Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Maha Maanv Aur Mangal Yatra

Om,prakash · 2010/12

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प्रसाद मुमन'
महामानव और मङ्गल यात्रा
[हिन्दी का प्रथम वानिक उपन्याम]
लेखक
ओमप्रकाश
भूमिया लेखक
रामधारीसिंह 'दिनकर'
प्रसाद बुक ट्रस्ट, आगरा

म उपन्याग का प्रेरणा मोत
म. श्री गन्डम हमले की पुमक
' Tie Brate.lar Il'orld
बर
: भीमप्रमा
प्रमागर : प्रसाद गुरदस्ट
iterup
पटिया आजम . आगरा
: पानस प्रेस, भागग
[पान: ७.५]
३सपा
r: रिपारमा परियो, रित्नो
१९९०
प्रमुम विनरस : गयाप्रमाद एण्ड संस,
मिटीरंगन गे:, मागरा

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण जी का आशीर्वाद
मानग मुद्रण
१४४ मिवित्र सादम भांमी
प्रिय सोमप्रकाश जी
मगर याना पर मै हृदय मे आपो बयाई दता हूँ।
या मनुष्य का यहां ता अमानुपित यनान जा रहा है
दमका एक काल्पनिर चिन जा जापन जड़ित पिया है
वस्तुत गमाचारी है। एमी व पना भी वितन जन कर
मरत है। आप जिम माग पर अग्रमरा है उमस निर्माण
या श्रेय भी आपको प्राप्त है। माननीय श्री मम्पूणानद
जी का आह्वान व्यर्थ नहीं गया । नापन उम मुनकर
माता दी है। जनिम अध्याय म आप येत नानिरही
नही दानिक और कवि स्प मनी दृष्टिगाचर हात है ।
में उमप का नमनार करता हूँ।
आपग पर प्रास्त हाना रह यही मरी वामना ।
आप प्रमन हाग।
भवदीय
मैथिलीशरण गुप्त

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स्व० महापण्डित राहुल साकृत्यायन को
मंगल कामना
प्रिय आमप्रकागजी,
,
'मगलयाना' मिली । बडी ही रावत और ज्ञानवर्षक
। वैज्ञानिक विषय का लकर इतनी मरत और मुन्दर भाषा
म लिखना आमान नहीं है । सफ्लता के लिए बनाई।
मुभ आगा है इस दिशा में आपकी यह पुस्ता आरम्भ
मात्र है। आपरी लेखनी से विज्ञान से सम्बन्ध रम्बन वाले
और भी राचा उपन्यामा व लिये जान की आस वा
जायगी।
चन्द्रलार की यात्रा का बहुत पहत किमी न लिखा
या। वह हिन्दी में आदि काल की रचना थी। अब आपन
परमाणु-युग म अपनी लेसनी उठाई है, इसलिए इसका उमम
कोई मुकाबला नहीं हो सकता। इस विषय पर इतनी अच्छी
पुस्तक का लिखा जाना बतलाता है कि हिन्दी साहित्य भाग
बढ़ रहा है। मुभ आशा है कि हिन्दी पाठर इसका अच्छा
स्वागत करेंगे।
मापस
राहुल सात्यायन

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भूमिका नुष वे मन पर आज जा प्रौद्यागिक और वैज्ञानिक प्रभाव पर रह है उन्द "यक्त बग्न का एवं माध्यम वनानिक कथा माहित्य भी है । अग्रेजी और दूमगै मायामा म इस प्रकार का माहित प्रचुर मात्रा म किया गया है और नाज नी निषा जा रहा है। हिन्दी म विनान का माध्यम बना कर वित्र गय क्या माहिय का लगमग जभावना ही है। प्रसन्नता की बात है कि वनमान पुन म लखन न रिन्दी म इम मरणी या सफरतापूर्वी पारम्भ किया है। टमम कुछ वनानिर तथ्यो और विज्ञान मगन कल्पनाना का गवार बना कर आज म कुछ वर्ष वाद क जीवन की कल्पना का गयी है। इस कपा का मुन्य घटना-म्थन मगल लार है। आज क वनानिमा का विनाम है कि यदि मौरमण्टन म कहीं पर भी जीवन पाकुट सम्भावना हा मक्ती है ता वह मगर ग्रह ही है। इस उपन्यास म इमा सम्भावना पर जावाग्नि मगन ग्रह (लाय) मएम मानर समाज की कल्पना की गई है । वहा क लाग लपन का महा- मानव कहत है। जिस समय की यह कया है ग समर पृथ्वी पर पिम्प मरवार वायमा गई है चन्द्रमा वा स्त्री निवामिया न अपना उपनियम बना दिया है और वहा पर जाना जाना भी काफी जामान हा गया है। उपन्यास की कथा यहा म आरम्भ हानी है। कुछ यात्री एर रापट स्टात स रावर यान द्वारा जाता टेगन पर पटुमन ८ हैं । आकाश स्टेशन आकाग में पृथ्वी से एक हजार मील की ऊंचाई पर मनुष्य द्वारा निर्मित उपग्रह है जो दो घण्टे में पृथ्वी का एक चक्कर लगा लेता है । इन यात्रियों में कुछ मित्र समाज' के सदस्य भी है । 'मित्र गमाज' पृथ्यो की एंगी मंस्था है जो पूर्व के दर्शन और पश्चिम के विमान में समन्वय स्थापित करने में लगी हुई है। ये यात्री जब आकासपात द्वारा चन्द्रलोक की और उड़न हैं। तव मार्ग में आवाग पोत दुर्घटना का गिकार हो जाता है। शेप यात्री तो बचा लिये जान है पर 'मित्र समाज के तीन सदस्य अशोक, अनीता और मदालसा भटक कर मंगल सोर की और गिरने लगते हैं। मगल सोर के तीन महामानवों को, जो आकाश की संर करने के लिए निकले हैं। इनरा पता चल जाता है और वे तीनों को बचा कर मंगल लोक के वनस्पति प्रदेश में से जाने है। वनस्पति प्रदेश के प्रभागा प्रादेशिक महामानव-निर्माता इनको अपने अनियिक रूप में स्वीकार कर लेते हैं । असार, अनीता और मदालसा मगन. मोकको मानिक प्रगति को देग कर पषित रह जाते हैं। वहाँ के अदभुत यस्त, यहां के अभिनय भवन, यही पा प्लास्टिक या बना हमा त्रिम आराम, महामानव निर्मित चन्द्रमा, यहाँ की स्वत: मानित अद्भुत गगन गादिषा और यहाँ के टनांतीनन गपाहा पद, गभी उन आरनपंग भरले । गिगु उत्पान मित्र, जहाँ पर मन नर नारी मिलन मेनरी, परन् बोनमा गरि जाने १. उनमा रिमित्र माना है। यहाँ पर वायों की बोननांग उत्पन्न पर पूर्व ही, मगर मोहमी आपपरवानुगार, मा भाप र नागो अनुगारहीमोगरीरको भूगासपा म तथा जन्म लन के पश्चान्, उनवे मन और मस्तिष्क का मान- मन्दिर म, उनकी भावी स्थिति और पशा के अनुरूप ढाला जाता उनका मगल लाय का मृत्यु-गृह भी अद्भुत दीखता है जहाँ पर महामानवा वा अन्तिम अवस्था म मरन व लिए भेज दिया जाता है । मृत्यु-गृहम इस प्रकार का वातावरण है कि मरन वाला व्यक्ति मान्ति से मर मर । इस लीग म सर्वत्र यन्त्र की पूजा हानी है । उत्पादन यन्त्र करत हैं भोजन यन्त्र वनात है और वही खान का काम भी यन्त्र ही करत हैं। इनकी सहायता से जनसख्या सतुतिन कर ली गई है। मनति प्रजनन पर नियन्त्रण हा गया है और रामायनिक आहार आदि की सहायता स भूख और बुढापा क्वल गुजरे दिना की याद रह गय है। इगवी एक यदि यन्त्र कोदाल और प्रांद्यागिर विवाम चरम सीमा तक पहुँच जाय ना उनवा मानव समाज और मम्वृति पर क्या प्रभाव पडगा, भांकी हम इस उपन्यास म मिलती है। लेखक बनानिष घल्पना व तों के गहार उस ममय की सामाजिक प्रथाआ का वणन करता है और मास्कृतिक रचना में इसके फलस्वरूप क्या-क्या परिवर्तन हा सक्ने है इसा अनुमान लगाता है। उमर अनुसार महामानव समाज म परिवार पर आधारित और परम्परागत गम्बन्धो वा प्रश्न ही नहीं उटना । इसलिए वहां पर 'सब-मय लिए, 'नही वाई एव के लिए नियम वा पारन विया जाना है। काम विषय उच्छ सलता वही जीवन की प्रवृनि समझी जानी है, जिसके हैं । आकाश स्टेशन आकाश मे पृथ्वी से एक हजार मील की ऊंचाई पर मनुष्य द्वारा निर्मित उपग्रह है जो दो घण्टे में पृथ्वी का एक चक्कर लगा लेता है। इन यात्रियों में कुछ मित्र समाज' के सदस्य भी है । मित्र समाज' पृथ्वी वी एमी संस्था है जो पूर्व के दर्शन और पश्चिम के विमान में समन्वय स्थापित करने में लगी हुई है। ये यात्री जव आकारापान द्वारा चन्द्रलोक की और उहते हैं, तब मार्ग मे आवास पोत दुर्घटना का शिकार हो जाता है । शेप यात्री तो बचा लिय जाते है पर 'मित्र समाज' के तीन सदस्य अशोक, अनीता और मदालसा भटक कर मंगल लोक की ओर गिरने लगते है। मंगल लोक के तीन महामानयो को, जो आता को सर करने ये. लिए निकले है. इनका पता चल जाता है और ये मीनों को बचा कर मगल लोक के वनस्पति प्रदेश में से जाते है। वनस्पति प्रदेश के प्रभागा प्रादेशिक महामानव-निमांना इन अपने अतिधिक. रूप में स्वीकार कर मने है । अर, अनीता और मदालसा मगल- सोकपी शानिक प्रगति देग घर धषित रह जाते है। वहीं अद्भुत वस्त्र, वहाँ के अभिनव भवन, यही या प्लास्टिक का बना हुमा कृत्रिम आग, महामानव निगिन पन्द्रमा, यहाँ मी स्वतः मानित अदभुत गगन गादिया और यह टेलीवीजन राग्राहक पट, गभी उनसे आरन गं भरी है। शिशु उत्पादन मिल, जहा पर सम्म नर नारी के मिलन में नहीं, वरन् बोनों गे पंदा पिये जाने हैं. उगी यहा निमित्र मगा है। पहा पर वन्नी की योजना ग उत्पन्न करने के पूर्व ही, मगल मोशनी आवायरमानुगार, उनारा भाप रपा जाताग अनुसार सरीर गोगाम्या में क्या जन्म लेने में परवान्, उनवे मन और मस्तित्र की मातृ. मन्दिर में, उनकी भावी यिति और पंगा वे अनुम्प द्वारा जाना है । उनी मगर लोर या मृत्यु-गृह भी अदभुत दीदता है जहाँ पर महामानवी को अन्तिम अवस्था में मरने के लिए भेज दिया जाता है । मृत्यु-गृह में इस प्रकार का वातावरण है कि मरने वाता व्यक्ति शान्ति से मर सा। इस लौव मे मर्वत्र यन्त्र की पूजा हाती है। उत्पादन यन्त्र करते हैं. भोजन यन्त्र बनाते है और वहीं खाने का काम भी यन्त्र हो करते हैं। इनकी महायता में जनमख्या मनुक्ति पर ली गई है। मन्नति प्रजनन पर नियन्त्रण हो गया है और रासायनिक आहार आदि की सहायता में भूम और बुढ़ापा वैवल गुजरे दिनी की याद रह गय हैं। यदि यन्त्र कीगन और प्रोद्योगिक विवाम चरम सीमा तक पहुँच आय तो उनका मानव समाज और सम्वृति पर क्या प्रभाव पटगा, इसकी एक मारी हमें इस उपन्यास में मिलती है। लेयर वैज्ञानिर बल्पना के तो वे महारे उम ममय वी सामाजिक प्रथाओ का वर्णन रखा है और मास्कृतिक रचना में इसके फलस्वरप क्या-क्या परिवर्तन हो सान है इसका अनुमान लगाना है। उसने अनुमार महामानव समाज में परिवार पर आधारित और परम्परागन सम्बन्धों का प्रश्न ही नहीं उठना । इसलिए वहाँ पर 'सब-सवरे लिए, 'नहीं बोई एव वे रिए नियम का पारन दिया जाता है। वाम विषया उग्सलता वहां जीवन की प्रति समझी जाती है, जिसके शिए शामन की ओर मे स्थान-स्थान पर आमोद-गृह बने हुए है । इसी प्रकार बंच्या होना सुमभ्यना का चिह्न माना जाना है। घोर रूप से वैमानिक युग के मनुष्यों के सामाजिक सम्बन्ध वगा होग, नापका ने इसकी भी कल्पना की है । महामानव समाज के कर्णधारों कर विस्वाग है कि-'व्यक्ति बोला, गमाज अता' । व्यक्ति द्वारा समाज के कायों की आलोचना करने में गमाज की स्थिरता गकट में पडेगी, गीलिए वही व्यनिगन म्यनन्त्रना पूर्ण रूप में दया दी गई है। जो व्यक्ति गमाज रो विद्रोह करता है. उगको नष्ट कर देना ही श्रेष्ठ है. ऐगी वहाँ भी मान्यता है । इसलिए वहां पर गुधारने रो नष्ट करनाघेप्ट हैं नागा नियम पान है। संगन का अनुमान है कि गमाज घिर और जनन भी बना रहे तथा उगमे पसा, गन्य और पल्याणार्ग गुन्दरता भी बिगिन हो, ये दोनों दाने गाय-गाय नहीं घर गाती । मानिस ममात्र इन दोनों विषयों में से केवल एक पो मनना ही पाप है और मंगनणमा महामानव ममान पगा गय और गुना बी यति द्वार गमाज मारिणा बनाने का मागं नगद कारमा। मगर मां गे गमान गो पर यनाने गी गुग म गिन मात्रा एर विराम नाद पराग है । मिनी उन्मुग, स्यारोनना में IT का गाणं माना गमा माया पाल मा आभाग गाना है। गांगुरक्षा और मुस्मिाता प्रेस जि. पाच मिाग गेही गम्भव सामाxिrir गानतिर गगनोकोनट मानगर पाग रे विवाम पा सहायर मानता है और वह ऐसे सभी सगटनो के विरद्ध है जिनसे समाज से अलग व्यक्ति को प्रधानता मिलती हो। मगल लोक में विज्ञान की अत्यधिक प्रगति से समाज का जो स्प दिखाई देता है, वह भयावह है। पर हम लेपक पर यह इल्जाम भी नहीं लगा सकते कि उसने जानबूझ कर विज्ञान का दुल्पित चित्रण किया है । क्योंकि अलेक्मिम देरल, घरट्रेन्ड रमल आदि महाचिलको न वरावर यह चेतावनी दी है कि मनुष्य के आगय यदि गुद्ध नही हुए तो विज्ञान उसका अभिशाप बनेगा। रमल ने कहा है कि मनुष्य की वर्तमान व्यवस्था म विज्ञान की ज्या ज्या प्रगति होगी, उसकी शागन व्यवस्था यानी सरकारी का दल बढता जायगा और ज्या-ज्या सरवार की शक्ति बढ़ेगी व्यक्तियों के अधिकार क्षीण होत जाएँगे । इम कल्पना को मगल लोक में लेसर ने सच होने दिपाया है। हम विज्ञान को छोटना नहीं चाहते। साथ ही हम व्यक्तियों थे आत्म सम्मान को भी अक्षुण्ण रपना चाहते है । इस लक्ष्य को माप्त चरन का उपाय यह है कि हम इस बात को स्वीकार करले कि जीवन की सारी बाते विज्ञान से जाची परखी नहीं जा सरती। कुछ ऐसी बातें भी है जिनवा सम्बन्ध धर्म और पलारी है। विज्ञान का काम इतना ही है कि वह नई शक्तियों को सीज पर मनुष्य के हाथो म धर दे। किन्तु मनुष्य इन शक्तियों का उपयोग गि उद्देश्य में लिए करेगा, यह वान हम विज्ञान नहीं, धर्म और पता से सोपनी होगी। इगलिए विज्ञान का अनत्यागारी प्रभार

१२
तय नष्ट होगा जब मनुष्य के भीतर धार्मिक कोमलता और पवित्रता
का वाम होगा।
संगर ने वनानिक कल्पनाओं के आधार पर एक ऐसी क्या
को मुष्टि की है जिमगे विमान के गुण और उसके पतरे जनता
की समझ में आसानी से आ जायेंगे। यह प्रयाग अत्यन्त कठिन है
और इसमें लेखक को जो भी मफलता मिली है उसके लिए हम
उसे बचाई ही दे सकते हैं । 'मंगल यात्रा' हिन्दी उपन्यागों में एक
नये क्षितिज का निर्माण करती है।
-रामधारी सिंह दिनक

[ चन्द्रलोव को जाने वाले यात्री प्रतीक्षालय मे बैठे थे । इनमे मे कुछ अपनी तैयारियो को अन्तिम रूप दे रहे थे और कुछ अपने इष्टमित्रों ने बातें कर रहे थे, जो उनको विदा करने के लिए रावेट स्टैगन पर आये हुए थे। यात्रियों के लाभ की आवश्यक सूच- नायें लाउडस्पीकर द्वाग रावेट स्टेशन के नियन्त्रण-वक्ष से प्रमारित की जा रही थी। चारो ओर एक हलचन मी दीन पडती थी। प्रतीक्षालय के एक कोने में अगोप, मदालसा और अनीता कुछ स्नहीजनो के बीच में बैठे थे। "आपना यह मूब वलिदान पृथ्वीलोर के मानव कभी न भूत सकेंगे' उनके परिचितो में में एा शोर को सम्बोधित करता हा चोला । "और आप भी क्या कम साहम कर रही हैं। जीवन में प्रथम वार चन्द्रलोत्र की यात्रा और वह भी मानवता का शुभ सन्देश वेवर। हमारी गुभ कामनायें आपरे साथ है" एक दूमरे व्यक्ति ने बनीता में रहा। वगोर और अनीता दोनों ही चुप थे। अगोप ने अनीता और अनीता ने शोक की ओर देखा । अशोर कहने लगा-"हम अपनी और में पूरा प्रयन वरेंगे कि जो उत्तरदायित्व आज आप हम सौंप ।

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कप्तान ने रिपोर्ट को ध्यान से देखा और अपना आन्तरिक पोन उठाया 'हला मुख्य चालक, नव ठीक है।" मुख्य चालक ने यह सुना तो अपनी पुर्मी में बाएँ हथे पर लगे बटन को दबा दिया। रावेट विमान को उडान में प्रथम सण्ड के गामा यन्त्रो से घर-परं की अत्यधिक तेज ध्वनि निकलने लगी। रावेट स्टेशन पर बैराट-मार्ग नियन्त्रवन विमान वा चलान का सन दिया। मुख्य चालर के केबिन से एक चकाचौंध पैदा हुई और रावट के प्रथम सण्ड के गामा यन्त्र पूरी तेजी से काम परन लगे। धर्म-परं वो थावाज और तीव्र हो उठी। स्वत चालिन यानिक चालको ने काम करना आरम्भ कर दिया और तभी राकेट विमान तेजी से आकाश की और सीधा उपर उटा। राकेट पर उठने पर एक भारी भटका लगा, जिससे यात्रियों के हृदय को भारी घटा-सा लगा और मदालसा का दिल तो कुछ बैठने भी लगा। राट विमान की सीटों के साथ लगी पिडदियों में पारदर्शक प्लास्टिक लगा हुआ था, जिसमें बाहर का दस साप दिसाई पदा था। यही नहीं, प्रत्यर सीट के यागे एक टेलीवीजन सामग्राहर- पट लगा था। अशोर वपने सप्रादपट द्वारा प्राप्त मजय जैनी दिव्य दृष्टि से राक्ट दिमान में, बाहर वायुमण्डल के दृश्य देखने में उल्लीन पावत वादलो को पार करता हुआ रावट विमान तीव्र गति से कार को उठ रहा था। आवाश का नीलापन धीरे-धीरे १ शाला में यात्रियों को निरन्तर तीन माम तक होने की भांति रटाई गयी थी। तभी एक घण्टी बज उठी। वैमानिक ने कहा-"अब आप लोग मतर्क हो जाएँ। विमान के चलने में अधिक देर नहीं है, इम- लिए आप गभी अपनी-अपनी रक्षक पेटियां बांध कर अपनी-अपनी मीटों पर वैट जाय ।"-और इतना कह कर वह चला गया। राकेट विमान के बाहर पड़े पप्तान ने एक बार मरसरी दृष्टि से विमान का निरीक्षण किया। उसके माथ इंजीनियर, मुख्य चालक, महचालक और दूसरे वैमानिक भी थे। उसने इंजीनियर को सम्बो- धित करते हुए कहा-"कल गत आकाश स्टैगन मे नौटते समय विमान का एक स्वत चालित गामक यन्त्र यगय हो गया था, क्या उमको दुरस्त कर दिया गया है ?" "हाँ, मैंने उगको ठीक कर दिया है। उसमे सम्बन्धित नियन्त्रण बोर्ड, सकेतक और चकाचौंधी-विद्युत-प्रकाशिकी भी पराय हो गये थे। लेकिन इस समय मव कुछ ठीक है।" कप्तान कुछ कुछ आगे बढ़ा और उसने अपनी दृष्टि एयर कण्डीशन पन्त्र पर डाली। उमको ठीक पाकर वह विमान में चढ़ गया। उसके पीछे-पीछे विमान के सारे कर्मचारी अपने-अपने केयिनों में चले गये। कप्तान अपने केदिन में जाकर बैठ गया। उसने मेज के नीचे का बटन दबा दिया। घण्टी बज उठी और तभी एक वैमानिक विमान के चलने से पूर्व को निरीक्षण रिपोर्ट लेकर उपस्थित हुआ।

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१८ घना और गहरा होता जा रहा था। बाहर आकार में होने वाले निरन्तर परिवर्तनों के चित्र संग्राहक-पट पर क्षण-क्षण में आ रहे थे और अशोक उनको देखकर रोमाचित हो उठा था। अशोक ने ऊंचाई मापक यन्त्र की ओर देखा। विमान धरातल से दस मील ऊँचा उठ चुका था। आकाश को नीलाई धीरे-धीरे कासनी रंग में बदलने लगी थी। पृथ्वी से १५ मील ऊपर विमान पहुँचा तो आकाश का रंग पूरी तरह से कासनी हो गया। अशोक को यह बड़ा मोहक दृश्य लगा। कोने में लगे परमामीटर की ओर भी उसका ध्यान गया। इतनी ऊँचाई पर तापक्रम बर्फ से ६७ गुना ठण्डा हो गया था, लेकिन राकेट विमान में बैठे अशोक को इसका रंचमात्र भी पता नहीं चला। एयर कण्डीशन के कारण उसे ऐसा लग रहा था, जैसे वह अपने पर के किसी कमरे में बैठा हो। सभी लोग अपने-अपने सग्राहक-पटों को सहायता से आकाश के दृश्य देखने में तल्लीन थे। विमान निरन्तर गति पकड़ता जा रहा था। वह पर्वतों और गहरे बादलों को नोचे छोड़, अब काफी ऊंचा उठ गया था। ऊँचाई मापक यन्त्र २० मील ऊँचाई बता रहा था और तभी अशोक के संग्राहक-पट पर अवेरा छा गया। बाहर आकाश का कासनी रंग भयानक अन्धकार में बदल गया था। अशोक को पट पर कालेपन के अतिरिक्त और कुछ नजर नहीं आता था, इसलिए उसने अपने बांई ओर लगे बटन को दबाया। संग्राहक पट ने काम करना बन्द कर दिया। उसने मापक यन्त्र में देखा, विमान धरातल से २५ मील की ऊँचाई पर आ गया था। तभी अचानक राकेट को एक भारी धक्का लगा। मदालसा चीख कर . M वोली-"अनीता वहन, मेरा दिल बेटा जा रहा है, मुझे बचाओ।" अनीता स्वय भी घबराई हुई थी, इसलिए उसने याचना को दृष्टि से अशोर की ओर देवा । अशोर ने कहा--"कोई विशेप वात नही है मदालसा, उडान का प्रथम चरण समाप्त हुआ है और राक्ट ने अपने शरीर स प्रथम खण्ड को बिलगा दिया है। इस खण्ड के अलग होने के कारण ही यह गहरा धक्का लगा है। पदराने की बात नहीं है।" हाँ दीदी, अशोक ठीक कह रहे हैं । विमान का प्रथम सप्ड अपना काम पूरा कर चुका है, इसलिए उसका यान्त्रिक चालक ने अलग कर दिया है। अब हमारे विमान की गति ५५०० मील प्रति घण्टे से अधिक हो गयी है"----अनीता मदालसा का ध्यान वटाने की दृष्टि से बोली। अशोक और अनीता की बातो को सुन कर मदालसा की घबराहट कुछ-कुछ दूर हुई । वह कह्न लगौ--"मैंने तो समझा या कि वस मेरा अन्त मा गया। फिर मैं हूँ भी तो दहुत भुलाड । मैं गनती हूँ कि ये सारी बातें मुझे आरोग प्रशिक्षणशाला में बताई गयी थी। पर न जान क्यों ऐसे अवसरो पर अनायास ही मेरे मस्तिप्प का सन्तुलन विगह जाता है।" भय यात्रियों ने मदालसा की ये बातें सुनी तो वे सब हंस पडे । अशोक ने मदालसा का ध्यान बंटाने के लिए वहा-"यहाँ से यान्त्रिक चालक ने विमान के दूसरे खण्ड को अपने नियन्त्रण मै पर लिया है और उसरे गाम यात्रा ने काम बारम्भ कर दिया है।"

२० "अनीता, पर यह यान्त्रिक पालक याम से करता है ? कुछ भिमपने हुए मदालसा ने कहा, "मैं जानती है कि यह मु प्रशिक्षगशाला में बताया गया था, पर तुम तो जानती हो मैं पितन भुलक्कड है और अय तुमसे ये सारी बातें पूछते हुए मुझे बड़ा संकोच हो रहा है।" "दीदी इसमें संकोच की क्या बात है। जो बात मुझे नही आती है, मैं भी तो तुमसे पूछ लेती हूँ। हो तो यान्त्रिक चालक एवं पुम्बकीय टेप के द्वारा विद्युत कणों की सहायता से चलाया जाता है। इस नुम्बकीय टेप में विमान के उड़ने से पूर्व ही गावश्यक आदेश उसी प्रकार भर दिये जाते हैं जैसे ग्रामोफोन रिकार्ड में ध्वनि भर दी जाती है।" उधर विमान गति पर गति पकड़ता जा रहा था। मदालसा ने अपने सिर के ऊपर लगी घड़ी को देखा। फिर उसकी नजर अशोक के ऊपर लगे थरमामीटर पर जा पड़ी जो वाह्य-आकाश का ताप चता रहा था। वह परमामीटर में बताये गये ताप को देखकर फि- चौंक उठी और अशोक से पूछ बैठी---''ऊपर देखो अशोक, परमा- मीटर आकार का ताप तो बहुत अधिक बता रहा है। अभी एक मिनट पहले तो आकाश हिम से कहीं अधिक शीतल था।" "हाँ यह टोक ही है। धरातल से २० मील की ऊंचाई पर वायुमण्डल में ओजोन गैस मिलने लगती है। इसमे सूर्यताप के सोखने का गुण होता है। उसी के कारण यह परमामीटर इतनी गरमी बता रहा है। जब हम धरातल से ५० मील ऊँचे पर पहुँच जावेंगे तो वाहर आकाश का ताप बहुत बढ़ जाएगा। यदि इतनी

२१
ऊंचाई पर क्सिी मानव को आवास में छोड़ दिया जाय, तो जानती
हो क्या होगा।"
"वह नीचे की ओर गिरने लगता होगा ।' मदालसा की यह बात
मुन कर पास बैठे यात्री भी हंस दिए । पर अशोर न बात को
सम्भालते हुए कहा-"हाँ वह तो होता ही है, लेकिन नीचे गिरने
से पहले ही वह मर जाता है, क्योकि सूर्य की ओर वाले उसके अङ्ग
जत्यधिक ताप से मुलस जाते हैं और घरती की ओर वाले अङ्ग
अत्यधिक शीत के कारण जम कर बरफ जैसे व टोर हो जाने हैं।
साथ ही इतनी ऊंचाई पर वायुमण्डल में आत्मीजन इतनी कम रह
जाती है कि साम नहीं लिया जा सकता।"
"यदि दीदी हम दृत्रिम वायुमण्डल में बन्द न होते तो हमागे
भी ऐसी ही दशा होती।" - अनीता ने अशोक की बात को आगे
बढाने हुए कहा।
अच्छा
7"
मदासा मागे
कुछ कहने वाली यी, अचानक तभी
विमान को एक बार फिर मारी धक्का लगा। यह प्रथम धये से
कहीं अधिक भारी या। मदालसा पिर पवराने-मी लगी, किन्तु
अचानक उमे स्मरण हो याया विराट विमान के ४० मील ऊंचा
उठने पर यात्रा का दूसरा चरण पूरा हो जाता है और वह अपने से
दूसरे सण्ड को भी अलग कर देता है।
राक्ट पो पृथ्दी मे चले ३०० मैरिड हो चुके थे। उगवी गति
बढ कर १५ हजार मील प्रति घाटा हो चुकी थी। अशोक ध्यान से
अरने वमरे वो छत को देखने लगा। प्लास्टिर और नाइलोन

बनी दीवारें देखने में बड़ी आकर्षक लग रही थी। कोने में एक छिद्र से वायुजनित्र ( एयर जनरेटर ) द्वारा उपचारित वायु कमरे को भर रही थी । उसने मापकयंत्र की ओर देवा। विमान धरती से सत्तर मील ऊंचा उठ गया था। कौतूहलवश अशोक ने संग्राहक-पट का बटन दवा दिया । संग्राहक-पट क्रियाशील हो उठा । पट पर अशोक को चिनगारी निकलती दीख पड़ी। वह समझ गया कि उल्का कणों ने विमान पर आक्रमण करना आरम्भ कर दिया है। मदालसा ने भी अपना संग्राहक पट चालू कर दिया। उसने पट में चिनगारियों के चित्र देखे, तो वह घबरा गयी। वह चिल्ला उठी "विमान को आग लगने वाली है।" "मदालसा, यह आग नहीं, उल्का कण हैं। इसमें घबराने की क्या बात है ? विमान को कोई हानि नहीं होगी, क्योकि न पिघलने वाली धातु की चादरें विमान के बाहर चारों ओर लगी हुयी हैं।" मदालसा का कौतूहल शान्त हुआ और वह अपने संग्राहक पट मे देखने लगी। उसने मापक यंत्र में देखा, विमान धरती से १३० मील की ऊँचाई पर आ गया था। अचानक पट पर एक चकाचौंध प्रकाश की झलक दिखायी पड़ी। उसे लगा जैसे अरुणोदय हो गया है । उसे याद हो आया कि यह एक ज्योति पुज है और इसी प्रकार के ज्योति पृज ६०० मील की ऊँचाई तक बराबर मिलते रहेंगे। अपनी स्मरण शक्ति पर वह गर्वित हो उठी। और यह बात वह अशोक को बताना भी नहीं भूलो, "जानते हो अशोक, अभी संग्राहक पट पर यह चकाचौंध किस वस्तु ने की थी?"

अशोर जानवर भी अनजान बना रहा और उसने कहा "नहीं तो?" २३ । "इतना भी नहीं जानते । पृथ्वी के ध्रुवो पर महीनो तक मूर्य के दर्शन नहीं होते । फिर भी वहां पर उजाला रहता है । वह इन्ही ज्योतियो के कारण होता है जो अभी सम्राहक पट पर चकाचौंध प्रकाश के रूप में दिसायी पड़ी थी। क्या अरोरा बोलियास को भी भूल गए " विमान के यात्री मदालसा के इस पूहडपन पर हँस पडे क्योकि इन वातो से वे सभी परिचित थे। मदालसा ने सबको हंमते देखा तो वह अप गयी। तभी एक राकेट वाला ने अपने आवागवाणी यन्त्र से घोपणा की "कृपया अपने सग्राहक पटो को कुछ समय के लिये बन्द कर दीजिए क्योकि विमान पर ब्रह्माड किरणो ने यात्रमण कर दिया है। पटो के चलाने मे ब्रह्माड किरणें विमान के अन्दर आ सरती हैं।" सभी यात्रियों ने अपने सग्राहक पटो को बन्द कर दिया, क्योकि वे जानते थे कि ब्रह्माड किरणें भी उतनी ही भयानर होती हैं जितनी हाइड्रोजन और परमाणु वमो से निवती किरणे धरती को ठोडे अभी केवल साडे अडतालीस मिनट ही हुए थे पर ऊँचाई मापक यन्त्र २०० मील की ऊंचाई बता रहा था। ज्यो- ज्यो रारेट विमान ऊपर उठ रहा था, त्यो-त्यों वायुमण्डल छिछला और हल्का होता जा रहा था । गुरुत्वाकर्षण भी पर्याप्त कम हो गया था।

L- । अब राकेट विमान पृथ्वी से एक हजार मील की ऊँचाई पर आ गया था। लोग वायुहीन आकाश की यात्रा के कुछ अभ्यस्त हो गए थे । सब जानते थे कि आकारा स्टेशन समीप है । वे मनुष्य निमित इस उपग्रह को देखने के लिए बड़े उत्सुक थे। इसलिए सब ने अपने संग्राहक पटों को चालू कर दिया था। संग्राहक पट पर तीब्रगति से प्रकाश करता हुआ राकेट विमान से आकाश में सौगुना कोई पदार्थ सरं से निकल गया । यही निरन्तर गतिशील और स्वत. चालित आकाश स्टेशन था। यद्यपि उसके बारे मे यात्रीगण कुछ न जान सके, पर फिर भी सब को सन्तोप था कि उन्होंने कम से कम पट पर तो आकाग स्टेशन को देख लिया । पृथ्वी से १०७५ मील की ऊँचाई पर यह स्टेशन आकाश में बनाया गया था। मानव मस्तिष्क और इंजीनियरिंग का यह एक अद्भुत उदाहरण था । प्रत्येक दो घण्टे में यह सम्पूर्ण पृथ्यो का एक चक्कर लगा लेता था। इसकी गति १० हजार मील प्रति घण्टा थी। हमारा राकेट विमान, भी अब धरातरा से १०७५ मील की ऊंचाई पर आ गया था । इसको पृथ्वी से यहाँ तक आने में केवल डेढ़ घण्टा लगा था । हम अपनी यात्रा की पहली मजिल पूरी कर चुके थे। इतने में ही एक राकेट वाला ने कहा, "यदि आप लोगो को कष्ट न हो तो आप अपने अपने चापयुक्त आकाशीय कवच और शिरस्त्राण धारी स्पेट सूट पहन लें, क्योंकि आपकी यात्रा समाप्त होने वाली है। दो घण्टे पश्चात् आप आकाश स्टेशन पर होंगे।"

२५ हमे लगा कि राक्ट विमान रुक गया है,पर विमान के गामा यन्त्र बब भी आग बरसा रहे थे। यह एक तरह में हमारे लिए अच्छा ही हुआ, क्योकि हम लोग आमानी से क्वच पह्न मरते थे। हमार शरीर पर अत्यधिक गति में उत्पन्न त्वरण पटना अब दन्द हो गया या। गति के कारण जो मास पेशियां शिथिल हो गयी थी वे पुन त्रियाशील हो उठी थी। मदालमा अपने स्वभाव के अनुनार पूछ दैटो-"यशोक, विमान की मोटरें तो चल रही हैं,पर फिर भी विमान स्थिर है, यह क्या बात है " यात्रियों के लिये मदालसा-मनोरजन की वस्तु बन गयी थी, इस- लिए गभी हम पडे। हमे नहीं तो केवल अशोक और अनीता । "दीदी, अब तक विमान आपाश की ओर र उट रहा था। किन्तु अब विमान की मोटरें इसको पृथ्वी की ओर ले जा रही है" बनीता दोली। ' लेकिन वास्तव में यह नीचे की योर तो नहीं जा रहा । यह तो जहाँ का तहाँ खडा है" मदालता ने कहा। "यहाँ पर किसी भी वस्तु को स्थिर करने के लिये उनको उटी दिशा में उमी गति मे चलाना पडता है।" "यह क्यों?" "इमलिए कि इस स्थान की यह विशेषता है कि जो वस्तु यहाँ पर जिस गति मे आती है उनकी गति मदेव वही बनी रहती है । इस म्यान तर आने लिये प्रत्येक पदार्य की गति १८ हजार मील प्रति घण्टा होना आवश्यक होता है।"

- "अरे मैं तो भूल ही गयी थी। यह तो मुझे आरोहण प्रशिक्षण- चाला में ही बताया गया था।" मदालसा ने कहा। अशोक को हंसी आ गयी और अपनी हंसी को रोकने के लिये वह चापयुक्त आकाशीय कवच को पहनने लगा। कवच क्या था, पूरा एक छोटा मोटा कमरा था-नाइलोन और अन्य प्लास्टिकों का बना हुआ । परन्तु यह पर्याप्त हल्का या । कवन में हो शिरस्त्राण लगा था। अशोक उसके अन्दर घुस गया। उसका सारा शरीर सिर से पैर तक इस आवरण में ढक गया। बाहर से देखने पर वह गोता- सोर जैसा लगने लगा। उसने अपने कवच में स्थित आक्सीजन- जेनेरेटर को चला दिया ओर वह जोर-जोर से सांस लेने लगा। मुख से निकली कार्वन डाइआक्साइड को यह जैनेरेटर आक्सीजन मे बदलने लगा । अशोक ने कुछ ताजगी का अनुभव किया । उसने कवच में लगे जेबी रेडियो का सम्बन्ध अनीता से जोड़ा। 'हलो. अनीता, तुम्हारा क्या नम्बर है ?" हलो कोन अशोक, मेरा नम्बर पाच है। जरा देर टहरो मे अभी तक पूरी तरह से वायुहीन रक्षक कवच को नही पहन सको हूँ।" अशोक फिर अपने कवच के निरीक्षण में लग गया। उसने अपने दाहिने हाथ के पास कवच में लगे दो बटनों में से एक को दवा दिया, कवच में स्थित रडार का संग्राहकपट संजय की दिव्य दृष्टि की तरह काम करने लगा। अब उसे अपने चारों ओर को चीजें पट पर दिखायी पड़ रही थी।

२७ मदालसा को कवच पहनने में पर्याप्त देर लगी। फिर भी वह क्वच न पहन सको और उसको अपनी सहायता के लिये राकेट बाला को बुलाना पड़ा। स्पेस सूट पहनने मे यात्रियो को लगभग डेढ घण्टा लग गया। अव भी विमान के गामक यन्त्र उसी चाल से काम कर रहे थे आर विमान उसी स्थान पर स्थिर खडा था । सभी यात्री अपन सग्राहक पटा से एक दूसरे को देख रहे थे। केवल अशोक ही कुछ और सोच रहा था। मन म रह-रह कर उसे अपने उन साथिया का स्मरण हो रहा था जिनको वह पृथ्वी पर छोड कर आया था। फिर उसे अपने उस गुरुतर काम की याद आई जिसके लिये वह चन्द्रलोक जा रहा था । इस यात्रा पर आने से पूर्व विश्व सरकार के प्रधान ने उसको विशेष रूप से बुलाकर कहा था 'तुम जानत हो, मानव की मगल यात्रा को न इतिहास रोक पाया है और न महाकाल का उताल नतंन । यह माना कि रागद्वेष स्वार्थपरता, क्लह और विवादो ने मानव की मगल यात्रा मे समय-समय पर विक्षोभ पंदा किया है, पर ये उसकी इस यात्रा को न कभी रोक पाय है और न कभी रोक ही सकेंगे।" उसे अनुभव हुआ जैसे इसी शाश्वत मदेश को फ्लाना उसवे जीवन का लक्ष्य है । जमे वह चन्द्रलोक में पहुँच कर सबको यही सन्देश सुना रहा है, वह इसी प्रकार न जाने कब तक सोचता रहा । अचानक उसको राकेट वाला का स्वर मुनाई पडा । 'माई अशाक, यहां पर खडे-सडे वया सोच रहे हैं, आपके सभी सायी वाहर नवीगेशन डक पर खडे आपको प्रतीक्षा कर रहे हैं।"

'ओह, माफ करिए वहन,-मैं कुछ यो ही मोच रहा था
आप चलिए, मैं अभी आया।" और अशोक अपने स्पेम मूट के
पहने डेक की ओर चल पड़ा।
उधर दूसरी घण्टी बजी और राकेट वाला ने बताया कि १५
मिनट बाद आकाश स्टेशन धरती का चक्कर लगाता हुआ यहा
आवेगा। तब तक आप राकेट टवसी में बैठकर उसका इन्तजार करे।
इसके बाद राकेट बाला ने सबसे विदा ली। उसके जाते ही क्लिक
जैसी आवाज हुई और नैवीगेशन डैक से एक पल्ला ऊपर उठा, नीचे
जाने के लिये सीढ़ियां नजर आने लगी। एक एक करके सब लोग
उनसे उतरे और नीचे लगी राकेट-रैक्सी में आ गये। टैक्सी विमान
से अलग होकर आकाश मे ऊपर उटने लगी। सबने अपने टेलीविजन
पदों पर देखा कि राकेट विमान धरती की ओर गिर रहा था। इसके
बाद वे राकेट टैक्सी में बैठे आकाश स्टेशन के आन का इन्तजार
करने लगे।
"
"राकेट टैक्सी ऊपर उठती जा रही थी। उसकी मोटरें अब भी
आग बरसा रही थी। पर इतने ऊँचे पर हवा नहे'
आवाज विल्कुल भी सुनाई नही देव
देखने को बड़े उत्सुक थे, इसलिये
ऐसा अनोखा चांद था जो पिछले
घूम रहा था। यहा जाता था शिश
इसी तरह घूमता रहेगा।
ती का एक पकर दो घण्टे
.

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२८ --- "ओह, माफ परिए वह्न,-मैं कुछ यों ही मोच रहा था । आप चलिए, मैं अभी आया।" और अशोक अपने स्पेस सूट को पहने डेक की ओर चल पड़ा। उधर दूसरी घण्टी बजी और राकेट वाला ने बताया कि १५ मिनट बाद आकाश स्टेशन धरती का चक्कर लगाता हुआ यहाँ आवेगा। तब तक आप राकेट टैक्सी में बैठकर उसका इन्तजार करें। इसके बाद राकेट वाला ने सबसे विदा ली। उसके जाते ही क्लिक जैसी आवाज हुई और नवीगेशन डंक से एक पल्ला ऊपर उठा, नीचे जाने के लिये सीढ़ियां नजर थाने लगी। एक एक करके सब लोग उनसे उतरे और नीचे लगी राकेट-टॅक्सी मे आ गये। टैक्सी विमान से अलग होकर आकाश मे ऊपर उठने लगी। सबने अपने टेलीविजन पर्दो पर देखा कि राकेट विमान धरती की ओर गिर रहा था। इसके बाद वे राकेट टैक्सी में बैठे आकाश स्टेशन के आने का इन्तजार करने लगे। "राकेट टैक्सी ऊपर उठती जा रही थी। उसकी मोटरें अब भी भाग यरसा रही थी। पर इतने ऊँचे पर हवा न होने के कारण उनकी आवाज विल्कुल भी सुनाई नहीं देती थी। सभी लोग आकार स्टेशन देखने को बड़े उत्सुक थे, इसलिये कि वह आदमी द्वारा बनाया हुआ ऐसा अनोखा चांद या जो पिछले सौ वर्षों से धरती के चारो ओर घूम रहा था। कहा जाता था कि यह धरती के खत्म होने तक वरावर इसी तरह धूमता रहेगा। उसको रफ्तार इतनी तेज थी कि वह धरती का एक चक्कर दो घण्टे में पूरा कर लेता था। वहाँ चांद

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३० ४ प्राकारा स्टेशन एक बहुत बड़ी इमारत थी। यह पांच सौ फीट सम्बा और चार सौ फीट चौड़ा था । अल्युमीनियम गार्टर और तन्तु कांच की चादरों से इसका ढांचा बना हुआ था। यह ढांचा नाइलोन प्लास्टिक के एक विशेष वस्त्र से मढ़ा गया था। हम सभी आकाश स्टेशन के बाह्य रूप को देखकर आश्चर्यचकित हो गये। इसके चारों ओर एक डंक था। स्टेशन का शेप भाग प्लास्टिक से पूरी तरह ढका हुआ था। एक ओर हमारी ही तरह कवच पहने एक स्टेशन कर्मचारी खड़ा था। हम जब उसके समीप आये तो उसने एक बटन दबाया। दरवाजा स्वतः खुल गया और हम सब उसके अन्दर चले गये। हमारे अन्दर घुसते ही दरवाजा पुनः बन्द हो गया। यहां पर यात्रियो को पासपोर्ट आदि आवश्यक कागज पत्र दिखाने की औपचारिक कार्यवाही पूरी करनी पड़ी। हम कुछ देर वहीं बैठे रहे। इतने में एक सत्कार बाला ने आकर हमारा स्वागत किया और वह हमें अपने साथ ले चली। पृथ्वी के राकेट स्टेशन के अधिकारियों ने आकाश स्टेशन के अतिथि-गृह में हमारे लिए पहले से ही स्थान सुरक्षित करवा लिए थे। सत्कार बाला ने चलकर हमें हमारे कमरे दिखा दिये। एक कमरे में तीन व्यक्तियों के रहने का प्रवन्ध था। अशोक, अनीता और मदालसा तीनों ने एक ही कमरे में रहने का निश्चय किया। सत्कार वाला आवश्यक सूचनाएं देकर वापस चली गयी। यहां आकर स्पेट सूट उतारे तो जान में जान आई। अशोक घोड़ी देर के लिए नीचे विछे बिस्तर पर लेट गया।

३ १ लेटते ही उसे नींद आ गयी। अनीता और मदालसा दोनो ही स्नानागार में चली गयीं। जब तक मदालसा और यनीता वस्त्र बदल कर आयीं तव तक अशोक अपनी नींद पूरी कर चुका था। वह बंटा हुआ दोपहर का समाचार पत्र देख रहा था। आज उसका मन कुछ उदास था। विस्तर पर से उटने को उसका जी नही चाहता था फिर भी अनीता के कहने से वह उठा और वस्त्र वदले । तभी सत्वार वाला ने यावर बताया कि खाना तैयार है। तीनो उसके पीछे चल पडे। सत्कार बाला ने इनको एव बढे हाल में लाकर सहा कर दिया। यहां पर लगभग पचास व्यक्ति भोजन कर रहे थे। एक खाली मेज के तीन ओर ये लोग बैठ गये। भोजन में वेवल कुछ पूर्व-पचित सघन खाद्य की गोलियां, कुछ पैक क्यिा हुआ लच और बुद्ध निल पररक्षित सजियां ही खाने को मिली और पीन के लिय दाव युक्त पात्र में कोई पेय । इस प्रकार वे खाने के हम लोग आरोहण प्रशि- क्षणशाला में आदी हो चुके थे। इसलिए हमको कोई विशेष असुविधा न हुई। भोजन के बाद ह्म पुन अपने कमरे में आ गये। हम सभी इतनं यरे हुए थे वि तुरन्त ही लेट गये और नीद ने हमको या घेरा। जब हम लोग सोरर उठे तो शाम हो गयी थी। रात वा भोजन हमने अपने कमरे मे ही किया। रात को आकाश स्टेशन के नृत्य हाल में एक विशेष समारोह आयोजित किया गया। सभी उसमें गये किन्तु अशोर और अनीता ने वहां जाना पसन्द नहीं दिया। मदालसा न जाने क्व चुपचाप खिसक गयी थी। अशोर मदालसा ६२ वस्तु का विश्लेषण हुआ जाता है । टोनी ने इतना कह कर एक बटन दवा दिया। गगन गाड़ी के एक भाग से अत्यधिक तेज प्रकाश चकाचोध करता हुआ कुछ क्षण के लिए निकला और उसके पश्चात कुछ अदृश्य शक्तिशाली किरणे मुक्त होने लगीं। रडार एक्स-रे पटल पर विश्लेपण स्पष्ट आ गया। "बस टोनी बन्द कर दो, अधिक देर तक यन्त्र को चालू करने से इन भीमकाय जीवो को हानि पहुँच सकती है", जोन ने कहा । किन्तु टोनी उस समय तक यन्त्र को बन्द कर चुका था । डोनाल्ड, टोनी, और जोन तीनो मिलकर विश्लेषण का गम्भीर अध्ययन करने लगे। "जोन यह तो बड़ा जटिल रहस्य सा लगता है । मेरी समझ में तो कुछ आता नहीं । इतना अवश्य लगता है कि इस में कोई मानवा- कृति अवश्य है क्योंकि अनेक स्थानों पर पटल छवि मे तरग-लम्बाई इसी प्रकार की आ रही है जैसी कि हमारे शरीर की रडार एक्स-रे से आती है। हाँ वह अपेक्षाकृत कुछ छोटी अवश्य है। तुम्हारा क्या विचार है ?" टोनी बड़ी गम्भीरता से बोला। "बात तो तुम ठीक ही कहते हो। ऐसा लगता है हम इनका विश्लेपण न कर पायेंगे। इनको क्यों न हम सुरक्षा केन्द्र तक ले चलें । इनको वहां के सचालक को सौंप देने से हमारा कर्तव्य समाप्त हो जाता है" जोन पटल का निरीक्षण करता हुआ बोला । "डोनाल्ड, क्या हम इन तीनों भीमकाय आकारों को मंगल की आकर्षण शक्ति के क्षेत्र में ले जा सकते हैं ?" टोनी ने प्रश्न सूचक दृष्टि से देखा 1 ।

६
"जरा मुझे थोडा सोचने दो" डोनाल्ड ने कहा और वह गगन
गाडी के दूसरे कमरे में जाकर अपनी अणुक्रेन की परीक्षा करने लगा।
कुछ समय पश्चात वह उसी स्थान से बोला-"हाँ टोनी यह सम्भव है।
मैंन अपनी गगन गाडी उसी दिशा में मोड दी है। अणु क्रेन नीचे
लटका दी गई है। तुम अपने पास वायी ओर का बटन दबा दो।
हा ठीक-मैंने भी गगन गाडी को खडा कर लिया है-जोन तुम
भी अपने पास का दाहिना बटन दवाओ-बस-टोनी दाहिना
बटन दवाओ-हाँ अव रहने दो"-
और जोन ने अपने रडार पटल पर देखा तीनो भीमकाय
आकार केन द्वारा गगन गाडी के पिछले भाग में यथास्थान लगा
।
दिये गये हैं।
जोन वही से डोनाल्ड की ओर उन्मुख होकर बोला-"याविर
चालय मे यादेश भर दो, तापि गगन गाडी अपनी तीवतम गति से
मगल ग्रह की ओर वापिस चले । आज हम लोगो ने बहुत भारी
काम किया है।"
[
८
]
मंगल लोक के वनस्पति प्रदेश मे चारा ओर एक ही विषय को
लेकर चर्चा हो रही थी। इस चर्चा में प्रदेश के सभी दैनिक
समाचार-पत्र अत्यधिक रचि ले रह थे। चर्चा का विषय था-स
वर्गीय महामानव जोन, टोनी योर डोनाल्ड तथा उनकी आधुनिकतम
खोज के फ्लवर्वर भूलोक वे तीन अधं सम्य मानव, जिनको वे
मगल लोक को आकर्षण शक्ति की सीमा से एक लाख मोल वाहर
से
पकड़ कर लाये थे। वनस्पति प्रदेश के दैनिक समाचार पत्रो के

६ ६ सम्यता अभी भी प्रारम्भिक अवस्था में है और यह सभ्यता मंगल लोक की महामानव सभ्यता से बहुत पीछे है । प्रदेशीय गुप्तचर विभाग ने इन मानवों से प्राप्त कागज पत्रों को सूक्ष्मता से जांच कर ली थी और उसकी सूचना प्रधान महामानव निर्माता महोदय को दे दी गयी थी। उनके कार्यालय में इन सब मूचनाओं का गम्भौर अध्ययन किया गया और वे इसी निष्कर्ष पर आये कि ये मानव मंगल लोक में कोई सकटापन्न स्थिति उत्पन्न नहीं कर सकते, इसलिए इनको महामानव समाज में खुले रूप में छोड़ देने में कोई हानि नहीं है । अपने इस आदेश को उन्होंने वनस्पति प्रदेश के महामानव निर्माता के पास भेज दिया । अंकुश हटते ही सभी समाचार पत्रों ने मानवों के चित्र बड़े-बड़े आकार में प्रकाशित किए। नर मानव के शरीर के प्रत्येक अंग का चित्र प्रकाशित किया गया। उसके प्रत्येक अंग की सुगठित रचना की ओर ध्यान आकर्षित किया गया । उसके मुख पर उभरी मृदु रेखाओं ने सभी महामानवीयों को मोहित कर लिया। उसकी छवि को देखकर सभी वर्गों की युवतियों ने अपने मन मे इस नर मानव के कम से कम एक बार निशा-निमन्त्रण देने का मन ही मन निश्चय कर लिया। मादा मानवों के चित्र उनके वस्त्रों सहित प्रकाशित किए गए। पीत वर्ण के मादा मानव ने अर्ध नग्न होकर भी अपना एक चित्र खिवाया था और उसको समाचार पत्रों ने बड़े सुन्दर ढंग से प्रकाशित किया था। किन्तु दूसरा मादा-मानव केवल वस्त्रों सहित ही चित्र खिंचवाने को तैयार हुआ ।

चित्र मे जिस प्रकार के भाव मादा मानव के मुख से प्रगट होते ये उनसे उसकी छवि बडी मनोहारणी लगती थी। इसके मुख पर एक विचित्र आमा का दिग्दर्शन महामानवी को हुआ, जिसने उनके मन में इस मादा-मानव के प्रति ऐसे भाव उत्पन्न कर दिये जैसे आज तक मगल लोक की महामानवीयो में सुन्दर से सुन्दर युवती के प्रति भी नहीं हुए थे। स वर्गीय महामानव जोन, टोनी और डोनाल्ड सारे वनस्पति प्रदेश में विजेता बन गय थे। चारो ओर उनकी माग थी । शरीर विज्ञान विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, भावुक्ता इजीनियरिंग विशारद, ऋतु नियन्त्रक आदि सभी उपवर्गो के स वर्गीय महामानव इनसे मिलने को उत्सुक ये । इनको बहुत दिनो के बाद अपनी.......... का अवसर हाय आया था। और वे उसको अनायास ही हाथों से निकालना नहीं चाहते थे। इससे पूर्व वनस्पति प्रदेश की सभी युवतियां इन तीनों स वर्गीय महामानवो के साथ अपनी रानि व्यतीत करने में बहुत हिचकिचाती थी। फिर भी कभी-कभी उनको इनके साथ रहना पड़ता था, क्योकि वे मगल लोक के सामाजिक नियमो की अवहेलना नहीं कर सकती थी। विन्तु मानवो की खोज ने उनको इतना महत्वपूर्ण बना दिया था कि सभी युवतियां इनको निशा-निमन्त्रण दे चुकी थीं। स वर्गीय महामानव जोन, टोनी योर डोनाल्ड को उनकी इस खोज पर दस-दस तोला सोमवटी और तीन माह का अवकाश मिला। इन तीनों के पदों में भी वृद्धि हुई । अब तक वे महामानव शिशु निर्माता मिल में वेवल प्रयोगशाला-वी थे। किन्तु अब वे ६८ एक-एक विभाग के नियन्त्रक बना दिए गए। उनकी इस नयी खोज के प्रति आभार प्रदर्शित करने के लिये तीनों मानवों के रहने का प्रबन्ध भी जोन, टोनी और डोनाल्ड के कमरों से लगे बड़े भवन में किया गया। तीनों मानवों को सम्पूर्ण मंगल लोक में कहीं भी जाने की अनुमति प्रदान की गई। अनीता, अशोक और मदालसा को जव होश आया तो उन्होंने अपने को एक बड़े भवन में कुछ अदभुत परिस्थिति में पाया । अपने चारो ओर सभी कुछ उनको अदभुत दिखाई पड़ रहा था। दीवार तारों जैसे चमकते हीरो से जडो थी। खिड़कियो के काच जैसे पदार्थ रग-बिरंगे प्रकाश से चमक रहे थे। छत की ओर देखा तो एक विचित्र चमक सी कोध गई। मानो किसी ने सहतों दर्पण इस प्रकार सजा दिये हों कि एक दूसरे की चमक को दूना चौगुना कर दें। छत का प्रकाश बरावर बदल रहा था। ये तीनों जादू टोना में विश्वास नहीं करते थे। किन्तु इस भूल भुलैया को देख कर अचानक उन्हे लगा जैसे उन पर किसी ने जादू तो नहीं कर दिया हो । अव उनका ध्यान अपने वस्त्रों की ओर गया। वे बहुत महीन थे और लगता था जैसे उनको विरोप तन्तु से बनाया गया हो । एक रंग की विभिन्न पुट देकर इनकी छवि बहुत ही आकर्षक बना दी गई थी। भवन को दीवार किसी पारदर्शक पदार्थ की बनी हुई थी। धीरे- धीरे उनको सभी बातें याद हो आयौं । अनीता ने अचानक अशोक से पूछा, "हम लोग कहाँ पर है ?" .... "यही तो मुझे भी पता नहीं। लेकिन इतना निश्चित है कि हम किसी ऐसे लोक मे आ गये हैं जहां के निवासी वैज्ञानिक उप- लब्धियो मे पृथ्वी लोक से बहुत आगे हैं । कोन हमे यहां पर लाया है-यह रहस्य हमे शीघ्र ही सुलभाना होगा।" जब ये तीनो इस प्रकार वातें कर रहे थे तभी अचानक उस विशाल हाल मे चार व्यक्तियो ने प्रवेश दिया। उनमे से एक पीतवर्ण पुस्प ने अशोक, अनीता और मदालस' को पृथ्वी की अन्तर्राष्ट्रीय भाषा मे सम्बोधित करते हुए कहा "ये हैं स वर्गीय महामानव जोन, टोनी और डोनाल्ड जो आपको मगल लोक के आवर्पण क्षेत्र की सीमा से एक लाख मील दूर जाकर यहाँ लाये हैं । आपकी जीवन रक्षा का सम्पूर्ण श्रेय इन्ही को है।" हमको बडा आश्चर्य हुआ कि यह पीतवर्णधारी पुरप विस प्रकार हमारी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा में बोल रहा है, किन्तु शिष्टाचार- वा अशोर ने तुरन्त ही अन्तर्राष्ट्रीय भाषा में उत्तर दिया- "आपने हमे नवजीवन प्रदान किया है, इसके लिय हम आपके हृदय से आभारी हैं, आपके इस उपवार को हम जीवन पर्यन्त न भूल सकेंगे।" जोन, टोनी और डोनाल्ड तीनो एक साथ ही कुछ-कुछ वुद- बुदाये, जिसे हम लोग न समझ सके । हम एक दूसरे के मुंह की ओर ताक्ने लगे। फिर वही पीतवर्ण पुरुप वोला । स वर्गीय महामानव आपसे यह रहे हैं कि उनसे आपसे मिलकर वडी प्रसन्नता हुई है, वे वापरा परिचय जानना चाहते हैं।

अशोक अन्तर्राष्ट्रीय भाषा में बोला-"हमें भी आपसे मिलकर भारी प्रसन्नता हुई है । मुझे अशोक कहते हैं। ये मेरे सहयात्री अनीता और मदालसा हैं।" स वर्गीय जोन, टोनी और डोनाल्ड तीनों एक साथ बोल पडे । -"अशोक, अनीता और मदालसा" इसके बाद उन्होंने क्या कहा यह हम नहीं समझ सके। फिर वही पीतवर्णधारी व्यक्ति वोला, "ये तीनों स वर्गीय महामानव आपका अभिनन्दन करते हैं और आपके आत्तिय करने की स्वीकृति चाहते हैं।" हमारी हैरानी का कोई ठिकाना नहीं था "हम सोच रहे थे कि ये लोग किस प्रकार हमारी भाषा को समझ लेते हैं। हमारे मस्तिष्क में एक साथ सैकड़ों प्रश्न उठ रहे थे । अचानाक अनीता पूछ बैठी- "हम लोगों को यह पता नहीं कि हम लोग कहाँ पर है ? किस प्रदेश में हैं और यहाँ के उच्चाधिकारी कौन हैं ? हम यह भी नहीं जानते कि हम आपके निमत्रण को स्वीकार करने की स्वतन्त्रता है भी या नहीं ?" "आप इस समय मंगल लोक के वनस्पति प्रदेश के एक स्वास्थ्य संवर्धन येन्द्र में है। प्रदेश के महामानव निर्माता महोदय अभी कुछ समय बाद आपसे भेट करेंगे। वे ही इस प्रदेश के सर्वोच्च अधिकारी हैं । इस विषय में सारी बातें दही आपको बतायेंगे।" पीतवर्ण व्यक्ति ? बोला।

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७२ "लेकिन उनके वस्त्र तो बहुत ही आकर्षक थे।" मदालसा ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा । "तुम दोनों ने उनकी छाती पर टगे चित्र नहीं देखे ? मैं उनको ही ध्यान से देख रहा था । उन पर बोतल से निकलते हुवे मानव शिशु अकित थे ।"-अशोक सोचता हुआ सा बोला। "लेकिन मुझे तो इनमें से एक भी पसन्द नहीं आया। पीला रंग, गड्ढे में धसी आंखें, पिचके हुए गाल, टेढी नाक, मुख पर अस्वाभाविक मुस्कराहट और चाल में एक प्रकार की कृत्रिमता । उनके मुख पर उभरी हुई अप्रीतिकर रेखाएं और एक विचित्र सा तनाव देखकर मुझे भूलोक के उन सैनिकों की याद ताजा हो उठी, जो प्रायः बाहर से आरोपित अनुशासन के कारण मुख पर आ जाती है"-अनीता मुंह बनाकर बोली। "तुम्हे कही कुछ पसन्द भी आता है । जहाँ जाती हो वहीं कुछ न कुछ कमी दिखाई पड़ जाती है।" मदालसा ने सोफे की चिकनाहट पर हाथ फेरते हुये कहा। "यहां पर आपस में इस प्रकार का मनोमालिन्य शोभा नहीं देता, यहाँ पर तो हमें बडी सावधानी से व्यवहार करना है।" लेकिन अशोक के इतना कहने के पूर्व ही मदालसा सोफे पर दूसरी ओर को मुंह करके बैठ गयी थी। हम तीनों कुछ समय तक अपने अपने विचारों में डूबे रहे। तभी कुछ आह्ट सी हुई और पीतवर्ण व्यक्ति के साथ एक और व्यक्ति हाल में आ गया। हम लोग उसको देखकर अभ्यर्थना के

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जाने की आपको पूरी स्वतन्त्रता है। किन्तु कुछ समय के लिए आपको स वर्गीय महमानव जोन, टोनी और डोनाल्ड के साथ रहना होगा, ताकि आप यहाँ की भाषा और संस्कृति को कुछ साधा. रण बातें सीख सके । इसके लिए पूरा प्रबन्ध कर दिया गया है । आपको यहां के सभी नियमों का पालन करना होगा । एक बात आप स्मरण रखें कि आप यहाँ पर कभी भी अकेले नही रह सकेंगे। इसीलिए रहने के लिए आप तीनों को एक ही कमरा दिया गया है। इसके अतिरिक्त आपको जो भी असुविधा हो, उसके दूर करने के लिए मुझसे कभी भी सम्पर्क स्थापित कर सकते है। आप लोगों के लिए दो गगन गाड़ियों का भी प्रबन्ध कर दिया गया है । मैं चाहूँगा कि आप जब कभी भी चाहें, मेरे पास आकर मुझे बर्बर भू-लोक के विषय मे बताते रहें।" इतना कह कर प्रादेशिक महामानव निर्माता महोदय कमरे से बाहर चले गये । हमें उन्होने न कुछ पूछने का अवसर दिया, न कुछ अपनी बातें कहने का । इससे हमें कुछ अचम्भा तो हुआ, पर फिर बाद में हमने यही सोच कर संतोप कर लिया कि कदाचित मगल- लोक में इसी प्रकार का रिवाज हो। दूसरे दिन सायंकाल उसी पीतवर्ण व्यक्ति के साथ जोन, टोनी और डोनाल्ड आये। ये बड़े प्रसन्न थे। माते ही वे अपनी छाती तक हाथ लाए और कुछ भुके। हम समझ गये कि यह उनके सभिवादन का तरीका है। हमने भी अपने तरीके से उनका अभि. वादन किया । इसके बाद वे तीनों हॉल में पड़े सोफों पर बैठ गये ।

७५
"कहिये अशोक जी, आपका स्वास्थ्य कैसा है ?" जोन ने
हमारी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा मे बोलते हुये कहा । उससे हमे बड़ा
आश्चर्य हुआ। फिर भी अशोक ने अपने कौतूहल को दवाते
कहा-"मैं धीरे-धीरे स्वास्थ्य लाभ कर रहा हूँ, आप लोग तो स्वस्थ
और प्रमन्न हैं"
"हां, हम सभी लोग ठीक है" जोन ने सक्षिप्त उत्तर दिया।
मदालसा अपने कौतूहत को न दबा सकी, वह बोली-"महा-
दाय जोन, आपको यदि कोई आपत्ति न हो तो मैं आपसे कुछ
"अवश्य"-जोन ने पहा ।
"देखिये क्ल प्रात काल जय आप हमसे मिले थे, तो हमारी
अन्तर्राष्ट्रीय भाषा को वोलने मे आप असमयं थे और अब आप
इसी भापा ने बातें कर रहे हैं।"
"यहाँ स वर्ग के सभी महामानवो यो वर्वर भू-लोक की
अन्तर्राष्ट्रीय भाषा वा थोडा ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य होता है।
किन्तु मगल लोप में अव यापपरी भापा एव मृत भाषा समभी जाती
है। आज से दो सौ वर्ष पूर्व तक सम्पूर्ण मगल ग्रह में इसी भाषा
का उपयोग होता था, किन्तु भापा-वैज्ञानिकों ने जब इस भाषा या
सूक्ष्म रुप से अध्ययन किया, तो इसे अवैज्ञानिक पाया। इस भापा
में सुधार किये गये । यह परवर्तित की गयी। इसका विकास पिया
गया। वर्णमाला दे यक्षरो कोक्म दिया गया। मगल लोक की
नाज को भापा आपको उसी भाषा का अत्यन्त परिष्कृत रूप है।

1 हमारी भाषा की वर्णमाला में आज केवल दस अक्षर ही है। मैंने कल से आज तक आपकी भाषा को बोलने का कुछ अभ्यास किया और इसी का फल आज आपके सामने है।" हम जोन की प्रतिभा के कायल हो गये। टोनी और डोनाल्ड अब तक चुप बैठे थे। उन्होंने जोन से कुछ कहा । जोन ने उसका अनुवाद करते हुए बताया-"मेरे ये साथी आपसे यह कह रहे हैं कि मंगल लोक की भाषा बहुत सरल है, इसको आप एक सप्ताह के अन्दर सीख सकते हैं। ये दोनों आपको भाषा सिखाने के लिए तैयार भी हैं। ये दोनों भी आज से आपको भापा को बोलने का अभ्यास आरम्भ कर रहे हैं।" मदालसा बोली-"हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है, हमें तो प्रसन्नता होगी कि हम आपकी भाषा को सोख कर उसे समझ और बोल सकें।" "हम आप लोगों को आपके निवास स्थान पर ले चलने के लिए आए हैं", जोन ने कहा-"आप लोगों के रहने का पूरा प्रबन्ध हो चुका है। साधारणतया मंगल लोक के सभी महामानव और विदो- पतः वनस्पति प्रदेश के सारे महामानव आपसे मिलने के लिए बड़े उत्सुक हैं। इस नगर के सभी स दर्गीय मानव आप के स्वागतार्थ एक महामोज को तैयारी कर रहे हैं। हम तीनों को भी प्रधान महामानव निर्माता ने तीन मास का अवकाश स्वीकृत किया है। हम चाहते हैं कि हम लोग आपको अपने साथ लेकर मंगल लोक को पूरा घूम आएँ । मापका इस बारे में क्या विचार है ?" .

७७ निश्चित "हमें क्या आपत्ति हो सकती है, आपने ो नया जीवन प्रदान दिया है। आप इसका जिस तरह चाहे उपयोग कर सकते हैं" -मदालसा ने उल्लसित स्वर में उत्तर दिया। "हमने आप लोगो के एक सप्ताह का कार्यक्रम पहले से ही कर लिया है। यदि आपको इसमें कोई आपत्ति न हो, तो उसे हम समाचार-पत्रो में दे दें। वनस्पति प्रदेश के महामानव आपके बारे में एक-एक बात जानना चाहते है। इसको दृष्टि मे रस पर हमने यह कार्यक्रम बनाया है। आपकी सुविधा के लिये मैं इने आपकी ही भाषा मे टाइप करा लाया हूँ।" यह कह कर जोन ने एक बहुत सुन्दर और चिक्ने कागज को आगे बढा दिया । अशोक ने आज तक इस प्रकार का सुन्दर टाइप नहीं देखा था। म तीनो कार्यत्रम पढने लगे । सातो दिनो में नित्य ही रात को किसी न किसी स्थान पर भोज और सभा का आयोजन था। प्रात काल के कुछ घण्ट नगर देखने के लिए सुरक्षित थे, और दोपहर का समय इतिहास तथा भाषा सीसने के लिये था। अशोक कहने लगा--"हम आपके इस वार्यक्रम से सहमत हैं, पर यह तो बताइए कि यह इतिहास विस चीज का है ?" जोन ने कार्यत्रम छपे वागज वो वापस लेते हुए कहा-"आधु- निा मगल लोक के बारे में कुछ भी जानने से पूर्व यह बहुत आव- श्यक है कि आप यह जान लें कि महामानवो के आने से पूर्व मगल लोर की क्या दशा थी। मगल लोक से परिचय प्राप्त करने के लिए यह भी जरूरी है कि आप लोगो को यह पता चल जाये कि महा- ७८ मानकों ने कितनी तीव्र गति से मंगल लोक की कापा पलट कर डाली है । यह हर्ष की बात है कि हमको मंगल लोक के इतिहास की एक प्रति आपकी भाषा में लिखी मिल गयी है। यह प्रदेशीय महामानव निर्माता के कौतुक भण्डार मे रखी हुई थी। उसको प्राप्त करने की हमने आज्ञा प्राप्त कर ली है । वह आपको कल तक मिल जाएगी।" हम तीनों जोन को वातो को बड़े ध्यान से सुन रहे थे। हमें अब तक अपने चन्द्रलोक न जाने का काफी दुःख था। पर जोन की वातों ने हमारे दुःख को हलका कर दिया और हम मंगल लोक के विषय में तरह-तरह की कल्पना करने लगे। तभी टोनी और डोनाल्ड ने जोन से कुछ कहा, जिसे सुन कर जोन उठ खड़ा हुआ और हमसे बोला--"अब आप लोग हमारे साथ चलें । आज आपको जाकर अपने कमरे से परिचय करना है। हमारी गगन गाड़ियां स्वास्थ्य संवर्धन केन्द्र के ऊपर आपकी प्रतीक्षा में खड़ी हैं। आप लोग हमारे पीछे-पीछे आ जाएँ”–इतना कह कर जोन चल दिया। डोनाल्ड और टोनी भी उसके पीछे चल दिए। हम तीनों ने उनका अनुसरण किया। एक गलियारे में कुछ दूर चलने पर एक स्वतः चालित लिपट मिली। हम सबने उसी में प्रवेश किया। लिफ्ट हमको बराबर ऊपर उठाती ले जाने लगी। जोन से पूछने पर पता चला कि यह भवन तीस मंजिला है। लिफ्ट में खड़े-खड़े हो जोन ने किसी को फोन किया। लिपट से हम भवन की सबसे ऊपर वाली मंजिल पर आ गये। वहाँ पर हमने दो वायुयान जैसे वाहन देसे । किन्तु वे देखने में बड़े सुन्दर थे। उनका सम्पूर्ण ढांचा कांच का बना हुआ था । कहीं-कही पर कोई धातु उपयोग में लाई गयी थी।

। वे भू-लोक के हैलीकॉप्टरो से कुछ-कुछ मिलते थे। मगल लोक के महामानव इनको ही गगन गाडी कहते थे। दो गगन गाडियां एक छत पर रखी हुई थी। दोनो मे हम तीन-तीन व्यक्ति बैठ गये। गगन गाडियो के अन्दर विथाम और आमोद की सभी सामग्री उपस्थित थी। जोन ने अपनी गगन गाडी का एक बटन दवाया। गाडी घर- घरं करने लगी और उसका स्वत चालित यान्त्रिक चालक' गगन गाडी को ऊपर उठाने लगा। हमारे लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। [ ११ ] गगन-गाडी आकाश मे ऊपर उठी और उडने लगी। हमे चारो ओर लाल रंग के ही दर्शन हुए। तन्तु कांच के बने भवनो और वीयिकाओ पर सभी स्थानो पर रत्ताम आभा छाई हुई थी। मगल के आकाश का रग भी लाल नजर आया। असोय को यह दृश्य देख कर अचानक पृथ्वी पर सायकाल के दृश्य का स्मरण हो माया । पर यहां के आवाशीय दृश्य में उसे उतने सौन्दर्य की अनुभूति नहीं हुई। अचानक गगन-गाडी एक तीस मजिली इमारत की छत पर आकर खड़ी हो गयी। जोन का अनुसरण करते हुए हम निक्ट की लिफ्ट तक आए। उसमे बैठ कर पांचवी मजिल पर उतर पडे : एक गैलरी को पार करके हम ज्योही एक द्वार के सामने पहुंचे, त्योंही आटोमैटिक मेकेनिकल ड्राइवर ।

८० द्वार पर लगे विस्तारक से हमें सुनाई पड़ा-"अतिथियों को लेकर जोन अन्दर चले आओ।" हमारे विस्मय का ठिकाना न रहा । द्वार के बाहर कोई भी व्यक्ति नहीं था, फिर अन्दर के व्यक्ति को हमारे आने का पता कैसे चल गया। इससे भी अधिक अचरज तो हमें तब हुआ जब द्वार के पट स्वतः ही खुल गये । हमने जोन के साथ अन्दर प्रवेश किया और चारों और देखा, तो कमरा प्रकाश से जगमगा रहा था। छत, दीवार, खिड़कियां, द्वार के पट सभी से प्रकाश निकल रहा था। लगता था जैसे सम्पूर्ण कमरे मे हीरे जड़े हो और उन्ही से यह प्रकाश फूट-फूट कर निकल रहा है। कमरे मे कही भी हमे बिजली के तार दृष्टिगोचर नहीं हुए। खिड़कियों के पारदर्शक कांच तो और भी अधिक आकर्षक लग रहे थे, क्योकि उनसे रंग बिरगे प्रकाश निकल रहे थे । उनका कोई भाग हरा प्रकाश दे रहा था तो कोई पीला; कोई नीला प्रकाश मुक्त कर रहा था तो कोई लाल । मदालसा अपने कौतूहल को न रोक सकी। वह पूछ ही बैठी, "यह मकान है या कोई तिलिस्मी घर ।" जोन ने थोड़ा मुस्करा कर उतर दिया, "घबराइए नहीं, आपको धीरे-धीरे सब कुछ ज्ञात हो जायगा । थोड़ा विश्राम कर लीजिए। उसके पश्चात वात होंगी। पर विश्राम से पूर्व एक बार इस निवास स्थान से परिचय प्राप्त कर लीजिए ताकि आपको इसका उपयोग करने में सुविधा रहे।"

और यह कह कर जोन ने दीवार पर लगे एक बटन को दया
दिया। दीवार ना कुछ भाग घरं घरं करता हुआ न जान कहाँ
लुप्त हो गया और उसके स्थान पर एक आलमारी का पन्ला खुल
कर नीचे गिर पडा । "इनमें आपकी बावश्यक्ता की सभी साम्रगी
रखी हुई हैं । माप जो चाहें उपयोग में ला सक्त हैं।"
जोन न बटन को पुन पूर्व दिशा में उल्टी बोर घुमा दिया।
दीवार का लुप्त भाग पुन. यथाम्यान पर आ गया। इसके पश्चात
वह हम कमर म पडे पलग के निकट लिवा से लिया। पनगद
ठीक सामने दीवार पर जड हुए चित्रा के समान एवं प्लास्टिर का पट
लगा हुआ या । टीर वैसा ही पनग पट के उपर रतु म लगा था।
जानन पलग के पास दीवार मलगदा वटना मग एकदा धुमा
दिया। दीवार पर लगे पट पर कमर के द्वार का चित्र स्पष्ट
दिपाई देन लगा । यब हम समझ वि अन्दर के व्यक्ति न इसी पट
'सहायता से यमर में बैठे ही हम द्वार पर सर देख लिया
था। पर वह स्वय वही बन्तान हो गया।
जोन ने अब वो वार दूसरे बटन का दवा दिया। इन पर लग
पर पर मगर लार का कोई चलचित्र यान लगा । जोन हमारी
बार उन्मुख होकर बोला-"इन दोनों पटावी सहायता से वाप
अपना मनारजन वर सरत हैं।"
पलग ने इधर उधर पर्याप्त रिक्त स्थान था। उसमे पुछ दूर
हट पर एक वही मेज और विचित्र आकार भी वृसियां पटरी हुई थी।
दूमरी और टोर सामने वाच धन्तु के भने दा जारी साफे पड़े हुए

८२ थे, जिन पर विचित्र रंगों का वस्त्र-सा पदार्य चढ़ा हुआ था। मेज पर तीन चार यन्त्र रखे हुए थे। दो यन्त्र तो हमारे जेवी रेडियो प्रेपक और संग्राहक जैसे ही थे। एक टेलीफून जैसा था। पर जोन से ज्ञात हुआ कि इसको मंगल लोक में टेलीविजो फून कहते हैं । यह स्वय चालित है। इसको केवल आदेश देने से मगल लोक के किसी भी महामानव से बातें की जा सकती हैं । इस पर बात करते समय उस व्यक्ति का चित्र भी इसके डायल के साथ लगे पट पर आकर अंकित होता रहता है जिमके साथ बातें की जा रही हैं। जोन से यह भी ज्ञात हुआ कि मेज के निकट जो यन्य रखा हुआ है वह यात्रिक मानव है। कमरे के प्रहरी का यही कार्य करता है । इसका विद्युत-नत्र प्रत्येक व्यक्ति, जीव, अथवा वस्तु को कमरे में प्रवेश करने से पूर्व एक चेतावनी देता है। इससे निरन्तर प्रकास और ध्वनि-तरंगे निकलती रहती हैं । जब जिस प्रकार की आवश्यकता होती है वैसा ही यह उत्तर देता है और साथ ही द्वार को खोलने का कार्य भी यह करता है। अब हमें भात हुआ कि यह यात्रिक मानव ही था जिसने हम को कमरे में प्रवेश करने की आज्ञा दी थी। जोन से यह भी ज्ञात हुआ कि मेज पर लगे दो बटनों को घुमाने से कमरे को इच्छानुसार गर्म या शीतल बनाया जा सकता है। पलंग के निकट ही छत से एक अलमारी लटक रही थी। जोन ने दीवार में लगा एक और बटन दबाया कि अलमारी खिसक कर फर पर मा लगी। उसके पल्ले स्वतः ही सुल गये। अलमारी क्या

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क्रीम की थी। एक बटन दबाने पर और मुख को उनके सामने करने पर अपने आप ही इच्छित पाउडर और क्रीम की इच्छानुसार मोटी या पतली तह पुत जाती थी और पता नहीं क्या क्या पदार्थ वहाँ रखे हुए थे। बनाव शृंगार की इस विविधता को देखकर मदालसा मन ही मन प्रसन्न हो उठी किन्तु अशोक का मन चकरा गया। उसने जोन से कहा-"कृपया बाहर चल कर कुछ देर के लिए बैठ जायें। उसके बाद आप शेप वस्तुओं के विषय में बताइयेगा।" जोन ने अनुभव किया कि वह अपने अतिथियों का काफी समय ले चुका है। उसने उनसे इसके लिये क्षमा मांगी और हम तीनों जोन के साथ पुनः कमरे में आ गये। कमरे में आये तो हमने देखा कि कमरे के एक कोने में भी भीना- भीना लाल प्रकाश निकल रहा है। मदालसा जोन से पूछ बैठी- "हमने यहाँ पर सभी स्थानों में लाल प्रकाश देखा है। हमारे भूलोक मे तो रात को जब चन्द्रमा निकलता है सारा धरातल स्निग्ध स्वच्छ चाँदनी से घिटक जाता है । जब चाँद नहीं निकलता तो रात्रि मे चारों ओर काला-काला भयानक अंधियारा छाया रहता है । यहां पर क्या चन्द्रमा लाल रंग का प्रकाश देता है ?" जोन मदालसा की बातों पर मुस्कराता हुआ बोला-"नहीं मदालसा जी, यह दात नहीं है। जैसा कि मंगल लोक के इतिहास से पता चलेगा, मंगल लोक पर पहले केवल सूर्य का प्रकार ही आता या । किन्तु जब से इसको महामानवों ने भावाद किया है तब से उन्होंने अपना एक कृत्रिम चन्द्रमा भी बना लिया है।"

अशोक आश्चर्य चकित हो गया, उसके मुह से अनायास ही निकल पडा "भला यह कैसे सम्भव हो सकता है।" "अशोक जी यहां पर सभी कुछ सम्भव है। असम्भव कुछ भी नहीं। मगल का यह कृत्रिम चन्द्रमा तो पिछले चार सौ वर्षों से प्रत्यक्ष रूप से इसी प्रकार प्रकाश दे रहा है। गगन गाटी मे आते समय जो चांद आपने बापारा में निकला देखा था वह कृत्रिम चाँद ही था।" इसके बाद वह कहने लगा-'रात्री में एक और भी गोला आपने आवाश में देखा होगा, यह गोला पृथ्वी लोक ही है । कल प्रात काल आप लिपट के द्वारा भवन की सब से ऊपर की छत पर चले जाइयेगा तो आप को सूर्य निक्लता दिखाई पडेगा। मगल लोर के कृत्रिम वायु मडल मे मूर्य प्रवास का भी अधिक तेज कर लिया जाता है, और रात्री में सूर्य प्रकाश के अभाव में इसी कृत्रिम चन्द्रमा से वाम लिया जाता है । इस से निक्ले प्रकाश की लगभग यही रचना है जो सूर्य प्रकाश की है। किन्तु जब भी प्रधान महामानव निर्माता चाहते हैं, वृत्रिम चन्द्रमा के प्रकार को बदल देते हैं। कभी कभी रात्रि में हमारा आवारा पीले रंग से भर जाता है और कभी वह वासनी हो जाता है। यह भी मैं आपको बता दूं वि सूर्य निक्ले या न निक्ले, भवनों में प्रकाश वरावर बना ही रहता है । सलोनियम के कण और गुप्त विद्युत-पारा की सहायता से भवनों के प्रत्येक कमरे से, दिन हो या रात, प्रकाश बराबर फूटता रहता है।"

८६ "यह सब कसे सम्भव है ? अनीता जो अब तक एक टक जोन की बात सुन रही थी, अचानक बोली। "यह इसलिये सम्भव है क्योंकि हम लोग एक कृत्रिम वायुमंडल में रहते हैं। आज आपने जो आकास देखा था वह भी कृत्रिम ही है और वह केवल यहां से १० मील की ऊंचाई तक ही है । उसके बाहर मंगल लोक का भयानक दृश्य दिखाई पड़ता है । यह सारा कृत्रिम आकाश एक प्रकार के प्लास्टिक पदार्थों से बनाया गया है और वायुमंडल उत्पन्न करने के लिए भूमि में उपस्थित नाइट्रेट से आक्सीजन प्राप्त की गई है। वायुमण्डल में विभिन्न गैसों का अनुपात इस तरह रखा गया है कि जिससे कृत्रिम आकाश पर वाह्य वायु का दवाब बराबर अधिक दना रहे और कृत्रिम आकाश इधर उघर नहीं जाये।" "वया हम लोगों को मंगल लोक के वास्तविक वायुमंडल का दृश्य देखने को मिल सकता है ?" अशोक ने जोन से पूछा। "इसके लिये तो मंगल लोक के प्रधान महामानव निर्माता का यादेश प्राप्त करना होता है।" जोन ने कहा । अचानक तभी कमरे में द्वार के पास लगे यान्त्रिक-मानव में एक लाल रंग की बत्ती जल उठी । जोन बोला-अन्दर आ सकते हो" । उसके बोलते ही बत्ती का रंग हरा हो गया और द्वार स्वतः खुल गया। टोनी ने आकर जोन से न जाने क्या कहा कि जोन ने हमसे रात भर के लिये विदा लो और टोनी के साथ बाहर चला गया।

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८८ से आप इस कमरे में आये हैं। उन सब बातों का आंखों देखा हाल भी प्रसारित किया जा रहा है । अशोक ने कहा, "यह सब कैसे सम्भव है ?" इसका कारण यह है कि आपके कमरे का सम्बन्ध वनस्पति प्रदेवा के चलचित्र विभाग से स्थापित कर दिया गया है और उसने आपकी गतिविधियों को महामानवों के सभी चलचित्र पटों से सम्बन्धित कर दिया है। "रडार द्वारा चालित संग्राहक पट पर आपको गतिविधियों के चित्र आ रहे हैं और वहां से वे प्रत्येक कमरे में लगे चलचित्र पटों पर आ रहे हैं।" हम सभी विस्मित थे। इसके अर्थ तो यह हुआ कि मंगल ग्रह में हम कोई भी काम ऐसा नहीं कर सकते थे जिसको वहां के निवासी न जान सकें। जोन अपने साथ मंगल लोक का इतिहास भी लाया था। उसको देते हुए उसने कहा, "इससे महामानव समाज के बारे में आपको काफी पता चल जायगा।" जोन के जाते ही अशोक ने मंगल लोक का इतिहास पढ़ना शुरू किया । मदालसा और अनीता भी उसको ध्यान से सुनने लगीं। अनेक शताब्दियों से पृथ्वी लोक के निवासी मंगल लोक के प्रति विरोप रूप से जिज्ञासु रहे हैं । दूरवीक्षण यंत्र के आविष्कार ने वैज्ञानिको का ध्यान मगल गृह की ओर आकर्षित किया था। ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाताओ का क्यन था कि मगल लाक मे जीव- पारियो का रहना असम्भव है।" "मगल पृथ्वी गे अपेक्षा सूर्य से अधिर दूर है और इसी कारण यहां पर शीत अधिक पडती है। यत्रो से ज्ञात हुआ है कि यहां के धरातल पर दिन में तापमान वर्फ जमने के ताप से १०० अधिक रहता है और इसका मुख्य कारण यह है कि मगल सूर्य की परित्रमा ६८७ दिन में पूरी करता है । पृथ्वी लोक सूर्य की परिक्रमा ३६५ दिन में पूरी करता है इसीलिए पृथ्वी पर ३६५ दिन का एक वर्ष होता है । मगल लोक मे एक वर्ष में ६८७ दिन होते है।" अनीता बीच मे ही वोल उठी "जब हम लोग आरोहण प्रशिक्षणशाला में थे तो हमको भी मगल लोन का कुछ ज्ञान कर- वाया गया था। उसमे और इस इतिहास मे दिय गय तथ्यो मे मुझे ता कोई विशेष अन्तर नहीं जान पडता।" 'अशोक जी को पढन दीजिये । मैं तो वह सब कुछ भूल गई। जर हमको मगल लोक में ही रहना है तो हमे मगल लाक के इति- हारा का पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिये । आप आग पदिय ।" मदालसा ने जैसे अनीता की अवहेलना करते हुए कहा । अशा ने आगे पढना आरम्भ विया,"ईमा पी३०दी शताब्दी मे हिमलर नाम का एक बडा वैज्ञानिक पृथ्वी लोक के यूरोप महाद्वीप में हुमा । जा भी उसके सम्पर्क में आया उसी न उमरी प्रतिमा या लाहा माना, पर पृथ्वी लोर तयावथित प्रथम श्रेणी .

के वैज्ञानिकों को उसके नित नये आविष्कार और उसकी बढ़ती हुई ख्याति बुरी लगी। उन्होंने हिमलर के सभी आविष्कारों को गलत और वेकार कह कर बदनाम कर दिया। उसने जितनी भी गवेपणा की उन सवको पृथ्वी के इस वैज्ञानिको ने कोई महत्व नहीं दिया । पृथ्वी पर उस समय वैज्ञानिकों के एक विशेष गुट का वोल वाला था, किन्तु वे हिमलर से कम प्रतिभावान थे । हिमलर ने प्रथम बार प्रयोगशाला में कांच की बोतलों में रसायनिक- भौतिक विधियाँ अपनाकर मानव गर्भ को उत्पन्न किया था और उसको एक माह तक जीवित रसा था। किन्तु वैज्ञानिकों ने उसको इस खोज को गम्भीरतापूर्वक न लेकर हंसी में उड़ा दिया। वह जानता था कि एक न एक दिन वैज्ञानिको का वही गुट इस खोज को अपनी बताकर पृथ्वी पर प्रसिद्धी प्राप्त कर लेगा, और वह भी न कर सकेगा। उसे इस प्रकार के अनाचार का व्यव- हारिक अनुभव था। इस गुट की इस प्रकार को धोखा देने की अनेक घटनायें उसने अनेक प्रतिभावन युवक वैज्ञानिकों के साथ होती स्वयं देखी थी। काम किसी ने किया, नाम किसी और का हुआ। कोई नई गदेषणा किसी कम प्रसिद्ध किन्तु प्रतिभाशाली युवक ने की । किन्तु उम अनुसंधान के लिये किसी और वैज्ञानिक को यश मिला। उसने यह भी देसा था कि अनेक युवक वैज्ञानिकों को केवल इसलिए मार डाला गया क्योंकि वे कुछ साधन सम्पन्न सामर्थ्यवान वैज्ञानिको से कुछ समय पूर्व ही उन्हीं बातो की खाज कर चुके थे जिन पर ये वैज्ञानिक काम कर रहे थे, और जिसमें उनको उस समय तक सफलता नहीं मिली थी। ऐसे लोग इन युवक वैज्ञा- ६१ निको के गवेपणा कार्य को अपना बता कर आज वैज्ञानिक वन बैठे थे। इसी कारण अनेक युवक वैज्ञानिको को योरोप से लुप्त कर दिया गया और उनका क्या हुआ यह आज तक पता नही है । उनके द्वारा हुए अनुसधान उक्त गुट के किसी वैज्ञानिक के नाम से पुकारे जाने लगे। "हिमलर को भी वही भय था। उसने अनेक ऐसे युवक वैज्ञानिकों से अपना सपर्क स्थापित कर लिया जो उसी की तरह सत्ताधीश वनानिको के गुट से परेशान थे। उन सबको अपना जीवन सदैव मरट में दिखाई पड़ता था। इसी बीच म हिमलर रमायनिव भौतिक विधि द्वारा प्रयोगशाला म बोतलो से मानव शिशु पैदा करने में सफल हो गया। उसने अपनी यह खोज अपने सायी वैज्ञानिकों को बताई। मभी उसपी इस प्रान्तिकारी खोज से वडे प्रभावित हुए जो विश्व की वर्तमान रचना मे मौलिक परिवर्तन कर सकती थी । इमलिये सभी माथियो ने उसके नेतृव का एक स्वर रो स्वीवार पर लिया।" "यह तो वही रोचर होती जारही है अयोव जी" । मदालसा ने कहा। "हाँ लगता तो कुछ ऐसा ही है ।" अशोक ने उत्तर देवर यागे पटना आरम्म दिया। "एक दिन हिमार की प्रमिद ज्योतिर्विज्ञ हैल्म होल्टस में अचानक भेट हो गई। उसने मगल लोक के विषय में स्वयं अपना एक मन भी प्रतिपादित दिया था। उसके बारे में उसने हिमनर को बताया।

२ इसके वाद हैल्म होल्टस ने हिमलर को अपना मत बताया जो उसने मंगल लोक के विषय में स्वयं बनाया था। वह कहने लगा, 'मेरे मत के अनुसार मंगल लोक पर मानव जाकर रह सकते हैं । सौर मण्डल के सभी ग्रहों में केवल मंगल पर ही वायु मण्डल है। यद्यपि यह वायु मण्डल पर्याप्त हल्का और छिछला है पर बहुत च्यापक है और इसे मानव अपने अनुरूप बना सकते हैं। वहाँ पर पानी की कमी है, किन्तु हिम को गला कर उस कमी को पूरा किया जा सकता है। वहाँ पर ऑक्सीजन नही पाई जाती लेकिन उसकी घरती में सिल्कन और लोह ऑक्साइड के रूप में अत्यधिक मात्रा में ऑक्सीसन जमा है । वहाँ के रेत मे यह लोह ऑक्साइड बहुत अधिक पाई जाती है। लोह ऑक्साइड का रंग लाल होता है, इसलिये हमें मंगल का रंग भी लाल दिखाई पड़ता है। पृथ्वी लोक पर वक्ष, दलोरोफिल की सहायता से जिस प्रकार वायुमण्डल की कार्बन डाइ ऑक्साइड से ऑक्सीजन निर्माण करते हैं उसी प्रकार मंगल लोक में मारमीजन बनाई जा सकती है। रेत में मिली लोह ऑक्साइड से भी ऑक्सीजन अत्यधिक मात्रा में अलग की जा सकती है।' हिमलर ने हैल्महोल्टज की बातें सुनी तो उसको अपनी चिर- सिंचित अभिलाषा पूर्ण होती दिखाई दी। वह जानता था कि उसको और उसके दूसरे युवक यज्ञानिक साथियों को सत्ताधीश वैज्ञानिकों का गुट एक एक करके नष्ट कर देगा। इसलिये वह वर्षों से पृथ्वो लोक को छोड़ कर कहीं अन्यन्त्र जाना चाहता था 1 हैल्म होल्टज को खोज ने दूरदी हिमलर को नई सूम प्रदान की और उसने पृथ्वी लोक के उन सभी युवक वैज्ञानिकों की एक गुप्त समा दुलाई जिनको दनानिको का सत्ताधीश दल विसी न क्मिी तरह गोषण कर रहा था। उमने मगल लोक को आबाद करने की योजना मद सामन रखी। उसने कहा-"मित्रो-आज मैंन आप सबको एक महत्वपूर्ण मन्त्रणा के लिये आमन्त्रित किया है। जैसा कि बाप मनी जानन मेरी क्रान्तिकारी गवेपणा सपल हो चुकी है। इसके परिणाम मानव समाज को पूर्ण रूप से वदल देंगे । यब तक मानद एक जैविक प्राणी था वोंदि वह जैविक प्रक्रियात्रा से उत्पन हाता था चोर उन्हीं के कारण उसा सवर्धन होता था पर अब भौतिर रमायनिक विधि का अपना कर हमन दातला से मानव शिशु को उन्पन कर लिया है । इसस आज तक मानव के जो दा पहलू थ और जिनम परस्पर सपर्प हाने के कारण वह वरावर ही यस्तुलित रहता था वह समाप्त हो गया है। विकास को दृष्टि से हम एक नवीन अध्याय आरम्भ कर रहे हैं जिसमे एक नवीन जीव जाति का हम पन्न कौशल की सहायता से जन्म देंगे । अव तक विकास के मम्पूर्ण इतिहास में यह अभिनव प्रयोग है । जवित्र क्रियाओं के ऊपर यात्र- कौशल को, प्रकृति के ऊपर मानव की विजय है। महामानव वो उत्पन्न करने की, मानवों को देवताओ के गुण प्रदान करने वाली कल्पना आज साकार हो उठी है । पर इस अभिनव समाज को बनान के मार्ग में आज के सत्ताधारी वैज्ञानिक सबसे अधिक बाधक है। उनके कारण हम युदर वंज्ञानिको का अस्तित्व ही सकट में पड गया है। ऐसी दशा मे मेरे मित्र हेल्म होल्टज ने अपने निरीक्षण और परीक्षण से एक ऐसा स्थान खोज निकाला है जहाँ हम निरापद रह कर अपने आविष्कारों का मन चाहा विकास कर सकते हैं । और वह स्थान है मंगल ग्रह । हम जानते हैं कि वहाँ तक पहुँचने में मार्ग में अनेक व्यवधान आयेंगे । सम्भव है इस अभियान में हम सबको अपने जीवन से ही हाथ धोना पड़े। पर अज्ञात की खोज के लिये हमारे से पहले के वैज्ञानिकों के आत्म वलिदान और त्याग के अनेक उज्ज्वल उदाहरण हैं। उनकी इस परम्परा को निभाने में कौन गर्व अनुभव न करेगा। हम यह भी मान सकते हैं कि हेल्म होल्टज के मत हमारे लिये अनुकूल सिद्ध न हो किन्तु पृथ्वी लोक मे भी तो हमारे जीवन का कोई भरोसा नहीं। किसी भी क्षण हमारी हत्या की जा सकती है अथवा हमें गुप्त रूप से उड़ा कर सदैव के लिए लुप्त किया जा सकता है । ऐसी दशा में मेरा मत तो यही है कि हमें इस भारी और भयानक अभियान का आमन्त्रण स्वीकार कर लेना चाहिये क्योंकि यदि इस प्रयत्न में हम मर भी जाते है तो भी यह मृत्यु इन अनाचारी वैज्ञानिकों के हाथों कुत्ते जैसी मृत्यु प्राप्त करने से कहीं अधिक पवित्र होगी और अपने पूर्वज वैज्ञानिक बन्धुओं को परम्परा पर मर मिटने में हमे अत्यधिक गर्व होगा । इसलिये मित्रो, मैं इस पवित्र कर्तव्य के लिये आपका आवाहन करता हूं।" हिमलर ने अपनी बात इतने प्रभावशाली ढंग से कही थी कि लगभग सभी उपस्थित वैज्ञानिकों के हृदय में उसकी बातें जम कर बैठ गई और उपस्थित सभी व्यक्ति मंगल लोक पर चलने के लिये तैयार हो गये । प्रश्न यह था कि मंगल लोक में जाने के लिये कौन सा वाह्न उपयोग में लाया जाय ! इस प्रश्न का भी समाधान हो गया जब एक रूसी वैज्ञानिक बैलेस्टोटस्की ने बताया कि वह मंगल

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वह वरावर विचारों में डूबा रहा । अनीता और मदालसा संग्राहक पटल पर रडार चालित चलचित्रों को देखती रहीं। जब जोन ने कमरे में प्रवेश किया तो भी अशोक अपने पलंग पर पड़ा विचार- मग्न था । जोन ने आकर जब उसको आज रात सहभोज मे चलने की बात स्मरण कराई तो उसको अपने कर्तव्य का भान हुआ। वे तीनों जोन के साथ सहभोज के लिये तैयार होने लगे। [ १४ ] अशोक के मस्तिष्क मे अभी तक भी महामानव सभ्यता का इतिहास ही चक्कर काट रहा था। उसने मंगल लोक में जो कुछ अव तक देखा था, उससे यह निष्कर्ष तो निकाल ही लिया था कि महामानवो की यह सम्यता पूर्ण रूप से विकसित यन्त्र कौशल के ऊपर टिकी हुई है। मानवता के जिस संदेश को लेकर वह चन्द्र लोक जा रहा था उसको प्रसारित करने को उसको यहाँ अधिक आवश्य- कता दिखाई पड़ी। सहभोज में जाने से उसको यहाँ के व्यक्तियों के मत जानने का उचित अवसर लगा। तभी जोन, टोनी और डोनाल्ड अशोक के कमरे में आये । वे इस समय बहुत ही सुन्दर वस्त्र पहने हुये थे। मदालसा बहुत देर की तैयार बैठी हुई थी। अशोक और अनीता गुसलखाने मे अभी- अभी गये थे। टोनी मदालसा के पास जाकर बैठ गया और बोला-"आज रात को क्या आप मेरे साथ नृत्य करने का निमन्त्रण स्वीकार कर मुझे अनुगृहीत करेंगी।"

ܕ । मदालसा तो ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में ही थी, पर वह स्वय पहल करना अनुचित समझती थी। इसलिये उसने टोनी का निमन्त्रण तुरन्त ही सहर्ष स्वीकार कर लिया । जोन और डोनाल्ड को टोनी के भाग्य पर ईर्षा हुई। अनीता और अशोक अव तव गुसलखाने से वाहर या चुके थे। आज रात को नगर के सभी स वर्गीय महामानवो ने हमारे सम्मान में एक मामुदायिक कार्यक्रम और भोज आयोजित किया था । उसो के लिये हम चल दिये । गगन गाडियो से हम जिस भवन की एत पर उतरे वह ५० मजिल का था। स वर्गीय महामानवो के आमोद प्रमोद और मनोरजन के लिये इसका उपयोग होता था। थाज नगर के सभी स वर्गीय महामानव वहां उपस्थित थे। हम लोग भवन के हॉल में पहुंचे तो सभी लोग उठ खड हुए। जोन हमको हॉल के मच पर ले गया। चारो ओर शान्ति छा गई। उसन वहाँ उपस्थित सभी महामानव और महामानवीयो से हमारा परिचय बरखाया । इसके बाद सामुदायिक भोज आरम्भ हो गया । भोज चलते समय भी मच के समात पट पर एक चलचित्र दिखाया जा रहा था । अशोक को लगा कि यह तो उसी के आगे का असग मानूम होता है, जहां उसने महामानव सभ्यता का इतिहास बहना छोहा था। पथानव कुष्ट इस प्रकार था- लगभग सो व्यक्ति धरातल से दस आवारा पोतो द्वारा आवास की ओर उडे और उडते हो चले गये । चन्द्रमा एक ओर रह गया फिर भी उनका बाकाश मोत बरावर यागे बढ़ता जा रहा था। अचानक वे एक १८ ग्रह के निकट पहुंच गये । उसका उन्होंने निरीक्षण किया तो पाया कि वह अभी तक सुनसान पड़ा हुआ है। उस उजड़े ग्रह पर ही उन्होंने अपने आकाश पोत उतार दिये। वहाँ के जलवायु, ताप और दाव ने उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालना आरम्भ किया । इस- लिये उन्होंने एक कृत्रिम वातावरण और वायुमण्डल का निर्माण किया । ग्रह पर पानी का नितान्त अभाव था उसके लिये उन्होंने जमे हुए हिम को तापवर्द्धन विधि द्वारा पिघलाया। उसको सम्पूर्ण ग्रह पर पहुँचाने के लिये नहर निकाली। आक्सीजन की भी वायु मण्डल में कमी थी। उसकी कमी को घरातल के सयुक्तो से पूरा किया। चलचित्र यही पर समाप्त हो गया था। इसके पश्चात् हाल के एक कोने से विचित्र प्रकार के संगीत की ध्वनि आने लगी। यह सगीत किसी यन्त्र से निकल रहा था। जोन से पूछने पर पता चला कि यहाँ पर किसी भी महामानव के पास सगीत आदि सीखने के लिए विशेष समय नहीं रहता और न महा- मानव निर्माता इसको पसन्द ही करते हैं। फिर भी महामानवों को सगीत सुनने में अत्यधिक रुचि है। इसीलिए सगीत के स्वरों को कृत्रिम रूप से इस प्रकार मिलाया जाता है जिससे अपने आप यान्त्रिक संगीतज्ञों के मुख से सगीत निकलने लगता है। यह एक यान्त्रिक संगीतज्ञ ही गा रहा है । भोज के बाद सोमवटी दी गयी। मदालसा ने सोमवटी को चखा, किन्तु अनीता और अशोक ने उसको नहीं खाया । इसके बाद स वर्गीय महामानवों को मनोरंजन सभा के प्रधान मंच पर आये । उन्होंने अपनी भाषा में कुछ कहा, जिसका अनुवाद 8 करके जोन ने हमें बताया कि वे स वर्गीय महामानवो की ओर से आपका स्वागत करते हैं और आशा करते हैं कि आप वर्वर भू-लोक की वर्बरता के विषय मे कुछ प्रकाश डालेंगे। इसके बाद वह महा- मानव अपनी जगह जाकर बैठ गया। अशोक को पृथ्वी के बारे में इस प्रकार का सम्बोधन सुन कर बड़ा क्षोभ हुआ, किन्तु फिर भी वह अपने को सम्भालता हुआ सयमित स्वर में बोला-"मगल लोक के आदरणीय महामानव और महामानवीयो, आप सभी ऊंचे वैज्ञानिक हैं और विकासवाद के सिद्धान्त से भली प्रकार परिचित हैं। इस नियम के अनुसार विसी विशेप जीव जाति के लिए जीवित बना रहना कोई खेल नहीं है। एक ओर अग्नि परीक्षायें और सघर्ष है तो दूसरी ओर विजय और प्रगति । जो जीव जाति इस बदलते हुए वातावरण से समझौता करने की प्रतिमा रखती है वही इस सेल में विजयी होती है। जिस जाति के स्थिति अनुकूलन अवयव प्रत्येक दशा मे मत्रिय रहते हैं, वे ही इस ब्रह्माण्ड में जीवित रह सकती है, और ऐमा वे ही जीव- जातियों कर सकती हैं, जिनकी रचना साधारण हो, जिनके जीवन का लक्ष्य सामान्यीकरण हो, विशेषीकरण नहीं। किन्तु जो जीव जातियां विसी विशेष प्रकार के वातावरण में रहने वो यादत बना लेती है, उस वातावरण में सपा लेने के कारण उनका अन्य वातावरण मे रहना असम्भव हो जाता है। एक वातावरण पर पूर्ण रूप मे आश्रित होने और रिमी एक विशेषता यो बढाते-दवाते अति की सीमा उल्लपन कर जाने के कारण अनेक जीव जातियां नष्ट हो चुकी है।"

१०० अचानक ही बीच में ही भौतिक विज्ञ श्री बोस बोल उठे- "यह भू-लोक का बर्बर ठीक ही कह रहा है।" अशोक पुनः अपनी उत्तेजना को रोकते हुए बोले-"मैं कहता ठीक उसी दशा में आज आपका महामानव समाज है। अधिक से अधिक सुविधायें और विलास तथा कम से कम श्रम और पराक्रम महामानव सभ्यता के आदर्श ज्ञात होते हैं । यन्त्र कौशल को सहा- यता से महामानव ने स्वनिर्मित कृत्रिम परिस्थितियों के बीच अपने लिए एक आदर्श-सा स्वर्ग स्थापित कर लिया है । पर जिस यन्त्र कौशल को महामानव ने जन्म दिया है, अपने हाथों पाला पोसा है, आज वही उसको खाने के लिए अग्रसर हो रहा है। अपने दुर्दान्त- चक्रों में वह महामानव की पवित्रता और सत्ता दोनों को ही पीस डालने की चेष्टा में है। एक ओर यह मशीन महामानव को पशु बनाने के लिए सुराक जुटा रही है तो दूसरी ओर उसकी अन्तर आत्मा की उज्ज्वलता को, उसकी सम्वेदना को नष्ट कर चुकी है। यन्त्र कौशल ने महामानव के हाथ में शक्ति नहीं दी है, शक्तियो के हाय में महामानव को सौंप दिया है और आज यही शक्तियाँ महामानव को खाती-सी जान पड़ती हैं।" अशोक पुनः रुक कर दोला-"और इससे बचने का एक मात्र यही उपाय अब महामानव के पास रह गया है कि वह नये-पुराने सभी मूल्यों में परिवर्तन करे और यथार्थ आवश्यकताओं के अनुकूल जीवन और समाज का निर्माण करे।" इतना कह कर अशोक अपने स्थान पर बैठ गये। जोन ने अशोक के भाषण का मंगल भाषा में अनुवाद करके सबको सुनाया।

१०१ बहुत कम महामानव अशोक की बातो को समझ सके। फिर भी सभी ने नौपचारिक शिष्टता निमान के लिए तालियां बजाई । महामानव समूह में से तीन चार व्यक्ति, जिन पर अशोर की बातों का कुछ प्रभाव पडा था, आगे वट वर अशाक के पास आय । जोन ने उन मुभी का परिचय एक-एक करके अशोर से करवाया मनोज्ञानिक विशारद थी भावानन्द है। य पूर्व भाग्य-रचियता थी अविनाश है और ये भौतिक विज्ञ श्री अम्ण हैं । इनका कहना है कि व आपकी दाता को पसन्द बरत हैं।' अशोक को यह जान कर प्रसन्नता हुई कि कम से कम कुछ महामानव तो उनकी बाता को समझे हैं। जोन न बताया कि ये तीनो व्यक्ति कभी भी सामवटी का उपयोग नहीं करते । वे सदैव ई बुछ न कुछ सोचत रहत हैं। कुछ गिन चुने लागो से ही ये मिलना पसन्द करते हैं। अनीता से अनेक क वर्गीय महामानवो ने परिचय करना चाहा, किन्तु उनने किमी से विशेष बातें नहीं की। नीलिमा, कुमुदनी, मारगरेट, ऐनी और मेरी महामानविया ने भी अशोक से परिचय प्राप्त किया । मदालसा मे डिम्योपक प्रयोगशाला के कुछ महामानवो, कृतिम रन निर्माण मित वे कुछ कमियो और वृत्रिम यात्रा के कारणाने में काम करने वाले बुद्ध वर्मचारियो वा परिचय कराया गया । उन सबने उनको निगा निमन्त्रण दिया, चोर उमने सभी का निमन्त्रण स्वीार कर लिया। इसरे बाद नृत्य होना बारम्न हुआ। अशोर और अनीता को नृत्य में कोई रचि नहीं थी। उन्होंने जोन से वापिस कमरे पर पलने के लिए वहा । अद जोन अगोर और १०२ । अनीता को लेकर चुपचाप हाल से बाहर निकले। ये तीनों गगन गाड़ी पर सवार होकर वापिस अपने कमरे में आ गये । [ १५ ] सभी स वर्गीय महामानव इस बात से अत्याधिक चकित हुए कि अशोक और अनीता जोन के साथ समारोह को बीच ही में से छोड़कर चले गये। आज के इस समारोह के लिए महामानवों ने पूर्व निश्चित कुछ बड़ी-बडी योजनायें दना रखो थीं । उनको अनीता और मदालसा से बड़ी-बडी आशायें थीं। किन्तु अनीता के इस प्रकार चले जाने पर उनकी कामनाओं पर जैसे पानी फिर गया। महामानवियों ने भी इस अवसर के लिए विशेष आयोजन किया था। नीलिमा, कुमुदनी, मारगरेट, ऐनी और मैरी ने याज विशेष वनाव और शृङ्गार किया था। उनका मेक-अप सभी को आकर्षित कर रहा था। आज निश्चय कर चुकी थीं कि जैसे भी हो अशोक से परिचय अवश्य प्राप्त करेंगी। वस्तुस्थिति तो यह थी कि मंगल लोक की जिस नारी ने भी अशोक को देख लिया था, वही उसके निकट सम्पर्क में आने की लालसा लेकर इस सहभोज में आई थी। पर जब अशोक बिना किमी मे बोले चुपचाप नृत्य-समारोह को छोड़ कर चला गया तो सबकी आशा पर भारी दुपारापात हुआ । । आज सबको टोनी और डोनाल्ड के भाग्य पर ईर्षा हो रही थी, जो वारी-बारी से मदालसा के साथ नृत्य करने में तल्लीन थे। सभी महामानव ललचाई और आशाभरी दृष्टि से मदालसा की ओर देख रहे थे कि वह उनको भी सह-नृत्य के लिए आमन्त्रित करे, पर मदा- लसा टोनी बोर होनान्ड साय नृत्य करने में इतनी तल्लीन यो कि उसतो अपने चारों ओर देखने का भी अदमर नहीं था। अब वर टोनी और डानान्ड का ममी महामानव मूर्व समनने बाये थे। उनरे विषय मे सम्पूर्ण वनस्पति प्रदेश म यह प्रनिद्ध या वि शिशु- उत्पादन मित्र में उनकी बोतला में जन्म हान से पूर्व कुछ भपकर ही भूल हो गयी थी, जिसके कारण उनका मानमिक सन्तुलन विगड गया है। पर बाज उन्हीं से वनस्पति प्रदेश के बडे-बडे अधिकारी मिलने को उन्मुत्र थे। इतिहान तो उन्होंने उनी दिन दना दिया था, जिस दिन उन्होंने दोन वे माय मिल कर भू-लोर के इन निवा- नियों को खोज निकाला था। पर मदालमा को अपनी बोर आकृष्ट परन में वे सपल हुए, अन्य महामानव इन दात से और भी अधिक प्रभावित हुंचे थे। म वर्ग की महामानव नारियां अशोर और अनीता के चने जाने के पश्चात् यापम में उनके बारे में चर्चा करन लगी। मरी ने कहा-"अगोर जैसा हृष्टपुष्ट और मुन्दर युवा मैंने तो अद तर देखा नहीं।" "टन मुख में एक बोन टपाता है।" यह माग्गरेट यो। "म लागों का पीलवा तो उन सम्मुख पीपा पड़ गया है।" ऐनी न यह बात कुछ ऐमे ढग मे वही, मानो वह बो को देय- पर जने अपने से ही असन्तुष्ट हो उठी यो। "पही कारण है कि उसने एक बार हमारी ओर बांस उठाकर देगा तर भी नहीं"-नीलिमा बोली।

१०४ "देखे भी क्यों, जब उसको हमसे कहीं अधिक सुन्दर सुडौल और हृष्टपुष्ट अनीता मिली हुई है। मैंने तो दोनों को सदैव साथ ही देखा । कोई कुछ भी कहे, पर मुझे तो अनीता मदालसा से भी अधिक सुन्दर लगी।"-कुमुदनी जो अब तक सबकी वार्ते सुन रही थी, बोली। "पर मदालसा ने ही यहाँ के महामानवों को पूरी तरह से वशी- भूत कर लिया है। सवकी दृष्टि उसी पर जमी है, कोई इस समय हमारी ओर आ भी रहा है ?" हुदोज निकोवा ने झंझला कर कहा । "उनमें से कोई नही आता तो तुम स्वयं ही उनको क्यों नहीं आमंत्रित कर देती। मैं तो अभी-अभी प्रादेशिक महामानव निर्माता के साथ शारीरिक सम्पर्क करके लौटी हूँ।" महामानवीयों में सबसे सुन्दर मैरी बोल उठी। ऐनी मैरी को वात सुनकर उठी और महामानवों की भीड़ में जाकर मिल गई । मरी को हेसी भा गई, वह बोली "ऐनी भी अपने में एक ही है। जब इसको निशा-निमन्त्रण मिलता है तो उससे भागती है और जब नहीं मिलता तो उसके लिए कामना करती और चिल्लाती है।" अचानक बीच में ही कुमुदनी उसकी बात को काटती हुई वोली "देसो टोनी मदालसा को परस्पर मिलन के लिये ले जा रहा है।" "ठीक ही है, न जाने कितनी बार वह तुम्हें आमंत्रित कर चुका है पर तुमने सदैव उसका तिरस्कार किया। यद्यपि तुमको 'सब सब के लिये, नहीं कोई एक के लिये नियम के अनुसार विवश हो कर और दांग,"मग यापवा प्रस्ताव में बगे याबीपनाह। उसके साथ जाना पड़ा, पर तुम्हागं टने सहमति कभी प्राप्त नहीं हुई"-मारगरेट दोली। "और तुमने स्वय ही टमसे कब सहानुभूति का व्यवहार किया है" ऐनी ने कहा । ऐनी और भी पृट करती पर तभी डानान्ड उनको ओर आता दिखाई पडा। महामानवीयों में एक हलचल सी मच गई। सभी डोनाल्ड के निकट जा खडी हुई । मैरी ने पूछा "कहो डोनाल्ड-आज हम लोगो के पाम आने वा समय तुमको मिल गया । हमने तो समभा या वि पृथ्वी से याये अतिथियो के सवार करने से हो तुमको अवकाश नहीं मिलेगा। क्या तुम हम एक निशा- निमत्रण के योग्य भी नहीं समझते" ? 'सो बात नहीं है मैरी।" डोनाल्ड थोडा हिचक्चाता हुआ बोला। "तो फिर और क्या दात है।" मारगरेट, मैरी, नीलिमा और मैं प्रभो तुमको एक निशा निमन्त्रण देने के लिए तरस रही है।" "मला इसमें डोनाल्ड वो क्या आपत्ति होने लगी" मारगरेट ने होनाल्ड अभी तक चुपचाप खडा था। वह मन ही मन गोष रहा था कि दनयति प्रदेश की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी मरी जोपभी उगयो देखने के लिये भी नेत्र ऊपर को नहीं उठाती थी, बाज वही इस प्रचार उमको यामममर्पण कर रही है । उग माने पर गर्व हुआ मंगल लोक का नियम 'सब सबके लिये नहीं कोई एक के लिये तोड़ने का मेरा साहस कहाँ ?" "पर जानते हो-इसके लिये तुमको हमारा भी एक काम करना पड़ेगा। तुमको उस रक्त वर्ण अर्ध-सभ्य मानव को हमारा निशा निमन्त्रण स्वीकार करवाने में सहायता करनी होगी।" मैरी बोल उठी। डोनाल्ड कुछ घबराया सा बोला, "सो तो ठीक है पर अशोक तो कभी इन बातों को चर्चा ही नहीं करता । वह मंगल लोक के इस रिवाज को अनुचित समझता है। उसका कहना है यह तो खुला व्यभिचार है और इसी के कारण मंगल लोक के महामानव और महामानवीयों का विकास नहीं हो पाता। वह कहता है कि मंगल लोक की यह स्वच्छन्द और अनियंत्रित यौन व्यवस्था एक दिन महामानव सभ्यता को नष्ट करने का कारण बनेगी। मैंने उसे बताया भी कि इस प्रकार बोलना मगल लोक में अपराध है, क्योंकि यहां का नियम है-'व्यक्ति बोला-समाज डोला।' पर उस पर इस बात का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा। हां, टोनी शायद इसमें आपकी सहायता कर सके।' यह कह कर डोनाल्ड ने अपना बोझ टोनी पर डाल दिया और वह उनको पीछे ही छोड़ कुछ आगे बढ़ गया। तभी इस नारी मण्डली को टोनी अकेला आता दिखाई पड़ा । ये सभी महामानवीयां उसकी ओर लपक कर आगे बढ़ी और उसको चारोओर से घेर लिया। मारगरेट टोनी को छेड़ती हुई बोली-'अब तो शायद तुम यह भी भूल गये होंगे कि मंगल लोक में भी नारियां रहती हैं।

१०७ 'ऐसी बातें क्यो करती हो मारगरेट-मला ऐसा कभी हो सकता है ? जिस मगल लोक मे वांझपन सभ्यता का चिन्ह माना जाता है वहाँ की स्त्रियो को कोई भूल सकता है', टोनी बोला। 'यदि ऐमी वात है तो मैं तुम्हे एक सप्ताह के लिए निशा निमन्त्रण देती हूँ। वोलो स्वीकृत है मेरा यह प्रस्ताव ' मारगरेट कुछ मुस्करा पर वोली। 'इसमे इन्वार किसे हो सकता है। 'पर तुमको इस कार्य मे मेरी सहायता करनी होगी। उस अर्ध-वबंर अशोक को मेरा एक निशा निमन्त्रण स्वीकार परवाना होगा।' 'देखो मैं प्रयत्न रहगा' टोनी वोला। अचानक मरी पूछ बैठी-'उस मध-वर्वर मदालसा को कहाँ छोड याये" 'लगता था प्रादेशिक महामानव निर्माता महोदय उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। अत उन्होने मदालसा को देख कर तुरन्त ही निशा निमन्त्रण दे डाला । मैंने मदालसा को मगल गृह का 'सब सववे लिये वाला नियम बताया। वह प्रादेशिक निर्माता वा आदर करती पी। वह उनके मुख से इस प्रकार के प्रस्ताव को मुनकर पहले तो चौरी । मुझे वह एकान्त में ले गई योर कहा-'मैंने तो यहाँ पर केवल तुम्हें और होनाल्ड पो ही समर्पण किया है।'

"फिर क्या हुआ?" मैरी ने पूछा- टोनी बोला कि मैंने जब उसे बताया कि मंगल लोक का नियम है कि 'सब सबके लिये तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कहा- "प्रादेशिक निर्माता जैसे पदाधिकारी भी सामान्य महामानव की तरह निशा-निमन्त्रग क्यों,देते हैं। उन्हें अपने पद की मर्यादा का तो कुछ ध्यान होना चाहिये ।' हुदोज़ निकोवा हँसती हुई बोली, "तब तो मदालसा सचमुच में बड़ी भोली है।" टोनी हसता हुआ वोला, "मैंने उसे बताया कि मंगल लीक में पद केवल कार्यभार सम्भालने और व्यवस्था को बनाये रखने के लिये ही बनाये जाते है । उनके कारण किसी का कम या अधिक सम्मान नहीं होता। वे भी मंगल लोक के अन्य नागरिकों की भांति सामान्य नागरिक हैं। इस पर उसने कहा-"बड़ी विचित्र वात है।" पर वयों कि उसने अब मंगल लोक में ही स्थाई रूप से ही रहने का निश्चय कर लिया है इस लिये बाध्य हो कर वह इस नियम का पालन करने के लिये ही निर्माता महोदय के साथ चली गई।" यह बात कहते हुये टोनी बेहद उदास हो गया था । "और तुम को अकेला थाना पड़ा। चलो तुम्हारा एकाधिकार तो समाप्त हुआ।" नीलिमा कुछ व्यंग करते हुए बोली। । टोनी को उदास देख कर मारगरेट पोली-"पर इसमें उदास होने को क्या बात है ? आज तुमने निर्माता महोदय पर जो

१०६
उपरार क्यिा वे उसे कभी भूल सकेंगे और फिर सोमवटी तो
तुम्हारी सेवा में उपस्थित है। यह क्यो मूल जात हा कि सोमवटी
साने चिन्ता उदासी भागे, सानो एक सामरटी।" यह कह कर
उसने स्वय अपनी जेब से एक गोली निकाल कर मुत्र मे डाली।
टोनी ने भी उमका अनुवरण किया। फिर तो नीलिमा दुमुदनी
और मैरी ने भी एक एक सामवटी बाई । सव म एक नया उत्साह
और जोश आ गया। एक विचित्र सम्पन उनके शरीर म पैदा हो
गई। मारगरट टोनी के साथ साथ परस्पर-मिलन के लिय
चलो गई। नीलिमा प्रादशिक ऋतु नियत्रा को लर सहनुप
करने चली गई। कुमुदनी और मेरी भी महामानवा रे ममूह म
पुन पडी।
जोन में
दे जाते ही अनीता अशोर वे निपट आई और उसरे सर
को अपन कोमल वरा से स्पर्श करती हुई बोलो 'क्या बहुत
पर गये हा
'नही तो।'
'फिर क्या बात है।
'मगल नोर के इतिहास को पड पर यहां की रचना का नक्शा
मेरे मस्तिष्क में लगभग पूर्ण रूप से स्पष्ट हो गया है। यही नहीं
हिमलर ने अपन भाषण में जो उसने पृथ्वी को सोते समय
₹

साथी वैज्ञानिकों के बीच में दिया था, पूर्ण रूप से एक नवीन विचार प्रस्तुत किया था। सम्पूर्ण महामानव सभ्यता उसी विचार को विकसित करके खड़ी की गई है। अभी तक भी मैं अपने विचारों को यान्त्रिक मंगल लोक के वातावरण के सदर्भ में संतुलित नहीं कर पाया हूँ।' 'पर इसमें परेशान होने की क्या बात है ? ज्यों-ज्यों यहाँ को परिस्थितियां स्पष्ट होती जायगी, यन्त्र कौशल और विज्ञान का परस्पर पात प्रतिघात उभरता आयेगा और तव स्वतः हो एक मार्ग निकलवायेगा। 'नही अनीता इस प्रकार अनागत पर छोड़ने से काम नहीं चलेगा । चन्द्रलोक में जिस मिसन को लेकर हम जा रहे थे हमें अब उसको यहीं पर पूरा करना है।' 'पर न केवल चन्द्रमा और मंगल के वातावरण में ही विशात अन्तर है वरन् यहाँ को महामानव सभ्यता जैसी पतित सभ्यता तो मैंने आज तक न देखी और न सुनी है।' 'इसीलिए इस सभ्यता के अवगुणों को प्रकाश में लाने के लिए इस पर किस ओर से प्रहार किया जाय, यही मैं सोच रहा हूँ।' 'पर मुझे तो यहाँ रहना बड़ा खलता है। जिस और भी हम जाते हैं, जहां पर भी हम बैठते हैं, वहां हमको बयर भू-सोक का अर्घ-सभ्य मानव कह कर पुकारा जाता है । मानवता और सत्य का क्या इससे अधिक अपमान और नहीं हो सकता है।' 'उत्तेजित न हो अनीता, हमें सबसे पहले इसी भ्रम को दूर करना है कि भूलोक वदर नहीं, यह मंगल लोक से अधिक सम्य है।'

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११४ 'वह क्या ?' 'यहीं कि महामानवों में जैविक-प्रक्रिया के प्रति एक कौतूहल जन्य जाप्रति हो रही है। निश्चय ही यह महामानवों को उनकी वास्तविक दशा समझने में सहायता देगी।' 'तो फिर क्या निश्चय किया?" 'हमें अभी और प्रतीक्षा करनी होगी । पर मुझे लगता है कि अन्तर-दर्शन अवश्य होगा। इतना तो निश्चय है कि जिस क्रान्ति के लिये हम निकले है वह यहां पर भी होकर रहेगी । इसके लिये अभी तो हमें महामानवों के विचार परिवर्तन का प्रयास करना चाहिये क्योंकि इससे उनका हृदय परिवर्तन हो सकता है और जव विचार और हृदय परिवर्तन की प्रक्रिया आरम्भ हो जायगी तो यह निश्चय है कि परिस्थिति में परिवर्तन होकर रहेगा।' अनीता अशोक की बात सुन कर चुप हो गई । अशोक भी मौन हो गया । अनीता अशोक से कुछ कहना चाहती थी पर कहते नहीं बनता था । किसी प्रकार साहम एकत्र कर वह मौन को भंग करती हुई बोली-'एक दात कहूँ ।' 'अवश्य। 1 'तुम्हारे स्नेह, करुणा और वात्सल्य ने मेरे जीवन की धारा को पूर्ण रूप से मोड दिया है । कुछ नया सा मेरे मन में उभरता जा रहा है । मैं तुमसे उस सबको प्रकट करना चाहती हूँ। पर मुझे उस के लिये शब्द नहीं मिलते। कभी कभी जब कुछ कहने का बहुत प्रयत्न करती हूँ तो लगता है जमे शब्द मुभमे उच्चारण माग रहे हो।' 'अनीता मैं तुम्हारी भावना को समझता हूँ। पर उसके लिये चिन्ता क्या । जा कुछ हो रहा है यदि वह प्राकृतिक है ता अवश्य मगलवारी है । यह निश्चय है कि हम दोनों साथ साथ आगे बढ़ेंगे। आज को सामाजिव शक्तियो क सेल और सघर्ष म न दोनो सहायक दन कर भविष्य का निमाण करेंगे। जर्जर मान्यताओ का विनाश करेंगे। फिर यवसाद क्यो।' और यह यह पर अशोर ने अनीता के हाथों को अपने हाथो में ले लिया। और उम स्पर्श म जो शक्ति थी उसने उच्चारण के अधूरेपन को टक दिया। उस मौन समर्पण में उन्ह देवल यही सर्व- दना हुई कि उनसे अलग-अलग 'मैं और तुम' का अस्ति व इम समर्पण के पश्चात् 'हम' में परिवर्तित हो गया है । वेवल एक व्यापक वृतज्ञता अनीता के मन में भर गई। अशोक को लगा कि एसवार होकर भी न उसने अनीता वांधा है और न अनीता ने उमरे लिये कोई बन्धन खडा किया है। [ १६ ] प्रादेशिक महामानव निर्माता को मदालसा से एक विलकुल नये तथ्य का पता चला और उमरा उन्हें स्वय अनुभव भी हुया । वातों यातो मे जब मदालमा ने उनमे उनी माता के बारे में पूछा तो महामानव निर्माता ने कहा था- 'जन्म देने वाली माता मे उसका तात्पर्य टम वोनल से तो नहीं है जिसमे से महामानय शिशु को उत्पन्न करवाया जाता है।'

११६ इस बात को सुन कर मदालसा बड़े जोर से हंसी थी। उसने कहा था--'भला यह भी कभी सम्भव हुआ है । यह तो केवल वैज्ञानिक विचारकों को कोरी कल्पना है । यह माना कि 'मगल लोक के इतिहास में यह दात कही गयी है पर वह तो केवल पुस्तक का तथ्य है । व्यावहारिक जगत में यह कभी सम्भव नही हो सकता।' महामानव निर्माता बड़ी कठिनाई से उसको इस तथ्य पर विश्वास दिता पाये थे। उन्होंने उसको शिशु उत्पादन मिल दिखाने का वचन दिया ताकि वहाँ पर जाकर वह अपनी आँसो से बोतलों से महामानव शिशुओ को पैदा होता देख सके। मदालसा ने अपने बारे में जो बातें कही थी, उनसे महामानव निर्माता को बड़ा आश्चर्य हुआ । उसने बताया था कि वह तो ठीक अपनी जैसी ही आकृति की नारी के गर्भाशय से उत्पन्न हुई है। नौ माह तक वह उस नारी के हो दारीर में रही। निर्माता महोदय ने ये वातें शिशु- उत्पादन विधि के पाठ्यक्रम का सध्ययन करते समय पड़ी तो अवश्य थीं, पर जीवित नारी के शरीर से उत्पन्न प्रथम नारी के दर्शन उनको मदालसा के रूप में ही हुए थे । उसी से उनको गह भी पता चला था कि अनीता और अशोक भी अपनी माताओं के गर्भाशय से ही उत्पन्न हुए हैं । निर्माता महोदय को मदालसा के साथ 'परस्पर मिलन' के बाद पहली बार इस बात को अनुभूति हुई कि नारी से उत्पन्न मनुष्य के क्या अर्थ होते हैं। मवं प्रथम उसो दिन उनको अपने बोतल से उत्पन्न होने की बात से चोट पहुंची और उसी दिन नारी शरीर से उत्पन्न और रसायनिक-मोतिक विधि से कारखानों में बोतलों से - पंदा हुये मानव के बीच मौलिक भेद का अन्तर स्पष्ट हुआ। वे अब तर यही समझते आये थे कि नारी जनन का उपयोग मगल लोक मे वेवल इसीलिये बन्द कर दिया गया है, क्योकि वोतल वाली भौतिक- रसायनिक प्रक्रिया से उत्पन्न मानवो को तुलना में इससे बहुत घटिया नतीजे प्राप्त होते थे। पर भू-लोक के इन प्राणियो को देख कर वे इस वैज्ञानिक तथ्य की सचाई के बारे मे भी शकाशील हो उठे। मदालसा ने देखा कि महामानव निर्माता उसकी बातो को सुन कर किसी गहरे सोच में पड़ गए हैं । इसलिये उसने उनको अकेला छोड दिया। वह बाहर आई तो देखा अनेक महामानवियां उसकी ओर ही चली आ रही हैं, क्योकि उन सभी को टोनी से यह पता चल गया था कि मदालसा पुरुष और नारी के परस्पर मिलन से पैदा हुई है। उनके लिए यह बात बिलकुल नई थी और वे इस बारे म सारी बातें जानना चाहती थी। उन्होन चारो पार से मदालसा को घेर लिया और उससे तरह-तरह के प्रश्न पूछने शुरू कर दिये। जब मदालसा ने शिशु जनने से पूर्व होने वाली पीडा या वगन किया तो उसको सुन कर वे पाप उठी। पहले तो उनकी समझ म यह यात ही नहीं आई कि प्रसव पीडा होती क्या है। पर जव मदालसा ने नारी के पारीर वा शिशु जनन के समय का पूरा चित्र रचा तो ये इसका कुछ अनुमान लगा सकी। इस चर्चा में भाग लेते हुये मैरी ने कहा-'नो माह मे तो गर्भ लगभग उतना ही बढ जाता होगा, जितना बोतलो से निरालते ममय महामानव शिशु होता है ।' मदालसा दो पुन यह वात कुछ विचित्र-सौ लगो। यह वोलो- 'जर तर बोतल से निकलते हुये शिशुको मैं स्वय न देखा, तब तक ११८ यह सब कैसे बता सकती हूँ। पर नारी द्वारा उत्पन्न स्वस्थ शिशु का भार लगभग चार सेर और लम्वाई पौन पुट होती है ।' 'चार सेर वोझ से तुम्हारा क्या तात्पर्य है ?'-ऐनी बोल उठी। 'चार किलोग्राम मदालसा ने यह सोच कर पृथ्वी की अन्तर्राष्ट्रीय इकाई में उत्तर दिया कि सम्भवतः महामानवियाँ इससे कुछ अनुमान लगा सकें। सव महामानवियाँ चौक पड़ी, 'चार किलोग्राम यानी वोतल शिशु से भी दो किलोग्राम अधिक ।' 'तो इसमें नारी को पीड़ा क्यों होती है ?'-मारगरेट बोली। "यह भी भला कोई पूछने की बात है।" मदालसा नारी जनित- लज्जा से एक वार को तो सकुचा-सी गई, किन्तु फिर उसे याद आया कि मंगल लोक को मान्यतायें तो दूसरी ही हैं, इसलिये वह अपने को सम्भालती हुई वोली—'जव चार किलोग्राम भार का शिशु योनि से निकल कर शरीर से बाहर आता है तो उसके दबाव से त्वचा धीरे-धीरे फटने लगती है। त्वचा के इस फटने से ही नारी को तीव्र वेदना होती है और इसी को भू-लोक में प्रसव पीड़ा कहते हैं।' सभी महामानव और महामानवीयाँ चौंक से पड़े । 'योनि द्वार से चार किलोग्राम के शिशु का निकलना--ओह कितना अमहामानुपिक है। कितना कष्ट होता होगा नारी को । वास्तव में यह वर्वर भू-लोक की असभ्य नारिया ही सहन कर सकती हैं।' मेरो जैसे प्रसव वेदना को स्मरण करके ही सिहर उठी हो ।

'इसलिय तो मगल लोक मे वाभपन का सभ्यता माना गया है न गर्भाशय होगा, न महामानवी का यह पीडा सहन करनी हागी।' हुडोज निकोवा बोल उठी ।। मदालसा को यह वात और भी अजीब लगी। उसने पूछा- 'क्या महामानवियो के शरीर में गर्भाशय सचमुच मे नही हाता?' इस बात पर सभी महामानवियो वो हंसी आ गई और उनको वैचारी मदालसा के अज्ञान पर तरस आ गया। पर तभी बहुत जोर से भोंपू जैसी यावाज हुई। मदालसा को पूछने पर पता चला कि यह भोंपू सभी प्रकार के मनोविनोदो को बन्द होने का सूचक है। तभी मदालसा ने देखा कि सहभोज का कार्यक्रम समाप्त हो गया और उसके चारो और इक्ट्ठी महामानवियां सोमवटी साकर जैविक प्रक्रिया से उत्पन्न नर-नारी की रगीन कल्पनाओ में यो-सी गयौं । उपर एक कोने में एक विचित्र प्रकार का संगीत सारे भवन मे गूंज उठा। स्वर और तालो से बधा सगीत यान्त्रिक सगीतन यन्त्र से निपल शन दान मभी पर एक अद्भुत सम्मोह्नमा दालन लगा। [ २० ] प्रात काल अशोक ने अपने को पर्याप्त हवा पाया। आज जोन, टोनी और डोनाल्ड ने यथासमय उनके कमरे में प्रवेश रिया। टोनी आने ही मनोना में बोला-'कल रात्रि के सहभोज म प्रादेशिप महामानव निर्माता आपमे मिरने के लिए बडे आतुर थे । थाप दोनो भोज के बीच में से ही चो आये। इस पर उन्ह पर्याप्न मेद था। उनका कहना था रि सम्भवत आप यहाँ पुछ निगना-मा । अनुभव कर रहे हैं। मंगल लोक के महामानवों और आपके बीच में उन्हें जैसे कोई व्यवधान दिखाई पड़ा। इसीलिए उन्होंने आज आपको महामानव शिशु उत्पादन मिल देखने के लिये आमन्त्रित किया है । वे स्वयं आपको मिल दिखाने के लिये आवेंगे। हम लोगों को भी आपके साथ आने का निमन्त्रण मिला है।' मदालसा कुछ झंपती हुई अशोक से बोली-'यह निमन्त्रण मुझे महामानव निर्माता महोदय ने स्वयं दिया था, तुमको इस बारे मैं मैं बताना भूल गई थी। अशोक और अनीता को सहभोज की सभी बातें जोन से मालूम हो गई थी। इसलिए अशोक ने मदालसा की बात का कोई जवाब नहीं दिया। पर उसने टोनी से कहा-'हम लोग अभी तैयार हुए जाते हैं।' हम लोग इस अद्भुत कारखाने को देखने के लिये बड़े इच्छुक थे, इसलिए हम बहुत जल्दी तैयार हो गये। भवन की सबसे ऊपर की छत पर गगन गाडियां तैयार थीं। लिफ्ट द्वारा छत पर आकर सभी गगन गाड़ियों में बैठ गये । यान्त्रिक चालक सक्रिय हो उठे। घर-घर करती हुई गगन गाड़ियां ऊपर उठी । असोक ने नीचे देखा तो उसे लगा जैसे वह इन्द्र की अमरावती के ऊपर उड़ रहा हो । सभी एक जैसे भवन इतनी ऊंचाई से छोटे-छोटे चौकोर कमरों के से लगते थे, पर उनका साम्य जैसे रह-रह कर अशोक को मंगल लोक के यान्त्रिक कौशल का स्मरण दिला रहा था। अचानक कुछ दूर जाने पर वसावट समाप्त हो गई और कुछ दूरी पर एक बड़ी पारदर्शक इमारत नजर आने लगी। आस-पास चारों ओर रेत का ढेर दिखाई देता था, उसमें न जंगल थे योर न खेत थे। यशोक को उस रेगि- . स्तानी प्रदेश में बना यह पारदर्शी भवन ऐसा लगा जैसे कोई पिशाच खडा हो । उस विशाल भवन से निकला भयानक प्रकाश ऐसा लग रहा था जैसे कोई क्रूर राक्षस अपने सहस्रो नेत्रो से उन्ही को देख रहा हो। गाडियाँ भवन की छत पर आकर रुकी तो अशोक के विचारो का सिलसिला टूटा। उसने नीचे देखा और अनीता के साथ चुप- चाप चलने लगा। लिफ्ट पर बैठकर सभी दसवी मन्जिल पर उतर गये । सामने गैलरी को पार करते हुये वे एर हाल के द्वार पर जा पहुंचे। वहाँ पर प्रादेशिक महामानव निर्माता इनस कुछ क्षण पूर्व ही मा गये थे और मिल मैनेजर से बातें कर रहे थे। पारस्परिर औप- चारिय परिचय के बाद निर्माता महोदय बाने-'मिल अत्यधिक वडा है । उमका देखने के लिए पर्याप्त समय लग जायगा । इसलिये हम सीधे ही मिल देसन के तिय चल रह है।' यह वह कर ये उसी गैलरी में चलने लगे। शेष अन्य व्यक्तियों ने भी उनका अनुसरण किया। गैलरी के दूसरे सिरे पर एक वृहत द्वार था, जिस पर किसी व्यक्ति का एक चित्र लगा हुआ था। निर्माता महोदय चित्र को ओर सक्त करते हुये बोले-'यही मगल- सोर की महामानव सभ्यता के सत्यापन और आदि प्रधान महा- मानव निर्माता श्री हिमलर हैं।' इसके पश्चात उन्होन दीवार के पास लगे एक बटन को वा दिया । दार स्वन ही सुल गया । द्वार को पार कर जिस कमरे में हमने प्रवेश किया वह बहुत बड़ा था। पारदर्शव होते हुए हम किसी भिन्न सामग्री से बना हुआ लगा। सम्पूर्ण १२२ । . वातावरण कुछ विचित्र सा, कुछ निराला सा लग रहा था। इसमें कांच की बडी-बड़ी मेजें अनेक समानान्तर कतारो मे लगी हुई थी। सभी सेजों पर दो दो अणुवीक्षण यन्त्र रखे हुए थे। इन यन्त्रों के नीचे हवा बद परख नलियां परीक्षा के लिये रक्खी हुई थीं। लगभग १०० प्रयोग कर्मी इनकी परीक्षा में लगे थे। ये श्वेत वस्त्र धारी कर्मी हाथों में विशेष प्लास्टिक के पोले दस्ताने पहने हुए थे। नीचे से ऊपर तक इनके शरीर का प्रत्येक अवयव वस्त्र से ढका हुआ था। श्वेत वस्त्र , हाथों में पीले दास्ताने, पैरों में पीले जूते, घुटनों से नीचे तक एक लम्बा वस्त्र इन सभी चीजों ने पीतवर्ण कमियों को वास्तव में भूत जैसा आकार दे दिया था। कमरे में सड़े ये महामानव मृत व्यक्ति जैसे लग रहे थे, जिनको किसी सम्मोहन यंत्र द्वारा खड़ा करके यांत्रिकों की भांति काम लिया जा रहा हो। कमरे की दीवारों के कण कण से एक विचित्र प्रकार का स्निग्ध, उज्ज्वल किन्तु तीव्र श्वेत प्रकाश निकल रहा था जिसने सम्पूर्ण भवन को इवेतित कर दिया था । एक विचित्र प्रकार की नीरवता भवन मे छाई हुई थी। हमें लगा जैसे हम किसी भूत-गृह में पहुँच गये हों। उसी समय प्रादेशिक महामानव निर्माता ने हमको सम्बोधित हुए कहा, 'इस समय हम लोग शिशु उत्पादन मिल के वर्गीकरण विभाग में खड़े हैं। यहां पर हवा बन्द परख-नलियों में रखे हुए शुक्राणुओं को छोटा जाता है और उनको नष्ट करके शेष को गर्भाधान केन्द्र में भेज दिया जाता है। इस प्रकार एक हजार परख नलियों में भरे हुए यरवों और खरबों गुणुओं की परीक्षा प्रति दिन की जाती है। करते १२३ अशोक ने प्रादेशिक महामानव निर्माता की ओर विस्मय भरी दृष्टि से देखते हुए पूछा, 'इतनी अधिक संख्या में गुजारणुओ को प्राप्त करने का आपका कौन सा लोत है।' प्रादेशिक महामानव निर्माता मुस्कराये और बोले "विस्मित होने जैसी इसमे कोई बात नहीं है । इन शुक्राणुओ को म भौतिक रमायनिक विधि द्वारा कारसानो में उसी प्रकार तैयार करते हैं जैसे कि तुम्हारे यहां कॉस्टिक सोडा या दूसरे रसायनिक तैयार किये जाते । यद्यपि मानव शरीर से बाहर ही इनवा निर्माण होता है पर ये ठोक उतने ही सक्रिय होते हैं जितने कि मानव के अण्डोप मे पाये जाने वाले शुक्राणु ।' इतना कह कर वे हमको एक मेज के समीप ले गय। उस पर कार्य करने वाले प्रयोगर्मी स्वत ही एक ओर हट गय। तीन अणुवीक्षक यन्यो मे हमको निरीक्षण करने का आदेश देवर एप निरीक्षण यन्त्र में वे स्वय देखते हुए बोले, 'परस-नली म ये जो लम्बी लम्बी दुमो को घुमाते हुए पुडीदार शिर वाले जीव हैं यही व सुशणु हैं जो मानव वा वीज कहलाते हैं।' अशोर ने देखा लम्बी लम्बी दुमो को घुमाने हुए गुभाणु परख. नली में एक दूसरे से टपरा रहे थे । लम्बी दुम और घुडीदार सिर, बस यही उनका दारीर था । किसी श्वेत चिक्न पदार्य मे चे रसे हुए थे। इमके बाद हम दूसरे कमरे में आये। यह भी पहले कमरे जितना हो वहा था और उसी प्रकार के उपकरणो से या। अन्तर देवल यही था कि यहाँ पर पीतवर्ण के १२४ पीतवस्त्रों को पहने कांच की बड़ी बड़ी बोतलों को भारी भारी अणुवीक्षण यन्त्रों से देख रहे थे। प्रादेशिक महामानव निर्माता ने कहा यह गर्भाधान केन्द्र है। इन बडी बड़ी कांच की बोतलों को डिम्बोपक कहते हैं । इन डिम्वोपकों में ही नारी अंडे और शुक्राणु का संयोग करवाया जाता है और इसी में नवीन भ्रूण की उत्पत्ति होती है। प्रत्येक परीक्षण मेज पर चार प्रयोगकर्मी चार विभिन्न बोतलों के साथ काम कर रहे थे। इन चारों बोतलों को हम क्रमानुसार अणुवीक्षक से देखने लगे। पहली बोतल के निकट एक शुक्राणु एक नारी अण्डे को झिल्ली पर आक्रमण कर रहा था। दूसरी बोतल मे शुक्राणु नारी अंडे की झिल्ली को फाड़ कर उसके अन्दर स्थित श्वेत पदार्थ में प्रवेश पा चुका था। तीमरी बोतल में शुक्राणु को धुंदी और दुम एक दूसरे से अलग हो गई थी और धुंडी नारी अण्डे के केन्द्र को खोजती हुई आगे बढ रही थी और चौथी बोतल में शुक्राणु को घुडी और नारी अपडे के केन्द्र का संयोग हो गया था। बोतलों से बच्चों को पैदा होने की सभी प्रक्रियाओं में मदालसा सबसे अधिक रचि ले रही थी। उसने निर्माता महोदय से पूछा, 'इतनी बड़ी संख्या में नारी अण्डों को किस प्रकार उपलब्ध किया जाता है ?' 'आइये, आपको यह तीसरे विभाग में चल कर ज्ञात होगा।' प्रादेशिक निर्माता के साथ जिस कमरे में इस बार हमने प्रवेश १२१ किया वह अब तक के कमरों में सबसे वहा था। एक ओर से भारी यन्त्र के चरने जैसी ध्वनि आ रही यो । निकट खडे एक प्रयोगकर्ता ने निर्माता महोदय का सक्त पावर दीवार में लगा एवं बटन दवा दिया और तत्काल ही टोस दीवार में एक द्वार निकल आया । द्वार में होकर हमने जिम कमरे में प्रवेश क्यिा वह अन्य कमरोपी अपेक्षा अधिक गर्म या। चारो ओर बडे बडे पारदर्शक प्लास्टिक पात्र रमे थे । सभी मे माम जैन लोयडे भरे हुये थे। उनका और मवेत करते हुए निर्माता महादय ने कहा- 'इन्ही पानो से हम नारी अपडे मिले हैं। इन पाना में मरनेपिन गर्भाशय रमे हुए हैं जिनम निश्चित समय में नार्ग टाण्डो को निश्चित मात्रा मिल जाती है।' 'ता पा यह बात सचमुच ममही है रि महामानवियों के गर्भाशय नहीं होते।' मदालसा का जैसे कल महामानविया की बताई हुई वान याद या गई हो। 'हो मगल लाक म स्त्री और पुरुष सब अपार से ममान है। लिंग के कारण जो एव पर्दा भू-सोर मे नर नारी को अलग विप रहता है वह यहाँ पर पूरी तरह से मिटा दिया गया है।' 'लेकिन वह तो इस निना भी दूर पिया जा सकता है।' अनीताने दृढ स्वर में कहा । 'यह आपका वैवल भ्रम है ।' निर्माता महोदय प्रतिवाद करते हुए मी बढे मृदु स्वर में बोले, 'मगल लोक ये निर्माताओं ने शुरू में ही इस वात यो अनुभव कर लिया था कि जब तर नारी में गर्माधय रहेगा, तव तर उमे किसी न किसी रूप में पुरष पर आश्रित होता परेगा।

१२८ परिचय हुआ या उनमें से कुछ यहां भी मौजूद थीं। हमने सोचा कि सम्भवतः यह इसी मिल में काम करती हैं और हमारा अनुमान सही निकाला । हमको देखते ही वे सभी उठ कर हमारे पास आ गई। ये सभी महामानवियां अनीता से अत्यधिक ईर्षा कर रही थीं और उसका कारण अशोक के प्रति उसका स्नेह था। वे सभी यह समझने लगी थी कि यदि अनीता न होती तो अशोक उनके प्रति उतनी उदासीनता न दिखाता जितना वह आज प्रकट कर रहा था। इसलिये मैरी ने कहा, 'अनीता, क्या तुम्हे पता नहीं कि मंगल लोक मे 'सब सब के लिए, नहीं कोई एक के लिए, नियम लागू है । मानी वह अनीता को मगल लोक के नियम भंग करने का अपराधी बता रही हो। अनीता ने कहा, यह बात 'मेरी समझ में नहीं आयी।' मदालसा बीच मे ही बोल उठी, 'मैरी कहना चाहती है कि तुम केवल अशोक जी के ही इतने निकट क्यों रहती हो ।' 'यह तो मेरा अपना व्यक्तिगत सवाल है ।' अनीता का मदालसा को इस प्रकार बोलना कुछ ठीक नहीं लगा। 'लेकिन व्यक्ति द्वारा सामाजिक नियमों की अवहेलना करना अपराध है । क्योकि मगल लोक में यह माना जाता है कि व्यक्ति का उसी में भला है जिसमें समाज का भला है । इसलिए हमारे समाज का नियम है कि 'व्यक्ति दोला, समाज डोला।' हुदोज निकोवा ने बीस हजार बार पढे निद्रा पाठ को अनजाने में हो दोहराते हुए कहा । 'तो, क्या तुम्हारे यहाँ मातृत्व और व्यक्तिगत प्रेम के लिए कोई स्थान नहीं है।' अनीता कुछ उत्तेजित होकर बोली ।

मारगरेट हंसती हुई बोली, 'हम वामपन को सम्यता मानते हैं।' तभी नीलिमा ने कहा, 'प्रेम' शब्द क्या बला है। हमने तो इसका नाम आज पहली ही बार सुना है।' अशोक और अनीता दोनो एक दूसरे की ओर याश्चयं से देखने लगे । अनीता अपनी बात को समझाती हुई वोली, "तो क्या तुमको इस बात को भी अनुभूति नहीं कि नर और नारी का जीवन सा. गीण दृष्टि से तभी पूर्ण होता है जब उनके मन और शरीर एक हो जाते हैं और जब उनकी गोद मे नवजात शिशु 'हुआ हुआ' करके आता है।" ऐनी, मैरी, नीलिमा और मारगरेट को कुछ समझ मे नही आया वि अनीता क्या कह गई। टोनी मानो हमे और महामानवीयो को समभाता हुआ बोला, वर्वर । भूलोक के सामाजिक नियमो में मगल लोर के नियमों से गस्तव में पृथ्वी और मगल ग्रह जितना ही महान अन्तर है । अशोर अब तर चुप था पर टोनी की बातो ने जैसे उसे बुध बहने का अवसर दे दिया हो-इम लहजे में वह बोला, 'सचमुच मे हमारे और आप रीति रिवाजा में बहा अन्तर है। हम लोगो को अवेलापन पमद है, पर मगल में अवेता रहना कानूनी अपराध है । हम अपनी उदामी को भगाने लिए पुम्नः पढ़ते हैं या गाते हैं पर आपके यहां सोमवटी साकर ही उदामी दूर पर दी जाती है।' अशोक अभी आगे और कुछ कहना कि तभी नलिनी बोल उटी, 'पर जो बुध आपने कहा वह तो बिन्दुन असन्यता और बबरता को निशानी .

है । आप भी अजीव लोग हैं जो न निशा-निमंत्रण को समझते हैं और न इस बात को समझते हैं कि जब हर व्यक्ति समाज के लिए काम करता है तो समाज का काम आगे बढ़ता है'-- नलिनी ने तीस हजार बार पढ़े निद्रा पाठ को दुहराया। अशोक और अनीता का मन इस बातचीत से ऊब उठा था और वे इस प्रसंग को यही समाप्त करना चाहते थे कि इतने ही में महा- मानव निर्माता ने मनोविज्ञान गृह में प्रवेश किया और हम लोग उनके साथ उटकर शिशु उत्पादन मिल के शेप भाग को देखने के लिये चल दिये। रास्ते में चलते-चलते वह बोले, 'आपने अभी तीसरे कमरे में शुवाणुओं और रजकणो का मिलन देखा था। अब मैं आपको पूर्व भाग्य रचियता के पास ले चल रहा हूँ जो महामानव शिशुओ के होने से पूर्व ही उनका भाग्य रच देते है। और यहीं से बोतलों के भ्रूण को उसके वर्ग के अनुरूप बनाने के लिए यावश्यक आदेश दिये जाते हैं।' अशोक ने कहा, 'हमने अपने पुराणों में तो इस प्रकार की कथायें अवश्य पढ़ी हैं कि मनुष्य के पंदा होने से पूर्व ही ब्रह्मा उनका भाग्य रच देता है, पर उसे हम अब तक कोरी कल्पना ही समझते थे । पर आपने तो उस कल्पना कोही साकार कर दिया है।' महामानव निर्माता यह नहीं जान पाये कि अशोक ने यह व्यंग किया है, अथवा अपनी अनुभूति को दाग्दों द्वारा व्यक्त किया है । अशोक ने भी उनको यह जानने का कोई अवसर नहीं दिया क्योकि वह अपनी बात को आगे बढ़ाता हुआ बोला, 'आपसे अनेक बार क वर्गीय महामानव का नाम सुन चुका हूँ, पर अभी तक समझ में नहीं आया कि यह क्या चीज है ? क्या सचमुच मे महा- मानव समाज भी वर्गों में बंटा हुआ है। महामानव निर्माता बोले, 'इस बात को विस्तार से समभाने के लिए यह उपयुक्त अवसर नहीं है फिर भी आप इतना जान लें कि मगल लोक म महामानवो के काम के विभाजन को याजना वैज्ञानिक ढग से बनाई गई है। मगल लोक म जिस काम के लिए जितन महामानवो की जरूरत पड़ती है उसी के लिए उतन महामानव शिशु उत्पादन मिलो मे बना लिये जाते हैं । अब तक महामानवो ये तीन वर्ग और उनके अनक उपवग ही मगल लाद वे सभी कामो को करने के लिए काफी हुए हैं । भविष्य मे जब कभी नये मो के लिए नये वर्गों की जरूरत होगी तो उनका भी निर्माण किया जा सकता है।' अशोर ने जिनामा भाव से पूछा, 'इन तीन वर्गों और उपवर्गों के महामानवो मे क्या कोई विशेष अन्तर होता है ?' "जहाँ तर सामान्य साधन और सुविधाओं का प्रश्न है, वहां तर मगल लोक मे भी महामानवो मे कोई भेदभाव नहीं है । पर आप तो जानते हैं कि मगरा लोर के महामानव समाज का नीव ही धाम पर रखो गयो है । इमलिये काम के अनुसार वर्ग और उपवर्ग बना लिये गय है । अब तक हमारा वाम येवल १०८ उपवर्ग से ही १३२ और वह चल रहा है । अव प्रत्येक उपवर्ग के महामानव केवल एक ही तरह का काम कर सकते हैं। पर वह अपने काम को पूरी तरह से समभते हैं। अशोक को निर्माता महोदय की बात सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ सोचने लगा कि इस प्रकार एकांगी विकास पर टिका महामानव समाज कितने दिनों तक चल सकेगा। तभी एक बहुत बड़ा भवन आगया जिसमें हम सब लोगों ने प्रवेश किया। निर्माता महोदय ने बताया कि यह बोतल भवन कहलाता है। हमने देखा ऊपर से एक सीढ़ीदार ढांचा जिसमें नोकीले दातों पर जंजीरें चढी थीं, तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है। इस ढाँचे का तला किसी बहुत ही चमकती हल्की धातु से मढ़ा था और उसके ऊपर शिकंजों मे कसी प्लास्टिक बोतलों का एक जलूस सा नीचे आ रहा था । यह बोतलें बिना पैदे की थीं । नीचे आकर हर बोतल कुछ क्षण के लिए रुकती थी और इस बीच मे ही एक भूगत सिलिंडर का पट खुलता था। उसमें से एक पंदी निकलती थी जिसमें संश्लेषित गर्भाशय लगा होता था। वह पैदी अपने आप बोतल में फिट हो जाती थी और इसके बाद बोतल अपने आप आगे बढ जाती थी। हमको बराबर यही क्रम दिखाई पड़ा। हम इस स्वतः चालित जंजीरों के बीच में कसे शिकंजों के बीच में फमो बोतलों के साथ-साथ आगे बढ़ने लगे। कुछ दूर जाकर यह घोतलों का जलूस मूमिगत हो गया था और हम एक दूसरे कमरे के द्वार पर खड़े थे । महामानव निर्माता ने बताया कि यहीं पूर्व भाग्य रचियता रहते हैं। ।

१३३ , पूर्व भाग्य रचियता श्री अविनाश हमको देखकर उठे और हमारे पास आये । महामानव निर्माता ने हमारा उनसे औपचारिक परिचय कराया यद्यपि इससे पूर्व हम लोग सहभोज मे मिल चुके थे। श्री अविनाश हमको समभाते हुए बोले, 'महामानवो के पैदा होने से पूर्व ही हम उनके भाग्यो को रच देते हैं । प्रधान महामानव निर्माता के आदेशानुसार मैं यह निश्चय करता हूँ कि कौन सी बोतल के भ्रूण को शिशु रूप धारण करके कौन से वर्ग का महामानव बनना है । यदि उसे स वर्गीय महामानव बनाना है तो मैं उसी वर्ग के गुण धर्मों के अनुसार उसके भाग्य को रच देता हूँ और उसके लिये आवश्यक आदेश भी जारी कर देता हूँ।' थोडा रुक पर वे फिर बोले, यह तो शायद आप जानते ही होगे कि स वर्गीय महामानव स्वतत्र रूप से विशेष उत्तरदायित्वो को भालने योग्य होते हैं।' अशोक को महामानव समाज के वर्गों को समझने का यही उपयुक्त अवसर लगा। इसलिए वह बोला, 'कृपया हमे विस्तार से यह यताइये किस वर्गीय महामानव से आपका क्या तापर्य है ? तथा महामानवी में और कौन कौन से वगं हैं।" 'मगल लोक मे महामानवो वे बामो के अनुसार स (सत्य), र (रज) और त (तमो) वर्गों में बांटा गया है । प्रत्येक वर्ग को आगे उत्तम, मध्यम और अधम उपवर्गों में बांटा गया है।' अविनाश को इस बात से योहा आश्चर्य हुआ फिर भी दह उसे व्यक्त न करते हुये बोला, 'उत्तम उपवर्ग के स वर्गीय महामानव के शरीर और मस्तिष्क को इस प्रकार रखा जाता है कि वह शारीरिक और बौद्धिक दोनों प्रकार के काम अत्यधिक निपुणता के साथ कर सके । र वर्गीय महामानवों को केवल शरीर श्रम के लिए तैयार किया जाता है पर आवश्यकता पड़ने पर वे मध्यम श्रेणी के बौद्धिक कार्य भी कर सकें और इसका प्रबन्ध उनको निर्माण करते समय कर दिया जाता है। त वर्गीय महामानव केवल शरीर श्वम के लिये ही बनाये जाते हैं और अधम उपवर्ग के त वर्गीय महामानव पीर, ववर्ची, भिस्ती, खर श्रेणी के सभी कामों को कर सकते हैं । वनस्पति प्रदेश के लिये केवल यही एक शिशु उत्पादन मिल हैं और यहां पर जिस काम के लिए जितने महामानवों को आवश्यकता पडती है उन सब के भाग्य मैं रचता हूँ।" कुछ ठहर कर पूर्व भाग्य रचियता बोले, 'मुझे ही यह निश्चय करना पड़ता है कि अमुक बोतल में पैदा होने वाले महामानव में क्या-क्या गुण होने चाहिए जिससे वह महामानव समाज के प्रति अपने पूर्व निश्चित कर्तव्यो को प्रसन्नतापूर्वक पूरा कर सके। इसके लिए उनके शरीर को भ्रूणावस्था में ही अनुकूलतम परिस्थितियों के अनुरूप ढाला जाता है और फिर शिशु अवस्था में उनका मातृ मंदिर में रख कर मनोवैज्ञानिक विधियों द्वारा उसके मन को शारीर 'अनुरूप बना लिया जाता है । उसका पालन पोषण ऐसे वाता- वरण में होता है जिससे वह इस काम को खुशी से करे जिसके लिए उसे रचा गया है।' अपनी बात को खुलासा करने के लिए पूर्व माग्य रचियता ने अपने पीठ पीछे लगे एक बटन को दबा दिया। कमरे की एक ।

दीवार धीरे धीरे नीचे बैठने लगी और बडे जोर की घर घरं की आवाज आने लगी। हमने देखा कि शिकजो मे फसी चादरो पर रखी हुई बोतलें नाचती हुई चली आ रही हैं। प्रत्येक बोतल पर एर परिचय पत्र लगा हुआ था। पूर्व भाग्य रचियता ने दूसरा बटन दवाया तो वोतलो का नाचना रद हो गया। जिन कांटेदार दांतो पर चडी जजीरो पर टिवा पह जलूस बढ रहा था वह भी चलने से बद हो गये। पूर्व भाग्य रचियता एक एक बोतल के पास आकर ध्यान से देखने लगे । फिर उन्होने तीसरा बटन दवाया। उसमें से वैसे ही परिचय पत्र निकल आये जैसे बोतलो पर लगे पूर्व भाग्य रचिमता ने भेज पर रखे टेप रिवाईर को चला दिया । परिचय पत्रो पर उनके आदेश अपने आप ही टाइप होने लगे। पूछने पर पता चला कि परिचय पत्रो पर वे सारे निर्देश लिख दिये गये है जिनके अनुमार बोतल में स्थिति भ्रूण को उपचारित किया जाता है । यो अविनाश ने अब चौया बटन दवाया तो उनके हाथ में टाइप क्यिा परिचय पत्र आ गया। उस पर लिखा था 'बोतलधारी भूण को अमुक अमुर औषधि ने इतने इतने गज दूरी पर इतने इतन टोपे लगान हैं, अयुष-अमुर घोलो वो इतने गज दूरी पर प्रवेश बराना है और अमुक अमुक नम्वर की बातलो को इतत इतने दूरी पर जावर उलट देना है, आदि आदि।' पूर्व भाग्य रचियता के पांचवें बटन दबान पर टाइप दिए परिचय पत्र अपने आप अचल बोतलो मे जाकर पुराने परिचय पत्रों में कार जावर पिट हो गये।

श्री अविनाश ने छठा बटन दबा दिया और शिकंजों में कसी चोतलों में फिर गति आ गई और वे नाचती हुई धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगीं। कमरे में फिर लाल बत्ती जल उठी और महामानव निर्माता को फिर हमें अकेले छोड़कर जाना पड़ा। अविनाश इस बात से बहुत खुश हुआ। महामानव निर्माता के जाने के तुरन्त बाद ही उसने कहा, "मुझे आप से मिलकर बहुत प्रसन्नता हुई है । अब तक मैं अपने आपको सम्पूर्ण वनस्पति प्रदेश में अकेला अनुभव करता था किन्तु जिस दिन से मैंने आपका स वर्गीय महामानव समाज में मापण सुना तो मुझे यह सोचकर भारी सन्तोष हुआ कि कम से कम मेरी तरह सोचने वाला एक जीव मगल लोक में भी आ गया है।" अशोक ने विनम्रता के साथ कहा, "यह आप की महानता है कि आप ऐसा समझते हैं । हम सब आपके बहुत आभारी हैं कि आप ने मंगल लोक की व्यवस्था के बारे में इतनी अमूल्य जानकारी दी।" अनीता ने कहा, "हमें जोन से यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई है कि आप सोमवटी का प्रयोग भी नहीं करते।" "इसका कारण यह है कि सोमवटी जैसी उत्तेजनात्मक औषधि का प्रयोग करके हमे क्षणिक विधाम तो मिल जाता है पर कालान्तर में सम्पूर्ण शरीर निष्क्रिय हो जाता है। आप तो जानते हैं कि यहां पर सामाजिक नियम बहुत सख्ती के साथ लागू किये जाते हैं इसलिए मुझे सोमवटो का प्रयोग न करने के कारण मेरे साथ यहाँ पर काफी नोंक भोंक होती रहती है।"

असोक ने कहा, 'मेरी यह बात समझ में नहीं आई कि आपके समाज ने बुद्धि को क्यो भौतिक शक्ति का दास बनाया हुआ है। क्या यह सम्भव नहीं कि महामानवो को मानसिक स्वतन्त्रता मिल सके क्योकि मगल लोक के इतिहास मे जिन महान आदर्शो पर महामानव समाज को बनाने की बात कही गई है वे तभी प्राप्त किये जा सकते हैं जब यहां के अधिकारी प्रत्येक व्यक्ति को इतनी आजादी दे सके कि वे निर्भय होकर प्रत्येक बात को विवेक तुला पर तौल सकें तथा मन में उठो सभी प्रकार की शवाओ का साहस के साथ समाधान कर सकें। यदि ऐसा नहीं होता तो महामानव समाज के आदर्श वेवल कोरे दिसावा बनकर ही रह जायेंगे।" अविनाश ने कहा, "आप ठीक रहते हैं, पर यहां तो प्रत्येक महामानव के शरीर और मन को ऐसे नपे तुले वातावरण में रखा जाता है जिसमे वह अपने को इस समाज का एक अभिन्न अग मानने लगे और उसका अपना व्यक्तित्व तथा मानसिक स्वतन्त्रता कुछ भी न रहे।" फिर कुछ रख कर अविनाश वोला, "यह मैं भी मानता है कि मारे समाज की दृष्टि से काम किये जाने के लिये समस्त समाज के वल्याण की योजना सद के सहचितन से बननी चाहिए क्योकि ऐमा करने से प्रत्येक व्यक्ति को सोचने विचारने का अवसर मिलता है। पर यहाँ तो कुछ महामानव ही सम्पूर्ण समाज को नियन्त्रित कर रहे हैं । इससे औसत महामानव की बुद्धि पूर्णम्प से कुटित हो रही है।" जोन बीच में ही बोल पहा, "अशोर बी, अविनाश जी को महा- मानव ममार में ऐमी ही बातोंरे पारण सनरी समझा जाता है।

१३८ वे जो कुछ कहते हैं उसका अर्थ यहां के अधिकांश महामानव नहीं समझ पाते। इसका कारण यह है कि जब इनका बोतल के अन्दर भ्रूण रूप में विकास हो रहा था तो इनको बुद्धि विकसित करने का टीका अधिक मात्रा में दे दिया गया था। यह विकार उसी टीके का है । इसमे इनका कोई दोष नहीं।" अविनाश जोन की बातों को सुनकर तिलमिला गया और बोला, "देखा आपने, यहाँ पर कोई भी महामानव मेरी वातों को समझता ही नहीं। सच बात तो यह है कि यहां के सभी अत्यधिक प्रतिभावान व्यक्तियों और वैज्ञानिकों को औसत महामानवों के बीच में ठहरने ही नहीं दिया जाता । उनको निरुद्देश्य और लक्ष्यहीन खोज में लगा दिया जाता है जिससे उनका दिमाग खाली न रहे।" अशोक ने कहा, पर मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि शिशु उत्पादन पर सभी प्रकार का नियन्त्रण होते हुये भी मंगललोक में भी क्यों कर ऐसे व्यक्ति पैदा हो जाते है । अविनाश ने मुस्करा कर कहा, "इसको रोका नहीं जा सकता क्योंकि यह तो नियति या चांस पर निर्भर करता है। सांख्यकी के एक नियम के अनुसार बोतलों से नपे तुले महामानवों को बनाने पर भी कुछ न कुछ महामानव अवश्य ही ऐसे बन जाते हैं जिनकी मेघा असाधारण होती है।" अशोक ने बीच में ही बात को काटते हुए पूछा, "लेकिन ऐमा सम्भव कैसे होता है ? अभी तो आपने बताया था कि एक एक

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१४२ पर इनकी बुद्धि को मन्द करने के लिए बोतलों की चाल कुछ कम कर दी गई है। इससे न केवल भ्रूणों को रक्त कम मिलेगा पर आक्सीजन भी कम जायगी। इससे न इनके मस्तिष्क का अधिक विकास होगा और न शरीर की वृद्धि होगी।" अशोक को तभी पूर्व भाग्य रचियता श्री अविनाश की बताई हुई बातें याद आ गई । इसलिये उसने पूछा, 'क्या उपरोक्त प्रक्रिया से पैदा हुए महामानव विलक्षण गुण प्राप्त नहीं कर लेते हैं ।' 'क्यों नहीं । यदि किसी को बोतल में असावधानीवश जितना रक्त जाना चाहिए, उसका केवल ७० प्रतिशत ही जाता है तो महामानव बौने रह जाते हैं और उनके नेत्रो का विकारा नहीं हो पाता।' 'ऐसे अन्धे महामानवों का क्या किया जाता है।' अनीता वीच मे ही बोल पड़ी।' 'उनको पैदा होते ही नष्ट कर दिया जाता है। निर्माता महोदय ने यह बात कुछ ऐसे ढग से कही जैसे कुछ हुआ ही नहीं । पर अशोक और अनीता दोनो ही इस क्रूरता से सिहर उठे। उन्होंने कहा, 'विज्ञान में अत्यधिक विकसित इस समाज में भी ऐसे लोगों को नहीं बचाया जा सकता।' "मने अनुभव से यह सीखा है कि सुधारने से नष्ट करना श्रेष्ट है।" महामानव निर्माता लगता था स्वयं भी वही वाक्य दोहरा रहे थे जो उन्हें बीस हजार वार निद्रापाठ के रूप में दिया गया था। अशोक जो कुछ जानना चाहता या उमको अनीता के बीच में दोलने से नहीं जान पाया था। इसलिये वह फिर वोगा, लेकिन असावधानीवश ऐमा भी तो हो सकता है कि भ्रूण को सामान्य तौर पर जितना रक्त और आक्सीजन चाहिये, उसका १५० प्रतिशत पहुँच जाय ।' 'हो, ऐसा भी हो जाता है। निर्माता महोदय न वडे अनमने ढग मे कहा, "उन दशाओ मे स वर्गीय भ्रूग से पंदा महामानव असाधारण प्रतिभावान बन जाता है और त वर्गोय महामानव में असाधारण भौतिक शक्ति आ जाती है।' अशोर को अपनी बात वा जवाद मिल चुका था इमलिये वह आगे कुछ नहीं बोला। मदालसा को लगा कि उमे भी कुछ पूछना चाहिए, इसलिये उमने कहा, 'मुझे लगता है कि ये बोतलें शायद अनन्त ममय तर इसी प्रार चलती रहगी क्योंदि अभी तब इनवे अन्त होने के आसार तो नजर नही आये।' यह गुन बर महामानव निर्माता मुस्करा कर बोले, 'नहीं ऐसी बात तो नहीं है । यहाँ पर मय कुछ वैमानिक विधियों पर भाषा- रित है। नारी चे गर्भाशय में एक भ्रूण को विकमित गिशु बनने में औसत २६७ दिन लगते हैं। यहाँ पर दोतलो के लिए यह एक १४४ दिन ६ मीटर के बराबर मान लिया है। इसलिए बोतलों को १६०० मीटर तक चलाया जाता है।" 'बोतलों के जलूस के चलने की गति औसतन २५ मीटर प्रति घंटा रखी जाती है । इस तरह शुक्राए और रजाणु के संयोग से लेकर पूर्ण विकसित शिशु के बनने में लगभग ६४ घंटे लगते हैं।' निर्माता मदोदय ने कुछ ठहर कर कहा, इस सरह बबंर मूलोक में शिशु जनन का जो काम २६७ दिन में किया जाता है, उसको यहाँ पर ६४ घंटे में ही निवटा दिया जाता है। हम इसीलिये आपसे इतना आगे हैं।' हम लोग बातें करते हुए आगे निकल आये । हमने देखा क बोतलो की कुछ कतारें दो सुरंगों के बीच में से होकर जा रही है। एक सुरंग काफी गर्म थी। पता चला कि इस सुरंग में केवल त वर्गीय महामानव भ्रूणों को भेजा जाता है जिनको बायलरों, भट्टियों और गर्मी में काम करना होता है। ये गरम दुरंगें भ्रूणों को गर्मी के प्रति सहनशील बना रही हैं। आगे जाकर हमें कुछ बहुत शीतल सुरंग भी मिलीं जिनमें से बोतलें होकर जा रही थीं। हमने अनुमान लगाया कि सम्मवतया इन बोतलों के महामानवों को आगे जाकर शीत वातावरण में काम करना होगा। इन सलग अग मोतलों की कतारों में आगे जाकर असग अलग ढंग के टीके लगाये जा रहे थे। सम्भवतया ये उनको जीत और गर्मी से बचाने के लिए थे। थोड़ा और आगे बढ़े तो

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मुक्त कर दिया है। परिवार व्यवस्था को भी सदा के लिये तिलां- जलि दे दी गई हैं। मां, वाप, पुत्र, पुत्री, और भाई बहिन के सम्बन्धों के अभाव में पति पनि के सम्बन्ध भी बेकार हो गये हैं। इसलिये यहाँ सभी महामानव और महामानवीयाँ मुक्त है । भूलोक मे तुमने मानव जीवन को जितना जटिल बना दिया है हमने उसको यहाँ पर उतना ही सरलतम कर दिया है। अनीता ने यों ही पूछ लिया, 'जब आप परिवार की सभी मान्यताओ को समाप्त कर चुके हैं तो महामानव शिशुओं का लालन- पालन कैसे किया जाता है ?' "उसके लिये प्रत्येक प्रदेश में मातृ मन्दिर मोजूद है जहाँ पर जन्म से लेकर युवावस्था प्राप्त करने तक महामानव और महामानवियों की देसभाल की जाती हैं।' मदालसा ने अति रसिक भाव से कहा, "क्या आप हमें मात मन्दिर की सैर नहीं करायेंगे।" निर्माता महोदय का शिशु उत्पादन मिल को स्वयं दिखाने के पीछे उद्देश्य या अनीता के निकट आना । पर इसमें वे सफल नहीं हुए थे और न इसकी कुछ आशा ही थी, अतः वे स्से स्वर में बोले, "इसका आवश्यक प्रबन्ध कर दिया गया है। आप लोगों को वह शीघ्र ही दिखाया जायगा।"

१४७ फिर कुछ रुक कर वे बोले, “आज आप भी काफी यक गये होंगे। अत अब मैं आपमे विदा लेता हूँ।' [ २३ ] अशोक ज्यों-ज्यो मगल लोक की बातो से परिचित होता जाता था, 'त्यो त्यो उसके दिमाग मे मगल लोक का नक्शा साफ होता जाता था। उसने मगल लोक के महामानवो को मानसिक दासता से मुक्ति दिलाने की एक योजना भी बनाली थी, पर वह चाहता था कि मगल लोव को व्यवस्था का घोड़ा अध्ययन और करले, तभी अपनी योजना को अमल में लाना शुरू करे। इसलिये महामानव निर्माता द्वारा 'मातृ मन्दिर' को देखन का निमन्त्रण उसन तुरन्त स्वीकार कर लिया और एक दिन-जोन, टोनी और डोनाल्ड के साथ वे मान मन्दिर को देखने के लिये पहुंच गये । मान मन्दिर पी मचालिका श्रीमती पिमरे थी । स्वय वे भी अशोक से मिलने के लिए बहुत आतुर । पई पार उन्होंने अशोर से मिलने के प्रपल भी वि थे किन्तु जोर ने बार-बार उनसे हतोत्साहित रिया या। आज जव उनको पता चला कि हम लोग मान मन्दिर को देखने के लिए आ रहे हैं तो यह बहुत शुभ हुई। मातृ मन्दिर के भीमकाय भवन को छत पर हम लोग गगन गाडी से जब उतरे तो वे कार्यालय के द्वार पर हमारा स्वागत करने लिए स्वयं सही यो। हम लोगों का आपस में परिचम राया गया। उसके बाद हमको मात्र मन्दिर के मुख्य मुख्य विभागों को देखने के लिए ले जाया गया।

१४८ सबसे पहले जिस कमरे में हमने प्रवेश किया उस कमरे में कांच की बड़ी-बड़ी मेजें लगी हुई थीं। इन मेजों पर गुलाब, वासन्ती, माधवी, मल्लिका, चम्पा आदि रूप और गन्ध से खिल- खिलाते हुए तथा निर्गन्ध किन्तु आकर्षक पुष्पों के गुलदस्ते बड़े ढङ्ग से सजे हुए थे। इनके बीच में स्थान-स्थान पर चित्रों वाली पुस्तकें खुली हुई रखी थीं। इनमें मछलियों, पशुओं और पक्षियों के चित्र थे। हमारी समझ में कुछ नहीं आया कि इस लम्बे चौड़े कमरे में इतनी बड़ी-बड़ी मेजें इतनी सस्या मे क्यो हैं और उन पर फूलों और पुस्तकों के रखने का क्या प्रयोजन है। संचलिका ने पास खड़ी एक श्वेत वस्त्रधारी परिचारिका को संकेत करके कहा-'बच्चों को ले आओं'। । इतना कहना था कि अनेक परिचारिकायें लगभग आठ-आठ माह के शिशुओं को लाकर मेजों पर बिठाने और लिटाने लगी। सभी शिशुओं का रूप रंग एक-सा था। शिशुओं को मेजों पर छोड़ दिया गया तो वे उन पर रेंगने से लगे । वे फूलों और पुस्तकों से उलझ गए। बच्चे हंस-हंस कर फूलों को तोड़ने और पुस्तकों को फाड़ने लगे। तभी संचालिका ने पुनः उसी परिचारिका को आज्ञा दी-"इनको पूर्व भाग्य रचियता द्वारा निर्देशित वातावरण के प्रति अभ्यस्त बनाने का कार्य आरम्भ करो।' ऐसा लगता था कि वह शायद मुख्य परिचारिका थी। उसने एक बटन दबा दिया। एक भयानक शोर निकलने लगा जिससे कान फटने लगे। शिमुगण इस आवाज को सुन कर फूलों और १४६ पुस्तको के साथ सेलना भूल गये । भय के कारण पुस्तको और गुलाब के फूल उनके हाथो से गिर पड़े और वे जोर-जोर से चीखने और चिल्लाने लगे। कुछ क्षण वाद ही मुख्य परिचारिका न दूसरे बटन को दवा दिया। हमने देखा कि शिमु वडे जोर से चीसे और धीरे- धीरे मुरमाने से लगे। अशोर ने भूल कर एक मज पर हाथ रख दिया। उमको एक साधारण-सा विद्युत आघात लगा। वह समझ गया कि बच्चो को विद्युत आपात दिया गया है। शिशु जोर से चिल्लाते और रोते रहे । मचालिका ने मुख्य परिचारिका को प्रदर्शन बन्द करने का आदेश दिया। घण्टियो की ध्वनि बन्द हो गयी फिर भी सभी शिशु सिसर-सिसक कर रो रहे थे और अनीता भी मिसकी भर रही थी। सचालिका ने पुन. आदेश दिया-'पूत और पुस्तकों को शिशुओ के पास लाओ।' फ्नो और पुस्तको को शिशुओ के पास लाया गया किन्तु यह क्या हुआ सारे शिशु अवको बार पूलो और पुस्तको को देख कर भी रोने और चिल्लाने लगे और उनसे दूर भागने का यत्न करने लगे। हम कुछ न समझ सके । सचालिरा ने मुख्य परिचारिका को शिशुओ को पुन वापिस ले जाने का आदेश दिया। सचालिका के थादेश मे वही परीक्षण शिशुओ के एक दूसरे वर्ग पर दोहराया गया। इस बार के प्रदर्शन में पहले शिशुओ यो पुस्तको द्वारा सेलने दिया गया, फिर फूलों द्वारा पिलाया गया और फिर विद्युत आपात दिया गया। विद्युत आपात रे पश्चात् शिराओ के सामने पुरत रखी गई तो वे उनसे रोनने लगे, पर जब उनके सामने पून लाए गए तो वे चौसने चिल्लाने लगे।

१५० शिशुओं के चले जाने के बाद संचालिका ने हमारी ओर देखा और कहने लगी-'आपने जो कुछ अभी देखा वह अमहा- मानुपिक दृश्य आपको जानबूझ कर नहीं दिखाया गया था। यह तो महामानवों को उनके भावी जीवन के अनुरूप बनाने का शिक्षण दिया जा रहा है । फूलों और पुस्तकों से खेलना शिशुओं का जन्म- जात स्वभाव होता है । वे इनको पसन्द करते हैं । शिशुओं का शोर और विद्युत आघात से भय खाना भी जन्मजात स्वभाव है। जब फूलों और पुस्तकों को अत्यधिक शोर और विद्युत आघात के साथ सम्बन्धित कर दिया जाता है तो वे फूलो और पुस्तकों से भी भय साने लगते हैं । इस कम को यहाँ पर प्रत्येक 'त' वर्गीय शिशु के साथ छ: माह तक प्रतिदिन २०० बार दोहराया जाता है । इसका प्रभाव यह होता है कि वे बड़े होकर फूलों और पुस्तको से घृणा करने लगते है। यदि इस प्रकार के त वर्गीय शिशुओं को वडा होकर किसी मनोवैज्ञानिक के पास ले जाया जाय तो वह यही कहेगा कि इन महामानवों का फूलों और पुस्तकों से घृणा करना जन्मजात स्वभाव है। दूसरी बार के प्रदर्शन में जो शिशु वर्ग लाया गया था वह भविष्य में र वर्गीय महामानव बनेंगे। इनका मानसिक स्तर त वर्गीय महामानवों से थोड़ा ऊंचा रसा जाता है । उनको शिक्षित होना जरूरी होता है, इसलिए उनको पुस्तकों से प्यार करना वचपन से ही मिनाया जाता है। पर यदि उनको फूलों से भी प्यार करना सिखाया जाय, तो वह मंगल लोक को स्थिरता के लिए संकट पदा कर सकते हैं।

अनीता पर इस अमानुपिक दृश्य की प्रतिक्रिया अत्यधिक तीव्र हुई । उसने कहा-'क्या इसी तरह मगल लोक में महामानवो को समानता देन का दावा किया जाता है ?" पियरे को अनीता का कुछ अजीर तरह मे मुंह बनाते हुये यह व्यग बुरा नहीं लगा। अपितु उसन उसी की हो मे हाँ मिलाते कहा- यह कभी भी सम्भव नही कि प्रयेक मनुष्य को एक जमा वाम, आराम और दूसरी चीजें दी जा सके, पर विज्ञान द्वारा यह सम्भव है कि हर आदमी अपनी स्थिति में रहता हुआ पूर्ण सन्तोप प्रात कर सके । अर उदाहरण के लिए त वर्गीय महामानवी का बहुत पटिन शरीर श्रम करना पडता है, यदि इनको पूतो और पुस्तकों से घृणा करनी नहीं सिखाई जाएगी तो यह भी स वर्गीय महामानवो की तरह पनों और पुस्तको वो प्यार करन लगेंगे और इसने वर्ग समपं को जन्म मिलेगा जिसको मगल लोक मे हर मूल्य पर रोपने का प्रयान दिया जाता है । पिपरे को इन विचित्र तां मे पूर्ण वात ने अशोर पो अनजाने में ही मगल लोर के विधाताओ के विरुद्ध एक नया अस्त्र दे दिया। दूसरे कमरे में गए तो हमे मनाविज्ञान विशारद श्री भावानन्द मिले। पियरे वो पता नहीं था कि हमारा उनसे पहले ही परिचय हो चुका है, इसलिए उमने हमारा औपचारिक परिचय वराया। इस कमरे में २-३ वर्ष के लगभग सौ महामानव गिशु पानो म मोये हुए थे। इन्होंने पीले रंग की पोशार पहनी हुई थी सौर पनि रग की चादरो पर हो वे लेटे हुए थे। एक और से एक ध्वनि धीरे-धीरे आ रही थी। हमको यह आवाज दडी मधुर लगी १५२ - और हम उसको सुनने लगे । ध्वनि कह रही थी, 'हम सब स-म वर्गीय महामानव हैं। हम पीले रंग की पोशाक को बहुत पसन्द करते हैं। र वर्गीय महामानव लाल रंग की पोशाक पहनते हैं, वह बहुत भद्दो होती है, वह देखने में बुरी लगती है । हम र वर्गीय महामानवों से मिलना पसन्द नहीं करते। त वर्गीय महामानव तो र वर्गीय महा- मानवों से भी बुरे होते हैं । वे खाकी वस्त्र पहनते हैं जो देखने में और भी बुरे लगते हैं। त-अ वर्गीय महामानव तो और भी बुरे हैं । वे काले रंग की पोशाक पहनते हैं। मैं कितना खुश हूँ कि मैं स-म वर्गीय हूँ यह मधुर ध्वनि कुछ क्षण रक कर फिर बोली- 'स-3 वर्गीय महामानव श्वेत वस्त्र पहनते हैं, वे हमसे अधिक काम करते हैं, पर वे भयानक रूप से चालाक होते हैं। उनसे जितना दूर रहा जाय, उतना ही अच्छा है। मैं वास्तव मे बड़ा ही प्रसन्न हूँ कि में स-म वर्गीय महामानव हूँ। मैं इतना कठिन वौद्धिक काम नहीं कर सकता जितना कि स-उ वर्गीय महामानव करते हैं । हम र, त-उ और तअ वर्गीय महामानवों से बहुत अच्छे हैं, स वर्गीय थोड़े बुद्ध हैं । त वर्गीय पूरे बुद्ध हैं और त-अ वर्गीय तो महाभोंदू हैं, मैं इनमें मे किसी के साथ भी सेलना पसन्द नही करता । स-3 वर्गीय महामानव बहुत अधिक चलते पुणे होते हैं, उनसे सदैव वच कर रहने में ही भलाई है।* *स-3 वर्गीय=उत्तम उपवर्ग के सतो वर्गीय महामानव सम्म तमो रजो " " " " " " -मध्यम =अघम उत्तम " " " त-अ र-3 " . " " "

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१५४ निद्रा पाठ का उपयोग मंगल लोक की आचरण शिक्षा देने के लिये किया जाता है क्योकि इसमें समझने की कोई बात नहीं होती, उसको तो केवल स्मरण शक्ति द्वारा रट लेना है। इन रटी बातों के अनु- सार आचरण करने के लिये महामानवों के शरीर को पहले से ही शिशु उत्पादन मिल में अभ्यस्त बना दिया जाता है। निद्रा पाठ के द्वारा उस शारीरिक प्रभाव को मानसिक स्तर पर भी उतार दिया जाता है, जिमका प्रभाव जीवन भर बना रहता है।' इतना कह कर श्री भावानन्द चुप हो गये। हम लोग उस कमरे को छोड़ कर आगे बढे । ठीक इसी प्रकार के चार कमरे हमें और मिले । इन सब कमरों में भी शिशु सोये हुये थे और धीमे स्वर में एक ध्वनि उसी प्रकार कुछ वाक्यों को बार-बार दोहराती हुई आ रही थी । अन्तर केवल इतना था कि इन कमरों में क्रमशः स,र,त-उ और त-म वर्गीय शिशु सोये हुए थे और उनको निद्रापाठ मे इस बात की शिक्षा दी जा रही थी कि सम्पूर्ण मंगल लोक मे वे सर्वश्रेष्ठ वर्ग के हैं । उनके वर्ग में जन्म लेना बड़े गर्व की बात है । मंगल के शेप वर्ग उससे नीचे हैं। अन्य धगों के महामानव जो कुछ भी काम करते हैं वह बहुत हा गर्हित है, उसको करने से उनके वर्ग का अनादर होता है। इन कमरों में निद्रा पाठ द्वारा वर्ग संघर्ष के बीज बोये जा रहे व और इमको अशोक तथा अनीता अच्छी प्रकार रामभ रहे थे। पर ये यह नहीं समझ पाए कि वगं भंघर्ष को इतना क्टू और तीब्र बनाने के बाद भी प्रधान महामानव निर्माता कौन-से उपाय से मंगल- लोक में वर्ग संघर्ष को जडें नहीं जमने देते। .

१५५
इन कमरो को छोड कर हम आगे बढे । अनीता का कौतूहल
बरावर बढ़ रहा था। उसन श्री भावानन्द को सम्बोधित करते
कहा-'इस प्रकार के निद्रा पाठ दन वा सिलमिला क्व तम चनता
रहता है और एक पाठ का प्रभाव शिगुओ पर रितन समय म
पडता है।'
भादानन्द ने विना साचे ही उत्तर दिया-'दम ममय जिन
प्या का निद्रा पाठ द्वारा शिक्षण दिया जा रहा है वह २०० वार
ज दाहाया जायगा और इसी प्रकार तीन माह तक दाहाया
ता रहेगा। उसके पश्चात् अगल तीन माह तर यह शिक्षण एक
सप्ताह म तीन दार दिया जायगा । इमस मिगु का अवतन मनिप्प
पूरी तरह न प्रभावित हो जाया गवाजातर म उनकी आदत का
९५ धारण कर लेगा।'
इस ममय हम अव एस वडे हाल के द्वार पर सड थे धन्दर
बाप तो हमन देना कि ६ वर्ष आयुवर्ग के महामानर वाप-दाति-
कायें सो रहे थे। कुछ अध-गगे पडे थ । हाल वे एर पान म मन्द
स्वरों में एक ध्वनि अपना सन्देश निद्रा पाट द्वारा मोये हुए महामानव
बालों को मुना रही थी। प्वनि बह रही यो-'मय मवर लिए,
नहीं काई एक वे लिए'। 'प्रये महामानर दौर प्रपत्र महामानवी
रायर ननिय यम्य है रि वद रभी भी विमी एक व्यक्ति के
साप बपन मम्बन्ध स्थाई रूप मे न जोडे । 'प्रयेव वर्ग रे महामानव
और महामानवी का यह अधिकार है कि वह अपने वर्ग के दिम
यक्ति को भी चाह निशा-निमन्त्रण दे मरे ।' 'समार व्यक्ति गे

है। समाज हित के लिये व्यक्ति का बलिदान किया जा सकता है 'प्रत्येक महामानव अपना-अपना काम करता है तो समाज का काम आगे बढ़ता है ।' 'प्रत्येक महामानव प्रत्येक महामानव के लिए काम करता है, हम बिना एक दूसरे के नहीं रह सकते।' 'सभी उपयोगी है, एक दूसरे के लिए काम करता है प्रत्येक महामानव ....ध्वनि ने पुनः दोहराना शुरू कर दिया। हम आगे बढे और पियरे से उसका कारण पूछा। अचानक पियरे जैसे सोते से जाग पड़ी हो, इस तरह वह अपने आप ही बोल पड़ी-'यहाँ निद्रा पाठ द्वारा समाजीकरण की शिक्षा दी जाती है। यह सदेश एक हजार बार सुनवाया जायगा।' हम इस हॉल से निकल कर दूसरे हॉल में पहुंचे। यहां पर आठ वर्ष के बालक बालिकायें सो रहे थे । वही चिर-परिचित ध्वनि एक कोने से बड़े मन्द मन्द स्वरों में आचरण प्रसार का कार्य कर रही थी, 'हम सब केवल महामानव हैं इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। हमारा न कोई मित्र है न कोई शत्रु । सव समाज के लिये एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। वघ्या होना महामानव सभ्यता का प्रमुख चिह्न है हमें बताया गया कि उक्त सन्देश निद्रा पाठ द्वारा २० हजार बार सुनवाया जायगा। तीसरे हाल में हमने प्रवेश किया तो हमें बताया गया कि इस हाल में आठ वर्ष से दस वर्ष तक के बालक सोये हुए हैं। हमने देखा कि दो चार बालक अपने पलंगों पर पड़े हुए करवटें बदल रहे - थे। ध्वनि मद-मद स्वर से वोत रही थी 'व्यक्ति बोला-समाज होला। जब व्यक्ति समाज के नियमो की आलोचना करता है तो समार को स्थिरता को चोट पहुँचती है । 'समाज के नियमा का उल्लघन करना समाज को नष्ट करना है। जो व्यक्ति समाज से विद्रोह करता है उसको नष्ट करना आवश्यक है क्यादि एक व्यक्ति का अर्थ है शिशु उत्पादन मिल की एक बोतल ।' पियरे ने बताया 'इस हाल में इन्ही बातो को निद्रा पार द्वारा पचास हजार वार दोहराया जायगा। इसके आगे जिस हाल में हमने प्रवेश किया उसमे १० से १२ वर्ष की आयु में बालक सोये हुए थे। वहीं पूर्व परिचित ध्वनि यहाँ पर भी अपन सदेश प्रसारित कर रही थी, 'बरेले रहना असम्यता है, अभिशाप है।' 'जो रहे अवेला उमरो दुख ने घेरा ।' 'जब महा- मानव अफेला रह तो सोमवटी की शरण गहे' क्योकि 'सोमवटी साके चिन्ता उदासी भागे।' जो सामाजिक नियमो का जितना पालन परता है सोमवटी की उतनी ही अधिक मात्रा का वह अधिकारी बनता है और जिनके पास जितनी अधिर सोमवटी है वह बैदना, पीड़ा और चिन्ता से उतनी ही दूर है। इसलिए यह बहावत सच कि 'सोमवटी नहीं पास, सब कुछ तो उदास ।' ध्वनि निद्रा पाठ से पूरा करने की यो कि पियरे ने बताया भी मदेश ५० हजार बार दोहराया जाता है। हम आगे बढ़ रहे थे। भवन वरावर माने पो पा रहे थे। जिम हाल में इस बार हमने प्रवेश विमा वर १२ से १४ वर्ष तक के १५० । बालकों का निवास स्थान था। यहां पर सभी बालक जाग से रहे थे। पर ऐसा लगता था कि वे मन्द-मन्द ध्वनि से परेशान हो उठे थे और सभी करवटें बदल रहे थे। कदाचित उनके मस्तिष्क में यह ध्वनि वरावर गूंज रही हो । न चाहते हुए भी उनको यह सुननी पड़ रही थी और मस्तिष्क पर टकराने से ही शायद उनको निद्रा आने लगी थी। अशोक को यह सम्मोहन विल्कुल विचित्र लगा। उसने बोलती हुई ध्वनि को ध्यान से सुना । वह कह रही थी, 'सभी महामानव नवीन वस्त्रों को धारण करते है । नित्य नवीन वस्त्र पहनना सभ्यता है। विलास सामग्री और उपभोक्ता वस्तुओ का जितना उपयोग किया जाता है उसी अनुपात में समाज की स्थिरता उननी सीमा तक आगे बढ़ जाती है। इसलिए अपनी इच्छाओं को बढाना, अधिक से अधिक उपभोक्ता पदायों का उपयोग करना सभ्यता है ।' 'सुधारने से नष्ट करना श्रेष्ठ है ।' 'समाज के लिये यदि एक महामानव को नष्ट करना पड़े तो वह उचित है क्योंकि एक व्यक्ति का नष्ट करने का अर्थ है, एक बोतल को नष्ट करना। इसके आगे अभी भी दो हाल और थे। पर हम निद्रा पाठ की इस अद्भुत क्रिया को सुनते-सुनते परेशान हो उठे थे। मंगलग्रह को यह प्रक्रिया जिसमें भोले भाले महामानवों को एक विशेष वातावरण के प्रति अभ्यस्त बनाने के प्रयल किये जा रहे थे हमको बहुत ही क्रूर लगी। पियरे भी मन्य महामानवीयों की तरह अशोक को एक बार निशा निमन्त्रग देने के लिये लालायित थी। उसने यही अवसर उपयुक्त देखा ।

और दोली 'मगललोक काममा महामानवीया यह चाहती हैं कि आप उना कम से कम एक-एक वार दो निगा-निमन्वम म्योरार करने और मैं भी उनमें से एक हूँ।' अशोर कुट विरक्त भाव से बोला, 'मुझे बात नहीं यह निशा- निमन्त्रण क्या है और न मैं इसके विषय मे यति जानना हो चाहता हूँ क्योकि मुझे महामानव सभ्यता का यह पक्ष बिलकुल पसद नहीं है।' इतना वहार वह आगे बढ गया वीर हन मी मात्र मन्दिर से वापस लौट जाये। [ २४ ] मदालमा अनीता म जना वार आग्रह कर चुरी था कि यह भी महानानपियों में अपने मम्पकं बनाये । एक दो बार अगोर ने भी उमगा इन बात का नरेत दिया था, क्योकि वह चाहता या व सोचता था कि सम्भव है कि अनीता दुध महामानदियों का विचारयरिवर्तन कराने में माह मरे । इनलिये एक दिन अनीता महालमा के साथ महामानवी मानिनोद गृह में पहुंच गई। मदाना ने अनीता का उपस्थित मनी महामानरियों ने परिचय कराया । वगे वनस्पति प्रदेश की मभी महामानदिया उनने परिचित दी, और वै टने वही ईर्षा की दृष्टि में देखती थीं। उनरे विषय में इन सभी मा यह विचार बन गया था कि वनीता ने ही अशोर की महामान- दियों से मिनने जुलने पर रोक लगाई हुई है। मारगरेट बनीता को सामने पापर अपनी इस भावना को न गेक मत्री। वह वनीता को नप परते हुए बोती, 'मगत नोक में 'रुच सबक निये, नहीं कोई एएके निचे नियम पातन दिया बाता है। यह नियम इतना १६२ । रही थी । उसकी बातों ने ऐनी के मन में कुछ ऐसी विचित्र गुदगुदी पैदा कर दी थी कि उसने बहुत धीरे से मारगरेट के कान में कहा, "काश मैं भी स्वाधीन होती, मेरा भी परिवार होता और मैं भी प्रेम और वात्सल्य का रसास्वादन कर पाती।" मारगरेट ने मुंह बिचका दिया और ऐनी से कहा-"यह तुम्हारा अपराध नहीं, यह तो तुम्हारी बोतल को दिये गये गलत टोके का कसूर है ।" उधर अनीता कह रही थी-'आप सोमवटी के वशीभूत होकर महामानवी तो क्या सामान्य नारी के कर्तव्यों से वंचित हो गयी हैं । मैं आपके इसी सम्मोहन को तोड़ना चाहती हूँ। मगल लोक में सबसे बड़ी गलती यह हो गयी है कि यहाँ पर नारी और पुरुप को हर तरह से समान मान लिया गया है।' अनीता की बातों को सुनकर सभी महामानवीया खिलखिलाकर हँस पड़ी और मारगरेट इस प्रकार वोली जैसे उसने सभी के मन की धात कह दी हो, 'बर्वर भू लोक की नारी से और क्या याशा की जा सकती है इसलिये इसमें तुम्हारा अपराध नहीं। जिस दिन तुमको इस बात को अनुभूति हो जायगी कि मंगल लोक में महामानव और महामानवी की समानता सभी प्रकार वास्तविक है, वह भावुकता पर आधारित नहीं है तो तुम भी महामानवी होने का स्वप्न देखोगी।' "नहीं और कभी नहीं। क्योकि मैं जानती हूँ और वैज्ञानिक तथ्यों द्वारा भी यह सिद्ध हो चुका है कि पुरुप और नारी में केवल लिंग का ही अन्तर नहीं, बल्कि उनका अन्तर मौलिक है । नारी के एक एक अंग पर, एक एक कोषाणु पर और एक एक विचार पर नारीत्व कापसमालोजानिक भी अलग नहीं ने कर सकते। मैं पूछती हूँ कि वोतल से देवल पुरुष वर्ग को ही क्यो नही पंदा किया गया । नारी की आवश्यक्ता ही क्या थी?" अनीता की इस वात ने सभी महामानवियो को निरुत्तर कर दिया। पर केवल एनी को ही अनीता की बातो मे सच्चाई जान पड़ी । अनीता कहा, "मैं बताती हूँ क्योकि मगल लोर के विधाता नारी का शोषण करना चाहते हैं । नहीं तो जिस समाज में नारी का अस्तित्व मान लिया गया है वह समाज यदि मातृत्व को नहीं मानता तो निश्चित रुप से उसरा विनाश एक न एक दिन हा पर ही रहेगा, क्योंकि माता के विना नारी का जीवन अधूरा है । मन्तान होन नारिया मदा हो एक हीन भावना मे ओत प्रान हाती हैं और उनका जीवन निराशा से भरा होता है।' नलिनी ने हेमते हुए कहा-'पर हम तोगो को तो निराधा जैसे पद या अयं भी पता नहीं।' एनी अचानक ही बीच में बोल दटी, 'पना चले भी कमे, जब सोमवटी वा उपयोग हम लोग दरावर करते हैं।' अन्य सभी महा- मानदियों ने ऐनी को बात ही कोष भरी दृष्टि से देखा। और अनीता यो भी ऐनी की बातों में बुध वारच हा । टने लगा कि उसरा महामानवियों के बीच में थाना सफत हवा । वह और जार में बोली, 'नविन एक न एक दिन माप गभी कोमोमवटी रे मम्मोहन को खोडना होगा और मदिन पापको पनी वास्तुविर स्थितिमा पता पलेगा। मैं पहली किबार गमी को विचार गति लि हो गयी है आपला यपना कोई पत्तिय नहीं रहा है, और बिग त्रिम मनोद.

ज्ञानिक वातावरण में महामानव शिशुओं को पाला जाता है उससे यह रह भी कैसे सकता है !" अनीता शायद और भी कुछ कहती पर तभी मारगरेट बीच में वोल उठी, 'यह महामानव समाज के प्रति खुल्लमखुल्ला विरोध है। तुमने मंगल लोक के नियम 'व्यक्ति बोला समाज डोला' को भंग किया है । क्या तुम्हें पता नहीं कि जो महामानव समाज को स्थिरता को नष्ट करने की कोशिश करता है यहाँ पर उसको ही नष्ट कर दिया जाता है क्योंकि एक व्यक्ति का मूल्य ही क्या है केवल एक बोतल को १६०० मीटर घुमा देना।' अनोता समझ गयी कि मारगरेट बचपन में पढ़े निद्रा पाठ को ही दोहरा रही है । लेकिन उसने अब महामानवियों के बीच में रहना अधिक उचित नहीं समझा और वह तुरन्त ही वहां से चल दी। अनीता के जाते ही वातावरण में एक सन्नाटा सा छा गया। कुछ क्षण तक तो महामानवियां कुछ बोल नहीं सकों, पर तभी सबको जैसे याद आ गया कि 'सोमवटी खाके, चिन्ता उदासी भागे' और सब ने एक एक सोमवटी सायी और सभी खिलखिला कर हंस पड़ी । पर ऐनी अभी तक उदास बैठी थी। उसने आज समझा कि मंगल लोक के विधाताओं ने नारी के चारों और कितना बड़ा इन्द्र जाल फैलाया हुआ है । उसे पहली बार जीवन में निराशा का अनुभव हुआ और वह चुपचाप उठकर बिना सोमवटी साये अनीता से मिलने के लिये चली गयी।

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नही करनी पड़ती । बुढापे का दर्शन ही नहीं होता क्योंकि मरने के समय तक न मुख पर झरी पड़ती है और न दांत गिरते हैं । बूढ़े और युवक सभी समान दिखाई पड़ते हैं । दस कदम के लिये भी गगन गाड़ी उपस्थित है । ऐसी दशा में यदि महामानवों ने अपने बारे मे चिन्तन करना छोड़ ही दिया तो अनुचित ही क्या है।' 'पर यह जीवन तो मृत्यु से भी बदतर है ।' अशोक ने कहा "आपका कहना ठीक है । हम भो यह समझते हैं कि अत्याधिक मानसिक दासता के कारण हम सम्भोग और कृत्रिम वातावरण के आदी हो गये हैं। पर हम करें भी क्या, क्योकि महामानव शिशुओं को आरम्भ में ही यौन स्वच्छन्दता का पाठ पढ़ाया जाता है और जब कभी यह सोचने के लिए मजबूर भी होता है तो उसको सोमवटी दे दी जाती है।" मनोवैज्ञानिक श्री भावानन्द अपनी बात को आगे बढ़ाते हुये बोले, "महामानवों को जब यौन सम्बन्धों से मुक्ति मिलती है तो इनके दिमाग को अमूर्त तथ्यों को समझने में लगा दिया जाता है।" समन्वय-विज्ञान विशारद श्री बोस ने देखा कि अशोक और अनीता उनकी बातों को नहीं समझ पाये हैं इसलिये उन्होंने कहा, मंगल लोक में प्रश्न यह है कि जो कुछ आज चल रहा है उसे वैसा ही चलने दिया जाये या उसमें सुधार भी किया जा सकता है। हम सभी यहाँ इसी लिए उपस्थित हुए हैं । महामानव समाज में यौन सम्बन्धी स्वच्छन्दता को हमारे लिए सहन करना असम्भव हो गया है। यदि हम इसका विरोध करते हैं तो सभी महामानव हमारी १६७ बातो को यह यह पर टाल देते हैं कि हमारी वोतलो मे गलत टीके लगने के कारण यह सब हुआ। लेकिन असलियत यह है कि सम्पूर्ण महामानव समाज को इसके विधाताओ ने एक माया मे फमाया हुआ है। मगल लोक मे पाचन से निस्तारा मिला तो कामिनी को इतना वृताकार कर दिया कि महामानव समाज का सम्पूर्ण चितन भनन उसी में डूब गया। हम आज इसी से मुक्ति बात है। हम पहने हैं कि नारी की आवश्यक्ता ही नहीं है क्योकि जिस मौलिग आवश्यकता के लिए युग युग मे पुरुप का नारी को जरूरत हाती आई थी वह हमने बोतलो से शिशु पैदा करा वर सरम कर दी है और जिन मानवोत्तर गुणो का नारी में निवास है वे सभी बोतलो में भौतिक-रसायनिय त्रियाओ के द्वारा नष्ट कर दिए गये हैं। देवल यौन सम्बन्धो के लिये नारी का अस्तित्व रखकर मगल लोक के विपाता हमारे साप बहुत बडा पड़पत्र रच रहे है । सब आप ही बताइय, हम क्या करें?" अशोव को पता नहीं था कि वि महामानव इम तरह भी सोच सकते हैं । यतीता तो यह कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि विना नारी के बोई समाज स्थापित भी किया जा सकता है। पर विज्ञान ने मगल सोप में मनुष्य को ऐसी स्थिति में ला पटना था कि या तो बेवल पुरुप रहे या केवल नारी। नारी पुरुष दोनो को ही रसने के लिये मगत लोप ये सामाजिक सदभं को ही पूरी तरह बदलना जरूरी था। इसी बात को समभाते हुये अशोर ने कहा, 'यह ता अम- म्भव ही लगता है कि भगल तोर के भाग्य विधाता इस बात को मान से कि नारी या पुरप में से केवल एक वर्ग ही रहे, और यह आपरे हाथ को बात भी नहीं है, पर आप लोग यह तो कर ही सकते हैं कि महामानव और महामानवियों में उन सम्बन्धों को स्थापित कराने का प्रयत्न करें जिनसे मनुष्य मात्र में करुणा, प्रेम और वात्सल्य का उदय होता है।' तभी अचानक ऐनी ने प्रवेश किया और वह बोली, 'मैंने अशोक जी की बातें सुन ली हैं और मैं चाहता हूँ कि हम सभी इस वारे में उनके परामर्श के अनुसार चलें क्योंकि हम सबका विकास तो यहाँ एकांगी ही हुआ है, पर अशोक जी को भूलोक में स्वतन्त्र चिन्तन का अवसर मिला है।' ऐनी की दात सभी को पसन्द आई । पर अशोक जल्दी में कोई निर्णय लेना नहीं चाहता था, इसलिये उसने कहा, 'मुझे आप दो दिन के लिये सोचने का अवसर दें।' श्री बोस ने कहा, 'ठीक है हम दो दिन बाद फिर यहीं मिलेंगे।' इतना कह कर सबने विदा ली। [ २५ ] जब तक महामानव बैठे हुए थे, तब तक अनीता अपने को भुलाये हुए थी। पर उनके जाते ही उसने अशोक से कहा, "अब मैं मगल लोक में नहीं रह सकती। यहां की यौन-स्वछन्दता और अनि- यंत्रित व्यभिचार से पूर्ण कृत्रिम वातावरण में मेरा दम घुट रहा है।' अशोक कुछ चकिता हुआ सा बोला, "अनीता, आज तुम यह क्या कह रही हो?' "मैं टोक ही कह रही है अशोक', अनीता ने कहा, 'मह महा- ।

मानव समाज केवल इच्छाओ का दास है । यहाँ के शब्द स्पर्श, रस, रूप और गन्ध मे कूट कूट कर राग और व्यभिचार भरा हुआ है। मोमवटी जैसे निकृष्ट पदार्थ ने इनके जीवन को यन्त्रवत बना दिया है जिसके कारण जीवन का अर्थ यहां केवल यौन सम्बन्ध तक ही रह गया है। यहां के मनोविनोद और सम्भोगगृह इन्ही निम्न भावनाओ का प्रतिनिधित्व करने वाले हैं। कहने को तो ये महामानव बनते हैं पर इनके सभी कार्य पशुओं से भी निम्न स्तर के हैं।' यो अनीता को बीच में ही टोकता हुआ कुछ गम्भीर होकर बोला, 'पर अनीता यह सव आज कहने का तुम्हारा तात्पर्य क्या है ?" अनीता को अशोक से इस प्रकार के प्रश्न की आसान थी इसलिये कुछ क्षण के लिये तो वह झिमकी पर फिर साहस एकन कर बोली, 'मैं भूलोक, अपनी मातृ भूमि वापिस जाना चाहती हैं। मैं पृथ्वी की उस उपा के दर्शन करना चाहती हूँ जो प्रतीची मे अपना अवगुण्ठन सोल कर सम्पूर्ण नील-गगन को अपने अरण आचल से निरप प्रति आच्छादित करती है। मैं उस दृश्य को दसना चाहती हूँ जव उपा की सुनहलो गोद से अशुमाली धारण कर भगवान भास्कर अपने स्वणिम रथ पर आरट हो सम्पूर्ण भूतल पर अपनी स्वर्ण किरणों को लुटाते हैं । जिसके कारण ओम की माती की सडिया तिरोहित हो जाती हैं, नीरजा वे अधरो पर मुस्तान पेनने लगती है और कुमुदनी सज्जा से मुग यो दिपा लेती है। मैं मातृ भूमि की उम अलसाई दोपहरी में जाना चाहती है जर अमिताभ के भीपण उत्ताप से धरा शतप्त हो उठती है। मैं धरती को उम साझ का आलिंगन करना चाहती है जिसके आने पर पसीगण अपने ।

नीड़ों की ओर जाने लगते है। मैं उस यामिनी का दर्शन करना चाहती हूँ जिसके आते ही तारे गगन में जगमगा उठते हैं और नभ प्रांगण मे तिमिर और आलोक का द्वन्द छिड़ जाता है। चलो, इस अन्धकार से पूर्ण अमंगल लोक को छोड़ कर अपनी उसी ज्योतिर्मयी पृथ्वी पर चलें।' अनीता इसके आगे और कुछ न कह सकी । अशोक समझ गया कि महामानबियों के व्यवहार से अनीता को मार्मिक पीडा हुई है। वह उसके थोडा निकट आकर बोला, 'अनौता आज तो तुम दार्शनिक यन गई हो । सभी प्रकार रो निवृत्ति चाहती हो । पर तुम यह क्यों भूल जाती हो कि तुम यहाँ पर मानव को यात्रा को मगर मय बनाने के लिये कार्य कर रही हो। क्या तुम्हे भान नहीं कि तुम्हारा यही काय एक दिन इस महामानव सभ्यता को आलोक प्रदान कर सकता है। लक्ष्य के इतने समीप आकर तुम इतनी निराशापूर्ण बातें क्यों करती हो । यह माना कि यहां जीवन केन्द्र- बिन्दु से उसके विस्तार वृत्त को और जा रहा है । पर ये समस्त लौकिक भोग अनिश्चित और अस्थायी हैं क्योंकि भौतिकता केदल सोमित्त मुख का साधन है। उससे मनुष्य को आत्मा को कभी तृप्ति नहीं हो सकती। पर तुम्हारी सम्पूर्ण ससार से निवृत्त होकर एक कोने में बवले बटने को इच्छा भी तो उतनी ही पलायनवादी है।' फिर अनीता को समभाता हा अशोक वहने लगा, 'यासिर पलायन किसे कहते हैं, पराजित और निराश जीवन को ही न । जिस प्रकार मंगल लोक की विज्ञान के वाब उपकरणों और वैभव तथा ऐश्वर्य पर पल्लवित होने वाली संस्कृति असफल जीवन से पलायन होने का परिणाम है उसी प्रकार युगो से चला थाने वाला निवृत्ति मार्ग भी केवल लात्म प्रवचना ही है। इन दोनो का ध्यय जीवन की निष्फनता को भुलाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं। वाहा त्याग और बलिदान उतना ही अस्वस्थता सूचप है जितनी उत्तेजनात्मक आसक्ति और भोग । इस भौतिक प्रवृत्ति और यात्मिक निवृत्ति को ही प्रकृति और पुरुप, माया और ब्रह्म कहा गया है । पर तुम्हें तो समस्त द्वन्द को मिटाना है। इसके मिटते ही आनन्द और सभास तत्व का उदय हो जायगा । विश्वात्मा का यही चिर मगल तत्व शिव है। इसी से मानव और महामानव का भेद समाप्त होगा और इसी से वह सर्वोच्च शक्ति हम सब की स्थलतम चेतना में अवतरित होगी। अशोक की बातो ने अनीता को निस्तब्ध कर दिया। उसे आज अशोर में सम्पूर्ण मानव के दर्शन हुए । छलछलाते नेत्रो से वह अशोर की ओर देखती हुई बोली-'मुझे क्षमा करो, क्षगिर भायुक्ता में सावर में अपने कर्तव्य को भूल गई थी। तुमने जो मुझे आज भान दिया है, उसे मैं जीवन पर्यन्त न भूलूंगी। पहले मैंन अपना जीवन तुम्हें समर्पिन फेवल भावनावश किया था, आज त और शान की पसौटी पर चढ़ा पर उसे तुम्हे समर्पित कर रही हूँ।' अनीता इसके आगे और कुछ न कह सकी।

१७२
[ २६ ]
अशोक और अनीता जब इस तरह वातें कर रहे थे तो अचा-
नक जोन के साथ टोनी ने कमरे में प्रवेश किया । वह कुछ
परेशान था। उसने हमें देखते ही कहा-'मदालसा की तबीयत
अचानक खराब हो गई है। आज मैं और डोनाल्ड दिन में उसको
प्रादेशिक चिकित्सालय में ले गये थे। वहाँ पर उस की परीक्षा की
गई। मुख्य चिकित्सक ने बताया कि अत्यधिक सोमवटी पान से
उसका शरीर जर्जर हो चुका है और महामानवों के साथ अत्यधिक
यौन क्रीड़ा इस मानवी को सहन नहीं हो सकी है, इसलिए अब
वह बच नहीं सकती।
अशोक और अनीता ने यह सुना तो उनको भारी आघात
पहुँचा और उन्होंने चितित स्वर में कहा-'इस समय मदालसा
कहाँ है ?'
'उसको प्रादेशीय महामानव निर्माता को याज्ञानुसार मृत्यु-गृह
में पहुँचा दिया गया है।'
'यह मृत्यु-गृह क्या चीज है ?'-अचानक अनीता ने पूछा।
"जब मंगल लोक में किसी महामानव का अन्त समय निकट आ
जाता है तो उसको मृत्यु-गृह में भेज दिया जाता है, वहां पर उसके
चारों और इस प्रकार का वातावरण रखा जाता है ताकि वह शान्ति
से मर सके। औषधि विज्ञान के अत्यधिक विकसित होने के कारण
मरने से एक क्षण पूर्व तक भी गरीर के किसी भी अङ्ग
में कोई
पीड़ा नहीं होती। मृत्यु आमुख व्यक्तियों के लिए मृत्यु-गृह में अत्या-

धिक मनोरजक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं, जिससे मरते समय
तक वे मृत्यु से किसी भी प्रकार भयभीत न हो। इसी मृत्यु-गृह मे
मदालसा भेजी गई है।
अशोर मदालसा के बारे में अत्यधिक चिन्तित हो गया था,
इसलिए उसने पूछा-'च्या वहाँ पर हम लोग इस समय नहीं जा
सस्ते ?"
'इस समय तो आपको वहां जाने के लिए आज्ञा नहीं मिल
सकेगी, पल क्सिी समय आप वहां पर जा सकते है इतना कहकर
टोनी अपने कमरे में चला गया।
अशोर ने जोन से पूछा- अब क्या किया जाय । आप जानते
। कि मदालमा हमारे साथ पृथ्वी से यहां पर आई है उसके प्रति
री
हमारा कुछ वर्त्तव्य है । हमे वह पूरा करना चाहिए।'
'लेकिन इसमे चिन्ता जैसी कोई बात नहीं है। क्ल प्रात काल ही
मैं प्रादेशिक महामानव निर्माता से आपके लिए मृत्यु-गृह का आज्ञा-
पत्र ले आऊंगा।'
'हम मदालसा से ययासम्भव शीघ्र मिलना चाहते हैं। इसके
लिए आप जो कुछ भी कर मक्ते हैं, वह कृपया तुरन्त परें।' इतना
यह पर अशोर अपने पलग पर पड गया। उमे पता नही कि पब
जोन समरे से गया । उमको अर तर मदालसा वे पतन पर दुख था,
पर अब उसके हृदय में उसके लिए सहानुभूति उमह रही थी। वह
सोच रहा था कि यदि मदालसा का पर्याप्त ध्यान रखा जाता तो
उसी ऐमी दशा न हो पाती। वह रात भर परवटें बदलता रहा।
.

1 उसका मन विक्षोभ से भर गया । वह अपने को दोपी समझने लगा और इसी उधेड़ बुन में उसकी सारी रात निकल गई। अनीता यह सब देख कर भी चुप रही। दूसरे दिन प्रातः काल ही जोन की सहायता से अशोक ने प्रादे- शिक महामानव निर्माता से मृत्यु-गृह में जाने का आज्ञापत्र ले लिया। अशोक, अनीता और जोन तीनों गगन गाड़ी द्वारा मृत्यु-गृह में पहुँच गये। जोन ने मृत्यु-गृह के अधिकारी को आज्ञापत्र दिखा कर उस कमरे में प्रवेश किया जिसमें मदालसा लेटी हुई थी। कमरे में शमशान जैसी शान्ति व्याप्त थी। यह काफी बड़ा कमरा था, दोनों ओर एक निश्चित दूरी पर बहुत-से पलग दो कतारों में लगे थे। सभी पर महामानव लेटे हुए थे। उनको देखने से ऐसा लगता था जैसे वे अफीम की पिनक में पड़े हों। कमरे के बीच में दो पलंगों के आमने-सामने एक-एक चलचित्र-पट लगा हुआ था और उन पर तरह-तरह के चलचित्र दिखाए जा रहे थे। पलंग काफी ऊँचे थे। इतने ऊँचे कि उन पर लेट कर भी चलचित्रों को देखा जा सकता था। प्रत्येक दो पलंगों के बीच में एक-एक परिचा- रिका बैठी हुई थी, जो समय-समय पर पलंगों पर पड़े महामानवों को सोमवटी को एक निश्चित मात्रा सिलाती रहती थी। जोन से पूछने पर पता चला कि ये सभी महामानव कुछ ही दिन के मेहमान हैं। पर हमने उनके मुख पर किमी प्रकार की व्यग्रता के चिह्न नहीं देखे । अशोक मदालसा को देखने के लिए बड़ा व्यग्न था, इसलिए वह आगे बढ़ता गया। कमरे के अन्त में एक पलंग पर

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लगती । डोनाल्ड इस कार्य में सिद्धहस्त है। हेनरी भी सुन्दर युवक है पर वह अपता बहुत है । ... खेल घर में वे छोटे-छोटे बालक यौन खेलो को खेलते हुए कितने अच्छे लगते हैं। इसी कारण उनको बड़े होकर कुछ भी करने में संकोच नहीं होता। मुझे तो फिर भी थोड़ी बहुत हिचक लगती है। हा-हा-हा मगल लोक कितना अच्छा है।' इतना कह कर वह चुप हो गई। परिचारिका ने उसको सोमवटी खिलाई और वह फिर मस्त होकर चलचित्रों को देखने लगी। अशोक और अनीता को मदालसा की ये बातें बिल्कुल भी नहीं सुहाई। वे मदालसा से सहानुभूति प्रदर्शित करने के लिए आए थे, पर मदालसा को उनकी सहानुभूति की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। अशोक ने मदालसा से बोलने का कुछ प्रयत्न किया, किन्तु उसने अशोक को पहचानने से साफ इन्कार कर दिया ! मदालसा से ध्यान हटा कर अशोक और अनीता ने मृत्यु-गृह की परिचारिकाओं पर दृष्टिपात किया । हमने देखा कि किसी भी परिचारिका के मुख पर उस प्रकार का गम्भीर भाव नहीं था, जैसा कि मृत्यु-गृह में होना चाहिए था। कमरे के वातावरण को देख कर कोई यह नहीं कह सक्ता था कि इसमे ऐसे लोग पड़े हुए हैं, जिनका अन्त समय निकद है । रोगी बड़े आराम के साथ चलचित्रों को देख रहे थे । मदालसा ने फिर प्रलाप आरम्भ कर दिया था। वह कह रही धी 'मुझे सबमे बड़ो परेशानी यहाँ इसलिए हुई क्योंकि वाम नहीं है। मरी, नीलिमा और मारगरेट सभी विना गर्भाशय के पैदा हुई हैं, इसलिए उनको इन्द्रियजनित सुख का भरपूर आनन्द मिला है । पर एक मैं अभागी हूँ। मैंने जब कभी भी उनसे सन्तान के विपस में बातें की, उन्होंने मुझे प्रतिगामी रह कर मेरा मजार उडाया । पर मैं विम प्रकार माता-पिता, भाई-बहिन के विचारों को निकाल सक्ती थी। कभी-कभी मेरे मन मे हैनरी के प्रति मोह पंदा होता और उसको अपना मममने लगती। पर हैनरी मेरे साथ सब पुछ करके भी मुझे ऐसे भूल गया, जैमे मुझे वह जानता ही न हो।' हम मदालसा को इन बातो को सुनते-सुनने तग आ गए थे। हम नहीं चाहते थे कि हम वहाँ पर एक क्षण भी रखें और उसके पास रखना भी अर्थहीन था, क्योकि वह अघ पतन की अन्तिम सोमा तक पहुंच चुकी थी। इसलिए हम मदालसा को इस प्रकार की बातें वरता छोड कर कमरे से बाहर निकल आए। हमने उसी समय कमरे में कुछ र वर्गीप बच्चो को प्रवेश करते हुए देखा । अनीता ने जोन से पूधा--'ये बच्चे मृत्यु-गृह में वया कर रहे हैं " "इनकी मृत्यु के प्रति अभ्यस्त यनना मिपाया जा रहा है । मृत्यु आने पर यह निर्भर रहे, किसी प्रकार या उन्ह डर न लगे, इमलिये यहां के प्रत्येक पमरे में उनसे घुमाया जायगा।" अनीता से यह कुछ अजीव मा लगा। उसने जोन से आग्रह पिया कि वह उनको मृत्यु के प्रति बम्पस्त होता देखना चाहती है। असोर का मन वही और था इमलिये अशोर को वहीं पर छोड पर अनीता और जोन उस रमरे मे धुम गये। अनीता ने देवा, र वर्गीय जुड़वा बच्चों में से सभी की पोशार एव सी है, और आकार ए मा है । बम गर्ने में एक एव पट्टी पड़ी हुई है जो उनकी भिन्नता यो प्रगट पर रही है। उनवे साप दो निरीश भी पे।

- दोनों बच्चों को काल के मुख में पड़े महामानवों को दिखा दिखा कर कुछ बातें बता रहे थे। एक निरीक्षक कह रहा था 'यह महामानव इस दुनिया में चार दिन का और मेहमान है, पर तुम देखते हो इसके मुख पर किसी प्रकार की शिकन नहीं, घबराहट नहीं, यह गले में पड़े हुए चलचित्र का रसास्वादन कर रहा है।' निरीक्षक आगे बढा । दूसरे पलंग के निकट पहुँच कर बोला, 'यह महामानव कल शाम तक मर जायेगा, पर इसको देखो यह कितना प्रसन्न है । कोई भी बालक उससे बात कर सकता है।' र वर्गीय एक बालक आगे बढ़ा। उसने रोगी पूछा "आपको कोई कष्ट तो नहीं । आपको पता है आप कल तक मर जावेंगे।" मदहोश रोगी ने उत्तर दिया, "मुझे कोई कष्ट-वप्ट नहीं है, मैं मजे में पड़ा चलचित्र रेख रहा हूँ। अभी थोड़ी देर में जब मैं चलचित्र देखता देखता ऊब जाऊँगा तो मेरे कानों के पास लगे यांत्रिक संगीत यंत्र से मंगीत की मधुर लहरें उठने लगेंगी। मैं उनको मुनता मुनता झूमने लगूंगा। कल को मरना है, क्या इसी चिन्ता में मैं अपने आज को पराव कर डालूं। इतना कहकर वह रोगी हम पड़ा। अनीता ने देखा रोगी का मुख दांतों से भरा है, उसके बाल काले हैं और झरौं का नाम निदान तक नहीं है, यद्यपि उसको आयु १०० वर्ष हो चुकी है। अनौता इस नाटक को अधिक समय तक नहीं देख सकी, वह जोन यो लेकर बाहर निकल आई। अशोक अभी तक भी मदालसा की मृत्यु से अधिक उसके पतन के आपात से मुक्त नहीं हुआ था। ।

१७६ सलिए गम्भीर मुद्रा मे वह अनीता और जोन के साथ वापिस अपने मरे पर लौट आया। [ २७ ] हम लोग जब यमरे पर पहुँचे तो बहुत से महामानव हमारी प्रतीक्षा में बैठे हुए थे। आश्चर्य तो यह था कि ऐनी भी इस सभा में उपस्थित थी। अशोर अभी तर भी मदालसा वो बात को नहीं भूल सका था। उसकी मुद्रा अभी तक भी गम्भीर थी। पर भी उसने अपने दोसयत बरवे सभी दो अभ्यर्थना की। सभी महामानवों को मदालसा का मृत्यु-गृह में जाने का पता लग चुका पा। उनके लिए यह कोई नयी बात नहीं थी। इसलिये रिमी ने उस बारे में बात भी नहीं की। पर समन्वय विज्ञान विशारद श्री पोम पोर और अनीता की भावनाओं को समझ गये थे, इसलिये उन्होंने मदालसा के लियं सहानुभूति प्रदर्शित की । अशोक ने अपने धारी और बैठे महामानवो वो देवा । सभी उमी की और देस रहे थे। इसलिए यह स्वप बोला, 'मदालसा की अचानक मृत्यु मै मेरा मन्तुनन कुछ गडबडा गया है । इसलिये मुझे जो कुछ कहना है वह सक्षेप में ही रहूँगा । आरा है आप इसे अन्यया न समझेगे।' इतना पहार अशोर पोडा मा और फिर बोला, 'यह माना कि महा. मानव समाज ने जीवन निर्वाह को आवश्यक सामग्री मवरे लिये मुलभ पर दी है, प्रपत्र व्यक्ति को कम से कम और अधिर' से अधिर विश्राम दे दिया है और जनमख्या को संतुलित कर दिया है पर यहाँ पर प्रत्पेर महामानव सी पक्तिगत विशेषता और गुणों ।

, दोनों बच्चों को काल के मुख में पड़े महामानवों को दिखा दिखा कर बातें बता रहे थे। एक निरीक्षक कह रहा था 'यह महामानव इस दुनिया में चार दिन का और मेहमान है, पर तुम देखते हो इसके मुख पर किसी प्रकार की शिकन नहीं, धयराहट नहीं, यह गले में पड़े हुए चलचित्र का रसास्वादन कर रहा है ।' निरीक्षक आगे बढ़ा। दूसरे पलंग के निकट पहुँच कर बोला, 'यह महामानव कल शाम तक मर जायेगा, पर इसको देखो यह कितना प्रसन्न है । कोई भी बालक उससे बातें कर सकता है।' र वर्गीय एक वालक आगे बढ़ा। उसने रोगी से पूछा "आपको कोई कप्ट तो नहीं। आपको पता है आप कल तक मर जावेंगे।" मदहोश रोगी ने उत्तर दिया, "मुझे कोई कष्ट-वष्ट नहीं है, मैं मजे में पड़ा चलचित्र रेख रहा हूँ। अभी थोडी देर में जब मैं चलचित्र देखता देखता ऊब जाऊँगा तो मेरे कानों के पास लगे यांत्रिक संगीत यंत्र रो मंगीत की मधुर लहरें उठने लगेंगी। मैं उनको सुनता सुनता झूमने लगूंगा। कल को मरना है, क्या इसी चिन्ता में मैं अपने आज को सराब कर डालूं। इतना कहकर वह रोगी हंस पड़ा। अनीता ने देखा रोगी का मुख दांतों से भरा है, उसके बाल काले हैं और झुरौं का नाम निगान तक नहीं है, यद्यपि उसकी आयु १०० वर्ष हो चुकी है। अनीता इस नाटक को अधिक समय तक नही देग सकी, वह जोन को लेकर बाहर निकल आई। अशोक अभी तक भी मदालमा की मृत्यु से अधिक उमके पतन के आपात से मुक्त नहीं हुआ था।

१८१ का आधार बुद्धि में है। इसलिये हमे बुद्धि की शरण म जाना चाहिए, किन्तु आज मगल लोक के सामाजिक ढांचे में वृद्धि और निर्भयता का स्थान सोमवटी ने ले लिया है जिसके कारण महामानवो को अपना मुक्ति पर स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ता और वे अंधेरे म टटालत हुए आगे बढ़ रह है।' प्रसिद्ध याविक वेलस्टोटस्की का अशोर वी बातें वेवल बरवास ही लगी। अशोर की बातें सुनत सुनते वह ऊव चुका था इसलिये वह उत्तेजित हावर बोला, "अशोक जी, मगल- लाय म यहाँ क्या गडबड है, यह ता शायद हम लोग आपसे अच्छी तरह जानते होगे । हमे तो आपसे इसका समाधान चाहिये, क्योकि आप एक ऐमे लार से आय है जहां के मुक्त वातावरण म चिंतन पर कोई अनुश नहीं है।" अशोर से यदि और विसी अवसर पर यह प्रश्न पूछा जाता ता वह निरुत्तर हो गया होता क्योरि इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए उसने हृदय मे भी उस समय से अन्तरद्वन्द चल रहा था जब से वह मगल लोर में आया था। पर मदालसा की सोमवटी पान द्वारा अकाल मृत्यु ने उसरा अत्याधिष प्रभावित किया था और उमे सोमवटी वहिवार में लगा दि जमे उसे अनायास ही उत्तर मिल गया। उसने सहे होकर वहा, "इसरे यि हमको वलिदान करना होगा, कुछ रप्ट उठाना पडेगा, विचार राप्रचार करना होगा। अन्न करण में तीव्रता लानी होगी और बुध दुस सह्न वरने पड़ेंगे।" "हम यह नहीं समभ सदे रि आपका इममे क्या आशय है ? क्या १८० के विकास का कोई अवसर प्रदान नहीं किया गया। "यह कितनी हास्यास्पद स्थिति है कि जिस समाज का निर्माण करने में प्रत्येक महामानव ने अपना अपना योग दिया, आज उसी ममाज ने व्यक्ति को इतना हीन बना दिया है कि यह जानते हुए भी अन्याय हो रहा है, उसका कोई प्रतिरोध नहीं कर सकता।' 'आप ठीक कहते हैं । सचमुच में आज हमारी यही स्थिति है।' मभी महामानव अचानक बोल उठे। लेकिन अशोक तो अपने विचारों मे डूबा हुआ था, इसलिये वह इन बातों को सुनी अनसुनी करते हुए बोला, 'इसके लिये महामानवों को निर्भय बनाना होगा और अपनी बुद्धि और समझ का स्वयं उपयोग करना होगा।' अचानक पूर्व भाग्य रचियता श्री अविनाश बीच में ही बोल उठे, 'पर यह आज के सन्दर्भ में हो कैसे सकता है।' अशोक विना हिचा के बोला, 'इसके लिये तो आज मंगल लोक का संदर्भ ही बदलना होगा और नये मूल्य स्थापित करने होंगे। क्योंकि आज के महामानव समाज ने तो अपना आधार पूर्णतया भौतिक जगत के विज्ञानों को मान लिया है। भौतिक जगत के विज्ञानों में शक्ति तो है । पर इन विज्ञानों को अपने को कुछ मर्यादाओं में बांधने की न तो बुद्धि है और न व्यक्ति को निर्भय बनाने की भक्ति । इनमें युद्धि आये भी कैसे । क्योंकि ये तो केवल शक्ति मात्र हैं फिर निर्भय बनाने की शक्ति का तो प्रश्न ही नहीं उटता । वुद्धि और निभंयता का देवता तो अलग ही है । विज्ञान का अच्छा या बुरा दोनों प्रकार से उपयोग हो सकता है, और अच्छे या पुरे उपयोग का आधार बुद्धि में है। इसलिये हमें बुद्धि की शरण में जाना चाहिए, विन्तु भाज मगल लोक के सामाजिक ढांचे में बुद्धि और निर्भयता का स्थान सोमवटी ने ले लिया है जिसके कारण महामानवो को अपना मुक्ति पय स्पष्ट दिखाई नहीं पहता और वे अंधेरे में टटोलने हुए आगे बढ़ रहे है। प्रसिद्ध यात्रिन वेलस्टोटस्को वा अशोर वी बातें दल बकवास हो लगी। अगोर की बातें सुनते सुनते वह ऊब चुका था इमलिये वह उत्तेजित होकर बोला, "अशोक जी, मगल- लोक में यहां क्या गडबड है, यह तो मायद हम लोग आपसे अच्छी तरह जानते होगे । हमे तो आपसे इसका समाधान चाहिए, क्योकि आप एक ऐमे लोक से आये है जहाँ से मुक्त वातावरण में चितन पर कोई अकुश नहीं है।" अशोर मे यदि और पिसी अवसर पर यह प्रश्न पूछा जाता ता वह निरुत्तर हो गया होता क्योरि इग प्रश्न का उत्तर पाने के लिए उसरे हृदय में भी उम समय से अन्तरद्वन्द चल रहा था जब से वह मगल सोर में आया या पिर मदालसा की सोमवटी पान द्वारा अबाल मृत्यु ने उसको अत्याधिर प्रभावित किया था और उने सोमवटी वहिवार में लगा कि जैसे उसे अनायाम ही उत्तर मिल गया। उसने सहे होरर यहा, "इसके लिये हमको बलिदान करना होगा, गुट बप्ट उठाना पडेगा, विचार का प्रचार करना होगा। अल करण मे तीवता सानी होगी और बुध दुम सहन करने पड़ेंगे।" "हम यह नहीं समझ सरे दि आपरा इमसे क्या माराय है क्या १८२ मुक्त हो आप उसको अधिक स्पष्ट करने का कष्ट करेंगे?"-भौतिक शास्त्री अरुण ने कहा। "क्यों नहीं, मेरे कहने का तात्पर्य है कि हमको मंगल लोक के सबसे बड़े अस्त्र पर कुठाराघात करना होगा जिसने महामानव को बेहोश और बेसुध बनाया हुआ है। आज मंगल लोक के सम्पूर्ण महामानव सोमवटी पान में रत है। यही सोमवटी-पान रमणीय कुमार्ग का रूप लेकर महामानव को कल्याण के पथ से दूर ले जा रहा है। यह माना कि इसके पान से महामानव कुछ समय के लिये व्याकुलता को भूल जाता है, वह चिन्ताओं और निराशा से जाता है, वह अपनी वास्तविक स्थिति की गहन वेदना का अनुभव नहीं कर पाता, पर इस पलायनवादी विधि से महामानव कब तक अपने को भुलावे में रस सकता है । सोमवटी ने उसे बुद्धिहीन और जड़ बना दिया है, वह अपने चित पर से अधिकार खो बैठा है। इसी के कारण आज मगल लोक में असत्य ने सत्य, अज्ञान ने विज्ञान और अकार्य ने कार्य का रूप धारण कर लिया है।" इतना कहकर अशोक कुछ क्षण के लिये एका। महामानवों ने देसा अशोक के मुख पर एक अद्भुत आभा प्रस्फुटित हो गई है और उसका प्रभाव सभी महामानवों पर व्याप्त हो गया है। अशोक कह रहा था, 'सोमवटी के प्रभाव में महामानव अपनी जीवन पद्धति के सारतत्व को भूल बैठा है। यही उसके नैतिक, आध्यात्मिक और मानसिक स्वतंत्रता के विकास में सबसे बड़ी वाघा बन गया है। इसी ने महामानवों को मानसिक और शारीरिक दृष्टि से . निप्रिय बना दिया है । मोमवटी ने यहां पर उत्तेजनात्मर आसक्ति और भोग को प्रोत्साहन दिया है, जिससे सम्पूर्ण महामानव जीवन अभिशप्त हो गया है। इस बुराई को दूर करने के लिये, उत्सवा शोधन करने के लिये, हम सभी को सोमवटी त्याग का प्रेमपूर्वक वचन लेना पडेगा। हम स्वय इम पर आचरण करें और अन्य महामानवों को इस पर आचरण वरने के लिय प्रेम से आग्रह पूर्वक प्रेरित करें और महामानवों में इसी बात का प्रचार करें। उनको स्थान स्थान पर जारर समभायें कि वे सोमवटी वा उपयोग न परें तारि वे अपने अन्तर की उटने वाली आवाज को कम से कम सुन तो सका। असाव का देदीप्यमान मुख देय पर ऐनी को एक विचित्र अनुभूति हुई। उसने देखा मगोर या रग तपे हुए सोन के समान चमक रहा था। उनके तेज ने ऐनी को इतना अधिक प्रभावित किया कि वह तुरन्त ही उटवर बोली, 'मुझे अशोर जी का यह सुभाव पूरी तरह मजूर है और मैंने आज अभी से सोमवटी को त्याग दिया है।' महामानवो में ऐनी की वात दो मुन कर हलचल मच गई। अरुण और वेलस्टोटस्ती एनो वो पागल समझ पर हम दिये पर योम ने उटार बहा, "अगोर जी, हम आपरी इस बात को ती मानने के लिये पार है नि सोमवटो पात्याग र दिला जाम, पर इमा प्रचार की अब महामानवी में क्या आवश्यकता है, यह समझ में नहीं माना। थाप तो व्यक्ति वा स्वतत्रता में हिमानी है। फिर नाप अपने विचारो को महामानवी पर गया यार है ?"

अविनाश भी अशोक की बात को समझ नहीं सका था इसलिये वह भी बोला, 'तो आप समझते हैं कि केवल विचार परिवर्तन से ही आप महामानव समाज को बदलने में सफल हो जायेंगे।' अशोक ने थोड़ा थोड़ा मुस्करा कर कहा- 'इस बात का उत्तर तो भौतिक शास्त्री थी अरुण अच्छी तरह दे सकते हैं क्योंकि छोटे से परमाणु से आपने मंगल लोक में अपरिमित शक्ति प्राप्त कर ली है तो मेरा कहना है कि जब एक साधारण जड परमाणु में इतनी शक्ति है कि वह विश्व की सबसे बड़ी सहारक शक्ति बन सकती है तो हमारे विचार रूपी चैतन्य परमाणु में कितनी अपरिमित शक्ति होगी । इसका इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि एक विचार रूपी बीज को बोते ही वातावरण में विचार परिवर्तन होने लगता है, हृदय परिवर्तन सक्रिय हो उठता है और इन दोनों से स्थिति विवश होकर बदल जाती है और तभी नये मानव का निर्माण होता है। भौतिक शास्त्री अरण अशोक की बातों को स्वीकार करते हुए बोले, 'विवार से नवीन समाज निर्माण की बात मान भी ली जाय । पर हम यह तो जानें कि आप सोमवटी बहिष्कार द्वारा कोन से विचार का प्रतिपादन कर रहे हैं।' अशोक को अरुण की दात पर हंसी आ गई। वह बोला, "मैंने अभी आपको बताया है कि सोमवटी वहिप्कार तो मेरे द्वारा पहले बताये गए वैचारिक आन्दोलन का केवल एक संकेत मात्र है।' 'आके वचनानुमार चलने से तो सर्वत्र हाहाकार मच जायगा।

- जव सभी महामानव स्वतन्त्र हो जायेगे तो फिर अनुशासन तिरोहित हो जायगा ।' भावानन्द ने कहा- 'मेरी बातो का गलत अर्थ न निकालिये।'-अशा भावावेश मे बोला। 'पर आप तो हमें गलत मार्ग दर्शन दे रह है, क्या आप चाहन हैं वि मगल लोक में प्राप्त एक्ता को हम समाप्त कर दें।'पह वेलेस्टोटस्वी था। अशोक ने संयत भाषा में कहा, 'जिस एक्ता को वात आप वह रहे है, उसी की आड लेकर यहाँ के विधाताओ न आपको बुटू बनाया हुआ है । जिस समाज निर्माण का मैं स्वप्न देखता हूँ उसके लिय एक्ता की नहीं, सामजस्यता की आवश्यकता होती है। एषता का नारा तो परीक्षामा प्रगट ६प से विमीन किमी प्रकार के अधिनाय- पवाद को जन्म देता है और व्यक्ति में व्यक्तित्व को नष्ट परलेस वारण बनता है। किन्तु सर्व-जन-समाज सभी व्यक्तियो वा अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का पूरा अवसर देता है । उसमे सभी व्यक्ति समाज के हित के लिय अपने व्यक्तित्व को ज्यो वा त्यो रस पर एक साथ आगे बढ़ने है । इस प्रकार की सामाजिक रचना यदि मगल लोक में आनी है तो उसके लिये अधिनायकवाद की प्रतीक सोमवटी के वहिवार थान्दोलन को प्रत्यक महामानव तक पहुँचाना आव. अशोष इतना बह कर अपने स्थान पर बैठ गया। मभा में पारी देर के लिये तो सपाटा छा गया। सभी महामानवो पो लगा कि १८८ विचारो के प्रचार में लगे रहे तो वह दिन दूर नहीं जब कि महा- मानव समाज इसका विरोध करने लगेगा। विरोध होते हमें समझ लेना चाहिये कि अब हमारे आन्दोलन की जड़ें जम चुकी है। तीनों महामानव अशोक को इसी प्रकार की बातों को सुनते मुनते तग आ गये थे इसलिये वे तीनों एक साथ ही बोल पड़े, 'जब तक कोई जोशीला कार्य हम नहीं करेंगे हमारा यह आन्दोलन सफल नहीं होगा। अशोक ने उनको वहुत समझाया पर उनकी समझ में एक न आई। अन्त में अशोक ने उनके सामने एक नया प्रस्ताव रखा। उसने बताया कि सोमवटी बहिष्कार को प्रयत्न कारखाने में अवकाश के ममय करके देखा जाय । अविनाश को यह बात कुछ जच गई वह कहने लगा 'म' वर्गीय महामानव तो हमारी हंसी उड़ाते हैं, पर अन्य वर्गों के लोग शायद हमारी बातो को सुनना पसन्द करेंगे । अब मौका भी अच्छा है। क्योंकि अभपूर्णा कारखाने में दो तीन दिन से 'त' वर्गीय महामानवों को सोमवटी नहीं बांटी गई है।' अशोक ने यह बात सुनी तो वह उछल पडा । उसने इसका कारण पूटा । अविनाश ने यताया कि कभी कभी सोमवटी को मांग इतनी बढ़ जाता है कि उसको सभी महामानवों को देना मुश्किल हो जाता है। ऐसे संकट के समय 'त' वर्गीय महामानवों को सोमवटी नही दी जाती वयोनिः उनकी शरीर रचना एसी की गई है कि वे एक १८१ सप्ताह तक सोमवटी के बिना भी आगम स रह सकते हैं । अशोक ने कहा, 'सोमवटी वहिप्यार को वात त' वर्गीय महामानवो को ऐसे ही समम सबसे जल्दी आ सकती है। वहीं चल र वहिवार का पहला जन-आन्दोलन शुरू किया जाय । अविनाश ने कहा अन्नपूर्णा कारखाना सारे वनस्पनि प्रदेश को पाद्य पदार्थ सप्लाई करता है। इसलिये वहाँ पर आप केवल एक बार ही जा मकेंगे। सभी का एक से अधिक बार वहाँ पर बिना काम के प्रवेश वजित है । लेकिन इससे आप घबरायें नहीं। मैं अभी अपन टेलीपट पर आपको अन्नपूर्णा कारखाने या दिग्दर्शन कराये देता हूँ ताकि आप यह यता मरें कि अपने काम के लिये वहाँ कौनसा स्थान उपयुन रहेगा।" टेलोपट पर अन्नपूर्णा वारपान का चित्र आ गया । अविनाश ने बताया कि यही अन्नपूर्णा वारसाना है और इमरी क्षमता इतनी धिर है कि इससे जो मागो सो मिल जाता है और इसका मडार भी रिक्त नहीं होता। पौल मिश्रित आश्चर्य से अशोर ने यह सब सुना और भौचना सा वह टैलीपट पर देयने लगा। उमको एक पारदशर इमारत नजर आई जो गतिशील नीव पर सही धीरे धीरे भूयं ये साय घूम रही थी। सच का एक बहुत बहा दर्पण धूप को पेन्द्रित सर पारणाने में मभी भागो में पहुंचा रहा था। बडे बडे नलो द्वारा एक होज में पारबन डाइ आक्साइड जमा की जा रही थी। एम होज पानी मे भरी थी और तीमरी होत्र में लोरोफिन या पर्णहरित या । कुछ त वर्गीय महामानव क्लोरोफिल को इधर से उघर ला रहे थे। कमरों मे वृहत बेलनाकार पारदर्शक पाय रखते हुए थे जिनसे चार बड़े बड़े नल जुड़े हुए थे। इनसे एक निश्चित क्रम के अनुसार क्लोरोफिल पानी, कार्बन डाइआक्साइड और रोशनी जा रही थी। अन्त में जो माल इस उपकरण से तैयार होकर निकल रहा था, उसको देख कर अशोक और अनीता दोनो को बड़ा आश्चर्य हुआ। विटामिन की गोलियां, पूर्व पचित सघन साद्य, बुनियादी ग्याध, वस्तुयें, मण्ड, प्रोटीन और वस्न सभी पानी, क्लोरोफिल, कार्वन डाइआक्साइड और धूप से तैयार हो रहे थे। इनको त वर्गीय महा- मानव अलग करने में लगे हुए थे । अशोक को याद आया कि प्रकाश संश्लेपण के फलस्वरूप ही ठीक चैमे ही यह चीजें बन रही हैं जैसे पौधों के अन्दर कर । मंडधारी अनाज, प्रोटीनधारी दालें और तन्तुधारी कपास बनती हैं। न जाने वह कितने सवाल इस बारे में अविनाश से पूछता पर तभी अविनाश ने उसरा ध्यान भंग करते हुए कहा, 'बस यही उपयुक्त जगह हो सकती है क्योकि यही पर त वर्गीय महामानव सबसे अधिक काम करते है।' टैलोपट पर अब वह स्थान नजर आ रहा था जहाँ पर त वर्गीय महामानव सोमवटी लेने के लिए इकट्ठा थे। अशोक ने देखा ये बड़ा हो हल्ला मचा रहे हैं। ! अशोक ने कहा, "आप टीफ, रहते हैं अभी जो-जो महामानव सोमवटी बहिवार आन्दोलन के लिए चलना चाहते हैं उनको इकट्टा करलो।"

अन्नपूर्णा कारखाने में जब हमने प्रवेश दिया तो उसकी पहली पालो सतम हो चुकी थी और दूमरी पाली के त-वर्गीय महामानव काम करने के लिए बड़े हॉल में खडे हो गये थे। कालो पोशाक पहें यह रावण की सेना जैसे लगते थे। हर एक के गले में एक-एक पट्टी पडी हुई थी और उस पर न जाने क्या क्या लिखा था। वे सभी सोमवटी न मिलने के कारण अपने असन्तोप को एक दूसरे पर प्रकट पर रहे थे। अशोर ने इस अवसर को अत्यधिक उपयुक्त समझा और वह एर सोने में बडा होरर बोलने लगा, "माथियो मैं जानता हूँ कि आपरो सोमवटी न मिलने के कारण वडा रप्ट हो रहा है। इसके अभाव में आप दुख और चिन्ना ने घेर लिया है। अभी शायद एक दो दिन और बिना सोमवटी के ही काम चलाना होगा । पर अगर आप स्वेच्छा से ही सोमवटी का त्याग कर दें तो न केवल आपको अपनी रिपो दाति या भान होगा, परन् आपका जीवन भी पूरी तरह बदल जायगा।" त वर्गीय महामानवो ने समभा दि अशोर उनको ऐमा उपदेश इसलिए दे रहा है क्योरि अभी मोमवटी मिलने में देर लगेगी इसलिए उनमे में एक महामानव दोल उठा, "मोमपटी साने चिन्ता जदामी भागे । ऐमी दशा में हम सोमवटी का उपयोग वची न करें।" अशोर को इस प्ररार बीच में बोलना बहुत अपरा फिर भी यह योरता ही गया, "यह माना रि मोमवटी से पुर ममय ये लिए १६२ स्फूर्ति मिल जाती है और मानसिक दवाव हल्का हो जाता है, पर कुछ समय बाद जब उसका प्रभाव जाता रहता है तो सारा शरीर शिथिल पड़ जाता है और दिमाग निष्क्रिय और निश्चेष्ट हो जाता है । आप आज भी तो बिना सोमवटी के रह रहे है। यदि आप इस बात का दृढ़ निश्चय करलें कि हमे सोमवटी का इस्तमाल नहीं करना है तो में मच कहता हूँ कि आपको इम क्षणिक आनन्द के बदले जीवन का पूर्ण रस मिलेगा।" भीड़ में कुछ हलचल हुई और कुछ महामानवो ने जोर से कहा, "हम आपका भाषण नहीं सुनना चाहते, हम मोमवटी के खिलाफ कुछ भी नहीं सुनना चाहते ।" अनेक आवाजों के बीच जब ऐनी ने अशोक की आवाज मन्द होने देवी तो वह अनीता का हाथ पकड कर आगे आई और बोली, "अशोक जी विलकुल ठीक कह रहे हैं । मैंने खुद जब से सोमवटी छोड़ी है, तब से मुझ में एक नया जीवन आ गया है और मेरी बहन यह अनीता; जिसने कभी जीवन में सोमवटी का उपयोग नहीं किया है, मम्पूर्ण महामानव समाज की सर्वश्रेष्ठ मुन्दरी से भी हजारों गुना सुन्दर है । साथ ही वह हमारे मे कहीं अधिक आनन्द अनुभव करती है। बोलो क्या तुम लोग ऐसा होना नहीं चाहते ?" त वर्गीय महामानवों ने जीवन में पहली बार स वर्गीय महा. मानवी को इतने निकट से देखा था। फिर उनके साथ जो अजीय मुन्दरी पड़ी थी, वैमा रूप तो उन्होंने आज तक नहीं देखा था। उमरा सम्मोहन उन पर कुछ विचित्र प्रकार का प्रभाव डाल रहा था। कुछ त वर्गीय महामानव आगे बरे और उन्होन जोर में महा, "हम सोमवटी का इस्तमाल कभी नहीं करेंगे।" ऐनी जोर से बोली, "सायास ! हम तुमसे यही आशा पी।" और इतना कहर वह उन त वर्गीय महामानवों को खुद जा जाकर थपथपाने लगी। म वर्गीय महामानवी मे ऐसा प्रिय व्यवहार किमी भी त वर्गीय महामानव को नहीं मिला था। इसलिए वे सभी एक- एक बरखे मोमवटी न खाने का वचन सेने लगे। पर तभी एक र वर्गीय महामानव ने आएर घोपणा की, "आप लोगों को सोमवटी अभी दी जायगी।" साय हो मोमवटी बटने को घण्टी भी बज उठी। अभी अभी जिन महामानवों ने सोमवटी न खाने का वचन दिया था, उनमें से भी अनेक महामानव मोमवटी लेने वाली कतार में बडे होने के लिये जाने लगे। अशोर ने यह देखा तो उसने बडे जोर से पहा, 'मेरे रहते हुये यहां पर कोई भी सोमवटी को प्राप्त नहीं कर सकेगा। जो सोमवटी लेने के लिये आगे बढेगा, उमवो मेरे शरीर पर गे होकर जाना होगा।" इतना कहकर अशोष पर्श पर लेट गया। त वर्गीय श्रमिकों में निये एष नई परिस्थिति पैदा हो गई थी। उनमे से जिनको मोमवरी प्राप्त करने की गीघ्रता थी, वे आगे बढे। अनीता ने यह देगा तो यह भी लेट गई। ऐनी भी अपने कौन रोग मली। वह भी अनौना रे साथ ही संट गई। ऐमा होते ही जो महामानव मोमवटी न साने का वचन से चुरे थे, उन्होंने घोषणा कर दी कि यदि कोई ऐनी और अनीता की प्रेरकर आगे बढ़ा तो उसका भर्ना बना दिया जायगा।

१६४ उघर भीड़ को सोमवटी प्राप्त न करने का विलम्ब दूभर हो रहा था । भीड़ में से फिर आवाजें आई. आगे बढ़ो और महामानवों की एक लहर आगे बढ़ी पर तभी सोमवटी न खाने वाले त और स वर्गीय महामानवों ने आगे बढ़ कर अशोक, अनीता और ऐनी के सामने एक दीवार सी बना ली। इससे मोड़ बहुत उत्तेजित हो उरी। भीड़ ने इस मोर्चे पर हमला बोल दिया और जिस महा. मानव के जो हाथ में आया उसी से एक दूसरे पर प्रहार पारने लगा। सब लोग सोमवटी लेना भूल गये और वह हॉल रणक्षेत्र में बदल गया । अशोक, ऐनी और अनीता अपने स्थान से उठे और रणक्षेत्र के बीच में जाकर समझौता करने का प्रयत्न करने लगे। किन्तु नयकारखाने में नूती की आवाज कहाँ मुनाई देती है । उनको भी महामानवों के श्रोध का शिकार होना पड़ा। यह दोनो गुटों के महामानवों के लिये सम्मान का प्रश्न था। दोनों गुट ही मोच रहे थे कि यदि वे हार कर लौटने या भागते है तो उनको मंगल लोक के प्रेषित के अनुसार कोई भारी दण्ड मिलेगा। र वर्गीय महामानव ने यह देखा तो उसने अपने जेयी रेडियो कानून द्वारा मारा गमाचार प्रादेशिक महामानव निर्माता को कह मुनाया। उनका आदंग पाकर र वर्गीय महामानव ने पांत्रिक मम्नियः को चला दिया, जिसमे हॉल में प्रधान महामानव निर्माता के उपदेश का रिकार्ड यजा कर मुनाया जाने लगा। मंगल लोक में झगड़ों को सान्न करने के लिए उपदेगों और विद्रोह रोक्ने के भाषणों में भरे इन रिसाडोंना काफी उपयोग किया जाना था। रिसाई में गे एर आवाज निकलने लगी। आवाज अत्यधिक फोमल थी। वह रह रही थी, 'मेरे मित्रो, मेरे माथियों, थोडा को और शान्त हो । मेरी बात को सुनो-इस प्रकार से असभ्य बनने से क्या अर्थ होते हैं । या इममे यह समझ दि आप अपने को प्रमान नहीं समझने ? क्या आप सब मिलकर खुग नहीं है ? आप मभी अच्छे हैं आप मदेव प्रमान चित्त रहते हैं, आप अपने सद्व्यवहार को स्मरण करें। 'प्रत्येक प्रत्येव के निये' का याद करे। ममाज के हित में अपने वो लगावें। अब आप भान्त हो, गान्त हो-मैं आपरा अच्छा देखना चाहता हूँ।' इम आवाज ये मुनते ही मारे हॉन में थोड़ी देर के लिये तो मचमुच ही शान्लि छा गई । प्रत्येक महामानव रिकार्ड पर वजी पनि को ध्यानपूर्वक सुनन लगा । अशोक, ऐनी और अनीता काफी पायन हो चुरे थे। उनसे घायन देवकर मोमवटी का बहिष्कार परने वाले महामानवो को फिर जोग आ गया और उन्होंने दूसरे गुट पर फिर हल्ला बोल दिया । दूसरा गुट अपने दो बचाने के लिये प्राण प्रण में कोशिश करने लगा। पर यह गुट हार रहा था, क्योरि आज मगल लोर में पहली बार स वर्गीय महामानव त वर्गीय महामानवो के साथ पन्धे मे कन्धा भिडा कर लड रहे थे। र वर्गीय महामानव द्वारा मूचना पारर अब तक मगन मोर की पुलिम हॉल में प्रवेश पर पुत्री थी । उमने पापो के द्वारा मोमवटी भी गैम मे हॉन गो भरना आरम्भ कर दिया। वे पानी की पिस्तोलो पा उपयोग पर रहे थे। इन पिम्नोलो मे पानी की तेज बोडार निरत रही थी और पुतिम इन बोधारी में महामानवो रे घुटनों यो निशाना बना रही थी। बौछारों की तेजी के पारण महामानों ।

के घुटने मुड़ जाते थे और वे फर्म पर गिर रहे थे। कुछ पम्पों की महायता में इस प्रकार के तरल द्रव्य छोड़े जा रहे ये जो महामानवों को मंशाहीन बना रहे थे। लगभग पांच मिनिट के अन्दर सारे झगड़े पर काबू पा लिया गया। पर तभी अचानक बड़े जोरों को गड़गड़ाहट हुई। हाल में धरती के अन्दर मे एक गोलाकार कमरा ऊपर उठा । इममे सभी महामानव भयभीत हो गये क्योंकि वे जानते थे कि मंगल लोक के प्रधान महामानव निर्माता स्वयं उपस्थित हो गये है। वह गोलाकार कमरा वरावर घूमता रहा । उममें से कुछ तेजदान किरणें निकल कर अशोक और अनीता पर पड़ने लगीं। ऐनी टो किरणों के सम्पर्क में आने के तुरन्त बाद ही भस्म हो गई पर अशोक और अनीता इन किरणों में केवल मंशाहीन ही हुए। उपस्थित महामानवों ने यह देखा तो उनको भारी आश्चर्य हुआ पयोकि मभी महामानव यह जानने पे कि प्रधान महामानव निर्माता के कमरे में निकली किरणें जिम महामानव पर पड़ती है वहीं भरम हो जाना है। पर वे आज अपनी आँखों में यह देख रहे थे कि उन किरणों का मामूली मानवो पर कोई ऐमा प्रभाव नहीं पड़ा । तभी उपस्थित महामानवों ने देखा कि घूमते कमरे की किरणें उन पर पड़ने लगी है । अविनाश समझ गया कि प्रधान महामानव निर्माता उपस्थित महामानों के सामने गामान्य मानवों के हाथों अपनी हार को स्वीकार करना नहीं चाहते, इमलिये उपस्थित सभी महामानवों को वै भस्म कर रहे हैं ताकि उनकी पराजय की यात मंगर मोक के अन्य महामानवों को पता तक नहीं चल सके । थोड़ी ही देर में अशोर और अनीता को छोड़ कर मभी

१९७
महामानव भस्म हो गये। कमरे से अब कुछ अद्भुत न निकली
जो अशोर और अनीता को उठा कर न जाने में नमरे अन्दर
ले गयी और फिर वह घूमता हुआ वमरा जैसे जमीन के अन्दर से
आया था, वैमे ही जमीन के अन्दर गायब हो गया।
[ २८ ]
अगोव और अनीता की आंख खुली तो उन्होन अपने वो एक ऐने
ममरे में पाया जिमको भव्य अतियिशाला वहा जा सकता था।
मगत लोक में पाई जाने वाली सभी वस्तुओं के चित्र उममे मौजूद
थे। एक चित्र पर हमारा ध्यान जावर अटक गया जिसमे प्रथम
प्रधान महामानव निर्माता वोतल से शिशु का आविप्वार परत
दिखाये गये थे। हमे यह बड़ा विचित्र लग रहा था कि हम अपराधी
होते हुए भी अनियिशाला में ठहराये गये हैं । यही कारण था कि
प्रधान महामानव निर्माता को देखने की हमारी इच्छा अन्यधिक
प्रबल हो उठी थी।
बुछ ममय बाद ही हमरी प्रधान महामानव निमांना ममरे
में ले जाया गया। उनरे कमरेको मजावट अनोखी थी। पर प्र०
महामानव निर्माता को दसकर हमारी पल्पना पर भारी तुपारापात
हुआ पयोकिये क्मिी भी तरह अलौविर नहीं थे। अविनाग जमा
ही उना रूप था, वैसा ही रग था। उनमे एक बात अवश्य यी
नि मुस्कराहट जैसे उन ओठी पर सेल रही थी। मुस्तरा हुए
ही उन्होंने हममें कहा, 'भूलोर से आये अशोर और अनीता
आराम से बैट जाओ, मुझे तुममें कुछ बातें करनी है।'

मंगल लोक में हमारे लिये यह प्रथम अवमर था जब कि हमारे नाम के पूर्व अर्ध-सभ्य विशेषण नहीं लगाया गया था और वह भी मंगल लोक के सबसे महान अधिकारी द्वारा । हम इससे अत्यधिक विस्मित हुये और निडर होकर बैठ गये। हमारे मन में स्वतः ही प्रश्न उठा कि महामानव निर्माता हमसे क्या आवश्यक बातें करना चाहते हैं । हम इमी प्रकार सोच रहे थे कि प्रधान महामानव निर्माता ने कहना आरम्भ किया, 'तुम लोग पृथ्वी लोक से चन्द्र लोक को जा रहे थे, जोन और उसके साथियों ने तुमको मौत के मुंह से निकाला । मंगल लोक में तुम्हारा अति- थियों की तरह स्वागत और मत्कार किया गया । तुमको हर तरह को मुविधा उपलब्ध कराई गई । तुम पर पूरी तरह विश्वास किया गया। फिर तुमने क्यों मंगल लोक को वर्तमान व्यवस्था को नष्ट करने का गहन अपराध किया?' अशोक जानता था कि उसमें इस प्रकार का प्रश्न पूछा जायगा और वह उसके लिये तैयार भी था। उसने उत्तर देते हुए कहा, "हमने मंगल लोक को आत्मा को जगाने का प्रयल किया है। हम जब यहाँ आये तो हमने अनुभव किया कि महामानव समाज जैसे जीवन-पद्धति के मार तत्व को भूला जा रहा है। हम इस बात से और भी विस्मित हुए कि यहां पर संतति प्रजनन के लिये जैविक विधि को छोड़ कर भौतिक-रसायनिकः विधि अपनाई जाती है । इम विधि द्वारा बोतलो से मानद के भौतिक परीर की रचना तो कर ली गई है पर मानसिक मान्यतायें ज्यो की त्यों हदिवादी हैं । होना यह चाहिये पा शिभौतिक गरीर विगी भी तरह निमित्त हो, पर मान का

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उनको व्यवहार करना चाहिए। वे चाहते हुए भी उसके विपरीत व्यवहार नहीं कर सकते। यदि इसके बाद भी कुछ गड़बड़ होती है तो फिर सोमवटी है। इतनी बड़ी व्यूह रचना में प्रवेश कर तुम उनको स्वतन्त्रता के अर्थ समझाने का प्रयत्न करते हो। तुम एक पालतू महामानव को एक जंगली मानव की बात समझाना चाहते अनीता की यह बात समझ में नहीं आई। उसने कुछ हिचक कर पूछा-'पालतू महामानव और जंगली मानव से आपका क्या तात्पर्य है ?' प्रधान महोदय ने हँस कर कहा–'तुम लोग जंगली मानव हो, तुम अपनी स्वतन्त्रता के लिए अपने जीवन की भी बलि दे सकते हो। अपनी परतन्यता की बेड़ियो को तोड़ने के लिए जी-तोड़ प्रयत्न करते हो, लहूलुहान हो जाते हो और उस समय तक चैन से नहीं बैठते, जब तक कि स्वतन्त्र नहीं हो जाते, भले ही इसमें जीवन की बाजी लगानी पड़े। किन्तु पालतू महामानव स्वतन्त्रता प्राप्ति के ऐसे सभी प्रयत्नों को घृणा की दृष्टि से देखता है, जिसमें जीवन वी बाजी लगानी पड़ती हो। वह सोचता है कि जीवन स्वतन्त्रता से अधिक मूल्यवान है, किन्तु तुम लोग स्वतन्त्रता को ही जीवन समझते हो-वरा मानव और महामानव में केवल यही अन्तर है ।' अनीता महामानव निर्माता की बातों को सुनकर तिलमिला गई । उनका अंग-अंग गहरी वेदना से मिहर उठा । उसने भावावेदा में कहा, 'हमें तुम्हारा ऐमा आनन्द,पौवन और वैभव नहीं चाहिए जो बरयम ही मनुष्य को अनंतिकता की ओर ले जाता है । हम ऐसी २०३ । सम्यता को भी दूर से ही नमस्कार करते है जिसमे मनुष्य जीवन का मून्य वेवल एक बोनल मर रह गया है। इसके विपरीत पदि हमें स्वतन्त्रता, चितन और जीवन ति वा प्राप्त करने के लिए मृत्यु का भी वरण करना पडे तो हम उसका स्वागत करेंगे।' महामानव निर्माता अनीता व उत्तजना पर मुम्बरा भर दिये और उन्होंने कहा, 'इमे तुम जो कुछ भी कहो, किन्तु ममाज में स्थिरता और अचलता लाने के लिये यह आवश्यक है । मगल लोन को गढ़ने ममय हमारे सामने दा विकल्प थे~समाज का मियर और मचल बनाया जाय अथवा उसम क्ला, मत्य, कल्याणकारी मुन्दरता, आदि विसित किये जायें । हमने प्रयम बात को पसन्द किया । समाज चाम्पिर बनाने के लिये क्ला, मत्य और कल्याणकारी सुन्दरता का जान बूझ कर हमन बलिदान कर दिया । समाज स्थिर हो गया ता दुर्भाग्य का सदा के लिये विदाई सनी पटी, जीने के लिय सघर्ष समाप्त हो गया । तालमाओं की पूनि होने लगी, इमलिय जीवन में लिये सयपं का प्रश्न उठना ही वन्द हो गया । यह माना कि ऐसी परिम्पिनिमा में सच्ची बना पा विधाम नहीं हो पाता, पितु हम मममने है कि समाज में स्थिरता रमन रे लिय यह कोई बड़ा मूल्य हमने नहीं चुराया। इतना होने पर भी हमारे यहाँ साहिय का जन होता है।' अशोर ने व्यग भरे दादो में रहा, "मैंन भी आपरा माहिय देशा है । आपला माहिय देवन ना की जादूगरी हाती है, इसम जीवन रहित चमत्कार होते है। पोथी पर पायो रियो जाती है पर ये उद्देश्य रहिन और अर्थ हान होती हैं, उनमें देवल २०६ अनीता सम्भवतया अपना सन्तुलन खो चुकी थी इसीलिए वह फिर बीच में ही बोल उठी. 'आपको ऐसी खोखली सभ्यता मुबारिक हो जिमने मानव को जीवन विमुप बना दिया है लेकिन हम तो जीवन शक्ति चाहते है । शिमुनिर्माता जमे वैज्ञानिक भले ही किसी जाति को कुछ समय के लिए जीवित रखने में समर्थ हो जायें पर मस्कृति को चिर स्थायी बनाने के लिए ऐसी जीवन शक्ति की आवश्यकता होती है जो अटूट विश्वास और चिन्तन से प्राप्त होती है. जिममें बलिदान और त्याग की आवश्यकता पड़ती है। महा. मानव समाज को ऐमी जीवन शक्ति के अभाव में भला सत्य, सौन्दर्य और कला की अनुभूति कैसे हो सकती है ?" जिन महामानव निर्माता को अनीता की बातों में जोन आ गया था इसलिये वे बोले 'सत्य, मुन्दरता और कला का ढोन तुमने अभी पीटा है, जानती हो, उनकी दोहाई क्यों दी जाती है ? बुढापा और मृत्यु का भय ही गत्य, मुन्दरता और कला की भावनाओं को जन्म देता है क्योंकि मनुप्य को जब बुढ़ापा आकर घेरता है तो वह अपने अन्दर अमीम दुर्बलता का अनुभव करता है । मृत्यु या भय उसको अधिक धार्मिक और नैतिक बना देता है। शायद इमी कारण वर भूलोक में धार्मिकता और नैतिकता मे शब्दों को गढ़ा गया है। महामानव निर्माता ने अशोक और अनीता दोनों को क्षण भर के लिए देखा और फिर उनमे पूछा, 'युढ़ापे में धार्मिकता क्यों बढ़ती है ? इसलिए न कि उस आयु में कामनायें और जालमा प्रान्त होने मगती हैं। योवन पी भावनाओं व वामनाओं के अभाव की पूर्ति के

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T -- वह भी समझना भूल है कि महामानव समाज कला और सौन्दर्य को नष्ट करने में सफल हुआ है। इनको भला कब कौन मार पाया है क्योंकि कला ही वास्तव में जीवन है और जीवन ही सर्वोत्तम कला। स्वयं महामानव उस कला का जीता जागता उदाहरण है। जो कला में रिक्त है वह मृतक समान है।' निर्माता महोदय ने देखा अशोक का मुख देदीप्यमान हो उठा था और उससे एक ऐसी अद्भुत आभा मुक्त हो रही थी जिसके प्रभाव मे महामानव निर्माता भी अछूते न रह सके । उन्हें अचानक उस काल- पुरुप नाम के यन्त्र-मानव की भविष्यवाणी याद हो आई जो उसने विद्वत मण्डली के सम्मुस कही थी। उसने कहा था, 'वर्वर भूलोक से दो मानय आयेंगे, जिन पर मंगल लोक की मृत्यु किरण का प्रभाव नहीं होगा और वे मगल लीक की सभ्यता का रूपान्तरण करेंगे।' महामानव निर्माता यह तो अपनी आंखों ही देख चुके थे कि जिन मृत्यु किरणों से उन्होंने अन्नपूर्णा कारखाने में सभी महामानवों को नष्ट कर दिया था, उनमे अनीता और अशोक केवल संज्ञाहीन ही हुये थे । इसरा कारण महामानव निर्माता ने यह समझा था कि मृत्यु किरण केवल भौतिक-रसायन विधि द्वारा पैदा हुये बोतल के महा. मानवों के लिये ही विकसित की गई थीं । इमलिये नारी में पैदा मानयों पर उनका अधिक प्रभाव नहीं पड़ सकता था, पर अशोक के विचारों को सुन कर महामानव निर्माता का मन स्वयं डोनने लगा था और उनको लग रहा था कि अशोक के व्यक्तित्व में जैसे कोई ऐसी अदृश्य मम्मोहन शक्ति पी जो उनके विचारों को भी प्रभावित कर रही है। इसलिये वे न चाहते हुये भी अनोक की बातों को, मुन रहे थे।

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कुछ बोलना बहुत विशाल है। उसकी विशालता और उदारता में उन्हें सम्पूर्ण महामानव समाज आत्मसात होता दिखाई पड़ा। वे चाहते भी कुछ बोल न सके। उन्होंने सुना अशोक कह रहा था, "मानव युगों के अनुभव से यही निष्कर्ष निकाल पाया था कि सुरक्षा और स्थिरता व्यक्ति स्वातन्त्र के विनाश से ही प्राप्त हो सकती है पर महामानव समाज ने इस तथ्य को भुला दिया । सामाजिक और राज- नैतिक संगठन का उद्देश्य तो मानवी व्यक्तित्व के विकास में सहायक होना है । सत्ता का मूल प्रमाण जनता है, जन शक्ति है। समाज की सभी संस्थायें इसी पर आश्रित हैं। इसीलिये वह तन्त्र प्रधान न होकर मेवा प्रधान होनी चाहिये, जिसमें सेवा सार्वभौम होती है और सत्ता सेविका । पर आपने सत्ता को, राज्य को उस दानव का रूप दे दिया जिससे आज आप अपनी ही सृष्टि के गुलाम बन बैठे हैं । जिस यन्त्र विज्ञान को आप वैज्ञानिक प्रगति का राजकुमार समझे, वही ध्वंस का दानव निकला। मंगल लोक के सम्य महामानवों की यही पर सबसे बड़ी पराजय हुई।' महामानव निर्माता को लगा जैसे उनका बनाया वह यन्त्र- मानव जिसे उन्होंने काल पुरुष का नाम दिया है, समूचे मंगल लोक को निगल रहा है । कल्पना में यह दृश्य जब उनसे और अधिक न देखा जा सका तो उन्होंने अपने नेत्र वन्द कर लिये । जब उनकी संशा लौटी तो भी उन्होंने अशोक को बोलते हुए ही पाया। वह जीवन रस उड़ेलता चला जा रहा था। वह कह रहा था, 'आज मंगल समाज का ढांचा चरमरा रहा है। मंगल सोक के निवामियों ने एक अत्यधिक औद्योगिक सम्यता ।

२११ को प्राप्त करने की कल्पना की थी। उस कल्पना को आधार मानकर विचार विकसित हुये, एक आन्दोलन चला और औद्योगिव सभ्यता आज प्राप्त हो गई है। वह अपने उच्चतम शिखर पर पहुँच चुकी हैं पर इम औद्योगिक सभ्यता के चक्कर में आप मानव सभ्यता के इतिहास को ही भूल गये, जो मानवों के श्वेद और रक्त के सहारे आगे बढ़ा है।' अशोक ने निर्माता महोदय को देखा वे शक्तिहीन से बैठे हुये थे । लगता था जैसे उनका सन्तुलन गडबडा गया है। पर अशोक बोलता गया, 'विशेष परिस्थितियो के बीच ही मानव सभ्यता की ओर अग्रसर हुआ था, क्योकि इन परिस्थितियों ने ही उगे नवीन और अभूतपूर्व प्रयल करने के लिये प्रेरित किया था। बदलने वातावरण से समझौता कर सकने की क्षमता के कारण ही मानव जाति अब तब जीवित रही थी, पर आपने मानव को महा- मानव बना कर वातावरण के अनुकूल बनने की मानव क्षमता पो ही नष्ट कर दिया। भावुकना विशारद, परमाणु वित और शिगु निर्माता के रूप यहाँ के मानव देवल एवागी विवामित ही हो पाये । इसका फल यह हुआ है कि मगल लोक की सभ्यता के पर कालरात्रि गहरी होती जा रही है, जिसका आपको भी ज्ञान है किन्तु समाज को स्थिरता रमने के लिये उसकी अवहेलना करने चले जा रहे हैं। अनीता मन्त्र मुग्ध होकर अशोक री बातें मुन रही थी और निर्माता महोदय उससे बातो को सुन पर अत्यधिर उत्तेजित हो उठे थे। पर अशोक बहता पला जा रहा था, 'आप जान बूझकर परिवारको २१२ रोक रहे हैं। किन्तु नदी के बहाव को कब कौन रोक पाया है। उसको दिशा को बदला जा सकता है पर वह सदैव ही बहती रहती है । मानव बुद्धि की प्रगति के कारण ही युग युग में क्रान्ति का प्रश्न उठता है क्योकि मानव दुद्धि नई परिस्थिति में पुरानो वस्तु से चिपट कर नहीं रहना चाहती, बदलती आवश्यकता के साथ साथ वह बदलती है और संसार बदलता है। यही मान्यता विज्ञान की मान्यता है । आज यही मंगल लोक में हो रहा है । आप चाहें या न चाहे आपको एक न एक दिन महामानवों को स्वस्थ वातावरण और उनकी प्रचेतनाओ को प्रकृत विकास की परिपूर्ण सुविधाएं देनी पड़ेंगी सभी महामानवो की भावी पीढ़ी मन से जितनी संतुलित होगी तन से भी उतनी ही पराक्रमी हो सकेगी। इस प्रकार के समाज को रचने के लिये इच्छा शक्ति को बलवती बनाना होगा और उसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये हमने सोमवटी वहिप्कार आन्दोलन शुरू किया था। यह विचार मंगल लोक में अब काल-प्रवाह बन गया और उसको घसीट कर पीछे नहीं ले जाया जा सकता। पर इसके यह मतलब नहीं हैं कि विज्ञान की दरेघों को रोका जाय अपवा उनको रोकने की आवश्यकता है। हां उसको नैतिक शक्ति के मार्ग दर्शन में रसना हमारा ध्येय है क्योंकि वह शक्ति मात्र है, बुद्धि उसमें नहीं है। इसलिये इस प्रगतिशील वैज्ञानिक मंगल सोक में विज्ञान का एकांगी विचार छोड़कर विज्ञान के समग्र विचार को अपनाना होगा। इसी से महामानवों का स्वयं प्रेरित सहयोगात्मक पुरपायं विषमता के निराकरण और समानता की स्थापना के लिये प्राप्त हो सकेगा।"

अशोक ने देखा निर्माता महोदय निरुत्तर हारर उसके सामन अमहाय अवस्था में बडे थे। पर जमे उनवा अचानक कुछ याद आ गया हो, इस प्रकार वे वोले, "अभी तुम दोनो को मेरे साथ कौतुक भण्डार तर चलना है। वहीं मैं तुम्हारे विरुद्ध लगाय गये अभियोग के बारे में कुछ निर्णय ले सकूँगा।" प्रधान महामानव निर्माता के साथ इस बार हमने जिस कमरे प्रवेश किया उममे चारो ओर पुस्तके फाइलें, समाचार-पत्र, राडयो संग्राह और प्रेपित्र रेको पर लगे हुए थे। उपर छत में लगी अनेक प्रलमारियां नीचे लटक रही थी। स्थान स्थान पर मानवाचार कुछ यन्त्र बडे ध्यानपूर्व साहित्य को देखने म लगे से जान पडते थे। हम सबने अधिक कौतूहल उन्ही को देख कर हुआ । एक कोन में एक और भी विचित्र आवार वा यन्त्र-मानव रखा हुआ था । वह ऐमवस्टस का बना ज्ञात होता था। उसको कदाचित विसी ज्योमित् शास्त्री ने बनाया होगा क्योकि वह देवल रेमाआ, त्रिभुजो आदि के मयोग वा सेल था। मुख में स्थान पर विभुन, गिर के स्थान पर चतुर्भुज और हाय तथा टागो स्थान पर सीधी सीधी रवायें थी। प पारीर वत्र रेवाओं को विभिन्न जोड तोड मे वना हुना था। हम पुस्तकालय के द्वार पर राड मभी वस्तुओ का देमवर विस्मित हो रहे थे कि तभी सामने यो निर्माता महोदय ने कहा, 'पवराभा नहीं, इन रावना रहस्य तुम पर धीरे धीरे प्रगट हो जायगा।' हम पुपचाप निर्माता महोदय के पीछे पीछे पत दिव । अनेर पत्र-मानवो ये ममीप से हम निरं। अनीता उनरे पाम आती तो बाप उठती। पिनी तरह हम लोग एमरे रे बीच में पड़े २१४ विचित्र सोफो पर बैठ गये। महामानव निर्माता ने एस्वस्टस के बने ज्योमिताकार यन्त्र-मानव की ओर संकेत करते हुए कहा, 'अशोक और अनीता सामने जो यन्त्र-मानव देखते हो, वही विद्वत मण्डली का मार्गदर्शक काल-पुरुष है। इसकी शक्ति अनन्त है। यह भूत और भविष्य सभी का ज्ञाता है। इसी के कारण मंगल लोक को नष्ट करना अस- म्भव है । अब मैं तुमको इमी की शक्ति से परिचित कराता हूँ।' इतना कहकर महामानव निर्माता ने दीवार में लगे एक बटन को दवा दिया। इससे यन्त्र-मानव और उनके बीच में एक पारदर्शक पट छत से नीचे तक लटक गया। और फिर अगोक और अनीता को लगा जैसे वे ऊपर उठे जा रहे हैं । पृथ्वी पीछे छूटती सी जान पड़ी । सौर मंडल कुछ क्षण मे ही पार कर लिया । सूर्य छोटा पीला तारा सा दिखाई पड़ने लगा। आकाश गगा, निहारिका आई और चली गई। करोडों निहारिकाओं से ऊपर उठते हुए अशोक और अनीता वहाँ पहुँच गये जहाँ पर सन्निहित परमाणु आपस में टकरा कर प्रकारा में तेज और मूलभूत तत्वों को जन्म दे रहे थे । और ऊपर उटे तो केवल शून्य ही शून्य की अनुभूति हुई। एक चक्कर सा आया । श्वांस एक सा गया । बड़ी घबराहट हुई। पर क्षण भर दाद हो विकलता दूर हो गई । एक अपूर्व अनुभव होने लगा। ऐसा लगा जैसे प्लास्टिक पट पर चित्रित आवास का और उनके मन का व्यवधान मिट गया हो। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं हुआ कि जो कुछ यनुभूतियां हो रही है वे उनके स्वयं के शरीर में हो रही है अथवा पट पर । उनी अद्भुत दृष्टि प्राप्त हो गई थी। जिस । ।

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२१६
.
सिद्धार्थ की आँखों में आंसू भर आये। गद्-गद कंठ से पूछा-
'छन्दक बताओ न यह व्यक्ति कौन है । नहीं बताते तो न सही,
पर वृद्ध क्या होता है, यह तो बताओ?'
'जरा जर्जरित व्यक्ति को वृद्ध कहते हैं' छन्ना ने कहा, 'इसे अव
अधिक दिन नहीं जीना है।'
सिद्धार्थ ने पुनः उस व्यक्ति को देखा । वह टेढ़े-मेढ़े झुके दंड
का सहारा लेकर चल रहा था। सम्पूर्ण अंग शिथिल थे। पंग
लड़-खड़ा रहे थे। मुख से लार टपक रही थी। मक्खियाँ मडरा
रही थी। दतहीन वृद्ध झुकी पीठ से चलता हुआ रोटो मांग
रहा था।
सिद्धार्थ छमा की ओर उन्मुख होकर बोले, 'आयं मैं इस वृद्ध
अवस्था को ही मिटा दूंगा। पर यह तो बताओ वह रोटी रोटी
क्यों पुकार रहा है।'
'वह भूखा है देव ।' 'और उनके पास खाने को रोटी नहीं है।'
'तो क्या विश्व में ऐसे भी व्यक्ति हैं जिन्हे रोटी दुर्लभ है ?'
'देव का कयन यथार्थ है।'
'फिर वे भूसे ही रहते होंगे, भूमे ही सोते होंगे ?'
'हाँ कुमार
'मैं भूख को मिटा दूंगा।' सिद्धार्थ ने मुट्ठी कम कर कहाँ ।
'और छन्ता यह पैसा क्यों मांगता है ?'

२१७
'खाद्य ऋय के निमित्त।'
'तो क्या साद्य त्रय विश्य भी दिया जाता है "
'परम महाराज के राज्य मे भी होने लगा है।'
'खाद्य विक्रय तो पाप है छन्ना।'
'हाँ आयं ।'
'मैं खाद्य विश्य को मिटा दूंगा' सिद्धार्थ के मुस की रेखायें
उभर आई थी।
दृश्य बदला कदाचित राजकुमार सिद्धार्थ का भव्य भवन था
यशोधरा सिद्धार्थ के निकट खडी थी।
'आर्य
पुत्र विश्राम करें। दो पहर रात्रि वीत चुकी है।'
'यशोधरे अब जीवन में विश्राम नही करना है।'
'क्या हुआ देव ।'
'आज मैंने एक प्रस्त वृद्ध भिसमगे को देखा है । उसको देयपर
भने निश्चय किया है-'मैं वृद्धावस्था भूप और साय के प्रय विक्रय
मिटारर रहूँगा।
'शमा हो देर, शव, यौवन और जरा तो कालगति के विराम
चन्ह हैं उनकी क्रिया पर ही तो ससार ठहरा हुआ है।'
'मैं इस दुदंन्त महाराल की गति को पैर पर रहूँगा । और
यशोधरा वह वृद्ध पितनी कातरवाणी से रोटी मांग रहा था।
मैंने धना से पहा रि आयं इमरा राजयोप में मे कुछ दिता देना
तो जानती हो वह क्या योगा"

२१८
'क्या बोगा देव?'
'कोप पर राजपरिषद का अधिकार है।'
'मैंने कहा, 'राजपरिषद क्या लोगो को भूखा मारेगी?'
'ऐसा न कहो, देव राजपरिपद सर्वोपरि सत्ता है। उससे
अधिकार के विषय में प्रश्न उठाना ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती
देने के समान है।'
'यशोधरा तुम भी छन्ना की बात को ही दोहरा रही हो ।
पर मैं कहता हूँ कि फिर मैं राजपुत्र किस लिए हूँ। क्या केवल
इसीलिए कि लोगों को भूखा मरता देखू। राजपरिपद तो मुझे
अन्यापी वर्ग जैसा लगता है जो लक्ष जनता को भूखा देखकर भी
अवसन्न है, मौन है। जन-जन की रोटी और रोटी के अधिकारी
को इसी निहित स्वार्थ वर्ग ने दवाया हुआ है।' सिद्धार्थ कुछ
क्षण ठहरकर पुनः बोले, 'पर मैं यह सब नहीं होने दूंगा। मैं आवाज
उठाउँगा। जिनके पेट खाली हैं जिनके अधिकार दिन गये हैं मैं
उनको लेकर रोटी और अधिकारों को मुक्ति दिलाऊँगा।'
दृश्य परिवर्तन हुआ और जैसे किसी ने कहा, 'यह आज से
कुछ वर्ष के बाद घटने वाला दृश्य है।'
इस दृश्य को देखकर तो अशोक और अनीता अत्याधिक चकित
हो गये, क्योंकि जिस मंगल लोक में हम मौजूद थे, वही प्लास्टिक पट
पर आ गया था। उसमें कही दूर एक बड़ा भारी यन्त्र लगा हुआ था
जिमम ऊपर की ओर लाल रंग का एक बड़ा हत्था लगा था । पास
में की एक विशाल यान्त्रिक-मानव बैठा हुआ था। उसका रूप
लगभग बाल-पुरप जैसा ही था । उसके आस पास अनेक

२१६ - छोटे मोटे यत्र रखे हुए थे। तभी यात्रिय मानव ने लाल मृठ वाले हत्थे को दवा दिया । यत्र से अत्याधिक तीव्र ध्वनि वरती हुई किरणें निकलने लगी, बहुत जोरो का अधड आया, जिसने मगल लोष के कृत्रिम आवास को उड़ा दिया, रत वे ढेर से सभी भवन ढब गये। वायुहीन आवास में सम्पूर्ण महामानव छटपटा का नष्ट हो गये । कुछ देर बाद ही वह यत्र-मानव भी नष्ट हो गया।' इसके बाद दृश्य परिवर्तन हुआ। एक कोन में मगल ग्रह था जिसके चारो ओर उसका एक चन्द्रमा चक्कर लगा रहा था और अशा व अनीता उसी चन्द्रमा मे ठोर वैसे ही भवन में बैठे थे, जैसे वे अभी कुछ देर पहले प्रधान महामानव निर्माता के साथ बैठे थे । अन्तर केवल इतना ही था कि सबसे ऊंचे आसन अशोक और अनीता ने ग्रहण किये हुए थे और उसके बाद प्रधान महामानव निर्माता महामानवी के साथ बैठे हुए थे। अशोर आशा की मुद्रा म सभी महामानवो को समभा रहा था, 'पृथ्वी पर आज से तीन हजार वप पहले जिस सामाजिक आर्थिक क्रान्ति का सूत्रपात भगवान बुद्ध राज- कुमार सिद्धार्थ ने शुरू किया था, उसको महामानव समाज ने बही कुशलता से पूरा किया है । लेकिन जिन मान्यताओ को आज मगल लोर के विधाता अभिनव मानते आये थे, उन्ही को अनेर महामानव रूढ़ियों से भरा और अनुदार मानने लगे हैं क्योकि चलना और आगे बढना ही मानव वा शाश्वत धर्म है। मानव समाज को प्रगति का जो टेका मगल लोरी वित मडली ने लिया था, उस एका- धिवार को महामानव समाज में कुछ वैज्ञानिको ने बाल-पुरुष नाम का यात्रिक-मानव बनारर उसको इतना शक्तिमानी बना दिया कि उसने 'क्या वोपा देव ?' 'कोप पर राजपरिषद का अधिकार है।' 'मैंने कहा, 'राजपरिषद क्या लोगो को भूखा मारेगी ?' "ऐसा न कहो, देव राजपरिषद सर्वोपरि सत्ता है। उससे अधिकार के विषय में प्रश्न उठाना ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देने के समान है। 'यशोधरा तुम भी छन्ना की वात को ही दोहरा रही हो । पर मैं कहता हूँ कि फिर मैं राजपुत्र किस लिए हूँ। क्या केवल इसीलिए कि लोगों को भूखा मरता देखू। राजपरिपद तो मुझे अन्यायी वर्ग जैसा लगता है जो लक्ष जनता को भूखा देखकर भी अवसन्न है, मौन है। जन-जन की रोटी और रोटी के अधिकारों को इसी निहित स्वार्थ वर्ग ने दबाया हुआ है।' सिद्धार्थ कुछ क्षण टहरकर पुन: दोले, 'पर में यह सब नहीं होने दूंगा । मैं आवाज उठाउँगा। जिनके पेट साली हैं जिनके अधिकार छिन गये हैं मैं उनको लेकर रोटी और अधिकारों को मुक्ति दिलाऊँगा।' दृश्य परिवर्तन हुआ और जैसे किसी ने कहा, 'यह आज से बुद्ध वर्ष के बाद घटने वाला दृश्य है।' इस दृश्य को देखकर तो अशोक और अनीता अत्याधिक चकित हो गये, क्योंकि जिम मंगल लोक में हम मौजूद थे, वही प्लास्टिक पट पर या गया था। उसमे वही दूर एक बड़ा भारी यन्त्र लगा हुआ था जिसमें ऊपर की ओर लाल रंग का एक बड़ा हत्था लगा पा । पास में ही एक विशाल यान्त्रिक-मानव बंटा हुआ था। उसका रस लगभग बाल-गुरुप जैसा ही था । उसके आस पास अनेक २१६ । छोटे मोटे यत्र रखे हुए थे। सभी याविक मानव न लाल मूठ वाले हत्थे को दवा दिया । यत्र से अत्याधिक तीव्र ध्वनि करती हुई किरणें निकलने लगी, बहुत जोरो का अन्धड आया जिसन भगल लोर के कृत्रिम आवादा को उड़ा दिया रत के ढेर से सभी भवन ढक गये । वायुहीन आवाश में सम्पूर्ण महामानव छटपटा कर नष्ट हो गये । वुछ देर बाद ही वह यत्र मानव भी नष्ट हो गया। इसके बाद दृश्य परिवर्तन हुआ । एक कोन म मगल ग्रह था जिसके चारो ओर उमका एक चन्द्रमा चक्कर लगा रहा था और अशाव व अनीता उसी चन्द्रमा में ठीक वैसे ही भवन में बैठे थ, जैस वे अभी कुछ देर पहले प्रधान महामानव निर्माता के साथ बैठे हुए थ । अन्तर देवल इतना ही था कि सबसे ऊंचे आसन अशा और अनीता न प्रहण किये हुए थे और उसके बाद प्रधान महामानव निर्माता महामानवा के साथ बैठे हुए थे। अशाक आशा की मुद्रा म सभी महामानवो का समभा रहा था, पृथ्वी पर आज से तीन हजार वर्ष पहले जिस सामाजिक आर्थिक क्रान्ति का सूत्रपात भगवान बुद्ध राज- कुमार मिद्धार्थ ने शुरू किया था, उसका महामानव समाज न वडी कुशलता से पूरा किया है । लेक्नि जिन मान्यताओं का आज नगल लोर के विधाता अभिनव मानत आय थे, उन्ही यो अनक महामानव रूडियो से भरा और अनुदार मानने लग है क्योति चना और आगे बढना ही मानव या शाश्वत धर्म है। मानव समाज की प्रगति का जो टेका मगल नोर को विद्वत मडलोन लिया था, उस एवा- धिकार को महामानव समाजवे कुछ वंशानिरो ने काल-गुरष नामा यानिर मानव वनारर उसको इतना शक्तिशाली बना दिया कि उसने २२२ को वह छोड़ चुका है, धर्म और कर्तव्य की न जाने कितनी कसौटियों को वह फेंक चुका है। तो फिर मंगल लोक के आचार विचारों को भी यदि उसने छोड़ना आरम्भ कर दिया तो इसमें आश्चर्य और विक्षोभ कमा ? भूतकाल में भी मानव ने सौंदर्य और शाली- नता को रटी अनेक वोलियों को भुलाया है, अनेक सस्कारो और विश्वासों की चिताओं को रोंदता हुआ वह आगे बढ़ा है। इसलिये यदि आज मंगल की प्रचलित मान्यताओं का स्थान नवीन मान्यताएँ ले रही है तो इसमे हताश होने जैसी बात नहीं। ये लक्षण तो अवश्य ही मंगलकारी हैं । 'इतिहास जहाँ तक ठेल कर पौधे हमें ले जाता है महाकाल के उत्तालनतंन के भग्नावशेष जितने तथ्यों की ओर इशारा करते हैं, उनसे भी यह वात स्पष्ट है । इस- लिये मैं कहता हूँ कि मानव और महामानव कल्याण की ओर बढ़ रहा है।' इतना कह कर अशोक और अनोता ने महामानव निर्माता को नमस्कार किया और नये उप विदा लो।

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Maha Maanv Aur Mangal Yatra

Author
Om,prakash
Title
Maha Maanv Aur Mangal Yatra
File name
Maha Maanv Aur Mangal Yatra
Text
OCR done
Citation
1964
Published
2010/12
Publisher
Agra,prasad Book Trasht
Language
Sanskrit
Pages
184
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514768
Barcode
4990010022453.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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