Sanmati Library, Jaipur

Jain-granth-sangrah

Sangheliya, Nandkishor · 2009/11

PDF Proofread

Front matter

प्रकाशक का निवेदन।
आज से कई वर्ष पहले मेरा विचार एक ऐसे ही गहन
ग्रन्थ का संग्रह प्रकाशित करने का था। उसके पश्चात् जब
मुझे श्रीगोमटेश्वरजी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुभा तव
वहीं मैसूर जैन बोर्डिङ्ग में मेरा यह विचार और भी दृढ़ हो गया
तब से मेरे सकल परिश्रम के फल स्वरूप जो कार्य हो सका
वह आज आप की सेवा में उपस्थित है।
खेद है मेरी अस्वस्थना और कई अनिवार्य असुविधाओं
के कारण, प्रकाशन के मार्ग में अनेक बाधायें आ पड़ौं।
मेरी बड़ी इच्छा थी कि यह प्रन्थ वृहत सर्वोपयोगी और
सब से सस्ता प्रकाशित हो सके। किन्तु प्रेस की कठिनाइयों
और महंगी के कारण मेरी वह इच्छा पूर्ण न हो सकी और
मुझे इस ग्रन्थ को लागत मूल्य पर ही वेचने के लिये बाध्य
होना पड़ा। यदि विज्ञ पाठकों और धर्मपरायण जैन-समाज
ने इसे अपनाकर मेरे क्षीण उत्साह को वर्द्धित किया तो मैं
प्रन्थ के द्वितीय संस्करण में अपनी इच्छा को पूरा करूंगा।
श्रीमान मास्टर छोटेलालजी प्रकाशक परवार-बन्धु
श्रीमान सि० खेमचन्दजी बी. एस. सी. एल. टी. और श्रीमान
भगवन्त गणपति-गोयलीय जी काहृदय से अत्यन्त आभारी हूं
जिन्होंने इस ग्रन्थ के प्रकाशन में विशेष सहायता की है।
इसके अतिरिक्त उन सभी विद्वान कवियों और जैनाचार्यों
का मैं परम कृतज्ञ हूँ जिनके सुालत, सरस और भक्तिभाव
से परिपूर्ण पद्यों के सभाव से मेरा यह प्रयत्न राका रजनी
के समान प्रकाशित रहेगा।
जबलपुर,.
विनीत,
रक्षा बंधन सं० १९८२ नन्दकिशोर सांधेलीय
१५२ पेज हितकारणी प्रेस जबलपुर में और शेष हिन्दी मंदिर
प्रेस जबलपुर में मुहित।
.

विषय-सूची। पृष्ठ न० ८ ६ के ६ नं० नाम नाम पृष्ठ १, मंगलाचरण १ १८, ग्यारह रुद्र २, णमोकार मंत्र ... १ १६, चौवीस कामदेव... ३, णमोकारमंत्रकामहात्म्य २०, चौदह कुलकर ... ४, पञ्च परमेष्ठियों के नाम १ २१, बारह प्रसिद्ध पुरुषों वर्तमान चीवीसी नाम ६, चौबीसतीर्थकरों के २२. सिद्धक्षेत्रों के नाम शरीर का वर्ण ६ २३, चौदह गुणस्थान... १० ७, चौबीस तीर्थंकरों २४, श्रावकके२१ उत्तरगुण १० के निर्याण क्षेत्र ६ २५, श्रावकको५३ क्रियायें ११ ८, पांचतीर्थंकर बाल- २६, ग्यारहप्रतिमात्राओं মুন্নী का सामान्य स्वरूप १३ ६, तीन तीर्थकर तीन २७, श्रावक के १७ नियम १५ पदवीधारी ६ २८, सप्तव्यसनका त्याग १६ १०, महा विदेह क्षेत्र के २६, वाईसमभक्षकात्याग १६ वीस विद्यमान ३०, श्रावककेनित्यपट्कर्म १७ ६ ३१, सामायिकपा(भाषा) १७ ११, चोवीसमतीततीर्थंकर ७ ३२, सामयिकपाठ १२, चौबीस भनागत (संस्कृत) ૨૨ तीर्थकर ७ ३३, दर्शन पाठ २५ ७ ३४, दौलतरामकृतस्तुति २६ १४, नव नारायण ८ ३५, दर्शन पचीसी १५, नव प्रति नारायण ८ ३६, शान्तिनाथाष्टकस्तोत्र ३३ १६, नव बलभद्र ८ ३७, महावीराटक स्तोत्र ३४ १७, नव नारद ८ ३८, प्रातःकाल की स्तुति ३५ तीर्थकर १३, पारद चक्रवती...

[ २ ] สุด पृष्ठ नं. पृष्ठ ३६, समाधिमरण ५०,जिन सहस्रनामस्तोत्रर०३ (कविद्यानतरायचत) ३६ ५८, तत्वार्थ सूत्रम् ४०, वारइभावना ५६, लघु अभिषेक पाठ १२४ (भूधरदासली कृत) ३८ ६, विनय पाठ ૨૮ ४१, सायंकालकी स्तुति ३८ ६१, देवशास्त्र गुरु-पूजा १३० ४२, प्रभाती-संग्रह . ४. ६२, देवशाल गुल्-यूजा ४३, स्तोत्र(द्यानतरायकृत)४२ (भाषा) ४४, वैराग्य भावना ४२ ६३, वीसतीर्थकर पूजा ४५, समाधिमरण (भाषा) (पं०सूरचन्द्रजी हत) ४५ ६४, विद्यमान बीस.तीर्थ- ४६, जिनवाणीकीस्तुति ५३ करों का अर्घ .... १५३ ४, नामावलीस्तोत्र... ५४ ६५, अकृत्रिम चैत्यालयों ४८, मेरी भावना ( पंग- ६५३ लकिशोरजीकृत)... ५५ ६६, सिद्ध पूजा १५५ ४६,इट छत्तीसी ५७ ६३, सिद्ध पूजा भवाष्टक १६० ५०, भकामरस्तोत्रसंस्कृत ६६ ६८, सोलहकारणकाअर्घ १६१ ५५, हिन्दी भक्तामर(पं० ६६, दशलक्षणधर्मकाअर्घ १६३ गिरिधरशर्माजीकृत) १७०, रत्नत्रय का अर्घ १६१ ५२, आलोचना पाठ... ७६ ७१, वीस तीर्थकर पूजा ५३, निर्वाणकाएड(भाषा) ७६ की अचरी ५४, निर्वाणकाण्ड ७२, सिद्धपूजाकी अचरी१६३ गाथा (संस्कृत)... ८५ ७३, समुनय चौवसी पूजार६४ ५५, पंच कल्याणक पाठ ८२ ७४, सप्त ऋषि पूजा... १६७ ५६ छहढाला ७५, सोलह कारण पूजा १७१ (६० दौलतरामती कृत) ७६, दश लक्षण धर्म पूजा का अर्थ ...

[ ३ ] . नं. पृष्ठ नं० नाम पृथ ७७, स्वयंभू स्तोत्र १८० ६७, सम्मेदशिखरविधान २५१ ७८, पंच मेरु पूजा १८२ ६८, दीप मालिका विधान२६३ .७६, रतत्रय पूजा १८५ ६६, धारें संस्कृत ૧૮ ८०, दर्शन पूजा १८७ १००, जन्म कल्याणकपूजा२७०. ८१, ज्ञान पूजा १८८ १०१, फूलमाल पच्चीसी २७५ ८२, चारित्र पूजा ... १६१ १०२, तारंगाजीक्षेत्र पूजा २७८ ८३, न्यामत कृत गजल १९२ १०३, देव शास्त्र गुरुपूजा ८४, नन्दीश्वर पूजा १६३ की अचरी २८१ ८५, निर्वाणक्षेत्र पूजा १६६ १०४, शन्ति पाठ ૨૮૨ ८६, अकृत्रिम चैत्यालय १०५, विसर्जनम् २८४ पूजा १६९ १०६, घुधजनकृत स्तुति २८४ ८७, देव पूजी २०५ १०७, सुप्रभात स्तोत्रम २८५ ८८, सरस्वती पूजा २०६ १०८, दृष्टाष्टक स्तोत्रम् २८७ ८६, गुरु पूजा २१२ १०६, अघाएक स्तोत्रम् २८८ १०,मक्शी पार्श्वनाथ पूजा२१५ ११०, सूतक निर्णय ૨૮૮ ६१, श्री गिरिनार क्षेत्र १११, दुःख हरण विनती २१० पूजा २१६ १९२, नेमिनाथ जी का ६२, सोनागिरि पूजा... २२५ वारहमासा ૨૨ , रधिवत पूजा २३० ११३, वारहमासी राजुल ६४, पावापुर सिद्ध क्षेत्र की : . २६४ पूजा २३३ ११५, विनती भूधरदास ६५, चंपापुर सिद्ध क्षेत्र कृत २६५ पूजा २३५ ११५, निशि भोजन कथा २९६ १६, लघुपंच परमेष्ठी ११६, फुटकर गायन ૨૨૮ विधान २३८ ११७, गजल-दादरा २६६ ...

- [४] नं. पृष्ठ नं. नाम पृष्ठ ११६, रसिया ११८, पूजा का महात्म्य ३०० १२२, जिनवाणीकोस्तुति ३०६ १३, भोजनोंकीमार्थनाएं ३०७ १२०, विनतीभूदरंदासकृत ३०१ १२४, मिथ्यातका फल ३०८ १२६, दश धर्म के भजन ३०१ ॐनमः सिद्धभ्यः। ॐकार विन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायति योगिनः। कामई मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः ॥१॥ अविरलशब्दघनौघप्रक्षालितसकलभूतलकलंका । मुनिभिरुपासिततीर्था सरस्वती हरतु नो दुरितम् ॥ अज्ञानतिमिरांधानां ज्ञानांजनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३॥ परमगुरुवे नमः परम्पराचार्यश्रीगुरुवे नमः । सकलकलुपविध्वंसक श्रेयसां परिवर्दक धर्म- संवन्धकं भव्यजीचमनःप्रतिवोधकारकमिदं शास्त्र श्री नाम धेयं......(ग्रन्थ का नाम लेवे) एतन्मूलग्रंथकारः श्रीसर्वज्ञ- देवास्तदुत्तरग्रंथकर्तारः श्रीगणधरदेवास्तेषां बचानुसारतामा- साध श्री......(ग्रन्यकर्ता का नाम लेवे ) विरचितम् । मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी । मंगलं कुदकुंदाद्यो जैनधर्मोस्तु मंगलम् ॥ चकर श्रोतारश्च सावधानतया परन्तु ॥

धीविनाय नमः
जैन-ग्रन्थ-संग्रह
णमोकार मन्त्र।
गाथा ।
समो अरहताणं । णमो सिदाणं। णमो आयरियाणं । .
णमो उज्झायाणं । णमो लोए सन्चसाहूणं ।
इस णमोकार मंत्र में पांच पद, पैंतीस अक्षर और अंठावन
मात्रा हैं।
णमोकार मंत्र का माहाल्य।
एसो.पंच णमोयारो, सन्चपावप्पणासयो ।
मंगलाणम् च सव्वेसि, पढ़मं होय मंगलम् ॥
अर्थ-यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों का नाश करने
वाला है और लव मंगलों में पहला मंगल है।
पञ्च परमेष्ठियों के नाम।
अरईस, सिद्ध, प्राचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधु ।
उही असि आसा। नमः सिद्धेभ्यः ।
नोट-अ सि आ उसा नाम पञ्च परमेष्ठी का है।
में पंच परमेष्ठी के नाम गर्मित हैं।
ही में २४ तीर्थंकरों के नाम मर्मित है।
..-

वर्तमान
क्रन नाम तीर्थकर, चिह
जन्म स्थान जन्म-तिथि
पमदेव बैल का
'अयोध्या
वैव चंदी
२. अजितनाथ हाथी का
माघ सुदी १०
३. संभवनाथ बोड़े का श्रावस्ती कार्तिक सुदी १५
५ अभिनन्दननाथ बन्दर का अयोध्या
माघ सुदी १२
५ सुमतिनाथ चकवे का
पभप्रभु कमल का फौशाम्बो कार्तिक सुदी १३
७) सुरार्श्वनाथ सांथिये का काशी ज्येष्ठ सुदी २
चन्द्रप्रभ अर्धचन्द्रका चन्द्रपुरी
चैत्र सुदी ११
६
पौष वदो ११
पुष्पदन्त नाका काकन्दो मार्गशिर सुदी
१० शीतलनाथ कल्पवृक्षका भद्रिकापुरी
माघ वदी १२
११ श्रेयांसनाथ | गेंडे का सिंहपुरी फागुन वदी १५
१२/ वासुपूज्य | भैसेका चंपापुरी फागुन वदी १४
बीसवापरात विधान में सम ०८ औरर यो निर्वाच-तिनि

- जैन-प्रन्थ-संग्रह - .. चौबीसी । आयु निर्वाणतिथि निर्वाणतिथि / पिता का मा का नाम काय ऊँची नाम धनुष मधलाखपूर्व माध घदी १४ नामि राजा मरुदेवी | ५०० ७२ लानपूर्व चैत्र सुदी ५ जितशत्रु विजयादेवी ५० चैत्र सुदी ६ जितारी सेना ४०० . .- ५० सिद्धार्था| ३५० ॥ " . ३० वैसाख सुदी ६ संवर संवर सिद्धार्था चैत्र सुदी १२ मेघप्रभ सुमंगला | ३०० " फागुन वदी ४/"धारण सुलीमा | २५० फागुन वदी ७ सुप्रतिष्ठ | पृथ्वी फागुन सुदी ७ महासेन | लक्ष्मणा | १५० कार्तिक सुदीर सुग्रीव रामा १०० २० १० . . . आलोज सुदीरथ सुनन्दा ६० वर्षश्रावण जुदी विष्णु विष्णुशी ० भादवांसुदी१४ वासुपूज्य विजया ७२ ७२ "" प्रामशः माप बदी और आरिवन जुदी ८ है।

जैन-प्रत्य-संग्रह। वर्तमान क्रम नाम तीर्थंकर चिह चिह । जन्म-स्थान, जन्म-तिथि १३/ विमलनाथ सुअर का कपिला माघ सुदी १४ अनंतनाथ सेही का अयोध्या ज्येष्ठ वदी १२ १५ धर्मनाथ वनदण्डका रत्नपुरी | माघ सुदी १३ १६ / शान्तिनाथ | हिरण का हस्तनागपुरः ज्येष्ठ वदी १४ १७ कुन्थुनाथ बकरे का वैसाख सुदी १ अरनाथ मच्छी का मार्गशिर सुदी १४ १६ मल्लिनाथ कलश का मिथलापुरी मार्गशिर सुदी ११ २० मुनिसुव्रतनाथ फछचे का गजमही राजमही बैसाख वदी १० २१ नमिनाथ कमल का मिथिलापुरी भाषाढ़ वदी १० २२ नेमिनाथ सौरीपुर श्रावण सुदी ६ २३ पार्श्वनाथ | सर्प का काशीपुरी २४ महावीर शेरका कुन्दनपुर शंख का पौष वदो ११ क्षेत्रसुदी १३ श्रीरामचन्म-कृव विधान में काम २०१३.की कम-विवि मा. और थापा मुदी ।

. . जैन-ग्रन्थ-संग्रह। चौबीसी। ... आयु निर्वाणतिथि पिता का. मा कानामा . काय ऊंची नाम ३० ॥ ४० " लाखवर्ष थापाढ़ वदी कृतवर्मा कृतवर्मा | सुरम्या | ६० धनुष चैत वदी ४ सिंहसेन | सर्वयंशा | ५० १० ॥ ज्येष्ठ सुदी। भानु सुंत्रता | ४५ " ज्येष्ठ वदी १४ विश्वसेन ऐरा शाजारवर्ष साख सुंदी १ सूर्य सूर्य्य | श्रीदेवी | ३५ ४ चैत्र सुदी ११ सुदर्शन मित्रा ३० ॥ ५५ फागुनसुदी ५ कुम्म रक्षिता | २५ ॥ ३० , फागुनवदी१२ सुमित्र' | पद्मावती| २०. , वैसाखवदी २४ विजय वप्रा १५ १ आपाढ़सुदी समुद्रविजय शिषादेवी | १० ,, १०० वर्ष प्रावण सुदी अश्वसेन घामा हाथ कातिकवदी२० सिद्धार्थ प्रियकारिणी. (त्रिशला) सदी १४ धौर०१८और २२ की निर्वाव-विवि क्रममा पत्र पदी ३०. १० ॥ ७२

६
जैन-नन्थ-संग्रह।
.
.
चौबीस तीर्थकरों के शरीर का वर्ण।
...एसपम और वासुपूज्य...का. लाल वर्ण, सुपार्श्वनाथ :
और पाश्वनाथ का हरा वर्ण, चन्द्रप्रेम और पुष्पदन्त का श्वेत
वर्ण, मुनि-सुव्रत और नेमिनाथ का श्याम वर्ण, बाकी के १६
तीर्थंकरों का फंचन वर्ण समान पीतं वर्ण हुआ है।
चौबीस तीर्थंकरों के निर्वाण-क्षेत्र।..."
भूषभदेव का. कैलाश, वासुपूज्य चंपापुरी का वन,
नेमिनाय का गिरनार, बर्द्धमान का पावापुरी, बाकी के २०
तीर्थङ्कर का सम्मेइंशिस्तर है।" :
पाँच तीर्थंकर बालब्रह्मचारी।
१ वासुपूज्य, २ मल्लिनाथ, ३ नेमिनाथ, ४ पार्श्वनाथ
और ५ वर्द्धमान।
नोट-ये वालब्रह्मचारी हुए हैं। इन्होंने विवाह नहीं किया
और राज्य भी नहीं किया, कुमार अवस्था में ही दीक्षा ले ली
तीन तीर्थकर तीन पदवीधारी।
शान्तिनाथ, २कुथुनाथ और ३ अरनाथ
नोट-यह ३ तीर्थंकर चक्रवर्ती और कामदेव
भी हुए !
महाविदेहक्षेत्र के २० विद्यमान तीर्थकर ।
.१ सीमन्धर, २.युगमंघर, ...३. वाहु, . ४ . सुबाहु, ५
सुजात, स्वयंप्रभा वृषभानन, = अनन्तवीर्य, सुरप्रम,
.
.
.

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। P4 .... .. १. विशालकीर्ति, १६ बज्रधद १२. चन्द्रानन, १३ चन्द्रवाह, १४ भुजंगम, १५ ईश्वर, १६ मेमप्रम (नमि), १७.वीरसेन, १८ महाभद्र, १४ देवयश, २० अजितवीर्य । चौबीस अतीत तीर्थङ्कर । १ श्रीनिर्वाण, २ सागर, ३ महासाधु, ४ विमलप्रभ, ५ श्रीधर, ६ सुदच, ७ अमलप्रभ, ८ उद्धर, ६ अंगिर, .१० सन्मति, ११ सिंधुनाथ, १२ कुसुमांजलि, '१३ शिवगण, १४ उत्साह, १५ ज्ञानेश्वर, १६ परमेश्वर, १७ विमलेश्वर, १८ यशोधर, १६ कृष्णमति, २० ज्ञानमति, २१ शुद्धमति, २२ श्रीमद, २३ मतिकान्त, २४,शान्ति । चौवीस अनागत तीर्थकर। १ श्री महाएन, २ सुरदेव, ३ सुपावं, ४. स्वयंप्रभ, ५ सर्वात्मभूत, ६ थीदेव,७ कुलपुत्रदेव, = उदकदेव, मोष्ठिल- देव, १० जयकीर्ति, ११ मुनिसुव्रत, १२ अरह (अमम ), १३ निष्पाप, १५ निकषाय, १५ विपुल, १६ निर्मल, १७ चित्रगुप्त, १. समाधिगुप्त, १६ स्वयंभू, २० अनिवृत्त, २१ जयनाथ, २२ श्रीविमल, २३ देवपाल, २४ अनन्तवीर्य । बारह चक्रवर्ती। १ भरतचक्री, २ संगरचक्री, ३ मघवाचको, ४ सनत्कु- मारचक्री,.५ शान्तिनाथचक्री (तीर्थंकर),६कुन्थुनार्थचक्रो,(ती- र्थङ्कर) ७ अरनाथचक्री (तीर्थंकर), सभूमचक्री,... पद्मचक्री घा महापन, १० हरिपेणचक्री, ११ जयचक्रो, २२ ब्रह्मदर्तचक्री Tit: जैन-प्रन्थ-संग्रह। . - नव.नारायण। 1 १ विष्ट, २ विष्ट, ३ स्वयंभू, पुरुषोत्तम, ५.पुरुष- सिंह, ६ पुण्डरीक, ७ दत्त, लक्ष्मण, कृष्ण । नव प्रतिनारायण । १ अश्वग्रीव, २ तारक, ३ मेरक, ४ मधु (मधुकैटभ), ५ निशुम्भ, ६ वली, ७ प्रहाद, रावण, जरासन्ध । नव बलभद्र। १ अचल, २ विजय, ३ भद, ४ सुप्रभ, ५ सुदर्शन, ६ आनंद, ७ नंदन (नंद), पा (रामचन्द्र), राम (वलमद्र)। नोट-२४ तीर्थकर, १२ चक्रवर्ती, नारायण, ६ प्रति नारावर्ण, ६ पलभद्र, ये मिलकर ६३ शलाका के पुत्र कह- लाते हैं। नव. नारद। १ भीम, २ महामीम, ३ रुद्र, ४ महारुद्ध, काल, महाकाल, ७ दुर्मुख, ८ नरकमुख, ! अधोमुख • - ग्यारह रुद्र १ भीमवली, २ जितशत्रु, इन्द्र, विश्वानल, ५ सुप्र- तिष्ठ, ६ मचल, ७ पुण्डरीक, = अजितधर, जितनामि, १० पीठ, ११ सात्यकी।

जैन-प्रन्थ-संग्रह। कामदेव । चौबीस ''. १ बाहुवली, २ अमिततेज, ३ श्रीधर, ४ दशमंद्र, ५ प्रशे- नजिव, ६ चन्द्रवर्ण, अग्निमुक्ति, = सनत्कुमार (चक्रवती), ६ वत्सराज, १० कनकप्रम, ११ सेधवर्ण, १२ शान्तिनाथ, (तीर्थकर ) १३ कुन्थुनाथ (तीर्थकर), २४ अरनाथ (तीर्थ- कर), १५ विजयराज, १६ श्रीचन्द्र, १७ जानलं, १८ हनु, मान, १९ पलगजा २० वसुदेव, २१ प्रधुन, २२ नागकुमार, २३ श्रीपाल, २४ जंवूस्वामी । चौदह कुलकर। १ प्रतिश्रुति, २ सन्मवि, ३ क्षेमंकर, ४ क्षेमंधर, ५ सीम- कर, ६.सीमंधर, ७ विमलवाहन, - चक्षुष्मान, ६ यशस्वी अभिचन्द्र, ११ चंद्राम, १२ मरुदेव, १३ प्रसेनजिद, १४ नामि नोट-इस प्रकार तो ये और ६३ शलाका पुरुष इनमें चोवीस तीर्थडरों के माता-पिता मिलाकर कुन १६६ पुण्य पुरुष कहलाते हैं । अर्थात् जितने पुण्यवान पुरुष हुए हैं उनमें इनकी गईंना मुख्य है। बारह प्रसिद्ध पुरुषों के नाम | १नामि, २श्रेयांस, ३ बाहुवली, ४ मरतं, ५ रामचन्द्र, हनुमान, ७ सीता, रावण, कृष्ण, १० महादेवं, ११ भीम, १२पार्श्वनाय।

जैन-प्रन्थ-संग्रह। ant .... ---. . नोट-कुलकरों में नाभिराजा, दान-देने में श्रेयांस राजा, तप करने में बाहुबली जो एक साल तक कायोत्सर्ग खड़े रहे। भाव की शुद्धता में भरत- चक्रवती को दीक्षा लेते ही केवळ ज्ञान हुआ। बलदेवों में रामचन्द्र कामदेवों में हनुमान, सतियों में सीता,..मानियों में रावण, नारायणों में कृष्ण, रुद्रों में महादेव, वलचानों में भीम, तीर्थंकरों में पार्श्वनाथ, ये पुरुष जगत् में बहुत प्रसिद्ध हुए हैं । दूसरे सिद्धक्षेत्रों के नाम । १ मांगीतुंगी, २ मुकागिरि (मेहँगिरि),३ सिद्धवरकूट, ४पावागिरि (चेलना नदी के पास), ५ शेत्रुक्षय, ६ बड़वामी, ७ सोनागिरि नैनागिरि (नैनानन्द ); .दौनागिरिः १० तारंगा, ११ कुन्थुगिरि, १२. गजपंथ, १३. राजग्रही, १४ गुणावा,.१५ पटना, १६ कोटिशिला। , : M . चौदह गुणस्थान । १.मिथ्यात्व, ,२ सासादन, ३ मिश्र, ४ अविरत सम्यत्त्व, ५ देशवत, ६. प्रमत्तविरत,. ७. अप्रमत्तविरत, . अपूर्व करण, अनिवृत्तिकरण, १० सूक्ष्म सांपराय; ११ उपशान्त कषाय वा उपशान्त मोह, १२ क्षीण कषाय वा क्षीण मोह, १३ सयोगकेवली, १६ अयोगकेवली। श्रावक के २१. उत्तर गुण। लज्जावत, २.दयावन्त, प्रसन्नता, ४प्रतीतिवन्ते, ५ परदोषाच्छादन, ६ परोपकारी, ७ सौम्य दृष्टि; - गुणग्राही, t .

. जैन-प्रन्थ-संग्रह। ...--.. .. ६.श्रेष्ठ पक्षी . १०. मिष्टवादी,.. .. ११... दीर्घविचारी, १२ दानवन्त, १३ शीलवन्त, १४ कृतम, १५ तत्वज्ञ, १६ धर्मब, १७ मिथ्यात्व-रहित, १८ सन्तोषवन्त, १६ स्यावादभाषी, २० अभक्ष-त्यांगो, २१ षट्कर्म प्रवीण । श्रावक की. ५३ क्रियायें। . : - मूलगुण, . १२ व्रत, १२. तप; १..समताभाव, ११ प्रतिमा, ४ दान; ३ रत्नत्रय, १ जल छाणन-क्रिया, १ रात्रिः भोजन-त्याग और दिन में अनादिक भोजन सोधकर खानां अर्थात् छानबीन कर देख-भाल कर खाना । 'श्रावक के मूलगुण- उदम्बरः । ३.मकार। १२ व्रत-५ अणुव्रत, ३ गुणवत, ४ शिक्षावत। .:.५ अणुवत-१.अहिंसाअणुव्रत, ९ सत्याणुव्रत, ३ परस्त्री त्याग अणुनत, ४ .अचौर्य (चौरी-त्याग अणुव्रत), ५. परिग्रह- प्रमाण अणुव्रत । . ३ गुण व्रत-दिगवत, २ देशवत, ३ अनर्थ दंड-त्याग ४ शिक्षाबत- सामायिक, २ प्रोषधोपवास, ३ मतिथि- संविभाग, ४ भोगोपभोग परिमाण.। १२ तप- आचार्य के ३६ गुणों में लिखे हैं। इनके भी वही नाम हैं। ज्यादे इतना है कि मुनियों के महान् व्रत होते है। श्रावकों के अणुव्रत अर्थात् कम परोपहवाले। ११ प्रतिमा-१ दर्शनप्रतिमा, २ ब्रत, सामायिक ४प्रोपंधोंपवास, सचित्तत्याग, ६ रात्रिभुति-त्याग, ब्रह्म 1." १५ जैन-प्रन्य-संग्रह। म चर्व, आरम्भ-त्याग, ६ परिग्रह त्याग, ३० अनुमति-त्याग, १ उद्दिष्ट-त्याग। ४ दाम-आहारदान, औषधदान,... शास्त्रदान और ममय-दान । यह ४ दान श्रावक को करने योग्य हैं। ३ रनत्रयं-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र । यह तीन रत्नश्रावक के.धारने योग्य हैं । इनका खुलासा मर्थ जैन-बान-गुटके के दूसरे भाग में सम्यक्त के वर्णन में लिखा है। इनका नाम रत्न इस कारण से है कि जैसे सुवर्णा- दिक सर्व धन में रत्न उत्तम अर्थात् बेश.कीमत होता है। इसी प्रकार कुल नियम, व्रत, तप में यह तीन सर्व में उत्तम हैं। जैसे कि बिना.अंक बिन्दियाँ किसी काम की नहीं इसी प्रकार बगैर इन तीनों के सारे व्रत नियम कुछ भी फलदायक नहीं है। सर्व नियम, व्रत मानिन्द विन्दी (शून्य) के हैं। यह तीनों मानिन्द शुरू के अंत के हैं। इसलिये इन तीनों को रत माना है। दातार के २१ गुंण-मधाभक्ति, गुण और ५ माभूषण । यह २१ गुण गातार के हैं । अर्थात् पात्र को दान देनेवाले दातामें यह २१ गुण होने चाहिए। दातार की नवधाभक्ति-पात्र को देख बुलाना, उच्म- सन पर बैठाना, चरण धोना, चरणोदक,मस्तक पर चढ़ाना, पूजा करना, मन शुद्ध रखना, वचन विनय-रूप वालना, शरीर गुद रखना और शुद्ध आहार देना । -- .. स जैन-अन्य-संग्रह। १३ .. यह नव प्रकार की भक्ति दातार है । अर्थात् दातार कहिए दान देनेवाले को यह नव प्रकार की - नवधाभक्ति करनी चाहिए। दावार के सातगुण-१ श्रद्धावान होना, २ शक्तिवानः होना, ३ अलोभी होना, ४ दयावान होना, ५.भकिवान होना, ६क्षमावान होना और विवेक वान होना। दातार में यह सात गुण होते हैं। अर्थात् जिसमें यह सात गुण हों वह सथा दातार है। दातारं के पांच भूषण-आनन्दपूर्वक देना, २ भादर- पूर्वक देना, ३ प्रिय वचन कहकर देना, ४ निर्मल भाव रखना, जन्म संफल मानना। दाता के पाँच दूषण-१ विलम्ब से देना, २ विमुख होकर देना, ३ दुर्घवन कहके देना, निरादर करके देना, देकर पछताना यह दाता के पाँच दृषण है । अर्थात् दातार में यह पांच बातें नहीं होनी चाहिए।" ग्यारह प्रतिमाओं का सामान्य स्वरूप । दोहा। . प्रणम पंच परमेष्ठि पद, जिन आगम अनुसार। श्रावक-प्रतिमा.एकदश कहुँ भविजन हितकार.॥१॥ सवैया श्रद्धा कर व्रत पाले, सामायकि दोष टाले, पौसी माँड सचित को त्याग, घटाय । रात्रिभुक्ति परिहरे, जैन अन्य संग्रह। ---- . . . ...i. ब्रह्मचर्य नित धरै, आरम्भ को त्याग कर, मन वचं काय के परिग्रह काज टारे, अघ अनुमत' छारें, त्वनिर्मित कत टारे, असत बनाया। सब पकादश येह प्रतिमा शर्म गेहा धार देश-वृत्ति उर हरप बढायकै. .:". दर्शन प्रतिमा. स्वरुप "अंष्ट मूल गुण संग्रह कर, विशुन अभक्ष्य सवै परिहरे, पुन अष्टाङ्ग शुद्ध सम्यक्त, घरहि प्रतिज्ञा दरशन रज ॥१॥ व्रत प्रतिमा स्वरूप- अणुव्रतपन अतिचार विहीन, धारह शो पुनगुणवत, तीन, शिक्षाबत खंजुत सोय, व्रत प्रतिमा.घर धावफ होय ॥२३.. सामायिक प्रतिमा स्वरूप-गीतकाछन्द-सब जियन में सम-भाव पर शुभ, भावना संयम मही । दुर्ध्यान भारत रोद तंजकर त्रिविध काल प्रमाणही ॥ परमेष्ठि पन.जिन धवन, जिंन वृष विच जिन जिगह तनी । वन्दन त्रिकाल करह, सुजानहु भव्य सामायिक धनी ॥३. प्रोषध प्रतिमा स्वरूप-पदरी छंद- तर मध्यम जघन्य त्रिविध घरेय, प्रोपध विधि युत निजबलं प्रमेह । प्रति मांस चार पवीं मझार, जानहु लो प्रोषध नियम धार ॥ ४ ॥ संचित्त त्याग प्रतिमा स्वरूप-चौपाई-जो परिहरैः हरी सय चीज। पत्र प्रवाल कद फं बीज ॥ अरु अपातुक जल भी लोय । लचित्त त्याग प्रतिमा.धर होय॥५॥ • रात्रिभुति-त्याग प्रतिमा स्वरूप-अडिल्लं छंद-मन बच तन कृत कारित अनुमोदै सही, नवविध मैथुन दिवस मांहि जो वर्जहीं। गरु तुर्विध माहार निशा माहीं तजै, रात्रिभुक्ति परित्याग प्रतिमा सो सजै॥६॥ TO . जन-ग्रन्थ-संग्रह -- - .. ब्रह्मचर्य प्रतिमा स्वरूप-चौपाई-पूर्वउक्त मैथुन नक भेद, सर्व प्रकार तज : निरस्नेय । नारि कथादिक भी परिहरे ब्रह्मचर्य प्रतिमा सो धरै ॥७॥ आरम्भ त्याग प्रतिमा स्वरूप-चौपाई--जो कछु अल्प बहुत अध काज। ग्रह संबंधी सो सयौं त्यान ॥ निरारंभ है वृष रत रहै, सो जिय अष्टमी प्रतिमा है ॥८॥ परिग्रह त्याग प्रतिमा स्वरूप-चौपाई-वनमान: परिग्रह अन्य । त्याग कर जो व्रतसंपन्न ॥ तामे पुनः मूर्छा परहरै, नवमी प्रतिमा सो भवि धरै॥६॥ अनुमत त्याग प्रतिमा स्वरूप-चौपाई-जो प्रमाण अघमय उपदेश देय नहीं पर को लवलेश ॥ मरुतसु अनुमोदन भी तजे । सोही दशमी प्रतिमा सजै ॥१०॥ उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा स्वरूप--चौपाई-ग्यारह थान भेद है.' दीय । एक छुल्लक इक ऐलकं सोय । खंड वन घर प्रथम सुजान । युतकोपीनहि दुतिय प्रछान ॥ ११ ॥ ए गृह त्याग मुनिन दिंग रहै। वा मठ मंदिर में निवस हैं। उत्तर उदंड उचित आहार । कहि शुद्ध अंबायन यार । दोहा-इम सय प्रतिमा एक दश, दौल देशवतं यान। ग्रह अनुक्रम मूल सह, पाले भयि सुखदान ॥ श्रावक के सत्रह नियम। १ भोजन, २ चित्त वस्तु. ३ गृह, ४ संग्राम, ५ दिशा- गमन, ६ औषधिचिलेपन, तांबूल, पुष्पलुगंध, नाच, १० गीतश्रवण, ११ स्नान, १२ ब्रह्मचर्य, १३ माभूषण, १४ चत्र, १५. शय्या, १६ चौपधिखाणी, १७ घोड़-बैलादिक की सवारी। .

जैन-प्रन्य-संग्रह। नोट- इनमें से हर रोज जिस जिसकी जबरत हो उसका प्रमाण रखे कि आज यह करूंगा। बाकी का प्रतिदिन त्याग किया करे। सप्त.व्यसन का त्याग। १जुआ, २ मांस, ३ मदिरा, ४ गणिका (रंडी), ५ शिफार, ६ चोरी, ७ पर-स्त्री। बाईस अभक्ष्य का त्याग। . पांच उदम्बर- १ उम्बदर (गूलर),२ कठूम्बर, ३ बड़फल, ४ पीपल- फल, ५ पाकरफल (पिलखनफल)। तीन मकार- १ मांस, २मधु, ३ मदिरा। नोट-इन तीनों को तीन मकार इस कारण से कहते हैं कि इन तीनों नामों के शुरू में 'म' है। बाकी चौदह यह है १ ओला, २ बिंदल, ३ रात्रि-भोजन, .४ बहुवीक्षा, ५.बैंगन, ६ अचार, ७ बिना जाने फल (अनजान), ८ कन्दमूल, ६ माटी, १० विष, -११ तुच्छफल, १२ तुषार (वरफ), १३ चलितरस, १४ माखन। नोट- उदम्बर, ३मकार, १४ दूसरे वाईस अमक्ष्य कहाते हैं। .

जैन-प्रत्य संग्रह।
श्रावक के नित्य षट् कर्म ।
पट् नाम का है। १ देवपूजा, २ गुरुसेषा, स्वाध्याय,
४ संयम, ५ तप, ६दान । यह कर्म श्रावक के नित्य करने
के हैं।
.
सामायिक भाषा पाठ।
.
[पं० महाचंद्रजी कृत]
अथ प्रथम प्रतिक्रमण कर्म
काल अनंत म्रन्यो जग में सहिया दुख मारी।
जन्ममरण नित किये पाप को अधिकारी।
कोड़ि भवांतर माहिं मिलन पुर्लभ सामायक ।
धन्य आज मैं भयो योग मिलियो सुखदायक ॥१॥
हे सर्व जिनेश किये जे पाप तु मैं अय।
ते सब मनवचकाय योग की गुप्ति बिना लम।
थाप समीप हजूर मांहिं मैं खड़ो बड़ो सब।
दोष कहं सो सुना करो नठ दुःख देहि जव ॥२॥
क्रोध मान मद लाम मोह माया-पशि प्रानी।
दुःख-सहित जे किये या तिनकी नहिं मानी।
बिना प्रयोजन एकेंद्रिय विति चउपदिय ।
माप प्रसादहि मिट शेष जो लग्यो मोहि जिय ॥३॥

जैन-न्य संग्रह। मापस,मैं इक गेर यापि करि जे दुख दीने । पेलि दिये पग तळे दावि करि प्राण हरीने । आप जगत के जीव जिते तिन सक्के नायक। अरज करौं मैं सुनो दोष मेटो दुखदायक ॥४॥ मंजन आदिक चोर महा धनघोर पापमय । तिनके जे अपराध भये ते क्षिमा तिमा किया। मेरे जे अव दोष भये ते संमों दयानिधि । यह पडिकोणी किया आदि षट्कर्म मांहि विधि अथ द्वितीय प्रत्याख्यान करें। जो प्रमाद-वशि होय विराधे जीव घनेरे। तिनको जो अपराध भयो मेरे अघ ढेरे। सो सब झूठो होय जगतपति के परसादै । जा प्रसाद मिलै सर्पसुख दुःख न लाधै ॥६॥ मैं पापी निर्लज दया करि होन महाशठ । किये पाप अति घोर पापमति होय चित्त दुठा निंदू हूँ मैं वारवार निज जिय को गरई। सब विधि धर्म उपाय पाय फिर पापहि करहूँ ॥७॥ दुर्लभ है नर-जन्म तथा श्रावक-कुल भारी। सतसंगति योग धर्म जिन श्रद्धाधारी। जिनवचनामृतधार समावर्त जिनवानी। तौह जीव संहारे धिक् धिक् धिक् हम जानी HER इंद्रिय लम्पट होय खोय निज शान जमा सव.। अज्ञानी जिम.करे तिसी विघ.हिंसक. वैभव जैन-प्रन्य संग्रह। १६ गमनागमन करतो जीव . पिराधे भोले। ते सब देय किये निन्, अब मन वच तोले ॥६॥ मालोचन-विधि थकी दोप लागेजु घनेरे। ते सब दोप विनाश होउ तुम ते जिन मेरे। चार बार इस भांति मोह मद शेप कुटिलता। ईदिकते मये निदिये जे भयमीता ॥१०॥ orpor श्रय तृतीय सामायिक कर्य। सर जोधन में मेरे समता भाव जग्यो है। सप जिय मोसम समतां राखो भाव लग्यो है। आर्त रोद द्वय ध्यान दि करिई सामायक। संयम मो कब शुद्ध हाय यह भाव वधायक ॥११॥ पृथिवि जल अरु अग्नि वायु चउ काय वनस्पति । पंचहि पावरमांदि तथा त्रस जीव यसै जित । चेद्रिय तिय च पंचेद्रिय माहितीष सय। सिन ते क्षमा फराज मुझपर क्षमा करे अय ११२॥ इस अवसर में मेरे सब सम फंचन सर नण। महल मसान समान शत्रु अब मित्राहि समगण ! जामन मरण समान जानि हम समता कोनी। सामायिक का काल जिते यह भाव नयीनों ॥१३॥ मेरो हक मातम तामें ममत तु कोनी। और सबै मम मित्र जानि समतारस भोनी मात पिता सुत घंधु मित्र तिय आदि सवै यह। मा न्यारे जानि जयारय रूप शर्यो गह Un

२० .
जैन-प्राय संग्रह।
.
मैं अनादिजग-नाल माहि फैसि रूप न जाण्यो।
एफेंद्रियदे आदि जंतु को प्राण हराण्यो।
ते मंद जीव समूह सुनो मेरी यह मरजी ।
भव भव को अपराध क्षमा कोज्यो करि मरजी १५
भय चतुर्थ स्तवन कर्म ।
नम् ऋषम जिनदेव मजित जिन जीत फर्म को।
संभव भव दुःखहरणकरण अभिनन्द शर्म को
मुमति सुमतिदातार तार भवसिन्धु पारकर।
पमप्रम पनाम भानि भवभीति प्रीतिघर ॥१६॥
श्रीसुपार्श्व तपास नाश भव जास शुद्ध कर ।
श्रीचंद्रप्रभ चंद्रकांति सम देह कांति घर म
पुष्पदंत दमि दोषकोश मवि पोष रोषहर।
शीतल शीतल करन हरन भव ताप दोपहर १m
श्रेयरूप जिन श्रेय धेय नित सेय भन्यजन ।
वासुपूज्य शतपूज्य वासवादिक भव भय हनम
विमल विमल मति दैन अन्त गत है अनन्त जिन ।
धर्म शर्म शिवकरन शांति जिन शांति विधायिन ॥१
कुन्थु कुन्धु मुखजीवपाल अरनाथ जाल हर ।
मल्लि मल्लसम महिंमलं मारण प्रचार धर।
मुनिसुव्रत व्रतकरण नमत सुर संघहि नमि जिन ।
नेमिनाथ जिन नेमि धर्मरथ मांहि ज्ञान धन ॥ १९ ॥
पार्श्वनाथ जिन पार्श्वउपलसम मोक्षरमापति।
बर्द्धमान जिन नम्बम् भवदुःख कर्मकृत ।
या विधि मैं जिन संघरुप.चडवोस:संख्यधर ।
स्तऊं नमूह कार पारी शिव मुखकर ॥२०॥

जैन-अन्य संग्रह। २४ भय पंचम.वंदना कर्म। बईमैं जिनधीर धीरं महावीर सु सन्मति । बमानं अतिवीर बंदिहों मनवचतनकृत ॥ त्रिशलातनुज महेश धीश विद्यापति बंदूं। बन्द नितप्रति फनकरुपतनु पाप निकंदू ॥२१॥ सिद्धारथ मपनंद द्वन्द दुख-दोष मिटावन । दुरित दवानल ज्वलित ज्याल जगजीव उधारन । कुंडलपुर करि जन्म जगतजित मानंदकारन । वर्ष वहरि मायु पाय सरही दुख टारन ॥२२॥ सप्त हस्त तनु तुंगभंग कृत जन्म मरण भय । बालब्रह्ममय ज्ञेय हेय आदेयं ज्ञानमय । दे उपदेश उघारि तारि भवसिंधु जीवधन भाप बसे शिवमाहिं ताहिबंदी मनवचतन ॥२३॥ बाके बंदन थकी दोष दुख दूरहि नावै । जाके बंदन यकी मुक्ति तिय सन्मुख आई। जाके बदन थकी वंद्य हावै सुरगन के। ऐसे वीर जिनेश बंदिई क्रमयुग तिनके ॥२४॥ सामायिक षट् कर्म माहि बंदन यह पंचम । बंदे वीर जिनेंद्र इंद्रशतवंध बंध मम । जन्म-मरण भय हरो करो अघ शांति शांतिमय । मैं अधकोश सुपोप दोष को दोष विनाशय ।स . भय षष्ठम कायोत्सर्ग करें। कायोत्सर्ग विधान के अंतिम सुखदाई। कायंत्यजन 'मयं हाय काय सबको दुखदाई॥

२२
जैन-न्य संग्रह
पूरख दक्षिण नमू विश पंभिम उत्तर में।
जिन-गृह बंदन करहरूभव पाप-तिमिरं मैं ॥२६॥
शिरोनती मैं कर नमू मस्तक कर धरि के।
आव दिक क्रिया कर्क मन वव मद हरि कैं:
तीन लोक जिन भवन माहि जिन है तु अकृत्रिम
कृत्रिम हैं द्वयबर्दद्वीपमाही : बंदों जिम 120
आठकोडिपरि उप्पन लाबजुसहस सत्याणु।
चारिशतकपरिं असी एक जिनमंदिर जाएं।
व्यंतर ज्योतिषमाहि संख्यरहिते जिनमंदिर।
जिन-गृह बंदन फर हरहु मम पाप संघकर ॥ २८॥
सामायिक सम नाहिं और कोड बैर मिटायक।
सामायिक सम नाहि और कोड मैत्रीदायक।
श्रावक अणुव्रत आदि अंत सप्तम गुणथानक !
यह आवश्यक किये होय निश्चयं दुबहानक ॥२६॥
जे भवि बातम काजकरण उद्यम के धारी।
ते सब काज विहाय करो सामायिक सारी।
राग दोष मद मोह कोष लोमादिक जे सव।
बुध महाचंद्र बिलाय जाय तातै कोयो भव ॥२०॥
रविवाणांविर्क मार्ग पर वाह
.
श्रीअमितगति प्राचार्य विरचित
(सामायिक पाठ संस्कृत)।
सखेषु मैत्री गुणिषु-प्रमोद, क्लिषु जोवेषु कपापरत्वम् ।
माध्यस्थमावं विपरीतवृत्ती, सदा ममात्मा विदुधातु देव ॥१॥

जैग-ग्रन्थ-संग्रह। २३ शरीरतः क मनमन्तशक्ति, विमिधमात्मानमपास्तदोषम् । जिनेन्द्र कोपादिवसायाधि, तव प्रसादेन ममास्तु शक्तिः ॥२॥ दुःख सुखे वैरिणि बन्धुवर्ग, योगे पियोगे भवने वने वा। मिराहताशेषममत्वबुद्ध, समं मतो मेऽस्तु सदापि नाथ ॥३॥ मुनीश!लीनाविव कीलिताविव, स्थिरी निशाताविव विम्वताविव पादौ त्वदीयो मम तिष्ठतां सदा, तमोधुनानी हदि दीपकाविव ४॥ एकेन्द्रयाद्या यदि देव देहिनः, प्रमादतः संचारता इतस्ततः। क्षता विमिमा मलिता निपीड़िता, तदस्तु मिय्या दुरनुष्टितं बदायू विमुकमार्गप्रतिकूलवर्तिना, मया कषायक्षवशेन दुधिया। चारित्रशुद्धर्यदकारि लोपन, तदस्तु मिथ्या मम दुष्कृतं प्रभो ॥६॥ चिनिन्दनालोचनगईरह, मनीषचाकायकषायनिर्मितम् । निहन्मि पापं भवदुःखकारणं मिषग्विष मन्धगुणैरिवाखिलम्॥७॥ मतिकम यं विमतेय॑तिक्रम, जिनातिवारं सुचरित्रकर्मणः । व्यधादनाचारसपि प्रमादता, प्रतिक्रमं तस्य करोमि शुद्धये ॥ क्षतिं मनःशुद्धिविधेरतिक्रम, व्यतिक्रमं शीलवतेविसंघनम् । प्रमोऽतिचारं विषयेषु वर्चनं, बदन्त्यनाचारमिहातिशतिताम् राधा यंदर्यमावापदवाक्पहीन, मया प्रनादाद्यदि किञ्चनाकम् । तम्मे क्षमित्वाविदधातु देवी, सरस्वती केवलयोधलब्धिः ॥१०॥ बोधिः समाधिः परिणामशुद्धिःस्वात्मोपलब्धिः शिवसौल्यसिद्धिः चिन्तामणि चिन्तितवस्तुदाने, त्वां पंद्यमानस्य ममास्तु देवि॥११॥ यः स्मयंते सर्ध्वमुनीन्द्रवृन्द, या स्तूयते सर्वनरामरेन्द्रः। यो गीयते घेद पुराणशा, स देवदेवी दये ममास्ताम् ॥१२॥ यो दर्शनशानसुखस्वभावः, समस्तसंसारविकारवाह। समाधिगम्यः परमात्मसंज्ञः,.स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥१॥ .

२. जैन-अन्य संग्रह निषूदते यो भवदुःखजालम, निरीक्षते यो जगदन्तरालम् । योऽन्तर्गतो योगिनिरीक्षणीयः, संदेवदेवो हदये ममास्ताम्॥१४॥ विमुक्तिमार्गप्रतिपादको यो, यो जन्ममृत्युज्यसनावंतीतः।' त्रिलोकलोकी विकलोऽकलङ्कः स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥१५॥ क्रीड़ीकृताशेषशरीरिवर्गाः, रागादयो यस्य न सन्ति दोषाम। निरिन्द्रियो ज्ञानमयोऽनपाय:, स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥१६॥ यो व्यापको विश्वजननीनवृत्तः सिद्धो विबुद्धो धुतकर्मबन्धः। ध्यातो धुनीते सकलं विकार, स देवदेवो हृदये. ममास्ताम् ॥१०॥ न स्टश्यते. कर्मकलङ्कदोषः, यो ध्वान्तसधैरिव तिम्मरश्मिः ! निरञ्जनं नित्यमनेकमेक, d देवमाप्तं शरणं प्रपद्य ॥१॥ विभासते यत्र मरीचिमाली, न विद्यमाने भुवनावभासी। स्वात्मस्थित बोधमयप्रकाशं तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥१६॥ विलोक्यमाने सति यत्र विश्वं, विलोक्यते स्पष्टमिदं विवचम् । शुद्धं शिवं शान्तमनायनन्तं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥२०॥ येन क्षता मन्मथमानमूर्छा, विषादनिद्रामयशोकचिन्ता । : क्षयाऽनलेनेव संरुप्रपञ्च, स्तं देवमात शरणं प्रपद्य ॥२१॥ नसंस्तरोऽश्मानतृणम् नमेदिनी,विधानतोनाफलकोविनिम्मितम् यता निरस्ताक्षकषायविद्विषः, सुधीमिरात्मैव सुनिर्मलोमत्ता५२ न संस्तरी भद्रसमाधिसाधन, न लोकपूजा न च संघमेलनम् । यतस्ततोऽध्यात्मरतो मवानिशं,विमुच्य सामपिवाह्यवासनाम नसन्ति बांझा मम केचनार्थाः, भवामि तेषां न कदाचनाहम् । इत्यं विनिश्चित्य विमुच्य बाह्य, स्वस्थः सदा त्वं भवभद्र मुतये आत्मानमात्मन्यविलोक्यमानस्त्वं दर्शनशानमयो विशुद्धः। एकाग्रचितः खलु पत्र तत्र स्थितोपि साधुर्लभते समाधिम्॥२४॥ . ... ..

ज-मन्य संग्रह। २५ एकः सदा शावति को ममात्मा. विनिर्मवसाधिणमस्वभावः। पहिर्मवा: सन्स्यपरे समस्ता, न शाश्वताः कर्ममवाः स्वकीया:२६ यस्यास्ति नैवं वपुषापि साद, तस्यास्ति कि पुत्रकलत्रमित्रः। पृयकृते धर्मणि रोमकूपाः, कुतो हि तिष्ठन्ति शरीरमध्ये ॥२७ संयोगितो दुःखमीकमेदं यतोऽमु तेजन्म बने शरीरी। ततनिधासौ परिवर्जनीयो, यियासुना निवृतिमात्मनीनाम् ॥८॥ सर्ष निराकृत्य विकल्पजालं, संसारकान्तारनिपातहेतुम् । विवळमात्मानमवेक्ष्यमानी, निलीयसे त्वं परमात्मत्वे ॥२॥ स्वयं कृतम् कर्म यदात्मना पुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभम् । परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुट, स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा ३०n निजाजितं कर्म विहाय देहिनो, न कोपि कस्यापि ददाति किंचन विचारयमेवमनन्यमानसः, परो ददातीति विमुच्य शेमुपीम् ॥३१॥ यो परमात्माऽनितगतिवन्या, सर्वविविको भूशमनवद्यः । शश्वदधीने मनसि लभन्ते, मुक्तिनिकेतं विभववरं ते ३॥ इति द्वात्रिंशतावृत्ती, परमात्मानमीमते । योऽनन्यगतचेतस्को, यात्यसौ पदमव्ययम् ॥३३॥ दर्शन-पाठ। अनादिनिधन महामन्त्र। गाया। णमो, अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो भाइरीयाणं। णमो उवभावाणं, णमो लाए सव्यसाहुणे ३१॥

२६ जैन-अन्य संग्रह। . की मन्दिरपी की वेदी गाने प्रकार की "अब पर्व भय मिति, निशात निरहिस प्रकार प्रचार करने मोकार सम्मकार बार पाटकरवत्परषाद- चत्तारि मंगलं-भरहंत भंगलं । सिद्ध मंगलं । साहू मंगलं । केवलिपएणचो धम्मो मंगलं ॥१॥ चत्तारि लोगुत्तमा. अरहंत लोगुत्तमा । सिद्ध लोगुचमा । साहू लोगुत्तमा। केव- लिपण्णचो धम्मो लोगुत्तमा ॥२॥ चचारिसरणं पध्वजामि- अरहंत सरणं पव्वंजामि । सिद्ध सरणं पव्वजामि । साहू 'सरणं.पव्वजामि। केवलिपएणतो धम्मो सरणं पव्वजामि। ॐ झौ झी स्वाहा । वहां पर चौबीसवीर्यकरी पान सेना पाहिए। गारमें काल सम्बन्धिचतुर्विशति तीर्थकरेभ्यो नमोनमः। अद्य में सफले जन्म नेत्रेचसफले मम । स्वामद्राक्षं यतो देव हेतुमक्षयसम्पदः ॥ १॥ अद्य संसार गम्मीर पारावार सुदुल्तरः। सुतरोऽयं क्षणेनैव जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥२॥ प्रद्य मे क्षालितं गात्र नेत्रेच विमले कते। स्नाताई धर्मतीर्थेषु जिनेन्द्र तव. दर्शनात् ॥३॥ मद्य मे सफलं जन्म प्रशस्तं सर्वमङ्गलम् । संसारार्णवतीर्णोऽहं जिनेन्द्र तव दर्शनाद un मद्य कर्माष्टकज्वालं विधूतं सकषायकम् । दुर्गतेर्विनिवृतोऽहं जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥५॥ - जैन-प्रन्यं संग्रह। . अद्य सौम्या गृहाः सर्वे शुमाश्चैकादशस्थिताः। अष्टानि विवजालानि जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥६॥ मद्य नहो महाबन्धः कर्मणो दुःखदायकः । सुखसङ्ग समापनो जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥७॥ अद्य कर्माष्टक नष्ट दुस्खोत्पादनकारकम् । सुखाम्भोधिनिमनोऽहं जिनेन्द्र तव दर्शनात् ।। अंधमिध्यान्धकारस्य इन्ता मानदिवाकरः। उदितो मच्छरीरेऽस्मिन् जिनेन्द्र तव दर्शनाद ॥३॥ मद्याहं मुफ्ती भूतो निघूताशेषकल्मषः । भुवनवयपूज्योऽहं जिनेद्र तव दर्शनात् ॥१०॥ चिदानन्दैकरूपाय जिनाय परमात्मने। परमात्मप्रकाशाय नित्यं सिद्धात्मने नमः ॥११॥ भन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम । तस्मात्कारुण्य भावेन रक्ष रक्ष जिनेश्वर ॥१२॥ न हि त्राता न हि त्राता न हिप्राता जयनये। वीतरागात्परो देवो न भूतो न भविष्यति ॥ १३॥ जिने भक्तिर्जिने भकिर्जिने भक्तिर्दिने दिने । : सदा मेऽस्तु सदा मेऽस्तु सदा मेऽस्तु भवे भवे ॥१४॥ जिनधर्मविनिर्मुक्तम् मा भवन चक्रवर्त्यपि। स्यांवेटोऽपि दद्धिोऽपि जिनधर्मानुवासितम् ॥ १५॥ तपाठमोसवरमाशंग मनस्वारपरला पाविमनस्वारी प्रसाद प्रपन लिये पांवल पढ़ाना हो वो गीचे तिखा खोप यात्र पढ़कर पड़ावे. मपारसंसारमहासमुद्रमोत्तारणे प्राज्यतरीम्सुमक्त्या । दीर्धाक्षतार्धवलासंतीधैर् जिनेन्द्रसिद्धान्तयतीन् यजेऽहम् ॥१

जैन-अन्य संग्रह।
२८
*जैही भक्षयपदप्राप्तये देषमात्रगुरुभ्यो मतान् निर्वामि।
परिपुष्पोरेश्वर पवारों को परे सिवा सोधीर
पारड़ावे.
विनीतमव्याजषियोधवान् पर्यान सुचर्याकथनकधुन् ।
कुन्दारविन्दप्रमुखैः प्रसूनैर् जिनेन्द्रसिद्धान्तमतीन यजेऽहम् ॥RH
ह्रौं कामबाणविध्वंसनाय देवशालगुरुभ्यः पुष्पं फल
निर्वपामि॥
बदि विपीको साग, बादाम, सावनीमा रात
पहावा हो. वो नीचे विधा सोपोर पावर पहाये,
तुभ्यद्विलुम्यन्मनसाऽप्यगम्यान कुवादिवादाऽस्खलितप्रभावान
फलैरलं.मोक्षफलामिसार जिनेन्द्रसिंबान्तयतीन् यजेऽहम् ॥३
हो मोक्षफलप्राप्तये देवशालगुरुभ्यः फळं निर्षपामि ।
गदि विसीको वर्ष पढ़ाना से वो नीचे सिवा रतीब र
बोलकर पढ़ावापारिक
:. .. सद्वारिंगन्धाक्षतपुष्पजातैर् नैवेद्यदीपालघूपधून।
फविचित्रैर्धनपुण्ययोग्यान जिनेन्द्रसिद्धान्त यतीन यजेशन
ॐही अनर्यपदप्राप्तये. देवशालगुरुभ्योऽध :समर्पयामि ।
उपयुक चार प्रकार के द्रव्यों में से जो द्रव्य हो
उसी द्रव्य का लोकंच मंत्र पढ़कर यह द्रव्य चढ़ाना चाहिए।
तत्पश्चात् नीचे लिखी स्तुति पढ़ना चाहिए।
,

जैन-न्य संग्रह। t दौलतराम कृत-स्तुति । दोहा। . सकल-जय-बायक तदपि, निजानंद रखलीन । सो जिनेन्द्र जयवंत नित, मरि रजरहस विहीन । पद्धरि छन्द। जय वीतराग विज्ञानपूर । जय मोह तिमिर को हरन सूर। नपान अनंतानंतधार। दूगमुख बीरज मंडित अपार ॥१॥ जय परमशांति मुद्रासमेत । भविजनको निज अनुभूतिहत । भवि भागनवश जागेवशाय । तुम धुनिह मुनि विभुम नशाय २॥ तुम गुणचिंतत निजपर विवेक । प्रघटै विघटें आपद अनेक । तुम जगभूषण दूषणवियुक्त । सव महिमायुक्त विकल्पमुक ॥३ भविरुद्ध शुद्ध चेतनस्वरूपं । परमात्म परमपावन अनूप ॥ शुभ अशुभविभावअभावकोना स्वाभाविकपरिणतिमयमछीन 18 अष्टादशदोषविमुक धीर । सुचतुष्टयमय राजत गंभीर । मुनि गणधरादि सेवत महंत नव केवललब्धिरमा धरंत ॥ तुम शासन लेय अमेय जीव । शिव गये जाँहिंजैहैं सदीय । भवसागर में दुब छारवारितारन को और न आप टारि ॥ यहलखि निजदुख गदहरण काज । तुमही निमित्तकारण इलाज। जानें, ताते मैं शरण आय! उचरों निज दुबजो चिर लहाय ॥ में प्रन्यो अपनपो विसरिमाप । अपनाये विधिफल पुण्य पाप। निजको परको करता पिछान । परमें मनिष्टता इष्ट ठानमा बारुलित भयो अज्ञानधारि।ज्यों मृग मृगतृष्णा जानि वारि ॥ सापयति में मापो चितार । कपन भनुभयो स्वपदखाया

३१
३
जैन-प्रन्य संग्रह।
-
..
तुमको विन जाने जो कलेशा पाये सो तुम जानत मिनेश।
पशुनारकनर मुरगतिमझारं भव घरघरमयो अनंतवार
अव काललन्धि वलत दयाल । तुव दर्शन पाय भयो खुशाल ।
मन शांतमयों मिटसकलद्दांचाख्योल्वातमरस दुखनिकंदर१५
तातै अव ऐसी करहु नाथ । विछुरै न कभी तुव चरण साथ.॥
तुन गुणगणको नहिं छेव देव । जगतारन को तुभबिरद्एव १२०
आतम के अहित विषय कषाय । इनमें मेरी परिणति न जाय।
मैं रहूं आपमें आप लीन ! सौ करों हो? ज्यों निजाधीन ॥१२॥
मेरे न चाह कुछ और ईश । रत्नत्रयनिधि दीजे मुनीश,
मुझ कारज के कारन सुआप ! शिव करहु हरहु मममोहतापर
शशि शांतकरन तपहरन हेत । स्वयमेव तथा तुंव कुशल देत ॥
पीवत पियूष ज्यों रोगजाय ।त्यों तुम अनुभव ते भवनलाया
त्रिभुवन तिहुंकाल मझार कोय । नहिंतुमदिन निजसुखदायहाय
मोउर यह निश्चय भयोमाजादुख जलधिउतारन तुमिजिहाजरा
दोहा।
तुम गुण गणमणि गणपती, गणतन पावहिं पार ।
दौल स्वल्पमति किमि कहै, नमूत्रियोग संहार।
इति दौलतरान व स्तुति ।
श्रीदर्शन पच्चीसी।
तुम निरखत मुझको मिली मेरों संपति आज।
कहा चक्रवति सम्पदा कहा स्वर्ग:साम्राज ॥१॥
तुम बंदत जिनदेवजी नित नव मंगल होय।
विन कोटि तत्क्षण टरें लहहिं सुयश सव लोय ॥२॥

जैम-अन्य संग्रह।
३.
...
तुम जाने बिन नाथजी एक स्वांस के मांहि ॥
जन्म-मरण ठारह किये साता पाई नाहि. ॥३॥
आन देव पूजत लहे दुःख नरक के बीच।
भूब प्यास पशु गत सही करो निरादर नीच ॥ ४॥
नाम उचारत सुख लहे दर्शन से अघ जाय।
पूजत पावे देव पद ऐसे हे जिनराय ॥५॥
बंदत हूं जिनराज मैं घर उर समता भाव ।
तन धन जन जग जाल से घर विरागता भाव ॥६॥
सुनो मरज हे नाथजी त्रिभुवन के आधार ।
दुष्ट कर्म का नाश कर बेगि करो उद्धार ॥७॥
याचत हूं मैं आपसे । मेरे जिय के मांहि ।
राग द्वष की कल्पना क्यों हूँ उपजे नाहि ॥
अति अद्भुत प्रभुता लखी पीतरागता माहि ।
विमुख होहि ते दुख लहें सन्मुख सुखी लखाहिं ॥३॥
कलमल कोटिक न रहें निरखत ही जिन देव ।
ज्यों रवि जगत जगत में हरै तिमर स्वयमेव ॥ १० ॥
परमाणू पुद्गल तणी परमातम संयोग ।
भई पूज्य सब लोक में हरे जन्म का रोग ॥११॥
कोटि जन्म में कर्म जो बांधे हते अनंत ।
ते तुम छवि अविलोकितें छिन में हो है अंत ॥ १२ ॥
आन नृपति किरपा करे तब कछु दे धन धान ।
तुम प्रभु अपने भक को कर लो आप समान ॥१३॥
यंत्र मंत्र मणि औषधी विषहर राखत प्राण ।
त्यो जिन छवि सबभ्रम हरे पर सर्व प्राधान ॥१४॥

जैन-प्रन्य संग्रह।
त्रिभुवन पति हो ताहि त छत्र विराजे तीन।
रा नाग नरेश पद रहे चरण आधीन ॥१५॥
सर्व निरखत भव आपने तुव भामंडल बीच ।
भ्रम मेटे समता गहे नाहिं सहे गति नीच ॥ १६ ॥
दोई ओर ढोरत अमर चौसठ घमर सफेद ।
निरखत ही भव को हरे भव भनेक को खेद ॥१७॥
तर अशोक तुव हरत है भवि जीवन का शोक।
आकुलता कुल मेटि के कर निराकुल लोक ॥५॥
अंतर बाहिर परिग्रह त्यागी सकल समाज ।
सिंहासन पर रहत हैं अंतरीक्ष जिनराज ॥१४॥
जीत भई रिपु माह ते यश सूचत है तास।
देव दुदुभि के संदा बाजे बजे अकास ॥२॥
बिन अक्षर इच्छा रहितं रुचिर दिव्य ध्वनि होय।
सुर नर पशु समझ सबै संशय रहे न कोय ॥२१॥
बरसत र त के कुसुम गुजत अलि चहुं ओर।
फैलत सुयश सुवासना हरषत भवि सब और ॥ २२ ॥
समुदवाव असतेग अहि अर्गल वंधु सग्राम ।
विघ्न विषम सयही टरै सुमरत ही जिन नाम ॥२३॥
श्रीपाल चंडाल पुनि अंजन भील कुमार ।
हायो हरि श्रहि सब तरे आज हमारी चार ॥ २४ ॥
बुध जन यह विनती करै हाथ जोड़ शिर नाय ।
जव लों शिव नहिं रहे तुव भक्ति हृदय अधिकाय ॥२५॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
२३
शान्तिनाथाष्टक स्तोत्र।
नाना विचित्रभव दुख रासी, नाना विचित्रं मोहान पांशी ।
पापानि दोपानिहरंति देवा, इह जन्म शरणे श्री शान्ति-
नाथं ॥१॥ संसार मध्ये मिथ्यात्व चिंता, मिथ्यात्व मध्ये
कर्मानि बद्धा ते वन्ध छेदन्ति देवाधि देवा, इह जन्मे भरणे
श्रीशान्तिनाथं ॥२ कामस्य क्रोधल्य माया त्रिलोचतु:
फपाय इह जन्म बन्धम् । ते.वन्ध छेदन्ति देवाधिदेवा, बह जन्म
शरणे श्रीशान्तिनाथं ॥३॥ जातस्य मरणं अवृतस्य वचनं
पर्सति जीवा बहु दुःख जन्म। ते वंध छेदन्ति देवाधि देवा,
इह जन्म शरणे . श्रीशान्तिनायं ॥४॥ चारित्र होने नर
जन्म मध्ये, सम्यक रसं प्रतिपाल यंति। ते जीव सीन्ति
देवाधि देवा, इह जन्म शरणे श्रीशान्तिनाथं ॥५॥ सूदु
वामहीने कठिनस्य चिन्ता, परजीव हिंसा मनसोच बंधा।
ते बंध छेदंति देवाधिदेवा, इह जन्म शरणे श्रीशान्तिनाथरीक्षा
परद्रव्य चोरी परदार सेवा, हिंसादि कक्षा अनुवस घं।
ते पंध छेदंति देवाधिदेवा, इह जन्म शरणे श्रीशान्तिनाथं ॥७
पुत्रानि मित्रानि कलत्र बंध, इह वध मध्ये बहु जीव बंध।
ते बंध छेदति देवाधि देवा, इह जन्म शरणे श्रीशान्तिनाथम् ॥
जपति पढ़ति नित्यं शान्तिनाथा विशुद्ध
स्तवन मधु गिरायां, पापतापाप हार
शिव सुख.निधि पोतं, सर्व सत्वानुक।
कृत मुनि गुणमई, सर्व कार्या सुनित्यं ।
दतियाग्निावस्वोष

जन-प्रन्य-संग्रह। : महाबीराष्टक स्तोत्र। कविवर भागचन्दनी कृत। 'शिखरली छन्द। यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचितः। सम मान्ति धौव्यं व्यय जनिलसन्तोऽन्तरहिता: गत्साक्षी मार्गप्रकटनपरी भानुरिवयो। शहावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (नः) ॥१ मताने यवक्षः कमलयुगलं स्पंदरहितम् जनाकोपापाय प्रकटयति वाभ्यन्तरमपि स्फुर्ट मूतिर्यस्य प्रशमितमयी वातिबिमला महरिम्मो नयनपंथगामी भवतु मे (न:) |२|| नमन्नाकेन्द्राली मुकुट मणिमाजाल जटिलं सत्पादाम्लभोज द्वयमिह यदीयं तनुभृतां भवज्वालाशान्त्यै प्रभवति जलं वा स्मृतमपि महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (न:) ॥३॥ यदर्चामांवेन प्रमुदितमना द१र इह क्षणादासीत्स्वर्गी गुणगणसमृद्धः सुखनिधिः लभन्ते. सद्भक : शिवसुखसमाज किमु तदा ? महावीर स्वामी नयनपथ गामी भवतु मे (न:) men कनस्वर्णामासोऽप्यपगततनुनिनिवही विचिंत्रामाध्येको नपतिवरसिंद्धार्थतनयः अजन्मापि:श्रीमान विगतभवरागोद्धतगतिर महावीरस्वामो.नयनपथगामी. भवतु मे (न) ॥५॥ यदीया वागड़ा विविधनयकल्लोलविमला वृहज्ञानाम्भोमिर्जगति जनतां या स्लपयति जैन-ग्रन्थ-संग्रह ३५ इदानीमप्येषा बुधजनमराली परिचिता महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (न:)॥६॥ अनिर्वायतकत्रिभुवनजयी कामसुभटः कुमारावस्थायामपि निजवलायन विजित: स्फुरनित्यानन्द प्रशम पद् राज्याय स जिनः महावीरस्वामी नयनपथगामो भवतु मे (न.) non महामाहातङ्कप्रशमनपरा कस्मिकमिषम् निरापेक्षो वन्धुर्विदित महिमा मङ्गलकरः शरण्यः साधूनां भवभयभृतामुत्तमगुणा महावीरस्वामी नयनपयगामी भवतु मे (न.) In महावीराष्टक स्तोत्रं । भक्त्या भागेन्दुना कृतम् । यः पठेच्छु,णु याचापिस । याति परमां गतिम् ॥६॥ इति महापीराष्टक स्तोत्रं समाहर प्रातःकाल की स्तुति। बीतराग सर्वक्ष हितकर भविजन की अब पूरो आस । ज्ञानभानु का उदय करो मम मिथ्यातम का हो अव नाश ॥१॥ जीवों की हम करुणा पाले मूठ वचन नहिं कहें कदा।। पाधन कचहुं न हरई स्वामी ब्रह्मचर्यव्रत रहे सदा ॥२॥ तृष्णा लोम चढ़े न हमारा तोप सुधा निधि पिया करें। श्रीजिन धर्म हमारा प्यारा.तिसकी सेवा किया करें ॥३॥ दूर भगावें धुरी रीतियां सुखद् रीतिका करें प्रचार । मेल मिलाप बढ़ावें हम सव धमाशतिका करें प्रचार Men सुखदुःश्व में हम समता धार रहें अचल जिमि सदा अटल। न्याय मार्ग को लेश न त्यागें वृद्धि कर निज आवमबल 12 ३६ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। अष्टकर्म जो दुःख देत हैं तिनके. क्षय का करें उपाय। नाम आपका जपें निरंतर विघ्न रोग सब ही टर जाया मातम शुद्ध हमारा होवे पाप मैल नहिं चढ़े कदा विद्या की हो उन्नति हम में धर्म ज्ञान हू बढ़े सदा॥७॥ हाथ जोड़कर शीस.नवावें तुमको भविजन खड़े खड़े । यह सव पूरो आस हमारी चरण शरण में आन पड़े। विमानपाल स्तुति समाप्त समाधि मरण। कवि यानतराय-कृत। चाल योगीरासा। गौतम स्वामी बन्दों नामी मरण समाधि मला है। मैं कब पाऊँ निशदिन ध्याऊँ गाऊँ वचन कला है। देव धरम गुरु प्रीति महा दृढ़ सात व्यसन नहिं जाने। त्यागि बाईस अमक्ष संयमी बारह व्रत नित ठाने ॥१॥ चक्को उखरी चूलि बुहारी पानी त्रस न विराधे। पनिज करे पर-द्रव्य हरे नहि छहों करम इमि साधे॥ पूजा शास्त्र गुरुग की सेवा संयम तप चहुं दानी। पर उपकारी अल्प अहारी सामयिक विधि ज्ञानी ॥ जाप जपे तिहुँ योग धरे दूढ़ तनकी ममता टारे। मन्त समय वैराग्य सम्हारे ध्यान समाधि विचारे। भाग लगै अरु नाव डुवे जव धर्म विधन ही आवे । चार प्रकार अहार त्यागि के मंत्र सु मन में ध्यावे ॥३॥ रोग असाध्य जहाँ बहु देखे कारण और निहारें। बात बड़ी है जो पनि आवे भार भवन को सारे। .

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २७ जोन ने तो घर में रह करि सवसो होय निराला। मात पिता सुत त्रिय को सोंपै निज परिग्रह अंहिकाला ॥ कछु चैत्यालय फछु श्रावक जन कछु दुखिया धन देई । क्षमा क्षमा सव ही सों कहि के मन की शल्य हनेई । शत्रुन सों मिलि निज कर जोरे मैं बहु करी बुराई। तुम से प्रीतम को दुख दीने ते सब बकसो भाई ॥५॥ धन धरती जो मुख सो मांगे सो सव दे संतोषे । छहो कायके प्राणी ऊपर करुणा भाव विशेषे ॥ बैंच नीच घर बैठ जगह इक कछु भोजन कछु पेले । दूधा धारी क्रम क्रम तजि के छाछ अहार पहेले ॥६॥ छाछ. त्यापिके पानी राखे पानी तजि संथारा। भूमि माहि थिर आसन मांडे साधी ढिग प्यारा ॥ 'अब तुम जानो यह न जपै है तब जिनवानी पढ़िये। यो कहि मौन लियो संन्यासी पंचं परम पद गहिये Ru चौ आराधन मन में ध्यावे वारह भावन भावे । दशलक्षण मन धर्म विंचारै रत्नत्रय मन ल्यावै॥ 4तिष सोलह षट् पन चौ दुई इक वरन विचार। फायां तेरी दुख की ढेरी धानमयी तू सारे ॥८॥ अजर अमर निज गुण सों पूरे परमानन्द सुभावे । आनंद कन्द चिदानंद साहव तीन जगतपति ध्यावे॥ क्षुधा तृषादिक होइ परीषह सह भाव सम राखै । बतीचार पांचो सब त्यागे ज्ञान सुधारस चाखै ॥६॥ हाड मांस संबसूखि जाय जंव धरम लीन तन त्यागें। असुन पुण्यं उपाय स्वर्ग में सेज उठे ज्यों जागे । सह मावे शिवपद पावे बिलसे मुक्ख अनन्तो। 'धानत' यह गति होय हमारी जैन धरम जयवन्तो १०॥

३८
जैन-प्रन्य-संग्रह।
.
भूधरदासजी-कृत बारह भावना।
दोहा।
राजा राणा छत्रपति, हायिन के असवार ।
मरना सबको एक दिन, अपनी अपनी वार ॥१॥
दलवल देई देवता, भात पिता परिवार ।
मरती विरियां जीव को, .कोई न राखन हार ॥२॥
दाम विना निरधन, दुखी, तृष्णा..पश धनवान ।
कई न सुख संसार में, सब जंग, देख्यो छान ॥३॥
आप अकेला अवतरै, मरे, अंकेला होय ।
यो कबहुं या जीव को, साथी सगा न कोय ran
जहां देह अपनी नहीं, तहां न अपनो कोय।
घर संपति पर प्रकट ये, पर हैं परिजन लोयं ॥५॥
दिपै चांम चादर मढ़ी, हाड़ पीजरा देह ।
भीतर या सम जगत में, और नहीं निगेह ॥१॥
सोरग।
मोह नींद के जोर, जगवासी घूमैं सदा ।
कर्म चोर चहुँ ओर, सरबस लूट सुधि.नहीं ।
सतगुरु देय जगाय, मोह नीद जब उपशमै ।
सब कुछ बनै उपाय, कर्मचार आवत के
दोहा।
ज्ञान-दीप तप तेल भर, घर शोधै अम छोर ।
या विधि बिन निकसे नहीं, पैठे पूख चोर ॥६॥
पंच महावत संचरन, समिति पंच परकार।
प्रबल पंच 'द्रियविजय, धार निर्जरा सार ॥१०॥

जैन-प्रन्य-संग्रह। १३ चौदह राजु उतंग नम, लोक पुरष संठान । तामें जीव अनादित, भरमत बिन ज्ञान ॥११॥ जाचे सुरतरु देय सुख, चितत चिंता रैन । विन जाँचे विन.चिंतये, धर्म सकलं सुख दैन ॥१०॥ धन कन कंचन राजमुख, सबहि सुलभ करंजान । दुर्लभ है संसार में, एक, जथारथ शान ॥१३॥ इविचारह भावना . सायंकाल की स्तुति। सर्वज्ञ ज्योतिमय गुणमणि बालक जन पर करहु दया । कुमति निशा अंधयारी कारी सत्य-झान रवि छिपा दिया ॥१॥ क्रोध मान अरु माया तृष्णा यह बट मार फिरें चहुँ ओर। लूट रहे जग जीवन को यह देख अविद्या तम का जोर ॥२॥ मारण हमको सुझे नाही ज्ञान विना. सब अंध भये । घट में आप विराजो स्वामी बालक जन सब खड़े नये ॥३॥ सत्पथ दर्शक जन-मन हर्षक घट. घट.अंतरयामी हो.। श्रीजिनधर्म हमारा प्याय तिसके तुम ही स्वामी हो॥४॥ घोर विपत में आन पड़ा है मेरा बेड़ा पार करों। शिक्षा का हो घर २ आदर शिल्प-कला संचार करो॥५॥ मेल मिलाप बढ़ावें हम सब द्वेष भाव हो घटाघटी। नाहि सतावे किसी जीव को प्रोत . क्षौर की गटांगटी॥६॥ मातपिता अरु गुरुजन की हम सेवा निशदिन किया करें। स्वारथ तजकर सुख दें पर को आंशिश सबकी लिया करें। आतम शुद्ध हमारा होवे पास मैल नहि.. चढ़े, कदा। विद्याको हो उन्नति हममें धर्म शान. बढ़े, सदा ॥८॥ . -

जैन-प्रन्य-संग्रह।
दोऊ कर जोड़ें बालक ठाड़े कर, प्रार्थना सुनिये नाथ ।
सुख से बोते रैन हमारी जिन मत का हो शीघ्र प्रभात ॥ER
मान पिता की आहा पाल गुरु की. भकि धरै उर में।
रहें संदा हम कर्तव तत्पर उन्नति कर दें पुर पुर में ॥ १०॥
प्रभाती।
(१)
वन्दों जिनदेव सदाचरण कमल तेरे। जा प्रसाद
सकल फर्म छूटर अघ मेरे ॥ टेक॥ ऋषम अजित संभव
अमिनन्दन केरे। सुमति पद्मश्री श्रीसुपार्श्व चन्दा प्रभू वेरे
॥१॥ पुष्पदन्त शीतल श्रेयांस गुण घनेरे । वासपूज्य विमल
अनन्त धर्म जग उजेरे ॥२॥ शान्ति कुथ अरह मल्ल मुनि-
सुव्रत. केरे। नमि नेमि पार्श्व प्रभू महावीर मेरे ॥३॥ लेत
नाम अष्टजाम छूटत भाव केरे । जन्म पाय यादौराय वरनन
के चेरे॥४॥..
(२)
ताण्डवसुरपति ने जहांहर्ष भावधारी ॥ टेक | रुन्ड:
रान्ड रुन्ड नूपुर ध्वनि छुमकिं २ पैंजनि पग मुनि मुनि मुनि
किन छबि लागत अति प्यारी ॥१॥ अनननन.सार.. दानि
सननननन किनरान अपघंध गंधर्व सर्व देत तहां तारी॥२॥
पंपंपंपग झपाट फफफफननननन वं मृदङ्ग वाजे बीना
ध्वनि सारी॥३॥ अददंद विद्याधर दिदि-दि दिदि देव
संकलं दास भवानी ज्यों कहें जिनं चरणन बलिहारी ॥४॥

जैन-प्रन्ध-संग्रह। . अद्भुत महिमा अपार सुनियत प्रभू तेरी ॥ टेक ॥ भव वधि गहिरो अपार कैसे के लगों पार डूबत हों मामधार यांह गहो मेरी॥१॥ आरत मोहे लगो ध्यान जप तप नहि पेत झान यातें करुणा निधान फिकर मो धनेरी॥२॥ प्रभू बीजे दयाल विनती यह सुनो हाल फर्म के सुकटें जाल मिटे जगत फेरी॥३॥ विधन सघन वेग टरें मेरे सब काज, सर वाजुराय अर्ज करें सुनो नाथ मेरी ॥४॥ स्तोत्र.द्यानतराय-कृत। [भुजंग प्रिया छन्द] नरेन्द्र फणीद्र सुरेन्द्र अधीश। शतेन्द्र सु पूज मजें नाय यीसं । मुनीन्द्र गणेद्रं नमैं जोड़ हाथं । नमो देव देवं सदा पार्श्वनाथं ॥१॥ गजेंद्र मृगेन्द्र गहो तू छुड़ावे । महा आग ते नाग ते तू बचावे । महा वीर ते युद्ध में तू जितावे। महा-रोग ते बन्धाते.तू खुलावे.॥शा दुखी दुःखका सुखी मुक्खकर्ता । सदा सेवकों की महानन्द भर्चा हरे यक्ष राक्षस भूतं पिशाचं । विर्ष डाकनी विघ्र के भय अवाचं ॥ दरिद्रीन को.द्रव्य के दान दीने। अपुत्रोन को ते भले पुत्र कीनें । महा सकटों से निकाले विधाता । सवे सम्पदा सर्व को देहि दाता ,४॥ महा चोर का वज्र का भय निवार, महा पवन के.पुंजवे तू उबारे । महा क्रोध की अग्नि की मेघ धारा । महा लोम- शैलेश को बन.मारा. ॥५.महा. माह बंधेरको शान भानु महा कर्म कान्तार को दोप्रधान । n ५२. जैन-प्रत्य-संग्रहा. किये नाग नागिन अघः लोक स्वामी । हरी मान तू दैत्य को हो अकामी ॥६॥ तुम्ही कल्पवृक्ष तुही कामधेनुं । तुही दिव्य चिन्तामणी नाग एवं । पशू नर्क के दुःख सेतु छुडावे । महा स्वर्ग में मुक्ति में तू वसावे ॥७॥ करें लोह को हेम पाषाण नामी। रटेनाम सो क्यों न हो मोक्षगामी। कर सेव ताकी करे देव सेवा । सुने बयन सोही लहै शान मेवा ॥३॥ जपें जाप ताको नहीं पाप लागे। धरे ध्यान ता के सवे दोष भाजे । विना तोह नाने धरै भव घनेरे। तुम्हारी कृपा से सरे काल मेरे ॥६ दोहा-गणधर इन्द्र न कर सके तुम विनती भगवान । द्यानत प्रीतं निहार के कीजे आप समान ॥१०॥ ; वैराग्य भावना। दोहा। बीज राखः फल भोगवे, ज्यों किसान जगमाहि । त्यो चक्री सुख में मगन, धर्म विसारै नाहिं । योगीरासा वा नरेन्द्र छन्द । : इस विधि राज्य करै नर नायक, मागे पुण्य विशाल । सुख सागर में मग्न निरंन्तर, जात न जानो काला एक दिवस शुभ कर्म योग से, क्षेमंकर मुनि बंदे । देखे श्री गुरु के पद पंकज, लोचन अलि आनंदे ॥१॥ तीन प्रदक्षिणा दे शिर नायो, कर पूजा युति कीनी । साधु समीपं विनय .

जैन-प्रन्य-संग्रह। कर बैठो चरणों में हग दीनी। गुरु उपदेशो धर्मशिरोमणि, सुन राजा वैरागी। राज्य रमा पनतादिक जो रस, सोस नीरस लागो ॥२॥ मुनि सूरज कथनी किरणावलि, लगत मर्म बुधि भागो। भव तन भोग स्वरूप विचारो, परम धर्म अनुरागोया संसार महा वन भीतर, भर्मत छोरन मावे । जन्मन मरन जरादौ दाई, जीव महा दुख पावे ॥३॥ विहूं कि जाय नर्क पद भुजे, छेदन भेदन भारी। कवहूं कि पशु पर्याय धरे तहाँ, बध बन्धन भयकारी। सुरगति में परि सम्पति देखे, राग उदय दुल हाई । मानुष योनि अनेक विपति भय, सर्व सुखी नहीं कोई ॥४॥ कोई इष्ट वियोगी बिलखे, कोई अनिष्ट संयोगी। कोई दीन दरिदी दीखे, कोई तनका रोगी॥ किसही घर कलिहारी नारी, के बैरी सम भाई । किलही के दुख बाहर दीखे, किसही उर टुचिताई ॥५॥ कोई पुत्र विना नित भूरे, 'होइ मरे तब रो। खोटी संतति से दुःख उपजे, क्यों प्राणी सुख सोब। पुण्य उदय जिनके तिनको भी, नहीं सदा सुख साता। यह जग पास यथारय दीखे, सवही हैं दुःख घाता॥६॥ संसार विर्षे सुख होतो, वोर्थकर को त्यागें । काहे को शिव साधन करते, संयम से अनुरागें ॥ देह अपवान अथिर धिनावनी, इसमें सार न कोई। सागर के जल से शुचि कोजे, तोभी शुद्ध न हाई ॥ ७॥ सप्त कुधातु भरी मल मूत्र से, चर्म लपेटी सोहै । अन्तर देखत या सम जग में, और अंपावन को है। नव मल द्वार श्र निशि पासर नाम लिये घिन आवें। व्याधि उपाधि अनेक जहां तहां, कौन सुधी सुख पावे ॥ पोपत तो दुख दोष करे अति, सौषत सुख उपजावे। दुर्जन देह स्वभाव वराबर, मूरख प्रीति बढ़ावे ॥राचन योग्य स्वरूप जैन-नन्य-संग्रह। नयाको, विरचन योग्य सही है। यह तन पोय महा तप कीजे, इस में सार यही है ॥8॥ भोग दुरे भव रोग बढ़ावें; बैरी हैं जग जीके। वे रस होय विपाक समय, अति, सेवत लागें बोके वन अग्नि विषधर से हैं वे, हैं अधिक दुःखदाई। धर्मर को चौर प्रवल अति दुर्गति पन्थ सहाई ॥१०॥ मोह उदय यह जीव अज्ञानी, भोग भले कर जाने...ज्यों कोई.. जन माय धतूरा, सो जव कंचन माने । ज्यों ज्यों भोग संयोग मनोहर, मन वांछित जन पावे। तृष्णा .नागिन त्यों.त्यों. के लहर लोभ विष लावै ॥ ११ ॥ मैं चक्री पद पाय निरन्तर, भोगे भोग घनेरे। तभी तनक भये ना पूरण, भाग मनोरथ मेरे । राज समाज महा अध कारण, वैर वढावन. हारा । वेश्या सम लक्ष्मी अति चंचल इसका कौन पत्यारा ॥१२ मोह महा रिपु वैर विधादे जग जीव संकट डारे। घर. कारागृह वनिता वेड़ी, परजन हैं रखवारे । सम्यग्दर्शन जान चरण तप, ये जिय को हितकारी । ये ही सार असार और सव, यह चली जीय धारी ॥ २२॥ छोड़े चौदहरत वोनिधि, और छोड़े संग साथी । कोटि अठारह घोड़े छोड़े, चौरासी लख, हाथी॥ इत्यादिक सम्पति बहुतेरो, जीर्ण तृणांवत् त्यागी। नीति विचार नियोगी सुत . को, राज्य दिया बड़ भागी ॥१४ा हाय निस्सल्य अनेक नपति संग, सूषण वंशन उतारे। श्रीगुरु चरण. घरी जिन मुद्रा, पंच महाव्रत धारे । धन्यं यह समझ सुधुद्धि जगौत्तम, धन्य वीर्यः गुण धारी । ऐसी सम्पति छोड़ बसे धन, तिन पद धोक: हमारी॥१५॥ परिग्रह पोर. उतार संब, लीनो चारित्र पथ । ..निज स्वभाव में थिर भये, वजनामि निग्रंथ ।। ॥

बैन-प्रन्थ-संग्रह। समाधिमरण भाषा (पं० सूरचन्दजी रचित) पन्दो श्रीमहन्त परम गुरु, जो सवको सुखदाई। इसजगमें दुख जो मैं भुगते, सो तुम जानो राई । अब मैं अरज कर नित तुमसे, कर समाधि उरमाहीं। अन्तसमयमें यह घर माँगू, सो दीजे जगराई ॥१॥ मव भवमें तन धार नये मैं, भव भव शुभ सँग पायो । भव मवमें नृप ऋद्धि लई मैं, मात पिता सुत थायो। भव भवमें तन पुरुष तनो घर, नारीहूं तन लीनो । भव भवमें मैं भयो नपुंसक, आतमगुण नहिं चीनो TRA भव भवमें सुरपदवी पाई, ताके सुख अति भोगे। भव भवमें गति नरकतनी धर, दुख पायो विधयोगे। भव भवमें विर्य योनि घर, पायो दुख अति भारी। भव भवमें साधर्मी जनको, संग मिलो हितकारी॥३॥ भव भवमें जिनपूजन कोनी, दान सुपात्रहि दीनो। भव भवमें मैं समवसरणमें, देखो जिनगुण भीनो। एती वस्तु मिली भव भवमें, सम्यक् गुण नहिं पायो । ना समाधियुत मरण करा मैं, ताते जग मारमायो॥४॥ काल अनादि भयो जग नमते, लदा कुमरणहिं कीनो। एक बारद सम्यकयुत मैं, निज मातम नहिं चीनो। नो निजपरको शान होय तो, मरण समय दुखदाई। देह विनाशी मैं निजभाशी, जोति स्वरूप सदाई ॥५॥ विषय कपायनमें वश होकर, देह आपनो जानो। पर मिथ्याशरधान हिये बिंच, आम नाहिं पिलानी ।

३
जैन-अन्य संग्रह।
.
यो कलेश हिय धार मरणकर, चारों गति भरमायो।
सम्यादर्शन ज्ञान तीन ये, हिरदेमें नाई लायो॥६॥
अव या अरंज कर प्रभु सुनिये, मरणसमय यह मागो।
रोग जनित पीड़ा मत होऊ, अरु कषाय मत जागो ।
ये मुझ मरणसमय दुखदाता, इन हर साता कीजे।
जो समाधियुत मरणहोय मुझ, अरु मिथ्यागद छीजा
यह तन सात कुधात मई है, देखत हो धिन मावे।
चर्म लपेटी ऊपर सोहै, भीतर विष्टा पावे ॥
अति दुर्गध पावन सो यह, मूरख प्रीति बढ़ावे।
देह विनाशी यह अविनाशी, नित्यस्वरूप कहावे ॥
यह तन जीर्ण कुटीसम मेरो, यात प्रीति न कीजे।
नूतन महल मिले फिर हमको, यामें क्या मुझ छीजे।
मृत्यु होनसे हानि कौन है, याको भय मत लायो।
समता से जो देह वजोगे, तो शुभ तन तुम पावो TER
मृत्यु मित्र उपकारी तेरो. इस अवसर के माहीं।
जीरण तनसे देत नयो यह, या सम साफ नाहीं ।
या सेनी तुम मृत्युसमय नर, उत्सव अतिही.कीजै।
क्लेशभावको त्याग सयाने, समताभाव धरीजै ॥ १०॥
जो तुम पूरव पुण्य किये हैं, तिनको फल सुखदाई।
मृत्युमित्र विन कौन दिखावै, स्वर्ग सम्पदा भाई ॥
राग द्वषको छोड़ सयाने, सात व्यसन दुखदाई।
अन्त समय में समता धारो, पर भव पन्य सहाई ॥१॥
कर्म महा.दुठ वैरी मेरो तालेती दुख पावे ।
तनं पिंजरे में बंध कियो मुझ, जालौ कौन छुड़ावे ।
भूख या दुख आदि अनेकन, इस.हो.तनमें गाढ़े।
मृत्युराज अव माप दयाकर तन पिंजर से काढ़े ॥१॥

जैन-प्रन्थ संग्रह। नाना वस्त्राभूपण मैंने, इस तन को पहराये। गंध सुगंन्धित अतर लगाये, पटरस अशन कराये। रात दिना मैं दास होयकर, सेव करी तन केरी। सो तन मेरे काम न आयो, भूल रहो निधि मेरी ॥१३॥ मृत्युराय को शरण पाय तन, नूतन ऐसी पांड। जामें सम्यक्तन तीन लहि, आठो कर्म खपा ॥ देखो तन सम और ततो, नांहि सुना जग माही। मृत्यु समय में ही परिजन सपहा हैं दुखदाई ॥१४॥ यह सब मोह बढ़ावनहारे जियको दुरगति दाता। इनसे ममत निधारो जियरा, जो चाहो सुख साता। मृत्यु कल्पद्रुम पाय सयाने, मांगो इच्छा जेती। समता धरकर मृत्यु करी तो, पावो संपति तेती ॥१५॥ चौ माराधन सहित प्राण तज तौ ये पदवी पावो। हरि प्रतिहरि चक्री तीर्थेश्वर, स्वर्ग मुकति में जावो । मृत्युकल्पद्रुम सम नहि दाता, तीनों लोक मंझारे । ताको पाय कलेश करो, मत जन्म जवाहरहारे ॥१६॥ इस तनमें क्या राचे जियरा, दिन दिन जीरण हो है। तेज कांति बल नित्य घटत है. यालम अथिर सु कोहै। पांचों इन्द्री शिथल भातव, स्वास शुद्ध नहिं आवै । तापर भो ममता नहिं छोड़े समता उर नहिं लावै ॥१७॥ मृत्युराज उपकारी जिय को, तिनके तोहि छुड़ावे । नातर या नन बंदीग्रह में, पड़ा पड़ा विललावे ।। पुद्गल के परमाणू मिलके, पिंडरूप तन भासी। यही मूरती मैं अमूरती, ज्ञानजोति गुणवासी ॥१॥ रोग शोक यादिक जो वेदन, ते सव पुद्गल लारे। मैं तो चेतन व्याधि विना नित, हैं सो भाव हमारे ॥

जैन-अन्य संग्रहा या तन से इस क्षेत्र संबंधी, कारण आन एनो है। खानपान देयानो पोपो, अव ससमाव उना है पर मिथ्यादर्शन यात्मज्ञान विन, यह तन अपनी जानोग इंद्री भोग गिने सुख मैंने, आपो नाहि पिछानो । तन विनशनते नाश जानि नित, यह अयान दुखदाई । कुटुम आदिको अपनी जानो, मूल अनादी छाई ॥२०॥ अब निज भेद यथारथ रमझा. मैं ज्योतिस्वरूपो। उपजे विनशे तो यह पुद्गल, जानो याको कपी: इष्टनिष्ट नेते सुदुख हैं, सो सब पुद्गल सागे। मैं जव अपनी सर विचारो, तब वे सब दुख भागेर विन समता वन नन्त घरे मैं, तिनमें ये दुख पायो। शस्त्रधावतें नन्त वार मर, नाना योनि नमायो । चार नन्तही अग्निमाहि जद, सूतो सुमति न लायो। सिंह ज्यान अहि नन्तवार सुझ,नानादुःख दिखायो RA विन समाधिये दुःख लहे मैं, अब उर समता आई। नृत्युराजको मय नहिं मानो, देवै तन सुख दाई । यात जवलग मृत्यु न आवे, उदलग जप तप कोई। अपनप दिन इस जगमाही, कोई भी ना सीजै २३॥ स्वर्ग संपदा तपसे पावे, तपसे कर्म नघावे। तपहीसे शिवकामिनिपति है, यासे तप वितं लाये। अब मैं जानी समता दिन मुझ, कोऊ नाहि सदई । मात पिता सुत बान्धवं तिरिया ये सब है दुखदायरा मृत्यु समयने मोह करें ये, तात आरत हो है। बारत ते गति नीची पावे, या लस माह तजा है। और परिग्रह जेते जगमें, तिनले प्रीति न कीजे। परमपमें ये संग चाल, नाहक भारत कीजे ॥२७॥ .

. लैनं-प्रन्य-संग्रह। जे जे वस्तु लशत हैं तुझ पर, तिनसे नेह निवारो। परगतिमें ये साथ न चालें, ऐसो भाव विचारो।। दो परभवों संग चल तुझ, तिनसे प्रीति सुकोजे पंच पाप तज समता धारी, दान चार विधवीजरिक्षा दशरक्षणमय धर्म धरी, मनुकम्पा चित लावो। पोड़श कारण नित्य चिन्तवो, द्वादश भावना भावो। चारी परवी प्रोपध कीजे, अशन रातिको त्यागो। समता धर दुरभाव निवारो, संयमसूअनुरागो ॥२७॥ मन्तसमयमें ये शुभ भावहि, होवें आनि सहाई । स्वर्ग मेंक्षफल तैहि दिखावे, ऋद्धि देंय अधिलाई ॥ सोटे भाव सकल जिय त्यागो, उरमें समता लाके । जासेती गति चार दूर पर, यसो मोक्षपुर जाके ॥२८॥ मन थिरता करके तुम वितो, चौ आराधन भाई। येही ताको सुखफी दाता, और हितू को नाई। आगे पहु मुनिराज भये हैं तिन गहि थिरता भारी । या उपसर्ग सहे शुभ भावन, आराधन उर धारी ॥२६॥ तिनमें कछुक नामकहूं मैं लो सुन जिय!चित लाके। :भावसहित अनुमोद तामें, दुर्गति हाय मजाक। अरु समता निज उरसे यावि, भाव मधीरज जाये। यो निश दिन जो उन मुनिवरको, ध्यान हिये पिचलाचे ॥३०॥ धन्य धन्य तुमाल महामुनि, कैसी धीरज धारी। एका श्यालनी युगपञ्चायुत, पांव मखो दुखकारी। यह उपसर्ग सहा धर थिस्ता आराधन चित धारी। तो तुमरे जिय कौन दुःख है ? मृत्यु महोत्सव वारी ॥ ३१॥ धन्य धन्य तु सुकौशल खामी, व्याघीने तन खायो। तो भी श्रीमुनि नेक डिगे नहि, तमसों हित लाया।

५० जैन-प्रत्य-संग्रह। यह उपसर्ग सहो घर थिरता, आराधन चित धारी। तो तुम जिय कौन दुःख है ? मृत्यु महोत्सव वारी ॥ ३२॥ देखो गजमुनिके सिर ऊपर विप्र अगिनि बहु वारी। शीस जले जिम लकड़ी तिनको, तो भी नाहि चिगारी। यह उपसर्ग सहे धर थिरता, आराधन चित घारी। तो तुमरे जिय कौन दुःख है १ मृत्यु महोत्सव वारी ॥३॥ सनतकुमार मुनी के तनमें, कुष्ठ वेदना व्यापी । छिन्न छिन्न तन तासो हुवो, तव चिन्ती गुण आपी । यह उपसर्ग सहो घर थिरता, आराधन चित धारी। तो तुमरे जिय कौन दुःख है ? मृत्यु महोत्सव पारीक्षा श्रेणिकसुत गंगा में डूयो, तब जिननाम चितारे। घर संलेखना परिग्रह छाँडो, शुद्ध भाव उर धारे। यह उपसर्ग सहो घर थिरता, आराधन चित धारी। तौ तुमरे जिय कौन दुःख है ? मृत्यु. महोत्सव वारी ॥३॥ समैतभद्र मुनिवरके तनमें, क्षुधा घेदना आई। ता दुखमें मुनि नेक न खिगियो, चिन्तो निजगुण भाई॥ यह उपसर्ग सहो धर थिरता, आराधन चितधारी। तौ तुमरे जिय कौन दुःख है १ मृत्युमहोत्सव वारी ॥३६॥ ललितघटादिक तीस दोय मुनि, कौशांचीतट.जानो। नहीमें मुनि बहकर मूवे, सो दुख उन नहिं मानी। यह उपसर्ग सहो धर थिरता, आराधन चित धारी। तो तुमरें जिय कौन दुख है ? मृत्युमहोत्सव वारी ॥ ३७॥ धर्मघोष मुनि चंपानगरी, वाघ ध्यान धर ठाढ़ों। एक मासकी कर मर्यादा, तृषा दुःख संह गाढ़ो । यह उपसर्ग सही धर थिरता, आराधन चित धारी। तौ तुमरे जिय कौन दुःख है ? मृत्युमहोत्सव बारी॥ ३४॥.

जैन-ग्रन्य-संग्रह। ::५१ ? श्रीदतमुनिको पूर्व जन्मको, बैरी देव सु आके। विक्रिय कर दुख शीत तनोलो, सही साध मन लाके । यह उपसर्ग सहो घर थिरता, आराधन चित धारी। तौ तुमरे जिय कौन दुःख है ? मृत्युमहोत्सव वारी ॥३॥ वृपभसेन मुनि उष्ण शिलाप, ध्यान घरो मन लाई। सूर्यघाम अरु उष्ण पवन की, वेदन सहि अधिकाई ॥ यह उपसर्ग सहो घर थिरता, माराधन चितधारी। तो तुमरे जिय कौन दुःख है ? मृत्युमहोत्सव बारी ॥४॥ अभयघोष मुनि काकंदीपुर, महा वेदना पाई। बैरी चंडने सव तन छेदी, दुख दीनो अधिकाई ॥ यह उपसर्ग सहो घर थिरवा, आराधन चित धारी। तो तुमरे जिय कौन दुःख है ? मृत्युमहोत्सव पारी ॥४१॥ विद्यु तधरने पहु दुख पायो, तौमी धीर न त्यागी। शुमभावनसे प्राण तजे निज, धन्य चौर बड़भागी। यह उपसर्ग सहो घर थिरता, आराधन वितधारी। तो तुमरे जिय कौन दुख है ? मृत्युमहोत्सव वारी ॥ ४२ ॥ पुत्र चिलाती नामा मुनिको, वैरीने तन घातो। मोटे मोटे कीट पड़े तन, तापर निज गुण रातो। यह उपसर्ग सहो घर थिरता, आराधन चित धारी। तो तुमरे जिय कौन दुःख है ? मृत्युमहोत्सव वारी ॥४३॥ दण्डक नामा मुनिकी देही, वाणन कर अरि भेदी। तापर नेक डिगे नहिं वे मुनि, कर्म महा रिपु छेदी। यह उपसर्ग सहा धर थिरता, आराधन चित धारी। तो तुमरे जिय कौन दुख है । मृत्युमहोत्सव परीneer अमिनन्दन मुनि आदि पांचस, घानी पेलि झुमारे । तो भी श्रीमुनि समता धारी, पूरव कर्म विचारे ।

५२ जन-प्रन्य-संग्रह। यह उपसर्ग सहो घर थिरता, आराधन चित धारी। तौ तुम जिय कौन दुःख है ? मृत्युमहोत्सव कारी ॥४॥ चाणक मुनि गोघरके मांही, मूंद अगिनि परिज्वालो। श्रीगुरु हर समसाव धार, अपनो रूप सम्हालो। यह उपसर्ग सहो घर थिरता, आराधन चित धारी। तो तुमरे जिय कौन दुःख है ? मृत्युमहोत्सव वारी ॥ ४६॥ सात शतक मुनिवरने पायो, हथनापुरमें जानो। वलिब्राह्मणकृत घोर उपद्रव, लो मुनिवर मर्हि मानो। यह उपसर्ग सहो धर थिरता, आराधन चिताधारी। तो तुमरे जिय कौन दुःख है ? भृत्युमहोत्सव वारो॥४॥ लोहमयी आभूषण गड़के, ताते कर पहराये। पांचों पाडव मुनिके तनमें, तो भी नाहिं चिगाये। यह उपलर्ग सहो घर थिरता, थाराधन चित धारी। तो तुमरे जिय कौन दुख है ? मृत्युमहोत्सव वारी ॥४॥ और अनेक सये इस जग, समता रसके स्वादी। बेहो हमको हो सुखदाता, हरहैं देव प्रमादी। सम्यकदर्शन ज्ञान चरण तप थे, आराधन चारों। येही मोको सुखके दाता, इन्हें सदा उर धारों ॥ ४ ॥ यो समाधि उररांही लावी, अपनो हित जो चाहे।। तज ममता अरु माठों मरके, जोतिस्वरूपी ध्यावो । जो कोई निज करत पयानो, आमांतर के काजे। सो भी शकुन विचारे नीले, शुभ शुभ कारण साजे ॥५०॥ मात पितादिक सर्व कुटुमसो, नीके शकुन बनावें। हलदी धनिया पुगी अक्षव; दुध दही फल लावें ॥ एक प्रामके कारण एते, कर शुभाशुभ सारे। जव परगतिको फरत पयानो, तव नहिं सोचे प्यारे ५१॥

जैन-अन्य-संग्रह। सर्व कुटम जव रोवन लगे, तोहि सलावे सारे। ये अपशकुन करें सुन ताई, तू यों क्यों न विचारे । अव परगति के चालत बिरियां, धर्मध्यान उरआनो।' चारों आराधन आराधो, मोह तनो दुखहानो ॥५२॥ है निश्शल्य तो दुविधा, आतमराम सुध्यावो । जय परगतिको करहु पयानो, परम तत्व उर लायो। मोह जालको काट पियारे! अपना रूप विचारो। मृत्यु मित्र उपकारी तेरो यो उर निश्चय धारो ॥ ५३॥ दोहा छंद।। मृत्युमहोत्सव पाठको, पढ़ो सुदो वुधिवान । सरधा घर नित सुख लहो, सुरचन्द शिवथान ॥ ५४॥ पंच उमय नव एक नम, सम्वत सो सुखदाय । आश्विन श्यामा सप्तमी, कहो पाठ मनलाय ॥५५॥ पनि समाधिमरण जिनवाणी-स्तुति। वीर हिमांचल ते निकसी गुरु गौतम के मुख कुंड डरी है मोह महातम भेद चली जग़ की जड़ता तप दूर करी है। ज्ञान पयोनिधि माँहि रली, बहुभंग तरंगनि सों उछरो है। ता शुचि शारद गंग नदी प्रति मैं अंजुली कर शीख धरी है। या जग मंदिर में शनिवार अज्ञान अंधेर छुपो अति भारी। श्रीजिनकी धुनि दीप शिखा समजो नहि होय प्रकाशनहारी॥ तो किस भांति पदारथ पांति कहां लहते रहते अविचारी। या विधिसंत कहें धनि है धनि हैं जिन वैन बड़े उपकारी २ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। नामावली स्तोत्र जय जिनन्द सुख कंद नमस्ते । जय जिनंद जिन फंद नमस्ते ॥ जय जिनंद वरवोध नमस्ते। जय जिनंद जितक्रोध नमस्तेशा पाह ताप हर इन्दु नमस्ते । अहं वरन जुत बिन्दु नमस्ते । शिष्टाचार विशिष्ट नमस्ते । इष्टमिष्ट उत्कृष्ट नमस्ते ॥२॥ पर्म धर्म वर शर्म नमस्ते। मर्म भर्म धन धर्म नमस्ते ॥ द्वगविशाल वर माल नमस्ते। हद दयाल गुनमाल नमस्ते ॥३॥ शुद्धवुद्ध अविरुद्ध नमस्ते। रिद्धिसिद्धि पर वृद्ध नमस्ते ॥ वीतराग विज्ञान नमस्ते। चिद्विलास धृत ध्यान नमस्तेक्षा स्वच्छ गुणांवुधि र नमस्ते । सत्व हितकर यत्न नमस्ते । कुनयकरी मृगराज नमस्ते । मिथ्या खग वर बाज नमस्ते ॥५॥ भव्य भवादधि नार नमस्ते । शर्मामृत सित सार नमस्ते ।। दरश ज्ञान सुखवीर्य नमस्ते । चतुरानन धर धीर्य नमस्ते ru हरिहर ब्रह्मा विष्णु नमस्ते । मोह मद मनु जिष्णु नमस्ते ॥ महा दान महमोग नमस्ते। महा ज्ञान मह जोग नमस्ते महा उन तप सूर नमस्ते । महा मौन गुण भूरि नमस्ते ॥ धरम चक्रि वृष केतु नमस्ते । भवसमुद शत सेतु नमस्ते का विद्याईश सुनीश नमस्ते । इन्द्रादिक नुत शीस नमस्ते। जय रतनत्रय राय नमस्ते । सकल जीव सुखदाय नमस्तेक्षा मशरण शरण सहाय नमस्ते । भव्य सुपन्य लगाय नमस्ते ॥ . निराकार साकार नमस्ते। एकानेक अधार नमस्ते ॥१०॥ लोकालोक विलोक नमस्ते । त्रिधा सर्व गुण थोक नमस्ते । सल्ल दल्ल दल मल्ल नमस्ते। कल्ल मल्ल जित लल्ल नमस्ते ९॥ भुंकि मुक्ति दातार नमस्ते । उक्ति सुक्ति श्रृंगार नमस्ते । गुणं अनंत भगवन्त नमस्ते । जै जै जै जयवन्त नमस्ते॥१२ . .

जैन-प्रत्य-संग्रह। मेरी-भावना ५० जुनविषारसुवा-कृव । - जिसने राग पकामादिक, जीते, सव जग जान लिया- सब जीवों को मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया। वुद्ध, वीर जिन, हरि, हर, ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो. भकिमाव से प्रेरित हो यह, चित्त उसी में लीन रहो। विषयों की आशा नहिं निनके, साम्य-भाव धन रखते हैं- निज-परके हित-साधन में जो, निश-दिन तत्पर रहते हैं। स्वार्थत्याग की कठिन तपस्या, विना खेद जो करते हैं, ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुखसमूह को हरते हैं ॥२ रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे। उनहों जैसी चर्या में यह, चित्त सदा अनुरक रहे। नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहिं कहा कर्क। पर-धन-वनिता परन लुभाऊं, संतापामृत पिया करूं ॥३ अहकार का भाव न रक्खू नहीं किसी पर क्रोध करूं । देख दूसरों की बढ़ती को, कभी न ईर्षा-भाव धर्क । रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार कर्क- बने जहां तक इस जीवन में, औरों का उपकार कर ४ मैत्रीभाव. जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे। दीन-दुखी जीवों पर मेरे उरसे करुणास्रोत बहे। दुर्जन-क्रूर कुमार्ग रतों पर, क्षोभ नहीं मुझ को आवे। साम्यभाव रक्खू मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे ॥५ गुणीजनों को देख हृदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे । ववे जहां तक उनकी सेवा करके यह मन सुख पावे। .

जैन-प्रन्य-संग्रह। होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं द्रोह न मेरे उर आवे । गुण-ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न होषों पर जावे। कोई बुरा कहो या · अच्छा; लक्ष्मी आवे या जावे, । लाखों वर्षों तक जीऊँ या मृत्यु आज ही आ जावे । अथवा कोई कैसा ही भय यां लालचं देने आवे। तो भी न्यायमार्ग से मेरा कभी न पद डिगने पावे॥७॥ होकर सुखमें मग्न न फूले, दुखमें कभी न घबरावे । पर्वत-नदी-श्मशान-भयानक अटवी से नहिं भय बावे । रहे अडोल-अप निरन्तर, यह मन, दृढ़तर वन जावे । इष्टवियोग-अनिष्टयोग में सहनशीलता दिखलावे nan सुखी रहें सब जीव जगत के, कोई कमी न धवरावे। वैरि-पाप-अभमान छोड़ जग नित्य नये मंगल गावे । घर घर चर्चा रहे धर्मकी, दुष्कृत दुष्कर हो जा। ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना मनुज जन्म-फल सव पावें ॥ ईति-भीति व्यापे नहिं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे । धर्मनिष्ठ होकर राजा मी न्याय प्रजा का किया करे रोग-मरी-दुर्मिक्ष न फैले, प्रजा शान्ति से जिया करे । परम अहिंसा-धर्म जगत में, फैल सर्वहित किया करे ॥१०॥ फैले. प्रेम परस्पर जग में मोह दूर पर रहा. करे । अप्रिय-कटुक-कठोर शब्द नहि कोई मुखं से कहा करे। धनकर सव 'युग-वीर' हृदय से देशोन्नति रत रक्षा करें। वस्तु-स्वरूप विचार खुशी से सब दुख-संकट.सहा करें ॥१२॥ .

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ५७.. इष्ट छत्तीसी। अर्थात् पंच परमेष्ठी के १४३ मूल गुण । सोरठा। प्रणमू' श्रीमहंत, दयाकथित जिनधर्मको। गुरु निरग्रंथ महन्त, अवर न मानू सर्वथा ॥१॥ विन गुण की पहिचान, जाने वस्तु समानता। तात परम बखान, परमेष्ठी के गुण कई ॥२॥ रागद्वषयुत देव-मानै हिंसाधर्म पुनि । सग्रंथगुरु की सेव ,सो मिथ्याती जग भूमै ॥३॥ . अरहंव के ४६ मूल गुण। दोहा । चौतीसों अतिशय सहित, प्रातिहार्य पुनि आठ। अनन्त चतुष्टय गुणसहित, छीयालीसों पाठ॥४॥ अर्थ-३४ अतिशय, ८ प्रातिहार्य, ४ अनन्त चतुष्टय ये अरहंत के ४६ मूल गुण होते हैं । अव इनका मित्र मित्र-वर्णन. करते हैं- जन्म के १० प्रतिशय । अतिशय रूप सुगंध:तन, नाहि पसेव निहार। प्रियहित बचन अतुल्य बल, रुघरश्वत आकार ...

जैन-प्रन्य-संग्रह। लच्छण सहसरसाठ तन, समचतुष्कसंठान । वजवृषभनाराच जुत, ये जनमत दंश जान ॥६॥ अर्थ-१ अत्यन्त सुन्दर शरीर, २ अति सुगन्धमय शरीर ३ पसेवरहित शरीर, ४ मलमूत्ररहित शरीर, ५ हित- मितप्रियवधन बोलना, ६ अतुल्ययन, ७ दुग्धवत् श्वेत रुधिर, शरीर में एक हजार आठ लक्षण, ६ समचतुरखसंस्थान, १० वजवृषभनाराचसंहनन । ये दश अतिशत अरहंत भगवान के जन्म से ही उत्पन्न होते हैं ॥६॥ केवल ज्ञान के १० अतिशय । योजन शत इको सुभिक्ष, गगनगमन मुख चार । नहि अदया उपसर्ग नहिं, नाहीं कवलाहार। सब विद्या ईसुरपनों, नाहिं बढ़े नखकेश । अनिमिषद्ग छायारहित, दश केवलके वेश ॥८॥ अर्थ-१ एकसौ योजन में सुभिक्षता, अर्थात् जिस स्थान में केवली हो उनसे चारों तरफ सौ सौ कोशमें सुकाल होता है, २ आकाश में गमन, ३ चार मुखों का दीखना, ४हिंसाफा अभाव, ५ उपसर्गरहित, ६ कवल (प्रास ) वर्जित आहा, ७ समस्त विद्याओंका स्वामीपना, नखकेशोका नहीं बढ़ना, 8. नेत्रोंकी पलकें नहीं झपकना, १० छाया रहित । ये १० अतिशय केवलज्ञान उत्पन्न होने से प्रगट होते हैं ॥८॥ देव-कृत १४ अतिशय देव रचित हैं चार दश, अर्द्धमागधी भाष । आपसमांहीं. मित्रता- निर्मलं दिश आकाश - En जैन-प्रन्य-संग्रह। ५8 r . होत फूल फल ऋतु सबै, पृथिवी कांच समान । चरणकमलतल कमल है, नमते जय जय बान ॥१०॥ मंद सुगंध पयार पुनि, गंधोदक की वृष्टि । भूमि विषे कंटक नहीं, हर्षमयी सब सृष्टि ॥११॥ धर्मचक आगे चले, पुनि बसु मंगल सार। अतिशय श्री अरहंत के, ये चौतीस प्रकार ॥१२॥ अर्थ-१ भगवान् की अर्द्धमागधी भाषा का होना, २ समस्त जीवों में मित्रता का होना, ३ दिशाओं का निर्मळ होना, ४ आकाश का निर्मल होना, ५ सब ऋतु के फल पुष्प धान्यादिक का एकही समय फलना, ६एक योजन तक को पृथिषी का दर्पणवत् निर्मल होना, ७ चलते समय भगवान् के चरण कमल के तले सुवर्ण कमल का होना, ८ माकाश में जय जय ध्वनि का होना, मंद सुगंधित पवन का चलना, १. सुगन्धमय जल की वृष्टि होना, ११ पवनकुमार देवों के द्वारा भूमिका कण्टकरहित होना, १२ समस्त जीवों का आनन्दमयहोना, १३ भगवान के आगे धर्म चक का चलना, १४ छत्र,चमर, ध्वजा, घंटादि अष्टमंगल द्रव्योका साथ रहना । इस प्रकार सब मिलाकर ३४ अतिशय अरहंत भगवानके होते हैं ॥ १२॥ अष्ट पाविहार्य । तर अशोक के निकट में सिंहासन छविदार। तीन छन सिर पर बसें, भामंडल पिछवार ॥१३॥.. दिव्यध्वनि मुख ते खिर, पुष्पवृष्टि सुर होय । ढार चौसाठि चमर जख, बाजै हुँदुमि जोय ॥१क्षा ६७ जैन-प्रन्य-संग्रह। अर्थ-१ अशोकवृक्ष का होना, २ रत्नमय सिंहासन, ३ भगवान के सिर पर तीन छत्र का फिरना, ४ भगवान के पीछे भामंडल का होना, ५ भगवान के मुखसे दिव्यध्वनि का होना, ६ देवों के द्वारा पुष्पवृष्टि का होना, ७ यक्षदेवों द्वारा चौसठ चवरों का दुरना, ८ दुंदुभि वाजों का बजना ।ये आठ प्राविहार्य है। .. अनन्त चतुष्टय। ज्ञान अनंत अनंत सुख, दरस अनंत प्रमान । बल अनंत अरहंत सो इष्टदेव पहिचान ॥१५॥ अर्थ–१ अनन्तदर्शन, २ अनन्तज्ञान, ३.अनन्त सुख, ४ अनन्तवीर्य । जिसमें इतने गुण हो, वह अरहन्त परमेष्ठी है। अष्टादश दोषवर्जन। जनम जरा तिरषा क्षुधा, विस्मय आरत खेद। रोग शोक मद मोह भय, निद्रा चिंता स्वेद ॥१६॥ राग द्वेष अरु मरण जुत, ये अष्टादश दोष । नाहिं होत अरहन्त के, सो छविलायक मोषः ॥१७n अर्थ-१ जन्म, २ जरा, ३ तृषा, ४ क्षुधा, ५ आश्चर्य, ६ अरति (पीड़ा), खेद (तुख), रोग, शोक, १० मद, ११ मोह, १२, भय, १३ निद्रा, १४ चिन्ता, १५ पसीना, १६ राग, १७ द्वष, १८ मरण, ये १८.दोष अरहन्त भगवान में नहीं होते ॥१७॥ ANSAM जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ६५ सिद्धों के ८ गुण। सोरठा। समकित दरसन शान, अगुरु लघु अवगाहना। सूच्छम धीरजवान निरावाध गुन सिद्ध के ॥१८॥ अर्थ-१ सम्यक्त्व, २ दर्शन, ३ ज्ञान, ४ अगुरुलघुत्व, ५अवगाहनत्व, ६ सूक्ष्मत्व, ७ अनन्तवीर्य, ८ अन्यावाधत्व, ये सिद्धों के ८ मूल गुण होते हैं ॥१८॥ . आचार्य के ३६ गुण। दोहा। द्वादश तप दश धर्मजुत, पाले पंचाचार पट आवंशिकंत्रिगुप्ति गुन, आचारज पद सार ॥ अर्थ-तप १२, धर्म १०, आचार ५, आवश्यक ६, गुति ३ ये आचार्य महाराज के ३६ भूल गुण होते हैं। अब इनको भिमर कहते हैं ॥१॥ द्वादश तप। अनशन ऊनौदर करें, प्रत संख्या रस छोर। विविक शयन आसन धरे, कायकलेश सुठोर ॥२०॥ . प्रायश्चिच घर विनयजुत, वैयाप्रत स्वाध्याय । पुनि, उपसर्ग विचार कै, धरै ध्यान मन लाय ॥२९॥ अर्थ–१ अनशन, २ जनादर, ३ व्रतपरिसंख्यान, ४ रसपरित्याग, विवितशय्यासन, कायफ्लेश, प्रायश्चित 8 जैन-प्रन्थ-संग्रह। लेना, म पात्र प्रकार विनय करना, 8 घेयावत करना, १० स्वाध्याय करना, ११ व्युत्सर्ग (शरीरसे ममत्व छोड़ना), और १२/ध्यान करना, ये बारह प्रकारके तप है ॥२१॥ . दश धर्म छिमा मारदव आरजव, सत्यवचन चित पाग। संजम तप त्यागी सरव, आकिंचन तियत्याग । अर्थ-१ उत्तमक्षमा, २ मार्दव, ३ आर्जव, ४ सत्य, ५ शौच, ६ संयम, ७ तप, त्याग, आकिंचन्य, १० ब्रह्मचर्य ये दश प्रकारके धर्म हैं ॥ २२॥ आवश्यक समता घर चंदन करें, नाना थुती बनाय। प्रतिक्रमण स्वाध्यायजुत, कायोत्सर्ग लगाय। अर्थ-१ समता (समस्त जीवोंसे समता भाव रखना), २ बन्दना, ३ स्तुति (पञ्चपरमेष्ठीकी स्तुति ) करना, प्रतिक्रमण (लगे हुए दोपोंपर पश्चाचाप) करना, ५ स्वा- ध्याय, और ६ कायोत्सर्ग (ध्यान) करना ये छह मावश्यक है।॥ २३॥ पंचाचार और तीन गुप्ति। दर्शन ज्ञान.चरित्र तप, वीरज पंचाचार । गौपै मनवचकायको, गिंन छतीस गुन सार ।

जैन-प्रन्य-संग्रह।
१३
३
अर्थ--१ दर्शनाचार, २ ज्ञानाचार, ३ चरित्राचार,
तपाचार, ५ वीर्य्याचार ।१ मनोगुप्ति-मनको वशमें करना,
२ वचनगुप्ति-वचनको वशमें करना, कायगुप्ति-शरीरको
वश्में करना, इस प्रकार सव मिलाकर आचार्यके ३६ मूलगुण
है ॥२४॥
उपाध्याय के २५ गुण।
दोहा ।
चौदह पूरवको धरै, ग्यारह अंग सुजान ।
उपाध्याय पञ्चीस गुण, पढ़े पढ़ा शान ॥ २५ ॥
अर्थ-११ अंग १४ पूर्वको आप पढ़ें और अन्यको
पढ़ावें ये ही उपाध्यायके २५ गुण हैं ॥ ५॥
ग्यारह अंग ।
प्रथमहि आवारांग गनि, दूजो सूत्रकृतांग।
ठाणअंग तोजी सुभग, चौथो समवायांग ॥ २६ ॥
व्याख्यापण्णति पंचमी, शातृकथा षट मान ।
पुनि उपासकाध्ययन है, अन्तःकृत दशठान ।
अनुत्तरणउत्पाद दश, सूत्रविपाक पिछान ।
बहुरि प्रश्नव्याकरणजुत, ग्यारह अंग प्रमान ॥
अर्थ-१ आचारांग, २ सूत्रकृतांग, ३ स्थानांग
समवायांग, ५ व्याख्याप्राप्ति, ६ छातृकथांग, ७ उपासकाध्य.
यनांग, ८ अन्तःकृतदर्शाग, अनुत्तरोत्पाददशांग, १० प्रश्नव्या.
करणांग, ११ विपाकसूत्रांग, ये ग्यारह अंग हैं ॥ २० ॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। चौदह पूर्व । उत्पादपूर्व अग्रायणी, तोजो वीरजवाद । अस्ति नास्ति परवाद पुनि, पंचम ज्ञानप्रवाद । छटो कर्मप्रवाद है, सतप्रषाद पहिचान । अष्टम आत्मप्रवाद पुनि, नवमों प्रत्याख्यान ॥ ३०॥ विद्यानुवाद पूरव दशम, पूर्वकल्याण महत प्राएवाद किरिया बहुल, लोकविदु है अंत ॥३१॥ अर्थ-उत्पादपूर्व, अनाविणी पूर्व, ३ वीर्यानुवादपूर्व, ४ मस्तिनास्ति प्रवादपूर्व, ज्ञान प्रवादपूर्व, ६ कर्म प्रवादपूर्व, ७सत्मवादपूर्व, आत्मप्रवादपूर्व, प्रत्याख्यानपूर्व, १० विद्या- नुवादपूर्व, २१ कल्याणवादपूर्व, १२ प्राणानुवादपूर्व,१३ मिया- :विशालपूर्व, १४ लोकविन्दुपूर्व ये १४ पूर्व हैं ॥३१॥ सर्वसाधु के २८ मूल गुण । पंचमहाव्रत। हिंसा अन्त तसकरी, अनल परिग्रह पाय। मनवचतन त्यागवो, पंचमहाव्रत थाय ॥ ३२ ॥ अर्थ-१ अहिंसामहानत, सत्यमहानत, ३ मंचौर्यमहा- व्रत, ४ महाचर्य महाव्रत, ५ परिग्रहत्याग महाव्रत, ये पांच महावत हैं। पांच समिति। ईर्ष्या भाषा एषणा, पुनि क्षेपन आदान । प्रतिष्ठापनाजत किया, पादों समिति विधान ॥

जैन-प्रन्थ-संग्रह। अर्थ-१ ईर्यासमिति, २ भाषासमिति, ३ एषणासमिति ४ आदाननिक्षेपणसमिति, ५प्रतिष्ठापनासमिति, ये पांच समिति हैं॥३॥ पांच इन्द्रियोंका दमन । सपरस रसना नासिका, नयन श्रोत्रका रोध । षटभावशि मंजनतजन, शयन भूमिको शोध ॥२४॥ अर्थ-१स्पर्शन (त्वक् ), २ रसना, ३ घ्राण, ४ चक्षु, और श्रोत्र। इन पांच इन्द्रियों का वश करना सो इन्द्रिय- दमन है (छह आवश्यक माचार्यके गुणों में देखो)॥३४॥ शेप सात गुण। वस्त्रत्याग कचलोच अरु, लघुभोजन इकबार । दांतन मुख में ना करें, ठाड़े लेहिं महार ॥ ३५॥ अर्थ-१ यायजीव स्नानका त्याग, २ शोधकर (देख भाल कर) भूमि पर सोना, ३ वस्त्रत्याग, (दिगम्बर होना) ४ केशों का लौंच करना, ५ एकवार लघुभोजन करना, ६ दन्त- धावन नहीं करना, ७खड़े खड़े आहार लेना, इन सात गुणोसहित २८ मूल गुण सर्व मुनियों के होते हैं ॥ ३५ ॥ साधर्मों मवि पठनको, इष्टछतीसी ग्रंथ । अल्पबुद्धि बुधजन रच्यो, हित मित शिवपुरपंथ। रवि पंचपरमेष्ठोंके १४३ मूलगुणों का धन धमास ।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। भक्तामर स्तोत्र। . वसन्ततिलका। भक्तामरप्रणतमौलिमणिप्रमाणामुद्योतकं दलितपापत- मोवितानम् । सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुग युगादावालम्बन भवजले पततां जनानाम् ॥१. यः संस्तुतः सकलवाडमय.. तत्त्ववोधदुभूतबुद्धिपटुमिः सुरलोक नाथैः । स्तोत्रैर्जगत्रित- यचित्तहरैरुदाः स्तोण्ये किलाहमपि तं प्रथम जिनेन्द्रम् ॥२॥ बुद्धया विनापि विबुधार्चितपादपीठ स्तोतु समुद्यतमतिविंग- तपोऽहम् । बोलं विहाय जलसंस्थितमिन्दुबिश्वमन्यः का- च्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥३॥ वतुं गुणान् गुणसमुद्र शशाङ्कशान्तान् कस्ते क्षमः सुरगुरुप्रतिमोऽपि बुद्धया । कल्पान्तकालपावनोद्धतनकचक्र को वा तरोतुवलम्वुनिधि भुजाभ्याम् ॥ ४॥ सोऽहं तथापि तव भक्तिवशान्मुनीश कर्तु स्तवं विगतशक्तिरपि प्रवृतः । प्रीत्यात्मवीर्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्रम् नाभ्येति किं निजशिशोः परिपालनार्थम् ॥ ५ ॥ अल्पभुतं श्रुतवतां परिहासधाम त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते वलान्माम् । यत्कोकिलः किल मधौ.मधुरंविरोति तचाम्रचारु- कलिकांनिकरैकहेतु ॥ ६॥ त्वत्संस्तवेन भवसन्ततिसन्निवद्धं पापं क्षणात्क्षयमुनि शरीरभाजाम् । आक्रान्तोक मनिील मशेषमाशु सूर्यांशुभिन्नमिव शावरमन्धकारम् ॥ ७॥ मत्वेति नाथ तव संस्तवनं मये-मारभ्यते ननुधियापि तव प्रभावात् । चेताहरष्यति सतां नलिनीदलेषु मुक्ताफला निमुपैति ननू- दबिन्दुः ॥ ८॥ आस्तां तवं स्तवनमस्नसमस्तदोष त्वत्संक- थापि जगतां दुरितानि हन्ति । दुरे सहस्त्रकिरणः कुरुते प्रभैव- जैन-प्रन्य-संग्रह। पनाकरपु अलजानि विकासमाधि ॥६॥ नात्यद्भुतं भुवनभूप- णभूत नाथ भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्तममीष्टुवन्तः । तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेनु किंवा भूत्याश्रितं य इह नात्मसमकरोति ॥१०॥ दृष्ट्वा भवन्तमनिमेषविलोकनीयं नान्यत्र तोपमुपयाति जनस्य चक्षुः । पीत्वा पयः शशिकरा तिदुग्धसिन्धाः क्षार जलं जलनिधेरसितुक इच्छेत् ॥ ११॥ यैः शान्तरागरुचिभिः परमाणुमिस्त्वं निर्मापितत्रिभुवनैकललामभूत । तावन्त एवं खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां यत्ते समानमपरं न हि रूपम- स्ति ॥ १२॥ वनं क ते सुरनरोरगनेत्रहारि निरोपनिर्जित. जगत्रितयोपमानम् । बिम्बं कलङ्कमलिन क निशाकरस्य यद्वासरे भवति पाण्डुपलाशकल्पम् ॥ १३ ॥ सम्पूर्णमण्डल- शशाङ्ककलाकलाप शुभ्रा गुणात्रिभुवनं तव जयन्ति । वे संश्रिताखिजगदीश्वरनाथमेकं कस्ताशिवारयति संचरतो यथेष्टम् ॥ १४॥ चित्रं किमत्र यदि ते विदशासनामित मनायपि मनो न विकारमार्गम् । कल्पान्तकालमत्ता चलिता- चलेन किं मन्दरादिशिखरं चलितं कदाचित् ॥ १५ ॥ निधूम- वर्तिरपवर्जिततेलपूरः कृत्स्नं जगत्रयमिदं प्रकटीकराषि । गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां दोपोऽपरस्त्वमसि . नाथ अगत्प्रकाशः ॥ १६ ॥ नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः स्पष्टीकरोपि सहसा युगएन्जन्ति । नाम्भोघरोदरनिरुद्धमहा- प्रभावः सूर्यातिशायिमहिमासि मुनींद्र लोके ॥ १७॥ नित्योदयं दलितमोहमहान्धकारं गम्यं न सहुवदनस्य न वारिदानाम् । विभ्राजते तब मुखाजमनल्पकान्तिं विद्योतयजगदपूर्वशशाङ्क विम्बम् ॥१॥किं शर्वरीपुशशिनाहि विवस्वताचा युष्मन्मुजेन्दु दलितेषु तमासु नाथ । निष्पनशालिवनशालिनि जीवलोके कार्य कियज्जलधरैर्जलभारनप्रैः ॥ १६॥ शाम यथा त्वयि ६ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। विभाति कृतावकाशं नैवं तथा हरिहरादिषुनायकेषु । तेजः स्फुरन्मणिषु याति यथा महत्वं नैवं तुकाचशकले किरणाकुलेऽपि ॥ २०॥ मन्ये वरं हरिहरादय एव दृष्टा दृष्टषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति । कि वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः कश्चिन्मनो हरति नाय भवान्तरेऽपि ॥२१॥ स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान् नान्या सुतं वदुपमं जननी प्रसूता । सर्वा दिशा दधति भानि महारश्मि प्राच्येव दिग्जनति स्फुरदंशुजालम् ॥ २२॥ त्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांस-मादित्यवर्णममलं तमसः पुरस्तात् त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयन्ति मृत्यु नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनीद्र पन्थाः ॥ २३ ॥ त्वामव्ययं विभुमचिन्त्यम- संख्यमा ब्रह्माणमीश्वरमनन्तमनङ्गकेतुम् । योगीश्वरं विदित- योगमनेकमेकं ज्ञानस्वरूपममलं प्रपदन्ति सन्तः ॥ २४ ॥ युद्धस्त्वमेव विवुधार्चितबुद्धिवोधात्त्वं शंकरोऽसि भुवनत्रयशं- करत्वात् । धावासि धोर शिवमार्गविधेर्विधानात्व्यक त्वमेवं भगयन्पुरुषोत्तमोऽसि ॥ २५॥ तुभ्यं नमत्रिभुवनातिहराय नाथ तुभ्यं नमः क्षितितलामलभूषणाय. तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमे- श्वराय तुभ्यं नमो जिनभवादधिशोषणाय ॥२६॥ को विस्म योऽत्र यदि नाम गुणैरशेषस्त्वं संधितो निरवकाशतया मुनीश। दोरैरुपाचविविधाश्रयनानगः स्वप्नान्तरेऽपिन कदाचिदपीक्षि तोऽसि ॥ २७ ॥ उच्चैरशोकतरसंश्रितमुन्मयूखमाभाति रूपम मलं भवतो नितान्तम् ॥ स्पष्टोल्लसत्किरणमस्तमावितानं विम्वं स्वैरिव पयोधरपार्श्वचर्ति ॥ २८॥ सिंहासने मणिमयूखशिखा विचित्रे विनाजते तव वपुः कनकावदातम् । विम्वम् वियद्विल- सदशुलतावितानं तुङ्गोदयाद्रिशिरसीव सहस्ररश्मेः ॥ २६ ॥ कुन्दावदातचलचामरवाशीम विनाजते तव वपुः कलधौत- जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ६२ कान्तम् । उपच्छशाशुचिनिर्भरवारिधार-मुस्तट सुरगिरे. खि शान्तकोम्भम् ॥ ३० ॥ त्रयं तव विभाति शशाङ्ककान्त- मुबास्थित स्थगितमानुकरप्रतापम् । मुस्ताफलप्रकरजाल- विद्यशोभम् प्रख्यापयधिजगता परमेश्वरत्वम् ॥ ३१ ॥ गम्भीर- ताररयपूरितदिग्विभाग-प्रलोक्यलोकशुम संगमभूतिदक्षः । सद्धर्मराजजयघोपणघोपका सन् ले दुन्दुभिर्षजति ते यशसः प्रवादी ॥ ३२ ॥ मन्दारसुन्दरनमेसुपारिजातसन्तानकादिषसु. मोत्करवृष्टिरद्ध । गन्धोदविन्दुशुभमन्दमरुत्पपाता दिव्या दियः पतति ते घचसांतति ॥ ३३॥ शुम्भत्प्रभावलयभूरिवि- मा विभास्ते लोकपया तिमतांधु तिमाक्षिपन्ती । प्रोधदिवा परनिरन्तरभूरिसंख्या दीप्याजयत्याप निशामपि सोमसीम्या ॥३४॥ स्वर्गापवर्गगममार्गविमार्गणेप्टः सद्धर्मतत्त्वकथनेकपटु खिलोमाः। दिव्यध्वनि यति ते पिशदार्थसर्वभाषास्वभाव- परिणामगुणैःप्रयोज्यः ॥ ३५॥ उजिद्र हेमनवपंकजपुञ्जकान्ती पर्युलसनलमयूखशिखाभिरामी । पादी पदानि तव यत्र जिनेन्द्र धत्तः पानि तत्र विवुधाः परिकल्पयन्ति ॥ ३६॥ इत्यं यथा तय विभूतिरभूलिनेन्द्र धर्मोग्देशनविधी न तथा परस्य याद- प्रमादिनकृतः प्रहतान्यकारा तादातो ग्रहगणस्य विकाशिनो- ऽपि ॥ ३७॥ श्च्योतन्मदाविलविलीलकपोलमूलमत्तम्रमभ्रम लादविवृद्धकोपम् । ऐराधताममिभमुद्धतमापतन्तं दृष्ट्वा भयं भवती नो भवदाधितानाम् ॥ ३८ ॥ मिन्नेभकुम्भगल- दुज्ज्वलशोणिताक मुकाफलप्रकरभूपितभूमिभाग । बद्धक्रमः कमगतं हरिणाधिपोऽपि नामामति क्रमयुगाचलसं- श्रितं ते ॥३॥ कल्पान्तकालपवनोद्धताहिकल्प दावानलं ज्वलितमुज्ज्यलमुत्स्फुलिदगम् । विश्व जिघन्युमिव सम्मुख- मापतन्तं त्वनामकीर्तनजलं शमयत्यशेपम् ॥ ४० ॥ रकेक्षणं 'जैन-प्रत्य-संग्रहा समदकोकिलकण्ठनील क्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमापतन्तम् । आक्रामति क्रमयुगेण निरस्तशङ्कस्त्वन्नामनागदमनी द्वदि यस्य पुंसः॥४१॥ चलानुरङ्गजगर्जितमीमनादमाजी बलं बलव- सामपि भूपतीनाम् । उद्यद्विवाकरमयूखशिखापविद्धं त्वत्कीर्त- मातम इवाशु भिदामुपैति । ४२ ॥ कुन्तानभिन्नगजशोणितवा- रिवाहवेगावतारणातुरयोधमीमे। युद्धे जयं विजितदुर्जयजे- यपक्षास्त्वापादपङ्कजवनाशयिणो लभन्ते ॥४३॥ अम्मानिधों मितभीपणनकचक्रपाठीनपीठमयदोल्वणवाडवोझौ। रङ्गत्तरङ्ग- शिखरस्थितयानपात्रास्त्रासं विहायभवतः स्मरणाद्व्रजन्तिा४४ उद्भूतभीषणजलोदरभारभूग्नाः शोच्यां दशामुपगताश्च्युतजी. विताशाः त्वत्पादपङ्कजरजोमृतदिग्धदेहा मा भवन्ति मकर- ध्वजतुल्यरूशः ॥ ४५ ॥. आपादकण्ठमरुशृङ्खलवेष्टितागा गाढं वृहन्निगडकोटिनिघृष्ठजला। त्वन्नाममन्त्रमनिशं मनुजाः स्मरंत सद्यः स्वयं विगतवन्धमया भवन्ति ॥४६॥ मत्तद्विपेन्द्रि- मृगराजदवानलाहिसंग्रामवारिधिमहादरवन्धनोत्थम् ।त्स्यायु नाशमुपयाति भयं मियेव यस्तावक स्तवमिमं मतिमान- धोते ॥४७॥ स्तोत्रनजं तव जितेन्द्र गुणैर्निबद्धां भक्त्या मया रुचिरवणं विचित्र पुष्पाम् । धत्तेजनो य इह कएलगतामजलं तं मानतुगमवशा समुपैति लक्ष्मीः ॥ ४ ॥ इति श्रीमानाचार्यविरचिवमादिनामस्तोत्रं समाद जैन-प्रन्य-संग्रह। हिन्दी-भक्तामर । पंडित गिरिधर शमी कृत हैं भक-देव-नत, मौलिमणिप्रभाके । उद्योतकारक, विनाशक पापके हैं ॥ आधार जो भवपयोधि पड़े जनोंके, अच्छी तरा नम उन्हीं प्रभुके पदोंको :॥१॥ श्रीमादिनाय विभु की स्तुति मैं करूंगा। को देवलोकपति ने स्तुति है जिन्होंकी । अत्यन्त सुन्दर जगत्रय-चित्तहारी। सुस्तोत्रसे, सकल शास्त्र रहस्य पाके ॥ २॥ हूं वुद्धिहीन फिर भी बुधपूज्यपाद ! तैयार है स्तवनको निलंज होके ।। है और कीन जगमें तज पालको जो-लेना चहे सलिलसंस्थित चन्द्र-विम्ब ॥३॥ हावे. बृहम्पतिसमान सुवुद्धि तो भी, है कौन जोगिन सके तय सद्गुणोको ॥ कल्पान्तवायुवश सिन्धु अलंध्य जो है, है कौन जो तिर सके उसको भुजासे ॥४॥ ई शकिहीन फिर भी करने लगा ई-री प्रभो ! स्तुति, हुआ वश भकिके मैं ॥ या मोह के वश हुमा शिशुको धचाने-है साम्हना न करता मृग सिंहका भी ॥५॥ हूँ अल्पवुद्धि, बुधमानपकी हंसीका-ई पात्र, भक्ति तव है मुझको धुलाती। जो घोलता मधुर कोकिल है मधूमें, है हेतु आम्रकलिका वसं एक उसका ॥ धानेरी क्रिये स्तुति विभो! बहु जन्मके भी. होते विनाश सब पाप मनुप्यके हैं। भौरे समान अति श्यामलं ज्यों अंधेरा-होता विनाश रविके करसे निशाका ॥ ७॥ यों मान की स्तुति शुरू मुझ अल्पधीने-तेरे प्रभाववश नाथ ! वही हरेगो-सलोकके हृदय को जलविन्दु भी तो, माती समान' नलिनी-दलपै मुहाते ॥८॥ निदोष दूर तव हो स्तुति का बनाना ७२ जन-प्रन्थ-संग्रह। M तेरी कथा तक हरे जगके अघोंको । हो दूर सूर्य करती उसकी प्रभा ही-अच्छे प्रफुल्लित सरोजनको सरों में ॥६॥ आश्चर्य क्या भुवनरत्न! भले गुणोंसे- तेरी किये स्तुति बने तुझसे मनुष्य । का काम है जगतमें उन मालिकोंका, जो आत्म-तुल्य न करें निज आश्रितोंको ॥१०॥ अत्यन्त सुन्दर विभो ! तुझको विलोक अन्यत्र आंख लगती नहिं मानवोंकी! क्षीराधिका मधुर सुन्दर वारि पीके, पीना चहे जलधिका जल कौन खारा ॥१॥ जो शान्तिके सुपरमाणु प्रभो! तनूमें--तेरे लगे, जगतमें उतने वही थे। सौन्दर्यसार जगदीश्वर! चिचहा, वेरे समान इससे नहिं रूप कोई ॥१२ वेरा कहां मुख सुरादिक नेत्ररस्य, सर्वोपमान विजयी, जगदीश! नाथ ! ॥ त्योंही कलंकित कहाँ वह चन्द्रविम्ब, जो हो पड़े दिवसमें ध विहीन फीका ॥१३॥ अत्यन्त सुन्दर कलानिधिकी कलासे, तेरे मनोज गुण नाथ! फिरें जगोंमें ॥ है आसरा त्रिजगदीश्वरका जिन्होंको, रोके उन्हें त्रिजगमें फिरते न कोई ॥१४॥ देवाङ्गना हर सकी मनको नतेरे, आश्चर्य नाथ ! इसमें कुछ भी नहीं है। कल्पान्त के पचनसे उड़ते पहाड़, पै मन्दराद्रि हिलता तक है कभी कमा!॥१शा बत्ती नहीं, नहिं धुआँ, नहिं तैलपूर, भारी हवातक नहीं सकती बुझा है।सारे त्रिलोक विच है करता उजेला, उत्कृष्ट दीपक विभो । घुतिकारि तू है ॥१॥ तूं हो न अस्त, तुझको गहता न राहु-पाते प्रकाश, 'तुझसे जग एक साथ ॥ तेरा प्रभाव रुकता नहिं बादलोंसे--तू सूर्यसे अधिक है महिमानिधान ॥१७॥ मोहान्धकार हरता, रहता -उगा हो-जाता न पहु-मुखमें, न छुपे धनोले । अच्छे प्रकाशित करें जगको, सुहावे, अत्यन्त कान्तिधेर नाथ! मुझेन्दु तेरा क्या भानुसे दिवसमें, निशिमें शशीसे-तेरे प्रमो जैन-ग्रन्थ-संग्रह। है समुबसे तम नाश होते ॥ अच्छी तरा पक गया जग बीच धान-काम कमा जलमरे इन बादलोंसे ॥ १६ ॥ जो ज्ञान निर्मल विभो! तुझमें सुहाता-भाता नहीं वह कमी परदेवता में । होती मनाहर छटा .मणिमध्य जो है, सो कांचमें नहि, पड़े रवि--पिम्बके भी॥ २०॥ देखें भले अयि विभो ! परदेवता दी, देखे जिन्हें हृदय आ तुझमें रमे ये॥ तेरे विलोकन किये फल क्या प्रभो! जो कोई रमे न मनमें पर जन्ममें भी ॥२१॥ माए अनेक जनती जगमें सुतोंको हैं किन्तु वे न तुझसे सुतकी प्रसूता ॥ सारी दिशा धर रही रविका उजेला-पै एक पूरय दिशा रविको उगाती ॥२२॥ योगी तुझे परम पूरुप हैं बताते, आदित्यवर्ण मलहीन तमिस्त्रहारी। पाके तुझे जय करें सय मौतको भी ई और ईश्वर नहीं वर मोक्ष-मार्ग ॥२an योगीश, अव्यय, अचित्य, अनङ्गकेतु-ब्रह्मा, असंख्य, परमेश्वर, एक, नाना-शानस्वरूप, विभु, निर्मल, योगवेत्ता-त्यों आध, सन्त तुझको कहते अनन्त ॥ २४ ॥ तू बुद्ध है षिवुध-पूजित- बुद्धिवाला-फल्याणकर्तृघर शंकर भी तुही है॥तू मोक्ष-मार्ग- विधि-कारक है विधाता--हे व्यक्त नाथ ! पुरुषोत्तम भी तुदी है ॥२१॥ त्रैलोक्य-माति-इर नाथ ! तुझे नमू मैं-हे भूमि के विमल रल तुझे नमू मैं-हे ईश सर्वजगके तुझ को नमू मैं- मेरे भवोदधि-विनाशि! तुझे नमूं मैं ॥२६॥ आश्चर्य क्या गुण समी तुझमें समाये-अन्यत्र क्योंकि न मिली उनको जगा ही। देखा न नाथ! मुख भी तव स्वप्रमें भी, पा आसरा जगतका सब दोपने तो ॥२७॥ नीचे अशोक-तकने तन है सुहाता-तेरा विमो! विमल रूप प्रकाश-फर्ता, फैली हुई किरणका, तमका विनाशी-मानो समीप घनके रवि-विम्ब ही है । सिंहासन स्फटिक-रन जड़ा उसी में माता विभो !कनककान्त शरीररा।

जैन-अन्य संग्रह। न्यों रत्नपूर्ण उद्याचल शीशपै जा.-फैला स्वकीय किरणे रवि-विम्ब सोहे २६ ॥ तेरा सुवर्णसम देह विमो.! सुहाता । है, श्वेत कुन्दसम चामरके उड़ेसे । सोहे सुमेरगिरि, कांचन- कांविधारी। ज्यों चन्द्रकान्तिघर निझर,के बहेसे ॥३०॥ मोती मनोहर लगे जिनमें, सुहाते। नीके हिमांशुसम सुरज तापहारी॥ हैं तीन छत्र शिरपै अति रम्य तेरे । जो तीन लोक परमेश्वरता बताते ॥३॥ गंभीर नाद भरता दशही दिशा में। सत्संग की त्रिजग को महिमा बताता ॥ धर्मेश को कर रहा जय घोषणा है । आकाश वीच वजता यश का नगारा। ३. गन्धोद विन्दुयुतमारुव को गिराई,-मन्दारकादि तरुकी , कुसुमावली की होती मनोरम महा सुरलोक से है-वर्षा, मनो तव लसे वचनावली है ॥३३॥ त्रैलोक्यको सव प्रेमामय वस्तु जोती.भामण्डल प्रवल है तव नाथ ! ऐसा ॥ नाना प्रचण्ड रवितुल्य सुदीप्तिधारी है जीतता शशि सुशोभित रात को भी ॥३४॥ है स्वर्ग मोक्ष पथ-दर्शन की सुनेता। सद्धर्मके कथनमें पटु हैं जगोंके । दिव्यध्वनि, प्रकट अर्थमयो प्रमो। है, तेरी, लहे सकल मानव.वोधं जिस्से ॥ ३५ ॥ फूले हुए कनक के नव पलके से,शोभायमान नखकी किरणप्रभासे। तूने जहां पग धरे अपनेनिभो! है,नीके वहां विबुध पङ्कजकल्पते हैं।दातेरी विभूति इस भांति विभो!हुई जो। सो धर्मके कथन में न हुई किसीकी । होते प्रकाशित, परन्तु तमिस्र-हर्ता-होता न तेज रवितुल्य कहीं ग्रहोंका ।। ३७ ।। दोनों कपोल भरते मदसे. सने हैं। गुजार खूब करती मधुपावली है । ऐसा प्रमत्त गज होकर क्रुद्ध आवे-पावे न किन्तु भय आश्रित लोक तेरे ॥३॥ नानाः करीन्द्रदल-कुभ विदारकेकी-पृथ्वी सुरम्य जिसने : गजमोतियोंसे । ऐसा मृगेंद्र तक चोट.करन उस्पै-तेरे.

जैन-प्रन्थ-संग्रह। पदाद्रि जिसका शुभ मासरा है ॥३६॥ झालें उठेवहुं उड़ें जलते अंगारे । दावाग्रि जो प्रलय-वहि समान भाले । संसार भस्म करने हित पास आवे, त्वत्कीर्निगान शुभवारि उसे समावे॥ ४० ॥ रकाक्ष क्रुद्ध पिककंठ समान काला-फुकार सर्प फणको कर उथ धावे। निःशंक हो जन उसे पगाने उलधेि-त्वनाम नागदमनी जिसके हिये हो ॥४१॥ घोड़े जहां हिनहिने गरजे गजाली-ऐसे महा प्रबल सैन्य. धराधिपों को॥ जाते सभी विखर हैं तव नाम गाये-ज्यों अन्धकार उगते रवि के करों से ॥ १४॥ बचें लगे बह.. रहे गजरतके हैं-तालाबसे, विकल हैं तरणार्थ योद्धा, जीते न जाय रिपु, संगर बीच ऐसे-तेरे प्रभो! चरण- सेवक जीतते हैं ।।४३ ॥ हैं काल नृत्य करते मकरादिजन्तु- त्यों चाडवाग्नि अति भीषण सिन्धु में है ।। तूफान में पड़ गये जिनके जहाज-वे भी प्रभो । स्मरण से तब पार होते ॥ ४॥ अत्यन्त पीड़ित जलोदर भारसे है, है दुर्दशा, तजं चुके निजजीविताशा, वे भी लगा तब पदाब्जरजसुधाको-होते प्रभो! मदन-तुल्य सुरूप देही ॥ ४५ ॥ सारा शरीर जकड़ा दृढ़ सांकलोसे, बेड़ी पड़ें छिल गई जिनकी सुजांघे, त्वनाम मंत्र जपते उन्होंके जल्दी स्वयं झड़ पड़े सब बंधवेडी mean जो बुद्धिमान इस सुस्तव को पढ़े हैं,-होके विभोत उनसे भय भाग जाता दावाग्नि-सिन्धु-महिका, रण-रोगका, त्यो- पञ्चास्य मत्त गजका, सब बन्धनोंका ॥४७॥ तेरे मनोष गुणसे स्तवमालिका ये-गूथी प्रमो! विविध वर्णसुपुष्प पाली-मैंने सभक्ति जन कण्ठ धरे इसे जो-सो मानतुंग-सम प्राप्त करे सुलक्ष्मी ॥४॥ * 'ये पुस्तक प्रकल्पीई "बैन साहित्य प्रसारक कार्वाक्षर-बम्बई" मी मिसवी है।

जैन-ग्रन्ध-संग्रह।
भालोचना पाठ ।
दोहा।
बंदी पांचों परम गुरु, चौबीसौं जिनराज ।
कई शुद्ध आलोचना, शुद्धकरन के काज ॥१॥
सखी छन्द (१४ मात्रा)।
सुनिये जिन अरज हमारी। हम दोष किये अति भारी॥
तिनको अब निर्वृतिकाना। तुम शरन लही मिनराजा ॥२॥ .
इकबे ते चर इंद्री वामनरहित सहित जे जीवा।
तिनको नहिं करना धारो। निरदह है घात विवारी ॥३॥
संमरंभ समारंभ आरंभमनवचतन कीने प्रारंभ।
छत कारित मोदन करिक। क्रोधादि चतुष्टय धरिक ॥४॥
शत आठ जुइम भेदन” । अघ कीने परछेदन।
तिनकी कहुँ कोलौं कहानी। तुम जानत केवलज्ञानी ॥५॥
विपरीत एकांत विनयके । संशय अज्ञान कुनयके।
वश होय घोर अघ कीने । वचत नहिं बात कहीने ॥६॥
कुंगुरुनकी सेवा कीनी। केवल अदयाकरि मीनी।
यो विध मिथ्यात भ्रमायो । चहुंगतिमधि दोष उपायो॥७॥
हिंसा पुनि मूठ जुचोरी । परवनितासों दूगजारी।
आरंभपरिग्रहमीनो। पुन पाप. जु याविधि कोनो ॥
सपरस रसना घाननंको। चख कान विषयं सेवनको।
बहु करम किये मनमाने । कछु न्याय अन्याय न जाने nan.
फलं पंच उदबर खाये। मधु मांस मद्य चित चाहे ॥
नहिं अष्ट मूलगुणधारे । विसन तु सेये दुखकारे ॥१०॥
दुई.बीस अभख जिन गाये । सो भी निशदिन भुजाये।
कुछ भेदाभेद न पायो।ज्यो त्यो फर उदर भरायो॥११॥

जैन-प्रत्य-संग्रह।
मर्मसान जयंधी जानो। प्रत्याख्यान अप्रत्याख्यानो
संज्वलन चौकड़ी गुनिये । सब मेद च पोडस सुनिये ॥ १२॥
परिदास अरति रति शोगाभय ग्लानि त्रिवेद संजोग ।
पनवीस शुभेद भये इम । इनके घश पाप किये हम ॥१३॥
निद्रावश शयन कराया। सुपनेमधि दोष लगाया ॥
फिर जागि विषय बन धायो।नाना विधिविपफल खायो॥१४॥
आहार निहार विहारा। इनमें नहिं जतन विचारा॥
पिन देखा घरा उठाया। विनशोधा भोजन खाया॥१५॥
तब ही परमाद सतायो । बहुविध विकल्प उपजायो।
कछु सुधि वुधि नाहि रही है। मिथ्यामति छाय गई है ॥१६॥
मरजादा तुम ढिग लीनो । ताहू मैं दोप हु कीनी ।
भिन मिन अव कैसे कहिये । तुम ज्ञानविपे सव पाये ॥ १७ ॥
हाहा मैं दुष्ट अपराधी। सजीवनराशि विराधी॥
थायरकी जतन न कोनी । उरमें फरणा नहिं लीनो ॥१८॥
पृथिवी चहु खोद कराई। महलादिक जागा चिनाई।
पुन विन गाल्यो जल ढोल्यो। पंखात पचन विलोल्यो॥ १६ ॥
हा हा मैं श्रदयाचारी । बहु हरितकाय तु विदारी॥
या मधि जीवनिक बंदा । हम खाये धरि आनंदा ॥२०॥
हा हा मैं परमादधसाई। पिन देखेभगनि जलाई ।
तामधि जे जीव जु आये।तेह परलोक सिधाये ॥ २१ ॥
बोधो अन्न रात्रि पिसायो। ईधन विन सोधो जलायो।
झाडू ले जागां बुहारी चिटियादिक जीव विदारी ॥ २२॥ ।
जल छानि जीवानी कोनी । सोह पुनि मारिजु दोनी॥
नहिं जलथानक पहुंचाई । किरिया विन पाप उपाई ॥ २३ ॥
जल मलमोरिनमें गिरायो । कृमि फुल बहु घात करायो।
नदियनि विच चीर भुषाये। कोसनके जीव मराये ॥२४॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। प्रचादिक शोध कराई । तामैं जु जीव निकराई । तिनका नहि जतन कराया । गलियारै धूप डराया ॥२५॥ पुनि द्रव्य कमावन काज । बहु आरंभ हिंसा साज ॥ किये अघ तिसनावश भारी। करुना नहिं रंच विचारी ॥२६॥ इत्यादिक पाप अनंता । हम कोने श्री मगधंता ॥ शंतति चिरकाल उपाई। वानीत कहिय न जाई ॥ २७ ॥ ताको तु उदय जब आयो। नानाविध मोहि सतायो । फल भुजत जिय दुख पावै । बचतै कैसे करि गावै ॥२८॥ तुम जानत केवल ज्ञानी । दुख दूर करो शिवथानी ॥ तो तुम शरन लही है। जिन तारन विरद सही है ॥२॥ जो गांवपती इक हावै । सो भी दुखिया दुख तुम तीन भुवन के स्वामी । दुख मेये अंतरजामी ॥३०॥ द्रोपदिको चीर बढ़ायो । सीताप्रति कमल रचायो ।। अंजनसे किये अकामी। दुख : मेटो अंतरजामी ॥३१॥ मेरे अवगुन न चितारो। प्रभु अपनी विरद निहारो। सब दोप रहित करि स्वामी । दुख मेंटहु अंतरजामी ॥३२॥ इन्द्रादिक पदवो न चाहूं। विषयनिमैं नाहि लुभाऊँ । रागादिक दोष हरीजे। परमातम निजपद् दीजे ॥ ३३ ॥ खावै॥ दोहा। दोषरहित जिनदेवजी, निजपद दीज्यो मोहिं। : सब जीवनकै सुख बढ़े, आनंद मंगल होय ॥३४॥ अनुभव माणिक पारखी, जौहरी आपजिनन्द । नेही वर मोहिं दीजिये, चरन सरन आनंद ॥ ३५॥ इदि मालोचना पाठ सनाव जैन-ग्रन्थ-संग्रह। निर्वाणकांड भाषा। पपिपर भैया नगपतीदाबी रषिक्ष । दोहा। वीतराग धंदौ सदा, भावसहित सिरनाय । कई कांड निर्वाणकी, भाषा सुगम बनाय ॥१॥ चौपाई १५ मात्रा। अष्टापदादीसुरस्वामि। वासुपूज्य चंपापुरि नामि । नेमिनाथस्वामी गिरनार । वदी भावभगति उरधार ॥२॥ चरम तीर्थकर चरम शरीर । पावापुरि स्वामी महावीर । शिखरसमेद जिनेसुर वीस । भावसहित यंदों जगदीस ॥३॥ वरदतराय रुइद मुनिंद । सायरदत्त आदि गुणवृद ॥ नगरतार- वर मुनि उठकोड़ि । वंशी भावसहित कर जोड़ि ॥ ४॥ श्रीगिर- नारशिखर विख्यात । कोडिबइत्तर अरु सौ सात ॥ संत्रु प्रद्युम्न अपर भाय । अनिरुद्य आदि नमूतसु पाय ॥५॥ राम चन्द्र के सुत छ वीर। लाडनरिंद आदि गुणधीर ॥ पांच कोडि अनि तिमझार । पावागिरि वंदी निरधार ॥६॥ पांडक तीन द्रविड राजान । आठकोड़ि मुनि मुरुनि पयान ॥ श्रीशत्रु जयगिरफे सीस । भावसहित बंदी निश दीस ॥७॥ वलिभद्र मुमतिमें गये। आठकोड़ि मुनि औरहि भये । श्रीगजपंथशिखर सुविशाल । तिनके चरण नमू तिहु काल ॥ ॥ राम पनू सुग्रीव सुडील । गवगवाख्य नील महनील ।। कोड़ि निन्याणचे नुपियान । तुंगोगिरि चंदौं धरि ध्यान ॥३॥ नंग अनंग कुमार सुजान। पंचकोडि अरु अर्धप्रमान मुक्ति गये सोनागिरसीस । ते चंदा त्रिभुवनपति ईस ॥१०॥ ।

6 जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ॥ रावणके मुत आदि कुमार । मुक्त गये. रेवावट सार | कोडि पंच अरु लाख पचास । ते चंदों धरि परम हुलास ॥ ११ ॥ रेवानदी सिद्धवरकूट। पश्चिमदिशा देह जहँ छ॥ चक्री दश कामकुमार। ऊठकोड़ि वंदौं भवपार ॥ १२॥बड़वाणी वडनयर सुचंग । दक्षिण दिश गिरिचूल उतंग ।। इंद्रजीत अरु कुभ जुकर्ण। वे चंदौं भवसागरतणं ।। १३ ।।सुवरणभद्रा- दिमुनि, चार । पावागिरिवर शिखरमंझार चेलना नदी तीरके पास । मुक्ति गये बंदों नित तास ॥१४॥ फलहोड़ी बड़गाम अनूप । पश्चिमदिशा द्रोणगिरिरूप ॥ गुरुदत्तादि मुनी सुर जहाँ । मुक्ति गये बंदी नित तहाँ ॥२५॥ वाल महावाल मुनि दोय । नागकुमार मिले त्रय होय ॥ श्रीअष्टापद मुक्किम- मार ते व नित सुरतसंभार ॥ १६ ॥ अचलापुरकी दिश ईशान । तहाँ मेढ़गिरि नाम प्रधान । साढ़ेतीन कोड़ि मुनिरोय। तिनके चरन नमू चित लाय ॥१७॥ वंशस्थल वनके ढिग होय । पश्चिमदिशा कुथगिरि सोय ॥ कुलभूषण देशभूषण नाम। तिनके चरणनि कर प्रणाम ।।१८।। जसरथराज! के सुत कहे । देशलिंग पांचसौ लहे ॥ कोटि शिला मुनि कोटिप्रमान | वंदन कर जोर जुगपान ॥ १९॥ समवसरण श्रीपार्श्व जिनंद । रेसंदीगिरि नयनानंद ॥ वरदत्तादि पंच ऋषिराज । ते बंदी नित धरमजिहाज ।।२०।। तीन लोकके तीरथ जहाँ। नितप्रति वंदन कीजे तहाँ मन वच कायसहित सिरनाय । वंदन करहिं भवकि गुणगाय ॥ २१ ॥ संवत सत- रहसौ इकताल । अश्विनमुदि दशमी सुविशाल ॥ " भैया' संदन करहिं त्रिकाल । जयनिर्वाणकांड गुणमाल ॥ २९॥ . इति निर्वाणकांड भाषा ।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह
R
निर्वाणकाण्ड गाथा ।
अट्ठावयम्मि उसहो चंपार वासुपुजजिणणाहो । उजते
मिजिणी पावाए णिबुदो महावीरी ॥१॥वीतं तु जिण-
वरिंदा अमरासुरवंदिदा घुदकिलेसा । सम्मेदे गिरिसिहरे
णिध्वाणगया णमो तेसि ॥२॥ वरदत्तो य वरंगो सायरदत्तो
य तारवरणयरे । आहुट्ठयकोडीमो णिवाणगया णमो
तेसिं॥३॥णेमिसामि पजण्णो संवृकुमारो तहवे अणिरुद्धो।
वाहत्तरिकोड़ीओ उजते सत्तसया सिद्धा ॥४॥ रामसुवा
वंण्णिा सुणा लाडरिंदाण पंचकोडीभो। पावागिरिवरसि-
हरे णिय्याणगया णमो तेसि ॥५॥ पंडुसुआ तिणिजणा
दविडरिंदाण अट्ठकोडीओ । सेञ्जयगिरिखिहरे णियाण-
गया एमो तेसिं ॥ ६॥ संते जे बलभद्दा जदुवरिंदाण अट्ट-
कोडीयो । गजपंथे गिरिसिहरे णिवाणगया णमो तसिं ॥ ७॥
रामहणू सुग्गीमओ गवयगवाक्खो य णोलमणोलो। एवणव-
दीकोडीओ तुंगीगिरिणिबुदे वंदे ॥८॥ गंगाणंगकुमारा कोडी.
पंचमुणवरा सहिया। सुवणागिरिवरसिहरे णिव्वाणगया
णमो तेलि ॥६॥ दहमुहरायस्स सुवा कोडोपंचद्धमुणिवरा
सहिया । रेवाउहयतडग्गे णिव्वाणगया णमो तेसिं ॥१०॥
रेवाणइए तोरे पश्चिमभायम्मि सिद्धयरकृडे । दो चक्की वह
कप्पे आहुट्ठयकोडाणिव्वुदे चंदे ॥ ११॥ बडवाणीवरणयरे
दक्षिणभायम्मि चूलगिरिसिहर । इंदजीदकुभयणो णिव्या-
णगया णमो तेसि ॥१२॥ पावागिरिवरसिहरे सुवरणमहा-
इमुणिवरा चउरो | चलणाणईतडगे। णिचाणगया णमो
तेसि ॥ १३ ॥ फलहोडीवरगामे पश्चिममायम्मि दोणगिरि-
सिहरे। गुरुदचाइमुणिंदा णिवाणगया णमो तेति ॥ १४॥

जैन-मान्य-संग्रह।
णायकुमारमुणिदो वालि महावालि चेवं अज्मेया। अट्ठावय-
गिरिलिहरे णिव्वाणगया णमो तेति ॥ १५॥ अचलपुरवर-
पयरे ईसाणे-भाए मेढगिरिसिहरे । आहुट्ठयकोडीओ णिब्वा-
गया णमो तेति ॥ १६ ॥ सत्थलवरणियरे पच्छिममा-
यग्मि 'कुंथुगिरिसिहरे । कुलदेसभूषणभुणी णिव्वाणगया
णमो वेसिं। १७॥ जसरहरायरस सुमा पंचसयाई कलिंग..
देसम्मि। कोडिसिलाकोडिमुणि णिवाणगया णमो
तेसि ॥१पासरस समवसरणे सहिया वरदचमुणिवरा
पंच रिरिसदे गिरिसिहरे णिवागया णमो तेसिं ॥ १६ ॥
पंच कल्याणक पाठ।
स्वीय कविषर पं० रुपपन्दजी पहि:स्व
এম কাযক্ষ
पण विवि पंच परम गुरु, गुरु जिन शालनी।
सकल सिद्धि दातार सु, विधन विनासनो ।
शारद अरु गुरु गौतम, सुमति प्रकासनो।
मंगल करहिं चड़-संध, सुपाप पणासनो।
पापै पणासन गुणहि गरुवा, दोष अष्टादश रहे ।
धरि ध्यान कर्म विनाशि केवल, ज्ञान अविचल जिन:सहे।
प्रभु पंचकल्याणक-विराजत, सकल सुर नर ध्यावहीं।
लोमनाथ सुदेव जिनवर, जगत मंगल गावही ॥१॥

जैन-प्रत्य-संग्रह। G जाकै गरभकल्याणक, धनपति आइयो। अवधिज्ञान-परवान, सु इंद्र पठाइयो। रचि नव घारह योजन, नगरि सुहावनी। कनकरयणमणिमंडित, मंदिर अति बनी। अति बनी पोरि पगारि परिखा, सुवन उपवन साहिए। नर नारि सुन्दर चतुरमेख सु, देख जनमन मोहिए। तहाँ जनकगृह छह मास प्रथमहि, रतनधारा वरषियो। पुनि रुचिकवासिनि जननि-सेवा, करहिं सब विधिहरषियो । सुरकुंजरसम कुंजर धवल धुरंधरो। केहरि केशरशोभित, नखशिवसुंदरी॥ कमलाकलशन्हवन, दोय दाम सुहावनी। रवि शशि मंडल मधुर, मोन जुग पावनी ॥ पोवनी कनक घट युगम पूरण, कमलकलित सरोवरो। फलोलमालाकुलित सागर, सिंहपीठ मनोहरो॥ रमणीक अमरविमान फणिपति, भुवन भुवि छविछाजए। रुचि रतनराशि दिपंत दहन लु, तेजपुंज विराजए ॥३॥ ये सखि सोलह सुपने, सूती सयनमें। देखे.माय मनोहर, पच्छिम-यनमें । उठि प्रभात पिय पूछियो, अवधि प्रकासियो। त्रिभुवनपति सुत होसी, फल तिहिं भासियो। मासियो फल तिहि चिति दंपति, परम आनन्दित भए । हमास परि नवमास पुनि तह, रयन दिन सुख गए । गर्मावतार महत महिमा, सुनत सब सुख पावहीं। मन रुपचंद' सुदेव जिनवर, जगत मंगल गावहीं ॥४॥ .

जैन-प्रन्थ संग्रह। 'श्री जन्म कल्याणक। मतिश्रुतअवधिविराजित, जिन जब जनमियो। तिलोक भयो छोभित, सुरगण भरमियो। कल्पवालिघर घंट, अनाहद बजियो। जोतिषधर हरिनाद, सहज गल गजियो। गजियो सहज हि संख भावन, भुवन सवद सुहावने । वितरनिलय पटु पटहिं वजिय, कहत महिमा क्यों बने । कंपित सुरासन अवधिवल जिन,-जनम निहचै जानियो। धनराज तब गजराज माया,-मयी निरमय आनियो॥५॥ योजन लाख गर्यद, वदन-सौ निरमए। वदन वदन बसु दन्त, दन्त सर संठए । सर सर सौ-पणवील कमलिनी छाजहीं। कमलिनि कमलिनि कमल, पचीस विराजहीं। राजहीं कमलिनि कमल अठोतर,-सौ मनोहर दल बने। दल दलहिं अपछर नहिं नवरस, हावभाव सुहावने । मणि कनककंकण वर विचित्र, सु अमरमंडप सोहये धन घंट चघर धुजा पताका, देखि त्रिभुवन मोहये ॥६॥ तिहि करी हरि चढ़ि आयड, सुरपरि वारियो। पुरहिं प्रदच्छंना देत सु, जिन जयकारियो। गुप्त जाय जिन-जननिहि, सुखनिंद्रा रची। मायामयी शिशु राखि तौ; जिन पान्यो सची। आन्यो सची जिनरूप निरखत, नयन त्रिपति न हूजिये। तव परमहरषितहृदय हरिने, सहस लोचन पूजिये ।। पुनि करि प्रणाम जु प्रथम इंद्र, उछंग धरि प्रभु लीनऊ। ईशानइन्द्र सु चंदषि शिप, छत्र प्रभु के दीनऊ ॥७॥ .

जैन-ग्रन्थ संग्रह। . ."- सनतकुमार महेन्द्र, चमर दुहि दारहीं। शेष शक जयकार, संबद उच्चारहीं। उच्छवसहित चतुर्विधि, सुर हरषित भये। योजन सहस निन्याणवे, गगन उलंघि गए। लंघि गये सुर्रागर जहाँ पांडक,-धन विचित्र विराजही । पांडुकशिला तहाँ अर्द्धचन्द्र समान, मणि छवि छाजही ।। योजन पचास विशाल दुगुणायाम, वस्तु ऊंची गणी। घर अष्ट मंगल कनक कलशनि, सिंहपीठ सुहावनी ॥ ॥ . रचि मणिमंडप शामित, मध्य सिंहासनो। थाप्यो पूरव-मुख तहाँ, प्रभु कमलासनो।। वाजहि ताल मृदंग, वेणु वीणा. धने। दुदुभिप्रमुख मधुरधुनि, मौर शु वाजने ॥ बाजने वाजहि सची लब.मिलि, धवल मंगल गावहीं। कर कह नृत्य सुरांगना सब, देव कौतुक धावहीं॥ भरि छीरसागर-जलशु हाथहि, हाथ सुर गिरि ल्यावहीं। सौधर्म अरु ऐशानइन्द्र सु. कलश ले प्रभुम्हावहीं ॥६॥ वदन-उदर-अवगाह, कलशगत जानिये। एक चार वसुयोजन, मान प्रमानिये ॥ सहस-अगेतर कलशा, प्रभुके सिर ढरै। पुनि श्रृंगारप्रमुख आ, चार सबै करै।। करि प्रगट प्रभु महिमामहाच्छव, आनि पुनि मातहिंदयो। धनपतिहि सेवा राखि सुरपति, आप सुरलोकहिं गयो। जनमाभिषेक महंत महिमा, सुनत सव सुख पावहीं । भन 'पचंद्र' सुदेवं जिनवर, जगत मंगल गावहीं ॥१०॥ .

E जैन अन्य संग्रह। --.- श्री सप कन्याणक। श्रमजलरहित शरीर, सदा सब मलरहिउ। छीर-बरन वर रुधिर, प्रथमआरति लहिउं॥ प्रथमः सारसंहनन, सुरुप विराजहीं। सहज-सुगंध सुलच्छन, मंडित छाजहीं।। छाजहिं अतुलबल परम प्रिय हित, मधुर वचन सुहावने। दश सहज अतिशय सुभग मूरति, बाललील कहावने।। आबाल काल त्रिलोकपति-मन, रुचिर उचितं जुनित नये। अमरोपुनीत पुनीत अनुपम सकल भोग विभौगये ॥१९॥ भवतन-भोग-विरत्त, कदाचित चित्तए । धन योवन पिय पुन, फलतः अनित्तए । कोरशरन भरनदिन; दुख चहुंगति भयो। सुख दुख एकहि भोगत, जिय विधिवंश पर्यो। पर्यो विधि वश आन चेतन, मन जड़ तु कलेवरो। तनअशुचिपरतें होय मानव, परिहरतौ संवरी ॥ निर्जगतपवल होय समकित,-विन सदा त्रिभुवन भ्रन्यो दुर्लभ विवेक विना न कबई, परम धरमविष रम्यो । १२.० ये प्रभु चारह पावन, मावन माझ्या। लोकांतिक वरदेव; नियोगो आइया ।। कुसुमांजलि दे चरण; कमल शिरनाइये। स्वयंबुद्ध प्रभु थुति करि, तिन समुझाइये ।। समुझाय:प्रभु.ते गये निजपद, पुनि-महोच्छव हरिकियो। रुचिरुचिर चित्र विचित्र शिविका, कर सुनंदन वन लियो। वह.पंचमूठी लॉच कीनों, प्रथम सिद्धनि नुति करी। मंख्यि महाव्रत पंच दुर्द्धर सकल परिग्रह परिहरी ॥१३॥ .

जैन-प्रन्य-संग्रह। मणिमयभाजन केश, परिट्ठिय सुरपती। छोर-समुद्र-जल खिपिकरि, गयो ममरापती॥ तप संजमवल प्रभुको, मनपरजय भयो। मौनसहित तप करत, काल फछु तह गयो। गयो फछु तहँ काल तपयल, रिद्धि पसु विधि सिद्धया । बसु धर्मध्यानयलेन क्षयगय, सप्त प्रकृतिप्रसिद्धिया ॥. विपि सातवेंगुण जतन विन तई, तीन प्रकृति शुधुधि यढ़े। करि फरण तीन प्रथम शुकलयल, खिपफश्रेणी प्रभुचढे ॥१४॥ प्रकृति छतीस न गुण-थान विनासिया। दशमें सूच्छमलोम,-प्रकृति तह नासिया। शुकल ध्यान पद दूजो, पुनि प्रभु पूरियो । चारहमें-गुण सोरह, प्रकृति जु चूरियो । चूरियो प्रेसठ प्रकृति इहविधि, घातिया फर्महतणी। तप किया ध्यानप्रर्यत पारद विधि त्रिलोकशिरोमणी निक्रमणकल्याणक सुमहिमा, सुनत सब सुख पावहीं । मन 'रुपचंद्र' सुदेव जिनघर, जगत मंगल गावहीं ॥१५॥ श्री ज्ञानकल्याणक। तेहरमें गुण-थान, संयोगि जिनेसुरी। अनंतचतुष्टयमंडित, भयो परमेसुरो। समवसरन तय धनपति, बहुविधि निरमयो। मागम सुगति प्रमाण, गगनतल परिठयो । परिव्यो चित्रविचित्र मणिमय, सभामंडपासोइये। तिहिं मध्य यारह बने कोठे, वनक सुरनर मोहये। मुनि कल्पवासिनि अरजिका पुनि, ज्योति भौम भुवन:तिया। 'पुनि भवन व्यंतर नमग.सुर.नर, पशुनि कोठे बैठिया...? .

Fa जमग्रन्य-संग्रह। . मध्यप्रदेश तीन, मणिपीठ तहां बने। गंधकुटी सिंहासन, कमल सुहावने ॥ तीन छत्र सिर शोभित, त्रिभुवन मोहए। अंतरीक्ष कमलासन, प्रभुतन सोहए। सोहए चौलठि चमर दुरत, अशोकतरु तल छाजए। पुन दिव्यधुनि प्रतिशबद जत तहँ, देवदुंदुमि वाजए। सुरपुहुपवृष्टि सुप्रभामंडल, कोटि रवि छवि लाजए। इमं अप अनुपम प्रातिहारज, वर विभूत विराजए॥ १७॥ तुइस योजन मान, सुभिच्छ चहूँ दिशी। गगन गमन अरु प्राणि,-वध नहिं अहनिशी ।। निरुपसर्ग निराहार, सदा जगदीसए । आनन चार चहूदिशि, शोभित दोसए । दीसे मशेष-विशेष विद्या, विभव वर ईसुरपनो। छायाविवर्जित शुद्ध फटिक, समान तन प्रभुको बनो । नहिं नयन पलक पतन कदाचित, केश नख सम छाजहीं। ये धातियाछ्यजनित अतिशय, दश विचित्र विराजहीं॥१८॥ सकल अरथमय मागधि, भाषा जानिये। सकल जीवगतः मैत्री, भाव वखानिये । सकल ऋतुज फलफूल, वनस्पति मन हरै। दर्पणसम मनि अवनि, पवन गति अनुसरै।। अनुसरै परमानंद सबको, नारि नर जे सेवता। योजन प्रमाण धरा सुमाहिं, जहाँ मारुत देवता ॥ पुनि करहिं मेघकुमार गंधो-दक सुवृष्टि सुहावनी। पदकमलवर सुर खिपहि, कमल सु, घरणि शशिशोभा बनीnan.

जैन-प्रन्ध-संग्रह। अमल गगन तल अरु दिशि तह अनुहारहीं। चतुरनिकाय देवगण, जय जयकारहीं। धर्मचक्र चले आगे, रवि जहं लाजहीं। पुनि भृगार-प्रमुख वसु, मंगल राजहीं। राजहीं चौदह चाह अतिशय, देवरचित सुहावने । जिनराज केवलज्ञानमहिमा, अवर कहत कहा बने ।। .. सब इंद्र आनि कियौ महोच्छव, सभा शोमित अति बनी। धर्मोपदेश दियो तहां, उच्छरिय वानी जिनतनी ॥२०॥ क्षधा तृषा अरु राग द्वेष असुहावने ॥ जनम जरा अरु मरण, त्रिदोष भयावने । रोग शोक भय विस्मय, अरु निद्राघणी। खेद स्वेद मंद मोह, अरति चिंता गणी॥ गणीये अठारह दोष तिनकार, रहित देव निरंजनो। नव परमकेवललब्धिमंडित, शिवरमणी--मनरंजनो। श्रीशानकल्याणक सुमहिमा, सुनत सब सुख पावहीं। मन 'रूपचन्द्र 'सुदेव जिनवर, जगत मंगल गावही ॥२१ " श्री निर्वाण कल्याणक केवलष्टि चराचर, देख्यों जारिसो। भविजनप्रति उपदेश्यो, जिनवर तारिलो। भवभयभीत महाजन, शरणे आइया। रत्नत्रयलच्छन शिवपंथनि लाइया । लाइया पंथजु भन्य पुनि प्रभु, तृतिय सुकल जू पूरियो । तजि तेरहौं गुणथान योग अयोगपथपग धारियो ।

जैन-प्रत्य-संग्रह। पुनि चौदहे: सुकलबल, बहत्तर तेरह हती! इमि घाति वसुविधि कर्म पहुंच्यो, समयमें पंचमगती-१२२ ॥ लोकशिखर तनुवात, बलयमह संठियो। धर्मद्रव्यविन गमन न, जिहिं आगे कियो। . भयनरहितं मूषोदर, अंबर जारिसो। किमपि हीन निजतनुते, भयौ प्रभु तारिसो। तारिसो पर्जय नित्य अविचल, अर्थ पर्जय क्षणक्षयों। निश्चयनयन अनंतगुण विवहार, नय वनु गुणमयो । वस्तू स्वभाव विभावविरहित, शुद्ध परणंति परिणयो। चिद्रप परमानंदमंदिर, सिद्ध परमातम भये ॥ २३॥ तनुपरमाणू दामिनिपर, सब खिर गये। रहे शेष नखकेशरूप, जे परिणये ।। तब हरिप्रमुख चतुरविधि, सुरगण शुम सच्यो । मायामई नख केशरहित, जिनतनु रच्यो। रचि अगर चंदनप्रमुख परिमल, द्रव्य जिन जयकारियो। पंदपतित अगनिकुमारमुकुटानल, सुविधि संस्कारियो । निर्वाणकल्याणक सुमहिमा, सुनत सब सुख पावहीं । भन 'रूपचंद्र, सुदेव जिनवर, जगत मंगल गावहीं ॥ २४ मंगल-गीत । मैं मतिहीन भगतिवश, मावन भाइया । मंगलगीतप्रबंध'सु, जिनगुण गाइया ॥ जो नर सुनहि बखामहि, सुर धरिं गावहीं। मनवांछित फल सो नरं, निहचैं पापहीं।

जैन-प्रसंन्यग्रह। ए पावहीं अष्टौ सिद्धि नवनिधि, मनप्रतीति तु आनहीं। भ्रमभाव छूट सकल मन के, जिन स्वरूप सो जानहीं। पुनि हरहि पातक टरहि विधन, सु होय मंगल नित नयें। भणि रूपचंद्र त्रिलोकपति जिन-देवं चउसंघहि जये ॥ २५ ॥ छह डाला। बीयुत पंडित दौलतरामजी कृव, सोरण । तीन भुवन में सार, चीतराग विज्ञानता। शिवस्वरूप शिवकार, नमहुँ त्रियोग सम्हारिके। प्रथमहाल-चौपाई छन्द १५ मात्रा। जे त्रिभुवनमें जीव अनन्त । सुख चाहें दुखतें भयवन्त । तात दुखहारी सुखकार । कहैं सीख गुरु करुणाधार ॥१॥ ताहि सुनो भवि मनथिर आन । जो चाहो अपनो कल्यान । माह महा मद पियो अनादि । भूल आपको भरमत वादि ॥२॥ तांस भ्रमणको है बहु कथा। पै कछु कहूं कही मुनि पथा। काल अनन्त निगोद महार वीतो एकेन्द्री तन धार ॥३॥ एक श्वासमें अठदशवार । जन्मो मरा भरो दुख भार। निकस भूमि जल पावक भयो। पवन प्रत्येक वनस्पति थयो ॥४ दुर्लभ लहिये चिन्तामणी । त्यो पर्याय-लही त्रस तणी। लट-पिपील अलि आदि शरीर । धरधर मरो खही बहुपीर राणा

जैन-प्रन्थ-संग्रह
कबहूं पंचान्द्रो पशु भयो । मन विन निपट मचानी थयो।
सिंहादिक सेनी है कूर । निबल पर हतः खाए भूर ॥६॥
कबहूँ आप भयो घलहीन, सबलनकर खायो अति दीन ।
छेदन भेदन भूखरु प्यास । भार वहनहिम आतप त्रास ॥७॥
वध बंधन आदिक दुख घणे । कोटि जीभकर जात नभणे,
अतिसंक्लेश भावते मरो। घोर शुभ्र सागर में परो॥८॥
तहाँ भूमि परसत दुख इसी।बीच सहस उसे नहि तिसो॥
सहाराध शणित वाहिनी । क्रम कुल कलित देह वाहनी ॥
सेमलतरु जुतदल असिपत्र | असि ज्यों देह.विदारें तत्र ।
मेल्लमान लोह गलिजाय । ऐसी शीत उष्णता थाय ॥१०॥
तिल तिल करें देह के खंड । असुर भिड़ा दुष्ट प्रचंड ॥
सिंधु नीरतें प्याल न जाय । ती पण एक न बूंद लहाय ॥११॥
तीन लोक को नाज जो खाय । मिटे न भूख कणा न लहाय ॥
ये दुस्ख बहु सागरलो सहै । करमयोगते नरगति लहै ॥ १२॥
जननी उदर बसो नवमास, अंग सकुचत पाई त्रास ॥
निकसत जे दुख पाये घोर, तिनको कहत न आवे ओर ॥१३॥
बालकपन में शान न लह्यो। तरुण समय तरुणी रति रयो॥
अद्ध मृतक सम बूढ़ापनो । कैसे रूप लखै आपनो ॥१४॥
कभी अकाम निर्जरा करे । भवनत्रिक में सुर तन धरै ।.
विषयचाह दावानल दह्यो । मरत विलाप करत दुःखसह्यो ॥१५॥
जो विमानवासीह थाय । सम्यक्दशनविन दुख पाय ॥
तहते चय थावर तन धरै । यो परिवर्तन पूरे करै ॥ १६॥
द्वितीय ढाल-परीछन १५ मात्रा ।
ऐसे मिथ्या दुग धानवर्ण विश भ्रमत भरत दुखि जन्म मणे॥
वाते.इनको तजिये सुजान । सुन तिन संक्षेप कई बखान ॥१॥

जैन-प्रन्य-संग्रह जीवादि प्रयोजन भूततत्व । सरधै तिन माहि विपर्यत्व ॥ चेतन को है उपयोग रूप । विन मूरति चिन्मूरति अनूप ॥२॥ पुद्गल नम धर्म अधर्म काल । इनते न्यारी है जीवचाल ॥ साकून जान विपरीत मान । करि कर देह में निजपिछान ॥३॥ मैं सुखी दुखी मैं रंक राव । मेरो धन गृह गोधन प्रभाव ॥ मेरे सुत तिय मैं सबल दीन । बेरूप सुमग मूरत प्रवीन ॥ ४॥ तन उपजत अपनी उपजजान । तन नशत आपको नाश मान। रागादि प्रगट ये दुःख दैन । तिनही को सेवत गिनत चैन । शुभ अशुभ बंधके फल मझार।रति भरति करै निजपद विसार। मातम हित हेतु विराग ज्ञान । ते लने आप कष्ट दान ॥६॥ रोके न चाह निज शक्ति खोय। शिवरूप निराकुलता न जोय ॥ याहि प्रतीत युत कछुक ज्ञान । सो दुखदायक अज्ञान जान IGN इन जुत विषयनिमें जो प्रवृत्त । ठाकु नानो मिथ्या चरित ॥ यो मिथ्यात्वादिनिसर्ग जेह । अब जे गृहीत सुनिये सुतेह ॥८॥ जो कुगुरु कुव कुधर्म सेव । पोखें चिर दर्शन मोह एव ।। अंतर रागादिक धरै जेह । बाहर धन अंबरतें सनेह ॥६॥ धार कुलिंग लहि महत भाव । ते कुगुरु जन्म जल उपलनाव । जे राग द्वेषे मलकरि मलीन । वनिता गदादिजुत चिन्ह चीन्ह ।। तेहैं कुदेव तिनको जु सेव । शठ करत न तिन भवभ्रमणछेव । रागादि भाव हिंसा समेत । दर्वित प्रसथावर मरणकेत ॥११॥ जे क्रिया तिन्हें जानहु कुधर्म । तिन सरधे जीव लहे अशर्म । या प्रहीत मिथ्यात जान । अब सुन प्रहीत जो है अजान ॥१२॥ .एकान्त वाद--दूषित समस्त । विषयादिक पोषक अप्रशस्त्र । कपिलादि रचित श्रुत का भ्यास । सोहै कुबोध बहु देन त्रास। जो ख्यातिलाभपूजादि चाह । धर करत विविध विधदेहदाह! मातम मनातमकेशान हीन । जे जे करनी तन करन छोन ॥१४॥ .

M जैन-प्रन्य-संग्रह। ते सब मिथ्या चारित्र त्याग..अव आतम के हित पंथ लाग। जगजाल भ्रमणकोदेय त्याग । अबदौलत निजातमनुपाग॥१५॥ तृतीय ढाल नरेन्द्र २८ मात्रा। मातम को हित है सुख सो सुख आकुलता चिन कहिये। माकुलता शिव मांहि न ताते, शिव मग लाग्यो चहिये। सम्यक् दर्शन ज्ञान चरित शिव, मग सो दुविधि विचारो। नो सत्यारथ रूप सो निश्चय, कारण सो व्यवहारो॥श परद्रव्यन त भिन्न आप में, रुचि सम्यक्त भला है। आप रूप को ज्ञानपनो सो सम्यक् झान कला है । आप रूपमें लीन रहे थिर, सम्यक् चारित सोई। अव व्यवहार मोक्ष मग सुनिये, हेतु नियत को हाई ॥२॥ जीव अजीव तत्त्व अरु आश्रव, वंधर संवर जानो। निर्जर मोक्ष कहे निज तिनको, ज्यों को त्यों सरधानो। है साई समकित विवहारी, अब इन रूप वखानों। तिनको सुन सामान्य विशेष, गुढ़ प्रतीति उर आनी ॥३॥ . बहिरातम अन्तरआतम पर-मातमजीव त्रिधा है। देह जीव को एक गिने वहि,-रातम तत्त्व मुधा है । उत्तम मध्यम जघन त्रिविध के, अन्तर आतम ज्ञानी। द्विविधसंग विन शुध उपयोगी, मुन उत्तम निज ध्यानी nen मंध्यम अन्तर मातम हैं ने, देशवती आगारी। जंघन कहे अविरत सम दृष्टी, तीनों शिवमग चारी। सकळ निकल परमातम द्वैविधि तिनमें घाति निवारी । भी परहंत सकल परमातम, लोकालोक निहारी ॥५॥ शानशरोरी त्रिविध कर्म मल, वर्जित सिद्ध महता। : ते हैं निकल.अमल.परमातम, भोगें शर्म अनन्ता ।

जैन-प्रन्ध-संग्रह। पहिरातमता हेय जानि तजि, अन्तर आतम हुजे। परमातमको ध्याय निरन्तर, जो नित आनंद पूजे ॥६॥ चेतनता घिन सो अजीव है, पंच भेद ताके हैं पुल पंचवरण रस गंधदो फरसवसु जाके हैं। जिय पुद्गलको चलन सहाई, धर्म द्रव्य अनरूपी । तिष्ठत होय अधर्म सहाई, जिन बिन मूर्ति निरूपी ॥७॥ सकलद्रव्यको यास जासमें, सो बाकाश पिछानो। नियत वर्तना निशिदिन सो व्यो-हार काल परिमानो। यो यजीव अब आधव सुनिये, मनपच काय नियोगा। मिध्या अविरत अरु कपाय पर-माद सहित उपयोगा॥८॥ येही भातमको दुखकारण, तातें इनको तजिये। जीव प्रवेश बंधे विधिसो सो, बंधन कहुँ न लजिये। शमदमते जो कर्म न आवै, सो संवर आदरिये । तप चलते विधि शरन निरजरा, ताहिं सदा चरिये ॥६॥ सकलकर्मत रहित अवस्था, सो शिव थिर सुखकारी। इहिविधि जो सरधातत्वनकी, सोसमकित व्यवहारी॥ देव जिनेन्द्र गुरु परिग्रह विन, धर्मदयायुत सारो। यह मान समतिको कारण, भष्ट अंग जुत धारो॥ १०.३ पसुमद टारि मिवारि त्रिशठता, पट अनायतन त्यागो। शंकादिक वसु दोप विना सं,-वेगादिक चित पागो। अष्टमंग अरु दोष पचीसों अव संक्षेपै कहिये। बिन जाने से दोप गुननको, फैसे तजिये गहिये ॥११॥ जिन बच शंका न धार वृष, भवसुख वांछा भाने । मुनितन देख मलिन न घिनावे, तरवकुतत्त्व पिछाने । निजगुण अरु पर औगुण ढाँके, वा निजधर्म बढ़ावै । कामादिक.कर वृप चिगते, निज परकों सु दिढ़ावै ॥ १२ ॥ - " ६ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। धर्मालो गउ बच्छ प्रीति सम, कर जिन धर्म दिपावै । इन गुणते विपरीत दोष वसु, तिनको सतत खिपावै ॥ पिता भूप वा मातुल नृपजो, होय न तो मद ठाने । मद न रूपको मद न ज्ञानको, धनवलफो मद भान ॥१३॥ तप को मदन मद जु प्रभुना को, करै न सो निज जाने। मंदधार तो यही दोष बसु, समकितकू मल ठाने । कुगुरु कुदेव कुवृष सेवककी, नहिं प्रशंस उचरे हैं। जिन मुनि जिन श्रुति विन कुगुरादिक, तिन्हें न नमन करे है । दोष रहित गुण सहित सुधीजे, सम्यकदर्श सजे हैं। चरित मोहवश लेशन संजम, पै सुरनाथ जजे हैं । गेहीपै गहमें न रचै ज्यों, जल में मिन कमल है। नगरनारिको प्यार यथा का-देमें हेम अमल है। १५ ॥ प्रथम नरक विन षटभू ज्योतिप, वान भवन सब नारी। थावर विकलत्रय पशु में नहि, उपजत सभ्य धारी ।। तीनलोक तिहुंकाल माहि नशि, दर्शनसो सुखकारी । सकल धरमको मूल यही इस, विन करणी दुखकारी॥१६॥ मोक्षमहलकी परथम सीढी, याविन शान चरित्रा। सम्यकता न लहैं सो दर्शन, धागे भव्य पवित्रा ।। दौल समझ सुन चेत सयाने. कालवृथा मत खोवे । यह नरभव फिर मिलन कठिन है, जो सम्यक् नहिं होवे १७॥ अथ चतुर्थ ढाल-दोहा। सम्यक् श्रद्धा धार पुनि, सेवहुं सम्यक् शान । स्वपर अर्थ बहु धर्मयुत, जो प्रगटावन भान...

जैन-प्रन्य-संग्रह।
रोला बन्द-२४ मात्रा।
सम्यक साथे शान, होय मिन अराधो ।
लक्षण श्रद्धा जान, हमें भेद मवाधो ।
सम्यक कारण जान, शान कारज हैं सोई।
युगपत होतेभी, प्रकाश दोपत होई ॥१॥
तास भेद दो हैं, परोक्ष परतक्ष तिन माहीं।
मतिश्रुत होय परोक्ष, अक्ष मनत उपजाहीं॥
अधिमान मन पर्याय, दोहै देश प्रतक्षा।
द्रव्यक्षेत्र परिमाण, लिये जाननिय स्वच्छा ॥२॥
साल द्रव्य के गुण, अनंत पर्याय अनंता ।
जान ऐकाल, प्रगट केवल भगवन्ता ॥
जान समान न मान, जगत में सुन को कारण ।
इहि पग्मामृत जन्म, जरामृत रोग निवारण ॥३॥
कोटिजन्म तप तप, ज्ञान विन कर्म करें जे
शानी के दिन महि, त्रिप्सित सदन टरे ते ।
मुनियंत घार अनन्त, बार प्रीयक उपजायो।
पनिज आतम धान विना सुखलेश न पायो ॥४॥
ताते जिनवर कथित, तस्व अभ्यास करीजै।
संशय विनम मोह, त्याग आपो लख लीजै ॥
यह मनुष्य पर्याय, सुकुल सुनके जिन यानी ।
इहिविधि गए न मिलें, सुपणि ज्यों उदधि समानी ॥५॥
धन समाज गज पाज, राज तो काज न आवै।
शान आपको रूप, भये फिर अचल रहावै॥
तास मान को कारण, स्वपर विवेक बजानो।
कोटि उपाय बनाय, भव्य ताको उर आनो ॥६॥

8 जैन-प्रत्य-संग्रह। .. जे पूरव शिव गए, जाहिं भव माने हैं। लो व महिमा ज्ञान, तणी मुनिनाथ कहे हैं। .:. विषय चाह दवदाह, जगत जन अरण दझावें। तास उपाय न आन, बान धन धान वुझावै ॥ SH: पुण्व पाप फल माहि, हरप चिलखो.मतभाई। यह पुद्गल पर्याय, उपज विनशै फिर चाई। लाख बात की बात, यही निश्चय उर लाओ। तारि सकल जगघंध, फंद नित आतम ध्यायो॥ सम्यग्ज्ञानी होय, बहुरि दृढ़ चारित लीज। एक्देश अरु सफल, देश तसु मेद कही। त्रसहिंसा को त्याग, वृथा शापर न संधारे। पर वधकार कठोर, निन्ध नहिं वचन उचारे । जलमृतिका विन और, नाहि कछु गहै अनुत्ता। निजवनिता विन और, नारिलो रहे विरता ।। अपनी शक्ति विचार, परिग्रह थोरोरासै। दसदिश गमन प्रमाण, ठान त सोम न नाखै ॥ १० ॥ ताहमें फिर ग्राम, गली ग्रह वाग वजारा। गमनागमन प्रमाण, ठान अन्न सकल निवारा काहूकी धनहानि, किसी जयहार न चित। देय न लो उपदेश. होय अघ बनज पीते ॥१६॥ करप्रमाद जल भूमि, वृक्ष पावक न विगधै। अलि धनु हल हिंसोप, वरण नाह दे यश लाधै ॥ रागद्वेष करतार, कथा कबहूँ न सुनीजै। औरहु अनस्थ दंड, हेतु अब तिन्है न कीजै ॥१२॥ धरं उर समता.भावं; सदा सामायक करिये। परव तुष्रे माहि पाप त प्रोषध धरिये जैन-प्रन्य-संग्रह। . :भोग और.उपभोग, नियमकर,ममत निवार। मुनिको भोजन देय, फेर निज करहि महारै ॥ १३ ॥ चारह व्रतके अतीचार पन पन न लंगावें। मरण समै संन्यास, धार तमु दोष नशावै॥ यों श्रावक व्रत पाल, स्वर्ग सोलम उपजावै। तहते चय नर जन्म, पाय मुनि हो शिव जावै ॥१४॥ . " पंचम दाल-मनोहर छन्द १४ मात्रा। मुनि सकल व्रती घड भागी । भवभोगनते वैरागो। वैराग्य उपवन माई । चितै अनुप्रेक्षा भाई ॥१॥ इन चिन्तत समरस जागै। जिमि ज्वलन पवन के लागे ॥ जवही जिय मातम जानै। नवही जिय शिवसुख ठाने ॥२॥ जोचन गृह गोधत नारी । हय गय जन आज्ञाकारी। इन्द्रिय भोग छिन थाई । सुरधनुं चपला चपलाई ॥३॥ सुर असुर वगाधिप जेते । मृग ज्यों हरि काल दले ते ॥ मणिमंत्र तंत्रबाहु होई । मरते न वचावे कोई॥४॥ चहुँगति दुख जीव भरे हैं। परवर्तन पंच कर है। सव विधि संसार असारा । तामें सुख नाहि लगारा ॥५॥ शुभ अशुभ करम फल जेते । भोगे जिय एकै तेते ॥ सुत दाग होय न सीरी। सब स्वारथ है भोरी ॥६॥ जलपय त्यो जियतन मेलो । पैभिन्न नहि मेला || जो प्रगट शुदे धन धामा ! क्यों हों इकमिल संत रामा पल रुधिरं राध मल थैली। कोश वसादित मैली। नव द्वार वह घिनकारी । अस देह करें किम यारो जे योगनको चपलाई । ताते होय आश्रम भाई। .

जैन-प्रन्थ-संग्रह। मानव दुखकार घनेरे । बुद्धिवंत तिन्हें निरवरे ॥९॥ जिन पुण्य पाप नहिं कीना आतम अनुभव चित दोना। तिनहीं विधि आवत रोके । संबर लहि सुख अवलोके ।।१०॥ निज काल पाय विधि झरना । तासों निजकाज न सरना ।। तप कर जो कर्म खंपावै । सोई शिवमुख दरसावै ॥११॥ किनहू न करो न धरै को। षट द्रव्यमयीन हरै को। सो लोकमाहि विन समता। दुख सहै जीव नित भ्रमता ।। अंतिम प्रीवकलोकी हद । पायो अनंत विरियां पद ।। पर सम्यक्ज्ञान न लायो । दुर्लभ निजमें मुनि साधो ॥१३॥ जे भाव मोहते न्यारे । द्वगज्ञान व्रतादिक सारे ॥ सोधर्म जबै जिय धारै । तवहो सुख अवर निहारे ।। १४ ।। सो धर्म मुनिनकर धरिये । तिनको करतूनी उचरिये ।। वाकू सुनिये भवि प्राणी । अपनी अनुभूति विछानी ।। १५ ।। पष्टम नाल-हरिगोतिका, छंद २८ मात्रा। पटं कायं जीवन हनन तेसव, विध दरवहिंसा टरी। रागादि भाव निवारतें, हिंसा न भावित अवतरी।। जिनके न लेश मृषा न जल मृण, हूं बिना दीयो गहैं । अंठदशंसंहस विधेि शीलवर, चित्रह्ममें नित रमि रहैं ॥१॥ अंतरचतुर्दश भेद बाहर, संग दशधा ते टल। परमाद तजि चौकरमहो लखि, समिति यात चले। जग सुहितकर सब महितहर, श्रुति सुखद सब संशय हरै अम रोग हर जिनके वचन मुख चंद्रत अमृत करै ॥२॥ छालीस दोष विना सुकुलं, श्रावक ताणे घर अशनको। के तप बढ़ापन हेत नहिं तन, पोषते तज रसनको । ..

जैन-अन्य संग्रह। शुचि ज्ञान संयम उपकरण लखि, के गहैं लेखिके धरै। निर्जतु थान विलोक तन मल, मूत्र श्लेषम परिहर ॥३॥ सम्यक्प्रकार निरोध मन वच, काय आतम ध्यावते । तिन सुथिर मुद्रा देखि मृगगण, उपल खाज खुजावते ॥ रस, रूप, गंध तथा परस अरु, शब्द शुभ अमुहावने । तिनमें न राग विरोध पंच, इन्द्रीनयन पद पावने ॥४॥ समता सम्हारे थुति उचारे, वन्दना जिन देवको। नित करें श्रुति रति करें प्रतिक्रम, तजै तनं अहमेव को। जिनके न न्हौन न दंतधोवन. लेश अंवर आवरण। भूमाहि पिछली रयनि में कछु, शयन एकासन करण ॥ ५ ॥ इकवार लेत आहार दिन में, खड़े अलप निज पान में। कचलीच करत न डरत परिषह, सों लगे निज ध्यान में। अरि मित्र महल मसान कंचन, कांच निन्दन थुतिकरण । अर्घावतारण असिप्रहारण, में सदा समता धरण ॥६॥ तप तपें द्वादश धरें वृष दश, रतनत्रय सेवे सदा । मुनि साथ में वा एक विच, चहैं नहिं भवसुख कदा। यो है सकल संयम चरित मुनि, ये स्वरूपाचरण अब । जिस होत प्रगटै आपनी निधि, मिटै परकी प्रवृति संब ॥७॥ जिन परम पैनी सुवुधि छैनी, डार अंतर भेदिया। वरणादि अरु रागादि तें, निज भाषको न्यारा किया। निजमाहि निजके हेत निजकर, आपको पापै गयो । गुणगणी शाता ज्ञान सेय, मझार कुछ भेद न रह्यो । जह ध्यान ध्याता.ध्येय कोन विकल्प, वच भेद न जहाँ । चिद्भाव फर्म चिदेश कर्ता, चेतना किरिया तहाँ। . .

१०२ जैन-अन्य-संग्रह। तीनो अभिन्न अखिन्न शुध, उपयोग को निश्चल दशा। प्रगटी जहाँ दगज्ञानब्रह्म , तीन धा एकै लशाह.. परमाण नयं निक्षेपको न उद्योत, अनुभवमें दिखै । हग-ज्ञान सुख-वल'मय सदा नहि, आन भाव जो मा.वि. मैं साध्य साधक में अवाधक, फर्म अरतसु फल नितें। चितपिंड चंद अखंड सुगुण करंड, च्युर पुनि कलनिः ॥२०॥ यो चिन्त्य निनमें थिर भए तिन, अकय जो आनन्द लह्यो । सो इन्द्र नाग नरेन्द्र वा अहमिन्द्र के नाहीं कहों । तवही शुकल ध्यानाग्नि कर चड, घात विधि कानन दह्यो। सब लख्या.केवल ज्ञान करिमवि, लोककू शिवगम कह्यो ॥१२॥ पुनि घाति शेष अघात विधि, छिनमाहि अष्टम भू बसै। वसु कर्म विनसै सगुण वसु, सम्यक्त आदिक सब लसै॥ संसार खार अपार पारा, वार तरि. तीरहिं गये। अविकार अकलं अरूपशुध, चिद्रप अविनाशी भये ॥ १२॥ निजमाहि लोक अलोक गुण, पर्याय प्रतिविम्बित थये। रहि हैं:अनन्तानन्त काल-यथा तथा शिव परणये ॥ धनि धन्य हैं जे जीव नर भव, पाय यह कारज किया। तिनही अनादी भ्रमण पंच, प्रकार तज बर सुख लिया ॥१३॥ मुख्योपचार दुभेद,यों बई, भाग रत्नत्रय धरैं। अरु धरेंगे ते शिव लहैं. तिन, सुयशंजल जगमल हरै। इमि जानि आलस हानि साहस, ठानि यह शिंख आदरो। जबलो न रोग जरा गहै तब, लो जगत निजहित करो ॥४॥ यह राग आंग दहै सदा. तीत समामृत पीजिये। चिर भजे विषयं कषाय अवता, त्यागं निजपद लीजिये। कहा रच्यो पर पदमें न तेरो, पद यहै क्यों दुख सहैं। अव दौलदाऊ सुखी स्वंपद रचि, दाव मत चूको यह ॥१५॥ .

जैन-प्रन्य-संग्रह। १०३ दोहा। इक नवं वसु एक वर्षकी, तीज सुकुल वैशाख । करयो तत्वउपदेश यह, लखि बुध जनको भाख ॥१॥ लघु धी तथा प्रमादत, शब्द अर्थ की भूल। सुधी सुधार पढ़ो सदा, जो पावो भव कूल ॥२॥ श्रीजिनसहस्रनामस्तोत्रम् । (भगवविमनाचार्यकृत) प्रसिद्धष्टसहस्रद्धलक्षणं त्वां गिरां पतिम् । नाम्नामष्ट- सहस्रेण तोष्टुमोऽभीष्टसिद्धये ॥१॥ वद्यथा,- श्रीमान्स्वयंभूत्वमा शंभषः शंभुरात्मभूः। स्वयंप्रभा प्रमुढेका विश्वभरपुनर्भवः ॥२॥ विश्वात्मा विश्वलोकेशी विश्वतश्चक्षुरक्षरः । विश्वविद्विश्वविद्य शो विश्वयोनिरनीश्वरः ॥ ॥ विश्वदश्वा विमुर्धाता विश्वेशो विश्वलोचनः । विश्वव्यापी विधिर्वधाः शाश्वतो विश्वतोमुखः॥४॥ विश्वकर्मा जगज्ज्येष्टी विश्वमूर्तिजिनेश्वरः । विश्वदग्विश्वभूतेशो विश्वज्योतिरनीश्वरः ॥५॥ जिनो जिष्णुरमेयात्मा विश्वरीशों जगत्पतिः। अनन्त- चिदचिन्त्यात्मा भव्यवन्धुरबन्धनः ॥ ६॥ युगादिपुरुषो ब्रह्मा पञ्चब्राह्ममयः शिवः । परः परतरः सूक्ष्मः परमेष्ठी सनातनः ॥७॥ स्वयंज्योतिरजोऽजन्मा ब्रह्मयोंनिरयोनिजः । माहारि- विजयी जेता धर्मचक्रो.दयाध्वजः ॥ ८॥ प्रशान्तारिरनन्तात्मा योगी योगी श्वराचिंतः ब्रह्मविब्रह्मतत्वको ब्रह्मोद्याविद्यवी-

२०४
जैन-प्रन्य-संग्रह।
श्वरः ॥६॥ सिद्धो वुद्धः प्रबुद्धात्मा सिद्धार्थः सिद्धशासनः।
सिद्धः सिद्धान्तविद्धयः सिद्धसाध्यो जगद्धितः ॥ १०॥ सहि-
णुरच्युतोऽननः प्रभविणुभवोद्भवः ।.. प्रमूष्णुरजरोऽजों
माजिष्णुर्थीश्वरोऽव्यः ॥११॥ विभावसुरसंभूष्णुः स्वयंभूष्णुः
पुरातनः। परमात्मा परमज्योतित्रिजगत्परमेश्वरः ॥ १२ ॥
इति श्रीमदादिशतम् ॥१॥.
दिव्यभायापतिर्दिव्यः पूतवाक्पूतशासनः । पूतात्मा
परमज्योतिधर्माध्यक्षो दमीश्वरः ॥१॥श्रीपतिर्भगवानहन्नरजा
विरजाःशुचिः। तीर्थकृत्केवलीशानः पूजाहः स्नातकोऽमल:
॥२॥ अनन्तदीप्तिानात्मा स्वयंवुद्धः प्रजापतिः । मुक्तः शको
निरावाधो निष्कलो भुवनेश्वरः ॥३॥ निरजनो जगज्ज्यो-
विनिरुतोकिनिरामयः । अचलस्थितिरिक्षोभ्यः कूटस्थः
स्थाणुरक्षयः॥४॥
अग्रणीमणोर्नेता प्रणेता न्यायशास्त्रशत् । शस्ता धर्मपति-
ईयों धर्मात्मा धर्मतीर्थकृत् ॥ ५ ॥ वृषध्वजो वृषाधीशो
वृषकेतुर्वृषायुधः । वृषो वृषतिर्भर्ता वृषमाङ्को वृषोद्भवः ॥ ६॥
हिरण्यनामिभूतात्मा भूतभृद्भूतभावनाः । प्रभवो विभवी
भास्वान् भवो भावो भवान्तकः ॥७॥ हिरण्यगर्भः श्रीगर्मः
प्रसूतविभवोद्भवः । स्वयंप्रभुःसर्वद्वक् सार्वःसर्वज्ञः सर्वदर्शनः।
.सर्वात्मा सर्वलोकेशः सर्ववित्सर्वलोकजित् ।। सुगतिः
सुश्रुतः सुश्रुक सुवाक् सूरिबहुश्रुतः। विश्रुतो विश्वतः पादो
विश्वशीर्षः शुचिश्रवाः ॥ १०॥ सहस्रशीर्षः क्षेत्रज्ञः सहस्राक्षः
सहस्रपात् । भूतभव्यभवहर्ता विश्वविद्या महेश्वराः ॥ १५॥
इति दिव्यादिशतम् ॥२॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह २०५ स्थविष्ठः स्थविरो ज्येष्ठः पृष्ठः पृष्ठो वरिषधीः। स्थेष्ठों गरिष्ठो वंहिष्ठः श्रेष्ठो निष्ठो गरिष्ठगीः ॥१॥ विश्वभृद्विश्वसुट् विश्वेट विश्वमुग्विश्वनायकः । विश्वाशीविश्वरूपात्मा विश्वजिद्विजितान्तकः ॥२॥ विभवो विभयो वीरो विशोको विजरो जरन् । विरागो विरतोसको विविको वीतमत्सरं ॥३॥ विनयजनतावन्धुर्विलीनाशेषकल्मषः । वियोगो योगविद्विद्वा- विधाता सुविधिः सुधीः ॥४॥ क्षान्तिमाक्पृथिवीमूर्तिः शान्तिभाक्सलिलात्मकः। वायुमूर्तिरसङ्गात्मा · वहिमूर्तिर- धर्मधृक् ॥५॥ सुयज्चा यजमानात्मा सुत्वा सुत्राम पूजितः । ऋत्विग्यक्षपतियज्ञो यज्ञाङ्गममृतं हविः ॥६॥ व्योममूर्तिर- मूर्तात्मा निलेपो निर्मलोऽचलः । सोममूर्तिः सुसौम्यात्मा सूर्यमूर्तिमहाप्रभः ॥ ७॥ मन्त्रविन्मन्त्रकृन्मन्त्री मन्त्रमूर्तिर- मन्तकः। स्वतन्त्रस्तन्त्रकृत्स्वान्तः कृतान्तान्तः कृतान्तकृत् ॥८॥ कृती कृतार्थः सत्कृत्यः कृतकृत्यः कृतक्रतुः । नित्यो मृत्युजयोस युग्मृतात्मामृतोद्भवः ॥ ब्रह्मनिष्ठः परब्रह्मब्रह्मात्मा ब्रह्मसम्भवः महाब्रह्मपतिर्ब्रह्मेट महाब्रह्मपदेश्वरः ॥१०॥ सुप्रसन्नः प्रसन्नात्मा शानधर्मदमप्रभुः । प्रशमात्मा प्रशान्तात्मा पुराणपुरुषोत्तमः॥११ इति स्थविष्ठादिशतम् ॥ ३॥ महाशोकध्वजोशीका का स्त्रया पद्मविष्टरः । पद्मशः पान- 'सम्भूतिः पद्यनाभिरनुत्तरः ॥१॥ पायोनिर्जगद्योनिरित्यः स्तुत्यः स्तुतीश्वरः । स्तवना) हुपीकेशो जितजेयः कृत- कियः ॥ २॥ गणाधिपो गणज्येष्ठो गण्यः पुण्यो गणाग्रणी। गुणाकरो गुणाम्भोधिगुणको गुणनायकः ॥३॥ गुणादरी गुणाच्छेदी निर्गुणः पुण्यगीगुणः । शरण्य पुण्यवाक्पूतो घरेण्यःपुण्यनायकः ॥ ४॥अगण्या पुण्यधीगण्यः पुण्यकृत्यु जैन-प्रन्थ-संग्रह। एयशासनः। धर्मारामो गुणग्रामः पुण्यापुण्यनिरोधकः ॥ ५॥ पापापेता विपापात्मा विपाप्मा वीतकल्मषः । निर्द्वन्द्वी निर्मदः शान्तो निर्मोही निरुपद्रवः ॥क्षा निनिमेषो निराहारो नि:क्रिया निरुपप्लवः । निष्कलङ्को निरस्तैना निर्धनाङ्गो निरामयः- ७॥ विशालो विपुलज्योतिरतुलोचिन्त्यवैभवः । सुसंवृत्तः सुगुप्ता- मा सुभृत्सुनयतत्त्ववित् ॥ ॥ एकविद्यो महाविद्यो मुनिः परिद्वदः पतिः। धीशो विद्यानिधिः साक्षी विनेता विहतान्तक: neir fपना पितामहः पाता पवित्र पावनो गतिः । त्राता मिषग्वरो वयों वरदः परमः पुमान् ॥१०॥ कविः पुराणपुरुषो वर्षीयान्वृषभः पुरुः। प्रतिष्ठाप्रसवा हेतुर्भुवनैकपितामहः ॥११॥ इति महादिशतम् ॥४॥ श्रीवृक्षलक्षणः श्लक्ष्णो लक्षण्यः शुभलक्षणः । निरक्षः पुण्डरीकाक्षः पुष्कला पुष्करेक्षणः ॥१॥ सिद्धिदः सिद्धिसङ्कल्पः सिद्धात्मासिद्धिसाधनः । बुद्धोध्यो महाबोधिर्वर्धमानो 'महर्द्धिकः ॥२॥ वेदाङ्गो वेदविद्वेद्यो जातरूपो विदांवर वेदवेद्यः स्वसंवेद्यो विवेदो वदांवरः ॥३॥ अनादिनिधना व्यको व्यक्तवाव्यकशासनः । युगादिकृयुगाधरो युगादिर्ज- गदादिजः ॥४॥ अतीन्द्रोऽतीन्द्रियो धीन्द्रीमहेन्द्रोऽतोन्द्रिया- र्थद्वक् । अनिन्द्रियोऽहमिन्द्रायों महेन्द्रमहितो महान् ॥५॥ उद्भवः कारणं कर्ता पारगो भवतारकः । अगाह्यो गहनं गृह्य परायः परमेश्वरः ॥६॥ अनन्तद्धिरमयचिरचिन्त्यदिसमग्रधीः। प्रायः प्रानहरोऽण्यग्यः प्रत्यनोऽग्योऽनिमोऽमज ॥ महातपा महातेजा महोदळ महोदयः। महायशो महाधामा महासत्वो महाधृतिः ॥" महाधैयौँ महावीर्यो महासंम्पन्महाबलः । महाशक्तिर्महाज्योतिर्महाभूतिक्षाधु तिः ॥8महामतिर्महानी- .

जैन-अन्ध-संग्रह।
::::
...
.
.
तिर्महाक्षान्तिमहादयः । महापाकों महाभागो महानन्दो
महाकविः ॥१०॥ महामहीमहाकौतिर्महाकान्तिर्महावपुः ।
महादानो महाज्ञान महायोगी महागुणः. ॥११॥ महामहपतिः
प्राप्तमहाकल्याणपञ्चकः । महाप्रभुर्महाप्रातिहार्याधीशो महे-
श्वरः ॥१२॥
इति श्रीवृतादिशतम् . ॥५॥
'महामुनिमहामौनी - महाध्यानी * :महादमः । महाक्षमा
महाशीलों महायज्ञो महामनः ॥ १॥ महाव्रतपतिर्मह्यो महा-
कान्तिधरोऽधिपः । महामैत्रो महामेयो महापायो महादयः ॥२॥
महाकारुण्यको मन्ता महामन्त्री महायतिः । महानादी
महाघोषो महेज्यो महसांपतिः ॥३. महायरधरो धुर्यों महौ.
दार्यों महिष्टवाक । महात्मा महसांघाम महर्षिर्महितादयः ॥४॥
महाक्लेशांकुशः शूरो महाभूतपतिगुरुः। महापरा क्रमोऽनन्तो,
महाक्रोधरिपुर्वशी ॥५॥ महाभवाब्धिसंतारिर्महामाहाद्रि
संदनः । महांगुणाकरः क्षान्ता. महायोगीश्वरः शमी ॥६॥
महाध्यानपतिर्ध्याता महाधर्मा महावतः ! महाकर्मारिहात्मशो
महादेवा महेशिता ॥ ७ ॥ सर्वले शापहः साधुः सर्वदोषहरो
हर असंख्येयोऽप्रमेयात्मा शमात्मा प्रशमाफरः॥ ८ ॥ सर्व
योगीश्वरोऽचिन्त्यः श्रुतात्मा विष्टरश्रवाः। वान्तात्मा दम-
तीर्थेशो योगात्मा ज्ञानसर्वगः ॥ ६ ॥ प्रधानमात्मा प्रकृतिपरमः .
परमादयः । प्रक्षीणबन्धः कामारिः क्षेमकत्मशासनः॥१०॥
प्रणवः' प्रणयां प्राणः प्रणाद: प्रक्षतेश्वर प्रमाण प्रणिधिदक्षो
दक्षिणेवियुरध्वरः ॥१२॥ आनन्दो नन्दना नन्दो बन्यो
निन्द्योऽभिनन्दन । कामहा कामदा. काम्या कामधेनुररिं-
जयः ॥१२॥
इति महामुन्यादिशतम् ॥६॥

. १०ः जैन-ग्रन्थ-संग्रह। असंस्कृतः सुसंस्कारः -प्राकृतो . वैकृतान्तक- तान्तकृत् । अन्तकृत्कान्तगुः कान्तश्चिन्तामणिरभीष्टदः ॥१॥ भाजिता जितकामारिरमिवामितशासनः ।। जितकोधी जिवामित्रो जितक्लेशो जितान्तकः ॥.शा जिनेन्द्रः परमानन्दो मुनीन्द्रो दुन्दुभिस्वनः । महेन्द्रवन्धो योगीन्द्रो यतीन्द्रो नाभीनन्दनः ॥३॥ नामेयो नामिजो जातः सुव्रतो मनुरुचमः । अभेद्योऽनत्ययोऽनश्वानविधिकोऽधिगुरु: सुधीः ॥ ४॥ सुमेधा विक्रमो स्वामी दुराधर्षों निरुत्सुकः। विशिष्टः शिष्टमुकशिष्टः प्रत्ययः कर्मणोऽनघः ॥५॥ क्षेमी.क्षेम- करोऽक्षय्यः क्षेमधर्मपंतिः क्षमी । अग्राह्यो ज्ञाननिमाहो ध्यान गम्यो निरुत्तरः ॥६॥ सुझती धातुरिज्याहः सुनयश्चतुराननः । श्रीनिवासश्चतुर्वक्रश्चतुरास्यश्चतुर्मुखः ॥ ७॥ सत्यात्मा सत्य. विज्ञान: सत्यवाक्सत्यशासनः । सत्यशीः सत्यसन्धानः सत्यः सत्यपरायणः ॥८॥ स्थेयान्स्थवीयान्नेदीयान्दवीयान्दुरदर्शनः । अणारणीयाननर्गुरुरायो गरीयसाम् ॥8॥ सदायोगः सदामो सदावृप्तः सदाशिवः । सदागतिः सदासौख्यः सदाविद्यः सदोदयः ॥१०॥ सुघोषः सुमुखः सौम्यः सुखदः सहित: सुहृत् । सुगुप्ता गुप्तिमृद्गाता लोकाध्यक्षो दमीश्वरः ॥११॥... इति असंस्कृतादिशतम् ॥७॥ बृहन्वृहस्पतिर्वाग्मी वाचस्पतिरुदारधीः । मनीषी धिषणो धीमान्छेमुषाशी गिर्यपतिः ॥१॥ नैकरूपो नयस्तुङ्गो नैकात्मा नैकधर्मशत । अविशेयोऽप्रतात्मा कृतज्ञः कृतलक्षणः ॥श ज्ञानगों दयागर्मो रक्षगर्भः प्रभास्वरः । पनगर्भो . जगदों हेमगर्भः सुदर्शनः ॥ ३. लक्ष्मीवास्त्रिदशाध्यक्षो ढूंढीयानिन ईशिता मनोहरो मनोक्षाको धीरो गम्भीर शासनः ॥ ४॥ ..

जैन-प्रन्थ-संग्रह। . धर्मयपो दयायोगों धर्मनेमोमुनीश्वरः। धर्मचकायुधो दैच: कर्महा धर्मघाषणः ॥५॥ अमोघवागमोधाज्ञो निर्मकोऽमो- घशासनः । सुरूपः सुभगस्त्यागी समयज्ञः समाहितः ॥६॥ सुस्थितः स्वास्थ्यमावस्वस्थो नीरजस्को निरुद्धवः । अलेपो निष्कलङ्कात्मा वीतरागो गतस्पृहः ॥७॥ वश्येन्द्रियो विमुक्तात्मा निःसपनो जितेन्द्रियः। प्रशान्तोऽनन्तधामर्मिङ्गलं मलहानघः ॥८॥अनीद्वगुपमाभूतो दृष्टिवमगोचरः । अमूनों मूर्तिमानेको नैको नानकतत्सद्वक् ॥ अध्यात्मगम्यो गम्यात्मा. योगविद्योगिवन्दितः । सवंगः सदाभावी त्रिकालविषयार्थदक ॥१०॥ शंकर शंवदो दान्ता दमी शान्तिपरायणः। अधिपः परमानन्दः परात्मक्ष परात्परः ॥११॥ त्रिजगहल्लमोऽभ्यर्च्यनि- जगन्मङ्गलादयः । त्रिजगत्पतिपूजावित्रिलोकाप्रशिखामणिः॥१२ इति वृहदादिशतम् ।। ८॥ त्रिकालदर्शी लोकेशो लोकधाता ढ़वतः। सर्वलोका तिगः पूज्यः सर्वलोकैकसारथिः ॥१॥ पुराणपुरुषः पूर्वः 'कृतपूर्वाङ्ग विस्तरः । आदिदेवः पुराणाः पुरुदेवोऽधिदेवता ॥२॥ युगमुख्यो युगज्येष्ठो युगादिस्थितिदेशकः । कल्याणवर्णः कल्याणः कल्यः कल्याणलक्षणः ॥३॥ कल्याणप्रतिदीत: कल्याणात्मा विकल्मषः । विकलङ्कः कलातीतः कलिलध्नः कलाधरः ॥४॥ देवदेवो जगन्नाथो जगद्वन्धुर्जगद्विभुः । जगद्धितैषी लोकाः सर्वगो जगदप्रजः ॥un चराचरगुरुगोप्यो गूढात्मा गूढ़गोचरः। सद्योजातः प्रकाशात्मा ज्वलज्ज्वलनस- प्रभः ॥६॥ आदित्यवर्णो भर्माभः सुप्रभः कनकप्रभः । सुवर्ण- वर्षों रुक्माभः पूर्यकोटिसमप्रभः ॥७॥ तपनीयनिमस्तुङ्गो बालार्कामाऽनलप्रमः। संध्याघ्रपद्महेमामस्तसचामीकरच्छाषिः .

. ११० जैन-ग्रन्य-संग्रह। -|| निष्कनरच्छायः कनकाञ्चनसन्निभः। हिरण्यवर्णः स्वर्णाभः शातकुम्मनिभप्रभः ॥ ६॥ द्युम्नमा जानरूरामों दीप्त- जाम्बूनदद्युतिः। सुधौतकलधौतश्री. प्रदीतो हाटका तिः॥१॥ शिष्टेटः पुरिदः पुरः स्पष्टः स्पाक्षरक्षमः । शत्रुनापतियोऽमोधः प्रशास्ता शासिता स्वभूः . ॥ १९॥ शान्तिनिष्ठो मुनिज्येष्टः शिवतातिः शिवप्रदः । शातिदः शान्तिकृच्छान्तिः कान्तिमान्का मितप्रदः ॥१२॥ धेयानिधिरधिष्टानमप्रतिष्ठः प्रतिष्ठितः। सुस्थितः स्थायरा स्थाणुः प्रथीयान्यथितः पृथुः ॥२३॥ इति त्रिकालदर्यादिशतम् ॥ दिग्वासा वातरशनानिन्थेशो निरस्वरः । निचिनो निराशंसो ज्ञानरक्षरमोमुहः ॥२॥ तेजोराशिरनन्तीजा ज्ञानाब्धिः शीलसागरः । तेजोमयोऽमितज्योतिज्योतिर्मूनिस्तमोपहः ॥२॥ जगच्चूडामणिदीप्तः सर्वविघ्नविनायकः । कलिनः कर्मशत्रुघ्नो लोकालोकप्रकाशकः ॥शा अनिद्रालुरतन्द्रालुर्जागरूपः प्रभामयः। लक्ष्मीपतिर्जगोदिर्धर्मराजः प्रजाहितः ॥धा मुमुक्ष्वन्धमोक्षको जिताक्षोजितमन्सया प्रशान्तरस रसशैलपो भव्य टकनायकः ॥५॥ मूलफर्ताखिलज्यनिर्मलनो मूलकारणः । आप्तो वागीश्वरः श्रेयायाञ्छग्यलोरिनिराकवाक्क्षा प्रवक्ता . वचसामीण मारजिद्विश्वभाववित् । सुतनुम्तनुतिर्मुक्तः सुगता हतदुर्नयः Hा श्रीशः श्रीधिसपाडाजो बीतमारभयङ्करः। उत्सन्नदोषी निर्विघ्ना निश्चलो लोसंवत्सलः = लोकोत्तरी लोकपतिलो. कचक्षरपारधीः । धीरधीवुद्धसन्मागः शुद्धः सूनतपूतवाक् प्रज्ञापारमितः प्राज्ञो यतिनियमितेन्द्रियः । भदन्ता भद्रचंद्रद्रः कल्पवृक्षों, वरप्रदः ॥१०॥ समुन्मूलितकर्मारि: कर्मकाष्ठीशुशु क्षणिः । कर्मण्या कर्मठ प्रांशुहेयादेयं विचक्षणः १॥ .

जैन-प्रन्य-संग्रह। १११ अनन्सशक्तिरच्छेय त्रिपुरारित्रिलोचनः । त्रिनेत्रस्ऽयम्बक- स्यक्षः केवलज्ञान वीक्षणः ॥१२॥ समन्तभद्रः शान्तारिधर्मा- चार्यों दयानिधिः । सूक्ष्मदर्शी जितानङ्गः रुपालुधर्मदेशका ॥१२॥ शुभंयुः सुखसाद्भूतः पुण्यराशिरनामयः। धर्मपालो जगत्पालो धर्मसाम्राज्यनायकः ॥१४॥ इति दिग्वासाद्यष्टोत्तरशतम् ॥१०॥ पदयाधिकपासनामापती समाला । धानांपते तवामूनि नामान्यागमकोविदः । समुचितान्यनु- ध्यायत्पुमान्तस्कृतिर्भवेत् ॥१॥ गोचरोऽपि गिरामासां त्वम. 'वाग्गोचरो मनः । स्तोता तथाप्यसंदिग्धं त्वत्तोऽभीष्टफलं भवेत् ॥२॥ मताऽसि जगन्धुस्त्वमतोऽसि जगद्भिपक् । त्वमतोऽमि जगद्धाता त्वमतोऽसि जगद्धितः ॥३॥ त्वमेक जगतां ज्योतिस्त्वं द्विरूपोपयोगभाक् । त्यं निरूपैकमुक्य सास्थानन्त चतुपयः ॥8॥ त्वं पञ्चब्रह्मतत्त्वात्मा पञ्चकल्याण- नायकः । पड्सद्भावतत्त्वशस्त्वं सप्तनयसंग्रहः ॥५॥ दिध्याष्ट- गुणमूर्तिस्वं नवकेवललब्धिकः । दशावतारनिर्धार्यों मां पाहि परमेश्वर ॥६॥ युप्मनामावलीब्धविलसत्तात्रमालया । भयन्तं विस्यामः प्रसीदानुगृहाण नः ॥७॥ इदं स्तोत्रमनु- स्मृत्य पूता भवति नाक्तिकः । य: स पाठ पठत्येन ल स्यात्क- ल्याणभाजनम् ॥ ततः सदेदं पुण्यार्थी पुमान्यठति पुण्यधोः। पौरहतीं श्रियं प्राप्तुं परमाममिलापुकः ॥६॥ पति भगनिमनाला पिरपितादिपुराणान्तर्गत निमसदसनाम- स्तपनं समाए। .

जैन-प्रन्य-संग्रह। . मोक्षशास्त्रम् [ तत्वार्थसूत्रम् ।] (भाचार्यजीनामास्वामिपिरप्तिम् ) सम्यग्दर्शनशानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥१॥ तत्त्वार्थश्र- द्धानं सम्यग्दर्शनम् ॥ २॥ तन्निसंर्गादधिगमावा ॥३॥ जीवा- जीवालववन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तरत्रम् ॥ ४॥ नामस्थापना- द्रव्यमावतस्तव्यासः ॥ ५॥ प्रमाणनयैरधिगमः ॥ ६॥ निर्देश- स्वामित्वसाधनाऽधिकरणस्थितिविधानतः ॥ ७॥ सत्संख्य- क्षेत्रस्पर्शनकालान्तरमावाल्पबहुत्वैश्व ॥ ॥ मतिधुतावधिमनः पर्ययकेवलानि ज्ञानम् ॥ ९॥ तत्प्रमाणे ॥ १० ॥ आद्य परीक्षा ॥११॥ प्रत्यक्षमन्यत् ॥ १२॥ मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ताऽभिः निबोध इत्यनर्थान्तरम् ॥ १३॥ क्षदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्त ॥ १४॥ अवग्रहहाऽनायधारणाः ॥ १५ ॥ बहुबहुविधक्षिमाऽनिः सृताऽनुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् ॥ १६ ॥ अर्थस्य ॥ १४ ॥ व्यञ्जन स्यावग्रहः ॥ १८ ॥ न चतुरनिन्द्रियाभ्याम् ॥ १९ ॥ श्रुतं मति पूर्व व्धनकद्वादशभेवम् ॥ २०॥ भवप्रत्ययोऽवधिदेवनानारका- खाम् ॥ २१ ॥ क्षयोपशमनिमित्तः पडविकल्पः शेषाणाम् ॥२२॥ विपुलमती मनःपर्य्यवः ॥ २३ ॥ विशुध्द्यामनिपानास्या तद्विशेषः ॥ २४ ॥ विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनः पर्यायाः ॥ २५ ॥ मतिश्रुतयोर्निवन्धी द्रव्येवसर्वपर्यायेषु ॥२६॥ रूपिप्ववधेः ॥ २७ ॥ तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य ॥२८॥ सर्व द्रव्यपर्यायेषु केवलस्यं ॥ १६॥ एकादीनि माज्यानि युगपदेक- स्मिनाचतुर्म्यः ॥ ३०॥ मतिधुतावधयो विपर्ययश्च ॥३१॥ सदसतारविशेषाद्यदृच्छोपलदधेरुन्मत्तवत् ॥ ३२॥ नैगमसंग्रह- व्यवहार प्रशब्दसमभिरुवंभूता नयाः ३३ ॥ रविवार्धाषियनेमोषणाने मपनो म्याद ११. .

जैन-प्रन्थ-संग्रह। औपशमिकक्षायिकी भावी मिश्रच जीवस्य स्वतत्वमौद यिकपारिणामिकी च ॥१॥ द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् ॥शा सम्यक्त्ववारित्रे || ज्ञानदर्शनदानलाम. भोगापभोग वीर्याणि च ॥ ज्ञानाशानदर्शनलब्धयश्चतुस्ति- त्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च ॥५॥ गतिक- पालिङ्गमिथ्यादर्शनाऽज्ञानाऽसंयताऽसिद्धलेश्याश्चतुश्चतुस्खये- कैकैकैकपड्भेदाः ॥६जीवभ्व्याऽभव्यत्वानि वा उपयोगी लक्षणम् ॥८॥ मद्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥ ६॥ संसारिणामुक्ताश्च ॥१०॥ समनस्काऽमनस्का: ॥१२॥ संसारिणत्रसस्थावरा:१२॥ पृथिव्यात जोवायुवनस्पतयःस्थावराः ॥ १३॥ द्वीन्द्रियादयन- साः ॥ १४॥ पञ्चेन्द्रियाणि ॥ १५ ॥ द्विविधानि ॥१६॥ नियु- पकरणे द्रव्येन्द्रियम्॥ १७ ॥लब्ध्युपयोगी मावेन्द्रियम् ॥ १८ ॥ रूपर्शनरसनघ्राणवाः थोत्राणि ॥१६॥ स्पर्शरसगन्ध- धर्णश द्वास्तदाः ॥२०॥ श्रुतमनिन्द्रियस्य ॥२१॥ वनस्त्पत्तानामेकम् ॥ २२॥ कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्या दीनामेकेकवृद्धानि ॥२३ ॥ संमिन्ः समनस्का: ॥२४॥ विग्रगती कर्मयोगः ॥२५॥ अनुश्रेणि गतिः ॥ २६॥ अविग्रहा जीवस्य ॥ २७ ॥ विग्रहवती च संसारिणः प्राक् चतुर्व्यः ॥ २८ ॥ एकसमयाऽविग्रहा ॥ २९ ॥ एक द्वौ त्रीवाs- नाहारकः ॥ ३० ॥ सम्मूर्छनगर्मोपणादाजन्म ॥ ३१ ॥ सचित्त. शीतसंवृताः सेतरा मिश्राश्च कशस्तद्योनयः ॥ ३२ ॥ जरायुजा- ण्डसपातानां नमः ॥ ३३ ॥ देवनारकाणामुपपादः ॥ ३४॥ शेपाणां सम्मूर्छनम् ॥३५४ औदारिकर्षकि यकाहारकतैजसका- मणामि शरीराणि ॥३६॥ परं परं सूक्ष्मम् ॥३७॥ प्रदेशताऽसं. ख्येयगुणं प्राक् तैजसात् ॥३८॥ अनन्तगुणे परे ॥३९॥ अप्रतीपाते । जैन-प्रन्थ-संग्रह। HAon अनादिसम्बन्धे च ॥४१॥ सर्वस्य ॥शातदादीनिभाज्यानि युगपदेकस्मिनाचतुर्म्यः ॥४३॥ निरुपभोगमन्त्यम् ॥ ४ ॥ औपपादिकं वैक्रियिकम् ॥४५॥ लब्धिप्रत्ययं च ॥४६॥ तैजस- मपि ॥४॥ शुभं विशुद्धमव्याधाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव Naan नारकसम्मूर्छिनो नपुंसकानि ॥५०॥ न देवाः ॥५१॥ शेषास्त्रिवेदाः ॥५२॥ औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसंख्येयवर्षायु पोऽनपघायुषः ॥३॥ इति तत्वार्थापिगमे मोलशा द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतमोमहातमःप्रभाभूमयो धना- भूवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताऽधोऽधः॥१॥ तासु त्रिशल्पञ्चविंशति- पञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि पञ्च चैव यथाक्रमम् ॥२॥ नारकानित्याऽशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः ॥॥ परस्परादीरितदुःखाः ॥४॥ संक्लिष्टाऽसुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः ॥॥ तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रि- शत्सागरोपमासवानां परा स्थितिः ॥६॥ जम्बूद्वीपलवणा- दादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः ॥७॥ द्विदिविष्कम्मा: पूर्वपूर्व- परिक्षेपिणो वलयाकृतयः ॥८॥ तन्मध्ये मेरुनाभित्तो योजन- शतसहस्त्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः ॥ भरतहैमवतहरिविदेहरस्य- कहरण्यवतैषितवर्षा क्षेत्राणि ॥१०॥ तद्विभाजिनः पूर्वापरा- यता हिमवन्महाहिमवभिषधनीलरुक्मिशिखरिणो वर्षधरप- वताः ॥ ११॥ हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः ॥ १२ ॥ मणिविचित्रपार्था उपरि मूले च तुल्यविस्तागः ॥१३॥ पद्ममहापद्मतिगिसकेसरिमहापण्डरीकपुण्डरीकाहदास्तेषामु- परि ॥१४॥ प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदविष्का- म्भोदः ॥ १५ ॥ दशयोजनावगाहः ॥ १६॥ तन्मध्ये योजन जैन-प्रन्ध-संग्रह। १११५ 'पुष्करम् ॥१७॥ तद्विगुणाद्विगुणा इदाः पुष्कराणि च ॥१८॥ तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीवोधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः पल्यापमं- स्थितयः समामानिकपरिषत्काः ॥ गङ्गासिन्धुरोहिद्रोहि- वाल्याइरिरिकान्तासीतासीतादानारीनरकान्तासुवर्णरूप्य-- कूलारकारकोदाः सरितस्तन्मध्यगाः ॥२०॥ द्वयोर्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः ॥२१॥ शेषास्त्वपरगाः ॥२॥ चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता गङ्गासिन्ध्वादयो नधः ॥२३॥ भरतः षडविंशतिपञ्चयोजनशत- विस्तारः षट्चैकोनविंशतिभागा योजनस्य ॥२॥ तद्विगुणद्वि- गुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः ॥२उत्तरा दक्षिण- तुल्याः ॥२६॥ भरतयवतयावृद्धिहासौ षट्समयाभ्यामुत्स- पिएयवसापिणीभ्याम् ॥२७॥ ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥२॥ एकद्वित्रिपल्यापमस्थितया हैमवतकहारिवर्षकदैवकुरु- वकाः ॥२९॥ तथोसः ॥३०॥ विदेहेषु सत्ययकालाः ॥३१॥ भरतस्य विष्कम्मा जम्बूद्वीपस्य नवतिशतमागः॥३२॥ द्विर्धात- फीखण्डे ॥३३॥ पुष्कराच ॥३४ा प्राण्यानुषोत्सरान्मनुष्या: ॥३५॥ आर्या म्लेच्छाश्च ॥३६॥ भरतैरावतविदेहाः कर्मभूम- योऽन्यत्र देवकुरुचरकुरुभ्यः ॥३७॥ नृस्थिती परावरे निपल्यो- 'पमान्तर्मुहूर्ते ॥३८॥ तिर्थग्यानिजानां च ॥३९॥ इति तत्वार्थाधिगने भीषशा वृतीयोऽध्यायः १३ देवाश्चतुर्णिकायाः ॥१॥ आदितस्त्रिषु पीतातलेश्या: ॥२॥ दशाष्टपच वादविकल्पाः कल्पापपानपर्यन्ताः ॥ इन्द्रसामानिकचायनिशपारिपदात्मरक्षलोकपालानीकप्रकीर्ण- कामियोग्यकिल्विषिकाचकशः ॥ ४॥ प्रायविंशलोकपालवं- ज्याव्यन्तरज्योतिष्कार ॥ पूर्वयोन्द्रा ॥६॥ कायप्रथीचाप मा ऐशानात् ॥७॥ शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रधीचारा: 0 परेऽप्रधीचारः ॥ अवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निका- जैन-प्रन्य-संग्रह। तस्लनिवाघिद्वीपदिककुमारा: ॥१०॥ व्यन्ता. किनकिम्पु- रुखमहारगगन्धर्वयक्षराक्षसमृपिशाचाः । १९ तिष्का: सूर्याचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च १२१ मेप्रद- क्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥१३॥ ततः कालविभागः शा वहिरवास्थिताः ॥ वैमानिकाः परा कल्लोपनाकल्या- तोताश्च ॥१७॥ उपर्युपरि ॥१८॥ सौधम्मशनसानत्कुमार- माहेन्दब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तबकापिष्टशुक्रमहाशुक्रशनारसहवारे-- बानतप्रापत्योरारणाच्युतयेर्निवलुप्रैवेयक विजयवैजयन.. जयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धी च ॥धा स्थितिजनावसुखयु - तिलेश्याविशुद्धोन्द्रियावधिविषयताऽधिका: FR: गतिशरीर- परिग्रहाऽभिमानताहीना: ॥२१॥ पोनपाललेश्या द्विविशेष ॥२॥ प्राग्वेयकेभ्यः कल्पाः ॥२शा ब्रह्मलेकाच्या लोकान्ति- काः ॥२१॥ सारस्पतादित्यवयत्तायनुरितान्यावाधा.. रिधाश्च ॥ २५॥ विजयाहिपु हिवरमाः ॥ ६ ॥ औपया- दिकमनुष्येभ्यः शेषास्तियन्योनयः ॥२७ स्थितिरतुर नागनुपर्णद्वीपशेशणां सागरोपत्रिमल्योपनाई होनमिताः २सौघशानयोः सागरांपमे अधिः ॥२॥ सानाकुमार- माहेन्द्रयोः सप्त ३ त्रिसप्तन कादरावये शामिथि. कानितु ॥३२मारणाच्युतादृर्वमेकैकेन नरसु येयकेषु विजु- यादिषु सर्वार्थसिद्धौ च ॥३२॥ अपरा पल्यापरमधिकम् ॥३३॥ परतः परतः पूर्वापूर्वानन्तराः ॥३४॥ नारकानां च द्वितीयादिषु श्या दशवर्षसहस्राणि प्रथमायाम् ॥३६॥ भवनेषु च ॥ ३० ॥ न्यन्तराणांव ॥३. परापल्यापमधिकम् ॥३मा ज्योतिष्काणां च ॥ तदष्टम गोऽपरा लौकान्तिमानामग्री सागरो- पमाणि सर्वेषाम् ॥४२॥ इति तत्तायोचिगने मोडमा व्यर्थोऽध्यायः Rel जैन-ग्रन्थ-संग्रह २७ अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्रलाः । द्रव्याणि ॥२॥ जीवाश्च ॥३॥ नित्यावस्थितान्यरूपाणि neiकपिणी पुद्रला: H५आ आकाशादेकद्रव्याणि ॥ निष्क्रियाणिं चं ॥७॥ असङ्ख्य याः प्रदेशा धर्माधर्मेकजीवानाम् ॥८॥ आकाश- स्थानन्ताः ॥६॥ सवये यासङ्ख्ययाध पुदलानाम् ॥१० नाणों: ॥११॥ लेाकाकाशेऽवगाहः ॥१२॥ धर्माधर्मयाः कृत्स्ने ॥१॥ एकप्रदेशादिषु भाज्य: पुद्गलानाम् ॥ १४॥ असङ्ख्य यभा- गादिषु जीवानाम् ॥१५॥ प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ॥१६॥ गतिस्थित्युपग्रही धर्माधर्मयारुपकारः॥१७आकाश- स्यांवगाहः ॥१८॥ शरीर वामनः प्राणापानाः पुद्गलानाम् १६i सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ॥२०॥ परस्परोग्रहो जीवानाम् ॥२॥ वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे चं कालस्य ॥२२॥ स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः ॥२३॥ शब्द. वन्धसौम्यस्थौल्य संस्थामभेदतमश्छायाऽऽतपोधोतवन्तश्च ॥२४॥ अणवः स्कन्धाश्च ॥२५॥ भेदसङ्घातेभ्य उत्पधन्ते ॥२६॥ भेदादणुः ॥२७॥ भेदसाताभ्यां चाक्षुषः ॥२८॥ सद्- द्रव्य लक्षणम् ॥२६॥ उत्पादच्ययध्रौव्ययुक्त सत् ॥ ३० ॥ तभावाव्ययं नित्यम् ॥३१॥ अर्पितामर्पितासिद्ध ॥३२॥ स्निग्धरुक्षत्वान्धः ॥३॥ न जघन्यगुणानाम् ॥३४॥ गुणसा-, म्ये सदृशानाम् ॥३५॥ घधिकादिगुणानां तु ॥३क्षा बन्धेऽधि- को पारिणामिकौ च ॥३७॥ गुणपर्यायवद्रव्यम् ॥३८॥ काल- श्च ॥३६॥ सऽनम्तसमयः ॥४०॥ द्रव्याश्रया निगुणः ॥४१॥ तद्भावः परिणामः ॥४॥ इति बरवाधिगमे गोपेशात्रै पञ्चमोऽध्या ia जैन-अन्य-संग्रहा कायवाङ्मनस्कर्मयोगः ॥१. सासूबः ॥२॥ शुभः पुण्यल्या शुभः पापस्य ॥ ३ ॥ सकषायाकषाययो: साम्परायिकापथयोः ॥४॥ इन्द्रियकषायावतक्रिया: पञ्चचतुःपञ्चपञ्चविंशतिसंख्याः पूर्वस्य भेदाः ॥ तीनमन्द- भाताहातभावाधिकरणवीर्यविशेषेभ्यस्तविशेषः अधिकरणं जीवाऽजीवा: ॥७॥ माघसरम्भसमारम्भारम्भ योगकृतकारितानुमतकषायविशेषत्रिनिखिश्च तुश्चैकशः ne निर्वर्तनानिशेष संयोगनिसर्गा विचतुर्वित्रिभेदाः परम् ॥९॥ तत्प्रदोषनिहवमात्सर्यान्तरायासादनीपघाता ज्ञान- दर्शनावरणयोः १०॥ दुखशोकतापोक्रन्दनवधपरिदेवनान्या- हमपरोमयस्थाग्यसद्वधस्य ॥१९॥ भूतवस्यनुकम्पादानसराग- संयमादियोगः शान्तिः शौचमिति सदस्य ॥१२॥ केवलिश्रुतसहधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ॥१॥ कषायो- दयातीवपरिणामश्चारित्रमोहस्य ॥१॥ बहारम्मपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः ॥५५॥ माया तैर्यग्यानस्य ॥१६॥ अल्पारम्मपरि- प्रहत्वं मानुषंल्य ॥१७॥ स्वभाषमार्दवं च ॥१॥ निशोलनतत्वं च सर्वेषाम् ॥१९॥ सरागसंयमसंयमासंयमाऽकामनिर्जरावाल- तपांसि देवल्य ॥२०॥ सम्यक्त्वंच॥२१॥ योगवकता विसंवादन चांशुभाल्य नामः ॥२२॥ तद्विपरीतं शुभल्य ॥२॥ दर्शनविशु- द्विविनयसम्पन्नताशीलवतेवनतीचारोऽभीषणशानोपयोगधे- गौशक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधियावृत्त्यकरणमईदावा- र्यबहुश्रुतप्रवचनमक्तियवश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभाषना प्रवचन- वत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥२४ परात्मनिन्दाप्रशंसे सद- सद णाच्छादनोद्भावने च नीचैर्गोत्रस्य ॥२५॥ तद्विपम्पयो नीचैव॒स्यनुदको चोत्तरस्य ॥२क्षा विवरणमन्तरायल्या२३॥ इति वा पिणने गोषणापोरवाया।

जैन-प्रन्य-संग्रह। हिंसान्तस्तयाब्रह्मपरिग्रहेन्याविरतिव्रतम् ॥१॥ देशस- वंतोऽणुमहतो ॥२॥ तत्स्थैर्यार्थ भावनाः पञ्च पञ्च ॥३॥ दानुनागुप्तीदाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानमोजनानि पञ्च ॥४॥ क्रोधलोभमोरुत्वहाल्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिभाषणं च पञ्च ॥५॥ शन्यागारविमोचितावासपरोपरीधाकरणभक्ष्यशुद्धि- सधाऽविसंवादाः पञ्चाक्षानीरागकथाश्रवणतन्मनोहरायनि- रोक्षणपूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्यागाः पञ्च Ren मनोकामनाक्षेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पञ्च ॥८॥ हिंसादिविहामुत्रापायावद्यदर्शनम् ॥ दुःखमेव वा ॥१०॥ मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यानि च सत्त्वगुणाधिकक्लिश्यमाना- विनयेषु ॥१२॥ जगत्कायस्थमावौ वा संवेगवेगग्यार्थम् ॥१२॥ प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा ॥१३॥ असदभिधानमनृतम् ११॥ अदचादानं स्तेयम् ॥१॥ मैथुनमब्रह्म ॥१६॥ मूर्जा पहिग्रहः ॥१७॥ निशल्यो व्रती ॥१॥ अगार्यनगारश्च ॥१६॥ अणुवनोऽगारी ।।२०। दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिकपोष- धोपवासोपमोगपरिमोगपरिमाणातिथीसंविभागवतसम्पनश्च ॥२१॥ मारणान्तिको संल्लेखना जोषिता ॥२२॥ शङ्काका- क्षाविचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतीचाराः॥२३॥ प्रतशीलेशु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् ॥२४॥ बन्धवधच्छेदातिमारा- रोपणानपाननिरोधाः ॥२५॥ मिथ्योपदेशरहोम्याख्यानकूटले- सक्रियान्यासापहारसाकारमन्त्रभेदाः ॥रक्षा स्तेनप्रयोगतदा- बतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिकमानोन्मानप्रतिरूपकव्यव- हारा ॥२७॥ परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीताऽपरिगृहीताग- मनानकोडाकामतीवाभिनिवेशा॥२८॥ क्षेत्रवास्नुहिरण्यसु- वर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणाऽतिकमाः ॥२६॥ ऊर्ध्वाध- स्तियंव्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ॥३०॥ मानयनने- जैन-अन्य-संग्रह। ध्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः ॥३१॥ कन्दर्पकौकुच्यम- खासमीक्ष्याधिकरणोपमोगपरिभोगानर्थयानि ॥३२॥ योग- दुम्पणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि॥३३अप्रत्यवेक्षिताऽपमा- जितोत्सर्गादानसंस्तरोएकमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ।।३।। सचित्तसम्बन्धसम्मिश्राभिषवदुःपक्काहाराः ॥३५।। सवितनि- क्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः ॥३६॥ जीवितम- रणाशंसामित्रानुरागसुखानुवन्धनिदानानि ॥३७॥ अनुग्रहार्थ स्वस्यातिसर्गोदानम् ॥३८॥ विधिद्रव्यदातपात्रविशेषाचद्वि- शेषः ॥३६॥ प्रति तरवार्याधिगमे मोक्षशाखे तमोउध्यायःnen मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः ॥१॥ सकपायत्वाजीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्ते स बन्धः ।।२।। प्रकृतिस्थित्यनुभावप्रदेशास्तद्विधयः ॥३॥ आद्यो ज्ञानदर्शनाव- रणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाः ॥४॥पंचनवद्यष्टाविंश- तिचतुर्द्विचत्वारिंशद्विपंचमेवा ययाक्रमम् ॥५॥ मतिश्रुताव- धिमनःपर्यायकेवलानाम् ।।६।। चतुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रा- निद्रानिद्रामचलापवलाप्रचलास्त्यानगृद्धयश्च ॥७॥ सदसवैद्य ut दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाण्यास्त्रिद्विन- वषोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्याकषायकषायौ हा. स्यरत्यरतिशोकमयजुगुप्सास्त्रीपुनपुंसकवेदा अनन्तानुवन्ध्य. प्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमा- यालोमाः ॥8॥ नारकतैयंग्योनमानुषदैवानि ॥१०॥ गतिजाति- शरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणबन्धनसङ्घातसंस्थानहनन- स्पर्शरसगन्धवर्णानुपागुरुलघूपधातपरघातातपोद्योतोच्छ्वा- सविहायोगतयः प्रत्येकशरीरत्रसशुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्ति- स्थिरादेययशाकीतिसेतराणि तीर्थकरत्वं च ॥११उनींचैश्व जैन-प्रन्य-संग्रह। १२१ ॥१२॥ दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ॥१३॥ आदितस्तिसृणा- मन्तरायस्य च त्रिशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥१४॥ सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥१५॥ विंशतिर्नामगोत्रयोः ॥१६।। प्रयस्त्रिंशत्सागरीपमापयायुपः ॥१७॥' अपरा द्वादशमुहूर्ता वेद- नीयल्य ॥१॥ नामगोत्रयोरटौ ॥१६॥ शेषाणामन्तमुहूर्ता ||२०|| विपाकोऽनुभवः ॥२१॥ स यथानाम ॥२२॥ ततश्च निर्ज- रा॥२३॥ नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाह स्थिताः सर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः ॥२४॥ सबंधशुभायु- मगोत्राणि पुण्यम् ॥२५॥ अतोऽन्यत्पापम् ॥२६॥ एक्षिरयाधिगमे मोक्षधामोध्यायः॥९॥ आलुवनिरोधः संवरः ॥१॥ स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रे- क्षापरीपहजयचारिौः ॥ तपसा निर्जरा च ॥३॥ सम्य' ग्योगनिग्रहो गुप्तिः ॥४ाईभाषेपणादाननिक्षेपोत्सर्गाः समि- तयः ॥५॥ उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौच सत्यसंयमतपस्त्यागाs चिन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥६॥ अनित्याशरणसंसारैकत्वा- न्यत्वाशुच्यानवसंवरगिज्जरालोकोधिदुल्लमधर्मस्वाख्यात- स्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः ॥७॥ मार्गाच्यवननिज्जराथ परिषोढन्या परीपहाः ॥८॥ क्षप्तिपासाशीतोष्पदंशमसंकनाग्न्यारतिस्त्री-: चय्यांनिपधाशय्याकोशवधायाञ्चालाभरोगवणशमलसत्कार पुरस्कारप्रशाऽज्ञानाऽदर्शनानि ॥ 8 ॥ सूक्ष्मसाम्परायच्छमस्थ घातरागयोश्चतुर्दश |॥१०॥ एकादश जिने ॥११॥ पादरसा- स्पराये सर्वे ॥१२॥ ज्ञानावरणे प्रज्ञाशाने ।।१३।। दर्शनमोहा- न्तराययोरदर्शनालाभौ ॥४॥ चारित्रमाहे नान्यारतिस्त्रीनिष- द्याक्रोशयाच्चासत्कारपुरस्काराः ॥१५।। वेदनीये शेषाः ॥३॥ एकादयो भाज्या युगपदकस्मिन्न कोनविंशते १४सामायिक- जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ર च्छेनोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसाम्परायथाख्यातमिति चारित्रम् ॥१८॥ अनशनावमौदथ्यवृत्तिपरिसलथानरसपरि- त्यागविविक्तशय्यासनकायक्ल शा बाह्य तपः ॥१६॥ प्रायश्चित्त- विनयवैयावृत्त्यखाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् ॥२०॥ नव- चतुर्दशपंचछिमेदायथाक्रम प्रारध्यानात् ॥२१॥ आलोचना प्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गतपश्छेदपरिहारोपस्थापना: २२ ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः ॥ २३ ॥ आचार्योपाध्यायतपस्वि शैक्ष्यग्लानगणकुलसङ्घमाधुमनोहानाम् ॥रा वाचनापृच्छना- नुप्रेक्षानायधर्मोपदेशाः ॥ २५ ॥ बाह्याभ्यन्तरोपध्योः ॥ २६ ॥ उत्तमसंहननस्य कांग्रेचिन्तानिरोधो ध्यानमाऽऽन्तमुहूर्तात् ।२७ आर्तरौद्रधर्म्य शुक्लानि ।।२८॥ परे मोक्षहेतू ॥२8 || आर्तममनी- शस्य सम्प्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः ॥३०॥ विपरीतं मनोज्ञस्य ॥३१॥ वेदनायाश्च ॥३२. निदानं च ॥३३ तदविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम् ॥३४॥ हिंसानृतस्तेयविषय- संरक्षणेभ्यो रौद्रमधिरतदेशविरतयोः ॥२॥ आज्ञापायविपाक- संस्थानविचयाय धर्मम् ॥३६ ॥ शुके चारे पूर्वविकः ॥३७॥ परे केवलिनः ॥२॥ पृथक्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रति- पातिव्युपरतक्रियानिवतीनि ॥३६॥ येकयोगकाययोगायोगा- नाम् ॥४०॥ एकाश्रये सवितर्कवीचारे पूर्वे ॥४१॥ अवीचार द्वितीयम् ।।४२पितकः श्रुतम् ॥ ४३ ॥ वीचारोऽर्थव्यखनयोग संक्रान्तिः ॥४४॥ सम्यग्दृष्टिपावकवितानन्तवियोजकदर्शन मेहक्षपकापशमकोपशान्तमोहलपकक्षीणमाइजिनाः क्रमशोऽसं. क्येयगुणनिजराः ॥४५॥ पुलाकवकुशकुशीलनिर्गन्धनातका निर्ग्रन्थाः ॥४६॥ संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिङ्गलेश्योपपाद स्थानविकल्पतः साध्या: 18sn इति तत्वार्याधिगमे मोशाय नवमोऽध्यायः .

जैन-प्रन्थ-संग्रह। १२३ - मोहक्षयाजज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच केवलम् ॥१॥ बन्धहत्वभावनिर्जराभ्यां फसकर्मविप्रमोझो मोक्षः ॥RI औप- शमिकादिमध्यत्वा नांच ॥३॥ अन्यत्र फेवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्यः ।।४॥ तद- नन्तरमूवं गच्छत्यालोकान्तात् ।।५।। पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वाबन्ध च्छेदात्तथा गतिपरिणामाच्च ॥६॥ आविद्धकुलालचक्रवद्- व्यपगतलेपालाम्बूवदेरण्डबीजवदाग्निशिखाचच्च ॥ ७॥ धर्मा- स्तिकायाऽभावात् ॥८॥ क्षेत्रकालगतिलिङ्गतीर्थचारित्रप्रत्येक- घुद्धयोधितानावगाहनान्तरसंख्याल्पबहुत्वतः साध्याः ॥९ रवितरवार्वाधिगमे भाषपापमोऽध्याय 19on अक्षरमात्रपदस्वरदीम व्यञ्जनसन्धिविवर्जितरेफम् । साधुभिरत्र मम क्षमितव्यं को न विमुखति शाखसमुद्रे ॥१॥ शाध्याये परिच्छिन्ने तरवायें पठिते सति। फलं ल्यादुपवा- सस्य भापितं मुनिपुश्वैः ॥२॥ तत्त्वार्थसूत्रकर्तारं गृद्धपिछोप- लक्षितम् चन्दे गणिसंजातमुमास्वामिमुनीश्वरम् ।।३।। रविवारवाभूमापमान स्थापिगममोपचार समाहर HOP जैन-प्रन्थ-संग्रह लघु अभिषेकपाठ। . श्रीमजिनेन्द्रमभिवन्य जगत्रयेशं स्याद्वादनायकमनन्तचतुष्टयाईम् । श्रीमूलसंधसुदशां सुकृतैकहेतु- जैनेन्द्रयज्ञविधिरेष मयाभ्यधायि ॥१॥ (यह पढ़कर पुष्पांजलि क्षेपण करना) सौगन्धसंगतमधुनतझंकृतेन सौवर्ण्यमानमिव गन्धमनिन्धमादौ । आरोपयामिविबुधेश्वरवृन्दवन्ध- पादारविन्दमांमिवन्यजिनोत्तमानाम् ॥२॥ (यह पढ़कर अपने ललाटादि स्थानों में तिलक लगाना चाहिये) ये सन्ति केचिदिह दिव्यकुलप्रसूता नागा:प्रभूतबलदर्पयुतावियोधाः। संरक्षणार्थममृतेन शुभेन तेषां प्रक्षालयामि पुरतः स्नपनस्य भूमिम् ॥३॥ (यह पढ़कर अभिषेक के लिये आगे की भूमि का प्रक्षालन करना चाहिये।) क्षीरार्णवस्य पयसां शुचिमिः प्रवाहै। प्रक्षालितं सुरवरैर्यदनेकवारम् । अत्युद्यमुद्यतमहं जिनपादपीठं प्रक्षालयामि भवसंभवतापहारि ॥४॥ (सिंहासन अथवा जिस आसन पर विराजमान करके अभिषेक करना हो उसका प्रक्षालन करके 'श्री'वर्ण लिखना चाहिये) जैन-प्रन्ध-संग्रह। .१२५, ६ इन्द्राग्निदण्डधरन नपाशपाणि- वायूचरेशशशिमालिफणीन्द्रचन्द्राः। मागत्य चूमिह सानुचरा सचिहाः, खं सं प्रतीच्छत पलि जिनपामिषेके ॥५॥ (दूर्वा फूल आदि लेकर दशों दिशाओं में निम्नलिखित मंत्र पढ़कर दशदिक्पालों की स्थापना करना चाहिये) ॐ को हों इन्द्र आगच्छ आगच्छ इन्द्राय खाहा । २ॐ अग्ने मागच्छ भागच्छ अग्नये स्वाहा । ॐ यम आगच्छ आगच्छ यमाय स्वाहा । ४ ॐनेत आगच्छ आगच्छ नै- नाय साहा।५ ॐ वरुण थागच्छ आगच्छ वरुणाय खाहा । ॐ पवन माच्छ आगच्छ पयनाय स्वाहा । ७ ॐ फुर आगच्छ मागच्छ फुवराय खादा । - ॐ ऐशान आगच्छ आगच्छ पेशानाय स्वाया। ॐ धरणीन्द्र आगच्छ आगच्छ धरणीन्द्राय स्वाहा। ॐसाम आगच्छ आगच्छ सोमाय स्वाहा। यः पाण्डुकामलशिल्टागनमादिदेव- मनापयन्सुरवगः सुशैलमूर्दिन् । फन्याणमोप्सुरगमक्षततोयपुष्पैः, संभावमि पुर एव तदीयबिम्बम् ॥६॥ (जल पुष्प अक्षतादि क्षेपण करके श्रीवर्ण पर जिन-बिम्ब की स्थापना करना चाहिये) सत्पलार्चितमुवान्कलधीतरूप्य ताम्रारकटघटितान्पयसा सुपूर्णान् ।

:१२६ जैन-प्रत्य-संग्रह। संवोधतामिव गतांश्चतुरसमुद्रान संस्थापयामि कलशान जिनवेदिकान्त ॥ (पुष्प अक्षातादि क्षेपण करके घेदी के कोनों में चार फलशों की स्थापना करना चाहिये) माभिः पुण्यामिरद्भिः परिमलबहुलेनामुना चन्दनेन प्रोक्पेयरमीभिः शुचिक्दकचयकदमैरेभिरुद्धः। इयरेभिनिवेधर्मखभवममिमदीपयद्भिः प्रदीप- धूपैः प्रायोभिरेभिः पृथुमिरपि फलरेभिरीशं यजामि ॥८॥ (यह पढ़कर अर्ध चढ़ना चाहिये) दूरावनम्रसुरनाथकिरीटकोटीसंलग्न- रत्नकिरणच्छविधूसरप्रिम् । प्रस्वेदतापमलमुक्तमपि प्रष्टैर्भ- कत्या जलैर्जिनपर्ति बहुधाऽभिषिञ्चे ॥६ (शुद्ध.जल की धार प्रतिमा पर छोड़ना चाहिये) भक्त्या ललाटतटदेशनिवेशितोच्च- ईस्तैच्युताः सुरवरासुरमर्त्यनाथैः। तत्कालपीलितमहारसस्य धारा सद्यः पुनातु जिनविम्वगतैव युष्मान् ॥१०॥ (इक्षुरलकी धारा०) उत्कृष्टवर्णनवहेमनसाभिराम- देहप्रमावल्यसंगमलुसदीप्तिम् । धारां घृतस्य शुभगन्धगुणानुमेयां वन्देऽहतां सुरमिसस्नपनापयुक्ताम् ॥११॥ . (घृत रस.की धारा०.)

जैन-प्रन्य-संग्रह। १२७ संपूर्णशारदशशामरीनिजाल- स्यन्दरिवात्मयशसामिव सुप्रधाई: क्षीरजिना: शुचितररभिपिच्यमाणाः संपादयन्तु मम चिससमीहितानि ॥१२॥ (दुग्ध रस की धारा०) दुग्धाधिवीचिपयनितफेनराशि- पाण्डत्यकान्तिमवधारयतामर्ताव । ना गता जिनपते प्रतिमा सुधारा संपद्यतां सपदि वाञ्छित सिद्धये यः ॥१३॥ (दही की धारा०) संसापितस्य घनदुग्धदधीक्षुवाहैः सर्यामिरीपधिभिगई तमुज्ज्वलाभिः । उद्धर्तितस्य विदधाम्पभिपेकमे- लाकालेयफूहमरसोत्कटाचारिपूरैः ॥१४॥ (सर्वोपधिरल की धारा०) इष्टमनोरथशतै रिघ भव्यपुंसा पूर्णीः सुवर्णकलशनिखिलैसानैः। संसार सागरविलमदेतुसेतुमा- प्लावये निभुवनैकपति जिनेन्द्रम् ॥१५॥ (फलशी से अभिषेक) द्रव्यैरनपधनसार चतुः समाय- रामोदवासितससस्तदिगन्तगल। मिश्रीकृतेम पयसा जिनपुयानां लाश्यपायनमहं स्नपनं करोमि ॥१६॥ (सुगधित जल की धारा०) R जैन-ग्रन्थ संग्रह। मुक्तिश्रीवनिताकरोदक मिदं पुण्याङ्करोत्पादक नागेन्द्रदिशेन्द्रचक्रपदवोराज्याम्पेिकोदकम् । सम्यग्ज्ञानचरित्रदर्शनलालंवृद्धिसंपादक की श्रीजयसाधत जिन स्नानस्य गन्धोदकम् ॥१७॥ (यह श्लोक पढ़कर गन्धोदक लेकर मस्तक पर लगाना चाहिये) इति लघुभांभषेक पाठ। विनयपाठ। इहि विधि ठाडो होय के प्रथम पढ़े जो पाउ। धन्य जिनेश्वर देव तुम नाशे कर्म तुपाठ॥ अनंत चतुष्टय के धनी तुम ही हो शिरताज ! मुक्ति वधू के कथं तुम तीन भुवन के राज ॥२॥ तिहुँ जग की पाड़ा हरण भवदधि शोपनहार । हायक हा तुम विश्व के शिव सुखके करतार ॥३॥ हरता अघ अँधियार के करता धर्म प्रकाश । थिरता पद दातार हो धरता निगुरा रास।४॥ धर्मामृत उर जल बसों ज्ञान भानु तुम रूप। तुमरे चरण सरोज के नाबत तिहुँ जग भूप मैं वन्दो जिनदेव को कर अति निरमल भाव । कर्म चंदके डेहने और न कोई उपाय । क्षा भषिजन को भवि कूप ते तुमही काढ़न हार । दीनदयाल अनाथपति अन्तिमंगुण भंडार ॥ चिदानन्द निर्मल किया थोय करम रज मैल । शरल करीया जमत मैं भविजनको शिव गैल पटा

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
तुम पद पंकज पूजत विघ्न रोग टर जाय।
शत्रु मित्रता को धरै विष निर विषता थाय ॥६॥
चक्री खग धर इंद्र पर मिले आपते पाप
अनुक्रम कर शिव पद लहै नेम सकल हन पाप:१०॥
तुम विन मैं व्याकुल भयो जैसे जल बिन मीन
जन्म जरा मेरी हरो करो मोह स्वाधीन ॥१५॥
पतित बहुत पावन किये गिनती कौन करेव ।
अंजन से तारे कुधी सु जय जय जय जिनदेव ॥१२॥
थकी नाव भत्रि दधि विर्षे तुम प्रभु पार करेय ।
खेवटिया तुम हो प्रभु सो जय जय २ जिनस्व ॥१३॥
राग सहित जग में रुले मिले सरागो देव ।
वीतराग भेटी अवै मेटो राग कुटेत्र ॥१४॥
कित निगोद कित नारकी कित तिर्यश्च अज्ञान ।
आज धन्य मानुष भयो पायो जिनवर थान ॥१५॥
तुमको पूजें सुरपति अहिपति नरपति देव ।
धन्य भाग मेरो भयो करन लगो तुम सेव ॥१६॥
अशरण के तुम शरण हो निराधार आधार ।
मैं डूवत भवसिंधु में खेव लगायो पार ॥१७॥
इंद्रादिक गणपति थकी तुम विन्ती भगवान ।
विनती बाप निहारि के कीजे आप समान ॥१८॥
तुमरी नेक सुदृष्ट से जग उतरन है पार।
हाहा हुवौ जात हो नेक निहार निकार ARER
जी मैं कहा हूँ और सों तो न मिट उर झार।
मेरी तो मोसो बनी तातें करत पुकार ॥२०॥
बंदी पाचों परम गुरू सुरगुरु. पंदत जांस ।
'विधन हरनं मंगल करन पूरन परम प्रकाश ॥२१॥

जेम-प्रन्य-संग्रह चौवीसौ जिन पद नमो नमो सारदा माय। शिवमग साधक साधु नमि रचो पाठ सुखदाय ॥ मंगल मूर्ती परम पद पंच घरो नित ध्यान। हरो अमंगल विश्व का मंगलमय भगवान ॥२३॥ मंगल जिनवर पद नमों मंगल अहंत सेव । मंगल कारी सिद्ध पद सो बन्दो स्वमेव ॥२४॥ मंगल आचार्य मुनि मंगल गुरु उबझाय । सर्व साधु मंगल करों बन्दों मन वच काय ॥२५॥ मंगल सरस्वति मात का मंगल जिनवर धर्म। मंगलमय मंगत करो हरो असाता कर्म २६ या,विधि मंगल करन से जग में मंगल होत । मंगळ "नाथूराम' यह भव सागर ढूढ़ पोत ॥२०॥ इति विनय पाठ समाप्त । देवशास्त्र गुरु पूजा। ॐ जय जय जय । नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु । णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं णमो आयरीयाणं। णमों उवझायाणं, णमा लोए सवसाहूणं । ॐ अनादिमूलमन्त्रेभ्यो नमः (यहाँ पुष्पाञ्जलि क्षेपण करना चाहिये). चत्तारि मंगलं-अहरतमंगलं सिद्धमंगलं साइमंगल केवलिपएणतो धम्मो मंगलं । चत्तारि लोगुत्तमा-अरहंतलो. गुत्तमा, सिद्धलागुत्तमा, साहुलागुतमा, केवलिपएणतो धम्मो लागुत्तमा । चत्तारिसरणं पध्वजामि-अरहतसरणं पन्वजानि, सिद्धसरणं पध्वंज्जामि, साहुसरणं पन्धज्जामि केवलिपपणचों धम्मोसरणं पन्चज्जामि ॐनमोऽईते स्वाहा। (वहाँ पुष्पांनतिरेपण करना चाहये) अपवित्रः पवित्रो वा सुस्थितो दुःस्थितोऽपि वा। ध्यायेत्पश्चनमस्कारं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१॥ अपवित्रा पवित्रो घा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्परमात्मानं स वाहाभ्यन्तरे शुचिः॥२॥ भपराजितमन्नोऽयं सर्वविघ्नविनाशनः । मंगलेषु च सर्वेषु प्रथमं मंगलं मतः॥३॥ एसो पंचणमायारो सम्धपावप्पणासपो। मंगलाणं च सम्वेसिं, पढम हार मंगल ॥४॥ आईमित्यक्षर ब्रह्म पाचकं परमेष्ठिनः । सिद्धचमस्य सद्वीजं सर्वतः प्रणमाम्यम् ॥५॥ कर्माएकषिनिमुक मोक्षलक्ष्मीनिकेतनम् । सम्यक्त्वादिगुणोपेतं सिद्धचक्र मनाम्यहम् ।। (यहाँ पुष्पांजलि रेप करना चाहिये ) (यदि मघकाश हो, तो यहाँ पर सहस्रनाम पढ़कर दश अर्ब देना चाहिये, नहीं तो नीचे लिखा ग्लोक पढ़कर एक अर्ध चढ़ाना चाहिये उदकचन्तनतन्दुलपुष्पकैश्वासुदीपसुधूपफलार्धकः । धवलमंगलगानरवाकुले जिनगृहे जिननाथमह यजे॥ ॐद्री श्री भगवम्निनसहस्त्रनामभ्योऽध्य निर्व पामीतिमारा.. श्रीमज्जिनेन्द्रममिवन्ध जगत्रेयेश स्याद्वावनायकमनन्तचतुष्टयाईम्। श्रीमूलसंधसुदशां सुस्तकहेतु- जनन्द्रयाविधिरेष मयाऽम्पयायि ॥८॥.. .

जैन-प्रन्थ-संग्रह। स्वस्ति त्रिलोकगुरवे जिनपुङ्गवाय स्वस्ति स्वभावमहिमादयसुस्थिताय । स्वस्ति प्रकाशसहजाजितदायाय स्वस्ति प्रसन्नललिताद्भुतवैभवाय ॥६॥ स्वस्त्युच्छलद्विमलबोधसुधःप्लवाय स्वस्ति स्वभावपरमात्र विभासकाय । स्वस्तिं त्रिलोकंविततैकचिदुद्गमाप स्वस्ति त्रिकालसकलायतविस्तृताय ॥१०॥ द्रव्यस्य 'शुद्धिमधिगम्य यथानुरूपं भावस्य शुद्धिमधिकामधिगन्तुकामः । मालम्बनानि विविधान्यवलम्य वल्गन् भूतार्थयात्रपुरुषस्य करोमि यश्चम् ॥११॥ मईपुराणपुरुषोत्तमपावनानि वस्तून्यनूनमखिलान्ययमेक एव । यस्मिन ज्वलमिलकेवलबोधवहीं पुण्यं समग्रमहमेक मना जुहोमि ॥१२॥ (पुष्पांजलि क्षेपण करना) श्रीवृषभो नः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअजितः। श्रीसंभव स्वस्ति, खस्ति श्रीअभिनन्दनः श्रीसुमतिः स्वस्ति, खस्तिं श्रीपनमः । श्रीसुपाश्वः स्वस्तिः स्वस्ति श्रीचन्द्रप्रमः । श्रीपु. पदन्तः खस्ति, खस्ति श्रीशीतले । श्रीश्रेयान्वस्ति, खस्ति भीवासुपूज्यः । श्रीविमला खस्ति; खस्ति,. श्रीअनन्तः । श्रीधर्मः खस्ति, खस्ति श्रीशान्तिः । श्रीकुन्थुः खस्ति, खस्ति.. भीमरनाथः । श्रीमल्लिः खस्ति, स्वस्ति श्रीमुनिसुव्रतः । श्रीनमिः जैन-प्रन्य-संग्रह खस्ति, स्वस्ति श्रीनेमिनाथः । श्रीपावः खस्ति, स्वस्ति श्रीवईमानः। (पुष्पांजलिझोपण) नित्याप्रकम्पाद्वतकेवलौधाः स्फुरन्मनःपर्यायशुद्धबोधा । दिव्यावधिज्ञानयलप्रयोधाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥ मागे प्रत्येक श्लोकके अन्त में पुष्पांजलि क्षेपण करना चाहिये। कोरस्यधान्योपममेकधीज संभिन्नसंधोलपदानुसारि। चतुर्विधं पुद्धिबलं दधानाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्पयो नःTRA संस्पर्शनं संश्रवणं च दुरादाखादनबाणविलोफनानि । दिव्यान्मतिज्ञानयलाबहन्तः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो न: ॥३॥ प्रज्ञाप्रधानाः श्रमणाः समृद्धाः प्रत्येकवुद्धा दशसर्वपूर्वै। प्रवादिनोऽटाङ्गनिमित्तविज्ञाः खस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ अगवलिणिफलाम्बुतन्तुप्रसूनबीजापुरचारणाहाः। नमोऽङ्गणस्परविहारिणश्च स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥५॥ मणिनि दक्षाः कुशला महिन्नि लघिन्नि शक्ताः कृतनी गरिणि । मनोयपुर्वाग्वलिनच मित्य स्वस्ति क्रियासुः परमर्पयो ना सकामरूपित्ववशित्वमैश्यं प्राकाम्यप्रन्तद्धिमथाप्तिमाताः । तथाऽप्रतीघातगुणप्रधानाः खस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥७॥ दोसच तसच तथा महोनं घोरं तपो घोरपरक्रमस्थाः। ब्रह्मापरं चोरगुणाचरन्तः ख'स्त क्रियासुः परमर्षयो न: CA मामर्षसर्वोपधयस्तथाशीविषविषा दृष्टिविविपाश्च । सचिलबिजलमलीषधोशा स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥8A क्षीरं सवन्तोऽत्र घृतं सवन्तो मधु सवन्तोऽप्यमृतं सवन्तः । . मझीणसंवासमहानसाच खस्ति क्रियासुः परमर्पयो नः ॥१०॥ इति खस्तिमालविधानं ।।

ie जैन-ग्रन्थ-संग्रह। सार्वः सर्वनाथ: सकतनुभृता पापसन्तापहर्ता. अलोक्याक्रांतकीर्तिः क्षतमदनरिपुर्धाति कर्मप्रणाशः। श्रीमानिर्वाणसम्पद्वरयुवतिकरालीलकण्ठः सुकण्ठे- देवेन्द्रर्वन्धपाशे जयति जिनपतिः प्रातल्याणपूजः ॥ जय जय जय श्रीसत्कान्तिप्रमो जगतां पते जय जय भवानेव स्वामी भवाम्मसि मजताम् । सय बब महामोहध्वान्तंप्रभातकृतेऽर्चनम् जय जय जिनेश त्वं नाथ प्रसदि करोम्यहम् ॥२॥ ही भगवजिनेन्द्र ! मत्र मवतर अवतर । संवौषट् । (त्याहानम् ।) हों भगवजिनेन्द्र ! अन तितिष्ठ | हैं: (इति स्थापनम्) ही भगवजिनेन्द्र ! अत्र मम सनिहितो भव भव वषट् । (इति सत्रिधिकरणम् ) देवि श्रीश्रुतदेवते भगवति त्वरपादपह- बन्द यामि शिलीमुखत्वमपरं भकया मया प्राध्यते। मातधेतसि तिष्ठ मे जिनमुखोद्ते सदा त्राहि मां : द्वंग्दानेन मयि प्रसीद भवती सम्पूजयामोऽधुना ॥३॥ *हौं जिनमुखोद्भूतद्वादशाङ्गश्रुतवान! अंत्र अवसर अवतर संवौषट् ही जिनमुखोद्भूतवादशांगश्रुतहान! अत्र तिष्ठ तिष्ठ हौं जिनमुखोजतदादागश्रुतशान.! अन मम सनिहितं भव भव वषट् । संपूजयामि पूज्यस्य पादपश्मयुगं गुरोः। तपःप्राप्तप्रतिष्ठस्य गरिष्ठस्य महात्मनः ॥४॥ हो आचार्योपाध्यायसंर्वसाधुसमूह अत्र अवतर२ संवौषट्। . ही आचार्योपाध्यायसर्वसाधुसमूह ! अत्र तिहतिष्ठा हो भाचार्योपाध्यायसर्वसाधुसमूह ! पत्र मम सन्निहितो भव भवः वषट् । : ... -- .

जैन-प्रन्य-संग्रह। . . देवेन्द्रनागेन्द्रनरेन्द्रवन्यान् शम्मत्पदान शोभितसारवान् । दुग्धाग्धिसंल्पर्धिगुणैर्जलाधैजिनेन्द्रसिद्वान्तयतीन्यजेऽहम् ॥१॥ ...ही परब्रह्मणेऽनन्तानन्तहानशकये अष्टादशदोषरहि- ताय पटचत्वारिंशद्गुणसहिताय अर्हत्परमेष्ठिने जन्ममृत्युषि- नाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । के हों जिनमुखोद्भूतस्याद्वादनयमितद्वादशांगश्रुतका- नाय जन्ममृत्युबिनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । *ही सम्यग्दर्शनशांनचारित्रादिगुणविराजमानाचार्यों- पाध्यायसर्वसाधुभ्यो जन्ममृत्युविनाशनाय जल निपामीति r साम्यत्रिलोकोदरमध्यवर्तीसमस्तसत्त्वाऽडितहारिवाक्पान् । श्रीचन्दनैर्गन्धविलुब्धभृगजिनेन्द्रसिद्घान्तयतीन यजेऽहम ॥२॥ ॐहों परब्रह्मणेऽनन्तानन्तकानशक्तये अष्टादशदोषरहि ताय पट्चत्वारिंशदुगुणसहिताय महत्परष्ठिने संसारतापवि- नाशनाय चंदनं निर्षपामोति स्वाहा। हों जिनमुखोद्भुतस्याद्वादनयगर्मितद्वादशाङ्गधुतक्षा- माय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निष्पामोति स्वाहा। ही सम्यग्दर्शनशानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्यों- पाध्यायसर्वसाधुभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामी ति स्वाहा। अपारसंसारमहासमुद्रप्रोत्तारणे प्राज्यतरीन् सुभकया। दोर्धाक्षनाङ्गैर्धवलाशतौजिनेन्द्रसिद्घान्तयतीन्यजेऽहम्॥३॥ ही परब्रह्मणेऽनन्तानन्तबानशक्तये अष्टादशोषरहिताय घटचत्वारिंशद्गुणसहिताय अर्हत्परमेष्ठिने अक्षयपदप्राप्तये 'भक्षतान् निपामोति स्याही।

१६ नं प्रत्य-संग्रह। - ही जिनमुखोद्भूतस्याद्वादनयगर्मितद्वादशांगत- मानाय अक्षयपदप्रप्ताये अक्षतानं निधपामीति स्वाहा। *हों सम्यग्दर्शज्ञानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्यों- पाध्यायसवसाधुभ्योऽक्षयपदप्राप्तायेमक्षतान निर्षपामोतिस्वाहा। विनीतभव्याजविबोधसून्विर्यान् सुचाकथनेकधुर्यान् । कुन्दार विन्दप्रमुख प्रसूनैर्जिनेन्द्रसिद्धान्तयतीन् यजेऽहम् HEN ही परब्रह्मणेऽनन्तानन्तज्ञानशक्तये अष्टादशदोषरहिताय षट्चत्वारिंशद्गुणसहिताय अईत्परमेष्ठिने .कामवाणविश्वंस- नाय पुष्पं निर्षपामीति स्वाहा। ॐ हीं जिनमुखामृतस्याद्वादनयगर्मितद्वादशाङ्गश्रुतबा- नाय कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निवपामीति स्वाहा। ॐ हीं सम्यग्दर्शनशानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्यो- पाध्यायसर्वसाधुभ्यः कामवाणविध्वसनाय पुप्पं निर्धपामीति स्वाहा। कुदर्पकन्दर्पविसर्पसर्पप्रसहनिर्णाशनबैनतेयान् । प्राज्याज्यसारैश्चमीरलायजिनेन्द्रसिद्धान्तयतोन्यजेऽहम्॥५॥ ॐही परब्रह्मणेऽनन्तानन्तज्ञानशकये अष्टादशोषरहि- तायषट्चत्वारिंशद्गुणसहिताय महत्परमेष्ठिने क्षुधारोगविना शनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वरहा। *ही जिनमुखोद्भूतस्यावादनयर्भितद्वादशांगभुत.. शानाय सुधारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा। *ही सम्यग्दर्शनशानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्या पाध्याव सर्वसाधुभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति .

जैन-अन्ध-संग्रह। ३० ध्वस्ताद्यमान्धीकृतविश्वविश्वौहान्धकारप्रतिधातदीपान् । दीपः फैनत्काशनभाजनस्थैर्जिनेन्द्रसिद्धान्तयतीन्यजेऽहम् ॥६॥ ही परब्रह्मणेऽनन्तानन्तज्ञानशकये अष्टादशीपरहि- ताय पट्चत्वारिंशदगुणसहिताय महत्परमेष्ठिने मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निवंपामीति स्वाहा। ॐ हीं जिनमुखोद्भूतस्याद्वारनयमितद्वादशांगश्रुतबा- नाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । ॐ हीं सम्यग्दर्शनसम्यग्ज्ञानसम्यक्चारित्रादिगुणवि- राजमानामोपाध्याय सर्वसाधुभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वामीति स्वाहा । दुष्टाष्टकर्मेन्धनपुष्टजालसंधूपने भासुर धूमकेतून् । भूपैर्विधूनान्यसुगन्धगन्धैजिनेन्द्रसिद्धान्तयतोन् यजेऽहम् ॥७॥ ही परब्राह्मणेऽनन्तानन्तज्ञानशक्तये अष्टादशदोषरहि- ताय पट्चत्वारिंशदगुणसहिताय अहंन्परमेष्ठिने अष्टकर्मदह- नाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । * ही जिनमुखोद्भूतस्याद्वादनयगर्भिनद्वादशांगश्रुतक्षा नाय अष्ट-कर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शनशानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्यों- पाध्यायसर्वसाधुम्ग अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामोतिस्वाहा। क्षुभ्यद्विलुभ्यन्मनसामगभ्यान कुवादिवादाऽस्खलितप्रभाधान् । फलैरलं मोक्षफलामिसारैजिनेन्द्रसिद्धान्तयतीन् यजेऽहम ॥८॥ ॐ ह्रीं परब्रह्मणेऽनन्तानन्तज्ञानशकये अष्टादशदोषरहि- ताय पट चत्वारिंशद्गुणसहिताय अईत्परमेष्टिने मोक्षपाल- प्राप्तये फल निवपामीति स्वाहा।

जैन-प्रन्य-संग्रह।
ॐ ही जिनमुखोद्भूतस्याद दनयमितवादशांगश्रुतका-
नाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
ही सभ्यग्दर्शनशानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्यो.
पाध्याय सवसाधुभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा
सद्वारिगन्धाक्षतपुष्पजातनैवेद्यदीपामलधूपधूनः।
फलैर्विचित्रैर्धनपुण्ययोगान् जिनेन्द्रसिद्धान्तयतीन यजेऽहमMER
*ही परब्रह्मणेऽनन्तानन्तबानशकये अष्टादशदोषरहि-
साय षट्चत्वारिंशद्गुणसहिताय भइत्परमेष्ठिने मनपदप्राप्तये
अर्घ निर्धपामीति स्वाहा।
ही जिनमुखोद्भूतस्यावादनयमितद्वादशाङ्गतमा-
नाय मनघंपदपाप्तये अर्घ निवंपामोति स्वाहा ।
ॐ ह्री सम्बग्दर्शनशानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्यों
पाध्याय सर्वसाधुभ्योऽनघग्दप्राप्तये अर्घ निवपामीति स्वाहा।
ये पूजां जिननाथशासयमिना भकया सदा कुर्वते
सन्ध्यं सुविचित्रकाव्यरचनामुग्धारयन्ता नराः ।
पुण्याच्या मुनिराजकीर्तिसहिता भूत्वा तपोभूषणा-
स्ते भव्याः सकलावबोधरुचिरां सिद्धि लभन्ते पराम.
इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलि,क्षेपण करना)
वृषभोऽजितनामा च संभवश्वामिनन्दनः ।
मुमतिः पन्नभासश्च सुगों जिनसत्तमः ॥१॥
चन्द्रामः पुष्पदन्तश्च शीतलो भगवान्मुनिः।
श्रेयांश्च वासुपूज्यश्च विमलो विमलद्युतिः ॥२॥
मनन्तो धर्मनामा शान्तिः कुन्युर्जिनोमः।
भरच मलिनाथश्च सुबतो नमितीर्थकद ॥३॥

जैन-प्रन्य-संग्रह। हरिवंशसमुभूगोऽरिएनेमिर्जिनेश्वरः । ध्वस्तोपसर्गदत्यारित पाचौँ नागेन्द्रपूजितः ॥ कान्तिान्महावीरः सिदार्यकुलसम्भवः । एते सुरासुरोघेण पूजिता बिमलत्विपः ॥५॥ पूजिता भरताश्व भूपेन्द्र रिभूतिमिः । चतुर्विधस्य मधस्य शान्ति कुर्वन्तु शाश्वतिम् ॥६॥ जिने भकिने भकिर्जिने भकिः सदाऽस्तु मे । सम्यक्त्वमेव संसारवारणं मेक्षिकारणम् uon (पुष्पांजलि क्षेपण) भुते भकिः धुने भक्तिः श्रुने भक्तिः सदाऽस्तु मे। सम्यक्त्यमेव संसारवारणं मासकारणम् Ru (पुष्पांजलि क्षपण) गुरी भकिमुरी भक्तिगुरौ भक्तिः सदाऽस्तु मे। चारित्रमेव संसारवारणं मोक्षकारणम् IBN (पुष्पांजलि क्षेपण) अथ देव जयमाला प्राकृत। बताणुहाणे जणघणुदाणे पइपोसिड तुहु वक्षधरू । तुहु चरणविहाणे केवलणाणे तुहु परमपउ परमपर ॥२॥ जय रिसह रिसिसर णमियपाय । जय भजिय जियं. गमरोसराय जय संभ संभवकय विमओय। अय भहिणं- दण दिय पभोय

.
जैन-प्रन्य-संग्रहा
जय सुमह मुमा सम्मयंपयास | जय पउमप्पह पंडमा-
णिवास । जय जयहि सुपास सुंपांसगत | जय चंदप्पह
बंदाहवत्ता
जय पुप्फयंत दंतंतरंग। जय सीयल सीयलवयभंग।
जय सेय सेयकिरणोहमुज । जय वासुपुज पुजाणपुज.॥४॥
जय विमल विमलगुणसेडिठाण । जय जयहि अणंताण-
तणाण । जय धम्म धम्मवित्थयर संत । जय सांति सांति
विहियायवस।५॥
जय कुंथु कुंथुपहुअंगिसदय । जय मर भर माहर
विहियसमय । जय मल्लि मल्लिादामगंध । जय मुणिंसुचन
सुज्वणिबंध ॥६॥
जय णमि मियामरणियरसामि । जय णेमि धम्म-
रहचकणेमि । जय पास पासछिदणकिवाणं । जय वंड्ढमाण
जसवड्ढमाण ॥ ७॥
पत्ता।
इह जाणिय णामहि, दुरियविरामहि, परहिंवि णमिय सुराध-
लिहिं अणहहिं अणाइदि. . समियकुवाइहिं. पणंविमि
भरहंतावलिहि
*हों वृषभादिमहावीरान्तेभ्योऽयं महार्ष निर्वपामोति
स्वाहा ॥१॥

जैन-अन्य संग्रह। श्रथ शास्त्रजयमाला प्राकृत । . संपइ सुहकारण, कम्मवियारण । भवसमुहतारण तरणं । जिणवाणि णमस्समि, सत्प्रयास्समि, सग्गमोक्खसंगमक- रणं ॥१॥ जिणंदमुहामो विणिग्गयतार । गणिदविगुफिय गंथप-. धार। निलोयहिमंडण धम्मह खाणि । सया पणमामि जिणिदहवाणि ॥२॥ अवगहईहवायजुएहि । सुधारणमेयहिं तिरिणपएहि । मई छत्तीम बहुप्पमुहाणि । सया पणमामि जिणिदह पाणि ॥३॥ सुदं पुण दीपिण अणेयपयार । सुवारहमेय जगत्तय- सार। सुरिंदरिदसमधिमओ जाणि । सया पणमामि जिणि- बह. वाणि ॥४.. जिणिदगणिदणरिंदह रिद्ध। पयासर पुरणपुराकिट- लद्धि । णिउग्गु पहिला एहुवियाणि । खया पणमामि जिणिदह वाणि ॥ ५॥ जुलायमलोयह जुत्ति जणे। शु.तिण्णविकालसरुव: भणेई । चपगइलपक्षण दजर जाणि । संया पणमामि जिणिदहवाणि ॥६॥ जिणिश्चरित्तविचित्त मुणे । सुसावयधम्महि जुति जणे । णिउगुवितिजा इत्यु वियाणि । सया पणमामि जिणिदह वाणि ॥७॥ ..

१४१ जैन-प्रन्य-संग्रह। सुजीवजीवह तबह चक्छु । सुपुण्ण विपार विवंध विमुक्ख । चउत्शुणिउग्गु विभासिय गाणि । सया पणमामि जिकिदह पाणि ॥ तिमेयहि ओहि विणाण विचित्तु । धउत्यु रिजोवि- लमह उत्तु । सुखाय केवलणाण वियाणि। सया पणमामि जिणिदह वाणिEn जिणिदह णोणु जगसयमाणु।महातमणासिव मुक्स. खिहाणु। पयश्चहुत्तिभरण वियाणि । सया पणमामि सिणिदह पाणि ॥१०॥ पयाणि सुवारहकोस्सियेण । मुलपतिरासिय जुति भरेण । सहरसाठावण पंच वियाणि । सया पथमामि जिणिदह पाणि ॥११॥ इकावण कोडिष लक्स अठेव । सहस धुलसीदिसया अव सहाइगवीसह गंथपयाणि ।सया पणमामि जिणि- वह बाणि ॥ १२॥ घचा। इह जिणवरवाणि विसुबई । जे भवियणणियमण धरई । सो सुररिंदसंपय सहिवि । केपळणाण विठ- चरई। १३ ॐ ही जिनमुखोडूतल्यावादनवगर्मितद्वादशावतका- नाय मर्ष निर्वपामीति खाहा।. China ..

जैन-प्रत्य-संग्रह। अथ गुरुजयमाला प्राकृत। भवियह भवतारण, सोलह कारण, अजिव तित्यय रमणहं । तव कम्म भर्सगह दयधम्मंगह पालवि पंच महा- यह ॥१॥ चंदामि महारिसि सीलपंत । पर्चेद्रियसंजम जोगजुस । ने ग्यारह अंगह अणुसरंति । जे चउदहपुबह मुणि यति ॥२॥ पादाणु सारवर कवुद्धि । उप्पण्णजाह मायासरिद्धि। में पाणाहारी तोरणीय । जे रंक्समूल भातावणीय ॥३॥ जे मणिधाय चंदाहणीय । जे जत्थत्यवणि णिवाल- णीय । जे पंचमहव्यय धरणधीर । ने समिदि गुत्ति पाळणहि वीर॥४॥ जे वहि देव विरत्तचित्त । जे रायरोसमयमोहचित्र । कुगइहि संघरु विगयलोह । जे दुरियविपासण कामकोह ॥५॥ जे जल्लमल्ल तिलिचत्त ।मारंभ परिगहंजे पिरत । जेतिएणकाल बाहर गमन्ति । छहम इसमउ तउचरंति पक्षा जे कगास 'दुइगास लिन्ति । जे णीरसंभोयण रह करति । ते मुशिवर बंदङ ठियमसाण । जे फम्म सहइवर सुकमाण॥७॥ बारह विह संजम जे धरति । जे चारित विकथा परहरति । वावीस परीसह जे शहन्ति । संसारमहणत ते परति जी

जैन-प्रत्य-संग्रहा..
जै धम्मवुद्ध महियाल थुर्णनि। जे काउस्सगो णिस
गमन्ति । जे सिद्धिविलालणि अहिलसंति ! जे पक्समास
आहार लिन्ति ५९॥
गोदूहण जे वीरासणीय । जे धणुड सेज बजासणीय ।
बेतववलेण आयाल ति। जे गिरिगुहकंदर विवर थन्नि ॥१०..
जैसत्त्मित्त समभावनित । ते मुणिवरवंड दिढचरित
बड़वीसह गंथह जे वित्त । ते मुणिवरवन्दउ जगवित्त ॥१६॥
जे सुझाणिज्झा एकचित्त । चंडामि महारिसि मोखपत्त ।
रयणतयरंजिय सुद्धभाव । ते मुणिवर वंदठिदिसहाव ॥१२॥
घचा।
जे तपसूरा, संजमधीरा, सिद्धवषअणुराईया।
रयणतयरजिय, कम्मह गंजिय. ते रिसिवर मा झाईया ॥१३॥
ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शनशानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्यो-
पाध्यायसर्वसाधुम्यो महाधं निर्वपामीति स्वाहा ॥३॥
देवशास्त्र गुरु की भाषा पूजा।
भदिन्ल छन्दः।
प्रथम देव अरहन्त सु. श्रुतसिद्धान्तजू।
गुरु निरग्रंथ. महन्न मुकतिपुर पन्थडू॥
तीन रतन जगमाहि सोये भवि ध्याइये।
तिनकी भक्ति प्रसाद परम पद पाइये ॥१॥
दोहा- पूजों पद मरहंत के पूजों गुरु पद सार ।
-पूजों देवी सरस्वती, नितप्रति अप्रकार ॥२॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। दोहा-स्वपरप्रकाशक जोति अति, दीपक तमकर हीन । जासों पूजों परमपद. देव शास्त्र गुरु तीन ॥ ६ ॥ ही देवशास्त्रगुरुभ्यो माहान्धकार विनाशनाय दीपं नि. पामोति स्वाहा ॥६॥ जो कर्म-इंधन दहन अग्निसमूह सम उद्धत लसै। घर धूप तासु सुगन्धि ताफरि सफल परिमलता हँसे । इह भांति धूप चढ़ाय नित, भवज्वलनमाहि नहिं पर्दा अरहंत श्रुतसिद्धांत गुरुनिरग्रंथ नित पूजा रचूं ॥७॥ दादा-अग्नि मांहि परिमल दहन, चंदनादि गुणलीन । जासों पूजों परम पद, देवशास्त्र गुरु तीन ||७|| ॐ ह्री देवशास्त्र गुरुभ्यो अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं निर्यपा. मति स्वाहा ॥७॥ लोचन सुरसना धान उर, उत्साह के करतार हैं। मोपै न उपमा जाय धरणी, सकलफलगुणसार हैं । सो फल चढ़ायत अर्थ पूरन, परम अमृतरस सचूं। अरहंत श्रुत सिद्धांत गुरुनिरग्रंथ नितपूजा र it दोहा- जे प्रधान फल फल वि, पंचकरण-रसलीन । बासों पूजो परम पद, देवशास्त्र गुरु तीन 10 ॐ ह्रीं देवशाखगुरुभ्यो मोक्षफलप्राप्ताये फलं निपामीति स्वाहा ॥८॥ जल परम उज्वल गंध अक्षत, पुष्प चरु दीपक धर्क । घर धूप निरमल फल विविध, बहुजनमफे पातकहरू ।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
: इहभांति अर्घ चढ़ाय नित भवि, करत शिवपंकति मचूं
अरहंत श्रुत सिद्धांत गुरु निरग्रंथ नित पुजा रचूं।
दोहा- सुषिधि अर्घ संजीयके, अति उछाह मन कीन ।
जालों पूजों परम पद, देवशास्त्र गुरु तीन 180
ॐ ह्रीं देवशाखगुरुभ्यो अनघ पद प्राप्ताये अर्घ निर्वपामिति
स्वाहा ॥
अथ जयमाला।
देवशालगुरु रतन शुभ, तोन रतन करतार ।
भिन्न भिन्न कहुं भारती, अल्प मुगुण विस्तार ॥१॥
पद्धड़ि छन्द ।
चकर्मकि त्रेसठ प्रकृति नाशि। जीते अष्टादशदोषराशि
जे परम सगुण हैं अनन्त धीर । कहवत के छयालिस गुण
गंभीर ॥२॥
शुभसमवसरण शोभा अपार । शत इन्द्र नमत कर सीस
धार देिवादिदेव अरहन्तं देव । वन्दो मनवचतनकरि सुसेव ॥३॥
जिंन की धुनि है ओंकाररूप । निर अक्षरमय महिमा
अनूपं । दश अष्ट महामाषा समेत । लघुभाषा सात शतक
सुचेतः॥४॥
सो. स्यावादमय सप्तभंग। गणधर गूंथे बारहसुअंग
रवि शशिन हरै लो तम हराय।लो शान नमोबहु प्रीति
त्याय ॥५॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ॐ ह्री देवशास्त्रगुरुसमूह ! अत्र अपतर अवतर। संचौपट । ॐ ही देवशालगुरुसमूह ! मन तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः। ही देवशालगुरुसमूह! अत्र ममसन्निहिती भवभवबपट गीता छन्द i सुरपति उरण नरनाथ तिनार, वन्दनीक सुपंदप्रमा। अति शोभनीक सुवरण उज्जल, देख छवि मोहितसभा ॥ वर नीरक्षीर समुद्रपटभरि,अन तसु बहु घिधि नवू । अरहंत श्रुतसिद्धांतगुरुनिरग्रन्थ नित पूजा रचू ॥१॥ दोहा-मलिन वस्तु हर लेत सब, जलस्वभाव मलछीन । जासों पूजे परमपद, देषशास्त्र गुरु तीन ॥१॥ ही देवशास्त्रगुरुभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ जे त्रिजग उदरमझार प्रानी, तपत अति दुद्धर खरे। तिन अहितहरन सुवचन जिनके, परम शीतलता भरे । तभ्रमरलोमित घाण पावन, सरसचन्दन घसि सचूं। अरहंत श्रुतसिद्धांतगुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं ॥२॥ दोहा-चन्दन शीतलता करे, तपतवस्तु परवीन । जासों पूजो परमपद, देव शाल गुरु तीन ||२|| ॐहीं देवशास्त्रगुरुभ्यो संसारतापविनाशनाय चन्दन निर्वपामोति स्वाहा ॥२॥ यह भवसमुद्र अपार तारण, के निमित्त सुविधि ठई। अति दृढ़ परमपावन यथारथ, भक्ति घर नौका सही। उजल अखंडित सालि तंदुल-पुज धरि भयगुण जचूं। "अरहंतश्रुतिसिद्धांतगुरु निरग्रंथ नितपूजा रचू॥३॥ ::

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
दोहा-तंदुल सालि सुगन्धि अति, परम अखंडित चीन |
जालों पूजों परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥३॥
ॐ हीं देवशास्त्रगुरुभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्व-
पामीति स्वाहा ॥३॥
जे.विनयवंत सुमव्यउरअंबुजप्रकाशन भान हैं।
जे एकमुखचारित्र भाषत, विजगमाहिं प्रधान हैं ।
लहि कुदकमलादिक पहुप, भव भव कुवेदनसी यचूं ।
भरहंतश्रुतसिद्धांतगुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं॥४॥
दोघां-विविधभांति परिमल सुमन, भ्रभर जास आधीन । .
तासौ पूजों परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥४॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः कामवाणविध्वंसनाय:पुष्पं निर्व
पामीति स्वाहा ॥४॥
मति सवल मदकंदर्प जाको, क्षुधा उरग अमान है।
दुस्सह भयानक तासु नाशनको सु गरुड़समान है।
उत्तम छहों रसयुक्त नित नैवेध करि घृतमें पचूं ।
अरहंतश्रुतसिद्धांतगुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचू॥५॥
पोहा-नानाविधि संयुक्तरल, व्यंजन सरस नवीन ।
जासों पूजों परमपद, देवशाल गुरु तीन ॥५॥
ॐ ह्रीं देवशाखगुरुभ्यः क्षुधारोगविनाशाय चळं निर्व-
पामीति स्वाहा ॥५॥
जे त्रिगज उद्यम नाश कीने मोहतिमिर.महावली।
तिहिकर्मघांती ज्ञानदीपप्रकाशजोति प्रभावली॥
इह भाँति दीप प्रजाल कंचनके सुभाजनमें खचूं।
अरहंतश्रुतसिद्धांतगुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं॥६॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। . भविक-सरोज-विकासि, निद्यतमहर रविसे हो। जतिं भावक भाचार कथन को. तुम्हीं पड़े हो फूलसुवास अनेकों (हो), पूजों मदन प्रहार । सीमं ॥४॥ ॐही विद्यमान विंशतितीर्थंकरभ्यः कामवाणविध्वंसनाय पुरुष्पं निर्व०॥ कामनाग विषधाम-नाशको गरुड़ कहे हो। छुभा महादयज्वाल, तासुको मेघ लहे हो। नेवज यहु घृत मिष्टसों (हो), पूजों भूत विडार । सीम०॥५॥ *हीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यः सुधारोगविनाशनाय नेवेद्य'निर्व०॥ उद्यम हान न देत, सर्व जगमाहिं भरयो है। मोह महातम घोर, नाश परकाश फरयो है। पूजों दीपप्रकाशसों (ह) ज्ञानज्योतिकरतार । सीम० ॥६॥ ॐ ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यो मोहान्धकारविनाश- नायदोपं निर्व:॥ फर्म आठ सय काठ, भार विस्तार निहारा। ध्यान अगनिकर प्रगट, सरव कीनों निरवारा। धूप अनूपम खेवते (हा), दुख जलै निरधार । सीम०॥७॥ ॐ.हीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्योऽष्टकर्मविध्वंसनाय घूपं निर्व

પુર
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
मिथ्यावादी दुष्ट, लोभऽहंकार भरे हैं।
सवको छिनमें जीत, जैनके मेर. खरे हैं।
फल अति उत्तमलों जजों (हो), चांडितफलदातार सीमा
ॐ ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यो मेक्षिफलमाप्तये
फलंनिर्व०
जल फल आठों दर्व, भरघ कर प्रीत धरी है।
गणधर इंद्रनिहत, शुति पूरी न करी है।
'धानत' सेषक नानके हो), जगत लेहु निकार। सीमा
ॐही विद्यमानविंशतितीर्थकरम्यान पदप्राप्तये मध्य
निर्व
अथ जयमाला भारती।
सोरठा ।
ज्ञानसुधाकर चंद, भविकखेतहित मेघ हो।
भ्रमतमभान अमंद, तीर्थंकर चीसों नमों॥१॥
चौपाई।
:सीमंधर सीमंधर स्वामी । जुगमंधर जुगमंधर नामी ।
बाहुबाहु जिन जगजन तारे। करम सुवाहु वाहुबल दारे ॥
'जोत सुजाव केवलज्ञानं । स्वयंप्रभू प्रभु स्वयं प्रधान।
ऋपमानन ऋषि भानन दोषं । अनंत वीरज चीरजकोर्ष ॥२॥

जैन-नन्ध-संग्रह। गुरु आचारज उवझाय साध । तन नगन रतनत्रयनिधि अगाध । संसारदेहवैराग धार । निरवांछि तपै शिवपद निहार ॥ ६॥ गुण छत्तिस पश्चिस आठ वीस । भव तारन तरन जिहाजईस । गुरु की महिमा वरनी न जाय । गुरुनाम जपों मनवचनकाय ॥७॥ सोरठा-कीजे शक्ति प्रमान, शक्ति विना सरधा धरै धानत' सरधावान , अजर अमरपद भौगवैः॥ ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो महायं निर्वपामीति स्वाहा। वीस तीर्थकर पूजा भाषा । दीप अढ़ाई मेरु पन, अव तीर्थ करवीस तिन सवकी पूजा कर्क, मनवचतन धरि शीट ।। १ ॐ ह्रीं विद्यमान विंशतितीर्थ करा! अत्र अवतरत अवतरत। संवौषट् । ॐही विद्यमान विंशतितीर्थंकरा! अत्र तिष्ठत तिष्ठत 1381 हों विद्यमान विंशतितीर्थकरा! अन मम सनिहिता भवत भवत । वपट् । इन्द्रफणींद्रनरेंद्र पंध, पद निर्मलधारी। गोमनीक संसार, सार गुण हैं अधिकारी।

१५० जैन-प्रन्थ-संग्रह। क्षीरोदधिसम नीरसों (हो), पूजों तुषा निवार। सीमंधर जिन श्रादि दे, धीस विदेहमँझार ।। श्रीजिनराज हो भव, तारणतरणजिहाज ॥१॥ ॐ ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यो जन्ममत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । यदि वीस पुज करना हो, तो इस प्रकारमंत्र पढ़ें ॐ ह्रीं सीमन्धर-युग्मंधर-बाहु-सुबाहु-संजात-स्वयंप्रमः ऋषभानन-अनन्तवीर्य-सूरसंभ-विशालकीर्ति-वज्रधर-चन्द्रान. नं-चन्द्रवाहु-भुजगम-ईश्वर-नेमिप्रभ-धीर-महाभद्र-देवयशाऽजि- तवीव्यति विशितिविद्यमानतीर्थकरेभ्यो जन्ममृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा !!॥ तीन लोक के जीव, पाप आताप सताये। तिनको साता दाता, शीतल वचन सुहाये ।। वावन चंदनसों जजूं (हो) भुमनतपन निरवार । सीम० ॥२॥ ॐ हीं विद्यमान विंशतितीर्थंकरेभ्यो भवातापविनाशनाय- चन्दन निर्वपामीति स्वाहा ।।२॥ यह संसार. अपार; महासागर ज़िनस्वामी तात तारे बड़ी भक्ति-नौका जग नामी ॥ तंदुल अमल सुगंधों (है। ), पूजों तुम गुणसार । सीम०॥३॥ ॐ हीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व०॥

जैन-प्रन्थ-संग्रह। सौरीप्रभ सौरीगुणमालं । मुगुण विशाल विशाल दयाल । वज्रधार भवगिरिवनर हैं। चन्द्रानन चन्द्रानन वर है ॥३॥ भद्रबाहु भद्रनिके करता । श्रीभुजंग भुजंगम भरता। ईश्वर सबके ईश्वर छाजै । नेमिप्रभु जस नेमि विराजै ॥४॥ वीरसेन वीर जग जानै । महाभद्र महाभद्र बखाने । नमों जसोधर जसघरकारी। नमों अजितवीरज वलधारी॥५॥ धनुष पांचसै काय विराजै। आयु कोड़िपूरब सब छाजै। समवसरण शोभित जिनराजाभवजलतारनतरन जिहाजा॥६॥ सम्यक रत्नत्रयनिधि दानी। लोकालोकप्रकाशक ज्ञानी। शत इन्द्रनिकरि चंदित सोहै। सुरनर पशु सबके मन मोहै ॥७॥ दोहा। तुमको पूजै बंदना, करें धन्य नर सोय । 'धानत' सरधा मन धरै,सो भी धरमी होय ॥८॥ ॐ हीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्योऽयं निर्वपामीति स्वाहा। अथ विद्यमानवीसतीर्थंकरोंका अर्घ • उदकचन्दनतन्दुलपुष्पकैश्चरसुदीपसुधूपफलार्धकैः । धवलमङ्गलगानरबांफूले जिनगृहे जिनराजमह यज्ञे ॥१॥ ॐ ह्रीं सीमंधरयुग्मंघरबासुबाहुसंजातस्वयंप्रभऋष- माननअनन्तवीर्यसूरप्रमविशालकीर्तिवजूधरचन्द्राननचन्द्रबाहु- भुजंगमईश्वरनेमिप्रमवीरसेनमहाभद्रदेवयशमजित वीर्येति वि- शतिविद्यमानतीर्थकरेभ्योऽयं निर्वपामोतिस्वाहां ॥१॥ अकृत्रिम चैत्यालयोंका अर्घ । कृत्याऽकृत्रिमंचारुचत्यनिलयानित्यं त्रिलोकीगतान वन्दे भावनव्यन्तरान्धु तिवरान्कल्पामरान्सर्वगान ।

१५४ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। 4 सद्गन्धाक्षतपुष्पदामचरुकैदीपैश्च धूपैः फलै- नौराद्यश्च यजे प्रणभ्य शिरसा दुष्कर्मणां शान्तयोश ॐहीं कृत्रिमाकृत्रिमचैत्यालयसम्बन्धिर्धाजनविम्वेभ्योऽयनिर्व० वर्षेषु वर्षान्तरपर्वतेषु नन्दीश्वर यानि च मन्दरेषु। . . : यावन्ति चैत्यायतनानि लोके सर्वाणिवन्दे जिनपुंगवानाम्॥२॥ अवनितलगतानां कृत्रिमाऽकृत्रिमाणां वनभवनगतानां दिन्यवैमानिकानाम् । इह मनुजकृताना देवराजार्चितानां जिनवरनिलयानां भावतोऽहं स्मरामि ॥२॥ जम्बूधातकिपुष्करार्द्ध वसुधाक्षेत्रत्रये ये भवा- श्चन्द्रम्भोजशिखण्डिकण्ठकनकप्रावृधनाभाजिनः ।। सम्यग्ज्ञानचरित्रलक्षणधरा दग्धाष्टकर्मेन्धना भूतानागतवर्तमानलमये तेभ्यो जिनेभ्यो नमः ॥३॥ श्रीमन्मेरौ कुलाद्रौ रजतगिरिवरे शाल्मली जम्बुवृक्ष वक्षारे चैत्यवृक्षे रतिकररुचिके कुण्डले मानुषा)। इष्वाकाऽजनाद्रौ दधिमुखशिखरे व्यन्तरे स्वर्गलोके ज्योतिलोकेऽभिवन्दे भुवनमाहितले यानि चैत्यालयानि॥ द्वौ कुन्देन्दुतुषारहारधवलौ द्वाविन्द्रनीलप्रभो । द्वौ बन्धूकसमप्रभौ जिनवृषौ द्वौ च मिङगुप्रभो । 'शेषाः षोडशजन्ममृत्युरहिताः सन्तप्तहेमप्रभा- स्ते संज्ञानदिवाकरासुरनुता:सिद्धिं प्रयच्छन्तु नः ॥५॥ ही त्रिलोकसम्बन्धिअकृत्रिमचैत्यालयेभ्यो अर्घ मिर्वपामि०॥ इच्छामिभंते-चेश्यमत्ति कालोसग्गो को तस्सालो- चेयी, अहलोय तिरियलोय 'उडलोयम्भि किट्टिमाकिहिमाणि जाणि जिणचेयाणि ताणि सव्वाणि । तीसुवि लोएसुभवण- वासियवाणवितरजोयसियकप्पवासियत्ति चविहा देवासप. .

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। १५५ रिवारा दिव्येण गन्धेण दिवेण पुप्फेण दिव्वेण धुव्वेण दिव्वेण चुरणेण दिव्येण वासेण दिव्वेण हाणेण । णिशकालं अचंति पुजति वंदति णमल्संति । अहमवि इह संतो तत्थ संताइ णियकाल अच्चमि पुजेमि वंदामि मस्सामि दुक्ख- क्खओ कम्मक्खो वोहिलाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिण- गुणसंपत्ति होउ मज्झं। ( इत्याशीर्वादः । परिपुष्पांजलि क्षिपेत.) अथ पौर्वाहिकमाध्याटिनकआपराहिकदेववंदनायांपूर्वा- चार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थ भावपूजावन्दनास्तवसमेतश्रीप- ञ्चमहागुरुभक्तिकायोत्सर्ग करीभ्यहम् । (कायोत्सर्ग कर णमोकार मंत्र का ६ बार जाप करे ) RE सिद्धपूजा। ऊद्धोधो रयुत सयिन्दुसपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितं वर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्सन्धितरवान्वितम् । अन्तःपत्रतटेवनाहतयुतं ह्रींकारसंवेष्टितं देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीमकण्ठीरवः । ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र अव- तर अवतर । संवौषट् । ॐ हीं सिद्धचक्राधिपते ! सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र तिष्ठ तिष्ठ। ॐ ही सिद्धचक्राधिपते ! सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र मम सन्निहितो भव भव । वपट् । निरस्तकर्मसम्बन्धं सूक्ष्म नित्यं निरामयम् । वन्देऽहं परमात्मानममूर्तमनुण्द्रवम् ॥१॥ (सिद्धयन्त्र का स्थापना) ५६ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। सिद्धौ निवासमनुगं परमात्मगम्य , हीनादिभावरहितं भववीतकायम् । रेवापगावरसरो-यमुनोद्भवानां नीरैर्यजे कलशगैरसिद्धचक्रम् ॥१॥. ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जन्ममृत्युवि- नाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ अानन्दकन्दजनक घनकर्ममुक्तं सम्यक्त्वशर्मगरिमं जननातिवीतम् सौरभ्यवासितभुवं हरिचन्दनानां गन्धैर्यजे परिमलैर्वरसिद्धचक्रम् ॥२॥ ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने संसारताप- विनाशनाय चंदनं निर्व० ॥२॥ सर्वावगाहनगुणं सुसमाधिनिष्ठ सिद्ध स्वरूपनिपुणं कमलं विशालम् । सौगन्ध्यशालिवनशालिवराक्षतानां पुर्यजे शशिनिभैर्वरसिद्धचक्रम ॥३॥ ॐ ही सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्टिने अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व० ॥३॥ नित्यं स्वदेहपरिमाणमनादिसंज्ञ द्रव्यानपेक्षममृतं मरणाद्यतीतम् । मन्दारकुन्दकमलादिवनस्पतीनां पुष्पैर्यजे शुभतमैर्वरसिद्धचक्रम् ॥४॥ केही सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने कामबाण- विध्वंसनाय पुष्पं निर्व० ॥en ऊर्द्धस्वभावगमनं सुमनाव्यपेतं ब्रह्मादिबीजसहितं गगनावमालम् ।

जैन-अन्य-संग्रह। क्षीरानसाज्यवरकै रसपूर्णग- नित्यं यजे चरुवरवरसिद्धचक्रम् ॥५॥ ॐही सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने क्षद्रोगविध्वं. सनाय नैवेद्य निर्व० ॥५॥ भातशोकमयरोगमदप्रशान्त निर्द्वन्द्वभावधरणं महिमानिवेशम् । करिवर्तिबहुभिः कनकावदात- दीपैर्यजे रुचिवरवरसिद्धचक्रम् ॥६॥ ॐही सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोहान्धकार- विनाशनाय दीपं निर्व० ॥६॥ पश्यन्समस्तभुवनं युगपनितान्त काल्यवस्तुविपये निविडप्रदीपम् । सद्रव्यगन्धधनसारविमिश्रितानां । धूपर्यों परिमलरसिद्धचक्रम् ॥७॥ ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्मदह- नाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ||७|| सिद्धासुरादिपतियक्षनरेन्द्रचक्र- ध्ययं शिवं सकलमन्यजनैः सुरन्धम् । नारिङ्गपूगकदलीफलनारिकेली सोऽह यजे वरफलेवरसिद्धचक्रम् ॥८॥ ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफल- प्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा ॥८॥ गन्धाय सुपयो मधुनवगणैः सॉवर चन्दन पुष्पोघं विमलं सदक्षतचयं रम्यं चर दीपकम् । धूप गन्धयुतं ददामि विविध श्रेष्ठ फलं लब्धये सिद्धानां युगपत्क्रमाय विमलं सेनांतर वाञ्छितम् ।।

१५८ जैन-अन्ध-संग्रह। ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घपदप्रा- ये अयं निर्वपामीति स्वाहा । ज्ञानोपयोगविमलं विशदात्मरूपं सूक्ष्मस्वभावपरमं यदनन्तवीर्यम् । कौंधकक्षदहनं सुखशस्यबीज वन्दे सदा निरुपम वरसिद्धचक्रम् ॥१०॥ ॐ हीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने महायं निर्व० ॥१०॥ त्रैलोक्येश्वरवन्दनीयचरणाः प्रोपुः श्रियं-शाश्वती यानाराध्य निरुद्धचण्डमनसः सन्तोऽपितीर्थङ्करः। संत्सम्यक्त्वविबोधवीर्य्यविशदाऽव्याबाधताय गुण-... युकास्तानिह तोष्टवीमि सततं सिद्धान् विशुद्धोदयान्॥११॥ (पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ) . न अथ जयमाला। विराग सनातन शान्त निरंश । निरामय निर्भय निर्मल हस । सुधाम विवोधनिधान विमोह। प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह॥१॥ विदूरितसंसृतभाव निरङ्ग । समामृतपूरित देव विसङ्ग। अवन्ध कषायविहीन विमाह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह॥२॥ निवारितदुष्कृतकर्मविपाश । सदामलकेवलकेलिनिवास भवोदधिपारण शान्त विमोहाप्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूहा॥ अनन्तसुखामृतसागर धीर । कलङ्करजोमलमूरिसमीर ॥ विखण्डितकाम विराम विमोह। प्रसीद विशुद्धसुसिद्धसमूहाठा विकारविवर्जित तर्जितशोक । विवोधसुधनेत्रविलोकितलोक ॥ विहारविराव विरङ्गं विमोह । प्रसीद विशुद्धमुसिद्धसमूहा जैन-ग्रन्थ-संग्रह। रजोमलखेदविमुक्त विगात्र । निरन्तर नित्य सुखामृतपात्र ।। सुदर्शनराजित नाथ विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूहा। नरामरवन्दित निर्मलमाव । अनन्तमुनीश्वरपूज्य विहाव । सदादेय विश्वमहेश-विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥७॥ विदंभ वितृष्ण विदोष विनिद्र । पराप्तर शङ्कर सार वितन्द्र ।। विकोप विरूप विशङ्क विमोह । प्रशीद विशुद्ध सुसिद्धसमूहाटा जरामरणोज्झित चीतविहार । विचिन्तित निर्मल निरहङ्कार ।। अचिन्त्यचरित्र विदर्प विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूहमा विवर्ण विगन्ध विमान विलोभ । विमाय विकाय विशब्दविशोम अनाकुल केवल सर्व पिमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥१० असमसमयसारं चारुचैतन्यचिह्न परपरणतिमुक्तं पद्मनन्दी- न्द्रवन्धम्॥ निखिलगुणानिकतं सिद्धचक्र विशुद्ध स्मरति नमति यो वा स्तौति सोऽभ्योति मुक्तिम् ॥११॥ ॐही सिद्धपरमेष्टिभ्यो महायं निवपामीति स्वाहा ।। अडिल्ल छन्द। अविनासो अविकार परमरसधाम हो। समाधान सर्वज्ञ सहज अभिराम हो। शुद्धबोध अविरुद्ध अनादि अनंत हो। जगतशिरोमणि सिद्ध सदा जयवंत हो ॥१॥ ध्यानमगनिकर-कर्म कलंक सबै दहे। नित्य निरंजनदेव सरूपी हो रहे ।। शायकके आकार ममत्वनिवारिके । सो परमातम सिद्ध नमूं सिर नायके ||२|| . . दोहा। अविचलज्ञानप्रकाशते, गुण अनंतकीखान ।

१६० जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ध्यान धरें सो पाइये परम सिद्ध भगवान ॥३॥ इत्याशीर्वादः (पुप्पांजलिं क्षिपेत् ) सिध्धपूजाका भवाष्टक। निजमनीमणिभाजनमारया समरसैकसुधारसधारया। सकलोधकलारमणीयकं सहजसिंद्धमहं परिपूजये ||१|| जलम् सहजकर्मकल कविनाशनैरमलभावसुभाषितचन्दनः । अनुपमानगुणावलिनायकं सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥२॥ चन्दनम् । सहजभावसुनिर्मलतन्दुलै सकलदोषविशालविशोधनः । भनुपरोधसुबोधनिधानसहजसिद्धमहं परिपूजय।।शाअक्षतान् समयसारसुपुष्पसुमालया सहजकर्मकरण विशोधया। परमयोगवलेन घशीकृतं सहजसिद्धमहं परिपूजये । पुष्पम् । अकृतबोधसुदिन्यनिवेद्यकैर्विहितजातजरामरणान्तकैः । निरवधिप्रचुरात्मगुणालयं सहजसिद्धमहं परिपूजये ।।५।।.. नैवेद्यम्। सहजरत्नरुचिप्रतिदीपकै रुचिविभूतितमः प्रविनाशनः । निरवधिस्वविकाशविकानैः सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥६॥ दीपम्। निजगुणाक्षयरूपसुधूपनैः स्वगुणघातिमलविनाशनः । विशदबोधसुदीर्घसुखात्मकं सहजसिद्धमहं परिपूजयाधूपम्। परममावफलावलिसम्पदा सहजभावकुभावविशो- धया । निजगुणाऽऽस्फुरणात्मानिरञ्जन सहजसिद्धमहंपरि- पूजये ॥८॥ फलम्। - जैन-ग्रन्थ-संग्रह। नेत्रोन्मीलिविकाशभावनिवहैरत्यन्तवोधायचे वार्गन्धाक्षतपुष्पदामचरुकैः सद्दीपधूपैः फलैः । यश्चिन्तामणिशुद्धभावपरमज्ञानात्मकैरर्चयेत् सिद्ध' स्वादुमगाधबोधमचलं संचर्चयामो वयम् ॥६ भय॑म् । सोलहकारणका अर्च। उदकचन्दनतन्दुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलार्धकः । धवलमङ्गलगानरवाकुले जिनगृहे जिनहेतुमहं यजे ॥१॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादिपोड़शकारणेभ्यो अध्यं निर्वपा- मीति स्वाहा दशलक्षणधर्मका अर्च। उदकचन्दनतन्दुलपुष्पकैश्चरसुदीपसुधूपफलार्धकैः । धवलमङ्गलगानरवाकुले जिनगृहे जिनधर्ममहं यजे ॥२॥ ॐ ह्रीं महन्मुखकमलसमुद्भूतोत्तमक्षमामाईवार्जब- सत्यशौचसंयमतपत्यागाकिञ्चन्यब्रह्मचर्य्यदशलाक्षणिकधर्म- भ्यो अध्यं निर्वपामीति स्वाहा रत्ननयका अर्घ। उदकचन्दनतन्दुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलार्धकैः । धवलमङ्गलगामरवाकुले जिनगृहे जिनरत्नमहं यजे ॥३॥ ॐ ह्रीं अष्टाङ्गसम्यग्दर्शनाय अपविधसम्यग्ज्ञानाय त्रयोदशप्रकारसम्यक्चारित्राय अयं निर्वपामीति स्वाहा ।।शा बीस तीर्थकर पूजा की.अचरी। भव अटवी भ्रमत बहु जनम धरत अति मरण करत लह जरा की विपत अति दुःख पायो।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ताते जल ल्यायो तुम ढिग आयो शांत सुधारस अब पायो । श्री बीस जिनेश्वर दया निधेश्वर जगत महेश्वर मेरी विपत हरो। भव संकट खंडो आनंद मंडो मोहि निजातम सुद्ध करो ॥२॥पर चाह अनल मोह दहत सतत अनि दुःख सहत भव बिपत भरत तुम ढिग आयो । तातें ले बाबन तुम अति पावन दाह मिटावन सुक्ख करो। फिर जनम धरत फिर मरण करत भव भ्रमर भ्रमत बहु-नाटक नट अति थकित भयो । तातें शुभ अक्षित तुम पद अर्चन भव भय तर्जित सुखद भयो ॥श्री०॥३॥ मोह काम ने सतायो चारों धामा उर लायो सुध बुध बिसरायो बहु विपत गमायो नाना विधकी। तातें धर फूलं तुम निराल मोह विशलं कर अबकी ॥श्री१४ मोह छुधा ने सतायो तब आशना बढ़ायो बहु याचना करायो तिहुँ पेट न भरायो अति. दुःख पायो। तातें चरू धारो तुम निरहारी मोह निराकुल पद वगसो ॥श्री०॥५॥मोहतम की चपेट तातें भयो हो अचेत कियो जड़ ही से हेत भूलो अप्पा पर भेद तुमशरण लही।दीपक उजयारों तुम ढिग घारो स्वपर प्रकासों नाथ सही ॥श्री०॥ ६ कर्म ईधन है भारी मोंको कियो है दुखारी ताकी बिपत गहाई नेक सुध हू न धारी तुम चरण नमूं । ताते बर धूपं तुम शिव रूपं कर निज भूपं नाथ हमें ॥श्री०॥७॥ अंतराय दुःख दाई मेरी शक्ति छिपाई मोसो दीनता कराई मोकों अति दुःख दाई भयो आज लों प्रभू । तातें फल- ल्यायो तुम ढिग आयो मोक्ष महा फल देव प्रभू ॥श्री०॥८॥ माठों कर्मोने सतामो:मोकों दुःख उपजायो मोसी नाचहू न- चायो भाग'तुम पिसावायो अब बच जाऊँबसु द्रव्य समारी तुम ढिग धारी हे भव तारी शिव पाऊं। श्री बीस जिनेश्वर दयां निधेस्वर. जगत. महेश्वर मेरी बिपत हरो। भव संकट जैन-ग्रन्थ-संग्रह। खंडो आनंद मंडो मोह निजतम शुद्ध करो। सिद्ध पूजा की अचरी। हमें तृपा दुःख देत, सो तुमने जीते प्रभू । जल सों पूजों तोय, मेरो रोग मिटाईयो॥१॥ हम भव तप वन माह, तुम न्यारे संसार सें। कीजे शीतल छांह, चन्दन से पूजा करों ॥२॥ हम औगुण समुदाय, तुम अक्षय सब गुण भरे। पूजों अक्षत ल्याय, दोप नाश गुण कीजिये ॥३॥ काम अग्नि तन माह, निश्चय शील स्वभाव तुम । फूल चढाऊ मैं तोय, सेवक की वाधा हरी॥४॥ हमें छुधा दुःख देत, शान खड़ग से तुम हने । मेरी बाधा चूर, नेवज से पूजा करों ॥५॥ मोह तिमर हम पास, तुम पर चेतन जोत है। पूजों दीप रसाल, मेरो तिमर नशाईयो॥६॥ सकल कर्म बन जाल, मुक्ति माह सब सुख करें। खेऊ धूप रसाल, ममत काल घन जारियो॥७॥ अंतराय दुःख टार, तुम अनंत थिरता लहें। पूजों फल धर सार, विघन टारि शिव सुख करें॥८॥ हम पर आठों दोप, भजों अर्घ ले सिद्ध जी। दीजे वसु गुण मोय, कर जोड़े धानत खड़े ॥६॥ स्त्र जेन-ग्रन्थ-संग्रह। समुच्चयचौवीसीपूजा। (कविवर वृन्दावनजीकृत) छन्द कवित्त । वृषभ अजित संभव अभिनंदन, सुमतिं पद्म सुपार्स जिनराय । चंद पुहुप शीतल श्रेयांस जिन, वासुपूज पूजितसुरराय ॥ विमल अनंत धरमजसउज्ल, शांति कुंथु अर मल्लि मनाय । मुनिसुव्रत नमिनेम पार्सप्रभु, वर्द्धमानपद पुष्प चढ़ाय ॥ ॐ ह्रीं श्रीबृषभादिवीरान्तचतुर्विशतिजिनसमूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरान्त- चतुर्विंशतिजिनसमूह ! अत्र तिष्ठि तष्ठि । 3. | ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरान्तचतुर्विंशतिजिनसमूह ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट्। द्यानतरायकृत नंदीश्वरद्धीपाष्टककी तथा गर्भारागादि अनेक चालोंमें) मुनिमनसम उज्जल नीर, प्रासुक गंध भरा। भरि कनककटोरी नीर, दीनी धार धरा॥ चौबीसों श्रीजिनचंद, आनंदकंद सही । पदजजत हरत भवफंद, पावत मोक्षमही॥ ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरान्तेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशाय जलं निर्वपामिक गोशीर कपूर मिलाय, केशर रंगभरी। जिनचरनन देत.चढ़ाय, भवाताप हरी। चौंवीसों ॥२॥ ॐही श्रीवृषभादिवीरान्तेभ्योभवातापविनाशनायचंदनं निर्वपामि॥ .

जैन-प्रन्थ-संग्रह। १६५ तंदुल सित सोमसमान. सुंदर अनियारे । मुफताफलकी उनमान, पुंज धरों प्यारे ॥ चौवीसों ॥३॥ ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरान्तेभ्योऽक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नियंपामि॥ घरकंज फर्दय कुरड, सुमन सुगंध भरे । जिन अन धरौं गुनमंड, कामकलंक हरै। चौवीसों ॥४॥ ॐ ह्रीं श्रीवृपमादिवीरान्तेभ्यः कामवाणयिध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामी० ॥ मनमोदनमोदक आदि, सुन्दर सद्य बने । रसपूरित प्रासुक स्वाद, जजत छुधाधि हने ॥ चौवीसो० ॥५॥ ॐ ह्रीं श्रीवृपभादिवीरान्तभ्य क्षधारोगविनाशनाय दीपं निर्वपामि॥ तमखंडन दीप जगाय,धारों तुम आगे। सय तिमिरमोह छय जाय, शानकला जागे॥ चौवीसों॥६॥ ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरान्तेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय नैवेद्य निर्वपामि॥ दशगंध हुताशनमाहि, हे प्रभु खेवत हों। मिस धूम करम जरि जाहिं, तुम पद सेवत हों। चौबीसों ॥७॥ • हों श्रीवृपभादिवीरान्तेभ्योऽएकर्मदहनाय धूपं निर्वपामि०॥ शुचि एक सुरस फल सार, सव ऋतुके ल्यायो । देखत दृगमनको प्यार, पूजत सुख पायो । चीयोसो० ॥८॥ ॐ ह्रीं वृषभादिवीरान्तेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फल निर्व० जल फल आठों शुचि सार, ताको अर्घ करों। तुमको अरचों भवतार, भव तरि मोक्ष परों। चौवीसों श्रीजिनचन्द, आनंदकंद सही। -

१६६
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
पदजजत हरत भवफंद, पाषत मोक्षमही ॥६॥
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिचतुर्विंशतितीर्थकरेभ्यो अनय॑पद-
प्राप्तये अयं निर्वामि०॥
जयमाला।
दोहा।
श्रीमत तीरथनांथपद, माथ नाय हितहत ।
गाऊं गुणमाला अबै, अजर अमरपददेत ॥१॥
छन्द धत्तानन्द।
जय भवतनभंजन जनमनकंजन, रंजन दिनमनि स्वच्छकरा।
शिवमंगपरकाशक अरिंगननाशक, चौवीसों जिनराज वरा ॥२॥
छन्द पद्धरी।
जय रिषभदेव रिषिगन नमंत । जय अजित जीत वसुअरि तुरंत॥
जय संभव भवभय करत चूर । जय अभिनंदन आनन्दपूर ॥३॥
जय सुमतिसुमतिदायक दयाल । जयपन पद्मदुति तनरसाल ॥
जय जय सुपास भवपासनाथ |जय चंद चंददुतितनप्रकाश ॥४॥
जय पुष्पदंत दुतिदंत सेत । जय शीतल शीतलगुननिकेत ॥
जयश्रेयनाथ नुतसहसमुज्ज ।जयवासवपूजित वासुपुज्ज ॥५॥
जय विमल विमलपददेनहार । जय जय अनंत गुनगन अपार ॥
जय धर्म धर्म शिवशर्मदेत । जय शांति शांतिपुष्टीकरत ॥६॥
जयकुंथु कुंथमादिकरखेय।जय अर जिनं वसुअरि छय करेय ।।
जय मलि मलि हतमोहमल्ल । जय मुनिसुव्रत तशलदल्ल ॥७॥
जय नमि नित वासवनुत सप्रेम । जय नेमिनाथ वृषचक्रनेम ।।
जय पारसनाथ अनाथनाथ । जय वर्द्धमान शिवनगरसाथ ॥८॥

जैन-प्रन्थ-संग्रह। १६७ - घत्तानंद छन्द। चौबीस जिनंदा आनंदकंदा, पापनिकंदा सुखकारी। तिनपदजुगचंदा उदय अमंदा, वासववंदा हितकारी ॥६॥ ॐ हीं श्रीवृषमादिचतुर्विशतिजिनेभ्यो महा निर्वामीति. सोरठा। भुक्तिमुक्तिदातार, चौबीसौं जिनराजवर। तिनपद मनवचधार, जो पूजै सो शिव लहै ॥ १० ॥ इत्याशीर्वादः । (पुष्पान्जलिं क्षिपेत ) HOG सप्तऋषिपूजा। चप्पय छंद। प्रथम नाम श्रीमन्व दुतिय स्वर मन्व ऋषीश्वर । तीसर मुनि श्रीविनय सर्वसुन्दर चौथीवर ।। पंचम श्रीजयवान विनयलालस षष्टम भनि । सप्तम जय मित्राख्य सर्वचारित्रधामगनि॥ ये सातौं चारणऋद्धिधर, कर्क तासु पद थापना । मैं पूजू मनवचकायकरि, जो सुख चाहूं आपना ॥ ॐ हीं चारणऋद्धिधरश्रीसप्तऋषीश्वरा! अत्रावतरत अवतरत संवौपट् । अत्र तिष्ठत तिष्ठत : 31 अत्र मम सनि- हितो भवत भवत । वषट् । गीता छन्दा शुभतीर्थउद्भव जल अनूपम, मिष्ट शीतल लायके । भव तृपा कंद निकंद कारण, शुद्ध घट भरवायके ।। मन्वादि चारण ऋद्धिधारक, मुनिनकी पूजा करू ।

१६८ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। . ता करें पातिक हर सारे, सकल आनंद विस्तर । ॐ ह्रीं श्रीमन्वस्वरमन्वनिचयसर्वसुन्दरजयवानविनय- लालसजयमित्रर्षिभ्यो जलं ॥१॥ श्रीखएड कदलीनन्द केशर, मन्द मन्द घिसायके। तसुगन्ध प्रसरति दिगदिगन्तर, भर कटोरी लायके म०॥ ॐ ह्रीं श्रीमन्वस्वरमन्वनिचयसर्वसुन्दरजयवानविनय. लालसजयमित्रर्षिभ्यो चन्दनं ॥२॥ अति धवलं अक्षत खण्डवर्जित, मिष्टराजनमोगके। कलधौत थारा भरत सुन्दर, चुनित शुभ उपयोगके म०॥ ॐ ह्रीं मन्वादिसप्तर्षिभ्या अक्षतान् निर्वपामि० ॥३॥ बहु वर्ण सुवरण सुमन आछे, अमल कमल गुलाव के। केतकी चम्पा चारु मरुआ, चुने निजकर चावके म०॥ ॐ ह्रीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिम्यो युष्पं निर्वपामि० ॥४॥ पकवान नाना भांति चातुर, रचित शुद्ध नये नये । सशिष्ट लाडू आदि भर बहु, पुरटके थारा लये ॥ म० ॥ ॐ ह्रीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्यो नैवेद्य निर्वपामि ॥५॥ कलधौत दीपक जड़ित नाना, भरित गोघृतसारसो। अति ज्वलित जगमग जोति जाकी,तिमिर नाशनहारसोम०॥ . ॐ ह्रीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्यो दीपं निर्वपामि०॥६॥ दिक्चक्र गन्धित होत जाकर, धूप दशभंगी कही। सो लायं मन वच काय शुद्ध, लगायकर खेऊ सही म०॥ ॐ ह्रीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्यो धूपं निर्वपामि ॥ ७ ॥ वर दाख वारक अमित प्यारे, मिष्ट चुट चुनायके। द्रावड़ी दाडिम चारू पुंगी, थाल भर भर लाय केम०॥ ॐ ह्रीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्यो फलं निर्वपामि ॥ ८ ॥ 'जलगन्ध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धीपसु लावना ।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। १६६ फल ललित आठों द्रव्य मिश्रित, अर्घ कीजे पावना.॥ म०॥ ॐ ह्रीं श्रीमन्वादिसप्तर्पियो अयं निर्वपामि॥६॥ अथ जयमाला। त्रिभंगी छंद। यन्, ऋपिराजा, धर्मजिहाजा, निज पर काजा, करत भले । करुणा के धारी, गगनविहारी, सुख अपहारी, भरम दले। काटत यमफन्दा, भविजन वृन्दा, करत अनन्दा, चरणनमें। जो पूर्जे ध्यावे मंगल गावे, फेर न आवें भवयनमें । पद्धरी छंद। जय श्रीमनु मुनिराजा महंत । स थावर की रक्षा करत ॥ जय मिथ्यातमनाशक पतंग । करुणारसपूरित अङ्ग . अङ्ग ॥१॥ जय श्रीस्वरमनु अकलंकरूप । पद सेव करत नित अमर भूप ॥ जय पंच अक्ष जीते महान । तप तपत देह कंचन समान ॥२॥ जय निचय सप्त तत्त्वार्थभास । तप रमातनो तनमें प्रकाश ॥ जय विषय रोध सम्बोध मान । परणित के नाशन अचल ध्यान ॥३॥ जय जयहि सर्वसुन्दर दयाल । लखि इन्द्रजालवत जग तजाल ॥ जय तृष्णाहारी रमण राम । निज परणति में पायो विराम ॥४॥ जय आनन्दधन कल्याणरूप कल्याण करत सबको अनूप ॥ जय मदनाशन जयवान देव । निरमद विरचित सब करत सेव ॥५॥ जय जेय विनयलालस अमान । सव शत्रु मित्र जानत

ܘܲܦܲܨܵ
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
समान ॥ जै कृर्शितकाय तप के प्रभाव । छवि छंटा उड़ति
आनन्ददाय ॥६॥
जै मित्र सकल जग के सुमित्र । अनगिनत अधम कीने
पवित्र ।। जै चन्द्रवदन राजीव-नयन । कबहुँ विकथा बोलत
नवयन ॥७॥
जैसातों मुनिवर एक संग । नित गगन गमन करते
अभंग ॥ जय आये मथुरापुरमझार । तह मरी रोगको अति
प्रचार॥८॥
जय जय तिन चरणोंके प्रसाद । सब मरो देवकृत भई
वाद ॥ जय लोक करे निर्भय समस्त । हम नमत सदा तिन
जोड़ी हस्त ॥६॥
जय ग्रीषम ऋतु पर्वतमझार । नित करत अतापन योग
सार ॥ जय तृषा परीषह करत जेर। कहुँ रंच चलत नहि
मन सुमेर ॥१०॥
जय मूल अठाइस गुणन धार तप उन तपत मान-
न्दकार ।। जय वर्षा ऋतु में वृक्षतीर। तह अति शीतल झेलत
समीर ।।११।।
जय शीत काल चौपटमंझार। कै नदी सरोवर तट
विचार ॥ जय निवसतध्यानारूढ़ होय । रंचक नहिं मटकत
रोम कोय ॥१२॥
जय मृतकासन वज्रासनीय । गौदहन इत्यादिक
गनीय ॥ जय आसन नाना भांति धार। उपसर्ग सहत ममता
निवार १३॥
जय जपत तिहारो नाय कोय। लख पुत्र पौत्र कुल
वृद्धि होय ॥ जय भरे लक्ष अतिशय भंडार । दारिद्रतनो दुख
होय झार ॥१४॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। - १.१ जय चौर अग्नि डांकिन पिशाच। अरु ईतभीत सद नसतं सांच ॥ जय तुम सुमरत सुख लहत लोक । सुर असुर नवत पद देत धोक ॥ १५ ॥ शेला। ये सातों मुनिराज महातपलछमी धारी । परम पूज्य पद धरें सकल जगके हितकारी ॥ जो मन वच तन शुद्ध होय सेव औ ध्यावै । सौजन मनरंगलाल अष्ट द्धनको पावै। दोहा। नमत करत चरनन परत, अहो गरीब निवाज । पंच परावर्तननित, निनवारी ऋषिराज ॥ ॐ ह्रीं सप्तर्षिभ्यो पूर्णायं निर्वपामीति स्वाहा । अथ सोलहकारन पूजा। अडिल्ला सोलहकारण भाय जे तीर्थंकर भये। हर्ष इन्द्र अपार मेरुपै ले गये। पूजा करि निज धन्य लज्यों बहु चाषसों। हमहू षोडशकारन भावें भावसौं ॥१॥ *हीं दर्शनविशुद्धयादि षोडशकारणानि! अत्रावतर- तावावरत ।.संवौषट् । ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणानि! अत्र तिष्ठत् तिष्ठत् ।। ही; दर्शनपिशुद्ध यादिषोडशकारणानि ! अत्र मम् सन्निहितानि भवत भवंत वषट् ।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। चौपाई। कंचनझारी निरमल नीर । पूजौं जिनवर गुनगंभीर परमगुरु हो, जय जय नाथ परम गुरु हो॥ दरशविशुद्धि भावना भाय । सोलह तीर्थंकरपददाय परमगुरु हो, जय जय नाथ परमगुरु हो॥५॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुयादिषोडशकारणेभ्यो जन्ममृत्युवि- नाशाय जल नि॥ चंदन घसौं कपूर मिलाय, पूजौं श्रीजिनवरके पाय परम हो, जय जय नाथ परमगुरु हो ॥ दरश० ॥२॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध यादिषोडशकारणेभ्यः संसारताप- विनाशनाय चन्दनं०॥ तंदुल धवल सुगंध अनूप । पूजौं जिनवर तिहुँजगभूप । परमगुरु हो, जय जय नाथ परमगुरु हो ॥ दरशवि०॥३॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणेभ्योऽक्षयपदप्राप्ताये अक्षतान् नि०॥ फूल सुगंध मधुपगुंजार । पूजौं जिनवर जगभाधार । परमगुरु हो जय जय नाथ परमगुरु हो । दरश०॥४॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्यादिषोडशकारणेभ्यः कामबाणवि- ध्वंसनाय पुष्पं ॥ सदनेवज बहुविध पकवान । पूजौं श्रीजिनवर गुणखान । परमगुरु हो, जय जय नाथ परमगुरु हो । दरशवि०॥५॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणेभ्यः क्षुधारोग- विनाशनाय नैवेयं दीपकजोति तिमर छयकार । पूजू श्रीजिन केवलधार। परमगुरु हो, जय जय नाथ परमगुरु हो। दरशविशुद्ध भावना भाय । सोलह तीर्थंकरपद् पाय ।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। परमगुरु हो, जय जय नाथ परमगुरु हो॥६॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध यादिषोडशकारणेभ्यो मोहान्धका- रविनाशनाय दीपं ॥ अगर कपूर गंध शुभ खेय । श्रीजिनवरमार्गे महकेय । . परमगुरु हो, जय जय नाथ परमगुरु हो । दरश०॥८॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध यादिषोडशकारणेभ्यो अष्टकर्मदह- नाय धूपं निर्वामि० ॥७॥ श्रीफल आदि बहुत फलसार। पूजौं जिन वांछितदातार। परमगुरु हो, जय जय नाथ परमगुरु हो। दरश०॥८॥ ॐ ही दर्शनविशुद्ध यादिषोडशकारणेभ्यो मोक्षफल- प्राप्तये फल निर्वपामी०॥८॥ जल फल आठों दरव चढ़ाय । 'धानत' वरत करों मनलाय परमगुरु हो, जय जय नाथ परमगुरु हो । दरश OEM ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध यादिषोडशकारणेभ्योऽनयंपदप्राप्तये अर्घ निर्वपामीति । प्रय जयमाला। दोहा। षोड़शकारण गुण करे, हरै चतुरगतिवास । पापपुण्य सब नाशकै, ज्ञानभान परकास ॥२॥ चौपाई १६ मात्रा। दरशविशुद्ध धरैजो कोई । ताको आवागमन न होई विनय महाधारै जो प्रानी। शिंववनिताकी सखी घखानी ॥२॥ शील सदा हृढ़ जो नर पालें । सो औरन की आपद टालें । ज्ञानाभ्यास करै मनमाहीं। ताकै मोहमहातम नाहीं ॥३॥ जो संवेगभाव विसतारे। सुरगमुकतिपद आप निहारे ।

१७४ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। दान देय मन हरष विशेखै । इहभव जस परभव सुख देखा जो तप तपै खपै अभिलाषा । चूरै करमशिखर गुरु भाषा । साधुसमाधि सदा मन लावै। तिहुँजगभोगि भोग शिव जावै॥५॥ निशदिन वैयावृत्य करैया। सौ निहचै भवनीर तिरैया। जो अरहतभगति मन आने । सो मन विषय कषाय न जाना जो आचारजमगति करै है। लो निर्मल आचार धरै है।। बहुश्रुतवंतभगति जो करई । सो नर संपूरन श्रुत धरई ॥७॥ प्रवचनभगति करै जो ज्ञाता। लहै ज्ञान परमानंददाता॥ षटआवश्य काल जो साधै । सो ही रतनत्रय आराधे ॥८ धरमप्रभाव करेंजे ज्ञानी । तिन शिवमारग रीति पिछानी ।। वत्सलअंग सदा जो ध्यावै । सो तीर्थंकरपदवी पावै ॥६॥ दोहा। पही सोलहभावना, सहित धरै व्रत जोय। देवइन्द्रनरबंधपद, 'धानत' शिवपद होय ॥१०॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध यादिषोडशकारणेभ्यः पूर्ण निर्वपामी० (अर्ध्वके वाद विसर्जन भी करना चाहिये) दशलक्षणधर्म पूजा। अडिल्लं! उत्तम छिमा मारदव आरजवभाव सत्यं सौच संजम तप त्याग उपाव हैं। . आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दश सार है। चहुंगतिदुखते काढ़ि मुकतकरतार हैं ॥१॥ है.

जैन-ग्रन्थ-संग्रद।
44
ॐही उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म! अनावतर अवतर!संवौषट्
ॐ ही उचमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ
।।
ॐडो उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र मम सनिहितो भव
भय । घपट्
सोरठा।
हमाचलकी धार, मुनिचित सम शीतल मुरम।
भवनाप निवार, दसलक्षन पूजों सदा ॥१॥
ॐहों उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय जलं निर्वामिनाशा
चंदन फेशर गार, होय सुवास दशौं दिशा । भवा० ॥२॥
ॐ ही उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय चंदननिवपामिलाशा
अमल अडित सार, तंदल चंद्रसमान शुभ ॥ भवा० ॥३॥
ॐ ही उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अक्षतान निर्वपामि॥३॥
फल अनेकप्रकार, मएक ऊरचलाफ लो। भवमा० 111
ॐही उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय पुष्पं निर्यपामि ॥४॥
नेषन विविध प्रकार, उत्तम पटरससंजुउत ॥ भवमा०॥५॥
ॐ ही उत्तमक्षमादिदशलक्षधर्माय नैवेद्य निर्वपामि ॥५॥
पाति कपूर सुधार, दीपकजोति सुहावनी ॥ भवमा०॥ ६॥
ॐही उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय दीपं निर्वपामि॥६॥
अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगंधता ॥ भवमा० ॥७॥
केही उच्चमक्षमादिदशलक्षणधर्माय धूपं निर्वपामिना ७॥
फलको जाति अपार, घान नयन मनमोहने ॥ भवा० ॥८॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिवशलक्षणधर्माय फलं निर्वामि०॥ ८॥
माठों दरव सँवार, 'धानत' अधिक उछाहसों। भवाom
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मायाय निर्वपामि० ॥६॥

१७६ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। अंगपूजा। 'सोरठा। पीड़ें दष्ट अनेक, बांध मार बहुविधि करें। धरिये छिमा विवेक, कोपन कीजे पीतमा ॥१॥ चौपाई मिश्रित गीताछन्द। उत्तमछिमा गहो रे भाई । इहमव जस परभव सुखदाई ॥ गाली सुनि मन खेद न आनी । गुनको भौगुन कह अयाना ॥ कहि है अयानो वस्तु छीने, बांधमार बहुविधि करे। घरते निकारै तन विदार बैर जो न तहां धरै॥ ते करम पूरब किये खोटे, सहै क्यों नहि जीवरा। अतिक्रोधअगनि बुझाय प्रानी, साम्य जल ले सियरा ॥२॥ ॐ हीं उत्तमक्षमाधर्माङ्काय अयं निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥ मान महाविषरूप, करति नीचगति जगतमें। कोमल सुधा अनूप, सुख पावै पानी सदा ॥२॥ उत्तम मार्दवगुन मन माना। मान करनको कौन ठिकाना। वस्यो निगोदमाहित आया। मरी कन भाग, विकाया ॥ रूकन बिकाया भागवसते, देव इकइन्द्री भया। उत्तम मुआ चंडाल हुआ, भूप कीड़ों में गया । जीतव्य-जीवन-धनगुमान, कहा करै जलवुदवुदा । करि विनय बहुगुना बड़े जनकी, शानका पावे उदा ॥२॥ ॐ हीं उत्तमार्दवधर्माङ्गाय अयं निर्वपामोति स्वाही ॥२॥ कपट न कीजै .कोय, चोरन के पुर ना बसै। सरल सुभावी होय, ताके घर बहुः सम्पदा ॥३॥ उत्तम आर्जवरीति बखानी। रंचक दगा बहुत. दुखदानी ॥ मनमें होय सो वचन उचरये। वचन होय.सो वनसौं करियो जैन-ग्रन्थ-संग्रह। १०७ करिये सरल तिहुँजेोग अपने देख निरमल आरसी। मुख कर जैसा लख तैसा, कपटप्रीति अंगारसी ।। नहीं लहै लछमी अधिक छल करि, करमवन्धविसेखता। भय त्यागि दूध पिलाव पोवै, आपदा नहीं देखता ॥३॥ ॐ ह्रीं उत्तमार्जवधर्माङ्गाय अध्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥३॥ धरि हिरदै सन्तोष, करहु तपस्या देहसौ । शौच सदा निरदोश,. धरम बड़ो संसार में ॥४॥ उत्तम शौच सर्व जग जाना । लोम पाप को वाप वखाना ।। आसापांस महा दुखदानी । सुख पावै सन्तापी प्राणी ॥ प्रानी सदा सुचि शीलजपतप, ज्ञानध्यान प्रभावतें। नित गंगजमुन समुद्र न्हाय, अशुचिदोष सुभावतें । ऊपर अमल मल भरयो भीतर, कौन विध घट शुचि कहै। बहु देह मैली सुगुनथली, शौचगुन साधू लहै ॥ ४॥ ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माङ्गाय अयं निपामोति स्वाहा ॥४॥ कटुक वचन मति बोल, परनिन्दा अरु झूठ तज । सांच जवाहर खोल, सतवादी जग में सुखी ॥५॥ उत्तम सत्यवरत पीलीज । परविश्वास घात नहिं कीजै॥ सांचे झूठे मानुप देखो। आपनपूत स्वपास न पेखो। पेखो तिहायत पुरुष सांचे को, दरब सब दीजिये। मुनिराज श्रावकको प्रतिष्ठा, सांचगुन लख लीजिये ॥ ऊंचे सिंहासन बैठि वसुन्टप, धरम का भूपति भया। बच झूठसेती नरक पहुंचा, सुरग में नारद गया ॥५॥ ॐ हीं उत्तमसत्यधर्माङ्गाय अयं निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ काय छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्री मन वश करो। संजमरतन संभाल, विपयचोर बहु फिरत है ॥६॥ उत्तम संजम गहु मन मेरे। भवभव के भाजै अघ तेरे ॥ । । .

जेन-अन्य-संग्रह। सुरग नरकपशुगतिमें नाहीं । आलसहरन करन सुख ठाहीं ठाही पृथी जल आग मारत, रूख त्रस करुना धरी.! सपरसन रसना घान नैना, कान मन सब वश करो। जिस विना नहिं जिनराज सीझे, तू रुल्यो जगकीच में । इक धरी मत विसरो करी नित, आव जममुखबीचमें ॥६॥ ॐ हीं उत्तमसंयमधर्मालाय अयं निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ तप चाहें सुरराय, करमसिखरको बन है। बादशविधि सुखदाय, पयों न कर निज सकति सम॥७॥ उत्तम तप सव माहिं बखाना । करमशिखर को वज्र समाना॥ वस्यो अनादिनिगोदमझारा । भूचिकलत्रय पशुतन धारा ॥ धारा मनुष तन महादुर्लभ, सुकुल आव निरोगता। श्रीजैनवानी तस्वज्ञानी, भई विषमपयोगता॥ अति महादुर्लभ त्याग विषय, कषाय जो तप आदर। नरभव अनूपमकनकघरपर, मणिमयो कलसा धरै॥७॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपेोधर्माङ्गाय अध्यं निर्वपासीति स्वाहा ॥७॥. दान चारपरकार, चारसंघ को दीजिये। धन विजुली उनहार, नरभरलाहो लीजिये ॥८॥ उत्तमत्याग को जग सारा । औषधशास्त्र अभय अहारा॥ निहचै रागद्वष निरवार । ज्ञाता दोनों दान संभार । दा. संभार कूपजलसम, दरब घर में परिनया । निज हाथ दीजै साथ लीजे, खाय खोया वह गया ॥ धनि साध शास्त्र अभयदिवया, त्याग राग विरोधकों। विन दान श्रावक साथ दोनों, लहै नाहीं वोधकों ॥८॥. ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्माङ्गाय अयं निर्वपामोति स्वाहा ॥ ८॥ परिग्रह चौविस भेद, त्याग करें मुनिराजजी। तिसनाभाव उछेद, घटती जान घटाइये ॥ ६॥ ..

जैन-प्रन्थ-संग्रह। उत्तम आकिंचन गुण जाना । परिग्रहचिन्ता दुख ही मानी। फांस तनकतो तन में सालै। चाह लंगोटो को दुख भाले ।। भाले न समता सुख कभी नर विना मुनिमुद्रा धरें। धनि नगनपर तन-नगन गड़े, सुर असुर पायनि परें । घरमाहिं तिसना जो घटावै, रुचि नहीं संसारसौं । बहुधन वुराह भला कहिये, लीन पर उपगारसौं ॥६॥ ॐ ह्रीं उत्तमाकिञ्चन्यधर्माङ्गाय अयं निर्वपामीति स्वाहा॥६॥ शीलवाडि नी राख, ब्रह्मभाव अन्तर लखो। करि दोनों थभिलाख, करहु सफल नरभव सदा ॥१०॥ उत्तम ब्रह्मचर्य मन आना । माता बहिन सुता पहिचानौ ॥ सह यानवरया बहु सूरै । टिके न नैन वान लखि कूरे ॥ कूरे तिया के अशुचितनमें, कामरोगी रति करें। बहु मृतक सड़ाह मसानमाही, काक ज्यों चौंचें भरें। संसार में विषवेल नारा, तजि गये जोगीश्वरा। द्यानत' धरमदशौड़ चढिक, शिवमहल में पगधरा ॥१०॥ ॐ ह्रीं उत्तमब्रह्मचर्यधर्मा गाय अध्यं निवपामीति स्वाहा ॥१०॥ अथ जयमाला। - दोहा । दशलक्षन चन्दौं सदा, मनवांछित फलदाय"। कहीं आरती भारती, हम पर हाहु, सहाय ॥ १ ॥ वेमरी छन्द । उत्तमछिमां जहां मन होई । अंतर बाहर शत्रु न कोई ॥ उत्तममार्दव विनय प्रकासै । नानाभेद ज्ञान सब भासै ॥२॥ ! उत्तमभार्जव कपट मिटावे । दुरगति त्यागि सुगति उपजावै ।

.
.
१८०
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
।
उत्तमशीच लोभपरिहारी । संतोषी गुनरतनभंडारी ॥३॥
उत्तमसत्यवचन मुख बोले । सो प्रानों, संसार न डोले।
उत्तमसंयम पालै ज्ञाता । नरभव सफल करै ले साता॥४॥
उत्तमतप निरवांछित पालै । सो नर फरमशत्रुको टालै ।
उत्तमत्याग कर जो कोई । भोगभूमि-सुर-शिवसुख होई ॥ ५॥
उत्तमआकिंचनव्रत धार । परमसमाधिदशा विसतारै ॥
उत्तममह्मचर्य मन लावै । नरसुरसहित मुकतिफल पावै ॥६॥
दोहा ।
कर करम की निरजरा, भवपीजरा विनाशि।
अजर अमरपदको लहै, 'धानत' सुखकी राशि |||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमामार्दवार्जक्शौचसत्यसंयमतपल्यागा.
किंचनब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्माय पूर्णायं निर्वामीति स्वाहा ।
स्वयंभूस्तोत्र भाषा।
चौपाई।
राजविर्ष जुगलिनसुन्न किया।राज त्याग भवि शिवपद लिया।
स्वयंबोध स्वंभू भगवान । वंदौं आदिनाथ गुणखान ॥५॥
इंद्र क्षीरसागरजल लाय | मेरु न्हवाये गाय बजाय ॥
मदनविनाशक सुखकरतार । चंदौं अजित अजितपदकार ||२||
शुक्लध्यानकरि करमविनाशि । धाति अधानि सकल दुखराशि ॥
लह्यो मुकतिपदसुख अविकार ! वंदौं शंभव भवदुख टार ॥३॥
माता पच्छिम रयनमझार । सुपने सोलह देखे ‘सार ।।.
भूप पूछि.फल मुनि हरषायं । वंदौं अभिनंदन मनलाय ॥४॥
सब कुवादवादीसरदार । जीते स्यादवादधुनिधार...'
जैनधरमपरकाशक स्वाम । सुमतिदेवपद करहुँ प्रनाम ॥५॥

.
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
गर्भअगाऊ धनपति आय । करी नगरशोभा अधिकाय ॥
घरषे रतन पंचदश मास । नमौं पदमप्रभु सुखकी रास ॥६॥
इंद्र फनिंद्र नरिंद्र त्रिकाल । बानी सुनि सुनि होहिं खुल्याल ॥
द्वादशसभा ज्ञानदातार । नौं सुपारसनाथ निहार ॥७॥
सुगुन छियालिस हैं तुममाहि । दोष अठारह कोई नाहि ॥
मोहमहातमनाशक दीप । नौं चंद्रप्रभ राख समीप ॥८॥
द्वादविध तप करम विनाश । तेरहमेद चरित परकाश ।।
निज अनिच्छ भविइच्छंकदान ॥ वंदौ पुहपदंत मनमान |
भविसुखदाय सुरगते आय । दशविध धरम कहो जिनराय ।।
आपसमान सबनि सुखदेह । चंदौं शीतल धर्म सनेह ।।१०॥
समता सुधा कोपविषनाश । द्वादशांगवानी परकाश ।।
चारसंघ आनंददातार । नमो श्रेयांस जिनेश्वर सार ॥१२॥
रतनत्रयचिरिमुकुटविशाल । सौमे कंठ सुगुनमनिमाल ।
मुक्तिनारभरता भगवान । वासुपूज वंदों धर ध्यान ॥१२॥
परमलमाधिरूपजिनेश । शानी ध्यानी हितउपदेश ॥
कर्मनाशि शिवमुख विलसंत । वंदौं विमलनाथ भगवंत ॥१॥
अंतर वाहिर परिग्रह डारि । परम दिगंबरवतकौं धारि॥
सर्वजीवहित राह दिखाय । नमौं अनंत वचन मनकाय ॥१४॥
सात तत्व पंचासतिकाय । अरथ नवों छहदरब बहुभाय ॥
लोक अलोफ सकल परकाश । वंदौं धर्मनाथ अविनाश ॥१५॥
पंचम चक्रवरति निधिभोग । कामदेव द्वादशम मनोग ।
शांतिकरन सोलम जिनराय । शान्तिनाथ वंदौं हरखाय ॥१६॥
बहुथुति करे हरष नहिं होय । निदे दोष गहें नहिं कोय ॥
शोलमान परब्रह्मस्वरूप । वंदौं कुंथुनाथ शिवभूप ॥१७॥
द्वादशगण पूलै सुखदाय । थुतिबंदना करें अधिकाय॥
जाकी निजथुति कबहुँ न होय । वंदौं अरजिनवर पद दोय ॥१८॥

१८२ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। . परभव रतनत्रय अनुराग । इस भव ब्याहसमय वैराग.॥ बालब्रह्म पूरन व्रत धार । वंदौं मलिनाथ जिनसार ॥१॥ विन उपदेश स्वयं वैराग । थुति लौकांत करें पग लाग ।। नमः सिद्ध कहि सब व्रत लेहिं । वंदौं मुनिसुव्रत वह देहिं ॥२० श्रावक विद्यावंत निहार । भगतिभावसौं दिया अहार ।। वरसे रतनराशि ततकाल । वंदौं नमिप्रभु दीनदयाल ॥२१॥ सब जीवन की बंदी छोर। रागदोष दो चंदन तार ।। . रजमति तजि शिवत्रियशों मिले । नेमिनाथ चंदौं सुखनिलारशा दैत्य कियो उपसर्ग अपार । ध्यान देखि आयो फनिधार ॥ गयो कमठशठ मुख करश्याम निमौं मेरुसम पारसस्वामा२३।। भवसागरते जीव अपार । धरमपोतमें धरे निहार ।। डूबत काढ़े दया विचार । वर्द्धमान वंदौं बहुबार ॥२४॥ दोहा। चौवीसौं पदकमलजुग, वंदों मनवचकाय ॥ 'द्यानत' पढ़ सुनै सदा, सो प्रभु क्यों न सुहाय ।।२५।। पंचमेरुपूजा। गीताछंद । तीर्थंकरोंके न्हवनजलतें, भये तीरथ शर्मदा। तातै प्रदच्छन देत सुरगन, पंचमेरनको सदा ।। दो जलघि दाईदीपमें सब, गनतमूल विराजही। पूजौं असी जिनधाम प्रतिमा, होहि सुख,दुख भाजही ॥१॥ ॐ ह्रीं पञ्चमेरुसम्बन्धि चैत्यालयस्थजिनप्रतिमासमूह ! : अनावतरावतर । संवौषट।. ॐ ह्रीं पञ्चमेरुसम्बन्धिचैत्यालयस्थजिनप्रतिमासमूह ।

.
जन-ग्रन्थ-संग्रह।
अत्र तिष्ठतिष्ठ। :-
ॐ ह्रीं पचमेरुसभ्यन्धिचैत्यालयस्थजिनप्रतिमासमूह!
अत्र ममसनिहितो भव भव वपट् ।
प्रथाधक।
चौपाई आंचलीबद्ध [ १५ मात्रा।]
सीतलमिष्टसुपास मिलाय । जलसौं पूजी श्रीजिनराय ।
महासुख हो, देखे नाथ परमसुख होय ॥
पांचों में असी जिनधाम । सब प्रतिमाको करों प्रनाम ।
महासुख होय, देखे नाथ परमसुख होय ॥१॥
ॐ ह्रीं पचमेरुसम्बन्धिजिनचैत्यालयस्थजिनविम्बेभ्यो
जलं निपामि॥
जल केसरकरपूरमिलाय | गंधसौं पूजौं थीजिनराय ।
महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ॥ पांचों ॥२॥
ॐ ह्रीं पच्चमेरुसम्बन्धिजिनचैत्यास्थजिनविम्बेभ्यः
चन्दन निर्वपामि।
अमल अखंड सुगंध सुहाय। अच्छतसौं पूजौं जिनराय ।
महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ॥ पांचों ॥३॥
ॐ ही पचमेरुसम्बन्धिजिनचैत्यालयस्यजिनविम्वेभ्यो
अक्षतान् नि०॥
घरन अनेक रहे महकाय, फलनसौं पूजौं जिनराय ।
महासुन होय, देखे नाथ परम सुख होय ॥ पांचौ०॥ ४॥
ॐ ह्रीं पञ्चमेरुसम्बन्धिजिनचैत्यालयस्थजिनविम्वेभ्यः
पुष्पं नि० ॥
मनवांछित बहु तुरत बनायः। चरसौं पूजौं श्रीजिनराय ।
महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय .पांचों ॥५॥

१८४ .
जैन-ग्रन्थ-संग्रह
.
-
ॐ ह्रीं पञ्चमेरुसम्बन्धिजिनचैत्यालयस्थजिनविवेभ्यो
नैवेद्य नि
तमहर उजल जाति जगाय । दीपसौं पूजौं श्रीजिनराय ।
महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ॥ पांचों॥६॥.
ॐ ह्रीं पञ्चमेरुसम्बन्धिजिनचैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यो
दीपं नि०॥
खेडं अगर परिमल अधिकाय । धूपसौं पूजौं श्रीजिनराय ।
महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ॥ पांचों॥७॥
ॐ ह्रीं पञ्चमेरुसम्बन्धिजिनचैत्यालयस्थजिनविम्वेभ्यो
धूपं नि०॥
सुरस सुवर्ण सुगंध सुभाय । फलसौं पूजों श्रीजिनराय ।
महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ॥ पांचों० ॥ ८॥
ॐ ह्रीं पच्चमेरुसम्बन्धिर्धाजनचैत्यालयस्थजिनविम्बभ्यो
फलं नि॥
आठ दरवमय अरघ बनाय । 'द्यानत पूजौं श्रीजिनराय ।
महासुख होय,देखे नाथ परम सुख होय ॥ पाचों ॥६॥
ॐ ह्रीं पञ्चमेरुसम्वन्धिजिनचैत्यालयस्थजिनविम्वेभ्यो
अयं नि०॥
नथ जयमाला।
.
.
सोरठा।
..
प्रेथम सुदर्शन स्वाम, विजय अचल मन्दर कहा।
विद्यु,न्माली नाम, पंचमेरु जग मैं प्रगट ॥१॥
वेसरी छन्द।
प्रथम सुदर्शन मेरु विराजै। भद्रशाल वन भूपर छाजै॥
चैत्यालय चारों सुखकारी । मनवचतन वंदना हमारी ॥२॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। १८५ ऊपर पंच शतकपर सोहै । नंदनवन देखत मन मौह ॥चै० ॥३॥ साढ़े बासठ सहसउंचाई । वन सुमनस शोभै अधिकाई ।च॥४॥ ऊंचाजोजन सहस छतीसं। पांडकवन सोहै गिरिसीसं ॥चै०१५॥ चारों मेरु समान वखानी ।भूपर भद्रसाल चहुँ जानो।६ चैत्यालय सोलह सुखकारी। मनवचतन वंदना हमारी चै० ॥७॥ ऊंचे पांच शतकपर भाखे। चारों नंदनवन अभिलाखे ।। चंत्यालय सोलह सुखकारी। मनवचतन वंदना हमारी चै० साढे पचवन सहस उतंगी। बन सोमनस चार बहुरंगा चि०१॥ चैत्यालय सोलह सुखकारी। मनवचतनवंदना हमारी ।चै०॥११॥ उचेसहस अट्ठाइस बताये। पांडुक चारों वन शुभ गाये चि०।१२ चैत्यालय सोलह सुखकारी।मनवचतनवंदना हमारी चि०॥१३॥ सुरनरचारन वंदन पावै । सो शोभा हम विह मुख गावें ॥१४ चैत्यालय अस्सीसुखकारी।मनवचतनवंदना हमारी चै॥१५॥ दोहा। पंचमेरकी आरती, पढ़े सुनै जो कोय। 'द्यानत' फल जानैं प्रभू, तुरत महासुख होय ॥१६॥ ॐ हों पञ्चमेरुसंबंधिजिनचैत्यालयस्थजिनपिम्वेभ्यो अयं निर्वपामि॥ re- रत्नत्रयपूजा। दोहा। चहुंगतिफनिविषहरनमणि, दुखपावक जलधार शिवसुखसुधासरोवरी, सम्यकत्रयी निहार ॥५॥ ॐ ह्रीं सम्यग्रतत्रय ! अत्रयतरावतर । संवौषट् । ॐ ह्रीं सम्यग्रतत्रय! अत्र तिष्ट तिष्ठ। 3 ।

१८६ जैन-प्रन्थ-संग्रह। ॐ ह्रीं सम्यग्रतत्रय अत्र मम सन्निहितं भव भव । वषट् सोरठा। क्षीरोदधि उनहार, जल जल अति सोहना । जनमरोगनिरवार, सम्यकरत्नत्रय भजों ॥१॥ ॐ ह्रीं सम्यग्रत्नत्रयाय जन्मरोगविनाशनाय जलं निर्वपामि ॥१॥ चंदन केसर गारि, परिमल महा सुरंगमय । जन्मरोगः ॥२॥ ॐ हीं सम्यग्रत्लत्रयाय भवातापविनाशनाय चन्दनं निवपामि ॥२॥ तंदुल अमल चितार, वासमती सुखदासके । जन्मरोग॥३॥ ॐ ह्रीं सम्यग्रत्नत्रयाय अक्षयपदप्राप्ताय अक्षतान् निर्व- पामि० ॥३॥ महक फूल अपार, अलि गुंजें ज्यों थुति करें। जन्मरो० ॥४॥ ॐ हीं सम्यग्रलत्रयाय कोमबाणविध्वंसनाय पुर्ष निर्वपामि० ॥४॥ - लाडू बहु विस्तार, चोकन मिष्ट सुगन्धता । जन्मरी०॥५॥ ॐ हीं सम्यग्रत्लत्रयाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्व० दीपरतनमय सार, जात प्रकाशै जगत में । जन्मरो० ॥६॥ ॐ हीं सम्यग्रत्नत्रयाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्चक धूप सुवास विधार, चन्दन अर्घ कपूरकी । जन्मरी०॥७॥ ॐ ह्रौं सम्यग्रतत्रयाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वामि ॥७॥ फलशोभा अधिकार, लोंग. छुआरे जायफल । जन्म० ॥८॥ ॐ ह्रीं सम्यग्रतत्रयाय मेक्षिफलप्राप्तये फल निर्वपामि ॥८॥ आठदरब निरधार, उत्तमसों उत्तम लिये । जन्मरी० ॥६॥ ॐ हीं संन्यनत्नत्रयाय अनध्यपदप्राप्तये अयं निर्वपामि | सम्यकदरसनहान, व्रत शिवमग तीनों मयो।

1 जैन-ग्रन्थ-संग्रहः। पार उतारन जान, 'धानत' पूजौं व्रतसहित ॥१०॥ ॐ ह्रीं सम्यमलत्रयाय पूर्णाध्य निर्वपामि० ॥१०॥ दर्शनपूजा। दोहा-सिद्ध अष्टगुनमय प्रगट, मुक्तजीवसोपान । जिहविन ज्ञानचरित अफल, सम्यकदर्श प्रधान ॥१॥ ॐ ह्रीं अष्टाङ्गसम्यग्दर्शन' अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं अष्टाङ्गसम्यग्दर्शन ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । छः ठः। ॐ ह्रीं अष्टाङ्गसम्यग्दर्शन ! अब मम सनिहितं भव भव । वषट् . सोरठा। नीर सुगन्ध अपार, त्रिपा हरै मल छय करै। सम्यकदर्शनसार, आठ अङ्ग पूजौं सदा ॥१॥ ॐ ह्रीं अष्टाङ्गसम्यग्दर्शनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ जल केसर घनसार, ताप हर सोतल कर। सम्यकदं० ॥२॥ ॐ ह्रीं अष्टाङ्गसम्यग्दर्शनाय चन्दनं निर्वपामोति स्वाहा ॥२॥ अछत अनूप निहार, दारिद नारी सुख भरै। सम्यकद० ॥३॥ ॐ ह्रीं अष्टाङ्गसम्यग्दर्शनाय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा॥३॥ पहुप सुवास उदार, खेद हरे मन शुचि करै । सम्यकद० ॥४॥ ॐ ह्रीं अष्टाङ्गासम्यग्दर्शनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥४॥ नेवंज विविध प्रकार, छुधा हरै थिरता करी। सम्यकद॥५॥ ॐ ह्रीं अष्टाङ्गसम्यग्दर्शनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ दीपज्योति तमहार, घटपट परकाशै महा । सम्यकद० ॥६॥ ॐ ह्रीं अष्टान्सम्यग्दर्शनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ धूप घानसुखकार, रोग विघन जड़ता हरै। सम्यकद० ॥७॥ ॐ ह्रीं अष्टाङ्गसम्यग्दर्शनाय धूपं निर्वपामोति. स्वाहा ॥७॥ श्रीफलमादि विथार, निहचै सुरशिवफल करै। सम्यकद० ।।८।।

१८८
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
ॐ ह्रीं अष्टाङ्गसम्यग्दर्शनाय फलं निर्वपामोति स्वाहा ॥८॥
जल गन्धाक्षत चार दीप धूप फल फूल चरु । सम्यकदा
ॐ ह्रीं अष्टाइसम्यग्दर्शनाय अयं निर्वपामीतिः ॥ ६ ॥
जयमाला।
दाहा-आप आप निहचै लखै, तत्त्वप्रीति व्याहार।
रहितदीप पच्चीस है, सहित अष्ट गुन सार॥१॥
चौपाईमिश्रित गीता छंद।
सम्यकदरसन रतन गहीजै । जिन वचनमै सन्देह न कीजै
इहभव विभववाह दुखदांनीं । परभवभोग चहैं मत प्रानी ॥
प्रानी गिलान न करि अशुचि लखि, धरमगुरुप्रभु परखिये।
परदेश ढकिये धरम डिगते को सुथिर कर हरखिये ॥
चहुँसंघको वात्सल्य कीजे, धरमकी परभावना।
गुन आठसों गुन आठ लाहकै, इहां फेर न आवना ॥३॥
ॐ ह्रीं अष्टासहितपश्चवींशतिदोषरहिताय सम्यग्द-
शनाय पूर्णायं निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥
ज्ञानपूजा।
दोहा-पंचभेद जाके प्रगट, शेयप्रकाशन भान ॥
मोह-तपन-हर-चन्द्रमा, साई सम्यकशान ॥२॥
ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञान अत्र अवतर अवतर । संवौषट् ।
ॐ हीं अष्टविधसम्यग्ज्ञान अत्र तिष्ठ तिष्ठ । 3 ।
ॐ ह्रीं अष्टषिधसम्यग्ज्ञान अत्र ममसनिहितं भव भव वषट्।
सोरठा।
नीर सुगन्ध अपार, त्रिषा हरै मल छय करें।
सम्यकज्ञान विचार, आठभेद पूजौं सदा ॥ १ ॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। १८६ ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्शानाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ जलकेसर धनसार, ताप हर शीतल करै । सम्यकशा० ॥२॥ ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्शनाय चन्दन निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥ अछत अनूप निहार, दारिद नाशे सुख भरै । सम्यकज्ञा० ॥३॥ ॐ ही अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय अक्षतंनिर्वपामीति स्वाहा ॥३॥ पहुपाल उदार, खेद हरै मन शुचि कर । सम्यकज्ञा० ॥४॥ ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय पुष्प निर्वपामीति स्वाहा ॥४॥ नेवज विविध प्रकार, छुधा हरै थिरता करे । सम्यकज्ञा० ॥५॥ ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ दीपज्योतितमहार, घटपट परकाशे महां । सम्यकज्ञा० ॥६॥ ॐ हीं अष्टविधसग्यशानाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ धूप घानसुखकार, रोग विधन जड़ता हरे । सम्यकशा० ॥७॥ ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ७॥ श्रीफल आदि विचार,निहवे सुरशिवफल करे। सम्यकज्ञाoller ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥८॥ जल गन्धाक्षत चारदीप धूप फल फूल चरु । सम्यकक्षा 10 ॐ ही अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय अध्यं निपामीति स्वाहा ॥६॥ अथ जयमाला। दोहा। आप आप जानै नियत, ग्रंथपठन व्योहार। संशय विभ्रम मोह विन, अर्थग गुनकार ॥१॥ चौपाई मिश्रित गीता छन्द। सम्यकज्ञानरतन मन भाया । आगम तीजा नैन बताया। अक्षर शुद्ध अरथ पहिचानौ । अक्षर अरथ उभय सँग जानी ।। जानौं सुकालपठन जिनागम, नाम गुरु न छिपाइये।

. जैन-ग्रन्थ-संग्रह। १६० तपरीति गहि बहु मान देक, विनयगुन चित लाइये। ए आठभेद करम उछेदक, ज्ञानदर्पन देखना। इस ज्ञानहीसों भरत सीझा, और सब पटपेखना ॥२॥ ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय पूर्णाध्य निर्वपामीति स्वाहा॥ चारित्रपूजा। दोहा । विषयरोगऔषध महा, दवकषायजलधार । तीर्थकर जाकौं धरै, सम्यकचारितसार ॥१॥ ॐ ह्रीं त्रयोदशविधसम्यश्चारित्र! अत्र अवतर अव- तर । संवौषट् । ॐ ह्रीं त्रयोदशविधसम्यक्चारित्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठः । ॐ ह्रीं त्रयोदशविधसम्यक्चारित्र! अत्र ममं सन्निहित भवभव । वषट् सोरठा । नीर सुगंध अपार, त्रिषा हरै मल छय करे। सम्यकचारित धार, तेरहविध पूजौं सदा ॥१॥ ॐ ह्रीं त्रयोदशविधसम्पक्चारित्राय जलं निर्वपामीतिक जल केशर घनसार, ताप हर शीतल करै । सम्यकचा० ॥२॥ ॐ ह्रीं त्रयोदशविधसम्यञ्चारित्राय चंदनं निवपामीति • अक्षत अनूप निहार, दारिद नाशै सुख भरै । सम्यकचा ॥३॥ ॐ ह्रीं त्रयोदशविधसम्यक्चारित्राय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा पहुपसुवास उदार, खेद हरै मन शुचि करै । सम्यक० ॥४॥ ॐ ह्रीं त्रयोदशधिसम्यकनारित्राय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा नवज विविध प्रकार, छुधा हरै थिरता करै । सम्यक ॥५॥ ॐ ह्रीं त्रयोदशविधसम्यक्चारित्राय नैवेद्य निर्वपामीतिः जैन-प्रत्य-संग्रह। दीपजाति तमधार, घटपट परकाश महा । सम्यकचा० ॥६॥ केही प्रयोदशविधसम्यक्चारित्राय दीपं निपामीति स्याहा धूप घान सुखकार, रोग विधन जड़ता हरे । सम्यकचा० ॥७॥ केहो प्रयोदशयिधसम्यक्चारित्रायधूपं नियंपामीति स्वाहा॥७॥ श्रीफलमादि विधार, निदवे सुरशिवफल कर । सम्यया ॥८॥ ॐ ही प्रयोदशपिघसम्यक्चारित्राय फलं निर्वपामोति स्वाहा। जल गंधासत चारा, दीप धूप फल फूल चर । सम्यक० ॥६॥ ॐो प्रयोदशचिघसम्यक्चारित्राय अध्यं निर्वपामीति स्वाहा अथ जयमाला। दादा-प्रापमाप घिर नियत नय, तपसजम व्योहार । स्वपर दया दोनों लिये, तहविध दुम्बहार चौपाई मिश्रित गीता छंद। सम्यकचारित रतन संभालो। पांच पाप तजिक चत पालो। पंचसमिति जय गुपति गहोजा नरभव सफल फरहुतन छीजे छो सदा तनको जतन यह, एक संजम पालिये। या कन्यो नरकनिगादमाहिं, कपायविषयनि टालिये। शुभकरमजोग शुबाट आया, पार हा दिन जात है। 'धानत' घरमको नाव यठो, शिवपुरी कुशलात है ॥२॥ ॐ ही प्रयोदशविधसम्यकूचारित्राय महायं निर्बपामीति. अय समुखय जयमाला। दोहा-सम्यकदरशन शान व्रत, इन रिन मुक्त न होय । अंध पंगु अरु आलसी, जुदे जले दर-लोय ॥१॥ चौपाई १६ मात्रा। ताप ध्यान मुधिर धन आवै । ताफे करमयंध कट जाव तास शिवतिय प्रीति बढ़ाव।जो सम्यकरतनत्रय ध्यावै ॥२॥ ताको चढुंगविके दुख नाहीं। सोन पर भवसागरमाहीं ।

૨૨
जैन-प्रन्थ-संग्रह।
जनमजरामृतु दोष मिटावै । जो सम्यकरतनत्रय ध्यावै ॥३॥
सोइ दशलक्षनको साधै । सो सॉलहकारण भाराधै ।।
सो परमातम पद उपजावै। जो सम्यकरतनत्रय ध्याचे या
सोई शकचक्रिपद लेई । तोनलोकके सुख विलसेई॥
सोरागादिक भाव वहावै ।जो सम्यकरतनत्रय ध्यावै॥५॥
सोई लोकालोक निहार । परमानंददशा विसतारै ॥
आप तिरे औरन तिरवावै । जो सम्यकरतनत्रय ध्यावै ॥६॥
दोहा।
एकस्वरूपप्रकाश निज, वचन कहयो नहिं जाय।
तीनभेद व्योहार सब, धानतको सुखदाय ॥७॥
ॐ हौं सम्यग्रत्नत्रयाय महयं निर्वपामीति स्वाहा।
(अर्घ्य के बाद विसर्जन करना चाहिये)
+TTE
न्यामतकृत-गजल ।
तुम्हारे दर्श बिन स्वामी मुझे नहिं चैन पड़ती है। छयी
वैराग्य तेरी सामने आंखों के फिरती है। टेक निरा भूषण
विगत दूषण परम आसन मधुर भाषण । नजरनैनोंकी नाशाकी
अनीसे पर गुजरती है ॥२॥ नहीं करमोंका डर हमको कि जव
लग ध्यान चरणों में । तेरे दर्शनसे सुनते कर्म रेखा भी बदलती
है ॥ मिले गर स्वर्गकी संपति, अचंभा कौनसा इसमें तुम्हें
जो नयन भर देखे गती दुरगतिकी टरती है ॥शा हजारोंमूरते
हमने बहुतसीगौर कर देखीं शांति भूरत तुम्हारी सीनहीं नजरों
में चढ़ती है | जगतसरताज हो जिनराज, न्यामतको दरश
दीजे, तुम्हारा क्या विगड़ता है, मेरी बिगड़ी सुधरती है ॥५॥

जैन-अन्य-संग्रह।
श्री नन्दीश्वर दीप ( अष्टाहनिका ) की पूजा ।
अडिल्ल ।
सर्व परव में बड़ो अठाई पर्व है।
नंदीश्वर सुर जाहि लेय वसु दरब हैं।
हमें सकति सो नाहिं इहां कर थापना।
पूजों निनगृह प्रतिमा है हित मापना ॥१॥
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्धीपेद्विपंचाजिनालयस्थजिन-
प्रतिमासमूह ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । ॐ ह्रीं
श्रीनन्दीश्वरद्वीपेद्विपञ्चाशज्जिनालयस्थजिनप्रतिमासमूह :
अत्र तिष्ठ तिष्ठ । 2. ठा। श्रीनन्दीश्वरद्धीपेद्विपंचाशज्जिनालय-
स्थजिनप्रतिमा समूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव । वषट् ।
कंचनमणिमय भृङ्गार, तीरथनीर भरा।
तिहुँधारदयो निरवार,जामन मरन जरा ॥
नन्दीश्वर श्रीजिनधाम, घावन पुञ्ज करों।
वसुदिन प्रतिमा अभिराम, आनंदभाव धरों ॥१॥
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणे द्विपञ्चा-
शन्जिनालयस्थजिनप्रतिमाम्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल
निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥
भवतपहर शीतलवास, सो चन्दननाहीं।
प्रभु यह गुन कीजे सांच, आयो तुम ठांहीं ॥ नंदी० ॥२॥
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणे द्विपञ्चा-
शज्जिनालयस्थजिनप्रतिमाभ्यो अक्षयपदप्राप्तये चन्दन
निर्वपामि ॥१॥
उत्तम अक्षत जिनराज, पुञ्ज धरे सोहैं ।
सब जीते अक्षसमाज, तुम सम अर को है ।। नंदी०॥३॥

१६४
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्धीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणे द्विपञ्चा
शन्जिनालयल्यजिनप्रतिमाभ्यो अक्षयंपदप्राप्तये । अक्षतान्
निर्वपामि ॥३॥
तुम कामविनाशक देव, ध्याऊं फूलनसौं।
लहिं शील लच्छमी एव, छुटू सूलनसौं ॥ नंदी० ॥४॥
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणे द्विपञ्चा-
शन्जिनालयस्थजिनप्रतिमाभ्यः कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं
निर्वपामि ॥४॥
नेवज इन्द्रियबलकार, सो तुमने चा।
चरु तुम ढिग साह सार, अचरज है पूरा ॥ नंदी० ॥५॥
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणे विपञ्चा-
शज्जिनालयंस्थजिनप्रतिमाभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य
निर्वपामि ॥५॥
दीपककी ज्योति प्रकाश, तुम, तनमाहि लसै।
टूटै फरमनकी राश, ज्ञानकणी दरसै ॥ नन्दी० ॥६॥
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरडीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणे द्विपञ्चा-
शजिनालयस्थजिनप्रतिमाभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं
निर्वपामि ॥६॥
कृष्णागरुधूपसुवाल, दशदिशिनारि चर।
अति हरषभाव परकाश, मानों नत्य करें ॥ नन्दी॥७॥
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणे द्विपञ्चा-
शन्जिनालयस्थजिनप्रतिमाभ्यो अष्टकर्मदहनाथ धूपं नि० ॥७॥
बहुविधफल ले तिहुँकाल, आनंद पचतं हैं।
तुम शिवफल देहु दयालं, तो हम जाचत हैं।
नन्दीश्वरश्रीजिनधाम, बावन' पुज करों।
वसुदिन प्रतिमा अभिराम, आनंदभाष धरों॥८॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्धीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणे द्विपश्चा- शज्जिनालयस्थजिनप्रतिमाभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फल नि० ॥८॥ यह अरघ कियो निज हेत, तुमको भरपत हों। 'धानत' कीनो शिवनेत, भूपै समरपत हों। नंदी०॥६॥ ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणे द्विपंचा- शन्जिनालयस्थजिनप्रतिमाभ्यो अनयंपदप्राप्तये निर्वपामि ॥६॥ अथ जयमाला। दोहा। कार्तिक फागुनसाढले, अंत आठ दिनमाहिं। नंदीसुरसुर जात हैं, हम पूजै इह ठाहि॥१॥ एकसौ तरेलठ कोड़ि जोजनमहा। लाख चौरासिया एक दिशमें लहा ॥ आठमों द्वीप नंदीश्वरं भास्वरं । भौन वावन्न प्रतिमा नमों सुखकरं ॥२॥ चारदिशि चार अंजनगिरी राजहीं। सहस चौरासिया एकदिश छाजहीं। ढोलसम गोल ऊपर तले सुन्दरं । भौन० ॥३॥ एफ इक चार दिशि चार शुभ वावरी । एक इक लाख जोजन अमल जलभरी। चहुँदिशा चार वन लाखजोजनवरं मौन० ॥४॥ सोलवापीनमधिसोल गिरि दधिमुखं । सहस दश महाजोजन लखत ही सुखं ।। वावरीकोन दोमाहिं दो रतिफर । भौन० ॥५॥ शैल बत्तीस इक सहस जोजन कहे।

१६६ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। चार सोलै मिले सर्व बावन लहे ।। एक इक सीसपर एक जिनमदिरं भौन० ॥६॥ बिच अठ एकसौ रतनमह सोह ही। देवदेवी सरव नयनमन मोह ही ॥ पांचसै धनुष तन पद्मासनपरं । भौन० ॥७॥ लाल नख मुख नयन स्याम अरु स्वेत हैं। स्यामरंग भोंह सिरकेश छवि देत हैं। वचन बोलत मनों हँसत कालुषहरं । भौन ॥८॥ कोटिशशि भानदुति तेज छिप जात है। महावैराग परिणाम ठहरात है। बयन नहिं कहैं लखि होत सम्यकघरं । भौना सोरठा। नन्दीश्वर जिनधाम, प्रतिमामहिमा को कहे। 'द्यानत' लीनों नाम, यहै भगति सब सुख करै ।। १० ॥ ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणे द्विपंचा- शन्जिनालयस्थजिनप्रतिमाभ्यः पूर्णाध्यं निर्वपामीति स्वाहा । (अर्यके वाद विसर्जन करना चाहिये।) चतुर्विशतितीर्थ कर निर्वाणक्षेत्रपूजा । सोरठा। परम पूज्य चौवीस, जिहं जिहं थानक शिव गये। सिद्ध भूमि निशदील, मनवचतन पूजा करौं ॥१॥ ॐही चतुर्विंशतितीर्थंकरनिर्वाणक्षेत्राणि! अत्र अवतरत अवतरत । संवौषट् । ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थकरनिर्वाणक्षेत्राणि! अत्र तिष्ठत तिष्ठत । 3. ॐ हीं चतुर्विंशतितीर्थंकरनिर्वाण जैन-ग्रन्थ-माला। १६७ क्षेत्राणि अत्र मम सन्निहितानि भवत भवत । वषट् । गीता छंद। शुचि क्षीरदधिसम नीर निरमल, कनकझारीमें भरौं। संसारपार उतार स्वामी, जोर कर विनती करौं । सम्मेदगिरि गिरनार चंपा, पावापुरि कैलासकौं। पूजों सदा चौवीसजिननिर्वाणभूमिनिवासकौं ॥१॥ ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो जलं निर्वपा- मीति स्वाहा ॥१॥ केसर कपूर सुगंध चंदन, सलिल शीतल विस्तरौं। भवपापको संताप मेटी,जोर कर विनती करौंसम्मे॥२॥ ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो चंदन निर्व- पामीति स्वाहा ॥२॥ मोतीसमान अखंड तंदुल, अमल मानंदधरि तरौं। औगुनहरौगुनकरौ हमको, जोरकर विनती करौं।सम्मेंगा३ ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो अक्षतान् नि- चंपामीति स्वाहा ॥३॥ शुभफूलरास सुवासवासित, खेद सब मनकी हरौं। दुखधाम काम विनाश मेरो,जोर कर विनती करौं।सम्मे४ ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो पुप्पं निर्वपा- मीति स्वाहा ॥४॥ नेवज अनेकप्रकार जोग, मनोग धरि भय परिहरौं । यह भूखदुखन सारि प्रभुजी,जोर कर विनती करौंसम्मे॥५ ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो नैवेद्य निर्व- पामीति स्वाहा ॥५॥ दीपक प्रकाश उजास उजल, तिमिरसेती नहि डरौं संशयविमोहविमरम-तमहर,जोरकर विनती करौं।सम्मे०६ . जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ॐ ह्रीं चतुर्विशतितीर्थंकरनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो दीपं निर्वपा- मीति स्वाहा ॥६॥ शुभ धूप परम अनूप पावन, भाव पावन चरौं । सब करमपुंज जलाय दीजे, जोर कर विनती करौं।सम्मेलन ॐ ही चतुर्विंशतितीर्थकरनिर्वाणक्षेनेभ्यो धूपं निर्वपा- मीति स्वाहा ॥७॥ बहु फल मँगाय चढ़ाय उत्तम, चारगतिसों निरवरौं। निहचैमुकतफल देहु मोकौं,जोर कर बिनती करौं।सम्मेव्दा ॐ हीं चतुर्विंशतितीर्थंकरनिर्वाणक्षेत्रेभ्यः फल निर्वपा- मीति स्वाहा ॥८॥ जल गंध अक्षत फूल चरु फल, दीप धूपायन धरौं। 'द्यानत'करो निरभय जगततै,जोर कर विनतीक सम्मे०॥ ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो अध्यं निर्व- पामीति स्वाहा ॥६॥ अथ जयमाला। सोरठा। श्रीचौवीसजिनेश, गिरिकैलासादिक नमों तीरथमहाप्रदेश, महापुरुषनिरवाणते ॥१॥ चौपाई १६ मात्रा। नमों रिषभ कैलास पहारं । नेमिनाथगिरिनार निहारं ॥ वासुपूज्य चंपापुर चंदौं। सनमति पावापुर अभिनंदौं ॥२॥ चंदौं अजित- अजितपददाता । चंदौं संभवभवदुखधाता ।। चंदौं अभिनंदन गणनायक । वंदौं सुमति सुमतिके दायक ॥३॥ बदौं पदम मुकतिपदमाधर । वंदौं सुपार्स आशपासा हर ॥ वंदौं चंदप्रम प्रभु चंदा । वंदौं सुविधिसुविधिनिधिकंदा ॥४॥ चंदौं शीतल अघतपशीतल । वंदौं श्रियांसश्रियांसमहीतल ॥ .

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। १ वंदौं विमल चिमल उपयोगी। चंदौं अनंत अनंत सुखभोगी।५॥ चंदौं धर्म धर्म विसतारा । वंदौं शांति शांत मनधारा ।। चंदौं कुंथु कुंथरखवालं । वंदौं भरि अरिहर गुनमालं ॥६॥ चंदौ मलि काममल चूरन । चंदौं मुनिसुव्रत व्रतपूरन ॥ वंदौं नमि जिन नमितसुरासर । वंदौं पास पासनमजरहर ॥७॥ वीसों सिद्धभूमि जा ऊपर, सिखर समेद महागिरिभूपर । एकवार वंदै जो कोई । ताहि नरक पशुगति नहिं होई ॥८॥ नरगतिनृप सुर शक कहावै । तिहुँ जग भोग भोगि शिवपावै॥ विधनविनाशक मंगलकारी । गुण विलाल वंदे नरनारी ॥६॥ छंद घत्ता। जो तीरथ जावै पाप मिटावै। ध्यावेगाचे भगति करे। ताकोजस कहिये संपति लहिये,गिरिके गुणको बुधउच॥१०॥ ॐ हो चतुर्विंशतितीर्थंकरनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो अयं निर्य- पामीति स्वाहा॥ । अकृत्रिमचैत्यालयपूजा। चौपाई। आठ किरोड़ रु छप्पन लाख | सहस सत्याणव चतुशत भाख ॥ जोड़ इक्यालो जिनवर थान । तीन लोक आह्वान करान ॥१॥ ॐ ह्रीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिषट्पञ्चाशल्लक्षसप्त- नवतिसहस्रवतु शतकाशोति अकृत्रिमजिनचैत्यालयानि मत्रा- वतरतावतरत । संचौपट् । ॐ ह्रीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिषटपंचाशल्लक्षसप्त- नवतिसहस्रचतु शतकाशीतिअकृत्रिमजिनचैत्यालयानि । अत्र तिष्ठत तिष्ठत । 3.3।

२०० जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ॐ हीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिपटपंचाशल्लक्षसप्त- नवतिसहस्रचतुःशतकाशीतिअकृत्रिमजिनचैत्यालयानि अत्रमम सन्निहितानि भवत भवत वषट् । छन्द त्रिमंगी। छीरोदधिनीर, उज्जल सारं, छान सुचीरं, भरि झारी। अति मधुरलखावन, परम, सुपावन,तृषा वुझावन,गुण भारी ।। घसुकोटिं सु छप्पन लाख सताणव, सहस चारसत इक्यासी। जिनगेह अकीर्तिम तिहुँजगभीतर, पूजत पद ले अविनाशी ॥५॥ ॐ ह्रीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिषट्पंचाशल्लक्षसप्त- नवतिसहस्रचतुःशतकाशीतिअकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो जल निर्वपामि ॥१॥ मलयागर पावन, चन्दन वावन, तापवुझावन, घसि लीनो। धर कनककटोरी, बैकर जोरी, तुमपदभोरी, चित दीनोवसु० ॐ ह्रीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिषट्पंचाशल्लक्षसप्त- नवतिसहस्रचतुशतकाशीतिअकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो चंदन निर्वपामि ।।२॥ बहुभांति अनोखे, तन्दुल चोखे, लखि निरदोखे, हम लीने । धरि कंचनथाली, तुमगुणमाली, पुअविशालो कर दीने ॥वसु०॥ ॐ हीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिषट्पंचाशल्लक्षसप्त- नवतिसहस्रचतु शतकाशीतिअकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो अक्ष- तान निर्वपामि ॥३॥ शुभ पुष्प सुजाती, है बहुभांती, अलि लिपटाती, लेय वरं। धरि कनक-रकेबी करगह लेवी, तुमपद जुगकी, भेट धरं ।। वसुकोटि सुछप्पन, लाख सताणव, सहस चारसत, इक्यासी। जिनगेह अकीर्तिम तिहुँजगभीतर,पूजत पद ले, अविनाशी ॥४॥ ॐ ह्रीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिषट्पंचाशल्लक्षसक्ष- .

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २०१ नवतिसहनचतुःशतकाशीतिअकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यः पुष्प निर्वपामि ॥४॥ खुरमा गिदौड़ा; घरफी पेड़ा, घेवर मोदक, भरि थारी विधिपूर्वक कोने, धृतमयभीने, संडमेंलीने, सुखकारी वसु०॥ ॐ ह्रो त्रैलोक्यसम्वन्ध्यष्टकोटिपटपंचाशल्लक्षसप्त- नवतिसहस्रचतुःशतकाशीतिअकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो नैवेय निर्वपामि ॥५॥ मिथ्यात महातम, छाय रहो हम, निजभव परणति, नहिं सूजे। इहकारण पार्क, दीपसजाके, थाल धराकै, हम पूजें वसुगाक्षा ॐ हीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यप्टकोटिपटपंचाशल्लक्षप्त- नवतिसहस्रचतुःशतकाशीति अकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो दीपं निर्वपामि ॥६॥ दशगंध फुटा, धूप बना, निजकर लेके, धरि ज्वाला। तसु धूम उड़ाई, दशदिश छाई,वहु महकाई, अति आला वसु० ॐ ह्रीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिपटपंचशल्लक्षसप्त- नवतिसहस्रचतुःशतकाशीति अकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो धूपं निर्वपामि ।।७॥ पादाम छुहारे, श्रीफल धारे, पिस्ता प्यारे, दाखवरं। इन आदि अनोखे,लखि निरदोखे,थापलजोखे,मेट घरं ॥वसु०॥ ॐ ह्रीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिपटपंचाशल्लक्षसप्त- नवतिसहस्रचतुःशकाशीति अकृत्रिमजिमचैत्यालयेभ्यः फलं निर्वपामि ॥ ८॥ जळ चंदन तंदुल, कुसुमरुनेवज, दीप धूप फल, थाल रचौं । जयघोष कराऊं, बीन बजाऊं, अर्ध चढ़ाऊ, सुख नचौं वसु०॥ ॐ ह्रीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिपटपंचाशल्लक्षसप्त- नवतिसहस्रचतुःशतकाशीतिभकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो अध्य २०२ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। . निर्वपमि ॥६॥ अथ प्रत्येक अर्थ। चौपाई। अधोलोक जिनागमसाख । सात कोडि अरु चहतरलाख ॥ श्रीजिनभवनमहा छवि देइ । ते सब पूजौं वसुविध लेइ ॥१॥ केही मध्यलोकसम्बन्धिसप्तकोटिद्विसप्ततिलक्षाकृत्रिम श्रोजिनचैत्यालयेभ्यो अध्यं निर्वपामि ॥१॥ मध्यलोकजिनमन्दिरठाठ । साढ़े चारशतक अरु आठ॥ ते सब पूजा अर्घ चढ़ाय । मनवचतन त्रयजोग मिलाय ॥२॥ ॐ ह्रीं मध्यलोकसम्बन्धिचतुःशताष्टपञ्चाशतश्रीजिन- चैत्यालयेभ्यो अयं निर्वपामि ॥२॥ अडिल्ल। उर्द्धलोकमाहिं भवनजिन जानिये । लाख चौरासी सहस सत्यानव मानिये ।। ताप धरि तेईस जजौं शिरनायके । कंचनथालमझार जलादिक लायक ॥३॥ ॐ ह्रीं ऊर्द्धवलोकसम्बन्धिचतुरशीतिसप्तनवतिसहस्त्र- त्रयोविंशतिश्रीजिनचैत्यालयेभ्यो अर्घ्यम् ॥ ३ ॥ गीताछन्द। वलुकोटि छप्पनलाख ऊपर, लहससत्याणव मानिये। सतच्यार गिन ले इक्यासी, भवनजिनवर जानिये ।। तिहुँलोकभीतर सासते, सुर असुर नर पूजा करें। तिन भवन को हम अर्घ लेके, पूजि हैं जगहुँख हरें ॥४॥ ॐ ह्रीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिपटपंचाशलक्षसप्तनः जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २०३ वतिसहस्त्रवतु शतकशीतिअकृत्रिमजिन चैत्यालयेभ्यः पूर्णाऱ्या निर्वपामि ॥४॥ अथ जयमाला। दोहा। अब चरणों जयमालिका, सुमा भव्य चित लाय । जिनमन्दिर तिहुँ लोकके, देहुँ सकळ दरसाय ॥१॥ पद्धड़िछंद। जय अमल अनादि अनन्त जान । अनिमित सु अफी- तम अचल मान । जय अजय अखएड अरूपधार । पट द्रव्य नहीं दीसे लगार ॥ २ ॥ जय निराकार अधिकार होय । राजत अनन्तपरदेश सोय । जय शुद्ध सुगुण अवगाहपाय । दशदिशामांहि इहविधि लखाय ॥३॥ यह भेद अलोकाझाश जान । तामध्य लोक नम तीन मान ॥ स्वयमेव वन्यो अविचल अनंत । अविनाशि अनादिनु कहत संत ॥४॥ पुरुपायकार ठाडो निहार । कटि हाथ धारिदै पग पसार ॥ दच्छिन उत्तरदिशि सर्व ठौर। राजू जुसात भाख्यो निचोर ॥५॥ जय पूर्व अपर दिशि घाटवाधि। सुन कथन कहताको जुसाधि|| लखि श्वभूतलें राजूजु सात । मधिलोक एक राजू रहात ॥६॥ फिर ब्रह्मसुरग राजु जु पांच भू सिद्ध एक राजू जु सांच ॥ दश चार ऊंच राजु गिनाय । पटद्रव्य लये चतुकोण पाय||७n तत्वातवलय लपटाय तीन । इह निराधार लखियो प्रवीन ।। वसनाड़ी तामधि जान खास । चतुकोन एक राजुजु व्यासा॥ राजू उतंग चौदह प्रमान | लखि स्वयंसिद्ध रचना महान ॥

२०४
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
तामध्य जीव त्रस आदि देय । निज थान पाय तिष्ठे भलेया॥
लखि अधोभागमें शुभ्रथान । गिन सात कहे आगम प्रमान ॥
षटथानमाहिं नारकि बसेय । इक शुभ्रभाग फिर तीन भेय ॥१०॥
तसु अधोभाग नारकि रहाय पुनि ऊर्द्धभाग द्वव थान पाय ॥
बस रहे भवन व्यंतरजु देव । पुर हर्म्य छजै रचना स्वमेव॥११॥
तिह थान गेह जिनराज भाख । गिन सातकोटि बहतर जुझाख॥
ते भवन नमों मनवचनकाय । गतिशुभ्रहरनहारे लखाय ॥१२॥
पुनि मध्यलोक गोलाकार लखि दीप उदधिरचना विचार॥
गिन असंख्यात भाखे जुसंत । लखिशंभुरमन सबके जुअंत॥१३॥
इक राजुव्यास में सर्व जान । मधिलोकतनों इह कथन मान ॥
सबमध्य दीप जंबू गिनेय । त्रयदशम रुचिकवर नाम लेय ॥१४॥
इन तेरहमें जिमधाम जान | सतचार अठावन हैं प्रमान ॥
खग देव असुर नर आय आय । पद पूज जाँय शिर नाय ॥१५॥
जय उर्द्धलोकसुरकल्पवास । तिह थान छजे जिनभवन खास ॥
जय लाखचुरासीपलखेय । जय सहस सत्याणव और ठेय॥१६॥
जय बीसतीन फुनि जोड़ देय । जिनभवन अकीर्तम जान लेय ॥
प्रतिभवन एक रचना कहाय । जिनवि एकसत आठ पाया॥१७॥
शतपंच धनुष उन्नत लसाय । पदमासनजुत पर ध्यान लाय॥
शिरतीनछत्रशोभितविशालात्रय पादपीठ मणिजडितलाल॥१८
भामंडलकी छवि कौन गाय । फुनि चवर दुरत चौसठ लखाय॥
जय दुंदुमिरव अदभुत सुनाय । जयपुष्पवृष्टि गंधोदकाय ॥१॥
जय तमअशोक शोभा भलेय । मंगल विभूति राजत अमेय ।।
बटतूप छजे मणिपाल पाय । घटधूपधून दिग सर्व छाय ॥२०॥
जय केतुपंक्ति सोहै महान । गंधर्वदेव गुन करत गान ।
सुर जनम लेत लखि अवधि पाय । तिस थान प्रथम पूजन
कराय ॥२१॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २०५ जिनगेहतणा वरनन अपार । हम तुच्छवुद्धि किम लहत पार ॥ जयदेव जिनेसुर जगत भूष । नमि नेम' मंगै निज देहरूपा॥२२॥ दोहा। तीनलोकमें सासते, श्रीजिनभवन विचार ॥ भनवचतन करिशुद्धता, पूजा अरघ उतार ॥ २३ ॥ ॐ ह्रीं त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटिपटपंचाशल्लक्षसप्तन- वतिसहनचतु शतकाशीतिअकृत्रिमश्रीजिनचैत्यालयेभ्यो अर्घ्य निर्वपामि ॥ २३॥ (यहां विसर्जन भी करना चाहिये। कवित्त । तिहुँ जगमीतर श्रीजिनमंदिर, बने अकोर्सम अति सुखदाय । नर सुर खग करि वंदनोक जे, तिनको भविजन पाठ कराय ।। धनधान्यादिक संपति तिनके, पुत्रपौत्र सुख होत भलाय । चक्री सुर खग इंद्र होयके, करम नाश सिवपुर सुख थाया॥२४॥ ( इत्याशीर्वादाय पुप्पांजलिं क्षिपेत् ।) देव पूजा । दोहा। प्रभु तुम राजा जगतके, हमें देय दुम्न मोह । तुम पद पूजा करत हूँ, हम करना होहि ॥१॥ ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहितषट्चत्वारिंशद्गुणसहितश्री- जिनेन्द्रभगवन् अत्र अवतरावतर । संघौषट् । * ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहितपट्चत्वारिंशद्गुणसहितश्री- • संवोपडिति देवोहदेशेन हवित्यागे।

२०६ जैन-ग्रन्य-संग्रह। जिनेन्द्रभगवन् अत्र तिष्ठ तिष्ठ 18:31+ ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहितपट्चत्वारिंशद्वगुणसहितश्री- जिनेन्द्रभगवन अत्र मम सन्निहितो भव भव! वपट् ।। छंद त्रिभंगी। बहु तृषा सतायो, अति दुख पायो, तुमपै आयो जल लायो। उत्तम गंगा जल, शुचि अति शीतल, शाशुक निर्मल, गुन गायो प्रभु अंतरजामी, त्रिभुवननामी, सबके स्वामी दोप हरो। यह अरज सुनीले, ढोल न कीजै, न्याय करीजै, दया धरी॥१॥ ॐ ह्रीं अष्टादशदापरहितषट्चत्वारिंशवगुणसहितश्री- जिनेन्द्रभगवद्भ्यो जन्माजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ अघतपत नरिंतर, अगनिपटंतर, मो उर अंतर, खेद कर्यो । लै बावन चंदन, दाहनिकंदन, तुमपदचंदन, हरष धर्यो॥प्रभु०॥ ॐ ह्रीं अष्टादशदापरहितषट्चत्वारिंशद्गुणसहितश्री- जिनेभ्यो भवतापनाशाय चन्दनं ॥२॥ औगुन दुखदाता, कयो न जाता, मोहि असाता, बहुत करै । रंदुल गुनमंडित,अमल अखंडित,पूजत पंडित,प्रीति धरौप्रभु ॐ ह्रीं अष्टादशदोपरहितषट्चत्वारिंशसद्गुणसहित- श्रीजिनेभ्योअक्षयपदप्रातये अक्षतान निर्वपामीति ॥ ३ ॥ सुरनर पशु को दल, काममहावल, वात कहत छल, मोह लिया। ताके शर लाऊ फूल चढ़ाऊ, भगति बढ़ाऊं, खोल हिया ॥ प्रभु ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहितषट्चत्वारिंशद्गुणसहितश्री- जिनेभ्याकामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामि ॥ ४ ॥ + ठ: 3: इति वृहद्वनौ । विदिति देवाहदेश्यकहविस्त्यागे।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
२०७
सब दोषनमाहीं, जासम नाहीं, भूख सदा ही मो लागे।
सद घेवर वावर, लाडू वहुधर, थार कनक भरतुमागें ॥ प्रभु
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहितषट्चत्वारिशद्गुणसहितश्री-
जिनेभ्योक्षु द्रोगनाशाय नैवेद्य ॥५॥
अज्ञान महातम, छाय रह्यो मम, ज्ञान ढक्यो हम, दुख पावै ।
तम मेटनहारा, तेज अपारा, दीप संवारा, जस गावै ॥ प्रभु०॥
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहितषट्चत्वारिंशद्गुणसहितश्री-
जिनेभ्योमोहान्धकारथिनाशाय दीपं निर्वपामि ॥ ६ ॥
इह कर्म महावन, भूल रह्यो जन, शिवमारग नहिं पावत है ।
कृष्णागरुधूप, अमलअनूप, सिद्धस्वरूपं, ध्यावत है।
प्रभु मंतरयामी, त्रिभुवननामी, लव के स्वामी, दोप हरी ।
यह अरज सुनोज, ढील न कीजै, न्याय करीजै, दया धरो॥७॥
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहितषट्चत्वारिंशद्गुणसहितश्री-
जिनेभ्योभएकर्मदहनाय धूपं० ॥७॥
सवतें जोरावर, अंतराय अरि, सुफल विघ्न करि डारत हैं।
फलपुंज विधि भर,नयनमनोहर,श्रीजिनधरपद धारत हैं ।प्र०
ॐ ह्रीं अष्टदशदोषरहितषट्चत्वारिंशद्गुणसहितश्री-
जिनेभ्योमोक्षफलप्राप्तये फलं० ॥८॥
आठौं सुखदानो, आठनिशानी, तुम ढिग आनी, बारन हो।
दीनननिस्तारन,अधमउधारन, धानत.'तारन,कारन हो ॥प्रभु०
ॐ ह्रीं अष्टादशदोशरहितषट्चत्वरिंशद्गुणसहितश्री-
जिनेन्द्रभगवद्भ्येऽनर्धपदप्राप्तयेअर्धनिर्वपामीतिस्वाहा ॥६॥
नथ जयमाला।
-
.
दोहा।
गुण अनन्त को कहि सके, छियालीस जिनराय ।
प्रगट मुगुन गिनती कहूं, तुम ही होहु सहाय ॥ ५ ॥

२०८
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
चौपाई (१६ मात्रा)
एकं ज्ञान केवल जिन स्वामी । दो आगम अध्यातम नामी॥
तीन काल विधि परगट जानी । चार अनन्तचतुष्टय छानी ॥२॥
पंच परावर्तन परकासी। छहों दरवगुनपरंजयमासी ।
सातभंगवानी परकाशक । आठों कर्म महारिपुनाशक ॥ ३ ॥
नव तत्त्वनकै भावनहार । दश लच्छनौं भविजन तारे।
ग्यारह प्रतिमा के उपदेशी । बारह सभा सुखी अकलेशी ॥४॥
तेरहविधि चारित के दाता | चौदह मारगना के ज्ञाता ॥
पंद्रह भेद प्रमादनिवारी । सोलह भावन फल अधिकारी॥
तारे सत्रह अंक भरत भुव । ठार थान दान दाता तुव ॥
भाव उनीस जु कहे प्रथम गुन । वीस अंकगणधरजीकी धुना॥
इकइस सर्व घातविधि जानै । वाइस बध नवम गुन थाने ।
तेइस निधि अरु रतन नरेश्वर सोपूजै चौवीस जिनेश्वर ॥॥
नाश पचीस काय करी हैं। देशघाति छब्बीस हरी हैं।
तत्त्व दरख सत्ताइस देखे । मति विज्ञान अठाइस पेखे ॥८॥
उनतिस अंक मनुष सब जाने । तीस कुलाचल सर्व बखाने ।
इकतिस पटल सुधर्म निहारे । बत्तिस दोष समाइक टारे ॥६॥
तेतिस सागर सुखकर आये। चोतिस भेद अलब्धि बताये।
पैंतिस अच्छर जप सुखदाई । छत्तिस कारन-रीति मिटाई॥१०॥
सैंतिस मग कहि ग्यारह गुनमें । अठतिस पद लहि नरक भपुनमें
उनतालीस उदीरन तेरम । चालिस भवन इंद्र पूर्फ नम ॥११॥
इकतालीस भेद आराधन । उदै वियालिस तीर्थंकर भन ।
तेतालीस बंध ज्ञाता नहिं । द्वार चवालिस नर चौथेमहि ॥१२॥
पैतालीस पल्य के अच्छर । छियालीस बिन दोष मुनीश्वर ॥
नरक उदै न छियालील मुनिधुन । प्रकृति छियालीस नाश
दशम गुन ॥ १३॥

जैन-अन्ध-संग्रह। छियालीसघन सजुसाज भुवामंक छियालीस सिरसों कहिकुव भेद छियालीस अंतरतपवर। छियालीस पूरन गुनजिनवर॥१५॥ अडिल्ल । मिथ्या तपन निवारन चंद समान हो। मोहतिमिर चारनको कारन भान हो। काल कपाय मिटावन मेघ मुनीश हो। 'यातन' सम्यकरतनत्रय गुनईश हो ॥१॥ ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहितषट्चत्वारिंशद्गुणसहितश्री- जिनेन्द्रभगवन्धो पूर्णाऽघं निर्वपामि ॥ (पूर्णाध्यके वाद विसर्जन करना चाहिये) अति श्रीजिनेन्द्रपूजा समाप्ता। सरस्वती पूजा। दोहा। जनम जरा मृतु छय करे, हरै कुनय अड़रीति । भवसागरसों ले तिरै, पूर्जे जिनवचप्रीति ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतिवाग्वादिनि ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ । 3:3। अत्र मम सन्निहितो भवभव ।। वषट् । त्रिभगी। छीरोदधि गंगा, विमल तरंगा, सलिल अभंगा, सुखगंगा। भरि कंचन झारी,धार निकारी तृखा निवारी, हित चंगा। तीर्थकरकी धुनि, गनधरने सुनि, अंग रचे चुनि, ज्ञानमई । सो जिनवरंबानी, शिवसुखदानी, त्रिभुवन मानी, पूज्य भई॥५॥ .

२१० जैन-प्रत्य-संग्रह। ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखौढभवसरस्वतीदेव्यै जलं निपामि इति स्वाहा ॥१॥ करपूर मंगाया, चंदन आया, केशर लाया, रंग भरी। शारदपद वंडों, मन अभिनंदों, पापनिकदी, दाह हरी॥तीर्थाशा ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखानुभवसरस्वतीदेव्य चन्दनं निर्व- पामीति स्वाहा ॥२॥ सुखदास कमाई, धारकमाद, अतिअनुमोद, चंदसमं । बहुभक्ति बढ़ाई, कीरति गाई, होहु सहाई, मातममातीर्थ०३॥ ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै अक्षतान् निर्व- पामि ॥३॥ बहुफूलसुवासं, विमलप्रकाश, आनंदरासं, लाय धरै । मम काममिटायौ,शील बढ़ायौ,सुख उपजायी,दोपहरातीर्थधा ॐहीश्रीजिनमुखानुभसरस्वतीदेव्यै पुष्पं निर्बपामिया पकवान बनाया,बहुत लाया,सब विद्यमाया, मिष्ट महा। पूजू थुति गाऊं. प्रीति बढ़ाऊं, क्षुधा नशाऊं, हपं लहातीर्थंला ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै नैवेद्य निर्व- पामि ॥५॥ करि दीपक ज्योतं, तमक्षय होतं, ज्योति उदोतं, तुमहिं चढ़े। तुम होपरकाशक,भरमविनाशक,हमघट भासक,शान बढ़तीर्थ. ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै दीपं निर्व- पामि॥६॥ . शुभगंध दशोंकर, पावको घर, धूप मनोहर, खेवत हैं। सब पाप जलाईं,पुण्य कमा,दास कहावे,खेवत हैं तीर्थ ॐह्रीं श्रीजिनमुखोड्भवसरस्वतीदेव्यै धूपं निर्वामिun बादाम छुहारी, लोंग सुपारी, श्रीफल भारी, ल्यावत हैं। मनवांछित दाता, मेट असाता, तुम गुनमाता, ध्यावत हाती . जैन-प्रन्थ-संग्रह। २११ करें। ॐहींधीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै फलं निर्वामि॥॥ नयननसुखकारी, मृदुगुनधारी, उज्वलभारी मोल धरै। सुभगंधसम्हारा, घसननिहारा, तुमतर धारा, ज्ञान तीर्थंकरकी धुनि, गनधरने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञानमई। सो जिनवरवानी, शिवसुखदानी, त्रिभुवनमानी, पूज्य भई ॥३॥ ॐहीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै वस्त्रं निर्वपामि। जलवंदन अच्छत, फूलचाचत, दीप धूप अति, फल लावै । पूजाको ठानत, जो तुम जानत, सो नर धानत, सुख पावै । तीर्थ ॥१०॥ ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखानुभवसरस्वतीदेव्यै अध्यं निर्व- पामि ॥१०॥ प्रय जयमाला। सोरठा । मोङ्कार धुनिसार, द्वादशांग वाणी विमल। नौं भकि उर धार, शान करै जड़ता हरे॥ वेसरी। पहला आचारांग वखानी। पद अष्टादश सहस प्रमानो। दूजा सूत्रकृतं अभिलाषं । पद छत्तीस सहस गुरु भाषं ॥१॥ तीजा डाना अंग सुजानं । सहस वियालिस पदसरधानं ॥ चौधो समवायांग निहारं । चौसठ सहस लाख इकधारं ॥२॥ पंचम व्याख्याप्रगपति दरश । दोय लाख अट्ठाइस सहसं । छट्ठा ज्ञातृकथा विस्तारं। पांचलाख छप्पन हज्जारं ॥ ३ ॥ सप्तम उपासकाध्ययनंगं । सत्तर सहस ग्यारलख भंग । अम अन्तकृतंदस ईस । सहस अठाइस लाख तेइस ॥ ४ ॥ नवम अनुत्तरदश सुविशालं । लाख पानचे सहस.चवाल ।

२१२ जैन-अन्ध-संग्रह। . दशम प्रश्नव्याकरण विचारलाख तिरानवै सोलहजारं ॥५॥ ग्यारम सूत्रविषाक सु भाखें । एक कोड़ चौरासी लाखें । चार कोडि अरु पन्द्रह लाखं। दो हजार सब पद गुरुशाख ॥६॥ द्वादश दृष्टिवाद पनभेदं । इकसौ आठ कोड़ि पन वेदं । अड़सट लाख सहस छप्पन हैं। सहित पंचपद मिथ्याहन हैं ॥७॥ इक सौ बारह कोडि बखानी । लाख तिरासी ऊपर जानी। ठावन सहस पंच अधिकाने । द्वादश अंग सर्व पद माने ॥८॥ कोड़ि इकावन आठहि लाखं । सहस चुरासी छहसौ भाखं ॥ साढ़े इकीस शिलोक बताये। एक एक पद के ये गाये ॥ १ ॥ घत्ता जा बानो के ज्ञान में, सूझ लोक अलोक।. धानत 'जग जयवंत हो, सदा देत हों धोक ॥ श्रीजिनमुखोद्गतसरस्वत्यै देव्यै पूर्णायँ निर्वपामि । इति सरम्वतीपूजा RE गुरुपूजा। दोहा चहुँ गति दुखसागरविणे, तारनतरनजिहाज । रतनत्रयनिधि नगर तन, धन्य महा मुनिराज ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीआचार्योपाध्यायसर्वसाधुगुरुसमूह ! अत्रा- परतावतर संवौषट् । ॐ ह्रीं श्रीभाचार्योपाध्यायसर्वसाधुगुरुसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ।। ॐ ह्रीं श्रीआचार्योपाध्यायसर्वसाधुगुरुसमूह! भत्र जन-ग्रन्थ-संग्रह। मम सन्निहितो भव भव । वषट् । गीता छन्द। शुचि नीर निरमल छोरदधिसम, सुगुरु चरन चढ़ाइया । तिहुं धार तिहुँ गदटार स्वामी, अति उछाह बढ़ाइया । भवभोगतनधैराग धार, निहार शिव तप तपत हैं। तिहुँ जगतनाथ भराधु साधु नु, पूज नित गुन. जपत हैं ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीभाचाचार्योपाध्यायसर्वसाधुगुरुभ्यो जलं नि० ॥१॥ फरपूर चंदन सलिलस घसि, सुगुरुपद पूजा करौं। सब पाप ताप मिटाय स्वामी, धरम शीतल विस्तरौं। भवभोगतनवैराग धार निहार, शिवतप तपत हैं। तिहुं जगतनाथ अराध साधु सु, पूज नितगुन जपत है ॥२॥ ॐ ह्रीं आचार्योपाध्याय सर्वसाधुगुरुभ्यो भवतापधि- नाशनाय चन्दनं नि० झिनवा कमाद सुवास उनल, सुगुरुपगतर धरत हैं। गुनकार औगुनहार स्वामी, वंदना हम करत हैं ।भव भो॥३॥ ॐ ह्रीं आचार्योपाध्यासर्वसाधुगुरुभ्योऽक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि० शुभफूलरासप्रकाश परिमल, सुगुरुपायनि परत हों। निरवार मार उपाधि स्वामी, शीलदिढ़ उर धरत होंभवonा ॐ हीं आचार्योपाध्यायसर्वसाधुगुरुभ्यः कामवाण- विध्वंसनाय पुष्पं नि० पकवान मिष्ट सलौन सुन्दर, सुगुर पायन प्रीतिसौं। कर क्षुधारोग विनाश स्वामी,सुधिर कीजे रीतिसौं।मव०॥५॥ ॐ ह्रीं आचार्योपाध्यायसर्वसाधुगुरुभ्यः क्षुधारोग- विनाशनाय नैवेद्य निक - २१४ जैन-प्रन्य-संग्रह। दीपक उदात सजोत जगमग, सुगुरुपद पूजों संदा। तमनाश ज्ञान उजास स्वामी, मोहि मोह न हो कदमव०॥क्षा ॐ ह्रीं आचार्योपाध्यायसवंसाधुगुरुभ्यो मोहान्धकार- विनाशनाय दीपं नि दहु अगर आदि सुगंध खेऊ, मुगुण पद पदमहि खरे। दुख पुंज काट जलाय स्वामी, गुण अछय चितमें घाभव०॥७॥ ॐ ह्रीं आचार्योपाध्यायसर्वसाधुगुरुभ्योऽष्टकर्मदहनाय धूपं नि० ॥७॥ भर थार पूर बदाम बहुविधि, सुगुरक्रम आगे धरों। मंगल महाफल करोस्वामी, नोर कर विनती करोंगभव०॥८ ॐ ह्रीं आचार्योपाध्यायसर्वसाधुगुरुभ्यो मोक्षफलप्रा- तये फलं निका जल गंध अक्षत फूल नेवज, दीप धूप फलावली। 'द्यानत' सुगुरुपद देहु स्वामी, हमाहि तार उतावलीमवाधा ॐ ही आचार्योपाध्यायसर्वसाधुगुरुभ्योऽनय॑पदप्राप्त ये अध्य निर्व॥६॥ अथ जयमाला। दोहा। कनककामिनी विषयवश, दीसै सब संसार । त्यागी वैरागी महा, साधु सुगुनभंडार ॥१॥ तीन घाटि नवकोड़ सव, वंदों सीसं नवाय । गुन तिन भट्टाईस लों; कहूँ भारती गाय ॥२॥ छंद. बेसरी। एक दया पालमुनिराजा, रागदोप द्वै हरन परं तीनों लोक प्रगट सब देखें, चारों माराधननिकरं ।

जैन-अन्ध-संग्रह। २१५ पंच महाव्रतदुद्धर धारें, छहो दरब जानै सुहितं । सातभंगवानी मन लावै, पावें आठ रिद्ध उचित ॥३॥ नवी पदारथ विधिसौं भावं, बंध दशो चूरन सरन । ग्यारह शंकर जानै माने, उत्तम चारह वृत धरनं । तेरहमेद काठिया चूरे, चौदह गुनथानक लखियं । महाप्रमाद पंचदश नाशे, सोलकपाय सबै नखियं ॥४॥ बंधादिक सत्रह सुतर लख, ठारह जन्म न मरन मुनं । एक समय उनइस परिपह, वीस प्ररूपनिमें निपुनं । भाव उदीक इकोसों जाने,वाइस अभखन त्याग करं । अहिमिदर तेईसों चर्दै, इन्द्र सुरग चौवीस वरं ॥५॥ पचीसों भावन नित भाव, छहसौ अंगउपंग पढ़ें। सत्ताईसों विषय विना”, अट्टाईसौं गुण सु बढ़े। शीतसमय सर चौपटवासी,प्रीपमगिरिसिरजोगधरें वर्षा वृक्ष तरै थिर ठाढ़े,आठ करम हनि सिद्धिव ॥६॥ दोहा। कहाँ कहाँ लो भेद मैं, बुध थोरी गुन भूर । हेमराज, सेवक हृदय, भक्ति करी भरपूर ॥ ७ ॥ भाचार्योपाध्यायसर्वसाधु गुरुभ्यो अयं निर्वपामि । इति गुरुपूना समाप्ता। nogome मक्सीपार्श्वनाथ पूजा। - दोहा । श्री पारस परमेशजी, शिखर शीर्ष शिवधार। यहां पूजता भाव से, थापनकर प्रयवार ।

२१६ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ॐ ह्रीं श्रीमक्सीपार्श्वजिनेभ्यो अत्रवत्रवतः सम्बोपरा- द्वाननं । अत्र तिष्ठ तिष्ठ :3: स्थापन ॥ अत्र ममसन्नहितो भव भव विषट् सन्धीसकरणं॥ अथाष्टकं । अष्टपदी छंद। लै निर्मल नीर सुजान, प्राशुक नाहि करों। मन वच तन कर वर आन, तुम ढिक धार धरों। श्री मक्सी पारसनाथ, मन बच ध्यावत हों। मम जन्म जरामृत्यु नाश, तुम गुण गावत हो । ॐ ह्रीं श्रीमक्सीपाश्वनाथ जिनेन्द्रेभ्यो जलं ॥१॥ घिस चन्दनसार सुवास, केसर ताहि मिले। मै पूजों चरण हुलासं, मन में आनन्द लै॥ श्री मक्सी पारसनाथ, मन वच ध्यावत हों। मम मेाहाताप विनाश, तुम गुण गावत हों ॥सुगंधा२॥ तन्दुल उज्ज्व अति आन,तुम ढिग पूज्य धरों। मुक्ताफलके उन्मान, लेकर पूज करों ॥ श्रीमक्सी पारसनाथ,मन बच ध्यावत हों। संसार वास निवार तुम गुण गावत हों ॥अक्षत॥३॥ ले सुमन विविधि के एव, पूजो तुम चरणा। हो काम विनाशक देव, काम व्यथा हरणा ॥ श्रीमक्सी पारसनाथ, मनं वच ध्यावत हों। मन वचतन शुद्ध लगाय, तुम गुण गावत हों। पुष्पाडा सजथाल सु नेवजधार,उज्ज्वल तुरत किया। लाडू मेवा अधिकार, देखत हर्ष हिया ॥ श्रीमक्सी पारसनाथ, मन घच पूजं फरों।

जैन-अन्य-संग्रह। - मम क्षुधा रोग निर्धार, चरणों चित्त धरोंनिवेद्य ॥५॥ अति उम्पल ज्योति जगाय, पूजत तुम चरणा। मम माहांधेर नशाय, आयो तुम शरणा॥ धीमक्सी पारसनाथ, मन यन्त्र ध्यावत हों। तुम हो प्रिभुवन से नाथ, तुम गुण गावत हो ॥ दीपं ॥६॥ पर धूप दशाग बनाय, सार सुगंध साही। अति हर्ष भाव हर ल्याय, अग्नि मझार दही ।। श्रीमक्सी पारसनाथ, मन बच ध्यावन हों। यसु फर्महि फोले क्षार, तुम गुण गावत हों ॥ धूपं ॥ ७ ॥ बादाम छुहारे दास, पिस्ता धोय धरों। ले आम अनार सुपफ, शुचिकार पूज करों ।। श्रीमक्सी पारसनाय, मन पर ध्यायत हो। शिवफल दीजे भगवान, तुम गुण गायत हों। फलं ॥८॥ जल मादिक द्रव्य मिलाय, असुविधि अर्घ किया। धर साज रलेषी ल्याय, नाचत हपहिया ।। श्रीमफ्सी पारसनाथ, मन पत्र ध्यावत हों। तुम भन्यों को शिव साथ, तुम गुण गायत हो। अर्घ ॥ ६ ॥ अडिल्ल। जल गंधाक्षत पुष्प लो नेवल ल्याय के। दीप धूप फल लेकर अर्ध चनायके ।। भाचोंगाय यजाय पं उपमारकर । पूरण अयं चढ़ाय सुजयजयकार फर ।। पूर्णाघ ॥ १० ॥ नयमाल। दोहा जयजयजय जिनरायगी, श्रीपारसपरमेश । गुण अनन्त तुम मांहि प्रभु, पर फछु गाळलेश ॥१॥ -

२२८
२१८०
जैन-प्रन्थ-संग्रह।
पद्धडि छन्द ।
श्रीवानारस नगरी महान । सुरपुर समान जानो
सुथान ॥ तहां विश्वसेन नामा सुभूप । वामादेवी रानी
अनूप ॥ २ ॥ आये तसु गर्भविर्षे सुदैव । वैशाखबदी दोइन
स्वयमेव | माता को सेवेसची आन । आशा तिनकी घर
शीश मान ॥ ३ ॥ पुनः जन्म भयो आनन्दकार । एकादशी
पौष वदी विचार ॥ तब इन्द्र आय आनन्द धार। जन्मा-
भिषेक कोनो सुसार ॥ ४ ॥ शतवर्ष तनी तुम आयु जान ।
कुंघरावय तीस वरस प्रमाण ॥ नव हाथ तुंग राजत
शरीर । तन हरित वरण साहै सुधीर ॥ ५॥ तुम उरग
चिन्ह वर उग सोइ । तुमराजऋद्धि भुगती न कोई ॥
तपधारा फिर आनन्द पाय । एकादशि पौष पदी सुहाय
॥६॥ फिर कर्म धातिया चार नाश । वर केवलज्ञान भयो
प्रकाश ॥ वदि चैत्र चौथि वेला प्रभात । हरि समोसरण
रचियो विख्यात ॥ ७ ॥ नाना रचना देखन सुयोग । दर्शन
को आवत भव्य लोग ।। सावन सुदि सप्तमि दिन सुधारि ।
तब विधि अघातिया नाश चारि ॥ ८॥ शिव थान लयो
वसुकर्म नाशि। पद सिद्ध भयो आनंदराशि ॥ तुम्हरी प्रतिमा
मक्सी मझार । थापी भविजन आनंदकार ॥६॥ तहां जुरत
बहुत भवि जीव आय । कर भक्तिभाव से शीश नाय ।।
अतिशय अनेक तहां होत जान । यह अतिशय क्षेत्र भी
महान ।। १० ॥ तहां आय भव्य पूजा रचात । कोई स्तुति
पढ़ते भांति भांति ॥ कोई गांवत गान कला विशाल ।
स्वरताल सहित सुन्दररसाल ॥ ११॥ कोई नाचतमन
आनन्द पाया तत थेई थेई थेई ध्वनि कराय ॥ छम छम
.

जैन-प्रन्थ-संग्रह।
नूपुर वाजत अनूप । अति नटत नाट सुन्दर सरूप ॥ १२ ॥
द्रम द्रुम द्रुमता बाजत मृदंग । सननन सारंगी बजति
सङ्ग ॥ शननन नन झल्लरि बजे सोइ । घननन घननन ध्वनि
घएट होइ ॥ १३ ॥ इस विधि भवि जीव करें आनन्द ।
लहें पुण्ययन्ध करें पापमन्द । हम भी बन्दन कीनो अवार।
सुदि पौष पञ्चमी शुक्रवार ॥ १४ ॥ मन देखत क्षेत्र बढ़ो
प्रयोग । सुरमिल पूजन कीनी सुलोग ॥ जयमाल गाय
आनन्द पाय | जय जय श्रीपारस जगति राय ॥ १५ ॥
पत्ता।
जय पार्श्व जिनेशम् नुत नाकेशम् चक्रधरेशम् ध्यावत हैं।
मन बच आरावें भव्य समाधे ते सुरशिवफल पावत हैं।
इत्याशीर्वादः ।
[इति श्रीमक्सीपार्श्वनाथपूजा सम्पूर्णम । ]
श्री गिरिनारक्षेत्र पूजा ।
दोहा।
बन्दों नेमि जिनेश पद, नेम धर्म दातार ।
नेम धुरन्धर परम गुरु, भविजन सुख कर्तार ॥१॥
जिनवाणी को प्रणमिकर, गुरु गणधर उरधार।
सिद्धक्षेत्र पूंजा रचों, सब जीवन हितकार ॥ २ ॥

जन-ग्रन्थ-संग्रह। उर्जयन्त गिरिनाम तल, कहो जगति विख्यात । गिरिनारी तासे कहत, देखत मन हर्षात ॥ ३ ॥ अडिल्ल। गिरि सुन्नत सुभगाकार है । पञ्चकूट उतंग सुधार है ।। वन मनोहर शिला सुहावनी । लखत सुंदर मन कोभावनी ॥४॥ और कूट अनेक वने तहां । सिद्ध थान' सुअति सुन्दर जहाँ । देखि भविजन मन हर्षावते । सकल जन यन्दन कोमावते ॥५॥ त्रिमगी बन्द । तहां नेम कुंमारा, व्रत तप धारा, कर्म विदारा, शिव पाई। मुनि कोडि यहत्तर, सात शतक धर, तागिरि ऊपर सुबदाई ॥ भये शिवपुरवासी, गुण के राशी, विधिथित नांशी, ऋद्धिधरा। तिनके गुण गाऊ, पूज रचाऊ, मन हर्षाऊ, लिद्धि करा ॥ दोहा । ऐसो क्षेत्र महान, तिहि पूजत मन बघ काय । स्थापत त्रय वारकर, तिष्ट तिष्ट श्त आय ॥ ॐ ह्रीं श्री गिरिनारि सिद्धिक्षेत्रेभ्यो । अत्र अत्रवतर सम्वौषटाहाननम् । अत्र तिष्ट तिष्ट - 3. स्थापनम् ॥ मत्र ममसन्नहितो भव भव वयट सन्धीकरण } प्रथाष्टकं । माधवी वा किरीट छन्द। लेकर नीरसुक्षीरसमान महा सुखदान सुप्रासुक भाई। देश्य धारजंजों चरणा हरना ममजन्मजरा दुःखदाई ।।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
गेम पती तज राजमती भये पालयती तहां से सिधपाई।
कोटि यात्तरि सातसा सिद्ध मुनीश भये सुजजों हरपाई ॥
ॐ ही श्रीगिरिनारि सिद्धक्षेत्रेभ्योः । जलं ॥१॥
चन्दनगिरि मिलाय सुगन्ध सु ल्याय फटोरी में धरना।
माद माहातप भेंटन फाजसी चचतु हो तुम्दर चरणा | नेमि-
पती ।। सुगन्धं ॥ २ ॥ अक्षत उज्ज्वल ल्याय धरों तहां
पुंज फरों मन फो पाई । देषु अक्षयपद प्रभु करणा कर
फेर गर्या भव पास फराई ॥ नेमपती० ॥ अक्षतम् ॥३॥
फूल गुलार चमेलो घेल कदम्य सुचम्पक तोर सुल्याई।
मागुरु पुष्प लपंग चढ़ाय सुगाय प्रभु गुणकाम नशाई ।।
नेमपती० ॥ पुष्पम् ॥ ४ ॥ नेयज नव्य करों भर थाल
मुकन्चन भाजन में घर भाई । मिष्ट मनोहर क्षेपत हों यह
रोग क्षुधा परियो जिनराई ॥ नेमपती० ॥ नैवेद्य ॥५॥
दीप पनाय धरों मणिका अथवा घृतवार्ति कपूर जलाई ।
नृत्य
फरोशर भारति ले मम मोहमदातम जाय पलाई ।।
नेमपती० ॥ दीपं ॥६॥ धूप. दशांग सुगन्ध मईकर खेषाणु
अग्नि मझार सुदाई। लोफर अजं सुनो जिनजी मन कर्म
महावन देउ जराई ॥ नेमपती० ॥धूपम् ॥ ७॥ ले फल सार
सुगंधमई रसनाद नेत्रन को सुम्प्रदाई । क्षेपत हों तुम्हरे
चरणा प्रभु ने हमें शिवकी ठकुराई । नेम-पती० ॥ फल८॥
ले घलु द्रव्यसु अर्थ फरों धरथाल सु मध्य महा हाई। पूजत
हो तुम्हरे चरणा हरिये वसुकर्म वली दुःखदाई ॥ नेमपती० ॥
अचं ॥६॥
दोहा।
पूजत हों घसुद्रव्य ले. सिद्धक्षेत्र सुखदाय ।
निजहित हेतु सुहावनो, पूर्ण अर्ध चढ़ाय ॥ पूर्णाधं ॥१०॥

२२२ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। R पंच कल्याणार्घ| पाइत्ता छंद। कार्तिक सुदिकी छठि जाना । गर्भागम तादिन मानो। उत इन्द्र जजे उस थानी । इत पूजत हम हर्षानी । ॐ ह्रीं कार्तिक सुदिछठि गर्भमंगल प्राप्तेभ्योःअधाशा श्रावण सुदि छठि सुखकारी। तब जन्ममहोत्सव धारी । सुरराजगिरिः अन्हवाई । हम पूजत इत सुख पाई ॥ ॐ ह्रीं श्रावण सुदी छठी जन्ममंगल धारणेभ्यो अघाशा सित सावनकी छठि प्यारी । तादिन प्रभु दिक्षाधारी । तप घोर वीर तहां करना । हम पूजत तिनके चरणा ॥ ॐ ह्रीं सावन सुदी छठि दिक्षा धारणेभ्यो अर्घ ॥३॥ एकम सुदि अश्विन मासा । तब केवल ज्ञान प्रकाशा । हरि समवशरण तव कोना । हम पूजत इत सुख लीना ।। ॐ ही आश्विनसुदीएकम केवलकल्याणप्राप्ताय||अघ||४ सित अष्टमि मास अपाढ़ा। तब योग प्रभुने छोड़ा। जिन लई मोक्ष ठकुराई । इत पूजत चरणा भाई ॥ ॐ ह्रींआषाडसुदी अष्टमी मोक्षमङ्गलप्राप्ताय ।।अघ॥५॥ अडिल्ल। कोड़ि बहतरि सप्त सैकड़ा जानिये । मुनिवर मुक्ति गये तहांसे सुप्रमाणिये ।। पूजो तिनके चरण सु मनवचकायके । वसुविधि द्रव्य मिलाय सुगाय वजायकोपूर्णा जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २२३ जयमाला दोहा। सिद्धक्षेत्र जग उच्च थल, सब जीवन सुखदाय । कहाँ तास जयमालका, सुनते पाप नशाय ॥१॥ पद्धड़ी छंद! जय सिद्धक्षेत्र तीरथ महान । गिरिनारि सुगिरि उन्नत वसान ॥ तहां झूनागढ़ है नगर सार । सौरष्ट्र देशके मध्य- सार ॥ २॥ जब झूनागढ़से चले सोई । समभूमि कोस पर तीन हाई ।। दरवाजेसे चल कोसाधं । एक नदी षहत हैजल अगाध ॥३॥ पर्वत उत्तर दक्षिण सुदाइ । मध्यनदी बहति उज्ज्वल सुताय ॥ ता नदी मध्य कई कुण्ड जान । दोनों तर मंदिर बने मान ॥४॥ तहां वैरागी वैष्णव रहाय । मिक्षा. कारण तोरथ करांय ॥ इक कोस तहां यह मचा ख्याल | आगे इक वरनदी नाल ॥५॥ तहां श्रावकजन करते स्नान । धोद्रव्य घलत आगे सुजान ॥ फिर मृगीकुंड इक नाम जान । तहां वैरागिन के बने थान॥६॥ वैष्णव तीर्थ जहां रची सोई। विष्णुः पूजत आनंद होइ ॥ आगे चल डेढ़सु कोश जाव । फिर छोटे पर्वतको चढ़ाव ॥ ७॥ तहां बंधी पैरकारी सुजान। चल तीन कोश भागे प्रमाण ॥ तहां तीन कुंड साई महान । श्रीजिनके युग मंदिर बखान ॥ ८॥ दिगाम्बर के जिनके सुथान । श्वेताम्बर के बहुते प्रमाण ॥ जहां बनी धर्मशाला सु जोइ । जलकुंड तहां निर्मल सुतीय ॥ ६॥ फिर आगे पर्वतपर चढ़ाव । चढ़ प्रथम कूटको चले जाव ॥ तहां दर्शनकर आगे सुजाय ।तहां द्वितिय टोंक का दर्श पाय ॥ १०॥ तहां नेमनाथ २२४ जैन-प्रन्थ-संग्रह। के चरण जान । फिर है उतार भारी महान ॥ तहां चढ़कर पंचम टोंक जाय । अति कठिन चढ़ाव तहां लखाय ॥११॥ श्रीनेमनाथका मुक्तिथान। देखत नयनों अति हर्षमान ॥ इक बिम्ब चरणयुग तहां जान । भवि करत वन्दना हर्ष ठान ॥१२॥ कोई करते जय जय भक्ति लाय । कोई स्तुति पढ़ते तहां बनाय ॥ तुम त्रिभुवन पति त्रैलोक्य पाल । मम दुःख दूर कोजे दयाल ॥१३॥ तुम राजऋद्धि भुगति न कोई। यह अधिररूप संसार जोई ॥ तजमातपिता घर कुटुमद्वार। तजराजमतीसी सती नार ॥ १४॥ द्वादश भावना भाई निदान । पशुवन्दि छोड़ दे अभय दान शेसावन में शिक्षा सुधार । तप कर तहां कर्म किये सुधार ॥१५॥ ताही धन फेवल ऋद्धि पाय । इन्द्रादिक पूजे धरण आय तहां समाशरण रचियो विशाल । मणिपंच वर्णकर अति रसाल ॥ १६ ॥ तहां बेदी कोट समा अनूप । दरवाजे भूमि बनी सुरूप ॥ बसु प्रातिहार्य छत्रादि सार । वर द्वादश सभा बनी अपार ॥ १७॥ करके विहार देशों मझार। भवि जीव करे भवसिंधु पार ॥ पुन टोंक पंचमी को सुजाय । शिव थान लहो आनन्द पाय ॥ १८॥ सो पूजनीक वह थान जान । बन्द तजन तिनके पापहान ॥ तहां से सुबहत्तर कोडि और । मुनि सात शतक सब कहे जोर ॥१६॥ उस पर्वत से शिवनाथ पाय । सब भूमि पूजने योग्य थाय ॥ तहां देश देश के भव्य आय । वन्दन कर बहु आनन्द पाय ॥२०॥ पूजन कर कोनो पापनाश । बहु पुरय बन्ध कोना प्रकाश ॥ यह ऐसा क्षेत्र महान जान । हम वन्दना कीनी हर्ष ठान ।। २१ ॥ उनईस शतक उनतीस जानासम्बत अष्टमि सित फाग मान । सब संघ सहित बंदन करायांपूजा कीनी मानन्द पाय ।।२२।। सब दुःख दूर कीजे दयाल । कहें चन्द्र कृपा कीजे कपाल ।। मैं .

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २२५ अल्प वुद्धि जयमाल गाय । भवि जीव शुद्ध जैकी बनाव ॥ २३॥ पत्ता । तुम दया विशाला सव क्षितिपाला तुम गुण माला कपठधरी। ते भव्य विशाला तज जग जाला नावत भाला मुकिवरी ॥ इत्याशीर्वाद ॥ ॥ इति श्रीगिरिनार क्षेत्र पूजा सम्पूर्ण ॥ सोनागिरि पूजा अडिल्ल छन्द । जम्बू द्वीप मझार भरत क्षेत्र सुकहो । आर्यखण्ड सु- जान भद्रदेशे लहो। सुवर्णगिरि अभिराम सुपर्वत है तहां । पंचकोडि अरु अर्द्ध गये मुनि शिव जहां ॥१॥ दोहा॥ सोनागिरिके शीश पर, बहुत जिनालय जान । चन्द्र प्रभू जिन आदिदे, पूजों सब भगवान ॥२॥ ॐ ह्रीं अत्रवत्रवतर: लंचौपटाहाननं । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: स्थापन ॥ अत्रममसन्नहितो भव भव वपट् सनिधी करणं । अथाष्टकं । सारंग छन्द पद्यद्रह को नीर ल्याय गंगासे भरके। कनक कटोरी माहि हेम थारन में धरके। सोनागिरि के शीस भूमि निर्वाण सुहाई।

२२६
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
पंचकोड़ि अरु अर्द्धमुक्ति पहुंचे मुनिराई ।
चन्द्र प्रभु जिन आदि सकल जिनवर पद पूजा।
स्वर्ग मुकि फल पाय जाय अविचल पद हो ।
दोहा।
सोनागिरि के शीसपर, जेते सब जिनराय ।
तिनपद धारा तीन दे, तृषा हरण के काज ॥
ॐ ह्रीं श्रीसोनागिरि निर्वाणक्षेत्रेभ्यो।। जलं ॥१॥
केसर आदि कपूर मिले मलयागिरि चन्दन ।
परमल अधिकी तास और सब दाह निकन्दन।। सोना०॥
दोहा।
सोनागिरि के शीसपर । जेते सब जिनराज ।
ते सुगन्धकर पूजियो,दाह निकन्दन काजासुगन्धं ॥२॥
तंदुल धवल सुगन्ध ल्याय जल धाय पखारी।
अक्षय पद के हेतु पुंज द्वादश तहां धारो। सोनागिरि० ॥
दोहा ।
सोनागिरि के शीसपर। जेते सव जिनराज।
तिन पदपूजा कीजिये । अक्षय पदके काज॥ अक्षत॥३॥
घेला और गुलाब मालती कमल मंगाये ।
पारिजात के पुष्प ल्यायः जिन चरण चढ़ाये । सोना० ॥
दोहा।
सोनागिरि के शीसपर | जेते सब जिनराज ।
ते सब पूजों पुष्प ले। मदन विनाशन काज ॥ पुष्पं ॥४॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २२७ विजन जो जगमाहि खांडघृत माहि पकाये। मोठे तुरत वनाय हेम थारी भर ल्याये । सोनागिरि०॥ दोहा। सोनागिरि के शीसपर। जेते सब जिनराज । ते पूजों नैवेद्य ले । क्षुधा हरण के काज ।। नैवेद्य ॥५। मणिमय दीप प्रजाल धरी पंकति भरथारी। जिन मन्दिर तम हार करहु दर्शन नरनारी ॥ सोना०॥ दोहा । सोनागिरि के शीसपर । जेते सब जिनराज । करों दीपले आरती। ज्ञान प्रकाशन काज ॥ दीपं ॥६॥ दशविधि धूप अनूप अरिन भोजन में डालों। बाकी धूम सुगन्ध रहे भर सर्व दिशालों ॥ सोनागिरि०॥ दोहा । सोनागिरि के शीसपरजेते सब जिनराज। धूप कुम्भआगे धरों । कर्म दहन के काज ॥ धूपं ॥७॥ उत्तम फल जग माहिं बहुत मीठे अरु पाके। गमित अनार अचार आदि अमृत रस छाके । सोना० ।। दोहा। सोनागिरि के शीश पर। जेते सब निजराज । उत्तम फल तिन ले मिलो। कर्म चिनाशन काजाफलं॥८॥ जल आदि के वसु द्रव्य अर्घ फरके धर नाची। वाजे बहुत बजाय पाठ पढ़ के मुख सांचो। सोना० ॥

२२८ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। दोहा। सोनागिरि के शीश पर जेते सब जिनराज । ते हम पूजें अर्थ ले। मुकि रमण के काज ॥ अर्थ ॥६॥ अडिल्ल छन्द । श्री जिनवर की भक्तिसो जेनर करत हैं। फल बांछा कुछ नाहि प्रेम उर घरत हैं ।ज्यों जगमाहिं किसानसु खेती. को करें। नाज काज जिय जान सुशुभ आप ही भरें। ऐसे पूजादान भक्ति वश कीजिये। सुख सम्पति गति मुक्ति सहज कर लीजिये । पूर्णाघ ॥ १० ॥ अथ जयमाला। दोहा। सोनागिरि के शीस पर। जिन मन्दिर अभिराम । तिन गुण की जयमालिका । वर्णत आशाराम ॥१॥ पद्धडि छन्द । गिरि नीचे जिन मन्दिर सुचार ते यतिन रवेशोभा अपार ॥ तिनके अति दीर्घ चौक जान । तिनमें यात्री मेले सुआन ॥२ गुमठी छज्जे शोभित अनूप । ध्वज पंकति लोहैं विविधरूप ॥ वसु प्रातिहार्य-तहां धरै आन । सब मंगलद्रव्यनिकीसुखान ॥३॥ दरवाजों पर कलशा निहार । करजोर सुजय जय ध्वनिउचार॥ इक मन्दिर में यतिराजमान | आचार्य विजयकीर्तिसुजान nen दिन शिष्य भागीरथा विवुध नाम।जिनराजभवनहींऔरकाम।।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २२६ अय पर्वतको चढ़ चलो जान । दरवाजातहाइकशोभमान ॥५॥ तिस अपर जिन प्रतिमा निहार । तिन वंदि पूज आगेसिधार।। तहां दुःखितभुखित को देत दान । याचक्र जन तहां हैं अप्रमाण आगे जिन मन्दिर दुहु ओर । जिन गान होत वाजिन शोर ।। माली यहु ठाड़े चौक पौर । ले हार कल्गी तहां देत दौर ॥७॥ जिन यात्री तिनके हाथ माहि । पखशीस रीझ तहां देत जाहि दरवाजा तहां दुजो विशाल । तहां क्षेत्रपाल दोऊ ओरलाल ||८|| दरवाजे भीतर चौक माहिं । जिन भवन रचे प्राचीन आहिं।। तिनकी महिमावरणी न जाय । दो कुण्डसुजलकरअति सुहाय जिन मन्दिर की वेदी विशाल । दरवाजो तीनो पहुसुढाल ।। ता दरवाजे पर द्वारपाल | लेलकुट खड़े अरु हाथ माल||१०॥ जे दुर्जन को नहीं जान देय । ते निन्दक को ना दरश देय ॥ चल चन्द्रप्रभू के चौक माहिं । दालाने तहां चौतर्फआय ॥२॥ तहां मध्य सभामण्डप निहार। तिसको रचना नानाप्रकार। तहां चन्द्रप्रभु के दरशपाय । फल जात लहो नरजन्माय||१२|| प्रतिमा विशाल तहां हाथ सात | कायोत्सर्ग मुद्रा सुहात ॥ चंदें पूजें तहां देय दान । जननृत्य भजनकर मधुर गान ॥१३॥ ताई थेई बाजत सितार । मृदंग बीन मुहचंग सार ॥ तिनकी ध्वनि सुन भवि होत प्रेम । जयकार करत नाचतसुएम ते स्तुति फर फिर नाय शीश । भवि चले मनाकर कर्म खीस यद सोनागिरिरचनामपार । वरणन कर कोकविलहेपार॥१५॥ अति तनक वुद्धि आशासुपाय । वश भक्ति कही इतनी सुगाय में मन्द बुद्धिकिमिलहों पार । बुधिवानचूकलीजो सुधार॥१६॥ पत्ता दोहा। सोनागिरि जय मालिका, लघुपति कही घनाय ।

.. २३० जैन-ग्रन्थ-संग्रह। पढ़े सुने जो प्रीति से, सो नर शिवपुर जाय ॥१७॥ इत्याशीर्वादः । इतिश्री सोनागिरि पूजा सम्पूर्ण । रविव्रत पूजा। अडिल्ल । यह भवजन हितकार, सु रविवृत जिन कही। करहु भन्यजन लोग, सुमन देके सही। पूजों पाच जिनेन्द्र त्रियोग लगायकैं। मिट सकल सन्ताप मिले निध आय के मिति सागर इक सेठ गन्थन कही । उनहीने यह पूजा कर मानन्द लही । ताते रविवृत सार, सो भविजन कीजिये । सुख संपति सन्तान, अतुल निध लीजिये । दोहा। प्रणमा पार्श्व जिनेश को, हाथ जोड़ सिर नाय । परभव सुख के कारने, पूजा कर बनाय ।। एतवार वृत के दिना, एक ही पूजन ठान । ता फल सम्पति लवें, निश्चय लीजे मान ।। ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अत्रअवतार अवतर तिष्ठ २ः अत्र मम सन्निहितो। अष्टकं । उज्जल जल भरके अति लायो रतन कटोरन माहीं। धार देत अति हर्ष बड़ावत जन्म जरा मिट जाहीं ॥ पारसनाथ जिनेश्वर पूजों रविवृत के दिन माई । सुख सम्पति बहु होय तुरतही, आनन्द मंगलदाई ॥ ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय । जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ मलया-

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
२३१
गिर केशर अति सुन्दर कुमकुम रंग बनाई। धार देत जिन
चरनन आगे भव आताप नसाई ।। पारसनाथ० ।। सुगंधं ॥
मोती सम अति उज्जल तन्दुल ल्यावो नीर पखारो । अक्षय
पद के हेतु भावसो श्री जिनवर ढिग धारो ॥ पारस०॥
अक्षतं । वेला अरमत्र कुन्द चमेली पारजात केल्यावो । चुन
चुन श्री जिन अन चढ़ाऊं मनवांछित फल पावो । पारस०॥
पुष्पं ।। वावर फेनी गोजा आदिक घृत में लेत पकाई ।
कंचन थार मनोहर भरके चरनन देठ चढ़ाई ॥ पारस ॥
नैवेद्य ॥ मनमय दीप रतनमय लेकर जगमग जोत जगाई।
जिनके आगे भारति करके मोह तिमिर नस जाई पारस०॥
दी। चूरन कर मलयागिर चन्दन धूप दशांक बनाई।
तट पावक में खेयं भावसों कर्मनाश हो जाई । पारसनाथ ॥
धूपं ॥ श्रीफल आदि बदाम सुपारी भांत भांत के लावो । श्री
जिन चरन चढ़ाय हरप कर तातें शिव फल पावो । पारस.
॥ फलं जल गंधादिक अष्ट दरबले अर्थ बनावो भाई। नाचत
गावत हर्ष भाव सो कंचन थार भराई पारस।। अधीगीतका
छंद । मन वचन काय त्रिशुद्ध करके पार्श्वनाथ सु पूजिये।
जल आदि अर्य यनाय भविजन भक्तिवन्त सुहजिये ॥ पूज्य
पारसनाथ जिनवर सकल सुख दातारजी।जे करत है नरनार
पूजा लहत सुःख अपारजी ॥ पूर्ण अर्धे ।। दोहा ॥ यह जगमें
विख्यात है, पारसनाथ महान । जिन गुनकी जयमालका
भाषा करौं घखान ।। पद्धरी छंद ॥ जय जय प्रणमा श्री पार्व
देव । इन्द्रादिक तिनकी फरत सेव ॥ जय जय सुवनारस जन्म
लीन । तिहुँ लोक विपे उद्योत कोन ॥१॥ जय जिनके पितु
श्री विश्वसेन । तिनके घर भये सुख चैन एन ।। जय धामादेवी
माय जान । तिनकै उपजे पारस महान ॥२॥ जय तीन लोक

२३२ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। आनन्द देन ! भविजनके दाता भये एन.।। जय जिनने प्रभु का शरन लीन । तिनको सहाय प्रभुजी सो कोन ॥३॥ जय नाग नागनी भये अधीन । प्रभु चरणन लाग रहे प्रवीन ।। तजके सो देत स्वर्ग सु जाय ! धरनेद्र पद्यवति भये आय ॥४॥ जे चोर अंजना अधम जान | चारी तज प्रभुको. घरो ध्यान ॥ जे मृत्यु भयें स्वर्गे सु जाय । रिद्ध अनेक उनने सुपाय ॥५॥ जे मतिसागर इक सेठ जान । जिन रविवृत पूजा करी ठान । तिनके सुत थे परदेश माहिं । जिन अशुभ कर्म काटे सु ताहि ॥६॥ जे रविवृत पूजन करी शेठ । ताफलकर सवसें भई भेट । जिन जिनने प्रभुका शरन लीन । तिन रिद्धसिंद्ध पाई नवीन ॥ ७ ॥ जे रविवृत पूजा करहिं जेय । ते. सुख्य अनंतानन्त लेय ॥ धरनेन्द्र पद्मवति हुय सहाय । प्रभु भक्ति जान ततकाल आय ॥ ८॥ पूजा विधान इहि विध रचाय । मन वचन काय तीनों लगाय॥ जो भकिभाव जमाल गाय। सोही सुख सम्पति अतुल पाय ॥६॥ वाजत मृदंग वीनादि सार गावत नाचत नाना प्रकार ॥ तन नन नन नन नन ताल देत । सन नन नन सुर भर सु लेत ॥१०॥ता थेई 'थेई थेई पग धरत जाय । छम छम छम छम घुघरू बजाय जे करहिं विरत इहिं भांत भांत । ते लहहिं सुख्य शिवपुर सुजात॥ ११॥ दोहा॥ रविव्रत पूजा पार्श्वकी, करे भवक जन कोय । सुख सम्पति इहिं भव लहै, तुरत सुरग पद होयं ॥ भडिल्ल । रषिव्रत पार्श्व जिनेन्द्र पूज्य भव मन धरें। भव भवके आताप सकल छिनमें टरें। होय सुरेन्द्र नरेन्द्र आदि पदवी लहै। सुख सम्पति सन्तान अटल लक्ष्मी रहे। फेर सर्व विध पाय भक्तिप्रभु अनुसरें।नाना विध सुख भोग बहुरि शिव त्रियवरै॥ इत्यादि आशीर्वादः ।....

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २३३ पावापुर सिद्धक्षेत्र पूजा। दोहा। जिहि पावापुर छिति अघति, हत सन्मत जगदीश । भये सिद्ध शुभ पानसो, जजों नाय निज शीश ॥ ॐ हों श्री पावापुर सिद्धक्षेत्रेभ्यो अत्र अवतर अवतर। अत्र तिष्ठ २४:४ःस्थापन ॥ अत्रममसनिहितो भवभववषट्स. निधीकरणं परि पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् । अथ अष्टक गीतका छंद। शुचि सलिल शीतौ कलिल रीतौ श्रमन चीतो लै जिसो। भर कनक भारी त्रिगद हारी दै त्रिधारी जित तृपौ । वर पावन भर पद्म सरवर बहिर पावा ग्रामही । शिव धाम सन्मत स्वाम पायो जजों सो सुख दामही । ॐ ह्रीं श्री पावापुर क्षेत्रीय वीरनाथ जिनेन्द्राय जन्म- जरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ जलं ॥ भव भ्रमत २ अशर्म तपकी तपन कर तप ताईयो। तनु वलय कंदन मलय चंदन उदक संग घिस ल्याइयो । वरपद्म०॥ सुगन्धं ॥ तंदुल नवीन खण्ड लीने ले महीने ऊजरे। मणि कुन्दइन्दु तुषारयु त जित कण रकाची में धरे। घरपना० ॥ अक्षतं ॥ मकरंद लोभन सुमन शोभन सुरभ चोभन लेयजी । मद समर हरवर अमर तरके घ्रान हग हरवेयजी । वरपद्म०॥ पुष्पं । नैवेद्य णवन छुध मिटावन सेव्य भावन हित किया। रस मिष्ट पूरत इष्ट सुरत लेय कर प्रभु हित हिया । वरपझ०॥ नैवेद्य ॥ तम अश नाशक स्वपर भाशक य परकाशक सही। हिम पात्रमें घर मोल्य विनवर द्योत धर मणि दीपही।

२३४ जैन-प्रन्य-संग्रह। वरपझ० ॥ दीपं ॥ आमोदकारी वस्तु सारी विध दुचारी जारनी। तमु तूप कर कर धूप लै दश दश सुरभ विस्तारनी वरपा० ॥ धूपं ।। फल मक्क पक्क सुचक सोहन सुक्क जनमन मोहने । वर रसपुरत लख तुरत मधु रत लेय कर अत सोहने । वरपद्मः ॥ फलं ॥ जल गन्ध आदि मिलाय वसु विध थार स्वर्ण भरायके मन प्रमुद भाव उपाय कर ले आय अर्ध वनायके । वरपद्म० अर्घ॥ अथ जयमाल ॥ दोहा ॥ चरम तीर्थ करतार श्री, वर्द्धमान जगपाल [कल मल दल विध विकल हुए, गाऊ तिन जयमाल ॥ १॥ पद्धडि छंद । जय जय सुबीर जिन मुक्ति थान । पावापुर वन सर शोभवान ॥ जे शित असाड़ छट स्वर्ग धाम | तज पुष्पोत्तर.. सु विमान ठान ॥१॥ कुण्डलपुर सिद्धारथ नृपेश । आये. त्रिशला जननी उरेश । शित चैत्र त्रियोदश युत त्रिज्ञान । जन्में तम अज्ञ निवार भान ॥२॥ पूर्वान्ह धवल चतु दिशि दिनेश । किय नहुन फनकगिरि शिरसुरेश । वय वर्ष तीस पद कुमर काल ।सुख द्रव्य भोग भुगते विशाल॥३॥ मारगशिर अलि दशमी पवित्र । चढ़ चन्द्रप्रभु शिवका विचित्राचलपुर से सिद्धन शीश नाय । धारी संयम वर शर्मादाय ॥ ४॥ गत वर्ष दुदश कर तप विधान । दिन शित वैशाख दशैं महान । रिजुकला सरिता तट स्व सोध । उपजायो जिनवर चरम बोध ॥ ५ ॥ तवही हरि आक्षा शिर चढ़ाय । रचियो समवा- भित धनद राय। चतु संघ प्रभृत गौतम गनेश.। युत तीस परष विहरे जिनेश ॥६॥ भवि जीवन देशन विविध देत। आये घर पावानन खेत ॥ कार्तिक अलि अन्तम दिवस ईश। । .

जैन-प्रन्थ-संग्रह। २३५ व्युतसर्गासन विध अघतिपीश ॥ ७॥ हे अकल अमल इक समय माहिं । पंचम गति निवशे श्री जिनाह ॥ तव सुरपति जिन रवि अस्त जान | आये तु तुरत स्व स्व विमान ॥ ८॥ कर वपु अरचा थुति विविध भांत । लै विविध द्रव्य परमल विख्यात ॥ तवही अगनींद्र नवाय शीश । संस्कार देह श्री त्रिजगदीश ॥en कर भस्म नन्दना स्वस्व महीय । निवसे प्रभु गुन चितवन स्वहीय । पुन नर मुनि गन पति आय आय । वंदी सोरज सिर ल्याय ल्याय ॥१०॥ तवहीसें सो दिन पूज्यमान । पूजत जिनग्रह जन हर्ष मान । मैं पुन पुन तिल भुवि शीश धार । वन्दो तिन गुणधर हद मझार ॥ ११ ॥ जिनहीका अव भी तीर्थ एह । वर्तत दायक अति शर्म गेह ॥ अरु दुषम अवसान ताहि । वर्ते गौभव थित हर सदाहि ॥१२॥ कुसमतला छंद ॥ श्री सन्मत जिन अघि पन जी युग जजै भव्य जो मन वच काय । ताके जन्म जन्म संतत अघ जवहि इक छिन माहिं पलाय ॥ धनधान्यादि शर्म इन्द्रीजन लह सो शर्म अतेन्द्री पाय । अजर अमर अविनाशी शिव थल वर्णी दौल रहै थिर थाय ॥ इत्यादि आशीर्वादः ॥ . चंपापुर सिद्धक्षेत्र पूजा। दोहा। उतसव किय पनवार जह, सुरगन युत हरि आय । जजों सुथल बसपूज्य सुत, चम्पापुर हर्षाय ॥५॥ ॐ ह्री श्री चंपापुर सिद्ध क्षेत्रेभ्यो अत्रावतरावतर संवौपट इत्याह्वाननं १ अन तिष्ठतिष्ठ स्थापन ।२।

२३६ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। अब मम सन्निहितौ भव भव वषट् सन्निधीकरणं परिपुष्पां. जलि क्षिपेत् ॥ अष्टक ॥ ढाल नन्दीश्वर पूजनकी ॥ सम अमिय विगत त्रस चारि, लै हिम कुम्भ भरा। लख दुखत त्रिगद हरतार दै त्रय धार धरा॥ श्री वासुपूज्य जिनराय, निवृत थान प्रिया । चंपापुर थल सुखदाय, पूजों हप हिया ॥ ॐ ह्री श्री चंपापुर सिद्ध क्षेत्रेभ्यो जन्म जरा नृत्यु विनाशनाय ॥ जलं ॥ काश्मीर नीर मधगार, पति पवित्र खरी । शीतलचन्दन संगसार, लै भव तापहरी ॥ श्री वाजु पूज्य० ॥ सुगंधं ॥२॥ मणिधु त समखंड विहीन, तंदुल लैनीके, सौरभ युत नववर वीन, शाल महानीके ॥ श्री वासुपूज्य ॥ अक्षदं ॥३॥ अलि लुभन शुभन दूग प्राण, सुमन सुरन द्रमके, लैवाहिम अर्जुनवान, सुमन दमन झुमके ॥ श्री वासुपूज्य ॥ पुष्पं ॥५॥ रस पुरत तुरत पकवान, पक यथोक घृती । क्षुध गदमद प्रदमन जान, लैविध युक्तकृती। श्री वासपूज्य ॥ नैवेद्य ॥५॥ तमअज्ञ प्रनाशक सूर, शिव मग परकाशी ॥ लै रत्नद्वीप धुत पुर, अनुपम सुखराशी ।। श्रीवासु० ॥ दीपं ॥ ६॥ वर परमल द्रव्य अनूप, सोध पवित्र करी । तसुचूरण कर कर धूप,लैविध कंज हरी ॥श्रीवासु०॥७॥ धूपं ॥ फल पक्क मधुररस चान, पासुक बहुविधिके । लख सुखद रसन द्वग घ्रान, लैप्रद पद सिध ॥ श्रीवासु०॥८॥ फलं जल फल वसु द्रव्य मिलाय, लैभर हिमथारी | वसु अंग धरा पर ल्याय, प्रसुद स्व चितधारी ॥ श्री वासु ॥ अर्घ॥ अथ जयमाल ॥दोहा॥ भये द्वादशम तीर्थपति, चंपापुर शुभ थान । तिन गुणको जयमालं कछु, कहों श्रवण .

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २३७ सुख दान ॥ पद्धड़िछन्द ॥ जय जय श्री चंपापुर सो धाम । जहां राजत नृप वसुपुज नाम ॥ जन पौन पल्यसे धर्महीन । भवनमन दुःखमय लख प्रवीन ॥१॥ उर करुणा धरसो तम विडार । उपजे किरणावलि घर अपार ॥ श्रीवासपूज्य तिन तने वाल । द्वादशम तीर्थ कर्ता विशाल ॥२॥ भवभोग देहलें घिरत होय । वय वाल माहि ही नाथ सोय ॥ सिद्धन नम महंवृत भार लीन । तप द्वादश विध उग्रोन कीन ॥ तह मोह सप्तत्रय आयु येह । दशप्रकृति पूर्व ही क्षय करेह ॥ श्रेणीजु क्षपक आरूढ़ होय । गुण नवम भाग नव माहि सोय ॥४॥ सोलह वसु इक इक षट इकेय । इक इक इक इम इन क्रम सहेय ॥ पुन दशम थान इक लामटार । द्वादशम थान सोलह विडार ॥५॥वै अंतिम चतुष्टय युक स्वाम । पायो सब सुखद संयोग ठाम ॥ तह काल त्रिगोचर सर्व गेय । युगपत हि समय इक महि लख्नेय ॥ ६॥ कछु काल मुविध वृष अमिय वृष्टि । कर पोर्षे भव भवि धान्य श्रष्टि ॥ इक मास आयु अवशेष जान । जिनयोगनकी सुप्रवर्तहान ॥७॥ ताही थल तृतिशित ध्यान ध्याय । चतुदशम थान निवसे जिनाय || तह दुचरम समय मझार ईश । प्रकृति जु बहत्तर तिनहि पीश ॥८॥ तेरहको चरम समय मझार। करके श्री जगतेश्वर प्रहार ॥ अष्टमि अवनी इक समयमद्ध । निवसे पाकर निज अचल रिद्ध ॥ ६ ॥ युत गुण वसु प्रमुख अमित गुणेश । हरहे सदाही इमहिं वेश ॥ तवहीसे मो थानक पवित्र । त्रैलोक्य पूज्य गायो विचित्र ॥१०॥ निज मस्तक लगाय । चन्दौं पुन पुन भुवि शीशनाय ॥ ताही पद वांछा उर मझार | धर अन्य चाह बुद्धि विहार ॥ ११ ॥ दोहा । श्री चंपापुर जो पुरुष, पूजै मनवच काय । मैं तसु रज .२३८ जैन-ग्रन्य-संग्रह। वर्णि "दौल- सो पायही, सुख संपति अधिकाय ॥ इत्यादि आशीर्वादः॥ इति श्री चंपापुर सिद्धक्षेत्रे पूना समाप्तम् । लघु पंचपरमेष्ठी विधान। स्व. कवि चन्द्रजी कृत स्थापना। दोहा-श्रीधर श्रीकर श्रीपती, भव्यनि श्रीदातार। श्रीसर्वज्ञ नमो सदा, पार उतारन हार ॥१॥ अडिल्ल छंद ! चार घातिया कम नाशि फेवल लयो। समोशरण तहां धनद+ आय सुंदर ठयो । चौतिस अतिशय अष्ट प्रातहारज भयें। चार चतुण्य सहित सगुण छयालिस लये ॥२॥ कर विहार भवि जीवन पार लगाइये। नाश अधातिय चार सो शिवपुर जाइये ॥ जिनके गुण सु अनंत कहा वर्णन करों। वस्तु गुण हे व्यवहार सिद्ध थुति उच्चरों ॥३॥ सोरठा। श्रीमाचारज जान, धरतं सदा आचारको। छत्तिस गुण परवान, वन्दों मन वच कायकर ॥४॥ ." + कुबेरं।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २३६ दोहा-पचिस गुण उवमायके, ते धारें घर वीर। पढ़ें पढ़ा। पाठ घर, निर्मल गुण गम्भीर ॥५॥ वीस आठगुणधारकर, साधे साधु महन्त । जीवदया पाले सदा, नहीं विरोधे जन्त ॥६॥ चौपाई। ये ही पंच परमगुरु जानो! या सम जगमें अन्य न मानो। जिन जीवन इन सुमरन किया।सुर शिवथान जाय तिन लियो। जो प्राणी मन वच तन ध्यावें। सिंह व्याघ्र गज नाहिं सतावें। जो मनमें इन सुमरन लावे। ताहि सप्त भय नाहिं सतावें ॥१॥ दोहा-येही इष्ट उत्कृष्ट अति, पूजों मन वच काय । थापत हों त्रय बारकर,तिष्ठ तिष्ठ इत आय ॥१०॥ ॐ ह्रीं पंचपरमेष्ठिनोऽत्रागच्छतागच्छत संवौपट (आहाननं ) ॐ ह्रीं पंचपरमेष्ठिनाऽत्र तिष्ठत तिष्ठत . . (प्रतिष्ठापन) ॐ हीं पंचपरमेष्ठिनोऽत्र मम संनिहिता भवत भवत भवतवषठ स्वाहा (सनिघापनम् ) अष्ट्रक। गीता छन्द। जल सरस गंग तरंगको, शुचि रंग सुन्दर लाइये। कंचन कटोरी माहि भर, जिनराज चरन चढ़ाइये। ये पंच इष्ट भनिए हरता, दृष्टि लगत सुहावने । मैं जजों थानंदकन्द लखकर, दन्द फन्द मिटायने । ॐ ह्रीं पंचपरमेष्ठिभ्यों जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ ले गारि मलयागिरि सु चन्दन, अति सुगंध मिलायके । मैं हर्पफर जिनचरण चरचों,गाय साज बजायकाये पंच०॥

રક जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ॐ ही श्रीपंचपरमेष्ठिभ्यो, चंदन निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥ ले सरस तंदुल खंड विनसित, सालिके वर आनिये । मल धोय थार संजोय पूजों, अखयपदको ठानिये ॥ ये०॥ ॐ ह्रीं श्रीपंचपरमेष्ठिभ्योऽक्षतान्निपामीति स्वाहा ॥३॥ केवड़ा वेला चमेली, कुन्द सुमन नुहावने । केतकी आदिकसे पूजों, जगत जन मन भावने ॥ ये॥ ॐ ह्रीं श्रीपंचपरमेष्ठिम्यः पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥४॥ लाडू पुआ पेड़ारु मिश्री, खोपरा खाजा बने । धर हेमथाल मझार पूजों, क्षुधा रोग निवारने ॥ ये० ॐ ह्रीं श्रीपंचपरमेष्ठिभ्यो नैवेद्य निर्वमाति स्वाहा ॥५॥ ले दीप मणिमय ज्योति जगमग, होत अधिक प्रकाशनी । कर आरती गुण गाय नाचों, मोहतिमिरविनाशनी ॥ ये॥ ॐ ह्रीं श्रीपंचपरमेष्टिभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ कर चूर अगर कपूर ले, भरपूर जास सुवासकी । खेऊं सु अगन मझार होकरके सो सन्मुख जासकी.॥ ये० ॐ ह्रीं श्रीपंचपरमेष्ठिभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥७॥ फल सरस सुख दातार, तन मन धोय जलसे लीजिये। घर थाल मध्य सुभक्तिसे, जिनराज चरण जजीजिये॥ये०॥ ॐ ह्रीं श्रीपंचपरमेष्ठिभ्यः फलं निर्वपामोति स्वाहा ॥ ८॥ ले नीर निर्मल गन्ध अक्षत, सुमन अरु नैवेद्य जी । मिल दीप धूप सु फल भले,धर अरघ परम उम्मेद जीआये॥ ॐ ह्रीं श्रीपंचपरमेष्ठिभ्योऽधं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ रोडक छन्द। वसु विधि अरघ संजोय, जायं जे पंच इटवर । पूजों मन हुलसाय, पाय जिन प्रीति हृदय धर ॥

जैन-प्रत्य-संग्रह। ૨૨ तुम सम अन्य न ज्ञान, जानि तुम्हरे गुण गा। धर थाली के मध्य सेो, पूरण अरघ बनाऊं ॥ ॐ ह्रीं श्रीपंचपरमेष्ठिभ्यो पूर्णाध्य निर्वपामीति स्वाहा ॥१०॥ श्रीधरहतगुण पूजा। सोरठा। छयालिस गुण समुदाय, दोष अठारह टारते। अरिहत शिवसुखदाय, मुझ तारो पूजों सदा ॥१॥ ॐ ह्रीं महत्परमेष्ठिने षटचत्वारिंशद्गुणविभूषिताय मपादशदोपरहिताय श्रीजिनाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । छन्द मोतियदाम । जिनके नहिं खेद न स्वेद कहा। तन श्रोणित दुग्ध समान महा। प्रथमा संस्थान विराजत है। वर वज्र शरीर सुराजत हैं ॥२॥ छवि देखत भानु प्रताप नसे । तनसे सु सुगन्ध महा निकले। शत लक्षण अष्ट विराजत हैं। प्रिय वैन सचे हित छाजत हैं ॥२॥ दोहा-तन मल रहित अतुल्य बल, धारत हैं जिनराज ॥ ये दश अतिशय जनमके, भाषे श्रीगणराज॥३॥ ॐ ह्रीं सहजदशातिशयमाप्ताय श्रीजिनाय अर्घ नि०॥ पद्धरी छन्द। केवल उपजे मतिशय सुजान । सो सुनो भव्य जन चित्तमान शत योजन चारों दिशा माहिं । दुर्मिक्ष तही दीखे सोनाहि ॥४॥ आकाशगमन करते जिनेश । प्राणीका घात न होय लेश। कवलामाहार नाहीं करांत । उपसर्ग विना'दीखत सो गाव ॥५॥ चतुरानन चारों दिशा जान । सब विद्याके ईश्वर महान ॥

૨૨ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। छाया तनकी नाहीं सो होय । टमकार पलक लागे न कोय॥६॥ नख केश वृद्धि ना होय जास।ये दश अतिशय केवल प्रकाश तिनको हम बन्दै शीशनाय । भव भवके अघ छिनमें पलाया|| ॐ ह्रीं केवलज्ञानजन्मदशातिशयसुशोभिताय श्रीजिनाय अर्घ नि॥ चौबोला छंद। अव देवनकृत चौदह अतिशय, सो सुन लीजे भाई। सकल अरथमय मागधि भाषा, सब जीवन सुखदाई । मैत्रीभाव सकल जीवनके, होत महा सुखकारी । निर्मल दिशा लसें सब ओरी, उपजें आनंद भारी॥८॥ अरु निर्मल आकाश विराजत, नीलवरन तन धारी। षट् ऋतुके फल फूल मनोहर, लागे द्रमोंकी डारी। दर्पण सम सो धरनि वहाँकी,अति जिय पानंद पाये। निष्कंटक मेदनि विराजे, क्यों कवि उपमा गावे ॥६॥ मन्द सुगन्ध धयारि वृष्टि, गन्धोदककी चहुँघाई। हरषमई सब सृष्टि विराजे, आनंद मंगलदाई । चरण कमल तल रचत कमल सुर, चले जात जिनराई । मेघ कुमारोंकृत गंधोदक, वरसे अति सुखदाई ॥१०॥ चउ प्रकार सुर जय जय करते, सब जीवन मन भावे । धर्मचक्र चले आगे प्रभुके, देखत भानु लजावे ॥ दश विधि मंगलद्रव्य धरी, तहाँ देखत मनको मोहे । विपुल पुण्यका उदय भयो है,सब विभूतियुत साहे ॥१॥ दोहा । ये चौदह देवन सुकृत, अतिशय कहे बखान । इन युत श्रीअरहंतपद, पूजों पद सुख मान ॥१२॥ ॐ ह्री.सुरकृतचतुर्दशातिशयसंयुक्ताय श्रीजिनायअर्धनि०॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २४३ लक्ष्मीपरा छन्द । प्रातिहार्य वसु जान, वृक्ष साहे अशोक जहाँ। पुष्पवृति दिव्यध्वनि, सुर ढोरें सु चमर तहाँ । छत्र तीन सिंहासन, भामण्डल छवि छाजे। रजत दुन्दुभी शब्द श्रवण, सुख हो दुख भाजे ॥१३॥ ॐ ह्रीं अष्टविधिप्रातिहार्यसंयुकाय श्रीजिनाय अर्घ नि०॥ चौपाई। शानाचरणी फरम निवारा, मान अनन्त तवै जिन धारा॥ नाश दरशनावरणी सूरा । दरशन भयो अनन्त सु पूरा ॥१४॥ दोहा। मोह फर्मको नाशकर, पायो सुक्ख अनन्त । अन्तरायको नाशकर, बल अनन्त प्रगटन्त ॥१५॥ ॐ हीं अनन्तचतुष्यविराजमानश्रीजिनाय अघ नि० ॥ पाईता छन्द । अतिशय चौतीस यखाने । घस प्रातहारज शुभ जाने । पुन चार चतुएय लेवा । इन छयालिस गुण युत देवा॥१६॥ ॐ ही पट्चत्वारिंशद्गुणसहिताय श्रीजिनाय अर्ध मि०॥ +-- श्रीसिद्धगुण पूजा। अडिल्ला दर्शन झानान्त, अनन्ता पल लहो। सुख अन्नत विलसत, सुसम्यक् गुण कहो॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। अवगाहन सु अगुरुलघु, अन्यावाध है। इन वसु गुण युत सिद्ध, जजों यह साध है॥१॥ ॐ ह्रीं अष्टगुण विशिष्टाय सिद्धपरमेष्ठिनेऽधं नि०॥ श्रीआचार्य पूजा। . दोहा-आचारज आचारयुत, निज पर भेद लखन्त । तिनके गुण षट् तीस हैं, सो जानो इमिसन्त॥१ वेसरी छंद। उत्तम क्षमा धरे मन माहीं। मारव धरम मान तिहिं नाहीं॥ आरजव सरल स्वभाव सुजानो । झूठ न कहें सत्य परमानो। निर्मल चित्त शौच गुण धारी । संयम गुण धारें सुखकारी ॥ द्वादश विधि तप तपत महता । त्याग करें मनवच तनसंता ।। तज ममत्व आकिंचन पालें । ब्रह्मचर्य धर कर्मन टालें। ये दश धरम धरे गुण भारी । आचारज पूजों सुखकारी ॥४॥ ॐ हीं दशलाक्षणिकधर्मधारकाचार्य परमेष्टिने अर्घ नि०॥ वेसरी छन्दा अव द्वादश तप सुनिये भाई, अनशन ऊनोदर सुखदाई ॥ व्रतपरिसंख्या रसनहि चाहें। विविकशैय्यासन अवगाहें ॥५॥ कायकलेश सहें दुख भारी, ये छह तप बारह गुण धारी। प्रायश्चित लेवें गुरु शाखें विनयभाव निशिदिन चित्त राखें दोहा वैयाघृत्य स्वाध्यायकर, कायोत्सर्ग सुजान । ध्यान करें निज रूप को, ये वारह तप मान ॥ ७॥ ॐ ही द्वादशविधितपोयुताय आचार्यपरमेष्टिने अर्ध नि॥

जैन-प्रन्थ-संग्रह।
२५५
लक्ष्मीधरा छन्द।
प्रतिकमण ये करें, सो कायोत्सर्ग ये ठाने ।
समताभाव समेत, वंदना नित मन आने ।।
स्तुति करें बनाय गाय, स्वाध्याय सुनीको ।
पट आवश्यक क्रिया, पाप मल धोय यती को ॥ ८॥
ॐ ह्रीं ण्डावश्यकगुणविभूषितायाचायपरमैटिने अर्घ
नि॥
झानाचार सुधार, दर्शनाचार सु धारें।
घर चारित्राचार, तपाचारहि विस्तारें।
घीर्याचार विचार पंच आचार ये धारी।
मन वच तन कर, बार बार बन्दना हमारी ॥६
ॐ ह्रीं पचाचारगुणविभूपितायाचार्यपरमेष्टिने अर्घ
निः॥
दोहा।
तीन गुप्त पाले सदा, मन भरु वचन सु काय ।
सो वसु द्रव्य संजोय के, पूजों मन हुलशाय ॥ १० ॥
ॐ ह्रीं त्रिगुप्तिगुणविभूषितायाचार्यापरमेष्ठिने अर्ध
नि० ॥
सोरठा।
दश विधि धर्म सुजान, द्वादश तप पद क्रिया धर।
पंचाचार प्रमाण, तीन गुप्ति छत्तीस गुण ॥११॥
केही श्रीआचार्यपरमेष्ठिने पूर्णाध्य निर्वपामीति
स्वाहा।
श्री उपाध्याय गुण पूजा ।
दोहा-उपाध्याय गुण परणऊँ, पंच अरु बीस प्रमान ।
एकादश वर अंग अरु अरु चौदह पूरब जान ॥१॥

રીકે
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
सुन्दरी छन्द।
प्रथम आचारांग सु जानिये। द्वितीय सूत्रतांग बखानिये ।।
तीसरो स्थानांग सा अंग जू । तूर्य समवायांग अभंग जू ॥२॥
पंचमी व्याख्याप्रज्ञप्ति जू । छट्ठम ज्ञातृकथा गुणयुक्त जू॥
उपासकाध्ययन सो सप्तमो । अंग अन्तकृतांग सु अष्टमी ॥३॥
दोहा-नवम अनुत्तर दशम पुनः, प्रश्नं व्याकरण जान ।
विपाकसूत्र सु ग्यारमो, धारें गुरु गण खान ॥४॥
ॐ ह्रीं एकादशांगपठनयुक्ताय उपाध्यायपरमेष्ठिने अर्ध
निः॥
गीता छन्द ।
'अब चार दश पूरब, प्रथम उत्पाद नाम सु जानिये।
अग्रायणी वीर्यानुवाद सु, अस्ति नास्ति बखानिये ॥
ज्ञानप्रवाद सु पंचमी, कर्मप्रवाद छट्ठों कहो ।
सत्यप्रवाद सु सप्तमी, आत्मप्रवाद वसु लहो ॥५॥
पुनः नाम प्रत्याख्यान अरु, विद्यानुवाद प्रमागिये।
कल्याणबाद महन्त पूरव, क्रियाविशाल बखानिये ॥
बर लोकविंद मिलाय चौदह, सार ये पूरव कहे ।
ते धरें श्री उबझाय तिनके, पूजते शिवमग लहे ॥६॥
ॐ ह्रीं चतुर्दशपूर्वपठनपाठनसंलग्नाय उपाध्याय पर-
मेष्टिने अर्घ नि० ॥
दोहा-ऐसे ग्यारह अंग अरु, चौदह पूरब जान ।
उपाध्याय जाने सुधी, सो पूजों रुचि ठान ॥ ७ ॥
श्री साधुगुण पूजा।
दोहा-साधु तने अठ बीस गुण, सो धारें मुनिराज ।
अतीचारं लागे नहीं, साधे मातम काज.॥१॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ર૭ छन्द भुजंगप्रयात। करें नाहिं हिंसा दया मन धर जू असत नाहि वोलेंन परधन हरे। महाशील पाले परिग्रह सु टालें। यही पंच भारी महावत सम्हाले। ॐ ह्रीं पंचमहाव्रतधारकाय साधुपरमेष्ठिने अर्घ नि०॥ त्रिमंगी छंद। पर्यापथ सोधे, जियन विरोधे, भवि संवोधे हितकारी। सांचे वच भाखे, झूठ न राखें, निजरस चाखें दुखहारी। ठाड़े चितधारा, करें महारा, अहे निहारा क्षेपत हैं। मल मूत्रहिं डारें, जीव निहारें, पंच समितिइमिसेवत हैं ।।३।। ॐ ह्रीं पंचसमितिसंयुक्ताय साधुपरमेष्ठिने अर्घ नि. दोहा-स्पर्शन रसना प्राण पुनि, चक्षु श्रवण निरधार । पांचों इन्द्री वश करें, ते पार्वे भव पार ॥४॥ ते गुरु मेरे हृदय बसो। ॐ ह्रीं पंचेन्द्रियापाररहिताय साधुपरमेष्ठिने अर्घ नि० प्रतिक्रमण ये आदरें, धारे उत्सर्ग सु ध्यान । समताभाव सो राखहीं, बन्दन करत निदान ॥ ते०५॥ त्रिकाल ये स्तुति करत हैं, चूकें नाहिं सुकाल । स्वाध्याय नित चित्त धरें, करुणाप्रति प्रतिपाल ॥०॥ ॐ ह्रीं षडावश्यकयुक्ताय साधुपरमेष्ठिने अर्घ नि०॥ पद्धरी छंद। सिर केश लुच करते सुजान । अरु नग्नवृत्तितिनकी प्रधान ॥ अस्नान नहीं करते सु वीर । भू शयन करत ते महा धीरा॥ धोवें न दंत जिय दयावान । आहार खड़े करते सु जान ॥ इक बार असन लघु करें जाना ये सात कहेगुण अति महान।।

રહે जैन-ग्रन्थ-संग्रह। * ही शेषसप्तगुणयुक्ताय साधुपरमेष्ठिने अधं नि०॥ दोहा-पंच महाव्रत समितिपन, इन्द्री दंडे पंच। षट् आवश्यक सप्त अरु, अष्ट बीस गुण संच ॥६॥ ॐ ह्रौं साधुपरमेष्ठिने पूर्णाघ निर्वपामीति स्वाहा ।। जयमाला। दोहा-पंच परमपद सार जग, ऋद्धि सिद्धि दातार। तिन गुण की जयमालिका, सुनो भव्य चित धार ॥१॥ पद्धडि छन्द । अरहंत सिद्ध आचार्य जान । उबझाय साधु पांचों बखान ॥ जग में इन समनहिंऔर कोय । देखें समद्गकरजगतसोय ॥२॥ शिवनायकशिवलायक सुआय । सो कर्म नाशिशिवलोकजाय॥ शिवमग दर्शावत आप आय।जे धरें ध्यान मन वचन काय ॥३ इक वार सुमरि शिवलोक नाय । आगम में कथा चली बनाय॥ जल थल कानन में जपत जोय । संकट नाशें आनन्द होय ॥४॥ यह महामंत्र नवकार जान । या समन जगत में मंत्र मान॥ जग में न मंत्र अरु यन्त्र होय । इसकी सरवरदूजा न कोय॥५॥ रसकूप पड़ी इक पुरुष दीन । तहां चारुदत्त उपकार कीन । यह मन्त्र सुमरिसुरलोकलीन । सोकथा जगतविख्यातकीना अनपुत्र कंठगत प्राण धार । यह महामंत्र कीना उचार॥ तज देह देव उपजो सु जाय । यह चारुदत्त उपदेश पाय len अंजनसे अधम किये उचार । मन वच तन कर सुरपदंसोधार मरपट मुनिका उपदेश पाय । कैइक भवमें केवल लहाय॥८॥ युग नाग नागनी जरत काय । श्रीपाश्वनाथ उपदेश पायं।' यह मंत्र सु फल प्रत्यक्ष दीश । धरनेन्द्र भये पद्माइतीश ॥६॥ इक समग ग्वाल कुलं हीन जास। तिन नेम लियोमुनिरान पास नप णमोकार शुभ गति सोजाय। यह कथा कही जिन सूत्रपाय जैन-ग्रन्थ-संग्रह। करिणी कांदेमें फंसी जाय । यह मंत्र सुमरि शुभ गति सो पाय इन आदि बहुतं जिय तरे सोय। जिन मंत्र जपो निश्चिन्त होय ।। याकी महिमा जगमें अपार । वरणों कहलों लहिये न पार ।। यह चिंतामणि सम लखा भ्रात। मन चिन्ते सबकारज करात। यह कामधेनु सम गिनो वीर । सुरतरु समान जानो सुधीर ।। मनवांछित फलको देनहार । सुमरो मन वच तन चित्तधार ।। यामें संशय जाना न कोय | धरके प्रतीत नित जपो जोय ॥ याते मैं भी चित धार धार । पूजों जिनचरणा बार वार ।। धत्तानंद छन्द। यह शुभ मात्रा, जाना तंत्रा, पूजो ध्यावा भक्ति करो। निश दिन गुण गाऊं,सुर शिव पाऊं,पूरच कृत सब करम हरी।। *हो पंचपरमेष्ठिम्योऽधं निर्वपामीति स्वाहा । गीतिका छंद । ये पांच पद पैंतीस अक्षर, सार जगमें जानिये । मन वचन काय त्रिशुद्ध करके, भक्ति पूजा ठानिये। याके सु फल धन धान्य सम्पत्ति, रूप गुणशुभ पाइये । सुरपद सहज ही मिलत है, वसु करम हर शिव जाइये॥१६॥ इत्याशीर्वादः । दोहा-जो अनर्थ घट बढ़ शबद, कोप न कीजे कोय। लघु मति यह पूजन रची, कारण सुंनिये सोया॥१७॥ सवैया । मान कछू कारण नहि, माया भी न यशकी चाह, शैलोके मायन, विचार किया आयकें। * हधिनी।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २५०. आगे आचारजने संस्कृत + पूजा रची, ताके शवद अरथ, कोई समझे ना बनायके । भाई पंडित लोग, भाषा पढ़ी पूजा रची, ताकी है थिरता नाहि, वांचनकी गायके। तातें यह छोटी करो, और चित्त नाहिं धरी, भैया इक घड़ी वाँचो, आछो मन ल्यायके॥१८॥ शैलीके भाईजी: गुलाबचन्द्र पण्डित जान । दुलीचन्द्र दयाचन्द्र, खूबचन्द्र जानिये। सिंगई भगोलेलाल, भाई, उमराव जान, लीलाधर सुखानन्द, और भी प्रमानिये ॥ आय जिन मन्दिर में, शास्त्र सुने प्रोति सेतो, घड़ी पहर बैठ, घर में बखानिये। धरम की चर्चा करें, करम की भी आन परे, छोड़ के कुधर्म 'चन्द्र'धरम हृदय आनिये ॥ ११ ॥ दोहा-पंचमकाल कराल में, पाप भयो अति जोर। क धरम रुचि राखिये, 'चन्द्र' कहत कर जोर ॥२०॥ वसत जबलपुर नगर में, चलत सु निज कुल रीति । राखत निशि वासर सदा, जैन धर्म से प्रीति ॥ २१ ॥ संत्रत एक सहस्र नव, शतक सुभसत्ताईस । भादों कृष्ण त्रयोदशी, बुद्धिवार सु गणीश ॥ २२ ॥ इतिपंचपरमेष्ठी विधान । + श्रीयशोनंधाचार्यकृत 'पंचपरमेष्ठिपूजा' वि० सं. १९२७ ॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
૨૨
श्री सम्मेदशिखरपूजाविधान।
दोहा।
सिद्धक्षेन तीरथ परम, है उत्कृष्ट सु थान ॥
शिखर सम्मेद सदा नमी, होय पाप की हान ॥१॥
अगनित मुनि जहं ते गए, लोक शिखिर के तीर ।
तिनके पद पंकज नमो, नासै भव की पीर ॥२॥
अडिल्ल छद।
है उज्जल यह क्षेत्र सु अति निर्मल सही।
परम पुनीत सुठोर महा गुन की मही ॥
सकल सिद्धि दातार महा रमनीक है।
चन्दौ निजसुख हेत अचल पद देत है ॥ ३ ॥
सोरठा ।
शिखिर सम्मेद महान | जग में तीर्थ प्रधान है।
महिमा अद्भुत जान । अल्पमती मैं फिम कहो Men
पद्धड़ी छद!
सरस उन्नत क्षेत्र प्रधान है। अति सु उज्जल तीर्थ महान है।
करहि भकिसु जेगुनगाह के । वरहि शिवसुरनरसुखपाइ
अडिल्ल छन्द।
सुर हरि नरपति आदि सु जिन वन्दन करें।
भवसागर से तिरे नहीं भवदधि पर।
सुफल होय जी जन्म सुजे दर्शन करें।
जन्म जन्म के पाप सफल छिन में टरें।
पद्धडि छन्द।
श्री तीर्थकरजिन घर सुवीस । अरु मुनि असंख्य सवगुननईस ॥
पहुँचे जह से केवल सुधाम । तिन सबकौं अव मेरी प्रणाम ॥७॥

૨૨ जन-ग्रन्य-संग्रह। - गीतका छंद! सम्मेद गड़ है तीर्थ भारी, सबन ने उज्जल करें। चिरकाल के ने कर्म लागे, दरस ते छिनमै टरै।. है परम पावन पुन्य दाइक अतुल महिमा जानिये। है अनूप सरूप गिरि वर तासु पूजा डानिये ॥६॥ दोहा। श्री सम्मेद शिखर महा । पूजों मन वच काय । हरत चतुर्गति दुःख को, मन वांछित फलदाय । ॐही श्री सम्मेदशिखिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो अत्रावतरा- वतरसंवौषट् इत्याहाननम् परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्। ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखिर सिद्ध क्षेत्रेभ्यो अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः स्थापनम् परि पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् । ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशितिर सिद्ध क्षेत्रेभ्यो अब मम् सनिहितो भव भव वषट् सनिधीकरणं परि पुष्पंञ्जलिं क्षिपेत् । प्रक। अखिल्ल चन्द-झोरोदधि सम नीर सु उज्जल लीजिये। कनक कलस मैं भरके धारा दीजिये । पूजौ शिविर सम्मेद सुमन वचकाय जूनिरकादिक दुःख टरै अचल पद पाय जू॥ ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखिर सिद्धिक्षेत्रेभ्यो जन्मजरामृत्यु विना- शनाथ जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ पयौं घिस मलया- गिर चन्दन ल्याइये । केसर आदि कपूर सुगंध मिलाइये। पूजो शिखिर० । ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो संसारताप विनासनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥ तंदुल धवल सु उज्जवल खासे धोय के। हेम वरन केथार भरौं शुचि हाय कैं। पूजौं शिखिर०॥ॐ ह्रीं श्री सम्मेद- मिखिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो अक्षयपद प्राप्ताय अक्षतं निर्वामीति जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २५३ स्वाहा ॥३॥ फूल सुगंध सु ल्याय हरष सौ आन चड़ायौ । रोग शोक मिट जाय मदन सब दूर पलायो। पूजी शिखिर० । ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो कामबाणविध्वंस- नाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥४॥ षट् रस कर नैवेद्य फनक थारी भर ल्यायो । क्षुधा निवारण हेतु सु हूजी मन हरपायो । पूजी शिखिर० ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखिर सिद्धक्षेत्रे भ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ लेकर मणिमय दीप सुज्योति उद्योत हो । पूजत होत स्वज्ञान मोहतम नाश हो ॥ पूजौ शिखिर० । ॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो महान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६॥ दस विधि धूप अनूप अग्नि मैं खेवहूं । अष्टकर्म को नाश होत सुख पावह ॥ पूजौ शिखिर० । ॐ ह्रीं श्रीसम्मेद- शिखिर सिद्धक्षेत्रेभ्योअष्टकर्मदहनाथ धूपंनिर्वपामीति स्वाहा।। मेला लोंग सुपारी श्रीफल ल्याइये । फल चढ़ाय मन वांछित फल सु पाइये ॥ पूजौ शिखिर० । ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥८ जल गंधाक्षित फूल सु नेवज लीजिये । दीप धूप फल लेकर अर्ध चढ़ाइये । पूजी शिखिर० । ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिस्विर सिद्ध- क्षेत्रेभ्यो अन_पद प्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ पद्धड़ी छन्द-धीपिंसति तीर्थकर जिनेन्द्र । अरु है असंख्य बहुते मुनेद्र ॥ तिनकौं करजोर करों प्रणाम । तिनको पूजो तज सकल काम ॥ ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो अनर्थ्य- पद प्राप्ताय अर्घ । ढार योगीरायसा-श्री सम्मेदशिखिर गिर उन्नत शोभा अधिक प्रमानों । विंशति तिहपर कूट मनोहर अद्भुत रचना जानौ ॥ श्री तीर्थकर वीस तहांते शिवपुर पहुंचे जाई । तिनके पद पंकज युग पूजो प्रत्येक अर्घ चढ़ाई। ॐ ह्रीं ॥

२५४ जैन-ग्रन्य-संग्रह। श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥३॥ प्रथम सिद्धवरकूट मनोहर आनंद मंगलदाई । अजित प्रभु जह ते शिव पहुंचे पूजी मनवचकाई । कोडिनु अस्सी एक अर्व मुनि चौचन लाख सुगाई । कर्म काट निर्वाण पधारे तिनको अर्घ चढ़ाई। ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखिर सिद्धटते श्री अजितनाथ जिनेन्द्रादि एक भर्व अस्ली कोडि चौवन लाख मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्ध क्षेत्रेभ्यो अर्ध निर्वामीति स्वाहा ॥२धवल कूट सो नाम दूसरी है.सबकौं सुखदाई । संभव प्रभुतो मुक्ति पधारे पाप तिमिर मिटजाई । धवलदत्त हैं आदि मुनीश्वर नव कोडाकोड़ि जानौ । लक्ष वहत्तर सहस बयालिस पंच शतक रिष मानौ ।। कर्म नाश कर अमर पुरी गए वंदौ सीस नवाई । तिनके पद युग जलौ भावसौ हरण हरष चितलाई ॥ ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर धवल चूटतें संभवनाथ जिनेन्द्रादि मुनि नव कोड़ाकोड़ि बहत्तर लाख व्यालिस हजार पांच से मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्धे ||३| चौपाई-आनंद कूट महा सुखदाय । प्रभु अभिनन्दन शिवपुर जाय । कोड़ासोड़ि वहत्तर जानौ । सचर कोड़ि लाख छत्तीस मानौ । सहस बयालीस शतक जु साता कहें जिनागम मैं इस भांत । ऐरिष कर्म काट शिव गये, तिनके पद युग पूजत भये ।। ॐ ह्रीं श्री आनन्दकूटते अभिनन्दननाथ जिनेन्द्रादि मुनि वहत्तर कोड़ाकोड़ि अरु सत्तर कोड़ छत्तीस लाख व्यालीस हजार सातसै मुनि सिद्धपद प्राप्ताय अर्घ निर्व- पामीति स्वाहा ||| अडिल्ल छन्द-अवचत चौथौ कुट महा सुख धाम जी । जहं ते सुमति जिनेश गये निर्वाणजी ।। कोड़ाकोड़ि एक सुनीश्वर जानिये । कोड़ि चौरासी लाख बहत्तर मानिये ॥ सहस इक्याली और सातसे गाइये । कर्म १

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
२५५
काट शिव गये तिन्हे सिर नाइये । सो थानिक मै पूजौ मन
वच काय जू । पाप दूर हो जाय अचल पद पायजू ।। ॐ हीं
श्री अवचल कूटतै श्री सुमति जिनेन्द्रादि मुनि एक कोड़ा-
कोड़ि चौरासी कोड़ि बहत्तर लाख इक्यासी हजार सातसै
मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्धं ॥५॥ अडिल्ल छन्द
मोहन कूट महान परम सुंदर कहो। पद्मप्रभु जिनराय जहां
शिव पद लहौ । कोडि निन्यानवै लाख सतासी जानिये ।
सहस तेतालिस और मुनीश्वर मानिये । सप्त सैकड़ा सत्तर
ऊपर बीस जू । मोक्ष गये मुनितिन को नमि नित शीश
जू कहैं जवाहग्दास सुदोय कर जोरकै । अविनासी
पद देउ कर्म न खोय। ॐ ह्रीं श्री मोहन कूटते श्री
पद्मप्रभु मुनि निन्यानवै क्रोड़ि सतासी लाख तेतालिस
हजार सातसै संताउन मुनि निर्वाण पद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्रेभ्यो
अर्घ दासोरठा-कूट प्रभात महान । सुंदर जन मणि मोहनौ ।
श्री सुपार्श्व भगवान, मुक्ति गये अघ नाश कर । कोडाकोड़ी
उनचास कोड़ि चौरासी जानिये । लाख बहत्तर जान सात'
सहल अरु सात सै। और कहे व्यालील । जंह तें मुनि मुक्ति
गये। तिनकौं नम नित सीस दास जवाहर जोरकर ॥ ॐ ह्रीं
प्रभात कूटते श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्रादि मुनि उनचास
कोडाकोड़ी बहत्तर लाख सात हजार सातसै व्यालीस
मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ ७॥दोहा-पावन
परम उतंग हैं। ललित कूट है नाम ।। चंद्र प्रभु मुक्त गये,
वंदो आठौ जाम ॥ नवसै अरु वसु जानियौ। चौरासो रिषि
मान । क्रोडि बहत्तर रिषि कहे । असी लाख परवान । सहस
चौरासी पंच शंतापचवन कहे मुनीश । वन कर्मन को नाशकर।
पायो सुखको कंद ॥ ललित कूटते शिव गये । चंदौं -सीस

२५६ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। नवाय ॥ तिनपद पूजौ भाव सौ, निज हित अर्घ चड़ाय ।। ॐ ह्रीं ललितकूट ते श्री चन्द्रप्रभु जिनेन्द्रादि मुनि नवसै चौरासी अर्व बहत्तर क्रोड़ अस्सीलाख चौरासी हजार पांच पचवन मुनि सिद्धपद प्राप्ताय अर्घ निर्वपामोति स्वाहा ॥ ८॥ पद्धडी छंद । सुबरनभद्र सो कूट जान । जह' पुष्पदंतको मुक्त थान ॥ मुनि कोड़ाकोड़ी कहै जु भाख । अरु कहे निन्यानवे लाख चार ॥१॥ सौ सात सतक मुनि कहे सात । रिपि असी और कहे विख्यात ॥ मुनि मुक्ति गये वसु कर्म कार । वंदी कर जोर नवाय माथ ॥२॥ॐ ह्रीं श्री समभकूटते पुष्पदंत जिनन्द्रादि मुनि एक कोड़ाकोड़ी निन्यानवै लाख सात हजार चारसै अस्सीमुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ ॥६॥ सुंदरी छंद-सुभग विद्युतकूट सु जानिये । परम अद्भुतता परमानियै ॥ गये शिवपुर शीतलनाथजी नमहुँ तिन पद कर धरि माथजी ॥ मुनिजु कोड़ाकोड़ी अष्टहु । मुनि जो कोड़ी ब्यालिस जान हूँ॥ कहे और जु लाख बत्तीस जू। सहस च्यालिस कहे यतीश जू। और तहसै नासै पांच सुजानिये । गये मुनि सिवपुरकों और जमानिये ॥ करहि पूजा जे मन लायकें । धरहि जन्मन भवमें आयकें ॥ ॐ ह्रीं सुभग विद्युत कूटते श्री शीतलनाथ जिनेंद्रादि मुनि अष्ट कोड़ाकोड़ी व्यालीस लाख बत्तीस हजार नौसै पांच मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्धिक्षेत्रेभ्यो अर्घ ॥१० ढार योगीरसा-कूटजु संकुल परम मनोहर श्रीयांस जिनराई । कर्म नाश कर अमरपुरी गये, चंदी शीस नवाई | कोडाकोड़ जुकहै क्यानवै ध्यानवे, कोड़ प्रमानौ ॥ लाख क्ष्यानवै साढ़े नवसै, इकसठ मुनीश्वर जानो । ताऊपर ब्यालीस कहे हैं श्री मुनिके गुन गावै । त्रिविध योग कर जो कोई पूजै सहजानंद पद पावै॥ ॐ ह्री. .

जन-ग्रन्थ-संग्रह। २५७ संकुल फटत धीयांसनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ध्यानवे कोड़ा- कोदी क्ष्यानचे फोड़ क्ष्यानवे लाख सादेनी हजार व्यालीस मुनि सिद्ध पद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ ॥११॥ कुसुमलता चंद्र-श्री मुनि संकुल कूट परम सुंदर सुम्बदाई । विमलनाथ भगवान जहां पंचम गति पाई ॥ सात शतक मुनि और प्यालिस जानिये । सत्तर कोड़ सात लाख हजार छै मानिये ॥ दोहा-अष्ट फर्मको नाश कर, मुनि अष्टम क्षिति पाय || निनको में वंदन फरों, जन्मभरण दुग्न जाय ॥ ॐ ह्रीं श्री संफुलकुटत श्री विमलनाथ जिनेंद्रादि मुनि सत्तर कोड़ सात लाख छ हजार सातसै व्यालीस मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिविक्षेत्रेभ्यो भर्च ॥१शा अडिल-कूट स्वयंप्रभु नाम परम सुंदर फदी। प्रभु अनंत जिननाथ जहां शिवपद कहौ । मुनि जु कोदाकोढ़ी झ्यान जानिये । सत्तर कोड़ जु सत्तर लाख घलानिये ॥ सत्तर सहस तु और सातसे गाइये । मुक्ति गये मुनि तिन पद शीस नवाइये ।। कदे जवाहर दास सुनी मन लायके । गिरवरकों नित पूजी मन हरपायकै ॥ ॐ ह्रीं स्वयंभू करतें श्री अनंतनाथ जिनेंद्रादि मुनि क्यानवै कोड़ा- फोदी सत्तर लाग्न सात हजार सातसै मुनि सिद्धपद प्रताय सिद्धिक्षेत्रेभ्यो अर्घ ॥१३॥ चौपाई-कूट सुदत्त महा शुभ जानों। श्री जिनधर्म नाथको थानी । मुनि तु कोड़ाकोड़ी उन तीस और कहे ऋषि कोढ़ उनीस ।। लाख तु नव्वै सहस नौ सानों । सात शतक पंचा नव मानों ॥ मोक्ष गंये वसु कर्मन चूर । दिवस रेल तुमही भरपूर ॥ ॐ ह्रीं श्री सुदत्त फूटतै श्री धर्मनाथ जिनेन्द्रादि मुनि उनतीस फोडाकोड़ी उनीस कोड़ नव्य लाग्न नौ हजार सातसे पंचानवै मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्थ निर्यपामिति स्वाहा ॥१४॥ है प्रभासी फूट . ૨૧૮ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। सुंदर अत पवित्र सो जानीये । सांतनाथ जिनेन्द्र जहांत परम धाम प्रमानिये । ॐ ह्रीं प्रभास कूटते श्री शांतिनाथ जिनेन्द्रादि मुनि नौ कोड़ाकोड़ी नौ लाख नौ हजार नौसे निन्यानवे मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ ॥ १५ ॥ गीतका छंद- शान घर शुभ कूट सुंदर परम मनको मोहनी । जहते श्री प्रभु कुंथु स्वामी गये शिवपुर को गनो ॥ कोडाकोड़ी क्यानवे मुनि कोड़ि क्ष्यानवे जानिये । लाख बत्तीस सहस क्ष्यानवे अरु सात सौ सात प्रमानिये । दोहा-और कहे ज्यालीस सुमरी हिये मझार । जिनवर पूजौ भाव सौ, कर भवदधि ते पार ॥ ॐ ह्रीं झानधरकूट से श्रीकुंथुनाथ स्वामी और क्ष्यानचे कोडाकोड़ी मुनि क्ष्यानवे क्रोडि बत्तीस लाख क्ष्यानवे हजार मरु सातसौ व्यालीस मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्ध क्षेत्रेभ्यो अर्घ ॥१क्षा दोहा-कूट जु नाटक परम शुभ, शोभा अपरंपार । जहते अरह जिनेन्द्रजी, पहुँचे मुक्त मझार । कोडि निन्यानवे जानि मुनि, लाख निन्यानवै और । कहे सहस निन्यानवै, धंदौ कर जुग जोर ।। अष्ट कर्मको नाशकर, अविनाशी पद पाय.। ते गुरु मम हृदये वसी, भवदधि पार लगाय ।। ॐ ह्रीं नाटक कूटते श्री अरहनाथ जिनेन्द्रादि मुनि निन्यानवै कोहि निन्या- नवै लाख निन्यानवै हजार मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्ध क्षेत्रेभ्यो अर्घ ॥ १७ ॥ अडिल छन्द-कूट संवल परम पवित्र जू॥ गये शिवपुर मल्लि जिनेश जू। मुनि जु-क्ष्यानवै क्रोडि प्रमानिये, पद जिनेश्वर हृदय मानिये ।। ॐ ह्रीं संवल कूटते श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्रादि क्ष्यानवै कोडाकोड़ी मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ ॥१८॥ ढार परमादीकी चालमें- मुनिसुव्रत जिनराज सदा आनंदके दाई । सुंदर निजर कूट जहाँ ते शिवपुर पाई ॥ निन्यानवै कोड़ाकोड़ कहे मुनि कोड़ ॥

जैन-प्रन्य-संग्रह। २५६ संतावन । नो लख जोर मुनेन्द्र कहे नासे निन्यावन । सोरठा-कर्मनाश ऋषिराज, पंचमगतिके सुख लहे । तारन तरन जिहाज मो दुखदूर करौ सफल ॥ ॐ ह्रीं श्री निर्जर कूटतें श्री मुनिसुवृतनाथ जिनेंद्रादि मुनि निन्यानवे कोड़ा कोड़ी संतावन कोड़ नौ लाख नौ शतक निन्यानवै मुनि सिद्धपद प्राप्ताय अर्घ ॥ १६ ॥ ढार जोगीरासा-येही मित्रधर कूट मनोहर सुंदर अतिछबछाई । श्री नमि जिनेश्वर मुक्ति जहांते शिवपुर पहुंचे जाईनौले कोड़ा कोड़ीमुनीश्वर एक अर्व ऋषि जानौ । लाख सैतालिस सात अव नौसे व्यालिस मानी। दोहा-वसु कर्मन को नाशकर, अविनाशी पद पाय । पूजी चरन सरोज ज्यों, मनवांछित फल पाय॥ ॐही श्री मित्रधर फूटते श्री नमिनाथ जिनेन्द्रादि मुनि नासे कोडाकोड़ी एक अर्व सैतालिस लाख सात हजार नाले व्यालिस मुनि सिद्ध- पद प्रासाय सिद्ध क्षेत्रेभ्यो अर्ध ॥२०॥ दोहा-सुवर्ण भद्र जू कूट ते, श्री प्रभु पारसनाथ । जहंत शिवपुरको गये, नमो जोडिग हाथ ॐ ह्रीं सुवर्णभद्र कूटते श्री पर्श्वनाथ स्वामी सिद्धपद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥२१॥ याविधि बीस जिनेन्द्रके, वीसी शिखिर महान ॥ और असंख्य मुनि जंह पहुँचे शिवपुर थान ॐ ह्रीं श्री वीस कूट सहित अनंत मुनि सिद्धपद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ ॥२२॥ ढार कातिककी प्राणी आदीश्वर महाराजजी, अष्टापद शिव थान हो । वासपूज जिनराजजी चंपापुर शिवपद जान हो। प्राणी नेम प्रभु गिरनारते, पावापुर श्री महावीर हो ॥ प्राणी पूजी अर्ध चढ़ाय कै, इह नाशै भयभीत हो। प्राणी पूजी मनवच कायके ॥ ॐ ह्री श्री ऋषभनाथ कैलाश गिरते श्री महावीरस्वामी पावापुर ते श्री वासुपूज चंपापुर तें नेमिनाथ .

२६० जैन-ग्रन्थ-संग्रह। गिरिनारते सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ ॥२३॥ दोहा-सिद्धक्षेत्रजे और हैं, भरत क्षेत्रके मांहि ॥ और जु अतिशय क्षेत्र हैं, कह जिना- गम मांहि । तिनको नाम जु लेतही, पाप दूर हो जाय । ते सब पूजौ अर्घ लै, भव भवकू सुखदाय । ॐ ह्रीं भरतक्षेत्र अतिशय क्षेत्रेभ्यो अर्घ सोरठा-दीप अढ़ाई मेरु सिद्ध क्षेत्र जे और है । पूजा अर्घ चढ़ाय भव भवके अधनाश है।। ॐ ह्रीं अढाई द्वीप सम्बंधी सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ ॥२४॥ - , नथ जयमाला। चौपाई-मन मोहन तीरथ शुभ जाना । पावन परम सु क्षेत्र प्रमानौ । उन्नति शिखिर अनूपम सोहै। देखत ताहि सुरासुर मोहे । दोहा-तीरथ परम सुहावना, शिखर सम्मेद् विशाल ॥ कहत अल्प बुध उकसो, सुखदायक जयमाल ॥२॥ चौपाई-सिद्धक्षेत्र तीरथ सुखदाई । वंदत पाप दूर हो जाई। शिखिर शीस पर कूट मनोग । कहें वीस अतिशय संयोग॥३॥ प्रथम सिद्ध शुभ कूट सुनाम । अजितनाथ को मुक्ति सुधाम ।। कूट तनौ दर्शन फल कही । कोड़ि बत्तीस उपास फल लहौ ॥ ४॥ दूजौ धवल कूट है नाम । संभव प्रभु जहते. निर्वाण ॥ कूट दरश फल प्रोषध मानौ । लाख व्यालिस कहै बखानौ ॥५॥ आनन्द कूट महासुखदाई । जह तैं अभिनन्दन .. शिव जाई । कूट तनौ वंदन हम जानौ । लाखउपाल तनी फल मांनी ॥६॥ अवचल कूट महासुख घाम । मुक्तिं गये जह सुमति जिनेश ।। कूट भाव धर पूजौ कोई । एक कोड़. प्रोषध : फल होई॥७॥मोहन कूट मनोहर जान । पझ प्रभु जहं निर्वाण ॥ कूट पुन्य फलं लहै सुजान । कोड उपास कहै भगवान ॥८॥ : मन मोहन शुभ कुट प्रभासा । मुक्ति गये जहत श्रीयांसा...पूजै..

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २६१ कूट महाफल सोई। कोड़ बत्तीस उपवास फल होई ॥६॥ चन्द्र प्रभु की.मुक्ति सुधामा । परम विशाल ललित घट नामा॥ दर्शन कूट तनौ म जाना। प्रोषध सोली लाख चखाना॥ १० सुप्रभ कूट महा सुखदाई । जहत पुष्पदन्त शिव जाई ॥ पूर्जे कूट महा फल होय । कोड़ उपास कहै। जिनदेव ॥ ११ ॥ सो विद्यु तवर कूट महान । मोक्ष गये शीतल धर ध्यान ॥ पूज त्रिविध योग कर कोई । कोड़ उपास तनी फल होई ॥ १२ ॥ संकुल कूट महा शुभ जानौं । जई ते श्रीयांस भगवानौ ॥ कूट तनी अब दर्शन सुनौ । कोड़ उपास जिनेश्वर भनौ ॥ १३ ॥ संकुल कूट परम सुखदाई । विमल जिनेश जहां शिव जाई ।। मन वच दर्श करे जो कोई । कोड़ उपास तना फल हाई ॥१४॥ कूट स्वयंप्रम सुभगसु ठाम । गये अनन्त अमरपुर धाम ।। एही कूट कोई दर्शन करै । कोड उपास तना फल धरै ॥१५॥ है सुदत्तवर कूट महान ।जह से धर्मनाथं निर्वाण ॥ परम विशाल कूट है कोई, कोड़ उपवास दर्शफल होई ॥१६॥ परम विशाल कूट शुभ कही। शांति प्रभु जहँ नैं शिव लहो ।। कूट तनौ दर्शन है सोई । एक कोड़ प्रोपध फल होई ॥ १७ ॥ परम ज्ञानधर है शुभ कूट । शिवपुर कुंथु गये अघ छूट ।। इनकी पूजै दोइ कर जोर । फल उपवास कहो इक कोड़॥१८॥ नाटक कूट महा शुभ जान । जहँ तै अरह मोक्ष भगवान ।। दर्शन करै कूट को जाई । क्ष्यानवै कोई उपासफल होई ॥१॥ संबलकूट-मल्लि जिनराय । जहते मोक्ष गये निज काय ।। कूट दरश फल कहा जिनेश । कोड़ि एक प्रोपध फल होय २० निर्जर कूट महा सुखदाई । मुनिसुनत जहँ तै शिव जाई ।। कूट तनौ दर्शन है सोई । एक कोड प्रोषध फल हाई ॥ २१ ।।. कूट मित्रधरतै नमि मोक्ष । पूंजत आय सुरासुर जक्ष ॥ कूट .

૨૨ जैन-प्रत्य-संग्रह। the तनौ फल है सुखदाई । कोड़उपास कहा जिन राई ॥ २२ ॥ श्रीप्रभु. पार्श्वनाथ जिनरायः । दुरगति तै कूट महाराज ॥ सुवर्णभद्र कूट को नाम ॥ जहं ते मोक्ष गये जिन धाम ॥२३॥ तीन लेक हित करत अनूप । मंगल मय जगमैं चिद्रूप.॥ चिन्तामणि वर वृक्षसमान । रिद्धसिद्ध मंगल सुखदान॥२४॥ पार्श्व और. फाम जौ धैना नाना विध आनन्द को देनः ।। व्याध विकार जाह सब भाज। मन चिन्तै पूरे सब काज॥२५॥ भवदधि रोग विनाशक होई। जो पद जग मैं और न कोई॥ निर्मल परम धाम उत्कृष्ट वन्दत पाप भजे अरु दुष्ट ॥ २६ ॥ जो नर ध्यावत पुन्य कमाय । जश गावत.ऐ.कर्म नशायः॥ कर अनादि कर्म के पाप ! भजे सकल छिन में संताप ॥ २७॥ सुर नर इन्द्र फणिन्द्र जु सवै । और खगेन्द्र महेन्द्र तु नमै । नित स्वर स्वरीकरै उचार । नाचत गायतविविध प्रकार॥२८॥ बहु विध भक करमनलाय । विविध प्रकारवाजिन वजाय॥२॥ दुमद्रुम छम बाजे मृदंग । घन घन घंट जै मुह चंग। झन झन झनिया करें उच्चार | सार सारंगी धुन उचार॥३०॥ मुरली वीन वजै धन मिष्ट । पट हांतुरी स्वरान्नुत पुष्ट ॥ नित स्वर्गन थित गावत सार । स्वर्गन नाचत बहुत प्रकार ॥ ३१॥ भननन झननन नूपुर तान । तननन तननन टोरत तान । तो येई येई थेई थेई थेई चाल । सुर नाचत निज नावत भाल||३|| गावत नाचत नाना रंग। लेत जहां शुभ मानन्द संग ॥ नित प्रति सुर जहां नदै जाय ॥ नाना विध मंगल की गाय ॥ ३३ ॥ आनन्द धुन सुन मोर जुसोय । प्राप्त वषको अत ही होय ॥ ताते हमकू है सुख सोई। गिर वंदन कर..धर शुभ होई ॥३४॥ मारुत मन्द सुगन्ध चलेय । गंधोदक तहांवर सोय। जियको जात विरोध न होई । गिरिवर-वंदै कर धर दाई ॥ ३५ ॥ ज्ञान जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २६३ चरित तपला धन होई । निज अनुभवको ध्यान धरेय ॥ शिव मन्दिर को धार सोई । गिरिवर वंदै कर घर दोई ॥३६ ॥ जो भव वन्दै एक नुवार । नरक निगोद पशु गति टार ।। सुर शिवपदकू पावै सोय । गिरिवर वंदौ कर घर दोय ॥३७॥ ताकी महिमा अगम अपार । गणधर कबहूँ न पा पार ।। तुम अद्भुत मैं मति कर हीन । कही भक वसु केवल लीना३८॥ धत्ता-श्री सिद्ध क्षेत्र अति सुख देत । सेवतु नासौ विघ्न हरा ॥ अरु कर्म विनाशै सुख पयासै केवल भासै सुख करा । ॥३६॥ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिसिर सिद्धपद प्राप्ताय सिद्धक्षेत्र- भ्यो महाघ । दोहा-शिविरसम्मेद पूजो सदा । मनवच तन नारि ॥ सुर शिव के जे फल लहै । कहते दास जवार । इत्यादि आशीर्वादः । दीप मालिका विधान । ( महावीर बिन पूजा कवि वृन्दावन जी कृत ) स्थापना । मत्तगयंद । श्रीमत वीर हरें भवपीर, भरै सुखसीर अनाकुलताई। केहरि अंक अरीकरर्दक नये हरिपंकतमौलि सुहाई ॥मैं तुमको इत थापतु हौं प्रभु, कि समेत हिये हरपाई । हे करुणाधन- धारक देव, यहां अव तिष्ठहु शीघ्रहि आई ॥ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर । संवौष्ट अत्र तिष्ठ तिष्ठ। 33:। अत्र मम सिनिहितो भव भव । वषट् ॥

૨૪ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। अथाष्टक. बंद अष्टपदी। क्षीरोदधिसम शुचि नीर, कन्चनभुंग भरौं । प्रभु वेग हरी भवपीर, या धार करौं । श्रीवीर महा अतिवोर, सन- मतिनायक हो । जय वर्तमान गुणधीर, सनमतिदायक हो। ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाम जलंनिर्वपाभीति स्वाहा ॥१॥ मलयागिरचंदन सार, केसरसंग चला।प्रभुभव आताप निवार, पूजत हिय हुलसौं ॥ श्रीवीर० ॥ जय वर्धमान०॥ ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं नि०॥ तंदुलसित शशिसम शुद्ध, लीने थारभरी । तनु पुंज घरी अविरुद्ध, पाऊ शिवनगरी॥ श्रीवीर. जय वर्धमान ॥२॥ ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षातान् नि॥३॥ सुरतरु के सुमनसमेत, सुमन सुमन प्यारे । सो मन- मथ भंजन हेत, पूल पद थारे ॥ श्रीवीर॥ जय वर्द्धमानः ॥ . . ॐहोंश्रीमहावीरजिनेन्द्राय कामवाणविध्वंसनाय पुष्प निगा। रसरज्जत-सज्जत सद्य, मज्जत थारभरी । पदजज्जत रज्जत अध, भज्जत भूख अरी ॥ श्रीवीर०॥ जयवर्द्धमान०॥ ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय क्षधारोगविनाशनाय नैवेध नि०॥५॥ तमखंडित मंडित नेह, दीपक जोवत हूँ। तुम पंदतर.हे सुखगेह, भुमतम खोवत हूँ ॥ श्रीवीर० जय वईमान० ॥. ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय माहान्धकारविनाशनाय दीप नि॥६॥ : हरिचन्दन अगर कपूर, चूरि सुगन्ध करे ! तुम पदतर खेवत भूरि, आठौं कर्म जरे ॥ श्री.वीर० ॥ जयवर्द्ध मान० ॥ ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं नि०॥७॥ रितुफल कलवर्जित 'लाय, कंचनथार भरौं, शिवः फल हित

जैन-ग्रन्थ-संग्रह
२६५
हे जिनराय, तुम ढिग भेट धरौं। श्री वीर० ॥ जयवर्द्धमान०॥
ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि०॥८॥
जलफल वसुसजि हिमथार, तनमन मोद धरी । गुण गाऊ
भवदधितार, पूजत पापहरों॥ श्रीवीर० ।। जयवर्द्धमान
ॐ ह्रीं श्रीचर्द्धमानजिनेन्द्राय अनद्यपदप्राप्तये अयं निगाह
पंचकल्यानक-राग टप्पा ।
माहिराखी हो सरना, श्रीवर्धमान जिनरायजी, मोहि
राणी हो सरना ॥ टेक ॥ गरम सादसित छट्ट लियौ तिथि,
त्रिशला उर अघहरना । सुर सुरपति तित सेव करत नित,
मैं पूजू भक्तरना । मोहि राखी० ॥१॥
के हों आपाढशुलपष्टिदिने गर्भमङ्गलमण्डिताय श्री-
महावीर जिनेन्द्राय अध्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥
जन्म चंत सित तेरस के दिन, कुंडलपुर कनवरना ।
सुरगिर सुरगुरु पूज रचायो, मैं पूजु भवहरना ॥ माहिराखौ.
ॐ ह्रीं चैत्रशुलत्रयोदशीदिने जन्ममङ्गलप्राप्ताय श्रीमहा-
वीरसिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामोति स्वाहा ॥२॥
मगशिर असित मनोहर दशमी, ता दिन तप आचरणा। नृप
फुमारघर पारन कोना, मैं पूजूं तुम चरना। मोहि राखौ हो॥३॥
ॐ ही मार्गशीकृष्णदशभ्यां तपोमङ्गलमंडिताय श्री-
महावीरजिनेन्द्राय अर्घ निर्वामीति ल्वाहा ॥३॥
शुकलदर्श वैशाखदिवस अरि, घात चतुक छय करना।
फेवल लहि भवि भवसर तारे, जजू चरन सुख भरना । मोहि
राखी०॥४॥
ॐ ही वैशास्त्रशुक्लदशम्यां शानकल्याणप्राप्ताय श्रीमहा-
वीरजिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥४॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। - . कातिक श्याम अमावस शिवतियं, पावापुर वरना । गनफ- निवृव जजै तित बहु विधि,मैं पूजू भवहरनामोहिराखौ०॥५॥ ॐ ह्रीं कार्तिकरष्णामावास्यायां मोक्षमङ्गलमंडिताय श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ अथ जयमाला । छंदहरिगीता ( २८ मात्रा) गनधर असनिधर चक्रधर, हरघर गदाधर वरवदा । अरु चापधर विद्यासुधर, तिरसूलधर सेवहिं सदा ॥ दुखहरन आनंदभरनं तारन, तरन चरन रसाल हैं। सुकुमाल गुन मणिमाल उन्नत, भालकी जयमाल हैं ॥१॥ छंद धत्तानंद (३१ मात्रा) जय त्रिशलानंदन हरिकृतवंदन, जगदानंदनचंद वरं। भवतापनिकंदन तनमनवंदन, रहितसपंदन नयन धरं ॥२॥ छंद तोटक । जय केवलभानुकलासदनं । भविकोकविकाशन कंजवन.. : जगजीत महारिपु. मोहहरं । रजवानद्दावरचूरकर ॥१॥ गर्मादिक मंगल मंडित हो।दुख दारिदको नित खंडित हो। जंगमाहि तुमी सत पंडित हो।तुमहीभवभावविहंडित हो॥१॥ हरिवंससरोजनकौं रवि हो। बलवंत.महंत तुमी कवि हो। लहि केवल धर्मप्रकाश कियौ। भवलौं सोई मारगराजतियो॥३॥ पुनि आपतने गुणमाहिं संही।सुर मग्न रहे जितने सब ही। विनकी वनिता गुणगावत हैं।लय ताननिसों मनभावत है। पुनिः नाचत रंग अनेक भरी। तुव. भक्तिविषेपा एम घरी। झनन भनन भनन भनन । सुर लेत. तहाँ तननं तननं ॥५॥ .

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। घनन घनन घनघंट पर्ने । दमदं द्वमदं मिरदंग सजें। गगनांगणगभगता सुगता ।ततता ततता अतता वितताक्षा धृगतां धगतां गति वाजत है।सुरताल रसालतु छाजत है। सननं सनन सनन नभमैं । इकरूप अनेक जुधार भमैं ॥७॥ कर नार सुधीन घजायतु हैं। तुमरीजस उलल गावतु हैं। करताल िफरतालधर । सुरताल विशाल जु नाद करें॥८॥ इन आदि अनेक उलाहभरी। सुरमकि फर प्रभुजी तुमरी। तुमही जगजीवनकेपित हो। तुमही दिन फारणफे हितह॥६॥ तुमही सय विघ्न विनाशन हो! तुमही निजानंदभासन हो। तुमही चितचिंतितदायफ हो जगमाहिं तुमीसबलायकहोर तुमरे पनमंगलमाहि सही। जिय उत्तम पुण्य लियौ सब ही। हमको तुमरी सरनागत है। तुमरे गुनमै मन पागत है ॥१६॥ प्रभुमो हिय आपसदावसिये जवली वनुकर्म नहीं नसिये। तबलौंतुमध्यान हिये वरतो।तबलौंधुतचिंतन चित्तरत॥१२॥ तवलींवत चारित चाहत हौं । तबलौ शुभ भाव सुगावत हौं। तपटींसतसंगति नित्य रही। तवलौंममसंजम चित्तगहो॥१३ जवलीनहिनाश फरी अरिको। शिवनारिप समताधरिको। यह यो नबली हमको जिनजी। हम जाचत हैं इतनीसुनजी॥१४ छंद धत्तानन्द । श्री वीर जिनेशा नमित सुरेशा, नाग नरेशा भगति भरा। 'वृन्दावन ध्या' वांछित पा शर्मवरा ॥१५॥ ॐ हीं श्री वर्धमान जिनेन्द्राय पूर्णाध्य निर्वपामीति स्वाहा । दोहा। श्री सनमति के जुगल पद, जो पूजहि धर प्रीति । वृन्दावन सो चतुर नर, लहै मुक्त नयनीत ॥१६॥ --- .२६८ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। धारेंसंस्कृत। जयमालासहित। . वसन्त तिलकाबन्द। यःपांडुकामल शिलागतमादि देव । सिस्नापयामिसु परान्सुरशैलमृद्धिन । कल्याणमीश्वर हमक्षित तोयपुष्पैः । सम्मावयामिपुरएवतदीपविम्बम् ॥ १॥जिन बिम्ब स्थापनं ।। सत्पल्लवार्चितमुखास्कलधौतरूप्य । तम्रारकटघटितापयसं सपूर्णान् । संवाजतो मिवगताचतुरासमुद्रान् । संस्थापयामि कलशां जिनदेदिकान्ते । कलश स्थापनम् ॥ २॥ दुरावनात्र- सुरनाथकिरीटकोटी । संलग्नरत्नकिरणाक्षविधूसरांगी । प्रस्वेदतपरिमलामुकतेप्रेकोष्टं । भक्त्याजलैजिनपतीवदुधा- भिषेक ॥ ३॥ जलस्नानं ॥ भक्याललाटतटदोसनिवेसतोच। हस्तीस्तुतानुरवरासुरमर्तिनाथै । तत्कालपेलतमहेक्षुरसंख्य- धारा । सद्यापुनातुजिनविम्वगतैवजुख्यान ॥ ४॥ इक्षुरसस्ना. पनं ॥ उत्कृष्टवर्णनवहेमरसाभिरामा । देहप्रभावलयसंकमलू- प्रदीस्थां । धाराघृतस्यशुभगन्धगुणानुमेयं । वन्देहतंसुरमिसं. स्नपनंकरोमिः ॥ ५॥ घृतस्नापनं । सम्पूर्णशारदशशांकमरीच जालैः । सधैरिवात्मयशसाम्विलाप्रवाहै । क्षीरै जिनाशुचित रैरभिषिंचमानं । सम्पादयन्तिमभिचिन्तसमीहितानं ॥६॥ दुग्धस्नापनं ॥ दुग्धाध्विीचिचयसंचितफेनराशै । पांडुत्व . कान्तिमिवधारयतामतीया । दध्यागताजिनपतेप्रतिमंसुधारा। सम्पादितसयदिवांक्षित सिद्धये ॥ ७॥ दधिस्नापर्ने । संस्ना पितल्यवृतदुग्धदधिप्रवाहै । सर्वाभिरौषधिभिरहतंउज्ज्वला- .

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २६६ भी। उद्धर्ततस्यचिदधामभिपेकमेला । कालेयकुमकुमरसोत्कट वारिपूरै ॥ ८॥ सौंपधीस्नापनं ॥ इटैमनोरथसतैरितभव्य पुस । पूर्णसुवर्णकलशैनिखिलावसानसन्सारसागरविलंधनहे. तुसेती। मप्लावरोत्रभुवनाद्धिपतिजिनेंद्र ॥६॥ चतुरकलश स्नापन ॥ द्रव्यरनल्पधनसारचतुरासमुद्र । रामोदवासितस- मस्तदिगन्तरात्म। मिधीकृतेनपयसाजिनपुंगवाने । त्रैलोक्य पाचनमहंस्नपनंकरोमिः ॥१०॥ गन्धोदकस्नापनं ।। श्लोक ।। निर्मल:निर्मलीकरण पवित्रं पापनासन । जिनगन्धोदकंवन्दे । सर्वपापविनाशनं ॥११॥ गन्धोदकवन्दनं ।। अथ जयमाला ।। अन्तमाह जिनेश्वर माहि परमेश्वर इन्द्रन्हवनसंजोइयऊ । नव देखिविलम्पो दियराजम्पो सुरंपरंपरयोलियऊ || पड़ीछन्द ।। शिमफलशदुवालाजिनेंद्र । तसुमन में जम्पोसुरवरेन्द्र । दिट्ठो- जिनेन्द्रयालोशरीर । तरनेरुअंगूठाइनोवीर ॥१॥ डगमगो मेर कम्पो सुरेश । नोराधियीरजाने जिनेश । सुरसाथ सुरेश भये अनंद । लोश्य नाथ जहां भुवन चन्द्र ॥२॥ जय जय पालोपन भुवन मन्य । कन्दर्प दलन निज मुक्ति पंथ । सुरनर पतियंजर गुणहमृद्धि । तुम दर्शन स्वामो होहुसिद्ध ॥३॥ तहां इन्द्र गुन्हौन कराययत्र ते तीसफोटि शिरधरें.क्षत्र । ढारघटसहस्रम्अष्टनार । क्षीरोदधि से ला सुरसुधीर ॥ ४॥ कुमकुम चंदन चर्ने शरीर भवताप दहननाशन सुवीराजे अन्य विरस गुरुकर विभाव । जे अमर लहें शिव पुरी ठाब ॥ ५॥ उज्चल अक्षत आगे धरेटु । अरिहन्तासद्धिपुनि पुनिभने । जेनेवजनवविधिथारदेहि । मनवचनलफलकाया फरेहि ॥६॥ आत: इन्द्रकरचलोशांति । मणिरत्नप्रदीपहि प्रज्वलांति ॥ धृपअगरखेसुगन्ध । मय जयनरघरपट्टवन्ध ॥७॥ फलमालिकेलिजिनचढनयोग्य । करभावधरपुनलहैं २७० जैन-प्रन्य-संग्रह। भाग्य । वसुविधिपूजाकर चलोहन्द्र! दुन्दुभीवाजेसुरमयां नन्द ॥ ८॥ नरपुहिमिलोयरंजीमहेन्द्र । सब विधिसे भकि करीसतेन्द्र । फेलोपहुनन्दनकरहिएव । फिरपालभनेंजिनचर णसेव ॥६॥ पत्ता । सम्यक्त्वढ़ावे शान बढ़ावे विविधभांति स्तुति करऊ। जिनवरमनध्यावे शिव पद पावे भव समुंद्रदुस्त- रतिरऊ । इत्याशीर्वादः। ॥ इति धार जयमालहित सम्पूर्णम् ॥ 17 जन्मकल्याणक पूजा। दोहा दोष अठारह रहित प्रभु, सहित सुगुण झ्यालीस । तिन सब की पूजा करौं, आय तिष्ट जगदीश ॥१॥ ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट्चत्वारिंशद्गुणसहित श्री- महत्परमेष्टिन् ! अत्र अवतर! अवतर! संघौषट् । ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट् 'चत्वारिंशदगुणसहित श्रीमदईपरमेष्टिन् ! अत्र तिष्ट तिष्ट । ठा। ॐ ही अष्टादशदोषरहित षट् त्वारिंशदगुणसहित श्रीमदहत्परमेष्टन् ! अत्रममसन्निहिती भव भव । वषट् । ... अष्टक। धानतरायकृत नन्दीश्वर द्वीपाक की चाल।) शुचिक्षीरउदधिको नीर, हाटक मुंग भरा। तुमपदपूजों गुणधीर, मेटो जन्मजरा ॥ हरि मेरुसुदर्शन जाय, जिनवर न्हौन करें। हम पूजै इन गुण गाय, मंगल मोद धरें॥१॥ ॐ ही अष्टादापरहित षट् चत्वारिषद्गुण सहित श्री- .

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
मदहत्परमेष्टिने जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वामीति
स्वाहा ॥१॥
केसर घनसार मिलाय, शीत सुगन्धधनी।
जुगचरनन चर्चा लाय, भव आतापहनी।
हरि मेरु सुर्दन जाय, जिनवर न्हान करें।
हम पूर्फ इत गुण गाय, मंगल मोद धरें ॥२॥
केही अष्टादशदोषरहित षट् चत्वारिंशद्गुणसहित
श्रीमदर्हत्परमेष्टिने संसारातापविनाशनाय चन्दनं निर्वयामीति
स्वाहा॥
मक्षत मोती उनहार, स्वेत सुगन्ध भरे ।
पाऊ अक्षयपद सार, ले तुम भेंट धरे।
हरि मेरुसुदर्शन जाय, जिनवर न्हान करें।
हम पूजै इतगुणगाय, मङ्गल मोद धरें ॥३॥
केही अष्टादशदोषरहित षट्चत्वारिंशद्गुणसहित श्री.
मदहत्परमेष्टिने अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा
चल्हा जूही गुलाव, सुमन अनेक भरे ।
तुम भेंट धरों जिनराज, काम कलंक हरे।
हरि मेरु सुदर्शन जाय, जिनवर न्हौन करें
हम पूर्जे इतगुण गाय, मंगल मोद धरें ॥४॥
• ॐ ह्रीं महादश दोषरहित षट्चत्वारिंशद्गुणसहित
श्रीमदईत्परमेष्टिने कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति
स्वाहा।
फेनी गोझा पकवान, सुन्दर ले ताजे ।
तुम अप्र धरों गुण मान, रोग छुधामाजे॥
हरि मेरु सुदर्शन जाय, जिनवर न्हान करें।
हम पूर्जे इत.गुण गाय, मंगल मोद धरै ॥५॥

२७२ जैन-अन्ध-संग्रह। ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट्चत्वारिंशगुणसहित श्रीमदहत्परमेष्ठिने क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा। कंचन मय दीपक चार, तुम आगे लाऊं। मम तिमिर मोह छैकार, केवल पढ़ पाऊ। हरिमेरु सुदर्शन जाय, जिनवर न्हान करें। हम पूर्फ इत गुण गाय, मंगल मोद घरें ॥६॥ ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट्चत्वारिंशइगुणसहित श्रीमदहत्परमेष्ठिने मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। कृष्णागर तगर कपूर, चूर सुगन्धं करो! तुम आगे खेचत भूर, वंतुविध कर्म हरों ।। हरि मेरु सुदरशन जाय, जिनवर न्हान करें। हम पूर्फ इत गुण गाय, मंगल मोद धरें ॐ ह्रीं अष्टादशदोपरहित षट्चत्वारिंशद्वगुणसहित श्रीमहत्परमेष्टिनें अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । श्रीफल अंगूर अनार, खारक थार भरों।.. तुम चरन चढ़ाऊ सारं, तां फलं मुक्ति वरों। हरि मेरु सुदर्शन जाय, जिनवर न्हान करें। हम पूर्फ इत गुण गाय, मंगल मोद धरें॥८॥ ॐ ह्रीं अष्टादश दोपरहित षट्चत्वारिशद्धगुणसहित श्रीमदर्हत्परमेष्ठिने मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा । जल आदिक आठ भदोष; तिनका अर्घ करों। तुम पद पूजों गुण कोप, पूरन पद सुधरों.॥ हरि मेरु सुदरशन जायं, जिनवर न्हान करें। हम पूर्जे इत गुण गाय, वदुरी मोद धरें॥६ - जैन-ग्रन्थ-संग्रह। . २७३ ॐ ह्रीं अष्टादशदापरहित षट्चत्वारिंशद्गुणसहित श्रीमदहत्परमेष्टिने अनद्यपदप्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। भारती। (जोगीरासा ।) जन्मसमय उच्छच करने को, इन्द्र शची युत धायो। तिहुँ को कछु वरणन करवेको, मेरो मन उगगायो । युधि जन मोकों दोप न दीजो, थोरी बुद्धि भुलायो। साधू दोष क्षमै सब ही के. मेरी फरी सहायौ ॥१॥ (छन्द कामिनी-मोहन मात्रा २० ।) जन्म जिनराज को जवहिं निज जानियों। इन्द्र धरनिंद्र सुर सकल अकुलानियों ॥ देव देवाङ्गना चलिये जयकारती ॥ शचियं सुरपति सहित करति जिन भारती ॥२॥ साजि गजराज हरि लक्ष जोजन तनो । वदन शत वदन प्रति दन्त वसु सोहनी ॥ सजल भरि पुर सरतंत प्रति' धारतीं। शचियं सुरपति सहित, करति जिन आरतीं ॥३॥ सरहिं सरपंच दुय एक कमलिनी बनी । तासु प्रति कमल पच्चीस शोभा घनी। कमल दल एक सौ आठ विस्तारती। शचियं सुरपति सहित करत जिन आरती॥४॥ दलहि दल अप्सरानाचहीं भावसों। करहिं सङ्गीत जयकार सुरचावल। तगड़दातगड़थेई करत पग धारतीं। शचियं सुरपति स० ॥५॥ तासु करि बैठि हरि सकल परिवारसों । देहि पर दक्षिणा जिनहिं जयकारसों आनि कर शचियं जिननाथ उर धारतीं। शचियं सुरपति स० ॥ ६ ॥ आन पांडुक शिला पूर्व मुख थाप जिन । करहिं अभिषेक उच्छाह सो अधिक तिन ।। देखि २७४ जैन-ग्रन्थ-संग्रह. प्रभु बदन छवि कोटि रविवारती शचियं सु०॥ ७॥जो जनह आठ.गम्भीर कलशाबने । चारि चौराई मुख एक जोजन तने। सहसर आठ भरि कलश शिर ढारही।शचियसुरपति साटा छत्र मणि खचित ईशान करतारहीं । सनत महेन्द्र दोऊ चमर शिर ढारहीं ॥ देव देवीय पुष्पांजिढारती ।। शचियं सुरपति सहित करहि जिन ॥ ६ ॥ जलसु चन्दन पहुप शालि चरु ले धरों ।दीप अरु धूप फल अर्घ ले पूजा करों ॥ पिंडिका और नीरांजना बारतीं। शचियं सुरपति सहित कर० ॥१०॥ कियो शृङ्गार सव अंगसामान लों। आनि मातहिं दियो बहुरि जिनराज को ॥ तृपत नहीं होत हग रूप. निहारतीं। शचियं सुरपति सहित करत० ॥११ ।। ताल मिरदंग धुनि.सप्तसुर वाजहिं । नृत्य तांडव करत इन्द्र अति छाजहीं ।। करत उच्छाह खौं निज सु पद धारती ॥ शचियं सुरपति सहित करत. ॥ १२॥ भव्यजन आय जिन जन्म उत्सव करें। आपने जन्म के सकल पातिक हरें॥ भक्ति गुरुदेव की पार उतारतीं। शचियं सुरपति सहित करहिं जिन आरती ॥१३॥ वत्ता। जिन वर पद पूजा भावतु हूजा, पूरण चित्त मानन्द भया । जयवन्त सु हूनो मासा पूजो, लाल विनोदी भाल नया। ॐ ह्रीं अष्टादश. दोषरहित. षट् चत्वारिंशद गुण सहित श्री मदईत्परमेष्टिने पूर्णा निर्बपोमीति स्वाहा । . चौपाई। मंगल गर्भ समय में जाय । मंगल भयो जन्म में जाय । मंगल दीक्षा धारत जाय । मंगल ज्ञान प्राप्ति में जायः॥

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २७५ मंगल मेाक्ष गमन में जाय । इन्दन कीनों हर्पित होय ।। जावू घार बार हो सोय । हे प्रमु! दोजे मंगल माय । इत्याशीर्वादः । ( पुष्पाञ्जलि क्षिपेत् ) फूलमाल पच्चीसी। दोहा। जैन धरम त्रेपन क्रिया, दया धरम संयुक्त। यादों वंश विर्षे जये, तीन ज्ञान करि युक्त ॥१॥ भयो महाछो नेमिको, झूनागड़ गिरनार । जाति चुरासिय जैनमंत जुरेक्षाहनी चार ॥२॥ माल भई जिनराजकी, गंथी इन्द्रन आय । देशदेशके भव्य जन, जुरे लेनको धाय ॥३॥ छप्यय। देश गौड़ गुजरात चौड़ सोरठि वीजापुर । करनाटक कशमीर मालवो अर अमेरधुर ।। पानीपथ ही सार और वैराट महा लघु । काशी अरु मरहट्टमगध तिरहुत पट्टन सिंधु ॥ तह चंगचंग बंदर सहित,उदधि पार लौ जुरिय सव। आसानुचीन मह चीन लग,मालभई गिरनारिजव ॥४॥ नाराच छन्द। सुगन्ध पुष्प लि कुंद केतकी मगायके। चमेलि चंप सेवती जुही गुही जु लायके । गुलाव कंज लायची सवै सुगंध जातिसे । सुमालती महा प्रमोद ले भनेक भांतिके ॥५॥ सुवर्ण तारपोइ धीच मोति लाल लाइया। सुहीर पन नील पीत पन जाति छाइया । शची रची विचित्र भांति चित्त देवनाइ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। है। सुइंद्रने उछाहसों जिनेंद्रको चढ़ाई है ॥६॥ सुमागहीं अमोल माल हाथ जारि वानियें। जुरौं तहां चुरासि जाति. रावराज जानिये ॥ अनेक और भूपलोग सेठ साहु को गर्ने । कहालु नाम वर्णिये सुदेखते सभा बनें ॥७॥ खंडेलवाल जैस- वाल अग्रवाल आइया ।वघेरवाल पोरवाल देशवाल छाइया:॥ सहेलवाल दिल्लिवाल सेतवाल जातिके । बघेरवाल पुष्पमाल श्री श्रीमाल पांतिके ॥८॥ सुमोसवाल पल्लिवाल चूरुवाल चौसखा । पद्मावतीय पोरवाल दूसरा अठसखा ॥ गंगेरवाल बंधुराल तोर्णवाल सोहिला । करिदवाल. पचिवाल भेडवाल खोहिला ॥ लवेंचु और माहुरे महेसुरी उदार हैं । सुगौला- लार गोलापूर्व'गोलहूँ सिंघार हैं ॥ बंधनौर मागधी विहारवाल गूलरा । सुखंड राग होय और जानराज वूसरा ॥१०॥ भुराल और मुराल और सोरठी चितौरिया। कपोल सोमराठ वर्ग हूमड़ा नागौरिया ॥ सीरीगहोड़ भंडिया कनौजिया अजो धिया। मिवाड़ मालवान और जोधड़ा समाधिया ॥१२॥ सुभट्टनेर रायवल्ल नागरा रुघाकरा । सुकथ रारु जालुरारु वालमीक भाकरापमार लाड चोड़ कोड़ गोड़ मोड़ संभरा। सु खंडित श्री खंडा चतुर्थ पंचमं भरा ॥१२॥ सु रलकार भाजकार नारसिंघ हैं पुरी। मुजंवूवाल और क्षेत्रं ब्रह्म वैश्य लौंजुरी ॥ सु आइ हैं चुरासि जांति जैनधर्मकी घनी । सबै विराजी गोठियो जु इन्द्रकी सभा बनी ॥१॥ सुमाल लेनको अनेक भूपलोग आवहीं । सु एक. एकतै सुमाग मालको बड़ा- वहीं ॥ कहें,जु हाथ जॉरि जोरि नाथ माल दीजिये। मगाय देउँ हेमरत्न सो भंडार कीजिये । बधेलबाल बाँकड़ा हजार बीस देत हैं। हजार दे पचास दे परिवार फेरि लेत हैं। सुजैसवाल लांख देत माल लेत चौपसों । जु दिल्लिवाल, जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २७७ दोय लाख देते है अगोपसों ॥१५॥ सु अग्रवाल बोलिये जुमाल मोह दीजिये। दिनार देंहु .एक लक्ष सो गिनाय लीजिये। खंडेलवाल बोलिया जुदाय लाख देउगो। सुवाटि केतमोल मैं जिनेन्द्रमाल लेडंगो ॥१६॥ जु संभरी कहें सु मेरि खानि लेहुँ जायकें । सुवर्ण खानि देत हैं चितौडिया बुलायके । अनेक भूप गांव देत रायसो चंदेरिको । खजान खोलि कोठरी सु देत हैं अमेरिका ॥१७॥ सुगौड़वाल यों कह गयन्द वीस लीलिये । मदाय देउ हेमदन्त माल मोहि दीजिये । पमार के तुरङ्ग सांजि देत हैं विनागने । लगाम जीन पाहुड़े जड़ाउ हेमके वने ॥१८॥ कनौजिया कपूर देत गाड़िया भरायके। सुहीर मोति लाल देत ओशवाल आयके । सु हुमड़ा हंकारही हमैं न माल देउगे। भराइये जिहाज में कितेक दाम लेउग॥१॥ कितेक लोग आयके खड़ेते हाथ जोरकें । कितक भूप देखिके चले जुवाग मोरिक। कितेक सूम यों कहैं जु कैसै लक्षि देतं हो। लुटाय माल आपनों सु फूलमाल लेतही ॥२०॥ कई प्रवीन श्राविका जिनेन्द्र को बधावहीं । कई सुकंठ रागसों खड़ी जुमाल गावहीं । कासु नृत्यकों करें नहैं अनेक भावहीं । कई मृदङ्ग तालपै सु अंगको फिरावहीं ॥२१॥ कहैं गुरू उदार धी सुयों न माल पाइये । कराइये जिनेन्द्र यश विवहू भराइये।। चलाइये जु संघ जात संघही कहाइये। तबै अनेक पुण्यसों अमोल माल पाइये ॥२॥ संबोधि सर्व गोटिसो गुरू उतारके लई । वुलाय के जिनेंद्रमाल संघ रायको दई । अनेक हर्षसो करें जिनेंद्र तिलक पाइये । सुमाल श्रीजिनेंद्रकी बिनोदीलाल गाइये ॥२३॥ दोहा। माल भई भगवन्तकी, पाई संग नरिन्द।

जैन ग्रन्थ-संग्रह। . लालविनोदी उच्चरें, सबको जयति जिनंद ॥२४॥ माला श्री जिनराजकी, पावै पुण्य संयाग। यश प्रघटै कीरति धरै, धन्य कहैं सबलोग ॥२५॥ फूलमाल पच्चीसी समाप्त ॥ श्री तारंगाजीक्षेत्र पूजा स्थापना। परतादि ऊठकोटि मुनि जानिये, मुक्कि गये तारंगा गिरिसे मानिये । तिन सबको शिरनाय सुपूजा ठानिये, भवधि तारन जान सुविरद वखानिये ॥ ॐ ह्रीं श्री तारंगा गिरिसे घरदत्तादि साढ़े तीन कोटि मुनि मोक्षपद प्राप्तय अत्रावतरावतर संवौषट् ( आजानन )। ॐ ह्रीं श्री तारंगा गिरिसे वरदत्तादि साढ़े तीन कोटि मुनि मोक्षपद प्राप्तय अत्र तिष्ठ तिष्ठ :: : (स्थापनं)।ॐ ह्रीं श्री तारंगा गिरिसे वरदत्तादि साढ़े तीन कोटि मुनि मोक्षपद प्राप्ताय अत्र मम सनिहितो भव भव वषट् ( सन्निधिकरणं)। अथाष्टक। शीतल प्रासुक जललाय भाजनमें भरके, जिन चरतन देत चढ़ाय रोग त्रिविध हरके । तारंगा गिरिसे . जान वरद- तादि मुनि, लव कंठकोटि परमान, ध्याऊं मोक्षधनी ॥ १॥ ॐ ह्रीं श्री तारका गिरिसे घरदत्त सागरदत्तादि साढ़े तीन कोटि मुनि मोक्षपद प्राप्ताय जलं निर्वपामीति स्वाहा । जलं ॥ मलियागर चंदन लाय केशर मांहि घिले, जिन चरण जजू. चित्तलाय भव आताप नसे। तारंगा गिरिसे जान घरदत्तादि, :

जैन ग्रन्थ-संग्रह।
मुनि, सब ऊंठकोटि परमान, व्याकं मोक्षधनी ॥२॥ॐ ह्रीं
श्री तारंगा गिरिसे वरदत्त सागरदत्तादि साढ़े तीनकोटि
मुनि मोक्षपद प्राप्ताय चंदन निर्वपामीति स्वाहा ॥ चंदन ॥
तदुल अखंड भरथार उज्वल अति लीजे अक्षयपद कारणसार
पूज सुढिग कीजे । तारंगा गिरिसे जान, वरदत्तादि मुनि,
लब उठ फोड़ परमानध्याउं मोक्षधनी ॥३॥ॐ ह्रीं श्री तारंगा
गिरिसे वरदत्त सागरदत्तादि साढ़तीन कोटि मुनि मोक्षपद
प्राप्ताय अक्षत निर्वपामीति स्वाहा । अक्षतं ॥ चंपा गुलाव
जई आदि फूल यचुत लीजे, पूजी श्री जिनवर पाद काम विथा
छौ । तारंगा गिरि से जान वरदत्तादि मुनि, सब उंठकोटि
परमान ध्याउं मोक्षधनी ॥४॥ॐहीं श्री तारंगा गिरिसे
घरदच सागरदत्तादि साढ़े तीन कोटि मुनि मोक्षपद प्राप्ताय
पुष्पं निर्वपामीति स्याहा ॥ पुष्पं ॥ नाना पक्वान बनाय
सुवरण थाल भरै, प्रभूको अर्थों चित्तलाय रोग क्षुधादि टरे ।
तारंगा गिरिसे जान वरदत्तादि मुनि, सब उठकोटि परमान
ध्या मोक्षधनी ॥५॥ॐ ह्रीं श्री तारंगा गिरिले घरदत्त
सागरदत्तादि साढ़े तीन कोटि मुनि मोक्षपद प्रासाय
नैवेद्य निर्बपामीति स्वाहा ॥ दीप कपूर जगाय जगमग
जोति लसे, क्षार आरति जिन चिचलाय (गुणगाय) मिथ्या
तिमिर नसे। तारंगा गिरसे जान घरदत्तादि मुनि, सप
ऊठकोटि परमान ध्याऊ मोक्षधनी ॥६॥ ॐ ह्रीं श्री तारंगा
गिरिसे घरदन सागरदत्तादि साढ़े तीन कोटि मुनि मोक्षपद
प्राप्ताय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । दीपं । कृष्णागर धूप
सुवास नेऊ प्रभू भागे, जल जाय कर्मकी राल ध्यान कला
आगे। तारंगा गिरिसे जान वरदत्तादि मुनि, सब ऊंठकोटि
परमान ध्याऊ मोक्षधनी ॥७॥ ॐ ह्रीं श्री तारंगा गिरिसे

२८.. जैन-प्रत्य-संग्रह। वरदत्त सागरदत्तादि साढ़े तीन कोटि मुनि मोक्षपद प्राप्ताय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ श्रीफल कदली. बादाम पुंगी फल लीजे, पूजा श्रीजिनवर धाम, शिवफल पालीजे । तारंगा गिरिसे जान-धरदत्तादि मुनि, सब ऊठकोटि परमान ध्याऊं मोक्षधनी ॥८॥ ॐ ह्रीं श्री वारंगा गिरिसेवरदत्त सागरदत्यादि साढ़तीन कोटि मुनि मोक्षपद प्राप्ताय फलं निर्वपामीति. स्वाहा ॥ शुचि आठी द्रव्य मिलाय तिनको अर्ध करो, मन वच तन बहु चढ़ाय भवतर मोक्षवरो| तारंगा गिरिसे. जान वरदत्तादि मुनि, सब ऊंठकोटि परमान ध्याऊ मोक्ष- धनी ॥२॥ ॐ ह्रीं श्री तारंगा.गिरिसे वरदत्त सागरदत्तादि साढ़े तीन कोटि मुनि मोक्षपद प्राप्ताय अर्ध निर्वपामीतिः स्वाहा ॥ अर्घा नथ जयमाला। . दोहा-वरदत्तादि मुनिंद्र, ऊंठकोटि मुक्तिह गये। वंदत सुर नर इन्द्र, मुक्ति रमणके कारणे ॥ पडि छंद ॥ गुजरात देशके मध्य जान, इक सोहे ईडर संसथान ! ताकी सुपश्चिम दिश बखान, गिरि वारंगा लोहे. महान ॥१॥ वहांते मुनि उंठ करोड़ सोय, हन कर्म. सवे गये मोक्ष सोय। तागिरपर मंदिर है विशाल, दरसन से चित्त होवे खुशाल ॥२॥ नायक सुमूल संभव अनूप; देखत भवि . ध्यावत निजस्वरूप। पुनि तीन टुकपर दर्शजान, भविजन वंदत उह हर्षठान || तहाँ कोटि शिला पहिली प्रसिद्ध, दूजी, तीजी है मोक्ष सिद्ध । तिनपर जिन चरण विराजमान, दर्शन फलं हम सुनिये सुजान len जो चंदै भविजन एकवार, मनवांछित फल पावे:अपार। वविध पूजे जो प्रीति लाय, दारिद तिनका क्षण पलाया।

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २८१ संब रोग शोक नाशे तुरंत, जो ध्याये प्रभूको पुन्यवंत । अरु पुत्रपौत्र संपत्ति होय, भव भवके दुख डारे सुखोय ॥६॥ इत्यादिक महिमा है अपार, वर्णनकर कविको लहे पार। अब बहुत कहा कहिये वखान, कहे 'दीप' लहे ते मोक्ष थानं घत्ता। तारंगा बंदी मन आनंदी, ध्वाऊं मन वच शुद्धकरा। सब कर्म नसाऊं शिवफल पाऊं, ऊंठकोटि मुनि-राजवरा । ॐ ह्रीं श्री तारंगागिर सिद्धक्षेत्रसे वरदत्त सागरंदचादि साढ़े तीन कोटि मुनि मोक्षपद प्राप्ताय पूर्णा निर्वपामीति स्वाहा॥ ॥ इत्याशीर्वादः॥ . देव शास्त्र गुरु पूजा की अचरी। फटिक मणिमय खचित भाजनं, गंग जल जामें भरौं । इन्द्रसुर सब साज लै, इहि भांत पूजा विस्तरौं। तेह कर मणिहार मणिमय, पूज प्रभू कासै बनें। त्रैलोक्य नाथ अनन्त गुण को कह सकै सुनतई बनें ॥१॥ साखा सुगन्धित घिस कालङ्कित चरणं चरचित अनुसरौं। इन्द्रसुर सब साज ले इहि भांत पूजा विस्त । तेह॥२॥ हीरा कनीसी जोत.जामें थिति अखएड पूजन धरौं।' इन्द्रसुर सब साज लै इहि भांत पूजा विस्तरौं । तेहुः ॥३॥ पंरिजात के फल फूल ले जुग आन के वर्षा करौं। इन्द्रसुर सव साज ले इहि. भांत पूजा विस्तरौं। तेह०॥४॥ मेषा सुमिष्ट कलप तरू के धार भर आंगै घरौं।

૨૨ जैन-अन्ध-संग्रह। इन्द्र सुर सव साज ले इहि भांत पूजा विस्तरौं । तेह ॥५॥ दीप रतनन जोत जामें नृत्य कर आरति करों। इन्द्र सुर लव लाज ले इहि भांत पूजा विस्तरौं । तेह ॥६॥ धूप दशाङ्गी खेड्ये वसु कर्म भव भव के दहैं। इन्द्र सुर साज ले इह भांत पूजा विस्तरौं ॥ तेह०॥ ७॥ फलयुक्त ले भागे धरै प्रभू फल फले से अनसरी । इन्द्र सुर सव साज ले इहि भांत पूजा विस्तरौं । तेहू॥८॥ वसु.द्रव्य ले एकत्र इह विधि अर्घ ले मङ्गल पढ़ौं। इन्द्र सुर सव सव साज ले इहि भांत पूजा विस्तगतिहगा अथ शान्तिपाठः पारभ्यते। (शान्तिपाठ बोलते समय दोनों हाथोंसे पुष्पवृष्टि करते रहना चाहिये) दोधकवृत्तम् । शान्तिजिन शशिनिर्मलवकं शीलगुणवतसंयमपात्रम् । अपशतातिलक्षणगात्रं नौमि जिनोत्तममम्वुजनेत्रम् ॥१॥ पञ्चममीप्सितचक्रधराणां पूजितमिन्द्रनरेन्द्रगणैश्च । शान्तिकरं गणशान्तिमभीप्सुः-षोडशतीर्थकरं प्रणमामि ॥२॥ दिव्यतरुः सुरपुष्पसुवृदुिन्दुमिरासनयोजनघोषौ । आतपवारणचामरयुग्मे.यस्य विभाति च मण्डलतेजः ॥ ३॥. तं जगदर्चितशान्तिजिनेन्द्र शान्तिकर शिरसा प्रणमामि.. सर्वगणाय तु यच्छतु:शान्तिं मह्यमरं पठते. परमां च ॥४॥ . . ® अशोकवृक्षः सुरपुष्पवृष्टिदिव्यध्वनिश्शामरमासनं च ।। भामण्डलं: दुन्दुभिरावपन्न समातिहायोणि जिनेश्वराणाम् । (यह श्लोक क्षेपक इसे वोलमा न.चाहिये!).

जैन-प्रन्थ-संग्रह। २८३ वसन्ततिलका। येऽभ्यर्चिता मुकुटकुण्डलहाररत्नैः शक्रादिभिः सुरगणैः स्तुत- पादपद्माः। ते मेजिनाः प्रवरवंशजगत्प्रदोपास्तीर्थङ्कराः सतत शान्तिकराभवन्तु ॥५॥ इन्द्रवज्रा संपूजकानां प्रतिपालकानां यतीन्द्रसामान्यतपोधना नाम् । देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञःकरोतु शान्ति भगवान् जिनेन्द्रः॥६॥ स्रग्धरावृत्तम् । क्षेमं सर्वप्रजानां प्रभवतु बलवान् धार्मिको भूमिपालः। काले काले च सम्यग्वर्षतु मघवा व्याधयो यान्तुं नाशम् ॥ दुर्भिक्ष चौरमारी क्षणमपि जगतां मास्मभूज्जीवलोके। जैनेन्द्रं धर्मचक्र प्रभवतु सततं सर्वसौख्यंप्रदायि ॥७॥ अनुश्टप् । प्रध्वस्तघातिकर्माणः केवलज्ञानभास्कराः। कुर्वन्तु जगतः शान्ति वृषमाद्या जिनेश्वराः ॥८॥ प्रथमं करणं चरणं द्रव्यं नमः। अथेष्टप्रार्थना । शास्त्राभ्यासी जिनपतिनुतिः सङ्गतिः सर्वदाय्यः सदत्तानां गुणगणकथा दोपवाद च मौनम् । सर्वस्यापि प्रियहितवची भावना. चात्मतत्त्वे सम्पद्यन्तां मम भव भचे यावदेतेऽपवर्गः ॥ ६ ॥ आर्यावृत्तम् । तव पादौ मम हृदये, मम हृदयं तव पदद्वये लीनम् । तिष्ठतु जिनेन्द्र तावद्यावनिर्वाणसम्प्राप्तिः ।।१।। .

२८४ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। भार्या। अक्खरपयत्यहीणं मचाहीणं च जमए भणियं। तं खमउ णाणदेव य मज्झिवि दक्वक्वयं दितु ॥१॥ दुक्खखमी कम्मखो समाहिमरणं च वोहिलाहो यी:: मम होउ जगतबंधव तव जिणवर चरणसरणेण ॥१२॥ (परिपुष्पान्जलिं क्षिपेत् ) . अथ विसर्जनम् । ज्ञानतोऽज्ञानता वापि शास्त्रोक्तं न कृतं मया । तत्सर्व पूर्णमेवास्तु त्वत्प्रसादाजिनेश्वर ॥१॥ आह्वानं नैव जानामि नैव जानामि पूजनम् । विसर्जनं न जानामि क्षमस्व परमेश्वर ॥२॥ मन्त्रहीन क्रियाहीनं द्रव्यहीनं तथैव च । तत्सवं क्षम्यतां देव रक्ष रक्ष जिनेश्वर ॥३॥ आहूता ये पुरा देवा लन्दभागा यथाक्रमम् । ते मयाऽभ्यर्चिता भक्त्या सर्वे यान्तु यथास्थितिम् ॥४॥ इति नित्यपूजाविधान समाप्तम् । * इति बुधजन कृत स्तुति। प्रभु पतित पावन मैं, अपावन, चरण आयो शरण जी । यह विरद . आय निहार स्वामी; मेट जामन मरण जी । तुम ना पिछान्या मान मान्या, देव विविध प्रकार जी। या बुद्धि सेती निज न जाण्या, भूम गिण्या हितंकार जी ॥१॥ भष विकट वन, में, करम वैरी, शान धन मेरो हो ।

जैन-अन्य-संग्रह। २८५ तव इष्ट भूल्यो भ्रष्ट होय, अनिष्ट गति धरतो फिर्यो । धन घड़ी यो धन दिवस याही, धन जनम मेरो भयो। अब भाग मेरो उदय आयो, दरश प्रभु को लख लयो ॥२॥ छवि चीतरागी नगन मुद्रा, दृष्टि नासा क् धरै । वसु प्रातहार्य अनन्त गुण युत, कोटि रवि छवि को हरैं। मिट गयो तिमर मिथ्यात मेरो, उदय रवि आतम भयो। मोउर हरप ऐसो भयो, मनु रंक चिन्तामणि लयो॥३॥ मैं हाथ जोड़ नवाय मस्तक, वीनऊ तुव चरण जी। सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपति जिन, सुनो तारन तरन जी॥ जावू नहीं सुरवास पुनि, नर राज परिजन साथ जी। बुध " जाचहूँ तुव भनि भय भव, दीजिये शिवनाथ जी इति वुधजन कृत स्तुति । (यदि भाशिका लेनी हो तो यह दोहा पढ़कर लेवे।) दोहा। श्री जिनवर की आशिका, लीजे शीस चढ़ाय। भव भव के पातक कटे दुःख दूर हो जाय ॥१॥ . सुप्रभातस्तोत्रम्। श्रीपरमात्मने नमः ।। यत्स्वर्गावतरोत्सवे यदभवजन्मा- भिपेकोत्सवेयहीक्षाग्रहणोत्सवे यदखिलज्ञानप्रकाशोत्सवे । यनिर्वाणगमोत्सवे जिनपतेः पूजाद्भुतं तद्भवैः सङ्गीतस्तुति- मंगलैः प्रसरतां मे सुप्रभातीत्सवः॥५॥श्रीमन्नतामरकि- रीटमणिप्रभाभिरालीदपावयुगदुर्धरकर्मदूर । श्रीनाभिनन्दनजि- नाजितभिवाख्य! त्वद्ध यानतेऽस्तु सततं मम सुप्रभातम् ।। छत्रत्रयप्रचलचामरवीज्यमान देवाभिनन्दनमुने सुमते जिनेन्द्र।

२८६ जैन-अन्ध-संग्रह। . पद्मप्रभारुणमणिधु तिभासुराङ्ग त्व०॥३॥ अर्हन् सुपाच कदलीवल-वर्णगात्र प्रालेयतारगिरिमौक्तिकवर्णगौर चन्द्रप्रम- स्फटिकपाण्डुरपुष्पदंत त्व०॥४॥ सन्तप्तकाञ्चनरुचे जिन शीतलाख्यश्रेयान्विनष्टदुरिताष्टकलङ्कपङ्क । बन्धुकबन्धुररुचे जि. नवासुपूज्य त्व० ॥५॥ उद्दण्डदपकरिपो विमलामलाङ्गस्थे- मन्ननन्तजिदनन्तसुखाम्बुराशे । दुष्कर्मकल्मपविवर्जित धर्म- नाथ त्व०॥६॥ देवामरीकुसुमसनिमशान्तिनाथ' कुन्थो दया गुणविभूषणभूषिताङ्ग। देवाधिदेव भगवचरतीर्थनाथ त्व०॥ यन्मोहमल्लमदभञ्जनमल्लिनाथ.क्षेमङ्करावितथशासनसुव्रताख्य। यत्सम्पदा प्रशमितो नमिनामधेय त्व०॥४॥ तापिच्छंगुच्छ- रुचिरोज्ज्लल नेमिनाथ घोरोपसर्गविजयन् जिनपार्श्वनाथ स्याद्वादसूक्तिमणिदर्पणवर्द्धमान त्व०॥ ॥ प्रालेयनीलहरि- तारुणपीतभासं यन्मूर्तिमन्यसुयरवावल, मुनीन्द्राः ध्यायन्ति सप्ततिशत जिनवल्लभानां :त्व०॥ १० ॥ सुप्रभातं सुनक्षत्र माङ्गल्यं परिकीर्तितम् । चतुर्विंशतितीर्थानां सुप्रभातं दिने दिने ॥ ११ ॥ सुप्रभातं सुनक्षत्र श्रेय प्रत्यभिनन्दितम् । देवता ऋष्यः सिद्धाः सुप्रभात दिने दिने ॥ १२॥ सुप्रभातं तवकस्य वृषभस्य महात्मनः । येन प्रवर्तितं तीर्थ भव्यसत्व सुखावहम् ॥१३॥ सुप्रभातं जिनेन्द्राणां ज्ञानोन्मीलितचक्षुषाम् । भशा- नतिमिरान्धानांम् नित्यमस्तमिता रविः ॥ १४ ॥ सुभातं जिने न्द्रस्य वीरः कमललोचनः । येन कर्माटवी दाधा शुक्लध्याना- प्रवहिना ॥ १५ ॥ सुप्रभातं सुनक्षत्र सुकल्याणं सुमङ्गलम् । त्रैलोक्यहितकतणां जिनानामेव शासनम् ॥ १६॥ . इति सुप्रभातस्तोत्रं समाप्तं ॥... Q.co.

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २८७ दृष्टाष्टकस्तोत्रम् ॥ दृष्ट' जिनेन्द्रभवनं भवतापहारि भव्यात्मनां विभव- सम्भवभूरिहतुः । दुग्धाब्धिफेनधवलोज्ज्वलकूटकोटीनद्वध्व- जप्रकारराजिवराजमानम् ॥ १ ॥ हूँष्ट जिनेन्द्रभवनं भुवनैक लक्ष्मीधामविद्धितमहामुनिसेव्यमानम् । विद्याधरामरवधू- जनमुक्कदिव्यपुष्पाञ्जलिप्रकरशोभितभूमिभागम् ॥ २ ॥ द्रुष्टंजि- नेन्द्रभवनभवनादिवालविख्यातनाकगणिकागणगीयमानम्।ना- नामणिप्रचयमासुररश्मिजालन्यालीढनिर्मलविशालगवाक्षजाल म् ॥३॥ दृष्टं जिनेन्द्रभवन सुरसिद्धयक्षगन्धर्वकिन्नरकरापि- तवेणुवीणा । सङ्गोतमिश्रितनमस्कृतधीरनादेरापूरिताम्बरत- लोरुदिगन्तरालम् ।।४॥ष्ट जिनेन्द्रभवनं विलप्तद्विलोलमा- लाकुलालिललितालकबिभमाणम् ॥ माधुर्यवाद्यलयनृत्यविला- सिनीनां लीलांचलद्वलयनूपुरनादरम्यम् ॥५॥ दृष्टं जिनेन्द्र' भवनं मणिरत्नहेमसारोज्ज्वलैः कलशचामरदर्पणाद्या सन्म- गलः सततमष्टशतप्रभेदेर्षिभाजितं विमलमौक्तिकदामशोम- म् ॥६॥ दृष्टं जिनेन्द्रभवन घरदेवदारुकपूरचन्दनतरुष्कसु- मनधिधूपैः । मेघायमानगगने पवनाभिघातचञ्चच्चलद्वि मलके. तनतुङ्गशालम् ॥ ७॥ दृष्टं जिनेन्द्रभवनंधवलातपत्रच्छायानि- मग्नतनुयक्षकुमारवृन्दः दोधूयमानसितचामरपङ्किभासं भाम- एडला तियुतप्रतिमाभिरामम् ॥ ८॥ दृष्टं जिनेन्द्रभवन वि. विधप्रकारपुप्पोपहाररमणीयसुरत्नभूमि ! नित्यं वसन्ततिलक- श्रियमादधानसन्मङ्गलम सकलचन्द्रमुनीन्द्रवन्धम् ॥ ६॥ दृष्ट मयाध मणिकाञ्चनचित्रतुणसिंहासनादिजिनविम्बविभूतियु- कम् । चैत्यालयं यदतुलं परिकीर्तितं मे सन्मंगल सकलचन्द्र मुनीन्द्रवन्धम् ॥ १०॥ इति दृष्टाष्ट्रकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

२८८ जैन-अन्य-संग्रह। अद्याष्टकस्तोत्रम् । अध मे सफलं जन्म नेत्रे च सफले मम । वामद्राक्षं- यतो देव हेतुमक्षयसम्पदः ॥१॥अद्य संसारगम्भीरपारावार:- सुदुस्तरः। सुतरोऽयं क्षणेनैव जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥२॥ अध मे क्षालितं गावं नेत्रे च विमले कृते । स्नाताहं धर्मतीर्थेषु जिनेन्द्र तव.दर्शनात् ॥ ३॥ अध में सफलं जन्म प्रशस्तं.सर्व- मंगलम् । संसारार्णवतीर्णाहं जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥ ४॥ अद्य कर्माष्टकज्वालं विघूतं सकषायकम् । दुर्गतेर्विनिवृत्तोऽहं जिने- न्द्र तव दर्शनात् ॥५॥ अद्य सौम्या ग्रहाः सर्वे शुभाश्त्रैचका- दशस्थिताः । नष्टानि विघ्नजालानि जिनेन्द्र तव दर्शनात् । ॥६॥ अघ नष्टो महाबन्धः कर्मणां दुःखदायकः । सुनसङ्ग समापनो जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥ ७ ॥ अद्यकर्माष्टकं नष्ट दुःखो- त्पादनकारकम् । सुखाम्भोधिनिमग्नाऽहं जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥ ८॥ अथ मिथ्यान्धकारस्य हन्ता ज्ञानदिवाकरः । उदिता मच्छरीरेऽस्मिन् जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥ ६ ॥ अद्याहं सुकृती भूतो निघूताशेषकल्मषः । भुवनेत्रयपूज्योऽहं जिनेन्द्र तव दर्श- नातू ।। १० ॥ अद्याष्टकं पठेद्यस्तु गुणानन्दितमानसः। तस्य. सर्वार्थसिद्धिर्जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥ ११ ॥ इति अद्याष्टक स्तोत्रं सम्र्पूणम् ॥ सूतकनिर्णय। सतक में देव शास्त्र गुरुका पूजन प्रक्षालादि तथा मन्दिरजीका वस्त्राभूषणादिको स्पर्शनकी मना है तथा पान दान भी वर्जित है। सूतक पूर्ण होने के बाद प्रथम दिन पूजन जैन-ग्रन्थ-संग्रह। ૨૮ - प्रक्षाल तथा पात्रदान करके पवित्र होवे। सूतक विवरण इस प्रकार है । १. जन्म का सूतक दश दिन का माना जाता है। २. स्त्री का गर्भ जितने माह का पतन हुआ हो उतने दिन का सूतक मानना चाहिये, विशेष यह है कि यदि तीन माह से कम का हो तो तीन दिन का सूतक मानना चाहिये। ३. प्रसूती स्त्री को ४५ दिन का सूतक होता है इसके पश्चात् वह स्नान दर्शन करके पवित्र होवे ॥ कहीं कहीं चालोस दिन का भी माना जाता है। ४. प्रसूति स्थान एक माह तक अशुद्ध है। ५. रजस्वला स्त्री पांचवे दिन शुद्ध होती है । ६. व्यभिचा रिणी स्त्री के सदा.ही सूतक रहता है । कभी भी शुद्ध नहीं होती । ७. मृत्यु का सूतक १२ दिन का माना जाता है। तीन पोड़ी तक १२ दिन, चौथी पीड़ी में १० दिन, पांचवीं पौड़ी में ६ दिन का, छठी. पोड़ी में ४ दिन, सातवीं पीड़ी में ३ दिन, आठवी पीड़ो में एक दिन रात, नवमी पौड़ी.मैं दो पाहर, और दशमी पोड़ी में स्नान 'मात्र से शुद्धता कहा है। ८. जन्म तथा मृत्यु का सूतक गोत्र के, मनुष्य को ५ दिन का होता है । १०. आठ वर्ष तक के बालक की मृत्यु का तीन दिन का और तीन दिन के बालक का सूतक १ दिन का जानो। ११. अपने फुल का कोई गृह त्यागी हो उसका सन्यासमरण अथवा किसी कुटुम्बी का संग्राम में मरण हो जाय, तो एक दिन का सूतक होता है। यदि अपने कुल कादेशान्तर में मरण करे मोर १२ दिन के पूरे होने के पहिले मालूम हो तो शेष दिनों का सूतक मानना चाहिये । यदि दिन पूरे हो गये हो तोस्नान मात्र सूतक जानो। ३२. घोड़ी, भैंस, गौ आदि पशु तथा दासी अपने गृह में जने अथवा आंगन में जने तो दिन का सूतकं होता है । गृह बाहर जने तो सूतक नहीं

२६०
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
होता । १३. दासी दास तथा पुत्री के प्रसूति होय या मरे,
तो ३ दिन का सूतक होता है। यदि गृह बाहर हो तो सूतक
नहीं। यहां पर मृत्यु की मुख्यता से ३ दिन का कहा है।
प्रसूतका. ही दिन का जानी । १४. अपने को अग्नि में जला
फर ( सती होकर ) मरे तिस का छह माहका तथा और
और हत्याओं का यथायोग्य पाप जानना । १५. जने पीछे
भैंस का दूध १५ दिन तक, गाय का दूध १० दिन तक और
बकरी का दूध आठ दिन तक अशुद्ध है पश्चात खाने योग्य
हैं। प्रगट रहे कि कहीं देशभेद से सूतकविधान में भी भेद
होता है इसलिये देशपद्धति तथा शास्त्रपद्धति का मिलानकर
पालन करना चाहिये । (श्रावकधर्मसंग्रह से उद्धत)
दुःख हरण बिनती।
श्रीपति जिनवर फरुणायतनं, दुखहरन तुमारा बाना है । मत
मेरी बार अंवार करो, माहि देहु विमल कल्यानो है ॥ टेक
कालिक वस्तु प्रतच्छ लखो, तुमसों कछु बात न.छाना
है। मेरे उर आरत जो वरतै, निहचै सब सो तुम जाना
है ॥ अवलोकि विथा मत मौन गही, नहि मेरा कहीं ठिकाना
है। हो राजिवलोचन सोचविमोचन, मैं तुम सों हित ठाना
है.।। श्री० ॥ १॥ सब अन्यनि. में निरग्रन्थनिने, निरधार यही
गणधार कही । जिननायक ही सब लायक हैं, सुखदायक
छायकज्ञानमही. ॥ यह बात हमारे कान. परी, तब आन
तुमारी सरन गही। क्यों मेरी वार विलम्ब करौ, जिननाथ
कहो यह बात सही ॥ श्री० ॥ २॥ काहू को भोग मनोग करो,
काहु को स्वर्ग विमाना. है। काहू को नाग नरेशपति, कार

जैन-ग्रन्थ-संग्रह! २९१ को ऋद्धिनिधाना है। अब मो पर क्यों न कृपा करते, यह क्या अन्धेर जमाना है। इन्साफ करी मत देर करो, सुखद भरो भगवाना है ॥ श्री० ॥३॥ खलकर्म मुझे हैरान किया, तब तुमसों आन पुकारा है। तुम हो समरत्थ न न्याय करी, तब वन्दे का क्या चारा है । खलपालक पालक बालक का, नृप नीति यही जग सारा है । तुम नीतिनिपुण त्रैलोकपती, तुम हो लगि दौर हमारा है। श्री०॥४॥ जब से तुम से पहिचान भई, तबसे तुम ही को माना है। तुमरे ही शासन का स्वामी!, हमको शरना सरधाना ॥ जिनको तुमरी शरनागत है, तिनसों जमराज डराना है। यह सुजलं तुम्हारे सोचे का जस गावत वेद पुराना है ॥ श्री०५॥ जिसने तुम से दिल- दर्द कहा, तिसका तुमने दुख हाना है । अघ छोटा मोटा नाशि तुरित, सुख दिया तिन्हें मनमाना है। पावकों शीतल नीर किया, औ चीर बढ़ा असमाना है । भोजन था जिसके पास नहीं, सो किया, कुवेर समाना है। श्री०॥६॥ चिन्तामन पारस कल्पतरू, सुखदायक ये परधाना है। तुव दासन के सब दास यही, हमरे मन मे ठहराना है । तुव भक्तन को सुर- इन्द्रपदी, फिर चक्रपती पद पाना है। क्या वात कहाँ विस्तार बड़ी; वे पार्वै मुक्ति ठिकाना है ॥ श्री० ॥ ७॥ गति चार चौरासी लाखवि, चिन्मूरत मेरा भटका है। हो दीन बन्धु करुणानिधान, अब लौं न मिटा वह खटका है। जब जोग मिला शिवसाधन का, तव विधनकर्म ने हटका है। तुम विघन हमारा दूर करो, प्रभु मौकों आश तुमारा है ॥ श्री. ॥८॥गज ग्राहग्रंसित उद्धार लिया, ज्यों अंञ्जन तस्कर तारा है।ज्यों सागर गोपंदरूप किया, मैनाका संकट टारा है। ज्यों सूलीते सिंहासन औ बेड़ी को काट विडारा है। त्यों ૨૨ जैन-प्रन्थ-संग्रह। मेरा संकट दूर करो, प्रभु मोको आश तुमारा है । श्री० ॥ ज्यों फाटक टेकत पाय खुला, औ सांप सुमन करि डारा है ! ज्यों खङ्गकुसुमका माल किया वालक का जहर उतारा है। ज्यों सेउ विपत. चकचूरि पूर, घर लछमी सुत्र विस्तारा है। त्यों मेरा संकट दर करो प्रभु, मोको आश तुम्हारा है ॥ १० ॥ जद्दपि तुम को रागादि नहीं, यह सत्य सर्वथा जाना है। चि: न्मूरत आप अनन्त गुनी, नित शुद्ध दशा शिवथाना है तदपि. भकन की भीति हरो, सुख देत तिन्हें सुहाना है। वह शक्ति अचिन्त तुम्हारीका, या पाचे पार सयाना है। श्री० ॥ ११ ॥ दुःखखण्डन श्रीमुखमंडनका, तुमरा: प्रन परम प्रमाना है। वरदान दिया यस कौरतदा, तिहुँलोक धुजा फहराना है । कमलाधरजी ! कमलाधरजी ! करिये कमला-अमलाना है। अव मेरी विया विलोक रमापति, रंच न बार लगाना है । ॥ श्री०॥ १२॥ हो दीनानाय. अनाथहितू, जन दीन अनाथ पुकारी है । उदयागत कर्म विपाक हलाहल, मोह विया विस्तारी है। ज्यों आप और भवि जीवन की, तत्काल विया निरवारी है .। त्यों " वृन्दावन." यह अर्ज कर प्रभु, माज हमारी बारी है ॥ श्री० ॥ १३ ॥ . . : नेमिनाथजी का बारहमासा । (पं० जियालालजी रचित) नप उग्रसेन केद्वार, जुकर शृंगार नेमि कव्वार,व्याइने आये। पशुचनकि टेर सुन गिरनारी जो छाप ॥ टेक ॥ कातिक में राजुलं कहै, नैनज़ल बहै बिरह तन. दहै, सुनारी आली.। .. .

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। २६३ । हमको तज मुनिवर भये नैमि बनमाली ॥ सखी पूजें खेलें जुआ, तिरी औ दुवा, खूब दिन हुवा, आज दीवाली । सब गावत मंगल चार बजावे तालो । झड़ी ॥ अगहन मैं बास नहिं प्यारा, तन भखा बिरहने सारा, संखी पड़ें शीत अति भारा, साजन दुद्धर तपधारा ॥ अब पाह भई शरदाई, नैमिजदुराई, वने मुनिराईजोग मन भाये । पशुवन कि० ॥ अब माघ शीत का मन्त, समै वासन्त, पास नहि कंत, कहा अब करिये । सुन होनहार से.सखी कहा अब लरिये ॥ फागुनमैं खेलंत होली, रंगभर झोली, पहन कर चोली, वन सरिये। जो पिछले भव मैं किया सो इस भव' भरिये ॥ झड़ी ॥ जब चैत फुलै वनराई, ऋतु शिशिर मेरे मन भाई । सो बिन पीतम दुखदाई, जो करम लिखा लोपाई । वैशाखमास भया गर्म, न पाया मर्म, तजके कुल कर्म सजन बन धाये ॥, पशुवनको० ॥. अब जेठ पड़े हैं. अगन, लगे सब तपन, काया से झरन, लगें पसीने । इस ऋतु साजन गिर शिखर जोगमैं भीने ॥ आषाढ़ बरसै धन घोर, बोलते मोर कोयल करै शोर, पी.मुझ चकबीने । किस लिये छोड़कर गये हमैं दुख दीने । झड़ी। सावनमैं तीज- तिव्हारे, सब झूले हिंडोलेनारे । सखी तज गये सजन हमारे इम वैठ रही मन मारे । भादों को अन्धेरी रैन, पड़े नहि चैन, तड़फते नैन को.पी समझाये । पशुवनकि० ॥ अब कारमास मा रहा, बहुत दुःख सहा, नैम जल.वहा, कहन लगि राजुल। दो आशा मुझ को गिर पर आऊ बाबुल.॥ अति तात मात समझाई, नहिं मन भाई, वहां ले आई, पास पी के चल। लग नेमि प्रभु के चरण रहे आंसू ढल ॥ झड़ी ॥ प्रभु ने राजुल समझाई, वह भई अर्जिका बाई । नेमीश्वरं मुक्ती पाई, राजुल सुरगोंमैं धाई । हम बरनै जियालाल, दीन दयाल, तुम्ही किर- ' २४ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। पाल, मुझे तो पाए । पशुवनकि टेर सुन गिरनारी जा छाए । वारहमासी राजुल, सोरठ में: पिय प्यार ने सुधि विसराई। अब कैसे जियों मेरी माई ॥ टेक ॥ सखी आयो अंगम अषाढ़ा। तव क्यों न गये गिरनारा ॥ मेरी रच संयोग बिसारी मन में क्या नाथ विचारी । अब क्यों छोड़ी अकुताई । अब० ॥१॥ सावन में व्याहन आये। सब यादव नृपति सुहाये । पशुवन की करुणा कोनी । मेरी ओर दृष्टि ना दीनी । गिरि गमन किया यदुराई। अब भादों बरसत गंभीरा। मेरे प्राण, धरें ना धीरा। मोहि मात पिता समभावे । मेरे मन एकन भावे ॥ मो प्रभु बिन कछु न सुहाई । अब० ॥३॥ सनी आयो मस्विन मासा। पहुंची अपने पिय पासा ॥ क्यों छोड़े भोग विलासा । कर पूर्व जन्म की आशा ॥ तज वर्तमान सुखदाई । मबाडा अबलांगो कातिक मासा । सब जन गृह करत हुलासा ॥ सब गृह मंगल गावें । हमरे पिय ध्यान लगावें । मेरी मान कही यदुराई । अब० ॥५॥ लागा अघहन मास सुहाई। जा में शीत पड़े अधिकाई ॥ सब जन कम्पै जग केरे । केसे ध्यान धरी प्रभु मेरे । थिरता मन नाहि रहाई । अव ॥क्षा संखी पूष में परम तुषारा। वरं शीत भई अधिकारा कैसे के संयम मंडी कैसे वसु कर्मन दंडो। घर चल के राज कराई । अब ॥७॥ सखी माघ मास अव लागो। सव ही जन आनंद दागो। तुम लीनी जगत बड़ाई ! मोहि त्यांग दया नहीं आई। धृक मेरी पूर्वकमाई । अब० ॥ फागुन में सब जन होरी खेलत केसर रंग वारी । तुम गिरि पर ध्यान लंगायो।मेरा कुछ ध्यान

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
२६५
न आयो। तुम शरणागत में आई । अब० ॥६॥ सखी पहिले
चैत जनायो । सव साल को आगम आयो । सब फूले वन
अकुलाई । मोहि तुम विन कछु न मुहाई ॥ मोहि अधिक
उदासी छाई । अब० ॥१०॥ वैशाख पवन झकझोरे । लूह लपट
लगे चहुँ ओरे । जे जड़ ते तपत पहारा ।मो तन कोमल
सुकमारा ॥ घर छोड़ चले यदुराई । अब० ॥१॥ सखी जेठ
मास अब आयो तब घाम ने जोर जनायो । कैसे भूख
पियास सहोगे। कैसे संयम धारोगे ॥ थिरता मन में न रहाई।
अब कैसे जियों मेरी माई ॥१२॥ इति सम्पूर्णम् ।
विनती,
, भूधर दास कृत।
गीता छन्द।
पुलकंत नयन चकोर पक्षी हसत उर इन्द्रीवरी। दुवुद्धि
चकवी विलख विछुरी निवड़ मिथ्या तम हरी। आनन्द
अम्बुज उमग छरी अखिल आतम निरदले। जिन वदन पूर्ण
चन्द्र निरखत सकल मन वांक्षित फले ॥१॥ मुझ आज आतम
भयो पावन आज विघ्न नशाइयो। संसार सागर नीर निवटी
अखिल तत्व प्रकाशियो । अब भई कमला किंकरी मुझ उभय
भव,निर्मल ठये । दुख जरो दुर्गति पास निवरो आज नव
मंगल भये ॥२मनहरण. मूरति हेर प्रभु. की कौन उपमा
ल्याइये । मम संकल तन के रोम हुलसे हर्ष ओर न पाइये।
कल्याण काल प्रत्यक्ष प्रभु को लखें जो सुर नर घने । तिस
समय की आनन्द महिमा कहत क्यों मुख से बने ॥३॥ भर
नयन निरखे नाथ तुम को ओर बांक्षा न रही। मन ठठ मनोरथ
भये पूरण रंक माना निधि लही । अब होहु भव भव भक्ति

२९६
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
तुम्हरी कृपा ऐसी कीजिये । कर जारभूधर दास विनवे यही
वर मोहि दीजिये
इति।
,
।
निशि भोजन भुंजन कथा।
( दोहा छन्द)
नमो सारदा सार बुध, करें हरै अघलेप |
निशि भोजन भुंज की कथा, लिंखू सुगम संक्षेप
(चौपाई छन्द)
जम्बू दीप जगत विख्यात । भरतखएड छवि कहियन जात ॥
तहां देश कुरु जांगल नाम । हस्त नागपुर उत्तम ठाम ॥
यशोभद्र भूपति गुण यांस रुददच दुज प्रोहित तास ॥
अश्वमास तिथि दिन आराध । पहलीपड़वा किया सरांध ॥
बहुत विनय सो नगरी तने।न्योत जिमायें ब्राह्मण बने ।
दानमान सवही कोंदिया । आप विन भोजन नहि "कियों ।
इतने राय पठायो दास भोहित गया राय के पास ॥
राजकाळ कछु एसो भयो । करत करावत सब दिन गयो ।
घर में रात रसोई करी । चूल्हे ऊपर हांडी घरी ॥
हींग लेन उठि वाहर गई। यहां विधाता औरहि ठई।
मैंडक उछल परी तामांहि। विप्र तहाँ कंजु जानों नाहि
बैंगन डॉक दियो तंतकाल | मैंडक मरो होय वेहाल।
तब९ विम नहिं आया धाम | धरी उठायरसई ताम ||
पराधीन की ऐसी बात औसर पायों आधी रात ॥
सोय रहे सब घरके लोग। आग न दीवा. कर्म संयोग ।
भूस्रो मोहित निकसे प्रान । ततषित बैठो रोटी खानः।
।
-:

जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
२६७
बैंगन भोले लोनी ग्रास । मैंडक मुंह में पायो तास ॥
दांतन तले चलो महिं जबै । काढ़ धरी थाली में तबै॥
प्रोत हुए मैंसक पहिचान | तामी विप्रन करी गिलानि ॥
थिति पूरी कर छोड़ी काय । पशु की योनी उपजो आय ।।
सोरठा छन्द।
१ घूघू२ काग ३ पिलाव,४ सावर ५गिरध पखेरुमा।
६ सूकर अजगर भाव, ८ बाघ गोह जलमें१०मगर।
दश भव इहिविधि थाय, इसो जन्म नरकहिं गयो।
दुर्गति कारण पाय, फलो पाप घट बीजवत ।
दोहा छन्द ॥
निशि भोजन करिये नहीं, प्रघट दोष अपिलोय ।
परभव सब सुख ऊपजे, यह भव रोग न होय ।।
छप्पय छन्द ।।
कीड़ी बुध पल हरे कंप गद करे कसारी। मकड़ी
कारण पाय कोढ़ उपजे दुख भारी॥ जुाँ जलोदर जनै फांस
गल विधा बढ़ाव। बाल सबे सुरभंग वचन माखी उपजावे ॥
तालुवे छिद बीजू भखत और व्याधि .बहु करहि थल ।
यह प्रगट दोष निशमसेन के पर भव दोष परोक्ष फल ।।
दोहा छन्द।
जो अघ इहि भव दुख करे, परभव क्यों न करेय ।
डसत सांप पीढ़े तुरत, लहर क्यों न दुख देय ।।
सुषचन सुन साहारजे, मूरख मुदित न होय ।
मणिधर फण फेरे सही, नदी सांप नहिं होय ।।
सुपचन सत गुरु के वचन, और न सुवचन कोय ।
सत गुरुवही .पिछानिये । जा उरलोभ न होय ॥
भूधर सुवचन सांगली, स्वपर प्रक्ष कर बौन ।

.
२६८
जैन-ग्रन्थ-संग्रह।
समुद रेणुका जो मिले, तोड़ें ते गुण कौन ।।
इति निश भोजन भुंजन कथा सम्पूर्णम् ॥
॥ झंझोटी ॥
देखि सखी छवि आज भली रथ चढ़ि यदुनन्दन मावत
॥टेक ॥ तीन छत्र माथे पर सोहैं त्रिभुवन नाथ कहावत
हैं ॥१॥ मोर मुकुट केसरिया जामा चोसट चमर दुरावत
हैं | ताल मृदंग साज सब वाजत आनंद मंगल गावत
॥३॥ मोहनलाल आस चरनन की कि झुकि शीश
नबापत हैं ।
॥ राग देश ॥
आज जिनराज दरशन से भयो आनन्द भारी है ।। टेक ।।
लहे ज्यों मोर घन गर्ने सुनिधि पाये भिखारी है। तथा मो
मोद की वार्ता नहीं जाती उचारी है ॥५॥ जगत के देव सब
देखे क्रोध भय लोभ धारी हैं। तुम्ही दोषावरण विन हो
कहा उपमा तिहारी है ।।२।। तुम्हारे दर्श बिन स्वामी भई.
चहुंगति में ख्वारी है। तुम्ही पद कंज नमते ही मोहनी धूल.
झारी है ॥३॥ तुम्हारी भकि से भव जन भये भव सिंधु .
पारी हैं । भकि मोहि दीजिये अविचल सदा याचक
बिहारी है ।
सोरठ।
ज्ञानी पिया क्यों बिसरे निज देश। कुमति कुरमिनी
सोत संग राचे छाय रहे परदेशः ॥टेक॥ अनंत काल पर
देशनि छाये पाये बहुत कलेश । देश तुम्हारी सुपद समारो
त्रिभुवन होउ नरेश शा भ्रम मद पाय छकायरहो धन धान
रहा नहीं लेश । दुखी भये बिललात फिरतहो गनिधरि

जैन-ग्रन्थ-संग्रह। दुरमेश ॥२॥ यह संसार असार जानि लख सुख नहीं रंचक लेश । मानिकलाल लब्धि पावस लहि सुमति हाथ उपदेश ॥३॥ पीलू । स्वामी मुजरा हमारो लीजे ।। टेक ।। तुम तो बीतराग आनंद घन हम को भी अब कीजे ॥शा जग के देव सब रागी द्वेषी या से निज गुण दीजे ॥२॥ आदि देव तुम समान को वेग अचल पद दीजे ॥३॥ रेखता। भगवान आदिनाथ जिन से मन मेरा लगा। माराम मुझे होत दुःख दर्श से भगा टेका मरु देवी मंद धर्म कंद कुल में सुर उगा। नप नाभिराज के कुमार नसत सुर लगा ॥१॥ युगला निवारि धर्म को संसार को तगा । बसु कर्म को जराय शिव पंथ में लगा ॥२॥ अब तो करो सितान मिहरवान दिल लगा। कहें दास हीरालाल दीजे मुक्ति का भगा ॥ गजल । ख्याल कर दिल मझार चेतन अजव करम ने झकाई गतियां ॥टेका निगोद बस कर सुनोध खोया त्रिजग बनाएक बनास्पतियां । कभी मनुषवा कमी सुरगवा अनादि ते दिन विताई रतियां ॥शा यह दुःख भर २ यतीम हवा न गौर की कहुँ.सनाई बतियां । पड़ा हूं अब तो उसी के दर पर लगें हजारी, यम की पतियां | दादरा। निरखत छवि नाथ नेना छकित रस होय गये ॥टेक॥ रवि कोट घुति लज जात है नख दीप्त अपार ॥१॥ इक तो ३०० जैन-ग्रन्थ-संग्रह। परम वैरागी दूजे शान्ति स्वरूप ॥२॥ उपमा हजारी से ना बने अनुपम जग चन्द ॥३॥ कहरवा। लीजे बबर हमारी दयानिधि ॥टेक॥ तुम तो दीन दयाल जगत के सब जीवन हितकारी शामो मत हीन दीन तुम समरथ चूक माफ कर म्हारी II भूपर वास मास चरनन की भव भंव शरण तिहारी ॥३॥ भैरवी। जग में प्रभु पूजा सुखदाई ॥टेका दादुर कमठ पांबुरी लेकर प्रभु पूजा को जाई । श्रेणिक नृप गज के पग से दवि प्राण वजे सुर जाई ॥१॥ द्विज पुत्री ने गिरि फैलासे पूजा आन रचाई। लिङ्ग छेदि देव पद ळीनो अन्त मोक्ष पद पाई ॥२॥ समोशरण विपुला चळ ऊपर आये त्रिभुवन राई । श्रेणिक बसु विध पूजा कीनी तीर्थ कर गोत्र पंधाई ॥३॥ धानत नर भव सुफल जगत् में जिन पूजा रुचि भाई । देव लोक ताके घर आगन मनुक्रम शिव पुर जाई ॥४॥ रसिया। तोसे लागीरे लगन चेतन रसिया टेकप कुमत सो तके संग तुम राचे नाना भेष गतिं गति धरिया ॥१॥ नरक मांहि बिललात फिरत ते वे दुःख विसरगये रसिया ॥२॥ नीठ नोउ नरकन से कढ़ कर मानुष भव दुर्लभ बसिया ॥३॥ नर भव पाह वृथा मत खोबो ऐसा औसर महिं मिलिया ॥४॥ कहत हंजारी सुमति संगरांचे फुमति छोड़तुम होमुलिया। -- जैन-प्रन्य-संग्रह। ३०१ विनती, भूधर दास कृत। अहा जगति गुरु एक सुनिये अर्ज हमारी । तुम प्रभु दीन दयालु मैं दुखिया संसारी ॥९॥ इस भव पन के माहि काल अनादि गमायो । भ्रमत चतुर्गति मांहि सुख नहीं दुख वहु पायो ॥२॥ फर्म महा रिपु जोर ये कलकान करें जी । मन माने दुख देय काडू से नहिं रेंजी॥३॥ कव हूँ इतर निगोद का हूँ कि नर्फ दिखावें । सुर नर पशुगति मांहि बहु विधि नाच नचावें ॥४प्रभु इनको परसङ्ग भव भव मांहि पुरोजी जो दुख देखो देव तुम से नाहिं दुरी जी ॥५॥ एक जन्म की बात कहिन सकों सब स्वमी । तुम अनन्त पर्याय जानत अन्त- यामी ॥ मैं तो एक अनाथ ये मिल दुष्ट घनेरे । कियो बहुत वेहाल सुनिये साहब मेरे ७ भान महानिधि लूट रंक निवल कर डारो । इन ही मो तुम मांहि है प्रभु अन्तर पारो । पाप पुण्य मिल दोय पायन वेरी डारो। तन कारागृहं माहि मूंद दियो दुख भारी ॥६॥ इनको नेक विगार मैं कुछ नाहि करोजी । विन कारण जगवन्धु बहुविधि और धरी जी ॥१०॥ अब मायो तुम पास सुन कर सुयश तुम्हारी। नीत निपुण महाराज कीजे न्याय हमारो ॥१५॥ दुष्टन देहु निकाल साधुन को रख लीजे । विनवे भूधर दास हे प्रभु ढील न.कीजे ॥१२॥ इति।

૨૨ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। । . दश धर्म के भजन। उत्तम क्षमा जियातज क्रोधमहा दुखकारी,भजक्षमा सुमनि मन प्यारीटेका" पूव अति संक्लेश भावतें, संचे अघ अनिवारी। वे अनिष्ट न इष्ट अन्य पर, खान वान क्यों धारो॥१॥ तप कल्पदम श्रेय सुमुन युत, शिव फल दायक भारी। रोष दोष दुःख कोष धनंजय, तत क्षण भस्म सुकारी ॥२॥ दीपायन मुन क्रोधा नलकर, द्वारावति. पुर जारी। तप निज भंज प्रभंज नरक में, दुख अति पंच प्रकारी ॥३॥ क्रोसन ताड़न मारन ही में, क्षमा धरीजिन सारी। अव चल वास बसे तिन मग में, होहु सदा सु विहारी ॥ ४॥ . उत्तम मार्दव। परिहरमान सुगुन निरवारो, सेवा मार्दव वृष सुखकारी॥टेक॥ जात्यादिक विध कृत संयोग कर, उंच गिनत अविचारी। सो तो शरद मेघवत् चंचल, विनशत लगत न वारी॥१॥ वचन सत्य युत हृदय दया युत, मत जिन श्रुत अनुसारी। . दान देन कल्पद्रुम समूह, श्रुत गाये मदहारी ॥२॥ निधिपत भरतेश्वर चक्री को भाता मद अपहारी। तीन खरड पति घली सवै इक, छिन मैं भये दुखारी॥३॥. सव गुण हीन दीन अवलम्बित, कर पुलकत भारी। सम्पदादि सब प्रगट अथिर लख, क्यों मद करत अनारी ॥ ४॥ :: सब अनर्थ को मूल दर्प लख, त्यागो सुबुध विचारी।.. माईव सार सुधारस पीकर, हो शिव सदन विहारी ॥५॥ उत्तम साजषा जिय तजमाया उपधि असारी, सज आर्जवसुखद अपाटेकर . . . .

जैन-अन्ध-संग्रह। ३०३ . वितथ वितरणी गुण आवरणी, दोष बढ़ावन हारी। कुगति युवति माला अघमाला नीत प्रीति निरवारी ॥१॥ अन्य कषाय प्रगट दीखत है, माया गुप्त कटारी। जैसे ढकी अग्नि हू जारत, करत फवौका भारी ॥२॥ कपट वृति कर पर वित्यादिक, पंचक होत दुखारी। सुर्गादिक सुख ठगत आपने, मोह हती वुध थारी ॥३॥ प्रगटत निज कृत दोष विपति मति, भोगत विविध प्रकारी। तो भी तजत नज्यों विलाव पय, पीवत लकुट प्रहारी ॥४॥ सल्य दोष हर आर्जव गुण धर, भये संत अविकारी। अविचल ऋद्धि लही तिन पथ में, कबहुं हो सुच विहारी ॥५॥ उत्तम सत्य। असत वैन दुख देत जानकर, सत्य धर्मधारो मुखकारीका कलह धरन दालिद्र करन अघ, पुंज भरण समलता कुठारी। अयल विधान अनीति खान, अप्रतीति थान तज मृषा असारी सत्य सुवोध जलधि वर्द्धन शशि,गुणगण कोष दोष निरवारी। शिव पथ संचल, हरण, अमंगल दलन विपति दल पुण्य भंडारी अति दुर्लभ वच योग लहो सो, वितथ बोल क्योंफरत असारी वसु नृप असत प्रभाव नरक में, वेदन सहत कहतमु पुकारी ॥ सत्य प्रसाद वचन ऋद्ध उपजी, पुन आप्त दिव्य ध्वनिधारी। तिन जिन चन्द्र चरण सेवा करह, सत्य मारग सुविहारी॥ उत्तम शौच। लोभमलिनता डार सारभज,शौच धर्म निज प्रज्ञाधारी टेक॥ मोह उदय परं द्रव्य चाह धर, करत अनर्थ अनेक प्रकारी। अटवी अन्त दिगन्तर भटकत, विकट समर में है संचारी ॥२॥ अघद्रमकानन, सुयश,नशावन,कलह बढ़ावन सुकत निवारी। यह-परभव दुख दाय पाय पितु,लोम सदृश न मलिनमसिकारी '३०४ जैन-ग्रन्य-संग्रह। मिथ्यात्वादिक मल विलप्त पुनि,परधन परत्रिय वांक्षाकारी। स्नान किये क्यों शुचि है,गणादिक जल तन मलहारी ॥३॥ जिन दूग-शान चरित्र जलकर, रन हर परम शौचता धारी। तिन जिनराज परम शासन कर, होह विमल पद पंथविहारी॥ उत्तम संयम । पञ्चहन्द्रिय मन जीत कायषट्, रक्षाकरः संयम सुधरीजेाटेका सेय अमेय विषय विष तिन फल, भव आताप माहि चिरछीजे। अव नित शान सुधारस पीके, सब दुख द्वंद जलांजलि दीजे॥२॥ मन विकल्य संतति उपजावन, क क्षण.के.गुण पारन लीजे। ताके विषम विकारहार निज, अनुभवमाहि सदाथिर कीजाशा स्वसम जीव मात्र सब लख, सबसे मैत्री भाव घरीजे। असत् अदत्त अवृह उपाधितज,पंच समिति प्रय गुपत धरीजे॥ वीतराग चारित्र धार कर, वन्ध काट सुख सिन्धु भरीजे । होहु विहारी संयम मग में, भव दुःख भानकाल चिर छोजेक्षा . उत्तम तप । द्वादश विधि पर सकल दोषहर,तपश्चरणधारो सोमानीटेका धरम धराधर हनन घनघर,काल ज्वाल जग गुण निधि पानी। दुष्ट करम अहिवर मंत्राक्षर, विघ्न न्यूम,तम रविं जिम जानी-॥ भव कानन भानन दावानल, दुम्बं. देव समन सुमेध समानी। निराछक जिन सदृश चिंतयति अविचल ऋद्धि देन बड़दानी॥ सो घर तप इच्छा निरोध लक्षण लख, धरत भेद विज्ञानी। विपरीता मिन घेश सहित.ह, वृथा क्लेश करत.मझानी। ऋद्धत्यादिक प्रत्यक्ष फळ जाके,पुनि इन्द्रादिक पद रजधानी । होहु विहारों तपो मार्ग मैं जा फल मुख्य. मोक्षमुनि दानी ।

जैन-प्रन्थ-संग्रह। ३०५ उत्तम त्याग। चंचल अघकृत तृष्णा वर्धन,धन लख सारत्यागवृत कोजाटेक॥ अभय ज्ञान आहार सोभेषज, चार दान जिन कथित करीजे। निर्भय विसद शान धन ऋद्धि रोग रहित सुरतन पाईजे ॥ वहु वध छत आरम्भ ठान अति,श्रम सहस्र कर धन संचीजे। सप्त क्षेत्र में चीज बोय घट, यादव वत असंख्य फल लीजे ॥ तीव्र लाभकर धन संचय कर, मधु मानी समान क्यों सीजे। रुपण कहाय अजश लह यह भव परभव सुखगिरि वज़न कीजे।। आपद निहत वि करुणा कर, पात्र विर्षे तिन गुण रस भोंजे। अभय देय सब जीव मात्रको, गृह वस दान विना न रहीजे।। सव पर द्रव्य ममत पर हरके, निज गुण रत्न सदा पर खोजे। होहु विहारी त्याग पंथ में, जाते सुन्न अनंत पिल सीजे ।। उत्तम (प्राकिञ्चन) परम अकिञ्चन भाव भायके सर्व उपधि तज दुख करतारी॥टेका मोह मद्य पोकर चिरतें निज रूप अचल चिद्रूप विसारी। अनुचर भय भंगुरं जड़ रूपी देह जंत्र में स्वय बुध धारी ॥१॥ सकल भाव निजद्रव्य चतुकमय सदा पर नमत हैं अनिवारी। तिन पर न मन अनिष्ट इट लख बांधे विधि नाना परकारी॥२॥ अब अपूर्व भाग्योदय ते लह जिनवच रविकर संशय हारी। अमल अखएड शुद्ध चिद्रूपी निन लख होहु अकिंचन धारी॥३॥ आशा गर्त प्राणि युत युत हैं लोक सम्पदा अणुवत कारी। त्याग भाव कर पूर्ण करो तुम तिन पद पंकजकी बलिहारी॥ क्रोधादिक कर फुगति बन्ध है परिग्रह सतत बन्ध विस्तारी। तातें त्रिजग त्रिफालचिव कह परिगृही नहिं शिवअधिकारी ।५॥

३०६ जैन-ग्रन्थ-संग्रह। . वाह्याभ्यन्तर संग त्याग जिन मुंद्राधार भये अविकारी। ज्ञानानन्द स्वरूप मगननित तिन जिन पथ का होहु विहारी। उत्तम ब्रह्मचर्य। पर वनिना तजो बुधिवान युगम भव दुख देन हारी प्रगट लखहु सुजान ॥ टेक॥ कुगति वहन सु सकल गुण गण गहन दहन समान । सुयश शशि को मेघमाला सर्वोगन वान ॥१॥ एक छिन पर दार रति सुख काज करत अज्ञान । करत अछति सफल नरक दुख सहत जलधन मान ॥२॥ अन्य रामा दीप में है सुलभ परत अजान । यहाँ ही दण्डादि भोगत पुन कुगति दुखदान ॥३॥ स्वदारा विन नारि जननी सुता भगिनी मान । करहि वांछा स्वप्न मैं नहिं धन्य पुरुष प्रधान ॥४॥ परवधू मन वचन तेंतज शील धर अमलान । स्वर्गसुख लह पुन विहारी होहि अवंचल थान ॥५॥ जिन वाणी की स्तुति। करों भकि तेरी हरी दुख माता भ्रमण का। टेक अकेला ही हूँ मैं कर्म सब आये सिमटके । लिया है मैं तेरा शरण अब माता सटक के॥१॥ प्रमावत है मेोकों कर्म दुख देता जनम का करा०॥१॥ दुःखी हुआ भारी भ्रमत फिरता हूँ जगत में। सहा जाता नाही अकल घबड़ाई भमण में । करों या मा मेरी चलत बस नाही मिटन का । करों ॥२॥ सुनी माता मेरी, अरज करता हूँ दरद में।

जैन-प्रन्य-संग्रह। ३०७ दुःखी जानों मेोकों डरपकर माया शरण में । रुपा ऐसी कीजे दरद मिट जावे मरण का करों ॥३॥ पिलावे जो मोकों सुबुद्धि का प्याला अमृत का। मिटावे जो मेरा सर्व दुख सारे फिरण कां। परों पेयां तेरी हरो दुःख भारी फिरण का॥ करो०॥४॥ रेक-मिध्या तम नाशवे को ज्ञान के प्रकाशवैको अप्पा पर भासवें कों भानुसी यखानी है। छहुँ द्रव्य जानवेकों यन्ध विधि भानवेकों स्वपर पिछानवेकों परम प्रवाणी हैं ॥५॥ अनुभव बतायवेकों जिय के जतायवेकों काहू न सतायवेकों भव्य उर आनी है। जहां तहां तारवेको पार के उतारवेको सुख विस्तारवेकों ऐही जिन वाणी है ॥६॥ दोहा। जिन वाणी की स्तुति, अल्प बुद्धि परमाण । पन्नालाल बिनती करें, देहु मोत माहि ज्ञान ॥८॥ है जिनवाणी भरती, तोह जपो दिन रैन। जो तेरी शरण गहे, सो पावे सुख चैन ॥६॥ जिनवाणी के शानते सझे लोकालोक । सो वाणी मस्तक धरू, सदा देत हो धोक ॥१०॥ भोजनों की प्रार्थनाएँ। . (सबेरे भोजन करने की इन्ट प्रार्थना) : परमेष्ठी सुमरण कर हम सब चालक गण नित उठा करें। : स्वस्थ होय फिर देव धर्म गुरु की स्तुति सब किया करें।.. - ३०८ जैन-प्रत्य-संग्रह । करना हमें आज क्या क्या है यह विचार निज काज करें। कार्यिक शुद्धि क्रिया करके फिर जिन दर्शन स्वाध्याय करें। मौन धार कर तोपित मनले खुधा वेदना उपशम हित.। विघ्न कर्म के क्षयोपशम से भोजन प्राप्त करें परमित ॥ है जिन हो हितकर यह भोजन तन मन हमरे स्वस्थ रहें। आलस तजकर "दीप" उमंग से निज परहित में मगन रहें। सांझ के भोजन समय की इष्ट मार्थना। जय श्री महावीर प्रभू को कह अरु निज फर्त्तव्य पूरण कर। संध्या प्रथम मौन धारण कर भोजन करें शांत मन कर। परमित भोजन करें ताकि नहिं मालस अरु दुःस्वप्न दिखें। "दीप समय पर प्रभू सुमरण कर लोवें जगे सुकार्य लखें । कुगुरु, कुदेव कुशास्त्र की भक्ति का फल । अन्तर वाहर अन्य नहि, ज्ञान ध्यान तप लीन । सुगुरु विन कुगुरु नमें, पड़े नर्क हो दीन ॥१॥ दोष रहित सर्वज्ञ प्रभु, हित उपदेशी नाय नाथ! श्री अरहंत सुदेव, तिनको नमिये माय ॥२॥ राग द्वेष मल कर दुखी, हैं कुदेव जग रूप! तिनकी वन्दन जो करें, पड़े नर्क भव कूप ॥३॥ मात्मानं वैराग सुख, दया. छमा सत शील! भाव नित्य उज्जल करें, है सुशाल भव कोल॥४॥ राग द्वेश इन्द्रों विषय, प्रेरक सर्व दुशास्त्र । विनको जो वन्दन करैलहै नर्क विट गात्र ५॥

No text on this page.

Jain-granth-sangrah

Author
Sangheliya, Nandkishor
Title
Jain-granth-sangrah
File name
Jain-granth-sangrah
Text
OCR done
Citation
1925
Published
2009/11
Publisher
Jabalpur, Jain Granth Bhandar
Language
Sanskrit
Pages
314
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain - granth - sangrah
DLI number
344307
Barcode
99999990234178.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
Tm9DJLopEeV
Download PDF

Jain-granth-sangrah