाहं कण्ठरवेणाऽप्याह-तदावश्यक- ताञ्चाऽऽह-कुर्खनेवेहेत्यादिना । इह ईशावास्ये । यो यत्र निवसति तेन तदावास्यं भवति । यथा राजधानी राज्ञाऽऽवास्या भवति । उत्पाद्य स्थापयित्वा च राजा तत्र निवसति । तथैवाऽनेशो निवसति । क्रीडाभाण्टत्वाद्विश्वस्य । उक्तञ्च तत्त्वार्थदीपस्य शास्त्रार्थे-"यः सर्वत्रैव सन्तिष्ठन्नन्तरः संस्पृशेन तत् । शरीरं तं न वेदेत्यं योऽनुविश्य प्रकाशते" इति । श्रुतयश्च-“तदनुप्रविश्य सच त्यचाऽभवत् । द्वा सुपर्णा सयुजा सखायौ समानं वृक्षं परिपस्वजाते । तयोरेकः पिप्पलं स्वाद्वत्ति अनन्नन्नन्यो अभिचाकशीति । तमेव भान्तमनुभाति सर्वमि"त्यादि । “यः पृथिव्यां तिष्ठन्नि"त्यादि । सृष्टानां स्वतम्रभक्तिमार्गस्थाप- नेन परमपुरुषार्थसाधनाच । तदर्थं तदा तदाऽवतारकरणेनाऽपि निवासाच्च । एवमिदं विश्वमीशावास्यम् । तत्र तेन ये सेवका यत्र कर्मसु नियुक्तास्तत्र तैस्त- परैरेव मवद्भिः स सेवितव्यः प्रेमातिरेक दधद्धिः प्रसादं स्पृहयद्धिः प्रमादे भयं सम्भावयद्भिश्च । तस्मात्कुर्वन्नेव कर्माणि जिजीविपेत् । तदिदमुक्तम्- “स वा अयं सख्यनुगीतसत्कथो वेदेषु गुह्येषु च गुहावादिमिः। य एक ईशो जगदात्मलीलया सुजत्यवत्यत्ति न तत्र सज्जते । यदा द्यधर्मेण तमोधियो नृपा जीवन्ति तत्रैप हि सत्त्वतः किल । धत्ते भगं सत्यमृतं दयां यशो भवाय रूपाणि दघद्युगे युगे। अहो अलं लाप्यतमं यदोः कुलमहो अलं पुण्यतमं मघोर्यनम् । यदेप पुंसामुपमः श्रियः पतिः स्वजन्मना चङ्कमणेन चाञ्चति । अहो बत स्वर्यशसस्तिरस्करी कुशस्थली पुष्ययशस्करी भुवः । पश्यन्ति नित्यं यदनुग्रहेपितस्मितावलोकं स्वपति रम यत्प्रजा" इति । "तत्र तत्र ह तत्रत्यैहरिः मत्युद्यताईण" इति । "आन"न् स उपनज्य स्वृद्धाञ्जनपदान् स्वकान् । दध्मौ ।
ईशावास्योपनिषद् । दरवरं तेषां विपादं शमयन्निवेति । “तमुपश्रुत्य निनदं जगद्भयभयावह- मिति । प्रत्युययुः प्रजाः सर्वा मर्तृदर्शनलालसाः । तत्रोपनीतबल्यो खेदर्दी- पमिवाऽऽदृताः । आत्मारामं पूर्णकामं निजलाभेन नित्यदा। प्रीत्युत्फुल्लमुखाः पोचुर्हर्पगद्गदया गिरा । पितरं सर्वसुहृदमवितारमियाऽर्भकाः । न ताः स ते नाथ सदाऽड्रिपङ्कजं विरिश्चरिश्यसुरेन्द्रवन्दितम् । परायण क्षेममिहेच्छता परं न यत्र कालः प्रभवेत्परप्रभुः । भवाय नस्त्वं भव विश्वभावन त्वमेव माता ऽथ सुहृत्पतिः पिता । त्वं सद्गुरुनः परमञ्च दैवतं तवाऽनुवृत्त्या कृतिनो बभू- विम । अहो सनाथा भवता स यद्वयं त्रैविष्टपानामपि दूरदर्शनम् । प्रेमस्मित- खिग्धनिरीक्षणाननं पश्येम रूपं तव सर्वसौभगमि"ति च । कर्माणि भक्तिमा- गीयमर्यादाबोधितानि स्वतन्नेतिकर्तव्यताकानि साक्षात्सेवारूपाणि च सर्वाणि खतन्त्रभक्तिप्रयुक्तानि स्वतः पुरुषार्थरूपाणि । तदुक्तम्-"शृण्वन् गृणन् संस- रयंश्च चिन्तयन्नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते। क्रियासु यस्त्वच्चरणारवि- न्दयोराविष्टचेता न भवाय कल्पते । मय्यर्पणं च मनसः सर्वकामविवर्ज- नम् । मदर्थेऽर्थपरित्यागों भोगस्य च सुखस्य च । इष्टं दच हुतं जप्तं मदर्थ यद्रतं तपः । एवं धर्मेमनुष्याणामुद्धवाऽऽत्मनिवेदिनाम् । मयि सञ्जायते भक्तिः कोऽन्योऽर्थोऽस्याऽवशिप्यते । आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मा- तिशेषेणाऽभिसमावृत्य शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्य अहिंसन् सर्वाणि भूतानान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुपं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते । कृत्वभावात्तु गृहिणोपसंहारः । यत्करोपि यदनासि यज्जुहोपि ददासि यत् । यतपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् । क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणम् । फर्माऽप्येकं तस्य देवस्य सेवेति । कुर्वन् न कारयन्न चक्रिवान् न करिप्यन् न चिकीर्पन किन्तु कुर्वन् । परस्मैपदप्रयोगात्स्वामिपरितोपादेव निप्पत्तिमात्रेण वा परितुप्यन् न फलान्तरमिच्छन् । फर्माणीति बहुवचनात्कु-निति वर्तमान- व्यपदेशाच नित्यामियोगः सततयोगश्च सेवायामपेक्षित इति सूचितम् । "मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डवे"त्युक्तः सततयोगः। "अहं सर्व करिप्यामि जाग्रतः खपतश्च ते ।
१५ पालेभाष्यविभूपिता। - खय परिचरेद्भक्त्या वस्त्रप्रक्षालनादिभिः । यथा सुन्दरतां याति वखैराभरणै- रपि । अलङ्कुर्वीत सप्रेम तथा स्थानपुरस्सरम् । अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेपां नित्याभियुक्तानामि"त्यादावुक्तो नित्याभियोगः । प्रेमातिप्रकर्षश्च परमादरश्च ततोऽन्यत्राऽनिर्वृतिश्चाऽरतिश्चाऽनभिरुचिश्च द- र्शिताः । प्रयतात्मता च निश्छिद्रता च । आलस्यं रसानधिगमश्चाऽवसराति- क्रमश्च सापेक्षता च व्यावर्तिताः । तदिदं व्यक्तम्-"दासीशता अपि विभो- विदधुः स दास्यम् । आदरः परिचर्यायाम् । विगाढभावेन न मे वियोग- तीबाधयोऽन्यं ददृशुः सुखाय । तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावन- गोचरेण । क्षणार्धवृत्ताः पुनरङ्ग तासां हीना मया कल्पसमा बभूवुः। ता नाऽवि- दन्मय्यनुपगबद्धधियः स्वमात्मानमदतथेदम् । यथा समाधौ मुनयोऽधितो- पे नद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे । इति नन्दादयो गोपाः कृष्णरामकथां मुदा । कुर्वन्तो रममाणाश्च नाऽविन्दन् भववेदनाम् । शय्यासनाटनालापखानक्रीडाश- नादिषु । न विदुः सन्तमात्मानं वृष्णयः कृष्णचेतसः । गोपीनां परमानन्द आसीद्गोविन्ददर्शने । क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाऽभवत् । पत्रं पुप्पं फलं तोयमित्युपक्रम्य-प्रयतात्मनः । अच्छिद्रसेवनाच्चैव निष्कामत्वात्स्ययो- ग्यतः । द्रष्टुं शक्यो हरिः सर्वैर्नाऽन्यथा तु कथञ्चन । नाऽयमात्मा घलहीनेन लभ्यो न च प्रमादाचपसो वाऽप्यलिझात् । यद्यप्यसौ पार्श्वगतो रहोगतस्तथापि तस्याऽद्वियुगं नवं नवम् । पदे पदे का विरमेत तत्पदाच्चलाऽपि यच्छ्रीन जहाति कर्हिचित् । तयोर्यशोदारोहिण्यौ पुत्रयोः पुत्रवत्सले । यथाकामं यथा- कालं व्यधतां परमाशिप" इत्यादिषु वचनान्तरेषु । कुर्वन्नेवेत्याग्रहस्तदर्चनार्थ 'तदर्पणार्थ तत्परितोपार्थ तत्प्रसादार्थ तत्सेवार्थ खधर्मार्थमपराधाभावार्थ स्वकृ- तार्थत्वार्थ खानन्दार्थ प्रेष्ठपरिचयार्थ सर्वपुरुषार्थसिद्धयर्थं स्वतघ्रपुरुषार्थतासि. ध्यर्थश्च सर्वथैवाऽऽवश्यकत्वात् । तथाहि । "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः । भक्तियोग स लभते एवं यः पूजयेत माम् । अर्चनं वन्दनं दास्यम् । यदहणं लोकस्य सद्यो विधुनोति फल्मपम् । तत्कुरुष्व मदर्पणम् । नारायणायेति समर्पयेत्तत् । फर्मशुद्धिर्मदर्पणम् । स वै पुंसां परो धर्मी यतो भक्तिरघोक्षजे । अहेतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति । वासुदेवे भगवति ईशावास्योपनिषद् । भक्तियोगः प्रयोजितः । जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं यचदहैतुकम् । धर्मः खनु छितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः। नोत्सादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् । अतः पुम्मिलिश्रेष्ठा वर्णाश्रमविमागशः । स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिहरि- तोपणम् । एतत्संसूचितं ब्रह्मस्तापत्रयचिकित्सितम् । यदीश्वरे भगवति कर्म ब्रह्मणि भावितम् । एवं नृणां क्रियायोगाः सर्वे संमृतिहेतवः । त एवाऽऽत्म- विनाशाय कल्पन्ते कल्पिताः परे। यदन्न क्रियते कर्म भगवत्परितोपणम् । ज्ञानं यत्तदधीनं हि भक्तियोगसमन्वितम् । कुर्वाणा यत्र कर्माणि भगवच्छि- क्षयाऽसकृत् । गृगन्ति गुणनामानि कृष्णस्याऽनुसरन्ति च । मत्कर्मकृन्मत्प- रमः । मत्कर्मपरमो भव । कुत्सिर्वाणि कर्माणि मदर्थ शनकैः स्मरन् । अन- न्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेम वहाम्यहम् । कर्माऽप्येकं तस्य देवस्य सेवा । सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो प्रजाधिपः । स्वस्याऽयमेव धर्मो हि नाऽन्यः क्वापि कदाचन । अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर । अपराध- सहस्राणां सहस्रमयुतं तथा । अर्बुदं चाऽप्यसश्येयं करुणाव्ये क्षमस्व मे । सर्व समर्पित भक्त्या कृतार्थोऽसि सुखी भव । यो दुस्त्यजान् क्षितिसुतस्वजना- र्थदारान् प्रार्थ्यां श्रियं सुरवरैः सदयावलोकाम् । नैच्छन्नृपस्तदुचितं महता मधुद्विदोवानुरक्तमनसामभवोऽपि फल्गुः । यत्कर्ममियत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् । सर्व मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लमतेऽञ्जसा । भगवदीयत्वेनैव परिसमाप्त- सर्वार्था" इत्यादि । जिजीविपेत् । तथाच वचनान्तराणि । "स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा- सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स ह नाव- यतु स ह नौ भुनक्तु । दीर्घायुत्वाय शतशारदाय । शत५ शरदय आयुषे वर्चसे जीवात्यै पुण्याय । आयुष्मन्तं वर्चखन्तम् । शिवाय लोकस्य मवाय भूतये य उत्तमश्लोकपरायणा जनाः । जीवन्ति । आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तं च यन्नसौ। तस्य यः क्षणो नीत उत्तमश्लोकवार्तया । आयुष्कामोऽश्विनी देवौ । बुद्धिश्चाऽऽयुश्च दोषाणाममावः कारण यतः । यस्य नैते भविष्यन्ति तस्य नाऽस्त्यधिकारिता" इति । शत समाः। अपरिमितं कालं जिजीविषेत् । "पिवत भागवतं रसमालयमि"ति वचनात् । अपरिच्छेद्यस्याऽपरिमितस्याऽऽन- पालभाष्यविभूपिता। न्दस्याऽनुभवेऽपरिमितोऽपि कालः स्वल्पतम एव प्रतीयते । "क्षणार्द्धवृत्ता" इत्युक्तेः । तादृशो हि रसस्वभावः । तथा चोक्तम् । "नित्यं निरीक्षमाणानां यदपि द्वारकौकसाम् । न वितृप्यन्ति हि दृशः श्रियो धामाऽगमच्युतम् । तस्याऽऽननं मकरकुण्डलचारुकर्णप्राजकपोलसुभगं सबिलासहासम् । नित्यो- सब न तत्पुर्दशिमिः पिबन्त्यो नार्यो नराश्च मुदिताः कुपिता निमेश्च । दिदक्षितदृशोऽभ्यगमन्त्समेताः । पीत्वा मुकुन्दमुखसारघमक्षिसः । गोपीनां परमानन्द आसीगोविन्ददर्शने । क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाऽमव- दिति । अत्र क्षणं युगशतमिवेति प्रतिनिर्देशेन गोविन्ददर्शने युगशतमपि क्षणायत इति ज्ञाप्यते। "तत्राऽन्दकोटिपतिमः क्षणो भवेदि"त्यत्राऽपि तथा । समानन्यायात् । जीवनं विना परमानन्दस्याऽननुभवो यतस्ततो जिजीविपेत् । खेहात्मिका घेपा जिजीविषा सेवकस्य स्वधर्म इति विधिनियोगः । तदुसाधने चाऽधर्मः । “न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिहे"ति वचनात् । फला- स्मकत्वं चाऽस्य ध्वनितम् । साधनात्मकत्वे फलपर्यन्तमिति विशेषोल्लेसो- अपेक्षितः । स त्विह न कृतः । तस्मात् । "सत्सङ्गान्मुक्तदुःसङ्गो हातुं नोत्स. हते बुधः । कीर्त्यमानं यशो यस्य सम्वाकर्ण्य रोचनम् । तस्मिन्यस्तधियः पार्थाः सहेरन् विरहं कथमिति कथनात् । कुर्वन्नेव जिजीविषेत् । अन्यथा तु-"मयि ताः प्रेयसां प्रेछे दूरस्थे गोकुलस्त्रियः । स्मरन्त्योऽ विमुह्यन्ति विरहीत्कण्ठ्यविहलाः । धारयन्त्यतिकृच्छ्रेण मायः प्राणान् कथश्चन । प्रत्या- गमनसन्देशैलन्यो मे मदात्मिकाः" इति । "गन्तहगताश्चाऽन्या गोप्यो- ऽलब्धविनिर्गमाः" इत्युपगम्य-"जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धना" इति । “यस्य वा भगवत्कार्य यदा स्पष्टं न दृश्यते । तदा विनिग्रहस्तस्य कम्य इति निश्चय" इति च न्यायेन जिजीविषा परित्यजेदेव । कुर्वनिति शता । प्रयोजनमिह हेतुः । भगवत्सेवनाख्यप्रयोजनजनितामेव जीय- नेच्छां विदध्यान्नेतरप्रयोजनामित्यर्थः । जीरनेच्छया हि भोजनादिव्यापारः। भगवत्सेवनाख्यप्रयोजनाभावे सति भोजनादिव्यापारमपि जीवनोपधायकं परि- त्यजेदेवेति भावः । असहाशोकेनाऽभिभवात् । महानेव खल्वसो होशः शोका- मिभयो नाम । सिएश्च न जीवितुमर्हतीति । अनुत्पन्नौहेपु सेहवत्कृतस्योपदे- ३ देशा २० ईशावास्योपनिषद् । पामपि तत्रैव प्रवृत्ति विरचयन्तस्तदर्थ शास्त्राण्यपि वेदवाहानि बहुधा प्रवर्त यन्तोऽमुरेभ्यो हिता भवन्तीत्यसुर्या इत्यधिक्षेपेण तत्स्वरूपोक्तिः । नामेति प्रसिद्धौ । प्रसिद्धास्ते । अलं तेषां भगवतद्भक्तितद्भक्तद्वेषिणां वेदविरुद्धार्थ- यादिनां वेदार्थमन्यथयताश्च नामोच्चारणश्रयणाभ्यामपि । तथापि प्रसिद्धास्त इत्यर्थः । कलिनोपहितत्वाप्रसिद्धयर्थ प्रयत्नयत्त्वाद्बहुभिस्तादृशैरनुवर्तन्नानामत- भेदेन बहुत्वाचेति भावः । त इति नाऽस्मदीयानां तैः कश्चन सम्बन्धः । येऽसान् द्विपन्ति यांश्च वयं द्विप्मस्तेपामलं वायेति भावः । न च ब्रह्मवा- दिनां द्वेपाभाव एव युक्तो न द्वेष उपपद्यत इति शवयम् । द्वेपेण तदनिष्टाभि- सन्धिराहित्येऽपि सदसद्विवेकवत्त्वातत्सङ्गपरिहाराय तत्स्वरूपविज्ञानबोधनयो. द्वेपत्वाविवक्षणात् । भगवद्वेपिषु द्वेपस शास्त्रविहितत्वेन गुणत्वाच।"छिन्या- असह्य रुशतीमसती प्रभुश्चेजिहामसूनपि ततो विसृजेत्स धर्म" इति वाक्यात् । "क्वचिद्गुणोऽपि दोषः स्याहोपोऽपि विधिना गुणः" इति वाक्यात् । "दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायाऽऽसुरी मते"ति तत्प्रसगस्य सर्वथैव परिहर्तव्यत्वा- चेति दिक् । लोका जनाः साधारणाः । प्राकृताः । लोक्यन्त इति लोकाः । इतस्ततो दुश्चेष्टितान्यातन्वाना लोक्यन्ते केवलम् । नाऽऽद्रियन्ते सद्भिः। नन्वलमौदासीन्येन तदुपेक्षया । तेऽनुकम्प्या भवादशामिति चेदनुकम्प्या इति सत्यं यद्यज्ञाः स्युः । ते तु-अन्धेन तमसाऽऽवृताः । तमः अज्ञानम् । तच ज्ञानाकारं न ज्ञानाभावः । तेन ज्ञानाकारेण तमसा रूढाभिमानाः सर्वज्ञम्मन्याः कमन्यं धन्यं मन्यन्ते येन ज्ञानार्थमुपसप्युः । अथ तथापि योधिता विमृ. शेयुः स्वाज्ञानमवधारयेयुरिति चेन्न। अन्धेनेति । उपदेशादिमिरशाम्येन निवि- डेन प्रगाढेन श्रुत्वा विमृशन्तोऽपि विशेपं प्रतिपत्तुमसमर्था एव भवन्ति । वादेषु च प्रत्युत्तरप्रतिपत्तिमूढमनसोऽपि स्वदुराग्रहं नोज्झन्ति । नन्वेवमपि विद्याव- ोिध्यमानाः शनैश्शनस्तादृशाचमसः प्रकाशमासादयेयुरिति चेन। आवृताः। यया कालपाशावृतस्य चिकित्स्यमानस्याऽप्युत्तरोचरं रोग एवाऽभिवर्द्धते न स्वास्थ्यमेवमसुरा अपि बोध्यमाना उत्तरोचरमज्ञानेनैवाऽऽनियन्ते प्रगाढेन अनवस्थितदुस्तादिरूपेण अनार्यतादिरूपेण च । प्रत्याशापराहता तेषां सत्पथपतिपत्तिरिति भावः । तेपामप्रतिपत्त्या न परमार्थस्य परमार्थविदश्च - 52416. पालभाष्यविभूपिता। काचिद्धानिरस्ति । परमार्थपथिकस्य च किश्चित्प्रयोजनमस्ति । तसात्त उपेक्ष्या एव । असम्भाप्याश्च । तैः संसर्गे खस्याऽपि बुद्धि_शादिना भगवत्सेवनादि- प्रतिबन्धेन च नाशसम्भवात् । ननु कोऽयं नाशस्तत्राऽऽह-तांस्ते प्रेत्याभि- गच्छन्तीति । तान् । शाश्वतिकनरकावाप्तिपर्यवसानाय पूर्वोक्तस्वरूपान- सुर्याने लोकान् । ते । असुर्या भगवद्विमुखा आसुराः प्रदर्शितस्वरूपाः । प्रेत्य । तत्कालीनं देहं पापपूर्णं त्यक्त्वा । प्रेतत्वं प्राप्य च । अभि । अभितः। तत्समीपमित्यर्थः । “समीपे निकटासन्नसनिष्टसनीडवत् । सदेशाभ्याश- सविधसमादसवेशवत् । उपकण्ठान्तिकाभ्यर्णाभ्यग्रा अप्यभितोऽव्ययमि"ति कोशात् । जन्माचारविचारसन्निकर्पदेशवेषरुचिसिद्धान्तविद्यावुद्धिसाधनफलैर्वा । 'अथवा । उगयतः । जन्मना मरणेन च । त्वरयेति वा । तेषां पुण्यलेशोऽपि नास्ति यद्भोगेन तत्माप्तो विलम्बः स्यात् । साकल्येन या । सर्वेऽपीति भावः । यदा जायन्ते तेप्येव जायन्ते यदा म्रियन्ते तदापि तेप्वेयोत्पद्यन्तेऽधिकाधिक पापर्द्धिपरिपूर्त्यर्थम् । तादृशासुरजन्ममरणपरम्परा कदापि न निवर्तत इत्यर्थः । कालसाकल्येन वा । सकलकालमित्यर्थः । "समीपोभयतः शीघ्रसाकल्याभिमु- खेऽभित" इति कोशात् । गच्छन्ति । प्राप्नुवन्ति । आसुरत्वं प्राप्नुवन्तीति यावत् । जन्ममरणचकेण वा शाश्थतिकनरकप्राप्त्याऽपि वा । उक्तं हि-- "प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । न शौचं नापि चाऽऽचारो न सत्यं तेषु विद्यते । असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहेतुकम् । एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पयुद्धयः । प्रभव- न्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः । फाममाश्रित्य दुप्पूर दम्गमानमदा- न्विताः । मोहाद्गृहीत्वाऽसद्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचित्रताः । चिन्तामपरिमेयाश्च प्रल्यान्तामुपाश्रिताः कामोपमोगपरमा एतावदिति निश्चिताः। आशापाशशते- बद्धाः कामकोधपरायणाः । ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनाऽर्थसञ्चयान् । इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्ये मनोरथम् । इदमस्तीदमपि मे मविप्यति पुन- र्धनम् । असौ मया हतः शार्दनिध्ये चापरानपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुसी । आयोऽभिजनवानसि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि मोदिप्य इत्यज्ञानविमोहिताः । अनेकचित्तविग्रान्ता मोहजा- २२ ईशावास्योपनिषद् । लसमावृताः । प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ । आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयजैते दग्मेनाऽविधिपूर्वकम् । अह- सारं बलं दर्प कामं क्रोधश्च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विपन्तोऽभ्यसूयकाः। तानहं द्विषतः ऋरान् संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजसमशुभानासुरीप्वेव योनिषु । आसुरी योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिमि"ति श्रीमद्भगवद्गीतासु । "जुगुप्सितं धर्मकृतेऽनुशा- सतः स्वमावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः । यद्वाक्यतो धर्म इतीतरः स्थितो न मन्यते तस्य निवारणं जन"इति श्रीमद्भागवते । "शृणु देवि प्रवक्ष्यामि ताम- सानि यथाक्रमम् । येषां श्रवणमात्रेण पातित्यं ज्ञानिनामपी"त्यादिवचनजातं पानोत्तरखण्डे । तच प्रागुदाहृतमुपोद्धाते । "एतेन शिष्टापरिमहा व्याख्याता" इति ब्रह्मसूत्रं च । एवमासुरा जीवा आसुरजन्ममरणपरम्पराचक्रे निपतिताः पर्यवसाने शाश्वतिकनरकानपि प्राप्ता विनश्यन्तीत्युक्तम् । ये च साननुसृता- स्तेऽपि तेप्वेव जन्म लब्ध्वा तथैव विनश्यन्तीत्याह-ये के चाऽऽत्महनो जना इति।च। पुनः । ये के ज्ञाताज्ञाता उत्कृष्धापकृष्टाः पण्डिता चा मूर्खा वा देवा मनुष्या असुरा वा वैदिकम्मन्या अवैदिकाश्च । आत्महनः । तदनुसरणादिना अविद्यालस्यादिना था तानेवाऽनुसृता भगवन्तमभजन्त आत्मपरमात्मनोग- स्परमात्मनोश्च स्वस्वामिसम्बन्धमविजानन्तस्तदनुरुध्याऽवर्तमानाश्चाऽसमर्पित- मुपभुझाना भगवत्सेवान्तदुपयोगीनि कर्माण्यकुर्वाणाः सत्रासात्संसारस्पोद्विज्य वृथा वैराग्यादिनाऽमङ्गलमाकाइन्तः स्वदेहेन्द्रियप्राणान्तःकरणानि भगवत्से- धनादावनुपयुञ्जानासत्सेवोपयोगितालोभेन तद्विधानहेतूनननुरुन्धानाः प्रत्युत तद्वैयर्थ्यमयथार्थमशास्त्रीयमभक्तिमार्गीयमनाचारमाचरन्तः श्रुतिस्मृत्युक्तसदा- चारयाधात्म्यमविदन्तः सर्वमुक्कं प्रद्विषन्तः प्रतिरुन्धानाचाऽऽत्महनः । प्रकर• यात् । “य आत्मनि तिष्ठन्नात्मानमन्तरो यमयति यस्याऽऽत्मा शरीरं यमात्मा न वेदेति श्रुत्या "यथाऽमेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवाऽस्सादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि सर्न एवाऽऽमानो व्युचर- ती"ति श्रुत्या "अहमारमाऽऽमनां तात भेष्ठः सन् प्रेयसामपि । अतो मयि रतिं कुर्य्याहादिर्यत्कृते प्रियः । हरिहिं साक्षादगवान्धरीरिणामात्मा झपाणामिव बालभाष्यविभूषिता । २३ तोयमीप्सितम् । कुर्वन्ति हि त्वयि रति कुशलाः ख आत्मन्नित्यप्रिय” इत्यादि- प्रमाणशतैश्च श्रीकृष्णः सर्वेपामात्मनामात्मा । तत्सम्बन्धविहीन आत्माऽपि कुण- पादतिरिच्यते । पुरुषार्थापेतत्वादपवित्रत्वादिभिश्च । “न तथा बघवान् राजन् पूर्यत तपआदिभिः । यथा कृष्णार्पितप्राणस्तत्पूरुपनिपेवया । तरवः किं न जीवन्ति मस्त्राः किं न श्वसन्त्युत । न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामपशवोऽपरे । धविडुराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पशुः । न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदा- मज" इत्यादिवचनैः । "कुणपः प्रोच्यते बुधैरि"त्यादिभ्यश्च । देहेनाऽहतोऽपि स्वरूपेण हत एव । हतो हि नोज्जीवयितुं शक्यः। प्रथमतस्तिरोहितभगवद्धर्मा खरूपात्मच्युतश्चाऽन्यादृशोऽपि आसुरसङ्गेनेदानी स्वधर्म भगवत्सेवामुत्सृजन हत एव । इतः परं गुरूपदेशसत्सङ्गश्रवणादीनामसम्पर्क एव यतः । तदर्थ चेप्टेय नास्ति । आसुरावेशात् । यो न चेष्टते स हतः । यश्च चेष्टते स चेष्ट- मान आत्मानमेव सेवतेऽनुभवति च तदानन्दम् । य आत्मा न चेप्टते चेष्ट- 'मानोऽपि स्वात्मानं श्रीकृष्णं न सेवते नाऽनुभवति च तदानन्दं स हतः। आत्मनि च हते देहतोऽपि हत एव । देहेन्द्रियादीनां भगवदर्थं चेष्टा न दृश्यत इति । तथा चोच्यते-"विले बतोरुक्रमविक्रमान् ये न शृण्वतः कर्ण- 'पुटे नरस्य । जिहाऽसती दारिकेव सूत न चोपगायत्युरुगायगाथाः । भारः परं पकिरीटजुष्टमप्युत्तमा न नमेन्मुकुन्दम् । शावौ करौ नो कुरुतः सप- हरेर्लसत्काञ्चनकवणौ वा । बर्हायिते ते नयने नराणां लिङ्गानि विष्णोर्न निरीक्षतो ये । पादौ नृणां तौ दुमजन्मभाजौ क्षेत्राणि नाऽनुनजतो हरेर्यो । जीवन्छवो भागवताद्विरेणुं न जातु मोऽमिलभेत यस्तु । श्रीविष्णुपद्या मनुजस्तुलस्याः श्वसञ्झ्यो यस्तुन वेद गन्धम् । तदश्मसारं हृदयं बतेदं यगृह्य- माणैर्हरिनामधेयैः । न विक्रियेताऽथ यदा विकारो नेत्रे जलं गावरुहेपु हर्षः" इति । ये तु न हताः किन्तु जीवन्ति ते तु-याणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोः । स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत् प्रणामे दृष्टिः सतां दर्शनेऽस्तु भवत्तनुनामि"त्युक्तप्रकारेण तत्मार्थनया च भगवत्सेवार्थ चेष्टन्ते । उक्तञ्च-नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्यं गुरुकर्णधारम् । मयाऽनुकूलेन नभखतेरितं पुमान् भवाब्धि न तरेत्स आत्महा।
H. २४ ईशावास्योपनिषद् । अनेजदेकं मनसो जीयो नैनद्देवा आमुवन् पूर्वमर्पत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपोमातरिश्वा दधाति ॥४॥ लब्ध्या सुदुर्लभमिदं वहुसम्भवान्ते मानुप्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः । तूर्ण यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यादिति । तस्ला- सेवारहिता भगवद्विमुखा आत्महनः । तांते प्रेत्याऽमिगच्छन्तीत्यनुपङ्गः । मोहमहाब्धावतिगम्भीरे तथा तले निमजन्ति यथा पुनर्नवोद्गच्छन्ति । ताननु विनश्यन्त्येवेत्यर्थः ॥३॥ एवमासुरॉल्लोकानासुरमार्ग तत्स्वरूपं तदपराधानां काष्ठाभावं तेषां घोरतम चेतसा विचारेऽपि भयवतरं फलञ्च तदनुवर्तिनाश्च पातमतिवनिं प्रतिपाद्य बुभूपोस्तैः सहाऽसंसर्ग एव सर्वथा वरम् । वुभूपुभिस्तत्प्रवृत्त्यप्रवृत्ती अचिन्त- नीये एव प्रयोजकतया । किन्तु फलाफले सुगतिदुर्गती एव तथा चिन्तनीये प्रगल्भैः । तत्संसर्गाच सदा दूर एव भवितव्यम् । न तु मुग्धैर्भवितव्यम् । दुस्समविपस्याऽतितीव्रतया सर्वात्मना परिहर्तव्यत्वात् । किन्तु सत्सङ्गान्मुक्त- दुस्सद्गः स्वपुरुषार्थसाधन एव स्वार्थज्ञस्तत्परो भवेदन्यदननुयोग्यचिन्तयन्निति शास्त्रार्थों दर्शितः । इदानी प्रकृतमनुसरन्ती प्राकृतादीशत्वादीशस्येशत्वं व्यवच्छिद्य प्रदर्शयन्ती भक्तरक्षादीक्षितत्वं तत्र सक्षणत्वं तदेकस्वभावत्वं भक्त- रक्षायामनलसत्वमन्यदेवातिशायित्वं विचित्रशक्तिशालित्वेन माहास्यं तल्लीला- तदप्राकृतत्वं च तत्समर्थनार्थ कथयन्ती भक्तिभरमुद्रेचयन्ती सर्वथा सेवनी- यतमत्वमाह-अनेजदित्यादिना । अनेजदकम्पमानमविचलत्सर्वमादित्यर्थः । अनागन्तुकानारोपितस्वरूपत्वात्सर्वस्येति । सर्वो हि पदार्धस्तत्स्वरूपेणाऽवति- छते । न प्रातिखिकेन रूपेण । “यथैकेन मृत्पिण्डेन सोम्य सर्व मृन्मयं विज्ञातर साद्वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यमि"त्यादिभिः श्रुतिमिः । बहिराविर्भावतिरोभावदर्शनेऽपि भगवति सर्वपदार्थानां सर्वदा स्वरू- पानतिरिक्तत्वेन स्थिततया कार्यकारणोभयरूपेण सदैव स्थितिरिति । "नटे लोके द्विपरार्धावसाने महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । व्यक्तेऽन्यक्तं कालवेगेन याते भवानेकः शिष्यतेऽशेपसज्ञ" इति वाक्यात् 1 "सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान् । तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः । आत्मकृतेः परिणामात् । पटवच्चे"त्यादिभ्यः बालभाष्यविभूषिता । २५ श्रुतिसूत्रेभ्यश्च । परिणमदपि स्वरूपादप्रच्युतमेव परिणमते । सुवर्णादिवत् । अविकृतपरिणामवादखीकारात् । सत्कार्य्यवादाच । आविर्भावतिरोमावावेव केवलं भवतो न वस्त्वन्तरं किश्चिदपि भवति । सर्वकारणभावादपि । समवा- व्यसमवायि निमितं च खयमेवेति । "तदात्मानर स्वयमकुरुते"ति श्रुतेः । "यत्र येन यतो यस्य यसै यद्यद्यथा यदा। स्यादिदं भगवान् साक्षात्प्रधानपुरुषे- श्वर" इति श्रीमद्भागवताच । एतेन-"ईशाऽऽवास्यमिदं सर्वमि'त्यादिमग्राभिमत- मुपष्टव्यमुपपादितञ्च । सर्वस्पेशाक्रान्तत्वञ्च स्वरूपेण नियामकत्वेन च दर्शितम् । लीलेच्छातो लीलाभ्यश्च सर्वदेवाप्रच्युतम् । "क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत्कृतं त" इति वाक्यात् । ईशेशितव्यो भूत्वैव रमत इतीशितव्यानामीशितव्यत्वं सेवकत्वापरपायं तेन च स्वस्पेशत्वं सेव्यत्वपर्यवसनं सर्वदेवाऽभिवाञ्छति । तथा सति खलीलानिर्वाहश्च वाञ्छतीति ततोऽप्यनेजत् । तेनाऽवश्यं सेवकेन स्वधर्मोऽनुष्ठातन्यो न प्रमदितव्यमित्युक्तम् । तल्लीला चाऽनुभवितव्याऽऽनन्द- रूपा । लीला घानन्दरूपा भवति । स्वानन्दानुभवादन्येभ्य आनन्ददानाच्च । तेनाऽनेजदित्यानन्दैकरसमित्यर्थः । स्वयमानन्दः परमानन्दमन्येभ्यो वर्षति नाऽन्यत्कुरुते तादृशस्वभावमिति यावत् । सर्वदैकरसा तत्पीतिः कदापि न विरसा भवतीति ध्वन्यते । सकम्पानुकम्पापीयूषपूरप्रपातपरम्परानुमासस्पृहणी- यतमस्वरूपा च परिस्पन्दमानप्रसादसुधारसपरिस्यन्दसंसिक्तसर्वसेवकसमाज- समभिनन्धमानसमुदया च सेति । अन्येऽस्य भयात्कम्पन्ते । नाऽयमन्येभ्यः कम्पते । किन्तु सर्वानेवेशमानिनः सवशे स्थापयति । नियोजयति च कर्म- करानिय तत्र तत्र कार्येषु । तदनेजत् । "भीपाऽस्माद्वातः पवते भीपोदेति सूर्यः । भीपाऽसादिन्द्रश्चाऽमिश्च मृत्युर्धावति पञ्चम" इति श्रुतेः । “मद्- याद्वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति मद्यात् । वर्पतीन्द्रो दहत्यमिर्मत्युर्धावति पञ्चम" इति स्मृतेश्च । भक्तरक्षायामनेजत् । तत्परत्वात् । तदुक्तम्- "सप्ताहमदधा- द्विरिम् । सप्ताहं नाऽचलत्पदात् । उत्पादककरण शैलमबलो लीलोच्छिलीन्ध्र यथा विद्गोष्ठमपान्महेन्द्रमदभित्नीयान इन्द्रो गयाम् । विपान्महामेः पुरुषा- ददर्शनादसत्समाया वनवासकृच्छ्तः । मृधे मधेऽनेकमहारथास्त्रतो द्रौप्यस्त्रत- थाऽसा हरेऽभिरक्षिताः। विपजलाप्ययायालराक्षसादर्पमारुताद्वैद्युतानलात् । ४ ईशा.
ईशावास्योपनिषद् । वृपमयात्मजाद्विश्वतोमयादृषभ ते वयं रक्षिता मुहुरिति । अनेजदित्येकत्रा- ऽविचलत्वेन स्थितं दृपद्वत् कार्यान्तरमकुर्वाणमिति नाऽर्थः। किन्तु तेभ्य- स्तेभ्यः सर्वेभ्योऽपि कार्येभ्योऽअच्युतमेवाऽनेजत् । तेनाध्य सर्वशक्तिमत्त्वं स्वाभाविकमित्युक्तं भवति । नन्विदं तचत्कार्येभ्योअच्युतत्वं कार्याणामान- न्त्यादनेकत्वं विना न सम्भवति । पुरुपवत् । मैवमित्याह--एकमिति । तथा सत्यनीशत्वापनिरिति भावः । एफस्याऽनेकत्वमीशत्वादुपपद्यते । न त्वनीश- त्वायाऽनेकत्वं करप्यमसम्मवं मत्वा । ईशस्पदं प्रकरणम् । निरहुशमीशत्व- मुपपादयितुमेव हि .श्रुतिः प्रवृत्ता । ईशस्य किमप्यसाध्यं नास्त्येकत्वमनेक त्वञ्च । कार्याणामानन्त्यमाच्युतत्वमेकत्वञ्च । किन्तु कार्यानन्त्याततस्ततो- ऽअच्युतत्वमनेकत्वं विना न सम्भवतीति कथनमयुक्तमित्यर्थः । निरङ्कुशमिद मैश्वर्यं न लौकिकम् । नैतदव्यात्या व्याकुलमिति । "न तत्समश्याऽभ्यधिकश्च दृश्यत" इति श्रुतेः। नन्वेतादृशमनेजदन्यदपि भवेदित्यत्राऽऽह-एकमिति । समाभ्यधिकरहितमित्यर्थः। "न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्य- प्रतिभप्रभाव" इति वचनात् । तदेकमेव समाश्रयणीयम् । नाऽन्यत्समाश्रय- णीयमिति मावः । नन्वेकः कथमनेकानि कार्याणि युगपत्कुर्य्यादित्यत्राऽऽह- मनसो जवीय इति । क्षणेनैव युगपदेव च सर्व कत्तुं समर्थमित्यर्थः । मनो हि सङ्कल्पेन क्षणमात्राचत्र तत्र गच्छदनुभूयते । ब्रह्म तु ततोऽपि जवीयः । सङ्कल्पमात्रेण युगपञ्च सर्व निर्माति पाति गच्छति कार्याणि साधयति । न त्वेवं मनः । तथाच श्रुत्यन्तरम् --"एकोऽहं बहु स्यां प्रजायेयेति । व्यापकत्वसत्यसङ्कल्पत्वादिकमीशत्वस्यैवोपसर्जनीभूतमितीशत्वपुरस्कारेणैव स. माधानाभिधानमिति ज्ञेयम् । तेन सर्वभक्तसमुद्धारे त्वराशीलत्वं श्रमाभावश्च तस्य स्फुटीभवति । अनेजदिति सुलभत्वमुक्तम् । कृपावत्त्वञ्च । "भगवानथ वि- वात्मा पृथुनोपहतार्हणः । समुज्जिहानया भक्त्या गृहीतचरणाम्बुजः । प्रस्थाना- भिमुखोऽप्येनमनुग्रहविलम्बितः । पश्यन् पद्मपलाशाक्षो न प्रतस्थे सुहृत्सता- मित्येवं वर्णनात् । एफमिति समायणीयत्वाय रूपं गुणाच तदतिशयश्च । मनसो जवीय इत्यनेन मनःकरणात्प्रागेवाऽशेषप्रतिबन्धनिवृत्ति मनोभिलषिता- र्थसम्पादनञ्च फरोतीति भक्तार्थसाधने त्वराऽनुकूलत्वञ्च । मनसैवैतदात- वालभाष्यविभूपिता। २५ श्रुतिसूत्रेभ्यश्च । परिणमदपि स्वरूपादप्रच्युतमेव परिणमते । सुवर्णादिवत् । अविकृतपरिणामवादखीकारात् । सत्कार्यवादाच । आविर्भावतिरोभावावेद केवलं भवतो न यस्त्वन्तरं किञ्चिदपि भवति । सर्वकारणभावादपि । समवा- थ्यसमवायि निमित्तं च खयमेवेति । "तदात्मानर सयमकुरुते"ति श्रुतेः । “यत्र येन यतो यस्य यसै यद्यद्यथा यदा । स्यादिदं भगवान् साक्षात्प्रधानपुरुपे- श्वर" इति श्रीमद्भागवताच । एतेन-"ईशाऽऽवास्यमिदं सर्वमित्यादिमघ्राभिमत- मुपष्टब्धमुपपादितञ्च । सर्वस्पेशाकान्तत्वञ्च स्वरूपेण नियामकत्वेन च दर्शितम् । लीलेच्छातो लीलाभ्यश्च सर्वदैवाअच्युतम् । "क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत्कृतं त" इति वाक्यात् । ईशेशितव्यो भूत्वैव रमत इतीशितव्यानामीशितव्यत्वं सेवकत्वापरपर्यायं तेन च स्वस्पेशत्वं सेव्यत्वपर्यवसन्नं सर्वदैवाऽभिवाञ्छति । तथा सति स्वलीलानिर्वाहश्च वाञ्छतीति ततोऽप्यनेजत् । तेनाऽवश्यं सेवकेन खधर्मोऽनुष्ठातव्यो न प्रमदितव्यमित्युक्तम् । तल्लीला चाऽनुभवितव्याऽऽनन्द- रूपा । लीला ह्यानन्दरूपा भवति । स्वानन्दानुभवादन्येभ्य आनन्ददानाच । तेनाऽनेनदित्यानन्दैकरसमित्यर्थः । स्वयमानन्दः परमानन्दमन्येभ्यो वर्षति नाऽन्यकुरुते तादृशस्वगावमिति यावत् । सर्वदेकरसा तत्प्रीतिः कदापि न विरसा मवतीति ध्वन्यते । अकम्पानुकम्पापीयूपपूरप्रपातपरम्परानुपासस्पृहणी- यतमखरूपा च परिसन्दमानप्रसादसुधारसपरिस्यन्दससिक्तसर्वसेवकसमाज- समभिनन्धमानसमुदया च सेति । अन्येऽस्य भयात्कम्पन्ते । नाऽयमन्येभ्यः फम्पते । किन्तु सर्वानेवेशमानिनः स्त्रवशे स्थापयति । नियोजयति च कर्म- करानिय तत्र तत्र कार्येषु । तदनेजत् । "भीपाऽस्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः । मीपाऽस्मादिन्द्रश्चाऽशिश्च मृत्यु(वति पञ्चम” इति श्रुतेः । “मद्ध- याद्वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति मद्भयात् । वर्षतीन्द्रो दहत्यनिर्मृत्युर्धावति पञ्चम" इति स्मृतेश्च । भक्तरक्षायामनेजत् । तत्परत्वात् । तदुक्तम्- "सप्ताहमदधा- द्विरिम् । सप्ताहं नाऽचलत्पदात् । उत्पाट्यककरण शैलमयलो लीलोच्छिलीभं यथा विनदोष्ठमपान्महेन्द्रमदमित्प्रीयान्न इन्द्रो गवाम् । विषान्महामेः पुरुषा- ददर्शनादसत्समाया वनवासकृच्छ्रतः । मृधे मृधेऽनेकमहारथास्त्रतो द्रौप्यसत- थाऽस हरेऽभिरक्षिताः । विपजाप्ययाद्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात् । ४ ईशा.
२८ ईशावास्योपनिपद् । सम्भवत्येव तल्लाभः । लब्धपूर्वमेव वा तद्भवेत् । देवानामलभ्यत्वाभावात् । अचिन्त्यप्रभावा हि देवा इति चेन्न । नाऽस्य लामादौ स्ववलं प्रयोजक फस्याऽपि । किन्तु भगवत्कृपैव प्रयोजिका । यमिच्छति स प्रवर्तते विन्दति च तत्सेवाम् । नाऽन्य इत्याह-नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्पद । भगवति दैन्य- हीनाः स्वबलेनाऽवलिप्ता नन्दनादौ क्रीडापरा मोदमाना मला देवास्तदर्थ ताप- क्लेशरहिता एनत् उक्तस्वरूपं परं ब्रह्म नाऽमुवन्न प्राप्तवन्तो न विजजुश्च । तन हेतुः-पूर्वमर्पत् । प्राप्तुः प्राप्त्यनुकूलव्यवसायात्पूर्वमेव तमर्पत् प्राप्नुवत् । न हि प्राप्ता तत् प्रामोति । किन्तु प्राप्तारं तद्रव स्वयं प्रामोति । अयं मां ग्रामोत्वितीच्छया । प्रा हि तस्मिन् रुचिस्ततस्तत्सेवादी प्रवृत्तिः । अप्राप्ते तु कुत्र निर्विपया रुचिरास्पदमासादयेत् । किंविपया भवेत् । कस्य च सेवादौ प्रवर्तेत । तस्मात्प्राप्यतया पूर्वमेव यानधिकारिविशेपान् कृपाविपयानभिमुखी- भवति त एव सन्मार्गलाभादिना तत्प्राप्नुवन्ति । ये तु तदतिरिक्तास्ते तु संस- रन्त्येव । देवा अन्यत्र सन्तु देवाः । भगवत्प्राप्तिविपये तु त इतरतुल्या एव । संसारित्वात् । तस्माते ब्रह्मादयस्तनुभृतस्तमसि स्वपन्तो विद्यावतामभजनीया एव । भगवानेव भजनीयः । स चाऽतिकृपालरात्मीयान् भजनीयतया पूर्व- मेवोपतिष्ठते । ततस्ते तं भजन्ति प्राप्नुवन्ति च । तथाच श्रूयते--"नाऽय- मात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैप वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैप आत्मा विवृणुते तनू५ स्वामि"ति । वरणोपरमपि न खवलं सह- कारि । किन्तु तदनुग्रहबलविचारेणोतरोत्तरानुग्रहार्थमुत्तरोत्तरसन्निधानार्थ च दैन्यातिशय एव सेवादौ निश्छिद्रा तत्परता च। तथैव हि श्रूयते-"नाऽयमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाऽप्यलिङ्गात् । एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वां- स्तस्यैप आरमा विशते ब्रह्मधामे"ति । तदेतद्देवानां किमपि नाऽस्तीति नैनद्देवा आनुवन् । तेन ब्राह्मण्यादिस्खयोग्यताभिमानं स्वसाधनाभिमानं च त्यक्त्वा तदे-- ककृपावलोकनैकप्रतीक्षिणा तदर्थ दैन्यवता च भवितव्यं बुभूपुणा । देवेभ्यो- यधिकच स्वसौगम्यं सेवायला मन्तव्यम् । सौभाग्यमदश्च पारपित्तव्यः । नाऽन्यत्र दैन्यं चिन्तनीयमित्युपदेशः फलितः । किञ्च । निजजनेषु कृपाति- शयाद्वैकुण्ठं विहाय पूर्वमेयाऽविज्ञातमेव श्रीमन्नन्दयशोदादीन् ब्रजजनान् बज;
पालभाष्यविभूपिता। भूमिश्च लीलार्थ तदानन्दप्रदानार्थश्चाऽपत् गच्छत् एनत् पूर्वोक्तखरूपस्वभाव- शक्तिकं परं ब्रह्म देवा अतीन्द्रियज्ञानसामर्थ्यवन्तोऽपि अवतारकालात्साक्षात्प- श्यन्तोऽपि लीलाविशिष्टं तच्च तल्लीलाश्च नाऽऽनुवंस्तत्त्वतो न ज्ञातवन्तो ज्ञात- वन्तोऽपि न प्राप्तवन्तः किन्तु मुहुर्मुहुरनुतापमेव दधुः । तदुक्तम्-"विन- देणुं जठरपटयोः शृङ्ग्वेने च कक्षे चासे पाणौ मसूणकवलं तत्फलान्यद्गुलीपु । तिष्ठन्मध्ये स्वपरिसुहृदो हासयन्नमभिः खैः स्वर्गे लोके मिपति बुमुजे यज्ञभु- बालकेलिरि"त्यत्र "स्वर्गे लोके मिपती"त्यनेन । बालकेलियु प्रसक्तस्य यज्ञ- मुजो भगवतः श्रीमन्नन्दराजकुमारस्य परित उपविष्टैः स्वसुहृद्भिर्गोज्यादानप्रदा- नादिरूपां मोज्यप्रदानोद्यमस्वयम्भक्षणपरस्परवञ्चनतजनितहासादिरूपाच लीलां विलोक्य ब्रह्मरुद्रेन्द्रादयो देवाः कदाचिन्मुमुहुः--परं ब्रह्मवाऽयं न वेति । कदाचिच्च परं ब्रहौवाऽयम् । किन्त्वङ्गीकृतवत्सल इत्यं क्रीडति । हा हन्त न वयं ब्रजस्साऽऽभीरार्मका बभूविम य इत्यं तत्कृपामनुभवन्ति । "अहोभाग्यम- होगाग्यं नन्दगोपनजौकसाम् । यन्मित्रं परमानन्दं पूर्ण ब्रस सनातनमिति । धिगसान्देवग्मन्यान् देवानेतदानन्दवश्चितानित्यभिप्रायेण स्वर्ग लोके मिपती- त्यर्थः । सुस्फुटञ्चैतद्वत्साहरणलीलायामिन्द्रमानभालीलायामन्यत्राऽपि च । तस्मान्न कोऽपि तत्समः । तदेव परं ब्रह्म सर्वोत्तमम् । इतरत्सर्वमवरम् । तत्मा- सिश्च तदनुग्रहबलादेव । न स्वसाधनबलादिति स्थितम् । नन्वनुग्रहोऽप्रयोजकः । शास्त्रान्यथानुपपत्तेः । "शास्त्रानि जनार्दनमि"त्यादिवाक्येभ्यश्च । अतः शास्त्रो- तमार्गरेव कर्मज्ञानादिमिः पुरुषार्थ इति चेन्मैवमित्याह-तद्धावतोऽन्यान- सेति तिष्ठदिति । सद्गुरूननुपसद्य सत्सङ्गममगत्या शास्त्राशयमनासाथ भगव- न्तमविज्ञाय कर्मज्ञानादीनां तदाराघनरूपतामवुद्धा तदनुग्रहस्य सर्वत्र नियामक- तामनिश्चित्य अतिरेव वा प्रतारिताः शिष्टानां वचनमशृण्वन्तः फर्मज्ञानादिमि- रनीधरैः पुरुषार्थप्रेप्सया धावन्तः लोशमनुभवन्ति ये तान् धावतः । अन्यान् । अनुग्रहात्मफमार्गेभ्यः पृथग्भूतान् भगवदुपेक्षितान् पृथाजनान् । तत् । कैश्चि- देव साक्षाद्भगवदनुगृहीतैरेव वेद्यं सेव्यं लभ्यश्च । तिष्ठत् । तादृशेष्वेव तैर्व- शीकृततया अन्यतोऽवरुद्धगतिकतया च वर्चमानम् । तदुक्तम्-"मयि निर्व- द्रद्ददयाः साधयः सगदर्शनाः । वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सस्त्रियः सत्पति ईशावास्योपनिषद् । यथा । यासां गृहापुष्करलोचनः पतिर्न जात्वपैत्यातिमिहदि स्पृशन् । यय- प्यसो पार्थगतो रहोगतस्तथापि तस्याऽवियुगं नवं नवम् । पदे पदे का विरमेत तत्पदाचलाऽपि यच्छ्रीन जहाति कर्हिचित् । रेमे स्त्रीरलकूटस्थो भगवान् प्राकृतो यथा । न भजति कुमनीपिणां स इज्यां हरिरधनात्मघनप्रियो रसज्ञः । मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारदे"त्यादि | "तिष्ठन्मध्ये खपरि सुहृदो हासयन्नमभिः खैरि"ति चोक्तम् । किञ्च । तिष्ठत् । शास्त्रेषु सर्वशास्त्राशय- तया अनुगृहीतैश्यमानं निर्वर्ण्यमानं व्याख्यायमानमसंशयेनाऽवधार्यमाणं श्रीकृष्णः शास्त्रार्थ आनन्दस्य हरेलीला शास्त्रार्थ इति निश्चीयमानमतिरोहितं देदीप्यमानम् । अपीति शेपः । अत्येति । तान् प्रति तिरोमवतीत्यर्थः । तेषां दोपादेव तिरोभवति । प्रद्वेषाभिभूतत्वात्तदृष्टेः । प्रद्वेपाभिमूतदृष्टयस्त एव तत्परं ब्रह्म वस्तुत ईशत्वसेव्यत्वादिरूपेण न पश्यन्ति । न तु तत्स्वयं तिरोभाति । यथा कंसादीनाम् । लीलयैव पूतनावृणावर्त्तदिवधेन कुवलया- पीडादिवधेन च देहिप्वसङ्गतानामतुल्यातिशयानां पराक्रमाणां प्रदर्शनात् । शास्त्रेषु प्रकाशमानतायाः संराधनेन प्रत्यक्षमनुभूयमानतायाः सत्सम्प्रदायानां संराधकानां जागरूकत्वाच्च । तेन तेषु तस्य प्ररोपो नाऽनुमहः प्रवेप्यास्ते सर्वपुरुषार्थवश्चिताः शाश्वतनरकाधिकारिण इति भावः । भकिमार्गेऽपि ये भगवदनुमहं कर्मजन्यमेव मन्यन्ते । न तु सन्मार्गमात्र नियामकम् । कर्मा- दीनां व्यापारस्वमेव न कर्तृत्वमिति । स्वतत्रमपि चाऽनुग्रहमार्ग ये न मन्यन्ते तान् प्रत्यपि तिष्ठदपि तत्तिरोहितमेव । अभ्यसूयकत्वात् । अभ्यसूया हि गुणेषु दोषाविष्करणम् । आदावीश्वरमेव केचिन्नेच्छन्ति । इच्छन्तोऽपि केचित्सर्व- विशेषशून्यमकर्तृ चाऽभजनीयश्चेत्यादि तद्गुणानां प्राकृतत्वं नामाकृतत्वमित्या- धातिष्ठन्ते । अन्ये तद्विपरीता अपि विधिनिषेधशास्त्रान्यथानुपपत्तिमिया कर्म- परितुष्ट एव स फलं प्रयच्छति । न तु निरतिशयानुग्रहशीलविवशो दोपान- दृष्ट्वाऽप्यपराधानननुसन्यायाऽपि स्वात येणाऽपीति कथयन्ति । स्वतन्त्रमनुम- । मार्ग नेच्छन्ति । यस्तावत्-"नाऽयमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेघया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूरस्वा- मि"त्यादिभिः श्रुतिसहस्रैः "अनाद्यविद्योपहतात्मसंविदस्तन्मूलसंसारसरिश्रमा- वालभाष्यविभूषिता । तुराः । यदृच्छयेहोपलता यमानुयुर्विमुक्तिदो नः परमो गुरुभवान् । न रोधयति मां योगो न सायं धर्म एव च । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापू न दक्षिणाः। ब्रतानि यज्ञाश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः। यथाऽवरुन्धे सत्सङ्गः सर्व- सनापहो हि माम् । सत्सङ्गेन हि देतेया यातुधानाः खगा मृगाः। गन्धर्वा- प्सरसो नागाः सिद्धाश्चारणगुह्यकाः । विद्याधरा मनुप्येषु वैश्याः शूदाः स्त्रियो- ऽन्त्यजाः । रजस्तमःप्रकृतयस्तसिंस्तस्मिन् युगेऽनघ । वहयो मत्पदं प्राप्तास्त्वा- ट्रकायाधवादयः" इत्यादिस्मृतिसहस्रैश्च जोधुप्यते । अपरे युक्तिविरोधे वेदो न प्रमाणमित्यातिष्ठाना वेदस निरपेक्षं प्रामाण्यमनभ्युपेत्य भगवति निरङ्कुशमै- श्वर्य तत्प्रतिपायं युक्त्यगोचरं न सहन्ते । इतरे-“अवजानन्ति मां मूढा मानुषी तनुमाश्रितम् । परम्भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् । इत्थम्परस्य निजवमरिरक्षयाऽऽत्तलीलातनोस्तदनुरूपविडम्बनानि । कर्माणि कर्मकपणानि यदूत्तमस्य श्रूयादमुप्य पदयोरनुवृत्तिमिच्छन् । निवृत्ततरुपगीयमानायौपधा- च्छ्रोत्रमनोऽभिरामात् । क उत्तमश्लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुमादि"त्यादिभिर्वचनसहलीलानामेव यथार्थवेदार्थत्वमनध्यवस्यन्तस्तत्पर- तया वेदमनापयित्वाऽनवतारचरित्रमात्रपरतया व्याचक्षते । ते सर्वेऽप्यभ्य- सूयकाः । तेऽपि धावन्त्येव । याथार्थ्यानुपलम्भन वृथा प्रयासात् । अन्ये च । पूर्णानुग्रहाभावात् । अभ्यसूयान्यथानुपपत्तेः । तान् प्रत्यपि यथा कथञ्चनाऽन्ध- हस्तिन्यायेन ज्ञेयतया तिष्ठदपि सर्वात्मना याथायेंन तचिरोहितमेवेति ज्ञेयम् । यत्तु शाखान्यथानुपपचिरित्युक्तम् । तत्--"गतेरर्थवत्त्वमुमयथाऽन्यथा हि विरोध' इति सूत्रोक्तव्यवस्थया मर्यादामार्गेऽनुमहव्यापारतया विधिनिषेध- योरुपपत्त्या नाऽऽनर्थक्यमिति सिद्धान्तेनैव समाहितम् । तस्माद्भगवदनुग्रह विना तत्प्राप्ती नाऽन्या गतिः सर्वेषामपीति तदनुग्रहः सर्वथैव मृग्यः सर्वैर- पीति स्थितमेतत् । ननु य एवं देवानामपि दुराराध्योऽन्येपाञ्च महाविदुषामपि महताम् । महानसावीशः । स कथमस्मदादीनामकिश्चनानां किम्पचानानामा- राध्यो भवेदिति । तत्राऽऽह-तस्मिन्नपो मातरिवा दधातीति । सत्यं महा- नसावीशः। तस्याऽसदादिमिः किमाराधनं सम्भवति । "किमासनं ते गरुडा- सनाय किम्मूषणं कौस्तुममूपणाय । लक्ष्मीकलत्राय किमस्ति देयं वागीश किं ३२ ईशावास्योपनिषद् । ते वचनीयमस्ती"ति वाफ्यात् । स च सर्वनिरपेक्षो धनादिना भजतोऽपि जनानुपेक्षते । तदुपेक्षाकार एव किमासनमिति वाक्येन दर्शितः । आत्माराम- खादाप्तकामत्वाच्च । तदुक्तम्-"भजतोऽपि न वै केचिद्गजन्त्यमजतः कुतः। आत्मारामा छाप्तकामा" इति । अन्यच्च-"अथाऽनयाऽपि न भवत इज्ययो. रुमारभरया समुचितमर्थमुपलभामह" इति । "न भजति कुमनीषिणां स इज्यामि"त्यादि च । तेन देवादीनामपि पूजामुपेक्षते । न गृह्णाति । किन्तु स्वकीयानामनुगृहीतानां भक्तानां तुच्छातितुच्छमपि प्रेमोपायनमनुगृहाति खीकरोत्यपेक्षते प्रशंसति बहु मन्यते परितुप्यति च । तत्प्रसिद्धं सुदानश्य- रित्रे-"नन्वेतदुपनीतं मे परमप्रीणनं सखे । तर्पयन्त्यङ्ग मा विश्वमेते पृथु. कतण्डुला" इत्यादौ । "अण्वप्युपाहृतं भक्कैः प्रेम्णा भूर्येव मे भवेत् । भूर्य- प्यभक्तोपहृतं न मे तोपाय कल्पत" इति "पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन" इति च तदेव दर्शितम् । अनामीत्युक्त्या तनुभुक्षाऽप्यस्योक्ता भवति । सा चाऽनुग्रहविलास एव । न स्वतः। "अविजिपित्सोऽपिपास" इति श्रुतेः । एवमभिप्रायेणाऽऽह-तस्मि- नपो मातरिश्वा दधाति । तस्मिन् । स्वबलेन सर्वथैवाऽप्राप्ये दुराराध्ये सर्व- थैव सर्वत्र निरपेक्षे श्रीपतौ निस्समाभ्यधिकपरमैश्वर्य्यपरिपूर्णे आत्मारामे आप्त- कामे देवाराधनमप्युपेक्ष्य स्थितेऽन्येपामपि विद्यातपोयोगधनैश्वर्यादिमतामपि पूजनमप्रतिपद्यमाने सर्वेपामप्युपायानां वशीकरणार्थानामगोचरे स्वतः निरङ्कुशे निर्गुणे स्वानन्दतुन्दिले तुच्छीभूततदन्यैश्चर्ये ब्रह्मादिदुरापलीले निरस्ताराध- नावसरेऽपि सौशील्यवात्सल्यादिगुणगणागारे प्रेमपरतन्नेऽनुग्रहैकशीले भक्तवश्ये दीनानुमहज्यमे कृपापीयूपवर्षाप्रावृषेण्यापूर्वपयोदे सदयसहृदयसमुदयसंशाप- नीयमहनीयदयाविवशाशये भक्तगृहमोजनमपेक्षमाणे तदर्थ सुधातुरे येन फेनाऽपि भक्तोपहतेन प्रेममयेन वस्तुना परमपरितोपशीले भगवति । अपः । तुच्छातितुच्छपत्रपुष्पफलोपहारापेक्षयाऽपि तुच्छतरोपायनमिदमित्यतिदैन्यप्र- दर्शनार्थमप इति । अण्वप्युपाहृतमित्युपक्रम्य नाऽणुत्वं परिमाणत एव विव. क्षितं किन्तु पदार्थानां तुच्छतयाऽपीत्यभिप्रायेण पत्रं पुष्पमित्युक्तौ सर्वाभावे तोयस्य दुर्विधतमेनाऽप्युपहर्तुं शक्यतया सुलभत्वेन च सर्वान्त उपादानात् । .
थालभाप्यविभूपित्ता। १३ मातरिश्वा वायुः । मातरि जनन्यां कश्यपपल्या दिती वर्धत इति मातरिया। स च दित्या व्रतपूर्वकं भगवदर्चनेन भगवत्प्रसादालयः । मगरतेव च कृपया गर्भे रक्षितः । तदुक्तम्--"न ममार दितेर्ग: श्रीनिवासानुकम्पया । बहुधा कुलिशक्षुण्णो द्रौप्यस्त्रेण यथा भवानि ति । तेनाऽनुगृहीतः । भगवद्भक्तः । भक्तवत्सले भगवति निरतिशयानुरागः । तत्सेवानिष्ठः । तदिदं श्रीमद्भागवत्ते पष्ठस्याऽष्टादशे स्फुटम् । ब्रह्मविदामग्रगण्यश्च वायुः । पुराणवक्तृत्वात् । “नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्माऽसीति "ब्रह्मविद् अझैव मवती"ति च श्रुतिः । ब्रह्मवित्समनियता च भक्तिः। अतः परमभक्तिमान् वायुः । दधाति । निर. न्तरमिति भावः । वर्चमानप्रयोगात् । न तु निधाय गच्छति । तथाच प्रेम- विवशस्तत्सेवार्थ जलं दधानस्तत्परस्तिष्ठत्ययसरं तकृपाकटाक्षञ्च प्रतीक्षमाणः दधाति । न तु ददाति । सत्ययुद्धेरपोदितत्वात् । स्वामित्वस्याऽऽविद्यफस्स 'निरस्तल्वात् । स्वस्वामिसम्बन्धालिनितं हि दानम् । तादृशस सम्बन्धस्यैवा- भावे कथं दानम् । केवलं सेवकत्वमयतिष्ठते प्रेमवैवश्यविशिष्टम् । तस्मि- नपः खानपानादिना तदाधेया अपः । आपच प्रेममयमुपायनम् । रसात्मक- त्वात्प्रेरणा चौपाहतल्यात् । प्रेमवता हि सरसवोत्कृष्टम्च प्राणाप्यायकच मधु- रञ्च तापहारकच वस्तु निवेदनीयम् । तत्राऽन्येपां सरसत्वविधायिनीनां रसा- मिकानामपां सरसत्वमनिर्वचनीयम् । सर्वेपूपहारेषु प्रथमत्वात्सर्वेषामुपहरणी- यानामग्मूलत्वाचोत्कृष्टतमत्वम् । "अप एवं ससर्जाऽऽदावि"ति वाक्यात् । प्राणाप्यायिकाश्च ताः । “आपो यै प्राणाः" इति "आपोमयः प्राणः" इति श्रुतिभ्याम् । मधुरास्तापहारिकाश्य । प्रत्यक्षात् । "छेदनं पिण्डनं तृप्तिः प्राण- नाप्यायनोन्दनम् । तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमा" इति वाक्याच । मातय॑न्तरिक्ष श्धयति सच्चरति स्वामित्वादित्यतथाऽपि मातरिश्वा । तथाच वायुपुराणम्-शव्दाकाशवलानाञ्च वायुरीशस्वथा कृत" इति । तेन पयो- घरग्रहनक्षत्रतारकादीनां तदधीनत्वमुक्तम्भवति । उक्तश्च-"व्यमुम्मन् वायु- भिर्नुन्ना मूतेभ्योऽथाऽमृतं धना" इति । तथा सति वर्पासरित्सरःप्रस्रवणादि- रूपा लीलोपयोगिनीः सेवार्था अपो मातरिश्चैव तस्मिन् प्रेष्ठे दधाति । तथा चोक्तम् - "ततः प्रावत प्रावृट् सर्वसत्त्वसमुद्वा । विद्योतमानपरिधिर्विस्पू- ५ईशा.
ईशावास्योपनिपद् । । . र्जितनभस्तला" इत्यादिना प्रावृपं वर्णयित्वा "एवं वनं तद्वर्षिष्ठं पक्कखजूर- जम्बुमत् । गोगोपालैर्वृतो रन्तुं सबलः प्राविशद्धरिः । धेनवो मन्दगामिन्य ऊधोमारेण भूयसा । ययुमंगवताऽऽहूता द्रुतं प्रीत्या नुतस्वनीः। वनौकसः प्रमुदिता वनराजीमधुच्युतः। जलधारा गिरेरासन्नासन्ना ददृशे गुहाः । कचि- द्वनस्पतिकोडे गुहायां चाऽभिवति । निर्विश्य भगवान् रेमे कन्दमूलफला- शनः । दध्योदनं समानीतं शिलायां सलिलान्तिके । सम्भोजनीयैर्वभुजे गोपैः सङ्कर्षणान्वितः । शाहलोपरि संविश्य चर्वतो मीलितेक्षणान् । तृप्तान् धूपान् वत्सतरान् गाश्च वोधोभरश्रमाः । प्रावृश्रियश्च तां वीक्ष्य सर्वभूतमुदाव- हाम् । भगवान् पूजयाञ्चक आत्मशक्त्युपहितामिति । "वीक्ष्याऽऽतपे प्रज- पशून सह रामगोपैः सञ्चारयन्तमनु वेणुमुदीरयन्तम् । प्रेमप्रवृद्धमुदितः कुसु- मावलीभिः सख्युर्व्यधात्ववपुपाऽम्बुद आतपत्रमिति । "तन्म घोपालिमृग- द्विजाकुलं महन्मन प्रख्यपयस्सरस्वता । वातेन जुष्टं शतपत्रसन्धिना निरीक्ष्य रन्तुं भगवान् मनो दध"इति । “सरित्सरःप्रस्रवणोमिवायुना कल्हारकञ्जोत्प- लरेणुहारिणा। न वर्तते यत्र बनौकसां दयो निदाघवयर्कभवोऽतिशाद्वल" इति । "दृष्टं वनं कुसुमितं राकेशकररञ्जितम् । यमुनानिललीलैजचरुपल्लव- शोभितमिति । "ताः समादाय कालिन्द्या निर्विश्य पुलिनं विभुः । विकस- कुन्दमन्दारसुरभ्यनिलपट्पदम् । शरचन्द्रांशुसन्दोहध्वस्तदोपातमः शिवम् । कृष्णाया हस्ततरलाचितकोमलयालुकम् । तदर्शनाहादविधूत(जो मनोर- थान्तं श्रुतयो यथा ययुः । स्वैरुत्तरीयैः कुचकुङ्कुमाकितैरचीकृपन्नासनमात्मब- धव" इति । “ताभिर्युतः श्रममपोहितुमनसगष्टसजः सकुचकुङ्कुमरञ्जि- तायाः । गन्धर्वपालिभिरनुद्रुत आविशद्वाः श्रान्तो गजीभिरिभराडिव भिन्न- सेतुः । सोऽम्भस्यलं युवतिभिः परिपिच्यमानः प्रेग्णेक्षितः प्रहसतीभिरितस्त- तोऽङ्ग । वैमानिकैः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानो रेमे स्वयं स्वरतिरत्र गजेन्द्रलीलः। ततश्च कृष्णोपवने जलस्थल्पसूनगन्धानिलजुष्टदिक्तटे । चचार भृङ्गप्रमदा- गणावृतो यथा मदच्युद् द्विरदः करेणुभिरि"ति च । तथाच मातरिश्वना तस्मिन्नब्धारणं यत्तदेवाप्रकारकं सेवोपयोगि लीलोपयोगि च विवक्षितमिति ज्ञेयम् । अप्पदश्च सर्वतत्सम्बन्धिवस्तूपलक्षणम् । तेन पकखजूरजम्बुकन्दमूल- बालभाष्यविभूपिता। ३५ तदेजति तन्नेजति तहरे तद्वदन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तत्सर्वस्याऽस्य बाह्यतः ॥५॥ पत्रपुष्पफलमधुधारावनराजितरुपल्लवपट्पदादीनाञ्च गोगोपादीनां प्रमोदस्य च प्राश्रियश्चाऽन्यस्यास्तत्प्रयुक्तलीलायाश्चाऽयनतिरिक्तत्वमेवेति । किञ्च । न खदिरेव चर्णितविस्तराभिः केवलानिर्भगवन्तमारानोति किन्तात्मना स्वरूपे- णाऽपीति मातरित्युक्तम् । वायुरपि तावदाप इव सेवोपयोगी लीलोपयोगी चेति । तदुक्तम्--ववी वायुः सुखस्पर्शः पुण्यगन्धवहः शुचिरिति । "महन्मनामख्यपयस्सरस्वता । वातेन जुष्टं शतपत्रगन्धिने"ति । ततश्च कृष्णोपवने जलस्थलपासूनगन्धानिलजुष्टदिकटे । चचारे"ति च । तदेवमनु- गृहीतानामेव भगवत्पातिर्नाऽननुगृहीतानामित्युक्तम् ॥ ४ ॥ इदानीगनुगृहीतकफलात्मकं भगवत्स्वरूपमाश्चर्यरसैकनिधानमित्याह- तदेजतीत्यादिना । तत्रेशाऽऽवास्यमिदं सर्वमिति कार्यद्वारैव कारणस्य परब्रमणो ज्ञानमनुगृहीतस्य पूर्व ततो माहात्म्यज्ञानपूर्विकया भक्त्या तत्सेवादिना तत्सा. क्षात्कारस्तल्लाभति सिद्धान्ताय कार्य जगदुपक्रान्तम् । तद्धि "अथैतद्विश्व- रखिलं नानारूपं निरीक्ष्यते । अतीव चित्रमेतस्य कारणं परिचिन्त्यतामिति रीत्या कारणजिज्ञासोदयद्वारा परब्रह्मज्ञापकं तदुपलम्मकञ्च । तदिदश्चेशाऽऽवा- स्यमित्यादिना दर्शितम् । तदेजतीत्यादिना मघेणाऽपि परं ब्रौव कारणं जग- पुरस्कारेणैव च ज्ञापयन्ती युक्त्यगोचरसर्वविरुद्धधर्माश्रयत्वेनाऽऽश्चर्य्यरसामि- निवेशाय तसेवातद्गुणगानादिप्रसक्तये च वर्णयति । द्वितीयस्य पष्ठे "नाऽऽहं न यूयं यहतां गतिं विदुर्न वामदेवः किमुताऽपरे सुराः । यन्मायया मोहितयु- यस्त्विदं विनिर्मितं चाऽऽत्मसमं विचक्ष्महे" इत्यत्र श्रीसुबोधिन्यां "सर्वगुण- प्रसिद्धिरूपत्याजगत" इति सिद्धान्तस्य स्थापनात् । “अथाऽतो ब्रह्मजिज्ञासे”. त्युपक्रम्य-"जन्माद्यस यतः शास्त्रयोनित्वादिति ब्रह्मसूनाच । नशात्मकत्व ब्रह्मक्रीडात्मकत्याच जगतः स्थितम् । तदनन्यत्वलीलाकैवल्य सूत्राभ्याम् । एवं सति जगति यदेजद्वस्तु तद्रसवैजति । यच नजति बझैव नैजति । सर्व- मिदं भगवत्कीडैवेत्यर्थः । तहरे । अहटमश्रुतच्च यत्तदपि सन् अझैव । सदाद- न्तिक । पचान्तिके दृष्टं श्रुतश्चेत्यर्थः । तदपि तद्वत् । ब्रसवेत्यर्थः । तेन नित्य. - ईशावास्योपनिपद् । युक्तमेवेति वा । ननु तथा सति सर्वस्य ब्रह्मरूपता कुतो नाऽनुभूयते कुतश्च जडाद्यात्मकताऽनुभूयते । तत्राऽऽह-वदन्तरस्य सर्वस्येति । अन्तर्धाय स्थित- त्वान्नाऽनुभूयते ब्रह्मात्मकता । जडात्मकता चाऽनुभूयत इत्यर्थः । का विनिग- मनेत्यत्राऽऽह-तत्सर्वस्याऽस्य वाह्यत इति । सच्चिदानन्दानां समन्वयस्था. अनुभूयमानत्वात्सर्वमिदं ब्रह्मैवेति विनिगम्यत इति भावः। तथाच सर्वभवन- सामर्थ्यात्सर्वविरुद्धधर्माश्रयत्वेनाऽचिन्त्यानन्तमहामहिमकमाश्चर्यरसैकनिधान- मतुल्यातिशयं प्रसह्य चिकाकर्षकं स्वसेवागुणगानादिपु निरोधकमितररागवि- स्मारक बाह्याभ्यन्तरयोरभितश्च स्वस्फूर्तिसम्पादनेन सर्वात्मभावोदयद्वारा मुख्य- शरणागतिप्रदानद्वारा चाऽकुतोमययापकमद्भुतकर्मत्वेनाऽसाधनं साधनं करोति तादृशं फलानुभवेऽपि विपश्चिता ब्रह्मणेति पदाभ्यामप्रधाने तृतीयया भक्तस्वा- तड्यभक्तेच्छावशगत्वाभ्याञ्चैजन्नैजति नैजचजतीत्यादिरूपेणाऽऽश्चर्यरसैकनि- धानमेवेति साधनफलदशयोरुभयोरपि परमानुकूलं तमेव सर्वथा भजनीय तदीयैः सुलमानुग्रहमित्युक्तम् । यद्वा । एवं भगवत्स्वरूपादिवर्णनेन भगवति प्रेममरमुद्रेच्य भूयःश्रवणे शिंप्यस्योत्कण्ठा जनिता । उत्कण्ठितस्य हि रसवि- शेषानुभवो नाऽनुत्कष्ठितस्य । विद्यमानतायामपि नोत्कण्ठितस्य दोपस्फूर्तिर- नुत्कण्ठितस्य त्वविद्यमानोऽपि दोषः स्फुरति । तेनैव तस्स रसविशेषानुभव उत्कृप्यतेऽन्यस्य च नैव भवतीति । अथाऽनवगाहमाहात्म्यस्य भगवतो- ऽचिन्त्यो महिमा वाङ्मनसागोचरो नेदमित्थतया विशिप्य वर्णयितुं शक्य इत्य- भिप्रायेण सर्वविरुद्धधर्माश्रयत्वमुद्देशमात्रेण निरूपयन्ती तादृशे जीवैः प्रहीमावो वा शरणागतिर्वा दैन्येन परिचर्या वा कर्तव्या नाऽन्यत्कर्तुं शक्यमित्याद्या- शयवती पूर्वमनोक्तदौर्लभ्यसौलभ्ययोरेवमेवत्वाय लाभेऽपि सति परमदौर्ल- भ्यस्फूर्त्या अलभ्यलाभत्वेन परमो हर्षातिरेकः स्यान्न दैन्यहानिरित्यलाभेऽपि सौलभ्यस्फूर्त्या समुत्साहातिरेको भजनार्थिनो भवेन्नाऽवसाद इति विशेषज्य- अनाय च विरुद्धधर्माणां योगपद्यमाह -तदेजतीत्यादिना । यत्तावज्जगत्का- रणतया जिज्ञास्यत्वेनेशतया सेव्यत्वेन चोपक्रान्तं तत्परं ब्रह्म एजति कम्पते चलति चेटते सर्वमेव करोतीत्यर्थः । तन्नैजति । यत्सर्वं करोति तदेव नजति न कम्पते न चलति न चेटते न किञ्चित्करोति किन्तु कूटस्थमेवेत्यर्थः ।
बालभाष्यविभूपिता। वर्तमानप्रयोगाभ्यान्तत्पदावृत्त्या च यौगपद्येनैकाधिकरणवृत्तित्वमुभयोर्विरुद्धयोः क्रिययोर्विवक्षितम् । तद्रे । तदेव दुरे वर्तते न सन्निकृष्यते । तद्वदन्तिके । तदेव समीपे वर्तते न विप्रकृप्यते । तद्वत् । सन्निकर्पविकर्पयोर्युगपदेवैका- धिकरणवृत्तित्वमित्यर्थः । तदन्तरस्य सर्वस्य । तदेवाऽस्य सर्वस्य जगतोऽन्त- रेव वर्त्तते नाऽन्यतः । तत्सर्वस्याऽस्य वाह्यतः । तदेवाऽस्य सर्वस्य जगतो बावत एव वर्तते नान्तः। तद्वदित्यनुपञ्जनीयम् । किन्तात्पर्य्यम् । अनव- गाद्यमाहात्म्यत्वादि । विचित्रोऽस्य शक्तियोगोऽतिशेते सर्वान् । ननु विरुद्ध- धर्माश्रयत्वं कथमुपपद्यते । प्रमाणात् । श्रुतिर्हि भगवती नः परमं प्रमाणम् । प्रमाणान्तरानधिगते हि परब्रह्माणि श्रुत्येकशरणत्वात् । शब्दबलविचारको हि भगवानाचार्यों वेदव्यासः । तत एवाऽसूत्रयत्-"श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वा- दिति । "उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवदिति च । वस्तुसामर्थ्याच । तथा च श्रुत्यन्तरम्-"अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । आसीनो दूरं प्रजति शयानो याति सर्वत" इति । "पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया चेति च । स्वाभाविकी । न साधनसव्य- पेक्षा । तेन साधनसन्यपेक्षतायाः सर्वत्र प्रतिषेधः स्वाभाविकतायाश्च विधान- मिति नाऽनुपपत्तिः काचित् । तथाच सूत्रम्-"प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिपेधति ततो ब्रवीति च भूय"इति । तथाच भाप्यम्-"प्रतीतश्च प्रतिषेध्यम् । नाऽप्रतीतम् । न श्रुतिप्रतीतमिति । आविर्भावतिरोभावाभ्याञ्च । न च योग- पधहानिः। अभावानां तिरोभायातिरिक्तत्वेनाऽनगीकारात् । प्रतियोगिमेदे- नाऽपि परस्परविरुद्धदयामारकत्वयोर्युगपदेकाधिकरणवृत्तित्वस्य राजादिहृदये प्रत्यक्षाच्च । पुरुपोत्तमत्वेन क्षराक्षरातीतत्वाच । “यसाक्षरमतीतोऽहमक्षरा- दपि चोचमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तम" इंति याक्यात् । क्षरमेजति । क्षरणात् । तदतीतत्वात्पुरुषोत्तमो नैजति । अक्षरं नैनति । कूट- स्थत्वात् । तत उचमत्वाद्भक्तवात्सल्यादिगुणगणागारत्वेन पुरुषोत्तम एजति । क्षरमन्तिके । क्षरस्थत्वादस्माकम् । क्षरातीतत्वात्पुरुषोतमो दूरे | अक्षरं दूरे । क्षरातिरिक्तत्वात् । अक्षरादुत्तमत्वात्कृपादिना पुरुषोत्तमो भक्तानामन्तिके । क्षरमबाह्यम् । व्यवहारगोचरत्वात् । तदतीतः पुरुषोतमः सर्वस्य क्षरस्य बा- ३८ ईशावास्योपनिषद् । . पतः । अक्षरं बाह्यम् । व्यवहाराविषयत्वात् । तदतीतत्वात्पुरुषोत्तमः क्रीडार्थ चनिजजनजीवातवेच विनाशाय च दुप्कृतामस सरस्य क्षरस्याऽन्तरेव । माति- खिकाः क्षराक्षरधर्माः पुरुषोत्तमे न सन्ति । पुरुषोत्तमत्वात् । तथा सति खतन्त्रा अपि पुरुषोत्तमधर्मा युगपदेकाधिकरणवृत्त्योऽविरुद्धा अपि च क्षराक्षरयोः सहानवस्थायिनो विरुद्धा एव । तेषां पुरुषोत्तमे सहावस्थानमतिपादनमनन्य- भावोदयार्थं तेन तद्भजनार्थश्च । तदिदं विस्पष्टयन्नुपरिष्टादाचष्टे-“यो मामे- चमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारते"ति । असम्मूढः विरुद्धानां धर्माणां सहावस्थानमुपपन्नमावश्यकञ्च मन्वानः । सर्व- वित् । क्षराक्षरपुरुषोत्तमविवेकद्वारा भजनीयतमपदार्थनिर्धारणात् । सर्वभा- वेन विषयान्तरातिमसतिरहितेनाऽनन्येन परिपूर्णेन प्रेरणा । अनुगृहीतञ्चैत- च्छीमत्कृष्णाश्रयस्तोत्रे श्रीमदाचार्यचरणैः--"प्राकृताः सकला देवा गणिता- नन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरितस्मात्कृष्ण एव गतिर्ममे"ति । किश्च । पुरुषो- चमः क्षराक्षरयोः कारणम् । कारणे चाऽन्योन्यविरुद्धसनभवनसामर्थ्य मिति विरुद्धसर्वधर्माश्रयता तत्र जोपमेवाऽङ्गीकरणीया । न विप्रतिपचिगोचरः । सत्कार्यवादाभ्युपगमात् । दारुणो हि हस्त्यश्वगवादयः परस्परविरुद्धधर्मवन्तः कारुभिरुद्भाव्यन्ते । ते सर्वेऽप्यन्योन्यविरुद्धा धर्माः पूर्वमेव दारुणि स्थिताः कारकन्यापारेणाऽभिव्यज्यन्ते । कार्यगतेभ्यश्च तेभ्यस्ते कारणे सामानाधिक- रण्येन स्थिता व्यतिरिच्यन्ते । तस्मात्कारणस्य कार्येभ्य उत्तमत्वं सर्वविरुद्ध- धर्माश्रयत्वञ्च स्थितम् । नन्वेवमनुमेयतापत्तिः । विशेपासिद्धिश्च । नेष दोपः । श्रुतार्थस्य बुद्धावारोहाय दृष्टान्तो नाऽनुमानार्थः । श्रुतिमात्रप्रमाणकत्वात् । श्रुत्येकशरणस्य तस्याऽदुष्टत्वाच्च । कारणगतधर्माणामेव दार्वादिषु दर्शनान्न विशेपासिद्धिः। प्रत्यक्षविरोधादेव माहात्यम् । प्रत्यक्षाविरोधदृष्टान्तस्तु सर्वा- तिशायित्वादेव नास्ति । सर्वातिशायित्वस्यैव निरस्तसाम्यातिशयत्वरूपस्य प्रति- पादनाय सविरुद्धधर्माश्रयं तं वर्णयन्ति श्रुतिप्रमुखानि शास्त्राणि । तेन मन्दा- नुग्रहाय यथाकथविद्युद्धिसोकामेव दृष्टान्तो विरुद्धधर्माश्रयत्वन्तूमयन्यप- देशादेव । युक्तिविरोधम्तु वस्तुतो भूषणं न दूषणम् । सति दृष्टान्ते सर्वाति- शायित्वायोगात् । सर्वोदारप्रयत्नात्मनि भगवति सर्मनिरुद्धधर्माश्रयताया आव. .
वालमाप्यविभूषिता। ३९ श्यकत्याच । तत एव--- "मल्लानामशनिणां नखरः खीणां ससे मूर्तिमान गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः । मृत्युभोजपतेर्वि- रादविदुपा तत्त्वं परं योगिनां वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रङ्गं गतः साग- जः इति गोप्यः कामायाकंसो द्वैपाच्चैद्यादयो नृपाः । सम्बन्धाद्वष्णयः स्नेहाय्यं भक्त्या वयं विभो" इति "निभृतमरुन्मनोक्षदृढयोगयुजो हदि यन्सु- नय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात् । स्त्रिय उरगेन्द्रभोगमुजदण्डविपक्त- धियो वयमपि ते समाः समदृशोऽधिसरोजसुधा" इति च वचनानि । श्रीम- दाचार्यचरणाश्चैतनिष्कर्षमूचुः--"नमो भगवते तरी कृष्णायाऽद्भुतकर्मणे । रूपनामविभेदेन जगत्क्रीडति यो यत" इति । तस्मात्सर्वविरुद्धधर्माश्रयत्वे ब्रह्मणो नाऽभ्यसूयितव्यमनुगृहीतेन । ब्रह्मतावच्छेदफत्यादिति । तव एव श्रीम- द्भगवद्गीतामु नवमे~~-'इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञान विज्ञान सहितं यज्शात्या मोक्ष्यसेऽशुभादि"ति गुणेषु दोपाविष्करणलक्षणासूयोदया- सम्भवपुरस्सरसमुत्कर्पदर्शनप्रहर्षप्रशंसाप्रसक्तिपरस्पृहयाळत्वलक्षणगुणशीलत्व- मनस्युत्यमधिकारिविशेषणं प्रथममुक्त्वा प्रवक्ष्यमाणस्य गुह्यतमस्य विज्ञानस- हितस्य ज्ञानस "राजविद्या राजगुयं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगर्म धणे सुमुखं फर्तमव्ययमि"ति प्रशंसातिशयमुखेन सर्वथोपादेयतमतां प्रतिपाद्य "मश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्याऽस्य परन्तप । अशप्य मां निवर्चन्ते मृत्युसंसार- वर्मनीति स्वाऽश्रद्धाया बलवदनिष्टानुवन्धित्वप्रतिपादनेन दुश्शास्त्रदुस्स- प्रादिनाऽनुपपत्त्यादिदूषणोद्धावनप्रमादपरिवर्जनस्याऽऽवश्यकत्वं शिक्षयित्वा "मया ततमिदं सर्वं जगदव्यतमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाऽहं तेव- वस्थितः । न च मत्स्यानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरमि"त्यारभ्य मध्ये च "तपाम्यहमहं वर्ष निगृह्माम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसचाऽह- मर्जुने"त्यभिधाय "मन्मना भव मदतो मद्याजी मां नमस्कुरु | मागेवैप्यसि युस्त्वैवमात्मानं मत्परायण" इत्याध्यायान्तमुक्तए । तेन भगवतो विरुद्धसर्व- धर्माश्रयत्वे भगवदीयानां परमरसास्वाद एव न विचिकित्सोदय इति । किश्च । अथैवमुत्कण्ठायां "येन येनाऽवतारेण भगवान् हरिरीश्वरः । करोति कर्णर- म्याणि मनोज्ञानि च नः मगो । यच्छृण्वतोऽपैल्परतिर्वितृष्णा सत्यञ्च शुर- ईशावास्योपनिषद् । त्यचिरेण पुंसः । भक्तिहरौ तत्पुरुषे च सख्यं तदेव हारं वद मन्यसे चेत् । अथाऽन्यदपि कृष्णस्य तोकाचरितमद्भुतम् । मानुष लोकमासाद्य तजातिमनु- रूधत" इत्युक्तानुसारेणाऽभिवर्द्धमानायामाह-तदेजतीत्यादि । तत्र तदेजति तनैजतीति श्रीशुकैः-"कदाचिदौत्थानिककौतुकाप्लवे जन्मक्षयोगे समवेत- योपिताम् । वादित्रगीतद्विजमनपाचकैश्चकार सूनोरभिषचनं सती । नन्दस्य पत्नी कृतमज्जनादिकं विप्रैः कृतस्वस्त्ययनं सुपूजितैः । अन्नाद्यवासःलगभीष्ट- धेनुभिः सञ्जातनिद्राक्षमशीशयच्छनैरि"त्यादिना शकटभङ्गतृणावर्चमोक्षविश्व- दर्शनाख्यैत्रिभिश्चरित्रैवर्णित सम्पूर्णाध्यायेन । तत्रौत्थानिकं चरणोत्क्षेपानो विवादि चैजनम् । सञ्जातनिद्राक्षस्य शयनमनेजनम् । प्रत्येकमतिचित्रम् । क तावत् तादृशोऽतिबालभावस्सौकुमा-तिशय औत्थानिककौतुकं तावतो- ऽभिषेचनादिश्रमस्याऽप्यसहिष्णुता चेति । क च तावत् तादृशस्याऽतिवालस्य सुकुमारतमस्य प्रवालमृद्धिस्पर्शमात्रेण शकटस्य विवर्तनञ्च मनश्चेति । तदु- क्तम्-"अधःशयानस्य शिशोरनोऽल्पकप्रवालमृद्वद्विहतं व्यवर्चत । विध्व- स्तनानारसकुप्यभाजनं व्यत्यस्तचक्राक्षविभिन्नकूबरमि"ति । अहो नु खलु भोः! बजे विसयरससागरसमुत्सेकः शिशोः सौकुमा-तिशयैकसदनस्य सर्वथैव स्वभावेनाऽशक्यसमन्ययं तादृशमद्भुतं कर्म प्रत्युत चाललीलाविलासरसविलसि- तोत्सवसमुद्रेकश्च । न तदपकपः किश्चिदपीति । एजनानेजनयोरुभयोरपि बाल- लीलारससरसत्वात् । “एकदाऽऽरोहमारूढं लालयन्ती सुतं सती । गरिमाणं शिशोर्वोढुं न सेहे गिरिकूटवदि"त्यादिरूपमनेजनम् । “गले गृहीत उत्स्रष्टुं नाऽशक्नोद तार्भकम् । गलग्रहणनिश्चेष्टो दैत्यो निर्गतलोचनः । अव्यक्तरायो न्यपतत्सहबालो व्यसुर्बजे । तमन्तरिक्षात्पतितं शिलायामि" त्यादिना वर्णितस्व- रूपश्चैजनम् । “एकदाऽभकमादाय स्वाकमारोप्य भामिनी । प्रसुतं पाययामास स्तनं स्नेहपरिप्लुते"त्यनेजनम् । “पीतप्रायस्य जननी सा तस्य रुचिरस्मितम् । मुखं लायती राजदृम्भतो ददृशे इदम् । खं रोदसीज्योतिरनीकमाशाः सूर्येन्दु- वहिश्वसनाम्बुधींश्च । द्वीपान्नगांस्तदुहितृवनानि मूतानि यानि स्थिरजङ्गमानि । सा वीक्ष्य विश्वं सहसा राजन् सातवेपथुः । सम्मील्य मृगशावाक्षी नेत्रे आसीत्सुविसितेति निरूपितञ्चैजनम् । भक्तिरेव साधनम् । भगवानेव फलम् । .
पालमाध्यविभूपिचा। तन्मूलं भगवद्वरणमेव । तनिरूपफमेवाऽखिलं वेदादिशास्त्रम् । भन्सिविधानार्थ- मेव भगवतः प्रपञ्चे क्रीडनं शक्तिभिर्दुभिाव्याभिः । परमात्मत्याच भगवतः स्वरूपं निरन्तरनिरुपधिस्नेहर्द्धिसमुदयैकस्वभावमेव तदेकविषयश्च । "प्रतिनियते- न्द्रियवद्भक्तिरित्येया च सिद्धान्तस्थितिः । तेन सर्च चतुरस्रम् । नाऽनुपपत्तिः काचित् । अपि च । श्रीमन्मातृचरणाश्चलितुं शिक्षयन्त्यः श्रीवालकृष्णमुपवि. एमुत्थाप्य उत्थितमेव क्षणमेकमवलम्व्य पतनाभावार्थ सिरीकृत्य हस्तावपसा- स्यन्ति। तदा भगवानस्थिरचरणारविन्दः पतन्निव वेपते । तस्यैजनम् । अति- मनोहरञ्च मधुरतमञ्च । कांश्चित्क्षणाने सातुकामोऽपि पेपित्वा पतन्निव भूमावुपविशति । तत्तस्याऽनेजनं परिसंपत्सितसुधारसनप्यमानमुखारविन्द विलोकयतामुच्छलमहर्षवर्ष हृदयं तादशनिजलीलाविलासतन्मयं विदधानम् । कदाचिसंयमस्थितानां श्रीमन्माचरणानामनेषु निममुकाम इव पुरःप्रहितै. रझरल्यापाग्या करारविन्दाभ्यामतिमनोहराभ्यां मणिकणादिना विभूपि- ताभ्यां पटीपटलीमवलम्ध्य स्थिरीभवति विहसन्तीप गोपिकासु विहसंस्तच तस्याऽनेजनश्चैजनश्च । "यनिनादर्शनीयकुमारलीलावन्तबजे तदवलाः प्रगृही- तपुच्छैः । वत्सेरितस्तत उभावनुकृप्यमाणो प्रेक्षन्त्य उज्झितगृहा जहपुर्हसन्त्य" इति वर्णिता कुमारलीला दामोदरलीलाऽपि चैजनानेजनव्याख्यानरूपा । तमिमं श्रीमन्नन्दालये विजृम्भमाणमुत्सवमनुभ्यैव प्रहृष्टा विचित्ररसाविष्टा च क भग- वानिगमागमगोष्ठीगीयमानगौरवो ब्रहादिदुरापचरणारविन्दरेणुरचिन्त्यपरमै- श्वर्यः क पा लीलाविलासविराजिता वरणविपयविषयकवात्सल्यविलसिता च मतियोगविधानद्वारा स्वानन्ददानानुकूला स्थितिरिति स्वसौभाग्यवैभवभर , लापमाना गायति-तदेजति तनेजतीति । तदुक्तम्---"ग्या चोपनिप- निश्च साइययोगैश्य सात्वतः । उपगीयमानमाहात्म्यं हरि साऽमन्यताऽऽत्मज- मिति । किम्बहुना । तरे तद्वदन्तिके । संयोगविप्रयोगात्मको हि भक्ति- रसः। तत्पानपदानसिद्धये च संयोगेऽपि रसप्रकर्याद विप्रयोगस्य विषयो- गेऽपि च रसमकत्संयोगस्याऽनुभवसिद्धये चेत्यर्थः । भक्तियोगानुमावेन भक्तानां दूरश्रवणदर्शनसिद्धिपदत्वाच दूरस्थस्याऽन्तिकवर्तित्वमुपजायते । मथु- ४२ ईशावास्योपनिषद् । रागमनलीलया दूरस्थितत्वेऽपि "मा खिया महाभागा द्रक्ष्यथः कृष्णमन्तिके। अन्तर्रादि स भूतानामास्ते ज्योतिरिवैषसी"ति-मवतीनां वियोगो मे नहि सर्वात्मना कचित् । यथा भूतानि भूतेषु खं वाय्वमिर्जलं मही । तथाऽहं च मनःप्राणभूतेन्द्रियगुणाश्रय" इति तस्याऽन्तिके स्थितत्वं वर्णितम् । तद्वत् । यथा दूरस्थितेरनुभावा अदर्शनाश्रुप्रलापादयोऽनुभूयन्ते तद्वदन्तिक- . स्थितेरपि प्रत्यक्षदर्शनसम्मापणाश्लेपादयोऽनुमावास्तदा तदाऽऽविर्मावादनुभू- यन्त एवेत्यर्थः । द्वारकालीलायाश्चाऽन्तिक एव स्थितेऽपि भगवति प्रेमाति- प्रसङ्गेन हृतधियां श्रीमतीनां महिपीणां दूरस्थितत्वमपि भातं युगपदेव । तथा हि-"विजहार विगाह्याऽम्मो इदिनीपु महोदयः । कुचकुङ्कुमलिप्तानः परि- रब्धश्च योषिताम्" इत्यादि-"ताः किनवस्त्रविवृतोरुकुचप्रदेशाः सिञ्चन्त्य उद्धृतवृहत्कवरप्रसूनाः । कान्तं स्म रेचकजिहीरपयोपगुह्य जातस्मरोत्सवलस- द्वदना विरेजुरि"त्याद्युपक्रम्य "कृष्णस्यैवं विहरतो गत्यालापेक्षितसितैः । नर्म- हवेलिपरिप्वरैः स्त्रीणां किल हृता धियः । ऊचुर्मुकुन्दैकधियो गिर उन्मत्त्वज- डम् । चिन्तयन्त्योऽरविन्दाक्षं तानि मे गदतः शृण्वि"त्युक्त्वा-"महिप्य ऊचुः--कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेपे खपिति जगति राज्यामीश्वरो गुप्तबोधः । वयमिव सखि कश्चिद्गादनिर्भिन्नचेता नलिननयनहासोदारलीलेक्षि- तेने"त्यादि "मेघ श्रीमंस्त्वमसि दयितो यादवेन्द्रस्य नूनं श्रीवत्साकं वयमिव भवान् ध्यायति प्रेमबद्धः। अत्युत्कण्ठः शबलहृदयोऽसद्विधो वाप्पधाराः स्मृत्वा स्मृत्वा विसजसि मुहुर्दुःखदस्तत्प्रसङ्गः" इत्यादि "शुप्यद्भदाः कर- शिता वत सिन्धुपल्यः सम्प्रत्यपास्तकमलश्रिय इष्टमर्तुः । यदद्वयं मधुपतेः प्रणयावलोकमप्राप्य मुष्टहृदयाः पुरु कर्शिताः स्मे"त्यादि चोक्तम् । तदिदं श्रीपुरुषोत्तमनामसहसे दशमस्कन्धीयनामसमाप्तौ निष्कृष्टं श्रीमदाचार्य- चरणैः- मनस्तिरोधानकृतन्यग्रस्त्रीचिचभावित" इति । नवीहशो भगवल्लाभो नाऽन्येषाम् । कुत एपाम् ! सत्राऽऽह-तदन्तरसेत्यादि । अस्य । सर्वेतर- विचित्रमहाश्चर्यचर्य्यस्य । “यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशया यत्कृते" "प्रेक्षन्त्य उज्झितगृहा जहूएईसन्त्यः निन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने जाताझदो महा- बालमाध्यविभूपिता। मनाः" इत्यारभ्य "तत मारभ्य नन्दस्य व्रजः सर्वसमृद्धिमान् । हरेनिवासा- स्मगुणै रमाक्रीडममून्नृपे"त्यादिनिरूपणानुसारेण स्थितस्य भगवदेकनिरतस्य तत्सेवानुरक्तस्य "तस्मान्मच्छरणं गोष्ठं मन्नाथं मत्परिग्रहमि त्याद्युक्तप्रकारेण भगवता सर्वात्मनाऽप्यात्मसात्कृतस्य शरणागतस्याऽऽत्मनिवेदिनो निस्समाभ्य- धिकस्याऽसाधारणस्य भकवर्गस यथायथं कायिकभावोमयसम्बन्धबन्धुरस्य सर्वथैवाऽमापनीयसौभाग्यभरस्य । सर्वस्व । परिजनपरिकरादियुक्तस्य । तत् ।' तथा परिपेव्यमानं स्वयं तथाविधविशेषाग्रहल्यग्रश्च । तदेजतीत्यादिरूपेण तदूरे इत्यादिरूपेणाऽनुसन्धीयमानं श्रीयशोदोत्सास्सिालितं श्रीकृष्णाख्यं पर ब्रह्म । अन्तः । हृदये । वर्चत इति शेषः । "मन्मना भव । महामनाः । इति नन्दादयो गोपाः कृष्णरामकथा मुदा । कुर्वन्तो रमगाणाश्च । वृष्णयः कृष्णचेतसः । ता मन्मनस्का" इत्यादिवाक्येभ्यः । तत्सर्वस्याऽस्य बाधतः । तत् । हृद्यवरुद्धमेव । "नाऽपि नाम हृदयाम्बुरुहात्स्वपुंसामि"युक्तेः । तथा तथा विविधभावशवले हृदये “गत्याऽनुरागस्मितविभ्रमेक्षितैमनोरमालापवि- हारविभ्रमैः । आक्षिप्तचिताः प्रमदा रमापतेस्तास्ता विचेष्टा जगूहुस्तदामिका" इति "इत्युन्मत्वचो गोप्यः कृष्णान्वेपणकातराः । लीला भगवतस्तास्ता धनु- चक्रुस्तदात्मिका" इत्याद्युक्तप्रकारेण परिवर्तमानमेव तत् । अस्य । कार्यान्तरे अचेतनस्य सर्वथैवाऽभ्यस्फुरणरहितस । सर्वस्य । भक्तवर्गस्य । बाखतः । प्रकटीभवतीति शेषः । नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने" इति "तासामाविरभूच्छौ- रिरि"त्यादिश्रीभागवतवचनेभ्यः । एपा खलु परमकाष्ठापना मुख्या स्वतघ्रा च पुष्टिमार्गीया वरणमात्रलम्या सर्वात्मभावाभिल्या भक्तिस्तया तेषां साहशो भगवल्लाभो नाऽन्येषां तदभावादित्यर्थः । सन्ति च संवदन्ति श्रुत्यन्तराणि- "यन नाऽन्यत्पश्यति नाऽन्यच्छृणोति नाऽन्यद्विजानाति । स एवाऽपस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उचरतः स एवेद सर्वम् । सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽनुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिते"त्यादीनि च ॥ ५॥ एवमनवगायमाहाम्यत्वाय चाऽद्भुतकर्मत्वाय च सौलभ्याय च भक्तिजन ननाय न भक्तिसौकाय च भक्त्यभिवृद्धये चाऽश्चर्यरसैकनिधानावेन सर्व- ४४ ईशावास्योपनिषद् । यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवाऽनुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥ रसात्मकत्वसिद्धये च फलात्मकत्वफलनाय च विरुद्धसर्वधर्माश्रयत्वं भगवतो निरूप्येशत्वं च ब्रह्मत्वञ्च व्याख्यातच समर्थितञ्च । अथाऽस्य सर्वस्येशावास्यत्वे कुत्सितत्यादिकं न भायात् । तेन माहात्म्यापकर्षश्च मक्त्यसम्मवश्व प्रसज्येते इति चेत्तत्राऽऽह-यस्तु सर्वाणीत्यादि। यः। वेदैकप्रमाणनिष्ठस्तदुक्तानुष्ठान- परो ज्ञानविज्ञानसम्पन्नोऽनुगृहीतो भगवद्भक्तः । तत्प्रतीतिः प्रमाणं न प्रान्त- प्रतीतिरित्यभिप्रायेणाऽन्यव्यवच्छेदार्थस्तुशब्दः । सर्वाणि भूतानि । जडज- मानि ब्रादिस्थावरान्तानि उच्चावचानि हेयोपादेयानि विविधविधिनिषेधा- पन्नानि शामित्रोदासीनानि प्रतिकूलानुकूलानि मनलामङ्गलानि । आत्मन्येव । सर्वात्मनि सर्वकारणकारणे भगवत्येव । मृत्सुवर्णादौ घटकुण्डलादिवत् तादा- म्येन स्थितानीति यावत् । अनुपश्यति । उत्पत्त्याद्यनुक्रमेण पश्यति । नाऽन्यत्र कालकर्मप्रकृतिस्वभावादावित्येवकारार्थः । आत्मानतिरिक्तान्येव पश्यति नाऽति- रिकानि । आत्मयतेषु सिद्धति व्यवहरति न दोषं पश्यतीत्यर्थः । प्रमा- णाधिगतत्वादिति मावः । “यदिदं मनसा याचा चक्षुभ्यां श्रवणादिभिः । नवरं गृह्यमाणञ्च विद्धि मायामनोमयमि"ति वचनेन प्रमाणान्तराधिगतस्य मायाम- नोमयत्वकथनादन्तरासृष्टिविषयत्वात्कुत्सितस्वादिमानस्येति । अधिगमयन्ति च कार्याणां कारणानतिरिकत्वं प्रमाणानि । "एकोऽहं बहु स्वां प्रमायेय । तदा- स्मान स्वयमकुरुत । आत्मैवेदं सर्वम् । सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीते"त्येवमादीनि । आत्मैकायत्तप्रवृत्तीनीति वा तात्पर्यार्थः । तेन तैः लिश्यमानोऽपि न तानि प्रद्वेष्टि । "न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चा- ऽप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ह्मणि स्थितः । सर्व सहेत परुपं सर्वेषां कृष्णभावनात् । नाऽयं जनो मे सुखदुःखहेतुर्न देवताऽऽत्मा ग्रहकर्मकाला" इत्येवमादिरूपः शास्त्रार्थो दर्शितः । किञ्च । “त्वं भावयोगपरिभावितहृत्सरोज आस्से श्रुतेक्षितपथस्तनुनाथ पुंसाम् । यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्त- द्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय । नाऽतिप्रसीदति तथोपचितोपचारैराराधितः सुर- गणैर्हदि बद्धकामैः । यत्सर्वभूतदययाऽसदलभ्ययैको नानाजनेप्ववहितः सुह- पालभाष्यविभूषिता । दन्तरात्मा" इति । "भूयस्त्वं तप आतिम विद्यां चैव मदाश्रयाम् । ताभ्या- मन्तहदि ब्राल्लोकान्द्रक्ष्यस्थपावृतान् । तत आत्मनि लोके च भक्तियुक्तः समाहितः । द्रष्टाऽसि मा ततं ब्रान्मयि लोकांस्त्वमात्मनः । यदा तु सर्वमू- तेषु दारुप्वमिमिव स्थितम् । प्रतिचक्षीत मां लोको जलातोव कश्मलम् । यदा रहितमात्मानं भूतेन्द्रियगुणाशयैः । स्वरूपेण मयोपेतं पश्यन् स्वाराज्य- मृच्छतीति । "पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो नमः स गुणदोपभाक् । कर्माकर्मविक- मेति गुणदोषधियो मिदा । तमायुक्तेन्द्रियमामो युक्तचित्त इदं जगत् । आत्म- भीक्षस्य विततमात्मानं मय्यधीश्वरे । ज्ञानविज्ञानसंयुत्त आत्मभूतः शरीरि- णाम् । आत्मानुभवतुष्टात्मा नाऽन्तरायैहिन्यसे । दोपबुख्योभयातीतो निगे- धान्न निवर्तते । गुणबुद्ध्या व विहितं न करोति यथाऽभकः । सर्वभूतसुहृ- च्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चयः । पश्यन्नदात्मकं विश्वं न विपद्येत वै पुनरि"ति च । समन्वयमाह-सर्वभूतेषु चाऽऽत्मानमिति । उपादानरूपेण स्थितमस्ति- भातिप्रियत्वैरनुगतेधर्मः प्रत्यभिज्ञायमानं "तदनुप्रविश्य सच त्यचाऽभव- दिति "अनेन जीवेनाऽऽमनाइनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणी"ति श्रुत्यु- तरकारेणाऽपि वर्तमान आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदि- ध्यासितव्य" इति श्रुत्युत्ताया प्रक्रियया प्रत्यक्षमप्यनुभूयमानम् । चोऽन्वाचये समययेऽवधारणे वा । अनुपश्यतीत्यनुपरः । अम्वीक्षया पश्यतीत्यर्थः । ततो न विजुगुप्सते । एवं भगवद्रूपतया तदधिष्ठेयतया चाऽवधारिताप्रपञ्चादि- त्यर्थः । न विजुगुप्सते 1 कुत्सितत्यादिमानविगलनादवसरस्मैवाऽभावादि- त्यर्थः । किन्तर्हि करोति । अभिनन्दति । तेन माहात्म्योत्कों भक्त्यवश्य- सवानिति निरूपितम् । यदि त्वायनीत्यामानमिति च जीवात्मैव व्याख्यायते तस्य "आराममानो परोऽपि दृष्टः । यथाऽः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युचरन्ति । ममैवांऽशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः" इत्यादिवाक्यैरणुत्वेन सिद्धान्तितत्वात् “यस्तु सर्वाणि भूतानीति व्यापकत्वोक्तिर्न स्वतः सम्म चति । भगवज्ञानसेवाभ्याम्भगवदावेशे व्यापकत्वमणोरपि तस्य भवति । तथा सत्येव तथोक्तिखत्रोपपद्यते । तदा यो भगवज्ञानभक्तिभ्यामात्मन्याविर्भूतभ- गवत्कतयाऽभिव्यक्तानन्दांश इत्यर्थः । आत्मन्येव । भगवदावेशेनाऽमिव्य- ४८ ईशावास्योपनिपद् । स पयंगाच्छुक्रमकायमन्त्रण- मलाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीपी परिभूः वयंभूर्याथातथ्यतो- ऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥८॥ भक्तिपात्यैव । नाऽन्यथा। तेन तत्प्राप्तिरेख मृग्या । न स्वातव्येण भगव- माप्तिः । स्वतः सिद्धत्वादित्युक्तमेवाऽर्थ भूतवन्निर्देशेन स्पष्टमेवाऽमिघातुं मग- वत्स्वरूपं भक्तस्वरूपं च फलप्राप्तिसामयिकं वक्तुं मक्तियोगश्च तदानीन्तनं स्वरूपतो दर्शयितुमाह-स पर्यागादित्यादि । सः । शोकमोहादिरहितः सर्वात्मभावाख्यपरमकाष्ठापन्नभक्तिमाननुग्रहबलविचारनिममस्तदेकशरणोऽली- किकसामर्थ्यः । परि । अविद्यारद्धाञ्जीवानन्तरायांश्च तांस्तान् वजयित्वा । अविद्यापद्धजीववैलक्षण्येनाऽन्तरायानुद्गमेन चेत्यर्थः। किञ्च । परितः । देहे- न्द्रियमाणान्तःकरणैरात्मना च । “सम्पद्याऽऽविर्भावः खेन शब्दादि"त्यादिमिः पञ्चाधिकरणसूत्रैः प्रदर्शितप्रकारेणेति यावत् । अगात् । फलत्वेन प्रापत् । "अक्षण्वतां फलमिदं न पर विदाम" इत्युक्तेः । किं तत् । शुक्रमित्यादिवि- शेपणयुक्तं यत् । विशेपणानामेव प्राधान्यापैरेव परिस्फुटीक्रियमाणत्याच न विशेष्यनिर्देशः । तच भगवत्स्वरूपं तल्लीलापरिकरस्तल्लीला तदुपयोगिसङ्घात- थेत्यभिप्रायेण विशेषणानि निर्दिशति-शुक्रमित्यादिना । शुक्रम् 1 बीज- भूतम् । आद्यम् । पुंरूपम् । अपीच्यदर्शनम् । स्त्रीभावेनाऽनुमवनीयम् । शृङ्गारवीररसप्रधानम् । भक्तजनजीवितैकनिधानम् । आनन्दरूपम् । कोटि- कन्दर्पलावण्यम् । स्त्रीपुम्भावात्मकम् । चन्द्रप्रभम् । ज्योतिर्मयम् । तदुक्तम्-- "बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । मम योनिर्महद्ब्रह्म तसिन् गर्म दधाम्यहम् । सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारते"ति । "रूपं यत्त- माहुरव्यक्तमाद्यमि"ति । "रूपं चेदं पौरुपं ध्यानधिष्ण्यमि"ति । "अपीच्य- दर्शनं श्यामम् । प्रियः स्त्रीणामपीच्य" इति । “वीक्ष्याऽलकावृतमुखं तव कुण्डलश्रीगण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम् । दत्तामयञ्च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्ष श्रियैकरमणश्च भवाम दासः । तं गोरजरछुरितकुन्तलबद्धबहवन्यमसून- रुचिरेक्षणचारुहासम् । वेणुं कणन्तमनुगैरनुगीतकीर्चि गोप्यो दिदक्षित- यालभाप्यविभूपिता। दृशोऽभ्यगमन्त्समेताः । पीत्वा मुकुन्दमुखसारघमि"त्यादि। "कामिनीभावमा- साथ । नन्दगोपसुतं देवि पति मे कुरु ते नमः । रूपं दृशां दृशिमतामखि- लार्थलामं त्वय्यच्युताऽऽविशति चित्तमपनपं मे" इति । "बद्धवहें"ति "बर्हा- पीडमिति "नटवरयपुरिति । "शुक्रायत्तश्च जीवितम्"। "को पेवाऽन्यात्कः पाण्याद्यदेप आकाश आनन्दो न स्यादिति । "कोटिकन्दर्पलावण्ये त्वयि दृष्टे" इति । "स एकाकी न रमते । स द्वितीयमैच्छत् । स आत्मानं द्वेधा- ऽपातयत् । पतिश्च पली चाऽभवतामि"ति । "सुधाकोटिस्वास्थ्यहेतुः । कोटी- न्दुजगदानन्दी । श्रीमद्वृन्दावनेन्द्विति । "ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारमि"ति च । अकायम् । कायो देहस्तद्रहितम् । जन्मजरामरणखेददौर्गन्ध्यादिनिश्शे- पदेहधर्मरहितमित्यर्थः । केवलानुभवानन्दस्वरूपमिति यावत् । “अशरीरम्" "अपाणिपादः" "अचक्षुः" "अकर्णः" "अविजिघित्सोऽपिपासः" "अवि- नाशी वा अरे अयगात्माऽनुच्छितिधर्मा" "विजरो विमृत्युर्विशोकः" "आन- न्दरूपममृतं यद्विभाति" "निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्मतन्नो निश्चेतनात्मक- शरीरगुणैश्च हीनः । आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः सर्वत्र च त्रिविधमेद- विवर्जितात्मा" "सर्वतः पाणिपादान्तं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुति- मल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति" "जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतधाऽर्थेप्वमिज्ञः खराद तेने ग्राम हृदा य आदिकवये गुह्यन्ति यत्सूरयः । तेजोवारिगृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसों मृपा धामा खेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि" "वकं व्रजेशसुतयोः" "सञ्चिन्तयेद्भगवतश्चरणारविन्दम्" "उत्पाट्यैककरण गैलम्" "प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः" "सोऽश्नुते सर्वान् कामानि"त्यादिविधिनिषेधात्मकपरस्सहस्रवचनव्यवस्यया प्राकृतशरी- ररहितमप्राकृतानन्दमयदेहमित्यर्थः । "तस्यैप आत्मा विवृणुते तनू५ स्वामि". त्यनुगृहीतकानुभवनीयशरीरसौन्दर्य्यमिति यावत् । सामान्येन निषेधाभिप्राये अकायमित्यतावतैव चारितार्य अत्रणमनाविरमिति न व्यवच्छिन्द्यात् । अन- णम् अक्षतम् । पूर्णानन्दैकतुन्दिलदेहमिति । अहाविरम् सायुभी रहित- मतिसौन्दर्ययुक्तं नित्यकिशोरं परिपुष्टवपुष्कम् । "त्यकश्मनुरोमनखकेशपिन- द्धगन्तर्मासास्थिरतमिविट्कफपित्वातम् । जीवच्छवं भजति कान्तमतिर्वि- शा.
ईशावास्योपनिषद् । .. मूढा या ते पदान्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री"ति वाक्यादित्यर्थः । शुद्धम् लौकिकवैदिकसंस्कारानपेक्षम् । ब्राह्मणाधिकारेण वैदिकानां प्रवृत्तत्त्वात्परमा- स्मनश्च जीवात्मनोऽपि विविक्तत्वात् । लौकिकत्वाभावादेव न लौकिकानां मानवस्त्राभरणादीनामपेक्षा । "विसापनं स्वस्य च सौभगढ़ेः परं पदं भूपण- भूषणाङ्गम्" "यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम् । भूषणायुधलि- जाख्या धत्ते शक्तीः स्वमाययेति वचनैः "देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्व- गुहाशयः । आविरासीद्यथा प्राच्या दिशीन्दुरिव पुष्कल" इत्युक्त्वा "तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शलगदायुदायुधम् । श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभिकौस्तुमं पीताम्बरं सान्द्रपयोदसौभगम् । महार्हवैडूर्यकिरीटकुण्डलत्विषा परिप्वक्तसह- सकुन्तलम् । उद्दामकाश्यादकरणादिभिर्विरोचमानं वसुदेव ऐक्षते"त्युत्तया च वस्त्राभरणादीनामपि साभाविकत्वं नाऽऽरोपितत्वमागन्तुकत्वश्च । तेन वसा- भरणादीनामपि स्वरूपत्वमेव नाऽतिरिक्तत्वम् । तथाच स्वरूपातिरिक्तेनाऽसे- सर्गः शुद्धत्वमित्यर्थः । अपापविद्धम् । अपमित्त्वैकखभावत्यात् । “अपहत- पाप्मे"ति श्रुत्यन्तरात् । “न तथा बघवान् राजन् पूयेत तपआदिभिः । यथा कृष्णार्पितप्राणस्तत्पूरुपनिषेवया" "वासुदेवपरायणाः । अयं धुन्वन्ति कात्स्येन नीहारमिव भास्करः" "किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आमीरकका यवनाः खसादयः । येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रयाः शुद्ध्यन्ति तसै प्रभवि- प्णवे नमः" "नामोऽस्ति यावती शक्तिः पापनिहरणे हरेः । तावत्कर्तु न शक्नोति पातकं पातकी जनः" "मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पाप- योनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्" "पुण्यश्रवण- कीर्तन" इत्यादिवाक्यैश्च । किञ्च । पर्यगात् । हे प्रेष्ठ ! नाऽन्यत्र गम्यता- म्मम सद्मन्येव न्युप्यताम् । यद्यदादेक्ष्यसि तत्तदेव दास्यं ते विधास्यामीत्या- दिपकारेण विश्लेषाभावार्थ प्रार्थनारूपेणाऽन्यतो गमनोयतं तं वर्जयित्या निवार्य परितः अगात् परिवारयामास रुरोध यथेष्टं बुभुजे च | "सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिते"ति श्रुत्यन्तरात् । एवं फलप्राप्तिनिरू- पिता । फलानुभवस्य फलताऽपि सेवाद्वारिकैव । तत्रापि सेयैव फलमिति दर्श- यन्ती तत्प्रकारांश्च सूचयन्ती तस्या एवं शाधतिकफलत्वमतिरिक्तफलाभावा- HOM 524/6. घालभाष्यविभूपिता । PURA र्थमाह-कविर्मनीपी परिभूः स्वयम्भूयाथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधा- च्छाश्वतीम्या समाभ्य इति । कविः । रसज्ञः अभिप्रायज्ञः । यचसाऽपि पीकरणसमर्थः । विनोदवाचस्पतिः । छविच्छरितागिर्वाणीमिरतिमधुरामिः सालमृतिमिर्गाववतीमिश्चित्तापहारकः । सर्वसेवाविषयकसर्वविधविविध- रचनाचतुरतरचितः । सरसः सवद्रससर्वकृतिकः । रसाभियक्तिविदग्धता- समाराधितहृदयाधिनाथः । विशेषज्ञताविशेपासाधारणसरससर्वपदार्थसार्थः । सर्ववस्तुजातसरसावलोकनकलाविलासनिपुणः । मनीपी मनीपा मनवाञ्चल्य- निवारिका बुद्धिः, साऽस्याऽस्तीति मनीपी । भावनैकनिरतः । विविधाभि- लापैकरसः । मनोरथनिममः । परिमूः । सर्वासु सेवासु स्वयं तत्परो भवतीति परिमः । प्रभुमपि शारक्रीडादिषु परिभवति तदिच्छासम्ध प्रियवाच । प्रकृ- प्यते हि प्रीतिरुकृप्यते च हासविलासादिभी रसः समुद्दीप्यते च प्रिये विजि- गीपोदयादिति परिमः । स्वयम्भूः । स्वतन्त्रः । न परतत्रः । भगवानस्य पर- तम्रो भवति । नाऽसौ तत्परतनः । तदुक्तम्-"सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत" "दौत्ये वृतः "प्रियः सुहृङ्गः सह मातुलेय आत्माऽर्हणीयो विधि- कृत" "भगवान् मक्तभक्तिमान्" "गोपीमिः स्तोभितोऽनृत्यत्" "उवाह भगवान् कृष्णः श्रीदामानं पराजितः" "तागात्तयष्टिं प्रसमीक्ष्य सत्वरस्ततो- ऽबरुह्याऽपससार मीतपत्" "विभर्ति फचिदाजशः पीठफोन्मानपादुकम्" "सोऽवते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिते"ति । ब्रह्मणेत्यप्रधाने तृतीया। "सहयुक्तेऽप्रधाने" इत्यनुशासनात् । रासोत्सवाम्मे च भगवद्वचनाना पूर्व- पक्षीकरणं श्रीगोपीजनैः स्ववचनानाच सिद्धान्तीकरणमिहाऽवधेयम् । "कृष्णा- धीना तु गर्यादा, स्वाथीना पुष्टिरुच्यत" इति श्रीमदाचार्य्यचरणयचनामृत- याऽनुसन्धेयम् । सेवकोऽपि संस्तत्तसेवोपकरणरूपेणाऽपि स्वयमेव भूत्वा परिचरतीति च स्वयम्भूः । रूपरसगन्धस्पर्शशब्दाना भगवदीयनिष्ठानामेव भगवद्धोग्यतानिर्णयात् । योगिनां फायब्यूवरक्तियोगवतां सर्वभवनोपपत्तिः । अलौकिकसामर्थ्यस्य सेवाफलत्वात् । एवं फलात्मकसेवायामुक्तस्वरूपोऽधिकारी भवतीत्युक्तम् । सेवाखरूपमाह-याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधादिति । प्रात्यहिक सेवाकम प्रातमध्याहसायानिककालान् बाल्यकैशोरादिभावान् वसन्त- ५२ ईशावास्योपनिषद् । अन्धं तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः॥९॥ ग्रीष्मवर्षाशरदेमन्तशिशिरतत्तद्विशेषोत्सवविशेषांश्चाऽनुसृत्य वस्त्राभरणभो. ज्यादीनामुत्कर्षापकः विविच्य वस्तूनां प्रियाप्रियत्वानिहल्यादिकं विचार्य शीतोष्णादिमावं विभाव्य च प्रेमातिप्रसरपरिष्टुतानामुपचाराणां प्रहीभावपुर- स्सरं भगवदावेशेनोत्सवावेशेन च साभिनिवेशं स्वयं समर्पणं याथातथ्यतो- ऽर्थविधानम् । एवंविधायाः सेवाया उत्तरोचरमुत्कर्षेणाऽनुवृत्तेः कदाप्यनि- धृतिरेवमितरभवेत्यभिप्रायेणाऽऽह-शाश्वतीभ्यः समाभ्यः । सर्वकालमिति तात्पर्य्यार्थः । शाश्वताय कालायेति वा । तेन तादृशसेवाया निरन्तरानुवृत्तिः कदाप्यनिवृत्तिब्ध समाशास्येति व्यज्यते । किंवा । त्यलोपे पञ्चमी । शाश्वतीः समा अनुरुध्य शाश्वतीपु समासु वाऽनुरज्य याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात् । न नित्यसेवार्थास्तात्कालिकानेव याथातथ्यतो व्यदधात्किन्तु वर्पोत्सवसेवार्था- नपि तांश्योभयानपि शाश्चतकालिकानेवेति किमस्य प्रेमातिभरस्य शक्यं वर्ण- यितुमिति व्यञ्जितम् । तथाच श्रीमदाचार्यचरणा:--"वृथैव जीवनं लोके भक्तिज्ञानोत्सवैर्विने"ति । न समाभ्य इत्येव किन्तु शाश्वतीभ्यः । तेन नित्या- नुवृत्तानिवृत्तसेवासिद्धिस्तत्फलत्वसिद्धिश्च ॥ ८ ॥ एवं "राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्य सुसुखं कर्तुमव्ययमिति वचनेन प्रशंसापरमकाठापदमुपानीतां परमां ब्रह्मवियां सफलां निरूप्य तदितराणि सर्वाण्येव मतान्तराण्यविद्याविद्यान्तरात्मकानि सङ्गध प्रतिक्षिपन्ती मुख्यायाः समादरं समर्थयितुमाह--अन्धं तम इत्यादि । तत्रैके लौकायतिकादयो वेदवाधा देहात्मयादित्वादिना पुण्यपापफलमोगानुरूप पुनर्जन्मादि नेच्छन्ति । अन्ये वैदिकम्मन्या भादृप्राभाकरादयो देहाद्यध्यासेन प्रवृत्ता नाऽविद्यामतिकामन्ति।ते उभयेऽपि भेदोपभेदैविविधा यथायथं त्रिवर्ग- मात्रपुरुषार्थपर्यवसन्नाः । अविद्यामुपासते । अविद्या मोक्षप्रतिबन्धकारिणी अन्धप्रबन्धविधायिनी विवक्षितज्ञानविरुद्धा अज्ञानसम्पद् । उपासना परिशी- लनमभ्यासोऽनुवृत्तिश्च । समर्थनं च स्थापनश्च । तेपामन्धे तमसि प्रवेशः फलं भगवद्वैमुख्यजन्ये नरकादियातनापूर्णे । तदुक्तम्- "या वेदवायाः स्मृतयो याच काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हिताः स्मृता" बालभाष्यविभूपिता। ५३ इति मनुना । भगवद्वाक्यच-"प्रवृचिव निवृत्तिच जना न विदुरासुराः । नशौचं नाऽपि चाऽऽचारो न सत्यं तेषु विद्यते । असत्यमप्रतिष्ठन्ते जगदा- हुरनीश्वरम् । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहेतुकम् । एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टा- मानोऽल्पयुद्धयः । प्रमवन्त्युमकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः । काममाश्रित्य दुप्पूरं दम्भमानमदान्विताः । मोहागृहीत्वाऽसद्भाहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिमताः । चिन्तामपरिगेयाश्च प्रलयान्तामुपाश्रिताः । कामोपमोगपरमा एतापदिति निश्चिता" इत्याद्युक्त्वा "मामात्मपरदेहेषु प्रद्विपन्तोऽभ्यसूयकाः । तानह द्विपतः ऋरान् संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजसमशुभानासुरीप्वेय योनि- वि"त्यादि । अन्यच्च-"विद्या मां सोमपाः पूतपापा सरिता स्वर्गति प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमानन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् । ते तं मुक्त्या स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं अयोधर्ममनु- प्रपन्ना गतागतं कामकामा लमन्त" इति । इहाऽपि.---"तांस्ते प्रेत्याऽभिग- च्छन्तीति । अथ ये विद्यायामेव रतास्त्रेऽपि बहुविधाः । केचिदविद्याया विद्यया निवृत्तिमिच्छन्ति । तथाच यचनम्-~-"विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगयस्थितम् । सत्यं पूर्णमनायन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयमि"ति । श्रीसुयो- घिनी च एते हि द्वादश धर्मा देहादात्मनो लक्षण्यप्रतिपादकाः तिक्षीते- रहन्ममेत्यसद्भावं देहादी मोहनं त्यजेदिति फलिप्यती"त्यादिः । केचित्कर्मणैव पुरुषार्थ इति वदन्तः कर्माहतया विद्यामिच्छन्ति । "यदेव श्रद्धया करोति . विद्ययोपनिपदे"ति श्रुतेः । “विदुपः कर्मसिद्धिः स्यात्तथा नाऽविदुषो भवे- दि"ति स्मृतेश्च । केचिद्विद्ययैव पुरुषार्थ मन्यमाना विद्योपयोगितया कर्म करणीयं मन्यन्ते । "तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिपन्ती"ति श्रुतेः । "तावकर्माणि कुति"ति स्मृतेश्च । केचित्प्रातिलिफात्मज्ञानमेव विद्यामुप- गच्छन्ति । एवमादयोऽनेके तद्भेदाः । ते सर्वे । ततः अविद्योपासनप्राप्याद- न्धतमसादपि । भूय इव । अधिकमिय प्रगादमिव । विद्यात्मकतया अवि- धाविजातीयत्वादिवेति । तमः । अज्ञानमावरणम् । प्रविशन्ति । भगवन्तं भक्तिश्च प्रत्युत मद्विपन्ति । न तयोः फलसाधनत्वे वास्तवे विमृशन्ति । विमृश्य च ततो निवन्ते । नान्यदुक्तमवधातुं शक्तिरवशिष्यते । परमुत्तरोवरममि- ईशावास्योपनिषद् । वर्द्धमानेन तमसाऽधिकाधिकमात्रियन्ते । "कोशकार इवाऽऽमानं कर्मणा- अच्छाध मुह्यती"ति न्यायात् । उकञ्च-"कृष्णाद्विपद्ममधुलिण्न पुनर्वि- सृष्टमायागुणेषु रमते वृजिनावहेषु । अन्यस्तु कामहत आत्मरजः प्रमा?मी- हेत कर्म यत एव रजः पुनः स्यादिति । इदमुक्तम्भवति । "भक्तियोगेन मनसि सम्यक्प्राणिहितेऽमले । अपश्यत्पुरुषं पूर्ण मायाञ्च तदुपाश्रयाम् । यया सम्मोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणात्मकम् । परोऽपि मनुतेऽनर्थ तत्कृतं चाऽभि- पद्यते । अनर्थोपशमं साक्षाद्भक्तियोगमधोक्षज" इति हि तावत्समाधिभाषा । "दैवी ह्येपा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेता तरन्ति ते" इति च साक्षाच्छीमुखवचनश्च । तथाच-"साकारं ब्रह्म शुद्ध हि माया तच्छक्तिरुतमा । तया सर्वत्र सम्मोहः साक्षाद्भक्तिश्च मोचिके"ति "एवकारेण सर्वेषामनुपायत्वमाह ही"ति चेति सिद्धान्तानाऽविद्यानिवृत्तिमात्र पुरुषार्थः किन्तु मायानिवृत्तिः । विद्ययोपमर्द एवाऽविद्याया अपि न नाशः। कुतः सा । मायामूले घविद्याविये । विद्याविद्ये मम तनू विद्धयुद्धव शरीरि- णाम् । मोक्षवन्धकरी आये मायया मे विनिर्मिते" इति वाक्यात् । तेन विद्योदयेऽपि संसारस्तिष्ठति । न सर्वथाऽनर्थोपशमो भवति । तत एव ज्ञानिनः सेसारागीतास्तिष्ठन्ति । दुःसङ्गादिना पुनः संसारोदयस्य सम्भवात् । अहं ब्रह्मा- ऽस्मीति संसारस्य मूलावशेषस्फूर्तेश्च । उद्देश्यतयाऽहम्भावस्स भानात् । ततश्च वाक्यम् --"ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा । पलादाच्छिद्य मोहाय महामाया प्रयच्छती"ति । समूलाविद्यानिवृत्तिस्तु भगवत्कृपया मत्यैव न विद्यामात्रेण । तदा विद्योदयोऽवान्तरल्यापारः। "भक्त्या मामभिजानाती"ति वचनात् । (ऽहम्भावोऽपि नाऽवतिष्ठते । "ता नाऽविदन्मप्यनुपबद्ध- धियः स्वमात्मानमदस्तथेदम् । यथा समाधौ मुनयोऽधितोये नद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे" इति वाक्यात् । “तमेव विदित्वाति मृत्युमेति । तरति शोक- मात्मविद् । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः । न द्वेष्ट्यकुशल कर्म कुशले नाऽनुपजत" इत्यादिभ्यश्च वाक्येभ्यः । श्रीमदाचार्यचरणाश्च करणा- मभिवपुः-"विद्यां प्रामोत्युस्टेशः पचित्सत्ययुगे पुमान् । सर्वज्ञत्वञ्च तस्पेष्टं लिन तेजोऽप्यलौकिकम् । तत्प्राप्तावपि नो मुक्तिर्जामत्स्वमवदुद्भवः ।
. पालभाप्यविभूपिता। अन्यदेवाऽहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तव्याचचक्षिरे ॥१०॥ अविद्याविद्ययोस्तरसादजनं सर्वथा मतमिति । ये तावचदिदमविदिल्या विद्य- यैवाऽविद्यानिवृचिमिच्छन्तो विद्यायामेव रता विद्यालामा भिन्तो भक्तिच प्रद्विपन्तो धन्ते ते अविद्यातोऽप्यत्यधिकमिव तमः प्रविशन्ति । यद्यप्यनि- द्याया अनर्थात्मकतया दर्शनाद्वियायाश्चाऽनर्थनिवृत्त्युपायत्ववेदनाचदर्थ प्रया- साच तमसोऽल्पीभावोऽभाव एव वा सुवचस्तथापि समूलायास्तस्या अनुत्साद- नादुपमर्दस्य सापायवाटलेशसहनादनमूलस्य मूलस्य मायाया प्रदर्शनातयु- च्छेयस्वभावत्वानगीकारात्सद्गुरूपदेशशास्त्राशययोरतिवर्द्धनान्मोक्षरयाऽसिद्धस्त्रि- वर्गस्याऽप्यसाधनेनोभयतोऽपि विभ्रंशात्सर्वस्याऽस्य पालोचनासामध्येन च भूयस्त्वमिव । अन्धस्य पातो दुःखदः । परं नाऽऽश्चर्यम् । चक्षुप्मांश्चैत्पते. पदा अन्धतरः रा इति दुःखमप्याश्चर्यमपि । तदुक्तम्-"श्रेयः स्तुति भक्तिमुदस्य ते विभो क्लियन्ति ये केवलबोधलब्धये । तेपामसी केशल एव शिप्यते नाऽन्यद्यथा स्थूलतुयायपातिनामि"ति । "येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्त- मानिनस्त्वय्यस्तगायादविशुद्धबुद्धयः । आरुख कृच्छेद्रण परं पदं ततः पतन्त्य- धोऽनादृतयुप्मवध्य" इति च । इयेत्यव्ययमुत्प्रेक्षायाम् । उद् रोपोक्तायनुफ- ग्यायाश्च । रता इत्यन्यत्वमविवेकित्वं व्यभिचार आक्रोशश्च ॥ ९॥ एवं विद्याऽपि परमार्थविदामविद्यासदृश्येव । गवत्येव वस्तुतोऽविद्या निव- ति इत्युक्तम् । तदेव विवृण्वती आचार्या येवेत्यादिश्रुतेर्गुरूपदेशभात- मिदं प्रमायामित्याह अन्यदेवेत्यादिना । विद्यया मायामूलया । साध्यं फलं मोक्षम् । अन्यदेव । मुख्यभक्तिमार्गीयाद्भिनमेव । यथासम्भवं सापाय- मल्पमनर्थरूपं कृच्छोपगतं पातोचरम् । आहुः कथयन्ति । वेदविदः । न मान्तैः प्रतिपन्नमशेपाविद्यानिवृत्तिरूपच मुख्यञ्चेत्येयकारार्थः । न प्रान्तवचन- निर्णयान्तरैश्च अमितव्यमित्यवधारणा वा । तदुक्तम्-"शल एव शिप्यते" "प्तन्यपण "ब्रह्मानन्दे प्रविष्टानामात्मनेच सुखममा । सज्ञतस्स विलीनत्या- दिति । किश्च । निबन्धे शास्त्रार्थे-विद्ययाऽविद्यानाशे तु जीवो मुक्तो भविष्यति । देहेन्द्रियासवः सर्वे निरभ्यस्ता भवन्ति हि । तथापि न प्रलीयन्ते ईशावास्योपनिषद् । जीवन्मुक्तगताः स्फुटमि"त्युक्तम् । अत्राऽयम्प्रकाशः। "अविद्या निरूप्य विद्या निरूपयति-विद्ययेति । निद्रावदविद्यापगमे न जीवस्य जन्ममरणे । तदा तस्मिञ्जन्मनि गृहीतानां देहादीनां विलयाभावमाह-देहेन्द्रियासव इति । अध्यास एव गच्छति न स्वरूपम् । प्रपञ्चमध्यपातात् । अध्यासाभावे स्थितिर्न स्यादित्याशझ्याऽऽह-तथापि न प्रलीयन्त इति । स्वबुद्धया लीनवत् प्रति- भानेऽपि न सर्वेषां बुद्ध्या तथा प्रतिभानम् ।" इति । अयञ्चाऽऽवरणभङ्गः- "अविद्यामित्यादि । सकाऱ्यां तां निरूप्य कार्य्यद्वारा विद्यां निरूपयतीत्यर्थः । ननु विद्यया मोक्ष एव भविष्यति चेत् कतर्हि भजनोपयोग इत्याकालायाम- विद्यानाशस्तया न सर्वथैति मोक्षोऽपि न तथेति वक्तुमाहुः-निद्रावदित्यादि । कार्यस्य सर्वथा नाशो हि समवायिनाशात् । प्रकृते च विद्यायाः सात्त्विकी- त्वेन स्वजनकमायानाशकत्वाभावान्मायासत्त्वाचन सूक्ष्मरूपेणाऽविद्यायाः सत्त्वे तस्या उपमर्द एव न तु नाशः । तेन तत्कार्य्यस्याऽपि देहादिधर्माध्यासस्योप- मई एवेति जन्ममरणाभावरूप एव मोक्षो न तु विश्वमायानिवृत्तिरूपो मोक्षः । तथाच सहेतुकस्य सकार्य्यस्य बन्धस्योपमर्दरूपोऽभावो विद्याकृतमोक्ष इति फरति । तदेति । अविद्यापगमे । अत्र देहेन्द्रियासूनां सर्वेषां निरध्यस्तत्वक- थनादन्तःकरणस्य चाऽकथनादन्तःकरणं किञ्चिदध्यस्तं तिष्ठतीति ज्ञायते । पूर्वोक्तनिद्रादृष्टान्तेनाऽविद्यायाः खकारणभूतायां मायायामेवाऽवस्थानमिति च । यथा हि जाग्दवस्थोपमर्दिता निद्रा बुद्धिवृत्तिरूपत्वाद् वुद्धौ तिष्ठति तथेति । माया चाऽत्र देहारम्भकधातुकारणभूता। तत्राऽविद्यास्थिती तत्प्रत्या- सन्नमन्तःकरणं किश्चिदविद्या व्यामोतीति तस्यैव किञ्चिदध्यस्तत्वं नेतरेपामिति हृदयम् । तत्राऽऽशङ्का-अध्यासाभाव इत्यादि । देहायध्यासाभावे तेपामत्यन्त- विस्मरणादत्यन्तविस्मरणस्यैव च मृत्युत्वादेहादिस्थितिर्न स्यादित्याशय तदभा- वेऽपि तेषां स्थितिमाहेत्यर्थः। किमत्र मानमित्याकालायां मूलस्यं स्फुटपदं व्याकुळन्ति-स्वबुद्धयेत्यादि । तथा च यद्यध्यासात् स्थितिः स्याज्जीवन्मुक्ता एव न स्युः । तथा सति शास्त्रं प्रसिद्धिश्च विरुद्धयेत । अतस्तदभावायाऽध्या- साभावेऽपि देहादिस्थितिरङ्गीकार्या। तथा सति संसारनाशेऽपि प्रपञ्चस्थिते. संसारप्रपञ्चौ मिन्नावेव सिद्धाविति भावः एवमत्र विद्यया अविद्याभिभव एव बालभाष्यविभूपिता। ५७ । न तु सर्वथा नाश इत्युक्तमिति । एवं भेदान्तरेष्वपि फलनिकर्ष उद्यः । "अक्षण्वतो फलमिदं न परं विदाम" इति "सोऽनुते सर्वान् कामानि"ति च मुख्यफलापेक्षया तन्निकर्षात् । अन्यदाहुरविद्यया । तदुक्तम् । एकादशे सप्तदशे-“यस्त्वासतमति,हे पुत्रवितेपणातुरः । स्त्रैणः कृपणधीमंढो ममाऽह- मिति बद्धयते । अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालाऽऽत्मजात्मजाः । अन्यथा मामृते दीनाः कथं जीवन्ति दुःखिताः । एवं गृहाशयाक्षिप्तझ्दयो मूढधीर- यम् । अतृप्तस्ताननुध्यायन्मृतोऽन्धं विशते तम" इति । तथैव दशमे-"श्रुतञ्च दृष्ट्वदुष्ट स्पर्धास्यास्ययव्ययैः । यहन्तरायकामत्वात्कृषिवच्चाऽपि निष्फ- लम् । अन्तरायैरविहतो यदि धर्मः स्वनुष्ठितः । तेनाऽपि निर्जितं स्थानं यथा गच्छति तच्छृणु । इप्लेह देवता यज्ञैः स्वर्लोकं याति याज्ञिकः । भुञ्जीत देव- वत्तत्र भोगान्दिव्यान्निजार्जितान् । वयुष्योपचिते शुम्ने विमान उपगीयते । गन्धविहरन्मध्ये देवीनां हृयवेपवृक् । स्त्रीभिः कामगयानेन किक्षिणीजाल- मालिना । क्रीडन्न घेदाऽऽत्मपातं सुराकीडेपु निर्वृतः । तावत्प्रमोदते स्वर्ग यावत्पुण्यं समाप्यते । क्षीणपुण्यः पतत्यगिनिच्छन् फालचालितः" इति भगवद्भक्तिरहितधर्मानुष्ठाननिष्ठानां गतिमुक्त्वा अधर्मगतिमाह-"यद्यधर्मरतः सङ्गादसतां वाऽजितेन्द्रियः । कामात्मा कृषणो लुव्यः स्त्रैणो मूतविहिंसका। पशूनविधिनाऽऽलभ्य प्रेतभूतगणान् यजन् । नरफानयशो जन्तुर्गत्वा यात्यु- यणं तम" इत्यादि । तत्रैव पञ्चमे-"राजोवाच । भगयन्तं हरिं पायो न भजन्त्यात्मवित्तमाः । तेपामशान्तकामानां का निष्ठाऽविजितात्मनाम् । चमस उवाच । मुखवारुपादेभ्यः पुरुपस्याऽऽयमैः सह । चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणै- चिमादयः पृथक् । य एषां पुरुष साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम् । न मजन्त्यषजा- नन्ति स्थानाद्रष्टाः पतन्त्यधः । दूरे हरिकथाः केचिद्रे चाऽच्युतकीर्तनाः । स्त्रियः शूद्वादयश्चैव तेऽनुकम्प्या भवाशान् । विप्रो राजन्यवैश्यौ च हरेः माप्ताः पदान्तिकम् । श्रौतेन जन्मनाऽभाऽपि मुह्यन्त्यान्नायवादिनः। कर्मण्यको- विदाः स्तब्धा मूर्खाः पण्डितमानिनः । चदन्ति चाटुकान्मूढा यया माध्च्या गिरोत्सुकाः । रजसा घोरसङ्कल्पाः कामुका अहिमन्यवः । दाम्भिका मानिनः पापा विहसन्त्यच्युतमियान् । वदन्ति तेऽन्योन्यमुपासितस्त्रियो गृहेषु मैथुन्य- CM ।
ईशावास्योपनिषद् । परेषु चाऽऽशिपः । यजन्त्यसृष्टान्नविधानदक्षिणं वृत्त्यै परं नन्ति पशूनत- द्विदः । श्रिया विभूत्याऽभिजनेन विद्यया त्यागेन रूपेण वलेन कर्मणा । जातस्मयेनाऽन्धधियः सहेश्वरान् सतोऽवमन्यन्ति हरिप्रियान् खलाः । सर्वेषु शश्वत्तनुभृत्ववस्थितं यथा खमात्मानमभीष्टमीश्वरम् । वेदोपगीतञ्च न शृण्वते- ऽबुधा मनोरथानां प्रवदन्ति वाया । लोके व्यवायामिपमद्यसेवा नित्याऽस्त्रि जन्तोन हि तत्र चोदना । व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञसुराग्रहैरासु निवृत्ति- रिष्टा । धनञ्च धर्मेकफलं यतो वै ज्ञानं सविज्ञानमनुप्रशान्ति । गृहेषु युञ्जन्ति कलेवरस्य मृत्युं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम् । यद् प्राणभक्षो विहितः सुराया- स्तथा पशोरालभनं न हिंसा । एवं व्यवायः प्रजया न रत्या इमं विशुद्ध न विदुः स्वधर्मम् । ये त्वनेवंविदोऽसन्तः स्तब्धाः सदभिमानिनः । पशून् द्रुह्यन्ति विस्रब्धाः प्रेत्य खादन्ति ते च तान् । द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम् । मृतके सानुवन्धेऽस्मिन् बद्धस्नेहाः पतन्त्यधः । ये कैवल्यमस- प्राप्ता ये चाऽतीताश्च मूढताम् । त्रैवर्गिका क्षणिका आत्मानं घातयन्ति ते। ये त आत्महनोऽशान्ता अज्ञाने ज्ञानमानिनः । सीदन्त्यकृतकृत्या वै कालध्वस्तमनोरथाः। हित्वाऽत्मायासरचिता गृहापत्यसुहृच्छ्यिः । तमो विश- न्त्यनिच्छन्तो वासुदेवपराङ्मुखा" इति । भक्तेः फलन्तु “स पर्यागादि". त्युक्तम् । "आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् । तथा न ते माधव तावकाः कचिद्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौरताः । त्वयाऽभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो । खयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन् भवार्णवं भीममदप्रसौहृदाः । भवत्पदाम्भोरुह- नावमत्र ते निघाय याताः सदनुग्रहो भवान् । कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवा. ब्धिम् । यास्यसे ह्यकुतोमयम् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विप- श्चिता । कृष्णाघरामृतास्वादः सिद्धिरत्र न संशयः । तदप्राप्तौ वृथा मोक्षस्त- दाप्तौ तद्गतार्थता । अतः सर्वोत्तमं स्तोत्रं जप्यं कृष्णरसार्थिमिः। अक्षण्वतां फलमिदमि"त्यादिमिश्चोक्तम् । इति शुश्रुम धीराणाम् । ईरयन्ति ते ईराः । धियामीरा धीराः। रान्ति ते राः। धियां राः धीराः। तेपाम् 1 शिप्यानुग्रह- शालिनाम् । याथातध्यतस्तत्त्वविदाम् । दृढस्थिरमनसाम् । पूर्वाचार्याणाम् ।
५९ पालभाष्यविभूपिता। विद्यानाऽविद्याश्च यस्तद्वेदोभय स ह । अविद्यया मृत्यु ती| विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ११॥ तेभ्यो वा । पञ्चम्यर्थे शेपे पष्ठी । इति पूर्वार्धोक्तप्रकारकं वचनम् । तथा चाऽसद्गुरवोऽपि गुरुपरम्पराधिगतमेवाऽभिदधुरित्यविच्छिन्नगुरुपरम्पराप्राप्तो- ऽयमर्थः परमं प्रमाणमित्यर्थः । अभिप्रायज्ञानपुरस्सरञ्चाऽस्माकञ्च तेपाश्च श्रवणं न शब्दमात्रपर्यवसन्नमित्याह-ये नस्तद्वयाचचक्षिर इत्युभयत्र । तस्मा- दविच्छिन्नपरम्परया गुरुकृपालव्धेऽर्थे विचिकित्सावसरस्याऽभावान्निविचिकित्स- मेव भक्तिमार्गः सर्वेण निःश्रेयसार्थिना समाश्रयणीय इति भावः ॥ १० ॥ ननु सर्वेषां परमार्थशास्त्राणां वन्धमोक्षविचारेणैव प्रवृत्तत्वादविद्याकृत- बन्धाभावमन्तरेण मोक्षस्य वक्तुमशक्यतया मुत्तोपसृप्यन्यपदेशेन भगवल्लीला- लाभस्याऽपि तदुत्तरमेव सम्भवेन विद्योदयस्याऽवश्याभ्युपेतन्यत्वे विपति- द्धिमिवेदमुच्यते-अन्यदेवाऽऽहुर्विधयेति चेत् ? तत्राऽऽह-विद्याश्चेत्यादि। क्तिमार्गे तावन्नाऽवश्याभ्युपेयो विद्योदयो नाऽप्यविद्यापगमः । सापायोपाय- योपपादनात् । अविद्यासादृश्यस्याऽपि प्रतिपादनाच । अविद्याया एकान्ततो नेवृत्त्यभावाच ।मुख्यफलाभावाचा तेन विद्याऽप्यविद्यावन्मुख्यात्फलात्मच्यावि- तेच व्यामोहिकैव च । व्यामोहकमायाविनिर्मितत्वात् । विद्या हि सुख- सङ्गेन वभाति । ज्ञानसतेन च । तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसझेन बध्नाति ज्ञानसनेन चाऽनघे"ति "सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानमिति च वचनाभ्याम् । प्रतिवन्नाति च भक्तिम् । तदिदं "विशुद्धं केवलमि"त्येतत्प्रक- रणे स्पष्टम् । किन्तु भगवच्छरणागतिरेवैका मृग्या । वस्तुतः सैव विद्या । तदभावश्चाऽविद्या । वादिप्रतिपन्नयोर्भगवद्वमुख्यसंसृष्टयोरुभयोस्तुल्यपरिहार्य- ताकत्वात् । भक्तिमार्गीययोर्भगवच्छरणागतिपुरस्सरयोस्तदङ्गभावमावितयोरु- मयोरपि तयोराधिदैविकीत्वेन तुल्योपादेयताकत्याच । भक्तिमार्गे विद्या- विद्ययोः स्यरूपमेव विभिद्यते नाऽनुपगमः प्रसज्यत इति वृथैवाऽनुपगमशक्केति ज्ञेयम् । किञ्च । भगवदधीनप्रवृत्तिनिवृत्तिके हि विद्याविद्ये । "मायाञ्च तदुपा- श्रयाम् । यया सम्मोहितो जीव" इत्यादिवचनात् । तयोरुद्धमापगमी न स्वशक्यौ साधनान्तरैरपि सर्वथा । तेन भगवच्छरणागतिरेवैका गतिर्नाऽन्येति।
ईशावास्योपनिषद् । । सापि न तदुद्गमापगमार्था । किन्तु स्वतघ्रपुरुषार्थतया भगवत्कृपार्थ भगवल्ला- भार्थश्च । भक्तिमार्गीयत्वात् । तथात्वे तच्छेपतया तद्गप्रसङ्गात् । "भक्तः स्वातन्त्र्येणैव मोक्षदानात् । भगवतस्तादृशस्याऽऽत्मत्वाचे"ति द्वितीयस्य पष्ठे "विशुद्धं केवलं ज्ञानमि"त्यत्र प्रकरणे श्रीसुबोधिनीवाक्यात् । उक्तञ्च-"तया मुक्तिर्न चाऽन्यथेति । "मयि सञ्जायते भक्तिः कोऽन्योऽर्थोऽस्याऽवशिष्यत" इति वाक्येन सर्वपुरुषार्थसाधकतया भक्तेस्तयोरानुपशिकत्वेनाऽन्यथा सिद्धत्वेन च धर्मादिमोक्षान्तपुमर्थानामपि तथात्वेन च स्वतन्त्रपुरुषार्थत्वाभावाद्भक्तरेक् तथा- त्वाच । "मधुद्विट्सेवानुरक्तमनसामभवोऽपि फल्गुः । आत्यन्तिकमपि पुरुषार्थ स्वयमुपगतं नो एवाऽऽद्रियन्ते भवदीयत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः । सालोक्य- सार्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृहन्ति विना मत्सेवनं जनाः। अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः । सोऽश्नुते सर्वान् कामानि"त्यादिभि- क्यैिश्च । "जय जय जयजामि"त्यादिप्रार्थनावाक्यान्यपि भक्तेभगवति शरणा- गतेश्च स्वतम्रपुरुषार्थत्वाभिप्रायाण्येव । तत्प्रतिवन्धात्मिकाया एव मायाया निवृत्तिरनेन प्रार्थ्यते न मुक्तिप्रतिबन्धात्मिकायाः । "स्वर्गापवर्गनरकेप्वपि तुल्यार्थदर्शिन" इति वाक्यात् । एतदेव "मायामेतां तरन्ति ते" इत्यत्राऽपि द्रष्टव्यम् । एतदपि वहिर्मुखदशायामेव । नैकान्तत आभिमुख्ये । "माया परै- त्यभिमुखे च विलजमाना । विलजमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुये"त्यादि- वाक्यैर्भगवदभिमुखे तस्याः सामर्याभावात् । भक्तेन तस्या अनपनोद्यत्वाच्च । द्वितीयस्य पञ्चमे-"विलजमानये"त्यत्र-“सा हि भगवतो भार्या स्वस्य भग- वता मह निरन्तररमणार्थमन्येषां बुद्धि मोहयति । तस्यास्तथात्वं भगवाजा. नाति । अतो विलजमाना । ईक्षापयेऽपि स्थातुं विलज्जते । अत एव ये तत्सम्मुखास्तान्न व्यामोहयति । पृष्ठतः प्रवृत्तानेव व्यामोहयती"ति श्रीसुबो. धिनीवाक्यात् । एवमेव "ततो भूय इव ते तम" इत्यादिश्रुतेर्विद्याया अप्यविद्यातुल्यतया व्यामोहकत्वेन विद्याविद्ये अपि भक्तस्य न प्रद्वेष्ये । शक्तित्वेन भगवदभिन्नत्वात् । यत्र तयोर्जननी मायैव निवर्त्तते तस्मिन्नेकान्तत आमिमुख्ये तयोः स्थातुमनवसरात् । “विद्याविद्ये हरेः शक्ती माययैव विनि- मिते" इत्यत्र नियन्धे शास्त्रार्थे-"तेन मामेव ये प्रपद्यन्त इति वाक्यानक्तो बालभाष्यविभूपिता। सत्यामविद्याऽपि निवर्तते विद्याऽपि । अन्यथा नित्यमुक्तता न स्यादिति श्रीमदाचा-चरणवचनात् । तस्मात्स्वतन्त्रपुरुषार्थतयैव शरणागतिः कार्यो । सैव प्रयोजिकाऽभीप्सितायाप्तये । तदैव च नित्यमुक्तता । न मायाविद्या- विद्यापगमचिन्ता विधेया । बहिर्मुखदशायामेव तचिन्तोदेति । न सर्वथैवा- अभिमुख्ये ! सदाभिमुख्येनैव स्पेयं न वाहिर्मुख्येन ! गायाविद्याविद्यानुचिन्तन बाहिर्मुख्यम् । तदपहाय सर्वथा सर्वदा शरणागतिरेखेका चिन्त्या। तदेयाऽऽभि- मुख्यं नित्यमुक्तता निरवशेषसकलपुरुषार्थावाप्तिश्चेति । तदेतदभिप्रेत्याऽऽह-- विद्यां चाऽविद्यां च यस्तदोभयर स हेति । यः । भगवत्कृपाविषयो- धिकारी । विद्याम् । अन्यमोक्षकारणत्वेन समाद्रियमाणाम् । वस्तुतोऽविद्या- पुल्यां न्यामोहिको मुख्यफलात्प्रच्याविकां सापायाल्पफलाश्चेति चकारार्थः । प्रविद्याम् । मोक्षप्रतिबन्धकत्वान्त्या मक्ततः प्रद्विप्यमाणाम् । वातुतस्तु पक्ष्यमाणरीत्या प्रत्युत तत्सहायिकामेवेति चकारार्थः । उभयम् । समुदितम् । मुख्यफलात्मच्यावकत्वेन व्यामोहकत्वेन चिन्त्याचिन्त्यत्वाभ्यां तयोस्तुल्यत्वात् । द् वेद । ब्रह्म वेद । शक्तित्वेन शक्तिमदनतिरिसरवादगवदभिन्नं वेद । दिधीनप्रवृत्तिनिवृत्तिकत्वादिनोपपादितप्रकारेणेति यावत् । शरणागतिसिद्धये दभिन्नं वेद तत्सिद्धौ चाप्रद्वेप्ये तदभिन्नत्याद्वेद जानाति । अनन्यभतिमा- नर्गुणो भवतीति भावः । “मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये । मनोगतिर- वेच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽग्वुधौ । लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य युदाहृतम्" 'मां भजन्निर्गुणो भवेत्" "मनिटं निर्गुणं स्मृतम्" "आनन्दं ब्रह्मणो वेद्वान विभेति कुतश्चने"ति वाक्यान्तरेभ्यः । सः । ह इति हर्षे । “अपि वेसुदुराचारो भजते मामनन्यभार । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्ज्यवसितो हे स" इत्युक्तप्रकारेण परमामिनन्दनमर्हति कृतकृत्यश्च भवतीति । "यसिन् पर्वाणि भूतानि आत्मैवाऽभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनु- श्यतः। द्वितीयादै भयं भवति । भयं द्वितीयामिनिवेशतः । तर ह या वन पतः किमह साधु नाऽकरपं किमहर पापमकरवम् । आस्मान स्पृणुते।" त्यादिवाक्येमेंदज्ञान एव भयस्योक्ततया प्रतिकूलानां प्रातिकूल्यसम्भवः । सर्वस्याऽऽत्मामेदेनाऽनुसन्धाने तु आत्मनो नित्यानुकूलतया प्रतिकूलान्यपि ६२ ईशावास्योपनिपद् । प्रत्युताऽऽनुकूल्यं भजन्ते भगवद्भक्तौ साहाय्यमेव समाचरन्ति च । तदस्य जातमिति महानेप हवसर इति भावः । एतदेवाऽऽह-अविद्यया मृत्यु तीवेत्यादिना । वस्तुतस्तावदविद्यया मृत्युं प्राप्नोति न तरति । "ये के चा- ऽऽत्महनो जनाः । पुमान् भवाब्धि न तरेस आत्महा । आत्मानं घातयन्ति ते । पञ्चपर्या त्वविद्येयं यद्वदो याति संमृतिमि"त्यादिवाक्यैः । किन्तु भगवद- नन्यत्वेन ज्ञाता सा शरणागतस्य संसारमुत्सादयति मृत्यु तारयति । न निव- ते। किन्तु प्रातिकूल्यप्रत्युदासेनाऽनुकूला भवतीत्यहो नु खलु मोर्महिमा भग- वन्मार्गस्य । भक्तिमार्गे हि भक्तिरसावेशार्थ किञ्चिदध्यासो देहेन्द्रियादीनाम- पेक्ष्यते । अनुकूलत्वात् । अन्यथा भक्त्यसिद्धिश्च । तथाहि-"यद्धामार्थसुह- प्रियात्मतनयप्राणाशया यत्कृते । सा वाम्यया तस्य गुणान् गृणीते । एकान्त- लाभ वचसो नु पुंसां सुश्लोकमौलेर्गुणवादमाहुः । श्रुतेश्च विद्वद्विरुपाकृतायां कथासुधायामुपसम्प्रयोगम् । वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोः । स्मृत्यां शिरस्तव निवास जगत्प्रणामे दृष्टिः सतां दर्शनेऽस्तु भवत्तनूनाम् । द्रष्टव्यः श्रोतव्यः । पीत्वा मुकुन्दमुखसारघमक्षि- भृङ्गैस्तापं जहुविरहजम् । पश्यन्ति भत्त्युत्कलितामलात्मना । अक्षण्वता फलमिदम् । पानपानं मुखं दृशाम् । प्रजः सम्मृष्टसंसिक्तद्वाराजिरगृहान्तरः । नवकुङ्कुमकिश्शाल्कमुखपङ्कजमूतयः । गोप्यश्वाऽऽकर्ण्य मुदिताः । नष्टप्रायेव- भद्रेषु । शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्नवणकीर्चनः । हृद्यन्तःस्थो बभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् । तदध्यासोऽपि सिद्ध्यति । पुत्रे कृष्णप्रिये रतिः। ममोत्तमश्लोकजनेषु सख्यं संसारचक्रे प्रमतः स्वकर्मभिः । त्वन्माययाऽऽत्मा- मजदारगेहेप्वासक्तचित्तस्य न नाथ भूयादि"ति । प्रथमस्य द्वितीये "नष्टमा- येष्वि"त्यत्र "धुता एव कामादयो न नाशिता इति कचित्कचिचेपां सत्त्वं प्रतीयते । श्रवणे आग्रह इव प्रतिबन्धे क्रोध इव सत्सने लोभ इवेत्यादि बोधयितुं प्रायग्रहणम् । तथाच तेषां प्रतिबन्धकत्वाभावाद्भगवत्कथाया नित्यं श्रवणम् । भगवद्भक्तानां च सेवनं नित्यं भवतीत्याह-~-नित्यमिति । पूर्व कथायाः श्रवणमेव । इदानी देयवत्सम्भावनमिति सेवार्थः ।" इति श्रीसुबो- धिनी च । न ज्ञानं न प वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिहे"त्युक्तिश्च । तथा च । ।
चालभाष्यविभूपिता। अविद्यया भगवदभिन्नताज्ञानेनैकान्ततः शरणागती प्रपन्नार्यितेन भगवदनुग्र- हेण शिथिलीकृतया निवृत्ताखिरदोपया प्रवृत्ताखिलगुणया तत्तत्परतासाधिकया मृत्यु ती निवार्येत्यर्थः । विद्यया खलु मृत्युस्ताय॑स्तथापि नाऽकुतोमयो भवति । अविद्योदयप्रसझात् । तदशक्यमपि भक्तिमार्गीया अविद्या विधत्त इति किं वाच्यं भक्तिमार्गे प्रकर्पस्य मुख्यत्वस्य चेति । अविद्ययेत्युक्त्या वेदा- न्तादिश्रवणेन ज्ञातस्य ब्रह्मत्वस्य ब्रह्मधर्माणाञ्च न्यग्भावेन लौकिकधर्मपुरस्का- रिणा मेहेन ज्ञानविरुद्धनाऽविद्यात्मकेनेति । प्रेमाविद्ययेति लेहोपचारेणेति च यावत् । तदैव तथैव च भक्तिमार्गस्वरूपसिद्धिर्नाऽन्यथेति । मृत्यु तीर्था । जन्ममरणातिगो मूल्या। विद्ययाऽमृतमश्नुते । विद्याऽपि वस्तुतो जन्ममरणादि न निवर्तयति । तदुपपादितम् । तयाऽपि भगवदमिन्नत्वेन ज्ञातया भक्तिमा- गीयया समुत्सृष्टसापायाल्पफलदोपया विद्यया भगवति सर्वतरविलक्षणभक्ति- मागीयधर्मपत्चातत्सेवाप्रकारतत्समाराधनफलादिविषयिण्या प्रेमविद्यया । अमृ. तम् । “अधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः" "वितर वीर नस्तेऽधरामृतमि"त्येवं मुख्यमक्कैरभ्यर्थितं भगवदधरामृतमश्नुते । “सोऽक्षुते सर्वान् कामानि"ति श्रुत्यन्तरोक्तान् सर्वान् कामान् वा । एकवचनं सर्वेषां मधुरतमत्वेनेकरूप्यामि- प्रायं परोक्षाभिप्रायञ्च । "परोक्षवादो वेदोऽयम्" "परोक्षमिया वै देवाः" "परोक्षश्च मम प्रियम्" "मधुराधिपतेरखिलम्मधुरमि"त्यादिवाक्यैः । भजना- नन्दमिति पर्यवसितोऽर्थः । विद्यया । अष्टाक्षरमहामनपञ्चाक्षरैरुपदिष्टार्थ- रूपया । श्रीमदाचार्यचरणव्याख्यातयाथातथ्यवेदादिप्रमाणचतुष्टयतदविरुद्ध- सकलशास्त्रसिद्धया । “मनोपासनवैदिकतान्त्रिकदीक्षार्चनादिविधिनियः । अस्पृष्टो रमते निजमक्तेषु स मेऽस्तु सर्वस्वमि"त्यादौ परिस्फुटनिजविलक्षण- खरूपया । पुष्टिमार्गीयया । भगवदनुग्रहैकलभ्यया । तदनुग्रहसमिद्धमा । अश भोजने । आत्मनेपदं छान्दसम् । विशेष आनन्दमयाधिकरणे भाष्यप्रकाशयोः स्थितस्तत एवाऽवसेयः । तस्मात्सुष्टतम्-"अन्यदेवाऽऽहुर्विद्यगे"त्यादि ।।११।। नन्वविद्याविद्ययोस्तमःप्रवेशः फलमिति यदुक्तं तन्न युक्तम् । “धर्मार्थका- ममोक्षाख्याश्चत्वारोऽर्थ मनीषिणामि"ति वेदविहितानां शिष्टपरिगृहीतानाच तेषामविद्याविषयोरन्वर्मावस्य तमःप्रवेशफालकत्वकथनेन तयोः प्रतिक्षेपस च - ६४ ईशावास्योपनिषद् । अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्मूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्या रताः ॥१२॥ सर्ववेदार्थविरुद्धत्वादिति चेत्तत्राऽऽह-~~अन्धं तम इत्यादि । अयमभिप्रायः। न वेदार्थविरुद्धमुच्यते । न मनीषिणां पुरुषार्थाः प्रतिक्षिप्यन्ते । नाऽविद्या- विद्ययोरन्तर्भावस्तेषां तमःप्रवेशफलकत्वकथनायाऽऽरभ्यते । नापि चाऽवि- धाविये प्रतिक्षिप्येते । किन्तु भक्तिमार्गीयाविद्याविद्यातः पृथग्भूते एव ते प्रति- पिध्येते । तयोरसम्भूतिसम्भूतित्वाभ्यां व्यवच्छिन्नत्वात् । न हि ब्रह्मविदाम- सम्भूतिसम्भूतिरूपाभ्यां ते अभिमते । तन्मते भक्तिमार्गतदनादरयोरेव सम्मू- त्यसम्भूतित्वात् । न विद्याविद्ययोः । ब्रह्मानतिरिक्तयोस्तयोभक्तिमार्गेऽभ्युपगमो न तदतिरिक्तयोरन्येपामिव । तयोस्तु सम्भूतिरूपत्वं केवलम् । तच न स्वत- धम् । किन्तु भक्त्यन्तःपातित्वात् । तदुपपादितं प्राक् । तेनोक्तानां पुरुषा- नामपि भक्तिमार्गातिरिक्तानामेव प्रतिक्षेपो न भक्तिमार्गीयाणाम् । भगवद्ध- क्तावेव वेदानां तात्पर्य्यम् । नाऽतिरिक्तेषु पुरुषार्थेषु । तदिदं व्यवस्थितं मर्या- दापुष्टिभ्यां यथायथम् । “धर्मस्य ह्यापवर्यस्य नाऽर्थोऽर्थायोपकल्पते । नाऽर्थस्य धर्मकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः। कामस्य नेन्द्रियप्रीतिलामो जीवेत यावता । जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नाऽर्थों यश्चेह कर्मभिरि"त्युक्तेः । "पुष्टिमार्गे हरेदस्यिं धर्मोऽर्थो हरिरेव हि । कामो हरेर्दिदृक्षव मोक्षः कृष्णस्य चेद्धवमि"ति वृत्रचतुःश्लोक्यां सिद्धान्तोक्तेश्च । “नाऽर्थो यश्चेह कर्मभिरि"ति भक्तिरहितानां केवलानां कर्मणां व्युदासमुखेन कथनात्मावाहिकत्वं दर्शितम् । कर्ममिरित्यु. पलक्षणं भक्तिरहितस्स केवलस्य ज्ञानस्याऽपि । "ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रता" इति तद्गर्हणात् । तथाच तमःप्रवेशफलकत्वं प्रावाहिक्योरेवा. ऽविद्याविद्ययोरुच्यते । मार्यादिक्योः पुष्टिमार्गीययोस्तु तयोर्यथायथं भक्त्यङ्ग- भूतयोक्तिव्यापारमूतयोश्च लिष्टप्रयोगेण मुक्तिफलकत्वं भक्त्येकफलकत्वञ्चैव सदृष्य प्राप्यते-"अविधषा मृखु तीर्त्या विद्ययाऽमृतमश्नुत" इति । पुष्टि- मागीयाणां मर्यादामार्गस्याऽपि तथोपयोगाभावात्तु मुख्यपक्षोऽत्र व्याख्यातः । विस्तरस्त्वाकरेभ्योऽवसेयः । भगवल्लीलारूपायाः सृष्टेः पुष्टिप्रवाहमादाभेदै- बालभाप्यविभूषिता । अन्यदेवाऽऽहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्वयाचचक्षिरे ॥ १३ ॥ खैविध्यात्रिविधानप्यधिकारिणोऽनुगृहसत्र सत्र प्रावाहिकानपि पुरुषार्थान् वेद एव निरूपयति यद्यपि तथापि भगवद्भक्तावेव तात्पर्यान्न प्रच्यवते । लीला- निरूपकत्वात् । अनुचरलात् । “कचिदजयाऽऽस्मना च चरतोऽनुचोनिगम" इति वाक्यात् । तस्मात्मावाहिक्योरेवाऽविद्याविद्ययोरतमःप्रवेशः फलं तयो- रेव च प्रतिषेधः । पुरुषार्थानामपि तादृशामेव तिरस्कारः । तेन न कश्चित्य- त्यवस्थानावसर इति सर्व चतुरसम् । तदेतदुच्यते-~अन्धं तमः प्रविश- न्तीत्यादिना । सम्मृतिः प्रावाहिको मोक्षो वादिबुद्धयनुसारी । भवतेमध्ये तिन् । भवनं भूतिः । सम्यग्भूतिः सम्भूतिः । जन्ममरणराहित्यं मागुपपादितस्यरूपं सम्यक्त्वम् । तदतिरिक्ता आसुरी सम्पदसम्भूतिः। विनाश इति यावत् । उक्तवादिवुद्धयनुसारेणेत्येव । नाऽऽमुरामिप्रायेण । तेषां बुद्ध्या निवर्गस्थैव केवलस्य सम्भूतित्त्वात् । नापि स्वाभिप्रायेण । तथा सति सम्भूतेस्तमःप्रवेश- फलकत्वकथनायोगात् । वदतो व्याघातेनाऽनौचित्यात् । स्वप्रक्रियानुसारेण तयोईयोरपि सम्भूतिताया अभ्युपेप्यमाणत्वाच । अन्यान्युपगतयोयोरप्यस. म्भूतिताया अभिप्रेयमाणत्वाच । स्वतन्त्रपुरुषार्थतया भक्तरेव वस्तुतः सम्भू- तित्याभ्युपगमाच । तयोः फलकथनं तु स्वाभिप्रायेणाऽज्ञानुग्रहार्थम् । तेन स्वाभिमतयोः प्रकारान्तरापन्नत्यमुक्तम् । पूर्व कारणभूतयोपियाविषयोस्तमः- प्रवेशः फलमित्युक्तम् । इह तत्कार्ययोस्तमःप्रवेशः फलमित्युच्यते । पर्याव- सानत आरम्भादपि च । तदर्थमेव "अन्य तमः प्रविशन्ती"ति पुनः पृथग- नुवादः॥१२॥ प्रकृतेन सझमयन्ती फलितमनुवदति-अन्यदेवाऽऽहुरित्यादिना । सम्भवात् । सम्भूतेः । भगवद्भक्तिरहितया केवल्या विद्यया साध्यानिस्सम्बो- धात्मकाचत एवं तमःपर्यवसन्नान्मोक्षादित्ययः । अन्यदेव । अतिविलक्षण- मेव भकिमार्गीय फलं साधनञ्च मोक्षादप्युत्कृष्टतममाहुः । भरिमार्गीया हि नैकान्ततोऽध्यासनिवृत्तिमिच्छन्ति । प्रत्युत सहातमपि वान्छन्ति । तथाहि- ९ देशा ईशावास्योपनिषद् । "तज्जन्म तानि कर्माणि तदायुस्तन्मनो वचः । नृणां येनेह विश्वात्मा सेव्यते हरिरीश्वरः" "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत्" "विधत्स्व कर्णायुतमेष मे वरः" "प्रयुज्यमाने मयि तां शुद्धां भागवती तनुम्" "देवदत्वामिमां वीणां स्वरब्रह्मविभूषिताम् । मूर्च्छयित्वा हरिकथां गायमानश्चराम्यहम्" "अहो देव- पिर्धन्योऽयं यत्कीति शाईधन्वनः । गायन् माधन गिरा तन्या रमयत्यातुरं जगत्" "सोऽश्नुते सर्वान् कामान्" "अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः" "भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गै- स्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देव हेतं यदायुः" "स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः" "आप्यायन्तु ममाऽनानि" "सम्पद्याऽऽवि- र्भावः खेन शब्दात्" "ममाऽस्तु तव सन्निधौ तनुनवत्वम्" "ब्रह्मानन्दे प्रविष्टानामात्मनैव सुखप्रमा । सङ्घातस्य विलीनत्वाद्भक्तानां तु विशेषतः। सर्वेन्द्रियैस्तथा चाऽन्तःकरणैरात्मनाऽपि हि । ब्रह्मभावातु भक्तानां गृह एव विशिष्यत" इति । न चैतावता तेषां संसार इति वाच्यम् । अन्य- दाहरसम्भवात् । असम्भवः । असम्भूतिः । संसारेण विनाश इति यावत् । तस्मादन्यदाहुः । अतिविलक्षणमाहुः । नित्यमुक्तत्वात् । अविद्याविद्ययोरुम- योरपि निवृत्तत्वात् । तदुक्तम्-'भगवदीयत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः। मत्से- वया प्रतीतञ्च सालोक्यादिचतुष्टयम् । नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत्का- लविण्ठलम् । सालोक्यसार्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः । न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ट्यं न सार्वभौम न रसाधि- पत्यम् । न योगसिद्धीरपुनर्मवं वा समञ्जस त्वा विरहय्य काझे । नारायणपरा लोके न कुतश्चन बिभ्यति । स्वर्गापवर्गनरकेप्वपि तुल्यार्थदर्शिनः । तस्माद्धा. रत सर्वात्मा भगवान् हरिरीश्वरः । श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च सर्तव्यश्चेच्छता- ऽभयम् । यत्कर्मभिर्यतपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् । सर्व मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेजसा । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां वरन्ति ते । विष्णोरनुचरत्वं हि मोक्षमार्मनीषिणः । मुक्तः प्रतिज्ञानात् । सम्पद्याऽऽविर्मावः खेन शब्दा- दिति । किञ्च । नित्यमुक्तस्स ब्रह्मणः सृष्टिकरणं श्रीशिवस्य तादृशस्य संहार- बालभाध्यविभूपिता। । करणं व्यामोहकमतप्रवनश्च प्रियव्रतस्य ध्रुवस्य प्रसादस्य राज्याधिरोहणं पापड- वानां द्रोणादिहननं राज्यकरणञ्चेत्यादि च सर्वमन्त्रोदाहरणम् । “सर्वधर्मान् परि- स्यज्य मामेकं शरणं अज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः । मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्प- रायण" इति श्रीमुखवचन "स्वयाऽहं सोषितः सम्पावेदगर्भ सिसक्षया । चिरं भृतेन तपसा दुस्तोपः कूटयोगिनामि"ति च श्रीमुखवचन "अयमेवाऽस्मिन्छास्त्रे मुख्यः सिद्धान्तः । यो भगवत्कर्तव्यं करोति महता प्रयलेन स मुख्यः । यस्तु भगवत्सेवां करोति स मध्यमः । यस्तु स्वार्थ भगवन्तं सेवते सोऽधम इति । नह्मणा त्यायः पक्षः कृत इति भगवानतितुष्टः । तदाह-सम्यगिति । कथं ब्रह्मणाऽयमों ज्ञात इति तत्राऽऽह-वेदगर्भति । वेदा गर्ने यस्स । वेदानामि- दमेव तात्पर्य यद्भगवत्कार्य कर्तव्यमिति । अत एव सर्वन-प्रजापतिरकाम- गत मजाः सजेयेति । ब्रतको प्रज्ञाकामाः प्रजा नाविन्दन्त । तेऽकाम- यन्त प्रजार सृजेमहि प्रजामवन्धीमहि प्रजां विन्देमहि प्रजायन्तः स्यामेति । अमिहोनं जुहोति । यदेव किञ्च यजमानस्य स्वं तस्यैव ततः सिञ्चति प्रजनन इति । अन्यथा लौकिकार्थपरत्वे वेदानामनुवादकत्येनाऽप्रामाण्यं स्यादि"त्येषा तत्रत्या श्रीसुबोधिनी च द्रष्टव्या । "कचिदेतच्छुतं पार्थ स्वयैकाग्रेण चेतसा । कञ्चिदज्ञानसम्मोहः प्रणष्टस्ते धनञ्जय | नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा स्वत्प्रसादा- न्मयाऽच्युत । स्थितोऽसि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव । व्यवहितपृतना- मुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद्विमुखस्य दोपवुझ्या । कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्च- रणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु" इत्यादीनि रचनानि "सोद्धारमयलामा कृष्णः प्रादुर्बभूव ह । तथात्वं येन संसिद्धयेत्तदर्थ व्यास उक्तवान् । श्रीभाग- वतमत्यन्तं सर्वेषां सुखदायकम् । तस्याऽपि तत्त्वं येनैव सिद्धयेदिति विचार्य हि । अमिश्चकार तत्त्वार्थदीपं भागयते महत् । तथाऽपि येन संसिद्धयेद् व्याख्यानं तन्निरूप्यते । तस्यैयाऽऽत्मानुभावप्रकटनहृदयस्याऽऽज्ञया प्रादुरा- सीझूगो यः सन्मनुष्याकृतिरतिकरुणस्तं प्रपद्ये हुताशमिति सिद्धान्ताद् "भुवि भक्तिमचारेककृते स्वान्ययकृत्पिता । मदर्चसापने श्रद्धा स्वतः संहत्य चोद्यम" इत्यादीनि च वचनानि तन्त्र तत्राऽनुसन्धेयानि । तस्माद्भचिमार्गो मोक्षादप्यति- ईशावास्योपनिपद् । सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभय५ सह । विनाशेन मृत्यु ती. सम्भूत्याऽमृतमभुते ॥ १४ ॥ विलक्षणः संसारादप्यतिविलक्षणः खतन्त्रो मुख्यो महाफलः सर्ववेदार्थभूत- श्चेति स्थितम् । शेषं प्राण्याख्यातम् ॥ १३ ॥ सम्प्रति कथमेप भक्तिमार्गः प्राप्यः । कथमन्यत्र तमःपर्यवसन्नयोरनर्थ- रूपयोरसाधनयोश्चाऽत्र साधनीभावः । कथश्च तेजस्तिमिरवद्विरुद्धस्वभावयो- रैकाधिकरण्यमित्याकालायां ब्रह्मयादद्वारा सर्वमिदमुपपन्नमित्यभिप्रायेणाऽऽह- सम्भूतिमित्यादि । अयमर्थः । ब्रह्मैव तावद्रमणेच्छया खयमेवोपादानं स्वय- मेव च निमित्तं भवदविकृतमेवाऽखिलजगद्रपेण परिणमति । तेनाऽखिलमपि जगलात्मकम् । न ततो भिन्नम् । एवंचिद्भयमतिवर्त्तते । अनेवंविदस्तु मृत्युभवति । अद्भुतकर्मत्वं सर्वशक्तिमत्त्वमात्मत्वं नियामकत्वमधिपतित्वं बन्ध- मोक्षाधीशत्वं श्रेयस्त्वं प्रेयस्त्वं शरणीकरणीयत्वं भजनीयत्वं विरुद्धसर्वधर्मा- श्रयत्वमसाधनानामपि साधनीभावसम्पादनसामर्थ्य च तस्य तावता व्युत्पन्नम् । जगतश्च सर्वस्य तदधीनोत्पत्तिस्थितिसंहृतिकत्वम् । एवमादिस्वरूपो ब्रह्मवादः। तथाच माहात्म्यज्ञाने सत्यात्मत्वात्परमस्नेहोदयावश्यम्भावाचाशभक्तिमार्ग- लाभः । सर्वभवनसमर्थे ब्रह्मणि लोकदृष्टपरस्परविरोधानां धर्माणामविरोधेन स्थितेरावश्यकत्वात्तदभेदाध्यवसाये भक्तिमार्गीयस्य ब्रह्मभूतत्वेनोभयत्रोभयोर- विरोधेन स्थितिसम्भवान्न काचिदनुपपत्तिः। तथा सत्यप्राकृतत्वे तयोःप्राकृतीभ्यां ताभ्यां सामानाधिकरण्यविघातकदोपराहित्यलक्षणं परस्परानुकूल्यलक्षणश्च वैलक्षण्यम् । अद्भुतकर्मत्वादसाधनानां साधनीकरणाचयोरप्यसाधनयोः साधनी- करणं नाऽनुपपन्नम् । तच शोधनादिसस्काराहामकादीनां दोपनिराकरणेन गुणोचेजनवदविद्याविद्ययोर्ब्रह्मवादसंस्कारेण संसारतन्निवृत्तिरूपफलासक्तिजन- काख्यं दोपं निराकृत्य भगवदासक्तिजनकतारूपगुणोत्तेजनम् । तथाहि । भगवत्कृपया सत्सङ्गलामे ब्रह्मवादश्रवणेन तत्सशिमगलाभे या रूपौदार्यादि- गुणश्रवणेन वा भगवचन्मार्गयोः सञ्जायमानया भक्तिप्रथमावस्थापनया रुच्याऽन्यत्र फरान्तरे मार्गान्तरे चाऽऽसक्तिः शिथिलीभवन्ती शनैस्ततो निवर्तते । भगवचन्मार्गयोः प्रचुरा भवति च । नाऽविद्याविद्ययोः स्वरूपतो ।
बालभाप्यविभूपिता ६९ दोपः । किन्तु फलतः । तथा सति दोपापगमे स्वरूपाज्ञानदेहादिचतुष्टयाध्या- साख्यपञ्चपर्वणां प्रत्युत निरतिशयभगवदासक्तिजनकतया गुणोचेजनान्न तेषां हेयत्वं प्रत्युतोपादेयत्वमेवेति प्राञ्जसमेतत् । स्वरूपाज्ञानं हि भावत्स्यरूपाद- न्यत्राऽऽसत्तिजनकं दुष्टम् । न भगत्स्वरूपलामेऽन्यथैव सिद्धेऽपि । बजलीलायां स्वयं भगयता सौन्दर्यमाधुर्यादिभिस्तत्सनिसझेन तच्छ्यणादिगिश्च मूढानां अजवासिनीनां स्वसिन्मनाकर्षणात्स्वरूपलामे सति वेदान्तोक्ततत्वरूपानानं फलस्याऽन्यथासिद्ध्यैव निवृत्ति नाऽपेक्षते । तन्निवृत्तिः कोपयुज्यते । न.च स्वरूपतो ज्ञानद्वारेव भगवत्स्वरूपलामः फलमिति वाच्यम् । तावतैव तनिधि विनैव ब्रमप्राप्तेरुपयर्णनात् । "ब्रह्म मां परमं प्रापुर्मरस्यरूपाविदोऽवला" इति वाक्यात् । तथा सति पश्चानान्तरीयकं स्वरूपज्ञानमपि जायते न घेत्य- न्यदेतत् । फलस्याऽन्यथैव सिद्धत्वात् । "पूर्वमर्षदि"ति श्रुतेः । तेन "ब्रह्मविदा- मोति परमि"त्यादिश्रुतयो मर्यादापरा भवन्ति । तदिदं "गतेरर्थवत्त्वगुभ- यथाऽन्यथा हि विरोध" इत्यधिकरणे व्यवस्थापितं श्रीमद्रिासचरणैः । मादायागपि भक्तिमार्गे-"अविजिपसोऽपिपास" "अविनाशी या अरे अयमात्मे"त्यादिश्रुतीनां सङ्कोच आवश्यकः । अन्यथा प्रेमसेवाया अन- यसरापत्तः । मक्तिपरिपाके स्वरूपक्षानमप्यवान्तरं भवतीति भवतु । तसा- रस्वरूपाज्ञानं विगाढभावजननद्वारा भक्तिमार्गोपकारकम् । श्रावयति हि- "विनाशेन मृत्यु तीर्खेति भगवदत्यन्तस्मृतिसन्ततिजननद्वारा स्वरूपा- ज्ञानादीनां मृत्युतारकत्वम् । भगवदत्यन्तविस्मृतेरेव मृत्युत्वस्य परिभाषित- त्वात् । "विषयामिनिवेशेन नाऽऽत्मानं यत्सारेत्पुनः । जन्तो कस्यचिद्धेतो- Vत्युरत्यन्तविस्मृतिरिति वाक्यात् । जन्मसहचरित एव या मृत्युः । “कामा- गोध्यो गयाकंसो देपावैचादयो नृपा" इत्यादिवावयेन स्वरूपसम्बन्धमात्रेण पुरुषार्थसिद्धिरनर्थनिवृत्तिश्च स्वरूपाज्ञानादिनिवृतिनिरपेक्षतया सार्य्यते । एवं विद्याऽपि पूर्वोक्षया रीत्या भगवद्रुची जातायां भगदितरेषु मोक्षान्तपुमर्थेषु वैराग्यजननेन अन्यबाऽऽनात्मत्वप्रतीतिपूर्वकेण भगवन्मान आगत्वनिश्चयेन साइयेन भगवति चिचनिरोधात्मकेन योगेन भगवद्विरहात्मकेन तपसा भग- पति परमलेहात्यया भक्त्या च भकिमार्गमुणकरोति । न भगवद्वयतिरेकेण ।
ईशावास्योपनिषद् । ७० ज्ञानमोक्षादौ सञ्जयति । तथाचैवं ब्रह्मवादसिद्धान्तस्वीकारेण सर्वाशक्कापकाए. गमे न कश्चिदपि सन्देहावसरः । तदिदमाह-सम्भूतिमित्यादिना । यः । भगवत्कृपाविषयः प्रावाहिकेभ्यो व्यवच्छिन्नः । सम्भूतिम् । मोक्षम् । विद्या- कार्य प्रावाहिकम् । तमःप्रवेशसमुच्चयार्थश्चकारः। विनाशम् । असम्भूतिम् । अविद्याकायं जन्ममरणपरम्पराजनकं देहगेहाद्यासक्तिरूपं संसारम् । अन्ध- तमसप्रवेशसमुच्चयार्थश्चकारः । उभयम् । भक्तिमार्गदृष्टयोभयोरपि तुल्य- द्रष्टव्यताकत्वेन समुदितं द्वयम् । तद् । भगवदभिन्नं भगवदिच्छाधीनतया स्वयं निर्दष्ट हेयोपादेयतयोरविषयं भगवद्वैमुख्यसांमुख्याभ्यां व्यवस्थितहेयो- पादेयताकं भक्तिसाधकं भक्तावावश्यकं भगवत्समाराधनसाधनभूतं नेहश्रद्धा- चातुर्यादिपर्यवसन्नम् । वेद । जानाति । सह । भगवद्वैमुख्य द्वयोः सहैव युगपदेव हेयत्वं भगवत्साम्मुख्ये च सहैव युगपदेवोपादेयत्वम् । पदच्छेदो वा पूर्ववत् । सः । हेति हर्षे । कुपथपरित्यागेन शुभपथप्राप्तेः । विनाशेन । प्रावाहिकविद्यावत्समयप्रसिद्धेन जन्ममरणपरम्पराप्रवर्तकेन स्वरूपाज्ञानादिनिब- न्धनेन । विरोधिनाऽपि । हेयेनाऽपि । अद्भुतकर्मत्वानुसन्धानार्थमेतत् । भक्तिमदृष्ट्या च वस्तुतो भगवदतिरिक्तेषु विषयेषु रागविनाशेन भगवत्चत्परता. पर्य्यवसायिना । देहगेहाद्यासङ्गेन । मृत्युम् । अविद्यावतां चक्राकारेण पुनः पुन प्राप्तम् । भगवद्विस्मरणात्मकं लौकिकञ्च । तीर्खा । व्यपोह्य । सम्भूत्या । प्रावाहिकविद्यावतो दृष्टया मोक्षत्वेनाऽभिमतेन विद्याकार्येण । भक्तिमदृष्टया हेयेनाऽपि । अद्भुतकर्मत्वानुसन्धानार्थमित्येव । वस्तुतो भक्तिमदृष्ट्याऽनन्यभक्ति- भरेण भगवदनुमहजन्येन साकारब्रह्मवादसिद्धान्तस्वीकारद्वारा सम्पादितेन । अमृतम् । सालोक्यादिलक्षणं मोक्षं च कथामृतं च परमप्रेमामृतं च भगव- ल्लीलासाक्षात्कारामृतं च भगवल्लीरालाभामृतं च भगवदधरामृतं च । अनुते । अगिनिविष्टः सन्नाखादयतीत्यर्थः ॥ १४ ॥ एवमीशाऽऽवास्यमित्यादिभिरष्टामिर्मत्रैः साकारब्रह्मवादमुपदिश्य अन्धं तमः प्रविशन्तीति पड्मिमनःप्रतिमताभिमतं निरस्य स्थूणानिखननन्यायेन स दृढी- कृतोऽवश्योपादेयता च तस्य समर्थिता । अथाऽऽचार्यवान् पुरुषो वेद । आचार्यदेवो भव । तद्विज्ञानार्थ स गुरुमेवाऽभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्म पालभाष्यविभूषिता। हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूपनपाणु सत्यधर्माय इष्टये ॥ १५॥ निष्ठम् । गुरोरनुग्रहेणैव पुमान् पूर्णः प्रशान्तये । आचार्यायेव विदिता विद्या साधिष्ठं प्रापयति । तस्माद्गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् । शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाभयम् । विजितहृषीकवायुमिरदान्तमनस्तुरगं य इह यतन्ति यन्तुमतिलोलमुपायखिदः । व्यसनशतान्विताः समवहाय गुरोध- रणं वणिज इवाइज सन्त्यकृतकर्णधरा जलयौ । आचार्योपासनं शौचम् । यस देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता द्याः प्रकाशन्ते महा- त्मनः । गुरुकर्णधारमि"त्यादिमित्रचनैराचार्योपासनस्य परमावश्यकत्यादन्यथा "श्रवणायाऽपि बहुमियों न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि यहवो यन्न विद्युः । आश्चयों वक्ता कुशलोऽस्म लब्धाऽऽश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः । उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । उत्तो त्वस्मै तन्वं विसो जायेव पत्य उशती सुवासाः।" इत्युक्तरीत्योपदेशस्य नष्फल्यापतेर्गुरुकृपयैव च तत्म- काशेन साफल्याच "नाऽहमिज्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन वा । तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया यथेति भगवद्वाक्याद्गुरुकृपां विना भगवत्कृपाया अप्यमावाचाऽऽचार्योपासनमानुपदिशति-हिरण्मयेन पानेणेत्यादींश्चतु- रचतुर्णा पुमर्थानां प्राप्तिस्तस्कृपयैव नाऽन्यथेत्यभिप्रायेण । तत्र मुख्यमाचा- यंत्वं भगवदेकविश्रान्तम् । तथाहि । "आचार्य्यचैत्यवपुपा स्वगतिं व्यनक्ति । आचार्य मां विजानीयात् । त्वं सद्गुरुनः परमं च दैवतम् । कृष्ण बन्दे जगद्गुरुम् । विमुक्तिदो नः परमो गुरुभवान् । यत्सेवया तो निधुनोत्यसन्मति अन्थि स भिन्द्यादुदय स नो गुरुः । भूयात्स ईशः परमो गुरोगुरुः । न यम- सादायुतमागलेशमन्ये च देवा गुरवो जनाः स्वयम् । क समेताः प्रभवन्ति पुंसस्तमीश्वरं त्वां शरणं प्रपद्ये । अचक्षुरन्धस्य यथाऽपणीः कृतस्तथा जनस्या- ऽविदुषोऽबुधो गुरुः । त्वमदृक् सर्वदृशां समीक्षणो वृतो गुरुनः स्वगति बुभुत्सताम् ।" इति । तेनाऽऽचार्योपासनमन्त्रा भगवदुपासनमन्त्रा एव । आचा- संपापुरस्सरा हि मगवत्कृपेत्याचार्यधर्मपुरस्कारेणैव भगवानात्मसिद्धान्त ૨ ईशावास्योपनिषद् । . ज्ञापयस्वित्यभ्यर्थनार्था इति । आत्मसिद्धान्तं ज्ञापयंश्च भगवानाचार्यो भवति प्रथमतः । आचार्यो भवंश्च भगवत्तां तत्रोपसर्जनीकुरुते तदनुप्राणनेन फलप- यवसायित्वार्थम् । यदि वक्ष्यमाणान् यमत्वादीन् धर्मानन्यथाचरणशीलेपु न प्रकटयेदाचार्यभवनं तैर्निष्फलीकृतं भवेत् । एवं सत्याचा-तिक्रमो भगव- स्कोपकारणमतिघोरकठोरयथानिर्दिष्टदण्डप्रचण्डः सर्वथैव परिहर्तव्यः । “सद- नुग्रहो भवानि"ति · वचनादाचार्य्यपक्षपाती भगवानाचार्यातिकम स्वल्पमपि नक्षमते । आचार्यानुगान् परिरक्षति। तत्प्रतिकूलांश्च कवलीकुरुते प्रणाशयति । अर्वाचीनानामाचार्य्यता तत्परम्पराप्रवर्तनादिनोपचरिता । आचाउनुसरणं श्रेयोर्थिनः सर्वथा सांतिशयप्रयोजनम् । तथाचाऽऽचार्यधर्मेस्तैस्तैस्तदने- भगवद्धर्मेश्च तैस्तैर्भगवन्तमेवोपदिष्टार्थयाथातथ्यप्रकाशाद्यभिमतायाप्तये गुरुशि- प्यावुभावप्यावश्यकत्वाच्चतुभिर्मन्त्रैः प्रार्थयमानौ प्रपद्येते । तथाच श्रुत्यन्त- रम्-"सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्य करवावहै । तेजसि नावधीत- मस्तु मा विद्विपावहै" इति । तत्र प्रथमेन मन्त्रेण "अजिज्ञासितमद्धों गुरुं मुनिमुपाब्रजेदिति न्यायेन भगवद्धर्मलाभतद्विज्ञानार्थाय प्रतिबन्धात्मकाज्ञा- ननिरासमुभयोः काम्यत्वाय तेनैव धर्मसिद्धये च तमेव चराचरगुरुं श्रीहरिं शिष्येण सह गुरुः प्रार्थयत इत्याह-हिरण्मयेनेत्यादिना । यथा खल्वति- स्पृहणीय वस्त्वन्यो मा द्राक्षीमा हाञ्चिनि हिरण्मयेन पात्रेणाऽऽच्छायते । तेन हि तस्याऽदर्शनं हिरण्मयस्यैव दर्शनम् । हाते लिप्सा नाऽज्ञाते । हिरण्म- येन पात्रेणाऽऽच्छादितस्य न ज्ञानमिति न तत्र लिप्सा । हिरण्मयस्यैव ज्ञान- मिति जनस्य तत्रैव लिप्सा भवेत् । स तदुपयोगेनैव कृतार्थीभूय निवृत्तो नाऽन्तय॑स्तमवदधीत किमस्याऽन्तर्निहितमतोऽप्युत्कृष्टमिति । लोके तत उत्कृ- टाभावात् । हिरण्मयत्वाच्च न सदपनयने सामर्थ्य येनाऽन्तर्यस्तस्य ज्ञान सम्भवेत् । भारयत्त्वाद्रक्षकैरशून्यत्वाच । न हिरण्मयं पात्रं शून्यमुत्सृष्टं क्रियते । तथैव तावत् सत्यस्य ईशाऽऽवास्येत्यादिभिरष्टाभिर्मघैरुपदिष्टस्य साका- रब्रह्मवादापरपर्यायस्य पुष्टि भक्तिमार्गस्य मुखं मुखमिव स्थित्या मुखं द्वारं तत्प्र- वेशसाधन पुष्टि भक्तिमार्गीयगुरुद्वारा भगवच्छरणगमनम् । स्वरूपं या । मुख- मेव हि स्वरूपम् । मुख्यत्वात् । सत्यस्य भगवतो या । "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । ।
पालमाध्यविभूषिता। चिकेत्येव सत्यम् । सत्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म । सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपना" इत्यादिवचनशतेभ्यः । मुखं स्वरूपेण वाचा च परिचायक समवायिनः । परिचये प्रथमोपस्थितन्च । अन्यतिरेकि च । दर्शने पूर्णेन्दुवदत्यन्ताहादकम- दर्शने चाऽतिशयिततापात्मकम् । फलात्मकश | वाक्पतिरूपश्च । अग्निरूपश्च । आचार्यरूपश्च । मुखेनैव हि आचार्यकृत्यं क्रियते । उपदेशादिकरणात् । भगवन्मुखस्याऽऽचार्यतायां को विवादः । वस्तुतो मुखस्वाऽऽचार्यत्वाचत्म- युक्तत्वाद्भगवत्याचार्यतायाः । एते धर्मा भगवन्मुखे विराजन्ते । एत एव धर्माः साकारत्रमावादमवर्तकाचार्य्यवर्य श्रीमदासमाचार्यचरणानां मुखावता- रतां निरूपयद्भिः साम्प्रदायिकैः श्रीमदाचार्याचरणेषु निरुप्यन्ते । तथा सत्य- न्योन्यपत्यभिज्ञानजननस्य नाप्राप्ततया श्रीमदाचार्यचरणस्वरूपनिरूपणमिद- मिति लभ्यते । प्रत्यभिज्ञयैव हि श्रुतदृष्टयोरैक्यगयसीयते । देशकालावस्या- दिगेदेन पृथगनुभूतयोश्च । मुखावतारता श्रीमत्प्रभुचरणैनिरूपिता । "दयया निजमाहात्म्यं करिष्यन् प्रकटं हरिः । वाण्या यदा तदा स्वास्स मादुर्भूतं चकार हि । श्रीकृष्णास्सं कृपानिधिः । श्रीकृष्णास्य देवता चेति । "साक्षात्स्वरूप- सम्बन्धिनां स्वरूपं तत्सम्बन्धिन एव जानन्ति न स्वन्य"इति सिद्धान्तश्च श्रीय- मनाटकविवृतिसमाप्ही श्रीमत्प्रमुचरणयुत्पादितः । किश्च । आत्मानुभावप्रकट- नदयस्य भगवत आजया प्रादुर्भूतैः श्रीमदाचार्यचरणश्च निजजावत्सलैः स्वस्वरूपं प्रकटनीयमेव नाऽतिगोप्यमिति तैरपि तत्र तत्र स्वखरूपं सूचित- मेव । तथाहि । “अमिश्चकार तत्त्वार्थदीपं भागवते महत्। "अर्थ तस्य विवे. चितुं न हि विभूवैश्वानराद्वारपतेरन्यस्तत्र वियाय मानुषतर्नु मां व्यासपच्छी- पतिः । दत्त्वाऽऽज्ञाय कृपावलोकनपटुर्यमादतोऽहं मुदा गूढार्थ प्रकटीकरोमि सततं व्यासस्य विष्णोः प्रियमि"ति । एवमन्यत्राऽपि । अमिश्च मुंसं वाप- तिथेत्यादि पुरस्तादुपपादयिप्यते । "तत्त्वं पूषन्नपावृषि"तीहाऽपि मुखमाक- व्यमेव पार्थ्यत इत्यवतारपर्यन्ततायां पूपनिति सम्बुद्धया पुष्टिमार्गाचार्य्यता- याच न प्रमाणान्तरं मृग्यम् । विशिष्योपरियाद्विस्पष्टयिष्यामः । अनुभूयन्ते च सैराधकर्मगवन्मुखधर्माः श्रीमदाचार्यचरणेप्विति नाऽन श्रीमदाचार्यचरण- निरूपणतायां कश्चिदपि सन्देह इति दिक् । हिरण्मयेन पात्रेणाऽपिहितमि. १. ईशा.
७२ ईशावास्योपनिषद् ।' ज्ञापयत्वित्यभ्यर्थनार्था इति । आत्मसिद्धान्तं ज्ञापयंश्च भगवानाचार्यों भवति प्रथमतः । आचार्यो भवंश्व भगवतां तत्रोपसर्जनीकुरुते तदनुपाणनेन फलप- यवसायित्वार्थम् । यदि वक्ष्यमाणान् यमत्वादीन् धर्मानन्यथाचरणशीलेषु न प्रकटयेदाचार्य्यमवनं तैनिएफलीकृतं भवेत् । एवं सत्याचा-तिक्रमो भगव- कोपकारणमतिघोरकठोरयथानिर्दिष्टदण्डप्रचण्डः सर्वथैव परिहव्यः । “सद- नुग्रहो भवानि"ति वचनादाचार्य्यपक्षपाती मगवानाचा-तिक्रमं स्वल्पमपि नक्षमते। आचार्यानुगान् परिरक्षति। तत्प्रतिकूलांश्च कवलीकुरुते प्रणाशयति । अर्वाचीनानामाचार्य्यता तत्परम्पराप्रवर्तनादिनोपचरिता । आचा-नुसरणं श्रेयोर्थिनः सर्वथा सातिशयप्रयोजनम् । तथाचाऽऽचार्यधर्मेस्तैस्तैस्तदङ्गै- भगवद्धर्मेश्च तैस्तैर्भगवन्तमेवोपदिष्टार्थयाथातथ्यप्रकाशाद्यमिमतावाप्तये गुरुशि- प्यावुभावप्यावश्यकत्वाचतुभिर्मन्त्रैः प्रार्थयमानौ प्रपद्यते । तथाच श्रुत्यन्त- रम्-"सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्य करवावहै । तेजखि नावधीत- मस्तु मा विद्विपावहै" इति । तत्र प्रथमेन मन्त्रेण "अजिज्ञासितमद्धों गुरुं मुनिमुपावजेदि"ति न्यायेन भगवद्धर्मलाभतद्विज्ञानार्थाय प्रतिबन्धात्मकाज्ञा- ननिरासमुभयोः काम्यत्वाय तेनैव धर्मसिद्धये च तमेव चराचरगुरुं श्रीहरिं शिष्येण सह गुरुः प्रार्थयत इत्याह-हिरण्मयेनेत्यादिना । यथा खल्वति- स्पृहणीय वस्त्वन्यो मा द्राक्षीन्मा हापचेति हिरण्मयेन पानेणाऽऽच्छाद्यते । तेन हि तस्याऽदर्शनं हिरण्मयस्यैव दर्शनम् । ज्ञाते लिप्सा नाऽज्ञाते । हिरण्म- येन पात्रेणाऽऽच्छादितस्य न ज्ञानमिति न तत्र लिप्सा । हिरण्मयस्यैव ज्ञान- मिति जनस्य तत्रैव लिप्सा भवेत् । स तदुपयोगेनैव कृतार्थीभूय निवृत्तो नाऽन्तर्यस्तमवदधीत किमस्याऽन्तर्निहितमतोऽप्युत्कृष्टमिति । लोके तत उत्कृ- प्याभावात् । हिरण्मयत्वाच न तदपनयने सामर्थ्य येनाऽन्तय॑तस्य ज्ञान सम्भवेत् । भारवत्त्वाद्रक्षकैरशून्यत्वाच । न हिरण्मयं पात्रं शून्यमुत्सृष्टं क्रियते । तथैव तावत् सत्यस्य ईशाऽऽवास्येत्यादिभिरष्टामिर्मयेरुपदिष्टस्य साका- रब्रह्मवादापरपर्यायस्य पुष्टिभक्तिमार्गस्य मुखं मुखमिव स्थित्या मुखं द्वारं तत्प्र- वेशसाधनं पुष्टिभक्तिमार्गीयगुरुद्वारा भगवच्छरणगमनम् । स्वरूपं का। मुख- मेव हि स्वरूपम् । मुख्यत्वात् । सत्यस्य भगवतो वा । "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । - घालभाष्यविभूपिता । मृत्तिकेत्येव सत्यम् । सत्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म । सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्ना" इत्यादिवचनशतेभ्यः । मुखं स्वरूपेण वाचा च परिचायकं समवायिनः । परिचये प्रथमोपस्थितञ्च । अव्यतिरेकि च । दर्शने पूर्णेन्दुवदत्यन्ताहादकम- दर्शने चाऽतिशयिततापात्मकम् । फलात्मकञ्च । वाक्पतिरूपञ्च । अनिरूपञ्च । आचार्यरूपञ्च । मुखेनैव हि आचार्यकृत्यं क्रियते । उपदेशादिकरणात् । भगवन्मुखस्याऽऽचार्य्यतायां को विवादः । वस्तुतो मुखस्यैवाऽऽचार्यत्वाचत्प्र- युक्तत्वाद्भगवत्याचार्यतायाः । एते धर्मा भगवन्मुखे विराजन्ते । एत एव धर्माः साकारब्रह्मवादप्रवर्तकाचार्य्यवर्य श्रीमद्वल्लभाचार्य्यचरणानां मुखावता- रतां निरूपयद्भिः साम्प्रदायिकैः श्रीमदाचार्यचरणेपु निरूप्यन्ते । तथा सत्य- न्योन्यमत्यभिज्ञानजननस्य नामाप्ततया श्रीमदाचार्यचरणस्वरूपनिरुपणमिद- मिति लभ्यते । प्रत्यभिज्ञयैव हि श्रुतदृष्टयोरैक्यमवसीयते । देशकालावस्या- दिभेदेन पृथगनुभूतयोश्च । गुखावतारता श्रीमत्प्रभुचरणैर्निरूपिता । "दयया निजमाहात्म्यं करिष्यन् प्रकटं हरिः। वाण्या यदा तदा स्वास्यं प्रादुर्भूतं चकार हिं । श्रीकृष्णास्यं कृपानिधिः । श्रीकृष्णास्य देवता चेति । "साक्षात्स्वरूप.. सम्बन्धिनां स्वरूपं तत्सम्बन्धिन एव जानन्ति न त्वन्य"इति सिद्धान्तश्च श्रीय- मुनाष्टकविवृतिसमाप्तौ श्रीमत्प्रभुचरणैयुत्पादितः । किश्च । आत्मानुभावप्रकट- नहृदयस्य भगवत आज्ञया प्रादुर्भूतैः श्रीमदाचार्य्यचरणैश्च निजजनवरसलैः स्वस्वरूपं प्रकटनीयमेव नाऽतिगोप्यमिति तैरपि तत्र तत्र स्वखरूपं सूचित- मेव । तथाहि । "अमिश्चकार तत्त्वार्थदीपं भागवते महत्" "अर्थ तस्य विवे- चितुं न हि विमुर्वैश्वानराद्वाक्पतेरन्यस्तत्र विधाय मानुपतनुं मां व्यासवच्छ्री- पतिः। दत्त्वाऽऽज्ञाश्च कृपावलोकनपटुर्यनादतोऽहं मुदा गूढार्थ प्रकटीकरोमि सततं व्यासस्य विष्णोः प्रियमिति । एवमन्यत्राऽपि । अमिश्च मुखं वाक्य- तिश्चेत्यादि पुरस्तादुपपादयिष्यते । "तत्त्वं पूपन्नपावृण्वि"तीहाऽपि मुखपाक- व्यमेव प्रार्थ्यत इत्यवतारपर्यन्ततायां पूपनिति सम्बुद्धया पुष्टिमार्गाचार्यता- याञ्च न प्रमाणान्तरं मृग्यम् । विशिष्योपरिष्टाद्विस्पष्टयिप्यामः । अनुसूयन्ते च संराधकैर्भगवन्मुखधर्माः श्रीमदाचार्यचरणेविति नान श्रीमदाचार्यचरण- निरूपणतायां फश्चिदपि सन्देह इति दिक् । हिरण्मयेन पात्रेणाऽपिहितमि- १. ईशा.
ईशावास्योपनिषद् । त्यन्वयः। हिरण्यं हि काम्येषु प्रलोमकेपु व्यामोहकेषु च पदार्थेषु प्रधानतमम् । "स्तेनं मनोऽनृतवादिनी वागि"ति श्रुतेः । कलिनाऽधर्ममित्रेणाऽधिष्ठितश्चेति चैरकर लोमानर्थमूलञ्च । "लोमोऽनृतं चौर्य्यमनार्य्यमहो ज्येष्ठा च माया कल- हश्च दम्म" इति कलिमनुवर्तमानेनाऽधर्मपूगेनाऽऽक्रान्तश्च । तत् तथाविधसर्व- वस्त्वन्तरोपलक्षणम् । तन्मयेन । विविधविमोहक विषयावलीविपयकेण कामे- नेत्यर्थः । निरन्तरतचिन्तनेन तत्मचुरा हि कामाः । जातायेकवचनम् । पात्रेण । पात्याच्छादनादिनाऽन्येभ्यो यस्त्विति पात्रम् । स्वरूपाख्यफलस्याऽनुगृहीतक- भोग्यतया तेभ्य एव दानायाऽऽसुरेभ्यः पारोक्ष्याय च रक्षणम् । तदर्थार्थीय भगवता वेदादिद्वारा व्यामोहकशास्त्रान्तरैश्च प्रवर्तितस्वैस्तैः कामैरित्यर्थः । अपिहितम् । आच्छादितम् । निगूहितमिति यावत् । निगूढं जानन्त एवं केचिज्जानन्ति । न सर्वे । येऽपि पुरुषार्थमिच्छन्ति ते वेदविहितत्वाभिमानेन प्रबलवाग्जालेन चाऽशक्यनिराकरणतया भूरिमारभृन्ति ततन्नानाकामनाभिर्मू- ढानां कनककान्तिकमनीयानि शास्त्राणि दृष्ट्वा मुह्यन्तस्तान्येवाऽनुसरन्तो दृश्यन्ते न तद् द्रष्टुं लभन्ते येन तदमिवाञ्छेयुः । अथ केऽपि बिरलास्तदभिवाञ्छ- न्तस्तानि निराचिकीर्षन्ति सत्सम्प्रदायप्रवृत्तिमिच्छन्ति ते तादृशतत्त्वाच्छादक- कुशास्त्रनिष्णातैः पराभूताः प्रतिनिवन्ते । तेन भक्तिमार्गस्य च तदाचार्य- चरणानाञ्च साक्षाद्भगवतश्च स्वरूपमतिनिगूढं न सर्ववेद्यम् । अशक्यनिराकर- णानि च सर्वथा मोहकशास्त्राणि स्वभावरक्तस्य जनस्य स्वभावानुकूलानि भग- वदिच्छयैव प्रवृत्तानि निरधिकारेभ्यः स्वरूपगोपनपराणि । वेदोऽपि तावदा- सुरेभ्यो भगवत्स्वरूपं गोपायति भगवत्परोऽपि । तदेतदुक्तम्-हिरण्मयेनेत्या- दिना । भगवदिच्छयैव चैतत्सर्वमिति भक्तिमार्गवरूपावगमो न सर्वथैव जीव- प्रयलसाध्यः । तदर्थ भगवत्कृपा चाऽऽचार्यकृपा चैव प्रयोजिका । न जन्म- श्रुतैश्वर्यादि । "नाऽयमारमा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैप वृणुते तेन लम्य" इति श्रुतेः । “ग्जिन्म नस्त्रिवृद्विद्यां धिग्नतं धिग्ब- हुज्ञताम् । धिक्कुलं धिक् क्रियादाक्ष्यं विमुखा ये त्वधोक्षज" इति स्मृतेश्च । तदेतदाह-तत्त्वं पूषनपावृणु सत्यधर्माय दृष्टय इति । पुष्णात्यनुगृहाति पालमाप्यविभूपिता । ७५ तमोऽप्रसारणेन मार्गदर्शनेन चक्षुरादिप्रमाणानुग्राहकत्वेन निद्रालस्यादिदोप- दूरीकरणेन जाड्यनिरासेन च खविषयमिति पूपा। तत्सम्बुद्धौ-हे पूपन् । अनु- प्रहकखभाव । निरतिशयतेजोमय । अपरिच्छेद्यशक्ते । त्वम्। ईशः । तावका वयं खां शरणागताः मायामह इति भावः । तत् हिरण्मयं पात्रम् । त्वत्स्व- रूपाच्छादकं लौकिकेषु कामे प्रवर्तकं प्रगादतिमिरोपमं शास्त्रान्तरमिति या. वत् । अपाणु दूरीकुरु । उच्छिन्धीति यावत् । नाऽस्योत्सादस्त्वदितरकृति- साध्य इति भावः । तेन भगवति परमं दैन्यं निवेदितम् । “न ज्ञायते मग- वतो गतिरित्यवद्यमि"तिवज्जन्मादौ जुगुप्सा विरहश्लेशो "रुरुदुः सुस्वरं राजन् कृष्णदर्शनलालसा" इतिवद्भक्तिमार्गलाभार्थ वैलव्यञ्चाऽपि ध्वनितम् । अपाकर- णेन के पुरुषार्थ प्रेप्ससि । तत्राऽऽह-सत्यधर्माय दृष्टय इति । सत्यस्य धर्मः सत्यधर्मः। पुष्टिभक्तिमार्गः साकारलवादसिद्धान्तः । स एव हि सत्यो धर्म इति सत्ययाऽसी धर्मश्च सत्यधर्म इत्यपि । प्रोज्झितकैतवो धर्म इत्यर्थः । सत्यः अमायिकः । पुरुषार्थान्तरपर्यवसन्नो मायिकः । स च सकैतवः । अन्तर्बहिर्वि- संवादः फैतवम् । प्रतारणाशास्त्रत्वात् । मायिकाधिकारेण पुरुषार्थान्तरप्रयोज- नेन व्यवहारप्रवृत्तिनिमित्तेन नानाधिकारवशात्पृथक्प्रतिनियतत्वेन साधनानां सोशप्रचुरत्वेनाऽविशुद्धिक्षयातिशययुक्तत्वेन फलानां फल्गुतया भगवद्वैमुख्य- दृषितत्वेन च भक्तिमार्गतिरिक्ता धर्माः सकैतवाः । भक्तिमार्गस्यैव स्वतमपुरु- पार्थत्वं तत्राऽनभावापनानामेव धर्मत्वमन्यथा स्थितानामधर्मत्वमेवेति सिद्धा- न्तस्य सुव्यवस्थितत्वेऽप्यभिप्रायगोचरत्वेऽपि येयमितरेषां धर्मत्वोक्तिस्तत्वैतव- मेवेति । फैतवं माया चेत्यनन्तरम् । "ऋतेऽर्थ यत्पतीयेत न प्रतीयेत चाऽऽमनि । तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽभासो यथा तम" इति वाक्यात् । मायिकञ्चाऽलीकम् । भक्तिमार्गातिरिका माययैव धर्मवद्धासन्ते वस्तुतस्ते- ऽलीकाः । भक्तिमार्गानुगृहीतास्तु ते भक्तिमार्गानुकूलास्तहणेन गृह्यन्ते नालीका न भतारणार्थ इति न कश्चिदतिप्रसङ्गः । येषां हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्याऽपिहितं मुखं तेपामेव हरिमेघसो विमुखाना ते धर्माः । धर्मत्वाध्यय- सायस्तत्र तेषामेव । न भगवदीयानाम् । तस्मात्तानुच्छिन्धि । न धनुच्छिनेषु । ईशावास्योपनिषद् । तेषु सत्यधर्मलाभः सम्भवति जनस्य । तथाच निरन्तराया मुख्यमक्तिमार्ग- प्रवृचिरस्त्विति प्रार्थनायां लोट् । यद्वा । मुखमपावृणु प्रकटीकुरु । त्वया मुखस्य प्रकटीकरणाभावादेव हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्याऽपिहितं मुखम् । ततश्च भगवदिच्छैव भगवदावरणे कारणम् । मुखे प्रकटीकृते तिमिरावरणं विशीर्येत । भगवन्मार्गः प्रकटं परिदृश्येत । प्रचलितश्च स्यात् । मुखेनैव युप- देशादिना भगवन्मार्गो ज्ञाप्यते । वादितिमिरमपसार्यते । प्रवर्चमाने च भग- चन्मार्गे भगवदावरणं नाऽवतिष्ठेत । तदुक्तं प्रथमस्य पञ्चदशे "वासुदेवाङ्मय- नुध्यानपरिहणरंहसा । भचया निर्मथिताशेपकपायधिपणोऽर्जुन" इत्यत्र श्रीसुबोधिन्याम्-"जीवात्मावरणं माया । भगवदावरणं भगवदिच्छा । तत्र जीवावरणं भक्तिसहितज्ञानेनाऽपगच्छति । भगवन्माहात्म्यज्ञानपूर्वकभगव- द्विपयकपरमप्रेम्णा भगवत्सेवायां भगवदावरणमपगच्छती"ति । तदिदमनुम- हादेव कार्य्य जीवकृतिनिरपेक्षतयेत्याह-पूपनिति । तथैव विज्ञापयन्ति श्रीमत्प्रभुचरणाः-"कियान् पूर्व जीवस्तदुचितकृतिश्चाऽपि कियती भवान् यत्सापेक्षो निजचरणदाने चत भवेत् । अतः स्वात्मानं खं निरुपममहत्त्वं व्रज- पते समीक्ष्याऽमन्नेत्रे शिशिरय निजास्याम्बुजरसैरिति । तथाचेह मुख्या आचार्य्यता भगवन्मुखस्यैवाऽभिप्रेयते । तदैव वादितिमिरापसरणं भगवत्सेवा- मार्गज्ञानं मार्गप्रवृत्तिर्मगवदावरणापगमश्च । नाऽन्यथेति । तस्य चाऽऽवि. विः प्रार्थ्यते । स च पुष्टया केवलानुग्रहेण । नाऽन्यथा सम्भवतीति । तेन पुष्टिमार्गाचार्य्यत्वम्मुखस्याऽस्तीति भगवदावरणापगमरूपत्वमाविर्भावस्येति तथा सति स्वानुभावप्रकटनहृदय एव भक्तेषु कृपया भवेति पुष्टिमार्गाचा- र्यमुपसृतानां भगवल्लाभो भुव इति भगवदिच्छायामन्यथा सत्यामपि पुष्टिमा. र्गाचार्यानुग्रहबलं प्रवरमिति पुष्टिमार्गस्य निर्विचिकित्सप्रवेश्यत्यमुत्तमोत्तमत्वं निर्विमत्वमविनप्रसरत्वं सुलभत्वं निस्साधनजनोद्धारबद्धपरिकरत्वमकम्पानुक- म्पासम्पन्नत्वश्चेत्यादि च व्यजितमिति ज्ञेयम् । भगवति प्रार्थना च सर्वथा सफला । सुतरां भक्तिमार्गीया । “प्रार्थितः कामनां दद्यादि"ति सिद्धान्तात् । आविर्भावश्च प्रपञ्चेऽवतारपर्य्यन्त एव स्वारसिकः । सङ्कोचे मानाभावात् ।
७७
पालभाष्यविभूपिता ।
सम्प्रदायप्रवृत्या प्रत्यभिज्ञानाच्च । तथाहि । “कलिकालतमश्छन्नदृष्टित्याद्विदु-
पामपि । सम्प्रत्यविषयस्तस्य माहात्म्यं सममुद्भुवि । दयया निजमाहात्म्यं करिष्यन्
प्रकटं हरिः। वाण्या यदा तदा खास्यं प्रादुर्भूतं चकार ही"ति । "तस्यैवाऽऽत्मा-
नुमावप्रकटनहृदयस्याऽऽज्ञया प्रादुरासीद्भूमौ यः सन्मनुष्याकृतिरतिकरुणस्तं
प्रपये हुताशमिति । "शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहमि"ति च ।
अनोक्तश्रुत्यर्थो यथोक्तो निरूपित इत्यप्रमत्तेन मनसाऽवधेयमेतत् । किञ्च ।
मुखमपावृण्विति प्रपञ्च एवाऽवतारः प्रायंते । प्राकृते प्रपञ्चेऽवस्थिताभ्यां गुरु-
शिष्याभ्यां खोद्धारार्थ प्रार्थनात् । प्रपञ्च एव च प्राकृते यथोक्तवादितिमिरा-
न्ध्यस्य विजृम्भमाणत्वात् । अनाविर्भावहेतुक एव प्रपञ्चे तथाविधानोदय
इति तन्निवृत्त्यर्थं तत्रैवाऽऽविवस्याऽभीप्सितव्यत्वाच । तदिदं प्राकट्यं प्रपथे
श्रीमदाचार्यचरणाः । प्रसिद्धः। यश्च सत्यधर्मः स पुष्टिमार्गः । मायिकानि
व्यामोहकानि प्रतारकाणि तानि तानि मतान्तराणि हिरण्मयेन पात्रेणे-
त्यादिपूर्वार्धार्थः । अपावरणं यदुक्तं तत्प्रादुर्भावकालमारभ्य श्रीमदाचार्य-
चरणचरित्रं सर्व तत्तन्मतान्तरनिरसनदिग्विजयपुष्टिमार्गस्थापनकरूपम् ।
दृष्टय इति । दृष्टि विना परवशः परोक्तं मनुते । दृष्टिमांस्तु स्वयं
परीक्ष्यैव प्रवर्तते निवर्तते च । दृष्ट्वैव पदं न्यस्यति । नाऽधवत्परप्रत्यय-
नेयः । शास्त्रश्रद्धापारवश्यात्परम्परावशाद्वा यः स्वधर्ममनुवर्तते । त्यजति
या खलवचसि विश्वस्य । नाऽसौ दृष्टिमान् । किन्तु सतां सत्त्वमसतामसत्त्वं
सन्मार्गस्य सन्मार्गतामसन्मार्गाणामसन्मार्गता परीक्ष्य श्रीमदाचार्य्यचरणा-
दिस्वरूपे सर्वोत्तमत्वं सावधारणमवधार्य माहात्म्यज्ञानपूर्वकपरमप्रेम्णा भगवन्तं
सेवते यः सः । तादृशी दृष्टिमायिकमतान्तरानिराकरणे पुष्टिभक्तिमार्गानि-
रूपणे च न सिद्ध्यतीति दृष्टये तत्त्वं पूंपन्नपाण्विति पूर्वेण सम्बन्धः । द्वारद-
र्शनाय । प्रगाढतिमिरावृतस्य दर्शनं नास्तीति । सदसद्विवेकक्षमा दृष्टये । सम्प्र-
दायज्ञानाय । वरूपसाक्षात्काराय । श्रीमुखदर्शनेन परमानन्दात्मकफलानुभ-
वाय । श्रीमुखात्मकश्रीमदाचार्य्यचरणस्वरूपयाथाल्यदर्शनाय | "मिद्यते हृद-
यमन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चाऽस्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावर"
इत्युक्तमय हृदयग्रन्थिमेदाय सर्वसंशयच्छेदाय कर्मक्षयाय च | कृपादृष्टये ॥१५॥
ईशावास्योपनिषद् । पूपन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः। यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥ ननु तपश्शमदमसत्यखाध्यायप्रवचनादिभिः पुरुषार्थसिद्धेः किं मम प्रार्थ- नयेति चेत्तत्रापि त्वदानुकूल्य एव सर्वेषां साधनता नाऽन्यथेति स्वातध्येण भवानेव समाश्रयणीयः फलं च 'साधनं च सौकात्प्रबलतमाश्च प्रतिबन्धा भवतोऽपि पराक्रमेणैव परा कार्या इत्याद्यभिप्रायेणाऽऽह-पूपन्नित्यादि । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां त्वदनुग्रहप्रयुक्तैव सर्वेषां साधनानां साधनता नाऽन्यथा । तसादनुग्रहः प्रथमं साधनम् । त्वं चाऽनुग्रहशीलः । अनुग्रहशीलो हनुमहा- भ्यर्थनां नोपेक्षते । किन्त्ववश्यमेवाऽनुगृह्णाति । वस्तुतस्त्वनुगृहन्नेव वर्चसे । नाऽभ्यर्थनामप्यपेक्षसे । तसिंस्त्वयि प्रार्थनाऽपि प्रत्युताऽपराधः । तथाप्यनु- ग्रहेकशीलत्वान्न तानपि प्रेक्षसेऽमिवर्षसि चाऽनुग्रहम् । बहिर्मुखा एव हि वयं ग्लिश्यामः क्लिनीमश्च सहजखेहोपलालनीयं त्वाम् । न सम्मुखाः क्लिश्येम क्लिभीमहि च । साम्मुख्यमस्मभ्यं देहीति पूपनिति सम्वुद्धिव्याजेन प्रार्थनम् । ननु वेदार्थविदो मन्वादयो महर्पयो धर्मादीनभ्युदयसाधनमाहुर्न तेष्वनास्था युक्ता । “यद्वै मनुरवदत्तद्रेपजमि"ति श्रुतेः । इति चेत्चत्राऽऽह-एक इति । अयम्भावः । यद्यनुग्रहानुप्राणितानेव धर्मादीनभ्युदयसाधनं स्मरन्ति तदानीं विवादाभावः। "यमेष उन्निनीपति तं साधु कर्म कारयती"ति श्रुतेः। "अतः पुभिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः । स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरि- तोपणम् । किमलभ्यं भगवति प्रसन्ने श्रीनिकेतने । तुष्टे च तत्र किमलम्ध- मि"त्यादिस्मृतिभ्यश्च । अथ स्वातन्यात् । आसुरव्यामोहायैवेति निश्चयः । "जनान्मद्विमुखान्कुरु । हिरण्मयेन पात्रेण । बुद्धावतारे त्वधुना हरौ तद्वशगाः सुराः । नाना मतानि विप्रेषु भूत्वा कुर्वन्ति मोहनम् । यथाकथञ्चित्कृष्णस्य भजनं वारयन्ति हि । अयमेव महामोहो हीदमेव प्रतारणम् । यत्कृष्णं न भजेत्माज्ञः शास्त्राभ्यासपरः कृती"त्याद्युक्तेः । वैमुख्यान्यथानुपपत्तेः । व्यभि- चारान्यथानुपपत्तेश्च । “यत्करोपि यदनासि" "तपखिनो दानपरा" "नमे ७९ बालभाष्यविभूपिता । भक्तः प्रणश्यती"त्यादिभिर्विरोधात् । "ऋषयोऽपि देव युष्मप्रसङ्गविमुखा इह संसरन्ति । देवानां शुद्धसत्त्वानामृपीणां चाऽमलात्मनाम् । भक्तिर्मुकुन्द- चरणे न प्रायेणोपजायते । धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः । नोत्पादयेद्यदि रति श्रम एव हि केवलम् । धर्मः सत्यदयोपेतो विद्या वा तप- साऽन्विता । मद्भक्त्याऽपेतमात्मानं न सम्यक्प्रपुनाति हि । क्षीणे पुण्ये मर्त्य- लोकं विशन्ति । गतागतं कामकामा लभन्ते । प्रायश्चित्वानि चीर्णानि नारा- यणपरामुखम् । न निःपुनन्ति राजेन्द्र सुराकुम्भमिवाऽऽपगाः । ब्रह्मादयस्त- नुमृतस्तमसि स्वपन्तः । न तथा ह्यघवान् राजन् पूयेत तपआदिमिः । यथा कृष्णार्पितप्राणस्तत्पूरुपनिपेवया" इत्यादिवचनेभ्यश्च । तस्माद्भगवानेवैको वेद- वित् । तदनुग्रहादेवाऽन्ये वेदविदो न त्वन्यथा। "वेदविदेव चाऽहम् । इत्यस्या हृदयं लोके नाऽन्यो मद्वेद काश्चन । सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति । वेदैश्व सधैरहमेव वेद्यः । यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तसौ । तेने ब्रह्म हृदा य आदि- फवये मुन्ति यत्सूरयः । नाऽयमात्मा प्रवचनेन लभ्यः । मन्मना भव । सर्व- धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रजे" त्यादिवचनेभ्यः । त्वद्वचनानुरोधेनैवाऽन्येपा प्रामाण्यामामाण्यव्यवस्था । न खतन्त्रा । साम्मुख्यमुख्याभ्यां धर्माधर्मनि- र्णयः । स एप वेदार्थः। तद्वेत्ता भगवानेव । स एव स्वानुगृहीतांस्तं वेदयति कृपया । अन्यथा तज्ज्ञानमन्येषां गगनकुसुमायितमेव । तेन धर्मावबोधस्तद्धा- रणश्चाऽमायया दम्भादिराहित्येन भगवत्कृपाधीनम् । अनुगृहाण शरणागतान- मान् । उच्छिन्धि पापान प्रतिवन्धकानिति प्रार्थनार्था सम्बुद्धिः-एकऐं इति । नत्यशक्योच्छेदास्ते बलदर्पिताश्च बहवश्च मर्यकाकिना । पारलौकिकश्च दण्ड- स्तेपामावश्यको नाऽन्येन कर्तुं शक्यः । यमस्तत्र प्रभवति । यमः प्रार्थ्यता- मिति चेत्तत्राऽऽह-यमेति । रावणादिमियमोऽपि निर्जित एव । मृतसञ्जी- विन्यादिविद्यायोगश्च तेषामस्ति । तस्मान्न यमो यमः । किन्तु भवानेव यमः । "मृत्युः सर्वहरश्चाऽहम् । मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् । मृत्युर्धावति पञ्चमः । सर्वाणि नामानि यमाविशन्ति । सर्वे देवा यत्रैकं भवन्ति । स सर्वनामा स च सर्व- रूपः । यो देवानां नामधा एक एव । इन्द्रं वृत्रं वरुणममिमाहुरथो दिन्यः A सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विमा बहुधा वदन्ति अमिं यमं मातरिश्वान- ईशावास्योपनिपद् । ८० माहुः । तदेवाऽमिस्तद्वायुस्तत्सूर्य्यस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्रममृतं तद्ब्रह्म तदापस्स प्रजापतिः । वायुर्यमोऽमिर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । वेत्ताऽसि वेद्यञ्च परञ्च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप । पटवञ्च । यथा तरो- मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः। प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणि तथैव सर्वार्टणमच्युतेज्या । मच्छासनपुरस्कृतः । प्रभुरहमन्यनृणां न वैष्णवा- नाम् ।" इत्यादिवाक्येभ्यः । त्वां च तावकांश्च प्रद्विपत्सु यमवत् क्रूरस्सछा- श्वतेषु नरकेषु तानिक्षिप। "प्रभवन्त्युप्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः" "क्षिपा- म्यजसमशुभानासुरीप्वेव योनिपु" । भक्तांश्च तेभ्यो रक्ष । प्रहादादिवत् । यमादपि प्रसिद्धाद्रक्ष । गुरुपुत्रवत् । अजामिलवच्च । धर्माधर्मविवेचनाधि- कारेण दुष्टदमनस्य धार्मिकसंरक्षणस्य च नामाप्तत्वात् । यमस्य भगवदाज्ञाधी- नत्वाद्भगवतो नित्यविभ्यत्त्वाच भगवत एव वस्तुतो यमत्वम् । तस्स तु यम- त्वमौपचारिकमेव । “शास्तृत्वमुपचारो हि यथा मण्डलवर्तिनाम्" इति वाक्यात् । न च "निर्दोषं हि समं ब्रह्म । समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेप्योऽस्ति न प्रियः। तिरस्कृता विप्रलब्धाः शताः क्षिप्ता हता अपि । नाऽस्य तत्प्रति- कुन्ति वैष्णवाः प्रभवोऽपि ही"त्यादिवाक्येभ्यो नैवं प्रार्थनीयमिति वाच्यम् । भगवत्तद्भक्तद्वेषिव मेवाऽस्य शास्त्रार्थस्य विषयात् । तदुक्तम्-"ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाऽप्यहम् । अहं भक्तपराधीनो घस्वतन्त्र इव द्विज । साधुभिर्मस्तहृदयो भक्तभक्तजनप्रियः" इति । किञ्च । नारायणविद्यायाम्- "हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षामि"त्युपक्रम्य-"चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि प्रमत्स- मन्ताद्भगवत्प्रयुक्तम् । दंदग्धि दंदग्ध्यरिसैन्यमाशु कक्षं यथा वातसखो हुताशः। गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे निप्पिण्डि निप्पिण्ड्यजितप्रियाऽसि । कूप्माण्डवै. नायकयक्षरक्षोभूतमहांचूर्णय चूर्णयाऽरीनि"त्यादिभिर्वचनैः प्रावाहिक्या भग- वत्तद्भक्तप्रद्वेपिण्या मायिक्याः सृष्टेः प्रद्वेपे दोषाभावावसायात् । बलदर्पिताश्च पहवश्च सन्त्वन्यस्याऽशक्योच्छेदाः । न तु मृत्योर्यमस्य तथा । त्वयैव च तस्य नियमितत्वापारलौकिकावश्यकदण्डविधाताऽपि त्वमेव । तसान्मारयाऽसुरान् । निक्षिप नित्यनरकेषु । परिरक्ष च प्रपन्नान् । अन्यथा भक्तवत्सलतागुणहानि- प्रसङ्ग इत्याह-यमेति सम्बुद्ध्या । नन्वज्ञाः शक्या उच्छेत्तुम् । न तु दुर्ज्ञाः ।
पालभाष्यविभूपिता। अतिप्रसङ्गात् । सर्वमेव हि प्रायस्तमसि निमां जगत् । किं तत्रोच्छेद्यम् । तम एव । न जगत् । किञ्च । "एतावत्सरसि सरोरुहस्य कृत्यं मित्त्वाऽम्भः सपदि बहिर्विनिर्गमो यत्। आमोदो मधुकर इन्दिरानिवासस्तत्सर्व दिनकर- कृत्यमामनन्ती"तिन्यायेन • गया पापण्डिनामुच्छेदेऽपि यन्नानामतध्वान्तं जगति प्रसृतं यच्च भक्तिमार्गाननुसन्धानमुपस्थितं वेदान्तहृत्पद्मं च मुकुलितं मधुकरसहशानां महात्मना तदनुपलम्भासञ्चारौ च श्रियोऽदर्शनञ्च तत्सूर्य- सदृशेनैव सर्व निवारणीयं न मयेति चेत्तत्राऽऽह-सूर्येति । सूर्यस्त्वमेव नाऽन्यः । “मीषोदेति सूर्यः । सूर्यास्तपति मद्यात् । तत्सूर्य्यस्तदु चन्द्रमाः । चक्षुरभूपतङ्गः । चक्षोः सूर्यो अजायत । त्वमर्कदृक् सर्वदृशां समीक्षणः । येन चेतयते विधं विश्वं चेतयते न यम् । दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेयुगपदु- स्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्धासस्तस्य महात्मनः । तमेव भान्तमनुभाति सर्व यस्य भासा सर्वगिदं विभाति । कृष्णामणिनिम्लोचे धर्मः कं शरणं गतः । कोटिसूर्य्यसमप्रभः । तेजसा तेऽविषयेण भूरि द्रष्टुं न शक्नुमः । इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । वेदाऽहमेतं पुरुपं महान्तमादित्यवर्ण तमसः परस्तादि"त्यादिवाक्येभ्यः । सूर्यस्त्वेवं शास्त्रैर्वर्ण्यते-"परोरजः सवितुर्जातवेदो देवस्य भगों मनसेदं जजान । सुरेतसादः पुनराविश्य चष्टे हंस गृध्राणं नृपद्रिनिरामिमः । सूर्येण हि विभज्यन्ते दिशःखं द्यौर्मही भिदा । स्वर्गापवर्गी नरका रसौकांसि च सर्वशः । देवतिय॑मनुष्याणां सरीसृपसवी- रुघाम् । सर्वजीवनिकायानां सूर्य आत्मा हगीश्वरः । स एष भगवानादिपुरुष एवं साक्षान्नारायणो लोकानां संस्तय आत्मानं त्रयीमयं कर्मविशुद्धिनिमित्तं कविभिरपि च वेदेन विजिज्ञास्यमानो द्वादशधा विभज्य पट्र्स ऋतुपु यथोप- जोपमृतुगुणान्विदधाती"त्यादि । तथाचाऽस्माकं त्वां शरणमुपागतानां त्वमेव तमसस्पारं दर्शयिता प्राकृतत्वं परिहर्ता ज्ञानं जनयिता स्वाराधने कर्मणि प्रवर्तयिता तदुपयोगिज्ञानप्रदाता तत्कलदाता सर्वं जगद्गवल्लीलेति योधो- सादयिता अविद्यागर्जकः सङ्कल्पमात्रेणैव विचित्रः प्रपञ्चस्त्वयैव समुत्पाद्यते पाल्यते संहियते चेति खस्य निरतिशयशक्तियोगवोधनेन स्वस्मिन् भक्तियोग- प्रदो जीवस्य शरणागतस्य विशोधकस्तदाकादितलौकिकालौकिकफलप्रदो ११ ईशा ८२ ईशावास्योपनिषद् । बुद्धिप्रेरकः शरणागतवत्सलः शरण्यः शरणीकरणीयश्च त्वदनुग्रहामावे तमसि निमज्जनात्सत्यपि सकलपुरुषार्थसाधिका सामग्री अप्रयोजिका । देशकालाद्युप- करणानि विफलानि । स्वर्गापवर्गनरकादिभेदाश्च विलुप्येरन् । देवतिर्यअनु. प्यादिसृष्टिश्च विशीयेत । लोकानां स्वस्तिस्त्वदायचा । ऋतुगुणानां विधान श्रियो दर्शनश्च । त्वदाराधनार्थकृतकर्मणां विशुद्धिस्त्वंद्विजिज्ञासयैव भवति । नाऽन्यथेति सर्वामङ्गलनिवृत्तिः सर्वमङ्गलप्रवृत्तिश्च त्वदधीनेति तामेतामस्मभ्यं विधेहीति सूर्येति सम्बुद्ध्या प्रार्थनम् । ननु के यूयम् । कोऽहम् । कः सम्बन्धोऽस्माकम् । येनैवं प्रार्थयध्वे । तत्राऽऽह-प्राजापत्येति । वयं ते प्रजाः । त्वचाऽस्माकं पतिः। यद्यपि ययमज्ञास्त्वां पतिं न जानीमः | तथापि त्वया त्वविसाव् एव । यदि वयं त्वत्कृतेषु सेतुषु न तिष्ठामस्तर्हि कृपया बोधनादिना त्वमेवाऽस्मान्स्थापय । अपराधे दण्डेनाऽप्यस्माछोधय । सर्वथा त्वदीयाः सः । त्वचाऽस्माकं सर्वथैवाऽसि । प्रजामिस्त्वं सेवनीयस्त्वया च प्रजाः परिपालनीयाः । प्रजानां योगक्षेमौ त्वया निर्वायौ । प्रजामिश्च तदर्थ त्वमेव सेव्यः । यदन्यैः प्रजास्ते परिपीड्यन्ते ते निराकार्याः । वध्याश्च दण्ड्याश्च । यधनायाः स्युः पीडां प्रामुयुः ।न त्वेवमस्ति । नाथे सति पीडा नाथस्याऽयशस्सम् । तत्तु द्रष्टुं न क्षमामहे । वयं,भाग्यदोपात्पीडां प्रामुमस्तदे- तदन्यत् । तव त्वयशस्यं भवतीति तन्मा मूत् । नन्वन्ये प्रजापतयो ब्रमादयो दक्षादयो नाहम् । तत्राऽऽह-प्राजापत्येति ण्यप्रयोगम् । प्रजापतीनो ब्रमा- दीनां दक्षादीनां प्रजापतित्वं त्वदायत्तम् । वस्तुतस्तेऽपि ते मजा एव । स्वत्कृतं - त्वदनं त्वलानुपाणितं त्वदनुगृहीतम् । “स वै पतिः स्यादकुतोमयः त्यमिति हि सर्म्यते । तस्माद्यपां प्राजापत्यं तत्त्वमेवाऽसि । प्रजापतित्वं सन्मार्गे प्रवन कुमार्गानिवर्तनश्च । "न योजयेत्कर्मसु कर्ममूढान्" । प्रजा. पतिर्हि प्रजापरिपारने सर्वथैव सावधानः मजासु वत्सलस्तद्विरोधिषु चाऽत्यन्तं यूरः प्रमादरहितस्ताः परिपालयति । नोपेक्षते । तस्माल्लौकिकालौकिकयोः सर्वथैव निश्चिन्ता वय त्वचरणारविन्दशरणागतिमुपधानीकृत्य स्वस्वं शया- महे । न शोचामः किश्चित् । "न विभेति कुतश्चन । स्वस्थः शेते मृत्युरमा- दपैति" भक्तानां लजारक्षकस्त्वमेवाऽसि विषमेषु । नाऽन्यः । तथाच कुमा- ।
बालभाध्यविभूषिता । ३ निवर्त्य सन्मार्गप्रापणं कुमार्गनाशः सन्मार्गविस्तारः प्रजापरिरक्षणं तास्वानु- कूल्यं तदवोधापमार्जन स्वसेतुपु स्थापनं कृपया तत्परिपोषणं प्रतिबन्धनिरा- करण स्वभक्तिदानं तासां सर्वविधयोगक्षेमनिर्वाहश्च त्वदेकाधीन इति तान् कुरु शिशिरया च दृष्ट्या वत्सवत्परिपालयेत्याह-प्राजापत्येति सम्बुद्धया । पतिरेख प्रार्थ्यः । सुतरां प्रजामिः । प्रार्थितः पतिर्न कुप्यति । सुतरां प्रजाभिः । पतिपराधान् शान्लाऽपि प्रसीदति । सुतरामपराधाभावे चाऽऽनुकूल्ये च । पातीति पतिः। तस्मान्नित्यप्रसन्नो नित्यप्रसादोन्मुखश्च पतिरुच्यते । न तु कोपादिना क्लेशकः । पतिश्च प्रियो भवति । "पतिः प्रियो भवती"ति श्रुतेः । अयश्चाऽऽत्मा च पतिश्च भवतीत्यत "आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भव- ती"त्यात्ममुसार्थिताऽपि नौपाधिकत्वं प्रयोजयति । अतिरिक्तस्याऽऽत्मनोऽभा- वात् । न चाऽवच्छेदकमेदः कारणम् । तत्सुखसुखित्वेन न्यग्मूतत्त्वादित्य- न्यदेतत् । प्रियः सेन्यो भवति प्रेम्णा । प्रीतिमन्तश्च सेवकाः । सेन्यसेवक- भावोऽस्साकं निर्विघ्नप्रसरोऽस्तु । अन्यथा न जीविष्यामः । यश्वाऽधमस्तत्र प्रतिबन्धमाचरति सोऽस्माकमिव तवाऽपि प्रद्वेष्य एव । "द्विषन्तः परकाये माम् । क्षिपाग्यजसमशुभानि"त्यादिवचनात् । तयुक्तमुक्तं प्रार्थ्यसे । त्वचा- ऽवश्यं प्रसत्स्यस्येव । इढोऽयमस्साकं विश्वास इति भावः । ननु किमर्थयध्वे तदेव विशदं कथ्यतामित्यत्राऽऽह-व्यूह रश्मीन् समूह तेज इति । यद्यपि "तत्त्वं पूपन्नपावृण्वि"ति प्रार्थ्य पञ्चभिः सम्बुद्धिभिः प्रार्थनीयम्प्रार्थितमेवा- ऽभिप्रायनिवेदनन्याजेन तदुपयुक्तम् । तथापि ब्याजोक्तिन्यकाष्ठां न गच्छ- तीति विचार्य कदाचिद्विलग्वेत । "प्रार्थितः कामनां दद्यान्नाऽन्यथेति सिद्धान्तस्य द्वितीयस्य तुरीये श्रीशुकभापिते सिद्धत्वात् । तन्मा भूत् । “आयु- हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तं च यन्नसौ । तस्यर्ते यः क्षणो नीत उत्तमश्लोकवार्चयेति वचनात् "अयेदं मसान्तर शरीरमि"त्यनुपदं वक्ष्यमाणाच "क्षणमपि नाप्र- यतस्तिछेदि"ति धर्मशास्त्राच निजजनजीवातवे त्वरखेति नियाजदैन्यप्रदर्शन- पुरस्सरं प्रार्थयते-व्यूह रश्मीनित्यादिना । वलवत्तमाग्रगण्योऽपि त्रिभुवन- कवीरधुरन्धरोऽपि यावन्न पराक्रमं विचारयति तावन्न क्षुद्रा उपद्रवं मुञ्चन्ति । तस्माद्रश्मीन् खरूपप्रकाशकानावरणनिवर्चकांस्तेजोमयांस्तमस उद्धारकान्द- ८४ ईशावास्योपनिषद् । र्शनीयतमान्सतां प्रियान्क्षुद्राणां दाहकानाड्यालस्यादिदोपनिवारकान्सत्कर्मणि प्रवर्तकानन्तर्बहिःप्रकाशसञ्चारकानुपद्रवनिवारकान्त्सदसद्विवेचकान्मार्गप्रदर्श- कान्देहेन्द्रियादिकरणकलापवैफल्यनिवारणपूर्वकतत्साफल्यकारफानुपकरणपाप- कान्सक्रियासम्पादकान्त्सर्वपुरुषार्थसाधकाजगदुज्जीवनानसत्कर्मविलम्पका-. श्चौरपाटचरादिविलायकान्दृष्टिप्रदान्वस्वरूपांतादाल्यापन्नान्प्रकाशाश्रयन्यायेन खाभिन्नांस्त्वदिच्छाधीनदर्शनांस्त्वदर्घनत्वत्सेवनत्वत्कर्मशिक्षकान्कुपथानिव-. कान्निप्कण्टकमार्गप्रदर्शकान्पुष्टिभक्तानित्यर्थः । "पुष्टिं कायेन निश्चय" इति वाक्यात् । तेन पुष्टिसम्बन्धि यत्तत्सर्व रश्मिपदवाच्यम् । रहमयोऽपि हि सूर्यादेः कायादेव प्रसरन्ति । न्यूह । उह वितर्के । प्रार्थनायां लोण्मध्य- मैकवचनम् । परगामिफलाभिप्रायेणाऽनुदात्त्वलक्षणस्याऽऽस्मनेपदस्याऽनि- त्यत्वाभ्युपगमात्परस्मैपदम् । "अनुक्कमप्यूहति पण्डितो जन" इतिवत् । वितर्को विचारः । व्युपसर्गार्थो विशेषः । स च पुष्टिभक्तिमार्गप्रवृत्त्यासुरसि- द्धान्तविध्वंसानुकूल्यम् । भुवि सम्प्रदायप्रवर्तनं तस्यामपि च तत्र तन्न देशेषु तेषां दुष्टदमनार्थ सत्परिरक्षणार्थ स्थितिश्च विशेषः । विचारय । विचारितं हि सिद्ध्यति । किं पुनः सत्यसकल्पस्य भवत इति भावः । यो चूहते स कर्तव्यनिष्ठो भवति । एकीभूतान् पुञ्जीभूतान् समुदितान् कुरु । मध्यान्हसूर्य- वदिति भावः । धारय वा । प्रसारय वा । "ओपेन व्यूह्यमानानां प्लवानां सोतसो यथे"त्यादौ तथा दर्शनात् । समूह तेजः । सम् सम्यक् । जह विचारय । विचारपूर्विकाः खल सर्वाः क्रियाः । तेजः पूषन्नित्यादिभिः पञ्चभिः सम्बुद्धिभिर्निरूपितम् । दीसिः पराक्रमः प्रभावो वा। अनभिभवनीयं हि तेजः । तदुक्तम्-- "न कश्चिन्मत्परं लोके तेजसा यशसा दिया। विभूति- भिर्वाऽभिभवेद्देवोऽपि किमु पार्थिव" इति । सम्यवत्वं समूहात्मकता । तदु. क्तम्--"दिवि सूर्यसहसस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्थादासस्तस्य महात्मनः" इति । "तेजसा तेऽविषयेण भूरि द्रष्टुं न शकुम" इत्येवमादि च धारय प्रसारय प्रयोजय प्रचुरीकुरु वा । यथा “तत्त्वं पूपन्नपा. वृष्विति प्रार्थिती प्रतिबन्धापगममुखप्रादुर्भावी सिद्धयेताम् । तथाच तव विचारमात्रेणैवाऽस्माकं सर्वार्थसिद्धिः प्रतिबन्धनिवृतिश्च । त्वं च सानुभाव- - ८५ पालभाप्यविभूपिता। तामेव विचारय । "तस्यैवाऽस्मानुभावप्रकटनहृदयस्ये"ति हि स्तूयसे । "रोपदृक्पातसम्प्लुटभक्तद्विडि"ति च । रश्मीणां व्यूहने तेजसः समूहने च सानुभावता । "तयोस्तदद्भुतं कर्म दावामेर्मोक्षमात्मनः । गोपाः स्त्रीभ्यः समा- चख्युः प्रलम्बवधमेव च । गोपवृद्धाश्च गोप्यश्च तदुपाकर्ण्य विस्मिताः । मेनिरे देवप्रवरौ कृष्णरामौ प्रजं गतौ" इत्यादिवत् । अन्यथा कथं स्यात् । सानुमा- बतायामेव प्रतिबन्धापगममुखप्रादुर्भावौ भवेताम् । नाऽविचारितायाम् । तौ विना रश्मिन्यूहनतेजस्समूहनयोः स्वरूपालामात् । तदर्थमेवाऽर्थनीयत्वात् । अन्यथा व्यर्थत्वात् । नियामकाभावे नियमनानुपपत्तेश्च । प्रतिवन्धापगममुख- प्रादुर्गावान्यामेव सम्प्रदायस्य प्रवृत्तिः परिरक्षणश्च । तदेव रश्मिन्यूहनं तेज- समूहनश्च । पुष्टिभक्तिमार्गप्रवृत्त्यासुरसिद्धान्तविध्वंसानुकूल्यस्य साम्प्रदायिकेषु मुखावताराधीनत्वात् । यस्मात्त्वं पूपन्नेकर्षे इत्यादिना निरूपितनिर्णयस्तरमा- स्परमार्थाच्छादकमापुरसिद्धान्तमुच्छिन्धि मुखं च प्रकटीकुर्विति निरूप्य पश्चात् रश्मिव्यूहनतेजःसमूहनयोः प्रार्थनान्मुखावतारेण निजजनपरिपालनं रश्मिव्यूहनवाच्यं तत्प्रतिबन्धनिराकरणश्च तेजस्समूहनवाच्यं विधेहीति प्रार्थ- नार्थः पर्य्यवस्यति । यत्र पूपन्नित्यादिना वर्णितस्य तवाऽपरिमेयशक्तेविनियो- गेन प्रतिबन्धनिवृतिस्तत्र प्रतिबन्धानां प्राबल्यमकथनीयमेव । जीवस्य तुच्छता चाऽवर्णनीयैव । साधनान्तराणामसामर्थ्यश्च सर्वथैवाऽवाच्यम् । तव विचारा- भावे त्वदीयानामस्माकं का दशा भवेत् । सर्वथैवाऽनन्यगतिकास्त्वां शरण- मागताः । तस्मादस्मदुज्जीवनाय तव विचार आवश्यकः। मा म तिष्ठस्ति- रोहितः । सर्वस्याऽस्याऽऽत्मसात्कृतस्य त्वदेकरक्षणीयस्य जनस्य प्राणजीवन- धनमसि । तस्य तव तिरोधाय स्थिती काऽस्य क्लेशकाष्ठा भविष्यति । वैरि- णश्च कवलयेयुस्तदानीमेनम् । तेन प्रकटीभूय स्थितः सन् दुर्द्धर्षेण रूपेण परिपन्थिनामुरस्सु शूलं शालय जहि तानभिवर्ष च सन्तप्तेपु निजजनेपु श्रीमुख- चन्द्रसुधासारानिति भावः। तदेतद्विवार्य व्याचष्टे-यचे रूपं कल्याणतम तो पश्यामीति । रूपं विवृतं कल्याणतमत्वञ्च दर्शितं हिरण्मयेनेत्यादिना समूह तेज इत्यन्तेन । गोपनीयं विमुखेभ्यः, प्रकटनीयं सम्मुखेभ्यः, प्रति- बन्धापगमद्वारा प्रदर्शनीय, मुखात्मकं, तत एव मुख्यं, प्रादुर्भूतं, दैन्येन ईशावास्योपनिषद् । शक्याविर्भावं, पुष्टिभक्तिमार्गीयैकनिष्ठं, पुष्टिमार्गीय, परमानुग्रहपुष्टमनुग्रहा- न्वयव्यतिरेकन्यवस्थितसकलशास्त्रसमन्वयासमन्वयं, निजजनेषु वात्सल्यरस- सरस, प्रतिकूलेषु यमकठोरं यथाव्याख्यातयमस्वरूपं विकटास्यं ललजिवं नखशस्त्र जयोत्कटमलम्मयान, यथोक्तसूर्यप्राजापत्यताक,न्यूटरश्मिकं, समूह- तेजस्कं यथान्याख्यातं निदाघमध्याहदिनकरसहस्रन्यतिकरकरकरसहससमु- द्भासमान भासमानातिरिक्तस्वरूपं च रसात्मकं फलात्मकं कल्याणतम रूप- मिह निरूपितम् । कल्याणतमत्वश्च गोपनीयत्वादिना समर्थितम् । संक्षेपा- कल्याणतम रूपं मुखमेव रूपेषु । मुखमपावृष्वित्युपक्रमाच्च । श्रीमद्वन्धमा- चाउन दर्शयेति निष्कृष्टोऽर्थः । यत् । अनुपदमुक्तमवसितश्च हिरण्मयेने- त्यादिना समूह तेज इत्यन्तेन । ते । कृपयेति शेषः । पश्यामि । वर्तमान- सामीप्ये वर्तमानवद्वा । अस्मिन् क्षणे द्रक्ष्यामीत्युत्कण्ठा वर्तमानप्रयोगार्थः । प्रार्थनायामवसितायां साक्षात्कारो वा । यत्ते तते इति द्विवचनं वा हर्षाति- रेकात् । साधनैरलभ्यमनुग्रहैकलभ्यमलम्पमिदं लब्धमिति हर्पोट्रेकः पश्यामि । अनुग्रहमार्गे विलम्बानवसर इति भावः । किश्च । पुष्णासि जन्मना बाललीला- दिना भक्तानामुत्सवं खस्मिन् स्नेहमिति पूषा पूतनातृणावर्गदेरागमनात्मागेव ज्ञानादेकर्पिस्तद्वधाद्यमः शोकव्यामोहादितिभिरापनयनेन प्रहर्पयतः प्रकाशपूर्णो- दयाद्भक्तजननलिनदिनेशत्वाच सूर्यः प्रजापतेः श्रीवसुदेयस्य श्रीमजराजस्थ चाऽपत्यत्वात्प्राजापत्यस्त्वं रश्मीन् गास्तदुपलक्षितानिःसाधनान् भक्तांश्च न्यूह इतस्ततो विपयासत्या विषयेषु प्रसक्तान् विप्रकीर्णान् त्वत्सानिध्याभावेन विषयासक्त्या च नियतानिष्टान् कृपया स्वसान्निध्यप्रापणेन रक्षणाय सर्वपुरुषार्थ- स्वरूपवानन्ददानाय लीलार्थ च एकीकृत्य समुदितमावेन स्वसमीपे स्थापय स्वदृष्टेरयहिनिवेशय तेजश्च समूह सम्यक् प्रकारेण धारय येन सत्यवात्सल्यादि- मावा भक्तानां नाऽपयान्ति माहात्म्य चाऽतिशयेन विस्फुरति प्रतिवन्धाश्च शल- भायन्ते सौकुमार्यमाधुर्य्यायनुभवश्च न विच्छिद्यते । तदुक्तम्---"अथ सर्व- गुणोपेतः कालः परमशोमनः । यदेवाऽजनजन्मक्षं शान्तःमहतारकम् । दिशः प्रसेदुर्गगनं निर्मलोडुगणोदयम् । मही मङ्गलभूयिष्ठपुरमामबजाकरा । नयः प्रसन्नसलिला दा जलरुहनियः । द्विजालिकुलसन्नादस्तबका वनराजयः ।
, पालभाप्यविमूपिता। ८७ चवौ वायुः सुखस्पर्शः पुण्यगन्धवहः शुचिः । अमयश्च द्विजातीनां शान्तास्तत्र समिन्धत । मनास्यासन्प्रसन्नानि साधूनामसुरनुहाम् । जायमानेऽजने तस्मिन्ने- दुर्दुन्दुभयो दिवि । जगुः किन्नरगन्धर्वास्तुष्टुवुः सिद्धचारणाः । विद्याधर्यश्च मन्तुरप्सरोभिः समं तदा । मुमुचुमुनयो देवाः सुमनांसि मुदाऽन्विताः । गन्दं मन्दं जलधरा जगर्जुरनुसागरम् । निशीथे तम उद्भूते जायमाने जनाईने । देवक्या देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः । आविरासीद्यथा प्राच्या दिशी- न्दुरिव पुष्कलः । तमद्भुतं पालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शङ्खगदायुदायुधम् । श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोमिकौस्तुमं पीताम्बरं सान्द्रपयोदसौमगम् । महाहवैडू- र्यकिरीटकुण्डलत्विषा परिष्वक्तसहसकुन्तलम् । उद्दामकाश्यदकरणादिमि- विरोचमानं वसुदेव ऐक्षत । स विसयोकुल्लविलोचनो हरिं सुतं विलोक्या- ऽऽनकदुन्दुभिस्तदा । कृष्णावतारोत्सयसम्ममोऽस्पृशन्मदा द्विजेभ्योऽयुतमा- सुनो गवामिति । "नन्दस्वात्मज उत्पन्ने जाताहादो महामनाः । आहूय विमान् वेदज्ञान् सातः शुचिरलतः । वाचयित्वा वस्त्ययनं जावकर्माऽऽत्म- जस्य तैः । कारयामास विधिवपितृदेवार्चनं तथा ! धेनूनां नियुते प्रादाद्वि- प्रेभ्यः समलकृते । तिलाद्रीन् सप्तरलौघाश्चातकौम्भाम्बरावृतान्" इत्युपक्रम्य "सौमङ्गत्यगिरो विप्राः सूतमागधबन्दिनः । गायकाश्च नगर्नेदुर्भेर्यो दुन्दु- भयो मुहुः" इत्याद्युक्त्या "तत आरभ्य नन्दस्य प्रजः सर्वसमृद्धिमान् । हरे- निवासात्मगुणै रमाक्रीडममूनृपेति । "नन्दः प्रमुदितो मेन आत्मानं पूर्ण- माशिमाम् । ततस्तु भगवान कृष्णो वयस्मैत्रजबालकैः । सह रामो ब्रजवीणा चिक्रीडे जनयन्मुदम् । मजस्योवाह चै हर्प भगवान् बालचेष्टितैरि"त्यादि- मिलतः प्रा-पेति। "वियुझ्यता पालकमारिकाहं चरायसमास निमीलितेक्षणः" इति । "एकदाऽऽरोहमारुढं लास्यन्ती सुतं सती । गरि- माणं शिशोवोढुं न सेहे गिरिकूटवत् । भूमौ निधाय तं गोपी विसिता भार- पीडिता । महापुरुषमादध्यौ बगतामास कर्मसु" इति । "नातं मम पुरैवैत- पिणा करुयात्मना । यच्छीमदान्धयोगिनिंशोऽनुग्रहः कृत" इति । "काऽन्यदृष्ट्वाऽन्तर्विपिने वत्सान् पालांच विश्वजित् । सर्वे विधिकृतं कृष्णः सहसाध्वजगाम है"ति । "यूयं विवस्त्रा यदपो पृतन्त्रता न्यगाहतेतत्तदु देव- ।
८८ ईशावास्योपनिषद् । हेलनमि"ति । इन्द्रयागप्रसङ्गे: "तस्माद्भवां ब्राह्मणानामद्रेश्चाऽऽरभ्यताम्मखः । हुयन्ताममयः सम्यग्ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादिभिः । अन्नं बहुविधं तेभ्यो देयं वो धेनु, दक्षिणाः । अन्येभ्यश्चाऽऽश्वचाण्डालपतितेभ्यो यथार्हतः । यवसञ्च गवां दत्त्वा गिरये दीयतां बलिः। खलता भुक्तवन्तः स्वनुलिप्ताः सुवाससः । प्रदक्षिणं च कुरुत गोविप्रानलपर्वतान् । एतन्मम मतं ताते"त्यादिभिरुपदेशै- रुद्धवार्जुनाभ्यां ब्रह्मवादोपदेशेन चैकर्षित्वम् । “राजन्यसंज्ञामुरकोटियूथपै- निर्वृहमाना निहनिष्यसे चमू:' इति "गाढं कराभ्यां भगवान् प्रपीब्य तत्प्राणैः समं रोपसमन्वितोऽपियदिति "तमश्मानं मन्यमान आत्मनो गुरु- मत्या । गले गृहीत उत्स्रष्टुं नाऽशनोद ताकम् । गलग्रहणनिश्चेष्टो दैत्यो निर्गतलोचनः। अव्यक्तरावो न्यपतत्सह बालो व्यसुर्वजे" इत्यादिभिः प्रसङ्गै- र्यमत्वम् । “ताः कृष्णवाहे वसुदेव आगते स्वयं व्यवय॑न्त यथा तमो रवे- रिणति वचनेन "गोकुलं सर्वमावृण्वन्मुष्णश्चभूपि रेणुभिरि"ति मुहूर्तम- भवद्गोष्ठं रजसा तमसाऽऽवृतमिति "नाऽपश्यत्कश्चिदात्मानं परं चाऽपि विमोहित" इत्युक्त्वा "पुनरेव बालको दिष्ट्या स्वमन्धून्मणयन्नुपस्थित" इति वचनेन "जरासुतस्तावभिसृत्य माधवौ महाबलौघेन बलीयसाऽऽवृणोत् । ससैन्ययानध्वजवाजिसारथी सूर्यानलौ वायुरिवाऽप्ररेणुभि"रित्यादिवचनैश्च सूर्य्यत्वम् । "त्वमेव पूर्वसर्गेऽभूः पृश्निः स्वायम्भुवे सति । तदाऽयं सुतपा नाम प्रजापतिरकल्मष" इति "द्रोणो वसूनां प्रवरो घरया सह भार्यये"त्या- द्युक्त्वा "अस्त्वित्युक्तः स भगवान् बजे द्रोणो महायशाः । जज्ञे नन्द इति ख्यातो यशोदा सा धराऽभवदि"ति च वचनेन "ता आशिषः प्रयुञानाश्चिरं पाहीति बालक" इत्यनेन च वचनेन प्राजापत्यत्वम् । “चारयामासतुर्वत्सा- नि"ति "ततश्च पौगण्डवयः श्रितौ बजे बभूवतुस्तौ पशुपालसम्मतौ । गाश्चा- रयन्तौ सखिभिः समं पदैर्वृन्दावनं पुण्यमतीव चक्रतुरिति "पशून् पुरस्कृत्य पशव्यमाविशद्विह कामः कुसुमाकरं वनमिति "मेघगम्भीरया वाचा नाम- भिर्दूरगान् पशुन् । कचिदाहयति प्रीत्या गोगोपालमनोज्ञये"ति "गाः सन्निवर्त्य सायाहे सह रामो जनाईनः । वेणुं विरणयन् गोष्ठमगाद्गोपैरभिष्टुत" इति वचनैः "ता वां वास्तून्युप्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयास" ८९ बालभाष्यविभूषिता। इति श्रुत्या "रश्मयो गाव उच्यन्त" इति निरुक्ताच रश्मिव्यूहनम् । “मालं प्रतिच्छन्ननिजोरुतेजसं ददर्श तत्पेऽमिमिवाऽऽहितं मसी"ति "गुणप्रका. शैरनुमीयते भवानिति "स विसयोत्फुल्लविलोचनो हरि सुतं विलोक्या- ऽऽनकदुन्दुभिस्तदे"ति "अथैनमस्तौदवधार्य पूरुषं परं नतानः कृतधीः कृताञ्जलिः । स्वरोचिषा भारत सूतिकागृहं विरोचयन्तं गतमीः प्रभावविदिति "नन्दो महामनास्तेभ्यो वासोलकारगोधनम् । सूतमागधबन्दिभ्यो येऽन्ये विद्योपजीविनः । तैस्तैः कामैरदीनात्मा यथोचितमपूजयत् । विष्णोराराधना- र्याय स्वपुत्रस्योदयाय चेति पूतनावधं दृष्ट्वा अतुलिततेजोवधारणसम्भव- समयेऽपि “यशोदारोहिणीभ्यान्ताः समं बालस्य सर्वतः । रक्षां विदघिरे सम्यागोपुच्छग्रमणादिभिरि"त्यादि "नन्दादयश्चाऽद्भुतदर्शनाकुलाः कथं स्वयं वै शकटं विपर्य्यगात् । इति ब्रुवन्तोऽतिविवादमोहिता जनाः समन्तात्परिव- चुरावत् । ऊचुरव्यवसितमतीन् गोपान् गोपीश्च बालकाः। रुदताऽनेन पादेन क्षिप्तमेतन्न संशयः । न ते श्रद्दधिरे गोपा बालभापितमित्युत । अप्रमेय बलं तस्य बालकस्य न ते विदुरि"ति "अहो बताऽस्य बालस्य बहवो मृत्यवोऽम- वन् । अप्यासीद्विप्रियं तेषां कृतं पूर्व यतोऽभयम् । अथाऽप्यभिभवन्त्येनं नैव ते घोरदर्शनाः । जिघांसयैनमासाद्य नश्यन्त्यमौ पतङ्गवदि"ति धेनुकबध- मुक्त्वा--"कृष्णः कमलपत्राक्षः पुण्यश्रवणकीर्तनः । स्तूयमानोऽनुगैपिः सामजो ब्रजमानजदि"ति "तं गोरजछुरितकुन्तलबद्धबर्हयन्यप्रसुनरुचिरेक्षण- चारुहासम् । वेणु कणन्तमनुगैरनुगीतकीर्ति गोप्यो दिदृक्षितदृशोऽभ्यगम- नसमेता" इति "पीत्वा मुकुन्दमुखसारघमक्षिभृङ्गस्तापं जहुर्बिरहजं प्रजयोपि- तोऽहि । तत्सत्कृति समधिगम्य विवेश गोष्ठं सबीडहासविनयं यदपाङ्गमोक्ष- मि"ति च वचनस्तेजस्समूहनश्चेति । एवं साक्षात्परमकाष्ठापन्नस्य गगवत एवं साधनत्वं फलत्वञ्चेति कथयित्वा तदुभयं भगवानेव मम भवत्विति सम्प्रार्थ्य फलत्वात्सर्वात्मत्याच भगवतः सर्वरूपाणां फलत्वेऽपि सर्वरूपरूपं मूलरूप- रूपञ्च यद्रूपं तत्फलतमं तदेव मे फलमस्त्विति प्रार्थयते यत्ते रूपं कल्याण- तमं तत्ते पश्यामीति । अयमर्थः । “एकोऽहम्बहु स्यां प्रजायेय । एकमेवा- ऽद्वितीयं ब्रह्म । स एकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् । असद्वा इदमन । ११ ईशा.
ईशावास्योपनिषद् । आसीत् । ततो वै सदजायत । सदेव सोम्येदमम आसीत् । तदात्मानर स्वयमकुरुते"त्यादिश्रुतिभिः सृष्ट्यादौ सजातीयविजातीयस्वगतद्वैतशून्यं ब्रम प्रतिपाद्य तसैर खेच्छया क्रीडार्थमुचनीचभावेन बहुभवनादात्मसृष्टिः प्रतिपाद्यते । “आत्मैवेदं सर्वम् । सर्व खल्विदं ब्रह्म । मृत्तिकेत्येव सत्यमिति कारणादभेदश्च निगम्यते । तथा सति सर्वस्याऽपि पूर्णब्रह्मत्वाद्विपये फले च तारतम्यं नास्ति । "ब्रह्मविदामोती"ति ब्रह्मविदां ब्रह्मप्राप्तिश्रवणात् । तथापि सा गणितानन्दा निस्सम्योधा च। विभूतिरूपत्वात्सङ्घातस्य विलीनत्वाच । "स एको ब्रमण आनन्द" इति श्रुतेः । विशेषानुमहे तु "आमोति परमि"ति परमाप्तिः श्राव्यते । “अथैपाऽभ्युक्ते त्यादिना च सा द्वयी विवियते । “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्नि"ति ब्रह्माप्तिः । “सोऽभूते सर्वान् कामान् सह अक्षणा विपश्चितेति च परमातिः । तथाच "योगास्त्रयो मया प्रोक्ता" इति वाक्येन धर्ममार्गेण यत्फलं तत्कल्याणं, ज्ञान- मार्गेण कल्याणतर, भक्तिमार्गेण च यत्तत्कल्याणतमम् । विभूतिरूपेषु फलानि नियतानि च विविधानि च स्वल्पानि च । कर्ममागीयत्वात् । ब्रह्मरूपे च फलं नियतमपि न विविधं नापि स्वल्पमपि त्वतिशयितानन्दं तथापि न निरतिशयम् । किन्तु गणितानन्दम् । ज्ञानमागीयत्वात् । पररूपे तु भगवति सर्वकामाशन- रूपत्वाद्विपश्चितो ब्रह्मणश्च सह भावाद्विविधमेकस्यैवेति न नियतं वा परिमितं वा किन्तु पूर्णानन्दच फलम् । भक्तिमागीयत्वात् । अन्यत्र साधनानि फलानि च पृथक् पृथक् । तत्र साधनानां फलपर्य्यवसायित्वे जीवसामर्थ्य प्रयोजकम् । यदि सिक्ष्यन्ति फलं लभ्यते । न सिद्धयन्ति न लभ्यते । तेन क्लेशमाधुर्या- द्वयभिचाराध विभूतिरूपं न कल्याणतमम् । नापि ब्रह्मरूपमपि तथा । "अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवहिरवाप्यते । क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसा- मि"त्यादिवाक्यैः । फल्स फल्गुता गणितानन्दता च विद्यते । पुष्टिमक्ति- मार्गे तु साधनं फलञ्चैकमिति न क्लेशो न व्यभिचारः पूर्णानन्दता वस्तीति तत्कल्याणतमम् । तदेतदुक्तम्-यत्ते रूपमित्यादिना । यत् । प्रक्रान्तं श्रीय. शोदोत्सालालितरूपं परमफाष्ठापनम् । "एते चांऽशफलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान स्वयमि" इति "मत्तः परतरं नाऽन्यत्किश्चिदस्ति धनझये"ति "जानीव म बालभाष्यविभूषिता। ९१ परमं तत्त्वं यशोदोत्सङ्गलालितमिति च याक्यात् । ते । सर्वरूपरूपस्य सर्वा- धीशस्य सर्वमार्गमवर्तवस्य तत्तत्प्रातिखिकसाधनफलरूपस्य सर्वभवनसमर्थस्स सर्वभूतस्य मूलभूतस्य निस्साधनफलात्मफस्स विभूतिविभूतिमदुभयात्मकस्य क्षरासरपुरुषोतमस्य क्षराक्षरातीतस्य पुरुषोत्तमस्य भक्त्येकभावनीयस्याऽनुग- हैकरसस्प निश्शेषप्रतिवन्धनिवर्तनशीलस्याऽविकृतपरिणामामिननिमित्तोपा- दानसत्कार्य्यवादादीनां विषयस्य स्वस्वरूपप्रकाशनशीलस्य प्रतिबन्धकवधकर्तु- परिमेयाचिन्त्यशक्तरपरिच्छिन्नपरमानन्दमहोदधेः । पुनरपि । यत् । उक्त- सर्वात्मकत्वेनैव प्रातिखिकेभ्यः सफलेभ्यो ज्यावृत्तं स्वतप्रमनितरसाधारणं मूलं. रूपफलरुपासाधारणं निरस्तसाम्पातिशयं देहदेहिभावानापन्नं मृपानिसर्ग केवलानुभवानन्दस्वरूपं वरणमामलभ्यं भगवदिच्छयैव दृश्यं स्वेच्छया सर्व- थैवाऽयं भगवदेकप्रकाश्यं पुष्टिभक्तिमदेकप्रकटं तदेकप्रसिद्धसेवामोग्यं साधनं च फलश्च त्रिभुवनतारकं भतिवत्स्वतनं निरीक्षणमात्रेण स्वरूपमापकम् । रूपम् । सकलसुन्दरसनिवेशवपुष्कं मरकतश्याममपीच्यदर्शनमानन्दरूपमान- न्दमात्रफरपादमुखोदरादि निदोपपूर्णगुणविग्रहमात्मतनं निश्चेतनामफशरीर- गुणहीनं विविधभेदविवर्जितात्मरूपं स्वाभाविकसरूपात्मकवस्त्राभरणादिविम्- पितमौत्पत्तिकसकलसंस्कारसम्पन्नं परमसौन्दर्यसौकुमार्यमाधुर्यलावण्यम् । फल्याणतमम् । "तदेव रम्यं तदु हैव मनलं तदेव शश्वन्मनसो महोत्सवम् । तदेव शोकार्णवशोषणं नृणां यदुत्तमश्लोकयशोऽनुगीयते । भियो निवासो यस्योरः पानपात्रं मुखं दृशाम् । बाहयो लोकपालानां सारङ्गाणां पदाम्बुजम् । इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य खिष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धिदचयोः । अविच्युतोऽर्थः कवि- मिनिरूपितो यदुत्तमलोकगुणानुवर्णनम् । वीपीड नटवरयपुः कर्णयोः फर्णि- कारं विनद्वासः कनककपिशे वैजयन्ती च मालाम् । रन्ध्रान्वेणारधरसुध्या पूरयन् गोपवृन्दैर्धन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशवीतकीर्तिः । यदा यदेह धर्मस्य क्षयो वृद्धिश्च पाप्मनः । तदा तु भगवानीश मात्मानं सजते हरिः । न यस्य जन्मनो हेतुः कर्मणो वा महीपते । आत्ममायां विनेशस्य परस्य द्रष्टुरात्मनः । यामायाचेष्टितं पुंसः स्थित्युत्पत्त्यप्ययाय हि । अनुमहस्तन्निवृत्तेरात्मलाभाय चेप्यते । अक्षौहिणीनां पतिमिरसुरैर्नपलान्छनैः । भुव आक्रम्यमाणाया अमा- ईशावास्योपनिषद् । राय कृतोद्यमः । कर्माण्यपरिमेयानि मनसाऽपि सुरेश्वरैः। संह सहर्षणश्चके भगवान्मधुसूदनः । कलौ जनिष्यमाणानां दुःखशोकतमोनुदम् । अनुग्रहाय भक्तानां सुपुण्यं व्यतनोद्यशः। यस्मिन्सत्कर्णपीयूषे यशस्तीर्थवरे सकृत् । श्रोत्रावलिरुपस्पृश्य धुनुते कर्मवासनाम् । भोजवृष्ण्यन्धकमधुशूरसेनदशा- हैकैः । श्लाघनीयहेतः शश्वत्करुसञ्जयपाण्डुभिः । निग्धसितेक्षितोदारैर्वा- क्यैर्विक्रमलीलया। नृलोकं रमयामास मूर्त्या सर्वाङ्गरम्यया । तस्याऽऽननं मकरकुण्डलचारुकर्णप्राजकपोलसुभगं सविलासहासम् । नित्योत्सवं न तत्पु. शिभिः पिबन्त्यो नार्यो नराध मुदिताः कुपिता निमेश्च । निवृत्ततर्परुपगीय- मानाद्भवौषधाच्छोत्रमनोभिरामात् । फ उत्तमश्लोकगुणानुवादात्पुमान् विरज्येत विना पशुभात् । पितामहा मे समरेऽमरञ्जयैर्देवव्रताधातिरथैस्तिमिनिलैः । दुर- त्ययं कौरवसैन्यसागरं कृत्वाऽतरन्वत्सपदं म यत्प्लवाः । द्रौण्यसविप्लुष्टमिदं मदहं सन्तानबीजं कुरुपाण्डवानाम् । जुगोप कुक्षिं गत आत्तचको मातुश्च मे यः शरणतायाः । वीर्याणि तस्याऽखिलदेहभाजामन्तर्वहिः पूरुषकालरूपैः । प्रयच्छतो मृत्युमुताऽमृतञ्च मायामनुष्यस्य वदस्व विद्वन् । भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयकरः । आविवेशांऽशभागेन मन आनकदुन्दुभेः। स विभत्सौ. रुपं धाम प्राजमानो यथा रविः । दुरासदोऽतिदुर्धर्षों भूतानां सम्बभूव ह। ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं समाहितं शूरसुतेन देवी । दधार सर्वात्मकमात्म- भूतं काछा यथाऽऽनन्दकरं मनस्तः । सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यसं योनि निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः । विभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मा क्षमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्त्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् । त्वय्यम्बुजाक्षाऽखिलसत्त्वधामनि समाधिनाऽऽवेशितचेतसैके। त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम् । स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं घुमन् भवार्णवं भीममद सौहृदाः। भव- स्पदाम्भोरुहनावमत्र ते निधाय याताः सदनुग्रहो भवानि"त्याद्यभिष्टुति- फोटिकरम्वितशास्त्रशरीरम् । किञ्च । अनुग्रहैकनिरतस्वभावं शरणागतवत्सलं अनुग्रहैकलीलमनुग्रहेतरलीलारहितमनुग्रहैकान्त विताखिललीलं फलतम रसै- फरसं नित्यसिद्धसर्वलीलोपकरणं सदा तरुणं सदा बाललीलापरं सर्वेन्द्रिया- पालभाष्यविभूपिता। खाद्यमितररागविरसारणमशेपक्लेशविशेपनिश्शेपनिप्पेपपेशलमखिलार्थलामाव- लोकमानन्दघन नित्यलीलानित्यलीलास्थलनित्यलीलापरिकरविशिष्टं नित्योत्सवं नित्यैकरसमखिलरसात्मकमखिलपुरुषार्थरूपमात्मानुभावप्रकटनहृदयं सर्वका- माशनशेयधिसाक्षात्कारं भक्तेच्छानुकूललीलाविलासविलसितं वेणुगीतश्नी- सुबोधिनीनिष्कृष्टपुष्टिमार्गायैश्वर्य्यवीर्य्ययश:श्रीज्ञानवैराग्यविराजिततयैकान्ति- कफूलकपानुकम्पाकगनीयं जीवगतयोग्यतातदुचितकृतिविमर्शनिळपेक्षस्यस्य. रूपस्यनिरुपममहत्त्वमानविचारपुरस्सरानुकम्पापीयूषासारमसारकृतार्थीकृतानी. कृतजनजीवनं परिसमाप्तपरिस्पृहणीयपदार्थसार्थस्पृहाप्रवाहं निरपायपर- मानन्दमयमद्भुतसौन्दर्यसीकुमार्यमाधुर्यविमोहितत्रिभुवनं परमममलमूलं नित्यनिर्मलमगलं साक्षान्मन्मथमन्मथं विधृतशोकश्च । अपरश्च । यद्यल्लोके पुत्रोत्सवादिरूपमायुरारोग्यैश्चर्यादिरूपं शास्त्रेषु चाऽऽत्मलागादिरूपं भगवत्मा- स्यादिरूपं कल्याणं प्रसिद्ध तदुभयरूपस्वरूपम् । सर्वलीलावैशिष्टयात् । "लोकवतु लीला कैवल्यमि"ति न्यायात् । स्वरूपानन्दानुकूल्येन लौकिकाली- किककल्याणप्रदताया अपि शाखैरुपवर्णनात् । “तत आरभ्य नन्दस्य प्रजः सर्वसमृद्धिमान् । हरेर्नियासात्मगुणै रमाक्रीडमभूतृप । जयति तेऽधिकं जन्मना प्रजः थयत इन्दिरा शश्वदन्न हि । दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्त्वयि घृता- सवस्त्वां विचिन्वते । अनेन सर्वदुर्गाणि यूयमजस्तरिष्यथ । वंशाहुरं वंशद- वामिनिस्तं सरोहयित्वा भवभावनो हरिः । निवेशयित्वा निजराज्य ईश्वरो युधिष्ठिरं प्रीतमना बभूव ह । अनेन खलु वंशोऽयं यदोः सुबहुविश्रुतः । थियं यशो महत्त्वं च लप्स्यते परिरक्षितः । न कश्चिन्मत्परं लोके तेजसा यशसा श्रिया । विभूतिभिर्वाऽभिभवेद्देवोऽपि किमु पार्थिवः । कृत्मभायात्तु गृहिणोपसंहारः । सम्पद्याऽऽविर्भावः स्खेन शब्दादि"त्यादिभ्यो वाक्येभ्यः । तत् । तदेव । एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानस्य वचनापदर्शने कल्याणकल्याणतर- दर्शनस्याऽपि सिद्धेः । पृथदर्शनस्यैवाऽशास्त्रीयत्वात् । तथा दर्शनायाऽन्यथा दर्शनपतिपेधायैव च "यचे रूपं कल्याणतममिति व्यावर्तकानि पदानि । ते । अनुग्रहबलादित्यार्थोऽध्याहारः । अनुग्रहप्रकरणात् । “तत्त्वं पूपन्नपाणु । पूपनेकर्षे" इत्यादिना प्रार्य्यत्वेनाऽनुग्रहस्सैव प्रक्रमात् । त्वदीय इत्यर्थो वा ।
ईशावास्योपनिषद् । ९४ वरणात् । "यमेवैप घृणुते तेन लभ्य" इति श्रुतेः । अतिरिक्तस्याऽनधिकारात् । पश्यामि । इदानीमेव निरन्तरं सर्वदा शाश्वतकालञ्चेति वर्तमानप्रयोगार्थः । "तत्त्वं पूपन्नपावृण्वि"ति प्रतिबन्धापगमपूर्वकं स्वरूपदर्शनं "व्यूह रश्मीन् समूह तेज" इति भगवदानुकूल्यञ्चाऽभ्यर्थितमिति खरूपे पुरः प्रादुर्मूते पश्या- मीत्युक्तम् । तेन "तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोश्येऽथ संपत्स्य" इति श्रुत्यर्थः सङ्ग्रहीतः । धैर्यामावो विरहासहिष्णुता च व्यञ्जिता । प्रार्थनोचर भगवान्न विलम्बत इति शास्त्रार्थश्च दर्शितः । प्रार्थनापरं तदीयत्वानुसन्धा- नपुरस्सरापारमार्थिक्यपेक्ष्यत इति भावो ध्वनितः । पश्यामीति स्वातव्यम्- क्तम् । "तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू५ स्वामि"ति भगवान्निजभक्तस्य खरूपं विवशस्तदिच्छानुसारेण विवार्य दर्शयति । भक्तंश्च पश्यति । कान्तः कामि- नीमिव । न तु दर्शनदानार्थं तं प्रतीक्षते । अनुग्रहमहिना भगवत्प्राधान्याप- गमात् । भक्ते प्राधान्योदयाच । "स्त्रीभावो गूढः पुष्टिमार्गे तत्त्वमिति कृष्ण- पदार्थः कचिद्विवृत" इति वेणुगीतश्रीसुबोधिनीवचनात् । “प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयती"ति न्यायात् । “सोऽभुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चि- ते"ति श्रुत्यन्तरात् । भक्तवश्यताखाभाव्याच । “एवं सन्दर्शिता ह्या हरिणा भक्तवश्यते"ति कथनात् । दर्शनस्य भोगपर्यवसन्नताऽपि च तावता दर्शिता । हर्षातिशयवशात्स्वप्राधान्यमेवाऽनुवदति तत्र निजस्य दर्शनमेव प्रमाणयति किम्पश्यसीति तदपि निघूते इत्याह-योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमसि । असौ। पश्यामीति प्रागुक्तेः प्रत्यक्षं दृश्यमानः । पुरुषः । आदिपुरुषो भगवान् । योऽसौ । सर्वस्य वंशी सर्वस्पेशानः । सोऽहमसि । अहं तदंशस्तद्दासस्तत्से- वकः सर्वथा निर्बलो निस्साधनः सर्वथा परतन्त्रः । सोऽसि । सर्वस्य वशी सर्व- स्येशानोऽसि । भगवतोऽपि यदानुकूल्येन वर्तनात् । ममैव प्राधान्याचदमाधा. न्यालीलायाम् । तदनुग्रहमहिनेति भावः । यद्वा । विरहवशात्सर्वत्र तादृशं रूपं पश्याम्यात्मनि च त्वामेव पश्यामि । "कृष्णोऽहं पश्यत गतिमि"तिवल्लीला. श्वाऽनुकरोमि । तस्माच्छीघ्रं विहं निवारय साक्षाद्दर्शनं देहीति भावः । किंवा । ननु जीवस्य दुष्टस्य भोगपर्यवसन्नं दर्शनं न योग्यमित्यत्राऽऽह-योऽसा- वित्यादि । असौ पुरुषः योऽसौ सर्वस्याऽऽत्माऽऽत्मनश्चाऽऽत्मा । अस्ति ।
पालमाष्यविभूपिता। ९५ वायुरनिलममृतमथ भस्मान्तर शरीरम् । ओं तो स्मर कृत स्मर फ्रतो मर कृत सर ॥ १७ ॥ स्वरूपत्वात् । नाऽतिरिक्तं किश्चिदस्ति । कटकसुवर्णवत् । तेन सोऽहमस्मि । परमात्मैवाऽस्मि ! न तदतिरिक्तः । अज्ञानादतिरिक्तत्वदुष्टत्वयोर्भानं न ज्ञाने । मक्तश्याऽस्मि । परमात्मन एकाऽऽत्मत्वभाने प्रेमावश्यम्भावात् । तस्मानाऽनुपपन्नं किश्चिदपि । ऐतदात्यमिदं सर्व तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो" इति श्रुतेः । अथवा । विरहवशेन त्वरातिशयात् पश्यामि । प्रतिबन्धापगमक्षणे द्रक्ष्यामि । प्रतिबन्धापगमाय स्वरख । न विलम्यस्य । दैन्यं निवेदयितुमाह- योऽसाबसावित्यादि । असौ पुरुषः । जीवः । भगवदंशत्वासपोऽपि सहज- सेवकोऽपि । योऽसौ । मायया विमोहितोऽनर्थपरम्परासु निममः। भगवद्भत्यैव निवर्तनीयानर्थपरम्परः । शारीरुच्यते । सोऽहमस्मि । त्वदेकशरणार्थी । पाहि मामित्यर्थः । तदुक्तम्-~- भक्तियोगेन मनसि सम्यक्प्रणिहितेऽमले । अपश्य- पुरुपं पूर्ण मायाश्च तदुपाश्रयाम् । यया सम्मोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणा- स्मकम् । परोऽपि मनुतेऽनर्थ तत्कृतश्चाऽभिपद्यते । अनर्थोपशमं साक्षाद्भक्ति- योगमधोक्षज" इति । श्रीसुबोधिन्याञ्च-वस्तुतो जीवोऽपि ब्रह्मैवेति परोऽपि प्रकृतेर्नियामकोऽपि त्रिगुणात्मकं गुणत्रयभावापन्नं जडरूपं मन्यते । तत्कृतं चाऽनथे जन्ममरणादि मामोती"ति ॥ १६ ॥ त्वरामेव प्रावपदर्शितां समर्थयन्नधिगुणोपनिहितायास्तदर्थनाया वैफल्या- योग विलम्बस्याऽनवेक्ष्यकारिताप्रसञ्जकत्वञ्चाऽयधापयन्नभ्यर्थयत इत्याह- वायुरियादिना । ओम् । अवति खकीयानित्योस् । हे ब्रान् । “ओमि- त्येकाक्षरं प्रति "ओं तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणविविधः स्मृत" इति च श्रीगीतावाक्यात् । "कृप्णवाक्यानुसारेण शास्त्रार्थ ये वदन्ति हि । ते हि भागवताः प्रोक्ताः शुद्धास्ते ब्रह्मवादिन" इति निबन्धात् । "वेदान्ते च स्मृती अमलिङ्गं भागवते तथा । ब्रह्मोति परमात्मेति भगवानिति शब्धत" इति श्रीपुरुषोत्तमवाचकताऽप्योहारस्य प्राप्यते । किश्च । “ईश्वरः सद्यो हृयवरु- ध्यतेन कृतिमिरिति श्रीपुरुषोत्तमपरत्वं प्रतिपाद्य निगमकल्पतरोगलितं फलमि"ति चेदफलत्वं श्रीभागवतस्य निरणायि । वेदवृक्षश्च प्रणवनीजः ।
ईशावास्योपनिषद् । "वेदः प्रणव एवाऽम" इति वचनात् । “प्रणवाया यतो वेदाः प्रणवे पर्य- वस्थिताः । याश्यं प्रणवः सर्व तस्मात्प्रणवमभ्यसेदिति वचनाच । "प्रणव- बीजो वेदतरुरस्ती"ति श्रीसुबोधिन्याश्च । “सर्व तस्योपन्याख्यानमि"त्यादिभ्यः शतशः श्रुतिस्मृतिभ्यश्च । ब्रह्म चोचरकाण्डार्थः । ज्ञापनीयत्वात् । ज्ञानच प्रेमार्थम् । आत्मत्वज्ञानेऽवश्यम्भावात् । प्रेम च सेवां प्रयुनक्ति न मोक्षम् । खतनपुरुषार्थरूपत्वादन्यथा प्रेमभङ्गप्रसङ्गात् । उक्तञ्च-"अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदाम" इति । येषां न सम्पद्याऽऽविर्भावस्तेषामस्तु मोक्षः फलम् । न त्वनुगृहीतानामिन्यत्र विस्तरः । "सालोक्यसार्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृहन्ति विना मत्सेवनं जनाः । मत्सेवया प्रतीतं च सालोक्यादि चतुष्टयम् । नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत्कालविष्ठतमि" स्येवञ्जातीयकानि च वचनानि बहून्येव विद्यन्ते । तथाच निरुपधिमेम्णा नित्यसेव्येत्योमिति सम्बुद्धयर्थः । एतदेवाऽवनं निरुपधिप्रेमवतां तेभ्यो नित्यसेवादानं नाम । "ता आशिपः प्रयुझानाचिरं पाहीति वालफ" इत्येतदवनमेव खोमित्येतदर्थः। प्रार्थनाया विधानोक्तत्वप्रदर्शनाय तदभावे यज्ञदानतपःक्रियाः कृता विफला- स्तस्याञ्च सत्यामकृता अपि कृता भवन्तीति यज्ञदानतपःक्रियात्मकताचाऽभि- व्ययितुं मङ्गलार्थश्च तेनोर्जस्वलत्याय च मार्थनावावयारम्भे प्रणवप्रयोगः । तदुक्तम्-"तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । मवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनामिति । पूर्वकाण्डार्थमाह-तो इति । कवर्थत्वात्पूर्व- काण्डस्य । “आम्नायस्य क्रियार्थत्वादि"त्यादिसूत्रात् । "वेदैः साङ्गपदक्रमोप. निपटैरि"त्या वेदपदस्येवाऽत्रापि तत्पर्यायस्याऽऽग्नायपदस्य पूर्वकाण्डैफ- विषयतेत्यन्यदेतत् । करोति पुरुषार्थसिद्धिं फलदानं वेति ऋतुः । क्रियते वेदोकाधानादिसोमान्तक्रियाभिदेहचेष्टारूपाभिर्ध्यानादिसहिताभिरभिव्यक्त इति ऋतुः । भगवान् । न तु वेदबोधितक्रियामानं ऋतुः । “अहं ऋतुरहं यज्ञ" इत्यादिवचनात् । “यज्ञ ईज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रमि"ति विष्णोर्नामसह- साच । “अमिहोत्रं तथा दर्शपूर्णमासः पशुस्तथा । चातुर्मास्यानि सोमश्च क्रमात्पञ्चविधो हरिः । तत्साधनं च स हरिः प्रयाजादि सुगादि यत् । प्राकृतं रूपमेतद्धि नित्यं काग्यन्तु पैकृतम् । ज्ञानिनस्तदभिव्यक्तौ फर्मोक्षः क्रमाद्भवे- घालभाध्यविभूपिता। दि"त्युपक्रम्य ध्यानादिभिर्यथा मूत्रभिव्यक्तिः परात्मनः [ आधानादि- क्रियातोऽभिव्यक्तिर्यज्ञस्वरूपिण" इति सर्वनिर्णयनियन्धाच्च । वेदोक्तकर्ममि. राराध्य पुरुषार्थसिद्धिप्रद चेत्यर्थः । सेवाप्रिय सेवैकलभ्येति यावत् । ओमिति सममिन्याहाराज्ज्ञानमेमोभयपूर्वकत्वं कर्मणां लभ्यते । तेन भगवदेकाराधना- न्येच कर्माणि न पुरुषार्थान्तरप्रेप्साप्रयुक्तानि । भक्तिमागीयाणि । न भत्त्या- कानि | न भक्त्यङ्गानि । प्रेमसेवायामझानपेक्षणात् । परं प्रेमप्रयुक्तानि परि- चारूपाणि । “विदुषः कर्मसिद्धिः स्यात्तथा नाऽविदुषो भवेत् । भक्त्या च हृदि भावितः । भागवतवत्सलतये"ति वचनान्तरैकवाक्यतातश्च । एवञ्च वयं निरुपधिप्रेग्णा ते नित्यसेवामपेक्षामहे । तस्यां क्रियमाणायामेव च परगानु- महविलाससाक्षात्कारिका तेऽभिव्यक्तिम् । भवांश्च भक्तैर्निरुपधिप्रेग्णा क्रिय- गाणां सेवाल्यां परिच- तत्पूर्वकमेव तैः साक्षात्कार्यास्वादां स्वाभिव्यक्ति- मतिशयितानुग्रहशीलस्वादपेक्षते । तथा सत्येव रसोत्कर्षावपूर्वानन्दसन्दोह- सुखाखादालेति वेदादिसच्छास्त्राविर्भावानुरोधात्साकारब्रह्मवादाचाऽवसीयते । एवमन्योन्याभिलापसिद्धौ सङ्गमविलग्योऽनवसरपराहतो दुप्पसहश्च विरहक्लेश इति तत्कारणमन्विष्यन्तोऽपि नोपलभामह इति भावः । इतश्च चित्रयाम इत्याह-वायुरिति । “तद्वायुः । मातरिश्वानमाहुः । वायुर्यमोऽमिर्वरुण" इत्यादिवचनैर्भवान् वायुरुच्यते । स च क्षेपिष्टा देवता । तन्न विलम्बः परमं चित्रम् । अभाग्यवसाचोद्रेचयति । तस्माद्वायुवदतिशयितया त्वरया निजजनो- जीवनाय स्वरूपदर्शनप्रतिबन्धापगमे प्रसज्जखेति भावः । नन्दलमत्यर्थगुत्ता- पैन । क्षणमवलम्व्यतां धैर्य्यमित्यनाऽऽह-अनिलममृतमथेदं भस्मान्तर शरीरं सरेति । विरहवैक्लव्यविहलाः क्षणमपि न शक्नुमः प्राणान्धारयितुम् । यदि त्वया धापनीयास्तर्हि अनिलं येनाऽनिमस्तत् अमृतं येन मृतं मरणं नाऽस्ति तत् । विशेषावधारणकथनाशक्तेः सामान्यतो वचनम् । अन्तःसमागमं वा अधरामृतदानं वा हृदये चरणाम्भोजस्थापन वाऽन्यदेव वैवंविधमिति भावः । विरहविषाणो, हि नलिनीदलवीजनादिनाऽनिलेनाऽमृतसेचनेन चोज्जीव्यते । उच्यतेऽपि-~-"कान्ताइसकुचकुङ्कुमरजितायाः कुन्दसजः कुलपतेरिह पाति गन्ध" इति । "वितर वीर नस्तेऽधरामृतमिति च । १३ देशा.
ईशावास्योपनिषद् । स्मरेति सम्बन्धः । मा भूत्कीडानुपङ्गवशाद्विसरणं येन पश्चातापस्ते मा साऽवशिष्यत । तस्मादसदुज्जीवनकनिरतचित्तो भवेत्यर्थः । प्रतिबन्धनिरा- करणेन स्वसाक्षात्कारदाने तु क्रीडाशीलस्य ते क्रीडाविच्छेदो न भविष्यतीति भावः । ननु तादृशो विरहल्लेशो नाऽस्ति युप्माकं यादृशं निवेदयध्वे इति चेत्सत्यमित्याह-~अथेदं भसान्त शरीरमिति । अथेति पक्षान्तरे । सत्यं भूते भवांसाहशो विरहक्लेशो नाऽस्तीति । सति तत्र तादृशे प्रार्थनायोगात् । प्रागेच प्राणापगमात् । धिन्दाम्मिकानसात् । तथापि कृपया शीघ्रमेव त्वत्सेवा- मसभ्यं देहि । यत इदं पुरुषार्थप्राप्तिसाधनं मानुषं वर्तमानयुवावस्थं पटुतर- करणकलापसम्पन्न परिश्रमक्षमं तत्र तत्र दक्षं , स्मृतिमेधासमेधितसेवाहताक सेवार्थमेव यदृच्छया लब्धं शीघ्रमेव सेवायां विनियोज्यं शरीरमितः परस्ता- द्विपरिणागादिगोचरतां गमिष्यदिदानीमपि रोगादिभिरेकान्ततोऽनुज्झितं भला- न्तमिदानीमेव त्वरसेवादिविनियोगाभावे भविष्यति । विगलिताखिलपुमर्थम् । भसन्येव भसैव वा अन्तः पर्यवसायो यस्य तत् । तादृशं तत् सर चिन्तय । सेवायां शरीरस्य विनियोगे क्षणार्द्धमपि न विलम्बितव्यमिति भावः । तदु- क्तम्-"लब्ध्वा सुदुर्लममिदं वहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः । तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् । नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् । मयाऽनुकूलेन नभस्वते- रितं पुमान् भवाब्धि न तरेस आत्महा । महता पुण्यपण्येन क्रीतेयं फायनोस्त्वयेत्यादि । यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुज यावजरा दूरतो यावच्चे- न्द्रियशक्तिरमतिहता यावक्षयो नाऽऽयुपः । आत्मश्रेयसि तावदेव विदुपा कार्यः प्रयलो महान् सन्दीप्ते भवने तु कृपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः । कौमा- रोदाचरेत्माज्ञो धर्मान्भागवतानिहे"ति । नन्वेयं चेजानथ कुतो विलम्बध्वे । प्रवर्तध्वं सेवायामित्यत्राऽऽह-सरेति । खदनुग्रहं विना खेच्छया तत्करणे कस्याऽपि सामर्थ्य नाऽस्तीत्यर्थः। तदुक्तम्-"यदनुसयेते काले स्वबुद्धया- ऽभद्ररन्धन । तेनोपशान्तिर्भूतानामि"ति ! "मेषगम्भीरया याचा नामभिर्दूरगान् पशून् । कचिदाहयति प्रीत्या गोगोपालमनोज्ञये"ति च । "हिरण्मयेन पाने. "त्यादि झुपक्रान्तमिति । किञ्च । कृतर सर । त्वयैतदखिलं जगत्स्वसुखार्थ .
पालमाप्यविभूपिता। अग्ने नय सुपथा राये अस्मान विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मनुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम ॥१८॥ सृष्टम् । जीवानाम्पुरुषार्थसिद्धयर्थश्च । सेफ्यैच प्रदण्या तदुभ्यं परमार्थतो भवति । नाऽन्यथा । अन्यथा कृतहान्यकृताभ्यागमो तय प्रराज्येयातामि- 'त्यर्थः । निर्दोपपूर्णगुणविग्रहे च तदसम्भवो यतस्तस्माचस्मृत्वा सेवामेवा- ऽसभ्यं शीघं देहि मा माऽन्यथा कापीरिति भावः । प्रार्थनावधापनार्थी आग्रहनिवेदनार्थी धैर्याभावार्था अनुपेक्ष्यत्वार्था पुनः पुनः प्रार्थनावश्यफ- त्यार्थी च द्विरुक्तिः ॥ १७ ॥ एवं "तत्त्वं यूपन्नषावृण्यि"ति प्रार्थना मप्रहयेन समर्थिता । देवरवमूला आचार्यरूपत्वार्था चैपा मार्थना । आचार्यकनिरस्यत्वाद्वयामोहानाम् । सम्प्रति पापण्डनिरासं विना नाऽऽचार्यलामः । आचार्यलाभ विना च न व्यामोह- निरासः । यथार्थस्यैकत्यादयथार्थानां बहुत्यानिरिणामकेश्च । पापण्डानां प्रचुरत्याच । तदर्थमाचार्याविव एवाऽऽवश्यकः । पापण्डानि निरस्तानि भवन्ति । आचार्यलाभः सिद्धयति । तदानीन्तनानामनायासेन स्वतः । आवि- र्भावात् । इदानीन्तनानामप्याचा-वतारत्वेन प्रख्यानात् । अन्ये ह्याचाव्ः शेपादयः । श्रीमतुलभाचा-स्तु आनाव्यतारा मगवतः । व्यामोहश्च निर- स्यते । युगपदिदं भवत्येफेन चेति तत्त्वं पूपन्नपाण्विति तत्पदेन शिप्टेन साहशेनाऽपावृण्विति पदेन च तदाविर्भावाभ्यर्थनम् । पारोक्ष्याय च । अथा- ऽऽचार्यरुपता पुरस्कृत्येव भगवदभ्यर्थनमिदं प्रवृतमित्यत्राऽतिविस्पटं प्रमा. णमुपदर्शयन्ती प्रार्थनासाफल्यमाचार्यरूपेण प्रादुर्भावारसूचयन्ती तसिनाचा- यरूपे भगवति यदयनीय सदम्यर्थयते तादृशं भगवन्तभिष्वग्नित्याह- अग्ने नयेत्यादिना । नयरामाचे फयमनुग्रहः कार्यः । प्रार्थना तर फोप्युज्यते । मार्गगता एव शानादयः फलदाः । मार्गनिहामाये मतिर्षिफला। भगवत्कृपाया अमावेऽपि गार्गनिष्ठा फलदा । निधागाये फलं तमाशास्त्ये- वेति विनिम्धयः" । समर्शितगार्गनिष्ठया पानावश्यग्मायान, । "सदनुमझो ईशावास्योपनिषद् । . भवान् । गुरुशुश्रूपया यथा । कृष्णं विज्ञापयाम्यहमिति भगवदनुग्रहसाध- कत्यात्स्वातध्येण मार्गस्य । तदुक्तम्-वै जनो जातु कथञ्चनाऽऽप्रजेन्म- कुन्दसेव्यन्यवदन संसृतिम् । सरन्मुकुन्दा युपगृहनं पुनर्विहातुमिच्छेन्न रस- ग्रहो यत" इति प्रथमस्य पञ्चमे । पूर्वार्द्ध व्याख्यायोत्तरार्द्ध व्याचक्षाणा ऊचुश्च श्रीमदाचार्य्यचरणाः श्रीसुबोधिन्याम्-"तत्र हेतुः--स्मरनिति । वाक्शरीर- साध्यमवत्यमावेऽपि कामुकस्य कामिनीस्मरणमिव परमानन्दरूपचरणालिङ्गन पूर्वजन्मनि जातमधुना स्मरन् तच्चरणपरित्याजकसाधनं न कुर्यात् । यथा भरत- हरिणेन स्वमात्रादयः परित्यक्ताः । न भगवन्मार्गः । इच्छामपि न कृतवान् । यतो रसग्रहः । रसेन ग्रहणं यस्य स तथोक्तः । भगवतः कृपाऽभावेऽपि मार्गस्यैव बलिष्ठता । तदाह-यत इती"ति । “यथाऽवरुन्धे सत्सङ्गः सर्वसङ्गा- पहो हि माम् | भवापवर्गों प्रमतो यदा भवेजनस्य तद्दच्युत सत्समागमः । सता प्रसङ्गान्मम वीर्य से विदो भवन्ति हत्कर्णरसायनाः कथाः । तत्राऽन्वहं कृष्णकथाः प्रगायतामनुग्रहेणाऽशृणवं मनोहराः । उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधते"त्यादयः स्मृतयः श्रुतयश्च सन्ति । तेनाऽऽचार्यप्रपत्तिः सन्मार्ग. राभस्तत्र तात्पर्यावधारणपूर्वकश्रयणं च प्रतिबन्धकमूलभूतपापनिवृत्तिश्च तस्यां निस्साधनतामात्रलभ्यत्वज्ञानं च तदर्थ परमं दैन्यं च तेनाऽर्थसिद्धिरिति किमपि युष्माकं नाऽस्तीति चेवत्समादधानस्तं प्रार्थयत इत्याह-अमे नय सुपथेत्यादिना ! अग्रे नयतीत्यग्नि. । निशि तिमिरावृतायामप्रगमनोपयोगि- देहेन्द्रियादिसम्पत्तौ सत्यामपि वैफल्यादरे गमनं न सम्भवति । तत्र प्रेक्षा- वन्तः पुरुषार्थमभीप्सन्तोऽमिमाश्रित्याऽने गच्छन्तो भयान्मुच्यन्तेऽभीष्टमर्ज- यन्ति । पुरुषार्थेप्सूनां कृते निश्यमिः पुरुपार्थसाधकः सृष्टावीशेन सृष्टः स्यापि- तश्च । अग्रे भयस्थानाद निर्भयस्थाने । अनभीरदेशादभीष्टस्थाने । अपकृष्टा- वस्थात उत्कृष्टावस्थायाम् । अवतारकाला पापण्डानुदयाच्छास्त्राशययाथास्य- लाभकालश्च दिनम् । पापण्डप्राचुर्याचदितरकालो रात्रिः । इदं च "कृष्णु- धुमणिनिम्लोचे धर्मः कं शरणगतः । पुराणार्कोऽधुनोदित" इत्यादिवचनानां स्वारस्यादवसीयते । तनाऽभयमिच्छता परित्राणाय भगवानमिरूपः संस्तिष्ठति तिमिराण्यपनयन्मार्ग प्रदर्शयाध्यमुजासयन्देहेन्द्रियादीननुगृहन् कर्मणि । t पालभाप्यविभूपिता। 52416. सहायः सन् प्रकाशं प्रवर्चयन् मार्गनिष्ठाञ्जनयन् मार्गात्प्रच्यावं निवारयन्छ- क्तिमाप्याययन्नुत्साहं बर्द्धयन् हर्प वपन्नवसादं विलुम्पन् ज्ञानमुतेजयन् सह- भावममुश्चन् रानिमपि दिनकक्षापन्नां कुर्वन् रान्भीपयन्नाश्रितान् परिरक्षन् क्षुद्राञ्छलमीकुर्वन् दोपान्दहन् स्वरूपं शोधयन् पावित्र्यं जनयन् भगवदुप- योगार्हता जनयन् सदसत्पदार्थविवेकक्षमतां कुर्वन्नसत्सम्बन्ध हापयन् सत्स- म्बन्ध सृजन् स्वस्वरूपं भगवद्रूपं प्रकाशयन् दीपादिपरम्परावदविच्छिन्ननिज- तेजस्का सन्ततिमातन्वन् स्निग्धेप्याविशन्निस्नेहांस्त्यजन् । तदिदममे इति सम्बुद्ध्या सर्व सूचितमर्थात् । किञ्च । अप्रे पुरस्तादेव नयति स्वकृपाविषयता- मित्यमिः । भगवान् हि अनुपलभ्यया । वर्मना तदाराधने तत्कृपा फल- मुखी । न पूर्वम् । प्रकरणमेदेन मार्गाणां निरूपणान्यथानुपपत्त्यैतदवसीयते । तस्य ज्ञानं गुरुवेदादिभिः । गुरुशब्दस्याऽन्धकारनिरोधित्वार्थकत्वादमेश्वाऽन्ध- फारनिरोधित्वादग्रौत्सर्गिक गुरुत्वं गम्यते । मन्नेऽसिंस्तचैवोपपायते । वाक्प- तित्वाच । "विवक्षोर्मुखतो भूनो वहिर्वान्याहृतं तयोरि"ति "याचां बहे- मुखं क्षेत्रमिति "अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशदि"त्यादिवाक्येभ्योऽमे गिन्द्रि- याधिष्ठातृत्वेन वान्यापारस्य च देवताधिष्ठितेन्द्रियसाध्यत्वेन तदर्थज्ञानस्याऽपि तथा सति याथार्थ्यतो वाक्पत्येकनिष्ठत्याद्वेदादिभिर्ज्ञानस्य तत्कृपयैवाऽन्येपा- मपि सम्भवात् । नाऽन्यथेति । तथाच भगवन्मार्गप्रविविक्षुणा भगवत्कृपा- र्थिनाऽमेः समाश्रयणमादावेव विधेयम् । नाऽन्यथा गतिः । तत्कृपायां सत्यां भगवत्कृपा नान्तरीयकी । भगवत्कृपाया अमावेऽप्याचार्यकृपया तसिद्धः । "गुरोरनुप्रहेणैव । गुरुशुश्रूपया यथा । सदनुग्रहो भवानि"ति वाक्येभ्यः । तत एव भगवत्कृपार्थ भगवदने शरणगमनार्थमात्मनिवेदनार्थ च नयति जीवा- ननुरुणद्धि च कृपार्थ भगवन्तमनुकूलयति च स्वयं समाराध्य प्रसादमासाद्य तहलेन जीवाननुकम्पते चोद्धरति चेत्यतोऽप्यमिः । “सर्वभक्तसमुद्धारे कृष्णं विज्ञापयाम्यहमिति वाक्यात् । एतेन भगवदपेक्षयाऽपि दयालुतायाः परमा काष्ठा निजजनोद्धारमात्र कार्यताऽद्भुतसामर्थ्य चोक्तम् । सा च भगवल्लीलेति नाऽनुपपत्तिः काचित् । "तस्यैवाऽऽत्मानुभावप्रकटनहृदयस्याऽऽज्ञया प्रादुरासी- दिति वाफ्यात् । “यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरावि"ति वावयाच ! ANIDIA १०२ ईशावास्योपनिषद् । है अमे । वाक्पते । पुष्टिमार्गाचार्य । गुरो। “यस्य साक्षाद्भगवति ज्ञानदीप- प्रदे गुरौ । मांसद्धीः श्रुतं तस्य मन्ये कुञ्जरशौचवदि"ति वचनश्च चकास्ति । तेन साक्षाद्भगवन्निति । अस्मान् । निःसाधनाननन्यगतिकाननुमाह्यान्वबले- नैवोद्धरणीयांस्त्वदेकचरणायसन्नान् । अस्मदुद्धारार्थत्वात्स्वरूपसत्तायाः । तद- र्थमेवाऽऽविर्भावान्मुखे भूमौ चाऽऽचार्य्यरूपेणेति । तेन "दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायाऽऽसुरी मते"ति वाक्यादेवोद्धारमयलात्मत्वमुक्तम् । निस्साधनजनो- द्वारपरायणत्यञ्च । प्रकरणादिदं लग्यतेऽग्निपदसमवधानाच्च । सुपथा । फला• त्मकेन स्वतन्त्रपुरुषार्थरूपेण परमानन्दमयेन रसात्मकेन क्लेशरहितेन निश्शेष- क्लेशनिष्पेपपेशलेन सद्यो भगवत्प्रापकेण अदूरेण फलाभिन्नसाधनेन सुकरो- पायवता सुगमन प्रोज्झितकैतवेन साक्षात्परम्परया च वेदादिसकलवामयसम- न्वयसिद्धेनैकदेशितारहितेन सार्वदेशिकेन तत एव शास्त्रविरुद्धांशत्यागपूर्वक- सर्वसमयसमन्वयमयसमुदयेन निरस्तसमस्तविरोधिजनेन निष्कण्टकेन यथा- थेन साक्षाद्भगवता प्रोक्तेन न प्रान्तिकल्पितेन निरस्तभ्रान्तिकारणेन सर्वगम्येन शिष्टाचरितेन निरपायेण भगवल्लीलामयेन वरूपात्मकेन सुलभौपयिकसक- लसामग्रीकेण निर्भयेण मनोहरेण मधुरेण प्रियेण सरलेन भगवता च भवता च परिरक्ष्यमाणेन विविधोत्सवेन अक्लिष्टेन साकारब्रह्मवादापरपर्यायेण पुष्टि- मार्गाख्येन सर्वशास्त्रैकतात्पर्येण प्रमेयबलोपहितेन । राये धनाय । अनधिकारिणे अमकाश्याय अधिकारिणेऽनुमायायैव देयाय । भक्तियोगाय । भगवते या । श्रीभागवतस्य प्रथमे श्रीव्यासनारदसंवादेन "अहो देवर्षिर्ध- न्योऽयं यत्कीर्चि शार्ङ्गधन्वनः । गायन्माद्यन् गिरा तळ्या रमयत्यातुरं जग- दि"त्यन्तेन भक्तियोगस्य रतत्वसिद्ध्या श्रीपुरुपोचमनामसहसे "भक्तिरत्न- प्रदायक" इति नाम्ना श्रीमदाचार्यचरणैस्तन्निष्कर्षकथनात् । “यद्वैप्णयानां धनमि"ति वाक्याच । तथा सति भगवानपि सुतरां धनम् । भगवत्त्वाच्च । "ऐश्वर्य्यस्य सममस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव पण्णां मग इतीरणे"ति वाक्यात् । श्रीपुरुषोत्तमनामसहस्र चतुर्थस्कन्धीयनामसु श्रीरिति भगवन्नामनिर्देशाच । षष्ठे वृत्रासुरचतुःश्लोक्यां "न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठचं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् । न योगसिद्धीरपुनर्मवं वा समास त्या विरय्य बालभाष्यविभूषिता। १०३ काहे" इति वाक्यव्याख्यायां श्रीमत्प्रभुचरणैः सर्वार्थरूपत्यादर्थत्वोपपादनाच । तदुक्तमादावेद कारिकाभिः-लौकिको वैदिकश्चाऽर्थविविधः प्राकृतैर्गुणैः । क्रमेण ते भगवत्तो गुणैः पद्भिनिराकृताः । स्वर्गभूमिरसैश्वयं सात्त्विकादि तु लौकिकम् । मोक्षश्च पारमेष्ठ्यं च सिद्धयश्चेति वैदिकम् । प्रवृचिधर्मसाध्य- त्वात्सामान्य तत्तु लौकिकम् । निवृत्तिधर्मसाध्यत्वाद्विशेषाद्वैदिकं परम् । प्रत्ये- कमेव ते चार्था म तु सम्भूय कुत्रचित् । मंगवत्यखिलात्मत्याद्भवन्त्येव तथा हि ते । अतोऽर्थो भगवानेव पुष्टिमार्गेऽअमन्यतः । सर्वतो नैरपेक्ष्यं च तथाऽत्र विनिरूप्यत" इति । विशिष्योपपादनं तत्रैव व्याख्यायां द्रष्टव्यम् । तथाच सर्वतोऽन्यतो नैरपेक्ष्यपूर्वकं स्वतनपुरुषार्थतया भगवत्तत्सेवाद्यर्थप्राप्तय इत्यर्थः । तेनाऽन्यत्र पुरुषार्थेष्वर्थपदं भाक्तमेव । भगवति भक्तियोग एव तु साक्षावर्चत इति ध्वनितम् । धर्मद्वारा धर्मिपरा भक्तिरपि न पुरुषार्थः । साक्षार्मिपरैय पुरुषार्थ इत्यपि ध्वनितम् । परिस्पन्दतेऽपि च साक्षाद्भगवतः श्रीमुखवचना- मृतम्-'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच" इति । पूर्वार्द्धवलादुत्तरार्द्धार्थो भक्तेनाऽभिप्रेतन्यो न भवति । भगवतोऽभिप्रेतस्तु न दोपायेति न कश्चिच्छवावसरः । नय । स्वच- रणरजोवलम्बदानेनेति भावः। तेन त्वत्कृपाध्यतिरेकेणाऽधीतवेदवेदान्तादि- सकलशास्त्राणां महापण्डितानामपि न सुमार्गज्ञानम् । परमतत्वेन यथाकथाचन ज्ञानेऽपि तदप्रयोजकमश्रद्धाग्रस्तत्वात् । ज्ञानेऽपि श्रद्धायामपि च जातायां यावन्नाऽमेस्तव कृपावलम्बः स्वसामाभिमानश्च भाति तावन्न मार्गलामस्तत्र गतिश्च । "गुरुकर्णधारम्" "अकृतकर्णधरा जलधावि"त्यादिवाक्येभ्यो गुरोः सततसहभावेनैव सलतगुरुभक्त्या गुरुनिष्ठया गुरुकृपयैव प्रमेयवलेनैव च पुष्टि- मार्गीयधर्मसिद्धिः । नाऽन्यमा प्रमाणबलेन ( कर्णधारत्वकथनात् । तेन मार्गज्ञानं तज्ज्ञापनसामर्थ्य तनिष्ठतासम्पादनमम्याचार्य्यरूपभगवदधीनम् । तदनाश्रयणे तदनुग्रहाभावे च सर्वविधान्ययोग्यताशालिन विद्यातपोयोगसमाधिभाजामपि सर्वथाऽनधिकार एव पुष्टिमार्गज्ञानादौ । एकान्ततोऽज्ञानमेव प्रबलमित्यमे: पुष्टिमार्गाचार्यत्वं मार्गाधिपत्वं तदाश्रयणस्य प्रथमकर्तव्यत्वञ्चोक्तम् । अमे नय सुपथा राये अस्मानिति पदेभ्यो ज्ञापकेभ्यः । समभिज्याहारसलारप्रसाद ।
ईशावास्योपनिषद् । नयेति नेतृत्वञ्च । अन्येषां प्रमाणवलेन मर्यादया यथाशक्यं शिष्योपकार- करणम् । अमेस्तु स्वयमूर्जस्वलस्वरूपत्वात्सान्निध्यमात्रेणाऽभयसम्पादनपुरस्सर- जाड्यापगमप्रकाशोपपादनाभ्यां प्रमेयबलेनैव परिपूर्णमेव । तच्चाऽनन्यशक्य- भगवत्प्रेमसेवादानं तन्निर्वाहश्च । अन्येषां साधनात्मकः पन्थाः प्रमाणात्मकः । अमेस्तु फलात्मक एव पन्था आरम्भादेव । स्वरूपतः । श्रीमदाचार्य्यचरणा• नुग्रहाच । स च प्रमेयात्मकः । प्रमेयवलादेवोन्नमनेन नेयत्वाज्जीवानाम् । नाऽन्यथाऽसिन् गतिः । निरस्तसाम्यातिशयत्वाच । अस्मानिति चातकवति. मोऽनन्यानिति दैन्यं त्वदीयानिति गर्वः। "न मे भक्तः प्रणश्यती"ति विश्वा- सशालिनः । "सत्स्वपि सरस्सु विमलेप्वलिहंसालीविनोदमधुरेषु । अम्बुद- विमुक्तपाथसि चातक ते दुर्महः कोऽयम् । अग्बुदस्य स्वभावोऽयं समये वारि मुञ्चति । तथापि चातकः खिन्नो रटत्येव न संशय" इति विज्ञप्तिषु श्रीमत्प्र- भुचरणवचनाभ्याम् । "कृतनिश्चयिनो वन्द्यास्तुगिमा न प्रशस्यते । चातकः को वराकोऽयं यस्येन्द्रो वारिवाहक" इत्यमियुक्तोक्तेश्च । एककौटौ प्रविष्टान् भवतो भविष्यतश्च सर्वान्पुष्टिमार्गीयजीवान् । नय गमय सर्वविधानुकूल्येन गमनयोग्यान् कुरु । सर्वथा स्वयमशक्तिर्दर्शिता । सुपथेति विना माग्योदया- चल्लाभो नाऽस्ति । “कः पन्था उत्पथश्च क"इति तदज्ञानश्च । अमे इत्यमि- रेव सुपथिज्ञस्तदध्यक्षश्च । मार्गनिर्धारो गुरुनिर्धर आचार्यनिर्धारश्चोक्ताः । नयेति नयनेनैव सुपथा गतिर्नाऽन्यथेति । भगवत्प्रेमसेवाख्ययथार्थधनप्राप्तये । पहिर्मुखसमात्पृथक्कुरु । तदर्थ सर्वदा प्रफटीभूतस्तैस्तैः प्रकारैस्तिष्ठ खकीयेषु न कदापि तिरोभनेरिति भावः । मार्गप्रवृत्तिः कामिता मार्थिता चेतीह विस्पष्टम् । अन्यथानुपपत्त्या सत्प्रकाराश्च मार्गस्थापनप्रतिबन्धनिरसनजन्मग्रहणदिग्विजय- शरणग्रहणस्वसदृशानन्यसदृशापर्याप्तपुरुप्रशंसवंशानुवृत्त्यादयः सर्व एव कोडी- कृता वेदितव्याः।हे देव विश्वानि वयुनानि विद्वानसि । उपादेयानि हेयानि च। हेयानि हापयन्नुपादेयान्युपादापयन् सुपथा नय । यो हि हेयान्युपादेयानि च वेद स एव सुपथा शक्तः शिप्यं नेतुम् । स भवानेव केवलो नाऽन्यः।यो वा त्वद- साधारणकृपाभाजनस्त्वदाराधनधन ऐहिकामुप्मिकनिरपेक्षः स्वयं विदानो हेयानि जहदुपादेयान्येवोपाददानो लोकांश्च हेयाशिययति सुपथि प्रवर्षयत्यु- . .
पालभाष्यविभूपिता। १०५ - पादेयानि प्रापयति । न तु यो हेयेषु हृप्यत्युपादेयेपु परिम्लायति केवलं गुरुपदमलीक बिनदलजमानो धृष्टो मिथ्यावलेपलेपपृथुलः खार्थकनिष्ठो निष्ठुरो निष्करुणोऽर्थेन्द्रियारामो वहिर्मुखो यथाऽऽधुनिकः कश्चिदितरः । तदुक्तम्- "अचक्षुरन्धस्य यथाऽप्रणीः कृतस्तथा जनस्याऽविदुपोऽबुधो गुरुरिति । "अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः । दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथाऽन्या" इति । "आचिनोति च शास्त्रार्थानाचारे स्थापयत्यपि । स्वयमाचरते यस्तु तमाचार्य प्रचक्षत" इति च । श्रीमदाचार्यचरणा अप्यनुजगृहु:--"कृष्णसेवापरं वीक्ष्य दम्भादिरहितं नरम् । श्रीभागवततत्त्वज्ञं भजेजिज्ञासुरादरादि"त्यादि । किञ्च । शिष्यार्थमेव शास्त्रप्रवृत्तेमुरुणा च शास्त्रस्याऽवश्योपदेश्यताया एव प्रस्तुतत्वाञ्च शिष्येणाऽपि प्रयत्नत एवं गुरुमुखाच्छास्त्रार्थः श्रोतव्यस्तदुक्तसाधनानि चाऽनुष्ठेयानि । "एक शास्त्र देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव । मनोऽप्येकस्तस्य नामानि यानि कर्माऽप्येकं तस्य देवस्य सेवे"ति वाक्यात् । "शास्त्रमवगत्य मनोवाग्देहैः कृप्पाः सेव्य इत्यर्थः' इति श्रीमदाचार्य्यचरणैरुकवाक्यनिष्कर्षा र्थकथनाच । यो हि विश्वानि ययुनानि वेद स एवैकवाक्यता निष्कर्ष निर्धार च वेद । अन्ये एकैकमपूर्ण विदुः । तेनैव नानामतानि परिकल्पितानि । मतावष्टम्भश्च । एकवाक्यतानिष्कर्ष निर्धारालाभात् । अज्ञाश्च गतानुगतिकाः । ते हि यथार्थ वस्तु दैवयोगात्कदाचिच्छ्रुत्वाऽपि यथार्थायथार्थनिर्णयाशक्त्या तघाथार्थ्यमविदन्तः श्रद्धाजाड्यात्वस्याऽल्पज्ञतावशाच पापण्डमपि पूर्वपरि- गृहीतं मतं सन्मतसम्भावनया न जहति । विवेकाभावात्सदसती विवेक्तुं न प्रभवन्ति । गतानुगतिका एव भवन्ति । तदुभयं मा भूत्सर्वेऽपि सर्वशाला- णामेकवाक्यतां निष्कर्ष निर्धारश्च प्राप्यैव सुपथा प्रयान्तु । तदैव परमानन्दो मार्गोत्कर्पज्ञानश्च । नाऽन्धवत् । को नामाऽस्याऽऽनन्दोऽन्धस्याऽऽकृप्येव नीय- मानस्य याथार्थ्यायाथार्थ्यमविदुपः परप्रत्ययपर्य्यवसितस्य पदे पदे सशकस्य । किञ्च मार्गज्ञानम् । न किञ्चिदपि । नाऽस्य भयनिवृत्तिनाऽविश्वासविनाशो गाज्यत्वोशनेपः । नाऽन्यथासिद्धं च मार्गज्ञानम् । आवश्यकत्वात् । परम- पुरुषार्थत्वात्। तत एव सम्प्रदायप्रवृत्त्यर्थत्वात् । तदेतदुक्तम् --विश्वानि ४ ईशा ईशावास्योपनिषद् । देव वयुनानि विद्वानिति । विवृतं चैतेन नयेति नयनस्वरूपम् । इदं हि नयनं नयनं यकिलोपजातप्रकाशस्य निरस्तान्धश्रद्धस्य यथार्थश्रद्धोदयस्य चीय- मानगुणगणस्य प्रेमातिभरनिर्मिनपुलकारस्य मार्गे पुरस्सरीभूय पुरः पुरः प्रवृत्तिः । तदर्थमेव प्रागपि "दृष्टय" इत्यभ्यर्थितम् । तसाच्छ्रीमदमिदेवप्रवर्ति- तसम्प्रदायपुरस्कारेण सकलशास्त्राणां समन्वयोऽवश्यमेवाऽवधार्यः शिष्येण ।। गुरुणा चाऽवधारयितव्यः शिष्याय । परम्परा च प्रवर्चतामिति शास्त्रार्थोऽयं सिद्धः। एतदुल्लङ्घनं सर्वानर्थकरं सर्वेषां न केवलं साम्प्रदायिकानामेवेति च न्यज्यते । साम्प्रदायिकैस्तु सुतरामेवाऽसावेतव्यमिति भावः । विशेषणेना- ऽऽधिभौतिकाध्यात्मिकायमी व्यावर्तितौ । आधिदैविकत्वं दर्शितम् । साक्षाद्ध- गवत्मापकत्वाद्विरदात्मकत्वाच । विरही हि गावदुपायान् वेत्ति विरहं विनिव- यितुम् । विधानीत्यनेन ज्ञानं नाम नाऽवशिष्यते यत्त्वं न वेसि । तस्मा- त्वदुदित एव सुपन्था अन्ये कुपथा एवेति भावः । तेन मुख्यं परमप्रमावि- स्वममेरुक्तम् । ब्रह्मवित्त्वमन्तरा सर्वविज्ञानस्याऽनुदयाच । सर्वं ब्रह्मेति ज्ञाने शास्त्राणामपि सर्वानतिरिक्तविषयत्वेन ब्रह्मपरत्वावधारणपर्यन्तत्वात्सर्वविज्ञा- नस्य । तदेतदुक्तम्-विद्वानिति । तेषां ब्रापरत्वं विद्वानित्यर्थः । सेवापर्य; न्तञ्च ब्रह्मपरतेति कृष्णसेवाप्रवर्चक इति यावत् । विद्वानित्युपदेष्मृत्वाद्भक्ति- मार्गाचार्य्यत्वम् । विद्वानेव हि भगवत्सेवां सर्वशास्त्रार्थभूतां सर्वोत्तमा जानाति करोति कर्तुं शक्नोति । ततः सर्वमेवाऽवरं च । सेवितुश्च । सेन्यञ्च, सेव्यत्वञ्च सेवाभावश्च सेवाश्च तत्स्वरूपश्च । स हि पियापियं विजानात्युप- हरणीयमनुपहरणीयं शुद्धाशुद्धि योग्यायोग्यमवसरानवसरम् । त्रिविधं क्लिष्ट नाऽर्पणीयम् । प्रेमानुकूलमेवाऽर्पणीयम् । प्रेम्णैवाऽर्पणीयमिति । तथाहि । "श्रीकृष्णहाईवित्" "यचदिष्टतमं लोके यच्चाऽतिप्रियमात्मनः । तन्निवेद- येन्मह्यम्" "न भजति कुमनीषिणां स इज्यां हरिरधनात्मधनप्रियो रसज्ञः। श्रुतधनकुलकर्मणां मदैयें विदधति पापमकिश्चनेषु सत्यु" इति । विद्वान् विदित्वा सेवते । स हि सर्वस्य शास्त्रराशेरयमर्थ इति विदित्वा भगवन्तं तत्सेवाञ्चोपाश्रयति सेवितुं वेति च । वस्त्राभरणभोजनभवनोत्सवादिरूपां सर्वा- मपि सेवासामनी सर्वोत्तमप्रकारको निर्मातुं कुशल एव सेवितुं जानीयाम । 1 बालभाष्यविभूषिता । १०७ मूढः । विद्वानेव च सर्वपुरुषार्थरूपां स्वतन्त्रपुरुषार्थरूपां च तन्मयस्ता प्रेमरस- परिष्ठतां करोति । प्रीयमाणो हि विद्वान् भवति । नाऽप्रीयमाणः । सार्चदे- शिकोऽयं नियमः । यस्तु शुष्कविद्यस्तं विद्वानिति नाऽऽचक्षते । विद्यानि चयुनानीति पुष्टिमार्गीयत्वम् । न हि मर्यादायां विश्वानि वयुनानि । “एक- सिझन्मन्येकमेव शास्त्रमिति हि मर्यादा। प्रत्यक्षासामर्थ्याभावाचौचित्याच । बेदव्यसनार्थापत्या च । तत्रापि वयुनानि ] भवन्ति बहवः शब्दतः शास्त्र- धारकाः । अर्थतस्तत्रापि याथायन धारका विरला एव । वस्तुतस्त्वगिरेवैको वयुनानि विद्वान् । तत्प्रसादादेवाऽन्यस्य तद्वोधः । वयुनानि विद्वान् । "श्रेयः- झुर्ति भक्तिमुदस्स ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलमोधलब्धये । तेपामसौ क्लेशल एव शिष्यते नाऽन्यद्यथा स्थूलतुपावघातिनाम् । धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विप्व- क्सेनकथासु यः । नोत्पादयेयदि रति श्रम एव हि केवलम् । माहात्म्यज्ञान- पूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः । स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया मुक्तिर्न चाऽन्यथा । मतः पुम्मिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः । खनुष्ठितस्य धर्मस्य ससिद्धिरितो- पणम् । इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य खिष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धिदचयोः । अवि- च्युतोऽर्थः कविमिनिरूपितो यदुवमश्लोकगुणानुवर्णनम् । भगवान् ब्रह्म का- ल्येन निरन्वीक्ष्य मनीपया । तदध्यवस्यस्कूटस्सो रतिरात्मन् यतो भवेत् । मियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थगहं स च मम प्रियः । प्रायश्चित्तानि चीनि नारा- यणपरामुखम् । न निःपुनन्ति राजेन्द्र सुराकुम्भमिवाऽऽपगाः । न तथा हाघ- यान राजन् पूयेत तप आदिमिः । यथा कृष्णार्पितप्राणस्तत्पूरुपनिपेवये"त्या- दिभिरुपहणः प्रेमपर्यवसितानि प्रेममयानि विद्यानित्यर्थः । यदि प्रेमान्तानि न जानाति मूढोऽसौ न विद्वान् । विद्वान् श्रीकृष्णसेवातत्परो भवति । “श्रवणं कीनं विष्णोः सरणं पादसेपरम् । अन चन्दनं दासं सल्यमामनिवेद- नम् । इति पुंसाऽर्पिता विष्णौ भक्तिधन्नवलक्षणा । क्रियते भगवत्यद्धा तन्मध्येऽधीतमुत्तममिति वाक्यात् । तेन शास्त्रार्थेषु परमकुशलः सर्वहेयो- पादेयमीमांसको दायेन सर्वापेक्षापरित्यागेन भगवतः सर्वविधप्रेमसेक्या परिष्ठतो भोगरागशृङ्गारवस्त्रभूषणपुष्पमण्डपनानाविधान्यशिल्पचित्ररचनापाक- वैदग्ध्यजलकेलिनिकजकल्पनाप्रेझपर्येक्वहिन्दोलादिविविधासक्ष्यसेवासु लोको- १०६ ईशावासोपनिषद् । देव वयुनानि विद्वानिति । विवृतं चैतेन नयेति नयनस्वरूपम् । इदं हि नयनं नयनं यत्किलोपजातप्रकाशस्य निरस्तान्पश्रद्धस्य यथार्थश्रद्धोदयस्य चीय- मानगुणगणस्य प्रेमातिमानिर्भिन्नपुलकास मार्गे पुरस्सरीमय पुरः पुरः प्रवृत्तिः । तदर्थमेव प्रागपि “दृष्टय" इत्यभ्यर्थितम् । तस्माच्छीमदमिदेवप्रवर्ति- तसम्प्रदायपुरस्कारेण सकलशासागां समन्ययोऽवश्यमेवाऽवधार्यः शिष्येण ।। गुरुणा चाऽवधारयितव्यः शिष्याय । परम्परा च प्रवर्ततामिति शालार्थोऽयं सिद्धः। एतदुल्लईनं सर्वानर्थकरं सर्वेषां न केवलं साम्प्रदायिकानामेवेति च. व्यज्यते । साम्प्रदायिकैस्तु सुतरामेवाऽस्मादेतव्यमिति भावः । विशेषणेना- ऽऽधिभौतिकाध्यात्मिकावनी व्यावर्तितौ। आधिदैविकत्वं दर्शितम् । साक्षाद- गवत्प्रापकत्वाद्विरहात्मकत्वाच । विरही हि यावदुपायान् वेत्ति विरहं विनिव- यितुम् । विश्वानीत्यनेन ज्ञानं नाम नाऽवशिष्यते यत्त्वं न वेसि । तस्मा- त्वदुदित एवं सुपन्था अन्ये कुपथा एवेति भावः । तेन मुख्यं परमजावि- स्वममेरुक्तम् । ब्रह्मवित्त्वमन्तरा सर्वविज्ञानस्याऽनुदयाच । सर्वे प्रति ज्ञाने शास्त्राणामपि सर्वानतिरिक्तविषयत्वेन ब्रह्मपरत्वावधारणपर्यन्तत्वात्सर्वविज्ञा- नस्य । तदेतदुक्तम्-विद्वानिति । तेपा ब्रह्मपरत्वं विद्वानित्यर्थः । सेवापर्य- न्तश्च ब्रह्मपरतेति कृष्णसेवाप्रवर्तक इति यावत् । विद्वानित्युपदेष्टुत्वाद्भक्ति- मार्गाचार्यत्वम् । विद्वानेव हि भगवत्सेवां सर्वशासार्थभूतां सर्वोत्तमा नानाति करोति कत्तुं शक्नोति । ततः सर्वमेवाऽवरं च । सेवितुश्च । सेन्यञ्च सेव्यत्वञ्च सेवाभावश्च सेवाश्च तत्स्वरूपश्च । स हि प्रियाप्रिय विजानात्युप- हरणीयमनुपहरणीय शुद्धाशुद्धिं योग्यायोग्यमवसरानवसरम् । त्रिविधं क्लिष्ट नाऽर्पणीयम् । प्रेमानुकूलमेवाऽर्पणीयम् । प्रेम्णैवाऽर्पणीयमिति । तथाहि । "श्रीकृष्णहाईवित्" "यद्यदिष्टतमं लोके यच्चाऽतिप्रियमात्मनः । वनिवेद. येन्मह्यम्" "न भजति कुमनीपिणां स इज्यां हरिरधनात्मधनप्रियो रसज्ञः । भुतधनकुलकर्मणां मदैयें विदधति पाएमकिश्चनेषु सत्सु" इति । विद्वान् विदित्वा सेवते । स हि सर्वस्य शास्त्रराशेरयमर्थ इति विदित्वा भगवन्तं तत्सेवाञ्चोपाप्रयति सेवितुं वेति च । वस्त्राभरणभोजनभवनोत्सवादिरूपां सर्वा- मपि सेवासामी सर्वोत्तमप्रकारका निर्मात कुशल एवं सेवितुं जानीयान, ।
-- बालभाष्यविभूपिता । । मूदः । विद्वानेव च सर्वपुरुषार्थरूपां स्वतन्त्रपुरुषार्थरूपां च तन्मयस्ता प्रेमरस- परिप्ठतां करोति । प्रीयमाणो हि विद्वान् भवति । नाऽप्रीयमाणः । सार्यदे- शिकोऽयं नियमः । यस्तु शुष्कविद्यस्तं विद्वानिति नाऽऽचक्षते । विश्वानि वयुनानीति पुष्टिमागीयत्वम् । न हि मादायां विश्वानि वयुनानि । “एक- सिजन्मन्येकमेव शास्त्रमिति हि मर्यादा। प्रत्यक्षात्सामर्थ्याभावाद्यौचित्याच्च । वेदव्यसनार्थापत्त्या च । तत्रापि वयुनानि । भवन्ति बहवः शब्दतः शास्त्र- धारकाः । अर्थतस्तत्रापि याथार्थ्येन धारका विरला एव । वस्तुतस्त्वमिरेवैको वयुनानि विद्वान् । तत्प्रसादादेवाऽन्यस्य तद्बोधः । वयुनानि विद्वान् । श्रेयः- भुति भक्तिमुदस्य ते विभो ग्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये । तेपामसौ केशल एव शिप्यते नाऽन्यद्यथा स्थूलतुपावघातिनाम् । धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विप्व- सेनकथासु यः । नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् । माहास्यज्ञान- पूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः । सेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया मुक्तिर्न चाऽन्यथा । अवः पुम्मिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः । खनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितो- पणम् । इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य खिष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धिदत्तयोः । अवि- च्युतोऽर्थः कविभिनिरूपितो यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनम् । भगवान् ब्रह्म का- स्येन निरन्वीक्ष्य मनीषया । तदध्यवस्सत्कूटस्थो रतिरात्मन् यतो भवेत् । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः । प्रायश्चित्तानि चीर्णानि नारा- यणपराशुखम् । न निःपुनन्ति राजेन्द्र सुराकुम्भमिवाऽऽपगाः । न तथा घथ- वान् राजन् पूर्यत तप आदिमिः । यथा कृष्णार्पितप्राणस्तरपूरुपनिपेवये"त्या- दिभिरूपवृंहणैः प्रेमपर्यवसितानि प्रेममयानि विद्वानित्यर्थः । यदि प्रेमान्तानि न जानाति मूढोऽसौ न विद्वान् । विद्वान् श्रीकृष्णसेवातत्परो भवति । "श्रवणं कीर्तन विष्णोः सरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेद- नम् । इति पुंसाऽर्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा । क्रियते भगवत्यद्धा तन्मध्येऽधीतमुत्तममिति वाक्यात् । तेन शास्त्रार्थेषु परमकुशलः सर्वहेयो- पादेयमीमांसको दावेन सर्वापेक्षापरित्यागेन भगवतः सर्वविधप्रेमसेवया परिप्लुतो भोगरागराङ्गारवस्त्रभूषणपुष्पमण्डपनानाविधान्यशिल्पचित्ररचनापाक- वैदग्ध्यजलकेलिनिकुञ्जकल्पनाप्रेहपर्यकहिन्दोलादिविविधासयसेवासु लोको.
१०८ ईशावास्योपनिषद् । - तरचातुर्यच-समाराधितपरमविदग्धशिखामणिनिजप्रेष्ठः प्रमाणे प्रमेये च परनिष्णातो भगवतः समाराधने जीवानां भगवत्कृपापापणे च परमनिपुणः । यद्यपि विद्वानेव श्रीकृष्णं समासेवितुं शक्तस्तथापि कृपया स्वानुगान्मूढानपि जीवांस्तादृशमेमोपचारादिशिक्षया शिक्षयित्वा विदुषो विधाय सेवायां प्रवर्त्य सेवाफलं प्रापयितुं प्रसिद्धपाण्डित्य इति विद्वानित्युक्तम् । एतेन नीवानां पशुवदज्ञत्वं विदुषाऽनुकम्प्यत्वं च दर्शितम् । तत एवं प्रार्थयेते इत्याह- , युयोध्यस्मञ्जुहुराणमेन इति । अस्माभिः पशुतुल्यैरज्ञः स्वभावतो विपया- सक्तैरमान् वोक्तरूपान् नानाविधकौटिल्यैः परोक्ष्येणाऽऽक्रमणैरविदित- सञ्चरैरलक्षितोत्थान धमानमेनोऽपराधं युयोधि पृथकुरु वियोजय नाशय नोत्ति- ऐतथा विघेहीत्यर्थः । भवन्ति तथाविधा अप्यपराधा ये शास्त्रदृष्ट्याऽपि नाऽप- राधा इति भासन्ते । यथा अविजिघित्सोऽपिपासो निर्भयो भगवानिति ज्ञानम्। किन्तु प्रेमोपचारे वेतज्ज्ञानमपक जनयतीत्यपराधः । न्यग्भूय सितं तु नाऽप- राधः । अन्येऽप्येवंविधाः। ते हि सूक्ष्मा दुर्शया इत्येकत्वेन लीवलिङ्गेन च निर्देशः । माहात्म्यज्ञानेन प्रेमापकपः पापप्रतिबन्ध रोगलेशादिनिराकरणप्रार्थना आर्थिभजनं लोकार्थभजनं भगवति दोपदर्शनमित्यादयो ह्यपराधाः सूक्ष्मा जीवेन दुप्परिहरास्त्वयैव विनाशनीया इत्यर्थः । जुहुराणमेनो यतीर्थादिभिर- शक्यनिरसनं फलमप्रतिवद्ध्य फलसमयेऽपि दुःखाकुर्वत् । किमुत साधनसमये। प्रतिबन्धकस्वभावं हि तत् । "तासां तत्सौभगमदं वीक्ष्य मानं च केशवः । प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवाऽन्तरधीयते"ति । "न पारयेऽहं चलितुं नय मां यत्र ते मन" इत्युक्त्वा "ततश्चाऽन्तर्दधे कृष्ण" इति च गोपीनामपराधो "गोपिकोलखले दामा बबन्ध पाकृतं यथे"ति श्रीमातृचरणानामिन्द्रकोपादौ रक्षार्थ प्रार्थना प्रेष्ठरक्षाविसरणाद्गोपानाम् । यन्न तेपामप्यपराधाः सम्भवन्ति । जयविजयाभ्यां तो भक्तापरापः । तत्राऽस्माकं का फथेति भावः । युयोधीति पावनतमत्वममिदेवाचार्यसुपथि प्रवेशस्य दर्शितम्-नैतादृशं पावनतमं कि- चिदन्यदस्तीति । सत्र हि स्वान् प्रणतान्छरणागतानमिदेवाचार्यः परिरक्षति । नेतरत्र । तेनाऽवश्यमेव तत्र प्रवेष्टव्यं प्रयलवता कृतार्थबुभूषणा पुरुषेणेति व्यशि- तम् । उपसंहरति-भूयिष्ठां ते नमउक्ति विधेमेति । स्वरूपभेदाभावेऽपि बालभाष्यविभूपिता। कृपावैशिध्याद्भगवतोऽक्षयाऽपि महत्तमाय प्रथममुपाश्रयणीयाय भूयिष्ठाम- सयेयां साक्षाद्दण्डवत्प्रणिपातपरम्परानुविद्धा निजापकर्षनिवेदनमगवदुत्कर्षा- वधापनप्रार्थनासहसतप्रवणीभूतचेतस्कां साधुपुलको दो सगद्गदा नमउक्ति नमोनम इत्यामेडन विधेम विदधीमहीति । एप साधननिष्कर्षः। एषा सम्प्र- दायप्रवृत्तिः । एपोपनिषत् । एष भगवद्धर्मः । एतदीशस्वमीशस ! "भगवति जीवनमनमेव कर्तव्यं नाऽधिकं शक्यमिति सिद्धान्त" इति श्रीमदाचार्य- चरणाः । "किमासनं ते गरुडासनाय किं भूषण कौस्तुमभूषणाय । लक्ष्मी- फलनाय किमस्ति देयं वागीश किन्ते वचनीयमती"ति । "नमो नम इत्येता- वत्सदुपशिक्षितमिति च । “यस्य स्मृत्या च नामोत्या तपोदानक्रियादिषु । 'न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतमि"ति "नामसङ्कीर्तनं यस्य सर्व- पापमणाशनम् । मणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं परमिति च वचनेन परममगलात्मकनमस्कारेणाऽन्ते मङ्गलाचरणाच्छालमसिद्धिरायुप्मत्पुरुषकता चाऽऽशासितेति । विधेमेत्यनुग्रहमार्गीयत्वं फलत्वं सर्वरप्यभ्यर्थनीयत्वच भूयिष्ठाया नमस्कतेर्दर्शितं प्रार्थितञ्चेति परमं मालम् ॥ १८ ॥ ३६. मनचतुष्टये साकारब्रह्मवादापरपर्य्यायपुष्टिमार्गसंस्थापकाचार्ययर्य- श्रीमतभाचार्यचरणानां स्वरूपाद्युपवर्णितमिति पुष्टिसम्प्रदायस्थानामपरो- क्षम् । अथाऽन्न कश्चितिमतिपद्येत~कथमेतदिति । तत्रोच्यते । सम्प्रदाय- प्रसिद्धया" भगवन्मुखावतारत्वामित्ययापतित्यपापण्डनिरसनसम्भदायस्थापना- धाचार्यचरणचरित्रमुपधारितवतः शास्त्रार्थश्रवणे शास्त्रार्थमुपधारितवतम्य पुष्टि- सम्प्रदायप्रवेशे तदिदमिति प्रत्यभिज्ञोदयावश्यमावादुक्कदृष्टयोरन्योन्यैक्यावधा- रणादिति गृहाण "यदेवेह तदभुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमामोति य इह नानेव पश्यती"ति भुतेरन्योन्यैश्यावधारणसम्भवेऽपि वस्तुमेदद- पिनो मृत्युभयप्रसङ्गात् । ननु सर्वत्र प्रसिद्धोऽयमर्थः कथमन्येनाऽधिगन्तव्य इति चेन्मैवम् । अमसिद्धावपि वाक्यान्यथानुपपत्त्या तादृशं प्रमेयमतीति परक्शेन प्रतिपदव्यत्वात् । आध्यात्मिकामेः कर्मकाण्डीयस्य कर्ममार्गाध्यक्षत्वेन ब्रह्मविद्या- ध्यक्षत्वामान सुपथा नयने सामामापात् । फर्ममार्गस्य सुपयित्वामावात् । "कर्मण्यसिनाचासे घूममात्मनां भवान् । मापाययति गोविन्दपादपमासर्व
ईशावास्योपनिषद् ।
मध्वि"त्यादिभ्यो वाक्येभ्यः । भगवद्धर्मातया तदनुसरणमपि लोकसाहादा-
योपक्षीणमिति न पुरुषार्थजननम् । मसविद्यात एव पुरमार्थसिद्धिनिर्णयात् ।
"पुरुषार्थोऽतःशब्दादिति यादरायण" इति सूत्रात् । तस्माद्रमविद्याध्यक्षततो-
ऽन्य एवाऽमिराधिदैविकः । तथा सति ताशप्रमेयस्स भाक्यान्यथानुपपत्त्या
खीकार्यतायां सम्प्रदायप्रसिद्धयोपस्थितस्य परित्यागेऽनुपस्थितस्य कल्पने चा.
न्यायात् । मानाभावात् । ब्रह्मविद्याप्रचारस्य वैदिरस्य श्रीमदल्लभाचार्यचर•
णाविर्भावसाकारब्रमवादापरपायपुष्टिसम्प्रदायप्रवर्द्धनान्तलाश्रावणाच पुष्टिस-
म्प्रदायतदाचार्यचरणावि वयोः परमवैदिक्त्वेन सर्वेषामपि वेदानुयायित्वामि-
मानिनामनिवार्यः परमादरः सिद्ध्यति । प्रतिहताश्च भवन्ति तयोः प्रामाणिकत्व-
मप्रतिपयमानाः परिपन्धिन इत्यनष्टदृष्टिभिर्द्रष्टव्यमिति शुमरोवधिः शोमताम् ।
नमो नमोऽसदीश दास्यसेवनीय सत्पते
नमो नमो मुखामिना तमस्समखमस्यते ।
धनये नयन्निजान् पथा सताऽपकर्पिणे
नमो नमो नमो नमो नमो नमो नमो नमः ॥१॥
नमो नमो मुखावतार वाक्पतेऽमिदेव ते
नमो नमो घियां निधे विधेयतां विधेहि ते ।
नमः स्वपुष्टिदृष्टिवृष्टिसृष्टसष्टितुष्टये
नमो नमो नमो नमो नमो नमोऽभिपुष्टये ।।२।।
नमः श्रीमदोवर्द्धनधरमुखाम्भोज भवते
नमः सर्वेशवास्पदपदपयोज ममवते ।
नम. सेवामार्गप्रकटनपटो रक्ष्मणपटो
नमः स्वीयाचार्य प्रगुणगुण ते देहि शरणम् ॥ ३ ॥
श्रीनन्दनन्दनलसद्वदनारविन्द
वेदोपदिष्ट विवुधेष्टपदारविन्द ।
आचार्येवर्य निगमागमगम्यरूप
श्रीवल्लमार्य भगवत्पथभूप पाहि ॥१॥
मतान्तरवान्तकृतान्तकान्त' श्रीकान्तसेवारससिद्धिकान्तः ।
तदन्यधन्याकथाफ्याक्षः श्रीविठ्ठलेशस्य कृपाक्टाक्षः ॥५॥
बालभाष्यविमूपिता।
។
गोवंश परिपाल्यते सुविशदः खाचार आधीयते
यैः प्रेम्णा परिचर्य्यते च भगवान्छीवालहष्णः प्रभुः ।
श्रीमद्वालभदेवदर्शितदिशा खाध्वा च संरक्ष्यते
ते श्रीगोकुलनाथपूज्यचरणाः सद्यः स्वदन्तेतमाम् ॥ ६ ॥
यैस्त्रातः करणापरैर्गुणगणागारैर्महादुस्तरे
व्यापावधिसमेऽपि भूरिविभवैः स्वाशीर्भिरप्येव च।
ये मां श्रीब्रजयात्रया च विधुताशेषाघमेव व्यधु-
स्ते श्रीगोकुलनाथचारुचरणाः काराां गिरां गोचराः ॥ ७ ॥
श्रीकृष्णजीवन इति प्रथितोऽस पुत्रो विद्वत्तमो गिरिधरापरनामधेयः ।
श्रीदीक्षितो विविधदर्शनदर्शनीयवैदुष्यवन्धपदविर्जयति द्वितीयः ॥ ८॥
श्रीमान् गोपीनाथो मुकुन्दकल्याणरायौ च ।
मथुरानाथो माधवरायश्चैते च पञ्च सुताः ॥ ९॥
सप्ताऽप्येते सप्तसतिवर्चसः सदृशाः पितुः ।
पिता चपा प्रमोदन्तां सहसं शरदा भुवि ।। १०॥
थीनाथसेवाहेवाकैरमाकं साधिताखिलान् ।
देवकीनन्दनान्नौमि तातपादान् पुनः पुनः ॥११॥
पुत्री पण्डितराजानां ममोपाध्यायसद्विदाम् ।
समाचरणानीडे करुणावरुणालयान् ॥ १२ ॥
श्रीवामनाचार्य्यबुधान्नमामस्तमा नुमो नन्दकिशोरभवान् ।
श्रीमहमादान पुरुषोचमांश्च तथैव विद्वहनन्दगांश्च ।। १३ ॥
गोने काश्यपसे समस्तनिगमन्यायाधिमन्याचला
आन्धा दक्षिणदिक्पथेऽध्वरिवराः श्रीरामचन्द्रा इति ।
तपुत्राः पितृतुल्यकीर्तिकृतयो वादीभपश्चाननाः
श्रीकृष्णारिजापरा हरिहराख्या दीक्षिता नझिरे ॥१४॥
श्रीवल्लभाधीशकृपावलान्याः श्रीविठ्ठलाधीशगृहीतहस्ताः ।
गोवर्द्धनाधीश्वरसादपद्मपरामरागैकरसान्तरमाः ॥१५॥
११२ ईशावास्योपनिषद् । . बुया खरूपेण गुणैः प्रमावाद्गणाधिपस्यैव परावताराः । उत्सूनयो दीक्षितधुर्य्यचर्याः मादुर्भवन्ति स गणेशभट्टाः ॥ १६ ॥ श्रीमद्दणेशदीक्षितसहधर्मिण्यः सतीशिखामणयः । श्रीशोमादेश्य इति प्रभुचरणानां जयन्ति मुख्यमुताः ।। १७ ।। श्रीमत्प्रमुचरणानां कृपारसाखादसिद्धसर्वार्थः । तद्वंशलब्धजन्मा पलभद्रः कृतिमिमां निरमात् ॥ १८ ॥ गोस्वामिनां गोकुलनाथनामामाज्ञानुगो भाष्यमिदं व्यघत्त । श्रीदीक्षितस्ततनयर्द्वितीयैः कृतानुमोदो बलभद्रगहः ॥ १९ ॥ श्रीमद्भागवतं वदन्त्युपनिपदाप्यं तदन्तागमा नाऽन्यार्थप्रतिपादकस्य गदितुं शक्या ततो भाप्यता । एपा टिप्पनिकाऽपि काऽप्युपनिपद्भागे प्रसादीकृता श्रीमदलभनन्दनै. फरुणया बालस्स भाप्यायते ॥ २० ॥ श्रीमद्भागवतं भाप्यं नाऽन्यद्भाध्यं विधीयते। प्रस्थानत्रयभाष्यं हि श्रीभागवतमिप्यते ॥ २१ ॥ "वेदाः श्रीकृष्णवाक्यानि व्याससूत्राणि चैव हि । समाधिभाषा व्यासस्य प्रमाणं तचतुष्टयम् । उचरं पूर्वसन्देहवारकं परिकीर्तितम् । अविरुद्धं तु यत्त्वस्य प्रमाणं तच नाऽन्यथा ॥ २२ ॥ एतद्विरुद्धं यत्सर्व न तन्मानं कथञ्चन।" इत्येतच्छीमदाचार्यवचनामृतमानतः ॥२३॥ सर्ववेदान्तसारत्वाच्छीगीताभ्यः परत्वतः । परत्वाबासूत्रेभ्यो पेद. व्यासस्स परितोषाच सर्वस बालमाप्यविभूपिता । ११३ ये भाज्याणि विभाव्य भावुकतया सर्वाणि सर्वांशतः प्रेक्षन्तेऽत्र विशेषमेप मधुरो मूलोस्थितोऽर्थोदयः । पूर्णः सोऽप्युपबृंहणेन निखिलानायेषु मुख्येन ते सन्तः सन्तु सुखान्विताः किमपरैर्दग्धैर्विदग्धैरपि ॥ २७ ॥ श्रीकृष्णः श्रीमदाचार्याः प्रमुपादास्तदुतयः । चतुष्टयं मे सर्वसं भूयाजन्मनि जन्मनि ॥२८॥ किं वर्ण्यः श्रीमदाचार्यतत्स्न्योः करुणाकणः । मन्दोऽपि माहशो येग तजनानुचरायते ॥ २९ ॥ निधित्रयविधौ वर्षे मासि फाल्गुनिके यदि । गथुरायां तटे तुर्यप्रियायाः प्रतिपद्यौ ॥ ३० ॥ श्रीमद्गोवर्द्धनाधीशचरणाम्भोजयोर्मया । निवेदितो गाप्यपुप्पाञ्जलिरेप समुज्ज्वलः ॥ ३१ ॥ श्रीमदाचार्यचरणाः शरणागतवत्सलाः । अङ्गीकुर्वन्तु कृपया कृतिमेतां समर्पिताम् ॥ ३२ ॥ इति श्रीमदाचार्यचकचूदामणिश्रीमदालभाचार्यमहामभुधरणघरणाम्भोजचचरीकेण श्वीमस्प्रमुचरणपदपजपरागाभ्यक्तमालपुलिनेन श्रीमहोगनोद्धरणधीरपादपनसेवाहेयाकाधिगयाक्षेपपुरुषार्थसार्थेन श्रीरामचन्दर- चरिश्रीहरिहरदीक्षिराश्रीमदणेशभदीक्षितानुगृहीतकुलजन्मलाभलव्धकीर्चिना त्रिगृहावतंसमधीदेयकीनन्दनसम्मतनुजनुपा फीतियाही- पण्डितमधीयलभद्रशम्मंणा कविकाप्यरयाकरकविदामाणिशुद्धाद्वैतभूषण- कविरसमहामहोपदेशकविद्यालकारपेदाराविधानिधि सनावनमार्ममापदश्रीसुपोधिनीसुधाधाराधरेण मणीरामीशावासोपनिषदो यालमाप्यं परिपूर्णम् । श्रीकृष्णार्पणमस्तु । शुभं भूयात् । 152416 BOR;". १५ इंशा०
११२
लावायोपनिषद् ।
शुग सम्पण गुणः ममापागणाधिपायर परावठाराः ।
वसूनयो दीक्षितमुपचाः प्रादुर्भवन्ति स गणेशमधः ॥ १५ ॥
श्रीमदणेशदाशिवगामिन्यः सीनिन्यानणयः ।
मीयोगादेय्य इति अमुचरणानां जपन्नि अग्न्यमुताः ॥ १७ ॥
श्रीमत्प्रमुचरणानां यारमासादसिद्धार्थः ।
उदयरब्यजन्मा परमद्रः तिमिर्मा निरमान् ॥ १८॥
गोस्वागिनों गोकुलनामनामामाशानुगो भाप्पमिदं व्यधप ।
थीदीक्षितमपनयेद्धितीयः पृतानुमोदी पटमद्रगः ॥ १९ ॥
श्रीमद्भागवतं पदन्युपनिषदाप्यं तदन्तागमा
नान्यार्थमतिपादफस्य गदितुं शपया ततो मान्यता ।
एपा टिप्पनिकाऽपि काऽप्युपनिषदागे मसादीना
थीमासमनन्दने. परणया पारम्प माप्यायते ॥२०॥
श्रीमद्भागयत्रं मान्य मान्यताप्यं विधीयते ।
प्रसाननयमाप्यं हि धीमागयतमिप्यते ॥ २१ ॥
"वेदाः श्रीरप्णवारयानि व्याससूपाणि चैव हि ।
समाधिमापा च्यासम्प प्रमाणं तमनुष्टयम् ।
उधरं पूर्वमन्देहवारकं परिकीर्तितम् ।
पविरदं तु यत्त्यस्य प्रमाणं तय नाऽन्यया ॥ २२ ।।
एतद्विरदं यत्सर्व न सन्मानं फयधन ।"
इत्येतच्छीमदाचार्यवचनामृतमानतः ॥ २३ ।।
सनवेदान्तसारत्वाच्छोगीताभ्यः परत्वतः ।
परवानास्त्रेभ्यो वेदद्रुमफटत्वतः ॥ २१ ॥
न्यासस्य परितोषाच सर्वसन्देदवारणात् ।
भूपत्वासनंशाखाणां संशालपरत्वतः ॥ २५ ॥
परप्रामाण्ययोगाध तदन्तागमनिर्णयात् ।
माध्यान्तरस भाष्यले बालोपच्छन्दनादिमिः ॥२६॥
बालभाष्यविभूपिता। ये भाज्याणि विभाज्य भावुकतया सर्वाणि सर्वाशतः प्रेक्षन्तेऽत्र विशेषमेप मधुरो मूलोत्थितोऽर्थोदयः । पूर्णः सोऽप्युपबृंहणेन निखिलाम्नायेषु मुख्येन ते सन्तः सन्तु सुखान्विताः किमपरैर्दग्धैर्विदग्धैरपि ॥ २७ ॥ श्रीकृष्णः श्रीमदाचार्याः प्रमुपादास्तदुक्तयः । चतुष्टयं मे सर्वसं भूयाजन्मनि जन्मनि ॥ २८ ॥ फि वर्ण्यः श्रीमदाचार्यतत्सून्वोः करुणाकणः । मन्दोऽपि मादृशो येन तज्जनानुचरायते ॥ २९ ॥ निधित्रयविधी व मासि फाल्गुनिके यदि । मथुरायां तटे तुयेमियायाः प्रतिपद्रवी ॥ ३० ॥ श्रीमद्गोवर्द्धनाधीशचरणाम्भोजयोर्मया। निवेदितो भाप्यपुष्पाञ्जलिरेप समुज्वलः ॥ ३१ ।। श्रीमदाचार्यचरणा. शरणागतवत्सलाः । अङ्गीकुर्वन्तु कृपया कृतिमेतां समर्पिताम् ॥ ३२ ॥ इति श्रीमदाचार्यचक्रचूदामणिश्रीमद्वल्लभाचार्यमहाप्रभुचरणचरणाम्भोजचचरीकेण श्रीमप्रभुचरणपदपढ़नपरागाध्यक्तभालपुलिनेन श्रीमद्रो भईनोद्धरणधीरपादपानसेवाहेपाकाधिगतापपुरुषार्थसाथैन श्रीरामचन्द्रा. भरिश्रीहरिहरदीक्षितश्रीमद्गणेशभदीक्षितानुगृहीतकुलजन्मलाभलब्धफीतिना निगृहावतंसमधीदेवकीनन्दनशर्मतनुजनुपा कीर्तिवल्ली- पण्डितमहश्नीवलभद्रशमणा कविकाव्यरसाकरकविचूडामणिशुद्धाद्वैवरूपण- कविरसमहामहोपदेशकविद्यालकारवेदान्त विद्यानिधि सनातनधार्ममाण्डश्रीसुबोधिनीसुधाधाराधरेण मणीवमीशावास्योपनिपदो बालभाप्यं परिपूर्णम् । श्रीकृष्णार्पणमस्तु । शुभ भूयात् । 152416 'BOME) 7 १५ ईशा.