Hindustani Academy Allahabad

Vidyapati Padawali Main Lok Sanskrit Ka Chitran

Dgr. P.k.. Singh · 2005/02/08

PDF Proofread

Front matter

विद्यापति-पदावली
में
लोक-संस्कृति का चित्रण
प्रमोना
डॉ० प्रनोदकुमार सिंह, एम. ए. ध हो,
व्याख्याना, हिन्दी-विभाग,
लंगट सिह महाविद्यालय बिहार विश्वविद्यालय).
मपकरपुर।
4
प्रकारक
कल्पना-तीर्थ
दलसिह सराय
१६७०

-
मन-नय सिंह
वाधिकार-लेखक ।
ग्रामर देष, मुजफरपुर ।
+
क
मुल्य
माधारण संकर-300 रुपये .
विष मस्करण
१... रुपये।
-

-समर्पण- पूज्य पिता श्री वैद्यनाथ सिंह को, जिनके ममन्त्र का संवन पाकर मैं टूट नहीं सका। -विनीत प्रमोद मुरवचन ་ -t•ཙྪཱ ཙྪཱ ཀྐ ཀུ་-ཨའ} * :༌ p? པ༌ད་'' སཱར* པདྨ་ ཚ་ ཙ་ར་ཡ - - - ་ ག ; – ༈༈པ ཨོའོ +-- ་་་བ་༌༌རྣལ F* = “ ཎའུ་ཡི་པ ཨ་ལཙྪ་ – ནaཀ ཀ༌པགསཾ ན ::ར མ༌ལག ལྟོ་ལཔུང ཤཱཡཀར《རཚ༑ རུ* '' ཟླ་ iཀཱ་ ༣ ཚལ་ : ནསཾཥ ༈ རྣ་བ་, 3འཛཱ ཨཨར་ རྣ་རཀཱ*ཏ ** ཀ ན ་ལྟ་, ,, ༔ ༔ཀུ་ཤུf=༔ ཙ་ནST ཙ,ཀ''' ན **མརྞ ཙྪཱ ཀྵ་ ། ཡཱ ཨཱ * ” །༢ ༢ :::ཙྩ ད་༣ ། ན༑ ཙྪཱ ཙ ཚོར་བ་ ༢ལ་ ལ༔ ཚ”་ ལ ཤ ་ བ བྷ; ༽ དུ =r བ*, ༩ནརོའོ རྫུ ཙངག པུཀྐལ་་ * – ས ས པ ས མཚབུ་མ་"༑ སྐུ༔ ; ་༨ ཨུ་ཡ བ ཨཔྤཡྻ “ཡཱ ཀཆབ ་་ག་ཎ ན - བཝ༑ ཤུ༽ qq ད་ , ལྟ ཁ “ཝཨཱ ཙྩ བྷཱུ བྷུདྡྷཾ དྷུ T g#* སུ པུཥ སཾ ༔ ཝུr * རྩྭ། རག་ * རྒྱུ་མ ཀ༈ ལ ག རྒྱ་ དཙ-f ་ ཀ ཀཱ - ཚུལྷ་ པོ་ པ་ སུ ཙ ཚ # བྱང ཡཱ ཙྪི ས ས # བཙ ་*ག རྩྭ་ • ཤཱ*དg༑ ༔ ༔ 7* ༡༢ ཨཱ ཙྪཱ ---ོརཱཙཱ• ཤཱ *ཁལ ཅུ ''' ༈ ༢༣ པས་ S+ རྒྱུ=7 པཎྞཾ པཎོ ཨཾ 'ཡ་ཝཱ ཙྪཱ ཀྐ ? ལྕམ་ G ''༣རུཎ – ཤུདྡྷེ༔ ཡཱར * གྷ ཨ་ཨཱ ཙ ༌ཙ - སཾནྡྷཱཝཀྐ ༈ ཤེ་ སཙྪ། མཱགཏཱཡཱ ལཱ ལཾ ཀཱ ཨཱཝཅས་ཀ· ཧྥ་ར་ རྩྭ -་ལ་ ︽ ཝཱིཙཙཔཀྵ བུfཝེ རཱཙྪ་ཨཱཙན ང ཤུ་མ-མས:༣ པ བས༔ rgའུ བྷཱཝཱཚུ་ ཡི ་འཁྲུ་ कइया कलष्ट करने का प्रयास -F 1 f ལ* ཧ ཨ ཨ• སྨ༔ ཤཱ༢ ༴ ཀ gཎཙི ཚེ ལྷའི་ཚད་དེ་ཚོ धमिता का में 7 उना हुआ है लगा में अवनय जान करतभी कां-बम- कार सवार बर प्रदीगो में श्योगध मनामनी के हर भार स्मटाके, नहान ने दादी - TET TA 4 Friaxse f - 4 - के नवन दान- --- .":- TET " हनन के दोनो टांक : लामा - 275 : ईन उपल- को न न नही देनी ई "23. में मर में बड़ी भी महन्न म छोटो छुटित गेले का अनी है - ' जन्दा नविन न पर मा बिल པས པ བྷཱུ བྷཀ༔ – * व जः महानन्दे पर चममा का न. --- - -देशम, १५१४-१ ' में की मदर महार, का मनी' भार :ना.., मन , क. : पी के चार दिन काबा सा प्रवन होनहै ने गला प्रप.जम कुकुममता का महत्वारकाम करते है। विधान पति मन्दाराला के 'क: नर मल के विरोध में बाटो की माँ का मात्रमा सवे प्रबल नहीं कर हैं किन्तु वे से अमान की तरह हा छोटे और नरम पदायों के प्रति कति जनावर मानावना का अनुभव करते हैं। - -देयायककार सिद्धान्चन यह स्थापन करने ई + बटो कार का लाभहने का कोई कारण नहीं है, किन्तु काकन उन 1 कद्र-नेन्द्र बभु के निता विद्यारल महत्ता क मानक म मुझ और लयुगा + प्रत मनना से युक्त अपने कांव-हृदय को घावहारिक अभिव्यक्ति प्रदान करते है। यह को है ! दिद्यापन अदमाग की तरह स्पष्ट मादी में बिना और गामडल्लो का मही करते हैं किन्तु उनको लोकतादिनी - -- + बडे और जम्मत हिन्दी को इटोरने में जिस या " मी मद के प्रति उनको गहन आम्था में * है। सदर मे सुमित्रा- न र मर्या'र के होते हैं कि उद उन्हें विद्यापन " मा मा "ट - मन्दर प्रतीत होता है तथा छन्नो की चमक ला मी, चमार आदि 'F' को 'नाने नगई। Sr. - - - 3 प्रनि गो है किन्तु उनमें 'म प्रार " "'; अभाब हैक मनन असंन्यो मन नपराओं को उनका द नाईटो प्रना-प्रनमा स्थान पर मानव को पूजा - AN Kaamta RE शुनबन हो २ ब म र माइकर, बाहिर, शिन्तु मेरे दुर को कोई नन्द-म, नाग -श्री कलक्टर सिह 'केसरी' N स पर उठा दर को कार में अन्दी भगवान, त गते दो बार की जगह नया ईमान , श्रो दयामनन्दन किशोर 'वान के नाम कविन्द में धुता के दम आधुनिक स्वर का नही रहना ** * - इनिहाय-मम्मत ही है क्योकि भारकालान सामन्तीय जीवन-मनो २ महित्यकार ये बोरी बोर 'बलवनमः' के नायकत्व को सिद्धि को प्रत्यार नही की जा सकती है। मुनर", नाक सस्कृति के रूपक विज्ञान की प्रगनिहाल निभा लघुता-यूदन नही लघुमा-चित्र में ही अपनी मानद य महानुभूति र वाहिया माय-भावना को अभियान देकर स्वनीर प्रमाणित होता है. यह मेरी मुश्चित धारणा है। हिन्दी-विभाग, लंगट सिह महाविद्यालय, प्रनाद कुमार सिंह, (बिहार विश्वविद्यालय, निथि २-२-१९७०। मुन्नपफरपुर। .

विषयानुक्रम पृष्ठ-संख्या प्रथम अध्याय-काव्य और मोक-निरी द्वितीय अध्यय-विद्यापनि अनि (१) लपिक की ..., at : पर V (7 मधुगे और खपृ ५.), 13 नव वरवर ०६.5; (ग) मुम्ब' froi), (५) पन्दी (', (इ) भी. च) इबर की कुई' ( हरि (पृ. ३.१० रोक जीवन के विविध यवनाने और का- कलापों पर आधारित अब १०-१९ (क) जलाना (पृ१४-११. 'व) कुम्हार (४. ११), (ग) तेली (११, ) कृषि और उद्यान-कर्म (पृ० ११-१२), मम्मबंधन तथा मत्स्यजीनी (पृ. १२-१३ , च) वाणिज्य और बार्षिक कारगाओं पर आधारित अर्थ (पृ. १४-१६) । (३) नी-निरीक्षण (४) वतरिना का चित्रण (1) मिथिला के निर्धनों की कोपड़ियाँ (६) जुमाड़ी और भामा २२-२३ (5) हाथी के जीवन और कार्य व्यापार-मंबंधी अधों का निधन (८) न्यायाधिकरणिक कल्पना (६) बसबाढ़ी की हाँडी (१.) डोट साँप (११) लोक-संस्कृति के इतर पक्ष (ब) लोकपिस्वाम और अन्यविश्वास २६ ६ - .

प्रतिभा जीवन के शुद्र, छोटे, उपेक्षित और विस्मृत बिन्बो को छटोरने में जिस उरमाह का परिचय देती है उपसे लेक-संस्कृति के प्रति उनकी गहन आस्था से उत्पन्न प्रगति-नील मल्यो का ही प्रकटीकरण होता है ! कालांतर में सुमित्रा- नन्दन पन्नु में भी इसी प्रातिशीलता के दर्शन होते हैं, कि जब उन्हे विद्यापति को ही नन्द बग्नी का तुच्छ कडा कर्कट मार्थक एद्र सुन्दर प्रतीत होता है तथा रसो के बच्चे, सिगरेट के खाली डिब्ब की चमकीली पन्नी, पसार आदि अडून विषय भी उनकी रचनाओ मे म्यान पाने लगते है। विद्यादि में 'लघुना-चित्रण की मालिक प्रवृत्ति लो है किन्तु उनमें आधुनिक प्रगनिवादियों और मानववादियो के इस 'हष्टिकोण' का अभाव है कि चाँद को साहित्य के लिहासन से उतार कर असख्य उपेक्षित ताराओं को उनका प्राप्य दिया जाए तथा ईश्वर को प्रस्नर-प्रतिमा के स्थान पर मानव को पूजाह समझने का प्रयल हो- तुम बहुन बड़े हो चाँद, मुन्ध तुम पर भूमण्डल सारा, चाहिए किन्तु मेरे हग को कोई नन्हा-सा तारा । -श्री कलक्टर सिह 'केसरी' on चीख उठा मन्दिर की कारा में बन्दी भगवान, पूजित होने दो पत्थर की जगह नया इसान। ---श्री श्यामनन्दन किशोर विद्यापति के लोकनिष्ठ कवित्व में लघुता-पूजन के इस आधुनिक स्वर का नहीं रहना उचित और इतिहास-सम्मत ही है क्योकि मध्यकालीन सामन्तीय जीवन-मूल्यों के साहित्यकार से 'होरी' और 'बलचनमा' के नायकत्व को सिद्धि की प्रत्याशा नहीं की जा सकती है। मुतरां, लोक-संस्कृति के कल्पक विद्यापति की प्रगतिशील प्रतिभा लघुता-पूजन नही लघुता-चित्र में ही अपनी मानवीय सहानुभूति और साहित्यिक न्याय-भावना को अभिव्यक्ति देकर स्तवनीय प्रमाणित होती है, यह मेरी सुनिश्चित धारणा है। हिन्दी-विभाग, लंगट सिह महाविद्यालय, प्रमोद कुमार सिंह, (बिहार विश्वविद्यालय ) तिथि २-२-१९७० मुजफ्फरपुर।

विषयानुक्रम पृष्ठ-संख्या 'थम अध्याय-काव्य और लोक-निरीक्षण १-४ द्वितीय अध्याय-विद्यापति का लोक-निरीक्षण और नजन्य अर्थ ५-५ (१) लौकिक पेड़-पौधों लना गमो, तृणों आदि पर आधारित अर्थ ५-१६ (क) ॐख 'पृ० ५-६), (ब) चटैल और परवल (पृ. ६-७), (ग) कुम्हडा (पृ० १.८), (अ) मूली (पृ. ८), (ङ) कु भी (१०६), (च) डाबर की कुई (पृ. ९), (छ) मधुरी और पाँडरि (पृ. ६.१०)। (२) लोक-जीवन के विविध व्यवसायों और कार्य- कलापो पर आधारित अर्थ १०-१९ (क) जुलाहा (पृ० १०-११), (ख) कुम्हार (पृ० ११), (ग) तेली (पृ० ११), (घ) कृषि और उद्यान-कर्म (पृ० ११-१२), (इ) मत्स्यबंधन तथा मत्स्यजीवी (पृ० १२.१३ '. (च) वाणिज्य औय आर्थिक धारणाओं पर आधारित अर्थ (पृ. १४-१६) । (३) नीड़-निरीक्षण ११-२० (৮) অনলি কা খি २०.०२ (५) मिथिला के निर्धनों की झोंपड़ियाँ २२ (६) जुआड़ी और पाशा २२--२३ (७) हाथी के जीवन और कार्य-व्यापार-संबधी अर्थों का निधन ) न्यायाधिकरणिक कल्पना (8) बैंसवाड़ी की हाड़ी (१०) ढोढ साँप (११) लोक संस्कृति के इतर पक्ष २६-५३ ब) लोकविश्वास और २६ (.) पृष-संख्या -- (क) काक-शकुन (पृ० २७-२६.), (ख) शुभ शकुन • अंगों और आँखो का फड़कना (पृ. २९-३०), (ग) यात्रा-संबधी शकुन (पृ० ३०-११, (ब) तारा और चंद्र- दर्शन-संबंधी अमंगल या अपशकुन (पृ० ३१ ३२), (इ' वाणिज्य-जगत् के शकुन- मुलक विश्वास (पृ० १२) । (२) भून-न-डागन-संबंधी लोकविश्वास और झाड़-फक · अंधविश्वास और तत्र-मंत्र (क) भूत-प्रेत (पृ० ३२-३३), (ख) झाखक (पृ. ३४-३६) (ग) (डायन-संबंधी प्रवाद (पृ० ३६, राध) बलि (पृ. ३७ )। (३) पाप-पुण्य -सबंधी लोक विश्वास (आ) रीति-रिवाज (क) लोक-कृत्य (१) शिशु जन्म (पृ. ३८), (२) विवाह (पृ ०३६-४२', (३पूजोपचार (पृ०४२-४३), (४) यद्ध-रीतिर्ण (पृ० ४३ ), (५) श्राद-भोज (पृ. ४४ )। (ख) लोक-प्रथाएँ (१) बेमेल विवाह (पृ०४४-४६), (२) पर्श- प्रथा पृ० ४६ ), (३) सती-प्रथा (पृ. ४६ ), (४) गोदना गोदवाने की परि- पाटो (पृ०४६-४७), (५) छत-क्रीड़ा की प्रथा (पृ० ४७ )। (ग) लोकोत्सव ४७-४९ इ) लोकोक्तियाँ ४१-५३ तृतीय अध्याय--विद्यापति की लोकाश्रिन कल्पनाओं का मूल्यांकन ५४. - 1 प्रथम अध्याय काव्य और लोक-निरीक्षण - कवि जीवन का विकार होना है। ईवन की बाताओ को ओ माहित्यकार जिन्नो दनता ने पाबित कर सकता है व उनना ही नहात साहित्यकार कहलाता है। जीवन का आकन वेवल व्यायन गर शास्त्राबलोकन नेहो नहीं होता है । कवियों को अपनी ऑवो ने लोक-जीवन का भी निरीक्षण करना पडता है ! निजी लोक निरीक्षण से ही कवि की जानकारियो मे आयता आती है। यान ने ठीक ही कहा है-"प्रत्याशी लोकाना सर्वदी भवेन्नर:।'' लोकानुभव ले ही मनुष्य नब कुछ जानता है । जीवन के पूर्ण ज्ञान के लिए लोक-ज्ञान अपरिहार्य है ! विद्यापति भी लोक- व्यवहार को ही सर्वोपरि स्थान देते है. सब तह गुनिल अधिक बेवहार । कोरा नास्त्र-ज्ञान विडम्बना पूर्ण हो होता है, अत. कवियो को निजी लोक- निरीक्षण से अपनी प्रतिभाओ के लिए खाच जुटाना चाहिए, यह आधुनिक चिन्तको का हो नहीं प्राचीनों का भो अभिमत है। . ma काव्य-विषयों का संग्रह साहित्य और शास्त्र के आकरों से ही नहीं हाता है अपितु इन दृष्टि से 'लोक' को भी आकर मानना चाहिए ! प्राचीन काल से ही कवि लोग 'लोक' का पर्यवेक्षण करके मोलिक अयो और अनुच्छिष्ट कल्पनाओ का संग्रह करते रहे हैं। शास्त्रीय काव्य-परम्परा पर लोक-परम्परा का प्रभूत प्रभाव लक्षित किया जा सकता है ! राजशेखर ने भी एक प्रमुख अर्थ- योनि के रूप में 'लोक का उल्लेख किया है । अन्य काव्य-शास्त्रीय पुस्तको और कवि-शिक्षा-मन्यो मे भी 'लोक-ज्ञान' की भावश्यकता बतलाई गई शास्त्रीय व्युत्पत्ति के साथ-साथ 'लोक' को व्युत्पत्ति भी कवियों के लिए अपेक्षित है क्योकि इससे वर्णन ने भ्रांति और प्रमाद का प्रवेश नहीं होता है तथा नए-नए अर्थों का उन्मेष होता है। शास्त्रीय परम्मत की लड़ियों से स्वच्छन्द होकर कविगण पुराकाल से ही लोक-प्रचलित उक्तियो, लोक-उपमानो और लोक-जीवन के सहज अछूते चित्रो का सन्निवेश अपनी रचनाओ मे करते । मा १. महाभारत, धरि पर्व ११०१-२ भारतीय शिक्षकों ने लोक-परम्परा और वेद-परम्परा तरा लोक और शास्त्र के विभेद को बीकन कर रखा है किन्तु में दोनों एक-दूसरे से यवृत्त और प्रभावित भी होते रहे हैं। जन समूह को हो लोक' हैं। जन' या 'लोक' की परिधि मे शिक्षित अशिक्षित सभी प्रकार के मनुष्य आ जाते है। कवि इसी 'लोक' के जोवन या उसकी मम् द का अET और व्यायामा हुआ करता है । कवियों के लिए हो नहीं मनुष्य मात्र के लिए लोक संग्रह को अपेक्षित कहा गया है । 'लाक' जगत-मात्र का है और जन-नानन्य के बहारों, आचरगो आदि से ही लोक सनई' का सम्बन्ध है । भान्तोर आगों ने यह व्यवस्था दी है कि कवियो को लोक-धर्म का परिचय रहना चाहेर और उन आदेश के पालन स्वम भारतीय काव्य साहित्य लाक जीवन से अपना प्रेमामारा ग्रहमा करता रहा है। लोक-जीवन के सहज चित्र सस्कृत, प्राकर, पत्रा और परवर्ती लोक भाषाओ के साहित्यो में विशाल परिमान ने प्रात होते हैं। कविया के लोक निरोशग से प्रसूत इन चित्रों का अध्ययन जन सस्कृति' या 'लोक वार्ता फांक लोर) की दृष्टि से भी किया जा सकता है। भारताय आचारों ने जिसे 'लोक' कहा है उसे हो पाश्चात्य चिन्तकों ने फोक' कहा है। लोन-जबन स अम्बद्ध बातो को यूरापीय पण्डितों ने 'शोक लोर' के अनर्गत विविध किया है। 'फोक लोर' के लिए हम 'लोक- सस्कृति' मान का हिन्दी में प्रयाग कर सकते है । कानयत्र दिवस जन जनकादय:। लोकमानका ये लपत्यक म्हसि ।। -धानद्-गबदनाना, ३.९० .. प्रष्टव्य श्रीमन्ननवदमान,३३,३२१,३२४ ।। है. " कृष ३३ 3:1-44 कम नुन क'कमार' के लिये 'ले क-संस्कृति शम का प्रयोग स्तिात उन्युक ५२ सन्मान है। लोकसंस्कृत के अन्तर्गय जनजीवन से शित जितने - चार, विधि, विश्वास, प्रथा, परपरा, धर्म, मूढ यह, अनुष्ठान आदि है वैसना - हे। सा रे द-तार से बतलाया जायना, फोकसोर के अन्तर्गतभी ये हा विश्व का बदई । -सरहद' शब्द 'कोकलो के व्यापक तथा विस्तृत अथक प्रयास करने से सस्था समय है! x x कुछ लोग कह सकते है करवाने शब्द ' फाल्वर, का पद हा सकता है, फाकलोर का नहों। परन्तु डॉ० उपाध्याय के सिद्धान्तानुसार 'कल्चर तथा कोलोर में कोई विशेष असर नहीं | दानों का सानार कटूसर हार को छूना दुई दिखाई पड़ती है।" [हिन्वा साहित्य का मुहुन् हातहास', भाग-१६६ प्रस्तावना, पृ० ११-१२ डॉ. दे० उपाध्याय १. -- -- का अभिजात एव शास्त्रीम बोधन-विधियों भोर भनसाधारण के बीच प्रवाह मै जन्तर देखा जाता है। हम सब देखते है कि शिष्ट जनों की सस्कृति और लोक-सस्कृति ने असर होता है। মাংলা প্রায় ২ * সন্ত ऋग्वेद में गिट सस्कृति का आकलन हुआ हजार अयवंबन में लोक-संस्कृति के विविध - का प्रकाशन प्रतना है हम हिट और नागर साहित्य की रचनाओं ने नालोकरात के अमले का आरमततः चित्र देख सकते है। यह एक प्रमाणि? बन है कि भारत में लार पहने ने निष्ट सस्कृति को अत्य. घिर प्रगविल किया है और भारती८ सावको ने लोकक अर्थों का अपनी रचनाओ मे छ यथेष्ट हरण करके अपने लोक-जन का पूरा परिचय दिया है ! इल के बिलियन जान टामसया थामस ने सन् १८४६ ई. में 'फोक कोर' शब्द भी उद्भावना की थी। 'कानन महोदय ने बह शाम सम्म जातियों में मिलने वालं असंस्कृत समुदाय की प्रथाओ, रीति-रिवाजों दया मूडा महो को अभिव्यक्त करने के लिए गडा था ! डॉ० हजारीप्रसाद देवदा ने फाक लार के सम्बन्ध मे स्टिथ थाम्मसन का मत इस प्रकार उपस्थित किया है .--'स्टिय थाम्पसन ने लिखा है कि फ्रांस और स्कण्डिनेशिया मे यह शब्द परम्परा से चले आते हुए गृह-निर्माण शिल्प, कृषि-विषयक नियम और विश्वास, वस्त्र वन कला जैसे उद्योगों के अर्थ मे स्वबहुत होता है और इङ्गलाड में ना के किलो वर्ग के लिखित या अलिखित परम्परा, सौन्दर्य का अभिव्यक्ति तया रसानुभूति के तौर-तरीको के अर्थ में । को द्विवेदो कार लार' के लिए साहित्य के अतिरिक्त लोह. सम्हात' जैस भारद के प्रयोग की सूचना दते हैं। १. द्रष्टव्य सनरा बाकसार', म.न १,१.०३; भरिया लाइ । द्रष्टव्य हिन्द, साहिल कोस, पृ. ६६०, इतरर कॉलन, शाके 'लोक जाता। उपयुक्त उद्धरख का तुलना इन त इनास डेया मिटाने का, के इस मत से का जा सकती है। सभ्यजनों में असरजन वर्ग के लोगों की परछाओं और प्रधानों का परपरागत बान ही 'फोकलोर है :- *... traditional learning of the uncultured classes of oiri. lized nations.''-- Eceyelopedia Britanica Vol. x. Folk-Lore.] 'विचार और विता', पृ० १०६, निक---'जाल-वाहित्यका अध्ययन ! ४. "परन्तु साधारणतः लोक कथानलो, लोक गीतों, अन्धविश्वासों, प्रादेशिक निर्बधरी क्यानो, लोकोलियों और पहलियो को इस साहित्य का विवेच्य विषय माना जाता है। इस मोर स्कोडनेविया में जिन परपरा प्रवलिन शिल्पा, कलामो और योगों को 'फोक-लोर माना जाता है के लोक-साहित्य शब्द से सूचित नहीं हो पाये। उनके लिए अपने देश के कई विद्वानों ने 'जन- मन', 'लाई सस्कात' जैसे शादों का प्रयोग अधिक उचित are और वित,0209)। DISEHOSHORT APNE कोलोर' के अन्तर्गत लोक परम्परा और लोक-माता की प्रतिमाया * प्रभावित बन्यो का ग्रहग होता है उनके अन्तर्गत समस्त लोक साहित्य, लोष केला, ओर मरम्परा, लोक-विश्वास, लोक-प्रथा आदि माते आ होनिमा बनेने मी कोक लोर के विषय-विस्तार का निरूपण करते हुए पूर्ण लोक-साहिन्छ, लोक विवान एव अन्धविश्वास तथा रोति-रिवाज और प्रयाओं को उनमे अन्तनुरू, माना है। मोकिया बर्त का ही मत सबसे प्रांजल और विशद है। . १ Toere waid teen in de no disagreement about its 25e to include si kuuls of fols.nags, Toli-tales, superstitions, local legends, proyerbs un rilales "wi Dictionary of World Literat are, P.242-13-See, ૨ इटर दि ई बुक अफ मनोर' १९६४, विच स. पृ०४ माफिया बने । म.टेद्र ने बर्न के बन्द को दस प्रकार स्पष्ट किया है :-~-"लोच्या सन ने 'फोकलोर' के क्षेत्र विस्तार के मंबन्ध में लिखा है कि यह एक जाति बोवक शब्द की नाति प्रतिष्ठित हो गय है जिसके अननन पिछी हुई जानिय में प्रचार अयन: अपेक्षाकृत समुन्नन स्थानिय क अरस्कृत ननुहाया क अवशिष्ट 'वेश्चात, रानिरिखान, कहानिया, गन तथा कहावते अाना है । प्रकृति के नत नथ, जड़ जगत् के बाद में भून घेता की दुनिया नध अनके साय ननुध्यों के सम्बन्याम वेषय में जाना समाइन, वशाकरए. ताबाज, शकुन, रोग तथा मृत्यु के सम्बन्ध में अादन तथा अन्य विश्वास इतके नेत्र में बात है । इल्क अतिरिक इसमें विवाह, उत्तम विकर, बायका तथा गाउ जादन में सातरिवाज तथा अनुमान और त्योहार, युद्ध, आलुट, नवसाय, पशुमान माद विया के 4 राइन रबाज और अनुष्ठान इसमें आते है न बनेगावा, अवदान (लाजेड), जोक कहानिया, बैलेड गात, चिनिया. पहेनिया और लारेबी मा इतक पन है । सहेप में लाक की मानसिक सम्पन्नता के अन्नत जो भी बस्तु मानता है बेसमा इसके क्षेत्र में है। यह किसान के इल को बाइसे नहीं है जो लोक सस्ते के विवाद को अपना भार अाकर्षित करता है प्रत्युन जे उपचार नया अनुष्ठान है जिन्हे किसान इल का भूमि जानन क कान में लाने के समय करता है; जान तथा अशी की बनावट नहीं, बल्कि बे टोने टोटके, जिन्हें मछुआ समुद्र के किनारे करता है तुल असा भवन के निमाण नहा है, प्रयुत बह बाल है नो उनके निधन के समय दा जाना है। लोक सस्छन वस्तुतः आदम मानव का मनो- वैज्ञानिक अभिव्यक्ति है। वह चाहे दर्शन, धन, विज्ञान तथा ओषधि के क्षेत्र में हुई हो. अथवा सानजिक लगठन, तथा अनुष्ठना न अबका विरान इतिहान, काम और साहित्य के अपेक्षाकृत बोद्धिक प्रदेश में सम्पन्न हुई हो।' ---[डॉर सत्येन्द्रः 'जनक-हित्य के भवन, ३२-४-7 के आधार पर 'हि.स. का वृहत् इतिहास, भाग १६) प्रस्तावना, पृ० १३ घर उद् ] - द्वितीय अध्याय

No text on this page.

विद्यापति का लोक-निरीक्षण और तजन्य अर्थ शिष्ट या अभिजात साहित्य प्रणेता होकर भी विद्यापति अपनी रचनाओं में अपने लोकानुग का परिचय देते हैं। विद्यापति पदावली में मिथिला के स्थानीय चित्रों और आंचलिक शिष्यो का प्राचु दृष्टिगत होता । कवि ने लोग जीवन के विविध पत्रों से अ का आयात करके अपनी रचनाओं में रूहि-मुक्त घराबादी टिम्बो की प्रतिष्ठा की है। लोक-जीटन के प्रति सामन्त कवि विद्यापति की यह गहन निठा निश्चय ही उनकी मौलिकता की विधायिका होने के कारण इलाध है। विद्यापति भी कालिदाम की ही तरह नगरिक जीवन और लोक. जीवन के युगपत् वर्णन में दक्ष हैं । (१) लौकिक पेड़-पौधों, लता - शुल्मों. क्षणों आदि पर आधारित अर्थ- (क) कैस:- कानिदस लोक-जीवन के मार्मिक चित्रों के संग्राहक और लोक-पर्यवेक्षण में प्ले हैं । रघुवंश के एक पद्य में लव वृत्तान्न विद् कालिदास प्रकृति का सही रूपांकन करते हुए ऊस और धान के खेतों का शरद् ऋतु में धर्णन करते है !खों की छाँह में बैठकर धान के खेत की रखवाली करने वाली और रघु का यशोगान गाने वाली स्त्रियों का लोकचित्र रघुवंश में इस तरह आया है इक्षुच्छायानिषा दिन्यः तस्य गोप्टगुणोदयम् । आकुमारकथोद्घातं शालि गोप्यो जगुर्वशः !! . कवि कृषक जीवन का महज चित्र हमारे सामने लाता है। शरद ऋतु में धान एक जाते हैं और ऊँख के पौधे भी बड़े हो जाते हैं जिनकी यह में पान की रखवाली करनेवाली स्त्रियाँ बैठ कर गीत गा रही है, यह लोक- जीवन का अकृत्रिम प्रसंग है । कालिदास ने धान और ऊँल तथा गीत गा-गाकर धान की रखवाली करनेवाली स्त्रियों के चित्र को अपने लोक-निरीक्षण की शक्ति से साकार कर दिया है। कालिदास का यह अर्थ श्रुटि रहित और लोक-परक है। विद्यापति की कल्पना भी रखका शोक-वित्र ले आनी मिथिला में अंस की खेती अभी भी धूज होती है । अपने ही रस से फट पडने आले ॐखा या किस प्रस्तुत करने विद्यापति अपने लोनार का परिचय देते हैं। विद्यापति ने जज का परीक्षण करके उचित ही कहा है कि ॐख अपने ही रह है ट दाताहै। विद्यापति की इम उक्तिमा समेत इपष्टतः लोक परिवेशही है 1 -- (ख) चटैल और परवल कालिदास की दृष्टि मिल या रमता". की 27 FEE में पाया छान और धरहों के प्रसंग में मोथा जैसे सामान्य पदार्थ पर श्री डी है ! इसी तरह विद्यापरिभीलोदिक और रेल पदार्थो अथा क्षुद्र लता- गुल्मों का चित्रण करके अपनी कपात झर रिचा ने है चठल और परवल का सपना है इपण मोश। बहाल रोग :- प्रस्तुत प्रम में माधिका अपनी मनि-विकृति पर पडताती है कि उसने मकल को असल ला लिगाया। तह टेही परवाल मान ही भी MHILA - भक अण्टा बन्न पिना पने सेकशि -~~ -नाराक बिदामाता 43-३८, १०.१६ कटु वस्त्र बीमुनिश्लीलामबन्ध नादुन्नारे प्रयासमा म नावनोत्क। ( मेघन, पूर्वमेघ १११) १. क) शब्दायमें मधुरमनिल. कीचकाः पूर्ण भाषा: संसमा मरित्रपुरविजयो गासने किनभिः। -- [पूर्व मेघ १५६ (ख) व पूरयाकी चकरभागान्दरीमुकोबर समस्रो ! उटा मिनि वि! 'नायिनि गन् । rane " + ४. वन दिनमा - क ५. भोलन गत पद-४ सक्ष को निहार र शल grey %AT N" न -: रहने 1 4 न -- 3 om . ३ - है कि कोई गर .:: :: :: रन-चिह्न बा--पर-.1F" हैं: ' या नतुर का 17 - - - ६ लेना है नब कन्धे पर लगे बाबा काम है। कुम्हडे के ननुलेक - चून-ज... सा होदे -- घर मदने में ले है जुम्हे ' वर का नर रखना और कमरे का नहीं छत वर के कई को विद्यापति ने रन-बिहा नायिका के ताने मना कर दिया है. विद्यापति ने एकाधिक वार कुम्हड़े के घरेलू का अस्त किया है। लोकवन के सम्मके में रहने वाले विद्या निकांडी और उनके पूरे करने से परिचित हैं। वे ओमन न रागन बाले बार बार पर फैलन वाले भतुए से भो पूर्णतअवगत है के द्वार पर फलः हुन नूना खर को विगवित और जीर्ण कर देना है, यह भी दे जाते है रूर के घर को दुर्दशा उनकी देखी हुई हैं। राजभवन में रह कर भा ब इस लौकिक मित्र को याद कर सके, व्ह सक, व्हात्र लाना का ज्वलन्त प्रमाण है। १. बिन कारले कुन्नन के कुन कम जुन दु छ : कुला र चोर मान रहे कान अलाह का --पद-1-पद- 'परिषड्-दावलो' के समादकीय मदन से इसका पाठ इस प्रकार है .. बिनु कारने कुन्तल कइसे अाकुल कर जुर ने किछु आज'। कुनटाः फेरि चोरि माल काउन्दि मान्य न लिन छ । सुस्ड़ा। कुछ का भूबनी नाने ह यह तरहा । र सुरले बनाने के काम में आता है: लौकी या शलग्नबी वाइ इ सह-भाग में रं आने वाल' जी है। -- खका परात इठह दुर , नथनक काजर मुह ममि मौला মম্বাই মরি मेरा देश 6स कुमद' मन गुमल सिनेर । परिषद् ५५ र - - सन्देशरासक में लोक कवि अदहमाण ने भी बाड़ी की तूंबी या लोको की गर्व पूर्वक चर्चा की है। विद्यापति ने खर के छप्पर पर पसरने वाले कुम्हड़े और जीर्ण छप्पर का चित्र खींचा है। आँगन का कुम्हड़ा और दरिद्र का विगलित छप्पर ये दोनो ही लौकिक चित्र है। 'पदमावत' के बारहमासा के अन्तर्गत लोक-कवि जायसी ने भी टपकने वाले छार का लौकिक प्रसग उपनिबद्ध किया है। जायसी की रानी नागमती "अपना रानीपन भूल कर" एक सामान्य नारी की तरह कह उठती है :--"पुष्य नखत सिर पर आवा। हो विनु माह मंदिर को पावा ॥२ यदि स्वापी रहते तो वे बरसात ने टपकने वाले छप्पर की मरम्मत करवाते, किन्तु स्वामी के न रहो से बेबारी नागमतो सोचती है कि कौन छप्पर को ठोक कराएगा ? महलों में रहने वाली नागमती जिसके पास मृत्यो और व्यवस्थापकों की कमी नहीं है, एक साधारण गृहिणी की भाँति बरसात में छप्पर को ठीक कराने की बात को लेकर व्यग्न है, यह जायसी की भावप्रवण कल्पना है जो लोक-संस्कृति की रसवर्षा में स्नात है। विद्यापति ने खर के छप्पर पर पसरे कुम्हड़े से छप्पर की क्षतिग्रस्तता को संकेत दिया है किन्तु जायसी ने बरसात मे छपर को छाने, खपड़ा बदलने आदि के लोकचित्र को प्रस्तुत (घ) मूली :--विद्यापति ने अप्रस्तुत-योजना के रूप में मूली का लौकिक चित्र इस प्रकार उपस्थित किया है: "मूर भाँगल सन कएलह सिनेह ।" -[० गु०, पद..-४४९] । उन्होंने एक अन्य पद मे भी जड़ से ही दूर जानेवाली मूली का लोक-उपमान प्रयुक्त करके अपनो स्वच्छद मनोवृत्ति का परिचय दिया है : सखि है दुरजन दुरनय पाए। मूरा जो मूह सञो भाल अपदहि गेल सुखाए । -- परिषद-पदावली, पद-१०४ ] मैथिजो में अम्मा का लेकर एक लोकोहि भी प्रचलित है.मोम धरी कोहका रोप" --(लेखक) १. 'तादि वाडिविजग्गामा निअवउ विपी कवि" (सन्देशरासक १४) पक्षनारा, नामर-वियो-सरहा ४ के ऊपर १० ११२ भावाय शुक्ल का सम्हरस किया है।

(क) झुम्भी :- विश्वका ने पोखदो और डावों के ऊपर रहने वाले कुम्मी नामक आच्छादक न को अनाम के रूप में प्रयुक्त किया है। कुम्भी का यह बिम्ब उनके लोक-निरीशा को मन करता है नबहुक वचन नन्द कार लाग कुम्भी जल है भेल अनुराग । --कारपद-शावली, उद-१३.] विद्यापति साहित्य में 'कुम्भी का उल्लक इस प्रकार भी मिलता है । "कुम्भी जलकएँ जेहन पिरोति । १ देहातो म कुम्भी से आच्छादित जलानों को आमतौर से देखा जा सकता है। कुम्मो बाल की हो जाम का नाम है . इम्का और नो का लगाव ऊपरी ही होता है। यह पल-उता जलाशय के जल का श्रष्ट कर देती है। विद्यापति यह जानते है कि पानी के साथ कुम्भो की प्रीति ऊपरी हो नहीं, पानी के व्यक्तित्व भी नाशिका भी है। (च) डाबर की कुई .-~-विद्यापति ने देहातो हाबरों में होने वाली कुई का ब्यग्यपूर्वक वर्णन किया है: झर पाति डोभक कोई घरब उसजू जाहि । भने विद्यापति दहक कमल दुखए वाहए ताहि ।। नः गुरू, पद-२१६) मिथिला में डाबरों या गड्डो के दृश्य अभी भी आमतौर में देखे जा. सकते हैं। प्रस्तुत पद में विद्यापति का बत्तव्य है कि डाबर में फूलने वाली कुमुदिनी यदि झील या हृद में पैदा होने वाले कमल को निन्दा करती है तो यह उसका मिथ्या गर्व ही है। (8) मधुरी और पांडरि :--विद्यापति उपमान के रूप में मधुरो: का व्यवहार करके मिथिला के इस विशेष पुटर के प्रति आना अनुराग प्रकट करते हैं । मधुरी नामक लाल फूल मिथिला मे बहुत फूलता है और अरुण अधरों के उपमान के साने सर्वथा हो उपयुक्त है। १. द्रष्टन्य मिथिला-जात-रूमा, भाग, पृ० । २. मुख मनोहर अदर ग फूललि मधुरो सम्ल स३|| विनीपुरी, पद-२०) (१०) ओंठ के लिए पौडॉर' का मान भी लोक-प्रसूत ही है। (२) लोक-जीवन के विविध व्यवसायों और कार्य-कलापों पर आधारित अर्थ: (क) जुलाहा' --विद्यापति की कल्पना लोक-जीवन के चित्रो का धवन करने में अप्रतिम है। एक पदने विद्यापति क्यनीवी निम्नवर्गीय जुलाहे का बिम्ब मस्थित करके ‘जुलाहा-जाति' और उनको कार्यावली का जो दृष्टान्त देते हैं वह पर्याप्त महत्त्वपूर्ण है :-- गमने -वे कस ओज परेको परक करए बोज । आहे. भाति जोलहा जेभी अट घर नहि बुरसेको !! -~~ परिषद---पशवले, पद-.३१) 'कोकलोर की इष्ट से जुलाई की जाति और उसके कार्य का यह निश महत्वपूर्ण है पद ने छोटी जाति ले बुलकर जुलाहे के सम्बन्ध में कहा गया है कि वह अन्त तक कपड़े को नही जुनता है। विद्यापति का यह विद्यारत आ यह लोक-निरोमण सत्य ही है कि जुलाहा वस्त्र के छोर को पूग नहो बुनता है। कदाचित् यह अलाहा-जाति का कोई अन्धविश्वासमूलक टोना-टोटका हो है जिसे मैथिली में 'खोम-टोन' कहते हैं। प्रस्तुत प्रसंग मे लोक धराता के वस्त्र उद्योग या दस्तकारी तथा धुनकरों की निम्नजातीयता का उल्लेख मिलता है ! इससे पिख है कि विद्यापति के समय में मिथिला में जुलाहे पोले हुए थे और है नीची जाति के १. सागर बरन, नयन अनुरजित, बलद - जोगा कुज कोका कर- वि श्रोट-पुट पांडार लिधुर - फेन र झोका ।। - बेनीपुर, पह-३ २. जुलादा-जाने मृतात्यविशारदी और समाजशास्त्र के जिहादुओं के लिए बहुत महत्त्व पूर्ण है ! सन्देशरासन का मवि अदनाए और विधान के परवन, कगार, य दानी हा जुलाहा आलि से संबद्ध थे [ डॉ० पाद जरदत्त इस बार क अनुसार का है। जज नान- धर्म में दीक्षित हो जाने पर सुनाई हो ..... ('कहै कमाई जोग या मिवार कोरा मेरो सम्म से वार मदान नया करी कर के थे जो मुसलमान होने क पहले जोगियों का अनुयायी था " है 'पूर्व सूत्र लोगों में परिगट होने थे। अभी भी दरभ अशुवी के क्षेत्रों में जुभाई बहुत हैं और उपको मैयिती के अवर 'जोज - बली' कहलाती है। मोनिकार ने - हली, या तनमा सय दुई दिनमा कमी है किन्तु माहे का नामोनिया है कार :- विद्या , कार में पाक और उसके कार्य कर भी है। * * * को ही मत्री कुम्हार माको FAT THAT मून से उसका तल्ल, 1237 2 : * .२ - जोकि . भनय रखते हैं। ܒܪ ग नेली :-विद्यापति की लंक कष्ट नेली के वैर पर भी पहुँची है। केवल जूर के'चे मने पल या बैल मे ही परिचित जलेलो की 77 हो भन्ने है। विद्यापति का लेलो रहर में - IT है. वर पालो में जतका बोको है बदर 7 . होता है। दो शानिए सायली, पवनाम और कृषिका के सन्दी को अम्बित करते है । नेलको हैल को महायता से नेत्र निकाला है और किमान भी मानो में देश को नकर हम करता है किन्तु दोनो के चेलों भी शाकि और प्रति से प्रशासर ना है। तेली का बैन, धान, पालो आदि सभी नोक- निकी है। (ो कृपि और अद्धानकर्न : विद्यापति-पदावली में कुछ और बागबानी के क्षेत्रों के भी विम्ब निते हैं। विद्यापति ने की मेट के आधार पर इस तरह को अर्थ योजना करते हैं ... . २. निधन-47, पद-१०२] नागन, गला, बाप, ल. नलि, नगर तुरी, तुनुक नजट . .."-आपलासा भन्न का पुछना र संसार ना मरे ग कट पुरुमा मुगुन बोलि निव जामोन दिने - दिने तेली बलद थान भर देविट पालब नदि इनिभाइ । परिषद -१७, पद-११३ मो परबालम तो परमारि हमे पए बहु दिस भेलिहु आरि।। दो खेमों के बीच में बंधी रहती है, यह भारतीय कृषि-जगत का शास . - विद्यापति एक पद में प्रेम की फुलवारी का चित्र उपस्थित कर फुलवारी के लोकपरक दृश्य को ही सामने लाते हैं। प्रेम-कुलवारी के प्रसंग में वे सुवचन-बारि, शील की आरी या मेंड, पिशुन-रूपी कीट आदि की भी चर्चा करते है। इस तरह यहाँ कवि की उद्यान-कल्पना लक्षित की जा सकती है। (1) मत्स्य-बन्धन तथा मत्स्यजीवी :-विद्यापति-पदावली में मरस्य- व्यापार और मत्स्यजीवियों से सम्बन्धित चित्र भी मिलते हैं। मिथिला में बगाल की तरह ही मछली का भोजन बहुत पसन्द किया जाता है और यहाँ मछलो फंसाने का व्यवसाय भी खूब चलता है । विद्यापति एक पद में अधेम' ( अंध या अन्हइ ) नामक एक विशेष मछली को चर्चा करते हैं जो साकार और नेत्र-विहीना होती है। इसी पद में वे मछली मारने पाले बगुले और मछली फँसाने वाले 'टेना' का भी प्रसंग उपस्थित करते है टेना चडल बक बहुल देवल अंधा पोसल आनि }--(परिषद्-५० पद-९५) 'टैना' मछली फंसाने के लिए मिट्टी, सिरकी आदि के डाले हुए अरे को कहते १३ मल्लाहों के कार्य-अयापार से 'टेदा' का चित्र और 'अन्हाई' नामक १. परिषद पदावली, पह----७२ । २. फूल एक फुलवारि ल'मोन मुगरि । पटामोल सुबदन-वारिस चौदिस वान्हल सीतक पारिश अवलम्बन का अवधारि ॥४॥ तन फुरल फुन अभिना पैन । जतु मन्त ला 1 लाख हेन ॥६॥ X पिनुन-कीर रहि लागत ताहि। माम कर देन निति निराहि । -बेनीपुरी, पद-२५७) टेना-मन्जली बनाने 7 लिए डाला गया मिट्टी, सिरको प्रादि का घेरा।" --(विद्यापति पदावली, भाग १. ९०११७, शब्दार्थ, पद-८५ मिहार राष्ट्रमाश परिषद) गतले जित्रे ame म h - - -- मछली का लोमविवार वि को मात करना प्रकट करने हैं। विज्ञापन के म शिकार तो बहुत ही सुगम है बल्कि मछली फैमाने के लिए मानक अन्धी है ही अन्त' अत्र उकाम नहीं है विद्यापति नाविक-झोका निरको प्रानुन र है। वे नाव पर नही पार करने और वि:' पर अनन्त "37-3 करते है। उनके एक दिन का न कि पार --- बाब नहीं ले रहा है। एकमा पर में भी एक नायिका हो : ?' र ' चाहती है और घटवार को शुभ ने पूर्व हार देना च' है। एक पद में नाव पर चढो एक तन्गो मल्ल, बने : सेम में निद उस से पार उतार देने की प्रार्थना करता है। ये भी चित्र मलाहो के जीवन से सम्बद्ध है। नाव डोलाव अहीरे जिनदत न प व दीर खर नारे लो। खेबा न लेनए माले हसि हँसि कीदहु बोले जिव डोले लो।" , वेनीपुरी, पद-. । इन पद में अन्द' की त्वरा भी वितरणमा पनि ती सन् न्यानोनिबार के चन, कनिकी मनिह है मल्लकलाकात के नन । ५६ है कर घर कर नाडे पार बैत्र में अपलम हो जानेधा : मखिमबजिलि दी । न जान् कौन पथ मेंनी काय हम नएन तुत्र पामे। जाएब औवट घाटे, कन्हैया ।। विद्यापलि एहो भाने । गरि भजु भगवाने, दया ! -गिरी, ५६-८॥ इस पद के छन्द में भी कापुन र लहरों को अपाय कालेन होना me- न गुन गौरख मील मोगार । नुनि कर चदलिद नो भव !! इट न कर कन्टु मोहि पर सन नह र थक पर पर ४ वर्न पग पद . 9 4 (3) हाइको मान- विपन दो वरियो ? पति धारणा रूमा नि" है .:. त्रिकी विधि १ . ' मान आ रहा उन्होने कयामक प्रयोग करके लोक मन मा परिचय दिया है। {१ बारे बदन में ही अगर का लने वाली राधा का प्रमाकात करके विद्यापति ने बम- रूदी सानिया स्त्रमादी दुकानदार उन दम हलेव समय की मामले चिनेवाले कोयल द्विज, म राई, भरी गांद ,मे, बांद-रूरी नवाद, रीमा हिमाद का ar और मान-पीजको चम उन्होने उस युग को मदीद-बिक्री की विधि का चित्रण मिरिया के प्राचीन बाजार में प्रस्तु-विक्रय केंद्र होता था, इसकी प्रामायिक जानकारी विद्यामनिदस पद में मिल जाती है ! उस युग ने बती नेहा में कड़े की लम् का प्रयोग होता था, यह भी प्रकट ही है । वाणिज्य और लोक-बहार की कल्पनाओ से पूर्ण इन पद के बनम को विद्यापति ने सन्कृत में भी लपवद्ध किया है।' (२) विद्यापति के एक पद का बना है कि कामदेव की दुकान ती ! नायिका को कुटिल कटान में नागर के बन लाख के मूल्य नारान ही आयत्त कर लेना चादित गाउने नी नोटा करनी चाहिए fr भरने को को भी नोलार नाम मे दालाच शिन । विद्यापति जानने कि की बोनी होती है. जी ही निकी होती है। अन्छी बानी होने पर दिन भर अन्न विकत होना है। पर मेरा में होना चाहिए। कल ना कवि ने जालिमागे बमल निवास को किया है। है और इस तरह दिया है। किन कन्हाई रोचन प्र. पनि हटर- नई पुरमा । नमथ मवथ उत्रिनमल बानी जनिक लेखा अलि माटा। काँप नमर-पहाबी चन्द्र अहि रति उग लिखापत मते श्री लिनि मान्न करना ....यो पुर–४ ) . विमापनि र + र T 1 ५ विद्यापन जानने काल देने की पता नहीं होनी वाह, अन्यथा न न करता है: हे मी पर है कि व्या और जन्दमन्द नामो का है 'जम्न नहोक इनत बीर' व्ह लोकोक्ति बनने के बार , आरति पाहत नहेग मा '- लोन के---- जान को प्रकट करती है।' इस वह हर देने है लोर-सबमार और नमनपी गति-रिवाजो और अमोहु. (३) मुलन बस्नु वः 34 है. बह झाधिक सिद्धान्त है। गोकर वे नने से दन्तु देस बना हे और दुर्लभ पदार्थ की कीमत अधिक होती है, लोक-जावन - पत्र को विद्यापति ने इस प्रकार प्रकिा है . 'वन न अमोल। र मोला , - प r . , - मार रनार ॥ निषद - १०, सब-२५१, • (2) विद्यापति का एक यद म र मे मिलता है- नुन्दरि म गुगनुमा सार आदि इन लहनधनमार। -10 10.पट -१०६) इस पाठ के अनुगर विद्यापति या वक्तव्य यह है कि बाजार आरम्भ और अन्त ने मना रहता है। किन्तु मि. म. (पद-४५ ) मे 'तह की जगह नदि पाठ मिलता है और डॉ. श्री सुभा मा (पद--१०८) भी 'नहि काठ को ही प्रतिरादित करते हैं । डॉ० मा इन प्रसंग का यह अ करते हैं कि बाजार में आरम्भ या अन्त नही होता है। उनका अभिप्राय यह है प्रथम दे मुन्नार के दल ६ ख नातार दे नमसन कालो : रसम नाम । . । अनि गह 115.1 - भनाई नहर ओर लाइ । अनि गाहक महँग अंशाह 1901 -नीपुरी पर- - P 1 4 T Tit: अर्थ विद्यापनि त म81 111111....पिपि माथिक धारणाओं काजामात्मक चिनियम दािर है। a. विकीकी विधि और निशी का न आलो कि जा' को विश्वास का उन्होंने काव्यात्मकः प्रयोग करके लोक नरनि का अन्दा परिचय दिया है। (१) आवे स्थान में ही कृer का ना कर लेने वाली राधा को प्रसंग उपस्थित करके विद्यापति ने बसंत-रूपी द्वात्रि या प्रमादी दुकानदार, उचित दाम कहनेवा मन्मथ-पो मध्यम, कपन लिनेवाले कोयन द्विज, मकरन्द भी रोगलाई, अमरगयी कार को नो चाँद-रूपी भवाह, रनिरंग की बड़ी या द्विगात का मान' और मान-पहची लेख की ची की है और इस तरह उन्होने उन चुग की खरीद-विक्री की विधि का चित्रण किया है। मिथिला के प्राचीन बाजार में वस्तु-विक्रय केगे होता था, इसकी प्रामाणिक जानकारी विद्याति के हम पद से मिल जाती है । उस युग मे लेखनी केहन में कॉड़े की कलम का प्रयोग होता था, यह भी प्रकट ही है । वाणिज्य और लोक-व्यवहार की कल्पनाओ मे पूर्ण इस पद के वनय को विद्यापति ने सस्कृत में भी लिपिवद्ध किया है । २) विद्यापति के एक पद का बनव्य है कि कामदेव की दुकान खुशी हुई है। नायिका को कुटिल कटाभ से नागर के दग लाख के मूल्य वाले प्राण को ही आयत्त कर लेना चाहिए या उगे मी चेला करनी चाहिए fअपने पाप को मीलोलकर नागर उसे दम लाग मिन दे । विद्यापति जानते है कि अंगी बोहनी होती है, वैभो ही बिकी होनी है। अच्छी बोनी होने पर दिन भर अवदा विक्रय होता है । अत: पहला मौदा कोटा में होना चाहिए । इस स्थल पर कवि ने वाणिज्यकारों के समूल निश्वास को यक किया है। . बर कोमल नु । किनल कन्हाई लोचन पाय 11२१॥ ऋनुपनि हटवाः नहि परमादा । सनमथ मथ उचित मूल बाटो दिन पिक लेखक मसि मदर कोप भमर-पटसारखी चन्दा 1101 बहि रति रंग लिखापन माने। श्री सिब निघलन कमि भान 11 Dous - 'वियानिकारinim", . . . + - . विद्यापति लानत ह कि 17 ₹। मान -7 को सता नही हाना चाहिए, अन्यथा कम मुल्य गलता है। उन्हे यह भी पता है कि व्यय जोर जरूरतमन्द प्राहक महंगा भी सरोकता है: 'जयमान परहार तदसन वीक'--- लोकोक्ति अनियों के विश्वास की जिन करती है सपा 'भारति गाहक महँग बेसाई-~-यह दीगोलिकता के मनो विजान को प्रकट करती है। इस तरह हम देखते है कि प्रस्तुत छद्र में लोक-यमाय और तत्लबंधी रीति-रिवाजो और आस्था मोका चित्रण हुआ है। (३) सुलभ वस्तु का पूज्य बह जाता है, यह आर्थिक सिद्धान्त है। उमग्न होकर बेबने से वस्तु कम मल्य पर घिरती है और दुर्लभ पदार्थ की कीमत अधिक होती है, लोक-जीवन के TEEN सत्य को विद्यापति ने इस प्रकार प्रकट किया है बिना में लि रत्न अमोल चिन्हि निकाल मोल ॥ सुम 'T न , म । नाव नानक नए मा गमार ।। -[परिषद - १०, १८-२५१, ७ मा (8) विद्यापति का एक पद इस रूप में मिलता है-- सुन्दरि रूप गुणत्रु पनी पार आदि अंन लहै महघ सार। -प० १०, पद -१.६) इस पाठ के अनुसार विद्यापति का बत्तव्य यह है कि बजार आरम्भ और अन्त में महंगा रहता है। किन्तु स० मा (पद-४५ ) में 'लह' की जगह नहि पाठ मिलता है और डॉ. श्री सुभा मा (पद----१०८) भी नहि पाठ को ही प्रतिपादित करते है। डॉ० मा म प्रसंग का यह अर्थ करते हैं कि बाजार में आरम्भ या अन्त नही होता है। उनका अभिप्राय यह है मुरि शुदित कुदर करता Filt जोख नागर दे दम लान 12:! नयो ने छा गया तुम नाक । न पराक नरसन होम || मुगु सुन्दर नब मदन-पसार । जति गोपद नामोन सिनार 115|| राम दरम्म रस राखन गोर भने । f-14 . ! मतहि जहर युनाव सा३ । भारति गाहक गहना बेसाई १० ~ जेनीपुरी, पद्-- १. प्रथमहि कि लौटय के मूल्य म आदि और अन्त नही होता है।' डॉ० श्री उमेश मिश्र ने इसका अर्थ इस प्रकार किया है-'महाध विक्रय का कोई आदि अन्त नही है ।"६ किन्तु अद्यापति का अभिप्रेत भाव यहाँ और ही है। लोकोन का मीधा अर्थ यह है कि शुरु और अन्त में बाजार महँगा नहीं होता यह वान कोण मा मत्य गित होती है। बोहदा करने के समान गुड़ में बाजार में चीनी के मू कम पहने है, ताकि निकी हो सके और शकुन बना रहै। इसी तरह संध्या का समय भी वोहनी को है और इस समय कम मुत्य रचने से बीजे बिक जाता है। बाजार जव लगता है तब भी मल्य कम रहता है और जब डटो लगता है तब भी मर कम ही रहता है। विकता अपोलो दोनो को 3 उठने के समय स्ते में भी वच देना चाहते हैं। विद्यापनि ब. तार को इस प्रकृति से परिचित जान पड़ते है। ३५) विज्ञान का यह दाव्य भी लोक भावान ही है कि पहली विकी में मले शक्ति यो मल कता से इयनहार करना दिए पहलो बोहनी अरे आपकी के हाथ होने से अच्छा शकुन बनता है। (६) वापिसाय के अभिप्रायों को विद्यापति ने अपने पदो में बार ननिष्ट किया। गदानली' ।। हाम, बोरलो, मरण आदि की वा अनेक मिलती हैं। विद्यापति एक पद में मुरल-रस के सार का उल्लेख करते हैं । उनका ॐनय है। मिकी उगार नहीं होनी चाहिए, क्योकि बनिया बोहनी के समय उधार कारवार नहीं करता है." 1. 'odamsal, I cauty is superior even to quality : there is no begiaring a end to the market (saluo of beauty ). III "--[ Songs of Vidyapati, Page 169/. द्रा वियपान 7. पू. १६१, पाटि २ } लोकसं०१७ के क्रम में ! 1. जोर साजनि पक्षिस पलार हमर बचने कामह । , wane हिल पहनाक बता के साथ से उपहसनगोषी साथ । परिपालो, पद-१० ] (क) सगर सारक सारे अछाप सुरत रस हमर पसारे n-(प० ५.४) (ो मदन के पसार का प्रसग भी मिलता है: "उत्तर मारे !"-[20, "om ४२ } दूर ह (हप्रो मो. सेवा पाई गटोक गरि न देता। wi परिषद्--१०, यx २. कुट्टनी के रेखा- A ४ विद्यापति को मिथिला के बाजार में केवल नकद ही नहीं उधार का व्यापार भी चलता है । तया यहाँ 'बाउल' या बाबले बनिए का भी अभाव नहीं है ।२ यहां का रोजगार मध्यस्थ 3 या दलाल के माध्यम से संपन्न होता है, पदावली ले इस तथ्य की भी सांस्कृतिक सूचना प्रात होती हैं। (5) फ्रीतिलता' ही नहीं विद्यापति-पदावली' में भी रूपहाट और हपाजीवाशों के संकेत मिलते है ! डली आयुवाली देहातिन चित्रकार विद्यापति वस्तुतः हर का वाणिज्य करनेवाली भून एवं वसा का ही प्रसंग उपस्थित करते है-- हमे ६नि क्रूनि परिनति नादि । सह वास न कहीं विधारि ।। काहु के पान काहु विभ मान ! कत न हकारि कयल अपमान ।। ---- वि० प १० गु० -पद-१५) एक अन्य स्थल पर प्रेम-पसार के प्रसार के चित्रकार विद्यापति यौवन- नगरी में रूप-विक्रय और मोल-गोल तथा रस के वाणिज्यकार कृष्णा और मध्यस्थ मन्मथ का उघड करके प्रकारान्तर हे रूपाजीवा, कमलाद और उसके दलाल के ही वाणिज्यपरक विरी को प्रस्तुत करते हैं। १. हरि नलगे कैमन रोक उधारी। ---( परिषद-~पदावली, १ । पद---६४) मथ ने बुल तुम परिप जाता बतिक कद वर साटी ।। --(वही, पन्द्र - २५.१ ) । ३. हृदय हार मार देषी, लोम निकट नहि होएन विशेषी ! चित परिपाटी मवथ मनोनवरहिघर साटो । --(वही, पद' ~~-६४)। ४. कुलबति धरम कचि सनलूल । मदन दलान में अनुकुल 11|| ~~( बेनीपुरी, पद --४८ ) ५. अन नगरि उन मन ARE पात्रो मन्त्री जोन नारि बनाइन् कप रहे मुरा भने सरूप it.f माजनि रे हरि रभ निजार गोप भरमे अनु बोल हवामार ! २. मोह हुनि उचित रहत नहि भेट मनमश मधये व परिद !! - परिश्र् गदारली , पद १११)।

विघापात ने एक जय पद में तियोवना दुश्चलो के शरीर के उसमार-स्वरा वकि-विहीन और अर्ध-रहित हार मा घर उपस्थित करके केवल अपनी लौकिक वाणिज्य- कल्पना को हो प्रस्तुत नहीं किया है बल्कि उस नारी के भूतकालीन गरीर-विक्रम मो भी जिन किया है। सब तरह से शून्य एव रिक्त दुकान का यह बिव तयारना शोक के परीर की सच्ची कहानी का वाचन करने में पूर्णत मपर्थ है ।' विद्यापति के एक पद में कौड़ी के पप्प मापन के में प्रचलन और मट्टतया भी के विक्रय का लं किक अर्थ उपनिबद्ध मिलता है। का बकव्य है कि दामभेजने पर पदि भट्टा नही मिलता है तब तो उगसे भी अधिक कीमत की चीज धी को उधार मांगन्। मुखता है। . (c) गला घोर व्याज को सनिन। हे म. [- अनी 47 फि ति का लामिक विही गया है। (१०) विद्यापति के एक बगग्यपरक पद में भी महाजनी जीपन के बहुत वित्र मिलते है। पद का वक्तव्य है वि खेती को रबबालों ने ही लूट लिया। वाणिज्य मे भी लाभ नहीं हुआ। गति और भी छीज गई । विद्यापति का कहना है फि रामधन का वाणिज्य करने में बहुत लाभ और व्याज मिलता है। वे इस विश्व को हाद और सच लोगो को वाणिज्यकार बतलाते है। जो जैसा रोजगार करता है वह वैसा ही गुनाका उठाता है । rammercTTPS- १. सन्दरि अवे की देह देह । निनु हटबर पर बिन जैगर हाटका ।। -(पारा ----पदारना, १ | --) को उडि पठायोले पान नहियो । पौव उधार गांग भतिभोर ।। | -~~(बनाप, पद- १०६ मानि यो नागर साम।। | पुल निगु 11 1 14 - ( बेनीपुरी, पद-~४४) A mehman a मम ना, में, के 4 सो सहन - विद्यापति साहित्य में बागज्य-सबधी . इस तरह हम देखते है कि पुष्कल वितरण नमाविष्ट है। ३. नोहनिरीक्षण मा' में कवि कालिदास दशाणदेश का वर्णन करते हुए केतकी पुर, जामुन के जग आदि के साथ-साथ पड़ो ने नो बनाने में यक्ष को का भी चित्र खीचते है। इस तरह पोसले बनाने में कार्यरत कौओं और पेड़ो पर की हलचल का पौर स्थित कर कालिदास अपने सुम लोक-निरीक्षण का ही परिचय देते हैं। , MummRavan १. देल कारन्त अपवार तरल सेवा निना कएल लाभ नदि पत्रोले अल निकट मेल थोर । रमपन निज वेज प्रल तान अन । मोति माजी न किस पोमल मनायब नो परेप गनदि हमे सिर पलपल मनोर -सा है। नई मानक निमार । जो जस पनिजय लामा म पात्र नुरुप गर्गह भामार !! विवाति का सतह भन्दा मशगति नाम । -(परिपट-१०. पद'-.४६ ) २. पार इच्छायोपनियत केतक के नक सबिभिन्न- नीटारम्भंग हवाले भागाकुलमा गया वारण मनस्यामजयनान्ता संभास्य कतिपदिनरवानिशा-1 -~-(पूर्वमेध ! ३311 । २० -- महाकायों को या मं नीलो पर भी है। 'माविकंठाभरण सुभष कवि के लिए सो उपाचो को शिक्षा दी है जिनमें लोकाचार-परिज्ञान, लोक-निरीक्षण आदि पर पूरा दल है ।' उन्हीं सो शिक्षाओं के जग में कहा गया है कि कवियो को धोसलो से लेकर प्रासादो तक का पर्यवेक्षण करना चाहिए। विद्यापति भी कालिदास की ही तरह सामान्य होनल का भी हार्दिकता से पर्यवेक्षण और चित्रण करनेवाले हैं। लोक-कवि विद्यापति ने मिथिला के छोटे से पक्षो चोवा के नीङ को उपमान कप में उायस्त किया है। चोचे के घोंसले के लोकाश्रित उपमान को लाकर विद्यापति अनुच्छिष्ट बिम्ब की योजना करते हैं । यहाँ कवि वा लोक-निरीक्षण सपुत प्रतिभासित होता है ! ४. चतरिआ का चित्रण विद्यापति की दृष्टि चतरिआ या भिचभंगे पर भी गई है प्रथमहि कएलह हृदयक हार बोललह तो मोरि जिवन अधार । अइसने ओ हठे बिघ टोलह पेम जइसन चरिआ हाथक हेम ।। परिषद् ---१०, पद-२४३ ] डॉ० श्री सुभद्रझाने 'चॉतरिआ' पाठ दिया है, किन्तु इसका अर्थ 'भिक्षक विशेष ठीक ही किया है । -- -- १. द्रष्टव्य 'कवि-कपठाभरण', द्वितीय संधि ! "तियों की सेवा, घासले से लेकर महलों तक समा निगल-स्थान देखना, मीठा और स्निग्ध भोजन करना, पासाम्य अर्थात् वान पित्त कफ की समता, शोक न करना।" -( कविकंठाभरण, श्यधि, अनुवाद, पृ० ६३ प्राचार्य गेन्द्र', डा. मनोहर लान गौड़) ३. अवे हमें तुभ मिनेह जान. कलोन उपगा देन ५ हरि चोचक खोन्या असन किन बानि-देन ।। ---- ( परिषद--१०, पद-३४) songs of Vidyapati, Page 215, F. N.--Catariana ofaay of beggars.

मोररी TATT T-MT के नाम में मिलायो का दान करने हर 'चारिझा' को ना की ई जना परिका का मौक बर्ष भित्रक का एक विशेष प्रकार की जान पड़ता है। मुस्कान चरिमा पाले संग करनी स्पष्टीकरा किया है उमले में अपनी विदन्न असहमति प्रकट करता है का कामतव्य है कि जैसे हठ और सनक में आकर शिखनंग सोने को भी करा देता है उसी तरह नायक ने प्रेम को तोड़ दिया है -- करा दिया मेरो समझ में पूरे प्रसंग का आशय यह है कि कोई मो के द्वारा तिरस्ता नायिका नायक से कहती है कि हे प्रिय, पहले तो शुमने मुझे हृदय- हार बनाया और मुझे अपना जीवनाधा बतलाया, किंतु ऐसे उम्कट प्रेम को भो तुमने हठपूर्वक लोड़ दिया. विटित कर दिया और अशा स्थिति में मट्टी नो ऐना लगता है कि जैसे चतरा के हाथ से मोम बटे जाने के बाद वह विकल, स्तन और दुयो हो जाना है। इसी तरह मैं भी नर्वस्व पोकर उना भिवारी की भाँति हो गई हैं। भिखारी के हाथ में सोना भागार पदि चला जाता है तब बड़ा पीड़ित होता है । नायिका वो माया भरपूर प्रेमिका का जितु उस प्रभ को नायक ने ही पुनः विघटित कर दिया है जिनके नाम का सोना पाकर पुन उससे वचित हो जाने वाले परिक्षा को वर माहित हो गई है। परिपद्-पदावली के पारको । ' का घर का मा बाजीगर किया।३ यह संभव कि परिवार की कोशिका "जा, यो', ग.रि. भर, भी, 1 चमा, बार, गोरमा, वाहिति, परमा अभूति के अनेक मिया 11"..-विरमाजर ११, नगर वर्णनो | पृ०२। "You have, like a Catarist, a gold, dixcarlol love this was so deep just on account of your win. II."(Mons of Vidyapati, Page 245, Sung-242) ३. “चलरिया- चमत्कारी-सं० ) बाजीगर' -[५० पद-२४३, शब्दार्थ, पृ० ३४४ ] 1 पूरे प्रसंग का अर्थ ५० ५० में इस प्रकार किया गया है :- पहले तो ( मुझे अपने ) इदय का हार बनाया (और } कहा (कि) तुम मेरे जीवन का आधार हो। एसा होते हुए भी इछार को विघटित कर डाला जैसे कि जादूगर के हाथ का सोना विघटित हो जाता है।" -----२४३, अर्थ-प्रकरण, ५० ३४४ 6 .

। २ ) हमाशा दिखा-दिखाकर भीख मांगने वाला या गण करनेवाला हो । यदि इम अर्थ को मान लिया जाए तो मो विमापनि-धाम निर्दिष्ट हाथ की सफाई दिखलाते बाल बाजीगर जिहमारे सामने आता है। बिल्कुल लोकचित्र ही है। किन्तु वर्णरत्नाकर और इ० मा के साक्ष्यों के आधार पर वितरिआ' का अभिप्राय एक विरोपप्रकार का भिखारी ही मानना समीचीन है। ५. मिथिला के निर्धनों की मोपड़ियाँ विद्यापति मिथिला के भो डोनमः घरो को नही भूलते है । पीछे देख चुके हैं कि वे खर के छपर पर कुम्हड़े के प्रसार के कारण खर की ठुरवा का मथेष्ट परिशान रखनेवाले यथार्थवादी कवि है। तरह उनकी अष्टि छप्पर से उतर कर ट्टी के घरों के द्वारों पर भी टिकती है--- साछ नुकावि तिमिरक सोन्धि परउसिन देथा फरकी बाधि ।। ---{० ५० । ७३) यहाँ विद्यापति झोंपड़ी को 'फलको' या टट्टी के फाटक का प्रसंग लाकर मिथिला के दरिद्रों के घरों का चित्र ला खड़ा करते हैं । एक अन्य पद में भी विद्यापति इस चित्र को दुहराते है-- "टाट टुटले आङ्गन बेकत सजे परदा राप!" -(4% 1015) ट्ठी के घरों में टाट या टट्टर के ही दरबाजे होते है। उसके बटर के टूट जाने में आज दिखलाई पड़ने लगता है. यह कवि का आँखो देखा अनुभव है। विशाल हम्यों और रत्नजटिन द्वारो वाले प्रासादों के नागर बाता. वरण से परिचित और समृद्धि को छाया मे नित जीवन बितानेवाले विद्यापत्ति जनसाधारण के खर से छाए छपर, टट्टो के घर और 'लकी' को नहीं भूल सके हैं, यह निश्चय ही उनके लोकानेट व्यक्तित्व का प्रमाण है। ६ जुआड़ी और पाशा भारत में प्राचीन काल में ही छत ने की प्रथा प्राप्त होती है। वेदों में घ त-क्रिया का वर्णन मिलता है। महाभारत में भी धूल के खेल का विशद् वर्णन उपलब्ध है। 'चारुदत्त'तथा 'मृच्छकटिक' आदि नाटकों में भी जुपाड़ियों और जुथा के अड्डों के लोकचित्र प्राप्त होते हैं। मृच्छकटिक का संवाहक निष्णात जाडी । ज्योतिरीश्वर ने वर्णरनाकर में जुआ-धर, जमाली और इत-क्रोडा के अंग-उपांगों का विशद वर्णन करके अपने लोक.

-- मान का अच्छा परिचय दिया है , जुभाघर की पूरी हलचल और इस खेल की पूरी बारीकियाँ चित्रोपम ईग से वर्ण-रत्नाकर में प्रात होती है। इन लोक-कोड़ा के ज्ञान के महारै विद्यापति ने भी अपनी एक उक्ति को बाँधा है। जार बने दिल आलिङ्गन गाठ जनि जुआर पस्मे खेल पाढ॥ (प प०, पद-.-१३८) 'जुआर' और 'बाद ये दोनों गब्ब यून-वर्णन के क्रम में वर्णरत्नाकर में भी प्राप्त होते हैं । विद्यापति के पद का वक्तव्य है कि नायिका सोई हुई थी, इसी बीच नायक बला गया । उठने पर गायिका अपनी मखी से कहती है कि यदि वह नीद में न होती तो प्रियतम को रोकने के लिए हर सम्भव प्रयल करती। वह प्रिय का गाढालिंगन करके उसे रोकने या जीतने का प्रयत्न उसो तरह करती जिस तरह जुगाडी उत्साहपूर्वक पाशा खेलता है। हारना हुआ इतकार भी उमंग से जीतने की सम्भावना करता हुआ अपना दाँव बनता है। पाशा चलाने में वह अभान्विल ही रहता है। पद की नायिका भी आलिगन का दौर चलकर जानेवाले प्रियलम को रोक लेने की चर्चा करती है। इस तरह हम देखते हैं कि विद्यापति के मन में पाशा चलाने वाले जमाड़ी का चित्र जमा हुआ था जिसका विनियोग उन्होंने अप्रस्तुत योजना के रूप में किया है। इस लोक-उपमान का प्रयोग करके विद्यापति श्लाध्य सिद्ध होते हैं। १. द्रव्य वर्णरत्नाकर 1४। 'मय अन बर्णना, पृ. २३-२६ । २. (4) "वैदे शेक, आमनै कादि अनेक व्यसनी, अर्थी, जुआर; सर खेलते देपुअह, Xxx डिप.ध्रुर, हे नवार, जुधार, दण्डाइ, दिवाय ।" - वर्ष ४ । पृ० २५ ] (ख) "तर उपर गण्ड देईन आह, अनेक जुमार युभह "xx "मारि जम् सहते शाह, अनेक असत्य वाक्य वेलस्तै । शाह पनि बढी मक्क न्याय सुपार इरवार देवुअह ।।" -वधरलाकर। [पृ०१६ । (ग) मा मोर कइसन । फिनायोन । मैलल । वहल । भासद । सरल । हथवा पात। पात्र विलग लाग ...." विरारलाकर ! ४ Te २५, क २० ) ७ हाथी के जीवन और काय व्यापार सम्बन्धी अर्थो का निवन्धन EMA . विद्यापति ने हायी के का-व्यागारों ओर उसके जीवन से सम्बन्धित तथ्यों के आधार पर जो रूपक खड़ा किया है उसमें भी उनकी लोक-दृष्टि का ही प्रकटीकरण हुआ है। इस प्रमग के सभी उपमान लोकाधित ही है। हृदय-रूपो हथिसार, लाज-रूपी खला, यौवन-रूपी हाथी और मनमिज-रूपी मदजल तथा जिक्तम-रूपी अकुम या प्रियतम के द्वारा अंकुश ठेकर यौवन हाथो का नियन्त्रण कान्ना एवं महावत से हाथी का भुकना आदि बातो के द्वारा विद्यापति हाथी ने सम्बंधित लोक-चित्रो को ही नास्ता- पूर्वक प्रस्तुत करते हैं ! लोक-काव्य ढोला मारू राहा' में भी योवन पी हाथी और प्रियतम के अकुश की कल्पना प्राप्त होती है। हाती ने मार गिला ग मागविला जाः । ती ग राला पाराई ||१६५॥ हा। पारणा जी को प्रिय के जी कि हे हाडी, यदि गला मिले तो न कहना कि योरन की पीर पर चा गया है अतः तुम अंकुश सकर घर मा माओ! J विद्याः हामी मानवी सप्रस्तुत-योजना का सार चित्र प्रर F4, किन्तु, सन्तपर कोला-माझ नाला के म भिणे पुराणे' दूहे का प्रभावी परिलक्षित किया जा सकता है। कानन गाल दवाबमार । ने बिर बभ पयोधर भार 21 लान-सिकर घर डकर गोग। भातक पचन हाहानु कोए ।४!! दुर कर लगे सति चिन्ता भान । [पतधान्न !lalt मुसलमान 41 म मारने नई 1 1 112011 "पेन घुगे, पद """) t ( २५ ) . -- .. यासाविकरणिक कल्पना कटिक में न्याय और न्याय विधि के लोक संपृक्त नित मिलने से विद्यापति भी गद में लोक-जीवन में भी अनुप्राणित यायाधिकनिका पंचायत मन्यो कदमता पार्थ कोजना त्रिती है। तु वर्णन करते हुए वियत ने गीत-वन के विवाद का चित्र बींचा है। बादी संतको परिवाद दक्षिण पवन के बहने के रूप में हैं। मध्यस्थ या च पूर्थ है तथा द्विजवर कोकिल साक्षी है जो वसंत के पक्ष में गवाही दे रहा है। दसंन के नए पल्लव जयपत्र की तरह हैं। मधुकरो की पंक्ति उस जयपत्र को बशर-पंक्ति के रूप में है। वाढी वसंत से प्रतिवादी शीत भीत हो गया है। अनुपम कुन्दकुमुव के विकास के रूप में वसंत अपनी जीत को व्यक्त कर रहा है।" हाकाल को हराकर बसंत के जोतने को बात को विद्यारत ने मुदई-मुहालह, पंचायत, पंच, गवाह, जयपत्र, जयलेख आदि की रोकिक- कल्पना में अभिवागत किया है। विद्यापत्ति की इस अप्रस्तुत योजना और अई-योजना का कार-प्रोत हो जोवन ही है। र सगो म दिवाकर की चर्चा जाई है। विद्यापति के एक नाम पर भी भयाप्रसंग आया है'अथिरक आलर मधय लजाइ ।।" [य में, पह-१२८ ! विद्यापति को इस लोकोक्ति में लोक- जीवन की पंचायत मन्त्री बात का ही संकेत मिलता है ! + १. बिन पवन पर इस दिल रोल । से जनि चादी मापा बोल | मनमथ का साधन सहिंशान । निमार से मामान परत गाय है सीन नन विशद । पोगोन तिचाप जय-अनत्ताद दुर वि स दिवाकर मेल । दुननर कोकिल साम्ब देल ! नत्र या जगात्रक भाति । मकराना पारख पान ११०॥ बोयर - TET HTTPil 11 नुसार विदमन । लन एक कामोदर्मर Pl - [नेनीपुरी, १६-१८ । १६ ) - विद्यापति यह जानते हैं कि मध्यस्थ की बात को दोनो परवाले मानते है किंतु अस्थिर लोगों का बीच-बचाव या न्याय करने वाला मध्यस्थ लज्जित हो जाता है, क्योंकि अग्रिचित्तवालो के बीच उसकी बात का पालन नहीं हो पाता है। ६. बसबाड़ी की हाड़ी विद्यापति ने बांस की बीट या वमबाड़ी तथा उसमें फेकी गई त्याज्य और उपेक्षित हाँडी का भी निरीक्षण किया है। विद्यापति की एक नायिका का वक्तव्य है कि उसे बंसवाडी की हाड़ी के समान अरमार्थ और त्याज्य बना दिया गया है। मिया है। १०. ढोंढ साँप विद्यापति ने एक पद में गर्वीले जलसर्प डोड या डुण्डुभ का प्रसंग उपस्थित यह निर्विप किन्तु विषगर्वी साँप डाबरो में प्रायः मिल जाता है। सत्वहीन घमडी व्यक्ति पर व्यग्य करने के लिए विद्यापति ने होट के लोक-चिन को हीक हा चुना है। ११. लोक-संस्कृति के इतर पक्ष विद्यापति-पदावली में लोक-संस्कृति की पूरी छाप देखी जा सकती लोक-परंपरा, लोक विश्वास, लोक-प्रथा, लोक व्यवसाय आदि 'फोकलोर' के विविध अंगो के आधार पर विद्यापति ने अपने अर्यो का निबन्धन किया है । (अ) लोक विश्वास और अन्धविश्वाद फलित ज्योतिष आर जादिम निश्वासोंगे सम्बद्ध तत्वो से जनसामान्य के मूढानहो और अन्धविश्वामो के विविध पक्ष ष्टिगत होते हैं । लोक मानस की इन बद्धमल अन्धपरम्पराओ को गकन अपशकुन, मत्र-तत्र, डायन, प्रेत, टोना- टोटका तथा शुभाशुभ-गवधी धारणाओ में देखा जा सकता है। इन लोक- विश्वासों में जनता का जातिगत मनोविज्ञान अनिव्य जित होता है। १. फन पाओन फार नोह सनि । कपल हाही छान परिषद् पदावली, पद --- २.म भार होहहु का भान ----[72 गुरु, "५१० pain - - (२) शकन क-का-रान :--'जम का अर्थ पक्षी ही होता है। बहुतेरै पक्षियों से संबद्ध लोक-निवास भारतीय जीवन में घर किए हुए हैं । कौए की बोली शकुन-सूचिका मानो गई है। कौए के बोलने से संबद्ध लोक-विश्वाम यह है कि इसका वोलना परदेशी प्रियतम के आने का सूचक होता है। भारतीय साहित्य में विरहिणी नायिकाओ का कौए से पूरा लगाव देखा जा सकता है। कभी तो कोए को उडाते-उड़ाते नायिकाएं उसकी जान मॉसत में डाल देनी है, तो कभी उसे तरह-तरह के प्रलोभन और आश्वासन देनी है कि प्रियतम के आने पर उभे अमुक-अमुक पदार्थ दिए जाएंगे । कौए पर प्रसन्न होकर नायिकाएं उसे बलि देनी है। 'कामसूत्र' में भी 'वायसपूजा' का संकेत मिलता है। 'मज्जालग्ग' की एवर माथा में गरीबिन प्रोषितपतिका प्रियतम के आने का शान जागो के लिए कौए को उडाती है। उड़ने के बाद कोमा पुनः आकर बैठ जाता है। इस शुभशकुन से प्रियतम का आना व्यंजित होता है। नायिका कौए को बलि देना चाहती है किन्तु उस विपन्ना के पास खाने की कोई भी चीज नहीं है जिससे वह कोए को पुरस्कृत करे। अपनी इम दुरवस्था पर वह इतना मदन करती है जितना उसने बांधव-मरण पर भी नही किया था। दिव्यदृष्टि धाहिन के अनश-काव्य उमसिरी चरिउ' मे विरहिणी परथी कौए से कहती है कि उनके किन-भाषण से यदि प्रिम मा जागमा नों वह उसे दही-भात खिलाएगी। १. बायन पूजा च ।। ३ । वायमेति । यन्नमा निमार, संग्राम नायम । बल्नामे समामले विराट ने दाभ्यामीति नदिदं प्रतिज्ञात र छाति । ५१|| [ कामनअधिकार, अ०, पत्र: जयमङ्गलार्ट फा] बन्धव मरणे विहहा दुग्णयपरिवर्ण विनतका रूप | भान बलि बिलग्य बल्लहकार समुदहोणे ।। [ वजालग ( मुघरिणी बजा)! ४६६17 ३ द्रष्टस्य पउनसिरी चरिड ३.४ | डॉ० हरिवंश कोछन्द्र ने इस प्रमंग का अनवाद इस प्रकार किया है ---"पद्मश्री कमी ज्योतिषियों से पूछती है कि मेरा पति पाव लौटेगा । कभी कीए को बाचन करती है कि यदि तुम्हारे शब्द से पति का गया नों मैं तुम्हे दही भात खिलाऊँगी। आँखों से गालो पर बहर बड़े बड़े भोमुत्रों से पद्मश्री दिन-प्रतिदिन भी होने लगी और कृष्णपक्ष की निस्तेजचंद्रलेखा के समान हो गई। [ अपभ्रंश-वाहित्य, पृ० २०३] .

मयपत्र भी 17 f t T 1 । . " 7 राग AIR 111111 ! 1110 परम । err; ཙཞུ ། ༈ ཀཾ ཀཱg རྒྱུ*# ལྕེ it एक जना अपाश दोड न TT पा चित्रग है जो कही भी टने नहीं पाता है....." दिशा | वितिय मान जानने के लिए उगे उड़ानी ही रहती है । 'डोला मा गदहा की विशिणी मारवणी में कहती है कि यदि कौथा प्रिय मे मिलाप करदेगा तो वनाई ही नहीं देगो, अपना कलेजा काटकर खाने के लिए भी देगी। एक दूसरे काहे से विहिणी मारवणी मान के लिए फाग को उठाने में दोनोबो : जाने की बात एक अन्य दोहे का वक्तव्य है कि बिर्सग मारणी दो कायम राबन्ति मध पिउ दिट्टा सहमति : २ । र अनि ||४|| ३५. 11 म अपनश मुनाक के वजन का एक राजरथानो समापन ।। :---- काग उगवण धुगा खनी आयो पाव म प्राधी नदी काग-गर, आधी गई नइकम ।। कारण वि बिरह करालि ५. उदाविय उ बा । माहि अच्चम दिक कमिठ विल कार । रीतीने " मका पार्श भी जानादन नाका T . - । । "विकलिता फौप को उगा दी है CATE तो ना ना । जदा क. विरहामुनि ।। 1.2. शन TGT उपर गया तो उधर ग 1 | - पा! बेचारा काट में प्रधर भल रहा है कि ' ' --- | पानी', :० २१ । २३.१ प यानर के सार या पद्य , " से है | गागर मिद न सका गुलेरी गे I .. !! विकास में शका योग, गाउमा, दिदा बचाया, प्रानन भर ...। काहि करना पापणउ भोजन दिलीत.. बालभ, एक सोर दे, TRA बेटियों का काग 1 || II, २६८ .

प्रियतम के आने के शुभ शकुन के रूप में आँखो का फड़कना और कौए का बोलना ज्ञात होता है, फिर भी वह दूरस्थ प्रिय के आने के संबंध में- आश्वस्त महीं हो पाती है। काक शकुन-सबंधी लोक-विश्वाम को हम विद्यापति के पदों में भी देख सकते हैं। प्रवासी प्रियतम यदि कौर के बोलने से आ जाएगा तो विद्यापति के पद की विरहिणी कोर को सोने के कटोरे में हाइ-मिश्रित दूध देने की प्रतिज्ञा करती है । विद्यापति के एक अन्य पद में आंगन के चंदन-वृक्ष पर चढ़कर बोलने बाले काग प्रोपित-पतिका बहती है कि यदि प्रियतम माज आ जाएगा तो वह काग की सोच को सोने से मढवा देगी। (स्त्र) शुभ शकुन · अंगों और आँखों का फड़कना ---यह लोक- विश्वास है कि स्त्रियों के बाएँ अगो का फड़कना भंगलमय होता है। 'गाथा- सतशती' को एक विरहिणी अपनी कड़कती हुई बाई और से कहती है कि यदि इस शुभ शकुन के फलस्वरूप उसका प्रिय आ जाएगा तो वह दाहिन आँख को बन्द करके बाई से ही प्रिय का दर्शन करके उस ऑज को आग्यायित और पुरस्कृत करेगी। हर कवि ने राधा को बाएं नेत्र से ही कृष्ण का दर्शन करती हुई चित्रित किया है क्योंकि उसी नेत्र ने फडककर नव अभ्युदय की सूचना दी थी।५ १. श्राख निमोणी क्या करद, काउका लवइ निमन । सड जोइन माहिल बम, सो किम आवइ अन्ज । होला ५१८ 11 काक मात्र निज भाखहरे पर आपोत मोरा। खीर खाँड भोजन देव रे भरि कनक कटोरा (1908 ( बेनीपुरी, पद-१६ ३. मोरा रे गनमा चनन फेरि गछिया लाहि चदि कुरुरय काम रे । सोने चोच बाधि देव तोय बायत जनों पिया आओत आज रे ||-( बेनीपूरी, पद-२२२) फुरिए बामछि तुए जाएछि सो पिसोजता सुदरं । संमीलिप दाहिण तुइ अवि एई पलोइस 1॥ -[गाथा-सप्तशती ||३७]] नैव सूचितनवाभ्युदयप्रसंगा मीनाहति स्फुटिततामर तोपमेन । अभ्यं निमीत्य नयनं मुदितव राया बामेन तेन नयनेन ददर्श कृष्णम || -- [पद्यावली : दर कवि - - : गाव नानापना Tण महतो मती ती और आलिंगन कर !!! . यि है पिसे * फड़कने से प्रिय संगम का द. Inा है। विद्यापति की एक नायिका मी पापा हदयबुध और लोचन फड़क रहे है जिन्हे लक्षित करके मवी मगलमय म कुन र झापन करती है।' अंगो के फडकने के वर्णन बोला-सासराहा' में भी प्राप्त होते हैं।' (ग) यात्रा-सम्बन्धी शकुन:-छोक होने पर कहीं नहीं जाना धाहिए, यह लोकविश्वास है। छौंक को अरनकुन माना जाना है। विद्यापति के एक पद वा प्रसंग है कि एक गोषी छीक होने पर भी गोरस आदि बेचने के लिए घर से चलती है कि कृष्ण की मुरली-ध्वनि सुनकर उसे अपनी वस्तुओ की बिक्री में रान्देर हो जाता है। पद के वर्णन के अनुमार छीक से भी अधिक मुरलो घ्यनि गोपी का अवरोध और अनिष्ट करती गोपी गिर जाती है और उसके चरण कॉटों से क्षत-विक्षत हो जाते हैं। प्रगति पश्यान नुम्यात सांग्लायात पुलक गुलि ने। प्रिनिगमाय रफुरिता बियोगिनी वाम्मबाहुलतान । (माया सप्तशती ३४७1) विहारी ने भी शुभशकुन मनका वामभुजा-सा उल्लेख किया है माम बासु फरकन मिले, जो रि जीवन मृरि । तो नोद्दी माँ मेरिया, रायि बाहिरि ।। गुरुगन न्यन अन्धकार पाश्रोन बांधव तिमिर बिसेन । तु उर फुरते बाम कुच लोचन बटु भगल करि लेख |5|| -निनीपुरी, पद-.--१०७ द्रष्टव्य होता-मारूरा दूहा', वृक्षा-१० ५.१६ से १२० नक । गोरम बिरस पासी बिसेग्नल छिका गह । मुरलि मुनि मुनि मोमन मोहन निवाहु मेल सदेह ।।४।। तीर तर गिान कदम्ब कानन निस्ट जमुना-घाट । उलटि हेरत लटि परली चरन चीपल कॉट ||| -~fring 4.७] PAN - ३ विधापति की एक लोकाक्ति में भी ठीक सवधी लोप विश्वास व्यक्त हुआ है~-“छिक्कहि नहिं चली।" ---R० गु०, पद-६] (घ) तारा और चन्द्र-दर्शन-सम्बन्धी अमंगल या अपशकुन- अकेले नारे को देखना शुभ मनका जाता है। इस लोक-विज्ञान का प्रका- शन विद्यापति की इन लोकोक्ति में हुआ है.. "एकसरि तारा केओ नहि देख ।' [ न० गु० पद---५३६ ] एक अन्य पद में नध्या के अकेले तार और भाद्रपद की चतुर्थी के चाँद को अप्रस्तुम-योजना के रूप में लाकर विद्यापति ने इनसे सम्बन्धित अमंगलपरक लोर-विश्वास का प्रकटीकरण लिया है। पद का वक्तव्य है कि किमी नायिका ने उसका प्रियतम रूठ गया है और उसके मुंह को मोर ननी देखना है। नायिका कहती है कि क्या उसका भानन अकेले भन्या-ताग या भावो की चतुर्थी के चाँद के समान है जो प्रियतम उसकी ओर दृष्टिमात नहीं करते है नाधिका को पृन्छा है कि इन दोनो अमंगल सूचा पदाथों मे से नायिका का मुख विस के समान है जो नायक उससे पराइ मुख हे ?' 'प्रमन राघव' में भी चतुरी के बाद को नही देखने के लोक विश्वास का इस प्रकार उल्लेख मिलता है उनकभूमिभिद्भिः मद्भि ग्वलु न दृश्यते । तुपन्द्रलेखा परस्त्रीभालाका । . 925५६ म PAHALA १ न . को हम सानक एकसरि लारा भादन चौधिक ससी। इथि दुह मास कमीन मोर पालन परमन इसी || ---[बेनीपुरी, पद-१५] सपर का सा: 4 पर भी मिलता है की इमें सामाक एकसरि नाश, भादव चाठिक चदा । अइसन कम पिया मोर मुल सरल, मो पनि जीवन मन्दा ।। परिप- १०, पद---७, सं० स०] भादो को चंथ की चाय और अकल! बार वे दोनों प्रदर्शनीय अथच अशुभ सनम जाते है। इसी लोग-विश्वास का यहाँ काव्यात्मक प्रयोग हुआ है ! लेखक] पनन रन, मनमक १२८ । E - । ३२ ) सुलमीदास मे भी प्रसन्नरापद की इस उक्ति से प्रभावित होकर पर-नारी के आनन को चौथ के चाँट की तरह त्याज्य और अदर्शनीय बतलाया है। (ए) वाणिज्य-जगत के शानभूलक विश्वास-विद्यापति की प्रातिपय लोको. क्तियों में 'ब'हनी' ? विषय मे चुकानदारों के बमल विश्वानो की अभिव्यक्ति हुई है। 'जश्मन परलोक दमन बोक', 'पहिल पहभोक भला के हाथ' 'पहिल पोक उघारि न देवा' आदि कहावतो में व्यावसायिक क्षेत्रों का यही परंपरागत शकुन-विवार सनिहित है कि बहनी' की सफलता पर ही व्यवमाय की सिद्धि निर्भर करती है, अत: पहली बिकी नकद ही नही लक्षण-सम्पन्न व्यक्ति के हाथों होनी चाहिए । (२) भूत-प्रेत-डायन सम्बन्धी लोकविश्वास ओर झाड़-फूक अंधविश्वास और तंत्र-मत्र :- (क) भूत-प्रेतः-विद्यापति के गुग में भूत-प्रेत पर विश्वास किया मिपा पर भत का आवेश आने पर उस युग में भी आज की ही तरह झाड-फ़क कर के प्रतावा दूर की जाती थी। रोमाइन बोभा आदि प्रेत उतारने का मंत्र पढकर प्रत को पछाड़ते थे । इस अंधविश्वास का विद्यापति ने घोड़े व्यंग्य-विद्रप के साथ चित्र ही है। उसे एक पद का यह प्रसंग है कि कृष्ण देवदेवासिन' या झाडा- क करनेवाल. तो का रूप धारण करके गोकुल में घूम रहे है। पूरे नगर में यह बात ई है कि ओझा इन आई हुई है। इसा रूप में कृष्ण अपनी प्रेमिका के द्वार पर माकर खड़ा हो जाते हैं। प्रेमिका प्रेत-बाधा से अपने को पीता पश्रित रती है। सास 'देवदेवासिनि' को झाड़-फूंक करने के लिए घर के भीतर ले जाती है। नायिका पर अतनु-देव अर्थात् कामदेव का आश हुई हैं जिन निजे में मंत्र पढ़कर काइने की बात 'देवदेयासिनि' -- १. वाधों के मनौर पर नारा के सुवनंद की ओर दृष्टि करना अकालमा कारो विशेषण गण को समझाले है -- . हीन wit घ सिन्ना गोसाई । द का नाम । ": '..., 4 न । १ कहती है एका = म कृष्ण अन्नु मत्र पढ़कर अनगदेव को झाडकर नायिका का उपचार करते है देव बाधा दूर होती है और सास बहुत भक्तिपूर्वक 'देवदेयासिनि' को भीख देती यहाँ देव का जावेश, झाड़-फूक करनेवाली, मंत्र-प्रयोग, लोक-जीवन में 'देवयासिमि' के प्रति निष्ठा आदि के प्रसंग लोक-जीवन के अंधविश्वास को सूचना देते हैं। विद्यापति ने नायक-नायिका के समागम की इस विशेष युक्ति को किचित् हंसी-ठट्ठ के स्वर मे चित्रित किया है। कदाचित् वे भूत, देव आदि को इकोमला ही मानते हैं। प्रेतात्माओ और उनका दर्शन करानेवाले करामाती लोगो का उल्लेख 'कोतिलता' में भी हुआ है "मगदूम नरावइ दोम जनो हाय ददस दस णारओ ।। ---( कीर्तिलता, २११९०१ डॉc वा० स० अग्रवाल, पृ० १०६) । यहाँ प्रेताबाहर करनेवाले या 'हदस' अर्थात हाजिरात करनेवाले मखदूम के क्रियाकलापो का वर्णन किया गया है। यह मखम' 'नरकपति की ही कोटि का पेशेवर प्रेत-विद्या-विशारद है, जो शीव्रतापूर्वक अंगूठी के नग मे मृतात्माओ को दिखलाता है जिससे देखनेवाले संतापित और भीत होते हैं। जौनपुर के बाजार मे ऐने चमत्कारी मखदूम का वर्णन स्वाभाविक ही है । पास - - १. गोकुन देवगामिनि पामोल नगरहिये पुकारि ! असल सन पैनिश जटिल स परि कान धार माझ लारि !!! मुनि धनि जटिला तुरति चामोल हरक्त चमकित मेल । हगर बवुक रीति देखि जनि पानमनि कहि मंदिर लइ गेल ||४|| देवदेयासिनि कान। जटिना बचन सुवामुखि नियरहि एक दीठि हेर बयान {१६|| कह तत्र अननु देव इथे पामोल हदि-मधि पसल काल | निरजन कोड मंत्र जद झाड़िए सत्र इह होएब माल |||| एत सुन्नि जटिला घर दोह लभल निरजन दुह एक ठाम ! सब जन निकसल बाहर बरसल पुरज कान्द मन काम ||१०|| बहु खन तनु नत्र पदि भारल भागल सब सेहो देवा । देवदेयासिनि वर मर्चे निकल चातुरि सूझब केला !!१२|| जटिला बहुन भगति करि हरखित तक भीख मानि देल । का कबिसेन्खर भीख लिए तर सेहो देवासिनि गेल ||१४|| ( बेनीपुरी, पद-१६१ 1 4 (ब) झाड फक (1) विधा। 14 कि कृष्णा योगी वेश में नायिका का हाय : TA के माय नायिका बहुत देर में दबाजे परा 51 करगिलाती हुई द्वार पर ठग्ने का कारण पूछी। नामिकामा अमगल संभावित है-उसके पनि का ना.. मात्रराकर बाहर आती है। योगी वेपारी पर देखने के लिए कहती है। योगेश्वर हथे की 11 नकर अमालकी मंभावना का क्या करते हैं। वेनिन मात्रिकी सेवा करने के लिए कहते हैं। इस तरह के नि...: योगी कहते है कि पूजा के अनेक नत्र गान है, जि ... चन्द नहीं है। लेकिन माम माती है कि उसके TT 111 लगा! कीन ܨ ܐܢ - । मास का प्रस्ताव है कि योगी " ....का नाकाकी झाड़-फूंक कर दे। इसके बाद योगी ए में 'म-म य र पढकर झाड़ने के छन ते गमागम-लाभ करता है। नवान् मोष्ट में निकलकर सास से योगी परराम देता निजवनको आराधना करने के लिए जाए तब कोई भी विधवा जरावे. पाप। सतह विधवा जटिला के नातंकमय अनुशासन से नायिका को दुरा. कारण आगामी मिलन को भी निर्वाध बना देते है। . १. बारला सास फुकार नहि बोलल मरि ! ललिता कहल सामंगल सूनाल मनि प िगर । सुनि का जटिला घटल की अनुसार न पादर होय। बहुरिक पानि बरि हेरा जोगी कि अनिल कह गोहि ।।१।। लोगेस्वर फेरि बहुरि। पानि परि कुमल कर नन । हे एक श्रापक बिसयमापन गरि !!!! युजनक तन-मन्त्र न माझए में इस वि जटिला कह आन कहो पायो न: न ]]-11 एत सुनि दुरजन मन्दिर पसल दान ग... दान। मनमथ मा पढामोल : uri पुनु दु जन मंदिन सब निकासत अति - २ अब हर माधन गोत्र मिया मल , सरीर।। एत कहि हम बलले निज मन्दिा जानो घरम! नियापति कह नवर सेखर सावि पदन म । --(पुरी, : ...१.२१) -- बन मा र पक्ष में ..., बीमाहिये यावरत कार्य: कलापों और विकास में xि किया है। वे । (२ व ३ ६ ३ का वक्त है या शिन को देखकर रो हो । पपियाँ बेषधारी शिव से कहती हैं कि वे अपना गुण ८२ कर , ताकि गौरी को मृछी टूटे । कहती हैं कि पारी सुमारी को दोउ लगा दी है। कुछ सखिया परामर्श देती है शिका को बुलाकर रवाना चाहिए ताकि राजकुमारी पर से भूत का प्रकोप दूर हो सो उसका सम्मोहन टूट सके ।' यहाँ दीठ लगना ताक परने वाले ओझा का स्पष्ट उल्लेख है। इनसे लेक-विश्वास का ही प्राधीकरण होता है। दीठ लगने, न ले जाने, ग्रह-बाधा होने और योनिधी में उपचार कराने की बाते विद्यापति के एक अन्य पद में भी वर्णित है। ३) माँप के विप को उतारने के लिए झाड़-फूंक :-लोक-विश्वाम के अनुमार साँप के देखने पर मांत्रिक या गारूड़ो के द्वारा विष की झाइ- फॅक को जाती है । प-दिप को माइने की बात आदिम काल से ही प्रचलित है। देहातो मे अभी भी दशा का उपचार, झाड़-फक से ही होता है। भाइ-फक का बहन- मनोरमागिता प्रभाव भी पड़ता है। विद्यापति के AT A TET Eा है कि मदन-भुजंग से दणित बाला के विष को गाड़ी कृष्ण ही माइमझते हैं। मदन-भुजा का विष उतारने । -- परिपद्-पृ०, पन-२५४] १. दुर कर गुनपन अरे अंगारो को लिटिभोला राजमारी । को बोल देपर दो अनु का केभो बोल बोका पनि निकाल २. है हरि पखला रे बर नारि । न जीवन पिनु कर परस नोहारि ॥६॥ केपी के ओजपथ बंद दिहि जानि ! केओ नबप्र पुन जोनिश्र प्रानि | केनो केओ कर धरि धातु बिचारि । वाह-विपिन कोड लखन पानि 011 - (बेनीपुरी, पद-५४} वा उपयो Trma .. रसोई जा 8 हैं गाय का मालिक होने का ओ गौरव है और गरुड़ में सपं भर माता इसलिए हाण से ही मदन भुजंग का विष उतर सकता है। शोक विधाय है कि जिस स प . • गंगे नहीं उतरता है। बाल भजन पर मंत्र-शक्ति का प्रभाव प्राय नही पड़ता है, इस आशय की लोकोनिया विद्यापति के पदों में प्राप्त होती हैं । वर्ग-इंजन के संबन्ध में यह भी लोश-विनाम है कि काट लेने के बाद यदि सॉप पुनः दशित स्थान पर काट ले तो उसने गिा का प्रभाव नष्ट हो जाता है ! कदाचित यह विश्वास 'विषस्य श्मौपक्षम' के ही वर्ग का है। सई-विष से संबन्धित यह लोक-विश्वास विद्यापति के भी एक पत्र में प्राप्त होता है। (ग) डायन-संबंधी प्रदादा-बुरी-से-बुरी स्त्री भी अपने पड़ोस में रहने वालों का बुरा नहीं करती है। चोर भी पड़ोस में चोरी नहीं करता है। 'डायन किसी को खा लेती है'- यह अधविश्वास है, किन्तु वह भी अपनी पड़ोमिन का अपकार नहीं करती है, यह लोक-प्रवाद है। विद्यापति ने भी अपने एक पद्य में शायन र छुरी भारत के लिए 'मन्दिर' शब्द को प्रयुक्त किया है। पद्य की नाविकर अपनी सखी से कहती कि डायन भी दूसरों को ही खाती है, अपनी पडोमिन को छोड़ देती है-उसका अपकार नहीं करती है। ३ 4 १. केओ बोल मन्त्र कान तर जोलि । क्षेत्रो कोकिल खेद डाकिनि बोलि || अरे अरे अरे कान्हु की स्मनिमोरि । गदन मुसँग उस बालदि तोरि ।११०! जना विद्यापति पदो रस मान । विप गामदि एक एक कान ||१२|| २. (क) परयो न माने जनि बाल भुश्रा ।' ~~बनापरी, पद-२१५) --(२० गु०, पद----१५४) --नक ग, घ -२१३ ) -नय ४०, पx-१०) (ख) मन्त्र न सुनार ननि आन मजंग । भन्नानिनिसि पुनहि यदि दमय, नहि समय विष जाह । तने ओडपातरि कि बोनिको नोति बडकए अएय चलभोलए मोहि नोरा करम चरम पर सालि मन्दिउ खाए पर उमिनि सन्दि ।। offer पावती पद १७) (घ) बलि :---बालिक मनुष्वानो में या बेमे भी पशु-बलिया नरबलि लो. विश्वास का ही , एक जग है जिसका संवध निश्चय ही तंत्र-मंत्रभूलक आदिम विधियों से स्थापित किया जा सकता है। कार्तिलता' में मुसलमानों द्वारा बिसमिल्ला' महकर पशु-वर करने तथा हिंदूओं द्वारा पशु चलि का संकेत मिलता है- कतह मिसिमिल कनहु छेद ।।" कीर्ति २.१६५1 अगवाल, पृ० ११२) (३) पाप-पुण्य · सम्बन्धी लोक-श्वास :-- अपने पाप-मुक्त चरित्र की सफाई देने के लिए स्वर्ण का स्पर्श करके गाना सब तरह से प्रामाणिक और विश्वसनीय है। मोना छूकर मिश्रा यापन करना विद्यापति के युग के धर्मभीरु मनुष्य के लिए असंभव ही था । विद्यापति के एक पद में इस नोक-विश्वास का बड़ा हो सुन्दर विनियोग पाया जाता है। ए धनि माननि करह मंजात । शुभ कुच हेम-घट झार भुजगिनि ता उपर हाल ॥२॥ तोहे छोडि जदि हम परसब कोय हुअ हार-नागिन करटव मोय ॥४॥ (बेनीपुरी, पद १३७) यहां नर्मकुशल नायक-नायिका के निकट अपने अपराध को छिपाने और विश्वास जमाने के लिए जो शपथ ले रहा है उसमें विवेच्य लोक-विश्वास को काव्यात्मक वैदग्ध्य सिद्धि का साधन बनाया गया है। जिस तरह झूठ बोलनेवाला पार भीति से सोना नहीं छूना है उसी तरह पाप-भात हिन्दू भी 'यम' का सामना करने से घबराता है। हिन्दू-जाति के मन में सनातन काल से यह विश्वास पर किए हुए है कि यम के दरबार में अपने कर्मों की सफाई देनी पड़ती है और पाप के परिणाम भुगतने पड़ते हैं। मुत्यु के बाद यम के आगे जवाब देना पड़ता है, इस लोक विश्वास को भी विद्यापति ने व्यक्त किया है। ए हर गोसामिनाह मोहे जनु देह पेखी। जम आग मह उतर हरे छाउन जबे धुझाओत लेखी ।। - (१० १०-१२५) (आ) रीति-रिवाज इतके अंतर्गत लोककृत्यों, लोक-प्रथाओं, लोकोत्सवों आदि की गणना होती है।

(क) बम जन्म, विवाह आदि मारो, पूजोबाग, लिया था सामूहिक भोज से संबंधित लोककृत्यों के आधार पर विद्यापति ने अपने कई पदों का मुधरतापूर्वक निबन्धन किया है। (17 शिE जन्म -~-4मर शहर के नाम के मा पर विशापति ने लोकिक रीतियों का जो वर्णन किया है उममे मिथिला के लोक-जीवन की आंचलिक विशेषता विवृत हुई है। गिय के जन्मोत्सव के ये विवरण बहुत चित्रात्मक, सच्चे और लोकपरक है। विद्यापति के पद की अर्थ योजना इस प्रकार है कि श्रीपचमी के दिन वसंत का प्रसव गर्भवती प्रकृति करती है और तदनन्तर विविध लोकाचारों का ताँता-सा बंध जाता है। वनस्पति-रूपी धाय, जन्म के बाद युवतियों के नृत्य, मंगल गान, मलयानिल से शिशु के बचाव के लिए ओट करना, माधवी पुष्प की गजमुना, बन्दनवार, 'महुअरि' गीत, तूर्यनाद, शखनाद, बालक को मधु चटाना, पमनाल का कटि-सूत्र-बंधन, बच्चे को बधनखा पहनाना, 'हरउद' गीत, लोरी-गायन तथा बच्चे द्वारा चंद्र-गोलक का देखा जाना, जन्मपत्री, गणित-गणना और नामकरण आदि बातों के वर्णन में लोक-रीतियों का सम्यक प्रकाशन हुआ है। वसत के शरीर पर उबटन लगने तथा ऑखो में काजल लगने के वर्णन में भी लोक व्यवहार का ही जान प्रकट होता है। महुअरि तथा हर उद-गायन, मधुटाने, कटि-मूत्र तथा बधनमा पहनाने आदि के वर्णनों के स्रोत लो नितांत लोविकही है। 24 माय मान सिरि चम, मालिक नाम पंचम भाई । अति धन पीना दुख र पाल बनाएनि मेल धाई || खन बेग पनव दिनकर दिन मना। सोरह सम्पन बनिस लखन मद्र जनम जैल गई | नावर नतिजना हररित मन जनरल चाल प्रधाई हे। मधुर महारत ममल गाना मामल मान उदाई 151 बह मलयानिल श्रोन उनित बन मा उजियार। माधवि फल मेल मुका नल ने दल बन्दनबारी || पाश्ररि पारि गाय कनार नागपुर- पर . + ।

( ३६ ) (२) विवाहः--विवाह-सबधी लौकिक कृत्यों और रम्मों के भी विवरण विद्यापति के पदों में अलब्ध होते हैं। वसंत के विवाह का वर्णन भी विद्यापति ने बत-जन्म की ही तरह रुचिर पद्धति पर किया है। लता और वृक्ष का ही मंडा वा मंडवा बना है। उसको नित्ति को चन्द्रमा ने मानों अपनी उमल-किरणों से धवलित कर दिया है अर्थात् उस पर चूना को पुताई कर दी है। भूमि पर के मांगलिक चित्र ऐपन के रूप में पद्मनाल है ! दिवाह मे लाल परिधान पहना जाता है और यहां पल्लव ही रक्त परिवान है। कानन -स्थली मे बसन-विवाह हो रहा है। नपरियाँ मगलगान कर रही हैं। द्विजश्रेष्ठ कोकिन्न मत्र पढा रहे हैं। विवाह का संकल्प पढ़ते समय जो हस्तोदक लिया जाता है वह मकरन्द है। श्रीर समीर और चाँद बारात वाले हैं। किंशुक तोरण है। वेला के फूलो का मंगल खोल या लाबा फैला हुआ है। केमर-कुसुम के पराग का ही पिदुर-दान हुआ है। मानिनियो के मान का ही योतुक या दहेज दिया गया है ! ។ ना मन मधुलर बालस दल कमत-पख पोनर तोर मूत्र में कटि केसर करा लि वधनाः १२01 नव नव पल्लव सेज ओछाप्रोल मिर ढाल कदम्बक माला | वैसलि भमरी हाउद च निहारा ||४|| कना करना सन-पत्र निक्षिपत्ता रामि नहत कए लाल !! कोविल बनि-गुनिल मा जनाए रितु वत नाम थोला ।।१६। भार या वान बनन तल व मनले मलारा || दग्विन पवन धन अग उगारत किमय कुन्न परागे। सुमलित हार नरि घन काजल अखि अान लगे ।।२०।। ना बन रितु अमर जीवनि विद्यापति कव गावे। [ बेन पुरी,१४ M लना नरु पर मंडर जाति निरमल ससर धालिए नीति :!! पउँनाल प्रदान भल भेज । रात परीइन पत्र देल १४|| दे माइने मन चिन जान । बसन्त-विवाह, कचिन धन प्राय | || मधुकरि-रमनी मंगल माद । दुजबर कोक्किा मंत्र पहा 11001 का मकरन्द' योदक नीर । वियु परिमानी धीर पार || Fti । ४० बसत के वाहिक सस्कार के इम वणन म लोकाचार का पूरा प्रकासन हुआ है। मंडप, ऐपन, रक्त परिधान, मंगल गान, मंत्र-पाठ, हस्तोदक, बारातो, सारण, लावा जिदूर दान, चौतुक आदि सभी बातों के लौकिक मित्रही इटिगत होते हैं। एक दुसरे पद में भी वसत-दुलहे के विवाह का लौकिक वर्णन मिलता उमो वैठने के लिए गल्लव का पापीठ या आसन है। श्वेत कमल ही मानो ने से धडित पुन या मगल-मन में। मकरन्द ही गगाजल है। लाल शाक क फर हो दीप है। अच्छा दिन है - शुभ लग्न है। वर वसन का 'चमाान' हो रहा है। मपूर्ण चाँद ही दही का थका है । बम धूम कर भ्रमरा 'हकार' या बुलावा देरही है कि इस अवसर पर स्त्रियाँ जुटे। किंशुक का फूल ही सिदूर के समान जान पड़ता है। केतकी के पराग से ही पटबास नामक मिद्र का शृगार वधू को माँग मे किया गया है।' यहाँ पुरहर, गंगाजल, दीप, चुमाओनदही, कार, सिंदूर, परबास आदि के वर्णन से विवाह की लाकिक रीतियाँ हमारे सामने स्पष्ट हो जाती हैं। कमश्र किसुक मुति नोरन वल । बाबा स्थिरल बोलको कुल २२।। केसर कुसुम ५ सिदूर दान ! जोतुक पाओ. मालिन मान !! | खेनए कौतुक नवे पँचबान ! विद्यापति कवि कप भान ।।१६।। auN बेनीपुरी, पद-१६६७] स अभिनव पल्लव बस इल | धनले कमल कुन पुरहर भेल |1|| * मन्द किनि । असोग पाई अविल जमा । चुमाश्री, य ल 11 IT संधानिधि करने १ P टेपु कुसुम कैनिक-गि विर पाय 111 ANN ( ४१ शिव-विवाह के वणन में भी लौकिक रीतियों को विद्यापति ने सके तित किया है। शिव बसहा पर चढ़कर आए है, जिसके खुर टपर-टपर बज रहे है और उनका माल खटखटा रहा है। भाँग खाए हुए डमरू बजाते गिध आए हैं। उनकी देवर सास ने ऐपन मिटा दिया है और पुरहर फोड दिया है। अब कोमुख दीप कैसे बले ? पुत्रो को लेकर कुपिता 'मनाइन' मण्डप में वैठी है। 1 यहाँ ऐपन, पुरहर, चौमुम्ब दीप आदि के प्रसंग लोकपरक ही है । डॉ तेजनारायण लाल ने पुरहर, पातिल, ऐपन या 'अरिपन आदि की शेव-लोको के रूप में व्याख्या करते हुए लिखा है :- "मिथिला में विवाह मंस्कार के समय 'पुरहर' (कलश पर चित्रण और पातिल (एक मिट्टी का छोटा बर्तन जिसे लाल रंग रंग देते हैं ) का प्रयोग होता है। 'पुरहर' को पुरारी यानी शिव और पाल को 'पार्वती' के रूप में लिया जाय तो इससे शवधर्म का प्रभाव दीख पड़ता है। मण्डप की सतह पर जो 'अरिपन' बनाया जाता है मह सन्द जपान" का अाशरूर जान पड़ता है। 'हिफन से तात्पर्य है --- कुण्डलिनी' का प्रतीक ! 'कमल' के फूल का जो चित्र बनाया जाता है वह हाय का संकेत है और मणिपुर नाभिकुण्ड का ।"३ दस वस्तुत: मिथिला की भूमि इन-कला है। इस भूमि-चित्रकला मुलना बंगाल को अपना सोचाला, उत्तर प्रदेश की चौक पुरने की कला, महाराष्ट्र-गुजरात की गोली कला, राजस्थान के मेहदी माँडने और दक्षिण भारत के कोलम् भू-निनों से की जा सकती है। परहर पर का दिऋण भी लोक-कला का ही नमूना है । मिथिला के कोहबर-पने में पित्तियों पर लोक-कला के स्वच्छंद रूपों को देखा जा सकता । परीके बनने वाली कथानो पर भी कसीदा काढ़कर जो चित्र बनाए जाने हैं उनमें लोक-कला के मौलित और प्राणवान रूपो की प्रतिष्ठा दिखलाई पड़ती है । . यहि चिदिव्य दज यात्रो रहन उपर जोगी। पर उपर कर अपना आयल स्टर-खटर है"उमाल || भकर सकर स्त्रि भाग कोसयि इमल तेवा कर लाय! सपन मेट्न रहर गय बर किमि चौमुख दीम। शिमा ले मनाइने मंडश इसलि गाविष्ट जन यखि गीत ।। मन विधानि नए मनाइनि ईगिका चिमुवन ईस।। -( बेनीपुरी, बद-~३४४ ) दशा शिजी लोक कः मशगन' [ डॉ लाल, पृ.६| 'वर्ण रत्ना 11 वह नहीं . N भी विमा मास्त्रीय विधिया पर अधिकार !' । ' 1. लोकारका ज! विमान 7 ... आज और मिन्दुर लान के बाद वो तो NET , ।' योनिमार वर्णन में tra FM है। (३) पूजोपचार - प्राणा, नगर, और मिथिला के धामिक वातावरण नहर विधानातकी 111 TETोजना में उसके व्यक्तित्व, वातावरण तया वर्गका र आमामा प्रकाराना है लोचन नोर तटनि निरमाने । सरस मृनाल कर जमाना" गलिग नारनामारा || वृन्दावन कान्द अनि ता करई। अनि मदनानक ब. १६॥ जिद कर गमिव समर कर आगी। हरति बा होमबह भागी।।। चिकुर बरहि रे सा कर ले । पर 12 पयो पर दे गई ।।१०।। भनइ विद्यापति गुन गुगरी। तुपय । अकबर नारी ॥१२॥ ---(वरी, १६-- ०१० ) इस शुगारिक पद म यज्ञीय या पूजन-कल्पना का राममहार मिलना है। यह एक वियोगिनो कवि है जिनमें कार्य काण्ड के लकिक कृत्यों से संबद्ध बिम्बों का सुन्दर प्रयोग लक्षित किया जा सकता है। वैदिक पूजा-पद्धति में लोकिक परंपरा का यह दिग्दर्शन अन्तविरोधमला नहीं, पेट की लोक-स्वीकृति का परिचायक है। सूत्रो में ही नहीं शाम म:माला-नयों में भी लोक- कृत्यों को आत्मसात् कर लिया गया है तथा वेद-विहित विधियाँ भी लोक- जीवन तक पहुँच कर 'लोक' की सपत्ति बन गई है । विरहिणो लोचनो के नीर से नदी tri] कक उममे नहाती है । हायों के लोलारमल या मृणाल का वनु या नाला बनाती वह दिन-रात हरिनाम जपनी रहती है। बर ही नहीं प्रेमी कृष्ण भी है। वह धन्या वापसी TERIर रही है। उसकी हदय-- मेदिका में कामाल जल रहा है। न। मेगा या लकड़ी लया स्मरन को भरणी बनाकर वह नायिय होम की। १. [क] द्रष्टव्य पर्श र ! uTET वर्गग: ' '--३५ [व] 'स' य. जा ोन का बनाई जोकाचार अन्य ही है 1-[] ALM सी ३ यहाँ बह-के भार के लिए को कल्पना प्रयुक हुइ है, कि नायिका शिखि-पुच्छ के मान देश को दुश की तरह हाथों में लिए है। वह प्रेम-पुजारिन पृमा के फलोपहार के रूप में पयोधरों का निर्माल्य घड़ा अव इन पूरे ५३ में पूजापान की विधियों मार मामनियों में ही जिम्बा का चयन किया गया है। स्नान करके पूजा करने, सुभरणी, जप, तप, वेदिका में आग के धनरुने, पमित्रा, अरणी, होम, कुश, उपहार आदि के चित्रो मे धानिक पूजन विधि के गन्धो काही निव धन दृष्टिगत होना है। (6) युद्ध-रीतियाँ-विद्यापति के निम्नलिखित पद में सैन्य व्यवहारो और युद्ध-सम्बन्धी लोकाचारी से अप्रस्तुतो का चयन किया गया है-- त्रिनलि तरं गिनि पुर दुग्गम जानि मनमथ पत्र पठाऊ । जोबन-दलापति ताहि समर लागि ऋतुपति दूत बढ़ाऊ ।।२।। माधव, देखु साजिए वाला। तमु सैसव तोहे जे सतारल से अब आओत पाला ॥४॥ कुण्डल चक्क तिलक अंकुम कए चन्दन कवच अभिरामा । नयन कमान कटाख बान दए साजि रहल अछि बामा ।।। मुन्दरि साङ्गि ग्वेत चलि आइलि विद्यापति कबि भाने । -(बेनीपुरी, पद--१००) बिवली ही खाई है। कामदेव ने पत्र प्रेषित किया है। यौवन ही बलाधिकृत है । बसन्न दुन के रस में आश है। मुन्दरी युद्ध के लिए बिल्कुल तैयार है। कुण्ड के चक्र, तिलक के अमुठा तया चन्दन-लेप के कवच एवं चितवन-बाण के साथ युवती बुद्ध के लिए बिल्कुल सन्नद्ध है। शगार के प्रमग में युद्ध-सम्बन्धो ये बिम् नडे ही दामात्मा हैं। 'कोतिला' के वीर रस के कवि और राजाधित तथा विश्रुत राज- पुरुष विद्यापति यदि मैन्य-कल्पना का प्रयोग करते हैं तो यह विल्कुल स्वाभाविक कवि के मन में सामन्तीय यदुव्यवस्था के जो संस्कार हैं वे ही इस पद के बिम्ब-विधान के चित्र हुए है। यहाँ पत्र- प्रेण, दुस-प्रेग आदि युद्ध-रीलियो के सकेत के साथ-साथ खाई, दल रति, अस्त्र-श आदि के बिम्बो से जिम युद्ध-ऋत्य का परिचय प्राम होता है उसका स्वरूर लोकतान्त्रिक ही है। -- } (५ मा भोज-...forgi { : ससदमा लोक रीति में आमी निर..! TET महमाहि म भोगी धर्मशास्त्रानमार श्राद्ध में भोजन करता भगा किन्तु यह भी सच है कि बिना ब्राह्मणों के भोजन किए श्राडू- काग होती नहीं सकता है। विद्यापति इम लोक-यवहार से अनभिजनहीं है कि किसी के मरने के बाद भोज बाना धर्मशास्त्र से विहिन नही होने के कारण है, किन्तु पातक से उरते हुए भी त्राद्ध-भोज खाया हो जाता है। गवि ने 7 लोग जीवन के श्राद्ध-भोज का टाल देकर संकटापन्न परवन परकीमा-प्रेम वा परपुरप-प्रेम करने की बाध्यता का निरूपण किया है। (ख) लोक-प्रधा (१) बेमेल विवाह-वृद्ध वर के साथ तरणी का विवाह नथा तभी के साथ बालक का विवाह अदुरदगितापूर्ण ठोक-प्रथा के ही जन्तर्गत आते हैं। विद्यापति-पदावली मे लोक-जीवन को इस विषमता की साहित्यिक बालोचना प्राप्त होती है। कवि ने इस दूषित लोक-प्रथा को उपहासामद संदमो में रखकर उस पर प्रश्नचिह्न लगाने का साहस दिखलाया है ! महापाणी- विद्यापति के सात साहित्य में अपने जामाता गिव को देखकर क्रुद्ध हो जानेवाली 'मनाइन' का जो चित्र प्रर होला है वह पुत्री को हिल- कामता में व्यग्न रहनेवाली ममतामयी मा प्रतिनिधित्व करनेवाला है। 'मत्तान' अपनी पार्वती को बूढे वर के हाथों में मोपने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। नवयुवती पार्वती और वृद्ध शिव के परिणय' का यह प्रबल तिरोध करनेवाली दिखलाई गई है। नारद-जैसे घटक को यह खरी खोटो ही नहीं सुनाती है बल्कि उसको दाड़ी नोचने का इरादा करती है । वह घर में रार पचा देती है और अपनी पुत्री के माथ गृह-परिवार को उद्यत हो जाती सात्त्विक क्रोध से बिफरी हुई "मनाइन' बूढे वर और उसकी बारात का अनादः करने के लिए कृतसंकल्प जान पड़ती है और उसके वक्तव्य मे बूट विवाह की सामाजिक गति पर कशाधान करने की अपूर्व अमता हटेगा होती है - हम नहि आ रहब एहि ऑगस जो बुह होएस जमाई, गे माई। एक त बरि मेल वीर बिधाला दोपरे पिया केरा - लेसरे बरि भेल नारद बामन में बढ़ आमल अमाई, गे माइ . पहिल्क डामर तोरख दोमर तौरव हाडमाल । घरद हाँकि बरिआत बेलाएब धिया लए जान पराई, गे माई ।। शेती लोटा पता पोथी सेहो सम लेदहि छिनाई। ओं किछु बजता नारद बामन दाही पए देव थिमिमाई, गे माई ।। ---( बेनीपुरी, १६००२३३) एक अन्य पद में युद्ध शिव को जामाता के रूप में देखकर कोपबश 'ऐपन' मिटानेवाली एव पुरहर फोडनेवाली 'मनाइन' के माध्यम से विद्यापति ने उस लोक-सामान्य माँ का चित्रांकन किया है जो अपनी बेटी को कथमपि किसी बूढ़े के गले में नही बाँधना चाहती चाहती है-- ऐपन मेटल पुरहर फोरल बर किमि चौमुख दीप। धिमा ले मनाइनि मंडप बइमलि गाबिए जतु सखि गीत ।। ( बेनीपुरी, पद-२४४) इस तरह हम देखते है कि शिव-विवाह की आड़ मे वृद्ध-विवाह की कुप्रथा की छीछालेदर करके विद्यापति अपने रूढिर्भजक एवं प्रबुद्ध साहित्यिक व्यक्तित्व का अच्छा परिचय देते हैं। विद्यापति-पदावली में बाल-विवाह की लोक-प्रथा का भी ध्यंग्यमय वर्णन उपलब्ध होता है। इस लौकिक कुसंस्कार पर कवि ने हास्यगर्भित मृड प्रहार करके उद्दिष्ट व्यंग्यालंबन-~-बेटी के बाप- की बरे आम पगडी उछाली है। उसने विवाहिता तरुणी के उद्गारों को इस प्रकार उपन्यस्त किया है कि बेमेल विवाह के तत्कालीन कर्ता-धर्ता भीतर-ही-भीतर तिलमिला गए होंगे- पिया मोर बालक हम तानी । कोन तप चुकलौह भेलौह जननी ।। पहिर लेल सवि एक छिनक चीर । पिया के देवत मोर दगध सरीर ।। पिमा लेली गोद के दलाल बजार हटिया के लोग पूछे के लागु तोहार ।। नहि मोर देवर कि नहि छोट भाइ । पुरख लिखल छल बालम हमार ।। बाट रे बटोहिया कि तुहु मोरा भाई । हमरो समाद नेहर देने जा ! काहिहुन बाबा के किनए धेनु गाइ ! दुधवा पिआड के पोसता जमाई ।। -~~( बेनीपुरी, पद-२६३) पति बालक है और पत्नी तरुणी है, जो अपने विवाह से प्रसन्न नहीं है। पति को गोद में लेकर जब युवती पत्नी बाजार जाती है तो लोग इस बालक से - होट म्वेल के विषय में पका करते है अपने बालक बालम की जननी का हित करने वाली व नाग अन्तव्यथा की आग में दम हो रही है। के द्वारा अगो के 7 जती है कि हे पशिक, पिला से कहना कर माय भेज र, ताकि दुध पीकर उनका नामात पुष्ट हो सके। ! यह गिय बना ही मुझम और बंधक है। उन्हो ने युवती पत्नी के अनभूति में प्रविन होकर बेमेल विवाह के चलन को जो आडे हाथो में उसके लोकानमव कवित्व के दर्शन होते हैं। पर्दा-प्रथा ----विद्यापति की निम्नलिखित पति में लोक-जीवन में निर्वाह की भूचना मिटती है-टाट टरले आगन बेकल सबै ".--(T: १० ।५)। का वन्य है कि सभी लोग पर्दा रखते है । नग्नता अच्छी नहीं घर-ऑगन के पर्व के लिए टाट का दरवाजा या घेरा लगा देते बिल्कुल ही जनसामान्य के जीवन से संबद्ध है। विद्यापति घर नतान्त लौकिक चित्र हो नही प्रस्तुत करते है अपितु पर्दा रखने त्ति का भी परिचय देते है। लोक-मानस में अपनी नग्नता को पुराकाल से ही बद्ध मूल है। 'मदे परदा राष'---यह लोक मनो- 'था-विशेष की परिचायिका उनिही प्रतीत होती है। ती-प्रथा ·- पति के देहावापान के बाद आत्यंतिक विरह से त्राण चीन काल की नारिया अग मे जल मरती थी। भारत के हास मे यह प्रथा राजपूत रमणियो की आन से संबद्ध होकर 1 में दिखलाई पड़ती है। विद्यापति की एक विरहिणी भी अभाव मे धधकतो चिता मे ममा जाना चाहती है:--- 1 से भ हिय सालार रे पिया बिनु घर मोर्य आजि । नति करओ महलोलिनि रे मोहि दे अगिहर साजि ।। --- ( बेनीपुरी, १८६) ना' तत्कालीन सती प्रथा का सूचक है। इस प्रसग मे यह : लापता शिवमिह की रानी लखिमाने भी बारह वर्षों की ग्नि-समाधि ले ली थी। कदाचित इस विरह-गीत मे कवि मनोभावों को रूपायित करने का प्रयास किया है। मा गोदवाने की परिपाटी:- हालतक मिथिला की स्त्रियाँ दिने के चित्र और लेख गोदवाती रही हैं। अभी भी निम्न होल Varta होईन . व्य श्रीर होगा प्रया आर और और ही होकर शापित विस्म - --- (४७) बंग की स्त्रियों में इसका चलन है जो पशवर खोदपाइनी स्त्रियो क स सिक्का गीतों को मुनती हुई उन से गोदने गोदवाती है विद्यापति ने अपने एक पद में नायिका के गोदने का काव्यात्मक विनियोग प्रदर्शित किया है। उन्हो ने कृष्ण पर बिगडकर सभी हम और नील वणो के पदार्थों को हटाने, मिटाने या नष्ट कर देने के प्रयत्न करने वाली एक मानिनी की मूर्ति रची है जिसके वक्ष पर काला चित्र या गोदना अकित है। नायिका मलयज लगाकर उस काले गोदने को मिटाने की चेष्टा करती है। इसी तरह वह सभी काली वस्तुओ पर रुष्ट होने के कारण विवुक के तिल पर भी मलयज लगाकर उसे छिपा देती है असित चित्र उर पर छल, मेटल मलयज देह लगाइ। मृगमद तिलक धोइ सुगंचल, कच मयं मुख लए छपाइ ।।। एक तोल छ र चार विबुक पर निन्दि मधुप-सत लामा । तृन अने करि मलयज रंजल ताहि छपाओल रामा ।।१।। -( बेनीपुरी, पद-१४५ ) यहाँ प्रकारान्तर से 'असित चित्र' या गोदना की प्रथा को कवि ने संके नित किया है। . (५) द्य त-क्रीड़ा की प्रथा. -निम्नलिखित प्रगमे जुआड़ी और पागा का उल्लेख करके विद्यापति द्य त की प्रथा से अपनो अभिज्ञता प्रकट करते हैं - "जाए खने दितहु आ लिङ्गान गाड । जनि जुआर यम्से खेल पाड ।" इसी तरह कवि बिहारी ने भी 'चौगान' खेल की चर्चा की है । (ग) लोकोत्सव विद्यापति ने लोक-जीवन के उत्मवो का भी वर्णन करके अपनी लोकधर्मी काव्य-चेतना का प्रमाण दिया है । प्राचीन भारत मे विविध ऋतु-उत्सवो के आयोजन होते थे जिनमे बसतोत्सव का स्थान सर्वोपरि था। प्राचीन साहित्य में इस वसतोरसव के बड़े हो ललित और स्वाभाविक वर्णन मिलते है। विद्यापति ने वसत-शिशु के जन्म-प्रसग मे वमत-पचमी या श्रीपंचमी के उत्सव का जो रूपांकन किया है उसमें लोक-चित्त के हर्ष-विह्वल पक्ष का सम्यक् प्रकटीकरण हुआ है --- " नाचए जुबति जना हरखित मन जनमल बाल मथाई हे।" कवि ने दूसरे स्थलों पर भी वसतोसद के मादक वित्रण किए है।' उन्होने फाग-क्रीड़ा काभी जमकर वर्णन किया है। शिव और विष्णु सपरिवार होली खेल रहे हैं, इसका अत्यत ही सौमनस्यपूर्ण और आलादक अंकन प्रस्तुत पद से हुआ है १ दृष्टव्य बेनीपुरी, पद-१७३ १४, ६.८ (नया पद'-१७ः ।

केत न झोरी सि दुरे भर लि भममे भर बोकाम । बसह कसरि मजूर मुसा घारह पलु पलान ।। डिमि कि डिमिकि च बाजए पसर खेलए फाग । मसमे सिन्दुरे दुप्रो खेटा एकहि दिवसे लागु ।। सझॉजे सिन्दुर भह समिति लाछीहि भरलि गोरा । इसरे भरमे भर नराएन पोत वसन बोरी ॥ एके तनो नागट अजाके उमत इसर थूर खाए। अओके उति खेडि खेलाबए किछ न बोलए जाए । गाड़ वाहन देव नराएन बसह चढ़ महेस । भने विद्यापति कौतुके गाओल सङ्गहि फीरथि देम ।। ---[ ५० ५० भाग १, पद-२५६ भस्म और सिन्दूर के झोले लेकर एक ही दिन धूलिया कीचड़ और रग दोनों के खेल खेलनेवाले, नगे, धतुरा खानेवाले और उन्मत्त शिव वस्तुत: होली की मस्तो के जीवत विग्रह है। यहाँ विद्यापति तत्कालीन होलिको- स्मव की इम परिपाटी को सकेतित करते हैं कि धूलि या कीचड़ और रग के खेल एक ही दिन नहीं होते थे, किन्तु महादेव इस रीति का उल्लघन करके होली के उत्साह को और भी बढा देते हैं, कवि के वर्णन से यह भी विदित होता है। होली के अवसर पर नशे का सेवन और उन्मस्स-जैसी चेष्टाएं करना आज भी लोक-विहित ही हैं । विद्यापति प्रमत्त एव उन्मत शिव के होलिकोत्साह के वर्णन से जन साधारण के उछाह को ही प्रकारान्तर से व्यजित करते है। विद्यापति नारायण और शलपाणि की एकता के प्रतिपादक कधि है। इस अभेद स्थापन की आवश्यकता कदाचित् लोक-जीवन मे विद्यमान भेद बुद्धि के कारण ही पडी होगी। एसा लगता है कि विद्यापति ने वैष्णवों के खों और शेवो के इमाओं के विसंवादी स्वरोको लोक. हृदय की धड़कनो में सुला होगा जिसमे प्रेरित होकर उन्होने दोनो सप्रदायो को ऐक्य सूत्र में बाँधने का प्रयत्न किया होगा। शेव और वैष्णव संरदायो के देवताओं मे वैमनस्य नहीं आत्मीयतापूर्ण संबध ही है, यह दिखलाने के लिए ही विद्यापति ने शिव और विष्णु के होली खेलने का प्रभावशाली चित्रण किया है। नारायण और शिव को साथ-साथ मचरण करते देख विद्यापति को आनन्दयुक्त कौतुष होता है, कि दो विरोधो देव आज सभी प्रकारके मनोमालिन्य से मुक्त होकर क्रीडारत हो गए हैं । इस चित्र को उपस्थित करके विद्यापति यह शापित करना चाहते हैं कि होली में लोग सभी प्रकार के बैर-भावो को विस्मृत करके एक-दूसरे से सौहार्दपूर्ण करतल पर मिलते-जुलते हैं।

{ ४६ ) २ -- विद्यापति-पदावली की युवतियाँ थारुती वातावरण में मानाविध आमोद-क्रीड़ाओं में व्यस्त दिखलाई पड़ती है। कवि ने चाँदनी से धुली रातो में मदन-आराधना, झूमर लोक-नृत्य १ और गीत को सकेतित करके तत्कालीन मिथिला की उत्सवप्रियता का उद्घाटन किया है। एक अन्य पद मे भी विद्यापति ने नृत्य और रास' का उल्लेख करके लोक-जीवन के मनोरजनात्मक स्रोतों को ज्ञापित किया है।" अपने प्रसिद्ध बारहमासा-वर्णन के अन्तर्गत विद्यापति ने 'सुखरात्रि' या दीपावली के लोकोमय को भो उल्लिखित किया है। " 'कीतिलता में भी लोकोत्सवों का संकेत मिलता है सम्मान दान विवाह उच्छव गीभ नाटक कब्बही ॥६॥ आतिथ्य विना विवेक कौतुक समय पेस्लिम लवहीं ||१२|| - कीर्ति ०२: डॉ. अग्रवाल) यहाँ उत्सव, गीत, नाटक, खेल-तमाशे आदि लोक-मनोरजन के सकेतक हैं। 'कोतिलता' में नक्षत्रानुसार होनेवाले हिन्दू-उत्सवो को 'नकत' कहा गया है और उसके साथ-साथ मुसलमानो के धार्मिक अनुदान 'रोजा' का भी कवि ने उल्लेख किया है-"कतहु नकत कतहु रोजा ।।१६७॥"--- (कीति• २१ डॉ. अग्रवाल )। (इ) लोकोक्तियाँ विद्यापति -पदावली की लोकोक्तियों के दो वर्ग दृष्टिगत होते है--(१)लोक- जोवनया लोक-साहित्य से गृहीत तथा (२) प्राचीन शिष्ट साहित्य से अपहृत । पहले वर्ग की लोकोक्तियाँ लोक-जिह्वा को सम्पत्ति है और दूसरे वर्ग के सुभाषित विद्यापति के कायाध्ययनमूलक अर्थ हरण के परिचायक है। अपने शोध-प्रबध विद्यापति- पदावली के आकर - स्रोत' में मैंने ऐसी लोकोक्तिवेधी सदुक्तियों का विश्लेषण करके यह सिद्ध किया है कि इन्हे कवि ने लोक-जीवन से नहीं प्राचीन आकर. ग्रन्थो से लेकर अपनी रचनाओं में जड़ दिया है। 'पदावली' के लोक-मुख से आयत्त सुभाषितों के भो दो प्रकार है-- (१) सार्वदेशिक प्रकृतिवाले तथा (२) आंवलिक विशेषताओ से समन्वित इस वर्गोकरण को निम्नलिखिल चित्र के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है -- भामर' गा-गाकर नाचले का लोक-मनोरजन मिथिला में आज भी प्रचलित है। यह नृत्य ही नही गीत भी है अतः इसे 'नृत्य गीत के मातर्गत रखा गया है। द्रष्टव्य बेनीपुरी, पद-२२२ | ३. बड़ी, पद-१४, ४. सुख सुखराति सब का मेला में दुखलाल सोमामि दश गेन 11३।। --(बेनीपुरी, पद-२०८) विद्यापति को लोफोनिया लोक-साहित्य से गृहीत, शिष्ट माहित्य से हत on- सार्वदेशिक प्रकृति की, आबलिक, - सार्वदगिक प्रकृति की लोकोक्तियो के उदाहरण ये हैं --१. गेल जउवन पुनु पलटि न आबए, केवल रह पचतावए, २. जे अनुपम उपभोग न आबए, की फल ताहि निहारि, ३. जे कर माहस ता हो मिधि, ४ दूधक माँछी दूती भेलि तथा ५. से नहि बिचल जकर जे जाति । 'पदावली' की आंचलिक लोकोक्तियो के कतिपय नमूने इस प्रकार उपस्थित किए जा सकते है.--१. कोआ मूह न भनिए वेद, २. छोट पानि बह-वह कर पोठी बोनहिं जान, ३. जइओ जकर मुह पेच सन, दूसए चाहए आन ('बलनी दूसलक सूप के जेकरा अपने सहस्सर छद'-मिथिला को इस लोकोक्ति से तुलनीय), ४. झीसी कादब भेला बात का बतंगड होना) तथा ५. पूब पछिम नहिं जान। शिष्ट साहित्य से हृत पदावलीय सुभाषितो के कुछ उदाहरण इस प्रकार प्रस्तुत हैं .--१. आगि जारि पुनि आगिक काज (गायासमगती, २१६३ तथा सिद्धहेमशब्दानुशासन, ६।३४३१२ में गृहीलो, २. दरं जानिजागिल बाज (चारुदत्तम्, अंक २ में उपलब्ध), ३ कुदिना हित जन अनतिरे धिक जगत सोभाब ( गारशतक, ३१, हेम-व्याकरण, ४।४०६।३, चारुदसम्, १५ आदि से), ४. रोपि न कादिर विपहुई गाछ (कुमारसभवम् , २१४५ मे) ५. हाथक कॉगन अरसी काज (कपूरमजरी-१ तथा पर्यापद, ३२ से)। -- तथा मिश्चय ही पदाइली' के सुभाषिता का एक प्रमुख स्रोत लोक या लोक-साहित्य है। लोकोक्तियो के विशाल मौखिक साहित्य से प्रभावित होने वाले विद्यापति की अनेक लोकोक्तियो मे जन सम्कृति रूपायित हुई है । इन कहावतों का लोकतात्विक अध्ययन करने में नामाजिक जीवन के अनेक पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है। विद्यापति की इन सुत्तियो में लोक-ज्ञान, व्यवहार-ज्ञान और जीवन के मार्मिक मत्यों का आकलन प्राप्त होता कवि ने मुख्यतः लोक-जीवन की कृत्रिमता और जीवन की तिक्तता' के अनावरण के लिए ही जीवनानुभवो मे संपृक्त लोक-सुभाषितो की योजना की है। इन सदुनियो के प्रयोक्ता विद्यापति महज ही एक ऐसे नीति-कवि के रूप में दृष्टिगत होते हैं जो जीवन की अयंगतियो और कुरूपता के समर्थ समीक्षक का दायित्व-निर्वाह करते है 'पदावली' की कहावतो के अनुशोलन से यह स्पष्टन विदित होता है कि इनमै लोक-मनोविज्ञान की अद्भुत परख के गुण सपुष्टित है।४ इस प्रसग में यह भी ज्ञातव्य है कि कवि ने कहावतों की कोरी उपदेशप्रवणता को अनेकत्र काव्यात्मक सौंदर्य के कलेवर में ही प्रस्तुत किया है। लोक-सस्कृति के चित्रण की दृष्टि से विद्यापति की लोकोक्तियो में लोक-व्यवसाय और लोक-विश्वास से सबद्ध प्रभूत सामग्नियाँ प्राप्त होती हैं। वाणिज्यजगत की प्रकृति की परिचायिका इन उत्तियों में लोक-मानम की स्पष्ट प्रतिच्छाया देखी जा सकती है-- -- - १. आदि अंत नहि महर पसार । २ आरति गाहक महम बेसाह । ३. आडम्बर श्रादर हो मब तहु ।-(वि० प० । न० गुरु | पृ० ५५०)। आनक बेदन नद अम आन, कुदिना हिनजन अनहित रे थिक जगत मे भाव, धनिकक आदर सब तहँ होय, निरवन बापर पुछ न कोय यक टा अगि बम पानि आदि। विद्यापति की असंचलिक लोकोकियों को इस प्रसंग में देखा । कता है- कुम्भी जलकर जेहन पिरीति, नख छेदन के लाब कुटार, पिपिडी को जजो पॉखि जनमए अनल कराठ झपान, बानर कैग की मोनिमार, बानर मुह की सोभर पान, सिधारका जनो मांग जनमय गिरि उपारए चाइ, हम नहर के विषहु अागर हो दछु का विक भान आदि । मिव जमो जनि निस्थने निधि पाए खन हरप खन राख भपाय, निरचनको जो धन किछु हो करए चाइए उछाह प्रादि ।

( १५ । ३.पएले रतन अधिक मुल होए । ४. मल राष वनिजारा। पहली उनि में बाजार के उतार-चढ़ाव का सटीक अध्ययन है तथा परी कता के मानस पर प्रकाश डाला गया है ! तीसरी जति मे माहुकार : इस प्रवृत्ति को विश्लिध किया गया है कि वह विक्रय की सामग्री को दबा क दुर्लभ बना देता है जिसमे उसकी कीमत ऊपर की ओर भागनी है। आधुनि पुंजीपति भी होडिङ्ग' के इम मिद्धान्त के कायन्न है। इसी तरह चौथ कहावत में भी व्यापारी के ही मनोविज्ञान पर प्रकाश डाला गया है कि व अपने मूलधन पर अत्यंत चौकस रहता है। मिथिला में इस उक्ति से मिलती. जलती एक और कहावत चलनी है -'मूर पलनाचे गाव ।" विद्यापति को कतिपय कहावतों में जुलाहा, तेली, कुम्भकार आदि के व्यवसायो और कार्य-कलापो के लोकतात्विक लकेत भी मिलते हैं जिनसे मिथिला के लोक-जीवन के चाक्षुप बिंब उभर कर सामने आते हैं।' 'पदावली' की लोकविश्वासमूलक कहावतों मे शकुन, तंत्र-मत्र आदि के जो लोक-तत्त्व प्रकट होने है वे 'लोकवार्ता' के प्रमुख प्रतिपाय ही है। पीछे हम विद्यापति को उन मूक्तियो पर विचार कर चुके जिनमे बनिया की बोहनी के शकुन, अकेले तारे को देखने के अपशकुन, छींक से यात्रा बिगड़ने के विश्वास तथा मर्प विष से सम्बन्धित अनुश्रुतियों के संचयन प्राप्त होते है। 'पदावली के कई सुभापितो में सामाजिक जीवन के यथार्थ की खरी अनुभूति भी पाई जाती है। 'परक दुआरे करह जनु काज । परक दुआरे करिम जो काज, अनुदिन अनुखने पाइअ लाज ।। पाइअ लाज ||"~(न० गु० । पद-३१ )- इस कथन मे पराश्रित मृत्य-वृत्ति की अपमानमूलक कुण्ठा को वाणी दी गई । सामाजिक जीवन में दूसरो के दरबाजो पर डोलनेवालों को प्रताड़नापूर्ण स्थिति को प्रकट करने में यह कहावत पूर्णतः सफल है। मिथिला में इसी भाव को व्यक्त करनेवाली एक और लोकोनि प्रचलित है.---"पर घर खइनी पेटही नाँव। सुतनी मुतनी नौव ॥" "पदावली' की एक अन्य सूक्ति में भी चाकरी की निकृष्टता और चाकर की अतृस सामाजिक दशा का विवरण प्राप्त होता है-~~-'भाड छुइल नहि भरले पेट'-(वि० ५० १ २० भा० परिषद्, पद-६२)। कवि ने यहाँ जुटन मलने पर भी पेट के ओहेमो जाति जोल हा जो ओल धरि नहि उनए सेनो, तेली बलद पान ममा देषिपालब नधि निभाइ, तर सते गरि कार कम्मर आदि पर घर AL नही भरने का संकेत दिया है। इम आंचलिक कहावत का कुलीन पात्र अपकर्म करके भी अपना उदर पोषण नहीं कर पाता है, यह तस्कालीन समाज ध्यवस्था की क्षोभकारी अनुभूति ही है । मिथिला मे इस आशय की एक और कहावत का प्रचलन है -- 'जातो गमइली, भातो न खइली' । 'पदावली' की नारी संबंधी लोकोक्तियों में नारी जाति के प्रति असम्मान-भावना का प्रकटीकरण हा है जिससे तत्कालीन समाज में नारियों की हीन और कथित दशा का पता चलता है।' कहा जा चुका है कि विद्यापति लोक-साहित्य ही नहीं शिष्ट साहित्य को मूक्तियों के रत्नाकर के भी मरजीवा हैं। बे केवल लोक-मुख को संतरण • शील सरस्वती के ही ऋणी नही. नागर साहित्य की सृक्तियो के भी ग्राहक हैं। 'पदावली के कवि ने केवल जन प्रचलित उक्तियो से ही अपने वक्तव्यों को स्पष्ट नहीं किया है अपित्त परपरागत माहित्य की ही हई लोकोपिलवेषी सूक्तियों को भी आत्मसात् कर लिया है। ये सदुक्तियाँ लोकोक्तियों के समान ही जान पड़ती है किन्तु वस्तृतः इनके पुरस्कर्ती विद्यापति के पूर्ववर्ती कवि है। विद्यापति डन चमत्कारप्रवण सूक्तियों को साहित्यिक रिक्थ के रूप में ग्रहण करके अपनी रचनाओं का मण्डन करने वाले है। इन प्राचीन और समानासपूर्व सटक्तियों को विद्यापति ने कही तो पथावत ले लिया है और कही-कहीं इन्हे माजित करके भी ग्रहण किया है। उनका सूक्ति-हरण सदैव और सर्वत्र 'प्रतिबिम्बकल्प' ही नही है, यत्र-तत्र सूक्तिकार विद्यापति की मौलिकता भी दृष्टिगत होती है। 'पदावली' के ये सुभाषित विद्यापति को एक नीति कवि के रूप में भी प्रतिष्ठित करते है। निश्चय ही प्राचीन साहित्य की सूक्तियो का अपने काव्य में सन्निवेश करने वाले विद्यापति केवल अपने काव्य-ज्ञान को ही प्रकट नहीं करते है बल्कि हिन्दी-नीति-काव्य-परम्परा को भी पुष्ट और समृद्ध करनेवाले सिद्ध होते हैं । ‘पदावली' को इन सूक्ति यो मे नीति-काव्य की उपदेशात्मकता तो है किन्तु इनमे सौष्ठव, चामत्व और लालित्य भी कम नहीं है। जीवनानुभवों से संपृक्त इन साहित्यिक सुभाषिनों में केवल चमत्कार और काव्यत्व की ही उपलधि नही होती है बल्कि विद्यापति-पदावली की लोकप्रियता ले इनमें लोकोनियाँ बनने की ममता भी भर दी है। 'पक्षावली' को अनेक साहित्यिक सूक्तियाँ या तो प्राचीन लोकोनियाँ ही है या उनमे लोकोक्तियों के रूप में लोक-जिहा पर चढ़ने की शनि आ गई है। mp4 २ बत चीत बड विपरीत मग केटा पर साल काब हम मल बुझाएल न मुमल अन्तर नारि मादि विद्यापति को लोकाश्रित कल्पनाओं का मूल्यांकन 'विद्यापति-पदावली' मिथिलांचलिक लोक-जीवन के विश्वसनीय चित्रागार की मर्यादा की अधिकारिणी सिद्ध होती है । निश्चय ही 'पदावली' के प्रस्तुत अध्ययन से हम तत्कालीन लोक -प्रवाह की विविध तरंगो से परिचित होते है । विद्यापति के साक्ष्य पर हम ऊँख, करैला, कुम्हड़ा और मूली की पैदावार; कुई, पॉरि और मधुरो पुप्पो, कु भी-कुई से आच्छादित डाबरों; डोड सॉप और अअ, पोठी आदि मछलियों; चोंचा, पेच, बगुला, डाहुक आदि पक्षियो; फूस के छपरों एवं 'फलकी' वाले घरो; कुम्हार, खेतिहर, जुलाहा, तेली, नाविक एवं मछलियो के शिकारी मल्लाहो, बनिया, माली आदि पेशेवर जातियो; चरिजा, जुआडी, फांसी लगाने में दक्ष वधिक, महावत आदि निम्न- स्तरीय लोगो; चहल-पहल से भरे बाजारो; रूपहाट के दलाल; गतयौवना रूपाजीवा एवं कुट्टनी; सूद और मुनाफा पर पलने वाले महाजन, न्यायकर्ता पंच; कानो मे अतिशय आभूषण पहनने मे 'कनलटको' बनो अमीर औरत,' गोदना-भूषिता मुन्दरी; बटमारो; डायन, गारुडी; देवदेवासिनि तथा बन्दूक, 'टना' एक सूप के प्रयोक्ताओं बाली उस मिथिला का प्रत्यक्षीकरण करते है जो जन्म, विवाह, पूजन, युद्ध, श्राद्ध आदि लोक-कृत्यो के आचारो; बाल-वृद्ध विवाह, पर्दा, सती आदि प्रथाओ; वसतोत्सव, होली, सुखरात्रि आदि उत्सवों और नानाविध लोकविश्वासो मे लीन तथा भूमर, रास आदि नृत्यों में जीवन की भांति को प्रवाहित करती-सी प्रतीत हो रही है। इसमें कोई बैमत्य नहीं है कि 'पदावली' के अनुशीलन से विद्यापति- कालीन समाज और जीवन पद्धति पर यथेष्ट प्रकाश पडना है किन्तु ज्ञाता है कि विवेच्य नथ मे लोक-संस्कृति के उपकरणो को यह खोज केवल समाज-विज्ञान, दूबे पटाइजमान नीन, मह में न लेजए करहला नाल 1-(न• गु• पद-६३% ) निडर डर-इर डाक बाहुक -( बेनापुरा, पढ-२००)। पछा सुने प्रभास महादेव जन के लाबेओ कान ।-( परिषद्मावला, ११३)। एका नगर बस मायब है, जनु कर टमारी |- बेनीपुरी, पृ० ८६ )। निडर डर डर डाक डाहुक छुटत मदनबनूक 1-(वनापुरा, पद-२०० )। गरम पनि रह समारन मूप मरि के आन। परिषद पदावली, १८)! १.

( ६ ) इतिहारा ओर लोक विज्ञान की दृष्टिया से हो नहीं की गई है of विद्यापति की इस लोकनिष्टता का साहित्यिक मूल्याकन ही लेखक का मुख्य उद्देश्य रहा है । विद्यापति ने अपने लोक-ज्ञान को 'अविचारित रमणीय' काव्य के रूप मे दालकर जिस परिचयवाहताका प्रमाण दिया है वह उनके साहित्यिक दृष्टिकोण को प्रकट करने वाली है। कायाध्ययन विद्यापति का पटपग करन वला तम्क कवि बनाता है और शास्त्राध्ययन उन्हे परपरावा पाचन काय का त प्रदान करता है कि लाक के अवेक्षण से प्रमागील स्वच्छदतावादा कल्पक का प्रानष्ठा प्राप्त करते हैं। उनके लाक-प्रसून बिवा और प्रताका म आधुनक प्रयागवादियो को तरह नवीनता के वचिन्म नहीं, वरता, प्रभावक्षन मामिकता और ताजगी क उल्लास-जन्य नन्दतिक मूल्ना की उपलब्धि हाता हैं। काव्य और शास्त्र के चबित-चर्वण स ऊब कर कवि विद्यापीत जब लाक भूाम पर मचरण करते हैं तब उनकी प्रतिमा जडा से मुक्त होकर नदान अथ-लाक पदापण करता है और अछूत बिबा का अशव बभव उनक काव्य-कुर भ प्रातच्छ। यित होन लगता है। विद्यापति के अप्रस्तुनो के सात द्विावध ई-शास्त्राय जोर लोकिक । उनक शारीय उपमान कामशास्त्र और काव-परपरा का अनुगमन करनेवाले अयच गतानुगतिक है । लोकान्मुख कवि विद्यापति रूढ़ और परम्परागत उपमानो का अतिक्रमण करक अनेक नजानिराक्षण के आधार पर मा बिबा का चयन करते है। क्लासिकल' उपमाना की तुलना में बहत्तर लोनावन और प्रकात के विविध क्षात्रा ससकलित य नव्ध उपमान कार का मान! मनोवृत्ति के परिचायक है। 6 आमानों का विद्यापति ने काव्याम्पयन आर काव-पारपाटा के अनुशीलन से प्रायत्त किया है। इस तरह के उपमानो के कई सू:-पत्र प्राचीन काव-शिक्षा-परम्परा क ग्नस्था में रहे होगा. जिनमें स कुछ तो लाज उपलब्ध हैं ओर बहुतेरे लुम हो चुके है । इन लामा की दवन से पता चलता है कि इनसे बुभूषु कवियों का बहुत उपकार होता रहा होगा। विद्यापति के समक्ष एमा : तालिकाएं रही हो. सम्बर अयाग उनका रचनाओ म दखा जाता है, किन्तु यह विद्या सहारमा मूल्य-माना है कि इन निश्चित और पानिष्ठित अप्रस्तुती का जालकासग से उसन्यन करने में वे अपने कवित्व की इयत्ता नहीं समझा हैं ! बम लय अनीभज्ञ नहीं हैं कि साहित्य म परसरामा उपमानो को अपेक्षा नवान हृदयावजक कल्पनाश्री बरहरू र हाना है और कवि-स-प्राधा' लिबिया एव ताक की पुनरुक्तियाँ अयस्कर नहीं होता है- 'पदावरी के पाठकों से यह छिपा नही । कि अपने कई पदों में लोक-जीधन से अस्पष्ट चित्रों के नयनकर्ता विद्यापत्ति घिसे-पिटे अप्रस्तों की तालिकाओ का प्रत्यायन करके अलीपन्धी कवित्व की स्थापना करते है। लोकाश्रित कल्पनाओ के एन विद्यापति परम्परान वन की बचन यता में मत होकर अन्यतम मौलिक कधि की महत्ता की प्राप्ति के लिए स्थापित प्रतिमानों को निम्मार करने वाले वृतटिकान के साहम का प्रदर्शन करने के कारण परवस्सियो के लिए अनी हो जाते है, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। - इस मान्यता में कोई विप्रतिपनि नही है कि लोकपरक मौलिक बिषों के घटक विदापति देवल चित्रवी काथ्य-प्रणेता ही नही अन्न मिट 'अछि साल काव्य-रस से बाणी-मंदिर की बेदिका को प्रक्षालित करनेवाले भी हैं। विद्या. पति की लोकातिल्पनाली में यदि केवल नवीनता ही होतो तो वे आलोचक की आशमा की अधिकारिणी नहीं होती किन्तु हर्ष का विषय है कि कवि की 7 योगगील प्रतिभा सहजता और मामिकता को ही नहीनता का निकष मानकर चलती है जिसमे तिबोध रस-सिद्धि के विधायक महाकवित्व को निT- दन स्वत हो जाता। इस प्रसंग में यह भी ध्यातव्य है कि विद्यापति की प्रतिभा जब जीवन के वैषम्य और अनौचित्य की आलोचना के लिए कृतसंकल्प होती है तब वह स्वभावत लोकाभिमुखी हो जाती है। बेमेल विवाह कुट्टनी आदि के वर्णन- क्रम में तो लोकचेता विद्यापति सामाजिक जीवन की निन्द आलोचना करते ही हैं किन्तुप्रणयादि इतर संदों में भी औचित्य का उल्लंघन देवकर वे लोक- उपमानों और लोकोक्तियों के द्वारा उनकी कान्तासम्मित' ताना को तत्पर हो जाते हैं। वे जब व्यंग्य करने की मनोदशा में होते हैं सब बेधक लोक प्रती की भाषा मे ही अपने वक्तव्यों की सुस्पष्ट और प्रभाव-पुरम्मर प्रस्तुति करते है, यह एक प्रत्यभिज्ञय तथ्य है। विद्यापति जब किमी दुराण-पन्न दोषावह व्यक्ति को दूसरे की कदर्थना करते देखते हैं तब इस अनौचित्य से क्षुब्ध होकर 'पेच' पक्षी तथा डाबर की कुई के चित्र मामने ले आते हैं । पेच जैसे कुरूप और हास्यास्पद पक्षी का समानधर्मा व्यक्ति दूसरे का दुषण करने का अधिकार नही रखता है; उमे सबसे पहले आत्मालोचन करना चाहिए, किंतु विद्यापति इस लोक-मनोवृत्ति नामो बार मुझ पेच सन दूम चाय भान अपनुक देह , १ ३ को जानते हैं कि लोग अपने दोष को अपने नही देखते हैं अपनहु न देखि मधमय अपना टेटर अपनी खो में अलक्षित ही रहत है। कमल-दूपण-रसिका कुई के लोक-संपृक्त बिज के द्वारा भी लोक-जीव के इम साहनीय प्रसंग का हो अख्यान पदावली' से प्राप्त होता है। डाब की कुई यदि झील के कमल की निंदा करती है तो कवि का औचित्य-बोष आहत हो जाता है। कौलीम-गर्व के कवि विद्यापति जन्मजात नीच के द्वारा जन्मजात उच्च की धनना में सामाजिक जीवन के भनित्य का अनिकमा देखकर अपनो काव्यात्मक खीझ को प्रकट करते हैं। विद्यापति को जब क्षुद्रजनो के मिथ्याभिमान पर वोट करने की इच्छा होतो है तब वे विषगर्वस्फीत डोला, पंखवाली चीटी, पर्वत उखाने के तथा स्वरूप जाल मे भी चहचहानेवाली पोटी मछली के कोक प्रतीको को योजित करते हैं जिसमें उनके मध्य में अत्यंत ही मनोरम वक्रता का मनिवेश हो जाता है। इसी तरह मानव-प्रकृति के पारही महा.. कवि भद्र-भजक गिगन-चरित्र की अमंगति और अनौचित्यमूलक क्षुद्रता के भिरसन के लिए मन्व-मुम्वार्थ पटोर को काट देनेवाले झीगर के व्यग्यात्मक लोक. प्रतीक' का रमात्मक विचार करके शिवेतर' के क्षय से सबद अपने लोक- मंगलबादी शिकोण को उदासित करते है । 'उचितान वित-विवेक' से रहित व्यक्ति पर विद्यापति का जमडा हुआ आक्रोश प्राय आंचलिक लोकोक्तियो के माध्यम से फूट उठता है। काँच- कंचन, गजा-रत्न और नीर-क्षीर को एक ही पलड़े पर तौलनेवाला अविधेको अब उनके भय का पात्र बनता है तब वह उनके मूक्ति-वथन के कौशल से निश्चय ही मर्माहत और लजित हो जाता है । कुपात्र की प्रतिष्ठा भी उनके अनुसार अनौचित्य ही है जिपके उपहास के लिए वे मौक्तिक-माल्य पहने एन 1. वि०प ०० गु० | प:४७७ । विपिडी को जो पानि जनमण, अनल रिए भापान |--[न P० ५६ ११ मिश्रारको जनो माग जना, मिरि उपा.५ बाद ! --~-10 गु० । पद-~-२४। छोद पानि च - वह कर पाटी, के न जान । मुख मुग। गुरमीद पटोर ।। कॉन मंचन में जाना मूल । गुजर रतन करणे. समतल i/४|| से किछु कसु नहि कलारम आन । नीर और दुर करए समान ६ बेन पुरी पद ३ ( ११ ) ताबूल से अधर रंगे वानर के लोक-प्रतीक का अवतरण करते दृष्टिगत होते हैं।" मामूली काम के लिए महान् उद्यम के समारंभ में भी 'उचितानुचित- विवेक' का अभाव ही लक्षित होता है । इस पर रमसिक्त फब्ती कसते हुए विद्यापति नख काटने में व्यस्त कुठार का बिन प्रस्तुत करते है ।२ होम करते जब हाथ बलता है तब जीवन की इस उल्टी गगा में विषण्ण होकर विद्यापति शक्कर खाने से टूटनेवाले दाँतों का चित्रांकन करके अपनी जिस रसपेशल आलोचना शैली का परिचय देते है३ वह औचित्य- विषयक जीवन-मूल्यों में ही प्रभावित है। विद्यापति की नायिका और द्रतियाँ जब प्रेम-प्रसंगों में उपालभ देने और व्यग्य करने की मद्रा में भाती है तब लोक-प्रतीको का ताँता ही लगा देना है। उनके अनुसार दुरा प्रेमी तेली के बैल की तरह है जो पालो' का कर्तव्य-भार संभालने में सक्षम नहीं है। आरभ मे इस कुपात्र में ही मत्तात्र का भ्रम हो जाता है किन्तु अन्तत. कार्य को परख से वास्तविकता का पना दलता है। इसी भाँति निष्ठारहित प्रिय के छिद्रान्वेषण-क्रम में नायिका चढ़ल और परवल के तुलनात्मक प्रतीकों की योजना करके नकल एव असल के परिज्ञान में उत्पन्न पश्चात्तापमूलक आत्मालोचन मे डूब जातो है इन सदर्भ मे हम उस नायिका को भी नहीं भूल सकते है जो हृदय के कपटी और वचन के ग्यारे नायक पर 'कुसियार' का आरोप करके अपने उपालंभ का प्रदर्शन करती है। क्षणस्थायी प्रणयानुवध पर व्यग्य करते हुए विद्यापत्ति उसे मूली की सरह भग्न हो जानेवाला प्रतिरादित करते है। इसी प्रकार कृत्रिम, बाहरी और भ्रष्ट प्रीति को वे कु भी-जल-न्याय तथा खर-कुम्हडा-न्याय से अपने व्यग्य- प्रहार का विषय बनाते है। कुम्भी जलाशय के जल पर छाकर भी उससे प्रकृत्या विलग ही नहीं उसके व्यक्तित्व की भ्रष्टता का कारण भी होती है तथा कुम्हडे का प्यार भी फूस के छापर की जीर्णता एवं उसके ध्वंस का विधायक ही सिद्ध होता है । (क) गानर-कठ कि मोतिम माल !' बानर-मुह की सोभार पान || -बेनीपुरी, पद-१७] | (ख) मदा रनन मंद सहि जान वापर मदन मोभर पान || -[वि. प. ११ | रा भा०प० । पद-११२] । नख छेदन के नाब कुलार । ~~~[न गु पद-३८१] ! मौकर खाइते भांगर रत -[न: शु० । पद-४१। - WAHA- १. । wm इसी क्रम में गारनि पर ठिठ ली करत हए विद्यापति कुम्मइ क चोर को अनावश्यक शिन, रूत का लोकक प्रसंग उानिबद्ध करके अपनी परिहास- प्रियता का परिचय देते है। करने की आवश्यकता नही है कि उनको परिहासात्मक प्रवृति से प्रसूत लोकिक बिको मे अकृत्रिम लोक जीवन की महज- सरल उत्फुल्लता की अपूर्व दीप्ति टिगन होती है । अबोध नायिका के शील-हरण पर व्यग्णाभिन गित करते हुए ' मछली' का लोक-प्रतीक लाकर विद्यापति अपने अभिब्य ज्य को अतीय मणीयता प्रदान कर देते है। पदावली के अध्येताओं को यह अविदित ही है कि विद्यापनि के लोक-प्रतीको का माधारणीकरण लोक-जीवन में व्यग्य-भावनकी साहित्यिक अमता और मप्रेषित चित्रो की प्रामादिकता के समीकरण का ही महज परिणाम है। विद्यापति-साहित्य में गतयात्रता रूपाजीवा के शरीर के लिए हाट की सूनी दुकान के सगत प्रतीक और परित्यक्ता पुश्चली के लिए बमबाई की हॉटीक प्रभावाण बिब भी आक्रोश की मनोदशा में ही दिल हए है और इनके साधारणीकुल होने में कोई भी बाधा नहीं है। केवल नारीजनोवित कोप-प्रदर्शन से ही विद्यापति की बिब-योजना का लोकाश्रित स्वरूप दृष्टिगत नहीं होता है बल्कि नारो के व्यवहारों से लब्ध होकर भी वे लोक-प्रतीको की जपलं भव्य जक भाषा में बोलते है। नारी के टेढ़े हृदय के लिए टकुए के लोक-उपमान और उमकी भ-लता के लिए फांसी को रस्सी के चित्र-वारा वे उसके पीडक चरित्र पर शोभाही प्रकट करते है। सुतरां, पदावली' की लोकाश्रित कलानाओं को इस विचिकित्सा से विदित है कि विद्यापति के लोकधर्मी प्रतीक आलोचना, उपालभ, वीक ओर नोक-झोक की कोख से उत्पन्न हा है । उत्पन्न हा है । मनावि जहाँ भी जीवन-रस के विघातक अनौचित्य को देखते है वहाँ के लोक बियो के सयोजन से माहित्यिक सघर्ष छेड़ देते है. फलतः उनका अनौचित्य-दालन का प्रयास रस-मरण का मकाल नियामक हो जाता है। आलम भी अनौचित्य-बोध की हो प्रतिक्रिया है, अत: कवि के उपालभाषित लोक-प्रतीकों में भी औचित्य-रक्षण के उत्साह के कारण अजस्र रसमयता काही संचार होता है । किबहुना, "पदावली" में लोकाभिन कल्पनाओं के विनियोग के उद्देश्य मौलिकता की स्थापना और जीवनगत असंगतियो की आलोचना है, जिनकी परिणति रसवादी मूल्यों की सिद्धि में होती है। साजनि तेजसि वचन रोध } हा सन दिन सोझो करनि माननियाकविरोध । -~{० ५० १५१८४ { रा० मा परिषद मोह लता बदपिन कोर } अने श्रामिकासि गुन ओर । --(वी, पद २०४) amarMam-

វា
ន
T
៦។
Ct9I

Vidyapati Padawali Main Lok Sanskrit Ka Chitran

Author
Dgr. P.k.. Singh
Title
Vidyapati Padawali Main Lok Sanskrit Ka Chitran
File name
Vidyapati Padawali Main Lok Sanskrit Ka Chitran
Text
OCR done
Published
2005/02/08
Publisher
Gramodaya Press Mujaarpharpur
Language
Sanskrit
Pages
75
Library
Hindustani Academy Allahabad
Classification
Language. Linguistics. Literature
DLI number
383071
Barcode
5990010044028.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Digital publisher
Digital Library of India
Rights
In Public Domain
VMLT id
TfBWFizIqZG
Download PDF

Vidyapati Padawali Main Lok Sanskrit Ka Chitran