Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Lalbahadur Shastri

Shri Vaythit Hardasy · 2010/12

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लालबहादुर
शास्त्री
भोम्पपितहरय
रामप्रसाद एण्ड सस • आगरा

प्रकामक
रामप्रसार एप सस
अस्पताल पर
प्रापरा
तीनपया पचास
मात
भारत मापामय
महारानीम्मी १२

दो शब्द मैं इसे अपना सामाम्य ही मामता हूँ कि मेरी प्रवृत्ति मिसमाप मोय महाम् पुस्पों पोर मवाों की बीवन-कामों को पाने और चमके मेगन की मोर नहीं है। मरठक में विष पोसियों मापों के जीवन परिषों और उनकी विसिष्टतामों के पावन-रस से पपनी सेमनी को पवित्र बना सका है। मेरी उसी प्रवृत्ति के माननीय नामबहादुर शास्त्री पी परिबांकन के लिए भी मुझे प्रेरमा दी है। हो सकता है अपने मन विकारों के कारण कुछ मोयों को इस काम में भी 'विकार की मर मिटे पर मुके तो उनकी विधिप्टवायों के प्रफर से पूर्व पोप हीपर्योकि समसे देस मनाया करोड़ों युरकों को प्रेरणा मिलेगी, पोनिपके पार पटक है। फिर मी म यह कहेगा कि मेरा यह प्रयास मड-बहुत ही मप है। क्योंकि शास्त्री जी का बीवन उन नीतिक और सामाधि पटनामों मोवप्रोत है, वो पिछले 10. बयों से हमारे देश में टी और बहुत ही महत्वपूर्ण है। मैंने शास्त्री श्री से प्रार्थना की है कि स्वयं पपने बीवन की कमी मिसें । पता नहीं गासमोबी मेरे मिरेपन पर ध्यान देंगे या नहीं पत उनके भनिछ मित्रों से भी मेरी यही प्रापमा है कि पात्री पीसे मनुरोप करें, कि पपना बीपनपतति । वन बीमन पर पिछले ३.४.बो कातिहास भौर राष्ट्रमारों का परितो प्पट होगा ही साप ही उससे मार और प्रष्ट्र को प्रेरणा भी मिमी। म पपरे इस प्रयास को सम्म मानवा परि माननीय शास्त्री की पौर वमरे मित्र मेरे इस मिशन पर ध्यान मे। ९२५,सापासोनी मोम्पवितहरप मई रिस्ती १४ ६मावर १९९४

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व्यक्तित्व
मौर मण, छोटा कद, चोग मुस-मपाल, प्रास्स भास पोर
मुस्कुराते हुए मोठ ! पो भो शास्त्री जी को देशवा है उस
पर उनके व्यक्तिस्व की पूग छाप पर पाती है। उनके पक्तित्व
में, अत्रिमतामहीं, सरमता है। सरक-महक और शान-शौकत
का पारर्पम नहीं, मनुष्य के लिए सहदय मोर विचारशीम
मनुष्य के लिए एक गहरा सिंपाप है। उनकी पासीनता, मौर
विनम्रता सपनों को ही नहीं, परायों को भी विमुग्प कर मेती
है। वे दोसन में-मिसने में बड़े रस सिक्त हैं। कड़ी से कड़ी
बात को मीधय के साथ हंसते हुए सुनना उन्हें माता है ।

२ तामहागुर मास्त्री विरोभों को मनोनक्तियों को मौछार में भी उनको प्राकृति पर क्रोम के पिव दृष्टिगोपर नहीं हो। इसका यह तात्पर्य नहीं मिलेमपने सभी विरोधियों को भूल जाते हैं पर यह सत्य है कि विरोधियों द्वारा उत्पन्न किए गए प्रारों में भी ये सबसते हुए नहीं देखे गए। उस दिम का चित्र मात्र मी मेरो पासों के सामने है। पत के नौ-साढ़ मौ बज रहे । शास्त्री की अपमे सुनाप क्षेत्र मै, कटरा चौरास्ते पर (इलाहाबाद), भापण दे रहे में। काफी भीरपी। लाम टोपोषारी सौरद सौ युवकों का दस सभा के बाहर प रहकर हगामा मचा रहा था। उस हगामे में उस शोर-गुप्त में भी शास्त्री पी करे षय के साथ कापस की योजनामों का पित्र जनता के समक्ष उपस्पिटपर रहे थे। उस समय तो शास्त्री पी का पेय पराकाष्ठा को पहुँच गया पण सहसा उक्त युवक सभा में प्रविष्ट हो गए और प्रयल करने मगे कि सभा भग हो पाए । कांग्रेस के सहर्मों समपक भी मापे से बाहर हो गए। पर शास्त्री जी के बेहरे पर रंचमात्र भी कोष म उमड़ा। ये पल की मांति अपने स्थान पर पड़े रहे। शास्त्री जी ने उन युगों को अपनी शालीनता--- अपनी विनम्रता के रज्य में इस प्रकार गांभा कि वे सग्मित हो तठे, पौर प्रपने शस्य पर दुख प्रकट करके सभा से पते गए । शास्त्री पी उन दिनों भारत सरकार के गृह मन्त्री पद पर पासीन थे । उमके हाम में पुलिस और धासम की सक्ति थी।

परिव वे भारते वो पुसिम अधिकारियों को समेत करके उन पुवकों को मिस करा सकते थे, पर शास्त्रा भी उनकी उद्दाताओं को पी गए। सभा को समाप्ति पर, व एप सात टोपीधारी युवक की पीठ पपयपाते हुए दोने- 'वा योनीले हो । पौर दूसरे दिन मैंने उन विरोषी सुमकों को रहते हए सुना--पाश्मय है, शास्त्री जी की मासि पर रघमात्र भी कोष नहीं प्रकट हुप्रा।' महान उन्नति के सफम यानो कितने हो ऐसे अवसरों पर शास्त्री मोदी शासीनता को पक्षमता देखने को मिली है। ऐसे अवसरों पर प्राप बड़े- दरे सम्मो और महान पुष्पों को भी कोष के भावेश में तब- लस हुए देखा गया है ! तो क्या पास्त्री जी के हदय में सन्तों की गिनन्द्रियता मोर महान् परों की महानता है? भवाम ! शास्मो मो के पम्ही मुर्मों ने तो उनके लिए---उस पद पर पहेपने के मिए निसेमी का काम किया है जिसे प्राप्त करन के मिए लोग ऐडी-पोटी का पसीना एक परते हैं। भारत ऐसे महान् पौर विसिप्ट देव के प्रमान मत्रित्व का पद ! बह पद, बिसे विश्व-पुरुष यौ नेहरू मुसोमिस कर चुके है पौर जिसकी पाक समार के बोबो देशो के मर भी नम चुकी है वसे-- उस महान् परमो धास्त्री जी ने बिना किसी प्रयास के ही प्राप्ठ पर सिया बांगेम को संसदीय पार्टी ने उनके गुणों केयम ४ नातवहारमास्त्री उनके गुर्गों पर रीझकर उन्हें भपमा नेता निर्वाचित दिया। यदि शास्त्री पी में विशिष्टताएं न होती, तो इस प्रपषमम भारम्परी राजनीति में कौन ऐसा है, जिसकाभ्यान पास्त्री जी की पोर प्रापित होता? क्योंकि शास्त्री जी के पास न तो सम्पत्ति है पोर न उनका जन्म हो किसी को वश में हुपा है। वे अपनी विशिष्ट- तामों को छोड़कर सब प्रकार से साधारण है-हत ही सापा- रम है। ऐसे ही और भी कई साधारण म्यक्ति अपने प्रसा पारम गुणों से उन्नति के शिखर पर पहुंच सके है। ममेरिका के राष्ट्रपति प्रमाहम लिंकन के वीवम पर दृष्टि गमिए । पया मह सच नहीं है मिमिकन का सांसारिक जीवन बहुत ही साधारण पा और क्या यह भी सच महीं है कि निकम ने अपमे प्रसाधारम गुणों से ही उस महान् पद को प्राप्त किया, बिसे प्राप्त करने के लिए मोर्गों को कई प्रकार का मनोरम प्रयास करना पड़ता है ? वो क्या शास्त्री वी सिंकम के ही पंपानुयायी हैं ? क्यारे मिकम की ही राह पर चमकर राति कर सके है। संभव है कुछ मोर्गों को इसमें मत्युक्ति की गंध मिले पर यह तो सस्प ही है कि मामी पी सिंकन के समान ही, देवस अपनी विशिष्टतापों से भारत ऐसे महान देश में प्रधान ममित्व के सिंहासन पर पासीन हो चुके है। सास्त्री पी की गौरवपूर्ण उन्नति हमारो मासों के सामने प्रवासुकमाम पापा का चित्र भी बीच देती है ! किसे मात परिव या कि एप पुरसान में जन्म मेमे पासा पासक ममाम कभी टीका भधिनायक होगा? किसे पताया कि गरीय विधवा का पुषकमान, मिसकी मासिक पाय यस भाठ रुपए है, कभी सूम की किरणों की तरह ससार में मपमा प्रकारा रिसर देगा? इसी प्रकार किसे यह शान पा हि मुगलसराय में एक साधारण मायस्थ वपा में जन्म लेने वाला मामा भारतका प्रधान मंत्री होगा? किसे पता था कि काशी के हरिश्चन्द्र हाई सूल में शिक्षा प्राप्त करने वाला एक विद्यार्थी, जिसको मावश्यकसार्मों की पूर्ति कठिनाइयों के साथ होती है एक दिन विषय के महान् रामनोतियों को पक्ति में बा बठेगा? तो क्या शास्त्री पो कमाल पाशा के सदृश्य महान् हैं ? निश्पय सास्मी यो ने कमास पापा को भांति हो उन्नति के शिखर पर पढ़ने में अपनी विशिष्टमा प्रदशित की है। सभव है मारस में शास्त्री जी की विशिष्टतापोंमी पोर प्रविधि लोगों का ध्यान माकपित न हो, पर निश्चय है कि यदि शाम्भो भो ने विदेशों में पम मेकर इस महान् पद को प्राप्त किया होता तो लिकन कमास पौर फैनेडी को भौति ही उन्हें भादर पोर सम्मान मिमता। मेहरू मो को पनी दृष्टि तो फिर कहना ही पड़ेगा कि स्वर्गीय यी नेहरू पो गरे दूरदर्षी पौर पैनी दृष्टि के म्याक्सिपे। पाप से पम्पीस-तीस वप पूर अब पास्त्री जी नेहरु मो के सम्पक में पाए पे, तो ये मकेमे पासबहमुरपात्री ही नहीं थे। उन्हीं के समान कितने प्रयापवासी युवक कांग्रेस कायम भी उनके सामथे। शास्त्री पी पौर ये सभी मोग पांग्रेस कार्यक्रमों को पूर्ण करने के लिए प्राम भी मेहमपी के साप गांवों में पोरे किया करते थे। पुसूयॊ में, समापों में भी प्राय उन सबका पौर श्री नेहरू का साथ प्हता था। पर नेहरू जी मे सबको छोड़कर, उनमें से केवल शास्त्री जी को हो प्रपमा भतुम स्नेहपात्र बनाया। मपि शास्त्री जी माहाबाद में 'प्रवासी किराये के मकान में रहते थे पर उनमें कांग्स के प्रति जो समयता जो निष्ठा और जो कमप्यता यो, उसकी भोर नेहरू वो भाऊपित हुए पिना म रह। उन्हनि पास्त्री पी के लिए अपने हृदय का द्वार सोम दिया । ग्यों-ज्यो शास्त्री जी की विशिष्टताएं मिधरने मगी- ग्मों-ज्यों उनकी कार्य-कुशलता सामने माने लगी, में नेहरू की के हदय में मणिमामिक स्थान पाने मगे और ऐसा क्षण मी माया, पर श्री मेहर द्वारा विवेध ममामय का कार्य सपि माने पर बोहराबनीतिश भी परपमें समाने मगे कि थी नेहरू के पापाद थी मालवहादुर शास्त्री ही भारत के प्रधान मंत्री हगि ! श्री मेहर के मोबन कास में प्रायः मोग उनसे यह प्रश्न करते थे कि उनके पश्चात् उनका उत्तराभिकारी' कौम होगा? श्री महरू सोर्गों के इस प्रश्न को सुमकर रहे कौसम से टास जाया करते थे। क्योंकि ये अमम्प प्रभातमवादी मे

पौर उनका उत्तराधिकार सी वस्तु में विश्वास महींपा।
किन्तु फिर भी उन्होंने शास्त्री जी को विदेश मंत्रालय का काय
सौंपकर उनको योग्यता और सप्रियता पर मुहर मगा दो।
कहा जाता है कि नियो रूप में उनकी अपनी यही इम्यापी
कि यदि उनके पश्चात् शास्त्री जी को हो प्रमान मत्री के रूप
में वरण क्रिया पाए,
सो पधिक प्रछा हो।
मेहरू जी के भाकर्षण का कारण
प्रश्न हो सकता है कि सास्त्री मो में ऐसी कौनसी विधि-
प्टसा है जिसने यी नेहरू गो के मन को वाप लिया था। हो
सकता है इस विषय में मतभेद हो, पर हमारी समझ में उन
विशिप्तामों को इस प्रकार स्मरण किया जा समता है-
परियमगीसता, विद्याप्त राष्ट्रीय दृष्टिकोण मोर अद्भुत
सूझ-बूझ । यी नेहरू के भोपन-दर्शन का भी यही सार है।
यो नेहरू ने अपने गोयन-दर्शन की सुना पर ही शास्त्री जी को
तोता पा, मोर उन्हें सर्व प्रकार से उपयुक्त भोर अनुभूस
पाने पर ही अपना स्नेह ही नहीं, बल्कि अपने पद का
कायमार भी उनके कों पर डाल दिया पार पाम्मी पी
थी नेहरू के सबस पपिक निकटवर्ती पे, वे जिस गात को किसी
पर प्रकार नहीं करते थे, उसे में बिना हिपक के पास्त्री जी से
मह दिया करते थे। ये प्राय बड़ी-बरो समस्यामों पर, पेचीदा
माममों पर, मास्त्री पी को ससाह सियारसे थे। बास्त्री जी
A

मामबहादुर मारी को ससाह उन्हें पंचती पी-पसन्द पी! कांग्रेस पार्टी में ऐसे बहुत से लोग थे, पोर है, चिन्हें श्री नेहरू पो का यह कार्य पमा न लगता पा पर फिर भी भी मेहरू धास्त्री जी को अपना हार्दिक स्नेह, मोर पपनो हादिक सहानुभूति देने में न हिरकत थे। मो मेहर शास्त्री को की भोर से पूर्ण पाश्वस्त पे। उनको विशिष्टवारों ने उन्हें भरोसा विमा दिया था कि भारत का भविष्य पास्त्री मी रे मेतृत्व में सुरमित है। यह सच है कि शास्त्री पी में विषिष्टसाएँ ६, यह सप। कि उमकी मिशिष्टतामों ने ही उनके गौरव-विर के लिए निसेनी का काम किया है पर यह भी सच है कि धास्मो वी इस समय में बड़े सौमाग्मधामी है, जो उन्हें भी मेहरू भी असे वोहय के सम्पर्क में माने का सुअवसर प्राप्त हुआ। धास्त्री पी के "गुग-योप' की परस के पश्चात् उन्हें सोगों के समम्म उपस्थित करमे का श्रेय एकमात्र धी नेहरू भी को ही है। श्री मेहरू ने शास्त्री पी के गुणों को भोक के समक्ष उपस्थित हो नहीं किया परन् उनको ममस स्याम्या करके उन्हें मार मी अधिक गौरवमान बना दिया ! मह थी नेहरू जी का ही काम पाकिये रापनीति के हाट में, पहा बड़ी भीड़ मार पी, शास्त्री मोदो छोट पाए, मौर कितने ही स्थानों से निकालते हुए उस स्पाम पर से गए, यहाँ पाय वे हैं ! यही तो कारण है निशास्त्री बी प्रपमे इस पुसम पोहरी के निधन पर प्रनाम बामा की भांति विसस पड़े मे। प्रयाग में पिरोपी का परिण तट ! यो नेहरू के मस्पिक्सिन के पश्चात् दिवगस प्रारमा का शान्ति के मिए शोक सभा का प्रायोबन हुपा । शास्त्री भी भी सामने के लिए सह हुए। दो चार ही रामद बोम पाए पे कि उनका कद बस्य हो उठा। मिसने उनकी पह सिसको सुनी होगी उसे महल में ही उनकी वेदमा का अनुभव हो सकता है। इतना ही नहीं बी नेहरू के निधन के पश्चात् उनका हृदय पुसावेग से इतना पाग्रस्त हो उठा कि उन्होंने गर से पारपाई पफर लो। प्रो मेहद पोर शास्मो का स्नेह सूत्र शास्त्रो पो की नेहरूनीक सम्पर्क में पाने की कहानी भी यो स्मरणीय है। कदापित् ११३० दिन थे। दिोसन मी पापो चारों पर पी। माहाराद में भी सभामो भौर मुलूसों पो पूम पी। रविवार का दिन पा। थोमसो विजयलक्ष्मी परितकमला नहरू पौर स्वरूपरानी के मतृत्व म एक यड़ा पुनम मष्टापर मे मिविस माइन को पार पमा । पभासों हजार लोग जुमूम में सम्मिलित थे। पास्त्री जी मोर उनको माता भी मुलूस में पों। पर यूसूस सिविन माइम में प्रसिप्ट म हो समा। पुष्पात्तमदास पारे पौराहे पर हो पुरसबारों की पति ने तुम को रोक दिया। सुनसके मोग भी वहीं अम- मरबह गए । मागे मी पक्ति मस्त्रियों पों, जिनमें स्परूपरानी मेहरू, कमला नेहरू पौर विषयमदमी परित प्रादि मुमय पी।

सातपायुर मारमा रह रहार गमनभेदी नारे सम रहे थे। ऐसे नारे, जो वृक्षों के पसों की मसों में भी सिहरन उत्सम कर देते थे। सहसा पुलिसमैनों के हाथों में भी सिहरन हुई और वे रणे पसाने मग । कितने ही मोग पुलिस के रणों से पाहत हुए । पाहत होने वामों में श्री नेहरू पी को माता श्री स्वस्परामी नेहरू मुख्य थी। स्वरूपरामो मेहस के पाहत होने पर पास्मी भी पौर उनके कुटुम्बियों ने उनकी सेवा में मपूर्व तम्मयता प्रकट की। थी नेहरू उमझी तन्मयता और कार्म-समम्नता को देखकर विमुग्प हो उठे। यपि इसके पूर्व भी शास्त्री पो के सम्पर्क में मारे थे पर पही यह दिन पा या शास्त्री पी पोर मेहरू श्री के वीप में पारिवारिक स्नेह ने अम्म मिया। इस घटना के पश्चात् पास्त्री की प्रानन्द भवन में भाने-माने समे। धीरे धीरे वे पानन्द भवन के सदस्यों ने एक प्रम मम पए। श्री नेहरू भी समय-समय पर, पावश्यकता पड़ने पर श्री शास्त्रीनी क पर पर जाने से म हिपकते पे। विवाह-वादियों मोर उत्सवों में, वे मपमे महत्वपूर्ण काय-कमों को छोड़कर शास्त्री की के निवास स्थान पर उपस्थित हुमा करते थे। यी मेहर शास्त्री बीकी ईमानदारी घोर सपाई से भमी-भांति परिचित नेमे पानते थे कि मो शास्त्री पी अपने कुटुम्बियों को प्रभावों की भाग में मुससटे हए देख सकते हैं पर शासम-सम हाम में होने पर भी कभी अपित दम नहीं उठा सकते । प्रत घी मेहस अस्विस्थ मी को पास्त्री को के कुटुम्बियों का सदा मान रहता था, पौर वे उनके बच्चों के भविष्य की चिन्ता भी किया करते थे। कहा जाता है कि शास्त्री जी के पुत्र मी हरेकृष्ण को इंजीनियरिंग की शिक्षा के लिए इग्मण भेषने में थी मेहरू जी का ही हाप पा । यदि यो मेहरूमा हाब न होता तो शास्त्री पी के लिए यह बारा पसभव न होती कि ये यह सोरते ए मावे कि मैं प्रपमे मभिकास में अपने माके को इम्लप किस प्रकार भे-मोग सुनगे तो क्या कहेंगे? नेहरू के मोपन-यशन के प्रमस्य समयक थी पास्त्री श्री मेहरू के 'बोपन-वन' के प्रतिस्स है। मेहसी के सिवातों पोर मादशी का उन्होंने मयन ही नहीं किया है परन् उनके सधि में पपमे को दासा है। यदि यहाँ यह भी कहा जाए, तो परपक्ति की बात न होगी, फि नहरु बीकी कई विधिप्टमाएँ शास्त्री षो में भी हैं, पाचनकी अपनी सम्पति है। समोग से पी नेहरू और शास्त्री को नाम के अक्षरों में भी समानता है-पाहरमान पोर मानबहादुर । मास्यावस्था में यो मेहरू पौर शास्त्री जी का एप हो नाम - नान्हें'। पोना का परम यपि एक-दूसरे से पूरवर्ती स्थान में हुमाया, पर प्रयाग में दोनों एक-दूसरे से गगा पौर यमुना की भांति ही स्नेह-सम में प्रापर हो उठे थे। मापिक दृष्टिकोण से भी दोर्मों में अन्तर था। इस दृष्टि से एक को १२ मामबहार धास्त्री पोषण मोर दूसरे को सुनमारहमा भनुपयुक्त महागा । जिस प्रकार पीकृष्ण भोर सुदामा का सम्मिसन सांदीपन ऋपि के माधम में हुप्रा पा उसी प्रकार भाखाय माधम की छाया में ही थी नेहरू और शास्त्री पीक पारम्परिक स्नेह को पम्सविस पौर पुष्पित होने का अवसर प्राप्त हुमा है। ऐसा भगवा है प्रकृति की मोर से ही दोनों पारस्परिक स्नेह सद्भावना त्याग, पौर सौहाद मेकर भरसी पर प्रापे है। मैं इस बात को भी प्रकृति की प्रेरणा ही मानता हूँ कि धास्त्री पी मेहरू पी के सम्पर्क में पाए और उनकी प्रीति पा स्मेह के भागन रमे। नहीं तो पप धास्मी जी प्रयाग में पाए तो उनका नेहरू मी की अपेक्षा रागपि टान से मषिक सम्पर्कपा। शास्त्रीची उस पोपुल्स सोसाइटी के भी सदस्म पे, जिसने सचालन में टपन पी का मुस्प हाप था। राजनीतिक कार्यों में भी उन्हें टएम बी से अधिक प्रोत्साहन प्राप्त होता पा। कारा- वास की यात्रा करने पर एणन बी के द्वारा ही उनके परिवार की पेल-रेस भी हाती पो। प्रयाग के लोगों को प्राय' यह पाव मासूम है कि टणन मी का शास्त्री बी पर पिहयत् स्नेह पा। पर यह प्रकृतिमी ही प्रेरणा भी कि शास्त्री मेहरू पोके सांभिक सम्पर्क में मा गए । इतने सम्पार्क में पा गए कि राजपि के स्नेह पा प्रथम उनसे एट गया। यपपि शास्त्री की ने कभी रामपि का विरोष न किया, पर यह तो सत्य ही है कि उन्होंने सो हदय से श्री नेहरू का पाप विमा, उमके मस्तित्व - सिवान्तों को ग्रहण किया, पोर उनके प्रभार पौर प्रसार में ऐसे चोटी का पसीना एक किया। फिर यह कहने में सकोच महीं हो सकता कि थी शास्त्री नेहरू जी के गीवन-दर्शन के मनम्य समर्पक है। इसका प्रमाण एक और बात से मिमसा है। श्री मेहरू जी के निधन के पश्चात् पो सो सम्पूर्ण भारत ही शोक-सागर में निमग्न हो उठा पा पर सबसे अधिक पीड़ा उन भस्पसस्पकों को हुई पी पो नेहरूपी को छत्रछामा' को अपने मिए अमर वरदान मानते थे। नेहरू यो के नियम के पचात् वे प्राप' इस पात का फेकर संकल्प विकल्प करने सगे से फिदेखें, अब सेंट किस करवट बैठता है। इतना ही नहीं, उनके मम में पाशकाएँ भी उत्पन्न होने ममी पी।पर पर शास्त्री बीकानेता के रूप में निर्वाचन हुआ, तो उनका मन प्राधा की ग्योति से उदीप्त हो उठा। ऐसा सगा, से शास्त्री जी के स्म में उन्हें फिर भी मेहरू मिल गए हों । मल्पसस्यकों के प्रायः सभी नेतामों और उनके समापार पत्रों में शास्त्री जी के चुनाव पर पांवरिष्प प्रकट किया। यदि एक समाचार पत्र को कुछ परिसयों को में यहाँ उस्त कर तो पनुपित म होगा-कांग्रेस की पसदीय पार्टी मे श्री नेहरू के उतराधिकारी के रूप में यो पास्त्री का निर्वाचन करके अपनी बुद्धिमता मोर दूरदर्शिता का परिमय दिपा है। श्री शास्त्री कोपस कमियों में सबसे प्रपिक नेहरू पी के स्नेह-मारन ऐ है। इसका एकमात्र कारण है पी सातबहादुर मारपी मेहरू के उसूनों के प्रति उनकी सपाई मौर मिष्ठा । इस पात में किसी को कुछ भी सम्देह नहीं हो सकता कि श्री वास्त्री मेहरू पीके मिपन के पदयात् भी उनके उसूमों में उसी प्रकार निष्ठा रखेंगे जिस प्रकार पहमे रखते थे।

आराम हराम
भास्त्री मो बरे परिपमो मार मध्यवसायी है। नेहरूको
के जीवन-दर्शन का सिवात, 'माराम हराम है, उनका अपमा
पन है। दे दात्यारस्पा से ही परिषम पौर मापनसाय के
माग पर सवे चमे पा रहे हैं। उन्हेंनि पात्यावस्था म जिस
परिषम और मगन के साप विधा प्रणित की,पहपाज के युवों
के लिए विद्यापियों के लिए शिक्षा ग्रहण करने की यस्तु है।
न ठाठ-पाट, म प्रामोद प्रमोद, पौर मध्यर्य वाद विवाद ।
पर पड़ने से तात्पय, सम्पयन से भगाय! दस सूस नाते
थे, और नव एफ सूख में रह पे, गन पाने सिखने से ही

नातबहादुर बास्मी नेहरू के उसूर्मों के प्रति उनकी सचाई और निष्ठा । इस मात में किसी को कुछ भी सन्दह महीं हो सकता कि धी शास्त्री मेहरू जी के निधन के पश्चात् भी उनके वसूमों में उसी प्रकार निष्ठा रखेंगे जिस प्रकार पहले रमते थे।

आराम हराम
घाम्बी मोबड़े परियमी पौर प्रध्यवसायी है। नेहरू गो
के बीपन-धनका सिधान्त, 'पायम हराम है, उनका प्रपना
धन है। ये वाल्यावस्था सही परिश्रम और मध्यवसाय के
माग पर पम पम पा रहे हैं। उन्होंने गाल्यावस्था मे जिस
परिपप मोर मयन के साथ विद्या प्रजितमी,वह पार के युवरों
सिए विद्यापियों के सिए शिक्षा ग्रहण मरने की वस्तु है।
न ठाठ-बाट, न प्रामोद प्रमोद, और न म्पप वाद विवाद !
केवम पाने स तात्पर्य अध्ययन से भगाब! पैदस सूस मासे
पे मौर चव तक सूस में रहते थे, यस पड़ने-सिखने से ही

नामबहादुर शास्त्री सरोकार रक्षत पे। घर पर भी म्पर्ष के कार्यों में समय नप्ट नहीं करते थे। प्राय कोई न कोई मग्छी पुस्तक पढ़ने में ही अपना समय व्यतीत करतेपे । शास्त्री जी की माता के निम्ना कित धम्दों से उनके वाम प्रौर विद्याी जीवन का मध्यवसामी चित्र पर्याप्त मप में मानों के साममे पिमित हो जाता है- नन्हें अपने मौसा रघुनाम प्रसाद के पर दारानगर (वारा पसी) में रहते थे। वही रहकर ये परते थे। यपपि उनके मौसा का नम पर पार स्नेह पा पर इस स्नेह के मूम में पो महें की परिममशीलसा, परने लिखने में उसकी त मयता मोर पावरण की सापुता! 'नन्हें ने कभी अपने गुरुपनों को शिकायत करने का प्रमसर नहीं दिया। मेम में पोर पर पर मी पपना सारा काम बड़े परिश्रम से पूरा करते थे।' शास्त्री पी के सहपाठी भी त्रिभुवननारायसिंह की निम्नांकित पविधया उनकी परिषमधीसता और कमठताका मित्र पम्भित करने में मेगार:- बह सत्यनिष्ठ ही नहीं बड़े ही कर्मठ पपक काम करने वाले तपोनिष्ठ म्यक्ति भी है। सन् ३५२६ की बात है वह उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा स्थापित उत्तर प्रदेश भूमि सुधार कमेटी के मत्री पे पौर बार पुरुपोत्तम दास टपन उसके समापति । उस कमेटी में विस परिश्रम से उन्होंने रात-दिन नाम किया, उसके दर्सम उन सोगों ने किये होंगे, जो उस समय पास्त्री जी के साथ रहे । वह राठ दिम उस कमेटी के सम्बन्ध में मुस-न

प्राराम हराम
कुछ सिहते-पाठे रहते । रातको ११ १२ तक दम पाते थे,
सेकिन उनका काम सरम नहीं होता था। तव में मोर पास्त्री
श्री उस समय साप ही रहते थे। मेरी एक छोटी भतीजी ने
एक दिन मुझसे पूछा-'पापा, पास्त्री पी दिन रात इसना
काम क्यों करते हैं ? सने छोटे, कमसोर से मादमी हैं, उन्हें
रखना काम नहीं करना चाहिये।"
उसने मुझसे कहा कि मैं उनको मना कई फि वह इतना
काम म किया करें। लेकिन वह कहां किसी की सुनसे । माद
में इस विषय पर अब यह रिपोर्ट प्रकाशित हुई तो उसने सारे
देस को एक प्रशस्त मार्ग दियसाया पोर पीरे-धीरे सभी
प्रदेपों मे उस रिपोटा स्वीकार किया। बाद में जम दोबारा
कायस ने शासन संमासा, सो उसने उसी रिपोर्ट के पादध पर
पूरी तरह से वेश में पीदारी का चन्मूमन किया। दिन रास
मगन से काम करने को पक्सि भौर फर्मठता को देखकर मेरे
मन में कुछ ऐसे विभार पाया करते थे कि यह व्यक्ति अपमे
परिव तथा परिमम के बस पर प-से-ऊब स्पाम तक पाने
के योग्य है मौर उसके रास्ते में कोई भीष एकावट नहीं गत
सकती।
माहावाद नगर और दिमे के कापस कर्मियों में अपने
परियम पौर मध्यवसाय के बस पर हो पास्त्री पी मे अपना
प्रमुस म्यान बनाया पा। इसाहाबाद के लिए के नए ।
क्योंकि उनका सम्म स्थान मुगलसराय है। उनकी पात्यारस्पा

नासामा मास्त्री
के कई वर्ष वाराणसी, रामनगर और मिर्वापुर में व्यतीत
हुए थे। उन्होंने वाराणसी में राबनीति में प्रवेश किया। प्रत
इसाहापाद उनके लिए नया पा-इस कपन में प्रत्युक्ति
नहीं। पापिक स्पिति भी ऐसी म थी कि वे उसकी शक्ति
का पवलम्ब ग्रहण करते। पर धन और सामाजिक प्रतिष्ठा
से भी बरकर उनके पास एक चीज पी, भौर यह पोर पी
उनकी परियमशीलताकाग्रस के उसूमों के प्रति उनकी
सच्ची मिष्ठा । परियम और मध्यपसाय हो उनका सापो
पाउनका मार्ग प्रवर्मक पा! वे उसी का प्रोमम पकरकर
कांग्रेस के पथ पर निष्ठा के साथ चलने समे! पोरही दिनों
में छोटों की तो बात ही क्मा गा-बड़े मेतार्मों का भी ध्यान
उनकी ओर प्राकर्षित हपा पोर छोटे-बड़े सबके बीच में पापर
से माने जाने सगे।
जिसने शास्त्री पी को एक कांग्रेस कर्मी के रूप में कर्मठता
देसी है मौर देसी है उमकी परिश्रमतीसता, यह यह कहे
मिना म रहेगा कि धास्त्री जी पुरम-पतमे और छोटे कद के
अवश्य है, पर उनकी हहियों में दधीचि की मस्पिों का तेग
है। गर्मी सर्दी, परसात-बाहे कुछ भी हो शास्त्री पी गांगों
के मिए निकल पड़से थे। रेम वगा इसा उनको सवारी पी
पर पोर देहाती क्षत्रों में यह भी महीं, पम पवम !
धूप
शीत भौर वर्षा के पपेनों को अपने सीने पर सहते हुए गांव
गांव के परिप्रमण किया करते मे। कदापित हो इलाहाबाद

प्राराराम . गि का कोई ऐसा गांव हो, वहाँ शास्मी दोन गए हों, पौर कदाचिद ही ऐसा कोई कस्वा हो, यहाँ शास्त्री पी मे भापण न दिया हो । मिले के गांव-गांव में, कोने-कोने में सास्त्री जी के नाम की गुंग है। प्रात कास पर से निकलते थे, तो फिर पाधी रात के पहले पर नहीं मोटसे थे। सामे-पीने की सुपि, पौर म पासवानों को चिन्ता ! कांग्रेस के कार्यो मे- उसके उसूलों ने जैसे उनके मम को पागम र दिमा हो । उनके मन के उसी पागसपन मे उनको उसी परियमशीमसा में...म्हें सोकप्रिय बना दिया । इसमा लोकप्रिय बना दिया कि जिस की सीमा को मापकर प्रान्त में पहुंचे, पोर प्रपती विशिष्टयामों से प्रोत की सीमा को सांपकर सपूण देश के मेता के पद पर पासीन हो गए। रस्तुत पास्त्री भी की उमवि ईया की वस्तु है--शिक्षा प्रहप करन को बीस है। मात्र यो मोग सापनों की विहीमवा पौर प्रभारों का रोना रोया से है उन्हें पास्त्री पीके जीवन पर दृष्टि समनी पाहिए। धास्त्री को भी मापन- विहीन व प्रमाणों से प्राग्रस्त पे। पर में एक महाबोर को मावि निरन्तर उन्नति के पय पर प्राय बढ़ते ही गए। पौर मात गए परियम केरम पर,भपने पप्परमाय को सस्ति मे। पो मोग परियम पोर प्रप्यवसाय का प्रारम ग्रहण करते है वेमी प्रकार प्रति रे पितर पर पहुंचकर अपनी पिनय पताका उड़ाते हैं। केवम बाहर ही नहीं, र्मों में भी पास्त्रो नामबहादुर पानी मी का जीवन बरा ही सापनामय मौर बड़ा ही परिश्रम- सीम होता था। धी मिरीवानारायण प्रयस्पी बी में शास्त्री भी परिधम और साथमाशीम खेल जीवन का पिन इस प्रकार सीमा है- शास्त्री को अपने नित्य कर्म मोर पोर से व्यायाम से निवृत्त होकर परामर मपनी पुस्तकों पौर सिसने की कापियों में दिन भ्यतीत करते थे। फियूस की गप-पाप, सहाईनमाई या मा बस मुझे मार' मामी कहारत परिताप करके पापस वाो पौर बम मामों से भगा मोम सेना पसन्द म करते थे। लेकिन सामी यदि किसी प्रस्त पर सबसम्मति से महमा मिरुपय करते थे, सो सही कदम पर स्वाभिमाम की रक्षा के मास्ते एक अनुशासित सेनामी की तरह पातापूर्वक सर्प में भी साप रहते थे। यह मित्रभाविता और गंभीर प्रकृति की छाया अपने साथियों पर मते पे । रमादा मेपपरवानी का उनको गरम पा। सदय मौन रहकर वम्मयतापूर्वक अपना काम करते रहने की उनकी भावस थी। या हम मोग सनसे विप प्राग्रह करते तब यह हम लोगों का मास मेते थे।' धासन सूमहाप में प्रामे पर भी धास्त्री जी में परिमन महा। जिस प्रकार पहसे पाराम को हराम सममो ये बही भाष उनका प्रदेश के मंत्रिकाम में पा, पोर नही भाव इस समय भी है जब वे प्रभान मत्री के पद पर पासीन है। उत्तर प्रदेश के पुलिस मत्री के रूप में शास्त्री जी राठ के दस- म्यारह बवे तक अपने दफ्तर में काम किया परते थे। यही प्रापपहराम २१ हाल उनका केन्द्र म रेम, पाणिग्य और गृह मत्री के रूप में मी या। इन पदों पर रहते हुए वे प्राय हड़के सह पाया करते पे और फाइमों मे तन्मय हो पाते थे । सारे यस यो पर से निकलते थे तो दो बजे मौटते थे, और कुछ सा- पोकर फिर पा पाठ पेठो दस प्रो के पहले मोटकर महीं पाते थे। मंगम पर पाते हो उन सोगों से मेंट-मुमा- कास प्रारम्म कर देते थे पो पचासों की सस्या में होसे पे पोर उनकी प्रवीक्षा में बैठे रहठे थे। शास्त्री बी एक- एक म्पति के पास स्वर्य माते पे पौर वरेस्मेह के साथ वाद- पीत करते थे। किसी से पार मिनट, और किसी से दस मिनट ! किसी-किसी से पावश्यकतानुसार पाप-पाप पटे का समय भी लग पाता था। यह बाठपीठ-यह भेंट-मुला- कात केवम पारेको पौर टहलते हुए, होती थी। कमी-कमी मारह तक बन जाते थे, पर या मजाम दियास्त्री जी की पाति पर ममसाहट प्रौर उकताइट दृष्टिगोचर हो ! अब तक प मवये मिस नहीं मेव पे, बराबर मान में टहलवे एने थे। रात को साबित हो कुछ घंटे पाराम से सो पाते रहे हाँ। प्रमान होते हो फिर यही काय पापक प्रारम हो जाता पा। परिवार का सुप दम्पों के साप भामोद-प्रमोन । के पायर हो नमो शान्ति मौर निश्चिन्तता कसापास प्रपूर भानन्द का रसास्वादन कर पाते रहे हों! उनकी पम-सस्नो - २१ नातगापुर पारी को तो साने-मिलाने के उद्देश्य से उनका दर्शम मी हो जाता मा पर तमके कुटुमा के अन्याय सदस्यों को उनके पास पठ- कर बातमीत करने का अवसर बहुत कम मिलता पा। जब वेसो तब शास्त्री जी फाइलों में उमझे हुए अपने प्राइवट सेक्रेटरियों से घिरे हुए ! घर के मोग हि०पी सभी शास्त्री पी को समय-समय पर टोकते हो रहावे में कि ये इतना काम न करें, पर शास्त्री पी क्यों मानने सगे ? सम्हनि माराम हराम है के मिस सिवान्त को बचपन में ग्रहण किया पा बह उनके मम्तर के कोने-कोने में प्रविष्ट हो गया था। परि णामत शास्त्री पी का स्वास्य भीतर ही भीतर गिरमे ममा। पर फिर भी उन्होंने कभी अपमे गिरते हुए स्वास्थ्य की शिका मत किसी सेम की। भीतर ही भीतर शास्त्री पी का स्वास्थ्य मिरता रहा पर फिर भी उनके अभ्यरसाय का कम म पदमा फिर भी उनकी परियम की सापना बम्द म हुई। मुझे यह दिन ममी भांति याद है पर बाम्नी पी इसाहाबाद में अपने मुट्ठी गंज के मकान के कमरे में मोर्गों से भेंट-मुलाकात कर रहे थे। बाहर सैकरों लोग एकत्र पर उन्हें एक-एक से मिलना था और उसके पश्चात् कार पारा मिर्जापुर पोषकर एक समारोह में माम मेना पा। स्पष्टत शास्त्री पो की मारुति पर दुमता के पिये। निश्चय ही ये भीतर ही भीतर पीड़ा का अनुभव कर रहे प पर वे जब तक मूभित होकर सरसरा नहीं पड़े,

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माराम हराम
लोगों को मिलने के लिए दुमाते गए। कदापित हो किसी
देस का कोई मत्री जन रुपि भौर पन हित के लिए इस प्रकार
अपने स्वास्थ्य को मानो ममा सका हो।

। सत्यनिष्ठा और ईमानदारी शास्त्री यो बरे पत्यनिष्ठ है। नेहरू शो के पोषन-दर्शन में सरम के लिए मिष्ठा भी है पर पास्त्री जी की सरनिष्ठा पर गांधी जी का प्रभाव है । शास्त्री पी गांधी पी के समान ही इस सम्बन्ध में पड़े कठोर है। उनकी सत्यनिष्ठा और उनकी मामदारी के कारण उनके सहनों ऐसे मित्र है, या उनसे प्रसन्न नहीं रखते। शास्त्री जी ने अपने घासन काम में सदा स्वजनों की, स्मगातीर्यो को, और सगे-सम्बधियों की उपेक्षा करके अपने सस्य की रक्षा की है। सैकों ऐसे प्रपसरो को में पानता है जब उन्होंने अपनी पृट माता भौर पत्नी को भी सस्पमिष्ठा और ईमानरारी सत्य के लिए उपेक्षा की है। इतना ही नहीं उन्होंने स्थप अपनी भी-अपनी कामनामों की भी उपेक्षा की है। भाज सोलह- सत्रह वर्पो तर सरकार में उरुम पदों पर रहते हुए शास्त्री बीके पास अपना कुछ भी नहीं है । न अपना मकान है पौर म अपनी कोई सम्पति है। मैं शास्त्री जी की पारिवारिक स्पिति से परिचित है। प्रत में यह कहने का पधिकार मी रखवा है कि कदाचित् कांग्रेस के वर्णभारों में शास्त्री जी ही एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हेनि शासम के क्षेत्र मे उम्प मौर सर्वोत्तम पदों पर रहते हुए भी अपने लिए कुछ नहीं किया। मेरे कानों में उनकी परनी के यह शब्द मान भी गूमते रहते --- 'शास्त्री जी, हम लोगों को वृक्ष के नीचे ही टिकायेंगे।" यपि में इमे देश का दुर्भाग्य ही कहूंगा। इस देश के लिए यह किनने दुल मौर कसक को ही मात है कि जो लोग उसकी सेवाग्नि में प्रपमा सषस्व होम कर दें, उनके पास उनके बच्चों के रहने के लिए अपना मकान भी न हो । यहाँ तक मुझे मालूम है उसके मामार पर मैं यही कहूँगा, कि इस देश के निवासियों मे कभी उनके साप न्याय नहीं किया है, जिन्होंने बिना किसी माह से देश के परमो पर अपना सवस्वमपित कर दिया। हो सकता है कि मोगों ने उनकी मूर्तियां बनाकर अपने कमरों में रा सी हों, हो सकता है कि उनकी मागियो समापर पानन्द को महरों में मान होते हॉ पोर यह भी हो सकता है कि उन्हें पूप-दीप दिखाकर उनको प्रापना भी करते हों, मालबहादुर मास्त्री दुइ ईमामदारी सी निष्ठा पौर मिानरारी ने शास्त्री पी को उन्नति के शिखर पर पहुंभाया है-समाज में संपूरम बनाया है। कांग्रेस मे, शासन सत्र मे इसी के बस पर पपनी धाक षमा सके है। उनकी सरयनिष्ठा की उमकी मिान- दारी को प्राज मोगों पर इसमी धाक है कि केबस "शास्त्री भी" कह ही मोग ईमानदारी का अर्थ मगा सेसे है। किसी भी कमेटी में किसी भी समठन में और किसी भी विमाग में केवम धास्त्री जी का नाम सुन करके हीमोग मह कह उठने है कि प्रपश्य ईमानदारो होगी, परश्य समाई बरती पायगी। क्मोंकि लोगों की यह धारणा है कि पास्मी भी अब स्वय अपने लिए भी सस्प का पचिस नहीं छोरसे फिर उनके संबंध में मह सोपना हो प्रपने साप विश्वासपात करना है कि वे कमी किसी के साप पक्षपात करेंगे निर्णम करते हुए पस्प का मादर मरेमे । पौर सपमुप शास्त्री जी म निर्णय में-नियमों के पामन में मान तक कमी पिसी का पक्षपात नहीं किया। उन्होंने अपने सगे से सगे सम्मन्पी को भी रुष्ट कर दिया है पर उन्होंने सत्य का पस्मा महाँ मोग है। उन्हाम भपमे प्रिय से प्रिय स- मन की भी चुपचाप पदावनति देस ली है पर सम्होंने ईमानदारी में पच से पृथक होना पसन्द नहीं किया। कई ऐसे भी अवसर माए है, पर उनके प्रपीनस्थ पफसरों तक मे किसी विशेष मनित के कार्य के लिए नमसे निषेवन किया है, पर उहनि सत्यनिष्ठा और ईमानदारी मत्य के लिए उपेक्षा की है। इतना ही नहीं, उन्होंने सर्य पपनी भी-अपनी कामनामों को भी उपेक्षा की है। मान सोमह- सह वॉं तक सरकार में उन्ध पदों पर रहते हुए पास्त्री मी के पास अपना मुछ भी नहीं है । न भपना मकान है पौर भएपनी कोई सम्पत्ति है। में शास्त्री को की पारिवारिक स्पिति से परिचित हूँ। मत में यह कहने का अधिकार भी रखता है कि कदापिद कांग्रेस के कर्मचारों में पास्त्री की ही एक ऐसे म्परित है मिन्होंने शासन के मन में उच्च पौर सर्योसम पदों पर रहत हुए भी अपने लिए कुछ नहीं किया। मेरे कामा में उनकी पत्नी के यह शरद पाव मो मूंगते रहते है-"शास्त्री पी, हम भोगो को इसके नीचे ही टिकायेंगे।" यपि में इमे देश का दुर्भाग्य ही करेगा। इस देश के लिए यह किसने दुम्स और कसक को ही बात है कि जो लोग उसकी मेवाग्नि में अपना सवस्स होम कर समके पास उनमें वर्षों के रहने के लिए अपना मकाम भी न हो । जहाँ तक मुझे मासूम है, उसके मामार पर मैं यही कहूँगा, किस देश के निवासियों मे कभी उनके माप न्याय नहीं किया है जिन्होंने बिना किसी माह के दम के चरणों पर अपना सवस्व भर्पित कर दिया। हो माना है कि मोगा ने उनकी मतिमा बनाकर अपने कमरों में गा मो हाँ हो सकता है कि वे उनको माझिया मनाकर पान को सहरों में मान होते हो, और यह भी हो सकता है कि वे उन्हें धूप-दीप रियाकर उनको प्रायना भी परखे हो मातहमर पाली ? पर उन्होंने कभी इस बात को सोपने मोर समममे की चिन्ता नहीं की कि उनके बचन पिस स्थिति में है और वे क्सि प्रकार जीवन यापन पर रह है। इतना ही नहीं उन्होंने इस बात को भी समझने की पातुरता बहुत कम अपों में ही प्रकट की है कि उनके सिवात या ये उनके विचार मा में शास्त्री पी की पमसत्र में बड़ी पास्पा है। उम्हनि अपने सामन पास में भी अपने प्रमोन अफसरों क कसम्म पामम में बाधा उपस्थित मही का । उन्ोंने कांग्रेस के सिवान्तों और मोजमामों के अनुसार कार्य करने की उन्हें प्रेरमा तो दी, पर प्रशासन के कार्यों में नियमों की पूर्ति में उन्होंने सभी अफसरों को झकने के लिए बाध्य नहीं किया । उत्तर प्रदेश से मेकर केन्द्र तक ये सपा अफसरों के प्रति विश्वस्त बने रहे। उनकी इस प्रवृत्ति से उनके ही मित्र सिन्न हो गए, कितनों ही के मन में उनके प्रति विरक्ति उत्पन्न हो गई मौर किवमों ही में उनकी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी का एक दूसरा पर्म भी सगापा, पर शास्त्री पी फिर मी पपमै पप से विषसित नहीं हुए । ऐसी बात नहीं कि वे इस बात से परिचित न हों, पर फिर भी के अपने सस्य का निर्वाह करते पा रहे हैं। पिखना अच्छा होता किमफसर भौर उनके साथ रहने कामे सरकारी कम- भारी भी शास्त्री जी के विचारों को समझ सकते प्रौर उमके जीवन से प्रेरणा ग्रहण करते । फिर तो मात्र यो कुरा हो रहा है वह न होता । म तो प्रिंस बदनाम होती, और म सम्पनिष्ठा प्रारमिानवारी सरकार के मस्तक पर ही किसी प्रकार का कलम सगसा । मैं यह महीं कहता कि शास्त्री मोके समान ही कांग्रेस के सभी नेता सरपनिष्ठ है पर में यह कहूँगा कि पार देश फी माव की पसबार विन हापों में हैं, वे अवश्य सस्य के साये में दम हुए है। पास्त्री मो को सत्यनिष्ठा और उनकी ईमानदारी की धमक ! यह ऐमी पमक है गो मग्नि को मपटों में सपाई माने पर ग्मोतित हुई है--निसरी है। उनकी वाल्यावस्था के ये पमाषपूग दिन । म सनकी सचाई और ईमानदारी के लिए चन दिनों को -उन दिनों को पड़ियों को भग्नि को सपर्ट ही हमा । शास्त्री पी पपने वयपन के दिनों में गिन स्पितियों से सह-चूमते रहे है, कोई विरमा ही वालक उनमें अपनी पवता मी-अपनी साता की रक्षा कर सकता है। वे जिस साहस के साप -जिस मैर्य के साप प्रनि की सम भयानक मपटों में रहकर मिसर सर है, यह उन्हीं के योग्य है । म उन दिनों को भी प्रग्नि को मपटें ही कहूँगा मन शाम्पो पो पपनी कम्पी महस्थी का प्रयाम में भगवान के भरोसे छोरकर बेल की यात्रा किया करते थे। परिवार में स्त्री, माता और छोटी वासिका।ममपिर सापन पोर न सम्मम । उस स्थिति के पनुमान मात्र से हो हृदय कोप पाता है। पर मास्पी पी का भी हदय कांप जाता था, यह नहीं कहा पा सकता। क्योंकि रेमपने परिवार को इसी स में छोरकर पारबार पेस की या किया करसे पे।

मालपदमुरसारनी यहाँ मैं कुछ घटमाों को उत्पस करने का लोभ रोक नहीं सकता क्योंकि ये भटनाएं मो माग की उन्हीं मपटों के समान है जिनमें शास्त्री मो की सचाई तपाई गई है। प्रकृति की पोर से ज्योतिस की गई है-शास्त्री जी मनी पेस में थे, इसी बीच पापकी पुत्री पुप्पा भस्मस्प हा पौर कुछ ही दिन में उसकी हासत चिन्तमीय हो गई। स्थानीय साथियों ने प्रापसे बाहर पाकर उसे देखने के लिए कहा । परोस स्वीकृत हुई- पर शास्त्री वी ने पैरोस पर मामा प्रपने भारम-सम्माम सिलाफ समझा कोंकि सफामीन निमाधीश मे कहा कि शास्त्री को यह मिसकर दे दें कि वाहर प्रान्दोमन के समर्थन मे कुछ म करेंगे । शास्त्री षो मे दावापूर्वक सर्व छूटने से इनकार कर दिया। अन्त में मिलापीश का शास्त्री जी की नैतिक पता और स्वाभिमान * सामने झुकना पड़ा। बिना मस पन्द्रह दिन के लिए पैरोम पर शास्त्री पी टे। पर ~~~पर उसी दिन नामिका के प्राण-पोकर गए । शास्त्री पी उसकी प्रतिम क्रिमापरके वापस लौटे-पर के अन्दर भी परिवार से मिप्तमे महीं गए। सामान नठारर तांग में बैठ गये-~~-सोगों मे समझाया कि ममी तो भापकी पैरोल पाणी है। शास्त्री बी में कहा कि जिम कार्य के मिए परोम पर घटा था वह धतम हो गया है इसलिए मव सियासत मुझे पैम मामा ही चाहिए और शास्त्री जी पेप्त पसे गए। इसी के एक बप गाव की बात है। शास्त्री पी का पुत्र

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सत्यनिष्ठापौर मामारी
वीमार परा। उसे परे जोर का टाइफाइर हो गया। उम्र
उसकी यही सोई पार वप की थी। शास्त्री को एक सप्ताह
के परोस पर माये । माने का दिन माया-वारे को १०४
रिग्री बुखार था। वह छटपटा रहा था। शास्त्री जी एक पटे
तक उसकी पारपाई के पास सड़े रहे। पिता को प्रांसों से
पार वहते रहे, बम्धे का विस्सर भीगता रहा । वुसार पढ़ता
पा रहा था गक्टर पिन्सित मुद्रा में सड़ा था। जिलाधीश
का सन्देश पाया कि शास्त्री जी मिसिस वायदा परे कि
पान्दोमनकारियो से कोई सम्पर न रसँग, तो परोल की
अवधि पाई पा सकती है। बुखार १०५ तक या पुका था।
शास्त्री जी के चेहरे की पोर सय की दृष्टि थी।
बम्मे ने शास्त्री जी को कसकर पर सिया-- बाबूजी,
मगाइए।"
उस समय शास्त्री बी के मन पर क्या बीत रही थी-
इसे किसी पिता का हदय ही अनुभव कर सकता है।
पिता की कोमस मावनामों पर क्रान्तिकारी प्रादर्श पोर
स्वाभिमान ने विषय पाई। शास्त्री जी ने हम्मे को अपने से
अमम पिया। प्रपूरित बालों से सबको नमस्कार किया पौर
कमरे के बाहर निकस भाये । यम्मा चीखता रहा- 'बाबूगी,
वागी!"पर शास्त्री जी ने फिर कर न देसा । मोर कुछ देर
मादये प्रेस की अपनी देर में थे।
यह है पास्त्री बी की सत्यनिष्ठा और सिद्धान्तों के प्रति
-

नामदार मास्त्री इस ईमानदारी इसी निष्ठा और ईमानदारीने शास्त्री भी को उपति क शिसर पर पहुँपापा है-समार में सपूग्य बमाया है। कोपस में, शासम सत्र में इसी के बस पर ये अपनी पाक कमा सक हैं। उनकी सायनिष्ठा को उनकी मिाम- दारी की माव मोगों पर इवनी धाक है कि देवम "शास्त्री थी" कहते ही मोग ईमानदारी का मई सगा लेते हैं। किसी भी कमेटी में, किसी भी समठन में और किसी भी विभाग में फेवस शास्त्री जी का नाम सुन करके ही मोग यह कह उठते है कि मपश्म ईमानवारो होगी भषय सपाई बरती जायगी। क्योंकि लोगों की यह धारणा है कि शास्त्री बी या स्वप अपने मिए भी सत्य का प्रावल नहीं छोड़ते फिर उनके संबध मे यह सोपना हो अपने साप सियासपात करमा है कि वे कमी किसी के साथ पक्षपात करेंगे-निमय करते हुए सस्य का मावर न करमे। मौर सपमुष शास्त्री जी ने निर्णय में-मियों के पासन में प्राग तक कमा किसी का पक्षपात नहीं किया। उन्होंने अपने सगे से सम सम्पयो को भी रप्ट कर दिया है पर उन्होंने सत्य का पस्मा नहीं होगा है। उन्होंने अपने प्रिय से प्रिय स्म बन की मो धुपचाप पदावमति देमली है पर उहोंने ईमानारी के पम से पृपकहामा पसन्द नहीं किया। कई ऐसे भी अबसर पाए है, जब सनक ममीनस्थ मफसरोक मे किसी पिप पक्निक कार के लिए उनसे निवेदन किया है, पर उन्होंने

सस्मनिष्ठा और मानारी
केगम इस लिए उमके निवेदन को स्वीकार करने में अपनी
मममपता प्रमट को कि उस व्यक्ति का उनसे विधेप सम्बष
है। प्रमी गत चुनाव की बात है । इलाहाबाद में कुछ मोयों ने
इस बात को मेकर कानाफूसी प्रार्रम की कि शास्त्री जी चौधरी
नौनिहाससिंह के भुनाय क्षेत्र में कांग्रेस उम्मीदवार का प्रभार
करने के लिए इसलिए नहीं पाते कि पौधरी साहब धास्त्री
पी के पनिष्ठ सम्बन्धी है। पोपी मोमिहामसिंह प्रमा
सोशमिस्ट पार्टी के उम्मीदवार पे पोर शास्त्री जी के
पनिष्ठ सम्बन्धी है। शास्त्री जी के कानों में पब यह सवर
पड़ी, तो ये दूसरे ही दिन पौधरी साहम के चुनाव क्षेत्र में
गए, पर उन्होंने कई सभामों में भाषण देकर जमक्षा से
भपीत की कि यह प्रपना मा कांग्रेस उम्मीदवार को ही दे।
कांग्रेस उम्मीदवार का समपन करते हुए शास्त्री भी इस बात
को भूल गए कि पौधरी साहब के घर में उनको पुषी, सुधी
सुमन, का विवाहमा है।
सिताम्तों के प्रति ऐसी निष्ठा पौर दाता कदापित् ही
भौरमही देसमे को मिले। भाव नगर कांग्रेस को दे दिया
मुझे कमी नहीं भूसती । शास्त्री जी एक साधारण मो कटिया
में ठहरे हुए थे। म सिपाही, और म सन्तरी । केयस प्रारेट
सेग्येार्मा उनके साप पे। मैं पड़क उनके साममे पा
पहुँपा। मेरे साप प्रयाग के दो-तीन पोर कापसमापनपे।
मैंने शास्त्री मो से निवेदन किया कि हम मोगों के लिए 'पास'

-
मात महागुर पारी
का प्रवध कर शास्त्री मो मोठों मे मुस्कराये, मोरबोले-
"मह सीजिए रुपए पौर टिकट मरोद मीगिए।" इषय पर
पोट मगो अवश्य पर साथ ही शास्त्री पी के प्रति मन में प्रया
मी पाय उठी मोर मन ही मन सोष उठा कि इस छोटे से
कर के व्यक्ति में सिमाम्लों के प्रति कसी गहरी निष्ठा मोर
कितनी पर सधाई तथा मास्था है।
अनुपित शत होगी यदि म यही कुछ और ऐसी पटमामो
को पर्चा फर, यो पास्त्री जो की सत्यमिष्ठा और उनकी
मिानदारी के चित्रों को सामने उपस्थित करती है। ऐसे
चित्रों को उपस्थित करती है जो उन लोगों के लिए शिक्षा
प्रद भी हो सकते है, जो भार पावि-पाठि भाई भतीने, प्रीती
यता मोर मापा पक्र में फंसकर भारतबी उमति में बापक
सिद्ध होने के साथ ही साथ सरकार को निन्दा के कारण यन
यह उन दिनों की बारा है, जब शास्त्री की उत्तर प्रदेश में
पुमिस मग्री मे । एक दिन शास्त्री जी के मौसी के मरो को,
मओ कानपुर में रहते थे, एक प्रतियोगी परीक्षा में सम्मिमिस
होने के लिए समम पाने की भावश्यकता पड़ी। वह नय
कानपुर स्टेशन के टिकट पर पर पहुँचे तो पारी मोटी दे
पुकी पी। परिणामत यह टिकट खरीद न सके मोर प्लेटफाम
की मोर दौड़े। इसी समय किसी अपरिमित म्पति ने उनसे
कहा कि उसके पास ससमऊ का टिकट है। यदि वे चाहें तो

सत्यनिष्ठा और मामरारी
से सकते हैं। उसने अपनी मात समाप्त करने के साप हो टिस्ट
उनकी मोर बढ़ा दिया। उन्होंने मट से उसे पसे दिए, मोर
टिकट वेव में गसकर पोटफाम को मोर माग सहए। किसी
प्रपार उन्होंने गारी पकरी । किन्तु मखनऊ स्टेशन पर मय वे
उतरे और उन्होंने फाटक पर टिकट दिया सो फाटक पर
स्थित कर्मचारी द्वारा रोग सिए गए। उसने कहा कि यह
टिकट पान का नहीं बीते हुए दिन का है। इसलिए प्रबंध
है। उन्हेंनि कर्मचारी से विनय प्रार्थना करनी प्रारम की कि
यह उन्हें जाने द क्योंकि उन्हें परीक्षा में बठना है। पर यह
टस से मस म हुमा। पब उन्होंने इस प्रकार काम मनता
हुमान देखा, तो शास्त्री पी का नाम सिमा। उन्हें अपना
पनिप्ठ समभी बताकर गर्मचारी से महानुभूति प्राप्त करने
की चेष्टा । फिर भी कमपारीमो विश्वास नहुमा । उसने
पात्रो गोलीकोठो पर टेमीफोन किया। सयोगस शास्त्री
जी उस समयमोठी में नहीं थे। शास्त्री जी को धर्मपस्मी ने
टमीफोन पर उक्त फर्मचारी के प्रश्नों का उत्तर देते हुए
कहा---'हो, यह सप है कि वे हमारे रिश्तेदार है।" फिन्तु
भर उमने उनसे यह पूछा कि उनके साथ नया किया जाय,
सब उन्होंने उसर में कहा कि यह दो शास्त्री गो ही पसा ससे
और उपर पास्त्री जी अपने दपतर में काय मैं म्पस्त
भरयासों को भी पता नहीं कि हाँ मए हैं। वे चारे

मालपार पास्त्री उक्त कर्मचारी के नियम में पास्त्री जी के घर पहुंचने की प्रतीक्षा करने लगे। टेमीफोन पर टेमीफोन ! प्रासिर बारह वो कराम शास्त्री जी टेलीफोन पर मिसे। उन्होंने सारी पटना सुनी। मयपि उन्हें दृढ़ विश्वास था कि उनका रिम्से दार को कुछ कह रहा है सम है फिर भी उन्होंने बरामी संगोष म किया। उन्होंने उस कर्ममारी को उत्तर देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में दूसरों के धाम पो म्यवहार किया भाता है वही उनके साथ भी होना पाहिए। पर एक पुलिस सर्योश्च मधिकारी मे मो कदाधिस् पापा साहब है, पूरी घटना सुनने के पश्चात् उन्हें मुक्त कर दिमा। दे पार तक यह नहीं भूम सके है कि केवल शास्त्री पी की सत्यनिष्ठा के कारण ये उस दिन परीक्षा में सम्मिमिव महीं हो सके । सुन है वे भान तक शास्त्री जी की कोठी पर कभी नहीं पाये। पर यदि वे शास्त्री जी की कर्तव्य-गुरुता पर विचार करते होंगे तो मेरा र विश्वास है कि उनके मन में इस बात के लिए पद ही पैदा होता होगा कि वे एक ऐसे म्पक्ति के मिकटवा है, मोजाति-पाति मौर स्वाम-सम्बन्धियों के परे से उपर है-बहु उपर है। यह एक दूसरी घटना, पास्त्री जी की बहन भीमसी सुन्दरी देवी एम० एम० ए० ने मुझे सुनाई मी पो उनकी माप बीती है। इस घटना का उस्मेस भी मैं यहाँ इसी उद्देश्य से कर रहा कि इससे धास्त्री जी की सत्यनिष्ठा पर प्रकाध परवा है-

सत्पानिप्स और ईमामारी
द
श्रीमती सुन्दरीदेवी का एक ही सका है। उनका नाम है
घी एकरसरण उन्हें मोरा पी पी कहते हैं। रे पारकस
भूमिर में बिसाधीश के पद पर नियुक्त हैं। कई वप पहने की
बात है, 'पीपी माई० ए०एस० को परीक्षा में सम्मिलित हुए
ये पोर उत्तीनं हए। साक्षात्कार में भी उनका चयन हो
पुकापा। पर उस वर्प को सूची तमार की गई पी, इसमें
उनका माम कुछ मोगो से पीछे माना था। सयोगस उस वर्ष
कुछ पोरे से ही स्पान रिक्त थे। यद्यपि 'भी मी के लिए यह
निर्दिषध पा कि वे अपनी योग्यता से ही नियुक्त हो पायेंगे।
पर इसमें कुछ देर की सभावना पी। प्रत श्रीमती सुन्दरीदेवी
मे दिमी पहुंचकर शास्त्री पी से कहा कि वे कुछ ऐसी
पेप्टा करें, गिसधे श्री' ची की नियुक्ति पासू वर्ष में ही हो
भाए । मास्त्री की उस समय सुभकर मौन हो गये। पाव में
पास्मी जी ने स्पष्टत उनसे कहा कि सरकार को यदि मधिक
अधिकारियों को पावश्यकता होगी सो उनकी नियुक्ति स्वत
हो हो जायेगी । मैं कुछ भी कर सकने में असमर्थ है।
दे
रस पास को लेकर कुछ प्रप्रसम भी हुई, किन्तु पास्त्री
जी ने उनके लिए भी अपने सियामत का परित्याग नहीं किया।
पारी नीकी सत्यनिष्ठा और उनकी ईमानदारी से संबंधित
इसी प्रकार और कई पटमाएँ, भो उनके मित्रों में कही
गाती है। पास्पो पो ने अपने पनिष्ठ से घनिष्ठ मित्रो
मप्रमाण होसे हए देश मिया है पर उन्होंने कभी
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१४
-
1
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नालयहमर पापी
उक्त कर्मपारी के नियत्रण में पास्त्री जी के पर पहुँचने की
प्रतीक्षा करने लगे। टेलीफोन पर टेमीफोन! मासिर मारह
बरे कराय शास्त्री श्री टेमीफोन पर मिल । उन्हनि सारी
पटना सुनी। पचपि उन्हें दड़ विश्वास था कि उनका रिश्ते
दार यो कुछ कह रहा है, सब है फिर भी उन्होंन परा भी
संगोपन किया। उन्होंने उस कर्मचारी को उत्तर देत हुए
कहा कि ऐसे माममों में दूसरों के साप को व्यरहार किया
मावा है वही उनके साथ भी होना चाहिए।
पर एक पुलिस सर्वोप भधिकारी ने मोकगचित् माया
साहव है पूरी घटना सुनने के पश्चात् नन्हें मुक्त कर दिया ।
दे पार तक यह नहीं भूस सके हैं कि कदम शास्त्री की
की सत्यनिष्ठा के रण में उस दिन परीक्षा में सम्मिभित
नहीं हो पके । सुनते हैं, वे प्राम तक शास्त्री बीकी कोठी पर
कभी नहीं पाये। पर यरिये शास्त्री पीपीपतष्य-मुख्ता पर
विपार करसे हमि, तो मेरा विश्वास है कि उनके मन में
इस बात के लिए गव ही पवा होता होगा कि वे एक ऐस
म्पक्ति के निकटवर्ती है पोषाधिोति मौर स्वरन-सम्बन्षियों
के भरे से उमर है-पान पर है।
यह एक दूसरी घटना शास्त्री जी की बहम भीमती सुन्दरो
देवी एम० एम० ए० मे मुमै सुनाई पी, यो सनकी माप बीती
है। इस पटना का उस्मेख भी मैं यहाँ इसी उद्देश्य से कर रहा
किसस शास्त्री पी की सत्यनिष्ठा पर प्रकाप परवा है-

उत्पानिया और मानगरी श्रीमती सुन्दरीदेवी का एक ही लड़का है। उनका माम है यी पगारण । उन्हें मोग 'यी जी कहते हैं। वे पाजकम मुमर मे विमावीम के पद पर नियुक्त है। कई वप पहले मी बात है 'भी' पीपा० ए. एस. की परीक्षा में सम्मिसित हुए पे और उधीर्ण हुए। साक्षात्कार में भी उनका भयन हो कापा। पर उस वर्ष भो सूची तैयार की गई मी, उसमें उनका नाम कुछ मोगों से पीछे माना था। मयोगस उम थप गुरु पोरे से ही स्थान रिक्त पे । यद्यपि यो' जी के लिए यह निश्चित पा कि वे अपनी योग्यता से ही मियुक्त हो जायेंगे। पर इसमें कुछ देर की संभावना पी। प्रत श्रीमती सुन्दरीदेवी न दिल्ली पहुंचकर शास्त्री जी से कहा कि वे कुछ ऐसी पेप्टा करें, जिससे पी वी को नियुक्ति पालू वप में ही हो पाए। शास्त्री पी उस समय सुनकर मोन हो गये। बाद में मास्त्री जी ने स्पप्टर उनसे कहा कि सरकार को यदि भपिक अधिकारियों की पावरपकसा होगी तो उनकी नियुक्ति म्बत ही हो पायेमा । मैं कुछ भी कर सकने में असमय है। रे इस बात को लेकर कुछ प्रप्रसप्त भी हुई किन्तु शास्त्री मी ने उनके लिए भी प्रपमे सिद्धान्त का परित्याग नहीं किया। मास्त्री पी की सत्यनिष्ठा और उनकी मानवारी में संयमित उसी प्रकार की पौर कई भटमा है, जो उनके मित्रों में पही माती है । यात्रा पो से अपने पनिष्ठ से पनिष्ठ मित्र को अप्रमत होते हुए देग्न मिया है, पर उन्होंने कभी किसी के लिए

नातवहार पात्रो
भी सस्य का परित्याग नहीं किया। सत्य पालन की यह
शिक्षा उन्हें राष्ट्रपिता गांधी ने परित्र से प्राप्त हुई है-पदि
यह कहा जाए तो प्रस्युक्ति की बात न होगी। पाप भी जब
उनकी वहिन योमती सुन्दरीदेवो इस घटना की पर्चा करती
है सो सष्टम उनको प्राकृति पर इस बात के लिए गर्व
झलक पड़ता है कि वे ऐसे माई की बहिन है जो अपनों की
उन्नति के लिए सियाम्तो का अपहरण नहीं करता।

देशभक्ति मेहर को क बोवन-दशाम को विशिष्टता-उन्नत राष्ट्रीय दृपियोप मास्त्री पो में भी है। पास्त्री जी का जीवन उपम राष्ट्रीयमा क हो मांचे में उसा हुआ है। वरोर स कायम्प ६ पर उनमें सभी वर्गों को विशेषताएँ मिलती हैं। उनमें मन और हदम क निर्माण में सभी वर्गों को विधिपतामों के घावों का योग है। परिणामस्वमप उनकी सबमें मासक्सि है, पौर दिमी में नहीं है । प्राह्मण, क्षप्रिय, पप पीर पूछ-पारों वर्षो साग उन पमिष्ठ मित्रा में हैं हिन्दू सम प्रम में सम्हनि जम्म ग्रहण लिया है पर उनकी सभी पो में मास्पा १८ नामबहादुर मास्त्री है। ये पम को दृष्टि से किसी व्यक्ति का मूल्म महीं मापसे, वरन् भांकते हैं उसकी मानवता की दृष्टि से । पाहे किसी भी धर्म को मानने वासा व्यक्ति हो पर यदि वह पम्छा है मोग्य है, पौर सदाचारी है वो उसरा सम्मान करते है उसे गड़ावा देते है । उन्होंने अपने पब तक के जीवन काम में कभी किसी व्यक्ति को इस कारण पावर नहीं दिया कि वह हिन्दू पर्मानुमायो है। यही कारण है कि मल्पसस्पक वर्ग के लोग उन पर पधिक मास्पा रमते हैं। मैं उस दिन को महीं भूल सकता पर शास्त्री बी का मेवा के रूप में चयन हुमा पा। उनके बमल पर उन्हें वनाइयां देने वालों की भीड़ एकत्र पी। इनम एकपूर मिया जी मी पे, पो पर्यों की पोटली में मामा मोर पुष्प सिए हुए थे। शास्त्री पी के आने पर उनके पास जा पहुंचे भौर उनके ममे मे मामा मामते हुए गोमे-~~ 'मुदा का शुक्र है पो मापफा नेता के रूप में चुनाव हुमा । प्रपनी यात पूरी परते हुए उनकी पनि एसएला माई भी। बरे मियां पी पी पासों में वे प्रामू । वे मासू नहीं प्रस्प सस्पकोंपीमास्पा पोर प्रेम की दूद भी। हो सकता है कुछ मोगों को यह प्रिय न हो, पर पो मोग उभव राष्ट्रीयता में विश्वास करत है मो मोग धर्म और वाति की सीमा सपूर मामवदा के आंगन में सना पसन्द करते है ये शास्त्री बी के इन विचारों का भावर ही फरेंगे कि राष्ट्रीयसा के क्षत्र में म कोई हिन्द्र है पोर म कोई मुसलमान ! म कोई सिक्स है

ए-मति
-
पौर न ईसाई। सभी केवम मारती है केवल भारतीय । श्री
मेहरू जी ने भारत की राष्ट्रीयता का चिन्न इन्हों विधारों के
भाषार पर निर्मित किया है। शास्त्री मी भी इन्हीं विचारों के
दर पोपर है। केवल दुक पोषक ही नहीं हैं, उन्हनि इम
विचारों के सम्रि में अपने जीवन को टाला है। ये राजनीति
के पप पर अपना एफ-एम पग इन्हों विचारों से पाषार मान
कर उठाते हैं। वे घर के भीतर और बाहर-समान
पापरण करते हैं। विस प्रकार राजनीति के मप पर उनकी
सब धमों में समदशिता दिखाई परती है, यही नाम उनका
पर के भीतर भी रहता है। उनके घर में प्रतिदिन पूजा-
पाठ पौर कीतन पनता ही रहता है। पर मैने भी उन्हें कुछ
देर तर ठमर पीतन मुनमे छुप नहीं दला। पाग्रह लिए मामे
पर ये मेवात मुसुरा दिया करते हैं, मौर फेवम एक ही यात
में प्राग्रहमानों । मुख बन्दर देसे है---"माप मोग पर
पुण्यारमा ई मेरे ऐसे माय कहा?"
पर इसका यह तात्पय मही विपास्त्री जी की पूजा-पाठ
पौर फीतुन से विरक्ति है। इसका सालय फेरल यह है कि
शास्त्री को नमो धर्मो रे परयों म, फेवस उन्ही कमियों को
रते हैं, को मनुष्यों के पारस्परिक पापपप का प्रमाण पती
है। मेरी समझ मसान्त्री जी की ये पहियो मम । म कह
नहीं माता पिपात्रो जी को कम पी प्रेरणा यहाँ मे मिप्ता।
यदि में यह कहूँ नि उहेंगम फी प्रेरणा मीता से मिमो हागी,

तो प्राश्यय नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि बाल्यावस्था से ही पास्त्री जी के भर में गीता का पाठ होता है। उनकी माता जी, दिनकी अवस्था इस समय मगमग अस्सी वर्ष की होगी, अपनी स्कीय-माईस वर्ष की प्रपस्पा से ही गीता म अनन्य प्रास्था रसती मती भा रही है। परिव निकामेश्वर मिश्र 1. भगवानदास स्वर्गीय बाधाम नरेद्रदेव और हा. सम्पूर्णानन्द प्रादि मनोपी भी जिमके सम्पर्क में रहार शास्मो को मे मानापन दिया है मराधना के क्षत्र में कर्म के ही उपासाचे भौर हैं। प्रत शास्त्री बी भी कर्म को हो प्रमुखता देस है । वे भीतर और बाहर--सम ओर से मेवल पर्म केही उपासम है। हिन्दू मुसलमान मोर ईसाई- सब में कम की ही खोमरते हैं। वा कमवान् है वह पाहे कोई हो उनका प्रिय है। वारापीत में भी ये प्राय काम की बात को ही महत्व देते है। उनसे जम काई व्यय की वातपात करने सगता है तो ये झट यह कहकर उसका मुस मद कर दिया करते है कि कवल काम का बात कीजिए। शास्त्री जी को राष्ट्रीयता पर गांपी जो की निभयता की पाप है । राष्ट्रीय परियों को सेगोने म शास्त्री मी भी गोषी जी के समान ही अपने कितने ही हित पियों मिण्टपतियों और मित्रों को पसंतुष्ट करणे हए नहीं हिचकते। पुलिस मत्री के रूप में उनके सामने कितनी ही बार ऐसी समस्याएँ पाई, जिन्हें हिन्दू-मुसलिम समस्या के नाम से मभिहित करना मन

चित न होगा। पर धास्त्री जी ने उन सपूर्ण समस्यामों के
हत और निपटारे मे सदा अपनो निर्भीकता का हो परिचय
दिया। उहोंने अपने परिचितों मित्रों और स्नेहियों से पृथक
होकर अपना निर्णय दिया। यद्यपि उनके निमय से कुछ लोगों
न उन पर मुससिमपरस्ती का इल्जाम लगाया, और अपने
स्माष-मापन के लिए जनता में प्रचार भी किया पर फिर भी
पाम्पी बी ने कभी इस पात की चिन्ता नहीं की। वे बगे
निर्भीकता के साथ माज भी उन्हीं से मिलते-जुमते निणयों
की पुनरावृत्ति परसे जा रहे हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि उन्नत
राष्ट्राय दृष्टिकोण केपारण भव थी नेहर बी को बदनाम
किया जा सकता है और मव गांधी जी ऐसे महामानव को
गोलियों पा गितार बनाया जा सकता है तब उन पर भी
छींगकशी की माए सो यह कोई माश्चर्य मी यास नहीं है।
फेवस जाति-पाति पौर पम के ही क्षेत्र में नहीं मापा
मोर प्रांतीयमा कक्षा में भी शास्त्री जी का दृष्टिकोण बड़ा
हो पा प्रौर मापनीय है। पास्त्री जी उरा प्रयाग पौर
वाराणसारे निवासी हैं, जिस सोग हिन्दी पौर सकस का
गम मानत है । शास्त्री जी ने स्वय हिन्दी पौर सम्मत का ही
विगेप रूप से प्रध्ययन किया है। हिन्दी के प्रबम समर्थक
राजपि पुरषोत्तमदास टणन के साथ में अपने जीवन के
गई वप म्यतीत पर चुके हैं। हिन्दी साहित्य संम्मेमन से में
बराबर उनका समय रहा है । पर फिर भी उन्होंने हिन्दी
।

४२ मानबहादुर मास्थी सवप में भी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे महिन्दी मापा-भापियों के मन में उमके प्रति सन्देह पागत हो, पौर उन्हें यह कहने का अवसर मिले कि धास्त्री पी पक्षपान कर रहे हैं । हिन्दी शास्त्री जी की अपनी मापा है और अब सो यह सबकी मापा है, पर राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से हिम्दी की उन्नति सबको साप में ही मेकर करने के पक्ष में है। किसी भी प्रबसर पर किसी भी समारोह में ऐसा कोई करय महीं करसे जिससे भाषा के सबष में उनकी मपनी हठधर्मी प्रकट हो । कदाचित यही वह कारण था कि शास्त्री जी में प्रधान मंत्री पद की पापप की पूर्ति अंग्गी में की। हिन्वी के कई प्रथमों में इस बात को मेकर शास्त्री पी की पामोपमा की गई पी पर इसके साथ ही साप महिन्दी भाषा भाषियों पौर राष्ट्रवादियों की ओर से उन्हें साधुवाद भी मिसा पा। पर शास्त्रोपी को न तो मालोचमामों मे भयभीत किया पौर म साधुवाद के शब्दों ने गुमराह पिया। वे भाव भी हिन्दी की सर्वतोमुषी उन्नति चाहते हैं, पर उसके लिए पे राष्ट्रीयता की उस मरी को कदापि भग म होने देंगे जो पोर साधनामों और तपश्चर्यायों के पश्चात् निर्मित की गई है। शास्त्री पी उत्तर प्रदेश के निवासी है ! पर कयापित यही एक एसे व्यक्ति हैं, गिमके मिफटपतियों में-कमपारियों में उत्तर प्रदेश के निपासियों का अनुपात बहुत ही स्वल्प है। वास्तव में बात यह है कि शास्त्री जी गग सि विमाम में रहे। उन्होंने प्रतिीयता के क्षेत्र से ऊपर उठकर काम किया है। कमचारियों और अफसरों की नियुक्ति प्रौर पसन्द में उन्होंने सदा योग्यसा पोर कायममसा को हो सर्वोपरि माना है। रेस मत्री से मेकर प्रमान मत्री के पद सक यदि उनके निकटवर्ती पोर प्रधान कमपारियों पर दृष्टि ससी जाए, सो शास्त्री की प्राम्सीयता के इस महा रोग से मुक्त दिखाई देंगे। यपि इस रोग मुक्ति ने शास्त्री जी को उसर प्रदेश की राजनीति म पीछे हिसपने के लिए बाध्य किया है, पर शास्त्री को रासनीतिक पदों पर अधिकारों से राष्ट्र को अधिक महत्व देसे हैं। वे राष्ट्र की वेदिका पर भपनी यति बढ़ा सकते हैं पर अपने स्वापो के लिए राष्ट्रीयता की बलि लम्हें पसन्द मही-स्वीकार नहीं। शास्त्री जी ने अपने विचारों के द्वारा अपने उन्नत राष्ट्रीय दृष्टिकोण का पित्र भी उपम्मित पिया है। निम्नांकित पवित्रयों में उन्होंनि राष्ट्रीयता, साम्प्रदायिकता, प्रठिीयवा भौर मापा का वो पित्र वौंपा है वह उन्ही के योग्य है- 'हमें अपनी राष्ट्रीयता को पड़ों को और मधिक मजयूस करना है। हमारी राष्ट्रीय भावना की एक कममोरी का नाम अपनों ने उठाया। भारत के एक बम को उन्हनि फूमसापा। कोपस ने कभी भी दाराष्ट्र के सिद्धान्त को स्वीकार नहीं झिया फिर भी हम परिस्थितियों से मजबूर थे। मोर कुछ मोगों ने एक प्रमग राष्ट्र पाकिस्तान की मांग की।

मातबहागुर भास्त्री
पाकिस्तान में अपने को एए इस्सामी राष्ट्र घोषित किया,
पर हम पद भी एक राष्ट्र सिदान्त को ही मानते है क्योंकि
इसी में मानव-समाज का कल्याग है।
पाकिस्तान के प्रति हमारी कोई वैमनस्यपूर्ण भावना
नहीं है। पाकिस्तान ने अपने को इस्लामी राष्ट्र पोपित करके
पहा के प्रस्थसस्यों को सूब सताया फिर भी हमने अपना
संमम नहीं छोड़ा। उधर पारिस्तान से मस्पसंश्यों को
बरदस्ती बाहर निकाला जा रहा पा, इधर हम भारत में
मुस्लिम पम्पसम्मों की पूर्ण रक्षा कर रहे थे। यह है मारत
को परम्परागत उदारभावमा ।
पाकिस्तान में हिन्दुओं को बना दिया गया। भारत में
फिलहाल सो साम्प्रदायिकता महीं है। पर क्या यह पूर्ण
समाप्त हो चुकी है या नहीं यह भावना तब तक समाप्त नहीं
होगी पद तक हम इस प्रवृत्ति को रचनात्मक कारों में नहीं
सगा पास
धर्म प्रभागमभी-कभी वर पिवित्र होते हैं। ममी मी
बहुत से माग यह कहते पाये बाते है कि हिण, मुसममाम
पौर सिक्त पलग समुदाय है। यह स्वीकार करना पड़ता
रिहमारे समाज में भनक मुटिया है और उनका कारण धर्म
को भावना है। एक ही पमी में रहने वाले हिन्दू, मुससमाम
पौर ईसाई भापस में मिमतेनुसते , उनके परस्पर सम्पत्य
भी है पर उनके जीवन का रण परस्पर भिन्न है। मत पर

1
पछि
तक यह मित्रता बनी रहगी सप सक हमारी राष्ट्रीयना
परित रहेगी।
। साम्प्रदायिकता के रोग का निदान करने में लिए हमें
पुराने इतिहास को दृष्टिगत करना होगा । यदि हम उसको
ध्यान में रखार माग प्रयत्न करेंगे, सो समषत हम यह
गमती नहीं करेंगे मो पहले हो चुकी है। मित्रता का प्रदान
सपा मुट राष्ट्रीय मायना-दोनों पृषक हैं । गप्ट्रीयता पा
पच है देम के प्रति सगाव पोर निष्ठा । व्यक्तिगत धार्मिक
तथा साम्प्रदायिक दायरे से बाहर निफमकर प्रपन प्रतीत,
मतमान तपा भविष्य के प्रति एक स्वाभिमान की भावना
ही राष्ट्रीयमा है । इसके लिए साधारण सके तुमसे प्रयत्नों या
दवाय स इम दिमा म कोई लाम न होगा। इस राग ना
निदान तो सपकर तपा घय फसाय करना होगा।
'किमी राष्ट्रीयता को प्रावश्यक पते ये हैं--एप
भौगोलिक पन प्रदेश, एक सम्मिमित इतिहास, सम्मिलित
मामाणिक प्रपाए एवं जीवन यापन सादग पोर एक मम्मिलिस
भापा । ये मभी पसे भारत में मौजूद है। इन सभी पर्ती का
पर ममग्रम्प हा सस्कृति महा जा सकता है। पौर व वर
यह मति मुरक्षित रहनी है सम तम अनसा पो भूम एपत्ता
दापि भय मी हो सकती।
हमारी मुमति भारत के विचारा उममी भावनामा
मया उमफा मरेतुन माझासापों की प्रतीर है।

मामरहमुर पास्त्री
पाकिम्मान में अपने को एक इस्लामी राष्ट्र पोपित किया,
पर हर पर भी एक राष्ट्र सियाल को ही मानते है क्योंकि
इमी म मानव-समान का कल्याण है।
'पारिस्तान के प्रति हमारी कोई कममस्पपूर्म भावमा
नहीं है। पाकिस्तान में प्रपन को इस्लामी राष्ट्र पोपित करके
वहाँ रे मलसस्यों को सून सताया, फिर भी हमने अपना
संयम नहीं पाता। उपर पारिस्तान से पल्पसम्यकों को
जबर्दस्ती बाहर निकामा या रहा था पर हम भारत में
मुस्लिम अल्पसस्पकों को पूर्ण रमार रहे थे। यह है भारत
को परम्परागत उदारभावना।
पाकिस्तान में हिंदुओं को दवा लिया गया। भारत में
फिलहास तो साम्प्रदायिकता नहीं है। पर बमा वह पूषत
समाप्त हो चुकी है या नहीं, यह भावना र ता समाप्त नहीं
होगी जब तक हम इस प्रसि को रपमात्मक कार्यों में नहीं
सगा पाता
"धर्म के प्रभाव कभी-कभी वापिषित्र होते हैं। अभी भी
बहुत से सोग यह कहते पाये जाते हैं कि हिन्दू मुसलमाम
पौर सिम्म प्रसग समुदाय है। यह स्वीकार करना परगा
किहमारे समान में अनेक जुटिया है और उनका मारम धर्म
को मावना है। एक ही पसी में रहने वाले हिन्दू मुसममान
पौर ईसाई आपस में मिमते-सुमते है उनके परस्पर सम्बाप
भोई, पर उनके जीवन पाक्य परस्पर भिन्न है। मठ मर

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सामयापुर हादी
'सस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति के प्रसार का माम्मम,
शाम का फोप सपा भारत की जन भाषा ही है। समर
का हाम हाने से राष्ट्रीयता का एक पस्तिशाप्ती माध्यम मप्र
हो गया। पेंग मी भाषा में हमें पून सास्कृतिक एकता प
राष्ट्रीयता मा बोष कराया पर साप ही उसमे समाग को
पासक और पासित तथा अदेसीदा और गर प्रेषीदा-
दो भागों में पांट दिया । पर पब हमारा लक्ष्य वगहीन समार
ममामा है हो हम इस भेद भाव को कैसे रहमे दे सकते हैं ?
मोकसत्र में ऐसी कोई भी मस्तु पीमित नहीं रह सकठी
पो पन-जन की अपनी म हो।"

बौद्धिक कुशलता
सास्मी गो में पूर्ण बुद्धि कौगस है। ये किसी विगती
हुई और को सपाना पौर किसी षटिम समस्या को मुमम्मा
भूब पामते हैं। ये विवादों के प्रकार में भी सम्प का
मेवे निदान की पाइ सपा मेते हैं। कांग्रेस के घर में
बिगड़ती हुई समस्यापों को समझाने के लिए ये अधिक प्रति
है। अब मौ किसी प्रान्त में कोई विग्रह का पा
मिमी बात को मेकर भगा उत्पन्न हुमा है, सागर
भारची जी का पागे खड़ा किया है। हो क्या नेहमी में
कोणम नहीं था। उनमें दूरदर्शिता का प्रभाव का

मातबहागुर मास्त्री
नेहरूपी में प्रपार बुद्धि-कौशम मा मौर पपार दूरदर्शिता मी,
पर नेहरू जी विवावग्रस्त मामलों में प्राय शास्त्री जी को
ही भाग किया करते थे। शास्त्री जो की मृदुवा उनो धर्म
मोर सनकी विपारधीमता का उन्हें पूरा भरोसा था । वे कई
अवसरों पर उनके इन गुणों को अपनी सौटी पर कस चुक
थे, और उन्हें सरा' पा चुके थे। शास्त्री पी में यह बात मुस्स
रूप से है frमिवावग्रस्त स्पों पर विप की परवी धू]
भी पीकर सहें पपा पाते हैं।
सन् १९११
के
माम
के दिन । कांग्रेस के भीतर घुमाय
को भेकर एक महान् सपर्प-सा उठ पाहमा पाम एक
प्राध में नहीं बस्कि प्राय सभी प्रांतों में पुनाव के प्रपम को
लेकर एक अजीब वितगवाद-मा पैदा हो उठा पा । वर-वर
मैता तो टिकट के उम्मीदवार पेही छोटे-छोटे कार्य कामों
के मुम में भी पानी भर पापा पा किसने ही बाहर के
मोग भी थे, जो काप्रस के टिकट के लिए एड़ी चोटी
का पसीना एक कर रहे थे। एक-एक स्थान के लिए
दस-दस उम्मीदवार ! जिसे वेसो वही में वरेर रहा
पाथी नेहरू के सामने एक महान मेवर-बाम-सा उत्पन
हो गया कि वे किस प्रकार लोगों की मभिसापामों की परगर्गों
को एकवा के सालों में गौष सकें। वे कपिस के भीतर एक
ऐसे महान म्पक्तिस्व की लाज करने मगे पो पपमे व्यवहार
से, अपनी बुद्धि को कुममता से सबको सन्तुष्ट कर सरे ।
-

रिक एमतता
४१
मासिर उनकी दृष्टि धास्त्री जी पर पड़ी। उन्होंने शास्त्री
भीके कों पर इसका मार छोर दिया। शास्त्री जी ने उनकी
भालानुसार हो शासन के कार्यों से पृपा होकर निर्वाचम के
दापिस्व को प्रपने उपर किया। पौर फिर जिस कौशल
छाप उन्होंने अपने दायित्व का निर्वाह किया उसकी समर्षों
ने ही नहीं, विरोधियों में भी मूरि भूरि प्रशसा की । इसी
प्रकार दूसरे पोर तीसरे घुमाव में भी शास्त्री जी ने अपने
मुद्धिनीराम से कांग्रेस संगठन कीमड़ी को, पारस्परिक विरो!
से कमजोर होने से वपाया ही नहीं, उसे सुपद भी बनाया।
पसम म मापा-विवाद के दिन ! ऐसा लगवा पानि
असम में भापा विवाद को मेकर एक भयानक विस्फोट होगा
पीर उससे भारत की राष्ट्रीयता की घरसी हिम उठेगी। नेहरू
जी को फिर मास्त्री भी की याद माई मोर उम्हनि सर्ने प्रसम
मेगा । बास्त्री भीम असम गाकर दोनों पक्षों की बातें सुनने
मीर सतुमित निर्णय देने में मिस धय और कौपाल को
उपस्थित किया था, उसकी सभी समापार-पत्रों पौर मेतामों
ने भूरि भूरि प्रशसा की पी। वह शास्त्री पी पी ही अपूर्व
मूझ-बूझ पौर मिना राम था कि असम की भाषा
समस्मा न रमरूप पारण नहीं किया, और उसके मस्तक परमो
फमा तगने गा रहा था, यह मगने से यर गया। माज असम
मोर बगाम योन्मो नेता तक पास्त्री बीरे इस उपकार
पो मानत है और उनले धुधि पातुर्य की सराहना करने के

नामबहार मास्त्री
1
सायही साप उनके प्रति कुखमता भी प्रगट करते हैं।
ये दिन भी नहीं भूमठे गय नेपाम और भारत के पार
स्परिक सम्बध दिगडमे सगे थे। कारण माहे पो भी रहा
हो, पर ऐसा प्रतीत होने सगा था कि भारत और मेपाम के
वीष एक महरी काई पैदा हो जायगी। ऐसी माई, जो दोनों
देशों की उन्नति और प्रगति के लिए विधातक सिम होगी।
थी नहरू फिर इस समस्या को मेकर पिन्तित हुए और उन्हेंमि
फिर पास्त्री श्री को इस कार्य के लिए मामे किया । शास्त्री
पी मे मेपाम की सद्भाषमा यात्रा की। शास्त्री जी ने मेपास
केसम्म भिकारियों से बात की और उन कारणों को मानने
की पेप्टाकी, गो भारत और नेपाल की पारम्परिक मित्रता
में प्रवरोध पैदा रहे थे। शास्त्री जी ने उन कारणों का
मपम करके एक ऐसा हम एटा जिससे दोनों देशों का पार
स्परिक विरोष दूर हो गया और दोनों देश फिर नह-मूत्र
में पास हो गए। इसी प्रकार व कश्मीर में हजरत मुहम्मद
साहब के वास को लेकर विग्रह की मधिी उठी, वो उसे पान्त
करने के लिए शास्त्री जी को ही करमीर मेया गया। धास्त्री
पी मे कपमीर में आकर विस नौद्यम से पोरी गए वास का
पता लगाने में सहायता दी मौर उठी हुई वियह की मामी को
भान्त किया, उसी देश के ही नहीं विदेश के पत्रो मे भी
मुक्त कठ से सराहना की पो।
इसी प्रकार मनिस के अन्तर्मत कितनी ही बार दसीय मग,

पौर विवादों को पत्ति करने म धास्त्री पी ने अपनी बुद्धि का पातुप प्रदर्शित किया है। शास्त्री जी की सत्य पन्वपिणी मुदि उनको अपनी सम्पत्ति है । इस युधि का उनसे वचपन से ही मगाव है। यहाँ हमें उमकी वाल्यावस्थाको एक षटना याद मा जाती है जिसे सामने रखने पर फिर इस याप्त में सनिक भी सन्देह नहीं रह पाता कि पास्त्री गो वास्यावस्मा से ही अपने बुद्धि- पातुर्म द्वारा सही बात का पता मगाने में बड़े सिवहस्त है। यह उन दिनों की बात है, जव पास्त्री नीमीपवस्मामेव्यस बारह वप पो पो। मास्त्री जीभपने मामा स्वर्गीय विषेश्वरी वायू के साप मिर्जीपुर गामे से सिय मुगससराय स्टेशन पर गाड़ी पर सवार हुए । विभेश्वर यापू के पास सोने के पाभूपर्णो पीए पोटसी थी जिसे मे गम में दवाए एए थे। मिर्जापुर स्टेपान पर उतरने पर ये गहमों की पोटली रेस के रिम्स मे ही भूल गए । पर पहुँचने पर उहें इस बात का स्मरण हमा कि पोटमी तो रिव्य में ही रह गई। पर प्रय क्या हो सरवा पा पर्योकि मदतफ तो गाहीस्टेिशनों को मागे पारपर गई थी। वेपारे सिन्सिस होगर पमग पर पर गए । शास्त्री जी भय तक विचारों में ही पे हुए थे। सोचते-सापते थे यिमवरी मामू के पास माफरोसे मामा, श्यों म एफवार स्टेशन पर पस- कर देटिंग रूम पादिम देश लिया पाए। हो सकता है दि मिस भादमी को पोटली मिमी हो, मह मिर्जापुर स्टेशन पर हो उतर गया हो, पौर वेटिंग रूम में मौजूद हो।" -

तातएर पास्त्री
विषेश्वरी बापू को शास्त्री जी को भाव पंच गई। 4
शास्त्री जी को साप सेकर फिर स्टेशन पर गए। विरेश्वरी
मावू तो इपर-उमर देखने मगे पर शास्त्री जो सीधे पुपचाप
वेटिंग रूम में जा पहुंभ । परे, यह मा? यह सो सचमुष एक
प्रादमी पोटसी सोसकर मंठा है और एक-एक गहने को बो
प्याम से देख रहा है ! पास्त्री पी मे मपटकर उस पावमी का
हाथ पकर सिया और कहा-"यह गहमे तो हमारे मामा के
है।' विषेश्वरी बार मी शीघ्र ही वहाँ पहप गये। उन्हें दो
हर्ष हुमा उसका भमुमान उसी को हो सकता है विपके सोमै
के माभूपण पोरी गाने पर पुन प्राप्त हुए हों। विषेश्वरी
मावू जव तक मीवित रहे, वरावर शास्त्री की के बुद्धि पातुर्य
की प्रससा क्यिा करते थे।
पर यदि भार ये होये तो देखते कि उनके मामवहादुर
के दृषि पातुर्म की प्रचसा सारा देश कर रहा है।

त्याग सास्त्री को मनम्य देशमक्स पीर स्यायी है। देश की वेदिका पर उन्हनि पिस प्रकार मपमे सुसो, पाकक्षिामों मोर माशार्मों की यसि घाई, वह उदाहरण को वस्तु है । देशों की स्वाधी- नता के इतिहास में उम नर-पंगपो के त्याग की बड़ी प्रशसा की गई है, जो ऐश्वर्य के प्रा में पसे थे किन्तु भव मातृभूमि को पोर से पुकार हुई, तो उन्होंने सर पूछ त्यागकर उसके सिए कमर में मूंग को मेषमा पहन मी। पर मोरमोरे उन दीपकों के स्याग की प्रोर बहुत ही कम लोगों का ध्यान पाय- पित हो सका है, बो देश की सो में फेवात असवे रहे है-अम- नामबहादुर भारती पस कर काले होते रहे है ! शास्त्री पी ऐसे ही एक पीपक है! वाराणसी में प्रथम मार पर वे बेस गए थे तो क्या मह सच नहीं है कि उन्होंने अपनी उस माँ की ममता और स्नेह फा भी स्पाल महीं किया पा पो पति की मृत्यु के पश्चात् यरी माशा से शास्त्री जी की मोर देख रही पो ! एक नहीं शास्त्री जी ने ग्यारहनयारह बार बेस को यामाएँ की मौर वह भी अपनी पत्नी और मां को प्रभाव की गोद में छोटकर अपने छोटे-छोटे बच्चों को निरामित त्याग कर !! रपए-पसे पौर घर-मार का त्याग तो सरसता साप किया था सकता है पर कोई भी पिता भपमे उस बच्चे का छारपर कारागार को यात्रा नहीं कर सफता मो ज्वरात हो पोर पारपाई पर तड़प रहा हो ! महाराज दशरप श्रीराम के पम गमन पर ही घोक विक्षम हो उठे थे, और इतना घोक निलम हो उठे थे कि उनके प्राणों के सतु टूट गए। फिर उस पेसभात प्रेत यात्री की किन पदों में प्रशसा की पाए, वो अपने बीमार पुत्र को पारपाई पर छोड़कर पेस की यात्रा कर रहा हो ! इन पक्सियों के मेयक को उन दिनों भी कईमार शास्त्री पीके पर में पाने का अवसर प्राप्त जा है । उनको मा, परनी और मम्मों से मिमने-चुममे का समोग उपस्थित हुमा है। पो कुछ इन मौनों मे ऐसा है कार्मों मै सुना है उनके पापार पर में केवम इतना ही कहूंगा कि शास्त्री बी पीर है, महान त्यागी है, मोर अनन्य देशभक्त ! हो सकता है कि कुछ मांग स्पाप यह कहे कि में मसिधयाक्ति पार पासक्सि का प्रचित ग्रहण कर रहा हूँ, पर फिर भी मेरे भीतर का शिवस्प यह कहने के लिए बाध्य कर रहा है जिशास्त्री भी उस योमी को मासि है, वो अपनी ममिल पर पहुंचने के लिए अपने सर्वस्व तक की वादी सगा देता है। शास्त्री जी का वह स्याग ही मार उनके पीयम में परदान की भांति पस्मवित पौर पुष्पित हो रहा है। उमकी महस्यपून उन्नति ही उनके स्याग का उपमन्त चित्र है। यविपास्त्री जी ने स्मागका मथित ग्रहण म किया होतासो भारत ऐस देश में उनके लिए कभी मह सम्भव नहीं था कि वे प्रभाव पूर्ण स्पिति म पग्म मेने और रहमे पर उस पद पर पहुंचते यहाँ मान है। शास्त्री जी राष्ट्रपिता गोपी मोके परम भक्त हैं। गांधी जी के सत्य महिसा मोर सादगी के साये में उन्होंने पून स्प से अपने जीवन को समा है। वे १९२. मौद १९२१. से ही खादी पहन रह है। केवल वे ही नहीं, उनकी पत्नी और मा मादि घर के कुटुम्बी भी सादी केही रस्त्र पारण करते हैं। पारुपी भी पर्श भी बनाते हैं। ये सपन से ही पाकाहारी है। उन सभो मुटुम्मी गांधी यी के 'पप्णव' पथानुयायी है। गांधी जी द्वारा मसहयोग पान्दोलन प्रारम्भ किए बामे पर गाम्त्री मो ने सोरमाह पहना-सिपना छोड़कर उस पान्दो- मन म भाग लिया। यद्यपि उस समय शास्त्रीयीको प्रवस्मा महारह-उन्नीस मप को पी, पर फिर भी वे बेस गए । नेम .

सामबहादुर शास्त्री पम कर फाले होते रहे हैं। शास्त्री जी ऐसे ही एक दीपक है ! वाराणसी में प्रपम वार पव वे पेम गए थे तो क्या यह सच नहीं है कि उन्होंने अपनी उस मां की ममता प्रौर स्मेह का भी स्याल नहीं किया पा, जो पति भी मृत्यु के पश्चात् वही पाशा से हास्मी थी की मोर देख रही पो ! एक नहीं, शास्त्री गो मे ग्यारह-यारह बार मेस को यात्राएं की, मौर वह भी अपनी पत्नी और मां को प्रभाव की गोद में छोटकर अपने छोटे-छोटे बच्चों को निराश्रित त्याग कर !! रुपए-पसे और पर-मार का त्याग तो सरसता के साप किया जा सकता है पर कोई मा पिसा अपने उस मम्चे को छोड़कर कारागारको यामा नहीं कर सकता को ज्वराकात हो और चारपाई पर परप रहा हो ! महाराष दसरप श्रीराम के वन गमन पर ही शोक विहम हो उठे थे, और इतना सोक विक्षम हो उठे पे कि उनके प्राणों के ससु टूट गए। फिर उस देशभक्त पेल यात्री की ग्नि शम्दों में प्रवसा की नाए षो अपने वीमार पुत्र को भारपाई पर छोड़कर खेल की यात्रा कर रहा हो! इन पक्तियों के लेखक को उन दिमों भी कई बार शास्त्री पीके पर में जाने का अवसर प्राप्त हुआ है । उनको मा, परनी मौर मन्त्रों से मिममे-जूमने का संमोग उपस्थित मा है। भो कुछ इन माखों ने देखा है, कानों ने सुना है-उनके प्रापार पर में केवम इतना ही कहूंगा रिक्षास्त्री पी पीर है महान त्यागी है, और मनन्य देवमय है! हो सकता है कि कुछ लोग यह कहें कि मैं पविषयाक्ति मौर भासक्सि का मधिस ग्रहण कर रहा हूँ, पर फिर भी मेरे मोटर का शिवस्व यह कहने के लिए वाम्म कर रहा है कि शास्त्री की उस योगो की मौत है यो पपमी मजिस पर पहुँपने के लिए अपने सर्वस्व तक को बाची सगा देता है। शास्त्री मो का यह त्याग ही मार उनके जीवन में परदान फी भामि पत्समिस भौर पृप्पित हो रहा है। चमकी महत्वपूम नन्नति ही उनके स्याग का पालन्त पित्र है। पदिशास्त्री पीने स्यागका प्रोपस ग्रहण न किया होसातो भारत ऐसे देश में उनके लिए कभी यह सम्मान नहीं पा कि वे भभाव पूग स्पिति में गम मेने और रहने पर उस पद पर पहुँचते नहीं मान है। पास्मो पी गप्ट्रपिता गांधी पी के परम भक्त है। गांधी सीके सत्य, अहिंसा पौर सादगी के साये में उन्होंने पूर्ण स्म से अपने जीवन को डाला है। १९२० पोइ १९२१६० से हो खादी पहन रहे हैं। केवल वे ही नहीं, उनकी पत्नी और मां मादि घर के मुदमी मी यादी के हो वस्त्र भारण करते है। शास्त्री जी पर्वा भी पसासे है। वपन म ही शाकाहारी है। नन सभी मुटम्मी पापी यो के गणप' के पपानुयायी हैं। मापी जी द्वारा प्रसहयोग पान्दोसन प्रारम्भ किए जामे पर पास्त्री जी ने सोरमाह पदना-तिसना छोरकर उस भान्दा सन में भाग सिया । यद्यपि उम ममय शास्त्री जी को अवस्था पठारह-उन्नोम बप की पी, परन्तु फिर भी व वेस गए । पम

नागदारपात्री
।
से मौटने पर वे गांधी जी के रमनात्मक कार्यों में लगे । प्रतो
सार, ग्राम सगठन हिन्दू-मुसलिम एकता मादि कार्यों में
उन्होंने अपना प्रग तक का बीवन व्यतीत किया है। गांधी को
मे देश की समाधीनता के लिए जब-जब रण-पम को घोपणा
को शास्त्रोषी ने उसमें बड़ी वीरतापौर साहस से काम किया।
उन्होंने मेलों में येनों के बाहर प्रपनी गिरफ्तारी के समम,
पैरोम पर फूटने के समय पादि रिसोपवसर पर मी गोपी षो
के सिद्धान्तों का परित्याग नहीं किया । वे सदा गोषी जो की
पहिंसा सत्य पौर शान्ति रे ही मनुयायी रहे है।
पर इसका यह तात्पर्म नहीं कि उममें अदम्य साहस मौर
तेज का प्रभाव है । पिस प्रकार गोषी भी अपनी शान्ति' में
ठिपो हई काम्ति से लोगों को विस्मित और पक्ति कर दिया
करते थे उसी प्रकार धास्त्री बी में भी विस्मयकारिपी पोर
प्रार्गों में पादू का सपार कर देने पामी कान्ति को पूर्व भावना
है। पजाब के वे रिम | ताला लाजपतराय यहोव हो एफे थे।
पंजाव को भरती महोदों के रक्त में रगो हुई माम पूनरो
भोरकर ठसा रही पी । सरकार को गईम को तनी हुई नसों
पोप्रोड़ने के लिए देश के कोने-कोने में स्वयंसेवकों को भरती
की जा रही पी। चारों भोर यह सबर फैलो हुई पो कि चो
भी स्वयंसेवको स्प में पधार की परती पर कदम रखेगा
मोरी सरकार के मर-दानों की गोलियां ससकेप्राणों का तरतु
तोरगी, किन्तु फिर भी दप्त कदत देश के दीवाने युगक

स्वयंसेवको में अपना नाम सिखा रहे थे। शास्त्री जी ने भी अपना नाम स्वयंसेवर्षों में मिला लिया। उनके मुम्बियों और हितपिर्यो मा हृदय कौर उठा । सोग उन्हें समझाने-बुझाने तमे किस्सयसेवकों में अपना नाम न सिखाये, पर पात्री पी पपने निएमय पर दृढ रहे। उन्होंने यह कहकर सवका निहतर कर दिया कि देश को पुकार सबसे मुख्य वस्तु है दिम की पुकार के समक्ष स्त्री पुत्र पौर परमार कुछ नहीं!" पर शास्त्रोपी को पंजाब गाने को भावस्यकता नपरी ।इसके पश्यात ही पंजाब से समाचार पाया कि प्रम स्वयंसेवकों के भबमे मी प्रारम्यकता नहीं ! मापय स्या, यदि भास्त्री जी के मोर हृदय को इससे प्रापात मगा हो। कई ऐसे प्रयमर भी प्राये है पद पास्त्री जो की पत्नी यो उनका प्रेम माना दुन का प्रमग मन पाता या मोर उनकी प्रांतों से मांसू निकल परते थे। पायी जी ऐसे अवसरों पर अपनी पत्नी पर भी प्रसन्तुष्ट होन सेन फे। उन्हें पलो का पथपात करना वम आसा या । योकि ये देश का सबस वा मममले थे। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी धमपरली में बपन मिया है कि वह कभी भी उनकी दम भक्ति के शर्यों में यापक विद न होगी। शाम्त्री पो पो यमपरली पार सम प्रपन वपनमा मिह वो दसा और हमयता के माय फाना जाना है। गास्त्री जी का पुट करत है करते है, वे अपना मार म फली मुछ भी नहीं कहती ! प्रमा मानबहादुर शास्त्री और उनकी मुस्कुराहट में एक ऐसी शक्ति है का मनुप्य के मर्म को भी स्पर्श कर सकती है, पौर वास्तविकता की पाह लगा सकती है। यहाँ शास्त्री जी के मौनात्ताप' की पर्चा करते हुए हमारी दृष्टि दुर्योधन की उस सभा की पोर पाकर्पित हए बिना नहीं रहती मिसमें कौरों मोर पाणवों के बड़े मरे योगा विराजमान थे और सबके बीच में दुशासन द्रोपदी को नग्न कर रहा था। दोपदी फी चीख-पुकार पर भीम रह- रहकर उबल रहा पा पोर युधिष्ठिर को भी परी-सोटी सुना रहा था । भीम की उछम-कूब से कर्ण को मी ताव मा गया । पर दुर्योधन ने कर्म को शान्त करते हुए कहा-"परे कर्म तू व्यप भीम को इसना महत्व दे रहा है। मसते हुए सवे पर पड़ी हुई पानी की वूगों के समान मनमनाते इए भीम से मुझे रपमात्र मी पर नहीं है मुझे पर तो है उस पर्जुन से मो गुमसुम चुपचाप मैठा हमा है, पौर वोम कुछ नहीं रहा है। मैं यह नहीं कहता कि शास्त्री जी पर्जुम है, पर मैं यह अवश्य करेंगा कि शास्त्री जी के मौन' मौर सपमित पार्तामाप के भीतर एक ऐसी ग्राहिणी अक्सि छिपी रहती है पो तीन ही तत्त्व को पका मेती है। एक बार पास्त्री जी ने स्वय ससद में प्रपनी इस मक्टि की मोर इस प्रकार संकेत किया पा- मैं छोटे कद का, एक दुवमा मतसा मनुष्य प्रवश्य हूँ पर किसी के शरीर को देखकर उसके बम का प्रवास मगाना उचित नहीं है। शरीर के प्रति

मिवमापी
रिम्न मनुप्य के पास माम्मा नाम की एफ घस्सु भी होती है।
मैं उस म्पक्ति को वीर और दमदान मानसा है जिसके शरीर
में मसवान मारमा का निवास होता है और मैं कह सकता हूँ
कि मेरे परीर के भीतर एक ऐमीही मारमा का निवास है
वस्तृत शास्त्री षो के भीतर सशस्त पोर इद प्रास्मा का
निवास है। इस प्रारमाही यह जौहर है कि शास्त्री जी
वो-वर संकटों में भी अपने पप फो टूटने नहीं दते और उस
भारमा का ही पह प्रशाप है कि वे पपपाप विप की परवी
मूंट पीनासे है। संम्पा का समय था। एक दिन पास्त्री जी
के एफ मिन उनसे मिसन के लिए पाए । दास्त्री जी ने उनके
पास उपस्पित होगर उनका प्रादर-मस्कार दिया। ये स्वय
उनके लिए अपने पर के भीतर से मापते का सामान लेकर
पठफ में गए । घरे प्रेम से बातचीत हुई। पर उन्होंने पास्त्री
जी मे समस एफ ऐमी गात रमली जिसे पूर्ण करना शास्त्री
भी केवा की बात नहीं पी। दास्मी जी द्वारा प्रतमयता
प्रपट किये जान पर वे उस परे पोर उन्हें परी-खोटी मनान
मगे। पास्त्री जी उनके पास वठफर घुपपाप का बी पूंट पीते
रहे। वे घरो-सोटी सुनाते हुए अपने-माप उठ पर मोर बाहर
निएस गए। शास्त्री जी ने उन्हें दोनों हाप मारकर प्रणाम
पिया । पदाचित ही ऐसा कोई मत्री हो, जो इस प्रकार
सुपचाप पक्तियो रे तोपे गर सहम परने पो समता गाता

नाम्यहमुरपास्त्री
।
ममी पोरे हो दिन हुए, शास्त्री जी का जब मेता के रूप
में वरण हुमा, सो विदेशी सम्वाददातापों और फोटोग्राफरों
की उनकी कोठी पर भीड़ लग गई। सबने पारों पोर से
शास्त्री जी को पर लिया। प्रश्नों की मड़ो सी मग गई। एक
से एक पल थे-मिप्पात मे। अपनी अपनी डायरी में
पहले ही से सोच-सोचकर प्रश्न मिटकर माये थे। शास्त्री
भी ने पारी-बारी से एक-एक के प्रश्न का उत्तर बड़े ही धैर्य
मौर बड़ी मुहिमामी + साप दिया। में उनके प्रमों को सुन
कर मुस्कुरा दिया करसे में और फिर उनका उत्तर ऐसी
मृदुता के साप देते थे कि ये उनका मुंह तापने लगते है।
कफिस समाप्त होने पर एक व्यक्ति में जो नहीं सर में,
एक विदेशी सम्बाददाता से प्रश्न निमा-"पहिए हमारे मए
प्रधानमत्रीको पाप मोगों मे कसा पाया" उसने मिनी-
कित सर देकर यहाँ पर मरे हुए सम भागों को पकित
कर दिया-~स छोटे पद के भीवर एक पद का ग्यक्तित्व
सपमुम शास्त्री जी के छोटे कर और समके मौन समा
समित पार्तासाप में एक महान व्यक्तित्व की ही झमक
मिमती है। साप्ताहिक हिन्दुस्तान में श्री हीरालाल पी पौने
मे शास्त्री जी के महाम् व्यक्तित्व का पिप निम्नांकित पुम्दो
में नींपा है- 'म्पणियल की कोई एक निश्चित परिमि या
सीमा नहीं है मौर म उसकी सही परिमापा की कोई निश्चित

मितमापी
पदावती ही है। व्यक्तिस्व उभरता है जीवन-दर्शन, त्याग, तप,
आपरम और कर्तयों से। पाति धर्म पद पहनावे मादि
से व्यक्ति प्रभावशाली हो सकता है पर व्यक्तित्व की छाप
के पीछे कुछ प्रनिहित पशिष्टय ही म्यक्तित्व को समारते
पौर उभारते हैं। देखने में शास्त्री जी का व्यक्तित्व उस
प्यक्तित्व को कसौटी पर खरा नहीं उतरता मिसका मापार
केवम वाह प्रदशन है। व्यक्तिस्व की परम का माघार तो
उनमें ममिहित वह मौसिकता स्वाभाविकता पौर सहसा
है, मिसके यस पर बार इस विशाम जनतात्रिक देश ने उन्हें
उसने उत्तरदायी पद पर प्रतिष्ठित किया है।"
।

सरल एव उदार शास्त्री जी पर ही सरस मोर सीधे-सादे म्पक्ति है। उनमें भारम्बर भौर महम् नाम को भी नहीं है। प्रमान मंत्री से महान् पद पर भासीम होने के पश्चात् भी नमके रहन-सहन में पौर उनके स्वभाव में तनिक भी हेर-फेर नहीं हुमा है। ये मिस प्रकार पहले धोती पौर छुर्वा पहनते पे उसी प्रकार पार भी ये घोती और कुरता ही पहनते हैं। पारे के दिनों में, पब भयानक शीत परता है, तब उनके बदन पर पोट अवश्य दिवाई परता है। पर मार भी वे 'मोबसोट' माविका इस्ते- माम नहीं करते। उनके पास पार भी इस प्रकार की चीजें परम एवं रार सम्पप में नहीं है। प्रमी कुछ दिन पूर्व जब 'बाल काण' चन्हें कश्मीर जाना पड़ा था, सो ये पीस से परन के लिए श्री नेहरू से 'पोपरकोट मांगार मे गए थे। प्रधान मत्री के निर्यापन के परमात ही इम्ला पाने का राव प्रश्न प्राया, वो उन सामने पहनाने की समस्या ने भी एक विकट स्प धारण कर लिया। विधार पिमश होन मगा कि वे इसर कौन-सी पीर पहनकर मायमे ? या पन्ट मौर कोट ! पर पास्त्री जी ने ता पैन्ट पोर पोट की कौन रहे विवाह के दिन को छोरफर कमी पूरी र पापत्रामे का भी म्यवहार नहीं किया। यदि पास्त्री बी सयोगत परस्य न हो पावे पौर राप्त मगरल को बैठक म सम्मिलित होने के लिए इतर जाते तापराविद उनको वा भूपा नहीं हासी, ओ पाम कर रही है। मेहरमी के बार-यार म्यम्य पौर उपहास किए जाने पर भी भय पास्मी भी ने अपनी 'सनातम' वा भूपा का परित्याग नहीं किया तो येकदापित ही इसरे जाने पर अपनी बेन- भूपा का परित्याग करते । वेद्य भूपा पी सादगी के क्षत्र में माम्त्री जी गोपी जो पौर एमपि टपणन जी के पयानुयायी है। विस प्रकार गांभो नी मोर राबपि टणन पी सदा भारतीय देश भूपा मोही महान देते रहे हैं, उसी प्रकार शास्त्री जी की भी भारतीय वेश भूपा में ही प्रास्था है। पास्त्री की मेषम वेश-भूपा में हो सादे और मरम नहीं है, उनका हृदय भी यही सरस पौर निएम है। ये सिम ,

१८
मात्तबहाारसास्त्री
प्रकार पहले सोगों से हंसते हुए सरमवा पौर निष्कपटता के
साप मिलते-जुलते थे वही सरसता वही निश्छसता भोर
पही निष्कपटता पान भी उनमें मौजूद है। पदों पोर मय
के शिखर पर पहुँचने पर पाबसे महामानों को भी बदमते
हुए देखा गया है। पर शास्त्री जी के भीतर ऐसी महानता है
कि उसे पद मोर पभव मापहम् स्मश तक नहीं कर सका
है। गोस्वामी तुमसीदास पी ने रामचरित मानस में भरत
के परित्र मा प्रकट करते हुए मिला है कि पाहे ससार में
'प्रसमर' पटनाए समव' के म में परिवर्तित हो पाएँ
पर भरत के मन म राग्य मद का सवार नहीं हो सकता।
भरत हमारे प्रतीत काम के श्रेष्ठ महामानव पे । पर हम तो
मार गोस्वामी जी के उक्त कपनको शास्त्री जी में परितार्थ
होते हए देख रहे हैं। संभप है कुछ मोग इसे मतिशयोक्ति
कहें पर गो मोग शास्त्रीबी के भीवरी पौर बाहरी नीमन
से परिचित है ये समक्त पानी में यही कहेंगे कि शास्त्री जी
भरत के समान ही पद की गुस्ता में मा अपने मन को अपनी
कामनापों को वाप रख सके।
शास्त्री पी मीतर और बाहर एकसमान ही प्यवहार
करत है। वे अपने घर के भीतर पर अपने पुराने मित्रों परि-
पितों और स्नेहियों को देशसे हैं, तो अपने पाप ही उनके पास
बठ पाते हैं और अपम समाचार पूछते हैं। कभी-कमी साना
हाते समय ये सौगों की पाम में मुककर देखते हैं, और पुख्ते

तरत एवं रार ९ हैं, क्या क्या-वा रहे हैं ? बच्चों को सेसते हुए देखकर उन्हें अपनी गोद में उठा मेते है और उनके साथ मनोविनोद करते है। कभी-कभी अपने कमरे में फस पर पटाईपर बैठकर मों के माप खेसते हैं। यग्नों के साथ खेलने मे वे भेद भाव नहीं परते। वे जिस प्रकार अपने बचों को प्यार करते है उसी प्रकार दूसरे मोगों के दमों के लिए भी उनके मन में प्यार का सागर छसकता रहता है। वे अपने नौकर रामनाप के बम्बों को भी अपने दम्पों के समान ही प्यार देते हैं। बों से प्यार करने म ये थी नेहरू के समान ही मृदुम मौर स्नेह मय है। जिस प्रकार सम्मों को देखते ही श्री नेहरू का हृदय स्नेह से उमा परता था, वही गुण शास्त्री जी में भी है। शास्त्री जी में प्रहम् का सबसे तक नहीं है। पदापित ही उनके मन में कभी यह यात माई हो जिवे मत्री पौर प्रभान मत्री हैं। कई बार ऐसे अवसर उपस्थित हुए ह जय उनको पार खराब हो गई है, या देर से पहुंची है, सो शास्त्री जो बिना पिमी हिप के पदस ही दफ्तर से घर की मोर पस परे है। कई बार नारे के दिनों में लोगों ने उन्हें सम्मल पोड़- कर इणिया गेट के पास घूमते हुए भी देखा है। मिमने-जुसने पोर बातचीत करने में भी शास्त्री भीमरे सरस है। ये प्राय" रात में पाठ-नौ मजे मेंट मुलाकात करते है, ममे ही रात के वारह बर गायें, पर जब तक ये मागन्तुकों से मुलाकात नहीं कर मेंगे, तबतक माराम नहीं करेंगे। मेंट-मुलाकात के लिए उनमे सेग्रेटरी मासयहागुर माथी । सूची प्रवश्य तयारफरसे है पर शालो बी प्रपने को उससे मुक्त रखते है। कभी-कभी ये ऐसे लोगो से बहुत पहले मिमते हैं जिनका माम सूची में नहीं होता पर जो उनसे मिलने के मिए व्यग्र रहते है। यहाँ शास्त्री जी को मिसनसारी पोर उनकी सरमता से सम्म प रखने वामो एक पटना मा उल्लेख कर देना मनुषित म होगा-एक वार वतमाम विदेश मत्री शास्त्री पी से मुसा कात करने के लिए उनके घगने पर गए । मुमाकात के लिए कई दूसरे लोग मोर ठभे अधिकारी मी प्रतीक्षा में बठे हुए थे। पास्त्री जी बाहर निकलकर इन समी मोगों से भट-मुमाराव परने सये । सहसा शास्त्री जी को दृष्टि वृक्ष के मीप बैठे हुए एक पद पर परी ओ प्रपने पीण-शीर्ण कपड़ों में शास्त्री बी. की भोर कड़ी प्रथा और तरूठा से देख रहा था । सास्त्रो जी भीम ही लोगों से क्षमा मांगकर उस पृय पक्मि के पास पा पहुंचे। सनी मा छमछमा उठी। उसने बड़ी अदा से अपनी पगस से एक पोटसी खोसी पौर उसे शास्त्री जी के सामने उपस्पिस किया। उसमें उसर मिन के हरी मटर में पाने थे। सास्त्री जी ने मरे प्रेम से दो-तीन दाने अपने मुंह में गले और शेप को अपने बगौ के भीतर भेज दिया। वेच भूपा को भौति ही शास्त्री जी का पाना-मीमा मी बड़ा सादा है। प्राय दिन के दो बजे के लगभग सादा भोग्न मेते हैं। मोचन मेने में गांधी जी के नियमों का पामन फरसे हैं। ये प्राय ऐसे मोगों को पैतापनी भी दिया करते है जो सरल एवं सार गरिप्ट भाषन सेते है और भोजन म अनियमितता बरसते हैं। उनमा पहना है पि स्वस्थ रहने के लिए सादा भोजन ममम के समान ही प्रभावपूर्ण होता है। शास्त्री पीके भोजन में पपातियां दास, सम्जी भोर ससाद प्रादि होता है। मूंग की खिमरी वे प्राय सिया करते हैं। पाव रोटी भी ये नाते में मेते हैं। हरे मटर की पूरी उन्हें बहुत अच्छी लगती है। पास्त्री जी का भोजन उनको धमपत्नी स्वय ही सयार करती है। उनके भोजन मवे पड़ी रुपि सेती है। शास्त्री जी प्राय अपने परम भाजन करते हैं। भोजन करने के समय उनकी धमपली उपस्पित रहती है। शास्त्री जी की दोनों कन्याएँ भी शास्त्री जी के क्षाने-पीन का बहुत खयाल रखती हैं 'पास्त्रा गोपी पुत्रपपू यो हरेरण को घमपस्नी भी पास्त्री जी के भोजन और उनको देख रेख मे मधिक रुपि रखती है। मपि गास्त्री जी किसी को देख रेख मौर सेवा-मुधुपा की अपेक्षा नहीं करते, पर उनके परिवार के सदके हाप उनकी सेवा के लिए उत्सुक रह है। गाम्मी जी परे उदार और सहदय हैं। पुमिम ममी से मेपर प्रधान मनी के पद तक उन्हाने न जाने गितने प्रभाव- प्रस्तों, पप्ट-पीड़िता मित्रों, मोर स्नहियों की सहायतापी है। किमी पी भी दुखद पहानी मो सुनगर वे पिम्ता में पर माते हैं और उसे दूर करने के लिए निदान खोजने लगते हैं। नही हम उनका बा पसता है ये लोगों की महायता करने में कर्म ०२ 1 तामबहादुर शास्त्री नहीं करसे। में ऐसे कई मोगों को मानता हूँ जो पास्मी मो की सहायता से ही अपने पोवन को स्थिर रह सके हैं। कई ऐसे लोग है पो शास्त्री मी से मासिक के रूप में भी सहा यता पाते हैं। कई सस्पार्मापी भी शास्त्री बी परावर सहा यता किया करते है। धास्मी जी और उनके कुटुम्मियों की भर्मप्रियता को सुनकर, प्राय साधु-सम्यासी, महात्मा पार्मिक ब्राह्मण, पोर दीन-हीम पम उनके पास पाते हैं। देर ममे हो हो पाय पर शास्त्री पी सबसे मिमते है, मोर सनकी यपो पित सहायता भी करते हैं। पास्त्री बी की उदारता और सरसता के कारण सोग उन्हें घोसा भी दे पाते हैं। पर गास्पी पी ऐसे मोगों को शीघ्र ही पहरान भो पाते हैं। पौर पर पहमान पाते है, तब फिर उनकी मूर्ति प्रपमे हृदय पटम पर अंकित कर मेते हैं । अपनी पातपीठ में अपने म्यबहार में, उनपर अपने मन का भाव प्रकट महीं होने दसे, पर फिर कभी ये उन्हें अपने हृदय की सहानुभूति पोर प्रपने हृदय का स्नेह नहीं देते। में ऐसे कई लोगों को जानता हूँ यो प्रपने कपटपूर्ण म्पबहार के हो कारण शास्त्री बी के स्नेह मौर उनकी सहानुभूति से पचित हो पए है। प्रिय से प्रिय म्पपिवयों को भी शास्त्री मी कपटपूर्ण म्या फरने पर अपने हपय से पृषक् कर देते है। तम म्पत्तियों से मभिक प्रसन्न होते है, घोसपाई के साप प्रपमी दुराई मी प्रमट कर दिया करते हैं। ऐसे मोगों को अपराध

सरल एवरगर
करने पर भी माय दे क्षमा कर दिया करते हैं।
शास्त्री पीको उदारता और क्षमाशोमता के प्रसग म
हमें उनके पीवन को उस समय की दो पटनाएँ याद मा जावी
है, पर उत्तर प्रदेश में पुलिस मत्री के पद पर प्रतिष्ठित
मे-'एक दिन शाम्रो नी कहीं दौरे पर जा रहे थे। मपानक
उनकी कार पराब हो गई। रे मिकट पाने में रिपोट
सिखाने या सहायता के लिए गए । सयोगद पाने का इपार
दारोगा उस समय पान पर नहीं था। धास्त्री जी ने ममी
के सामने अपनी कठिनाइयां रखी । पर मुभी ने उन्हें झिएक
दिपा भौर कहा, इस प्रकार के यहत से मोग माते हैं और
अपनी इस प्रकार की कठिनाइयां बताते हैं। मैं कुछ नहीं कर
समता । शास्त्री को पाने से निगम हो रहे थे कि पार्न
पा मया।वह पास्त्री पीयो पहचानता पारामास्त्री जी को देखते
हो रहें मकर ससाम दिया, पौर फिर पसर मारते मारे
पाने में बिजली की भांति पर फंस गई कि पुलिम मंत्री
जी पाने में ! मुधी यो फ तो प्राण कोप गए । रोगर
शास्त्री जी के पास पहुंचे और योसे-'हर भूस हा गई।'
पास्त्री जी ने इसपर मुंशी गोपी पीठ थपथपाई और फिर
वे पत दिए।"
दूसरी पटना मागरे को है । साम्त्री पो रेस द्वारा मागरे
पहुँचने वाप्त थे। स्टेगन पर स्वागत करने वामों की मीर
पमा पो। बोयो मागरिम, कपिमत्रम पौर पि अधिकारी

नाममा भारती स्टेशन पर उपस्थित थे। गाड़ी स्टेशन पर पहुँचते हो मोग प्रथम येणो के रिम्पों की पोर दौर परे । पर शास्त्री जी तो तीसरे दर्जे के रिध्ये में थे। ये सिरे से उतरकर गेट की पोर पम दिए । मेट पर कोसटेविस सनात था। उसन शास्त्री पी को बाहर जाने से रोक दिया। कहा 'हमारे पुलिस मत्री भी इसी गाड़ी में पाये है । वे अब तक बाहर नहीं मिमम पायेंगे, किसी को बाहर नहीं जाने दिया मामगा।" शास्त्री श्री भूप- पाप मेट पर एक मोर बरे हो गए। सहसा पुलिस कप्तान को उनपर दृष्टि पड़ी भोर वे दोहपर उनके पास जा पहुंचे। पप्तान में शास्त्री जी का अभिवादन किया। प्रव तो कोसटे- बिसरे देवता कूच कर गए। शास्त्री जी ने मागे पदार उसका भी पीठ थपथपाई। मोर फिर ये प्रयनावों के बीच में गेट के बाहर निकल गए। शास्त्री पी को सदारता पौर क्षमाशीमता ने ही उन्हें पिरोपियों के बीच में भी प्रावर पौर प्रेम का पाम बनाया है। तिने ही ऐस मोगों को मैं पानता हूँ, मो राजनीति के क्षेत्र में शास्त्री पीक प्रतिस्पर्दी है पर व्यक्तिगत रूप में ये शास्त्री जी के प्रति प्रादर ही प्रदधित करते है। कांग्रेस में कितने ही ऐसे लोग हैं जो शास्त्री गोपी उम्नति से उमसे ईर्पा भो करते हैं। पर य शास्त्रो पो के गुणों को पवनती है सब उन्हें भी मौन होकर मस्तक मुका मेना परता है।

जन्म एव वाल्यावस्था
पास्त्री जी का जन्म १९०३ ६० में २ अक्टूबर के दिन
मुगसमराय में उनके नाना पो हमारीमान पी के घर पर
हमा । हजारीसाम मी मुगुमसराय में रेमरे सूल में प्रधाना-
ध्यापक थे। शास्त्री जी भाई के स्प में अकेले है । पर उनकी
दो बहनें हैं जिनमें एकमा नाम श्रीमती सुन्दरी देवी पौर
दूगरोपामाम श्रीमती कसाराबती है। श्रीमती सुन्दरीदेवी
इस ममय भी मौजूद है पर छ-सात बप हए, श्रीमती
कमावतीमा स्वगवास हो गया। थोमसो मुम्बरीदवी फा-
विवाह छपरा में हुपा पा । उनके पति यो पम्भूगरण
-

नातबहमुरमा
हाई कोर्ट के सुप्रसिदपकीप्तों में से पे। पर पुस है कि प्रस्सा
रस्पा में ही उनपा स्वर्गमास हो गया। उनके पुत्र श्री शकर
सरग पी उप शिक्षा प्राप्त उप विपार के म्मक्ति है
ये मानकम मुंगेर में विक्षाधीश के पद पर प्रतिष्ठित है
स्य सुन्दरीदेवी सुप्रसिट कांग्रेस कार्यकर्षी है। गांधी 4
के रपनात्मक कार्यों में उनकी पषिक दचि है। भारतीय स्वा
घोनता के पाम्दोमन में भी ये भाग में पुकी है पीर देश
सेवा के पप पर विविध संकटों का सामना भी कर चुकी है
वे भागफस पटना में रही है बिहार विधान सभा की सदस्या
है। पिछले चुनावों में भी उन्हें विजय प्राप्त हईपी। शाम
की को दूसरी बहन सुधी फैमासपती का विवाह मानोपुर में
हमा पा। कसाशपती की सन्तानें भी उपे पदों पर है मौर
समार में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा है।
शास्त्री बी की बाल्यावस्मा मुगलसराय, मिर्षापुर पौर
रामनगर में म्पतीस हास्यापस्मा में उनके माना ही उनके
एकमात्र मामार थे। प्रत ये कभी मिपुर मौर कमी मुग्रस
सराय में अपनी माता जी के पास रहते थे। कभी-कभी राम
मगर में भी रहते थे। पापम में भी शास्त्री पी बड़े सीमे-सावे
मोर सरत थे । ये प्राय पुपचाप रहते थे। अधिक म पोमने
की मादव सनमें वपन से ही है। पर कभी-कभी घरारत
करने से भी वाराम माते में । एफपार वे अपनी परारत के
कारण ही, कापी के मणिकर्णिका के पूण में रखतेनरते

धम्म एई बारपारमा - पर गए पे। अपनी माताश्री के साप गगा-स्नान के लिए गये थे। उनकी माता वो उमें गगा के तट पर बिठाकर यगा में स्नान करने मर्गी । सास्त्री पी चुपचाप अपने स्थान से उठे, और उस कुणके पास भा पहुंचे, पिसे मणि-कणिका कुण कहते हैं। उत्सुकतावश कुण के भीतर झांकने लगे। कुछ सोगों ने दौड़कर उन्हें पकर मिया। नहीं तो भारपय क्या किये पुग के भीतर द पड़से । पास्त्री जी को बास्यारस्पा काशी दारानगर नामक मुहस्स में भी व्यतीत हुई। दारानगर में शास्त्री जी की मोसो रहनी पी । उनको मौसी का माम योमती श्यामप्यारी और मौसा का माम यो रपुनापप्रमाद पा। यो रममाप- प्रसाद ने विचार सहदय व्यक्ति पे। आठ बप को सबस्मा में पाम्त्री श्री दारानगर में रहने मगे थे। पर कभी-कभी ये रामनगर मो पाठे थे। शास्त्री जी की वास्यास्पा की दो पटना पड़ी रोषक, मिक्षाप्रद और प्रेरमादायिनो है। मत ननका तस्सेस करना महा मनुपित म होगा। पहमी पटना उस समय की है, पर शास्त्री को को प्रयस्था पाप-य वर्ष की पी । एक दिन पास्त्री जो स्तूम में छुट्टी होने के पश्चाद अपने सापियों के साप पर की पोर लौट रहे थे। माम में एक बगीचा पाया पा, जिसमें ग्राम के फम भटक रहे थे। फों को देखते ही भरपी के मुंह में मानो भर माया भौर में बगीचे में .

सातबहादुर शास्त्री । रोमको बक, सराय यो पर और सरसो साथियों के की भादतपशोभा पड़ता परमे से भी को देखते ही कारण ही, साथ में घुसकर फर्मों पर हाथ साफ करने लगे । पर पास्त्री षो बगीचे के बाहर ही बरे रहे । सहसा एक सापो योम उठा-"मम्हें, तुम भी क्यों नही भाम छोड़ते ?" धास्त्री पी का बचपन में प्यार का माम नन्हें था। उनके पर के मोग मोर संगी-सायी उन्हें प्राय इसी माम से पुकारा करते थे। शास्त्रो भी भी अपने सापी के प्रोत्साहन से बाप में पहुंचे। पर उन्होंने फर्मों पर हाप मही मगाया। उन्हें गुमाग का फूल बहुत मुन्दर लगा मोर एक गुमाव का फूल उन्होमि वो सिमा । इसी समय बगीचे मासी की सरकों पर दृष्टि परी। वह हाक एकर दौड़ा । सरके भाग खरे हुए। पर शास्त्री जी पपने स्थान पर यहाँ के महा मर रहे। मामी ने उन्हें पकाकर एकबोटा पर दिया । शास्त्री ची रो पड़े और सुबकते हुए बासे- 'तुमने मुझे पोटा क्यों लगाया पा सुम्हें मासूम नहीं है मि मेराया है? माप्ती ने अपना सुनते हो शास्त्री कसकर लगाया, पौर कहा- 'फिर एकमात्र सनी चाहिए। क्योंकि तुम्हें सबसे साहिए।' जी के प्रामों में हिमोर पवा मन उस घटमा को सोचन एषमुच मुझे सबसे पधिक प्रास्त्री जी अपपन . दिन मपर में मी

पम्म एवंदाचारया
VE
दो मोरियों को पार कर गए ये-"उन दिनों पार का नोति
हो रामनगर में मेमा मगा करतापा। पर मान को मानिन
दिनों रामनार पाने के लिए पुस नहीं बना पा। उन दिनों
रिम नो गमनगर जाना होता था या रामनगर म कामी
पाना हाता पा, उस ना काही महारा सेना पडना पा।
एक दिन मास्त्री जी नी प्रपन कुछ सापिरों के माम मेमा
पणन मणि रामनार गा! पाम होने पर बव मसा नाण
हो गया, ता माग मागेपर बठार मपने घर सोट पाए। पर
पास्त्री से वही दर तक पपचार गगा के छट पर बैठे ऐ।
उनदेव मित्रों और परिपितों ने उनम बनने के लिए कहा
पर फिर नी व पाचार प्रपन म्पान पर वठे रह ! या
कारण यह पा कि उनके पास नाप का नराई देन के लिए
पसे नहीं पायनि पाम्पो । पाहा तो वरी मामानी में
किमी मात्र पर इंटकर उस पार राम। नोमि नाब
मना, नी उम्मे पर्गिपत यापर टनर मादी
सनाव न उन्हें मामघरन दिया। देश कर गया
स्मिार पर पठे रहे और मापनपार कर ग । मन में
उन्होंने माने साहस पोर पुरपाप का प्रायप लिया गया में
१८पर, मौर तरते हुए उस पार हा गा" ममय गगरी
बाह पर थी। यदी हुई गंगा में जिमने नौ मास्त्री जी को
सरकर उस पार माते देखा उनक माहग की गिर
प्रामा की।

नामदापुरमास्त्री महायुद्ध के दिनों में भारसीम मेतामों को यह वचन दिया था मि महामुख में विजय प्राप्त करने के पश्चात् वे मारत को मोपनिवेशिक स्वराम्प देदये। मंत्रों के इसी पाश्वासन पर भारतीय नेतामों में प्रथम पुर म खुसकर पग्रेजों के पक्ष का समर्मम किया। मप्रषों ने अपनी निगम के लिए स्वतन्त्रता पूर्वक भारत को पन मौर जन-शक्ति का उपयोग किया। परि- मामस्वरूप मग विषयी हुए। किन्तु पर पुर समाप्त होने परपाव भारतीय नेतामों मे मीपनिवेक्षिक स्वराज्य की मांग की, तब मंग्रेप अपने बयम से मुकर गये । कुछ देने की कौन कहे उल्टे वे कोको कानूमों के हारा स्वाधीनता की प्रवृत्ति को कुपसने मगे और सभापों तथा पुसूसों पर रोक लगा कर नेतामों को बन्दी बनाने सये। परिणामय भारत में एक कोमे से मेकर दूसरे कोने तक प्रसम्सोप की माषी बोर ठी। गांधी भी भारत की रानीति के रगमप पर पा चुके थे। दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों के ममसिर मषिकारों कोमेकर पेामी शासन से उन्होंने को संपर्प किया था, उससे मारत के कोमेमोमे मे उनका माम मूंग रठा पा और मार सीम अमवा मे उममें अपनी भया के साप ही साप प्रपनी प्राथा पौर माकांक्षामों को केन्द्रित कर दिया था। मंगेशों के कठोर कामूनों, और उनके पानवी दभम पक्रों ने गांधीपीपी मारमा को भी शुम्भ कर दिया। उन्होंने भग्रेजों को बार-बार पेतावनी यो। पर प्रमेष प्रपने दमन चक्र से वाम पाए । अन्त में

form
उन्होंने विवश होकर भारतीय जनता का माद्वान किया-
"भारत की स्वाधीनता के लिए पत्री शासन का वहिप्पार
करो। विदेशीपों को छोड़ो, सूस-कामेनों में पढ़ाई बन्द
करो, मोर म्यामामों में धरना दो।"
गांधी पी के माद्वान पर भारत के कोने-कोने में असहयोग
का पाम्पगम्य बन ठा। मोर बहुमूल्य विदेशी परों की
होसियां समाने मगे। बम रेस मे युगक स्त्रियां, कन्माएँ,
पूरे पौर यम्भे अपने-अपने परों से निकलकर विदेशी कपड़ों
पोर मराब की दुकानों पर पिकेटिंग करने ममे । विपापियों
ने स्कूल पोर कामेर छोड़ दिए । वडीमों पोर मा परे परि-
स्टरों ने अपनी-अपनी प्रेक्टिस सन्दरदी! स्वर्गीय पडित
मोदीमास मेहरू, स्वनामपन्य मी वनाहरमाल नेहरू, स्वर्गीय
ग. राजेन्द्रप्रसाद पोर स्वर्गीय देववन्पु पिवरनास तपा
समीप सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि कितने ही मो-यो
बकीस, नेता पौर विद्वान गांधी जी के मामान पर अपने-अपने
नाम-कार को गाकर समापीनसा के रण-स्पन में पर पड़े।
पारों पोर जीवन मौर सागति को महर सी दौर मई। ऐमी
महर पोर पड़ी, जिसने सबके प्राणों में हिसार पदापर दी-
सममी रगों में एक प्रत बोध का रव-सा गुंजा दिया।
पास्त्री जी को प्रयस्मा उस समय सासह सत्रहमपको पी।
फठिनामों की माइयां भी उमरे समसमी, पर उनके मोबम के
मागीदवता मे उनके प्राणों में भी देश भक्सि का दात फूंका पोर

६४ मालयापुरात्री ये भी बिना किसी सोप-विचार के प्रपनी पढ़ाई लिखाई छार कर गांधी वो के माहाम पर रण-स्पल म कूद पड़े ! उमकी माँ मे हिनैपियों ने पौर उनके सरक्षों ने उन्हें रोकने का प्रयास पिया उन्हें समझनने की पेप्टा की, पर सब निष्फम । पर्दे को मोट में वठा हुमा शास्त्री जी का भावी देवता पर उनका हाप पफर चुका पा । शास्त्री मी प्रसहयोग की पांघो में तर उड़कर देश प्रम मा गीत गाने सगे- 'कभी शराब की दुकान पर पिकेटिंग, कमी विदेशी पस्नों की होसी, मौर कभी पुम्स तपा सभा का सगठन। प्रपनों का दमन चक्र तीव्र गति से बस रहा था। वर-परे नेता वन्दी वमाए पा पुके थे। माठियों पौर गोलियों की वर्षा रोग ही हुमा करती थी। गिरफ्तारियों की भी घूम-धाम पो। पास्त्री मी भी गिरफ्तार हुए पौर गई वर्ष के लिए जेल में राम दिए गए । यह शास्त्रो बी की पहली खेम यात्रा पी। यहीं से शास्त्री जी के राजनीतिम ओवन का प्रथम अध्याय मी प्रारम्भ होता है। पास्थी जी की भांति ही भारत के पितने ही घर-पा नेतामों ने भी प्रसहयोग मान्दोमन से ही राजनीति में प्रवेश किया । वनमें फितमे ही भारत में शिसर फे मेवा बनकर अपने नाम को पमर कर गए है पौर पिठमे ही यह भी पिघमाम है। पास्पी जी उनमें से एक है। काशी विद्यापीठ में १९२२६० में गौरीचौरा का हत्यार हुपा । गांधी बी मिना ने उससे भुभ होकर पसहयोग पान्दोमन वन्द कर दिया। पर पर तो स्वाधीनता की प्राग पदा हो चुकी थी। मसहयोग मान्दोसन में जिन सोगों में देश के परणों पर प्रपना सब कुछ सुटा दिया था, पर उनके लिए स्वाधीनता की मन्तिम मजिम पर पहुंपने के पतिरिक्त कोई पारा न था। लोग बब मम्मी- सम्वी समाएँ काटकर सों स निमसे, हम फिर नए सिरे से अपने अपने पार्यों में सग गए। गोपी को बम बेस से बाहर भाए, तो उन्होंने कांग्रेसमों में सामने हिन्दू-मुमप्तिम एमता, ग्राम सगठन, महतोदार, किमान संगठन पोर पा सपा खादी प्रचार प्रादि रपनारमार्य पसे। सालों मोग गांधी जी में मादेदानुसार इस कार्यों में मग गए । शास्त्री जी जय अपनी मया पूरी परे प्रेम से बाहर निकले, तो में भी इन्हीं कार्यों में भाग समा पाहवे पे। पर उनके हिपियों ने उन्हें प्ररणा दीजिये अपनी प्रसूरी मिक्षा को पूर्ण कर सें। शास्त्री बी मे इसे ठीक ही समा। क्योंकि जीवन-सत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए मान के समसको प्रत्यधिक मापश्यकता मास्त्री पी में अपनी प्रभूरी शिक्षा को पूर्ण करने के लिए पापी विद्यापीठ में नाम लिसाया। उन दिनों कापी विपापीठ में म्बर्गीय ग. मगपानवास, स्वर्गीय नरेन्द्रदेव माराय, भोर ग. सम्पूर्णानर पस उमट विधाम मोर देश भवन प्रयापन कार्यरत पेगास्त्री जोमाइन विहानों सम्पप्राण

प्र
तामबहादुर
पात्री
हमा । पाशी विद्यापीठ के शान्त मोर पवित्र वातावरण में
एकर सहने इतिहास दर्शन अर्थशास्त्र भौर समानशास्त्र
मादि मिपा की शिक्षा प्राप्त की। शास्त्री पी मे १९२५६.
में काशी विपापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की।
शास्त्री जी के सहपाठी यो टी० एन० सिंह ने पो भाष
कस केन्द्र में भारी इजीनियरिंग के मत्री है शास्त्री बीके
विद्यार्थी बीवन का चित्र इस प्रकार सीधा है- 'शास्त्री को
पैसा कि सभी मोग जानते है पद में छोटे हैं । उस समय पोर
भी छोटे थे। घर के सभी सोग उन्हें 'नन्हें कहा करत पे ।
ये भी मानक क इस दोहे को परामर दोहराया करत पे---
मानक मम्हे में राघो जैसी नही दूर।
मोर उस सुख आपगी दूव-दूव नी स्व ।।
यो तो हम सभी कभी न कभी कोई गीत या पध गुन
गुमाते है मैंने शास्त्री जी को भी अक्सर उन दोहे को दोहराते
हुए सुना है। ऐसा मामूम होता है कि उस समय उन्होंने
निरषय पर सिया पा कि सारी जिन्दगी यह विनम्रसा सर
भता मोर सचाई से रहेंगे।"काशी विद्यापीठ फी विधार्मी सभा
में वाद-विवाद के प्रायोगम इपा करते थे। एक बार उसमें
पहें उपोगों पौर कुटीर उद्योगों के समय में वाद-विवाद हो
रहा था। उसमें वे (पास्त्री डी) यो उद्योगों के पक्षपाती
पे, पोर मने छोटे उपोगों का पक्ष मिया था। पर वह उयोग

पिमा मत्री हुए तो उई वा उद्योगों को देश मास तो करनी ही पड़ी, पर उनका पोर परामर छोटे उद्योगों पर ही रहा । उसके माद कुछ ऐसी बातें हुई कि में योजना प्रायोग का सदस्य होने के नाते मा सपोर्मों का प्रमपन करने मगा। ऐसी बातों में जिन्दगी में उसट-फेर हपा ही करते हैं। र होने मो एक बार इसमा धिक सेष्ट्रस एशमायरी बोर्ड की बैठक में किया था। वह मुझे अभी तक याद है। उसके बाद से मैंने भी योजना भायोग में पपमा पम समम्म कि यहाँ तक हो सके, छोटे उयोगों पा समपन पर।" लोक सेवक मगल के सदस्य पास्त्री जी कागी विद्यापीठ को सर्वोष परीक्षा पास करने के पश्चात् बोवन-सत्र में प्रविष्ट हुए । उनके सामने मह प्रश्न उपस्थित हुमा पिदे प्रव पपने गोवम पा ताना-याना विस प्रकार में । स्वर्गीय मामा मानपतराय पी बहुत पहले ही भपनो मोक-सेवक मास' मामक सस्थामा निर्माण पर पे। इस संस्था का उद्देश्य उन राजनीतिक कायपत्तोिं को मासिक मप में सहायता देमा पा, ओ इम सस्था ने सदस्य के रूप में प्राजीयन देस-सेवा का प्रत करते थे। असहयोग प्रान्दोमन के पश्चाद सपों-राहमा म्पमित्रों ने मगम पी सदस्यता स्वीकार करके देश सेवामा समस्प पिया। शास्त्री जी का मोप्पान मास की पोर प्राकर्षित हुमा । उनसे पुफ मामबहादुर मारली प्रवृत मित्रों पौर हितपिर्यो ने भी उन्हें परामर्श दिया कि ममस की सदस्यता स्वीकार कर में। शास्त्री मी पो भी लोगों की राय उभिती पोरवे सासाजी के पास गए। उन्हनि शास्त्री पी को मण्डलका सदस्य बना सिया। शास्त्री भी मालक सदस्य के स्म मेमोक सेवा में हो गए। वे दलितों पटतों पोर किसानों ममदूरों की सेवा में मग गए। सादी भौर पके प्रचार में भी योग देने सये। शास्त्री जी मे बड़ी निष्ठा पौर कमठता के साम मपम के कार्यक्रमों की पूर्ति की। उन्होंने अपनी सचाई और अपनी मगन से मगम के सदस्यों में प्रमुख स्थान प्राप्त कर लिया। शास्त्री जो ममपफरनगर में पास्त्री मी मपम की सदस्पता ग्रहण करने के पश्चात् मुगफ्फरमगर पसे गए, पौर वही रहकर मतों पौर दसितों की सेवा करने लगे। उनके साथ समझी माता जी भी मुगपफर- मगर में रहती थी । शास्त्री जी प्राय पोवार के सिमसिसे में मेरठ सहारनपुर मादि स्थानों के दौरे किया करते थे। कईका विम तक प्राय दौरे पर रहा फरते थे। धी मममूराय शास्त्री पौर श्री विधिमनारायण शर्मा प्रादि कायकर्ता भी पास्त्री पी के साप ही पे। शास्त्री जी की मासापीरोफमी- पभो इन सभी लोगों का पाना भी धमामा परता मा।मास्त्री पीके पर पर प्राय कार्यासापों का दस एकत्र हुमा करता

ए
या शास्त्रीषी का सबके साप महा मेस-गोस भौर स्नहमय
पर रहता था। सभी मोग शास्त्री जी की लगन उनई परि
यम, मोर उनके प्रेम-पूण वय की प्रशमा क्मिा करते थे।
शास्त्री श्री ने पो हो दिनों में अपने पति से सवको विमुग्प
कर मिया, और मुजफ्फरनगर जनपद के कार्यकत्ताओं में
उनका मुहम स्पान हो गया। पर कुछ दिनों के पापात् धास्त्री
पी को इसाहावाद पसाबाना पग और इसाहामाद ही उममा
मुस्य कार्य क्षेत्र हो गया। इसे प्राप्ति मौर दैविक शक्ति की
प्रेरणा समझना चाहिए कि शास्त्री जी का कार्य-क्षेत्र प्रयाग
हुमा, क्योंकि प्रयाम में ही शास्त्री जी को ये सापन मोर स्वर्ग
अवसर प्राप्त हुए, जिनक कारन ये पान उमति पिलर पर
पहुँच सके हैं।

- दीक्षा शास्त्री जी के गुरु शास्त्री जी में सदगुणों का विकास पिस प्रकार हमा- इसपर भी प्रकाश नाममा उपित ही होगा। यह सब है कि शास्त्री जी में प्रात रूप से गुणों और विशिष्टतामों के मकुर पे, पर यदि उन पंकुरों को योग्य, विद्वान मोर परिणनिष्ठ गुरुपों तपा भाचार्यों के द्वारा देख-रेस म की गई हो तो यह सभव नहीं था कि उमसे इस प्रकार के फूल-फम निसते इसे भी शास्त्री जी के लिए प्रकृति की पोर से परवान ही मानना पाहिए कि उन्हें अपने गुणों के विकास के लिए समय- दीक्षा मे सुप्ठता समय पर विद्वान गुरुपों और महान पुरुषों का सम्पर्क प्राप्स हाला गया। पास्त्री मो की प्रथम गुरु उनकी मां है। सत्य निष्ठा प्रापार-विपार, सादगी भौर गीता के फमवाद में विश्वास की प्रेरणा उहें अपनी मां से ही प्राप्त हुई है। परि स्पितिया से पूमने और सकटों से न हारने का भाव भी उन्हेंनि उन्हीं से ग्रहण किया है। उनकी ईश्वर भक्ति, व्रत पौर सामना हो शास्त्री जी के हृदय के रूप में प्रगट हुई है। स्वर्गीय परित निष्कामेश्वर मिश्र शास्त्री जी के विसीय गुरु हैं, जिन्होंने अपने सद्गुणों के साये में शास्त्री श्री के भीवन को ढामा था। वे एक मादी अध्यापन । देश प्रेमा पे, स्पागो ये, पोर परिवनिष्ठ थे। वे अपने विद्यापियों पा प्राय देश प्रेम साहस और त्याग की कथाएं सुनाया करते थे। उन विद्यापियो में शास्त्री जी भी थे, और उनपर परित निष्कामेश्वर मिश्र की मभिक सपा भी पी। देश प्रेम, त्याग और क्प्ट-सहिष्णुता की भावना पा लियाम उन्ही प्रयत्नों से शास्त्री प्रो मे हो मका है। दर्सन पोर प्रम्यारम फी प्ररणा मी पास्त्री जी को उन्हीं से प्राप्त हुई है। स्वामी रामाप्ण परमहस भौर विमानन्द रे साहित्य ने भी पास्त्री जी के लिए गुरु का ही काम लिया है। परित निकामेश्वर मिय भी मे शास्त्री जीरे हृदय में प्रभ्यार पौर दान के जो अफर सगाए थे, उनमा विपास स्वा विवानन्द के साहित्य से ही द्वारा हमा। स्वर्गीय .

भासणामुरमात्री भगवानदास के सम्पर्क ने उसे पल्लवित और पुष्पित किया। काशी रियापीठ में शिक्षा प्राप्त करते हुए उन्होंने डा. भगवानदास से बहुत कुछ प्रहण किया-दर्शन का मान, परिण के प्रति दृढ़सा, सादगी और भारतीय सससि के प्रति निष्ठा प्रादि । ग० सम्पूर्णानन्द पोर स्वर्गीय मरेन्द्रदेव प्राचाय का सम्पर्क भी उन्हें विद्यापीठ में हुमा। समाजवाद' की प्रेरणा, मोर समाप में 'समाम अधिकार' का भाव उन्होंने इन्हीं मेसामों से पहम किया है। प्रयाग के क्षेत्र में प्रविष्ट होने पर शास्त्री पो को स्वर्गीय रावि पुष्पोत्तमदास टण्डन का सहयोग प्राप्त हुमा। ईमान वारी, सपाई के लिए सपर्ष सादगी पौर भारतीय संस्कृति के मिए मिष्ठा रुपा हिन्दी प्रेम उन्हें टपन भी से ही प्राप्तहमा है। गांधी जी के सम्पर्क में रहने का ययपि शास्त्री पो को अवसर प्राप्त नहीं हो सका है, पर गांधी जी के जीवन और उनके सिवाम्तों मे उनके लिए मनस्य गुरु का काम किया है। गांधी साहित्य में शास्त्री जी को प्रगार निष्ठा है। गांधी जी के सिमान्तों और प्रापर्टी के सांचे में उन्होंने अपने कोसने का प्रयत्न किया है। ये प्रपन एक-एक कार्य को गोपी को के सिवातों को ही सामने रखकर पूर्ण करते हैं। सत्य, पहिसा संयम, देश प्रेम, कर्तम्म के लिए ससा, हिन्दू-मुस्लिम एकता, और मासिकता की प्रेरणा उन्हें गांधी पी से प्राप्त हुई है। अपने पीवम काम के मध्य से ही शास्त्री को भी मेहर बौना मी के सम्मक में रह रहे हैं। अपने पिछस गुरुपों में, माँ को छोड़फर उहें सबसे अधिक श्री नेहरबी के ही सम्पर्क में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुमा है। उन्होंने पी मेहरू बी के साप कांग्रेस के कार्यो म ही भाग महीं सिया पर उसके साम दोरे किय समा-गोष्ठियों में विचार विमर्च पिया एक साप बठगर मरणाएं की भोर कभी-कभी निवास' तपासाने- पोने में भी भाग लिया। इस प्रकार उन्हें यी नेहरू बी के गुभों और उनी विशिष्टतामों को देखने मानमे समझने पौर हृदयमम करने का अधिक अवसर प्राप्त हुमा। विरोधी परिस्थितियों से चूममे भावात्मक एकता, अल्प-सम्पर्कों की मुरक्षा, महान् राष्ट्रीय दृष्टिकोण पौर पाति-पाति तपा धर्म विहीन सर्वोपयोगो समानवादी पासन की प्रेरमा नन्हें यो नेहरूबी से ही प्राप्त हुई है। इस प्रकार पानी पी के ग्पक्सिस्म म गोषो और पी मेहम दोनों के हो गुर्गों और उनकी विशिष्टता का मिश्रण है । जहाँ एक पोर उममें गांधी जी ने सरय महिमा मान- दारो पौर मास्तिकता रेतब है वहीं दूसरी पार उनमें थो मेहरू जी का पाति-पाति तथा पम-विहीन समारवादी दृष्टिकोण भी मौजूर है। एर मोर महाँ उनमें भारतीय वसति पौर दान पे लिए पाम्पा है, वहाँ दूमरी मार मानव-सम्मति के लिए अनुराम भी है। एक पोर जहाँ उन में अपने कसम्म पालन के लिए दाता पौर मालिक सिए मिष्ठा है। वर्ग 1 सामहाड दूसरी पोर उममें क्रान्ति को पिनगारिया मी है। इस प्रा उन्होंने मपने व्यक्तित्व के निर्माण में, गांधी जी पौर श्री ने के सिमान्तों से तत्व ग्रहण करके, उसे दोनों महान् पुष्पों विशिष्टिसामों का केन्द्रमाने का भरसक प्रयत्म किया है।

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पर्चाय पी र प्रचार बी (गाम्बी मीपिना)

पूर्वज-परिवार
शास्त्री पी उत्तर प्रदेश, वाराणसी पिसांतगत रामनगर
के निवासी है। रामनगर कापी नरेश का निवास स्थान है,
यो कापी के पास ही पगा के उस पार, गगा-तट पर स्पिस
है। शास्त्री पी के पूपर रामनगर के ही निवासी थे। शास्त्री
बी परवावा परमोहनप्रसाद काशी मरेश के यहाँ दीवान
पेगावा राजेश्वरप्रसाद पौर साप्रसाद को भी समान
में अच्छी प्रतिष्ठा पो। साम्नी भी के पिता का नाम श्री
धारदाप्रसाद पादे कायस्थ पाठशाना साहाबाद में प्रया-
परुपे। हिन्दो, मप्रेमी मीर उर्दू में उनकी प्रन्टी गठि पी।

स
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1
तालबहमुराराधी
ये एक कुपल प्रध्यापक होने के साथ ही साप पार्मिक विचार के
भक्ति पे। शिवनी में उनकी बहुत बड़ी निष्ठा थी। वे प्रतिदिन
शिवनी के मन्दिर में माफर नियम के साप उनको पूजा
मिया करते थे। साहाबाद में वे प्रतिदिन गगा-स्नाम भी
पिया करते थे। वे प्रतिवर्ष माघ के महीने में कल्पवास भी
करते थे। कभी-कभी वे भूसी में भी रहते थे। धार्मिक होने
रे साप ही साप वे पर परोपकारी भी थे। साधु-सम्सों की सेवा
पौर गरीबों की सहायता में उनकी बड़ी रुचि थी।
कई वर्षों तक मध्यापन कार्य करने के पश्चात् उन्हनि
स्याग-पत्र दे दिया पा मौर फिर तहसीलदार के पद पर
उनको नियुक्ति हुई थी। पर पुम है कि फेवस २८ वर्ष की
मल्पावम्पा में ही उनका स्वगवास हो गया। मिस समय उनका
स्वर्गवास हुमा शास्त्री जो की पवस्था उस समय केवस म
पप कोपी।
शास्त्री जी को माता का नाम श्रीमती रामदुमारी है ।
इस समय उनकी प्रवस्या ८२ बर्फ के सगभग है। उनका
पोहर, मिर्जापुर में गणेशगम में है। उनके पिता का नाम
हजारीसास था। हमारीप्तामधार माई पे। एम पहन भी पी,
जिसमा माम गंगादेवी पा। हमारीमास मुगमसराम में रेसब
स्म में अध्यापक थे। पास्त्री पीपा पग्म मुगलसराय में
इन्हीं के घर में छपा था।
घास्त्री जी की माता विशुट पार्मिक विचार भी हैं।
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पू-रिवार
इक्कीस वप पो भवस्था में ही ये मौमाग्य सुख से पधित हो
मा। तब से सेपर मात्र एक तपम्बिनी को मावि ही प्रपना
पीवन व्यतीत कर रही है। उन्होंने शास्त्री जी के पालन
पोपण, मौर चनमी चनति में पाया संकटों पोर स्थितियों
स सपर्य किया है। उन संकटों पोर स्मितिया में 'राम' ही
उनके एकमात्र पाधार पे। 'राम' में उनकी प्रपार निष्ठा
है। ये रात दिन राम की उपासना में समग्न रहती है। साधु
संतों की समा गरीमा की सहायता प्रप्त भौर गगा स्नान ही
उनका मुस्य काप है।
कदाचित् हो ऐमा मोई पत हो जिम मे न करती हों।
बयामी बप को प्रवम्था में भी अपना मोजन अपने हाथ
स हो पमाती है। वे किसी दूसरे म्यपिल के हाथ का बना
हुमा भोजन ग्रहण नहीं करतीं। सान-पान में पवित्रता और
एकोखता को दे अधिक महत्व देती है। ये खान-पान और
मोअन सरम में पारने लोगों को पपप्रप्ट मामती है।
चमका कथन है कि माम-पान और भागन २ सम्बष में
ममताही मारण पार से ममार में माना प्रभार के
रोगों प्रादेक है।
पान-पाम प्रोर मामन में नहीं वे एफातता रखती है
वहाँ ये ममो प्राणियों मनुष्यों की उन्नति पौर कल्याण
पाहती हैं। परिपित-यपरिचित पाहे कोई भी व्यक्ति उमके
पास पपरर यब उन्हें अपनी दुग्म की कहानी सुमाता

नामदारमारती
तो ये बिना किसी सोम-विचार के उसकी सहायता करने के
लिए उपस हो जाती है। कभी-कभी वे पाय पेषवार मामलों
में फंसे हुए मोगों के पांसुभों पर भी दमित हो जाती है, और
शास्त्री जी से उनकी सहायता करने के लिए कहती हैं। कभी
कमी शास्त्रीशीको उनकी इस उदारता से यही परेशानी
होती है, और उन्हें सीझकर कहना पड़ता है-"मम्मा म सो
तुम्हारी उदारता से परेशान हो गया।" पर उमका पृट हरप
कमी किसी का दुर सुनते हुए नहीं सकता। किसी का दुख
दूर करने के पश्चात उन्हें पा सतोप मौर मानन्द होता है।
वे यज्ञों, अनुष्ठानों पौर वत-उपवास से भी परोपकार को
प्रपिन महत्त्व देती है। उनके परोपकार की एक कहानी
सदा मेरे प्राणों में अमृत घोप्सती रहती है। मैं प्राय उस
कहानी को सोचता है और मन ही मन काममा भी करता है,
कि काश समाज में इसी प्रकार सभी सोग परोपकारको
महत्व देठे ।
माष का महीना था। प्रयाग में निवेमी कवट पर माम
के मेमे की पूम पी। शास्त्री जी की माता पी प्रिवेणी की रेती
में एक झोपड़ी में रहकर कल्पवास कर रही थी। मुझे यह यात
पहसे ही से शात पी। प्रत में एक दिम प्ररमी मर्मपत्नी के
साप, उनकदममा, पता मगाकर उनकी कुटिया पर जा
पापा। पर वहां नहीं दी। मुझे पता पमा किये पास ही
एक-दूसरी फुटिया में एक माकी का तिमक पड़ाने गई है। मुझे

पूर्वम-परिवार पापपर्य हुमा, पौर साथ ही उस्कम्ठा भी। मैं सोचने मगा, 'फिसका तिलक कौन-सी साफी।" में पता लगाकर उस कुटिया पर जा पहुँचा । देक्षा तो, सममुप यहाँ तिलक का स्प पूरा किया जा रहा था। उन्हनि हो मुझे देखते ही भावर से बिठाया फिर तो उन्होंने मुझे उस तिमक का पूरा हाम बताया, कि यह किस मरकी का सिता है और उसकी मां किस भांति गरीबी के साप अपना जीवन म्पतीत कर रही है। तिसक' समारोह के पश्चाद जिस प्रकार उस सरसो का उम्हनि वहीं विवाह किया-विस प्रकार भारात माई जिस प्रकार सम्होंने मारात का भाबर-मस्कार किया मौर जिस प्रकार चन्होंने उस कम्या की विदाई की उसे देखकर में प्रवाद हो गया। में प्रब तक परोपकारियों की भनेक कहानियां सुना चुका हूँ, पर यह पहनी हो रास्तविक कहानी थी, जिसमें ममे किमीको पराई कन्या के विवाह में अपनी कम्पा के विवाह के समान ही हथि मेत हुए देखा था। पास्नी पी की माता जी सचमुप एक तपस्विनी है । पिस प्रकार एक तपस्विनी संयम पीर भाचार-विपार की माग में अपने घरीर को साते हुई महीं पकती, बही हाल उनका भी है। मपामा से भयानक भीत के दिनों में मी के दिन में दो बार स्नान करती । कातिको महोमे में ये, विस्मो में रहने पर, यमुना दी के किनारे पुटिया मगाकर पदवी हैं। उनकी दुटिया के लिए इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि यह सपमुप

सामबहादुर पानी
कृरिया होती है। माय का महीना प्रारम्भ होवे ही ये प्रयाग
पहुँच पाती है मौर गगा की रेसी में महीने भर कल्पवास
करती है। यहाँ भी उमकी कुटिया दर्शनीय होती है। मारचय
की बात ही है कि उसी माम मेले में दमाहामाद गिसे के
अधिकारियों के कुटुम्मियों की पुटिया पड़े ठाठ-बाट की होती
है, इतमा हो नहीं उनके लिए अधिक स्पान परा जाता है पर
देश के मम्त्री और प्रपान म भी पास्त्री बी की माता फेमस
एक छोटी सी कुटिया में मल्पवास के दिन पाट मेतो है।
कभी अधिकारियों पर यह भाव नहीं अताप्ती कि वे पास्त्री
बी की मां है इसलिए उन्हें सुविधाएं प्रदान फी पाएँ । किसी
के कुछ कहने पर वे यह कहकर उसकी पुबान बन्द कर देती
है कि गगा की रेती में एक में एस मोग पाकाश क मी ही
अपना दिन काट रहे हैं। क्या ये मनुष्य नहीं है?

विवाह और गृहस्थ जीवन
विवाह
पास्त्रो मो का विवाह मियापुर के गज नामक मुहस्ने
में हमा। उनकी धर्मपत्नी का नाम श्रीमती मलितादेवी है,
नमक पिता का नाम यो गणेशप्रसादपासास्त्रीणी की वापत
रामनगर में मिपुर भाई थी। इम्हे के रूप में पालो यो मे
मिर पर मोर पोर परोर पर पूगारपामगामा पा शेरवानी
पारण फी भी।
विवाह रे पश्चात् मास्त्री से की धमपस्नो रामनगर
गा। पूछ दिनों तर रामनगर रहार ये धास्त्री जी के साथ

नामरहार मात्र । इमाहाबाद भलो गई मौर फिर वे राममगर गई। रामनगर में ही ग्येष्ठ नया सुधी कुसुम का मन्म हुमा पा। सेप सभी पच्चों, श्री हरेकृष्ण, सुश्री सुमन श्री रामकृष्ण मो मोहमाण पौर श्री गोपासाप्त की जन्मभूमि प्रयाग है। उसके पश्चात् घास्त्री भी का यह छोटा परिवार इलाहाबाद पमा गरा मौर स्पायी रूप से माहापार रहने मगा। शास्त्री भी की धर्मपत्नी धोमतो ममितादेवी में विचार को सहदम महिला है । यपपि उन्हें हाई स्कूम मौर कालेर में विक्षा प्राप्त करने का अवसर महीं मिला है पर उसके हवय में सभी बातो को समममे मौर ग्रहण करने को शक्ति है। वे ईश्वर भक्ति में सुम्बर पद रचना करती हैं। उनकी पद रचना में स्पष्टत उनसे हृदय की सुष्टता और भावमयता होतो है । गाईस्प्य बीवन के सचामन में ये पपिक निपुण है। उनके अपर सब कुछ छोड़कर बास्त्री श्री निश्चिन्त रहते है। व एक योग्य पोर शत भारतीय महिला की भांति ही पर कोम्पपस्था और भान्ति से मुम्दर बनाये रहती है । मामिक राजनीतिमा भी उन्हें शाम है। ये पाप निक रामनीति की गतिविधि से अपने को परिपिट रसती है। श्रीमती ममतादेशी गाईस्म्य भीवन में कुणम हामे के माप ही साप देशभक्त भी है। खार के ही वस्त्रों का उपयोग परती है। पास्मो मो के साप उनके पुनार कोड में भी पाठी ६। मबसे सास्त्री नी का स्वास्प्प सराव हुमाई रे छाया को भौति ही उनके माप रहती है। उन्होंने देश के लिए, देश

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विवाह पार पहस्प मोबम
को म्यापोनता के लिए या-पो फप्टों का सामना किया है।
उनका इसाहाबाद का जीवन बरा हो तप और साधना का
जीवन रहा है। पर में वे पट माता और छाटे-छोटे बच्चे।
पास्त्री जी मयफो राम भगेसे छोरगर देश की सेवा में रस
रासे पे। मब बन्दी बनाये गाते पे तो दो-दो पप तक तों
में रहते थे। मपि उन्हें 'मण' को पोर में मासिक मृत्ति
मिससी पी, पर महस्ति इतनी नहीं थी कि जिससे पर का
पाम-फार मुसहस्त होकर पलाया जा सकता। मह तो पास्त्री
बी को घमपत्नी और उनकी माता की ही कुचामता पो कि
में उसने में ही अपना काम चमा मेतो पी मौर किसी पर भी
प्रकट न होने देतो पो ! मो लोग हम परिस्थिति में रहने
है यही पास्त्री जी के परिवार से स्पिति मोर उनके कुटु-
बियों के पान्तरिक पंप का अनुमान मगा सकते हैं।
पास्त्रोमी वम पेप्स साठे पे तप स्वर्गीय रामपि पुरुपोत्तम
दाम टगान (यदि बाहर होते थे) उमक परिवार को देख रेल
करते थे। रपम मो का पास्त्री जी पर बहुत बड़ा स्मह पा।
रान जी भी जर जेम में होते पे सो उनके सापी-दिसपी
पानी भी कुटुम्य की देख रेख किया करते थे। मेहन जी से
सम्मक होन पर उन्हें भी मामी यो के मुटुम्म की चिन्ता
होती थी। एक यार जब गास्त्री गोपी मा बीमार हुई थी,
हो थी नेहरू उन्हें दबमे रे पिए पास्त्री जीरे पर भी गए
घे, यपपि प्रमो श्री मेहर और पाम्पो की पारस्परिकप्रीति

नासम्मुर शास्त्री
मम ही पारण कर रही थी पर फिर भी भी नेहरू शास्त्रो
जी की कमठता मोर उनकी कार्य-क्षमता से रहें और उनके
परिवार को प्रपने स्मेह और प्रपनी सहानुभूति से प्रमिसिवित
करने मगे थे।
गृहस्थ जीवन
शास्त्री जी की धमपस्नी की पापार विचार धर्म और
पूमापाठ में ही निष्ठा है। पारम्मी जी के भर में प्रति सोमवार
को 'नाम सकीर्तन' समारोह इन्हीं की देन है। नाम सकोसन'
के लिए उन्होंने 'मास मणमी' का गठन किया है। इस
मममी में उमके घर के सभी मुटुम्मी पौर नौकर सपा उनके
वाम-मम्मे है। प्रति सोमवार को सब मोग एकत्र होसे है पौर
बरे प्रेम से नाम सकीतन करते हैं। यपि शास्त्री जी की
धर्मपत्नी को भावान एकर में बड़ी निष्ठा है पर वे राम' और
'श्रीकृष्ण' की पूमा-पर्पना मे भी भाग सेतो है। ये स्वयं भजन
पौर कीर्तन बनाती है और मम से उनका गान Fखी है।
उनके ममाए हुए भवनों की एक पुस्तक छप चुकी है पौर
दूसरी शीघ्र ही प्रकाशित होने मासी है। ये प्रतिदिन सममग
मारह बजे तक मौन रहती हैं, भौर पूजा-पाठ तमा सापना में
मगी रहती है।
शास्त्री जी की धमपत्नी के पीवन में शिवोपासमा से
समरिषप्त चमत्कारित पटनाएं भी पट गरी है। यह में एक

विवाह और महत्प
एसी हो घटना का उस्सेस करन पा रहा हूँ। म पटना से
पहाँ उनकी यि निष्ठा पर प्रकाम परता है वही उमसे इस
बात का भी पता चलता है कि उनपर मी शिवजी पीपा
इष्टि है- 'उनके वाल्यावस्या की बात है। वे प्राय अपनी
माता के माप स्नान के लिए गाया परवी पी पौर सौटव
समय मन्दिर में शिवजी की मूर्ति को मगाजस से स्नान कराया
करती मा । कुछ दिनों के पश्चात उनके मन में अपने भाप ही
यह विपार उत्पन्न हुप्रा कि हम क्यों न शिव-मूर्ति को अपने
परम पर्ने प्रऔर तुलसी के पेट र नौम रसार उनकी पूजा
किया करें। एक दिन उन्होंने अपने मन की वास भपनी मा पर
प्राट को और मां की सहमति पान पर शिष-मूर्ति को पर
उठा ल मा मोर प्रतिदिन प्रम से पूजा मना करने सगी।
एक बार शिवरात्रि के दिन उन्होंने मम निवास मप्र
के मवामक्ष उप का अनुष्ठान किया। आप पारम्म हा गया।
एप वार मात्र अपने के पश्चात् ये पानामा निमाल
कर ए दिया करती थी। मगमग ग्यारह बजे गततय उमा
बाप मना रहा। पर सभी साग निद्रा माम हो गए। पारों
पोर सन्नाटा छा गया । पर फिर भी रह मनायोग माप टनमा
माप पारी वा । महमा बहुत मरा माप उन्हें अपने कमरे
में रगता हुमा रिपाई परा। प्रमो उम देय ही पाई कि
म बायु के ममान पाकर उनस मापने उपस्थित हो गया और
मरमा फन फ्रमापर बैठ गया। अपने का माम न मरी-

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तातहारपात्री भय से पोस नीं ' उनको मां ने दौड़फर कमरे में प्रवेश किया। स्वय कमरे से बाहर निकलती हुई मोसी-"सोप, बहुत बड़ा सांप " पर पा सांप उन्हें छाकर मौर किसो को भी मिसाई न पड़ा । ये सोमो के पूछने पर मार-बार सर्प पी पोर समेत करती थी, पर वह सप उन्हें छोड़कर और किसी को निकाई न पड़ा।" उन्हीं दिनों से शास्त्री पी की धर्मपत्नी को शिवा-पूजा में निष्ठा भी बढ़ गई। इतनी अधिक मिष्ठा मोर इतना प्रपिक परिरमास उनका विवनी में हो गया कि वे अपनी शिव पूजा की पाक्ति से परन्वरे सकटों को पार कर पाने की क्षमता की अनुभूति करने लगी और इसमें सन्देह नहीं कि शास्त्री मीनी सभी पिछमी बीमारियों में उन्होंने शिवजी की शरण ग्रहण को मोर सम्हों की कृपा से उनकी मया पार भी सग गई। पास्त्री जी के कुटुम्ब में उमके महके उनकी पुत्र क्यू उमकी कमाएँ पौर माती-पोते भो है। मास्त्रो जो के परे सरके यो हरेकृष्ण एक कुशल सीनियर है । क्षेप तीम मरके ममी छोटी पय में है और शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। पास्त्री जी की कन्याएँ यापि विवाहित है, पर वे उन्हीं के साप रहनी है। सास्मी जी के मुदम्बियों की वर्षा करते हुए उनके मौकर राममाम को पर्वा न करना मनुपित होगा। रामनाप भी फुटपन से ही परिवार की मामि ही शास्त्री जी के साप रहता है। मब सो उसके बाम-नाम्चे भी है, और वे सब भी शास्त्री

नामहापुरानी
यो कामराम मे कई दिनों सक रिपार-मपन किया। प्रस्त में
उनको दूरदर्शिता और उनकी मनम्प देश-सेगा-क्सि ने उन्हें
प्रेरणा दी कि शास्त्री जी के पक्ष में वातावरण तयार करें।
पर फिर भी उहोंने भी अपनी पोर से कुछ म कहकर निमय
का भार संसदीय पार्टी के ही ऊपर छोर दिया। ससदीय
पार्टी के सदस्यों ने भी कई दिनों तक विचारों का मपन किया
पर सब इस विषय में एकमस पे कि भारत का कल्माण इसीमें
है कि शास्त्री जी के हार्यों में ही बह पतवार दी जाए, बिसे
नेहरूबी छोड़ गए हैं।
२ नून के प्रभात काम में ससदीय पार्टी की वठक हुई
पौर शास्त्रो जी सर्वसम्मति से नेता पुने गए। सारे देव न
ससदीय पार्टी के इस मिणम का हृदय से स्वागत किया और
पार्टी के सदस्यों नपा कांग्रेस अध्यक्ष कामराम को उनकी इस
सुम पूम मौर पुद्धि पातुर्य के लिए उन्हें सापुमाद दिया। पून
मोपास्त्री जी म सपप ग्रहण की और अपने मत्रिमणमा
गठम किया। माम ये भारत के प्रमान मत्री है। स्ममावत
पाज उन मोगों के मन-मानस में हर्प की परंग रह हार
उठ रहा होगी गिनके साप धात्री पी ने अपना बचपन
ग्मतीत किया है कगोर ग्यतीत किया है मोर म्पतीती
है अपनी दुल की घड़ियाँ । उमरा मी मन-मयूर पान मानन्द
से नापा पड़ता होया मो उनके इलाहाबादी जोगन के सापी
है-निकटवर्ती है। यही नहीं मान उन पोटि-कोटि गरीबों

पौर साधम बिहीन भ्यक्तियों मा मम भी प्रसन्नता से नाप
उठा होगा मो यह समझो हैं कि पुरोगी की गोद में जन्म
नेमेक कारण--मापनों का प्रभाव होने का कारण उनके मन्नों
का भविष्य पकारमय है। शास्त्री जी नभपमी गौरवपूर्ण
उन्नति से यह सिर करफ दिखा दिया कि यदि वाला में
विशिष्टता है, प्रतिमा है भाग पाने की माससा है तो गरीवी
उसके मरणॉो मही याच माती-नहीं बांध सकती !!
साम किले से
प्रधानमत्री पर पर प्रतिष्टित होने के पश्चात् मास्त्री भी
ने १५ भगस्त मो मासरिले के उमर सो होकार प्रथम
भापम दिया है। उन्होने अपने भाषण में अपनी भावी नीतियों
पर प्रकाश डाला है। प्रत उनका यह भापण भाषिक
महत्वपूण है। उनके दम मापण से उमरे व्यरिसस्व पौर
निपारा पर भी प्रकाश पाता है। इसी उद्देश्य से हम भी
यही उगर महत्वपूर्ण प्राहि दुम्वान' से उदपत कर रहे
ई-भारम् सम्मान और गौरव के माय किसी भी दा से
बातचीत द्वारा पपन विवाद हम करने को उपत है किन्तु
मगर कोई प्रमही पोर तमवार के यम पर हमें झकामा
बाहेगा, तो हम अपनी मारी गति से उसका मारता
करणे। चीन ने भूपि प्रपन रग में कोई परिपतन नहीं किया
है इसलिए उमरे प्रति हमारा मी एवंमा कायम रहेपा।

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नातामुर भारती
'प्रमो-प्रमो एक महीने से अन्न का सदाम कठिन
मन गया है माम दौर से कुछ मूों में भी मापके पड़ोस में
है-उत्तर प्रदेश विहार बगाल और उत्तर-पश्चिम की
तरफ जाएँ ना महाराष्ट्र और गुजरात राज्य मौर राजस्थान
के एक हिम्स में । लेकिन मैं मामस कह सकता है कि हमने
उसका मुकावसा करने की पूरी कोशिश की है, यस बाहर
के पमान से नहीं पस्कि अपने देश के उन सूत्रों से महाँ भन्न
यहाँ को जान से ज्यादा पदा होता है बम पगाव सीसा,
प्रौन और मध्य प्रदेश से प्रमाम हमने अल्दी-मल्दी उत्तर
रग बिहार गाम, महाराष्ट्र मोर गुगरास भिजवाया है।
इसमे यहाँ हासम सुधरी है। मीम दिन या एक महीने पहले
वहाँ जो परवानी पौर वपनी पी यह प्रय कम है। अपने
महीन-यो महोने में हमें पौर यान परमा होगा। जिसके
पास जितना है उमसे यह स्पाना स न करे। हम भपमे
वर्षका पगएँ मन के सच को तो उससे भी पटाएं। मैं
पाहता हूँ कि हर एक पहर का रहन वासा हर एक गांव
का रहन बामा प्रपने परोसी ना देखे विहाँ मुमीषत है
कौन तकलीफ उठा रहा है। हमें पपम खाने में कुछ कमी
करके मो दूसरे को सिसाना पर तो उस मिए सपार रहने
की चम्परत है। पवार अपने अपने घरों में कुछ ज्यादा रप
में यह बात मुनासिब नहीं है मौर मुझे विश्वास है कि हमें
गिम साटमा मुरावसा करना पर रहा है उसमें हम हिम्मत
-

प्रमान मन्त्री
४१
बहादुरी पौर दूरदेशी से फाम मेये।
" में यह समझता है कि पाप के समाने म पगसे दो
तीन महीनों में म दावों की पारख है, नग्निस की समरस है,
म मस पी जात है। मत्री मो न कोई दावत मरूर करेंगे,
न कहीं जायेंगे, म कोई वापस लेगे, और म पार्टीन होंगी। मैं
मानता हूँ कि मम कोई महत मपठ की यात महीं है, फिर
भो मार देशमा एप मानस तयार करना है, देश का दिमाग
तयार करना है और हमें यह दिससामा होगा कि वो बाग
कमियां है उनका हम सब मिलकर दूर करने की कोशिश कर
'भमसी मवास तो यह है कि हम अपने देश में ज्यादा
मनाम पदारें। इसके लिए हमने भो कदम उठाने का
इरादा स्पिा है हम जिस तरह से किसानों क प्रमान की
पोमत बनाना पाहवे हैं, जिस तरह में मिमानों पा मगर
मुमीयत पराए सरकार उमसे प्रमान वरीदना पाहती है
पौर हम को दूसरी पा करना पारस है, मुझे विश्वास है
कि उनकी भोमस अगले वर्ष-दो पप के अन्दर हम अपनी
हामत ऐसी बना सकेंगे जिसमें पान मधी स्पिति का हम
मुगावमा म करना पड़े।
'हमें यह भी ध्यान में रमना है निरयावा प्रमाज पदा
होगा याद देने से पूरी तरह पानी दन म, या किमानों को
कार्यादेने मे या भण्ठे योग मोर मा वामपरों के कारण,

मातबहादुर पारमा
प्रपमेस्सर यह
1
लेकिन प्रससो सामत तो दिमों में रहती है। मान करोड़ों
किसान पगर यह इरादा कर ते कि हम एक भान्दोलन फे
प मे सेसी की पदावार को बड़ायेंगे तो समय बदल सकता
है हालत बदल सकती है। कुछ हमें गमिोजा की भावना को
प्रपनाना होगा । जब हम प्राम्दोलम पसाते ये गांव-गांव में
जाते थे। इस समय भी इस बात की जरूरत है कि हम गाँया
में जाए मत-त पर गाएँ। हम
जिम्मेदारी
उठायें कि देश के अंदर गांवों के मदर किसानों में ज्यादा से
पयादा मनाम पदा परने का एक माम्दोसन मा देंगे। मैं
चाहता है कि हम सब पाज इस भावना से प्रेरित हा ।
'मौर भी दूसरे सवास है। मैं फिसी पोर को माप से
हिपाफर और दवाकर रममा नहीं चाहता। भार कीमम
बढ़ रही है मूल्य बढ़े हुए है। स्री सामान भी ज्यादा कीमत
परमिलता है। कपड़ा है तेस है चीनी है, गुर है दियाससाई
-छोटी-मोटी ऐसी पोरे गा हमारी रोज़ की जिदगी में
माम पाती है, उनक यो दाम मदे हुए है और उसका पसर
क्सिाम पर भी परसा है। उसपर भी हमें रोक सगानी
होगी। मूल्य वृद्धि के पीछे कुछ मौसिक बात हमारी
मापिक नोतिया है।
हमने पिछले १५ साम के अन्दर तीन प्माना में २०
हजार करोड़ रुपए सप किए है, पोर सर्व करने का इरादा
रखते हैं। क्या हम कभी कल्पना कर सकते थे कि इस देश में
।

पान मात्री
हम दस-बारह सास के अंदर इतना सर्प पर मेंगे। सेकिन
व हम रुपया सगाते हैं तो उसी के अनुसार हमें पदा मी
करना चाहिए। प्रपर रूपया लगाने क साथ-साथ हमारी
मैदावार न बढ़े य मोट बड़ी मात्रा में फलते हैं । इमसे गोमते
जाती है। प्राय ऐमी हालत मा गई है जब हमें सोचना
रेगा कि इन कीमतों की बढती पर साबू पाने के लिए हम
नया फवम उठाएं । इसमें कोई पीछ हटने पी बाप्त नहीं
मदिन मरमून परम उठान की बात है। हमारा माय एम
हो है । हम वही पड़ेगे एक नया ममान एक प्रांतिकारी
समार हमें मनाना । मेदिन हमारा हर कदम मोरा हमा
धमझा हुप्रा पर एक मजबूती के साथ वदमा पाहिए। मुझे
विश्वास है कि पार जो हमाग साधारण प्राधिक परिस्थिति
है सरकार उमे पन्छो नरह से मोपेगो भौर हम एक राम्या
निकालेंगे, रिस राम्से मे हम ठीक-ठीक पागे पद म पौर
भार यो यदतो हुई कीमतें है उमपर भी काबू पा सके।
अपने देग में अगले कुछ सालों में प्रदर देखना
पाहता निवारी मामान की कीमतें बंधी हा हो। से
पादा बड़ी नूवमूरत पोरें है उनपर जो जितमा पमा गप
करना पाहे परे, पोर जोकोमते रहें वह रहें। मेकिन मुझे इस
मातमी पिटाईदिपान गरीव भादमी, मापारण मादमी मा
सके, पहन सके यह मके, और साथ ही साप उसपो एसी
चहरी पोरें, जिमसामने पोड़ा पिक किया, उमको मिल सके
।
.

मातबहादुर मारली
पौर उनकी कीमतें बंधी रह सरें। एक-एक दूकाम पर कीमतों
की सूची टंगी रहे भोर यह सरकारी अफसरों का काम होगा
कि वे यह देखें कि वे कीमतें ठीक होती है मौर उमके अनुसार
काम पमता है।
पसे अपने देश में हमें पड़ोसी देशों की पहसे फिक
करनी है मौर जिसनी हम अपने देश में शांति रम सः पौर
उसकी वजह से दुनिया में पौप्ति बनाये रख सकें वह एक
बहुत ही सरूरी बात है। चीन का हमला हमारे देश पर
हुमा । उसका रुस नहीं बवसा है हम मी प्रपना रुम नहीं
मदस सकते । इरपत भौर सम्मान के साप वातघोप्त करने से
हमारा देश कमी पीछे नहीं हटा है। क्या गांधी जी, पौर
मया प्रवाहरलास जी, हमारा यह तरीका रहा कि पाहे
हमारा कोई किप्तमा हो पिरोपी या मुसासिफ क्यों न हो
अगर वह बात करमा चाहे तो हम शान भौर मर्यादा के साप
वाप्त करने को तयार है लेकिन मगर तसवार की मोक पर
या एटम बम के गर से कोई हमारे देश को झुकाना चाहे,
दबाना पाहे तो यह देश दयने वाला नहीं है। हमारी करोड़ों
की ताकत मनवा की ताकत इतमी जबर्दस्त है कि हम
किसी भी सप्तरे का मुकाबमा कर सकते हैं।
'मुझे गड़ी मुशी है कि राष्ट्रपति प्रसूब मे एक वरी
मन्छी भावना का प्रसार किया है प्रग्छे सयासात माहिर
किए हैं। कम हो मापने पखवारों में देखा होगा कि उन्होंने

प्रपाम मन्त्री
भारत पोर पाकिस्तान की एकता और मेल-जोस की वास
को है । मुझे उससे खुशी है और मैं उसका स्वागत परता
हूँ। मैं भी पाहता हूँ पौर देवा भी पाहता है कि पाकिस्तान
पौर हिन्दुस्तान में मेल रहे। पाये दिन रोग झगए होते है
सरहदों पर गोलियां चलती है। यह न पाकिस्तान के लिए
पन्छा है और न हिन्दुस्तान के लिए । लाखों भाई मगर इघर से
उपर पाएँ और हम इसे रोप न सके सो हमारे लिए यह
मोई गौरव की सात महीं है। इसलिए मत प्रौर ममझौता
मसा कि ममे पहा मादर पोर सम्मान के साथ एक दूसरे की
मात को समझकर हम कोई रास्ता निकामना बाहें तो उस
भी मिकामना चाहिए । मुझे भरोसा है कि अगले कुछ महीनों
में हम अपनी वाकर समंगे पौर मेस-मास पी एम ऐसी
भावना पदा कर सकेंगे जिससे एम रासा-ठीक राम्सा
निमल पाए।
'हमारे पड़ोस में हमारा प्रेम वर्मा से है मका से है
नेपास स है और प्रफ्गानिस्तान से है। ये ममी हमारे मित्र
दा है। कुछ पाठिनाइयां नमी-कभी पा जाती हैं । पुछ सा
में भी है बर्मा में भी है। हमें मुशी है कि मोमोन को प्रधान
मत्री मे यही प्रायर के महान में प्राना मजूर किया है। सरा
में हिदुम्सानियों का जो प्रश्न है मुझे भरोमा है कि उस हस
परने महम कामयाय होंगे। हमारे दिल मला मरदार
म्वसिंह जी धर्मा पा रहे हैं मोर मैं समझता हूँ जिवी पास

मानणार पास्त्री 1 पो कठिनाइयां मोर दिया है, उनको भी हम करने में हम कामयार होंगे। दुनिया में शांति का रास्ता जवाहरमास मी ने विस- माया मोर भाष भी हम दुनिया में शांति कायम रमने में अपनी सारी ताकत लगाएंगे । हमारी नीति किसी पगे पकिन के साथ नहीं रहने को की है। हमारी मीवि पाहे नान असाइनमेण्ट की हो, पाहे को-एक्सिसटेंस की हो चाहे रिस प्राममिष्ट की हो, माहे एण्टीकामोनियसिपम की हो या एण्टी रेशिमसिरम को हो, हम उपनिवेश महीं चाहते। हम पुतगाल की कासोनीप को मिटाना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि ये कायम रहें। हम कामे मौर गोरे के रंग को बर्दाश्त नहीं करना पाहते, चाहे वह साउप प्रमोका में हो या कहीं और हो। हम नीति पर भरे रहेंगे, जो सच है। हम सपाई का साप ये । 'दुनिया में हमारी र वमो होगी जब हम भपने देश में मदत हों, पर अपने देश में हमारी ताकत हो पौर पर हम अपने देश में गरीषी को मिटा सकें। हमारे मन्दर मेस पौर एकता पसरी है। मगर हम साम्प्रदायिक झगड़ों में पड़े, अगर हम भापा पौर बवान के मापसी ममरों में पड़े तो हमारी ताकत में बाधा परेंगी। "मैं नहीं कहता कि कोई विरोधी पस सरकार की भालोचना न फरे, रसर करे । सरकार की जितमी बुराई करली पाहे एक नोकतत्रीय डम से करे । हम उसका सामत

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है। लेकिन कुछ ऐसा पाठ भी भावा है, कोई ऐसा सवास
ताई रिसमें सारा देश सारा राष्ट्र पौर सारी पार्टियां
पिसी होती हैं मोर मुल्क के सवामों को हम करती
ने का सवाम कोई ऐसा सवास नहीं है जिसको हम
की युनियाद पर हल करने की कोधिप करें। मैं इस
को अपमे तमाम साथियों पर छोरना है कि ये इस पर
पौर विचार करें। मकिन इतना मापसे मिवेदन है कि
जय एकता--देश पी एमता को पनाए रखकर अपना
नया समाज मनाकर भपन ममात्र में शान्ति करके हमको
देश को मजबूत बनाना है और तभी हम दुनिया में
बत बम समे।
यह साना-पीना, पहनना मर पारी है लेकिन देश
केबस धन-दौसत से नहीं । पया-पंसा होते हुए मी
पीछे रहते है। दुनिया मी मररों में--पौर भपनी नसरां
पर कैसे बनता है-दध पनता हे गांभो नसे मारमियों से,
हरसास से मादमियों से रवीन्द्रनाथ टगोर से
पायों से । मम पया वात पो? उनमें एप परिण पा,
महिपता भो । मगर पार हम पाहते हैं कि हमारा देश
पड़े वो फिर ऐसे मौजवानों को जन्म सेना होगा जो
स पर मनुशासम को प्रपने सामने रसँग, तो देश का
प्य वरायम होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।
'मैं इतना ही भापो विश्वास दिलाना चाहता है।
"

नामबहार पास्त्री
जो कठिनाइयां और विश्कलें हैं, उमको भी हल करने में हम
कामयाब होंगे।
दुनिया में शांति का रास्ता बबाहरमास मी ने दिन
साया मोर माग भी हम दुनिया में शांति कायम रसमे में
अपनी सारी ताकत लगाएंगे । हमारी नीति किसी पड़ो पक्छि
में साप नहीं रहने फी की है। हमारी नीति चाहे नान
अमाइनमेण्ट की हो चाहे को-एक्जिसप्रेस की हो, पाहे रिस
प्राममिष्ट की हो, चाहे एण्टीकासोनियमिपम की हो, या एम्टी
रेपियसिपम को हो हम उपनिवेश नहीं चाहते। हम पूर्वगाम की
कासोनीर को मिटाना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि वे कायम
रहें। हम कासे और गोरे के रंग को बर्दाश्त महीं करना
पाहणे, पाहे वह सानप पफ्रीका में हो या कहीं पौर हो। हम
नीति पर पड़े रंगे को सच है। हम सपाईका साप देंगे।
"दुनिया में हमारी कद्र तमो होगी अब हम अपने देश
में मरबूत हों, अब अपने देश में हमारी ताकत हो पौर जय
हम अपने देश में गरीबी को मिटा सकें। हमारे अन्दर मेम
पौर एकता जरूरी है। मगर हम साम्प्रदायिक भगों में पड़े,
मगर हम भापा पौर जवाम के मापसी मगरों में पड़ तो
हमारी ताकत में यामा परेमी।
' में महीं पहता कि कोई विरोधी दम सरकार की
भासोचना न करे सर करे। सरकार को जितनी पुराई
परमी पाहे एक मोकसत्रीय रंग से परे । हम उसका स्वागत

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तातबहमुर भास्त्री
कि हम पिसाने के लिए कोई काम नहीं करेग। हमें अपनी
कामयावी और सफलता का पूरा भरोसा है। मैं इतमीनान से
कहता हूँ कि हम देश के काम को भामे वदाएं तेजी से
बढ़ाएंगे मजमूती से घमाएंगे और देश के प्रश्नों को हल कर
भारत को दुनिया में एक पा से ऊंचा स्पान वगे।"
शास्त्री जी का यह मापण उन्हीं के अनुम्प है। उन्हीं के
पाम्दों में देश के वन-मन को भरोसा है कि वे देश के काम को
मागे वहाएंगे-वृढ़ता के साप मागे वदाएँगे।
उनके साप सापना की शक्ति है। हम सो उसी में
विश्वास करते हैं और उसी के पस पर रहते है कि वे अपए
देश के काम को माग बढ़ाएंगे-मेहरू के स्वप्न को पूरा
करेंगे।

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Lalbahadur Shastri

Author
Shri Vaythit Hardasy
Title
Lalbahadur Shastri
File name
Lalbahadur Shastri
Text
OCR done
Citation
1964
Published
2010/12
Publisher
Agra,ramprasad And Sans
Language
Sanskrit
Pages
137
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
History
DLI number
514820
Barcode
4990010022500.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
TdBJs2zU8c4
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