Adarsh Library, Jaipur
Feyslye
Front matter
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
फैसले
मनहर चौहान
ra
No text on this page.
पा...'urr...!
याण गोगरी भीमामा गराया दिया? पागमा
ग पाया मानदूर करने लिए उगने time
नारो पना पार गरे भने गिरको एरलगाया।
अगरीसपिरोएरएर मग एंट गई।
जोधला दोर हा पा, पर दीपना होकर जाने मगा। ध.
भीमा पाम पार जगने
मामी।
भीमापो पर भी पामममानिने गरी पार पर भागोगी।
ग पार पीरी गारदिवाई दी। भीमा मेमोnि-Ti:
पारदीवार...रामीरामप...ना मरा...।
रहा है भीमा ? पहा पाया
पुण्यार माला। भीमापो भारपा-मागे नही मा
मनानागार पर माले पारगोगमा मरेपनि
पाररि...पालामार माना।
भोर. मग! free nirmisएगा.रिगगे भीगारी
रसार गनी पी पी माम अनुनही, भाri
-
: फैसले सकी तुलना में वह युवक छडूंदर से ज्यादा कुछ नहीं था। लेकिन उसी छडूंदर ने भीमा की वह गत बनाई थी कि...। पीड़ा और अविश्वास से भीमा का अंग-अंग एक बार फिर सिहर गया। बॉक्सिग! भीमा और उस छडूंदर के बीच वॉक्सिग हुई थी। कितने-कितने लोग आए थे बॉक्सिग का वह समारोह देखने । उतने-उतने लोगों की मौजूदगी में भीमा हार गया था...कितनी करारी हार...अखाड़े में भीमा बेहोश हो गया था. .... - उस छरहरे युवक में ऐसी अद्भुत स्फूर्ति थी कि भीमा चकाचौंध हो गया था। कई बार तो यहां तक लग आया था, जैसे उस युवक के दो नहीं, दस हाथ हैं। दसों हाथों से वह भीमा के मोटे चेहरे पर दनादन वार कर रहा है...खून...भीमा का चेहरा सन गया था...ऐसा नहीं कि खून अकेले भीमा का ही निकला हो । उस युवक को भी भीमा ने खून से सान दिया था, लेकिन बेहोश कौन हुआ? भीमा कि वह छछूदर ? आंखें खोलने के साथ सब धुंधला-धुंधला क्यों नजर आया था-भीमा समझ गया...भीमा की वेहोशी पहली बार दूर हुई है...अखाड़े में बेहोश होकर गिरने के बाद भीमा ने पहली बार आंखें खोली...अस्पताल में ! सूना, चकाचक सफ़ेद कमरा ! दवाओं की गन्ध...डरावनी खामोशी...! भीमा ने गहरी सांस ली। खूब गहरी सांस । अपना तमाम चेहरा उसने एक बार फिर छूकर देखा। पट्टियाँ-ही- पट्टियां। जो दरवाजा आंखों के सामने ही था, वह खुलने लगा। एक नर्स प्रवेश कर रही थी। सौम्य, भीमा ने कराहट-भरे स्वर में कहा, "सिस्टर...!" भीमा ने न पुकारा होता, तब भी वह उसी की ओर बढ़ रही थी मुस्करा रही थी वह । बोली, "तो...आप होश में आ गए...नहीं, नह उलिए नहीं, लेटे रहिए...अभी आप काफ़ी कमजोर हैं।" । । मधुर नर्स। ,
मगर !
भीमारग मुगारा दिला भीमा पहनात भारतीय
मगर मापनी गरमानसिपाश्मिी।
मेरिन पग पमुष भीमापोमानी रण-रम में बोरीमागम नही
होनीपी ? उम पर ने भीमा केरल पहरे गोही,तभार रगे
पोगररपतिा था।
"गर महो?" भीमा परण में मानी मातार भी मी
तापमगर महामाकिमान गरीर।
"गर पाने...
"मेरे गादी-रामनेर.मेरा मितर...." मीमा गमता।
" ममी-अभी गए। भार तर होग में नही। मामटे मे शिर
मोग, ऐनामा" नर्गनी।
भीमा पर ना पाहापा, मदुन लिना मर रोग
सा?'-fr
नुमा परिमन ने मारा रियर काही प्रपात
गमरमरगा गो श्रीमान र माला।
भीमामही मान परपनना पारिएरिगतिनगदी पिता
होगा।
जानता पानी मिनट में उमेर मारगर
गुराग नही समस्या निर पर ती पटिनोपा
मरनी।.....
वि भीमा कोपी मानगर पमना frefraरतो....
भीमा डों पर रि दुसान मारे मनो-ने-
नाभीन्दार लिना नगनी-mimt
गिटा..."मागिरम पापा. दोपही "gi
पटी पर निमो?"
नगरिमरकर मुगाई, मी गपसी कीमोपने गये भी
नोमारोगीमार।"
'शिसभी...?"
"Frieोगी। होमसोर
: फैसले की इजाजत कब दी जा सकेगी।" "मोके, सिस्टर..." भीमा का तापमान लेने के वाद नर्स चली गई। तब-~-डॉक्टर ने प्रवेश किया। भीमा ने वही सवाल उससे भी पूछा। जो जवाब मिला, वह बहुत निराशाजनक नहीं था। भीमा को 'घर' जाने की अनुमति तीसरे दिन मिल जाएगी। घर! डॉक्टर के मुंह से यह शब्द कितनी सहजता से प्रकट हुआ! लेकिन- कहाँ है भीमा का घर? भीमा तो शहर-शहर भटकता है। अपने मैनेजर और प्रशिक्षक के . साथ । केवल शहर-शहर ही क्यों ? विदेशों तक की खाक छानी है भीमा ने । भीमा जैसे लोगों का कहीं कोई ठोर नहीं हुमा करता...! लेकिन कहीं तो होगा न घर? नाते-रिश्तेदार ? सगे-सम्बन्धी ? हाँ । यदि यों सोचें, तो भीमा का भी है एक घर। भीमा ने उस घर को छोड़ दिया-ताकि उसे आवाद रख सके। भीमा के चले जाने पर ही वह घर आवाद हो सकता था-हुआ था। मिर्जापुर...यही था वह शहर, जिसे भीमा अपना शहर कह सके। था या है ? शहर तो अव भी है...लेकिन क्या वह भीमा का है ? नहीं। है नहीं- था। किसी ज़माने में था,जव भीमा ने उस शहर की मिट्टी को अपने अंग- अंग में सानते हुए पहलवानी शुरू की थी। लेकिन जब से भीमा ने पहलवानी को धन्धे के रूप में अपनाया, मिर्जापुर को छोड़ ही दिया उसने । केवल अपनी बह्नों की शादियों के समय गया है वहाँ । गया भी इस प्रकार है कि कम-से-कम लोगों को पता चले- भीमा आया है। "शुक्रिया, डॉक्टर...!" भीमा ने कहा, "वैसे, यदि बाप दूसरे दिन... याने, कल ही जाने की इजाजत दे सकते, तो...." "जाने के लिए इतने उत्सुक क्यों हैं आप?" । -
तेसा शेरन में भी रोकारनही मारेला तरबार
होनहो कि सिरे में भी कई। मोरने के लिए से पह
शेचरगाह, हेरिन...सोपार, पापोसाक लेना...सारको
पर मेरेर होला मारेकम है।"मोसोला।
औस्रने मुसराबर हिलाया, "मस एस, आयसमा में
मोरे साहो..."
मल रिसे संपररूपा। इसके बारहोगहरूमा कि...अभी
कारहारायसे।" रिटरने कहा।
रिसलेने से पहले रोस्टर मीना मोमोलोसों में समोरोपनी
पर निरोशप रिश। फिर मौज- केरेनों एक पाई
निकाला और एक रंगोओरतो र पु"माए, यह
नकार है। और रोका और सोफे "
हॉस्टर पलासा और मोका सोपने मना, सौषों को कोच काका
-
अपने कमरे से सहा भोला ने खुसर-पुत्तर होने वाभास पार।
अगले सपा फिर खुला और पाताल तल दिलाई दिया।
पापस । फोकामा मोबर। विभिन्न स्लो में भीमा का स्थान
निषित करने और उनसोको बार मे भीमा काहिस्ता तिना हो.
तिमाहवार खो बाला-खो शेती करने वाला समरित।
गरे पर पाक पिरमरबहा रह गया । भीमा पर उसो गवर
तेरिसर होने लगो, गोवा रह भीमा को नही, शिसो और को धरहा
निगाह मिलने हो भौमा ने मुस्कराणा पाहा।
तरले परल मुरसराहा हो, इस तरह पापा भी मुसार
एगासागरमागे सारा।
पमा ने मोहोराला. नहा एक और प्रशस्ति पाहुभा।
हरति भोगावे पर दो पर का। देखता रहा भीगा की ओर।
उसासों में भीमा के लिए भारमीयता और जीपी।से
१० : फैसले पल रुकने के बाद, होले-हौले वह भी आगे आया और भीमा के नजदीक खड़ा हो गया, चम्पक की वग़ल में। यह व्यक्ति था-देशराज ! भीमा का प्रशिक्षक । चम्पक था छरहरे बदन का नाटा व्यक्ति । देशराज ठीक उल्टा था। ऊँचा-पूरा, अलमस्त, पहलवानों जैसा । पहलवानों को प्रशिक्षित करने वाला व्यक्ति स्वयं भी पहलवानों जैसा हो, यह आवश्यक तो नहीं, किन्तु देशराज पहलवानों जैसा ही था। मोटापे के कारण जब वह चलता, तो ऐसा लगता, जैसे समुद्र में कोई जहाज़ डोल रहा हो। अपने प्रशिक्षक से निगाह मिलते ही भीमा ने गहरी शर्म महसूस की। प्रशिक्षक ! गुरु ! देशराज का सिखाया हुआ विख्यात पहलवान भीमा हार गया था...1 किन्तु देशराज की आंखों में जो स्नेह, करुणा और आत्मीयता थी, उस से भीमा की शर्म कम होने लगी। वह बुदबुदाया, "देशराजजी...माफ़ कीजिएगा, मैं...मैंने पूरी कोशिश की, लेकिन.. ।" "कोई बात नहीं। हर पहलवान, ज़िन्दगी में, कभी-न-कभी, करारी मात जरूर खाता है । तो क्या !" देशराज मुसकराया। "लेकिन...मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा कि उस पिद्दी-से आदमी में इतनी ताकत कैसे समाई हुई थी।" भीमा वोला, "उसने मुझे, यो कहिए कि...भौचक ही कर दिया।" देशराज बोला कुछ नहीं। मुस्कराया भर । चम्पक अभी तक चुप खड़ा था। भीमा ने उसकी ओर देखा, "तुम भी मेरे कारण शमिन्दगी..." "नहीं, यार !" चम्पक ने कहा, "कमाल की बात करते हो। इस शामिन्दगी जैसा क्या है ? दुनिया का कोई मैनेजर ऐसा नहीं, जिसका पहल वान कभी न हारा हो।" "तो भी..." "छोड़ो! यह वताओ, अब कैसे हो?" "ठीक हैं। काफी ठीक।" भीमा वोला।
इस पर चम्पक और देशराज एक-दूसरे की तरफ़ ऐसे देखने लगे, गोया भीमा ने जो कहा था, वह सच नहीं था। भीमा ने उनको ऐसी प्रतिक्रिया की माशा नहीं रखी यो। उनकी ओर वह नाश्चर्य से देखने लगा। चम्पक और देशराज ने उनके आश्चर्य को पहचाना। उनके होंठों पर जैसे कोई बात माते-आते रह जा रही थी। भीमा ने पूछा भी, "क्यों ? क्या बात है?" "कुछ नही।" देशराज ने हौले से कहा। "कुछ भी नहीं, यार!" चम्पक ने जोरों से मुस्कराकर कहा। उसकी मुस्कान नकली यी, यह भीमा क्षण-मान में समझ गया। भीमा आशंकित होने लगा। २ काबू में न आने वाली कुमारिका--कुन्दन ! अपनी खूबसूरती, भादगी, स्नेहशीलता और दिलेरी के लिए सारे ब्लॉक में प्रसिद्ध कुमारिका-कुन्दन ! जब वह घर से निकली, बुरी तरह खीझी हुई थी। जिस चर्चा से वह बेहद बेहद चिढने लगी है, वही चर्चा विधवा मां ने साज फिर छेड़ी । कुन्दन तव नौकरी पर जाने की तैयारी में थी। सुनते ही चेहरा तमतमा बाया उसका। मां के प्रति गहरा स्नेह और सम्मान होने के बावजूद उसने कडवाहट के साय कहा, "मैं एक बार 'ना' कर चुकी हूं या नहीं? फिर क्यों बार-बार उसी बात को..?" "हम तो तुम्हारे भले के लिए कह रहे हैं।" मां ने उत्तर दिया। यह वाक्य मां न जाने कितनी बार कुन्दन के कानों में उड़ेल चुकी है...! कुन्दन ने भी ऐसा वाक्य कहा, जिसे वह न जाने कितनी बार मां के कानों में उड़ेल चुकी थी, “बच्ची नहीं हूँ। अपना भला-बुरा बाप तय कर सकती हूं।" मिन्ना कर मां सामने से हट गई थी। हटते-हटते वुदबुदाई थी वह, १२ : फैसले ३ नौकरी क्या करने लगी, पर निकल आए हैं।" 'ये पर ही मेरी रक्षा कर रहे हैं।' कुन्दन ने मन-ही-मन कहा था, 'नोकरी न कर रही होती, तो कब की उस बूढ़े के गले में बांध दी गई होती। जैसे मेरे कोई अरमान ही नहीं। वह जमाना लद चुका, जब घर की लड़की गऊ की तरह हुआ करती थी, जिसे जव जिस खूटी से चाहा, बाँध कर छुट्टी पा ली। कुन्दन से लगभग दोगुनी उम्र का एक विधुर है । माँ चाहती है, कुन्दन उसके साथ शादी कर ले । कारण-विधुर महोदय अत्यन्त धनी हैं। सैकड़ों सालों से, हर दूसरे-तीसरे घर में, दोहराई जाने वाली कहानी! किन्तु कुन्दन ने क्या इसीलिए एम० ए० किया कि वह इसी घिसी-पिटी कहानी की पात्र बनकर रह जाए? सवाल ही नहीं। कुन्दन यदि मां के प्रस्ताव का विरोध करती है, तो इसमें कोई अजूबा नहीं है । इसी तरह, मां जिस ज़माने की है, उसे देखते हुए माँ यदि ऐसा प्रस्ताव बार-बार रखती है, तो इसमें भी कोई अजूबा नहीं। इसीलिए कुन्दन और उसकी मां को एक-दूसरी पर खीझना नहीं चाहिए। लेकिन वे खीझती हैं। कुन्दन यस की क्यू में खड़ी हो गई। दिल्ली की बसों की तरह बम्बई की बसें असुविधाजनक नहीं। यात्रियों की अधिकांश भीड़ बिजली की ट्रेनें खींच ले जाती हैं । बसों में इसीलिए बहुत रश नहीं हुआ करता। ट्रेन की भीड़ में भिंचने से बेहतर कुन्दन को यही लगता है कि बस से यात्रा करे। बस-यात्रा थोड़ी महंगी ज़रूर पड़ती है, किन्तु सुविधा को देखते हुए अखरता नहीं। बस आई। क्यू आगे चली। कुन्दन को जगह मिल गई। सीट पर बैठ- कर उसने आज का अखवार खोल लिया। खीझ के कारण, घर पर उसने अखबार पोलकर देखा भी नहीं था। पहले पृष्ठ पर कई महत्त्वपूर्ण समाचार छपे थे। उनके बीच छपे इस समाचार ने भी वरवस उसका ध्यान आकर्षित कर लिया- सुप्रसिद्ध पहलवान भीमा एक नए पहलवान से बुरी तरह पराजित...! । - कुन्दन पढने लगी। ३ . डॉक्टर ने 'घर' जाने की अनुमति अगले दिन नहीं दी। अगले में अगले दिन भी नहीं। भीमा को छुट्टी देने के अपने 'वचन' को डॉक्टर ने बडी दिठाई के साथ मुस्कराकर तोड दिया। घर याने गेस्ट हाउस। दादर के एक मध्यम श्रेणी के गेस्ट हाउम मे भीमा ठहरा करता-- जब भी वह बम्बई में होता। तीन पलगो का एक अच्छा-सा कमरा वे किराए पर लिया करते । भीमा, चम्पकलाल और देशराज ! कुश्ती के क्षेत्र में नए-नए दांव-पेंचों का आविष्कार करना देशराज के लिए कोई कठिन काम नही था। भीमा को वह नवीनतम दांव-पेंचो से लेस रखा करता । इसीलिए-जहाँ-जहाँ भीमा, वहां-वहाँ देशराज। चम्पक मी-जंसा कि आसानी से समझा जा सकता है-भीमा के साथ परछाई बना घूमा करता । भीमा का आर्थिक व्यवस्थापक जो था ! सब पूर्ण, भीमा की तमाम प्रसिद्धि का थेय चम्पकलाल को ही जाता था। उसी ने भीमा की योग्यताओं को पहचान कर, उसके लिए एक ऐसा बाजार तैयार किया था, जिसकी जड़ें अव विदेशो तक मे फैल चुनी थी। विदेशों में आयोजित दगलों का भी वातावरण, भीमा की मौजूदगी में, एक अजब ही रोमाच से भीग जाता। अस्पताल से छुट्टी मिलते ही भीमा दादर के उसी गेस्ट हाउस के अपने कमरे में पहुंच गया। उसकी पट्टियां खुल चुकी थी, कमज़ोरी विशेष महीं थी, किन्तु डॉक्टर ने अधिक चलने-फिरने की मनाही की थी। भीमा विस्तर मे लेट गया । चम्पक और देशराज दो स्टूल खोचकर उसके नजदीक बैठे। इधर-उधर की कुछेक बातों के बाद चम्पक बोला, "भीमा ! बहुत गम्भीर समस्या हम तीनो के सामने है।" . ।
१४ : फैसले - "क्या ?" भीमा ने पूछा। "डॉक्टर ने 'वॉक्सिग-कमीशन' को जो रिपोर्ट दी है, उसके अनुसार...।" चम्पक हिचककर रुक गया। वाक्य कैसे पूरा किया जाए, उसकी समझ से परे था। "डॉक्टर की रिपोर्ट ? किसके बारे में ?" भीमा ने पूछा "स्वयं तुम्हारे बारे में।" "रिपोर्ट यही है न कि अब मैं पूर्णतया स्वस्थ हो गया हूँ ? उस नौज- वान पहलवान से दूसरी टक्कर लेकर, उसे चारों खाने चितकर देने के लिए मैं अत्यन्त लालायित हूँ।" कहते हुए भीमा ने देशराज की ओर इस प्रकार देखा, मानो उसकी अनुमति मांग रहा हो। देशराज मुस्कराया भी नहीं। चुपचाप उसने निगाह झुका ली। उस दुखद सच्चाई को भीमा के सामने रखने का जिम्मा चम्पक ने निवाहा। उसने कहा, "विश्वास करोगे? डॉक्टर के अनुसार---अब तुम कभी भी दंगल के मैदान में नहीं उतर सकोगे।" भीमा हँसने लगा, "अच्छा मजाक है।" "मजाक नहीं, दोस्त, यह सच्चाई है।" चम्पक ज़ोर देकर बोला, "सचमुच अव तुम्हें 'वॉक्सिग-कमीशन' की ओर से दंगल में उतरने की इजाजत नहीं मिलेगी।" भीमा का हास्य डूब गया। एकदम अविश्वास से वह चम्पक की आंखों में निहारता रह गया। कुछ कहने के लिए उसने मुंह खोला, किन्तु आवाज फूटी ही नहीं । भीमा ने देशराज की तरफ़ देखा-मानो कह रहा हो कि ऐसा फूहड़ मजाक करने के लिए क्यों न चम्पकलाल को कोई कड़ी सज़ा दी जाए। किन्तु निगाह मिलते ही देशराज ने दूसरी बार पलकें झुका ली। देश- राज के लटके हुए चेहरे ने भीमा के सामने स्पष्ट कर दिया कि जो कहा जा रहा था, उसमें मजाक का कोई अंग नहीं था। "ऑक्टर पागल है।" भीमा सहसा विफर गया, "मैं वॉक्सिग छोड़ दूं? पिछले सत्रह सालों से जो काम मैं करता आया हूँ, उसी को छोड़ दूं? आखिर क्यों?"
. "क्योंकि...अभी जो अन्तिम लड़ाई तुमने लडी, उसमे...।" "बोलो, बोलो।" "उसमे तुम्हारे दिमाग पर गहरा आघात पहुंचा है।" "मगर मेरी पट्टियां खुल चुकी है।" "यह आधात अन्दरूनी है। पट्टियो खुलने के साथ उसका कोई सरो- कार नहीं।" "याने ?" भीमा की आवाज़ कुछ थर्रा गई। "दिमाग में, प्रत्येक सवेदन के लिए, अलग-अलग कमरे से बने होते हैं। देखने के संवेदन का जो कमरा है, उसी पर तुम्हे चोट पहुंची है। डॉक्टर को रिपोर्ट के अनुसार, यदि तुमने फिर से दगल मे उतरने का साहस किया, तो यह चोट और भी गहरी हो जाएगी। अभी तुम अन्धे हो जाने से बाल-बाल बचे हो, लेकिन यदि फिर से लड़ने के लिए उतरोगे, तो बिलकुल अन्धे हो जाओगे।" "यह झूठ है।" भीमा को मुट्ठियाँ मिच गई। "डॉक्टर 'वॉक्सिग-कमीशन' के सामने झूठ नहीं बोल सकता।" "लेकिन..." "अब किसी भी 'लेकिन' की गुंजाइश नहीं है, मेरे दोस्त ।" "लेकिन चम्पक, फिर मैं क्या करूँगा?" भीमा का स्वर तप आया था। चम्पक का स्वर बुझा हुआ था, "यही सवाल मेरे सामने भी है।" खामोशी छा गई। देशराज बोला तो कुछ नही, किन्तु वही सवाल उसके सामने भी मुंह वाकर आ पड़ा हुआ है, यह बात उसकी आँखो के निरीह-भाव में साफ़- साफ पढी जा सकती थी। चम्पक ने भीमा को प्रतिष्ठा दिलाने के पीछे अपनी पूंजी पानी की तरह बहाई थी। भीमा के प्रचार के इश्तहार, पत्रकारो को खुश करने के लिए महंगी पाटियां, विशेष प्रतिष्ठा दिलाने वाले दगलों के संचालकों को घूस, सरकारी अनुदान पाने के लिए सम्बद्ध अधिकारियो को घूस...खर्चे के मोरचे एक नही, अनेक थे। स्वय भीमा के पास, गुरू मै, कानी कोडी नही फैसले -- यो। भीमा का जबर्दस्त खर्च...भीमा ने चम्पक से कई हजार रुपए बतौर कर्ज के ले रखे थे--अपनी सबसे छोटी बहन की शादी के लिए...वह तमाम वोझ चम्पक पर ही तो आया था। और...देशराज...देशराज की खोज किस ने की? भीमा के लिए देशराज को नियुक्त किसने किया? विदेशों की सैर के समय देशराज को भी साथ किसने रखा? जहां तक आर्थिक नुकसान का प्रश्न था-चम्पक ही सबसे ज्यादा लुटा हुआ दिखाई पड़ रहा था। गणित के सवाल की तरह, यह तमाम जोड़-घटाना, भीमा के मस्तिष्क में क्षण-मान में, सनसनाकर रह गया । यह सोचना भूल होगी कि देशराज किसी नए पहलवान को ढूंढ़ लेगा। यह भी सम्भव नहीं कि चम्पक को कोई और पहलवान मिल जाएगा। मिलने को तो एक नहीं, अनेक पहलवान मिल सकते हैं, किन्तु-भीमा जैसा पहलवान ? प्रतिष्ठा और धन दिलाने वाला पहलवान ? ऐसा पहल- वान, जिस पर जनता जान छिड़कने लगी हो ? मनुप्य उम्र कोई बहुत लम्बी नहीं। देशराज और चम्पक उम्र के उस दौर को पार कर चुके हैं. जब वे किसी नए पहलवान की तलाश करें, उसे प्रशिक्षण दें, उसे नए सिरे से पूरी प्रतिष्ठा दिलाएँ । उन्होंने भीमा की तलाश की, प्रशिक्षण दिया, प्रतिष्ठा दिलाई। अव उनका सारा खेल भीमा पर ही आधारित है। भीमा हार गया, यह कोई शर्मिन्दगी नहीं। हर पहलवान, कभी-न- कभी हारता ही है। प्रतिष्ठा, कुछ दिनों के लिए, नीचे गिरती है-किन्तु वही पहलवान जब फिर से जीतता है, तो प्रतिष्ठा वापस मिल जाती है। पिछली हार को भूल कर लोग नई जीत को ही अपने मन में वसा लेते हैं। पहलवान पर वे नए सिरे से जान छिड़कने लगते हैं। हार का मतलब यह नहीं कि वेल हमेशा के लिए खत्म हो गया। किन्तु डॉक्टर ने जो रिपोर्ट दी है, उसके अनुसार तो... भीमा का सिर घूम गया सोचकर। चम्पक यया करेगा? भीमा से अपनी रकम की वसूली कसे कर सकेगा वह ? और देशराज ? इस भारी-भरकम व्यक्ति के दुर्बल हो जाने में ज्यादा दिनों की देर नहीं। "चम्पक...अब क्या होगा?" भीमा ने बुदवुदाकर पूछा। केवल चम्पक से ही नहीं, इसी सवाल को मानो वह मारी दुनिया से पूछ रहा था। और दुनिया का कोई व्यक्ति, ताबड़तोड़, कोई जवाब नहीं दे सकता था। "हमें कुछ करना होगा..." आखिर देशराज ने मौन भंग किया, "हाथ- पर-हाय घरकर बैठने का क्या अर्थ ? तुरन्त कुछ सोचना होगा। समस्या हम तीनों की है। तीनो का दिमाग लगना चाहिए।" किन्तु तीनों में से किसी का दिमाग काम नही कर रहा था। "पता नहीं, मैं कैसे उतनी चोट खा गया...!" भीमा ऐसे बुदबुदाया, मानो उससे कोई अपराध हो गया हो। देशराज ने सान्त्वना दी, "इसे दुर्घटना ही कहा जाएगा और दुर्घटनाओ पर किस का बस होता है ?" तीनों दोस्त चुप हो गए। उनको पक्की दोस्ती में दरारें पड़ने का खतरा पैदा हो गया था। यह खतरा उन्हे बडे वीभत्स ढंग से डरा रहा था। चुप्पी के बीच, चम्पक सहसा उठ पड़ा। कमरे का दरवाजा खोलकर वह बाहर निकलने लगा। भीमा और देशराज मे से किसी ने न पूछा कि चम्पक कहां जा रहा था, क्यों जा रहा था... केवल चम्पक ही जानता था-अब उसे कहां जाना होगा। ४ क्षमा याचना...चम्पक को अब क्षमा याचना करनी होगीली हू के सामने। ती हू से पहला परिचय कब हुआ, चम्पक को ठीक से याद नहीं। चम्पक और ली ह अपने-अपने क्षेत्रो को गुरु थे और गुरुओ का मेल अना- मास हो जाया करता है, भले ही वे अलग-अलग क्षेत्रो मे दखलए सम्पक यदि पहलवानी के क्षेत्र का गुरु था, तो लो हू या सद : फैसले का मुख्यात गुरु । यह एक चीनी आदमी था-इतना गोरा कि एक बार तो यही लगे, इसे ल्यूकोडर्मा का रोग तो नहीं ! चीनियों की आंखें सॅकरी होती ही हैं, तिग पर ली हूँ की आँखें तो और भी ज्यादा सेंकरी थीं। यही लगता कि भौहों के नीचे एक-एक लकीर खिंची हुई है...किन्तु वे दो लकीरें भयंकर थीं। राट्टे के क्षेत्र का गुरु यदि भयंकर आंखों वाला न हो, तो उसका काम करो चले ? ली हू का कद, जैसा कि अनुमान लगाया जा सकता है, नाटा था। वह एकदम गंजे सिर वाला आदमी था। उसकी आवाज़ औरतों जैसी पतली थी, किन्तु वही आवाज बम्बई के अनेक कुख्यात गुण्डों के दल का सफलतापूर्वक संचालन करती थी। दंगल में भीमा हार गया, उससे गोवल एक दिन पहले, एका रेस्तोरां में, ली हू और चम्पक की मुलाकात हुई थी। वातोंबातों में ली हू ने कहा था, "चम्पक, तुम्हारा पहलवान इस बार हार जाएगा--देखना।" "असम्भव !" चम्पक पूरे आत्म-विश्वास के साथ बोला था। "दुनिया में कुछ भी असम्भव नहीं है।" "यह वाक्य तो नेपोलियन का है। तुम हो नीनी । चीनियों के मुंह से मैं फेवल माओ के वाक्य सुनने की आशा रखता हूँ।" चम्पक ने व्यंग्य कर दिया था लीह पर। नी ह व्यंग्य को हंसकर टाल गया था, "चाहे जो कहो, तुम्हारा पहल- वान इस बार जरूर हारेगा।" "उसकी टक्कर एक पिद्दी पहलवान से होने वाली है ।" चम्पक का उत्तर था, "यदि तगड़े पहलवान से होने वाली होती, तब भी मैं यही कहता कि भीमा हारने वाला नहीं।" लेकिन मत भूलो कि भीमा की उम्र अब काफी ज्यादा है। वह केवल देराने में ही मोटा-ताजा है। उसकी टक्कर एगा नौजवान से होनी है। नौगवान उसका भुरपास निकाल देगा।" भीमा अभी हातो नहीं हुआ।" चम्पक ने दाँत पीसे थे। "गुस्सा क्यों होते हो, प्यारे !" ली हू मुस्कराया था, "चाहो तो शर्त ।
"मैं सट्टा नहीं खेलता । धन्यवाद ।" "यह सट्टा थोड़े ही है । यह केवल शर्त है । मैं सट्टे के क्षेत्र में न होता, तव भी ऐसी शर्त तो किसी के भी साथ बदी जा सकती थी।" ली हू ने दलील दी थी और चम्पक ने हामी भर दी थी। "अच्छा, ठीक है..." कहा था चम्पक ने, "यदि मेरा पहलवान हारा, तो मैं तुम्हें पांच हजार रुपये गिन दूंगा। ठीक विपरीत, यदि भीमा न हारा, तो" "तो मैं तुम्हें पांच हजार दूंगा।" "मजूर।" "चम्पक, यदि चाहो, तो इस शर्त में हम थोडा संशोधन भी कर सकते "क्या ?" चम्पक की आँखें ली हू पर ठहर गई थी। ली हूँ मुस्कराया था--जैसे चम्पक को मूर्ख बना रहा हो। बोला था, "ऐसा है, तुम शर्त ऐसी न वदो कि भीमा हारेगा या जीतेगा। शर्त इस तरह रखो कि भीमा ज्यादा-से-ज्यादा कितने राउड हारेगा, क्योकि...हारना तो उसका निश्चित ही है।" चम्पक को यह बात बड़ी अपमानजनक लगी थी, किन्तु ली हू के स्वर में जो दृढता थी, उमने चम्पक को हिला दिया था। जिस पिद्दी पहलवान से भीमा भिडने वाला था, उसका पूरा इतिहास चम्पक को मालूम नहीं था। शायद ली हू को मालूम है। तभी तो वह इतने विश्वास के साथ शर्त बदना चाहता है। चम्पक तो केवल उस पहलवान की काठी देखकर ही अन्दाजा लगा रहा है कि उसमे कितनी औकात होगी। तेकिन क्या, कभी-कभी, देखने मे कमजोर लोगों में भी इतनी ताकत नही हुआ करती कि...? आँखें सिकोड़कर चम्पक ने ली हू की ओर देखा था। ली हू फिर से व्यंग्य-युझी मुस्कान मुस्करा दिया था। अन्त मे शर्त इस प्रकार रही थी- चम्पक ने कहा था, "भीमा हद-से-हद चार राउड हारेगा।' और ली हू ने कहा था, 'कम-से-कम छः राउड हारेगा।'
२० : फैसले - - और भीमा? वह पूरे सात राउंड हारा वाने-~-चम्पक को ली हू के चरणों पर पाँच हजार रुपये रख देने होंगे । कब तक ? शर्त वदते समय मियाद तय कर लेना किसी के ध्यान में नहीं रहा था। अब, चम्पक को जाकर ली हू से क्षमा याचना करनी होगी, क्योंकि वह ताबड़तोड़ पांच हजार का इन्तजाम नहीं कर सकता था। क्षमा- याचना किए बगैर ली हू मियाद देने वाला नहीं। कितनी मियाद देगा वह ? सात दिन ? दस दिन ? एक मास? किन्तु उससे भी बड़ा प्रश्न था- मियाद वह देगा भी या नहीं? यदि उसने मियाद देने से इन्कार कर दिया ? चम्पक को कुछ सुझा नहीं कि उस सूरत में उसे क्या करना होगा...कि वह क्या कर पाएगा... चम्पक के पास, बैंक में मुश्किल से पांच सौ रुपये होंगे। सियान...वम्बई की खूबसूरत उपनगरी! उसमें ली हू की एक छोटी- सी कोठी थी। ऊंची-ऊँची अटटालिकाओं के बीच बैठी हुई कोठी, जो उन अट्टालिकाओं को जैसे हमेशा चिढ़ाती रहती। चम्पक ज्यों-ज्यों उस कोठी के नजदीक पहुँचा, अपने पैरों में उसे कमजोरी का एहसास बढ़ता महसूस हुआ। "हलो, चम्पक !" औरतों जैसी बारीक आवाज़ ने चम्पक को बुरी तरह चौंका दिया। क्षण-मान में समझ गया वहली हू की आवाज़। उसने फौरन पलटकर देखा । कोठी आने से पहले ही, बीच सड़क पर ही, ली ह से आमना-सामना हो गया था। सहप-किनारे के एक लैम्प-पोस्ट के नीचे खड़ा था ली है। सिर के ऊपर जलती ट्यूब-लाइट के कारण ली हू का गंजा सिर चमक रहा था। लकीरों जैसी उसकी दो आंखें चम्पक पर उसी तरह ठहरी हुई थी, जैसे कीड़े पर छिपकली की आंखें ठहर जाती हैं। अपनी झुरझुरी पर काबू रखता हुआ चम्पक आगे बढ़ा, तालिी हू के नजदीक पहुँच सके। लीहू मुस्करा रहा था। पम्प ने भी मुस्कराना चाहा, किन्तु सफल न हो सका । उसने सहना ध्यान दियाली हू अकेला नहीं है। दो अलमस्त गुंडे भी खड़े हैं उसके अगल-बगल । दोनों के हाथ छाती पर मुड़े हुए हैं। दोनों के जैकेट लाल रंग - के है। सतरनाक चटन लाल रंग! "मैं आप ही से मिलने जा रहा था।" ली हू को हमेशा 'तुम' यहकर पुकारने वाला चम्पक इस वार 'तुम' न कह सका । चम्पक की आवाज धीमी थी। "मुझे यही आशा थी।" ली हू हेमा । वह बिलकुल मुद्ध हिन्दी बोल राता था। गुजराती और मराठी भाषाएँ भी वह बहुत अच्छी तरह जानता था। अपने सतरनाक आदेशी को वह हिन्दी, गुजराती, मराटी, अंग्रेजी और चीनी, किसी भी भापा में गुंगा सकता था। "मैं...मैं आपसे यह पूछना चाहता था कि....?" चम्क हकला गया। ली हूँ इस प्रकार वाला, गोया उगने चम्पक की आवाज़ गुनी ही न हो, "तुम्हारा पहलवान हार गया, चम्पर ! भविष्यवाणी मेरी मही निरसी, तुम्हारी नहीं।" "हाँ।" चम्पक की निगाहें झुक गई। "तो? लेकर आये हो न पांच हजार रपये ? नकद ?" ली हू ने मीधे मुद्दे पर आते हुए कहा। गहरी सांस लेकर चम्पक ने निगाह उठाई, "मैं इमी मिलगिले में आपमे मिलना चाहता था।" "टीक है । मुलाकात हो गई है । निकाली।" ली हू ने हाय फैला दिया। उसके गोरे हाथ मे हिमालय जैमी दृढता थी। चम्पक की आवाज कांप गई, "में ..कुछ मियाद चाहता या।" "मियाद ?" ली हू ने अट्टहाम किया, "इतने गालों मे नुम भीमा की कमाई में में अपना हिस्सा निकाल-निकालकर बैंकों में जमा करते रहे हो। हमेशा विदेशों के मैर-सपाटे भी करते हो। तुम्हारे माय तो पांच लाख की शर्न वदनी चाहिए थी। मैं चूक गया। सिर्फ पांच हजार के भुगतान के लिए मियाद ' हा, हा, हा "मेरे पाम बैंक मे मुस्किल से पांच मो हाँग।" चम्पा ने मचाई सामने .. रखी। "विश्वाम कौन करेगा?" "मैं जानता हूँ, यह वाल महमा विश्वास करने लायक नहीं, किन्त, २२ : फैसले ... - - M - राचाई यही है। धन की कमी तो मुझे कभी नहीं रही, लेकिन...कुछेक पारिवारिक कारणों से...धन कभी मेरे हाथ में टिक नहीं पाया। इसीलिए, क्षमा याचना के साथ, थोड़ी मियाद चाहता हूँ।" "एक दिन की ? डेढ़ दिन की?" ली हू का स्वर मजाक का था। "जी नहीं, इतने समय में भला क्या हो सकता है ? मुझे कम-से-कम दो मारा की मियाद चाहिए...यदि आप दे सकें, तो बड़ी कृपा होगी।" "साफ-साफ यों कहो न टालना चाहते हो।" "नहीं, ली हू साहब, आपके हाथ कितने लम्बे हैं, क्या मैं नहीं जानता? दुनिया के किसी कोने में मैं आपसे छिपा नहीं रह सकता। छिपने का कोई शरादा भी नहीं है।" चम्पक बोला, "लेकिन आप मियाद दें, चाहे न दें- रुपयों का इन्तजाम तो मैं दो मास से पहले कदापि नहीं कर सांगा। मेरी आय का साधन टूट चुका है। असवार में आपने पढ़ा ही होगा कि... भीमा आईदा गभी दंगल में नहीं उतर सकेगा। भीमा, मैं और देशराज, तीनों के सामने रोजी-रोटी का सवाल है। ऐसी हालत में, पांच हजार की रकम में अचानक से निकाल ?" "दो मास तो नहीं, लेकिन दो हफ्तों की मियाद में ज़रूर दे सकता हूँ गुछ सोचकर ली हू ने पाहा। "लेकिन पन्द्रह दिनों में तो...कुछ भी न हो सकेगा।" "यों सोचें, तब तो दो मास में भी कुछ नहीं होगा। मैं जरूरत से ज्यादा डोल नहीं देना चाहता।" ली हू ने ठंडे स्वर में उत्तर लौटाया,"मियाद आज रात के बारह बजे शुरू होगी और ठीक पन्द्रहवें दिन की रात बारह बजे सत्म हो जाएगी।" "यदि मैं मियाद खत्म होते-होते भी इन्तजाम न कर पाया, तो?" सम्पन ने आशंपित होकर पूछा। ली ह ने अपने दोनों गुण्डे साथियों की तरफ देखते हुए कहा, "चम्पक साहब को जरा शौकी दिशाओ कि मियाद सत्म होने के बाद क्या किया - जाएगा।" फिर जो हुना, बिजली की गति से हुआ। चम्पक क्षण-भर पहले फुट- पाम पर गदा, नी हूँ रो बातें कर रहा था--- ओर अगले ही क्षण यह, उसी फुटपाथ पर, चारों खाने चित्त गिर चुका था। दोनों गुंडों ने उसके जबड़े पर एक-एक मुक्का मारा । जबदस्त शक्ति के सबूत कुल दो मुक्के। और चम्पक एकदम चित्त होकर गिरा। भिन्नाते मिर को सम्भालता-सहलाता हुबा, चम्पक जब उठा, तो वहीं न ली ह था, न उसके दोनों गुडे । थी केवल लम्प-पोस्ट की उदास रोशनी। आते-जाते लोगों ने यह नन्ही-सी मुक्केबाजी देखी थी। दूर-दूर वे रुक जाने लगे थे, किन्तु नज़दीक कोई नहीं आ रहा था। कौन गुंडों के लफड़े में पडे ! ऐमी है बम्बई की महानगरी! कोई किसी का नही...। चम्पक बेहद शमिन्दगी से मिर झुकाकर चलने लगा-लीहू की कोठी से दूर। ली हू के शब्द उसके कानों में जोरो से सनमना उठे थे-~-सिर्फ पन्द्रह दिन...। ५ कमरे से चम्पक के चले जाने के बाद भीमा ने देशराज से कहा था, "डाक्टर में प्यादा चलने-फिरने की मनाही की है, लेकिन विस्तर से बिलकुल न उटने के लिए तो नहीं कहा है न।" "तो?" "वन्द कमरे में मेरा दम घुटने लगा है। चलो बाहर । कही भी।" और भीमा उठ पड़ा था। देशराज और भीमा सड़क पर निकल आये। बिना किसी उद्देश्य के इधर-उधर टहलते रहे । वसों में बैठे। ट्रेनों मे घुसे। पंदल भटके । वे खामोश थे। लगता था, उनकी तमाम दुनिया सामोश हो जाने वाली है। रात की रोशनियो मे, जगह-जगह, इश्तहार चिपके हुए देखे जा सकते थे। इश्तहार, जो भीमा को अजेय पहलवान के रूप में घोपित कर रहे थे। भीमा अविश्वास से एक इश्तहार के नजदीक जाकर सड़ा हुआ। पढ़ने
२४ : फैसले
लगा...।
देशराज ने भीमा के कन्धे पर हाथ रखकर दवाया, "भूल जाओ,
भीमा।"
और आतंक की उनांस के साथ भीमा उस इश्तहार से परे हट
गया। सहसा उसके दमों में बहुत तेजी आ गई-ऐसी तेज़ी कि देशराज
को टोकना पड़ा, "इतना तेज क्यों चल रहे हो? मैं बार-बार पिछड़ रहा
हूँ, देखते नहीं ?"
भीमाने सावधानी के साथ अपने कदमों को धीमा कर लिया। वह
और देशराज साथ-साथ चलने लगे।
"भीमा साहब !" सहसा पीछे से किसी ने पुकारा।
भीमा और देशराज रुककर पीछे देखने लगे।
सामने राजन खड़ा था। उसके चेहरे पर मुसकान थी। भीमा और
देशराज के लटके हुए चेहरे देखकर वह मुस्कान डूबने लगी। राजन ने दोनों
से हाथ मिलाया, फिर भीमा के चेहरे पर आँखें ठहराते हुए पूछा, 'अब कैसे
है ?"
"क्यों? मुझे क्या हुआ है ?" भीमा ने अकड़कर पूछा।
"जिस दिन आप अस्पताल में भरती हुए, मैं आपको देखने के लिए वहां
गया था।" राजन बोला, "डाक्टरों ने बताया कि आप बेहोश हैं, लिहाजा
विना मिले ही लौटना पड़ा।"
भीमा चुप रहा। राजन के साथ उसका परिचय विशेप गहरा नहीं था।
भीमा ऐसी आशा कदापि नहीं रख सकता था कि उसकी मिजाजपुरसी के
लिए राजन अस्पताल आएगा--जवकि वह आया था।
पचों?
अवश्य वह किसी स्वार्थ के कारण आया होगा...महानगरों में, बिना
स्वार्थ के, कौन कहीं आता-जाता है ?
लेकिन भीमा के साथ राजन का भला कौन-सा स्वार्थ जुड़ा हो सकता
है ?
भीमा महमा समझ न पाया । उलझन में मुस्करा भी न सका।
देशराज ने कहा, "आपने अस्पताल तक जाने की तकलीफ़ उठाई,
राजन जी, इसके लिए बहुत-बहुत..." "अजी नहीं, इसमें तकलीफ कमी?" राजन बोला, "अभी आप लोग क्या किसी ग्राम काम मे कही जा रहें है?" "नहीं । दया ?" देशराज ने कहा। "मा मैं बाप दोनों को चाय पर बामन्द्रित कर सकता है?" राजन ने ज्या ही यह पूछा, भीमा और देशराज दोनों ममझ गए कि राजन ने अस्पताल तक जाने की तकलीफ यों ही नहीं उठाई थी। उरूर इसके पीछे कोई राज था, जो अब खुलने वाला था। भीमा और देशराज ने एक-दूसरे को और गहरी निगाह में देता, फिर सहमति में मिर हिला दिया। राजन बोला, "लेकिन...आप दोनों का स्वागत में किमी महग होटल में नहीं कर मषंगा। अपन तो हमेशा मुफलिमी में ही रहते हैं। दूनरो का भला करना ही अपना काम है और आज की दुनिया में दूसरों का भला चाहने वाले हमेशा तकलीफें महते हैं।" "कहीं भी बैठ जाएंगे। बरे, किनी रेलवे स्टेशन में. महे-उड़े भी चाय पी जा मकती है। बातें करने के लिए वहाना ही नो चाहिए।" देगराज ने उल्लाम के माय कहा। न जाने कों, उमे आगा की हल्की किरण-मी दिखाई दे रही थी। असम राजन कोई व्यावमायिक प्रस्ताव रखेगा। भीमा की दंगलों में विदायगी के बाद देशराज, भीमा और चम्पक, तीनो को व्यावसायिक प्रस्तावो की ही प्रतीक्षा थी। पता नहीं, चम्पक इस वक्त कहां भटक रहा है। राजन का प्रस्ताव जब उनके सामने रखा जाएगा, अवाय उने राहत मिलेगी। किन्तु अभी से इतनी दूर तक क्यो सोचा जाए। देशगज ने अपने टोखचिल्लोपन को तुरन्त पहचान लिया। पता नहीं, राजन का प्रश्नाव क्या हो । उम प्रस्ताव को, पता नहीं, स्वीकार किया भी जा सके या नहीं। राजन कह रहा था, "पड़े-बडे तो नहीं, कही बैठ कर ही तसल्ली से चाय पीएंगे।" एक मस्ते डिपार्टमेंटल स्टोर का दरवाजा सामने ही था। वहां दनिर जरूरतों की चीजे मिलती थी और चाय भी। तीनो ने वहां प्रवेश २६ : फैसले एक-एक कुर्सी खींची। बैठे। कुर्सियां नाजुक थीं। स्टोर का मालिक भीमा की तरफ आशंका से देखने लगा। उतना जबर्दस्त आदमी यदि उतनी नाजुक कुर्सी में बैठा, तो कुर्सी कहीं टे न बोल जाए ! मालिक की शंकालु निगाह देशराज पर भी टिक गई, क्योंकि देशराज का वदन भी कोई कम भारी नहीं था। फिन्तु सौभाग्य से उन नाजुक कुसियों में मजबूती की कमी नहीं थी। भीमा और देशराज का वज़न उन्होंने सम्भाल ही लिया। स्टोर के मालिक की उलझन भीमा और देशराज से छिपी नहीं रही थी। मन-ही-मन वे मुस्करा दिए। राजन ने तीनों के लिए चाय का आदेश दे दिया था। वैरा के चले जाने के बाद वह भीमा की ओर झुका । अपना वही सवाल उसने दोहराया, "अव कैसे है ? बिलकुल ठीक हैं न?" "हाँ, हाँ।" भीमा ने किसी तरह कहा। "अखबारों में पढ़ने को मिला कि अब आप...कभी भी..." "फिलहाल तो डाक्टर का यही कहना है कि मैं दंगलों में भाग न लूं, लेकिन...मुमकिन है, कुछ दिनों में डाक्टरों को अपनी राय बदलनी पड़े।" भीमा ने कहा । कहते समय ही वह जानता था, उसके शब्दों में कोई वज़न नहीं। डाक्टरों ने जो फैसला दिया है, वह अन्तिम ही है। उसके अन्तिम होने की बात डाक्टरों ने विशेष जोर दे कर घोपित की है। राजन ने पाहा, "मुझे बहुत ही दुख है कि आपको वैसी अन्दरूनी चोट पहुँची। भगवान सबका भला करे, लेकिन...अव आगे की आपने क्या मोची है ?" "क्यों न हम सीधे मुद्दे पर ही आएँ ?" मीमा ने सहसा कहा, "मुझे लगता है, आपकी ओर से कोई सुझाव है...?" राजन ज़रा पकार मुस्कराने लगा, "जी हां...ऐसी ही बात है।" "काहिए।" "आपने गूवासिंह जी का नाम सुना होगा।" भीमा मुस्कराया, "आपने भी कमाल की बात कही, राजन जी! गूवासिंह जी का नाम तो आज देश का बच्चा-बच्चा जानता है।" + मूदासिंह कुछ वर्ष पहले का एक नामी पहलवान या। देश-विदेश में उसने बड़ा आतंक फैलाया था, दंगलों में अनेक पुरस्कार जीते थे उसने । फिर...उसके जीवन का एक नया ही दौर शुरू हुआ। उसने पहलवानी छोड़ दी। एक बम्बइया फिल्म-निर्माता ने उसे अपनी फिल्म मे उप-नायक का रोल दिया- डाकू का रोल । वह फिल्म बॉक्स-आफिस पर कमाल की हिट माबित हुई। मूवासिंह अभिनेता के म मे स्थापित हो गया। नए-नए अनुबन्धों के साय, फिल्म-निर्माताओं ने मूवामिह के दरवाजे पर लाइन लगा दी। बम्बई के फिल्म-जगत में मब इमी तरह होता है-भेड़ियाघसान! उस फिल्म-जगत ने मूवासिंह को रातो-रात अपना लिया। स्वयं सूवामिह ने कल्पना तक नहीं की थी कि भयानक दंगलों से हट कर यह फिल्मी अभिनेता का मुलायम जीवन शुरू कर सकेगा, जिस में हमेशा मुर, सुरा, मुन्दरी से घिरा रहेगा वह...। वात मपने जमी धी... लेकिन वह सच थी। तरक्की की हालत यह कि अब मूवामिह ने अपनी फिल्म स्वयं ही बनाना और निर्देशित करना शुरू कर दिया था। मूवासिंह की फिल्में राजकपूर की फिल्मों की तरह तो नहीं चलती थीं, लेकिन राजकपूर की फिल्मों की तरह पिटती भी नहीं थी। उसको फिल्में हमेशा एक निश्चित कमाई किया करती-मुरक्षित कमाई। इसीलिए, उमकी फिल्मों में पंसा लगाने वालों की कमी नहीं थी। मूवामिह का नाम मचमुच देश का बच्चा-बच्चा जानता था। भीमा और मूबासिंह का आमना-मामना कभी नहीं हुआ था। राजन ने गम्भीरता में कहना जारी रखा, "मेरा प्रस्ताव मूवासिंह जी का ही प्रस्ताव है। वैमे, उनके सामने अभी मैंने दान छेडी तो नहीं है, लेकिन जब भी ऐई गा, वह 'हाँ' कह देंगे। मेरे प्रस्तावों को उन्होंने आज तक यस्वी- कार नहीं किया है।" "आप फिर से भूमिका में उलझने लगे। मुद्दे पर आइए न।" लेकिन राजन मुद्दे पर बाता, इममे पहले वर ने याकर चाय के तीन कप रखे और माध-यौन मिनट तक वे तीनों, बिना एक-दूसरे से ૨૬ : फैसले गर्म चाय की चुस्कियाँ लेने में मगन हो मा । मीन राजन की आवाज से ही टूटा, "गुद्दा यह है कि...भीमा जी, पया आप सूवासिंह जी के 'डबल' के रूप में काम करना पसन्द नारेंगे?" "उवल ?" भीमा सहमा समन न पाया। "जी हाँ । फिल्मों में सारा काम हीरो-हीरोइनें नहीं किया करते।" राजन ने स्पष्ट किया, "आप की काठी, यदि पीछे से देखा जाए, तो... विलगुल मूवासिंह जी से मिलती-जुलती है। याने, जिरा शॉट में मूवासिंह जी को पीछे से दिगाया जाना होगा, उसमें उनकी वजाए आप को दिखा दिया जाएगा। इसी प्रकार, मार-धाड़ को दृश्यों में भी, आम तौर पर, 'उबल' रोही काम लिया जाता है।" "ओह, लेगिन फिल्मों में काम करना...मुझे इराका कोई अनुभव नहीं।" भीगा ने संकोच में कहा। "वह सब तो दायरेक्टर राम्भाल लेगा। डायरेक्टर होता किस लिए है ?" राजन ने सिगरेट निकाली और भीमा की तरफ बढ़ा दी। "धन्यवाद...मैं नहीं पीता।" भीमा औपचारिकता से मुस्कराया। देशराज ने भी सिगरेट न ली। राजन ने वही सिगरेट स्वयं सुलगा ली और कहा, "अभी तो हमें केवल यह तय करना है कि 'उवल' का काम----जो पाताई मुशिल नहीं है आप स्वीकार कर सकेंगे या नहीं।" "हमेशा का काम है ?" भीमा ने जानना चाहा । "हां, यह गाग हमेणा निकलता रहेगा।" "और...पैसा? पैसा कितना मिलेगा?" "यह अभी से नहीं कहा जा सकता। यह तो आप का काम देवार... और जमात के मुताविक...." भीमा ने देणराजगी ओर देवा, जैसे सलाह लेना चाहता हो। देशराज उलझन मेगा । उनको दिमाग़ में मोटा हिसाव यही था कि पिलमों में काम करने पर अच्छा ही पैसा मिल जाएगा। कोई निश्चित ठा सामने न होने पर भी, इतना तो मानकर चला ही जा सकता है कि पंगा बुरा नहीं मिलेगा। उगने भीमा की ओर से हामी भर दी, "ठीक है, गुवासिंह जी का 'बल' चनने में भीमा को गोई एतराज नहीं । आप गूवा- . सिंह जी से तय कर लीजिए। फिर...पंसा किराना मिलेगा, यह भी बता दीजिए। काम हो जाएगा।" जब देशराज ने हामी भर दी, तो भीमा कैमे इन्कार कर सकता था ! चाय का विल राजन ने ही दिया। भीमा और देशराज से विदा लेने से पहले उसने उस गेस्ट हाउस का फोन नम्बर नोट कर लिया, जहाँ भीमा ने कमरा किराए पर लिया हुआ था। "मैं स्वय सम्पर्क करूंगा।" राजन ने उल्लसित मुस्कान के साथ कहा। राजन चला गया। भीमा अव भी जरा अनिश्चय में था। बोला, "देशराज जी, यह आदमी ...राजन.. खुद तो यह हमेशा फटेहाल रहता है। हमें यह क्या दिला सकेगा?" "देखते हैं, क्या होता है।" देश राज ने उत्तर दिया, "फिल्म इंडस्ट्री अद्भुत है। यहाँ कौन किसे कय वितना दिला सकता है, फरिश्ते भी नही जान सकते । आखिर हम लोगों को कोई-न-कोई नया काम ढूँढना है ही। शायद यही काम रास आ जाए।" ६ भीमा और देशराज जब गेस्ट हाउस वापरा आए, तो रात के माढे दस वजने को धे। कमरे में उन्होंने चम्पका को मौजूद पाया। चम्पक का चेहरा इतना बुझा हुआ था कि बिना पूछे ही वे समझ गए जरूर कोई उलझन "कहाँ चले गए थे?" देशराज का स्वर। "यों ही...जरा घूमने।" चम्पक ने उत्तर लौटाया। अमलियत यह अपने साथियो को बता नहीं सकता था। वह जानता था, उसके साथी चिन्तित हैं। उन्हें वह और पयादा चिन्तित नहीं करना चाहता था। "हम लोग भी जरा घूमने चले गए थे। हमारी मुलाकात ३० : फैसले "अच्छा। फिर?" "उसने एक प्रस्ताव रखा है।" देशराज ने कहा, फिर प्रस्ताव की रुप-रेखा चम्पक के सामने रख दी। चम्पक उछल पड़ा, "अद्भुत !" चम्पका की सारी उदासी ऐसे छंट गई, जैसे सूर्य निकालने पर कोहरा। भीमा और देशराज, दोनों ही के लिए उसका उस तरह उछल पड़ना आशा को विपरीत था। "क्यों ?" भीमा ने पूछा। "अद्भुत आइडिया । आश्चर्य ! यह आइडिया मेरे दिमाग में पहले क्यों न आया ?" चम्पक ने कहा । उसने हसना शुरू कर दिया। "तो क्या...'डबल' का काम करने में...बहुत ज्यादा पैसे मिलेंगे?" भीमा ने आशाओं के साथ चम्पक की तरफ देखा। चम्पक ने भीमा को जोर मे धौल जमाई, " 'डबल' ? आखिर क्यों तुम किसी के 'डबल' बनो?' "क्या मतलब?" "उस राजन के बच्चे से कहना, 'उवल' किसी भड़वे को बनाए ! हमारा भीमा तो सिंगल ही बनेगा।" "पहेलियां क्यों बुझाने हो ? "मांचो, भीमा ! मूवासिंह यदि फिल्मी-अभिनेता बन सकता है, तो तुम क्यों नहीं बन सकते ?" "मैं? अभिनेता?" भीमा आयें झपकाने लगा। "तुम में और मूवामिह में अन्तर क्या है ? यह पहलवान ! तुम पहलवान ! ठीशुंग-टीशुंग वाला काम अगर मूवा कर सकता है, तो तुम क्यों नहीं?" भीमा ने जोर में ठहाका लगाया, "मपने देखने के मामले में तुम्हारा जवाब नहीं, चम्पक !" "ऊँची बातें हमेशा गपनों जैमी लगती हैं.---जब तक कि उन्हें माकार न कर लिया जाए।" नम्पक ने दार्शनिकों की तरह वाहा । "लेकिन हर ऊँची बात नाकार नहीं हो सकती।"
"लेकिन मुझे बताओ-जो मैं कह रहा हूँ, उममे अजूया क्या है ?" चम्पक के स्वर में चुनौती थी। भीमा और देशराज, किसी से, चम्पक को जवाब देते न बना। इमसे चम्पक और भी उत्साहित हो गया, "पहलवान का मतलब बेडोल, वौड़म आदमी नहीं हुआ करता । मूवासिंह भी जब अखाड़े में उत- रता था, तो मुटल्ला और दौलमदाला लगता था । आज उसे कोई कहता है मोटा ? ढीलमढाला? आज सब उसे अभिनेता कहते हैं। पहलवान भी आखिर एक मर्द होता है। केवल मर्द नहीं-जबर्दस्त, ऊंचा पूरा मदं । ऐसा मर्द कि देखते ही सुन्दरियों की जान निकल जाए।" "रहने भी दो, यार! आकाश से उतरो। धरती पर आओ।" भीमा हैसा, "मेस बन्द होने वाला है। हम लोगो को पेटपूजा करने की सोचनी चाहिए।" "क्यों नही ?" सीतों उठे और मेस में चले गए। चरे ने-रोज की परम्परा के अनुसार-भीमा और देशराज के सामने इतना भोजन रख दिया, जितना कम-से-कम पांच आदमी खाते। यह पहला मौका था-जीवन में पहला मौका-जब भीमा और देश- राज, दोनो को सहसा लग आया कि उनकी खुराक बहुत ज्यादा है। एक- एक आदमी अनेक आदमियो जितना भोजन करे महंगाई के इस जमाने में इसे तबाही न कहा जाए, तो क्या कहा जाए ? भीमा के ठाठ तो और निराले थे । पौष्टिक भोजन, उसके लिए, अलग से तैयार किया जाता । दूध-मलाई छनती । मेवे खाए जाते। मालिशों के दौर चलते। गेस्ट हाउस वाले भीमा की जरूरतों का पूरा ध्यान रखते थे। सबसे तगडा बिल भीमा का ही हुआ करता। लेकिन अब? देशराज ने बैर को कर, शान्त और गम्भीर स्वर में आदेश दिना, "आज रघ दिया, सो रख दिया -कल से उतना ही रखना मांग। समझे? हम कोई राक्षस नहीं है, जो इतना खा जा A .
: फैसले - आदमो।" वेचारा वैरा देशराज की ओर आँखें झपकाता देखता रह गया। वरे के चले जाने पर चम्पक बोला, "देशराज जी, आज पता चला, आप कितने मनहूस हैं ! वैरे को डांटने का क्या मतलब? इसके अलावा... किसने कहा कि हम लोगों के खर्च कम होने वाले हैं ? हमारे ठाठ वैसे ही रहेंगे, जैसे हुआ करते थे-जैसे होने चाहिए। हमारा भीमा फिल्म-अभि- नेता बनने वाला है। भीमा ने एकदम नाराज होकर आँखें तरेरी, "अब यह बात फिर न. दोहराना, वरना...दंगल हो जाएगा। डॉक्टर ने मुझे किसी पहलवान से भिड़ने की मनाही की है, तुम जैसे मच्छर से नहीं।" चम्पक चुप तो हो गया, किन्तु रह-रहकर उसके होंठों पर मुस्कान उभरने लगती। वह एक स्वप्नजीबी व्यक्ति था। भीमा से पहली मुलाकात होने पर चम्पक ने उसे एक अत्यन्त प्रसिद्ध पहलवान बना देने का सपना देखा था। क्या वह सपना साकार न हुआ? फिर क्यों दूसरे सपने साकार नहीं हो सकते? रात भर चम्पक को ठीक से नींद न आई। सुबह जब उठा, तो उस वक्त भी दिमाग पर जैसे नशा छाया हुआ ? था। "भीमा ?" उसने कहा, "जरा अपना सबसे शानदार सूट तो निकालो।" "क्यों?" "पहनो । मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ।" "पागल हो ! क्या कभी उस सूट में मुझे देखा नहीं है ?" "देता है, मगर आज मेरी नजर कुछ और होगी।" चम्पक ने दृढ़ता से कहा, "आज ने मैं एक पहलवान का 'प्रमोटर' नहीं, बल्कि एक भावी अभिनेता का सनसनीरोज प्रमोटर' हूँ। मेरी नई ज़िन्दगी शुरू हो रही है। मेरे साथ-हन सबकी। हमारी टोली कभी नहीं टूटेगी, भीमा! हम तीनों-~-मैं, तुम, देशराज--हमेशा नाथ रहेंगे। मैं 'प्रमोटर' बनूंगा । देश- राज को कोई और जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।" "शनमुच तुम्हारा दिमाग मराव...।" ।
। । "खराब सही ! निकालो सूट । पहनो।" चम्पक के स्वर में ऐसी बच्चों जैसी जिद थी कि भीमा समझ गया, यदि उसने बात न मानी, तो चम्पक को दुप होगा। उसने मूट निकाला, पहना । चम्पक ने उसे आगे से देखा, पीछे से देखा । इम कोण से देखा, उस कोण से देखा । उसकी आँखो मे गहरा सन्तोप तैरने लगा। वोला, "सच कहता हूँ, भीमा, किसी हीरो से कम नही जंचते । अभी तो स्टूडियो के मैक- अप-मैन का हाथ नहीं लगा है। वह तुम्हे ऐसा बढिया सँवार देगा कि मुद अपने को नही पहचान सकोगे।" "ठीक है, ठीक है, अव उतारू कोट-पतलून?" "इसे कोट-पतलून नहीं, सूट कहो मूट !" देशराज बोला, "भई, चम्पक, भीमा को हीरो बनाने के बाद एक नजर मुझ पर भी डालना । देखने में मैं भी किसी से कम नहीं ।" "तुम्हें जोकर का रोल दिला दूंगा। परका वचन ।" और चम्पक ने ठहाका लगा दिया। भीमा और देशराज ने अनायास उस ठहाके मे साथ दिया भीमा और देशराज का हास्य तो शीघ्र ही डूब गया, लेकिन चम्पक की आँखों का सपना और ज्यादा सनसनाने लगा था। उसके होठो पर मुस्कान उभरती जाती...। नहाने के लिए चम्पक जब बाथरूम में घुसा, तो सहसा ली हू का चेहरा उसकी आँखों के सामने उभर आया। औरतों जैसी बारीक किन्तु बेहद खतरनाक ली हू की आवाज उसके कानों पर पन की तरह वार करने लगी...पन्द्रह दिन...सिर्फ पन्द्रह दिन.... पांच हजार का इन्तजाम...) चम्पक स्वप्नजीवी ज़रूर था, किन्तु वेवकूफ नहीं। भीमा को यदि सचमुच अभिनेता बनाया जा सकता हो, तव भी-यह केवल पन्द्रह दिनों मै सम्भव नहीं था। भीमा यदि अभिनय का व्यवसाय शुरू कर पाता है, तब भी-हर व्यवसाय की तरह-इसके जमने में समय लगेगा जवकि ली हू किमी सूरत मे मियाद बढाने वाला नहीं। चम्पक को किसी से उधार लेना होगा। किस से? भीमा के पाम - - ..
: फैसले : हीं है । भीमा ने तो स्वयं चम्पक से कर्ज लिया हुआ है, जिसकी वापसी का अब तो बिलकुल कोई अता-पता नहीं। रही वात देशराज की। देशराज ने आज तक कभी वचत नहीं की। भीमा के प्रशिक्षक के रूप में उसकी एक बंधी-घाई आय थी, जिसे वह बंधे-बँधाए ढंग से खर्च कर दिया करता। किसी भी पारिवारिक चिन्ता का वोक्ष देशराज पर नहीं। बचत यदि वह करता, तो स्वयं अपने लिए-लेकिन वह उन इन्सानों में नहीं था, जो स्वयं अपने लिए बचत कर सकते हैं। तव? - नहाते-नहाते चम्पक याद करने लगा-अपने दोस्तों, परिचितों के नाम, रिश्तेदारों के नाम...रिश्तेदार बम्बई में कोई नहीं। समय इतना नहीं है कि उन शहरों तक जाकर लौटा जा सके, जहां रिश्तेदार हैं...क्योंकि जाकर, एकदम ताबड़तोड़ इतने रुपयों का इन्तज़ाम वे कर सकें, इसकी गुंजाइश कम है । इन्तजाम करने में उन्हें समय लगेगा। वे हीलाहवाला भी कर सकते हैं। आजकल की रिश्तेदारियां ऐसी ही होती हैं। याने रिश्तेदारों के चक्कर लगाने का न तो समय है, न कोई अर्थ । रह जाते हैं केवल वे दोस्त और परिचित, जो वम्बई में हैं। परिचितों को सूची में नहीं रखा जा सकता। महँगाई के ज़माने ने सब के दिल छोटे कर दिए हैं । केवल जो बहुत अन्तरंग मित्र हैं उन्हीं से कुछ आशा रखी जा सकती है चम्पक जब नहाकर वाथरूम से निकला, तो उसकी रंगत उड़ी है थी। देखकर यही लगे, जैसे वह बिना नहाए ही निकल आया ! ७ - "नमस्कार !" पुरुष-स्वर । इतना अपरिचित कि कुन्दन को लग नहीं, वह स्वर उसे ही सम्बोधित कर रहा है। अगल-बग़ल इतने कर्म बैठे है। उन्हीं में से किसी का कोई परिचित मिलने आया होगा, क होगा नमस्ते।
कुन्दन नै मिर न उठाया। अपनी फाइल में डूबी रही। पितना अधिक काम होता है इस दफ्तर में ! ज्यों-ज्यो महंगाई बढ़ रही है, वकारी का राक्षम और भी ज्यादा मुंह फाह रहा है। काम-दिलाऊ दफ्तर मे यदि फाइलो की संख्या अनेक गुनी हो जाए, नो क्या आश्चर्य ? काम-दिलाऊ दफ्तर मे कुन्दन पिछले पांच वर्षों से नौकरी पर थी। तरखवी करती-करती वह खामे अच्छे पद पर पहुंच गयी थी। कुन्दन के पड़ोसी और रिश्तेदार, चुपके-चुपके व्यग्य किया करते, "काम-दिलाऊ दफ्तर ही पति-दिलाऊ दफ्तर मावित होगा। जब तक नहीं होगा, बुन्दन शादी करने वाली नहीं ।" किन्तु याज तक कभी न मुना गया कि साथ काम करते किगी युवक के गाय कुन्दन की फ्यादा छनने लगी हो । वस, अपने काम में मतलब । "कुन्दन जी, मैं आप ही को नमस्कार कर रहा हूँ।" कुन्दन ने ज्यों ही नजर उठाई, एकदम मन्नाटे में आ गई वह । सपने में भी न मोचा था, उम व्यक्ति मे इस तरह आमना-सामना होगा, जिसे कि वह मामने बड़ा देख रही थी। वहीं विधुर, जिमके माय कुन्दन शादी कर ले, ऐमी जिद मां के मन में बमी हुई है ! ओह. वहीं मामने सहा था। कुन्दन को-शिष्टाचार की सातिर-ज़रा मुम्कगना चाहिए। कुन्दन आधुनिक लड़की है । उसे यो मकपना नहीं जाना चाहिए। लेकिन कुन्दन का चेहरा-पल मर को-ऐसा हो गया, जैसे उगके वदन का तमाम मून अचानक सोय लिया गया हो। लेकिन फिर-ऐप और अकुलाहट के कारण उसका चेहरा लाल पड़ने लगा। जब उसने नमस्कार का उत्तर देते हुए हाय जोड़े, तो 'नमस्कार' शब्द ने उसके गले में मानो बार-बार फंस जाना चाहा। "ठ जाऊँ ?" आगन्तुक नै कुन्दन के सामने रखी एक कुर्मी की ओर पर ही मंकेत किया, फिर कुन्दन की 'हाँ' या 'ना' की परवाह न करते हए, झट-मे उग कुर्मी पर अधिकार कर लिया। "ओह, क्षमा कीजिएगा..." कुन्दन ने जरा बदलती हुई आवाज़ में पहा और फाइल बन्द कर दी, "मैं एकाएक आपको देखकर ऐसी चौकी कि : फैसले बैठने के लिए कहना भी याद न रहा । न जाने आपने क्या सोचा हो...?" कुछ भी नहीं सोचा।" आगन्तुक गहराई से मुस्कराया, "आपने मुझे...पहचान तो लिया न?" "जी हां। मां ने आपका फोटो दिखाया था।" "नाम भी बताया होगा ?" "हो, सुरेश जी और...पैर छोड़िए..." "मैंने भी मापको फोटो के आधार पर ही पहचाना। यहां किसी से पूछने की ज़रूरत न पड़ी। अन्दर आने के साथ, आपकी मेज़, सामने ही दिखाई दी।" कुन्दन चुप रही। सुरेश जी क्यों आये हैं, समझना मुश्किल नहीं था। मिन्नत करने ? ललचाने ? कुन्दन ने यदि सुरेश जी की अर्धागिनी बनना स्वीकार कर लिया, तो उसकी पांचों उँगलियां किस तरह घी में होंगी-यही समझाने ? कुन्दन के लिए यह सब बेहद बौखलाहट-भरा होगा, किन्तु...शायद छुटकारा नहीं था। 'शायद' क्यों? छुटकारा था ही नहीं। वह बैठी-विठाई पगाड़ी गई है। अब उन पटिया संवादों का मुकाबला करना ही होगा। मगर-यह मुखावला आखिर कहाँ हो ? क्या यहीं बैठे-बैठे ? इतने- इतने कर्मचारियों की मौजूदगी में ? नहीं। उठ कर कहीं और चले जाना चाहिए। किसी को भनक भी नहीं मिलनी चाहिए कि सुरेश जी किस प्रकार के रिश्ते के लिए आतुर हैं...साथ काम करते लोग चिढ़ा-चिढ़ाकर कुन्दन को नाक में दम कर देंगे। "बहुत व्यस्त हैं ?" सुरेश जी पूछ रहे थे। गुन्दन ने इस वाक्य का सहारा तुरन्त ले लिया, "नहीं, नहीं, आइए... चाय पसन्द करेगे या कॉफी ?" और वह इस प्रकार उठ पड़ी, गोया सुरेश जी को इन्कार करने का कोई अवसर न देना चाहती हो। सुरेश जी भी उठे। दोनों अगल-बगल नलते रहे। दोनों की ऊँचाई में विशेष अन्तर नहीं पा। सुरेश जी एकाध इंच से ज्यादा ऊँचे नहीं थे कुन्दन की तुलना - में...
लेकिन...कुन्दन को, मन-ही-मन यों आपसी ऊँचाइयो की तुलना करने की जहरत क्या है? धुन्दन ऐसी सहजता का दिखावा कर रही थी, गोया किसी 'आफि- शिपत' कार्य से कोई मिलने आया है, जिसे वह कैंटीन में ले जा रही है। ऐसे मिलने वालों की संख्या खासी वडी थी। सुरेश जी को यह उसी संख्या के बीच गुमा देना चाहती थी। सौभाग्य से कटोन सूना मिल गया । एक कोने में वे आमने-सामने बैठे। मंवाद शुरू किम तरह किए जाएं, यह बात किसी समस्या का रूप न लेने पाई । सुरेश जी ने ही शुरू किया, ' नया ट्रेक्टर खरीदना था। इन बहाने दिल्ली चला आया। सोचा नहीं था कि आपमें भी मिलने का अवसर निकालूंगा, किन्तु ..किसी तरह अपर निकल हो गया। कइयों मे आपके आधुनिक विचारों के बारे में सुन रखा था। इसी लिए तसल्लो-सो पो कि यदि अचानक में सामने आ गया, तो आप बुरा नहीं मानेंगी।" "लेकिन..." कुन्दन जरूरत मे मादा नम्र भी नहीं बनना चाहती थी, "आपने गुना तो यह भी होगा कि मैं...कि मेरा बड़ा फैमला है...?" "क्यों नही ? आपका फैसला मैं जानता हूँ। दरअसल...याम इसी वजह से भी. आपमे मिलने के लिए उत्सुक था।" कुन्दन कुछ न बोली। मुरेश जो जिस उत्माह से बातें कर रहे थे, उम से वह समा चुकी थी कि मुरेश जी पूरी तैयारी के साथ आए हैं। बातों का सिलसिला रुक जाए, अमनीय मौन छा जाने लगे-ऐसा सुरेश जी कभी न होने देंगे। रुके हुए सिलसिले को शुरू किस प्रकार किया जाए, इसके अनेक तरीके उन्होंने याद कर रखे होंगे। मोन छा जाने लगता, किन्तु सचमुच सुरेश जी के ही कारण मान होने पाया। वह मुस्कान के साथ बोले, "कबीर ने कहा है, 'निन्दक नियरे रासिए, आंगन बुटी छवाय'। मैं आपके मुंह से अपनी निन्दा सुनने आया हूँ।" इसके साथ ही यदि उन्होंने अपनी भुम्कान गहरी न कर दी होती, तो कुन्दन वास्तव में मकुना जाती। किन्तु सुरेश जी सौजन्य भाव से, गहन-गहन, मुस्करा रहे थे। 'ओह, नी, प्लीज..." बुन्दन तपाक से बोली, "ऐसा न मौपिए । मैं : फैसले . आज तक कभी किसी के सामने आपकी निन्दा में एक शब्द नहीं कहा है।" "कहा होता, तो बेहतर रहता, क्योकि तब मैं जान तो सकता कि... कि...आखिर वह आधार क्या है, जिससे आप मुझे... मेरा मतलब है...।" उतने उन्मुक्त दीखते सुरेश जी भी, सहसा असहज हो गए। वाक्य पूरा करने में उन्हें अत्यन्त संकोच हो रहा था। "मैं आपका मतलब समझ गई।" कुन्दन ने तुरन्त कहा, ताकि उन्हें असहज स्थिति से छुटकारा दिला सके। गुरेण जी मुस्कराए-मुस्कान, जो अभी-अभी डूबने लगी थी--बोले, बहुत स्पष्टचादी व्यक्ति हूँ। देहात का हूँ न । लट्ठमार ।" "मुझे स्पष्टवादिता अच्छी लगती है ।" कुन्दन बोली "मेरा सौभाग्य...! उसी समय चाय आ गई। दोनों ने चुस्कियां लीं। सुरेश जी का स्वर-"मैंने इस पर काफी सोचा है। यदि अनुमति हो, तो अपना विश्लेषण सामने रखू।" "जी?" तुन्दन ने ऐसी बात की आशा नहीं रखी थी। उसने पलकें शपकाई। "मैंने काफी सोचा है कि आप...आखिर क्यों इन्कार कर रही है।" "मैं भी जानना चाहूंगी।" कुन्दन को कहना पड़ा, "वास्तव में, अपने इंकार का सही-सही कारण मेरे सामने भी स्पष्ट नहीं । एक हिनक-सी है। यस । देगं, आप क्या सोचते हैं ?" "ऐसा है, पहला कारण तो यही हो सकता है कि मैं...विधुर हूँ, किन्तु- आपकी आधुनिकता को देखते हुए-मैं नहीं सोचता कि... क्योंकि मेरी उम्र कोई उतनी नहीं है कि आप इसे ध्यान में रखें।" सुन्दन ने साहस के साथ स्वीकार किया, "दरअसल...मां मुझे हमेशा कहती रहीं कि आपकी उम्र कोई उतनी' नहीं है, लेकिन...'कोई उतनी' का क्या मतलय में लगाती? मां ने उग्न का आंकड़ा भी मेरे सामने रखा, लेकिन मेरे मन में अविश्वास बैठ चुका था। यह माइडिया ही, दरअसल, मुझे पचता नहीं है कि मैं किसी विधुर से शादी करूं।" "हाँ, लेकिन यदि में विधुर हूँ, तो यह मेरा अपराध नहीं है। वैसे तो... - चेहरे आदि से उग्र का मही अन्दाजा नही लगता, किन्तु...फिर भी...जसा कि आप स्वयं देख सकती हैं, हमारी उम्र मे इतना बड़ा फर्क नहीं कि...." कुन्दन चुप रही। सुरेश जी का संकेत वह समझ गई थी। स्वयं कुन्दन की उम्र भी-एक कुंवारी लड़की के लिए कोई कम नही कही जा सकती...। "वहरहाल..." सुरेश जो ने जारी रखा, "दूसरा कारण, जो मेरी समझ में आता है, यह है कि आप बम्बई जैसा शहर छोड़ना नहीं चाहती। मैं देहात में रहता हूं, खेती-बाड़ी करता हूँ। आपको मेरे साथ देहात में ही रहना होगा।" "नही, मेरे मन में ऐसी कोई हिचक नहीं।" कुन्दन बोली, "मुझे मालूम है, भाहर के मशीनी जीवन से गांव का सरल जीवन कही बेहतर है।" "मुमकिन है, एक हिचक यह हो कि आपको नौकरी छोड़नी पड़ेगी, लेकिन नौकरी तो गांव में भी की जा सकती है। गांव को चुनौतियां शहरी चुनौतियो से किसी प्रकार कम नहीं। समय कैसे कटे, यह समस्या आपके सामने न होगी। गांव मे तनख्वाह जरूर कम मिलेगी, किन्तु-चूंकि मुझे ऐसी कोई आर्थिक तकलीफ नही-नोकरी आप धनोपार्जन के लिए नहीं, बल्कि जीवन में कोई सार्यकता ढूंढने के लिए करेंगी। इसलिए, यदि आप भोचती हैं कि गांव में मन कैसे बहलेगा, तो ..यह आशंका निर्मूल ही है।" कुन्दन चुप रही। सुरेश जी ने कुछ क्षण इन्तजार किया कि शायद कुन्दन कुछ कहे । उसे चुप ही देखकर उन्ही ने आगे चलाया, "मेरी कोई मन्तान नहीं। किसी बच्चे की जिम्मेदारी भी आप पर नही आने वाली...।" "प्लीज़..." कुन्दन एकदम अकुला गई, "हमारी बातचीत को वात- चीत तक ही रहना चाहिए। यदि इसे वहस का रूप मिल गया, तो...." "माफ कीजिएगा..." सुरेश जी ने तुरन्त ही अपने स्वर मे उभरते आ रहे आगोश-जसे भाव को वश में कर लिया,"दरअसल...वर, छोड़िए...।" दो पल का मौन। फिर चूंकि ऐसा लग नहीं रहा था कि यातचीत समाप्त हो गई और चूंकि कुन्दन कुछ बोल नही रही थी, सुरेश जी ने ही शुरू किया, "विस्तरको + ८० - छोड़कर. अब मैं आखिरी नुक्ते पर आता हूँ।" "जी...!" "वान्तत्र में, यह आखिरी नुक्ता ही मेरा विश्पण है। दोप सारी बातें तो आम बातें थी..." सुरेश जी ने चाय का अपना कप न्वाली कर नीचे रख दिया, "आखिरी नुक्ता यह कि आपकी हिवका का कारण कोई ऐनी दीवार भी हो सकती है, जो केवल मापके मन में है।" "यदि साप दागंनिक शैली न अपनाएं, तो...मुझे सुविधा रहेगी।" कुन्दन बोली। उसने स्वयं को, मन-ही-मन, दूसरी बार याद दिलाया कि जहरत से ज्यादा नम्र भी उसे नहीं होना है। हर तरह से उसकी स्थिति मुरेश जी में केंत्री है। सुरेश जी उसके सामने अभी-याचक बनकर वाए हैं। "सीधे, सरल शब्दों पर ही में आ रहा था। ऐसा है, कुन्दन जी... सौभाग्य कहिए या दुर्भाग्य...मैं धनवान हूँ और...मेरा धन ही आपको हिवक का कारण हो सकता है। मैं दहेज नहीं लूंगा-इसका मयं नापने मापद यह लगाया हो कि मैं आपको अमा कीजिएगा शायद आपने मोचा हो कि मैं नापको खरीदना चाहता हूँ, जबकि वास्तविकता यह है कि यदि मैं गरीब होता, तब भी...दहेज लेने से इन्कार कर देता । द्धान्तिक धरातल पर इन प्रथा के खिलाफ हूँ। जब तक यह प्रथा जिन्दा है, भारतीय नारी कभी पुगप की बराबरी में न आ सकेगी।" यह नारी बात नुरेश जी एक सांस में, जल्दी-जल्दी कह गए, मानो उन बात को वह शीघ्रातिगीव्र 'व्यतीत' की श्रेणी में पहुंचा देने को आतुर हों। कुन्दन को फिर से अकुलाहट होने लगी थी, किन्तु नुरेश जी को चुप कराने की स्थिति में वह नहीं थी। "मैं यही कहूंगा कि धन युरी चीज नहीं है। धन यानी शक्ति, क्षमता-- और विना क्षमता के आप कुछ नहीं कर सकते। हर व्यक्ति महात्मा गांधी नहीं हो सकता, जिनके पास धन के नाम पर लाठी और लंगोटी ही थी।" "मुरेश जी...प्लीज...मुझे आपके धन के प्रति कोई असहजता नहीं है। में नहीं जानती, आपने ऐना सोच कर लिया।" "फिर बताइए, आपको इन्कार का आधार क्या है ?" ।
1 "अबतक नीम बापकी उम्रगेनारहिचक रही यो, मेरिन अद...!" मुरेश जी की वा चर उठीं। कुन्दन ने उन चमक काययं मममा और तुरन रहा, "नेदिन अव भी मेरे मन में सोहिवक है. इसका कारण क्या है, मैं महना नहीं दा मरनी। मैं स्वदं ममझने की कोगिन करेंगी।" "मेरा मारने मिलना कार्यक रहा।" गुरेज दी बोले, हालांरि उनकी योगों को चमर कम हो चुकी थी। उसकी जगह मावधानी का मृवा एक पैनापना गया था। "सरिन एक मवाल में जरूर पूछना चाहूंगी।" कुन्दन में न रहा गया। "वा?" "क्या इन दुनिया में केवल में ही हूँ, जिन बार...?" कुन्दन ने वापर यधरा रहने दिया। "न जाने कों, घर में धनते वक्त ही मुझे मारम या, आप यह उम्र पूगी। जवाब में मोचार नही वाया। जवाब पहने में ही...मों कहिए ..पहरे में ही मौजूद है। वह यह कि...मेरे नामने एक नहीं, अनेक प्रस्ताव आपके है। मुखिन यह है कि वे सभी प्रनार, या यहिए नि अधिकार प्रस्ताव, पोग्य कन्याओं रे होते हुए भी, मन में रहीं मु यह घटका है कि उनके लिए मरने वटा मारन मेरा धन है। टोक है. धन वुरी चीज नहीं, रिन्नु धन को ही मदमे वहा मावन नहीं बनना चाहिए । बारका मामला उन्टा है। साप न केवल मेरे धन को, पर मुझे भी नवाग्नी रही है या पहूं कि....दन वम मी नकार रही है।" मुन्दन मुनती रही। कुन्दन स्वयं को मारधान कर रही थी, 'हौनियार, यह पनि तुझे यरने प्रभाव में लेना चाहता है. कुन्दन ! यह तु मानन नगा रहा है। दर ! और कुन्दन वा चेहरा एक्दन निदिशार पा। मुरंग शाम्बर जारी रहा, "इमोलिए--आराइनार मेरे लिए एक चुनौती है। मैं...ऐगान मोचिएगा दिम...आपने इलरको पपटने गरी वैटा में हूँ।न। ऐना नहीं है। परिमाराइनार बरकरार २ : फैसले हता है, तो भी मुझे दुःख नहीं। जो अनेक प्रस्ताव मेरे सामने है, उन्हीं में । किसी को स्वीकार कर लूंगा। किन्तु...जानती हैं, अभी आपसे मिलने का मूल कारण क्या है ? आप शौक से इन्कार करिए, किन्तु इन्कार का ठोस कारण भी बताना होगा । बस । मुझे और कुछ नहीं कहना।" और सुरेश जी झटके के साथ उठ पड़े। ८ "धन के नाम पर हमारे पास जो-कुछ भी है, वह तेजी से शुन्य की ओर बढ़ रहा है, भीमा ।" चम्पक ने चिन्तातुर स्वर में कहा। भीमा चुप रहा । देशराज भी। कहने के लिए उनके पास था ही क्या? उन तीनों के बीच सर्वाधिक बातूनी था चम्पक । सुख या दुःख की हर घड़ी में, सबसे ज्यादा वही बोला करता। अपनी इस परम्परा को वह आज भी निभा रहा था। दोनों साथियों को चुप देखकर उसी ने आगे चलाया, "क्या करें? कैसे करें ?" "तोते की तरह बार-बार एक ही वाक्य न दोहराओ।" भीमा चिढ़ गया। - "लेकिन, भीमा, यकीन जानो, चाहे ज़मीन-आसमान एका करना पड़े, मैं तुम्हें अभिनेता बनाकर छोडूंगा।" भीमा और देशराज का साथ छोड़कर, चम्पक, सारा-सारा दिन जे गायब हो जाता था, उसका कारण भीमा और देशराज ने यही समझा कि वह विभिन्न फिल्म निर्माताओं के घरों और दफ्तरों के चक्कर काट लगा है। वास्तविकता यह थी कि चम्पक के अधिकांश चक्कर उन दोस्तों ठिकानों पर ही लगे थे, जिनसे उसने कुछ रकम उधार पाने की आशा र गुछा चक्कर उसने फिल्मी हस्तियों के यहाँ भी लगाये थे, किन्तु- सभी तरफ निराशा।
फिल्मी हस्तियों ने साफ जवाव दिया, "इण्डस्ट्री के पास एक 'पहलवान अभिनेता' है-मूवासिंह । एक बहुत है। दूसरे की गुंजाइश यहाँ से निकालें?" और दोस्तो के यहाँ ? अधिकांश ठिकानो पर चम्पक को जवाब मिला, "यार...दो दिन पहले आते । एक रफम अलग रगी थी। किसी को परमो ही दे दी। सॉरी!" कुछेक जगह जवाब मिला, "नहीं, यार, जेव बिलकुल सानी है । तुम्ही कुछ इन्तजाम कर दो।" पुछेक जगह दोस्तों से मुलाकात ही न हो सकी। कुछ दोस्त शहर से बाहर थे, कुछ अपने ठिकाने से गायय । चम्पक उड़ता पंछी पा। कभी इस शहर में, कभी उस शहर मे। उसके दोस्त, इसीलिए, अनेक शहरों में बिखरे पड़े ये--किन्तु उनमें से कितनों को 'अतरंग' माना जाए, चम्पक ने पहली बार पहनाना। अन्य शहरो को ईश्वर जाने, किन्तु बम्बई में तो 'अन्तरंग' की श्रेणी पाने वाले लगभग न के बराबर सावित हुए। 'अब तो कोई चमत्कार ही मेरी जेब गर्म कर सकता है।' सप्ताह के अन्त मे चम्पक ने सोचा। राजन का फोन आया था-'डबल' बनने का प्रस्ताव...। फोन चम्पक ने उठाया था और उसने राजन को किस बुरी तरह झिड़क दिया था। "भंगी का काम एक राजा से कराना चाहते हो?" पहा था चम्पक ने, अपने मूवागिह को खबर कर देना-भीमा को तो उसकी टक्कर का अभिनेता बनाया जाएगा। सूवामिह है विम सयाल मे?" चम्पक यदि राजन को न झिडकता, तब भी स्थिति में कौन-सा फर्क पह जाता? भीमा और देशराज के सामने चम्पय ने स्पष्ट किया था, "उस राजन के बच्चे को खूब पहचानता हूं। वह अदना-मा एक्स्ट्रा-गप्नायर है । 'डबल' बनकर आसिर प्राप्त हो गया होगा? इस काम में न इज्जत है, न पंमा। गलत सोचते हो कि 'हयल' बनने वाला जल्द ही मालामाल हो जाता है । जान हथेली पर रखकर, खतरनाक मूटिंग में भाग लो-और पाओ पया? मिर्फ इतना कि भूरी न रहो। वस। लेकिन भीमा । यभी हमारी हालत भुखमरी वाली नहीं है।" ।
४४ फैसले सही तसवीर सामने आने के बाद देशराज और भीमा ने 'डबल' बनने वाला प्रस्ताव न केवल भुला दिया था बल्कि ऐसा प्रस्ताव रखने वाले राजन प्रति वे दोनों गहरे आक्रोश से भी भर उठे थे। दैनिक अखबारों का 'जगह खाली है' कॉलम भीमा रोज पढ़ा करता। सब जगह अनुभवी व्यक्तियों की जरूरत थी...हुंह...जैसे कोई मां के पेट से ही अनुभव लेकर आ सकता हो ! अनुभवी-या फिर, बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे। और भीमा बहुत ज्यादा पढ़े-लिये लोगों में से नहीं था। केवल इंटर पास किया था उसने । पहलवानी में उलझने के बाद तो इंटर तक की विद्या भी जैसे हवा में घुल गई थी। तो क्या करें भीमा? चपरासी बने ? चपरासी बनने के लिए भी साइकल चलाना आवश्यक शर्त थी---और भीमा ने कभी साइकल चलाना नहीं सीखा। "मुझे साइकल से ज्यादा तेज तो मेरी टांगे ही ले जा सकती हैं।" शुरू से ही भीमा की 'फिलासफी' इस श्रेणी की रही। तो? क्या भीमा साइकल चलाना शुरू करे ? सीख ले ? लेकिन-- क्या दुनिया में यही एक काम वाकी रह गया है ? चपरासी बनना? 'मुझे ऐसे घटिया ढंग से सोचना भी नहीं चाहिए।' भीमा स्वयं को समझाया करता, 'एक ओर यह चम्पक है, जो मुझे फिल्मी अभिनेता बना कर लाखों कमाने की सोच रहा है। कमा सके या न कमा सके, यह दीगर वात है---उतने ऊँचे ढंग से वह सोच तो सकता है न ! में क्यों इतने ओछे ढंग से सोचूं?' मगर दिनोंदिन उसका हौसला पस्त हो रहा था। यही हालत देशराज की थी। दिन-ट्रिन...! फोन बजा। गेस्ट हाउस के मैनेजर ने रिसीवरं उठाया, "हैलो...!" "जरा भीमा जी को बुला दीजिए। जरूरी बात करनी है।" किमी पुरुप-स्वरन पहा।
मैनेजर ने भीमा को बुलाने के लिए नौकर रवाना किया। एक मिनट भी मुश्किल से बीता होगा कि भीमा ने याकर रिमीवर उठाया, "हेलो ! मैं-मीमा।" "वधाई-भीमा साहब।" उम पुरप-म्बर में व्यंग्य की कमी नहीं थी। भीमा मावधान हुआ, "वाई? विम बात की ?" "माज के जमाने में ऊँचे स्वाव देखना भी बधाई की बात है।" "क्या मतलब?" "अगर एक पहलवान अभिनेता बन गया, तो इसका मतलब यह तो नहीं कि दुनिया का हर पहलवान अभिनेता बन सकता हो।" "आप कौन माह्य बोल रहे हैं ?" "नाम जानकर क्या करेंगे?" पुरुष-स्वर ने पूरी ठडक के साय जवाब दिया, "मोटे तौर पर यूं ममलिए—आपका शुभचिन्तक हूँ।" "शुक्रिया, लेकिन मुझे गुमनाम लोगो मे बात करना पसन्द नही है।" और भीमा ने कनेक्शन काट दिया। मैनेजर के कानी तक भीमा के शब्द पहुंचे ही थे। ज्यो ही भीमा ने रिमीवर रखा, मैनेजर ने पूछा, "किस का फोन या, भीमा साहब ?" "पता नहीं कौन पा... ." भीमा बुदबुदाया, "किसी से मेरी दुश्मनी नहीं, लेकिन लोग दुश्मन पनना चाहते हैं।" "वातचीत से ऐमा लगा, जैसे कोई आपको धमकी-गो दे रहा हो...?" "यही समझ लीजिए।" भीमा युदबुदाया। "मेरा खयाल है, फोन दूसरी-तीसरी बार भी आएगा।" मैनेजर बोला, "क्या करूं? आपको बुलाऊं या नहीं ?" "हमेगा फोन करने वाले का नाम पूछिए । यदि बताने मे वार करे, तो एक ही जवाव दीजिए, 'गलत नम्बर' । वह दूसरी बार नम्बर मिलाएगा, तीसरी बार मिलाएगा–जितनी चार मिलाए, यही काहिए.'गलत नम्बर।" "ओके, वॉग | " मैनेजर मुस्कराया । भीमा को कभी-कभी 'दॉम' म्ह देना उमकी पुरानी आदत थी। यह मन्द भीमा को पसन्द भी पा, गिन्तु- . याज? भीमा को लगा, मैनेजर म्यग्र कर रहा है । रिम या 'बॉम' फैसले का मालिक? नजर झुकाकर भीमा अपने कमरे की ओर जाने लगा। दूसरे दिन फोन आया। फोन करने वाले ने नाम बताने से इन्कार या। मैनेजर ने कनेक्शन काट दिया और काटने के बाद ही भीमा को चित किया, "उसी शख्स का फोन था...." भीमा चिन्तित होने लगा। धमपियों पर ध्यान न देना ही उनका गुफ़ाबला करने का सबसे अच्छा तरीका होता है, लेकिन...क्या कभी-कभी धमकियों के अनुसार लोग कार्य भी नहीं कर डालते ? धमकी-कि तुम्हारा बेटा हग उठा ले जाएंगे...और क्या सचमुच बेटे को उठा नहीं लिया जाता? धमकी-कि अगर इतनी मियाद में इतना रपया इस-इस जगह नहीं पहुँनाया और अगर पुलिस की सहायता लेने की चेष्टा की, तो तुम्हारे बेटे का अंग-भंग कर दिया जाएगा और पया सचमुच बेटे का अंग-भंग नहीं कर दिया जाता? भीमा को लगा, उस आदमी से बात करना ज़रूरी है। आखिर पता तो चले कि यह किस प्रकार की धमकी देना चाहता है। अभी सिर्फ इतना आभास मिला है कि उस व्यक्ति को भीमा के अभिनेता बनने का प्रयास करने पर एतराज है-नेकिन यदि भीमा ने प्रयास न छोड़ा, तो? भीम की ओर से चम्पक ने प्रयास न छोड़ा, तो? क्या करेगा वह व्यक्ति ? देशराज और चम्पक से उसने रहस्यमय फोन आने वाली बात अ छिपा रखी थी। संयोग की बात कि जब भी फोन आया, ये दोनों या अनुपस्थित थे, या किसी छोटे-मोटे माग में व्यस्त । आदेशानुसार, मैनेजर ने इस बार फोन आने पर कनेक्शन काटा वल्लि भीमा को बुला दिया। रिसीवर कान से लगाते हुए भीमा ने स्वर गुरू किया, “पहिए ?" "ाब रही, भीमा साहब ! यूव गायव हुए आप। ऐसी कारखा! फोन पर बात करने में गोई रातरा नहीं।" वही पुरुष- भीमा ने कहा, "कायरता किम में है ? नाम न बताने वाले नाम फोन.मी उपेक्षा गारने पाले में ?" "ओहो...!" या अनमान पुरुष व्यंग्य से हम दिया, "तोह .
वान साहब आज बहुन मोझे हए हैं...?" "फिजूल की बातों में परत जाया न कीजिए । यतादए. आप मुझे गया सन्देश देना चाहते है।" "अभिनेता बनने के स्वाव छोड दो।" "ऐसे स्वाब मैंने कभी देगे ही नहीं, लेकिन मुझे जहाँ भी रोजी-रोटी मिलेगी, मैं जाऊंगा।" "तुम कभी अभिनेता नहीं बन सकोगे।" "न सही, लेकिन अगर मैंने कोशिश की, तो आप मना करेंगे?" भीमा ने पूटा। वह जल्दी-से-जल्दी धमकी का स्वरूप जान लेना चाहता था। "वुछ भी कर सकता हूं।" "फिर भी?" "यह तो वक्त ही बताएगा। 1" "यानी-आपम न अपना नाम बताने का साहस है, न यह बताने की मूमयूम कि आप विस-किस प्रकार मुझे नुकसान पहुंचा मरने हैं । बधाई, मिस्टर अनजाने।" "वधाई स्वीकृत है।" "वैसे...मैं अन्दाजा लगा सकता हूं कि आप किम की और मे बोल . "बहुत यूव ! यानी आप घेवल बलवान नही, बुद्धिमान भी है।" एफनाक गन्द जैसे भीमा के सीने के पार निकल गया. रिन्तु उसने अपना गंयम न गोया और पूछा, "आपने बताया नहीं कि अगर मैंने अभि- नेता बनने का प्रयाग न छोडा, तो आप क्या करेंगे।" "युछ भी...कुछ भी...।"पुरुप सतरनाक ढग मे बुदबुदाया। इसके साथ ही उसने फोन का कनेक्शन काट दिया। उलान में पड़ते हुए भीमा ने रिगीवर रया । धमनी वा म्वरूप आज भी अमात रह गया था। अब भीमा पम्पक में चर्चा किए बिना न रह गया देशराज भी मौजूद था। पम्पक ने मारी बात सुनकर प्रसन्नता मे कहा, "इमा वेवर - मतलब है । वह यह पि जो मपने में देश रहा है, वे एपदम आधारही ४८ .. फसल - । हैं। मैं फिल्मी हस्तियों के पास चक्कर लगा रहा हूँ, यह वात किसी से छिपी नहीं। एक-दो फिल्मी पत्रिकाओं ने इसका नोटिस भी लिया है। जाहिर है कि यह समाचार मूवासिंह तक पहुंच चुका है और उसके कान खड़े हो गए हैं । ये धमकियाँ उसीके इशारे पर दी जा रही हैं।" धमकियां सुनने का भीमा के लिए यह पहला अवसर था। उसके चेहरे से ही प्रकट था कि वह हचमचाया हुआ है...। चम्पक ने इस तरह आगे चलाया, जैसे अपने-आप से बातें कर रहा हो, "फिल्म इंडस्ट्री में एक से अधिक पहलवान-हीरो के लिए गुंजाइश नहीं है, यह साफ दीखता है। सूवासिंह है जमा-जमाया। यानी हम लोग या तो जमेंगे ही नहीं, और यदि जम गए, तो सूवासिंह को उखड़ना होगा। सूवा- सिंह हम से डर गया है, वरना यों धमकियां दिलवाने की उसे न सूझती। चूंकि यह डर गया है, हमें यह मान कर चलना चाहिए कि हम वास्तव में सफल हो सकते हैं।" भीमा ने कुढ़ते हुए सिर हिलाया, "कसा अभिनय, कैसी बात ! कुछ अतापता ही नहीं, और धमकियां चालू ! कमाल है ! इससे बेहतर तो यही ! रहेगा कि..." चम्पक ने उसे वाक्य पूरा न करने दिया और कहा, "देखो यार, तुम एक बार अपना भविष्य मेरे हाथों में सौंपा था। मैंने तुम्हें प्रसिद्ध पहल- वान के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई या नहीं? एक और बार अपना भविष्य मुझे सोपो। मैं तुम्हें अभिनेता के रूप में प्रतिष्ठा दिलाकर रहूँगा।" "मुन-सुनकर मेरे कान पक गए है।" भीमा नाराज होने लगा था। मगर चम्पक की आंखें चमक रही थीं। अगली बार जब उस अनजान पुरुष का फोन आया, तो चम्पक भीमा की बग़ल में ही खड़ा था। "क्या सोचा आप ने, भीमा साहब ? अभिनेता बनने का स्वाव अभी तक छोड़ा या नहीं ?" पुस्प-स्वर ने पूछा। "आप तो सीधे से यह बताइए कि यदि मैंने स्वाव नहीं छोड़ा, तो आप मया करेंगे।" भीमा ने अपना वही सवाल दोहरा दिया। "यह मेरा आखिरी फोन है।" पुरुप बोला, "अगर असली पहलवानी नहीं कर सकते, तो नाली करो-~-या विलकुल मत करो...कुछ भी करो, t - - लेफिन एक्टिग-वेक्टिग का शौक छोड़ दो।" उसो समय, महमा, वम्पक ने भीमा के हाथ से रिसीवर ले लिया और कडककर पूछा, "कौन बोल रहा है ?" दूसरी ओर से कोई जवाब न आया। चम्पक ने आंखें सिकोड़कर, फिर से, उसी कडकती आवाज में कहा, "कोन ? राजन? ठहर, राजन के बच्चे...!" इसका भी कोई जवाब दूसरी ओर से न आया। और, तव, अचानक, दूमरीआर से कनेक्शन काट दिया गया। ठीक अगले दिन, सुबह-सुबह-- बन्द दरवाजे पर खट-पट । "कौन ?" लेटे हुए भीमा ने पूछा। देशराज और चम्पक चुपचाप नाश्ता करते रहे। "जी...मैं राजन..." संकोची स्वर । चम्पक ने आश्चर्य से देखा भीमा की ओर। कल जव चम्पक ने फोन पर कड़ककर कहा था, 'कौन ? राजन के बच्चे...' तो दूसरी ओर मे चुप- चाप कनेक्शन कट गया था। इसका अर्थ पम्पफ ने यही लगाया था कि फोन पर राजन ही बोल रहा था--आवाज़ बदल कर। लेकिन यदि फोन पर राजन ही था, तो आज ही वह भीमा के सामने कैसे मौजूद हो सकता है ? इतनी हिम्मत कैसे जुटा सकता है राजन? नाश्ते की प्लेट एक तरफ सरकाकर चम्पक उठा। दरवाजा खुलने के माय ज्यों ही राजन ने प्रवेश किया, चम्पक ने उसका गला पकड़ लिया देशराज ने लपककर सिटकनी चढाई। "क्यों थे, फोन पर धमकियां देकर तसल्ली नहीं हुई?" चम्पक ने ओखें तरेर कर पूछा और राजन को हचमचा डाला। ।
४८ : फैसल हैं। मैं फिल्मी हस्तियों के पास चक्कर लगा रहा हूँ, यह वात किसी से छिपी नहीं। एक-दो फिल्मी पत्रिकाओं ने इसका नोटिस भी लिया है। जाहिर है कि यह समाचार सुवासिंह तक पहुँच चुका है और उसके कान खड़े हो गए हैं । ये धमकियाँ उसीके इशारे पर दी जा रही हैं।" धमकियां सुनने का भीमा के लिए यह पहला अवसर था। उसके चेहरे से ही प्रकट था कि वह हचमचाया हुआ है...! चम्पक ने इस तरह आगे चलाया, जैसे अपने-आप से बातें कर रहा हो, "फिल्म इंडस्ट्री में एक से अधिक पहलवान-हीरो के लिए गुंजाइश नहीं है, यह साफ दीखता है । सूवासिंह है जमा-जमाया। यानी हम लोग या तो जमेंगे ही नहीं, और यदि जम गए, तो सूबासिंह को उखड़ना होगा। सूवा- सिंह हम से डर गया है, वरना यों धमकियाँ दिलवाने की उसे न सूझती। चूंकि वह डर गया है, हमें यह मान कर चलना चाहिए कि हम वास्तव में सफल हो सकते हैं।" भीमा ने कुढ़ते हुए सिर हिलाया, "कैसा अभिनय, कैसी बात ! कुछ अतापता ही नहीं, और धमकियां चालू ! कमाल है ! इससे बेहतर तो यही रहेगा कि..." चम्पक ने उसे वाक्य पूरा न करने दिया और कहा, "देखो यार, तुम ने एक बार अपना भविष्य मेरे हाथों में सौंपा था। मैंने तुम्हें प्रसिद्ध पहल- वान के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई या नहीं ? एक और वार अपना भविष्य मुझे सौंपो । मैं तुम्हें अभिनेता के रूप में प्रतिष्ठा दिलाकर रहूँगा।" "सुन-सुनकर मेरे कान पक गए है।" भीमा नाराज़ होने लगा था। मगर चम्पक की आँखें चमक रही थीं। अगली बार जब उस अनजान पुरुष का फोन आया, तो चम्पक भीमा की बग़ल में ही खड़ा था। "क्या सोचा आप ने, भीमा साहब ? अभिनेता बनने का स्वाव अभी तक छोड़ा या नहीं?" पुरुप-स्वर ने पूछा। "आप तो सीधे से यह बताइए कि यदि मैंने स्वाब नहीं छोड़ा, तो आप क्या करेंगे।" भीमा ने अपना वही सवाल दोहरा दिया। "यह मेरा आखिरी फोन है।" पुरुप बोला, "अगर असली पहलवानी नहीं कर सकते, तो नकली करो-या विलकुल मत करो...कुछ भी करो, - - लेकिन एक्टिग-वैक्टिग का शौक छोड़ दो।" उसी समय, महमा, वम्पक ने भीमा के हाथ से रिगीयर ले लिया और कड़ककर पूछा, "कोन योल रहा है ?" दूसरी ओर से कोई जवाब न आया। चम्पक ने आँखें सिकोड़कर, फिर से, उनी कडकती आवाज़ में बहा, "कौन ? राजन ? ठहर, राजन के बच्चे...!" इसका भी कोई जवाब दूसरी ओर से न आया। ओर, तव, अचानक, दूमरी आर से कनेक्शन काट दिया गया। ठीक अगले दिन, सुबह-सुबह- बन्द दरवाजे पर खट-पट । "कौन?" लेटे हुए भीमा ने पूछा। देशराज और पम्पक चुपचाप नाश्ता करते रहे। "जी...मैं राजन...." सकोची स्वर । चम्पक ने आश्चर्य से देखा भीमा की ओर । कल जब चम्पक ने फोन पर कड़ककर कहा था, 'कौन ? राजन के बच्चे...' तो दूसरी ओर मे चुप- चाप कनेक्शन कट गया था। इसका अर्थ चम्पक ने यही लगाया था कि फोन पर राजन ही बोल रहा था आवाज वदल कर। लेकिन यदि फोन पर राजन ही था, तो आज ही वह भीमा के सामने कैसे मौजूद हो सकता है ? इतनी हिम्मत कैसे जुटा सकता है राजन ? ना को प्लेट एक तरफ सरकाकर चम्पक उठा। दरवाजा खुलने के माय ज्यों ही राजन ने प्रवेश किया, चम्पक ने उसका गला पकड़ लिया। देशराज ने लपककर सिटकनी चढाई। "क्यों थे, फोन पर धमकियां देकर तसल्ली नहीं हुई?" चम्पक ने आयें तरेर कर पूछा और राजन को हचमचा डाला। .
: फैसले भय और आश्चर्य से राजन की घिग्घी बंध गई, "जी? ज-ज-ज जी?" "क्या 'जीजी-जीजी' लगा रखा है ?" देशराज हंसा, "यहाँ कहाँ है तेरी जीजी? यहाँ तो तीनों तेरे जीजा बैठे हैं।" "घोल ? क्यों आया है ?" चम्पक ने राजन को इतने ज़ोर से धकेला कि वह गिरते-गिरते बचा। "यह क्या ? मैंने क्या किया है ?" राजन की आवाज़ थरथरा रही थी, "मेरा क्या कुसूर है ?" तड़पकर चम्पक दूसरी बार उसका गला पकड़ने वाला था, किन्तु भीमा का संकेत पाकर रुक गया। राजन उठा और कांपता हुआ बोला, "मैं समझ नहीं पा रहा। मेरी आप लोगों से कोई दुश्मनी तो नहीं। ठीक है, मेरा प्रस्ताव आप लोगों ने स्वीकार नहीं किया-लेकिन... लेकिन...इससे हम दुश्मन तो नहीं हो गए ?" "दुश्मन के बच्चे !" चम्पक ने दांत पीसे, "कल फोन पर तू भीमा को धमका रहा था कि नहीं?" "धमकाना? कसा घमकाना?" राजन ने आँखें झपकाई। उसकी आँखों का आश्चर्य इतना विशुद्ध था कि चम्पक को अपनी आक्रामक मुद्रा छोड़नी पड़ी। देशराज ने जव धमकी वाली सारी वात राजन के सामने रखी, तो वह गहरे सोच में डूबता हुआ वोला, "नहीं, ये धमकियां सूवासिंह जी की ओर से नहीं दी जा रहीं।" "तुम्हें कैसे मालूम ?" देशराज ने जानना चाहा । भीमा बोला, "बल्कि मैं तो सोच रहा था कि सीधा जाकर सूवासिंह से वात करूं कि यह कैसा मजाक है ?" चम्पक ने कहा, "राजन, तुम सूवासिंह के खरीदे हुए गुलाम हो । उसके खिलाफ़ कैसे कुछ बोल सकते हो ? राजन ने गम्भीरता से जवाब दिया, "नहीं, गुलाम-वुलाम मैं किसी का नहीं हूँ। जब मैंने कहा है कि धमकियों के पीछे सूवासिंह जी नहीं हो सकते, तो किसी ठोस आधार पर ही कहा है।" -
"आधार क्या है, मुनूं जरा?" चम्पक कुछ याग गरर बापा।
"गगे पहले तो यह बताऊँ कि अभी मैं यहां क्यों आया हूँ।"
"यताओ।"
"मुझे महरा जी ने भेजा है।"
"प्रकाश मेहरा ने?" देशराज ने आश्चर्य मे पूछा।
"जी हो, उन्ही ने।"
"प्रकाश मेहरा को भला हम मे क्या गरोकार?"
"मेहरा जी ने मेरे माध्यम में एक गन्दग आप लोगो तक पहुँचाना
चाहा है।"
"मन्देश?" चम्पर गाधान हुआ।
"ध्यान मे मुनिएगा कि मन्देश क्या है, क्योकि ग गन्देश में ही इगा
जवाब भी छिपा है कि घमरियों के पीछे किसका हाय हो सकता है।"
"मैं पूरे ध्यान से सुन रहा हूँ." चमा बोला।
"मेहरा जी ने भीमा जी के नाम मन्देश दिया है कि यदि भीमाजी माहें,
तो उनके 'दल' में शामिल हो रायते हैं। हजारो-लामो की बात न गही,
लेकिन रोजी-रोटी की समस्या कमी न रहेगी," राजन ने उत्तर दिया।
पम्पक की भौह सिमट आई।
मेहरा का 'दल'...प्रकाश मेहरा का 'दल'...!
प्रस्ताव सुनते ही भीमा की रग-रग में गुस्सा उवल गया, किन्नु वह
चुप रहा, क्योकि पम्पक और देशराज की तरह उसका भी दिमाग दूसरी
दिशा मे दौडने लगा था। फोन पर धमकी देने वाले ने, अन्तिम वार, जो
कहा पा...पया पहा पा उगने .. यही न कि अगर असली महाइया नहीं
सह मरते, तो नकली लड़ो!
प्रसाश मेहरा ही तो था नकली पहलवानों का सरतान-अगुआ !
वह स्वयं नही लहता पा-हारे हुओं को सहयाता और बीच में अपने मे
गरे करता।
नकनी पहलवान ! देग्रने में बिलकुल अगली जंगे।
आम जनता को वल्पना भी नही हो मरनी कि इन नामी पहा
की भी अपनी अलग दुनिया है।
५२ फैसले यह दुनिया तेजी से सिमट रही है, छोटी हो रही है, कुछ वर्षों में शायद यह गायव ही हो जाए-किन्तु फ़िलहाल यह दुनिया मौजूद है। अखाड़े में किसी-न-किसी कारणवश, हर साल. अनेक पहलवान इतने घायल हो जाते हैं कि 'वॉक्सिग-कमीशन' की ओर से उन्हें दंगलों में भाग लेने पर मनाही हो जाती है। ये हारे हुए तिरस्कृत पहलवान-~~मनाही के वावजूद-दंगल में उतरते हैं, किन्तु ये दंगल असली नहीं, नकली होते देखने वाला कभी नहीं जान सकता कि दंगल नकली है। विलकुल असली की तरह ही पहलवान हुँकारते हैं, उछलते हैं, चुनौतिया देते हैं, भिड़ जाते है--एक-दूसरे का हाल खस्ता कर देते हैं। किन्तु वह सब दिखावे का होता है। दर्शक समझता है कि ज़ोरदार मुक्का खाकर पहलवान चारों खाने चित हो गया, जबकि वास्तव में एक पहलवान ने दूसरे पहलवान को धीरे से ही मुक्का मारा होता है। पिटने वाला पहलवान-~-जान-बूझकर-~~-ज़ोर से उछल पड़ता है, एकदम चारों खाने चित हो जाता है, हांफने लगता है। कई पहलवान तो इतने अच्छे ढंग से बेहोशी का दम भरते हैं कि दर्शक उस पर तरस खा-खाकर दुबले हो जाएँ! किन्तु सब नकली। असली दंगलों की तरह ही इन नक़ली दंगलों का प्रचार होता है। जनता आती है, टिकट कटाती है, देखती है, खुश होती है। नक़ली दंगल आयोजित करने वाला सबसे बड़ा गुरु यदि कोई था, तो प्रकाश मेहरा ही था। भीमा को उससे सख्त नफ़रत थी। "प्रकाश मेहरा मिलावट का व्यापारी है," भीमा कहा करता, 'जिस तरह सरसों के तेल में जहरीले बीजों का तेल मिलाकर बेचा जाता है, उसी तरह प्रकाश मेहरा भी दंगलों में मिलावट करता है । लानत है !' देशराज की आँखें सिकुड़ चकी थीं। वह बुदबुदाया, "तो क्या...धमकी देने वाला वह आदमी प्रकाश मेहरा के ही इशारे पर कह रहा था कि यदि "भीमा असली लड़ाइयाँ नहीं लड़ सकता, तो वह नकली लड़ाइयाँ शुरू ।
फरे?" "जी हां, देशराजजी," राजन बोला, "मेरा यही सयार है। पहले धमकियां, फिर मुझाव...।" "यानी प्रकाश मेहरा, भीमा को, मनोवैमानिक दबाव में रगने मे वाद ही..." "जी हो," राजन का मिर हिलने लगा, "मनोवैज्ञानिक असर डालने पे बाद ही प्रकाश मेहरा ने अपना सन्देश भेजना उचित गमना।" भीमा घोला, "लेकिन नकली लड़ाइयो लड़ने का सुझाव केवल आगिरी फोन में दिया गया। दिया भी वहुत मामूली ढग से गया--जोर देकर कुछ नहीं कहा गया। मैं कैसे मान लूं कि प्रकाश मेहरा मुझ पर मनोवैज्ञानिक अगर डालना चाहता है ?" "अभी मामूली ढंग से कहा गया है। आगे जोर देकर कहा जाएगा।" राजन ने अपना मत सामने रखा। "लेकिन वह फोन तो धमकी देने वाले का आयिरी फोन था।" "ऐमा नहीं होगा। फोन फिर मे आएगा।" राजन ने पूरे विश्याम के साप उत्तर दिया। "देखते हैं...," भीमा युदबुदाया। राजन ने मिर गुजलाया, "तभी तो प्रकाश मेहरा ने पूरे दम-गम के साय मुश रो पहा पाकि भीमा मेरा प्रस्ताव जरूर मान सेगा, इन्कार करने का सवाल ही नहीं। मैंने प्रकाश मेहरा को समझाने का प्रयास भी किया पा, फिन्तु उसे पूरा-पूरा यकीन पा कि भीमा की ओर मे इनार हो ही नहीं सकता। मुझे भला क्या मालूम था कि प्रकाश मेहग धमपियों के धरिए अपना जादू चलाने की नापाक कोशिश पहले ही कर चुका है। मालूम होता, तो उगका सन्देश लेकर यहाँ कभी न आता। कभी नहीं।" और राजन ने नाटकीय ढंग से कान पकड़े।
: फैसले । यह दुनिया तेजी से सिमट रही है, छोटी हो रही है, कुछ वर्षों में शायद यह गायव ही हो जाए-किन्तु फ़िलहाल यह दुनिया मौजूद है। अखाड़े में किसी-न-किसी कारणवश, हर साल, अनेक पहलवान इतने घायल हो जाते हैं कि 'बॉक्सिग-कमीशन' की ओर से उन्हें दंगलों में भाग लेने पर मनाही हो जाती है। ये हारे हुए तिरस्कृत पहलवान-मनाही के बावजूद दंगल में उतरते हैं, किन्तु ये दंगल असली नहीं, नक़ली होते है। देखने वाला कभी नहीं जान सकता कि दंगल नकली है। बिलकुल असली की तरह ही पहलवान हुँकारते हैं, उछलते हैं, चुनौतिया देते हैं, भिड़ जाते हैं--एक-दूसरे का हाल खस्ता कर देते हैं। किन्तु वह सब दिखावे का होता है। दर्शक समझता है कि जोरदार मुक्का खाकर पहलवान चारों खाने चित हो गया, जबकि वास्तव में एक पहलवान ने दूसरे पहलवान को धीरे से ही मुक्का मारा होता है। पिटने वाला पहलवान जान-बूझकर-~-ज़ोर से उछल पड़ता है, एकदम चारों खाने चित हो जाता है, हाँफने लगता - कई पहलवान तो इतने अच्छे ढंग से वेहोशी का दम भरते हैं कि दर्शक उस पर तरस खा-खाकर दुवले हो जाएँ ! किन्तु सब नकली। असली दंगलों की तरह ही इन नकली दंगलों का प्रचार होता है। जनता आती है, टिकट कटाती है, देखती है, खुश होती है। नक़ली दंगल आयोजित करने वाला सबसे बड़ा गुरु यदि कोई था, तो प्रकाश मेहरा ही था। भीमा को उससे सख्त नफ़रत थी। "प्रकाश मेहरा मिलावट का व्यापारी है," भीमा कहा करता, 'जिस तरह सरसों के तेल में जहरीले वीजों का तेल मिलाकर बेचा जाता है, उसी तरह प्रकाश मेहरा भी दंगलों में मिलावट करता है। लानत है !' देशराज की आँखें सिकुड़ चकी थीं। वह बुदबुदाया, "तो क्या...धमकी देने वाला वह आदमी प्रकाश मेहरा के ही इशारे पर कह रहा था कि यदि 'भीमा असली लड़ाइयाँ नहीं लड़ सकता, नकली लड़ाइयाँ शुरू तो वह " मरे?" "जी हां, देगराजजी," राजन बोला, "मेरा यही गपार है। पहले धमकियां, फिर मुझाय...." "पानी प्रकार महरा, भीमा पो, मनामानिक दवाव में रखने के बाद ही...' "जी हो," राजन या मिर हिलने लगा, "मनोरंभानिर अमर दालने पंवाद ही प्राय मेहरा ने अपना सन्देश भेजना उचित ममता।" भीमा वोला, "लेकिन नाली लडायो नाइने का सुझाव येवल मानिरी फोन में दिया गया। दिया भी बहुत मामूली ढग से गया-जोर देकर कुछ नही पहा गया। मैं कमे मान तू शिप्राय मेहरा मुद्दा पर मनोवैज्ञानिक अगर बातना चाहता है ?" "अभी मामूली ढंग मे कहा गया है। आगे जोर देकर कहा जाएगा।" राजन ने अपना मन गामने रया। "लेकिन यह फोन नो घनमी देने वाले या आगिरी फोर पा।" "एमा नहीं होगा। फोन फिर मे आएगा।" राजन ने पूरे विश्वास के गाय उत्तर दिया। "देगते है.. भीमा युदबुदाया। राजन ने गिर गजलाया, "तमी नो प्रकार मेहरा में पूरे दम-गम के माय गुहा से पहा पाकि भोमा मेरा प्रस्ताव जरुर मान लेगा, लार करने पारावाल ही नहीं। मैंने प्रकाग महरा पो समझाने का प्रयास भी किया था, मिन्नु उमे पूरा-पूरा यकीन पा कि भीमा की और में लार हो ही नहीं गवता। मुझे भला या मालूम था कि प्रमाण मग धमरियों के जरिए अपना जादू चलाने फी नापार योगिग पहले ही पर चुरा है। मालूम होता, तो उगना सन्देश पर यहाँ कभी न आता। कभी नहीं।" और राजन ने नाटकीय ढग में पान पर। " १० . राजन की वात सच निकली। धमकी देने वाले का फोन तीसरे दिन फिर आया। "माफ कीजिएगा, भीमाजी..." भीमा के फोन पर आते ही उसने कहा, "पिछले फोन को मैंने आखिरी फोन बताया तो था, किन्तु आपको फिर से याद करना पड़ रहा है।" "किस खुशी में ?" भीमा ने पूछा। "पिछले फोन को मैंने आखिरी फोन इसलिए बताया था कि मुझे पक्का यकीन था, मेरे शब्दों का आप लोगों पर पूरा असर होगा। खेद कि ऐसा न हुआ। मेरी मनाही के वावजूद आपका दूत-क्या नाम है उसका? -~हाँ.. याद आया...चम्पक! चम्पकलाल वंसल ! क्या उसने फिल्मी हस्तियों के चक्कर नहीं काटे ? मनाही के बाद भी? इसका अर्थ क्या है ?" "इसका अर्थ वही है, जो आप समझ रहे है।" भीमा ने उत्तर दिया। "सोच लीजिए। किसी भी सीमा तक भुगतना पड़ सकता है।" "और यदि मैं नक़ली लड़ाइयां लड़ने के लिए तैयार हो जाऊँ ?" "तो मैं.. आपकी बातचीत एक ऐसे व्यक्ति से करवा दूंगा, जो इस मामले का सबसे बड़ा उस्ताद है।" "उसी उस्ताद के कहने से धमकियां दे रहे हो न?" भीमा का स्वर तप आया, "कह देना प्रकाश मेहरा से, भीमा को प्रकाश दिखाने की जरूरत नहीं। खवरदार, जो आइन्दा कभी फोन किया। जाओ, जो करना हो, करो। पूरी छूट है ।"...और भीमा कनेक्शन काट चुका था। घण्टों बाद ही भीमा को एक ऐसा समाचार सुनना पड़ा, जिसके लिए वह बिलकुल तैयार नहीं था। राजन ने फोन किया, "भीमा साहब, फौरन नानावती हास्पिटल इसके कुछ - पहुँचिए।" "क्यों? क्या बात है ?" "मैं और चम्पक जी एक फिल्म प्रोड्यूसर से मिलने के लिए जा रहे थे..." राजन की आवाज काँप रही थी, “पैदल चल रहे थे। वातें कर रहे ।
पे। पना न चला, कब पुछ गुरे पीछे लग गए । एक मूने नुसार पर उन्होंने
अचानया हमला बोल दिया।"
"ओह..."
"मुझे उन्होंने छुआ भी नहीं। उनका आत्रमग मिर्फ घमाजी पर
था। पाक मे गोद डाला। बाया मिनट भी न सगा होगा। दहान के मारे
मैं चिल्ला भी न पाया। पम्पक जी सहसूहान होकर सहक पर गिर पड़े-
लगभग वहोगी जमी हालत में। गुण्डे गायब हो गए। मेरे मुंह से घोल
नही फूट रहा था। पिसी तरह टंसी की, पम्पक जी को हास्पिटल
पहुंचाया।"
"मैं अभी बाया...नानावती हाम्पिटल ही न?"
"हो. इमरजेन्मी यार्ड में घुगने के गाय ही दूसरा बैड।"
"राजन...!"भीमा को आवाड आशंका मे परपरा गई।
"हाँ, भीमा गाय...!'
"चम्पा पतरे में बाहर तो है न?
"चिन्ता न करिए, भीमा साहब ! हमलावरों को अच्छी तरह मालूम
था कि उन्हें क्या करना है।"
"तब तो..पम्पक मी दशा...."
"हमलावरों को मालूम था कि उन्हें पम्पक जी की हत्या नहीं करनी
है.येवल पायन घरना है। उन्होंने कयल पायल ही पिया । सधे हुए
गुण्डं थे। बडे हो गहरे पाव पिए है, लेकिन ऐगी-ऐसी जगहो पर कि जान
को कोई खतरा न रहे।".
“मैं अभी रवाना हुना।" भीमा ने फोन रग दिया।
देशराज यो माय संकर, टेक्मी में, भीमा तुरन्न नानावती हास्पिटल
को और रवाना हो गया।
।
"नी हू यहाँ गया कर रहा है ?" भीमा ने नाश्च से पहा । भी
: फैसले देशराज ठिठककर खड़े रह गए। हास्पिटल पहुंचे हुए उन्हें तीन घंटे बीत चुके थे। अभी तक चम्पक से बात नहीं हो पाई थी! कारण वह दर्द से छटपटाता रहा था। छुटकारा दिलाने के लिए डॉक्टर ने उसे ऐसी गहरी नींद की दवा दे दी थी, जो बेहोशी से किसी तरह कम नहीं थी। चम्पक के तमाम बदन पर पट्टियाँ-ही-पट्टियां बंधी देखकर भीमा और देशराज थर्रा गए थे। वेखवर सोए चम्पक को पता भी न था कि भीमा और देशराज कितने चिन्तित हैं। चम्पक की गहरी नींद खुलने के इन्तजार में भीमा और देशराज हास्पिटल के कैंटीन में जा बैठे थे। समय काटे न कटता था। एक-एक पल पहाड़ लग रहा था। और आशंकाएँ...चम्पक पर हमला केवल सांकेतिक है। चम्पक के साथ-साथ-वास्तव में-~-यह हमला भीमा को सबक सिखाने के लिए है। ऐसा ही हमला-~-इससे भी भयंकर हमला -स्वयं भीमा पर होगा, यदि उसने अभिनेता बनने का प्रयास न छोड़ा...! विडम्बना यह भी थी कि भीमा ऐसे प्रयास को लेकर विशेप उत्साहित कभी नहीं रहा है केवल चम्पक ही था, जो उस सुनहरे सपने को छोड़ने के लिए राजी नहीं था-~-धमकियों ने जिसका आत्म-विश्वास और बढ़ा दिया था। लेकिन भीमा को सबक देने के लिए चम्पक पर हमला हुआ...चम्पक को अपने बढ़े हुए आत्म-विश्वास की कीमत अदा करनी पड़ी। चम्पक अव जाग गया होगा, इस अनुमान के साथ भीमा और देशराज कैंटीन से बाहर आए। आए ही थे कि उनकी नज़र ली हू पर पड़ी। वह गोरा, गंजा, नाटा, खतरनाक व्यक्ति, पूरी गम्भीरता से इमर- जेन्सी वार्ड की ओर बढ़ रहा था। किससे मिलने जा रहा था वह ? भीमा और देशराज ने सोचा भी न था कि वह चम्पक के बैड के पास जाकर रुपेगा। उनकी कल्पना यही थी कि ली हू का भी कोई सगा-सम्बन्धी या दोस्त-परिचित, इमरजेन्गी वार्ड में दासिन हुआ होगा। दंगराज और भीमा, एफ फामला बनाए रगार, ली हमे पीछे-पीछे चलते रहे थे । ली ह को चम्पक के बैंड में पाम काते देगार उन्हें आश्चर्य हुआ था...बहुत गहरा आश्चर्य...सो हु और पम्पमा मे धीय परा रिता है ? कसा सम्मक है? कौतूहल मे भीमा और दंगराज प्रसार मागे बढे पे रिनी ह या पणा में गे किगी पी निगाह उन पर न पड़े, किन्तु उन दोनों की यातचीत इन दोनों के पानों नक आ जाए। तब उन्हें यह वान भात हुई, जो पम्पक ने आज तक छिपा कर रपी । पम्पक होश में आ पा था। नगं ने सीहू पो हिदायत दे दी थी कि यादा यातचीत न की जाए। लोहू ने नर्म की यात पर रंगमार भी ध्यान नहीं दिया था। पम्पक से मुगानिव हो पर पह रहा पा यह, "मियाद पूरी होने में अब गिफं. दो दिनों गोदर है।" "हाँ, ली हू माहब..." पम्पर का स्वर मग्यिसा, "और दो दिनो तक तो मुझे शायद यहाँ से एट्री भी न मिले । माफी पाहता हूं। मांग भी यौन मरता था, ऐमा हो जाएगा।" "लेकिन...मियाद माने मियाद।" "यदि आप मियाद यहाने मिगी तरह ममयं नहीं, तो पहने के लिए मेरे पास कुछ नहीं रह जाता।" "जय सबर मिली कि चाकू से हमला हुआ है, तो मैंने स्वय आ कर देखना जरूरी समझा--ताकि.. ।" मी ह ने वाक्य पूरा न निया । घार ने मुम्कराने का प्रयाग पिया। मी हा आशय पपा पा, पम्पक गमा गया था। सीटू ने स्मय आ कर देपना पाहा हिमरे का समाचार मच्चा या या झूठा । उतनी-उतनी पट्टियों के कारण मुम्कराना कोई आमान पाम नही पा। पम्पर की मुम्कान दोधाण में ही डूब गई। उसने गम्भीरता मेमहा, "मुमरिन है, मैं भूटी पट्टियां तमाम शरीर पर घंधया पर पहाडमा हो । यदि और भी तगल्ली परनी हो, तो पटियां गुलदा कर दिगा।"
: फैसले "जरूरत नहीं।" ली हू पर चम्पक के व्यंग्य का रंच-मान भी असर न हुआ। "मैं चेहरा देख कर असलियत भाप सकता हूँ। घायलों की आंखें अलग तरह की होती हैं।" "और गरीबों की आंखें ?"चम्पक ने पूछा। "क्या मतलब ?" ली हू न समझा। "क्या आप को मेरी आंखों में देख कर पता नहीं चलता कि मियाद पूरी होते-होते पांच हजार रुपये ला कर आपको दे देने का भरसक प्रयास मैंने किया है ? क्या आप इतना भी नहीं समझ सकते कि यदि मेरी जेव खाली न होती, तो मैं आपके सामने यों शर्मिन्दा होना कभी पसन्द न करता? सब-कुछ आप देख रहे हैं और फिर भी ये शब्द आपके ही हैं कि मियाद माने मियाद !" ली हू का चेहरा, जो पहले ही पथरीला था, अब और पथरीला हो आया। उसने उठते हुए कहा, "हाँ, चम्पक ! मियाद माने मियाद ही होता है। पहले तुम हास्पिटल से छुट्टी पा लो । मैं मियाद बढ़ा नहीं रहा हूँ, लेकिन मियाद पूरी होने के साथ-पांच हजार न मिलने की सूरत में---जो कार्रवाई करने की मैं सोचे हुए था, उसे फ़िलहाल रोके रहूँगा।" "चलिए, गनीमत है। धन्यवाद !" "हास्पिटल से छूटो। तब हम फिर से मिलेंगे। मियाद बढ़ने का सपना न देखना।" "एक बात बताइए, ली "क्या?" लीह जाते-जाते रुक गया। "क्या आपको रुपयों की इतनी भयानक तंगी है कि यदि पाँच हजार का इन्तज़ाम मैं कुछ विलम्ब से कर पाता हूँ, तो आपकी गाड़ी ही रुक हू साहव !" - जाए ?" ली हू हँसा, “सवाल यह नहीं कि मुझे तंगी है या नहीं। सवाल उसूल का है। मियाद बढ़ाना मेरा उसूल नहीं। फिर मिलेंगे...." और वह जाने देशराज और भीमा उसके रास्ते से हट गए। न जाने क्यों, वे उसके द्वारा देसे जाना नहीं चाहते थे।
सी हू जय इमरजेन्सी वार्ड मे निरन चुरा, तो घे पम्पर केयर यी और बड़े। चम्पक गहरी सांग लेता हुमा, आग मूंदकर, हवाग चेहरे के माय, युन की तरह घिर पहा या। यदि वह गहरी गां न से रहा होता, नो पता चलाना मुगिन ही रहता कि वह पट्टियों में निपटा हुआ युत है या जिन्दा आदमी । उसके पूरे पक्तित्व में ऐगा बंजानपन आ गया था, जो पहले कभी नहीं देगा गया था। "चम्पक...!" भीमा ने हौले मे पुकारा। पम्पक ने आगे पोली। उन आगो में आगंगा पाप रही थी--नीह माय हुई बातचीत का कोई अंश इनके पानो तक तो नहीं पहुंचा? आशंका केही कारण पम्पक ठीक मे मुम्परा भी न पाया। भीमा ने कहा, "कैसे हो? "टी हूँ। अदभुत घटना रही-है न? मैंने कुतई नहीं सोचा था किउन धरियों में बोई दम है।" पम्प ने उत्तर दिया । "हम तुममे मिलने के लिए कई पटों मे इन्तजार कर रहे हैं । तुम गहरी नीद मे थे।" "हापटर की कृपा-और क्या ! नौ नजदीक आई और भीमा मे बोली, "इन मे पयादा बात न करें, तो बेहतर। यह माफी कमजोर है।" "जी" भीमा ने नर्मी और उनी निगाह में देश लिया। नगं चली गई। दंशराज बोला, "चम्पक . यह नी हू वरो आया था यहा तुमसे मिलने के पीछे क्या मकमर था उमरा मियाद-विवाद का क्या चार पम्पर ने आगे दन्द कर ली। तो.. इन्होंने जान लिया। दरअसन, हिपाने का कोई अयं पा ही नहीं। मापद गुरु मे नही पा, पिनु परफ ने मोगा पा-मेरी जिन्दगी घमसारोपी दुनिया रही है। परा अजूबा, पहिरिमी पमत्कार में मेरी जेब में परि-नान हजार आ जाएं। देगराज या भीमा को बताने की जरूरत क्या है ? 4 यागिर पगे जानें कि मैंने गट्टा लगाने जंगा गन्दा पाम किया यह भी--मी हू जमे घटिया आदमी फैसले न!' - फिल्मी हस्तियों में से यदि एक को भी यह बात अँच जाती कि भीमा फल्मों में हीरो बनाया जा सकता है, तो- अनुबन्ध पर हस्ताक्षर करने का ही पाँच-सात हजार मिल सकता । अजूवा क्या रहता, यदि सचमुच किसी फिल्म-निर्माता को वात जंच ती? मगर किसी को बात नहीं जंची। बात नहीं जंची-इससे भी कोई अजूवा उसी तरह नहीं था, जिस तरह बात किसी को जॅच जाने में न होता। फिल्मी दुनिया में कुछ असम्भव नहीं, कोई, वात अजूवा नहीं। लेकिन बदकिस्मती... चम्पक ने अनिच्छा से आंखें खोलीं। कम-से-कम शब्दों में उसने पाँच हज़ार की शर्त के बारे में अपने दोनों साथियों को सब बता दिया। भीमा और देशराज सन्नाटे में आ गए। देशराज पहली बार पछ- ताया कि उसने आज तक एक पाई भी क्यों न बचाई। और भीमा? उसके पास तो पछताने के लिए भी शायद कोई गुंजाइश नहीं थी। भीमा यदि चाहता, तब भी क्या वचा सकता था? भारत देश में कितनी-कितनी सामाजिक क्रान्तियों की गुंजाइश है ! मगर यहाँ क्रान्ति होने का नाम भी नहीं। यहां की जनता लकीर की फकीर ही वनी रहना चाहती है, वरना- दहेज जैसी प्रथा, अब तक, खत्म क्यों न हुई ? भीमा की पांच वहनें थीं। भीमा-उनका अकेला भाई। सबसे बड़ा। पांचों बहनों की शादी भीमा ने करवाई। भीमा ने मिर्जापुर क्य छोड़ा था? अपने घर से निकल क्यों गया था वह ? इसीलिए न कि ध वटोर सके-बहनों की ढंग से शादियां कर सके ? चारेक मास पहले भीमा ने अपनी सबसे छोटी बहन की शादी की। हर शादी में औस पचास हजार फुक गया...लोग कहते थे, बहुत कम खर्च किया इन्हें पचास-पचास हजार फूंकने के बाद भी लोग ऐसा कहते थे...! ठीक यही चक्कर चम्पक के साथ भी था। उसकी भी चार थीं। चारों में से एक भी सुन्दर नहीं। पढ़ी-लिखी जरूर थीं ?
गुन्दरला पा मावश्यक यरदान तिमी को नहीं मिला था। पम्पा ने उनी
गादियां करवाई-पम्पकी सारी आप उमी में गायब हो गई।
घम्परः और भीमा, दोनों मां सगल्ती पी-कि गव यहां भी
मादिया गयुगल नियट गई।
पम्पक और भीमा, दोनों की जा साली जहर हो गई है, लेग्नि
दंगलों में नए-नए रिकार्ड पापम करने वाला भीमा फिर से समाएगा।
पम्पफ भी, अपने इस पहलवान दांम्त के माध्यम से, धन बटोरेगा। धन
यमी तर हाय में टहरा नहीं-मिन्नु अब ठहरने वाला पा...जर
टहरेगा...।
मपिन बदकिस्मती का पार भी अभी होना था। यस्मिग-कमीगन'
पी रिपोर्ट ! भीमा कभी दंगल में नहीं उतर. मांगा...पह पुछ ऐगी ही
यात पी फी गुन-गमीना एकः करके, गारी जिन्दगी दाव पर लगा कर
थापने एक टपमान लगाई, चिन्नु भूपाल आया-टरयान परती मे पेट
में!
पर की रडत बचाए रणने के लिए, पर को याद रराने के लिए
भीमाने पर छोड़ाया। चम्पर ने भी मीनिए अपने घर का स्पाग पर
न जाने रहाकही री पार छानी पी। कभी यहाँ दगल,
दंगल...
क्या आज पा ही दिन देवने के लिए?
कभी यही
१२
अगवारी के. 'आयरनता है विभागों में विज्ञापन भीमा के लिए
निरपर ही रहे थे। हारर उगने मना पिया कि यह मामदिनाऊ
दानर पीगरणगा।देवराज ने उनरेग फंगले वाविपराग्लन
रिया। देशराज के यनुमार-पादिनाज मारकी मार-पीतानाही
मोर पूगयोरी भीमा यो राम नहीं आएगी। मगर बरा दिया जाए ?'
भीमा फेम मवाला जयाय भी देगराज के पास नहीं था।
६२ : फैसले . देशराज की असहमति के कारण ही भीमा जब कामदिलाऊ दफ्तर में अरजी देने के लिए रवाना हुआ, तो वह अकेला ही था। देशराज को साथ नहीं रखा था उसने कामदिलाऊ दफ्तर की भव्य इमारत ने भीमा को आतंकित कर दिया। दंगलों के सिलसिले में, इससे पहले, अनेक बार, भीमा ने भव्य-से भव्य इमारतों में प्रवेश किया था, किन्तु आज उसने पहली बार जाना कि इमारत की निर्जीव भव्यता में भी कैसा आतंक होता है ! वह बड़ी-सी इमारत मानो ऐलान-सा कर रही थी, 'यह जगह बड़े लोगों के लिए है... जो छोटे लोग यहां आते हैं, वे भी किसी-न-किसी बड़े आदमी के ज़ोर पर आते हैं...तभी उन्हें सहायता मिलती है । भीमा, तुम छोटे हो, इस इमा- रत को तुम से कोई सहानुभूति नहीं...।' भीमा ने संकोच के साथ प्रवेश किया। चपरासी को बताया कि वह किस उद्देश्य से आया है। चपरासी बोला कि एक फार्म भर कर देना होगा। 'फार्म कहाँ मिलेगा?' के उत्तर में उसने एक काउंटर की ओर इशारा कर दिया। वहाँ से फार्म लेकर भीमा वैठ गया। जेब से उसने फाउंटेन- पेन निकाला । खोला। नाम ? उसने अपना पूरा नाम भरा। वर्तमान पता? उसने दादर के गेस्ट हाउस का पता भर दिया। स्थायी पता? वह उलझन में पड़ा । मिर्जापुर की गलियाँ और सड़कें उसकी आँखों के सामने जिन्दा हो उठी...मिर्जापुर को तो भीमा ने छोड़ हो दिया। वहाँ के पते को स्थायी पते के रूप में भला कैसे दर्ज किया जाए ? लेकिन दूसरा कोई पता भी तो नहीं ! आखिर भीमा ने वहीं का पता लिख दिया वम्बई.में निवास की अवधि ? यहाँ क्या भरा जाए? भीमा तो कभी एक जगह टिका नहीं। लेकिन...यदि बम्बई में निवास की अवधि--एक लम्बी अवधि-दर्जन की गई, तो शायद...कामदिलाऊ दफ्तर की सहा- नुभूति भीमा को उतनी न मिल सके, जितनी कि उसे मिलनी चाहिए... । ग़लत भर दे ? लिख दे कि पन्द्रह साल से यहाँ है ? बेकार है ? दर- दर की ठोकरें खा रहा है ? लेकिन नहीं, भीमा को झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए...। मगर इस दुनिया में झूठ कौन नहीं बोलता? धर्मराज युधिष्ठिर ने भी
तो... भीमा मुस्करा दिया मन-ही-मन । एक फालतू-मी वात यो वह जरू-
रन से ज्यादा अहमियत दे रहा या-वह जान गया।
किन्तु बम्बई में निवाम की अवधि का साना वह भर नहीं मका । उस
खाली ही रहने देकर उसने सानापूरी को अगली दका पढो-पहले कहाँ
नौकरी करते थे?
नही। इस दफा को भी नही भरा जा गाता।
अगली दफा-
महां-कहाँ, कब-कब, कमी-कैसी नौकरियों के अनुभव अव तक मिल
भीमा को पसीना आने लगा। यहां भी वही मवाल था-अनुमव !
असवारों के 'आवश्यकता है' विज्ञापन जिस तरह निरयंक रहे थे, क्या उगी
तरह कामदिनाऊ दफ़्तर भी हिरयंक ही रहने वाला है ? देशराज वा कहना
सही था शायद..!
भीमा की उंगलियां कांपने लगी थी और उसे इस का पता नहीं
या।
उमने अगली दफाएँ पढ़ी। घुमा-फिराकर, सब में, एक ही बात पूछी
गई थी-अनुमद।
मस्तक के नम हो चुके होने का पता अचानक चला । भीमा ने रुमाल
निकाला । मस्तक पर फेरा । महसा वह उठ पड़ा । आधा भरा हुआ फार्म
उमने बैंच पर ही छोड़ दिया, जिस पर कि वह बैठा हुआ था। 'वकार...
व्ययं की कोशिश...'भीमा के चेहरे को रग-रग से जमे यही चोत्सार-मा
फूट रहा था।
जल्दी मे फाउंटेन पेन का कप बन्द करके उसने बाहर निकलने के
लिए कदम उठाए ही थे कि
"जरा सुनिएगा...!"
वह टिटक गया । उतना झंकार-भरा, मीठा नारी-स्वर उमन
कमी नहीं सुना था। पलट कर देखने लगा।
मेज पर, पूरे यधिकार के साथ जमी हुई एक युवती की
म्भिर हुई जा रही यो। क्या वह मधुर स्वर इमी युवती का
पढेर फालों मे,
.
६४ : फैसले - A यही है...भीमा का दिल धक-से हो कर रह गया। 'इस सुन्दरी को मुझसे क्या काम है ?' यह प्रश्न उसे रोमांचित और स्तब्ध-सा कर गया। पहलवानों की दुनिया में औरत की जगह कहाँ होती है ! धूमते- फिरते, दर्शकों की गैलरी में निगाह फेरते, पत्र-पत्रिकाओं को पलटते हुए भीमा ने अनेक सुन्दरियों के दर्शन किए थे। वस ! भीमा की दुनिया में नारी केवल इतनी ही थी। किसी अजनबी नारी ने आज पहली बार पुकारा था उसे। भीमा का चेहरा लाल पड़ गया। वह अत्यन्त असहज मुद्रा में चलता हुआ उस मेज़ के नज़दीक पहुंचा। "आपने मुझे पुकारा ?" पूछते समय उसे लगातार भय लग रहा था- कहीं मैं हकला न जाऊँ। उस रेशमी युवती ने मुस्करा कर उत्तर दिया, "जी हाँ, आप ही को।" "लेकिन मैं..." भीमा और कुछ न बोल सका। "वैठिए ।” युवती ने सामने रखी कुर्सी की ओर संकेत किया। भीमा वैठा। "आपने फार्म भरा क्यों नहीं ?" भीमा का आक्रोश, सहसा, उछल पड़ा, "कोई मतलव नहीं था। यह दफ्तर मेरे लिए विलकुल..." "जरा उठा कर दीजिएगा? देखू, आपने क्या-क्या भरा है ?" भीमा ने कुर्सी छोड़ी। उस बैंच तक पहुंचा, जहाँ उस का अधूरा फार्म ज्यों-का-त्यों पड़ा था। उसे लेकर वह मेज़ तक वापस आया। फार्म युवती के सामने रखता हुआ वह कुर्सी पर फिर बैठ गया। युवती की आँखें फार्म पर घूमने लगीं, "यह तो लगभग कोरा है।" "जी हाँ।" भीमा ने रूखी हँसी हँसने का प्रयास किया। "लेकिन क्यों ?" "यदि पूरा भरूँ, तो भी कोरा ही छोड़ना होगा। लिहाज़ा सोचा कि भरने का मतलब ही नहीं।" "मैं...समझी नहीं।" - - । -- "अधिकाग खानों में पिछली नौकरियों के अनुभवों का ब्यौरा मांगा गया है। मैंने आज तक कभी नौकरी नहीं की। पहली बार तलाम में निकला हूँ।" "कभी नौकरी नहीं की? तो क्या...आपका कोई व्यापार पा, जिस में मफल न होने के कारण अब बाप:" "व्यापार!" भीमा की असहजता अव कम होने लगी थी, हो...आप उसे व्यापार वह सकती हैं। आधुनिक दुनिया में हर चीज व्यापार ही है। मेरे दो भागीदार भी थे। मैं असफल क्या हुआ, उनकी भी लुटिया डूब गई।" "ओह...लेकिन...जो भी है, आपको यह फार्म तो भरना ही चाहिए।" "आप मुझे नौकरी दिलाएंगी?" भीमा ने सीधा सवाल पूछा। उसने युवती की आँखो मे सीधे-सीधे देखा। वे आंखें उसे इतनी सगीत-भरी और जादुई-सी लगी कि अगले ही क्षण वह झेप-गा गया-जैसे उसने कोई अप- राध करने का इरादा वसाया हो और पकड़ा गया हो। उसकी निगाहे झुक गई । झुकने के साथ ही उसने स्वयं जो सावधान किया । नहीं। उसने कोई अपराध नहीं किया था। युवती से जब बातें हो रही है, तो युवती की आँखों में सीधी नजर डालना-इसमे कही कोई अपराध नहीं है। भीमा ने निगाह उठाई। युवती गम्भीरता से बोली, "आपका यह फार्म, क्लर्क के माध्यम से आखिर मेरे पास ही आना था। नौकरी दिलवाने के लिए ही यह दफ्तर खोला गया है।" "यह तो मैं भी जानता हूं लेकिन... ...क्या आप नौकरी दिलवाने का वचन देती हैं ?" "नहीं।' "इसीलिए तो कहता हूँ कि यह दफ्तर केवल एक ढोंग है... कम...मुझ जैसे व्यक्ति को तो यही लग सकता है।" भीमा के इस आरोप को युवती ने रंच मात्र भी पसन्द और यह नापसन्दगी उसके चेहरे पर टभर मी आई, : फैसले सौजन्य भाव में कोई कमी न आई । उराने उत्तर दिया, "यह दप्तर केवल प्रयास कर सकता है । नौकरी तो अन्तत: अपनी योग्यता से मिलती है। "क्यों नहीं !" भीमा के स्वर में कटुता का आभास था, "और योग्यता की कसौटी क्या है ? अनुभव ! यही न? मेरे पास किसी चीज का अनुभव नहीं। किसी नौकरी की साख मेरे पास नहीं।" "लेकिन जो व्यापार आप करते थे, उसका अनुभव तो...।" "प्लीज़...उसे 'व्यापार' न कहिए।" "किन्तु...जैसा कि स्वयं आपने बताया... "वह मेरा शोक़ था। यह एक दीगर बात है कि उसी शौक़ ने मुझे पैसा बहुत दिया, किन्तु केवल इसी आधार पर मैं उसे व्यापार मानने को तैयार नहीं।" "स्वयं आप ही ने 'व्यापार' शब्द...." "हाँ, यह शब्द स्वयं मैंने इस्तेमाल किया, किन्तु विना अर्थ के।" "आप क्या करते थे?" "पहलवानी।" कुन्दन को लगा, उसने कुछ ग़लत सुना है। भीमा की ओर देखती रह गई वह । फिर-~-सहसा-उसे याद आया कि क्यों वह भीमा के चेहरे की ओर आकर्षित हुई थी। उसकी मेज़ के सामने, रोज़ न जाने कितने व्यक्ति ऐसे आकर बैठते थे, जिनके चेहरों पर असहनीय उलझन कांप रही होती थी-किन्तु किसी भी व्यक्ति की उलझन के प्रति कुन्दन ने कोतूहल अनु- भव नहीं किया था। वह जानती थी, यह दप्तर उलझन-भरे व्यक्तियों का केन्द्र है । किस-किस पर गौर किया जाए ? किन्तु भीमा ने उसका ध्यान बरबस आकर्षित कर लिया था। इसी- लिए तो जव भीमा फार्म वहीं छोड़ कर जाने लगा था, तो कुन्दन ने पुकार - । . लिया था। क्यों ? क्योंकि भीमा का चेहरा उसे जाना-पहचाना लग आया था। अव उसके मस्तिष्क में कौंध-सी हुई-जाना-पहचाना क्यों लगा था वह चेहरा ? क्योंकि उसे उस ने अखबार में देखा था। समाचार-नामी "ओह " पहलवान भीमा हार गया...समाचार के माय फोटो...उस दिन, बस की यात्रा के दौरान, वह समाचार कुन्दन ने पढा था, फोटो देखा था...उस वक्त क्या वह सोच भी मकतो थी कि उसी नामी पहलवान को वह अपने दफ्तर मे देवेमी?-उलझन के साथ ? ये सारे तार जुड़ नहीं रहे थे -~-जब तक कि भीमा ने बताया नहीं कि वह पहलवानी करता था। 'पहलवानी' शब्द सुन कर कुन्दन पर पहली प्रतिक्रिया यही हुई कि उसने या तो कुछ गलत सुना, या फिर उसके साथ कोई मजाक किया जा रहा है। अगले ही क्षण- मस्तिष्क में हुई कौंध ने---कुन्दन के सामने प्रकट कर दिया कि सच्चाई वही है, जो वताई जा रही है। कुन्दन के मुंह से बेसास्ता निकल पड़ा। भीमा द्वारा दिए गए अधूरे फार्म पर उसकी नजर दौड गई। नाम-भीमसेन अग्रवाल... तब- सुन्दन हंसने लगी। हँसने लायक कोई बात नहीं थी, किन्तु अनायास उसे हंसी आ गई भीमा उसके हास्य का कारण समझ सकता, यह सम्भव नहीं था। चकित- सा देखने लगा। "क्यों ?" पूछा उसने, "आप हंस क्यो रही हैं ?" "ओह, माफ कीजिएगा...पता नहीं, आप क्या सोच रहे हों, लेकिन ... अमल मे...चूंकि आप पहलवानों जैसे बिलकुल नजर नहीं आ रहे, इम कारण मैं कुछ ऐसी चौंकी कि..लेकिन दुरा न मानिएगा।" कुन्दन ने किसी तरह वहा । भीमा पुलकित हो गया, "बुरा क्यों मानूं? अपनी तारीफ़ मुनकर आज तक किसे बुरा लगा है ?" "पहलवानी तो बडा रोमाचक काम है-- नही कुन्दन ने बाल- सुलभ कौतूहल दिखाया। "हो, और खतरनाक भी।" इसके साय भीमा ने, संक्षेप मे, कुन्दन को बताया कि क्यों उसे दंगलों की दुनिया में हमेशा के विदा लेनी पड़ी है। "मुझे दुःख हुआ सुनकर।" कुन्दन हार्दिकता के मायबोली. जसो 11 .. फैसले अन्दरूनी चोट आपको लगी, वैसी चोट दुश्मनों को भी न लगे।" "उस चोट को मैं सह गया, किन्तु अव जो वेकारी की मार पड़ रही है, उसे सहना मुश्किल है। यह मार मुझ अकेले पर नहीं-पूरे तीन व्यक्तियों पर पड़ रही है। देशराज जी और चम्पक पर भी।" "ये दोनों कौन हैं ?" "देशराज जी मेरे प्रशिक्षिक हैं। चम्पक मेरा मैनेजर है।" और भीमा ने बताया कि किस प्रकार भीमा की केवल एक हार ने उन दोनों को भी पस्त कर दिया था। वातों-बातों में कुन्दन ने भांप लिया कि देशराज जी के प्रति तो गहरा आदर रखता है, किन्तु चम्पक के प्रति अत्यन्त भावुक है। चम्पक की समस्या को लेकर भीमा इतना चिन्तित था कि उसे 'ज़रूरत से ज़्यादा चिन्तित होना' ही कहा जाएगा। कुन्दन ने भीमा जैसे वयस्क, ऊँचे-पूरे व्यक्ति से ऐसी भावुकता की आशा नहीं रखी थी, किन्तु वही भावुकता इसका प्रमाण थी कि भीमा दिल का कितना साफ़ आदमी है। "मैं जो कुछ भी बन सका, चम्पक के ही कारण बन सका। भीमा ने कहा, "उसी ने मुझे प्रसिद्धि के चरम के शिखर पर ला विठाया। उसी ने मुझे देशराज जी जैसा प्रशिक्षक ला कर दिया। बता नहीं सकता, मैं कितना दुःखी हूँ-~~-क्योंकि उसी चम्पक को मेरी हार ने चौपट कर दिया। किसी कारणवश उसे फ़ौरन पाँच हजार रुपयों की सख्त ज़रूरत है। मैंने उससे आठ-नौ हजार रुपये उधार लिए हैं-अपनी बहन की शादी मुझे निव- टानी थी। रुपए उसके हैं। इन दिनों उसे रुपयों की सख्त जरूरत भी है...मुझे चाहिए कि रुपए लौटा दूं। मेरे पास नया पैसा भी नहीं ! स्वयं को अपराधी-सा महसूस करता हूँ-हर क्षण। प्लीज़...मेरी मदद करिए। कोई ऐसा काम दिलाइए, जिससे मैं तुरन्त और एकमुस्त पाँच हजार की रकम पा जाऊँ-वाद में चाहे, हर मास, तनख्वाह में से काटता . , रहे..." कुन्दन बोली, "ऐसी व्यवस्था करना लगभग असम्भव है। नौकरी 'भी एकदम तुरन्त मिल जाएगी, ऐसी आशा आपको नहीं रखनी चाहिए। अभी तो आप ने फार्म भी ठीक से भर कर नहीं दिया। हजारों लोग आपमे पहले ही लाइन में लगे हुए हैं। फिर भी...आपका में विशेष ध्यान रखंगी। रही वान एक मुश्त पांच हजार के इन्तजाम की । उसकी चिन्ता आपको करने की जरूरत नहीं। भूचाल के ममय हर व्यक्ति अपना ही मिर बचाने को मजबूर होता है-दूसरों के लिए मोचने की गुजाइश नही होती। चम्पक जो को पांच हजार का इन्तजाम करना है-वह करेंगे। यदि न कर सकेंगे, तो जिम्मेदारी उनको है -आपको नहीं।" "मैं आपसे सहमत नहीं हूँ। मैं चम्पक के लिए जान लडा देना चाहता "आप बहुत नेकदिल हैं, किन्तु इतनी नेकदिली को भावुकता भी कह दिया जाता है और आज के जमाने मे भावुकता के लिए कोई जगह नहीं।" भीमा चुप रहा । कुन्दन की 'फिलामफी' उसे अच्छी नहीं लगी थी, किन्तु वह उसे दोपी कैसे ठहरा सकता था। वह एक ऐसी जगह काम करती, जहां यदि किसी भावुक व्यक्ति को बिठा दिया जाए, तो उमके तो हाथ-पांव ही फूल जाएं। अभावुकता की आदत पड़ गई है इस युवती को। नाम क्या है इस युवती का? मीमा को जबरदस्त इच्छा हुई- -नाम जान लेने की। "भावुकता?" मीमा बुदबुदाया, "शायद आप सच कहती हैं । में भावुक हूँ, किन्तु भावुकता एक अच्छा गुण है।" "किन्तु अति किमी चीज़ की अच्छी नहीं होती।" "क्या मैं चम्पक के प्रति अति की सीमा तक भावुक हूँ "इमका उत्तर मैं सहमा 'हाँ' या 'ना' में कैसे दू?" कुन्दन ने उत्तर दिया, "मैं आपको जानती ही कितना हूँ? चम्पक जी को तो मैंने कभी देखा तक नहीं। तो भी-पहला इम्प्रेशन मुझ पर यही पड़ा है कि आप चम्पक जी की चिन्ता जरूरत से ज्यादा कर रहे है। "मेरे और चम्पक के रिश्ते कितने गहरे हैं, आप मोच नहीं सकती। इमीलिए यदि आपको वैसा लगता है, तो आश्चर्य नहीं।" "जो भी है ..बहस के लिए यहां मौका नहीं। किमके साथ कैसा : फैसले । रिश्ता रखा जाए, यह आपका निजी मामला है। मेरी पहुँच वहाँ त न तो है, न होनी चाहिए। इसके अलावा-अभी मुझे यहाँ काफ़ी कार पड़ा है। यदि इजाजत हो, तो आपका फार्म भर कर मैं रख लूं?" भीमा को 'पत्ता कट जाने' जैसा आभास मिला । उस मीठी युवतं से ऐसी सहानुभूति-सनी बातचीत यों अचानक खत्म होने लगेगी--उस चाहा नहीं था। किन्तु युवती ने जो कहा है, उचित कहा है। यह दफ्तर है, कोई पार्क वार्क नहीं, जहाँ आप घण्टों बैठ कर अपना गुबार निकाल सकते हों। भीमा से पूछ-पूछ कर कुन्दन ने सारी जानकारियाँ फार्म में स्वर अपने हाथ से भरी। भीमा से दस्तखत करवाए । तव फार्म को सावधान से साथ एक फाइल में लगा लिया। "तो?" भीमा ने उठने से पहले की मुद्रा में कहा, "मैं चलूं ?" "बेशक...गेस्ट हाउस का फोन नम्बर और पूरा पता, दोनों, अ हमारे पास है । जैसी भी जरूरत हुई, मैं आपको खवर करूंगी।" "मैंने आपका समय-इतना अधिक समय लिया है कि...." "समय आपने लिया नहीं, मैंने स्वयं दिया है।" कुन्दन अत्यन्त माधुर्य से मुस्करा कर बोली, "मैंने ही आपको पुकारा, वरना आप तो जा है रहे थे।" "मुमकिन है, स्वयं मैं ही फोन करके पूछताछ करना चाहूँ।" "क्यों नहीं।" "फोन उठाने वाले से मैं क्या कहूँगा? कैसे बताऊँगा कि किसे बुलान - . कुन्दन मुसकराई, "मेरा नाम कुन्दन है। नाम बताना काफ़ी रहेगा नम्बर नोट कर लीजिए।" भीमा ने फोन नम्बर नोट किया। फिर विदा ली।
१३ नानावती हास्पिटल से, चम्पक का, निर्धारित समय से एक दिन पहले छुट्टी मिल गई। अस्पताल वालों ने गेस्ट हाउस मे फोन किया कि चम्पक को 'घर' से जाने की व्यवस्था कर ली जाए। भीमा, उस वक्त, कामदिलाऊ दफ्तर गया हुआ था। देशराज बाहर से घूम कर आया लौटा ही था कि सन्देश मिना। वह अस्पताल की ओर रवाना हो गया। अस्पताल के गेट पर उसकी मुलाकात राजन से हो गई। वह भीतर से बाहर आ रहा था। देखते ही देशराज ने कहा, “कहिए, राजन साहब, नमस्कार ! क्या हाल है ? चम्पक से मिलकर आ रहे हैं क्या?" "जी हां।" राजन ने देशराज की ओर जरा सकपका कर देखा। देशराज उसके सकपकाने पर गौर न कर सका और बोला, "आज चम्पक को छुट्टी मिल रही है।" "हो.. चम्पक जी बहुत खुश हैं।" राजन चला गया। देशराज चम्पक के बैंड की ओर बढा। थोड़ी ही देर बाद टैक्सो ने देशराज और चम्पक को दादर के गेस्ट- हाउस के सामने उतारा । गेस्ट हाउस के व्यवस्थापक ने चम्पक का स्वागत ऐसे किया, गोया वह विदेश-यात्रा करके लोटा हो ! चम्पक मुस्कराया मन ही मन । उसे मालूम था-गेस्ट हाउस मे जव सक उधारी शुरू नहीं होती, तभी तक यह आवभगत है। उसके बाद तो.... और उधारी शुरू होने मे अब देर भी क्या थी? बम्बई कितना महंगा शहर है. चम्पक ने जैसे पहली बार जाना। जो कुछ भी धन चम्पक, देश- राज और भीमा के पास था, सब जादू की तरह फुक रहा था...। कमरे में पहुंच कर चम्पक आराम से लेट गया। दोनों हाथ मोड़ कर, सिर के पीछे ले जा कर टिकाते हुए उसने कहा, "देशराज जी... अस्पताल से छुट्टी पाने के कुछ समय पहले राजन भाया था।" "हाँ, मेरी-उसकी भिड़न्त गेट पर हो गई थी। क्यों ?, ।
७२ : फोरले बात?"देशराज ने जानना चाहा। "गह राजन बड़ा चालू आदगी है। हमेशा गोई-न-कोई खास बात उसकी जेब में रखी होती है।" चम्पक हँसा । उराका हराना अगव ढंग का था---लोमड़ी जैसी चालाकी से भरा। देश राण को वह हँसी चम्पक की जैसी न लगी। अचरज रो पम्पक की और देखता रह गया, "क्या पह रहा था?" "मेरी रागस्या हल करने आया था।" गम्पक की चालाकीपूर्ण हँसी और गहरी हो जाने लगी। "यानी ?" "किसी व्यमित ने, राजन को माध्यम से, एक सन्देश भेजा है।" "किरा व्यक्ति ने ?" देशराज सावधान हुआ। "यह राजन ने नहीं बताया।" "बदमाश आदमी है। हमेशा इसी तरह...।" "लेविन, देशराज जी, प्रस्ताव खासा टोरा है।" "सुनूं ?" "सुनाने से पहले मुझे आपके सहयोग का परका वचन चाहिए।" "गया बनन अलग से देने की पारूत है ? वचन तो है ही।" "वचन की राचगुन अलग से पारूरत है।" देशराज की भौंहें सिकुड़ी । चम्पक की बदली हुई हँसी उसे, न जाने क्यों, खतरनागा-सी लगने लगी। नवादीक सरकते हुए पूछा उसने, “प्रस्ताव गया है ?" "पहले सहयोग का वचन दीजिए।" "पहले प्रस्ताव जानना चाहूँगा।" "बात यह है, देशराज जी...यदि आपका सहयोग न मिला, तो शायद यह प्रस्ताव गुझे छोड़ना पड़ेगा।" चम्पक ने गम्भीर होते हुए कहा, "लेकिन यह प्रस्ताव नहीं छोड़ता हूँ, तो-मेरी समस्या हल हो जाती है।" पोन-सी रामस्या? लीह वाली ?" "हाँ । यही" "पांच हपार एक मुश्त मिलेंगे?"
"पूरे छह हजार । एकमुश्त । काम मिर्फ दो-ढाई घंटे का।" देशराज को यह वात असम्भव-सी लगी, "कमाल करते हो ! यह कैसे हो सकता है ?" "हो सकता है। तभी तो राजन मेरे पास आया था।" "यदि मेरे सहयोग से तुम्हारी समस्या हल होती है, तो मैं यही कहूंगा कि तुम जो चाहोगे, मैं करने को तैयार हूं।" देशराज ने वचन दिया। "भीमा को तैयार करना होगा।" "मैं समझा नहीं। कहना क्या चाहते हो?" "काम भीमा का है। रिहर्मल और एक्चुअल शो-सब मिला कर दो-ढाई घटों से ज्यादा का काम नही है। राजन का प्रस्ताव सुन कर यहीं लगा-मेरी लाटरी निकल आई।" "मेरा कौतूहल काफी बढ़ चुका है। फौरन बताओ, प्रस्ताव क्या है ?" "प्रस्ताव कुछ ऐसा है कि भीमा एकाएक मानेगा नही," चम्पफ ने देशराज की आंखों में वेधकता से देखते हुए कहा, "लेकिन वह आपको पृज्य मानता है। यदि आपने आग्रह किया, तो वह टाल नही सकेगा।" "लेकिन आग्रह कैसा, यह तो बताओ।" "भीमा को नाचना होगा-रेड-इडियनो का नाच ।" "क्या वकते हो?" "मुझे मालूम था, आपको बुरा लगेगा, किन्तु सोचिए-" "नाचना भीमा का काम है " देशराज ने आंखें तरेरी। "पहले पूरी बात तो सुनिए," चम्पक बोला, "ज़रा-सी देर के ही लिए नाचना होगा। बम्बई का कोई पूंजीपति है-राजन ने नाम नहीं बताया। कई बरसो तक वह बीमार रहा। अब स्वस्थ हो गया है। इसी खुशी मे वह एक 'कामिक प्रोग्राम' का आयोजन कर रहा है-अपने दोस्तों, रिश्तेदारो, परिचितो के मनोरंजन के लिए। इस 'कामिक प्रोग्राम' का एक ही फारमूला है--इसमे जाने-माने व्यक्तियों को ऐसे-ऐसे स्पो में पेश किया जाएगा, जिसकी कल्पना भी न की जा सके । मसलन ने ७४ : फैसले भीमा को ही लेते हैं। वह नामी पहलवान है.--रह चुका है। क्या कोई कल्पना भी कर सकता है कि भीमा रेड-इंडियनों का नाच नाचेगा? यही इस कार्यक्रम का रोमांच है। एक-एक आइटम के लिए पानी की तरह पैसा बहने वाला है। अनेक फिल्मी हस्तियां भाग लेने वाली हैं।" "चम्पक, तुम्हारी बातें सुन कर मेरे रोम-रोम में आग लग रही है।" "भावुकता से न सोचिए, देशराज जी!" चम्पक ने उत्तर दिया, "भीमा आपसे ज्यादा भावुक है। आपको न केवल अपनी भावुकता छोड़नी है, भीमा की भावुकता को भी नष्ट करना है।" "चम्पक ! "मेरी हादिक इच्छा है कि भीमा इस प्रस्ताव को न ठुकराए।" "लेकिन यह घोर पतन का प्रस्ताव है। मैं सपने में भी नहीं सोच सकता कि मेरा प्रिय शिष्य, पूंजीपतियों के मनोरंजन के लिए, सबके सामने अधनंगा होकर नाचे।" "अधनंगा!" चम्पक व्यंग्य से मुसकराया, "दंगलों में उतरते समय क्या भीमा अधनंगा नहीं होता था ?" "चम्पक !" देशराज की मुट्ठियां कस गई। "चीखने से काम नहीं चलेगा, देशराज जी! भीमा पर आखिर मेरा कुछ अधिकार भी है। इसी तरह, आप पर भी मेरा कुछ अधिकार है।" "तुम्हारे अधिकारों को हमने कभी नहीं नकारा, किन्तु अधिकारों की सीमा से बाहर नहीं जाना चाहिए।" "ऐसा है, देशराज जी, मैं बहुत डर गया हूँ।" चम्पक बोला। उसका यह वाक्य, हो रही बातचीत में, सहसा, फिट नहीं बैठ रहा था। देशराज ने उसकी ओर जलती निगाहों से देखना जारी रखा। दो पल के मौन के बाद चम्पक ने कहा, "मैं सपनों में जीने वाला व्यक्ति हूँ। कोमल हूँ। छुरों और चाकू इत्यादि से मेरा नाता नहीं। इसीलिए, छुरों और चाकू का जो हमला मुझ पर किया गया, उसने मुझे दहला दिया है। जब तक हमला नहीं हुआ था, तभी तक मैं वहादुर बना हुआ था, लेकिन आपके सामने तो मैं स्वीकार कर ही सकता हूँ कि इस एक हमले ने मेरे हौसले पस्त कर दिए हैं।" - -- "तो?" "यह कल्पना मुझे दहला देती है कि ऐसा ही हमला मुझ पर दुबारा भी हो सकता है।" "नही होगा--यदि भीमा को अभिनेता बनाने की कोशिशें छोड़ दोगे।" "वह तो छोड़ ही दूंगा, लेकिन ली हू जो छाती पर बैठा हुआ है ! पांच हजार का इन्तजाम, उसके लिए, जल्दी-से-जल्दी कर लेना है। मैं कोई जादूगर तो हूँ नही । आशिर कैसे इतने रपयो का आननफानन इन्त- जाम होगा? हमारे सामने समस्या केवल रोजी-रोटी को नही है। पेट भरने लायक तो हम कमा ही सकते हैं-अपने-अपने लिए । समस्या तो एक मुश्त पांच हजार का प्रवन्ध करने की है—फौरन । ली हू ने मियाद बढाने से इन्कार कर दिया है।" देशराज चुप रहा। चम्पक ने गहरी सांस ली, "उस कम्बस्त चीनी का दिमाग सड़ा हुआ है । अभी भी वह...किसी भी सीमा तक जा सकता है। क्या वह मुझ पर छुरे चाकू का हमला नही करवा सकता?" "तुमने ली हू के साथ सट्टा मेला । इमकी सजा तुम भीमा को देना चाहते हो?" "इममे सजा देने की क्या बात है ? दोस्ती के नाते सहयोग मांग रहा हूं। बस।" "लेकिन..।" "मुझे बताइए, देशराज जी-'लेकिन' की कोई गुजाइश है ?" चम्पक ने देशराज की आँखों में घूरते हुए कहा । देशराज बोला, "तुम्हारे और भीमा के बीच कितना बड़ा अन्तर है ! भीमा हर वक्त तुम्हारी चिन्ता मे डूबा रहता है। जब देखो, उसकी उवान पर एक ही नाम है-चम्पक, चम्पक ! तुम्हारी समस्या कैसे हल हो, सोच-सोच कर वह परेशान है । वह तुम्हारा भला चाहता है । इधर तुम हो कि अपने दोस्त को सरेआम, अपमानजनक ढग से नचाने की सोच रहे हो । तुम्हें केवल अपना सायाल है-अपने दोस्त को इपद्धत का नहीं । भीमा फैसले •• री इज्जत बचाने के लिए रातों को ढंग से सो नहीं पाता। इधर तुम मा की इज्जत बेचना चाहते हो।" "एक मिनट को मान लीजिए, देशराज जी, कि भीमा को किसी ल्म में वढ़िया रोल मिल गया और वह रोल हो, रेड-इंडियन की शाक पहन कर नाचना।" "मन मनाने के लिए कुछ भी सोचा जा सकता है। फिल्मों वाली सारी बात हवाई है । यह हवाई क़िला मूलतः तुम ने बाँधा है-मैंने या भीमा ने नहीं।" देशराज ने उत्तर दिया, "अपने रौल के साथ पूरा न्याय करने के लिए, किसी फिल्म में, यदि भीमा अधनंगा हो जाता, तो सब उसकी तारीफ़ करते, उसकी कला के गुण गाते । इसी प्रकार, दंगल के मैदान में भीमा यदि अधनंगा होता रहा है, तो इसके लिए किसी ने उसका मज़ाक़ नहीं उड़ाया। अधनंगा होना दंगल की आवश्यकता है। 'कामिक प्रोग्राम' और दंगल में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। 'कामिक प्रोग्राम' में भीमा को अधनंगा देख कर क्या लोग उसकी कला की प्रशंसा करेंगे? नहीं। वे उस पर हँसेंगे, सीटियाँ वजाएँगे । इसीलिए मैं कहता हूँ कि-' "आपका कहना अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन मैं भी अपनी जगह सही हूँ। मुझे जान के लाले पड़े हुए हैं । ली हू से दुश्मनी मोल लेन मेरे बूते में नहीं । मुझे धन चाहिए। अपनी सबसे छोटी बहन की शादी समय भीमा ने मुझ से हजारों रुपये उधार लिये थे। लिये थे या नहीं ?" "तुमने सहर्ष दिए थे। विना मांगे।" "तो अव भीमा को भी विना माँगे वे रुपए वापस कर देने चाहिए "यदि उसके पास होते, तो तुम्हें ऐसा कहने की ज़रूरत न पड़ती "नहीं हैं, तो इन्तजाम करे। इन्तज़ाम कैसे हो सकता है, रास्ता मैं सुझा रहा हूँ । ग़लत क्या है ?" "रास्ता तुम सुझा रहे हो न? ठीक है। तुम्हीं सुझाओ।" "यानी?" "भीमा के सामने यह प्रस्ताव मेरे मुंह से क्यों रखवाना चा जाओ। ईश्वर ने तुम्हें भी जवान दी हुई है। बल्कि...हम तीनों सबसे लम्बी जवान तुम्हारे ही पास है। स्वयं जाओ। भीमा से । .
फैसले ७७ क्यो कहूँ ?" "वह मेरा गला पकड़ लेगा।" "लेकिन मार नही डालेगा।" और देशराज उठकर कमरे से निकल गया। उसके भारी-भरकम शरीर को दरवाजे के पार होते हुए चम्मक देखता रहा । यदि देशराज का सहयोग नहीं मिलता-जो कि मिलता हुआ दीख नहीं रहा--तो पांच हजार की रकम हाथ में आकर भी नहीं आएगी। उस मूरत मे- क्या करे चम्पक? एक ही रास्ता रह गया है-चम्पक भाग जाए। किसी को न बताए । एकदम रफूचक्कर! गुमनाम होकर कही बस जाए, किसी तरह पेट भरे। ली हू के गुंडो के हाथो जान गंवाने से बेहतर यही होगा। शरीर मे जगह-जगह पट्टियां बंधी है। इनके खुलने का इन्तजार करना होगा। यदि पट्टियों के साथ ही भागा, तो ऐसे हुलिये के आदमी को खोज कितनी आसानी से करवा ली जाएगी-चम्पक अच्छी तरह समझता था। लो हू के गुडे भी, जब तक पट्टियां नही खुलेगी-सहसा हमला करने वाले नहीं। चम्पक यह सब अभी सोच ही रहा था कि गेस्ट हाउस के नौकर ने आकर सूचना दी, "चम्पक साहब, आपका फोन है।" "किसने किया है फोन? नाम पूछा ?" "जी नहीं, यह पूछना तो याद नहीं रहा।" चम्पा कहने वाला था, "जाओ, पूछ कर आओ।' लेकिन फिर, ऐसा कहे बिना ही उठ पड़ा। पट्टियो और कमजोरी के कारण, टेलीफोन तक तुरन्त ही जा पहुंचना सम्भव नहीं था। पर्याप्त समय लेता हुआ वह टेली- फोन तक पहुंचा और रिसीवर नठा कर बोला, "हैलो !" "हैलो, चम्पक जी !" औरतो जैसी वारीक आवाज, "मैं ली हू बोल फैसले १ "आपकी पूरी खबर मुझे मिलती रही है। अस्पताल से आपको एक दिन पहले ही छुट्टी मिल गई। आप अपने गेस्ट-साउस अभी थोड़ी देर पहले ही पहुंचे हैं।" "जी...!"चम्पक धीमे से वोला। "क्या आप वम्बई से भाग जाने की सोच रहे हैं ?" "नहीं तो।" चम्पक सकपका गया। "यदि सोच रहे हो, तब भी न सोचिएगा। मैंने एक आदमी आपके पीछे लगा दिया है। इस आदमी की तनख्वाह बहुत कम है। महीने के सिर्फ तीन सौ रुपए । याने-रोज़ के केवल दस रुपए। आपको याद तो है न कि मैंने मियाद नहीं बढ़ाई है ?" "कैसे भूल सकता हूँ !" "तो अव-नई स्थिति यह है कि-जो आदमी आपके पीछे लगा हुआ है, उसकी तनख्वाह आपके जिम्मे है।" "जी!" "क्यों ?"-बात समझ में न आई ? एक-एक दिन बीतेगा और पांच हज़ार की वह रकम, रोज़ दस रुपयों के हिसाब से, बढ़ती जाएगी।" "लेकिन ली हू साहब, ऐसा तो हमारी शर्त में कहीं भी नहीं था।" "न सही, यह मेरा तोहफ़ा है।" "यह तो सरासर अन्याय है।" "पाँच हजार की रकम आप मुझे दे नहीं रहे। क्या यह मेरे साथ अन्याय नहीं ?" "मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ।" "मुझे कोशिश से क्या सरोकार ? मुझे तो रुपए चाहिए।" ली हू ने उत्तर दिया, "मुझे यह भी मालूम है कि पाँच हजार का इन्तजाम करने का एक उपाय आपको सुझा दिया गया है।" चम्पक सावधान हुआ, "यानी...क्या आप जानते हैं कि.. "जी हाँ, मैं जानता हूँ कि बम्बई के किसी पूंजीपति द्वारा आयोजित हो रहे एक 'कामिक प्रोग्राम' में आपका लाडला भीमा यदि रेड-इंडियन की पोशाक पहन कर नाचा, तो...आप तर जाएंगे-और मैं भी।" - "आपको किमने बताया?" "मेरे जामूमों ने । और...यहाँ "आपको में एक और सूचना देना चाहूंगा।" "क्या?" "उस प्रोग्राम का आयोजन जिसे मौपा गया है, वह मेरा पार्टनर है। प्रोग्राम में जो भी लाभ होगा, मैं और मेरा पार्टनर आधा-आधा बांटेंगे।" "ओह, यानी...भीमा 'हाँ' कहता है या 'ना' इसमें आपकी रुचि और भी गहरी है।" "जी हो।" और ली हू मक्कारी से हेमा। "तो क्या...मैं यह मान कर चल सकता हूँ कि यदि भीमा ने 'हाँ' कह दी, तो उस पूंजीपति की ओर से भारी रकम दी जाएगी। मुझे छह हजार की बात कही गई है, लेकिन...रकम छह हजार से बहुत ज्यादा मिलेगी- आपको।" "व्यापार माने व्यापार।" "और मुझं जो छह हजार मिलेंगे, वे आप वापस ले लेंगे। एक हवाई शतं के आधार पर।" "शतं माने पतं।" यह भी मान कर चलना चाहूंगा कि भीमा को अभिनेता बनाने को मेरी कोशिशें रोकने के पीछे स्वयं आपने दिलचस्पी ली है।" चम्पक का स्वर तीखा होने लगा था, "यदि हमे किसी फिल्मी हस्ती से पांचेक हवार एकमुश्त मिल जाते, तो इस 'कामिक प्रोग्राम' मे भीमा की 'हाँ' होने का सवाल ही नहीं पा । इसीलिए आपने नहीं चाहा कि.. "हो, इसीलिए मैंने नही चाहा कि... "क्या आपके पार्टनर का नाम प्रकाश मेहरा नही, जो नकली दंगल आयोजित करवाता है ?" "आप यह सब क्यो पूछ रहे है ? पार्टनर का नाम प्रकाश मेहरा हो या दिलीपकुमार, आपको क्या फर्क पड़ेगा?" "मैं अपने सामान्य ज्ञान में वृद्धि करना चाहता हूं। भारतीयो का सामान्य ज्ञान बहुत कमजोर है। इस दिशा में हर भारतीय को सावधान " " ८० : फैसले रहना चाहिए।" चम्पक ने व्यंग्य से कहा। किन्तु ली हू की खाल मोटी थी। ऐसे व्यंग्य उसके लिए कोई अर्थ नहीं रखते थे। उसने कहा, "भारतीय सरकार चाहती है कि टेलीफोन पर हद-से-हद दो मिनट तक बातचीत की जाए। उससे ज्यादा नहीं।" "हाँ...और दो मिनट होने को हैं।" "हो चुके हैं। रिसीवर रखने से पहले आपका जवाब पाना चाहूँगा। भीमा 'हाँ' कह रहा है या 'ना' ?" "अभी उससे मेरी मुलाकात नहीं हुई। मुझे नहीं मालूम, यह प्रस्ताव उसके सामने किस प्रकार रखा जाए।" चम्पक ने कहा, "आपको यही विश्वास दिलाना चाहूँगा कि भीमा की 'हाँ' पाने के लिए मैं कोई कसर वाकी नहीं रखूगा।" "आप समझदार हैं । मैं फिर फोन करूँगा।" ---और ली हू ने कनेक्शन काट दिया। १४ भीमा लौटा। चम्पक को एक दिन पहले ही अस्पताल से छूट आया देखकर उसे प्रसन्नता हुई। उसने विस्तारपूर्वक बताया कि किस प्रकार कामदिलाऊ दफ्तर में उसकी मुलाकात कुन्दन नामक एक युवती से हुई और कुन्दन ने किस प्रकार 'पूरी सहानुभूति' के साथ वात की। "कुन्दन नामक यह लड़की शादीशुदा है या नहीं ?" चम्पक ने हँसकर पूछा। भीमा झेंप गया, "हो या न हो, मुझे क्या !" "उसका नाम लेते ही तुम्हारी आँखों में चमक आ जाती है। मैंने तो यही सोचा कि पहली मुलाकात में ही तुम ने उसके शादीशुदा होने-न-होने की बावत पूछ लिया है और...फिल्मों में रोल मिले या न मिले, हीरोइन का पीछा हीरो ने करना शुरू कर दिया है।" "तुम्हारा दिमाग खराव है।" भीमा ने शर्म से लाल पड़ते हुए कहा, "खबरदार, जो आइन्दा कभी ऐसी फिल्मी वात' मुंह से निकाली।" "कान पकड़ता हूँ।" चम्पक ने नाटकीयता से कान पकड़ते हुए कहा, फिर ठहाका लगा दियाभीमा को याद आया, एक दिन राजन ने भी ऐसी ही नाटकीयता से अपने कान पकड़े थे । वह मुस्करा दिया। चम्पक जान-बूझकर मजाकिया वातें करना चाहता था। उसमे साहस नही या कि रेड-इण्डियन के नृत्य वाला प्रस्ताव, भीमा के सामने, एकाएक रख दे। कुछ-न-कुछ तो बोलना ही चाहिए, कोई-न-कोई बात तो होनी ही चाहिए केवल इस गरज से चम्पक भीमा से मजाक कर रहा था। भीमा उतना अधिक झेंप जाएगा, उसने सोचा नहीं था। इसीलिए, भीमा के अपने पर उसे पयादा मजा आया। अत्यन्त स्वार्थी ढंग से वह मजा लेना चाहता था-केवल अपने मनोरंजन के लिए। "उस दपतर में और भी कई लड़कियां होगी," वह बोला, "इस कुन्दन से हो तुम्हारी बातचीत केसे शुरू हुई ?" "उसी ने पुकारा । उसी ने बात की। मैं तो विना फार्म भरे वापस आ रहा था।" १ "बधाई !" "फिर छेड़छाड ?" "क्यों ? बधाई देने में कौन-सी 'फिल्मी' बात है?" " 'बधाई कहते समय तुम ने औवें क्यो नचाई ?" "अरे! मुझे मालूम ही नहीं। क्या मेरी पे नाची थी ?" भीमा हँसा, "वह लड़की...यो...है काफी सुन्दर ।" "लो, फिल्मी तर्ज की बात तुम्ही ने शुरू कर दी।" "तुम्हारा जी जला रहा हूँ।" भीमा फिर हंसकर बोला और नहाने के लिए कपड़े उतारने लगा । बम्बई के चिपचिपे वातावरण में वह अकसर दो बार नहा लिया करता। सूट उतारा। बूट उतारे। तौलिया लपेटकर वह वापरूम में जा घुसा। वाथरूम के बन्द दरवाजे के पीछे से चम्मक ने उगकी गुनगुनाहट मुनी। 'मेरा पहलवान वाकई खुश है।' उसने मन-ही-मन •या। भीमा नहा कर बाहर निकला, तो चम्पक बोला, “कुन्दन से तम ने
८२
: फैसले
कह तो दिया है न कि नौकरी ऐसी चाहिए, जिसमें पांच हजार एडवान्स
'मिल जाएँ ?"
"हाँ, मैंने कहा; जिसके जवाब में वह बोली कि यह असम्भव है। उस
ने मुझे कोई झूठे आश्वासन नहीं दिए हैं । साफ़ कहा है कि मामूली नौकरी
पा लेने की आशा भी मुझे फ़ौरन नहीं रखनी चाहिए।"
चम्पक ने मुंह विदकाया, "मेरी नौका डूबकर रहेगी।"
भीमा ने स्नेह से उसके दोनों कन्धे पकड़ लिये, "प्यारे ! वता, तेरे
लिए मैं क्या करूँ ? मुझे हर क्षण याद है कि तुझे कितने रुपये, कितनी
जल्दी चाहिए, लेकिन बता मैं क्या करूँ।"
भीमा के स्वर में ऐसी गहरी आत्मीयता थी कि चम्पक दहल गया।
इतने अच्छे दोस्त को वह रेड-इण्डियन की भद्दी पोशाक में भद्दे ढंग से
नचवाना चाहता है...चम्पक नीचे देखने लगा।
"क्या सोचने लगे, चम्पक ?"
"समय इतना कम है कि शायद सोचने का भी मौका नहीं।"
"रुपए जल्दी न दे पाने की सूरत में ली हू तुम पर हमला करवाएगा-
यही शक है न तुम्हें ? फिलहाल मैं यही कह सकता हूँ-बाहर मत निकलो।
ली हू के आदमी गेस्ट हाउस के अन्दर घुसकर तुम पर आक्रमण करें, इसकी
गुंजाइश मैं सहसा नहीं देखता।"
"तो क्या कैदियों का जीवन विताऊँ ? कब तक?"
"वाहर जब भी निकलो, मुझे साथ रखो।" भीमा ने अपने अलमस्त
शरीर की ओर इशारा किया, "चाहे कितने ही आदमी, कैसे भी हथियार
लेकर आएँ-जब तक मैं तुम्हारी बग़ल में जिन्दा रहूँगा, तुम्हारा वाल में
बांका न होने दूंगा।"
"भीमा !" चम्पक की आवाज़ कांप गई।
"फिलहाल केवल इतना ही मेरे वस में है, मेरे दोस्त !
.
,
-
तीन दिन हो गए...कुन्दन का फोन नहीं आया...भीमा को अकुलाहट बढ़ रही थी। युन्दन का मुन्दर, गलोना मुखड़ा हर पड़ी उमकी आंगों के सामने छाया रहता। चम्पक ने पहला सवाल पूछा था--कुन्दन शादीशुदा है या नहीं ? एक ऐसा मवाल, जिसका जवाब भीमा को मालूम नहीं था। भीमा ने कह दिया था, 'शादीशुदा हो या न हो, मुझे क्या !' लेकिन क्या भीमा ने सोते-जागते, हर क्षण, यही कामना-न चाहते हुए भी नहीं की है कि कुन्दन को शादीशुदा नहीं होना चाहिए? वह स्यय को समझाना चाहता, 'कुन्दन यदि गचमुच शादीशुदा नही है, तर भी मुझे क्या फर्क पड़ेगा? मैं क्यो इस तरह गोचने लगता हूँ ?यार- वार? वह मेरी क्या लगती है ? क्या लग सकती है ? हल्की-सी, औप- चारिक, केवल एक मुलाकात | और मेरे विचारो की दिशा ही यदल गई है । लानत है ! पहली वार पता चला—नारी का अभाव कितना बड़ा होता है। जीवन में कभी नारी के सम्पर्क में आया ही नहीं। मुछन्दर पहलवानो को पछाड़ने में ही व्यस्त रहा हूँ मैं। इसीलिए, केवल इतनी-सी मुलाकात में, ऐमे गुदगुदी-भरे विचार दिमाग मे घुट रहे हैं । सानत है-और कमाल युन्दन ने वचन थोड़े दिया था कि यह तीन दिनों के अन्दर फोन करेगी। पदि नहीं आया है फोन, तो इसमे अकुलाने जैसा क्या है ? मगर इग अकुलाहट को नकारा कैसे जाए? आविर भीमा ने तय किया, वह स्वय ही कुन्दन को फोन कर देगा। रिमीवर उठाकर उसने कामदिलाऊ दफ्तर का नम्बर डायल करना शुरू किया ही था कि उँगलियाँ मे मुरझरी। ऐसी मुरारी कि दम मील दूर से दिखाई दे ! पवराकर, फोन किए बिना ही, भीमा ने रिगीवर रण दिया। अब? अगला दिन और भी पादा अकुलाहट का था। -दाग उगना मन कहता, 'गुन का फोन आने ही वाला है...'
: फैसले मन कितना झूठा था! दोपहर का भोजन करने के बाद भीमा ने लेटना चाहा। रात को ठीक तो नहीं पाया था। पता न चला, कव आँखें झप गई। "उठो, पहलवान ! जागो ! किसके नाम की माला जप रहे हो?" म्पक ने भीमा को झकझोरा। वह हड़बड़ाकर जागा। उठ बैठा । आँखें लने लगा। "क्यों ? क्या हुआ ?" पूछा उसने। "तुम नींद में वड़वड़ा रहे थे। कुन्दन जी को नमस्ते कर रहे थे।" "धत् "सच।" मज़ाक और छेड़छाड़ का, फिर तो, दौर ही चल पड़ा। चम्पक उसे सताना चाहता था। रेड-इन्डियनों के नृत्य के लिए जिसे वह मजबूर नहीं कर सकता था, उसे-कम-से-कम-सता तो सकता था न वह ! सताने में कोई 'गद्दारी' नहीं, दोस्ती का कोई अपमान नहीं। कितना अच्छा लग रहा है भीमा का यों तिलमिलाते जाना! देशराज उपस्थित नहीं था। भीमा ने चाहा, 'काश, देशराज जी उप- स्थित होते । चम्पक इतनी ज्यादा छेड़छाड़ न करता। उनका कुछ तो लिहाज़ रखता ही है।' किन्तु देशराज, अपने लिए, छोटी-मोटी कोई नौकरी तलाश करने के लिए निकला हुआ था। शाम के चारेक बजे भीमा से ऐसा सोचे बिना रहा ही न गया, 'जाक इसी वक्त, कुन्दन से मिलता हूँ।' भीमा को आशा थी-वल्कि, विश्वास था-कि कुन्दन से दो- मुलाक़ातें हो जाने के वाद, उसके प्रति वह अनावश्यक आकर्षण अन नहीं करेगा। सहज हो जाएगा उसके प्रति । एक मुलाक़ात-पहली--हो चुकी। तीन-चार मुलाक़ातें और चाहिए। जितनी जल्दी हो जाएं, उतना अच्छा । क्यों न आज ही मिल जाए? वह तैयार होने लगा। "कहाँ चले ?" चम्पक ने पूछा।
"मैं भी चलूंगा।" "मुझे अकेले जाना है।" "लेकिन, भीमा, तुम्ही ने कहा था कि मैं तुम्हें गाय रयकर याहर निकाला कहें।" "न वक्त बाहर कौन निकल रहा है ? तुम या में ?" "दोनों।" "नहीं. मैं अकेला जा रहा हूँ। ममर्श ?" "ममझ गया।" चम्पक मुस्कराया। "क्या समझे" "कुन्दन से मिलने जा रहे हो। जल्दी मे हो। पार पर चुके हैं। पाच- माढ़े पांच बजे जनका दफ्तर बन्द हो जाता होगा। उममे पहले पहुंचना चाहते हो?" "हां, तो?" "इन देवी जी के दर्शन मुझे भी करने हैं।" "करवा दूंगा दर्शन--जब मौका आएगा।" "मैं तो इमी यक्त गाय चलूंगा।" "मेरा दिमाग तुम्हीं ने सराव किया है !" और भीमा ने पम्पा को ऐसे उठा लिया, जग मच्छर को उठाया हो। पोला बाप रूम और पानी से सवालय भरे टब में दे पटका चम्पक को। चम्पक दहाड़ मारने की तरह चीप उठा। भीमा ने ठहाका लगाया, "ऐमी भोगी हुई हालत में चलो मेरे माय?" "ठहर, यार, अभी दूसरे कपड़े निकाल कर .." "जब तक तू कपड़े बदलेगा, तब तक तो मैं पहन चुका होऊंगा।"- और भीमा बाहर था। इलेक्ट्रिक ट्रेन में बैठनेके माप भीमा के होंठो पर मुम्कान याने लगी। जोहा, पूब हुआ । चम्पक को गिर से पाच तर एकदम भिगो दिया। अच्छा ही हुआ। कम्बस्त ने ऐड-ऐडकर दिमाग मुलसा दिया या!
फैसले । + ! आसपास बैठे यात्री भीमा को अचरज से देखने लगे थे कि यह आदमी ला-अकेला भला क्यों मुस्करा रहा है। भीमा ने सह यात्रियों के आश्चर्य गौर किया। गौर करते ही उसकी मुस्कान खत्म हो गई। मगर मन में फुलझड़ियाँ छूट रही थीं। वह--एक पहलवान-किसी दरी से मिलने जा रहा था। हा, हा, कैसी फिल्मी सिचुएशन ! किन्तु ऐसे सूटेड-बूटेड, बढ़िया, ऊँचे-पूरे पुरुष को देखकर सोचेगा भी कौन कि पहलवानी इस का धन्धा रहा है ? धन्धा और शौक़ ?. कोई नहीं सोच सकेगा । कुन्दन कैसी हँस पड़ी थी, जव भीमा ने उसे पहली बार बताया था कि वह दंगलों का राजा रहा है। भीमा को अपना अतीत भूल जाना चाहिए। कुन्दन फाइलें समेट कर, पर्स उठा कर, चलने की तैयारी में ही थी ----जब भीमा सहसा उसके सामने प्रकट हुआ। उसे देखते ही कुन्दन मुस्करा दी, "नमस्कार ! "ग़लत वक्त पर पहुँचा । नहीं ?" भीमा ने हाथ जोड़ कर नमस्कार का उत्तर देते हुए कहा। "ग़लत वक्त पर? क्यों?" "आप घर जाने की तैयारी में हैं।" "तो क्या हुआ। आइए।" और वे दोनों साथ-साथ चलने लगे। "पिछली बार मैंने आपका--आप जैसे प्रसिद्ध व्यक्ति का स्वाग नहीं किया था। उस दिन न सही, आज सही। बोलिए, क्या पिएँगे चाय ? कॉफ़ी? या कुछ ठंडा?" कुन्दन कैटीन की ओर कदम रही थी। "चाहे जो पिया जाए, बिल मैं अदा करूँगा।" भीमा ने कहा। कुन्दन हँस पड़ी, "स्वागत मुझे करना है, विल आप पे करेंगे ? "शिष्टाचार की पुस्तक में लिखा है कि पुरुपों की मौजूदगी में लाओं को बिल पे करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।" "शिष्टाचार की पुस्तकें रट कर आए हैं क्या ?" - . ऐलाही नमम तोरिए।" कुन्दन के पाप चनना मीनाको बटन अा मनमाया। रेन्ट हाटन में रवाना होने ममय भीमा विना अन्त पा! मुकाव होने पर वह टौर में बाद भी कर नगाया नहीं, उसे रियान नहीं पा । मुन्न गंवार उन पर दाहसदाह छाई रही-पदियह कार कुन्दन गार गार तो? मारने, ता? भाग लेने की गति महिनामों में, अभुत होती है। कुन्दन की कमानगा, यदि उन ने मानिस? नो मामाने भीमा को, भीतर-ही-मीतर, जने रौंद ही डानाया। दिनु सामना-मामना होने पर उसने पापा-~उन अमहता का नाम भी नहीं है । कुन्दन में वह ऐने मिल रहा था, जैसे पुराना परिचय हो-मामा पुराना परिचय पानी अन्दाजा मही निकला। मेल-मुनाकात होती रहे. महिलाओं के सम्मकं के अवसर आते रहें, फिर किसी भी महिला को लेकर मामाह गुदगुदी- भरे स्याल मन में आएंगे नहीं। यमार के कारण, मनाही के कारण, व्ययं रा आप पंक्षा होता है। भीमा को इसमे छूटना होगा। यदि कारणवश, कुन्दन के माय मम्पर्क टूट गया, तो भीमा किसी और महिला के साप परिचर विकसित करेगा। अवश्य करेगा। लेकिन क्या मनमुच कुन्दन के साथ सम्पर्क टूटने पाता है ? उह, ममी से क्यों उतनी दूर की सोची जाए? भीमा ने महमूरा किया-अपनी 'असहजता दूर करने के लिए यह युन्दन को इस्तेमाल कर रहा था-उसी तरह, जैसे सिर-दर्द होने पर 'एनागिन' ले ली जाए। और...स्वयं कुन्दन को पता नहीं कि यह इस्तेमाल की जा रही है। यह सारा विचार भीमा को बहुत ही बुरा लगा। एक अजब कुरेदन- सो मन में होने लगी-कि इसी वन वह बुन्दन से धमा-याचना फर से। वचन भी दे कि वह आइन्दा कभी उसे 'एनासिन' की सरह इस्तेमाल नहीं करेगा...लेकिन नहीं, यह आवेश भावुकता का ही आयेग होगा। भीमा को याद रखना है कि भावकता के लिए इस दुनिया में आज की याद ।
: फैसले हारिक दुनिया में-~-जगह नहीं है । स्वयं कुन्दन ने यही कहा है। कैंटीन में प्रवेश किया जा चुका था। कैंटीन में सन्नाटा नहीं था। दफ्तर में छुट्टी हो चुकी होने के कारण अनेक व्यक्ति वहाँ आ जमे थे, डटे हुए थे। पहली नज़र में तो यही लगा कि इन दोनों को बैठने की जगह भी न मिलेगी, किन्तु उसी समय दो व्यक्तियों ने विल पे किया और उठे । एक छोटी मेज़ खाली हो गई। कुन्दन और भीमा ने झट वहाँ अधिकार कर लिया। पर्स मेज पर रखते और बैठते हुए कुन्दन बोली, "आप अपने बारे में पता करने आए होंगे। है न ?" भीमा ने 'हाँ' में सिर हिलाया। "मैंने आपसे कहा ही था कि ज्यों ही कोई इन्तज़ाम होगा, मैं फोन कर दूंगी।" भीमा अचकचा कर बोला, "मेरे आने के कारण यदि आपको ज़रा भी कोई तकलीफ़ हुई है तो...' "अरे, नहीं-नहीं, मेरा मतलव वह नहीं था। प्लीज़, ऐसा न सोचिए।" कुन्दन ने तुरन्त सफाई दी, "मैं सिर्फ यह कहना चाहती थी कि...मेरा मतलव है...आपकी समस्या लगातार मेरे ध्यान में रही है। यह न सोचि- एगा कि मैंने आपके केस को आफिस के रूटीन में टाल दिया।" "शुक्रिया।" "लेकिन...दिक्कत यह है...मुझे एकाएक समझ में नहीं आ रहा कि पहलवानी के अनुभव के आधार पर आप को आखिर कैसा काम दिलाया जाए।" "कुन्दन जी, बुरा न मानें, तो एक निवेदन करूं।" "कहिए।" "क्या अभी हम यह भूल नहीं सकते कि मैं भूतकाल में क्या था? मुझे मालूम है, वह अनुभव आज मेरे किसी काम का नहीं। फिर उसे याद रखे रहने से क्या लाभ ?" कुन्दन बहुत प्यारी मुस्कान मुस्करा कर बोली, "आप सच कहते हैं। वाकाई मैं गलत ढंग से सोंचती रही
फमला
भीमा हैसने लगा, "यताइए, अभी मैं क्या सोच रहा हूँ।" उमने 'मैं'
पर जोर दिया।
"कसे बता सकती हूं?"
"मुझे [~-इम वक्त --चम्पक की याद आ रही है।"
"ओह, आप का व्यवस्थापन ! कोई अजूया नहीं। मैंने पहली मुला-
कात में ही भांप लिया था कि आप चम्पर जी के प्रति यदा भावक हैं।
इसीलिए, सोते-जागते. हर पल उन्ही की गमस्या को लेकर उसपने हैं।"
"नहीं, कोई और यात है।"
"वया?"
"देखिए, बुरा न मानिएगा।"
"हो, आप । यात कुछ ऐसी है कि आप को बुरा लग सकता है।"
"भला ऐसी भी क्या बात हो सकती है। बुरा नहीं मानेगी। मना-
"गेस्ट हाउस लौटने पर मैंने चमक को बताया कि कुन्दन जी से
मुलाकात हुई थी और उन्होंने बहुत ही अच्छे ढंग से बात की।"
"तो, चम्पक ने, छूटते ही, जानती है, क्या पूछा
"क्या पूछा?"
"कुन्दन जी शादीशुदा हैं या नहीं।"
कुन्दन जोर से हंस पड़ी, "हिर...!"
"सचमुच यही पूडा ।"
"फिर"
'कुन्दन ने आग पकाई।
"फिर क्या ! जान छुडानी थी। मैंने यह दिया, 'शादीशुदा हैं। दो
बच्चे भी है । जब मुझ से बात हुई, दोनो बच्चे पाम ही वंठे हुए थे।"
"वाप रे!"
m
"क्यों"
"आपमे भूल हुई । बच्चे दो मही, पूरे तीन है, तीन ।" और.
१० : फैसले ऐसी उन्मुक्त होकर हँसी कि दूर तक के बैठे हुए लोग गर्दन घुमाकर देखने - - भीमा का चेहरा बुझते-बुझते खिल उठा । कुन्दन का वास्तविक आशय क्या था, एक कौंध की तरह उसकी समझ में आ गया। वह मेज़ छोटी थी। आमने-सामने केवल दो ही कुर्सियाँ थीं, जिन पर वे अधिकार जमाए हुए थे। आसपास, यों, मौजूद तो अनेक व्यक्ति थे- किन्तु सब अपनी बातों में मगन । कुन्दन की हँसी जब तक खत्म हुई, तब तक घूमी गर्दनें फिर से सीधी हो गई थीं। फिर से सब अपनी-अपनी बातों में खो जाने लगे थे। भीमा ने कहा, "अब तो मुझे कोई और ही शक होने लगा है।" "क्या?" "कभी आप के घर आ कर गिनने होंगे। बच्चे शायद तीन से भी प्यादा हों!" कुन्दन हुलस कर बोली, "आप जैसा प्रसिद्ध व्यक्ति मेरे घर आए, इससे ज्यादा खुशी की बात मेरे लिए भला और क्या हो सकती है !" "दरअसल...चम्पक का कोई दोप नहीं। वह सपनों में जीने वाला आदमी है । जब तक मैं और वह दंगलों में उलझे हुए थे, तब तक तो किसी को होश नहीं था कि इस दुनिया में मर्दो के अलावा भी कुछ और होता है । अब, सहसा आँखें खुली हैं कि दुनिया में...कि दुनिया में...भीमा ने, संकोचवश, वाक्य पूरा न किया। कुन्दन गहन मुस्कान के साथ बोली, "हूं।" अचानक ही भीमा ने पाया, वह दिल खोल कर बातें कर रहा है। विना डरे कि कुन्दन पर कैसी प्रतिक्रिया होगी। अनायास उसके मुंह से शब्द फूटते जा रहे थे । वह कुन्दन को बता रहा था-किस तरह कुन्दन उसके मानस पर छाई रही, लगातार छाई रही। "मैं क्षमा-याचना करने आया हूँ।" भीमा ने अपनी 'आत्म-स्वीकृति' पूर्ण करते हुए कहा। "यह सब आपकी भावुकता का प्रमाण है।" कुन्दन ने स्नेह-भरी शिकायत के स्वर में कहा, "जो भी है...मैंने बुरा नहीं माना है।" - सचमुच उसने बुरा नहीं माना था, हालांकि यह गारीमा उगे भी मही लगी थी। कटीन में इतने-हनने लोगो की मौजूदगी मे, पुस 'एगी ऐसी बातें करे...गनीमत भयल इनती थी कि उनकी मंड, गर्ग मेगों मे. काफी कुछ कटी हुई थी भीमा धीमें ग्यर में योर हापा, बामपाम के लोग अपनी ही बातों में सीन, frगी ने भीमा पर महगा गौर न किया होगा-फिर भी.. पया भीमा को "एंगी याने पहा करनी चाहिए? करनी चाहिए या न करनी चाहिए-गर्म रंपमान भी गन्दर नही किया जा सकता था कि भीमा दिल या रामादमी था। उरी नामी इतनी अजब थी कि कुन्दन ने यदि चुग मानने का प्रयाग रिया होता, मी भी शायद बुरा न मान गयी . । भीमा, भावकना-जनित टन वारों को धोन पाने वाट, मानी अपनी विमो अपराध-मायना में हर गया पान्दिन रे प्रति गहना, अमी की दूसरी मुलाकात होते ही, मनमें या गई थी, वा गहराउन वारों रो बोल देने के पश्चात--रा और भी गहरी नही हो गईदी' "कुन्दन जी, मैंने नी म मन का गुबार निगम नि। पता नहीं, यासी कैगा लग रहा हो . का यर भी आर मृने पर पापाय पर आमन्त्रित करना चाहेंगीनी।"
६२ : फैसले देने का मौक़ा भीमा को दिया । अवसर के अनुकूल यही था। वैरा चला गया। "कोई गीत सुनना पसन्द करेंगे?" कुन्दन ने सहसा पूछा, जिसका जवाव भीमा के पास नहीं था । अव्वल तो वह यही ठीक से न समझ पाया कि कुन्दन का आशय क्या है । क्या कुन्दन स्वयं कुछ गा कर सुनाने वाली है ? धत् ! यह कैसी वात ! इतने लोगों की मौजूदगी में, केवल दूसरी ही मुलाकात में, कुन्दन कुछ गाकर सुनाए-धत् ! भीमा को दो पल वाद ही समझ में आया कि कुन्दन का संकेत कैंटीन में रमे ज्यूक-बॉक्स की ओर था। लगभग आदमकद ज्यूक-बॉक्स, अपनी जलती रोशनियों के साथ, कोने में चुपचाप बैठा हुआ था। जब महँगाई की मार आज के जितनी नहीं थी, उस ज्यूक-बॉक्स को यों चुप नहीं होना पड़ता था। बैठे हुए लोगों में से कोई-न-कोई उठ कर पच्चीस पैसे का सिक्का उसमें डालता और अपनी पसन्द के रिकार्ड का बटन दवा देता । ज्यूक-बॉक्स उस गीत को सारे कैंटीन में गुंजा देता...लेकिन महँगाई ने लोगों को संकोची बना दिया है । रह-रह कर ज्यूक-बॉक्स को चुप हो जाना पड़ता है। उसके पेट में पच्चीस पैसे वे सिक्के, दिन-भर में भी, बहुत कम पहुँचते हैं । भीमा को पता ही नहीं था कि दुनिया में संगीत नामक भी कोई ची है। जिस तरह वह पहली वार, दुनिया में, स्त्रियों की मौजूदगी के प्रा सजग हुआ था-उसी तरह, कुन्दन ने ज्यों ही उससे गीत सुनने के बारे पूछा, त्यों ही उसका रोम-रोम संगीत की सम्भावनाओं के प्रति सचेत - गया। - लेकिन वह कोई उत्तर नहीं दे सकता था। 'हाँ' नहीं। 'ना' नहीं । कुर की ओर देखता रह गया-जैसे कुन्दन ने न जाने क्या पूछ लिया हो! : भीमा ने कहा कि हां, वह गीत सुनना पसन्द करेगा, तो यथासम्भव कु का अगला सवाल होगा, 'कौन-सा गीत ? किस फिल्म का कौन-सा गीत और भीमा को फिर से चुप रह जाना होगा। जिसे मालूम ही कि संगीत भी इस दुनिया में रहता-बसता है, वह इस क्षेत्र में अपनी के बारे में आखिर क्या कह सकेगा? कुन्दन ने क्या उसकी उलझन भांप ली ? समझ ली?
पता नहीं ... लेपिन उमने अपना सवाल दोहराया नहीं। न पूछा दूसरी बार कि गीत सुनना पसन्द करेंगे या नहीं। भीमा को वही बैठा रहने देकर यह उठी, पहुँची ज्यूक-बॉक्म के पास। पच्चीस पैसे का सिक्का भीतर सरकाया। अपनी पमन्द के एक गीत का बटन दश दिया। यलच...रिकार्ड लगने की धीमी आवाज...फिर संगीत का फूटता स्वर... गीत अच्छा था। मगीत अच्छा था। ज्यूप-बॉक्स भी नया और गुन्दर था। मगर ये फिल्मी गीत ! हर गीत में वही-लड़का-लड़की! जो भी है...कुन्दन ने एक गीत चुना था...भीमा ने उसे गौर से सुना-पूरे गौर से । नहीं, इस फिल्मी गीत में भीमा को कोई साकेतिकता नही ढूंढनी चाहिए। लड़का-लडकी। भीमा लपका। नहीं, नहीं, इस तरह मोचना बेजा हरकत होगी। गीत जब तक जारी रहा, न जाने क्यों, कुन्दन और भीमा, दोनों की जवान बन्द रही। आमने-सामने बैठकर घे एक ऐसी स्थिति जी रहे थे, जैसी स्थिति जीने का अवमर रोग नहीं होता। शायद ये चुप इम. लिए हुए कि उन्हे चुप्पी की आवश्यकता थी। क्या थी ? शायद उन्हें मालूम नहीं था। गीत खत्म होते ही भीमा बोका, "धन्यवाद, पुन्दन जी! इस गीत को में कभी नहीं भूल सकूँगा।" "क्यों भला? यह गीत लोकप्रिय है, ठीक है, बिनु लोकप्रिय गीत तो नए-नए आते रहते हैं। नए गीत गाते है, पुराने भुला दिए जाते है।" "हो, किन्तु इस गीत को मैं कभी न भूल मरूंगा। इसने मुझे मगीन फे साथ पहली बार परिचित कराया है।" "अच्छा, इतनी-सी बात को भी आपने भावुवता से रग दिया।" "क्या आपको भावुकता से ज्यादा बिट है, कुपन जी?" "ओह, नहीं, लेकिन...मेरा ख्याल है कि भावुपता के बिना काम पलाया जा सकता है। सर, छाहिए।" चार आ चुकी थी। पी जा चुकी थी। दिल या पृङ्गा था।
६४ : फैसले उसे पे कर दिया था। बैरा अपनी टिप पा चुका था। भीमा को हल्का-सा सलाम कर चुका था। जा चुका था। वातें खत्म होने लगी थीं । अव मुला- कात को भी खत्म हो जाना चाहिए। "तो? चला जाए ?" भीमा ने पूछा। कुन्दन चुपचाप उठने लगी। भीमा भी उठ पड़ा। दोनों साथ-साथ कैटीन से बाहर आए। चुप । चौराहे पर सहसा वे ठिठक गए । भीमा ने पूछा, "आप कैसे घर जाती हैं ? ट्रेन से या वस से?" "वस से।" "जवकि मैं ट्रेन पकड़ना पसन्द करूँगा," भीमा ने कहा । हालांकि उसका दिल चाह रहा था, काश, वह बस पकड़ सकता ! "मुझे काफ़ी देर हो गई है।" कुन्दन ने अपना पर्स, दोनों हाथों में, कुछ इस तरह थाम लिया, मानो उस पर्स से वह अपनी रक्षा करना चाहती हो। किन्तु, रक्षा किस से ? भीमा से ? मगर भीमा उसे कोई नुकसान तो पहुँचा नहीं रहा । तो क्या...भीमा ने उसे बोर कर दिया है ? विना कुछ कहे न जाने क्या-क्या कह दिया जा रहा था...ऐसी स्थिति में, एक-दूसरे के सामने से, जितनी जल्दी हट जाया जाए, उतना अच्छा। भीमा ने हाथ जोड़ दिए, "बहुत-बहुत शुक्रिया, आज की मुलाकात के लिए । आपकी जगह कोई और होती, तो न केवल बुरा मान जाती-~-मुझे शायद...हमेशा के लिए...." "ऐसा न कहिए। मेरी हैसियत क्या है ? जबकि आप बहुत प्रसिद्ध..." "प्रसिद्ध हूँ नहीं था। अब तो मेरी भी हैसियत...खैर, जाने दीजिए, बीती विसार कर आगे की सुध लेने में ही सार है।" "मैं हमेशा आपकी मदद करूंगी।" "आपको देर हो रही है न ? प्लीज़...क्षमा कर दीजिएगा, मेरे ही कारण आपको..." "नहीं, आप के कारण नहीं। ऐसा न सोचिए। फिर भी...समय काफ़ी हो चुका है।"
? "फिर मिलेंगे..." भीमा विदा लेते-लेते बुदबुदाया। "हो...नमस्कार...!" यह मुडी और जाने लगी। भीमा ने रेलवे स्टेशन की ओर कदम बढ़ाए। गर्दन घुमाकर, जाती हुई कुन्दन को एक बार देख लेने का वड़ा मन हो रहा था, किन्तु भीमा ने म्वयं को रोका। ये सब भावुकता पो बातें हैं। फिन्तु कुन्दन के साथ बिताया हुआ एक-एक क्षण भीमा के नन-मन में बज रहा था। सहमा भीमा ने देखा- एक जगह भीड लगी है। हुंकार जैसी आवाजे उठ रही हैं । शायद कोई गहा... भीमा रक गया। भीड़ के नजदीक आया। देखा-दो किशोर हैं। गुत्थमगुरया हो गए हैं । एक-दूसरे के बाल नोच रहे हैं, गालियां दे रहे हैं । अपडे-नत्ते में मवाली तो नहीं लग रहे, किन्तु इतने क्रोधित हैं कि आपा सो बैठे हैं। भीड इकट्ठी तो हो गई है, किन्तु उन्हे छुडाने या प्रयास कोई नहीं कर रहा। मव तमामा देयने के लिए हैं। यलि एक-दो जने ऐगे भी है, जो उन किशोरी को और भी फ्यादा लड़ाना चाहते हैं । उन्हें तरह-तरह से उकसा रहे है। भीमा से न रहा गया। लडाई। हाथापाई। दंगल ! पूरा दगल न सही-आधा दंगल सही। दंगल ही तो भीमा की दुनिया थी। उमे उस दुनिया से जयरन निकाल बाहर किया गया, किन्तु क्या ऐमे छोटे दगलो में भी भीमा को कोई उपयोगिता नहीं? भीड़ को चीर कर भीमा आगेमा गया । उम का अलमस्त जवान शरीर भीड़ के लोगों को इतनी यामानी से हटाता गया, जमे गिमी मशाल के सामने मोम की दीवार पिपल कर बैठती जाए, हटती जाए, गररती . भीमा ने दोनो किशोरों कों एव-एक हाप से पार कर एपदम अधर हो उठा लिया। दोनो विशोर अचकचा गाए । अचानक यह क्या घमसार फैसले ६४ .. . उसे पे कर दिया था। बैरा अपनी टिप पा चुका था। भीमा को हल्का-सा सलाम कर चुका था। जा चुका था। बातें खत्म होने लगी थीं। अव मुला- क़ात को भी खत्म हो जाना चाहिए। "तो? चला जाए ?" भीमा ने पूछा। कुन्दन चुपचाप उठने लगी। भीमा भी उठ पड़ा। दोनों साथ-साथ कैंटीन से बाहर आए । चुप । चौराहे पर सहसा वे ठिठक गए । भीमा ने पूछा, "आप कैसे घर जाती हैं ? ट्रेन से या वस से?" "बस से। "जबकि मैं ट्रेन पकड़ना पसन्द करूँगा," भीमा ने कहा। हालांकि उसका दिल चाह रहा था, काश, वह बस पकड़ सकता ! "मुझे काफ़ी देर हो गई है।" कुन्दन ने अपना पर्स, दोनों हाथों में, कुछ इस तरह थाम लिया, मानो उस पर्स से वह अपनी रक्षा करना चाहती हो। किन्तु, रक्षा किस से ? भीमा से ? मगर भीमा उसे कोई नुकसान तो पहुँचा नहीं रहा । तो क्या...भीमा ने उसे बोर कर दिया है ? विना कुछ कहे न जाने क्या-क्या कह दिया जा रहा था...ऐसी स्थिति में, एक-दूसरे के सामने से, जितनी जल्दी हट जाया जाए, उतना अच्छा। भीमा ने हाथ जोड़ दिए, “बहुत-बहुत शुक्रिया, आज की मुलाक़ात लिए। आपकी जगह कोई और होती, तो न केवल बुरा मान जाती-मू शायद...हमेशा के लिए...।" "ऐसा न कहिए। मेरी हैसियत क्या है ? जवकि आप व प्रसिद्ध..." "प्रसिद्ध हूँ नहीं-था। अब तो मेरी भी हैसियत...खैर, जाने दीपि वीती विसार कर आगे की सुध लेने में ही सार है।" "मैं हमेशा आपकी मदद करूंगी।" "आपको देर हो रही है न ? प्लीज़...क्षमा कर दीजिएगा, मे कारण आपको..." "नहीं, आप के कारण नहीं। ऐसा न सोचिए। फिर भी... काफ़ी हो चुका है।" 14 "फिर मिलेंग..." भीमा विदा लेते-लेते बुदबुदाया। "हो...नमसार...!" वह मुड़ी और जाने लगी। भीमा ने रेलवे स्टेशन की ओर कदम बढ़ाए। गर्दन घुमाकर, जाती हुई कुन्दन को एक बार देख लेने का बड़ा मन हो रहा था, किन्तु भीमा ने स्वयं को रोका। ये मव भावुकता की बातें हैं । किन्तु कुन्दन के साथ बिताया हुआ एक-एक क्षण भीमा के तन-मन में बज रहा था। सहगा भीमाने देखा- एक जगह भीड़ लगी है। हुंकार जैसी आवाजें उठ रही हैं । शायद कोई झगड़ा...? भीमारक गया। भीड़ के नजदीक आया । देखा-दो किशोर हैं । गुत्थमगुत्या हो गए हैं। एक-दूसरे के बाल नोच रहे हैं, गालियां दे रहे हैं। कपड़े-लत्ते से मकानी तो नहीं लग रहे, किन्तु इतने क्रोधित हैं कि आपा खो बैठे हैं । भीड़ इकट्ठी तो हो गई है, किन्तु उन्हें छुडाने का प्रयास कोई न्हे कर रहा । सब तमाशा देखने के लिए हैं। बल्कि एक-दो जने ऐसे जो उन शिोरों को और भी ज्यादा लड़ाना चाहते है । उन्हें उन्हत असा रहे है। भीमा में न रहा गया। लड़ाई। हाथापाई। दंगल! दर सही -आधा दंगल सही । दंगल हो तो मोमा को दुनिया दुनिया से जबरन निकाल बाहर किया गया, किन्नु क्या में भी भीमा की कोई उपयोगिता नहीं? भीडको चीर कर भीमा आगे आ गया। वर- गरीर भीड़ के लोगों को इतनी मामानी से हटाता र कमायने मोम की दीवार पिपल कर बैठती दादा !
६६ : फैसले हुआ, दोनों में से किसी की समझ में न आया। "क्यों लड़ रहे हो, प्यारे वच्चो?" भीमा ने मुस्करा कर पूछा, "ज़रू- रत-से-ज्यादा जोश कहाँ से आ गया? अभी तो ठीक से जवान भी नहीं हुए।" "छोड़िए। छोड़ दीजिए।" किशोरों ने छूटने के लिए तड़पना शुरू किया, किन्तु भीमा की इस्पाती पकड़ के सामने उनका बूता ही क्या था। भीमा ने उन्हें ऐसा जकड़ा कि तड़पना तो दूर, हिलना भी उनके लिए सम्भव न रहा। भीड़ की ओर देखकर भीमा गुर्राया, "खड़े क्या है ? जाइए। रास्ता नापिए। इन बच्चों से मैं निवट लूंगा।" भीमा की चुनौती ने भीड़ को तुरन्त विखेर दिया। भीमा ने दोनों किशोरों को जमीन पर खड़ा किया, फिर दोनों के बीच में स्वयं डट गया और बोला, "बताओ, क्यों लड़ रहे थे?" दोनों किशोर चुप । "बताओ, वरना मैं यही समझंगा कि विना वात के लड़ रहे थे।" दोनों किशोर फिर भी चुप । नीचे देखने लगे। 'नहीं वताओगे ?" भीमा प्यार से हँसा, "तो मिलाओ हाथ।" दोनों में से किसी किशोर ने हाथ न वढ़ाया। भीमा ने पकड़ा एक किशोर का हाथ । भीमा ने पकड़ा दूसरे किशोर का हाथ । जवरन खींच कर मिला दिया और कहा, "हो गई न फिर से दोस्ती?" किशोरों ने न 'हाँ' कही न 'ना' । "विलकुल हो गई-एकदम पक्की दोस्ती हो गई। चलो, इस खुशी में तुम दोनों का मुंह मीठा कराऊँ।" भीमा ने कहा। यह वात उन किशोरों की आशा के विलकुल विपरीत थी। वे भीमा की ओर देखते रह गए । भीमा ने दोनों को प्यार से एक-एक चपत लगाई और दोहराया, "क्यों ? मुंह मीठा नहीं करना ?" दोनों किशोर कुछ शरमाए, कुछ झेंपे । भीमा उन्हें खींचता हुआ सामने के डिपार्टमेंटल-स्टोर की ओर ले गया। दोनों के लिए अपने राचं पर टाफिया परीदी। उनको यों में पर "जाओ, भागो! अगर आइन्दा फिर लहते दिपाई दिए, तो हायगर बांध कर चिड़ियाघर में छोड़ माऊँगा। समझे?" मीमा बोला और या पर हम दिया। उम की हंसी, दोनों किशोरों के लिए इतनी उल्लासदायक घी पिये भी हमे विना न रह सके। वे जाने लगे। भीमा ने रोका, "जात-जाते एक और चार हाप मिताने जानो।" किशोर रो। जरा शितके। फिर दोनों ने तपाक से आपम में हाप मिलाए। "शावान!"भीमा ने दोनों पी पीठ थपथपाई,"बव कभी न लड़ना।" किमोर चले गए । भीमा ने भी रेलवे स्टेशन की ओर कदम यहा दिए। उस नन्हें-से 'दंगल में भाग लेकर वह बम प्रसन्न नहीं पा। किंगोरों पा सगड़ा भीमा ने फितनी शीघ्रता में, केसी भारमीयना से गमाप्त कर दिया इसकी जानकारी कुन्दन को मिल चुकी पी। यदि भीमा जान माता कि कुन्दन ने उमे उम झगड़े का निवटारा परते देख लिया है, तो उमकी प्रसन्नता निश्चित रूप से दोगुनी हो जाती । किन्तु मह जानकारी भीमा को नही थी। जानकारी न होने के बाद- जूद यह यामा प्रसन्न था। स्टेशन की ओर उठने कदमों में तेजी आ गई पी। भीमा से विदा मैने के बाद मुन्दन ने, यो हो पलट कर पीछे देख लिया पा। भीमा से नंकदिल व्यक्ति का साथ पाकर यह एक ऐने सन्तोष से भरी हुई थी, जो उसके लिए अबूझा ही था। उसी सन्ताप के पारण उगर्ने जाते-जाते, भीमा को और पलट कर, एक नहर देय लेना पाहा पा। और तर उगने देखा था-भीमा उस मोर को धीरता हुआ रिगोरों ओर बढ़ रहा था। भीमा ने कैसे रोबोने ढंग से भीड़ को विमेर दिया और में पुट- चिों से ही दोनों किशोरों को दोस्त बना दिया-~-कुन्दन में सब देया।
फैसले देखने के लिए, नुक्कड़ पर, थम गई थी वह । किशोरो को विदा करने के वाद भीमा ने जब स्टेशन की ओर कदम उठाए, उसके बाद ही कुन्दन अपनी जगह से हिल सकी थी। भीमा की योग्यता को उसने ऐसे कोण से पहचाना था, जिस में अनेक सम्भावनाएँ थी। उन सम्भावनाओं के ज़ोर पर भीमा को कोई काम शायद शीघ्र ही दिलाया जा सकेगा...। अपनी मेज पर रखी अनेक फाइलें कुन्दन को याद आ गई थीं...कल सुबह, दफ्तर पहुँचते ही, वह उन फाइलों को चेक करेगी। . १६ - 1 दफ्तर पहुँचते ही, अगले दिन,कुन्दन ने उन फाइलों को चेक किया। एक फाइल सचमुच ऐसी निकल आई, जो भीमा के लिए वरदान सावित हो सकती थी। वह फाइल थी 'क्वीन मेरी पब्लिक स्कूल' की। इस स्कूल के इम्तहान अपने अन्तिम चरण पर थे । इम्तहानों के बाद, स्कूल का ग्रीष्मकालीन कैम्प लगने वाला था। तमाम बच्चे बम्बई से बाहर जाने वाले थे। कहाँ जाएँगे, यह अभी निश्चय नहीं था, किन्तु किसी खुली जगह में ही जाएँगे-जहाँ उन्हें प्रकृति की गोद में खेलने-कूदने का अवसर मिल सके और बम्बई की चिपचिपी गर्मी से छुटकारा भी मिल सके। इस ग्रीष्मकालीन कैम्प में, शैतान बच्चों को सम्भालने के लिए, स्कूल को एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी, जिस में अनुशासन लागू करने की योग्यता हो। भीमा में ऐसी योग्यता है। इस योग्यता की कोई डिग्री तो नहीं भीमा के पास, किन्तु यह उसमें नैसर्गिक रूप में ही है। जन्मजात ! कुन्दन ने स्वयं अपनी आँखों से देखा था उस योग्यता को। उसने 'क्वीन मेरी पब्लिक स्कूल' के प्रिंसिपल मिस्टर के. के. महा- जन का फोन नम्बर मिलाया।
"हेलो. महाजन माहय ! नमस्कार...मैं कुन्दन बोल रही हूं।" "नमस्कार, युन्दन जी! ईवलपमेंट?" "आपसे एक वान पूछनी पी।" "ग्रीष्मकालीन कप में आपको जो 'फिजिकल इन्स्ट्रक्टर' पाहिए न, उग पद के लिए . हिपी-विग्री का कोई बन्धन तो नहीं है न?" "चाहेंगे तो हम विमी डिग्री वाले व्यक्ति यो हो, किन्तु...अपवाद मब जगह होते हैं।" "एक व्यक्ति मेरे घ्यान में है। डिग्री तो नहीं है उसके पाम, पिन्तु जैसी पोग्पना किसी फिजिकल इन्स्ट्रक्टर में होनी अपेक्षित है, कमी योग्यता उसमें कूट-फूटकर भरी हुई है।" और बुन्दन ने, अपनी और में जो भी अधिकतम प्रशंमा, भीमा की हो मानी थी, कर डाली। केवल एक सात हिवाई उमने--कि भीमा भूनपूर्व पहलवान रहा है। प्रिमिपन पर इगमा प्रभाव अच्छा नहीं पड़ेगा, वह जानती थी। महाजन साहय योले, "जब आप इतनी मिफ़ारिग कर रही हैं, तो इम पक्ति को ..क्या नाम यताया आपने" "श्री भीममेन अग्रवाल।" "ठीक है। हम इन सज्जन को कन्गीडर कर गाते हैं। मगे न उनका एक हलामा इण्टरव्यू ले लिया जाए ? देगे, जब आप ने गिफारिश की है. तो.. लगभग पक्का ही जानिए, फिर भी ..." "ओके.-एण्ड क्यू । मैं भीमसेन जी मे सम्पर्क कर के आपरोअगली मूचना दूंगी। इष्टरव्यू के लिए आप उन्हें काव वुलाना पाहेंगे।" "एक मिनट.. मैं रा अपनी डायरी में चर-अप पर नं।" टेलीफोन पर योहामभाटा। फिर --- "हो, कुन्दन जो, ऐमा है ..उन्हें आप परगो तक मत भेजिए। उसी बाद रिमी भी दिन रया नामकता है। जैसा भी उनके लिए सुविधाजनक "मोरे.-एगेन क्यू . "मेगन नार...."
१०० : फैसले । - कुन्दन ने रिसीवर रख दिया। गहरी सांस ली। तो आखिर, कुछ करना सम्भव हुआ तो सही! उसने भीमा की फाइल खोली। गेस्ट हाउस का फोन-नम्बर अलग परची पर नोट किया, फिर डायल घुमाने लगी। इन्गेज्ड । दसेक मिनट बाद कुन्दन ने फिर ट्राई किया। इन्गेज्ड । दसेक मिनट बाद फिर---इन्गेज्ड। कुन्दन ने टेलीफोन-एक्सचेंज को सहायता मांगी, तो जवाब मिला, "उधर की लाइन खराव है।" "ओह...!" ...!" बुदवाकर कुन्दन ने रिसीवर रख दिया अब ? भीमा को कैसे खवर की जाए ? सोचा, 'दोपहर तक शायद लाइन ठीक हो जाएगी। -जो कि न हुआ। शाम हुई। दफ्तर से उठने का समय हो गया। लाइन वैसी-की-वैसी। एक बार सोचा, 'कल खबर कर दूंगी। आज ही ऐसी कौन-सी जल्दी है।' किन्तु तभी याद आया--कोई काम पाने के लिए भीमा कितना उत्सुक था ! कितना नेकदिल आदमी ! इन्टरव्यू देने के लिए उसे भले ही एकदम आज या कल नहीं जाना-किन्तु काम उसे यथासम्भव मिल सकता है, यह समाचार तो आज का है न ! आज का समार उसे आज ही मिल जाना चाहिए। एक ही उपाय है-कुन्दन स्वयं जाए बताने के लिए। किन्तु...? क्या ऐसा करना उचित रहेगा ? भीमा के मन में जो कोमल भावनाएँ पनप सकती हैं क्योंकि वह भावुक व्यक्ति है--क्या उसमें कोई खतरा नहीं ? ऐसी कई घटनाएँ कुन्दन की सहेलियों के साथ घट चुकी हैं, जब भावुक व्यक्तियों के कारण उन सहेलियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा । कुन्दन ने उन निरीक्षणों से सवक़ लिया था-भावुक व्यक्तियों से जरा दूर का ही वास्ता रखना चाहिए। किन्तु कुन्दन से रहा न गया । दफ्तर से निकलते समय वह अनिधिचत- पी पी फिजाए या न जाए.किन्नु निकल कर महा पर आते-आते यह फंमला कर चुकी पी--यह जाएगी। पह गई। दादर में उम गेस्ट हाउस मोदन विशेष ममय न मगा। एराध जगह ही पूछताछ करनी पड़ी। गेस्ट हाउग में प्रवेश करने के माय वह मैनेजर की मेज के मामने गही थी। जब उगने बताया कि यह थी भीममेन अग्रवाल मे मिलने आई है. मो मैनेजर ने उगे गिर गे पांव तक देगा। यह अगहन होने लगी, किन्नुभोध ही सम्भर गई। मनेनर ने नौर माय कर दिया, "इन्हें भीमा जी के कमरे तक पहुँचा आरो।" बन्द दरवाजे तक पहुँचाकर नौकर लौट गया। बुन्दन ने दरवाजे पर धीमे-मे मटयट की। "कौन ?" भीतर मे पूछा गया। पुरुष-स्वर । भीमा पा म्यर नहीं पा वह स्वर । भीमा का नहीं, तो किमका? पाहे जिमया भी हो, कुन्न को उत्तर देना होगा। वह बोली, "जरा गोलिएगा।" दरपाबा तुरन्त गुला। गामने घमा पडा था। वह उसे पहचाननी नही पी। पम्प भी उसे नही पहचानता था, विन्नु उगने अन्दाजा लगा लिया । मुन्दन बोली, "श्री भीमगेन जो है ?" "भीमगेन जी ? मोह, यादए ..आइएन । मम्मर मामले में हट गया । वृन्दन फे मदिम ने उसे पकाचौंध कर दिया था। मादगीपूर्ण वेग- भूपा ने उस सौंदर्प से इतना सम्माननीय बना दिपा पा कि पम्प के भीमा के भाग्य से जतन हुई। इस तरह कभी कोई मुन्दरी धम्मर मे मिलने नहीं आई। मुन्दन ने प्रवेश किया। योजपूर्ण निगाह पूरे कमरे में हाली। भीमा अनुपस्थित पा। पूछा, "यह ..कही गए हए है पगा।" "जरा गनून तक गए हैं। गए हुए पाफी ममय हो गया। आने होंगे। बिलकुल आने ही होंगे। वैटिगे न। मेरा गपाल है, आर कुन्दन नी है।" "जी।" दुग्दन गंकोच के साय बंटी। "मुझे पम्पक कहते हैं।" "ओह. आर है।" बुन्दन पोर पड़ी, "भीममेन जो आप के बारे में इसने पिन्नित है कि उसने तो म्प अपने बारे में भी नहीं।' . ।
१०२ फैसले " चम्पक मुस्कराया, "दरअसल...हम लोग ऐसी स्थितियों से गुजर रहे हैं कि केवल चितित होने का भी कोई अर्थ नहीं रहा। मौक़ा तो अब त्याग और बलिदान का है।" "मैं समझी नहीं।" "क्या लेंगी?" चम्पक ने शिष्टाचार का परिचय दिया, "कॉफ़ी या चाय ? वैसे, इस गेस्ट हाउस की चाय-- केवल चाय ही...कुछ पीने लायक होती है। कॉफ़ी न मँगा वैठिएगा।" "नहीं, प्लीज, रहने दीजिए, विलकुल इच्छा नहीं।" "लेकिन जब भीमा आएगा, तो..,क्षमा कीजिएगा, भीमसेन जी को यहाँ सव भीमा ही कहते हैं... "इट्स ओ.के।" "भीमा आपको कुछ-न-कुछ ज़रूर पिलाएगा। वह आता ही होगा। लिहाज़ा, विशेष आग्रह यदि मैं न करूं, तब भी काम चल सकता है।" और चम्पक मुस्कराया। न जाने क्यों, कुन्दन को ऐसा लगा-वह मुस्कान किसी दोस्त की मुस्कान नहीं थी। उस मुस्कान में चुनौती जैसी छाप क्यों थी? क्यों मिला ऐसा आभास ? "मैं...भीमसेन जी के लिए एक सन्देश लाई हूँ । यदि आप दे सकें, तो मैं आप को बता कर ही..." "क्या भीमा से मिले बिना चली जाएँगी ? सवाल ही नहीं।" चम्पक ने साधिकार कहा, "तो भी-~सन्देश क्या है ?" "उनसे कहिएगा, कल मुझसे मिल लें। टेलीफोन की लाइन खराब थी, इसलिए कहने के लिए स्वयं आई हूँ।" "आपने वास्तव में कष्ट किया। वस, इतना ही सन्देश है ? कह दूंगा। वैसे, यदि यह सन्देश न दूं, तो भी...भीमा आपसे मिलने के लिए...कल नहीं तो परसों आने ही वाला था। हर समय आपके गुण गाता रहता है ।" कुन्दन ने क्षण-मान में भाँप लिया--गलत व्यक्ति के सामने फेंस गई । उठ जाना चाहिए । कुन्दन को अपनी धड़कन के जरा तीन हो जाने का पता चल गया। उसकी आँखों की वेधकता बढ़ी। पल्लू खींच कर उस ने कन्धे पर और भी ज्यादा समेट लिया। यह उसकी आत्म-रक्षा वाली - मुद्रा पी। "आपका व्यक्तित्व थाम्नर में बैंगा ही है, जंगा भीमा यताया परता है।" चम्मक योगा, "मुझे आपसे मिलकर प्रगलना हुई। दरअगल .. आपकी तारीफ गुन-गुनकर में इतना उत्सुक हो चुमा पा कि यदि आज मुलाकात न होती, सो याम आप के दर्णन करने के लिए एप्लायमेंट- एकगज तक याना पडता।" युन्दन ने यात पलटने के लिए पहा, "त्याग और निदान के मोर के बारे में आप कुछ कह रहे थेन?" "मोह हो .अगर में...भीमा में मुझे हर-मा सगना है। यह सरायम व्यावहारिक है। मेरे लिए यह पिगी भी मीमा तक स्वाग पर गाना:-- किन्तु अपने सिद्धान्तों को न छोड़ते हुए। अब... ..देगिएन नी यह दुनिया है- हगमे पाग को भी दो शरिया बन गई है।" पापक योता, "एक गली आदर्शयादियों को। दूगरी दुनियादारीमी। गोपने की बात यह है-आदर्शवादियों का स्याग आगिर स्निना मापंग हो गस्ता है?" "मुझं नही मासूम कि आप और भौममेन जोगि ननिर पहेली में फैग हुए हैं।" "मुझे पाच हजार रुपयों को मरत जरूरत है। भीमा ने मुगरी भनेर हजार रुपए उधार लिए हुए हैं। मुझे उम्रत है-भीमा यो मौदा देने पाहिए। वह इसके लिए कोशिश भी कर रहा है, पिनु लाग और परि. दान की उगको शंली क्या है ? वही-आदर्शवादियोमी' मसलन ..पति मैं उससे कहूँ कि भीमा, तुम एक साग प्रोपाम मेरेरा-दिन पी पोगा पहन कर नापी-पांच-छह हजार एरमुग्न मिल जाएंगे तो यह तपार नहीं होगा।" "होना भी नही पाहिए," कुन्दन योनी। "क्यों ? यदि कोई जरूरत एपदम गला हो पाट रही हो, तो- "इस बारे में तो सम्बी पर्यायी जरूरत है।" मुन्दन ने मार दिया. "अभी मेरे पास इतना समय नही। भीमा जी.. मौरी . भीमान चीनी मेरा मन्देश दे दीजिएगा। उन्हें मारी तुरन्ल मुनापात करनी पाहिए।" "क्या कियो नौकरी का इन्तराम हो गया है ?" पार " +
रहे
कारिय दिला जात
नीवर-कलापही...कुछ पीने लापत
कार
नहीं लोग, इन वजए, बिलइन्दा नहीं।"
दिन चीनकाएमालो...जना कीजिएगा, नीनतेन जी को
यहां द मीना ही कहते हैं...'
"नको."
भीना आपको कुछ-न-कुछ जरूर पिलाएगा। वह जाता ही होगा।
लिहाडा, विशेष आग्रह पदिन कीं, तब भी काम चल सकता है।
बार चम्मक मुस्कराया । न जाने क्यों, कुन्दन को ऐसा लगा-वह मुस्कान
किसी दोस्त की मुस्कान नहीं थी। उन मुस्तान में चुनौती जैसी छाप क्यों
थी? क्यों मिला ऐसा लाभास?
"मैं...भीमसेन जी के लिए एक सन्देश लाई हूँ। यदि आप दे सके, तो
मैं बाप को बता कर ही..."
"क्ष्या भीमा से मिले विना चली जाएंगी? सवाल ही नहीं।" चम्पक
ने साधिकार
कहा,
"तो भी-सन्देश क्या है ?"
"उनसे कहिएगा, कल मुझसे मिल लें। टेलीफोन की लाइन खराब
थी, इसलिए कहने के लिए स्वयं आई हूँ।"
"आपने वास्तव में कष्ट किया। बस, इतना ही सन्देश है ? कह दूंगा।
वैसे, यदि यह सन्देश न दूं, तो भी...भीमा आपसे मिलने के लिए...कल
नहीं तो परसों आने ही वाला था। हर समय आपके गुण गाता रहता है।"
कुन्दन ने क्षण-मान में भांप लिया ग़लत व्यक्ति के सामने फंस गई
है । उठ जाना चाहिए । कुन्दन को अपनी धड़कन के जरा तीन हो जाने
का पता चल गया। उसकी आँखों की वेधकता बढ़ी। पल्लू खींच कर उस
ने कन्धे पर और भी ज्यादा समेट लिया। यह उसकी आत्म-रक्षा वाली
मुद्रा पी। १॥ "यारामपितार पानव मे बैगा ही है, मा भीमा यशापा परता है।" नामक योगा, "मुझे आगे मिनकर प्रममता हुई। मगर .. आपनी तारीफ मुन-गुनकर मैं इतना उरगुरु हो चुरा या नि आर मुमागत न होती, तो गाग मार मेनन करने के लिए एप्लायमेंट- एकागज' तर आना पश्वा।" पुदन ने यात पसरने के लिए पहा, "रयाग और बलिदान मौके के यारे में आप कुछ मह रहे पेन?" "ओह. हो ..अगल में...भीमा में मुर-गा समता है। यह उगमम प्यावहारिक है। मेरे लिए यह रिगी भी मोगा तर स्याग फर माना है- किन्तु अपने गिदानो को न छोड़ते हए। अप...देगिए न गी पह दुनिया है इसमें स्पाग की भी दो जनियाँ बन गई है।" पग बोला, "एक गली मायादियों की। दूसरी दुनियादारी की। मोपने की बात यह है-आदर्शवादियों का स्वाग आगिर ग्निना मापंर हो गराई "मुझं नहीं मालूम कि आप और भीममेन जी मितिक पहेनों में गहए है।" "मुझे पाय हडार परयों को गस्त सहरत है। भीमा ने मुमगे अनेक हजार पाए उधार लिए हुए है। मुझे जात है-भीमापो मोटा देने पाहिए। यह इसके लिए मोगिग भीर रहा है, किन्तु पाग और पलि. दान भी उगको जगी क्या है ? यही-आदर्शयादियों की । मगरन ..पति मैं उगमें पहूँ कि भीमा, मुम एक साग प्रोग्राम में रेस-हिरन पी पोगार पहन पर नापी-पाच-एक हजार एषमुन मिल जाएंगे तो यह संधार नहीं होगा।" "होना भी नहीं पाहिए,"कुन्दन योनी। "क्यों ? परिमोई हात एरम गमाही पोट रही हो तो --" "इस बारे में सो सम्बी पर्यादीवरूरत है।" पुग्दन ने उत्तर दिशा "अभी मेरे पागतना समय नही। भीमा जी.. गारी . भोममेन पोमो मेरा गन्देश दे दीजिएगा। उन्हें मुझमे तुरन्न मुमात्रात भरनी चाहिए।" "परा रिगी नोररी का प्लगम हो गया है ?" पापा ने मारों । - १०० फसल सिकोड़ी। "जी हाँ । अस्थायी पद है। बाद में...शायद स्थायी हो जाए।" "कैसा पद है ?" "मैं भीमसेन जी को बताऊँगी । आप उन्हीं से पूछ लीजिएगा। फ़िल- हाल...मैं चलती हूँ।" कुन्दन झटके के साथ उठ पड़ी। चम्पक के चेहरे का रंग बदलने लगा, "कुन्दन जी... मुझे पहली मुला- कात में ही कहना तो नहीं चाहिए, लेकिन कह रहा हूँ-क्या आप मेरे पहलवान को अकेला नहीं छोड़ सकती ?" "क्या मतलब ?" कुन्दन की आँखों की वेधकता बढ़ गई। "आप सरकारी कर्मचारी हैं, तनख्वाह पाती हैं। भीमा की चिन्ता नहीं करेंगी, तब भी तनख्वाह आपको मिलेगी।" "मैं अभी यहाँ सरकारी खर्च पर नहीं आई हूँ, मिस्टर ! यहाँ आने का कोई ओवर-टाइम भी मुझे नहीं मिलेगा।" "यह तो आप ही ठीक-ठीक जान सकती हैं कि आप क्यों आई हैं । मुझे केवल यही कहना है कि भीमा में दुनियादारी की काफ़ी कमी है। भीमा की परेशानियों का मूल कारण यही है। यदि आप इस कमी को और गहरा कर देंगी, तो..." "भीमसेन जी की किसी भी कमजोरी को उभारने में मेरी रुचि न तो है, न हो सकती है। मैं केवल मानवीय नाते से उनकी सहायता करना चाहती । भीमसेन जी भी इसी नाते से आपकी सहायता करना चाहते हैं। मैं नहीं जानती कि रेड-इंडियन की पोशाक पहन कर नाचने का उदाहरण आपने केवल उदाहरण के रूप में दिया-~अथवा ऐसा कोई प्रस्ताव सचमुच आपके सामने है। भीमसेन जी इसी तरह का कोई घटिया प्रस्ताव मान लें, चाहे न मानें-मुझे उनकी सहायता करनी है और करूँगी।" "रेड-इंडियन की पोशाक पहन कर नाचने वाली बात मैंने केवल उदाहरण के रूप में नहीं कही है, कुन्दन जी!" चम्पक ने अवसर पहचानकर कहा । भीमा के सामने उक्त प्रस्ताव रखने के लिए देशराज राजी न हो, न सही-स्वयं चम्पक साहस न जुटा पाए, न सही-किन्तु कुन्दन के माध्यम से यह सन्देश भीमा को अवश्य दिया जा सकता है। चम्पक ने जारी रखा, +
.
"भीमादी जगह यदि में होता, तो अपने दोन मोरान पारगिगा
प्रसार सहर्ष स्वीर कर मता। भीमा नही मरेगा-सीर मेरे लिए
स्वाग करना चाहकर भी यह नहीं भरना पाहता।"
"स्वाग करने का अपं यह नहीं कि मपनी मानास्पmi"
"आरमाओ का पही अस्तित्व नहीं।"
"आप मुझे कभी नहीं ममता मरने । भीमबर्मनीमा
मगी। हमे ऐमा प्रयास करने में समर दामी ! TE
एक-दूसरे के लिए किमी अब हमें बानिनगर मटि
है-और रहेंगे। परम पार पम्नी।" और उन्दन्टी पर
में बाहर निम्न गई।
पौधे में चम्मर मुमरालि। मनमरर
जाएगा-पहेंचरर रहेगा। देगे, मगर.ट
उमे रहते हैं. जो मुनीवन गान
मात्र
निभाता है।
मेस्ट-हाउग की मोहिम रबर NR
भीमा में मामना-मामना होगा।
'अरे, बार?"-मीनारमिटा.
--
१०४ : फैसले , सिकोड़ी। "जी हाँ । अस्थायी पद. है। बाद में...शायद स्थायी हो जाए।" "कैसा पद है ?" "मैं भीमसेन जी को वताऊँगी । आप उन्हीं से पूछ लीजिएगा। फ़िल- हाल...मैं चलती हूँ।" कुन्दन झटके के साथ उठ पड़ी। चम्पक के चेहरे का रंग बदलने लगा, "कुन्दन जी...मुझे पहली मुला- कात में ही कहना तो नहीं चाहिए, लेकिन कह रहा हूँ-क्या आप मेरे पहलवान को अकेला नहीं छोड़ सकती ?" "क्या मतलब ?" कुन्दन की आँखों की वेधकता वढ़ गई। "आप सरकारी कर्मचारी हैं, तनख्वाह पाती हैं। भीमा की चिन्ता नहीं करेंगी, तव भी तनख्वाह आपको मिलेगी।" "मैं अभी यहाँ सरकारी खर्च पर नहीं आई हूँ, मिस्टर ! यहाँ आने का कोई ओवर-टाइम भी मुझे नहीं मिलेगा।" "यह तो आप ही ठीक-ठीक जान सकती हैं कि आप क्यों आई हैं । मुझे केवल यही कहना है कि भीमा में दुनियादारी की काफ़ी कमी है । भीमा की परेशानियों का मूल कारण यही है। यदि आप इस कमी को और गहरा कर देंगी, तो..." "भीमसेन जी की किसी भी कमजोरी को उभारने में मेरी रुचि न तो है, न हो सकती है। मैं केवल मानवीय नाते से उनकी सहायता करना चाहती । भीमसेन जी भी इसी नाते से आपकी सहायता करना चाहते हैं। मैं नहीं जानती कि रेड-इंडियन की पोशाक पहन कर नाचने का उदाहरण आपने केवल उदाहरण के रूप में दिया--अथवा ऐसा कोई प्रस्ताव सचमुच आप सामने है। भीमसेन जी इसी तरह का कोई घटिया प्रस्ताव मान लें, चाहे मानें--मुझे उनकी सहायता करनी है और करूँगी।" "रेड-इंडियन की पोशाक पहन कर नाचने वाली बात मैंने केव उदाहरण के रूप में नहीं कही है, कुन्दन जी!" चम्पक ने अवसर पहचानव कहा । भीमा के सामने उक्त प्रस्ताव रखने के लिए देशराज राजी न हो, सही-स्वयं चम्पक साहस न जुटा पाए, न सही-किन्तु कुन्दन के माध से यह सन्देश भीमा को अवश्य दिया जा सकता है। चम्पक ने जारी र ܝ
-
"भीमाकोरम पहिम हता, तोप्राने मेन गरेर
प्रबाव महर्ष बोरार पर नेता। भीगा नही रग-र
सागरना चाहकर भी वह नहीं परना हो"
"रलाग करने का अर्थ यह नहीं लिआनी मनानगर।"
"आत्मायोशाकही अम्लिय नहीं।"
"बार मुझे कभी नहीं गमगा गा। मैं भी भारी भीनहोरा
मगी। हम ऐमा प्रयान परने में पर बारीमा। हम
ए-दूसरे के लिए निगी अन्य प्रह में आर मिलोंगो तर प्रसिरित
हैऔर रहेंगे। परम पॉर पनी।" और तमामातीनामरे
से बाहर निगल गई।
पीई में चमक मुमरा दिश। श्रीमानक पर प्रसार र पर
जाएगा-पहुंचकर रहेगा। देणे, भीमा पर माहिती दोरा
उमे बहते है, जो मुमीरत में पाम आए। देणे, माया दिनी
निभाता है।
गेस्ट हाउस को सीढिया उमर पर कुल्न गार पर ही पीरि
भीमा में आमना-मामना हो गया।
"अरे, आप?"--भीमा परिताहतप्रभ ।
उमे देगते ही युन्दन मा तमतमाया पेहरा पाएर विम उस बगे'
माश्चर्य की भया बात है
"नही, नही, आश्वयं नही, पलि... भरपोपहा मागे
मिले चिना जा रही थी।" भीमा ने मुस्खरापरा। गंगोमा परमा.
कर मापा पा यह । पुन्दन को उमरा मेहरा पारी पोटापा गागाभा ।
यास पटवाने के बाद-पुरषो या पेहरा, रिना' भीमा
जबर्दस्त गरीर पर जा पहरा केवर छोटा मो. कोर-गाभीसगा
पाया गचमुग यह पेहरा निरीह पाया, नानापरी'
जो भी हो, भीमा रा रा यदला हुआ-गाथा को और भी
बच्या सया। पहरेका मोटापन भीमानमा काही
रहा या क्या? परतो रहा पानी।
भीमाने गौर किया -युग्दा दगती, 17
१०६ : फैसले - है से किस ने कहा ' झेंपा, "क्या देख रही हैं ?" कुन्दन ने निगाह हटाई नहीं, "आपकी हेयर स्टाइल बदलने की जरूरत है।" "ओह !" भीमा झेंपा गया~दूसरी वार । "कभी किसी व्यूटीशियन के पास ले जाऊँगी।" भीमा, झेंप छिपाने के खयाल से, मुंह फाड़कर हँसा, "आप मुझे सौन्दर्य-विशेपज्ञ की कुर्सी में विठाएँगी ?" "क्यों ? पुरुषों को आकर्षक दिखाई पड़ना ही नहीं चाहिए, यह आप ?" "मगर उससे भी पहले मेरा नाम बदले जाने की ज़रूरत है।" भीमा ने मुंह विदकाया, "भीमसेन ! भीमा ! यह भी कोई नाम हुआ ?" "दोनों काम साथ-साथ करेंगे। नया नाम, नई हेयर स्टाइल।" "मगर.. पहले यह बताइए-मुझ से मिले बिना लौट क्यों रही थीं?" "दरअसल, मिलने नहीं आई थी, एक सन्देश छोड़ने आई थी। टेलिफोन की लाइन में खराबी होने के कारण खुद आना पड़ा।" भीमा ऐसा कहते-कहते रुक गया, 'खुदा करे, ऐसी खरावी रोज़ आती रहे।' इसकी बजाए उसने कहा, "कमरे में चम्पक से मुलाक़ात हुई होगी। क्या उसने आपसे बैठने के लिए भी न कहा ?" "अजी, कहा क्यों नहीं। कहा तो उन्होंने बहुत-कुछ...बल्कि, जो उन्होंने कहा, उसी के कारण.. खैर, जाने दीजिए । सन्देश, जिसे छोड़ने के लिए आई थी- आई हूँ.--यह है कि आपका काम शायद बन जाए भीमा पानी-पानी हो गया। चम्पक ने उस कुन्दन को ढंग से विठाया भी नहीं, जो भीमा का काम बन जाने का समाचार देने के लिए स्वयं चल- कर आई। बिठाना तो दूर, न जाने क्या कह दिया उसने...न जाने ऐसी कौन-सी बात कि कुन्दन ने बैठकर इन्तजार करना उचित न समझा। इस चम्पकवा की जवान बड़ी लम्बी है। हमेशा इसी तरह बक-वक करके खेल बिगाड़ता रहता है...। शर्म से भीगे स्वर में भीमा ने कहा, "सड़क से ही, यो खड़े-खड़े ही बातें - "नही तो।" करके आप लौट जाएं, मेरे लिए यह कितना बड़ा दुर्भाग्य होगा, कसे बताऊँ ? प्लीज़, कुन्दन जी, थोडा रुक जाइए।" "मुझे देर हो रही है। आप नहीं जानते, जरा-मी देर होते ही मेरी माँ की जान कसे फडफडाने लगती है !" "दो मिनट मे क्या फर्क पड जाएगा? इतना तो सब जानते है कि बम्बई में आते-जाते देरी हो ही जाती है।" कुन्दन मुस्करा दी, "यम्बई दिल्ली तो नहीं है।" "आपको यो जाने नहीं दूंगा। चलिए मेरे साथ।" "कहाँ ?" कुन्दन ने पूछा, मगर भीमा ने मानो गुना ही नहीं। उगो सामने के रेस्तोरों को ओर कदम बढ़ाने शुरू कर दिए थे। उगपी पीट कुन्दन की ओर धूम चुकी थी। भीमा के आदेश का अगादर करना गिना आसान है कुन्दन के लिए भीमा की पीठ घूमी हुई है ही, उगे पशाही या चलेगा कि कुन्दन पीछे-पीछे, मग-मग आई या नहीं ? कुन्दन म जाए उगम मंग-लौटकर यही मे चलती बने। जब तक भीमा कोदग गया का पगा चलेगा, तब तक तो दोनों के बीच इतना अन्तर या चुका होगा कि... अमित भीमा क्तिने विश्वास के माय बढ़ा जा रहा है रेनोगे की ओर। गुप्ता उस विश्वास के विरद्ध-चाहकर भी टिक गयी। अनायाग उग कदम उठ गए। वह भीमा की बगल में चलने लगी। "मगर एक मतं है।" कुन्दन ने कहा । "क्या?" "मुझमे मिलने आप बाए थे, तब बापन मुवं क्यिा काम मियन मैं आई हूँ। सर्च में करूंगी । गिटाचार वाली पुग्दा यी दुहाई नही पण सी।"
१०८ : फैसले "हाँ । चम्पक जी तो यहाँ तक आशा रखते हैं कि उनके भले के लिए आपको यदि रेड-इंडियन की पोशाक पहन कर किसी प्रोग्राम में नाचना पड़े, तब भी आप न हिचकें।" भीमा मुस्कराया, "रेड-इंडियन की पोशाक पहन कर नाचना! बड़ा सटीक उदाहरण दिया उसने।" "उदाहरण नहीं, उनके पास ऐसा प्रस्ताव सचमुच आ चुका है। यह प्रस्ताव आपके सामने रखे जाने की ही देर है।" कुन्दन का स्वर इतना तीखा था कि भीमा अविश्वास न कर सका। फिर-उसकी रग-रग में एक ऐसा आवेग उवल आया, जिसका कारण क्रोध था या कुछ-और, भीमा न समझ पाया। काफ़ी देर बाद वह इतना ही बोल सका, "चम्पक मेरे लिए ऐसा नहीं सोच सकता। वह जानता है, मैं होटल में डिशे धोना स्वीकार कर लूंगा, किन्तु कोई ऐसा काम नहीं करूँगा, जो मेरे आत्म-सम्मान के खिलाफ़ हो।" "मैं नही जानती कि चम्पक जी के प्रति क्यों आप इतने ज़्यादा...?" "इस आदमी ने मुझ पर पानी की तरह पैसा बहाया है।" "दोस्ती के नाते नहीं, व्यापार के नाते । अव उसी पैसे को वह व्याज- समेत वसूल करना..." "कुन्दन जी,मैं चम्पक से निवट लूंगा। आप...कह रही थीं न कि मेरा काम बन गया है ? अव जरा विस्तार से बताइए।" "फिलहाल यह पद अस्थायी है। एक स्कूल को व्यायाम-शिक्षक चाहिए। यदि वे सन्तुष्ट हुए, तो पद स्थायी होने की पूरी गुंजाइश है।" और कुन्दन ने सारी वात विस्तार से सामने रखी। भीमा के हाथ-पाँव फूल गए, "मैं इस पद के योग्य नहीं।" "क्यों?" "स्कूल यानी शिक्षा का केन्द्र । मैं----अनपढ़ आदमी।" "तो क्या हुआ? इसके अलावा...किसने कहा, आप अनपढ़ हैं ?" "बेकारी के इस जमाने में एम० ए० पास भी अनपढ़ ही है।" "वह एक दूसरा पहलू है।" --
"मुझे नहीं लगता, इटरव्यू में वे मुझे पारा करेंगे।"
"यह बाद की बात है।"
"मैं प्रिसिपल के सामने खडा ही न हो सकंगा। मापागा।"
भीमा का आत्म-विश्वास बढाने के लिए दिन उगे मार-माद
समझाती रही। आखिर भीमा मान गया। "टीक है," पर Rm, "A
आपका इतना ही आग्रह है, तो इटरव्यू देने चला जाऊँगा।"
"यदि पास न हुए, तो कुछ और किया जाएगा। मैं आप.infy
"मुझे नहीं मालूम, कुन्दन जी, आपदा मुक्रियाशिम भास
करूं?"
"नही मालूम है, यही अच्छा है। क्रिया अदा का int
घबराती हैं?"
"कुन्दन जी, बाप बहुत अच्छी है।"
"इसके जवाब में क्या कहूँ ? करा यह टिmarriaytm
और कुन्दन खुलकर मुस्करा दी।
"मैं क्या है, मुझे मालूम है।"
११० : फैसले ने पूछा जिसके आधार पर जाना जा सके कि किसी को अगर 'हाँ' कही तो क्यों और 'ना' कही तो क्यों ?" "मुझे विवेक की परिभाषा नहीं मालूम, किन्तु...यदि आप में विवेक नहीं है, तो मैं यही कहूँगा कि विवेक कोई ऐसा गुण नहीं, जिसके लिए लालायित रहा जाए।" "आप बहुत दयालु हैं। इसीलिए ऐसा कह रहे हैं। आप मुझे चोट नहीं पहुँचाना चाहते।" "कुन्दन जी...शायद आप बहक रही हैं।" "यह भी एक प्रमाण है कि सचमुच मैं अविवेकी हूँ।" "यह कौन-सा गुबार है, कुन्दन जी, जो इस तरह फूट रहा है ?" भीमा और कुन्दन के मन की पर्ते खुल गई। उसने बोलना शुरू किया, तो बोलती चली गई । सुरेश जी...माँ ने बताया था कि सुरेश जी की उम्र कोई ज्यादा नहीं लेकिन कुन्दन पहले से माने वैठी थी कि वह लगभग बूढ़े हैं । फिर:..सुरेश जी स्वयं आए । मिले । कुन्दन ने देखा, स्वयं अपनी उम्र को ध्यान में रखकर देखा----सुरेश जी वास्तव में इतनी अधिक उम्र के नहीं थे कि...और इसके बावजूद, कुन्दन उन्हें 'हाँ' नहीं कह पा रही थी.... ...क्यों ? कुन्दन नहीं जानती थी। क्यों नहीं जानती थी? क्योंकि कुन्दन अविवेकी... कुन्दन को पता ही नहीं कि किसी को अगर 'हाँ' कही जाए, तो किस आधार पर...और 'ना' कही जाए, तो किस आधार पर... अपने पूर्वाग्रह के साथ यों चिपकी रहने वाली कुन्दन...! भीमा ने गम्भीरता से कहा, "सुरेश जी भाग्यशाली होंगे, यदि उन्होंने आपको अपनी जीवनसंगिनी के रूप में पाया...लेकिन...ऐसा न सोचिए कि आप अविवेकी हैं।" "मुझे बताइए, आखिर क्यों मैं उन्हें 'हाँ' नहीं कह पा रही?" "क्या आप 'हाँ' कहना चाहती हैं ?" "मुझे नहीं मालूम, नहीं मालूम...।" "यदि 'हाँ' कहना चाहती हैं, तो अवश्य 'हाँ' कह लेंगी।" "मैं कारण ढूंढ़ रही हूँ। आखिर क्यों उन्हें 'हाँ' कह दूं? केवल इतना काफ़ी नहीं कि उनमें कोई दोष मैं नहीं ढूंढ़ पा रही। इस दुनिया में न जाने कितने व्यक्ति ऐसे निकल आएंगे, जिनमें कोई दोप- --महमा- नहूँढा जा मके। तो क्या...ऐसे अनेक व्यक्तियों में मे किमी को भी पना जा सकता है?' "मैं आपके इस सवाल का जवाब नहीं दे मरता। गहने के लिए मेरे पाम, बस, यही है कि मुरेश जी को यदि आप 'हो' नही कह पा रही तो इसका कारण कभी-न-कभी आपको पता चल ही जाएगा।" "मैं सोच-मोच कर परेशान हो गई हूं।" "कोई हर्ज नहीं।" घुन्दन ने मुम्कराने का प्रयास किया, "कितनी आमानी से आप ने कह दिया, 'कोई हर्ज नहीं' ! आपको क्या मालूम, मेरी क्या हालत है !" "चाहे जमी भी हालत हो, इतना निश्चित जानिए कि आप अविवेकी नहीं हैं। आप दयालु हैं। आधुनिक हैं । हिम्मती हैं। प्रयोगशील है।" "आधुनिक । हिम्मती । प्रयोगशील । दयालु । इनने मारे विशेषण! इनका आधार?" "आधार-आप का मेरे प्रति व्यवहार।" "क्यों ? आपके प्रति मैंने ऐसा क्या व्यवहार रिया है कि जिसमे.. "जहाँ तक मेरी सामान्य बुद्धि कहती है..." भीमा ने अपना विश्ले. पण मामने "रखा, इतने अल्प परिचय में ही आप मेरी सहायता कर रही है, यह आपकी दयालुता का प्रमाण है । आप आधुनिक हैं, वरना दूसरी मुलाकात में ही जय मैंने बताया था कि किस प्रकार आप मेरे मानम पर छाई रही-तो अवश्य आप मान जाती । आप प्रयोगशील और हिम्मती है. वरना अभी मेरे साथ इस रेस्तोरों में बैठ कर चाय न पी रही होती।" "आप जिन्दगी को बहुत सरल रूप में देखते हैं।" बुन्दन ने जब यह कहा, उसके स्वर में सन्तोष और उल्लाग प्रकट होने लगा था, "काश, जिन्दगी सचमुच इतनी सरल हुआ करती'" "मगर जिन्दगी उतनी क्लिष्ट भी नहीं है, जितनी आप सोच रही है।" "जो भी है...अपने मित्र के रूप में पा कर मुझे अच्छा लग रहा है।" "मुझे भी।
११० फैसले - रहा जाए।" जिसके आधार पर जाना जा सके कि किसी को अगर 'हाँ' कही तो क्यों और 'ना' कही तो क्यों ?" "मुझे विवेक की परिभाषा नहीं मालूम, किन्तु...यदि आप में विवेक नहीं है, तो मैं यही कहूँगा कि विवेक कोई ऐसा गुण नहीं, जिसके लिए लालायित "आप बहुत दयालु हैं। इसीलिए ऐसा कह रहे हैं। आप मुझे चोट नहीं पहुँचाना चाहते।" "कुन्दन जी...शायद आप बहक रही हैं।" "यह भी एक प्रमाण है कि सचमुच मैं अविवेकी हूँ।" "यह कौन-सा गुवार है, कुन्दन जी, जो इस तरह फूट रहा है ?" भीमा पूछा और कुन्दन के मन की पर्ते खुल गई। उसने वोलना शुरू किया, तो वोलती चली गई। सुरेश जी...माँ ने बताया था कि सुरेश जी की उम्र कोई ज्यादा नहीं लेकिन कुन्दन पहले से माने बैठी थी कि वह लगभग बूढ़े हैं। फिर...सुरेश जी स्वयं आए। मिले । कुन्दन ने देखा, स्वयं अपनी उम्र को ध्यान में रखकर देखा----सुरेश जी वास्तव में इतनी अधिक उम्र के नहीं थे कि...और इसके बावजूद, कुन्दन उन्हें 'हाँ' नहीं कह पा रही थी...क्यों ? कुन्दन नहीं जानती थी। क्यों नहीं जानती थी? क्योंकि कुन्दन कुन्दन को पता ही नहीं कि किसी को अगर 'हाँ' कही जाए, तो किस आधार पर...और 'ना' कही जाए, तो किस आधार पर... अपने पूर्वाग्रह के साथ यों चिपकी रहने वाली कुन्दन...! भीमा ने गम्भीरता से कहा, "सुरेश जी भाग्यशाली होंगे, यदि उन्होंने आपको अपनी जीवनसंगिनी के रूप में पाया...लेकिन...ऐसा न सोचिए कि आप अविवेकी हैं।' "मुझे बताइए, आखिर क्यों मैं उन्हें 'हाँ' नहीं कह पा रही?" "क्या आप 'हाँ' कहना चाहती हैं ?" "मुझे नहीं मालूम, नहीं मालूम...." "यदि 'हाँ' कहना चाहती हैं, तो अवश्य 'हाँ' कह लेंगी।" "मैं कारण ढूंढ़ रही हूँ। आखिर क्यों उन्हें 'हाँ' कह दूं? केवल इतना काफ़ी नहीं कि उनमें कोई दोष मैं नहीं ढूंढ़ पा रही। इस दुनिया में अविवेकी...
। " न जाने कितने व्यक्ति ऐसे निकल आएंगे, जिनमें कोई दोप-महमा- न ढूंढा जा सके। तो क्या...ऐसे अनेक व्यक्तियों में से किसी को भी चुना जा सकता है ?" "मैं आपके इस सवाल का जवाब नहीं दे मकता! कहने के लिए मेरे पास, बस, यही है कि मुरेश जी को यदि आप 'हाँ' नही कह पा रही तो इसका कारण कभी-न-कभी आपको पता चल ही जाएगा।" "मैं सोच-सोच कर परेशान हो गई हूँ।" "कोई हर्ज नहीं।" कुन्दन ने मुस्कराने का प्रयास किया, "कितनी आसानी से आप ने कह दिया, 'कोई हर्ज नहीं' ! आपको क्या मालूम, मेरी क्या हालत है !" "चाहे जैसी भी हालत हो, इतना निश्चित जानिए कि आप अविवेकी नहीं है । आप दयालु है । आधुनिक है । हिम्मती हैं । प्रयोगशील है।" "आधुनिक । हिम्मती । प्रयोगशील । दयालु । इतने सारे विशेषण । इनका आधार? "आधार-आप का मेरे प्रति व्यवहार।" "क्यो ? आपके प्रति मैंने ऐसा क्या व्यवहार किया है कि जिससे..।" "जहां तक मेरी सामान्य बुद्धि कहती है..." भीमा ने अपना विश्ले. पण सामने "रखा, इतने अल्प परिचय मे ही आप मेरी सहायता कर रही है, वह आपकी दयालुता का प्रमाण है । आप आधुनिक हैं, वरना दूसरी मुलाकात में ही जब मैंने बताया था कि किस प्रकार आप मेरे मानस पर छाई रही तो अवश्य आप मान जाती। आप प्रयोगशील और हिम्मती है, वरना अभी मेरे माथ इस रेस्तोरों में बैठ कर चाय न पी रही होती।" "आप जिन्दगी को बहुत सरल रूप में देखते हैं।" कुन्दन ने जब यह कहा, उसके स्वर में सन्तोष और उल्लास प्रकट होने लगा था, "काश, जिन्दगी सचमुच इतनी सरल हुआ करतो!" "मगर जिन्दगी उतनी क्लिष्ट भी नहीं है, जितनी आप सोच रही है।" "जो भी है...अपने मित्र के रूप मे पा कर मुझे अच्छा लग रहा है।" "मुझे भी।"
११२ फराले . 4 १७ गुन्दन को विदा गर गीगा जब गागरे में वापरा भाया, तो पम्पको साश धेशराज भी गौजूद था। गुन्दन ज्यों ही सामने से हटी थी, भीगा बौखलाने लगा था। जैरो गिसी ने उरो धगमाया हो कि तुम्हारा राबरो बड़ा सशाना लुट जाने वाला है। सुरेश जी...गुन्दन गो प्राप्त करने का प्रयारा कर रहा धनी-गानी पुरुप... लेगिन भीमा गो सुरेगा जी से नाराज होने गी गया परूरत ? सुरेश जी गो तो भीगा अस्तित्य तगाना पता नहीं...और फिर, भीगाको अधिकार गया है गुन्दर गे राम्भावित पति के प्रति ऐराा उचाल-सा गहरा गारने का? भीगा बहुत बुरे मूड में था, जब उराने कमरे में कदम रसे। सम्पया ने उससे निगाह न गिलाई । सड़क पर भीगा और गुन्दन गी गुलात हो गई है और दोनों ने साथ-साथ रेस्तोरा में प्रवेश किया गह अपनी बिगी रो पम्पक ने देख लिया था। रेउ-इंडियनों ने नृत्य का प्रस्ताव अव गीगा नो ज्ञात है, यह रागश गुगा था। अपने-आप मे सागने यह काग शगिन्दा नहीं था, फिन्तु...। भीगा ने इन्तजार किया--कि चम्पग उरारो नपार गिलाए। गन यो निसी गोने में भीगा ने अब भी आशा रखी थी कि नृत्य पाला प्रस्ताव पवल एन 'राटीगा उदाहरण' ही था----वास्तव में प्रस्ताव नहीं था यह...गिन्तु पम्पगने जब निगाह न मिलाई, तो भीमा जान गया---प्रस्ताव वास्तव में प्रस्ताव था। और फिर-~~-गुछ ही देर में स्पष्ट हो गया---गह प्रस्ताव तो आदेश था। एक मैनेजर गा आदेश । एक ऐसे व्यथित का आदेषा, जिरासे हपाारों रुपयों नागार्ज भीगा ने लिया हुआ था। शुरू भीमा ने ही गिया "गयों चम्पा, हो गए गुन्दन जी के दर्शन?" "तुग बधाई यो पाप हो, भीमा!" सम्पग ने निगाह तो मिलाई, किन्तु उराने जिरा ठेग से जवाब दिया, पह बूंरुवार था। -
भीमा गम्भीरता से बोला, "तुम शायद उगे मेरी प्रेमिका मान रही
चल रहे हो!
"मैंने कब कहा ऐगा?"
"कई बातें बिना कहे कही जाती है।" भीमा योला।
"पर, छोडो।"
"और यह...रेड-इण्डियनों के नृत्य वाले प्रनाय कामका रहस्य ?"
भीमा ने मीधा सवाल किया।
चम्पक ने तुरन्त कोई जवाब नहीं दिया।
भीमा ने पाया-उमको यात ने देशराज को घौशायामही घामानो
..देशराज को भी जानकारी है...पमक ने रग जम्प पर भी बना दिया
है कि बुन्दन का आगमन हुआ था... ,गोनिग तो मामा के महगे दुन्दन
का नाम सुनने के बावजूद देगरात्र पर कोई प्रतिक्रिया नहई।
भीमा को आपात पहुँचा-देगरान नै गरे गाय हिराव बग्ना या,
इमाथामास-मार भी उनके लिए महनीय नहीं था।
किन्तु उमका मंपर्षअभी देगराज में गाय नहीं। अमीनी उसे
चम्पक के साथ लाना है।
"बोलोगे नहीं ? क्या रहा है म मन्द मारा?" मामाने
अकुला कर पूछा।
"प्रस्ताव गन्दा नहीं है।" चमक ने जवाब मोटाना।
"यह मेरी मरवरी है। नन्हें प्रमाव वारदा पारित
मोमा, सपना धीरज मंडाला हवा. मी पर देर, "म्मिा में
चमार ने सब की योर कर देगा। मारपीट
करदै ए उमन मगातार मीमा रुझायों में या टाकी
नारन गई। दो दुश्मन
मारेर मी पता, मा.
मग मी ही पाठ, भीमा ओर
पारेर
योरपणाने मनमmfirmat:
पास यह यादगार देने वाले माहवारकामा
११४ : फैसले । "मैं नाचूं ? अधनंगा होकर कूल्हे मटकाऊँ ? सवाल ही नहीं।" भीमा ने कहा, "मेरे भविष्य की कोई और ही दिशा तय हो रही है..." "मुझे पाँच हजार चाहिए।" "नहीं हैं।" "तुम्हारे भविष्य की नई दिशाओं में मुझे दिलचस्पी नहीं।" "यानी-हमारी दोस्ती टूट रही है ?" "नहीं। दोस्ती की पहचान हो रही है । कसौटी पर कसी जा रही है।" "मैं ऐसी कसौटी पर खरा उतरना नहीं चाहूँगा।" भीमा ने कहा । "तुम्हें खरा उतरना ही होगा।" "चम्पक !" भीमा दाँत पीस कर चिल्लाया। "मैं ऐन इसी वक्त तुम्हारी 'हां' नहीं सुनना चाहता । अभी तुम गुस्से में हो । शान्त हो लो। फिर बात करेंगे।" और चम्पक उठ कर कमरे से निकल गया। भीमा ने निरीह दृष्टि से देश राज की ओर देखा । एक शिष्य अपने गुरु का सहारा मांग रहा था । देशराज ने ऐसे सिर हिलाया, जैसे कहना चाहता हो-मैं क्या करूँ ? मैं क्या कर सकता हूँ? देशराज की खामोशी की भाषा ने भीमा को दहला दिया। "लेकिन, देशराज जी...!" "भीमा!" देशराज उठ कर नजदीक आया। भीमा के कन्धे पर हाथ रख कर महा, “सोचो, उपाय भी क्या है ? दूसरा कौन-सा तरीका ऐसा निकल सकता है कि जिससे...?" भीमा ने थूक निगला। देशराज ने समझाने की मुद्रा में कहा, "क्या तुम सोचते हो, मैं ऐसे प्रस्ताव से सहमत हूँ ? क्या मैंने इसका विरोध न किया होगा। लेकिन चम्पक ने मुझ से पूछा, 'दूसरा उपाय क्या है ?' यही सवाल मैं तुमसे पूछता । है कोई जवाब ?" भीमा के पास जवाव---उस वक़्त तो नहीं ही था। देशराज ने क्रमशः स्पष्ट किया कि चम्पक पर चाकू से हमला होना, भीमा को धमकी-भरे फोन मिलना, प्रकाश मेहरा की ओर से नकली दंगलों .
में भाग लेने का प्रस्ताव रखा जाना...यह सब एक ही मेन्द्र मे संचालित हुआ था । इस कुचक्रमे ली है और प्रकाश मेहरा, दोनों, घरावरी में हिस्गा ले रहे थे...। "सवाल अब केवल पांच हजार के इन्नशाम या नहीं है।" देशराज ने कहा, "सवाल अब - जहाँ तक मैं समझ मकता हूं-ली हू जैसे गुण्ड की इच्छा के सामने झुक्ने या न झुकने का है। क्या तुम सोचते हो, ली हू पांच हजार के लिए मरा जा रहा है ? लेकिन वह तुम्हें एक प्रसिद्ध पहलवान को-नीचा दिखाने के लिए जरूर मरा जा रहा है।" "मुझे नीचा दिखा कर उसे क्या मिलेगा?" "दूमरों को दुमी और अपमानित करने का अपना एक अलग आनन्द होता है । उसको कोई और व्याख्या नहीं हो सकती।" "नही..." भीमा ने मिर हिलाया, "यदि पांच हजार का इन्तजाम हो जाए, तो...मेरा सयाल है कि ली हू का मुंह बन्द किया जा मरता है । यदि सचमुच कही से पांच हजार...?" "कहाँ से आएँगे ? आसमान से नो टपकने से रहे।" रात भर भीमा करवटे घिसता रहा। तरह-तरह के विचार...भांति-भांति की कल्लनाएं...क्या करे? कैसे करे? क्या सचमुच प्रस्ताव स्वीकार कर ले। कुन्दन क्या सोचेगी? जिस भीमा को वह इतनी ऊंची निगाह से देखने लगी है, जिसके प्रति व ऐसी सहजता से स्नेह प्रशित कर रही है, जिसे मित्र के रूप में पाकर यह इतनी प्रसन्न है-उसी भीमा को जब यह मंच पर उतर कर भोई ढग से कमर मटकात देनेगी, तो क्या सोचेगी? भीमा कुन्दन को हमेशा के लिए खो देगा। नही...नही...ऐसा नहीं होना चाहिए...। तो क्या करे भीमा? जाए कुन्दन के ही पाम और हाय पसार कर वहै, "लाओ, पांच हजार दो उधार लौटा दूंगा- जय भी लौटा रारूंगा।" चम्पक का प्रस्ताव मानने से तो बेहतर होगा-कुन्दन के ही सामने हाय फैला लिया जाए। हद-रो हद क्या होगा? धुन्दन इन्कार कर देगी- यही न? तो ठीक है। उसके बाद मुन्दन के सामने नाक कट ही जाएगी ११६ : फेराले Maina -- -फिर चम्पकमा प्रस्ताव स्वीकार किया जा सकता है। सुबह की किरणें फूटने से पहले भीमा की आँखें आध-पौन घण्टे मे लिए शप रागी । शपकी आने से पहले, अन्तिम विचार, जो पराले का स्वरुप पा कर, उरागे मस्तिष्क में स्थिर होने लगा था, यही था कि यह पुन्दन से गांग कर देखेगा। लेकिन शपकी टूटने के बाद? स्वयं अपने सामने भीगा इतना शमिन्दा हुआ, जिरा का हिसाब नहीं। गुन्दन के साथ गिनती की ही गुलाकात हुई हैं। ठीक है, उतनी गग गुला- कातों में उतनी पयादा दोस्ती पनप गई है, गिन्तु इरागा अर्थ यह तो नहीं कि...1 ओह, ऐसा सराव पिसार भीमा को गन में आया ही पौरो ? गुन्दन भीमा के लिए जो मार रही है, जितना करना चाहती है. यही बहुत है। ऐरो गरी किसी के सामने रुपए-पैसों लिए हाथ पलाया जा रागाता है? और फिर... इरागा ही गया राय कि गुन्दन गे पारा रुपए निकल ही आएँ ? शायद उसने अपनी तनख्वाह में रो बना-बना गार...लेगिन गया वह भीगा के लिए बचाती रही होगी? भीमा ने अपने सिर को शाटगा दिया। सोचने का यह तरीका ही सलत है ? कुन्दन को बीच में लाने की जरूरत ही गया है ? गयों न ऐसा मान लिया जाए गि गुन्दन है ही नहीं। फिर आगे सोचा जाए। लेनिन नहीं...ऐसे जैसे गाना जा सकता है कि गुन्दन है ही नहीं ? भीमा ने गुस्से में गर गर, पोर रो मे पर हाथ पटगा। मेज एगदग उछल पड़ी। छोटी-सी गेषा थी। पाय-नाश्ते के संगम इस्तेगाल होने के लिए, गेस्ट हाउस गी ओर रो, हर गागरे में पैसी गेजों रखी गई थी। मेला उछलते ही उस पर पड़ी तपतरियाँ, पाप-सारार आदि फर्ण पर आ रहे । खणणणण...चीनी मिट्टी गी नाणुग पीपों...उन्हें टूटने नया देर? , । भीमा ने स्वयं से कहा, 'मनुष्य की इपजत भी चीनी मिट्टी की चीजों जैसी है। बड़ी मुश्किल से बनती है। जब तक बनी रहती है, निहायत सूयमूरत लगती है। मगर टूटते क्या देर?" तो? क्या अब कुन्दन से कभी न मिला जाए? कभी न मिलना हो वह उपाय है, जिससे यह माना जा सके कि कुन्दन कोई है ही नहीं। ठीक है, यही किया जाए । नाता एकदम तोड दिया जाय । नाता अभी काफी कच्चा है---बहुत कम ममय की पैदाइश । अभी इमै, फिर भी, तोटा जा सकता है। बाद मे तो...। लेकिन नाता तोड़ने का सारा मनमूया एकदम कपूर की तरह उड़ गया-जव लगभग ग्यारह बजे कुन्दन का फोन आया। "शनीमत है, आप गेस्ट-हाउग मे ही मिल गए।" कुन्दन ने कहा, "मुझे तो शक था, कही बाहर निकल गए होंगे, तो टूढुंगी महाँ' ऐसा है ...आपका इण्टरव्यू एक-दो दिनो वाद होने वाला था, लेकिन ..अभी मैं प्रिसिपल महोदय से बात की, तो बोले कि इण्टरव्यू यदि आज ही हो जाए, तो बेहतर, क्योंकि बाद में कुछ दूसरे काम निकल आए हैं और उन्हें शायद शहर से बाहर भी जाना पड़े।" "आज ही ? इण्टरव्यू ?" भीमा अचकचाया। "क्यों ? फ़ैसला जल्दी हो जाएगा। बलि ..फमला,तो यो समलिए, हो चुका है । आपकी इतनी तारीफ मैंने कर ली है कि इण्टरव्यू को तो केवल खानापूरी जैसा मामला समझिए।" कुन्दन ने उत्साहित स्वर में कहा। । भीमा के मस्तक पर नमी उभरने लगी, "लेकिन..." "क्यों ? हिचक क्या है " "कुछ नहीं, लेकिन मैं मोच रहा था...' "कुछ मत मोचिए । सोचने जैसा कुछ है ही नहीं। दे हानिए इण्टर- प्यू।" कुन्दन ने तपाक मे कहा, "मैं जान गई। आप नरपस हो रहे हैं। मुनिए । नरवस मत होइए । वात आई समझ में और हाँ .जय आपपा
११८
: फैसले
इण्टरव्यू लिया जाएगा, तब मैं भी मौजूद रहूँगी । बोलिए, अव तो मन
पक्का हुआ न ? मेरी मौजूदगी में आप बिलकुल नरवस नहीं होंगे।"
"ओह, कुन्दन जी..."
"मेरे नाम के आगे 'जी' मत लगाया करिए । आप मुझसे बड़े हैं । हर
तरह से।"
इण्टरव्यू
"जवान पर 'जी' ऐसा चढ़ गया है कि...खैर...कोशिश करूँगा..
के लिए कब कहाँ पहुँचना होगा ?"
कुन्दन ने पता नोट कराया। समय बताया- शाम के पांच बजे।
१८
बारह बज चुके थे । इण्टरव्यू की उत्तेजना के कारण, दोपहर का
भोजन, जरा-सा ही लिया था भीमा ने
"चम्पक...!" वह बोला था, "तुम्हारे प्रस्ताव के लिए मैं इन्कार
तो नहीं कर रहा, किन्तु अभी 'हाँ' कहने की स्थित में भी नहीं हूँ। पहले
यह इण्टरव्यू हो जाए।"
चम्पक उत्साहित नहीं था, "यह नोकरी यदि मिल गई, तव भी...
पाँच हजार का इन्तज़ाम-~-एकमुश्त~-कैसे...?"
"उस पर फिर सोचेंगे। एक-साथ सभी दिशाओं में कैसे सोचा जाए ?"
एक बजा। दो बजने को आए।
चम्पक के दिमाग में कोई और खिचड़ी पक रही थी
ढाई बजते-बजते भीमा की हालत खस्ता होने लगी। इण्टरव्यू के लिए
आत्म-विश्वास वह सँजो ही नहीं पा रहा था।
चम्पक बोला, "थोड़ी-सी पी लो।"
"उससे क्या होगा?" भीमा ने पूछा।
दंगलों के सिलसिले में जब उन्होंने ठण्डे मुल्कों के दौरे किए थे, तब
वहाँ भीमा थोड़ी-बहुत पीना सीख गया था। उन मुल्कों की ठण्ड का मुका-
बला इसके बिना भला कैसे किया जाता? किन्तु भीमा को शराब की लत
कभी नही पड़ी। शराब को उमने जब भी ग्रहण किया, दवा की तरह ही किया। "पीने से आरम-विश्वास बढ़ता है।' चम्पक ने उत्तर दिया। "लेकिन मुझे इण्टरव्यू देने जाना है।" "इसीलिए तो कह रहा हूँ कि थोड़ी-मी पोलो।" चम्पक ने उकसाया, "तुम घबरा रहे हो । पीने से यह नरवसनेस दूर हो जाएगी।" "लेकिन यदि उन्हें आभाम मिल गया कि मैं पी कर आया हूँ, तो... सोचो, क्या इम्प्रेशन पड़ेगा । मुझे उस स्कूल में व्यायाम-शिक्षक बनना है। स्कूल का कोई भी कर्मचारी यदि शराब पीता हो, तो...बच्चो पर क्या असर पड़ेगा: चम्पक खिलखिला उठा, “कमाल करते हो, यार, तुम भी!" "क्यों?" "मैंने कब कहा कि तुम इतनी पी डालो कि उन्हें पता चल जाए।" "शराव की गन्ध इतनी तेज होती है। थोडी-सी पीने के बावजूद...." "तुम तो सोचते हो, इन्टरव्यू लेते समय चे मुम्हारे मुंह-मैं-मुंह डाल देंगे।" चम्पक ने यह कहते हुए, जेव से, शराय की योतल निकाली और मेज पर रप दी, "देखो, यह गोआ को सास शराब है-'फनो' । तुमने कभी नही चयी। चखोगे तो होंठ पाटोगे। इसमें एक और सूची है। इस को गन्य तेज नहीं है। यदि किसी को पता चल भी जाए, तो एकाएक ऐसा नहीं लगेगा कि शराब को गन्ध है।" "नहीं, चम्पक, मैं एतरा मोल ले नहीं सकता।" "लेकिन पी कर नहीं जाओगे, तब तो और फ्यादा खतरा है। तुम इतने ज्यादा नरवस हो कि तुम्हारे चेहरे पर हवाइयां उघ रही हैं।" पम्पक बोला, "क्या तुम सोचते हो, मैं तुम्हारा बुरा चाहने वालों में से हूँ ? भले को लिए ही कह रहा हूँ-पोड़ी-सी पी कर जानी।" "लेकिन...?" "प्रिसिपल को मेज के सामने रखी किसी वुमी में ही बैठोगे न जा र? क्या गोचते हो, मेज़ की पूरी पौड़ाई पार करके तुम्हारे मुंह को घि प्रिंसिपल तक पहुंच जाएगी? मवान ही नही । 'फैनी' को गन्ध तो .
0 १२० : फैसले पहुँच ही नहीं सकती।" भीमा ने खुली हुई बोतल को सूंघ कर देखा, "यार, इसकी गन्ध कोई कम तेज़ तो नहीं है।" "तुम 'फैनी' के गुणों से परिचित नहीं हो, इसीलिए ऐसा लगता है। पीने के बाद यह शराव बहुत ही आनन्ददायक, हल्का-हल्का नशा देती है; जिससे आत्म-विश्वास बढ़ता है। गन्ध लगभग नहीं आती। पियो भी यार, तुम भी क्या लड़कियों की तरह डर रहे हो?" भीमा झांसे में आ गया। 'फैनी' के 'गुणों' से वह परिचित नहीं था। पीते समय उसे सचमुच ऐसा लगा, जैसे उसका आत्म-विश्वास दृढ़ होता जा रहा है। बातों में उलझाकर चम्पक ने उसे कितनी पिला दी, वह सहसा न भाँप सका। 'फैनी' तो तीर की तरह दिमाग पर चढ़ती है। चम्पक ने घड़ी की तरफ़ देखा, "अरे, खासा वक्त हो गया। समय पर पहुँचने के लिए तुम्हें टैक्सी करनी होगी। आओ, मैं पहुँचा देता हूँ। यह लो इलायची। प्रिंसिपल के कमरे में घुसने के पहले मुंह में इलायची रख लोगे, तो असलियत भांप ली जाए, इसका खतरा बिलकुल नहीं रहेगा।" व्यायाम-शिक्षक का काम भीमा को न मिल सका। चम्पक की मुराद पूरी हुई। बात केवल इतनी नहीं थी कि काम न मिला । उससे भी बुरा--- भीमा को प्रिंसिपल के सामने अपमानित होना पड़ा। केवल भीमा को नहीं-कुन्दन को भी अपमानित होना पड़ा। प्रिंसिपल के कमरे की चिक उठाकर भीमा ने जब प्रवेश किया, तो पहली नज़र उसकी कुन्दन पर ही पड़ी, जो प्रिंसिपल की बग़ल वाली कुर्सी में बैठी उसी की प्रतीक्षा कर रही थी। भीमा के प्रवेश के साथ कुन्दन और प्रिंसिपल, दोनों के होंठों पर मुस्कान उभर आई। प्रिंसिपल ने कहा, "आइए, भीमसेन जी, वैठिए।" कुन्दन मन्द-मन्द मुस्कराए जा रही थी। और भीमा के दिमाग़ पर नशे की धुन्ध सवार हो रही थी। प्रिंसिपल ने बैठने के लिए जिस कुर्सी की ओर इशारा किया था, उस कुर्सी में भीमा बंठ ही न सका। 'फैनी' का नशा दिमाग में अचानक ऐसा कुलबुलाया कि भीमा के पांव लड़पड़ा गए। कुर्सी तक पहुंचने से पहले ही वह एक स्टूल में बैठ गया-स्टूल विलकुल नजदीक ही था। प्रिंसिपल और कुन्दन उसकी तरफ़ आश्चर्य से देखने लगे। भीमा ने आखिर क्यो कुर्सी की बजाए स्टूल पर बैठ जाना पसन्द किया? कारण वे समझ सके, इससे पहले भीमा का चेहरा सफेद पड़ना शुरू हो चुका था। गोल-गोल घूमता कमरा...लुज होते जा रहे हाथ-पैर...। भीमाने उठने का प्रयास किया, "क्षमा कीजिएगा..." वह बुदबुदाया। उसने उठकर कुर्सी की ओर बढना शुरू किया। कुर्मी की पीठ का सहारा लेने के लिए उसने हाथ बढ़ाया। नशे और आशका ने मिलकर भीमा पर ऐसा असर डाला कि उसका बढा हुआ हाथ बुरी तरह कांप गया। उसने कुर्सी अपनी ओर खीची। उसे यही लगा कि कुर्सी के पास पहुँचना कठिन है, किन्तु कुर्सी को अपनी ओर खीच लेना आसान रहेगा। कुर्सी न जाने किस तरह खीची गई कि वह एकदम ही उलट गई। कुर्सी के साथ ही भीमा भी गिरा। क्षण-मान में कुछ-का-कुछ हो गया। कितनी बड़ी भूल हो गई है, इसके दारुण अहसास ने भीमा या मस्तिष्क जैसे चीर कर रख दिया। उसने हडबड़ाकर उठना चाहा, लेकिन उठने के प्रयास में यह दूमरी बार गिरा। "क्षमा कीजिएगा...," उसने चोरकार-सा किया, "मैं नालायक हूँ। मैंने पी रखी है।" किसी चोर के सामने जव रंगे हाथों पकड़े जाने का खतरा पैदा हो, तो घबराकर वह पकड़े जाने से पहले ही, स्वयं ही चिल्लाना शुरू कर दे, "मैं चोर ! मैं चोर!"-कुछ-कुछ ऐसा ही भीमा ने किया। एक जबर्दस्त प्रयास के साथ वह उठ खडा हुआ। वह झूम रहा था। किसी चीज़ पर उसकी आंखों का फोकम नहीं मिल रहा था। उसे नहीं मालूम था-वह प्रिसिपल की ओर देख रहा है या कुन्दन को और । -और वह कह रहा था, "आपने एक नालापन आदमी को बुलाया।
१२२ : फैसले , - आपकी उदारता अद्भुत है...हिक्...लेकिन माफ़ कीजिए...इ-इ-इंटरव्यू देने मैं नहीं आया हूँ। मैं तो...हिक...माफ़ी मांगने आया हूँ। माफ़ कर सकें, तो कर दीजिएगा...." प्रिंसिपल श्री के० के० महाजन, कुन्दन पर, एकदम ही वरस पड़े, "कुन्दन जी, यह कैसा आदमी आपने चुना ? आपसे ऐसी आशा न थी।" कुन्दन को काटो तो खून नहीं। कुन्दन की आँखों में आँसू आने लगे थे। किसके लिए थे वे आँसू ? स्वयं अपने लिए ? या भीमा के लिए ? भीमा के दुर्भाग्य के लिए? उसे लगा, भीमा शायद दूसरी बार लड़खड़ाकर गिरने वाला है। आगे वढ़कर भीमा को संभाले या न संभाले, वह न समझ पाई। भीमा अचानक ही पलट गया। चिक उठाकर वह प्रिंसिपल के कमरे से निकल गया। वह दौड़ रहा था। चिक के आर-पार कुन्दन ने देखा- वेतहाशा भागा जा रहा था वह । स्कूल का अहाता पार करने से पहले वह एक बार फिर गिरा-~~बहुत ज़ोर से। बिलकुल किसी खिलौने की तरह कलावाज़ी खा गया वह । उठा। भागा। धूल झाड़ने तक का होश नहीं था उसे...। कुन्दन ने दोनों हथेलियों से अपना चेहरा ढांक लिया। "वह शरावी है।" प्रिंसिपल के शब्द, गर्म सीसे की तरह, कुन्दन के कानों में प्रवेश कर रहे थे, "आपने एक शराबी की सिफारिश की...हद है !...भविष्य में कभी आप पर भरोसा नहीं करूँगा। आप जा सकती हैं, कुन्दन जी। यहाँ तक आने का कष्ट आपने किया । धन्यवाद... कुन्दन, थरथराती हुई, प्रिंसिपल के कमरे से निकल गई। विना कुछ भी बोले...। बोलने के लिए रहा ही क्या था? प्रिंसिपल के पूरे कमरे में शराब की गन्ध उबल-सी गई थी। कमरे से निकलने के बाद भी वह गन्ध मानो कुन्दन का पीछा नहीं छोड़ रही थी। भीमा ने क्यों किया ऐसा ? कुन्दन ने लंवे डग भरते हुए स्कूल का अहाता पार किया। कहाँ है भीमा? उसने खोजपूर्ण दृष्टि चारों ओर दौड़ाई। भीमा कहीं नजर न आया। ?"
नजर आ जाता, तो कुन्दन क्या करनी? कुन्दन ने पर्ग सोला। रूमाल निशला। आन पदि। स्वयं यह गमा नहीं पा रही थी, भीमा यदि दियाई पड़ जाना, तो क्या करती वह ...भीमा ने चीय-चीखकर जो वहा, मच ही कहा। नालायक ! स्वप के लिए वार- बार उसने नालायक शब्द इस्तेमाल किया। मठ नहीं बोला वह । ऐसे अवसर पर भी झूठ नहीं बोल मका वह । वह एक मच्चा इमान है। लेकिन बचकाना...! कंली बचकानी भूल ! इंटरव्यू देने से पहले क्या कोई इतनी अधिक पी लेता है कि...दुन्दन ने उमे पहचानने में कितनी बड़ी गलती थी.. टोक है, भीमा को मचाई से इंकार नही-ऐने अवसर पर भी वह मच बोला--- उमने माफी मांगी लेकिन एक नालायक को जबरन लायक मिद करने की कोशिश किसने की ? बुन्दन ने ही न ? एगी ऊटपटांग कोशिश करने वाली कुन्दन को क्या कहा जाए? भीमा और कुन्दन की मुलाकातें, इसमें पहले, जिग तरह होती पी-- उमी तरह क्या अब कभी भी हो सकेंगी? कुन्दन एक आत्मपानी पश्चाताप मे भर उठी। ऐमें बचाने व्यक्ति के मामने पुन्दन ने अपने मन की पर्ते मोली थी...ही ! फिर मे उसकी आंखें छलछलाने लगी। क्रोध और परवाताप के बावजूद एक. आगा-मी उनके मन को बींधती जा रही थी। नशे में झूमता भीमा यदि किमी दौडने वाहन से टकरा गया, तो? 'केह, बला मे !' छलरते आ रहे आनी पो पोख्ने हुए पुन्दन ने मोचा, 'रोज न जाने कितने लोग दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं। मर जाए भीमा, वला मे ! मुझे क्या ?" किन्नु आधे घंटे के भीतर ही कुन्दन ने पाया, यह गेस्ट हाउस मे प्रवेश कर रही है, जिसमे भीमा रहता था। आज दिली से पूछने की जरूरत नहीं थी कि भीमसेन जी वापरा यहाँ है। पिछली बार जब आई थी, नौकर ने साप पलार दिलाया ही १२४ : फैसले था। यंत्र की तरह चलती हुई कुन्दन उस कमरे तक पहुंच गई। दरवाज़ा बन्द था। उसने खटखटाया। धीमे से...। भीतर से कोई जवाब नहीं। कुन्दन ने ठेलकर देखा। दरवाज़ा केवल उढ़काया हुआ था। खुलने लगा। कुन्दन ने प्रवेश किया। कमरे में यदि भीमा न हुआ, ती? यदि चम्पक से मुलाक़ात हुई, तो? चम्पक का चेहरा नोच लेगी कुन्दन । वह समझ चुकी थीभीमा को इस सीमा तक पिला देना, यह सिर्फ़ चम्पक की हरकत ही हो सकती थी। भीमा की नालायकी केवल इतनी रही कि वह चम्पक के झांसे में आ गया... मूल दोष चम्पक का है। लेकिन क्या सचमुच चम्पक का चेहरा नोच सकेगी कुन्दन ? उस सीमा तक 'जंगली' हो सकेगी? कुन्दन के पास जवाब नहीं था। जो होगा, जैसा होगा--देखा जाएगा। खेल तो विगड़ ही चुका। अब थोड़ा और विगड़ जाए, कोई हर्ज नहीं। उसे राहत मिली, जब उसने पाया-~कमरे में चम्पक नहीं था। भीमा था। विस्तर पर औंधे मुंह गिरकर, लाश की तरह स्थिर पड़ा था वह । नहीं, नहीं, लाश की तरह नहीं...कुन्दन को क्या हो गया है ? क्यों 'लाश' जैसा शब्द उसके दिमाग में आया? निश्चय ही यह उस सारी बौखलाहट का परिणाम है, जो कुन्दन ने अचानक झेली। 'लाश' जैसा शब्द-भीमा के लिए ? ओह, नहीं...ऐस शब्द सोचने के लिए कुन्दन अपने-आप पर हज़ार लानतें भेजने लगी। प्रवेश करते समय उसने दरवाजा खुला छोड़ दिया था। मन हुआ बन्द कर दें। नहीं-नहीं.. उसने हौले से पुकारा, "भीमा जी...!" भीमा ऐसे उछल गया, जैसे आसमान से कोई सांप गिरा हो उस पर घोर अविश्वास से वह कुन्दन की तरफ़ देखने लगा। उसका दयनीय चेह
कुन्दन से देखा न गया, किन्तु निगाह चुराने का पया अर्थ ? जिन्दगी की
वास्तविकताओं से आखिर तक कव निगाहे चुराई जा सकती है ?
गुन्दन के होंठ कांप गए, "अचानक यह क्या हुआ, भीमा जी ?"
शराव का नशा, भीमा की आंखों में, अब भी जोम लपलपा रहा था।
भीमा उठकर पढ़ा हो गया-जैसे कोई गिरी हुई इमारत अचानक उठकर
तन जाए।
"कुन्दन जी!" उसने दृढता से कहा, "यहाँ से चली जाए।"
"मैं आपके पीछ-पीछे आई थी, लेकिन आप इतनी तेजी से मागे
कुन्दन आगे बढ़ी।
भीमा पीछे हटा, "मैं कहता हूँ, कुन्दन जो, चली जाइए यहाँ से,
वरना...
"वरना क्या होगा? जो होना था, हो चुका।" कुन्दन ने कहा । वह
जरा और पाम आ गई। फिर थमी।
"कुछ नहीं हुआ है। अभी तो कुछ भी नही हुआ है । चली जाइए।"
"क्यों ? अब क्या होना शेष है ?"
"मैं बता नहीं सकता। आप जाइए । जाती हैं या नही ?"
"नहीं।"
-
"तो मैं...तो में..."
"तो आप क्या करेंगे?" कुन्दन ने गंभीरता से पूटा।
"नहीं मालूम, मुझे नहीं मालूम-मेकिन मैं कुछ उरूर करूंगा, कर
बंगा। चली जाइए, कुन्दन जी!"
"जाने के लिए नहीं आई हूँ। आने के लिए माई है।"
"आने के लिए आई हैं, या जवाब मांगने ?"
"जवाव मुझे मालूम है।"
"नहीं मालूम ! आपको कुछ नहीं मालूम 1 जवाब अभी मैंने दिया ही
नहीं।"
"मैंने मांगा कब?"
"लेकिन मैं जवाय अवश्म दूंगा। जानती हैं-मेरा जवाब क्या
१२६ : फैसले कुन्दन चुपचाप उसकी तरफ़ देखती रही। "मेरा जवाब होगा-मैंने अपनी औक़ात पहचान ली है। जान गया हूँ कि क्या हूं और क्या हो सकता हूँ।" "भीमा जी...!" "चम्पक अभी-अभी इस कमरे से गया है। अपना जवाब मैंने उसे दे दिया है।" भीमा ने स्वर चबाते हुए कहा, "चम्पक के कल्याण के लिए मैं रेड-इंडियन की पोशाक पहनकर भोंडा नृत्य करने को तैयार हूँ।" "नहीं...," कुन्दन का चेहरा फक पड़ गया। "यही है मेरा जवाब।" "नहीं, भीमा जी, नहीं... "क्यों न नाचूं ? मेरा क्या बिगड़ेगा ?अधनंगा होकर जनता के सामने उतरना, यह तो मेरे पेशे में शुरू से रहा है। पहले दंगलों में उतरता था, अब मंच पर उतरूंगा, थोड़ा-सा मटक लूंगा। विगड़ क्या जाएगा ?" "यह जवाब आपका नहीं, आपकी निराशा का है।" "निराशा !" भीमा हँसा, "कसी निराशा ? निराश होना भी सब के बूते में नहीं हुआ करता। निराश होने के लिए भी एक मानसिक धरातल चाहिए। मुझ में कोई ऐसी योग्यता नहीं। पत्थर न निराश होते हैं, न उत्साहित । पत्थर कुछ नहीं होते । पत्थर केवल पत्थर होते हैं।" "पत्थर ही जब तराशे जाते है, तो देवताओं की मूर्तियां तैयार होती ।" सुनते ही भीमा एकदम चिढ़ गया, "आपने मुझे तराशने की कोशिश की। क्या मिला आपको? देवता? या बबुआ? बदसूरत, बुद्धिहीन । बबुआ?" "तराशने का मौक़ा ही कहाँ मिला मुझे।" "छोडिए।" "भीमा जी...!" "मुझे अकेला छोड़ दीजिए। मैं आपका दोस्त बनने के भी लायक नहीं। मैं किसी का कुछ बनने के लायक नहीं। जो मैं बन सकता हूँ, उसकी हामी मैंने भर दी है-भोंडा नाच दिखाकर लोगों को हंसाने वाला विद्वपक" " "आप बेहद दुखी हैं । इमीलिए ऐमा कह रहे हैं।" "कौन कहता है, मैं दुखी हूँ? मैं तो बहुत ही खुश हूँ। इतनापुर मैं जीवन में पहले कभी नहीं हुआ। मैंने आत्म-दर्शन कर लिया है। अपने-आप को पहचान लेना-इमसे बड़ा मुशी की बात भला क्या हो सकती है ? "याद है, भीमा जी, एक दिन आपने मुझ से कहा था कि मैं आपका नया नाम सोच रखू ?" "नहीं, मुझे कुछ याद नहीं।" "आपके लिए एक अच्छा-सा नाम मेरे मन मे है।" "उसे अपने पास ही रखिए। प्लीज.. जाइए। मैं कहता हूँ, पली जाइए।" सकती हूँ "ठीक है । जाती हूँ। अनी आप आपे में नहीं है। फिलहाल यही कह '-मैं हमेशा आपकी सहायता के लिए तैयार रहूंगी।" "-बशर्ते मैं आऊँ और सहायता मांगू।" भीमा व्यग्य मे मुखराया, "क्या आप सोचती हैं, आइंदा कभी मी में आपके पास स्वय आ सकंगा' हमारा रिश्ता अभी बहुत कच्चा है। हम बहुत सही वक्त पर टूट रहे हैं। टूटना अभी सभव है और कम दुखदायी है, इस टूटने की याद फ्यादा दिनों तक दिमाग पर छाने वाली नही। मुझे मेरे भाग्य पर छोडिए। जाइए। सोच लीजिए, हम कभी मिले ही नहीं थे।" "यदि आप इसी में प्रसन्न है, तो...ठीक है...गोच लेने मा प्रयास करूंगी कि हम कभी मिले ही नहीं थे...." और कुन्दन गहरी उदागी मे साथ, होले-हौले, बाहर निकल आई। १९ "नमस्कार !"मुनते ही कुन्दन ने अपनी फाइलो पर से निगाह उठाकर देया। सामने चम्पक पड़ा था। चम-चम मुस्कराता हुआ । जीत जानेयाले खलनायको जैसी मुद्रा में।
१२८ : फैसले 14 "कहिए?" कुन्दन का तमाम व्यक्तित्व काठ जैसा हो आया। "बैठ सकता हूँ?" चम्पक ने ढिठाई से पूछा। "कहिए, क्या काम है ? यह दफ्तर है।" "हाँ, हाँ, मुझे मालूम है कि यह दफ्तर है-और मैं यह भी जानता हूँ कि इसी दफ्तर से एक ऐसी कहानी शुरू हुई थी, जिसकी नायिका का रोल आपको नहीं मिल सका।" "देखिए, मिस्टर...!" "घवराइए नहीं, मैं गड़े मुरदे उखाड़ने नहीं आया हूँ। मैं तो आया हूँ... ...आपको आमन्त्रित करने।" और उसने एक लिफ़ाफ़ा उसकी मेज़ पर उछाल दिया, "इस कार्यक्रम में केवल आमन्त्रित लोग ही आ सकेंगे। मैंने सोचा, आप क्यों वंचित रह जाएँ। न, न, यह न सोचिएगा कि आमन्त्रण भीमा ने भिजवाया है। सवाल ही नहीं। आपका नाम भी उसकी जवान पर नहीं आता...आपको विलकुल भुला दिया है उसने...किन्तु मैं नहीं भूल पाया। सोचा, आमन्त्रित होने का पूरा अधिकार आपको है। क्यों न इस अधिकार की रक्षा...?" "अगर आपने ज़रा भी गलत ढंग से बात की, तो याद रखिए...." "आप इस आमन्त्रण को हमेशा याद रखेंगी। हो सके, तो आइएगा। बल्कि...कहना चाहिए कि-हिम्मत हो सके; तो आइएगा। आपका स्वागत कर मुझे अवश्य खुशी होगी।" और चम्पक पलटकर दरवाज़े से बाहर निकल गया। कुन्दन की निगाह उस लिफ़ाफ़े पर स्थिर हो गई, जो उसे चिढ़ाता हुआ मेज़ पर पड़ा था। कुन्दन को बताने की ज़रूरत नहीं थी कि वह आमन्त्रण किस कार्यक्रम का था। लिफ़ाफ़े में से सहसा एक मूर्ति प्रकट होने लगी...कुन्दन ने कहा था, पत्थरों को तराशने से देवताओं की मूर्तियाँ तैयार होती हैं...लेकिन वह मूर्ति किसी देवता की नहीं थी...वह एक मनुष्य की मूर्ति थी। रेड-इंडियन की पोशाक पहन कर वह अधनंगी मूर्ति मटक-मटक कर नाच रही थी...चेहरे पर अजीवो-गरीव रंगों की धारियाँ। सिर पर विकि पंखों की कलंगी। अजव-सी ढाल । अजव-सी तलवार । संगीत...ही-ही...यू-हू...हिकु-हिकु...!
कुन्दन ने यौवें बन्द कर ली। आज खोल कर उसने उस लिफ्रा को जब फिर से देण, वह मानव- भूति गायब हो चुकी थी। कांपनी उँगलियों से उगने लिफ़ाफ़ा उदाया। पोला । अत्यन्त पीत दंग से छापा गया आमन्त्रण पत्र...उस पूंजीपति का नाम, जिराके स्वस्थ हो जाने की गुमी में यह कार्यक्रम आयोजित हो रहा था। भाग लेने वाले कलाकार अनेक फिल्मो हनियो । अनेक गैर- फिल्मी किन्तु मुप्रसिद्ध हस्तियां भी...सबको ऐमे-ऐसे रूपों में प्रस्तुत करने का आश्वासन, जिनकी यल्पना भी पहले सेन की जा र...उन अनेर नामो के बीच फंसा हुआ यह नाम भी भीमा ! दगती वा राजा...! बुन्दन का दिल धक-धक करने लगा। एक ऐसा विचार उनके दिमाग में आया था, जिसके आने की पूर्व सूचना उसके यनात मन को न जाने कब में मिली हुई थी। प्रमट मन में वह विचार पहली बार प्रवेश कर रहा पा... और कुन्दन जानती थी-उसे उम विचार के गामने हारना नहीं है। विचार-कि... मारी उलझन पांच हजार कायों की है न कुन्दन ने रपये जौहरी हैं । सातेर हजार होंगे । जाए और चमक के मुंह पर नोटों की गहिरो फेंककर मारे। कहे "ले, कमीने, उठा--और छोरपीमा कासि!" लेकिन नहीं ऐसा करना पोर भावकता होगी। आत्र के आधिक युग में, पार हजार की रकम, युन्दन जैसी स्थिनि मुवती के लिए, कोई छोटो नो नहीं। भीमा के माप कुल कितनी मुलाकात हुई है ? मि इतनी कि उंगमियों पर गिनी जा सके। कुन्दन अपनी बचत के रूपया मे हाथ धो बैठगी! मिलेगा क्या? जो वह चाहती है, वह क्या मिल सकेगा। क्या चाहती है वह ? मिर्फ इतना कि भीमा रेस-इदिनी का जाप करने में बच जाए? क्या इतनी भी बात के लिए सुन्दन पानी रपट न्योछावर कर दे? को को जब इसका पता चलेगा, मुरली फैसले ३० ? पर? भावुकता का आज की दुनिया में कोई मोल नहीं-यह उपदेश स्वयं कुन्दन ने भीमा को कितनी वार पिलाया है ? क्या उसी भावुकता के शिकंजे में कुन्दन फंस जाए? सवाल ही नहीं...। कुन्दन को इस कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए। चम्पक आमन्त्रित करने नहीं, व्यंग्य करने आया था उस पर- और यदि आमन्त्रित ही करने आया हो, तब भी-अर्थ क्या है वहाँ जाने का ? भीमा ने कभी न सोचा होगा, कुन्दन आएगी। नाचते-नाचते, दर्शकों के बीच बैठी कुन्दन पर नमक नहीं पड़ जाएगा? . कुन्दन नहीं जाएगी। आमन्त्रण-पत्र फाड़ कर रद्दी की टोकरी में डाल देना चाहिए। आमन्त्रण-पत्र उसने अपने पर्स में रख लिया। क्यों फाड़ न सकी वह कुन्दन न जान सकी...न समझ सकी...भीमा नाचेगा...यदि कुन्दन पाँ हजार न्यौछावर करे, तो भीमा के इस पतन को रोका जा सके...लेवि नहीं, कुन्दन यों भावुकता के शिकंजे में फंसने वाली नहीं...जो होने रहा है, वह होकर रहेगा...लेकिन उस 'होने' को देखना क्यों चाहत कुन्दन ? देखे विना कुन्दन का काम नहीं चलेगा, ऐसा तो नहीं.. आमन्त्रण-पत्न क्यों उसने संजो कर रख लिया? कुन्दन अपने-आप पर झुंझला गई। कुन्दन अविवेकी ! भीमा नालायक़ और कुन्दन अविवेकी । को मालूम ही नहीं कि किसी को 'हाँ' कहे तो किस आधार पर अ कहे तो किस आधार पर। कुन्दन इतना भी तय नहीं कर सकती कार्यक्रम में यदि वह जाए, तो किस आधार पर-न जाए आधार पर...आँखें होते हुए भी अंधी कुन्दन...ऐसी कुन्दन यदि न कहलाए, क्या कहलाए? 'फाड़ दे, कुन्दन !' उसका मन उसे ललकार रहा था, 'फ न्त्रण-पत्र !' लेकिन घर जाने के लिए जब वह वस में बैठी, पर्स में व तर्णतया सुरक्षित था...।
रात भर सो नहीं सको वह । आज वह तप कर मेना चाहती थी--- भीमा के साथ उसका आसिर क्या रिश्ता है ? आखिर क्या नाम है | रिप्त का? क्या केवल दोस्तो? लेकिन क्या दोस्ती में फेवल दोस्ती मे-इतनी कशिश होती है कि....? और यदि केवल दोस्ती नही, तो? अजव था वह रिश्ता । तोड-फोड़ कर भी टूटने में नहीं आ रहा था। उम रिश्ते को कोई नाम नहीं दे पा रही थी पह-कोई गंशा नहीं पा रही थी उसके लिए.... एक वीभत्स फंगला उसके मन में जहें जमाने लगा था। कुछ घटों पहले मोचा पा-कार्यकम देगनं नहीं जाएगी। अब सोय रही थी-जरूर जाएगी । कुन्दन को कायरता उगो मामने नगी होकर नाच रही थी। पांच हजार न्यौछावर करने की हिम्मत कुन्दन में नहीं। व्यावहारिकता और दुनियादारी के नाम पर यह उन पायों पर गपंथी भांति कुंडली मार कर बैठी रहना चाहती है । दूगरी ओर, इतना आरम. विश्वास भी कुन्दन में नहीं कि कार्यक्रम में मनई न जाने का फंगला कर हाले । अपने रुपयों की रक्षा करके वह एकः यीभरग स्थिति पैदा कर रही है और उस वीममता के आमने-गामने भी होना चाहती है। करा आमने-सामने होने की यह इच्छा यह फंगलासपं भी बीमाग नहीं? लेकिन उस यीभत्स फैगने पो पलटने पी पापित उगमे नहीं थी। वह गई। गई उग कार्यक्रम में। पूरी तरह यन-उन कर गई। अपने शृंगार गे मन्दन उन तमाम वीभस्मता को और भी ना कर मेना चाहती थी। अपने आप को गला दे रही थी यह। यही पीन उगरी मुद्रा ? वात्मगीडन की मुद्रा अपने अश्वेिश का प्रायश्किा यह गी तरह करना पानी पी। अश्विक नहीं तो क्या ? पाच हजार मोसम पर इतना मोह ? यया इग रकम को यह नाप लेकर जाएगी? दूगरे मोर में? उगी रकम की रक्षा के लिए यह एक निर्दोष मारिन पोहगार कर रही १३२ : फैसले ! थी...कैसा डरावना अविवेक ! सही समय पर सही निर्णय कभी न ले पाने की कैसी घिनौनी, जहरीली मजबूरी ! जहर से जहर नहीं कटता क्या? जो जहर उसने पैदा किया था, उसी के आमने-सामने होकर वह उसी को काट देना चाहती थी। चम्पक चकित रह गया। कुन्दन के चमचमाते सौन्दर्य से नहीं, कुन्दन के आगमन से। सचमुच चम्पक आमन्त्रित करने आया था उस दिन । व्यंग्य करने ही आया था इसीलिए, सोचा नहीं था उसने-कि कुन्दन आमन्त्रण स्वीकार करेगी। । किन्तु कुन्दन न केवल आई थी, अपने पूरे बनाव-शृंगार में आई थी। क्षण-भर को चम्पक का चेहरा आश्चर्य, अविश्वास से फक-सा पड़ गया। अगले ही क्षण उसने स्वयं को सम्भाला और भाव-भीना स्वागत किया। "इधर आइए, कुन्दन जी, इस तरफ़...," उसने अगली पंक्तियों की ओर कुन्दन को ले जाते हुए कहा । ठीक है...कुन्दन को अगली पंक्तियों में ही बैठना चाहिए, ताकि भीमा की नज़र यदि न पड़ रही हो, तव भी पड़ जाए । कैसी गुज़रेगी भीमा पर? ऊंह, इस तरह भी क्या सोचना! भीमा उसका लगता ही क्या है ? वे दोनों, एक-दूसरे के कुछ भी नहीं लगते । कितने-कितने दर्शक आए हुए हैं; आ रहे हैं ! कुन्दन भी उन्हीं में से एक है। भीमा तो कुन्दन के प्रति तटस्थ हो जाना चाहता है न ? कुन्दन को देख कर भी नहीं देखेगा वह...इन अनेकानेक दर्शकों को वह केवल एक समूह के रूप में पहचानेगा। इसी समूह में कुन्दन खोई हुई रहेगी। कुन्दन को लगा, वह किसी इम्तहान में बैठने आई है। भीमा को वैसा भोंडा नृत्य करते देख कर भी यदि कुन्दन विचलित न हुई, तो इस इम्त- हान में पास हो जाएगी वह । सिद्ध हो जाएगा-कुन्दन हमेशा के लिए भीमा से टूट गई, अलग हो गई। भीमा जब नाच रहा होगा, लोग ज़रूर सीटियाँ बजाएँगे। एकाध सीटी कुन्दन भी दे मारेगी। कुन्दन को बिठाकर चम्पक लौट गया है । अवश्य वह भीमा को सूचना
देने गया होगा--व्यंग्य-भरी मूचना, कि कुन्दन आई है।
भीमा पर कंगी प्रतित्रिया होगी?
कंह, प्रतिक्रिया भला क्या होगी! कोई प्रतिषिया न होगी।
'यकि ..मेरा तो स्पाल है, कुन्दन ने अपने-आर में कहा, 'बम्पर
भीमा को मूवना शायद दे ही नहीं। ऐमो मूचना पाकर भीमा को दुप
होगा, यह सोच कर पम्पक शायद चुप रह जाए। कार्यक्रम के ऐन पहल
यह भीमा को भला क्यों दु.गी करना चाहेगा?'
कार्यक्रम शुरू हुआ। वास्तव में अनोपा कार्यक्रम । अनेक फिल्मी और
गर-फिल्मी हस्तियो, जिनकी केवल तसवीरें ही बुन्दन ने देखी थी, आज न
केवल उसकी आंघो के सामने यी-लिगे-ऐमे विचित्र रूपों में सामने
यो कि पिसी को भी दांतों तले उंगली दवा लेनी पड़े।
और फिर.-
ऐलान--
भीमा के मंच पर अवतरण वा।
भीमा आपा । झुक-सुयः कर उमने दर्शकों को सलाम किया। पूरा
रैड-इण्डियन लग रहा था वह...हरायना किन्तु हास्यास्पद । जरा-जरा में
कपड़े। अटपटे अस्त्र-पास्त्र । विचित्र हाव-भाव । आयें मदवाना। पल्हे
हिलाना । कमर को निहायत भोंडे दग से पाटयो देना। बुन्दन के रोम कपि
गए। नहीं...इस इम्तहान मे पास होना मुन्दन के लिए मम्भव नहीं। यह
विचलित होने लगी थी। यि मुंद सेना पाहती थी यह मगर---
चाहा हुआ सब-कुछ हो जाता हो, तर रहना हो गया ! मनुष्या
ओवन इतना दुगदायो बने ही करो !
नचाहकर भी वह आगोले हुए पो देख रही थी--भीमारा-
साना, उछलना, किलकारी मारना।
मंगीन मुन्दन के कानो में चुभना आ रहा था...
मनमान...अप्पारु,..
...हो-ही ..पू-यू...-...
भीमा ने फुन्दन को देय तो नही लिया न?
सुन्दन पाहती थी, धरती फट जाए और यह उममें समा जाए।
नापता भीमा, सम्पूर्ण दर्शक-समूह पर, मुस्करा-मुसरा कर मार
फैसले ४ कर रहा था। क्या कुन्दन इस दर्शक-समूह में खोई हुई रह सकेगी? क्या सीमा उसे अलग से नहीं पहचानेगा? क्या कुन्दन के आगमन की सूचना चम्पक ने भीमा से छिपा कर ही रखी है ? कुन्दन का दिमाग़ सांय-सांय करने लगा था। और तव-- भीमा की नज़र, कुन्दन पर, अचानक पड़ी। वह क्षण भयंकर था। भीमा की तमाम थिरकन बर्फ की तरह जमी रह गई। उसकी आँखों में जो पथरीलापन अकस्मात् पैदा हुआ, क्या वह विस्मय के कारण था ? या अविश्वास के कारण ? दुःख के कारण ? कारण चाहे जो रहा हो, उसकी आँखें कुन्दन पर ऐसी ठहर गईं कि कुन्दन को लगा, उन निगाहों की अग्नि अभी उसे पिघला कर वहा देगी। इसी कुर्सी में बैठी-बैठी, इतने-इतने दर्शकों के ऐन सामने, कुन्दन किसी मोम की गुड़िया की तरह पिघल कर वहना शुरू कर देगी...साँसें थमी रह गईं थीं कुन्दन की। नाचते भीमा की उस क्षणिक स्थिरता को दर्शकों ने नृत्य की ही ए मुद्रा समझ लिया था। लोगों ने उस मुद्रा को वेतहाशा पसन्द किया। सीटिन वजने लगीं। कुन्दन की बग़ल में बैठी हुई एक औरत बुदबुदा उठी, 'ग़ज है ! न जाने कितनी बार रिहर्सल किया होगा...!" न केवल सीटियां बज रही थीं, लोग 'हाय, हाय', 'मार डाला', रे' आदि आवाजें भी कस रहे थे। उन आवाजों ने भीभा को जैसे अचानक चैतन्य कर दिया। उसने नए जोश से नाचना शुरू किया। अब वह दर्शकों के सामने नहीं, दर्शकों की व्यक्त्त्विहीन भीड़ के नहीं, बल्कि कुन्दन के सामने नाच रहा था । कुन्दन क्या देखने आई का नृत्य अथवा भीमा की औक़ात? यह नृत्य, भीमा की औक़ा प्रतीक बन गया है न ? ठीक है । भीमा झूम-झूम कर नाचेगा, की औक़ात की बावत कुन्दन को किसी तरह का सन्देह न रहे। वह ऐसा नाचा, ऐसा नाचा कि दर्शक तौवा कर गए। ता भीमा हाँफने लगा था। E a उसके नृत्य का समय पूरा हो चुका था, लेकिन वह मंच से हटने का नाम नहीं ले रहा था। ज्यों-ज्यों समय वोना उमका नृत्य और-और ऊँचे परम को ओर बढता गया। हर क्षण लगता, भीमा ने मर पर जो तूफान बरपा कर दिया है, वह इतना तेज है कि उससे ज्यादा तेज तूफान और भला हो ही क्या मक्ता है, किन्तु अगले ही सण भीमा उस सूफान को और भी तेज कर देता...लगा, जैसे भीमा का एक-एक अंग टूट कर अलग हो जाना चाहता है। एक भीमा अनेक भीमाओं में वियर जाना पाहता है, ताकि जो दर्शक केवल एक भीमा का नृत्य देखार इतने गद्गद् हो रहे हैं, अनेक भीमाओं का नृत्य देखकर पागलपन की सीमा तक गद्गद हो जाएँ.... कार्यक्रम के आयोजको ने आखिर परदा गिरा ही दिया। गिरे हुए परे के पीछे भी भीमा नाचता ही रहा होगा, जब तक मंचारियों ने दौड़कर थाम नहीं लिया होगा। तालियां...तालियां...'वन्समोर' की आवाजें...गड़गडाहट...! कुन्दन होश में आई। सब तालियां बजा रहे हैं-सारे दर्शक । कुन्दन ने स्वयं को दनंकों में से ही एक समता है न? जो दर्शक कर रहे हैं, वही कुन्दन को भी करना चाहिए। सूब तालियां बजाए कुन्दन । वाह-वाह करे । हंस-हंसकर मोद- पोट हो जाए। किन्तु वह हिल भी नहीं पा रही पो...। कार्यक्रम अब थोड़ा-सा ही शेष था। दुन्दन बैटी रहो-जम्वत् । मेष मे क्या-क्या दियाया गया, किन-किन हस्तियों को पेग रिया गया--कुन्दन की ममान में पुछ न आया। देयकर भी वह कुछ नहीं देय रही पी। समा कर भी कुछ नहीं समा रही थी, उसे नहीं मालूम या, यह मामें भी मे रही है या नहीं। २० बम्बई में जितने भी प्रमुख असार पे, सरके नगर प्रतिनिधि उस १३६ : फैसले कार्यक्रम में आमन्त्रित थे। अगली सुबह हर अखबार में कार्यक्रम की भूरि- भूरि प्रशंसा छपी। भीमा के नृत्य को सर्वाधिक पसन्द किया गया था। कुन्दन ने ये समाचार पढ़े। दहल गई वह । भीमा की सर्वाधिक प्रशंसा? अथवा भीमा के पतन का सर्वाधिक प्रचार? ज़िम्मेदारी किसकी? क्या कुन्दन की नहीं ? यदि उसने अपना धन प्रस्तुत किया होता...देर-सवेर, भीमा की नौकरी कहीं-न-कहीं लग ही जाती। थोड़े-थोड़े कर उन रुपयों की वापसी हो जाती। भीमा जैसा आदमी उस रकम को दवाकर बैठ थोड़े जाता । कुन्दन ही साहस न कर सकी। साहस करने का निर्णय न ले सकी कुन्दन...1 अगले दिन एक ऐसा समाचार छपा, जिसने कुन्दन की दशा और बुरी कर दी। वह अद्भुत कार्यक्रम -वही कार्यक्रम-~-फिर से आयोजित हो रहा था! उक्त पूंजीपति के लिए, सम्पूर्ण कार्यक्रम का आयोजन, जिस संस्था की ओर से किया गया था, उसे नाम दिया गया था-'रंगायन' । अखवारों के नगर-प्रतिनिधियों ने 'रंगायन' से आग्रह किया था कि उतने अद्भुत कार्य- क्रम से आम जनता को वंचित न रखा जाए। पहला आयोजन भले ही केवल आमन्त्रित व्यक्तियों के लिए था, किन्तु जनता को क्यों वंचित रखा जाए ? पहला आयोजन टिकट खरीद कर देखा नहीं जा सकता था। जिन्होंने भी देखा, आमन्त्रण पाकर, निःशुल्क देखा--किन्तु उसी कार्यक्रम को दूसरी-तीसरी बार, जरूरत हो तो अनेक वार, आयोजित किया जाना चाहिए। इस बार टिकट खरीद कर देखने की सुविधा हो, ताकि जनता भी खुश हो सके। यानी-भीमा फिर नाचेगा। बार-बार नाचेगा। 'रंगायन' ने कार्यक्रम को आम जनता के लिए भी उपलब्ध करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था । तिथि की घोषणा शीघ्र होने वाली थी...! कुन्दन भीमा को रोकेगी। एक बार जो हुआ, सो हुआ। बार-बार वही होता जाए, कुन्दन कैसे सहन कर सकती है ? भीमा के जीवन को एक ग़लत दिशा में मुड़ने नहीं - देगी वह । भीमा की नियति का यही है कि वह केवल विदूपर बन कर रह जाए ? नहीं, नहीं, कुन्दन के रहते ऐमा नहीं हो सकता। अब तो.. पांच हजार की रकम वाला बन्धन भी नहीं। भीमारी रकम मिल चुकी होगी। भीमा मे चम्पक को और घमा मे मी हू को मिल चुकी होगी। लेकिन भीमा फिर में नाचेगा। बुन्दन अनुमान लगा सरती थी- जरूर वह फिर से नाचेगा। धन के लिए...धन कमाना जाएगा वह... एमे वहशीपन के माय, गोया दुनिया में धन ही गव-कुछ हो। क्या दुनिया में धन ही मद-कुछ होता है ? बुन्दन ने अपने मचित धन पर कुटनी मी तरह मारी थी, मानो दुनिया मी मवमे यही शक्ति धन में ही समाई हो। फिर से कुन्दन पोर पश्चाताप से भर उठी क्या करे बुन्दन ? इस पश्चाताप की अग्नि मे कैसे छूटे? 'समय बड़ा बलवान होता है, वह स्वयं को समझाने का प्रसार कर रही थी, 'घाव अभी हरा है न ! इनीलिए इननी तड़पन महसूस हो रही है। ममय बीतेगा। घाव भर जाएगा। भीमा अपनी राह । कुन्दन अग्नी राह । भीमा की याद भी नहीं आएगी। क्यो, कुन्दन, यही होगा न? यही होना पाहिए न ?' नेपिन बलवान ममय भी, बीतने के लिए, रितना अधिर गमय लिया करता है ! ठीक है, कभी-कभी समय ऐमा जादू की तरह दोन जाता है कि पता ही न चले; लेकिन वही ममय जय बीतने में नहीं आता? कंगा एक- एक पल पहाड की तरह गुजरता है। क्षण-सण पहाड की तरह नहीं, युग की तरह बीत रहा था। नही, गमय के बीठने का इतवार इस तरह नहीं किया जा मरता। इस तरह तो यह कभी बीतेगा ही नहीं । कुन्दन दीवानी हो जाएगी। मुन्दन गोपुछ करना चाहिए। अभी भी देर नहीं हुई...मरिन यदि कुन्दन ने अब भी कुछ न किया, तो फिर...तव तो...निश्चित ही हमेगा-हमंगा के लिए देरी हो चुरी होगी। पुन्दन की झलाहटरी मीमा नही पी। आखिर क्यों यह मोई निर्णय ।
१३८ : फैसले सही समय पर नहीं ले पाती ? क्यों हमेशा देर हो जाती है उससे ? भीमा ने अपनी 'औकात' सिद्ध करने के लिए वैसा नृत्य किया। भीमा ने कुछ किया तो सही ! सही या ग़लत, कुछ तो किया...मगर कुन्दन कुछ भी नहीं कर रही। हाथ पर हाथ धरे बैठी है। सव-कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ दिया है उसने । जो होता है, होता जाए । कुन्दन का काम है केवल देखते जाना...लेकिन क्या यही सच्चा मानव-धर्म है ? भीमा ने मानव-धर्म निवाहा । अपने दोस्त के... चम्पक के-उद्धार के लिए वह नाचा। कुन्दन ने क्या निवाहा ? जो और जितना कुन्दन ने निबाहा, क्या वही और केवल उतना ही मानव-धर्म था ? 'कहाँ मैं धर्म-अधर्म पर सोचने लगी !' कुन्दन ने अपने सिर को झटका दिया, 'मैं तो धर्म और ईश्वर पर विश्वास नहीं रखती...केवल प्रयास पर, मनुष्य के प्रयास पर विश्वास रखती हूँ।' लेकिन यह विचार, स्वयं कुन्दनःको ही चिढ़ाने लगा.प्रयास ! कुन्दन ने क्या प्रयास किया? न किया न सही...लेकिन क्या अव भी न करें ? उसी शाम कुन्दन ने पाया, वह भीमा के गेस्ट हाउस के सामने खड़ी है। प्रवेश करने से पहले उसने भयंकर संकोच अनुभव किया, लेकिन अव वापस मुड़ने का सवाल नहीं था। वह भीतर गई। पहुँची भीमा के दरवाजे के सामने । खटखटाया। भीमा मौजूद था। दरवाजा खुलते ही दोनों की निगाहें मिलीं। और वे देखते रह गए । कुछ ऐसे, मानो एक-दूसरे को पहली बार देख रहे हों। एक पल...दो पल...उन्हें नमस्कार करने का भी होश नहीं था। होश नहीं? या ज़रूरत नहीं ? नमस्कार करना क्या केवल औप- चारिकता नहीं है ? जो बहुत अपने होते हैं, क्या वे हर मुलाकात में एक- दूसरे को नमस्कार किया करते हैं ? "भीतर आने के लिए भी नहीं कहेंगे?" मौन आखिर कुन्दन ने तोड़ा।
भीमा बोला कुछ नहीं। दरवाजे के सामने स हट
भीतर आई। जो कुर्सी सामने दिखाई पड़ी, उमी पर बैठ गई। भीमा रहीं
न बैठा। खडा रहा।
"वैठिए न, वरना में भी यही हो जाऊँगी। तब उसका अयं होगा कि
आप मुझे तुरन्त चली जाने के लिए कह रहे हैं।" बुन्दन गंभीरता से
बोली।
भीमा, सावधान मुद्रा मे, पलंग के किनारे बैठा, "क्यों आई हैं आप?"
"मिलने।"
"पिछली बार आपने कहा था, 'जाने के लिए नहीं पाई हूँ। आने के
लिए आई हूँ।' लेकिन आप चली गई। चली गई या नहीं ?"
"लेकिन फिर से आई है या नहीं ?"
"फिर मे पूछ रहा हूँ-क्यो आई हैं ?'
"आप बताइए, आपको क्या लगता है, क्यों आई हूँ?" सुन्दन मुनराई
नहीं।
१
"नही मालूम।"
"मैं रोकने आई है।"
"किसे?"
"आपको।"
"क्यो?"
"क्यो न रोक एक बार न रोक पाई, न सही-उसी भूल कोस
बार दोहराऊँगी नहीं।"
"रोकने आई हैं ? किस सिलसिले मे?" भीमा ने इस तरह पहा,
गोया उसे कुछ मालूम ही न हो।
"आप दूसरी बार रेड-इडियन वनेंगे?"
"क्या हर्ज है ? आपको क्या फर्क पड़ेगा?"
"कुछ-न-कुछ तो पड़ेगा ही। कितना पडेगा, अभी रो हिसाव नही मगा
सकती।"
भीमा का स्वर अनानक ही तीया हो आपा, "आपको फ़र्क पडना है
या नहीं, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।"
: फैसले "वाक़ई ?" . "हाँ।" "आपको झूठ बोलना नहीं आता, भीमा जी!" भीमा चुप रहा। फिर से उनकी आँखों में एक ललक, एक खोज पैदा हो गई थी। एक- दूसरे की आँखों में एक-दूसरे को खोजने लगे थे, लेकिन उन्हीं को नहीं मालूम था-साफ़-साफ़ नहीं मालूम था-वे किसे खोज रहे हैं, क्यों खोज रहे किया, भीमा ने गहरी सांस ली, "अखबारों में आपने पढ़ा होगा, वह कार्यक्रम फिर से आयोजित हो रहा है। शायद कई बार आयोजित हो । अव तो सारा मामला टिकटों की विक्री पर आधारित है। यदि 'शो' जनता ने पसन्द तो...' "आप वार-बार नाचेंगे?" "हाँ" "मैं ऐसा नहीं होने दूंगी।" "लेकिन मुझे धन चाहिए।" "धन किसे नहीं चाहिए ? इसका मतलब यह तो नहीं कि दुनिया का हर आदमी विक जाए ?" "विका हुआ कौन नहीं है ?" "मैं आपको नहीं बिकने दूंगी।" "गुलामों की विक्री केवल एक बार होती है। बाद की विक्रियाँ उस पहली विक्री काही दोहराव...।" "सौ बात की एक बात । मैं आपको उस कार्यक्रम में नहीं जाने दूंग कुन्दन ने जल्दी से कहा, "चम्पक जी को आपने मुसीबत से उवार है। इतना बहुत है। फिर से क्यों उसी शिकंजे में...?" "हर इंसान को अपना-अपना धन्धा चुनने का हक़ होता है।" "लेकिन दूसरों के हक़ छीनने का हक़ किसी को नहीं होता।" "मैं समझा नहीं।" "मुझे आपको रोकने का हक़ है।"
१.१Ju ११ भीमा फिर से चुप रह गया। संगे रहदेसिनही दुन्दन, तुम्हें ऐगा कोई हक नहीं? "मैं अपने इम हक की रक्षा करगी।" "लेकिन तुम मुझे कैसे रोगोगी? भागिर पंगे?" भीमा मोपतान पला, भावावेश मे कर वह 'आप' मे 'तुम' पर आ गया । 'तुम एक अपना सहज सम्बोधन या, जिसके अचानक उदित होने का पता पुलको भीम घला। "कसे रोकूगो?" कुन्दन मुसराई, "हाय गोड गो, गिनिमागी, मनाऊँगी। इमसे भी अगर न माने, तो राम्न में नेट जाऊंगी।" भीमा को जोर से हमी भा गई, "तुम जैगी नाम गुपयो भागे पहाडको रोकने की सोये...वाह मई वाह !" "जो होगा, सब देखेंगे।" "अच्छा, ठीक है, मैं जाऊंगा। तुम रोरना।" "मर जाऊँगी । जाने न दूंगी।" सुन्दन ने अवागर ही उपए । ये शब्द ऐसे पे, जो उसके मुंह में बनायाग फूटे थे। उन्हें बोलने की कोई पूर्व-निश्चित योजना नहीं पी। उन गरदों ने म्पन्न कोही पत्ति सा किया। भीमा भी अचकचा गया, रिनु. .साप-दो साल में होगुनी उस भावावेश को, उन दोनों ने ही, गहलना में म्यौपार पर लिया। भीमा बोला, "बुन्दन...तुम मे रिना टूट जाएगा, दगा मय पर नहीं रहा। रिश्ता तो, मेरी और मे, टूट ही घुरा है। तुम गोटने आई हो। वह नहीं मरता, तुम क्यो ऐमा चाहती हो, मस्ति...मानती हो, गग.. ऐसी बातों का...अयं क्या होता है.' भीमा के स्वर में जो अकुलाहट थी. जोगिन पी, दमा या भी समझ सरता था। भुन्दन थरांकर वोली, "हर बात कहने में शिनही दी। मन दीजिएगा. पहन दीजिएगा..." भोर वह कमरे से बाहर निकन पुगी थी। भीमा ने उसे रोकने का प्रयामन पिया। ।
१४२ : फैसले । . - कुन्दन ने वहीं किया, जो उसने कहा था। कार्यक्रम के दूसरी बार आयोजित होने की तिथि घोषित हो चुकी थी। 'रंगायन' की कार भीमा को लेने आई हुई थी। कुन्दन रास्ता रोककर खड़ी थी। भावनाओं और घटनाओं का वह तमाम संघर्ष, जो कभी वन्द दीवारों के बीच कैद रहा था, उस क्षण खुली सड़क पर आ गया था। चम्पक और देशगज कार में बैठ चुके थे। ड्राइवर ने इंजन चालू कर रखा था। सामने कुन्दन अड़ी हुई थी। सूटेड-बूटेड भीमा, कार के खुले दरवाजे के पास, सड़क पर खड़ा घूर रहा था उसे। "हटो, कुन्दन !" भीमा ने कांपते स्वर में कहा। "ड्राइवर से कहो, कुचलता हुआ निकल जाए।" कुन्दन की आँखों में ऐसी चमक थी कि भीमा को लगा, ऐसी चमक तो केवल उन्मादित लोगों की आँखों में ही हो सकती है । कुन्दन उसे रोकने के लिए सचमुच उन्मादित हो उठी थी। "मुझे जाना है, कुन्दन ! मुझे ड्रेस वदलनी है, मेकअप करना है। जाने दो। मेरे लिए तुमने अब तक जो किया, वह ज़रूरत-से-ज्यादा ही है । उतनी अनुकम्पा के योग्य मैं नहीं । अब और शर्मिन्दा न करो।" "मैं नहीं जाने दूंगी," कुन्दन ने दोहराया। "मैं तुम्हें उठाकर फेंक दूंगा," भीमा हँसकर बोला-कुछ ऐसे, मानो किसी बच्चे को धमका कर समझाना चाहता "फेंक सकेंगे?" कुन्दन ने चुनौती दी। ---और विस्फोट हो गया। किसी शक्तिशाली पशु की तरह भीमा आगे बढ़ आया। "मुझे नहीं चाहिए यह नाता...मैं इसके लायक नहीं।" इन शब्दों के साथ उसने कुन्दन का हाथ पकड़ लिया और इतने ज़ोर से झटका दिया कि कुन्दन किसी खिलौने की तरह सड़क पर लुढ़क गई। भीमा मुड़कर 'रंगायन' की कार में बैठने ही वाला था कि- सड़क पर ज़ोर से ब्रेक लगने और टायरों के रिरियाने की आवाज़ ने उसे चौंका दिया। पलट कर देखा उसने--और जो उसने देखा, उस पर ।
- -- तिरवाम ही न हुआ। लुटकली बुन्दन एक सपटनी वार रे नीचे दरने ही वाली थी। वार वाला, दुर्घटना को बनाने के लिए, पूर्ग योगिग में पारा पूरी मदिन में ग्रेक लगाया था उमने, स्नुि... भीमा ने अपनी मांगों में देगा- कार कुन्दन में टकरा चुकी थी। कन्दन दुनरी बार उघन गई। महर पर वह ऐमी गिरी फि हिल भी न मरी। "कुन्दन. .!" भीमा ने हृदय विदारर पोलार रिया । मदन भून कर वह कुन्दन की ओर दौड़ पड़ा। कुन्दन कराह रही थी। उसका मर पट गया था... पून...मन... "कुन्दन...कुन्दन... 1"भीमा ने उसे अपनी गोद में गीच लिया। कुन्दन ने कराह कर यांन मोनी। टक्कर मारने वाली कार रक गरी दी। उमरा पावर बाहर निरन कर, दौड़ना हुआ करीब आ रहा था। रगापन की कार पर भी वाहर निकला और दौडा। इन्दन की युली हुई आ फिर मे बन्द हो जाने लगी । अरनी होगी मे वह किनी तरह जीन नहीं पा रही थी। फिर भी, किमी तरह, भीमा की आय में ओपनर बोगी, मेरे माय बसतान नहीं चलोगे, तो ..तो मैं..." वापर वह पूरा न कर मी। वहोगी ने उसे अपने मानिन्न के गोच लिया था। कन्दन के सर मे बहते खून ने भीमा के हाय रंग दिए थे। भीमा परयर कांप रहा था । "यह सा हो गया यही बुदबुदाहट फूट मको। . ? अस्पताल में कुन्दन ने अब आसे गोली, मबसे पहले उसे मीना राही पैहरा दिखाई दिया । वह मुस्कराई, "तुम...तुम मेरे पास होन? मुझे माम पा... •मुझे मालूम था ..." भीमा ने उसके होठों पर हयती रप दी, "दोतो नहीं...."
१४४ : फैसले होठों पर रखी हथेली को कुन्दन ने पकड़ लिया; अपने होठों पर और ज्यादा दवा दिया। परम सन्तोष से कुन्दन की आँखें मुंद गई। कोशिश करके उसने आँखें खोलीं। चारों ओर देखा । अस्पताल का साफ़-सुथरा कमरा...सफ़ेद...! कमरे में उस वक्त वे दो ही थे। कुन्दन और भीमा । नर्स नहीं। डाक्टर नहीं। केवल वे दो। भीमा ने कुन्दन के हाथों में थमी अपनी हथेली धीमे से खींच लेते हुए कहा, "नर्स को बुला लाऊँ।" "नहीं। उससे पहले...।" कुन्दन आगे न बोल सकी । सर पर बँधी पट्टियों के नीचे अचानक ऐसी टीस उठी कि शब्द घुट गए । उसने पट्टियों पर हाथ फेर कर देखा । भीमा शर्म से नीचे देखने लगा। भीमा के कारण ही तो वह दुर्घटना...लेकिन भीमा क्या करे? उसने सोचा थोड़े था कि... "मुझे... ...माफ़ कर दोगी न ?" भीमा ने सिहर कर पूछा। "नहीं।" कुन्दन हँसी भीमा ने चौंक कर देखा उसकी ओर। किसी तरह पूछा, "क्यों ?" "माफ़ी माँग कर ही तुमने इतना बड़ा अपराध किया है कि.. "कुन्दन...!" भीमा का गला भर आया। "सुनो, जरा नज़दीक आओ..." कुन्दन ?" "कब से बैठे हो मेरे पास ?" कुन्दन ने पूछा । भीमा तड़प गया, "तुम क्या सोचती हो? क्या मैं उस कार्यक्रम में नाचने के बाद वापस आया हूँ ? यहाँ मैं शुरू से ही बैठा हूँ।" "शुरू से यानी ?" कुन्दन ने पूछा। भीमा ने कहा, "जब से दुनिया शुरू हुई।" वे चुप हो गए। उनकी नई दुनिया शुरू हो रही थी। दुनिया शुरू होते समय हमेशा खामोशी ही छाई रहती होगी-उस शुरूआत की पवि- नता की रक्षा के लिए। "कुन्दन...!" भीमा ने लरजते स्वर में कहा, "मुझे अभी भी निश्चित "क्या, - हर मे नहीं मालूम, तुम्हारे दिल में क्या है, लेकिन...जो मेरे दिल में है, बताए बिना माज न रह गकंगा । मैं तुम्हारे बिना जिन्दा नहीं रह गईगा, कुन्दन ! तुम्हारे गाय अपने रिश्ते को नकारने का मैंने भरगक प्रयाग किया है । तुम्हे धक्का देकर रास्ते से हटा देना यह भी उसी प्रयाग का हिस्सा था...लेकिन लगता नहीं कि ऐसे प्रयास में में कमी मफल हो मकंगा। सच कहता हूँ, कुन्दन, तुम्हारे विना मैं नही जी सदूंगा। तुम इतनी अच्छी हो, इतनी अच्छी हो कि...." शब्द रघ गए। कुन्दन ने सिहर कर आंखें मूंद लो, "मैंने जवाब पा लिया।" "जवाब ?" "हाँ, एक ऐमा जवाव, जिसकी तलाश में मैं बेहद परेशान थी।" "बोर, तव, अचानक कुन्दन को अपनी मां की याद बाई । झट से बोली, "मां को पवर करनी होगी। मैं यस्पताल में हूँ और उन्हें पता ही नहीं । मेरी राह देख-देख कर वह..." "तुम्हारे पर्म में से तुम्हारे घर का पता हमे मिल गया था।" भीमा ने पहा, "चम्पक रवाना हो चुका है। मां को साथ लेकर ही आएगा। पहुंचता होगा।" मी जव माई, वह अकेली नहीं थी। सुरेश जी भी साथ थे। कमरे में प्रवेश के साथ ही मां के आंसू फूट पड़े, "यह क्या हुआ, बेटी? कैसे हुआ?" "पपराओ नही, मामूली चोट है । ठीक हो जाएगी।" कुन्दन प्रस्ट में योली। फिर मन-ही-मन कहा, 'इस चोट के ही फारण मुझे वह मिल सका है, जो से मिल ही नहीं सकता था।' पान्दन की मांगें सुरेश जी की ओर घूमी। नजर मिलते ही वह यौने, "दुर्घटना की सबर जब आई, तो मंयोगवश मैं आपके घर पर ही था।" फन्दन मुसराई, "लेकिन आपको अस्पताल आना पड़ा। "तो क्या हुआ ! अव आप जल्दी मे ठीक हो जाइए।" मुरेश जी ने उत्तर दिया। "आपका व्यवहार, मेरे प्रति, बहुत ही मन्तुलित और गालीन रहा ४ : फैसले । होठों पर रखी हथेली को कुन्दन ने पकड़ लिया; अपने होठों पर और ज्यादा दवा दिया। परम सन्तोप से कुन्दन की आँखें मुंद गई। कोशिश करके उसने आँखें खोली। चारों ओर देखा । अस्पताल व साफ़-सुथरा कमरा...सफ़ेद...। कमरे में उस वक्त वे दो ही थे। कुन्दन और भीमा। नर्स नहीं डाक्टर नहीं। केवल वे दो। भीमा ने कुन्दन के हाथों में थमी अपनी हथेली धीमे से खींच लेते हुए कहा, "नर्स को बुला लाऊँ।" "नहीं। उससे पहले...।" कुन्दन आगे न वोल सकी। सर पर बंध। पट्टियों के नीचे अचानक ऐसी टीस उठी कि शब्द घुट गए। उसने पट्टियों पर हाथ फेर कर देखा । भीमा शर्म से नीचे देखने लगा। भीमा के कारण ही तो वह दुर्घटना...लेकिन भीमा क्या करे ? उसने सोचा थोड़े था कि... । - "क्या, "मुझे...माफ़ कर दोगी न ?" भीमा ने सिहर कर पूछा। "नहीं।" कुन्दन हँसी भीमा ने चौंक कर देखा उसकी ओर । किसी तरह पूछा, "क्यों?" "माफ़ी मांग कर ही तुमने इतना बड़ा अपराध किया है कि... "कुन्दन...!" भीमा का गला भर आया। "सुनो, जरा नज़दीक आओ...।" कुन्दन ?" "कब से वैठे हो मेरे पास ?" कुन्दन ने पूछा। भीमा तड़प गया, "तुम क्या सोचती हो? क्या मैं उस कार्य नाचने के बाद वापस आया हूँ ? यहाँ मैं शुरू से ही वैठा हूँ।" "शुरू से यानी ?" कुन्दन ने पूछा। भीमा ने कहा, "जब से दुनिया शुरू हुई।" वे चुप हो गए। उनकी नई दुनिया शुरू हो रही थी। होते समय हमेशा खामोशी ही छाई रहती होगी-उस शुरूआत व्रता की रक्षा के लिए। न...!" भीमा ने लरजते स्वर में कहा, "मुझे अभी - न्टन रूप में नहीं मालूम, तुम्हारे दिल में क्या है, लेकिन...जो मेरे दिल मे है, चताए बिना आज न रह सकूगा । मैं तुम्हारे विना जिन्दा नहीं रह सकूँगा, कुन्दन ! तुम्हारे माथ अपने रिश्ते को नकारने का मैंने भरसक प्रयास रिया है । तुम्हें धक्का देकर रास्ते से हटा देना—यह भी उसी प्रयास का हिस्सा था...लेकिन लगता नही कि ऐसे प्रयास में मैं कभी सफल हो मर्केगा। सच कहता हूँ, कुन्दन, तुम्हारे विना मैं नहीं जी सकूँगा। तुम इतनी अच्छी हो, इतनी अच्छी हो कि...।" शन्द रंध गए। कुन्दन ने सिहर कर आंखें मूंद ली, "मैंने जवाब पा लिया।" "जवाव?" "हो, एक ऐसा जवाब, जिसकी तलाश में मैं बेहद परेशान ।" "और, तय, अचानक कुन्दन को अपनी मां की याद आई। घट से बोली, "माँ को खबर करनी होगी। मैं अस्पताल मे हूँ और उन्हें पता ही नहीं। मेरी राह देस-देख कर वह...." "तुम्हारे पर्स में से तुम्हारे घर का पता हमे मिल गया था।" भीमा ने पहा, "चम्पक रवाना हो चुका है। मौ को साथ लेकर ही आएगा। पहुंचना होगा।" मां जब आई, वह अकेली नही थी । सुरेश जी भी साथ थे। कमरे में प्रवेश के साथ ही मां के आंसू फूट पड़े, "यह क्या हुआ, बेटी? कैसे हुआ?" "घबराओ नही, मामूली चोट है । ठीक हो जाएगी।" कुन्दन प्रकट मे चोली। फिर मन-ही-मन कहा, 'इस चोट के ही कारण मुझे वह मिल सका है.जो वैसे मिल ही नहीं सकता था।' कुन्दन को आंखें सुरेश जी की ओर घूमी । नजर मिलते ही वह बोले, "दुर्घटना की सदर जब आई, तो संयोगवश मैं आपके घर पर ही था।" कुन्दन मुसराई, "लेकिन आपको अस्पताल आना पड़ा।" "तो क्या हुआ ! अब आप जल्दी से ठीक हो जाइए।" मुरेश जी ने उत्तर दिया। "आपका व्यवहार, मेरे प्रति, बहुत ही सन्तुलित और शालीन रहा ।
१४६ फसल - है।" कुन्दन बोली, "आप...मेरा जवाब पाने को उत्सुक होंगे। है न ?" "जवाब इसी वक्त देना ज़रूरी नहीं।" सुरेश जी असहज होते हुए जल्दी से बोले, "मैं जवाब पाने के लिए आपके घर नहीं गया था। मैं तो... मैं तो..." "जो भी है...जवाब पाने के लिए मेरे घर आने का अधिकार आपको था ही," कुन्दन गम्भीरता से बोली, "जवाब अब तक तो नहीं था मेरे पास, लेकिन अव है।" "आप आराम करिए । वातें बाद में।" सुरेश जी उतने सारे लोगों की मौजूदगी में 'उस चर्चा' को छेड़ना नहीं चाहते थे। किन्तु कुन्दन न रुकी । वोली, "सुरेश जी...आपने कहा था, यदि मैं इन्कार करती हूँ तो मुझे इन्कार का कारण भी बताना होगा। यही कहा था न आपने ?" "प्लीज़, कुन्दन जी...!" "इन्कार का कारण अव तक तो मेरी समझ में-खुद मेरी समझ में-नहीं आया था, लेकिन...अव आ गया है। आप मुझे क्यों पाना चाहते हैं ? चुनौती में जीतने के लिए ही न ? लेकिन यदि मैं न मिलूं ? क्या आप जिन्दा नहीं रहेंगे ? आप बड़ी आसानी से ज़िन्दा रह लेंगे। आप किसी और युवती को 'हाँ' कह देंगे। यही होगा न ? मेरा महत्त्व आपके लिए एक चुनौती जीतने जैसा ही है, लेकिन...इस दुनिया में ऐसा भी कोई है, जो...मेरे बिना जिन्दा नहीं रह सकेगा...मैं उसे ही ज़िन्दा रखना चाहूँगी...आप मुझे क्षमा करें। कर देंगे न ?" "कुन्दन जी...क्षमा न मागें। शर्मिन्दा न करें। मैं...मैं सदैव...' सुरेश जी को समझ में न आया, वाक्य किस तरह आगे बढ़ाएं। इतने- इतने लोगों के सामने यो इन्कार हो जाना...उनकी अकुलाहट की सीमा नहीं थी। सहसा वह चल पड़ने को तत्पर हो गए। हड़बड़ाते हुए-से बोले, "मैं चलूं? आप ठीक हो जाइए। मैं आपको देखने के लिए फिर आऊँगा..." और...इससे पहले कि उन्हें रोका जा सकता, हाथ जोड़कर वह चल दिए थे । कुन्दन जानती थी, वह फिर नहीं आएंगे । आ नहीं सकेंगे। - "बेटी...!" मा नजदीक आई, "मारियर मे हमारे ६...गो गान मुग्ने बुनाने के लिए आए, उनमे पूरा- पूरा गई। नोंने छन बताया।" पम्पक चुपक मे गिसक पाया। मारो बुलाने पगमा यह । का को दुपंटना का पूरा योग देने पोड़े ही गया था। "कछ नहीं,मा।" बन्दन ने कहा, "मरक पार कर ही पोहम्मान नहीं रहा कि एक बार आ रही है... मा दोगलाई, “पागल हो। मुरेग जी को नुमने गयो मापने जोरह दिया..." "छोडो, मां' कुछ मामले तिनी उल्दी निबट जाएं, गाना बच्छा..." "लेकिन तुम ..लेकिन तुमने...आमिर गिग पनि यो पुन पिया है ?" मा ने नाराजगी में पूछा, "यह सब क्या ममेना है ?...ान है, जो गुम्हारे बिना निन्दा नहीं रह मरता? या तुमने ..केदम मुरेग जोको टालने के लिए...?" "गुरेश जी को तो एक बार टाल भी सपती पी, मरिन अपने प्रापरी कब तर टानती रहनी, मा?" कुन्दन ने रहा। उमका अर्थ पूरी तरह मा की गमन में न आपा, मेकिन मां ने भाप नियानपी निगार, गि अयं मे गाय, पिग व्यक्ति पर, बार-बार टिक जाती है। माने पलट कर भीमा को देया-गिर मे पातर । ने भीमा से कहा, "यह मेरी मां है .." हालांकि परिचय फराने की जरूरत नहीं थी। भीमा ने शालीनता से हाथ जोड़ दिए । भीमा का परिपय कुन्दन ने न दिया। देना आवश्यक पा भी तो नहीं। मा ने गमार लिया। यूम लिया। भीमा को मिर मे पाप तर म बार देया उगने । मां के मुंह मे, दग, पही निगमा, "मोह...!" मेरिन, वाम्नव में, मां रहना पाहतो पी, "अरे!" भीमा क्षेप गया। नीचे दमने लगा। पूमा नहीं गमा जापान - १४८ : फैसले ही से वह एक लम्बा-तडंगा आदमी था। मारे खुशी के जव वह फूला न समाया, तो यही लगा कि अस्पताल के कमरे में केवल भीमा समाया हुआ है-~-फूलकर, गद्गद होकर केवल वही भरा हुआ है। हर तरफ़...लेकिन नहीं-केवल वही क्यों ? उस तमाम कमरे में, भीमा के साथ-साथ ही एक और भी व्यक्ति समाया हुआ था- कुन्दन.
No text on this page.