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The Mahabharat Bhishma Parv

Vedvyas · 2012/08

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[42361 Mahabhaint (४०३६) डाध्ययनसम्पना सर्व द्धाभिनान्दन । आसन्तो जय युद्धे बळेनाभिमुखा रणे ॥ ४ ॥ अभिवाय चदुर्धर्षा धागष्टस्य वाहिनीम् । प्रारमखा पश्चिमभागे न्यविशन्त ससैनिका ॥ ५ । समन्तपञ्चाद्वाय शिावगाणि सहनश । कारया माम घिधिवत् कुन्तीपणो युधिष्ठिा ॥ ६ ॥ शू या च पृश्चिची सर्वा वालवृद्धाव शेपिता । निश्च रुपेवास द्रयकुभरवर्जिता ॥ ७ ॥ यावत्तपत्ति सूर्या हि जम्बू द्वीपस्यमण्डलम् । तायदेय समायात चल पार्थिरसतम ॥ ८ ॥ एकस्था सर्ववर्णा स्तेमण्डल बायोजनम् । पर्याझामन्त देशाश्च नदी शेलार बनानच ॥ ९ ॥ तेषां युधिष्ठिरा राजा सर्वेषापुरुषर्षभ । व्यादिदेश सवाहाना भा-यभाज्यमनुस मम् ॥ १० ॥ सय्याश्च विविधास्तात तपारानौ युधिष्ठिर । एरवेदी चोदतव्य में उतरकर कौरवो के सम्मुख धनपान हुए, और पराक्रम के द्वाग विजयी आशा रखनेराळे पद्धभूमि में वर्गगान दुर्योधन क उस दुःखगे महाखादत सेनाक सम्मुख पहुँचकर कुरुक्षन के परिवार गाग में सेनामा गनुष्यों समेत पूर्वाभि- मुख हो स्थिरता से नियतहुए । ५ । फिर कु-तानन्दन सशिष्ठर ने स्पचक से बाहर अपनी बुद्धिक अनुसार हगारों शिविर अर्थात् खपटर तवृ तैयार किय | और बृद्ध बालक स्त्री इनको छाडकर सब पृथ्वी क मनुष्य गात्र हाथी घाह रथ इत्यादि समत यहांतक इक हुए कि पृथ्वी के मदन निर्जन स हागणे, ह राजन्द्र मनोज जहांतक कि सूर्य में प्रकाश करना हश्रा स त काता है उस पृथ्वी मंडल के सबरराजा लोग अपनी २ सेनाओं समेत आकर वह हुये सब वर्गोन देवानदी पांगों को और बहुत योजन क उम पृथ्वी गड का उल्लघन करक एक स्थानमें निवाप्त किया । ९ । तब महा चुद्धिमान रामायुधिष्ठिर न 37 अक्षत्री राजाओं से लेकरम्लच्छपर्यन्त लोगोंक निषित बहुत उत्तम २ प्रकारक भोजनों के धनवाने की आज्ञादी और भावना अनन्ना गनि कसय सव लागों का Agrinst_the Krurayas Those scholars of the ledus too great delight in wir ind Leing desno is of victory faced the lattle field with thu troops Appronching the umy of Duryodhan the invincibly Pandu is statiuncu thellules to the west of the plain with their faces lookmg Castrid 5 Yushishthir the son of hunti caused thousands of tents to be p tched in a levular order les nud Samıntpinchal It spenjtd as if ibe whole euth bad poured donar there all its lior es men churi ts and elephants and lind kept only the cudien und nged people at lion lhe wlio e of Jaini ud vip under the sun jo nod to me up the fou I eople of all races asuml led theit hwing unched to uulk sort hills Vers woouls and plains 9 I udl; -hthu, the lest of tien orderud good food and other necessities to lic supplied to the 11111Im 1 thuu laists, llo one (४२३७) frazi Baisasta PARO [4237] पाण्डवेयोऽय मित्युत ॥ ११ ॥ गिज्ञानान सर्वेषां साश्चाभरणानिच । पोजया माल कौरव्यो युद्धकाल उपाम्पते ॥ १२ ॥ हावाध्य जान पार्थस्य धार्तराष्ट्री महामनाः । सह सर्वमहीपाले. प्रत्यन्यूहत पांडगम् ॥१३॥ पाण्टरेगातपत्रेण ध्रियमाणेन मुद्धनि । मध्ये नागसहस्रस्य भ्रातृभि परिवारित ॥ १५ ॥ दृष्ट्या दुर्योधनं दृष्टाः पावाला यदनन्दिन । दध्म प्रीता महा शयान् भे मधु'स्वना. १५ तत प्रहृष्टां तां सेनामभिमाक्ष्याध पाण्डया । यमबुद्देष्टगगसो चाचदेवश्च वीर्यवान् ॥ १६ ॥ ततो हर्प समागम्य वासुदेवधनञ्जयो । दध्मतु पुरपन्यानो दियाशंसा रथ स्थिती ॥ १७ ॥ पञ्चजन्यस्य निर्घोष देवदत्तस्प चोभयो । श्रुत्वा तु निनदं योधा. शझन्मूत्र प्रमुखघुः ॥ १८ ॥ यथा सिंहस्य नदन स्वन श्रुत्वेतरे उत्तम स्वच्छ विस्तरों समेत भयमा सोनकादी इस मकारसे इस बुद्धिमान् पांडवों के बड़े भाई युधिष्ठिरने सबका यथोचिन मान सन्मान करके युद्ध वर्तमान होने के समयपर अपनी सेनार मनुष्यों की पहचान के लिये सबके चिह्ननाम और आभूपण र आदि में लगवादिगे, तब तो महामाहसी दुर्योगने अर्जुनकी वना पताकाको देखकर सब राजाओं समन अपनी सेनाको पांडों से लड़नेके लिये युदमें सन्नद्ध फिता और आपभी अपने श्वत छत्र धारण काफ भाइयों समेत हजारों हाथी घोड़ों समेत उपस्थितहुआ। १४ । दुपिन की इस धूमकाम और तयारी को देखकर युद्धाभिलागी प्रसन्नचित निमय के चाहने वाले पांचालन बड़े शब्दापमान शंख और मधुवाणी चाली दुन्दुभी को बजागा तदनन्तर पांडव और श्री कृष्णजी उस अपनी सेनाका प्रसन्नचित्त देसार महा आनदिनहुये फिर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों वीरपुरुषोंने रथमें सवार हाकर अपने दिव्य मांसों की अनिकी इनदोनों पुरुष सिंहवीरोंके पांचगाय और देवदत्त नाम खों- की ध्वनिको मुनतेही कोरवी सनात चोरोंने मारे गपके मूत्र और विष्टा his men various watchwoids in order to distinguish them from others and fixed for them names and badges for recognitiin during hattle Seeing the banner of the son of kuntı, the pagnanıınnus son of Dhırıtıashtra, nith the white umbrella rarsed ore his head, surrounded by a thousand cleph'ınts and accompained by his hundred .brothers and king, bsgan to array luis own troops against the Punda. The narlike Panchals blew their cunchshells and beat tho fectsounding cymbulls in glee at the sight.of Durg dhan Aljun and vallant Vpsudes were delighted to see those troops. The lest of men, Vasudev and Arjun seated on the same chariot bless their celestial conciishcils in great glee. The warriors vere terified by the sound of then peals as deer do on hearing a lion roar. A terrible qust enveloping the sun and hiding all tlungs from vien, arose with vas. 14 Malabbarab . [12381 (४२३८) मृगाः । सेयुर्मिनदं श्रुत्वा तथासीदत्त तटबलम् ॥ १९ ॥ सतिष्ठद्रजो भौम न प्राज्ञाया किश्चन । अस्तं गत इवादित्ये सैन्येन सहसा वृतः ॥ २०॥ घर्ष तत्र पर्जन्यो मांसशोणतवृष्टिमान् । दिक्षुसर्याणि सैन्यानि तदतामषाभयत् ॥२१॥ वायत्ततः प्रादुरभुन् नीचे शफरकपणः। चिनिनस्तान्यनकिानि शतशोधसहस्रशः ॥ २२ ॥ उभे सैन्ये च राजेन्द्र युद्धाय मुदिते धृशम् । कुरुक्षेत्रे स्थिते यत्ते सागरक्षाभतोपमे ॥ २३ । तयोस्तु सेनयोरासीद अतः सतुसहम । पुगान्तसम नुप्राप्त द्वयोः सागरयोरिव ॥ २४ ॥ शून्यासी पृथवी सर्वा चालवृद्धावशेषिता । तेन नासमूहेन समानीतेन कौरव ॥ २५ ॥ तस्ते समयं चक्रुः कुरुपाण्डवः कादी जसे कि सिंहकी गर्दनाका सुनकर अन्य मुगादि पशु भयभीत होकर मूत्र पुरीपादि करडालते हैं पैसेही कोरनी सेनाभी शखौके शब्दोंको मुनकर व्याकुल हागई और पृथ्वीकी धूलि आकाशको ऐसी उड़ी जिसके कारण सूर्ग अस्तंगतसा हागया और कुछ ही नानागया । २० । और बादलने उससमय सेना के चारों तरफ के मनुष्यों पर मांस और रुधिरकीचांकी यह बडा आश्चर्यसा हुआ तदन ननर नाचेगे आरसे पृथ्वीके कंकड़ों का खींचनेवाला वायु बड़े वेगस एसा प्रचण्ड- हुआ कि जिसने संपूर्णसेना के मनुष्यों को घायल कर दिया हे गजेन्द्र इस फारसे पीड़ित होकर दोनों औरकी सेनाओं के मनुष्य युद्ध करनेके लिये अत्यन्त प्रसन्नचित्त फुरुक्षत्रके मैदान नियत ही साधान और व्याकुल होकर शोभित सागरकी समानताको प्राप्त हुए अर्थात् उन दोनों सेनारूपी समुद्रों का एसा अपूर्व योग हुआ जैसा कि प्रलपके समय दानों समुद्रों का सम्मात होता है, और सब पृथ्वी जिसमें केवल चालक और वृद्ध ही शेषरहगयर्थ वह कौरों बुलायेहुए उनसेनाओं के समूहोंके कारणघोड़े मनुष्य रप और हायियों सेभी शून्य हागई २५ a the march of the army 20. Flesh and blood dropped from black cloud over the ai my It was a strange sight. The wind blew pieces of stone which hit hundreds and thousands of warriors Both the armies stood in great ) y ready for action on the field of Kurukshetra, like two agitated oceans The encounter of the two armies, was very wonderful like the two occans at the end of the Yug. On account of the great muster of the armies by the Kauravas the outh was divested of men and only children and aged people were lett at home. 25. The Kauravas and the l'andavas math the Somaks then entered into certain conditions and rules to be observed during the battle as people under similar circumstances do to fight fairly and to secure safety to the party which has to retire Those engaged in contests of words shc uld te fought sgainst with words, those leaving भामपऱ्या BENS HA PAur [4239] सोमका । धर्मान सस्थापयामासुर्युद्धानां भरतर्पम ॥ २६ ॥ निवृत्ते विहिते युद्ध स्यात् नतिर्न परस्परम् । यथारप यथा योग नच त्याच्छलनं पुन ॥ २७ ॥ चाचा युद्धे प्रवृत्ताना पाचय प्रतियोधनम् । निष्क्रान्तौ पृतनामभ्यानहन्तभ्या कदाचन २८ रथीच रधिना योध्यो गजेन गजधूर्गत । अभ्येनाची पदातिश्च पादाते नैव भारत९॥ यथा योग्यं यथा काम यथोत्साह यथा यलम् । समामाण्य प्रहर्तव्य न विश्वस्त न पिसले ॥ ३० ॥ एकेन सह सयुक्त प्रपनो विमुत्रस्तण । क्षीणशस्रो विवर्माच न हनु तन्यः कदाचन ॥ ३१ ॥ नसूतेषु न धुर्येषु नव शास्त्रोप नायिपु । न मेरी शखवादपु महर्त्तव्य कयञ्चन ॥३२॥ एवं ते समय कृत्या कुरुपाण्डव सोमका । विस्मय परम तदनन्तर उन फौरव पांडन और सोमकोंने नियम करके युदके इन धर्मों को। नियतकिपा कि इस नियत कियेहुये युद्ध के समा हानेपर हम सबकी नीति परस्पर में होचे, इस निमित्त कि फिर किसीके एक से गिलाप में भिन्नभावन होनेपावे वचन रूप शस्त्रों से सम्मुख होने वालोंको वचनाहीसे लडना योग्य है | सेना से बाहर होजान वालको कभी न मारना चाहिये रथोरथी से हाधीका सवारसे अश्वारुढ अचारुढस पैदल पैदल से लड़ने का योग्यहँ अर्थात् जैसा कि उचित युद्ध होता है वैसाही अपने बलपराक्रम के साथ करना योग्य है और मुख से घोल कर शस्त्र प्रहार करना चाहिये परन्तु विश्वासित और व्याकुल मनुष्य पर शस्त्र महार करना अयोग्य है । और एक के साथ भिडेहुए शरणमें आगेहुए वा ऐसे व्याकुल लोग जो टूटे शस्त्र और विना वस्तरके हो उनको यमी न मार ना चाहिये इनके सिराय सोबहुपों को शखों के लाने वाले वा बनाने वालों को भी न मारे और मेरी ख नगाड़े आदि बाजोंपर किसी दशा में भी शख्न न चलाना चाहिये इसमकार जनसव परस्परदेखने वाले कौरव पांडव और सोरकों ने नियम करके पढ़ा आश्चर्य किपा इसके पीछे वह सब महात्मा वीर युदranks should not be slaid, a charioteer should have a charioteer for an antagonist, an elephant rider with one of bus own sort, a borseman should engage with a horseman and a foot soldier with a foot soldier Guided by considerations of fitness, willingness and courage cnc give notice to another before stribing No one should strike another who is unprepared, terrified, engaged with another, serking quarter retreating, having unfit weapons or destitute of armour None should slay chanot drivers, beasts, men engaged in carrying weapons, beaters of drums or blowers of conchshells Having enter a mto the above-mentioned covenants, the Kaurtas, the Pandavas and the Somals gazed at one another with yonder And having thus formed themselves into battle array, those great warriors should - [4240] Mahabharat जग्मु. प्रेक्षमाणा. परस्परम् ॥ ३३ ॥ निर्षिश्य च महात्मानम्ततस्ते पुरुपर्पमा रूपा समनसो बभूवु सहसैनिशा । ३४॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्यूखण्डविनिर्वाणपर्वाण सैन्यशिक्षणे मथमोऽध्याय ॥ १ ॥ वैशम्पायन उवाच । तत पूर्वीपरे सैन्ने समीक्ष्य भगवानृषिः । सवगेदवि. दांश्रेष्ठो व्यास सत्यपतीसुत' ॥ १ ॥ भविष्यात रणे घोरे भरतानां पित महा। प्रत्यक्षदर्शी भगवान् भूतभन्यभावष्यावत् ॥ २ ॥ वैचिनवीर्य गजान स रहस्य बधीदिदम् । शोचन्तमात ध्यायन्त पुत्राणामनय तदा ॥ ३ ॥ व्यास उवाच । राजन् परीत कालासे पुनाश्चान्ये च पार्थिव । ते हिंसातीच सग्रामे समासाद्यतरे तरम् ॥ ४ ॥ तेपु कालपरीनेपु विनइतन्म्येच भारत । कालपर्यायमानाय मास्म शोफे मन कृथाः ॥ ५ ॥ यदि चच्छसि सन्नामे द्रष्टमतान् विशाम्पते । चक्षुर्ददा भूमि में प्रयश फरक, अपने पराक्रमी सेना क प्रसन्नचित्त मनुष्पों समेत गनमें मसन्न हुए ॥ १४ ॥ अगाय ॥ २ ॥ वैशम्पायनमोल कि युद्ध के नियम हान के पछि सव वेदज्ञों में श्रेष्ठ सन्यदती के पुर भरतवंशियों के पितामह आगे होनेवाले युद्ध के वृधान के प्रत्यक्षदर्शी भूत भविष्य वर्तमान के ज्ञाता सपर्थ भगवान वेदव्यास ऋषि कौरवं पाण्डवों फी सेनाको दानों और तयार देसकर उस शानग्रस्त अपने पुत्रों के अन्याय के पान करने वाले रामाधाराष्ट्र से गुप्त प्रगाजन के साथ गहवचन वाले फिर राजन तुम्हारे पुत्र और अन्य तुम्हार सहायक राजा 'योग मृत्यु के पशी- भून है यह युदभूमि में एक दूसरे से सन्मुख लष्कर नाशवा पायेंगे, ई भरत- वशी उन मृत्यु के वशीभूत और नाश होन चालों में समय की रिपरीतता को and bust af men, with thiur trup's Lutrayed the happiness of their hearts from their cheerlul facts CHAPTER 11 "moting the two armies on the last and sest ready to fight," said Varlınmpy in, "Vy as the holy s , son of Satyavati, list of nien, scholar of the Vedas and grandt utlu of the Bharats, to whom tilo past, present and futuiu wcru liku tlic present; spoke the following Norils to Vielutrauirya's royal con who wils nt that time distresui and corrow ful for the destructas u policy of lus ou n fons. "Ilic days of thy hons and of other kings," sd Vyas to Dhuutrashtrn, " numixrd 'Ilicy wll destroy one anothici in battle and shall perish nil, luciuse the hour of their denth 19 nich keep in mund the changes brought about Ly Time and donot yn cyourself up to forios Islal 1 are (१२४१) TT BIJISHT, PA v [4241] निने पुन युद्ध तन निशागय ॥ ६॥ धृतराष्ट्र उवाच । नगेचये जातिवघद्रष्ट नसत्ता । युद्धमालशर्पण शृणुया तव तेजसा ॥ ७ । वैशम्पायन उवाच । एतस्मिन्नच्छति द्रष्टु सग्राम धोतुमिच्छति । चाणामीश्वरो व्यास सजयाययर ददा ॥ ८ । एपते सजयो राजन् युद्ध मेशद्वान यति । एतस्पसर्च सग्रामेनपराक्ष भविष्यात । ९ ॥ चक्षुषासजय रामन् दिवसमन्वित । कथयिष्यतितेयुच सर्वतश्चमविष्यति ॥ १० ॥ प्रकाशयाऽप्रकाश वादियागयदि वा निशि । मनसा चिन्तिनमपि सर्व चेम्यति सजय ॥ ११ ॥ न शस्त्राणि च्छेत्स्यति नैन पाधि । गारलाणिस्य जांच युवादसमाहिमोक्ष्यते ॥ १२ ॥ महन्तु कीर्तिमे तेरा करूगा भरतपभ । पाण्डवानाच सर्वेषा प्रथयिष्यामि मा शुच. ॥ १३ ॥ प्यो श्रग जानकर मनको शोषग्रस्त माग हे गगा जो तू इनसे युद्ध में देसा चाहताहै तो मैं हे पत्र तुझाा नेत्र देताह तू उगमे युद्धों को देख । ६ । धृतराष्ट्र पोळे कि हे वीपों में अष्ट में अपो नाति व.धु और पुगेका पारना नहीं देखना चाहचाई सल यही पाहताहू कि आपक तेज स युद्धमा सब वृत्तान्त सुनारस, पैशम्पायन बाले कि जर मनीने जाना कि यह युद्ध देग्टना नहीं चाहना किन्तु पूरा पूर्ण सात युद्ध का सुनना चाहा है तब महायरदायी होकर उन्हों न सजय का वादिया और सजा से कहा कि हेराना यह सनप तुपसे सर कदाई का वृत्तान्त पहेगा १० 1 दिन में या गनिमें गुप्त प्रकट कैप्साही वृत्तान्त हो सब तुमस वर्णन करगा और यह सजय दृमरे के मनकी शोची हुई चानको भी जानेगा शसों से इसमा घात नहीं होगा और यह परिणम स कभी ग्यदित भी नहीं हागा हे पुन धृतगष्ट यह गालगनका बेटा युद्ध । अलग रहेगा और हे भरतर्षभ में इन कोग्य पाण्डव और सब राज ओंकी कीर्सिको स्थाओं के द्वारा विरुपात लगा grant thee my son, eyes to see the battle if thou wish to do so Buhold the battle! 6 • Best of Bribnian sages ! replied Llirit Inshtra "I have no desne to see the slaughter of businen, though I would libe to licar the minute det ils of it through thy pourer Vaist ampayan said that as Dhritrashti i expressed his crgernes, to it arif the events of the Lattle without living to see it with his ofyn ejes lyas the grer of boons gave him a loon saying This Smjeya wall descrile the battle to theeling Not a single detail (fit will exempe his a tyre. Gifted with a divine von Sinjay ? rill give thee tlied tuls and will be a snowled je ot ei erything 10 Senyasawal ] tius utry ng ann cted with the far whether it le 13 dny o nicht event the citent í sbst mºn thub in their pundz. He will be safe fr m neapons and will not bc.subject to initig ue Th.s con - - ॥ [4212] Malabharnt (४२४२) दिष्टमेतनरव्याघ नाभिशोचितुमर्हसि । न चैव शक्य सयन्तु यतो धर्मस्ततोजय १४ ॥ शम्पायन उवाच । एवमुक्त्वा स भगवान् कुरूणा प्रापतामह पुनरय महाभागो घृतगष्टमुवाच ह ॥ १५ ॥ इह युद्ध महाराज भाविपतिमहान् क्षय । तह च तिमिचानि भयदान्युपलक्षये ॥ १६ ॥ श्यना गृप्राश्च काका कपाश्च खहितावकै । सम्पतान्त नगाग्रपु समवायाश्च दुर्वते ॥ १७ ॥ अभ्याचप्रप श्यन्ति युद्ध मानन्दिनो हिजा ! क्रव्यादा भक्षयिष्यान्त मासाी गजवाजिनाम् ॥ १८ ॥ निर्दयश्चाभिवाशन्तो भैरवा भयवेदिन । कड़ा प्रयान्तिध्यन दक्षिणा मभितो दिशम् ॥ १९॥ उभेपूर्धापरे सध्ये नित्य पश्यामि भारत । उदयास्तमने सूर्य कव.धै परिवारितम् ॥ २०॥ श्वेतलाहितपयन्ता कृष्णनीवा सचिद्युत । हे नरोत्ता ऐसाही होनेगला है इस तु गका शाच पाना अवश्य नहीं है, यह होनहार वात रोकने नहीं आसक्ती निघर धर्म है उपरही विजय है। १४ । वैशम्पायन बोले कि यह दुरनशियों के पितामह महाभाग भगवान मासजी ऐसा कहकर फिर धृतराष्ट्र से घोल कि हे महाराज गहां इस युद्ध में बड़ी | हानि होगी क्योंकि में यह भपकारी कारण का देसावाज गिद्ध कौधे | और कक नाग पक्षी वगले समेत वृक्षों सरी डालियों पर एा साथही मिरत हैं और इकह होजाते हैं यह सरपक्षी बड मसग होकर युद्धको सम्मुरा देखते हैं और कच्चा गास सानेपाल जीत हाथी घाडी क म का | खापेंगे, भयानक और भय उत्तान करनेवाले पमना। पक्षी नियन्ग क शब्द परते हुये गप में से दाक्षणदिशा की ओर चलना हे भरतवशी में पहली और पिउली दोनों सध्याओं में उदय और अस्त होनेवाल मूर्य या सदा | प्रतिदिन गहु से घिरा हुआ देखनाहू । २० । थे। लाहा रक्त इत्यादि अमर of Gau ilgani will livu ti stu the wlio Wall Abu nysulf I shall spruul the famo of the K muns s are the Pond 17. It is predestined Ilust dangt. vc nay ta grut awl sonraw it wt luovertel. Tlio victory will of coli fill on the s le where ughteousness १५ 11 I aislıamp wan cont nued thit thu bi ed und holy tandfither of the Kauravas ng un ad Iesu Uutilitan siyang at tlit ensun littlu will lugt Olins I clutcomens indic!' turoof disaster dus values herons, crows and cranes ac purching mgient nume s on tlic tops of thu tices and are looking down on the field well plc lscd at tlıc prospect of battle. Bezsts of prey will fiad on the lush of houses an elephants. Tiercu herons f rulmı: disaster are h mumy hom the aunter to the south I sv the rising nud the settin sun doly surrounded by the herdless trunk lliru coloured clouds with their ends w lute and rpd ! Ilic cll na -0 (४२४३) मोमप→ BAISHNA PANY [42431 प्रियाः परिधाः सन्धी भानमन्तमधारयन् ॥ २१ ॥ ज्वलिताकन्दुनक्षत्रं निर्षि- शेषदिनक्षयम् महोगनं मया दृष्टं तनयायभविष्यति ॥ २२ ॥ पालल्या प्रभया छीनः पौर्णमासींच कात्तिकी । चन्द्रोभूदांमवर्णध पद्मवर्णे नमस्तले ॥ २३ ॥ स्वप- स्यन्ति निहता चीरा भूमिमाघृत्य पार्थिवाः । राजानो राजपुत्राश्च शूराः परिध बाहयः ॥ २४ ॥ अन्तरिक्ष वगहस्य वृपदंशस्य चोभयोः । प्रणादं युध्यतोरात्री रौद्रं नित्यं प्रलक्षये ॥ २५ ॥ देवताप्रतिमाश्चैव कम्पन्ति च हसन्ति । वमन्ति रुघर चास्यैः विद्यन्ति प्रपतन्ति च ॥ २६ ॥ सनाप्हता दुन्दुभयः प्रपदन्ति विशाम्पते । मयुक्ताश्च प्रवर्तन्ते क्षत्रियाणां महारथाः ॥ २७ ॥ कोकिला शत भासाः शुशास्तथा । सारसाथ मयूगच याचो मुञ्चन्ति दारुणाः पत्रध चापा रंग धारण करनेवाली विद्युत संध्या के समय सूर्य को घेर लिया है यह में रात्रि दिन देखताहू यह भयंकर उत्पात के सूचक लक्षण है और सूर्ग चन्द्रमा नक्षत्रादि स आग्नि के वाण निकलने पालूप होते हैं यह भी गहा अशुभ सूचक उत्पातहैं, कार्तिकमास की पूर्णिमासी के दिन आपाश में लालरंग चन्द्रमा प्रभारहित अपने कृष्ण चिह्नके विना अग्नि के समान वर्णवाला दिखाई दिया, इसका फल यह दिखाई देग्हा है कि परिघ के समान प्रलम्ब भुनवाले शूरवीर और मृतक रागा- लोग वा गापार पृथ्नीको आच्छादित करके सोचेंगे और अन्तरिक्ष में उछलर कर लड़ते हुगे मुकर और वृपदंश दोनों के भयकारी महाशब्दों को रात्रि के समय नित्य र देखना और सुनताहूं । २५ । और देवनाओं की मूर्तियां कांपनी हँसती हुई मुखोंसे रुधिर उगलती और पसीनों में तरहो होकर पृथ्वीपर गिरती हैं और हे राजन दुन्दुभियां विनावनाये आप अच्छेप्रकार से यजमी और क्षत्री लोगों के वृहत् और उस दिव्य रथ घोड़ों के चिनाही चलते हैं योफिल शतपत्र नीलकण्ठ गाप्त और तीने सास मोर यह सब पक्षी भयानक शब्दोंको करते हैं and neck blach, charged with lightning assume the forms of maces and cnvelop the sun Loth at its rising and setting. I have seen the sun, the moon and the stars all blazing of an evening simultaneously. I bave fecn this both ly day and night. This foretodes consternation. On the full woon night of Kartik, the moon became lightless, in risible andla ficry ( 1 y tuins ) and the shy Lecame lutus libe in colour. Many valliant hings and princes of great bravery and of a nus lile clubs, will lic dux n slain on the carth. Night after night I have Leen noticing in the air the cries of fighting loars ard cats. The images of gods and goddesses have ſeen suen laughing, trembling, vomitting blood from their mouths, sweating or falling down from their pedistals. Diums give sound without Leating and tire great charints [ 1244 ) Mahabharat (४२३४) २८ ॥ गृहीत शस्त्रा कोशलि चर्मिणो वाजिपृष्टगा । अरुणोदये अदृश्यन्ते বন शलभप्रजा ॥२२॥ उभ सन्ध्ये प्रकाश ते दिशो दाहसमन्वित । पर्जन्य. पांस्वी च मासवांचभारत ॥ ३० ॥ या चैपा विशुता राजस्रलोक्ये साधुस म्मता । अरन्धती तयांप्यप वसिष्ठ पृष्ठत इत ॥ ३१ ॥ रोहिणी पीडयोप स्थितोराजन् शनैश्वर । व्यावृत्त लक्ष्म सोमस्य भविष्यति महद्भयम् ॥ ३२ ॥ अनभ्रे च महाघोर स्तनित भयते स्वन वाहनानाच रुपतां निपतनत्यशुचिन्दव ॥३३॥ इति श्री महाभारते भीगाणि जम्बूखण्डविनिर्वाणपर्वाण श्रीवेदव्यासदर्शने द्वितीयोऽध्याय ॥२॥ | और घोड़ोंकी पीठ पर बैठे हुये बाज अपनाजहा रूपी शस्त्रों से शब्द रूपी आघातों को करतेहैं और सूर्य के उदय होने पर टीड़ियों के हजारों समूह- दृष्ट पडते हे भरतवंशी दिग्दाह युक्त दोनों स-या प्रकाशमान होती हैं और बादलों से मांस और धूलि की वर्षा होती है । ३० । और यह गा साधुओं की मानी हुई अरुन्ध. ती तीनों लोकों में प्रसिद्ध है उसने भी वसिष्ठनी की ओर पीठगी है और यह शनिश्चर रोहिणी नक्षत्रका पीड़ित करना हुभा वर्तमान हे चन्द्रमामा रूप ढक गया इन सर उत्पानोंस महाभप उत्पन्न हागा और पिना वादलोंके आकाश में वी भारी भयानक गर्जना सुनी जाती है और रोती हुई सवारियों के अशुगातों की दृष्टि पृथी पर होती है ३३ ।। of*) shiatryas move without being diann by bersts Cuckoos, wood peckers, jays cocls, parrots and peacochs cry iu shull t nes Horsc men bcaring arins and rmour cry out of a sudden Hundreds of insects are seen in swarnis flying in the morning and evening the four quarters are seen ablaze and the clouds pour showers of dust and flesh Aiundhati celeliated throughout the three regions and pr used of the nightenus hteps her back tmoed on Vashishth Shani the planet is seen harass ng Rohını The sign of the deer in the mo n has changed its prupei place All this denotes giert evil The cloudless sly sends forth pends of thundei, uud tears falls dowh from the eyes of beasis Both morning . -- (४२५५) 7575 Buisgya PARY [ 4245] ध्यास उवाच ॥ खा गोधु प्रजायन्ते रमन्ते मातृभिः कृता । भगात पुषफ लं पर्शयन्तिवन हमा ॥ १ ॥ गर्मिण्योजातपुत्राश्च जगपन्ति चिभीपणान् । मन्यादाः पक्षि भिश्चापि सहानन्ति गरारम् ।। २॥ निविषाणातुनेंना पञ्चपादा द्विमहना । द्विशीर्षाश्च द्विपुच्छाश्च दोष्टण पशवोऽशियाः ॥ ३॥ ज वन्ते विवृनायाश्च प्यार न्तोऽशिवा गिर । विपदा शिपिनस्ताक्ष्याश्चतुर्दष्या विधाणिनः ॥ ४ ॥ तथैवान्याश्च | दृश्यन्ते स्त्रियोथै ब्रह्मयादिनाम् । वैनतेयान् मयांश्च जगन्ति पुरे तय ॥ ५ ॥ गोवास यडया सूरो या शृगाल महीपते । कुनकुरान् फरमाश्चय शुकाशशुभवादिनः ॥ ६॥ खिय. काधित्मजायन्ते चतसः पञ्च कन्यकाः । जातमानाश्च नृत्यन्ति गायन्तिच अध्याय ॥ १ ॥ नामजी बोछे कि हे गा गधे गौओं के साथ विगग करते हैं और पुत्र माताओं के साथ रमण करते हैं और बनके अनेक वृक्ष विना ऋतु के फल फूलोंको दिखलाते हैं गर्भवती पुत्र उत्पन्न करने वाली त्रिशंगमारी चालकों को उत्पन्न करती हैं गयेआदि पशु कच्चे मांस खाने माले पक्षियों के साग मिलकर परस्सा भोजन करते हैं। तीन सींग चार नेत्र पांच पैर दोनिगेन्द्री दो शिर दो पूंछ गले असभ्य अधुध रूपमाहारी निर्माताहारी पशु उत्पन्न होने हैं और तीन पंजे चोटी चार डाढ़ सींग धारण किये गरुट नाम पक्षी अशुभ और भगानक पदों को चोलो हुपे उत्पन्न होने हैं। ४ । इसी प्रकार ब्रह्मवादियों की स्त्रियां भी विप- रीत दृष्ट आतीहैं तेरे पुगों गरुद पक्षी गोगे को उत्पन्न करते है राजा घाडी गौ के बछड़े को और गियां शृगाल को और ताने अशुभ बोलने वाल कुट और करभोंको उत्पन्न करते हैं काई २ स्त्रियां चार २ पांच २ कन्याओं को एक समय में डत्या करती है आश्नय यह कि मह कन्या पैदा हानेही नाची गानी और CHAPTER II ' Asses," continued Vyas, "are born from kine; sons hare sexual pleasure with mothers, forest trees bear fruits and flowers out of season, pregnant and impregnant women give buth to monsters; Juids and beasts of prey feed together; all omened bcasts having three horns, four eyes, five legs tro sexual organs, Hiro heads or tno tals, are born with fierce teeth, and with gaping mouths utter fo-tlı Garuds are Lorn with three legs, with crests, with four teeth or nith horos. Brahman women in the city hare leen found giving buth to garuds and peacuch. Nares give birth to calves, bitches give buth to jackals and cocks, and antelopes and parrots utter ominous cries Some women gave birth to fuur of fire daughters who, as soon as they were Lorn, set about dancing, singing Ominous cries.

[42161 Mahablarat (४२४६) इसन्तिच पृथकजनस्य सर्वस्थ क्षुद्रकाः प्रहसन्तिच । नृत्यन्ति परिगापान्त चेदयन्तो महद्भयम् ॥ ८ ॥ प्रतिमाश्चालिखन्त्येताः सशस्त्राः काल चोदिताः । अन्यायमाभधावन्ति शिशवो दण्डपाणयः ॥ ९॥ अन्योन्यमभिमृदन- न्तिनगराणि युयुत्सवः ।. पद्मोत्पलाान दृक्षघुजायन्ते कुमुदानिच ॥ १० ॥ विश्व ग्याताश्च वा-युग्राः रजो नाप्युपशाम्यति । अभीक्षणं कम्पते भामर रारुपात ११ ॥ श्येतो प्रहस्तथा चित्रां समतिक्रम्य तिष्ठति । अभावह विशेपेण कुरूणां तत्र पश्यति ॥ १२ ॥ धूमकेतुर्महाघोरः प्रपञ्च रम्य तिष्ठति । सेनयो रशिंग घारं कारयान मह ग्रहः ॥ १३ ॥ मधास्वगारको पक' श्रवणे च वृहस्पातः। भगं नक्षत्रमाकाय सूर्यपुत्रेण पीज्यते ॥ १५ ॥ शुक्रः प्रोष्ठपदे पूर्व समारुह्य हसती है और साप नांच मनुष्यों के नातेदार भाई बन्धु पाने कुबई आदि भी हाकर हास्प करते भयको दिखलात हुये नाचते और गान हैं यह शस्त्रभारी मूर्ति. या काल के विपरीत होने से गिरती हैं और बालक लोग हाथों में दण्ड लिगहुए परस्पर में एक दूसरे के सन्मुख दौडत हैं और युदाभिलाषी होकर अपने बनाये हुपे नगरों को परस्पर विध्वंस करते और स्थानों को ढाते हैं. पन, उत्पल कुमुद और सूर्य के उदय में खिळने वाळे कमल वृक्षों पर पैदा होते हैं । १० । और संसार में चलने वाले वायु भयानक चलते हैं और धूलोका उड़ना शा-त नहीं होता है, पृथ्वी अत्यन्त प्रकाशित होती है और राहु सूर्य स मिलता है । ११ । इसी प्रकार केतु भी चित्रा नक्षत्र को घेरे हुये नियत है यह अधिकतर कौरवों के नाश को देखता है और बड़ा घोर धूम्रकेतु पुष्य नक्षत्र को दबाये हुए उपस्थित है यह पहाउस ग्रह दोनों सेनाओं के घार अंकल्याण को करेगा । १३ । गंगन रिछा होकर मघानक्षत्र में और वृहस्पति श्रवण नक्षत्र में है, और सूर्य के पुत्रशनैश्चर से पूर्वाफाल्गुनी वा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र देवकर पीड़ित and laughiug Ilie members of the lowest 0.des laughi, dance and Sulg and thus indicate wie consequences. Infants as if actuated by death, diaw armed images, lun against one another armed with clubs and disnous of battle break down the toans ( crected in sport ). Lotuses and files of soits blow on trecs, strong winds blow and bring' dust continuously. Larthquakes are frequent and Rahu is coming touards the sun. JI. hetu has stopped its course after passing thra This in prrticular foretells the destruction of the Kauravas. A fierce comet has arisen to aftlict l'usya. It will cause great desti uctiou to both the armies. Mars inclines towards Jagha and jupiter towards Sruvan. Snan the offspring of the sun afflicts Phalguni by its approach 11. Shukrn shines on Purza-bhadrapadd and conjointly with Purigh, casts its influence on Ullara bhadrapad. planct Clutia - (४२५७) भोगापर्य BISHI PHY [12113 चिरोचते । उत्तांत परिक्रम्य सहितः समुदीक्ष्यो ॥ १५ ॥ श्वेतो ग्रह प्रवासतः सधूम इव पाचकः । पेन्द्र तेजस्वनक्षत्र ज्येष्ठामाप्राम्य तिष्ठति ॥ १६ ॥ प्रय प्रज्वलितो घोरमपदव्य प्रवर्तते । गहिणी पीढयत्येव मुभाचशशिभास्करी। चिना स्वात्यन्तरे चव चिष्ठितः परुपनः ॥ १७ ॥ बकानुव त्याच श्रवणं पायकप्रभः। ब्रहाराशिं समावृत्य लो हतांगो व्यवस्थितः ॥ १८ ॥ सर्वसध्यपरिच्छन्ना पृथिवी सस्यमालनी । पञ्चशीर्षा यवाश्चापि शतशांश्च शारायः ॥ १९ ॥ प्रधान लोकस्य पास्वायत्तमिद जगत् । ता गाव: प्रस्तुता वत्सै शहाणत प्रक्षात्यत ॥२०॥ नियमविपश्चाप न् प्रदगाश्च ज्यांलता भृशम् । व्यक्तं पश्यात शस्त्राणि संग्राम किये जाते हैं और शुक्र पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र, चढ़कर उतको दबाये हुये प्रकाश करता है और परिघ नाम उपग्रह के संग होकर उत्तराभाद्रपद नक्षत्री और देखता है । १५ । और कत्ग्रह सधूग अग्नि के सपान जल रहा है और महामञ्चीलत भयकारी राहुइन्द्रसे संबंधरखनवाल तंजस्वी ज्येष्ठा नक्षत्र को पात कर के वर्तमान है । १६ । और अपमन्य होकर वर्तमान है वह पटिन ग्रह नित्रा और स्वानी के गध्या वर्तमान सोहणी नक्षत्र और दोनों मूर्ग और चन्द्रपा को पीडा देता है और अग्नि के सपन प्रकाशवान मंगन बारम्बार तिरछा होकर हस्तानी स दवाये हुये श्रवण नक्षत्र को पूर्ण दृष्टी से वेधे हुगे वर्तमान है, । १८ । खनी से प्रशंसा पानवाली पृथ्वी सरकार के खेतोंसे आच्छादित होकर पांचशिर वाल जौ और गौ शिरवालधानों को सान्न करती है, संसार, पूज्य और निनों यह सब जगत् वर्दमान है एसी गौएं अपने बछड़ों के समीप हाकर रुषिको छोड़ता है ।२०। इस का यहफल है कि धनुषों से अग्नि निकले और खड्ग अत्यन्त अग्नि रूपहों और शव व्यक्त होकर संग्राम moon. 15. Ketu burns lite smoky fire, menecing Jyeshtha the bright constellation sacred to Indra. 16. Dhrura, blazing fiercely turns towards the right and afflicts Rohini as nell as the sun and the Fierce Rahu is staying betiscen Chilia and Sicari. Mars of fare-lobe glory in its oblique course casts a full gaze on Shravan which is already under the influence of Vrahaspati. The earth which used to produce particular crops at fired times is covered with the crops of every season-barley and rice at the same time! Cows the best of creatures upon thom all the world depends give out blood when the calves have suched them 20. Rays of light come out of bors and swords blaze forth brilliantly. This shows that the Teapons themselves are alive to the approach of the great battle which is [4248] Malalharat (४२४८) समुपस्थितम् ॥ ॥ भाग्गयां यथा भास शस्त्रागामुदकस्यच । कवचानां ध्वजान च भावणात महाक्षय ॥ २२ ॥ पृथवी शोणितावर्ग ध्वजोडुपसमा. कुला । फुरुगां वैशसे गजन् पाण्डवै सह भारत ॥ २३ ॥ दिक्षु प्रजालिता स्थाच व्याहरान्त मृगाद्वमा । अत्याहित दर्शयन्ता चेदयन्तो महद्भयम् ॥ २४ ॥ एकपक्षाक्षिचरण. शकानः पचरानिाश । रौद्रं वदति संरब्धः शोणित छदंपनिय २५ ॥ शस्त्राणि चैव राजेन्द्र प्रज्वलन्तीय सप्रति । सप्तसामुदारा सम इच्छाधते प्रमा २६ ॥ सम्बासरस्थापिनो च ग्रहौ प्रज्वलितावुभा । वि. शासापा. समीपस्यो वृहस्पतिशधये ॥ २७ ॥ चंद्रदत्यायुभी प्रस्तावेकाना हित्रयोदशों । अपग ग्रहयाती प्रजासंक्षयमिच्छतः ॥ २८ ॥ अशोभितादिशः 11 युद्धको मकट देखें और शोंकी चमक का रंग आग्न के समान है कवच और वनाओंका बडा नाश होगा, हे भरतवंशी रागा धृगगष्ट पांडवोंक साथ फारचाकी शत्रुता होनेपर पृथ्वीपर रुधिर की नदियां बहेगी और ध्वजारा नौकाओं से माहोकर वाफूल होगी और अत्यन्त क्रोध रूप मुख मे पशुपक्षी घड़भगको मूचित करते आए अशुभता फाश करने हुए दिशाभों में पालत है । २.४ । रानि के समय एक पक्ष एकत्र और एकही चरणका रखने वाला अत्यन्त नापी आकाशवारी पसी खीरका उगिलना हुआसा भाकारी शब्दों को करता हेरान-द्र शनभग्नि के समान वगान जिनसे महातेजस्वी सप्तमणिगों के प्रकाश मंदहोकर ढकेहुएगे यिदिा होते है । २६ । और अत्यन्रा तेजस्वी दृहस्पति और नैश्चर दानोंगर वार्षिक गति में नियत होकर विशाखा के सन्मुख नियत दरिखते है एकही दिन नरस निरिको दागो मूर्य और चन्द्रगा ग्रंसगये और घिना पर्वकेराहु ग्रह से मिले हुगे मगाने गाएको चाहते है, चारों ओर धूजिकी वर्षा से संब,दिशा unminent. The colour of weaping, water, armour and standards is lilo that of fire. Ilus oliu ss that a great plsughter is at land. A mai of blox all run out of the bulles of the Kauravas in the Pandavas with the banners for 's inters. Animals and birds on all sides, withi their mouths blaziny lile fire and suith fierco cuies, are displaying cvil omens and terrible curls quentes A bud watli one sing, one cyo an one leg, horcrmy over the sky the miglit, mahes a fiightful mo.se and vomits bloud 25. The neapons pre blazing like fire and the glory of the cinstellation know as the seven rishisis dimel. Tho Inight planets. l'rahanpan and Shani, haying approached Tisha Wha, hnve stopped their annual cousc. Thic moull and the sun linio undergarte an eclipe within thirteen days in thic sanc fortnight. Sueli a strange cincidence of two celies forcixxles a great slaughter.

(४२४९) भीष्मपर्व BNISHA PATH [4249] सर्वा पंगुवर्षे समन्ततः । उत्पातमेघा रोमाश्च रानी पन्ति शोणितम् २९ ॥ कृत्तिकां पीडयस्तीक्ष्णैननन पृधिचीपते । अभीक्ष्णयाता पायान्ते घूमकेतुमवस्थिताः ॥ ३० ॥ विषमं जनयन्त्येते भानन्दजनगमहत् । निषु सर्वेषु नक्षत्र नक्षनेषु विशा. पते । गृध्रः सम्पतते शीर्ष जनयन् भयामुत्तमम् ॥ २१ ॥ चतुर्दशी पञ्चदशी भूतपूर्वाश्च पोडशीम् । इमातुनााभजानेहममावस्यांत्रयोदशी । चंद्रसूर्याभौग्रस्तावेक- मासी त्रयोदशों ॥ ३२ ॥ अपर्वणिग्राहगेती प्रजा, सक्षयायष्यत. 1 मांस वर्ष एनस्तीवासीकृष्णचतुर्दशी । शोणितर्वसम्पूर्णा अतृप्तास्तत्र राक्षसा ॥३३ ।। मातनोतो महागथ. सरितः शोणितोदका. 1 फेनायमाना. कपाल पूर्दन्तिवृषभा ॥ पनन्त्युका सनिघांता शक्राश नसमप्रमा. । अद्य चैव निशा अशोभितहोगई और गति के समय घड भयानक उत्पान और रुधिर को पेय सात है, और ई गजन राकतिका को पीडा देता हुआ अपगे फटिनकों से गरा हुआ देखागया है, धृतोतु नाग उत्पात में निफ्त होकर वायु चढते हैं । ३० । यह वा महा पुद्धकारी नुना को उत्तराम करते हैं, और हे राना सा नक्षत्रों के पा रक्षा न करने वाला पापग्रह बड़े भय पैदा करता हुआ तीनों छत्रों में सबके शिरों के छत्रों कलशी पर गृद्ध पक्षी होकर गिरता है, एक गासकी तेरस तिगिको विना पर्व के चन्द्रमा और सूर्य दोनों राहु ग्रहसे ग्रसेगपे हैं । ३.२ । यह दोनों प्रनाका नाश करेंग इस लिगे में चौदशपूर्णमासी और व्यतीत प्रतिपदा को गानता परन्तु अगावास्या और तेरस के याग का नहीं जानताहू वहां रुधिर से भरे हुए मुग्नवाले राक्षम लोगों की तृष्णा आयिक शोणित पानेकी होगी और नदियों में बड़ी नदियां गारुद्ध प्रवाह युक्त होई और छोटी नदियां रुधिर समान जलको वहने लगी कुएं फेनोंमे भरेहुए बैलों के समान क्रीड़ा करते हैं The land being overv helmed in J dnections by storms of dust, looks desolate l'ience and ominous clouds nightly pour forth showers of bloc d. Fierce kalu is also attictiny Ksila Ruugh sinds portend ill nre constantly blowing All these portend a dreadful One planet on vther las slied its evil influence on every onc of A lunar for Imght usually conss sts of fourteen, fiftecn.or sixteen days, but novel of thirteen days, yet in ulic course of the aninu in nth there have leen luna and cola cclipses within thitien diys of cach other A gicat laughter of the autures of the earth Rakshases duuhung Woul by mouthfuls will not yet be satisfied Give Inc5 alt lluning in opp site duections, their waters base comic blooly and the wells luiming up are bellowing like bulls 30 ing nar. . tic threesorts of constellations 32 This will The clu4 [4250] Mahabharat (४२५०) वयुष्टामनय समवाप्स्यथ ॥ ३५ ॥ चिनि सृत्य महोल्कामिस्तिमिर सर्वतो विशम् । अन्यान्यमुपतिष्ठद्भिस्तत्र चोक्त महर्षिभि ॥ ३६ ॥ भूमिपालसहस्राणा भूमिपाल सहस्राणा भूमि पास्यति शोणितम् । कैलासमन्दाराभ्यान्तु तथा हिमवताविभो ॥३७॥ सहसूशोमहाशब्द. शिखराणिच पतन्तिच । महाभूता भूमिकम्मे चत्वार सागरा पृषक् । वेलामुद्वर्तयन्तीच क्षोभयन्तो वसुन्धराम् ॥ ३८ ॥ वृक्षानुन्मथ्यवान्त्युमा याता शर्करकर्षिण । मभग्ना. सुमहायातरशनीम समाहता ॥ ३९ ॥ वृक्षा | पतन्ति चैत्याश्च प्रामेषु नगरपुच । नीललोहितपतिश्च भवत्यग्नि तोद्विजै ॥४.। घामाञ्चि१एगन्धश्च मुञ्चन्वै दारुणस्वनम् । स्पर्शा गन्धा रसाश्चैव विपरीता महीपत ॥ ४१ ॥ धूमध्यजा प्रमुञ्चन्ति कम्पमाना सहर्मनु । मुञ्चन्त्यकारवर्पश्च और इन्द्र के वज्र के समान प्रकाशमान महाशब्दापमान उल्कापात होते. अव तुम प्रातकाल अन्याय के फल को पाओगे । ३५ । और महर्षियों ने भी सब दिशाओं में अंधेरा देख मसालें ब ल घरसे बाहर निकलकर परस्पर में एकत्र होकर कहा है कि पृथ्नी हजारों गनाओं क साधा का पविगी और है समर्थ इसी प्रकार फैलास मन्दराचल और हिमाचल पर्वतों से हजारों बड़े घोर शब्द शिखरों पर गिरतेहैं, और पृथ्वीके कम्प से चारों समुद्र पृथक् २ अपनी २ पर्या- दाओं को उल्लंघन और सब संसारको व्याचल करत हुए बडी वृदियुक्त हुए हैं और कंकडों से भराहुआ भयानक चायु ऐसा चलता है कि जिसके वगसे चिजली से समापे हुए अनेक वृक्ष टूट २ कर गांगी सीमाओं और नगरों क भीतर जाकर गिरते हैं और ब्राह्मणों से होगीहुई अनि नील रक्त और पातरं की हाती है नह दुष्टगंश नापार्ची भयानक शब्दको करती विदित होती है ह रागा स्पर्श गध और रससवावपरीत हैं, चारंबार कापमान हाकर वनागे धूपका छोड़ती हैं Meteors effulgent like Indra's thunder bolt fall with loud hisscs Livil consequences will Ofertal e you when this might pisses a way Gient rislas uith lighted brinds cenu olt of thui huusis and met together in the thich zloum of the night. After ob erving these signs they sny tlınt tlie caitli sill drink tlie bloud of thousinds of hings. Trom thie mo intanis of k ulas Vlandai and Huwat tlous.inds of pyplan sio is ur lic rd and thousands of summits ac tumbling down. In consequena of tho cuch's tiembling the four occans nie much swollen and no it dy to tuness their bounds and to afilct the earth Fierce win.ls charged with slip pebbles are blowing crushung inights trees Odnry and sacred tio s in villages and towns are uprouted by fierez sinds and lightning Wien Bralımans pour donn libutions on fire, it burns with blue, red or yellow flames Lending (४२५१ भीष्मपर्व BAISINA PARY [4251] मेयश्च पदहास्तथा ॥ ४२ ॥ शिसपणां समृद्धानामुपरिष्टात् समन्ततः । वायसाश्च रुवन्युनं वाम मण्डलमाश्रिता ॥ ४३ ॥ पक्यापस्येति सुभृश चावाश्यन्तेच्या सि च । निलीयन्त जानेषु क्षयाय पृथिवी क्षिताम् ॥ ४४ ॥ ध्यायन्त माकर. न्तम व्याला वेपथुसगुता । दानानुरङ्गमाः सचे वारणा सलिलाश्रया ॥ ४५ ॥ पतच्छत्वा भवानत्र प्राप्तकाल व्यवस्यताम् । यथा लोक समुच्छेद नाय गच्छेत भारत ॥ ४६ ॥ वैशम्पायन उवाच । पितुर्वचो निशम्यतत् धृतराष्ट्रोप्रवादिदम् । दिएमतत् पुरामन्ये भावयति न रक्षय ४७ ॥ गजान क्षनधर्मेण यदिवध्य न्तिसंयगे । वीरलोक :समासाद्य पुरा प्रापयन्ति केवलम् ॥ ४८ । इह कीति परे लोके दीर्धकाल महत् सुसम् । प्राप्स्यन्ति पुरयव्याघ्रा प्राणांस्त्यक्त्वा महा और चागेदिशाओं में अच्छे फूलै फले वृक्षों के ऊपर अग्नि मंडल में बैठेहुए काफ भयकारी सदन करते हैं और पक्षी पका २ अर्थात् नाश होने वालोंका परस्पर पद है ऐसे अत्यन्त शब्द करते हैं और गजाओं के नाश सूचन करने को ध्वजाओं की" नाकों में छिपनान हे दुष्ट हायी ध्यान करते हुए मूत्र विष्ठाको करत कंपायमान हैं और गरीबहाथी और घोड़े पसीनों में चूरहै अब तुम यहां यह बातें सुनकर समय के अनुसार निश्चय करो जिस्से कि हे भरतवंशी यह संसार नाश न होने । ४६ । वैशपायन बोले कि पिताक इन वचनों को सुनकर धृतराष्ट्र यह बोला कि हे पिता व्यासजी में इसको सीपही होनहार मानलाई और मनुप्पों का नाश होगा, जो राजा लाग क्षत्रीधर्मसे युदमें मरेंगे वह सव वारों क लाकों को पाकर मोक्षरूप सुख को पावेंग, इ पुरुषोत्ता भारी युद्ध में towards the left, yielding stench and accompanied by loud report. Touch smell and taste base lost their powers. The standards tremble ad gure out smoke drus upd si mluls gute qut showers of coal dust and from the tops of the trees all round, crows whecling in circles from the left are uttering fierce cries of pakka, pakka and perching upon the tops of the standards for the destrucfoon of bings Vicollis elephants, trembling all over, are running hither and thither giving out urine and excreta 45 The horses are melancholy and the elephants are resorting to the water Having heard all this do what is needful so that the world may not be depopulated, 0 hing Vaishampaan continued that on hearing these words of his father, Dhritrashtra said, "I thunk all this hay been ordaiced of old A great slaughter of humın beings will tale placc. }f the kings die, domg the duties of kshatry as, they will obtain bliss in the regions of tlie heroes. These lions among men, .

[4252] Mahabharat (४२५२) हवे ॥ ४९ ॥ वैशम्पायन उवाच । एवं मुनिस्तयेत्युक्त्या कवीन्द्रो राजसत्तम । धृतराष्ट्रेण पुत्रेण ध्यानमन्वगमत् परम् ॥ ५० ॥ स मुहर्त तथा ध्यात्वा पुनरेवा ब्रवीद्वच । असशयं पार्थिवेन्द्र कालः संक्षयते जगत् ॥ ५१ ॥ सृजते च पुनः लॊकान् नेह घिद्यति शाश्वतम् । ज्ञातीनांव कुरूणाच सम्बन्धिसदान्तथा ॥५२॥ धर्य देशय पन्थानं समों ह्यास चारणे । शुदं जातिवध प्राहुर्मा कुरुप्चममा प्रियम् ॥ ५३ ॥ कालोयं पुत्ररूपण तच जातो विशाम्पते । न वध पूज्यने दें हितं नैव कधञ्चन ॥ ५४ ॥ हन्यात् स एन यो हग्यात् कुलधर्म स्विकांतनुम् । काले नोत्पथगन्तासि शस्ये सति रापदि ॥ ५५ । कुलस्यास्य विनाशाय तथैव च महीक्षिताम् । अनर्थो राज्यरूपेण तव जातो विशाम्पते ॥ ५६ ॥ लुप्त प्राणोंको त्यागकर यहां तो कीर्ति और परलोक में बहुत काळ तक महा सुखको पायेंगे । ४९ । वैशंपायन वाल कि हे राजेन्द्र जनमेजय वह करीन्द्र पारादेव अनि ऐयाही है यह कहकर अपने पुत्र धृतराष्ट्र के साथ चिन्ता ग्रसित हुगे और एक शुहूर्त पर्यन्त ध्यानावस्थिर होकर यह वचन बोले कि हे रामा निस्म देह काल जगत् को नाश करना और फिर उत्पन्न पी करत है या किसीका सदैवता नहीं गात है, तुप जानवाले, कोरय, गानेदार और मित्रों के धर्यरूप गागों को उपदेश करो और तुम्ही उनके राकनेमी समर्थ हो ज्ञातिवालों का गाना नीवकर्म कहाजाताहै इस से इसमेरी अप्रियपातको सनकर हेरामन यह काल तेरेवेटेदुर्योधन के रूपसे प्रकट हुआहै, गारने वाले को वेदगे अच्छानहीं कहते है और किसीदशा में भी वह मियकारी नहीं है ।५४ जो को मारता है वह धर्म उसी को मारनाहै कुलका धर्म अपना देह है, समर्थ होनेपर इसकुल और इसी प्रकार अन्य राजाओं फे नाव के लिये काल से मेरित होकर तू आपचिकाल के समान कुर्माण में चलता dying in the great bittle will gun time in this world and happiness Varsh impiyan wit nuld tlint on hearing the froids of D}ırıtraslıtd, Vj da the primer ut purts, concentrated his mind in supreme yoga and hunc coenplatul to a shot time, he again sud, "No dubt, it 15 Sime tais d scroys the world and cicates it again Notlinis unipo tu luule It is your duty to preach | righteousness to the K 1111119, kunsmin and friends as you like the power to icstrain them The slaugh, I of himnun 18 sinful and you should not do what I donot li.c Death is lorn in the shape of Dunyolhan thy hun Tlic de stic! not much in the Vedas and is not benefiirl to any country 5! llen lo distroys Dham is ilustroyrd hul by it, to, the Dhuin of uni's on n famly is one's loly. Being manthaity, thuu ant urdly Time to deate from in the next 49.

(४२५३) भीष्मपर्व BAISIHA PART [4253] धर्मा परेणास धर्म दर्शग दै सुतान् । फिले राज्येन दुर्घ पेन प्राप्तलिफिल्यि पम् ॥ ५० ॥ यशो धमत्र कीर्तिश्च पालयन् स्वर्गमाप्स्यसि । लभन्तां पाण्डया रार शमं गच्छन्तु कौरवा ॥ एनं अति विप्रेन्द्र धृतराष्ट्रो- म्बिकास्तः । आक्षिप्य धास्यं वाक्यतो वापचयात्रवीत् पुन ॥ ५९ ॥ धृतराष्ट्र उवाच यथा भवान् वेत्तित्ववेत्ता भावामादत में थायों । स्वार्थ हि समद्यात तात लोको माचापि लोकात्मक मय घिद्धि ॥६० ॥ प्रमादये त्वा मतुलप्रभा व नो गतिर्दर्श पिताचधीरः । न चापिते मशगा महर्षे नचाधर्म कर्तु महाहि म मति ॥२॥ त्यहि धर्मप्रवृत्तिश्च यशः कीर्तिश्च भाती । करूणां पांडवा नाच मान्यश्चापि पितामह. ।। ६२ ॥ व्यास उवाच ॥ वैचिनार्य नृपते यत्ते मनास ॥ . है, हे राजा तेरा अनर्थ राजरूप से उत्पन्न हुआ? तू अत्यन्त अर्ज है अपने पुत्रोंको धर्षा उपदेशकर, है दुर्ष तुमको राज्य से क्या लाभ है जिसके लिये नेपापको विसाया है अपन यश और का पालन कर जिसस कि तू स्वर्ग को पावेगा पाण्डयों को राज्य दो और कौरवों का जागी दो। ५८ । यह पिताके चचन मुगकर अम्बिका पुत्र वचन का जाननवाला नराष्ट्र पिताके इनशिक्षा रूपी वचनों को तिरस्कार करके फिर यहचन बोला कि नेहा आपमानने हे पाही गंभी जाननाहू और मुझको अपना और दूम। जीवन का नाय ठीक २ विदिन है हे तात यह लोक अपने प्रयोगन में बड़े २ गोहीको पाता है आप मुझकोभी लोफरूपही जानो। ६०) हे पहा नभाव वाले में आपको मसन करता हूं आप पंडित होकर हगारी गति और उपदेश के करनेवालहा परन्तु हे महर्षी वह पुत्रोरे स्वाधीन नहीं है और युद्ध हो अर्ग करने का नहीं चाहताह आप भरत वंशियोंफे यश और कार्तिक कारण रूपही और शेरव पांडव दानों के पिता- the path of right in order to cause the destruction of the family as well as of other kings Ihy eud genius clings to thee in the shape of thy hingdom Thou art very unjust as thou dost rot prevent thy sons from doing wrong ll hat is the 0-e of thy being a bing, when for the sake of thy kingdom thou art immerging thyself in sin ? Preserve thy fame and virtue so that thou mayst attem keaven Gire hingdom to the Panduas and peace to the Kauravas" 58 Haung lcud the words of his father, Dhritrashtra the pic son of Ambica, disregarding the sislom of Vyas, sard m reply, “I now as much as you do about the life and d ath, but man, in that regards hus interests, is unable to use hv undgment and I am not an ercept on to this rule GO I entreat you, learned and great min, to teach me by cons are leyond my control It is never my intention to lead a [ 42541 Mahabharat (४२५४) वर्तते । मभिधत् यथा काम छेत्तास्मि तव सशयम् ॥ ६३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच ॥ यानि लिंगान सग्रामे भवन्ति विजयिष्यताम् । तानि सर्वाणि भगव-छ्रोतु मिच्छामि तत्वत. ॥ ६४ ॥ व्यास उवाच ॥ प्रसन्नभा. पावक ऊर्वरस्मि प्रदाक्षणा वत्त शिखो बिधूम। पुण्या गन्धाश्चातीना प्रभात जयस्यैतद्भाविनो रुपमाहुः ॥ ६५ ॥ गम्भार घोपाश्च महास्वाश्च शखामृदङ्गाश्च नदन्ति यत्र । विशुद्धाविमस्त पन. शशीच जयस्यैतद्भावनो रूपमाहु ॥६६। इटा वाच प्रसूता वायस नां समस्थिता नाच गमिष्यताच । ये पृष्ठतस्ते त्वरयन्ति र जन् येवाग्रतस्ते प्रति पेषयन्ति । ६७॥ कल्याण याच शकुना गजहसा शुका फ्रौञ्चा. शतपत्राश्च यत्र । प्रदक्षिणाथैव भवन्ति सखेय ध्रव जयस्तत्र यदान्त विप्रा ॥ ६८ ॥ अलङ्क रै. फय, केतुभिश्चमुख गह भी, । ६२ । व्यासजी दोले हे गमा धनराष्ट्र जो तेरेगन में वर्तमान है उस को तू इच्छा पूर्वक कह में मेरेसब सन्दह दूरव रूगा धृतराष्ट्र ने कहा कि युद के बीच विजयपान बालोंक जा चिहन होते हे उनसयको हे भगवन में आपस मूल समेत सुना चाहनाहू,। ६४ । व्यापजी वोल कि स्वच्छ अने प्रकाशमान उंची ज्वालायुक्त प्रदक्षिणावर्ति निधूमहा और जिसमें आहुनियोंवी पवित्र मुगध उठतीहाय सा विजगहान वाल पुरुषका शुभलक्षण है, आर जहां शंखमृदगोंकी वही गम्भीर ध्वनिता और बड़े शब्द वजने हों और सूर्य चन्द्रमा यी स्वच्छ किरणें पड़नाहों उसका विषयहानका लक्षण जाना ।६६ चलनेहुय वा जाना चाहते काकोंक बोल हुगे वित्तराचक एमे वचन विदिनहों जाकि पीठकी ओरसे तेरी गात्राको जल्दी करते हैं और आगे से तुझको निषध करते हैं, जिस स्थानपर युद्धभूपि में गहम | तोते क्रौंच और शतपत्र नामपक्षी शुभचबन वालते हुए ६८ दक्षिणभारको हॉप " " " life of sın You are the cause of fame and greatness to the descendants of Bharat as well as the grandfather of both the Kauravas and the l'andavas 62 Open thy mind freely to me and I shall remi ve all thy doubts" sud Vyas. Tell me, Bhagwan, in detail, what occurs to those who are victorious 64 " It is a sign of victory," replied Vyas, “ that Agni, when libations are poured over it, burns with a bright flame inclining towards the right without smole, and gives out a sweet odour The conchshells and cymlals are sonorogs and the sun and the inoon shed.clear light to the victorious. Crows, flying o about to rise on their wings, give out agreeable sounds Those behind urge you to go on, while those that are before Leep you back from doing so Where s sans, parrots, crines and wood pechers, utter delightful nntes to the right of the battle field, the Brahmans predirt victory to that side. 68 The Kshatryas whose | (४२५५) 1776 Buisosla Pare [4255 प्रणादै पिताहयाताम् । प्राजिमनी दुप्रतीक्षाया येपाञ्चम्स्ते विजयन्ति शत्रून् ॥ ६९ ॥ हा याचस्तथा सत्वं यांधानां यत्र मारत न म्लायान्त नजायेय ते तरन्ति रणोदाघम् ॥ ७० ॥ इष्टा पाच प्रयिष्य दक्षिणा. प्रविविक्षतः। पश्चात् सन्धारयन्त्यर्थमग्रे च प्रांतधिकाः ॥ ७१ ॥ शब्दरूपरसस्पर्श गन्धाश्चाविकतामाः । पदा हर्षश्च योधानां जयतामिह लक्षणम् ॥ ७२ ॥ अनुगा चायनो यान्ति तथा भ्राणि पयासच । अनुप्लवान्त मेघाव तयपेन्द्रघनपिच ॥ ७३ ॥ एनानि जयमानानां. लक्षणानि विशाम्पत । भवन्ति विपरीताान मर्पूणां जनाधिपः ॥ ७४ ॥ अल्पापां या महत्यां पा सेनायामिति निश्चयः । वर्षा योधगणस्यैको जयलक्षणमच्यत ॥ ७५ ॥ उस स्थानपर विजयकाहोना ब्राह्मण वर्णन करते हैं जिनक्षत्रियोंकी सना अलंकारदि और कवच ध्वजा वा घोडों के हौंसने के मुखदायी शब्दों से गोभायमान कस देखने के योग्यहो वह क्षत्री आश्य शत्रुओं को रिजय करते हैं, हे भग्नवंशी जहां शूरवीरों के वचन प्रसन्नमा से भरे हुए पराक्रम में तुलंहगे होते हैं और जिनकी माला कुँभनाती नहीं है वह पुरुषरणरूपी समुद्रको तरजाते हैं । ७० । शत्रुकी सेना में प्रवेश करके देखने की इच्छाकरने वाले योद्धाओं के पसन्न मन सावधानी से संयुक्त हों उनके वचन विजय का धारण करते हैं और जो सम्मुख निषेध करनेवाल है वहभी मृत्युसे विदित करने वाल है, रूप, रस, शब्द, गन्ध स्पर्श यह शुभ और रूपान्तर दशास रहित हो अर्थात् अपने मुख्य रूपों ही नियतों और योद्धाओं में सदैव प्रसन्नताहोय यह भी विजय पानेवालों के नत्तमाचहन हैं। अनुकूलवायुहों इसीमकार वादळ वा पक्षागी हों अथवा बादल पाछ चलते हैं। और इन्द्रधनुपभी इसीपकार हो, हे राजा पह सब विनयीलागोंक लक्षण हैं और यही सब लक्षण गरने वालोंके लिपे विपरीन हाते हैं थोड़ी वा बहुत सेना में योद्धा armies are embellished with armours, banners and the cheerful neighing of horses, are strong enough to conquer their enemis. Thuse warriors who speak cheerfully with one another, who are full of' prowess and whose garlands donot fade, are able to cross the ocean of war.-10. Those who, having entered in the thick of the battle, utier cheerful shouts, who warn their enemies of the approach of death and to whom the objects of senses appoar just is they are, can vin victory. 72. The winds, the clouds and the birds as well as the rain-bos appearing after the clouds are faşvurable to the victorious; the same phenomena occurring unfavourably are a sign of destruction. Whether the army be great or small, the cheerful.

[ 1250 Arthabharat (४२५६) एको दीणों दारयात सेनां सुमहतीमपि । तां दीमनुदीर्यन्ते योधाः शूरतरा अपि ॥ ७६ ॥ दुर्निपत्र्तवा तदा चैव प्रभमा महतो चमूः । अपामिव महावेगा स्वस्ता मृदगणाइव ॥ ७७ ॥ नैव शस्या समाधातु सतपाते महाचम् । दीर्णा मित्येव दीर्यन्ते सुारद्वांसोपि भारत ॥७८ ।। भीतान् भमांथ सम्प्रेप भयं भूयोभि वर्द्धते । प्रभग्ना सहसा राजन् ।दशो विद्यते चम् ॥ ७९ ॥ नैव स्थापयितुंशस्या गरैरपि महाचमूः । साकृत्य महती सेनां चतुरगामहोपति. उपायपूर्व मेधाधीयते. तसततोत्थिन ॥ ८० ॥ उपाशवमयं श्रेष्ठमा हुर्भेदन मध्यमम् । जघन्य एप विजयो यो युद्धेन विशाम्पत् ॥ ८१ ॥ महान् दोषः सन्निपातस्तस्याद्यः क्षय उच्यते । लोगों की केवल एक प्रसन्नताही विजयकी देनेवाली है । ७५ । एकभी मागाहुआ योदा बहुन पडी सेना को भी भागो हुईसी कर देता है उस भागे हुएके पीछ बड़े शुरवीर योद्धाभी गागजाते है भागो हुई सेना वर्ग कठिनता से फिर लौट सक्ती है जैसे कि गलों के बड़े बेग और डाये मृगों के समूह कठिनतास नही लौटसक्ते इसी प्रकार भागीहुई सगा कोभी जाना, हे भरराशी बड़ी सेना को सम्मुख निपत करना अप्तम्भव है क्योंकि भागे हुओं में बड़े बुद्धिमान् भी भाग जाते है, भयभीत और अलग २ होजाने वाले शूरवीरों को देखकर और भी भग बढ़जाता है हे गना असन्त गाफुल सेना अात् चारों आरों को भागती है ऐसी वड़ी सेना शूचीगें से भी नियत करनी कठिन है राजा अपनी चतुरंगिणी सेना को अच्छे प्रकार से ध्यान करके युद्ध करे । ८० । युक्तियों से अर्थात् शत्रु के | चाहन से ना कुछ धन देन से नो विजय होती है वह उत्तम विनग कही जाती है और शत्रु के मनुष्यों क मध्य विशेषता डलवाने से जो विषय होती है वह मध्य विजय कहानी है और जो विगा युद्ध के द्वारा होती है उसको निकृष्ट ness of the warriors is the give of victory 75. The flight of eren one soldier cao 'ue ramma "ris fto the wht'u ariy, foi u'nun onu soitti -tuins lack the bravest of the army find it difficult to stand their ground, and when once an al my is lvuted, it cannot be checked like the flow of waters or a head of pinic-strichen der 77. A large army, when once fallen into diso der, is incapable of being rallied, for even the most-shaltul in battle run away afteż the flying. The terror multiplies on seeing biase min turn back and the whole army is then dispersed in all directions presing out of control should therefore heep a careful watch on his army of four kinds of forces 80' The best hind of victory is that which is achieved by negotiations, the middliny one is that which is brought about by A ling (४२५७ भीमपर्व BaIS A MA PARY [4257] परस्पान्नाः संहटा व्यवधूताः सुनिश्चिताः ॥ ८२ ॥ अपि पञ्चाशतं ना मृदनन्ति महती चमूम् । अपिवा पञ्च पट्सप्त विनयन्त्यनिवर्तिनः ॥ ८३ ॥ न चैनतेयोग. रुडः प्रशंसति महाजनम् । दृष्टचा सुपर्णोऽपचिति महत्या अपि भारत ॥ ८४ ॥ न बाहुक्येन सेनाया जया भवति नित्यशः । अध्रुवो हि जयो नाम देवश्चापरायणम् । जयवन्तो हि संग्रामे कृतकृत्या भवन्ति हि ॥ ८५॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मरणि जम्वृखण्डविनिर्वाणपणि निगिनारूपाने हतीयोऽध्यायः ॥ ३॥ विनय जानो कोकि युद्ध में य: २ दोष होते हैं उसका प्रथम फळ तो नाश है । ८२ । परस्पर में ज्ञाता प्रसन्न चित्त स्त्री आदि में मोह से रहित दृढ़ निश्चम रखने वाले पचास शूग्वीर पुरुष भी बड़ी भारी सेना को विध्वं- स करते हैं अर्थात् एक लड़ने हैं कि सबको मार कर विजय पाते हैं और मुख न फेरने वाले पांच छः दा सात शुरवीरभी पूरी विनय को करते हैं, हे भरतवंशी उत्तम पक्षधारी विनता के पुत्र गरु जी बड़ी सेना से भी हानिको देखर बड़े भारी समूह को अच्छा नहीं कहते हैं सेनाकी आधिक्यतासे बहुधा नित्य विजय नहीं होती है निश्चयकरके विजय नाशवान है इस में पारव्यमी मुख्य है क्योंके मारब्ध वाळेही पुरुष युद्ध में विजय प्राप्त करके अपने अभीष्टको सिद्ध करते हैं। ८५ । causing disunion among the enemies and that nhich is gained by bloodshed is the worst For war has many defects of which the foremost is destruction. 82 Even fifty warriors, hnowing one another, cheerful and free from wordly cares, when firmly resolved, can cause the destruction of a large aimy. Even five, six or seven warriors may gain complete victory. Iinata's son Garud of beautiful plumage has no desire for an army even when he is surrounded by great numbers It is not always the great numbers that give victory. Victory is uncertain Fate has much to do in that matter, for it is, the fortunate who gain victory in battles and aocomplish their desires. 85.

[4258] Mahabharat (४२५८) वैशम्पायन उवाच । एवमत्स्या यो व्यासो धृतगाय धीमते । धृतराष्ट्रो पितच्छुन्या ध्यानमेवान्यपद्यत ॥ १॥ समुहर्त्तमिव ध्यात्या चिनि.श्यस्य मुर्ग। समय संशितात्मानमपृच्छद भरतर्षभ ॥ २ ॥ सजयेमे महीपालाः शूरा युद्धाभि नन्दिनः । अन्योन्यमभिनिनन्वि शरुचावचैरिह ॥ ३ ॥ पार्थिवाः पृथिवीहेतो. समाभत्यय जीवितम् । तथा शाम्यति नितातो दयन्ति यमक्षयम् ॥४॥भौम मैश्वर्यमिच्छन्तो न मृप्यन्ते परस्परम् । मन्ये वह गुणा भूमिस्तन्ममाचक्ष्वसञ्जय ॥५॥ पहनिच सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानिच । कोटयन लोकवीराणां समेताः कुरुजाङ्गले ॥ ६ ॥ देशानांच परीमाणं नगराणांच सञ्जय । श्रोतुमिच्छामि तत्वेन पत एत अध्याय ॥४॥ वैशम्पायन वोने कि हे राजा जनमेजय गासनी इस प्रकार की अनेक पाने बुद्धिमान् धृतराष्ट्र से कहकर चलगये और उनकी बातों का ध्यानकरके धृतराष्ट्रभी चिन्ता युक्त हुभा और हे भरतर्षभ उहा एक मुहूर्व पात ध्याना बस्थिनहो बारम्बार श्वासलेकर उस बुद्धिमान संजपसे पूछा कि हे संजए इस स्थानपर यह युद्ध में प्रशंसनीय शूरवीर राना लोग छ ट पड़े लों के द्वारा परस्पर में मारते हैं, यह सब जीवनकी आशाको त्याग हुये बुद्धिमान राजा लोग पृथ्वी के कारण मारते हुये शान्ती को नहीं पाने है और यमलोक को बढ़ाते हैं पृथ्वी सबंधी ऐश्वयोंको चाहत हुये परस्परमें क्षमा संतोष इत्यादि नहीं करत हैं मैं जान- ता.और मानता कि पृथ्वी बहुन गुण धारण करने पार्टी ई हे संजय इसको मुझसे पहो । ५ । सुरु और जांगल देशमें संसार के कासवधि क्षत्री इट हुये सो हेसंग मैं उनके देश नगर ग्राही संख्यामूळ समेत सुगना चाहताहू जहां जहां रो पह आगे हैं, तुग उगाहोगस्वी ब्रह्मयापे पासणी के प्रभावसे दिव्य CHAPTER IV Va slampayan continued. Bng pen, as menti ned above, to King Dhritylitia, 'yas Wuutaway and the loz mei jellected on at in silence During his meditat.un he lived deep sulis and asked of .se Sanjaya, “The se lase hings of ditterent countries who a. so is to join the lattle, have issembled here to die for the sile of 12t'u al wall the one and her with different so: ts of capo's They will not be satsad till they have filled the region of Yam, and ani de stitute of wercy and peace of mind after worldly gains. Muci.inks the Earth must passess many attributes Tell me, ianya, all alontit. , Jillions of Kshatigas hare assembled at. Kui ujangle to die, I wish to know in detail the number of their countries, cities and villages from which they hare comc. By the समागता (४२५९, भीष्मपर्च BHUSHMA PARY [42591 दिन्यबुद्धिप्रदीपेन युक्तस्त्व जामचनुपा । प्रभावात्तस्य पप लिस्यामितीजम ॥ ८ ॥ सजय उवाच ॥ यात्रा महाप्रत भीमान् पक्ष्यामित गणान् । शालचक्षरवेक्षम्य नमसभरतपम ॥ ९ ॥ द्विविधानीह भूतानि चमणि स्थ बगाण च । प्रसानां निविधा योनिरस्वेदजरा जाः ॥ १० ॥ अमागास सर्वेषां श्रेष्ठा राजन् जायुजा । जगयुजानां प्रा मानवा. परापश्चये ॥ ११ ॥ नानारूपधा गर्जस्लेपा भेदाश्चनईश । यदोक्ता पृथियौपालयेषुयना प्रतिष्ठिता ॥१२॥ ग्राम्याणांपुरुषाठा सिंहाचारण्यवासिनां। संपामेवभूतानामन्योन्यनोपजीबन १३ रागना. धाराः प्रोक्तान्तपा पंचवजातय । वृक्षगलगलगायल्यर वपसाराम्तृपसातय ॥ १४ ॥ तंपाविशतिरेकोनामहास्तेपुपंचसु । चतुर्विशानिरहिष्णा गायनीलाकममता ॥ यएतां वेरगापन पुण्यांसर्य गुगान्यतां । तत्वेगभरतश्रेष्ठ सलोकनप . युद्धिरूप दीपक और ज्ञानरूप नेत्रों से संयुक्त हो, संगय बोले कि भरतर्षभ महाज्ञानी धृतराष्ट में अपनी बुद्धि के अनुसार पृथ्वी के गुणोंका वर्णन कल्गा तुमभी शाखली नेत्रों का धारण किये किनार रुग में आपको नमस्कार करताई यहां दो प्रकारके जीवधारी है एकस्थागर दुगरे जंगा अर्थात् नहीं चलने वाल और चलने वाले और सब जीरगानका उत्पत्ति स्थान सीन मकारसे है अर्थाद अंडज संदा जरायुगस है । १० । और गंगा जी में जरायुग उचगई और नरायुजों में मनुष्य का पशु हैं पर दोनों अत्यन्त उत्तम वही अनेक प्रकार के रूप धारण करना है उनके मकार ना पद में कहेगये हैं यह संख्या में चौदह हैं उन्हीं में यज्ञादि धर्ष निगत ई और ग्राम पा नगर के वासियों में मनुष्य श्रेष्ठ हैं और वनवामिणों में सिंह उत्तम है सब जीवों का जीवन निर्वाह I bow to you boon of the great 1 shi Vyas, you are endered with the light of wisdom and the eyes of hnowledge " Best of Bharats" rephed Sanjaya " I shall tell you the merits of the earth to the extent of my hnowledge. Hear and compreit sih your hnon Jedge of books The centuues of the carth are of tsro Linds, morcabila and immoveable They are again divided into three corts according to their system of birth-Oriporous, Vi sporous and thr so lornly effect of lieat and clamp 10 Oi moveable leings thoe who are born alıve are the best and of the latter the foremost are liuman beings and animals These app-ar in various forms which according to the Vedas are fourtecn in numler and on which cacrifices reste Of those who live in villages nd cities, humin, Leins are the lest, Thile lions are the foremost of those living in frots. They all lice uith the help of one another 16. These which come out of groupil, [4260] Mahabharat (४२६०) श्यति ॥ १६ ॥ अरण्यवासिनः सप्तसप्तपांग्रामवासिन । सिंहाव्याघ्रावराहाश्चम हिपाचारणास्तथा ॥ १७ ॥ ऋक्षाश्चयानराश्चैव सप्तारण्या स्मृतानृप । गौरजापि मनुष्याश्चअश्याश्वतरगर्दभाः ॥ १८ ॥ एतेनाम्या समाख्याता पशव सप्तसाधुभि । पसेपशवोराजन् ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश ॥ १९ ॥ भूमौच जायतेसर्व भूमौसर्वविनश्यति । भूमि प्रतिष्ठाभूताना भूमिरेवसनातन ॥ २०॥ यस्यभूमिस्तस्यसर्वजगस्थावरजगमम् । तत्रातिगृद्धाराजानोचिनिप्रतीतरेतरम् ॥ २१ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि जम्बूखण्ड विनिर्माणपर्वणि भौगगुणकथन चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥ परस्पर में है। १६ । पृथ्वी को फोड़कर उत्पन्न होनेराले वृक्षादिक स्थानर को जाते हैं उनके पान भेदहै वृक्ष, गुल्ग,लता, बल्ली, त्वचामार और तृणजाति, पंच महा भूनों में उनके उन्नीस प्रकार हैं अर्थात् स्थावर जीव ५ और जंगम १४ और लोक में गायत्री भी चौबीस अक्षरों को उपदश की जानी है सो हे राजा जो जीवधारियों में से उस सर्वगुणसम्पन्न गायत्री को मूल समेत जानता है वह संसार में नाय नहीं होता है, सब पृथ्वी मेंही उत्पन्न होते हैं और पृथ्वीपर ही नाश होजाते हैं पृथी सव जीवों का निवास स्थान होकर बढ़त प्राचीन है इननीयों में सात ग्रामवाप्ती वा सान नगर निवासी हैं सिंह, व्याध, बगह, भैंसा हाथी, रीछ, वानर यह सात वनवासी कहे जाते हैं गौ वी भेद मनुष्ण घाडा खिचरगधा इन सातोंको साधूलाग ग्रामवासी कहते हैं और यही ग्रामवासी और वनवासी चौदह पशु है इन्हीं चौदह पशुओ में मनुष्य भी गिनानाता है जिसकी पृथ्वी है उसीका यह सव स्थावर जगा जगत् है उसमें लाभी राजा लाग परस्पर में पारते है ॥ २१ ॥ such as trees, etc, are immoveable They are five in number, 222, trces, shrubs, ai cepers vallis ( creeping on ground ) and gi isses Thus of moveables and immoveables there are nineteen Their constituents are five which with the above make up twentyfour, the same as the letters of gayatı He who knows this gayatri possessed of every virtue, is free from destructi n All who are born on earth die on it The errth being the refuge of all creatures, is (f very old. standing of the animals seven live in forests eix, li ns, ligers, boais, buffaloes, elephants, bears and monkeys, and seven, 212, cows, goats sherp, men horses mules and asses live in lrabitations Of these, He who possesses the errth, is the lord of all its move ablts and inimnvenbles and it is for the sale of the earth that ayarı. cious hings slay onc another man is one " 21 (४२६१) भीष्मपर्छ BAISIHA PALY [4261] धृतराष्ट्र उवाच ।। नदीनां पर्वतानांच नामधेयानि सब्जय । तथा जनपानांच ये चान्ये भूमि माश्रिताः ॥ १ ॥ प्रमाणञ्च प्रमाण पृथिव्यामम सर्वतः । निखिलेनसमा चक्ष्य काननानिच सय ॥ २॥ साय उवाच ॥ पश्चमानि महाराज महाभूतानि संप्र- हात् । जगतीस्थानि सर्याणि समान्याहुर्मनीषिणः ॥ ३॥ भूमिरापस्तथा घायु रग्निरा काश मेवच । गुणोचराणि सर्वाणि तेषां भूमिः प्रधानतः ॥ ४॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपंच रसो गन्ध पंचमः । भूमेोते गुणाः प्रोक्ता ऋषि भिस्तत्व वेदिभिः ।।५॥ चत्वारोऽप्स गुणा राजन् गन्धस्तत्र न विद्यते । शब्दः स्पर्शच रूपंच तेजसोय गुणास्त्रयः । शब्दः स्पर्शच वायोस्तु माकाशे शब्द एयतु ॥ ६ ॥ पते पंच गुणा राजन् महाभूतेषु पंचस । वर्तन्ते सर्व लोकेषु येषु भूताः प्रतिष्ठिताः ॥ ७ ॥ अन्योन्यं नाभिवर्तन्त साम्यं भवति अध्याय ॥ ५॥ धृतराष्ट्र घोले कि हे संजय नदी पर्वत देश और अन्ग अन्य जो पृथ्वी पर नियत है उन सबके नामाको वर्णन करो, हे प्रमाण के भी ज्ञाता संजय पृथ्वीका प्रमाण जैसा कि सब ओरसे है उस सबको मूल समेत हम से वर्णन करो, संजय बोले कि हे महाराज पंडित लोगों में इन सब पञ्च महाभूतों को एकत्र कोजाने से ब्रह्माण्डरूप और ब्रह्मरूप वर्णन किया है पृथ्वी जल, वायु, अग्नि, आकाश यह पाँची कपसे एक से दूमरा एक एक गुण अधिक रखनेवाले हैं, मूल जाननेवाले ऋपियों ने पृथ्वी के शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध यह पांच गुण कहे जळमें चार गुण हैं एक गन्ध गुण नहीं है अग्नि के तीन गुण शब्द स्पर्श और रूप घायु में शद वा स्पर्श है आकाश में केवल एक शब्दही गुण है, है राजा पञ्च महाभूत रूप सब लोकोंमें यही पांच गुण वर्तमान है, उन्हीं में जीव- घारी नियत हैं, निश्चय करके जब मलप मुपुति, समाधि, गोक्ष इन चारोंमें ब्रह्म- CHAPTER V. Dhritrashtra desired of Sanjaya to name the rivers, mruntains, countries and other things of the earth as well as its dimensions " The learned, O king," replied Saujaya, regard all things of the universe to be of same form on acc,unt of the presence of the five great ciements in them. Space, fire, air, water and earth are the elements of which each succeeding one possesses the quality of the former ones in addition to its own. Their attributes are sound, touch, vision, taste and scent respectively. The whole world is made up of these five elements or attributes. All the living beings are made up of these. The eater and that which is to be eaten donot e ime face to face with each other as long as they are united with Brahm in the four states, riz, Pralaya, sushupli, samadii and " Mahabharat [ 1262 ] (४२६२) धै यदा ।। ८ ॥ यदातु विपीभाव माविशति परस्पाम् । रादाद हेहवन्तो व्यतिरोईति नान्यणा ॥९॥ भानु पूविनश्यति जायते चानु पूशिः । सोण्यपी मेयागि तदे. यांका मैश्वरम् ॥ १०॥ तर तन हि श्यन्ते धातय पांच भौतिका । रोपांमनुष्यास्त कण प्रमाणानि प्रचक्षते ॥ ११ । अचिंत्याह पल ये भावा न तास्तण साधयेत् । प्रह तिभ्य परं यत्तु तदचित्यम्य लक्षणम् ॥ १२॥ सुदर्शन प्रपश्यामि द्वीपंतु मनंदन । परिमण्डला महागज द्वीप सौ चक्रसस्थितः ॥ १३ ॥ नदी जल प्रतिच्छन्न पश्चाभ्र सनि । पुरैश्चविविधामारे रम्यैर्जगपद तथा ॥ १४ ॥ वृक्ष पुष्पफलो गते सम्पनधन धान्यवान् । लत्रणेन समुद्रेण समन्तात् परिवारित ॥ १५ ॥ ययादि पुरप पश्ये दार्श भान होता है तब वह भक्ष्य पक्षक परस्पर में मम्मख नहीं होते और जब वह नामावसे गिरकर पररपर भिन्न २ रूपों में प्रवेश करते है शब निषा करके जीन जीनों पर गिरन काही उत्तम हो। है और क्रप का सही नाश होगाते हैं और वह सब अमरूप हैं इस कारण इन सबका व्रहारूा है । १० । फि" काय के पीछ पानभून शम्बन्धी भूगोल आदि धातु जहां नहां दृष्टिगोचर होते है उनके प्रमाणो का मनुष्य बुद्धिकी तण ओं स कहने हैं निश्चय करके जो ध्यान से भी बाहर हैं उनको राणाओं से कैरो सिद्ध करसक्तं हैं, जो तीनों गुण और पञ्चभूतादि से पृथक है घर ध्यान भी अगम्ग बम का लक्षण है, है कोरपनादन अब मैं सुदर्शन नाग जम्बूद्वीप का वर्णन करता हूँ कि यह परिमण्डल नाप द्वीप बागें ओर से देशरूप अश्या चकक सपान निया है, नादिगों के जल से और बादलो क रूप पर्वतो ये अथवा नानापकार के रूपवाले पुर ना देशों रे। ढकाहुआ है और फूल फळे वृक्ष धन धान्य आदि रा सयुक्तबगारी साद से घिगहुआ है । १५ । जैसे कि मनुष्य दर्पण में अपने मुख का देखता moksh But when, disunited fiom Biahm, they appear on the earth in diftuent fi ruis, onc living being falls upon another The living beings are born one by one and meet their death in the same order 1. They are nmuime table and like Brahm in form 10 Aftei Pialaya, things made of the five clements are seen here and there People try to ascertain then dimensions by the exercise of their reasoning powers But those matters hich are inconceivable should never be sought to be tried by reason That wluch is beyond nature is an indication of the inconcuivable 1 shall now describe to you the island of Sudarshan, Joy of the Kauravas ! This island is circular like It is covered with rivers, mountains looking like clouds, cities and provinces It is covered with trecs bearing fruits and floncis and with cops of various kinds and other wealth - a wheel It is ४२६३) भीष्मपर्व BENI PARY [4:263} मुसमात्मनः । एवं सुदर्शनद्वीप दृश्यते चन्द्र मण्डले ॥ १६ । द्विरंश पिप्पलानन द्वि- शे च शशो महान् । सयौंगधि समाचायः सर्वतः परिवारितः ॥ १७॥ सागस्ततान्या चिनेयाः शेषः संक्षेप उध्यते । तान्य उच्यते चाय मेनं सक्षेपत्त' गृणु ॥ १८ ॥ इति श्रीमहाभारते भीमपर्वणि जम्यूखण्ड विनिर्माणपर्वणि सुदर्शनद्वीपवर्णने पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ है उसी प्रकार सुदशन द्वीप ब्रह्माण्ड स्वरूप चन्दूमण्डल रूपी पन में दिखाई देना है, उस चंद्र मंडल के एकभाग में दोरूपधारी पीपलका वृक्ष है और दोभाग एक बड़े खर के कीनाई देखाई देते है वह सुदर्शन द्वीप सब औपयों का रखन वाला सर और से समुद्र और अन्य देशों से घिरा है इमक आतरिक्त और जो कुछ है उसको साप से मुनी । १८ । . sur ounded by the sall waters of the occan The island is seen in the lunar disc just as we see our faces in a muior. Two of i's parts are seen lile a prpal tree, while the other two look like a large haie. It is overgrown by medicinal herbs and is surrounded by seas and countries. I shall, in short descrile to you what remains besides this." 18. .. FRIBN [ 4264 ] Mahabharat (४२६४) धृतराष्ट्र उवाच । उक्तोद्वीपस्य सक्षेपो विधिवबुद्धिमंस्त्वया। तत्वज्ञश्वासि सर्वस्य वितररयू है सजय ॥ १ ॥ यावान् भूम्यवकाशीय दृश्यते शशलक्षणे । तस्य प्रमाण प्रचूहि ततो वक्ष्यसि पिप्पलम् ॥ २ ॥ वैशम्पायन उवाच । एवंराज्ञासपृ एस्तु सजयो वाक्यमब्रवीत् । सजय उवाच । प्रागायतामहाराज पडेतेवपपर्वता. अवगाढााभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ ॥ ३ ॥ हिमवान् हेमफूटश्च निपश्चनगोत्तम । नालय वैदूर्यमय. श्वेतश्च शशिसन्निभ ॥ ४ ॥ सर्वधातुावचित्रश्च श्रृङ्गानामपर्वत । पतेच पर्वता राजन् सिद्धचारणसविता. ॥ ५ ॥ तेषामन्तरविष्कम्भो योजनान सहस्रश. । तर पुण्या जनपदास्तान वर्षाणि भारत ॥ ६॥ सन्ति नेपु सत्त्वानि अध्याय ६॥ धृतराष्ट्र बोले कि हे बुद्धिमान संजय तुमने अपनी बुद्धि के अनुसार जंवूद्वीप का आशय वर्णन किया और तुम मुख्यताके भी जानन वालही इससे इसको मूलसमेत गोरेवार वर्णनकरो पहले उस भागका वर्णन करो जा खरहे की नाई दिखाई दता है और फिर उसका वर्णन करना जो पीपल की सदृश दिखाई पडता है सजय बोल हेराजा अब जाप का सपूर्ण गोरेवार वृत्तान्त सुनो छः खडों के पर्वत दोनों ओरको पूर्व और पश्चिम समुद्रसे पिलेहु ये हैं, हिमवान, हेगकूट, निफ्ष, वैडूपनील, शशिमभश्वेत, सर्वधातुमय शगवान पर्चत इनछःओं पर्वतों पर सिद्ध चारण लोग निवास करते हैं, हे भरतवंशी इनपर्वतों के मध्य स्थलका विस्तार हजारों योजन है और इन में अनेक पवित्र ५ देशहैं उन्हींका खण्डनाम है । ५। उनखडों में नानामकारक जातिवाले लोग निवास करत है यहभारतवर्ष इस से दूसरा हेमवत नापखण्ड है, और हेमकूट पर्वत से परे हरिवर्षनाग खण्ड है, 4 CHAPTER VI " Wise Sanjaya," sard Dhritrashtra, You have given a good account of lumbaduzu Tell me all ah utite i detal Gwe we w account of the dimensions of that portion which looks like a hare and then of that portion which resembles a pipal tree " Hear a full account of Jambudweep," replied Sanjaya, " Touching the eastern and western sens are sax ranges of mountains, viz, Himuan, Hemcoot, Nishadh, Vaiduryanıl, Shashaprabh shuet and Shringuan which is full of all sorts of metals These six mountains are inhabited by Sidhas and charans The space between them extends for thou. sands of miles and several holy cities are situated over those areas. They are known as varshas 5 People of different tribes live in them and the whole lind is known as Bharat-varsh The next portion is (४२६५) Fiche Beisaus Pars [4265] नानाजातीनि मशः । इदन्तु भारत वर्ष ततो हमवत परम् ॥ ७ ॥ हेमक्टात् परञ्चैव हरिव प्रचक्षते । दक्षिणेनतु नलिस्य निषधस्योत्तरणतु ॥ ८॥ प्रागायतो महाभाग मत्यवानाम पर्वत । तत पर माल्यवत पर्वतो गन्धमादन ॥ ९ ॥ परिमण्डलस्तयोर्मधे मेरु काम्पत । धादित्यतरणाभासा विधूमधायक ॥ १० ॥ योजनाना सहस्राणि चतुरशीतिरहित । सघस्ताचतुरशीतियोजना नांमहीपते ॥ ११ ॥ ऊर्धमघर तिर्यक च लोकानावृत्य तिष्टात । तस्य पाये चमी दीताश्चत्वार सस्थिता विभो ॥ १२ ॥ भद्राश्च फेतुमालश्च जम्बूद्वीपश्च भात । उत्तपश्चैव पुरस्कृतपुण्यप्रतिश्रया ॥ १३ ॥ विहग मुसोयस्तु उपर्ण स्थात्मज. जल । स वैयचिन्तयामाम सौवर्णान् वीक्ष्य चायगान् ॥ १४ ॥ मेरुर चममध्यानामधमानाच पक्षिणाम् । आयशेपारो यस्मात्तस्मादेन त्यजाम्यहम् १५ नील फर्मत के दक्षिण और निराध के उत्तर और से पूर्व और पश्निा समुद्र का पर कानवाला माल्यवान् पर्वत है उस पाल्ययानमे आगे गन्धमादन पर्या है और उनदोनो क म पो सुनहरी और चारों ओर से मण्डलवर्षी मेरु पनि है, वहतमण मूर्य के समान प्रकाशमान और निधूम अग्नि के समाग ।१०। और चौरासी हजार योजन ऊना है और नीचे की ओरभीउतनाही है वह ऊचानीचा विरछा लोकों को व्याप्त करके वर्तमान है, ई समर्थ भरतपशी धृतराष्ट्र उप मे क अन्तर्गत यह चारद्वीप नियत हैं एकरूप जंबूद्वीप और तीनउपद्वीप भद्र श्व, केतुपाल, कौरव नाप से पुष्पवान पुरुषों के रचे हुपे आश्रम है ।१निश्चग करके जो सुमख नाप गरुडपक्षी है उसने सुनहरी कौरवोंको देख का विचार कियाई जोकि मेरुपनन उत्तम और विस्तृत वा छोटे २ पक्षियों की भी मुरूपताको नहीं करनेगलाई इमकारणसे में इसको त्याग करताहू, प्रकाशीका Knorrn as Hemi rat and I trioarsh lies beyond Herkut To the south of Nil and north of 3 rahadh, touching the eastern and western seas, is the range known as J[alyavan and beyond it les Gandhmadan Betseen thee t o lies the golden Yeu which is round 10 share; shining like the morning san or smolkeless fire. 10 It is eightyfour thousand yojans high and is as much below as abore It supports the carth on all sides Besides Jero there are four islands, the chief of which is Jambn and the minor ones are Bhidrashwa, Ketumal and Kaurav, inhabited by virtuous men. 13 Ihe bird Sumulb, son of Supirn, beholding that all the birds on Micru were of golden plumage, thought it better to leave that mountain beciuse there was no difference there of good, mrddling or bad. 15 The sun always [4266] Mahabharat (४२६६) तमादित्योनुपति सततं ज्योतिषाम्बर, । चन्द्रमाश्च साक्षत्रो वायुबैधप्रदक्षिणः ॥ १६ ॥ सपर्यतो महाराज दिव्यापफ जन्धितः । भवनैराहत साम्बूनदप रिते. ॥ १७॥ ता देवगणाराजन् गन्धर्वा सुरराक्षसाः। अप्सरोगण संयुक्ता शैले कीडन्ति सर्वदा ॥ १८ ॥ तन ब्रह्मा च रुद्रश्च शाश्चापि सुरश्वरः । समेत्य विविधै चर्य जन्तेऽनेकदक्षिणैः ॥ १९ ॥ तुम्बुमारदश्चैव विश्वाय हहाहुहू । अभिगम्यामर' श्रेष्ठांस्तुष्टवुर्विविधैः स्तवै ॥ २० ॥ सप्तर्षयो महात्मान कश्यपश्च प्रजापतिः । तत्रगच्छ न्ति गदंते सदा पक्षण पर्वणि ॥ २१ ॥ तस्येय मुर्धन्युशनाः काव्यो दैत्यैमहीपते । इमानि तस्य रतानि तस्पे मे रखपर्वताः ॥ २२ ॥ तस्मात् कुबेरो भगवांश्चतुर्थ भाग मश्नुते । तत कलांशं वितस्य मनुष्येभ्यः प्रयच्छति ॥ २३ ॥ पार्य तस्योत्तरे दिव्यं ससाणी सूर्प सदैव उसको परिका करता है और नक्षयों समेत चन्द्रमा और वायुभी उसकी परिक्रमा करते है, और यह दिव्यफल फलफूलमूलों से संयुक्त है और सब स्वर्णमय स्थानों से व्याप्त है जिसपर देवताओंक समूह गर्व असर राक्षस अप्सराओं के समूओं सगेत कीड़ा करत हैं, और उसपर ब्रह्मा रुद्र और देवेन्द्र आदि देवता मिलकर बड़े २ यज्ञादिक कान हैं और तुम्बुरुनाग विश्वावसु हाहाहूहू नाग गन्धर्व उन देवताओं के सम्मुख जाके उनको अनेक स्तोत्रादिकों से प्रसंन करते हैं । २० । आपका कल्याणहो उस पर्वतार महात्मा सप्तऋगि काश्यप गजापति सदैव पर्व पर्व में जाते हैं, और उसी पास क मस्तक पर शुक्र जीमी राक्षों समेत विहार करते है उन शुक्रनी के यह हेमरत्न है उनी रत्नों के पहाड भी अनेक हैं और कुबेर जी उग के चौथेभ ग को गांगते हैं उस धन के सोलहरें भागको मनुष्यों के निमित्त देन हैं, उप मरुके उपरभाग में कर्णिकार रामवृक्षों का मन है जो कि दिगरूप सब ओरसे पल्लर गनाहर goes sound Merut the best of lum naries, and the moon with her attend in co stellations and the god of wand follows the wake of the sun Tint mountun bring forth celestial fruits and flowers and is dotted all over with houses ide of gold There the gods, the Gandharavas, the usuras and thr rakshases join in sport sath apsaras 18. llere Bilime', Rudia and Shuhra the prince of gods pei foi med many sicuifices with large donations Tauvu u, Narad, Vich wavaszi Hulin and Huhu go there to adore the king of gods with various hymns 20. The high model seven rishis and Kashyap the progenitor of all beings go there on every parva day. On the brow of the sime m rintam Shuhra rorms along with the rakshases To him belong all the jewels and gold as well as the mountains abounding in sucli commodities Kuvei enjoys a fourth part of those valuables (१०६७) मीमा BHISHRA PARY [ 4267] सर्व पुसमैक्षितम् । पर्णिकार व रम्य शिलाजाल समुद्गतम् ॥ २४ ॥ तन साक्षात पशुप दिध्यन समात । उगासहायो भगवान रमते भूतभावगः ॥ १५ ॥ पनि कारमयीं मालां वित्रत्पादावलम्विनीम् । विभिनेत्र रस्ता द्योतनिभि नर्थ जादिरी ॥ २६ ॥ ताम तपस. सिद्धा मुव्रता सत्यवादिनः । पश्यन्ति नहि दुर्वृत्त, शस्पोरष्ट महेश्वर. ॥ २७ ॥ तत्व शंलाय शिवरात् क्षीरधारा नरेश्वर । विश्वरूपापारामता भम निर्यात नि स्थना ॥ २८ ॥ पुग्पायुज्यतमा गगा भागीरधी गुमा । प्लवंतीवन बेगेन हूर चन्द्रमस शुभ ॥ २९ । तया शुपादित पुण्य समूद सागरोपम । ता धारयामास तदा दुर्घरा पनैिरागे ॥ ३० ॥ शत वर्ष महनाणा शिरसय पिनाकल । मेरोस्तु पश्चिमे पाय केतुमाली महीपते ॥ ३१ ॥ जम्युम्नण्डेनु तर महाजनपदोनृप । शिला जालों से अन्यन्त ऊंचा है उसके ऊपा जीवों के नत्पन्न कर्ता कणिकार फूलोंकी चरण पर्या पानाका पहने हुगे सूर्यके समान प्रकाशित तानमनधारी | साक्षात् शिपनी गहाराग अपनी उमादी समेत दिव्य जीम रियों से व्यास रहते हैं । २६ । उनपी गुन्दरबी सत्यरक्ता शुद्धलोग उगमा दर्शन करसक्त है यह गहेश्वरनी कुचाली पुरुषों मे देसमेके योग्य नहीं ह । २७ । हे रागा उसी पहात के शिखरसे दूध के समान धारा रखने वाठी विष्णुला भयानक गम्भीर शब्दाली वायुगे टका खाती हुई श्रीगगाजी पाट हुई, यह परिन पोर पावस गनुष्यों स सेरित शुभ भागीरथी गंगा पडी शीवा और तीयतासमता च-पाके शुभ हृदयमें विलास करतीदुई मरदहुई है उसीन यह समद्रोपर परिवहदय जानी तीनधारा उत्पन्न विपा जो पहाड़ों से भी धारण नहीं कीजाती थी ऐसी गंगा को शिमगीने एक 'लाग्य दर्प पर्यन्त अपने शिर में धारण किया और मेरुके पश्चिमी कोण अंटी के गप केतुमा नाप खण्डही उसमें बड़ादेश है । ११ । and gives a sixteen h part of it to men Tl.e no thern part of Meru is covered with the forest of Karnılar trees which icar flowers throughout the year It is very lugli with its netvorh of ste nc There resides the creator of all Le ngs, Shir the thrce-eyed, wearing a garland of Karnıl ar flo scra extending to his feet, glonons like this sun, accompinied by hus goddess Oma and surrounded lyg da 26. Great ascetics, observers of vows, the truthful and the pure only can See Him, the great Lord ernnot be perceived by tle riched. 27 From the summit of the same Meru flors the Ganges with her milly current ex'ending far and wide and raising 7 tremendous uproir when her waters come in contact with the wind. Blingnathi tlie lholy Ganges app-urs with a tremendous relocl y, forming an Ocean like lahe The Ganges shom even the mountains cannot ler, winkept dy Shus on his head for a hundred thousand years. In the trester?

[4268 ] Whabharat { ४२६८) आयुर्दशसहस्राणि वीणा तन भारत ॥ ३२ ॥ सुवर्ण वर्णाश्चनरा स्त्रियवाप्सरसोपमा अनामया पीतशोका नित्य मुदितमानसा ॥ ३३ ॥ ज यन्ते मानवाम्तन निएतकनक प्रभा । गधमादन शृगेषु कुबेर सह राक्षसै ॥ ३४ ॥ सवृतोऽसरसा सधैर्मोदते गुह्यकाधिप । गन्धमादन पार्थेतु परे त्वपरगण्डिका ॥ ३५ ॥ एकादशसहस्राणि वर्षागापरमायुप । तत्र हष्टा नरा राजस्तेजो युत्तामहायल । त्रियश्चोत्पल वर्णाभा सा सुप्रियदर्शना ॥ ३६॥ नीलात्परतर श्वेत श्वेताद्धरण्यक परम् । वर्ष मैरायत राजार नानाजनपदावृतम् ॥ ३७॥ धनु सस्थे महाराज द्वेध दाक्षणोत्तरे । इलावृत मध्यमन्तु पञ्चवपाणि चैव हि ॥ ३८ ॥ उत्तरात्तरमेतभ्या वर्षमुद्रिच्यते गण । आयु प्रमाणमारोग्य धर्मत कामतीर्थत ३९ ॥ समन्धितानि भूतान तेपुरर्षेषु उसमें मनुष्यों को अवस्था सतयुगादि में दश हजार वर्षकी है वहां के मनुष्यों फा सुवर्ण के सपान वर्णहोता है और खिां अप्सराओं क समानह तो हैं वहां के मनुष्य नीरोग आन दी सन्देह हित स्वर्ण के समान वर्ण रखनवाल दर रूपवान उत्पन्नहाने हैं और गुह्ययक्षों के राजा कुनाजी राक्षसों समेत अप्सराओं के समूहोंसे संयुक्त गन्धमादनक झुके हुए शिखरोंपर आनन्द करत हैं, ग धपादन के दूसरेभागके समीप अपरगडिका ना छाटे २ पहाड हैं। ३५ । वहां के जीव ग्यारह हजार वर्गकी उमरके होत हैं, वएके गनुष्य तेजस्वी और गहचिली है और नियां उत्पल नाम कमल के समान मुन्दर अत्यन्त दर्शनीय है, नील पर्वतके आगे श्वेतपर्वत है और वनसे आग हैरण्य कनागखड है और भृगवान पर्वतक भाग अनक देशों से व्याप्तएरावा खण्ड है और दक्षिणोत्तरण भरतखण्ड और एरावत खण्ड यह दोनों धनुष समान अर्थात् तिकोणरूप है और बीच में इलावादि पांचखण्डवत- मानहैं, उनसे आगे क खराद गुणों में अधिक और अवस्था बानी रोगतामी corner of Meru is Ketumal 31 In anty ug the people living there attuned the age of ten thousand years I he men are of the colour of gold and the vom n are beautiful lil e apsaras. The people living Llrere 're healthy hypy free from care and bezutiful huver the king of Guhyals and yakshes retels with the apsırış on the suinmits of G indhmrdan In the vicinity of Gandhmadan there nre other smaller hills 35 The prople living there attain the age of eleven thousind seirs and are glor ous and stionz The women are beautiful and of the colour of a lo us flower Beyond the blue mountains are the white mountains and farther on uie the golden ones Beyond these 11, the Anavat hills dotted orer with many provinces. Anarnt m the no th and Blu att ursh in the south are of the form of boty These five province, are in the middle of which the centre (४२६९) भीमप BHISHIA PAV [ 1269] भारत । एवमेवा महागज पर्वतेः पायत्री यता ॥ ४० ॥ हेमकूटस्तु सुमहान् फैलासो नाम पर्वत । पर वैश्रवणो राजन् गहा के सहमोदते ॥ ४१ । अन्त्य त्तरेण फैलास मैनाफ पर्वतं प्रति । हिरण्या सुमहान् दिव्यो मागमयोगिरिः ॥ ४२ । तस्य पार्श्व महादिव्य शुभ्र काश्चनवालुकम् । रम्य बिन्दुमरो नाम यन राजा भगीत ॥ ४३ ॥ श्वा भागीरमी गहामवाम यदुला सम' । युगाम णियास्तन चैत्याश्चाप हिरण्मया ॥ १४ ॥ तनष्टयातु गत सिद्धि सहस शोमहा यशाः । सृष्टा भूतातिर्थ सबैलोकै. सनातनः ॥ ४६॥ उपाय तिग्मतजायन भूतैः समन्तत । नरनारायणी ब्रह्मा मनु स्थाणुध पश्म ॥ ४५ ॥ तन दिव्या पिपमा प्रथमन्तु प्रतिष्ठिता । ब्रह्मलोकादपका ता सप्तधा प्रतिपद्यते ॥ ४७ ॥ एकमे मो में उचरोत्तरदै उनखण्डों में सब जीवधारी धर्म का अर्थ से संयुक्तई हे राजा इसमा कार से यह पृथ्वी पर्वतोसे व्याप्त है ४० और बड़ापन हेगलूटनाम कैलास है सिपर कुरेरजी गुह्य गक्षों सगेन विलाम करतहैं फैलास पर्न न क उच्चर नाफ पर्वत के सम्मुख दिप अनिलोगों से भरा हुआ हिरण्य मृग नाम बडा पर्नर है, उप क ममीप स्वर्णरज युक्त पनोहर और दि०५ वि.दुसर नापतड़ागर जिसपर रागाभाशीरपन भागीरथीगंगाको देखकर बहुन वर्षोंतक निवाम कियाथा वहां गणि जाटनपज्ञ स्तंभ और सुवर्णजाटताही यज्ञकी सीमा ४१०वहीं बड़ेगशम्बी इ-द्रोभी गज्ञको करके महानसिद्धीको पाश, वहांधी सव समारकेस्वामी सबसे प्रथम महातेजसी शिवनी चारों ओर से पवित्रात्गापुरुषों से सेवाकिये जाने हैं और नर नारायण बहागनु पांचवें स्पाणु नाग रुद्रनी भी वर्तमान वहांही प्रथम पृथ्वी is Elavrita. Of the seven provinces that which is further north, excels the one to its im medinte south in respect of longerits, 'stature, health, reghteousness, happiness and profit Creatures live together in these provinces and thus the earth is covered with mountains. 40 The huge mountain nimed Heincoot, also called Kailas, is the resort of Kuver and his fab shes and guhyals To the north of Kallas and opposite Venik is the huge muntain Hiranyashring in the vicinity of which is lahe Vindusar, containing gold dust, on the band of which king Bhagirath stayed for the sake of the Ganges. There the pillars and trees, studded with gold and gems, murh the houn daries of sacrifices. It was there that Indra of great glory won great success by his saciifices. It is there that shit the lord of all the world and the foremost of glorious beings, is attended by persons Piscessing pure soul. It is the residence of Nar, Narayan, Brahma, । 4970] Mahabhatab (४२७०) चस्पीकसारा नलिनी पायनी च सरस्वती । जन्तूनच होताच गदा सिन्धुध सप्तमा ॥ ४८ ॥ अचिन्त्या दिम्पस कशा प्रभारपैय सचिाधि । उपासत यन सरसहस्रयुगपर्यये ॥४९॥ दृश्याऽदृश्याच भातरा तिरसास्वती । एतादव्या सप्तगहा लिपुलोकेपविश्रुता ।५०। रक्षासवैहिमपातमिन्टतगृह्यका । सानाग निषधेगोकर्ण च तपोवनम् ॥ ५१ ॥ देवासुर णा सपाश्वेतपति उच्यते । गन्धयों नपधेनित्य नीले ब्रह्मर्पयस्तथा । श्रद्भवास्तु मह राज दयात्रा प्रतिसचर. ॥ ५२ ॥ इत्यतान महाराज सप्त पाणि मागश । भूतान्युपानविष्ट नि गनिमान्त धुवाणिच ॥५३॥ तेष मृद्धिविधा हश्पते दैवमानुपी । सशस्यापरि सत्पात् श्रद्धयातनुभूपता 1५५॥ पान्तु पृच्छसि मां राजन् दिव्यामेतां शशासातम् । पा शशस्य द्वे वर्षे उके पाताल और सर्ग के मार्ग में बहने वाली दिव्यनदी श्रीगगानी नियन होकर घालोफस चली हुई सान प्रकारसे यसोर, सारा, नलिनी, पावनी सरस्वती, जवूनदी, शीता गगा, सिंधु नामों से पानस अगम्य और दिप रूपसे वहती है पर गभु ईश्वाकी रनना ह हजार यज्ञोंके चक्रों इन्द्र उपासना करते है कहीं २ सरस्वती गुग और पकट है, यह सातों गगा दिप रूगोस तीनों लाकों में पत्तमान है । ५० : हिमाचल में गक्ष ग, हे ।कूट में गुह्यक, निपाण.सर्प, गोकर्ण में सपोधन ऋपि लोग, स्वतपर्व। सब देवता और असुरों का कहागाता है निषध में गंधर्व और नील पर्वत पर वामऋषिलोग सदैव निवास करराहे, ह महाराज शृगवान नाम पर्वत देवगाऑमा विहार स्थान है और यह सानोखण्ड माग फिप गपे हैं उनसत्र में स्थावर और जगा जीप रहने हैं उनका देय संबंधी और मनुण संधी धन वहुत प्रकार देखन में आताह । ५४ । ६ राजा तुप लिप्त Manunnulsthanu It was there that the divine Ganes, flowing on carth, liciten and subteraneon relons, issuing out of the region of Brauma, ilrst slioned herself and then dividing lierulf into seven streamus, flows is the Vasnolsun thi Nalını, the cleansing Saraswati thic Jamsund, the Sheets the Ganges and the Smdlu Ilius supreme Lod has made this rangement. Indra has performed thousands of facrifices there The Sar 24satris $191k, in some parts and invisibile in otlıurs JO Himncial in the home of rakshusey, wlute mountain of gods and ayurv, Renerxit of Guhyaks, Nishadh of snakes, Gol arn of usatic illus, Nishadhif Gandharavas, Nil of Brahmins and Shiringsan ix the pleasure ground of gid Thew Arc the seven divisions ose which irosibles and immoschules are found and Jose divine and worldly call. I cinnot count then, nlthougit at (४२७१ भीमप BPIS HI PARY , [4271 ये दक्षिणोत्तरं । पर्णी तु नागद्वीपश्च कादयपढीप एयच ॥ ५५ ।। गाम्रपर्ण शिलो राजीमान् मलयपर्वतः । एतद् द्वितीय द्वीपस्यदृश्यते शशमंस्थितम् ॥ ५६ ॥ इति श्रीमहाभारते भीमपर्वणि जम्बूसण्ड विनिर्माणपर्वणि भूम्यादिपरिमाण विवरणे षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ धृतराष्ट्र उवाच । मेरोरथोत्तरं पार्य पूर्व चाचश्यसनाय । निसिलेन महा बुद्धे माल्यवन्तम्च पर्वतम् ॥ १ ॥ सञ्जय उवाच । दक्षिणेनत नीलस्य मेरोपा तयोत्तरे । उत्तराः कुश्यो राजन् पुण्या. सिद्धनिपेपि ॥२॥ वृक्षामधुफला नित्यपु. पफलीपगाः । पुष्पाणि च सुगन्धीनि रमयन्ति फलान च ॥ ३ ॥ सर्वकामफ. लास्तन कोचद् वृक्षा जनाधिप । अपरे क्षारणो नाग वृक्षास्तत्र नागधिप ॥४॥ अध्याप ॥ ७ ॥ दिव्य निगट स्वरूप को मुझसे पूछनेहो उमकी संख्याका ममाण करना इझमे असंभव है परन्तु उसका सुननाही श्रद्धाक योग्य है विराट पुरुषके दोनों भार दोखण्ड का है दाहिने में गरतखण्ड अर्थात् कर्मभूमि और कार्य में ऐरावत खंड अर्थात् योगभूमि दोनों कानों में नाग द्वीप और काश्यपद्वीपहै । ५६ । घृतराष्ट्रवोले कि हे बुद्धिमान् संजय प्रथम मेरु पर्वत के उनीय भाग के मालय-त पहाडकं मूल समेत वृत्तान्तों को वर्णन करो, संजय बाले कि हे राजा नील पर्वन क दक्षिण और मेरु के उपरभाग में उत्तर कुरुदेश हैं जोकि पवित्र और सिद्रियों से बाधित नहाएर वृक्ष मधुर फल फूलों से सदैव शोभित रहते हैं और पुण अत्यन्त सुगन्धित और फल पहा रमील हाने हैं, हे राजा वहां कोई कोई वृक्षतो सब अभिलाषाओंक पूर्ण करनेवाले हैं और अन्य बहुन से वृक्ष अis good for the believers to hear of them. I have told you about the two divisions, that on the right is called Bharath hand and that on the left is Asrayathhand. Nagevip and Kashyap dwip are the two ears of the hare"56. CHAPTER VII " Tell me Sanjaya," said Dhritrashtra, ' of the regions to the North and East of leru as well as of Malyarat." "Un the south of the Nil mountain and the north of Meru," replied Sanjaya, "are sacred northern Kurus tlie residence of Sidbas The trees there Lear 8110et fruits and floncis. The flowers are fragrant and the fruits are crcellent in taste; some trees give fruits according to desire, while others give milk and other kinds of food of six different flavours.

[4272] Nahalirrat (४२७२) येक्षरन्ति सदा क्षीरं पड़सञ्चामृतोपमम् । यस्त्राणि च प्रसूयन्ते फलेम्वाभरणानच ॥ ५ ॥ सर्वा मणिमयो भूमि' सूक्ष्मकाचनयालुका । मणिरत्लनिभं रम्यं बजावैर्य सन्निभम् ॥ ६ ॥ भूभागदृश्यते तत्र पद्मरागलपप्रभम् । सर्वतसुखसंस्पर्शा नष्पका च जनाधिप ॥ ७ ॥ पुष्करिण्य शुभास्तन सखस्पर्शा मनोरमा । देवलोक- व्युता सर्वे जायन्तेतनमानवा. ॥ ८ ॥ शुक्लामजनसम्पन्नाः ससुप्रियदर्शना । मिथुनान च जायन्ते त्रियश्चाप्सरसोगमा ॥९॥ तवान्ते क्षीरिणां क्षीरं पिवम्त्य मृनमान्नभम् । मथुनं जायते काले समन्तच्च प्रवर्द्धते ॥ १०॥ तुल्यरूपगुणोपेत समवेश तथैवच । एवमवानु रूपश्च धक्रयाक समं प्रभो ॥ ११ ॥ निरामयाश्चते लोका नित्यं मुदितमानसा । दशवर्पसहस्राणि दशवर्षशतानिच ॥ १२ ॥ जीवन्ति ते महाराज न चान्योन्यं जहात्युत । भारुण्डानाम राकुनास्तीक्ष्णतुण्डा महाबलाः ॥१३॥ मृत समान स्वादुयुक्त छ रस से युक्त दूधों के देनेगले हैं और फलों में वस्त्रा- भरणों को उत्पन्न करते हैं । ५ । हे राना सब पृथ्वी मणियों की वनीहुई और दिप सुर्णिकी घालू रखनेवाली और सब ऋतुओं में सुख से स्पर्श होने वाली कीच आदि से रहित है वहाँर दालोक से पतित लोग उत्पन्न होते हैं पर सब विष्णुभको स सगकरनेवाले और अत्यन्त स्वरूपवान् होते हैं और अप्सराओं के समान स्त्रियां वहां जोड़ों को उत्पन्न करती है वह गाड़े उन दूध देनवाले वृक्षों के अमृतरूपी दूनों का ५ ते हैं समयपर जोड़े उत्पन्नहात है और सदैव बढ़ते हैं और | रूप गुणसंयुक्त सदैव एफसी पोशाकनान हाते है । .. हे सार्थ वह जोड चक्र वाकों क सगान एकसे रूप भी होते है और नारोगतापूर्वक सदैव प्रस नगन रहते हैं उनकी अवस्था ग्यारह हजार वर्षकी होती है और समान अवस्था हानके कारण कोई किसी को नहीं मानता है अर्थात् एकही समय में देहोंको त्यागते हैं They also yield cloths and ornaments, 5 The land abounds with golden sand. One portion of that beautiful land is radiant like aubies, diamonds, or lapis lazuli and other fems All the seasons are agrecable and the carth is without mire, Ile tanks are charming, delicious and full of crystal water People who ars born there, come down from among the ds They are pare of birth and very beautiful. They are boin in pairs and the nampen there are like apsaras in beruty. They sucklo on the fiectar like miłh of these trees and are of cqual stature, beauty and virtuts, wear the same sort of dress and love each other like chakravahs 11 They are cheerful and free frudi illness. "lley live elesen thousand years and nurer abandon cach other. Bhasund, a lund with shalp Deak and great strengtli, hfts them up then they are dead and throw them in inountain A (४२७३, भीष्मपZ BEIS II PARV [1273] ताग्निहरन्तीह मृतान् दरीषु प्राक्षपन्तिच ! उत्तग कुरवो राजन् व्याख्याताग्ते समा सतः ॥ । मेरोः पार्थमहंपूर्व पक्ष्याम्यशयथातथम् । तस्य मूर्धाभिषेकस्तु मद्राश्वस्य विशाम्पते १५ भद्रसालवनं यन कालानश्च महामः। कलाम्रस्तुमहाराज नित्यपुष्पफल शुभः॥१६॥ द्रुमश्र योजनोत्सेधः सिद्धचारणसेवितः । तत्रते पुरुषावता स्लेजोयुक्ता महाबलाः ॥ १७ ॥ स्त्रियः कुदवर्णाश्च सुग्दर्य प्रियदशना । चन्द्रप्रभाश्चन्द्रवर्णाः पूर्णचन्द्र निमानना' ॥ १८ ॥ चन्द्रशीतलगायश्च नृत्यगीत विशारदा । दशवर्षसहस्राणि तनायुभरतर्षभ ॥ १९ ॥ कालानासपातास्ते नित्यं सस्थितयौवनाः । दक्षिणेन तु नीलस्थ निपधस्योत्तरेणत ॥ २० ॥ सुदर्शनोनाम महान् जम्बूवृक्ष सनातन 1 सर्वकामफलः पुण्य. सिद्धचारपसे चितः ॥ २१ ॥ , यहां बड़े पराक्रमी और तीक्ष्ण बंटनाले मारंड नामपक्षी उन पुरुषों को पकड़कर गुफाओं में डाल देते हैं, ई राजा यह मैंने उत्तर कौरव देशका सक्षेप से वर्णन किगा । १४ । अब उम मेरुके पूर्वीभागके वृत्तान्त को यथावस्थित कहनाई हे राजा उस भद्राग्वखंडका मूभिषेक नाम महाराज और गद्रशाल नाम वन और कालान ना वृक्ष है वह कालान नाम शुभ वृक्ष फूल फलयुक्त सिद्ध चारणों स सीबत एक पोगन ऊंचा है, जिस स्थानपर श्वतवर्ण पुरुष तेजसे भोहुये महाबली और स्त्रियां वुमुद कमळ के समान सुंदर स्वरूपवान चन्द्रमा के समान प्रभाव और पूर्ण चन्द्रमा सा प्रकाशवान मुखवाली और चन्द्रमा के ही समान शीतल देह नृत्य गान में मीण वर्धमान है और वहां अवस्था दश हजार वर्षकी होती है वह कालान का रस पीन से सदैव तरुणरूपही रहते हैं । १९ । नीलपर्वत के दक्षिण और निपप पर्वत के उत्तर सुदर्शन नाम या जंवूवृक्ष सनातन है यह सब अभीष्टों का दाता पवित्र सिद्ध चारणोंसे सवित है अर्थात् मनुष्य उसको This is, o king, a brief description of the northern Lurus I shall now describe the eastern part of Meru Bhdrashwa is the Lest place there A large forest of Bhadrashals and a tall tree of Kalamras yielding good fruits and flowe s, are situated there. This trec is a yojan in light and is ado.ed by Sidlas and Charans. The nien of that place dio ur white complexivn very energetic and strong. The wouien are of the colour of lilies, very beautiful and enchanting. They possess the radiance and shiteness of the moon and their faces resemble a full moon 'Their bodies are cool like the rays of the moon and they are accomplished in singing and danung. The duration of life there is ten thousand years, and the people always remain you tlıful by drinhing the milk uf the balami a tice To the south of Nil and noth of Nishadli there is a huge Jamru tree that is caves 14 [42741 Mahabharat (४२७४) तस्य नाना समाख्यातो जम्बूद्वीप सनातन । योजनानां सहस्त्रच शतञ्चभरत पभ ॥ २२ ॥ उत्सेधी वृतराजस्य दिवस्पृट् मनुजश्वर । अरत्तीना सहनश्च शतानि दश पञ्च च ॥ २३ ॥ पारणाहस्तु वृक्षस्य फलानां रसभेदिनाम् । पत्त मानानि तान्युवी कुर्वान्त विपुलं स्वनम् । २४ ॥ मुञ्चान्त च रस राजस्तस्मि रजतसान्निभम् । तस्या जम्वाः फलरसो नदी भूत्वा जनाधिप ॥ २५ ॥ मेरं प्रदाक्षिण कृत्या सम्प्रयात्युत्तरान् कुरुन् । तनतेषां मन शान्तिन पिपासाजनाधिप ।' २६ ॥ तस्मिन् फलरसे पीते न जरावाधते च तान् । तर जाम्वूनद नामकनकं देवभूपणम् ॥ २७ ॥ इ द्रगोपफसकाश जायते भास्यग्न्ततत् । तरुणादित्यवर्णाश्च जायन्ते तन मानवाः ॥ २८ ॥ तथा माल्पयतः शृङ्ग दृश्यते हव्यवाट् सदा सदा । नहीं पासक्त लिये कि यहभी दिव्य है इप्ती के नाम से गह सनातन से जंबूद्वीप प्रसिद्ध हुआ है है भरतबशियों में श्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्र उस बृक्षगन गंवृक्ष की ऊँचाई आमाश को छूनेगाली ग्यारह सौ योगन है उस वृक्ष के पहुये फटनचाले फलों का विस्तार ढाई हजार आत्नी है अर्थात् कोई संख्या विशेष है यह फल जय पृथ्वीपर गिरते हैं तो बड़े भारी शब्द को करते हैं २५! और जहां जहां गिरते है वहां वहां चांदी के समान श्वेत रसका छोडते हैं हे रागा उनी जंवूफल के रसकी नदी होकर मेरुको मोक्षण करके उचर कुरु देशों को आग है “हे राना यहां पिपासा लगने के कारण उन्होंके चिनकी कान्ती नहीं है परन्तु उस फलके रस पानसे उनको जगवस्था दुग्वदागी नहीं होनी है वहांही जावूनद नाप कनक देवर्तामों का भूपण वीरवधुनद के सपान रक्तवर्ण उत्पन्न हाना है उसमें बना तेन हानाहै वहां मनुष्य तरुण और मूविर्ग उत्पन्नहाते हैं २८ इसीप कार पागवत के शिखरपर सवा नाग अने सदैव दिखाई देती है हे भरतम्भ वह संवर्तक and eterna! It is adored by Sidha3 and (hus and sants every desire. Jamvudsap driss its name from that tree It is, 0 prince of Bharats, cles en hundred joins lugh and its branches touch the Pug lensens Its culcumfurent measures tienty five hundred cubits and its fiut bursts open when ripi falling on corth with a loud noiso giving out a silvery juice such flows lile a rer nnd pissing round Vun comes down t, noi thorn Kuu: If the juice of that troo is qualled it conducez t) tho perce of mind and allays thurst Thosc who drinh of it are never netry and weak There is a species of gold ellau Jams und wluch is used for the ornaments of gols and shines like glow from Men born there are of the colour of the morning sun On the summit of Malyarat is always seen the Gro called samsar tak wluch hursis forth at the end of the jug fors 26 (४२७५) भीष्मपर्य BAISHMA PARY [4275] नाम्ना सम्वतको नाम कालाग्निर्भरतर्षभ ॥ २९ ॥ तथा माल्यवतः शृङ्गं पूर्व- पूर्वानुगाण्डका । योजनानां सहस्राणि पंचषण्माल्यवानय ॥ ३० ॥ महारजतसं- काशा जायन्तेतत्र मानघाः । ब्रह्मलोकच्युताः सर्वे सर्वेषु लाघवः ॥ ३९ ॥ तपस्तप्यन्ति ते तीनं भवन्ति ह्यध्यरेतसः । रक्षणार्थन्तुभूतानां प्रावशंते दिवाकरम् ॥ ३२ ॥ पष्टि स्तान सहस्राणि पाप्टरेव शतानिच । अरुणस्याग्रतो यान्ति परिवार्य दिवाकरम् ॥ ३३ ॥ पटियर्षसहस्राणि पष्टिमेव शतानिच । आदित्यतापतप्तास्ते विशन्ति शशिमण्डलम् ॥ ३४ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्यूखण्ड विनिर्माणपर्वणि माल्यवर्णने सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ नाप कालाग्नि है और वही माल्यवान् के शिवरपर चारों और को छोटे छोटे पर्वत हैं और माल्यवान् पर्वत ग्यारहहजार पोजन है।३०। वहां ब्रह्मलोकसे गिरेहुये चांदी के समान वतवर्ण सब के सब साधू मनुष्य उत्पन्न होते हैं वह मनुष्य का ठिन तपस्याओं को करते हुये ऊर्ध्वरेन अर्थात् ब्रह्मचारी होते हैं और जीवोंकी रक्षा के निपिच सूर्य में प्रवेश करते हैं यह संख्या साठहजार बाल्पखिल्यऋषि सूर्य को घोहुँ पे अरुण नाप सूर्य के सारथी के आग २ चलते हैं वह सब छयासठ हमार वर्ष तक सूर्य की ऊष्मा से रापेहुपे होकर चन्द्रगण्डल में प्रवेश करते हैं अ- र्थात् सूर्य कोक में विराट पुरुष की उपासना करके मन के स्वामी चन्द्रमा प्रवेश है और सूत्रात्म भाव को पाने हैं ॥ ३४ ॥ करत the destruction of the aniverse. On Malyarat's summit towards the east are many smaller mrutains; the former is eleven thousand yojans. 30. l'euple born there are of the complexion of gold. They come duwn from the region of Brahma and are utterers of Brahma. They perform very severe asceticism and are permanently celebates. 'bey go up to the Sun for the gord of all. They proceed in front of Arun and surround the sun to the number of. sixty thousand After being heated for sixtysix thousand years by the rays of the sun they enler the disc of the moun. 34.

[4976] Mahabharat (४२७६) धृतराष्ट्र उवाच । पर्याणाञ्चैव नामानि पर्वताच धनजय । साचत्यमे यथा तत्त्व ये च पर्वतवासिन ॥ १ ॥ सजय उवाच । दक्षिणेनतु वतस्प निपथ स्योत्तरेण तु । वर्ष रमणक नाम जायन्ते तत्रमानवा. ॥ २ ॥ शुक्लाभिजन सम्पन्नाः सर्वं सुप्रियदर्शना । नि:सपलाच ते सर्वे जायन्ते तत्र मानाः ॥ ३॥ दशवर्षसहस्राणि शतानिदशपचच । जीवतितमहाराज नित्यमाद्तमानसा ॥४॥ दक्षिणेनतु नीलक्ष्य निपधस्योत्तरेणतु । वर्षहिरण्मय नाम पर हैरण्यतीनदी ॥५॥ यत्र चाय महाराज पक्षिराट् पतगोत्तम । यक्षानुगा महाराज घनिन प्रियदर्शना ॥ ६ ॥ महायलास्तत्र जना राजन् मुदितमानसा । एकादशसहस्राणि वाणातेज नाधिप ॥ ७ ॥ आयु प्रमाण जीवन्ति शतानि दशपचच । श्रृङ्गाणि च विचित्राणि भीण्यष मनुजाधिप ॥ ८ ॥ एक मणिमय तत्र ययक रोक्ममद्भुतम् । सघन अध्याय ॥८॥ धृतराष्ट्रनोले हे समय तुम ने खण्डों और पर्वतों का वर्णन किया अब उन पहाड़ों में जा पास करते है उनका मूलसमेत वर्णन करो, सजय ने कहा कि श्वन पर्वत के दक्षिण और निषधक उत्तर रगणकनाप खण्ड एक पृथ्वीका भाग है वहाँ ऐसे मनुष्य उत्पन्न होते हैं जोकि विष्णुभक्तोंक साथ स्नहरखनेवाले अत्यन्त स्त- रूपवान् हैं उनमें कोई परस्पर शत्रु नहीं होता है, नीलपर्वतके दक्षिण और निगम के उत्तरभाग में हिरण्मय नापखण्ड है वहां हिरणपती नाप नदी है । ५। वहाँही पक्षियों में श्रेष्ठ गरुडजी हैं उसस्थानके धनवान स्वरूपवान् मनुष्य यक्षों के सेवक महाबली और प्रप्तान चित्त होन हैं और सदैव प्रसन्नता पूर्वक रहकर सादे ग्यारह हजार वर्ष पर्यन्त आस्था को भोगते है और कोई उनमें से साढ पारदहजार वर्ष तक भी गीत है उस पर्वतके तीन वड़ विचित्र शिखर हैं उनमें एकता गणिपोंका शिखर है दूसग अत्यन्त सुन्दर सुवर्ण का अपूर्व शिरवर है Said sinjly by CHAPTER III “Tell me the name of all varslies, mountams and their inhabitants, Sinjaja" Sad Dhritrishtra To the south of the whito mnountains and north of Nishadh" is domanahvarsh Men of lute complexion are born ther. They are of noble buth and hand. somo appairince They hare no enemies Ind live happily for clercn thousand fise hunditd jers On the south of Nishadh 19 Niranmayın]where the Ilirinyatı fois. 5 There ives Garud the forermont of birds. The rope are the followers of yakshes, scalthy and landsome They strong and clicerful and the dumtion of their life is twelve thou-ind your The Shringai at mountains liave third leiutiful summits, one, made of jewels anda (४२७७) भीष्मपर्व BISHNA Patv [4277] मयक भवनेरुपशोभितम् ॥ ९ ॥ तर स्वयम्प्रभा देवी नित्य वसति शाण्डिली ! अत्तरेणतु शृङ्गस्य समुद्रान्ते जनाधिप ॥ १० ॥ यपमैराधत नाम तस्माच्मृतमत परम् । न तन सूर्यस्तपात न जायन्ते च मानवाः ॥ ११ ॥ चन्द्रमाश्च सनतनो ज्योतिर्भूतरवावृत । पद्मप्रभा पप्रवर्णा पद्मपत्रानभेक्षणा ॥ १२ ॥ पनपत्रसुगन्धाश्च जायन्ते तर मानवा । अनिष्पन्दा इष्टग घा निगहारा जितेन्द्रिया ॥ १३ ॥ देवलोक न्युता सर्वे तथा घिरजसे नृप । प्रयोदशसहस्राणि वर्षाणान्ते जनाधप ॥ १४ ॥ मायु प्रमाण जीवन्ति नरा भरतसत्तम । क्षीरोदस्य समुद्रस्य तथैवोत्तरत प्रभुः । हरिवसति बैकुण्ठ शकटे कनकामये ॥ १५ ॥ भटचक्र हि तद्यान भूतयुक्त मनो और तीसरा शिखर सवरनों से मिश्रित अनेक स्थानों से शोभित है । ९ । वहां स्वगं प्रकाशवान शांडिली देवी निवास करती है,'हे राजा शिखरके उत्तर समुद्र के समीप ऐरावत नापखण्ड है इसी कारण यह भृगवान पर्वत से घिराहुआ उत्तम खण्ड कहाना है उपमें सूर्य किसीको संतप्त नहीं करते हैं मनुण वृद्ध नहीं होते और नक्षत्रों समेत चन्द्रमा ज्यानि रूपके समान घिरा रहता है यहां के मनुष्य कपल के समान कोमल वा सुन्दर रंगनेन और सुगन्ध युक्त उत्पन्न होते हैं । १३ । हे राजा वह सब देवलोक से गिरे हुये परसद से रहित अर्थात् देवता- ओंके सपान इष्ट मधधारी निगहारी गिते-द्री और रजोगुण से रहित है और उनकी अवस्था तेरा हजार वर्गतककी होती है इसीप्रकार दूध के सद्रकी उत्तर दिशा में अनेक मायाओं के स्वामी ज्योतिरूप श्रीहारे नारायणजी सुवर्ण के शफूट पर निवास करते हैं वह सवारी आठ पहियोगी है जिसमें एक पहिया तो पचको- द्विप समूह दूसरा पच ज्ञानेन्द्रिय समूह तीसरा मन बुद्धि चिरा अहकार का समूह चौथा पत्रमाण पांचवां पांचों मुक्ष्म तत्व छठां अविद्या सांत काम अ. gems, another is very wonderful, being made of all kinds of gems and adorned with palaces. There the self luminous lady, known as Shandili lives On the north of Shringvat, extended to the sea shore, is Airavatvarsh which is superior to all on account of its Juwelled mountain. The sun gives no heat there and thº people are free from old age The only sources of light are the moon and stars. Beautiful like lotus and having their eyes like lotus petals, the men børn there have the fragrance of the lotus. Their eyes donot vink they donot take any food and their senses are under control They come down there from the region of gods and are free from sin The duration of their life is thirteen thousand years. On the north of the milliy ocean, Lord Iları of boundless prowess dwells on his car of gold That vehicle having aght wheels, has numerous super- [4278] Mahabharat (४२७८) जवम् । अग्निवर्ण महातेजो जाम्बूनदविभूषितम् ॥ १६ ॥ स प्रभु सर्वभूतानां विभुश्च भरतर्षभ । सौगो विस्तरश्चैव कर्ता फायिता तथा ॥ १७ ॥ पृथिव्या पस्तथाकाश चायुस्तेजश्वपार्थिव । स यज्ञ सर्वभूतान मास्य तस्य हुताशन ॥ १८ ॥ | वैशम्पायन उव च । एवमुक्त सजयेन धृत राष्ट्रो महामना । ध्यानमन्वगमद्राजा पुत्रान् प्रति जनाधिप । १२ । सावचिन्त्य महातेजा पनरेवाब्रवीद्वच । असशय सूतपुत्र काल सक्षिप्तेजगत् । २०॥ सृजतेच पुा सर्व नेह विद्यात शाश्वतम् । नरो नारायणश्चैव सर्वत्र सर्वभूतहत् ॥२१॥ देवांवकुण्ठामत्याहुनरा विष्णुमितिप्रभुम् । २२॥ इति श्री महाभारते भीष्पाणि जम्बूखण्डावीनर्वाणपर्वाण धृतराष्ट्रवाकरे seोऽध्याय ॥८॥ फर्म भारी शुद्ध ब्रह्मपृक्त मनके समान शीघ्रगामी अग्निवर्ण तेजस्वी नांबूनद नाग सुनर्ग से शोभायमान है, हे भरतर्षभ वह सब संसार त्राा स्वामी गापक समका अपन में लय करनेवाला और प्राटकरने वाला जीवरूपसे की और ईश्वररूपसे कर्म करनवाला है हे राजा वही पचतत्ववही सबका यज्ञ और मुख उसका आग्ने है।। १८ । वैशंपायन वाले कि ह जनमेजग यह सब बातें संजय से | सुनकर बड साहसी रामा धृतराष्ट्रने अपन नोंकी चिताकरी और फिर भी बहुतसा विचारकरके बोला कि हे समय निस्मन्देह काल जगतको भक्षण करता है, और फिर सवको उत्पन्न करता है यहां कोई भी विनाश रहित नहीं है नर नाण अर्थात् जीव ईश्वर भी दोनों रूपोंमे अविनाशी नहीं अर्थात् दोनों एक रूपहोकर अकेलाही सर्वज्ञ और सर्वगीवोंका मित्रहै उसीसमर्थ पुरुषको दवता और मनुष्योंने पायाधीश और सर्वव्या वर्णन किया ॥ २१ ।। " natural creatures sented in it, and has the speed of the mind It is fiery in colour, is very strong and is adorned with Jamounod geld The lord of all crcatuies possCS »cs every sort of wealth 17 The unnerse verges in him and from lum it emanates again Ho is the actor > nd mahes others act He is the earth, ynter, space, air and firc. He is Sacrifice's self for all creatures and fire is His mouth Vaislampryan continued " The high minded king Dhritrashtra, thus riddressed by Sanjaya, became absorbed in meditation alout us sons and liaving reficcted for a time the poirerful hing said, “\Vithout doubt, Time is the dustiosor of unit crse and Time creates crery tlung Again Nothing is eternal Nar and Narnyan the omniscient destroy all crcatures The gods calls him Voihunth Thuile men call hun Visliniu 21.

(४२७९) भीष्मपर्व BIHHHA PIPE [4279] धृतराष्ट्र उगाच ॥ यदिद भारत वर्ष यत्रेदं मूछिन दलम् । यत्रातिमात्र लुम्यो य पुत्रो दुर्योधनो मा ॥ १ ॥ या गृद्धा प ण्डुपुत्रा यत्र में सजते मन । एतन्मे तत्व माचक्ष्य त्यहि मे बुद्धिमान्मत ॥ २॥ सजय उवाच ॥ न तन पाण्डवागृद्धा गुण राजन् पचो गम । गृदो दुर्योधनस्तत्र शनिश्चापि सौवल ॥ ३॥ अपर क्षत्रियाश्चय नागाजनपदेश्वरा । ये गृद्धा भारते व न मृत्यन्ति परम्परम् ॥ ४ ॥ अनते कीर्त यिष्यामि व भारत भारतम् । प्रिय ।मन्द्रस्य दवस्य मनाववस्वतस्प च ॥५॥ पृयो स्तु राजन् वैन्यस्य नपेक्ष्याकोर्महात्मन । ययाते रम्परीपस्य मांधातुपस्पच ॥६॥ तथैव मुचकुदस्य शिचे रौशी नरस्यच । ऋपमम्य तथैलस्य नृगस्य नृपतम्तथा । कुशिकस्य च दुर्घर्ष गाधेश्चैव महात्मन ॥ ७॥ सोमकस्य च दुर्धर्ष दिलीपस्य तथैव अध्याय ॥९॥ धृतराष्ट्र ले कि यह भरतखण्ड निममें यह सबसेना भूली हुई है उस में यह मेरा पुत्र दुर्योधन अत्यन्त कोभी हारा है और जिसमें गंडव लागी हैं और मेरा भी मन लगरहा है उसका पुरा वृत्तान्त मुझसे कहाँ मेन तुमको बुद्धिमान माना है, । २ । सजप वोल ह राजा मेरेवचनको सुनो उसमें पांडव गभी नहीं इसमें केवळ दुर्योधन और सौपला पुत्र शकुनी ही लोभी हैं, नाना प्रकार के दशों स्वामी अन्य क्षत्री लाग जो भरतखण्डमें लाभी हाका परस्पर में ई करते है । ४ । इस स्थानपर मैं भरतवण्डका वर्ण । तुसे वर्णन करताहूं कि यह भरतखण्ड इन्द्र देवता और सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु का अभीएहै हे राजा धृतराष्ट्र | इसके विशेष यह भरतग्वण्ड पृथु, वैन्य तथा महात्मा इक्ष्वाकु, ययाति, अवरीष, औशीनरके पुत्र शिकि, कपन, ऐल, नृग, कृशिक, महात्मा गाघि, सोगक दिलीप 1 CHAPTER.IX. "Give me a detailed account of Bharatvarsh, where these senseless forces have been collected, which my son Duryodhan covets and which is so desired by the Pandavas and myself as well Tell me all this Sanjaya, for, methinks you are very intelligent in this matter" asked Diritrashtra of Sanjaya. " Listen, king," replied Sanjaya, " The Pandavas d not couct this country, it is thy son Daryodhan and Shakuni the son of Suval that are covetous I shall now tell thee, descendant of Bharat, of the land known as Bharatvarsh This is the favourite land of Indri and of Manu the son of Virus at, cf Pnthu, of 1 ainya, of lkshwaku, of Yayatı, of Amyarish, of Mandhata, of Nahush, of sluchkund, of Sou the son of Ushinar, of Rishabh, of Ila, of king Nrig, of Kushik, of Gadhi, of Somab, of Dilip and of । [4280} Mahabharat (४२८०) घ। अन्येपांच महाराज क्षत्रियाणां चलीयसाम् ॥ ८ ॥ सर्वपामेव राजेन्द्र प्रियं भारत भारतम् ॥ ९ ॥ तस व प्रवक्ष्यामि यथायथ मारन्दम । शृणु मे गदतो राजन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि । महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षवाना ॥ १० ॥ विन्ध्यवारियात्र श्च सप्तते फुलपर्वताः । तेषां सहनशी राजन् पर्वतास्ते समीपतः ॥ ११॥ अविज्ञाताः सारवन्तो विपुलाश्चिमानव । अन्ये ततोऽपरिज्ञाता इस्वा स्वोप जीविनः ॥ १२ ॥ आर्या म्लेच्छाच कौरव्य तैर्मिश्राः पुरुषा विभो ।, नदी पिवन्ति विपुलां गङ्गां सिंधुं सर स्वतीम् ॥ १३ ॥ गोदावर्ग नमदांच बादांच महानदीम् । शतद्रू चन्द्रभागाञ्च यम नांच महानदीम् ॥१४ । दृपद्धती चिपाशांच निपापां स्थूलवालुकाम् । नदी वेत्रवती चैव कृष्ण घेणांच निम्नगाम् ॥ १५ ॥ इरावती वितस्तांच पयोष्णों देविकामपि । वेद स्मृता चेद्वती भिाव चामिक्षुलांकृमिम् ॥ १६ ॥ कापणी चित्रवाहां चित्रसेनांच निम्न में . आदि बहुतसे पहा पराक्रम क्षत्रियोंका पाग है, हे शान्ता यह भरतखण्ड कर्म भूमि होने के कारण सरकाही प्यारा और महातेजस्वी खण्ड है। ९ । इसको कहताहू परेन्द्र, पलय, सह्य, शुक्तिवान् , पारियन ऋक्षवान, विन्ध्याचल यह सानों पर्वन बड़ेकुलवान और प्रतिष्ठिन हैं और इन्हीं सातोंके समीप हजारों पर्वत उता पदार्थों के रखनपाले विस्तृत और पर्वनके निवासियों के निवासस्थान रूप गुप्त है, इनमे अग छोट २ पर्वत छोटी २ वस्तुओं के रक्षा स्थान रूप सबके जाने हुगे है हे कोलग धृतराष्ट्र जो आप मनुष्य अर्थात् वर्णाश्रमी वाले और म्लेच्छ अर्थात् वेद से विरुद्ध मतवाले उन में निशस करते है और गंगा सिंधु सरस्वती इत्यादि बड़ी २ नदिगों क जलकर पीते हैं । १३ । और गोदावरी, नर्मदा और पाहुदा नाप महानदी शतद्रु, चन्द्रभागा और महानदी, यमुना, हनी, निपाशा, विपा, स्थूलवालका, नेत्रवनी, कृष्णवेणी जो नीचे फो चलतीहै, इरावती, वितस्ता, पयांप्णी, दविका, वेदस्मृना, चेदयनी, निर्दिवा, many other Kshatryas. I shall now describe to thee, chastiser of foes, the country I have spoken of, as far as I know. 3. Attend to mc; hing; as I proceed to satisfy your curiosity. Mahendra, Malnya, Saliya, Shuhtivan, Pari yatra, Rikshran and Vindhiyas are the scren mountains of the first rank, Besides these there are thousands that arc unhnown, of hard mahc, huge and having crallent valleys. Mfanya of tlıc smaller ones are inhabited by barbarians. Aryans and Mahas lire there and drink the waters of the Ganges, the Sindhu, tho Saraswati, the Goalavery, the Narmada, the Vahuda, the Shatadru, the Chandrabihingn, the Yamunn, the Drishndvati, the Vipasha, tlıc Vipapa, the Sthulsaluka, the Vetrarati, the Krishnrena 15., the liavati, the Vitas'n, the l'ayoshini, tlıc Devihn, the Vedasinrita, tlic (४२८१) Hraguá Busana PARY [4281] गाम् । गमनी धूतपापाच बन्दनाञ्च महानदौम् ॥ १७ ॥ फौशिकी निदियां कत्या निचितां लोहितारणीम् ॥ १८ । रहस्यां शतकुम्भाञ्च सरयूश्च तथैवच । धर्म अपनी बेतरती इस्तिसोमां दिशं तथा ॥ १९ ॥ शरापती पपोणीच परां माम रथीमपि । कावेरी चुलकांचापि पाणी शतवलामपि. ॥ २० ॥ नीवारा महिता चापि सुप्रयोगां जनाधए । पविना कुण्डली सिन्धु राजनी पुरमालिनीम् ।। २१ ॥ पूर्वाभिरामा चीराव भीमामोधयी तथा । पाशाशिनी पापहरी महेन्द्रा पाटला वतीम् ॥ २२ ॥ करीपिणीमतिलाच कुशची महादीम् । मकरी प्रवरांमेनां हेम. घृतवती तथा ॥ २३ ॥ पुरावतीमनुष्णाच शव्या कापाञ्च भारत । सदा नीरामधृष्याच फुशधरां महानदीम् ॥ २४ ॥ सदाकांतां शिवाञ्चेव तथा धीर वतीमपि । वस्त्रासचत्रा गौरीच कम्पना सहिरण्यतीम् ॥ २५ ॥ यरा चौरक- राचापि पचीच महानदीम्। रणचिनां ज्योतिग्यां विश्वामिनां कपिजालाम् । उपेन्द्रा पहलावेन कवीरा मनाहिनीम् । विगदी पिला घेणां तुङ्गवणा महानदीम् २७ इक्षुळा, कृपी, करीषिणी, चित्रचाहा नीचे चलने वाली चित्रसेना, गोगती, धूतपा- | पा, महानदी, गंडकी, { १७ । यौशिकी, त्रिर्दिया कृत्या, निविता, लोहतारणी, रहस्या, शनकुम्भा, सरयू , चर्मण्वती स्त्रवती, हस्तिसोपा, दिशनदी, शरारती, पौणी, वेणा, भीमरथी, कावेरी, चलुका, वाणी, शतश्ली, नविारा, महिता, मुम | योगा, अंजना, प्रविना, कुंडली, सिन्ध, राजनी, पुरमालिनी, पूर्वाभिरामा, अमोघ वनी, भीमा, पालाशिनी, पापहरा, महेन्द्रा, पाटलावती, करीपिणी, असिक्ली, मुश चीरा, महानती, मकरी, भवरा, मेना, हेमा, घृतवती, पुरावती, अनुप्णा, शैव्या, कायी, सदानीरा अधृपया, महानदी, कुशधारा, सदाकान्ता, शिवा, परिवती, वस्त्रा, सुवस्त्रा, गौरी, कंपना, हिरपती, परा, वारकरा, महानदी, पंचमी, । २० । रथ चित्रा, ज्योनिस्था, विश्वामिना, कपिजला, उपेन्द्रा, दहला, कुवीरा, अंबुवाहिनी, Vedavats, the Tidiva, the Ilshula, the Krimi, the Kanshini, the Chitravahy, the subterrincan Chitraseny, the Come's, the Dhoot papa, the Mahanadı, the Gandakı, the hau shihi, the Iridiva, the Kritya, the Nichita, the Lohithranı, ti e Rahasya, tho Sbathumbha, the baryu, the CharlaniVati, the Vetrvati, the Hasticoma, the Dishnadı, the Sharavati, the Pigoslını, thic Vena, the Bhimrathi, the Cavery, tha Chuluka, the Jam, the hatreli, the Neerara, the Mahity, the Suprayogn, the A njuna 20, the l e vitra, the Kundali, the Sindhu, the Rajani tho Purmalını, the Fürra' bırma, the Affioghvati, the Bhima, the Palashni, the Taphera, the Kahendra, the Patalavatı the Karishini, the Asıklı, the Kushchira, the Malanadı, the Makri, the liavara, the Mena, the Hema, the Ghritratı: the Puravati, the Anushna, the Shuvga, the Kasee, the Sadınıra, the Adluislıy., tlie Kus'dharı, the Sadabantı, the Shiva, the Brsati, the Bastra, the Susustra, the Goul, the Cimina, the .

[482] Mahabharat विदिशां कृष्णवेणांच तानांच कपिलामपि । रालु सुचागां वेदाभ्यां हरिमाया महापगाम ॥ २८ ॥ शीघ्रांच पच्छिलाञ्चैव भारद्वाजी च निसगाम् । कौशिकी निगा शोणा वादामध चन्द्रमाम् ॥ ॥ दुर्गा चित्रशिलांचैव प्रक्षधेध्यां वृहद्वतीम् । यवक्षामथ रोहीच तथा जाम्बूनदीमपि ॥ ३० ॥ सुनसां तमसां दासी वसामन्या वराणाम् । नीलांधृतवतीचैव पर्णाशाच महानदीम् ॥ ३१ ॥ मानवी वृषभांचैव ब्रामेभ्यां वृहत् धनम् । एतावान्याश्च वहया महानद्योजना घिप ॥ ३२ ॥ सदानिरामया कृष्णा मन्दगामन्दवाहिनीम् । ब्रह्माणीञ्चमहागौरी दुर्गामपि च भारत ॥ ३३ ॥ चित्रोपलां चित्ररथां मञ्जुलां वाहिनी तथा । मन्दा फिनी वैतरणी कोशां चापि महानदीम् । भुक्तिमतीमनगाच तथैध घृपत्ताहवयाम् ॥ ३४ ॥ लोहित्यां करतोयाच तथैव वृषकाइपयाम् । कुमारीमृपिपुल्याञ्च मारि विनदी, पिजला, वेणा, महानदी, तुंगणा, विदिशा, कृष्ण वेरणा, ताम्रा, कापला, । २७ । खलु, भुवामा, वेदावा, हरिश्रावा, महोपमा, शीघ्रा, पिच्छला, भारद्वाजी, निम्नगा, निम्नगाकौगिकी, शोणा, पाहुदा, चन्दमा, दुर्गा, मंगशिला, ब्रह्मयोध्या, हद्वती, याता, अवरोही जांबूनदी,सुनसानमता,यासी, वसा,वरुणा अमसी,नीला, धृतिमती, महानदी पर्णाशा, माननी, टपभा, ब्रह्ममेध्या. हद्वती इत्यादि सब नदियों का जल पान करतेहैं । ३१ । पोर हे राजा इनके सिवाय औरभी बहुत मकारकी मदानदी है जैसे कि सदानीरा, अया, कृष्णा, मंदगा,मन्दवाहिनी ब्राह्मणी,महागौरी, दुर्गा, चित्रोपला चित्ररथा, मंजुजा, वाहिनी, मन्दाकिनी, वैतरिणी,महानदी, कोशा, मुक्तिमती, मनिगा, पुष्पवेणी, उत्पलापती, लोहित्या, करतोया, पका नाम नदी, Huanvati, the Vara, the Virakand, the Panchmm 25, the Rath. clutra, the Jyotiratha, tho Vishwamitra. thi Kapinjala, ihe upendra the Balul , the Kuvira, thu Ainbuvahını, the Vınadı, the Pinjala, tlie Vena, the Tungsena the Bidishi, the Kirshnavena, the Tamrs, the Kapilo, the Klinlu, the Suvema, the Ved'ishia, the Harishurin, tho Maliopama tho Shiglırı, tlie Pichala the Bharadwaji, the Nimnngn, the Nunnaga hausluki, the Shorl 1, the Vahuda, the Clandraina, tho Darga, tlie Clutrashuin, the Brahmabodhyn, the Brid wati, the Yaraksha, the Athrohi, the gambundi, the Sunnss, the Tamast, the Disl, the Vasa, the Vas, the Amasi, the Nila, tho Dultimatl, the Pannasha, the dansi, the Brashabha, the Brnhionmedliya, tlic Vriladw ati and others 31. Besides these there are othei liters, such as the Sudanırı, thc Ayn, tlio kristinn, tho Mandia, the Mandsahint, the Brahmint, the Mahngauri, the Durga, the Chitropilt, the Chitrarathi, the NManjula, the Valuni, the Mandakını, the 101slim, the Ko lia, the Juhtimntı, thic Aniga, thic भीष्मपw BIISTHA PARY [4283] पाच सरस्वतीम् । ३५ ॥ मन्दाकिनीसृपण्यांच सी गलाच भारत। विश्वस्थ मातर सर्श सर्वाद महाफला ॥ ३६ ॥ तथा नद्यस्त्वम्याशा शतशोधस हनशः । इत्येता सरितो राजन् समात्याता यथास्मृति ॥ ३७ ॥ मतमध्ये जनपदानिवोध गदतो गम । तमे कुरपाचाला शाल्वामाद्रे यजाङ्गला ॥ ३८ ॥ शूरसेना पुलिंदाच बोधा मालास्तथैव च । मत्स्या कुशल्या सौशल्या कात य कानिकोसला ॥ ३९ ॥ चदिमन्स्यकम्पाश्च भोजा सिन्धुपालन्दका । उत्तमाश्च दशाच मेकलाश्चोत्पल. सह ॥ ४० ॥ पाचाला. कोसलाय नेव पृष्ठाधुरन्धग । गोधा मदकालिदाश्च काशयोपराशय ॥ ११ ॥ जटरा सुराश्चैव सदशाव भारत । कुत्तयोऽय तयश्चन तचापरघुन्तय । ५१ ॥ गोगता मन्दका. सण्डा विदर्भा रुपवाहिका । अश्मका पाडुराष्ट्राश्च गोपराधा परीतय. ॥ ४३ ॥ आध राज्यकुशायश्च मल्लराष्ट्र करम् । वारवाश्यापवाहाश्वचाश्चक्रातय शका कुमारी, ऋषिकुल्या, मारिपा, सरस्वती । ३० । सुपुण्या, मन्दाकिनी, सर्वा, गंगा, यह सम्पूर्ण नढी विश्वकी माता और महाफलकी देनेवाली हैं इसी प्रकार हजारों नदीऔरभीगुप्नह हेराजा यहनदियांनने सरणके अनुसार वर्णनकी। अवम देशोंका वर्णन करताहं वहां यह कुरुडेशपांचालदेश,शाल्व,मायनांगल,शरमेनदेश,पुलिन्द, योगामाला, मत्स्पदेश,कवादिदेश,मौगल्य,कुन्नीदेश, कान्तिकोशलदेश,चेदि,मत्स्य, करूप, भोज, सिन्न, पलिन्टक, उत्तम दगार्ण देश, मेकल, उत्कल, । ४० । पालाल कोशल, नैकपृष्ट, घुरंसर, बोरा, मठ, कलिन्द, काशय, परकाशय, जठरा, कुकुरा, दगार्ण देशयुक्त, कुत्प, अन्त्य, अपरकन्त्य, गोमन्त, मन्दक, खंड, विदर्भ, स्पवाहिक अश्यक, उत्तर, गोपराष्ट्र, करीत, अधिराज्य, कुशाय, मल्लराष्ट्र, केवल, वारवास्प, Pushpreni, the Utpalarati, the Lohitia, the Kartoya, the Vrishaha, th• Kumar] the Rsukulya, the farisha, the Sarasnati 35, the Supunya, tho Mandakini, the Sarra and the Ganga. All these rivers are motliers of the world and a cource of great profit There are thons ands of others unknorn. I have given thee, ling, all the names that I remembered. 37 I shall nor mention the names of countries Kuru, Panchal, Snala, Judia Shursen, Pulmd, Bodha, Jala, Jalaya, Kush, Yoshlaya, Kuniz, Koshal, Chedi, Matsya, Earush, Bhoj, Sindhu, Pulindah, Daslarna, llc al, Ull al, 40, Panchal, Koshal, Nar-prisht, Dhurandhar, Bodha, Aladra, Kalind, Kashya, Parlashya, Jalhara, Ankura, Dasharn, huntya, Atantya, Apar I untya, Gomunt, Mandal, Khand Vidarbh, Nuprull, Å shuul, Uttar, Goprashtra, Kart, Adhirajya, Kushadya, Malla Keval, Farrasya, 14284] Mabablant (४०८४) ॥ ४४ ॥ विदेहा मगघा स्त्रक्षा मलजा पिनयास्तथा । या पद कालजात्र यरल्लामान पाच ॥ ४५ ॥ मरा सुदेष्णा प्रहलादा माहिका शशिकास्तथा । बादलीमा चारपानाच भाभीरा कारतोपा ॥ ६ ॥ अपाता पगन्ताश्च पञ्चालामण्डला । अटचीशिपराश्चैप मरभूताच मारिप ॥ ४७ ॥ उपावृत्ता नुवृता स्वरादा कैश्यात्तथा । मुदापरान्ता माया रक्षा सामदारकुटा ॥४९॥ अनाथ वदवो राजनन्तर्गियोसाधेर च । यहिगियासारजा मागयामा नवर्जका ॥ ५० ॥ समतरा प्रावृपया भार्गवाच जना घप । पुण्ड्रामा किरा तात्र सुदृष्टया यामुनास्तथा ॥ ५ । शमा निपादानपधास्तधैवानत्तनैना । दुर्गाला प्रतिमस्याश्च कुन्ना कोसलास्तथा ॥५२॥ तीरमहा शूरसेना ईजिका कन्यकागुणा । दिलमारा गसीगश्व मधुमत सुकन्दका ।। ५३ ॥ काश्मीरा सिन्धुसीयारा गान्धारा दर्शकास्तथा। सभीसारा उलूनाश्च शेवला वारि फास्त था ॥ ५४ ॥ दारू च वानवादी यातजामरथारगा । वव्याद्याश्च कौरव्य सुदामान समद्धिका ॥ ५५ ॥ या करीषम-वापि कलिग्दोपत्यफास्तथा । वायचोदशा अपनाह, वस्वक्रान, शक, विदेह, मगर, स्वक्ष्य, मलय, विजय, अग, ग, कलिंग, यकृल्नोम । ४ । मल्ल, सुदेण, माठ, माहिक, गशिक, वाइलीक, वाट्धान, आभीर, कालतोषक, अपरान, परान्त, पाचाल, चर्ममडल, अबी, शिखर, मेरुभूत, मारिप, अपाटन, अनुपाटन, सौराष्ट्र, केकय, कुड़, परान्त, माहेय, कल्य, मानिष्क ट, अन्न, और हे राजा इनके विशेष पर्वतों में अनेक, देश आर पहाडों के बाहर अग, मलज, मगम, मानवक, महत्तर, प्राधियेय, भार्गर, पोएट्र, भर्ग, किरात, मुद्देष्ट, या. मन । ८० । शक, निपाट, निपध, पान, नमन, दुर्गाल, ननिमत्स्य, कुनन, कुशन, तीर-ग्रह गरसेनाईजककन्यकागण निलभार नभीर, यधुमन, मुकन्दक कास्मीर, सिंधु सौवीर, गापार दर्शक, अभिसार, उलत, शान, पाहलीक, दर्वी, नार्वी, वातज, मोरंग, वाहवाय, कौरव्य, मुद्दामान, सगल्लक, वना, करीपक, कलिन, उपत्यका Apath Pakr totka Sial Vagua Sırask Julaya Tyaja Angting halin Inllo : 45 Halla Sillcshna Pra Thad Jahch Shas) 1/ Tuhi! r !!! all, holtryck 4 parant Purant Panchal Cinemaz trdi disuhar Jerubhui jarish Apalrit Anups34 SK sr? 2019 Irlayı hall Parant Jihoya hashya Samudri esh/ 11 dolers which are situated in and oil of hull , My Marrdh Hinraryal, Mahyam Pratisheer Bhar. I Toind Bliar, firat Sudesht Yarnun 50 Shah Vs IV Ludhi Inart Sant Duga Prode in itsy huntil hul Thal Sunn Ink เinalgirl Tiliar Simur Indhumatta Vlul anda' Illinen Srdhu, Shuur, Gall ar Di Inl, Ilur Ulit Slimus Ilik Derl, avan des lits Vli lini lalu dia hauri.17 Si laman Samullih Bishn harrink hainl Untyah Vrumsu Dharn Hum Kust मालवामरा (४२८५) भीमपर्च BHIS HA PALY [4285] पार्श्व रोमाण कुशायन्दवः ॥ ५६ ॥ कच्छा गोपालाक्षश्च जागला. कुरुवर्णका । किगता व सिद्वा देवास्ताम्रालयकाः ॥ ५७ ॥ हादाम्लेला संसिसीधाः 'पार्वतीयाश्च मारप । अधापो जनपदा दक्षिणा भातर्षभ ॥८॥ द्रविडाके- रला. प्राच्याभूापा पनयासिकः। कपाटा महिपा विलापमापा ५९ | झिल्लिका. कुन्तलाश्चैव लोहा नभक नना. यौटकातिया कला के कणा ॥ ६० ॥ समंगा. करकाश्चैव कुरोगामापा । ध्याजन्यु गवसके, तास्त्रिगर्मा शाल्वसेनप यूका कोक वका. प्रोष्ठा समवेगवशास्तथा । तवांवध्य धुलिका पालन्दा वलाल सह ॥ ६२ ॥ मालवा बलुवाचव तचापरवल्लया फलिन्दाः कालदाय कण्डला करटास्तथा ॥ ६३ ॥ मूपमास्तगपालाश्च सनी पापटसञयाः । थठिदा पाशिवाटा तनयाः सुगधाम्तथा ॥ ६४ ॥ ऋपिकाधि- दभाः काकास्ताणा परतहणाः । उत्तराधापरे म्लेच्छाः राभरतसत्तम ॥६५॥ यवानाचीनकाम्बोजा दारुणाम्लेच्छजातय । सनहा फुलत्याचगा पारसिकै वानायु, दशार्ण, रूम, कुशविन्द । ५५ । कच्छ, गोपालकक्ष, जांगल, कुरुवर्णक, किरात, वर, सिद्धा, वैदेह, ताम्रलिप्तक, और, पार, सेसिकत, पायतीय, मारिष | इसके विशेष दक्षिणमें । ५७ । दविण, केरल, मान्य, भूपिक, यनवासिक, कर्णादक माहिपक, अविकल्य, मूपक, जिल्लिक, कुन्तल, सौहद, नभकानन, कौकुट्टक, चोल, कोंकण, मालपानक । ६० । समंग, कारक, कुरर, अंगार, मारिए, वजन्यत्मवसंकेत, स्त्रिगर्स, शायसेन, वक, कोकवक, प्रोष्ट, समोगवश, विन्ध्य, चुलिक, कल्कल सहित पुलिन्द, मालव, मल्लव, परवल्लभ, कुलिन्द, कालद, कुंडल, फरट, यूपका तनवाल, सनीय, घटसुंजय, अलिंदाप, शिवाट, तनय, मुनय, ऋषिक विदर्भ, काक संगरण परतंगण हे भरतर्षभ इसीप्रकार अन्य उत्तर देश वासी कोरचित्त और म्नेछिनाम | मे प्रसिद्ध है, यवन, चीनी, कांबोज, सकृद्गाह, कुलत्य, आहण, पारसियों समेत हूण । ६५ । यह सब म्लेच्छनाति के लोग भयकारी है रमण, चीन, दशमालिक vind 55, Cutch Gopalkuksh, Jangal, Karuvarnak, hirat BarLar, Sidha, Vardeh, Tamralıptıb, Aundra, Paundra, Sarsılat, l'aratiya, Marish and besides these, in the South, Dravin, Keral, Prachya, Bhusluk, Vanvısıh, Karnatah, Mahishal., A vikalya, Mushak, Jillib; Kuntal, Sauhrid, Nabhkanan, Kaukuttah, Chol, Conean, Malsanal, Gi) Samang, Kanak, Kumar, Angar, Maurnsh, Dhwajany utsaLsanket, Strigart, Shalsasen Vak, Kokvah, Froshth, Samvegvash, Bndhya, Chulil, Pulind with Kalkal, Malar, Mallas, Parvallabh, Kulind, halad, hundal, Karat, Mushah, Tanral, Suniya, Ghatsrin. jaya, Alindap, Shivat, Tapaya, Sunaya, nishik, Bidarlh, Kal., Tangan, } artangan, and others. The noi thern people are hardhcarted Mlechas These arc Yavang, Chinese, lamtojas, Si ntgrahs, Kalathi, Alun, erd Persians. 65, The Ramans, the Clunese , - [4236 | Whabharat { ४२८६) सह ॥ ६ ॥ तथैव रमणाश्चानास्तथैव दशमालिका । यो पनिवशाय वैश्य भद्रपुलानच ॥ ६७ ॥ शूद्राराध दादा वाश्मीरा पत्तिभि सह । वाशी रावा तनारायद हवा गिरिगहरा ॥ ६ ॥ यात्रपा सभरद्वाजास्तथैवस्तनपायका । प्रोपकाय वालनाश्व विराटश्च जातय fi६९ ॥ तारा हन्यमानाश्च तथव कर भजका । एत चन्य जनपदा प्राच्यादीच्यास्तथैवच ॥ ७० ॥ रद्दशमानेणमया देशा सकीर्तित विभो । यथागग पर चाप त्रिवर्गस्य महाफलम् ॥ ७७ ॥ दुहत धन कामधुक भूमि सम्यगनष्टिता । स्था गृध्यान्त राजान भूग धर्मार्थ शायदा ।। ७२ ॥ त त्यजन्त्याहये प्राणान् चसुगृद्धास्तारिधन । दवम नपकायाना राम भूमि परायणम् ॥ ७३ ॥ यान्यस्यावलम्पन्ति सारमेया यथाामपम् । राजानो भरतश्रेष्ठ भक्तमामासु धाम् ॥ ७४ ॥ नचापि तृप्ति कामाना विद्यतद्यापिकाय चित् । तस्मा परिग्रह भूमेवतात करपाण्डवा ॥ ७५ ॥ सानाभेदेन दानेन जो कि क्षत्रीयोनिले उत्पन्न वेश्य और शद्रों के कुल हैं शुद्र, आभीर, दरद पशुओं समेत काश्मीर, खाशीर अर्थात् [ घरासानी ] अन्तवार, पल्हव ( जिनकी भाषा पहलवी प्रसिद्धः) गिरिगहर, प्रात्रेय, भराज, सनपोपिक, मोपक, कलिंग, किरातों की जाते, तोमर, इतमार्ग, करमजा यह और अन्य पूर्वीय और उत्तीय देशहे, हे समर्थ धृतराष्ट्र यह मते सर देश उद्देशमात्रसे कहे । ६१ । मनोरथों के पूर्णकरने वाले कामनु रूपी पृथ्वी श्रेष्ठपोषित गुण ओर वनके समान त्रिवर्ग अर्थात (धर्म अर्थ काम ) हिरण्यगर्भरूपी फलके भी देनेवाले धर्म और अर्थ में कुशल बुदि शरवीर राजालोग उस पृथ्वीकी इच्छापक लालसाकरते हैं वह शीव्रता करनेवाले धनके लोभी युद्धभूमि में अपने प्राणों को त्यागकरने हैं, यह पृषी इच्छानुसार देवता और मनुष्यों की देहोंकी रक्षाका स्थान है हे भरतपशी पृथ्वी के भोगने की इच्छा रखनेवाले नीलोग परस्पर में एक एक को मारते हैं जैसे कि कुत्ते मानके टुकडे करते हैं इसीप्रकार से अवतकभी किसीकी तृष्णा न्यून नहीं होतीहै हे राजा इसी and the Dushinaliks who ne i aishiy as and shudrus descend d fiom Kshatry zs, ac very dreadtul Abłurs, Darads haslıncre Klastur, Antchar, Pallar Girigahvar, Atitya Bharadwaj, Stanposlıla, Polith Kilma. Kiri, Tomar, Hansmarg and Karblianjak nre other castorn and northern tribus and countries. I last now told thice, 11 Iso Dliritrushtrn the names of all the countries. This wonderful carth, giver of all dwes hbe the fainous Kamdhenu, froin whida virtuc profit and pleasure may be obtained is coveted lig virtuous and porernal lings who rashly love their lives I he earth is the refuge of gods and human beings. It is the lone of contention for poncrful kshatryas who desire to obtain it and whos anric is never #tisfied It is this that the hauriro and the Pandavas aro (४२८७) भोगw BIS111 PARY [42871 दण्डेनैव च भारत । पिता प्राता च पुत्राश्च सन्चोश्च नरापहः । भूगिभवति भूतानां सम्यगछिद्रदर्शना ॥ ७६ ॥ इति श्री महाभारत भीष्णपाण जम्बूखण्ड विनिर्माणपर्वणि भागिनदीदेशाद नागकयने नयमां ॥१॥ धृतराष्ट्र उवाच । भारतम्यास्प वपस्य तपा हैमवतस्पच । प्रमागायुषः सूत घलञ्चापि शुभाशुभम् ॥ १॥ अनागत मनिफ्रान्त वर्तमानंच संजय । माचक्ष्य सेवि स्तरेण हरिव तथैवच ॥ २॥ समय उवाच । चत्वारि भारत वर्षे युगान भरतर्षभ। कृतं प्रेता द्वापरंच नियंच करवधन ॥ ३ ॥ पूर्व मृतयुगं नाम ततस्रतायुगं प्रभो । स. क्षाद् द्वापरस्याथ ततरितम्य प्रवर्तते ॥ ४॥ चत्वारितु सहस्राणि धर्माणकरुसत्तम । आयुः संरया कृतयुगे संरयाता राजसत्तम ॥५॥ तसा त्रीणि सहस्राणि यायांगनुजा धिप । द्वे सहस्र द्वापरे तु मुवि तिष्ठन्ति साम्प्रतम् ॥ ६ ॥ न प्रमाणस्थितिबस्ति सिध्य कारण से कौरव पाण्डव भी साय, दाप, भेद, दण्ड इन चारों नीनों के द्वारा पृथ्वी के विजय करनेमें अनेक उद्योग करते हैं, जिसको अच्छे प्रकार से पूरा छिद्र दर्शन है उसीकी पृथ्वी पिता भाई पुत्री आकाश और स्वर्गरूप भी होती है । ७६ ॥ अध्याय ॥ १० ॥ धृतराष्ट्र बोले कि हे मृत संजय इस भरतपण्ड और हेमवतखण्डकी अवस्था- ओंकी संख्या बल शुभाशुभ भूत भविष्य वर्तमानको भी व्योरेदार कहिये इसी प्रकार हरिखण्डको भी.काहये संजयवाले कि हे भरतर्षभ और कौरवों की द्धि चाहनेवाले धृतराष्ट्र भरतखण्ड में चार युग है सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग प्रथम सतयुग फिर त्रेता फिर द्वापर और द्वापर के अन्त से कलियुग जारी होताहै है । ४ । कौरवोत्तम राजेन्द्र सतयुगमें चारहजार वर्षकी अवस्था होती है बेतामे तीन हजारकी द्वापर में दोहजार वर्षकी और हे राजन् कलियुगमें अवस्था की संख्या नहीं है इस कलियुग में उत्पन्नहुये वालक और गर्भ में वर्तमान बालक striving to passess by negotiations, disuiun, gift and bloodshed It stands in the relation of father, mother, daughter, firmament and paradise to him who looks well to it. 7. CHAPTER X "Let me know, Sanjaya," said Dhritrashtra, “all about the period of life, strength, the good and bad things, the future, past und present of Bharat-khand, Hemrat-khand and Harikhand." "Best of the descendants of Bharat and dasirous of the welfare of the Koura. vas replied Sanjaya,' there are four yugs, namely, Krit, Treta, Dwapar and Kali successively in Bharatvarsh Four thousand years is the duration of life in the first, three thousand in the second and two thousand years in the third; but in the last or Kali there is no fixed ईरा ॥ [4268} Mahabharat (४२८८) ऽस्मिन् भरतर्पग । गर्भस्थाश्च द्रिय तेऽन तथा जाता नियन्तिच ॥ ७ ॥ महाबलामहा सत्या प्रवागुण समन्विताः । प्रजापन्तेच जाताच शतशोऽथ सहनश. ॥ ८॥ जाता. सतयुगे राजन् घनिन प्रगदर्शना । प्रजायन्तच जाताश्च मुनयो चै तपोधनाः ॥ ६ ॥ महत्साहा महात्मानो धार्मिका सत्यवादिन । प्रदर्शना यपुमन्तो महावीर्या धनु ॥ चगायुाध जाय ते क्षनिया शासत्तमा । त्रेताया हनिया राजन् सर्वं पे चमचर्तिन । ॥ आयुष्मन्तो महावीरा धनुर्द्धपारा युधि । जायने क्षत्रिया. समस्त्रता यशवर्तिन ॥ १२ ॥ सर्ववर्णाथ जायन्सदाश्चैव च द्वापरे । महोत्साहनीयवन्त पारपरजयोपण ॥ १३ ॥ तेजसाल्पेन सयका क्रोधा पुरुपा ना । लुधा अनृतकाश्चैव तिप्ये जायन्त भारत ॥ १४ ॥ ईया मागस्था के धो मायाऽस्मा तपैयच । तिथे भवति भूताना रागोलोभ. श्च भारत ॥ १५ ॥ सक्षेपो वत्तते राजन् द्वापरोस्मानसाधप । गुणोत्तर हमवत हरिव तत परम् ॥ १६ ॥ इति महाभारते भीमरणि भारतवर्षे कृत द्यानुराधे गायनिरूाणे दशमोऽध्याय १० समाप्तच जम्बूसण्ड विनिर्माणपर्व ।। भी मरते हैं और सतयुगमें बड़े बलिष्ठ पराक्रमी ओर युद्धिाआदि गुणयुक्त सैकड़ों वा हजारों मनुष्य उत्पन्नहोकर सन्तानको उत्पन्न करते थे और धनी मियदर्शन तपोधन मुनि उत्पन्नहोकर सन्ततियों के उत्पन्नका हुये बड़े उत्साह मन धार्मिक | सत्यवादी मियदर्शन उधम वर्ण महापराक्रमी धनुपधारी वरके योग्य शूरोंमें श्रेष्ठक्षत्री उत्पन्न होते हैं और त्रेतामें सब क्षत्री चक्रवर्ती होने हैं । ११ । और बड़े अवस्था वान् शरवीर युद्धमें भनुपधारियों में उत्तम राजाओंके प्राज्ञायी उत्पन्नहोतेहैं द्वापर युगने सत्र वर्ण सदैव उत्साह चित्त पराक्रमी परस्परमें विनयाभिलाषी उत्पन्न होते और कलियुगमे थोड़े पराक्रमी क्रोधी लालची मिथ्यावादी मनुष्य उत्पन्न होतेहे और कलियुग में जीव पारियों में प्रकार क्रोध ईर्पा छन दूसरे की निन्दा और विषयों में प्रीति करनेवाले लालची उत्पन्न होतेहे शोर हे राजन इम द्वापर की प्रमाधि अब थोड़ी रहगई परन्तु हेमवतवण्ड और हारेखंड सम्बोत्तम ।। १६ ।। time of denth ag som dra as soon as they are born while others die in the voinb In Sat yug theru sule hundreds and thousands of wise, strong an l energetic people born to produced children weilthy ascetics of handsome features were born in that age and proluced children Lnergetic, virtuous, truthful and handsome archers of nublo buth and great proiyuss were born among hslitry as in the Treta age all the lishatry things were emp rods 11 They lived long and were bravo warriors, best of archers and firm on duty. In the dwapır ng nll the classes are energetic, desirous of victory over one another and full of prories Men ot Kahage are less warhhe, wrathful, coctous and untruthful In that aga ir börn ciletou3 m n full of santy, nnger, jealousy, ducut and mulice. Thr dicap or age 13 about to come to its close, bat Hemsatkhand and Marihuni aty better than Bharatvarsh i these respects. 16 ૨ (४२८९) framsø Brisur: Pare [4289] ॥ अथ भूमिपर्व ॥ घृतराष्ट्र उवाच ।। जम्बूझण्डस्त्वया प्रोक्तो यथारदिह सजय । विकन्भमस्यमयहि पारमाणन्तु तत्वत ॥१॥ समुद्रस्य प्रमाण सम्यगच्छिद्रदर्शनम् । शाकद्वीपच गेवहि कुशद्वीपश्च सजय ॥ ॥ शाल्मलिश्च तापेन क्रौञ्चद्वीप तथैव च । ब्राह गावल्गणे सर्व राहो सोमार्कयोस्तथा ॥ ३ ॥ समय उवाच । राजनसुप हयो द्वषा यैरिद मन्तत जगन् । सप्तद्वीपान् प्रवक्ष्यामि चन्द्रादित्यो ग्रह तथा ॥४॥ मष्टादश सदस्राणि योजनानि विशाम्पते । पटगतानि च पूर्णानि चिदम्भोजम्वुपर्वतः ॥ ५ ॥ लायणस्य समुद्रस्य विषम्भो द्विगण स्मृत. नानाजनपदातीर्णो मणिविद्रुमचित्रित ॥ ६ ॥ नैधातुविाचनैश्च पर्वतरुपशोभित । सिद्धचारणसकीर्ण सागर परिमण्डल ॥ ॥ शाकद्वीपञ्च वक्ष्यामि यथावदिह पार्थिव । शृणु अन्याय ॥ ११ ॥ धृतराष्ट्र बोले कि हे संजय तुमने जम्वृखण्ड अर्थात् जम्बूद्वीपका वर्णन यथार्थ कहा अब इसके केन्द्र और परिधिकी संरयाको मृलममेत वर्णनकरो और समुद्रकी संख्याको भी कहो और सर दृष्टिगोचर शाकद्वीप दक्षद्वीप, शाल्मलद्वीप, क्रॉचद्वीप इन मत्रको राहु चन्द्रमा और सूर्यसमेत वर्णनकरो । ३ । संजय योले कि हे राजा बहुनमे ऐसे दीप हैं जिनमे यह युग बाविस्तार युक्त है अब मैं मर्य चन्द्रमा और राहुममेत सातोंद्वीपोंका वर्णन करताई जनयूद्वीपका केन्द्र और वृत्तफल अटारह हजार छ सौ योजन है । ५ । और सारी समुद्र का विस्तार इस्से दूना कहा है यह समुद्र नानादेशों से युक्त मणि मृगे आदि से शोभित नानाप्रकार की धातुओं से विचिन पर्वतों से शोभायमान सिद्धचारणों से सेवित चारोंओर मे मंडलाकारहै । ७ । हे राजा अब मैं शाकद्वीपको यथार्थ वर्णन करताहूं हे CHAPTER XI Bhumi Parva -"Thou hast duly described Jambulhund to me Sanjay ?," sud Dlırıtrashtrn; 'give me now an accurate idea of its dimensions and crtent a well as the ci tent of the ocean, of Shaka dwip, of Kushindsip of Slnlmuldwip of Kraunchadwap, of Rahu of Somn and of the Sun, Without leaving any thing" "There are Ohing," replied Sanjaya,'mmy nylands dotted over the carth shall however, descrilk to thec only seven is!nrids besides the moon the sun and the planet kalu Jams udsip extends for cightecn thousand and six launcred yojans 'I he catent of the salt ocean 19 said to be twire this diut cca is covered with many ) ingdoms nnd 14 ndorned with foms and colly It is ilso decked with many mountains coruild with metils of valous kinds The ocean 19 I ९ [4290] Mahabharat (४२९० मेत्य यथान्याय वृधतः कुरुनन्दन ॥ ८ ॥ जम्बूद्वीपप्रमाणेन द्विगुण सनराधिप । विष्कम्भेण महाराज सागरोपि विभागश ॥ क्षीरोदो भरतश्रेष्ठ येन सम्परिवारित. 1 तन पुण्याजनपद स्तन न नियते जन ॥ १० ॥ फुतएवाहि दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुताहि ते । शाकद्वीपस्य सक्षपो यथावद भरतर्षभ ॥ ११ ॥ उक्त एप महाराज किमन्यत् कथयामिते । धृतराष्ट्र उवाच । शाकद्वीपस्यसक्षेपो यथावदिह सजय ॥१२॥ उक्तस्त्वया महाम्राज्ञ विस्तर वाह तत्वत । सजय उवाच । तथैव पर्वता राजन् सप्तात्र मणिभूपिता ॥ १३ ॥ रत्नाकरास्तथा नद्यस्तेषां नामानिमे अणु । अनीवगुणवत् सर्वं तत्र पुण्य जनाधिप ॥ १४ ॥ देवर्षिगन्धर्षयुतःप्रथमो मेरुरुच्यत । प्रागायतो महाराज मतयो नाम पर्वत. ॥ १५ ॥ ततामेघा प्रवर्तते कौरखनन्दन तुम भी न्यायपूर्वक मुझसे सुनो वः द्वीप जग्वीप के विस्तार से दूना है और समुद्र भी विभाग के अनुसार क्षीरोदनामी है हे राजन् जिस समुद्र से यह द्वीप चारों ओर को घिराहुया है उसमें पवित्र देश है वहां मनुष्य नही मरते हैं तो वहां दुर्भिक्ष कैसे होसक्ता है वह क्षमावान तेजगारी है यह तो शाकद्वीप का संक्षेप ठीक २ वर्णन किया अब दृमरी यात क्या सुनना चाहतेहो ।११॥ धृतराष्ट्र पोले कि हे महाज्ञानी तुमने इसशाकदीप का संक्षेप तो ठीक कहा परंतु उसको व्योरेवार मूल समेत वर्णनकरी संजयवोले कि हे महाराज इसीमकार के सातपर्वत इसमें मणियों से भूपित वर्तमान है औरनदियांभी अनेक रत्नोंकी आकारहे इन के नाम में कहताई यहा सर लोग पवित्र और गुणवान हैं देवता गधर्व और पिलोगों से सयुक्त प्रथम पर्वत मेरु कहाजाता है और पूर्व पश्चिमका स्पर्श करनेवाला दृमरा मलय पर्वत | है उस पर्वतसे सब बादल प्रकटहोकर कर्ममें प्रवृत्तहोते हैं ।१५। हेकौरव्य उस्से circular in form and thickly peopled by sidlas and charans. I shall nor speal of Shaldrip L sten to my description Kaurari Its arcs is twice that of Jamrudırıp and the ocean too is twice that island in arca Shakdnp is surrounded on all sides by the ocean The people inhabiting it are righteous and free from death 10 Famine cannot prevail there. The people are forgiving and energetic. Thus is a brief account if Shalad sp O hing, what more do you desire to hear?' "You have given in Sinjay suid Dlırıtrashtra, "a brief nccount of Shahadivin, but I want to hear it in detail, nio 12 "Tlint Island " replied Sinjas n, contains seven mountains dcched with jeniks and full of the mines of gums and prec ous stones There are many rien in that rend Lsten to me as I rexount ther name Every t'uing there is erallent and charming The PM man (४२९१) भीष्मपर्च BRSHMA PANY [4291] प्रभवन्ति च सर्वश | तत परणकौरव्य जलधारो महागिरि ॥ १६ ॥ ततोनित्य मुपादत्ते वासर परभ जलम् । ततो वर्ष प्रभवति चर्पकाले जनेश्वर ॥ १७ ॥ उचैगिरीरैवतको यन नित्य प्रतिष्ठिता । रेवतदिार नक्षन पितामहकृतो विधि ॥ १८ ॥ उत्तरेण तु राजेन्द्र श्यामो नाम महागिार । नवमेघप्रभ.प्रांशु श्री मानुज्वलचिंग्रह ॥ १९ ॥ यत श्यामत्वमापना प्रजा जनपदेश्वर । धृतराष्ट्र उवाच । सुमदानसंशयोमेद्य प्रोक्तोय समयत्वया ॥ २० ॥ प्रजा कथ सूतपत्र सम्प्राप्ता श्याम तामिह । सञ्जय आच । सर्ववेव महाराज द्वोपेषु कुरुनन्दन ॥ २१ ॥ गौर कृष्णध पतगस्तयोर्वर्णान्तरे नृप । श्यागो यस्मा प्रवृत्तो वै तस्माद्यामोगिरि पूर्व की ओरएक जलधारा नाम वा पर्वत है जहांपर इन्द्र देवता उत्तम जलको ग्रहणकरताहै उसी जलसे याऋतु में प्रथ्वीपर वर्षा होती है और उस्से भी वडा पर्वत रैवतक है वहांस्वर्ग में निवास करनेवाला रेवती नक्षत्र सदैव वर्तमान रहताहै यह ब्रह्माजी की उत्पन्न कीहुई रीति है और उपर ओरको श्याम नाम बड़ा पर्वत है वह नवीन यादल के समान प्रकाशवान ऊंचा शोभायमान उज्ज्वलस्वरूप है हे राजा उसीसे मनुप्या ने श्यामकर्ण को पाया है धृतराष्ट्रवोले हे संजय अय तुम ने | यह मुझसे बड़ा संदेहयुक्त वचन कहा हे मूत पुत्र संसार ने कैसे श्यामवर्ण को पाया 100 1 संजय बोले कि हे राजा सब द्वीपामें गोरा नररूप जीव और काला नारायण रूप ईश्वर पक्षी है उन दोनों दों में जिस हेतु से नारायण की कलारूप श्यामवर्ण भकट हुया इसी से उसका नाम श्यामगिरि विख्यात हुआ और उस में निवास | करने व शाक भोजन करने से मनुप्यों ने भी श्यामवर्ण को पाया हे कौरfirst of those mountains is Meru, the secoud is Malaya, stretching towards the cast, on which clouds are produced and disperse on all sides. The next mountam in nimed Jaldhary from which Indra darly takes water of the best quality 16 It is from that water that we get showers in the rainy season Next comes the high mountain known as Ravatah over wluch permanently shines Revatı from the sky by the order of Brahmr himself On the north of these is the huge mountain called Shyam which possesses the splendour of the nowly risen clouds, end 18 very high, be rutıful and ot bright body, lhe colour of these inountuns is dark and therefore the people living there are of dark complexion A great doubt ”sud Dhritrashtra, rises in my mind from what thou has said, Sanjay? \l hat causes the complexion of the people there to be darl : ' 20 • The people". said Sanjaya, " of a place are either fur oi duh or a mited brecd of the two, and it is from the people of darl colou inhabiting there that " “ .

[ 4292] Blahabharat (४२९२) स्मृतः ॥ २२ ॥ ततः परं कौरवेन्द्रदुर्गशैलो महोदयः । केसर केसरयुतो यनो वातः प्रवर्तते ।। २३ ॥ तेषां योजनयिम्भो द्विगुण प्रविभागशः । वाणि तेषु कौरव्य सप्तोकानि मनीपिभिः ॥ २४ ॥ महामेरुमहाकायो जलद कादोत्तरः। जलधारो महाराज सुकुमार इति स्मृन ॥ २५ ॥ रेवतस्य तु कौमारः श्यामस्य मणिकाञ्चनः । केसरस्याथ मौदाकी परेण तुमहापुमान् ॥ २६ ॥ परिवार्य तु कौरम्प दैर्ध्य इस्वत्वमेव च । जम्बूद्वीपेन सहयातस्तस्य मध्ये मह'द्रुमः ॥ २७ ॥ शाको नाम महाराज प्रजा तस्य सदानुगा । तत्र पुण्या जनपदा पृश्यते तत्र शंकरः ॥२८॥ तत्र गच्छन्त सिद्धाश्च चारणा देवतानि च । धार्मिकाच प्रजा राजश्च वापतीय भारत ॥ २९ ॥ वर्णा स्वधानरता न च स्तनेत्र दृश्यते । दीर्घायुपोमहाराज जरामृत्युविवर्जिताः ॥ ३० ॥ प्रजास्तत्र विवर्षन्ते वर्षारिचय समुद्रगः । नघः | चन्द्र उससे आगे बढ़कर महोदय दुर्गशैल केशरी और केशरयत पर्वत है | उसी से वायु उत्पन्न होती है उन दोनोंके विस्तार की संख्या क्रम से एकसे दूसरे की दूनी है हे राजा इनके मध्यवर्ती ज्ञानियों ने यह सात खण्ड वर्णन कियेहैं जिनके महामेरू, महाकाश, जलद, समुद, उत्तर, जलधार, सुकुमार यह सातनाम वर्णन किये हैं, रेखेत पहाड़ का खंड कौमार और श्याम गिार का खण्ड मणिकांचन है । २५ । केदार पर्वत का खण्ड मोदाकी है उससे परे महापुमान् है जो छोटे बड़ों को घरेहुए है उसद्वीप में एक शांकनाम बड़ा व जद्वीप के जम्बू दृक्षकी समान है और सब मजा उसकी सेवामें तत्परहें इस द्वीप सूक्ष्म देहधारी होने के कारण सब वर्ण अपनेर धर्मों में प्रीति रखने वाले बड़ी अवस्था वाले जरा मरण से रहित है जहां चोरनहीं दिखाई देने हैं वहां मजा लोगों की ऐसे सृद्धि होती है जैसे कि वर्षा the mountains are called blach Afte, thus crine the large impregnablo mountains Keshu and Keshar over which fragrant breezes constantiy blow. Lich succeeding one of these is coudlo tio size or tho forincr one That island is divided into seven parts, namely Blahancru, Malinkash, Jalad, Kumud, Uttar, Jaldhar and Suhamar. Tlie portion containmg Revat mountains, is called Knumar and that containing the black mountains, is Manil anchan. The portion containing hedlar hills is called Mindshi Beyond this 19 Malinpuman w lich surroundis ju ing laryu and smull ones. Thint island contains a Ingre tree known as Shah which is a large as the Jawru tree of Jou ul.liund lhe people of tint country adore it. Possessing dime lalies, the people of all clases th re ale loiers of virtue, long loved and free foon old age anl d'ath There are not fouud there.

(४२९३) भीष्मपर्व BIISHIA PV [4223] पुण्यजलास्तत्र गहा च पायागता ॥ ३१ ॥ सुमारी स्मार्गच शीताशी वेणियातया । महानदी च कौरव्य तथा गाणजलानदी ॥ ३२ ॥ चधाका चैव नद्रामात सत्तम। तन प्रवृता पुण्योदान्य करु लोहह ॥ ३३ ॥ सघन पा शतान्यच यतो वर्षति वासव । नतासा नामधेयानि परिमाण तयैश्च ॥ ३४ ॥ रामचनपी सख्यातु पुण्यास्ता हि सरिद्वप । तर पृण्या जमादाश्चत्यागेरारसम्मता ॥३५॥ मगाव मशकाश्चेव मानसा गन्दगा तथा । मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा स्वकीनरतानृप ॥ ३६ ॥ मशकेषु तु राजन्या धार्मिका सर्वकामदा । मानसाश्च महाराज वेश्यध मोपजीविन ॥ ३७ ॥ सर्यकामसमायुका शूरा धर्मार्थनिश्चिता । शूद्रास्तुपन्दगा नित्य पुरुषाशीलिन ॥ ३८ ॥ न तन राजा राजेन्द्र न दण्डो नच दण्डिका । ऋतु में नदियों की चाद्ध होतीहै। ० । वहां नदियां पवित्र जलवाली हैं और बहुत रूपधारी गंगा भी वर्तमान हैं उनके सिवाय मुकमारी, कुमारी, शीतासी, वेणि का, महानदी माणिजलानदी, चक्षुवर्धनका नदी इत्याद लाग्यों नदियां पवित्र जल वाली है जहांसे इन्द्र जलको लेकर वर्षा करता है उनके नाम विस्तार दैश्य इत्यादि संरयाकरने के योग्य नहीं हैं वह उपम नदियां पवित्रता और पुण्यकी वढ़ानेवाली है वहां सग्लोकों में प्रतिष्ठित पवित्र चारदेश हे वह मृग, मशक मानस, मन्दग नाम से प्रसिद्धहै । ३० । मृगनाम देश में बहुतसे ऐसे ब्राह्मणहें जो अपने कमो में सदैव महत्तहैं और मशक देशमें ऐसे क्षत्री लोगहे जो धर्मचारी और सब मनोरयों के देने गाले हे मानम देशवासी वैश्य धर्म से निर्वाह करने वाले हे मन्दग देग के रहने वाले गृह लोग धर्मके अभ्यासीहे हे राजेन्द्र उन देशोंमें न राजा न दण्डहै न दण्डधारी हाकिमहै वहां सरमजालोगही धर्मज होकर अपने धर्मों से परस्पर की रक्षा करतेहैं It is and the people grow lile rivers in the rains 30 The rivers there have pure water and Gang, too of many forms flows there Besides these there flow the Sukumari, tue huunari, the Shitasi, the Venka, the Mahanadı, the Manijalı, the Chabahubardhanaha and thousands others of pure water from which Indra draws water to ponr as rain beyond my power to mention their umes The nisers are sin cleansgirers of purity That land contains four provinces, boora MIrig, Masbal, Minus and Blanda. Mug is inhabited by numbers of Brahnians firm on their duty, ashak is mbabited by hshatryas that are virtuous and generous, tlie inhabitants of Manas are Vaishyas living by trade and those of Mandag are dutıful Shudras Those countries hare nather Lings nor punishment nor viongdoers for the people know then duties and are firn on them We not only this ing and [42941 Valablarat (४२९४) स्वधर्मेणेच धर्मज्ञास्ते रक्षन्ति परस्परम् ॥ ३९ ॥ एतावदेवशक्य तु तत्रद्वीपेप्रमापि. तुम् । एतदेवचथातम्यं शाकद्वीपे मह जसि ॥ ४० ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भूमिपाणि शाफदीपपर्वणि एकादशाऽधायः॥११॥ सञ्जय उवाच ॥ उत्तरेपुच कौरव्य द्वीपेषु धूयते कथा । एप तत्र महाराज ब्रुनश्च नियोधमे ॥ १ ॥ ततोय. समुद्रोत्र दाभण्डोदको परः । सुरोद. सागरश्चैघ तथा यो जलसागाः ।२॥ परस्परेण द्विगुणाः सर्वे द्वीपा नराधिप । पर्वताश्च महाराज समुदै परिवारिता ॥ ३ । गौरस्तुमध्यमे द्वीपे गिनिर्मान शिलो महान् । पर्यत पश्चिम कृष्णो नारायणसखो नृप ॥४॥ तत्र रत्नाान दिव्यानि स्वयं रक्षति केशव प्रसन्न- रचाभवत्तत्र प्रजाना व्यदधत् सुखम् ॥ ५॥ कुशस्तव कुशद्वीपे मध्ये जनपदै सह । उस बड़े प्रकाशवान् शाकद्वीप में इतनाही कह सक्ते हैं और इतनाही सुनने के योग्य है ॥ ४० ॥ अध्याय ॥ १२ ॥ संजय वाले कि हे महाराज वहां पूर्वकहे हुये उसर द्वीपोंमे जिस प्रकारसे कया | सुनी जाती है उसको तुम मुझते सुनो, कि वहां एकतो घृनका समुद्र है दूसरा दधि का तीसरा मदिरा का समुद्र, चौथा मिष्टजलका समुद्र है हे राजा धृतराष्ट्र सबद्वीप और पहाड़ परस्परमें दुनेर समुद्रोंसे घिरेहुये हैं और मध्यवर्ती दीपमें गौर शिलारूप पर्बत है और पिछले द्वीपमें कृष्ण नाम पर्चत नारायणका सखारूप है वहां प्राप केशवमूर्ति दिव्यरत्नों की रक्षाकरतेहैं और प्रसन्नहोकर प्रजालोगोंको मुख देते ५ और कुशदीपमें कुशस्तंभ देशोंसे युक्तहै और शाल्मलद्वीपमें शाल्मली वृक्ष पूजनकिया much about the island of Shaka and it is sufficient for you to hear." 40 CHAPTER XII "llerr the account of the northern Islands, mentioned above," said Sanjaya tn Dhritrashtrn, One of the sets there has clarified butter for water, another contains eurds of milk, the third as full of wine and the fourtli contains biret water. All these islands and muuntains are surrounded by seas that are double their sizc. In the muddlemost island is a mountain of red stono and in the nort island is thic blnch mountain which is a favourite sent of Narayan who protects the divine jufcls there in person and 18 plensed to deal happiness to luis dependents. 5 The Kushia islands consist 'of the (४२९५) भीष्मपर्य BE IS MA PATv [4295 सम्पूज्य ते शाल्मलिश्च द्वीपेशाल्मलि के नृप ॥ ६॥ कांचीपेमहाकोचो गिरीग्लच याकर.! सम्पूज्यते महाराज चातुर्वर्ण्यन नित्यदा ॥ ७ ॥ गोमत पर्वतो गजन् सा. हान् सरंधातुकः । यत्र नित्यं निवसति श्रीमान् काललोचन' ॥ ८॥ मोतिभिःजगतो निय प्रभुनारायणो हरिः । कुशद्वीपेत्तुगजेन्द्र पर्वतो पिठुमेश्चितः ॥ ९ ॥ स्वनामनामा दुर्धपों द्विनीपो हेमपर्वतः। द्युतिम नाम कौरव्य तृत य कुमुदो गिरि ॥ १० ॥ चतुर्थ पुष्पचन्नाम पञ्चमस्तु कुशेशयः । पष्ठो हरि गिराम पडते पर्वतोत्तमा ॥११॥ नेपा मन्तर विष्कम्भाद्विगुण सर्वभागश । आद्भिद प्रथम वर्ष द्वितीय घेणु मण्डलम् १२ तृतीय सुरथाकार चतुर्थकम्बलम्मृतम् । धृतिमत्पश्चमवर्ष पष्ठवप्रभाकरम् ॥१३॥ सप्तमं कापिल वर्षे सतते वर्पतम्भका. । एतेषु देवगन्धर्वा प्रजाच जगतीधर ॥ १४ ॥ जाताहै और क्रौञ्चद्वीपमें रत्न समूहोंका भंडारमहाकाँच पर्चतको सदेव सवर्ण पूजते है हैराजन् उसमें सब धातुओं का रखनेवाला वहुन चापर्वत गोमन्त नामहै जिसके ऊपर श्रीमान् कमललोचन विष्णु भगवान् सदैव निवास करतेहै वह प्रभु नारायण हरि सदैव मुक्त पुरुपोंसे मिलेहुये रहतेहें और कुशद्वीप ही में एक पर्चत मुख्य • वृक्षों से आच्छादितहै वह दुर्धर्प पर्चत स्वनाम नामसे प्रसिद्धहै इसमे दूसरा हेम पर्वत है तीसरा द्युतिमान कुमुद नाम गिरि है । १० । चौया पुष्पवान नामहै पांचवां | कुशेशय नामहै छठा हरिगेरि नाम है यह छओं उत्तम पर्वत हैं इनका मध्यवर्ती विस्तार पूर्वक विभाग के अनुसार दना है प्रथम खण्ड प्रौद्भिद है दूसरा वेगु मण्डल है तीसरा स्थाकार है, चौथा कंबल है पांचवां धृतिमत् खंडहै छटयां प्रभाकर नाग सण्ड है सातवां कार्पिल खण्ड है यह सातों पर्वत स्वण्डों के विभाग करने province of husbastambh and Shalmalı tree is adored in Shalmolidup And hraunch mountains, the treasury of all sorts of jewels are adored by all classes of peoplo in the Irunch island 7 The islands contains the huge muuutam called Gomant, contunning all sorts of metals, which is the permanent residing place of lotus eyed Vishnu Lord, Narayan or Hari who mingles with emancipated Leings In Kushdwp, there is a mountam, covered with large trees, bearing the same name as the island. Next to it rre Lem mauptains and the third is the glorious hill called humud 10 I he fourth is known as Pushpvan, the fifth is h usheskaya and the sixth is Harigira All these six mountains are the best The intervening space between those six increases in the ratio of one to two as they proceed further north. The first portion is audbhıd; the second is Venumandal, the third is Rathahar; the fifth is Kambal, the fourth is Djiritimatkhand, the sixth 19 Prabhakar and the seventh is Kapilkhand, 14996 ] 1 zl ablisrat (४२९६) बिहरन्ते रमन्ते च न लेपु म्रियते जन । न नेषु दम्यव सन्ति म्लेच्छजात्योपि घा नृप ॥ १५ ॥ गौग्प्रयोजन' सर्वः सुकुमार पार्थिव । अपशिष्टेषु सर्वेषु यायाम मनुजेश्वर ॥ १६ ॥ यधाश्रुत महाराज तदप्रग्रमना शृणुक्रौञ्चद्वीपे महाराज करमा नाम महागरिः ॥ १७ ॥ क्रौञ्चात् परोवागनको वामनादन्धका रक । गन्धकारात् परोराजन् मैनाकः पर्वतोत्तमः ॥ १८ ॥ मैनाकात् परताराजन् गोविन्दो गिरिरुत्तम. । गोविन्दात् परतो राजन् निविडो नाम पर्वतः ॥ १९ ॥ परस्तु द्विगुणस्तेषा विष्कम्भा शवद्धन । देशास्तत्र प्रवक्ष्यामि ताम निगदत. शृणु ॥ २० ॥ क्रौञ्चस्यकुशलो देशा यामनस्य मनोनुग । मनोनुगात् परश्योष्णो (देश. कुरुकुलोद्वद ॥ २१ ॥ उष्णात् पर प्रावरफ: प्राचारादन्धकारक । अन्धका रकदेश त्तुमुनिदेशः पर स्मृत ॥ २२ ॥ मुनिदेशात् परश्चैव प्रोच्यते दुन्दुभि वाले है इनखंडों में देवता गंधर्व और प्रजालोग विहार पर्चक आनन्द करतेहैं उन में मनुष्य नहीं मरता न चोर म्लेच्छ जाति आदि के लोग रहतेहैं । १५ । और सब प्रजा गौर वर्ण मुकुमार होतेहैं इनके सिवाय शेपद्वीपों काभी तुमसे वर्णन करताहूं इसको आप सावधानीसे सुनो कि द्वीपमें क्रौञ्चनाम वापतहै और क्रौञ्च से परे | वामनहै वामनसे परे अन्धकारक है अन्धकारक से परे मैनाकनाम उत्तम पर्चत और मैनाकसे परे गोविन्दनाम उत्तम पर्वत है गोषिन्दसे परे निविड़ नाम श्रेष्ठ पर्वत है इनकाही विस्तारद्विगुणित है, इनके देशोंकाभी वर्णन करता हूं उसको तुम मुनो । २० । क्रौञ्चद्वीपका देशकशतहै वामनका देश मनोनुगहै, मनोनुगसे परे उप्ण देशहै उप्णते परे प्रावरक है प्रावरकसे परे अन्धकारक देशहै अन्धकारकसे परे माने देशहै मुनि देशसे परे दुन्दुभी स्थान वोला जाताहै, हे राजन् यह सिद्धचारणों का These seven proymces are divided by mountains and are inhabited by g da, gandharvas and other happy people. They are free from duath, therts and nulechas The people are of wlute completion and delicate I shall now give an account of other islands as I have licard Listen attentrely, hing in the Krunch island, o ling there is a large mountain of the same nime Next to Kraunch is, Vainanal and then comes Andhaharak Next to Andhhar. Oking, is Menal the best of mountains Next to Menak 18 Govind and after the latter, coides the mountain Lnonn as Nind The distance between thcsc mountains incrcases in the proportion of one to tra I shall non tell thee of the countries that lie there, Listen to me as speak of them. 20 The country near Kaunch is called Kushal, while that nez Vaman is Manonug Nest to Manonug is Ushna; after Uslina conics Privare and after Pmara is Andhikara. Tho country next to Andlikar is Munidesh and after Mundesha comes Dundubhisthan full of S.dlins and Charans. The people arc of wluto , 15 - ४२९७) मोगमप BISHA PART [4297] स्वनः । सिद्धचारणसंकीणी गौरप्रायो जनाधिप ॥ २३ ॥ एने देशा महाराज देवगाधर्यसेयिता। पुष्करे पुष्करोनाम पर्वतो मणिरत्नयान ॥ २४ ॥ तत्र नित्यं प्रमवति | स्वयं देवः प्रजापतिः । तं पर्युपासते गत्यं देवाः स महपयः ॥ २५ ॥ याम् भिमनोनुकूलाभः पूजयन्तो जनाधिप । जम्बूद्वीपात् प्रवर्तन्ते रतानि विविधान्युत ॥ २६॥ द्वीपु तेषु सर्यपु प्रजानां कुरुसत्तम । प्राचार्येण सत्येन प्रजानांह दमेनच ॥ २७ ॥ बारोग्यायुः प्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः । एको जनपदो राजन् दीपेचतेषु भारत । उक्ता जनपदा येषु धर्मश्चकः प्ररश्यते ॥ २८ ॥ ईश्वरो दण्डमुद्यस्य स्वयमेय प्रजापतिः । द्रौपानेतान् महाराजा स्तिष्ठति नित्यदा ॥ २९ ॥ स राजा स शिवो राजन् स पिता प्रपितामहः । गोपायति नरश्रेष्ठप्रजाः सजडण्डिताः ॥ ३० ॥ भोजनश्चात्र कौरव्यप्रजाः स्वपमुपस्थितम् । सिमेव निवासस्थान बहुत गोरे वर्णवाले मनुष्यों से पूरित है यह सब देश देवगंधर्षों के निवास और विहार स्थान पुफरदीप में पुष्कर नाम पर्चत मणिरत्नों का रखने- वाला है ।२४। उसमें आप देवदेव ब्रह्माजी निवास करतेहै और हेराजन् उन ब्रह्मा जी को सब देवता और महर्षि योगमनसे पूजन करते हुये सदैव चारों ओरसे उपा- |सना करते हैं उन सब द्वीपों में मनाना के अनेक प्रकार के रत्न जंबुद्धीपसे आते हैं ब्रह्मचर्य सत्यता और पंजाओं की शान्ति से नीरोगता पूर्वकएक से एकद्वीपकी अवस्था दूनीर है इन सब द्वीपोंमें केवल एकही देशहै उसी देश में सब देश कहे जाते है वह एक धर्मरूप देश दृष्ट पड़ता है अर्थात् धर्म फल भोगने के लिये छाद्वीप और जगदीप कर्म और योगकी भूमि है हेराजन् आप प्रजापति ईश्वर दण्ड धारण करके इनद्वीपों की रक्षाके लिये नियत रहताहै वही राजाहै वहीशिवहै वही पिता पितामह आदि हैं । ३० । वही सब जड़ चैतन्य मजाओं की रक्षा करता है हे कौरव यहां के colour. All tliese places are inhalited by gols and Gandharvas. In Pushhar is a mountain, named Pushhar shich abounds in jewels and genis. There always the divine Prajapalı is adored by the gods and great rishis. The geins of Jamvudwip are used there. In all these islands the proportion of celibacy, truth, and self control & roll as the licalth and longevity of the inhabitarets, is double as the place is more and more remote towards north. All these islands together make up one countıy as one religion is professed throughout supreme Prajapati himself dwells there, dealing punishment and protecting this, Islands He is the ling, the source of bliss, the fathar, tlie andra be: ( 30 ) <nd protector of all mureables and iur. moreables. The inlabıtanis of liose places have or shful fuut to. The {4298 } Mahabharat १४२९८) महाबाहो नद्ध भुमन्ति नित्यदा ॥ ३१ ॥ तत पर समानाम दृश्यते लोकसस्पि तिः । चतुरस्र महाराज प्रयास्त्रशत्तु मण्डलम् ॥ ३२ ॥ प्रतिष्ठन्ति कौरक्ष्यचत्वारो लोकसम्मताः । दिगगजा. भातश्रेष्ठ वामनरावतादयः ॥ ३३ ॥ सुपतीकातदा राजन् प्रमिनकरटामुम । तस्याहं पारमाणन्तु न सपघातुमिहात्सई ॥ ३४ ॥ असहयातः स नित्यं हि तिर्यगूर्व मधस्तया । तन वै यायवो पान्ति दिग्भ्य.सं. चांभ्य एवाहि ॥ ३५ ॥ असम्बद्धा महाराज तानिगृहन्ति ने गजा' । पुष्कर पासकाशैफिसद्भिर्महाप्रभः ॥ ३६ ॥ शतधा पुनरेवाशु ते तान् मुशान्त नित्यशः । यसदिच्यमानास्तु दिगगरिह मारुताः ॥ ३७॥ मागच्छन्ति महाराजततस्तिष्ठन्ति वै प्रजाः । धृतराष्ट्र उवाच । परो चै विस्तरोत्यर्थ त्यस समय कीर्तितः ॥३८॥ | दर्शितं छीपसंस्थानमुत्तरं हि समय । समय उवाच । उक्ता दीपा महाराजग्रह धे श्रृणुतत्वतः ।। ३९ । स्वभांनो. कौरवश्रेष्ठ यावदेव प्रमाणतः । परिमण्डलोहा मजालोग स्वतःसिद प्राप्तहुये भोगनको खाते हैं, इसके पीछे समानाम लोकोंकी नि. वास भूमि दृष्ट पाती है हेराजन् वह चतुर्मुख कमलरूपहै और उसका मंडल तेंतीस हजार योज़न है हे राजेन्द्र वहां लोकोंके प्रधान चारदिग्गन वामन और ऐरावत नाम आदिसे नियत हैं और इसीप्रकार तीसरा । ३५ । प्रतीक है चौथा प्रभिन्नकरट है उसका प्रमाण में वर्णन नहीं करसक्ता वह गजसमूह सदैव तिरछा ऊंचानीचाहै इस्से गणनासे बाहर है । ३६ । वहां पर सब ओरकी वायु चलती है वही गज उनको घड़ी प्रकाशवान खिलेकमलों की समान अपनी मासे पकड़ते हैं और पकड़कर शीघ्रही सौ भागकरके छोडते है वही गजोंके श्वासोंकी छोडीईई वायु यहां पातीहै उसीसे सब प्रमालोग जीवते रहतेहैं धृतराष्ट्रवोले हे संजय यह तुमने बहुतवडा विस्तार वर्णन किया और द्वीपों काभी रूप दिसाया अब हे संजय इनके विशप और २ जो भाग है,उन का वर्णन करो संजय बोले हे राजन् मैंने दीपोंका वर्णन किया मा ग्रहाँका वर्णन cat without undergoing any liouble for coihing it After thcsc regions comes the place known as Sahua which, sterlike, thus tuur COINCIE and thirty thrco Vandals. I dore dnell the four dagjes [clephants supporting the fuur quarte 3 of the globe ] ad red lig all. 'lley nre nained Vaman, Airbat, Pratik and Prabluna harat, 1 can not give you an idea of the size is 'he length, lurandth and Ulich ness of their lxxlies are as yet une certamed. 35. The winds blow thieru irrurly from all sides and being caughi hy thiase clepliants in their trunks of the colour of lutuses and ut great splendour, aro lut in pirts towards us and bezps us alise." On licaring this, Dhrithishtin kitd. "You have given Sanjaya an amount of the hands in detail, non telline about others that runnin." I harc given you an artount of islands," said Smjiya, "not hear ftonu loon naill (४२९.९.) भीष्मपर्व BLISHMA PATY [4290] गज स्वनः श्रूयते ग्रहः ॥ ४० ॥ योजननानां सहस्राणि विष्कम्भोद्विादशास्य धे । परिणाईन पत्रिशद्विपुलत्वेग चाराध ॥ ४१ ॥ पष्टिमाहुः शतान्यस्ययुधाः पौराणिकास्तथा । चन्द्रमान सहस्राणि राजन्नेकादशः स्मृतः ॥ ४२ ॥ विष्कम्भेण कुरुश्रेष्ठ त्रयस्त्रिंशत मण्डलम् । एकानपष्ठिकिम्भं शतिरदममहात्मनः ॥ ४३ ।। सूर्यस्व सहस्राणि हे चान्ये कुरुनन्दन । विष्कम्भेण ततो गजन् मण्डलत्रि- शता साम् ॥ ४५ ॥ गएपञ्चाशतं राजन् विपुलत्येन चानघ । श्रूयते पामोदारः पतगोसौ विभावसुः ॥३५॥ एतत् प्रमाणमकस्य निर्दिप्रमिह भारत । संराष्ट्र"छादयत्यती यथ काल महत्तया ॥ ४६॥ चन्द्रादित्यौ महाराज संक्षेपोयमुदाहृतः । इत्येतत्ते महाराज पृच्छतः शाखेचक्षरा ॥ ४७ ॥ सर्वमुक्तं यधातत्य तस्माच्छममवाप्नहि। पोहिष्यं मया प्रोकं सनिर्माणमिदं जगत् ॥४८॥ तस्मादाश्वस कौरव्य पुत्रं दुर्योधन मूलसमेत सुनो । ४० । हे कौरवेन्द्र राहुग्रह गोल सुना जाता है उसका व्यास निश्चय करके वारहइजार योजनहै और मंडल छत्तीसहजार योजनहै और बुद्धिमान पौराणिकों ने उसको मुटाई में छाहजार योजनसे अधिक कहाहै, और चन्द्रमा का व्यास ग्यारह हजार योजन कहाहै उसका मंडल तैतीसहजार योजनहै और घुटाई उसठ योजनते अधिक है और हे राजन् सूर्यका व्यास दशहजार योजन है परन्तु मुटाई में तेरहसौ योजन से अधिकहै इसी हेतुसे इकतीस हजार तीन सौ योजनका मण्डल है यह शीघ्र गामी सूर्य बड़े उदार मुने जाते, हे राजन् यह सूर्यका प्रमाण कहा और वहराहु अपने बडे देहसे समय पाकरदोनों सूर्य चन्द्रमाको ढक लेता है यही संक्षेपसे वर्णन किया हे महाराज धृतराष्ट्र मेने शाबरूप दृष्टिसे यह सब वृत्तान्त यथावस्थित कहा यह जगत् समेत मैंने जैसा गुरूसे सुना है उसके अनुसार तुमसे वर्णन किया इस्से आप me, king, abolt heavenly bodies. 40. Ve bear that. Rahu is globular in form. Its diameter is twelve thousand yojans and the circular measurement is thirtysix thousand yojans. lis thickness as given by the writers of Purans, is more than six thousand yojans. The diametre of the moin is said to be.eleven thousand yojans, its circumference is thirty three and its thickness more than fiftyninc yojons. The diametre of the sun is ten thousand yojans; but the thicktiess being more than thirteen hundred yojans , its circumference is. Thirty one thousand and three hundred yojans. We hear that this fast-ging Sun is very generous. I bare given you an account of the.dimensions of the Sun bo like the njoon, is sme times hidden by the huge brdy* (f Rahu. I have to ld yeu all as 1 have read; in books. and heard fiom my teather. icm this you Mahallarat [4300] (४३००) प्रति । श्रुत्वेदः भातश्रेष्ठ भूमिपर्व मनोनुगम् ॥ ४९ ॥ श्रीमान् भवति राजन्यः सिद्धार्थ साधुसम्मत । आयुर्वलञ्च कीर्तिश्च तस्य तेजय चईते ॥ ५० ॥ य. शृणोति महीपाल पर्वणीद यतव्रत । प्रयन्ते पितरस्तस्य तथैव च पितामहाः ॥ ५१ ॥ इदन्तु भारत वर्ष यर वर्णमहे चयम् । पूर्वः प्रवर्तित पुण्य तत् सर्व शुनपानास ॥ ५२ ।। इति श्री पहाभारवे भीष्मपर्वणि भूमिपर्वणि उत्तरीपादिसंस्थानवर्णने द्वादशोऽध्यायः ॥१०॥ ॥ समाप्तञ्च भूमिपर्व ॥ & शान्तीको पात्रो इन अनेक कारणों से हे राजन् तुम अपने पुत्र दुर्योधनमें शान्तीको पाओ हे भरतवंशियों में श्रेण इसचित्तरोचक भूमिपर्व को जो राना सुनताहै वह धन वानहो अभीष्टको प्रासकरके साधुओं में प्रतिष्ठाको पाता है और उनकी, आयु वल- कीर्ति तेज वृद्धि चढ़ती है और श्रद्धापूर्वक नियम से जो राजा सुनेगा उसके पिता पिनामहादे तृप्तहोते है यह भरतखंड जिसमें हम सब वर्तमान हैं यह पूर्वजोंसे वडा पुण्यका बढ़ाने वाला नियत कियागया है इस सरको तुमने सुनाहै ।। ६२ ।। may be pleased to obtain peace of mid and may now indúce your son Duryodhan, by giving reasons, to become peaceful Whatever Kshatrya will ber this chu ming account of the yırld, will get wealth, respect among rightenus non, longevity, p wer, fime, glory and satisfaction of desires. Il bloever hears this port on attentively with observances, gratifies bis forefathers You have heard account of Bhıratrarsh where we live and which lias ever been prisad by our predecessors,' 52" an AURA वैशम्पयन (४३०१, भीमपZ BAISHA Paily [43011 अथ भगवद्गीतापर्व ॥ उवाच । अथ गाघलागिर्विद्वान् संयुगादेत्य भारत । प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य भूतभव्यभावश्यवित् ॥ १ ॥ ध्यायते धृतगष्ट्रय सहसोत्पत्य दुःखितः । माचष्ट निहतं भीष्म भरतानां पितामहम् ॥ २ ॥ सजय उवाच । सञ्जयोहं महाराजनमस्ते भरतर्षभ । हतो भीष्मः शान्तनची भरतानां पितामहः ॥ ३ ॥ ककुदं सर्वयोधानां घाम सर्वधनुष्मताम् । शातल्पगतः सोद्य शेते कुरुपितामहः ॥ ४ ॥ यस्य वीर्ये समाश्रित्यङ्तपुत्रस्तवाकरोत् । स शेते निहतो राजन् संख्ये भीष्मः शिखाण्डना ॥ ५ ॥ यः खर्यान् पृथिवीपालान् समवेतान् महामृघे। जगा. यैकरनेच काशपों महारथः ॥ ६ ॥ जामदग्न्यं रणे राम योयुध्यदपसम्ममः न हतो जामदग्नेघन सहतोद्य शिखण्डिना ॥ ७ ॥ महेन्द्रसदृश. शौर्ये स्थर्येच अध्याय ॥ १३ ॥ वैशंपायनजी बोले हे भरतवंशी इसके पीछे सवका वृत्तान्त प्रत्यक्ष देखने वाले भूतभावप्य वर्चमान के ज्ञाता बुद्धिमान संजय ने युद्ध भूमि से आकर आकस्मिक ध्यान करनेवाले धृतराष्ट्र के समीप जाकर भरतवंशियों के पितामह का महाघायल होना वर्णन किया जो सब युद्धकर्ताओं में ध्वजारूप और धनुर्धारियों में महातीत्र, हैं अब वह कौरवों के पितामह शर शय्यापर सोरहे हैं जिनके पराक्रम के प्राश्रय को पाकर तेरेएत्र ने पांडयों से जुवाखेला वही भीमजी शिखण्डीसे विदीर्ण घायल होकर शरशय्यापर विराने है। ५ । जितमहारथी ने काशीपुरी में एकही रथसे महाभारी युद्ध में सब मिले हुये राजाओंको विजय कियाथा और वही महाभयकारी युद्ध में जमदग्नि जी के पुत्र परशुरामजीसे लडे और उनके हाथ से नहीं मारेगये अबवही CHAPTER XIII Vaishampayan said that having seen with his own eyes all that had hassed in the field of battle, wise Sanjaya who knew of present, past and future, returned to Dhritrashtra who was plunged in thought and informed him that Bhishm the grandfather was fatally wounded in Lattle. The foremost of all warriors and archers, Bhishm the grand lather of the lisurvas,' said Sanjaya to king Dhritrashtra " is slecping on the bed of arrows He on whose strength tlıy son engaged in the gambling match with the Pandvas, is lying wounded by the arrows of Shikhandi. 5. The brave warrior who alone conquered A large assembly of kings at Kashi and whom Parashuram the son of Jamalgani could not slay in a ducl, lies slain by Shiblandi.

[43021 Mahabharat (४३०२) हिमवानिध । समुद्र इच गाम्भीर्य सहिष्णुत्वे घरासमः ॥ ८॥ शरदंष्टो धनुर्व क खड़गाजहयो दुरासदः । नरसिंहः पिता तेच पाचाल्येन निपातितः ॥ १॥ पांडवानां महासयं यदृष्टयोद्यतमाहचे । प्रावेपत भयाद्विमं सिंहं दृष्ट्व गोगणः १० परिरक्ष्य स सेना ते दशरात्र मनीकहा । जगामास्तामयादित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्क- रम् ॥ ११ ॥ यः स शक्र इवाक्षोभ्यो वर्षन् थाणान् सहस्रश, | जघान युधि योधानामधूदं वशीभर्दिनैः ॥ १२ ॥ स शेते निहतो भूमौ यातभनाइवद्रुमः । तबदु- मान्यते राजन् यथा नाहः स भारतः॥ १३ ॥ इति महाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गीतापणि भीष्ममृत्युश्रवणे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ भीमजी शिखंडी के हाथ से मारेगये हैं। ७ । जो शुरतामें महा इन्द्र के समान और स्थिरचित्तता में हिमाचल पर्वत के समान और गंभीरता में समुद्रके सदृश और क्षमा में पृथ्वी के तुल्य हैं अववह वाणरूप दंश और धनुप रूप मुख खगरूप जिहा दुर्धर्ष नरोत्तम सिंहरूप तेरापिता पांचाल देशी शिखण्डी के हाथसे पृथ्वीपर मारागया पांडवों की सेना जिसको युदमें शस्त्र लिये उद्यत देखकर भयसे व्याकुल होकर ऐसे कांपती थी जैसे कि सिंहको देखकर गौओंका समूह व्याकुल होकर थरथराता है वह वीरों का मारनेवाला उसतेरे पुत्रकी सेना को दशदिन रात्र रक्षाकरके बडे कठिनयुद्धों को करता हुआ घायलों के समान अस्त होगया । ११ । जोकि हजारों वाणो को वरसाता हुआ इन्द्रके समान महा.व्याकुलता से पृथक है उसने अपने दशदिनके युद्धों में एक अद सेनाको मारडाला हे भरतवंशी वह मेरी बुरीसलाह के होनेसे वायु से गिरेहुये वृक्ष के समान पृथ्वीपर ऐसे सोताहै जैसे कि कभी वह सोनेके योग्य न था ॥ १३ ॥ who was brave lihe Indra, firm like the Himalayas, grave like the Oceann and like the earth n forgiveness, who had arrons for his teeth, bow for mouth, and swoid for tongue, that invincible father of thinc, tho best of men, lies dead by the wounds of Shibhands of Panchal, Ho at the sight of whose arms the Pandos a army trembled like a lord of cows at the sight of a lion, that destroyer of warriors, having protected tlic army of thy son tor ten days and nights and haseng jxertoi med matchless deeds of biarery, has set like the sun 11. Ho who liho India hiuself, scattering uirons ly thousands sith great skill, daily slen ten thousand warmors for ten tlays, lhes slain, though he did not deserve it, on the bare ground like a trec brohen dunn by the mind, in consequence of thy evil counsels, O Bharat." .13.

(४३०३) भीष्मपर्व BHISHNA PARY [ 43031 धृतराष्ट्र उवाच ॥ कथं करुणामृपमो हतो भीष्मः शिवण्डिना । कथं रथात् स म्यरतत् पिता मे यासयोपमः ॥ १ ॥ कयमाचक्ष्य में योधा होना भी मेण सजय । घलिना देयकल्पेन गुर्वर्थे ग्रह्मचारिणा ॥ २ ॥ तस्मिन् ति महाप्राज्ञ हेप्यासे महायले । महासत्वे नरख्या किमु आसीन्मनस्तव ॥ ३॥ आत्ति परम विशति मनः संससि मे हतम् । कुरूणामपभ धार मकम् पुरुषर्षभम् ।। ४ ।। केतं यान्तमनुप्राप्ता के पापासन् पुरोगमा: । के तिष्ठन् फेन्यवर्तत केऽन्ववर्तन्तसमय.५ के शारयशार्दूल मदभुतं क्षति पर्पमम् । तथानीकं गाहमान सहसा पृष्ठतोन्ययुः ॥६॥ यस्तमोकं इवापोहन पासैन्यममि प्रहा। सहस्राश्मिप्रतिम. पापा भयमादधत् ।। ७ ॥ अकरोद दुष्करं कर्म रणे पाण्डस अध्याय ॥ १४ ॥ धृतराष्ट्रने कहा कि मेरापिता भीष्म कैसे शिखण्डी के हाथ से घायलहुआ और कैसे रथसे गिराहे संजय उस पराक्रमी देवता के समान अपन पिता शंतनु के लिये ब्रह्मचारी होनेवाली गुरूरूप भीष्मजी के विना मेरे पुत्रों की कौन दशाई और ऐसे महावली धनुर्धारी महाज्ञानी शस्त्रवेत्ता नरोत्तम भीम के मारेजाने पर तेरा चित्त कैसा होगया जिस निर्भय कंपरहित कौरवेन्द्र पुरुषोत्तमवीर भीप्पजी को मृतक | सुनकर मेराचित महापीड़ा से व्याकुल होताहै हे संजय कौन २ क्षत्री इस के आगे और कौन इनके पीछे चलनेवाले हुये कौन स्थिरहुये और कौनलौट आये और कौन से क्षत्री सम्मुख वर्तमानहुये ।५। और कौन से शृर उस महारथी क्षत्रियोत्तम युद्ध में | सेनाके दवानेवाले भीष्मजीके पीछे की ओरको चले जिसबड़े प्रबल सेनाके स्वामी सूर्य के समान तेजस्वी शत्रुहंताने शत्रुओंकी सेना के मनुष्योंको मारहटाया और CHAPTER XIV " How was Bhishm my father wounded by Shikhandi," asked Dlıritrashtra of Sanjaya, " and how did he fall from the chariot? To what state were my sons reduced in the absence of that great elderly warrior Illishm who was full of prowess like gods and sho observed a vow of celibacy for the sake of his father Shantanu! ll hat was the state of your mind at the death of Bhishm the great archer, Wise in the use of weapons and best of men ? Bhishin has the great intrepid Kaurava chiet and best of men at the news of whose death my mind is perplexed with excessive pain. Tell me, Sanjaya, what Kshatryas were before and after him, which of them stayed there, which returned and which of them faced him. 5. What warriors followed that best of Warriors, Bhishm the best of hshatryas, destroyer of foes and wonderful archer, While he was engaged in battle, what warriors opposed that slayer of focs, glorious libe the 14304] Malabharat (४३०४) तेषुय । असमानमनीकाान य एन पर्यवारयन् ॥ ८ ॥ कृतिनन्त दुराधर्ष सञ्जयास्यत्व मान्तके । कथ शाम्तनव युद्धे पाण्डवा प्रत्यवारयन् ॥ ९॥ निकन्तन्त मनीकानि शर दष्ट्र तरस्चिनम् । चापव्यात्तानन घोर मासि जिव दुरासदम् ॥ १० ॥ अनर्ह पुरुषव्याघ्र होमन्तमपराजितम् । पातयामास कौन्तेय. कथ तमाजत युधि ॥ ११ ॥ उमघवानमुने पु वर्तमान रथोत्तमे। परेपामुत्तमागानि पचिम्वन्तमधेपुभि ॥ १२॥ पाडवानां महत् सैन्य य दृष्टयोद्यतमाहवे । कालाग्निमिव दुर्घर्ष समचेपत नित्यशः ॥ १३ ॥ परिकृष्य स सेनातु दशरात्रमनाकहा । जगामास्त मिवादित्य कृत्वाकर्म सुदुष्करम् ॥ १४ ॥ स शक्र इवाक्षय्य वर्षे शरमय तिपन् । जघान युधि योधाना मर्बुद दशभिर्दिनै १५॥ शत्रुओं में महाभयको उपजाया और युद्ध में पाण्डवोंके ऊपर महाकठिन कर्मकिया और हे मंजय तुमने उसके सम्मुखहोने वाले युद्ध में कुशल दुप्पधर्प महावली को भी देखा है जिसने कि इस सेनाके निगलने वाले महावीर धनुर्धारी भीष्मको मारकर हटाया हे संजय पांडवा ने युद्ध के वीचमें उन भीष्मजी को कैसे प्रकारसे रोका और सेनाओं के काटनेवाले वाणरूप दंशा रखनेवाले वेगवान चापरूपी मुखफहलानेवाले खड्गरूप जिह्वाधारी दुर्धर्षइस दशाके अयोग्य पुरुपोत्तम लज्जावान अजित जितेन्द्री भीष्म जीको अर्जुन ने किसप्रकार से गिराया जो भीम कि भयानक धनुप वाणयुक्त उत्तमरथमें आरूद्ध वाणों से शत्रुओं के शिरों के छेदने वाले होते थे उसकाल अग्नि के समान दुर्धर्ष शस्त्र धारण किये सबद भीप्मनी को देखकर पांडवोंकी सेनासदैव मृतकमायके सदृश चेष्टा करती थी वह शत्रुहन्ता दशरानि सेनाको बैंचकर महाकठिन युद्ध कर्मको करके सूर्य के समान अस्तहोगया। १४ । जिसने दशदिन तक इन्द्र के समान असण्ड वाणों को छोडकर युद्ध में एक अर्वद संख्याके शुरवीरों को मार sun, who riuscd great terior to the warrios of the umy and accom plished difficult exploits in the ranks of the Pandav 16 How did the Pandavas oppose thu s n ot Shantanu, that acomplished and invmcıblı Hari10i, when he was engaged in killing their ar mits ? Have you seen the man who opposed Bhishm and wounded him in bittle. ? How did Aijan ciuse the fall of that destrog u of arties having urows for his tecth, the swift bow for lus & ping mouth and Sword for his tongue, imvincible, undeserving of such atate, best of men, modest, inconquerable and having control over his organs Bhushamn who with lus creadtul Lost and arrang cut down the hands of tho enemies trous luis suat in lus clanot, who was my ulnerable like the fire of yug, ulo appard lile denth ta the army of the Pandavas, that destroyer of enchies having performed a dilficult work in the field of battle for ten days, has sut like the sun. He who like Indra, discharged for tuu days an incessant slower cf arrous and (४३०५) भीष्मपर्व BNISEHA PARY [ 4305] स शेने निहतो भूमौ बातमुम्न इदम । मम दुर्मन्नितेनाजी यषा नाईति भारत १६॥ | कप शान्तनय दृएमा पाडय नामनाकिनी महर्जुमशकत्तन भीम भीमपराक्रमम् ॥ १७ ॥ कथं भीगेण सग्राम प्रादुर्षन् पाण्डुनन्दना' । काच नाजयद् भीष्मो द्रोणे जी घति समय ॥ १८ । रपे सन्निदिने तर भरडाजात्मने तथा । भीष्मः प्रहरता थेठ कथं स निधनं गत ॥ १९ ॥ कयाचातिरथस्तेन पाञ्चाल्यन शिन्टिना । मीमो विनिहतो युद्धे दवैरपि दुरासद ॥ २० ॥ यः पद्धते रणे नित्य जाम- दग्पं महारम् । आजत जामदग्न्येन शक्रतुल्याणक्रमम् ॥ २१ ॥ त हतं समरे मी महारथकलोदितम् । सनयाचप्रमे चौरं येनशमन विद्महे ॥ २२ ॥ मामा के महेवासा नाजहु सजयाच्युतम् । दुर्योधनसमादिया के चीरा पर्यधारयन् ॥२३॥ हाला वह भरतर्षभ मेरेदमंत्रों से युद्ध में पराजय होकर पृथ्वी में सक्षके समान गिर कर ऐसा घायल होकर सोता है जैपा कि वह कभी होनहीं सक्ता । १६ । ऐमे मतापी महागली भीमजी को यर में सनद देखकर पांचाल टेशियों की सेना किस मकार से उनके ऊपर प्रहारकरने क। समर्थ हुई और पांडवोंने भीमजी के सम्मुख कैसे लड़ाई की और हे संजय द्रोणाचार्यजी के जीनेहुये होनेपर भीप्मजी ने कैसे विजय को नहीं पाया ओर प्रहार कर्मों में श्रेष्ठ भीप्पनी ने भारद्वाज के पुत्र कृपाचार्य और द्रोणाचार्य के वर्तमान होनेपर कैसे मृत्यु को पाया और देवताओं से भी महादुर्धर्ष प्रति रथी भीमजी युद्ध मे उस पांचाल देशी शिखण्डी के हायसे कैसे मारेगये।२०।जिन्होंने महावली परशुगमजीको युद्धमें प्रसन्नकिया अर्थात् उनसे | पूर्वक लड़ाई होनेपरभी उनके हाथ मे नही मारागया इन्द्र के समान प्रवल महा राथियों में मूर्य रुप महावीर भीमजी युद्ध में जैसे मृतक हुए वह सन झसे वर्णनकरो और हे संजय मेरे कौन कौनसे वडे धनुर्धारी वाण फेकने वाले पुत्रों ने उसदुराधर्ष destroyed hundred thousand warriors, that scion of Bharat race now lies on the bare ground in the field of battle, deprived of life, like a mighty tico uprooted by the wmd, is a result of my evil counsels, althougli lie did not deserve this fate 16 Seeing the son of Shantanu ready to fight, how as the army of the Pandavas able to wound him ? Hon d d the Pandavas fight agunst Bhishm' How was at that Bhishm dd not conquer although Drona is still alive? How did Bhishm die when both Drona and Anpacharya are alive? How did Shiblandı of Panchal Lal Bhishin who was invincible oren by gods? He pleased mighty Parashuram in battle and tras not killed by him. Let me know in detail how that best of warrios was killed in battle What great archers of us army did not [ 4306 ] Murbliarat (४३०६) या उपण्डिमुखा सर्वे पाण्डया भीष्ममध्यए । कच्चते कुरय सर्वे नाहि समयाच्यु तम् ॥ २४ ॥ अश्मसारमय नून हृदय सुदृद्ध मम । यच्छ्रुत्वापुरुष यान हन भीष्म नदी यते ॥ २५॥ यस्मिन् सत्यश्चमेधाच नीतिश्व भरतर्षमे । अप्रमेयाण दुर्धर्षे पथ स निह तो युधि ॥ २६ ॥ गौधिोपस्तनायित्नु पृषन् फपृपतो महान् । धनुदिाहाशब्दो महामेघ इयोन्नत. ॥ २७ ॥ योभ्यवर्पत कौनीयान् सपाचालान ससृजयान् । निघ्नन पर रथान् चीरो दानवानिव पद्मभृत् ॥ २८ ॥ इण्यासागर घोर वाणग्राह दुरासदम् । कार्मुकोमिणमक्षय्य मद्वीप चलमलपम् ॥ २९ ॥ गदासिमकरावास हपाप गजाफ लम् । पदाति मत्स्यकलिलं शसदुदुभ नि स्वनम् ॥ ३० ॥ हयान् गज पहाताश्च को त्याग नहीं किया और दुर्योधन के आज्ञावर्ती कौन २ से वीरोंने शत्रुओंको न राका जिससे कि वह सब पाण्डव जिनमें सब का अग्रगामी शिखण्डीथा भीष्मजी के सम्मुख आये हे संजय उस अजित वीर को सव कौरवों ने तो त्याग नहीं किया मेरा निश्चयकरके पजके समान हृदय है जो ऐसे पिता भीप्य पराक्रमी के मरनेपर भी नहीं फटता है। २५ । वह भरतर्षभ दुराधर्प सत्यवादी गद्ध स्मरण में सावधान शास्त्रों का ज्ञाता होकर युद्ध में कैसे मरा है जिसका धनुपरूप वादल वाणरूप जल वाण और धनुपकी टंकारही गर्जनायुक्त घोरशब्दवाले वडे बादलही के समान ऊंचा है और जैसे इन्द्र दैत्यों को मारताह उसी प्रकार शत्रुके रथियों को मारतेहुये जिस वीरने पाण्डव प्रौर पांचाल देशीय वा सजय लोगों के पद वाकी उसवाण आदि अनेक भयानक अस्त्रों के समुद्र वाणरपी ग्राहधारी दुराधर्ष धनुप रूप तरग वाले प्रावनाशी निराधार नौकाओं से रहित गदालग रूप मकर जीनों से व्याप्त घोडे रूपी पावर्ती समेत हाथियों से व्याकुल पदातीरूपमीनो से भराहुआ शख desert Blushm? What Furriors of my s n's army did not help Bhıslım in cheching thu adı ince of the Pandav rs e ho led by Shikbandı were able to fnco Bhishm. Did the lauravas desert that warrior My heart must be hard lihe adament 18 it does not break on hearing of the death of Bhishm. 23 Thnt irresistible bull of Bharatrnce Fas truthful, wise and a great politician Ajns ! how was ho slain in battle? like a nuhty and lunch cloud le lind the thing of his bowstring for the thunder and luis arro s for showers, and shocked In shafts on the enemy us Indra does on tie Danarne What herocs resisted that chastiser of foes as the shore resists the rates of the seat Honas a terrible necan of across and weapons, whose shnits scre the irrevestible croc dils and lots men the sases. He mas a boundless ang ocean without an island, aud without a raft to cross it over, भीष्मपर्च BASTHA PART [4307] स्थांश्च तरसा बहून् । निमजयन्तं समरे परवारापहरणम् ॥ ३१ ॥ विदद्यमानं कोपेन तेजसाच परन्तपम् । बेलेचमकरायासं के वीराः पर्यवारयन् ।। ३२ ॥ भीष्मोय दकरोत् कर्म समरे सञ्जयारिहा । दुर्योधनहितार्थाय के तस्यास्य पुरोऽभवन् ॥ ३३ ॥ केरक्षन् दक्षिण चक्र भीमस्यामित तेजसः । पृष्ठतः के परान्वीरानपासेधन् यतत्र- ताः ॥ ३४ ॥ के पुरस्तादवर्तन्त रक्षन्तो भोममन्तिके । के रक्षन् नुत्तरं च चौरावीर स्य युध्यतः ॥ ३५ ॥ चामे चक्के वर्तमानाः केऽनन्सजय सृजपान् । अग्रतोप्रधमनी केषु केऽभ्यरक्षन् दुरासम् ॥ ३६ ॥ पार्थतः केऽभ्यरतन्त गच्छन्तो दुर्गमा गतिम् । समूहे के परान्चीरान् प्रत्ययुध्यन्तसजय ।। ३७ ॥ रक्ष्यमाणः कथं वीरैर्गोप्यमानाचते | दुन्दाभियों से शब्दायमानयुद्ध में अपने वेगसे बहुतसे हाथीघोडे पैदलों को डुवाने वाले शत्रुओं के वीरों के हानेवाले क्रोधसे अग्निरूपतेजसे शत्रुओं के संतप्तकरनेवाले को कौनर से वीरोंने ऐसे रोकालेवा जैसे कि समुद्र को उसकी किनारा रूप मर्या दा रोकलेती है । ३२ । हे संजय शत्रुहन्ता भीमजी ने युद्ध में दुर्योधन के अभीष्ट के लिये जो २ कर्म किये उस समय उनके सम्मुख कौन २ हुए और कौन २ से वीरों ने भीमनी के दाहिने पक्षकी रक्षाकरी और पीछेकी ओरसे कौन से सावधान धीरोंने शत्रुके वीरों को हटाया और कौन २ वीर भीष्मजी के समीप में जाकर रक्षा करतेहुए आगे हुए और किन २ वीरों ने भीप्मनी के लड़ते समय उत्तरीय भागको रक्षाकरी । ३५ । और वाम पार्श में होकर किस २ ने संजय देशियों को मारा और किस २ वीरने उस दुर्धर्ष भीमजी की आगे से रत्ताकी और चलते समय में किम २ ने चारों ओरसे उनकी रक्षाकरी हे संजय having maces and swords for sharks, steeds and elephants for eddies, the numberless foot soldiers for fishes and the noise of conchshells and drums for its roars. He was an ocean that swallowed horses, elephants and foot soldiers quickly, an ocean that devoured the warriors of the enemy and secthed with rrath and energy as if containing within himself the subterranean fire. 32. When, for the sake of Duryodhan, Bhishm the destroyer of foes achieved feats in battle, who were in his van? Who pero those that protected the right wheel of that great warrior of immense energy Who were they that, with great • patience and energy, checkel the enemy from his rear. Who vere stationed in front to protect him wlu protected the fore sheel of that warrior while he was fighting. 35. Who stationed theniselves on his left to beat oft tho Srinjaya-. Who were they that protected the front ranks of irresistible Bhi hm? Who were they that protected him on all sides while he was moving with difficulty and a ho, 14308 ] Mahabharat (४३०८) नते। दुर्जयानामनीकानि नाजयस्तरसायुधि ॥ ३८ ॥ सर्वलोकेश्वरस्पेच परमेष्ठीप्रजा पतेः । कथं प्रहर्तुमपित नेक. समय पाण्डवाः ॥ ३९ ॥ यास्मन् द्वीपे समाश्वस्य युध्यन्त फरवः परैः । ते निमग्न नरव्याघ्र भीष्म शंससि सजय ॥ ४० ॥ यस्य वीर्य समाश्रित्य मम पुत्रो वृहदलः । न पाण्डवानगणयत् कथं स निहतः परै ॥४१॥ यः पुरा विबुधैः खः सहाये युद्धदुर्मद । कातितो दानवान् मद्भिः पितामम महावतः ॥ ४२ ।। यस्मिन्जारो महायार्ये शांततलाक विधुतः । शोक दैन्यञ्च दु खच पाजहात् पुत्रलक्ष्म- णि ॥ ४३ ॥ प्रोक्त परायणं प्राज्ञ स्थधर्म निरतं शुचिम् । वेदवेदांग तस्यत कथं शंस उस समूहमें से शत्रुओं के वीरों से युद्धकरनेवाले कौन २ वीर थे वीरों से रक्षित भीमजी ने और भीष्पजीसे रक्षित उन वीरोंने युद्ध के वीच देगसे वा दुःखसे वि- जय होनेवाली राजाओंकी सेनाओंको क्यों नही विजय किया हे संजय जो सब लोकों के ईसर प्रजापति के समान भीमके मारने के लिये वह पाण्डवलोग कैसे समर्थ हुए, कौरवलोग जिस रक्षाके स्थानपर भरोसा करके शत्रुओं से युद्ध करते हैं उस नरोपम भीष्मनी को हे संजय तुम डूबाहुमा कहते हो । ४० । जिस के बलका आश्रयलेकर बड़ी सेना रखनेवाला मेरा पुत्र पाण्डयों को कुछ नहीं समझा- ताथा वह ऐसा प्रतापी भीष्म पांडवों के हाथ से कैसे मारागया, युद्ध में दुर्मद महा | व्रती जिसमेरे पिता भीमको सहायता में करके देवतालोग दैत्यों के मारनेके लिये | उपस्थित हुये और संसार में विदित राजा शन्तनु ने पुत्रों में उत्तम वपरा- क्रमी जिस भीष्म के उत्पन्न होनेपर शोकभय और दुखों को अत्यन्त दूर किया और उसी पुत्रको रक्षाका स्थान वाज्ञानी और अपने धर्मो में आते O Sanjaya, fought with the warriors of the enemy in the genaral engagement ? If he was protected by warriors, and if they were protected by him, n hy then could he not vanquish at once, the ianuarie army of the Pandeeras ? Bosi aould the Pandavas destroy Bhishm who was like Parameshtlu or Lord and Creator of all creatures. You speak, O Sanjaya, of the disappearance of Bhishm the best of men, on whose strength the Kauravas are making this mar on the enemies. 40 How did the Pandavas destroy that great warrior, relying on whose strength, my son Duryodhan locked down, upon the Pandavas ? diy father Bhishım the great warrior of drcadful vous, whose assistance was sought by the gods to destroy the Danares and on a hose birth famous Shantanu laid aside all his griefs and cirus and u liom he called his refuge, ras very wise, firm on his duty, schular of the Vedas and their branchics and of pure soul;, भीष्मपर्च BAISBNA PARY [1309] स मे हतम् ॥ ४५ ॥ सर्वास्त्र विनयो पेतं शांत दान्त मनस्चिनम् । इशान्तनयं त्या मन्ये शेष हतं बलम् ॥४५॥ धर्मादधोपलवान सम्माप्त इति मे मातः। पत्र वृद्ध-गुरु हत्वा राज्य मिद्धान्त पाण्डवाः ॥ ४६ ॥ जामदग्न्यः पुरारामः सर्वानविद नुत्तमः । अम्वार्ध मुद्यत संरये भीष्मण ,घ निर्जितः ॥ ४७ ॥ तमिन्द्र समकर्माण ककुदं सर्व धन्विनाम् । हतं शससि में भीष्म किन्नु दु.समत. परम् ॥ ४८ ॥ असन् क्षत्रिपनाताः संख्ये पेन विनिर्जिताः। जामदायन चीण परवीर निघातिना ॥४९॥ नहतो यो महायुद्धः स हतोच शिखण्डिना । तस्मान् नूनं महावीर्याद मार्गवायुधाम दात् ॥ ५० ॥ तेजो वीर्य वलै यान् शिस्त्रण्डी दादात्मजः । पाशुर कृतिनं युद्ध सर्व शास्त्र विशारदम् ॥ ५॥ परमालावद शूरंजयान भरतपमम् । के वीरास्तम मित्रग्न पर वेद वेदांग के मूलोंका ज्ञाता महापवित्रात्मा वर्णन किया हे संजय ऐसे पुरुप को मराहुआ कैसे कहता है उन सब अस्ताले शितायुक्त शन्तनु जितेन्द्री उदार बुद्धि | भीमजी को मृतकमुनकर में शेप वचीहुई सेना कोभी मृतकही मानताई । ४५ । कि जिसस्थानपर पांडव अपने वृद्ध गुरुकोभी मारकर राज्यको चाहतेहैं इससे यह मेरा मत है कि अधर्म धर्मसे प्रबलतर होता है, पूर्व समय में सब अस्त्र शस्त्रों के माता अनुपम युद्ध में सन्नद जमदग्निजी के पुत्र परशुरामजीको युद्ध में भीष्मजीने विजय किया उसइन्द्र के समान कर्यकर्ता सब धनुपधारियों के ध्वजारूपभीप्नजीका मृतक कहताहै इससे अधिककौनसा दाखहोगा जिन परशुरामजीने अनेक समय क्षत्रियों के समूहों को बारम्बार विजय किया परन्तु बडा बुद्धिमान मेरापिना नहीं माराग्या सो अब वह शिखण्डी के हाथ से मारागया इन हेतु से निश्चय करके द्रुपदका पुत्र शिखण्डी वहा पराक्रमी युद्ध में परशुराम जीसे भी अधिक तेजस्वी वल पराक्रम में भी अधिक है जिसने शुरवीर पंडित महाशास्त्रज्ञ धर्मअनके नाता भरतवंशियोंके उत्तम how can yorn say, Sanjaya, that he is deud ? Kuowing the use of all weapons and harmg his passions under control the son of Shantanu mas modest, gentle aud energetic. Alas ! heanng of his death; } regard the rest of the army as already slain 95. The Pandavas desire to rule by killing their grandsire; from this I conclude that vice is stronger than yirtue What grief can be greater than that of the death af Bhishma the best of archers and of Indra like 'prorress, who vanquished Parashuram the son of Jamdagni of matchless pruness and knowledge of arms! My wise father who has not slain by Paraslıuran the destroyer of Ishatryas, is nor slain by Shikhandi. Indeed Skikliandi the son Drupad must be a greater warrior thau Pornshurau is he lias destroyed the most glorious descendant of 43101 Mahabharat (४३१०) - मन्धयु शस्त्रससदि ॥ ५२ ॥ शस मेत् पण चासायुद्ध भीष्मस्य पाण्डवै । घोपेव तपारा में सेना पुत्रम्य सजय ॥ ५३ ॥ अगोपमिध चोद्धान्त गोकुल तल मम । पौरुप सर्थ हाफम्य पर यस्मिन् गहाहो ॥५४॥ परासक्त चस्तस्मिन् कथमासीन् । मनस्तदा जीवित प्यद्य माध्यं किमि यास्मासु सञ्जय ५५ घातयित्वामहावीर्य पितर ভাষা मकम् । अगाधे सलिल भग्ना नौका दृष्टय पारगा ॥५६॥ भीम्मे हते भृश दुखात् मन्य शोचात पत्रका । अद्रिसारमय नून हदय मम समय ॥५७ ॥ पच्छू स्यापुरुषव्याघ्र हत मम न दीयते । यस्मिन्नस्त्राणिमेधाच नीतिश्च पुरुषर्षभे ॥ ५८ ॥ अप्रमेयाणि टुर्घ कप स निहतो युधि । न चास्त्रण न शौर्येण तपसा मेघया नच ५९ प्रतापी वीरको तारा युद्धभूमि में । ५२ । उस शत्रुहन्ता भीमजी के पीछे कौन २ वीर चले और जैसे पाण्डओं से और भप्मिजीसे लडाई हुई यह सब मुझसे विस्तार समेत वर्णन करो हे सजय मेरे पुत्रकी वह सेनास्त्री के समान मृतक वीरवाली है और वही मेरी सेना इस प्रकार व्याकुल है जैसे कि विनागोपके गौओं का कुल, होता है जिसभारी युद्ध में सबलोगोंकी वडी वीरता है अब उस भीष्म के मरने के पाछे सबका मन कैसाहोगया, हे सजय अवलोक में धर्मवानपडे पिताको मरवाके हमारे पुोंमें जीवनकी क्या सामर्थ्य है भीष्मनी के मरनेपर मेरे वेटेसदैव दुःखसे ऐसे शोचतेहैं जैसे कि पारपर खडे हुए मनुष्य गहरेजल में डूबीहुई नौका को देख कर शोचतेहैं हे सजय निश्चय करके मेरा बमसेभी प्राधिक कठोर हृदयहै जो ऐसे पुरुषोत्तम भीष्मजीके मरनेपरभी नहीं फटताहै जिसपुरुपोचम दुराधर्ष में प्रसाद्धि और नीति अत्यन्तथी वह युद्ध में केसे मारागया कोई भी मनुप्पमत्रशूरता तपबुदि Bbarnt (ferent inoun and slalin arins 1 lint varriors follosed that clestiojer of encinics in thoitat battle! Toll me in detail how the battlo was fought between the landas ns nnd Bhalına Our army, in the olsunce of that hero is lilc A woman ulio h29 lost lor protector or like licrd of cows usthout the herdsman In wlint stato did he lease the fring when that »arrior of matchlas Proncis rs !nd low on the field of Lattle? What is the use of our lifo m this 110ld, when we could not save our father from bring slattn soris must be gricsed at the death of Bhishm like there ni la having lost their leat in tlic midst of a swollen wier, Arc standing on the opposite shore Als lerrt niuat lw hard as moment as it does not break nt the deith of Bluslim tho krest of men who tras endued with intens sild in arms and policy low hrs hic lxxn Lillest No cne can escape death ly bras lu}, asceticism, wigious (४३११ सीलमपZ BITS 'Ma Panv [4311] नघत्या न पुनस्त्यागान् मृत्योः कश्चिविमुच्यते । कालो नूनं महावार्यः सर्व लोकदुरत्य पः ॥ ६०॥ यत्र शांतनवं मीनं हत शसास संजय । पुत्रशोकाभि सन्तप्तो महदुःख मचिन्तयन् ॥ ६१ ॥ आशंसहं परं त्राणं भीमाच्छांतनुनन्दनात् । यदाहत्य मियापा श्यत् पाततं भुवि सञ्जय ॥१२॥ दुर्योधनः शान्तन किन्तदा प्रत्यपद्यत । नाह स्वे- षांपरेषांवा यासंजय चिन्तयन् ॥६३॥ शेष किं चत् प्रपश्यामि प्रत्यक्षीके महीक्षि ताम । दारुणः क्षत्रघमोय म पभिः सम्प्रदर्शित. ॥६४॥ यत्र शान्तनवं हत्वा राज्य मिच्छन्ति पाण्डवाः । वयं वा राज्य मिच्छामो घातयित्वा महानतम् ॥६५॥ क्षत्रधः रिपताः पार्था नापयन्नि पुत्रकाः । एतदार्येणकर्तव्यं कृच्छा स्वापरसुसंजय ॥ ६६ ॥ पपक्रमः पराशक्तिस्तत्तु तस्मिन् प्रतिष्ठितम् । अाकानि विनिघ्नन्त हीमन्तमपराजितम् ॥६७ ॥ कथं शान्तनवं तातं पाण्दुपुत्रायवारयन् । यथा युक्तान्यनीकानि कथं युद्ध धैर्य और तपस्या इत्यादिके द्वारा मृत्युसे नहींछूटताहै इससे निश्चयकरके सवलोकों को दुःखसे उल्लंघन करनेके योग्यकाल महावली है । ६० । हेसंजय उन शंतनुके पुत्रभीष्पनीको मृतक कहताहै उनशंतनु नन्दन भीष्मजीसे में पुत्रोंके शोकसे दाखी वड़ेदःखोंको स्मरण करताहुआ रक्षाकी आशा करताया हेसंजय जब सूर्यके समान अस्तहुए भीष्मजीको दुर्योधनने देखा तब मन में क्या विचाराकिया और मैं बुद्धिसे चिन्ता करताहुआ सेनाके मध्यमें अपने पुत्रोंको और अन्पराजाओंको कुछभी नहीं समझताहूं यह वह भयका कारण क्षत्री धर्म ऋपिलोगोंने दिखायाहै । ६४ जहां पांडव लोग भीप्पजी को मारकर राज्यको चाहने हैं अथवा हमकौरव लोग महा श्रत वाले भीप्मनीको मरवाकर राज्यको चाहते हैं, क्षत्रीधर्म में महत्त मेरे पुत्र पांडव भी कुछ अपराध नहीं करते हैं क्योंकि दाख और आपचियों में उत्तम पुरुप को यह पराक्रम और महासामर्थ्य प्रकटकरने के योग्य है उसमेंही वह सबपांडब नियत हैं. हेतात. उनपांडवाने रन, लाहान दुराधर्ष मेना के मर्दनकरनेवाले भीष्मजीको patience and penances. Surely, Time is too po verſul to be trans. gressed by any one in the world. 60. You say, Sanjay, that Bhishm, tlie son of Shantanu, is dead. I expected relief from the grief of my sons through Bhishmi. What did Duryodhan think when lie saw Bhishm setting like the sun !. I fear for my sons and other kings who are engaged in battle. Hard are the duties of kshatryas enjoineci by risliis 64. The Pandavas have killed Bhishm for the sake of the kingdom and we desire the same even after his death. My sons the Pandavas aro committing no sin as when one is beset with calamities one must show proness. How did the Pandavas check Bhishin tlie invincible, modest and destroyer of enemics ? Ilow fcre the armies [4312] Mahabharat (४३१२) महात्मभि ॥ ६८ ॥ कय वा निहतो भीष्म पिता सजय मे परै । दुर्योधन कर्णश्च शकुनिश्चापि सौचल ॥६९॥ दु शासनच कितवो हते भीष्मे किमनवन् । यच्छरीररुण स्तीर्णा नग्धारण याजिनाम् ॥ ७० ॥ शरशाक्त महासाग त मराक्षा महाभयाम । प्रा शिन् किनवा मन्दा सभा युद्ध विशारदाम् ॥ ७१ ॥ प्राणद्यूते प्रति भय केऽदीव्यन्त नरर्षमा । केजीयन्ते जितास्तत्र कृतलक्ष्यानिपातिता ॥ ७२ ॥ अन्ये भीमाच्छान्तन घात् तन्ममाचक्ष्यसञ्जय । नाह म शान्तिरम्तीह श्रुत्ता दयव्रत हतम् ॥ ७३ ॥ पितर भीमकर्माण भीष्ममाहवशोभितम् । आत्ति मे हृदय सदा महतीं पुत्रहाानजाम् ॥ ७॥ त्यहि म सनिषेयानि मुद्दोपयास सजय । महान्त भारमद्यम्य विश्रुत सा लौकिकम् कैसे रोका और जैसे २ सेनातैयारहुई और सव महात्माओंका युद्धकैसे हुआ और मेरापिता भीष्म दूसरों के हाथसे कैसे मारागया, भीष्मजी के मरनेपर दुग्योधन कर्ण और सौवलकेपुत्रशकुनी और छली दुश्शासन ने क्या कहा, जिन देहों के विछौनों से संयुक्त मनुष्यहाथी । ७० । घोड़ोसमेत वाण वरछी और बड़े खड्ग | तोमर रूप पाशेवाले महा भयकारी सभा में प्रविष्टहुये और वह युद्ध में कुशल नरो चम उस भयकारी प्राणदेवत अर्थात द्यूतरूपमेंखेने उनमेंसे कौनसा विजयी जीवनाहै और जोभीष्मजीसे युद्धमें मारेगये इनमवको हेसंजय मुझसे कहो, यहांपर भयकारी कर्म और युद्ध में शोभा पानेवाले महाव्रत पिना भीष्मजीको मृतक सुनकर मेरेहृदय में शान्ती नहीं होती, हे संजय तुम पुत्रकी हानि से उत्पन्न महा पीड़ा को मेरे हृदयमें ऐभे बढातेहो जैसे घृतते अग्निको पढाने हैं, और संबंधीलोग मसिद्ध महाभार को उटाकर भोर भीमजी को मृतक जानकर शोचते हैं और मैं दुर्योधन के उत्पन्न arrayud ind how did the lierocs fight? How wis my fıtlıer Blushim killed by them What did Duryodhen, harin, Shrkunm the son of Soubil and deceitful Dushasan s y at the fall of Flislın ! The dice Lord is made of the Lodies of men, elephants and horses, (70) there arroirs, javelins, swords and darts form doc, and entering that frightful winsion of destruction, Tere the wretched gimblers that staked their lives Who won, n ho were defeated, who cast their dice sucessfully and who besides Bhishm, werd numbered with the dead? Tell me all this Sanjay, I can have no rest after hearing of the death of Bluislım of dreadful vows. The thought of the ucath of all my childern gives me much pain and thou influmest the fire of my grief ns t by puring over it clarified butter guns must be boruling the loss of Blushım the world renowned sho hnd taken the burden on himself I shall listen to all the sorrorg arising from Duryodhin's acts Tell me, Sanjaya, cserything I think, my (४३१३) भीमपर्च ButSEL PARY [43131 ॥ ७५॥ दृष्टवा चिनिहत भीमं मन्ये रोचन्ति पुत्रकाः । ओष्पामि तानि दुग्णानि दुर्योधन कृतान्यहम् ।। ७६ ॥ तस्मान्म सर्व माचक्ष्य पदवृत्त तन सअथ। यवृत्त तत्र सग्रामे मन्दस्याधुद्धि सम्भवम् ॥ ७७॥ अपनीत सुनीत यत् तन्मणाचक्ष्य सजय । यत्कृत तत्र सग्रामे भीष्मेण जय मिच्छता ॥ ७८॥ तेजो युक्त रतालेण शस तचाप्य शेपत्त । ययातदभव युद्ध कुरुपाण्डव सेनयो ॥ ७९ ॥ क्रमण येन परिमश काले यच यथा भवत् ।। ८० ॥ इति महाभारते भीमपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि धृतराष्ट्रप्रदने चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ सम्जय उवाच ॥ त्वयुकोय मनुमन्नो महाराज पधाहसि । नतुदुयोधने दोप मिममासकमहसि ॥१॥ य यात्मनोदुथरितादशुभ प्राप्नुयानर । एनसातेननान्यं स उप शाङ्कितुमईति ॥ २ ॥ महाराज मनुग्येपु निन्ध य सर्गमाचरत् । सबध्यः कियेहुए उन दु ग्वाँको मुदंगा इस कारण हेसंजय वहांका सब हत्तान्त मुझमे कहो | और जो युद्ध में अल्पबुदियों की निर्वद्धिता से उत्पन्न वृत्तान्त न्याय वा अन्याय संबंधी माहाहो वह सब मुझ से कहो और युद्ध भूमिमें शतज्ञ और शास्त्रज्ञ विजया भिन्नापी भीमजी ने जो अपने तेजसे कमकिया वह भी विस्तारपूर्वक संपूर्ण कहो और जा जिम क्रमसे समय पाकर कौरव और पांडवों की मेना से परस्पर युद्धा उसमें जैसा • जो काम जिस का हुआ वह सब मुझने कहो ८० ॥ अनाय ॥ १५ ॥ मंजय बोले कि हे महाराज यह मा प्रश्न जो तुम पृछतेहो सब ठीकहे परन्तु आप इन दोपों को जो लगाते ह सो योग्य नहीं है जो मनुष्य अपने बुरे कर्म से दुःखादि को पावे वह उसपापकी शंका दूसरेपर करने के योग्य नहीं है । २ । हे महाराज नो मनुप्यों के मध्य निन्दाके पोय कर्मको करता है वह निन्दित कर्म that has happened by the folly of my son. Tell me all, whether good or bad, whatever was done in battle by the energy of Bhishm who was desirous of victory. How the battle was fought between the the Kauravas and the Pandayas and the order and manner of each event as it happened." 80. CHAPTER XY "This question, great king!" Sud Sanjaya to Dhritrashtra, "is worthy of you It is not hoirever, proper to impute this fault to Duryodhan He who incurs cl as the result of bis own misconduct should not attribute it to others. He who does injury to others, .

क्षया [4314 ] Mahabharat (४३१४) सर्घलोकस्य निन्दितानि समाचरन् ॥ ३ ॥ निकारो निति पाण्डवस्त्वत्प्रती । अनुभूत सहामात्यै क्षान्तश्व सुाचरं बने ॥ ४ ॥ हयानाच गजानाञ्च राज्ञाश्वामिततेजसाम् । प्रत्यक्ष यन्मयादृष्ट दृष्ट योगपलेनच ॥ ५ ॥ शृणु नत् पृथिवी पाल मा च शोक मग. कृथा । दिष्टमेतत्पुरानून मिदमेव नराधिप ॥ ६॥ नमस्कृत्या पितुस्तेह पाराशर्याय धीमते । यस्यप्रसादाद्दिव्य वत् प्राप्त जानमनुत्तमम् ॥ ७ ॥ दृष्टिश्चातीन्द्रियाराजन् दूराच्छ्यणमेव च । पर चित्तस्य चित्तानमतीतानागतम्य च ॥ ८॥ व्युरियसोत्पत्ति विज्ञानगाकाशे च गति शुभा । अस्त्रैरसगो युद्धेषु घरदानान्महात्मम ॥ ९ ॥ शृणुमे विस्तरे णेद विचित्र परमाद्भुतम् । भारताना मभूयुद्धं यथा तल्लोम हर्पणम् ॥ १० ॥ तेष्यनीकेपु यत्तेपु व्यूढेच विधानतः । करनेवाला सबलोकोंसे मारने के योग्य है, छल संयुक्त दुर्योधन आदि ने निरादर किया और पाण्डवोंने मंत्रियों के द्वारा तेरी ओर को ध्यान करके बहुत कालतक वनके बीच बैठकर उस अपमानको क्षमाकिया और मैने प्रत्यक्ष घोड़े हाथी और बडे तेजस्वी राजाओंकी जो दशादेखी और योगबल से भी जो निश्चयकिया है राजा उसको तुम मुझसे सुनो । ५ । और शोकसे चित्तको हटाओ यही होनहार प्राचीन है मैं आपके बुद्धिमान पिता उन व्यासजीको नमस्कार करके कहताहूं जिन की कृपासे मने दिव्यदृष्टि और अनुपम प्रज्ञाको प्राप्तकिया, हे राजा ध्यानसे पृथक देखना वा दूरसे वातका सुनना अथवा दुसरे के मनका अच्छे प्रकारसे जानना और भूत भविष्यका शानहोना, उठेहुए अत्रकी उत्पत्तिका जानना, प्राकाश में शुभंगमन, लड़ाइयों में अस्त्रोसे वचजाना इत्याद सव वाते महात्माके वरदानसे प्राप्त इस अपूर्व विचित्र गान्त को व्योरेवार तुम मुझसे सुनो जैसे कि नहभरतवंशियोंका रोमहर्पण करनेवाला युद्धहुआ । १० । हेमहाराज जब व्यूह रचनाकी रीतिसे उस deserves to be slain by all men for his wickedness. The sinless Pandavns, with their friends and counsellors, lore the injuries and long exile for your sake and forgave them Hear, Oling, what l liavo scen of horses, elephants and powerful lings ly the aid of yog power All thus was predestined before Having lowed down to thy father, Vyas the wise, through u hose giace I havo gamed supernatural porrers of sight, beyond the eyes, hcarfrom a great distacc, hnowledge of other people's minds, of jurist and future, of the effects of weapons thronn, the delightful porrer of ranging thougli shies and escape from weapons, listen to mo in detail as I recito romantic and wonderful battle that happened between the cuscundants of Bharat, a battle that makes one's hairs stand on end I 10. When the armies were arranged in phalanxcs, 5 lange of ing (४३१९) मोगपर्च BMSNIA PARY [4315] दुर्योधनो महाराज दुशासन मपानचीत् ॥ ११ ॥ दुःशासन रथास्तूण यज्यन्त भीष्म रक्षिण । मनीकानि च सर्वाणि शीत यमन चोदय ॥ १२ ॥ यय समाममिप्राप्तो पगामि चितित । पाण्डवानां सस यानां कुरुणांच समागम ॥ १३ ॥ नात. कार्य तम मन्ये रणे भीम रक्षणात् । हन्या गुप्तो ह्यसौ पार्थान् सोमकांश्च ससृजपान ॥ १८ ॥ अत्रयं च विशात्मा नाई हयां शिखण्डिनम् । धूयते स्त्री घसौ पूर्व तस्माद् पज्यों रणे मम ॥ १५ ॥ तस्माद मीगो रक्षितव्यो विशेषति में मतिः । शिपण्टिनो पच यत्ता सबै तिष्ठन्तु मामझा ॥ १६॥ तथा प्राच्या प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्योत्तराप था. । सर्वधारोप फशलारनं रक्षन्तु पितामहम् ॥ १७ ॥ अरक्ष्यमाणं हि घृका हन्यात् | मेनाकी तैयारियांहुई तब दुर्योधनने दुश्शासनमे कहा कि हे दुश्शासन भीप्मजीके रत्नाकरनेवाले रथशीघही तैयारहों और तुमदन वातका सबसेनाको शीघमुनादो कि सेनाके मनुष्यों में पाण्डव और कौरवोंका बह मिलाप वर्षमान हुआहे जोकि बहुत पों से विचारा गाह, मैं युद्धकेनीच इनमीप्पनीकी रक्षामे अधिक कोई वडाकाम नहीं समझता हूं क्योंकि जो भीष्मजीकी रक्षाहोगी तो यह अकेलेही पाण्डव सोमक और संजय लोगों समेत सबको मारेंगे ।१४। और इन सत्य वक्ता भीष्मजीने कहाहै कि में शिखण्डीमर याण और शस्त्रमहार नहीं करूंगा इसका यह हेतु मुनाजाताहै कि यह पूर्व य स्त्रीया इनकारणयुद्ध में इसके ऊपर शम्न छोडना क्षत्रियोंको निषेध? इस गुप्त कारणसे भीप्नजी अधिक करके रक्षा करने के योग्य हैं । १५ । इस मेरेमत से हमारी मत्र सेनाके भनुप्य शिसंडी के मारने में सावधानी से उद्युक्त होना और इमीमकार से पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण इन चारों दिशाओं के मद शमधारी: म कुशल राजा लोगोंको भी योग्यहै कि सब मिलकर भीमजीकी रक्षाकरें। १७ “ Duryodbau said to Dushasan, Onder the preparation of chariots fur tlic protection of Bhishm Gise at once notice to all the armies that the encounter of the Kauras as and Pandaras, which has tor jcars been under consideration, 13 at last about to happen. I donot tlink any duty to be greater than the protection ot Bhishm; for. alone he will destroy all the Pandavas, the Somabs and the Srinjayas, of lie is well protected Bhishım the truthful lias already said that lit would not discharge his arrows and other weapons at Shikbaudi *ho is said to have lun once a woman and that no Lslatı ya ought to kill a woman. This is another cause wly Bushm should Le especially protected. 15 I et all the variors of our arnıy try their best to kill Shkhandi and at the same time protect Bluishm tiom ail Let us not allow Slihband, to hil Bhubun as a lion when srdes. 17 ] 4316 ] Malinbharat (४३१६) सिंह महाबलम् । गा सिंह अम्बुके देव घातयाग. शिखण्डिना ॥ १८ ॥ घाम चक्र युधामन्यु रुत्तमौजाश्च दक्षिणम् । गोप्तारौ फाल्गुन प्राप्ती फागुनोपि शिखण्डिन १९ स रक्ष्यमाण, पार्थेन भी मेणच विवर्जित । यथा न हन्याट् गागेय दुःशासन तथा फुरु॥२०॥ इति श्रीमहाभारते भीमपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि दुर्योधनदु शासन- संवाद पञ्चदशोऽध्याय ॥१५॥ सञ्जय उवाच ॥ ततो ग्जन्यां व्युशायां स शब्दः समभवन् महान् । कोशतां भूमि पालाना युज्यतां यज्यता मिति ॥ १ ॥ ख दुन्दुभि घोपैथ सिंहनादेश भारत । यहोपतनादेश्व रथनमिस्वनैग्तथा ॥ २ ॥ गजानावृहताञ्चैव पोघाना चापि गर्जताम् । धेलितास्फोटितोत्स्तुमुल सर्वतोभवत् ॥ ३ ॥ उद् तिष्ठन् | महावली रक्षा रहित सिंह को जैसे शृगाल मारे इमी प्रकार शृगाल के समान शिखं डी के हाथमे हम लोगोंको योग्य है कि सिंहरूप भीमजीको नहीं मरने दें, रयके धामभागका रक्षक युधामन्यु और दक्षिण भागका उचमौजा यह दोनों अर्जुनके | रक्षकह और अर्जुन शिखंडीका रक्षक हुआ है वह अर्जुनसे रक्षित शिखंडी गंगा के पुत्र भीष्मजीको जिप्त रीति से मारनेको समर्थ नहो हे दुश्शार्सन वही उपाय अवश्य करना चाहिये २०॥ अयाय ॥१६॥ 'संजय बोले कि तदनन्तर रात्रि व्यतीत होनेपर जोडो जोडो ऐसे राजा लोगों के कहे हुए महान् शब्द होतेहुए और हे भरतर्षभ शंख और दुन्दुभियों के बडे शब्द ओर वीर पुरुषों के सिंहनाद और घोडा के हीनने के शब्द आर रथके पहियों के महान शब्दों से और हाधियों की चिघाडामे वा मल्लों के क्रीडापूर्वक हाथ और मुखके अनेक प्रकारके शब्दों के कारण चारों ओरसे महातुमुल भयकारी शब्द हुए . unprotected is killed by jichnis Yudhamiany u protects the left wheel and Uttam ujr the right wheel of Arjun who protects Shikhandi I et us so manage Dusliawan, that Shihhandı, protected As he is liy Arjun may not be able to case the death of Bh-in" 20 CHAPTER ITI " At the clove of the night," sd Sanja; n, “there was a great upronr of warriors, mulling on their men to prepuse chinuts, mingled with the mains of the warriors, the neglun; of hiorres, the rombling of climrint wheels, the norscof clephants and the clapping of wrestleri L (४३१७) भीष्मपर्य BRISE MA PARY [4317] महाराज सर्च युक्तमशेषत । सूर्योदये महत्सैन्यं कुरुपाण्डयसेनयो ॥ ४ ॥ राजेन्द्र तव पुत्राणां पाण्डवानां तथैवच । दुष्प्रधृष्याणि चात्राणि सशस्त्रस्यचानि च॥ ५ ॥ तत प्रकाशे सन्यान समदृश्यन्त भारत | त्वीयानां परेपाञ्च शस्त्रयन्ति महान्ति च ॥ ६ ॥ सत्र नागा राव मारवून दपरिष्कृताः । विधाज माना दृश्यन्ते मेघा इच सविद्युत ॥ ७॥ रथानीकान्यदृश्यन्त नगराणीय भूरिशः। अताच शुशुमे तत्र पिताते पूर्णचन्द्रवत् ॥ ८ ॥ धनुर्मिष्टिभि. खदगर्गदामि शाक्ततोमरैः । योधा प्रहरणैः शुभैरते चाकण्यवास्थता ॥ ९ ॥ गजा पदाता रथिनस्तुरगाश्च विशाम्पते । व्यतिष्ठन् घागुराकारा शतशोध सहनश ॥ १० ॥ ध्वजा पा विधाकारा यह यन्त समुच्छ्रिताः स्वेपाचैव परेपांच चति मन्त सहस्त्र । ३। हे महाराज मूर्य के उदयहोने पर सव ओरसे तैयार कौरव और पांडवॉकी | महाभारी सेना आकर खड़ी हुई और तुम्हारे पुत्रोंके और पांडवों के दु धर्पशस्त्र अस्त्र और कवचभी घड़ी तीवता से तैयार हुए इसके पीछे जब घड़ा प्रकाश हुआ उस समयतेरे पुत्रोंकी और पांडवों की सेना के वह मनुष्य दिखाई दिये जो बड़े महात्मा आर शस्त्रों को धारण कियेहुये थे। ६। इसके विशेप वहांपर जंबूनद नाम सुवर्ण से अलंकृत हाथी और रथ भी ऐसे दृष्टपडे जैसे कि विजली समेत बादल दिखाई देते हैं, स्थपर सवार बहुतसी सेना नगरोंके समान दिखाईर्दी उनसब प्रकारकी सेनाओं में आपके पिता भीमजी पूर्ण चन्द्रमासे पकाशमान दिखाई देतेथे।८। और संपूर्ण मेनाभरमें युद्धक लोग धनुप यप्टी खड्ग गदा वरछी और तोमर आदि श्वेतरास्त्रों सहित नियतहुए, और हाथी पैदल स्थ घोडे इत्यादि हजारों पशु चारापोरसे जालके समान घेरेहुए दृष्टि पड़ते थे । १० । और अपने दूसरे लोगोंकी हजारों ध्वजा नानामकारके चिह्नोंकी दिखाईदी, वह सब वजा सुनहरी At sunrise the armies of the Kauravas and the Pandavas stood The Kauray as and the Pandavas were armed with irresistible weapons, missiles ond armour After this, when it was Inord day light, the faces of the warriors of Loth the armies sere clearly discernible 6 The elephants and chariots decled with gold or ippings looked like clouds and lighining The army of charioteers looked like a city and in the midst of all tliose armes was seen Bhusham, your father, glorious like the full moon The warriors aimy armed with buts, snads, scinuitars, maces, jarelins and olher well polished weapons, took up their positions in raphs Elephants, foot soldiers, chariots, and horses by thousands surrounded on all sides, forming a network 10 There were Le seen thousands of ensigns belonging to both parties The Golden tanners shining in battle array 8 of the [ 4318] Mahabharat (४३१८) श।। ११ । काचना मणि चित्रागा ज्वलन्त इव पावका । अर्चिामन्तो व्यराचन्त ध्वजागेहा. सहस्रश ॥ १२ ॥ महेन्द्रकेतव शुभ्रा महेन्द्र सदनधिय । सन्नद्धास्ते प्रधीराश्च ददृशुर्युद्ध कांक्षिण ॥१३॥ उद्यतैरायुधैश्चित्रैस्तलवद्धा कलापिन । ऋष भाक्षा मनु ये द्राथम् मुखगता वभुः ॥ १४ ॥ शकुनि सौबल शल्य आव त्योथ जयद्रय चिन्दानुषिदो कैकेया काम्बोजश्च सुदाक्षण, । १५ ॥ शुतायघय कालिगो जयत्सेनश्च पार्थिव । वृहद्वलच कौशल्य कृतवर्माच सात्वत ॥ १६ ॥ दशैते पुरुष व्याघ्रा शूरा परिघ चाहतः । अक्षौहिणीनां पतयो यज्वानो भूरि दक्षिणा. ॥ १७ ॥ पते चान्येच वहयो दुर्योधन यशानुगा । राजानो राजपुत्राश्चनीति मतो महारथा. ॥ १८॥ सन्नद्ध. समदृश्यात स्वेचनीके धवस्थिता । वद्ध कृष्णाजिना सर्वे बालनो युद्ध शालिन. १९ ॥ हा दुर्योधनस्यार्थे ब्रह्मलोकायदीक्षता । समर्था दशवाहिन्य. परिगृह्यव्यवस्थिता ॥ २०॥ एकादशी घराष्ट्री कौरवाणा महाचमू । अग्रत सर्व सैन्याना यत्र शातन अग्निके समान देदीप्यमान माणयोंसे जटित ऐसी दृष्ट पडतीधी जैसे कि महाइन्द्र के भवनों में उसी महेन्द्रकी श्वेत ध्वजा होतीहैं उन युद्धाभिलापी शस्त्रोंसे अलकृत महा बलवानाने परस्पर में एक एकको देखा । १३ । आयुधोको उठाये हुये शत्रोंसे शोभित नलको बांधने वाले धनुषधारी शुभ्र नेनोंसे प्रकाशमान राजा लोग सेनाके मुखपर आकर सुशोभितहुए, सौरलका पुत्र शकुनी, शल्य, अान्तीका राजा जयद्रय विन्द, अनुविन्द, केकय देशी राजा काम्बोज सुदक्षिण । १८ । श्रुतायुध, कालि. न्द, राजा जयरसेन यह दशों महा शूरवीर पुरुषोत्तम परिघातमान भुजाधारी हदति णा के यज्ञ करनेवाले अक्षौहिगिया के स्वामी, यहमव और अन्य बहुतसे नीति महारथी राजा और राजकुमार जो कि दुर्योधनकी स्वाधीनतामें वर्तमानथे सब अपनी • सेनामें सावधानी से नियत भूपण शस्त्रादिकों से अलकृत काले मृगचर्म धारी महाबली युद्ध म कुशल प्रसन्न और दुर्योधनके निमित्त ब्रह्मलोक के अर्थ Ithe fire wh jewels, lo hed like the white banners on the palaces of Judia The great warriors, aimed with weapons and desirous of battlo lo hed at one another 13 Many gl nous kings, ar med with arins and arinom, great arches with Lulzing ej es, stood at the herd of their al mes. Shahuni the son of Suusal, Shalya, Jayadmth of Avantı Vind, Anuund, Kings of hahnya Kamboj and Sudahslun, (12) Shrutayudh, halind and hing Jayatsen all these fen warriors, best of men, having arms liht cluls, performers of sacrifices with large donations, each a li dur of nn alsnauhın of army all these and innny other Politicians, Tings and princes under the lanner of Duryodhan, stood in the m dst of their armics, 1 ceping n careful watch, duci ed with ornaments and weapons, Leiring ludes of black deur, of immense strength, shilful in Lattle, cheerſul, ready to lay down their lives for the sake of Durjallian. They kept their (४३१९, भीमपर्य BAISHNA PALY [43191 योऽग्रणीः ॥ २१॥ वेतोष्णीपं वेतहयं श्वेत वाण मच्युतम् । अपश्याम महाराज भीम चन्द्र मियो दितम् ॥ २२ ॥ हेमतालध्वजं मी मं गजतं यन्दने स्थितम् । श्वेता भइय तीक्ष्यांशुं ददृश. कुरुपाण्डवा. ॥ २३ ॥ सृजयाश्च महावासा धृष्टद्यम्नपुरोगमा । जुम्ममाणं हामिहं दृष्ट्या समृगा यथा ॥ २५ ॥ धृष्टद्युम्नमुपाः सर्वं समु द्विपिजिम्मुहुः । एकादशंशा: श्रीजुष्टायाहन्यस्तव पार्थिव ॥ २५ ॥ पाण्डवानां तथा सप्त महापुरुषपालताः । उन्मत्तमरावती महाग्राहसमाकूलौ ॥ २६ ॥ युग नो समती द्वा दृश्येते सागराविध । नैव नस्तादृशोगजन् दृष्टों नच चैत । अनीकानां समत नां कौरयाणां तथाविध ॥ २७ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि सैन्यवर्णने पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ दीक्षित और समर्थ दश संख्याकी सेनाको लेकर स्थिर हुए ।२० । और ग्यारहवीं कौरवी महाभारी दुर्योधनी नाम विख्यात सेना जिसके स्वामी भीष्मजी थे वह सेना सब सेनाओं के आगे वर्णमानथी हे राजा ऐसी महा तेजस्वी असंख्य सेनामें हमने श्वेत पगड़ी श्वेतछन और कवचको धारण किये दुराधर्ष चन्द्रमा के समान उदय रूप कौरवेन्द्र भीप्यजी को देखा बड़े धनुर्धारी वारण विद्यामें कुशल छोटे मृगों के समान वह संजय देश पासी जिनका अधिपाते धृष्टद्युम्न था जंभाई लेतेहुए इम महा सिंहरूपी भीमको देखकर महाभयभीत हुए । २४ । हेराना यह तेरी ग्यारह अक्षौहिणी सेना शोभायमानहुई और इसी प्रकार पाण्डवों की सात अन्नौहिगी महा पुरुपोंसे रक्षित होकर तयार हुई और दोनों सेना ऐनी दिखाई देतीथी जमे कि युगके अन्त वाली प्रायमें दोनों ओरसे तरंग उठते हुए महा भयानक मदोन्मत्त मकरग्राहमादि जीवों से भरेहुए दो समुद्र व्याकुल होते हैं हे राजा हमने काखों की इकट्ठी हुई सेनाका ऐसा युद्ध प्रथम कभी न देसा था न सुना था २७ ॥ station at the head of the ten dirisions of the army 20 The eleventh division, hnown as the great army of Dury dhan, led ly Bhrhm, was in advance of all other divisioDS. In that countless army of great glory, I saw Bhishım the leader of the Kaurasas, intrepid, shining like the moon with his white turtan, white umbrella and The residents of Srınjaya, under the leadership of Dlirishtadyumn, sere terrified like a fluch of small animals at the sight of Bhishm the great and skilful archer who seemed to them to be like a yawning lion 24 Thy eleven alshaukinis looked grand and so were the seven al shaxhins of the l'andaras, also protected by great warriors. Both the armies loked like the waves of tro angry ses with their sharks and crocodiles, coming to meet each lother at the end of the Yug I had never seen or heard before a battle of tiro such great ai mies." 27. Armour 01) [4320] Malablarat (४३२०) सञ्जय उवाच ॥ यथा स भगवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनोप्रतीत् । तथैव सहिताः सर्व समाजग्मुर्महीक्षितः ॥ १ ॥ मघाविषयगः सोमस्ताद्दनं प्रत्यपद्यन । दाप्यमा- नोच सम्पनर्दिीव सप्त महाग्रहा ॥ २ ॥ द्विधाभूत इचादित्य उदये प्रत्यदृश्यत । ज्वलन्त्या शिसया भृयो भानुनानुदितो रविः ॥ ३ ॥ चवाशिरे च दीप्तायां दिश गोमायुवायसा लिप्समाना शाराणि मांसशोणतभोजनाः ॥ ४ ॥ अहन्याहनिपार्थानां वृतः कुरुपितामहः । गरद्वाजात्मजश्चैव प्रातरुत्याय संयतौ ॥ ५ ॥जयोस्तु पाण्डुप- प्राणामित्यूचतुरारन्दमौ । युयुधाते तवाय यथा स समयः कृतः ॥ ६॥ सर्वधर्म विशेषन्न' पिता देवव्रतम्तव । समानीय महीपालानिदं वचनमबर्तात् ।। ७ ॥ इदं पः क्षत्रियाद्वारं स्वर्गायापावृतं महत् । गच्छध्वं तेन शक्रस्य ब्रह्मणः सहलोकताम् ॥ ८॥ अध्याय ॥ १७ ॥ संजय बोले कि जिसप्रकार उन भगवान कृष्ण द्वैपायन व्यासजीने कहाहै उसी प्रकार सव राजालोग युद्धभूमिमें आपहुंचे।।उसदिन मघानक्षत्रमें चन्द्रमा मारहुआ और आकाश के मध्यमें सातमहाग्रह राहुकेतु आदि महातेजधारी मातहुए औरमूर्य देवता उदयहोने के समय दोरूपसे दिखाई दिये फिर वह प्रकाशवान् मूर्य अग्नि की ज्वाला के समान उदय हुआ और मांस रुधिर भोजन करनेवाले लोथोंके चा- हनेवाले काक और भृगालों के चारों दिशाओं में शब्दहोनेलगे।४। शत्रुओं के विन यकी सावधान चित्त सेनाओं के स्वामी कौरवों के पितामह वृद्ध भीमजी और भारद्वाज के पुत्र द्रोणाचार्य जीने वारंवार यहकहा कि कुन्ती के पुत्र पांडव लोगोंकी विजय हो और तेरे निमित्त युद्धकरेगे इसप्रकारसे वचनकहकर नियम किया, तब सव धोके जाननेवाले देववत नाम आपके पिता सवरानाओंको बुलाकर यह वचन बोले कि हे क्षत्री लोगो तुम्हारे स्वर्ग के निमित्त यह युदरूपी वहुत बड़ा द्वारखुलाहै उस द्वारके द्वारा तुम सब इन्द्र और ब्रह्माजी की सन्निकटताको पावो । ८ । यह CHAPTER XVil " The kings of the land," said Sanjaya, "mustered for the encounter, just as Vyrs had said. I'he day on which the battle commenced, Soma had approached the region of Pitris. Tho scven large planets as they appeared in the sky, looked like the blazing fire Tho sun looked as if divided into two, and slione like fire. Carnivorous jackals and crows, expecting corpses, began to utter ficiæ crics froin all directions which seemed on fire. Livery day Bhishin the grand. father and kirip charya used to say carly in tho morning, “ Victory to the Pandavas," although they fought according to their promise. Thy father Dovabrnt, firiu on duty, suinmonal all the hings and said to them, 10 Kshatryus, the door of henven is open for you. Go through it to the regions of Indra and Brahma Tlic rishis of old have show you this eternal path. Honour younulf ly engaging (४३२१) भीष्मपर्व BIISHA PAY [1321] एपः शाश्या पन्था. पूर्व पूर्ववर जूनः । सम्भावयारमा मागनव्यग्रगगसो युधि ॥ ९ ॥ नामागोप ययातिश्च मान्धाना ना नृगः । संसिद्धा परमं स्थानं गता कर्मभिरीशै. ॥ १० ॥ वर्ग क्षत्रियस्यैप यद्याधरणं गृहे। यदयो निधनंयाति सास्य धी. सनातन ॥ ११ ॥ पर मुस्ता महीपाला भीमेण भरतर्षभ । निर्ययु. स्थान्मनीकानि शोभयन्तो पात्तमैः ॥ १२ ॥ स तु चैकत्ताः फणः सामात्य साह याधुगि । न्यामत समरेशलं भीमेण भरसर्पभ ॥ १३ ॥ अपेतकर्णाः पुत्रास्ते राजान थैव तायका । निर्थ यु सिंहनादेन नादयन्तो दिशो दश ॥ १४ ॥ भ्वते. छ. पसासामर्णजयारणवाजिभि । तान्यनीकानि शेभन्ते गजैरथपदातिभि ॥ भेरीपणयाशदश्च दुन्दुभीनांच नि स्पनः । रथनेमिनिनादैश्च पभूषा पुलितामही ॥ १६ ॥ कावनाइदकेयूरै कार्मुकैथ महारथा. । भाजगागाव्यराजन्त ॥ रानानन मार्ग प्राचीन रझाने तुम समलोगों के निमित्त नियत कियाहै तुम युद्धमें मह. तचित होकर अपनी बड़ीसावधानी से लड़ो,राजा नाभाग, ययाति मान्धाता आदि वानसे महात्मा ऐसही युद्धरूप कर्मों के द्वारा मिद्धरूपहोकर राम २ स्थानों को गये। १० । घरमें रोगादि से जो क्षत्रियों का मरना है यह गर्म है और जो युद्ध मे शस्त्र के द्वारा मरता है वही क्षत्री का सनातन धर्म है हे भरतर्पम इसीमकार से भीमजी के मनमाये हुए राजालोग अपनी सेना उराम रथासे शोभित और बागसे अलंकृत करके मस्थित हुए और वह सूर्यका पुत्र कर्ण अपने मन्त्री और भाईबन्धुओं समेत युद्धये भीष्मजीके कारण शोकात्यागकर गया और आप के पुत्र और सर राजा लोग कर्ण से पृथक्होकर सिंहनाद करतेहुए टशों दिशाओंको चले वह सब सेना श्वेत छन और प्रजा पताका हाथी घोडे स्थ और पदातियांसे शोभायमान थी । १५ । उस समय मेरी पणव दुन्दुभियों के शब्द और स्थ के चक्रों को ध्वनि से. पृथ्वी महान्याकुल थी और महारथीलोग सुवर्ण के वानूवंद in war with attentive minds Nabhag, Yayatı, Mandhata, Nshush and Nrig obtained success and high regions of bliss by such deeds of prowess, 10. To die of a disease at home is derogatory to a bshatrya, to die ander arms in battle is his cternal duty” Thus addressed by Bhishm, the kings occupied their excellent cars and proceeded at the head of their respective divisions Only Karan the son of Surya went way from the field of battle on account of Blushm, your sons and other bings seprated themselves from Karan and went on roar. lihe lion3 All that army looked beautiful with white umbrellns, banners, elephants, h rses clituots and foot soldiers 15 The earth Wus agitated with the sjunds of drums labors, cymbals and the ing [ 4322] Mahabharat (४३१२) साग्नय पर्वता इव ॥ १७ ॥ तालेन महता भीष्मः पश्चतारण केतुना । विमला दित्यसकाशस्तस्थौ कुरुचम्पतिः ॥ १८ ॥ ये त्यदीयामहेप्यासा राजानो भरतर्प भ । अवन्ति यथादेश राजन् शान्तनवस्यते ॥ १९ ॥ स तु गोपासन शैव्य सहित सर्वराजभिः । ययौ मातङ्गराजेन राजाहेण पताकिना ॥ २० ॥ पद्मवर्ण स्त्वनीकानां सर्वेपामग्रन स्थितः । अश्वत्थामा यया यत्तः सिंहलाडगुल केतुना ॥ २१ ॥ श्रुतायुधश्चित्रसेन पुरामित्रो चिविंशति ! शल्यो भूरिश्रवाश्चैव विकर्णश्च महारथः ॥ २२ ॥ एते सप्त महेष्वासा द्रोणपुत्रपुरोगमा । स्यन्दनैर्वर वर्माणो भीष्मस्यासन पुरोगमाः ॥ २३ ॥ तेषामपि महोत्लेधा शोभयन्तो रथोत्तमाः । भ्राजमानाव्यरो चन्त जाम्बूनदमयाध्वजा ॥ २४ ॥ जाम्बूनदमया वेदी कामण्डलुविभापता । केतु केयूर और धनुपों से प्रकाशित होकर ऐसे शोभायमान थे मानों ज्वालामुखी पर्वत हीहैं। १७ । और कौरवों की सेना के रक्षक पचताराधारी ताल तके समान ऊंचे घड़ी ध्वना समेत निर्मल सूर्य के समान नियत हुए हे राजा जो बड़े धनुर्धारी शस्त्रके वेत्ता राजालोग तेरी सहायता में आयेह वह सबभी अपने २ योग्य स्थानों पर भीप्मनी के समीप वर्तमानहुए तदनन्तर गोवाशन शैव्य राजाओंके योग्य गजेन्द्र आदि चिनधारी ध्वनाओं से शोभित सब राजाओं समेत चला और राजा कमलवर्ण सर सेनाके आगे चला । २० । और महा सावधान शस्त्रधारी अश्व- स्थामा सिंह लांगूलवाली ध्वना से संयुक्त होकर गया और श्रुतायुध, चित्रसेन, पुरु- मित्र, विविंशाते, शल्य, भूरिश्रवा, और महारथी विकर्ण यह सातों महारथी वाण प्रहारी उत्तम कवच धारी हैं जिनमें मुख्य प्रश्नत्यामा रथमें सवार होकर भीप्मनी rumbling of charot wheels The mighty warriors deched with bracelets and ariolets of gold and with their bo19q, shone like hills of fire With lus stundered, tall us & palm tree, decled with five stars, Bhıslım the general of the Kaurav army, was glorious liho the sun. Those mighty archers of kingly rank that were on thy side, took up their positions as Chishm ordered them Shuvyn the ling of Govisang, accompinied by other king, rent out on his riyal clephants under a banner. 20 Ashwathama of the complexion of lotus went out, ready for every emergency, putting himself at tho head of all the divisions, with his standered bearing the device of the lion's tail Shrutayudh, Chitrasen, Purumitra, Virinshsti, Shalya, Bhurishrava and mighty Vzhorn, these scren great archers, sented on their chariots and protected by armour, followed Drona's son, in advance of Bhishm The tall standards of these warriors, made of (४३२३) FIAT BAISEMA PART [4323] चार्यमुख्यस्य द्रोण य धनुषा सह ॥ २५ ॥ अनेकशतसाहसमनीकमनुकर्पत । महान् दुर्योधनस्यातील गो मणिमयो ध्वजः ॥ २६ ॥ तस्य पौरपालिङ्ग कायो. जाम पुमक्षिणा क्षेमधन्याच शल्यश्च तस्थुः प्रमुखतोरण ॥ २७ ॥ स्पन्दनेन महाण केतुना वृषभेणच । प्रकपन्नेय सेनान मागधस्य पो थयो । २८॥ तदनपति ना गुम पेणच मनस्चिना । शारदांबुधरप्रख्यं प्राच्यानां सुमहद्धलम् ॥ २२ ॥ अनीक प्रमुखे तिष्ठन् घराहेण महायशा. । शुशुभे केतुमुख्यन राजतेन जयद्रय शत रथसहस्त्राणां तस्यासन् घशयतिन । अष्टौ नागसहस्रागि सादिनामयुता. के आगे चला उन सबकी भी जाम्बूनद मुवर्ण की प्रकाशित धनाएं शोभायमान हुई और प्राचार्यों में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य की धजा जांबूनद सुवर्णकी वेदी और कम- एडलसे शोभित धनुप समेत प्रकाशित हुई । २५ । और वहुनसी लाखों अनीकों समेत दुय्योधनकी बडी भारी ध्वजानाग चिन युक्त मणियों से जटित भी शोभित हुई और उसके आगे पौरख कालिग, कांगेन, सुदक्षिण, क्षेमधन्वा, शल्प, यह सब महारथी नियतहुए ओर मगध के राजा बडे मूल्य के रथ और पभ चिहन वाली बजा समेन सेना मुखको बचते हुए से चले और पूर्वी राजाओं की वडी भारी | सेना राजा अंग और महा उदार कृपाचार्य से रक्षित शरद ऋतु के बादलों की समान शोभायमानहुई ।२९। और वहा यशस्वी वाराहके चिन वाली श्रेष्ट ध्वनां का रखनेवाला महा प्रकाशवान सेना के मुस्लपर शोभित जिस के आज्ञावती एक लाख स्थीथे वह राजा जयद्रथ आठ हजार हाथी और छः अयुत रथों से युक्त होकर सेना cars, gold, beautifully set up for adorning their excellent looked highly resplendent The standard of Drona, the foremost of preceptors had the dcvice of golden star with a nater pot and the figure of a bow 25 The standard of Duryodhan guiding many hundreds and thousands of divisions bi re the device of an elepliant dechel with gems Puurasa the ruler of Kalmgas, Sudahshin the ruler of Kamyo. pes, Kshemdhanwa and Salya toob their pouition in Duryodlian's On a costly car with his bamper bearing the device of a bull and guiding the very van, the ruler of Niagadh marched against the foe. The large force of the East looking l be the fleecy clouds of autumn wu protected by the chief of the Angas and Krip3 of great energy. Putting himself in the van of his divisions with his beautuul standard of silver bearing the device of the boar, the famous Jayadı ath looked very glouvous A bundred thousand chariots, eight thousand elephants and sisty thousand horses were van 30 ] 4324] Malalharid (४३२५) निषट् ॥ ३१ ॥ तसिन्धुपतिना राज्ञा पाल्त जिनामुराम् ! सतरपना गाश्वमशोभत महदपलम् ॥ ३२ ॥ पश्या स्थल हसरतु न गान मर वेन च । पत सर्वकार पानां ययौ देतमतासह ॥ ३३ तस्पर्वतमाशा व्यरोचन महागजा । यन्त्रतोमरतूणीर पताकाभे सुशोभिता ॥ ३५ ॥ शुशुभ के नुपरयेन पावकन क. लिङ्गक । श्वेतच्छनण निकेप चापरव्यजाच ॥ ३० ॥ केत्मानपि म तङ्गायव परमाशम् । आस्थित सगरे राजन् मेघस्थ व भातम न् । २६ ॥ तजसा दीप्यमानस्तु चारणोत्तममस्थत । भगदत्तो व्यौ गजा यथा पत्रधरस्तथा ॥ ३७॥ गजस्कन्धगतायास्ता भगदत्तेन सम्मितौ । यिमानुषि दाराव त्यो केतुमन्तमन्नतो ॥३८॥ सरथानीकधान व्यूहा हस्त्यद्गो नृपर्पिवान् । वाजिपक्ष पतत्यग्र प्रह को शोभा देता था ।३ ओर सब कलिंग देशों का ध्वनापारी राजा साठि हजार स्थ मोर दशहजार हाथियों समेत चला । ३। उस के वडे रथ पहाड के समान शोभायमानहुए ओर वह अपने यन्त्र तोमर तूणीर पताका आदिसेभी महाशोभितथा और राजा कलिंगक अग्निका चिहन रखनेपाली उत्तम वजा और संत छत्र माला व्यजन चवर समेत शोभित था । ३५ । ओर हे राजेन्द्र युद्ध में राजा केतुमानभी विपिन और महा उराम अकुशवान हाथी पर सवार ऐमा पिढित हत्ता जमे कि वा- दल मर चढ़ाहमा सूर्य दृष्ट पडताहै पोर तेजमे प्रकाशमान उत्तम हाथीपर चढ़ा हुआ राजा भगदत्त भी ऐसा जाता था जेसे ऐतवत पर इन्न जाताहो । ३७ । निन्द, अनुविन्द अवन्ती के राना लोग भी हाथों पर सवार होकर उस बजाधारी भग- दल के समीपपनी ओर आशाकारी हुए वह रथाकी अनीक रखने वाला भयानक गृह जिसके अंग रूप हाथी रागा रूप शिर ओर घोडे स्पी पक्ष ह सामोर को under las command. The luce disanjon of the vin, hendel by thic burger of Sindhu containing numiurle-s cars cluphants and caruiry looked gloulou, Tliu nukı ot himgis with httumat had in huis retinue sixty thionsand chariots and ten thous nd el phants looking like lullo and cpuippul with m chmes lineus quisers and standered, we e glori ous t, le hold. llc ruler of the halonges with la- tall standured shining like fin a hatte umbrelt golden sun salt and chainars shonc brilliant Is Ketumat too, riding an clephant with a goal and leiutiful hool was stationeri in little like the sun in the midst of cloud: King Bling dittr ol yn at intus rele luis elephant and losind lihe Indrs, Yind and mind tu tormex of Asanti equal in rank to Bha quatta flower hetom it on their clephants 18 Armnger bs Drona Blu lım, Ashwathains, Vahlk and ripu, the phalant h diluphants (४३२५) HISHTEG Bosnja Pais [4325] सन् सर्वतोमुपः ॥ ३९ ॥ द्वोणेन विधितो राजन् राज्ञा शान्तनबेनच । तथैवाचार्य पुत्रेण पालीकेन कोण च ॥४॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि सैन्यवर्णने सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ सजय उवाच । ततोमहालुमल शब्दो हृदयकम्पनः । अथूपत महाराजयो. धानां प्रयुयुत्सताम् ॥ १॥ शहदुन्दुभिघोपैश्च वरणानांच बृहतः । नेमिचं पैर. थानांच दौर्यतीववसुन्धरा ॥ २ ॥ हयानां पमाणानां योधानाचैन गर्जताम् । क्षणे नैव नभानामः शब्दनापूरितन्तदा ॥ ३ ॥ पुत्राणांतत्र दुर्घर्ष पाण्डवानां तथैवच। समकम्पन्त सैन्यानि परस्परसमागमे ॥ ४ ॥ तत्र नागास्याश्चैय जाम्यूनदविभूपि. ताः । श्राजमाना ब्यदृश्यन्त मेघा इव सावधुतः ॥ ५ ॥ ध्वजा बहुविधाकारास्ता मुख किये हुए हँमताहुआ उग्ररूप होकर गिरता है उसको द्रोणाचार्य राजा भीष्म अश्वत्थामा, बालीक और कृपाचार्य इन पांचोंने रचाहै ॥ ४० ॥ अध्याय ॥ १८ ॥ संजय बोले हे महाराज इस के पीछे युद्धाभिलापी महा शूरवीरों के कठिन भयं- कर शब्द हृदय के कंपाने वाले मुने गये, शंख दुन्दुभियों के शब्द और हाथियों की चिंघाड वा रथों पहियों के महा शब्दों से पृथ्वी कंपायमान सी होगई घोडोंके दिन- हिनाट और गर्जना करते हुए महा मल्ल शर वीरोंके शब्दों से पृथ्वी और आकाश एक क्षणनात्र में शब्दों से भरगये और वह महा दुर्वर्प अापके पुत्र और पांडवों की सेना के मनुष्य परस्पर में तम्स होकर कंपायमानहए वहां जांबूनद सुवर्ण से अलं- कृत हाथी और रथ ऐसे दिखाई दिये जैसे बिजली समेन बादल दिखाई देते हैं। ५ । 40. for its body, the Kings for its head and the cavalry for its wings With face tunaids all sides, the phalans scemed to smile and ready to spring CHAPTER XVIII Sanjaya said, " Soon after, a loud uproar, shalking the heart, made by the warriors who were ready to fight, was heard The tarth seemed to rend with the sounds of conchsliells, drums, the 6 unts of elephants and the rumbling of chariot wheels. And soon the car th and shy nere filled with the neighing of horses and the shouts of warriors. The troops of thy suns and those of the Pandavas trembled at the time of encounter. The elepliants and cburiots, deched in gold, loolcd glorious lilc clouds decked with lightning. 5.

[4326 । Malabharat (४३२६) यकानां नाधिप । काश्चनाइदिनारेजुर्वलिता इव पावकाः ॥ ६ ॥स्वेषाञ्चैय पोषांच समदृश्यन्त भारत । महेंद्र केतव शुभ्रा महेन्द्र सदनेणिव॥७॥कांचन कवचै/राज्वलना समप्रभ । सन्नद्धाः समदृश्यन्त ज्वलनार्कसमप्रभाः ॥ ८ ॥ कुरुयोधवराराजन् विचनायुधकार्मुकाः । उद्यतैरायुधाश्चत्रस्त लवद्धाः पनाकिनः ॥ ९ ॥ ऋषभाक्षा महेवासाश्चमूमुखगगावभुः । पृष्ठगोरास्तु भी मस्य पुत्रास्तव नराधिप । दुःशासनो दुर्विप दुर्मखो दुःसहस्तथा ॥ १० ॥ विविंशतिश्चित्रसेनो. विकर्णश्च महाग्थ सत्पत्रतः पुत्रमित्रो जयो भूरिश्रवाः शलः ॥ ११ ॥ ग्था विंशतिसाहस्रातिथैपाम- नुयायिन । अभीवाहा शूरसेनाः शवयोथ वसातयः ॥ १२ ॥ शाल्वा मत्स्यास्तथा और मुवर्ण के वाजूबंद पहरे हुए आपके पुत्रों की ध्वजाओं में नाना प्रकारके रूप- वाली अग्नि की ज्वाला अग्नि के समान प्रकाशमान हुई इसी प्रकार मब अपने और दूसरे लोगों की भी ध्वजा ऐसी दिखाई देती थी जैसी कि महा इन्द्र के भवनों वे उस की तेजस्वी ध्वजा वर्तमान हों, अग्नि और मूर्य के समान प्रकाशमान और सुवर्ण के कवचों से अलंकृत वीर लोग भी सूर्य और अग्नि के ही समान प्रकाशित दृष्टपडे हेराजा कौरवों की सेना में श्रेष्ठ विचित्र आयुध वा धनुप धारी श्रायुधों समेत उठाये हुए छत्र ताल और पिनाक नाम धनुपों के बांधने वाले मुन्दर नेत्रधारी वाणविद्या में कुशल सेना के मुख पर वर्तमान होकर शोभायमान हुए और हे राजा आगे कहे हुए आपके पुत्रभीमजी के रक्षक पीठ के पीछे की ओरहुए अर्थात् दुश्शाशन, दुर्वि- पह, दुर्मुख, दु सह, विनिशति, चित्रसेन, महारथी, विकर्ण, ११ । सत्यग्रत, पुरु मित्र, जय, भूरिश्रया, शल, और इसी प्रकार बीस हजार रथ इन के पीछे चलनेवाले The banners of different forms belonging to the warriols on thy side, adorned with golden rings, looked resplendent like fire and lesembled the banners of Indrs on his celestial palaces. 'l he heroic warriors accoutred in golden roats of mul, blazing like the sun were glorious to behold like fire on the sun. The chief Kaurava warriors with their good bows and weapons upraised nnd their hands protected with leather guards, leaning linners, and the mighty archers with eyes as large as those of bulls, placed themselves at the heads of their divisions l'hose of thy sons who protected Bhıslım from behind noro ( 10 ) Dushesan, Durvishnh, Durmukh, Dussah, Vivinshati, Chitrasen and vnlliant Viharn 11. With them wero Satyavrat, Purumitra, Jaya, Bhurishrava, Shi] and twenty thousand charioteers. Tho Abhishabas, the Shursenes, the Shivis, the Uasatis, the Shralyas, tho Malayas, the Anyashtas, the Traigartas, the Kehayas,tho Sauvirase,' (४३२७ भीष्मपर्व BHIBYAA PARV [4327] वष्ठागताः केकयास्तथा । सांवराकैतवाःमाच्याः प्रतीयोदीच्यवासिनः ॥ १३ ॥ द्वादशैते जनपदाः सर्चे शूरास्तनत्यजः । महता रथयेशन ते रक्षुः पितामहम् १४॥ मनीकं ३शसाहसू फुजराणां तरस्चिनाम् । मागधो यत्र नृपातस्तद्रयानीक मन्वयात् । १५ ॥ रथानाञ्चक्रपक्षाश्च पादरक्षाथ दन्तिनाम् । अभवन चाहिनीमध्ये शताना- मसुनानि पट ॥ १६ ॥ पादाताश्चाग्रतोगच्छन् धनश्चीसपाणयः। अनेकशतसा. हवानस्वरासयोधिनः ॥ १७ ॥ अक्षौहिण्यौ दर्शकाच तव पुत्रस्य भारत । सदृश्यंत महाराज गनेव यमुनान्तरे ॥ १८ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गीतापणि सैन्यवर्णने अष्टादशोऽध्यायः ।। १८॥ हुए, अभीपाह, शूरसेन, शिवय, वसातय, शाल्व, मत्स्य, अवष्ट, बैग,केकयासौवीर, कैतव, और पूर्वी पश्मिी और उत्तरीय राजाओं के समूह इन बारह देशाके नाम से विख्यात सब शूरवीर देहों के त्यागने वाले राजाओं ने बहुत से रथों समेत पितामह की रक्षाकी, और शीघ्रगामी हाथियों की एकलाख अनीक थी उस रथों की अनीक के साथ मगध का राजा चला और सेना के मध्यवर्ती रथों के पहियों की और हा थियों के पैरों की रक्षा करने वाले साउलाख धनुप खड्ग ढाल धारण कियेहुए नख और भासनाम आयुधोंसे लडनेवाले लाखों पदानी आगे को चले, हे महाराज धृतराष्ट्र इस प्रकार से आपके पुत्र की ग्यारह अक्ष हिणी सेना ऐसी दृष्टि पड़ी जैसे कि गंगा में यमुना अन्तर्गत होकर दीखती है । १८ । the Ritares and the people of the Last, the west and the Nortin; these twelve bravo races were resolved w fight rechless of their lives and protected the grandfather with innumerable chariots. With an army consisting of ten thousand swift elephants, the king of Magadlı followed them. Those who protected the clephants and the wheels of chariots, were six millions in number. The foot soldiers 1hit marched in advance, armed with bows swords and shield, numbered many millions. They used also their nails and dirts in fighting. The eleven ahshauhinis of thy son looked like the Yumuna entering the Ganges." 18.

{ 4328] Mahabharat (४३२८) धृतराष्ट्र उवाच ॥ अक्षौहिण्यो दशैकाच ब्यूटादृष्ट्वा घिष्टिरः । कथमल्पेनसैम्पे न प्रत्यव्यूहत पाण्डव ॥ १॥ यो वेद मानुष व्यूह देवं गांधर्व मासरम् । कथं भीष्म स कातेयः प्रत्यव्यूहतसंजय ॥२॥ संजय उवाच ।। घार्तगटाण्यनीकानि दृष्ट्वाड्यूटा नि पांडय. । अन्य भापत धर्मात्मा धर्मराजो धनंजयम् ॥ ३ ॥ महर्वचनात्तान चेदय न्तिवृहस्पते. । संहतान् योधयेदल्पान् कामं विस्तारयेत् यहून् ॥ ४॥ सूचीमुख मनांक स्या दल्पानां वहुभि सह । सम्माकञ्च तथासैन्य मल्पीय सतरां परैः ॥ ५॥ एत द्वचन मानाय महयूह पांडव । एतद छु वा धर्मराज प्रत्यभापत पांडवः ॥ ६॥ एप व्यूहामिते व्यूह राजसत्तम दुर्जयम् । अचलं नाम वजाप्यं विहितवज्रपाणिना ॥ ७ ॥ अध्याय धृतराष्ट्र बोले कि पांडव युधिष्ठिर ने व्यूहरची हुई ग्यारह अक्षौहिणी सेना को देखकर किस प्रकार से अपनी थोड़ी सी सेना से व्यूह की रचना की हे संजय जो पधिष्टिर कि मनुष्य देवता गन्धर्व और असुर सम्बन्धी न्यूहों को जानता है उस कुंती के पुत्र ने किस प्रकार से अपने व्यूह को रचा, संजय ने कहा कि धर्मात्मा धर्मराज पांडव युधिष्टिर दुर्योधन की व्यूह रचीईई सेना को देखकर अर्जुन से कहा कि हे तात अर्जुन वृहस्पति महर्षी के वचनों से हम जानते हैं कि थोडी सेना को मिलाकर लडा और वहुनसीतेना को इच्छापूर्वक फदलावे बहुत से मनुष्यों से लड़ने में थोडे मनुष्यों की सेना का मूचीमुग्व होय इनी प्रकार हमारी सेना थोडी है। ५ । और शत्रुओं की अधिक है सो हे अर्जुन महपी के इस बचन को जानकर सेना का व्यूह रच यह मुनकर अर्जुन युपिचिरसे कहा कि हे राजेन्द्र में इस तेरी सेना के व्यह की वह रचना करता हूं जो इन्द्रकी नियत करी हुई वजूरूप army? CHAPTER XIX Dhutrashtri sud, " Seeing the eles en akshuhuins arryed in the order of lbattle, hor did Yudhi-h shir the Pandar array his smiller lon drd Kunti's son array his army agains: Bhushan nho was acquainted with all binds of arriy, human, a lestual, Gandharon and Asura!' " Seein: Dhritrashtra's ariny a'rayed in order of battle, the rurta us Pundar, King Yudhishthir the just addressed Arjun, sıying, "Vulssprti tells us that a smaller army hen brought against largo nuinkers slı uld le e nedensed, wlule a large army may be spread at pleasure. A smallor or my arrayed against a large one should be redge shap! Our trops compired *ith that of the eneiny is sinnllur Buar in mind the words of tlic great rishi, arrango "I shall arrange the army into the ships of vajrs, thic Army (४३२९) भीमपच BIISRAS PARY [4329] यः सबात इनोभून समरे दु सह परैः । सन. पुरो योत्स्यते चै भीम प्रहरतां घर ॥८॥ तेजाास रिपुसैन्याना मृदनन् पुष्पसत्तमः । मोऽनणीर्योत्स्यात नोयुद्धो पायविचक्षण ॥ ९ ॥ य सध्या दुरव सधै दुर्योधनपुगेगमाः । नियतिष्यन्ति संवस्ताः सिंहदगा यथा ॥ १० ॥ त सर्वे सश्रयिष्याम प्राकारमतोभया. भोम प्रदरतां श्रेष्ठ देवराज मिवामरा. ॥ ११ ॥ न हि सोस्ति पुमाल्लोके य सकुद्ध वृकादरम् । द्रष्टमत्युप्रफर्माणं विपहेत नरमम् ॥ १२ । एवमुक्त्या महावास्तथा चक्रे धनजय 1 व्यूह्य तानि चलान्याशु प्रययौ फाल्गुनस्तधा १३॥ सम्प्रयातान् कुरुन् रटवा पाण्डवानां महाचम् । गगय पूर्णास्तिमिता स्पन्दमाना व्यदृश्यत ॥ १३ ॥ भीमसेनोऽग्रगातेपा धृष्टद्युम्नश्च वीर्यवान् । नकुल सहदेवश्च धृष्टकेतुश्च पार्थिवः ॥ १५ ॥ विराटय तत पवाद राजाधाक्षोहिणीवृत । भातृभि सह अचल नाम है जो वह लड़ाई में वायु के समान उठा हुआ शत्रुओं से असहामहार कर- नेवालों में मुख्य और युद्ध के विचारों में कुशल पुरुषोत्तम भीमसेन सम्पूर्ण सेना के पनों को विदीर्ण करना हुआ हमारे आगे मागे चलेगा और सब कौरस लोग जिन का अग्रवर्ती दुयोधन है वह सब कौरखी सेना भीमसेन को देखकर ऐसे लौटेगी जैसे कि सिंह को देखकर छोटे छोटे मृगों के यूथ भागते है हम सब निर्भय होकर उस महारकर्ताओं में श्रेष्ठ पर कोटारूप भीमसेन के समीपी होकर ऐसे रक्षालगे जिस प्रकार से देवता इन्द्रकी रक्षा में होते है । १। ऐसा मनुप्य इस लोक में कोई नही है जो इस कोररूप भयकारी भीमोन को देखमके ऐमा कहकर उस महावाहु अर्जुन ने इसी कार से किया और दडी शीघ्रता से अर्जुन व्यूहकी रचना करके चला गया तिस पीछे गंगाजी के.समान पूर्ण और चल पांडवों की सेना कौरवों कोदेख कर कुछ चलायमान हुई इस सेना के अधिपति भीमसेन, पराक्रमी धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव और राजा पृष्टकेतु।१५। उसके पीछे राजा पिराट एक अक्षौहिणी सेना और designed by Indrs," replied Arjan Bhim who is like the bursting teinpost unbearable by the enemy will leid our army Bhim who is so skulful in fighting will work in the vin and will crush the trops of the enemy Bhim the great destroyer of enemies, at whose sight the followers of Duryodhan will run away in tertur, as lower animals d) at the sight of a lion, while our men will seek his shulter as if he were a wall or as gods seek the refuge of Indra No living man an cist'hi eye on Vuthadar of fierce deeds when hais angry." Having sand this, Phan-lujry of mighty arms did as ho had said and quickly arranging lus troups in battle array proceedcd against the foa Thu mighty army of the Pandav is, seeing the inotion, noved like the rapid current of the Ganges Bhimseli, Dhirshtndyun of great energy, Nakul, Sphadey and Dhuristahetu lued the King Vunt, 8 11 Kuuraya army in 11 amics 15 रथ [4380] Wablisrat पुत्रैव सोभ्याक्षतपृष्ठत ॥ १६ ॥ चारक्षौ तु भीमस्य माठीपुनौ महायुगी । द्रौपदे या ससौभद्रा पृठगोपास्तरस्थिन ॥ १७ ॥ धृष्टद्युग्नश्च पाञ्चालास्तेषा गोप्तामहा । सहित पृतनाशूरैरगमुरथै प्रभद्रकै ॥ १८ ॥ शिखाडीतुतत पश्चादर्जुनना गिरक्षिा । यत्तो भीष्मपिन शाय प्रययौ भरतर्षभ । १९ । पृष्ठत प्यनिस्यासी युयुधानो महारत । चकाक्षौतु पाचाल्यौ युधामन्यूत्तमोजमा ॥ २०॥ कैयो धृष्टकेतुश चेपित नश्च वीर्यवान् । भीमसेनो गदा विध्रयजसारमयी दृढाम् । चरन् वेगेन महता समुद्रमपि शोपयेत् ॥ २१ ॥ एते तिष्ठति सामात्या प्रेक्षन्तस्ते जनाधिप । धृतराष्टस्य दायादा इति व भरवावीत् ॥ २२ ॥ भागला तदा राजन दर्शयस्वमहाबलम् । बुवाणन्तु तथा पार्य सर्वसैन्यानि भारत ॥ २३ ॥ अजयस्तदाया | गाभरनुफूलाभिराहये । राजा तु मध्धमानीके कु-तीनो युधिष्ठिर ॥ २४ ॥ वृहद्भि भाई बन्धु पुनों समेत भीमसेन की रक्षा के निमित्त पीछे की ओर हुए और भीमसेन के रथकी रक्षा करने को नकुल और सहदेव दोना भाई नियत हुए उनके पीछे द्रौपदी के पुत्र अभिमन्यु, रक्षा करने को उपस्थित हुए और पाञ्चाल देशी महारथी धृष्टद्युम्न शरों की सेनाका और प्रभद्रक नाम रथों का रक्षकश और हे भरत बंशिया में श्रेष्ठ धृतराष्ट्र इन सबके पीछे अर्जुन से रक्षित भीष्म जी के मारने में कुशल शिखंडी चला और अर्जुन के पीछे रक्षा के लिये महाबली युयुधान हुगा ओर रथके पहियों की रक्षा के लिये पाञ्चाल देशी युधामन्यु और उत्तमौजा यह दोनों हुए. केकयदेशवासी धृष्टकेतु और पराक्रमी चेकितानभी साथ हुए और भीमसेन वजूसारमयी दृढ गदाको धारण किये पड़े वेग से चलता हुआ समुद्र को भी शोपण करनेवाला था, । २१ । हे राजा उसके पीछे अर्जुन भीमसेन से यह वचन बोला कि हे भाई भीमतेन तुम्हारे देखने को मंनियों समेत धृतराष्टके पुत्र वर्तमान होकर नियतहैं तुम इनको अपना अतुल पराक्रम दिसामओ ऐसे वचनाके कहनेवाले अर्जुनको युद्ध भूमि में देखकर सब surrounded by an uhshuhını of army and accoinpined by his brothers and sons, brought up the rear The two sons of Madri, of great gloy protected Bhum's wheels while the sons of Draupadi and the son of Sublindra of great energy protected from behind. Dhrishtadyumn the mighty charioteer prince of Panclial with tho bravo warriors and the forçmost of charioteers, the Prabhadraks, protected those princes from belund. Behind him was Shuhhandı protected by Arjun advanced with concentrated attention for the destructi n of Bhishm Behind Arjun was mighty Yuyudhıon, and Yudhamnny u and Uttamoujas protected the wheels of his chariot, along with them were the princes of haihaya and Dhrishtahetu with Cholunn Bluusen, weilding lus mace of the hardest metal and moving with gicat speed could dry up the very occ in The cons of Dlarıtrishtra nh thur coun-ellors were also pointed out by (४३३१) सोमपर्व BEISIN ! Pany [4331] पारमत्तश्चलनचरिच ! अक्षाहिण्याय पापारयो यनसेनामहामना । विराटमन्य यान् पश्चात् पाउयाय पराक्रमी ॥ ५५ ॥ तेप मादित्यचन्द्रामा नरोत्तमभूषण । नानाचिन्दा राजन् ग्येप्यासन् महायजा ॥ २६॥ समुत्सार्प तत पञ्चाधृष्टद्युम्नो महारथ. I बात में मह पुनध से याद युधिष्टिरम् ।। २७ ॥ त्वदीय नापरपाच रथेषु (पुर न घजान् । अभिभ्यार्जुनस्र्थयो रधे तस्थौ महायपि ॥ २८ ॥ पदातान्त्यग्रतो गासशक्त्यप्रियाणय । अनेरयतम हना भीमसेनस्य रक्षिण ॥ २२ ॥ धारणा दशसाहना प्रभिन्नरटामया । शूग हेममयीलदीप्यमाना इचा. चला ॥ ३० ॥ क्षरस्त इव जीमा महाही पद्मगधिन ! राजानमाययु पश्चाजीमूता सेनाने अपने अनुकूल वचनों से उसको पूजा और कुन्तीका पुत्र राजा युधिष्ठिर मेना के मय में चलायमान पर्वतके ममान मनवाले हाथियों मे नंयुक्त था इन सबके पीछे पाञ्चालदेशी रड़ा साहसी पराक्रमी सन्न राजा एक अताहिणी मेना ममेत राजा विराट के पीछे चला । २० । जिनके रथों पर सूर्य चन्द्रमा के समान प्रकाशित उत्तम मुवर्ण के मायूरणों मे अमहत अनेक मकार की विकराली वडी २ जना वर्तमानीं तदनन्तर महारथी धृष्टद्युम्नने सेनाको हटाकर भाई रेटों ममेन युधिष्ठिर को रक्षामे किया और हे धृतराष्ट्र तेरेपुत्रा के बार जन्य राजाओं के रयॉपर जो वडी वही नजार्थी उन सको तिरस्कार करके अर्जुन की वना पर श्रीहनुमान.जी अपने अनेक भारोंको निये वर्चपान हुर वरली यष्टी आर्ट के रखनेवाले लाखों पढाती रक्षाकरने के लिये भीयमेनके आगे चले । २९ । और गंडस्थलोंमे मह डालनेवाले क्ली महारती सुनहरी बालों से गोभित कंपी बादल से मढ वरमानेवाले वदुमूल्य वाले वकालीन मेघों के रूपकमल कीसी गन्यवाले दशहजारमटोन्मत्तहाथी Vibhatsu who directed Yudhishther's attention towards Bhim Wule Purth was saying this, the troops congratulatd him with res pect King Yudhishthur, the son of Konti toob up his po ition in the centre of the army, surrounded by huge and furious elephants resembling moving hills Kiing Drup d of I anchal of great prowes followed Virat with an Abshuuhini of troops for the sabe of the Punduvas. On tne chariots of three king nere tall standards bearing various devices, deched with excellent ornaments of gold and shining Bibe the sun and the moon Leading thione hings ard Diabing room for ludhishthur, the mighty chanoteer, Phra ht•dyumna accom panied by his brothers and sons, protected ) udhu stluir from Lehind. But higher than all the standards on the cbarois of the army 9.5 tell as on this if the other side 12s the one of Arjun bearing the device of Hanuman Hundreds of foot sold er, armed with cords spars, and switars, went forward for the protecti n of Ibimsen.

] 4332] Valia bharit (४३३२) | इव धार्पिका ३. भीममेनो गदाभामा प्रकर्पन परिघापमाम् । प्रचर्प महासैन्य दुराधपी महमना ॥ ३२ ॥ तममिव दुष्प्रेक्ष्य तप तामेव वाहनीम । न शक सवयोधास्त प्रति चौक्षितुमन्तिक ॥ ३३ ॥ वज्रो न मैप स व्यूहा निर्भय सवतामख । चाप विद्युतध्वजा घोरो गुप्तो गाण्डीयव-वना ॥ ३४ ॥ य प्रनि-यूह्य तिष्ठीत पाण्डवास्तव वाहिनीम् । अजेयो मानुपे लोक पाण्डवै रभिराक्षत ॥ ३५ ॥ सधया तिष्ठत्समैन्यषु सूर्यस्यादया प्रति । प्रावात्सपृषतो वार्निरभ्रे स्तन यित्नम न् ।। ३६ ॥ विघामाताश्च विवधुनींचे शर्क रवर्षिण : रजश्चायतमहत्तमआच्छाप्यजगन् ॥ ३७॥ पपात महती चोल्का प्रामखी भरतर्षभ । उद्यन्त सर्यमाहत्य व्यशीर्यत महास्थना ॥ ३८ ॥ अथ सना मानेपु सैन्येषु राजाके पीछे चले उसकाल महा साहसी दुराधर्ष परिघ के समान भयानक गदाको धारण किये हुये वडे प्रवल भीमसेन ने बडी भारी सेनाको बँचा तब उस मूर्य के समान दु ग्वसे देखने योग्य सेनाके तपाने वाले भमिसनके सन्मुख आकर वह सब सेना समीपसे उसके देखने में अप्समर्थ हुई ओर वह वज नाम निर्भय सव ओरको मुख रखनेवाला भयकर ब्यूह वडी भारी बजा रूप विजली से सयुक्त गाडीव धनुष धारी अर्जुनसे रक्षित हुआ हे राजा तेरी सेनाके सन्मुख पाण्डवलोग जिसब्यूह को रचकर वर्तमानहै वह व्यूह चारों ओर पाडवासे रक्षित होकर इसलोक म महादुर्धर्ष । है अर्थात् उनका विजय करने वाला कोई नहीं दिखाई देता है । ३५ । सूर्योदयी स या के समय सब सेना के नियतहोनेपर विना वारल आकाशीय जल कण रखने वाला महा प्रचण्ड वायुका वेग चला ककडा की सचनेवाली पृथ्वी सवधी महावायु चली उसके कारण वडी भारी धल ऐसी उडी कि जिससे सम्पूर्ण संसार आच्छा दित होगया उस समय महा शब्दवाले पूर्व को मुखकिये उग्र उल्कापात हुये और len thous ind clephınts, with juice trielling down their cheels ind mouths like rund op- from clouds possessing grew courage sluning with golden tippugs huge is lills costly and emitting the fragrance of lotuses follo4 cd the ling like moving mountains. 32 Thu magnanim us and invincible Bhimsen, whirling his fierce mace, resembling large pirigh or club sernied to crush the large army Dazzling the eyes of behuldeis lihe the sun, and scorching as it were, the hostile arms, none of the warii rs could look him in the face or appl onch too nen him The intiep d aray, with its face towards all sides called yra hiving bows for the sign of lightning and very dre udful was protected by the fielder of Gandıv Disposing their troops in this countei aray against thy ariny, the Pandavas waited for battle and protected by the Pandat is the any was invincible by human beings 30 When both the umies stool at dawn waiting for sunrise a sind begin to blow with diopes of writer and roll of thunder without clouds. The wind brought with it sharp 30 (४३३३ भोजपE BAISHA PARV {4333] भरतर्षभ ! निष्प्रभोऽभ्यधयो सूर्यः सघोपं भूश्वचालच ॥ ३९ ॥ व्यशीर्थत सनादाच भूस्तदा भरतर्षभ । निर्याता वहयो राजन् दिदुसर्या चाभयन् ॥ ४० ॥ प्रादुरासीद्र जम्तीनं न प्रज्ञायत किंचन । ध्वजानांधूयमानानां सहसा मातरिश्वना ।। ४१ ॥ फिर्कि- जीजालबद्धानां कांचनन्नग घाराम्बरः। महनां सपतानामादित्यसम तेजसाम् ॥ ४२ ॥ सर्व झणझणी भूत मासीत्तालयनेष्विय । एवन्ते पुरुषव्याघ्रा, पाडया युद्धनन्दिनः ४३॥ व्यवास्थताः प्रतिव्यूह्य तय पुत्रस्य बाहिनीम् । प्रसन्त इवमज्जानो याधानां भरतर्षभ ॥४४॥ दृष्टयानतो भीमसेन गदापाणि मवस्थितम् ॥ ४५ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि पांडवसैन्यगृहे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ उदय होनेवाले सूर्यको घातकरके फैल गये इसके पीछे फिर सव सेना के तैयारहोंने के समय मूर्यका उदय प्रकाश से रहित हुआ और शब्दों के कारण पृथ्वी कंपाय मान हुई और अनेक प्रकार से हिलझल कर जहां तहां फटभी गई और सब दिशा- ओं में हवाओं के परस्पर टक्करखाने से घडे २ भयानक शब्द हुये ऐसी भारी कठिन धूल उडीके कुछ भी नहीं जानपडता था फिर अकस्मात वायुसे कम्पायमान मुनहरी माला वा उत्तम वस्त्रों समेत तुद्रघंटिकावाले जालों से मांडेत प्रकाशमान ध्वजाओं का ऐसा झंझणा शब्द हुआ जैसा कि ताल क्षके बन में होता है हे भरतर्षभ इस प्रकार से वह युद्धको शोभा देनेवाले पुरुषोत्तम हाथ में गदा लिये हुए भीमतेनको आगे नियत देखकर आपके पुत्रकी सेना सन्मुखम व्यूहको रचकर हमारे वीरोंकी मज्जाको निगल जानेवालोंके समान नियनहई ४५ ॥ pebbles and a thick dust arosc covering the world with darkness Largo meteois shot eastwards ng urust the rising sun and broke into pieces sith a loud noise In the mcantine the sun rose without splendour, the earth shook with loud reports and crached in many places The tall standards furnished with bells and decked with Ornaments, flowels and inch drapery, shining like the sun, being shaken by the wind, gave a loud jingling no se like that of a forest of palm troes it was thus that the Pandavas a lo loved battle, arrayed their army against our own and the very appearance of Bhimsen driving away the life out of our narrious with terror." 45.

[ 4374] Mahabharat धृतराष्ट्र उवाच सूर्योदयंसजय केनु पूर्व ययुत्सवो हप्यमाणा इवासन् । मामकावा भीष्मनत्रा समीप पाण्डयाचा में मनेनास्तदानीम् ॥ १ ॥ केषां जयन्यौ सोमसूर्यो स वायू केषा सेनाश्चापदाश्चाभपन्त । कश यना मुखवर्णाः प्रसन्ना. सर्य मेव हि मेव यथावत् । २ ॥ सञ्जय उवाच ॥ उभे सेन तुल्य मियोपयाते उभे व्यूहे दृष्टरूपनरेंद्र । उभ चित्र वनगाजप्रकाशे तथैवोभे नागरथाश्वपूणे ॥ ३ ॥ उभे सेने वृहत्यौ भीमरूपे तयुयोम भारत दुर्विपद्य । तवाम स्वर्गजयाय स्टे तथैवामे सत्पुरुषोपजष्टे ॥ ४ ॥ पश्च न्मुखा. कुरवो धार्तराष्ट्रा स्थिता पार्था प्रामुखा यात्स्यमाना. । दैत्यन्द्र सेनवच कौरव णा देवेन्द्र सेनेवच पाण्डवानाम् ॥ ५॥ चके वायु पृष्ठत पाण्डवाना धार्तराष्ट्रान् । अध्याय ॥ २० ॥ धृतराष्ट्र बोले कि हे संजय मुग्योदय होनेपर भीष्मजी के आज्ञावर्ती मेरे पुत्र अथरा भीमसेनसे रक्षित पाण्डव लोगों से युद्धाभिलापी सेनाके सन्ख लड़नेको कौन • प्रसन्नमन हुए किसके पीछेतो वायुसमेत मूर्य और चन्द्रमा हुये और कि नकी सेनाको फाहनेवाले श्वान आदि पशुओंने भूता और कौन से वीरों का प्रस न्न मुस था यह सब यथातथ्य संपूर्णताके साथ मुझ से कहौ, संजयोले हेमहाराज भरतवंशीपरापर सन्मुख जाने वाली दोनों न्यूहित सेना प्रसन्नरूप चित्रित वनकी पक्ति समान मकाशिन हाथी घोड़े स्थों से युक्त महाभयानक और क्षमारहेत क्रो धाग्नि रूप स्वर्गके विनय केलिये उत्पन्न सत्पुरुषों से सेवित अर्यात सत्पुरुपों के निवास स्थान थी उसमय धृतराष्ट्र के पुत्र कोख तो पश्चिमाभिमुख और युद्धाभि लापी पाण्डमलोग पूर्वाभिमुख नियतहुएइनदोनोंमें कोरवोंकी सेनाता सेनाकेसमान थी और पाण्डों की सेना देवेन्द्रकी सेनाके समानथी । ८ । उतमयम पाण्डवों CHAPIFR IX Dhritrushtri $11, -"Wlien the sun rose, O Sinj?y , of iny army led by Bhishma und the fanduva nrmy led by Bhim, wluch first cheerfully approached the other, desirous of fight! To which s de wen the Sun, the Mon, and the wind hostile, and against whim did the ix ests of prey u ter inauspicious sounds ? Who wer than young mun, the complexions of whose faces were charful ! Tell me all tlus truly and duls Sanjaya saud --" Both arnines, when arrayed, eru equally joy fu) O hing! Both armies, looked equally beautiful, nummy the aspect of blossomning woods, and both arms were full of il phants, el-s, und horson 3. Both arines en last and terrible in aspect, and sy also, O Bharata, nont of tlim could bear the other Both of them were arrayed for conquering the very lessons, and Loth of thicin consisted of exallent persons The Kauraias lxloom " (५३३५) भीष्मपर्व BHISTIMA PAY [ ३१35] श्वापदा न्याहरन्त । राजेन्द्राणां मदगन्धाश्रत नान्न सेहिरे तव पुत्रभ्य नागा. ॥ ६॥ दुर्योधनो हस्तिनं पारणे सुवर्णकक्षं जालवन्तं प्रभिन्नम् । समास्थितो मध्यगत कुरुणां सातूयमानो यन्दिभिर्मागघेछ ॥ ७॥ चन्द्रप्रमं वेतमधातपत्रं सौपर्ण वगधाजति चौत मागे । तं सर्वत शकुनि. पानी साई गान्धारांति मान्धाराज. ॥ ८ ॥ मामी प्रत सर्व सन्यप वृद्ध श्चतच श्वेतघनः सपग । श्वेतोष्णीप पाण्डुरेणध्यजन श्वेतैरावैः श्वेतशलप्रकाश. ॥९॥ तस्य सन्ये धार्तराष्ट्राच सर्वे याहुलीकानामेरुदेश के तो पाकीअनुक्ल वायुचली और धृतराष्टकेवेटोंकी सेन कोकुत्तेभोंकतेथे और हे धृतराष्ट्र तुम्हारे पुनोंके हाथीगजेन्द्रोंकी उक्तट मदयाली गंधको न सहसके और कौरवोंकेमध्य में वन्दीमागधों से स्तुतिमान कमलवर्ण रूपं मुनहरी अंवारी और जालवाले मदोन्तत्त हाथीपर दुर्योधन सवारहुआ, जिसके शिरपर चन्द्रमाके समानमका गिन छन और सुवर्णकी माला प्रकाशमानथी और गन्धरकाराजा शकुनी सब गन्धारियों और पहाड़ियासमेत उसको सवोरसे घेरेहुए जाताया, और श्वत छन श्वेत धनुप श्वेतखड्ग और शेतही पगडी पहरेहये श्वेतपर्वत के समान वनही घोहों समेर पाहु वर्ण की बजायुक्त होकर वृद्ध पितामह भीप्मनी सब सेना के ing to the Dirit asht a parly stool facing the rest, while the l'arthas stood facing the east, ready for nghiting The troop, of the Kauravis lovhed like the army if the clue of the Inasals, while that of the Pandavas looked like the army of alts als u. The ind began to bloss tromu beluind the i andavas ( ng inst the feces of the Dharıtarashtras), and the beasts of pily began to full against the Dhritaraslıtras. i he c'ephan s lel ng ng to thy s na could not bear the stroug od iu of the temp tal julle enuitted by the huge elephants (of the Pandavas) 0. And Vui yodjan, jode on an elephant of the complexion of the lotus, with rent temples, graced with a golden buksha ( on its bach ), and cased in n armour of steel network And be uas in the very centre of the hurus and was ad red by eulogists and bards. 7 And a wbite umbrella of lun ir eilulgence was held ore lus head griced with a golden chain haji Shahudi the ruler of the Gandharas followed with mountaineers of Gandhara placed all around 8 And the venerable Bhishma was at the head of all the troops, with a shite umbrelli held over his head, armed with a wlute bow and scord, with a ruta head gear, with a blute banner (on his car ), and with wute steeds (Joked thereto ), and altogether looking like a white mantain In Bhishma's divi on were all the son of Dhritrashatra, and also Cala who was a country [43361 Mahabharat (४३३६) शलश्च । ये चांवठा क्षत्रियायेच सिन्धे स्त्रया सौवीरा पञ्चनदाश्च शूरा ॥१०॥ शोणे- हयैरुक्मायोमहात्मा द्रो गो धतुष्णागिरदोगसावः । आस्ते गुरु. प्रायश सर्व राज्ञां प श्चाच भूभीन्द्र इवाभियाति ॥ ११ ॥ वार्द्धनात्र सर्व से यस्य मध्ये भूरिश्रवा. पुरुमित्रा जयश्च । शल्यामरस्या के कयाश्चेति सर्वे गजानीकैर्धातरो योत्स्यमाना ॥ १२ ॥ शानिश्चोत्तर महात्मा महेश्यासा गौतमश्चियोधी । शकै किरातैर्ययनैः पन्हवैश्व सार्ध चम्मुत्तरतोभियाति ॥ १३ ॥ • महारथैवृष्णिभेजै सुगुतं सुराष्ट्र कैर्विदितै गत्तश. |. । वृहदल कृतवर्मामि गुप्त वलं त्वदीयं दक्षिगे नाम याति ॥ १४ ॥ सशप्तका नाम युतं रथानां मृत्युर्जयो वार्जुन स्थति सृष्टा । येनार्जुनम्तन राजन् कृतास्त्रा. प्रयातारस्ते आगे जाते थे उनकी सेनामें आप के सयवेटे वाहलीकों का एक देश, शल, अम्बष्ट, क्षिन्नु के राजा लोग, सौ वार और पञ्चनदके सब शूरवीर थे ।१०। और महावली धनुप हाथ में लिये महात्मा गुरू द्रोणाचार्यजी लाल घोड़े के लालही रथपर सवार पर्वतकेसमान अचलकौरव पांडव और अन्यं वहुधा राजाओंके गुरू पाछेरजानेवे ओर सब सेनाके मध्यमें वार्धक्षत्री भूरिश्रवा पुरुमित्राजय,शाल्व,मत्स्य और केकयदेश वासी सबभाई ओर युदाभिलाषी सेना हाथिया समेत चली, तब महात्मा धनुधारी चित्रयोधी गौतम कृपाचार्यजी शकजाति, किरात, यवन अर्थात यूनानी राजालोगों | समेत सेनाके उत्तर ओरको रक्षाकरते हुए जातेथे और संसप्नकनाम दृशहजार रयी जो कि मृत्युमा विजय करने के लिये उत्पन्न किये थे वह निगर्त देशी असा शूरवीर लोग जिधर की और अर्जुन था उस दिशा की ओर जाते हुर, हे भरतवंशी min' of the Vallukas, and also all those A shatriyas called Am vastas, and those callid Sindhus, and those also that a.c called Shuras, and the heroic dwelles f the country of the five viven 10 And on a golden cu unto u luck we e yuled red steeds, thu hugh souled Divin, bow in hand and with never failing heirt, the p eceptor of almost all the hings, icinuned behind all the troops, p otecting them like Indra Andw tuo tudst of all th. focus Jodhwalskatu, and Blıurisrav is, and Purumitra, and Jnya and the Shalw 15, tlic Matsy.19, and all the Kokaya b.others hghting with their cleplunt divistons. 12 and Ciradowt's son, that fighter in thic van, that lugl souled and miglity buwan, Cilled also Grutam, conter ant with all m dus of rarfire, accompanied by the City, the Kiratns, the Tavaas, and thu Palkuvus, tool up las pruition at the nn thun point of the aray: 13 Thut large force nuch as hell p otectel by mghty car-t' arriors of the t'r-hmi and the Bl1914 races, as also by the warriors of Sum shtra well as med nnd use]). acquainterl with those of weapons, and such as led by Kritsarman, povedlu tosards the south of thy 'len tlou-und e irs of the Saincapinhas, a lo scru eru ateul TPS army. 14 ॥ (४३३७॥ भीमपर्च BF IS MA PANV [4337] त्रिगधि शरः ॥ १५ ॥ सनं शतसहन्नन्तु नागानांतवभारत । नागे नागे रशतं शत मश्वा रथ रथे ॥ १६ ॥ अश्येऽश्वे दशधानका धान के शश चर्मिणः । एवं व्यूहान्यनी कान भी मेण तव भारत : १७॥ संव्यूह्य मानुपं न्यूई दवं गांधर्च मासाम्। दिवसे दिव से प्राप्त भीमाशांतनयो ग्रगीः ॥ १८ ॥ महारयोघ विपुलः समुद्र इय घोपवान् । भीमेण पारायाणां व्यहः प्रत्यमुस्रोयुधि ॥ १९ ॥ अनन्तमा हाजिनीनरेन्द्र मांगात्य दीया नतु पाण्डयानाम् । तांचयमन्ये वृहती दुष्प्रघ यस्यानेता केशवरचार्जुनश्च २०॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भगवदगीतापर्वणि मैन्यवर्णने विशोऽध्याय ।। २० आपके हाथीभी एकलाखसे उपरथे और हरएक हाथी के साथ सौ रय और प्रत्येक रथके साथ सौ २ घोडे और हर घोडे के पीछे दश दश धनुपधारी और हर एक धनुप धारी के साथ दश दश मनुष्य थे, हे भरतवंशी इस प्रकार से भीष्म जीने आपकी सेना को तैयार किया, शन्तनु के बेटे प्रभु भीमजी ने प्रतिदिनकी विद्य- मानता में मानुप, देव, गान्वर्य, आसुर नाम चारों प्रकार के व्यूरोको अच्छी रीति | से रचकर युद्धके वीच धृतराष्ट्र के पुत्रका व्यूह बड़े २ रथों के समूहोंमे समुद्र के समान विस्तृन और शब्दायमान पूर्व की ओर को रचा, हे महाराज आपकी सेना | बहुन रूप मोर ध्वजा संयुक्त होनेसे ऐसी महा भयानकहै जिसको मैं केशवजी और अर्जुनकी सहायना वाली पांडवों की सेना से भी बड़ी कठिनताले धर्पणा के योग्य समझनाहूं ॥ २० ॥ for the death or fame of Arjun, sent in the direction wherc erjun was. Your elephants amounted to a hundred thousand. Each elephant was followed by a hundred chariots, each chariot by a hundred horses, each horse by ten archers and each archer by ten men. Thus O Bharat, Bhishm ariayed your army. Lord Buish the son of Shantanu, did, each day of his career, arrange the army in human celestial, gandhary or Asur way. Your army consisting of many svarriors, extended and roaring like the ocean, was arrayed by Bhishm towards the East, Your army containing numberless Farriors and kanners was tou formidable to be easily intimidated by the Pandava army assisted by Arjun and Keshay." 20. toucidar --- तनते {4338 ] Mahabharat सन्जय उवाच । वृहती धार्तराष्ट्रस्य सेना दृश्या समुद्यताम् । विषादमगमद्राजा कुनीपुत्रो युधिष्ठिर ॥ १ ॥ ब्यूह भीष्मेण चाभेद्य कलियत प्रेक्ष्य पाडव । अभेध मे च सदय विवर्णऽर्जुनमब्रवीत् ॥ २ ॥ धनञ्जय का शक्यमरमाभिर्योदु माहव । घर्तराष्ट्रमहाबाहो येषा योद्धा पितामह ॥ ३ ॥ अक्षाभ्योयमभद्यश्च भीमेणामित्रक पिणा । कल्पित शास्त्रदृष्टेन विधिना भूरिचर्चसा ॥ ४॥ ते यय सशय प्राप्ता ससैन्या शत्रुकर्षण । कथमस्मान् महाव्यूहादुत्य न नो भविष्यति ॥ ५॥ अथ जनोब्रवीत्पार्थ युधिष्ठिरममित्रहा । विषा गमिव सप्रेक्ष्य तय राजननोफिनीम् ॥ ६ ॥ प्रज्ञयान्यधिकान् शूरान् गुणयुक्तान् बहूनपि ॥ जयन्त्यल्पनरा येन तन्नियोध विशाम्पत ॥ ७ कारण राजन् प्रवक्ष्याम्यनसूयव । नारदस्तमृर्पिद भीष्मद्रोणौ च पाण्डव । ८ ॥ अभ्याय ॥ २१ ॥ संजय बोले कि कंती के बड़े बेटे राजा युधिष्ठिर ने दुर्योधन की बड़ी सेना को अत्यन्त उपत जानकर बड़ी व्याकुलताको पाया, ओर भीप्पनी के रचे हुये अभेध व्यूह को यह जानकर कि यह अभेद्य है महाभयभीत रूपान्तर दशा में होकर अर्जुन से करा कि हे महाबाहु अर्जुन युद्ध में धृतराष्ट्र के पुत्र के साथ हम लोग युद्ध करने को कैसे समर्थ होसक्ते हैं जिनकी ओर से युद्ध करने वाले भीष्म पितामह है इन महातेजस्वी शत्रुहन्ता भीष्मजीने शास्त्रोक्त देखीई विधिके अनुसार बड़ी सावधानी से इस अभेद्य व्यूहको रचाहै हे शनुहन्ता अर्जुन हैम सब सेना समेत व्याकुल होते हैं इस महाभारी व्यूह से हमारी कैसे विजय होगी हे राजा धृतराष्ट्र पापकी सेना के देखनसे व्याकुल हुए युधिष्ठिर की इस बात को मुनकर अर्जुन वाला कि हे राजा युधिष्ठिरथोडे से भी बुद्धिमान् शूरवीर गुणीपुरुप पहलमारी सेना को विजयकरते हैं ऐसा निश्चय जानो हे राजा वहा एक एक के छियों को देखता है । ७ । इसका भेद में तुझसे कहूंगा इस कारणको नारद ऋपि, भीष्मपितामह, " CUAPIER XII Sanjaya continued Knoring Duryodhan's army rearly for Orttie, Kmg I udheshtir tiro Met sun uf Kunts, was much distances e, and being terrifitd at the sight of the imp canalle phınlanır niranged by Blushin, he said to Arjun, • How shall we cope in battle with the sons of Dhritr ishtra sho have Blushn tho grand fnther for thuir warrior? Glorious Blushım the distroyer of cnenie's hus carufully organised according to Shastris this impregnalle plialane. I and my army aro much pu plured How shall wo be able to conquer the formid at le a my licard the words of Yudhistlur who uns distressed nt the sight of your army, Arjun repl ud as followes —"A small company of ws and skilful warriors cuti sunls win a lrrge army, Iudlusthur Lach Tarrior sets the Wewness of hus enemy I shall tell you all about it which 'nonc Haung । (४३३९) भीष्मपर्व BARSHA PARY [4339] एवमेवार्य माश्रित्य युद्धे देवासुरेऽनजीत् । पितामहः किल पुरा महेंद्रादीन् दि. चौकसः ॥ ९ ॥ न त चल वीर्याश्या जयन्ति विजिगोपः । यथा सत्यानुशं स्याभ्यां धर्मेणैवोधर्मगच ॥ १० ॥ नवा धर्ममधर्मच लोभवोत्तम मास्थिताः । गुमनहद्वारा पनो मर्मस्ततो जय ॥ ११ ॥ एवं राजन् विजानीहि धो स्माकं रंग जरः । यगा तु नारद प्राह यत कृष्णस्ततो जयः ॥ १२ ॥ गुणभूतो जय कृष्णं पृष्टतो भ्योत माधवम् । तद्यथा विजयश्चास्य सतिश्चापरी गुणः।।१।। अनन्नतजा गाविन्द शत्रु गेषु निर्यथ । पुरुष सनातनमयो यत ऋणस्ततो जपः ॥ १४ ॥ पुरत होप हरिया विमुण्ठेऽकुण्ठ सायकः । सुरासुराणवस्फ जग्न वात् के जयन्विति ॥ १५ ॥ कयं कृष्ण जये मेति पैरुक्त तत्र तैर्जितम् । तत् द्रोणाचार्य जी यह तनिों जानने ह हे निष्पाप युधिष्ठिर पूर्व समय में देवता और अपुराके युद्ध में ब्रह्माजीने इस प्रयोजन को मानकर महाइन्द्रादि देवताओं से कहा है कि विजय के चाहने वाले पराक्रमी पुरुष वा पराक्रम से ऐसी विजय नहीं करसक्के जैनी कि सत्यना दया और एक धर्म से विजय करते हैं । १० । धर्म अधर्म मोर लोभ को जाकर उ मर्मत अहंकार रहित होकर युद्धको करो जहां धर्म है वहांही विजय? हे गजा जैसा कि नारदजीने कहाँहै उसीप्रकार चिरा में सदैव जानो कि हमारीही विजय होगी अर्थात् नारदजीने कहा कि जियर श्रीकृष्णजी हैं उबरही विनर होगी क्योंकि विजय श्रीकृष्णजीके पाम दास रूपहोकर पीठकी ओरसे सम्मुख होकर स्तुति करती है जिसरीति से इनकी विजय है उसी प्रकार नम्रता आदि उनके दूसरे गुण हैं श्रीगोविन्दजी अत्यन्त तेजस्वी शत्रुओंके समूहों से अधर्प संपूर्ण ब्रह्मागड में व्यापक सनातन सचिदानन्द रूप है इससे जिधर श्रीकृष्ण हैं उधरही विजय निश्चय है पूर्व समय में यह माया से पृथक् अचमायुध हरिरूप प्रकट होकर देवता और अनुरोंको अपनी वज्रसमान वाणीसे चेताकर यह वचन वोला but Narad, Bhishm the grandfather and Dronacharya hnots former times when the war between the gods and asars was raging, Brahms who hnevy the secret, said to Indra and other gods that warriorsd strous of enquest could not achieve victory so easily by meie plıysical force as by truth, werey and 10 Knowing the consequences of dharm, adharm and avarica, and being free from vanity, let us figat, for where there is dhrm, there is victory You must remembe, ling the wo ds of Narad s ho srd that victory guld fall on the side where lirishna is Victory follows Krishna wherever he goes Victory and lumility a e the two attributes of Krishn Ho possesses infinite energy. He cannot be intimidated by any number of f es He is etenal and victy follo is lus vrabe. Indestructible and invulnerable ly weapons, Har of o'd said to gods and Asurs "SVho amongst you will be victori us!" Jn भ union 15.

[43401 Vabarat (४३५०) प्रसादाद्ध त्रैलोक्वं प्राप्त सक्रादिभिः सरैः ॥ १६ ॥ तस्य ते न व्यधां कांचि दिह पश्यामि भारत । यस्य ते जय माशास्ते विश्वनुक् त्रिदिवेश्वरः ॥ १७ ॥ इति श्रीमहाभारते भीप्नपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि युधिष्ठिरार्जुन संवादे एकविशोऽध्यायः ॥ २१ ॥ समय रखाच ॥ ततो युधिष्ठरो रामा स्वां सेनां समनो दयत् । प्रति व्यूहन्ननीका नि भीमस्यभरतर्षभ ॥ १॥ यशोद्दिष्टान्य नाकानि प्रत्यव्यूहन्त पाण्डया । स्वर्ग परम मिच्छन्तः सुयुद्धेन कुरूद्वहाः ॥२॥ मध्ये शिखण्डिनोऽनीकं रतितं सव्यसाचिना । धृष्ट धुम्नश्चरनने भामसेनेन पालितः ॥ ३॥ अनीकं दक्षिण राजन् युयुधानेपालितम् । श्रीमतासात्वताग्रयेण शक्रेणेव धनुष्मता ॥ ४ ॥ महेन्द्रयानप्रतिम रथन्तु सोपस्कर था कि कौन विजय करता है । १५ । उसके उत्तरमें जिन्हों ने यह कहा कि श्रीकृष्णाजी की सहायता से विजय करते ह वहां उन्हीं लोगों ने विजयकी और इन्द्रादि देवताओने उसकी कृपा से तीनालोकों को पाया, हे भरतवंशी वैसी पीडामै तुझमें नहीं देखताहूं जिसकी विजय को विश्वका भोक्ता और स्वर्ग का ईश्वर चाहता है । १७ । अध्याय ॥ २२ ॥ संजयबोले कि हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ इसके पीछे भीष्मजीके सम्मुख राजा युधिष्ठिर ने अपनी व्यहितसेना को उपस्थित किया, फिर धर्मयुद्ध से उत्तम स्वर्गके चाहनेवाले कौरवोंके पोपणकरनेवाले पाण्डवो गुरूकी आज्ञाके अनुसार सेना को यथायोग्य स्थान पर नियत किया मव्यमें अर्जुन से रक्षित शिखंडीकी सेनाहुई और आर्गे चलताहुआ धृष्टद्युम्न भीममेन से रक्षितहा और इन्द्रके समान धनुपधारी श्रीमान युयुधान से दक्षिण की सेना क्षित हुई और राजायुधिष्ठिर हाथियोंकी and they conquerda lo sud that the party which hul Hari for its leader was sure to win By his g ace India and other gods won victory over the three wɔlds I see no cause for fear when the Lord of the world as well as of Swarg, himself desires your victory." 17. CHAPTER XXII Sanjaya continued " When king Yudhishir had arrayed his armies against those of Bhishm, the latter said, " The Pandavas have arrayed then forces against us in the manner laid down in the shastras l'ight fairly, ye sınless ones for the sake of entering heaverl!" In the centre of the Pandava army Wals Shikhandi with his army, protected by Arjun, Dhi ishtadyuma, p otected by Bhim was in the Van; the southern part wis led by Yuyudlian, the mighty archer of the Satwata race, resembling Indra hinıself 4. Yudhishthir was suulted on a cliariot worthy of Cali rying India llimself, adorned with (४३४१) Hiya Bhusudia Piny [49411 हाटकरत चिनम् । युधिष्ठिर काचन भाण्डयोक्त्र समास्थितो नागपुराय मध्ये ॥ ५॥ समुचिकृत दन्तशलाकमस्य पाण्डुर छत्र गतीव भाति । प्रदक्षिण चैनमुपाचरन्त मह पय सस्तुति भिमहेन्द्रम् ॥ ६॥ पुरोहिता शयघ वदन्तो ब्रह्मर्षि सिद्धा, श्रुनयन्त एनम् । अप्यैश्च मन्त्रैश्च महौषधीमि सम तत स्वात्य यन यन्त ॥ ७ ॥ तत. सघ. स्त्राणि तयैव गाश्च फलानि पुपाणि तथैव निक न् कम्त्तमो ब्राह्मणसान्महात्मा कु. चन् ययो शक इयामरेश ॥ ८ ॥ सहन सूर्य शत किंकिणीक परामर्थजाम्गदहेम चित्र । रथार्जुनस्याग्निरिचाञ्चिमाली विभ्र जते ध्वत हय सुचक ॥९॥ तमास्थि त केशव सगृहीत कपिध्वजो गाण्डववाणपागः । धनुर्धगे यस्य सम पृयच्या न विद्यते नोभायता कदाचित् ।। १० । उद्धर्त यिभ्यस्तव पुत्रसेना मनीवगंद्र स विमति | सेनामे महेन्द्रकी सवारीके स्वरूप मुन्दर सामग्री वाले सुवर्ण और रत्नासे जटित मुनहरी कलशयुक्त स्थपर नियतधुआ।५। इसकाश्तछत्र हाथीदांतकी यष्टीपरशोभित अत्यन्त ऊंचा देदीप्यमान था महीलोग स्तुति करते हुये इसमहाराज के दक्षिण चलनेवाले हुये पुरोहित लोग और शास्त्रज्ञ ब्रह्मऋपि अथवा सिद्ध पुरुष मन्त्र जप और बड़ीबड़ी औपधियों समेत इसका स्वस्त्ययन पढतेहुये शनुके मरण को उच्चा- रण करते तदनन्तर वह कौरवों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर सुन्दर वस्त्र, गौ, फल, फल और मुवर्ण मुद्राको ब्राह्मणोंके अर्थ दान और भेटोंको करताहुआ देवेश्वर इन्द्रके समान चला, प्रार अर्जुन का रथ मणियों के जाटत होते से हजारों सूर्य के समान प्रकाशमान और सैकड़ों घंटालियॉप्ते चिहानत उराम जावूनट नाम सुवर्णसे महा अग्निकेसमान किरणोंसे युक्त श्वेत घोड़े और सुन्दर पहिया से शोधित है वह गांडीव धनुपधारी हाथ म वाण, रखनेवाला कपिवन जिसकी समान धनुपधारी पृथ्वीमें न कोई हे न होगा वह अर्जुन केरावजी को पकड़ेहुये स्थपर विराजमान है । १० । वह तेरेपन की सेनाको मर्दन करताहुआ बडे भयकारी रूपको धारण करता है, an excellent standard, decorated with gold and gewis, nith gold traces, m the nudst of his army of clephants 5 His pure wite umbrella with white ivory handle, rused over his head, looled very beautıful Many a great nisl led sound the hing, chanting liyinns in lus praise Nany priests, Brahmrishis and Swhas, singing praises and benedictions, prayed for the destruction of his enemies by means of aphorisnisy drugs and ceremonies 1 he inngninimous prince of huius gave cons, fruits, flowers, gold pieces and clothes to Brah „matis and jul oceeded lilc India the chief of gods Arjun's chartok, furnished with mung lells, dec) ed with Lurnished gold, laving good 1 heels, shining like the and druan ly white horses looked brilliant lihe a thousand suns luc cliriot n hose ieins were held by Keski, has furnished with the standırd Learing the figure of Hanuman and us occupied Ly Aljun the wielder of Gandıand matehlers ercher Ho wło assumes the wost awful form for the destruction of thy [ 4342] Mahabharat (४३५२) रूपम् । अनायुधो य सुभुजो भुजाभ्यां नाश्व नागान् युधि भस्म कुर्यात् ॥ ११ ॥ स भीमसेन साहतो यमाभ्या वृकोदरो वीर रथस्थ गोप्ता 1 त तत्र सिंहर्षभमत्तखेल लोके महेन्द्रप्रतिमान कल्पम् ॥ १२ ॥ समीक्षण सेनाग्रगत दुरासदं संचिव्यथु. पंक गंता यथा द्विगा. । वृकोदरं बारणराजदर्प योधास्त्वदीया भयविनसत्वा ॥१३॥अनांक मध्ये तिष्ठत राजपुत्र दुरासदम् । अत्रवीद्भातश्रेष्ठं गुडाकेशं जनार्दनः ॥ १४ । वालदेव उवाच ॥ य एपरोपात् प्रतपन बलस्था योन सेना सिंह इवेक्षतेच । स एप भीष्म कुरुयश केतुर्यनाहताशित वाजि मेधा ॥ १५॥ एतान्यनीकानि महाभाव गहान्तमेघ इवरहिममन्तम् । एतानि हत्या परुषप्रवीर काक्षम्वयुद्ध भरतर्षमेण ॥ १६ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि युधिष्ठिरार्जुनसंवादे द्वाविंशोऽध्याय ॥ २२ ॥ और जो कि अशस्त्र भी सुन्दर भुजदण्ड युक्त युद्धके मध्य में अपनी महाभुजाओं सेही मनुष्य और हाथियों को मर्दन करता है वह कोदर भीमसेन अपने छोटेभाई नकुल सहदेव समेत शूरवीर अर्जुन के रथका रक्षक है, ऐसे महासिंहरूप चाल चल नेवाले लोकमें महाइन्द्र के समान दुराधर्ष सेना के आगे वर्तमान महाबली भीमसेन को देखकर तुम्हारी सेनाके मनुष्य ऐसे कम्पायमान हुये जैसे कि कीचमें फंसे हुये हाथीभयभीत होते हैं उस गजेन्द्र के समान गर्न से भरेहुये भीमसेन को देखकर आप के शूरवीर लोग चित्तसे भयभीत होकर मनसे हारगये, और हे राजा तब सेना में | वर्तमान दुराधर्ष अजेय राजकुमार अर्जुन से जनार्दन श्रीकृष्णजी यह वचन वाले, कि हे अर्जुन जिस भीष्म ने अपने क्रोध से सेना को संतप्त किये हुये बलमें नियत सिंहरूपहोकर हमसे बचायाहै वह भीप कौरव कुलकी ध्वजाहै जिसने कि तीनसौ अश्वमेध यज्ञ किये, यह सब सेना इम को ऐसे घेरे हुएहै जैसे कि सहस्र किरण वाले सूर्यको वादल घेर लेते है हे पुरुपोंमें बड़े वीर अर्जुन तुम इन सेनाओ को मारकर भरतवंशियों में श्रेष्ठ भीष्मजीके साथ युद्ध करने की इच्छा करो। १६ । sons and thy ai mies and brings to dust horses and elephants without weapons, that strong armed Bhimsen, known as Silkodas, accompanied by the twins, became the protector of the Pandav chariotecis. Like a sportive lion or like India hiselt in Lod form, the sight of the invincible Vuikodu like a leader of a herd of Dephants, stationed in tłu vam of the natio., trightened and thered thy wariors like elephants sunh i inne 13 To the invincible Gud aktsh (Aijun) standing in the midst of his troops, Jan dun said, "]onder is the Lanner of Blushu who lias perto. mid thice liundied sacritices, who burns us with his wrath and who stands in the midst of his roops vendy to attrek us like a lion His soldiers suliound him on all sides like thu clouds round the moon Slay those armues and sech lattlo with that bull of the Bharat zace. " 1b (४३४३) भीमप BHISHNA PARY [4343] सञ्जय उवाच ॥ धार्तराष्ट्र बल दृष्ट्या युद्धाश्च समुपस्थितम् । अर्जुनस्य हितार्थाय सगो वचन म त् ॥ १॥ श्रीभगवानुवाच ॥ शाचत्वा महार हो सप्रामाभिमुखे स्थित । पराजपाय शत्रूगां दुर्गालमुदीरय ॥ २ ॥ साय चाच । एमुकोऽर्जुनः सले वासुदेन धीमता । अनीस पात् गार्ग: स्तात्रमाह स्नालिः ॥३॥ अर्जन उवाच। नमस्ते सिद्धसनानि अट मन्दावासिनि । कुमारिकााल कागााले कपिले ऋण पिहले।४ भद्रकाले नमस्तुभ्य महाकालिं नमोस्तुते । चाण्ड चण्डे नमस्तुभ्य तारिणि वरवर्णिनि ५॥कात्या पनि महामाग करालि विजयेजये । शिखिपिच्छध्वजधरे नानाभर भापते ॥ ६ ॥ अदृशूलमहरणे स्वदगखेटकधारािण । गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे नन्दगोप- फलोद्ये ॥ ७॥ महिषासनामयेनित्यं कौशिफि पीतवासिनि । अहासे कोकमुखे अध्याय ॥ २३ ॥ संजय बोले कि हेराजा युद्ध के निमिच सम्मुख वर्तमान दुर्योधनकी सेना को देखकर श्रीकृष्णाजी अर्जुन के अभीष्ट सिद्ध करनेकेलिये यह वचन बोले कि हे महावाह अर्जुन तुम युद्ध के सम्मुख वर्णमान होकर बड़ी पवित्रतासे शत्रुओंकी पराजाय के लिये श्रीदुर्गाजीके स्तोत्रका पाठकरो, संजय वोले कि इस प्रकार वासुदेवजीकी आज्ञाको मुनकर पाण्डव अर्जुनने रयसे उतरकर हाथ जोडकर युद्ध भूमिमें आगेलिखे हुए दुर्गाजीके स्तोत्रको पट्टा, । : । निद्ध सेनावाली, आर्ये, मन्दार वानिनि, कुमारि, कानिकापालि, कपिले, कृपणापिंगले तुझको नमस्कारहै । हे भकानि, महाकालि, चंडि, तारिणि, बरपाणिनि तुझको नमस्कारहै । कात्याय ने, महाभागे, करालि, विजय, जये, मोरकेपरों की धजावाली और नाना प्रकार के आ- भूषणों से भूपित तुमको नमस्कारहै । शूल, खड्ग और द ल धारण करने चाली, गोपेन्द्र की वहिन, ज्येठे, नन्दगेप के कन में उत्पन्न तुझको नमस्कार है। पहिप के समिर को नित्य यि रसन वाली, कौशिक, पीताम्बर धारण CHAPILRAIII Sanjrza continued ” Sucing the army of Du jodlian ready to fight, she Kralın spore these woda to the benent of Arjun Mighty, Arjun i huving cleansid thy self, stand with thy face towards the nuli ut battle and sing hy was in the praises of Durgr for the defeat of thy foes" Sanjaya continued that leing thus advised by Iasullev, Arjun the Pandat cumni do in from the chai 106 and with joined hands recited the following by an in the field ut battle - I bow to tlice leader of Siddias, good goddess living ju the forest of Mandar, Kuma 1, hali, Kapali, hapila, Krishna pingola, Bhadrikalı, 1 buw tu thee, siahahalı, I bus to thee I box to thce Chandi, Tarini, Hau barnini, hatyay int, Mahabhaga, halali, Niy , Jaya, bearer of the banner of peacoch’s feithers, decked sitli oʻna mente, bearer of uwiul speur, snod and shield, younger sister of [43441 Mahablarat (४३४४) नमस्तेस्तु रणाप्रये ॥ ८॥ उमे शाकम्भारश्वते कृष्णे कैटभनाशिनि । हिरण्याक्षि विरू- पाक्षस धूम्राति नमो तुते ॥ ९ ॥ वेदश्रुतिमहापुण्ये ब्रह्मण्ये जातवेदास । जम्बू कटकचैत्यप नित्य सन्निाहतालये ॥ १० ॥ ब्रह्मविद्या विद्यानां महानिद्रा च देहिनाम्। स्कन्दमातभंगयात दुर्गे कान्तारयासिनि ॥ ११ ॥ स्वाहाकार स्वधाचैव कला काठा सरस्वती । सावित्री बदमाता च तथा वेदान्त उच्यते ॥१२॥ स्तुताास त्वमहादेविय शुद्धनान्तरात्मना । जयाभवतमेनित्य त्वत्प्रसादाद्रणाजिरे १३कान्तार मगदुर्गेषु भक्ताना चालयषु च । नित्य वसास पाताले युद्ध जयास दानधान् ॥ १४ ॥ त्यजम्भनी माहिनी च मायाही श्रीस्तथैव च । सन्या प्रभावताचैव सावित्री जननी तथा ॥ १५॥ ताष्ट. पुष्टिधृतिर्दीप्तिश्चन्द्रादित्यविवर्दिनी । भातर्भूतमता सहये वीक्ष्यसे ।सद्धचारणैः ॥१६॥ सञ्जय उवाच । ततः पार्थस्य विज्ञाय भाक्त मानववत्सला । अन्तरिक्षगतोवाच गाविन्द करने वाली, फमुख धारण करके असुरों को मारने वाली रणभिये तुझको नमस्कार है । वेदश्रुति, अतिपपिन, ब्रह्मण्य, जात वदसि जम्बूखंड के चैत्य में निवास करनेवाली तूरह्मविद्याओं और महानिद्रा की देनेवाली स्कंद की माता, भगवति, दुर्गा, कठिन स्थानों की रहने वाली, स्वाहा, स्वधा, कला, काष्टा, सरस्वती, सावित्री, वेद और वेदान्त की माताहै । हे महादेवि, विशुदों की अन्त- रात्मा में तेरी स्तुति करताई हे रणप्रिये तेरे प्रसाद से मेरी सदाजयहो तूसदा भयानक दुर्गम स्थानों और पाताल में निवास करती है भक्तोंका पालन करती है और युद्ध में जयदेती है तु जंभनी,मोहिनी,मायाही,श्रीतिघ्या,प्रभावती सावित्री और जननीभी है, तु तापष्टि, धृति और चंद्रपूर्वकी मभावहाने वाले है तु धनियोंको धनदेनेवाली और सिद चारणोंको दिखाई दनेपालीहै । सजयनेकहा कि दर्गा अर्जुनकी भुक्ती को जान Gopendia, Jyeshtha born in the race of Nand the cowherd, fond of buttalo's bl od, haushil, fond of yell w clothes, Attahast, hok muklia, I bow tu thee waru r goddess Uma, Shakambhari of malute or black colour, destroyel ut databh, Hi anyakshi, Viruopikshi, Sudhum akshi, I bow to thee. Thou art Vedic hymn of great holiness, Brahmanya, jatvedası, al says living in the shrinus of Janvu, lained in the knowledge of B ahm, giver of" piutuund sle mother of -hand, Bhagvati, Iruiga, dinellei in maccessible places, Swaha, Sradha, Kala, Kashtha Savitri, Vedmata and Vedant. I a aise thee Alah devi, sjul of sumts May victory cier fall to my lot by thy grave on the field of battle In inaccessible places where there is fear, in dificulties in the abodes of thy worship pers, in nether regions thou al says divellest Thou art Jambhani, fushti, Pushti, Dhriti, Dipti giving light to the moon and the sun, giver of prosperity and seen by Siddhas and Charans” Sanjaya continued that knowing the devotion ot Aijun, Daiga the protector, . P, गीष्मपर्व BHISHILA PARY [4345] स्थानतः स्थिता ॥ १७ ॥ देव्युवाच । स्वहानैव तु कालेन शन जेष्यसि पाण्डव ! मास्त्वमसि दुर्धर्ष नारायणसहायगन ॥ १८ ॥ अजे यस्त्वं रो रीगा मपि वनभृतः स्वयम् । इन्ये मुक्त्वा वादाः क्षणेनान्तर धीयत ।। १२ । लम्चा बरन्तु कौन्तेयों मने विजयमात्मनः । सासरोह ततः पार्थो स्य परमसम्मतम् ॥२०॥ कृष्णार्जुना देकरयो दिव्यौ माह प्रदध्मतः । य इदं पठते स्तोनं काय मुत्थाय मायः ॥ १२ ॥ यक्षरक्षःपिशाचेभ्यो न भयं विद्यते सदा। नचापि रिपचस्तेभ्यः समीया ये दीष्टणाः ॥ २२॥ न भय विद्यते तस्य सदा राजकुलादपि । विवादे जयमाप्नोति बद्धो मुच्यति बन्धनात् ॥ १३ ॥ दुर्ग तरति चावश्यं तथा चारैर्विमुच्यते । संग्राम विजयोन्नित्यं लक्ष्मी प्राप्नोति फेघला ॥ २४ ॥ आरोग्याल सम्पन्नो जोधपशतं तथा । एतद् दृष्टं प्रसादास्तु गया व्यासस्य कर और मनुष्योंपर कृपालु होकर अन्तरिक्ष से वहां पाई जहां गोविन्द थे देवी ने कहा कि थोड़ीदेर में शत्रुओंपर विजय पावेगा हे पाण्डव तू अनय है क्योंकि नारा- यण तेरे सहायक है तुझको इन्द्रभी जयनहीं करसकता यहकहकर वरदायिनी देवी चलीगई अर्जुन ने वरपाकर अपने को युद्ध में विजय पायाहुअा जाना और अपने स्थपर फिरचढ़ा श्रीकृष्ण और अर्जुन ने रथपर चढ़ेहुए अपने शंख बजाये जो कोई इसस्तोत्र को मातःकाल पढ़ेगा उसका यक्षों, राक्षसों और पिशाचों से कदापि भय नहोगा न उनको सपों अथवा राजकुल से भयहोगा वह विवाद में जय पावेगा और वन्धनसे छुट्नायगा उसको चौरी और दुर्गम जगहों से कुछभय नहोगा संग्राम में उसकी विजय होगी और लक्ष्मी मिलेगी वह सौवर्पतक आरोग्य और बलवान रहैगा ।२२। मैंने बुद्धिमान् व्यासजीकी कृपा से यह देखा है लोग अपने मोह से इन दोनों नरनारायण ऋपियोंको नहीं जानते हैं आपके सवपुत्र दुरात्मा औरश्रभिमानी, यह वचन समयके अनुसार है कि वह मरकालंक फन्दे में फंसे हुए हैं, व्यामजी, नारद, of mankind, approred in the air and stood before Govind. The goddess: "Sbortly thou sh It conquer thy ioes, Pandav. Thou art invincible, because Narayan helts thee. Thou art invincible even •by the njelder of thunderbolt," Having said this, the giver of bouns disappeared. Arjun, leaving not the bun, regarded himself as already successful and remounted his clari-t. Krishna and Arjun seated on the samc chariot, bicw their cules'in conths. lle nilio reads the above hymn every incruing has no fear from yakshes, rakshases and pishaches. He has no fear from toothed serpents and kings, gains victory in discussions anl is fiel from the Londs of confinement. Difficult places and thieves give him no trouby!; he gains victory in battles and gaire wealth. lle lives for a hundred ycnrs fice from diseases and Incomics strong. I have 1.110wn all this throngh the of l’yors. People for ignorance donot know the two rishis "Nur and Nuryan. All your sons are richied and proud; their time rac [4346 ] Mahabhaiat (४३४६) घीमत ॥ २५॥ मोहादतौ न जानति नर नारायणावृषी । तव पुत्रा दुरात्मान सयें मावशानुगा ॥ २६ ॥ प्राप्तकालागद वापय कालपाशन गुण्ठिता द्वैपापनो नाग्दच कण्वो रामस्तथा नघ ॥ २७ ॥ अवारयस्तव सुत न चासौ तट गृहीतवान् । पत्र धर्मों गुति, कान्तिर्यग्रही श्रीस्तथा मति । यतो धर्मस्तत कृष्णो यत कृष्णस्ततोजय २८॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि दुर्गास्तोत्रे ज्योविंशोऽ यायः ॥ २३ ॥ धृतराष्ट रुघाच । पेपा प्रशास्तनाने योधा युध्धन्ति सञ्जय । उदग्रमनस के घा केधादीना विचेतस ॥ १॥ फेव प्राहरस्तत्र युद्ध हश्यकम्पनम् । मामका पाण्डवेयावातम्ममाचक्ष्य समय ॥२॥ कस्य सेनासमुदये गन्धमाल्यसमुन्य । पाच प्रदक्षिणाश्चैध सोघानामभिगर्जताम् ॥ ३ ॥ समय उवाच । उभया सेनपोस्तत्र करण, परशुराम, नभ इनसत्र ऋपियोंने आपके पुत्रको बहुत निषेध किया परन्तु इसने उमवातको स्वीकार नहीं किया जहां धर्म है वही तेजको कान्ति है और जहां नम्रताहै वहां लक्ष्मी है इसीप्रकार जिधर मुनिलोग हैं उधरही धर्म है और जिधर श्रीकृष्णा, उधरही विजय है २८ ॥ अन्याय।। २४ ॥ धृतराष्ट्र बोले कि हे संजय उस युद्धभूमि में किपरके शूरवीर प्रति प्रसन्न | मनहोकर लडते हुये स्थिर चिता और किधरके दुखी मनहोकर उद्विग्न चित्तहैं और युद्ध के बीच मेरेपुत्रों में से अथवा पाण्डया में से प्रथम किसने हृदय का कंपानेवाला प्रहार किया हे सजय इसको मुझ से वर्णन करो और किसकी सेना ओं में मुगन्ध युक्त पुष्प मालाओं के उदय में अत्यन्त गर्जना करने वाले शूरोंके of dea h is net and they are alrcady entan,led in the mu hes of death Vyas Narid kanwr Pirasliuram and Nabh lirve all prevented thy sons but they gavu noen to then counsels. Glory and beruty go hand in hand wı h dhra and prospuity is attached to in dusty Dharm go s with munis and victury i lls on the side whert Krishn is 20 CHAPTIR IXIV • The warriors of hich s de asked Dlutrushtrr of Sanjay & advanced cheerfully in the fit d of battle! Who were confident and who were despondent? Who stiuck the first bloy in that dreadful battle mino or those bel ng ng to the Panduvas? Tell me all thuis O Sanju Whs wiruors worned with gr lands of steet scented flowes uttered kudu nours indicative of prowess? The warriors, (४३४७ पोधा कानां सेनयो राणांचे Ageä BDISBAA Pany [4347] सुगन्यानामुमयत्र समुद्भवः॥४॥ संहतानामनी. नात् समुदीर्णानां पिमईः सुमहानभूत् ॥ ५॥ यात्रि : । शूराणांरणशूराणां गर्जतामितरतरम् ॥६॥ उमयोः वत् । अन्योन्यं घोक्ष्यमाणानां योघांनां भरतर्षभ । कुन प्यताम् ॥ ७ ॥ पर्वणि भगवद्गीतापर्वणि धृतराष्ट्र संजय संवादे विशोऽध्यायः ।। २४ ॥ चचन नेवाले हैं संजय बोले कि वहां दोनों सेनाओंके शूर वीर ला है और दोनों सेनाओं में मुगन्यता फैल रही हे भरतर्ष मिलीहुई मिलाप मे वडारूप धारण करने वाली सेना ओं पौर शंख और भेरियों से मिलेहुये परस्पर के शब्द और पर गर्जने वाले शूरवीर पुरुषों केभी शब्द सरस्थान सेनाओं के बीच परस्पर देखने वाले शूरवीर और गर्जने वाले हाथी और प्रसन्न चिच सेना के चिचों में बड़ा खेद हुआ ॥ ७॥ of both the armies," replied Sanjaya, "are cheerful. The flower garlands of both sides give forth equally sweet smell. Both the formidable armies met in a fierce coinbat and fought bravely, filling the whole place with the sounds of conchshells and drums and the fierce roars of the warriors. Fierce nas, o king. the encounter of the warriors, staring at one another, and of the roaring elephants, giving much trouble to the cheerful warriors."

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॥ श्री मद्भगवदगीता ॥ धृतराष्ट्र उवाच । धर्मक्षेत्रे कुरक्षेने समवेता युयुत्सा । माममा पाण्डधाधैव किमकुर्वत सजय ॥ १॥ सन्जय उवाच । दृष्ट्वा तु पाण्यानक यूढ दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥ पश्यैतां पाण्डपुत्राणामाचार्य महती श्वमूम् । व्यूहां हुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता | ३॥ मत्र पूरा महेकासा भीमार्जुासमा युधि । गुयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ ॥ ४ ॥ पृष्ट फितान काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शेन्यन नरपुगव ॥ ५ ॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्त मौजाश्च वीर्यवान् । सामद्रो द्रौपदेयाश्च सर्च एव महारथा ॥ ६॥ स्मारुन्तु विशिष्ट्रा ये तानियोध द्विजोसम । नायका मम सैन्यस्य नार्थ तार प्रवीमिते ॥ ७ ॥ अध्याय ॥ १ ॥ धृतराष्ट्र बोले कि हे संजय धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में मिलेहुए युद्धाभिलापी मेरेपुत्रों ने और पांडवों ने क्या २ काम किये भसंजय बोले कि हे राजा धृतराष्ट्र उस समय राजा दुर्योधन पांडवों की व्यूहरची हुई सेनाको देखकर द्रोणाचार्यजी से यह वचन बोला ।२। कि हे आचार्यजी द्रुपद के बेटे अपने शिष्य धृष्टद्युम्न से व्यह | रचीचई पांडवोंकी बड़ी सेनाको देखो । ३। इस सेनामें बड़े धनुपधारी युद्ध में कुशल भीमसेन और अर्जुन के समान जो २ वार हैं उनके नाम यह हे युयुधान, विराट, महारथी द्रुपद । ४ । धृष्टकेतु, चेकितान पराक्रमी काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज | नरोचम शैव्य । ५ । पराक्रमी युधामन्यु विक्रान्त तथा उत्तमौजा सुभद्राकापुत्र अभि- | मन्यु द्रौपदी के पांचोपुत्र यह सब महारथीहैं ।।हे ब्राह्मणो में श्रेष्ठ हमारे जो विशिष्ट IIIEBHAGAVAD-GITA LECTURLI Dhritrasht12 sand-Tell ine, O Sanjaya what the people of my onn puty, and those of the Pandavas, who are assembled at Kuruk. shatru resolved for war, have been doing" i Sanjaya replied "Duryodhan having seen the army of the Pandavas drawn UP for battle, went to his Preceptor, and addressed hum thus" --2. "Jehold O master," said he, "the mighty arny of the sons of Pandu drawn up by thy clever pupil, the son of Drupada 3 In it are heroes, such as Bhim or Aljunı; there is Yuyudhana and Virata and Drupada (4) and Dhrightaketu und Chelitinn, and the valiant prince of Kası, and Purujit, and Kuntibhoja and Shubya a mighty chief ( 5 ) and Yudhamanyu and Vibranta, and the daring Uttamonja, so tho son of Subhadra, and the sons of Drrupadı all of them great in arms. G Know also the names of those of our party who - [43501 Mahal hai at (४३५०) भवान् भीमश्च कर्णश्च कृपच स मतिजय । अश्वत्थामा विकर्णश्व सैमिदात्तजयद्रय ॥ ८॥ अये च बहव तारा मदर्थे त्यक्तजीविता । नानाशस्त्रमहरणा सथै युद्धविशा रदा ॥९ । अपायाप्त तदस्माक पल भीमाभिरक्षितम् । पर्याप्त स्विदिमेतपायल भीमाभिरक्षितम् ॥ १०॥ अपनेषु च सर्वेषु यथाभागमवास्थता । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु गवत सर्व एव हि ॥ ११ ॥ तस्य सजनयन् हर्ष कुरवृद्ध पितामह ।सिंहनाद दिन- घोच्चै शय दध्मौ प्रतापगन् ॥ १२ ॥ तत शहाश्च भेर्यश्च पथादानकगामुख । सह चाश्यान्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥ तत श्वतह पैयुक महति स्पन्दने स्थिती । माधव पाण्डवश्वव दिव्यौ शह प्रदध्मन ॥ १४ ॥ पाञ्चजन्य हपीरेशो देव लोगहै उनके भी नामों को सुनो । ७ । आप, भीष्म, कर्ण युद्ध के विजय करने वाले कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्तका पुत्र आदि ।८। अनेक शूर वह सबमेरे निमित्त जीवनके त्यागने वाले नानाप्रकार के शस्त्रों के धारण करने वाले सबके सब युद्ध में बडे कुशल हैं । ९ । भीमजी मे रक्षित हमारी सेना अधिक होनेके कारण दुराधर्ष है ओर भीमसेन से रक्षित पांडवों की सेना न्यून होनेके हेतुसे धर्ष | णा के योग्यहै । १० । सब लोग अपने • मोरचों पर यथा विभाग स्थितहोकर | भीमजीकी चारों भोर से रक्षा करें ।११। और कौरवों में पद प्रतापवान भीष्म जीने दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिये सिंहनाद के समान शंख वाने को किया । १२ । तदनन्तर शखभेरी ढोल, आनक, गोमुख आदि वाजे चारों ओर से बने और महा शब्दहुए | १३ | उसके पीछे श्वेत घोड़ोंसे जुतेहुए बडे रथ पर सवारहोकर माधवजी और पांडव अर्जुन ने दिव्यशंसों को बनाया । १४ । अर्थात हपीकेश are the most distinguished. I nill ment on (a few of ) my generals. 7 Thyself, Bhashma, Karnn and Kripa, the conqueror in battle, and Aswatthama, And Viharni, and tlie son of Soina dutta, mith others (8) in vast numhers rho for my service linse forsaken the love of lift They are all of them practised in the use of arms and experienced in every mode of fight Our innumerable forces are commanded by Bhishnin, and the inconsidernble numy of our foes is led by Bhim. 10 I et all the generals, accu ruling to their respectre disenons stand in their posts, and one and all resolve to support Bhishni 11 The ancient chief Blushmi the grand-src of the Kurus then shouting with a soice like a roaring hon, blevr his shell to raise the spirits of the Kuru chief, (12) and instantly innunicrablc oonch shelle, nud other marlıle instru înents, were struch up on all sides, so that the clangour way 13 At this time hashna and Arjuns scated in a splendid chariot domn by white horses, sounded their conch shells which rrere of celestial form the name of the onc nhchs excSSIC (४३५१) श्रीमगरद्गीता BHAGATAVGI : [4351 ] दत्तं धनमयः । पौण्ई दध्मौ महाश मामकर्मा वृकोदाः ॥ १५ ॥ बनाताविजय राजा कुन्त्रीपुत्रो युधिष्ठिरः । नकुल, सहदेवश्च सुघोषमाणपुगको ॥ १६ ॥ काश्यश्च परमेश्वासः शिखण्डी च महारथः । पृष्टयुम्नो विराटश्च सात्याकशापराजितः ॥ १७ ॥ दुपदो द्रोपोयाच सर्वश पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शहन दध्मुः पृथक पृथक ॥ १८ ॥ स घोपा धात्तगटाणां हृदयानि व्यदास्यत् । नमश्च पृथियोञ्चैव तुमुलो. प्यनुनादयन् ॥ १९ ॥ अथ व्यवास्थतान दृष्टया धार्तराष्टान् कपिध्वजः । प्रवृत्त | शस्त्रसमाते बनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २० ॥ हृषीकेश तदा वाक्य मदमाह महीपते । अर्जुन उवाच । सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेच्युत ॥२१॥ याचदेतान् निरीक्षहं योद्ध (श्रीकृष्णजी ) ने पांजजन्य नाम शंख और अर्जुन ने देवदच नाम शंखको बनाया और भीमने पौंडू । १५ । कुन्ती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्त विजयनाम शस्त्रको और नकुल सहदेव सुघोष और मणिपुप्पक नाम शंखोंको वजाया । १० । और बडे घनुपधारी काशिराज, महारथी शिखंडी, और धृष्टद्युम्न, विराट और विजयी सात्यकी, । १७ । द्रुपद और द्रौपदी के पांचों पुत्र, महावाहु अभिमन्यु इन सबाने सब पोरसे पृथक् २ शंखों को बनाया । १८ ! इन सब सों के महा शब्दों से धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण मे होगये और पृथ्वी से आकाश पर्यन्त शब्द व्याप्त होगया । ११ । तदन्तर धानरध्वन अर्जुन धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्याकुल और अच्छे प्रकार से नियत देख कर शस्त्रों के प्रहार होने के समय धनुष को उठा. कर । २० । सब जगत् के स्वामी हपीकेश श्रीकृष्णजी से यह वचन कहने लगा कि हे अपिनाशी कृष्णा मेरेरथको दोनों सेनाओं के मध्य में नियत करो । २१ प्रथम मैं इन युद्ध में स्थिरशूरवीरों को दे कि इस युद्ध के प्रारंभ में मुझको किंम blown by Kri-hna was Panchajanya, and that of Arjuna was called Deva datto Bliin of diedful deeds blew his capacious shell Pawndra and Yudhishthira the royal s n of Kuntı: sounded inanta- Vijaya, Nakula and sahadeva blew their shells als; the one called Sugliosha, the other Manipushpaka 16 The prince of Kasi of tho mighty bow, Sikhandi, Dhrishtadyumni, Viata, Satyaki the invincible, Drupada and the sons of liis royal daugliter, Krishna, with the son of Subhadra, and all the other chiefs and nobles, bles also their 1espective shells; 18 so that their shrill sounding noice pierced the hearts of the Kurus and re echoed with a dreadful noise from heaven to earth. 19. In the mean time Arjuna, perceiving that the sons of Dhritarashtra stood ready to begin the fight, and that the weapons began to fly abroad, having taken up his bow, [20] addressed Krishna in the following words Arjuna - pray thiec, Krishna, cause my chariot to be driven and placed between the tro armies, [ 21 ] that I may behold so arc the men that stand [ 4362 ] Mahabharat (४३५२) कामान वस्थितान् । वैया राह योद्धव्यमम्मिन्त्रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥ योत्सयमानानवे- क्षहं य एतेऽत्र सन गता । धार्तराष्ट्रस्य दुईद्धयुद्धे मियचिकीर्षयः ॥ २३ ॥ जय उवाच । एमुक्तो हृषीकेशा गडाकेशेन भारत । सनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रधो. त्तमम् ॥ २३ ॥ भीमद्रोणप्रमुखतः सपांच महीक्षिताम् । उयाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति ॥ २५ ॥ तत्रापश्यत् स्वितान् पार्थ पितृनय पितामहान् । भाचार्यान् मातुलान् भ्रातृम् पत्रान् पौत्रान् सास्तथा ॥ २६ ॥ श्वशुरान् सहृदधैव सेनायोरुभयोरपि । नान्समीक्ष्यसकौन्तेयः सर्वान बन्धूनवस्थितान्२७कृपयापरयाविष्ट विदिग्निदगीत् । मर्जुन उहाच । दृश्चमं स्वजनं कृष्ण ययुत्स समुपस्थितम् ॥२८॥ सीदान्तममग प्राणि मुखञ्च परिग यति । चेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ।२९ ॥ गाण्डीवं संसते हस्तात् त्वक्चैवपरिदह्यते । नच श कोम्यवस्थातु भ्रमतीघ च मे मनः से वा किस को मुझ से लडना उचित है। २२ । जो यह राजा लोग इस दुखी दुर्योधनकी सहायता करने को यहां आये हैं इन सब युद्धाभिलापियो को में देर । २३ । संजय बोले कि इस गकार से अर्जुन के वचनों को सुनकर श्रीकृष्णजी अर्जुन के रथको दोनों सेनाओं के मध्य में नियतकर । २४ । भीष्म द्रोणाचार्य आदि सब राजाओं के सम्मुखकर यह वचन बोले कि हे अर्जुन इन मिले हुए कौरवों को देखो।२५।वहां अर्जुनने पिता पितामह प्राचार्य मामा भाई पत्र और मित्रोंको और कृतवर्मा आदि श्वशुर और मुहदों को दोनो सेनाओं के मध्यवर्ती इनसव बांधवादिको।२७। अपने नेत्रों से देसकर यह बड़ी करणा से वचन बोला कि हे श्रीकृष्णजी इन युदाभिलापी मुजन महद पिता पितामह गुरु भाई बन्धु और पुत्र पौत्रादिकों को अपने सन्मुख युद करनेके निमिरा नियन देखकर । २८ । मेरे अंग शिथिल होते हैं मुख में शुष्कताहोकर शरीर में कंप और रोमांचखड़े होतेहैं । २९ । हाथ से गांडीव धनुप मिरा पड़ता है और शरीर की त्वचा भस्म हुई जाती है यहां खडे ready, anxious to commence the Lloody fight; and with whcm it is that I am to figlit in this ready field; ( 22 ) and who they are that are leie assembled to support the vindictive son of Dhritiashtra in the battle." ( 23 ). Sunjay --- Kiislına being thus addeessed by Arjuna, drove the chariot in the indst of the two al mics, [ 24 ] and bade Aljuni cast his eyes towards the lands of the Kurus 25 looked at both the armies, and beheld, on either side, none but grandsiies, uncles, cousins, tutors, sons, and brothers, near relations or vosom fiiends 26. And when lie hud, gazed for it whilo, and beheld sucli triends as thiene p.epared for the fight, he was scized with actreine pity and compunction; and uttered his sorrow in tho fulloning words: Arjun "llaving beheld 0 Kushna! my lindied thus standing anxious for the fight, ( 28 ) my members fnil ic, mouth drics up, the liair stands on end and all my frame trembles, He (६३५ श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4353] ॥ ३० ॥ निमितानि च पश्यामि विपरीतानि केशर । गच श्रेयोनुपश्यामि हत्या स्वजन माइये ॥ ३१ ॥ न काई विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किन्नो राज्येन गोविन्द कि भोगनीवितेन वा ॥ ३२ ॥ येषाम फाङ्गितं नो राज्यं भोगा: सुरवानिच। तइमेऽचस्थिता युद्ध प्रागांस्त्यक्त्वा धनानि च । त योऽपस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यमत्या धनानि च ॥ ३३ ॥ आचार्याः पितरः पुत्रारतर्थय च पितामहाः । मातुटाः शुगः पौत्राः श्याला' सम्बन्धिनस्तथा ॥ ३४ ॥ एता हन्तुमिच्छामि प्रतापि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्य राज्यस्प हेतोः किन्तु महाकृते ॥ ३५ ॥ नित्य | धार्तराष्ट्र नः का प्रीतिः स्थाजनाईन । पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्येतागाततायिगः ॥३६॥ उस्माना वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान सबान्धघान् । पजन हि कय हत्या सुखिनः स्याम होनेको.भी असमर्थ होकर मेरा चित्र चलायमान होता है । ३० । और हे कृष्ण मैं विपरीत शकुना कोभी देखता हूं युद्ध में अपने सुजन लोगों को मारकर पीछे से अपना कल्याण नहीं देखना हूं । ३१ । हे श्रीकृष्ण मैं विजय करके राज्य सम्बन्धी मुखों को नहीं चाहताहूं राज्य से हमको क्या लाभ है और जीवनकरके भोगों से क्याफल होगा । ३२ । हम जिन लोगों के लिये राज्य मुख और भोगों को चाहतेहैं वही सब लोग अपने माणधन प्रादि मुखों को त्याग करके इस युद्ध में वर्तमान हैं । ३३ । अर्थात् आचार्य, पिना, पितामह, मामा, श्वशुर, पोते साल बहनोई इत्यादि अनेक नातेदार लोग । ३४ । हे मधुसूदन मैं त्रिलोकी के भी राज्य के लिये इन मारने वालोंको भी नहीं मारना चाहताहूं तो क्या पृथ्वी के लिये इनको मारूंगा।३५ । हे जनाईन धृतराष्ट्र के भी पुत्रों को मारकर हमको क्या मुख होगा इन आतनायियोंकाभी मारनेसे हमको पापही होगा ।३। इसकारण 29. Even Gandiva, my brir, thps from my hand, and my skin is parched and dried up I am not able to stand; for my head swips. 30. I behold inauspicious mens on all sides. When I shall have destroyed my kindred shall I lon.er look for happiness ? 31. I wish not for victory, Krishna; I want not pleasure; for what is domininion, and the enjoyments of life, or even life itself, 32. when thore, for whom dominion, pleasure, and enjoyment were to te coveted, hare alandoned life and fortune, and stand here in the field ludy for the truttle ? 33. Tutors, Song and fithers, grandsires and grandsons: uncles and nepheus. cousins, lindred, and fiends ! 3.4. Although they would kill me, I wish not to fight them, no, not even for the dominion of the three sezone of the universe, much less for this litttle cart! ! 33 Ilaring killed the sons of Dhritrashtra, what pleasure, O frisins. can re enjoy? Should sre dis.ory them, 43541 Musablıarat । ४३५४) माधव ॥ ३७ ॥ यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभापदतचेतस । कुलक्षयकृत दोप मित्रद्रोह च पातकम् । ३८ ॥ कथ न सयमस्माभि पापादस्मानिनवतितुम् । कुलक्षपात दोष प्रपश्याद्भिजन ईन ॥ ३९ ॥ कुर क्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा सनातन । धर्मे नष्ट कुल कृत्स्नमधर्माभिमवत्यत ।। ४० ॥ अवभिभवान् रण प्रदुष्यात कुलनिय । स्त्रीपु दुरस धार्णय जायते वर्णसङ्कर । ४१ ॥ सङ्करो नरक पेय कुलमाना फुलस्य च । पतन्ति पितरा होपा लुप्तपिण्डोदकामया ॥ ४२ ॥ दापोते कुलमानां घर्णसङ्करकारकै । उरसायन्त जातिधर्मा कुलधर्माश्च शाश्वता ॥ ४३ ॥ उत्सनक लधर्माणा मनुष्याणा जनाईन । नरके नियत चासो भवतीत्यनशुशुम ५३ ॥ अहो हम अपने वांयत्र धृतराष्ट्र के पुत्रोंके मारने को योग्य नहींह हेमाधवजी हम मुजनोंको मारकर कैसे मुखी होंगे। ३७ । यद्यपि लोभा कर्पित चित्त होकर लोग कुलके नाश रूप दोपको और मिनों के साथ शत्रुता करने के पातक को नहीं देखते हैं, । ३८ । हे जनार्दन कुल के नाश होनेसे उत्पन्न दोपो को देखने वाले हम लोगों को इस पाप से अलग रहना क्यों नही चाहिये । ३१ । कुल के नाश में कुल के परम्परा सम्बन्धी कुल धर्म भी नष्ट होत और धर्म के नष्ट होनेसे सम्पूर्ण कुल अधर्मी होजाता है । ४० । और अधर्म अधिक होनेसे कुलकी स्त्रियां दोपयुक्त होजाती हैं, हे दृष्णि वंशी दुष्ट स्त्रियोंमें वर्णसंकर उत्पन्नहोताहै।४॥ कुल के नाश करनेवालोंके घरानेका वर्णसकर नरकही के लिये है उनके पितृ लोग पिंड जल आदि क्रिया के गुप्त होजाने से स्वर्ग से गिरते है । ४२ । कुलके नाश करने वाले पुरुपों के इन वर्णसकर करने वाले दोपों के कारण नाचीन कुलधर्म जाते रहते हैं । ४३ । हे श्रीकृष्ण जिनके tyrants as they are sin nould take refuge with us 36 It therefore behoves us not to kill such near relations as these. Hos,OKrishna, can we be happy herurfter, n lien we have been the murderers of vur raco ? 37 What if thay whose minds are deprived by the lust of power se no १m n the citirpation of their race, no crime in the murder of their fiends (38) is that a 101son why we should not resolve to turn away from such a crime 1e who alhor the sin of cttırpating the handied of our blot? 9 in the destructa nof a family, the nncient untio of thic family is lost Upon the loss of v tue, vice and impınty ose him thr wholu of 1 rrec. 40 I roin the influence of impiety tlic f nnlw of a family gros vicious, and from nom n that aru bec mg vil vus ute Lurn the spirious brood called Varun S ul nr. 11 Thu Sanko poudes He'l loth for those which are slain and Iloy whe's survie, and thus fo fatheis being depris ed of the ceremonies of ailes and water oficrel to their manes, sink into the infernal re_10ns 12 By the crimes of this who murder their onn relations, srcuolfcontamination and birth of Varuns intary, (४३५५) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4255] यत महापातं का व्यवसिता वयम् । पढ़ायसुग्नलामेने इन्तुं म्वजनमुद्यताः ॥४४॥ पाद गामप्रतीकारमान शान पाणयः। धार्तराष्ट्र प्रत्युत्तनगे क्षेमतर भयेत् ॥४६॥ समय उगच । एवमुक्तवार्जुन सात्यो रयोपस्य उपाविशत् । यिमन्य मशरं चाप शोक संघिग्नमानमः ॥ ४७।। इति श्रीमहाभारते भीमपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि श्रीकृष्णार्जुन विपाद योगोनाम प्रयनोऽध्यायः ॥ १ ॥ कुल धर्म लोप होगये हैं उन मनुष्यों को सदैव नरक का निवास होता है यह बड़े लोग कहते आये हैं । ४४ । बड़े दुःख और पश्चात्ताप की बातहें कि हम उनबड़े पप करने के निश्चय करने वाले हुये जो राजमुखके निमिरा अपने मुजनोंको | लोभसे मारने को उग्रत हुये । ४५ । जो धृतराष्ट्र के पुत्र शस्त्रधारी होकर मुफ प्रशनधारी सन्मुखता से राहत को मारें तो मेरा बड़ा कल्याण होवे । ४६ । संजय बोले कि इसपकार शोकग्रस्न चित्त अर्जुन युद्ध में ऐसे करुणा पूर्वक वचनाको कहकर धनुपवारणको रखकर रथ में बैठगया ॥ १७ ॥ The family virtue, and the virtue of a whole tribe is for crer done nmay with. 13. And we have leen told, O Krishna, that the habitation of those mortals wli se generation has lost its virtue, sliall be in Hell. 41. -l'oe is me I what a great crime are tre prepared to comunit! Alas! that for the lust of the enjoyments of domininon we stand here ready to murder the kindred of our own lilood 1 45. I would rather patiently suffer that the sons of Dhrita- Inshtra, with their weapons in their hands, should come upon me, rnd, unopposed, kill me unguarded in the field.' 46. Sanjaya- " When Arjuna hod ceased to speak, he sat down in the chariot Letween the two armies; and having put aray his bow and arrons, his licert was overrholened with affiction." 47.

। [ 4356] Mahabharat (४३५६) स जय उवाच । तन्तथा कृपयाविष्टमधुपर्णा कुलेक्षगम् । विदि तमिद वाक्य सयाच मधुसूदन ॥ १ ॥ श्रामगवानुपाच । कुतस्त्वा कश्मरामिद विपमे समुपस्थि तम। अनार्यजुष्ट मादर्य मकीर्तिकर र्जन ॥ २ ॥ पलैव्य मास्म गम पार्थ नेतत्वय्युपपद्यत । क्षुद्र हृदयदौर्दय त्यक्तात्तष्ठ पर तप ॥ ३ ॥ अर्जुन उवाच । कथ भाममह सख्य द्राणश्चमधुसूदन । इपुभि प्रातयोत्स्याम पूजाहापरिसूदन । ४॥ गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्त भैक्षमपीह लोके । हत्वार्थकामास्तु गुरूनिदेव भुजीय भोमान् रुधिरप्रदिग्घान् ॥ ५॥ न चैतद्विद्म कतरनो गरीयो यद्वा जयम यदि अयाय ॥०॥ संजय बोले कि स्नेहयुक्त कृपासे भरेहुये अश्रुपात समेत व्याकुल और दुखी अर्जुन को जानकर मधुसूदन श्रीकृष्णजी यह वचन अर्जुन से बोले । १ । कि हे अर्जुन इस युद्ध में ऐसा योह तुझको कासे उत्पन्न हुमा यह मोहस्वर्ग रोकनेवाला और अपकीर्तिका प्रकट करने वाला है ऐसे योहको नपुसकलोग करते है इससे हे अर्जुन तू नपुंसक मतहो यह तुझको उचित नहीं है हे शनुहन्ता अर्जुन हृदयकी इस क्षुद्र दुर्वलताको त्यागकर सडाहोजा। ३ । यहसुन कर अर्जुन कोले कि हे मधुमूदनजी मै युद्धमें द्रोगाचार्य ओर भीष्म पतामह के सम्मुख उनसशस्त्रोंके द्वारा कैसे लडू हे शत्रुघ्न कृष्ण वह दोनोंमेरे पूज्यतम है।४ा वडे प्रभाववाले गुरुओं को न मारकर इसलोक में भिक्षाकाही अन्न खाना उगम है और अर्थ के चाहने वाले गुरुओंको मारकर इस लोक में रुधिरसे भरे हुए भोगोंको भोगेंगे।५। और यह | भी हम नहीं जानते कि हम गुरुओको विजय करेंगे वा गुरू हमको विजय करेंगे LLCIURLIL ( The nalui e of the soul ) Sangaya--"Kushni bcholdin; him thus infiuenced by compunc tion, lus cycy over'lowing with a frid of tenis, and luis heart oppressed witli dcep affliction duri sou him in the follo ving words 1 Krishna-- IVhence O Arjun comes unto thce, this folly and unmanly werkness? It is disgracelul contrary to duty and the fundati n of dishonoar ! Yield not thus to jumanliness, for at all lecomns ana lile theo Alandon this despicable wenkness of thy licuit, and stand up" } Aijuna--" llogy, U Krishna, shall I resolvo to fiunt wita my arrows in the field against such ns Bhishma ind Dr m, why of all tnen are most worthy of my respect I would rather bog iny brad al out the vold, thm be the murderer of my preceptors to whom such anful lureicnce 13 duc Should I destrı y such friend as thee, I should pa talc of po scastinis, wealth, and pleasures polluted with their blad 5 Wel non not whether it would be better that wc sliould let them, or they us for those, (५३५७) 'श्रीमद्भगवदगीता Bhagavadgita [4357] वा नो लययुः । यानेच हत्या न जिजीविष मम्तवस्थिताः प्रमगे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ कार्पण्यदे घोपहतस्वभाधः पृच्छा त्वां धर्मसंमूढचेताः । यच्छेय. स्थानश्चित ऋद्धि तन्ने शिष्यतेऽहं शावि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ नाह प्रपश्यामि मिमापनुद्यात् यच्छो कमुच्छोपणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्यभूमावसालमृद्धं गल्प मुराणामपि चाधिपत्यम् ८ सन्जय उवाच । एवमुक्त्या हपोकेशं गुडाकेशः परतरः । न योस्य इति गोविन्दम. पत्या तणी यभव ह ॥ ९ ॥ तमुधाच हृषीकेशः प्रहसानय भारत । सेनयोरुम- यामध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ १० ॥ श्रीभगवानुवाच । अशोच्यामन्यशोचस्त्य प्रन्नाचादांश्च मापसे । गतासूनगतासूश्च नानुशोचान्त पाण्डताः ।। ११ ॥ नत्वेघाई और हम जिनको मारकर जीवन के इच्छावान् नहीं हैं वह धृतराष्ट्र के बेटे सन्मुख वर्तमान हैं। ६ । हे कृपण मैं दीनता युक्त दूपित प्रकृतिवाला धर्म में असावधान चित्त होकर आपसे पूछताहूं कि जो आपने मेरे निमित्त कल्याण निश्चय किया है उसको कृपाकरके मुझ से कहिये क्योंके मैं आपका शिष्यहूं आपअपनी शरणागततामें मुझको उपदेश कीजिये । ७ । पृथ्वीपर वृद्रियुक्त निर्विभाग शत्रु- ता रहित अथवा धन आदि से परिपूर्ण राज्यको और देवताओं की प्रभुता को भी पाकर इन्द्रियोंका मुखाने वाला जो मेरा शोकद उसके दूरहोने का मैं कोई भी उपाय नहीं देखता हूं।16। शत्रुओं का संतप्त करने वाला अर्जुन श्री कृष्ण जी से यह वचन कहकर कि युद्ध नहीं करूंगा मौन होगया । १ । यहदशादेखकर दोनों सेनाओं के मध्य में हॅसनेहुर श्रीकृष्णजी अर्जुनको अत्यन्त दुखी जानकर यह वचन वाले १० कि अर्जुन जो शोक के योग्य ही नहीं हैं उनको तू शोचता है और पंडितोंके वचनों को कहता है परन्तु पंडित लोग उन पुरुषोंको 'जिनके कि शारीर छूटगये अथवा शरीर में प्राण नियत हैं अर्थात् प्रात्मा के अविनाशी होने whom having killed, I should not wish to live, are cven the sons and The vi rinusurra and are nerv tarni up kahure 'as. 6. Hy compassionato nature is overcome by the dread of sin Tell me truly wliat may be best for me to do, I am thy disciple, wherefore instruct ine in my duty. 7. For my understanding is confounded by the dictates of my duty, and I sec notliing that my assunge the grief which drics up my faculties, although I were to obtain a lingdom whithout a rival upon carth, or dominion over the liosts of heaven "a. | Sanjaya -" Arjuna having thus spoken th Krislina, and declared that he would not fight, was silent. 8. Krishım smiling, addressed the afflicted prince, standing in the midst of die two armies, in thco following words. 10. iiishna--" Thu grievest for those whopar unworthy to be lamented wulst thy sentiments are those of the The wise neitser gricve for the dead n r for the living. 11 viac nien.

14358 ] Malabharat (४३१८) जातु नासत्व नेमे जनाधिपा. । न चैव न भविष्यामः सर्वे चयमतः परम ॥ १२ ॥ देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौम र यौवनं जग । ता देहान्तरमा सारस्तान मुक्ति ॥ १३ ॥ मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुख दुखदाः । अगमापायिनोनित्यास्ता- स्तिारोक्षस्थ भारत ॥ १५ ॥ यं हि न प्यघयत्त पुरुषपुरुषपभ । समदुःख पुन धीर स्यामृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥ नासनो विद्यत भावो नामागे विधते सतः। उमपोर प दृपोन्तस्त्वनय स्तत्वदामः ॥ १६ ॥ अविनाशितु ताद्वाद्ध येन समि दततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कधितकर्तुमईति ॥ १७ ॥ अन्तयन्त इमे देवा नित्यस्योक्ताः शरीरिण. 1 अनाशनोप्रमंयश्य तस्मासुध्यस्य भारत ॥ १८ ॥ प पनं से नहीं शोचते हैं ।११। मैं कभी नहीं हुआ और तुझसमेत यह सब राजा लांगभी कभी नहींहर न इसक पीछ हम सब उत्पन्नहोंगे यहवात नहीं है।१२।जैसे कि स्यूल शरीर में वाल्यावस्था, तरुणावस्था और वृद्धावस्था यह तीनों दशाहांती हैं इसी प्रकार अन्य शरीर की प्रामि है, वहां ज्ञानी पंडित माहको नहीं पाता ।१३३ हेकुन्ती पुत्र अर्जुन इन्द्रियों की दृतियों के शब्दादि विषय देखना खाना सूंघना और शीतोष्णता आदि सुख दुःख के देने वाले उत्पत्ति नाशयुक्त मव विनाशवान है इससे हे भरतर्षभ त इनको सहनकर । १४ । हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ जिस मुख दुःख में एकसे रहनेवाले ध्यानी और योगी पुरुपको यह पाड़ा नहीं देते हैं वह मोक्षके योग्य समझाजाता है, ।१५। अभावरूपी वस्तुका भावभी नहीं है और सतरूप ब्रमका अभाव वर्तमान नहीं है । १६ । उस सत अर्थात् सत्यको जिससे कि यह जगद | व्याप्तहोरहा है भावनाशीजानो इस न्यूनगा रहित आत्माके नाशकरनेको कोई भी समर्थ नहीं है । १७ । प्राते प्राचीन निरवाधे अविनाशी आत्मा के यह सब शरीर I myself never bus not, nor thou, nor all the piinces of the carth; nor shall we ever hereafter cense to be. 12. As the soul in this mortal frime finds infancy. youth, and old age; so. in some future frame, will it find the like. One who is confirmed in tlus Lelict, is not distubed by any thing that may come to pass 13. Ibo sensibility of thic faculties gives leat and cold, pleasure and pain; which como and go, and are transient and mconstant. Bear them with paticnco, O son of Bharata. 14. Fur the sisu man, whom these dirtub pot and to uliom pain and pleasie arc the same, 13 foi med for imın riality.13. A thing imaginary las no existence whilst that which is true is a stranger to n nentity. 16. By tlı 1se who look into the panciples of things, the design of ench is seen Loirn that lie by hom all things were formed is incorruptible, and that no one is able to effect the destruction of this thing whicli is inexliaustiblc. These bodied, which cnvelope the ronls which inlinbit thein arc eterna! incorruptible, and suu passing all conception, are declareel to lo finita 17.

। (४३५९) श्रीमद्गवगीता BHAGAVAIGHT [43000 घेत्ति हन्तार यथैन मत्पते हतम् । उभौ तौ विजानीतो नाय हान्त न हन्यते १९॥ न जायते म्रियते या कदाचिनाय भूत्वाभावता या न मय । अजा तस्य शाश्वताय पुराणो न हन्यते हन्यमाने शगरे ॥ ॥ वेदारिनाशन नित्य य एनमजमव्ययम् । कप स पुरुष पार्थ क घातयात हान्तरम् ॥ २१ ॥ घासाक्षि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपणि । तपा शरीसाग बिहाय जाणन्यन्यानि स पाति नमाने देही ॥ २२ ॥ नैन छिन्दन्ति शस्त्राण नैनात पायक । न चैन क्लश्यत्यापोन शोषयति मारुत २३ ॥ अच्डेद्योयमद हायमले गोऽशोग्य एबच । नित्य सर्वगत स्थाणु रचलाप सनातन ॥ २४ ॥ अव्यफायाचिन्यो नाशवान् कहे हैं इसकारणते हे अर्जुन तुम युद्ध में प्रवृत्तहो । १८ । जो पुरुष इस मात्माको मारनेवाला समझताहै और जो इसको मरामा मानताहै वहदोनों अज्ञानी है, यह कभी न मरता है न कोई इसका मारनपाला है । ११ । यह आत्मा न कभी उत्पन्न होताहै न मरताहै ओर न पहले उत्पन्नहुआहै न पीछे उत्पन्न होगा यह अजन्मा आत्मा नित्य ओर प्राचीनता के कारण सदेव एक रूपह यह अनित्य देहों के मरनेमें नहीं मरताहै । २० । जोइसआत्माको अविनाशी और नित्य अजन्मा और न्यूनतासे रहित जानता है वह सब गरीरोंमें पूर्ण आत्मारूप पुरुष कसे किसीको मारेगा और किस को मरवावेगा।२१। जैसे कि मनुष्य पुराने बसोंको त्यागकर नगीन बनाँको धारण करताहै इसीमकार आत्माभी पुराने देहोंको त्यागकर दूसरे नवीन शरीरोंको प्राप्त करलेता है । इस आत्माको न शन्न छेद सक्त न अग्नि जलासक्ती न जल गलाप्तता न वायु मुखा सक्ती है। २३ । क्योंकि यह आत्मा म छंदनेके योग्य न जलाने के योग्य न गलानेके न मुखाने के योग्यहै यह नित्य रूप सर्वत्र धर्नमान सदैव एक दशा में अचलरूप प्राचीन सनातन और अग्वड beings wherefore O Aijan, resolve to fight 18 He who Lelicies that it is the soul which hills and lio who thinks that the soul may be destroyed, bre both alike decieved, for it neither kills nor is hilled. 19 It 19 not a thing of which a min nay say, it has seen it is about to be, or is to be heierfter, for it is a thing without birth, it is ancient, constant, and eternal and is not to be destroyed like the mortal frame. 20 How can the man ho believes that thus thing is incorruptible eternal, inexaustible and without birth think that ho can uither hill or cause it to be hilled ? Asa mln throws away old garments and puts on new even so the boul, having quitted its old mortal finnes enters into new ones. Thio weapon divides it not, the fire burns it not, the water corrupts it not, the wind drics it not asray, ( 23 ) for at as indivisible inconsumable, incorruptible and is not to be dried away it is eternal universal, porment immovcablc ( 24 ) it is invisible, mconceivable 22 843601 Malablıust (४३६०) यमविकारोयमुच्यते । तस्म देव विदित्वन नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥ अध चन नित्यजात नित्य वा मन्यसे मृतम् । तथाप स्व महावाहा नैन शोचितुरईस ॥ २६ ॥ ज.तस्य ह वो मृत्युधंच जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहायधे नत्व शोचितमईसि ॥ २७ ॥ अयतादीनि भूतानि व्यत्तमध्यानि भारत । अव्यक्त निधनान्यच तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥ आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवत् चंदति तथैव चान्य । आश्चम्यघच्चैनमन्य शृणोति श्रुत्वाप्येन धेद न चैधकश्चित् ॥ २९ ॥ देही नित्यसवयी य देहे सर्वस्य भारत । तस्मात् सर्वाणि भूतानि नत्य शोचितमांस ॥ ३० ॥ स्पधर्मपाप चावपग विकम्पितुमईसि । धाश युखाच्छ्यान्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥ यदृच्छया चोपपन स्वर्गद्वारमपावृतम् । है । २४ । यह गुप्तरूप भ्यान स अगम्य ओर रूपान्तर दशासे पृथक कहा जाताहै इन हतुनोस इसका ऐसा जानकर तुम शाचकरन के याग्य नहीहा । २५ । तू इसको सदैव मरन व ला ओर जन्मलने वाला मानताहै तौभी.सोचनकर । २६ । ह महा वाहु जन्म लेनेवालेकी मृत्यु भी अवश्यहै और मरनकालेका जन्मभी निश्य है इस कारण अर भावी है इस का कोई भी उपाय नही है इसमें तेरा शोच काना थाहै ।११ हेभरतवंशी जीवोंका आदि विदित नहींहोता म यविदितहाताहै ओर अन्तभी विदित नहींहे एसीदशा में विलाप क्यों करना चाहिय । २८ । काई तो उसका मार्यरूप से मानताहै पोर काई 'गाश्चर्यके समान दखता ओर कहता है और कोई उसका आधर्यकेही समान सुनकर नही जानताहै अर्थात् वह आत्मा देखने मुनने और कहनेम नहीं आता है ।२१। हे अर्जुन यह आत्मा सब के शरीरों में नित्य भौर अन यहै इसकारण हेताततुमसव जीवधारियोंक शोचनके योग्य नहींहो । ३०। अपने धर्म को देखकर कांपना छाइदो क्योंकि धर्मयुद्ध के सिवाय क्षत्रीका दूसरा und, unalterable, therefore Lelieving it to be thus thou shouldst not But whether thou believest it of eternal butli and durr tion, or that it dies with the Lody still th u hast 112 ciuse to lament it. 26 Death is ccrtam to all thmgs wluich are subject to birth, and regeneration to all things hi h ari mo tal, 11 herefore it does not behove thcc to griure about that which is mevrablu. 27 The fou mer stnto of beings is unknoun, the middle state is evident, and their future stato is not to be discovered Illiy then shouldst thou trouble tly self about such things as these 28 Some regard the soul as a monder, whil-t, some speak, and others her of it with astonishment, but no onc 111018 slint it is 29 Thuis spirit Leing never to be destr sed in the moutal finne which it inhabits, it is unworthy for thicu to le troubled for all these mortal 30 Cast Iut thy cycs tos ardy tlı dutics of tlıy puticulrı tribu, and it will all become thice to trumll A collir of the Kshitja trilu las no duty sujurior grleve.25 श्रीमद्भगवदगीता Bhagavadgita [4201] सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्ध मीरशम् ॥ ३२ ॥ अग चेत्वमिमं धर्य संग्राम न करिष्यसि । ततः स्वधर्म कीर्तिञ्च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥ नीतिवापि भूतानि कथा यान्ति तेव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकोतिर्मरणादातारच्यते ॥ ३४ ॥ मयाद्रणापरत मंस्यन्त त्वां महारथाः । येषाञ्चत्य वमतो भावा यास्पसि लाय. पम् ॥ ३५ ॥ अवाच्यवारश्च बहून् वदिष्यन्ति तवारिताः । निन्दन्तस्तव साम. प्यो ततो दुःखतरन्नु किम् । ३६ ॥ हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जिवा पा भोक्ष्य से महीम् । तस्तादात्तष्ठ कौन्तय युद्धाय कृतनिधयः । ३७ ॥ सुखदुःखे समे हत्या लामालामो जयाजयो । त्यो युद्धाय गुम्यस्य न पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥ एपा कल्याणकारी नहीं है । ३१ । हे अर्जुन विना इच्छा किये स्वर्गका द्वार खुला हुआ वर्तम न है सर्ग का मुख पानेवाले क्षत्री ऐसे युद्ध को पाते हैं । ३२ । जो तू इस धर्मरूप पुद को नहीं करेगा तो अपने धर्म और कीर्तिको त्यागकर पाप का भागी होगा । ३३ । बहुत समय तक सब जीव तेरी अपकीर्ति को कहेंगे और मतिष्ठावान पुष्पकी अपकीर्ति परण सभी अधिक दुखदायी होती है ॥३४॥ और सब महारथी. लोग तुममा भयके कारण युद्धसे हटाहुआ मानेगे उन सब लोगोंके भागे तू महान स्तुतिमानहाकर निन्दायुक्त छुटाई और तुच्छताको पावगा ३५औरतेरेशत्रु तेरे पराक्रम कीनिन्दा करते हुए कहनेक अयोग्य अनेक अनुचित वातोंको कहेंगे लज्जावानको इस से प्राधिक और क्या दुःख होगा।३३। मरकर तो स्वर्गको और विजय करक पृथ्वी के भोगांको भोगंगा हेअर्जुन इसकारण तू युद्धके निमिस निश्चयकरके उठ खड़ाहो ।३०। हाने लाभ जय विजय समानकरके युदके निमित्त तैयारीकर इसरीति के to fighting. 31. Just to tlıy wish the door of heaven is fouml open before thice. Such soldiers only as are the favourites of Ileayen join such a glorious figiit as this. 31; But, if thou wilt not perform the duty of thy calling, and tight wul thic field, thou wilt abandon thy duty and thy hè nor, and le guilty of a crimc. 33. Man..ind will speak forever of thy disgeace Disgrace to a man of honnur is worse than death. 34. 'l he genei als of the armies will think that thy retiremeni from fiuld arose from fear, and thou wilt Lecome despicable even auringst those ly wl.om th u wert wont to be respected. 35 'lly cuenties will speak of theo in words which Are unwortly to be spokon, and direcciatc tlıy courage and abilities; what can be more dhendful th n this! 30. iftlion Art slain thou wilt obtain tiesven, it clio ert v ctrozirus thou wilt enjoy a wild for thy renard; threfire son of Kunti, ariss and be determined for the battle 37. Muhe plea-u, v ind puin, g.in and loss, victory and defent, the same, and than prepare for Lattle,th rs th.dahalt 4862 ] Mababharat (४३६२) तेभिहिता सांध्ये बुद्धिोंगे विमा शणु । बुद्धया युक्तो यया पार्थ कर्मयन्धं प्रधास्पति ॥ ३९ ॥ नेहाभिगमनाशस्त प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य भायते महतो भयात् ॥ ४० ॥ व्यवसायात्मिका बुाद्धरकह कुरुनन्दन । परशाखा धन न्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायनाम् ॥ ४१ ॥ याममा पम्पितांबाचं प्रवदन्त्यविपश्चित । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिन ॥ ४२ ॥ दामारमाः स्वर्गपरा जन्मफर्म फलप्रदाम् । झियाविशेषयला भोगैश्वर्यगति प्रात ॥ ४३ ॥ भोगैश्चर्यप्रसरतानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धि. समाधी गावदीयते ॥ ४५ ॥ प्रैगुण्य युद्ध में तू कभीपापका भागी नहीं होगा । ३८। हे अर्जुन यह मैंने उपनिपद और सांख्य सम्बन्धी ब्रह्मज्ञान तुझ से कहा अब इमी शान को कर्म योग में वर्णन करता हूं इस शान में प्रत होकर हे अर्जुन तू कर्ष बन्धा को त्याग करेगा।३९। इस कर्म योग में प्रारम्भ कर्म का नाश नहीं है और पाप भी नहीं है इस फल की | इच्छा रहिन कर्म रूपी धर्म का थोड़ा भी करना बड़े भारी संसारी भयसे रक्षा करता है । ४० । हे कौरख नन्दन इस कर्म योग मे तत्व के नियय करनेवाली बुद्धि एकही है और जिनको तत्व का निश्चय नहीं है उनकी बहुत शाखा ररानेवाली अनेक बुद्धियां हैं। ४१ । हे अर्जुन वह तल निश्चयसे रहित वेद बाद में प्रति रखने वाले इच्छा से जीते हुए चिच से स्वर्ग को उत्तम जाननेवाले अज्ञानीलोग पुप्पित वचनों के समान चित्तरोचक भोग ऐश्चर्य की माहि में साधन रूप जन्म कर्म और फल के दनेवाले अथवा अग्निहोत्रादि की मूल क्रियाको अधिक रसने वाले वेद के वचनों को कहते है और यह भी कहनेवाले हैं कि कर्म से उत्तम दूसरा मोक्ष और मान नहीं है । ४३ । भोग और ऐश्वर्य में प्रत्त चिरा और उस वचन से हरे हुये नित उन पुरुपों की समाधि में तत्त्व की निश्चयात्मिका बुद्धि incur no sin This & noaludge is based on Sankhya shastra; hour what it is in the practical, so that thou mayst le free from the bonds of action 14. In this no effort falls, nor is there any harm A very small portion of this duty delivers a man from In this there is but one judginunt, but that is of a dufinite natuc, whilst the judgment of those of indefinite principles are infiute nnd of many branches The unwice delighting in the remaids praised in the Vedas, tainted with worklly lusts, and picfurring a trans.ent njoyment of hilaren to eternal absorption, whilst they declare there is no other renard, pronouncc, for the attainment of nouldly riches and cnjoyments, flowery sentences, ordaining innumerable and inanifold C'emon is, eni proinising rewards for the actions of this life. 43. The dute mined judgment of such as ac attached to riches and enjoyment, and shose reason is led arany ly this de tuine, in not fond upon mature consic. 38 grent fear. 40 11 (४३६३) श्रीमद्भगवद्गीता Bhaga radgita [4363] विषया घेदा विस्तगण्यो मान । निन्छा नित्यसत्यम्यो नियोगक्षम या मवान् ॥ ४५ ॥ पामा उदाने सर्वतः संप्नुमोदक । तापान् संवैपु वेदपु प्रामणस्य विजानत ॥ ४६ ॥ धर्मण्येवाधिकारस्तं मापालेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्मा ते सात्यकर्मणि ॥ ४७ ॥ योगस्य पुरु कर्माणि लगत्यत्स्वा धनाय । विद्धध- सिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥ दूरेण घरं कर्म पुद्धियोगार- नञ्जय । हुदो शरणमन्घिन्छ कृपणाः फलतिय' . ॥ ४९ ॥ युधियुक्तो नादातीय । उमे सुस्तते । तरूपायोगाय युज्यस्य योग धर्मसु कौशलम् ॥ ५० ॥ फर्म नहीं होती है । ४४ । तीनों गुणों को कहनेवाले वेद हे अर्जुन तू तीनों गतियों से विरक है । मुख दुात भादि द्वन्द गुणों से पृथक् सर्पद सम बुद्धि वाला होकर सदैव धैर्यवान् ना शुद्ध सतोगुण वृत्ती हो और मनोरनों की प्राप्ति और रक्षासे पृथक होकर प्रात्नमान हो ।४५ जिाना कि घड़ी नदी ना मरोवर आदि में किसीका प्रयोजन होता है उतनाही योजन विज्ञानी बामणका सय यदों में होताहै मज्ञानी कर्म में ही सेरा अधिकारकै कर्म के फलों में कभी तेरा प्रतिकार न हो और तू कर्मफल का कारण भी मरहो और कर्म न करने मभी तेरा मन नहो।४७) कों की सिद्धी और प्रसिद्धी में समान बुद्धि होकर तू योग में नियत हो और और अकर्मियों के नंगाको छोड़कर कर्म को कर ऐसी सगता को योग कहते हैं { ४८ । हे अर्जुन फल की इच्छा किराया कर्मशान योग मे अत्यन्त लघु है, बुन में रक्षा का शरण को चाशे जिनके जन्म मरण का कारण कर्मों का फल है वह दीन अर्थात दुखी होते हैं। ४१ । इस लोक में बुद्धि में संयुक्त होकर मनुष्य पुग्य और पाप को त्याग करता है इम हेनु से समताप युद्धि योग में उपाय कर deration and meditatin. 41. The object of the ledus is of a threefold nature Be thou free from a threefold nature, be free from duplicity, and stand firm in the path of truth, be free from care and trouble, and turn thy mind to things which are spiritual 41. The knowing devine requires as little out of the n Lole Ted us collectively, as are from a reservoir floring with water 46 Thou hast a right in the deed, and not in tlie fiut of it. Be not one s bote motivo for action is the hope of levrå Int not thy lite be spent in inaction. 47. Depend upon application, porfiom thy duty, abandon 1]] thought of the consequences, and make the erent equal, bother it terminatein good or evil; for such pp equity is called Yogi 48 acions are for inſer 01 to the applicat on of wisdom Seek an asylum in widoa. Poor are the fruit secking 49 Nien who are cnducd frith true sidom cast off good or evil deeds in this storld Study then to obtain this applicatiou of thy understanding, for such application - [4364] Mahallarat (४३६४) बुद्धियुका हि फलं त्यक्तधा ननीषिण । जरबन्धधिनिमुक्ता पदगच्छन्त्यनामयम्।५१॥ यदा ते मोहकलिलं वृद्धिाततरिष्यति । तमा गन्तासि निवेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्थ च ।। ५२॥ श्रुतिविप्रतिषमा ते यदा स्थास्यति निश्चला ! सम धावचला बुद्धिस्तदा योगमवास्यसि ॥ ५३॥ अर्जुन उवाच । स्थतप्रनस्य का भाषा समाधिस्य केशव। स्पितघी. किं प्रभाषेत किमासीत प्रजेत किम् ॥ ५४ ॥ श्रीभगवानुवाच । प्रजाति पदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्ट स्तितप्रनस्तदोव्यते॥५५॥ दु.खे धनुद्विग्नमना सुखेपु विगतस्पृहः । वीतरागभयोधः स्थितधामीनरुच्यवे॥५६|| . सर्वत्रानाभस्नेहस्त तत् प्राप्य शुमाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वेपि तस्य प्रताप्रात- क्योंकि ज्ञान योग ही कर्मों में चातुर्य्यता है बुद्धि से संयुक्त पुरुप कर्म जन्य फलोंका त्यागकरके जन्म बंधन से छूटता है और निरुपाधि मोक्षपद को पाता है । ५१ । जर ते मोहरूपी बुद्धि शुद्ध होगी तब तू सुनेहुए और मुनने के योग्य शास्त्रों से बैराग्य पावेगा । ५२ । और नानामकार के शात्रों को सुनकर संदेहों से भरी हुई तेरी बुद्धि प्रसादृश्य ब्रह्म में नियत होकर निर्विकल्प समाधि में भचल वर्तमान होगी तब योग को पायेगा। ५३ । अर्जुन बोले कि हे केशवजी जिसकी बुद्धि शुद्ध ब्रा में नियत है और समाधि में वर्तमान है उसको लोग क्या कहते है और वह बुद्धि में नियत होकर कैसे वोलता है और कहां वैठता है और कैसे विपयों को भोगता है । ५४ । श्री भगवान वोले हे अर्जुन जब यह योग मन में वर्तमान होता है और सब इच्छाओं को त्याग करता है और प्रात्मा करकं अपनेही में तृप्त होता है तब स्थिर बुद्धि कहा जाता है। ५५ । दुःखों में व्याकुलता रहित मन, और मुखों में अनिच्छावान, राग भय क्रोध से पृथक स्थिर बुद्धि, मुनि कहा जाता है । ५६ । जो सर्वत्र में प्रीति न रखने वाला जो शुभ पदार्थ को पाकर उसकी हर्प से in business 18 cleverness Wast men, who have abundoned all thought of the fruit which is produced from their actions, are freed from the chains of birth, and go to the regions of eternal happiness. 51 When tly reason shall get the better of the gloomy weakness of thy hout, then shalt thou linse attained all browledge wluch has been or 18 worthy to be tauglite 5? When thy understanding, by study brouglıc w maturity, sliall be fired immoveably in contemplation, then shall it obtain true wisdom ' 53 arjuna,- \What 0 Krishni is the distinction of a *180 and steady man a ho is fixed in contew plation? Where doey lie dwell? How docs bo act?" 54 Krishna,~"A man 13 said to be confirmed in wisdon), when he fomsahes every desire which enters into his mind and is contented 1 huselt. 65. He whose mm is undisturbod in adver sity, unulated in prospurity, and why is stranger to anxiety, fcar and anger, is called a munt The adorn of that an is 50 श्रीमद्भगवद्गै ता Blingavndgita [4365] ष्टिता ॥ ५७ ॥ पदा सहरते चाय कूर्म झाग य सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियान्यस्तभ्य प्रना प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥ विषया चिनियत निराहास्य दिनः । रसव सो प्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तने ॥ ५९ ॥ यततो यपि कातिय पुरुषस्य पश्चित । इन्द्रि याणि प्रमाधीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६ ॥ नान सर्वाणि संयम्य युक्तमासीत मत्परः । शेहि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रातष्टिता ॥ ६१ ॥ भापतो विषमान पसः सस्तेषूपजारते । सहात सजायतं कामः कामात् कोशोभिजायते ॥ क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिवनमः । स्मृतिभ्रशाद बासनाशी युद्धना- शात् प्रणश्यति ॥ ६३ ॥ रागद्वेषविपुस्तु विषयानि ट्रयेश्वरन् । आत्मघश्योधिध. प्रशंसा नी करता है और अशुभको पाकर दुःखी होकर निन्दा नहीं करता है उसकी बुद्धि स्थिर अर्थात निश्चल है । ५७ । जब यह पुरुप सब प्रकार से इन्द्रियों को विषयों से कछुएके अंगों के समान खेचता है तब उसकी बुद्धि स्थिर समझी जाती है । ५८ इन्द्रियों से विषयों को न ग्रहण करने वाले देहाभिमानी से सब विषय होजाते हैं परन्तु उन के विपयों का अनुराग निवृत्त नहीं होता विपय संबंधी प्रीति भी परब्रह्म को देखकर दूरहोती है ।५९॥ हेअर्जुन ज्ञानी मनुप्यकी इन्द्रियां भी लुटेरोंके समान चित्तको अत्यन्त चुराती हैं ।३०। उन सबको अपने वशीभूत कर के विधानमनमे मुझ जगद के प्रात्मा को अत्यन्त मियतम माने और इन्द्रियों को आधीन करे उसकी बुद्धि स्थिरहै । ६१ | विषय वासना वालों के विषय ध्यान करने का संग इन्द्रियों पर होताहै उसी संगसे काम उत्पन होताहै कामसे क्रोध क्रोध से मोह मोह से विभ्रम, मृति के भ्रंश से बुद्धि का नाश और बुद्धि के नाश से मरण होजाता है। ६३ । मनको साधीन रखने वाला योगी उन राग द्वेपों से पृथक् मन के बा- established, who in all things is without aflection; and having rccieved good or evil, neither rejoices at the one, nor is cast down by the other. 37. His wisdom is confirmed, when like the tortuise he can draw in all his senses, and restrain them from their wanted purposes. 58. Tlie hungry man loses every other object but the gratification of his appetite, and when he is become acquainted with the Supreme, he loses even that. 59. 'I lie tumultuous senses hurry away, by force, the heart even of the wise man who strives to restrain them. 60. The inspired man, trusting in me may quell them and be happy. The man w lo has his passions in subjection is possessed of true wisdun. 61. The man who attends to the inclinations of the senses, is united vith them; from this uniun are created passions, froin passions anger, from anger is produced folly, from Colly a depravation of the memory, from the loss of mernory the loss of reason, and froin the loss of reasen the loss of Ho who has control over his senses, who despises delights all? 63.

७० ॥ विदाय 4366 ] Mulebharat यात्मा जसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥ प्रसादे सर्वदु सनां हानिरस्योपजायते । प्रसन्न चासो ह्याश बुद्धि पर्यवतिष्ठते ॥ ॥ ६५ ॥ नास्त बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य | भावना। न चाभावयत शान्तिरशान्तस्य कुत सुखम् ॥ ६६ ॥ इन्द्रियाणा हि चरता यानोनुविधीयत । सदस्य हरति प्रता वायु चमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥ तस्मा द्यस्व महापाहा निगृहीतानि सर्यश । इन्द्रियाणीन्द्रयार्थभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिछता ॥ ६८ ॥ या निशा सर्वभूताना तस्या नागरी सयासी । यस्था जाप्रति मतान सा निशा पश्यतो मुने ॥ ६९ ॥ आपूर्वमाणमचलप्रतिष्ठ समुद्रमाप प्रविशा त यत् । तद्वत् कामा य प्रविशन्ति स स शान्तिमामोशि न कामयामी ॥ धीन होने वाली इन्द्रियों से विषयों के समीप धूपता है वह अपने संकल्प विकल्प. रूपी कीचड़ के धोने से चिर की शुद्धी को पाता है । ६४ । उस गुली के होने से उसके सब दु.सीका नाश होता है और उस शुद्ध चित्तवाली दुद्धि से वह ज्ञानको पाता है । ६५ । संशय और विचार से रहित पुरुषको ज्ञान नही होसकना ज्ञान- हान पुग्प भ्यान नहीं कर सकता विना ध्यान चित्तसावधान नहीं होसकता और रिना चिता थर हुये उसको मुख केने होमक्ता हे । ६६ जिसका मन विषयों में जाने वाली इन्द्रियों के पीछे २ चलताहे उसकी ब्रह्मसंधी बुद्धिको देभेहर लेताहै जैसे कि जलमें नौका को वायु हरलेता है। ६७ । हे महावा इस कारणसे जिस- को इन्द्रियां सब प्रकार करके विषयों से पृषक होती है उसकी बुद्धि स्थिर कहाती है ६८ । रानिमें जितेन्द्री ज्ञानी जागता है और दिनमें जा सर अज्ञानी जीव जागते है ब्रहातच के देखने वाले मुनि लोगों की रानि है । ६१ । जैसे कि अचान रहने वाले समुद्र में जल प्रवेश करते है इसी प्रकार सब प्रकारकी इच्छा जिस ब्रह्म- ज्ञानी में प्रवेश करती है । वह शान्तीको पाता है परन्तु विषयोंका चाहने वाला and whose mind is in his bidding obtains happiness surpeme 64 In his happiness is boun to hm an exemption fiom all his troublcs, and lus muud being thus at eist, wisdom soon floss to him from all sides 60 lle min who attends not to this is without wisdom or the power of c ntemplation The man who is incapable of thinking, Iins 101st " hat happiness cin he enjoy who has no rest 66 Thy heut, which follows the dictates of the moving pissions, carries away the reison, as the storm, does tbo Lal in tlerlying orcan 67 The min, therefore, who can restrain all luis passions frm their inodinate desnes, is cndued with trưu wisdom Such a one wales but in the night when all things go to iest. 'Ile comtemplavile Muni sleeps but in the dny time when all thing, wohe. 69 The inan ulosc precions enter his heart 013 waters run into the unsu clling pisile olan, obtains bappiness (४३६७) श्रीमद्भगवद्गीता BLAGAYAPGIT: [ 4907] धामान्यः सर्वान् पुमाश्चरति निःस्पृहः । निममोरहारःख शान्तिमधिगच्छति ७२॥ पमा ग्रहीत्यितिः पार्थ नैनां प्राप्य बिमुह्यति । स्थित्यास्थामन्त कालापिनल निर्माण मृच्छति ॥ ७२ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपणि भगवद्गीतापर्वणि सू० सांख्य योगोनाय द्वितीयोग्ध्यायः ॥ २ ॥ -वर्जन उवाच । ज्यायसी चेत् कोणते मतः बुद्धिजन ईन । तत् किं कर्मणि गोनदि मोहयतीव मे । देक याच : लोवेस्मिन् द्विविधानिष्ठा पुरा इच्छानों को त्यागकर ममता और र्यात् केवल देइके निर्वाहके निमिरा को पाता है । ७१ । हे अर्जुन यह । नहीं भूलता है इसमें नियत होकर र्म से बुद्धिकी उगमता आप मानतेहैं ममें क्यों लगातेहो । १। आपकभी को त्यागकरके ज्ञानी और त्यागीहो लिनेहो सो आप इनदोनों में से एकको ।२। श्रीभगवान् बोले हे निप्पाप he man who having abardoned aordinate desires, unassuming 8. 71. This is divine depen. dance. Aman deny Pustasuvrem confidence in the Supreme goes not astray: even at the hour of death, should be attain it, he shall inix with the incorporeal nature of Brahm." 72. LECTURE 111 .Arjuna,-"If according to thy opinion, knowledge be superior to work, why then dost thou urge' me to engage in an undertaking so dreadful as this? 1, Thou, is it were, confoundest my reason with a mixture of sentiments; wherefore choose one amongst them by which I may obtain happiness, and explain it unto me." " Krishna --"It has already been observed by me, that there are [45681 Mahal hurnt (४३६८) मोक्तामयानघ । बानयोगेा सांएशना कर्मयोगेन योगनाम् ॥ ३ ॥न कर्मणागना रम्बाफम्य गुरुपाश्नुते । न च सन्यमनादच सिई समधिगच्छति ॥ ४ ॥ नहि कथित क्षगमागे जातु तिष्ठत्यकर्मग्न् । कात घश कर्ग सर्व प्रकृतिजैगुणे ॥५॥ कर्मेन्द्रियाणि सयभ्य य आस्ते गनसा म्मान् । इद्रियार्थान् विमुढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते ॥ ६॥ यास्यन्द्रियाणि मनसा नियम्याग्भतेर्जुन। मन्द्रियै कर्मयोगम सक्त. स विशिष्यते ॥ ७॥ नियतं कुरु कर्म व कर्मज्यायोगकण । शरीरयात्रापच ते न प्रासध्यदकर्मण ॥ ८॥ पन्नात् कर्मगोन्यत्रलोकायं कर्मवन्धन. 1 तदर्थ कर्म कौन्तेय मुक्तसर समाचर ॥ ९ ॥ सहयना. प्रजा सृष्टया पुरोवाच प्रजापति । अनेन मैंनेप्रथम प्रयायमें कही है निष्टा इनल कमें दोमकारकी है सांख्य वालोंकी निष्ठा ज्ञानयोगहै और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोग है ।३। क्योंकि यज्ञादि कोका प्रारंभ करने से पुरुप ज्ञान निष्ठाको नीं पाता है और कर्मयोग उत्पन्न चित्त शुदी के विना केवल त्याग अर्थात् सन्याससेही मोक्षप सिद्धीको नहीं पाताहै।४ाकर्मजानन सिदी के विना मनका न जीतने वाला कोई पुरुष समाप में भी पुरी बासनाको करके एक क्षणमात्र भी नियन नहीं रहमक्ता है निश्चयकरके सवलोग योग प्रकृति क सत्तादि गुणोंस कर्म करतहैं।राजो रागाादे भरेडये चित्त स कमेन्द्रियोंको स्वारीन करके मनमे इन्द्रियोंके विषयोंका स्मरण करता हुआ ध्यान के बहाने से एकानम बैठगहै वह मिथ्या आवारवाला कहाजाता है । ६ । हे अर्जुन जो पुरुप मनस माने- न्द्रियोंको साधीन करके निष्काम कर्मीहो कर्मेन्द्रियोंसे कर्मयोग का प्रारंभ करता है वह पूर्वसभी श्रेप्टनरहै । ७ । तू नियम करके कर्मोंका कर सब कमेद्रियोंज रोकने और कर्म के बिना चित्त शुद्धी न होनसे कर्मही श्रेष्ठ है भोर चित्त शुखी ह नेपर भी तुमकर्म न करने वाले क्षत्रीकी शरीर यात्राभी सिदनहीं होसक्ती। ८ । एक मरमेश्वरके पूजनके लिये जो कर्म किया जाता है उत्तरो सादिकी इच्छारूपी two pathr That of those who follor the Sankhyr, is the gyan yog. and the practıcıl, or the kirmy 19 for the yogie The man enjoys not freelon fron artion, from th ment of thint wluch he has to de, nor does he obtain linppines from a total inactisity No one ever rests moment inactive- Lvery man 19 msolantt ily urge to nct by those principles which aro inherent in huis naturi. The man who restrains lus active frculties and sits donn nith his mind attentive to the oljects of his senses, 19 called one of an astrage s'ul and the practı-er of derast So the man Nprarel, who having sultued all his presIone, performs with lus nctisu fren]ties all the functions of lifi, unconccrnci wbout thc eicnt 1. Perform tho settle functions action 19 preferable to innelinn The journey of thy mortal frainc inny not sure from junction The buss Borlel is eng from - 3 tioncm mcncc 5 G ५ (४३६९) धीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4262] प्रसविण्यध्वमेपोस्त्विष्टकामधुक ॥ १० ॥ देवान भावयतानेन ते देवा भावयन्तु यः । परस्परं भावयन्तः श्रेयःपरमंचास्यथ ॥ ११ ॥ इष्टान भोगान् हि यो देघा दास्यन्ते यसमाधिताः । तैर्दत्ता न प्रदाभ्यो यो भुक्तस्तेनएचसः ॥ १२ ॥ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषः । भुझतेते त्वघंपापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥ अन्नाद् भवन्ति; भूतानि पर्जन्यायग्नलम्भवः । यज्ञाभयति पर्जन्यो यतः कर्मस. सन्दवः ॥ १४ ॥ कर्म ब्रह्मोन्द्रयं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भयम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यो प्रतिष्टितम् ॥ १५ ॥ एवं प्रवर्तितं च नानापर्चयतीहयः । अघायुरि. अन्यकों में प्रवृत्त होकर यह लोक कर्मबंधनमें फंसनेवाला है हे अर्जुन उस ईश्वर के आराधनके लिये तू निष्काम कर्मोको करके वर्णाश्रम के योग्य वातोंको अच्छी तिसे कर । ९ । पूर्व समय में ब्रह्माजीने सव सृष्टिको यों समेत उत्पन्न करके कहा कि इसयज्ञ कर्मको तृप्तकरा और वह तुम्हारीद्धिकरें और तुम परस्परमें वृद्धि पाते हुए परम कल्याण को पाओगे । ११ । निश्चय करके यज्ञों से पृजिन और तृप्त किये हुए देवता तुमको तुम्हारी रुचिके योग्य भोजन वस्त्रादि देंगे, जो पुरुष उन देवताओं के दियेहये भोगोंको उन देवतागों के अर्पण न करके भोगताहै वह निश्चय चोर है । १२ । वैश्वदेव आदि यज्ञोंमें शपश्चहुये अन्नादिको भोजनकरते हुए सब हत्यारूपपापोंसे छूटनातेहैं और जो केवल अपनेहीनिमित्त भोजनको बनातेहैं वहपापी अपनेपापोंको भोजन करते हैं । ६३ । अन्नसे जीव उत्पन्नहोतेहैं, अन्नकी उत्पत्ति बसिहै और वर्षा यज्ञोंसे होतीहै और यज्ञ काँसे पैदा होनेवालाहै ।१४। कर्मवदसे और चंद अविनाशी ईश्वरसे उत्पन्न जानो इसहेतुसे सवदेश काल में वर्तमानरूप ईश्वर में सब भियमों समेत वेद और यज्ञ नियतहै । १५ । इस प्रकार other motives than the worship of the Deity. A handon then, O son of Kunti, all selfish motives, and perform thy duty. 9. Wher in ancient days Blamha created beings along with yajuus, he said: “ With this, multiply; verily it is all desire girer. 10. With this serve the gods, that the gods may serve you. Serve one another, and ye shall ohtain supieme linpriness. 11. The gods being remembered in worship will grant you the enjoyment of your wishes. He a lo enjoys what has been given to liim by them, and offers not a portion to them, is a thicf. 12. Those who cat not but what is left of offerings, shall be purified of all thoir transgressions. Those who dress their meat but for theinselves, cat the bread of sin. 13 All beings come from food; food is produced from rain; rain froni yajna, 'and yajna is the result of actions. 14. Know that works coine from Lody (Bralım,) whose nature is incorruptible; wherefore the omnipresent Brahıma is present The sinful mortal, who delights in the in the worship. 13.

[4370] Mahabharat (४३७.) न्द्रियारामो मोघ पार्थ सजीवति ॥ १६ ॥ यस्यात्मरतिरेयस्या दात्मतृप्तश्च मान घ. । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्य न विद्यते ॥१७॥ नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । नचास्य सर्वभूतेषु पश्चिदर्थव्यपाथय ॥ १८ ॥ तस्मादसक्त सतत कार्य कर्मसमाचर । असक्कोद्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुप ॥ ११ ॥ कर्मणैव हि ससिद्धि मास्थिता जनकादय । लोकसग्रहमेचापि संपश्यन् कानुमर्हसि ॥२०॥ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदवेतरो जन. । स यत् प्रमाण कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥ नमेपा योस्ति कर्तव्य त्रिषु लोकेषु किश्चन । नानवाप्तमवाप्तव्य वर्तएषचकर्मणि ॥ २२ ॥ से सदैव जारी रहनेवाले चक्र में जो नियत नही होता अर्थात् यज्ञादि कर्म नहीं करता है हे अर्जुन वह पापरूप जीवनसे इद्रियों में क्रीडा करनेवाला निरर्थक जी- वताहै । १६ । परन्तु जो मनुष्य प्रात्मा में प्राति रखनेवाला आत्मा में तृप्त और. आत्माही में संतुष्ट है उसको कोई दूसरा कर्म करने के योग्य नहीं है । १७ । उस प्रात्मामें प्रीति रखनेवाले ज्ञानीको प्रयोजन कियेहुए कर्मों से कुछ भी नहीं है और इसके विपरीत कर्म सेभी उसको कुछ प्रयत्न नहीं है और उसके मुखभोग रूप प्रयोजनका कोई सम्बन्ध किसी जीवमान से नही है । १८ । इसी हेतुसे तू कर्म फलों से पृथक् होकर सदैव करने के योग्य कर्मोको कर, फलकी इच्छा रहित कर्म करनेवाला पुरुप अन्तःकरण की शुद्धता से मोक्षपदार्थको पाताहै । १९ । कर्मकेही द्वारा जनकादि ने सिद्धी को पाया अर्थात् धर्म में लोककी संग्रहको देखता हुआ कर्म करनको योग्यहै । २० । क्योंकि उत्तम पुरुप जो जो कर्म करतेहै उसी कर्म को दूसरे मनुष्यभी करतेहैं और यह श्रेष्ठ पुरुष जिस वातको प्रमाण करतेहै उसी को संसार करताहै २१ । हे अर्जुन तीनों लोक में मुझको कोई बात करने के योग्य नहीं है अथा प्राप्त और अमाप्त होनेके भी योग्य नहीं है परन्तु तोमी मै gratificntion of his passions, and follows not the wheel, thus reyol ving in the world, lives but in vain 16 But the man who is selfdelighted, self satisfied, and happy in lus own soul, has nothing to do 17 He has no interest either in that which is donc, or thnt wilt es merelms, atmi' aluru 18 mut m all ohmys what there beir created, any object on which he may place dependance. 18 Wherefore, perform thou that which thou hast to do, at all times, un mindful of the event, for he who does his duty, withont affcction, obtains the Supreml. 19 JANAKA and othera hasc at. tuincd perfection cren by worl s. Thou shouldst also observe what is the practice of manhın.], and act accordin:ly 20 Thc man of low degree follows the example of him who is above bim, and dns that which he docs.21 I myself, Arjuna, haie not, in the three regions of ilc uniserse, any thing which is neabsiry for ine to Terform, nor any thing to obthun which is not obtained, and yeti (४३७१) धीमद्भगवद्गीता BHAGAVADGITA [4371] पर्दिछह नवत्तपं जातुकर्मण्यतन्द्रितः । मम यमीनवर्तन्ते मनग्या पार्थसर्वशः ॥ २३ ॥ उत्सादेयारमे लोका न कुर्यो कर्म चेदहम् । सङ्करस्य च कर्ता स्यामु पहन्यामिमाः प्रजाः ॥ २४ ॥ सकाः कर्मण्यविद्वांसो यथा मन्ति भारत । कुर्या द्विद्वांस्तथासतविकीपुलोकसंग्रहम् ॥ २५ ॥ न बुद्धिभेदं बनयेदज्ञानां कर्मसनि नाम् । जोपयेत् सर्व कर्माणि विद्वान युक्तः समाचरन् ॥ २६ ॥ प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकार चिमूहात्माकर्ताहमिति मन्यते ॥ २७ ॥ तत्यधिः तुमहावाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणागुणेषु पन्त इति मत्वा न सज्जते ॥२८॥ कर्महीको करताहूं । २२ । जो कदाचित् मैं आलस्यसे कोंको न कर्म तो हे अ- र्जुन सब मनुष्य सब रीति से मेरेही अनुसार चलनेलगें अर्थात् कर्मकरना छोड़दें १२३ । जो मैं कर्मोंको नहीं करूं तो यह सब लोक भ्रष्होजायें और मैंभी वर्णसं- करोंका ईश्वर कहलाऊं और इनसब प्रजाओंका नाश करदूं । २४ । हे भरतवंशी जैसे कि कर्मफल के चाहने वाले अज्ञानी लोग कर्मको करते हैं उसी प्रकार कर्म फलके न चाहने वाले ज्ञानीलोग लोक संग्रह अर्यात् संसारको धर्म में नियत कर- | नेके लिये कर्म को करें । २५ । विद्वान् लोग कर्म में प्रट पुरुषोंकी बुद्धिको कर्म | से पृथक् न करें योगीहोकर अच्छी रीतिसे आचरण करता हुआ सब कर्मों को करे और दूसरेसे करावे । २६ । सब प्रकार से प्रकृतिके सतोगुण रजोगुण तमो- गुणसे किये हुए कर्म होते हैं जो अहंकारसे अज्ञान वुदीहै अपनेकोही कर्ता मानता है ।२७॥ हे महावाहु जो पुरुष गुण और कर्मके विभागकी मुख्यताका जानने वालाई और यह मानकर कि इन्द्रियां विपयों में वर्तिनी हैं इस से वह अपनेको कर्मका I am engaged in work. 22. If I were not vigilantly to attend to these duties, all men would presently follow my example. 23. If I not to perform actions this world would fail in their duty; I should be the cause of spurious births, and should drive the peaple from the right way. 24. As the ignorant perform the duties of life from the hope of reward, so the wise man, out of respect to the opinions and prejudices of mankind, should perform the same without moitves of interest. 25. He should not create a division in the understandings of the igorant, who are inclined to outward Forks. The learned man, by in. dustriously performning all the duties of life; should induce the vulgar to attend to them. 26. The man whose mind is led astray by the pride of self-sufficiency, thinks that lie hinself is the executor of all those actitns which are perfurmed by the principles of his constitution. 27. But thr. man who is acquainted with the naturo of the two distinctions of cause and effect, haring consider ed that principles will act according to their natures, gives up weie 4372] Mulablarat (४३७२) प्रश्तेर्गुणसमूहाः सज्जन्ते गुणाकर्मसु । तानतस्तविदो मन्दान् कृत्स्नचिन्न विचाल यत् ॥ २९ ॥ मयि सर्वाणि कर्याणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा निराशा ममो भूत्या युध्यस्य विगतज्वर ॥ ३० ॥ येमे मतमिद नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा । श्रद्धावन्तोनयन्तो मुच्यन्ते तेपि कर्मभि ॥ ३१ ॥ ये त्वेतदभ्यस्य तो नानुति टन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥ सदृशं चेष्टते स्वस्या प्रकृतेज्ञानवानपि । मकृति यान्ति भूताति निग्रह किं करिष्यति ॥ ३३ ॥ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयो वशमागच्छेत्तो हास्य परिप न्थिनौ ॥ ३४ ॥ श्रेयान स्वधर्मो विगुण परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । स्वधर्म निधनश्रेय. कर्ता नही मानता है ।२८। प्रकृति के अहंकारादि गुणोंसे अज्ञानी पुरुष शरीरादिक मुश और कर्मोमें आसक्तहै उन आत्मज्ञानसे रहित अल्पज्ञ पुरुषों को श्रात्मज्ञानी कर्मनिष्ठा से न हटाव।२९।मोक्षका चाहनेवाला विवेक बुद्धि से सय कर्मोको मुझसव के अन्तर्यामी में अर्पणकरै इस से ह अर्जुन तू कर्मफल में आशा रहित और प्राप्तवस्तुको अपनी न माननेवाला होकर शोकस विगत होकर युद्धकर । ३० । जो मनुष्य मेरेइस मत पर काम करतेहै और श्रद्धावान् शेकर उस मे दोष दृष्टी नहीं करते वह धर्म अधर्म रूप कर्मों से छूट जाते है । ३१ । जो दोपलगाने वाले इसमरे मतपर कर्म नहीकरते है उनको ब्रह्मज्ञान में अत्यन्त अज्ञानी विवेक रहित स्वर्ग और मोक्षसे भ्रष्टहुए जानो।३२। ज्ञानवान्-भी अपने अनुमार चष्टाकरते हैं सब जीवमात्र अपने स्वभाव के अनुसार कर्म कर्ण होते है और मैभी पूर्पकर्म के अनुसार उन स कर्म करताहूं| । ३३ । परन्तु यहवात संभव है कि जो दोनों प्रकार की इन्द्रियों के विपयो में राग देष अधिकता से नियत है तो उन दोनोंके साधीन न होवे निश्चयहै कि वह दोनों राग द्वेप इस मोन चाहने वाले के शत्रु है । ३४ । अपने धर्माश्रम के अनुसार attachm nr. 28, Men who are led astı ay by the principles of then nature, are interested in the works of the faculties 1 he inan nilio is all inforined should not d sturb the mis-informed ignoianto 29 deed on me and with heut, over lucl the coal presides, be free from hope, be unpresumingle free from, troublt, and resolve to fight 30 The se s ho with a fim 1 clicf, and without repouch, shall constantly follow this my doctuinc, shall IHereleased from norhsal But those who, holding it in contempts fo}low not tlus my counsel, 10 astr wyed from all wslýn, depred of 10zson, and are lost. 32 The wise mm acts upon tlıc nclination of lus own name All tlings act according to their nn tures, what can Iestrunt val? In cicry purpose of the senses nie fired affection and dislike A we man should not put lum-uif in the power, for both of them are him opp ments, 31 Throw every A jan's (४३७३) श्रीमद्भगवद्गीता Bhageridgrta [4373] पग्धो भयावहः ॥ ३५ ॥ थर्जुन उवाच । सघ केन प्रयुत्तोपं पापंचरति पूरुष । अनिच्छ नपि घार्णय बलादिव नियोजित ॥ ३६ ॥ भगवानुवाच ॥ फाम एषज्ञोध एपरले गुणसमुद्रव । महाशनो महापामा बिद्धयमिह चरिणम् ॥ ३७ ॥ धूमेगात्रयवहानियधा दर्शा नले नच । यधोल्वेगानो गर्भस्तथा तेनेदमामृतम् ॥ ३८ ॥ आवृतं नागमतेन ज्ञानिगो नित्यनारणा । कामरूपेण कौन्तेय दुप्पणान सनच ॥ ३९ ॥ इन्द्रियाणि मनोमुचिस्याधिष्टानमुच्यते । एतेर्पिमोहपत्येप ज्ञानमा वृत्य देहिनम् ॥ ४२ ॥ तस्मात्वमिन्द्रपाण्यादौ नियम्यभरतपम । पाप्मान प्रजाह अपना धर्म और गुण भी अन्डीशनि से कियेहए दूमरों के धर्म से श्रेष्ठ है अपने युद्धादि कर्मों में मरना बहुत उत्तम है और दूसरे का धर्म महाभयकारी है। ३५ । अर्जुन बोले हे श्रीकृष्णजी फिर किस से संयुक्त कियाहुमा यह पुरुष पापों को करता है और अनिच्छावान् होकर अपने बल से कर्म में प्रकृत जुआ मालूम होता है, । ६। श्री भगवान बोले कि यह इच्छा रजोगुणसे उत्पन्न है यही क्रोधरूप होजाती है और यही इच्छाग्रुप काम महाभोक्ता वा उग्रम्प भय- कारी है इमको इसढेह में महाशनुरूपही जानो। ३७ । जैसे कि अग्नि धुएं से और दर्पण मैन से ढकजाते है और गर्भ जेर से ढका रहता है इसीप्रकार इम इन्छारूप कामसे यह ज्ञान भी ढकाहुआ है । ३८ । हे अर्जुन इस नानियों के पुराने शत्रु और अग्निके समान पूर्ण होने के अयोग्य इन्छारूप काम मे ज्ञान ढकाहुया है । ३९ । इस इच्छाका निवासस्थान इन्ट्री मन बुद्धि है और यह इच्छारूपी काम उन संघ के साथ ज्ञानको ढककर देहाभिमानी पुरुपको अत्यन्त मोह और भ्रान्ति में डालता है । ४० । इसकारण हे अर्जुन तुमप्रथम इन्द्रियोंको स्थाधीनकरके इस अत्यन्त भयंकारी own religion, though contrary is better the futh of an other, let it be ever so well followed. It is good to die in one's own faith, for another's faith is dangieous 35 ARJUNA, By what, O Krislina is man propelled to commit oftences ? It seems 1s if, con. trary to his wishes, he tas impelled by some secret force. ARISHNA --- Know that it is the enemy Inst, or passion, off spring of the carnal principle, insatiable and full of sin, by which this world is covered as the flame by the smcle, as the mirror by lust, or as the foctus by its pembirine The understandmg of the risc man is obscured by tlus inycterate foc, in the shape of desire, who rages like fire, and is hard to be 'ppeased. 39 Kaid that the senses, the mund and the nnderstanding are the places where it delights most to rule. By the as»ıstance of these it osers holms reison, and stupefics tlie soul 40 Thou shouldst, therefore, first subdue thy passions, and get the better of this soful 36 38 It is [4374] Mahabhu at (४३७४) धेन ज्ञानावत ननाशनम् ॥ ४१ ॥ इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियभ्य पर मन । मन सातु परा युधिर्यो बुद्ध परतस्तुस ॥ ४२ ॥ एव युद्ध परयुध्या सस्त यात्मान मात्मना । जाह शनु महाबाहो कामरूप दुरासदम् ॥ ४३ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गीता पनिपत्मब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे कर्मयोगोनाम तृतीयोऽ यायः ॥ ३॥ श्रीभगवानुवाच । इभ विवस्वते योग प्रोक्तवानहगव्ययम् । विवस्वान् मनये प्राह मनुरिक्ष्वाकयेद्रवीत् ॥ १ ॥ एव परम्पराप्राप्त मिग गजपयोऽषिदु । स कालेनेछ महता योगानष्ट परन्तप ॥ २ ॥ स एवाय मया तेद्य योग प्रोक्त पुरातन । भक्तोसि मे सपाचेति रहस्यह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥ अर्जुन उवाच । अपर भवतो ज्ञान विज्ञानके नाश करने वाले कामको मूलसे नाशकरो । ४१ । इन्द्रियोंको उत्तम कहाहै, इन्द्रियोंसे उतम मन, मनसे उत्तम वुद्धि ओर जो वुदिसे भी उत्तम है वह काय कहाजाता है । ४२ । इसप्रकार परमात्माको बुद्धिमे श्रष्ट जानके वदि के द्वारा मनको नियत करके कठिनतासेभी नाश न होनेवाले कामरूप शनुको मारडाल ॥४३॥ अध्याय ॥४॥ श्री भगवान बोले हे अर्जुन यह दो प्रकारवाला अविनाशी ज्ञान मैने सूर्यदेवता से कहाथा ओर मूर्य ने मनुजी से कहा और मनुने इक्ष्वाकुसे कहा ।। इसप्रकार से परपरापूर्वक प्राप्तहुए इस योग को राजमृपियों ने जाना है हेशत्रुहन्ता योग इसलोक में बहुन कालसे गुप्त है । २। उसी प्राचीन योग को अब मैने तुझसे कहा है क्योंकि तू मेरा भक्त और सखा है निश्चयकरके यह उत्तम योग गुप्तकरने के योग्य है destroyer of wisdom and I now ledge The organs are es teemel grent, but the mind 19 greatei than they Resolution 18 greater than the mind, and desire is superior to resolution 42 Wlien thou hast recognised what 18 superioi to icsolution and hept thy mind under control, determine to abandon tho cheny in the shape of desire 43. LECTURCIV 01 Tur FONSAI ING OF Norr Krishni-This never fuling discipline I formerly taught to Virnswon Varissan communicated it to Manu, and Manu inndo It hnown to 11 shishu Being handed doun successisely, it was studicd by the Raarchis, but in the coure of time, the Jog was lost. 2 It is tho sino di cipline which I have this day communicated to thico, lxcusa thou art my devotco and ins friend It is an ancient anula . (४३७५) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4975] जन्म परं जन्म विषस्थतः । कथमेतद्विजानीयां यादी प्रोक्त या निति ॥ ४॥ श्रीभगवानुवाच || यहूनि मे व्यतीतान जन्मानि तव चार्जुन | तान्यहं वेदसर्वाणि नत्यं वेत्यपस्तप ॥ ५ ॥ भजोपि साव्ययामा भूतानामांश्यरोपि सन् । प्रति स्यामधिष्टाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ ६॥ यदायदाह धर्मस्य ग्लानि भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् १७ ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशायच दुष्कृताम् । धर्मसस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ८ ॥ जन्म कर्म च मे दिव्यमेव पो वेत्तितत्वतः । पक्या देहं पुनर्जन्म नैति मामांत सोर्जुन ॥ ९ ॥ वीतरागम- यमोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता गन्नायमागताः ॥ १० ॥ । ३ । अर्जुन बोले कि हे कृष्णाजी आपका जन्म तो पीछेछुपा है और सूर्यका जन्म बहुत पहले हुआहै तो मैं यह कैसे जानं कि आपने सृष्टीकी उत्पत्ति के बारम्भ में कहा । ४ । श्री भगवान, बोले कि हे अर्जुन मेरे और तेरे अनेक जन्म हुए हैं उन सब को मैं जानता हूं तू नहीं जानताहै ।। मैं अजन्मा अविनाशी सवजीव मात्रों का आत्मा और ईश्वर भी होकर अपनी प्रकृतिको स्वाधीन कर के अपनीही माया के साथ मकटहोताई । ६ । हे भरतवंशी जब जब धर्मकी न्यूनता और अधर्म की रदिहोती है तब मैं अपनेको प्रगटकरके । ७ । साधुओंकी रक्षा और कुकर्मी पापा. स्मानाका नाश और धर्मके नियतकरन को प्रत्येक युग में प्रगट होताई । ८ । मेरा जन्म और कर्म दिव्यहै अर्थात् वनावट का नहीं है जो इस प्रकारसे मुल समेत जान ताहै हे अर्जुन वह पुरुष शरीर को त्यागकर फिर जन्म नहीं लेताहै अर्थात् मुझको माप्त होकर मुझीमें लय होता है । ९ । और जिनलोगोंकी विपयोंमें मीति वा अपने मरणका भय, अपने पराये दुःख के क्रोध इत्यादिवाते दूर होगई हैं और मुझीको श्रेष्टमानकर मेरी शरणागत होकर ज्ञानरूप तपसे पवित्र हैं ऐसे अनेक योगी मेरे भाव supreme mystery. 3. Arjuna.-- Seeing thy birth is posterior to that of Vivastan, how am I to understand that thou hadst been formerly .the teacher of this doctrine ? 4. Krishna,---1Both I and thou have passed many births. Mine are known to me, but thou knowvest not of thine 5. Although I am not in my nature subject to birth or decsy, and am the lord of all created beings; liyet, having command over my own nature, I am made evident by my own power. As often as there is a decline of virtue, and an insurrection of vice and injustice, in the world, I make myself evident.7. Thus I appear, from age to age, for the preservation of the just, the des truction of the wicked, and the establishment of virtue. S. He, o Arjunn, who, from conviction, acknowledges my divine birth and actions to bo cych so, does not upon his quitting his mortal frame. enter into another, for lie enters into me. 9. Many who were free, from affection, fear, and anger, and, filled with my spirit, depend.

[4376 ] Malia bharat (४३७६) ये यथा मां प्रदद्यन्ते तास्नर्थव भजाम्यहम् । मम यामानुवर्सने मनुन्या. पार्थसर्वशः ।॥ ११ ॥ दक्षिन्तः कोणासद्धि यजन्त इह देयता । ति हिमानुपे लोके सिद्धि भति कमंजा ॥ १२ ॥ चातुर्वण्य मया सृष्टं गुणधर्म विभागश । तस्य पत्ती रमपि गाविद्धयतीराव्यम् ॥१३॥ नगां कर्माणि लम्पान्त नमकर्मफरो स्पृहा । इति मां योगिजानाति काम सध्यते ॥ १४ ॥ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म वैराय मुमुक्षु भि. । फुराममेव तस्मात्य पूर्व पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥ किं कर्म किगकतिपययो प्यत्र मोहिया । तत्तेकर्म प्रवक्ष्यामि यजताया मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥ कर्मणोद्यपि वोद्धव्य चोप्यञ्च विफर्मण । अकर्मणश्च वेद्धव्य गहना फर्मणो गति ॥ १७ ॥ को प्राप्त हुए हैं अर्थात् मुझमें लयहोगयेहैं । १० । जो पुरुप मुझ सर्वव्यापीको मित्रता वा शत्रुताके भावसे प्राप्तहोतेहैं में भी उनको उसीरीति से सम्मुख होताई । ११ । इस नरलोकमें कर्मोसे उत्पन लक्ष्मी धन पुत्रादि सिद्धी शीघहोती है इस निमित्त यहां | कर्मोंकी सिद्धिजाननेवाले पुरुप जो देवताओं को पूजते हैं वहभी मेरेही भक्त ॥१२॥ | मने चारोंवों को उनके गुण विभागों समेत उत्पन्न फिया माया के योगसे गुझको उनकामी स्वामी जानो और वास्तरमें अविनाशी और अर्ना नानो । १३ । | क्योंकि कर्म मुझको स्पर्श नही करते है और न मेरी कर्मपल में इन्गहै जो पुरुप | मुझको इस प्रकारमे जानता है वह कर्म बंधनको नहीं पाताहै । १४ । पूर्व समय क मोक्षचाहने वाने शानियोंने इसीमकार से जानकर कर्माको किया है इस कारगा हे अन तभी इस माचीन रद्धों के किये हुए कर्मको कर । १५ । कर्म क्या और अकर्म कसाहै इसके जानने में पंडितलोग भी मोहका प्राप्त होते है उनदोनों कर्म और भौंको मै तुझगे कहताहूं जिनके जाननेगे तृ इस अशुभ संमार मे हटना- पगा। १६ । शास्रोक्त कर्म की गति भी जानने के योग्य है और शान में विरुद a upron me, lowing lxun purified ly thic potser of siulom linko entered into inc. 10 laasist theme me a ulo m nll tlung walk in my path, cun ns they serve me. 11. Those who wish for succes to thur works in this life, yomlup the Duvatne That ishich is achusel in this hfe, from Horks, spethly comes to 21. Mankind uns created by ine of four l.inds, distinct in their principley nud in Knowine then to be the cruitor of ununland, uneint. their duties सम: (४३७७) श्रीमद्भगवद्गीता BIHAGAVADGIT: [4377 ] कर्मण्यकर्मयः पश्येदकर्मणिच कर्मयः। सबुद्धिमान् मनुष्येषुसयुक्तःकृत्स्नकर्मवत् १८॥ पस्यसवेंसगारम्भाःकामसकल्पवर्जिजता ज्ञानाग्निदग्धकर्माणतमाःपण्डितंयुधाः१९॥ स्यकत्या कर्मफलासहं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तीपि नैय किश्चित् करोति सः ॥ २० ॥ निराशार्पतचित्तात्मा स्यफसर्वपरिग्रहः । शारीर केवलं कर्म दुर्धना. मोति किरियपम् ॥ २१ ॥ यहच्छालामसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो चिमत्सरः । सिद्धावसिद्धौ च कृत्यापि न नियध्यते ॥ २२ ॥ गतसशस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थित चेतसः । यज्ञायाचरतः कम समन प्रविलीयते ॥ २३ ॥ ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविग्रह्मा कर्म भी जानने उचित हैं और अकर्म अर्थात् न करने की भी गति जाननी चाहिये क्योंकि कर्म की गति कठिन है ।१७। जो पुरुष कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्मको देसता है वह मनुष्योंमें बुद्धिमान महायोगी और सवकों का करनेवाला है । १८ । जिस के समारंभ कर्म इच्छा और संकल्पसे रहित हैं और ज्ञानरूप अग्निसे काँको भस्म कर दिया है उसको ज्ञानीलोग पंडित कहते हैं । १९ । कर्मफल को | त्यागकरके सदैव आत्मलाभ से संतुष्ट अहंकारादि से रहित है वहकर्म में अत्यन्त पट तभी कुछ नहीं करता है । २० । जो पाग ऐश्वर्यो को नहीं चाहता देह मन बुद्धि और सपइन्द्रियों का जीतनेवाला है वह केवल शरीर संवन्धी कर्मोको करता हुआ पाप रहितहोताहै । २१ । चिना याचनाके मिसेए से संतुष्ट हर्पशोकसेरहित दूसरेकैलाभमें प्रसन्नहोंनवाता और सिद्धी भासिद्धी में रूपान्तर दशाके बिना कर्म करके भी बंधन को नहीं मास होता है । २२ । मसंग मर्याद अपनेको प्रकर्षा | मानने वाले कर्म फल की इच्छासे रहित यज्ञादिक कर्मा को विरार्पण करनेवाले ज्ञान निष्टलोगों के संपूर्णकर्म नष्ट होजाते हैं । २३ । अपंगके साधनमत्रादिक action, improper action and innction. Tho path of action in full of darkness. 17. He who may fxchod, as it were, inaclion in action, and aclion in inaction, is wisc amongst mankind. He is a perfect perfonici of all duty. 18. Wiso mon call him & Pandit, x liome every undertaking is free from desire, and alloc actions are consumed by tlie fire of wisdom. 19. llu alandons the desire of Ricward of his actions; lıc is always contcuted and independent; and althwugh lie inay engaged in a work, lo, ng it truc, docs nothing. 20. Ho is unsolici. touk, of a subdued mind and spirit, and exempt fiom cvery percrption; and, as he docs only the officcs of the budy, he commits no offence. 21. He is pleaf-cd with whatever ho may by chance obtain; ho has got better of duplicity, and he is free from envy. He is the famo in prosperity and ndycrsity; and although he ncts lie is not lound. 22. The work of him, who has lost all anxiety for the oveno, lo has renounced all and stands with lay inind subdued by spirtual sissa dom, and wild per for siis sacrifices has nothing cloc to do God is thio be [43771 Mahabharat (४३७८) ग्नो ब्रह्मणा चुतम् । ब्रह्मैव तेन गतब्य ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ । दैवमेवापरे यज्ञ योगिन पर्युपासते । ब्रह्मामायपरे यन यानयोपजुह्नति ॥ २५ ॥ श्रेजादी नौन्द्रियाण्य ये ससम्मनिषु जुन्यात । श दादीन विषयानन्ये इन्द्रियाग्निपु जुवति ॥ २६ ॥ ागान्द्रिय कर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । गात्मसयमयोगाग्नौ जुवात ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥ द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथा परे । स्वाध्यायनानयज्ञाश्च याय साशतप्रता ॥ २८ ॥ अपने जुहवति प्राण प्राणे पान तथा परे । प्राता पानगती हत्या प्राणायामपर यणा ॥ २९ ॥ अपरे नियताहारा. प्राणान् माणेषु ब्रह्मरूपही है और अर्पणके हव्य घृतादिक भी ब्रहा है जो होम कियागया है वह ब्रम मेही है जो अग्नि मे होमा है वह ब्रह्म में है होम करनेवाला और करानेवाला दोनों ब्रह्महै जो यजमानने हवन किया वह ब्रह्मनही कियाहै, जो ब्रह्म कर्य रूप समाधिकद्वारा उप्त कर्मका फल मिलनेवालाहै वह भी नही है । २४ । कोई योगी देव यज्ञकी उपासना करतेहै कोई जीव यज्ञ को निरुपाधि रूप के द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि मे हवन करते है यह उत्तम ज्ञान यज्ञहै कोई योगी श्रोत्रादि इन्द्रियों को संयम रूप अग्नियों मे हवन करते हैं कोई शब्दादि विषयों को इन्द्रीरूप अग्नियों में हरन करते है ।२६। काई योगी इन्द्रियो के सवकर्मों को वा प्राणों के सब कर्मों को मन और बुद्धिकी उस संयमरूप अग्निमे जो ब्रह्मज्ञानसे प्रकाशमानहै हवन करते है ।२७। इसीमकार द्रव्य यज्ञ तपयज्ञ और योगयज्ञ है और सदेव वेदपाठन पठन में प्रीति रखना स्वाध्याय यज्ञहै ग्रोर वेदके अर्थको अच्छी रीति से समझकर ब्रह्म में तदाकार रहना यह ज्ञान है इन यज्ञों करने वाले अथवा उपाय करनेवाले तेजनंत है, । २८ । इसीमकार कोई • योगी अपान में प्राण को हवन करते है अर्थात् रेचक करते है और प्राण अपानकी गति को रोक कर माणायाम में प्रवृत्त है विषयों को साधीन करने वाले अर्थात् विषयों के आधीन न होने वाले कोई२ gift of charity, God is the offung God is in the fire of the altar, hy God is the sacuific performed and God is to be ubtainod lg lim s lo mahes Him alone the object of his wori 9 24 Some of the devout attend to the worship of the Devatas others with offering, dircct their worship unto Gud in the fire others socrifice their ears, and other organs, in the fire of cons'raint, whilst some sacrifice sound and the lile, in the fire of their organs 26 Sonie gain sacrifice thic action of all theul organs and faculties in the fire of self traint, lighted up by the spark of in pued wisdom 27 Some sacrifice wealtlı sine sicrifimo iscuticism, some sacrifico yog fice self study, and somo yitis of fired 10olve pırform sarifics of Asislom 28 Smo thicierre de p-actice pruningam, observing food restrictijns, sacrifici prin inapin e nd ap in in prin, and restraining cons some sacri.

श्रीमद्भगवद्गीता Bhigar ndgita [4379] यति । सर्वप्येते याविटो यज्ञपितरतमषा ॥ ३० ॥ यज्ञशिष्यामृतभुजो यान्ति प्रा सनातनम् । नाय लोवोस्त्यपन्नस्य फुतो य कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥ पप यषि धा यता वितता ब्रह्मणोमुखे । कर्मज्ञान् पिद्धि तान् सर्मा नेजनात्या विमोक्ष्यसे ।। ॥ ३२ ॥ श्रेयान् द्रव्यमयाचसाज जानपन पर नए । सर्व कमालिल पार्थ जाने परिसमाप्यत ॥ ३३ ॥ तहिद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेपया | उपदेष्यति ते शान ज्ञानिनस्तत्वदर्शिन ॥ ३४ ॥ यजम्नाचा न पुनए मंच यास्यास पाण्डय । येन भूतान्यशेपण द्रक्ष्यस्थात्मन्यधो गयि ॥ ३० ॥ सपि चेदामि पापे-प. सर्वेम्प योगी मन इन्द्री को मन चित्त अहंकार में क्रम पूर्वक हवन करते है तब इनकी समाघि निद्धी होती हे इन सब यज्ञोंके प्राप्त करनेवालेभी अपने यज्ञों के द्वारा पापों मे निटत्त होते हे अर्थात् इन यज्ञोका फल पापा से पृथक होना है। ३० । पचमहायज्ञ में शेष बोये अमृत नाम प्रन के भोजन करने वाले चित्त शुद्धी के द्वारा सनातन ब्रह्मलो पाते हैं, हे कोरवों में श्रेष्ठ अन यज्ञ न करनेवाले पुस्पका जायही लोक नहीं है तो परलोक कहांसे होसक्ते है। १ । इस प्रकार करके वेद के मुख से फैलेहुए अनेक यश है उनसत्रको कर्मों से उत्पन्नछुआ जानकर तत्व ज्ञानके द्वारा तू मुक्तिको गवेगा। : । हे शनुतापी जो द्रव्य यय यज्ञ होते है उनसे ज्ञानयज्ञ वडा श्रेष्ठ है क्योंकि सबकर्म अपने फलोसमेत संपूर्णता पूर्वक ज्ञान मेंही समाप्त होजाते है । ३ । उस ब्रह्मज्ञान को जानकर भास्न जाननेवाले वा अनुभव करनेवाले ज्ञानी तेरी दण्डवत वा सेवा और पूरेप्रश्नके द्वारा उपदेश करेंगे ।३८ । हे पाण्डव उसे ब्रह्मज्ञानको जानकर फिर इसप्रकार मोहको नही पायेगा तदनन्तर उसब्रह्मज्ञान के द्वारा ब्रह्मामे लेकर तृणपन्यत जीव मात्रको अपने में both the currents ( pan and apan ) sacrifice pran in prin All these different kinds of worshippers are by their particula mides of wor ship, purified from theu sins 30 flerho crijoys but the Amrita which 18 left of llls fleungs, obtains the etern il Bramha. This world is not for lum who does not 11o-hip, and where, 0 Arjuna, is there another? 31 A greut variety of modes of worshup emanate from the mouth of God Learn that they are all the oft pring of action Being convinced of this, thu u slult o't in an eternal release 32 .The spritual isdom is fu better than the rorrhip with offer. ings of things In wisd m is to Lef und Craig work without est ception 33 Seek then this wisdom wati p ostrutuns with questions, and with attentior that those llurned men ho now its principles may instiuct thee in its rules 31 thou shalt not gun, O son of panelu fill into folly and shalt Having learnt it, [ 4380] Mahabharat (४३८०) पापरुत्तमः । सर्च ज्ञानप्लवेनैव मजिन सन्तरिष्यसि ॥ ३६॥ यथैधांसि समिद्धोग्नि भस्मसात् कुरुतेजुन । ज्ञानानि सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ॥ ३७॥ न हिनानेन सदृश पवित्रमिह विद्यते । तत् स्वय योगसासद्धः कालेनात्मनि चिन्दात | ॥ ३८ ॥ श्रद्धाघाँल्लभते ज्ञान तत्पर. सयतेन्द्रिय । ज्ञान लब्ध्वा परा शान्तिमाधि रेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥ अतश्चाश्रद्धानश्च सशयात्मा घिनश्यात । नायं लोकोक्ति न पगेन सुसं सशपात्मन ॥४०॥ योगसन्यस्तकमाणं नानसछिन्न सशपम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निवघ्नन्ति धनंजय ॥४१॥ तस्मादनान सम्भूत और फिर मुझ में देखेंगा । ३५ । जो सब पापों से भी अधिक पाप का करनेवा- लाहै तो भी ज्ञानरूपी नौका के द्वारा पापग्ध्वी सब समुद्रों को तर जायगा । ३६ । जैसे महामाल अग्मि इंधन को भस्मकरदेनी है उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मोको भस्म करडालती है ।३०। इसलोक में ज्ञानके सिवाय कोई पवित्रता वर्तमान नहीं है निप्फाम यज्ञों से पूरी शुद्धता पाकर योगी उस ज्ञानको बहुत समय में अपने में पाताहै। ३८ 1 श्रद्धापान अच्छा जितेन्द्री उस शानको पाताहै और शानको पाकर मारब्धादि कर्मों के समाप्त होने कैवल्य माक्षम्प परा शान्ती को पाता है । ३९ । अज्ञानी श्रद्धा से रहित मन में सन्देह रखने वाले नाराको पाते है चित्त में सन्देह रखने वालों को न यह लोक है न परलोक है और न सुख है । ४० । हे अर्जुन योग से कर्मफल के त्यागने वाले अथवा कर्मको ही त्यागने वाले ज्ञान संशय से रहित शम दमादि के करने वाले प्रात्मपान का कर्म बंधन नहीं करसक्ते है । ४१ । भरत belold all nature in thy self and then in me 35 Although thou trert the greatest of all offenders, thou shalt be able to cross the gulf of siu with the back of wisdom 36 As the natural fire,0 donna, reduces the void to shes, so my the fire of wisdom rc. duce all immoral actions to ashes 37 There is not any thing in this world to be compired with wisdom for purity He who is perficted by practice, in due tine finds it in lus o rn soul 38 He who his futh fird, wisdom, and, above all, he shio has got the Letter of lus passions, and liaving oltamed this spiritual wisdoin he shortly enjoys supreme rence. 30 The ignorint, and the man with out faith, wliose spirit is full of do ibt, is losto Neither thuis world. nor that aluch is above, nor leppines, min bc enjoyed by thic min of a doubting mind, The human actions have no power to conline the spiritual mind, rhich by study, has forsaken norh, and sluch, by wisdom, has cut under the bonds of doul t. 41 Il hicro- (४३८१, श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4381] हरस्थं मानासि गारमनः । छिन्वेग संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ १२ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि श्रीभगवद्गीता पनिपत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे यज्ञविभागयोगोनाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥ अर्जुन उवाच ॥ संन्यास कर्मणां कृष्ण पुनर्योगञ्चशंससि । यच्छ्रेय पतयो रेक तन्मे छि सुनिश्चितम् ॥ १॥ श्रीभगवानुवाच ॥ सन्यासः फी योगश्च निःश्रेयसकरा चुभो। तयोस्तु कर्म संन्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २॥ होपः स नित्यसंन्यासी योनष्टि न कांक्षति । निर्द्वन्द्वो हि महायाहो सुतं यन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ सारययोगी पृथग्वालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्य गुमयार्थिदते फलम् ॥ ४ ॥ बंशी इसीकारण इस प्रज्ञान से उत्पन्न हृदय में नियत अपने संशयको ज्ञानरूपी खड्ग से काटकर निष्काम कर्म योग में नियतहो ॥ ४२ ।। अध्याय ॥५॥ अर्जुन बोले कि हे श्रीकृष्णजी आप कर्मोके त्यागको कहकर फिर योगकर्म करने को कहतेहो इनदोनों में से कौनसा आपने श्रेष्ठतम निश्चय कियाहै उसको मुझे समुभाइये । १ । श्रीभगवान बोले कि कों का त्याग और कर्मों का करना यह दोनों ज्ञानकी उत्पत्ति के कारण हैं परन्तु इनदोनों में कर्म करना कर्मके त्याग से श्रेष्ठ है । २ । हे महावाहु वह सदैव नियत रहने वाला संन्यासी जानने के योग्य है जो न इच्छा करता है न अलग होताहै और विभाग वा द्वन्दों से पृथक् है वह मुख पूर्वक मायाके वंघनसे छूटताहै । ३ । अज्ञानी पुरुप व्रह्मज्ञानरूप सांख्य और कर्म के अनुष्ठानम्प योगको पृथक् २ कहते हैं पंडित नहीं कहते हैं। | क्योंकि एकमेंभी निपत दोनांके फलोंको अच्छी रीतिसे पाताहै। ४ । जो मोक्षरूप fore, O son of Bharata, resolve to cut asunder this doubt, offspring of ignorance, which has taken possession of thy mind, with the sword of wisdom, arise and practise yog. LECTURE V Renunciation of Yorks Arjuna-Thou now speakest, o iiishna, of the forsaking of works, and now again of performing them. Tell me positively which of the two is better. 1. KRISHNA—Both the repun. ciation and the practice of works are equally the means of extreme happiness; but of the two the practice of works is to be distinguished above the desertion. 2. The perpetual reclase, who neither longs nor hates, is worthy to be known. Such a one is free from duplicity, and is happily treed from the bond of action. 3. Children only, and not the learned, speak of the speculative and the pructie cal doctrines as two. They are but one, for both obtain the self- 42.

13821 Malalhamt (४३८२) पदस्य प्राप्यते धानं तद्योगापि मन्यते । एफ सारयञ्च योगञ्चयः पश्यति त यति ॥ ५॥ सन्यासम्तु महामहो दुखमाप्तुमयोगत । योगयुक्तो मुनियन चिरै| पाघि गन्छति । ६॥ योगयुतो विशुक्षात्मा चिजितामा जितेंद्रियः । सर्वनात्ममृता रमा पुर्यनाप न लिप्यते ॥७॥ नैव किंचित् करो मारी युनो मन्येत नत्पवित् । पश्यन् शृण्वन् स्मनजिप्रसनन् गच्छन् म्वपन श्वसन् ॥ ८॥ प्रलपन विसृजन्गृह्यन्नुनिमय निमिपन्नाप । इन्द्रियान्टियार्थेषु वर्तल इति धारयन ॥ ९॥ ग्रहाण्यापायकर्माणि सहं त्यस्चाकरोति यः। लिप्यते नस पापेन एमपत्र मियाम्मता ॥ १०॥ कायनमन- सा बुद्धया कयले रिन्द्रियैरपि। योगिनः फर्म न्वति सङ्गं त्यस्त्वात्मशुद्धये ॥ ११ ॥ स्थान शानियोंको प्राप्त होवाहै यह ज्ञानके द्वारा कर्म योगियोंकोभी माप्त होताहै ब्रह्मज्ञान और कर्मयोग यह दोनों एकही जो देखनाहै की अच्छी रीतिने समझा- ताहै । ५ हे अर्जुन विना कर्मयोगके संन्यास होना बड़ा कठिन और कर्म योगमें मत्त हुअा माने थोड़ेही समयमें ब्रह्मको पाता है । ६ । जो योग मे संयुक्त है ओर जिसकी चतन्य आत्मा सात साम्प्य ढोर से रहित है और जिमने मनको जीतकर इन्द्रियोंको जीताहै और सब जड़चैतन्य जीव मात्रोंका आत्मास्पद वह कोको करना हुआभी उनसे अनंग गौरनिलेप करताहै । ७ । ततश योगी देख- ता, मुनता, स्पर्श करता मूंघता साता चलता मोतावासलेता योजना त्याग करता ग्रहण करता आंखोंको सोरता चिताभी यही मानना है कि में कुछनहीं करताहूं। और जो ज्ञानी कर्मों को व्हामें धारण करके अयवा फलों को त्यागकर कोंको करता है वहभी पापोंसे संयुक्त ऐने नहीं होताहै जैसे कि कमलका पला पानीमे नहीं भीगता । १० योगी कर्मफलको त्याग कर चित्त शुद्धी के निमित्त ममनामे anc end 4. The plice nh chis g uned by the followers of the one, is guined ly the fullusers of the other That msn cys, who sees tlıut the seculalisi dori11n1c7 ind the practical nic but onc, 5. To be a Sunyasec, os recluse, without application, is difficult, nhilst the luni, who is employed in the ptactice of his duty, prently obtains Bramha, the Alrughty 0. He nho, einployer in gog, is puno mindel and has control over lily mind and prw.ens, and mand soul is the universal soul, y not tunted though he irorksi. Thcattent ise nin, nlho is acquinted with the connection of senses with their olijects, thinks that he dus nothing although licus engaged in ering, thearing, touching, Erncling, esting. ralking, sleeping, Uresth. ing, grasping, talking, orering and closing his eyes. The man who, performing the dutim of life, and quitt.ng all interest in the iv, asemins them to Brnmlin, in not tunted by sr; lat remains like the leif of the lotus umatesteel thy the waters 10 Yogisrrform tle ofiter of life with thur lalits, mind, understanding-. ardsnes (४३८३) श्रीमनगवदगीता Bhngas adgita [4383] युक्त कर्मफल त्यक्त्वा शान्तमात नैष्टिकीम् । सयुक्त कामकारेण फलेसत्तो नियध्यते ॥ १२ ॥ सर्वकर्माणि मनसा सन्नयस्यास्ते सुख चशी । जयद्वारे पुरे देही नैव कर्वन कारयन् ॥ १३॥ न कर्तृत्व न कर्माणि लोकाय सृजति प्रभ । न कांफल संयोग स्वभायात प्रयतत ॥ १४ ॥ नादत्ते फस्यचित् पाप न चैव सधारा पर, अज्ञानेनात मानतेनमुह्यन्तिजन्तय ॥१५॥ ज्ञानेनतुतदाज्ञानयपा नाशितमात्मनः। तपामा दित्ययज्ञान प्रकाशयतितत्परम् ॥ १६ ॥ तद्बुद्धयस्तदात्मानम्तानष्टास्तत् परा यणा । गच्छन्त्यपुनरावृत्ति ज्ञाननिधूतफल्मपा ॥ १७ ॥ विद्याविनयसम्पन्ने ग्रहाणे रहितमन वाणीदेह और इन्द्रियों के द्वाराभी कर्म को करते हैं । १११ योगी कर्म फलको छोड़कर शान्तीको पाता है और अयोगी चित्तकी इन्गके अनुसार,कर्मफल में मवृत्तचित्त हाकर वारंवार बंधन में पड़ता है । १२ । चित्तका जीतनेवाला देहा धीश भात्या नवद्वारवती पुरी नकरता न कराना हुआ सवकों को मनसे त्यागकर सुखपूर्वक बैठा है । १३ चैतन्यात्मा प्रभु लोक के कर्तृत्व या कर्मत्र और कर्म फलक संगको उत्पन्न नहीं करता है किन्तु जिप्तका जैसाम्वभाव है वह उसीमकार से की को करता है । १४। वह व्यापक ईश्वर किसीके पाप पुण्यको नही लेता है अज्ञान से ज्ञान ढका हुआहै इसी कारण जीव मोहको पाते है । १८ । जिन लोगो के प्रात्मा का वह अज्ञान ज्ञानके द्वारा दरहोगयाहै उनका ज्ञान सूर्य के समान प्रकाशमानहोकर परम आत्म तत्त्वको मकाशित करता है । १६ । उस परम तत में वृद्धि वा आत्माको लगानेवाले उसीम निष्ठावान और आश्रय करनेवाले योगी जिनके कि पाप मानसे | नाशहुए है वह मोक्ष का पाते है । १७ । जो ब्रमनानी पंडित है वह विद्या और and forsake the conseqences for the purification of their souls. 11. Although employed, they forsake the fruit of actions and obtain in. finite harpiness, whilst the man who is unemployed, Leing attached to the fruit by desire, remains bound 12 The man who has luis passions in subjection, and with his mind forsales all works, bis soul sits at rest in the nine guted aty (body), neither acting, por causing to act 13. The Almughty creates neither the powere nor the deeds of mankind, nor the application of the fruits to action nature prevails 14. The Almighty receipts neither thit vices 101 the yırtucs of any one Mankind are led astray by their ieasons being obscured by ignnı ince 15 But when that ignorance of their souls 19 destroyed by knowledge, their wisdom shines forth agun with the glory of the sun, and causes the Deity to appeu 16 Those wie sc understandings are in him, whose souls are in um, irhose confidence is in him, and shoso asylum is in lim, are by wisdom purified fion all their offenres and go fioms hence they shall never return 17, The learned behold him alihc in the Bialımaps, per- [4384) Nalablarat (४३८४) गवि स्तिनि । शुनि चैवश्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥ इहैव तैजि तःसर्गो येषां साम्यस्थितं मनः । नोपं हि समं ब्रह्म तामात् ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥१९॥ न प्रहप्येत् प्रिय प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसमूहो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥ वाघ स्पर्श यसकात्मा चिन्दत्यात्मानि यवसम् । स ब्रह्मयोगयुक्ता स्मासुखमक्षय्यमश्नुते ॥ २१ ॥ ये हि संस्पर्शजाभोगा दुःसयोनयपवते । आद्यरतवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुध. ॥ २२ ॥ शक्नोता है। यः सोईप्राक्शरीरांवमोक्षपात् । कामक्रोधोद्भवं पेगं स युक्तः स मुखी नरः ॥२३॥ योऽतःसुपावरारामस्तथान्तज्योतिरे नम्रता से भरेहुए ब्राह्मण गौ हाथी श्वान और चांडालमें समान ब्रह्मके देखने वाले हैं । १८ । जिनका मन सब जीवमात्रों में ब्रह्मभाव रूपी समता से नियतहै वह इसी लोकमें अपने जन्म को सफल करतेहैं, निश्चय ब्रह्म दोप से रहित सम बुदी है इस समता वुदि से वह ब्रह्मोही नियतहैं ।१९। अभीष्टको पाकरभी प्रसन्न न होय और दुखदायी को पाकर व्याकुल न होजाय ब्रह्ममें नियत वुद्धि और ध्यानके द्वारा उत्पन्न होनेवाले मोहसे रहित ब्रह्मज्ञ और ब्रह्ममें नियत होजाय ।२०। बाहर उत्पन्न होने वाले स्पर्श अर्थात् विषय में चिच न लगानेवाला पुरुप जो मुख आत्मा में पाताहै वह ब्रह्म योग में मचत्त बुद्धि अर्थात् ब्रह्म ज्ञांनी मोक्षरूपअविनाशी मुखको पाता है,। २१ । ह अर्जुन विषयों के योग से उत्पन्न होनेवाले जो भोगहें वह दुःखके उत्पारी स्थान हैं क्योंके आदि अन्त अर्थात् उत्पाते नाश रखनेवाले हैं उनमें ज्ञानी पुरुष नहीं रमनाहै। २२ । जो मनुप्य इसलोकमें देह त्याग से गथमही इच्छाते का क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहताहै वही योगीहै घार मुसी है,। २३ । जो प्रात्मामें मुख माननेवाला विपयोंसे वैराग्यशानदै अथवा आत्माही में क्रीड़ा करने fected in hnmledge, in the ne, in the elephant, in the dog, and in him who cats of the fesli of dogs. 18. Those whose minds arc fixed on this equality, gain eternity even in this world. They put their trust in Bramha, the Eternal, . becauss he is erery rhere alike, free from fault. 19. The man who knows Braunha confincs in Bramhin, ybose mind is steady and free from folly, should neither rejvice in prosperity, nor complain in adversity. 20. He whose soul is un affected by the impressions made upon the outstard feelings obtains pleasure in his own mind Such a ono, hoce soul is thus fired upon the study of Bramha, enjoys pleasure without end. 21. The enjoyments which proceed from the ferlings are as the womba ni future prin. The wise man who is aquainted with the beginning and the end of things, deliglits not in the 22. He who can lear up ag iinst the violence which is produed from lust and anger this mortnl 11. Yogi no is in .

(४३८५) श्रीमद्भगवद्गीता BHAGAVADGIT: [4385] वय । स यांगी ब्रह्मानर्वाणं ब्रह्मभूतोधिगच्छति ॥ २४ ॥ लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मापा । छिन्नदघा यतामान सर्वभूताहते रता ॥ २५ । कामक्रोधषियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । अभितो ब्रह्मानणि वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥ स्पर्शान् हत्या वहिर्वाधाश्रक्षश्चैवान्तरध्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृपा नासाम्यन्तरचारिणी ॥ २७ ॥ यतन्द्रियमनोवृद्धिर्मुनिर्मोक्षपरापणः । बिगतेच्छाभयक्रोघो य.सदामुक्त एवसः ॥ २८ ॥ भोकार यगतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूताना मात्यामां शान्तनृच्छति ॥ २९ ॥ डाति श्रीमहाभारते भीमपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि संन्यास योगोनाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५॥ वाला वीआदि.से रहिनहै ओर उसकी क्रीडा के सामानभी आत्मारूप वह जीवन्म- तयोगी देवयान पिपान संबंधी ब्रह्मको पाता है । २४ । जो पापों से और संशयोंमे रहित सब जीवों के हितकारी है वह ब्रह्मज्ञानी ऋषि ब्रहानिर्वाण को पाते है। २५ । और काम क्रोधमे रहित चिसके जीतनेवाले ब्रह्मज्ञानी संन्यासी सबद- | शामों में मोनको वरतते हैं । २६ । आत्मा से बाहर उत्पन्न होनेवाले विपयोंको बाहर करकं और नामिका के भीतर रहनेवाले माण और अपानको समान कर के अर्थात् प्राणायाम करके, जो मुनि इन्द्रीमन और बुद्धिका जीतनेवाला वा मोतको उत्तमस्थान जाननवाला इच्छामय क्रोधमे राहतहै वह सदव मुक्तहै इस प्रकार सावधान चिरशानी को क्या जानना चाहिये उप्सको कहते है-उपाधि युक्त स्वामी देवरूप से यज्ञ और तपोंके भोक्तासबलोकों के पितामह मुझपन्त-मी को जान कर अर्थात् माक्षात्कार करके मेरेभावको पाकर कैवल्य मोक्षरूप शान्तीको पाताहै।२९। within, attains Brahma-Nirran. 24 Such Rishces as are punified from their sins freed from doubt, of subdued minds, and interested in the good of all mankind, obtain the incorporeal Brahını 25. Tho incorporeal Brahmi is everywhere for such as are free from lust and anger, of,humble minds and subdued spirits, and who are acquainted with their own souls 26 Shutting out all outward con tret, with eyes fixed between lus bross, wlio mahes the breath to pass through both his nostris alihc in expiration and inspiration, ho 19 of subdued ficulties, mind and understanding, and has ect 1114 henet upon salration, and who is free from lust, fear and anger, 19 for ever blessed in thus life, and leing cuns inced that I am the cherisher of religious zell, the lord fall warlds, and the firend of all ulture, the sirll obtain me and Le blessed. 29 । [4386] Mahabharat (४३८६) श्री भगवानुवाच ॥ नाश्रित. कर्म फत कार्य कर्म करोतिय ।स सन्यासी । योगी च न निरग्निर्नचा क्रिय ॥ १ ॥ य सन्यासमिति प्राहयोगन्त शिद्धि पाण्डवान हसन्यस्तसाम्पो योगी भवति कधन ॥ २॥ आरक्षोर्मुनेयोग कम कारण मुख्य ते। योगाब्दस्य तस्यैव शम धारणमुच्यते ॥ ३॥ यदाहि नेन्द्रियापु न कमस्वनु पजते । सर्व संकल्पसन्यासी योगासहस्तदोच्यते ॥ ४॥ उद्धरेदात्मन मान नात्मान मवसादयेत् । यात्मैव ह्यात्मनोवन्धु रात्मैव रिपुरात्मन ॥५॥ वन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित । मनात्मनस्तुशत्रुत्वे वःतात्मैवरायत् ॥ ६॥ जितात्मक प्रया मयाय ॥६॥ श्रीभगवान ने कहा कि जो कर्म फलका आश्रय न करने वाला करने के योग्य कर्मको करताहै वही संन्यामी है वही योगी है ययाप वह वेट और स्मृति संबंधी अग्निको और मनवाणी देहकी क्रियाओंको त्याग करनेवाला नहीं है।" निमको कि संन्याम कहते हैं हे पांडव उमको योगमान मंकल्पको त्यागन करने वाला कोई योगी नहीं होता है। • । ज्ञान योगपर चढ़नेकी इच्छा रखनेवाले मुनिका साधन कर्म कहा है और उमझिान योगपर चढ़ेहुएका साधन काँका त्याग रूप सन्याम कहा है। । जब सब संकल्पोंका अच्छी रीनिमे त्याग करनेवाला कर्म योगी इन्द्रियोंके विषय और कौमें तदाकार नहीं होनाई तब ज्ञान योगपर चाहा कहाजाता है । ४ । आत्माके द्वारा आत्माको उद्धारकर कभी आत्माका विनाश न करे क्योंकि आत्माही प्रात्मा का वन्यु और शनुहै। । प्रात्माका बंधुमन है जिमने मन के द्वारा चितको जीना है, और जिसने चित्तको नहीं जीना उसकामन शत्रु के ममान शत्रुता में नियत होता है । ६ । शीतोष्णुता मुख दुःख LECTURE VI Of the erercisc of soul Krishna -He is both a Yogee and a Sanyases, who performs work as a duty, unde pendent of its fruit, not be who loves usth. out the sacriticial fire and without action ! Imrn, O sun of Pan / that what they call Sanyas, or a forsaking of the world, sthetime as Yoga Hu morot Lua Nigee, who, in his actions, has not olan doned all satcntions, ! Worls are said to le the fulans for a son, so rest in cillu tlc incans for him who lies attained des oiuil. 3 When the all contemplatise Sanyasce is not engaged in the objects of the , l1or II 05, then le is culled ono us ho has attaiand devotion. li should mee hunfly hits mind lie lould right sutler har svul to be deemed Sulf), the friend as well as the uncing of zelts Sulf is the trend of himn who has sulduulit, but a fu to ho na ho las not cinquind the mind o Thu wal of the pred (४३८७) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagaradgita [4287] न्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदु.सेपु तथा माना पमानयोः ॥ ७॥ बान चित्रानतृप्तामा कूटस्थो विजितौद्रियः । युक्तइत्युच्यत योगी समलोष्टाश्मांचनः ॥८॥ मुहन्मित्रायुदासीन मध्यस्थ द्वेष्य बन्धुषु । साधुश्चपिच पापेपु समबुद्धि विशिष्यते ९ योगी युजात सततमात्मानं रहास स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशार परिग्रहा: ॥१०॥ शुचौ देश प्रतिष्ठाप्य स्थिरमास नमात्मनः । नात्यच्छित नातिनीचं चैला जिन कुशोत्तरम् ॥ ११ ॥ तत्रैकाग्रं मनः कृत्या यतचित्तेन्द्रिय क्रियः । उपविश्याहने युज्या द्योगमारम विशुद्धये ॥ १२ ॥ सा काय शिरोनीचं धारयनचलं रिधरः । सम्प्रेक्ष्य ना. मानापमानमें निर्विकार चित्त महाशान्त योगी का मन बड़ी समाधिको पाता है । ७ । वह शास्त्रोपदेश से उत्पन्न बुद्धिरूपज्ञान और विज्ञानसे तृप्तचित्त मोक्ष के अधिकारसे डिगायमान न होनेवाला अर्थात् निर्विकारहोकर इन्द्रियों का जीतने वाला सब लोहा सोना पत्थर आदिको समान जाननेवाला योग सिद्ध पुरुप योगी कहा जाता है । ८ । प्रतीकार बुद्धि विना उपकार करने वाला शत्रु मित्र में सम भाव प्रिय अमिय और साधु असाधु इन सब में समान बुद्धि रखने वाला इन्द्रियों | समेत देह मनका जीननेवाला निरपेक्ष योगाभ्यासी एकान्तमें बैठा हुआ सदैव वुदीको आत्मामें लगाये । १० । पवित्र स्थान में अपना ऐसा अचल पासन.विद्याकर जो न बहुत ऊंचा न नीचा कुशाका वनाहुना अथवा कुशाके ऊपर मृगचर्म उसके अपर मूत्रवस्त्र विछाहो । ११ । चित्त की क्रिया और इन्द्रियों की क्रियाओं को विजय करनेवाला योगी उस आसन पर बैठकर मनको एकाग्र करके अन्तःकरण की अत्यन्त पावित्रता के लिये योग का अभ्यास करे । १२ । और मूलाधारसे मस्तक तक सीधा और निश्चल नियत होकर अपने नासाग्र को देखना हुआ दिशाओं को न देखताबैठे। १३ । और उस आसन पर बैठकरं ब्रह्मconqucred spirit is uniform in heat and cold, in pain and pleasure, in honor and disgrace, 7. The man nhose mind is deplete with divinc wisdom and learning, who is constant and has subdued his passions, is said to be devout To the Yoge, gold, iron, and stones, are the same. The man is distinguished who regards impartially his companions, friends, enemies strangers, veutrals, ferciguers, kins. men, saints or sinners. 9. Let tho Yogec constantly exercise selfconcentration, alone and in secret, checking the thoughts of the mind and fiee from liepe and greed. 10. In a pure place, on the firm ground, neither too high nor too low, let him prepare a seat wade of Kushin grass covered wih deer shiu and a cloth. There baring made the inind one pointed, acstraining all activities of the mind and the senses, let him prctise concentrati in for the purification of his s'ul. 12. Kcoping luis head, his neck, and body, steady sitliwat motion, his eyes fixed on the p int of his nose, lo king at no त्मन [4388 ] Mahabharat (४३८८) सिकाग्र स्व दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥ प्रशांतात्मा विगतभीग्रहाचारिव्रते स्थित । मन सयभ्य मचित्तो युक्त मार्सत मत्पर. ॥ १४ ॥ युजन्नेव सदात्मान यागोनियत मानस । शान्ति निर्वाणपरमा मत्सस्थामावगच्छति ॥ १५॥ नात्यक्षतस्तु योगास्ति न चैकातमनत्रत । न चाति स्वपशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥ युकाहार विहार स्य युक्तचष्टस्य कमस । युक्त स्वमाय घस्य यागा भवति दु खहा ॥ १७ ॥ यदा विनियत चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निस्पृह सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यत तदा ॥ १८ ।। यथा दीपो निवातस्थो नगरे सोपमा स्मृता । योगिनो यत चित्तस्य युञ्जतो योगमा । १९ ॥ यत्रोपरमते चित्त निरुद्ध योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मान पश्यन्ना मिनि तुप्यति ॥ २० ॥ सुखमात्यान्तक यत्तबुद्धिमाधमतीन्द्रियम् । वेत्ति यन न चर्य व्रत में नियत योगी संन्यासी मुझ में चित्त लगानेवाला अपने मनको स्वाधीन करके मुझको सर्वोत्तम जानने वाला होवे । १४ । वह अत्यन्त शान्त चित्त सदैव मनको जीतने वाला योगी इस रीतिसे आत्मा को परमात्मामें एकता को करता हुआ मोक्ष निष्ठावाली शान्ती जोकि मुझ में वर्तमान है उसको पाता है। १५ । हे अर्जुन बहुत भोजन करने वाले का भी योग नहीं होता और बहुत कम खाने बाले का भी नहीं होता और अत्यन्त सोने और जागने वाले का भी नहीं होता । १६ । जिसका कि आहार विहार योग्य रीति से है और कर्मों में भी चेष्टा योग्यहै सोना जागनाभी योग्यहै उसका योग दुःखो का दूर करनेवाला होताहै । १७ । जन अच्छी रीतिसे जीता हुग्रा चित्त आत्मा मेही नियत होता है और सब कामनाओ से इच्छा रहित होता है वह योगी निर्विकल्प कहाजाता है । २८ । जैसे कि दीपक निर्वात स्थान मे रखाहुआ नही हिलता है वैसेही चित्त जीतनेवाले और समाधि का अनुष्ठान करनेवाले योगीको जानो । ११ । रकाहुया एकाग्र चित्त जिप्त दशामें लय होताहे अथवा जहां चिरा से आत्माको निर्विकल्प देखताहुआ प्रात्माही में तृप्त होताहै बाहर उत्पन्न होनेगाले विपयोमे नही होता जो बड़ा ब्रह्मानन्द रूप o lier police around 13 Tliu peaceful soul, fearless, fun in the vow of Bi thucharya, he should restrain the mind, and, fixing it on ine, depend on mo alune 14' The Yogee, ever unting his mind in me, becomas mind disciplined and obtuns happiness incorporeal and supiemo in inc 15 Meditati n cannot le for lum arjun , who eats much or fasts much, lui who is addicted to eressire sleeping or Cressiic ushing 16 Jlcditation destrogs puin to hun who is inoder ate in tuting, and reciention, w liose inclinitions are moderate in nc tion, and who is moderate in sleep and wal ing 17 A man is caled luirmonised us lien his mind is fited within himself, and lic is creipt from citry lust and desire 18 1 lie I ogee of a subducd mind, thus cniployed in tlic (lereise of lus de sotion, in compared to an umlere flu, standmy in a plac without wind." 19 Tunt (3:) where in the instrumel mind finly delight, tuns whertily " श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [43891 चेघाय स्थितश्चलति तत्वत ॥ २१ ॥ य लध्या चापर ताम मन्यते नाधिक तत । यस्मिन् स्थितो न दुपन गुनणापि घिचाल्पते ॥ २२ ॥ त विद्याद्दु पसयागवियोग योगसज्ञितम् । स निश्चयन योक्तन्यो योगोनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥ सहलाप्रभवान् कामास्त्पत्या सर्वानशेपा । गनवेन्द्रियग्रान विनियम्यममन्तत शनै शहरमेद युद्धया धृातगृहोतया । आत्मसाथ गन त्या न किञ्चिदपि चि त येत् ॥ २५ ॥ यतो यतो निश्चरात मनश्चश्चलमस्धिरम् । ततस्ततो नियमौतदात्मन्येव वश नयेत् ॥ २६ ॥ प्रशा तमतस ह्यन यागिन सखमुत्तमम् । उौति शातरजस ब्रह्मभूतमफल्मपम् ॥ २७ ॥ युजन्नव सदात्मान योगा विगतकल्मप । सुसेन ब्रह्मस मुरा इद्रियों से बाहर ब्रह्म ज्ञानरूपी बुद्धि के द्वारा प्राप्त करने के योग्य है और इम सुख में नियतहै वह ब्रह्म के सिवाय दूसरी वस्तु को नहीं जानता है और तत्व से पृथक नहीं होताहे । १ । इस बडे लाभ को पाकर उससे अधिक लाभ को नहीं मानता है और इस में प्रवृत्त चित्त होकर पुरुष बडे दुःखों के कारण से भी पृथक् नही कियाजाता है । २० । उसको दुखों के संग से पृथक् करने वाला योग नाम जाने जिसका चिर वैराग्य के द्वारा दुख मुखादिका सहनेवालाहै उस से वह योग निभय ममेत अनुष्ठान करने के योग्य है । १३ । संकल्प से उत्पन्नई सब इच्छाओं का सब वासनाओं समेत त्याग करके ओर चित्त के द्वारा इन्द्रियों के समूह को चारों पार से रोककर । २४ । अथवा धृति से स्वाधीन कीहुई बुद्धिके द्वारा धीरे निमित्त करे ओर उस मनको पात्मा में नियत करके कुछ भी नि- न्तान न करे।२०। यह चचल ओर अस्थिर मन जहां जहां विपर्योमे जावे वहा वहां से रोककर उसको आत्मा के स्वाधीन करे । २६ । इस अत्यन्त शान्तचित्त रजो- गुण रहित धर्माधर्म से पृथक् ब्रह्मरूप योगी को ही उत्तम सुम्बकी माप्ती होती है mind perceiving self iests content in self, 20 that, wherein one feels infinue intelles uul suprenie bliss, wherein one (stalished, nc ono would retire from reality, 21 which having obtained, he respects no other acquisition so great as it, in which depending, he is not moved by the sevei cat pain 22 This disunion from the conjunction of pain may be called Yoga spirituıl union or devotion It is to be attained by resolution, by the man whol nows his own mind 23 Il ben le hus ab indoned every desire that arises from the wall, and subdued with his mind every inclination of the senses, (24) he may, by degrees, find rest, and having, by a steady resolu tion, fived his inind within lumself, he shou'd thind of nothing else Whercsues er the unsteady mind 101ms, lie should subdue it, bring it back, and place it unde the control of self 20 Supreme happiness attends the Iogi s hose mind is at perce, whose passions are subdued, who is Brahma like, and fiee fiom sin 27 The Yogi 23 [4390] Mahabliarat (४३९०) स्पर्शम य त सुसमश्नुते ॥ २८ ॥ सर्वभूतस्थमात्मान सर्वभूतानि चात्मनि । इक्षते योगयुक्त त्मा सर्वत्र समदर्शन. ॥ २९ ॥ योमा पश्यात सर्वत्र सर्वच मयि पश्यते। तस्याह न प्रपश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥ सर्वभूतस्थित यो मां भजत्येक स्वम स्थित । सर्वथा वर्तमानोपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥ मात्मौपम्येन सर्वत्र सम पश्यति योर्जुन । मुख वा यदि वा दु ख स योगी पामो मतः ॥ ३२ ॥ अर्जुन उवाच । योय योगस्चपा प्रक्त साम्येन मधुसूदन । पतस्याह न पश्यामि चश्चलत्वात् स्थिति स्थिराम् ॥३३॥ चश्वलहि मन कृष्ण प्रमाथि बलपदृढम् । तस्याई निग्रहमन्ये चायोरिव सदुष्करम् ॥ ३४ ॥ श्रीभगवानुवाच । असशयं महावाहो । २७ । अविद्या आदि क्लेशों से रहित योगी इस रीति से मनको स्वाधीन करता हुमा मुख पूर्वक ब्रह्मानन्द रूप अनन्त मुखको पाताहै। २८ । योग से सावधान चित्त सब जीवोमें ब्रह्मका देखनेवाला योगी सब जीवों में वर्तमान अखण्ड ब्रह्मरूप आत्माको और सब जीव मात्रों को आत्मा में देखता है । २१ । जो मुझको सब जीवमात्र में देखता है और सबको मुझने देखता है मै उससे कभी परोक्ष नहीं होताहूं और वह भी मेरा परोक्ष नहीं है । ३० । जो योगी जीव ब्रह्मकी एकता | में नियतहोकर सब जीवोमें वर्तमान मुझको निर्विकल्प समाधि के द्वारा भजता है वह योगी सरकार के व्यवहारो को कहता हुआ भी मुझ में वर्तमान है । ३३ । जो योगी आत्माकी समता के कारण सवजीवों में सुख और दुखको समान देखता है वह योगी उत्तम कहाताहै।३२। अर्जुन बोले हे मधुसूदनजी आपने जो यह समता युझ योग वर्णन किया सो मै मनकी चंचलता से उसकी बड़ी स्थिरताको नहीं देखताई । ३३ । हे श्रीकृष्णजी यह चंचल मन वडापराक्रमी और दृढ़ है उस मनका रोकना मै वायुके समान महाकठिन मानताहूं । ३४ । श्रीभगवान् बोले कि who is thus constantly vowed to soul, and free from sin, enjoys eternal happiness of contact nuth Brahma. 28 The man whose inind 16 absorbed in meditation und who looks on all things alike, sces tho supremt soal y all things in the sayewe soa! 29 He whosees ws everywhere, and sees all this in me, I forsale not hun, and he forsales not me 30 The Yogee who believes in unity and worships me present in all things, dwells in me in all respects, even whilst he lives 31 The man, 0 Arjuna, who from nhat passes in his can vrlast, wlicthei it be pain or pleasure, beholds the same in others, 19 esteemed a suprenio ogee. 32 Arjuna-From the testlessness of our natures, I concen e not the permanent duration of this doctrino of equality which thou hast told mc. 33 The mind O Krislina, is naturally unsteads, turbulent, strong, and stubborn I esteem it as difficult to iestrain as the wind 34 Krishna-The unsteady mind. ।

(४३९१) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4191] मनो दुनिग्रह चलम् । अम्पासेनतु कौन्तेय चैराग्येणचगृह्यते ॥ ३५ ॥ असंयता. स्मनायागो दुःप्रापहारिमे मतिः । पश्यात्मना तु पतताशस्योवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥ मर्जुन उवाच । अयतिः घरांपेतो योगाचालतमानसः । अप्राप्य योगसंसिाद्धका गति कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥ कच्चिनोभयविभ्रश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महावाविमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८॥ एतन्मे संशयकृष्णछेत्तुमर्हस्यशेपतः । त्यदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥ श्रीभगवानुवाच । पार्थ नेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणरूत् कशिदुर्गति तात गच्छति ॥ ४० ॥ प्राप्य' पुण्यकृतां लोकानुपित्वा शाश्वती.समाः । शुचीतांश्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोमिजायते ४१॥. हे महावाहु अर्जुन निस्सन्देह यहमन वडाचंचल है इसका स्वाधीन होना बड़ा कठिन है हे अर्जुन इस मनको अभ्यास और वैराग्य के द्वारा स्वाधीन करना योग्य है । ३५ जिसने चित्तको अच्छी रीति से न जीता उसको योगका मिलना बड़ा कठिन है यह मेरा मत है और मनको स्वाधीन करनेवाले वा उपाय करनेवाले को अभ्यास वैराग्यादिक उपार्यों से उसका प्राप्तकरना सम्भव है । ३६ । अर्जुन बोले हे श्रीकृष्णजी कर्म योग से मनको हटाकर श्रद्धायुक्त योगमार्ग में पृत्त थोड़ा उपाप करनेवाला योग सिद्धी को न पाकर मृतक होके कौनसी गतिको पाता है । ३७ । और हे महावाहु वामदेवजी वह कमयोग और ज्ञानयोग का आभय न करनेवाला अज्ञानी ब्रह्मप्राप्ती में नियत कर्मयोग ज्ञानयोग इन दोनोंसे गिराहुआ टूटेहुये वादल के समान नाशदशाको तो नहीं पाता है । ३८ । हे श्री कृष्णजी अब इन मेरे सम्पूर्ण सन्देहोंको आप दूरकारये क्योंकि आपके सिवाय इस संशयका दूर करनेवाला कोई नहीं विदितहोता । ३९ । श्रीभगवान् वोले हे अर्जुन इसलोक परलोक में उमका किसीमकार से नाशनहीं है और हे तात कोई शुभकर्मी मनुष्य दुर्गती को नहीं पाता है । ४० । योग से भ्रष्टहुये अपने पुण्य O valiant youth, is undoubtedly difficult to subdue; yet it may be restrained by practice and temperance 35. In my opinion, Yoga is hard to be attained by him who has not his mind in subjection; but it may be acquired by him who takus pains, and has his mind in his own power. 36. Arjuna--Whither, O Krishna, does the inan go after death, who, though ardent has his mind moved away from yog for want of application ? Does he who is found not standing in the path of Bramha fall between good and evil, like a broken cloud? Thou; Krishna, canst entirely clear up this my doubts; nonc except thee can remove this doubt. 39. Riishna-His destruction is neither here nor in the world above. No man who has done good goes the evil way. .40. A man fallen from Yog haring enjoyed for long . [4392 ] Mallabh urat (४३९२) अधचा योगिनामेव कुलेभवात धीमताम् । एताद्ध दुर्लभतर लोके जन्म यदीदृशम् ४२ । तत्र त चुद्धिसयोग लभते पोर्वदहिकम् । यततेचततो भ्य समिद्धौ कुरनन्दन ॥४३॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव हियते ह्यवशोपिस । जिज्ञासुपि योगम्य शब्दब्रह्मातघर्त्तते ॥४॥ प्रयनायरामानस्तु योगी सशुद्धकिाल्वप । अनेकजन्नसखिद्धस्ततो याति परागतिम् ॥४५॥ तपस्विभ्योधिको योगी मानिभ्योप मतोधिक । कर्मभ्यश्चाधिको योगी तस्मा घोगोमवाजुन ॥ ४६॥ योगिनामाप सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान भजतेयो मां स मे युक्ततमो मत ॥ ४७ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि अध्यात्मयोगोनाम पष्ठोऽध्याय ॥ ६॥ पणितुरिंशोऽन्यायः ३०॥ से उत्पन्न लोकां को पाकर बहुत वर्पनक निवास कर के धनी लोगों के यहां उत्पन्न होता है । ४१ । प्रथया वह पुरुष बुद्धिमान योगियों के घराने में |पैदाहोता है परन्तु लोक में ऐसा जन्महाना दुर्लभ है । ४२ । ह कौरवनन्दन वहां पूर्व दह सम्बन्धी उस बुद्धि संयोगको पाता है उसके पीछे वह बड़ी शुद्धी के निमित्त अनेक उपाय करता है । ४३ फिर वह पिछले अभ्यासके कारण से रीचा जाता है क्योंकि योग जाननेका इच्छापान शब्द ब्रह्मको उल्लंघन करके कर्म कर्ता होता है । ४४ । बड़े प्राणायामादि उपाय करने से पापोसे छुटाहुआ योगी बहुत (से जमों में मोक्षक योग्य होकर परम कल्याणरूप मोक्षको पाताहै,। ४५ । योगी बड़े • तपस्त्रियों से भी अधिक है क्योंकि वह शास्त्रज्ञ ज्ञानियो और कर्म करनेवालों से भी अधिक मानागया है हे अर्जुन इस कारण से तू योगीहा, । ४६ । सब कर्म योगियों में भी जा श्रद्धावान् मुझ बामुदेव में लगेहुये मनके द्वारा मुझको भगता है उसको मै वडायोगी मानताहूं ॥ ४७ ॥ years the ren ırds of lus sirtues in the regions above, at length 13 born again in some well to dy family, or perhaps in the house of como learned Yogee But such a regeneration into this sold is thic mest difficult to attain Here lo recovers the memory of huis furmer bodyard begins again to labour for perfection in der tion 13 By the former presice lie is attracted mountarıls into Yog, lic who desires to knoir it, passes beyond Shall Bianha Thic Yoges who lab suring with all luis mht, is purified of his sins, nnd, after imany irths, mnde perfect, at length goes to the suprenio abole The Yover 19 inore exalted than lapass bes, ho is sujxerior to the Kurmas and tho 1190 ( Jnants ), wherefore, O Arjunn, icsolve thou to become a Yogec. 16 of all Yogees, I resport him as the most des out, who hins faith in me, and u lio series inc with a soul promised of my spirit 17 42 (४३९३) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4293] श्री भगवानुवाच । मय्यासकगनाः पार्थ योगं युजन् मदाश्रयः। असंशयं स. मग मां यथा नास्पासि तच्छृणु ॥ १ ॥ ज्ञानन्तेऽहं नविज्ञानमिदं पक्ष्यांग्यशेषतः । यजनात्वा नेह भूयोन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥ मनुष्याणां सहस्रेषु कश्रियतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेति तरचनः ॥ ३ ॥ भूमिरारोनलो यायुः खमनो बुद्धिरेवच । अहङ्कार इतीय मे भिन्ना प्रतिरप्रया ॥ ४ ॥ अपरेयमि तस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मे पराम् । जौचभूनां महाबाहो यये धार्यते जगत् ॥ ५ ॥ एतद्योननि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कत्नस्य जगतः प्रभवः मलयस्तथा ॥६॥ मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनजय । मयि सर्वमिदं प्रोन सूत्रं मणिगणा अध्याय ॥ ७॥ श्रीभगवान घाले हे अर्जुन मुझ में मनलगानेवाला और योगसमाधिका करनेवाला मेरे आश्रित होकर मुझपूर्ण ब्रह्मको जैसे जानेगा उसको श्रवण करो । १ । मैं इसज्ञान विज्ञानको सम्पूर्णतासमेत तुझसे कहनाहूं जिसको जानकर जान ने के योग्य दूसरा कोई विज्ञान शेप नहीं रहता है। २ । हजारों मनुष्यों में कोई मोक्षरूप सिद्धियोंके लिये उपाय करता है और उनउपाय करनेवाले सिदोंमें कोईर पुरुष मुनको मूलसमेत जानना है । ३ । पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , ख, मन , बुद्धि और अहंकार यह आठ भाग मेरी प्रकृति के हैं। ४ । परन्तु यह प्रकृति अनुत्तम ( अपर ) है इससे उत्तम मेरी दूसरी प्रकृति जीवहै जिस्ले हे महा वाहु यह जगत् धारण किया जाताहै । ५ । यहमकृति सब जीवोंकी उत्पत्तिस्थान और नाशकरनेवाली है इसीसे मैं संसार की उत्पत्ति स्थान और लय होनेका स्थान हूं।६ । हे कुन्ती पुत्र मुझ से उत्तम दूसरा कोई नहीं है यह सब प्रपंच मुझंही में LEDTIRE TII ni Supreme saintly fisdəni Krishna.-~Hear, O Arjuna, hor having thy mind attached to me, engaged in devotion, and relying on me, thou nilt, without doubt, know me. 1. I will intruct thee in this wisdom and Jerrning with out reserve; koo sing which there remains pothing more to be kuown. 2. For amongst thousands of mortals strive for perfoction; and of those who strise and Lecome perfect, scarcely one knows me truly. 3. My nature is divided into eight distinctions: earth, water fire, air, nether, mind, understanding, and Ahankar, { self-consciousness). But besides this, know that I have another paturc superior to this, and by which this world is supported. 5. Learn that these two are tho norubs of all beings. Can the origin and the dissolution of the whole universe. G. There is nothing greater than !; all things [4394 ] Maliablhant इव ॥ ७ ॥ रसोहमएस कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणयः सर्ववेदेषु शब्द खे पौरुष नृषु ॥ ८ ॥ पुण्यो गन्ध पृथिव्या च तेजशास्मि विभावसी । जीवन सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९॥ धोज मां सवभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥ बल बलवतावाद कामरागवि वर्जिनम् । धर्माविरुद्धा भूतपु कामास्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥ ये चैव साचिका भा थाराजसास्तामसाश्चये । मत्त एवेति तान् विद्धि न त्यह तेगु ते मयि ॥ १२ ॥ त्रिभिर्गणमयीवरेभि सर्गमिद जगत् । मोहित नाभिजानाति मागेभ्यः पामव्ययम् ॥ १३ ॥ देवी ह्येपा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेता तरन्ति ते ॥ १४ ॥ न मा दुष्कातनो मूढा प्रपद्यन्ते नराधमा । माययापहनाना । एसे पुहा हुआ है जैसे कि सूत्रमें मणि पुही होती है । ७ । हेअर्जुन जलमें मैंही रस हूं और मूर्य चन्द्रमा दोनों में प्रकाश रूप मै हूं और सब वेदों में प्रणव मैंह आकाश में शब्द मैहूं सब पुरुषों में पुरुषार्थ मै हुँ। ८ । पृथ्वी में पवित्र | गंध मैं हूं अग्नि में तेज मैंहूं सवजीवों में जीवनरूप मैंई तपस्वियोग तप मैंहूं । ९ । हे अर्जुन मुझको सब जीवो का प्राचीन वीजरूप जान, बुद्धिमानोंमेधुदि मैं हूं तेजस्वियोमें तेज । १० । बलवानों में काम राग विवर्जित वल मै हूं है भरतर्षभ जीवोमें धर्म से अविरद्ध काम मै हूं, जो सात्विक राजस तामस भावहै उन सव कोभी मुझसेही हुआ जान वह सब मुझ मे है परन्तु मै उन में नहीं हूं । १२. । | सत्व रज तम इन तीनों गुणों की तीन रूपान्तर दशानों के भावोंसे यह सब संसार भूलाहुआ मुझको नहीं जानताहै कि मै अविनाशी रूपान्तर दशा से रहितत् । १३ । यह मेरीमाया दुःखसे उल्लंघन करने के योग्य है, जो मुझ को अच्छी रीनिसे जानते है वह पुरुष इसमायाको तरतेहै ।।४। परन्तु जो पापात्मा शात्मा अनात्मा के विवेक hang on me, as gens on & strog 1 Pm sapidity in unter, the light in the sun and inoon, prunara ( Om) in the Perlas, sound in the firmament, and virility in men 8 I am the fragrance of earth, glory in fire, in all tlungs I am life, and I au tlie austerity of the know, 0 Arjunı, that I am the eternal sced of 1]l naturc. I am the understanding of the wise, the glory of the proud, the strength of the strong, free from lust and passion, and in beings 1 am desire not contiary to dl 110 But know thnt I am not in those natures aluch are of the thrce qualities cilied Saloa, Raja and Tima, altlıough they proceed from me jet they are not in ing 12 The whole of this world Lciog Leuldured by the influence of these three-fold qualities, i nons not tizat I am above thesc and imperishable 13 flus iny divine and supernatural illusion 1 hard to be overcoiuc crccpt by those who come to me as their nfuge 11. The ruled, the foolisl, and the loss wunded, disord of rand in ascetic 9 ।

(४३९५) श्रीमद्भगवद गीता Bhagavadgita [4395] मानुर भावमाथता ।। १५ । चतुर्विधा भजन्ते मां जना समातिनाउँग । आ तो जिज्ञासुरर्थी नानी च भरतन ॥ १६ ॥ तेग नानी नित्ययुक्त पाभक्ति विशिष्यते । प्रियो हि बानिना त्वर्थ मह स च मम प्रिय ॥ १७ ॥ उदरा सर्व एवैते मानी त्यात्मैच में मतम् । आस्तित स हि युकामा मामेवानुत्तमा गातम् ॥१८॥ पाहुना जन्मनामन्ते वानवान् मा प्रपद्यते । चालुदव समिति स महात्मा सदुर्लम ।। १९ ॥ कामस्तस्ततज्ञा प्रपद्य तन्यदेवता । त त नियममास्थाय प्रत्या नियता. स्वया ॥ २० ॥ पोचाया था तन भक्त प्रजयाचितुमिच्छति । तस्य तस्थाचला श्रद्धा तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥ सतया नया युक्तस्तस्याराधन माहते । लभते य तत कामान् गयैव विहितात् हितान् ॥ २२ ॥ अन्तावात फल . से रहित मनुष्योंमें नीच मायाके कारण बामशान से शून्य आकुरी ज्ञान में आश्रित है वह मुझको न श्रेष्ठ रीतिसे जानते है न प्राप्त होते है । १० । हे भरतवंशी दुखी, नाज्ञानक आकांक्षी, धनाकांक्षी, ज्ञानाकांक्षी यह चारों भकारके शुभकर्मी पुरप मुझको भजतेहै, इनचारों में ज्ञानीउत्तमह वह सदैव मुभाय अनुराहोकर एक भत्तिसे भजन करनेवालाहै क्योंकि मै ज्ञानी का अत्यन्त प्याराहू और वह मेराप्याराहि १७ | यह सवउत्तम, परन्तुन्नानी मेरा आत्माहै क्योंकि वह मुझजगदात्मा में मन को नगानेवालाहोकर मुझ उत्तमगात रूपमेंही नियतहे।१८। वह पुरुप बहुतजन्मोंके पीछे सब संसारको वासुदेवम्प जानकर मुझको पाताहै । १९ । जो कामनाओं से ज्ञान भ्रष्टहोकर अपने स्वभानके द्वारा नियमाम यिनतहोके अन्यर देवतामो को भनते है १२०॥ यह भक्त जिस२ देवता को श्रद्धा पूर्वक पूजने है मै उन अचल श्रद्वाको नियत करताहूं।२१।फिर वह श्रद्धा भरेहुये उसका प्रारा बनकरतेहै ग्रोर उसीसेअभीष्टोंको by illusion, and men of demoniac nature donot come to me 15 ami, O Arjuna worshipped by four classes of men who are good the distressed, the inquisitive, the wishers after health, and, the wise 16. Of these the wise mmu who is constantly united and single loving is the best. I am extremely dear to the vise man, and he is dear to ine. 17 All these ale exalted, but i esteem tle wise man even as my self, because he is muy sole devoted and depends on me as lis ultimate resource The proceeds to me aftei miny tirths for the esulted one who believes that, Vosudeva is all, is hord to be found 19 Deprived of misdom by desires and impelled by nature, people worship other gods, impos img on themselves various ol.sexincies 20 Whaterer image a devotce wishes, desircus to Fo Slup in futh, that very futh in hum I endel fin 21 Posses ed with that faith, hocrer devotes himsell to that worship, obten; his 1 ashes but they are granted I 18 Fise man ॥ [4396] Mahabhu it (५३९६) तेषा तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान् देवयजो याति मनना यान्ति सामपि ॥ २३ ॥ अध्यक्त व्यक्तिमापन्न मन्यन्त मामबुद्धय । पर आवमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् | ॥ नाह प्रकाश सर्वस्य योगमायासमावृत । महोय नाभिजानाति लेका मामामध्ययम् । २५ । घेदाह समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्पाणि च भूतानि मा तु वदन कश्चन ॥ २६ ॥ इच्छाहपसरधन द्वन्द्वमाहेन भारत । राव भूतानि सम्मोह सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २८ ॥ येपा पन्तगत पप जन ना पुण्यकर्म णाम् । तेद्व दमोहनिमुत्ता भज ते मा दृढव्रता ॥ २८ ॥ जरामरणमोक्षाय मामा श्रित्य यतन्ति ये । ते महा तद्विदु कृत्वा मध्यात्म फर्म चारितम् ॥ २९ ॥ साधि पातेहै जो कि मेरेही उत्पन किये हुयेहै। उन निर्वद्धियोंका फल विनाशवान होताहे देवताओंके पूजनेवाले देवतापोको पातहै गोर मेरेभक्त मुझ अनन्तको पाते हैं । निर्बुद्धी लोग मुभ अविनाशी अनूपम अव्यक्त पुरुषको संसारी जीवो के समान देहधारी मानते है । २४ । क्या'के योग माया से ढकाहा मै सब को नही देखाई दताहूं यह अज्ञानी लोक मुझ अज अविनादी को नहीं जानता हे । २० । उपाधि रहित होनेसे मै भूत भविष्य वर्तमान इन तीनोकाल के जीवधारियों को जानताह परन्तु कोईभी मुभाको नही जानता है । २६ । हे शत्रुहन्ता अर्जुन सब जीवधारी इच्छा और अनिच्छा आदि मोह द्वन्दोंसे इस ससारके विपय प्रावक को पीते है । २७ । जिन पनित्रकर्मी पुस्पोका पापनाश हुआहै वह मोहके द्वन्दोंसे छुटे हुये ये शम दमादि ननोंमें दृहहोकर मुझको भगते है । २८ । जो मुझमें समाहित पित्त होकर जरा मृत्यु से हटनेके निमिच उपाय करते है, वह ब्रह्म अ यात्म और संपूर्ण कम्मों के शाता है । २१ । जिन पुरुषों ने अधिभूत अविदेव अधियज्ञ समेन by me But the reward of such short sighted men is finite. Those lo woi lup the Devatas bo to thuni and tho e who worship m3 alonc I hu ignorint len o un cquainted with ly supienie infinite and evalted nature Lelits the who am invisible, to exist in the visible for m 24 I am not visible lo all lecruse l nm) concual cdly yogynnyih The igno intorld don t knon that I nin not Fulbject to birth orderm 25 I Inh Arjuna, all the bein's thnt wcro aie, and will ! but there in tinc ainongst them who lnous me 201il beingsm Inth find then 1erson firinted and populaci by the sales of c ntrary at 110 111 11 011ing fioulon anllintili 27 Tlio men of regular lists, wh so sing niu d nc 1 11, Ixing free from th fascinatio 1 **1920); fruin thone contend 28 in pts ons worlup me Thet alio put their trust in mic, millil for adults crance fion de on dath now Bramhar tha uliol Ailliy itmi on! erry harmı ?J Plin dusut only who join inc ॥ ॥ य य चाप (४३९७) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagvadgita [4397] भूमाधिदेव मा साधिया ये विदु । प्रयाणकालेपि च माते विदुयुत्तचेतस ३० इति श्रीमहाभारते भीप्यपरिश्रीमद्भगवद्गीतापळसूपनिष सुब्रह्मावियाया योगशाले श्रीकृष्णार्जुन संसदे शानयागोनाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ अर्जुन उवाच । क्तिनम किमध्यात्म किड्वम पुरुषोत्तम । अधिभूतञ्च पि प्रोक्त मधिदैव किमुच्यते ॥ १ ॥ अघियज्ञ कप दोन दहस्मिन् मधुददन । प्रयाणकारच कपञ्जयोसि नियतारगामि ॥ २॥ श्रीभगवानुवाच । अक्षर ब्रह्मपरम स्थभायोध्यात्म मुध्यते । भूतभावोद्यकरो विसर्ग कर्मसहित ॥३॥ आभभूत क्षरोभाय पुरुपश्चा घिदैवतम् । अघिपक्षाहमेचान दह देठ भृताम्बर ॥ ४॥ अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्या कलेवरम् । य पाति समगाव याति नार यन सराय स्मरन् भाय त्यजत्य ते कलेवरम् । त तापति की तय सदा तद्भावभाषित ॥६॥ मुझको जाना है अर्थात् उपासनाकी हे वह मुझमें चित्त लगाने वाले पुरुप शरीर त्यागके समय में भी मुझको ही जानते मोर देखते है ॥ ३० ॥ श्रयाय ॥८॥ अर्जुनबोले हे पुरपोत्तम वह ब्रह्म साहे अयान क्या हे कर्म दयाहै और आध भत अपिंदैव और अधियज्ञ कौन कहाताहै ! १ । और किप्स रीतिमे इसशरीर में नियत हे और आपममागनविष पुरुपोंको शरीर त्यागके समय कसे जाने जाते हो । । श्रीभगवान् वोले हे अर्जुन जो परमअक्षरहै वह ब्रह्मदै और जो पदार्थ है यह अ यात्म है और जो त्यागरूपमन है वहजीवों का उत्पन्नकरने वाला कर्म नाम है।३। जो विनाशवान् कर्म है वह अधिभूतहे पुस्प अधिदेव हे हेदेहधारियोंमे अप्ठ अर्जुन इस शरीर में अपियज्ञ मैह अन्तकालमें मुझीको स्मरण करता हुमा शरीर कोत्यागकर निस्सन्देह मेरेही मावको पाता है । । हे अर्जुन जिस • भावको स्मरण करताहुमा अन्तमें शरीरको त्याग करनाहे वह सदैव उस भाव से भाषित know mc to be the Adlubliuta, the Adbidaira and the Adliyini, 1 now me ws0 in the time of their departure 30 I LCIURL VIHI Arjunt - hat is that Bramha What is Adhyatma? What is harinn O first of men ! Ilhat is Adhiblioita called? Il hat Adhi duva? 1 How and tho 15 Adhizajna in this body ! Hun art thou knost in thc_liour of depirture by men of subdued nundy? 2 Irislina- Brunlır 19 thunt uluch is supreme and indes tructible Adly atma is S vabhava a nature, I u tri nation which causes the birth of being Adhubhut 18 of pyrisha able naturc, Adli daly z is Purush and Adin yajan, O best of nien, 18 myself in this body ! At tiht time of lenth he, who haring abandoned bus mortal franio diparts thinhing onls of me without doubt untes si ane W lintever idea isu permost at the time of death, is that emn 3 [ 4398 ] Mahabharat (४३९८) तस्म व सर्वेषुभालपु गामनुस्मर दुध्यच । मर्यातमनोद्धिर्मागवैयस्यसशय ॥ ७ ॥ अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नायगामिना । परम पुरुष दिव्य पाति पार्थानु चित यन् ॥ ८॥ पविंपुर णमनुशासितारमणोरणीयासमनुस्मरेद्य । सर्वभ्य धातारमाच. त्यरूपमादित्यवर्ण तगस परस्तात् ॥ ९ ॥ प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युको योगवलेन चैत्र । भ्रुवोमध्य प्रापमावेश्य सम्यक स त पर पुरपमुपैति दिव्यम् ॥१०॥ पदक्षा चेदविदो बदन्ति विशन्ति यद्यनयो वीतरागा । यादच्छन्तो ब्रह्मचर्य चन्ति तत्ते पद सग्रहेण प्रवक्ष्य ॥ ११ ॥ स राणि सयम्य मनो हाद निरुभ्य होकर उसीभावको पाता है । ६ । इसकारण सब समय पर मुझी को स्मरण कर के तू पुद्धमे प्रल्हो मुझजगदात्मा में मन और बुद्धिका लगाने वाला अथवा लय करने वाला तू मुझीको पावेगा इसमें कुछभी सन्देह नहीहै । ७ । हेअर्जुन अभ्यास और अभ्यासजन्य योग समाधि इनदोनोंसे संपृक्त अनन्य हत्तीचित्तके द्वारा अन्त यामी परम पुस्पको पाताहे । ८ । अर्थात् सबके जानने वाले पर्गरूप जगत्के पान्तर्यामी सूक्ष्मतेभी सूक्ष्म सवकर्म फलाके दिमाग करनेवाले व्यान से प्रगम्य मूर्य के समान प्रकाशमान अर्थात् सर जगतके प्रकाशक अविद्या से रहित को स्मरण करै । ९ । शरीर त्यागने के समय मनकी दृढता पूर्वक योगवल से अथवा पामुदेव भगवानकी भक्तिमें प्रवृत्तहोके दोनों भूकटिगों में प्राणको चढ़ाकर उस हिरण्य गर्भनाम दिव्य परमपुरुपको पाताहै। १० । जिसमणव अक्षरको वेदज्ञ लोग कहते है और जिसमें वैरागी यतीलोग प्रवेशकरते है अर्थात् उसकी शरण लेतेहै और जिसको इन्छा करते हुए ब्रह्मचर्य को करते है उसपदको तुमान व्योरे समेत कहताई.सप इन्द्री स्पद्वारों को अपने स्वाधीन करके मनको हृदयमें रोक कर अपने मारा को सुपुम्ना नाड़ी के मार्ग से मरतक में धारण करके योग शास्त्र की लिखी in the mind of a mun, he goes to it G Wheruf re at all times think of me alone and fight. Ich thy mud and understanding be set on me al ne, and thou shalt, without doult, go unto me 7 Howho longs after thic Disine and Sumclue Bung, with his nund mutent upon the practice of devotion, goes to lum 8 IHe who in the Inst lu tlumls on the ancient, the Omnicient, the Rulur, inmuter than the ntom, the presenter of all, of form uninnginablo refulgent like the sun, buyond dirlness, with a stends mind fis cd in devotion by the power of yogi and with Pron will drinn in letnicen ins brows, rtrebes the Supremo Being 10 stomarily make thee acqunintel with that path u luch the learned m the Vedas, call micrfalling, whch the men of suklued minds and conquerel p7syong enter, anel u luch, desirous of knowing tlicy live the lives of Bramlachang 1 !le who, harun, clovel up th dour lax bel up lus mind in lus oun louest, and licend 1114 life all (४३९९) श्रीमद्भगवद्गीता BILAGAVADGITA [4393] । मून्याधायारमन प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ १२ ॥ योगित्येकानरं मम व्याहरनमानुस्मान । य प्रयात त्यजन् देह स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥ अनन्य चेनाः सतत यो स्माति नित्यश. । तस्याह सुलभ पार्थ नित्ययुक्तस्ययागिता ॥ २४ ॥ मामुपेत्यागर्जन्म दु सालयाशाश्चतम् । नाप्नवन्ति महात्मा ससिद्धिपग्मा गताः ।। १५ । आनहानुचनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोर्जुन ! मामुपेत्यतु कोन्तम पुन जग्मा थियते ॥ १६ ॥ सहायुमार्यन्तमहर्षद महणायदु । रानि युगलहरांतां तेऽहोराप्रधि दोजना ॥ १७ ॥ अव्यक्ता व्यक्तय सर्चा प्रभवन्त्यहरागमे । राच्या गमे प्रलीयन्त तत्रैवाव्यासबके ॥१८॥ भूतग्राम. सएवार्य भूत्वा भूत्वानलीयते । न्या गमेऽधश पाप्रभपत्यहाामे ॥१९॥ परस्तस्मातुभावोन्यो च्यतोव्यक्त त् सनातन । हुई धारणामें अच्छी रीतिमे नियत होकर, डोम इस एक अक्षर ब्रह्मको कहता और मुझको स्मरण करता हुआ देहको त्यागकर जो जाता है वह ब्रह्म लोककी मासिके द्वारा मोक्ष रूप परमगतिको पाता है। १३ । जो अनन्य बुद्धि से सदैव मेराही स्मरण और कीर्तन करता है हे अर्जुन उस योग्य प्रहार विहार और यम नियम आदि में प्रटत्त योगीको मै बड़ा मुलभहूँ । १४ । युझको पाकर दु खके प्रालय बिनाशवान् पुनर्जन्मको नहीं पाता है । ५। हे अर्जुन बहातोको लेकर सब संसारीलोक इस पृथ्वीपर फिर लौटकर आने वाले है और मुझको प्राप्तहोकर पुनर्जन्म नहीं होताहै । १६ । जिन लोगोंने सहसयुमो का ब्रह्माका एकदिन जाना है और इतनीही रात्रिभी मानी है वह दिनरात्रिके जाननेवाले गमिद हैं । दिनके होतेही सर प्रत्यक्ष पदार्थ स्वप्न दशारूप अव्यक्तसे विदित होते है और रात्रिमाने पर उसी अव्यक्त नाम में सब अत्यन्त लयहोजाते है । १८ । हे अर्जुन यही यह सृष्टि समूह वारंवार प्रकट होकर रात्रिके आने पर अविद्या और कर्म फल के स्वाधीन होकर लयहोजाता है और दिनके आने पर प्रकट होजाता है । १९ । breath in his head., firm in. yog, and silence things of the one-syllabld Om, tho Bramha, quits this inortal frumc, calling uprn me, goes to the Supreine State 13 To the yg nho thinks constantly of me with his mind undiverted by an other oł ject, I will at all times be casily found in By attaining me thoso elcsated souls, are no more born in the finite mansion of pun and sorrow. 15 Know, O Arjunr that all the regions beta ccn this and the alode of Bramha afford but a transient residence, but he shu finds me, returns not again, to mortal birth 16 They who are acquainted with day and night know that the day of Bramha 15 ! thousand Yugas, and that his night extends for a thousand more On the coming of that day, all things proccer from invisibility to visibility, so, on tho approach of night they disappear and beconie innoisible 18 Tho is repcatedly dissolved and reproduced universe, [44001 Mahabharat (४४००) घ स सर्वेषु भूतेषु नायन विनश्यति ॥ २० ॥ अव्यक्तोक्षर इत्युक्तरतमा परमा गतिम् । य प्रात्य न निवर्तन्ते तद्धाम परम मम ॥२१॥ पुरुष स पर पार्थ भक्त्यालभ्य वस्वनन्यया । यस्पातस्था ने भूतानि येन सर्वमिदतमम् ॥२२॥ यत्रकालेत्वनावृत्तिमायात्त चैधयोगिन प्रियातायान्ति त कात वक्ष्यामि भरतपम ॥२३॥ अग्निज्योतिरह शुक्ल पण्मासा उत्तरायणम् । नभ प्रयाता गच्छन्त ब्रह्म ब्रह्मचिदो जना ॥ २४ ॥धूमो रानि स्तथा कृष्ण. पण्मासा दक्षिणायनम् । तन चान्द्रमस ज्योतिर्योगप्रिाप्य निवर्तते॥५॥ शुक्लकणेगत होते जगत शाश्वतेमत । एकया यापनावृत्तिमन्ययावर्त्तते पुन ॥ २६ ॥ नेते रसृती पार्थ जानन येगी मुह्यति कञ्चन । तम्मात् सर्वेषु काला योगयुको भया उस अव्यक्त से अन्य सतावान् अरूप उपाधि रहित नित्य एकरूप जो सा संसार के नाशहोने पर नाशनही होताहै वहगुप्त अविनाशी कहाजाताहै जिसको कि पाकर फिर नही लौटकर आतेहै वही मेरी ब्रह्मज्योति । २१ । हे अर्जुन अनन्य भक्तीसे जो पानेके योग्यह वह शुद्ध ब्रह्माहै जिसगे सब जीवमात्र ऐसे नियत है जैसे बीज में क्षनियतहोताहै ओर जो जजन में व्याप्तहै।२२। हे भरतर्षभ कर्मयोगी जिप्ससमय शरीरको त्याग कर चले हुये अनाहीत और आत्तिको पातेहै उस समयको वर्णन करताहूं । २३ । अग्नि, ज्योत और दिन शुक्लपक्ष और उत्तरायण इन के उदय मताप में ब्रह्मकी उपासना करनेवाले पुरुष शरीरको त्यागकर ब्रह्मलोक को पाते है। २४ । धूमरााने कृष्णपक्ष छः महीने दक्षिणायन इनचारों के उदय में योगी चान्द्रमसि ज्योति को पाकर फिर लौट जाता है । २५ । संसारकी यह शुक्ल और कृष्ण नामगति प्राचीन मानी गई है एकसे तो अनाति अर्थात् लौटकर न आना मोर दूसरी से आहाते अर्थात् लौट आता है । २६ । हे अर्जुन इन दोनों at the approach of mightand day, 'y Divine order 19 That which upon the dissolution of all things else, is not destuoj ed, is superio! and of another nature from that visibility, it is invisible and cternal 20 That invisible and incorruç tıble is called the Supreme Abode, they who reach as never more retra to earth, that is MY MAASIH D That Surieine Being 19 to be obtained by him who worships Hinn alone in whom all beings livo and who pervades al 22 now speal to thee of thint time in which depar ting the yogis return and that when they donot. 23 Those holy men who know Brambia, defiling in fire, light, duy time, the brignt fortnight, the six inon this of the sun's northern course, go to him, but those who depart in smoke night, the dush fortnight and the six months of the southern pith of the sun, ascend for a wlule into the regions of the moon and again return to mortal birth 25. Light and darhness are the world's crerlasting piths, by the ono le gies who returns not, by the other He who returns again A logee, slo is acquamted with these 21 will 26 २०178 (४४०१) श्रीमद्भगवद्गीता BHAGAVADGITA {4401] जुन ॥ २७ ॥ वेदेषु यतेषु तपातु चैव दानेषु यत् पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येतितत् समिदं विदित्या योगी पर स्थानमुपैति चाधम् ॥ २८ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे अटमोऽध्यायः ॥ ८॥ पर्वाणतुद्वात्रिंशोऽध्यायः ॥३२॥ श्री भगवानुवाच ॥ इदन्तुते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञान विज्ञानसाहित पजज्ञात्वा मोक्ष्यसेगुमात् ॥ १ ॥ राजविद्याराजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षाच गर्म घय सुसुखकर्तुगव्ययम् ॥ २ ॥ अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । अमाप्य मां निवर्तन्ते मृत्युससारवार्मनि ॥ ३ ॥ मपा ततमिदं सर्वे जगव्यकमूर्चिना । मागों को जानता हुआ कोई ज्ञान योगी नहीं भूलताहै इस कारण हे अर्जुन सदैव योग में महत्तहो ।२७। वेदोंमें यज्ञोंमें दानों में शास्त्रानुसार जो पुण्य फल कहागपाहै उस सब पुण्यफलको योगी उल्लंघन करके इस विषयका ज्ञाताहोकर ब्रह्मलोकको जाकर स्वयं सिद श्रेष्ठस्थानको पाता है ।। २८॥ अध्याय ॥९॥ श्रीभगवान् बोले कि मैं इस अत्यन्त गुप्त रखने के योग्य ज्ञान को अपने विज्ञानके द्वारा तुझ अनसूया रहित से वर्णन करता हूं जिसके जानने से तू इस अशुभ संसारसे मुक्त होगा ! यह विद्याओंका और गुप्त देवताओं का राजा महा उत्तम पवित्र कर्ता अपरोक्ष ब्रह्मका प्राप्त करनेवाला धर्म में हितकारी अनुष्ठान करने में मुखरूप और अविनाशी है । २ । हे शत्रुओं के संतप्त करने वाले अर्जुन । इस ज्ञानधर्म के श्रद्धा न रखनेवाले पुरुप मुझको अमाप्त होकर जन्म मृत्युरूपी संसार मार्ग में घूमाकरतेहै । मुझवुदि से परे सच्चिदानन्दरूप सगुण रूपधारी से two paths of action, will never be deluded; wherefore, 0 Arjuna, bc thou at all times employed in devotion. 27. The fruit of virtue pointed out in the Vedas to sacrifice, to mortifications and also to charity, the Yogee who knows this, shall surpass all, and shall ob. tain a supreme and prior place. 28. LECTURE IX of the chief of secrets and Prince of sciences: Kiishng.-I will tell thee, who findest no fault, a most mysterious secrets accompanied by profound learning, which baring stu. dieå thou shalt be delivered from inisfortune. 1. It is a soverigo art, a sovcrign mystery, sublime and immaculate; clear to the sight, virtuous, inexaustible, and easy to be performed. 2. Those who are infidels to this faith, not finding me, return again into the mortal world This ulile world is pervaded by me in my 3.

[4402 Mihabharat (४४०२) मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेप्यवस्थित । ४ ॥ न च मत्स्थानि भूतानि पश्यमे योगमेश्वरम् । भूतभृन्नव भूतस्थो मात्माभूतभावन. ॥५॥ यथापाशस्थितोनिग्य । वायु सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय । ६ ॥ सर्व भूतानि कोन्तेय प्राति यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि करपादी विरजा म्यहम् ॥ ७॥ प्रति स्वामयष्टम्य चिसृजामि पुनः पुन । भूतग्राममिम हम भवश प्रशात् ॥ ८ ॥ न च मा तानि फर्माणि निबध्नन्ति धनजय । उदासी नवदासीनमसक्त तेषु कर्मसु ॥९॥ मयायक्षेण प्रकृति सूयते सचराचरम् । हेतुमा नेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्त्तते ॥ १० ॥ अवजानन्ति मां मूढा मानुषी तनुम धितम् । भिन्न परमात्मा से यह सर जगत् व्याप्तहै मुझ परमात्मा में यहसव स्थावर जंगम जीव नियत है परन्तु मै उनमें नियत नहींहूं । ४ । जीवमुझ एकाकी में नियत नहीं है जीवोंके साथमेरे योगको अथवा ईश्वरता संवन्ध रखनेपाले को देख कि मेरा परमानन्द रूप प्रात्मा अपने आनन्द से जीवों की सद्धि करने वाला और धारण करनेवाला है परन्तु आप उनजीवों में नियत नहीं है । ५ । महान् वायु सर्वत्र वर्त- मान होकर आकाश में सदैव नियतहै इसी प्रकार चैतन्यरूप सवमाणी मुझमें गि. यतहै ऐसा तृ समझ । ६ । कल्पके अन्तमें सत्र जड़ चैतन्य शरीर मुझ मायोपहित । ईश्वर की प्रकृति में प्रवेश करतेहै मैं कल्प के मारंभ में फिर उनको अनेकमकारक रूपों से उत्पन्न करताहूं 19 अपनी प्रकृति के आश्रय में होकर मै इस सम्पूर्ण देह समूहों को पारम्बार नानाप्रकारका बनाकर उत्पन्न करताहूं यह देह समूह स्वभार के आधीन होनेसे अपश है । ८1 हे अर्जुन यह कर्म मुझ को बंधनमें नही डाल सक्त हैं ।। हे अर्जुन मुझम-यक्ष रूप के कारण से प्रक्रति सजड़ चैतन्यों समेत जगत्को उत्पन्न करती है इसीकारण से जगत् जन्माद टशामोंमें भ्रमताहै ।१०। अज्ञानीलोग मेरेउधम तत्व पदार्थको न जानकर मुझ मनुप्य देहमें नियतहोनेवालेका invisible form. All things are dependent on ine,but I am not dopendent on them.1 Behold My creatiso spirit 19 thc herpur of all things vot the dependent. 5 Understand thint all things rest in me, as the mighty or suspended in $p200 pas. ses every where. At the end ofa Kalpn all things, O son of Kun. tec, roturn into my primordial source and at the leginning of an other Kalpa, I create them all again | Resorting to my nature, I crente, ngain and again, tlus nesembinge of leings from the power of natur without poiler Th a sorhs confino rict auc, leknusu I am liho onclio rith nloof unir tuicatul in th10- works 9 By my Fuprillion untun praluat both the instable and the m. move all. It is fron tins O Arjuna, that unisere rivols 4. Thic folioli, lxin; unapointer mith my sapreine nature, as loril iny disine connection S 10 (४४०३) श्रीमद्भगवदगीता Bhagavadgitr [4403] पर भायमजानन्तो मम भृतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥ मोघाशा मोघनर्माणो मोघज्ञाना विचतम । राक्षसीमापुरीञ्चव प्रकृति मोहिनी श्रिता ॥ १३ ॥ महामानस्तुमा पार्थ दैवी प्रकृतिमास्थिता । मज त्यनन्यमनसा वालवा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥ सतत कीर्तयतोमा यत तश्च घनता । नमस्यन्तश्चमामा या मित्ययुक्ता उपासते१०॥ झानयन चाप्यन्य यजन्तोनामुगासने । एकत्वेन पृथक्त्तन बहुधा विश्वतोमुखम् १५ मह कतुरह यन स्वधारमहमौषधम् । मत्राहमहमवाय महमग्निरह प्रतम् ॥ १६ ॥ पिताहमस्यजगतो माताधाता पितामह । वेध पवित्र मोकार मृरसाम यजुरेषच १७॥ गतिभती प्रनु साक्षी निवास शरण महत् । प्रभव प्रल्थ स्थान निधान चौजमध्य अपमान करते हैं और मे जीवधारियोंका महेश्वरहू ११ मरा अपमान करने से वह अज्ञानी निरर्थक आशा और निष्फन ज्ञानी विवेकसे रहित राक्षसी आसुरी चित्त अर्याच रजोगुण तमोगुण प्रधान स्वभावों में आश्रय लेनेवाले है । १० । परन्तु जो | वडे उदारचित्त देव स्वभाव सतोगुण में प्राथय लगानेवाले है यह पुरुप मुझको | सत्र ममार का आदि अविनाशी जानकर एकान चिपस मेरा भजन करने है १३ । वह शान्ताचा दृढनत जितन्द्री शम दम आदि में उपाय करनेवाले सदैव. मुझी में बुद्धिसे तटाकार होकर मेरा कीर्तन करनेवाले नमस्कार पूर्वक बडी भक्ति स मेरी उपासना करते है । १४ । और कोई २ निर्विकल्प समाधिरूप ज्ञान यन्न करने से भी मुझको पूजतेहुए उपासना करते है कोई मुझको एकही जानकर और काई मुझको अनेक रूपवाला मानकर उपासना करतेहै । १५ । क्रतुहू पैही यज्ञह मेही सपाम्प पितरोंका अन्नह मैही औपधीह और जिमके द्वारा दानादिक दियेनाते है वह मन्नभी मैही हमेही हव्य मेही अग्नि मही हवनकरनेकी क्रियाह.१६॥ मही जगत्का पिता माता धाता पितामह ज्ञेय और पविन करन पाला तप इत्याद ह मैंही कार और चारों वेदहू । १७ । मैहीं गतिल, मैही कर्म फल का देनेवाला, of all things, despise me in this human fcrm 11 Having evil, diabolic and deceitful nature they are of vain hopes of vain endoas ours of sain wisdom and sold of terson But men of grent inmds trusting to divne natures discover that I am before all things and incorruptible and serve me with unwavering mind 13 Men of firm resolve coinc before me h unbly boning donn, Glorifying my nume they are constantly einployed in my service 14 Others worship me with the worship of wisdom and meditate op me as One and manifold in paljons shapes sacrifice, the worslup, the spices the invocation, the swadha the lutter, the fire and the victim 3G I am the father and the mother of this world the grandsire, and preserver I am the holy one northy to le known, the mystic Om, tlic Ril the Sama and Yajur Velus I7 I am the path, the comforter, the creator the 12 15 1 am the - [4404 ] Mahabharat (४४०४) यम् ॥ १८ ॥ तपाम्यहमह वपैविगृहणाम्युत्सृजामिच । अमृतश्चैव मृत्युश्च सदसवाह मर्जुन ॥ १९ ॥ त्रैविद्या मा सोमपा पूतपापा यज्ञे रिष्ट्या स्वर्गतिं प्रार्धयन्ते । ते पुण्य मासाद्य सुरेन्द्रलोक ममति दिव्यान दिवि देव भोगात् ॥ २० ॥ ते त भुक्त्वा स्वर्गलो फ विशाल क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोक विशन्त । एव प्रयोधर्ममनु-पन्ना गतागत कामका मालभन्ते ॥ २१ ॥ अनन्याश्चिन्तयन्तो मा ये जना. पर्युपासते। । तेषा नित्याभियुक्ताना योगक्षेम वहाम्यहम् ॥ २२ ॥ येप्यन्य देवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता । तेपिमामे व फौन्तेय यजन्त्य विधि पूर्वकम् ॥ २३ ॥ चाह हि सर्व यज्ञाना भोक्ताच प्रभुरेचच । पोपण करनेवाला , अन्तर्यामी साक्षी, निवासस्थानरूप प्रभु यजमान आदि रक्षक मतीकार रहित परोपकारी कर्म फल अर्पण करनेका स्थान ससार का वीन रूप आविनाशीहूं । १८ । मैदी रूप होकर संसारका तपाताहूं और अपनी किरणों से चर्पाको ग्रहणकरताहू और वर्षाऋतुमें अपनी किरणों সম্পৰমানা हु , हे अर्जुन मैही जीवन मररा और साधु असाधु हूं। १९ । मृग् यजु सामवेद रुपीशवाले यज्ञों में सोमपान करनेवाले निप्पाप पुरुप यज्ञों से मेरा पूजन करतए स्वर्गगतिको चाहते है वह पवित्रात्मा इन्द्रलोकमें जाकर स्वर्ग में दवताओं के दिव्य भोगोंको भोगते है । २० । उस बड़ेभारी स्वर्ग के भोगोंको भोगकर कर्म फल समाप्त होजाने पर वह फिर इसी मर्त्यलोक में आते है इस प्रकारसे वेदोक्त सफल कमों के द्वारा विषयों के चाहनेवाले पुरुप आवागमनको पाते है । ११ । जो पुरुप इस राति से चितवन करते है कि मैही भगवान वासुदेव उपा- सना के योग्यह दूसरा नहीं है ऐसी एकवताके द्वारा मेरी उपासना करते हैं उन सदैव, योगकी उपासना करने वाले भक्तों के स्थान भोजनान्छादन की मै आप रक्षा करताह । २२ । और जो अन्य देवताओं के भक्त है और उनका पूजन करते है हे अर्जुन वह पुरुष भी बुद्धि के विपरीत मुझीको पूजते है । २३ । क्योंकि witness the abode, the asylum and the friend I am the ocat, of generation and dissolution repisit and the inexhaustible seed. 18 are heat, I rend and hold back run, I 20 death and immortality, I am entity end nonentity The followers of the three Vodw, who drinh Soma; being purified of their sins address me in sacri. ficos, nnd petition for leiren. Thase obtain the regions of Indra and first upon calestial ford and divine enjoyments. 20 When they home partaken of that spicious heaven, they sinh agam, celinus ad in this mortal lif Thus those follon ers of the thice Vedas, pursuers of desire, obtain a transient retard 21. To those who tluhing of no other, surve me, alone and are desirous of cternal union with me, I secure permanent union They also sho reril other Gols with a firm Iclief, in on inf mal manner, or slup in 23 I am the partaker of all szerifices and the sole I orch 19 merit 22 (४४०५) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4465 नतु मामभि जानन्ति तत्वेनातश्च्यन्तिते ॥ २४॥ यांति देवव्रता देवान् पितृनयांति पितृप्रताः । भूनानि यांति भूज्यायांतिमद्या जिगोपि माम् ॥ २५ ॥ पत्रं पुष्पं फलं तोपं यमे भक्त्याप्रयच्छति । तदह भक्त्युपहत गन्न मि प्रयतात्मनः ॥२६॥ यत् करोपि यद शासि यन्तुदोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् फुरुच मदर्गणम् ॥ २७ ।। शुभाशुभ फल रेवं मोक्ष्य से फम बन्धनः । सन्यासयोगयुक्तामा विमुक्तो मामु पैष्य सि ॥ २८ ॥ समोहं सर्वभूतेषु नमे द्वण्योस्ति न प्रियः। ये भजन्तितु मां भक्त्या मपि ते वेपु चाप्यहम् ॥ २९ ॥ अपि चेत् सदुराचारी भजते मामनन्यभार । साधुरेव स मही सब देवताओं के रूप से सब यज्ञों का भोक्ता फल का देनेवाला प्रमुहूं परन्तु मुझको मुख्यता के साथ अच्छी रीति से नहीं जानते हैं इस हेतुसे वह फिर गिरते हैं। २४ । देवताओं के उपासक देवताओं को और पितरों के उपासक पितरों को पाते हैं और भूतों के उपासक भूतों को प्राप्त होते हैं और एक अविनाशी के पूजनेवाले मुझीको पाते हैं । २५ । जो भक्तिपूर्वक पत्र फूल फल और जलभी मुझको देता है उस शुद्ध अन्तःकरण के दिये हुए को मैं ग्रहण करता५ । २६ । इस कारण जो कुछ काम करे उसको मेरे अर्पण कर जो कुछ खाता है या हवन करता है वा दान करता है वा तप करता है हे अर्जुन उसको मेरेही अर्पण करे । २७ । इस प्रकार से शुभाशुभ कर्म फलों के बंधनों से छूटेगा उसकर्म फल के त्यागरूप संन्यास योगसे सावधान चित्त कर्म बंधनों से अत्यन्त छटा हुआ वह पुरुप मुझपरमात्माको पावेगा । २८ । मैं सवजीवों में वरायर हूं न मेरा कोई मित्र है न शत्रुहै परन्तु जो भक्ती के साथ मुझको भजते हैं वह मुझीमें हैं और मैं उनमेंहूं जो अत्यन्त दुराचारी भी है और मेरे मिवाय दूसरे में मनका नहीं लगाने वाला है और मुझीको भजता है उसको साधु समझना चाहिये क्योंकि But because they know not my nature, they fall. 24. Those who worship the Devas go to the Devas, the worshippers of the Pirits go to the Pirits; the servants of the Bhutas go to the Bhutas, but my worshippers come to me. 25. I accept and enjoy the offerings of the humble soul, who in his devotion presents leares, flowers, fruit, water to me. 26. Whatever thon duest, O Arjuna; whatever thou eatest, whatever thou sacrificest, whatever thou givest, whatever thou doest of tapas, do it as an offering to me. 27. Ilou sholt thus be free from good and evil fruits and the bonds of works Tiy mind being joined in the practice of a Sanyasce, thou shalt come unto me. 28. I am the same to all beings: there is none hate. ful to me nor dear. They who serve me with adoration, I am in them, and they in me. 29. If one whose rays are ever so evil, serves me alone, he is esteemed as virtuous; for he is going on the । { 4406 ] Misliabharat (४४०६) मन्तव्यः सम्यगव्यवसितो हिस ॥३०॥ भिनं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्ति निगच्छ ति । कौन्तेय प्रतिजानीहि नमे भक्त. प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ मांहि पार्थ व्यपाश्रित्य थेपि स्य पापयोनय । लियो वैश्यास्तथाशूद्रास्तेपि यांत परांगतिम् ॥ ३२ ॥ किं पुनीश- या पुण्या भक्ता राजर्पयस्तथा । अनित्यमसुख लोक मिमप्राप्यमजस्थमाम ॥ ३३ ॥ | मन्मना भप मङ्गतो माजी नारझरु। मामे चप्पसि युकाचैव मात्मानं मस्परायणः इति श्रीमहाभारते भीमपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीता सू०राज विद्याराज गुह्ययोगोनाम नवयोऽध्यायः ॥२॥ पर्वणितुत्रयस्त्रिशोऽध्याय : ३३ ॥ श्री भगवानुवाच ॥ भूयएच महाबाहो शृण मे परम वचः । यत्तेहं प्रीयमाणाय प. क्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥ नम विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। अहमादिहि देघा वह दृढ़ निश्चय करने वाला है। ३० । वह पुरुप शीघही धर्मात्मा होता है और | सदैव मोक्ष रूपगति को पाता है हे अर्जुन तू मेरी अाज्ञासे प्रणा कर के इस वातको दृढमानले कि मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता । ३१। हे तात यह वात प्रकट है कि जो स्त्री वैश्य शूद्र भी पापात्मा होयं वह भी मेरी शरण को लेकर मोक्ष रूप परमगतिको पाते हैं ।३२। तो क्या पवित्र ब्राह्मण और राजर्पिलोग मेरेभक्त होकर मोक्षम्प परम गतिको नहीं पायेंगे हे अर्जन इसनाशवान् सुखसे रहित लोकको पा. । कर तू मुझ को भन । ३३ । अर्थात् मुझी में मनको लगानेवालाहो मेरा भक्तहो और मरेही निामे न यज्ञ करनेवाला हो मुझी को नमस्कार इत्यादि रीति से योग को करके मुझी उत्पत्ति के स्थानमें भक्ति रखने वाला मुझजगदात्मा परमात्मा मेंही लय हागा ॥ ३४॥ अध्याय ।।१०।। श्रीभगवान बोले हे महावाहु तू फिर मेरे इम उत्तम वचन को सुन जो तेरे | भलाई के लिये तुझपीति मान से कहताहूं। १ । कि देवतामोंने और महर्पियो ने right way, he soon becomes of a virtuous spirt, and obtains eternal happiness. Recollect, son of Kuntı, that my devotco never perislıcs. 31. Those even who may be of the nomb of sin, women, Voisyne, or Sudias, sliall go on the supreme journey by trusting we 32. llos much more holy and devoted Bralwans, and Rnjarsluis. Consider this world as a finita and joyless place, and worslip mo. 33. In the mud on me, be my beloved, my ndurer, and bow donn before me Tuite the soul to me, make ine thy asylum and tlou sliult conie to ne. 31. J.ECTURLI Of divine naturc Krishna --fear again, o valliant youth, my supreme words whiclh, for thy good, I will speak to thed, who art beloved. I. Nei.

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(४५०७ श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [1407 ] न मीणांच सर्वश ॥२॥ यो रामजमना दिच घेति तोकमहेश्याम् । सममूड स मत्येषु सर्वपापै प्रमुच्यते ॥ ३॥ बुद्वितांन ममम्मोह क्षमा सस्य दम सग । सुन दु स भयो भावो मयञ्चामय मेयच ॥४॥ अहिंसासमता तुष्टिस्तपोहान पशोऽया। भवन्ति भावा भूताना मत्त एव पृथग्विघा. ॥५॥ महर्षय सप्त पूच वागमनधारा था । मद्भायामानवाजाता येपा लोक इमा प्रजा ॥ ६॥ एता निम्त योगश्च मम यो वेत्ति तायत.। सोऽविकरुणेन योगग ज्य ते नान लशय, ॥ ७॥ मह सर्वम्य प्रभयो मत्त. सर्व प्रवर्तते । इति मायामजन्ते मां पामार समन्विता ॥८॥ मचित्तामग ताप्राणा बोधयन्त परस्परम् । कथयतश्चमां नि य तुष्यन्ति च रन्तिच ॥ ९ ॥ तपास भी मेरे ऐश्वर्य को नहीं जानाई इमकारणसे कि मैं मन देवता और महपियामे भी मथम ई जो ज्ञानी है वहमुझ अनादि रूप अनत्मा और सब लोकों के सामी को जानना है और वही मरने वालों में सब पापों मे मुक्त होताहै । . ! बुद्धि, नान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, मुख, दुःख, उत्पत्ति, मृत्यु, भय, निर्भयता, माह सा, समता, सन्तोप, तप, दान, यश अयश यह जीवधारियों के वासामान नाना मकारों के द्वारा मुझही से उत्पन्न होतेहै । ८ । सर सृष्टिमे प्रथम भृगु मरीन्यादि महर्पि और सनकादिक ऋषि वा चौदह मनु मुझ हिरण्यगर्भ रूपक मनसे टत्पन्न | हुए हैं जिनसे कि यहसर प्रना और लोक उत्पन्नहुए है । । । जो वत्तमाण मेरी विभूति और योग को मूल समेत जानते है वह निर्विकल्प योग ममाधि के द्वारा अचलहोकर निस्संदेह तदाकार होता है । ७ । मैमव संमार की उत्पत्तिका बारा हूं बुद्धि आटे के द्वारा जो कुछ कर्म होता है वह मुझसदी संबंध रखनपाला होता है ऐमा मानकर ज्ञानीलोग भक्तेि मुझको भजते है । ८ । जिनके मनमें मैही वर्त- मान हूं और जिनकी इन्द्रियां भी मुझी में मग्न है वह परस्पर में श्रुतियों और युक्तियों के द्वारा मुझको प्रकट करते है और सदैव मुझी को रटते हुए तृप्तीको that the host of Suras, nor the Maharshıs, hoow of my greatne s because I am before all the Deras and Maharshis. 2 11 hoso free from foliy, knows me unborn, beginning less and the mighty ruler of the universe, is delivered from all sins. 3 Reason, Anom ledge, non illusion, patience, truth humility, meekness, pleasure and pain, birth and death, fear and counge, harmlessness, "equanimity, austerity, charity, zeal, renown and infamy, sil distinctly come from me 5 In former days the seven Naharshis and the four Nanus were born of my mind, of them are descended all the inhabı tants of the earth. 6 He who boots this my power and my connection, as without doubt endued with an unerring 30g 7 am the creator of all things, and all things proceed from me The 1115e believe this and worship me Their thoughts and life are in me, they rejoice amongst themselves, and delight in spe sling of - 8 [4408 ] Mahabharat (४४०८) तत युक्तानां भजता प्रात पूर्वकम् । ददामि बुद्धियोग त येन मानुष पाति ते ॥ १० ॥ तेपा मेघानु कम्पार्थ महमज्ञानज तम । नाशयास्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपन भास्वतार अर्जुन उवाच ।। पर ब्रल पर धाम पवित्र परम भवाम् । पुरुष शाश्वत दिव्यमादवेध मज विभुम् ॥ १२ ॥ मास्त्वामृपय सर्वे देवर्षिा रदस्तथा । असितो देवलो व्यास स्वयव प्रयोपिम ॥ १३ ॥ सर्व मतहत मन्ये यन्मा वदसि केशव । न हि ते भगवन् व्यक्ति विदुर्दैवा न दानवा ॥ १४॥ स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थत्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश दवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥ वक्तुमर्हस्यशेपेणदि. व्याह्यात्मविभूतय । याभिर्विभूतिभिलों का निमारत्व व्याप्यतिष्टास ॥ १६ ॥ कथ विद्यामह योनिस्त्वा सदा परिचिन्तयन् । केपु केएच भाषेपु चिन्त्योसि भगयन् पाकर मुझी मे रमण करतेहै । ९ । उन सदैव उत्साह युक्त प्रीतिसे भजन करनेवाले महात्माओंको मै उस बुद्धि योग को देताहूं जिसके द्वारा वह मुझको पातेहै ।१०। उनके ऊपर दया दृष्टि करने के लिये मै अन्तःकरणवर्ती होकर प्रकाशरूप ज्ञान दीपकके द्वारा उनके अज्ञानसे उत्पन्न हुए मोहरूपी अंधकार को दूर करताहूं ॥११॥ अर्जुन वाले हे परब्रह्म परमज्योति पवित्रात्मा शरीररूप पुरियों में वर्तमान हृदया काश में प्रकट होनेवाले सब के आदिरूप व्यापक अजन्मा श्रीकृष्णजी, ऋपि देव- र्षि नारद असित देवल व्यासजी इनसव मृपियो ने तुमको उत्तम २ गुणो से संयुक्त किया और आप अपने श्रीमुख से भी वर्णन करतेहो ।१३। सो हे केशवजी आपके ऐश्वर्य को देवता और दानवों में से कोई नहीं जानता है इसवातको मै सत्यही मानता हूं । १४। हे जीवों के उत्पन्न करनेवाले ईश्वर, देवदेव जगत्पति, पुस्पोत्तम | तुम अपने को आपदी जानतेहो । १५ । हे भगवन आप अपनी उन दिव्य विश तियों को मूल समेत वर्णन कीजिये जिनसे कि आप इन लोकों को व्याप्तकरके नियत रहते हो । १६ । हे पड़ेश्वर्य के स्वामी मै अपने चर्म चक्षु से व्यान करता me. They are content and joyful 9 I gladly inspire those who are, constantly thirsty for union, with that use of reason, by which they como to me 10 In compassion I dissipate the dark ness of their ig norance with the light of wisdom 11 Arjuna -~-All the Rishis, the Devarsh19, Narndo, Asit, Deval, Vyes (etc) call thee the supreme Bramlın, the supremo abode, the most holy, the eternal Puruskan the Divine, the First Lord, the birthless, the omnipresent And thou thyself hast told me to 33 I firmly believe, O Keshava, all thou tellest Neither the Devas nor the Danavas under stand, O Lord, thy manifestation 14 Thou nlone knowest thy self, OPurushottam! Source of beings, God of gods, Lord of Leings, Ruler of the world ! 15 Thou alone art able to tell Thino osn glories by wluch thou perridest and decllest in this world. 16 How can I, thy 'votary, by constant meditation know thee? In me.

४५०९) धीमद्भगवदगीता Bhagavadgita [4409] मया ॥ १७ ॥ विस्तरेणात्मनो योग विभूति जनाईन । भूयः कषय तृतिदि शृण्यतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥ श्रीभगवानुवाच । हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या खात्मविभूतयः । प्राधान्यतः फुरश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥ अहमात्मा गुडाश सर्वभूताशयस्थितः । महमादिश्च मध्यञ्च भूनानामन्त पचच ॥२०॥ मादित्यानामहं विज्योतिर्ण रविरंशुमान् । मरीचिस्तामस्मि नक्षत्राणामहं राशी॥ २१॥ वेदानां सामवेदोस्मि देवानामस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनचारिम भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥ रुद्राणां शङ्करचास्मि वित्तशो यक्षरक्षसाम् । यस्ता पायकवासिम मेकः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥ पुरोधसाच मुख्य मां विद्धि पार्थ हुआ आपको कैसे जानें आप कौन २ से भावों में मेरे देखने के योग्य हैं । १७ । है जनार्दन आप अपने विश्वम्प योग और ध्यान के योग्य विभूनियों को फिर विस्तार युक्त वर्णन कीजिये क्योंकि इन पोक्ष साधन युक्त अमृत रूप वचनामे मेरी तृप्ति नहीं होती है । १८ । श्रीभगवान वॉलं कि हे अर्जुन बहुत श्रेष्ट है में अपनी उत्तम दिव्य विभूतियों को तुझसे कहताहूं मेरी विभूतियों के विस्तार का अन्तनहीं है । १९ । हे गुडाकेश में व्यापक आत्मा सय जीवों का प्राश्रय म्प.अंचल हूँ मैं सवका आदि मध्य अन्तहूं । २० । मैं अदिती के पुत्रों में विष्णा हूं, प्योतिरूपों में सूर्य मैं हूँ, मरुद्गणों में मसीचे मैं हूं, नक्षत्र और तारागणों में चन्द्रमा मैं हूं । २१ । मनोहर गानयुक्त वेदों में सामवेद में है, देवनाओं में इन्द्र मैंह, इन्दियों में मन मैं हूं, जीवों की बुद्धिकी दृत्ति में हूं, । २२ । ग्यारह रुद्रों में शंकर मैं हूं, यत राक्षसों में धनाविप कुरेर मैं हूं, अष्ट वनों में अग्नि में हूं, शिखर और रत्न धारी पर्वतों में सुमेरु नाम उत्तम पर्चत मैं हूं, । २३ । और हे अर्जुन पुरो- what way art thou to be found ? 17. Tell me in full, Janardan, thy connection, and thy potter; for I am never satisfed with drinking of the living water of thy words. 18. Krishna: Blessings be upon thee! I will tell thee my sovereignty, as the extent of my nature is infinite. 19.1 am seated in the bodies of all beings. I nu the beginning, the middle, and the end of ali things. 20. Of the Adityas 1 am Vishnu, of the luminous orbs, the radiant sup; I am Marichi am ongst the Jaruts and of the stars I am the moon. 21. Of the Vedas I am the Sani, and I am Vasara amongst the Devas. Amongst the faculties I am the mind, and amongst apimals I am lıfe 22. I am Shankara amongst the Rudras, and Vittesba amongst the Yakshas and the Rakshasas. I am Paraha amongst the Vasus und Meru amongst the mountains. 23. Amongst teachers hnory that I their chief Brihaspati atm [4410] Mahabharat (४४१०) वृहस्पतिम् । सेनानानामह स्कन्द सरसामस्मि सागर ॥ २४ ॥ महर्षीण भृगुरह गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञाना जपयज्ञोस्मि स्थावराणा हिमालय ॥ २५ ॥ अश्वत्थ सर्ववृक्षाणा देवर्षीणाच नारद । गन्धर्वाणां चित्ररथ सिद्धाना कप लामुगि. ॥ २६ ॥ उच्च भवसमश्वाना विद्धिमाममृतोद्यम् । ऐरावत गजेन्द्राणां नराणाञ्च नराधिपम् ॥ २७ ॥ मायुधानामह चक्रं धेनून मास्मि कामधुक प्रजन चास्मि कन्दर्प सर्पाणामरिंग घासुकि ॥ २८ ॥ अनन्तश्चारिम नागाना वरुणो यादसामहम् । पितृणामर्यमा धास्मि यम सयमतामहम् ॥ २९ ॥ प्रहदिया सिदैत्यानाकाला कलपतामहम् । मृगाणाच मृगेन्द्रोह चैनतेयश्च पााणाम् ॥३०॥ पवन, पयतामस्मि राम' शलभृतामहम् । झपाणा महाश्वास्मि सोतसामस्मिजा धसों में वृहस्पति मै हूँ, सेनापतियों मे स्कन्द मै हूं, नदी आदि जलाशय में समुद्र | मैहूं, १२४. महर्पियों में भृगु मैहू, वाणियो मे रोकार अक्षर मैहूं, यज्ञोमे जपयज्ञ मै हू, नियत स्थानों में हिमालय पर्वत मै हूँ, । २५ । सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष मैं हूं, देवर्पियोमें नारदऋपिमहूं, गन्धा चित्ररथ गन्धर्वमह , सिदो मे कपिल माने मैहू २६॥ घोड़ोमें उच्चरेश्रयामहू , गजेन्द्रोमें ऐरावतनाम हाधीमैह, मनुष्यों में राजा मैहूं, । २७ । आयुधों में यज मैहूं गौओं में कामधेनुमैह सन्ततिका उत्पनकर ने वाला कामदेवमैंह सों में वामुको सर्प मैहं । २८ । नागोमें अनन्त शेपनाग मैहूं जलजीवों में और जलके स्वामियों में वरण मै हूं, पितृगणोंमें अर्यमा पितर मैंह दंड देनेवालोमे यम मैहूं । २९ । दैत्योंमें भलाद मैहू, संरया करनेवालों में काल मैहूं. मृगो में मृगेन्द्र अर्थात् सिंहमै हू, पक्षियों में गरुड़ मेहूं ॥३०॥ पवित्र करने amongst warrios I am Shanda and amongst floods 1 pu the ocean. 21 Inm Bhrigu amon, st the Iolarshus nnd I am monosyllable (Om ) amongst words I am amongst trorships the Jaja silent ro ship) und amongst immorables Ilamalaya 25 Of all the trous I am the asavalıha, and of Devarshis I am Nirada I am Cllra ratha anongst Gandiarraz and the Mum hapıla amongst the saints 26 h now that amongst horseslam O chaisshrada the nectar born, amongst elephants I am Anar ata, and the sorereign amongst Henpons I am lapra and amongst mttle, Kamalhul pornlitic Kandarpa (the God of love), and amongst serpente am Tasul, 33 I ain Anunta amongst the Nagas, and Paris amongst the iulinlitants of the waters. I am Alyama amongst ile Putrin, and Juma among t all those who rulu..9 Duity as I nm Prahalada, and Kala (tme) amongst computations Among t Ix zsts I am the li n, and ininteja nmongst the lords 30 tlic tlo men 27 Ainongat I am the Amongst the (४४११) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4411] इनवी ॥ ३१ ॥ सणामादिरन्तश्च मध्यञ्चैवाहमर्जुन । अध्यात्माविद्या विद्यानां घादः प्रादतामहम् ॥ ३३ ॥ अक्षराणामकारास्मिद्वन्द्व सामासिकस्यच । अहमें चाक्षयः फाला धाताई विश्वतोमुरा. ॥ ३३ ॥ मृत्यु सर्वहरचाहमुद्यश्च भघि. प्यत म । कीर्तिः श्रीक च नारीणां स्मृति धा धृतिः क्षमा ॥ ३४ ॥ वृहत्साम तथा सानां गायत्री छन्दसामहम् ।मासानां मार्गशीर्थोहमृतूनां कुछमाकरः ॥३५॥ यूत छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोस्मिव्यवसायोस्मि सत्वसत्ववतामहम् ॥ ३६ ॥ वृष्णीनां घासुदेवोस्म पाण्डवानां धनमयः । मुनीनामप्यह व्यास कवी. नामशना कमिः ॥ ३७ ॥ दण्डो दमयतामस्मि नीतिरमि रजगीपनाम् । मौनाचे वालोंमें अश्वा शीघ्र गतिपालों में वायु मैंहूं, शस्त्रधारियों में राम मैं, मत्स्यादिकों में मगर मैं हूं, नदियों में गंगा मैहूं, 1391 हे अर्जुन संपूर्ण संसार का आदि मध्य अन्त गेहूं विद्याओं में अध्यात्म विद्या मेंहूं, वितंडा इत्यादि में सिद्धान्त रूप मैंहूं । ३२ । सब अक्षरों में प्रकार अक्षर मेंहूं मिले हुएशब्दों में बंद मेंहूं, मैं अविनाशी कालहूं , मैंही कर्म फलका देनेवालाहूं , मै विश्वतो मुस हूं । ३४ । मैही सबका मारनेवाला मृत्यूहूं, प्राप्त होनेवाले कल्याणों में ऐश्वर्य की महत्त्वता और कीर्ति मैंहूँ,स्वभाव मृदभापण, मेधा, धैर्यता, सन्तोप मैहूं, मामांदकी । ३४। ऋचारोंयें वृहत् नाम ऋचा मैंहूं, छन्दोमें गायत्री मैहूं, महीनोंमें मार्गशीर्ष मैंहूँ, ऋतुओंमें बसन्त ऋतु मेंहूँ । ७५ । छन करने वालों में जुवा मैंहूं, तेनास्त्रयों में तेज मैहूं, विनय मैहूं, निश्चय वा उपाय मैंहूं, सतोगुणी पुरुषों में सतोगुण मैंहूं । ३६ । यादवों में वाम- देव मैंहूं, पांडवों में अर्जुन मैहूं, मुनियों में व्यासमनि मैं, कवियों में शुक्र कवि | मह । ३७ । राजामों में दण्ड रूप मैहूं, विजयामिलापी पुरुषों में नीतिरूप मैंहूं Amongst purifiers I um Pavana, and Ramu amongst those who cariy arms Amongst fishes I am the Mahar, and amongst rivers I am Ganga. 31. Of creation I am the begining, the middle, and the Of sciences I am the Allhyatma Vidya, and of speakers I am the argument 32. Amongst letters I am the letter a, and of all compound words I am the Drandi cha I am also never-fail time; the preserver, whose luce is turned on all sides, 33 I um all.grasping death; and the origin of all to comc. Amongst femmines i ann fame, fortune, eloqiience, memory, understanding, fortitude, 'patience. 34 Amongst harmonious measures I am the Gayotree, and amongst Sams I am the Brzhat Suma. Amongst tlie months I am the month Margaslur«lın, and amongst seasons Kusumahara, (spring 35. Amougst frnuds I ain gambling: and of all tlungs glozious I am tho glory, lam victry, I am industry, and I ain the essence of all qualities, 36. Of the Irislins I am lasudeva and amongst the l'andavas, Dirananjaya I am 'yasa amongst the Munis, and Aninngst the sages lam Tshana 37 å mongst rulers ) an the rod, and - end १ . [4412] Naliablıarat (४४१२) वास्मि गुधानां लानं वानवतामहम् ॥ ३८ ॥ बच्चापि सर्वभूतानां वीजं तदहम. जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतराचरम् ॥ ३९ ॥ नान्तोस्ति मम दिव्या नांविभूतीनां परन्तप । एप तद्देशत प्रोक्तो विभृतेविस्तरो मया ॥ ४० ॥ यद्यांद्व मूतिमत्सत्वं श्रीमर्जितमेयवा । तत्तदेवावगच्छ वं ममतेजीशसम्भवम् ॥ ४१ ॥ अथवावहुनैनन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिद कृममेकांशेन स्थितोजगत् ॥४२॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतास्पान विभूतियोगोनाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ पणितुचतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ अर्जुन उवाच । मदनप्रहाय पाम गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । यत्वयोक्तं वचस्तेन माहोऽयं विगतो मम ॥ ॥ भवाप्ययौह भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । गुप्त वस्तुओं में मौनता मह, ज्ञानियों में ज्ञान मैंहूं । ३८ । हे अर्जुन जो सब जीव धारियों का तेजहै वह मैंह, अर्थात् सबमेराही विभूति हैं । ३९ । हे शत्रुहन्ता अर्जुन मेरी दिव्य विभूतिया। अन्त नहीं है यह मैने अपनी असंख्य विभूतियोंका संक्षेप तुमसे वर्णन किया, । ४० । जो जो माणी ऐश्वर्यमान लक्ष्मीवान शोभावान और पराक्रम प्रादमे भी अत्यन्त युक्त है उसउसको तुम मेरी चैतन्य शक्तिकी अग्निमे | उत्सम हुआ जानो । ४१ । हे अर्जुन इसबहुनसे ज्ञानसे तुम को क्या प्रयोजन है मैं | इस संपूर्ण जगको अपने एक अंशमे व्याप्त करके नियतहूं । ४२ । अध्याय ११॥ अर्जुनबोले कि जो आपने मेरेऊपर अनुग्रह करनेको दृष्टि से अत्यन्त गुप्ता और गुप्तही करने योग्य आत्मज्ञान को अर्थात् आत्मा अनात्मा के विवकरूप वचनको वर्णन किया उसके द्वारा यह मेराअविवेकरूपी मोह अत्यन्त दूरहोगया । १ । इसके विशेष हे कमलदललोचन मैने जीवोंकी उत्पत्ति नाश और आपका महा अविनाशी amongst those who seek to conquest I am policy. Amongst the secrets ( am silence, amongst the wise I am wisdom 58. I am, in like manner, 0 Arjuna, that which is the seed of all things; and there is nothing animate or inanimate that is without me. 3. My dirino distinctions are without end, and the many lich I have nientioned are by way of example. 40 And leatn, u arjuna, that erery being which a worthy of dis'ınction and pre eininence, is the produce of the portion of my glory 41. But slint, U Arjuna liast thon to do with this manifold i esdom? I persade this whole universe with a portion of anyself 42. LECTUREXI T'isica-rup Sandarshan Ajun-This supreme mystery of Adhyatma which, ont of Isving Lindness, thou hast disclo-ed to me, his dissipated usy delusion haro heard from thee a full account of the creation ane! 1.

(४४१३) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagiradgita [11131 वत्तः कमलपत्राक्ष महात्म्पमणि चाव्ययम् ॥ २ ॥ एवमेतद्यथात्य त्वमामानं परम श्वर 1 द्रधुमिच्छामि ते रूप मेश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥ न्यसे यदितच्छस्य मया द्रष्टमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानगव्ययम् 1४॥ श्रीभगवानुवाच ॥ पश्यमेपार्थ रूपाणि शनशोध सहनश ! मानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनिच ॥ ५॥ पश्यादित्यान् बघून् रुद्रानश्चिनौ मरुतस्तपा । यहन्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्च याण भारत ॥ ६ ॥ इहकस्थं जगत् कृत्स्नं पश्याच सचराचरम् । ममदे गुहाकेश पञ्चान्यत् द्रष्टामच्छास ॥७॥ न तु मां शम्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुपा। दिव्यं ददामिते चक्षु-पक्ष्य योगमैश्वरम् ॥८॥ सञ्जय उवाच । पचमुक्या तनोराजन महा योगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपाध्वरम् ॥ ९॥ अनेकय क्रनयन महात्म्य भी आपक मुखारविन्दसे सुना।राहे ईश्वर जैसा आपने अपनेको कहा आप यथार्थ में वैसेही हैं परन्तु हे भगवन आप के विराट् रूप देखनेकी मुझको बड़ी अभिलापा।३।हेमभु योगेश्वर जो आप ऐसा समझे हो कि उस रूपको में देखने योग्यहं तो आप उस अपने अविनाशी आत्माको मुझे दिखलाइये । ४ । श्रीभगवान् वाले हे अर्जुन मेरे सैकड़ों हजारों दिव्यरूप जो नानाप्रकारोंसे अनेकरंग रूप के हैं उनको देखा।हेभरतवंशी उसीस्वरूपमें सूर्य वसु रुद्र दोनोंअस्विनीकुमार वायु इसी प्रकारकी अन्य बहुतसी अद्भुत बातोंको जोतूने प्रथमकभी नहीं देखी हैं उसकोभी देख, हे गुडाकेश अवयहां मेरे शरीरके एकअंशमें वर्तमान सव स्थावर जंगमसहिन जगतको और जो २ भूत भविष्य स्यूल मूक्ष्म देखनाचाहताहै उनको भी देख ।७। परन्तु तू इन नेत्रोंसे मेरे देखने कोसमर्थनहीं है तुझे दिव्यनेत्र देताहूं इन नेत्रों से ईश्वरता संबंधी मेरे योगको देख । ८। संजय बोले कि हे राजा •धृतराष्ट्र बड़े योगेश्वर हरिने इस प्रकारसे मन करनेवाले अर्जुनको अपने ऐश्वर्य संबंधी उन दिच्य उत्तम रूपोंको दिखाया । ९ । जो अनेक मुख नेत्र और अद्भुत दर्शन destruction of all things, and also of thy eternal greatness 2. thou hast described thyself, Parmeshwara ! I wish to see thy omnipotent form. 3. If, Prabhu ! thou thinkest it may be seen hy me, shos thyself to me, Yogeshwara. 4. Krishna.-Behold, O Arjuna, my million forms divine, of various species, shapes and colours. 5. Behold the Adityas, and the Vasus, the Rudras, the Aswins and dlaruts. Bebold many wonders never seen before. 6. Behold, in this my body, the whole world animate and inanimate, and all things else thou hast a mind to see. 7. But as thou art unable to see me with these thy eyes, I give thee a heavenly eye; See my sorereign yog. 8. Sanjaya-The great Lord of yog, Hari, having, O Rajan, thus spoken, showed to Arjuna his supreme surereigo form of many a mouth and eye, many a wondrous sight; many a hearenly ornament; As Mai abharat - [4414] (४४१४) भनेक गुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोधतायुधम् ॥ १० ॥ दिव्यमा. ल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलंपनम् । सर्वाश्चर्य्यमयं देवमनन्त विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥ दिवि सूटयंसहन्नस्य भवेयुगपदुस्थिता । यदि भा' सदृशी सा स्याद् भासस्तस्यम- हात्मनः ॥ १२ ॥ तत्रैक जगत् कृतस्नं प्रावभक्तमनेकधा । अपश्यद्देव देवस्य शरीरे पाण्डवलदा ॥ १३ ॥ तत स चिम्मयाविष्टो दृष्टगोमा धनजयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृतांजलिरभापत ॥ १४ ॥ अर्जुन उवाच । पश्यो मे देवांस्तव देव देहे मस्तिथास्तविशेषसंघान् । ब्रह्माणमशि कमला पनस्थमृपश्चि खर्चानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥ अनेकवारदरबननेः पश्यामि त्वांसर्वतोनन्तरूपम् । गान्तं न मध्यन पुनस्तादि पश्यामिव विश्वेश्वर विश्वरूपम् ॥ १६ ॥ किरीटिनं गदिनच ममेत बहनसे दिव्यभरण वस्त्र और उसम शस्त्रों से अलंकृत मुगन्धित पुष्पमालाओं से शोभित सय भोरको हजारों मूर्य के समान देदीप्यमान थे । १२ । तद नन्तर अर्जुनने उस देवदेव वासुदेव श्रीकृष्णजी के उस शरीरके भीतर एक अंशमें नियत नानाप्रकारके रूपों समेत संपूर्ण जगत्को देखा । १३ । यह देखकर अर्जुन पाश्चर्य युक्तहुआ और शरीरमें रोमांच खडे होगये तब उसने हाथ जोड़ कर उनको प्रणाम करके यह वचन कहा । १४ । कि हे प्रकाशमान आपके शरीरमें देवता और चारों प्रकार के सयजीवोंको और कमलासम्पर विराजमान ईश्वर ब्रह्मा जीको और सवऋपि मुनि यक्ष राक्षस गन्धर्य किमर उरगराजों को भी देसनाई । १५ । हे विश्वम्प अखिलेश्वर आपको सब ओर अनेकरूप भुजा उदर मुसनेत्र कान नाकोंम शोभित देसताई फिर आपका आदिमध्य अन्तभी नहींदेसताहूं ।१६। और आपको मुट गदा वक्र धारण किये तेज समूहोंसे कठिनता many an upraised weapon; adorned with celestial tobes and cliaplets: anointed with licarcnly unguents; all mai vellus, loilliant, intinite and all fuced. 11. The splendour of thint mighty being resembled thist of a thousand sims blazing out together in the sky. 12. The Pandava behele wolluin tlic lvly of the Deva of Devas, the whole univers dividid forth into its vast variety 13. He has over whiclnx. od with wonder, and every hair was raised on cnid llo lowed down his hond lufuru the Deva, and thus addressed fun with joined hunds, 14. Arjunm-Ishe, loord lm thy founu all the Devns, and ercry specific tritre of lkingI see Tirumha sitting on his lotus throne: all. tin Rasis and thesenly Uragas. 15. Ike thyself, on all rides of infinite bhak, with countless u. me, breasts, inouths, and eyes, but I tan neither dirrorer thy beginning, thy middle, nor again thy end, O universal Lord, of formn infinite ! 16. I see thee mitli a cronn and armed with club and Chakra, a mass of glory, dazzling every (४४१५) श्रीमद्भगवद्गीता BIHAGAVANGIT: 14 44150 क्रिशन तेजोराशि सर्वतोदीप्तिमन्तम् । पश्याम त्यो दुनिरीक्ष्य समन्नादीप्तागला युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥ त्यमक्षर परमं चेदितव्यं त्वमस्य विश्वदय पर निधानम् । स्वाम्ययः शाश्वतधम्मंगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषोमतोगे ॥ १८ ॥ अनादिमध्यान्त मनन्तवीर्यमगन्तवाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामित्यां दीप्तहाशवा स्वतेजसा विश्व मिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥ द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्त स्वयफेन दिशश्च सर्चाः । दृष्टवाद्भुत रूपमुग्रंतवेदं लाकत्रय प्रव्यषितं महात्मन् ॥ २० ॥ हित्वाऽसुरसंघा विशन्ति केचिद् भीताःमाजलपो गृगन्ति । स्पस्तीत्युक्त्वा महर्विसिद्ध संघाः रतुवन्ति त्यां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥ रुद्रादित्या यसवो ये च साध्या विश्वेशानी मस्तश्चोमपाश्च । गन्धयक्षासुरसिखसंघा चीक्षन्ते त्यां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥ पूर्वक देखने के योग्य चारों ओरसे प्रकाशित अग्नि सूर्य के समान देदी प्यमान अनमेय देखताई । १७ । पाप अविनाशी शुद्ध बहादेदान्त •सेही जानने के योग्यहैं आपही इससंसारके कारण ब्रह्महो और माचीनधर्मों के रक्षकहो तुम्हीं को सबने सनातन ब्रह्मपुरुप मानाहै । १८ । मैं आपका आदि मध्य अन्त रहित महा पराक्रमी बहुत भुजाधारी चन्द्र सूर्य रूपनेत्रयुक्त पकाश मान अग्निरूप मुख, अपने तेजसे इस विश्वका सना करनेवाला देखताहूं । ११ । हे महात्मा स्वर्ग पृथ्वी और इन दोनों के मध्यवर्ती आकाश दिशा विदिशाओंकोभी मैं तुझी अकेले रो व्यात देवताहूं इस तेरेअद्भुत भयकारी रूपको देखकर तीनों लोक भयभीत होते हैं । २० । सुर समूह आपकी रक्षामें आतेहैं आपकी कोई भयभीतहोकर स्तुति करते हैं और महर्षि सिद्ध गणलोग कल्याण शब्दकहकर स्तोत्रादिकों से आपकी स्तुति करते हैं । २१ । रुद्र, सूर्य, वसु, और साध्यविश्वेदेवा, दोनों अश्विनीकुमार मरुन और उप्णभोनी पितराादे यक्षगंधर्न अगर सिद्धगण यह सब आश्चयित there and on all sides dazing, the ight; shining with light immen. surable like the ardent fire or glorious sun. 17. Thou art the Suprone Being, incorruptible, worthy to be knonn! Thou art prime supporter of the universal orb ! Thou art the never failing and eternal guardian of religion ! Thou art the Primal Paru-ha. 18. ! see thee, boginningless, middleless, and endless, of valour infinilc; «f arms innumerable; the sun and moon thy eyes; thy mouth a flaming fire, and the whole world shining with thy reflected glory | 19. The space between the heaven and the earth in all direcions is filled by thes alone, the three regions of the universe, O mighty spirit ! behold the wonders of thy awful countenance sith troubled minds. 20. Of the celestial bands, some I see fly to thee for rcfuge; whilst some, afraid, with joined hands sing forth thy praisc. Maharshis, holy bands, hail thee, and glorify thy name with adoring praises. 21. The Rudras, the Adityas, the Vasus, and those Sadlıyas the [44161 Mahabharat (४४१६) रूप महत्ते बहुचपत्रनेत्रं महापाहो बटुवाहरुपादम् । घहूदर बहु दंष्ट्राकराल दृष्टयालोका प्रत्यार्थतास्तथाहम् ॥ २३ ॥ नमः 'पृशं दीप्यमनकवर्ण व्यात्ताननं दैतविशालनेतम् । दृष्ट्वा हित्वा प्रव्यथितान्तरात्मा पात न बिंदामि शमच विष्णो॥ २४ ॥ दंष्ट करालानि च ते मुसानि दृष्टव कालानलसनिमानि । दिशो न जानेन लभेच शर्म प्रसीद देवेश नगभिवास ॥ २५ ॥ अमी चत्वा धृतराष्ट्रस्य पुता सबै सहैवावनिपाल संघे भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैराप योधमुख्यैः ॥ २६ ॥ पक्राणि ते स्वरमाणा विशन्ति दवाकरालानि भयानकानि । के चद्विलग्ना दशनन्तरेषु सन्दृश्यते चूर्णितरुत्तमाई. ॥ २७ ॥ यथा नदीना यह घोम्बुवेगा. समुद्रमेवा होकर आपको देखते हैं । २२ । हे महावाहु बहुभुज जंघा चरण पाठकराल दंष्ट्रायुक्त महारूपधारी आपके रूपको देखकर सवलोक पीड़ामान है और मैं भी पीडामानहूं । २३ । हे सर्वव्यापी आपको आकाश में व्यापक प्रकाशमान अनेक वों से शोभित, दिशाओंमें विस्तृत, प्रकाशमान नेत्रवाला देखकर अन्तःकरण से अत्यन्तपीडामान होकरमुझे धैर्यता नही होती है । २४ । हे देवेश्वर कालाग्निके समान आपके मुख और कठिन दंष्ट्रायों को देखकर मारे भयके किसी दिशाको भी नही पहिचानता महा दाखी हूं , हे विसरूप प्रसन्नहोकर सुख दीजिये । २५ । यहसव धृतराष्ट्र के दुर्योधनादि पुत्र सवसाथी राजामो समेत प्राप के शरीरमें प्रवेश करते है और इसीप्रकार भीष्म द्रोणाचार्य सूतका पुत्र कर्णभी हमारे उधम योधाओं समेत अनेक शीघ्रता करने वाले श्राप के मुखों में प्रवेश करते हैं जो मुख तीक्ष्ण दंष्ट्रा और भयानक रूपके है उन में कोई तो दातों में चिपटे हुये एसे दिखाई देते है जिनके शिर चूर्ण होगये है। २७ । जैसे कि नदियों के जलोके अनेक समूह l'iswas, the Aswins, the dlaruts and the Voshmapas; the Gandhar vas and the Yahslus, asulas and Sidhas, all stand gazıng on thee 'and all ahle amazed! The worlds, alike with me, are terrified to behold thy n ondrous form gigintic, with many mouthis and eyes, with nany arms, and legs and bicasts, with many bellies, and with rous of dreadful teeth123 As I see thee, touching the heavens, cffulgent, of various hues, with widely-opened mouths, and bright expanded eyes, I am disturbed within me, my resolution fails me, O Vishnul and I find no rest! 94 Having seen thy dreadful tectlı, and gazed on thy countenance, enblem of Time's last fire, 1 .not not where I am! I find no pauce ! Haso mercy O God of gods !" tliou refinge of the unii crso I 25 The sons of Dhiritarachtra, with all those rulers of the land, Blushama, Dronu, the son of Suta, and cuon the fronts of our auny, seein to be precipitating themselies liastıly into thy inouths having such frightful rons of teeth; whilst some apikar to stich between thy teeth with their dodies sorely .

(४४१७) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4417] भिमुखा द्रवन्ति । तया तवामी नरलोकचीरा विशन्ति पाण्यभिविष्यलन्ति ॥ २८ ॥ यथा प्रदीप्तं ज्यलनं पतला पिशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैय माय विशन्ति लोकारावापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥२९॥ लेालासे असमानः समन्ताल्लोकान् समग्रान् चदनचलद्भिः । तेजो भिरापूर्य जगत् समग्रभासस्तयोग्राः प्रतान्ति विष्णो |॥ ३० ॥ सारयाहि मेको भवानुग्ररूपो नमोस्तुते देववरप्रसीद । विता तुमिच्छामि भवन्त माय नहि प्रजानामि तवप्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥ श्री भगवानुवाच । कालोस्मि लोकक्षयात्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तु मिहप्रवृत्तः । ऋने पित्यानमविष्यन्ति सर्वे येऽयस्थिताः प्रत्यनीकेयु योधाः ॥ ३२ ॥ तस्मात्यमुत्तिष्ठयशो लभस्व जित्वाश विगते समुद्रकी ओर दौड़ते हैं इसी प्रकार यह नरलोकके वीर पुरुष सब ओर से भाप के अग्नि मुखों में प्रवेशकरते हैं । २८ । जैसे कि अत्यन्त शीघ्रगामी पतंग अपने नाशके लिये बड़ी प्रकाशमान अग्गियों में दौड़कर गिरते हैं इसीप्रकार बड़े वेगवाले लोक अपनेनाशके निमित्त आपके मुखों में प्रवेशकरतेहैं ।२९। श्राप सवलोकों को अपने साग्नि युक्तं मुखोंमें निगलतेहो हे विप्रा व्यापक आपका भयानक प्रकाश अपनेनेनोंसे सवसंसारको चारोंमोर पूर्णकरके अत्यन्त संतप्तकरताहै।३०ऐसे भयानक रुपवाले श्रापकौन हैं यह मुझे समझाइये हे देव आपको नमस्कार है आप प्रसन्न हूजिये मैं आपको सवका आदि कर्च जानता हूं और आपकी चेष्टाओंको नहीं जानताहूं ॥३१॥ श्रीभगवान् बोले हे अर्जुन मैं लोकोंका नाश करने वाला महाकाल नाम परमेश्वर हूं इस युदमें लोंगों के भक्षण करने को प्रवृत्तहूं जो योधा लोग कि शत्रु की सेना में नियत हैं वहतेरे सिवाय नहीं रहेंगे इसकारण तू युद्धमें खड़ा होकर यशका भागी हो और शत्रुओं को मार धन और राज्य से पूर्ण होकर वृद्धि युक्त राज्य को भोग हे सव्यसाची अर्जुन यह सब जो तू देखाहा है यह mangled. 27. As the rapid streams of full flowing rivers roll on to meet the ocean's bed, so do these heroes of the human race rush on into thy flaming mouths. 28. As insects, with increasing speed, seck their own destruction in the flaming fire so do these people, with swelling fury, seek their own destruction. 2:. Thou involvest and swallowest all the worlds within thy flaming noulhs; whilst the whole world is filled with thy glory, ag thy awſul beams, 0 Vishnu, shine forth on all sides ! 30. Reverence be unto thee, thou most cxalted ! Deign to make known to me who is this God of adful figure! I am anxious to Icarn thy source, and ignorant of thy work. 31. Krishna -I am Time, the destroyer of world, come to destroy the voild. Except thyself none of all these warriors in tliese hostilo ranks, sliall live. Therefore, arise ! seek honor ond renown! defeat the fos, and enjoy the full-grown kingdorn 1 They are already, as it were, destroyed by me. Be thou - [4418 ] Mahabharat (४४१८) न मुंत्यराज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहनाः पूर्व मेय निमित्तमात्र भव सव्यसाचिन् ३३ द्रोणञ्च भीम जयद्रथञ्च फर्ण तथान्यानपि योधवीरान् । मया हतास्त्वं जाहिम व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्लान् ॥ ३४ ॥ सजय उवाच ॥ एतच्छुत्यावचनं शयस्य कृतांजनिपातः किरीटी । नमस्कृत्वाभूय एवाह कृष्ण सगद्दं मातमीतः प्रणम्य ॥३५॥ गर्जुग उवाच ॥ स्थाने दृषीकेश तवनकीा जगत् प्रहृष्यत्यनुज्यतेच। रक्षांसि भौतानि दिशो द्रवन्तिसचे नमस्पन्तिच सिद्धसंघाः ॥ ३६॥ फरमाञ्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोप्यादिकर्ने । मनन्त देवेश जगन्निदास त्यमक्षरं सद सत् तत्परं यत् ॥ ३७॥ त्वमादि देव पुरुष. पुराणस्त्वमस्यविश्वस्य पर निघानम् । घेतासिवेद्यञ्च परम धाम त्वयाततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८॥ घायुर्यमोग्निर्वणः शशां प्रथमही मुझसे मारे गये हैं तू केवल इनके मारने में कारणही रूप होगा । ३३ । तू मुझ से मारेहुये द्रोणाचार्य, भीष्म, जयद्रय, कर्ण को और इसीमकार अन्य उधमवीरों को भी मारडाल दुखी मतहो युद कर त युद्ध में शत्रुओं को विजय करेगा । ३४ । संजय बोले कि है धृतराम मुकुटधारी अर्जुन केशवजीके इनवचनों को सुनकर कांपताहुआ हाथगोड़ भत्यन्त भयभीतहुआ और अत्यन्त मुककर नमस्कारपूर्वक फिर गद्गद्कण्ठसे श्रीकृष्णजीसे वोला । ३५ । हे हृषीकेश अन्त यामी तुम्हारा नामनेनेसे सवसंसार अत्यन्तमसन्नहोता है और प्रीतिकरताहै और तुम्हारी कीर्ति होनेसे राक्षसलोग महाभयभीत होकर इधर उधरको भागते हैं और सांसदलोगोंके समूह नमस्कार करतेहैं । ३६ । हे महात्मा ब्रह्माजीके भी पितारूप आपको वह लोग क्यों नहीं नमस्कार करें क्योंकि हे अनन्त देवेश्वर हे जगत् के उत्पति स्थान अग्निाशी कार्यकारणस्प आदि देव सर्व शरीरवर्ती पुराण पुरुप संमारके लप स्थान ज्ञानगम्य ज्योतिस्वरूप अन-ततुम्ही से सब जगव व्याप्त है । along the immediate agent 33 Be not disturbed ! kill Drona, Blishni, Jayadrathin, haran, and all the other heroes ah cady killed by me light and thou shalt defeat thy rivals in the field. 31 Sanjaya -- TWhen the trembling Arjuna licard this froin Krislina, hc salute lun with joined hands and addressed hum in brolen ac cents 35 Arjun flushlesha' the universe rejoice and revel at thy glory. The rakshrsas are terrified and flee on all sides; whilst tho hosts of siddhas salute thie 36 And therefore should they not, O mighty Being! boy down before thiec, who, greater than Brihmn. nrt the primo Gencontur ! cternal Gud oi gods tho world's minsion ! Thou art tho incorruptible, the effect and tho muse, distinct from all things trulsient ! Thou art boforo all gode, tho ancient Purulin, and the supremne supporter of the universe I Thiou hootrest all things and art wortly to Le hno in, tho supremo mansion, and ly thee, O Infinite furir ! thic univcrc 13 fillcl. 38 (४४१९) श्रीमद्भगवद्गीता BHAGAVADGITA [4419] फ प्रजापतिस्थ प्रपितामहश्च । नमो नमस्तेस्तु सहनकृत्य पुनश्वभ्योपिनमोनमस्ते ।। ३६ ॥ नम पुरस्तादय पृष्ठतस्ते गमोस्तुते सर्वन एव सर्व । अनन्तवीपी मितविक्रम स्त्व सर्व समामोपि ततोसि सर्व ॥ ४० ॥ सखेति मत्या नभ यदुक्त हेकृष्ण है यादय ६ सनात । अज्ञानतामहिमान तवेद मया प्रमादात् प्रणयेनपापि ४१॥ यम यहासार्थमसत्तोसि बिहाशग्यासनभोजनेषु । एकोथ वाप्यन्युत तत्समक्ष तत् शामयेत्यामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥ पितासे लोकस्य चराचरस्य त्वमस्यपू.यश्च गुरुगरीयान् । नत्यत्समोस्त्यापयिक कुत्तोन्यो लोकत्रयप्पप्रतिमप्रमाय ॥ ३ ॥ स्मात् प्रणम्य प्रणिधाय काय प्रसादप स्यामहमीशमीडयम् । पितेव पुनस्यस प्रापही वायु, यम, याग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजापति, ब्रह्मादि देवताओं के पिताहो मापके अर्थ वारम्बार नमस्कार है हे सर्वरूप हे महापराक्रमी आप अतुलवलहो और अपनी ऐश्यता से सब को व्याप्तकरते हो इस कारण तुम्ही मर्वरूप होकर कमों के प्रारंभ ओर अन हो आप सब प्रकार से नमस्कार करने के योग्य है । ४० । अाप की महिमाको न जानकर अज्ञान से वा प्रीति से मैंने अपना भाई और मित्र मानकर हे कृपण हे यादव हे मित्र इत्यादि शब्दों को जो कहा और | विहार शग्या भोजन के समय अकेले में वा मित्रों के सम्मुख भी हास्य के निमित्त असत्कारी जो वचन कहा है हे अविनाशी उन अपराधों को मैं आप से क्षमा कराना चाहताहूं । ४२ । तुमइस स्थावर जंगम लोकके स्वामी पूजनीय और गुल्हो मापके समान समयेय प्रभाववाला कोई नहीं है तो तीनोंलोकोंमें आपमेअधिक कहां से होगा । ४३ । इम हेतुमे मे आपको साष्टांग प्रणामकरके स्तुतिके योग्य आपको मसन्न करताहूं जैसे कि पिता पुत्रकाअपराध और मिन मित्रका अपराध और पति Thou art Vayu, Agni, Varuna, the moan, Prajapati, and Prapita. maha Reverence ! Keverence to thee a thousand times repeated ! Agun and agun Reverence | Reverence to thee 1 Reverence be sthee before and betimes Revereme to thee on all sides all in alll Infinite is thy power and thy glory ! Thcu includest all things, so thou art all things I 40 Thinking thec friend, I habıtuully called thce Krishna, Yadavu, Iriend! I was ignorant of thy greatness, because I was blinded by my affection and pre. sumption. 41 Thou hast, at times, alvo in sport been treated ill by me, in thy recreations, in thy bed, on thy chur, and at thy meals, in p ivate and in pablick for which, 0 Being in conceivable ! I humbly erare thy forgiveness 42 Thou art the father of all things animate and inanimate, thou art the sage instructor of the whole, worthy to he adored | There is none like to thee, nor superior in the three rolds. 13 wherefore I bow dosu, and with ng Lody prostrate upon "be ground, crave thy mercy, adorable [4420] Mahabharat (४४२०) पेसप्युः प्रियाप्रियायाईसि देव सोदुम् ॥ ४४ ॥ अदृष्टपूर्व पितोरिम दृष्ट्या भयेन च प्रव्याधितं मनो मे। तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसाददेवेश जगनियास ४५ फिरीटिन गदिनं चक्रहस्त मिच्छामि त्वांद्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रुपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भवविश्वमूते ॥ ४६॥ श्रीभगवानवाच ॥ गया प्रसन्न तवार्जुनेदं कर परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मेत्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥ न घेदाध्ययनैदानै च क्रियानि तपोभिरुप्रैः । एवंरूप शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन फुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥ मा ते व्यथा माच विमूढभाषो दृष्ट्वाला धोरमी हममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमना पुनस्त्वं तदेव मे रूप मिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥ अपनी स्त्रीका अपराध क्षमाकरता है इसीप्रकार हे देवदेवेश्वर आप मेरेअपराधों को क्षमाकरनेके योग्यहैं ॥४४॥ मैं पूर्व में नहीं देखेहए इसरूपको देखकर प्रसन्नहं परन्तु मेरा चित्त मारेभयके पीडामानहै हेपरमेश्वर आप अपने उसीरूपको मुझे दिखलाइये । हेदेवदेव जगत् के उत्पत्तिस्थान आप वारंवार प्रसन्नहो।४५हेिसहस्रभुजधारी विश्वरूप मैं तुमको मुकुटगदा चक्रहाथों में धारण कियेहुये दर्शनकरना चाहताहूं इस से भाप अपनेचतुर्भुनी रूपका दर्शन दीजिया४६।श्रीभगवान्बोले हेअर्जुन मुझ प्रसन्न रूपने अपनी सामर्थ से यह उत्तम चैतन्य तेजोमय आदि अन्तरहित विश्वरूप दर्शन तुझको दिखलाया इसस्वरूपको तेरे सिवाय किसी दूसरे ने कभी न देखाथा ॥४७॥ हे कौरवों में बड़े वीर नरलोक में तेरे मिवाय इस रूपके देखने को वेद यज्ञ जप दान क्रिया तप व्रतादिकों से भी कोई दूसरा पुरुष योग्य नहीं है। ४८ । | मेरे इस प्रकार इस भयानक रूपको देखकर तुझको नपीडाहोगी न कोई मकारका मोह होगा निर्भय और प्रसन्न चित्त होकर फिर उसी पूर्वरूप को देख । ४१ । Lord ! for thou shouldst bear with me, as father with the friend with friend, as lover with the belored. 44. At the sight of what I never san before, I am glad and terrifice. Horo mercy, then, O licas enly Lord! O mansion of the universe ! and slicw me thing other form 45 I fish to behold thee with diaton on thy hend, and armed with club and Chaking negume then, O God of a thousand arms, image of the universo ! thy four armed form. 16 Krishna,-IVell pleased, O Arjuna, I have thern tliec, by my Divme power, this my supreme form, the uniscmsc, in all its glory, infinite and eternal wluch was never seen by any ono except thyself. 47 l'or ro onc, O valliant Kuru! in the thrco Torlds, except theelf, can obtain such a sight of me; nor by the Velns rior eacrifices, nor profound study, nor by charntable gifts, nor lng decals, nor by the most smjere ansterities. 45. llaving fon my form, thus nrſul, be not disturlxd, nor let thy faculties Iconfoundel. Cost nosny fear and let thy mind rejoice, behold Bona (४५२१ श्रीमद्भगवदगीता Bhagavadgita [4421] समय उवाच ।। इत्यर्जुनं वासुदेवस्तोरस्वा स्वकं रूपं दर्शयामासभ्यः। मावा सयामास च भीतसेन सूत्वा पुनः सौम्यवएमहात्मा ॥ ५. ॥ अर्जुन उवाच । दृष्ट्येदं मानुपं रूपं तय सौन्य जनाईन । इदानीमरिम संवृत्तः सचेता प्रकृतिगतः ॥ ५१ ॥ श्रीभगवानुवाच । सुदुशमिदं पं दृष्टयानास पन्मम । देवाप्पस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाक्षिणः ॥ ५२ ॥ नाहं दैनं तपसा न दानेन न घेन्यया । शस्य पवाययो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥ भत्त्यात्वनन्यया शश्ययाह मेवीवघोर्जुन । ज्ञातुंद्रष्टुश्च ताधेन प्रवेष्टुश्च परन्तप ॥ ५४ ॥ माकर्मछन् मत्परमी | मनकः समवजितः निरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डय ॥ ५५ ॥ इति श्रीमहाभारते भीमपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतामू० विश्वरूपदर्शननाम नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११॥ पर्वणितुपंचत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ संजय ने कहा हे राजा वासुदेवजी ने इस प्रकार अर्जुन को समझाकर फिर अपने रूपको दिखाया और भयभीत अर्जुन को आश्वासन दिया। ५० । अर्जुन ने कहा हे जनाईन आपके इस सौम्य नरम्पको देखकर अब मैं सचेतहुआ और प्रकृति में स्वस्थताहुई । ५१ । श्रीभगवान् बोले जो तुमने इममेरे रूपको देखाहै वह बड़ी कठिनता से दृष्टि आनेवाला है इम रूपके देखने को देवतालोग भी सदैव इच्छा करते हैं। ५२ । जैसे तुमने मुझको देखा है उस रीति से वेद यज्ञ तप दान व्रत आदि के द्वाराभी कोई पुरुप मेरेदर्शन करने को ममर्थ नहीं है ।५३॥ हे शत्रुओं को संताप देनेवाले अर्जुन इम प्रकार के रूप से मैं अखण्ड भक्ती के द्वारा दर्शन के योग्यहूं । ५४ । जो मेरे निमित्त कर्म करनेवाला और मझी को सर्वोत्तम माननेवाला मेराभक्त सब संग्रहों से पृथक् शरीरी मानों में प्रात्मभाव माननेवाला है वह मुझ शुद्ध ब्रह्माको पाता है ।। ५५ ।। this my familiar form again. 49. SANJAYA---Vasnders haring thus spoken to Arjuna, sliewed him again his wonted furm; and having re-assumed his milder shape, he presently assuaged the fears of the affrighted Arjuna.50. Arjuna Having beheld thy placid, human shape I am again collected, and am restored to my natural state 51, KRISHNA- This form of mine which thou hast seen, is difficult to lo scen; cren Deras are constantly anxious to see it. 52. I am not to be seen as thou hast seen me, by the Vedas, by mor. tifications, by sacrifices or by gifts. 53. But I am to be seen, Anown, and obt.uined by means of bhakti alone. 54. Doing works for me, haring me as arm, being my rotary, haring abandoned all consequences, free from hatred, one 55. comes to me.

॥ 14422] Malabharat (४४२२) गर्जन उवाच । एवं सततयुक्ताये भक्तास्त्वां पर्यु पासते । ये चाप्यक्षरमम्प कतेषां के योगचित्तमा ॥१॥ श्री भगवानुवाच । मध्यावश्य तनो ये मा नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परय पेतास्तेमे घुक्ततमा मता ॥ २॥ ये स्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्त पर्यु पासते । सर्वत्रगमचिन्त्यञ्च कूटरूपमचलं भुवम् ॥ ३ ॥ सनियम्यन्द्रियप्राम सर्वन समबुद्धय । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता ४ ॥ क्लेशोधिक तरस्तेपामयकासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दु ख देहवद्धिरवाप्यते । ये तु सर्वाणि कर्माणि मवि सन्यस्य मत्पराः । ममन्यमेव योगेम मां ध्यायन्त उपा सते ॥ ६ ॥ तेषामह समुद्धती मृर ससारसागरात्. 1 भवामि न चिरात् पार्थ अध्याय १२॥ अर्जुनवाले इसमकार सदैव सावधान चित्त भक्तलोग सगुणब्रह्मरूप आप को उपाप्तन करते हैं और अक्षर अर्थात् अविनाशी अव्यक्त शुद्ध ब्रह्मको उपासना करते है उन दोनों में योगके जाननेवाले कौन है । १। श्रीभगवान घोले हे अर्जुन | जो मुझ में मनको प्रवेशकरके सदैव उपाय करने वाले मेरेभक्त मेरी उपासना करते | है और श्रद्धावान है उनको मै मुक्ततम मानताहूं, और जो इन्दियोंको मनसमेत स्वा- धीन करके अर्थात् आत्मामें लयकरके अविनाशी मन बुद्धिसे परे सर्वब्यापी निर्विकार अचलरूपकी उपासना करतेहै वह दृढ बुद्धि सवजीवो के प्यारे है और इच्छावान् होकर मुझ निर्गुण ब्रह्मको प्राप्तहोते है अर्थात् मुझीमें है मुझसे जुदे नहीं है फिर उनके विषय में योगवित् यह शब्द कब नियत होसत्ताहै । ४ । निर्गुण ब्रह्ममें चित्तलगाने वालों को प्राधिकतर दुःख है क्योंकि निर्गुण पदकी प्राप्ति अभिमानी पुरपों को कठिनतासे मिलती है । ५। और जो सब कर्मोंको मेरेअर्पण कर के | मुझी को लय स्थान समझके अद्वैत बुद्धिसे मेरेही ध्यानमें मत मन होकर मुझ LECTURE X11 Of serving the deity in hi8 ore ble and invisible forsne ARJUNA-Of those of thy sei vants who are always thug employed, lo hnos their duly best ? those who worship thiec ag thou nov nrt, or those who serve thee in thy invisible and incorruptible nature? | KRISHNA Those who, having flaced their minds in rae, servo mo nith constant zerl, and are endued with steady faith, aro esteemed the best des oted Thay, too, who, delighting in the welfaro of all, servo in in my incorruptible, ineffable, and invisible forni oinnipresent, incomprehensible, standing on high, fixed and imr, movable, with ruldued passions and understandings, tho same in all things, shall also come unto me.4 Thosc hose winds aro nttrelied to my inssiblo nature have the grcater labour to encoun: ter, luceruso an invisible patlı difficult to be found by corporcal kuings. 5 Them wliose minds are thus attached to me, who lerro (४४२३) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4423] मय्याशितचेतसाम् ॥ ७॥ मध्येय मन आधत्स्व मपि बुद्धि निवेशय । निद- सिण्यास मय्यैव सत ऊध्ये न संशय ॥ ८॥ अथ चिच समाधातु न शक्नोपि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धननय ॥ ९ ॥ अभ्यासेत्यसमाति मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमसि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥ अथै तदप्यशकोसि कषु मद्योगमाथि । सर्वरर्मपाल त्याग तत. कुम्यनारमचान् ॥ ११ ॥ श्रेयो हि ज्ञानमयासा-जानाध्यान विशि यते । ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्या गाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ १२॥ अद्वष्टासर्वभूताना मैघ क्रुणएचच । निर्ममो निरष्ट्रवारः समदु पास. क्षमी ॥ १३ ॥ सन्तुम सतत योगी यताला दृढनिश्चय । मर्पितमनो को ध्यानकरते हुए उपासना करते हैं, हे अर्जुन मै उनमनमे उणमना करने वालों को थोड़ेही काल में जन्ममरणरूपी समुद्रसे उद्धार करताहूं । ७ । मुझ विसस्प ईश्वर में संकल्प विकल्पात्मक मनको नियत करके मुझी में बुद्धि को लगायेहुए जो पुरुप मेरेही रूपमें निवास करेगा वह निस्तदेह मुमी में ऐक्यता पावेगा । ८। जो तू मुम विश्वरूपमें मन लगानेको समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन उपासना मे मनको दृढ़करके मुझको प्राप्तहो और जो उपासनामें अममर्थ है तो मेरेनिमित्त कर्माको करता हुआ चित्तशुद्धीको पायेगा ।१०। और भी तू मेरी निष्ठाकेभी करने में असमर्थ है तो सर कर्मों के फलों को त्याग कर दे । ११ । विचार के अभ्याम से ज्ञान श्रेष्ठ है और ज्ञान मे ध्यान उत्तम है और व्यान से कर्म फलों का त्याग करना शुभ है और कर्म फल के त्यागसे पाछे मोक्षरूप शान्ती । १२ । शत्रुता रहित सवजीवों का मिन, दयावान् शरीरादि में निरभिमानी अबुदिमेरहित रागद्वेष में समभाव क्षमावान, यथा लाभ संतोपी, श्रवणादे में सदैव मन लगानेवाला इन्द्रियों समेत देहको स्वाधीन करनेवाला आत्मतत्त्व में दृढ़ निश्चय रखनेवाला और मुझ शुद्ध all vorhs for mo, and, free from the worship of all others, contemplate and serve me alone, I presently raise up from the orean of of matality, 7. Pla e then thy heart on me, and penetrate mo with thy understanding, and thou shalt, without doubt, hereafter enter unto me 8 But if thou be unable to fix firmly thy mind on me, endeavour to find me by means of practice. 3. If after practice thou art still unable, derote thyself to my works, for by performing works for me, th ju shalt attain perfection 10. But shoudst thou find thyself unequal to thuis task, control thyself and forsabe the fruit of actions. 11 Knowledge 1s battrr than devotion, meditation is better than know ledge, forsabing the fruit of actions than meditation, for peace is derived fron such forsaking 12 That bhalt is dear to me who is free from enmity, banign, merciful, exempt from pride and selfish ness, the same in pain and pleasure, pattent, contstanly devout, passions, firmi in faith, and hose mind and understanding tris region of subduwd [1424] Mahabharat (४४२४) धुद्धियों मे भक समे प्रिय ॥१४॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोफानोद्विजते चय । मिर्पभयोद्वैगैर्युत्तो प सच मे प्रिय ॥ १५ ॥ अनपेक्ष शुचिर्दक्षउदासीनोगत यथः। सीरभरित्यागीयोमद्भक्त समेप्रिय ॥ १६ ॥ यो न हण्यति न देष्टि न शोचात न पांक्षति । शुभाशुभपारत्यागी भक्तिमान् य समे प्रिय. ॥ १७ ॥ सम शत्री च मिव तथा मानापमानयो । शीतोष्णसुखदु पेषु सद्गविधर्जितः ॥ १८॥ तुल्यनिन्दास्तातर्मानी स तुष्टो ये फेनाचत् । मानकत स्विरमातर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥ येत धम्मामृतामद यथोक्त पर्युपासते । भ्रद्दधागा मत्परमा भक्ता स्ततीघमें मिया ॥ २० ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गीताद्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥ पर्वणितपत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥ ब्रह्म में मन बुद्धिको लयकरनेवाला जो मेरा भक्त है वह मेराप्याराहै । १४ । जिससे लोक नहीं डरताहै और जो लोकसे नही डरताहै जो प्रसन्नमन असन्तोपता, भय और व्याकुलता मे रहित है वह मेरा प्यारा है । १५ । मुखकी माप्ति और दुःख के निट नहोने में अनिच्छावान् बाहर भीतर से पविन भगत भजन भादि में भालस्परहित उदासीन अर्थात् प्रतिष्ठा अप्रतिष्ठा को समान जाननेवाला क्लेशरहित | सब कमी के भारम्भों का त्यागनेवाला जो मेराभक्त है वह मेराप्यारा है । १६ । जो मिय माप्तीमें प्रसन्न नहींहोता और भाभियता में दुखीनही होता और मियवस्तु के नियोगमें शोचनहीं करता और शुभाशुभ को भी नहीं चाहता हुआ भक्तिमान है। वह मेराप्यारा है । १७ । जो शत्रुमिन में औरमाना पमान में अथवा शीताप्ण मुख टु सोमें समानहोकर संगोंका त्यागनेवाला है और निन्दास्तुतिमें तुल्यभार मौनी संतोपी त्यागी स्थान से रहितहै और दृढद्धि से भक्तिमान है वह पुरुप मेराप्यारा है । १९ । जो श्रदावान मुझ को अपना लयस्थान जानते है और इस | अविनाशी मोक्षमाधन का अत्यन्त अनुष्ठान करतेहै वह मुझकोअतिशयप्यारे है २० ॥ are fired on me alone. II Ile also 1s dear to mo of whom manlund aro not afraid, and who of winnkind 15 not afrud, and who is free from tho influenco of joy, impatience, and tho drcad of learni, Tlint bliaht of mind is dear to me a lo is unctpecting, pure, piro ficient, unconcerned. unflicted and who has forsalen cycry en terprize. 10 llo alco is worthy of my love, ulio neither rejoices nor finds fault, who neither luments, nor concts, and has for. when oth good and on 17 I liat bhaht iş dear to mo who is mmo in friendshup and in hntrol, in lionor and in dishonor, in cold and in 11e7t, in pain and pleasure, who is free from attachunent, to vlivna pris and blimo aru u one, who is of littlo speech, ple24 al with any thing, is not liomc ted, and a lo is of a steady mind 18 Thucy who ech tlus Amrila of religion csen as I linio $3d, ani spl ma futlıfully la fure all others, are any dearest bhaktos 20 ४४२५) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4425] अर्जुन उवाच । प्रकृति पुरुपं चैव क्षेत्र क्षेत्रनमवच । एतद्वदितामच्छामि ज्ञान बेयञ्च केशव ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच । इदं शरीर कौन्तय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्योत्तिं तं माहुः क्षेत्रइति तद्विदः ॥२॥ क्षेत्रनमापिमा विधि सर्यक्षेत्रेपुमारत । क्षेत्रक्षेत्रन्नयोनीनं यचज्ज्ञानं मतमम ॥ ३ ॥ तत् क्षेत्रं यच्याटक घ यविकारियतथ्य यत । सचयो यत्मभावश्च तत् समासन मे शृणु ॥४॥ भपिभिर्वाधारीत छन्दो भिर्विविधः पृयक । महासूत्रपदेश्चैव हेतुमन्दियीनश्चतैः ॥ ५ ॥ महाभूतान्यष्ट- कारोवुद्धिव्यक्तमेवच । इन्द्रियाणि दशैकञ्च पञ्चचन्द्रियगोचराः ॥ ६॥ इच्छा अध्याय १३ ॥ अर्जुन वाले हे केशवजी प्रकृति और पुरुप और क्षेत्रमा क्षेत्रज्ञ औरज्ञान वा ज्ञेय इन सवको मैं जाननाचाहताहूं,श्रीभगवान् बोले हेअर्जुन यह शरीर क्षेत्रहै जो इसक्षेत्रको जानताहै क्षेत्र और क्षेत्र के जानने वालोंने आत्मा रूप क्षेत्रज्ञ कहा है ।१। हेभरत पंभ सब क्षेत्रों में मुझीको क्षेत्रज्ञ जानो क्षेत्र और क्षेत्रका जो ज्ञानहै वह मुझसेही सम्बन्ध रखनेवाला ज्ञानहै इमको ब्रह्मज्ञानियों ने निश्चय कियाहै । २ । वह क्षेत्र जोरूपका है और जैसे प्रकारका है और जिन जिन विकारों से युक्तहै और जिस जिस विकार से जो जो उत्पन्न होता है और जो वह क्षेत्रज्ञ है अथवा जैसे प्रभाव चाला है उसको मूलसमेत मैं कहताहूं। ३ । जिसको ऋपियों ने अनेकरीतों से गाया और जो अनेक प्रकार के छन्द वेद और मन्त्रोंसे प्रत्येक शाखाओं में सिद्ध किया गया वहुत निश्चय युक्त हेतवान् ब्रह्मके जतलानेवाले वेदके भागरूप ब्राह्मणों के वचनों से निश्चय किया हुआ। ४ । पंचमहाभूत अहंकार बुद्धि इन्द्रियां और पांचस्थूल विषया।इच्छा द्वेप,मुख, दुख,यह विकारोंसहित क्षेत्रका मिलाहुआ वर्णन LECTURE XIII. Matter and Spirit Arjuna -1. desire, to know 0 Kesbara, about matter and spirit, the field and the knower of it, wisdom and that thich ought to be known. Krishna -Learn that by the rrord field is implied this body, and that he ho knows it is called the looser of it by the sages. 10. Know that I am that bnower in every field. The knojyledge of the field and the bouwer of it is by me esteemed wisdom. 2. Now hear shat that Kshetra or field is, its nature, its origin, its purpose, its knower and his power. 2. Each has been variously sung by the Rishis in various measures, and iu verscs containing Divine precepts, inclading arguments and proofs. 4. The elements, Ahankara, Budhi, Aryalta (invisible spirit), the clesen Indriyas i organs ), and the five sensibles. 5. Lore and hatred, pleasure and pain, constitute Lshetra and its [4486] Mahabharat (४४२६) द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत् क्षेत्र समासेन सविकार मुदाहृतम् ॥ अमानित्वमद म्भित्यमहिंसा शान्तिराज्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमाम पिनिग्रहः ॥ ८ ॥ इन्द्रियार्येषु वैराग्यमनहकार एवच । जन्ममृत्युजराव्याधि दुःख दोपानुदर्शनम् ॥ ९ ॥ असक्तिरनभिष्वङ्ग पुत्रदारगृहादिषु । नित्यश्च समचित्तत्व मिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ १० ॥ मयि चानन्ययोगन भातरव्यभिचारिणी। विविक्तदेश- सेवित्वमरतिजनसंसदि ॥ ११ ॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज् ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोग्यथा ॥ १२ ॥ नेयं यत्तत् प्रवक्ष्यामि यजशास्वामृतम- श्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तभासदुच्यते ॥ १३ ॥ सर्वतः पाणिपादतत् सर्वतो हुधा । ६ । अपनी प्रतिष्ठा न चाहना देह मन वाणी से किसी जीव को दुःख न देना, अपकार होनेपर चितको न विगाड़ना, सरल प्रकृतिहोना, उपासना, भीतर वाहरसे पवित्रता, मोक्ष नियतबुदि रहना इन्द्रियों के विषयमें वैराग्यहोना निरहंका रता, जरा जन्म रोगके दुख और दोपोंको अच्छेपकार देखना । ८ । पुत्र स्त्री और घरों में ममता न रखना और उनके मुख दुखों में सुखी और दुखी न होना प्रिय अमियकेमिलनेमें सदैव एकभाव रहना । ९ । इष्ट अनिष्टकी उपपत्तिमें सदैव सम चित्तरहना एकान्त स्थानमें बैठना मनुष्योंकी सभा मीत न करना ।१०। अध्यात्म शास्त्रजन्य ज्ञानमें सदैवनियत रहना तत्त्वज्ञानके प्रयोजनको देखना यह ज्ञान अर्थात् ज्ञानका साधन कहा जो इसके विपरीतहै वही अज्ञानहै । ११ । जो इसज्ञानसे जान ने के योग्यहै उसको कहताहूं जिसको जानकर मोक्ष को पाता है आदि रखने वाला जो कार्य कारण है उस से श्रेष्ठ जो ब्रह्म है वह न सत् कहाजाता है न असत् कहाजाता है । १२ । वह सव दिशाओं में वाह्याभ्यन्तर हाथ पैर नेत्र मुख शिर कान रखनेवाला है और लोकमें सबको व्याप्तकरके नियत है । १३ । विना changes. Thus have I briefly described this aggregate or basis of the soul. 6. Humility simplicity, harmlessnese, forgiveness, rectitude teacher's service, chastity, faith, self control, disaffection for the objects of the senses, freedom from pride, insight into the cvils of birth, death, decay, sickness and misery, 8. Unattachment, absence of affection for son, wife and home; a constant evenness of temper in good or bad events, 9. Exclusive devotion to me, resort to Bequestered places, and a dislike to the society of man; 10. a con. tant study of the superior spirit, and the study nf the knowledge of truths. This is declared to be the risdom; all against it is igno 11. I will declare that which ought to be known, know ing which one cnjoys immortality, the beginningless Brumlis, who can neither bo called Sat (cns) nor Asat (non ens). 12. All hands and fect, all inces, hends, and eyes and all ears, dvells in the world encompassing all. 13. Shining with all senso facultics, without rance.

(४४२० श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4427 ] सिीशरोमुखम् । सर्वतः अतिमलोके सर्वमावृस्य तिष्ठति ॥ १४ ॥ सन्द्रियगुणा भासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृचव निर्गुणं गुणभोक्तच ॥ १५ ॥ पाहि. रन्तश्च भूतानामचरं चरमेवघ । सूक्ष्मत्वात्सदविज्ञेयं दास्यवान्तिफेचतत् ॥ १६ ॥ भविभकञ्च भूतेषु विमकमिव च स्थितम् । भूतभर्तृच तजन्नयं ग्रासिष्णुप्रभावित णुच ॥१७॥ ज्योतिपामपि तन्नयोतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानदेयं नानगम्यं हादसर्यस्य विष्ठितम् ॥ १८॥ इति क्षेत्र तथा ज्ञान यज्ञोक्तं समासत । मद्भक पवित्राय मनाया योपपद्यते ॥ १९ ॥ प्रकति पुरुषश्चय पिद्धयनादी उभावपि। विकारांध गुणांश्चैव विद्धि प्रकृति सम्भवान् ॥ २०॥ कार्यकारणकर्तृत्वहेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषःसुखदुःखानां भोक्तत्वहेतुरुच्यते ॥ २१ ॥ पुरुपः प्रकृतिस्योाह मुंक प्रहातजान गुणान् । कारण गुण- इन्द्रियों के वहसर इन्द्रियों के कार्य करता है सब से पृथक् और सवका धारण कर ने वाला, निर्गुण सब गुणों का भोगने वाला । १४ । जीवों के बाहर और भीतर चलायमान और अचल, सूक्ष्म, जानने के अयोग्य, दूर और निकट । १५ । विभाग रहित प्राणियों में बहुत रूप वाला भूतोंका धारण करने वाला वह क्षेत्रज्ञ जाननेके योग्य है नाश करने वाला और फिरउत्पन्न करने वाला । १६ । वह प्रकाशमामिभी ज्योतिरूप है, और अज्ञान से पृथक् कहाजाता है और सब के हृदय में नियत ज्ञानरूप जाननेके योग्य विज्ञान से माप्त होने के योग्यहै । १७ ॥ यहक्षेत्रन और ज्ञान विज्ञान से जानने के योग्य मिला हुआ क्षेत्रज्ञ वर्णन हुआ इनको जान कर मेरा भक्त मेरे भाव के योग्य होता है । १८ । प्रकृति और पुरुष इन दोनों को अनादि जानो और इच्छा आदि विकार और गुणों को प्रकृति से उत्पन्न जानो । १९ । कार्य कारण के कर्तृत्त्व में प्रकृतिही कारण रूप है, और मुख दुःख के भोगने में पुरुष कारण कहा जाताहै । २० । प्रकृति में नियत पुरुपही प्रकृति से उत्पन्न होनेवाले गुणों को भोगता है उत्तम अनुचम योनियों any senses; unattached, supporting all things; and without quality, enjoying every quality. 14. Without and within all beings, moveable and immoveable, subtleand inconceivable, stands far and yet near. 15. Undivided in things, it stands as the supporter of all things, it. is to be known; it destroys and produces. 16. It is the light of lights and is declared to be free from darkness. It is wisdom and obtained by wisdoun; and it presides in every breast. 17. Thus have been described Kshetra, knowledge and knowable. My bhakta who knows this, is fitted for my state 18. Learn that buth prakriti and Purusha are without beginning. Know also that modifications and qnalities are matter-born. 19. Prabriti is the cause of tho occurrance of causes and efects. Purusha is the cause of the enjoyments of pain and pleasure. 20. The purusha residing in Prakriti, partakes of the qualities of Prakriti; attach . [4428] Malabuarat (४४२८) सद्गोस्य सदसद्योनिजन्मम् ॥ २२॥ उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ना भोकामहेश्वर । पर मात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन् पुरुष पर ॥ २३ ॥ य एव चेत्ति पुरुष प्रतिञ्च गुणे सह । सर्वथा वर्तमानोपि न सभूयाभिजायते ॥ २४ ॥ ध्यानेनात्मनिपश्य रितफेचिदात्मानमात्मना । अन्येसारपेन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २५ ॥ अन्यत्व घमशागन्त. धृत्वान्येश्य उपासते । तेपिचााततरन्त्येव मृत्युतिपरायणा ॥ २६ ॥ यावत् सआयते किञ्चित् सत्व स्थावरजङ्गमम् । क्षेत्रगतसयोगात्तद्विद्धि भरत म ॥ २७ । समं सर्धेषु भूतेषु तिष्ठन्त परमेश्वरम् । विनश्यश्वधिनश्यन्त प के जन्मों में इस के गुणोंका संगही कारण है ।२१। दृष्टा, साक्षी अनुमन्ता और | भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा इस शरीर में भी परम पुरुष काहा जाता है ।२२। जो इस रीति से पुरुष को और गुणयुक्त प्रकृतिको जानता है वह कमों में कैसाही मत्त हो तौभी फिर जन्मनही लेताहै । २३ । कोई कोई तो शरीर में बुद्धि और भ्यानके द्वारा परमात्माको देखते है और कोई सांख्य योग अर्थात् ब्रह्मज्ञान से और कोई कर्मयोगी पुरुष कर्म फलको ईश्वरके अर्पण करनेसे परमेशरको देखते हैं । २४ । और कितनेही पुरुष इस प्रकारको न जानकर दूसरे प्राचार्यों से | मुनकर उपासना करते है वह गुस्से मुनेहुये उपदेश में पूर्ण विश्वास रखनेवालेभी संसारको अवश्यतरते है । २५ । जितने जड़ चैतन्यजीव उत्पन्न होते है है | भरतर्पभउनका पैदाहोना तेन और क्षेत्र के योगसे जानो । २६ । जो सब | सृष्टि में सदैव नियत नाशहोने वालों में नाश न होनेवाले परमेश्वरको देखता है वही देखने वाला है, । २७ । अपने शरीरके समान सन शरीरोंमें अच्छे प्रकार से नियत ईश्वरको समानता पूर्वक देखता हुआ शरीरादिक के सम्बंध हेतुसे ment to tho qualities is the causo of bnth in a good or evil body 21 In thus body the superior soul who 13 called Maheshwara, is the observer, the director, the protector, the partaher He who the Purusha and Prakriti, together with the Gunr or qualities, whatercr mode of life le may lerd, he is nover born again. Somc men, by meditation, lehold the spirit witiun themselves, others ly Sankher yog and others by harma yon 21 Others ngun sho aro not acquunterl with this but lure heard it from others these also, by adhering to that they have heard, gass beyond the gulf of death 25 Knou, O chief of isharntas, that cicry creature, whether animate or inanunntc is produced from tho union of Kshetri and Kshetrajz ?, matter and spirit. Ho ho sccs the Supreme Being alike in all things, inde tructible within destructible, sees in reality 27 By ing that Gol in all things is the func onc dons not of luself conceites conceir- (४४२९) श्रीमद्गगवद्गीता Blhagavadgita [4429] प्रश्यत्तिसपश्यति ॥२८॥ समपश्यन् हसर्वत्र समवस्थितश्विरम् । नदिनस्त्यात्मनात्मान ततोपातिपराङ्गतिम् ॥२९॥ प्रात्यवचकर्माणि क्रियमाणानसर्वशः।यापश्यातितयामान. सकर्तारं स पश्यति ॥ ३० ॥ यदा भूतपृथगमावर्मकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३१ ॥ अनादित्वान् निर्गुणत्यात् परमारमायमव्ययः । शरीरस्थोपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३२ ॥ यथा सर्वगतं सौदम्यादाकाश नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देखे तथात्मानोप लिप्यते ॥ शयत्येकः कृतन लोकमिमं रविः । क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥३४॥ क्षेत्रक्षेत्रनयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृति मोक्षश्च पे चिदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३५ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि मू० क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योगोनाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥ पर्वणितु सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥३७॥ . यथा नका. आत्मारूप ईश्वरको पाडानहीं देताहै वहीअन्त में मोक्षको पाताहै।२८ानो कर्मोको | प्रकृति से किया हुआ देखता है और इसी प्रकार आत्माको अकर्ता देसताहै वह देखताहै ।२९।जयजीवोंको एकमात्मामें लयहोता हुआ देखताहै औरउसीएकआत्मासे | विस्तारको देखताहै तब ब्रह्मको प्राप्तहोताहै ।३०। हे अर्जुन यह अविनाशी परमात्मा आदि रहित और गुणोंमे पृथक् होनेसे शरीरमें वर्तमान होकरभी कर्म नहीं करताहै और न लिप्त होताहै । ३१ । जैसे कि सर्वव्यापी आकाश असंग स्वभावसे लिप्त | नहीं होताहै इसीमकार देह के भीतर सर्वत्र नियत आत्माभी लिप्तनहीं होताहै ।३२ । हे भरतवंशी जैसे कि मूर्य इस संपूर्ण लाकको प्रकाशित करता है उसी प्रकार तंत्रज्ञ आत्मा नानाप्रकारका रूप धारण करने वाले क्षेत्ररूपशरीरको ममाशित करताहै, । ३३ । जिन्होंने इसप्रकारसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको जानकर ज्ञानरूप नेत्रकेद्वारा अथवा आकाशादि भूतोंकी मूलरूप जो त्रिगुणात्मिका विद्या है उसके विद्यारूपसे मोक्षको जानाहै वह मोक्षको पातेहैं। ३५ । injure his own soul, and goes to the supreme goal. 28. He who sees all actions performed by Prabriti ( matter ), sees that Atma is inactive. 29. When he sees the different specices in nature centred in unity, and proceeding from it, he then reaches Brahuia 30. This supreme and incorruptible Spirit, eren when it is in the body, neither acts nor is affected, because it is without beginning and without quality. 31. As the all pervading ether, being subtle, is not affected, eren so tho omnipresent spirit remains in the body unaffected. 32. As a single sun illumines the whole world, eren to does the spirit illnmine the whole body. 33. They who, with the aid of wisdom, perceive the body and the spirit to be thus distinct, and that there is a final release from the animal nature, co to the Supreme. 34.

44301 Maliablıarat (४४३०) श्री भगवानुवाच । पर भूप प्रवक्ष्क्षामि नानानां ज्ञानमुत्तमम् । यजज्ञात्वा मुनय सर्व परां सिद्धिमितो गता ॥ १॥ इद ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्य मागता । सर्गेपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यन्ति च ॥ २ ॥ ममयोनिमहद्मा तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम् । सम्भव सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥ सर्वयोनिपुकौन्तेय मूर्तय. सम्भवान्त या । तासा ब्रह्म महद्योनिरहं वजिप्रद पिता ॥४॥ सरघरज स्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवा | नवधनान्त महावाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥५॥ तत्र साव निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् । सुखसतेन वध्नाति नानसङ्गेन चानघ ॥ ६ ॥ रजो रागात्मक विद्धि तृष्णाससमुद्भवम् । तानवध्नाति कौन्तेय कर्मस अध्याय १४ ॥ श्रीभगवान वाले कि हे अर्जुन अव मै महाउचम ज्ञानको कहूंगा जिसको जानकर सवमुाने लोगों ने इस संसार मे पृथक् होकर मोक्षरूपा महासिदि को पा. या है। जिन्होंने इसानको आश्रयकरके मेरे भावोंको पायाहे वह सृष्टि के उत्पत्ति काल में भी उत्पन नही होते है और प्रलय में भी कालाग्नि से पीड़ित नहीं होते है । २ । मेरी योनि महत्तत्व की प्रादिभूतामाया है उस में गर्भको मैं धारण करता हूं हे भरतवंशी उसीसे सब भूतों की उत्पत्ति होती है । ३ । हेअर्जुन सव योनियों में जो जीव उत्पन्न होते है उनकी योनि महत् ब्रह्म है और मैं वीर्य का देनेवाला पिताहूं। ४ । हे महावाहु यह सच रज तम तीनोंगुण उसमाया से उत्पन्न हुयैहै वहगुण रूपान्तर दशा रहित प्रात्मा कोभी देहमें बन्धन करते हैं ॥५॥ हे निष्पाप अर्जुन उनगुणों में सतोगुण निर्मलता होनेसे तो सबका प्रकाश करने वाला होता है और मुख और ज्ञानके संग से बन्धन करताहै। ६ । और तृष्णा और संगसे उत्पन्न रजोगुण को राग सरूप जानो हे अर्जुन यह रजोगुण LECTURE XIV. of the threo gunas or qualities. Krishna - I will now reveal to thee the superior wisdom which liaving learnt, all the Munis havo passed hence to the supreme per, fect on. Those who embrace this wisdom, attain to my stato and aro not born at solution nor suffer at dissolution. 2 The great Brahma is my womb In it I place the germ from a hich all brings are produced. 3 Tho great Brahma is the womb of all the forms which aro born of every womb, and I am the father who sows tlie secd.4 Sistica, Rajas, and Tamas aro matter born qualıties which confine tho incorruptible spirit n tho body. 5 Tho Satua, because of its purity, is luminous and painless and links (souls) to bliss and wisdom. G. Rajas is of a passionate naturo ८ श्रीमद्भगवद्गीता BHAGATANGIT: {4431] अन देहिनम् ॥ ७॥ नमस्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सदाहनाम | प्रमादालस्यान प्रामिस्तत्रिवनाति भारत ॥ ८॥ सावं मुख्ने सहयातरजः कर्मणि भारत । ब्रानमा वृत्यतु तमः प्रभादे सज्जयायुत ॥ ९॥ रजस्तमश्चाममप सत्वं मति भारत । रजः सत्वं तमश्चैव तमः सर्व रजस्तथा ॥ १ ॥ सर्वद्वारेषुदेहेस्मिन् प्रकाश उप जायते । बानं यदानदा विद्याद्विवृद्धं सत्व मित्युत ॥ ११ ॥ लोमेश्वृत्तिरारम्मः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्ध भातर्पम :॥ १२ ॥ अप्रकाशो ऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एयच । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्ध कुरुनन्दन ॥ १३ ॥ पदासत्वे प्रवृद्धेतु प्रलय याठि देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान् प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥ रजास प्रलयगाया कर्मसहिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिपु अभिमानी शरीर को काँक कर्म फलकी इच्छा से बन्धन करता है । ७ । और सब अभिमानी शरीरोंको मोह करने वाले तमोगुण को अज्ञान रूपमाया की आ- वरण शक्ति से उत्पन्न जानो हे भरतवंशी वह तमोगुण प्रमाद, आलस्य, निद्रा, इत्यादि से बन्धन करता है । । हे अर्जुन सतोगुण सुख में प्रवृत्त करता है, रजोगुण कर्म में और तमोगुण ज्ञानको ढककर प्रमाद में लगाता है । ९ । हे भरत वंशी रजोगुण तमोगुण को स्वाधीन करने से सतोगुण की बाद होती है और सतोगुण तमोगुण को शांत करने से रजोगुण की बाद होतीहै और सतोगुण रजो. गुण को आधीन करनेसे तमोगुण दि पाता है। १० । जयइस देह के भीतर वायाभ्यन्तरकी इन्द्रियरूपद्वारों में प्रकाशम्पज्ञान और सुख उत्पन्न होताहै तब सतोगुण की हो जानो११और हे अर्जुन रजोगुणकी दृद्धि होनेपरलोम प्रचाते प्रारम्भ अशान्ति इच्छा इत्यादि सबातें उत्पन्न होतीहैं।१२।और तमोगुणकी अतिशय धादि होनेपर अप्रकाशता, कोका न करना प्रमाद मोह इत्यादि सब वस्तु उत्पन्न होती हैं । १३ । जब सतोगुण की अतिशयदि होनेपर किसी का मरना होजाता है तब देवताओं के निर्मल क्लेशरहित लोकों को पाता है। १४ । रजोगुण में शरीर arising from desire and attachment; it ties the embodied to Work. 7. Tamas begets ignorance and deludes all the embow died beings and by heedlessness it binds one to sloth and sleep. S. Satwa prevails in felicity, Rajas in action, and Tamas, having clouded wisdom, prerails in intoxication. 9. Orercoming Tanas and Rajas, Satwa prefails; Rajas over Sativa and Tamas; and Tamas over Satira and Rajas. 10. When visdom, shines through all the avenues of this body, then shall it be known that Sat. wa is prevalent. II. Greed, unrest, nndertaking works, disquiet and desire, are produced from the prevalence of the Rajas. 12. The tokens of the Tam are gloominess, 'idleness, sloth, and distraction of thought 13. If the body is dissolved rhilst Satta prevails, tho VYhin tlo soul proceeds to the spotless regions of the blest. 14.

[4432] Mahabharat (४४३२)- जायते ॥ १५ ॥ कर्मण सुस्तस्याहु सात्विक निर्मल फलम् । रजसस्नुफलदु स मज्ञान तमसः फलम् ॥ १६ ॥ सत्वात् सजायते धान रजसो लोभएवच । प्रमादमोहा तमसो भवतान्न नमेयच ॥ १७ ॥ ऊर्य गन्छन्ति.सस्त्वस्थामध्योतिष्ठन्ति राजमा । जघन्यगुणवृत्तस्था अघो गच्छन्ति तापसाः ॥ १८ ॥ नान्य गुणेम्प' कर्सार यदाद्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च पर वत्ति मद्भाच सोधिगच्छति ॥ १९ ॥ गुणानेतानतीत्यत्रीन् देहो देहसमद्भवान् । जन्ममृत्युजरादु खौर्वमुक्तामृतमश्नुते २०॥ गर्जु। उवाच । कैलि स्त्रीन् गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचार कथञ्चै तास्त्रीन् गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥ श्रीभगवानुवाच । प्रकाशचप्रवृत्तिश्च मोहमेवच त्यागहोने पर कर्मफल चाहने वाले पुरुषों में उत्पन्नहोता है इसीप्रकार तमोगुण में मरनेवाला चांडाल आदि में वा पशु पक्षियों में उत्पन्नहोता है । १५ । अच्छी रीति से किये हुये सतोगुणी कर्म का फल दुख और अज्ञान से रहित निर्मन और ज्ञान वैराग्य आदि युक्त सात्विक धर्म है रजोगुणी कर्म का फल दुःख है और तमो गुणी कर्म का फल अज्ञान है । १६ । सतोगुण से ज्ञान उत्पन्नहोता है रजोगुण से लोभ पैदाहोता है और तमोगुण से प्रमाद मोह और अज्ञान पैदाहोते हैं । १७ । सतोगुणी पुरुप ऊपर जाते है अर्थात् देवभावको पाते है रजोगुणी मध्य में नियत होते है अर्थात् मनुष्य शरीर को पाते है और नीचगुणोंकी वृती में नियत तामती पुरुप नरक को जाते है अर्थात् पशु पक्षी आदि में उतान्नहोते है । १८ । जब इप्टारूप जीव सिवाय गुणों के किसी दूसरेको नहीं देखता है और जो गुणों से परे मुझको जानता है वह मेरेनह्मभावको पाता है । २९ । जीवात्मा इन तीनगुणों को जिनसे कि स्थूल शरीर की उत्पत्ति है उल्लंघन करके जराजन्म मरणके दुःखों | से रहितहोकर मोक्ष को पाताहै ।२० । अर्जुन बोले कि हे प्रभु कौनसे चिह्नों से इन तीनों गुणोंको उल्लंघन करनेवालाहोता है उसका कैसा प्राचार है और किस body finds dissolution whilst Rajas 18 predominant, one ,s born nmongst those who are attached to action Likewise dying when Tamas 19 prosalent, one is born in the wonebs of irrational beings. 1. The frut of good works is called pure and hols, the frut of the Rajas is pun, and the fruit of Tanks 18 ignorance From Satwa is produced wisdom, from Rijns covetousnes, and from Tomus mrdness, distmction, and Ignorance. Those fixed in Satwa, mount on Hugh, thoso of the Nijas stny in the middlc, whilst those abject fulloners of Tainus sink belos 18 When tho seeriperccises no other ngent than the qualities, and knows plat na ley ond them, ho enters 19 Surpassing these three qualities, co existent with the Lolly, the roul 13 dels ered from birth and death, old age and fun and drinks of the water of immortality ARJUNA-By mint toho is it hnown that a man liaz surjussed these thro qualitsus? 16 17 iny state 20 ४.३३ श्रीमद्भगवद्गाता Blingarsdata [4183] च पांडय । नवेष्टा सम्मवृत्तान नानवृत्तानि कांक्षति ॥ २२ ॥ उदासीनधदा सानो गुणों न विचाल्यते । गुणा वर्तन्तइत्येव योवातष्ठात नगते ॥ २३ ।। समदु न मुस स्वस्य समलोष्ठाश्मकांचन । तुल्यप्रियाप्रिया धीरस्तुल्यनिन्दात्मसातुति ॥ २४ ॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुत्यो मिनारिपक्षपो सीरम्मपरित्यागी गुमातात. स उच्यते ॥ २५ ॥ माच योऽव्यभिचारेण भक्रियोगेन सेवते स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कलाते ॥ २६ ॥ ग्रह्मणा हि प्रतिष्ठाहममृतस्याम्पयस्य च । शाश्वतस्यच धर्मस्य सुरसस्यैकान्तिकस्यच ॥ २७ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि मू० गुणत्रयविभाग योगोनाम चतुर्दशोऽध्याय ॥२४॥ पर्वणितु अष्टनिंशोध्यायः ॥३८॥ गति से इन तीनों गुणों को उल्लंघनकरके वर्ताव करता है । २१ । श्रीभगवान् योले हे पाण्डव प्रकाश, मत्ति, मोह यह तीनों सत्चाहे गुणों के कार्यरूप है जो वह अन्तःकरण आदि में वर्तमान होय तो उनसे शत्रुता नहीं करता है । २२ जो उदामीनके समान नियत होकर गुणों से चलायमान नही होताहै अर्थात् पेमा जानता है कि यह गुणों का वर्ताव है उस बुद्धि में नियत होकर जो स्थिरना से निपत है वह चलायमान नही होता है । ०३ । सुख दुःखको समान जाननेवाला वा अपनी इच्छा से नियत लोहे पत्थर मुवर्ण को वरापर समझनेवाला अथवा मिय अप्रिय वा निन्दा स्तुति में समबुद्धि धैर्यमान मानापमान रहित शनु मित्रमें समभाव होकर जो प्रारम्भ कर्मों का त्याग करनेवाला हे वह गुणातीत कहानाताई । २० । जो मुझको भक्तिमे ध्यान करता है वह इन गुणों को उल्लंघन करके ब्रह्मभाव के योग्य होताहै । २६ । मैं वेढका वा अविनाशी मोक्ष साधन का अथवा प्राचीन धर्म का पोर मोक्षरूपी मुखका अन्त स्थान हूं । २७ । What is hrs practice? Hor does he overcome them. A Krishnr-He O son of Pandu, who despises not lucidity, activity and delusion when they come upon him, mor longs for them when they disap pear, ,22 h), sitt og uncoprerned, es unagitated by the qualities, who, whilst the qualities are present, stands still and moves not, 1 ho is self dependent and the same in ease and pain, and to whom iron, stone, or gold are as one, firm ahle in love and dislike, and the same whether prused or blamed, 24 the same in honor and digrace, the same to sards the friend and the foe, and wlio for sales all cntcrpriza, such a one has surmounted the influence of the qualities 20 And he, my sertant, tho-erres me alone with due attention, overcomes the qualities and is fit to be absorbed in Bahma 26 I am the embleip of the immortal and of the loco Tuptablc, of the eternal justice, and of endles bliss. 27 23 4434] Malalibarnt (४४३४) श्री भगवानुवाच ॥ ऊर्य मूलमघ शाख मश्यत्य प्राहुरख्ययम् । छन्दासि यस्य पणांनि पस्त द स चेदवित् ॥ १ ॥ अघचो प्रस्तान्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रयाला । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि फर्मानुर-धीनि मनुष्यरोक ॥ २ ॥ न रूपमध्येह तपोपुलस्यते नान्तो न चादि च सम्प्रतिष्ठा । अश्वत्समेन मुविरुड मूलमसशस्त्रैण दृढेन छित्या ॥ ३ ॥ तत पद तत् परिमागिनन्य यस्मिन् गता ननित्तन्त भूयः । तमेव चाय पुरुप प्रपद्ये यत प्रवृत्ति प्रस्तापुराणी ॥ ४ ॥ निमानहो जिससोपा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तमामा । द्वन्द्वर्षिमुक्ता सुपर भन्याय १५॥ श्रीभगवान्याले कि ऊपरको मूल रखनेवाला और नीचेकी ओर शाग्वा रखने वाला वृक्ष अविनाशी वर्णन कियागयाहै उसरक्षके पत्ते वेद और यज्ञहैं उस क्षको जो जानता है वह वेदका जाननेवाला है। उसकी शाखा नीचे और ऊपरको फैलरही हैं और सतोगुणादि गुणों से महारादि युक्त विषयरूपी पत्तों से व्याप्त है और नीचे उस वृक्षकी जड़ें जिनसे कि कर्म बंधेहुये है फैलीहुई हैं। । उसका रुप नहीं पायाजाता है इससे यहटन आदि अन्त मे रहित है और उसके लय होनेका भी स्थान नहीं है ऐसे अत्यन्त दृढ मूलवाले वृक्षको असगरूप दृढशस्त्र मे काटकर वह ब्रह्मपद निश्चय करने के योग्य है जिस में प्राप्त होनेके पीछे पुरुष फिर नहीं लौटते हैं उस सपके आदिरूप और घटपटवामकिी शरण होताह कि आदिरहित संसारी प्रत्यक्षता रूपी प्रत्ति निकले । ४ । मोह मान और कमों के संगों समेत रागादि दोपोंको जीतनेवाले प्रात्मानेष्ठ मर्वदन्द्रीन्ति हर्पशोक रहित LLCTURE AV of purushottama Krishna ---With roots above and branches Lelry, they speal. of Ashwattha indestructible, whose leaves are the Vedas He who knows that, Iy acqulinted with the Vedas. I Its branches nourished by the Gunas spread upwards and dow awards, its buds oro the objects of seases. The roots which spread below, in the regions of mankind, are restrained by action 2 lts form is not un derstood hero, neither its beginning, nor its end nor its source When a man h23 cut down this Ashwattha with the strong are if disinterest, that place is to be sought after from whence there is no return for thoso who find it. Lot us seek the first Purusha from hom 19 produced the ancient progression of all things. 4 1hose who nro free from pride and ignorance, who karo prevail (dover (lio culs of attachment the s ul alvorled, freed from (४४३५) श्रीमद्भगवद्गीता BHAGAVADGIT: [4435 सहगच्छन्त्यमूटाः पदमव्ययन्तत् ॥ ५॥ न तद्मालयने सूर्यो न शशांको नपावकः । यदात्यान नियतन्ते तदीमपरमं गम ॥६॥ ममयांशो नीयलोके जधिभूतः सनातनः । मन पठानििन्द्रयाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७॥ शरीरं यदयानोति यघाप्युतकाममीश्वरः । गृहीत्वैतनि संघाति वायुगंधानिधारायान् ॥ ८ ॥ थोत्रं चक्षुः स्पर्शनच रखने घाणोपच । अधिष्टाय मनश्वार्य विषयानुपसेयते ॥९॥ उत्क्रामन्तं स्थितं चापि भुझानं या गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति Kानचक्षुषः । २० ॥ पतन्ती योगिनयन पात्यामन्यवस्थितम् । यतन्तोप्यक. और विया के द्वारा अविद्या दूर करनेवाले पुरुप उसप्रविनाशी पदको पाते हैं ।। उस पदमें न मूर्य प्रकाश करता है न चन्द्रमा प्रकाशित होता है अग्नि प्रकाश नहीं करमक्ता है जिसको जानकर नहीं लौटने हैं वही मेरी परमज्योति है। ६ । इम जीव लोकमें जीवरुप मेराही अंश और सनातन है वह अपने विपय रूप स्वभाव | में नियत होकर छठेमन समेत पांचों इन्द्रियों को अपनी ओर आकर्पण करता है 1 ७ । और जाग्रत उत्पात और पालनके समय इन इन्द्रियाँको अपने लय स्थान से विषय के स्यानपर लेजाकर ऐमे प्राप्तहोता है जैसे कि गंधको लेकर घायुमाप्त होती है । यह श्रेत्र, चतु, स्पर्श, रसना, घाण, इनपांचों ज्ञानइन्द्रियों को और मनको व्यापारवान करके विषयों को प्रकाश करता है । ९ । उनमन संयुक्त इंद्रियों की देहान्तर करने वाली इन्द्रियों के नियत होनेपर आपभी नियतहोकर इन्द्रियों के भोक्ताहोने पर भोगनेवाले और गुणों से संयुक्त होनेवालेको अज्ञानी लोगनहीं देखते हैं परन्तु मानरूप नेचरखने वाले उनको देखते हैं 1१०1 उपाय करनेवाले योगी इम प्रसंग प्रात्माको बुदिमें नियतदेखते हैं और जिन्होंने यज्ञादिकमौके करनेसे मनको शुद करके अपने प्राधीन नहीं किया वहस्पाय करते हुएभी इसपरमात्मा को नहीं Justy and the pairs of pleasure and pain, tread, undeluded, that en. during path. 5. Neither the son nor the moon nor the fire enlightun that place from whence there is no return, and which is the suprenie mansion of my abode 6. It is a portion of myself that in this animal sorld is the universal spirit of all things. It drans towards itself the matter-seated senses and the mind, which is the sixth. 7. Whichever body the lord (soul) enters or quits, it takes them (senses) and gres, as the breeze (tahes) the fragrance from the florer. 8. It ( soul ) presides over hearing, sceing, fex:ng, tasting and smelling, and the mind and the objects. 9. foolish see it no', attended by the. Gana or qualitics, in expiring, in being, or in enjoying; but those who are endued with the eye of risdom behold it. 10. The persistent sngis percuive it planted in their own breasts, wipe those of unrefined minds and week judgments, laboaring, find it not. sense The 11.

[4416] Mahabharat (४४३६) तात्मानो न पश्यन्त्यचतेस ॥ ११ ॥ यदादित्यगत तंजो जगदासयतेऽखिलम् । यचन्द्रमास यच्चामौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥ गामाविश्यच भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वा सोमो भूत्वा रसात्मक' || १३ ॥ मह वैश्वानरो भूत्वा प्राणिना देहमाश्रित । प्राणापानसमायुक्त पचाम्यन्नंचा विघम् ॥ १४ ॥ सर्वस्य चाह हृदिसन्निविष्टो मत्त. स्मृतिज्ञानमपोहनश्च । घेदैश्च सर्वे रहमेव वेद्यो वेदान्तद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥ द्वाविमौ पुरुषी लोके क्षरश्चाक्षर एवच । क्षर, सर्वाणि भूतानि कूटस्थोक्षर उच्यते ॥१६॥ उत्तम पुरुषस्त्यन्य. परमात्ममेत्युदाहृत । योलोनयमाविश्य विभयव्ययईश्वर ॥ १७ ॥ यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तम । अतोस्मिलोके वेदे च प्रथित पुरुषोत्तम देखते है ।"। जो तेज सूर्य में वर्तमानहोकर संपूर्ण संसारको प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमा और अग्नि में है उसको तुम मेराही तेज जानो । १२ । | मै पृथ्वी में प्रवेश करके अपने तेजसे संसार को धारण करता हूं और जल रूप चन्द्रमा होकर सव औपधियों को रससयुक्त करके पुष्टकरता हूँ। १३। मैहीं वैश्वानर नाम अग्निहोकर सर जीवोंके शरीर में नियतहोकर प्राण अपान से संयुक्त भक्ष्य भोज्य चूप्य लेद्य इनचारों प्रकारके पदार्थोको पचाताहूं । १४ । मै सबके हृदयमें | वर्तमान आत्मा है मुझ आत्मा रूपसे स्मृतिज्ञान और अज्ञान है और मैहीं सब | वेद द्वारा जानने के योग्यहूं और वेदान्तका कर्चा और वेदार्थका ज्ञाताहू । १५ । लोकमें यहतर अक्षरनाम दोही पुरुप है सब संसार तर नामहै पोर रूपान्तर दशा रहित अक्षर नामसे प्रसिद्धहै । १६ । उपाधि से रहित उत्तम पुरुप परमात्मानाम तीनों लोक वालोंके शररोिं में प्रवेश करके रुपान्तर दशासे रहित सबका पोपण करता है। १७ । जोकि मै क्षरसे पृथक् और उपाधियुक्त जीवसेभी उत्तम हूं Know that tho light in the sun which illumines the whole world, and the light which is in the moon, and in the fire, is mine Permeating the earth, I support all things by ny vigour and lecoming the juicy moon I nourish all the plants 13 I am tho fire residing in the budies of all living leings, and joined with Pranz and Apana, I digest the four fold food II 1 penetrate into tho hearts of all, trom mo piocced memory, knowledge, and the loss of both I am to be known by all the Vedas and I am heslo hnows thru Vedrs 15 There as two kinds of Purusha world, the one corruptible and the other incorruptible Thic corruga tillo Purusha is the body of all thing, the incorruptible one is constant There is another Purusha most high, the Pare minton or 5 iprrinc soul, who peliades and sustains the three work's, tlic incurruptible Ishara. 17 Because I am al ore cortul tion and sup nor to incorruption, wherefore in the world, and in 12 in the 16 (४४३७) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavndgita [4437] ॥ १८॥ यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुत्तमम् । ससंबीयत भजतिमा सर्वमायन भारत ॥ १९ ॥ इति' गुह्यतम शास्त्र मिदमुश्मुक्तं मयानघ । एतयुध्वावुद्धिमान स्यात् कृतकृत्पश्च भारत ॥ २० ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतामू० पुरुषोत्तमयोगोनाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१६॥ पर्वणितु ऊनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥३१॥ श्री भगवानुवाच । अभयं सत्यसंशुद्धिमानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश यत्रश्च स्वाध्यायस्तपआर्जवम् ॥ १ ॥ अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् । दयाभूतेचले लत्वं माईवहीरचापलम् ॥ २ ॥ तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो इसी कारण से लोक और बेदमें पुरुपोत्तम कहाजाता हूं । १८। जो मुझको संशय माद रहित होकर पुरुपोचम जानताई बहसर्वज्ञहै और हे अर्जुन वही मुझको सब भाव और रीति से भजता है । १९॥ हे निप्पाप भरतवंशी अर्जुन मैंने यह अत्यन्त गुप्त शास्त्र तेरे आगे वर्णनकिया इसको जानकर बुद्धिमान् ब्रह्मज्ञानी कमों से निवृत मोक्षको पाता है ॥२०॥ अध्याय १६॥ श्रीभगवान बोले कि भय न करना, चिचकी निर्मलता, ज्ञानयोगके निष्ठावान, नितेन्द्री,श्रौतस्मार्त्तयज्ञ, वेद पढ़ना,तप, सरलभाव ।१। अहिंसा, सत्य,क्रोध न करना, | त्याग,शान्तिचित्तकी शान्ती, पराये दोपों को न कहना, दुखी जीवोंपर दयाकरना, विपरीत दशासे रहितहोना, मृदुता, लज्जा, नचि कर्मों में किसी अंगको प्रच न करना ।। तेजसे प्रगल्भता,क्रोधयुक्त न होना, धैर्य्यता, पवित्रता, शत्रुतारहित होना, the Vedas, I am called Purushottama, 18, The man of a sound judgment, who knows ine as the Purushoztam, knows all, and serves me in every principle. 19. Thus, 0 Arjuna, have I made Inowa to thce this most mysterious Shastra; lie who uoder. stands it shall be wise and shall liave accomplished all that is fit to be done. 20. LECTURE SVI of good and evil Destiny Krishna -The man who is born with Divine destiny is endned with the following qualities: Fearlessness, purity of heart, settlement in the yog of wisdom, charity, self-restraint, sacrifices, study, penance, rectitude; (I) harmlessness veracity, absence of anger, resignation, temperance, freedom from slander; universal compassion, uncoretuousness, mildness, modesty, ficklelessness, (2) lustre, patience, fortitude, chastity, unrevengefulness, and free.

[ 4438] Mahubhaint (४४३८)। नातिमागिता । भवन्ति सम्पद देवीमाभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥ दम्भोदपोऽभि मानध के पारुभ्यमेयच । अन्न नचाभजातस्य पार्यसम्पदमाहुरीम् ॥ ४ ॥ देवी सम्पद्विमोक्षाय नियन्यायासुरीमता । माशुच सम्पद देवोमभिजानोसि पण्डय । ५ ॥ द्वीभूतसौ लोफेस्मिन् देव आसुर एवच । देवो विस्तरश प्रोक्त आसुर पामे गृणु।६। प्रवृत्ति निवृत्तिञ्च जना न घिदुरासुरा निशौचनापि घाचागे न सत्य तेषावद्यते ॥ ७ ॥ असत्यमप्रतिष्ठन्ते जगदारनीश्वरम् । अप | रपरसभूत किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥ एता हाष्टमयष्टभ्य नटात्मानोत्पबुद्धय । प्रभवन्त्युग्रफर्माण जयाय जगतोऽहिता ॥ ९ ॥ काममाश्रत्य दुप्पूर दम्ममान अभिमान न करना, हे भरतर्षभ देवी सम्पत्तिके प्रागे जन्मलेने वालोंको यह गुण होते है।३पाखण्ड, धनका गर्व इत्यादि अपनीमहन्वता चाहना, क्रोध, कठोर वचन, अज्ञ न, यहगुण प्रामुरी सम्पत्ति के उदय होनेवाले के है ।४। दैवी सम्पात्ते मोत के निमित है और प्रामुरी सम्पचि सदैव वन्धन करनेवाली कही जाती है सो हे अर्जुन तू दैवी सम्पत्तिके सम्मुख उत्पन्न हुआहै इस्ले शोकमतकर । ५ । हे अर्जुन इस लोकमें जीवों के स्वभाव दा प्रकारके है एक दैव दूसरा भामुर इनदोनों में देव स्वभावको तो ब्यौरवार कहा अब प्रामुर स्वभाव को कहता हूं। ६ । मासुर मनुष्य प्रवृत्ति नित्ति को नही जानकर अपवित्र होते है और आचार सत्यता आदि से रहित होकर वह पुरुप संसारको भी यथार्थ राहित धर्माधर्म और मतिष्ठासे खाली कहते हैं और यहभी कहते है कि इस का कोई ईश्वर नहीं है यह पुरुष स्त्री के संग से उत्पन्न हुआ है इसका हेतु कामदेव है । ८ । ऐसे निर्बुदी भयानक कर्मी दुष्ट लोग जिनके धैर्यादि नष्ट होगये है वह ऐसे प्रमाणको आश्रयकरके जगतके नाशके लिये उत्पन्न होते है । ९ । वह कपटी मानी भ्रष्टनती कठिनता से पूर्ण होने वाली कामनाओं को प्राश्रय करके प्रधानतासे नीच कर्मों को अंगीकार करके संसारके dom from vain glory, these are his who 1s torn with the divine properties, 0 Bharat 3 He who is Lorn sath asur properties, 19 distinguished by" 13 pxcriss, pride, presumption, anger, harshness of speech and ignoronce, 4 The discue chixracter is for Mohsha and tho nsur for bondige lerr not, Arjuna for thou art born of the divno hind 5 Then are two hands of beings in the world The dirinc naturo ling been fully explained. Henr whnt the evil rature 13. Asuras know neither activity nor abstinence, nor is purity, sercity, ur morality found in them. They say the world is unreal, without prop and without bord, ur ruglit about by mutual union and having lust for its cus Holding this is the lost soul, smallwitled, of cruel deeds, sile beings become the ruin of the worldh O. Surrenderin; thensselies to eatiablo desires, seizing unlawfully by deluson, 1830.jatat mith hypocrisy, pride and passion and proce G 8 (५४३९) श्रीमद्भगवदगीता Bhagavadgita [4439] मदान्विता: मोहाइगृहीत्वाऽसदनाहान प्रवत्तऽन्तशुचिप्रताः ॥ १०॥ चिन्तामपरिमेयांच प्रलयान्तामुपाश्रिताः । कामोपभोगपरमा एतापदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥ भाशा पाशशतैर्वधाः कामक्रोधोपरायणाः । ईहन्ते काममोगार्थमन्यायेनार्यसंचयान् ॥१२॥ इदमद्यमयालन्धमिदं प्राप्स्ये मगोरथम् । इदमस्तादमाप में भायप्पात पुनर्धनम् ॥ १३ ॥ असो मया हतः शत्रुहनिये घापरानपि । ईश्वरोहमहंगी सिरोह बलवान्सुखी ॥ १४ ॥ अन्योभिजनवानस्मि कोयोन्ति सदृशोन्या । यध्येदा- श्याम मोदिप्ये इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥ अनेकचित्तवित्रान्ता मोहजालस मावृताः । प्रसक्ता कामभोगयु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥ अात्मसम्भाविताः स्तब्धा, धनमानमदान्विताः। यजन्तेनाम योरते दम्भेनाायधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥ नाशके लिये कर्मकर्चा होतेहैं । १० । वह लोग मृत्युकारी महा चिन्ताओंमें डूबे हुएहैं और कायादि भोगोंको जीवनका फल मानने वाले हैं। १.२५ और जोकुछ दृश्य मानहै उसको निश्चयकरके वहीमानते हैं और प्राशारूपी हजारों वन्धनों से बंधेहुए काम क्रोधहीको मुख्य स्थान समझने वाले कामभोग के लिये अनर्थों के द्वाराधन समूहों को चाहते हैं । १२ । यह प्राप्तहुआ इस मनोरथ को पाऊंगा यह है और फिर यह सब मेरा धन होगा । १३ । यह शत्रु मैंने मारा और उन शत्रुओं को भी मारूंगा मैं समर्थहं भोगीहूं श्रद्धात्मा हूं वलीहूं और मुखीहूं । १४ । धनीहूं कुलवान हूं मेरे समान कौनहै यज्ञादि करूंगा दान करूंगा आनन्द करूंगा ऐसे अज्ञानोंमें भूलाहुआहै ।१५। बहतसे विषयों में प्रत होने से चित्त से व्याकुल मोहरूपी वन्धन में बँधा हुआ काम और भोगों में प्रत्त चित्र पुरुप महाघोर नरकों में गिरने हैं। । १६ । पानेको वड़ा मानने वाले स्तब्ध अहंकारी धनके मदमें भरेहुए मनुष्य tising nnholy vows, they prevail. 10. Because of their folly they adopt false doctrines, and continue to live the life of impurity, indulging in sensual appetites as the supreme good. 11. Fast bound by the hundred cords of hope, and given up to lust and anyct, they seek by imjustice to hoard wealth for the gratification of their inordinate desires. I2. This, today, has been acquired by me. I shall obtain this object of my heart. This wealth I have, and this shall I have also. 13. This foe have I already slain and others will I forth with vanquish. I am Ishwara, and I enjoy; I am con sunmate, I am powerful, and I am happy. 14. I am rich, and well-born; where is there another like unto me? I will make presents at the feasts and be merry." Thus talk those who are infatuated by ignorance. 15 Confounded with various thoughts, entangled in the net of folly, and attached to the gratification of their lusts, thoy sink at length into the Naraka of iniquity.. 16. Being self-conceited, stubborn and pufod up with wealth and pride, they perform nominal sacrifices for show and not according to divine - 4440] Malabharat यहकार बल दर्प काम क्रोधश्च सनिता । मामात्मपरदहेषु मद्विप तोश्पस् पका' ॥ १८ ॥ तानह द्विपित कूरान् ससारेपु नराधमान् । सिपाम्यजसमगु भानासरोवेव योनपु ॥ १९ ॥ आसुरों योनिमापन। मूढा जन्मनि जन्मनि । ममा माप्दैव कौन्तेय ततोयान्त्यघमागतम् ॥ २० ॥ विविध नरकस्यद द्वार नाशनमारमन । काम कोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्रय त्यजेत् ॥ २१ ॥ पतैर्विमुक्त को तेय तमौद्वार स्त्रि भर्नर । आचरत्यात्मन थेयस्ततो यातिपरागतिम् ॥ २२ ॥ य शास्त्र विषि मन्सत्य वत्तते कामकारत । न स सिाद्धमघाप्नोति न सुख न परा गतिम् ॥२३॥तस्मा ज्छ स्त्र प्रमाण ते कार्याकार्यव्यवस्पिती। ज्ञात्वाशास्त्रविधानाक्त कर्मकर्तुमिहाहसि२४ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गीता देवासुरसम्पाद्विभागयोगोनाम पोडशोऽध्यायः ।। १६ ।। पर्वणितुचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४० ॥ पाखण्ड करके बुदिके विपरीत नाममात्र यज्ञों से पूजन करते है, । १७ । अहंकार वल दर्प काम क्रोध इत्यादि को आश्रय करके वा घातादिक कर्मों से अपने शरीर से दूसरे शरीरोंमें मुझ जगदात्मासे शत्रुता करते है। १८ । हे अर्जुन मै अन्तरात्मा उन शनुता करनेवाले निर्दयी सबसे अपम पापात्माओं को सदैव आसुरी योनियों में डालताहू । १९ । फिर वह अज्ञानी आसुरी योनियों में पड़े हुए जन्म जन्मान्तर में | भीमुझको न पाकर अपम पशु पक्षी वृक्ष आदिके शररोिं को पाते है । २० । यह काम क्रोध लोभरूपी नरकके तीनों द्वार नाश करने वाले है इसकारणइन तीनोंको त्यागकरे । २१ । हे अर्जुन इनतीनो नरकके द्वारोसे अत्यन्त अलगहोकर भगवत् भजन आदि कल्याणों को क है तब परममोक्ष रूप गति को पाताहै । २२ । जो मनुष्य शासवाद को त्यागकर मनके इच्छारूपी कमों में प्रप्त होता है वह मनकी शुदी को और मुसपूर्वक मोक्षको नही पाता है । २३ । इसहेतु से कर्तव्य अकर्तव्य व्यवस्थाओं में तू शास्त्र को प्रमाणकर अर्थात् जिसकी जैसी विधिशास्त्र में कही हुई है उसको ठीकही जानकर कर्मों को करना योग्य है । २४ । ordination. 17 Placing all their trust in pride, porer, ostentation), lust, and anger, they maliciously hate me in themselves and others I cast down upon the earth those furious, abject sretches thoso ovil beings, in demonincal Frombs 19 lntering the woniks of Asuras from birth to both, at length not finding me, they to the infernal region 20 There are these three passages to Nara ka lust, anger, and a rice, which are the destrovers of the coul vherefore a min should aroid them. 21 Bung freed from these dark grates of sin, he advances luis own happiness, and at length he gous to the Highcst end 22 le ssho abandong the dictates of bus lusts, attains neither perfection happiness, nor tho bughest goal Wherefore, O Arjnna, thy authority is Shastrn, in determin ing shat is fit and unfit to be done, thou shouldst perforin those works vluch 110 declared by the commandments of the Shastra 24 18 63 (४४४१) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4411] सर्जुन उवाच । ये शास्त्रविधिमत्सृज्य यलन्ते अद्धयान्विताः । तपांतिष्टात कारण सत्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच । विविधा भवति श्रद्धा देहिनां सास्वमायजा। सात्विकी राजसी चव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥ सत्वानुरूपी सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत | अद्धामयोयं पुरुपो यो यच्छदः एक्सः ॥ ३ ॥ पजन्ते सायिका देवान् यतरक्षांसि राजसाः । प्रेतान् भूत. गांवाये पनन्त तामसाजनाः ॥ ४॥ अशास्त्रविदितं घोरं तप्यन्तये तपो जनाः । दम्माहकारसयुक्ताः कामरागवलान्यिताः ॥ ५ ॥ फर्शयन्तः शरीरस्थं भूतनागम चेतसः । माश्चैवान्सःशरीरस्थां तान् विद्धयापुर निश्चयान् ॥६॥ आहारस्वपि सर्वस्य अध्याय ॥ १७॥ अर्जुन पोले हे श्रीकृष्णजी जो श्रद्धावान पुरुष शास्त्राद्धको त्यागकरके ईश्वरका भमन पूजन करते हैं उनकी कौन निष्ठा है सतोगुणी वा रजोगुणी अथवा तमोगुणी है, । १५ ॥ श्रीभगवान बोले कि अभिमानी पुरुषों की स्वभावसे उत्पन्न होने वाली श्रदा पूर्व जन्म के धर्माधर्म से उत्पन्नहै वह सतोगुणी रजोगुणी और तामसी इनतीन प्रकारकीहै इनतीनों मकारकी श्रद्धाको कहता हूं ।२। हे भरतवंशी पूर्वकर्म संस्कार के अनुसार जो बुदिवलहै उसीके अनुरूपसबकी अदा वनीहुई रहतीहैयहश्रद्धाहै जो जैसी श्रद्धावाला है वह उसी श्रद्धा के गुणोंसे प्रसिद्ध होताहै सतोगुणों पुरुष देवताओं को पूजते हैं रजोगुणी मनुष्य यक्ष राक्षसों को और तमोगुणी लोग मेत भूतादिकों को सेवन करते हैं । ४ । वेदादि शास्त्रोंके विरुद्ध घोरतपोंको जो मनुष्य करते हैं और पाखंड पूर्वक अहंकारमें भरे हुए विना विचार किये विपयकी इच्छा से दुरी वासना करके विपप साधन में संयुक्त हैं । ६ ! वह अज्ञानी शरीरकी इन्द्रियों को र्निवल करने वाले मुझ शरीरवरी को भी अप्रसन्न Chapter X1'11 The threefold'division of Faith Arjuna - --How is that sacrifice characterised, Krishn, which is performed in faith, against the precepts of the Shastra ? Is it ove of Satira, Rajas, or the Tamas? I. Krishna-The faith of mortals is of three kinds, denominated after the thres Gunas, Satrik, Ra. jasce, or Tamasee. Hlear what these are. 2. The faith of every one accords with his nature; man is saturated with faith; he is that which his faith is 3. Sittwic man sorships the Deros; Rajasic the Yakshas and Rakshasas; the Tanasic Forship the Pretas and tho tribo of Bhutas. 4, Those who perform serere mortificatious not authorized by the Shastra, vedded to hypocrisy, pride, lust. passion, and strength, 5. Those fools torment the elements in the body, and me also planted in it know them to be of domoa [4442] Mahnbharat (४४४२) त्रिविधो भवात प्रिय यशस्तपस्तथा दान तपा भेद मिम शृणु ॥ ७ ॥ मायुसत्यवला रोग्यसनीतिविपर्धना । रस्था स्निग्धा स्थिरा हृद्या माहारा सात्विज्ञप्रिया ८ ॥ कट्वाललघणारयुष्ण ताक्षणक्षविदाहिन । अहारा राज सस्थष्टा दुखशोकायप्रदा ॥ ९ ॥ पातपाम गतरस प्रति पर्युपितञ्च यत् । | उच्छिष्टमपि चामेध्य भोजन तामसाप्रियम् ॥ १. ॥ अफलाकाक्षिाभर्यत्रो विधि दृष्टो य इज्यते । यरव्यमेवेति मन समाधाय स सात्विक ॥ ११ ॥ अभिसन्धाय तु फल दम्भार्थमपि चैव यत् । इज्यत भरतश्रेष्ठ त यन्न विद्धि राजसम् १२ ॥ विधिदीनमसृष्टान्न मन्त्रहीनमदक्षिणम् । श्रद्धाविरहित यज्ञ तामस परिचक्षते ॥ १३ ॥ देवद्विजगुरुप्रान्नपूजन शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसाच शारीर तपउच्यते ॥ १४ ॥ करनेवाले है उनको असुरों में निश्चय करनेवाला जानो ।६। अन्नादि भोजन भी सवको तीन प्रकार का प्याराहै इसी प्रकार यज्ञ तप दान भी तीनही प्रकार का प्यारा है इनका विभाग सुनो। । जीवन, उत्साह, सामर्थ्य, नारोगता, सुख, प्रतिदायक वस्तु, रसीले कोमल स्थिर अर्थात् शरीर में रसके द्वारा विलम्वतक रहने वाले, देखने में सुन्दर हृदयको प्रसन्नकरनेवाल, ऐसे गुणयुक्त भोजन सात्विकी पुस्पोंको प्यारे होते है । ८ । कडुए, नोनके, खट्टे, अति उष्ण, चपरे, रूखे, अ. त्यन्त जलन करनेवाले, दुःख शोक ओर रोगोंके उत्पन्नकरनेवाले भोजन रजोगुणी को प्यारे है । ९ । दुर्गन्ध युक्त, वासी, उच्छिष्ट, अभक्ष भोजन तामसी लोगोंको प्यारा है । १० । यज्ञही करनेके योग्यहै इसप्रकार अपने मनको समाधान करके फल के न चाहनेवाले पुरपोंसे जो आवश्यकताके लिये रचाहुआ यज्ञ कियाजाता है वह सात्विको कहाजाता है, । ११ । हेभरतर्षभ, फलकी इच्छा मनमें धारण कर पाखण्ड और कपट के निमित्त जो यज्ञ कियाजाता है उस यज्ञको राजसी जानो । १० । शास्त्रकी रीति अन्नदान ओर म प्रदक्षिणा रहित श्रद्धा से विहीन यज्ञको तामसी यमजानो ।१३। देवता वालण और माता पिता आचार्य इत्यादि गुरू वा nature, 6 Thero wro three kind of food whuch are dear to all men So oro sacrifico, fusterity and charity Hear sbat arc their distinctions. 7 The food dear to Sntwik men 18 sucn os increases life, energ), vigour hcalth Joy and clish It is tasteful, nourialı ing substant al and agreeable & The fool deur to Rajasic, is bitter, four, saltish, oser hot, pungent, dry and burning, producing pain, gricfand sichness. 9 Tho fond dear to Tamasic men is that which is stale, changul, putrid, rcfuso and spure Enerifice s satic, Fluch is done mithout the desiro of ronord, 10 That jou sanctioned with a firm bel of that it is a duty 1I The sacrifice offered with a vi to fruit, and with his po-risy, is of the Injzs 12 Thnt sacrifice is lamas aluch is contriy to distril ution of Firel, without Imanture, gifts and futh I3_1Bolly Titlwut the श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [44431 अनुगकरं पापं सत्यं प्रियहितञ्च यत् । स्थाध्यायाभ्यसनव बारामपंतप उच्यते ॥ १५ ॥ मन प्रमाद सौम्यत्यं मौनमात्मचिनिग्रहः । भावससिरित्य तत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥ शद्धयापरया तप्त रापरततानाविध नरे। यफला कातिभिर्युको सायिक परिचक्षते ॥ १७ ॥ सरकारमानपूजा तपो दम्मेनचव यत् । क्रियते तादाद भोक राजस चलाभुवम् ॥ १८ ॥ मूढमाहात्मनो यत् पाडया क्रियते तपः । परस्यो त्सादनार्थ वा तत्तामसमुदाहतम् ॥ १९ ॥ दातव्य मिति तदान दीयते नुप कारिणे । देशे कालेच पाच तदान सात्विकं स्मृतम् ॥ २०॥ यत्तुप्रत्युपकारार्थ फलमुदिश्य ब्रह्मज्ञानियों का पूजन, पवित्रता, सरन्नता, सत्यता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा यहमय देह क तपकहे जाते हैं । १४ । जो वचन दूसरेका सुखदाई, सत्यता, स्नेहता सहित | सबका हितकारी है वह और वेदका अभ्यास यह वाणीकी तपस्या कही जाती है । १५ । प्रमन्नता चित्तशुद्धी सौम्यता वचनको आधीन रखना मनका रोकना | व्यवहार में प्रौरोंके साथ निश्छलता यह मानसीतप कहाता है ।28। फलकी इच्छा न करनेवाले सावधान चित्तपुरुष देह मनवाणी स जो तीन प्रकारकी तपस्या श्रदा पूर्वक करते है वह सालिकी कहाजाता है। जो तपस्पा अपनेमान स- | कार और पूजनके निमित कपटसे कीनाती है वहतपस्या इसलोकमें फलसे रहित, नाशवान् रजोगुणी कही जाती है । । पारसेक से उत्पन्न दुराग्रहसे अपने शरीर की पीड़ा अथवा दृप्सरेके नाशके निमित्त जो तप किया जाता है वहताममी कहाता है । ११ । यह दानके योग्य है इस बुद्धि से फलकी इच्छा रहित जो दान अनुपकारी पात्रको दशकालके विचारसे पुण्य क्षेत्रादि में दिया जाता है वह सा- विकी दान कहा जाताहै । २० । जो दान बदले के लिये प्रथवा फलको ध्यान austerity consists in the worship to the Dorzs, the twice bord, the teachers and learned men, in cliustity, rectitude and freedom from injury. 14 Oral susterity ages 10. gentleness, fastness, Lindness, and benignity of speech and attention to the religious studies 15 Niental auste.ity consists in good temper, benerolence quietude, self restraint, and purity purpose This threefold austerity done by men, being warm in ferrid faith, regardless of the fruit, and rith devotion, 1s Satric IT Ihe zeal which is shown by hypocriss, for the sake of the reputat on of sanctity, honor, and respect, is said to be of the Rajo Guns, and is inconstant and uncertain The austerity which is exlubited with sel torture, by the fool, without examination, or for the purpose of injuring auothcı, is of the Tamo Guu', That ciuty which is bestowed, with the idea of duty, on one who is trolle to return it, in dne place and seas.un, and to proper objects, is of the Stwc 20 Tliat which is gren in expectation of a returu, u for of IG 18 19 [4444] Malablarat (४४४३) घा पुन । दीयतेच परिक्लिष्ट तहान राजसंस्मृतम् ॥ २१ ॥ अदेशकाले यहानमपाने भ्यश्च दीयते । असत्तमयनात तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ ओतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणरित्रविध स्मृत । ब्रालणास्तेग पेदाश्च यज्ञाश्च विहिता पुरा ॥ २३ ॥ तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतप क्रिया प्रवर्तन्ते विधानोक्ता सतत ब्रह्मवादिनाम् | ॥ २४ ॥ तदित्यनमिसाधाय फल यज्ञतप क्रिया । दानक्रियाश्च विविधा क्रियते मोक्षकाक्षिमि ॥ २५ ॥ सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत् प्रयुज्यते । प्रशस्तेकर्म णि तपा सच्छब्द पार्थयुज्यते ॥ २६॥ यज्ञ तपसि दान च स्थिति सदितिचोच्यते । कर्म चैव तदर्थीप सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥ अश्रद्धयातदत्त तपस्ततं स्तश्च करके धन व्ययहोनेकांचिन्ता समेत कियाजाता है यह रामसी काहाताहै।२। जो दान देशकालकेविपरीत अपानोंकोअपतिष्ठा और अनादरसेदियाजाताहै उसको तामसीकहते है ।२२। प्रोम्तरसत् यह ब्रह्मकानाम तीन प्रकारका हाताहै पूर्वकालमें उसीनसके मामसे ब्राह्मण वा चारोवेद और यज्ञप्रकट किये गये ।२३। इसकारण ओमका उ- च्चारण करके ब्रह्मवादी अर्थात् वैदिक लोगों के यज्ञदान तपमादि सवाक्रिया जो कि वेदविधि में कही है सदैव होती रहती है । ०४। कर्मफल को अंगीकार न कर के तत कहकर मोतके चाहने वालं नानाप्रकारके यज्ञ तप दान आदिकी क्रिया ओंको करतेह।२५ हेअर्जुन यहसतनाम श्रेष्ठहै जैसे वेदभाव और साधुओं के भाव में संयुक्र कियाजाता है इसी प्रकार उत्तम कर्मभी सतशब्द संयुक्त कियाजाता है । २81 यज्ञराप और दान में जो निष्ठा है वह सत् नाम कही है और ईश्वरकी प्राति के निमित्त जो कर्म है वहभी सत्नाम कहाजाता है ।२७ । श्रद्धा रहित जो fiuit and with reluctancy, 13 Rijzsic 21 That which is given out of place and serson, and to un roi thy objects, ungraciously antl sonrnfulls us pronunced toboosthe Teme-Gara. 22 ओम् Qm na Tnt te Sat, are the three mystic chai actors used to denote the Duits By Inn in the beyinning were crcated the Bramlıons, the Vedas and sacrifices. 23 Hence the Vedic sacrifices, gifts and austerities of the crjounders of the word of God, constantly begin nith the word Om !24 With Tnt begin thc acts of sacrifices and of gift, performed by aspu ants of mol sh, not nish ing for fruit 25 The word Sat is used for reality and goodness. Sat 19 also applied to dicds which aro prnisok orthy 26 Steadlast nea m sacrifices, austerity and gifts is called Sate Deeds which nro perſormed on that account are also nanied Snt. 97 What estr is performed mithont farth, whether it he sacrifices, deeds of (४४४५) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [44453 यत् । असदित्युच्यते पार्थ नच तत् प्रेत्यनो इह ॥ २८॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि मू० श्रद्धात्रयविभाग योगोनाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥ पर्वणि एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४॥ अर्जुन उवाच ॥ संन्यासस्य महायाहो तस्यमिच्छामि दितुम् । पीकेश पृथक केशिनिपूदन ॥ १॥ श्रीभगयानुवाच । काम्यानाकर्मणान्यास संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकम्मफलत्यागं प्राहुरत्याग विचक्षणाः ॥२॥ रयाज्यं दोपवादित्येक कर्म प्राईमतीपिगः । यज्ञदानताःकर्म नन्याज्य मिति चापरे ॥ ३ ॥ निधयं शृणु में तत्र त्यागभरतसत्तम । त्यागोहि पुरुषम्यान त्रिविधः सम्मकीर्चितः॥४॥ यदानतपः त्यागस्यच दान तप यज्ञादिक किये जाते हैं हेअर्जुन वह असत् हैं वह न इसलोक में न परलोक गिनजाते हैं। २८ । अध्याय १८॥ अर्जुनयोले हे महावाहु हपीकेश केशी मूदन मैं त्याग और संन्यास को मूल समेन जानना चाहताहूं। १ । श्री भगवान बोले कि जिनमें किसी प्रकार की | इच्छा है ऐसे कर्मों के त्याग को सूक्ष्म पदार्थदर्शी पुरुषोंने संन्यास कहा है और पंडित लोगों ने सब कर्म फलों के त्यागको त्याग कहा है। २ । चिक्के जीतने वालों ने केवल कर्मोहीका त्याग दोपयुक्त रागादिके समान त्याज्य कहा है और परमात्मा के चाहने की इच्छा करने वालों ने यज्ञ दान और तपको नहीं त्यागने के योग्य कहा है । ३ । हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन उस कर्म के त्यागने में मेरेभी निश्चयको तू सुन हे पुरुषोचम त्यागतीन प्रकारका कहाहै।४। यज्ञ दान तप charity or mort'fications, is called Asat; it is neither for this world 'nor for the next. 28. LECTURE XV111 OF SALVATION u ise say Arjuna.—I wish, strongarmed ! to know the principle of Sanyasa and of Tyaga, o Keshi-slayer. 1. Krishna-Sages knot that Sanayasa means the forsaking of all actions; the that Tyaga is the forsaking of the fruits of every action. 2. Certain philosophers declare that work should be abandoned as evil, whilst others say that deeds of sacrifice, mortification and charity should not be forsaken. 3. Hear from me, o best of Bharats, the truth about this Tyage. Tyaga, o tiger of men, is pronounced to be of three natures. 4. Yajna, Dana and Tapas are not to '' शय ( 44461 Mahubharat (४४३६) कर्म न पाय काय्यं मेयतत् । यो दाम तपश्चैव पायनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥ एनान्यपि तु कण सङ्ग त्यस्त्वा फलानि च । कत्तव्यानीति में पार्थ निश्चित मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥ नियतस्यतु सन्यास वर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्थपरि त्यागस्तामस परिकीर्तित ॥ ७ ॥ दु समित्येव यत् कर्म कायश्लेशमयात्तय जेत् । स हत्या गजस त्याग नैव त्यागफल लभेत् ॥ ८ ॥ कार्यमित्येय यत् फर्म नियत कुरुतेऽर्जुन । सङ्ग त्यक्त्याफलश्चैव सत्याग सात्विको मतः ॥ ९॥ न द्वेश्यकुशल कर्म कुशले नानुपज्जते । त्यागी सत्यसमाविष्टो मेधावी छिन्नस ॥ १० ॥ न हि दहभृता शक्य व्यक्त कर्माण्यशेपत । यस्तु कर्मफलत्यागी त्यागात्यभिधीयते ॥ ११ ॥ अनिष्टमिष्ट मिश्रच निावध कर्मण फलम् । भवत्य | और कर्म यह चारों त्यागके योग्य नहीं है वह अवश्य करनेकेही योग्य है क्योंकि यज्ञ दान तप गुद्धिमानों के मनको पवित्र करनेवाले है। ५ । संगको और कर्म फलों को त्याग करके यज्ञ दान तपादिक कर्म करने के योग्य हैं यह मेरा संमत अत्यन्त निश्चय किया हुआ उत्तम है। ६ । करने के योग्य कर्मोंका त्याग उचित नहीं है मोह से उसका त्याग करना तामसी कहागया है । ७। यह कर्म दुःख रूप है ऐसा मानकर शरीरके क्लेशके भयसे जो त्याग करता है वह इस राजसी त्याग | के चिरा शुद्धी रूपफलको नहीं पाता है । ८ । हे अर्जुन कर्मको करने केही योग्य मानकर संगफलको त्यागके जो कर्म किये जाते है उसको सात्विकी त्यागमाना है ।९।दुखदाई कर्म को बुरानही कहता और मुखदायी कर्ममें प्रीति नहीं करता राग द्वेप से रहित सतोगुण से भरा हुआ त्यागी अर्थाद संन्यासी है बुद्धिका स्वामी होकर छिन्न संशय कहाजाता है । १० । देहाभिमानी से सर्व कर्म त्यागकरने महा कठिन और असंभव है जो कर्मोके फलोंका त्यागी है वही त्यागी कहाजाताहै ।। जो त्यागी नहीं है उन के कर्मों का फल मरने के पीछे तीनप्रकारका होताहै अर्थाद forsal on they should be perforined, for Sacuficcs, charity, and morti are puribers of the philosophei It is my ultimato opinion and decrie that such works as those ought to be donc forsaling attachunent and fruitRenunciation of worls which aro prescribed, is improper The forsking of them through dclusion is considered as Tomas 7 The forsaking of a work because it is pumful, and from the dread of bodily nilliction » Rujas and lo *ho thus 11110s it undunc, derives me lenefit from it. & Tlio trole thich is p rformed as a duty, forsking attachment and fruit, that fureaking is deemed Strie y Therchnquisher imbued with Satua wise and freo from doubt, 18 noithier vored at adscr- Aty nor exults in sucome 10 No corporeal being is able totally to restrain froin norbe He i denominated a Tynger who fursales the frunt of action I The fruit of action is threefold goud, cul fication 5 - श्रीमद्भगवद्गीता BHAGAVADGIH:: {4447 त्यागिनोप्रेत्य न तु सल्यासिनां चित् ॥ १२ ॥ पञ्चैतानि महाबाहो कारणान नियोधमे । सांस्पे कृतान्त प्रोकाति सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥ अधिष्ठानं तण काकरण पृाग्यधम् । विविधाय पृथक चेष्टा देवं चचात्र परमम् ॥ १५ ॥ शीर वाल्मनोभिर्यत् कर्म प्रारमते नरः । न्याय्यं वा विपरीत या पञ्चते तस्पतयः ॥ १५ ॥ तत्रैवं सति कत्तारमात्मानं केवलन्तुयः । पश्यत्यकृतबुद्धित्यान स पश्यसि दुर्मतिः ॥ यम्य नाहकतो भावो वुदिर्यस्य न लिप्यते । हत्याप स इमॉल्लोकान हन्ति न निवध्यते ॥ १७ ॥ ज्ञान नेयं परिज्ञाता त्रिविघा फर्मचो दना ! करणं कर्म कर्तेति त्रिवधः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥ननं यामच कर्ता च विधेय गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसंल्याने यथावच्छृणुशान्यपि ॥ १९ ॥ सर्वभूतेषु अच्छा बुरा और मध्यम परन्तु संन्यासियों का कुछ नहीं होता है । १२ । हे महा- वाहु सवकर्मों के मिदी के लिये यह पांचकारण सांख्य शास्त्रों में कहे हैं ।।३। स्थूल शरीर, कर्ता और दशोंइन्द्री और नानाप्रकारकी पृथस् २ चेष्टा और इन में पांच देव हैं । १४ । मनुष्य जो कर्म धर्मम्प वा अधर्मरूप मनवाणी और देहके द्वारा प्रारंभ करता है उसी के यह पांचों हेतु हैं । १५ । ऐप्ती दशाहोने पर जो | बुद्धिकी म्लानता से केवल आत्माको कर्ता देखता है वह पाप रूप युद्धि रखने वाला नहीं देखता है । १६ । मैं कर्म का कर्ता हूं जिसको कि यह अहंकार नहीं है और जिसकी बुद्धि उस में लिप्तनहीं होती है इनलोकों कोभी जीतकर नहीं मारता है और न बन्धनमें होता है । १७ । ज्ञान ज्ञेय और परिज्ञाता यहतीन प्रकारवाले कर्मों की चेष्ठा होती हैं इन्द्रियां कर्म और कर्ता यह तीन प्रकार के कर्मों के निवास स्थान हैं । १८ । ज्ञान कर्म कर्ता गुणों के विभागले सांख्यशास्त्र में तीन प्रकार के कहे जाते हैं इनकी भी व्यवस्थाको मुन । १९ । जिस ज्ञान से पृथक रूपवाली and mixed, which hofuls, after death to the non relinquisher, but never to the relinquisher. 12. Learn, 0 Arjuna, these five causes for .the 'accomplishment of all actions, declared in the Sankhya system. 13. The body, the actor, the implements of various sorts, sereral contrivances, and fifthly Providence. 14. The 'rork n hich a man does, either with his body, speech or mind, whether lawful or unlawful, has these five causes. 15. He then who after this because of the imperfection of his judgment, beholds no other agent, than himself, is of unsound mind and sees not. 16. Henho is free from pride, and whose judgment is not affected, although he should destroy those people, neither hills nor is lound. 17. Knowledge, knowvable and knower are the three motives to action; the means, the action and the agent are the factors of action. 18. Knowledge, action, and agent are each distinguished in the category of qualities by the influence of the three Gunas. Hear their true nature.

4448 ] Mahabharat (४४४८)" पेनैक भावमव्ययमाक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्नानं विद्धिसायिकम् ॥२०॥ पृथकत्वेन तु यजन्तान नागाभावान् पृथग्निधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञान घिद्धि राजसम् ॥ २१ ॥ यत्तु कृत्स्नयदेकश्मिन कार्ये सताहैतुकम् । अतत्वार्थ धदरपञ्च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ नियतं सारहितमरागद्वेपत. कृतम्। अफलमे पसुना का यत्तत् सात्विकमुच्यते ॥ २३ ॥ यत्तुकामप्सुनाकर्म साहकारेणवापुन । क्रिपते बहुलापास नद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥ अनुया, क्षयं हिंसामनप्रेक्ष्यच पौरुपम् । मोहादास्यतके मर्यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥ मुक्कसंगो नहं वाटी धृत्युत्साहसमान्यतः । सिद्धघासद्धयोनिर्विकारः कर्नासात्विकउच्यते ॥ २६ ।। रागी कर्मफलप्रेप्सर्छ-घो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्यतः कर्ता राजसः सृष्टि में न्यूनाधिकता रहित विना भेद एक चिन्मात्र रूपको देसता है उस ज्ञानको सात्विकी जानो । २० । जिसज्ञान से सब मुष्टि में अनेक भाव भिन्न प्रकार के जानता है वह ज्ञानराजसी है । २१ । और जो शान एक कार्य में परिपूर्ण के समान प्रवृत्त है वह हेतु से रहित परमार्थ सिद्धान्त नहीं है वह ज्ञानतामसीहै । २२ ॥ कर्म फल न चाहने वाले पुरुपसे जो शास्त्रोक्त कर्म सदैव संग और राग द्वेपसे रहित किया जाता है वह सात्विकी कहाजाता है । २३ । फिर फलकी इच्छा रखने वाले जो अत्यन्त परिश्रम का कर्म अहंकार युक्त होकर करते हैं वह राजसी | कहाता है । २४ । जो परिणाम फल और धनका खर्च वा दूसरेका कष्ट वा अपनी सामर्थके वल का विचार न करके मोहसे कर्म किया जाता है वह तामसी है । २५ । संग रहित अपने को कर्त्ता न मानने वाला धैर्य और उत्साहसे पूर्ण कर्मों की सिद्धी वा प्रसिद्धी में विपरीत दशासे रहित है ऐसा कर्ता साविकी कहाता है । २६ । विपयों में प्रीति रखनेवाला दूसरेके धनका लोलुप पर पीड़ा That knowledge is satvik by whucli one indestructible being 13 seen in all beings, indivisible in the divisible 20. That knowlego 13 Rajas, which regards among all beings, plurality in substance, and variety in quality, as distinct 21 That knowledge is Tamas, which clings to a single object as if it were the whole, without reason, without grasping the reality and narrow 22. That action as Satwin which is done as duty by one who does not desire for fruit, without attach mnent, love or hate 25. That action is Rajas which is performed to gratify desire by selfishness with great effort 24 The action is Tamas, which is andertaken through ignorance and folly, and Withont fore sight of its fatal and injurious consequences. 25 any The actor 1s .Satwil, who is free from attachment, pride and arror gance, is cndued with fortitude and resolution, and is unaffected by success or failure 26 That actor is Rajas, who is ambitions, 19 (४४४९) श्रीमद्भगवद्गीता BHAGAVADGITA 14449 परिकीर्तित ॥ २७ ॥ मयुक्त प्रारत स्तब्ध नाठो नैकृति कोऽलस । विपादीदी सूत्रीच कर्ता तामस उच्य ते ॥ २८ ॥ युद्धभेद घृतेचैव गुणतरित्रविध शृणु । प्राच्य मानमशपेण पृषकत्वेन धनंजय ॥ २९ ॥ प्रवृत्रिंच निवृत्तिच कार्या कार्य भयाभये । बन्ध मोक्षश्च या वेत्ति बुद्धि सा पार्थ सात्विकी ॥ ३०॥ यया धर्ममधर्मच कार्यचा कार्य मेवच । अयथावत् प्रजानाति बुद्धि सापा वामसी ॥ ३१ ॥ अधर्मधर्म मितिया मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धि सा पार्थ तामसी ॥ ३२॥ धृत्यापया धारयते मनप्राणेंद्रिय क्रिया । योगेनाव्यभिचारिण्या धृति सा पार्थ साधिकी ॥३३॥ | ययातुधर्म कामार्थान् घृत्याघारयतेर्जुन । प्रसङ्गेन फलाकांक्षी धनि सा पार्थ राक्षसी देनेवाला अपवित्र प्रिय अमिय मिलने में प्रसन्न और सुख दुख से संयुक्त कर्ता राजसी कहाजाता है । २७ । असावधान, प्राकृत, किसी का आदर न करनवाला, शउ, छली, दूसरे का अपमान करनेवाला, कार्यासक्त, मालसी, विपादी, दीर्घमूत्री ऐसा कर्त्ता तामसी कहा जाता है । २८ । हे अर्जुन गुणों से बुद्धि और धैर्य के तीन प्रकारके भेद मै तुमसे पृथक २ करके कहताहूं उन सवों को सुनो । २९ । जो बुद्धिमान प्रत्ति निवृत्ति कार्य अकार्य भय निर्भयता कर्म संबंध वंधन और मोक्षको जानते है वह सात्विकी होते हैं। ३० । जिस वुद्धिसे धर्माधर्म और का- -कार्य को खादित और संदिग्ध जानता है उसकी राजसी बुद्धि कहाती है ॥३१॥ हे अर्जुन जो अशानसे ढकीहुई बुदिसे अधर्म को और मा भर्थों को उलटा मानते है उनकी घुद्धि तामसी कहाती है । ३२ । जो चित्तवृत्ति के रोकने के द्वारा जिस समाधि में प्रवृत्तहोकर धैर्यता से मनमाण और इन्द्रियों की क्रियाओं को देरतक नियत करताहै वह धैर्य सात्विकी है । ३३ । हे अर्जुन जिस धैर्य से धर्म अर्थ | कामों को करता है, अथवा धर्मादि के संबंध से फल का आकांक्षी है वहरानसी who longs for the fruit, who 13 avaricious, cruel, impure, and a slave to joy and grief 27 The agent is Tamas who is inattentive, vulgar, stubborn, dissembling, mischicrous, indolent, melancholy, and dilatory 28 Hear Dhananjayı 1 the threefold divisions of understanding and firmness, according to the Gunas, which are about to be explained to thee distinctly and without reserve 29 The understanding which can determine action and inaction duty and non-duty, fear and non fear, liberty and bondage, is Satwice 30 That understandıng is Rajas, 0 Parthal which does not conceive justice and injustice, duty and non-duty 31 That undarstand ing is Tamas which, overwhelmed (in darkness, miscal es injuetire for justice, and scos all things subverteil. 32. That is Sats 15 firmness of unerring yog by which one restrains the activity of the mind and organs 33. That interested firmness is Rajas hy nhich a man, from views of profit, persists in Dharm, pleasure and .

[4450] Mahabharat (४४५०) ॥ ३४ ॥ यया स्वप्न भयं शोकं विपादं मदमेघच । न विमुञ्चति दुर्मेधा प्रति. सागार्थ तामसी ॥ ३५ ॥ सुखं त्विदानी त्रियिष शृणु मे भरतर्षभ । अण्यासाद्गमते यत्र दुखा न्तम्च निगच्छति ॥ ३६॥ यत्तद्न विपमिव पारणामेऽमृतोपमम् । तत् मुखं साविक प्रोक्तमात्मवुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७॥ विषयेन्द्रियसंयोगायत्तदप्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत् सुख राजसंस्मृतम् ॥ ३८ ॥ यदने चानुबन्धे व सुख मोहनमात्मन । निद्रालस्यप्रमादोत्यं तवामसमुदाहतम् ॥ ३९ ॥ न तदस्ति पृथिव्यांचा दिवि देवेषु वापुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्त यदभिः स्यात् त्रिभिर्गुण ॥ ४० ब्राह्मणदात्र यपिशां शूद्राणाचपरन्तप । फर्माणि प्रविभक्कानि स्वभावप्रमवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥ धैश्य है । ३४ जिसकी बुदि विगड़ी हुई है वह जिस धीरज से स्वप्न, भय, दुःख व्याकुलता और चित्तकी अस्वाधीनता को धारण करता है वह धैर्यता ताममी कही जाती है।३५ाहे भरतवंशी अर्जुन अव उन तीन मकारके सुखोंको कहताहूं जिन मुख समाधियों में अभ्यास करके रमताहै और दुःखके अन्त होनेपर मोक्षको पाता है। ३६ । जोकि वहमुख प्रथम विप के समान अन्तमें अमृत के समान होता है वह | बुदि की निर्मलता से उत्पन्न हुआ सात्विकी मुल कहलाता है। ३७ । जो विषय इन्द्रियों के योगस आदि में अमृत के समान है और अन्त में विप के तुल्य है उस गुसको राजसी कहते है । ३८ । जो स्वप्न आलस्य और भूल से उत्पन्न हुआ सुख है पद्द आदि में और अन्त में वृद्धिको मुलानेवाला है वह तामसी है । ३९ । वह पृथ्वी के जड़ चैतन्य जीवों में ओर स्वर्ग के देवताओं में भी नहीं है जोकि तीनों गुणों से राहत प्रकृतिमाले होय । ४० । हे अनुहन्ता अर्जुन स्वभाव जन्य गुणों के कारण ब्राह्मण क्षनी वैश्य और शूद्रो के पृथक् २ कर्म होते है ।४ wealth 34 That firmness Is Tamas by which a fool departs not from sloth, fear, grief, melancholy, and folly 33 Now hear from me, Bharatarshabh, the three hınds of pleasure Tbav pleasure which a man habitually enjoys, wherein he finds the end of his paids, that which in the begioning is as poison, and in the end as nectar and which springs from the blissful knowledge of self, is called Satsıl 37 That pleasure is Ryas w bich arises from the conjanction of the organs with ther objects, which in the beginning is as pector and in the end as a poreon. 38 That pleasure is Tamus luch in, beginning and the end stupeſies the soul, and which arises from dron sidess, idleness, and heedlessness 39 There is no thing on earth or amongst the hosts of heaven, wbich is free from tl come three Gunnslorn of mitter 40 The re-pectire datics of Braho Isllatrix, l'aslıgas, and Shudras, are also dete is the qualities which are in their constitutions. I the 2018, श्रीमन्नगवद्गीता Bhagavadgita [4451] शमो दमस्तपः शौचं शान्तिराजचमेवच । सानं विमानमास्तिक्यं प्रकर्मस्वमा पजम् ॥ ४२ ॥ शौर्य तेजो धृतिद्दाक्यं युद्ध चान्यपलायनम् । दागमीश्यामापथ क्षाकर्म स्वभावजम् ॥ ५३ । कृषिगोरक्षपचाणिज्यं पैश्यकर्म स्यभापजम् । परिचयात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥ स्ये स्वे कर्मण्यभिरनः संसिद्धि लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धि यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥ यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदंततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ॥ ६॥ श्रेयान स्वधर्मा विगुणः परधर्मात् स्यनुष्ठितात् । स्वभावनि- पतं कर्म कुर्व नाप्नोति कित्विपम् ॥ ४७ ॥ सहज कर्म कौन्तेय सदोपमपिन त्यजेत् । सामाभि दोपेग घूमेनाग्निरियावृताः ॥ ४८॥ यसका सर्वत्र शम, दम, ता, शौच, शांति, पान, धान, विशाल, श्रद्धा यह पूर्व जन्मक संस्कार से उत्पन्न हुये प्राह्मण के कर्म हैं । ४२ । पराक्रम, तेज, धैर्य, चातुर्य्यता, युद्धके सम्मुख होकर न भागना, ईश्वरभाव अर्थात् अपराधियों को दण्डदेना यह क्षत्रियों के पूर्वजन्म सस्कार और स्वभावज कर्म हैं । ४३ । खेती गौकी रक्षा पोपण वनज यह वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं और सेवा करना आदिक शूद्र के स्वाभाविक कर्म कहलाते हैं ।४४ा अपने अपने कर्ममें प्रति करनेत्राला मनुष्य सिद्धि को पाता है और जैसे अपने कर्म में प्रीति रखनेवाला मुख्य सिद्धि को पाता है उसको भी मैं कहताहूं । ४५ । जिस अन्तर्यामी से जीवों की प्रवृत्ति है और जिससे यह सब जगत् भी व्याप्त है उसको मनुष्य अपने कर्मों से पूजन करके मोक्षरूपी सिद्धि को पाता है। ४६ । दूसरे के उत्तम धर्म से अपना धर्महीन भी श्रेष्ठतम है स्वभाव जन्य कमों के करने से पापका भागी नहीं होताई । ४७ ॥ है अर्जुन स्वाभाविक दोपोंसे युक्त कर्मकाभी त्यागनकरे क्योंकि सब कर्मों के मारंभ duties of the Brahmans are peace, self-restraint, austerity, purity, patience, rectitude, risdom, learning, and theology. The natural duties of the Kshatriya are brarery, glory, fortitude, rec. titude, not to flee from the field, generosity, and princely conduct. 43. The natural duties of the Vaishya are agriculture, cattlefarming, and commerce. The natural duty of a Shadra is service. 44. Lach man devoted to his own duty obtains perfection. Hear, how that perfection is to be accomplished 45. One who makes on offering of his own works to that Being from whom all beings proceed, and by whom the shole aniverse is persaded, obtaing perfection. 46. One's own duties, destitute of merit, are preferable to the duty of another however sell pursued. One following the dutics which are appointed by his birth, incars no sin. 17. One's olin calling, with all its faults, ought not to le fotsahen. Every [44521 Mahabharat (४४५२) सितामा विगतस्पूनः । नैष्कासद्धि परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥ सिद्धि प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निवाघ मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठावानस्य पापरा ॥ ५० ॥ उद्धघा विशुद्धया युक्तो घृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन् वि. प्यास्त्याचा रागद्वेषौ व्युदस्यच ॥ ५१ ॥ विधिक्तसेवी लध्वाशी यतवाकाय भागलः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ।। अहङ्कारं बल दर्प फार्म क्रोधं परिग्रहम् । 'विमुख्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥ घह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति । समः सर्वभूतेषु मद्भाक्तं लभते पराम् ॥ ५४ ॥ भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः । ततोमा दोपों से ऐसे आच्छादित हैं जैसे कि भाग्न धुयें, से । ४८ । सब पदार्थों में वुदिन लगाने वाला शान्त चित्त अत्यन्त लोभ और इच्छा से रहित सन्यास के द्वारा उस परम सिद्धिको पाताहै जो कर्म के त्याग और ब्रह्मज्ञान से सम्बन्ध रखने वाली है । ४९ । हेअर्जुन जैसे कि वैराग्य सिद्धि को पाने वाला ब्रह्मको पाता है उसका वृत्तान्त मुझसे मुनो वह वृत्तान्त ज्ञानकी परानिष्ठा है । ५० । अत्यन्त शुद्ध बुद्धिके द्वारा धैर्यतासे शरीर और इन्द्रियोंके समूहको माणों समेत स्वाधीन कर के अर्थात् दृढ़ आसन से शब्दादि विपयोंको त्यागकर रागद्वेप रहितहो और अहंभावको दूर करके सदैव एकान्त वासी अल्पाहारी मनको जीतनेवाला वैराग्य युक्त, सदैव ध्यान योग में प्रवृत्त, अहंकार वलक्रोध इच्छा और आत्म भावरूपी परिग्रहको छोड़कर शान्तरूप होकर ब्रह्मभाव के योग्य होता है। ५३ । ब्रह्मरूप योगी प्रसंन्न वित्त होकर न शोच करता हैन इच्छा करता है और सबनीवमात्रोंमें समदर्शी होता है वह मेरी पराभाक्तिको पाता है । ५४ । उस भक्ति के द्वारा ज्ञानी पुरुष जैसा मैं श्रीमन्द्भगवदगीता Bhagavadgita [4453] तरपतो प्रात्या विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥ सर्यकर्माण्यांप साकांणो मद्वय भ्रपः । मत्प्रसादादयानोति शाश्वतं पदमन्ययम् ॥ ५६ ॥ चेतसासर्यक्रमण मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमपाश्रिय मच्चित्तः सततं भय ॥ ५० ॥ मचित्तः सर्वदुगाणि मत्प्रसादातरिष्यसि । यथ चत्यमाकारामथ्रोष्यसि घिनध्यासे ॥ ५८ ॥ यदहंकारमाश्रित्य नयोत्स्यइति मन्यसे । मध्यप व्यवसायन्ते प्रकृति रत्वांनियोक्ष्यति । ५२ ॥ स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्पेन कर्मणा । कत्तुनेच्छसि यन्मोहारकरियस्यपशोपि तत् ॥ ६० ॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हुईरो नतिष्ठति । भामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया ॥ ६१ ॥ तमेव शरणं गच्छ सर्वमान वास्तव में हूं वैसाही टीक जानता है तदनन्तर मुमको मूल समेत जानकर मुझ में ही समाता है । ५५ । उसप्रकारका ज्ञानी में निवास करने वाला सदैव सव कर्मों को भी करता हुआ मेरी कृपासे अविनाशी सनातन मोतपदको पाताहै।५६। विवेकबुद्धि से सब कर्मोको मुझ में अर्पणकरके मुझको उत्तमलय स्थान जाननेवाला बुद्धि योगमें प्रटच होकर सदैव मुझी में चित्तका लगानेवालाहो । ५७ । मुझ में चित्त लगाकर तू सब कठिनतामों से तरेगा और जो तू अहंकार से मेरे वचनको नहीं मुनेगा तो नाश पावेगा । ५८ जो अहंकार में प्रवृत्त होकर तू मानता है कि मैं नहीं लडूंगा यह तेरा निश्चय करना मिथ्याहै तेग क्षत्री स्वभार तुमको युद्ध में प्रवृत्त करेगा । ५१ । हे अर्जुन स्वभाव से उत्पन्न होने वाले अपने कमों से बंधा हुआ तू जो अज्ञान से युद्ध नहीं करना चाहता है तो तू पराधीन के समान अवश्य उसको करेगा । ६० । हे अर्जुन ईश्वर सब सृष्टि के हृदयस्थानमें लिंगदेहनाम यन्त्र पर श्राद्ध होनेवाला अपनी मायासे सवजीवों को ऐसे घुमाताहै जैसे कुम्हार चाक को ६॥हे भरतवंशी सब भाव से उसी ईश्वरकी शरण जाओ उसकी कृपा से तू knows well who and that I am; having thus discorered who I am he at length is absorbed in my nature. 55. Doing all works, with trust in me alone, he shall by my grace, obtain the eternal and infi nite state; 56. With thy heart dedicate all thy works to me; and resorting to Buddhivyog, think constantly of me. 57. Think. ing of me, thou shalt, by my grace, surmonnt every difficulty. But if from egoiso thcu wilt not listen, thon shalt perish 58. If from selfsufficiency thou resolsest that thou wilt not fight, rain will be thy determination, for nature will impel thee. 59. Being tound, Kaanteyal to action by the duties of thy natural calling, thou wilt involuntarily do that thich thou wantest, through ignorance, to avoid 60. Ishwara resides in the breasts of all beings, resolving with his maya all beings, as if mounted on a potter's sheel 61. Tale sanctuary पानवद्गद्यमदं परम् । पोगं पागेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयम् ॥७५।। श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4455 ] सविता बचो तस्मादन्यःप्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥ मध्येष्यते वय इस धयंसंवाद यो । भानयन ताम स्थति में गतिः ॥ ७ ॥ श्रावनस्पश्च पशुपादपियो नरः । सोपि मुक्तः शुभाँहोकान् प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥ पश्चिदेतच्छतु शर्ष स्वयकाणचेतसा । फाच्चिदानसम्मोहः मनष्टस्ते धनञ्जय७२॥ अर्जुन उवाच । न मोहः स्मृतिर्लया वासादामयागुत । स्थितोस्मि गाल सन्दरः करिष्ये वचन HEMEMA या इत्यह वासुदयस्य पार्थस्य महात्मनः । बंपादमिममीफ भुतम् ले गहर्षणम् ॥ ४ ॥ व्यासप्रसादात अधिक मुझको प्यारा पृथ्वीपर कोई नहीं होगा (६९। जो हमदोनोंके इस धर्मरूप उपाख्यान को पढ़ेगा मैं उस ज्ञानगा निकल्प समाधि के द्वारा उससे पूजित (गा ७०। श्रद्धावान् अन्य के गणों में दोप न लगानेवालाजो मनुष्य इस गीता के श्रोकों को मुनेगा वहभी मुक्तहोकर पविनामा पुरुषों के शुभ लोकोंको पारेगा १७१ १ हे अर्जुन नूने एकाय चित होकर इस गीता शास्त्रको सुना और है धन- (जप तेरा मोह जनित सव अशान अब नए होगया । ७२ । अर्जुन बोले हे भावे नाशी आपकी कृपासे मेरा मोह दूर इश्रा और स्मशत भास दुई अब मैं सन्देह से रहितई इससे आपको पचनाको कन्गा । ७३ । समय बोले कि मैने महात्मा वासु देवजी और अर्जुन के इस अपूर्व लोमहर्पण संवाद को सुना १ ७४ । मैंने च्यासजी की कृपासे यह अत्यन्त गुप्त योग निज योगेश्वर श्रीकृष्णजी के मुख से मुना । हे राजन ! केशवजी के और अर्जुन के इस अपूर्व पुण्यकारी service than he, nor shall there be in all the earth one dearer to me Cum IIo also who shall read these our religious dialogurs, by him I Andli"no worăbiipped with the sacritice of wisdom, This is my resolve. 70. That man too who hears it withont doubt, and with due faith, is released and shall obtais the blessed abodes of the rightoons 21 Hast thou heard this 0 Arjuna ! sith thy mind fixed to one point Is the distraction of thought, which arose from thy ignorance, renoved? 72. Arjun-By thy grace, Achyuta ! my delusion is destroyed and I have gained visdon. I am now settled and freed from all doubts; 1 will do thy bidding." 73. Sanjaya.--} this manner I heard tho astonishing and pisaculous conversation between Vasudeva, and the magnanimous son of Pandu, 74. I heard this supremne andmiraculous doctrine even as revealed from the mouth of Krishna himself, the lord of Yog, by the favor of Vyasa. 75. Alle O mighty Prince 1 I recollect again and again this holy and wonder- - [4454 ] Mahabharat (४४५४) भारत । तत्प्रसादानपरांशान्ति स्थान प्राप्यासि शाश्वतम् ॥ ६२ ।। इति ते बार गारयात गुह्याद्गृह्यतरंमया। विमृश्यैतदशेपेण तथेच्छति तथा कुरु ॥६३॥ सर्वगुह्यतम भूयः शृणु में परमं वचः। इष्टोत मे दृढमिति ततो पक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥ मन्मनाभयमद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामवैष्यसि सत्यन्ते प्रतिजानप्रियोसिमे ॥६५॥ सर्घधर्मान् परित्यज्य मामकं शरणंग्रज । अत्यासर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच ॥ ६६ ॥ इदन्तेनानपस्काय नाशकाय कदाचन । नचाशुश्रूषवेवाच्य नचा योग्यसूयति ॥ ६७ ॥ पइर्द परमं गुह्यं मद्भक्तेयभिधास्पति । भकिमयि पकृत्या मामेव्यत्यसशयः ॥ ६८ ॥ नच तम्मान्मनुष्येषु काभन्मप्रियकृत्तमः। + अविनाशी पराशान्ती मोक्ष को पावेगा । ६२ । मैंने यह गुह्य से गुह्य ज्ञान तुम से हा इस सबको अच्छी रीतिसे विचारकर जैसा चाहो वैसा करो। ६३ । फिर सब से गुह्यतम मेरे उत्तम वचनोंको मुनो तू मेरा बड़ाप्यारा है इसकारण मैं तेरेपरमहित को कहूंगा ६४। मुझ मेंही चित्तसे लगाहुआ तू मेराभक्तहोकर मेरेहीनिमित्त कर्मका करने वालाहोकर मुझको नमस्कारकर मुझही लयहोगा यह मैं सत्यही प्रतिज्ञा करताहूं क्योंकि नू मेरा बड़ाप्यारा है। ६५ । सब धर्म और कर्म और सुखदुःखादि को अत्यन्त त्यागकर मुम अकेले की शरण को प्राप्तकर मैं तुझको सब पापों से मोक्ष करूंगा किती पातका शोक मतकर । ६६ । जो तपसे रहित और भक्तिसे शून्य हैं अथवा गुरूकी सेवासे वहिर्मुख होकर मेरी निन्दा करतेहैं उन से कभी यह मेरा गुप्त ज्ञान कहनेके योग्य नहीं है । ६७ । जो इस मेरे गुप्तज्ञान को मेरेभक्तों में प्रचार करेगा यह मुझमें पराभक्ति को प्राप्तहोकर निश्चय पुक्ति को पावेगा ।६८। मनुष्यों में इसगीता पढ़ानेवाले से अधिक मेराकोई प्यारा नहीं है और उससे 1 with Him alone, Bharata, for, by His divine pleasure thou shalt obtain supreme happiness and eternal abode 62. Thus have I taught thee wisdom which is a superior mystery. Ponder it well in thy mind and act as thou wilt. 63. Attend noir to my supreme and most mysterious Fords, which I will for thy good reveal to thee, because thou art dearly beloved of me. 64. Be of my mind, be my devotce, my norslupper, and prostrate before me, and thou shalt come to me; in troth I pledge thee; thou art dear to me. 63. Torsake all duties, and fly to ruo aloue Grieve not for I will deliver thec from all transgressions. 66. This is never to be revealed by thee to any ono who is non-austero and loveless; nor to the undutiful, nor to him who despises me. 67. Ho sho shall teach this supreme mystery to my devotees, will loro me deeply and shall undoubtedly come to mc. Gs. There is not one amongst manhind sy ho docs me a greater (१९५५) श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavadgita [4455] सविता नचमे तस्मादन्याप्रियतरो भुपि ॥ ६९ ॥ अध्यष्यते चप इस धसंवाद मायो । हानयनेन तेनाम: स्यामिति में मतिः ॥ ७० ॥ भदायाननसूयश्व मृज्यादपियो नरः । सोपि मुक्तः शुभाँमकान प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम ॥ ७१ ॥ अश्चिदेतच्छतुं पार्थ त्वयैकाग्रेणचेतसा । कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धगञ्जय७२॥ अर्जुन उवाच । नष्टे मोष्टः स्मृतिलब्धा त्यासादामयाव्युत । स्थितोस्मि गत सन्देह करिष्ये वचनं तय सञ्जय उवाच । इत्यह घासुदेवस्य पार्थस्य महात्मनः । संबादमिममश्रौपद्भतम् ले महर्षणम् ॥ ७३ ॥ व्यासप्रसादाच्छुत घानेतद्गुहामहं परम् । योग योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कण्याः स्वयम् ॥७५॥ अधिक मुझको प्यारा पृथ्वीपर कोई नहीं होगा ।१९। जो हमदोनोंके इस धर्मरूप उपाख्यान को पढ़ेगा मैं उस ज्ञानयजा निर्विकल्प समाधि के द्वारा उससे पूजित हूँगा 1901 श्रद्धावान अन्य के गुणों में दोप न लगानेवालाजो मनुष्य इस गीता 1) के श्लोकों को मुनेगा वही मुक्त होकर पवित्रात्मा पुरुषों के शुभ लोकोंको पारोगा । ७१ हे अर्जुन तूने एकाग्र चिप होकर इस गीता शास्त्रको सुना और हे धनं- जय तेरा मोह जनित सब अज्ञान अव नष्ट होगया। ७२ । अर्जुन बोले हे भविः नाशी प्रापकी कृपासे मेरा मोह दूर हुआ और स्मृति प्राप्त हुई अब मैं सन्देह से रहितई. इससे आपके वचनोंको करूंगा । ७३ । संजय बोले कि मैंने महात्मा चामु देवजी और अर्जुन के इस अपूर्व लोमहर्षण संवाद को सुना । ७४ । मैंने व्यासजी की कृपासे यह अत्यन्त गुप्त योग निज योगेश्वर श्रीकृष्ण जी के मुख से सुना । ७५ । हे राजन् ! केशवजी के और अर्जुन के इस अपूर्व पुण्यकारी service than he, nor shall there be in all the carth one dearer to me 69. NU also ho shall read these our religious dialogues, by him I sháll be worshipped with the sacrifice of wisdom. This is my resolve. 70. That man too who hears it without doubt, and with due faith, is released and shall obtain the blessed abodes of the righteons. "I Hast thou heard this 0 Arjuna ! with thy mind fixed to one point ? Is the distraction of thought, which arose from thy ignorance, removed ? 72. Arjun.-By thy grace, Achyuta my delusion is destroyed and I have gained wisdom. I am now settled and freed from all doubts; 1 will do thy bidding," 73. Sanjaya.--}a this manner I heard the astonishing and miracalous conversation between Vasudeva, and the magnanimous son of Pandu, 74. I heard this supreme and-rairaculous doctrine even as revealed from the mouth of Krishna himself, the lord of Yog, by the favor of Vyasa. 75. As, O mighty Prince i I recollect again and again this holy and wonder- [4456 ] Maliablıarat (४४५६) राजन् संस्मृत्यसंस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । फेशवार्जुनयोः पुण्यं दृप्यामिच मु. मुंः ॥ ७६ ॥ तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । विस्मयो मे महान् राजन् हष्यामिच पुनः पुनः ॥ ७७ ॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्रपार्थोधनुर्धरः। तत्र दीजियो भूतिया नीतिमतिर्मम ॥ ७८ ।। इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वरि, श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि मूव० श्रीकृष्णार्जुनसंचादे संन्यासयोगोनाम अष्टदशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ पर्वणितु द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ ॥ समाप्त भगवद्गीतापर्व ॥ | संवाद को वारम्बार प्रसन्नता पूर्वक स्मरणकर आनन्द में मग्न होता हूं । ७६ । हे राजन् हरि के उस अपूर्व रूपको वारम्वार स्मरण करके मुझको बड़ा आश्चर्य है और पारम्बार प्रसन्न होता हूं। ७७ । जिधर योगेश्वर श्रीकृष्णजी और जिधर धनुपधारी अर्जुन हैं उधरही लक्ष्मी जय ऐश्वर्य और नीतिहै यहमेरा निश्चय मत है ॥ ७८ ॥ •77 ful dialogue of Krishna and Arjuna, I continue more and more to rejoice. 76. And as I recall the miraculous form of Hari, my astor ristment is great and I marvel and rejoico again and again! 77. Whersorer Krishna the lord of yog may be, wherever Arjuna the mighty bow man may be there shall eternally dwell fortune, power, victory. and virtuo. This is my firm beliei. 78.

(४४५७) भीमप Bhishama Parv {4457 ॥अथ भीमवधपर्व ।। सजय उवाच । ततो घतभयं दृष्ट्या बापगांडीधधारिणम् । पुनरय महानाद भ्यसृजन्त महारथाः ॥ १॥ पाण्डघाः सोमफाश्चैव पेचपामनुयायिनः । दध्मुख मुदिता संखान धीराः सागरसम्भवान् ॥ २ ॥ ततो भैध पश्यञ्चककचा गोध. पाणि: । सहसैवाभ्यहन्यंत ततःशब्दोमहान भूत् ॥ ३ ॥ तथा देवाः सगन्धर्षाः पितर जनाधिपः । विद्धचारणसंश्च समर्मायुस्तेदिक्षपा ॥ ४॥ अपयश्चममा माग पुरस्कृत्य शतक्रतुम् । समीयुस्तम सहिता द्रष्टुं तदेशसं महत् ॥ ५॥ ततो युधिष्ठिरो दृष्ट्या युद्धाय समवस्थिते । से सेने सागरमस्ये मुहुः प्रचालते. चुप ॥६॥ विमुच्य फयचं चारो निक्षिप्य च परायुधम् । अपरधरयारक्षम पदमामेव कृताउअलिः ॥ ७ ॥ पितामहमाभिप्रेक्ष्य धर्मराजो युधिष्ठिरः। धाग्यतः अध्याय ४३ ॥ संजयवाले कि तदनन्तर महारयियों ने वाणों समेत गांडीव धनुषधारी अर्जुन को देखकर महाशब्द करना प्रारम्भ किया ।। पांडव वा संजय अथवा जो इनके पीछे चलनेवाले महायजी वीर लोग थे उनस्तयों नेभी बड़े प्रसन्न चितहोकर | समुद्रोत्ान्न उत्तमर शंखोंकी अतिकी ।। और इसीप्रकार भेरी कृकच गोविपाणक नाम सब-वाजे एकसाथही वजनेलगे और महातुमुल बन्द हुआ, तदनन्तर हे राजा धृतराष्ट्र देवता पितर सिद्ध चारण आदि गन्धवों समेत सब देवता युद्ध देखनेकी इच्छासे आपहुँचे और महाभाग ऋपिलोगभी इन्द्रको अग्रभाग,करकेउस महाभारी नाशकेदेखने को वर्तमान हुये।५ तदनन्तर हेराजन् वीर राना.धर्मराज युधिष्ठिर इन युद्धोंके लिये अच्छे प्रकार सन्नद होकर सागरके समान वारम्बार चलायमान दोनों सेनाओं को देखकर, कवचको उतार धनुप को त्याग शीग्रही रथसे उतरकर पैदल ही हायनो हुए पितामहकी ओर देखकर मौनता साधहुये पूर्वाभिमुखहोकर CHAPTER All Sanjaya continued:- Having seen Arjun, the great archers, once again with his Gandiy bow and arrows, the warriors raised a tremendogs cry. The Pandaras, the Srinjayas and the other warriors who followed them, sounded their sea-bora conch shells in great gloe. Other musical instruments followed suit and the poise was great. There upon all the gods accompanied by Pitars, Sidhas, Charans and Gan. dhurvas, came there to sce the battle. The fortunate rishisitco, pre. ceded by Indra, siere present to witness that great destruction. Thep the brave warrior prince, Yudhishthir tbe just, seeing those two armies like the waves of the ocean, put off his coat of mail and leaving tho good bow on his chariot, he stood on foot looking towards the Standfather with joined Palms and then turning his face eastward, (४४५८) 144581 Mahabharat प्रपपी पेन प्राइम रिपुवादिनीम् ॥८॥ तं प्रयान्तमाभप्रेक्ष्य कुन्तीपुत्र धनंजय । अब तीय रथा पूर्ण भातामा सहितोऽवयात् ॥९॥ वासुदेवनार तोऽनुज तपा मुरपास राजागस्तपिचा जम्मसुका. अर्जुन उवाच । किन्ते व्यवास संराजन यद मागपहायवे । पयामेव प्रयातो मासुखो रिपुवाहिमाम् ॥११॥ भीमसेन उवाच । स्वामिप्यास राजे निशियचा ! दाशते वारिसन्येषु भारत भीमें दुनोति हृदय मूदिगन्ता भवानम्वनु॥ १३ ॥ सहदव उवाच.1 अस्मिन् रणसमूहे घे वर्तमाने महाभये । उत्सृज्यस्वन गन्तासिशनाममुखो। नृप ॥ १४ ॥ सजय उवाच । एवमाभाध्यमाणोपि भ्रातामा कुरुनन्दन.गोवाच । (शत्रुकी सेना में घुसाहुभा चला। ८ । उन धर्मराज को जाते हुए देखकर कुन्ती | का पुत्र अर्जुन शीघहीं रथसे उतरकर भाइयों सपत उसके पीछे चला और है। राजा वासुदेव जी उसके पीछे चले, तिस पीछे सब पृथ्वी के राजा अपने २ मनो। रिय सिद्ध करने की इच्छा से उसके पीछे चले। १० । अर्जुन बाले हे युधिष्ठिर श्रापका क्या निश्चय है जो हम लोगों को त्याग करके पैदल होकर पूष्वाभिमुख शवों की सेना में जाते हो, भीमसेन वोले हे राजेन्द्र राजा युधिष्ठिर आप कवच और शत्रों को त्यागकर भाइयों को छोड़ कर शनासे सन्नद शत्रुओं की सेना के। | मनुप्यों में कहां को जाओगे, नकुल पोले हे भरतवंशी आप सरीके मेरे बड़ेभाई। को इसप्रकार से जानेपर बड़ा भारी भय मेरे हृदय को पीड़ित करता है कहिये पाप अव कहां जानोगे सहदेव बोले हे राजा इस महा भयकारी युद्ध करने के योग्य शत्रुकी सेनाके समूह के सम्मुख होकर कहां जातेहो ।१४। संजय बोले कि हे | कौरव नन्दन धृतराष्ट्र भाइयों के इस प्रकार से कहने परभी मौन हुए अवाक् होकर bo wolked to enter the forccs of the enemny. 8. Seeing him thus procoeding onward, Aijun the son of Kunti at once leaped from his chariot and with the other brothers followed him. Vasudey to follow. ed Arjun's example and was followed by other kings who were intent on doing their duty 10 " What do you intend to do, that you aro so Icaving us and going eastward on foot amongst the enemy?" said Aijun to Yudhishthur. “Where will you go, prince Yudhishthir, the prince of princess leaving your armour, wenping and brothers and (४४५९) भीष्मपर्व Bhishma Pary [4459] पाग्यतः किश्चिद गच्छत्येव युधिष्ठिरः ॥१५॥ तानुवाच महाप्रानो पाएदेवोमहामनाः । अभिप्रायोस्व घिन्नातो मयेति प्रहसनिव१६ ॥ गपभी तथाद्रोण गौतमशस्य मेषच । अनुमान्य गुरुन् सान् योत्स्पते पार्षिपारिमिः ॥ १७ ॥ धूयते हि पुरा कल्गुनननमान्ययः । युष्पत सभवेद्दपक मपध्यातोगहत्तरः ॥ १८ ॥ अनुमान्य पंद्याशाखे यस्तु युध्ये महत्तरैः । यस्तस्प अयो युद्ध मदिति मतिर्मम ॥१९.। एवं घुवति कृष्णेन धार्तराष्ट्रय प्रति । हाहाकारोमहानासीन् निःशदास्यपरे. भवन् ॥ २० ॥ दृष्ट्वायुधिष्ठिरं दूराद्धाराष्ट्रस्य सनिकाः । मियाकया रेपो हि मुलपासनः ॥ २१ ॥ व्यक्त भीतइवाभ्येति राजासी भीष्ममान्तकम् । युधि हिरः ससोदर्यः शरणार्थ प्रयाचकः ॥ २२ ॥ धनजये फर्थ नाथे पांडवैध वृको चला जाता था, तबतो बड़े साहसी वासुदेवजी ने बड़े प्रसन्न होकर कहा कि मैंने इस के चित्तकी इच्छा को जाना, यह युधिष्ठिर भीष्म द्रोणाचार्य कृपाचार्य और शल्य आदि सब गुरुओं की प्रतिष्ठा पूर्वक परिक्रमा करके उनसे प्राज्ञाको मांग कर युदमें शत्रुओं से लड़ेंगे।१७ प्राचीन शान में मुनाजाताहै कि जो वांधवोंसमेत गुरू रद्धों को शानके अनुसार प्रतिष्ठा देकर अपने से बड़ों के साथ युद्ध करे निश्चय करके युद्धमें उमकी विजय होती है यह मेरामत है, श्रीकृष्ण जी के इस भकार कहनेपर शत्रुओं की सेना में बड़ा हाहाकार शब्द हुआ और पाण्डव लोगों के पती राजा लोग चुप होगये दुर्योधन की सेना के वीरों ने युधिष्ठिर को देखकर परस्पर में वार्तालाप की कि यह कुलका कलंक है, प्रकट है कि यह राजा युधिष्टिर भाइयों समेत भयभीत के समान भीमजी की शरण लेनेके निमित्त श्रोता है। । २१ । पांडव युधिष्टिर अर्जुन भीमसेन नकुल सहदेव चारों भाइयों समेत किस प्रकार से भयभीतसा होकर सम्मुख आना है निश्चय है कि यह पृथ्वीपर मसिद without giving any reply. Thereupon Vasudov of great energy said in excess of cheer, I know what passes in his mind. Yudhishthir, will pay his respeets to and take the permission of his elders, Bhishm Kripa and Slialya, before the fight begins 17. We see in old books that he who fights ngainst his elders after paying his rospect to them according to the shastras, will surely win victory, and I am of the same opinion." At these words of Shree Krishn, the warriors of the enemy raised cries of grief and the followers of the Pandavas were silenced. At the sight of Yudhishthir, the warriors of Duryodhan's army began to talk with one another, saying, "Yudhishthir is a discredit to the family! He is surely coming with his brothers, like a terrified man to thiow himself on the mercy of Bhishm.21. How does the Fanday Yudhishthir come like a terrified man, followed by his brothers Arjun, Bliim,Nakul and Sahader? Surely [4460] Mahabharat (४४६०) दरे । नकुले सहदेवेच भतिरभ्येतिपाण्डयम ॥ २३ ॥ ननून क्षायिकुले जातः संप्रथितेभुवि । यथास्य हृदयं भीतगल्पसत्यस्य संयुगे ॥ २४ ॥ ततस्ते सैनिकाः सर्व प्रशंसान्निस्म कौरवान् । दृष्टाः सुमनसो भूत्वा चैलानि दुधुवुःवह ॥ २५॥ व्यनिन्दध ततः सर्वे योधास्तव.विशाम्पते ! युधिष्ठिरं समांदर्य सहित फेशयेनाहि ॥ २६ ॥ ततस्तत् कौरवं सैन्य विकृत्वातु युधिष्ठिरम् । निशब्दगभयत् तूर्णः। पुनरेव विशाम्पते ॥ २७ ॥ किंनुवक्ष्यति राजसौ कि भीमः प्रतियक्ष्यति । कि भीमासारलाधी किं नुकृष्णार्जुनायिति ॥२८॥विक्षित किमायेति संशयासुमहाभूत्। 'उभयोः सेनयो राजन् युधिष्ठिरकृते तदा ॥ २९ ॥ सोवगाधचमू शत्रो.शाश- क्तिसमाफुलाम् । भीष्ममेवाश्ययाद तूर्ण प्रातृभिः परिवारितः ॥ ३० ॥ तमुवाच क्षत्रियों के कुल में उत्पन्न नहीं हुत्रा काहेसे कि इस अल्प वलरखने वाले का हृदय युद्ध से भयाकुल है, तदनन्तर उन प्रतिपक्षी मनुष्यों ने बड़े प्रसन्न हृदय से कौरवों की प्रशंसा की । २४ । और पृथक चैलों को अर्थात् रूमालों को घमाया, हे राजा तिसके पीछे वहां सब के वीर उनकेशवजी और सगे भाइयो.समेत युधिष्ठिर,की भोरको गर्ने हे राजा फिर वह कौरवों की सेना युधिष्ठिर को तुच्छ करके शीघ्रही अवाफ होगई और सब विचारने लगे कि यह राजा क्या कहेगा और भीमतेन क्या कहैगा और युद्ध में प्रशंसनीय भीष्मजी क्या कहैं गे और भीकृष्णा वा अर्जुन क्या करेंगे ।२८॥ हे धृतराष्ट्र इन विचारों के कारण युधिष्ठिर के जानेसे दोनों ओरकी सेनामें वड़ापारी संशय उत्पभ हुआ कि राजा युधिष्ठिरको क्या कहने की इच्छा है, वह राजा युधिष्ठिर भाइयों समेत शत्रुकी सेना के वास बरछियों से व्याकुल सेना के पारहोकर भीष्म जीके सम्मुख पाया. तदनन्तर शंतनु के पुत्र युद्धोत्सुकापतामह भीष्मनी के दोनों चरणों को युधिष्ठिर ने हाथों से दावकर कहा । ३० । हे दुर्जय पितामह मैं आपसे पूछताहूं कि इस युद्ध में हम ho is not born of kshatryas of world wide renown as lic seems to lo afraid of war." With such remarks the warriors of the enemy praised the Kauraras24 They rared ther handserchiefs and roared at Keshay the bravest of mariors and at Yudhishthur and his brothers, and saya ing "FIC on Yudhisthir," hept quict. They Legan to think within themselves wint Yudhishthur and Bhim will say and what Bbishw tho lucst of marriors will say in reply. They wondered as to what Krishn and Arjun nould say: 28. Thus thicre s as a great suspense ju both the armies oli account of Yudhishthir as they did not know what he ras going to say. In tho meantiwe Yudhishthir with his brothers crossed the enemy's army, amidst spears and arrots, and coming icroru Blislim, lie touched with his linndy Loth the feet of Bhishn the grandfather theion of Shantanu, and srd,30. Invincible grandfatherl भीमपर्व Bhishma Pary [4461] ततः पादौ कराभ्यां पढ्यि पांडयः । भीमं शान्तनयं राजा युद्धायसमुपस्थितम् ॥ ३१॥ युधिधिर उवाच । थामन्त्रये त्वां दुर्घपं त्वया योत्स्यामहे सह । अनुजानीहि मां तात आशिपश्च प्रयोभय । भीम उवाच । यद्येचे नाधिगच्छेथा पुधिमा पृथिवीपते । शपयंत्यां महाराज पराभावाय भारत ॥ ३३ ॥ प्रोताहंपुप्रयुध्यस्य जय प्राप्नुधि पांडघ । पत्तेमिलापतं चान्यत् तदवाप्नुहि संयुगे ॥ १४॥ प्रियतांच घरः पार्थ झिमरमत्तोऽमिकांक्षास । एवं गते महाराज न तयास्ति पराजयः ॥ ३५ ॥ अस्य पुरुपो दासो दासत्वों न कस्य चित् । इति सत्य महाराज पद्धोम्यर्थन कौरवैः ॥ ३६॥ अतस्यांक्लीववद्वाक्षं प्रवीमि कुरुनन्दन । मृतोऽस्म्ययन कौरव्य युद्धादन्यत् किमिच्छसि ॥३७ ॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ मन्त्रयस्य महावाहो हितैषी मम आपके साथ लड़ेंगे सो आज्ञा दो और आशीर्वाद भी दो, भीमजी बोले हे भरत वंशी महाराज राजा युधिष्ठिर जो तुम इसपद में इसरीति से मेरेपास न आते तो मैं तुमको पराजयहोने का शाप देता, हे पुत्र मैं प्रसन्न हूं हे पाण्डव युद्ध कर विजय को प्राप्तकरो और युद्ध में जो तेरी दूसरी इच्छा है उसको भी तुम पाओगे, हे राना युधिष्ठिर वरमांग तू मुझसे क्या चाहता है हे राजा इस प्रकारके तेरे आचरणों से तेरी पराजय नहीं है, पुरुप धन रूपादि अर्थोंका दास है परन्तु अर्थ किसीका दास नहीं है हं महाराज यह सत्य है मैं कौरवों की ओर से अर्थद्वारावशीभूत कियागया हूं, हे कौरवनन्दन मैं इस कारण से कायर के समान तुम से वचन कहताहूं कि मुझको कौरवों ने धनके द्वारा पोपण किया है. सो इनके लिये युद्ध तो अवश्य करूंगा तू युद्ध के सिवाय क्या चाहता है । ३६ । युधिष्ठिर वोले हे महाज्ञानी मेरा हित चाहनेवाले तुम सदैवमेरे अन्तको विचारो और दुर्योधनादि कौरवों के निमित्त युद्धकरो और आपका दियाहुआ घर सदैव नियत रहै, भीम जी वाले हे कौस्त्र I beg your përmisson to fight with you in the ensuing kattle and invoke your Messing. "To this Bhishm replied,"l shad have wishek your dcfeat, if you had not come to me at this time, king Yudhishthir, the descendant of Bharat! I am plen-ed with you, go Gain victory in the hattle, Panday. You will also gain your second desire in battle. You may ask of me any boon you desire, king Yudhishthir: with conduct you cannot suffer defeat. Man is a slave to wealth, while wealth is nobody's slave. It is trus, ling, that I am under the influena of the wealth of the Kauravas. It is therefore like a coward 'that I say to you that I am maintained by the wealth of the Kauravas and must fight for them; but you may ask of me any other loon except this." "May you always think well of me, wise man!" said Yudhishthir, "Fight for Duryodhan and others, but always bear in mind the boon you liave just given me," " WYlint help can I render such .

[4162] Muliablerat (४४६२" नित्यशः। युध्यस्थकारवस्याथै ममप सतत घरः ॥३८॥ भीष्म उवाच ।। राजन् फिमश्र साह्यन्ते करोमि कुरुनन्दन । कामं योत्स्ये परस्पार्थे अहि यत्ते विवक्षितम् ॥ ३९ ॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ कथं जययं संग्रामे भवन्त मपराजितम् । एतन्मे मानवहितं यदि श्रेयः प्रपश्यसि ॥ ४०॥ भीष्मउवाच ॥ नैनं पश्यामि कौन्तेय योमा युध्यन्तमाहचे। विजयेत पुमान् कश्चित् शाक्षादपि शतक्रतुः ॥४१॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ हन्त पृच्छामि तस्मात्यांपतामह नमोस्तुते । घोपायं प्रवाहित्व मात्मनः समरेपरैः ।। ४२॥ भीम उवाच ॥ नस्मतं तात पश्यामि समरे ये जयेतमा । नतावन्मृत्यु कालोपि पुनराग मनं कुरु ॥ ४३ ॥ संजय उवाच ॥ ततो युधिष्ठिरो वाक्यं भीष्मस्य फुरुनन्दन । नंदन युधिष्ठिर इस स्थान पर मैं तेरी कौनसी सहायता करूं दूसरे के लिये अपनी इच्छा के समान लडूंगा और जो तेरी इच्छा है उसको भी कह, युधिष्ठिरं घोले हे तात पितामह आपको नमस्कार है मैं आपसे पृछताहूं हे अजेय में युद्ध में आप को कैसे विजय करसक्ताहूं इस विषय में मेरे लिये श्रेष्ठ हितकारी शिक्षा दो, भीष्म जी बोले कि हे कुन्ती के पुत्र मैं ऐसा किसी को नहीं देखताई जो कोई पुरुष वा साक्षात् देवता इन्द्रभी मुझ युद्ध में लड़ते हुए को विजएकरे । ४० । युधिष्ठिर वोले हे पितामह तुम्हारे अर्थ नमस्कार है मैं आपसे यह हेतु पूछता हूं कि आप युद्ध में अपने विजय करने के उपाय को कहो भीमजी बोले ह तात जबतक मेरी मृत्युका समय न होय तबतक कोई मुझको युद्ध में जीतनेवाला नहीं दिखाई देता है, संजय बोले इसके पीछे कौरवनंदन युधिष्ठिर ने भीष्मजी के वचन को शिरसे अंगीकार किया और फिरभी नमस्कार करके वह महावाहु युधिष्ठिर भाइयों समेत | शत्रुकी सेना के सब मनुष्यों के देखते हुए सेना के मध्य में से निकलकर गुरू प्राचार्य द्रोणाचार्य जीके रथके पासगया, वहां कठिनतासे विजयहोनेवाले द्रोणाचार्यजीको परिक्रमापूर्वक नमस्कारकर के वाणी से अपने कल्याणकारी वचन को वोला, हे you, son Yudhishthn' t shall fight with all my heart for Duryodhan, but you must speak out plainly what you desire." said Bhishm. “! bow to you, grandfather," said Yudhishthir, "may 1 ask you how I can conquer you in battlo: Give me proper advice in this matter." "} donot see," replied Bhishm, "any man or even Indra the prince of gods that can overpower me in fight." 40. " 1 boy to you, grand. father and ask you the manner of your being overcome in battle" said Yudhishthir. "l cannot be overcoma in battle," said Bhishm, "but when the time of my death approaches." Sanjaya said that Yuhdithrhir having heard these words, bowed down to Bhishm and having departed from the middle of the army he went on looking at the warriors of the enemy to the place where Dronacharya the preceptor's chariot Aud having paid his respects to the invincible Dronacharya, was.

(४४६३) Hirage Bhishma Parv [4463] शिरसाप्रति जनाइ भूयस्तमाभिवाद्यच ॥ ४४ ॥ प्रायान् पुनमहाबाहुराचार्यभ्य रथं प्रति । पश्यतां सर्व सैन्यानां मध्यन भ्रातृभः सह ॥ ४५ ॥ स द्रोणागि चाद्याथ त्याचामि प्रदक्षिणम् । उयाचं राजा दुर्धर्ष मात्मनिः श्रेय संचचः ॥ ४६॥ सामन्त्रयत्वां भगवन् योत्स्ये विगतकल्मप्र । कर्ष जये एनमर्याननुन्नातस्त्वया राज ॥ ४७ ॥ द्रोण रचाच ॥ यदि मां नाभि गच्छेया युद्धाय कृतनिश्चयः । शपेयं त्वां महा राज पराभावाय संबंशः ॥ ४८ ॥ तधिष्ठिर तुष्टोम्नि पूजितश्य लपानय । अनुजाना मि युध्यस्य विजयं सम वाप्नहि ॥ ४९ ॥ करवाणि च ते फार्म घहित्वमसि कांक्षितम् । पंथं गते महाराज युद्धादन्यत् किमिच्छसि ॥ ५० ॥ अर्थस्यपुरुषो दासो दासस्त्वों न कस्य चित् । इति सायं महाराज पद्धोम्पर्थन फौरवैः ॥ ५१ ॥ प्रवीम्येतत् क्लीय भगवन गुरुदेव मैं आपका पूजनकरता हूं और पूछताहूं कि मैं पापसे युद्धकरूंगा या पापसे रहित युद्धकरूंगा इसको आप कहिये हे विमेन्द्र आपकी आज्ञासे मैं किस प्रकारसे सवशत्रुओंको विजयकरूंगा ।४४ाद्रोणाचार्य बोले कि जो युद्धके निश्चय करने के लिये तू मुझको नहीं मिलता तो हे महाराज सब प्रकार से पराजयहानेके लिये तुमको शाप देदेता हे निष्पाप युधिष्ठिर मैं तुम से पूजित होकर मसन्नहूं मैं प्राज्ञादेताहूं कि युद्धको और विजय को पाओ, तेरेमनोरथको सिद्ध करूंगा जो तेरी इच्छाहोय सो कहो हे महाराज तुम ऐसी दशामें युद्ध के विशेष अन्य कौनसी बात चाहतहो, पुरुपमर्थका दास है परन्तु अर्थ किसी का दास नहीं है हे युधिष्ठिर यह सत्यही वातहै कि मैं कौरवों की ओर से अर्थ से वशीभूत कियागया हूं, इस हेतुसे असमर्थों की समान मैं तुझ से कहताहूं कि युद्धतो दनके अर्थ हम करेंगे के सिवाय दूसरी बात क्या चाहता है मैं कौरवों के निमित लढूंगा परन्तु तुम्हारी विनय होनेका आशीर्वाद देताहूं। ५२ युधिष्ठिर योले हे गुरुदेव मेरी विजय होने he said, "I salute you, Bhagwant and ask you whether my fighting will bo in good cause or not so. I beg to ask of you, best of Brabmans, how I shall be able to conquer all the eneuies by your grace." 44 "I should have cnusce your defeat by all the means in my power and had cursed you, if you had not come to me to ascertain about tho propriety of war. 1 am pleased, Yudhishthir, by your respectful behaviour. I allow you to make var and gain victory. What more do you want besides this war? Man is a slave to wealth, but the Tealth is nobody's slave. I tell you truly that I have been influencod by the wealth of Kamayas and it is therefore that I tell like a reakling that fight I must, but is there aught that I can do far you? I shall fight for the Kanrafas, but shall pray for your victory." you 164] Mahabharat (४४६४) वत्या युद्धाद-पत् किमिच्छसि । योत्स्येह कौरवस्या तवाशास्यो जयोमया ॥ ५२ ॥ युधिष्ठिर उवाच ।। जयमाशाहसमे ब्रह्मन् मन्नयस्व च माद्धतम् । युध्यस्थकौरवस्या घर एप वृतो मया ॥५३॥ द्रोण उधाच । भुवस्तविजयो राजन् यस्य मन्त्री हरिस्तय। महत्वामभिजानामि रणे शत्रून् घमोक्ष्यसे ॥५४॥ यतोधर्मस्तत कृष्णो यत कृष्णाततो जय । युध्यस्थ गच्छ कौन्तेय पृच्छमांकि प्रवीमिते ॥ ५५ ॥ युधिष्ठिर उवाच । पृच्छामित्या द्विश्रेष्ठ शृणुयन्मेऽभि कााक्षतम् । नर्थ जयेयं सग्राम भवन्तमपरा जितम् ॥ ५६ ॥ द्रोण उवाच । न तेऽास्त विजपस्तावद्याययुद्धधाम्यह रणे। ममाशु निघने राजनयतस्वसह सोदर ॥५७॥ युधिष्ठिर उवाच । इन्त तस्मान् महावाहारयो पाय घदात्मनः । आचार्य प्रणिपत्यैपपृच्छामित्वा नमोस्तुते ॥ ५८॥ द्रोण वाच । का आशीर्वाद दो ओर मेरे हितकारी सलाह दो और आप कौरवों के निमित्त युद्ध करिये मुझे वरदो द्रोणाचार्य बोले हे राजा तेरी अवश्य विजयहै क्योंकि तेरेमन्त्री हरि हैं मै तुझको अच्छी रीति से जानताहूं कि तू युद्ध में शत्रुओं को जीवनसे मुक्त करेगा जहां धर्म है वही श्रीकृष्णजी है जहां धर्म है वहीं विजय है इससे हे कुन्तीनन्दन जामो युद्धकरो तुम्हारी विजयहोगी अब मुझ से तू क्या पृछना है । ५५ । युधिष्ठिर वाले हे ब्राह्मणवर्य मै अपनी इच्छा के अनुसार आप से पूछताहूं हे अजेय मैं युद्ध में आपको कैसे विजय करूगा, द्रोणाचार्य बोले कि हे राजा जबतक मै युद्धभुमिमें लडूंगा तबतक तेरी विजय नहीं होगी मेरे मरने के पीछे तुम अपने भाइयों समेत शीघ्र उपायकरो, युधिष्ठिर बोले हे महावाई बड़े कटकी बातहै कि मै आपको नमस्कार करके प्रार्थना करताहूं कि आपअपने मरने के उपायकोरताइये, द्रोणाचार्यबोले हे तात मै उस अपने शत्रु को संसार में नहीं देखताहूं जो मुम क्रोधाग्नि में भरेहुए वाणोंकी वर्षा करतेहुएको युद्धमें मारे, हे राजा इसके विशेष मरने के निमित्त निश्चय करनेवाले योग वलसे देह त्याग 52 “Pray for my victory and give me salutaray advice. Give me this boon and fight on the side of the Kauravae” said Yudhishthur “Your victory is certain, for you have Hari for your adviser," said Drona") know well that you will destroy the enemies. Where there is Dharm there Krishn and victory are Go, son of Kunti, fight and you will win What more do you ask of me ?" 55 « Best of Brahmans!' said Yudhishthir, “I wish to ask of you, inconquer able one how I shall be able to conquer you To this Dronicharys replied that Yudhisthir could not gan victory as long he mus alive and that after his death the Pandavas were sure of it. At this Yudhisthir respectfully ushed of Dropa the manner of his death, and Drona 1 (४४६५० भीमप Bhishma Pary [44653 न शत्रु तात पश्यामि योमा हन्याद्रणे स्थितम् । युध्यमानं सुसंरब्धं शरवोधर्पिणम् ॥ ५९ ॥ अते प्रायातं राजन् न्यस्तशस्त्रमचेतनम् । हन्यान्मा युधि योघानां सत्य में तनचीमिते ॥६० ॥ अनचाहं रणे जहां श्रुत्वा सुमहदप्रियम् । श्रद्धेयवाफ्यात्पुपा देतत्सत्यं प्रवीमिते ॥६१५ सञ्जय उवाच ॥ एतच्छ्रुत्वा महाराज भारद्वाजस्यधीमतः । अनुमान्य तमाचार्य प्रायाच्छारद्वतं प्रति ॥ ६२॥ सोऽभिवाद्य कृपं राजा कृत्वाचापि प्रदक्षिणम् । उवाच दुर्धर्ष तमं पाक्यं वाक्य विदांवरः ।। ६३ ।। अनुमान येत्वां योत्स्ये हं गुरो विगत कल्मषः । जयेयश्च रिपन सर्वा नुज्ञातस्त्वयानघ ॥ ६॥ रुपउवाच ।। यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृत निश्चयः । शपेयत्वां महाराज परभावायसर्वशः ६५ करनेवाले मुझको युद्ध में कोई वीर मारने वाला नहीं दीखता है यह मैं निश्चय करके कहताहूं, मैं युद्ध में विश्वासित पुरुष से बहुत बड़े अप्रिय और असत्य वचन को सुनकर शस्त्रोंका त्याग करूंगा यह तुमसे मैं सत्यर कहताहूं। ६० । संजयवोले हे धृतराष्ट्र धर्मराज राजा युधिष्ठिर द्रोणाचार्य के इस वचनको सुनकर उन mama J4464] Mahabharat (४४६४) वत्या युद्धादयन् किमिच्छसि । योत्स्येह कौरवस्या तवाशास्यो जयोमया ॥ ५२ ॥ युधिष्ठिर उघाच ॥ जयमाशास्समे ब्रह्मन् मन्त्रयस्य च माद्धतम् । युध्यस्वकौरयस्या घर एष वृतो मया ॥५३|| द्रोण सधाच । ध्रुचस्तविजयो राजन् यस्य मन्त्री हरिस्तष। महत्वामभिजानामि रणे शत्रून् घमोक्ष्यसे। ५४॥ यतोधर्मस्तत कृष्णो यत कृष्णस्ततो जय । युध्यस्थ गच्छ कौन्तेय पृच्छमांकि ब्रवीमित ॥ ५५ ॥ युधिष्ठिर उवाच । पृच्छामित्यां द्विश्रेष्ठ शृणुयन्मेऽभि काक्षितम् । पथ जयेये समामे भवन्तमपरा जितम् ॥ ५६ ॥ द्रोण उवाच । न तेऽस्त विजयस्तापद्यावाद्धधाम्यह रणे । ममाशु निधने राजन यतस्वसह सोदरं ॥५७॥ पुधिष्ठिर उवाच । हन्त तस्मान् महावाहारयो पाय पदात्मनः । आचार्य प्रणिपत्यैपपृष्छामित्वां नमोस्तुते ।। ५८ ॥ द्रोण स्वाच । का आशीर्वाद दो और मेरे हितकारी सलाह दो और आप कौरवों के निमित्त युद्ध करिये मुझे वरदो द्रोणाचार्य बोले हे राजा तेरी अवश्य विजयहै क्योंकि तेरेमन्त्री हार है मै तुझको अच्छी रीति से जानताहूं कि तू युद्ध में शत्रुओ को जीवनसे धक्त करेगा जहां धर्म है वही श्रीकृष्णजी है जहां धर्म है वही विजय है इससे हे कुन्तीनन्दन जाओ युद्धकरो तुम्हारी विजयहोगी अब मुझ से तू क्या पूछना है । ५५ । युधिष्ठिर वोले हे ब्राह्मणवर्य मै अपनी इच्छा के अनुसार आप से पूछताहूं हे अजेय में युद्ध में आपको कैसे विनय करूगा, द्रोणाचार्य बोले कि हे राजा जबतक मै युद्धभुमिमे लडूंगा तवतक तेरी विजय नहीं होगी मेरे मरने के पीछे तुम अपने भाइयों समेत शीघ्र उपायकरो, युधिष्ठिर बोले हे महावाहु घडे कष्टकी यातहै कि मै आपको नमस्कार करके प्रार्थना करताहूं कि आपअपने मरने के उपायकोबताइये, द्रोणाचार्यवाले हे तात मै उस अपने शत्रु को संसार में नहीं देखताहूं जो मम क्रोधाग्नि में भरेहुए वाणोंकी वर्षा करतेहुएको युद्ध में मारे, हे राजा इसके विशेष मरनेके निमित्त निश्चय करनेवाले योग वलसे देह त्याग 52" Pray for my victory and give me salutaray advice. Give me this boon and fight on the side of the Kauravas" sud Yudhishthir "Your victory is certain, for you have Hari for your adviser," said Drona“ I know well that you will destroy the enemies. Where there is Dhurm there Krishn and victory aro Go, son of Kunti, fight and you will win What more do you ask of me?" 55 Brahmans l' said Yudhishthir, " I wish to ask of you, inconquer able one, how I sluall be able to conquer you To this Dronacharya replied that Yudhisthir could not gain victory as long he rrus alive and that after his death the Pandavas were sure of it. At this Yudhis thir respectfully asked of Drona the manner of his death, and Drona " Best of (४४६५ भीमपर्व Bhishma Pary [4463] न शत्रु तात पश्यामि योमा हन्याद्रणे स्थितम् । युध्यमानं सुसंरब्धं शरयपाधवार्पिणम् ॥ ५९ ॥ ऋते प्रायगतं राजन् न्यस्त शस्त्रमचेतनम् । हन्यान्मां युधि योघानां सत्य में तद्मचीमिते ॥६०॥ अखचाहं रणे जहां श्रुत्वा सुमहदप्रियम् । श्रद्धेयवाक्यात्पुया देतत्सत्यं प्रपीमिते ॥६१५ समय उवाच ।। एतच्छुत्वा महाराज भारद्वाजस्यीमत। अनुमान्य तमाचार्य प्रायाच्छारखतं प्रति ॥ ३२ ॥ सोऽभिवाद्य रुपं राजा सत्याचापि प्रदक्षिणम् । उवाच दुर्धर्ष तमं वाक्यं वाक्य विदायरः ॥ ६३ ॥ अनुमान येत्वां योत्स्ये गुरो विगत कल्मपः। जयेयश्च रिपून सर्या नुशातस्त्वयानघ ॥ ६४॥ रूपउवाच ॥ यदि मां नाभिगच्छेधा युद्धाय कृत निश्चयः । शपेयंत्यां महाराज परमावायसर्वशः ६५ करनेवाले मुझको युद्ध में कोई वीर मारने वाला नहीं दरिखता है यह मैं निश्चय करके कहताहूं, मैं युद्धमें विश्वासित पुरुष से बहुत बड़े अभिय और असत्य वचन को मुनकर शस्त्रोंका त्याग करूंगा यह तुमसे मैं सत्य कहताहूं । ६० । संजययोले हे धृतराष्ट्र धर्मराज राजा युधिष्ठिर द्रोणाचार्य के इस वचनको मुनकर उन आचार्यजी की प्रतिष्ठाकरके नमस्कार कर कृपाचार्य जीके पास आया और वह वक्ताओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर उस बड़े दुर्जय कृपाचार्यजी को प्रणाम और प्रदक्षिणा करके यह वचन बोला कि मैं गुरूजी को प्रणामादिक करके पापसे पृथक हुमा लंडूंगा या पापसे हे निप्पाप मैं आपसे आज्ञा पाकर सब शत्रुओंको विजयकरूं कृपाचार्य वाले हे महाराज जो युद्धके निमित्त निश्चय करने वाला तू मुझसे नहीं मिलतातो मैं तेरेपराजयके निमित कठिन शाप देता, पुरुषही अर्थ का दास है परन्तु अर्थ किसी का दास नहीं है हे महाराज यह सत्यही है कि मैं कौरवों की प्रोरसे अर्थके द्वारा आधीन किया गया हूं उनके निमित्त युद्ध करना योग्य है है replied that he would give up arms on hearing an untruth which was very disagreeable, from one in shom he had a trust.” 60. Sanjay continued that having heard the words of Dronacharya, Yudhishthir bowed down to the preceptor and then came to Kriracharya Yudhishthir the best of speekers saluted the inconquerable Kripacharya and said, “Having howed down to you shall I fight in a good cause or not? Having got your permission, sinless one, may I conquer my foes ?" “ Had you not come to me, liog, to ascertain about war," said Kripacharya, "I would have cursed you and caused your defeat. Man is a slave to wealth, but stealth is a slave to nobody. It is true that I am bound to the Kaura vas for their supply of wealth and shall have to fight for them. This is my opinion and therefore [44661 Mahabharat अर्धस्य पुरुषो दासो दासस्त्यों न कस्य चित् । इति सत्यं महाराज बद्धोम्यर्थेन को रवैः ॥६६॥ तेपामर्थे महाराज योद्धव्य मिति मे मतिः । अतस्त्वांपलीवयद्यां युवा दन्यत् किमिच्छसि ॥ ६७ ॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ हन्त पृच्छााम ते तस्मा दाचार्य शृणु मे वचः । इत्युक्त्वा व्यथितो राजा नोचाच गतचेतन गौतम प्रत्युवाच विज्ञायास्य विवक्षितम् । अवध्योह महीपाल युध्यस्वजयमाप्नुष्ठि ६९. प्रोतस्तेऽभि गमेनाइं जयन्तवनराधिप । आशासिव्ये सदोत्थाय सत्य मेतद् अधीमिते ॥ ७० ॥ एतच्छ्रुत्या महाराज गौतमस्य विशाम्पते । अनुमान्य कृपं राजा प्रययौ येन मद्रराट् ॥ ७१।। स शल्य मभिवाचाथ कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । व्याच राज' दुर्धर्ष ॥ ६८ ॥ सजय उवाच॥त महाराज मेरा यह मत है इसी हेतुसे मै असमर्थ के समान तुझसे कहताहूं कि युद्ध के विशेष दूसरी जो बात चाहे वह मुझ से कह । ६६ । युधिष्ठिर योले हे आचार्य (जी बड़े कटकी वात है मैभी इसी हेतुसे आपसे पूछताहूं आपमेरे वचन को सुनो यह कहकर पीड़ावान् और ब्याकुल चित्त होकर कुछ न वोला, संजयवोले कि गौतम कृपाचार्य जी उसके अभिप्राय को अच्छी तरह जानकर यह बचन बोले हे महाराज मैं तो अबध्यही हूं आपयुद्ध करो और विजयको पायो मैं तेरेानेसे प्रसन्न हूं हे राजा मै सदैव प्रात काल उठकर तेरे विजयहोनेका आशीर्वाद दूंगा यह तुझसे सत्य २ कहताहूं, यह गौतम कृपाचार्य जीके वचनोंको मुनकर उनको प्रदक्षिण पूर्वक नमस्कार करके वहांको चले जहां मददेशके राजाशल्य वर्तमानथे १७० । उस दुर्जय राजा शल्यकी नमस्कार पूर्वक परिक्रमा करके अपने कल्याण कारी वचन को वोला, हे कठिनता से विजय होनेवाले राजा शल्य मै आपकी प्रतिष्ठा करता हुआ प्रणाम करता हूं कि मैं निप्पाप होकर युद्ध करूंगा हे राजा I like a weak man I say that you may ask of me anything except what pertains to war" 66 "It 19 & painful subject to me," said Yudhishthir, "that I am constrained to speak about Hear me." Having said this, Yudhishthir in the excess of grief could speak no more and remuined silent Sanjaya continued that Kripacharya, knowing tho purpose of Yudhishthir full well, said to him, “None can kill me, You mry fight and gain victory I am much pleased with your I shall pray every morning for your victory and shut I sry is true” Huing herd the words of Kripacharyn and having respectfully siluted him, Yudlushthir moved on to the place where Shalya the king of Madra' was 70 Having paid respect to the invincible hing Shalys, I udhishthir sud, "Invincible Shalya ! I res pectfully salute muy fight a sinless battle. I shall conquer coming hore you that I (४५६७) भीष्मपर्व Bhishma Pary [4407 ] मात्मनिःश्रेयसं पधः ॥ ७२ ॥ अनुमानये त्या दुर्घर्ष योरस्पेविगतकल्मपः । जये यन्नु परान् राजन् ननुशातस्त्यया रिएन् ।। ७३ ॥ शल्य उवाच ॥ यदि मां नाघि गच्छेचा युद्धाय शतनिधयः । शय त्वामहाराज पराभायायचे रण ७४ तुटोस्मि पूजितधामि यत् कांक्षसि तदस्तुने । अनुमानामि चैवत्वा युध्यस्वजयमाप्नहि ॥ ७५ ॥ नहिचियपरं पीर फेनार्यः किं ददामिते । एवं गते महाराज युसादन्यत् फिमिच्छसि ॥ ७६ ॥ सर्प स्थ पुरुपोदासो दासस्यों न फस्य चित् । इति सत्यं महाराज.वोसम्पन कारयैः ॥ ७७ ॥ करिष्यामिहि ते कामं भागिनेष यथेप्सितम् । प्रवीम्यता पलीपपयां पुरा दन्यत् किमिच्छसि ॥ ७८॥ युधिष्ठिर उपाय ॥ मन्त्रयस्थ महाराज नित्यं मनितमुत्त पापकी पानासे मैं बड़े बलवान् शत्रुओं को विजय करंगा पाल्य वाले हे महाराज युधिष्ठिर जो युदके निश्चय करने को भाप मेरे पास नहीं भाते तो मैं तुम्हारे पराजय के निमित्त महाशाप देता, मैं तुमसे पूजित होकर पड़ा प्रसन्न हुआई जो इच्छा में होय वह मुझसे मांगो और जो तू चाहता है वही.तेरा मनोरय सिद्धहोगा और मैं तुमको आवा देताहूं कि युद्धकरो और विजय प्राप्तकरोहे वीर इसके सिवाय अपने अभीए को कहो जिसको मैं हूँ हे युधिष्ठिर ऐसी दशायें युद्ध के मित्र दूसरी वात क्या चाहता है, पुरुष अर्थ का दास है और अर्थ किसी का दास नहीं है यह वचन सत्य २ कहता हूं कि मैं कौरवों की ओरसे अर्थ के प्राधीन किया गया हूं, हे इच्छावान मैं तेरी अभीष्ट इच्छा को पूर्ण करूंगा इस हेतुसे मैं असमर्थों के समान कहता हूं कि तुम युद्धके विशेष कौनसी वात चाहतेहो ।७७॥ युधिष्ठिर बोले हेमहा- राज सदैव सुखदायी मेरेअभीष्ट के विषय में सलाहदो और कौरवों के निमित्त प्राप युद करो यही मैं वरमांगताहूं। ७८ । शल्य वोले हे राजेन्द्र यहां मैं तेरी कौनसी thronrmires.by ympermirjan." "f shevi baxe. prays for your defeat, had you not come to me," said Shalya, "I an wuch pleased by your respectful behaviour. Ask of me that you desire and it shall be fulfilled. I give you permission to fight and to conquer. Tell me if you want anything else besides battle. Man is a slave to wealth, but wealth is slave to none. I tell you truly that 1 bare been overpowered by the realth of the Kauravas. I Fould fulfil' Four desiro and therefore lilea nealling 1 say that except my joining in bittle you may ask me anything you desire." m. "Gire me good advice king,” said Yudhishthir, "and fight on the side of the Kauravas. This isalt I want." 78. "What help ean I render you here, purince." said Shalya, "I liere promised the Kauravas to fight against you and shall, therefore, ight for them." "lt is sufficient for me," said ॥ 1 [4168 ] Muhabbayat (४४६८) मम् । काम युद्धयपरस्याथै वामेत वृणोम्यहम् ॥ ७९ ॥ शन्य उवाच ॥ किमत्र ब्राष्ट्रि साह्यन्ते करोमि नृपसत्तम । काम योत्स्य परस्यायें यद्धो रम्यर्थन कौरवै ॥ ८. युधिष्ठिर उवाच । स एप मे घर शल्प उद्योगे परवयात । सूतपुनस्य समामे कार्यस्तेजोवधस्त्वया ॥ ८१ ॥ शस्य उवाच | सम्परस्पत्यप ते काम कुश्तीपुर यथे सितम् । गच्छ युध्यस्य विश्रध्ध प्रतिजानेवचस्तव ! ८२ ॥ सञ्जय उवाच । अनु मान्याध कौन्तेयो मातुल मद्रकेश्वरम् । निर्जगाम महासन्याद भ्रातृभि परिया रित ॥ ८३॥ वासुदेवस्तु राधेयमाहवेभिजगाम। तत एनमुपाचेद पण्डचा गदा प्रजः ॥ ८४ ॥ श्रुत मे कर्ण भीष्मस्य देवात् किल न योत्स्यस ! सस्मान् वरप राधेय यावद् भीष्मो न हन्यते ॥ ८५ ॥ हत्तेतु भीमे राधेय पुनरप्यासि संयुगम् । सहापताकर मैं तेरे प्रतिपक्षी कौरवलोगोंकी ओरसे युद्धके लिये वचन बद्धहो- गयाई इस्ले उनकेही निमित्तलढुंगा, युधिष्ठिरवोले कि हेशल्य मुझे वहीवर आपका दियाहुआ उचितहै जो आपने युद्धके उपाय में मुझसे मणकिया है आपको पदमें कर्ण के तेजका नाश करना चाहिये । ८० । शल्य वाले हे कुन्तीके पुत्र युधिष्ठिर यह तेरा मनोरथ सिद्धहोगा तुम इच्छा पूर्वक युद्धकरो तुम्हारी विनयहोगी।८। संजयवोले कि इसमकार महावीरों से ऐसे २ वरदान लेकर भाइयों समेत पुधिष्ठिर अपने मामाशल्यको नमस्कार करके बड़ी सेना मेंस बाहर को निकले इसके पीछे गदके बड़े भाई वासुदवजा युद्धभूमि में कर्ण के पासगये और पांडवोंके निमित्त उससे यह बचन बोले, हंकर्ण मैंने सुना है कि तुम निश्चय करके भीमकी विरुद्धता से युद नही करोगे हे कर्ण हमारेसायरलो और जबतक भाष्मजी नही मारेजायें तबतक आपयुद्ध न करोगे भीमजीके मरनेपर युद्धके निमित्त संग्राम भूमिमें गाकर जो तुमचाहातो दुर्योधनकी सहायताकरो । ८५ । कर्णवाले हे केशवनी मै दुर्योधन " Yudhishthu, "f you will beop your promise about your slnre in the war, namely, that you will have to destroy the vigour of Koran 80 * This desire of thine shall be fulfilled,' said Shalya, "fight with a light heart for thou shalt win, son of Kuntz' Sanjaya continued that having got the above mentioned boous from the warriors named above, and having respectfully tnl en leave of his maternal uncle Yudhishthir crne out of the army Then, Vasudeva, the elder brother of Gada, sent to Kalan in the field of battle and for the good of the Pandavas, spoke to bim as fulloss "1 hear, Karan," said he, "that you will not take up artus on account of your quvre) with Bhishni Come and stay with us as long as he is not killed After Bhishma's death y u mag aguin c me into tht field of battle to fight in Durga (४४६९) Aragó Bhishma i arv [41691 धार्तराष्ट्रस्य साहाय्यं यदि पश्यसि चेत्समम् ॥ ८६ ॥ कर्ण उपाच । विप्रियं कारप्यामि धार्तराष्ट्रस्य केशघ । त्यतप्रागाह मां विद्धि दुय्योधन हितैषिणम् ॥ ८७ ॥ तच्छत्वा वचनं कृणः सन्यवर्तत भारत । युधिष्ठिरपुरोगैश्च पाण्डवोः सह सनतः संजयउवाच ।।८८॥अथ सैन्यस्य मध्यतु प्राक्रोशत् पाण्डवाग्रज । योस्मान् वृणोतितमहं घाये साह्यकारणात् ॥ ८९ ॥ अथ तान् समाभक्ष्य युयुत्सु रिदमत्रवीत् । प्रीता स्माधर्मराजान कुन्तीपुत्रं युधिष्टिरम् ॥ ९० ॥ यह योत्स्यामि मरतः संयुगे धृत राष्ट्रजान् । युष्मदर्थ महाराज यादमा वृणुपेऽनघ॥ ९१ ॥ युधिष्ठिर उवाच । पोहि सर्व योत्स्यामस्तव मातृगपाण्डताम् । युयुत्सो वासुदेयश्च पपञ्च प्रम सर्वशः ॥ वृशामित्वां महाबाहो युध्यस्यममकारणात् । त्यपि पिण्डव तन्तुश्च का अनिष्ट नहीं करूंगा मुझको आपदुर्योधनका अभीष्ट चाहनेवाला और उसके मिमित्त अपने प्राणोंकाभी त्यागनेवाला जानो, हेभरतवंशी धृतराष्ट्र श्रीकृष्णजी उसके वचनको मुनकर युधिष्ठिरादि पांडवोंसमेत वहां से लौटे तदनन्तर राजा युधिष्टिर सेना में आकर बड़े उच्चस्तर से पुकारे कि जो हमको वरताहै मैं उसको सहायताके कारण वरताहूं तदनन्तर धृतराष्ट्के पुत्र युयुत्सुने इनको अच्छेपकार से सच्चादेखकर बड़े प्रसन्नचित्त होकर कुन्ती के पुत्र धर्मराज राजा युधिष्ठिर से यह वचन कहा कि हे महाराज मैं आपके मिमिच युद्धभूमि में धृतराष्ट्र के पुत्रों से लडूंगा हेनिप्पाप जो तुम मुझको वरतहो । ९० । युधिष्टिर बोले हे युयुत्सु आओ हम सब तेरेअज्ञानी भइयों से लड़ेंगे वासुदेवजी समेत हमसवप्रकार से कहते हैं, हे महावाहु मैं तुमको वरताहूं मेरेकारण से युद्धकर तूही धृतराष्ट्र के पुत्रों के पिण्डों का सूत्र दिखाई देता है हे बड़े तेजस्त्री राजकुमार तुमहम सब चाहने वालोंको चाहो तू निश्चय करके dhan's cause." 85, “I shall do nothing, said Karan that mas be injurious to Duryodhan as 1 am kis staunch well-wisher and ean Jay down my life for him." Da hearing these ords, Krishn and the Pandvas returned from that place. Then hing Yudbishthir called out in a lond tone, "I accept him for my ally who accepts me." At this Yuyutsu the son of Dhri'rashtra, finding the Pandavas true men, spoke cheerfully the following words to Yudhishthir:- * I shall, said ho, "bght for you with the sons of Dhritrashtra, if you take mo with you." 90. "Come, come, Yuyutsu!" sad Yudhishthir in reply, "ro shall all fight against thy unwise brothers. Vesuder and I say this. I accept you, brave man, figlit for me. Methinks thou art the thread of the cakes that shall be offered to the maues of the cons of Dhritrashtra Come, glorious prince, to us who accept thee. Enot reme [4470] Mahabharat (४४७०) धृतराष्ट्रम्य दृश्यते ॥ ९३ ॥ भजस्वास्मान् राजपुत्र भजमानान् महाधते । न भविष्यति दुर्बुद्धिर्धा तराष्ट्रऽत्यमर्पण ॥९॥ सञ्जय उवाच ॥ ततो युयुत्सुः कौरल्यान् परित्यज्य सुतास्ता । जगाम पाण्डुत्राणां सेनां विश्राव्य दुन्दुाभम् ॥ १५ ॥ ततो युधिष्ठिरी राजा संग्रहृष्टः सहानुज । जग्राह कवचं भूयो दीप्तिमत् कनको ज्ज्वलम् ॥ ९६ ॥ प्रत्यपद्यन्त ते सर्वे स्थरथान् पुरुषर्षभाः ततो व्यूह यथापूर्व प्रत्यब्यूहन्तते पुनः ॥ ९७ ॥ अवादयन् दुन्दुभीश्च शतशश्चैव पुष्करन् । सिंह नादांश्च विविधान् बने. पुरुषर्षभाः ॥ ९८ ॥ रथस्थान् पुरुषव्याघ्रान् पाण्ड. वान् प्रेक्ष्य पार्थिवाः । धृष्टद्युम्नादय. सर्वे पुनर्जहपिरे तदा ॥ ९९ ॥ गौरवं पाण्डपुत्राणां मान्यान् मानयताञ्चतान् दृष्ट्वा महीक्षितस्तत्र पूजयाश्चक्रिरे भृशम् । खौहरच कृपाश्चैव प्राप्तकालं महात्मनाम् । दयानानिपु परांकथयों चक्रिरे नृपाः ॥ १०१ ॥ साधुसाध्विति सर्वत्र निश्चेरुः स्तुतिसाहता वाचः पुण्याः जान कि निर्बुद्धि दुर्योधन माराजायगा । १३ । संजय बोले तवतो युयुत्सु कौरवों और तेरेपुत्रोंको त्यागकरके नगाड़ा वजाकर पांडवोंकी सेनामें गया तदनन्तर बड़े प्रसन्न चित्त उत्साह युक्त राजा युधिष्ठिर ने अपने स्वर्णमय प्रकाशमान महातेजस्वी कवच को धारण किया १९५। और वह सब उसके साथी पुरुषोत्तमभी अपनेर रथोंपर सवार होकर उसके रथकेपीछे हुये और सोंने पूर्वके समान अपनेव्यूहको सभद्ध किया, और सैकड़ों दुन्दुभी वा पुष्करनाम अनेक वाजोंको वजाया और नानामकारके सिंह नादभी उन पुरुषोत्तमोंने किये, तव धृष्टद्युम्न आदि सब राजालोग पुरुषोत्तम पांडवोंको रथोंपर सवार देखकर फिर प्रसन्न हुये, और उन प्रतिष्ठा के योग्य पुरुषोंको प्रतिष्ठा देनेवाले पांडवों के समूह को देखकर राजालोगों ने बड़ी प्रशंसा की, और अनुसार उन महात्माओंकी जात वालोंपर वडी सुहदता और कृपालुता को वर्णन किया, उन कीर्तिमानों की प्रशंसासे युक्त पवित्र चित्तों के हृदय आकर्षण करनेवाले बहुत अच्छा बहुत अच्छा कह श्रेष्ठ वचन चारोंओर को फैलगये, जिन समय के for certain that Duryodhan shall die." Sanjaya still that at this Yuyutsu left the army of the Kauravas and joined the Pandavas amidst beat of drums Yudhishthir with a cheerful heart put on his bright arnipur. 95 All the followers of Yudhishthir got on their chariots again and arrayed theniselves as before. Hundreds of musical instruments sounded and the warriors roared like lions. Dhrishtadyumn and other princes, best of men, seeing the Pandavas mounted on their chariots, were glad and praised the respectable Pandavas in songs expresive of their merciful deeds charity. At the praiscs of the famous l'andavas the cry of "Vell and good" (४४०१) भीमप Bhishma Pary {4871 कीर्तिमतांमनोहदयणाः ॥ १०२ ॥ म्लेच्छाश्चायश्चि तत्र दशुःशुभस्तथा। वृत्त तत् पाण्डपुत्राणां शरुदुस्ते सगदगदाः ॥ १०३ ॥ ततो जघ्नुर्महाभरी: शतशवस. हस्रशः । शंखांश्च गोक्षागनिमान दध्मईया मनास्वनः ॥ १०४ ॥ इति श्री महाभारते भीप्मपर्वणि मीप्मवधपर्वणि भीष्मादिसंमानने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ।। धतराष्ट उवाच ॥ एवं व्यूढेवनाकेषु मामग्वितरेषुच । के पूर्व प्राहरंस्तत्र फुग्यः पाण्डवानुकिम् ॥ १॥ बजय उयाच ॥ भ्रातृभिः सहिता राजन पुत्रो दुःश सनरतय । भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा प्रययौ सहसेनया ॥ २ ॥ तथैव पाण्डवाः सर्वे भीमसेनपुरोगमा: भीमेण युद्धमिच्छ-तः प्रपयुद्धष्टमानसाः ॥ ३ ॥ क्ष्वेडा किलकिलाशब्दाः ककचा गो . म्लेच्छ और आर्य पुरुषों ने पांडवों के उस चलनको देखा और मुना वह गदगद कराठों से रुदन करनेलगे तदनन्तर मसन्न चिर साहसी सेना के मनुष्यों ने सैकड़ों भेरी और पुष्करादि अनेक वाजे और दुग्ध समान महाश्वेत उत्तम उत्तम शंखों को वजाया १०४॥ अध्याय ॥४४॥ धृतराष्ट्र वोले कि मेरे पुत्रोंकी और पाण्डयों की सेना के इस रीति पर तैयार होनेपर पहले किन लोगों ने अर्थात् कौरख पाण्डवों में से पहले किस ने प्रहार किया। १ । संजय बोले कि आपका पुत्र दुश्शासन भाई के उम वचन को मुनकर भप्मिनी को प्रागे करके सेनाके साथ चला, इसीपकार भीमसेन मादि सब प्रसग चित्त पाण्डव लोगभी भीम जीसे युद्ध करने की इच्छा करके चले ३१ शंखन्नान और कलकला शब्द पूर्वक कृकच, गोविपाक,भेरी,मृदंग,मुरज, इत्यादि वाजों के और घोड़े हाथियों के अनेक प्रकारके शब्द होने लगे, हे राजा spread all round. All the mlechas and Aryans who heard of the conduct of tho Pandavas, sept for excess of joy. The cheorful and ambitious warriors of the army sounded hundreds of musical instru. ments and milk-white conch-shells. 104. CHAPTER XLIV "TVhich side was the first to strike a blow, when the two arnies were thus prepared for battle?" askeal Dhritrashtra. "Your son, Dushasan," replied Sanjaya, "went fornard, led by Bhishm, at the order of Duryodhan; Dixit and other Pandavas, cheerful at heart, proceeded to meet l'hishm in combot Conch shells Tere sounded, Warriors roared, various musical instruments Tere beaten and blogo [4472 ] Mahabharat (४४७२) विषाणिका । भेरीमृदङ्गमरजा हयकुञ्जनि स्वना ॥४॥ उभयो सनयोसि स्ततस्ते Sमान्ममाद्रवन । वय तान् प्रति नईन्तस्तदासीत्तमल महत् । ५॥ महान्यनीकानि महासमध्ये समागमे पण्डवधार्तराष्ट्रयां । कम्पिरे शमृदङ्गनि स्वनैः प्रकम्तिा- गील वनानि वायुना ॥ ६ ॥ नरेन्द्रनागाश्वरथाकुलानामभ्यागतानामशिवे महः । बभूव घोपस्तुमुलश्चमना बातोदुतानामिव सागराणाम् ॥ ७॥ तास्मन् समुरिधते शब्द तुमले लोमहर्षणे । भीमसेनोमहाब प्राणदगोवृपो यथा ॥ ८॥ शखदुन्दुभि नि? पवारणानाच वृहितम्। सिंहनादचसैन्यानां भीमसेन रचोभ्यभूत् ॥ ९ ॥ हयानाहेप माणानामनी घुसहनश (सर्वानश्यभवच्छन्दान् भीमस्यगदत स्वन ॥१०॥ तश्रुत्वा निनद तस्य सैन्यास्तव ायत। जीमूतस्येच नदत शकाशनि समस्वनम् ॥ ११ ॥ तदनन्तर वह दोनों सेनामोके वीर लोग परस्पर में एक दूसरे पर प्रहार करने को महा गर्जनाओं को करके ऐसे दौड़े कि जिनके शब्दों से महातुमुलशब्द होगया 1५। पांडवों और दुर्योधनादि कौरवो की महायुद्ध करने वाली सेना समागम के समय शंख और मृदंगोंके शब्दों से ऐसी महा कम्पायमान हुई जैसे कि वायु से सब वन कम्पायमान होते है, फिर राजा लोगों से और हाथियो से समाकुल और अशुभ मुहूर्त में आनेगाली सेनामों क ऐसे कठोरशब्द हुए जैसे कि वायुप्ते चलायमान समुद्रों के शब्द होते है । ७ । शरीर के रोमहर्पण करनेवाले उस | तुमुल शब्दक उठने पर महावाहु भीमसेन ऐमा गर्जा कि जिसकी गर्जना के कारण शंख दुन्दुभियों के शब्द और हाथियोंकी चिंघाड़ वा सेनाकै मनुष्यों से सिंहनादभी तिरस्कार होगये, इस भीमसेनके शब्द ने सेना के मध्यवर्ती हजारों घोड़ो के हिनहिनाहट आदि अनेक शब्दो को दवादिया। १० । उसके उस महावज़ के समान शब्द को सुनकर तेरी सेना के मनुष्य अत्यन्त भयभीत हुए उस वीर के शब्द से सव सारियों के वाहनों ने ऐसे मूत्र विष्ठा को डाला जैसे 5 and the noise of all these, mixed with the neighing of houses and the grunting of elephants, nas execəsiye The warriors on either side rushed on to fight with tremendous roars The armies of the Pandavasand Kauravas shook with the noise of conch shells and drums as forests shaken by the wind The uproar from the warriors and elephants of the army was hike that of the ocean in a storin of wind.7 Above that fearful din rose Bhim's war cry which was heard above the sounds of conch shells, trumpets, elephants and sarriors und subdued the neighing of thousands of horses 10 The people of thy army rere afraid to hear the thunder like sound of (४४७३ भीष्मपर्य Bhishma Pary [4473] धाहनानिच सर्वाणि राकम्मू प्रसुनुवुः । शब्देन तस्म वीरस्य सिंहस्येवारेमृगाः ॥ १२ ॥ दर्शयन् घोरमात्मान महात्रमियनादयन् । विभीपयंस्तवतान् भीमसेनः समभ्ययात् ॥ १३ ॥ तमायान्तं महे चासं सोदाः परर्पवारयन् । छादयातःशर प्रतिमेघा इय दिवाकरम् ॥ १४॥ दुर्योधनश्च पुषस्ते दुर्मुखो दुःसह शलः । दु.शा सतश्चातिरथस्तया दुर्मर्पणो नृपः ॥ १५ ॥ विविंशतिश्चित्रसेनो विकर्णश्चमहारथः। पुरुमिनो जयो भोजः सौमदत्तिश्च वीर्यवान् ॥ १६ ॥ महाचापानि धुन्वन्तो मेघाइयस विद्युतः । याददानाश्च नाराचानिर्मुकाशीविषोपमान ॥ १७ ॥ अथते द्रौपदीपुत्राः सौमद्रश्च महारथः । नकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्वतः ॥ १८ ॥ धार्तराष्ट्रानप्रति यपुरर्दयन्तः शितैः शरैः । धरिय महायेगे. शिवराणि घराभृताम् ॥ १९ ॥ तस्मिन् . कि सिंह के शब्द को सुनकर अन्य जंगल के पशु विष्टा मूत्रको डालते हैं । १२ । वहां भीमसेन अपने शरीर को महा भयानक दिखाता और बड़े घनके समान गर्जता तेरेपुत्रों को डराता हुआ फिर उन्होंके सम्मुख आया, तबतो उस आते हुए बड़े धनुपधारी भीमसेनको दुर्योधन के सहोदर भाइयों ने चारों ओर से वाणों की वर्षा से ऐसा ढक दिया जैसे कि सूर्य को यादल ढकदेता है, हे राजा आपके पुत्र दुर्योधन, दुख, अतिरथी दुशासन, दुस्सह, दुर्मर्पण, विविन्शति, चित्रसेन, महारथी विकर्ण, पुरमिन, जप, भोज, पराक्रमी सोमदत्त यह सब वीर जैसे बादल विजली को धारण किये हुए होते हैं उसी प्रकार धनुपों को चढ़ाये हुए कांचली रहित सपों के समान नाराच नाम वाणों को हाथों में लिये इए सम्मुख आये । १७ । तदनन्तर द्रौपदी के पुत्र और सुभद्राका पुत्र महारथी अभिमन्यु नकुल सहदेव पार्षदका पुत्र धृष्टद्युम्न यह सव बड़े तीक्ष्णशरों से ऐसे पीड़ित करते हुए शत्रुओंके सम्मुख गये जैसे बड़े वेगवान पत्रों से शिखरों को पीड़ित करते हुए इन्द्र पर्वतों के सम्मुस जाय, उस पहले युद्ध में तेरेपुत्रोंके और पांडवों के धनुपों की Bhim, and the animals vero so terified as if they had lieard the roar of a lion. 12. Bhimnsen, with his formidable appearanco, roaring like thunder and terrifying thy sops, came again in front, and the great archer, Bhimsen was covered on all sides by the arrons of Duryodhan's brothers as the sun by the clouds. Your sons Duryodhan, Durmuklı, valiant Dushasan, Dussah, Durmarshan, Vivinshati, Chitrasen, valiant Vikara, Purumitra, Jaya, Bhoj and warlike Soudatta, with their bosts bright like lighting and arrows deadly like the serpents sho have cast their skins, came to the front, Tho Eons of Draupadi, Abhimanyu the son of Subhadra, Nakul, Sahadov and Dhrish tadyumna the son of Parshad came in front of the enomy, shooting their sharp arrows as Indra strikes his [4474] Mahabharat (४४७४) प्रथमखग्रामे भीमज्यातलनि स्वने । तापमानापरेपाच नासीत्कश्चित् परामुख २० लाघव द्रोणशिष्याणामपश्य भरतर्षभ । निमित्तवेधिना चैव शरानुत्सृजतां भृशम् ॥ २१ नोपशाम्यति नि?पो घनुपाजता तथा विनिश्वर शरादीमा ज्योतीपीय नमस्ललात् ॥ २२॥ सर्वे त्यग्ये महोपाला प्रेक्षका इवभारत । ददृशुर्दशनीय तमाम शातिसमागमम् ॥ २३ ॥ ततस्ते जातसरम्भा परस्परकृतागस । अन्योन्यस्पर्धा राजन् व्यायच्छन्तमहारथा ॥ २४ ॥ दुरपाण्डवसेने ते हस्त्यश्वरथसकुते । शुशुभाते रणेऽत्तीयपटे चिधार्पितेइच ॥ २५ ॥ ततस्त पार्थिवास मगृहीतशरासना । सह सन्या समापेतु पुत्रस्यतय शासनात् ॥ २६ ॥ युधिष्ठिरेण चादिया पार्थिवास्ते ज्या प्रत्यंचाओं के भयानक शब्दों से दोनों पक्षवालों मेंसे कोर्डभी परमुख नहीं हुअा अर्थात किसीने मुख न फेरा । २० । हे भरत बशियों में श्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्र मैने वाणोंको वरावर छोडते और लक्षों को वेधते हुए द्रोणाचार्य के शिष्यों की हस्तलाघवता को देखा, उस समय शब्दायमान धनुपों के शब्द वन्द नहीं होते थे और मकाशित वाणभी वरावर ऐसे चले जैसे कि 'गाकाश से नक्षत्रों के पतन वरावर होते है । २२। हे भरतवशी अन्य सा राजाओं न कुतूहल देसनेवालों के समान उस दर्शनीय अोर भय उत्पन्न करने वाले जात भाइयों के युद्धको देखा, तदनन्तर हे राजा उन क्रोषों में भरेहुए परस्पर में अपराधी महा थियो ने अन्यो- न्यकी ईपीसे परस्पर वीरताकी, कौरव और पांडवों की यह दोनों सेना हाथी घोडे और रथों से व्याप्तहोकर युद्धमें ऐसी शोभायमान हुई जैसे चित्र पटों से विचित्र दो वस्त्रहोते है । २५ । तदनन्तर धनुपवाण हाथमें लिये सब रागा लोग आपके पुत्रकी आज्ञासे सेनाके मनुष्यों समेत चारों ओरसे आटूटे उनचारों ओरसे दौडने वालों के ब्याकुल शब्द उस समुद्रकी गर्जना से मुनाई दिये जिस समुद्र में हाथी bolts at a mountain None of the vlrriors turned back from the arrows of the Pandavas or those of thy sons in that first encounter 20 I saw, o king Dhritrashtra' the dexterity of the papıls of Dronaoharya in discharging arrows and hitting the mar) The tang from their bows vis continuous and the bright amous looked like the fall of meters from the sky 22 Other kings only looked on at the fiwe inspiring encounter of those brothers and kiusmco Then, o king those angry wiriors eiger to destroy one another, mado use of their skill in fighting The arnies of the Kruravis and the Pandavas, with their elephants, horses and chariots looked as beautiful as the Pictures on a canvass 20 Tlien all the lings with bows and arrays in their lands rushed on all sides by the order of your son Thc hubbub crusel by the assulants was like the rour of the ocean having (४४७५) भीष्मपर्व Bhishma Pary [4415] सहन्नश । विनदत समापनु पुत्रस्य तप वा हनीम् ॥ २७ ॥ उभयो.सेकयोस्तीत: सैन्यानांमसमागमः । अतीयनचादित्य सेन्यनरजसान ॥२८॥ प्रयुद्धानां प्रभग्नाग पुनरावर्तिनामपि । नात्रस्येपा परेपावा विशेष सादृश्यत ॥२९॥ तस्मिस्तुतुमुले युद्ध याने महामये । यतिसर्याण्पनीकानि पितातेऽभिव्यरोचत ॥ ३० ॥ इति श्री महामारते भीष्मपर्वणि भीष्मवारपर्वणि युद्धारम्भ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ साप उवाच । पूर्वादणे तस्य रोदस्य युद्धमइनोविशाम्पते । मावर्तत महाधोर राज्ञा देवापत्तनम् ॥ १ ॥ फुरुणा सृञ्जयानांच जिगोपूणांपरस्परम् । सिंहा घोहों के शब्द सिंहनाद से मिश्रित बास भेरी से व्याकुल शब्दायमान बाणरम्प प्राहकाला धनुप हाथी और खड्गरूप कलए रसने वाला और चारों ओरसे घोड़ों की चाल रूपवायु को आगे रखगेवाला था, और युधिष्ठिर की आज्ञा पायहुए हजारों रानालोग अपनी सेना के मनुप्यों समेत आपके पुत्रकी सेनापर पड़े उस समय दोनों ओर के वीरों में पास्पा ऐसा कठिन युद्धहुआ जिमकी धूलिमे सूर्य भी भान्छादित होगया, इमीसे दोनोंोर के वीरोंका अत्यन्त लड़ना वा मुसफेरना प्रयवा लौटना वा किसी की मुख्यता दिखाई नही दी इस बड़े भयकारी तुमुन्न युद्ध के वर्तमान होने पर आपके पितामीम जी सब मेना को उल्लंघनकर के अत्यन्त शोभायमान हुए ॥ ३० ॥ अन्याय ४०॥ संजयगोते कि ईरामा उनभयकारियों के प्रथममाग में राजाओं के शारीरोंको काटनेवाला महाभारी घोर युद्ध प्रारंभहुआ, युद्ध में विजया कांक्षी कौरवों के और नियों के सिंहनाद रूपी गब्दों ने पृथ्वी भोर पाकामाको शापमान कर दिया, the no ses of elephants and horses mixed with hervats of warriors and swords for crocodiles and tortoiscs and the tramp of horse , hools for wind storm At tlu older of Yudhishthur, thousands of lings with their attendant warriors fell on the army of thy son. The Lattic on both sides $15 severe and the sun was Ludden by the dust storm raisua thy them, the feats of marriors, thur turning back, the supremacy of onc warrior over the other were not distinguishablo in that great battle and your father Bluskm vas zlorious alove all 32 CHAP1CR XI.V Sanjay a continued "Thus commenced the greatest rar, destructie of kings Tlie v ar crics of the Kauravas and Srdjayas, desirous of [4476] Afghabharat (४४७६) नामेव संहादो दिवमुर्वीशनादयन् ॥ २ ॥ आसीत् किलकिलाशब्दस्तलशहरवे सह । जन्निर सिंहनादाश्च शूराणां प्रतिगर्जताम् । तलबाभिहताव च्याशब्दाभरत पमा पतीनां पादशब्दश्च घाजिनांच महास्वनः ॥ ४ ॥ तोनाकुशनिपातश्चमा- युधानांच नि स्वन । घण्टाशब्दश्च नागानामन्योन्यमभिधावताम् ॥ ५ ॥ तस्मिन् समुदिते शब्दे तुमुले लोमहर्षणे । चभूच रनिर्पोप पर्जन्यनिनदोपमः ॥ ६ ॥ ते मनः ऋामाधाय समभित्यक्तजीविताः । पांडवानभ्यवर्तन्त सर्वएवोच्छूितध्वजाः ७ अथ शान्तनवो राजनभ्यघावद्धनञ्जयम् । प्रगृह्य कामुकं घोरं कालदण्डोपमरणे ॥८॥ अर्जुनोपि धनुगृह्य गाण्डीवं लोकविश्रुतम् । अभ्यधावत तेजस्वी गाङ्गेय रणमूर्धनि ॥ ९ ॥ ताबुमो कुरुशाईलौ परस्परवधैषिणः। गांगेयस्तु रणे पार्थ विध्वानाफम्म ओर धनुपधारियों के धनुपों की टंकारों समेत शखों की महा ध्वनियों से अत्यन्त कलकला शब्द उत्पन्न हुआ और परस्पर में सम्मुख गर्जनेवाले मनुष्यों के सिंहनाद उत्पन हुये, हे भरतर्पम हस्तत्राण से टक्करवाई हुई प्रत्यंचामों के शब्द और पदातियों आदि घोड़ों के चरणोंके शब्दो से और गिरेहुये अंकुश वा अस्त्रों के शब्दों से अथवा परस्पर में सम्मुख दौड़ने वाले हाथियों के घंटोंके शब्दों से, इस युद्धमें शरीर के रोमहर्पण करने व ले तुमुल शब्द उत्पन्न हुये और रथों के शब्द वादलों की गर्जना के समान हुये ।६। वह सबलोग जिनकी वजा उन्नतर्थी और जो जीवनको आशाको अत्यन्त त्यागकरके कठोर चित्त निर्दय और दूसरों से यात्रुता करनेवाले वनकर पांडवों के सम्मुख लड़ने को उपस्थितहुये हे राजा आप भीष्मपितामहजी कालदण्ड के समान भयानक रूप धारण किये अपूर्व भयकारी धनुप को हाथ में लेकर अर्जुनके सम्मुख दौड़े और संसारमें विदित धनुपपारी महाहस्त लाघव जानने वाला तेजस्वी अर्जुनभी अपने गांडीव धनुपको लेकर भीमजी के सम्मुस दौड़ा, कौरवों मे महा श्रेष्ठ वह दोनों परस्पर में मारने की इच्छा में मत्त हुये परन्तु महाबली भीमनी ने अर्जुनको वाणों से भेदकर victory echoed through the earth and shy,and the noise has great fiom the lwangs of bows, the blasts of the conch-sliells and the roar of war riors From the trange of bows, tne tramp of the soldiers and laorses, the fall of goods and other reapons and the ringing of the bells of tho moving elephants, the noise was tremendous, and the rambling of the chariot wheels as he thunder 6. I shall mentron those who with banners upraised, fought desperately and fearless of life, encoun. tered the Pandavas Bhishm the grandtatlier, dreadful as the rod of Death, armed with the most dreadful lor, lushed upon Arjun That world-renoirned archer too, of very great destenty of hand, Arjun, armed with the Gandiy bow rushed upon Bhishm and the two best of Kaurav zs, met each other in combat, nishing to strike each other. But Bhubim of great proves could not quell Arjun with his (४४७७) भीमपर्य Bhishma Parv [14771 यदली ॥ १० ॥ तच पांडयो राजन भीष्म नाकम्पयाधि । सात्यकिस्तु गहे ग्यारा एतचर्माणमभ्ययात् ॥२१॥ तयो सम भवद्युद्ध तुमुललोगहर्पगम् । सात्यकि इतवर्मा पंक्तवर्मा च सात्यकिम् ॥ १२ ॥ मानाईतु शाघारस्तक्षमाणो परस्परम् । तीसरा चितसवाडी शुशुभाते महायली ॥ १३ ॥ सन्ते पुष्पग्ली पुष्पिताधिय किंशुको । अभिमन्युमहेप्यास यूपयलमयोघयत् ॥ १४ ॥ तत फासलराजासावभिमन्यो विशाम्पते । ध्वज चिच्छेद समरे बारविश्वव्यपातयत् ॥ १५ ॥ सामद्रस्तुतत र पातिते रथसारथौ । वृहयल महाराज विव्याध नयाभि शरैः ॥ १६ ॥ अथा पराम्यांमश्लाम्या शिताभ्यामरिमर्दन । ध्वजमेकेनचिच्छेदपार्णिमेकेन सारथिम् ॥१७॥ अन्योन्यञ्च शरै कुद्धौ ततक्षातेपरस्परम् । मानिन समरे हप्त:कृत्तचर महारथम् ॥१८॥ भीमसेनस्तपसुत दुर्योधनम्योधयत् । तावुभौ नरशालो फुरुमुख्यौ महारलौ ॥ १९ ॥ कंपायमान नहीं किया । १० । इसी प्रकार अर्जुनने भी भीप्मनी को वाणों से | भेदकर कंपायमान नहीं किया और धनुपपारी सालिकी कृतवर्माके सम्स गया, इनदोनों कामी रोमहर्पण महातुमुल युद्धहुमा साविकाने कृतवर्माको मैर कृतवम ने साविकीको घायल किया, दोनों ने बड़े शब्दोंको कहकर परस्पर में घायल किया, तदनन्तर वहदोनों यादववाणों से भरेहुये अंगोंसमेत एसे शोभायमान विदित हुये जैसे कि वसन्तऋतु में फूलों से आच्छादित विचिन किंशुक होते है उससमय वडायनुर्धारी अभिमन्यु वृहदन से युद्धकरने लगा । १४ । हेराजा तिसपीछे युद्ध में राजा कोसलने अभिमन्यु की ध्वजा को गिराकर उसके सारथी को गिरापा ध्वजाकेकाटने और स्थसारथीके गिरानसे अभिमन्युने महाक्रोधाग्निरूप होकर सहगलको नौवाणों से घापल किया, अर्थात् एक वाणमे तो ध्वजाको और एक पाणसे पीछे के रक्षक और सारथी को मारा, शत्रुमौके विजय करने वाले दोनों ने परस्पर में तीक्ष्ण वाणों से घायल किया और महामानी युद्ध में प्रकागित शत्रुता करनेवाले महारथी आप के पुत्र दुर्योधनसे भीमसेन युद्ध करने लगा, उन Nor could Arjun shahe Bhishm by his arrows. Sat wili the great archer cncountered Krtyarma, and the two marriors fought furiously and rounded each other while they spoke highsounding words The two Yadaras, with their bodies founded by arrows looked like Kinshuks (a tree with red flowers) in bloom in spring season. Abhimanyu the great archer fought with Frihadra! The king of Kosal felled the banner of Abhimanyu and Lilled the driver Beinginfuriated by the fall of his banner and chariot driver, Abhimngu wounded Vrihodral ith mine arrows. one arrow he cut down his banner, tith another he billed the driver and tho rear guard The tiro cunquerers of enemies wounded each Your proud son Duryodbin of great glory in battle, valiant and resentful, met with Bhimsen in combat Both these l'auratals arrows 10 14 With other [44781 Mahabharat (४४७८) भन्योन्यं शरवर्षाभ्यां ववृपाते रणाजिर । तो चीक्ष्यतुमहात्मानौ कृतिनौ चित्रपो. धिनी ॥ २० ॥ विस्मय सर्वभूतानां समपद्यतभारत । दु शासनस्तु नकुलंप्रत्यु द्याय महायकम् ॥ २१ ॥ अविध्यनिशितैर्वाणहभिर्मर्मभेदिमिः । तस्य माद्रीत केत सशरच शरासनम् ॥ २२ ॥ विच्छेद निशितैोणैः प्रहसनिय भारत । अथैन पंच विशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् ॥ २३ पुत्रस्तुतवदुर्घष नकुलस्यमहाहये । तुरनश्चिच्छिदेवाध्यंजञ्चैवाभ्यपातयत् ॥२४॥ दुर्मुख सहदेवंच प्रत्युद्यायमहायलम्। विष्याध शरवण यतमान महाहवे ॥ २५ ॥ सहदेवस्ततो धीरो दुर्मुखस्य महारणे । शरेण भृशतीक्ष्णेन पातयामाससारपिम् ॥ २६ ॥ तापन्योन्य समा साद्य समरे युद्ध दुर्भदौ । त्रासयेतां शरै|ः कृतप्रतिकृतैपिणी ॥ २७ ॥ युधिष्ठिरः स्वयराजा मदराजानमभ्ययात् । तस्य मद्राधिपश्चापं विधा चिच्छेद मारिप ॥ २८ ॥ दोनों नरोत्तम और कौरवोत्तम महारथियोंने । १९ । युद्धभूमिमें अपने २ वाणों की | वर्षासे परस्पर में एकने दूसरेको ढक दिया, हे भरतवंशी उन युद्धमें कुशल दोनों महात्मा चित्रयोधियोको दखकर सब जीवोंको आश्चर्य उत्पन्न हुआ। २० । और दुश्शासन ने महारथी नकुल के सम्मुख जाकर बड़ी प्रसन्नतासे तीक्ष्णवाणों से नकुल को घायल किया और इसीमकार हे राजा हँसतेही हुये नकुल नेभी अपने तीन वाणों से दुश्शासन की ध्वजा और धनुपवाणको काट डाला:ोर पच्चीस क्षुद्रक नाम वाण उमपर छोड़े । २३ । फिर तेरेपुत्र दुश्शासन ने नकुल के घोड़ों को मारकर उसकी ध्वजा को गिराया, और दुर्मुख ने महावली सहदेव के सम्मुख जाकर उपाय करने वाले सहदेव को अपने वाणोंकी वर्षासे पाड़ामान किया । २५ । तिसपीछे बड़ेबीर सहदेन ने उसी युद्ध के बीच बड़े तीक्ष्ण तारों से दुख के सारथी को गिराया उनदोनों दुर्मद घात के बदले घातकरने के इच्छावान वीरों अपने वाणों से युद्ध में भय उत्पन्न कर दिया, और आप राजा युधिष्ठिर मद्रदेश के राजा के सम्मुख गये उसको देखते ही मद्रदश के राजाने युधिष्ठिर के are the best of men With the shower of their arrows they covered each other and the lookers on wondered to see the fighting of those two warriora Dushasan met Nakuland, »ith a cheer ful heirt, wounded him by luis arrows Likewise, Karan two, with a smiling face, cut down with his arrows Dushasan's banner, bow and arrows, and shot twentyfive arroirs of small heads at him 23 Then thy son Dushasan Lilled the houses of Nakul and cut down his banner. Durmukh encountered Sahadev of grent valour and wounded him with his arrows The gieat warrior, Sahadev struck Durmukh's chariot driver down by his sharp arross. The two dreadful warriors, with their plots and counterplots, caused a great alarm in the field of battle King Yudiushthir himself encountered I9 20 30 भीष्मपर्य Bhishma Parv [1470 तदपास्य धनुदिछन्नं कुन्तीपुत्रो युधिर्धाप्टर: । अायत्कार्मुकमादाय वेगवबलवत्त रम् ॥ २९ ॥ ततो मद्रेश्वरं राजा शरःसन्नतपर्वभिः । छादयामास संकद्धस्ति- छतिष्ठेति चानधीत् ॥ ३० ॥ धृष्टद्यन्नस्ततो द्रोणमययत भारत । तस्यद्रोणः मुसंरक्षः परासुकरणं रढम् ॥ ३१ ॥ विघाचिच्छेद समरे पांचाल्यस्यतु कामुकम् । शरश्चैव महाघोरं कालदण्डभिवापाम् ॥ ३२ ॥ प्रेषयामास समरे सोस्यकायेन्य मज्जत । अथान्यद्धनुरादाय सायफांध चतुर्दश ॥३३ । द्रोणगुपदएप्रस्तप्रतिविव्याध सयुगे। तावन्यान्यं सुसंगद्धौ चक्रतु सभृशं रणम् ॥ ३४ ॥ सोमात्ति रशहो रमसं रमसोयुधि । प्रत्युद्ययौ महाराज तिष्ठतिष्ठे ते चाब्रवीत् ॥ ३५॥ तस्य पै दक्षिण चारो निर्विभेद रणे भुजम् । सौमदत्तिस्ततः शङ्ख अनुदेशे समागत् ॥ ३६ ॥ तयोरतदयाच घोररूपं विशाम्पते । दृप्तयों समरे पूर्व वृत्रयासपोरिय ॥ ३७॥ घनुप को काट डाला । २८ । तर कुन्ती के पुत्र वेगवान् युधिष्टिर ने उस कटेहुए घनुप को डालकर दूसरे दृढ़धनुपको धारणकिया, तिसपीछे अत्यन्तक्रोधयुक्त होकर राजा युधिष्ठिर ने तक्षिण वाणों से मदेशाधिपति को प्रान्छादित किया और तिष्ठतिष्ट करके अनेक वचनोंको कहा । ३० । हे भरतवंशी इसके पीछे धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्य के सम्मुख दौड़ा उससमय महा क्रोध में भरे हुए द्रोणाचार्य ने पद में उस महात्मा पांचाल के दृढ़ धनुप को जोकि मारनेका साधन था काटडाला और महा भयानक काल दण्ड के ममान अपने पाणको युद्ध में फेंका वह उसके शरीर में घुसगया तिसपीछे द्रुपदके पुत्र धृष्टद्युम्न ने दूसरे धनुप में शायक नाम चौदह याणों को धारण करके युदमें द्रोणाचार्य को घायल किया और दोनों क्रोधरूपों ने परस्पर में बड़ा युद्ध किया । ३४ । हे महाराज युद्ध में शीघ्रता करने वाला शंस अपने समान गुणवाले सोमदत्त के सम्मुख गया और निष्ठतिष्ट शब्दको वोला तर बड़े वीर मोमदत्तने युद्ध में उसके दक्षिण भुना को घायल करके अत्यन्तही व्याकूल किया, ई राजा उन दोनों अहंकारियों काभी युद्ध ऐसा महा भयकारी tho Ling ni Madia, who cut down Yudhishthir's bow as soon as he savy hitr.. 28. Then Yudhishthir the son of Kunti dexterously three away that bow and took up another, a hard eno, and in great anger corered the king of Madra with his arroirs, saying "Stay, stay" 30. Dbrishtadyunna rushed upon Dronacharya s ho cut down the hard box of the Panchal prince with which tho latter had come to fight. Dronacharya disclinrged his arrors like the staff of death which pierced the body of the Panchal prince Dhrishtadyumna the son of Drupad thcrcupon discharged fourteen arrows from another low and wounded Dronn, Both tlicsc cnraged waariors fought valiantly. 34. Shakuni the dexterous in lattle, faced Somadatta nho was his equal, and said, "Stay. stay," Somendatta wounded his right arin which smarted and upsct his mind. Thic encounter between those tho कच 4480] Malabharat (४४८०) घालाकन्तुरणे क्रुद्धं क्रुद्धरूपो विशाम्पते । अभ्यद्वमेयात्मा धृष्टकेतुमहारप ॥ ३८ ॥ बालीकातु रणेराजन् धृष्टकेतुममर्पण । शरैर्वहुभिरानछत् सिंहनाद मथानदत् ॥ ३२ ॥ चेदिगजस्तु सक्रुद्धो वाटलीक नचभिः शरै । विव्याध समरे तूर्ण मत्तो मत्तामय द्विपम् ॥४॥ तौतत्र समरे धौ नईन्ताच पुन पुन । समीयतु सुसफुद्धाचङ्गार वुयायिय ॥ ४१ ॥ राक्षस रौद्रकर्माण करकर्माघटोत् । अलम्बुप प्रत्युदियादबल शक्रयाहवे ॥ ४२ ॥ घटोत्कचस्तत.द्धिो राक्षसं तं महाबलम् । नवत्या सायकैस्तीक्ष्णैरियामास भारत ॥ ४३ ॥ अलम्बुपस्तु समरे भैमसेनि महायलम् । बहुधा दारयामास शरैः सन्नताभि ॥ ४४ ॥ व्यभ्राजेता ततस्तौ तु संयुगे शरविक्षतौ । यथा देवासुरे युद्ध वलशोमा बलौ ॥ ४५ ॥ शिखण्डी समरे राजन् द्रौगमायुधयों चली । अश्वत्थामा ततः कुछ हुआ जैमा देव दानवों का युद्ध होता है । ३७ । तिप्त पीछे बड़ा साहसी महारथी युद्ध में क्रोध रूप धृष्टकेतु बालीक राजा के सम्मुख गया, तब वाह्नीक ने उम क्षमा से रहित धृष्टकेतु को बहुत से वाणों से आच्छातिद करके महा सिंहनाद किया फिर उस महाक्रोधरूप चादराज धृष्टकंतु ने भी युद में बड़ी शीघ्रता से नौ वाणों से बालीक को घायल किया और एसा युद्ध किया जैसे मत्त और उनमत्त हाथी लड़ते है । ४० । और युद्ध में महा क्रोधाग्निरूप दोनों वारंवार शब्दों का करते हुये मंगल और बुधके समान बड़े पराक्रम से लड़े, महा कठिन कर्मी घटोत्कच | उसी के समान कठिनकर्मी अनंबुपनाम राक्षस के सम्मुख ऐस गया जैसे कि युद्ध | में वलिके सम्मुख इन्द्र जाता है, हेभरतवंशी फिर घटोत्कच ने उस महाक्रोध रूप महावसी राक्षस को तक्षिण नौ तीरों से घायल किया । ४३। और अलंबुप ने भी युद्ध में भीममेन के पुत्र घटोत्कच को गुप्त ग्रान्ध वाले बाणों से अनेक रीतिसे घायल किया तदनन्तर वह दोनों वाणों से भिदेहुए युद्ध में अत्यन्त शोभाय मान हुए । ४५ । हे राजा महा पराक्रमी शिखण्डी उस युद्ध में अश्वत्थामा से proud warriors traz like that between the gods and the dwarvas. 37. Next, the great warrior Dhrishtaketu of immense prowess, Rage in person, faced king Vahik The latter covered the former Tith a shower of arrows and roured hle a lion Durishtaketu the king of Chedı, in his turn, wounded Vahlık sath nine swift going The two heroes fought libe mad elephants 40. The two warriors spole loudly in a rage and fought like Mangal and Budh Valiant Gbatotkach faced the rakshas Alam rush of equal prowess with bim, as Indra faced Balı, and wounded him with nine sharp Alamyuzh too, wounded Ghatotkach the son of Bbimsen with his arrors having hidden knots, and the tro, wounded by arrows, looked glorious. 15 Sbiblimdi of great prove-s faced Ashthe very arrows. arrowo (४४८" भीष्मपर्व Bhishma Pary [4481] गिलण्डिनमुपस्थितम् ॥ ४६॥ नाराचेन सुतीक्ष्णेन भृशं विध्याह्यकं पयत् । शिपंड्य पि ततो राजन् द्रोणपुत्रमताडयत् ॥ ४७ ॥ सायकेन रुपीतेन तीक्ष्णेन निशिते नच । तीजम्नस्तदान्योन्य शर्यविधैर्नृघे ॥४८॥ भगदत्तं रणे शूरं विराटोघाहिनीपतिः । अभ्ययावरितोराजस्ततोयुद्धमवर्तत ॥४९॥ विराटो भगदत्तन्तु भारवर्षेणभारत । अभ्यवपासुसंकुद्धो मेघौवृएथाइवाचलम् ॥ ५० ॥ भगदत्तस्ततस्तूर्ण विराटं पृथिवीप. तिम् । छादवामास समरे मेघः सूर्य मिवोदितम् ॥ ५१ ॥ वृहत्क्षत्रंतुकैकेयं कृपाशार द्वतीययो । तं कृपः शरवर्पण छादयामास भारत ॥ ५२ ॥ गौतमं कैकयः क्रुद्धः शरवृ. घ्यायपूयात् । तावन्योन्यं हयान् हत्या धनुरिछावा व भारत ॥५३॥ विरथावसि युद्ध करने के लिये उनके सम्मुख गया तब तो क्रोधाग्निरूप अश्वत्थामा ने सम्मुख वर्तमान होनेवाल शिखएडो को बड़े तीक्ष्ण नाराच नाम वाणों से अत्यन्त घायल करके महा कंपायमान किया, तिस पीछे हे राजा शिखण्डी ने भी बड़े तीक्ष्ण पुंखवाले पीतरंगके शायकों से अश्वत्थामा को घायल किया । ४७ । और युद्ध भूमि में परस्पर बहुत पकार के वाणोंसे संग्राम किया और सेनापति राजा विराट संग्रामभूमि में राजा भगद च के सम्मुख गया तिसपीछे पुद्ध होना मारम्भहुआ और राजा विराटने महा क्रोधित होकर भगदत्त के ऊपर वाणों की ऐसी वर्षाकी जैसे बादल अपने जल से पर्वतपर वर्षा करता है फिर भगदच ने भी बड़ी शी- घ्रता से उस राजा विराट को संग्रामभूमि में वाणों के मारे ऐसा आच्छादित कर. दिया जैसे वादल सूर्य को आच्छादित करते हैं । ६० । और शारदत कृपाचार्य जी केकय देशीय सहच्छत्र के सम्मुखाये, हे भरतवंशी कृपाचार्य जीने वाणों की कृष्टि से उसको ढक दिया और सहच्छत्र ने भी महा क्रोध युक्त होकर गौतम कृपाचार्य जी को वाणों की वर्षासे ब्याप्तकरदिया तदनन्तर हे राना वह दोनों परस्पर में धनुप को काट घोड़ों को मारके विस्थ होकर महाक्रोधों में भरेहुए खड्ग युद्ध करनेलगे । ५३ । उन दोनों का वह युद्ध भयानक रूप देखनेवालों को भी wathania in battle. Ho was wounded and shaken by the sharp. arrows of furious Ashwathama and wounded him with his own. 47. Both herues fought bravely with various scapons. King Virat the commander of tho army, faced hing Bhagdatta in battle The battle between them was furious. King Virat, in anger, showered his arrows on Bhagdatta as the clouds drop rain over a mountain. King Bhag. datta tor coverod king Virat with & slower of arrows and hid hiru like the sun under clouds. 50. Shardwat Kripacharya faced king Vrihachol of Kaikaya and covered him with arrows. King Vrihachal too, in grcat anger, covcred Kripacharya with his own arrows. Both cut down cach other's bows, killed the horses, and being deprived of chariots, fought furicusly with swords Thoir furious Lattle 53.

[4482] Mabalherat (४४८२) युद्धाय समीयतुरमर्पणौ। तयोस्तदवार घोररूप सुदारुणम् ॥५४॥ द्रुपदस्तु ततो राजन सैन्धव चै जयद्रथम् । अभ्युद्ययौ हष्टरूपो हष्टरूप परन्तप ॥ ५५ ॥ तत सन्धय को राजा द्रुपद विशिखस्त्रिभिः । ताडयामास समरे सच तं प्रत्य विध्यत ॥५६॥ तयोस्तदभवयुद्धं घाररूप सुदारणम् । ईक्षणप्रीति जननं कांगारकयोरिय ॥ ५७ ॥ धिर्णम्तुसतस्तुभ्यं सुतसो महावलम् । अन्पयाज्जयनैरश्स्ततोयुद्धमवर्गत ॥५८॥ विकर्ण श्रुतसोमन्तु विध्वा नाकम्पयच्छरै. । श्रुतसोमा विकर्णश्च तदद्भुतमिवाभवत् ७ ५९ ॥ सुशर्माण नरव्याघ्रश्चेकितानो महारथः । अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्ध पाण्डवार्थ परा कमी ॥ ६० ॥ सुशर्मात महाराज चेकितानं महारथम् । महता शरचर्पण धारयामासा सयुगे॥ ६१ ॥ चेकितानोपि संरब्ध सुशर्माण महाहये । प्राच्छादयत्त मिमिमहामेघ भयकारी विदित होताथा, तिसपीछे शत्रु संतापी महा क्रोधाग्नि रूप राजाद्रुपद सिंधु के राजा जयद्रथ के सम्मुखगया तब जयद्रथ ने द्रुपद को तीन विशिसों से युद्ध भूमि में घायल किया और इसी प्रकार द्रुपद ने भी जयद्रथ को फिर उन दोनोंका युद्ध भयानकापदादुःख से प्राप्तहोने के योग्यदेखनेर लों को प्रसन्नता देने वाला ऐमाहुआ जैसा कि मंगल और शुक्र का युद्ध होताया तिसपीछे आपका पुत्र विकर्ण बड़ेशीघ्रगामी घोड़ों के द्वारा भीमसेन के पुत्र महा पराक्रमी सुतसोमके सम् सगया और युद्ध होनेलगा विकर्ण ने सुतसोम को और मुतसोम ने विकर्ण को वाणों से वेधित करके कंपायमान नहीं किया इसमें बड़ा आश्चर्य्य सा हुआ, नरोत्तम महारथी पराक्रमी पाण्डवों पर अत्यन्त क्रोधरूप चकितानसशर्मा के सम्मुख गया, हे महारान युद्ध होनेलगा और मुशर्मा ने युद्ध में चेकितान को वाणों की बड़ी वर्षा करके रोका तब तो चेकितान ने भी महाक्रोधरूप होकर वाणो की वर्षा से मुशर्मा को ऐमा आच्छादित कर दिया जैसे कि बड़ा बादल पहाड़ को प्रान्छादित कर लेता है । ६१ । हे राजा इसके पीछे पराक्रमी शक frightened the lookers on Furious lmg Drupad the destroyer of enemies, faced Jayadrath the king of Sindhu wounded each other with their arrows and the battle between them was drcadful Difficult to be goen, pleasing the learts of the lookers on, the encounter was like that between Mangal and Shukra. Your son, Vikarn rode 1118 swift horses to weet Sutsoma the son of Bhinson and legan fighting The two wounded each other with then arrows but none could shake the other Pronderful sight Chekitan the best of men valiant and infuriated against the Pandavas, faced Susharma The two began to fight. Susbarma checked the volley of chekitan's arrows, but the latter in great anger covered huo with the shower of his arrows as a great cloud covers mountun Gi Valiant Shakunı proceeded against po yerful Prati The two heroes 56 It was a (४५८३) भीमपर्व Bhishma Pary [4483] इवाचलम ६२ ॥ शकुनिः प्रति विन्ध्यन्तु पराक्रान्तं पराक्रमी सभ्यद्रवतराजेंद्र मत्तः सिंह इय द्विपम् ॥ १३ ॥ यौधिष्ठिरस्तुसंकुद्धः सौपदं निशितैः शरैः। व्यदारयत संग्राम मघवा निव दानवम् ॥ ६४ ॥ शकुनिः प्रतिविम्यन्तु प्रति विध्यं तमाये । व्य. दारयन् महाप्राज्ञः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥ ६५ ॥ मुदक्षिणन्तु गजेंद्र काम्बोजानामहार थम् । श्रुतकर्मा परराकान्त मभ्यद्वतसंयुगे ॥ ६६ ॥ सुदक्षिणस्तु समरे साहदेवं गदा रथम् । चिया नास्मायन वै मैनाक मिय पर्वतम् ॥६७॥ श्रुतकर्वा ततः कदः काम्यो मानामहारयम् । शरैर्यदुभिरानच्छदारयनिय सर्वशः ॥ ६८ ॥ इरायानय संक्रुद्धः श्रुता युपरिंदमम् । प्रत्युद्ययौ रणे पत्तो पत्तरूपं परन्तपः ॥ ६९ ॥ आर्शनिस्तस्य समरे इयान हत्वा महारथः। ननाद बलवान् नादं तत् सैन्यं प्रत्य पूरयत् ॥ ७० ॥ श्रुतापुस्तु ततः सुद्धः फाल्गुनेः समरे हयान् । निजघान गदाण ततो युद्ध मपर्तत ॥ ७ ॥ महावली प्रतिवन्ध के सम्मुख इम तीव्रता से गया जैसे कि सिंह मतवाले हाथी के सम्मुख जाता है, युधिष्ठिर के पुत्र प्रतिचिन्ध ने महा क्रोधित होकर मुरल के पुत्र शकुनि को तीन बाणों से ऐसा अत्यन्त घायल किया जैसे कि इन्द्र दैत्यों को करता है और शकुनि ने भी बड़े ज्ञानी महावली प्रतिवन्ध को अत्यन्त सपनयासों से विदर्णि करोदया । ६५ । और श्रुतकर्मा कांयोन के, महारथीपराक्रमी राजाः मुदक्षिण के सम्मुख गया, हे राजा सुदक्षिण ने सहदेव के पुत्र को घायल करके (मैनाक पर्वत के समान कंपायमान नहीं किया, इसके पाछे श्रुतकर्मा ने भी का वोजके महारथी मुदक्षिण को वाणोंसे अनेक रीति करके आच्छादित करदिया तदनन्तर शत्रुसंतापी युद्ध में कुशल अत्यन्त कोष युक्त अर्जुनका पुत्र इरावान श्रुतायुप के सम्मुख गया, और महारथी बलवान इरावान ने युद्ध में उसके घोड़ों को मारकर बड़े वेगसे शब्द किया जिससे कि संपूर्ण सेना में शब्द भरगया, और अत्यन्त क्रोधयुक्त श्रुतायुग ने भी अर्जुनके पुत्र इसवान के घोड़ों को गदामों से मारडाला फिर युद्धहोनेलगा । ७० । फिर भात्य देशके राजाविन्द अनुविन्द vindh like aa infuriated lion against a mad elephant. Pratirindh the son of Yudhishthir rounded Shalani rrith his sharp Sirows as Iudra does the daityas, and was sounded by the arross. of Shakuni 64. Shrutkarma faced the valiant Sudakshin the king of Camboj. Sudakshin wounded the son of Sahader, but could not shake him like the Nepak mountains. Shrutkarma too civered the valigut Sudakshin of camboj on all sid.s. Then Arjun's son Irayan, the destroyer of enemics and desterous in battle, angrily faced Shrata. yush. Iravan roared load after killing hie borses and the noise of at filled all tlic arraics. The euraged Shrutayush too, killed the horses of Iravan rith his mace and the battle contiaued. 70. Vind and Anuvind the tiro princes of Avanti, faced reliant Kuntibhoj. I saw 4484] Mahabharat (४४८४) विंदानुविन्दावायत्यो कुन्तिभोज महारथम् । ससेनं ससुतंबीरं सससज्जतुराहवे ७२ तत्राद्भुत मपश्याम तयोघोर पराक्रमम् । अयुध्येता स्थिरो भूत्वा महत्या सेनयासह ॥७३॥ अनुर्विदस्तु गटया फुन्तिभोज मताडयत् । कुन्तिभोजश्च त तूर्ण शरमातैरवा किरत् ॥ ७९ ॥ कुन्तिमोजसुतश्चापि विद विव्याध सायकै । बचत प्रति विव्याध तपदभुतमिवाभवत् ॥७५॥ केकयानातर पञ्च गांधारान् पञ्चमारिय। ससैन्यास्त स सैन्याध बोधयामासुराहवे ॥ ७६ ॥ बीरयाहुचते पुनो वैरार्टि रथ सत्तमम् । उत्तरं योधयामास चियाप निशितै शरैः ॥ ७७ ॥ उत्तरश्चापितं वीरं विम्याघनिशितैः शरे । चेदिराट् समरे राजन् नुलूक सम भिद्रवत् ॥ ७८ ॥ तथैव शरवर्षेण उलूक सम वि. द्धधत । उलूकश्चापि तं वाणनिशितैलोमयाहिमिः ॥ ७९ ॥ तयोर्युद्ध समभषद घोर का विशाम्पते । दारयेतासुसकुद्धा वन्यान्यमपराजिती ॥ ८० ॥ एप द्वन्द्व समाणि दोनों महावीर कु.तभोजके सम्मुख युद्ध में उपस्थित हुये, हे राजा वहां हमने उन दोनों के अपूर्व भयानक पराक्रमों को देखा अर्थात् वह दोनों बड़ी सेना समेत युद्ध करने में प्रवृत्तहुये७२ अनुविन्दने गदा से कुन्तिभोज को घायल किया और कुन्तभोज ने शीघ्रही अपने वाण समूहोंसे उसको ढकादया, फिर कुन्तिभोजके पुत्रने भी शाय- कोसे विन्दको पीडामान किया और उसने उसको पीड़ित किया यह भी आश्चर्य सा हुआहे धृतराष्ट्र केकयदेशी पांचोंभाइयों ने सेनाओं समेत संग्रामभूमि में नियतहोकर गंधारियों के सम्मुख होकर महायुद्धकिया। ७५ । फिर आपका पुत्र वीरवाहु रथि- यों में श्रेष्ठ विराट के पुत्र उत्तरसे युद्ध करने लगा और नो वाणों से उसको घायल | किया, उत्तरने भी अपने तीन पाणों से उस वीरको घायल किया और उलूक ने भी बड़ी तीवता से शीघ्र गति वाले बाणों से उसको विदीर्ण किया। ७८ । हे राजा उन दोनों का युद्धभी महाघोर भपकारी हुआ और क्रोधित होकर दोनो ने परस्पर एकने दूसरे को घायल किया, इस प्रकार तेरेपुत्र और पांडवों के स्थ राज अश्वों से सङ्कलित युद्ध में हजारों योधा लोगों के द्वन्द युद्ध हुए। ८० । हे the prowess of the two dreadful va riors in the midst of the armies Anuvind sounded Kuntıbhoj with his mace and was himself covered by the shover of his arrons. Kuntıbhoj wounded Vind with bis arrows and the encounter of those famiors was wonderful The princes of Kaiknya, with their armies, faced the Gandhurs and fought bravoly 75 Your son Biryahan faced the best of charioteers, Uittar the son of Virat and sounded him with nine arrots Uttar too wounded bin with his arroy9 The king of Chedı encountered vlak and rounded fun with his shup arrows Ulul also younded him with his sharp arrors 78. The encounter between those two varors was dreadful, as they rounded each other Thus thousands of warriors who rode on chariots, elephınts and horsos in the armies of your son and those of the Pandavus, fought duols. 80 For a short time their 72 1 (४४८५) भीष्मपर्व Bhishma Parv [4183] रथयारणवाजिनाम् । पदातीनांच समरे तव तेषांच संकुले ८२ ॥ मुहर्त मिव तार मासीन मधुर दर्शनम् । तत उम्मत्तयद्राजन् मप्र नायत किंचन ॥ ८ ॥ गजोगन समरे रचिनचरथी पचौ । अश्वोभ्वं सममिमायात् पदातिश्चपदातिनम् ॥ ८३॥ ततो युद्धसदुर्धर्ष व्याकुलं समपद्यत । शूराणां समरे तत्र समासाद्ये तरेतरम् ॥ ८४ ॥ तत्र देवर्षयः सदाचारणायसमागताः । प्रेक्षन्त तद्रणं घोरं देवासुर समभुपि ॥ ५ ॥ ततो दन्ति सहस्राणि रयानांचापि मारिप । अश्वौघाः पुरुषोघाश्च विपरीतं समाययुः ॥८६॥ तत्र तत्र प्रदृश्यन्ते रथवारण पत्तयः । सादि नश्च नरव्याघ्र युध्यमाना महु- मुंदुः ॥ ८७॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वाण भीष्मवधपर्वणि द्वंद्व युद्ध पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥ राजा एक मुहूर्ततक तो उनका युद्ध अच्छा देखने के योग्यहुआ फिर उन्मत्तोंके समान हुआ उस समय वहां कुछभी नहीं जाना गया अर्थाद ध्यानकरके देखा तो युद्धभामि में गजारूढ़ गजारूढ़ के साथ स्थी रथी के साथ अश्वारुढ़ अश्वारूड़ों के और पदाती पदातियों के सम्मुख हुए तिसपीछे परस्पर युद्ध में सम्मुख होकर शूरवीरों का महा कठिन युद्ध हुआ और सब महा व्याकुल होगये । ८३ । वहां युद्ध देखने को आयेहुये देव ऋपियों ने और सिद्धचारणों ने देवता और अमुके के समान महा भयकारी युद को देखा, हे धृतराष्ट तिसपीछे हजारों हाधी रथ और घोड़ों के सवारों के समूह और पुरुपों के समूह मर्यादा रहित होकर परस्पर में युद्ध करनेलग और जहां तहां रथ हाथी और घोड़ों के सवार बारम्बार लड़ते हुए दृष्टि पड़े ।। ८७ ।। Costing was northy to be seen,bat after that they fought like mad men, so that there was no order bept. The elephant riders faced the elephant riders, the charioteers faced the charioteers, the horsemen rode against horsemen and the foot soldiers fought the footsoldiers. The warriors on either side fought bravely and were much distressed. 84. The rishis, Sidhas, charans and gods that had come to see the fighting, found it to be like the encounter of gods of asurs. Then there was no order maintained in the battle and the soldiers of various denominations mixed together and fought in confusion." $7.

4486]. Mahabharat (४४८६) सञ्जय उवाच । राजनशत सहस्राणि तत्र तत्र पदातिनाम् । निर्मादं प्रयुद्धानि तत्ते वक्ष्यामि भारत ॥ १॥ न पुत्र पितरं जज्ञे न पिता.पुत्रमारसम् । न भ्राता भ्रातरं तर स्वस्नीय नच मातुलम् ॥ २॥ न मातुलश्च स्वसीयो न सखायं सखा तथा।' साविष्टा इव युध्यन्ते पांडवाः कुरुभिः सह ॥ ३ ॥ रचानीकं नरव्याघ्राः केचिदम्य पतन स्थैः । मनज्यन्त युगेरव युगानि भरतर्षभ ॥ ४ ॥ रथेपाश्च रथेपाभिः चरा रथधरैः । सङ्गतै सहिता केचित् परस्पर जिघांसवः ॥ ५॥ नशेकुश्चलितु फेचित् सन्निपत्य रथारयः । भिन्नास्तु महाकायाः सन्निपत्य गजागजैः ॥ ६ ॥ यहुधादारयन् ऋद्धा चिपारितोतरम् । सतोरगपताकैश्च धारणावरंवारणैः ॥ ७॥ अभिमृत्यमहा. राज वेगवद्भिर्महागजै.। दन्तैरभिहतास्तत्र चुक्रुशुः परमातुराः ॥ ८ ॥ अभिनीताश्च अध्याय । ४६ । संजय वाले हे राजा जहां तहां लाखों पदाती मर्यादा से विरुद्ध लड़ने में मटच हुए उसका सान्त मैं तुमसे कहता हूं, उस युद्ध में पुत्र ने अपनेपिता को न जाना और पितानपुत्र स्त्रीको नहीं जाना और भाईने भाई कोन जाना और भानजे ने मामाको और मामा ने भानको और मित्र ने मित्रको नहीं जाना भूतादि के अवेश युक्त पुरुषों के समान वह सवलोग कौरव और पांडवों के पक्ष में एक एकसे लड़ते थे । ३ । हे भरतर्षभ कोई २ नरोसम शूरवीर रथों में सवारहो होकर सेना के और भागोंपर जा टूटे और रथोंहीसे रथों के जुनाको तोड़डाला, रथाधीश रथा धीशोंसे औरकूबररथकूबरों से खडित हुए और कोई २ परस्पर में मारनेकी इच्छासे सम्मुख आने वालों से युद्ध करनेलगे।५। कोई स्थतो रथोंसेहीटक्करें खाकर चल नके याग्य नहींरहे और बड़े डीलडौल के रथ आदि बड़े २ हाथियों से मिल कर टुकड़े २ होगये, हे महाराज वहां बहुन से क्रोधभरे हाथी दांतोंसे घायल करतेहुए मेवारी और पताकायाले युद्धक महागजेन्द्र हाथियों से मिलकर अत्यन्त पीड़ा से CHAPTER XLVI Sanjaya continued, “Here and there, foot soldiers fought against rule I shall tell you how:-The father, in that battle, did not know the son; the son did not spare the father, the brother did not know the brother; the maternal uncle did not know his sister's son and friends fought with one another in confusion. All the Kauravas and Pandavas fought liha those possessed of spirits. 3. Some brave charioteers fell on portions of the armies and broke the shafts of chariots with their own. All parts of their chariots were thus crushed and broken. Others fought with those who opposed them. Some of the chariots were disabled by dashing against others, while others of large size, were broken into pieces by coming in contact with large elephants. Many elephants shrieked there, wounding with their teeth huge war elephants bearing howdahs and 5.

(४४८७) भीष्मपर्च Bhishma Part 4187 शिक्षामिस्तात्राकशसमाहता । अनभिन्ना प्रमिनामा सम्मुखाभिमुखाययु ॥९॥प्रमि भैरपि समता कचित्तत्र महागजा कौञ्चवन्निनद रत्वा दुगु सर्वतो दिशम् ॥१०॥ सम्यक प्रणीतानागाश्च प्रभित्रकरटामुसा । प्राष्टितामरनाराचैर्निरुद्धावरचारणा ११ प्रणेभित्रमर्माणोनिपेतुश्चगतासघ । प्रादयतादश चन् नदन्ताभेरवानग्यान १२॥ गजा पादरक्षास्तु व्यहोरा प्रहारण । मिश्च धनुभिश्च विमरे चपर वधै ॥ १३ ॥ गदामर्मुसलथैव भिन्दिाले सतोमरे । आयस पारपश्चापनिनि सम्मिले शितै ॥ १५ ॥ प्रगृहीत असरच्या द्रमाणातनस्तत । पश्यन्तमहाराज परस्पराजिघालव ॥ १५ ॥ राजमानाश्च निस्त्रिंशा ससिक्ता नाशाणते । प्रत्पश्यत शूराणामन्योन्यमाभिधावताम् ॥ १६ ॥ अक्षिताउधूना मसीना बोरवा हुमि । सपन्ने पुकारते थ। ८ । शिक्षाओं से सीखेहुए चायक मोर अशों से घायल बिना मदवाले हाथी मदों के चूनेवाले उन्मत्त हाथियों के सम्मुसहुए, और कोई २ मद चूने वाले वडे २ हाथी हाथियों से भिडे हुए क्रौचक समान शब्दोंका करत हुए जहां तहां भागे । १० । इस प्रकार अच्छे हमना करने वाले गंडम्बना से मदझारनेवाले उत्तम हाथी लाठी तोमर ओर नाराचों से रकगये, मर्मस्थलोग | महझारनेवाले उत्तम हायी लाठी तोमर और न राचों म रकगय मर्मस्थलों से विगे हुए चिरकारें मारते हुए पृथ्वी पर गिरकर मृत्यु वशहुए और कोई २ हाथी महाभयानक शब्दोंको करत हुए चारोंओर को ढाडे हेमहाराज हाथियों के चरण रक्षक शूरवीर लोग जो कि बडे २ वक्षस्थल पृक्त मिले हुए ओर प्रहार करने वाले थे वह हायकी यष्टी पनुप और निर्मल परसे गदागूमल गोफन तोमर परिष और स्वच्छतीक्ष्ण खड्ग, इनसा शस्रोंको अच्छे प्रकार से धारण किये हुए अत्यन्त को भर परस्परमें एक दूसरे के मारने की इच्छा करते हुए जहा तहा दोडते दृष्टपडे । १० । परस्परमें एक एक क सम्भव दोडते हुए पूरवीरों के सहग मनुष्योंके रविशी से भरेहुऐ शोभायमान दृष्टि में आये, बीरोंकी भुजाओंसे अयो 8 The trained ones rounded by whip, and goads, though not themselves musty, rere made to encounter others mad ones, while others in rut, huge ones, ran hither and thither shriekng lile Thus many good fighting elephants from whose temples dropped juice, were checked by clubs and javelins and being wounded in vital parts shinehel loadly and fell down derd on earth Some elephants, making ? dreadful noise ran in all direct ons who guarded the fc t of the elephants and sho with broad cheats, di sterous in the use of great sarlıhe weapons armed with bows, shining bottle axes mares catapults, clubs and sbarp swords angrily trisulog to hill one another, were sten ruoniOg luther and thither 15 The swords of the encounteuing combat ints reeking in human bloods looked glonous to behold Pallig fiat or prone the enemies were . banners cranes 10 The men [44881 Mahabharat (४४८८) तुमुल. शन्द पततां परमर्मसु ॥ १७ ॥ गदामुप्तलहाणानां भिनानांचवरासाम । दन्तिदन्तायभिमाना' मृदितानांचदन्तिभिः ॥ १८ ॥ तत्रतत्रनरौघाणां क्रोशतामितरे तरम् । शुश्रवुदारुणावाचः प्रेतानामियभारत ॥ १९ ॥ हयैरपि हयारोहाथामरापीड. धाशिम । हंसीच महावगैरन्योन्यमभिविताः ॥ २० ॥ तैर्षिमुक्त महाप्रासाजम्बू मदावभूपणा । आशुगावमलास्ताक्षणा. सरेतु जगोपमा. ॥ २१ ॥ अध्यैरप्रयजः केचिदाप्लु य महतोरथान् । शिरांस्पादिरे धीरारपिनामध्यसादनः ॥ २२ ॥ पहनपि ह्यारोहान् भल्लै सनतपर्वभिः । रथी जघानसम्प्राप्यवाणगोचरमागतान् ॥ २३ ॥ नवमेधपतीकाशाश्व क्षिप्य तुरगानगजा । पात्रेयविमृदनन्ति मता कनकभूषणाः ॥ २४ ॥ पाट्यमानेषु कुम्मपु पावापचवारणा । प्रासैविनिहताः कोचदपिनदुः परमातुराः ॥ २५ ॥ साभ्यारोहान्हयान् कादिच्दु मध्यवरवारमा । सहसाचिति- एस और ऊर्धरख गिरायेहुए शत्रुनोंके मोपर पड़ेहुए खगोंका तुमुलशब्द उत्पन्न हुआ । १७ । गदा और मूसलोंसे टूटेहुए अंग और उत्तम खड्गों से कटेहुए हाथियों के दांतों से घायल हाथिय सेही खुदेहए मनुष्योंके जहां तहां परस्पर पुकारे हुए भयकारी ऐसे वचन सुनेगये जैसे कि प्रेतों के शब्द सुनने में आते हैं, अश्वा शुद्ध मनुष्योंसे और अन्य तीरगामी अश्वोंकी सवारीसे परम्पर में सम्मुखताहुई२० उन के छोड़हुए शीघ्रगामी निर्मलसों के समान जांबूनद सुवर्ण से अलंकृत भाले उन अंगोंपर परस्पर में पड़े कितनेही वारोंने उत्तम गतिवाले घोड़ोंसे बड़े रथोंको संयुक्त करके घोड़ो समेत रथोंको ओर सवारों के शिराको काटा, और स्थके सवारने बहुत से अश्वारूदों को पाकर बड़े झुके हुए पर्ववाले भालों से उन वाणों से भिंदेहुओं को मारा, मदोन्मत्त मुनहरी भूषण वाले हाथियों ने नवीन वादल के समान रंगीनघोड़ों को तिरस्कार करके अपने पैगेंसे मर्दन किया ।२४ बड़े भयानक कित हाथी मस्तक और देह में कवच आदि सभी अलंकृत भालों से मारेहुए बड़े पीडामान शब्दों को करते थे फिर वहां महा युद्ध होनेपर कितनही wounded in vital parts by the warrior's srords which made a great 17 Soldiers with broken ligbs by the races and clubs of warriors, rounded by swords and elepbant's tusks and trampled un. der the feet of elephants, raised, here and there, hideous cries like those of the sprites Horsenen encoutered horsemen or others who rode on swift beasts 20 They slew one another nith their swift arrows shiqing like serpents and their darts decked with pure gold Many warriors, mounted on large chariots drawn by swift horses cut down the chariots, the horses and the heads of soldiers Charioteers killed horsemen with their numerous duts having hooked points. Mad elephants dected with gold ornaments trampled dotrn the horses under their feet. 24. Many for nudable elephants whose foreheads and bodies were protected by mail, pierced by darts, shrieked with Doise.

(४४८२) मीमपर्व Bhishma Pary [4481 पुम्तत्रसंकुले भैरवसति ॥ २६ ॥ साभ्यारोवापियाणार्गन्निय तुरगानगजाः । रोयानमिन्दनन्तः सध्यजानामिचक्रम: २७ पुत्वादतिमत्वाच कवित्तनमहाराजा साश्वारोहान्हयान जघ्नुः फरैः सचरोस्तथा ॥ २८॥ मारोध समरे हस्ति- सादिमिरेवच। प्रतिमानेषु गायु पार्श्वनामे च वारणान् । माधुगा विमलास्तीक्ष्णः सम्पेतुर्भुजगोपमाः ॥ २९ ॥ नराश्वकायानिमिंद्य लोहानि कवचानिच । निर्षि मलाः शक्त्यावीरवाइभिपिंवाः ॥ ३० ॥ गहोल्काप्रतिमा घोरास्तत्र तत्रविज्ञा- गते । द्वीपिचर्माघनश्च व्याघ्रचर्मच्छदैरपि ॥ ३१ ॥ धिकोशर्षिमलैः घरभि अघ्नः परान् रणे । अभिप्नमभिधर्मकपाभ्यांवदारतम् ॥ ३२ ॥ चिदर्शयन्तः सम्पेतुः सहचर्मपरश्वधैः । केचिदादिन्य करिणः शाश्वानगि रयान करैः ॥३३॥ विकर्षन्तोदिशासर्याः संपतुःसर्वशब्दगाः । संकुभिर्दारिताः केचित् संमिनाञ्चपरश्वधः उत्तम हाथियों ने सवारों समेत घोड़ों को मपकर चा उठाकर फेंक दिया हाथी अपने दातों की नोक से सवारों समेन घोड़ों को ऊँचेको उटाये बजाधारी स्थ समूहोंको मईनकरते हुए चारों ओर घूमनेनगे और कितनेही बड़ेहाथियोंने बड़ीवीरता और मदोन्मत्ततासे अपनी मूंड और चरणों के द्वारा सगरोंममेत घोड़ों को मारा, चारों भोर से हाथियों के मस्तक वा अंग वा पसन्नी और 'जयाओं पर बड़े शीन गामी सोके समान तीक्ष्ण वाण गिरे, और हे राजा जहां तहां बोरोंकी भुजाओं मेमारीहुई घरछियां लोहे के कवोंको काटकर मनुष्य और घोड़ों के शरीरों पर पड़ीं वह वरछियां महाभयानक उल्काओं के रूपीं ।। और इसी संग्राम में चित्र व्याव चर्म से वहुए और व्याघकेही चर्म में रहनेवाले पियान से बाहर स्व. च्छ खड्गों में शत्रुओंको मारा, निर्भय मनुष्य के सम्मुख जाना और काटना मादिक सब कर्मों को करना और थाई ओर को सवारी करना इत्यादि चेष्टाओं को दिखलात खड्ग दान और परशु नाम शनों समेत गिरे, फिननेही हायी मूड़ों pain. During the battle many clephants trampled or hurled the horses and their riders. Lifting up the horses and riders on the points of their tusks, trampling the banderer chariots, the elephants roamed; and bravely and madly cu-lied the lorses and their riders under feet. Sharp and swift arrows fell serpent like from all sides on the heads, Lodics, sides and legs of the elephants. Here and there, sharp darts hurled by the warriors, pierced through the steel armour and entered the lodies of men and horsis like sparks of fire.30. Swords stere draen out of the scabbards made of tiger's hide to Will the coemies. Going fearlessly before the enemy, Lilling and doing deeds of horsemanship, the warriors full in spite of their swords, shields and Some elephants draged the chariots and horses with their trunks and all those who heard their cries dispersed in different directions Many men were killed by the wheels and whilo battleases. ares, - 4490] Malabharat (४४९०) ॥ ३४ ॥ हस्तिभिमंदिताः फेकित्क्षुण्णाश्चान्ये तुरङ्गमै । रथने मनिहत्ताश्च निकृत्ताश्च परश्वधै ॥ ३५ ॥ व्याक्रोशन्त नराराज स्तनतत्रस्मवान्धवान् । पुत्रानन्येपितृनन्ये भ्रातृश्चसहबन्धुमि ॥३६||मातुलान्भागनेयांश्च परानापचसयुगे। विकीर्णोत्रा सुवहयो भग्नसक्थाधमारत ॥ ३७॥ याहुभिश्चापरे छिन्नै पापुच विदारिता ! फ्रन्दन्त सम दृश्यन्त तृपिताजीवितेप्सवः ॥ ३८ ॥ तृपपिरिगता केचिदल्पसत्याविशाम्पपे । भूमौ निपतिता सख्ये मृगयाञ्चाकरे जलम् ॥ ३९ ॥ रुधिरौघपरिदिलनाः क्लिश्यमानाच भारत । व्यनिन्दन्भृशमामान तव पुत्राध सङ्गतान् ॥ ४० ॥ अपरे क्षत्रिया शूराः कृतवैरा. परस्परम् । नैवशस्त्र विमुञ्चन्ति नैय कन्दन्ति मारिप ॥ ११ ॥ तर्जयन्ति च सहष्टास्तत्ररात्रपरस्परम् । आदश्पदशनैश्चापिक्रोधात् स्परदनच्छदम् ॥४२॥ भ्रकुरी से घोड़ों समेत रयोंकोखंचतेथे और बँचनेवाले हाथियों के शब्दों को सुनकर सबके सब चारों ओर को गये, कितनेही मनुष्य इंडोंकी कीलों से कटेहुए और परशुओं से मारे हुए थे और बहुत से हाथियों स मर्दित हुए और कितनेही घोडों से अत्यन्त घायलहुए हे महाराज जहां तहां कितनेही मनुष्य वांधवों को पुकारते हुए रथों के पहियों से दबकर परशुओं से कटगये । ३५ । और कहीं संग्राममें अपने पुत्रों को कोई भाइयों को और मामा वा भानजो को अथवा अन्य लोगों को पुकारते हुए घायल होकर मारेगये, हे भरतवंशी जिनकी प्रांत फैलगई और जंघा टूटगई ऐसे सब मनुष्य होगये और बहुतसे कटीहुई भुजाओं समेत अंगों से रहित हुए, और अनेक मनुष्य जीवनकी इच्छाकरते हुए अत्यन्त रोदन करते दृष्टपड़े बहुतेरे प्यासे और धैर्य को छोड़हर जल को खोजते थे, हे राजा उन रुधिरों से भरे हुए दुखिपों ने आप समेत आपके पुत्रों की निन्दाकी, हे धृतराष्ट्र अच्छे शूरवीर क्षत्रिय न तो शस्त्रको छोड़ते है न रोते और पुकारते है । ४० । हे राजा जहां तहाँ अत्यन्त प्रसन्न चित्त शूरवीरलोग क्रोधसे अपने दांतों के द्वारा अोठोंको काटकर निंदा युक्त वचनों का कहते है, कोई २ धैर्यवान् महावली वाणों से others were crushed by elephants Some were wounded by the horses and others calling on thoir kinainen were crushed under the wheels Some calling upon their sons and others calling upon therr brothers, maternal uncles, nephews and others, were wounded and slan Their entruls came out of their bodios, their thighs were broken and then arms and other limbs were cut off Many men, wishing to liyo longer wore seen weeping, othors, thirsty and forloin, Serched for water The blood stained wietehes cursed you and your sons, O kingl But good soldiers did not let the weapons go out of their grasp, and neither wept nor cried Here and there cheerful warriors, biting thoir lips in anger, uttered words of blame Some tenacious warriors, though mortally wounded, bore the pean in 35 . 40 (५४९१) भीष्मपर्व Bhishma Part [4491]] कुटिलैःच्छन्तिपरस्परम् । अपर क्लिश्यमानास्तु शराती प्रणपीसिताः ॥४३॥ निष्कजाः समपद्यन्त दलायामहावलाः । अन्येच घिरचा शूरा रथमायस्पसंयुगे ॥४४॥ पार्थयानानिपतिताः संक्षुण्णायरचारः । अशोमन्त महाराज सपाइय किंशुकाः ॥ ४५ ॥ सस्वभ्युरनीकेषु घहयो भैरवस्थनाः । वगाने महाममि तस्मिन् चौरयरक्षये ॥ ४६ ॥ निजघानपितापुत्रं पुत्रश्चपितरं रणे । घनायो मातुलयापि स्वनीयञ्चापि मातुलः ॥ ४७ ॥ सपाससायचतथा सम्बन्धीवान्यतथा । एवं युयुधिरे तत्र कुरवः पाण्डवैः सह ॥ ४८ ॥ वर्तमागे तथा तस्मिन् निर्मर्यादेभपा नके । भाममासाद्य पार्धानां वाहिनी समकम्पत ॥ ४२ ॥ फेतुनापञ्चतारेण तालेन भरतर्षभ । राजतेन महावामच्छिनेग महारथे । बभीष्मस्तदा राखं चन्द्रमा इवमेरुणा ।' ५० ॥ झते श्री महाभारते भीमपर्वणि भीष्मपर्वणि संकुलयुद्ध पदचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ।। महा व्याकुल और चावों से पीड़ित होकर महा कष्टसे मौन होगये, कितनेही शुरवीर युद्ध में रथमे विहीन और उत्तम हाधियों अत्यन्त घायल दूसरे के रयों की इन्छा करते हुए मार्ग में गिरपड़े, हे महाराज बह फूलेहए किंगुक एन के समान शोभायमान हुए।४४। और इसके विशेष सेनामें भयकारी अनेक शब्द प्रकटकरते हुए, इस बड़े भयानक और उत्तम वीरों के नाम करने वाले युद्धके होनेपर संग्राम भूमि में पिता ने पुत्रको और पुत्र ने पिताको मारा, मामाने भानको और भानने ने मामा को मित्रने मित्रको इसी प्रकार बांधवों ने यांधव आदि संबंधियों को भी मारा, इस रीतिसे पांडवों मे और कौरवों से उस भयानक रूप मर्यादासे रहित बड़े भयकारी युद के होनेपर यह सर्व संहार हुआ। ४७ । हे भरतर्षभ पांच नक्षत्रबाले तालवजा ममेत भीप्मनी के सम्मुख होकर पांडवों की सेना अत्यन्त कंपायमान हुई उससमय वह महावाहु भीमजी मुवर्ण निर्मित उत्तम ध्वजा समेत विस्तृत रय में बैठेहुए ऐसे शोभायनाम हुए जैसे कि मेरु पर्वत पर चन्द्रमा शोभित होता है ।। ५०॥ Bilence. Many warriors, deprved of their chariots in the field of battle and wounded by elephants, fell down dead in the nay, de-iring to get other chariots They looked glorious lhe Kinshuk plants in bloom. 44. Beydes these there were other dreadful noises in the ormies. During this dreadful war destructive of warriors, fathcrg and sops, maternal uncles and nephews, friends and bitsmen killed one another. All such atrocities occureil in that dreadful war of the Kauravas and Pandavas which was withoul rule 47. Bhishm, with luis ensign of the palm tree and five stars, shook the armies of the Pandaras with his golden ensign, anıl mounted on a large chaiot, looked glorious like tho moon on monnt Dieru. 49, 1 4492] Maliabharat (४४९२) समय उवाच । गतपूर्वाहणभूषिष्टे तस्मिनहनि दारुणे । वर्तमाने तथा रौद्रे महावीर घरमाये ॥ १ ॥ दुर्मुख कृतवर्माच कृपः शल्यो विविंशतिः। भीमं जुगु परासाद्य तव पुत्रेणचोदिताः ॥ २ ॥ एतैरतिरगुतः पश्चभिर्भरतर्षभः । पाण्डवा नामनीकानि चिजगाई महारथः ॥३॥ चेदिकाशिकरूपेषु पचालेयुचमारत । भीम. स्यवहया नालश्चलत्फेतुरदृश्यत ॥ ४ ॥ स शिसंसिरणेऽरीको रथांचसयुगध्यजान् । निवर्तमहावगैर्भल्लैः सनतपर्धामः ॥ ५॥ नृत्यतो रथमार्गेयु भीमस्यभरतर्षभ । भृशमार्तस्य चकर्नागा मर्मणि ताडिताः ॥ ६ ॥ अभिमन्युः शुद्धिः पिशझै- स्तुरमोत्तमैः संयुक्त रथमास्थाय प्रायादभीमरथं प्रति ॥ ७ ॥ जाम्बूनदपिचित्रेण कर्णिकारेण फेतुना। मभ्यवतर्त भीमञ्च तश्वैिध रथसचमान् ॥ ८ ॥ सतालके " अध्याय ॥४७॥ संजययोले हे राजा उस महा भयानक दिनके मध्याह्न व्यतीतहोने और इस रीति से उपम लोगों के नाश वर्तमान होनेपर, आपके पुत्रकी आझालेकर दुर्मुख कृतवर्मा कृपाचार्य शल्य और विविन्शति ने भीमजी के पास आकर उनकी रक्षा की, हे भरतपम इनपांच अतिरथी वीरों से रक्षित महारथी भीमजी ने पाण्डवों की सेना में प्रवेश किया, और हे धृतराष्ट्र चेदि काशि कुरूप और पांचाल देशकी सेना के मध्य में भीष्मजी की तालरूप ध्वजा बहुत मुन्दर दृष्ट पड़ी, उस वैरिणी युद्धमैं बड़े वेगवान् अतिशय सुके हुए भल्लनाम वाणों से भीष्मजी ने शिरों और ध्वजायुक्त रथों को रथ के जुए प्रादि अगों समेत काटा ।। हेभरतर्पभ, नक्षत्र के समान भीप्मनी के घूमने पर मर्मस्थलों से घायल कितनेही हाथियों ने पीड़ा के शब्द किये, उस समय अभिमन्यु अत्यन्त क्रोधमें भराहुआ पिंगल वर्ण उत्तम घोड़ों के रथ में बैठकर भीप्मनी के स्थ के सम्मुस आया, और जांबूनद सुवर्ण से रचित कर्णिकार रक्षके चित्रवाली ध्वजा समेत भीप्मयादि उन उतम पांचों रथियों के CHAPTER XY In the afternoon of that dreadful day," said Sanjaya, "hen those good men were thus leing dertroyed, Durmukh, Kritrarma, Kripa, Shalya and Vavinshati went to Blushin by the order of your son and protected fhim. Protected by those fire great warriors, Bhishu entered the army of the Pandatas. Bhislims's ensign of the palm tree looked rory glorious in the midst of the arinies of Chedi, Kashi, Kurush and Panchal. In that destructive kar Bhislim cut, down the licus and tho yoles of hannued chariots by his hooked 5. When Bhasin as thus círcling like a metcrr, inad clepliants soumied in the vital puts slirieked with prin. Tlien Abhimanyu in n rage dimose luis goul stecus of yellois colour and forought his chariot face to fue with that of Bhishm. Ve encoun- Arrors - (४४९३) भीपाप Bhishma Parv [4193] तोरतीक्ष्णेन केतुमाहत्य पत्रिणा । भीमेण युयुधे पीरस्तस्य चानुरयासह ॥ ९ ॥ कृतवर्माणमेकेन शल्यं पञ्चामराशुगैः । विध्वानभिरानच्छच्छितामः प्रपितामहम् ॥ १० ॥ पूर्णायतचिसृष्टेन सम्यक प्रणिहितेनच । भ्वजगेकेन घिण्याच जाम्यूनदप. रिस्कृतम् ॥ ११ ॥ दुर्मुपस्य तु मलेन सर्वावरणमेदिना । जहारसारयःकायाच्छिर: सन्नतपर्वणा ॥ १२ ॥ धनुचिच्छेद मलन कार्तस्वरविभूपितम् । कृपस्य निशि ताण तांश्च ताक्षणमुसैः शरैः ॥ १३ ॥ जघाग परमशुद्धो नृत्यनियमहारयः । तस्य लाघवमुद्रीक्ष्यतुतुपुर्वेचता भापि ॥ १४ ॥ लन्धलक्षत्या काणे. सर्च भीष्म मुखारथाः । मत्यन्तममन्यन्त साक्षादिव धनजयम् ॥ १५ ॥ तस्य लाघवमार्गस्थ मलातसदृशप्रभम् । दिशः पयंपतचापं गाण्डीवमिव घोषवत् ॥ १६ ॥ तमासाद्य महा सम्मुख हुआ, फिर वह वीर भीप्मनी की ताल ध्वजाको तक्षिण चाणों से छेदकर उनके पछि चलनेवाले पांचों रथियों से युद्ध करनेलगा, एक वणिसे कृतवर्मा को और पांच वाणों से शल्य को और नौ उसम वाणों से पितामह को घायल किया । १० । और जांबूनद सुवर्ण से शोभित एक उत्तम शायक से उनकी ध्वजा को काटा, और सब पर्दो के भेदन करनेवाले झुकेहुए पर्ववाले एक भल्ल नाम वाण से दुर्मुख के सारथी का शिर देह से पृथक् करादिया, सुवर्ण से यनेहुए महा शोभायमान कृपाचार्य जी के उत्तम धनुप को तीक्ष्ण नोकवाले भल्ल से काटा | और महा क्रोधरूप होकर उस महारथीने अपने तीन बाणों से उनसव को भी घायल किया देवता लोग भी आकाश से उस शीघ्र इस्तलाघवता को देखकर प्रसन्नहुए, और भीप्मादि सब रवियों ने उस अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के लक्ष भेदनेसे उसको साक्षात् अर्जुन के समान पराक्रमी माना । १५ । और घुमाये हुएउल्मुक के समान प्रकाशित निर्विघ्न मार्ग में नियत उसका मण्डल दिशाओं में गिरा और गांडीव धनुपके समान उसको शब्दायमान किया, तब शत्रुओं के tcred the five great warriors beginning with Bhishn of the ensign of golden palm. Having pierced the palmyra ensign of Bhishm with his sharp arrows, he began to fight with the five warriors vbo rode behind him and wounded Kritvarma with one of his arrows, Sbalya with five and the grand father with nine.10. And with one of his goldbedecked arrows he cut his bannerstaff. He cut down the head of Durmukha's chariot driver with one of his pie cing, hcoked arrows. He out the good gold bow of Kripacharya with one of his sharp pointed darts and wounded all those warriors. The g ds in the sky were pleased to see the dexterity of his hand and Bhishm and other warriors judged him to be as good in hitting marks as Arjun himself. 15 Shining lile a circle of fire, of unceasing motion, his low sent round its sloser of arrows and its trang was heard like that of the Gandiy.

[41941 Maliabharat (४४९४) घेगैर्मी मो नयाभराशुगे । विध्याधसमरे तूर्णमार्जुनि परवीरहा ॥ १७ ॥ वजञ्चास्य निभिभल्लाबच्छद परमौजस । सारथिच विभिवाणेराजघान यतव्रत ॥ १८ ॥ तथैव हत्तधर्माचा शल्यश्च मारिप । विध्यानाकम्पयत् काणि मैनाकमिव पर्वतम् ॥१९॥ सत परियून शूरा धार्तराष्ट्रमहारथै । वर्ष शरवर्षणि काणि पञ्चरधानप्रति ॥२०॥ ततस्तेषा सहस्राणि निवार्य शरवृष्टिभ । ननाटचलवान् काणि माय विजन शरान् ।। २१॥ तनास्य सुमहद्राजन् वाड्याल दृश्यत । यतमानस्यसमरे भीममईयत. शरै ॥ २२ ॥ पराकान्तस्य तस्यैव भीष्मोपिप्राहिणाच्छरान् । सताविच्छेदसमरे भीष्मचापच्युतान्शरान् ।।२३।। मतो ध्यजममोघेपुष्मिस्य नवभि शरै । चिच्छेदसमरे पारस्तत उच्चुकशुर्जुना ॥ २४ ॥ स राजतो महास्काघस्ताला देमविभूषिता । | मारनेवाले भीमजी ने शीघ्रता पूर्वक उससे आगे होकर युदभूमि में शीघ्र गति वाले नौगाणों से तत्कालही उस अर्जुन के पुत्रको घायल किया, और बड़े पराक्रमी दृढारत सावपान भीष्मजीने उसकी चना को तीन भल्लों से काटा और उसके सारथी को तीन वाणों से मारा, हे राजा इसीप्रकार कृतवर्मा कृपाचार्य और शल्यनेभी अर्जुनके पुत्र को घायलकरके ऐसे कंपायमानही किया जैसे मैनाक पर्वतका कंपायमाननही करसक्ते । १९ । फिर उन महारथियों से घिराहुआ अर्जुन कापुन अभिमन्युपाचों रथियों के ऊपर वाणों की वर्षा करके पांचोंके प्रलोको अप ने बाणों में रोककर भीमजीके ऊपर वाणों को छोडताहुआ बडे वेग से गर्जा । २१ । उमसमय हे राजा वहां उस युद्ध में उपाय करने वाले और वाणों से भीष्मको मारने वाले अभिमन्युका वडामारी भुजवन विदित हुआ, तब भीष्मजी ने भी उस पराक्रमी के ऊपर वाणों को छोडा फिर उसने युद में भीमजी के धनुप से छुटेहर बाणोंको काटा, तिसपीछे उस सफल वाणवाले वीरने भीमजी की ध्वजाको फिर नौतारों काटा इस कारण सरलांग बडे शब्द से पुकारे Then Bhishm the destroyer of enemies faced the son of Arjun in great liasto and wounded lum at once nith nine swift arron 8 And wise Bluslun of great prowess and firm ror, cut his banner with threo darts and hilled lus driver with iluree others Kritrarma, kopacharya and Shaly, too wounded tlie son of Arjun, but could shake bım 110 moro than they could mount Menak 1 ben surrounded by thoso sorriors, arjun's ein Abhimanyu showered lus arrows over tho fire warriors, and checking their weapons with lus own, hic wounded Bhuslim with 1 truncndous 109r 2 Trying hard in that bottle and Intting Burun with his Arroys, Allumunju displayed his great prurese Bluishm too diseinrged arons at the warrior ans Abhimanyu cut them doa ni with lus orn Then the muheman cut the Ixinner of Bhishim with an arrors and at this there wa4 n grent 19 भीष्मपर्व Bhisins Pary [44957 सौमदविाशप्पै उन्न पपातभुषिभ रत ॥२५॥ ततु सोभद्र विशिसै पातितभरतर्षभ। दृष्ट्वाभीमाननादोच्च सौमद्रुमभिदर्पयन् ॥ २६ ॥ अथ मोमो महास्राणि दिव्यानम् घहान च । प्रादुश्चके महारोद रणे तास्मन्महाल. ॥ २७ ॥ तत शरसहत्रण सौभद्र प्रपितामह । अवाकिरदमेयात्मा तदतमिवाभवत् ॥ २८ ॥ ततो दश महेवासा पाण्डवानां महारथा । रक्षार्यमभ्यघायन्त सौभद्र वारता रथे ॥२९॥ विराट सह पुत्रेण धृष्टद्युम्नश्चपापंत । भीमश्च केकयाथेय सात्यक्शि विशाम्पते ॥३०॥ तेपाजवनपतता भौम शान्तनयोरण । पासायप्रिमिरानच्र्छत् सात्य िनयाभ शरे ॥३१॥ पूर्णायतविसृष्टेन रणनिशितनच । ध्वजमकेन चिच्छदभीमसेमस्य पनिणा ॥ ३२ ॥ आम्यूददमय श्रीमान् केसरी सनरोत्तम । पपात भामसेनस्य भीमेण । २४ । हे भरतवशी वह बड़ी शाखा युक्त सुवर्ण से शोभित मुवर्णित ताल त अभिमन्यु के विशिखनाम वाणों से कटा हुआ पृथ्वीपर गिरा, हे भरतर्षभ अभि. मन्यु के विशिखों से घिरीहुई श्वनाको देखकर भीमसेन ने महा प्रसन्न होकर उस अभिमन्यु को प्रसन्न करके बड़ी गर्जनाकी । २६ । इसके पीछे महापली भीमजी न उस महाभयकारी युद्ध में बहुत से दिव्यमहा अस्त्रों को प्रकट करके सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु को सहस्र वाणों से ढकदिया यह आश्चर्यसा होगया ।२८। यह | देखकर हे राजा पांडवों के दस महारथी बड़े धनुपारी रथों में सवार होकर शीवही अभिमन्युकी रक्षा के लिये दौड उनके नाम यह है । अपने पुत्र उत्तरममेत राजा विराट, पृपतका पुत्र धृष्टद्युम्न, भीममेन, केकय और सात्यकी, शतनु के पुत्र भीप्मजी ने युद्धमें उनतीन आनेवालों के म-य में धृष्टद्युम्न को तीन वाणों से और सात्यकी को नौगाणों मे घायल किया, और कर्ण पर्यन्त संचकर छोडेहये तीक्षणधार वाले एक वाण भीमसेन की वजाको काटा । ३० । हे नरोत्ता भीम | सेन की बजा सिंह के चित्रकी स्वर्णमयी भीम से गिगईहुई पृथ्वीपर गिरी shout of the people The golden palm, dissevered by Abbimanyu's ariows fell to the ground and at the sigut of it Blu uttered a great war cry to cheer Abhimanyu Then Bhishm of immense prowess made use of his celestial weapons and covered Abhimariyu at once with a thousand arois, making it appear as a wonder 28 Upon this, ten warriors of the fundayıs at once drove in their chariots to help Abhupanyu Kug Vırat with his son Uttar, Dhirish tadyumn the son of Irishat, Bhim, Kalkayn and Satyaki were among those who came to help him In the midst of those warriors, Bhishm the son of Shantanu, rounded Abhimanyu with three arrows and Satyakı yith nice Hc cut Bhim's binner with one arrow, shot from the low which was drawn to the err 3? Bhum's banner, having the figure of a lion wrought in gold, cut down by , 24 4196] Malablinrat (४४९६) मधितोस्थात् ॥ ३३ ॥ ततो भोमस्तिभिर्विध्या भीष्म शान्तनवं रणे । कृपमेकेन विव्याध कृतवर्माणमष्टभिः ॥ ॥ प्रगृहतिाग्रहस्तेन पैराटिरपि दसिना । अभ्यद्वत् राजानं मद्राधिपानमुत्तरः ॥ ३५ ॥ तस्य वारणराजस्य जयेनापततो रथे । शल्यो निधारयामास बेगमप्रतिम शरैः ॥ ३६ ॥ तस्य कुद्धः स नागेन्द्रो वृहतः साधुवादिन । पदा युगमाधष्ठाय जघानचतुरो हयाम् ॥ ३७ ॥ सहताश्वे से तिष्ठन् मद्राधिपतिरायसीम् । उत्तरान्तकरी शक्ति चिक्षेप भुजगोपमाम् ॥३८॥ तथाभिन्नतनुजाण प्रविश्यविपुलंतमः । सपपात गजस्कन्धात् प्रमुक्तांशुकतोमरः ॥३९॥ यासादाय शल्योपि अयप्लु य रथोत्तमात् । तस्य वारणराजस्य चिच्छेदाथमहा करम् ॥ ४० ॥ भिन्नमर्मा शरशता छन्नहरतः स धारणः । भीममारीस्वरंकृत्या तदनन्तर भीमसेनने शंतनु के पुत्र भीष्मजी को वाणो से घायल करके एक वाण से कृपाचार्य को और आठवाणों से कृतवर्मा को घायल किया । ३४ । और उपरनाम विराटका पुत्र अग्रभाग में सड़की कुंडली बनाने वाले हाथी पर सवार होकर मद्रदेश के राजा शल्य के सम्मुख दौड़ा, शल्य ने बड़ी तीव्रता से स्थपर गिरने वाले उसगजेद्र के महावेगको रोका, फिर उस क्रोधित गजेन्द्र ने चरणों से रथके जयेको दवाकर उसके चारों उत्तम सवारी के घोड़ों को मारा, । ३७ । मृतक घोड़े वाले स्थपर नियत राजा मद्रने सर्प के समान और उत्तर के नाश करने वाली लोहेकी परछी को फेंका, उसबरछीसे जिसका कवच कटगया ऐसा वह उत्तर विस्मरणता में प्राकर हाथी के ऊपरसे नीचे गिरपड़ा और गिरतेही उस के हाथ से अंकुश और तोमर छूटपड़े, फिर शल्य ने अपने रथसे उतर खड्ग हाथ में लेकर बड़े पराक्रम से उसके गजेन्द्र की बड़ीमारी मूडको काटडाला, वह हाथी वाण समूहों से भिंदाहा कवचा कटीहुई मूंड़ से भयानक शब्द करता हुआ Bhishm, fell on carth Thercupon, Bhim wounded Bhishm with his arrows and prorced Kuipacha ya with ono arrow and Kritvarma with eight. 34 Uttil, the son of king Virat, rode the elephant wuch had formed a circle of its trunk and encountered Shalya tho king of Madra Shnlyn speedily checked tho elephant which was advancing towards his chariot, but the clophant trampled the yoko of his chariot undor foot and killed the four houses which diose it 37. Sented on the chariot of which the horses were slain, the king of Mndra lurled his sorpent liho iron spear to kill Uttar. Uttar nitli his nrniour cut by the spcar, fell down in a stoon from tho clephant and all tho weapons foll dorn froin his grasp Shalya then Icaped from his clinriot and with great bravery cut dosen tho trunk of the lium clephant, which already pierced by the arrow through the (४४२७) भीष्मपर्व Bhishma Pary [4497 ] पपात व ममार च। ४१ ॥ एतदीदशक करवा मद्राजो नराधिप । मारोह रथ तूर्ण भास्वर कृतवर्मणः ॥४२॥ उत्तरच हतं दृष्ट्वा बैरादितरंतदा । छतधर्मगाथ सरितं दृष्ट्वा शल्यवस्थितम् ॥४३॥ श्वेत क्रोधाप्रजज्यालहविपाहण्यपाडिय। सविस्फार्यमहचापंशकचापोपमवली ||४|| सम्यधावजिघांसन्वै राज्यमद्राघिवली। महतारशेनसममंतात्परिवारितः ॥ ४५ ॥ मुंघन्याणमयंवर्षे प्रायाच्छल्परप्रति । तमापतंतसंप्रेक्ष्यमत्तवारणविक्रमम् ॥ ४६॥ तापकानारथाः सप्तसमंतात्पर्यवारयन् । मद्रराजमोडतोमृत्योर्दष्ट्रांतरगतम् ॥ ४७ । वृहदलचकोसत्योजयत्सेनश्चमागधः । तथारुकमरयोराजन शल्यपुत्र प्रतापवान् ॥ ४८ ॥ विंदानुर्विदायावत्यौकांवोजप सुदक्षिणः । वृहत्क्षत्रस्यदायादः संघवश्वजयद्रथः ॥ ४९ ॥ नानावर्णविचित्राणि महादुःखों से पृथ्वीपर गिरकर मरगया ! ४१ । हे राजा ! शल्य ऐसाकर्म करके शीघ्रही कृतवर्मा के प्रकाशवान रथ पर चढ़गया, तब विराट्का पुत्र श्वेत भाई उत्तरको मृतक देखकर और साथ में बड़े वीरलोगों को जानकर झोपकी आग्न में ऐसा प्रचलित हुभा जैसे अग्नि घृतडालने से प्रजनित हो वह वीर इन्द्रके धनुप की समान अपने धनुपको कानतक बँचकर मद्रपति शल्य के मारने को दौड़ा और वाणोंकी वर्षा करताहुआ वह बहुत से रथियों सहित शल्य के रथकी ओर चला पुरुपार्य में वेगवान हाथीकीनाई उसको रण के लिये दौड़ता देख सातमहारथियोंने उसे सब पोरसे घेर लिया और काल के मुखमें पायेहुए मद्रपतिकी सहायताकी । ४७।। उन सातमहारथियों नाम ये हैं कोशलराज, हट्ठल, मगधका राजा जयसेन, शल्यका पुत्र रुक्मरय भवन्तिके विंद और अनुविंद काम्बोनराज मुदक्षिण और सिंधुराज जयद्रय और वृहच्छत्र का सम्बन्धी इन वीरों के धनुप विचित्र रंगों से armour fell down shrieking on earth with the rounds. Having done this brave deed, Shalya soon mounted the chariot of Kritvarma, The Shwet the son of Vnat, seeing that Uttar his brother was slain and that his destroger ras surrounded by bave warriors, burnt with anger like a flame of fire fed with clarified butter. And drawing his box, like the bow of Indra, to his ear, he ran to kill Shalya the king of Madra. Accompanied with many charioteers, he advanced towards the chariot of Shalya, showering luis arrows upon him. Seeing him advancing hko a furious elephant, the warriors surrounded Shalya on all sides, desiring to protect him who was then like one about to fall in the jaws of death. The warriors who helped Shalya Were Vrihudbal the king of Kosil, Jayatsen of Magadh, Shalya's son Rukmarath, Vind and Anuvind of Avanti, the king of Camboj, Sudakshin, Jayadrath the king of Sindhu and Vrihadbal's kinsmen.

[4498 ] Malalharat (४४९८) धनपिचमहात्मनाम् । विस्फारितानिदृश्यतेतोयटेब्धिवाद्युत. ॥५०॥ तेतुयाणमयवर्षे श्वेतमूर्धन्यपातपन् । निदाघातेऽनिलोद्भूतामेघाइवनगेजलम् ॥५१॥ तत कुद्धोमहेप्यास. सप्तभल्ल सुतेजनः । धनूपितेपामाच्छिद्यममर्दपृतनापतिः ॥ ५२ ॥ निकत्ता येवतानि स्मसमदृश्यन्तमारत । ततस्ते तु निमेपार्धात् प्रत्यपद्यन् धपिच ॥ ५३ ॥ सप्त चैव. पृषत्कांश्च श्वेतस्योपर्यपातयन् । तत पुनरमेयात्माभल्लै, सप्तभिराशुगै । निय फस महायाहुस्तपा रापानि धन्विनाम् ॥ ५४॥ ते नित्तमहाचापाघरमाणामा रपा । रथ शक्ती. परामृश्य चिने दुभैरवान् रयान् ॥ ५५ ॥ अन्ययुभरतश्रेष्ठ सप्तम्वेत रथ प्रति। ततस्ताज्यलिता सप्त महेद्रा शनि नि स्वना ॥ ५६ ॥ अप्राप्ता सप्तमिर्मले चिच्छद परमात्र चित् । तत समादाय शर सर्चकाय चिदारणम् ॥ ५७ ॥ प्राणोन्न रतश्रेष्ठ श्वेतो रुका रथ प्रात । तस्य देह निपतितो पाणो याति गामहान् ॥ ५८ ॥ विधुत की समान चमकतेथे । ५० । उन सब ने सेतके शिरपर वाणोंकी वर्षा की मानो बादल गर्मी के अन्त में पहाड़पर जलकी वर्षा करतेहैं उससेनापति धनुपधारी ने क्रोधयुक्तहोके गुप्तग्रन्धी वाले वाणों से उनके धनुपोंको काटा, हे भरतवंशी वह धनुप कटेहुये दीखपड़े तदनन्तर उन्होने अर्द्ध निमेषों मेही अपने सवधनुषों को तैयार कर के सातवाण श्वेत को मारे तदनन्तर अपारयुद्धि खेत नै सप्त भल्लों से उन धनुपधारियों के धनुपों को काटा । ५४ । वह धनुप कटेहुये महारथी दिव्यपर छोंको हाथ में लेकर थयकारी शब्दोंको करनेलगे और सातोयरछोंको उन्होंने श्वेत के स्वपर छोड़ा तिसपीछे परम अनों के जाननेवाले शेत ने उन ज्वालारूपमका- शित उल्का और वजूके समान शब्दायमान सातों परोको अपने सातभरलो से वाचहीमें काटडाला, तदनन्तर हेभरतवंशियों में श्रेष्ठ वेतने सर शरीर के छेदनेवाले चाणको रूपमके स्थपर चलाया, बहाण उसके मुसको उल्लंघन करके बड़ी शीघ्रता Tho bors of these warisors, of many c lours, shone like lightning 50 All theso showered arrons over Shuot like rain frlling on a nt an tain aft i tho hot weathom That great archer and leader of arm cs Tag filled in a rigo anel cut down then bost with his arions. Wc $115 their las cut down, but all the warriors soon refitted their bows and flot soyen 7rows at Shwet Tho wise a chcr, Siret ngan cut down their b) 158 51 When the loss of thew Karrior vero cat, they took up in lt speury and with dreadful 101409 burled the sesen sperry at Shuet, liut the latter, adopt mu tlo 11-o of arton“, cat dosa sith his data, in tho and air, thio seien spaars sluming liko sparks and hesin likt vajra Thien, Lest of Bharnts 1 Shoci shot at Rukmurath an arron vluch could pierce all the parts of the Lody, 1 (४४९९) मीमपर्व Bhishma Pary [41901 ततोगकम रथो राजन् सापकेन वाहतः । निषसाद रथोपस्थे कश्मलञ्चाविशम्महत् ॥ ५९ ॥ तं विसं विमनसं स्यामाणस्तु सार । प्रपोवादनसंम्रान्तः सर्घटोफम्य पश्यतः ॥६०॥ ततोम्यानपद समादाय श्वेतो हेमविभूषितान । तेषांपण्णा महापायज शीर्षाण्यपातपत् ॥ ११॥ यांच तेषांनिर्भिद्य सारणीश्च परण्तप । शरश्चैतान् समा कोर्य प्रायाञ्छरयरथं पनि ॥ ६२ ॥ ततो हलहलाशब्दातच सम्येपुभारत । दृष्ट्यासेनाप तिं तूर्ण यान्तं शल्या प्रति ॥ ६३ ॥ ततो भीमं पुरस्कृत्य तप पुत्रो महाबलः । नृतस्नु सर्व सैन्येन प्रायाच्धेत रथं प्रति ॥ ६८ ॥ मृत्योगस्यमनुप्रातं मद्रराजममोचयत् । ततो युद्धं समभवत् तुमुल लोमहर्पणम् ॥ ६५ ॥ तावान परेपांच व्यतिपत्तरप द्विप म् । सौभद्रे भीमसेमैच सात्यकीय महारथे ॥ ६६ ॥ कैकेये च विराटे व धृष्टद्युम्ने घ. से उसके शरीर में प्रवेशकरगया । ५८ । इस के पीछे हे राजा रुक्म रथी शायक नाम वाणसे घायलहोकर रथ के बैठने के स्थान में बैठगया और बड़ी अचेतता में प्रत्तहुआ परन्तु शीघ्रता करनेवाला उसका सावधान सारथी उसको अचेत जानकर | सबको देखतेहुये बहुत दूर लेगया । ६० । तदनन्तर महाबाहु श्वेनने सुवर्ण से शो. मिल दूसरे घोड़ोंको लेकर, उनछोंकी बजाओंकी नोकोंको गिराया फिर हेराना घहश्वेत शेपवचेहुये घोड़ोंको धागों से आच्छादित करके शल्य के रघपर गया, हे भरतवंशी इस के अनन्तर शल्य के स्थपर जातेहुये सेनापति श्वेतको देखकर आप की सेनाके मनुष्यों में पड़ा हलचलका शब्दहुमा । ६३ । फिर प्रापका पुन महा वली भीमजीको भागेकर के सब सेनाके मनुष्यों समैन श्वेत के रथपर गयां और मृत्यु के मुखमें फंसहुये मद्र के राजा शल्यको बचाया, इस के पीछे आपकेपुत्र और मंतिपक्षियों में महारोमहर्पण करनेवाला तुमुल युद्ध हुआ जिस में रय और हाथी सं. युक्त थे, कौरवोंके पितामह रद्ध भीम ने अभिमन्यु भीमसेन महारथी सात्विकी केकय and it entered his mouth and pasted into his brdy: 68. Wounded by that arrow, Rukmarath srooned in liis chariot and succumled in his stat. But his # so chariot driver, l.nowing this, took him farther away from the sight of all. 60. Thrin the warrior' Shnet tool other horses declod with gold and cut the langer ..cads of tl ose six årrior« nnd covering their horses witli 1119 arrows, came forFard against Shalya: Secing Shwet falling on Shalya, there ses a great commotion in your army. Then, your son; preceded by val,ant Bhishm and followod by his soldiers, encountered Sheet and thus resmited the king of Madra froth the jaws of death Trei tice as a toy ere fighting botereen your sons red the othe: side The chariots and clephants got mixed together. The old grand-ire nf the Kuros showered his arrows on Abhimanyu, Bhumsen, Valiant catoriki, 63 मह ॥६७॥ [45001 Mahabharat (४५००) पार्पते । एतेषु नरसिंहेषु चेदि मत्स्येषु चवह । ववर्ष शर वर्षाणि कुरु वृद्धः पिता N इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधर्पवणि श्वेतयुद्ध सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४७॥ धृतराष्ट्र उवाच ॥ पय नेते महेष्वासे प्राप्ते शल्यस्य प्रति। कुरव पाण्डघेयाध किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥ भीम. शांतनव किंचा तन्ममाचक्ष्व पृच्छत ॥ सजप उवाच ॥ राजन शत सहनाणि तत क्षत्रियपुगवा ॥२॥ श्वेत सेनापति र पुरस्क त्य महारथा । राशो पल दर्शयन्तस्तवपुत्रस्य भारत ॥ ३॥ शिखण्डिनं पुरस्कृत्यत्रातु | मैच्छन् महारथाः । अभ्यवर्तन्त भीष्मस्य रथ हेम परिष्कृतम् ॥ ४॥ जिघासन्त युधा श्रेष्ठ तदासीत् तुमुल महत् । तत्तेहं सम्प्रवक्ष्यामि महावैपासाव्युत ॥ ५॥ साधकाना राद् धृष्टद्युम्न पर्पतकापौत्र इननरोत्तमों पर और राजाचंदेली की सेनाके पुरुषों पर याणोंकी शष्टिकी ।। ६७ ।। मध्याय ।। ४८ ॥ धृतराए वोले हे संजय इसमकार शल्य के रथ के पास बड़े धनुपधारी श्वेत के वर्तमानहोनेपर कौरव और पाण्डवों ने क्या क्या कर्म किये और शांतनु भीष्म जीने क्या किया उसको मेरेआगे वर्णन करो, संजयवोले हे राजा इस के पीछे लाखों उत्तम शूरवीर और महारथी क्षत्री उससेनापति श्वेतको भागे करके आपके पुत्र राजा दुर्योधनको अपना पराक्रम दिखलाते हुये शिखण्डी को भागे कररक्षा करने की इच्छा करके, युद्धकर्ताओं में उत्तम भीप्मनीको मारने की अभिलापा करते हुये उनके मुवर्ण जटित रय के समीप उनकी सम्मुखता में आकर वर्तमान हुये उससमय वहाभारी युद्धहुआ । ४ । अवमै उसयुद्ध को कहताहं जिसरीति से तुम्हारे पुन और दूसरे लोगोंका युद्ध प्रचलितहुमा उसयुसमें भीमनीने रथीलोगों Kahayn, Vırat, Dhrishtalgumna the grandson of Parshat and on the armies of the king of Chandeli 67. CHAFTER ALVI11 Dhritrashtra nsked of Sanjaya – lyhen Shalya and the great archer Shtos were thus incing each other, what did the Kouratas and the Pandavas do? What did Bhishm the son of Shantanu dol Let me knor all this." Sanjaya replied, Then hundreds of thousands of sarı 1011 ani choroleurs, led by their gencral Shwet, showed their prores to Duryodhan. They made Shikhandi to face Blighwa the best of warriors and protecteu the former from all sides in order to bring about tho destruction of Bhishm. On their approaching the gold laienhed chanot of Bhushm, A sercro fight engucd. 4. I shall not describe to you how they fought Bhislim filled numbers of chanot (४५०१) भाग्मपर्व Bhishma Parr [45011 परेषांच यथायुद्ध मवर्तत । तत्राकरोद्रथोपस्थान् ग्यान्शातनयो यान् ॥ ६॥ तत्राद भुतं माचके शरैरार्छद्रयोशमान । समावृणोच्छरैरकं मर्कतुल्य प्रतापवान् ॥ ७ ॥ नुदन् समन्तात् समरे रवि रुधन पथा तमः । तेनाजी प्रेपिता राजन शरारातसहस्रशः ८॥ क्षत्रियांत कराः संख्ये महावेगा महावलाः शिरांसि पातयामार्षीराणांशतशोरणे ९॥ गजान् कण्टकसन्नाहानवजेणेव शिलोच्चयान् । स्था रथेषु संसक्ता ग्यश्यन्त विशाम्पते ॥ १०॥ एकेरथंपर्यवहंस्तुरगाः स तुरङ्गमम् । युधानं नातं घोरं लम्बमानं सकामुकम् ॥ ११ ॥ उदार्णाश्च हयाराजन् वहतस्तत्रतत्रहा वद्धखगनिपगाध विध्य स्तशिरसोहताः १२ शतश:पतिताम्मी चीरशय्याशेरते । परस्परेण धावन्तः पतिताः पुन कात्यताः ॥ १३॥ इत्यायच प्रधावन्तो द्वन्द्वयुद्धमवाप्नुषन् । पीडिताःपुनरन्योन्यं के स्थानोंको खाली करके उनके शिरों को काटा, सूर्य के समान प्रतापी युद्धमें चारों भोर से पीड़ित करतेहुये भीष्मजीने वाणों से मूर्यको ऐसेढकदिया जैसे उदयहोकर मूर्य अंधेरेकोढक देता है। । हे राजा उन्होंने युद्धके वीच क्षत्रियों के नाश करने वाले बड़े शीघ्रगामी लाखों तीव्र वाणोंकी वर्षा की, युद्ध में अनेक शूरोंके शिरोंको गिराया हे राजा मल्ल और वाणों से युक्त शिरसे रहित बहुतसे स्थी रथ में वैटेहुये दिखाई दिये रथी रथीके ऊपर अश्वपाते अश्वपति के ऊपर वर्तमानहुये । १० । और सेनाके साथ मरे हुये धनुषों समेत रयमें पड़ेहुये वीरौंको उनके रयों के घोड़े इधर उधर लेजाते हुए दृष्टपड़े, खड्ग और तृणीर के बांधनेवाले कटेहुए शिरोंसे वर्तमान हुए और सैकड़ों पृथ्वीपर पड़ेहुए वीरोंकी शय्याओंपर सोते हैं, और परस्पर में दौड़ते गिरते हुए और उठकर अत्यन्त दौड़नेवालों ने द्वन्दयुद्ध को मचाया, फिर परस्पर में पीड़ित होकर युद्ध भूमि में फिरन लगे मतवाले हाथी चारों eers and cut down their heads. Glorious like the sun, spreading destruction on all sides, Bhishm covered the son with his arrows as the sun covers the darkness by his appearance. 7. He showered millions of kshatrya killing arrows and cut down the heads of many brave warriors Many charioteers with their bodies pierced through with darts and their heads chopped off, were to be seen in their chariots. Charioteers fell upon charioteers and horsemen upon horse men. 10. Killed in the midst of the army, pierced by anows in their chariots and lying on their seats, the warriors were seen carried liither and thither by the horses. The trielders .of swords and quivers were deprived of their heads and hundreds of Farriors lay dead on the field of battle. Randing against one another, falling and rising again, the warriors fought duels. Wounded by one another, the mad elephants in the field of battle fell down dead in all directions Other elephants and horses Tere killed because they had no riders to guide them. 14. The charioteers met the charioteers all 1502 kahabharat (४५०३) लुण्ठतोरणमधान ॥ १४ ॥ खचापा सनिपगाश्च जोतरूपपरिताः । घिसध्यातवी. राधशाश.पारपीडिता ॥ १५ ॥ तेननेनाम्पघातविसुजतश्चभारत । मत्तोगजापर्य घर्तद्धयाश्चहतसादिन ॥ १६ ॥ साधारविनवारि विमृद्गत समंतन । स्पंदनादपतत्क चिनिहलाम्पेनसायकै ॥ १७ ॥ हतसारधिरप्युचैःपपातकाप्टरद्रयः । युध्यमानस्यते नामेन्यूटजमिचास्थित ॥ १८ ॥ धनु कूजत विज्ञानंतत्रावितियुद्धधत ! गात्रापर्शन योधानांग्यज्ञाप्तपरिणधिनम् ॥ १९ ॥ युद्धधमानंशरैराजन् सिाजनीध्वजिगीरयात् । अन्योन्यवीरसंशब्दोनाथूयतम कृतः ॥ २० ॥ शब्दायमानेसंग्रामेगरहेकर्ण दारिणि । युध्यमानस्यसंग्रामे कुर्चत पौरुपं यकम् । २१॥ नाप्रौपनामगोत्राणिकीर्तनच परस्परम् । ओर से गिरे और जिनके सारथी मारेगये वह भी हाथी घोड़े गिरपड़े। १४ । रयों के साथ रथीलाग चारों ओर से मर्दन करनेलगे और कोई किसी के वाणसे मरा हुमा रथसे गिरा, और जिमका सारथी मारा गया वह बड़ा रथभी काष्ठ के समान गिरा और द्वन्द्व युद्ध में धूलके उठने पर, लड़नेवालों का विज्ञान और सम्मुख युद्ध करने वालों के शब्द धंसहुये युद्ध करनेवालों का शरीर छूने से शत्रुका शानहोता था । १७ । हे राजा धनुपकी ज्या के शब्दों पर वाणों से लड़नेवालों ने याण मारे और वीरों के कहे हुये वीर शब्द परस्पर में सुनाई नहीं दिये, युद्धके शब्दायमान होने और कर्ण फाड़नेपाले पटहशब्द होने पर युद्ध करने हुये अपनी शूर वीरता कान का परस्पर में पिछली शूरताओं का वर्णन करना भी नहीं सुना गया | भीष्पनी के धनुप से निकले हुये वाणों से पड़िामान और युद्धर्मे लड़नेवालों का भी वर्णन नहीं मन ई दिया, एकने दूसरे वारोंके मोंको कंपित किया उस वरावर व्याकुल कारनवाले रोमहर्पण तुमुल युद्ध में, कोई पिता अपने निज पुत्र को नहीं जानताथा २०' रथके पहिये और जुए टूटगये और एक भारवाहक घोड़ा पारागया , जुए के और पहिये के टूटने और रथ को राधीन राहत होनेपर round and destroyed one another. Some fell down on enu th from thicir charioty piciced thuongli by arrows Tho huge chariots, whose driters traic lilled, fo}} dotru ou aarth hilo logy of woods, In the fury of tlo lnttlo tho dast stori roso 50 tluch that the fighters cjuld not (listinguish the faces and voice of their ndrererries and the only source of knowlcilge to them was tho contact of their lodies 17. llic n-cleme, ling! thot Oitulys at the sound of boxstring; tho Steroic sands of tlic wari'tir's were not licard In tlic inidst of thing tremcndous up orr o butt'o and tlic account of the forinor esploits of then starriors could not lo hicard founded by the arrow shot from the low of ili lim, tlie #arriors uttered puudible sounds. The warriors sho's the ruinds of one anotlier. Daring tlint terrillo little thio father, cruld not disingui-li tlic son 20. Tho liccls and thic yoles of the cliniuta tycre Trolen ud the horses sero siain. Ontho chinriots (४५०३) भीष्मपर्व Bhishma Pari [45031 मामवापच्युतैर्याणातीनांयुध्यतांमधे ॥ २२ ॥ परस्परेवांधाराणामनांसिसमकंगवन् । तस्मिन्नत्याकुलेयुद्ध दारुणलोमहर्षण ॥ २३ ॥ पितापुत्रचसमरेनाभिनांनातिषश्चन । चक्रममेयुगन्छिनएकधुर्येहयेहतः ॥ २४ ॥ याक्षितःस्पंदनाद्वीरः सस रथिििजलगः । पवंचसमरसर्वेवारा वरयाकृताः ॥२५॥ तेननम्मदृश्यते धाबमाना समतत । गजोहतः शिरस्छिन्नममभिन्नहयोहतः॥२६॥ अहत.पापिनासीद्भी माननतिशात्रवान् । श्वेतः कुरुणामकरोनियंतस्मिन्महादचे ॥२७॥ राजपुत्रानयोदानवीरतसघश । चिच्छेदाधिनांचा शिरोसिमरतर्षभ ॥ २८ ॥ सांगदावाइयश्चैवधन पचसमतत । रक्षेपांरपचक्रागिनूगीरााणयुगानिच ॥ २९ ॥ छत्राणघमहागणपताकावाशांपते। हयोधाधरपौधायनरौघाश्चयभारत ॥ ३०॥ धारणा.शतश्चैवहताश्वतनभारत । सारथी समेत वीर लोग मूरे चलनेपाले बाणों के द्वारा रथों से गिराये गये, और परस्पर में लड़ने हुये दृष्टपड़े जो मारागया वह शिरमे रदिन हुआ कोई मर्मस्थलों में घापन होकर मग, भीष्मजी के हाथ से शत्रुओं के.मनुष्यों को मारते हुये के ईभी विना घायल के नहीं बना कौरवों के उसबड़े युद्ध में आप वेतने, राजकुमारों को और सैकड़ों समूहवाले बड़े २ पुरुषों को मार। और हजारों ममूह युक्त रथियों के शिरोंको काटा ।२४। हे मरतवंशी उस युद्ध भूमि में चारों ओर से वाजूबन्दों समेत भुना वा धनुप और रथी पदाती रयवारयों में सवार छोटी बड़ी पताका अथवा घोड़ों के और रयों के समूह वा मनुष्यों के समूह सैकड़ों हाथियों समेत खेत शूरवारके हाथों से मारेगये उसके पीछे इमभी बेत के भय से भयभीत होकर अपने उत्तम रय को छोड़कर दूर चलेगये और यहां आपकी चिन्ताको देखते हैं। सो हे कौरवनन्दन हमसब कौरव लोग बाणोंकी झड़ीको वचाकर वहां पर नियंत, शान्तनु भीमजी को देखनेनगे वह नरोत्तम बड़े उदार प्रतापी हमारे दृद्ध पितापद भीप्पनी भयके समय बड़े मारी युद्धमें निश्चल मेरु पर्वतके समान अकेलेही नियन being tbus disabled, the warriors and the cbariot drivers were slain by the arrows which came in straight lines The hends ot"some warriors were cut off and others died of receiving wpanes in vital parts No individual of the enemy's army escaped unlıut while Blislın was Gghting. In that war of the Kauravas, Shwet killed hundreds of princes and wariors of renoira and belcided thousands of chari teers. 91. In that battle, descendant of Bharat! jewelled arms, bous, chariotcors, fuot soldiers, bapiers and bannerets, horses and chariots with men and elephants rere cut down ly the great warrior Shrets I myself, being afraid of Shwet, left u good chariot and went farther off and thus nas able to see you once mi re pluoged in grief. So all the Kauravas stood removed from the pllower of arrows and looked on Blish m. That test of men, of great prowess, our grandfather Bhishm, firm ljbe drunt med at the tixud of danger, in the thich of battle, stood aloaa 30. And as in numerous [4304]] Mahabharat (४५०४) घयश्वेतभपाद्भावाविहायरमसत्तमम् ॥ ३१ ॥ अपयातास्तथापश्चाद्विमुंपश्यामकृष्णध । शरपातमातिक्रम्य कुरवः कुरुनंदन ॥ ३२॥ मीशांतनवंयुद्धस्थिता:पश्यामसर्वशः1, भदानादीनसमयेमोमोस्माकंमहाहवे ॥ ३३॥ एकस्तस्थौनररूपायोगिरिमकारवाचलः। भाददानावप्राणान्सविताशशिरात्यये ॥ ३४ ॥ गमस्तिभिारयादिरयस्तस्यौशरमरी चिमान् । समुमोचमहेचास शरसंधाननकराः ॥ ३५ ॥ निमनमित्रान्समरेवनपा- णिरिवारान् । तेवपमानाभीष्मेण जास्तमहाबलम् ॥३६॥ स्वयादिवतेयूशामुक्त भूमिपुदारुणम् । तमेवमुपलक्ष्यैकोहष्ट-पुष्टः परतप ॥३७॥दुर्योधनाप्रपयुक्तःपांडवान्पारे हुए। ३० । और जैसे चैव वैशाख में सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी के रसादिकों. को माकर्पण करता हुआ नियत होता है उसी मकार वा शीतल किरणों वाला भीष्मभी शत्रुओंके प्राणोंको बँचताहुआ नियतहुआ युद्ध में शत्रुओंको मारतेहुए उस धनुप धारी ने बहुत प्रकार से वाणों के समूहोंको ऐसे छोड़ा जैसे कि चक्रधारी विष्णु असुरों पर छोड़ते हैं तब भीष्मजी से घायल हुए वीर लोगों ने भीम को त्याग किया और अपने सव समूहों कोभी काष्ठ से छुटीदुई अग्नि के समान शत्रुओंके समूहों से पृथक् किया प्रसन्न चित्त देहसे प्रफुल्लित शत्रु संतापी दुयोधन के प्रयोजनकरने में महत्त वित्त अकेले भीष्मजी ने उस अकले खेतको, अपने सम्मुख देखकर पांडवोंको बहुत शोपण किया । ३४ । हे राजा जीवनको और उससे उत्पन्न हुए भयको त्यागकर उस महा युद्ध में पांडवों की सेना के मनुष्यों को मारकर गर्दमर्द किया फिर आपके पितादेवव्रत भीष्मजी उस सेनाओं के मारनेगले सेनापति को देखकर बड़ी शीघ्रगति से सम्मुख हुए उस समय उसवेतने वाणों के महाजालों से भीष्मजी को प्राच्छादित कर दिया, इसीमकार भीष्मजी नेभी वाणोंके समूहों से श्वेतको दर्क दिया। ३७ । और फिर वह दोनों वैलोंके समान गर्नते हुए summer, tho sun stands drawing humidity from out of the enrth, 80 did Bhishm of cool rays stand attracting the life out of the enemios. Killing tho enemics in the field of battle, that archer let shower of ortowsons does Vishna the wielder of discus dischargo Wounded by Bhishma's arross, the warriors removed themselves away from Bhishm and went away with their men out of the field of battle as fire does when it is separated from Trood. Cheerful of body and mind, the destroyer of enemies, Bhishm stood alone for the sake of Duryodhan and seeing Shwet before him he hilled niany warriors of the Pandavas 34. Leaving all caru for this life and body. o king! your father Derabrat Bhishm des. troyed the l'andra army; and seeing their leader of the army coming towards him, ho at onco faced himn. Shwet corend Bhishm* with tho net irork of his arrots and Bhislım did the same. And then gro his his arrossat asuras.

(४५०५) vir Bhishma Pary [4505 शोचपन् । जीवितदुस्यजत्यय वाभयचगुमहाहये ॥ ३८ ॥ पातयामाससम्यान पौडधानाधिशापते । प्रहरतमनीमानिपितादेवनतस्तव ॥ ३९ ॥ दृष्ट्यासेनापतिमाम स्त्वरित श्वेताम्ययात् । तमामशरजालेनमप्यतासमवायिरत् ॥ ४. ॥ तथापि तथाभीपा शगधै समवाफिरत् । तीनृपाधिचनदतीमचाधिवमहाद्विपी ॥४१॥ व्यामा विषनुसंख्यायन्यो.यमभिजप्ततु । यस्त्रास्त्राणिसवार्यततस्तीपुरुषर्षभौ ॥ ४२ ॥ मीम श्वेतश्चयुयुधेपरस्परवधं पौ। एकानोनियोग पांडयानामनीकिनी ॥४३॥ शरै परमसयुद्धोयदिश्वनोनपालयेत् । पितामहतोदृष्टया श्वेतेनधिमुपीत ॥ ४० ॥ महपाडयाजग्मु पुरस्तेविनामवत् । ततोदुर्योधन फुद्ध पार्थिचे परिचारित ॥४५॥ ससैन्य पाडवानीकमभ्यवतसयुगे । दुर्मुख कृतवर्माचकृप. शल्योरिशापति ॥४६॥ बड़े मतवालेहाथी और व्याघके समान अत्यन्त प्राध में भरे परस्परमें प्राघातकरने लगे, तदनन्तर वहदोनों पुस्पोत्तम अस्त्रोंसे अलोंको रोककर, परस्परमारनेके इच्छा वान युद्धमें प्रवृत्तहुए अत्यन्त क्रोधरूप भीमजी पांडवों की सेनाकोएकही दिन्म भस्मकर डालते जो श्वेत रक्षा न करता । ४० । तिस पीछे देतसे मुख फेरेहुए पितामह को देखकर पांडरोंने वडाहर्प मनाया, और आपका पुन उदास हुआ । तदनन्तर क्रोध भराहुादुर्योधन अपनेसाथी राजाओं समेत सेनाके मनुप्योंको साथ लिये युद्ध में आकर पांडवों की सेनाके सम्मुख दौडातर शेतने गंगाके पुन प्मिनीको छोड़कर बड़ी तीनतासे आपके पुत्रकी सेना का ऐसे नाशकिया जैसवायु अपने क्लसे वृक्षों का नाशकरताहै, वह क्रोध से भराहुआ विराद का होतनाम बड़ा पुत्र दुय्योधनकी सेनाका नाशकरके वहां से लौट कर फिर वही आपहुँचा जहां भीमजी नियतथे । ४४ । हेराजन वह दोनों प्रकाशमान महापली महात्मा परस्पर में फिर ऐसे युद्ध करने लगे जैसे कि नामर और इन्द्र लड़तेधे और परस्पर मारनेकी इच्छाकरतेथे श्वेतने अपने धनुपको हाथ में लेकर भीमजी को both roaring like bulls they fcught with erch other like two angry e'ophants or lions And each checking the weapons of the other and desiring to kill cach other, they engaged in combaf The enraged Bhishm would have estirpated the army of the Pandavas in ono day, were there no Shwet to protect it Then seeing the grandfather turn back on Shwet, the Pandavas rared great cry of joy. Your son sas grieved at this and accompanied by lings and Bamies, rushed upon thic army of the Pandavas Shwet then left Bhishma the son of Gang; and Icgnn sriftly to destroy your army as tho wind destroys trees by its foro The enraged sou of Inat, Shwet, having routed Duryodhan's army returned to the place where Both glorious murriors of great rénorn fought watlı each other lilo Vrtiasur ind Indrs and desired to will cach 40 Bhishm was.

- [4506 Malabharat (४५०६) भीमजुगपुरासाद्यतयपुणनोदिता । दृष्ट्यातुपार्थिवै सार्दुर्योधनपुरोगमैः ॥ ४७ ॥ पांडवानामनीकानि बध्यमानानसयुगे। श्वेतोगांगेयमुत्स्यतवपुत्रस्यवाहिनी ॥४८॥ नाशयामासवेगेगयायुक्षानिवौजसा । द्रावयित्वाचमराजन्वैरादि क्रोधमूछित ४९॥ आपतत्सहसाभूयायभीमोव्यवस्थित । तौतनोपगतौराजन् शरद तौमहायलो ।। ५०॥ अयुध्येतामहात्मानौययोभौवृत्रदातवी । अन्योन्यतुमहाराजपरस्परवपिणी ॥ ५१ ॥ निगृह्य कार्मुकश्येतोभाष्मविव्याधसप्तभि ॥ पराक्रमततस्तस्यपराक्रम्यपराक्रमी ॥ ५२ ॥ तरसाधारयामासमतोमत्तमिवद्विपम् । श्वेत शातनवभूय शरै सनतपर्धाग ॥ ५३ ॥ विन्याधपचविंशत्यानद्भुतमिवाभवत् । तंप्रत्यविध्यदशभिर्भीष्म शातनवस्तदा ५४॥ साय वाणों से विदीर्ण किया इसके पीछे इस पराक्रमी ने उसपराक्रमी को बड़े पराक्रम से ऐसेहटा दिया जैसे कि मतवालाहाथी मतवाले हाथी को हटादेता है 1४७ । फिर क्षत्रियों के प्रसन्न करने वाले विरादके पुत्र श्वेतने क्रोध करके युद्धमें धनुरको खेंच कर भीप्पनीको घायल किया, इसी प्रकार शंतनु भीमनी ने भी उसको दश वाणों से विह्वल करदिया, वह पराक्रमी भीष्मजीसे घायल होकर भी पर्वत के सामान कम्पापमान नहीं हुआ तदनन्तर फिर श्वेतने गुप्त अन्धि वाले पच्चीम पाणों से भीप्मनी को घायल किया, यह भार्यप्ता हुआ और युद्धमें होठ को चारने वाले खेतने अत्यन्त हँसकर, दश वाणों से भीप्मक धनुपको दश खएड कर दिये तिसपीछे वाणोंकेभी छेदनेवाले विशिखों को चढ़ाकर उन महात्मा भीमजी की ताल बना के शिर को मथन किया फिर आपके पुत्रोंने भीमजी की ध्वनाको गिरा हुआ देखकर भीष्मजी को श्वेत के आधीन वर्तमान मृतक रूप माना और प्रसन्न चित्त पाण्डवोंने भी चारों ओर शंखोंको वजाया। ५३ । महात्मा भीष्मनी की ताल-बजा को गिरा हुआ देखकर दुर्योधन ने बड़े क्रोध से other. Shwet pierced Bhishm with soven arious and wasr himself repulsed 12th equal force by Blushm, as one mad elephant repulses another 47. Then Virat's son Shwet, the joy of lshatryas, drawing hus bow in great onger, founded Bhishm In the enine manner Bhishin also founded him with ten trrone lhe brase man, Founded by Bhishma's arross, remained unshahen like a mountain and ngnin woundesi Bhishm with gwift sharp arrolls tyas a wonder. And liting his lips in the field of battle, with a smilo ou luis face, Shwet cut the bor of Bhishm into ten pieces with ten Then lio discharged moro Artoys and cut down the banner of Blushm with the figuro of palm treo on it. Your sons, sceing the Lanrer of Bhishu down, thought that he was vanquished and slain Ty Surret and the Pandavas chucrfully bleve their conch sbolla 53 Saing the Pala ensign of great Blizsiun strack down, Duryalhan ५ His deed arrows -- (४५०७) भीमपर्ध Bhishma Pary [4507 ] सविद्धस्तेनबलपाशाकपतयधाऽचलः । चैराटि समरकुद्धोभृशमायम्यकार्मुकम् ॥५५॥ आजघानततामी मंश्वत क्षत्रियनंदनः ! संप्रहस्पततःश्वेतासक्तिपीपरिसंलिहन. ॥५६॥ धनुश्चिच्छेवमी मस्यनयभिर्दशधाश। संधायनिशिपंचवशरलामप्रवाहिगम् ॥५७॥ उन्ममाधततस्तालंध्यजीमहात्मनः । केनिपतितंदृष्ट्वाभीष्मस्थतनयास्तव ॥ ५८ ।। हतभीष्मममन्यंतश्चतस्थवशमागतम् । पांडवाचाहिपाद मुशंगामुवायुनाः ॥५९ ॥ भीष्मस्थपतितकेतुं दृष्ट्वातालमहात्मनः । ततोदुर्योधनानोधारस्वमनीकमनोदय ॥६०n यत्ताभीमपरीप्सध्चरक्षमाणा:समंततः मान-प्रपश्यमानानांश्वेतान्मृत्युमपायांत ॥६॥ भीमाशांतनवःशूरस्तथासत्यप्रीमियः । राक्षस्तुवचनभुत्वायरमाणामहारथाः ॥ ६२ ।। बलेनचतुरंगणगांगेयमयपालयन् । यालहीका कृतघावशल शल्यश्चमारत ॥ ६३ ॥ अपनी सेनाको जताया कि उन देखनेवालोंको भी श्वेत.मारेगा तब शान्तनु भीप्यगी भी मारे जायँगे इसलिये मैं तुम लोगों से कहता हूं कि बड़े उपाय से भीप्पनी के जीवनकी इच्छा से तुमचारोमोर से उनकी रक्षा करो यहवात्त मैं सत्य सत्यही कहताहूं राजा दुर्योधनके वचनको सुनतेही शीघ्रता करनेवाले महारथियोंने चार अंग वाली सेनासमेत गंगा के पुत्र भीष्मकी रक्षाकी, वाइलीक कृतवर्मा कृपाचार्य शल्य जरासन्धकापुत्र विकर्ण चित्रसेन विविंशनि हे भरतवंशी उन सब शीघ्रता करने वालों ने चारों ओर से भीष्मजी को मध्य में करके शेत के ऊपर अक्षों की वाकी, हस्त लाघवताके दिखानेवाले और शीघ्रता करनेवाले महावली बड़े बुद्धिमान् श्वेतने उन क्रोध भरेहुमों को अपने तीनवाणोंसे रोका, जैसेकि सिंह हाथियोंको रोकता है उसीप्रकार श्वेतने उन सोंको रोककर वाणों की बड़ी वासे भीप्मनीके धनुपको काटा, तदनन्तर हे राजन युद्ध भूपि शांतनुं भीष्मजी ने दूसरे धनुपको लेकर कंकपक्ष युक्त शिलापर तीक्ष्ण किये हुए वाणों से वेतको घायल किया, तिस पीछे हे राजन लड़ाई में सवलोगों के देखते बड़े क्रोपयुक्त वेतने भीष्मनी को बड़े २ लोहेके वाणों से विदीर्ण किया, इसके अनन्तर राजा in anger ordered his warriors not to let Shwet destroy Bhishm as Prig sreylirvaid. We areteeu Tireunwgun Bhirsima is a stles with great care as he said that Shwet was sure to kill all the warriors if he got victory over Bhishin. At his command the parisors guarded Bhishn the sou of Ganga on all sides. Vallik, Kritvai ma Kripaciarya, Shalya, Yarn the son of Jarasaidh, Chitissen and Vivinghiati at once stationed themselves round Bhishm and shorer. cd their weapons on Shwet. Dexterous in the use of arms, the rise Shwet checked those angry ones with sharp arrows, as a lion checks elephants. Having checked those rarriors with a shower of his Arrows, ho cut down Bhishma's bow. But Bhishm at once took up onother low and founded Shwet by bis arrons sharpered by grinding on stone and fitted with .quills. Then, within sight of all, 4508] Muhabharat (४५०८) जलसघोषिकर्णध चिपसनोविविंशति । त्यरमाणारत्वकाले परिवार्यसमतत ॥६॥ रावृष्टिंमलातस्यापर्णपातयन् । तान्द्धनिशितैर्याणस्वरमाणोमहारथ ॥६५॥ अवारयदमेयामादर्शयन्पाणिलाघवम् । सनिवार्यतुतान्सर्वान्केसरीकुजरानिय ॥६६॥ महताशरवर्षणभीष्मस्यधनुराच्छिनत् । ततोन्यदनुरादायाम शांतनयोयुधि ॥ ६७ ॥ श्येतचिव्याधराजेंद्र ककपनै शितै शरै । तत सेनापत्ति सुद्धोभीष्मवहुभिरायसे ।। ६८ ॥ वियाघसमरराज सबलोकस्यपश्यत । तत व्यथितोराजाभामटवानिवारित ॥१९॥ प्रचारसर्वलोकस्यश्वेतेनयुाघपैतदा । निष्ठानक हमहास्तवसैन्यस्यचाभवत् ॥ ७० ॥ तवीरवारितयाध्यतेनमारायक्षतम् । इतश्वेतगम यतश्वतस्यवशमागतम् ॥ १ तत माधवशप्राप्त पितादेवव्रतस्तव । ध्वजगु मायरष्टयाताच्सेनानिधारिताम् । ७२॥ दुर्योधन उन सर लोगों के आगे बडे वीर भीमजी का युद्ध मे श्वेत से रुका हुआ देखकर बडा दुखी हुआ, श्रापकी सेनाका बहुत देर तक निवासरहा । १४ । मोर श्वेतके वाणोंसे विदीर्ण उस वीर भीप्मको देखकर शेतके आधीन वर्तमान होकर उसके हायसे मृतकरूप माना इसपीछे आप के पिता देवनत भीमजी क्रोधके पशीभूत हुए, हेमहाराज ध्वजाको मथितफरके उस सेनाको रोके हुए देखकर श्वतके ऊपर अनेक शायकों की वर्षा की, फिर रार्थयों में श्रेष्ठ श्वेतने वाणों को रोककर फिरभी आपके पिता भीमके धनुपको भल्लोंसे काग्डाला, हे राजन् क्रोधमें भरे हुए भीमजी ने धनुप को त्यागकर दूसरे अत्यन्त दृढ धनुपको लेकर शिलको तीक्ष्ण किये हुए सात भल्लों को चढ़ाकर चार वाणोंसे तो शेतके चारों घोडोंपर मारा और दोवाणों से वजाको काटा ओर सातवें भल्ल से सारथीके शिरकोकाटा । ७० । फिर वह महारथी त जिसके सारथी और घोडे मरगयेथे रथसे कूदकर क्रोधसे व्याकुलहुआ पितामह ने रधियों में श्रेष्ठभेतको रथसे विहीन देखकर बडे तीक्ष्ण नाणों से उसको चारों ओरमे घायल किया, युद्धमें भीम के चारों से Shnor pecud Bhishi with lung 11on arrows Seeing Bhishin thus olnuci ed 11 lattli by Shwet Duryodhan rig much grioved Your any stood there long 64 And soeing Bhishm nounded by Sliweta ano's and clieni matul they tool lum alrejdy foi derd your fıthor Desal mnt tris beset with anger and seeing huis banner zohen on ? lus urniy chicched he showered many arrows at Shrict, Then Susset tlso lest of chans stocis again clicci ed luis ariows and cut luis Lan in train Then filled with anger Bhishm left thint bor and talinn »nother and stronger onc sliot sesen arrors at bım 12ths four arro re lielilled the four horses of Shact with two ho cut down Ire standard and frith the serent's lic lchoaded the dmser 70 To great warrior Sluet loin; thus deprned of tho durer and hore papued from lu choriot and » z uvel zgıtatt. with anger krmanther song Shuet the last of nantors deprircl of thout Then TIO down by sharp arrsis and at this, o best of Bharats! all your sons "and divided it into niparts. That god golden spear tras cut (४५०९) भीष्मपर्प Bhishma Pary 1:4:10 श्वेतप्रतिमहाराजव्यवसायकायनातानाचार्यरणे यतोमी मस्परधिनायरः ॥ ७३ । धनुचिच्छेद गलनपुनरेवपितुस्तय । उत्सृज्यकार्मुफराजेनगांगांक्रोधच्छितः ।। अन्यत्कार्मुकमादायदिपुलबलवत्तरम्। तत्रसंघापयि पुलान्गाहान्सप्लशिलाशिताना चतुर्मिश्चजधानाध्यान्वतस्यपुरानापतेः।ध्य द्वाभ्यांनाचच्छेद सहमेनचसारयः ७६॥ शिरोचच्छेदभालनसंद्धोऽलघुविक्रमः तादयस्तात्सायादवप्लुत्यमहायला अमर्षवशमापनाव्याकुलःसमपद्यत । घरयरपिनांश्रेष्ठंश्वनयापतामहः ॥ ७॥ ताडयामासनिशितःशरसंधैःसमंततः । सताड्यमानासमोभी मचापच्युतःशरैः ॥ ७९ ॥ घरधनुरुत्सृज्यशर्तिजनाहकांचनी । ततःशकिरणेश्वेतोजमाहोग्रांमष्ठामयां ॥८॥ कालदंडोपमांघोरांमृत्योहियामिवश्वसन् । अमवीचतदाश्वतोभीष्मंशांतनयंगणं ॥८॥ तिष्ठेदानींबसंरब्धःपश्यापुरुषोभय । एपमुक्त्वामहं यासामीम युधिाराक्रमी ॥२॥ घायल हुए शेतने अपनें रथपर पनुपको छोड़कर दिब्य मुबार्णत बग्छीको धारण किया, तदनन्तरं युद्धमें घोर भयानक उग्र कालदण्ड के समान नाश करने में महां समर्थ अपनी बरछी को लेकर, महा क्रोधरूप बुद्धिमान् खेत ने भीष्म भीप ऐसा कहकर सर्प के समानं वरछी को फेंका, हे राजन उससमय आपके पुत्रों ने बड़ा हाहाकार किया कि पांडवों के निमित्त पराक्रम करने वाला श्वेत आपका अनर्थ करना चाहताहै। ७७ । ऐसी. सर्पाकार रूप वाली नाश घोतक श्वेत की छोड़ी हुई परछी को देखकर आपके पुत्रों में बड़ा हाहाकार हुआ.1७८ । हेराजन उसकी फेंकीहुई बरछी एकाएकी उल्कापात के समान आकाशसे गिरी तर भ्रांतों से युक्त आपके पिता देवव्रतने उस पृथ्वी और भाकाशके वीच, प्रकाशवान् किरणों से युक्त वरछी को भाट चाणों से काटकर नौटुकड़े किये वह उत्तम सुवर्णवाली वरछी तीक्ष्णवाणों कटगई इस के पीछे हे भरतर्षभ आपके सवपुत्र बड़े शब्दों को कर के पुकारे, तब क्रोध से भरे काल से विदणि चिच श्वेतने उसवरछीको खंडिर of his chariot, pierced him with sharp arrows on all sides. his wounded in battlo hy tho arrots of Bhishm, leſt his baking tiis chariot" and too's up his cclestial golden spear. Tlytbe staff. of spear, dreadful in battle and capıble of destroying and hurled it .Death, wiso Shwet said in anger "Bhishm, Bhicry of ah and ilas liko a serpent. Your suns then raised a our sons expressed signs of Secing tlmt destructive spear of Slyoking, fell down suddenly-like grief. 73. The spear burled by father Devabrat, cut that spear of E.moteor from the sky; but yor luminous at the probable consequences of Shwet's Fan'injury to your cause. rays with eight ows in the midst of the earth and sky criod for joy. sivet, agitated by anger and broken hearted at the 14510] Mahabharat (४५१०) तन शक्तिममेयात्माचिक्षेपभुजगोपमा । पांडयापगक्रांतस्तथानचिकीर्षुकः ॥ ८३ ॥ हाहाकारोमहासात्पुत्राणांतेविशांपते । दृष्ट्याशक्तिमहाघोरांमृत्योर्दडसमप्रभाम् ८४॥ तस्यकरनिर्मुक्तानिमुक्तोरगसानभाम्।अपतत्सहसाराजन्महाल्केवनभस्तलात् ८५॥ ज्वलनीमतारक्षतांज्यालाभिास्यसंवृताम्। असंभ्रांतस्तदाराजपितादेवव्रतलब ॥ ८६ ॥ अष्ट भनेवभिर्भ म.शक्तिचिच्छेदगत्रिभिः। उत्कृष्टहमाविकृतांनिकृतनशितै शरैः ॥८७ उच्चुकशुम्मनःसर्वेतायकाभरतपभ । शक्तिपिनिहतांदृष्ट्वावैराटि क्रोधमूच्छितः ।। ८८ ॥ कालोपत्तचेतास्तकर्तव्यंनाभ्यजानताक्रोधसछितारामनवैराटि प्रहसनिय ॥ ८९ ॥ गांजन हसहयोभीष्मस्यनिधनप्रति । क्रोधेनरक्तगयनोदंडपाणिरिवत्तिकः ॥ १० ॥ भीष्मसमभिदुद्राबजल घइवपर्वतम् । तस्यगमसवार्यमत्वामी मःप्रतावान् ।। ९१ ॥ प्रहाराचप्रमोक्षार्थसह साधरणांगतः । शेत क्रोधसमावष्टाभ्रामीयत्यानुतांगदां ॥ २२ ॥ हुई जानकर करने के योग्य कर्म को नहीं जाना, फिर क्रोधयुक्त और प्रसन्नाः शेतने भीष्मजी के मारनेके लिये गदाको हाथ में लिया, और क्रोधसे अत्यन्त रक्त नेत्र दूसरे काल के समान भीमनी के ऊपर ऐसा दौड़ा जैसे कि बादल पर्वतपर दौड़ता है, मभाव के जानने वाले भीष्मनी उसके वेगको नरोकने के योग्य मान कर अपने बचाव के लिये शीघही पृमीपर उतरपड़े, क्रोधके आधीनहोकर श्वेत ने अपनी उसगदा को घुमाकर भीमजी के रथ पर ऐसा फेंका जैसे कि धनेश कुबेर अपनी गदाको फेंकताहै, उसमयानक घात करनेवाली गदाने घोड़ोंसमेन रथ सारथी और ध्वजाको भरमकर दिया फिर महारथी भीष्मनी को रथ से विहीनदेखकर रथियोंमें श्रेष्ठ शल्य आदिक महारथी एकसाथ दौड़े तदनन्तर महादुःखी भीप्मनी दूसरेरथमें बैठकर धनुपको टंकारकर हॅसतेहुए धीरे से श्वेतके निकटमाये । ९० । इसी अन्तरमें भीष्मनी ने आकाश से उत्पन्न वा अपना भला करनेवाली इस दिव्य वाणी को मुनाकि हे भीप्न हेमहाबाहु इसके विजयकरने में शीच उपाय कर यह ममय ईश्वर m.of his spear, did not knor what to do. Then the enrnged Shwet cyes rilieerful face, touk'up his mace to destroy Bhishm and with a cloud ru anger rushed upon him like a second Death or liko knowing his 7.over a hill. Kínowing the fury of the onset and cl fiom his chariJsbility to bear the attack, Blushım at once alightof Bhistım as kuvat Shuct in anger liurled his mace at the chariot ful destructivo inace destitd of wealth hurls lus own. That' dread his chariot, Shalya and other greate lorses and banner. Secing in the chariot togother sith the driver, ontent warrior Bhishm deprived of with a licury heart, mounted upon atic rriors rushed at once. Bhishm, Los nppronched Shiset with n smuling face or cliariot and tsangir 90. In the meantime, his Khislı lierru froun the sky these celestia) world of great benefit to triin:-- ""Bhislim of great ai nisi malo linste to conque him. This is (४५११) भीमपर्य Bhishma Pary [45111 स्येभीमविक्षपययादेवोधनेश्वरः । तयामीमनिपातिन्यासारथोभस्मसातः ॥ ९३॥ सध्वजासहसूनेनसाइच-सयुगबंधुरः यरधनांश्रेष्ठं भी मयारपोरगाः ॥ १४ ॥ भभ्यघाचतसहिताशश्यप्रभृतयारधाः । ततोन्यरथमास्थायधनुर्चिस्फार्य दुर्गनाः ॥ ९५॥ शनकरभ्यपारछयेतंगगिय महसानय । एतस्मिनंतरेमीमाशुश्रापविगुलांगरम ॥ ९६ ॥ माकांशादीरांदिव्याममनोहतसंभवाम् भीष्मीमहायाहोशीघ्रयांकुरुप्य ९७॥ एपद्यस्यजयकारोनिर्दिष्प्रोविश्वयोनिना । एतच्छत्यातुथचनंदेचदूतनमायतम् ॥ ९ ॥ संप्रहष्टमनाभूत्वावधेतस्थमनोदघे । घिरथरथिनांश्रयं श्वेतदृष्ट्वापदातिनम् ॥ साहितास्यश्यवतपरीसंतोमहारपा। सात्यक्रिीमसेनश्चधृष्टद्युम्नश्चमार्पतः ॥१०॥ से कहाहुआहै, देवदूत के कहेहुए भाकाशसे उस वचन को सुनकर प्रत्यन्त मसन्नचित्त हो भीम जी ने उसके मारने में मनको लगाया, सात्विकी भीमसेन पार्पतकापोता धृष्टद्युम्न केकय धृष्टकेतु पराक्रमी अभिमन्यु यहसव महारथी उसरथियोंमें श्रेष्ठ वेतको स्थसे विहीन देख कर एकसाथ ही चारोंओरको देखतहुए लौटे उनको चारों ओर से प्रात हुये देखकर बड़े बुद्धिमान भीप्मनी ने द्रोणाचार्य शल्य और कृपा चार्यको साथ लेकर उनको ऐमे रोका जैसे कि वायु के वेगोंको पर्वतरोके, महात्मा पाण्डव और सबकेरुकजानेपर श्वेतने खड्गको बैंचकर मीप्मके धनुषको काटा, फिर.शीघ्रता करने वाले पितामहने उस टूटे हुए धनुपको छोडकर और देव दूत के वचनको याद करके उसके मारने में मनको मत किया, इसके पीछे भाप के पिता महारथी शीघ्रता करनेवाले देवव्रत भीष्मने दूसरे धनुपको लेकर उस इन्द्रायुध के समान प्रकाशित धनुष को क्षणमात्र मेंही तैयारकिया । ९९ । फिर हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ फिर आपके पिता भीमनी उन भीमसेन आदि पुरुषोत्तमों से चाहाहुआ उस महारथी श्वेतको देखकर उसके मारने में प्रवृत्तहुए, इस के पीछे the time fixed by God." Having hesid the word of the divine wesseniger from the sky, Bhishm, with a mind full of cheer, sot his heart. on killing Sbwet. In the meantime, seeing Shwet destitute of cliariot, Sakwiki, Bhimsen, Dhrishtadyumna the grandson of Parshat, Kakays, Dhrishtaketu and valiant Abhimanyu ran at once to his holp. But wise Bhishm, then he gave them coming, checked their advance with the help of Dronacharya, Shalya and Kripacliarya, as a mountain resists the fury of the rinds. When the l'andavas were thus checked in their advance, Shwet drew forth luis sword and cut "into pieces the bow of Bhishm. The grandfather left the brol en los and remembering the words of the celestial messenger, set his heart on killing him. After this, your valiant father, Derebrat Bhishm, took up another bow and prepared it in an instant like the weapon of Indra. 39. Then, O best of Bharats seeing that Shwet was protected by Bhini and other parriors, your father prepared to kill him. Seeing.

४ ५ [4312] Malabliaint (१५१२। कैकेयोधृष्टकेतुश्चअभिमन्युधवीर्यवान् । एतामापतत सर्घान्द्रोणशल्पकृपैःसह ॥ ११॥ सवारयदीपात्मावारिवेगानिवाचलः । सनिरुघुसर्चपुपांडवेपुमहात्मसु ॥ २ ॥ श्वेतापगमपायभीष्मस्यधनराच्छिनत् । तदपास्ययनशियनंत्यरमाणापितामहः ॥३॥ देवदतयच श्रुत्वावधेतस्य मनोदः । ततःपचरमाणस्तापतादेवनतस्तय ॥ मन्यत् फार्मुभमादाययायरमाण महारयः । क्षणेनसस्यमकरोच्छकचापसमप्रभम् । पितातभरतश्रेष्ठश्वेतंहवामहारथैः । वृतंर्तमनुजव्याप्रेभीमसेनपुरोगमैः॥ ६॥ अश्पपर्त तगांगेय तसनापतितम् । मापततंततोभीमोभीमसेनप्रतापवान् ॥ ७ ॥ माजधि. शिरःपल्यासेनान्यसमहारथः । अभिमन्युचसारे पितादेवनतस्तय॥ ८॥आज भरत श्रेष्ठस्त्रिमिसन्नतपर्वभिः । सात्यकिंचशतेनाजौभरतानांपितामहः ॥९॥ धृष्टद्युम्नंच मतापवान् महारथी भीमसेनने उस बहते हुए सेनापति भीप्मको देखकर साठवाणों से घायल किया फिर तो आपके पिता देवव्रत नेभी युद्धके वीचमें अपने घोरवाणों से अभिमन्यु आदि सबमहारथियोंको रोककर, उसी युदमें. गुप्तग्रन्धीवाले तीन वाणों से श्वेतको घायल किया । १०१। और एकसौ बाणों से सालिकी को और वासबाणों से धृष्टद्युम्नको भौर पांचवाणों से केकय को और बहुतसे वाण समूहोंसे शेप सयराजाओं को घायल करके रोकदिया जव सवरुकगये तब श्वेत के सम्मुखदौड़े तिसपीछे भीप्मनीने मृत्युके समान कठिनता से प्राधर्ष होनेवाले वाण को तरकससे संचकर चढ़ाया, उसब्रह्ममनसे युक्त चजकोभी काटनेवाले वाण को देवता गन्धर्व पिशाच सर्प और राक्षसों ने देसा वह वाण अग्निके समान मका | शित और महावनके समान ज्वलित श्वेतके कवचको काटकर उसकी नाभि में ऐसे समागया जैसे अस्तगतहोता हुआ मूर्य शीघही अपने प्रकाश को लेकर चलाजाताहै। | इस रीतिसे वह वाण खेत के जीवन को लेकरगया हमने इस प्रकारसे युद्ध में उस नरोधम को भीप्मनी के हाथ से मराहुमा पृथ्वीपर गिरताहुआ ऐसादेखा जैसे tho advance of general Blushım, Blum wounded him with sifly But your fatlier Doyabrat checked the advance of Abhimanyu and others with hus arrows and wounded Shwet rrith thrco of his dreadful darts having hudden joints. 103. He cheched and rounded Satwiki with a liundred arross, Dirishtndyuunda viti trenty, Kalaya with fire and all the other kings with numerous lll'lict liv liad thus checked them all, lie rushed upon Shwet and out of his quiver ho put on lus Low an unerring and fatal arrow. The fuls, gandharras, polachas, scipuents and rahshases $20 that Arruby umtal with Brahwastm, fit to piercu vajra itself. That artur, luminons like fire and burning like the great ynjru, piered the ar mour of Slıvet and enten«l liiy narel, and as the setting sun tuke's trita liim his own light, it took away the life out of Slwct. We 81 that last of men killed in the field of battlo 1. Bhishm and fallen arrors. arrons (४५१३) भीष्मपर्य Bhishma Part [43 विशत्या कैकेयचापिपंचभिः । तांश्च पर्वान्महेष्वासान् पितादेवव्रतस्तव॥१०॥धारयिया शरोरैः श्वेतमेवााभदुदुचे । ततः शरैमृत्युसम भारसाधनमुत्तमम् ॥ ११॥ विकृपयल बांनभीष्म समाधमदुरासदम् । ब्रह्मास्त्रेण संयुक्तं तं शरंलोमवाहिनम् ॥ १२॥ ददृशु देवगंधर्वा. पिशाचो रंगराक्षसा । सतस्य कवचंभिस्या हदयचामितौजसः ॥ १३ ॥ लगाम घाणीचाणो महाशतिरिवज्यलम् । अस्तं गच्छन्यधादित्यः प्रभामादायसवरः ॥ १४ ॥ पपंजीवित मादाय श्वेतदेहाजगामह । तंगी मेणारख्यानं तथा यिनिहतंयुधि 1. १५ ॥ प्रातंतगपश्याम गिरे शृंगमिवध्युतम् । सशोचपांडवास्तन क्षत्रियाश्च महारथाः ॥ १६ ॥ प्रहृष्टाश्च सुतास्तुभ्यं कुरववापि सर्वशः । ततो दुःशासनोराजन् श्वेतदृष्ट्यानिपातितम् ॥ १७ ॥ वादन निनदर यतिस्मसमंततः । तस्मिन् हते मण्चासे भीष्मेणाहयाभिना ॥ १८ ॥ प्रापंतमहेष्वासाः शिसाण्ड प्रमुसारथाः । ततो धनजयो राजन् घायश्चापि सर्वशः ॥१९॥ अपहारं शनैश्चनिहतवाहिनीपतो। ततोवहारः सन्यानां तवतेषां च भारत ॥२०॥ तापकानां परेपां च नर्दतांच मुहमुहुः ।। पार्था विमनसोभूत्वा म्यवर्तनमहारथाः । चितयतोवधं घोरं द्वैरथेन परंतपाः ॥ १२१ ॥ झते श्री महाभारते भीमपर्वणि भीमवववणि श्वेताधे अष्टाचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४८॥ पर्चतसे गिरता हुआ शिखरहोता है उस स्थान में पाण्डव आदि जो महारथी धं यह सब उसे देखकर युद्ध करने से बंदहुए और आपके पुत्रों समेत सब कौरव प्रसन्न हुए। तदनन्तर हे राजा दुश्शासन श्वेतको गिराहुआ देखकर, बड़े बड़े वाजोंसे घोर शब्दों को करके चारों ओरको घूमने लगा युद्धमें शोभा पाने वाले भीष्मजी के हाथ से उत्त बड़े धनुषवारी के मरनेपर शिखण्डी आदि रथी अत्यन्त कम्पायमान हुए हे राजा इस सेनापतिके मरनेपर अर्जुन और. श्रीकृष्णजी नेभी सक रीतियों से धीरे धीरे युद्धका विश्राम किया, तदनन्तर आपके पुत्रों के और पांडवों के गर्जने और प्रसन्न होनेपर दोनों सेनाओंका विश्राम हुआ, हे शत्रु सन्तापी धृतराष्ट्र महारथी पाण्डय कौरवों के घोर मरणको शोचते उदास मन होकर स्थित liko n nonntain peek. 116. The Pandavas and other narriors presont thero stopped fighting at the horrible sight to the joy of the Knura. var and your sons. Seeing the fall of Shwet, Dushaun caused a tremendous noise to be made from the musical instuments and tuined round and round Shihhandi and other warriors shook with ſcar « hon that great archer as killed by glorious Bhishm and at the denth of that como mander of tho army Shree Kri lina and Arjun gl adually caused the fighting to cease and the two armies 1otired. your sons and those of the landaras. {The Pandava warrisrs ieturned with heavy hearts, devising the destruction of the Kauravas." 121. inid roars of (७५१४) - [4514] Mahabharat वृतराष्ट उवाच । श्वेते सेना पतौतात सग्रामे निहतपरै । किमकुर्व महेष्वासा पचाला पाडवै सह ॥१॥ सेनापति समवर्य श्वत युधि निपातितम् । तदर्थ यतता चापि परेषा प्रपलाायनाम् ॥ २ ॥ मा प्रोणाति मेवाक्य जय सजय गण्यत प्रत्युपाय चितयत सजना प्रसवतिमे ॥ ३॥ सहारो नुरक्तश्च वृद्ध कुरुपतिस्तदा । पता सदातेन पितु पुत्रेण धीमता ॥ ४ ॥ तस्योद्वेग भयाचापि सश्रित पाडवान् पुरा । सर्वे वलपरित्यज्य दुर्गे सटि यातष्ठात ॥ ५ ॥ पाडयाना प्रतापेन दुगैदेश निवेश्यच । सपत्नान सतत वाघनार्यवृत्ति मनुष्ठित ॥ ६ ॥ आयो सदा तेषां पुरारामा सुदुर्मति । ततो युधिष्ठिरेभक्त कथसजयस् देत ॥ ७ ॥ प्रक्षिप्त समत क्षुद्र पुत्रोमपुरपाधम । युद्ध रोचयेद्रीमो नचाचाप क्यचन ॥ पो नच गाधारी नाह सजयरोचय । न घासुदवा वार्णेयो धर्मराजश्च पाडय अध्याय ॥४१॥ धृतराष्ट्र बोले कि हे तात युद्धपे दूसरों के हाथ से श्वेत सेनापति के मरनेपर पांचालो ने पाडवों के साथ क्या किया, हे सजय युद्धमें गिराये हुए सेनापति श्वेत को ओर उसके लिये उपाय करनेवाले वा अहकार करनेवाले दूसरों कोभी विजय करनेके वचनों को सुनकर मेरा चित्त मसन्न होता है और मानमी पापों कोभी विचारता हुआ मेरामन लज्जा युक्त नही होता है । ३ । हे सजय पाण्डव लोग विराट के घरमें जाके बडे सुख पूर्वक रहेथे उस विराट के दोनों पुत्रों को युद्धमें मरवाडाला इमसे उनको कुछ लज्जाभी आई या नही आई अब हमारे विचार को तुमसत्य सत्यमुनो कि अब महा अनर्थकामूल उत्पन्न हुआ कि इसी श्वेतकेमरने के हेतु पार्थ और भीमसेन महा क्रोध होकर अनेक वीरों को मारकर इस पृथ्वी को धिर से भरदेंगे देखो इस दुर्योधनको हपने गाधारी ने श्रीकृष्णजी ने और कृपा चार्य भीमजी द्रोण,राम, विदुर, न्यास इत्याद अनेक गुरुइष्टमित्रों ने समझाया CHAPIER XI IX • Whint did the l'anchinis ind the Prodhpis do nshed Dhritrash trnof Sanjay ashen Shact the commander of the armies was slain! I like to hear of the fall of Shuet of his allıcs and his proud conquerer I am not ashained of my own mental sins 3 How tere the Pan daras, who li donce talen 1cfuge in the house of hing Vint, effected long tho denth of his two srns within then very night Methinks truly Chave crpuscil ourselves to greater danger, for enraged at the denth of Shiwot Arjun and Bhim wall fill the earth will blood I nyrell, as well as Gondları Shri brıslın Kripachar Bhuishm, (४५१५) भीष्मपर्य Bhisima Pary [4515] नमोमोनार्जुनश्चैव नयमोएरुषर्षभौ। वार्यमाणो मयानित्यं गांधार्याविदुरेपाच ॥१०॥ जामदग्नपेन रामेण प्यासेनच महात्मना । दुर्योधनायुध्यमानो नित्यमेघाहसंजय ॥ १९ ॥ कर्णस्य मतमास्याय सौयलस्यच पापरुत् । दुःशासनस्यच तथा पांडवान्नान्य चिंतयत् ॥ १२ ॥ तस्याहं व्यसन घोरं मन्येप्रारंतु सजय । वेतस्य च पिना शेन भी मस्य विजयेनच ॥ १३ ॥ संक्रुद्धः कृष्णसहितः पार्थः किमकरोधि । अर्जुनाद्ध भयंभूयस्तन्मे तातनशाम्यति ॥ १४ ॥ सहि शूरश्च कौतेयः क्षिप्रकारीघ नंजयः । मन्येशरैः शरीराणि शत्रूणांप्रमधियति । १५ । पंद्रिमिंद्रानुज सममा मेंद्र नाशं वले । अमोघ क्रोध सकल्पं दृष्ट्यावः किमभून्मनः ॥ १६ ॥ तयैव नेद | विच्छ्रो उबलनार्कसमद्यतिः । इन्द्राखायदमेयात्मा प्रपतनसमिर्तिजयः ॥ १७ ॥ धन परन्तु इस निर्बुद्धिने किसीकाभीकहना नहींमाना औरसंवपांडवों केभी मनमें परस्पर स्नेह रखने कीही इच्छाथी तौभी दुर्योधन ने हठकरके इससंग्रामको रचा देखिये भव ईश्वर क्या करता है हे संजय वह पापकर्मी दुय्योधन कर्ण और शकुनि के मन में नियत होकर दुश्शासन का साथी बनके पांडवों की निन्दा करने लगा । १२ । मैं उसका फल उसके घोर दुःसका होना अवश्य वर्तमान देखताहूं खेत के नाश | होने से महा क्रोष रूप होकर अर्जुनने भीप्मनी के विजय करने के हेतु श्रीकृष्णानी से क्या विचार किया अर्जुनही से पुझको बड़ा भयहै हे तात वह मेराभय दूरनहीं होताहै। वह संसारके सवपदार्थोका विजय करने वाला फुन्ती का पुत्र अर्जुन अत्यन्त हस्तलाघव करनेवाला प्रतापी शूर है मैं निश्चय जानता हूं कि वह वाणों से शत्रुओं के शरीरों को मर्दन करेगा । १९ । उस इन्द्रके पुत्र और इन्द्रके छोटे भाईके वरा वर युद्ध में विप्रा के समान क्रोध और संकल्प में सफल वाले अर्जुनको देखकर तुमसब लोगोंका कैसा चित्त होता है, वह शूरवीर वेदज्ञ और प्रतापमें सूर्य और अग्निके.समान इन्द्र के अत्रों का ज्ञाता वड़ा बुद्धिमान युद्ध में कुशल महा विजयी ably, but Duryodhan would not consent to anything but war. Let us see how God disposes. This sinful Duryodhan, O Sanjaya, acted upon the advice of Karan, Shakuni and Dushasan and made enemies of tbe l'agdayas. 12. I fore see that as a result of this hd will come to grif. Arjun and Shiec lirishina will put their heads together to devise sumo plan for killing 1bishm because he has killed Shret. I and very much afruid of Arjun and cannot shahe off this fceling. Kunti's son, Arjun the world conquerer is a warrior of great prosess and dexterity of hand. I believe he will pierce the bodies of his enemies with his sharp arrows. 15. How do all of you feel at the sight of Arjun the son of India and of equal prowess to Vislına the younger brother of Indra That brave man, scholar of the Vědas, glo liko the sun or Ayni, skilful in using the weapons of Indra, very [4510 ] Mahabharat संस्पर्शरूपाणामस्त्राणांच प्रयोजकः । सखड्गाक्षेप हस्तस्तु घोष चक्रमहारथा १en ससंजय महाप्राज्ञो द्रुपदस्यात्मजोवली । धृष्टद्युम्न किनकरोच्छ्ये ते युधिमिपातिते । १९ ॥ पुराचैवापरार्धन पधेनचचमूपतेः । मन्येमनः प्रजज्याल पांडवानाहात्मनाम् २० ॥ तेषां क्रोध चितमस्तु अह.सुचनिशासुच । नशांति मधिगरछामियों घनकृतेनाहि । कथंचाभूनमहायुद्धं सर्वमाचक्ष्व' संजय ॥ २१ ॥ संजय पवावा Pणुराजन् स्थिरोमत्या तयापनयनो महान् । नवदुर्योधने दोष मिममाधातुमर्हसि २१ गतोदकेसेतुषधो या रक्ताहमतिस्तव । संदीभवनेयदपायनननं तथा ॥ २३ ॥ गतपूर्वाहण भूयिष्ठे पस्मिन्नहनि दारुणेः । तावकाना परेषांच पुनयुद्ध मवर्तत ॥ २४ ॥ श्वेततु निहतंदृष्ट्या विराटस्य मूर्ति । कृतवर्मणाच सतिंदृष्ट्या ॥ युद्ध करने को उपस्थिन, जो वह कुन्तीका पुत्र महारथी पत्रके समान स्पर्श वाला अनेकरूप वा मस्त्रोंको शवओं के ऊपर चलाने वाला है, हे संजय उसदुपद के पुत्र बड़े ज्ञानी बलवान धृष्टद्युम्न ने युद्ध में श्वेतके मरनेपर क्या किया, पूर्व समय के अपराधों से और ज्वेतके मारेजाने से मैं मानताहूं कि महात्मा पांडवों का हृदयक्रोध से अग्निरूप होगया । २० । मैं रात्रिदिन उनके कोषों को शोचता हुआ दुर्योधन के कारण शान्ती को नहीं पाताहूं, इसके सिवाय यह बड़ाभारी युद्ध कैसे हुआ हे संजय उस.सवको मुझ से कहो ॥२१॥ संजय वाले हेराजा स्थिर चित्त होकर मुनो कि इसमें आपकाही वड़ा भारी अन्याय है-यहदोप आप को दुय्योधन में लगाना योग्य नहीं है जैसे विना जलके नदी में पुन और आग्नसे जलते हुए घरमें पानी के निमित्त कुएंका खोदना निरर्थक है, उसी प्रकारकी आपकी धुद्धि है, हे भरतवंशी दिन के तीसरे भाग में भीप्मनी के हाथ से श्वेत सेनापति के मरजाने पर, कृतवर्मा के साथ शल्य को नियत देखकर शन्नुकी मेनाको मारने वाला युद्ध में विजयम्पी कीर्ति वाला विराटका पुत्र शंखनाम शीघ्रही ऐसा viso in battle, conquerer of prais, ready to tight, hard to touch like vijra, uses different sints of treapons. Dhrishtadyumna, the s •n of Drunad, do at the death of Shwet! With the former wrongs and the death of Shnet, I Lelieve that the Pandaras must bo enraged like tre 1 Junot find peace of mind and constantly fear for Duryodhan. Tell me ho i this great war is going on. San. Jayi!" 21 "Hear me, ling, attentively,” said Sanjaya, "the main fault lies in you. It is useless to attributo it to Durgodlıon, for your wisdom is az vain As a bridge over a Faterless place or digging a well -when a hou-o 13 on fire. In thu tlure quarter of the day, when Sheet tho conimandar liad been slaiu ly Bluishm, sceing Sinlya stationeel with Kritinran, Shinkh theson of Virat, destroyer of loes and con: querer in Lattle, tras enraged like blazing fire when lilation is pourel What did brave and wise HISATO Bhishim, Pary [ 4517] शल्यमवस्थितम् ॥ २५ ॥ शंस क्रोधात्मजज्वाल हविपाहव्यवाडिय । रूचिस्पा यमहचा शचापोगमाला ॥ २६ ॥ अभ्यधाचीनघासन्चै शल्यमहाधियुधि । महतारणसघन समंतात् परिरक्षित ॥ २७ ॥ सूजन्याण मय वर्ष प्रायाच्छ यरथ प्रति । तमापततसंप्रेक्ष्य मत्तवारण विक्रमम् ॥ २८ ॥ तावकानारथा सप्तसम तात्पर्यवारयन् । 'मद्रराज परीसतो मृत्योर्दष्ट्रांतरगतम् ॥ २९ ॥ वृषद्धलश्चकोस योजयासेनश्च मागघ । तथारुपमरथोर जन्पन शल्यस्यमानित ॥ ३० ॥ विधात विदायावत्यो कांचोजश्च सदाक्षण । वृहक्षमस्यदाय द सैंधवध जयदर ।३१॥ क्रोधम्प होगया जैसे कि हव्य से अग्निकी प्रचण्डता होती है वह बलवान् शंख इन्द्रधनुष के समान बड़े धनुप को टंकारकर मद्रदेश के राजा के मारने की इच्छा से चारों ओरको वड़े रयों से रक्षित होकर सम्मुख दौड़ा । २७ । और बडे वाणों की वर्षा करता हुमा शल्य के रथके समीप आया उस मनवाले धया के समान पराक्रमी शस्त्रको प्राताहुआ देसकर मृत्युके मुख में फंसे हुए राजा मद्रकी रक्षाकरने के लिये तुम्हारे पुत्रों के साथ इन रथियों ने उमको चारों ओर से रोका कौशल हद्दल जयत्सेन मागघ उसी प्रकार शल्यका पुत्र रूखमरथ वि द अनुविन्द और भावन्तिका के राजालोग सुदक्षिण कांगोज हन्छनका पुत्र जयद्रथ सिंधुका राजा इन सब लोगों के धनुष नानामकारकी धातुओं से जटित ऐसे दृष्टि पडे जैसे कि वादनों में बिजली दिसाई देती है, उन वीरों ने वाणरूप वर्षा शंख के मस्तक पर ऐसी की जमे कि वर्पामृतु में वायु से मकट बादल आकाशी जलको बरसाते है, इसके पीछे वडा धनुपधारी सेनापति शंख महाक्रोधित होकर उन लोगों के घनपों को अपने सातभल्लों से काटकर महा बनि से गर्ना, तदनन्तर महाराहु भीप्मनी बादल के समान गर्जते तालरक्ष के समान धनुप को लेकर उसयुद्ध में शव के सम्मुस दोडे, उस वड़ धनुपधारी महारली को उदयरूप देखकर पांडवों की सेना over it, and twanging his lov wluch was like that of ludra, he rushed upon Shalya, accompued with many charioteers, in order to kill him 21 He approached the chariot of Shalya, showering ariows Seong Sbankli cuming like a mul elephant and desiring to roscuc Slınly a from the jaws of death, your sons checked bis advance with the assistance of Ki sala, Trihadva), Jayntsen, Magadh, Rulm rath the son of Shalya, Vind, Anu vind, tho princes of Avanti, Sudahsbin, Camboj, Jayadratių the son of Vrılınchıntra and the hing of Sindhu The bovs of all these Warriors, decked ith various metals, lookod lil o lightwing in the midst of clouds Shey showered ther errons over thio hend of Shankli Then the archie Shanbh, the commander of armies, cutting the bons of all those afarriors with s0Ven of lus darts, roared iz loud roir Then Bhialım of great arnis, (४५१९) भीष्मपर्व Bhishma Parv [43ity रथातर्ण मुत्पततिपतत्रिणः ! यातरिक्षं भूमिश्च सर्वतः समवस्तुना ॥ पंचालानथ मरस्पांच केकयांश्वप्रभद्रकान् । भीष्मः प्रहातांश्रेष्ठः पानयामासपत्रिमिः ॥ ४२ ॥ उत्सृज्यसमरे राजन् पांडव सभ्य समुचनम् । अध्ययतपांचाल्यं द्रुपदमन पावृतम् ॥ १३ ॥ प्रियंसंयविनं राजन् शरानयाकरन्याहुन। अग्निनेयमदग्धानियना निशिशरात्यये ।। ४४ ॥ शरदग्धा-पश्यंत मन्यात द्रुपदस्यह । प्रायतिष्ठद्रणेभी माथि पूमरवपावकः । ४५॥ सध्यादने या दित्य तपतमिवतेजसा। नशेक.पाण्डवेयस्य योधाभीमानरीक्षितुम ॥ ४६ ॥ यक्षिांचक्रुः समंतात्तपांडयाभयपीडिताः । भ्रातारंना ध्यगच्छंतगावःशातार्दिताव ॥ ४७ ॥ सातुयौधिष्ठिरोसना गांगेयशरपीडिता । सिोनेवविनिर्मिनाशुक्लागारवगोपतेः ॥.४८ ॥ हनोवप्रदुसन्ये निरुसाहेविमर्दिते। हाहाकारोमहानासीत् पांडुसैन्येषुभारत ॥ ४२ ॥ ततोमीःशांतनको नित्यंमंडल कामकः । मुमोचयाणान् दीप्तामानहोनाशीचिपानिय ॥ ५० ॥ शौरेकायनीकुर्वन् दिशः सर्वायततः । अथानपांडवरथानादिश्यादिश्यभारत ॥ ५१ ॥ तत.सैन्येषु भग्नेषु की सेना वाणों से भरमहुई दृष्टपड़ी और भीष्मजी अग्निके समान दिखाई दिये, | जैसेकि मध्याहनके समय संतप्त करनेवाले महापचण्ड सूर्य के देखने को लोग अस मर्थ होते हैं उसी प्रकार पांडवों के युद्ध में भीष्मजी के देखने को कोई समर्थ नहीं हुा । ४६ । पांडव लोगों की सेना भयसे पीड़ित होकर चारों ओर को अपना | कोई रक्षक ऐसे नहीं देखती थी जैसेकि जाड़े से दुःखी गोएं अपना कहीं रक्षक नहीं देखती, हे राजा फिर वह युधिष्ठिरकी सेना भीष्मजी के वाणों से ऐसी पाडा मान हुई जैसेकि सिंहसे भयभीत हुई श्वेत गोएं, हे भरतवंशी सेना के मरने भागजाने सहस छोड़ने और मर्दन होनेपर पांडवों की सेना में बड़ा हाहाकार हुआ, फिर सदेव मण्डलरूपी धनुपधारी भाप्मजी ने विपमें बुमेहुये सर्प के समान तक्षिणवाणों को छोड़कर अपने वाणों से सब पोरकी सफाई करके रथियों को तिष्टतिष्ट शब्द करके मारा, जब सेनाके इंधर उधर भागने और मर्दन होने वा मूर्यके अस्त होनेपर dearly loved brother-in-law Drupad ng fire dcez in 'a diy wood in sunimer. Drupad's army seemed consumed by the arrows. of Bhished who looked like fire. No warrior of the Pandasas could look Bhishm in the face like the noonday tun. 46. The army of the Pandaras. shahing with fear, could find no one to protect thein on all sides and was distressed like cows in winter. The army of Yudhish hir tas so distresscil by Bhishm's arrows as cows ale by a lion. With the death,'Ajght, terror and destruct on in the Pondav army there arose a terrible cry of distress. Bhisbm, circling his low and discharging his arrows like poisonou, serpents, destroyed many warriors, saying stay, stay!' At the set of sun nothing was discernible .except des- 145181 Malabharat (४५१८) नानाधातु विचितागि कामपाणि महात्मनाम् । विस्फारिमान्य दृश्यततोयदेविषवि. धुत ॥ ३२॥ तेतुयाणम पर्व शंखमू नियातयन् । निदाघांत निलोड्नामेघा श्यनगेजलम् ॥ ३३ ॥ ततद्धमहे वासः सप्तभल्लै मुझेजने । धनपितप माछ यमन गनापातः ॥ ३४ ॥ ततोभी मोमह बाधिनद्यजलदोयया । तालमात्रधनुगू घशयमभ्यद्रवद्रणे ॥ ३५ ॥ तनुत मदोत्याधमहेन्यात मह बलम् । सनस्तापां डवीसनापातगहतेवनी ॥ ३६ ॥ ततार्जुन सत्याप्तः शंखापासात्पुरतसरः । भीमादस्योयमति ततोयुद्धमवर्तत ॥ ३७ ॥ हाहाकारोमहानासीयोधानायुधियु. ध्यताम् । तेजस्तेज सिम्पृक्तमित्ये विस्मयययु ॥ ३८ ॥ अथशल्योगहरापाण रपतीर्यमहारथात् । शंखस्य चतुराबाहानहनद्भरतपम ॥ ३९ ॥ सहताश्वादशातर्षे सहगमादाय विद्वनः । वीभत्साश्वरथं प्राप्यपुन. शांतिगपिंदत ॥ ४० ॥ ततोमोम - ऐसी भयभीतहुई जैसेकि वायु के वेग से टक्कर खाईहुई नौकाडामाडोल होती है, उसयुद्ध में अर्जुनभी यह शोचकर शख के आगे चलने वाला हुआ कि भव यह भीप्मनी से रक्षा करने के योग्य है युद्ध में लड़ने वाले युद्धकर्ताओं का वड़ा हाहाकार हुआ । ३८ । तदनन्तर गदाधारी शल्य ने बड़े रथसे उतरकर शंखके चारों घोड़ोंको मारा वह मृतक घोड़ों के रथ से शीघ्रही उतरकर खड्ग लेकर दौड़ा और अर्जुन के रथको पाकर फिर शान्त होगया इसके अनन्तर भीमजी के रयते शीघ्रही बाण ऐसे उछलनेलगे जिनसे पृथ्वी और आकाश व्याप्त होगये । ४१ । प्रहार करनेवालों में श्रेष्ठ भीष्मजी ने वाणों से पांचाल, मत्स्य केरल और प्रभद्रक नाम अनेक वीरों को गिराया । ४२ । हे राजा भीप्मनी युद्ध में अर्जुन को छोड़कर सेना समेत बहुत वाणों को फेंफतेहुए अपने प्यारे समधी द्रुपद के सम्ख एसे दौड़े जैसेकि चैत्र वैशाख के महीने में वनका जलाने चाला अग्नि दौड़ता है द्रुपद thundering like clouds, rusled upon Shankh with his bow like the palm tree Secins the greit archer como forth, the Pandava army shook with fear liko n bort in a storm of sind. Arjun came betwen Shnuhli and Blirsium to protect the former from the latter, and the warriors sluited loudly 98. Then Shalyn the Learer of mace, corving down froun lus huge chariot, hilled the four horses of Shankle churot Shankli juuraped, şuord in liand, froin lus liorseless diarinto and found nhelies in Arjnn's chariot Theti there come out a slioner of arruns from the chariot of Bhishi, covering the leaven and carth 11. Bhislain the best of warrio s hillal with his arrons mins a entliko inun of l'ancun), Matsyn, hard and I'raladrak armies. **. Bhushai, accompaned by lits army, luft Arjan and rusliced upon his भीमपर्य Bhishna Pary 143il) रधात्तूर्ण मुत्पततिगतत्रिण: । यतिरिक्षं भूमिश्च सर्वतः समवस्तृना ॥ पंचालान मरस्पांच केकयांश्चप्रभद्रकान् । भीष्मः प्रहातांश्रेष्ठः पानयामासपत्रिमिः ॥ ४२ ॥ उत्सृज्यसमरे राजन् पांडवसभ्य साचनम् । अस्यद्वतपांचाल्यं द्रुपदंसन पावृतम् ॥ ४३ ॥ प्रियंसंबंधिनं राजन् शरानवाकरन्याहून। अग्निनेवादग्धानिधना निशिशरात्यये ॥ ४४ ॥ शरदग्धान्पदृश्यंत मैन्यानदुपदस्यह । गायतिष्ठद्रणेभी माथि पूमइयपायकः ॥ ४५ ॥ मध्यादने या दित्यं तपतमिवतेजसा । नशेक पाण्डवेयस्य योधाभीमानरीक्षितुम् ॥ ४६॥ चीक्षांचक्रुः समंतात्तेपांडवाभयपीडिताः । भ्रातारंना पगच्छंतगायःशातादिताइव ॥ ४७ ॥ सातुयौधि छरीसेना गांगेयशरपीडिता । सिनेविभिन्नाशुषलागारियगोपतेः ॥४८॥ हतोच प्रदुसन्ये निरुत्साविमर्दिते । हाहाकारोमहानासीत् पांडुसैन्येषुभारत ॥ ४९ ॥ ततोभीमाशांतनो नित्यंमंडल कामकः । मुमोचयाणान् दीप्तामानहीनाशीविषानिय ॥ ५० ॥ शरीफायनीकुर्वन दिशः सोयतमतः । जयानपांडवाथानादियादिश्यभारत ॥ ५१ ॥ तत सायेषु मग्नेषु की सेना वाणों से भस्महुई दृष्टपड़ी और भीप्यमी अग्निके समान दिखाई दिये, | जैसेकि मध्याह्नके समय संतप्त करनेवाले महाप्रचण्ड सूर्य के देखने को लोग अप्स मर्थ होते हैं उसी प्रकार पांडवों के युद्ध में भीष्मजी के देखने को कोई समर्थ नहीं हुा । ४६ । पांडव लोगों की सेना भयसे पीड़ित होकर चारों ओर को अपना | कोई रक्षक ऐसे नहीं देखती थी जैसेकि जाड़े से दुःखी गोएं अपना कहीं रक्षक नहीं देखती, हे राजा फिर वह युधिष्ठिरकी सेना भीप्पजी के वाणों से ऐसी पीड़ा मान हुई जैसेकि तिहसे भयभीत हुई श्वेत गोएं, हे भरतवंशी सेना के मरने भागजाने साहस छोड़ने और मर्दन होनेपर पांडवों की सेना में बड़ा हाहाकार हुआ, फिर सदेव मण्डलरूपी धनुपधारी भीमजी ने विपमें वुमेहुये सर्प के समान तक्षिणवाणों को छोड़कर अपने पाणों से सब पोरकी सफाई करके रथियों को तिष्ठतिष्ट शब्द करके मारा, नव सेनाके इधर उधर भागने और मर्दन होने वा मूर्यके अस्त होनेपर dearly loved brother-in-law Drupad ng fire does in a diy wood in Bummer. Drupal's army scemed consumed by the arrows of Bhishra who looked like fire. No warrior of the Pandavas could look Bhishm in the face like the noonday run. 46. The n my of the Pandavas, shahing with fear, could find no one to protect thom on all sides and was distressed like cows in winter. The army of Yudhishihir tas so distressed by Bhislim's arrows as cows Aic by a lion. Fith the death.fljglit, icrror and destruction in the Pondav army there arose & tcrrillo cry of distress. Bhishim, circling lis Low and discharging liy arrows liko poisonous sou pents, destroyed niany warriors, saying stay, stnyl' At tho set of sun nothing was discci nible.crccpt des.

. 43201 Mahabharat मधितेपुच सर्वशः । प्राप्तंचास्त दिनकरनेमाहायताकंचन ॥ ५२ ॥ भीमंचसमुदीर्य त दृष्ट्या पाहाहो । अवहारममुर्वत सन्यानांभरतर्षभ ॥ ५३ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि.भीष्मपर्वणि शेडयुद्धे प्रथमदिवसःवहारे एकोनचत्वारिंशोऽध्याय ॥ ४१ ॥ सजय उवाच । कृतेऽवहारसैन्यानां प्रथमेभरतर्षभ । भीमेचयुद्धसंरधेरैदुयाँ धनेतथा ॥ १ ॥ धर्मराजस्ततस्तूर्णमभिगम्य जनार्दन : भ्रातृभि साईत सधैं सर्प चैध जनेश्वरः ।। २॥ श्रृंवारमयायुक्रश्चियानः पराजयम् । वार्णेयमवद्रिाजन्दृष्ट्या भीमस्य विक्रमम् ॥ ३ ॥ कृष्ण पश्य मोवासं भीमं भीमपराक्रमम्'शाद। हतंसन्यं मे भीष्मेकक्षमिवानलम् ॥ ४ ॥ कायमेन महात्मानं शश्यामः प्रतिवीति तुम । ले लयमानं सन्यं मे हावामन्त मिचानलम् ॥५॥ एतं हि पुरुषव्याघ्र धनु मन्त मह यलम् । दृष्ट्या विद्रुतं सैन्यं समरे • मार्गणाहतम् ॥ ६॥ शक्यो जतयमः कुछ नहीं जाना गया तबतो पांडवों ने उस महायुद्ध में भीमजीको भाग्न बरसाता हुआ देसकर सेनाका विश्राम किया ५३ ॥ अध्याय ॥ ५० ॥ संजय बोले हे भरत वंशियों में श्रेष्ठ उस प्रथम दिन में सेना के मनुष्यों के विश्राम करने और युद्ध में भीष्मजी के क्रोध रूप होने अथवा.दुर्योधन के मसन्न होने पर, धर्मराज ने सब भाइयों और राजाओं समेत जनाईनजी के पास जाकर बड़े शोक युक्त होकर अपनी परजय को शोच भीमजी के पराक्रमको देख कर श्रीकृष्णानी से कहा । ३१ कि हे श्रीकृष्ण जी इमबड़े धनुषधारी भयानक पराक्रमी भीमजी को देंसिये कि यह वाणों के मारे मेरी सेना को ऐमे भस्म किये डालते हैं जिसे कि ऊप्ममृतु में अग्नि वन और वन की मूखी घास को, हव्य भोजन करने वाले भाग्न के समान मेरी सेना को चाटने वाले इम महात्मा की ओर देखने को भी हम कैसे समर्थ होसक्ते हैं, इसी धनुपधारी महावली पुरुषोत्तम को देखकर वाणों से महाव्याकुल हमारी सब सेना इकर उबर को भाग गई, युदमें क्रोधाग्नि fruction a'r and Pre nuk vas stul sccing risim slioserving the his fiery arrows, orderod their armios to ietire. CHAPTER L Sınjaya contul, "After the retreat of his army from before tho cnrnged Bhishm and cheerful Duryodnan, Yudluslithir tho just went with Is brothers and hings to Janardan, and fearing deſist by tho prosess of Barım, ko saul to krasia. “Look at that dreadful nrcher Bliishnu With his nrrons lie con nines my arms as fire does a dry ſorust in summer., flow can we face that great man lia cort. HumC4 our armies as fire docs thc Jibations. Our seldiers run away at the sight of tlnt great warrior. We inny conquer angry Inmmi. 49.

(४५२१) भीमपर्व Bhishma Pary [4521 ऋद्धोवनपाणिश्वसंयुगे । घरुणापाशभृद्वापि वेरोवागदाधरः ॥ ७ ॥ नतुभीमो महातेजाः शक्योजेतुंमहाबलः । सोहमेघगतेमग्नो भीष्मागाधजलेऽप्लवे ॥८॥ आत्मनो बुद्धिदाबल्यानीप्ममासाद्यकेशव । धनंयास्यामि वाणयश्रेयोमे तत्रजीयितुम् ॥९॥ नत्वतान् पृथिवी पालान् दातुंभीष्मायमृत्यवे । क्षपयिष्यतिसेनामे काणभीग्मोमहास्त्र चित् ॥ १० ॥ यथाऽनलंप्रज्वलितंपतंगा समभिदुताः । विनाशायोपगच्छंति तामे सीनकोजनः ॥ ११ ॥ क्षयनीतीस्मिवाणय राज्यहतो पराक्रमी । भ्रातरश्चैयमेवीराः कर्शिता शरपीडिताः ॥ १२ ॥ मक्कतेमातृहार्दनराज्याद्मशास्तथा मुखात् । जीवित बहुमग्येहर्जीवितह्या दुर्लभम् ॥ १३ ॥ जीवितस्यच शेपेण तपस्तयामि दुम्वरम् । नघात यिष्यामि रणे मिनाणीमतिकेशव ॥ १४ ॥ रथान में पहुंसाहनान् दिपेरने रूप यमराज वा वज्रधारी इन्द्र वा पाशधारी वरुणं या गदाधारी कुचेरको भी चाहैं विनय करना संभव है परन्तु महावाहु अति पराक्रमी भीष्मजी को विजय करना असंभव है । ७ । सो मैं ऐसी दशा में भीमरूपी अथाह जलमें बिना नौका के हूवा जाता हूं, हे श्रीकृष्णजी मैं अपनी बुद्धिकी निर्वलतासे भीप्मनी के सम्मुख होकर वनको चला जाऊंगा अथवा हे वृष्णिवंशी मेरे जीवन में कल्याण नहीं है, परन्तु इन राजाओं को भीष्मरूपी मृत्यु के वश करने को मैं योग्य नहीं हूं, हे श्री कृष्णजी महाबली भीमनी मेरी सेनाको नाश करडालेंगे जैसे कि पतंग ज्वलित अग्निकी ओर दौड़ते हुए अपने नाशके निमिच जाते हैं इसी प्रकार मेरी सेनाके मनुष्य भीष्मनी की ओर को जाने वाले हैं। ११ । राज के निमित्त मैं पराक्रम करने वाला नाश होता हूं और मेरे वीरभाई लोगभी बाणों से पीड़ित होकर महा दुर्वलांग हैं, वह मेरे कारण अथवा भाई विरादरी की शुभचिन्तकता के कारण अपने राज्य मुखों को त्यागने वालेहुए मैं जीवनको बहुत मानता हूं अव जीवनहोना कठिन मालूम होता है, शेप जीवन से तपस्या करूंगा हे केशवनी मैं युद्ध में इन मित्रों को Indra che wielder of Vajra, Varun the bearer of moose or Kuver tho violder of mace; but to conquer braver Bhishin is impossible, I am about to be diowned in the bottomless ocean of Bhishm for want of a boat. Being unable to vithstand Bhishm, I shall go away to live in forest; for I sco no good in living here, Krishn! I donot liko those kings to be slaughtered by hislim warrior, Bhishm will destroy my army. My men run into the jaws of.death by going tofore Bhishm, like insects falling into fire 1]. I shall die fighting for the sako of kingdom and my brave brothers aro getting wscaker in bo ly with the sounds of the arrows They have forsaken all plcasure for my sake and for tho good of the lins. men. It appears that I shall lose the life which I hold so dear. I intend practising penance during tho rest of my life and shall no longto give up The great २० [4522 ] Malia bharat (४५२२) महायलः । घातयत्यनिशं भीष्मः प्रवराणांप्रहारेणाम् ॥ १५ ॥ किंनुक वाहितमे स्थावहि माधव माचिरम् । मध्यस्थ मिवपश्यामि समरे सव्य सााचनम् ॥ १६ ॥ एकोभीमः परंशक्त्या युध्यत्येव महाभुजः । कंचलं वासुदीर्येमा क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥ १७ ॥ गद्याचीर घातिन्यायथोत्साहं महामनाः । करोत्यसुकर कर्म रथाश्वनरदं तिषु ॥ १८ ॥ नालमेष क्षयंकर्तुं परसैन्यस्यमाहिप । आर्जवेनैव युद्धेनं धारयर्प शतैरपि ॥ १९ ॥ एकोऽनधित्सखातेऽयं सोप्यस्मान् समपेक्षते । निर्दह्यमानान भीमेण द्रोणेनच महात्मना ॥ ॥ दिव्यान्यस्त्राणि भीमस्य द्रोणस्य च महात्मनः । घक्ष्यति क्षत्रियान् सीन् प्रयुक्तानि पुन.पुनः ॥ २१ ॥ कृष्ण भीष्मः सुसरधः सहितः सर्प पार्थिवैः । क्षपयिष्यातनोनूनं यादृशोस्यपराक्रमः ॥ २२ ॥ सत्यं पश्य महाभाग योगेश्वरमहारथम् । भर्मियः शमयेत्संख्षे दावामि जलदो नहीं मरवाऊंगा, महावली भीष्मजी अपने दिव्य अस्त्रों से मेरेहजारों उत्तम शूरवीर रथियों को वरावर मारते हैं। १५ । सो भाप शीघ्रता से कृपाकरके बतलाइये कि कैसे मेरा कल्याणहो मैं इस युद्ध में अर्जुनकोभी उदासीनके समान देखता हूं, यह महावाहु अकेला भीमसेन क्षत्री धर्म को स्मरण करता केवल भुजा द्वारा बड़ी सा- मर्थ्य से लड़ता है, यह बड़ा साहसी अपने साहस के अनुसार वीरोंकी मारने वाली गंदास स्थघोड़े हाथी और मनुष्यों के मध्य में कठिन कर्मको करता है, हे श्रेष्ठ वह वीर सत्ययुद्ध के द्वारा वर्षामें भी शत्रुकी सेना के नाशकरने को समर्थ नहीं है, यह आपका एक मित्र (अर्जुन) अस्त्रों का जाननेवालाहै वहभी महात्मा द्रोणाचार्य और | भीमजी के हाथ से वरावर भस्मीभूतहोताहुआ देखकर हमलोगोंको कुछनहीं समझ ता है । २० । महात्माभीष्मजी और द्रोणाचार्य के बारम्बार चलायेहुये दिव्यास्त्र सव क्षरियोंको जलाते हैं, हे कृपणजी निश्चयकर के क्रोधरूप भीमजी सब राजाओं समेत हमको मारेंगे ऐसा इनका पराक्रम है, हे योगेश्वर तुम उसमहाभाग महारथीकोदेखो और विचारो जो युद्ध में भीष्मजीको ऐसे शान्त करे जैसे बादल er cause the destruction of my friend in battle. Brave Blishm is killing thousands of my warriors with his celestial weapons. 15. Pray let me know without delay in what lies my welfare. This brave Bhimsen alone is firm on his duty and fights very diligently. Ho performs vory hard task with his warrior destroying mace in the midst of chariots, clephants, horses and men; but by his own bravery alone lic cannot even in course of years, destroy all the ni nies of the enemy. Your friend Arjun alone knows how to uso weapons, he does not care in the least to save us from being destroyed by great Dronacharya and Bhishm. 20. The celestial weapons of Dror nacharya and Bloislın burn all the warriors ngnin and again; the enrayed Bhislım will surely destroy us along with all the hings lig his matchless provess. You Lord of yog! knoir tho marrior who man but (४५२३) भीमप Bhishma Pary [4523] यथा ॥ २३ ॥ तयप्रसादाद्गोबिंद पांडया निहतद्विपः । स्वराज्य मनुसंप्राप्तामो- दिप्यने सबांधवाः ॥ २४ ॥ एचमुचा ततः पार्थो ध्यायनास्ते महामनाः चिरमंतर्म माभूत्वा शोकोपहतचेतनः । शोकार्तितमधोशात्वा दुःखोपहतचेतसम् ॥ २५ ॥ मन्त्र चीत्तत्रगोविंदो हर्पयन् सर्व पांडवान् । माशुचोभरत श्रेष्ठ नत्वं शोचितुमर्हति महा पस्यते भ्रातरःशूराः सर्वलोकेषु घन्धिनः । अहंचप्रियकृद्राजन् सात्यकिश्च महायशाः ॥ २७ ॥ विरारटुगदौरेमो धृष्टद्युम्नच पार्पतः । तथैव सवलाश्चमे राजानो राज सत्तम ॥ २८ ॥ त्वत्प्रसादं प्रतीक्षते त्वङ्गताच विशांपते । एपते पार्वतो नित्यं हित काम.प्रियेस्तः ॥ २९ ॥ सैनापत्य मनुपातो घृष्टयानो महाबलः । शिखंडांच महाबाहो भीष्मस्य निधनं किल ॥ ३० ॥ एतच्छुत्वा ततो धर्मो धृष्टद्युम्नमहारयम् । अब्रवीत्समितीतस्यां वासुदेवस्यशष्यतः ॥ ३१ । धृष्टद्युम्ननिवोदयायांवक्ष्यामि दावानल अग्नि को, हे गोविन्दजी आपकी कृपासे पांडव शत्रुओंको नाशकर के अपने राज्य से मिलहुए पांचवों समेन आनन्द करेंगे, तदनन्तर बड़ा साहसी युधि- टिर इस प्रकारकी बातें कहकर शोक से पीड़ित विच देस्तक मनको हृदय में नियत करके ध्यान करता हुआ बैठा । २५ ! फिर गोविन्दजी पांडवों को दुःख शोक से पीड़ित और उदास रूप देखकर सब पांडवों को प्रसन्न करते हुये यह वचन बोले, हे भरतवंशियों में उत्तम तू शोच मतकर और तू शोच करनेके योग्य नहीं है क्योंकि तेरेभाई तो महा शूरवीर हैं और वह सब संसार में विख्यात हैं, हे राजा धर्म मैं और महारथीं सात्विकी विराद् द्रुपद और धृष्टद्युम्न आपके मनोरथ पूर्ण करनेवाले हैं, हे राजेन्द्र युधिष्ठिर इसी प्रकार सब राजा लोगभी अपनी २ सेना समेन तेरी प्रसन्नता कीही वाटदेखते हैं और आपके परमभक्त हैं। २९ सदैव भल ई चाहनेवाले मापके प्यारे प्रीतिमान महारथी धृष्टद्युम्न ने सेनाध्यती के अधिकारको पाया, निश्चयकरके यह महाबाहु शिखण्डी भीष्मका नाशकरनेवाला (है राजा अधिष्ठिर यह कृष्णके वचन को सुनकर उसी सभा में वासुदेवजी के subdue Bhishni in Lattle as rain does the flames of a forest. By your gracc, Govind, the Pandavas can destroy their enemies and enjoy their kingdono rith their kinsmen." Haring said this, Yudhishthir of great prosess, distressed with grief, meditated a long while in silence. 2. Seeing the Pandavas full of distress and sorrow, Govind said, "Donot bogriered, best of the descendants of Bharat! Baviny such brave brothers of world wide renovn you need not be anxious for your victory. You have, king, on your side Dharm, myself, brave Satviki, Virat, Drupad and Dhrishtadyumna. The other kings, likewise, are solitous to please you, Prince Yudhishthir! 29. Your over well wisher and dear friend Dhrislıtadyumina is the com. mander of your armies! Surely, bravc Shihlandi is the destroyer of Bhishmi!'' Having heard these words of Shree Krishna, Yudhish- । .

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[45241 Mahabharat- (४५२४) मारिप । नातिक्रम्यं भवेत्तच्च वचनं ममभापितम् ॥ ३२ ॥ भवानसेनापतिमा घासुदेवेग संमितः । कार्तिकेयो यथा नित्यं देशनाम भवत्पुरा ॥ ३३ ॥ तथास्वम पिपाडूना सेनानीः पुरुषर्षभ । सत्यपुरुषशार्दूल विक्रम्य जाहे कौरवान् ॥ ३४ ॥ अहंच तेनुयास्यामि भीमः कृष्णश्चमारिप । माद्रीपुत्रौच साहतो द्रौपदेयाश्चदंशिताः ॥ ३५ ॥ येचान्ये पृथिवीपालाः प्रधानाः पुरुषर्पभ 1 ततउर्पयन् सर्वान् धृष्टद्युम्नोस्य मापत ॥ ३६ ॥ अहद्रोणांतक:पार्थ विहित. शंभुनापुरा । रणे भीष्मंकप द्रोणं तथा शल्यं जयद्रथम् ॥ ३७ । सर्वानधरणे दृप्तान प्रतियोत्स्यामि पार्थिव । अधोत्क्रुष्टं महेन्नासः पांडवैर्युद्धदुर्मदैः ॥ ३८ ॥ समुधनपार्थिवेंद्रे पार्यतेशत्रुसूदने । तमनवी त्ततःपार्थः पार्पत पृतनापतिम् ॥ ३९ ॥ व्यूहःक्रौंचारुणोनाम सर्वशर निवईण । आगे धृष्टद्युम्न से बोला कि हे धृष्टद्युम्न जो मैं आपसे कहताहूं उसको अच्छी रीति से समझो वह मेरा वचन उल्लंघन करने के योग्य नहीं है आप वासुदेवजी के विचार से मेरी सेना के सेनापतिहो, पूर्वसमय में जैसे कार्तिकेय देवताओं की सेना के सेनापति हुये इसी प्रकार से प्राप पांडवों के सेनापतिहो हे पुरुषोत्तम तुम अपने पराक्रमको करके कौरवों को पारो और बडभागी मैं व भीमसेन और श्रीकृष्णजी तेरेपीछे चलेंगे एक साथ दोनों नकुल और सहदेव और द्रौपदी के शस्त्रधारी पुत्र और अन्य सब राजा लोगभी तुम्हारे साथ पीछे चलेंगे । ३६ । यह सुनकर धृष्ट द्युम्न सवको प्रसन्नकरके बोला कि हे राजा पहले समय में शिवजीकी ओर से मैं द्रोणाचार्य के नाश करनेवाला नियत हुआ था इसी हेतु से हे राजा अब मैं इस युद्ध में भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, शल्य और जयद्रथ आदि सव अहंकारियों से अवश्य लडूंगा तदनन्तर शत्रुसंतापी धृष्टद्युम्न के अच्छी रीतिसे सन्नद्ध होनेपर युद्ध में आकर महादुर्मद और धनुपधारी पांडवों ने उच्चस्वर से शब्द किया. फिर युधिष्ठिर ने सेनापति धृष्टद्युम्न से कहा कि सब शत्रुओं का नाश करनेवाला thur said to Dhuishtadyumna in the midst of that assembly and in the presence of Vasudev — "Hear Dhrehtadyumna what I say to you and attend to it crrefully without fail You are the commander in-chief of my armies as Vasudev says:-You are the commander of the Pandavas, armies as Karlikeya was of those of gods. Kill the Kauravas with your proses and I as well as Bhimsen and Krishna will follow you along with Nahul and Sabades, the brave sons of Draupadi and other hinys' On hearing this, Dhrishtadyumna pleased the audience by the following reply -"I am born, o king: srid ho, “to destroy Drona by the order of Shiva, and thereforo, I shall faco Bhishma, Drona, Kripa, Shalya, Jagadrath and other proud warriors in the field of battle." When Dhrishtadyumna had made his proprntions, he stood in the field of battle and the bravo Panduay runed a loud war cry. And Yudhishtinr thus addressed 36 . भीष्मपर्व Bhishma Pary [4525) यवृहस्पतिरिंद्रायतदा देवासुरेब्रवीत् ॥ ४० ॥ तंयथावत्प्रतिब्यूई परागीकविनाशनम् । अपूर्वराजानः पदयातुकरुभिः सह ॥ ४१ ॥ पयोक्ता सन्दयत विष्णुर्वमभृता यया । प्रभावे सर्व सैन्यानामग्रे चक्रे घनंजयम् ॥ ४२ ॥ यादिव्यपया केतुस्ताया तमनोरमः । शासनात्पुरुहूतस्यानर्मितो विश्वकर्मणा ॥ ४३ ॥ इंद्रायुधसवणाभिः पताकामिरलंकृतः। याफाशगयाकाशे गंधर्व नगरोपम. ॥ ४४ ॥ नृत्यमानइवामा तिरपच मारिप । तेनरत पतापार्थः सधगांडीच धन्वना ॥ ४५ ॥ चभूधपामो पेतः सुसरिच भानुना । शिर्पद्रुपदो राजा महत्या सेनया वृतः । ४६ ॥ कृति भोजश्व चैधश्च चक्षुप्तीजनेश्वरी दाशार्णका प्रमदाश्च दाशरकगणैः सह ॥ ४७॥ अनुपकाः किराताय ग्रीवायां भरतर्षभ । पटचरैश्च पाश्च राजन पौरवकस्तथा ।.४८n क्रौंचारुण नाम व्यूह जिसको देव दानवों के युद्ध में दृहस्पति जीने देवेन्द्र से कहा था उसी शत्रुहन्ता व्यूहको आप विधि के अनुसाररचो । ४१ । उस अपूर्व व्यूहको | राजाओं समेत कौरख लोग देखें धृष्टद्युम्न से राजा धर्मराज ने इस प्रकार से यह वचन कहा जैसे कि वधारी इन्द्रने विष्णुजी से कहाया, प्रातःकाल के होतेही सब सेना के आगे अर्जुनको किया उससमय प्रकाशित और मनको प्रसन्न करने वाली अपूर्व ध्वजा सूर्य के मार्ग में वर्तमान थी उस बजा को इन्द्रकी आज्ञा से विश्वकर्मा ने बनाया इन्द्र वजूके समान पताकाओं से अलंकृत, आकाश में गन्धर्व नगर के समान नियत थी हे राजा वह ध्वजा रयके भ्रमण करने में नाचती दुई प्रकाशमान थी । १५ । और वह युधिष्ठिर उस रत्नवान गांडीव धनुषधारी श्रेष्ठ पुरुपकै कारण ऐसा शोभित हुआ जैसे कि सुमेरु पर्वत सूर्य से.मुशोभित होता है हे राजा बड़ी सेना संयुक्त राना द्रुपद तो शिर हुअा और कुन्तभोज और चन्देल राजा आंखें हुये हे भरतर्षभ प्रभद्रक शार्नक और अशीरक नाम समूहों के साथ अनूपक किरात ग्रीवा में वर्तमान हुआ। ४८। Dhrishtadyumna the commander in chief:-"Array the armies in the Krauocharun array, explained to Indra by Prihaspati in the war of the gods and danayas. 41. Let the Kaurava princes so the matchless array." These words were addressed to Dhrishtadyumna by Yudhislıthir as they rera done by Indra to Vishnu. Early in the morning Arjun led the army. The bright banner, cheeinrg the heart, shone like the sun, It was made by Vishwakarma by Indra's order. It was decked with banners like Indra's vajra and stood in air like the city of Gandharvas. It danced with the advance of chariots 45. *Yudhishthir, in company with the best of men the bearer of Gandiv bow decked with jewels, looked glorious like Sumeru with the sun shining upon. of that array king Drupad with his army became the head; kings Kuptibhaſ and Chandel ncre the eyes; Anuped tho Kirat with the Parbhadrals, the Sharnaks and the Ashiraks stood [4326] Nul abharat (४५२६) निपाद सहितथापि पृष्ठमासीयु धष्ठिर । पत्तीतुर्भमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्चपात ४९ ॥ द्रौपदेयाभमन्युश्च सात्यकिश्व महारथ । पिशावाद रदाश्चय पुदा कुडीविपै सहा५०॥ मारुता घनकाश्चैध तगणा परतगणा 1 वालिकास्तत्तिराश्य चोला पाड्याच मरत ॥ ५१ ॥ पतजनपदारराजन् दक्षिण पक्षमाश्रिता । आमेवश्यास्तु हुडाश्चमाल पादानमारय ॥ ५२ ॥ वापराउभसाश्चैव वासाश्च सहनाकुलै । नकुल सहदेवश्य वामपक्षसमाश्रिता ॥ ५३॥ रधानामयुत पक्षौ शिरस्तु नियुततथा ! पृष्ठमवुदमेवासीत् सहस्राणिच विंशति ॥ ५४ ॥ ग्रीवाया नियुतचाप सहस्राणि च सप्तति । पक्ष फाटि प्रक्षेषु पत्तातपुच धारणा ॥ ५५ ॥ जग्नु पारवृता राजश्वलत इवपर्वता । जघन पालयामास विराट सहकेकयै ॥ ५६ ॥ काशिराजश्च शैम्यच रथानामयुत और राजा युधिष्ठिर पटश्चर पोंडर और निपादों के साथ उसकपिीठ हुआ और भीमसेन, पर्पत का पत्र धृष्टद्युम्न द्रौपदी के पुत्र व अभिमन्यु औरमहारथी साविकी पक्षवने, ओर कुण्डी व मृपियों समेत पिशाच दारद पौडू पवन, धेनुक तगण परतगगग वाल्हीक तित्तिर चोल पाण्डय इन देशों के निवासी दक्षिणपक्ष में नियत हुए, अग्निवेश्य गजतुण्ड मलद आश्कारय शवर कुम्भस मालुकोसमेत वत्स नकुल सहदेव यह सवगायें पक्ष में नियत हुए एक अर्जुद रथ पक्षमें रह और इसी मकार श्योंका एक नियुत शिर हुआ और एक अर्बुद और वीसहजारकी पृष्ठहुई और सत्तरहजार ग्रीवा में हुये । ६४। हे राजा ऐसे पती रूपी व्यहके मागे वा पक्ष और पूंछके स्थानों पर चलनेगले पर्वतोंके समान चारों ओरसे रक्षाकरते हुए हाथी चले, राजा विराट् न केकय लोगोंके साथ और काशीराज शैवीने तीनअयुत रथोंके साथ जवन स्थानकी रक्षा करी हे राजा वह सव पाडव इसमकार से इस in the place of neck King Yudhu.hthir with the Poundras and the Nishadna represented the bach Bhimsen with the grandson of i nrshal (Dhrishtidsumnr) the cons of Drupidi, and Allumangu and bmro Satwili represented the wings And hundi with the Lishnches, the inches, the Darrdas, the laundras, the laranas, the Dhenuks the Tangane tho Partaugans, thic I alliks, tho Tittırs, the Cholns and the landy as stool on the right wins, and the A goiresh jos the Gnjatuudus the \ zlad 14, the Ashkaravas, tho Shabars, the humihinees and laluland Sthndev with the Maluhns and the Yntsns stood on the liſt A thousand millions of chariot occur ten thousand occupied the head, 1 thousand millions and txunty thousand orupied the Ench and sesents thousand stood on the neck 51 Elephants movel all round, beforo, on the wings anl on the tail of that array to manga liril hung 1 srnt with the Kakinar ani the Shn king of Karhi with thirty, thousand chariots protect the lup and the lome Tlus, o ling, did the Pundas 15 48 cd thic rinะ (४५२७) भीमार्य Bhishma Pary {5271 खिभिः । परमेनं महाव्यूहव्यमारत पांडयाः ॥ ५७ ॥ स्यांदयंतइच्छतः ग्यितायुद्धा यदशिताः । तेषामादित्यवर्णानि विमलानि महातच । तच्छनाण्य शोमन धारणेपु रयेपुच ॥ ५८ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीप्सवयपर्वणि क्रौंचव्यूहनिर्माण पंचाशत्तमोऽध्यायः ॥५०॥ संजय उवाच । क्रौचंदृष्ट्वाततोव्यूह मभेद्यं तनयस्तय । रक्ष्यमाणं महाधो पार्थेनामिततेजसा । ॥ वाचार्यमुपसंगम्य कृपेशल्यंच पार्थिव । सौमदतिवि- कर्णच सोध्यत्यामानमेव ॥ २ ॥ दुःशासनादीन् मातृश्य सनिघच भारत । अन्यांश्च सुबहन शरान युद्धाय समुपागतान् ॥ ३ ॥ प्राइवचनं कालं हपंयन्तन यस्तव | नानाशस्त्र प्रहणा सर्वे युद्ध विशारदाः ॥ ४ ॥ एकैकशासमर्थाहिययंसर्वे महारथाः । पांडुपवान् रणेहंतुससैन्यान् कि.मसंहनाः ॥ ५ ॥ अपर्याप्तं तदस्माकंबलं बड़े उत्तमन्यूह को रचकर बड़ी सग धनके साथ शत्रों को धारण किये सूर्योदय को चाहते हुए युद्धके निमित्तं नियत हुए, उन लोगोंके छत्रजो मूर्यय वर्ण निमन और अत्यन्त श्वेतरूप थे वह हाथी और रथों के ऊपर दिखाईदिये ।। ५८ ।। अध्याय ।। ५१॥ संजयबोले हे श्रेष्ठभरतवंशी राजा धृतराष्ट्र इस के अनन्तरं आपका बड़ा बेटा बड़े तेजस्वी पाण्डवोंके रचेहुए घोर और अभेद्यमहाव्यूहको देखकर आचार्य द्रोगा चार्यजी के पास जाकर कृपाचार्य राजाशल्य सोमदत्त विकर्ण अश्वत्थामा, दुइशा- सनआदि सवभाइयों और युद्धके निमित्त समीप आयेहुए अन्य बहुत से राजाओं को, समयपर प्रसन्नकरताहुना यह वचनबोला कि तुम सबनानाप्रकारके शस्त्रधारी और अत्रों के अर्थ में पंडितहो, आप सत्रमहारथी एकाही युद्ध में पांडवों के मारने में समर्थहोतो साथियोंके मिले हुये होनेसे क्यों नहीं समर्थहोगे, हमारी सब सेना | भप्मिादि की रक्षासे अजेय है और यह उनकी सेना भीमाद से रक्षितपराजय array thcir army and stood in great glory, armed with weapons, waiting for the sunrise. Their shining sunshades, pure white in colour, were seen above elephants and chariota" 59. CHAPTER LI Sanjaya coctinued thus, addressing Dhritrashtra: Seeing the dreadful and impregnable plialanx the glorious Paodaras, eldest son went to Dronacharya ard thus spoke out, cheering Kripacharya, King Salya. Somdatta, Vikarna, Ash rathama, Dushasan and other brothers and kings assembled there for fighting with his cords.- All you marriors! wielders of different reapons adept in the art of fighting and capable of destroying singly all the Pandavas, are surely able to defcat them then put together. Our army is insos. " your . [ 4528] Mahabharat (१५२८) भीमामिराक्षतम् । पर्याप्तमिदमेतेषां यलम माभिरक्षितम् ॥ ६ ॥ संस्थाना.गरसे नाथ त्रिका कथुरास्तथा । आरोचकास्त्रिगर्तावमद्रकाय यनास्तथा ॥ ७ ॥ राजयेन सहितास्तथा दुशासनेनच । विकर्णेनच घारेण तथा नदोपनदकैः॥८॥ चित्रसेनेने सहिता सहिता पारिभद्रकै । भीष्ममेवामि रक्षतु सहसैन्य पुरस्कृता ॥९॥ तना भीमय द्रोणश्च तवपुत्राश्चमारिप । मन्यूहंत महान्यूह पांड्ना प्रतिवाघपम् ११॥ भीम सैन्येन महता समतापारवारितः । ययौप्रकरमही वाहिनीसुराडिय ॥११॥ तमन्ययान्महेप्यासी भारद्वाजः प्रतापवान् । फुतलैश्वदशाणैधमागधैश्वावशांपते ॥ १२॥ विदर्भमकलेश्चैव फर्गप्रावरणै रपि । सहिता सर्वसैन्येनभीष्ममाहय शोभितम् ॥ १३ ॥ गापारा सिंधु सौयोग शिवपोयवसातय । शकुनिश्चस्वसैन्यन भारद्वाज मपालयत् ॥ १४ ॥ ततो दुर्योधनो गजा सहितः सर्वसोरः । अश्वातर्विध तपाचांवष्ठकोसलै ॥ १५ ॥ दग्दैवशकैथैव तथा दकमालवै । अभ्यरक्षतसंहष्ट होनेके योग्य है, संस्थान विकर्ण शूरसेन क्कुट रेचक त्रिगर्त मद्रक यवन शत्रुजय दुश्शासन बड़े वीर विकर्ण नन्द उपनन्द मणिभद्रकों समेत चित्रसेन सेना के मनु- प्योसमेत सम्मुखहोकर भीष्मकी रक्षाकरो, हे श्रेष्ठ इस के पीछे आप के पुनों ने | पांडवों के रोकने क लिये बड़ेभारी व्यूहको रचा, भीप्मनी तो चारों ओर सेना से रतित देवराज के समान बड़ीसेना समेतचले, और बड़े धनुपधारी प्रतापी मार द्वाज द्रोणाचार्यजी कुन्तल मागध और दशार्ण के साथ भीष्मनी के साथ चले और विदर्भ मेकलकर्ण मावरकभी सब सेनासमेत भीमगी केही साथचले, गांधार मिधु सौवीर शव्य विशातय और शकुनीने सेनासमेत भारद्वाज द्रोणाचार्यजीको रक्षतकिया, तदनन्तर राजादुर्योधन और सब सगेभाई अश्वातक विकर्ण वामन querable, well protected as it is hy Bhishm Let Samasthanas, tbo Surasens, the Kulhars, the Rechahs, the Trigarlas the Jadındas, the Yavanas, with Satrnujaya, Dusshasanı, that excellent hero Viharna, Nanda, Upandaka, (8) and Shilacena, along with tlic Vanıbhadralas, protect Bhishma with their troops! O sire, Then Blushma and Drona and thy sons formed a mighty array for resisting that of Parthias. Ind Bhishma surrounded by n Inrge body of troops advanced loading a mighty army, Ithe chief of the celestinls himself 11 And that mighty Low man, the son of Bharad raja, endued with grent energy, follored him, with the Kuntains, the Dashırnas, and the Magadlias, 0 hing, and with the Vidarbhns, the felals, the harnas and the Prnsaranas nlsa And the Gandhurss, the Sindlusiarime, ti e Shsis, and the l'agatis, nath all their coinbntants also ( followed) Blushma that ornament of Intth. And Slinkumi, with all lie tronps, protected the son of Bharndriya Anıl that hin: Duryodhan, united with nll lies 10 (४९२९) भीष्मपर्व Bhishma Pory 145291 सोचलेयस्य वाहिनीम् ॥ १६॥ भूरियवाः शल: शल्यो भगदाध मारिप । पिदानु विदा वावन्न्यो घामपाल मपालयन् ॥ १७॥ सौमदत्तिः सुशर्माच कांबोजयसुद क्षिणः । श्रुतायुया च्युतायुध दक्षिण पक्षमास्थिताः ॥ १८ ॥ अभ्यरयामा रुपये हरा पर्माच सात्वतः । महत्पा सनया साधं सेनापृष्टे व्यवस्थिताः ॥ १९ ॥ पृष्ठगोपास्तु त स्यासन मानादेश्याजनेश्वराः। केतुमान् यसुदानव पुनः काश्यस्यचा मिः ॥२०॥ ततस्ते तायकाः सर्वे हया युद्धाय मारत । दमः शंसान मुदाघुक्काः सिंहनादास्तथा मदन ॥ २१॥शं अत्यात दृष्टानां वृद्धः कुरु पितामहः । सिंहनादं पिनघोच्चः शंसं दध्मौ प्रतापवान् ॥ २२॥ ततः शयाच भैर्यश्च पेक्ष्यपविविधाः परः । माननाधान्य हन्यन्त स शब्दस्तुमुलोमयत् ॥ २३ ॥ ततः श्वेतैईयेयुं महति स्यन्दन स्थित प्रद कोसल दरद एक और वालवलोगों के साथ तुक पांडबन्नोगों की सेना के सम्मुख दौड़ा हे राजा भूरिश्रवा शैल शल्य भगदन्त और विन्द अनुविन्द अन्ति देश के राजालोगोंने वायें भागको रक्षितकिया, १२७ सोमदगि सुशर्मा कांबोज मुदक्षिण सतायुप श्रुताय यहमव दक्षिणोर नियनहुए, अत्यामा कृपाचार्य कृतवर्मा यादव यह सब बड़ीसेना समेत पीछेकी ओर को नियतहुए उसके पीछे से रक्षक अनेक देशों के राजा केतुमान यमुदान और काशीके राजाका पुत्र इत्यादिहुए।२०॥ हे भरतवंशी इस के अनन्तर आपके उन सब पुत्रों ने जोकि युद्धके लिये बहुतप्रसन्न चित्त ये शंखों को वजाकर सिंहनादों को किया, कौरवों के उद्धपितामह प्रतापवान् भीमजीने उन प्रसन्नचिचों के मिहनादाको सुनकर बड़े शब्दमे मिहनादकरके अपने शंखको वजाया तदनन्तर दूसरी ओर के शंख भेरी आदि अनेकवाने चारों ओरसे बने और तुमुलशब्द हुअा तिसपीछे खेत घोड़ों से युक्त बड़े स्थपर वर्तमान brothers and with Ashwatak. Vikaru, Kosal, Darad, vrik and Balay warriors, advanced against the Pandar armies. Bhurishrava, Sial, Shalya, Bbagdant with Vind and Aravind the princes of Aranti, guarded the left flank. 17. Sondatti, Susharma, Kamtoj, Sudak. shin Shatayush and Shrutayo stood on the right; and Asbeatbama, Kripacharya, Brits arma and the Yaclavas vith a large army stood on the rear and were themselves guarded Jy Ketuman, Vasudev, the son of the king of líasi aud others. 20. Then, O descendant of Bha. rat; your sous cheerfully bless their conclı shells in the field of battle. At this the other side too, blew ther conclh shells, trumpets and other musical instrumeats and the acisz was tremendous Then riding their hage chariot drawn by white horses, Brisboa and Arjun blev their conch shells decked with gold and jewels Krishna the lord of - [4530] Nahabharat मतुः शंसबरी हेमरत्नपरिष्कृतौ ॥ २४॥ पांचजन्यं हपो केशो देवदत्तं धनजयः। पाँई दध्मौ महाशर भीमकर्मा वृकोदरः ॥ २५ ॥ अनन्त विजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधि हिर नकुलसहदेवश्च सुघोपमाणि पुपको ॥ २६ ॥ काशिराजय शैम्पश्च शिसण्डो च महारथः । धृष्टयुम्नो विराटश्च सात्यकिय महारथः ॥ २७ ॥ पांचाल्याश्च महासा द्रौपद्याः पञ्चचात्मजाः । सर्वे दमुर्महाशमान सिंहनादांच नेदिरे ॥२८॥ स घोप समहांस्तत्र वारेस्तैः सदारितः । नभय पृथिवींचैव तुमुलो ध्यनुनादयन् ॥२९॥ एवं मेते महाराज प्रहाः कुरुपाण्डवाः । पुर्नयुद्धाय संजग्मुस्तापयानाः परस्परम् ॥३०॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्माण भीष्मपर्वणि कौरवव्यूहरचनायां एकांचाशत्तमोऽध्यायः॥५१॥ श्रीकृष्ण जी और अर्जुनने, सुवर्ण और रत्नों से मटित उत्तम शंखों को बनाया फिर इन्द्रियों के स्वामी जगदात्मा श्रीकृष्णजी ने तो पांचजन्य नाम शंखको और अर्जुनने देवदत्त नाम अपने शंस को बनाया, और भयकारी भीमसेन ने पौण्ड्रनाम महाशंखको बनाया औरकुन्तीपुत्र राजायुधिष्टिरने अनन्त विजयनाम शंसको बनाया और नकुल सहदेवने मुघोप और माणेपुप्पकनाम शंखको वजाया और शव्यकाशि राज और महारथी शिखंडी धृष्टद्युम्न विराट महारथी सालिको बडापनुर्धर पांचाल द्रुपद और द्रौपदीके पांचोंपुवोंने सिंहनादकोकरके अपने महाशंखोंको वजाया सब | वीरों ने अन्छेप्रकार उत्तम शब्दकिये, तुमलशब्द से आकाश और पृथ्वी शब्दा- यमान होगई हे महाराज इमरीति से यह कौरव और पांडव परस्पर में संतप्त करते हुए फिर युद्ध के निमित्त गये ॥३०॥ The senses and soul of the world, blows lus Panchjanya cnch and Arjun bless his Dei adatta. Blumscn the dreadful, blew Inundra, and Prioco Yudhi-hther the son of Kunti bier Anantvijaya Vabul and Salıader blev Sughosh and Janipu-hpık. Shairya the princ of Kashi, Shiklandi the great warrior, Dkrisktadyuman, Virat, Laro Satyalı, Drupad tho great archer of Panchal nnd the five sons of Draupadosored like lions and blen their conchshells. Thu loal sounds of the sarr on rang through the earth and shy. Thus, Princes, did the Kauravas and the Pandavas avonce aganist cach other with dreadful 0.ss." 30.

FATİ Bluishma Pary [4531] धृतराष्ट्र उवाच । एवंप्यूटचीकेषु मामफेयतरेषु च । कपं प्रहरतां श्रेष्ठाः सम्प्रहार प्रक्रिरे ॥१॥ मजय उवाच ॥ समं व्यठेचनीपु सगरमावरषजम् । मगारमिव संदृश्य मागप्रतिम यलम् ॥ २ ॥ तेषांमध्ये धितो राजन पुत्रो दुय्यों घातय । श्रीधीत् तायकान् सर्वान युद्धयध्यमिति दोरानाः ॥ ३॥ तेमन रमापाय समामिरपक्तजीचिताः । पाण्डवानभ्यवर्तन्त सर्व एकोच्छितध्वजाःततो युदं समभयतुमलं लोमहर्षर्णम् । तायकानो परेषाञ्च व्यतिपकरपशिपम् ॥ ५॥ मुक्तास्तु रणिभिर्यायारपुंसा सुनेजसः । समिरकाण्ठमा नागेपुच इयेपुच ॥ ६॥ तथा प्रवृत्चेि संग्रामे धनुरुधम्यदंशित । अभिपत्य महामाहीमा भीमपराग्रामः ॥ ७ ॥ साम। भीमगो र सात्यकीय मदारये। कैकेये च विगटेच धृष्टद्युम्नेच पापते ॥८॥ अयाय ५२ ॥ धृतराणवाले है मंजय इम रीति मे मेरेपुत्र ओर पांडवॉकी मेना के व्यूह रच- नपर प्रहार करनेवालोंमें उत्तम गूरॉने परसरमें कमे कैमे प्रहार किये । ? । संजप वाल कि इमरीति से मेनाके व्रहितहोनेपर ममुद्रम्प मेना को अपार देखते हुए उनवीरों के कवच तैयार हुए जिनकी ध्वजा महामुन्दर और मनोहरी, है राजा नन मव में नियनहोकर आपका पुन दुर्योधन आप के सबपुत्रों को बुलाके कहने लगा कि तुम मव शनधारण करके युद्ध करो वह जीवनको त्यागे हुए बजाको ऊंची करनेवाले सब मन मे नियरूपहोकर पांडवों के सम्मुख लड़नेको उपस्थित हुए नद- नन्तर आपके पुत्र और दूसरोंका युद्ध जिस में स्थ और हाथी संयुक्त थे गेमपंगा और तुमुन्ने शब्दों से व्याप्त हुआ ।६। मुवर्ण पंग और अत्यन्त प्रकाशित और तीमणवाण स्थीलोगों के हाथों मे छूटेहुये हाथी और घोड़ों पर गिरे हमीप्रकार युद्ध प्रारम्भहोनेपर भयकारी पराक्रमी अन्नधारी पितामह भीष्मजी ने धनुप को उठाये CHAPTER LII. Haring tlous formed an array of their armies, hor did the soosaat those of the Panda" as forlut mith one another? asked Dhritrashtra of Sanjaya 1. Haring arrated their armies in the manner mentined above," replied Sadjara, " thattoptrdless ocean of the r armies, shining with panoply and excellent Lanners, looked glorious to behold. In the midst of those armies your sɔn Duryodhan collected his brothers aud erid to them, “Taho up your arms for fightiog." And regardless of their lives all fair sons, with cruel hearts, faced the Pandav is in battle. The battle between your sons and the otlier party, with chariots and elephants mited together raged furiously with tremendous noise. 5 The sharp arrots, rith Iright golden feathers, discharged by charioteer, fell upon the eleplants and horses. At the commencement of the lattle, Bhishm the great archer of dreadful prowess faceil with his low, Brare \bhi- Varriersof [45321 Mahabliarat (४५३२) एतेषु नरवीरेषु चीदमत्स्येपुवाभिभूः । ववर्प शरवर्षाणि वृद्धः कुरुपितामहः ॥ ९ ॥ अभिधत ततो व्यूहस्तस्मिन् चरिसमागमे । सापामेव सैन्यानामासद्वियतिकरोमहान् ॥ १०॥ सादिनो ध्वजिनश्चैव हत प्रवरवाजिनः । विद्रुतस्थान काः समपचन्त पांडयाः ॥ ११ ॥ अर्जुनस्तु नरव्याघ्रो दृष्ट्वाभीष्मं महारथम् । वार्णयमप्रवीत् कुद्धो याहि पत्र पितामहः ॥ १२ ॥ एपीम. सुसंकुद्धो वागणेय मम वाहिनीम् । नाशयि यति सुव्यक्तं दुर्योधनहिते रतः ॥ १३ ॥ एष द्रोण कृप. शल्यो विकर्णश्च जना ईन । धार्तराष्ट्राच सहिता दुर्योधनपुरोगमाः ॥१४॥ पंचालानिहानियान्त रविता दृढधम्विना । सोहं भीष्मं घधिप्यामि सैन्यहेतोजनाईन ॥ १५ ॥ तमनवीद वासु देवो यत्तो भयधनञ्जय । एप.वां प्रापयिष्यामि पितामहर प्रति ॥ १६ ॥ पवमुक्रवा हुए सम्मुख आकर, महारथी अभिमन्यु भीमसेन अर्जुन, केकय, विराट, धृष्टद्युम्न, चेदि, मत्स्य, विभु इन नौवीरों पर वाणोंकी वर्षाकरी ।९। उस बड़े वीर के सम्मुख बड़ी सेना अत्यन्त कम्पायमान हुई और सब सेना के लोगोंको बड़ाखेद उत्पन्नहुआ, और वह अत्यन्त उत्तम घोड़ों के रथोंके सवार मारेगये जिनकी सेना इट गई थी ऐसे अकेले पांडव वर्तमान हुए नरों में उत्तम क्रोधरूप अर्जुन महारथी भीष्मको देखकर श्रीकृष्णजी से बोले कि वहां चलो जहां पितामहहैं । १२॥ हे दृष्णिवंशी यह निश्चय है कि यह अत्यन्त क्रोधरूप भीष्म दुर्योधन के अभीष्ट में प्रवृत्त मेरी सेनाको अवश्य मारेंगे, हे जनार्दनजी यह द्रोणाचार्य कृपाचार्य शल्य विकर्ण और सब धृतराष्ट्र के पुत्र जिनमें अग्रगामी दुर्योधन है, वह सब धनुषधारियों से रक्षितहोकर पांचाल देशियों को मारेंगे सो हे जनाईननी मैं भी सेना समेत भीमनीको मारूंगा । १५ । वासुदेवजी बोले कि हे अर्जुन सावधानहो मैं तुझको अभी पितामह के रथके पास पहुँचाताहूं, हे राजा ऐसा कहकर वासुदेवजी ने उसको शीग्रही भीमनी के रथके पास पहुंचाया, यह पाण्डव अर्जुन वगले के समान वेत manyu, Bhimsen, Arjun, kashaya, Virat, Dhrishtadyumna, Chedi, Matsya nad Vibhu, and showered his arrows on them. 9. The great army trembled before that great warrio and was much distresscd. Thc riders of vei y excellent horses were slain and the armies of the Pandivas rere disparsed when the Pandavas were left nlone, brate Atjun enragol at the sight of Bhislın ahed Krislina to lead him in tho vicinity of tho grandfather. "Suely," said lie to Krishna, "Bhishim in his rngo will dosti y my armics for the good of Duryodban. Dronehryn, ir pr-harya, Shalys, Vikarn and all the sons of Dhrit Trashtra 105 ng bary allian at their head and protected by all tho gol nrclion, willdestroy the Panchals I wish therefore, 0 Janar. dan, ta destroy }}luislim and his si my” 15. “Bo wido nunha Ar jun," uvid Vngudes, "I shall furthwith inho you to tho vicinity of Bluishna's cliniul" and dress tho chariot close to that of Bhialım.

(४५३३) भीष्मपर्थ Bhishma Pary [4533 ] ततः शौरी रथं तं लोकविश्रुतम् । प्रापयामास भीष्मस्य राति जनेश्वर ॥ १७ ॥ बलापताकेत बलाकावर्णवाजिना । समन्तिमहामीम नदद्वाना फतुना ॥ १८ ॥ महतामेघनादेन रथेनामिततेजसा । चिनिनन् कौरवानाकं शूरसेनाच पाण्यः ॥ १९ ॥.यायाच्छरणदः शीघ्र सुध्दाहर्षवर्द्धनः । तमापतन्त वेगन प्रभिनमिव धारणम् ॥ २० ॥ प्रासयन्तं रगे गगन मर्दयन्तञ्च सायर्कः। सन्धयप्रमुखर्गत P. च्यसचिौरकेकयैः ॥ २१ ॥ सहसा प्रत्युदीयाय भीष्मः शन्तनपार्जुनम् । कोहि गाण्डीवधन्वानमन्यः कुरुपितामहात् ॥ २२ ॥ द्रोणकत्तनाभ्यां या रयी संपातु माईति । ततो मामा महाराज सर्यलोकमहारथः ॥ २३ ॥ अर्जुन सप्तसप्तन्या नारा- घानांसमाचिनोत् । द्रोणध पञ्चविंशत्या कृपञ्चाशताशार. ॥ २४ ॥ दयाघनश्चतः पष्टया शस्यय नयमिः शरैः। सन्धयो नयामधेय शनिश्वापि. एचमिः ॥२५॥ घोड़ों के स्थपर सवार बड़ी ऊंची प्रकाशमान बजाको फहराता बड़े वादल के समान गरजता हुआ मूर्य के समान प्रकाशित रयके द्वारा कौरवों की सेना और शूरसेनों को संहार करता हुआ मित्रों के उत्साहोंका बढ़ाने वाला शीघही युद्ध भूमि में भाया उस मदोन्मत्त हाथी के समान महा वेग युक्त पातेहुए युदर्गे घरोंको कंपाते और अपने वाणों से प्रहार करके गिराते हुए अर्जुनको देखकर पूर्वी सौवेर केकय जय- द्रय और सिन्यु आदि के राजामों से रक्षित, भीमजीएकाएकी सम्मुख वर्तमान हुए कौखों के पितामह भीष्म द्रोणाचार्य और कर्ण के सिवाय दूसरा कौनयी है जो गांडीवधनुषधारी अर्जुन के सम्मुख जासके तदनन्तर हे महाराज कौरवों के पितामह भीष्मनी ने तो सतत्तर बाणोंसे अर्जुनको सबपीडामान किया और द्रोणा- चार्य व कृपाचार्य ने पच्चीस २ वागों से । २४ । दुर्योग्नने चौमठ वाणोंमे शल्यने नौवाणोंसे और नरोत्तम अश्वत्यामाने साठ वाणोंसे विकर्ण ने तीनवाणों से और प्रार्चायनिने तीनभल्लवाणों से पांडव अर्जुन को सूत्र घायल किया वह Arjun tbe 1 ander rode on the chariot drawn by horses white as heron, over which flattered gloriously the ligh bsaner, and raring like thunder und destroying the Kauravas and Shorsedag from his chariot, he entered the army to the great joy of his friends. Seeing him coming like a mad eleplant and sbaling and killing the rartiorg rith the shower of his arrows, Bhishm, protected by the Sauvirs of the East, the Kaibeças, jayadrath and the princes of Sindha and other places, turned upon him. Who else except Bhishm the grandfather of the Kauraras, Dronacharya or Karan could face Aijm the bearer of Gandiri Then, O king! Bhishma the grandfather wounded Arjun sith seventy seven arrows and Dronacharya and Kripacharya cach of therp wounded him with twenty fise. 24. Duryodhga shot sixty four arrows, Shalya nine; Ashwathama, the best of men, sixty; Vikarn three and Artagani too, hit and wounded Arjun the Pandava 4531] Muliabharat (४५३४) विकर्णोदशनिले राजन् विव्यापाण्डवम् । स तैद्धिो महेन्यासा समन्सानिशितैः शर. ॥ २६ ॥ न विन्यथे महावाहमिद्यमान इवाचल: । स भीष्मं पञ्चविंशरया रुप नयभिः शरैः ॥ २० ॥ द्राण पश्या नरव्याघ्रो विकर्णचत्रिभः शरैः। शल्यं चैन प्रिभिर्माण गजामश्चैव पक्षभि ॥ २८ ॥ प्रयविध्यदमेयात्मा किरीटीमरत- पंभ 1 ते सात्यकि बिरादध धृष्टद्युम्नश्च पातः ॥ २९ ॥ द्रौपदेयाभिमायुश्च परिचमुर्घ नञ्जयम् । ततो द्रोण महवास गद्लेयस्य प्रिये रतम् ॥ ३० ॥ अभ्यवर्तत पाशाल्पः संयुक्तः सह सोमः । भीष्मस्तु रथिनां श्रेष्ठो राजन् यिव्याध पाण्डयम् ॥ ३॥ अशोत्या निशिौर्याप्ततंऽक्रपात तावकाः । तेपतु निनदं श्रुत्वा सहितानांसह यत् ॥ ३२ ॥ प्रवियेश ततो मध्धं नरसिंहः प्रतापवान् । नेपांमहारथानां मध्यं ॥ ३३ ॥ चिकोड धनरा राजेंडत कृत्वामहारथान् । ततो दुय्यों प्रापघनजयः महावाहु अर्जुन उनके चारोंऔर की वाणष्ट से पर्वत के समान माच्छादित और पायल भी होकर पीडामान नहीं हुआ फिर उस नरोत्तम अर्जुनने भीष्मनी को पच्चीस वाणों से कृपाचार्य को नौवाणों से द्रोणाचार्य को साठ वाणों से विकर्ण को तीन वाणां से आयाने को भी तीनवाणों से और राजादुर्योधन | को भी पांच चाणों से घायल किया, जो कि अर्जनबड़ा साहनी और मुकुटधारी था तो भी हे भरतर्षभ सात्विकी विगट धृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पांचो पुत्र और अभि- मन्यु इन सबने भाकर अर्जुन को चारोंओर से रक्षिताकया तदनन्तर रामानुपद भीष के अनभीष्ट में मृत्त द्रोणाचार्य के सम्मुख उस्थित हुआ फिर रथियों में श्रेष्ठ भोप्पनी ने शीवहीं पांडव अर्जुन को। ३१ । तक्षिण अस्मी-वाणों से घायल किया उसमे आपके पुत्र प्रसन्न हुए तदनन्तर रथियों में उत्तम प्रतापी अर्जुन उन प्रसन्न चित्तों की गर्जनाको मुनकर बड़े पमन्न चित्र के समान सेनामें घुसा हे राजा.वह अर्जुन उन उत्तम रथयों के मध्यको पाकर महारथियों को चिनितकर with three of lus Lionel pounted arrone But thouglı Arjuu ya cusered with arrows like a mounta n wth, clouds, lic did not slake in spite of the nourris he had received Irjan ihe lest of men piere od Bhishın sıtlı tweety five ru roig Er piclursa nith nine, Dronachryn with birty, Vikarn with thier, Artnyaun nith three and prince Duryoallinn with five A.jua the learer of durden of great provers, was assistel hy Situthr. Yuat, Dhrishtadyumnt, the fire 19 of Draupadnud allumanyu n ho guanded luum on all sides. Then Drupach, intent on doing harm t, Bpuslam, ledd Dronacharya and Bhilım the b stof clariteers faced! Arjun lhe Paddva (31) and wo) indul liim willi eighty spruits to the giant jny- of your sora Thelt Irjun af yn at proses buenang tluir cheerful crice, entered the army with a chit fal inind and ronny in the midst of the charioten (४५३५) MITT Blislının Pury [1335} धनी राजा भीममाह जरेयर। |॥ ३४ ॥ पंडयमानं स्व सन्य यायिन समुंगे। एप पाण्डुइतस्तात कृष्णेनसहितोचली ॥ ३५ ॥ यततांसर्प सन्यांना मलं नागार कृन्तति । चयिजीव त गारपद्रोण च रथिनां घरे ॥३६॥ यत्ने चयकोंग यस्त शस्रो विशागते । न युध्यात रणे पार्धं हिमकामः सदामम ॥ ३७ ॥ सता कुरु गाङ्गेय यथा हन्येत फागुनः । एवमुक्तातो राजन् पिता देयग्रतरतय ॥ ३८ ॥ धिक क्षाधममित्युक्त्या प्रायात् पार्थस्थति। उमाँ वेतहयो राजन् संसक्तीग्रय पाधियाः ॥ ३९. ॥ सिंहनादानभृशंचकु शंख नदध्मश्च मारिपा द्राणदुर्योधनप विकर्णश्च तयात्मनः ॥ ४० ॥ परिवार्य रणे भीम स्थिता युद्धाय माय । तय पाण्डया: सचे पारपार्य धननयम् ॥ ४१ ॥ स्थिता युद्धाय महते ततो युद्धमत्तंस के धनुपलिये हुए घूमने लगा तदनन्तर राजा दुर्योधन युद्ध में अपनी सेनाको अर्जुन के हाथ से पीड़ामान देखकर भीमसे वोला देतात यह वलवान पांडव श्रीकृष्णजी के साथ । ३५ । सब सेनाओंको मारता गिराताहुआ रथियों में श्रेष्ठ गांगेय और द्रोणाचार्य के जीवते होनेपर हमारे मूलको काटे डालता है हे राजा आपहीके कारण सदैव मेरा हित चाहने वाला यह कर्ण भी वेसलाह होकर युद्ध में पांडवों से नहीं | लड़ता है। ३७ । हे भीमजी सो तुम ऐसाही करो जिससे अर्जुन नाशको पाये तदनन्तर हे राजा इसमकार कहे हुए आपके पिता देवव्रत भीमजी क्षत्री धर्मको धिक्कार है ऐसा शब्द कहकर अर्जुन के रथके समीप आये हे श्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्र राजाओं ने उनदोनों महावली श्वेत घोड़े वालों को मिलाहुआ देखकर अत्यन्त | सिंहनादक शंखों को बनाया अश्वत्थामा और आपका पुत्र दुर्योधन और विकर्ण ! ४० । यहसब युद्ध में भीमजी को चारों ओर से रक्षित करके युद्ध के निमिन नियत और हे राजा इसी प्रकार से सब पाण्डव लोग अर्जुनको चारों ओर घेरकर बड़े युद्ध करने के निमित्त नियतहुए इसके पीछे पद प्रारंभ हुआ फिर hitting the lest of them. Secing his ar zny thus destroyed by Arjun, Duryodhan said to Bhishm, "Father, this brare Pandav, assisted by Shree Krishn, (35) is destroying my armies in the presence of you and Dronacharya the best of charioteers and will thus, uprout us. Having quarrelled with you, Karan will not fight agninst the l'andavas. 37. Cause the destruction of Arjun in some way or other." Hearing this, Devabrat Blishın cursed the Kshatrya daties and came near Arjan's chariot. Secing those two great warriors face to face, the kings roared lihe lions and bicer their conch shells Ashwathama and your sons Duryodban and Viharn (10) guarded Bhishm on all sides and prepared for all the Paodayas surrounded Arjan and stood ready to fight. Then In the same manner [1536 ] Mahabharat गाङ्गेयस्तु रणेगर्थ मानछुनभिःशरैः ॥४२॥ तमर्जुनःप्रत्यविध्यत् दशभिमर्मभेदिभिः । तत. शरसहसूण सुप्रयुक्तंन पाव' ॥ ४३ ॥ अर्जुनः समरश्लाघी भीष्मस्पावार यदिशः । शरजालं ततस्तनु शरजालेन मारिप ॥ ४४ ॥ धारयामास पार्थस्य भीष्मः शान्तस्तदा। उभौ पामसदृष्टायुभौ युद्धाभिनन्दिनौ ॥ ४५ ॥ निर्षिशेष मयुध्येतां कृतप्रतिकृतैपिणी । भीमचापविमुक्तान शरजलागि संघशः ॥ ४६॥ शीर्य माणान्यदृश्यन्त मन्नान्यर्जुनसायकैः । तथैवार्जुनमुक्कानि शरजालानि सर्वशः ॥ ७ ॥ गाङ्गेयशरनुनानि प्रागतन्तमहीतले । अर्जुन पञ्चविंशत्याभीममाईच्छिते-शरैः ४८। भीष्मोपि समरे पार्थ विम्याध निशितैः शरैः। अन्योन्यस्याहयान् यिध्वाध्वजौ च सुमहायलौ ॥ ४९ ॥ रथेषां रथचक्रेच चिक्रीडतुररिन्दमौ । तत कुद्धो महाराज भीष्मः प्रहरतांवरः ॥ ५० ॥ यासुदेव त्रिभिर्वा राजधान स्तनान्तरे । भीष्मचाप व्युतस्तैस्तु निर्विद्धो मधुसूदनः ॥ ५१ ॥ पिरराज रणे राजन् सपुष्प इव किंशुकः। गंगापुत्र भीष्मजी ने युद्ध में नववाणों से अर्जुनको घायल किया । ४२ । फिर अर्जुनने मर्मभेदी दशवाणों से उनको घायल किया तदनन्तर युद्ध में प्रशंसनीय पांडव अर्जुनने अच्छे प्रकार से चलाये हुए हजार वाणों से भीप्मनी की दिशाओं को रोका, तदनन्तर भीमनी ने अपने वाणों से अर्जुनके उनवाणों के जालोंकों रोका, दोनों युद्ध में प्रसन्न चित्त और उत्साह मानने वाले प्रहार के बदले महार करने की इच्छावाले युद्ध में अतिशयता पूर्वक प्रवृत्त हुए, भीष्मनी के धनुप से छूटेहुए वाणनालों के समूह अर्जुन के वाणों से कटे हुए दृष्टपड़े, इसीमकार अर्जुन के छोड़े हुए वाणजाल भीष्मनीके वाणों से टूटरकर पृथ्वीपर गिरपड़े फिर अर्जुन ने पच्चीस तीक्ष्ण शरोंसे भीप्मनीको व्यथित किया। ४८ । भीमजी नेभी नत्र वाणों से अर्जुन को घायल किया वह दोनों महावली शत्रुओं के जीतनेवाले युद्ध में घोड़ों को और रयोंको परस्पर घायल करके, क्रीड़ा करने वाले होगये तदनन्तर हे राजा महाकोष रूप महामहारी भीष्मजी ने, तीन वाणों से वामदेवजी को लनान्तर में घायन किया, उन भीष्मनी के धनुप से निकले हुये वाणों से घायल the fighting began lihishin rounded Arjun nith nine arrons and recieved ten from him. Then Arjun ths best of warriors, spread a thousand well aimed arrows round Bhisam and both tha sarriors returned each other's blors with great shill. The network of arrows as cut donn ly those of Bhishm. Arjun then wounded Bhishm with twenty five arro. 48. Bhishm too wounded Arjun with ninearrors. The trogreat warriore, conquerers of enemies, rounded tho horses of each other's chariot and delighted in their work. Then Bhishm the great warrior struch Vasudes in the midle of the brezst with three arrons. Wounded by the arrows of Blishm, Vadhusudan loohed lihe a Kinshuk tree in bloom. Secing Nadhar wounded by (४५३७) भीष्मपर्ष Bhishma Pary [4537] ततोर्जुनोभशंकडो निद्धिं प्रेक्ष्यमाधयम् ॥ ५२ ॥ सारधि फुगवृद्धस्य निर्बिभेदाशतैः शरैः । यतमानीतती घौरा चन्योन्यस्य घधप्रति ॥ ५३ ॥ नशक्नुतां तदान्योन्य मभिसंघातु माइये । तोमंडलान चित्राणि गतप्रत्यागतानिच ॥ ५४ ।। अदर्शयेतां बहुधा सूतसामर्थ्य लाघवात् । अंतरंच प्रहारेपुतकंयती परस्परम् ॥ ५५ ॥ राजन तरमार्गस्थौस्थितावास्तांमुहर्मुहः । उभो सिंहरवन्मिथं शंखशब्दं च चतुः ॥५६॥ तथैव चापनि|प घऋतुस्ती महारयो । तयोः शंसाननादेन रथनेमिस्वननच ५७॥ दारिता सहसा भूमिश्चकंपच ननादच । नोमयोरंतरंकश्चिद्ददृशे भरतर्पम ॥ ५८ ॥ वालनी युद्ध दुर्धो धन्योन्यसदृशायुभो । चिढ्नमात्रेण भीमंतु प्रजQस्तन कौरघाः ।। ५९ ॥ तथा पाण्डुसुताः पार्थ चिहन मात्रण जन्निरे । तयो नुवरयोदृष्ट्या ताटतं पराक्रमम् ॥ ६ ॥ विस्मयं सर्व भूतानि जग्मुर्भारतसंयुगे । नतोधिवक श्चगणे पश्यं मधुसूदनजी, युद्धमें फूले हुये किंशक . दृक्षके समान शोभायमान हुए तदनन्तर माधवजीको घायल देखकर अत्यन्त क्रोधित होकर अर्जुन नेभी भीष्म के सारथी को तीन वाणेसे घायल किया तव युद्ध में एक दूसरे के रयपर उपाय करने वाले दोनों वीर, परस्पर में गिरानेको समर्थ नहीं हुए फिर उन्हों ने मूतके वलकी तीव्रता से वारंवार विचित्र मंडलोंको दिखलाकर, अवकाश के मार्ग देखने में नियत दोनों वारों ने वारंवार प्रहारों के याचमें अवकाश को तकने हुए सिंहनाद पूर्वक शखों के शब्दों को किया । ५६ । और इसीप्रकार दोनों महारथियों ने धनुपों के भी शन्दों को किया, उन दोनों के शब्दोंसे और रयोंके शब्दोंसे अकस्मात् पृथ्वी फिटगई और कंपायमान होकर शब्दायमानभी हुई हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ उनदोनों के अन्तरको किमीनेभी नहीं देखा दोनों पुद्धमें बलमान शूरवीर परस्पर में समान थे वहां कौरव लोग केवल चिह्नों को देखकर भीष्म जीके पासगये, इसीमकार पाण्डवों ने भी केवल चिनही मात्र से अर्जुनकोपाया हैराजाधृतराष्ट्र उन दोनों those arrows Arjun too, in gnat anger, wounded the chariot driver of Bhishm with three arrows Thus wounding each other, the two warriors could not defeat each other and with the skill of their charioteors described circles of their arzows agein and again. Watching an opportunity to gain advantage over each other, they blew their conchsliells and roared like lors 56- Both the warriors tranged their bons. The earth cracked and shook with a noise at the sound of thiosc warriors and zumbling of their chariot wheels. None could see any distinction between the tiro vai riors; loth vere strong, brare and of equal prowess. The Kauravas could approach Blishım ty scoing his banner and the Pandavas came near Arjun ly the same All beings were amazed to see the great process of those ricans.

[4538] Muliabharat (४५३८) तिभारत ॥०६१ ॥ यस्थितस्यहि यथानकधिजिनं क्वचित् । उभौच शरजा लेन तावदृश्यो बभूवतुः ॥ ६२ ॥ प्रकाशौच पुनस्तूर्ण बभूवतुरुभौरणे। तत्रदेवाः स गंधर्वाश्चारणाश्चभिः सह ।। ६३ ॥ अन्योन्यं प्रत्यभापंत तयोदृष्ट्या पराक्रमम् । नशक्यौ युधि संरब्धौ जेतुमेतौ कथंचन ॥ ६४ ॥ स देवासुर गंघलौकैपिमहा रपी । आर्यभूतं लोकेषु युद्धमे तन्महाद्भुतम् ॥ ६५ ॥ नैत शानि युद्धानि भघि यति कथंचन । महि शक्यो रणे जेतुं भीष्म. पार्थेन धीमता ॥ ६६ ॥ सघनुःसरथः साभ्यः प्रवपन् सायकान्ग्णे । तथैव पांडवं युद्धे देवैरपि दुरासदम् ॥ ६७ ॥ नधि जेतुरणे मीम उत्सहेत धनुघाम् । आलोकादाप युद्धाह सममेतद्भविष्यति ॥ ६८॥ इतिस्मवाचोऽधूयंत प्राचरत्यस्ततस्ततः । गांगपार्जुनयोः संख्ये स्तव युक्ता विशांपते ॥ ६९ ॥ त्वदीयास्तुतदायोधाः पांडवेयाश्च भारत । अन्योन्यं समरे जनुस्तयोस्तत्र नरोत्तमों के उस महापराक्रम को देखकर युद्ध में सव जीवमात्रों ने आश्चर्य किया और कोई भी उनदोनों के अन्तरको ऐसे नहीं देखसक्ताथा जैसे कि धर्मवान् पुरुष का कोई पाप कहीं दिखाई नहीं देता वह दोनों वाणजालों में गुप्तहोगये । ६२ । इस के पीछे दोनों शीघ्रही प्रकटहोगये वहां गंधवों समेत देवताओं ने और महर्षियों समेत चारण लोगों ने इनदोनों के पराक्रमको देखकर परस्पर में वार्तालाप की कि यह युद्ध में क्रोध रूप दोनों महावली देवता अमुर औरगंधर्वो से भी किसी दशा में लोकमें जीतने के योग्य नहीं है यह बड़ामारी अपूर्व युद्ध इसलोक में होरहा है | ऐसा युद्धकभी नहीं होगा । ६५ । धनुपरथ और घोड़ों समेत युद्ध भामि में शायकों को छोड़ते हुए भामजी युद्धमें बुद्धिमान् अर्जुन को विजय करने के योग्य नहीं हैं इसीप्रकार युद्ध में देवताओं से भी अजेय धनुपधारी पांडवोंकी विजय करने को भीमजीभी उत्साह नहीं करते देखने सेभी यह युद्ध वरावर का होगा, हे राजा भीम और अर्जुनकी प्रशंसा के यह वचन जहांतहां फैलेहुए मुनेगये ।६९ । तदनन्तर उनदोनों के पराक्रमहोने पर आपके शूरवीर और पांडवों ने परस्पर में युद्ध किया two best of men und could find no distinction in either no one docs not find a sip in A virtuous man. Both were bid within the network ofarrows. 62. Thicy appeared again in a short time. Thoĝandharvas, the gods and the maharshis with tho Charans, present there, sar their prowes and talkel rith one another as follows:-'These enraged warriore nro not be conquered in battlo by gods, asurs and gand harsns. The world has not seen such a fight nor is libely to Rec it again. Gs. Discharging arrons with the help of his bow.chariot and liores, Bhiilım cannot conquor Arjun nor doce lo aspiru to conquer ths Pandava archers who aro inconquornble oven by gous. Both the sarriors are equal in promoss." Such tords of the भीष्मपर्व Bhishma Parv [4532] पराक्रमे ॥ ७० ॥ शितधारस्तमा खड्गमिलैंश्च परश्वधः । शरैरायैश्च बहुभिशने नानाविधेपि ॥ ७१ ॥ उभयोनियोः शूरान्यतंत परस्परम । वर्तमाने तथाघोरेत- स्मिन्युद्ध सुदारुणे। द्रोणपांच ल्य योराजन् महानासीत् समागमः ॥ ७२ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीमवधपर्वणि भीमार्जुनयुद्धे द्विपंचाशत्तमोऽध्यायः । ५२॥ धृतराष्ट्र उवाच । कपंद्रोणो महेषासः पांचाल्यश्चापि पार्पतः। उभौ समीयतुर्य चौतममाचक्ष्य संजय niदष्टमेव परंमन्ये पौरुपादिति मेमतिः । प्रशांत नवो भीमो मातरधु पांडवम् ॥ २ । भीष्मोहि समरे क्रुद्धो हम्याल्लोकांधरा वान् । सकय पांडव युद्धेनातरत् संजयौजसा ॥ ३ ॥ संजय उवाच । शृणुराजन् स्रोभूत्वा युद्धमे तत्सदारुणम् । नराश्याः पांडयाजंतु देशी सयासः ॥ ४ ॥ इमीपकार तीनधार खड्ग और निर्मल परशे वाण और अन्य २ प्रकार के अनेक शस्त्रों से दोनों ओरके शुरवीरों ने परस्पर में एकने दुमरेको प्रहार किया हे रागा इमी रीति से उसघोर और महा भयानक युद्धहोनेपर द्रोणाचार्य और द्रुपदकी | बड़ी भारी लड़ाई हुई ॥ ७२ ॥ अध्याय ।। ५३ ॥ धृतराएबोले हे संजय बड़े धनुपधारी द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नदोनों बुद्धिमान कैसे युद्ध में परस्पर सम्मुख हुए उनका वृत्तान्त मुझ से कहो, हे संजय मैं उद्योग से प्रारब्धकों बड़ा मनिताहूं जहां युद्ध में शान्तनु भीप्पनी ने पांडव अर्जुनको विजय नहीं किया जो भीम रण में क्रुद्धहोकर सवस्थावर जंगमजीवों कोभी मारसक्ता है उस महावीरने किस हेतु से युद्ध में पराक्रमकरके पांडव अर्जुनको नहीं मारा। ३ । संजय बोले कि हे राना तुम स्थिचित्त होकर इस बड़े भारी भयानक युद्धको सनो कि पांव अर्जुन इन्द्रादि देवताओं सेभी विजय करने के योग्य नहीं है द्रोणाचार्य praises of Bhishm and Arjun were heard on all sides. 69. Your sops and the Pandavas then fought with bright ares and other weapons, The fighting between Dronacharya and Drupad was very furious."72 CHAPTER LIII " Describe the encounter bet wren Dronacharya and Dhrishtadyumna, Sanjaya. I Lelieve fate to be superior to prowess; for Bhishm did not conquer Arjun the Pandas in battle, though be could destroy all the moveables and immoveables. How it tras that ho did not hill the Pandar Arjan in spite of all his prowess." asked Dhritrashtra of Sanjaya 3. "Hear attentively, king" replied Sanjaya " about the dreadful war. Arjua the Panday is inconquerable even lwy gods. Dronacharya rounded Dhrisatadyunna rith many arrots 4540] Mahabharat (४५४०) द्रोणस्तु निशितैोष्टयुम्नमविध्यत । सारथिं चास्य भल्लेन राडाद पातयत् ॥ ५॥ तथास्य धतुरो चाहाश्चतुर्भि सायकोत्तमै । पीडयामास सकुद्धो धृष्टद्युम्नस्य मारिप ॥ ६ ॥ धृष्टद्युम्नस्तता द्राण नवत्यानिाशते शरै ।व याध प्रहसा धीरस्तिष्ठतिष्ठे तिचाप्रवीत् ॥ ७ ॥ तत पुनरमयात्मा भारद्वाज प्रतापवान् । शरै प्रच्छादया मास धृष्टद्युम्नममर्पणम् ॥ ८ ॥ ददन शरधार पार्वताताचकर्षिया । शक्राशनि समस्पर्श कालदमिवापरम् ॥ ९ ॥ हाहाकारो महान सीत् सर्व सैन्ययु भारत । तमिपुसीघतदृष्टवा भारद्वाजन सयुगे ॥ १० ॥ तत्रादभुतमपश्याम घृष्टयुम्नस्यपौरुषम् । पदर समरेवीरस्तस्थौ गिरिरिवाचल ॥११ । तचीत शरघार मायात मृयुमा मन । चिच्छदशरवृष्टिं च भारद्वाज मुमोचह ॥ १२ ॥ तत उच्चुकशु सर्वे पचाला पाय सह । प्रद्युम्न तत्कर्म कृत दृष्टया दुष्करम् ॥ १३ ॥ तन शकिं महाधुर्गा ने नाना प्रकार के वाणों स धृष्टद्युम्नको घायल किया ओर भल्लों से उसके सारथी को रथके नीडसे नीचे गिरा के महाक्रोधित होकर उस धृष्टद्युम्न के घोडौंकोभी चार शायफों मे महापीडित किया, ताभी बडे वीर धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य को नब्बे तीक्ष्ण शरों से घायल किया और तिष्ठतिष्ठ शब्दो काभी किया तदनन्तर वढे प्रतापी द्रोणाचार्य जीने उस धृष्टद्युम्नको मारे वाणो के आच्छादित करदिया | । ८ । और उसके पारने के लिो इन्द्रवजू के समान स्पर्श वाले मृत्युदडके | समान घोर वाणको हाथ में लिया, हे राजा उस युद्ध में द्रोणाचार्य के चढायेहुए | उसगाराको देखकर सब मेना में हाहाकार हुआ, उसस्थान में हमने धृष्टद्युम्न के अपूर्व पराक्रमको देखा कि अकेला ही शूरवीर युद्धमें पर्वतके समान अचल होकर नियत खडा रहा । ११ । और उस प्रकाशित घोर मृत्युरूप आये हुए शणको अपने पाणोसे क टडाला और द्रोणाचार्य के ऊपर पाणको वरसाया तदनन्तर धृष्टद्युम्नके कियेहुए उस काठन को देखकर पाण्डवों समेत पांचाल and hilled his chariot driver who fell down from his sent Then in grtat anger he woun led Dkrishtadyumna s horses with four broad pointed aro 18 Dhashtady umas pierced Dronachary & Rith minety sharp arro vs and challenged him with the cry of stay, stay' Then Dionuclinry of great prunless covered Dh ishtadyumn with a shower of arrows 8 H, took up a hard arrow like pijra or the staff of Death to de troy Dhusht idyumni All the warriors of the army who saw that arrow on the boss of Dionacharz a expressed signs of grief. We sax there tho matchless pro s oss of Dhrishtadyumn who alona st od in battle fumoscallo lihe amountain I And seeing drendtui ai ro i coming 1011 01 ds him liko Death hituself, cut it with hus on Drois end si Oried his arrors over Dropuchary a Pandayan sath thu Pinchals cried loudly at the sight of Dhirishtathat Tho (४५५१) भीष्मपर्व Blhishma Parv [4541] स्वर्णवैर्यभूषिताम् ! द्रोणस्थनिधनाकांक्षी चिक्षेपसपराक्रमी ॥ १४ ॥ तामापदंती सहसा शक्ति कनकभूषिताम् । विधाचच्छेद समरे भारद्वाजोइसनिय ॥ १५ ॥ शक्ति यिनिहतां दृष्ट्वा पृष्टयम्न प्रतापवान् । वर्ष शरवर्षाणि द्रोणं प्रात जबर १६॥ शरव ततस्तत्तु सनिचार्य महायशाः । द्रोणो द्रुपद पुत्रस्य मध्ये चिंच्छेद कार्मुकम् ॥ १७ ॥ सच्छिन्न घन्वा समर गदांगुवा महायशाः । द्राणाय प्रेषयामास गिरिमार मयीं बली ॥ १८॥ सा गदावेगवन्मुक्का प्रायाद्रोण जिघांसया । तबादभुतमपश्याम मारद्धाजस्थपरिपम् ॥ १९ ॥ लाधबाद यंसयामास गदहिग विभूषिताम् । न्यसमित्या गदांतांच प्रेषयामास पातम् ॥ २० ॥ भलान् सुनिशितान् पानान् सनम मुखान् मुदा रुणात्। ते तस्य कवचं भित्या पपः शोणित माहवे ॥२१ ।। अयान्पद्धनुरादाय भ्रष्टा म्नो महारथाः । द्रोणं युधिपराकम्प शरैर्विव्याधपञ्चांगः ।। २२ ।। रुधिरको ततस्तोतु देशी लोग उच्चशब्द को पुकारे । १३ । तदनन्तर द्रोणाचार्य के मारने की इच्छा करनेवाले उस पराक्रमी ने बड़ी वेगवान मुवर्ण वैडूर्य जटिन महाघोर वरछी को | मारा इस घरछी को आता देखकर मसन्नचित्त द्रोणाचार्य ने शीघ्रही अपने वाणों से मार्ग में काटकर गिरा दिया । १५ । हे राजा तब उस धृष्टद्युम्न प्रतापी ने अप नी उग्रबरछीको कटा हुआ जान के द्रोणाचार्य के ऊपर अनेक वाणोंको बरसाया फिर महायशस्वी द्रोणाचार्य ने धृप्रद्युम्नकी पाणकी वरसाको रोककर उसके धनुप को मध्य मेंसे काटडाला, फिर उस कटे हुए धनुष वाले महामतापी ने अपनी एक भारीलोहे की गदाको फिराकर द्रोणाचार्य के ऊपर फेंका, उसके हायकी टूटी गदा द्रोणाचार्यके मारनेको शीघ्रही आई तो वहांहमने द्रोणा वार्यके अपूर्व पराक्रमको देखा। १९ । कि उससुवर्णित घोरगदाको खण्ड २ करके अत्यन्त तीक्ष्ण पीतरंग सुनहरी शिलापर तीक्ष्ण किये हुए वाणको धृप्रद्युम्नके ऊपर फेंका उसवाण ने उसके कवचको काटकर -उरा के रुधिर को पिया, तदनन्तर बड़ेवीर धृष्टद्युम्नने दूसरे धनुपको लेकर युद्ध में महा पराक्रम करके पांचबाणों से द्रोणाचार्य drunner deed of proces 19. Then wishing to kill Dronzkozga, he hurled at him his stviſt spcar, adorned with gold and gens. Seeing the dreadful dart coming towards biu, Dronacharya, with a cheerlul mind, cut it down with his arrowa 15. Seeing his good spear thus cut down by Drona, Dhirish tadyumn showered bis arrows on him. Dronacharya checked the shower of Dhrishtadyumna's arrows and cut his bow from the middle. The brave warrior, with his bow cut asunder, burled his jorn mace at Dronacharya. We saw the matchless prowess of Dronacharya when the niace, was coming on to kill him. 19. He cut donn tho gelden dreadful mace into pieces and discharged a sliarp arrow of golden colour at him, The arrot pierced through the armour and drank his blood, Brave Dhrishtadyunın then took up another bor and nith great proses [4542] Mahabharat (४५४२) गुशुभाते नरपंभी। बसन्तसमये गजन् पुष्पिताविध किंशुकौ ॥ २३॥ ममर्पितस्ततो राजन् पराक्रम्य चमूमुसे। द्रोणोद्रुपद पुत्रस्य पुनश्चिच्छदकामुकम् ॥ २४ ॥ अथैन छिनधन्यानं शरैः सातपर्धाम: अभ्यर्पद यात्मा वृष्ट्यामेघ इवाचलम् ॥ २५ ॥ सारथिं चास्य भल्लेग रचनाडाद पातयत् । अथास्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिनिशितैः शरैः ॥ २६ ॥ पातयामास समरे सिंहनादं ननादच .ततो परेण मल्लेग हस्ताच्चाप माच्छिनत् ॥ २७ ॥ सच्छिन्न धन्या विरयो हताश्वो हतसारथिः । गदापाणि रवारोहत् ख्यापयन् पौरुपमहत् ॥ २८ ॥ तामस्य विशिस्तूर्ण पातयामास भारत । रथादनयरूढस्य तदभुत मिवाभवत् ॥ २९ ॥ ततः स विपुलं चर्म शत चंदेंच भानुमत् । सड्गच विपुल दिव्य प्रगृह्य सुमुजो बली ॥ ॥ आमदु द्राव बेगेन द्रोणस्य वधकांक्षया । मामिपार्थी यथा सिंहो बनेमत्तामवहिपम् ॥३॥ को घायल किया, तदनन्तर बढदोनों रुधिरस भरेहुऐवीर ऐसेशोभायमानहुये जैसे किं वसंतऋतुमें लालफूलवाले किंशुक वृक्षशोभादेते हैं । २३ । हेराजा तदनन्तर युद्धभूमि में महाक्रोधरूप द्रोणाचार्य ने बड़े पराक्रम से धृप्रद्युम्नके धनुष को काट कर उसको मारे वाणों के ऐसे ढक दिया जैसे वादल वरसाकरके पर्वत को ढक | देता है, फिर भल्लों से इसके सारथी को रथ के नीढ से गिरादिया और चारों घोड़ोंकोभी चार तीक्ष्ण वाणों से पृथ्वीपर गिरा दिया, और सिंहनाद कर के दूसरे वाणसे उसके दूसरे धनुपको भी गिराया । २७ । वह धनुप रथ और घोड़े सारथीं मृतकवाला धृष्टद्युम्न गदाको हाथ में लेकर अपनी वास्ताको मकटकरता हुमा रथसे उतरा उससमय द्रोणाचार्य ने बड़ी शीघ्रता से रथ से उतरनेभी नहीं पाया था कि उसकी गदाको एक विशिख वाणसे काटकर गिरादिया यह बड़ा आश्चर्यसा हुआ तदनन्तर वह सुन्दर भुजाधारी महावली मुवर्ण की मूर्य चन्द्रमावाली बड़ी ढाल और दिव्य खड्गको लेकर द्रोणाचार्य के मारने की इच्छासे बड़े वेग युक्त होकर सम्मुख । ऐसे दौडा जसे कि मांसका चाहनेवाला सिंह वन में मनवालें हाथी के ऊपर दौड़ता है. trounded Dronncharya rith fivc arros, Then the two bleeding warriors look.cd like Kinshuk trees in bloom in the season of spring. Thien Druimcharyn, in the excess of rago, cut down Dhrishtadyumna's bor and corcred him with arrows like a hill with clouds 'Then he killed his chariot driver who dropped down from his scat, Willel a?l tho four hersey with sharp darts and with a linn's roar cut dorn his sccond bow. 27. Mestitute of box, chariot, horses and clriver, Dhrishtaiyumnn lenpt down from his chariot, mace in hand, elowing lis promess; but as soon as liolid como dorn from his chariot, Dronachoryo cut the maco down from his hinna nith a sliarp arrow, All this was a work «f wonder. Then that brave warring of findet. como arme, took up his huge golden sluield bearing the sun and the 23 . (४५५३) भीमप Bhishma Pary [454:] तत्रातमपश्याम भारद्वाजस्य पौरुपम् । लायघंचार पांगंध घलवादोश्च भारत ॥ ३२ ॥ यदेने शरवर्षेग वारयामास पार्षतम् । न शशाक्ततो गत्तुं यलबानाए सयुगे ॥ ३३ ॥ निवारितस्तु द्रोणेन धृष्टयानो महारथः । न्ययारयच्छरौधा रतांधमणा कृतास्तपत् ॥ ३४ ॥ ततो भीमोमहायाः सहसाभ्यपतद्वली । साहायफास भरे पापंतस्य महात्मनः ॥ ३५ ॥ सद्रोणनिशिताणे राजन् विपाच सतभिः । पार्षतच रथं तूर्ण स्वकमारी इयतदा ॥ १६ ॥ ततो दुर्योधनो राजन् मानुमंतमचो दयन् । सन्येन महतायुक्तं भारद्वाजस्य रक्षणे ॥ ३७ ॥ ततः सामहतीसेनाक लिंगानाजनेश्वर । भीममायुधयौ तूर्ण तव पुत्रस्य शासनात् ॥ ३८ ॥ पांचाल्य मथसंत्यज्यद्रोणोपि रथिनांवरः । पराटदुपदी वृद्धी पारयामास संयुगे ॥ ३९ ॥ धृपधुम्नोपि समरे धर्मराजानमभ्यात् । ततः प्रयवृते युद्ध तुमुललोमहर्पणम् ॥ ४ ॥ - 1 ३१ । हे राजा वहां हमने द्रोणाचार्य की वीरता और अस्त्रयोग से हस्तलापरता अपूर्व प्रकारकी देखी कि अकेलेनेही वाणों की बरसा कर के धृपद्युम्न को रोक दिया तदनन्तर उस महायुद्ध में कोई महावली भी जाननेको समर्थ नहीं हुआ, वहां हमने बड़े स्थके समीप नियत और वाण विद्यामें कुशल के समान वाणसमूहों को ढाबसे रोकते हुये धृष्टद्युम्न को देखा । ३४। तदनन्तर महाबाहु पराक्रमी भीमसेन युद्धमें महात्मा धृष्टद्युम्न की सहायता करने वाला अकस्मात् प्राकूदा, हे राजा उस ने पातेही अकस्मात् सात वाणों से द्रोणाचार्य को घायल किया और शीघ्रही धृष्टयम्न को दूसरे स्थपर सवार किया इस के पीछे राजा दुर्योधन ने बड़ी सेना समेत राजा कलिंगको द्रोणाचार्यजी की रक्षा के निमित्व भेजा । ३७ । तदनन्तर हे राजा आपके पुत्रकी आज्ञासे कलिंग देशियों की बड़ी भारी भयानक सेना भीमसेन के सम्मुख आई, रथियों में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य भी धृष्टद्युम्न को छोड़कर मिले हुए वृद्ध विराट् और राजा द्रुपद से युद्ध करने लगे और धृष्टद्युम्नभी युद्ध में धर्मराज युधिष्ठिरके पास गया तिप्त पीछे उस युद्धभूमि में कलिंग देशियों से और moon, and with his celestial snord ran upon Dronacharya lilo a ravenous lion upon a mad elophant. 31, Then we saw the matchless and dexterity of Dronacharya's hand. He alone checked the advance of Dhrish tadyumna with his arrons No warrior could enter the field of battle at that time. We saw Dhrish tadyumna stationed like A skilful warrior near his chariot, receiving the shower of arrows on his shield. 34, Then Bhimsen of great protress came suddenly in the fitld of battle to help Dhrishtadyumna and wounded Dronacharya with soven arraws. He made Dhrishtadyumna ride another chariota Duryodhan sent the king of Kaling to the help of Drona and the dreadful army of Kaling faced Bhim. Droncharya too left Dhrishtadyumta and faced the old hings Virat and Drupad. Dhrishtadyumna prowess [4541 ] Maliablarat (४५४८) फलिंगानांच सारे भीमस्यन्त्र महात्मन । जगतः प्रक्षयकर घोररूपभयावहम् ॥४१॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि धृष्टद्युम्नद्राणयुद्धे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच ॥ तमापनि समादिष्टः कालिंगो बाहिनीपतिः । कथमद्भुत फर्माण भीमसेन महाबलम् ॥ १॥ चरंत गदया र दंडहस्तमिवांतकम् । योधया मास समरे कालिंग. सहसेनया ॥ २ ॥ सजय उवाच । पुनेण तवराजेंद्र सतयो तोमहाबलः । महत्या सेनयागुप्त प्रायादीमरथ प्रति ॥३॥ तामापती महतीक- लिंगाना गहाचमू । रथाश्वनाम कलिलां प्रगृहीतमहायुधाम् ॥ ४ ॥ भीमसेनः कलिंगानाम च्छंगारतवाहिनीं । फतुमंतच नेपानि मायात सहचेदिमि ॥ ५ ॥ तत शुतायु सकुद्धो राज्ञाकेतुमतासह ! भाससादरणे भीम व्यूढ नीकेपुचेदिषु ॥६॥ रथैरनक सानै कलिंगानांनसाधप । अयुतेन गज नाच निपाद सह केतुमान् ॥ ७ ॥ महाला भीमसेन से महाघोर रोमहर्पण संसारका मृत्युकारी घोररूप भयानक युद्ध हुआ। ॥ ४१ ॥ अध्य य ॥ ४ ॥ धृतराष्ट्र वोले कि उस प्राज्ञा पाने वाले कलिंगके राजा ने अपनी सेना समेत युद्धभूमि में आकर उस अपूर्पकर्मी महा वलिष्ठ मृत्यु दण्ड समान गदा हाथ में निये वीर भीमसेन से युद्ध करने को मन किया, संजय बोले हे राजेन्द्र इस रीति से आपके पुत्र से भाज्ञा पाकर वह कलिंग देशका राजा भीमप्तेन के रथ के पास आया, हे भरतवंशी भीमसेन ने घोड़े हाथी और रथों से युक्त उत्तम शनधारी कलिंगों की बड़ी सेनाको चीददेशीय लोगों के साथ आते हुए देसकर केतुमान निपादों के राजा को घायल किया । ५ । तदनन्तर व्यूहित सेना समेत शस्त्रों धारण किये अत्यन्त क्रोषयुक्त श्रुतायु केतुमान नाम निपादों के राजा के साथ उस युद्ध में भीमसेन के सम्मुख ओया, हे महागज कलिंग देशों के राजा केतुमान ने Front to Yudhislıthn and the battle between Bhim and the Kaling warriors was dicadful to the extreme CHAPTER LIV "How did the king of Kaling, ordered by sour son, come into the fieli of battlo, followed by the army? How did he fight title Blum tho nighty warrior of matchlese strength and bearer of pace!" Enid Dhritrashtra to Sanjaya, "Having got the permission of your son, repited Stajaya, the king of Kaling rpproached the charrot of Binn, who, seong lum approach with horses, elephants, chariots and tho soldiers of Chedi, sounded Kotuman the king of Nishadas. 5 Then with lus ariny of armed soliurs, Shrutayu, accompanicd with Ketuanan the hing of Nishindas, fnced Bhimsen in battlo tho Ling of Kalingas surrounded Blusen with hiss army consisting " 4I Ketaman भीष्मपर्व Bhishma Parv [4545] भीमसेनं रणे राजन् समंतात्पर्यधारयंत् । चैदिगरस्य करूपाव भीमसेनपदानुगाः ॥ ८ ॥ अभ्यधापंत समरे निपादान् . सहाजभिः । ततः प्रयवृतयुद्ध घोर रूपमया पहम् ॥ ९ ॥न प्राजानंतयोधाः स्वानपरस्परजिघांसया । घोरमासाचतो युद्ध भीमस्यसहसापरैः ॥ १० ॥ यथेंद्रस्य महाराज महत्त्यादैत्य सेनया | तस्य सग्य स्थसंग्रामे युध्य मानस्यभारत ॥११॥ यभूध सुमहानशब्दः सागरस्येव गर्जतः । अन्यो न्यरमतदायोघा विकर्पतोधितापते ॥ १२ ॥ महींचकुचितां सवा शश लोहित सन्नि भाम् । योघांध स्थान परान्वापि नाभ्यजानन् जिघांसया ॥ १३ ॥ स्यागप्या ददत स्वाश्थशूराः परमदुर्जयाः । विमर्दःमहानासदिपाना यहुभिः सह ॥ १४॥ कलिंगैः सहदीनां निपादैश्च विशांपते । कृत्वा पुरुषकारंतु यथाशाक्त महाबलाः ॥ १५॥ भीमसंनं परित्यज्य संन्ययततचेयः । सः फलिंगरासनः सनिघृचेषु चेदिषु १६ ॥ बहुत हजार रथ और दश हजार हाथियों और निपादों को साथ में लेकर चारों ओर से भीमसेन को घेर लिया, और भीमसेन के आगे चलने वाले चेदिमत्स्य और करूपं देशोंके वासी धीर राजाओं समेत एकाएकी निपादों के सम्मुख पाकर वर्तमान हुए विसं पीछे घोर रूप भयानक युद्ध जारी हुआ, फिर एकाएकी परस्पर में एक दूसरे को मारने की इच्छासे दौड़ते हुए वीरों का और शत्रुओं के साथ भीमसेन का घोर युद्ध जारी हुअा, हे राजा जैसे कि इन्द्र का युद्धदैत्यों की सेनाके साथ होता है इसी प्रकार हे भरतवंशी युद्ध में लड़ने वाले बहुत बड़े शब्दों से गर्जना करते हुए सागरके समान हुए, हे राना इसके पीछे परस्परमें महार और घात करने वाले युद्ध कर्ताओं ने सब पृथ्वी को मांस और रुधिर से पूरित करके शोभित किया और मारने की इच्छासे अपने और पराये युद्ध कर्ताओं को नहीं पहिचाना । १३ । फिर युद्ध में दुर्भय शूरवीरों ने अपनी सेना के लोगों को भी शस्त्रों से मारा घोड़ों का बहुतों के साथ वहाभारी युद्ध हुआ, हे राजा चेदि देशवाले शूरवीरोंका | युद्ध कलिंग और निपादों के संग हुआ तब चेदिदेशी अपनी सामर्थ्य के अनुसार वीरता को करके । १५ । उस भीमसेन को पागकर अलग होगये चेदिदेशियों of thousands of chariotsy myriad of elephants and Nishadas. The soldiers of Chedi, Datsya and Krosh countries with brave princes, faced the Nishadas all of a sudden and a dreadful fight ensued. Bhimsen fought bravely with the warriors who ran to fight and kill one another.. The descendants of Bharat roared like the ocean and the 'fighting was 'as dreadful as that betreon the gods and asurs. The brave fighters filled the land with flesli and blood and did not distinguish friends from foes in the heat of encounter. 13. The inconquerable warticis killed with their weapons the people of their own army and the battlo ras furious. The soldiers of Chedi fought against those of Kaling and Nishad, and having done their best the people [4546] Mahabharat स्वबाहुवलमास्पायसंन्यवर्ततपांडयः। नचचाल रथोपस्थाद्भमसेनोमहायलः ॥१॥ शितैरवाफिरद्वाणैः कलिंगानांवरूथिनी । कालिगस्तु महेण्यासापुत्रश्वास्यमहारथः॥१८॥ शक्रदेवाति ख्यातो जनतु-पांडवं शरैः । ततोभीमो महायाधुिन्वन्रुचिरथमः ॥१९॥ योपयामास कालिंगं स्वयाहुबलमाश्रितः। शक्रदेवस्तुसमरे विधजनसायकान्याहून२०॥ समान जघान समरे भीमसेनस्य सायकैः । तं दृष्ट्वा विरथ तत्र भीमसेन मन्दिमम् ॥ २१ ॥ चक्रदेवोभि दुद्राव शरियकिरन शितैः । भीमस्यो परि राजेन्द्र शक दयो महा बलः ॥ २२ ॥ घवर्ष शरमाण तपांते जलदो यथा । हताश्येतु रखें तिष्ठन् भीमसेनो महाबलः ॥ २३ ॥ शकू देवाय चिक्षेप सर्व शैक्यायलीं गदाम् । स तयानिस्तोराजन कालिंग तनयो रथात् ॥ २४ ॥ धिरथः सहसूतेन जगाम परणीतलम् । तिमात्मसुतं रया फलिंगानों जमाधिपः ॥ २५ ॥ रपैरनेकसाहस्त्रैर्भीमस्यावारयदिशः। ततो भीमो - के अलग होजानेपर सव कलिंग देशियों के सम्मुख होकर पांडव भीमसेन अपने भुजावलं में स्थिर होकर खड़ारहा अर्थात् वह महावली भीमसेन अपने स्य से नीं इटा । १७ । और कलिंग देशवासियों को भी अपने तीप्रमाणों से ढक दिया तब बड़े धनुषधारी कलिंग के राजा और उसके पुत्र महारथी शादेवने वाणों से भीम- सेन को घायल किया तदनन्तर अपने भुजबल से रक्षित सुन्दर धनुष को हिलाते हुए महावाहु भीमसेन ने राजा कलिंगको लड़ाया और युद्ध में अनेकवाण छोड़ते हुए शक्रदेवने भीपमेन के चारों घोड़ों को मारा फिर शकदेव उस शत्रुहन्ता भीम- सेनको विस्य देखकर अपने तीक्ष्ण वाणों से ढकता हुआ उसके सम्मुख दौड़ा फिर पहावली शकदेवने भीमसेन के ऊपर वाणों की ऐसी बरसाकरी जैसे वर्षा ऋतु में मेघ जल को परसाता है मृतक घोड़ों के रथपर चढ़ेहुए महावली भीमसेन ने । २३ । अपनी लोहेकी गदाको शक्रदेव के ऊपर फेंका हे राजा कंलिंग के राजा का पुत्र उस गदासे मरकर ध्वजा और सारथी समेत रथसे पृथ्वी पर गिरा कलिंग देशके महारथी ने अपने पुत्रको मगहुआ देखकर । २५ । हजारों रथों समेत of Chodi Jeft Bhimseni to fight alone. At this, Bhinisen the Pandav fneed tho armios of Kaling and stool firmly fighting in his own elsriot. 17. Ho covered the Kalingas with his arrows. Thern the great nrclicr king of Kalng and his Lravo fon Shakradey wounded Bhimsen with their orrows. Bhim, potected by the strength of his own Arme alone, fought with the king of Kaling, Shahzadev killed all the four horses of Bhimson with his arross and soung him destitute of the 360 of his chariot covered Jun with leis anons like a shoror of min. Dhimen, mounted on his clarint with the horeca dead, liurled his tao nt Shakrades. The son of the king of. Kaling, atruck by' tlint mice, fell down dead upon earth together with tho banner and driver: Thea tic warrior king of Kaling. seeing this son deal, es, checked (४५४७) भीष्मपर्व Bhishma Parv [4547 महावेगां हस्यागुनी महागदम् ॥ २६ ॥ निस्विंय माददे घोर चिकीर्षुः कर्म पारुणम् । चर्म चाप्रतिमं राजन् न पमं पुरुषभ ॥ २७ नशरद्धचन्द्रश्च शातकम्म मयैक्षितम् । कालिंगस्तु सत्तः क्रुद्धो धनुमियमृज्यच ॥ २८ ॥ प्रगृन च शरंथोर मेक सर्प विषोपमम् । प्राहिणोद्भीमसेनाय बधाकांक्षी जनेश्वरः ॥ २९॥ तमापतन्तं घेरोन प्रेरितं निशितं शरम् । भामसनो द्विधाराजंविच्छेद विपुलासिना ॥ ३० ॥ उदकोशच्च संहष्टलासपानावरूधिनीम् । कालिंगोयततः मुद्धो भीमसनाय संयुगे ॥ ३१ ॥ तोमरान् प्रारणोच्छीघ्रं चतुर्दश शिलाशितान् । तानप्राप्तान महायाहुः खगतानेवपाण्डयः ३२॥ चिच्छेदसाताराजन नसंभ्रांतो यरासिना। निरुत्यतु रणे भीमस्तोमरान्च चतुर्दश ३३ भानुमन्तं ततो भीमः प्रादयत् पुरुषर्षभः । भानुमांस्तुततो भीमं शरवणच्छादयन् ॥ ३४ ॥ ननाद यलवमाद नादयःनो नभस्तलम् । नचतं ममृपे भीमः सिंहनादं महाद घे ॥ ३५॥ ततः सम्देन महता विनन द महास्वनः । तेन नादन विषस्ता कलिंगानां | भीममेनकी दिशाओं को रोका तदनन्तर हे राजा पुरुषोत्तम भीमसेन ने गदाको छोड़कर अनुपम खड्ग और दालको हायमें लिया वहढाल सुनहरी नक्षत्र और अर्द्धचन्द्रों से जटितथी तदनन्तर क्रोध प्राकर राजा कलिंग ने घनुपकी ज्याको चढ़ाकर सर्पके विपके समान एकमहाघोर वाणको लेकर मारनेकी इच्छाकरके भीमसेनके ऊपर फेंका १२९॥हे राजा उस गिरतेहुए विप संयुक्त वाणको भीमसेनने अपने खड्गसे दो खण्ड कर दिये । ३० । और भापकी सेनाको भयभीत करता हुआ बड़ा प्रसन्नचित्त बड़े मान्द से पुकारा तदनन्तर राजा कलिंग ने महाक्रोधित होकर शीघ्रही भीमसेनके अपर शिलासे तीक्ष्ण कियेहुए चौदह तोमरोंको फेंका तव भीमसेन ने अपने उत्तम खड्ग से समीप में न पहुंचने वाले उन तोमरों को वीचही में काटा हे पुरुपोचम वह भीमसेन उस युदमें चौदह तोमरों को काटकर समीप आये हुए भानुमन्तके सम्मुख दाड़ा तदनन्तर भानुमन्त तीरों की वासे भीमसेन को ढककर प्राकाश और पृथ्वी को शब्दायमान करके महाशब्द का करनेवाला हुआ तब भीमसेन उस सिंहनादको न सहकर अपनी महागर्जना करके गर्जा कलिंग देशों की सेना उस Bhinsen, on all sides with thousands of chariots. Then Bhim the best of men left his mare and took up the matchless sword and the shield deched with gold stars and half moons. The king of Kaling, in grent anger, shot from his bow an arrow dreadful like a venomous serpent, but Bhimson cut it down with his sword. 30. And causing fear in your army he uttered a loud roar with a cheerful heart. Then the king of Kaling, in the excess of anger, shot Bhim with fourteen sharp arrows, but Bhimsen cut them all with his sword before they had touched him. Having cut those fourteen Arrows, Bhim attached Bhanumant who was near. The latter covered Bhim with arrots and filled the carth and firmament with his roar. Unable to bear that roar, [45481 Mahabharat (४५४८) परुथिनी ॥ ३६॥ नभीम समरे मेने मानुप भरतर्षभ । ततो भीमों महाबाहुर्नर्दियायि पुल धनम् ॥ ३७ । सासर्येगवदाप्छुत्य दन्ताभ्यागारणोत्तमम् । आरुरोह सतोमध्य नागराजस्थ मारिप ॥ ३८। ततो मुमोच यालिंग शर्षितामझरोदाद्वधा । खड्गेन पृथुनामध्ये मानुमन्त मधान्छिनत् ॥ ३९ ॥ सोतरायुधि न हत्या राजपुत्रमरिंदम । गुरु मारसह स्कन्धे नागस्यासि मपातयत् ॥४०॥ छिन्नस्कन्ध सविनदन् पपातगजयूथ प. । आरुग्ण सिंधु पंगेन सानुमानिव पर्वत ॥४१॥ ततस्तस्मादयप्छुय गजाभारत भारत । सगाणरदीनात्मा तस्थौ भूमौ सुदशित ॥ ४२ ॥ सचचारवहून्मार्गानभि, त पातयनगजान् । अग्मि चक्र मिवाविद्ध सर्वत प्रत्यदृश्यत । ४३ || अव देपुनागे पुरधानीकेषु चा भिभू । पदातीनाच सधेषु विनिधनशोणितो क्षित ॥ ४४ ।। श्येनवह शब्द से भयभीत हुई। ३६ । हे पुरुषोत्तम धृतराष्ट्र युद्ध में सोंने भीमसेन को | मनुष्य नहीं माना इसके पीछे भीमसेन बड़े उच्चशब्द को करके, खड्ग समेत | महावेगसे दोडकर हाथी के दांतों के द्वारा उत्तम हाथीपर चढगया और शीघ्रही, । हाथीकी पीउपरहोगया. फिर बड़ेखड्गसे भानुमन्तकी कमरको काटकर उस शत्रुहन्ताने युद्धभूमि में उस राजकुमार को मारकर वडेभारी खड्ग को हाधीके कंधेपर गिराया उसके महारसे वह गजराज हाथी पृथ्वीपर ऐसे गिरपडा।४। जैसे कि रत्नों से प्रकाशित पहाड ममुद्र के वेग से टूटकर गिरपडता है दे भरतवंशी वह महावनी भीमसेन गिरते हुए हाथी से कूदकर हाथ में खड्ग लिये महा अलंकृत शस्त्रयुक्त मसन्न मन होकर पृथ्वी पर नियत हुआ और निर्भय होकर अनेक हाथियों को गिराताहुआ बहुतसे मार्गों में घमा । ४२ । फिर वह समर्थ घोडों के हाथियों के और रयोंके समूहों में सर ओर से गोल अग्नि के समान दिखाई दिया, गद्दावली भीमसेन उस युद्धभूमि में पनीरूप पदातियों के समूहों में वाज पक्षी के समान सब को मारता और घृमता दृष्ट पडा,फिर वह बड़ा वेगवान् भीमसेन तीक्ष्ण धार वाले Blum rozred a louder roar and terrified the Kalingas 36. From tho promoss of Bhim in bott'o people regarded him is superhuman Hnuing uttered the dreadful roar, Bhim ran sword in linnd, and mounting the clept int by tho tushs cut asunder the body of Bhanumant nt the vast. And having billed the prince in the field of battlc Blumsen let luis sword full over the clephant's shoulder With thint blow the c!eplınnt fell to the ground (10) lilo a gemu bedcel cd mouutin bs the action of the sch Blum of great prorre$9 Jenpt down from the shoulder of the filling clephant and en ord in linnd stood on earth with cheerful mind IIo fearlessly cut down sci crul olup hinnts and rormed through many paths we that capollo warur, raining through lorsca, clephants and chariots seemed like A circle of fi Braso Blusen lowked like a bank entering and - (४५४१). भीष्मपर्व Bhishma Pary [ 4549] ग्यचरद्धीमो रणेऽरिपुबलोत्कटः। छिदस्तेषांशरीराणि शिसंसिच महायला ।। १५ ।। •खड्गेन शितघारेण संयुगे गजयोधिनाम् । पदाति रेक: संकद्धः शांभयवर्द्धन. ४६॥ संमोहया मास सतान कालांतक यापमः । मूढाश्वते तमे वाजौ चिनदन्तः समाद्र धन् ।। ४७॥ सास मुत्तम बेगेन विचरन्तं महारणे । निकृस्य रथिनांचाजो रथेपाश्चयुगा निच ॥ ४८ ॥ जघान रथिनचा बलवान् रिए मर्दन. । भीमसेनश्चरन्मार्गान् सरहन् प्रत्यदृश्यत ॥ ४९ ॥ प्रांतमाघिद्ध मुद्घांत माप्लुतंप्रस्तंप्लुतम् । सम्पातं समदीगच दर्शयामास पाण्यः ॥ ५० ॥ केचिदनासिनाच्छिन्ना• पांडवेन महात्मना । विनेदुभिन्न मर्माणो निपेतुगतासकः ॥५१|| छिन्नदन्ताग्रहस्ताश्च भिन्नकुम्भास्तथा पर | वियोधाः। स्वान्यनाकानि जघ्नुर्भारतवारणाः ॥ ५२ ॥ निपेतुरुव्यों च तथा विनदन्तो महारवान् । खड़ग से उन युदकर्ता हाधियों के सवारों के शिर और देहोंको काटता हुआ देखने में आया । ४५ । शत्रुओंके भय उत्पन्न करनेवाले अत्यन्त क्रोधरूप मृत्युके समान पदाती अकेले भीमसेनने उन सब शूरवीरोंको मोहितकिया, उसमहाभारी युद्ध में हाथमें तीक्ष्ण खड्ग को लिये बड़े वेगवान् भीमसेनको घूमता हुआ देखकर सब लोग अत्यन्त व्याकुल और अचेत होकर पुकारते हुए भागे, फिर शत्रुहन्ता पराक्रमी भीमसेन रे युद्ध में रथियों के रथ जुए आदि को काटकर रथियों को भी मारा ! ४८ । प्रौह बहुत मार्गों में घूमताहुआ दिखाई दिया हे भरतवंशी फिर भ्रांत उद् भ्रांत प्राविद प्राप्लुत मम तेस्टत संपात समुद्ररण अर्थात् घुमाना ऊंचाघुमाना टेढ़ा घुपाना शरीर में लयकरना अकेपर झुकाना सब खडग का महार बड़े वलसे मारना क्रमसे इन सब दशाओं को दिखाया हे राजा कितनेही शूरवीर भीमसेन के खड्ग के अग्रभाग से कटगये और टूटे कवचवाले गर्न २ कर मरगये इसीप्रकार से हे राजा दांत और मूड़ों की नोक हे मस्तक फटे चोट खायेहुए शूरवीरोंसे रहित हार्थियों नेभी अपनी ही सेनाको मारा और बड़े भारी शन्दोंको करके वह सब पृथ्वीपर गिरपड़े १५२। औरहे राजा फटेहुए तोमर वावड़े भारी शिर वा मुवर्णसे जटित परशे वा मुवर्ण से küling the fout soldiers like a fight of birds. Then he was seen cutting asundor the heads and bodies of the elephant riders. 45. Terrifying the enemy, triat angry figure like Death, Bhimsen alone mado all tlic warriors ingonsible. With the sharp srord in his hand, in the field of battle, Bhimsen was the terror of all tho warriors. They ran. away from him crying for ſear. Bhimsen of immeuse prowess cut asunder the yohes of chariots and killed the charioteers. 48. Roaring through many paths and porſorining various ſeats with his sword, Bhimsen cut down numerous warriors who fell dead crying, piorced through their armour, The clephants with their tusks, tranks and leads cut and broken and destitute of their riders foll upon their own army and fell down on earth with hideons cries. 52. Wo saw tho weapons, heads, golden axes, tho gem bedecked trappings [4550 ] Malabharat (४५५.) छिन्नांधतोमरान राजन् महामात्रशिरांसिच ॥ ५३ ॥ परिस्तोमान्विचित्रोध कक्ष्या श्वकनकोज्ज्वला: । प्रैवेयाण्यथं शक्तीश्च पताकाः कणांस्तथा ॥ ५४ ॥ तूणीरानथ यंत्राणि पिचित्राणि धपिच मिदिपालानि शुभााणतोत्राणि चांकृशैः सह ॥ ५५ ॥ घन्टाय विधिधी राजन् गर्भानसरूनशि। पततः पातितार्थव पश्यामः सहसादिभिः ॥ ५६ ॥ छिन्नगावापर करैहितैश्चापि वारणा आसीद्भामः समास्तीर्णापतितै धौ रिव ॥ ५७ ॥ विमृयैवं महान गान् ममन्याग्महाबलः । अश्वारावरांश्चय पातया मास संयुगे ॥ ५८ ॥ तद्घोरमभवद्युद्धं तस्य तेपांच भारत । खलीनाम्यय योक्राणि कल्याश्चकनकोयलाः ॥ ५९ ॥ परिस्तोमाश्च प्रासाश्च ऋष्टयश्वमहाधनाः । कवचा न्यथचमीण चित्राण्यास्तरणानच ॥ ६ ॥ तत्र तत्रापविद्धानि पश्यंतमहारये. मासचिश्व शस्त्रैश्च चिमलैस्तथा ॥ ६॥ सचक्रेयसुधांकीणी शयलै कममैरिव । आप्लु-यापनः कश्चित्परामृश्य महाबल. ॥ ६२ ॥ पातयामास गड्गेन सभ्वजानपि जटित स्वच्छ झूलें वा ग्रीवा के भूपण हाथियों की भूपों समेत पताका वा तूणीर यन्त्र विचित्र धनुप वा श्वेत वर्ण के अग्निदण्ड वा अंकुशों से युक्त चावकोंको वा नानाम कारके घंटे और सुनहरी खड्गों की मूठोंको भी, सवारों समेत गिरेहुए और जहां तहां पड़ेहुओं को देखताहूं जिनके अंग और आगे की सूड के भाग कटगये और जो मरभी गये उन हाथियों से वह.पृथ्वी ऐसी होगई जैसी किगिरेहुए पहाड़ों से होजाती है, उस नरोत्तम ने इसप्रकार बड़े २ हाथियों को मारकर घोड़ोंको भी मर्दन किया । ५७ । और घोड़ों के उत्तम २ सवारों को भी मारकर गिराया रे भरतर्षभ तेरे पुत्रों का और पाण्डव लोगों का वह महा घोर युद्ध हुआ, विचित्र लगाम और उत्तम सुवर्ण से मंडित झूलें परशे तोमर मास दुधारेखड्ग कवच दालें और अनेक रत्नवाले विस्तर यह सब उस महायुद्ध में जहां तहां कटेहुए बहुमूल्यके दिखाई दिये । ६० । इसके विशेष उसने पिचित्र पोथयन्त्र और स्वच्छ खड्गोसे भी पृथ्वी को ऐमा व्याप्त करदिया कि जैसे कमलोंसे शवल व्याप्त होताहै, महावली पांडव भीमसेनने सेनामें जाके कितनेही रथियोंको मर्दनकरके खड्ग से ध्वजाधारियों and necs orna.nents of elephants, banners, quivers, machinery bonis of Birts, fire weapons, goads, whips, bells, swords with gold handles and riders fallen do.rn on earth here and there. With the carcases of elephants the ground looked as if it was strewn over with That best of men cut and killed the clephants and horses. 57. Ho killed the best riders as well. Thus the battle was dreadful bct. ween your sons and the Panda vas. Various sorts of bridlos, golden trap pings, battle axes, tomars, prases, double edged srords, arrows, shields bedecked beds of great value were seen lying cut and mangled hero and othere. Ge. Besides theso the ground was strewn with othice weapons and bright swords like lilies on a tank. The l'anday Bhimsen of great prowess cutered the lists and cut down the chariothills and Som भीष्मपर्व Bhishma Part [41] पारयः । मुहुरूपततो दिक्षुधावतच यशस्विनः ॥ ६३ ॥ मागायचरतषि ध्यस्मयंत. रजनाः । ससधानपदाकांधिव्याक्षिप्यान्यानपोथयत् ॥६५॥ घरगे मापांबधि दनादेनागपांच मीपयन् । ऊरुवेगेन चाप्यन्यागातयामास भूतले ॥ ६५ ॥ अपरचना लोक्य भयावपशव मागताः। पवंसा बहुला सेना कलिंगानां तर्रास्यनाम् ॥ ६६ ॥ परिचार्य रणे भीष्म भीमसेन मुपादयत् । ततः कालिंग सन्या प्रमुख्ने भरतपम ६७॥ भुतायुष मभिप्रेक्ष्य भीमसेनः समभ्ययात् । तमायांत मभिप्रेक्ष्य कालिंगोनगिमारः ॥ ६८ ॥ भीमसेन ममेयात्मा प्रत्यविष्यास्तनांतरे । कालिंगयाणामि इतस्तोत्रादित इचारपः ॥ ६९ ॥ भीमसेनः प्रजस्वाल क्रोधेनामिरिधितः । अधाशीका समादाय रहम परिष्कृतम् ॥ ७० ॥ मैमसंपादयामास रपेनरयसारपिः । तमारघरवंतूर्ण कौतेयः शत्रसदनः ॥ ७१ ॥ कालिंगमाम दुदाय तिष्ठतिष्ठेति चारचीत् । तत श्रुतायु कोभी गिराया, युद्ध में उस उग्र रूपके वारम्बार इधर उधर दिशाओं में गिरते दौड़ते और चित्रमार्गोंमें घूमतेहुये को देखके मनुष्य बड़े आश्चर्य में हुये, किननोंको वोचरणोंहासे मारा कितीको सैंचकर मारा । ६३ । किसीको खड्ग से माग किमी को शन्दसे भयभीत किया किसीको जंघाओं के वेगसे पृथ्वीपर गिरायाइनसवातों को | देखतेहुये अन्यलोग बड़े भयातुर होकर भागगये, इमरीतिसे मरीकुटीवेगवान्कलिंगदेशि योंकी वडीसेना युद्ध में भीमनीको मध्यवर्ग करके भीमसेन के सम्मुख दौड़ी, तदनन्तर भीमसेन कलिंगकी सेनाके आगे श्रुतायुपको देखकर उसके सम्मुख गया उस वडे बुद्धिमान् कलिंगदेशीने भीमसेनको आताहुआ देखकर नवती से हृदयके मध्य में घायल किया, अंकुशसे पीड़ित हाथाके समान वाणोंसे घायल भीमसेन क्रोधसे पिसा अग्निरूप होगपा जैसे कि इंधनसे अग्नि प्रज्वलित होती है, तंदनन्तर रथियों में श्रेष्ठ अशोकने मनहरी अंगवाले रयको सायलेकर भीमसेनको सवार करवाया शत्रुहन्ता भीमसेन वढ़ी शीघ्रता से उसरथ पर चढ़कर । ७० 1 श्रुताधुपके सम्मुख दौड़ा और तिष्ठतिष्ठ शब्दको कहा, तदनन्तर अपनी इस्तलाघवताको दिखातेहुये eers and banners with his gyord. Seeing that dreadful forio again and again falling, running and roaming in various paths, the people vere much amazed. Some he killed with his feet, others he dragged down todeath. 63. Some he killed with his sword, others he frightered with his roar. Some he hurled down with the velocity of his legs, others fled in terror at the sight of these atrocities Thus des troyed and cut down, tho large army of the Kalingas, with Bhishm at their head, rushed upon Bhim.. Seeing Shrutayush in front of tho Kaling army, Bhim came upon him. That wise Kalinga, socing Bhimsen coming towards him, wounded him in the middle of the breast Like an elephant wounded by goad, Bhinisen rounded by the arrows, flew into a rage, as fire burns with dry wood. Then Asbok the best of warriors caused Bhimsen to mountàgolden charot.

4552] Nahabharat (४५५२) चल जान मीमापनिशितान् शरान् ॥ ७२ ॥ प्रेषया मास संकुद्धो दर्शयन् पाणिलाघवम्। सकार्मुकवरोत् एटपिभिनिशितैः शरैः ॥ ७३ ॥ समाहतो महाराज कालिंगेन महा स्मना । संचुकुशेभृशंभीमादेडाहतइयोग्गः ॥ ७४." क्रुद्धश्चचापमायम्य पलयद्वालिनां धरः । कालिंगमवधीत् पार्यों भीमः सप्तभि रायसैः ।। ७५ ॥ क्षुरापां चक्ररक्षौच कालिंगस्यमहायली । सत्यदेवं च सत्यंचप्राहणोद्यमसादनम् ॥ ७६ ॥ तत' पुनरमे थामा नाराचैनिशितैत्रिभिः । केतुमंतरणे भीमो गमयद्यमसादनम् ॥ ७७ ॥ ततःकलिं गाःसद्धा भीमसनममर्पणम् । अनायसाहौः क्षत्रियाः समधारयन् । ७८ ॥ ततः शकिगदा खड्गतोमरर्टि परश्वधैः । कलिंगाश्च ततो राजन् भीमसेनमवाकिरन्' ॥ ७९ ॥ संनिनार्य सतां घोराशरवृष्टि समुत्थिताम् । गदामादायतरसासनिपत्यमहा बलः ॥ ८॥ भीमः सप्तशतान् वीराननयद्यमसादनम् । पुनश्चैवद्विसाहनान् कलिंगान महाक्रोध रूप वळवान श्रुतायुपने बड़े तीक्ष्णवाणोंको भीमसेनकेऊपर फेंका, हेराजा श्रुतायुपके उत्तमधनुपसंछुटेहुये तीवनववाणोंसेघायल महाबली भीमसेन ऐसामहाक्रो: धितहुभा जैसे कि लकड़ी सेघायल.सर्प क्रोधित होताहै, पराक्रमियोंमें श्रेष्ठ क्रोधित भीमसेन नेवड़ेभारी धनुपको चढ़ाकर, सातलोहेकेवाणोंसे श्रुतायुपकोमारा ७४। और वाणों सेही श्रुतायुके दोनों महावलीपायोंके रक्षकसत्यदेव और सत्पको यमलोक भेना । ७५ । इसके पीछे महा साहसी भीमसेन ने तीवनाराचोंसे केतुमन्तको यम | लोकमें पहुंचाया फिर कलिंग देशी क्षत्रियों ने अत्यन्त क्रोधित होकर हजारों सेनाओं से उस क्रोधित भीमसेन को लड़ाया तदनन्तर हे राजा सैकड़ों कलिंग देशियोंने यरछी गदा खड्ग तोमर दुधाराखड्ग और परशों के द्वारा भीमसेन को रोका, तब भीमसेन ने उनको और उनके वाण समूहों को बहुत अच्छी रीति से रोककर, गदाहाथ में लिये बड़ी तीव्रतासे दौड़कर सातसौ वोरोंको यमलोक में पहुंचाया। ८० । फिर उसी शत्रुहन्ताने कलिंग देशियों के दोहजार वारों को Bhim attached Shrutryush with a cry of 'stand stand' Then showing his skill of hand Shrutnyush in grout anger wounded Bhimsen of great proness with his arrows. This mondo Bhimsen angry like a scrpente hit by n stick. Bhimsen of great prowess in the excess or anger, pierced Shrutnyush with scven steel arrons shot from his hugo low.7h. With two airons he hilled Satyadev and Satya tho tro ponerſul guards of Shrutnyu. it. Then with three sharp arrows Blıimsen of great promess Lilled Kelumant. Tlio keliatryas of Kaling attacked Bhinsen in great numbers and linried at him hundreds of spear, maces,swords, tomars, doublo edged swordy and ares: Bhimsen cliccked tho shus er of tlicir weapons and arron's very bravely and rushing upon thcm, mace in land, hillod seren liundred of the Kaling warriors in n short time. 80. Then tho destroyer of enemies killed tva [4353 HITATU Blushma Paiv (४५५३) रिमानः ॥ ८॥ प्राहि गोन्मृत्यु लोकायतददभुत मिगभवत् । एपं सतान्यनीकानि कलिंगानां पुनः पुन: ॥ ८२ ॥ विभेदसमरे तूर्ण प्रेक्ष्यमाम महारथम् । हसारोहा. चमातंगा पाडवेन कृतारणे ॥ ८३ ॥ विप्रजगमरनाकपु मेघाघात इताइघ । मुरनंत: स्थान्यमीकानि विनदत'शरातुरा' ॥ ८४ ॥ ततो मीमो महाराहः सदगहस्तोमहाभुजः। संप्रष्टो महाघाप शलंप्रामाण्याली ॥५॥ सर्व कालिंग सन्यानां मनांसि समरूप यत् । मोहनापि कलिंगानामा विवेशपरंतप ।। ८६ ॥ प्राकपतच सन्यानि चाहना निसर्गश भीमेन समरे राजन् गजेदेणेघसर्यश. ॥ ८७ ॥ मार्गान यहून विधरता घावताच ततस्ततः । मुहुरुपतराय संमोहः समपद्यत ॥ ८८ ॥ भीमसेन भयत्रस्तं कालवश किया यह बड़ा माश्चर्पसा हुआ, इसप्रकार उसमयानक पराक्रमी महावीर भीमन ने' कलिंग देशियों की उन सेनाओंको युद्धमें पारंवार भगाया और असंख्य हाथियों को सवारों से रहित किया फिर वह हाथीभी वाणों से पीडित होकर अपनी सेना को मारते वृंदते अत्यन्त गर्नते हुए सेनाके मध्य में से ऐमे भाग गये से कि वायु से टक्कर खाये हुए वादल इधर उधर होनाते है । ८३ । तदनन्तर खड्गहाथ में लिये महाबली, अत्यन्त प्रसन्न चित्त भीममेन ने बड़े घोर शंखको बजाकर मय कलिंग देशी सेना के हृदयको कंपाया, हे परन्तप धृतराष्ट्र कालिंग देशियों में मोह पैराहा मौर सवारियों समेत सब सेना के लोग अत्यन्त भयभीतहुए, युद्धमें सब ओर से गजेंद्र के समान मार्गोमें घूमते और जहां तहां सब दौड़ते अथवा बारम्बार उछलते भामसन के देखने से बड़ामोह अर्थात् विहलता माप्तहुई : ८७ । वह सेना भीमसेन के भयप्ते ऐसी अत्यन्त कम्पायमान हुई जसे बड़े ग्राहसे पीडित सरोवरहोताहै, भीमसेन से कौरवोंके भयभीत होनसे और चारों ओरमे उनकालिंग देशियों के लौटने और भागजाने पर पाण्डवों के मेना पति ने . thousand variors of tho Kalingas, causing wonder to all Thus, Bhimsen of die ultūl (ccals, gain and again, routed the Ealing army and male numerous elephants niderless. The elephants, rounded by arrows, iled through tlie midst of thou my tiampling donn the soldiers and shiricking, and vanished libo clouds propelled by the wind 8. I ben, sword in hand, that great warrio blex his conch in the excess of cheer and shook to hearts of the Kalingas. They became faint hcarted and all tho peop'o of the ai my with their beasts were much frightened Roaning like the prince of elephants in the way and running hitler and thither, with occasional Jumps and bouuds, Bhimsen was the cause of unensiness to all The army trembled with tho fear of Blunnsen lihe : lahe agitated luy a large crocolile. When the Kauravas were so amo struck by Bhna and the Kalingas were running away or turping bach, the leader of the Pandrs army [4554] Mahabharat (४५५४ सैन्यंच समयत 7-क्षोन्यमाणमसंबाचं माहेणेव महत्सरः ॥ ८९, शासितेथेच सर्वेपु भीमनाद्भुत कर्मणा । पुनरावर्तमानेषु विद्रवरमुच सघशः ॥९॥ सर्घकालैंग योघे पांडूनांध्यजनीपतिः । अत्रवीत् स्वान्यनीकानि युध्यध्यमिति पार्षतः ॥ ९१ n सेनापति पचः श्रुत्वा शिखण्डि प्रमुखागगा। भीममेवाभ्यवर्तत रपानीकैः प्रहारिभिः ॥,९९ ॥ धर्मराजवतान् सर्या नुपजग्राह पांडवः । महतामेध वर्णन नागानीकेनपृष्ठतः ॥ ९३॥ एवं सनोधसर्वागि स्वान्यनीकानि पार्पतः भीमसेनस्य जग्राह पाणि सत्यु रुपैर्वृतः ॥ ९४ ॥ नहि पंचालराजस्य लोकेकश्चन विद्यते । भीम सात्यायोन्यः प्राणेश्यः प्रियकृत्तमः ॥ ९५ ॥ सोपश्यचकलिंगषुचरंतमारंसूदनः । भीमसेनं महाबाई पार्पतः पावीरहा ॥ ९६ ॥ नगर्द पहुधा राजन् हएश्वासात्परंतपः । शहंदध्मौच समरे सिंहनादं ननादच ॥ ९७ ॥ सवपारावतीश्वस्यरथेहेम परिष्कृते। कोविदारम्बजे दृष्ट्या भीमसेनः समाश्वसत् ॥ ९८॥ धृष्टद्युम्नस्तुतदृष्ट्वा कालैंगैः समभिद्रुतम् । म मसनम, आज्ञादी कि तुमभी लड़ो। ९० । हे भरतवंशी शिखण्डी जिनमें उत्तम, वहभेना सेनापातके वचनको सुनकर, प्रहारकर्ता रधियों समेत भाममेनके पास पर्चमान हुई, और धर्मराज यु धष्ठिर ने मेवाण हाथियों की वही सेना समेत पीछे की ओर से उन सबको रक्षित किया इमरीतिसे धृष्टद्युम्न सेनापति ने अपनी सब सेना को चलाकर अच्छे पुरुषों समेत भीमसेनके पृष्ठमाग को क्षित किया:इम लोक | में भीमसेन और सात्यकी के सिवाय पाचालेश राजाधृष्टद्युम्नकों कोई अन्य प्राणों से प्यारा नहीं है वह शत्रुहन्ता धृष्टद्युम्न कलिंगोंके मध्यमें घुमतेहुएं महावाह ममिको देखकर सवओर को गर्ज कर महा प्रसन्न हुआ । १६ । फिर उनसे युद्धमें शंखको वाकर महा सिंहनाद को किया तब वह भीमसेन उस कपोत के समान घोड़ों | युक्तं मुवर्णसे मंडित रयपर कचनार क्षकीबजाधारी को बैठाहुआदेखकर विश्वास पुक्त हुआ और यहसाहसी धृष्टद्युम्न उन कलिंग देशियोंको भीममनकी भोर .दौड़ते देखकर उसकी रताके लिये युद्ध में घुनकर उसके पास आया तबउन महासाहसी धृष्टद्युम्न और भीमसेन दोनों पारी को कलिंग देशकी सेना दूरमे युद्धमें वर्तमान देखकर ordered his inen to make an assault.90 The army led by Shikhandi the best of leaders approsched Bhinsen and his fighting chariotairs Yudhishthir the just, with a large army of elepbants, protected the re:. Thus Dhrishtadyumns moved his whole arms and protected Bhim from the back. The prince of Panchal Dhrshtadyumuns lored nune so dearly as he did Bumsen and Satyab. Seeing Bhiw tle great warrior, roaming in the midst of the halings, Dhrishtadyumns the destroyer of encules mared loudly will a cheerful heart. 96 Fle blue lis cunch in the field of battle and ruind a loud roar. Bhinscu tusk courage at the sight of that warnor seatud on his golden clario: drama by hors of the colour of pawns with his banner ifal bigh on a nnlınar ink: Sxing the Kulinas rith Bhiinen ranging ia - भीष्मपर्व Bhishma Pary [40051 मेयामा प्राणायाजो समस्ययात् ॥ ९९ ॥ तौद्रात् सात्या दृष्ट्वा धृष्टद्युम्न कोदरी। कलिंगान् समरेवारी योधयेतामनस्थिनी ॥ १० ॥ स तत्र गत्या शैनेया अवेनजयां घर । पार्धपार्पतयो पाणि जग्गाहपुरुषर्षभ. ॥ १.१ ॥ स रवा दारुणं फर्म प्रगृहीत शासन मास्थिती रौद्र मात्मान कलिंगानन्यवैतत ॥ २॥ कलिंग प्रमयांचव मांसदो .णितकर्दमा । धिरस्यदिनी तत्र भीम प्रातयनदीं ॥ ३॥ अन्तरेण कलिंगानां पाड वामांच वाहिनी। तासन्ततारटुस्तारा भीमसेनो। महायल ॥४॥ भीमसेन तपादृष्ट्या मानोरास्तावकानृप । कालोय भीमरूपण कलिगः सहयुद्धद्यते ॥ ५ ॥तत शांतनको भीष्म. श्रुत्वात निनदरणे । अभ्ययात्वरितो भीम व्यूढानीक समतत. ॥६॥ संसात्य किर्भीमसेनो धृष्टद्युम्नश्च पार्वत । अभ्य द्रवत भीमस्य रप हेमपरिष्यातम् ॥ ७॥ महा भगति हुई फिर उस शीघ्रगामियों में श्रेष्ठ सात्यकि ने वहां जाकर भीमसेन और धृष्टद्युम्नकी पृष्ठकोराक्षत किया और बड़ी धनुपधारी सेना को मारकर भपानक रूपमें नियतहुआ और भीममेन ने कलिंग देशियों से उत्पन्न रुधिर झपकीचसे भरी हुई, रघिर के बहने बाली नदीको जारी किया इसी अन्तर में महाबली भीमसेन कलिंगदेशीय औरपांडवोंकी महादुर्गम सेनाको अच्छेमकारमे तरगया।१०। हे राजा तब तुम्हारी सेना के लोग भीमसेनको देखकर पुकारे कि यह काल पुरुष भीमरूप से कलिंगादेशियों के माथ हडता है तदनन्तर शान्तनु भीमजी युद्ध में उस शब्दको सुनकर सेनाको चारों ओरसे तयार करके वड़ी शीघ्रता से सेना के सम्मुख आये उनको प्राते हुये देखकर मात्यकी व भीमसेन और धृष्टद्युम्न भीप्मनी के रयके सम्बर दौड़े और सबो ने बड़ी शीघ्रता से गंगा पुत्र भीमजी को चारों ओरसे घेरकर तीनरशीघ्रगामी वाणोंसे घायलकिया।१०६फिर आपके पिता देवत्रतभीष्मनी ने उन सब उपाय करनेगले बड़े धनुप धारियों को सीधे चलने वाले तीनर वाणों their wudet, brave Durish ladyucan entered the list of warriors and came to the help of Bhim Tlie Kaling army was exceedingly terrified at the sight of those two great trarriors, Bhim'en aod Dbrishta dyumna Satyaki the foremost of agile warriors, protec ed the tro warriors on the back and stocd there billing the enemies from behind Blum produced 8 st eam of blood from the bodi-s of the Ka joga Wartors apd croseed over the impregnable ames of the Pardaras and Kalinghe, 302. Then the people of your army cried out, "This dreadful warrior Brom br ngs death to the Ralny warriors." Henring these word in the Held of battle, Bhishma rallies hus forces from all sides and led them there Satyaklı Bhrosen and Dlırı-litudyamni ran on to meet the chariot of Bhishin as soon as they saw him With great rapidity they surrounded the son of Ganga on a'l sides and each of then ple-cal him with tiro ship 2013 th n po ir father 106.

- .. [4556] Mahabharat (४५५६) परिवायतु ते सर्वे गांगेयं तरसारणे । त्रिभिात्रभिः शरैोरीष्ममानछुरोजसा ॥ ८ ॥ प्रत्यविध्यत तान् सर्वान् पितादेव व्रतस्तव । यतमानान्महेवासास्त्रिभित्रिीमरीजलगैः ॥ ९ ॥ ततः शरसहस्रेण सनिवार्य महारथान् । हयान् कांचन'सन्नाहान् 'भीमस्य न्यहनच्छरैः ॥ ११० । हताश्वे सरथे तिष्ठन् भीमसेनः प्रतापवान् । शक्तिचिक्षेप तरसागांगेयस्य रथप्रनि ॥ ११ ॥ अप्राप्तामथतां शक्तिं पितादेवं व्रतस्तष । त्रिधावि च्छेदसमरे सापृथिव्यामशीर्यत ॥ १२ ॥ तत शैक्यायसींगुर्थी गृहबलवान्गदाम् । भीमसेनस्ततस्तूर्णं पुप्छवे गनजर्पभ ॥ १३ ॥ सात्यकोपि ततस्तूर्ण भीमस्य प्रियका- म्यया । गांगेय सारथि तूर्ण पातयामास सायकैः ॥ १४ ॥ भामस्तु निहतेतस्मिन् सारयो रथिनांवरः । याताय मानस्तैर श्वैरपनीतो रणाजिरात् ॥ १५ ॥ भीमसन स्ततो राजन्नपयाते महावते । प्रजज्वाल यथा वहनिर्दहन्कक्षामवेधितः ॥ १६ ॥ से घायल किया तिसके पीछे हजार वाणों से उन महारथियों को रोककर सुनारी कवचरूप वस्त्रों से अलंकृत भीमसेन के.घोड़ों को वाणों से मारा, फिर मृतक घोड़े वाले रथपर नियत मतापवान् भीमसेन ने बड़ी तीव्रतासे भप्मिजी के रथपर उग्रवरछी को फेंका।१०१। फिर आपके पिता देवत्रतने उस न पहुंची हुई वरछीको वीचही मेंदो खंड करके पृथ्वी में गिरादिया तदनन्तर पुरुपोत्तम भीमसेन बड़ी शीघ्रता से शक्या यशी बड़ीगदाको लेकररथसे कदा॥११॥और महारथी धृष्टद्युम्न उसको अपने स्थपर सवार करके सब सेनाके देखते हुए दूर लेगया तदनन्तर सात्यकी ने भी भीमसेन के अभीष्ट के लिये शीघ्रही शायकों से कोरवों के पितामह भीष्मजी के सारथीको रंथमे गिराया उस सारथी के मरने पर रथियों में श्रेष्ठ भीष्मजीभी जन वायु के समान शीघ्रगामी घोडों के द्वारा युद्धभूमि से दूर चले गये तदनन्तर हे राजा उस महारथी भीमके दुरचले जाने पर भीमसेन को ऐसा महाफॉप उत्पन्न हुमा जैसे कि वनको जलाने वाली अग्नि प्रचंडहोती है और सब कलिंग देशियों को Devabrat Blushıon pounded carl of then with thee slarp and checking them all with a thouwid arrow le Wed B!!im's horses decked with gold nrmou and trapp ngs. And from his lio1 seless cliariot Bhim burlej a diourful spear at Blushi 109. ''You father Devabiat cut the spea.m two pieces bofo e it bad reaclicl hin. Clicrcupon }}lum jumped down from the charict with the mace in his hnnu. Dhirislıtadyumna tool Bhru on lus o un chariot and vent away with liina further away Bhishma's chuiot and Cheshm diose luis horses, swift as the mind, To please Bhim Satyali killed' tlio diiver of far from the field of battlc. After the departure of that great war. jor, Blumm f.ew into a rago like fire in a burning fo:est and enteral thio Kulmy army intending to destroy all None of your warriors could Inco Blim at that time, 116, Tlien Blum tho Lestor tlo descend amro - (४५५७) Fraga Bhislıma Pary [ 4557] सहत्वा सर्व कालिंगान सेनामध्ये म्यांतष्ठत। नैनमायुत् सहन केचित्ताच कामरतपंभ ॥ १७ ॥ धृष्टद्युम्नस्तमारोऽप्य स्वरथे राधनांवरः । पश्यतां सर्य सैन्यानामयाद परा स्थिनम् ॥ १८ ॥ संपूज्यमानः पांचाल्र्मस्पैश्च भरतर्षभ । घृष्टद्युम्नपरिष्यस्य समे यादय सात्यकि । १९॥ अथाप्रबद्रीम सेनं सायकिः सत्यांचनमः । प्रहर्षयन् यदुव्यानो धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ॥ १२०॥ दिल्या कालिंग राजश्व राजपुप्रय फेतुमान् । राक्रदेवध कालिंग कलिंगाच मृघेहताः ॥ २१ ॥षया पलायण नागाश्वरथ कुंळ::महापुरुष भूयिष्ठो घोरयोघ निपेवितः ॥ २२ ॥ महायुदः कलिंगाना मेकेनमृदितस्त्वषा । एवमुफ्त्याशिनतादीर्घयारिदम.२३ प्ररथाद्यमाभिनुप' | पर्यग्वजत :पांडवम् ततः परपमास्पाय पुनरे यमहारथः । तायकान चोकदो भीमस्य घलमादधत् ॥ १२४ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीमवधप० द्वितीय युद्ध दिवसे कलिंग रामवधे चतुप्पंचा शत्तमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥ मारकर सेना में आगया, हे भरतवंशी आपका कोई वार इसके सम्मुख होनेको समर्थ नहीं हुआ।११। फिर भरतं वंशियोंमें श्रेष्ट भीमसेन पांचाल और मत्स्यदेशियोंसे अच्छी रीति प्रशंसितं धृष्टद्युम्न को छोड़कर सात्यकी से मिला तदनन्तर यादवों में श्रेष्ठ सत्य पराक्रमी : सात्याकै धृष्टद्युम्न के देखते हुए भीमसेनको प्रशंसा करके यह वचन बोला कि प्रारब्धसे राजा कलिंग और राजकुमार केतुमान् और कलिंगदेशी शक्रदेव और अन्य संब'कलिंगदेशी लोग युद्ध में मारेगये सो तुम अकेलेनेही अपने भुंजवलके पराक्रम से कलिंग देशियों के घोड़े 'हाथी और रयोंसे संकुल महापली शुरवीरोसे सेवित महान्यूहकों मरदन ११२० किया, शत्रुओंका जीतनेवाला और लम्बी 'भुजावाला सात्विकी इस प्रकार कहकर उस स्थपर नियत पांडवों के पास जाकर मिला, तदनन्तर उस क्रोधसे भरे सात्यकि ने भी आपकी सेना के मनुष्योंको मारा और भीमसेनकी सेना को रक्षित किया ॥ १२४ ants of Bharat, praised by the people of Blatsya ane Panchal, left Dliislatadyumuna and came to Satyaki. Satyaši of true protress, The best of the Yadaras, praised Bhim in the presence of Dhrishts. dyanina and said: "It var by fate that the king of Kaling, prince Keloman and Shakrader and other Kalingas were killed in the field *of battle. You alone' have by the prowess of your aring killed all the Kalings together witlt the chariots, horses and elephants."1:0. Bear. ing this, Satyaki of long arms drore in his chariot to the Paodavas and bic too, destroyed the people of your army in a great rage and protected the aring of Bhimsca. 124.

[4558 ] Malabharat (४५५८) संजय उवाच । गतपूर्वाहण भूयिष्ठे तस्मिन्नहनि भारत । रथनागाध्य पत्तै नांसा दिनांच महाक्षये ॥ १ ॥ द्रोण पुत्रेण शल्येन कृपणच "महात्मना । समसजता चाय स्त्रिाभरत महारथैः ॥ २ ॥ सलोक पिदितानश्वानिजधान महाबलः । द्रोणे। पांचालदायादःशितैर्दशभिण्शुगैः ॥ ३ ॥ ततः शल्य रयतूर्ण मास्थाय हतवाहनः । 'द्रीणि पांचालदायाद मायघर्ष दधेपुभिः ॥ ४ ॥ धृष्टद्युम्नंतु सयुक्त गिनायीक्ष्य भारत । सौभद्रोम्यपतत्तूण विकिरनिशितान् शरान् ॥ ५ ॥ सशल्यं । पंचविंशः त्यालगंच नवभिः शरैः। अश्वत्थामान मष्टाभिर्विव्याघा पुरुषर्पम ॥ ६॥ मार्जुनितु ततस्तूर्ण द्रौणिर्विघ्याध पत्रिणा । शल्योध दशमिवैध पश्चानतिनिभिः॥ ७ ॥ अध्याय ॥ ५५॥ । संजयबोले हे भरतवंशी उस-मध्याह्न के अन्तहोनेपर स्यघोड़े. हायी और सवार पैदलों के बड़े नाशहोने पर ,धृष्टद्युम्न अकेला ही, अश्वत्थामा शल्य और महात्मा कृपाचार्य इन तीनों महावलियों के सम्मख .हुआ, और बड़ी शीघतासे वीन और शीघ्रगामी वाणों से, अश्वत्थामा के प्रसिद्ध.घोड़ोंको सारा तदनन्तर मृतक | घोड़ेवाला अश्वत्थामा बहुतशीघ्र शल्पके स्थपर चढ़कर.उसी रीतिसे वाणसंयुक्त होकर धृष्टद्युम्न के सम्मुखहुआ. हे भरतवंशी सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु अश्वत्थामा से भिड़ेहुए धृष्टद्युम्न को देखकर बड़े तीव्र वार्णोको फेंकताहमा शीघंही सम्मुख दोड़ा, और वहां जाकर उस अभिमन्युने शल्यको.पच्चीसवाणोंसे कृपाचार्यको नी पाणों से और अश्वत्थामा को आठवाणोंसे घायल किया, ६। इसके पीछे अर्जनके पुत्र अभिमन्युको अश्वत्थामा ने एकवाण से शल्पने,वारह वाणों से और कंपाचार्य . CILAPTER 1. V "In the afternoon," said Sanjaya, "after the great destruction of chaziots, laissea, clephants and soldiers Dbrıshtadyumna alıne faced Aslie wathamn, Shalya and g cai Kupacharya nnd nith, great dexterity destroyed the famous hi fes of Ashwathinma Ashwathamn, shen his horses were killed, mounted the chariot of Shalya and faced Dhria shitidyunnnAblum nyu the con of Sabhadra snx Dhrish tadyumon fighting with Ashwathain and at once came there shooting sharp Ho sounded Shalya with twenty five arions, Kripacharz a trith nine and Ashwathama with eight. c. Then, Ibhimanyu, the arrans । ध्यत । - भीष्मपर्व Bhishma Pary [4569 लक्ष्मणस्तवपत्रिस्तु, सौमद समयस्थितम् । अभ्यवर्तत सह एस्ततो युद्धमवर्तत ॥८॥ दोर्योधनि उसकुद्ध सौभद्र परवीरहा । चिन्याय समरे राजस्तदभुग मियाभवत् ॥९॥ अभिमन्युःसुसंकद्धो भ्रातर भरतपंम । शरै पंचाशते राजन् क्षिप्रष्टस्तोऽभ्यवि लक्ष्मणोषि पनस्तस्य धन बच्छेदपनिणा । मटिवेश महाराजततरते चुकशुजना" तीहार्य धनु छन त भद्र परवरिहा । अन्यदादत्तवाविनं कार्मक_गवत्तम ॥ १२ ॥ तो तब समरे युक्ती सतप्रात कृतषिों । अन्योन्यविशि. बस्तीदगर्जप्रतुः पुरुषर्षभौ ॥ १३ ॥ ततो दुर्योधनों राजा दृष्टया पुनमहारयम् । पीडितं तच पौत्रेण प्रायात्तत्र प्रजेश्वरः ॥ १६ । सन्निवृत्तेतयाते सर्व एवजना धिपा । आर्जुनि रियशन सतारधारयन् ॥ १५॥ सतपरिवृतःशूरैः शूरोयु ने तान. तीक्ष्णवाणों से घायल किया, फिर आपका पोता लक्ष्मण उम सम्मुख आये हुये अभिमन्यु को देखकर महाकोपित होकर उसके भागे वर्तमान हुआ और उनदोनोंका बड़ा:यद्ध हुआ. हे राजा इसके पीछे महाबोधी दुर्योधन के पुत्र ने युद्ध में उस सुभद्रा के पुत्रको तत्रियाणों से घायल किया यह आश्चर्यसा हुआ हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ फिर-उस क्रोधरूप अभिमन्यु ने अपनी हस्तलाघवता से शीघ्रदीपांचसौ वाणोंसे भाई लक्ष्मणकोघायलकिया ।१०। फिरलक्ष्मणनेभी एकवाण से उसके घनुपको मुष्ट, देश से काटा इसकारण से मनुष्यों ने बड़ा शब्द किया, फिर वीर शत्रुहन्ता,अभिमन्यने उस दृट् हुए धनुपको छोड़कर बड़े वेगवान जड़ाऊ धनुषको हाथमें लिया,फिर युद्धकर्म में प्रवृत्त द्वन्द्रयुद्ध करने वाले दोनों पुरुषोत्तमों ने तीक्ष्णधार वाले वाणों से परम्पर एकको एकने घायल किया, इसके पीछे महा राजा दुर्योधन अपने महाबली पुत्रको आपके-पीतेसे पीडामान देखकर वहां आया फिर आपके पुत्र के अलग, होनाने-पर- सब राजालोगों ने रथोंके समूहों समेत अर्जुनके पुत्र अभिमन्युको राका ।१५। हे राजा युद्ध में अजेय श्रीकृष्णजी के समाने son of Arjud nas hit by one arrow of Ashwathama's, twelve of Sha. lya's and three sharp enes of Kripacharya. Your grandson Lakshman, seeing the adyanco of Abhinangu attacked him in great anger. Both the warriors fought bravely. The enraged son of Duryodhan wounded the son of Subhadra with sharp arrows and did wonders. Abhimanyu was thereupon much enraged and wounded his coun Lakshman by dexterously shooting five hundred artons at him. 10 Laksliman cut desen the love of Abhimanyu by an arrow to the Acclamation of the people. ·Brare Abhimanyu dropped that bow and took up another, decked with gems. Both the warriors roundbattle. Panca Duryodhan, scting his con in trouble at the hands of Abhimanyu, came there and with innumerable chariots the kings checked Abhimanyu the son of Arjun. 15. cd each other ॥ - [45601 Mahabharat (५५६०) धिसुदुर्जयैः । नरमप्रव्ययते राजन् कृष्णतुल्य पराक्रमः ॥ १६ ॥ सौभद्रमथसंसक्तं दृष्ट्वा तत्र धनंजयः । अभिदुद्रायवेगेन त्रातुकामः स्वमात्मजम् ॥ १७ ॥ ततः सरयनागा भ्वाभीमद्रोणपुगेगमा । अभ्यवर्तत राजानः सहिताः सव्यसाचिनम् । उत सहसा भौम नागाश्वरयपत्तिमिः । दिधाकररथं प्राप्यरजस्तीप्रमदृश्यः ॥१९॥ तानिनांग सहस्त्राणि भामपाल शतानिच । तस्य पाणपथं प्राप्य नाभ्यवर्ततसर्वशः ॥ २० ॥ प्रणेदुः सर्वभूतान बभूवुस्तिमिरादिशः । कुरूणांचानपस्तीत्रः समदृश्यत दारुणः ॥ २१ ॥ नाप्य तरिक्षं नदिशो नभूमिनचभास्करः । प्रजनेभरतश्रेष्ठ शस्त्रप्तयः किरीटिनः ॥ २२ ॥ सादिता रथनागाश्च हताश्वारथिनोरणे, ; विद्रुतरथा केचि दृश्यते रथयूथपाः ॥ २३ ॥ विरथा रथिनश्चान्ये घायमानाः, समंततः। तत्रतत्रैव दृश्यते सायुधाः सांगदैर्भुजैः ॥ २४ ॥ हयारोहाहयांस्त्यक्त्वा गजागेहांश्चदतिनः । पराक्रमी शूरवीर अभिमन्यु उनशूरों से घिरा हुआ भी व्याकुल नहीं हुआ, तदन न्तर अर्जुन वहां अभिमन्युको भिड़ाहुआ देखकर अत्यन्त क्रोधित होकर अपने पुत्रकी रक्षा करनेको सम्मुख दौड़ा तदनन्तर स्थ घोड़े और हाथियों समेत वह राजा लोग | जिनमें 'अग्रगामी भीष्म और द्रोणाचार्य थे अकस्मात आकर अर्जुन के सम्मुख | वर्तमान हुए। १८ । मनुष्य घोड़े और रथोंके चलने से एको एक पृथ्वी से धल उड़ी 'और सूर्य के मार्गको पाकर तेज दिखाईदी वह हजारों हाथों और राजा लोग उस अर्जुनके वाणों के मार्गको पाकर सवरीतों से सम्मुख वर्तमान नहीं रहे । २० । सब जीवजन्तु पुकारे और दिशाओं में अन्धकारटुमा भौर कौरवोंका अन्यायरूंप भयानक फल उत्पन्न हुमा हे नरोत्तस मुकट धारी अर्जुनके वाणों से अन्तरिक्ष अर्थात पृथ्वी और प्राकाश के मध्य में दिशा पृथ्वी और सूर्य नहीं दिखाई दिये हाथों ध्वजाओं से रहित हुए और असंख्यों रथी मृतक घोड़े वाले हुए और कोई महारथी ऐसे दृष्ट पड़े कि जिनके रथी भाग गये कह रथी लोग अपने रयों से रहित शस्त्र और | वाजूयन्दों समेत इधर उधर दौड़ते हुए जहां तहां दिखाई देते थे हे राजा भर्जुनके querable in inttle, like shreo Krishn in progress bravo Abhimanyu, surrounded by those warriors, did not lose heart. Seoing his fori 80 surrounded, Arjun hastened to protect him. With chariots, livrses and clephants tho kings led by Bhishm and Dronnchnryn, oppoxi Arjun. 18. Men, horses and chariots, moving together, 'caused a storm of dust which rose to tho siln. The kings with all their armay, of clephonts could not withstand Arjun's ariowe tures criol out with far and there was darkness in all diroction, showing tho truit of the injustice of the Kaurarns 'Tho carth and firmanent tras covered with Arijan's arrows; the elephants bochnia destituto of hannors atl numerous cliariots lost their horses. Some warriors lost their chariot driven others lost chariots and pero sech roaming this my or that, with reapons and armonr on. The riders of - 20. All the creu ४५६१) भीमपर्य Bhishma Pary [4501) अर्जुनस्य मया राजन् समंताद्विपदुद्युः ॥ २५ ॥ रथेयश्च गजेभ्यश्च येम्यध नराधिपाः पतिताः पात्यमाना दृश्यतर्जुनसायकैः ॥ २६ ॥ स गदानुद्यतान याइन् स खांश्च विशांपते । स प्रासांश्च स तूणीरान् स शरान् स शरासनान ॥ २७ ॥ सांकृशान् स पताकांध तर तमार्जुनोनृणां । निचकशरैरप्रै रौद्रंयपुरधार यत् ॥ २८ ॥ परियाणां प्रदीप्ता मुद्गराणांच मारिप । प्रासानां मिदिपालानां निनिशानांच संयुगे ॥ २९ ॥ परश्वधानां तीक्ष्णानां तोमराणांच भारत । धर्मगां पापविद्धानां कांचनानांचभूमिप ॥ ३० ॥ ध्यजानांचर्मणांचव व्यजनानांच सर्वशः। छत्राणाहम दंडानां तोमराणांच भारत ॥ ३१ ॥ प्रतोदानांच योक्राणांकशानांचैव मारिप । संशयास्मानश्यते दिनिकीरणक्षिती ॥ ३२ ॥ नासीत्तम पुमान्फ- वित्तप सन्यस्यभारत । योऽर्जुनं समरे शूरं प्रत्युद्यायाकथंचन ॥ ३३ ॥ पोपोधि समरेपार्थ प्रयुधातिविशांपते । ससंख्येविशिस्तीक्ष्णः परलोकापनीयते ॥ ३४ ॥ भयसे घोड़े के सवार घोड़ों को और हाथी के सवार हाथियों को त्याग करके | चारोंपोरसे भागे।२५। और बहुतसे गजालोग अर्जुनके वाणोंमे रथहाथी और घोड़ों से गिराये वा गिरते हुए दृष्ट पड़ते थे हे रागा अर्जुन ने जहां तहां गदा समेत उठाये हुए और खड्ग पराश. तूणीर वांण धनुष इत्यादि को उठाये हुए अथवा अंकुश और पताकाओं समेत उठाये हुए मनुप्यों की भुजाओं को अपने कराल घागों.से काटकर रुद्ररूप धारण किया । हे भरतर्षभ धृतराष्ट्र युद्ध में कटे हुए परिघ, मुद्गर प्राश भिदिपाल खड्ग तक्षिण परसे तोमर औरधनुपसे काटेहुए सुनहरी कवचभी हजारों पृथ्वीपर पड़े हुए दृष्ट आये और सवप्रकारकी ध्वजा ढाल पंखे और सुनहरी दंडवाले छत्र तोमर चाबुक कोडे और रस्तियों के हेरॉके ढेर युद्ध भूमि में फैले हुए दिखाई दिये ॥३॥हे श्रेष्ठ आपकी सेनाका कोई मनुष्यभी ऐमा न हुआ जो युद्धमें उसशूरवीर अर्जुन के सम्मुख जाय हे राजा युद्ध में जो २ अर्जुनके सम्मुस जाता है वह वाणों के द्वारा यमपुर को भेजा जाता है सब ति से आपके शूरों के भागनाने पर अर्जुन और वासु elnhants and horses. lost their beasts ansi fel incufferuntumtions.25 And many kings, hit by Arjan's arrosts, were seen falling from their chariots, horses or elepliants. Arjun assamed dreadful form 3s hic cut down the hands which nere in the act of raising maces, swords, quivers, arrows, Lors, goads or lanners. There were scen on the field of battle thousaods of cluls, maces, swords, sharp arrows and golden armour pierced through by Arjun's arrows. All sorts of Banners, shields, fans aud umbrellas with gold handles, whips and ropes were seen in heaps on the field of battle,32. Not a single warrior Four army could face Arjun in the field of I atule. Whoever came in Arjun's way, was sent to the region of Yam by Arjun's arrors. When your army tras thus routed, both Shree lirisho and Arjan sounded their good Conch shells. Your father Darabrat, secingg of [4562 ] Maha bliant तेपुचिद्रयमाणेषु तवयोधेपुमर्वशः । अर्जुनो वासुदेवच दमतर्वारिजोत्तमौ ॥ ३५॥ तत्प्रभवलं दृष्ट्वा पिनादेवव्रतम्तय । अनधीत्समरे शूर भारद्धाजस्मयनिय ॥ ३६॥ एपपांडु सुतोचीर कृष्णगसहितोवली । तपा करोति सैन्यानि यथाकुर्याद्धगजय । ॥ ३७ ॥ नहोप समरे शस्यो विजेतुहि कवचन । यथास्यदृश्यते का कालातकयमोपम ॥ ३८ ॥ ननिवर्तयितुं चापि भयेय महतीचम् । अन्योन्य प्रेक्षपापश्य द्रवतीयं वरूथिनी ॥ ३९ ॥ एप चारतं गिरिष्ठ भानुमान प्रतिपद्यते । चक्षुपि सर्वलोफस्प संहरशिव सर्वथा ॥ ४० ॥ तनावहार सप्राप्त मन्येष्ठ पुरपर्मभी थाताभीतान नोयोधानयोतयतिकथचन ॥४१॥ एवमुक्या ततो भीमो द्रोणमाचार्यसत्तमम् । अपहारमधोचके तलवकानां महारथः ॥ ४२ ॥ ततावहार, सन्यानां तयतेपाचभा रत । अस्तगच्छतिसूर्येऽभूत्सध्याकालेच वर्तति ॥ ४३ ॥ इतिश्री महाभारते भीष्मपर्वाण भीष्मवधणि द्वितीययुद्ध दिवसा बहारे पंचपंचाशत्तमोऽध्याय ॥ ५५ । देवजी ने उत्तम शंखोंको वजाया फिर आपके पिता देवव्रत उस सेनाको भागाहुआ देखकर बड़ा आश्चर्य करके युद्ध में महा शूरवीर द्रोणाचार्यजी से बोले कि यह पांड काबेटा चार क्लान् श्री कृष्णजी के साथ में होकर उसी प्रकार सेनाओंफो मारकर काटे डालताहै जैसे कि संसारी धनका विजय करने वाला करताहै अर यह किसी प्रकारसे भी युद्ध में जीतने के योग्य नहीं है, इसका रूपकालवा अन्तक वा यमनाय मृत्यु के समान दृष्ट आता है और यह बड़ी सेनाभी नाश करवाने के योग्य नहीं है देसो.यह सेना परस्परकी सहायता से निर्मल है यह सूर्य सब रीति से सवलोको की दृष्टि को हरता हुआ पर्वतों में श्रेष्ठ अस्ताचल को प्राप्त होता है हे पुरपोचम ऐसी दशा में सेनाके विश्रामको चाहताहूं, जो युद्धकर्ता भयभीत हुए धकगये है वह कभी नहीं लड़ेंगे महारथी भीमनी ने प्राचार्यों में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य से इस रीति से कहकर आपकी सेनाओं का विश्राम किया हे श्रेष्ठ मूर्य के प्रस्तंगत होनेपर आपकी और पांडवोंकी सेनाका विश्राम हुमा और सन्ध्यावर्त्तमान हुई ।। ४३ ॥ the defeat of your armies mundo in grant umazement the following remark with n ficrrug of braio Dionncharya -“This son of Pandu, accumpamby Shmo Kushina, bills and destroys tho armica like fuoletty Icelthi 11g18 in no way conquerablc in iultler u Yam - duitha ia balily furm. We slevuld not leave this largdarmy to by tus destroyed by him Thic sollicr: aro ti and thu pun i stimy dowa, depuising inople of the use of their iht. U idur tas circunst inci's I desire thic retront of the Army The narr urs who are tirel ur afrad will light no longer." lluring Nand thin to Drunacharya, Bhishm Bounded the retreat of the army and as it has riculy diri, the no armes retured for the night ots aFiner lelooksl - (४५६३) भीष्मपर्व Bhishma Pary [4563) लजय उवाच । प्रभातायांच शया भीष्मः शांतनयस्तदा । धनीकान्यनुसयाने ध्यादिवेशाथमारत ॥ १ ॥ गागडंच महाव्यूह चक्रे शांतनधातदा । पुत्राणांतेजया कांक्षी भीमः कुरुपितामहः ॥ २ ॥ गरुडध्यस्वयं तुंडे पितादेव प्रतस्तव । चक्षु पीच भरद्वाजः कृतवर्माच सात्वतः ॥ ३ ॥ अश्वत्थामा कृपधैव शीर्षमास्तांयश स्चिनौ ! गारपधै टधानश्च संयुगे ॥४) भूरिश्रवाशिल शल्योमगदस्तश्चमारिप। गढ़का-सिंधु सौची रास्तथापचनदाश्चये ॥५। जयद्रथेन सहिताग्रीयायां सनिवेशिताः। पृष्ठे दुर्योधनो राजा सौदयः, सानुगैर्वृतः ॥ ६॥ विन्यानपिदावाचनत्यो काम्बोजश्वशकैः सह । पुच्छ मासन्महाराज शूरसेनाश्च सर्वशः ॥ ७॥ मागाश्च कलिंगाश्च दासेरफग णैः सह । दक्षिणं पक्षमासाद्य स्थिताव्यूहस्य दंशिताः ॥ ८॥ कारूपाश्च विकुम्जाच अध्याय ।। ५६ ॥ संजय बोले कि इसके पीछे शत्रु संतापी भीष्मजी ने प्रातःकाल के समय चढ़ाई करने के निमित्त सेनाओं को आज्ञाकरी तब आपके पुत्रों की विजय चाहने वाले कौरवोंके पितामह दृद्ध भीष्मनीने गारुड़नाममहाव्यूहको रचा, उस में आपके पिता देवव्रत तो गरुड़की चोंच पर हुए और भारद्वाज द्रोणाचार्य व कृतवर्मा पादय यहदोंनो नेत्रों के स्थानमें हुए और यशस्वी अश्वत्थामा और कृपाचार्य शिरके स्थान में हुए और जो विगमत्स्य वा केकय यह सव वारधानों से युक्त थे और भूरिश्रवा शाल शल्य भगदत मद्रक सिंधु सौवीर और पंचनदवासी लोग यह सब जयद्रथ के साथ ग्रीवा में नियत्त हुए और राजा दुर्योधन अपने सगे भाइयों ममेत अपने पीछे चलने वाले शूरवीरों से युक्त पाछे की ओर नियतहुए विंद और अनुविन्द अवन्तिके राजा लोग और कांबोज यहसव शकलोगों वा शूरसेन देशी वीर लोगोंके युक्त गरुड़ की पूंछकी ओर नियतहुए 19। और मगध देशी व कलिंग देशी व अमुर लोगोंके समूह यह सब गरुड़ के दक्षिण पक्षपर नियत हुए और CHAPTER LVI Sanjaya continuod. "Blishm the destinyer of enemies, led his arnics at the break of day and desirous of the conquest over your sons le arrayed the forces in the form of a bird. Your father dorabiat stationed lunsolf in the placo of the beak; Bharadwaj, Dropacharya and Kritvarına the Yadav Icpresented the cyes; glorious Ashwathama and Krimnelorya sith the Thigarts, the Blatsyas, the Baikayas and tho Vatdhang stationcd them-elves at the head; Bhurishrava, Sla), Shalyar Bhagdatta, and the people of Hadiak, Sindhu, Sauvir and, Punchond led by Jayadrathi, stood at thic niech. Prince Dui yodban and his brothers with their attendant warriors stood on the back. Vind, Anuvini tlic princes of Avauti and Kaloj sith the Shakns and Shur'senas stood at the tail.i. The arnies of singndh and Kaling [4564] Mahabharat (४५६४) मुण्डाः कुण्डी वृपास्तथा । वृहद्वलेन सहिता घामपार्य मयस्थिता. ॥९॥ व्यूह दृष्टनातु तत् सैन्य सव्यसाची परन्तप । धृष्टद्युम्नेन सहित प्रयन्यूहतसयुगे ॥१०॥ अर्द्धचन्द्रेण ब्यूहेन व्यूह तमति दारुणम् । दाक्षिण गृह मास्थाय भीमसेनो ग्यरोचत ॥ ११ ॥ नानाशस्त्रौध सम्पनैर्नादेश्यैर्नपैत । तदन्येव विराटश्च दुपदश्च महारथ १२॥ तदनन्तर मेवासीनीलोनीलायुधै सह । नीलादनन्तरथैव घटकेतुर्महाबल ॥१३॥ चेरि काशिकरूपैश्च पौरवैरपि सवृत । पृष्टद्युम्न शिखण्डीच पक्षालाच प्रभद्रका ॥ १४ ॥ मध्ये सैन्यस्य महत स्थिता युद्धाय भारत । तत्रैव धर्मराजोऽपि गजानीकन सवृत. ॥ १५ ॥ ततस्तु सात्यकी राजन् द्रौपद्या पञ्चचात्मजा । अभिमन्युस्तत शूर इरावा ब ततः परम् ॥ १६ ॥ भैमसेनिस्ततो गजन् केकयाथ महारथा । ततोभूद् द्विपदां श्रेष्ठो वाम पार्श्व मुपाश्रितः ॥ १७ ॥ सर्वस्य जगतो गोप्ता गोप्ता यस्य जनार्दनः । एव कारुप विकुंज मुंड कौडी प यह सव हवलसमेत वायें पक्षपर उपस्थितहुए।९। उस युद्धभूमि में शत्रुहन्ता परन्तप अर्जुनने उस व्यहित सेना को देखकर धृष्टद्युम्नकी | सलाह से उसकी समानताका अपनी सेनाकाभी व्यूहरचा अर्थात् सब पाण्डवों ने आपके उसव्यूह को देखकर अर्द्धचन्द्राकार व्यहसे अपनी भयानक सेनाको सुशो. भित किया।११ श्रोर नानाप्रकार के शस्त्रोंके समूह और अनेक देशी राजा लोगों से युक्त भीमसेन दाहिने शृंगपर नियतहोकर शोभायमानहुआ, उसीके पीछे महारथी विराट ओर द्रुपद नियतहुए फिर उन के पीछे अपने नीले आयुधों समेत राजानील और नील के पीछे चंदेरी व काशी व कम्पदेशी व पौरवदेशी इन सबको साथ लिये राजा धृष्टकेतु वर्तमानहुए और हेभरतर्पम धृष्टद्युम्न शिखण्डी पांचालदेशी और | प्रभद्रक-यह सब अत्यन्त सेना समेत युद्धकरने के लिये वीचमें नियतहुए।१५।और उसीस्थानमें हाथियों को सेना समेत राजा धर्मराज युधिष्टिरभी वर्तमानहुये और उस के पीछे सात्रिकी व ट्रोपदीके पांचों पुत्र थे उन से पीछे अभिमन्यु अभिमन्यु के stood at the ught wing, and Karush, Vihunj, Vund, Kaundi, Vrish and Vriladı al yer on the left sing. In that field of battle, glorious Arjun the destroy er of euenies, seeing that array of the Kaurare army, Arrayed luis os n army with the advice of Dhirish tady Pandar al my #19 arrayed in the form of a crescent moin. U Feapons and princes of different p] 2009, s'ood nt the right horn in great glory Kings Virat and Di upad stationed themselscs behind Bhinen Behind them, with blue arins and arinour, stool king Xil, and on his unck stool the rarriors of Charr deri, Kashi, Karusl and Puuray countries led by Danishtnketu Dhrshtady unini and Shibliandi of Panchal and the Prabhadrahs with a large army stool in the middle 15 Near them yas king Yudlusktur with a large number of clephants, and on luis bich some umna. The Bhim son with a collection of - (४५६५) भीष्मपर्व Bhishma Parv [ 4565] मैतं महाव्यूई प्रत्यज्यूहन्त पाण्डवा. ॥१८ वधार्यतवपुत्राणां तत्पदं येच संगताः । ततः प्रववृतेयुद्धं व्यतिपकरथद्विगम् ॥ १९ ॥ तायकानां परेषाञ्च निम्नतामितरेतरम् । 'हयोघाथ रथौधाश्च तत्र तत्र विशाम्पते ॥ २० ॥ समातन्तो व्यदृश्यन्त निमन्तस्ते परस्परम् । धावतांच रचौघानां निष्णताञ्चपृथक पृथक् ॥ २१ ॥ पभूप तुमुला शब्दो विमिश्रो दुन्दुभिस्वनैः । दिवस्पृङ नरवीराणां निम्नतामितरेतरम् । सम्प्रहा स तुमुले तव तेपांच भारत ॥ २२ ॥ इतिश्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि तृयीयेयुद्ध दिवसे परस्पर व्यूहरचनायां पदपंचा शत्तमोऽध्यायः ॥५६॥ पीछे इरावान और उसके पीछे भीमसेनका पुत्र घटोत्कच और महारथी केकयदेशी उसके पीछे नरोत्तम सब जगत् का रक्षक जिसके रक्षक जनार्दन थे वह अर्जुन हुआ ।१९। इसरीतिसे पांडवोंने आपके पुत्रों के और उन के सहायकों के मारनेके निमित्त इस बड़ेमारी व्यूह को रचा, तदनन्तर आपके पुत्र और पांडवों में परस्पर वह युद्ध जिसमें हाथी घोड़े और रथ संयुक्त थे जारीहुआ, हे राजा जहां तहां वह हाथी और रयोंके समूह परस्परमें मारते और गिरते हुये दृष्ट पड़ते थे, और दौड़ते वा पृथक् २' लड़नेवाले रथ के ममूहों के महाकठिन शब्द दुन्दुभियों के शब्दों से मिले हुये सुने जाते थे, हे भरतवंशी उसतुमुलयुद्ध में परस्पर में मारतेहुये आपके और दूसरों के शूरवीरोंके शब्द आकाशतकं व्याप्तहुये २३ ॥ Satyaki, the fivo sons of Draupadi and Abhimanyu. Behind Abhimanyu was Lavan and Ghatothach the son of Bhimsen was on the back of Iravan. Behind them pere the warriors of Kailaya with the best of men, Arjun who was himself protected by Janardan the protector of all. 19. Thus the Pandavas arrayed, that formidable army to destroy your sons and their allics. Then the two armies consisting of elephants, horses and chariots, mixed together, met in comlat- The groups of elephants and chariots were seen destroying one au other, and the rumbling of chariot wheels, which were constantly rolling in the field of battle, was dreadful. The noise made by the chariot wheels; mixed with that from tho liorus was tremendous; and the crics of the warriors on both sides rang through the firmament, 23.

M - 14566] Mahabharat सजय उवाच ॥ ततो व्यूढेचनीकेप तायकेषु पोपुच । धनजयो स्थानीक मयत्तिवभागत ॥ १ ॥ शरैतिरथो युद्धे दारयन्थयूथपान् । ते वध्यमाना पार्थन कालेने युगक्षये ॥ २ ॥ धार्तगष्टा रणे यन पाण्डवान् प्रत्ययोवगन् । प्राधयाना यशोदीप्त मृत्युकृत्या निवर्तनम् ॥ ३॥ एकानमनसो भूत्वा पांडवाना वरुथिनीम् । वम इशो राजस्ते चासज्जन्त सयुगे ॥ ४ ॥ द्रवद्भित्थ भनैश्च परिवर्त दरवच । पाडवै कौरवेयश्च न प्रानायत किचन ॥ ५ ॥ उदतिष्ठद्रजो भीमन छ दयान दिवा करम् । न दिश प्रदिशोधागि तत्र हन्यु कानरा ॥ ६ ॥ अनुमानेन सन्नाभिन्न मग त्रैव सयुगे । वर्तते च तथा युद्ध तन त विशाम्पते ॥ ७ ॥ न व्यहो मिद्यते तत कौर वाणा कधचन । रक्षित. स यसधेन भारद्व जेन सयुगे ॥ ८॥ तधैवपाडवानाच रक्षित सव्यसाचिना । नाभिद्यत महाव्यहो भीमेन च क्षित ॥ ९ ॥ सेनामादपिनिष्पत्य अध्याय ।। ५७॥ संजय घोल हेभरतवंशी इमके अनन्तर आपके पुत्र की और पांडवोंकी सेना के व्यहितहोनेपर वाणों से महारथियों को गिराते हुए आत स्थी अर्जुनने रथके यूथों को इप्त रीतिसे मारा जैसे कि युग के अन्तमें काल सका नाश करता है, इस गति से अर्जुन से घायल और पीड़ित उन धृतराष्ट्र के पुत्रों ने युद्ध में महा कुशल पांडव लोगो से युद्ध किया हे राजा अपनी कीर्ति के चाहने वाले उन कौरवों ने मृत्युको न लौटने वाली मानकर चित्तको स्थिर करके पांडवो की सेनाको अनेक रीतों से छिन्न भिन्न करके आपभी युद्धसे छि न भिन्न होगये, फिर भागते और छिन्न भिन्नहोते अथवा लौटते समय में कौरव पांडवों की धूमधाम में नहीं जाना गया और धूल ऐसी उदी कि जिप्से पृथ्वी और सूर्य ढकाये और अन्धकार ऐसा मचगया जिसमें दिशा विदिशाका कुछ भी ज्ञान न रहा, हे राजा उस समय वहां संग्राम भूमि में ध्यान ओर नाम गोत्रों के द्वारा युद्धजारी रहा, हे श्रेष्ठ राजा धृतराए CHAPTER LVII Sinjaja continued, "When the armies of your sons and those of the Pandavas were tljus ariayed Aljun Legan to destroy the great Wir1101s and charioteers as Kal destroys all the living bemgs at tlie Wounded and distressed by the arrows of Aijan, the cons of Dlırıtrishtra fought agust the Pandav virriors Kauravas desirous of fame, knew that death was inevitable and fought steadily, killing others and be ng killed tliemselves. Nothing was discernible in the fury of the lattle and the dust ari ing from the two ai mics cosered the whole firmament, so that noither the sun nor the carth could be distinguished. 6 The warri rs fought with their ndversuies by distinguishing their voices and asking their nimes Protec ed by Dronucharya the Knurnya umies could not ko end of the yug The #cago Bhishma Parv [4567 ] प्रायुध्यस्तत्रमानवाः .. उभयोः सेनयो राजन् व्यतिपक्तरयद्विगः ॥ १० ॥ हयारो हैहयारोहाः पात्यनेस्म महाहवे। ऋतिभिर्विमलामिश्च :प्रासैरपि च संयुगे ॥११॥ रथी रधिनमासाद्य-शरैः कनकमपणैः । पातयामास समरे तस्मिन्नतिभयङ्करे १२॥ गजारोहा गजागेहान् नाराच शरतोमरैः। संप्तक्तान् पातयामासुस्तष तेपांचसर्वशः 11-.१३ ॥, पत्तिसंधारणेः पत्तीन् भिदिपालपरश्वधैः । न्यपातयत संहृष्टाः परस्पर कृतागसः॥ १४ ॥ रथीच समरे राजन्नासाद्य गजयूथपम् । स गजं पातयामास राजी चाधिन वरम् ॥ १५ ॥ रथिनंच हयारोहः प्रासेग भरतर्षभपातयामास समरे रथीच, हयसादिनम् ॥ १६ ॥ पदातीरधिनसंख्ये योचापिपदातिनम् । न्यपातय; च्छितै शस्रः सेनयोरुभयोरपि ॥ १७ ॥ गजारोहाहयारोहान् पातांचक्रिोतदाः । हयारोहागजस्थांश्च तदद्भुतमिवाभवत् ॥१८॥ गजारोघौयापि तत्र तत्र पदातयः । वहां भारद्वाज द्रोणाचार्य से रक्षित वह कौरवों का व्यूह-छिन्न भिन्न नहीं होता था और इसी प्रकार अर्जुन से रक्षित पांडवों का बड़ा व्यहभी भीमसेन से आश्रित होकर पराजय नहीं होता था .फिर वहां रथ हाथियों से संयुक्त दोनों सेनाओं के मनुष्य सेना के आगे से निकल कर युद्धकरने लगे तब उस महा युद्धके.वीच तक्षिण पार वाले दुधारा खड़ग और परशों के द्वारा घोड़ों के सवारों के आपसे घोड़ों के सवार गिराये गये, फिर उस अत्यन्त भयकारी सेना में मुनहरी वाणों से रथीने रंथीको सम्मुख होकर गिराया, फिर आपके और उनके हाथियों के संवारों के समूहों ने नाराच शेर और तोमरों के द्वारा सम्मुख होकर, हाथियों के सवारों को गिराया और उस रण में पत्तिसिंह नाम सेना के भागने भिण्डिपाल और परशों के पत्तियों को गिगया और रथी ने हाथी के सवार को सम्मुख होकर मारा और हाथी के सवारने इसी प्रकार से रथी को जागिराया. हे भरतर्षभ घोड़ों के सवारों ने पराशों के द्वारा रथी को और स्थी ने घोड़ों के सबारको और दोनों roatod and the armies of the Pandavas remained firm under the protection of Arjun and Bhiinsen 9, Then the warriors of the tivo armies broke the lines and advanced to fight Then in that great battle horsomen were killed by the double-edged sharp swords arid battlo axes of huisemen. Amid those dreadful armies charioteers slew charioteers with their golden artons. The elephant riders of the two armiés fought with arrows and slew one another. The foot suldiers fought with battle axes and other weapons. Charioteers faced clephaut riders and slew one another. The liorsémen and chariotcers slew one another with sharp arrors. Some lorsemen and elephant riders met in combat and destroyed one another in a wonderful way. 18. The foot soldiers were seen destroyed by elephant riders who kvere 'sometimes killed by the foot soldiers Horsemen and foot [4568] Mahabharat (४५६८) पातिताः समदृश्यंत तैश्चापिगजयोधिनः ॥ १९ ॥ पत्तिसंघाहयारोहै. स दिसंघाचप- त्तिभि । पात्यमानाब्यदृश्यत शतशोथसहस्रशः ॥ २० ॥ ध्वजैस्तत्रापविद्वैध कार्मुके स्तोमरैस्तथा । प्रासैस्तथा गदाभिश्च परिधै कंपनैस्तथा ॥ २१ ॥ शक्तिभि कवचै- चित्रै कणरंकुशैरपि । निस्त्रिंशैमिलैश्चापि स्वर्णपुंखे. शरैस्तथा ॥ २२ ॥ परिस्तो | मैःकुथाभिश्च कंवलैवमहाधनैः । भूर्भातिभरतश्रेष्ठ सादामरिवचित्रिता ॥ २३ ॥ नरा बकायैः पतिततिभिश्च महाहवे । अगम्य रूपापृथिवी मांसशोणितकर्दमा ॥२४॥ प्रशशामरज भौम युक्षितरणशोगितः। दिशश्च विमलाः सर्वाः संबभूवुर्जनेश्वर ॥२५॥ उत्थितान्य गणेयानि कबंधानि समंततः । चिहनभूतानि जगतो विनाशार्यायभारत ॥ २६ ॥ तस्मिन् युद्धे महारौद्रे वर्तमानेसुदारुणे । प्रत्यदृश्यंतरथिनो घावमाना:समतत. ॥ २७ ॥ ततो भीमश्च द्रोणश्च संघवश्व जयद्रय । पुरुमित्रोजयोभोजः शल्यश्चापि स | सेनाओं के हाथी के सवारों ने तीक्ष्ण शस्त्रों से घोड़ों के सवारों को और घोड़ों के | सवारोंने हाथी के सवारोंको विध्वंस किया यह भी आश्चर्य सा हुआ औरजहां तहां अच्छे २ हाथी के सवारों के हाथ से पदाती भी मारे हुए दृष्ट पड़े और उन पदा तियों के हाथ से हाथियों के सवार मरेहुए देखने में आये धोड़ों के सवारों से पतियों के समूह और पतियों से सवारों के समूह गिराये हुए दिखाई दिये हजारों गिरते हुए हजारों ध्वजा और धनुपों समेत और हजारों तोमर परिम्तोम और कुथों समेत और बहुतेरे वहु मूल्य कंवलों को ओढ़े हुए पास गदा परिघ कंपन शक्ति और विचित्र कवचों को धारण किये भूमि में गतप्राण दीखे हे भरतर्षभ'हजारों कुणप अंकुश और सुवर्ण पुंखवाले वाणों से भूमि ऐसी शोभायमानी जसे कि. मालाओं से पूरित होकर शोभित होती है और उस महायुद्ध में मनुष्य घोड़े और हाथियों के गिरे हुए शरीरों से ढकी हुई पृथ्वी मांस रुधिर रूपी कीच से महा दुर्गम और देखने के अयोग्य थी और मनुष्यों के रुधिरों से छिड़की हुई पृथ्वी soldiers fought and slesv one another. Thousands were seen falling, with their banners and bors cut down Other weapons by thousands, precious wrappers, maces, spears and armour of sorts were seen on those who had fallen in battle. Thousands of goads and arrors with golden feathers beautified the field as if strewn with flower chaplets 22. In that great hattle men, horses and elephants covered the field with tbeir flesh, blood and corpses, and the scence was dreadful to behold The dust, sprinkled over with human blood, subsided; the directions and innumerable headless bodies sprang up all round 111- dicating destruction of the world. 26. And in that dreadful battle charioteers were seen running away in all directions Then Bhishm, Drona, Jayadrath the ruler of Sindhu. Purunitra, Vikarn and Sha. huni the son of Sural, all those warriors invincible in battle and cleared up भीष्मपर्व Bhishma Parv [4569] स सौधलः ॥ २८ ॥ एतेसमरदुर्धर्षाः सिंहतुल्यपराक्रमाः । पांडपातामनीकानि घ जस्मधुन:पुनः ।। २९ । तथैव भीमसेनोपि राक्षसश्च घटोत्कचः । सात्यकिश्चकिता. नश्च द्रौपदेयाश्च भारत ॥ ३० ॥ तायफास्तवपांच सहितान् सर्व राजभिः । द्राय पामातुराजौते त्रिदशादागवयि ॥ ३१ ॥ तयाते समरेन्पोन्यं निनंतःक्षनियर्पमाः। रक्तीक्षिता घोररूपा विरेजुनिवाइच ॥३२॥ विनिर्जित्य रिप्वीराः सेनयोरुभयोरपि । व्यदृश्यंतमहामात्रा ग्रहाइवनभस्तले ॥ ३३ ॥ ततो रथसहोण पुत्रोदुर्योधनस्तप । अभ्ययात् पांडवं युद्ध राक्षसं च घटोत्कचम् ॥ ३४ ॥ तथैव पांडया सर्व महत्या सेनयासह । द्रोणभीष्मी रणे यत्ती प्रायुधयुरीरंदमौ ॥ ३५ ॥ किरीटीच पपौकुछः की धूल अत्यन्त शान्त होगई हे राजा सब दिशा शुद्ध हुई और कवन्ध अर्थात् विना शिरके रुण्ड चारों ओर से असंख्य उत्पन्न होकर सब संसारके नाशकारक हुए | फिर उस बड़े भारी भयानक युद्ध जारी होनेपर चारों ओरसे दौड़ते हुए अनेक रथी दृष्ट पड़े इसके पीछे भीष्म द्रोणाचार्य जयद्रथ राजा सिंधु पुरुमिन विकर्ण शकुनि सौवल यह सब युद्ध में दुर्घर्प सिंहके समान पराक्रमी पडियोंकी सेना के मारने को उपस्थितहुए, १२९ । इसी प्रकारहे भरतवंशी भीमसेन घटोत्कच राक्षस साविकी चेकितान द्रौपदी के पांचों पुत्र इन वीरों ने भी सब राजाओं समेत युद्धभूमि में नियत होकर आपके शूरवीरों समेत सव पुत्रों को ऐसे छिन्न भिन्न कर दिया जैसे कि देवता लोग दानवों को करदेते हैं इसीप्रकार से वह सब क्षत्री परस्पर में युद्ध प्रहार करते हुए रुधिर भरे हुए शरीरों से घोर रूप किंशुक वृक्षों के समान शोभाय- मान दिखाई देनेलगे ॥३२॥ हे राजा दोनों मोर की सेनाके शूरवीर अपने २ शत्रुओं को विनय करके ऐसे देखने में आते थे जैसे कि आकाश मंडल में सूर्यादि बड़े ग्रह दिखाई देते हैं इसके उपरान्त आपका पुत्र दुर्योधन हजार रथों के साथ उस युद्ध में पांडव और घटोत्कच राक्षस के सम्मुख आया पैसेही सब पांडवभी अपनी बड़ी सेना समेत भीमजी और द्रोणाचार्य के सम्मुख गये यह सप पांडच आदि युद्ध में शूरवीर शत्रुओं के विजय करने वाले हैं इसके पीछे दिव्य मुकुटधारी क्रोध Possessing the strength of lions, bioko the ranks of the Pandavas. 29. In the same manner Bhimsen, Ghatotkach, Satyski, Chekitan, the five sons of Draupadi and other warrior princes beat your sons and warriors, as gods did the danavas. Thus all those warriors fighting against ono other looked glorious like Kipshul trees in bloom with their blood stained bodies, 32. The warriors on both sides, conquering their enemies, looked as if they were sups on high. Then your son Duryodhan, accompanied with a thousand chariots, faced the Pandar Ghatotkach of rakshas blood, and the Pandavas, with their ar. mies, faced Bhishm and Dronacharya. All these Pandavas are brare warriors and conquerers of foes. Then Arjun, with his colestial dia.

[4510] Mahal harat (४५७०) समंतात्पार्थिवोत्तमान् 1 मार्जुनि. सात्याकैश्चैव ययतु सौवलंबलम् ॥ ३६ ॥ ततः प्रयवृतभूयः संग्रामोलोमहर्षणः । तायकानांपरेषांच समरेविजयैषिणाम् ॥ ३७ . इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि तृयीयेयुद्ध दिवसे संकुलयुद्धे सप्तपंचाशत्तमोऽध्यायः ५७ ॥ सव्यय उवाच । ततस्रोपार्थिवाः कुद्धा फाल्गुनंवीक्ष्य संयुगे। रथैरनेफलाइन. | समंतात्पर्य धारयन् ॥ १॥ अथैनं रथवृदेन कोष्ठकीकृत्यभारत । शरैःसुबहुसाहसः समतादश्ययारयन् ॥ २ ॥ शक्तीच विमलास्तीक्ष्णा गदाश्च परिधै सह । प्रासानगर भ्यघांधव मुद्गरान् मुसलानपि ॥ ३ ॥ चिक्षिः समरेकुद्धाः फाल्गुनस्यस्यति । शस्त्राणामयतां वृष्टिं शलभानामिवायति ॥ ४॥ रुरोध सर्वतः पार्थः शरैः कनकभूषणैः। तत्र तल्लाघनं दृष्ट्या पीभत्सोरति मानुपम् ॥ ५॥ देव दानव गंधर्वाः पिशाचो रगरा में भरा अर्जुन सब ओरके राजाओं के सम्मुख गया और अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु व सात्यकी यह दोनों शकुनी की सेना के सम्मुख गये तिसके पीछे परस्पर में विजय की इच्छा रखने वाले आपके पुत्रों का और दूसरों का रोमहर्पण करने वाला महायुद्ध फिर जारी हुआ ॥ १७ ॥ पाध्याय ।। ५८॥ संजय बोले कि फिर उन क्रोधरूप राजाओं ने अर्जुन को युद्ध में देखकर हजारों रथ समेत उसको प्रानकर घेर लिया तदनन्तर हे भरतवंशी उसको रथ समूहों से घेरकर चारों ओर से हजारों वाणों से भी रोका फिर युद्ध में क्रोधप उन लोगों ने स्वच्छ बरछी तीक्ष्ण गदा प्राश परस्वध मुद्गर और मूशनों फो परिघों समेत अर्जुन के रथपर छोड़ा और अर्जुगने भी अपने मुनहरी पाणों से उस टीड़ी के समूहके समान राजाओं की शस्त्र और वाणोंकी वर्षा चारोंको भोर से रोका हे राजा उस युद्ध में अर्जुन की हस्तलाघवता जो कि दृष्टि से बाहरथी उसको देव दानव गन्धर्व पिशाच उरग और राक्षसों ने देखकर अर्जुनको यही dem on, cncountered all the princes, while his son, Abhimanyu together with Sityahı, faad Shahuni's army. Then a dreadful figlie ensued etween your sons and the Pandaras."37. CILAPTER LVIU Sanjaya continuel "The enraged princes, sccing Arjun in this field of battle, surrounded him on all sides with thousands of chariots And while he was thus surrounded they checked him from all dire tions with thousands of arross. .Ind the unnged warriors in that battle hurled at Arjun bright sperry, macs, clubs and other persone, Arjun too, with his golden scrolls, checked the locast like figlit of this wespoons and darts of those prina's. The gods, danasan, Eanduar मीष्मपर्व Bhishma Pary [4571) क्षसाः । साधु साध्धिति राजेंद्र फाल्गुनं प्रत्यपूजयन् ॥ ६ ॥ सात्यकिश्वामि मन्युध महरया सेनयावृत्तौ । गांधामन् समरेना जग्मतुः सहसौपलान् ॥ ७ ॥ तत्र सौवलकाः कुदा याणस्य रथोत्तमम् । तिलशथिच्छदुः क्रोधानानाविधे. युधि ।। ८ ॥ सात्यकिस्तुरथं त्यावावर्तमानेभयावहे । अभिमन्योरयंपूर्ण मारोह परंतपः। ९ ॥ तायकरय संयुक्तो सोचले यस्य वाहिनीं । व्ययमेतो शितैस्तूर्ण शः सनसभिः ॥ १० ॥ द्रोपभीगीरणे यत्ती धर्मराजस्यवाहिनीम् । नाशयेतां शरस्तीक्ष्णः कंकपत्रपरिच्छदैः ॥ ११ ॥ ततो धर्म सुतो राजा मामी पुत्रीचपांढची। मिपता सर्व सैन्यानां द्रोणानीकमुपादयन् ॥ १२ ॥ तत्रासीत्सुमहद्युद्धं तुमुललोमाद- पंणम् । यथा देवासुर युद्ध पूर्व मासीरसुदामणम् ॥ १३ ॥ कुर्वाणी सुमारकर्ममी- मसेनघटोत्कचौ । दुर्योधनस्ततोभ्यत्यताबुभावप्यवारयत् ।। १४ ॥ तत्राद्मुतमपश्याम प्रशंमा धन्य धन्य शब्दोंसे की । और सात्यकी और अभिमन्युने बड़ी सेना वाले युद्ध में शूरवीर गांधारियों को सौवल के पुत्रों समेत युद्ध में रोकदिया, इसके पीछे क्रोध में भरेहुए सौवलके पुत्रों ने प्णिवशी सात्यकी के उत्तम स्थको नाना प्रकार के शस्त्रों से तिलके समान टुकड़े २ करडाला, हे शत्रु सन्तापी धृतराष्ट्र फिर | तो सात्यकी उस महाभारी युद्ध के होनेपर उत्त रथको त्याग शीघ्रही अभिमन्यु के रथपर चढा फिर एकही रथपर सवार ।१०। उनदोनोंने बड़ी शीघ्रता से गुप्त ग्रन्थी वाले वाणों से शकुनी की सेनाको मारा, और युद्ध में कुशल द्रोणाचार्य और | भीष्मनी ने कंकपक्ष वाले तीक्ष्ण पाणों से धर्मराज युधिष्ठिर की सेना का विध्वंस किया इसके अनन्तर धर्मराज युधिष्ठिर माद्रीनन्दन नकुळ सहदेव आदि पांडवों की सब सेनाके देखते हुए द्रोणाचार्य की सेनाके सम्मुख दौड़े फिर वहां रोमर्पण करने वाला बहुत भारी ऐसा तुमुल युद्ध हुआ जैसे कि पूर्व समय में देवता और असुरों का महा भयानक युद्ध हुआथा।१३।फिर भीमसेन और घटोत्कच ने बड़ाकर्म किया Taw, pishaches, Uragas and rakshases who saw the unseen dexterity of Arjun's hand, praised his skill in loud words. G. Satyahi and Allimanyu cheched the gandhars together with the sous of Shabudi in tliat great battle, and thereupon they broke into very minuto pieces the chariot of Satyali. At this dreadful mutilation of his chariot, O invincible Dhritrashtra, Satyaki shared the chariot of Abhiwanyu. Then both those warriors, seated on the saine chariot, began to destroy the army of Shakuni with a swift discharge of their arrors.10. Dronscharya and Bhishm. adept in the art of war, destroyed the Yudhishthir with their feathered airo, Thereupou, Yudhishthir Fith Nakul and Sahadev the sons of Jadri and tlie Pandav army, rushed upon army of Dionacharya, and the fight as so furious as that between the gods and danaras of old.13. Bhinisen and Ghatotarmy of the [4572] Mahabbaiat (४५७२) हैडिंयस्यपराक्रमम् । अतीत्यपितरयुद्धे यदयुध्यतभारत !॥ १५ ॥ भीमसेनस्तु संकुद्धो | दुर्योधनममर्पणम् । हृद्यविध्यत्पृपत्केन प्रहसनिवपाडय ॥ १६ । ततो दुर्योधनोराजा प्रहारधरपीडित ।पिसादरथोपस्थे कश्मलचजगामह ॥ १७ ॥ त विसन विदित्वातु स्वरमाणास्पसारथि । अपाषाहरणाद्राजस्तत सैन्यमभज्यत ॥ १८ ॥ ततस्ताको रवीसेना द्रवमाणासमतत । निधन्भीम शरैस्तीक्ष्णै रनुवबाजपृष्ठत ॥१९ ॥ पार्पत श्वरधश्रेष्ठो धर्मपुत्रश्चपाडय । द्रोणस्यपश्य सैन्य गागेयस्य च पश्यत ॥ २० ॥ जनतु विशिस्तीक्ष्ण परानीविनाशने । द्रवमाणतु तत्सैन्य तव पुत्रस्यसयुगे ॥ २१ ॥ नाशयनुता चारपितु भीष्मद्रोणौ महारथौ । वार्यमाणञ्च भीष्मेण द्रोणे नच महात्ममा ॥ २२॥ विद्रवत्येव तत् सैन्य पश्यतो द्रोणभीम्मयो । ततो रथ सहस्रेषु विद्वत्तत स्तत ॥२३॥ तावास्थितावेकरथ सौभद्र शिनि पुङ्गवौ। सौयली समरे सेना शाठ तवतो दुर्योधन ने सम्मुख आकर उनदोनों को भी रोका, हे भरतवशी वहां हमने हिार्डवा के पुत्र घटोत्कचका अपूर्व पराक्रम देखा कि युद्ध में पिता कोभी उल्लघन करगया।१५। फिर अत्यन्त क्रोध भरे अशातरूप भीमसेन ने हॅसफर प्रशस्तनाम वाण से दुर्योधन के हृदय में महार किया तव उस महारथी के वज्ररूप महार से पीडामान राजा दुर्योधन रथके बैठने के स्थान में वेठगया, हे राजा फिर उस का सारथी उसको अचेत जानकर बडी शीघ्रता पूर्वक युद्ध भामे से दूर लेगया इस के पीछे सेना इधर उधर विखर गई, फिर भीमसेन जहां तहां से भागने वाली उस कोरवी सेनाको तक्षिण वाणोंसे मारता हुआ पीछे की ओरसे चला।१९ हे भरतवशी युद्ध में कुशल धृष्टद्युम्न पोर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने द्रोणाचार्य ओर भीष्मजी के देखते हुये शत्रुहनने वाले विशिखों से उस सब सेनाको मारा ओर सेना ऐसी भागी कि जिसके.रोकने को भीम ओर द्रोणाचार्यभी समर्थ नही हुये ओर हे परतप जहा तहां हजारों रथके टूटनपर उन एक स्थपर पेठने वाले अभिमन्यु मोर सात्यकी नेभी kach did prodigies of valour and Daryodhan himself camo round to check them Thero tre saw the extrnordinary proness of Ghatothach the son of Hidimba who surpassed hisfather in ileeds of vrlour 15 Then Bhimsen enraged and dissatisfied hit Duryodhan s Lreast with an Arrow which he shot smiling Wounded by that dreadful weapon hard liko 1 yra, prince Dui yodhan Lecame motionless in his sent. His coach inan, seeing hun senseless carried Inm farther away from the army At this the army brohe Blusen chased the army of the hapra las and slot many a sliarp arrow from behind 19 Dhrishtadyumn the shilful warrior and Yudhishthir tho son of Dharm killed the Kaurar warriors within sight of Dronacharya and Blushm There was a toʻal durant of your armies and even Dronncharya and Bluslim could not chock the soldiers from fight Thousands of chariots vero soCA brohen licre and thero by Abhimanyu and Saty akt scated in the up (४५७३) भीष्मपर्व Bhishma Pare [4573] येतां समन्ततः ॥ २४॥ गुगुमाते तदातीतु शैनेययस्पष्टयां । ममायाभ्यांगसी पन् सोममा नमस्तले ॥२५॥ गर्नुनस्तु ततः युद्धस्तव सन्यं विशाम्पते। घचर्प शार चण धारागिरिव तोयदः ॥२६॥ ययमान ततस्तत्र शरैः पार्थस्य संयुगे। दुदाय कौरवं सैन्यं विपाद भय काम्पितम् ॥ २७ ॥ यतस्तान् समालक्ष्य भीमदोगी महा रयौ । पचार येतां संरस्यौ दुर्योधन हितैपिणी ॥ २८ ॥ ततो दुर्योधनी राजा समा श्यास्य विशांपते ।न्यतयत तत् सैन्यं द्रवमाणं समन्ततः ॥ २९॥ पर यत्र सुतस्तु भ्यं यं यं पश्यति भारत । तत्र तत्र व्यवन्त क्षत्रियाणां महारथाः ॥ ३० ॥ तानिवृत्ता समीक्ष्येव ततो पपीतरे जनाः । अन्योन्य स्पर्पयाराजन् तजयाचायतस्थिरे ।। ३१॥ पुनायतां तेषां धेग मासीद विशाम्पते । पूर्यतः सागरस्येव चन्द्रस्यो दयनं प्रति३२ सनिवृत्तस्तितस्तास्तु दृष्ट्या राजामुयोधनः । सनधीत् त्वरितो गत्या भीष्मं शांतनव शकुनि की सेना कानाश कर दिया।२४। इसके पीछे वह दोनों अभिमन्यु और सात्यकी ऐसे शोभायमान हुये जैसे कि अमावास्याके दिन आकाश मंडलमें वर्तमान मूर्य और चन्द्रमा शोभित होते हैं, हे राजा इसके अनन्तर क्रोषयुक्त अर्जुनने आपकी सेना पर ऐसी वाणों की वर्षा की जैसोके धारों से वादल जलको वरसाता है, फिर इसके पीछे युद्धके वीच अर्जुनके वाणों से घायल और भयसे विड्वल और कंपायमान होकर वह कौरवी सेना युद्धसे भाग गई, फिरदुर्योधनके अष्टिचाहने वाले महाबली भीम और द्रोणाचार्यने उस भागीहुई कौरवी सेनाको बड़े क्रोधसेरोका हेराना इसके पीछे रानादुर्यो- धनभीने अच्छी रीतिसे विश्वास देकर उम भागीइई अपनी सेनाको चारों ओरसे लौटाया हेभरतवंशी जहां जहां जिस जिसने आपके पुत्रको देखा वहां २ से वह क्षत्रिय महारथी लौटे।३०। इसके पीछे हेराजा उनलोटेदुओंको देखकर अन्य मनुप्यमी परस्पर की ईपसे व लज्जा से लौटकर नियत हुए फिर उन लौटनेगालों का ऐमर वेग हुआ जैसे कि चन्द्रमाके उदय में पूर्ण होते हुए समुद्र का वेग होता है इस के पीछे राजा दुर्योधन उन लौटेहुओंको देखकर बहुत शीघ्रही शांतनु भप्मिनीके पास same chariot, who brought about the destruction of Shabuni's army. 24. Tho two warriora looked glorious like the sun and the moon in the sky on the day of Amarasya. Then tho enraged Arjun showered his arrows like rain from clouds on your army. Wounded by Arjan's arrows in the field of battle, terrified and shaking, the Kaurar army fled from the field. The rell mishers of Duryodhan, valliant Bhishm and Dronacharya checked the Kaurav army in great anger. Prince Duryodhan too, encouraged the army by his presence and brought thom back from all sides. Whatever soldiers says your son, redurned to the field of battle.30. Seeing the brave arriors returning to their duty, others too, by example or shame, returaed and stationed themsəlves on their posts. The returners rallied with a force like the ocean tide at the full moon. Seeing his soldiers returo, prince Duryo- 1 45211 Mnbharat (४५७४) घच ॥ ३३ ॥ पितामह निधदे यत्या वक्ष्यामि भारत । नानुरूपमह मन्ये त्वयिजीव ति करव ॥ ३४ ॥ द्रोणे चास्त्र विवाश्रेष्ठे तपुत्रे ससुदृजने। कृपे चैव महेष्वासे द्रवते यद् वरुथिनी ॥ ३५ ॥ न पाडवान्प्रतिबलास्त चमन्ये कथश्चन । तथा द्रोणस्य सप्रामे द्रोणश्चैव रुपस्यच ॥ ३६ ॥ अनुग्राह्या पाण्डुसुतास्तव नून पितामह । यथेमाक्षमतेवीर वध्यमाना वरूगिनीम् ॥ ३७॥ सोस्मि याच्यस्त्वया गजन् पूर्व मेच समागमे । न योत स्ये पाडवान् सख्ये नापि पार्षप्त सात्यकी ॥ ३८॥ श्रुत्वातुवचन तुभ्य माचायस्यरूप स्यच । कर्णेन सहित कृत्य चिन्तयानस्तदैवहि ॥ ३९ ॥ यदिनाह परित्याज्यो युपाया मिह सपुगे । विक्रमेणान रूपेण युध्येता पुरपपमौ ॥ ४०॥ एतच्छ्रुत्वा बचो भीष्म प्रहसन्य मुहुः । अवकीत् तनय तुभ्य क्रोधादुवृत्य चक्षुषी ॥४१॥ यदुशोसिमया जाकर यह वचनबोला।३३ हेभरतवशी पितामह आप मेरे इम वचनको समझिये है कौरवों में श्रेष्ठ मै यह उचित नहीं समझता हूं कि आपके और सफल शस्त्र विद्याके ज्ञाता द्रोणाचार्य जी और उन के पुत्र अश्वत्थामा और महाधनुर्धर कृपाचार्य व उनके मित्रों के विद्यमान रहतेहुए सेना भागती है, मैं किसी दशा में भी किसी को | आपके समान पराक्रमी नहीं जानता हू इसी प्रकार द्रोणाचार्य कृपाचार्य और अश्वत्थामा के भी समान युद्ध में पांडव लोग नहीं है।३६। हे पितामह निश्चयकरके पाडव लोग आपकी कृपा के योग्य है हे वीर इसीसे इस घायल और मारी कृती हुई सेनापर आप क्षमा करतेहो सो हे राजा आपको प्रथमही सम्मुखता में कहना योग्य था कि मै इस युद्ध में पांडव नोगों से व सात्यकी और धृष्टद्युम्न से नहीं लगा हे भरतवंशी जो मै आपके और आचार्यजी के वचनों को सुनता तो उसी समय कर्णसे कर्म करवाने के विचार को करता आप दोनों को इस युद्ध में मेरा त्यागना योग्य नहीं है, आप दोनों पुरुपोत्तम अपने योग्य पराक्रम के द्वारा युद्धकरो।४०। भीष्मजी उस की यातोंको सुनकर वारम्वार इंसते हुए क्रोध से दोनों dhan camo to Bluishım and said 33 "Ilescendant of Bharati gradfather, grceir to my rords. I donot understand why soldiers should run away from battle when you, Dr ornharya the master of the science, of arms, us son Ashwathama ralliant Kripacharya and jour nre present here I never think anyone else to be stronger than you nur arc tho Pandavas & fit match for Dronacharya, Kriprcharya and There is no doubt, grandfather, that the Pandaras nro worthy of your lovo and this is the reason why you donot punishi then for tho mutilation of your army, but yon should knso trid me before, that you would not fight against the Paodovas, Satsaht of Dhrishtadyumni. Had you and Dronocharya told this to mo bcfore, I could liave asked Karan to do battle for mc. You tiro should not le sto mo in the lurch now Fight therefore and shion a prouess trorthy "10 Bhuslim luglicu rt these words, and opening widc luis eyes friends Ashwatha'nn 3G ofyou (४५७५० भीमपर्व Bhishma Pary [4575] राजंस्तथ्यमुको हितं वचः । अजेयाः पांडवा युद्धे देचे रपि समासः ॥ ४२ ॥ या शक्यं मया कत्तुं वृद्ध गाद्य नृपोत्तम { करिष्यामि यण शक्ति प्रेक्षदानी सांघयः ४३१ अद्य पाण्दु सतानेकः ससैन्यान् सह वन्धुभिः । सोह निधार यिष्यामि सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ४४ ॥ पवमुक्तेतु भीष्मेण पुवास्तवजनेश्वर । दध्मुः शंसान मुदा युक्ता भेरी: संजजिरेभृशम् ॥ ४५ ॥ पांडयाहि ततो राजन् अत्यातं निनदं महत् । दध्म रांपांच भेरीश्च मुरजांधाप्यनादयन् ॥ ४६॥ इतिश्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्प्रवधपर्वणि तृतीययुद्ध दिवसे भीष्मदुर्योधन सम्बादे अष्टपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ । नेत्रों को अच्छी रीति से खोलकर आपके पुत्र से वाले कि हे राजा मैंने बहुत वार तुम से तुम्हारा हितकारी वचन कहा है, कि पांडव लोग युद्ध में इन्द्र समेत देवताओं से भी अजेय हैं हे राजाओं में श्रेष्ठ जो मुझ दृद्ध से करने के योग्य है उसको मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार करूंगा तू अब वांधवों समेत देख कि मैं सेना समेत पांडवों को तेरे और सब लोकों के देखते हुए हटाऊंगा हे राजा भीम से कहे हुए ऐसे वचनों को सुनकर आपके आनन्द भरे पुत्र ने शंख और भेरीको वजाया इसके पीछे पांडवों ने भी इस बड़े शब्दको सुनकर शंखों को बनाकर भेरी मुरजादिकों को अच्छी रीति से वजाया ॥ ४६॥ in anger, spoke these words to your son:-"I have often given you good advico, kiug," said lie, "and told you that the Pandavas were invincible even by the gods including Indra. I do my duty to the bost of my ability and age. You and your kinsmen will uow scc how I make the Pandavas and their army give way:"4-1. Hearing these words from Bhishm, your son sounded his conch and bugle in glec. The Pandavas heard the ljud sound and blew their conchs and bugles in reply. 46.

[4576] Mahabharat (४५७६) धृतराष्ट्र उवाच । प्रतिज्ञाते ततस्तस्मिन् युद्ध भीष्मेण दारुणे । क्रोधितो मम पुत्रेण दुखितेन विशेषतः ॥ ॥ भीष्म झिगकरोत्तत्र पाण्डवेयेषु भारत । पितामहे चा पश्चालास्तम्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥ २ ॥ सञ्जय उवाच ॥ गतपूर्वाण भूयिष्ठे तस्मिन्नहनि भारत । पाश्चिमां दिशमास्थाय स्थितेचापि दिवाकरे ॥ ३ ॥ जयं प्रक्षेषु दृष्टेः पाण्डवेषु महात्मसु । सर्वधर्म विशेषज्ञ पिता देवव्रतस्तव ॥४॥ मभ्ययाज बनरश्वैः पाण्डवानामनीकिनीम् । महत्या सेनया गुप्तस्तव पुत्रध सर्वशः॥५॥ प्रावर्सत ततो युद्धं तुमुल लोमहर्पणम् । अस्माकं पाण्डवैः सार्ध मनयात्तव भारत ॥ ६ ॥ धनुषां जतां तत्र तलानांचाभि इन्यताम् । महान समभवच्छन्दो गिरी णामिव दीर्यताम् ॥ ७॥ तिष्ठ स्थितोस्मि वित्यैनं निवर्तस्व स्थिरोभय । स्थिरो. स्मिनहरस्वोत शब्दोधूयति सर्वशः ।। ८ । कांचनेषु तनुत्रेषु किरीटेषु वजेपुच । अध्याय ॥ ५९॥ धृतराष्ट्र घोले हे संजय इसके अनन्तर उस भयानक युद्ध में मेरे पुत्र के कहने से भीमजी के कोप युक्त होकर प्रण करने पर, भीष्म जीने पांडवों के ऊपर और पांचाल देशियों के पितामह के ऊपर क्या २ काम किये वह मुझ से आप बर्मन कीजिये, संजय बोले कि हे भरतवंशी उस दिन के मध्याहून समय के व्यतीत । होनेपर सूर्य के पश्चिम ओर होने के काल में और महात्मा पांडवोंके विजयी होकर मतन्न होनेपर सब धर्मों के ज्ञाता आपके पिता देववत भीमजी सव रीति से आपके पुत्र और सेनामों से रक्षित होकर बड़े शीघ्रगामी घोड़ों के द्वारा पांडवों की सेनाके सम्मुख गये, हे भरतवंशी इसके पीछे आपके अन्याय के कारण पांडवों से हमारा रोम हर्पण करने वाला महातुमुल युद्ध हुआ, अर्थात् धनुपों के शब्दों से और तालों के वजने से ऐसा तुमुल शब्द हुआ जैसे कि पर्वतों के फटनेका हुआ करता है, तिष्ठ तिष्ठ खड़ाहूं खड़ाहूं इसको देख, लौट लौट नियतहो, नियतहूं, प्रहार कर CHAPTER LIX " Being asked by my son in tho field of battle, what did Bhishm, who had made the proinise in his raze, do to the Pundavas and tho Pandavas to Bhishm? Pray tell me all, Sanjaya,” said Dbritrashtra " In the afternoon of that day," replied Sanjayn, " when it was nearly evening time and the Pandavas were making merry at their conquest, your father Devabrat Bhishi, acquainted with all dhnrons, being protected by your son's nrmies from cyrry side, faced the arms of the Pandarns on very stift horses. Then, on nocount of your injustice, wo fought i drculful light with the Pandaras 6. The sounds made by Loirs and beating of palms caused a noise lile that of tho rending of mountains 'Stand, Stand;I stand;look here; return, return; keep standing: begin ete' rere the words heart the gi ound looked as if strewn over riti: 1 lor clay From tle ४५७) भीष्मपर्य Bliishma Party [4571) शिलानामिव शैलयु पतितानाम मूत्मनिः ॥ ९ ॥ पतितान्युत्तमानानि चाहवश्ववि भूषिताः । व्यचेए-त महीं प्राप्य शतशोध सहस्रशः ॥१०॥ हतोत्तमाहाः केचित्तु तथयो धतकार्नुकाः । प्रगृहीतायुधाश्चापि तस्थुः पुरुषसत्तमा ॥ ११॥ प्रापर्चतमहावेगो नदी घिरवाहिनी । मातादशिलारौद्रा मांस शोणितकर्दमा ॥ १२ ॥वराश्वनर नागानां शरीरप्रमवातदा । परलोकार्णवमुखी गृभगोमायु मोदनी ।। १३ ॥ न दृष्टं नश्रुतं चापि युद्ध मेतादर्श नृप । यथा तव सुतानाच गांडवानांच मारत ॥ १४ ॥ नासी दयपयस्तत्र योधैर्युघि निपातितः । गजेमपतितैनीलगिरिगृढ़रियावृतः ॥ १५ ॥ विक्रीणैः कवचैश्विः शिरस्त्राणेश्च मारिप । शुशुमे तद्रस्थानं शरदीवनमस्तलम् १५ १६ ॥ विभिन्ना शरैः केचिदनापीडप्रकर्पिण:। अभीताः समरे गर्नभ्यधावन्त इत्यादि अनेक प्रकार के शन्द मुनाई दिये, मुनहरी कवच कमठ और ध्वजाओं पर ऐसे महा शब्द हुए जैसे कि पर्वतों पर शिलाओं के गिरने से शब्द होते हैं, हजारों भूपगों से अलंकृत शिर और भुजा पृथ्वीपर गिरकर नानाचेष्टा करने लगे, कितनेही शिर कटेहुए पुरुपोत्तम धनुप उठायेहुए वा शस्त्रों को धारण कियेडुए उसी दशा में नियतहुए तब रुधिरमे जारीहोनेवाली घोर नदी हाथियोंके अंगरूप शिला और मांस रुधिररूप कीचड़ से भरीईई बड़े वेगवान् उत्तम घोड़े हाथी और मनुष्यों के शरीरसे प्रकट गिद्ध मृगालोंको प्रसन्नना देनेवाली परलोक समुद्ररूपा घोरनदी बड़े प्रवाहसे वही ।१३। हे राजा जमा कि आपके पुत्रोंका और पांडवोंका युद्ध हुआ वैसा आज तक देखागया न सुनागया, उस युद्ध गिरायेहुए शूर वीरों के कारण कहींभी स्यों के जानेका मार्ग नहींरहा और हाथियों के गिरने से वह पृथ्वी नीले पहाड़ों के गिसरों के समान दिखाईदी, हे श्रेष्ठ सुवर्ण निर्मित कवचों के और शिर वाणों के फैिले हुए होने से वह युद्धभूमि ऐसी शोभायमान हुई जैसे कि शरद ऋतु में आकाश मण्डल शोभिव होता है। १६ । कोई मनुष्य अत्यंत घायल प्रांत वा पैरोंसभी from different sides. 8. The din of the fall of golden conts of mail 12 helmetes medaunande-Islahatul Jannes V. nountains hovsands of lieads and arms decked with jewells, falling ou earth, trembled and shook in various pays. Many waniors remained in tho posture they were before raising up their bor's or other weapons when their heads were cut off their bodies. Then the river of blood, laring the bodies of elephants for its stones and flesh and blood for its mire, sprang from the bodies of warrior horses, elephants and men, pleasing the vultures and jackals, flowed with great relocity like the occun of the other world. 13. The world lias not yet syn or heard & battle like that letseen the Pandayng and your wona. On account of tho carcases of Warriors there 629 110 may left for tho chariots to pass orer. Froin the bodies of the elephan's íalim over the past 45181 Mabharat (४५७८) दर्पिता ॥ १७ ॥ तात भात सखे यो वयस्य मम मातुल । गामा परित्यजे त्यन्ये चुकशु पतिता रणे ॥ १८ ॥ अधाभ्योहित्यमागच्छ कि भीतोस पथयारपति। स्थितोह समरे माम गिति चान्ये विचुक्रुशु ॥ १९ ॥ तन भीष्म शान्तनधी नित्य गण्डलकामक । मुमोच चाणान् दीप्तामानहीनाशीविषानिय ॥२०॥ शकायमी कुन दिश सी यतयत । जघान पाण्डवरथानादिश्य भरतर्षभ ॥ २१ ॥ स नृत्यन्वैत्योपस्थे दर्शयन पाणिलाघायम् । अलातचक्रवद्राजस्ता तन स्मदृश्यते ॥ २२ ॥ तमेक समरे शूर पाण्डया सृक्ष सह । बनेकशतसाहन समपश्यातलाघ चात् ॥ २३ ॥ मायाता(मानमिव भीष्म तन स्म मेनिरे । पूर्वस्या दिशित इटधाता च्यादरशुजना ॥ २४ ॥ उदीच्याचेव गालोक्य दक्षिणस्या पन प्रभो । एव सारेशूरा कटेहुए मन से अदीन ओर अहंकारी होकर उम युद्धमे शत्रुओं के सम्मुख दारे, कोर्ड के पिता हे भाई हे मित्र हे वांधव हे समान गवस्थावाले हे मामा हे काका मुझको मतसताओ मतसताओ ऐसा कहकर पुकारे, और कोई सम्मुख वनमानहो तुम आओ क्या भयभीत है कहा जायगा में युद्ध मे नियतहू भर न कर इत्यादि सने कहकह कर पुकारते थे, उस युद्ध में शान्तनव भीमजी न जिनका धनुप) मण्डल के समान था विपके बुझेहुए तीननोक के सर्पाकार वाणो को छोडा, हे भरतपशी वाणो से सर दिशाओं को वरावर करने वाले सावधान व्रत भीष्मजी रय के मागी मे नृत्य करते ओर हस्तलाघपता को दिखाते हुए ररका समान जहा तहां फिरने और चमकते हुए दृष्टि पडे, पाइयो ने मृनयों समेत युद्ध भूमि में उस अकेले शूरवीरकी हस्तलाघनता के कारण लाखो के समान जानकर भीमनी को महा मायावी के सदृश माना, क्योंकि उसको अभी पूर्व मे देसकर फिर पश्चिम दिशा मे देसा, इमी प्रकार उत्तर में देखार दक्षिण दिशा में भी देखा, इस गति Gillelets omul and turbine fallen lielt ud here the field of tatt! losled lil t the sky in cold rate 16 Some nien, inoitally wounded with thieu entrails and legs catdos, cheerfully and proudly rastet on the onoins Oilu seri 1 'ither, brother, friend, liusinon, com pamon, inatumi unci donot abandon int, donot till mer Sone and out, Com and fuc ne Com Alt riyadr where goeath Dont lx atrnd I un livrtul Brom the won of Shantanu whose lor mosca liben cul shut ska ppumtei nirows lilc senomais serpente 20 Beschur_1114 mqr luce sol mi ross mall dnection. Blitlin olid suns, skel tau iluuias strypr8 a tu calling out thornati e Bansfoute en danc in lusel still all directions, anil celulitina t're se adesets of dies lited and low" ed lil e sporbs of fire 118 al die I'lu l'allava titla tivo Sunjavas iegral ud luun as though was n my oul of warriors in ore lui 2011 ic al poner lL nas wir Luiset us in dit cz, now in the soutli m the 1s ??! . 11015- । 101 ittt!

भीष्मपर्च Bhishma Pary [ Air]] गाङ्गेयः प्रत्यदृश्यत । २५ ॥ ग पाण्डचयानां कश्चित् शरतोति बक्षितम् । विशि वानेव पश्यन्ति भीम चापच्युतान्वहन् ॥ २६ ॥ कुर्वाण समरे कर्म ‘सूदयानञ्च चाहिनीम् । व्याक्रोश रणे तन नराबहु विधायहु ॥ २७ ॥ अमानुषेण रूपेण चरणों पितरं तय । शलभा इव राजानः पतन्ति विधिचोदिताः॥२८॥ भीम्माग्निमिसन विनाशाय सप्तशः। न हि मोघः गरः कषिदासीद भीमस्यसयुगे। २९१ नरगांगाव कायेषु यहावाल्लघुयोधिनः। मिनायेकेन वाणेन समझेन पनत्रिणा ॥ ३० ॥ गजकाटक सन्नद्ध पत्रेणेव शिलोच्चयम् । द्वा त्रीनपि गजागेहान् पिण्डितान वर्मितानपि ३१॥ नागचेग सुमुक्तेग निजधान गितातय । यो यो भीष्म नरव्याघ्रमभ्येति युधि कश्चन ॥ ३२ ॥ महत्तः समया पतितो भुवि श्यते । एवंसा धर्मराजस्य वध्यमानामहा से वह गांगेय भीष्मजी युद्ध में महायुद्ध करते हुए दृष्टिआये । २५ । पांडवों का कोई शूरवीर उनके युद्ध के देखनको समर्थ नहीं हुआ इन भीमनी के धनुप भेगिरे हुए अनेक विशिख नाम वाणही दिलई पड़ते थे, उस संग्राग में उस कर्म करनेवाले सेनाको मारते देवरूप घूमते हुए आपके देवत्रत पिताको देखकर युद्धमें लोग अनेक रीता ने पुकारते थे, और अत्यन्त मोहित हजारों राजा लोग उसभीष्मरूप अग्नि में सलभाओं के समान गिरकर काल बाहुए, युद्धभूमि में उत्सहस्तलाघवनामे लड़ने वाले भीमजी का कोईभी घाण मनुष्य हाथी घोड़े आदि के शरीर में लंगकर निष्फल नहीं गया, वह भीष युद्वमें मुकेहुए पर्ववाले एकही वाणु से दन्तमण्डल धारी हाथी को ऐसे मारडालने थे जैसे कि वन से पर्वतको इन्द्रमारना है आपके पिताने अत्यन्त तीन नाराच नाम वाण मिले हुए पर्जनों के समान दो वातान हाथियों के मवारों कोभी मारा | ३१ ! जो कोई युद्धमें इस नरोत्तम भीप्तके मम्मुख पाता था यह भयो एक मुहूर्ततक पृषीपर गिराहुआ दृष्टपड़ता था, इस रीति से अतुल बल भीप्मनी से घायल हुई युधिष्ठिरकी सेना हजारों प्रकार से दुखी और North. The son of Ganga was thus scen fighing in battle. 25. Nono of the Pandav warriors could faco Blushm in battle. The sharp arrows shot fronm Bhishm's bow were szen here and there. Eceing your father Devabrat doing that difficult wolk killing the wariors and rouing like a god, the pzople uttored variou-cries. Thousands of kings lost their senses and fell into the Bhishmic file lilo so many insects. None of the arrois sluot by detterous Bhislim ras ineffec. turi on urn clephaut or liorso With single ho sked arrons Bhislın hilled elephants having large tushsn3 Indra biea's down mountains with his vajra. Your father killed with his sharp pointeil an uns many sn clephant aider by twos and threes at a time. 31. Whocrer faced Blixlım the best of men fell on earth with fear and remained insensible for a whilc. Thus wounded by: Bhashm of immenso proo Was Yudhishthit's army was distie.sed and fiightened. That arty 4580] Mahabharat (४५८०) चम् ॥ ३३ ॥ भीष्मेणातुलवीर्येण व्यशीयंतसहन्नथा । प्राकपतमहासेना शरवर्षेग तापिता ॥ ३४ ॥ पश्यतोवासुदेवस्य पार्थस्याध शिखण्डिन । यतमानापिनेधीराद्रय माणान्महारथान् ॥ ३५ ॥ नाशक्नुवन्धारयितु भीमवाणप्रपीडितान् । महेंद्रसावीण पध्यमानामहाचम् ॥ ३६॥ अमन्यतमहाराजगच द्वौसाधावत आधिद्धनरनागाश्व पतितजकूचाम् ॥ ३७॥ अनीक पाडुपुत्राणा हाहाभूतमचेतनम् । जघानाप्रपितापुत्र पुनपितरतथा ॥ ३८ ॥ प्रियसखायचाऊदे सखादेवदलात । विमुच्यफयचा न्यन्ये पाण्डुपुत्रस्य सैनिका ॥ ३९ ॥ विमुक्त केशाधायत प्रत्यदृश्यतभारत । तद्गो इलमिबोदनातमुद्भातरथयूथपम् ॥ ४० ॥ ददृशे पाइपत्रस्य सैन्यमार्तस्थरतदा । प्रभ ज्यमान सैन्यंतुदृष्ट्या पादवनन्दन ॥४१॥ उवाचपार्थ वीभत्स निगृहरयमुत्तमम् । भय भीतहुई, वह पांडवों की बड़ी सेना भीमजी के बाण ममूहों से पीड़ित होकर वासुदेवजी और महात्मा अर्जुनके देसते हुए वही कम्पायमान हुई, उपाय करनेवाले ) वारलोगभी भीमजी के बाणों से अत्यन्त पीडामान भागतेहुए महारथियों के लौटाने को समर्थ नहीं हुए हे महागज महाइन्द्र के समान पराक्रमी भीमसे उच्छिन्न पांडवों की वडीमारी सेना पराजय को माप्त हाहाकार रुप होकर अचेत होगई और रथमें हाथी घोड़े भी घायल होकर ध्वजाओं समेत पृथ्वी पर पड़ेहुए थे । ३७ । उस युद्धमें पिताने पुत्रको और पुत्रने पिताको वा मित्रने प्रियमित्रको मारा हे भरतवंशी पाण्डवोंकी सेनाके मनुष्य कवचोंको त्याग भिर के बालोंको फैलाकर दौड़ते हुए। दृष्टपड़े, , तब पाण्डवों की वह सेना जिसके महारथी भ्रान्ति से युक्त थे व्याकुल दुखी और भपकारी शब्दों को करते हुये दिखाई दिये फिर यादवों के प्रसन्न करनेवाले श्रीकृष्ण जी सेनाको पराजय में प्राप्त देखकर अपने उत्तम रथको रोककर भर्जुनसे बोले कि हे अर्जुन अब यह समय प्रागया है जो तेरा अभीष्ट है हे नरोत्तम जो तू romy of the Pandavas, hit by the arrows of Blushnu, was inuch shaken within sight of Krisho und Arjun Even the bravest of men could the soldiers from running 2017 Routed by Bluslim of Indra lile prosess the Pandav army suffered defeat and borzne 19 sensible with cries of rh and alas. Chariots, clephants and horses too, full do on on ground The fntlicr struch son father, and thic friend struck friend in that grent Lattle Tho peop's of thic Pandis arms, leasing their armour cio scen running spa) with dishes cllcil hair Then the army of the Pandasas, o hoscar riors had lost their wits, distressed and frightened were seen uitoring frightful sounds. Shree K119in the joy of the Ynda vas seeing de army of the Pandas 15 in the act of suffering defert, cheched lids chart and thus spole to Arjun The time las non come, Arjun which you nen to long nishing for. Attack Bhishm, if not) cep 37 the son struck Jon bare -- (४५८१) Fraga Bliishoia l'arr [1281] अयंसकालः संप्राप्त. पापस्तेऽभिकांक्षितः॥ ४२ ॥ प्रहरस्वनाध्याघ्र रचेग्मोहा द्विमासे । यत्वयाकथित धीर पुरानांसमागमे ॥ ४३ ॥ भीमाद्रोण मुखान्सर्यान्धार्न गष्ट्रस्य सैनिकान् । सानुबंधान् हनिष्यामि येमायोत्स्यनि संयुगे। ४४ ॥ इतितकर कौतेय सायंचास्यमरिंदम । बीमत्सोपश्य संन्यस्वभज्यमान ततम्मतः ॥ १५॥ यतच महीपालान्पश्ययौधिष्टिरेबले । दृष्ट्वाहि भीष्म समरे व्यात्ताननमियांतकम् ॥ ४६ ॥ भयार्ता प्रपलायंते सिंहात्क्षुद्रगाइच । एवमुक्तः प्रत्युवाचासुदेवं धनंजय ॥ ४७ । नोदयाश्वान्यतो भीष्मो विगाह तहलार्णवम् । पातयिष्यामि दुर्धर्षे वृद्धपुरुपितामहम् ॥ ४८ ॥ सञ्जय उवाच । ततोश्वान् रजतप्रख्यातो दामासमाघ । पत्तोभीष्म रथो राजन् दुप्प्रेक्ष्योरश्मिवानिय ।। ४९ ॥ तनस्तत्पुरगवृत्तं युधिष्ठिरवलंमहत् । दृष्ट्या पार्ध महावाहु भीष्मायोद्यनमाहये ॥ ५० ॥ ततो भीमः करुश्रेष्ठ सिंहयाद्विनदनमः । मोहमे अज्ञान नहीं है तो इनके ऊपर महार कर । ४२ । हे महावीर पूर्व समयमें गजा ओं के मिलाप में जो तुमने कहा है कि दुर्योधनकी सेना के भीष्म द्रोणाचार्य आदि लोगों को उन के सहायकों समेत मागा जो कि मुझ से युद्धको करेगे, शत्रुजय अर्जुन तू अपने उस वचनको सत्यकर तू इधर उधर छिन्न भिन्न हुई अपनी सेनाको देख, युधिष्ठिर की सेनामें युद्ध कुशल मृत्यु के समान भीप्मको देखकर इन भागते हुये राजाओं को देखो। ४६ । यह सब भयसे पीड़ित होकर ऐसे नाश हुए जाते हैं जैसे कि छोटे मृगीतहको देसकर भयसे मरजाते हैं यह कृष्ण के वचन सुनकर अर्जुन ने वासुदेव जीको उत्तर दिया, कि माप घोड़ोंको उधर चनाओ जहां भीष्मनी हैं मैं अब इस सेना रूपी समुद्रको उतरकर इस अजेय और वृद्ध कौरवों के पितामहको गिराऊंगा हे गगा तबतो माययजी ने चांदी के समान वेत रंगके घोड़ोंको उधरहीको चलाया जिधर सूर्य के समान कठिनता से देखने के योग्य भीमजी थे, इस के अनन्तर भीमके निमित्त युद्ध में प्रत्त महावाहु अर्जुन को देखके युधिष्ठिरकी वह बड़ी भारी सेना फिर लौटआई, । ५० । तदनन्तर niot lost your senses 42. You said in the presence of kings that you would destroy Bhislıma Diona, and other warriors of the Kau- Tavas with their allies in battle Fulfil your promise, destroyer of foes! Look at your army scattered liere and there and look at bravo Bhishm roaming like leathi and causiog the kshatryas, flight. 46 They die with fear like lower animals in the preser.ce of a lion." To these words of Vasudev Arjun gave the following reply:—"Lead the horses to tho place where Bhishm is I shall cross the ocean of and shall destroy the old grandfather of the Kauravas. At this, Madhava drove the silvery horses toifads Bhishni i ho stood in great glory and could not be gazed at like the sun Seeing Arjun ready to fight with Bhishm, the army of Yudhishthir cime back. 50. Then thie army [1582 } Nrhal harat (४५८२) धनंजया शोध शावरवाशिरत् ॥ ५१ ॥क्षणेन सरथस्तस्यसहयः सहसारथिः । शावर्षण महतासंछनोनप्रकाशते ॥ ५२ ॥ वासुदेनरत्य सभ्रांतो धैर्यमास्याय सत्त्व धन् । चोदयामासतानश्वान् विचितान भी मसायकै ॥ ५३ ॥ तत-पायर्योधनाद्य दिव्यंजलदनि स्मनः । पातयामासभीष्मम्प धन िछत्वात्रिभिः शोः। ५४ ॥ सच्छिन्न पुनरन्यामहदन । निमिपांतरमाण सजंयक्रेपितातव ॥ ५५ ॥ विचतितोदोया धतुजलागि स्वना । धय स्यतदापिकुद्ध विच्छेदधनुरर्जुन. १५६। रास्यतत्पूजयामास लाघवंशान्तना सुत । साधुगार्धमहाबाहो साधुभोपाण्डुनन्दन ५७ स्वविता कहां महाकमधनंजय | प्रीतोस्मिसुभृशं पुत्र कुरुयुद्ध भयासह ॥ ५८ प्रति पार्थ प्रशम्याच प्रत्यायन्महद्धनुः । ममोच समरे वीरः शरान् पाधर प्रति ॥ ५९॥ अदर्शयद यासदेवो हययाने परं वलन् । मोधान् कुर्वन् शस्तस्य मण्डला. धन्या कौटयः सिंहसंमान गर्जने कौरवों में श्रेष्ठ भीमजी ने शीघ्रही वाणोंकी वर्षा से अर्जुनको ऐसा हकदिया कि उसकारथ ध्वना सारथी समेत क्षणभर में वाणों से आच्छादित होकर दिखाई नहीं दिया. फिरतो भ्रान्ति से रहित बुद्धिमान वासुदेवजी ने धैर्यतामें नियत होकर भीप्मही के शायकों से उन्हीं के धनुपको काटकर पृथ्वीपर गिरा दिया, फिर उसदृढ़े हुए धनुप वाले पितामह भीष्मने शीघ्रही दूसरे बड़ेभारी धनुषको लेकर एक निमिपमें ही तैयार कर लिया ।१५। तदनन्तर उसवादल के सामान गर्जने | व ले धनुपको भीष्म ने दोनों हाथों से खेंचा फिर क्रोधयुक्त अर्जुनने उनके उसधनुष कोभी काटा, अर्जुनकी इस हस्तलाघवताको देखकर भीमजीने प्रशंमाकी कि हे महा पाहु अर्जुन धन्यहै हे पांडवनन्दन तुमको धन्यहै, हे संसारके धनोंके विजय करनेवाले यह बड़ाकर्भ तुझीमें है योग्य है योग्य है हे पुन मैं तेरे इसकर्मसे अत्यन्त प्रसन्नहूं । मेरेसंग युद्धकर इसशतिसे इसनीरने अर्जुनकी प्रशंसाकरके फिर दूसरे बड़े धतुपको | लेकर अर्जुनके रथपर वाणोंको वर्षाकरी, फिर वासुदेवजीने भीमके बाणों को 1001 ing lolo a lion, Bhislım the rest of the Kauravas foon covered Arjun with the shower rt airo vs so that neither the chinos nou thic coach man or standard was discernible. Then use Vasudov with great shill caused the bow of Bluslim to lie cut down by his enn arrows. Bluslım the grandtather then took us another large lor and prepucd it for action in a 11 cc. 55 Blisluna drou sith Loth hinuis the low wluch vo vred like thunder, but Ajuncut this second bow too. At this dexten yol ni juu's Janel Blii-lım praised liiv, saj ins. "Well done, lizate Arjun? \'ell-clonc son of landu worthy of jou Dlununuys! I am much pleased with thig work of thine, ny son: l'ight with ane! Ifnumg thus given praiso to Arjun, Bluishm Look up anothier In ge bus and shower his allows on liin!. Vasudev turned thic lots of chariut, now this way nor that may, It was (४५८३) भीष्मपर्च Bhishma Pary [1388 ] न्याचरलघु ॥ ६० ॥ ततात भीष्मः सुदृढ़ यासुदेव धनजयो । विध्याध निशितैोण: सर्वगात्रेषु भारत ॥ ६१ ॥ गुशुभाते नरम्यानी तो भीष्मशायिक्षता। गोवृधाविय संर पो विपार्टिसितांक्षितौ ॥ ६२ ॥ पुनश्चापि मुममुद्धः शरैः शन सारः। कृष्णयो घि सरधो भीम भावार यद्दिशः ॥ ६३ ॥ वाणेयञ्च शरत्तीण. कम्पयामास रो. पितः । मुहुरगुतमयन् भीमा प्रहम्प स्वायत्तदा ॥ ६४॥ तत. ह. णस्तु समर दृष्टया भीमपराक्रमम् । सम्प्रेष्यच महाबाह पार्थस्य मृदुयुद्धताम् ॥ ६ ॥ तं भीमं शरय. पाणि सृजन्त मनिशं युधि। प्रपन्तमिवादिन्य मध्यमामाघसेनयोः ॥ १६ ॥ यान. घरान् विनितान्त पाण्डपत्रस्य सैनिकान् । यगांतमिय कुर्वाणं भाग यांधिष्ठिर बल ६७ ॥ अमृष्यमाणो भगवान केशवः परपोरहा। अचिंतपदोधारमा नास्तियोधिष्टिरेदलम् ६८ निष्कल करके तेजमंडलों में घूमने हुये घोड़ोंके चलाने में बड़ा पराक्रम दिसाया६० । इसके पीछे भीष्मजीने अपने तीक्ष्ण वाणों से वासुदेवजी को और अर्जुन को बहुत घायल किया उनाणों से अत्यन्त घायल वह दोनो पुरुषोत्तम ऐ शोभायमान | हुए जैसे कि गजेते और शाखामों के घातसे चिहनित दो उत्तम बैलहोते हैं, इसके पीछे अत्यन्त क्रोध में भरे हुए भीप्पनीने लाखों बाणों से इनदोनों कृष्ण अर्जुन की दिशाओं को रोक दिया, फिर वारम्बार अत्यन्त अहंकार और क्रोधयुक्त भीमजी ने बड़े ऊंचे शब्द से हँसकर तीन वाणों से वृष्णिवंशी श्री कृष्णजी को कंपाय- मान कर दिया । ६४ । इस के अनन्तर महाबाहु श्रीकृष्णाजी युद्ध में भीप्यजी के महा पराक्रम को देखकर ,और अर्जुन के मृदु युद्ध को अच्छी ,रीति में विचार और युद्ध में बारम्बार वाणोंको छोड़ते हुए दोनों सेनाओंके बीचको पाकर पांवोंकी उत्तम सेनाको और सेनाके उत्तम शूरवीर पुरुषों को सूर्य के समान संतन करते वा,मारने, युधिष्ठिर की सेनामें मलय मचातेहुए भीमको देखकर उस बड़े बानी शत्रुओं के मारनेवाले तमाशील भगवान केशवजीने, यह निन्ताकी कि युधिष्ठिरकी | सेनानहीं रहेगी क्योंकि भीमाजी एकही दिन में युद्धकं वीच दैत्य दामत्रों कोभी and made the cornpour of Bhishm wounded much Vasudev and Arjun with lijs sliarp arrows. Wounded with those arrow's the two best of men looked glorious lilc ito bellowing bulla vounded with the horns of each other. Then Blisium in great ingo checked Krishn and Arjun with thousands of Lis arror, and they could not move in any direction. Bhislım, full of pride and angor, with loud laughs sloo) Kiislın of the Frislını family ly his 64 Thien Lsave Krishn, seeing the great prosess of Bhishm anit sceing also the mildeness of Arjun's fighting and seeing the con. tinuons downpour of Bhishma's arrosss over thio l'andas army and tlio consequcut destructinn, the visest of men, destroyer of cnemies Bhagwan Keshav of forgiving nature thought that Yudhishthirs army woulu Le estirpated as Bhishm could destroy althe god; andds arrors futile. Then Büisim arrows - [ 4584 ] Malia bliarat (४५८४) एकाहनाहि रणे भीमो नाशपेदेव दानवान् । किन्नुपाण्डुसतान युद्ध सबलान् सपदा नुगान् ॥ ६९ ॥ द्रवतेच महासैन्यं पांडवस्य महात्मनः । एतेच कौरवास्तूर्ण प्रभगनवी त्यसोमकान् ॥ ७० ॥ प्रादयति रणे दृष्टया हर्पयन्त पितामहम् । सोहं भीष्म निहन्म्य व पांडवाीय देशितः ॥ ७१ ॥ भारमेत विनेष्यामि पांडयानां महात्मनाम् । अर्जुनोहि अजुनोहिशरस्तीणेचध्यमानोप संयुगे ॥ ७२ ।। कर्तव्यनाभि जानाति रणेभीष्मस्प गौरवात् । तधा चिंतपतस्तस्य भूयएचपितामह : प्रेषयामाससंकुद्ध शरान्पार्थ रथंप्रति ॥ ७३.॥ तेषांवत्यात्तु भृशंशराणां दिशश्चसर्वा पिहितायभूवः । नचांत रिक्ष न दिशो नभूमिनभास्करो दृश्यतरश्मिमाली ॥ ७४ ॥ घघुश्चयातास्तुमुला सधूमादिशश्च सर्वा. झुभिताबभूवुः । द्रोणोसिकायजयद्रथश्च भूरिश्रवाः कृतवर्मारूपय ॥ ७५.", थुतापुरचष्ठ पतिश्च राजाविंदाबिंदौच सदक्षिणश्च । प्राच्याश्चसौपीरगणाश्च नाशकरनेवाले हैं तो सेना और सहायकों समेतं पांडवों का मारडालना उनको कितनी बड़ी बातहै ! ६१ । और इन महात्मापांडवोंकी सेना भागीभी जाताहै, और यह कौरवलोग सोमकों को युद्धसे भागे हुए देखकर बड़े प्रसन्न चित्त पितामहको प्रानन्ददेते हुए चारोंओर से दौड़ेचले आते हैं सो अव मैंभी शस्त्र धारण करके पा हयों के निमित्त भीष्मको मारके महात्मा पांडवों के इस महाभारको दूर करूंगा, और अर्जुनभी युद्ध में तीव वाणों से पीडामान है वहइस युद्ध में भीप्मनीकी महत्वता से करनेके योग्य कर्मको नहीं जानताहै, इसप्रकार उन श्रीकृष्णजी के विचार कर | तेहीमें फिर अत्यन्त क्रोधरूप भीप्मनीने अर्जुन के रथपर वाणोंको फेंका । ७३। उनवाणोंकी अत्यन्त आधिक्यतासे सव दिशाढकगई उस समय अाकाश औरदिशा कुछभी दिखाई नहीं देतेथे और न किरणसमूह धारी सूर्य दिखाई देताथा वायुमहा। तुमुल हुभासव दिशाओं में धुआंसाव्याप्त होकरमहाब्याकुलतामचगई द्रोणाचार्य विर्ण जयद्रथ भूरिश्रवा कृतवर्मा कृपाचार्य श्रुतायु अयष्ठपात विन्द अनुविंद मुदक्षिण पश्चिमी राजा सौर्यारोंकेगण सर्वविशालगण तुद्रकमालव यह सवराजालोग शीघही danavas in a day and therefore the destruction of the Pandavas and their allies was no great work for him. 69. The army of the great Pandavas is 1 unning away, and the KaurayJ9, seeing the flight or the Samahs, are swarming froin all sides to the joy of the grandfather. So I shull take up nrnus for the good of the Pandavas and sliall rf licvc than fiam this danger by killing Bhislım al by s'ia: p arrows and does not know what to do out of respot for Bhishim. When Shre Krishn was thus thinking, Bhishm again shore ered his arrois over the chariot of Arjun. 73. Thoºthick shower of arrows covered all tic directions of-space, and neither the sky nor. cartu was visible. Tlie rys of the sun wera hidden with those Art ITB tho wind blerr a fok. Thero was an nncasiness on all sides and there was something liko smohe spread all over. Drunacharya, Vikari, Arjun too, is wound- (४५८५) भीमप Bhishma PAIY [4585] सर्ये वयातयः क्षुद्रकमालपान ॥ ७६ ॥ किरीटिनं स्वरमाणा विसनिदेशमा शान्त नवस्परानः । तवाजिपादातरचौघजालैरनकसाहनशतेददर्श ॥ ७७॥ फिरीटिनसंप- रिवार्यमाणं शिनेनता धारणणयूपश्च । ततस्तुदृष्टयानयासुदेयौ पदाति नागाभ्यरथैः समतात् ॥ ७८ ॥ अभिद्रुती शस्त्र भृतांवरिष्ठौ शिनिप्रवीरोमि ससारम् । सताम्यनीयानि महाधनुष्मान् शिनप्रवीरः सहसाभिात्य ।। ७९ ॥ धफारसाहाय्य:- थार्जुनस्य विष्णुपया दृत्रनियूदनस्य । विशीर्णनागाश्व रपध्वजो भीमेणयित्रासित सर्वपोषम् ॥ ८० ॥ युधिष्ठिरानीकमभिद्रत प्रोवाच सदृश्यशिनि प्रधीरः । पथक्ष त्रियायास्यथनपधर्मः सतांपुरस्तात्कथितः पुराणः ॥ ८१ || माश्याप्रतितांत्य अतप्र. धीराः स्वधीरयम परिपालयध्वम् । तान्या स यानं तरजो निशाम्य नरेंद्र मुरुपान द्रवतःसमंतात् ॥ ८२ ॥ पार्थस्य दृष्टया मृदयुक्तांच भीष्मंच संपन्ने समदीर्थमाणम् । अमृप्यमाणः सततोमहात्मा यशस्विनं सर्व दशाहभरी ॥ ८३ ॥ उवाचर्शनयममि मामजी के माझावती होकर अर्जुन की भोरको दाढ़े जब सात्यकि ने उसपर्जन को घोड़े हाथी रय और पदातियों के लाखों जालों से और हाथियों के स्वामियों से घिराहुभा देखा वहांजाकर उससुरवीर धनुषधारी मात्यक्नेि उन मेनाकि सम्मुख पहुँनकर । ७८ । अर्जुनकी ऐसीसहायता की नसी कि विष्णु भगवान इन्द्रकी सहायता करते हैं फिर वह महावली सात्यांके युधिष्ठिर की स्थायी घोड़े पर पदानियों समेत उस भागनेवाली सनाका जिसकी सपना गिरी हुई और शूरवीर भीमनी से भयभीत हुए देखकर यह वचन बोला कि हे क्षत्रिया कहां मानेही पुराणों में यहधर्म शेठपरूपोका नहीं कहा है । ८१ । ईश्रेष्ठबीर लोगो मान पणों को मात्यागो थाने वागधर्मों से पुरुषार्थ करो तुमअर्जुन को मृदं युद्ध कती और भीम को भयंकर युद्ध कता और चारों ओरसे गिरते हुए कौवोंको Jayadrath, Bhurishrava, Kritvama, Knipacha153, Shrutayu, the ruler of Amvashta, Vind, Anuvind, Sudakshin; the princes of the West, the armies of Saurirs, the Vishats and the Kshudrabs attacked Arjun by Bliskua's order. When Satrakı saw Arjun surrounded by thousands of hurses, elephants, cları its, foot soldiers and elephant riders, le came at once to the rescue When there the brave warrior lielped Arjun AS Vishnu helped Irdra. The brave warrior Satyabi, see.tizs the cha. riota, elephaats, fiorses and fout soldiers of Yudhishthir in a state of di order, their banucrs fallen and the whole army terrified by the bravo deeds of Bhisho, le cried out:-"[There are you going Esha tryas? This has never lean the pračtice of good ben in ancient times.81. Donut lose your lives, good řarriors Do your dnty fulls. You think Arjas to be inild in fight and Bhishm to be a dreadful fighter, and therefore you are running away at the right of the Engraras [4586] Mahnbljarat (४५८६) प्रशंसनद्दष्ट्या कुरूनापततः समग्नान् । येयांतितेयांतुशिनि प्रधीरयेपिस्थिता साम्य तोपियांतु ॥ ८४ ॥ भीमरथात्पश्यानित्यमा द्रोणं च संरपे स गणमयाय । नमेस्सात्यतकौरयाणां झुद्धस्यमुच्यतरणेद्य कश्चिम् ॥ तस्मादर गृह्यापांगमुन प्राणहरिष्यामि महाव्रतस्य । निहत्य भीम स गणं तथाजी द्रोणंचशैनेय रथप्रवीरौ ॥८६॥ प्रीतिकरिष्यामि धनंजयस्य राजयभीमस्य तथाश्विनोक्ष निह त्यसन्धृितराष्ट्रपुत्रांस्तत्पक्षिणो येचनरेंद्रमुख्याः ॥ ८७ ॥ गज्ये न गजानमजातशत्र संपादयिष्याम्यहमद्यदृष्ट । ततःसुना वसुदेवपुत्र. सूर्यप्रभवनसमप्रसाधम् ॥ ८॥ क्षुरतिमुद्यम्य भुजेन चक्र रथादवप्छुत्य विसृज्यवाहान् । संकंपयनूगांचरोमामा | देखकरभागे जातहो यह वचन सुनकर सब यादवों के भर्ता महात्मा श्रीकृष्णमी बड़ी प्रशंसा करके उस यशस्वी सात्यकि से बोले कि हे सेनापतियों में बड़े वीरजी जातेहैं वह चले जायँ और जो नियत हैं वहभी चाहे चले जायें । ८४ । अव युद्ध के वाच'रथ हाथी घोड़े और सब सेना समेत भीम को और 'द्रोणाचार्य को | मेरेहाथ से गिरे हुए देखो हे यादव सात्यक कौरवों की सेनामें कोई ऐसा नहीं है जो अय युद्ध में मुझ कन्धयुक्त सिाथ युद्ध करने को समर्थहो, इस कारण भव मैं | महावतभीप्म के प्राणों को हरूमा हे सात्यकि रथियों में घडेबीर भीष्म और द्रोण चार्य को सेना के समूहों समेत इस युद्धभभि में मारकर राजा युधिष्ठिर भर्जुन भीमसेन नकुल और सहदेवकी प्रसन्नता को करूंगा अवमैं प्रसन्न मनहोकर धृतराष्ट्र के सब पुत्रोंको और जो उनके सहायक राजाहैं उनको मारकर । ८७ । प्रजात शत्रु राजा युधिष्ठिर को राज्यसे युक्त करूंगा, यह कहकर घासुदेव श्रीकृष्णजी मुन्दर रूपमूर्यके समान प्रकाशित हजारवज्र के सदृश कठोर 'छुरेके समान ताण घेरारखने वाले चक्रकोऊंचा घुमाकर और घोड़ोंको छोड़ रथसे उतर चरणों ndvancing on all sides/" At this, Krishin the lord of tho Yadayus praiscd Satyahi and said, “Bravest of commanders, let theru go who are unwilling to stay. I care not if the reinaining ones also loayo 14. 84 You will noir see the full of Blushin and Dronnclinryn with the cha: iots, elephants, liaises and soldiors by my hands in the field of battlo. There is none, O Satyakı, in the indst of the Kaura png that can withstand me in my inge. Ishall the otoro deprive Blist of his life. Having killed brnve Blushin and Dionichni ya with all the lhosts in the field of battle. I shall please king fudhishthir. Arjun, Bhishm, Nnkul and Hnlpadey. I shall, with great pleasure dest.or. all tho sons of Dantraghem and their allies 87. I slinil instal prince Yudhishthur on tho throne." Ilasing said this, Vasudev Shrco Krishin turned on high his diseys of beautiful form, glorious libo tlic song a thou« ind times as hard as the vajrn and laying a sharp edgo' all (४५८७) भीष्मपर्व Bushma Pary [1587] बेगेना प्रससारभीष्मम् ॥ ८९ ॥ मदांधमाजो सेमुदीर्ण सिंहोजि_सनिय धारणेद्रम् । साभियभीममनीकमध्ये ऋद्धोमहेष्टाधरज प्रमाथी ॥ ९० ॥ ध्यालंपि. पातात पटयकाशे घनोयप पेतहिनायगद्ध । सुदर्शनचास्परराजशारेस्तध्यापन शुभुजोरुनालम् ॥ ११ ॥ ययादिपद्मतरुणार्कवर्णरंगजनागंयणनाभिजातम् । तरणको पोदयसूचुर क्षुराततीक्षणग्रसुजातपत्रम् । ९२ ॥ तस्यैवदेशेल्सर प्ररुहरराजगा रायणवाहोलम् । तमात्तचक्रप्रणदतमचे क्रुद्धमहेंद्रावरजसमीक्ष्य ॥ ९३ ॥ सर्याणि भूतानि भृशीधनेदु ईय कुमचिंतयित्या । स वासदेय प्रगृहीतच संपतयिष्प नियसर्वलोकम् ॥ ९४ ॥ मध्युत्पतन्लोक गुरुर्षभासे भूतानिधक्ष्यनियधूमकेतु । से पृथ्वी को अत्यन्त कंपायमान करते हुए महात्मा भीष्मकी ओरको ऐमे चले जैसे कि युद्धभृमि में महामदोन्मत्त अहकारी गजेन्द्र के मारने को सिंह दौड़े । २० । उसममयगरीर में वर्तमान उत्तम पीताम्बर ऐमा प्रकाशमान हुआ जैसे कि प्राकाश में मुन्दर अलंकारों से युक्त वादल विजलीसहित हो, और इन श्रीकृष्णजी का यह मुदर्शनचक्र रूप कमल जिसकी बडी नालही सुन्दर भुजा थीं ऐमा शोभायमान विदित हुआ जैसे कि नारायण की नाभि से उत्पन्न तरुण सूर्यके समान वर्णवाला | नवीन कपल शोभायमान हुआ था यह, कमल श्रीकृष्णजी के क्रोधरूप सूर्य के उदय से खिलाहुआ और छुराओं से युक्ततीवनोंकरूपपत्तेवाला उनके शरीररूपी बड़े तड़ागमें नियत शोभायमान हुआ ऐमे चक्रारी उच्चस्वर से गर्जना करने | वाले महाइन्टके छोटे भाई श्रीकृष्णजीको देखकर सवीव यह चिन्ना करके अत्यन्त पुकारे कि यह कौरवों की मलय वर्तमान ई फिर यह चक्रधारी लोकों के स्त्र मी जीवलोक के नाश करने को सम्मल गिरते हुए ऐसे प्रकाशमान हुए जैसे कि सबनीवमात्रों का भस्म करनेवाला माग्न देदीप्यहोता है ऐसे पुस्पोत्तम round like that of a razor He left the reigns of the horses and jump. mug dorn from h18 chartut, ran towards Blishtu, shaking the earth under ins feet, like a lion assaulting an elephant. 90 At Lat tina the yellow clothi wlrich he had un his tody, slune lihe lightning in the midst of clouds Tho Sudarshad chahr (discu) of Shree Krishn, havitig his arm for its stein, looked like a new lotus arising out of the navel of Narayan, like the stoit all its vigour That lotus flower opeung at the 17se of the sun oʻShree Krishna's anger and provided with sharp edges for its petals, lool ed very handsuwe over the lake of Shree Krishna's body Seeing krishn the Learer of discus and younger brollier of Indra, roaring loudly, all creatures cried in terror and thought that the end of the Kauravas was Digh. Then that welder of the discus, the lord of the world, ready to destroy the world, Icoled glorious }:Le fire ti o dest oyer of all things Seeing . [4588] Mahabharat. (४५८८) तमाद्रपंतप्रीतचक्रं दृश्यादेवशांतनघतदानी ॥ ९५ ॥ असंभ्रमंतद्विवकपयोपों महाधनुगाडियतल्यधोपम् । उवाचभीमस्तमनंतपौरुषं गोविंदमाजाययिम्ढचेताः ॥ ९६ ॥ एोहिदेवेशजगनिवासनमोस्तुने माधवचक्रपाणे । प्रसह्यमांपातयलोक नापरथोत्तमात्सर्वशरण्यसख्ये ॥ ९७ ॥ स्वयाहतम्यापि ममायरुणश्रेयः पास्मिनि हचैवलोके । संभावितोस्म्यधकवृष्णिनाथलोकनिभिग्तवाभियानात् ॥ ९८ रथादवप्लुत्यततस्त्वराधान पार्षाप्यनुद्रुत्य यदुप्रारम् । जग्राहपीनोत्तमलयवाहुंयाहयो हरियायतपीनवाः॥ ९९ ॥ निगृह्यमाणश्च तदादिदेवो मुशंसरोपा लियास योगी । भारायवेगेन जगामविष्णुनिष्णुमहावातवैफवृक्षम् ॥ १० ॥ पार्थस्तुलित देव देव चक्रधारी को प्राता देखकर, धनुष बाण हाथ में रखनेवाले स्थाई | भीमगी निर्मयता से बोले कि हे देवेश्वर हे जगन्निवास हे शार्ङ्गधन्वा गदा सहग धारी प्रावो मैं तुमको नमस्कार करताहूं हे लोकनाथ हे जीवों के आश्रय और रक्षा के स्थान तुम युद्ध में हठकरके मुझको इसउत्तम स्थसे गिरामो हे श्रीकृष्णजी अब तुम्हारे हायसे मुझमरे हुएका इसलोक और परलोकमें कल्याण है । ९७ । हे अन्धक दृप्णी क्षत्रियों के नाथ मैं तीनों लोकों में प्रसिद्ध प्रभाववाला होकर अंगीकार हुअाहूं बड़े वेगसे दौड़ते हुए श्रीकृष्णजी भमके इस वचन को मुन कर उन से बोले कि अब तुम्हीं इस संसारके नाश के मूलहो सो तुम प्रबोधन का नाश देखोगे क्योंकि दुष्टयतका खेलने वाला राजा धर्ममार्ग में नियत मन्त्री से निवारण करने के योग्य है अथवा जो काल से विपरीत बुद्धी होकर धर्मको उल्लंघन करके चले वह कुलका कलंकी है वह त्यागही करने के योग्य है इस बात को मुनकर वह राजा देवत्रत भीमजी यादवों में बड़ेवीर परम देवदेव श्रीकृष्णजी से यह पंचनवाले कि दैव प्रवल है यादवों ने अपने प्रयोजन के सिद्धकरने that best of men, the god of gods and wielder of mace, Bhishm, armed with bow and arrows, said fearlossly fiom his seat in the chariot:- " Lord of gods ! asylum of the worl!! Vielder of Sharang bow, mace and sword ! volcoux. I how to Lord of the world! refuge of beingö! you may vill malo me fall from this good ehtriot. It will bo good for me in this world and the next, if I fall by your land. 97. Lord of the Andhaks and the Vrishnis ! I shall deen myscif fortunate nbove the threo worlds, if I am accepted by you.” Henring the worde of Bhishm, Shree Krislına alio was coming tonards him in grcal baste, replied, "You are nt tho root of all this bloodshed and will tee the destruction of Daryodhang fu lionest ministers should check 8 Ling from the richediness of gainbling, and lie who nots unjustly without regard for time and placo, is a curse to trio fumils and worths of iring álvandoncel." Ilaving heard this, Des alirat Bhishm, garotho dilinising nipis-tin til greasent warrior of thir Yndavas, Sliret Krisho youl (१९८५ sitará Bhishma Park [4163] श्यपलेनपादा मामांतिकतर्गमभिद्यतम् ॥ बलानिजप्राहगिरीपदेपजिन्दशमें कचित् ॥ १॥ अपरिपतंधीपापकृष्णप्रसोर्जुनाकांचनचित्रमाल । याचको पप्रतिसंहीतिगतिमानकेशवपांडवानां ॥ २ ॥ नहास्यते कर्मयपानिनने शुकशय सोदर ॥ अतंकरिष्यामियागांययाहमिंद्रानुजमंप्रयुकः ॥ ३॥ तत प्रतिमा समपंचतस्पजनार्दनः प्रीतमनानिशम्पा स्थित प्रियकोग्यसत्तमरयरयचक्र.पनरा ॥ ४ ॥ सतानमीमराददानः मगृह्यशवंद्विषतां निहता। विन दय माम ततीदिशध सपांचजन्यस्मरणशौगिः ॥५॥ व्यापिद्धनिकायकलसरजीविकीणाचितपम नेत्रम् । विशुदप्रगृहति विचः प्रेक्ष्यकुरुधारा. ॥ ६ ॥ मृदंगभेरी पणष के लिये कसकोमारा वह राजाभी मममाने से नहीं समझा मारब्ध मे दुख के लिये जिमकी विपरीत पुद्धि है उप्तको प्रभीष्ट मुनाने वाला कोई नहीं है, इसके पछि लम्बे और मोटे भुजावाले शीयता करने वाले अर्जुनने स्यसे कूदकर पैदल चलके मोट ऊँचे और लम्बेभुजा वाले यादों में बड़े वीर हरिको दोनों भुजाओं में पकड़ लिया, तत्र प्रादिदेव प्रात्मयोगी और अत्यन्त क्रोय रूप पकड़े हुए विष्णुजी अर्जुन को लेकर ऐसी शीघ्रतामे चले अमे कि बड़ा वायु अकेले टक्षको लेकर चलनाहै १००। राजा फिर महात्मा अर्जुन ने क्लमे दोनों चरणों पकड़कर बड़ी शीघ्रतासे भीप्पनी की ओर दौड़ते हुएको दशर्वेपाद चिहनपर बड़ी मुगमता पूर्वक वलसे पकड़ लिया, सुनहरी जड़ाऊ मालाधारी ममग्न चित्त भर्जुग उन ठहरेहुए श्रीकृष्णजीको दण्डवत् करके बोले कि आप कोषको दूर करिये हे कृष्ण आपही पांडवोंकी गतिहो। १०२ । आप अपने प्रणके अनुसार कर्मको मन छोड़ो, हे केशवजी में पुत्र और भाइयोंकी शपथ खाताहूं है इन्द्र के छोटे भाई में अवश्य आप के साथ में होकर कौरवों का नाश करंगा तदनन्तर उसकेमण और the god of gods:--"Fate is very powerful. The Yadaras, for their ovu good, destroyed Kans fbo ras dend to all good advice No one can bring him to right path whose understanding is reak Lecause he is lated to fall in misery." In the wcantime, Arjud of long and thick ards jumped down from his chariot and caught the bravest of the Yadavas in both his arms. But the ancient god, atma-yogi, Vishnus in the excess of rage, rushed on along with Arjun as a storm of vind carries away with it a lonely tree. 100. Arjun thereapon held both his fect fast before he had gono ten pacus tassards Bluishma. And howing before Krishd, Arjun decked with gold necklace, thus addressed liini- "Subdue your ratb. Krisho. You alone are the refuge of the Pandaras. 102 Remember your promise and act accordiogly. I swear by my brothers and sons. O younger brother of Indra, that is com. pang' rith you'l'fall destroy all the Kaurasas." Hearing his pro- 4590] Mallaiat (४५६७) प्रणासानेमिस्वनाद्दुभिनिः स्वनाश्च । स सिंहनावार्थ यमथुरुग्राः सम्पनीकेषु ततः कुरूणां ॥ ७ ॥ गांडीवघोप.स्तनयिरनुफको जगामपाधस्य भोदिशश्च । जग्मुथयागा विमला प्रसन्नाः सर्या दशः पायचापमुक्ताः ।।८॥ तं कौरवाशामधियोज्ञ घेन भीमेणभूविसावसाईम् । अभ्युद्ययावयतवाणपाणिः फैक्षविचक्षनिबधुमके तुः ॥ ९ ॥ अथार्जुमाय प्रजिघायभालन् भरिभवाः सतर्गपखान् । दुर्योधनस्तोमर मुनवेंग शल्योगदाशांत नवशक्ति ॥ १० ॥ स सप्तभि सप्तरप्रवेकान संवार्यभू. श्रियसाधिस्मान् । शितेन दुर्योधनया मुक्तं सुरेणतत्तोमममुन्ममाय ॥ ११ ॥ ततः शुभारपती स शार्क विद्युत्प्रभांशांतनयेनमुक्ताम् । गदाच मद्राधिय हमकांद्याभ्यां शराभ्या निचकर्तवीरः ॥ १२ ॥ ततो मुजाभ्यायलयद्विकष्य निधनगीडिवमप्रमेयम् । नियमको मुनकर जनार्दनगी महा प्रसन्न होकर उस कौरवों में श्रेष्ठ अर्जुनके भभीष्ट सिद्धारने में प्रवृत्त हुए और चक्र समेत स्थपर सवार हुए फिर उन लगामको हाय में लेनेवाले शत्रुओं के मरने प ले उन श्रीकृष्णजी ने हाथमें पांचजन्य शंखको लेकर ऐसी ध्वनिकी कि जिसके कारणसव दिशाभों समेत आकाश शब्दायमान होगया उस निष्कबाजूबंद और कुंडलों से अलंकृत रजसे भरे पमनेत्र विशुद्ध दंष्ट्रायुक्त शंख को धारण कियेश्री केशवमूर्तिको देखकर महापली कौरवलोग पुकारे तदनन्तर मृदंग भेरी पटहाओंके व रथकेचक्रों के और दुन्दभियों के भयकारी शन्द शंखध्वनियों समेत कौरवोंकी सेनामेंभी होनेलगे । १०७ । और अर्जुनके गांडीव धनुपका शब्द वादलकी गर्जना के समान आकाश और दिशाओं में व्याप्तहुआ तदनन्तर पांडव अर्जुनके धनुपसे निकले हुए बहुत निर्मल और प्रकाशित वाण सत्र दिशामों में चले तव कौरवों का राजादुर्योधन जिसनेवाण हाथ में ऊंचाकररक्खा था वह अपनी सेना व भीष्म भूरिश्रवाको साथ में लेकर अर्जुनके सम्मुख ऐमे गया जैसे कि वनको जलाताहुआ अग्निजाताहै इसकेपीछे भूरिश्रवाने मुवर्ण पुखवाले सात inise and condition, Junradan was inuch pleased and engaged himself in doing what Arjun desired. He mounted the chariot together with liis discus And tuhing the reigns in his lisund, Rrishn the destruyer of enemies blew his conch, knuten ag Panchjanya, so loudly tunt the eky svith all the direct.ons rany with the echo. The Kauravas cried in dismay at the sight of Kuislın deckod with bracelets and earriage und liaving eos liku lulus Then the sounds of drung, truorpets! 110119, chariot wheels and bugles ruse forud from tho army of the 10r. But the sound of Arjun's Gandir bon iose likes peal of thunder above all the din, The ai ross sliot fiom Arjun's bott sere to be seen in all directions. Duryodhan tlio prince of the linuravas with diss ara wa raised up, accompanied by Dislın and Bhurislunia and foloxed ly n laugo at my, faccd. Arjun liho fire, bursa Kaurasis (४५९९) भीष्मपर्व Bhishma Parv [4501] माहेद्रमसंविधिवत्मघोरं प्रादुश्चकारामतम तरिक्षे ॥ १३ ॥ तेनोसमाग तनो RRIERT. सर्वाण्याकानि महाधनुष्मान् । शगजालैबिमलामियागनिवारयामास किरीटमाली ॥ १४ ॥ शिलीमुखा.पाचनः प्रमत्तारपानध्वजावागि घुनंधियाइन् । निकृत्य देहान् विविशुः पोषो नरेन्द्रनागेंद्र तुरंगमाणाम् ॥ १५ ॥ ततो दिश. सोन दिश पार्थः शरैः सुधारैः समरे वितत्य । गांडीव शब्देन मनांसि तेषां फिरीटमाली व्यथयां चकार ॥ १६ ॥ तरिमस्तथाघोरतमें प्रवृत्ते शंपस्यनादुंदुभि नि स्वनाश्च । अंतर्हितागां भरल अर्जनके ऊपरफेंके, भरदुर्योधनने बड़े शीघ्रगामी भयकारी तोमरको और शाल्यने गदा को और भीमजी नवरछीको मारा फिर अर्जुनने अपनेसात बाणोंसे भूरिश्रवाके चलाये तीन सातों वाणोंको काटकर तरमनाम वाणसे दुर्योधनके छोड़े हुए तोमरको काटा तिस पीछे भीष्मनी की विजय के समान तीन वरछी को, और' शल्पकी फैकी हुई गदा को अपने दोवाणों से काट कर । ११२ । महा कठिन भौर अतुल प्रभाववाले अपने गांडीव धनुष का दोनों भुजाओं से वंचकर बुद्धि के अनुसार महाघोर अपूर्व माहेन्द्र अस्त्रको अन्तरिक्षमें प्रकट किया इसके पीछे बड़े धनुपधारी महात्मा 'मकुटमालाधारी ने उस उत्तम धनुप के द्वारा निकले हुए बड़े स्वच्छ और तीन वाणों के समूहों से सब सेना को हटाया फिर उसके गांडीव से निकले हुए शिलीमुख वाण रय हाथी घोड़े और ध्वजाओं के शिरोंको वा धनुपौंको और भुजाओं को काटकर शत्रुपक्ष के गजगजेन्द्र और राजामों के शरीर में प्रवेश करगये फिर उस मकुट मालाधारी अर्जुन ने उत्तमघारवाले तीनवाणों से दिशा और विदिशामों को पूर्ण करके गांडीव धनपके शब्दों से उन सबके हृदयों को महापीडित किया इस प्रकार उस बड़े भयानक अस्त्रों के युद्ध में शंख दुन्दुमि- ing a forost. Bhurishirayıshot at Arjun seven golden darts with feathers; DuryodHan hurled hir Tomar, Shalya his mace and Bhishm his spear. Ariun cut down the coven a 19ws of Bhurisbrava with his own. With one arrow he cut down the weapon of Duryodban and with two mo.o he cut down the spear of Bhishm and the mace of Shalya 112. Diawing his Gandiy bow of immence st:ength with Loth his armis, be are fully shot in the air the weapon given bin by Indra. And then that great archer, decked with diadem and garlands, with his numerous bright arrops shot from the bow made all the yarriors turn their faces. The sharp edged arrows shot from luis boir, cut asunder the thariots, elephants, horses, banner heads, bows and arms and pierced through the bodies of the elephants and tho princes of the enemy. Then Arjun decked with diadem and garlands filled all the directions with his sharp arrówa and shook the hearts of the enemies with the ttvang of the Gandiv boy. Thus in that war of dreadful weapons tho peals from conchis and trumpets were subdued by the 'trany of Mahalliarut [4592] डिव निःस्पनेन यभवुरुमाश्यग्यप्रणादाः ॥ १७ ॥ गांडीय शम्दतमयो विदिरा पिएर राजप्रमुख मधीपांचालराजो द्रुपदधारस्तदेशमाजग्मुगदीनसत्याः । १८॥ स _णि सैन्यानितु तायानि यतोयतो गांसियजःप्रणादः । ततस्ततः सप्तति मेपजग्मुर्नतं प्रतीपोभिससारकक्षित् ॥ १९ ॥ तस्मिन्मुघोरेनपसप्रहारे हताःप्रयोग सराश्वस्ताः। गजाब नाराच निपणापत्तप्ता महापताकाः शुभरुश्मकश्याः ॥२०॥ परीतमत्वाः सहसा निपेतुः किरीटिनाभिन्नतनुत्रकायाः। ढहता. पत्रिीमरुप गैः पार्थनमलैर्षिमलै शिता प्रैः ॥२१ निकत्तयन्त्रानि हतंद्र कीला भजामहांतो ध्वजिनी मुखेषु। पदातिसपाय रथावसंख्ये हयाच नागाध धनजयेन ॥२२॥ याणाहतास्तूर्ण गपेतसत्या विटभ्यगात्राणि यों के शब्द, गांडीव धनुप के शब्दों मे छुपगए और रथों के भी महाभयानक शन्द मन्दहोगये ।११। इसके पीछे उस गांडीव के शब्दों को जानकर नरोंमें वीर राना विराआदि और पांचाल और द्रुपद यह महापराक्रमी उसस्थानपर आये और आपके पुत्रोंकी भी सब सेना वहां आई जहां कि गांडीवके बहे शब्द होरहे थे और सबों ने अपने को न्युनही समझा कोई प्रतिपक्षी उसके सम्मुख नहीं गया हे राजा उसबड़े भयानक युद्ध में रथ वा मूतों समेत बडे २ शूरवीर मारे गये और सुनहरी जड़ाऊ झूलों से भलंकृत बड़ी पताका रखने वाले हाथी भी नाराचोंके भाघात से मुल हुए से होकर अर्जुनके हाथ से कटे हुए शरीर से निर्जीव धोकर अकस्मात् गिरपड़े, | सेनामों के मुखों पर राजा लोगों की ध्वजायें अर्जुन के भयानक वेग तीक्ष्ण धार युक्त निशित फलवाले वाणों से अत्यन्त विध्वंश होगई और यन्त्र कटेहुये हजारों इन्द्रनाल भी वारंवार नाशको माप्तहुए और युद्ध में स्य हाथी घोड़े और पदातियों के समूहभी उस भर्जुन के वाणों से घायल और असामर्थ भंगोंको विना साधे शीन ही पृथ्वीपर गिरपड़े, हे राजा ऐसे बड़े युद्ध में उस ऐन्द्रनाम उत्तम अस्त्र से कवच टूटे और शरसर जर्जरी भूतहोगये । १२३। तदनन्तर भर्जन के तीनवाण समूहों से the Gandis and the rumbling of chariot wheels as heard no more. 117. Then hearing the sound of the Gandir, the best or marriors, king Virat and otlio., with the Panchals and Drupad, cams thor Tlu wholo arıny of your sons came there where the tirang of the Gandıv p:ocuo.Id from Yons of thu enemios dared approrch Arjun In that great latt!c, tha wa riurs Trith their chariots and coachinea Tore destroyed and the large elephants bearing largo Lanno. and decked with gold tappings fell dusra wounded by the land of Arjun. The banues of the princes at the heads of the arinies, cae doma by tlo arrons of Arjua, fell down on carth and thousands of maclincs rere destroyed Tho elephants lortos and foot soldiers Founded in large numbers by Arjun's arroas fell dorn on farth. Cunts of malas iell as the bodies of the warriors were pierced through and through hy the weapon of Indra. 123. Then by Arjun's ehare (४५९३) भीष्मपर्य Bhishma Pary [4393] निपेतुरंध्यों । पंद्रेगगास्त्र परेणराजन् महाइयेभिन्नतनुप्रदेहाः ॥ २३ ॥ तश. शरोधी शितः किरीटिनान्देहशत्रततलोहितोदा। नदी योगनरमंदफेनामवर्तित तवरणाक्षिरे 2॥२१ वेगेनसाती पृयुवाहापरत नागाश्वशरिरोधा. नरेंद्राजोरितमांसपंचा प्रभूत रक्षो गणभूत सविता ॥ २५ ॥ शि: काल कल फेशशादला शरीर संघात सहन पाहिनी । पिशीर्णनाना कवचोमि सकुला नराश्वनागास्थि निरचरा ॥ २६ ॥ भवपाशाला वृकप्रकाका क्रम्यादसधेश्व तरक्षुभिश्च । उतिकूलादन मनुष्याः रामदातरमी प्रज्ञाशाम् ॥ २७ ॥ प्रवर्तितामर्जुन घाण संधमेदोक्सा सकप्रयहाभीमाम् । एतापीर.च तयेय या सेनाकुणामफाल्गुोग ॥ २८ ॥ तेचीदांचाल कम्पमत्याः पायाश्च सर्व साहिताः प्रणेदुः। जयप्रगल्भाः पुरुषप्रवीराः संपासवंतः कुरुवायोधान् ॥ २९ ॥ इतमपीराणि पलानि दृष्ट्या किरीटिगाशत्रभ- - मनुष्यों के देहमें शास्त्रों से निकले हुए रूविररूपी जलवाली नदी वहां वह निकली उस नदीमें मनुष्योंकी वसा तो जलका फेनथा वह नदी तीबतासे बड़ी मवाहवाली और मृतक हाथी और घोड़ोंके शरीरों के किनारेवाली मनुष्यों के प्रांत भेजने उत्पभमान रूप कीचको धारण कियेहुएथी और बहुत से राक्षसों के अवताररूप रागाही उस के क्षये । १३५ । और शिरों के कपालों से व्याकुल मृतक यालरूप धाससे गोभिन देशों से युक्त शरीरों के समूहों से हजारों माला रसनवाली हजारों प्रकारको काच | रूपी लहरों से व्याकुल और मरेहुए मनुष्य हाथी घोड़े और मनुष्यों के हाहरूप उसमें कंकड़ और रेतवर्तमान थे । १२६ । मनुष्यों ने इस शृगालकंक गिद्ध और कच्चेमांत सानेवाले राक्षस पशुपक्षी आदिके समूह वा छोटे व्यामों से संयुक्त किनारे वाली कठिन बैतरणीपीनदी को देखा, अर्जन के वाण समूहों के द्वारा कडुए कमालपता रु.पर से बहनेवाली अत्यन्न भयानक नदीको देखकर अथवा इतनकार अर्जुन के हायले मृतक शरीर वाली पौरखी सेनाको देकर वह चदेरी aruustie e flows on taalolies wf warmos a iver of Leod, having fot for its tuam, chiu cu cases of elephants and horses for its banks, tlie fiesla and olluils of men bir its try and the rakslases in the guise of princes for its the... 1-5. Full of human shalls, with the hair of the deal for its weeds, garlanded on human Lodies of rarious countries, Laving the dead Lodies of men and elephants and their bunes for its pebules and sand, that river was difficult to le crossed hile the Baituri aud its lauks were sean to be full of jackal-, ferons, vultures, carnivorous tal-lases and tigers At the sight of those heads cut down by Arjun's arrors, the dieadful river of blocd and the fourava army whose warriors trere destroyed by Arjun, the tranriors of Chanderi, Panchal and Matsya as well as all thic Panda res desirous of victory, raised a dreadful syar cry terrifying the Kauraras, 14594 Mahabharat (४५९४) पापोन । सिधास्य सेनाध्यजिनी पतीनां सिंक्षे मृगाणामिच यूथसंघान् ॥ १३॥ विस्ताति हर्षयुक्तो गाटीय धन्याध जनार्दनश्च । ततो रविसंवृनामिनाल रएमा भृशयनपरिक्षतांगाः ॥ ३१ ॥ तद्रमन पिततंच धोरमसघ मदीपयुगा ताल्पम् । अथापयान कुरामः समीपमा स द्रोण दुर्योधन धाविका ॥ ३२ ॥ चर्निशासंघि गतां समीय विभावसोदितायुक्ताम् । अवाप्यकीचिंश्च पयम लोके विजित्यशचूंश्च धनंजयोति ॥ ३३ ॥ ययौनरेंद्र सहसोदोध समाप्तकर्माणि विनिशायाम् । ततः प्रजोतुमुल कुरूणां निशामुखे घोरतम प्रणादः ॥ ३५ र रथामामयुतं निहत्य इतागजा सप्तशतार्जुनेग । प्राच्या सोयीरगणा सर्व निपा. तिताः क्षुद्रकमालयाश्च ॥ ३५ ॥ मालतं कर्म घमंजन क पण मानिक चिरन्य । श्रुतापुरचष्ठपतिवाजा तय दुर्मर्षण चित्रसेनी ॥ ३६ ॥ प्रोणका पांचाल और मत्स्यादिक देशीवीर और सब शूरवीरपाण्डब विनय में बुद्धि रसने और पुरुषों में बड़ेवार उनकोसी सेनाके बड़ेशूग्वागेको हराते हुए सब एक सायही महागर्जना करते हुए, शत्रुओं को भय उत्पन्न करने वाले मुकुटधारी अर्जुन के हायसे मृतक वारोवाली सेनाको देखकर और जैसे कि मृगों के यूथों को सिंह भयभीत करे उसी प्रकार सेनापतियों की सेनाको भयभीत करके वह प्रति प्रसन्नमन गांडीवधनुपधारी और जनाईननी अत्यन्तता से गर्ने तदनन्तर शत्रों से अत्यन्त घायल भंग भीष्म व द्रोणाचार्य दयाधन पाहलीक आदि काग्वों ने निशाकी सन्धिको देखकर और उस मलय के समान अस और घोर फैले हुए ऐन्द्रास्त्रको देखकर अपना सूर्य की महणता से युक्त संधिगतरात्रिको देखकर युद्ध से निष्टतो की और नका इन्द्र अर्जुनभी लोक में यशी भौर कीर्तिमान होकर शामुमो का मर्दन करके युद्ध कर्मको समाप्त करनेवाला अपने निज भाइयों समेत राविक ममय अपने डेरेको गया इसके पीछे रानिक प्रारंभमें कौरवोंके बड़े घोर साद उसन्न हुए। १३४ । अर्जुन ने दश हमार रथियों को मारकर साततो So-ing tho karriors of the army destioj el by Arjun, no more diadem on his head and who in the terror of the enemies they torrified the Icaders of your artay with their sonrs as a lion does a herd of door. Tho cheerful F.elder of Guadiy loir and Janardan too, 1orced very loud ronrs. Then Bliislım, Dicnacharys, Duryodhon, Vahilih and other Kauraras, much trounded,' seeing the ri pranch of night and the dreadful has oo done by the neapon, of Indra prepared to rotire. Irjuu the best of men lasing non thic honour and famo oftheday's victory and having destroyed many. enemies, retired to bis cup along with his brothere Dorog that night a dreadful howl. 108 629 heard from the camp of the bauraray, 13t. Arjun der, trored on that day ten thousand charioteers and coron hundred 1998 Bhishta Part [4535] संघववाहको रिथंवा शक्ष्यशलीवराजन् । अन्येचंयोधाः शतश समेता बुद्धग पान जपमध्ये ३७ ॥ स्वाइयाण जितासमीमाः किरीटिनालोपमहा पर रितिबंत शिविगविजम्मा से गगामारतपरवीगः ॥ ३८ ॥ उहफासस्य संप्रदीप्ताप्राजे मानमतचाप्रदीप । किरीटिवित्रसित सर्व योधाचक्रे नियन्वनि मीकुरूणाम् ॥ १६ ॥ इति श्री महाभारते भीमपर्वणि भीष्मवयपर्वणि तृतीयदिवसावहारे एकोनपष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९॥ सेय बाद । मध निशाभारत मारताना मनी कनीनां प्रमुखमारमा । यपी स परमान् प्रतिभातको हत. समग वर्मम ॥१॥ तद्रोग दुयोधनपावित काय तव दुर्मपण चित्रसेनी जयद्रशाति बलोबलपिनशास्तमन्ये प्रययुःसमता हायी वारे और सब पूर्वदेनी शूरवीर सधीरगगों समेत बुद्रक मालबों को मारा, यह अर्जुन ने ऐसा पहाभारी कर्म किया जैसा कि दूमरा कोई भी नहीं करसला हे राजा श्रुतायु और अंशष्टपात दर्पण चित्रभेन द्रोणाचार्य पाचार्य संघव बालीक भूरिश्रवा शल्प शल और भीमजी समेत सैकड़ों योद्धाभोंको युद्ध में उस हस्त लायती महावली लोक महारथी कोपित अर्जुन ने विनय किया हे भरतवंशी रामा धृतराष्ट्र प्रापके सब शूरवीर हगारों पसाने दलयाकै इस वातको कहते हुए कि किरीटी भर्जुन से सत्र शूरवीर भयभीत हुए है कौरवों की सेना के डेरों में गये १३९॥ अध्याय ६० ॥ संजय बोले हे भातवंशी इस के जनन्तर मातःकाल के समय यहात्मा मोममी जिनका क्रोध शत्रुओं के ऊपर उत्पन्न हुआ वह सव सेना समेत भरतवंशियों की सेना भागे गये द्रोणाचार्य दुर्योधनं पाहलीक दुसर्पग चित्रसेन महावली जयद्रय और अन्य रामा लोग मेताओं के समूहों समेत चारों ओरसे भीप्मनी के पास elephants including the Sauvis, the malayas and the Kshudrals of the east. Arjun's deed of protes3 Tas matchless Shrutas u and Durmarsban the ruler of Ami asht, Clitraven, Dronaclarga Kripacharya, Saindhav, Vahik, Bhurnshrati, Shalya Shal, and Bhi ihmia with hundreds of other wamors sufferd defeat at the lands of Arjun the brarest and most dexterous vartijr of the torld. Thoa. BBnda I your warriors with burn og t&rches setuired to their camp La, ing. "The Lrarest of the warriors are as det Åljun itu bearer of the dadem." 139.. CHAPTER LI "Early the cert morning," said Sanjaye to Dur.trashtra, IBLE. Bhtia tbo greet, Thow Biger upon the enemies was intensc, led all the army of the descendants of Bharat. 'Dro harya, Duryodlani, Vaklik, Durmarshan, Chitrasen, Talliant Jayadratb end other lega .

- (१५९७) & Blushima Parv [4097 ] यदनामृषभेगलथ्ये । पापिध्वज प्रेक्ष्य दियेदुरानो सदय पुसाया ॥९॥ प्रपंतागम मदायुधेन किरीटिनालोकमहाग्येन। सन्यूह ग दरशु स्वदीयाश्चतुत लिलहनम् ॥ १॥ याहिपूर्व हनि धर्म राता व्यूहरन कौरयसत्तमेन । तथा नमूनो भुविमानपेष नपर्क मचतच ॥ ११ । ततो यथा दशमोत्य तथु पाचालमुल्या सहचेदिनौ । तत. समा देश समाहता मी सहमगियिनेदुराजा ॥ १३ ॥ शनवनात्य रयापदाथ सर्वचनीकेषु स रिहादा । तत सगणानि महास्वनि पिस्कार्यमाणानि धनुपियारे ॥ १३ ॥ क्षणेनमेरीषण प्रणादा नतर्दध शमहास्वगाय । तच्छबराब्दातमतरिक्षमतभामदुतरेणुजालम् ॥ १४ ॥ ET वितानायततप्रकाश मालोक्यवीरा सहसामिपेतु । श्री रमेनाभिहत ससून पपात शोभित कोप-न अर्जुन को और यादवपति श्रीकृषण मारथी से ऊचेकीओर यांधे हुए पनवाले रयको युद्धभूमि में देखकर महा याकुल हुए अापके पुत्र और सबशरवीरों ने लोक महारथी शत्रपारी मेनाको विध्वंस करने वाले मुकुट वारी अर्जुन से रक्षित चार सहस्रात्त हाथियों में संयुक्त उत व्यहराजको देखा । १० । जैसे कि प्रथम दिन में कौरवोंमें श्रेष्ठ धर्मराग ने व्यहको वताया था उसमकार का व्यूह इनलोकमें मनुष्योंने प्रयन कभी न देखाया नमुना था. इसके पीछे सरसेनाके बीच युद्धभमि में बडे बरने बजाइहुई हजारोंमेरी गदायमानहुई ओरशंखोंके व हजारों तूर्योके शब्दभी बड़ेवेग से हुए, इससे पोछे वारो के छोडे हुए वाणों के शब्दों से संयुक्त चलाये हुए धनु- पों के प्रोर शंखों के बड़े शमों ने क्षणनान मेंही भेरी ओर ढोली के कठिन शन्दों को गुप्त कर दिया, शंतों के उन शब्दों से मत्र अन्तरिक्ष व्याप्त होगया और शी- घही पृथ्वी से घलोंके समूह आकाशकी ओर उडे तदनन्तर बड़े वितानों से प्रकाश को देखकर वारलोग अकस्मात दौड़उठे, स्थीरथ से भिड़कर घोड़े समेत रथी बना. great array Then all the hauravas, acconprnmed by your cons, seeing Arjun with his banner of the ens gn of monkey and Shree krishn the prince of Vadayas as driver, were inuch perplexed Your! Bons and their warriors, saw that brave-t of charioteers, Arjun tho destroy er of foes, protected by four thousard elephants. Nõne of the people of this rorld had seen or heard an array of aronijeg like the one formed on the previous day by that Lest of men, Yudhishtiur the just Thon from the midst of all ţirat arnry, rang through all the Lattle-field thousuads of trampets and couchs with loud peāls, but the Equnds made by thó discharge of arrons and the concle of warr.ors surpassod the noiso made Ly trampets and drunis All the air, Was filled with the blasts of conchs and foon the sl y was ofercast with dust The warriols rushed to battle as good as the Irglit was strong Charioteers met charioteers in combat and fell down together 8 horses, chriots, charioteers and foot soldiers, coming on in great force Hrasc Arjun, mounted on his lannered clatiot, drama ny hito horses and adanced at the head of his army towards that I 4596] Mahabharat ॥२॥ सतहद्भिश्च महारथैश्च तेजस्थिभिर्य धाद्विराजन् । राजेरजासतुरा. जमुख्यतः सबैरिववनपानि ।। ३ । तस्मिन्नगीफप्रमुग्ने विपक्कादोधूपमानाध महापाका. । सुरकपीतासित पांदुरामा महागजस्कंध गताविरेजुः ॥ ४ ॥ माया हिनीशांतनवे गुप्ता महारथैरिणाजि भिश्च । वर्भ स विद्यतनधिानुकल्पाजलाग भेद्योरिवजातमेधा ॥ ५॥ ततोरणायामि मखी याना प्रत्यन शासनवाभिगुप्तर। सेनामहोया सहसा कुमणा गोयथा भीम चापगाया ॥ ६॥ तम्याल नानाधि घगूढमार गजाश्वपादात र धाक्षम् । घ्यूह गहा मेघ समें महात्मा ददर्श राशी राजकेतुः ॥ ७ ॥ विनियो केतुमता रणेन गार्प ऐनकीर । पिना सैन्यमुपमहात्मा मधेधृत' रार्थ स पत्नयूनाम् ॥ ८ ॥ सूपस्कांसोत्तरधुरेपयत्त आये। २। हे राजेन्द्र धृतराष्ट्र वह भीष्मजो उन महापुरुष महारथी तेजस्वी पराक्रमी राजाओं के बीच में ऐभे शोभागमान हुए जैसे कि देवताओं के मध्य में देवर जे इन्द्रशोभित होता है, उस सेना के प्रागेलगी हुई वडे २ हाथियों के कंधों पर वर्ग- मान लाल पीली काली श्वेत कम्पायमान पताफाभी शोभित हुई और वह सेना राजा भीष्म च महारथी वा हाथी घोड़ो से विद्युद्धारी वादलके समान ऐसी शोभाय- मान हुई जैसे कि जलके आगमनमे वादलों मे भर हुआ शाकार होताहै १५। इसके पीछे भीष्मजी मे रक्षित राना लोग युद्ध के निमित्त अर्जुन के सम्मुख गये और कौरवो सेनानी अझस्तान ऐसे चली जैसे कि गंगाजी का भयानक वेग चलता है। किर कपि बज महात्मा अर्जुन ने दूरही से उम हाथी घोड़े रथ रथी गोर पदातियों समेत बड़ वेग मे भरे हुए बादल के समान नानासकार के पक्षो समेत ब्यूहको देखा, और सेनाओं के प्रागे स्वडा हुआ दोनों सेनामो से संयुक्त महात्मा वीर अजा से घोड़े और धनाधारी रथकी सब री में मुशोभित होकर सव शत्रुओंकी सेना के और चला ८ तब आपके पुत्रो समेत सब कारस लोग उस सब सामान से as the head of armies caine 10ind Bhilsnm 2 Sui rounded by those goat warrio s and the glorious Lugs of great prosess, Blushm looked lile Indra the prince of gods in the midst of the gods In the front of that army, on the shou'dus of elephants, fiutiered res, yellore black and wh tu binne's The t army of prinees, rarrnors, elephants and horses, led by Bhean, looked like the sky overcist with clouds with fi ishes cf light in Then the kings pro weted Ly Bhishal, cane face to face is thu Arjun, ready for fighting, nid tio Kinrar srn es followed t lien lie the waves of the Ganges Fith dreadful Lelocity Arjup with his Lanner bem ing the figure of Hanután say from a great a s'ance that Inge kimy consistiríg'of depliants, 116d clouds (४५९७) भीष्मपर्व Bhushna Pary [4.97] यामृषभेगसण्ये । पधज प्रेक्ष्य विदुराजा संघ का येग ॥९॥ प्ररुर्षतागुत मदायुधेन किरीटिनातोक्महारोग। रव्यूह ग दर त्वदीगावात र्यालसहन कर्णम् ॥ १०॥ याहिपूर्व हनि र्धा राना व्यसन कौरवसत्तमेन तया नमूनो मुविमानषेप नहरों नउसंश्रुतध ॥ ११ । ततो यथा दशमयतायु पाचालमत्या सहचेटिमुर । तत समा देश समाहती मी सहनामिपिटुराजो ॥ १ ॥ शमम्बनास्तप रयम्बदाश्च सर्वपन देषु स हिदा । तत साणानि महास्वनि घरहार्यमाणानि धपिचौरे ॥ १३ । क्षनरीक्षणप्रणादा नतर्दध शस्त्रमहास्यगाय । तच्छपरान्दानमतरिक्षमतमामतुतरेणुजालम् ॥ १४ ॥ वितानायततप्रकाश मालोक्यवीरा सहसाभितु । श्री रमेनानिहत ससून पपात शोभित कोप रज अर्जुनको यादवपति श्रीकृपणे मारपी मे उचेकीओर बाधेहुए पनवाल रयो युद्धभूमि में देखकर महा व्याकुल हुए अापके पुत्र और सघशरवीरों ने लोक महारथी शखबारी मेनाको विस करने वाले मुकुटपारी अर्जुन से रमित चार सहस्त्रात्त हाथियों से युक्त उत व्यहरानो देखा । १. जसे कि प्रथम दिन में राम श्रेष्ठ धान ने यहको बनाया था उनप्रकार का व्यूह इनकम | मनुष्याने मया कभी न देखाया नमुना था. इसके पोछे मासेनाके बीच युद्धभाम में बड़े पर बनाइहुई हजारोमेरी शब्दायमानहुई जोरशोंके व हजारों तूयोंके शब्दभी वडेवेग मे हुए, इससे पाछे बोरों के छोडे हुए वाणों के शब्दों से संयुक्त चलाये हुए धनु- प के और गांवों के बडे शनों ने क्षणनान मेंही भेरी ओर ढोला के कठिन शब्दों को गुप्त कर दिया, शवों के उन शब्दों से मा अन्नारिल व्याप्त होगया और शी- नदी पृथ्वी से धनों के समूह आकाशकी और उडे तदनन्तर बडे वितानों से प्रकाश को देसकर वारलोग अकस्नाव दौडउठे, स्थीरथ से भिडकर घोडे समेत रथी ध्वजा great array Then all the hauravas, accompanied by your sons seeing Arjun with his banner of the ens go of monkey and Shree krishn the prince of 1 adazas 13 driver, were nich perplexed Lousong and their warriors sats that bravett of charoteers, Arjun tbo destroyer of fous protected by four thousard elephants. None of the people of this world had seen or leard an array of armies like the 07c formed on the previous day by that test of men, Yudhıhthir the just. Thon from the midst of all tirat arny, rang throogh all the tattle-field thousands of (rumpets ard conchis with ſoud peals but the Founds made by thc discharge of arrors and the conchs of warr ore surpassed the noiso made by trumpets aod drunja All the ar Was filled with the blasts of conchs and soon the sky was overcast with dust. The Farriols rushed to Lattle as coon as the Irghie was strong.Charioteers met charioteers in comlat and fell down together 8 [ 4598 ] Blahabbaat 1,१५९ साब स रथ सकेतुः ॥१५॥ गजो गंजेनामिहतःगपात पदाति मायाभिहत पदातिमा आय मानान्यभिवर्तमानोरी कृतान्यदभुतदर्शनानि ॥ १६ प्रसिधखेगवसमा हतानि सदश्यदानि सदश्वनः । सुवर्ण तारांगण भूषितानि सूर्यमामानिराग घराणि ॥ १७॥ विदार्य माणानि परश्वधेश्व प्रासैच खगैध निगव्योम् । गर्विषाणे चरहताणा फेचित्मजूतारपिन प्रपेतुः ॥ १८ ॥ गजषभांश्चावि पर्ष गनि पातितागणहता पुधिया। गंजीचवेंगावंतसाविता भुस्याविषेदु सरसीमनुष्या. ॥ १९ ॥ मार्तस्वनं सादिदातियूनां विशणगावरताडितानाम् । संभ्रांतनाग रमुहर्ते महाक्षये मापदातियूनाम् ॥ २० ॥ महारः सपरिषयमाणो ददर्श भी. म कपिराजयुम् । संपंचतालोति तालतु सदश्वगाइभुतवीर्यपानः ॥ २१ ॥ को भी लेकर गिरा और हाथी से माराहुमा यी गिग इसीमकार पदातीसे मारा 'हा पदाती गिरा । १५ । और घोड़े के सवार परस्परमें परशे और खड्गों से | लडका पृथ्वी पर मारे गये, और मनहरी तारामों के समूहों से शोभायमान सूर्य की समान प्रकाशित ढाल परश्वध मास और खड्गोंसे खण्ड २ होकर पृथ्वी पर गिरी, और कितनेह। रथी हाथियों के दांतों से चबाये हुए पृथ्वापर गिरे और रयी के बाण से स्थी पदाती के बाण से पदाता पृथ्वीपर गिरे, हाथियों के समूहों के वेग से कंम्पायमान व सवारों और हाथियों के दांत व अंग व जंघाभों से घा. गल सवार और पदातियों के प्राक्रदित शब्दों को मुनकर मनुष्य अनेक प्रकार से व्याकुल हुए जिप्त में हाथी घोड़े और रयों की व्याकुलता और सवार पदाती धारोंकी विसताधी ऐमेह में महारथियों से घिरे हुए भीष्मजीने हनुमानजीकी धमा धारण करने वाले अर्जुन को देखा। २० । पचिनाल की उन्नत ध्वमा धारण करने वाले भीप्पनी उन उत्तमघोड़ोंगी तीव्रतासे बड़े भारी अखकोलिये were killed frith their horses, the chariots and the banners Elephants by elephants and foot soldiers ly foot soldiers 15. The horsemen fighting against horsemen, were cut down by ages and swords. The shiolds, décked with gold stars and plaining like the sun, were cut down into proces by the blows of swords and clubs. Many a chariola eers mangled by the tuaks of elephants, fell duten on earth Chariots fell down by the artowa of charioteera and foot soldiers by the arrow of foot soldiors. Shaking with the yelocity of elephænts, tho horsoner were wounded by horsemen and Ly the tusks of olophants, in their títuhs and thighs, wero porplexed Pritla tho cries of lorsemen und foot Boldiers. Elephants, horses, chariots, horsctuen and foot soldiers were des troyed in large numbers. At that time, Bhislim surrounded by sarrions saw Arjun with leis banber of tho figure of Hanuthad. 20. phiebta the bearer of the high standard oror which blazoned the five palo भीमपर्व Bhishma Parr 14599 महाख बागाशनिदधिमत किरीटिनं शांतनयोऽभ्यधावत् । तपशकति मप्रभाष मिंद्रात्मकं द्रोणमुखाविसः ॥ २२ ॥ रुपयशल्य विधिशनिश्च दुर्योधनः सामवासिय राजन् । ततो रथाना प्रमुखादुपाय साखविकांचन चिमधर्मा ॥ २३ ॥ जन शूरोभि स सासवोत्तानर्जुन स्पारमसुतोमिमन्युः । तेषां मालागि महापानामस सकर्माविनिय काणिः ॥ २४ ॥ यमौ महामंत्रतार्थि माली सदोगतः सन्मग- पानिवामि. । सत.सतूर्ण विरो दफेनां कृत्वानदीमापुररिपूणाम् ॥ २५ ॥ जगामसी मदमतीयमीमो महारथंपार्थ मदीनसत्यः । ततः प्रास्पात विक्रमेण गांडीव मुकेन शिलाशिनेन ॥ २६ ॥ विपउबालेन महाजालं विनाशयामास किगट माली । तमुत्तमं सर्व धनुर्वाणा मसककर्माकविराजकेतुः ॥ २७ । भीममात्मा विजली से चमकपर अर्जुन के सम्मुख दौड़े और इसीमकार कृपाचार्य शल्य विवि- शति दुर्योधन सोमदन पर सभी द्रोणाचार्यजी को भागे करके इन्द्र के समान महाबली इन्द्र पुत्र अर्जुन के सम्मुल गये, इसके पीछे सर्व भस्त्रोंका शाता सुवर्ण का जड़ाऊ कवच पहरने वाला महाशुर अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु रयके सेनामुख से निकल कर बड़े वेगसे उन सबके सम्मख पला, फिर यह असहिष्णु शील कर्मी अभिमन्यु जनमहाक्लवानों के बड़े अस्त्रों को काटकर ऐसे शोभायमान हुमा जैसे कि महामन्त्रमाहुति से संयुक्त महाज्वानामान सभा में वर्तमान अग्नि देवता होता है तदनन्तर वह महापराक्रमी भीष्मशीग्रही युद्ध में शत्रुओं के रुधिर रूपी जलसे उसनदी को पूर्णकरके महारथी अर्जुन और अभिमन्यु कोभी उल्लंघन कर गया ५२५ । फिरमकट मालाधारी भर्जुनने बड़े हठकोकरके गांडीवधनुपकैशब्दसे पहा शन्दायमान विपाठनाम बाोंके जालसे उन प्रल शत्रुओं के बालोंका नाशफिया, फिर कर्म फलके चाहनेवाले हनुमानजी की वजारखने वाले महात्मा अर्जुनने बड़े सीबधारखाले स्वच्छ भल्लोंसे उस सर्व धनुर्धारियों में श्रेष्ठभीष्म जीके ऊपर वर्षा trees, rode on his swift horses, rith weapong upraised, to 1.eet Arjun with the speed of lightning. In the same mauner Kripacliarya, Shalya Vivisbati, Duryodhan and Somdatla led by Dronucharya, facad Arjun the son of India. Then the adept in the use of all sorts of neapons, clad in gold bedecked armour, Arjun's son Abhimanyu the bravest of warriors, cane out of the lists and encoud lered all those warriors, And cutting their weapons with his own, he stood in glory like Agni fed Trith libations in the midst of a court. Thon Bhish nt of great prowess, makiug & rivet tu flow with the blood of the enemy surpassed Arjun and Abhimanyu in bravery. 25. Then Arjun the wearer of diadem and garland with his hissing arrowe shot from the Gandir bow, dispersed the not work of bis adversary's arrowa, Wishing to gain succoss, the bearer of the standard with the monkey's brand, slovered his sharp and Eright [46001 Mal alhaiat (४६००) मियवर्णतू गैधजालविंगलेश्वभल्ले । तथैव भीष्माहतगतरिते महास्त्रजाल कपि राजकेतो. ॥ २८ ॥ विशीर्षमाण ददृशुस्त्वदीया दिवाकरेणेव तमोभिभूतम् । एय विध कार्मुक भीमनाद मदीनवास परुषोत्तमाभ्याम् । ददर्शलोक. फुरुर जपाथ तवरथ भीष्म धनजयाभ्याम् ॥ २९ ॥ शते श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि भीमार्जुनदैरथे पष्टितयोऽध्यायः ६०॥ सअप उवाच । द्रौणिभूरिश्रया शल्यचित्रसेनश्च मारिप । पुत्र. सायमनेश्चैव सौभद्पर्धवारयन् ॥ १ ॥ संसक्तमति तेजामि तमेक ददृशुर्जना । पञ्चभिर्मनुज व्यात्रैगजे. सिंह शिपथा ॥ २ ॥ नातिलक्ष्य तथा कश्चिनशौर्य पराक्रमे । बभूव सदृश कार्गाने नापिचलाघवे ॥ ३ ॥ तथा तमात्मज युद्धे विक्रम तमरिंदमम् । की इसी प्रकार प्रापके पुत्रों ने भी अन्तरिक्ष अर्जुनके वड़ अस्त्र जालों का भीष्मजाके ह थसे ऐसे टटे और व्यर्थहुए देखा जैसे कि सूर्य से तिरस्कार किया हुआ अंधकार होता है। इस शनिसे प्रसन्नचित्त कौरव मुंजय आदि सबलोगोंने उन सत्पुरुषों मे श्रेष्ठ भीष्म और अर्जुन दोनोंके इस प्रकार द्वैर युद्ध का जो कि भयकारी धनुषों के शब्दोंसेसंयुक्तथा देखा ॥२९ ।। अध्याय ॥६१ ॥ संजय बोले हे श्रेष्ठ धृतराष्ट्र उन अश्वत्थामा व भूरिश्रया शल्य चित्रसेन और सायमन के पुत्र इन सब ने अभिमन्य से युद्ध किया, मनुष्यों ने उस अकेले अभिमन्यु को इन पांचों व्याघ्ररूपों से लड़ता हुआ ऐसा देखा जैसे हाथियों से लटता हुआ एकतिह का बच्चा होता है, वडी लक्ष भेदन पूर्वक शरता और अस्त्रो के कारण पराक्रम और हस्तलाधता में अभिमन्यु के समान कोई भी नही हुआ, इसके पीछे युद्ध में सावधान अर्जुन ने अभिमन्युको परा arrows over Bhishin th: best of archers In the same manner your sons 811 the network of Arjun's weapons, broken and diepersed ly Blushm like darkness at sunuse Thus the cheerful brinjay as and other K vuravas saw those Lest of men, Bhishn and Arjun, frghting with one another and making dreadful noise with the Lous" 29 Sinjhya continued “ Ashwathama Bhurishrava, Shulya, Chitra sen and the son of Samyaman attacked Abhimanyu People s** Lrave Abhımınyu fighting alone ng unst those live wari lors like a lion fightmg ajunst clephants Hitting the marks with great precision, Abhimanyu surpas ed them in deeds of prowess and des terity of hand llo skilful wartior, Aijun seeing the deeds of prowess done against the enemies by Alhimanyu roared like a lion CH41 TLR I XI 20128 भीमपर्व Bhishma Pary [4601 राणार्थ. सुसं यत्तं सिंहनादमसानदत् ॥ ४॥ पीडयानतु तत्सैन्य पातयिशा पते । दृष्टवावदीशराजेंद्र सासात्म्य वारपन .॥ ५ ॥ वजिनीं धार्तराष्ट्रगां दीन शादीनवत् । प्रत्युधयों स स भरतेजसा च यलेनच॥६॥ तस्य लाधयमार्गस्य मादित्य सहशप्रभम् । व्यदृश्यतमहच्चापं सारे युध्यत. परै. ॥ ७ ॥ सद्राणि निपुण केन विनाशन्य च पञ्चभिः । घज सायमनेश्वच सोटाभिश्चिनियतत ॥ ८॥ मडामा शति प्रेपिता सौमदत्तिना ! शितनारंगसंकाया पत्रिणापहाताम् ॥ ९ ॥ ५स्यस्यच महागा नस्यत. समरेशगन् । निवाया दायादा जय गचतुरो इयान ॥ १० ॥ भूरिश्रयाय शल्यश्च द्रोण सायमनि. शुल । नाश्यवर्तत सम्धा का- आपलोदयम् ॥ ११ ॥ सतस्निगर्ता राजेंद्र मद्राय सहकैकयैः । पञ्चविंशति साहसास्तक पुग चोदिता. ॥ १२ ॥ धनुर्वेद विदामुग्न्या अजेयाः शभियुधि । क्रम करने वाले शत्रुओं का ऐसामर्दन करनेवाला देखकर बड़े वेगस सिंहनाद किया, रे राजेन्द्र प्रापके पुत्रोंने इससीत से सेनाको पीडामान करता आपके पोते अभिमन्यको देखकर चारों प्रारमे आकर रोकलिया ।५। फिर शत्रुमंतापी अर्जुन बहुत हर्षित मन के समान अभिमन्यु सपेन वळपराक्रम युक्त आपके पुत्रों की सेना के सम्मुख गया, युद्धमें शत्रुओं से संग्राम करनेवाले उस अर्जुन का बड़ा धनुपरस्त लांघरता के मार्ग में नियतहोकर मुर्थ के समान प्रकाशमान दिखाईदिया, उसने एकवाण से अश्वत्थामाको और पाचपाणों से शल्यको घायल करके आठवाणों से सांयपन के पुत्रकी बनाको गिराया, और सोमदत्तकी फैकी दुई मनहरी दंह बाली सर्पाकाले शक्तिको तात्रवाणी मे का फिर अर्जुन के पुत्रनेवाण के फेंकनेवाले शत्यके महाघोर सेकड़ों बाणों को रोककर उसके चारों घोड़ों को मारा ।१० फिरता अत्यन्त कायमें भरेहुए भरिला शल्य अश्वत्थामा सांयमनका पुत्र और शल उस अभि मन्यु के मामवलपराक्रमके प्रागेटहर न सके, इसके पीछे हेराजा अापके पुत्रककहनले Seeing yoda glavidson Abhimanyu thus destroying your a mes, yuur tous cliente lsu on all sides. Tien Arjun the dest yer enemics, with a cheerful beant, accuwjanied Auhiwanya to t stiengul on your armses. sijun's bus luuaed libe the sun on account of Lue dex.city of his hand in shijoutug He wounded 1 Ashwathawa wali onie aniow and Shayo Wah nise, and cul dumn this lander ut Damay nana's con with cigle, He cut uuwa the skin gnist like spea. ci sindasta with lils ui10ns. A jun's sun checked the slowe. u Slalyu's thousands of a. Otrs and build alt lie tour : Lukas ut fris cha.10t. Then Buurisiuala, Saulga, Abhwatawas, Domyuuian's son and saulc uld not slund agalust that greut von: EIO Abhaudasu Tuci at the request of your bun, the skilul Archo-, uucunqucrable ir busto with, thouty five thvūsäod"Irigalas, y us all017.

[4602] Mahabharat *(४६०२) सहपुत्रं जिघांसतं परिवन किरीटिनम् ॥ १३ ॥ तैतुतत्र रिसापुत्रौ परिक्षिप्ती म रयो । ददर्श राजन पांचाल्य. सेनापतिररिंदम ॥ १४ ॥ सवारणरोधानां सर्व हुभितः । पाजिभि पतिसिधैव तृतः शतसहमशः ॥ १५॥ धनुर्पिरफार्यसंकुद्धोनो दपिरवाच वाहिनीम् । पयोत मद्रफानफिं केकयांब परंतप ॥ १६॥ तेनकीर्तिम तागुप्त मनीफंहधन्वना । संरघरधनागा योत्स्यमानगोमत ॥ १७ ॥ सोर्जुन प्रमुखयांतं पांचाळ कुलपर्धनः । त्रिभि शारद्वतंयाणदेशे समापयत् ॥ १८ ॥ ततःसमद्रकान्छत्वा दर्शषदशभिन्शरेः । पृष्टराजधानाशुमल्लेन कृतवर्मणः ॥१९॥ दमनं चापि दायाद पौरवस्यमहरमन । जघानधिमलाप्रेण नाराचेनपरतए ॥ २० ॥ सत. सायमनेः पुत्र. पांचाल्यं युग दुर्मदम् । भविष्यात् प्रिंशिता याशामधास्य धनुर्वेद के ज्ञाता युद्धअमेय पच्चीसहजार त्रिगर्तदेशी और मद्रदेशियोनेकेकयदेशियों समेत उस पुत्र समेत भर्जुन के मारनेकी इच्छा से चारोंभोरसे उनको पेरासिया ॥१५॥ हे राजा वहाँ सनयी सेनापति धृष्टयम्न ने उनापता पुत्रोकोरयों से चारों भोरको चिराहुमा देखा तदनन्तर वह शत्रुसंतापी सेनापति महा कोषित होकर हजारों घोड़े रथ हाथियोंके पतियों से युक्त अपने धनुपको चढ़ाकर सेनाको भार देकर और मद्र केकय देशियों के सम्मुस गया, उस कीर्तिमान् दधनुषधारी से रहित रथहाथी घोड़े से युक्त युद्ध करनेवाली सेना शोभायमान, दुई पांचालकुलावतंस उस धृष्टद्युम्न ने तीन वाण से अर्जुन के सम्मुख जानेवाले कृपाचार्य को घायल किया, फिर दश ताग यागोले मद्रकों को घायल करके शीघही एक भलसे कृपाचार्य के सारथी को मारा, फिर उस शत्रु संतापी ने बड़े वक्ष्ण नाराचोसे | पौरपके पत्र दमन को मारा । २० । इसके पीछे चित्रसेनने दुर्मद धूप्रद्युम्न को दश बाणों से और उसके सारथीको भी दश वाणों से घायल किया फिर उस महा Madras, and Kaikayas, sumounded Arjun ard his son on all sides in order to kill then Daushtadyuwn, the commander of armies and des t.oyer of enemies, saw Aijun and his son surrounded by the enemies, and with thousands of loi sus, chesi tots and elephants ho'advanced againt the armies of Madia and Kaibaya, shooting his arrows against thom. Protected by that glorious ar chci, the chi lots, clephants and horses of the army housed giu ious Dhrishtadyumna the descendant of the Panchals wounded with three arrows Kripachârg al who per advancing to attack Arjun, and having shot ten "arrõlvs at Sbalsa, killed the chariot driver ot Kripacharya with one nirow. Then trithe sharp arrows, that destroyer of Buemes killed Danian thu son of Paurav. 20. Cutrasen wounded bzare Dhrishtadyumna with them aripes and his chariot driver with ten more. -Wounded merith thabo (४६०३) भोप Bhishma Parr [46031 सारथिम् ॥ ११॥ सोति विद्धो महेष्वासः सृपिकणी परिसंलिहन् । भल्लेनमशतीक्ष्णेन निधकर्तास्य कार्यकम् ॥ २२ ॥ अथेनं पञ्चविंशस्या क्षिप्रमेय समर्पियत् । अवास्या पीद्राजन् नभातीपाणिसार २३ ॥ सहवाश्ये रथे निधन ददर्श भरतर्षभ । पुत्र. सविमः पुत्र पाश्चाल्यस्यमहात्मनः ॥ २४ ॥ मप्रगृह महाघोर निशियामापसम् । पदातिस्तूर्ण मान; द्रषस्थं पुरुषर्षमः ॥ २५॥ तं महोघ मिवायांत मारपतन्त मियोग म् । प्रांतावरण निमिश काळोत्स्ष्ट भिवांसफम् ॥ २६ ॥ दीपमान मिया वित्यं मया रणविक्रमम् । मपश्य-पांडवास्तत्र पुष्टयम्नश्च पार्वतः ॥ २७ ॥ तम्य पांचाल दापादः प्रतीप ममि धापत्तः । शित निशि हस्तस्य शगधरणधारिणः ॥ २८ ॥ पाण धेगमती तस्य तथा भ्यास पेयुषः। वरन्सेनापति. कुद्धो विभेद गदया शिरः ॥ २९ ॥ तस्य राजन् स निखिरां सुप्रमञ्च रारा परम् । हनस्यपततोहस्तावेगेन म्यपतमुधि ॥३॥ त मिरप गदाप्रेण सभेपरमांमुवम । पुत्रः पांचाल राजस्य महात्मा मीम विक्रमः पायन धृष्टद्युम्न ने होगेको चबाकर बड़े तीक्ष्ण मल्लसे इसके धनुषको काटा, हे राजा इसी प्रकार इसको भी पच्चीस वाणों से पाड़ामान करके उसके घोड़ों को दोनों सारथियों समेत मारडाला, हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ फिर उस मृतक घो- हेवाले रथमें बैठे हुए चित्रसेन ने उस द्रुपद के यशस्वी पुत्रको देखा और देखतेही रथसे उतर पैदल होकर शीघही महाघोर खड्गको धारण करके रथपर बैठे हुए धृyम्न कीबोर को चला । २५ । उस महा भयानक खड्गधारी को आता हुआ देखकर पाण्डव और धृष्टद्युम्न ने उसको मूर्यके समान प्रकाशित और पतवाले हाथी धमान महावली रूप देखा, फिर शीघ्रता करने वाले सेनापति पृष्टयम्न ने उस महा कालरूप सम्मुख पानेवाळे घोर खड्गधारी के शिरको गदा |संतोड़ा, हे राजा वह अपने खड्ग और दाल समेत मरकर पृथ्वी पर गिरा ।१०। रामा पृष्टपुम्न ने उसको गदा की नोकसे मारकर पड़े यश को पाया, हे श्रेष्ठ Arrows, Darishtadyunna bit his lips, and with a sharp arror cat his bow from the middle. He then wounded Clitrasen with twenty five arrows and killed hig horses with the drivers. Then, Obost of the descendants of Bharat, Chitrasen sented in the chariot with dead krordaa, tas the glorious son of Drupad and leaping down from his clinriot, sword in hand ad rancod towards hiin, 25. Gooing the -drcadful sword bearer coming towards liim like tho san in glory-and Iko n mad olophant in tho prido of power, the skilful communder of armies Dhrishtadyumna broke with his mace the liend of that advanc ing wartiór of areadful sword, and caused bim to fall down with his stiield and drord. 30. King Dhrishtadyumpa griner great fame -by killing that warrior with the point of his wace At tho death Ti6045 Mahabharat । ४६०४) ॥३१॥ तस्मिन् इते महेवासे राजपने महाग्थे । हाहाकारों महानासीत्तयसन्याय मारिष ॥ ३२ ॥ तत. सांयमनि शुद्धो दृष्ट्वा निहत्त मात्मजम् । यमि दुद्राय वेगेन पां चालयं युद्धदुर्मदम् ॥ ३३ ॥ तौ तन समरे शूरौ समेतौ युद्ध दुर्मदो। दशः सर्परा जान फरव पांडवास्तथा ॥ ३४ ॥ तत सांयमनि कुद्धो पाप गरीरहा। भाजधान त्रिभियांणस्तोत्र रिवं महाद्विपम् ॥ ३५ ॥ तथैव पापंत शूर शल्य. समिति शोभन । भाजपानो रसिद्धरत तो युद्ध मवर्तत ॥ ३६ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीमवधपर्वणि चतुर्थयुद्धदिवसे सांयमानपुत्रवधे एकपष्टितमोऽध्यायः ६१॥ धृतराष्ट्र उवाच देय मेपर मन्ये पौरुपादासिंजय । यसैन्यं ममपुत्रस्प पाण्डुसै- ग्येनयाभ्यते ॥१॥ नित्यंतिकारकांस्तातहतानेय दिशससि । सम्पग्राम प्रहांच नि- . धृतराष्ट उस बड़े धनुपपारी महारथी राजकुमार के मरने पर आपकी सेना में बड़ा हाहाकार हुआ, इसके अनन्ता क्रोध में भरा हुआ सांपमनी अपने पुत्रको मृतक देखकर बड़े वेगले धृष्टद्युम्न के सन्मुख दौड़ा तब सब राजा व कौरव और पाण्डवोंने युदमें जुटेहुए उत्तम रयों समेत दोनों शूरवीरों को देखा, इसके पीछे शव विजयी सांयमनी ने महा क्रोधित होकर तीन बाणों से धृष्टद्युम्न को ऐमा घायल किया जैसे कि अंकुश आदि से बड़े हाथीको करते हैं इसी प्रकार युद्ध भूमिको शोभित करने वाले क्रोधरूप शल्य ने उस शूरवीर धृप्युम्नको छातीमें पायल किया इस पीछे युद्ध होना जारा हुआ ३६ ॥ अध्याय ६२॥ धृतराष्ट्र वोले हे संजय मैं प्रारब्ध को उपायसे भी वहा मानताएं जो मेरे पुत्रकी सेना पाण्डवों की सेनासे मारी जाती है हे सृत तू सौव हमारे शूरवीरों को मृतक कहता है और पाण्डवोंको सदैव अत्यन्त प्रसन और अक्षत कहा करता है। of thnt great trarrior prince there is a grent cry of distress raiser in your army. Samnyamau, enraged at the death of his son, rushed against Dhushtidyunina 'Then all the warriors of the Kaurarea those brave chmuoteers engaged in comiat Samayamanı the destroyer of 1093 rounded Dlırishtadyunin frith' tlıcze arrors like a large clephant will gurds In the same mander Shalya the pride of the field of Lattle, rounded Durinktadyunda is. the breast and the battle continnrd "36 CHAPTÉR LÁTI; Sa-ing t'iat my son's armies are destroyed by those of tho Pan. 02419, I hold fate to be supərior to espui cats!" said , Dhritrashtra to Suniwy, "You always say that such aa l sich warrions of my piny and Pandavas saw - .

[4000, { ४६०५) भीमपर्व Bhashma Parv यशप्तसिड जन-11-२ ॥ नन नपुरूष कारण-मामकाजाम जय । पातितागा. स्वम नाथ तानेषचशससि ॥ ३ ॥ युध्यमामान् यथाशक्कि घटमानान्जयप्रति । htratजयत्येव जायते चैपमागका ॥ ४ ॥ सोहत वा पानि दुर्योध कृता निव । थाप्याणि सतततात दु सहानि बहू नच ॥ ५ ॥ तमुपाय न पश्यामि जयं रन्येनपापडचान् । मागक विजय युद्ध प्राप्नु पुर्यनसजय ॥ ६ ॥ सजय उयाच । क्षयमनुष्प देव नां गजवाजि रथसपम् । शृणुर जन् स्थिगभू वा तवापनयामहान् ॥ ७ ॥ धृष्टद्युम्नस्तु शल्येन पीडितोनाभि शौ । डिपासससो महाधिपति मायस ॥ ८ ॥ तत्रामुतमपश्याम पार्पतम्य पराक्रमम् | म्यवारयत पम्तू" शस समिति शोभनम ॥९॥ मातर दृश्यते गत्र तयोधरथिनोस्तदा । महमियत शुद्ध तयो समभिवामवत् ॥ १०॥ तत शपयो महाराज घृष्टगस्थ सयुपे । धनुदिच्छ हे संजय अव हमार शुरवारों को गिरते गिराते दोनों प्रकारसे पराम से रहित कहता है इसी से पाण्डव लोग सामर्थ्य के अनुसार लड़ते विजय में उप य करते हुए जयको पाते है और मेरे बेटेपर जय को पाते है, हे तात सो मैंने दुग्योधन से उत्पन्न हुए दुःखके सहनेके योग्य अनेक दुखों को परमार मुना, हे संजय में उस उपाय को नहीं देखता हूँ जिसके द्वारा पाण्डवों की हार होय और मेरएत्रों की विजय होय । ६ । संजय बोले कि हेराजा तुम सावधानी से मुनो कि यह मनुष्यों का और रथ घोडे हाथी प्रादि का नाश होना तुम्हारेही अ-गायका फल है, शल्य के नौ वाणों से गाडि। अत्यन्त क्रोश्युक्त धृष्टयुम्न ने लोहे के तीरमे मद्र देश के राजाको पीड मान किया, वहां हम ने धृष्टद्युम्न के अपूर्व पराक्रम को देखा जो युद में शोभा पानेवाले शल्य को शीघही इटादिशा, किसीने इसयुद्ध में इनदो- नों मोघ युक्तों के अन्तर को नहीं देखा दोनों का युद्ध एक मुहूर्त तक अच्छा हुमा । ०। इसके पीछे हे महाराज शल्यने युद्धाममें पाले तीनधार वाले are dead, while y u vepres pt the Panday warriors to be indestruc ble and cheerful You say that billing og falling, our ärrioru aro destitute of prowess and consequently the Pandavas are ag in and 4,a1n victorious, chile our side is the loser I am tired of bearing the troul les of Naryodhan I see no expedient Sanjaya how to cause the defert of the Pondayns and the vctory of my sons' 6 Hear O king maaljently,” En d Esnjega in replo "The destitction of nied, chariots Horses elepi ants and others is the result of your own injus tiệon Woạnded by the n no prrows of Si alya 1 bitualitaayamna, much enraged, Foundid the king of Mrdra' with ron arrors. There ne witnessed the great protees of Dhinchlad; umpa rbo econ wado Sbalza turn back Hotli tre sarnors ſought for a time wití cut any distinction Then Shals & with one sharp atTot cut asunder 1 1 10 {46001 Mahabharat (५६०६) धमल्लेन पीतेग निशितेनच ॥ ११॥ अन शरयण च्छादणमास संयुये । गिरिजला गमेयजलवाजल घृष्टिमि ॥ १२ ॥ मभिमन्युस्तत हुँदो घृश्यम्भवपीडिते। पीडिते । अभिदुद्राव बेगेन मद्रराजरथं प्रति १३ । ततो मदाधिपरचे कारण प्राप्याति कोपन । थायनिमम यात्मा विध्याघनिशितै शरै ॥ १५ ॥ तत दुर्योधन विकणच दु शासनविविंशती । दुर्मपणो दु सह चित्रसेनोपदुग ॥ १६ ॥ सरयमतच भद्रते पुरुमित्रश्वभारत । एतेमद्राधिपरप पालयते पिता रणे ॥ १७ ॥ तान्भीमसेन सकुलो घुष्टद्युम्न पार्षन । द्रौपदेयामि मन्युनमा दोपुगे व पांरवौ ॥ १८ ॥ धार्तरापान दारणान् दशेय प्रत्यवारयन् । माना रूपाणि शलागि विसजठो विशापते ॥ १९ ॥ मभ्ययत साधी परस्पर भल्ल से पृष्टपुम्न के धनुपको काटकर इसको वाणों की वर्षा से ऐसे ढक दिया जैसे कि बर्षाऋमें जन भरेहुए वादल पर्चत को दकदेते है, फिर धृष्टयम्न के पीड़ामान | होने पर अत्यन्त क्रोधरूप अभिमन्यु वड़े पेगसे राजामद्र के रयको और दो ड़ा, तदनन्तर महासाहसी क्रोधमें भरेहुए अभिमन्युने राजा मद्रके रयको पाकर आतीयान को तीन पने तीरों से घायल किया हे राजा फिर तो भाभिः मन्यु दबाने की इच्छासे आपके पुत्र शीघ्रही रामामक रयके चारों भोर आकर नियत हुए । १५ । दुर्योधन विकर्ण दुश्शासन विविंशाते दुर्मर्षण दुस्सई चित्रसेन सुर्मुख सत्यात पुरोमित्र महारथी विकणं यह सव राजामद के रयकी रक्षा करत हए युद्धमें नियत हुए, इनको देखकर हेराजा महाक्रोधित भीमसेन धृष्टपुम्न द्रौपदी के पांचोंपुत्र आभिमन्यु और माद्रीके पुत्र नकुल मौरसहदेव इननाना प्रकारक शम्भक प्रहार करनेवाले दशा शूरवीर धृतराष्ट्रके महारथी दीपुत्रोंको रोककर परस्परमें मारनेके इच्छावान अत्यन्त क्रोधरूप सम्मुख वर्तमानहुए हेराजा निश्चय the bow of Dhrishtady umn and covered him with the shorer of his arrows like a hill with the clouds of ralus. When Dhrishtadyumn was thus wounded, Abhimanyu in great rage rushed against the chariot of Shalya The brave warrior Abhimanyu, full of proness, founded Artayanı with the sharp arrow's. Your sons soon camo round the chariot of the king of Kadra to punish Abhimanyu Duryodlani Viburn. Dushasan. Vivinshati, Durmarsban, Düssaki, Chifrase. Sudurmukh, Satyabrat Puromitra, and the great warrior Vihara protected the chariot of the king of Madra Sosing them the stationed, Bhimsen, Dhrishtadyumna the five eons of Draupadi, Abhimanyu and the tons of Bladrı-Nakul and Sahadev discharging various sorts of weapons, checkad the ten warriors of the Kauravis and the tro sides fought for life and death. All this was the result (४६०७) भीष्मपर्व Bhishma Pury [46071 षिणः । तेसमेयुः संपामेराजन् दुर्मत्रितय ॥ २०॥ तस्मिन् देशर कुदेपर्तमाने भराभये । सावकानां परेषांचा प्रेक्षकारथिनो मयन् ॥ २१ ॥ .शमाण्याकरणाणि वितो महारथाः । अन्योन्यायमभिनतः संप्रहार प्रचक्रिरे ॥ २२ ॥ ते तदाजात संरमा सयोग्यं जिघांसवः । मन्यन्यमभिमदतः पर्षमानाः परस्परम् ॥ २३ ॥ सम्योन्याया गजन शातयः सगतामिय. । मह स्राणि विमुंचतः समापेतुरमपिंग ॥ २४ ॥ दुर्योधनस्त संदो धृष्टद्युम्न मारणे । विव्याध निशितवाणश्चतुर्भिः समरेद्रुतम् ॥ २५ ॥ दुर्मर्पणन विशत्या चित्रसेनच पश्चभिः । दुर्मुखोनवमिर्याणे दुःसाधापि सप्तभिः ॥ २६ ॥ विशतिः पञ्चभिश्वत्रिभिई शासनस्तथा । तान्प्रत्य विष्यद्राजेंद्र पर्पित. शत्रुतापनः ॥ २७ ॥ एकैकंपविशत्यादर्शयन् पाणिलायवम् । सत्यातं समरे पुमित्रचभारत ॥ २८ ॥ अभिमन्युरविपत्तुदशभिदशमिशन। करके भापकी दुरीसलाह करनेपर वह लोग युद्ध करने में अत्यन्त महत्त हुए।२०। उन दशोरपियों के और बड़े भपके वर्तमान होनेपर भापके पुत्र और पाण्डवों के स्थीयुद्ध क्रीड़ा देखनेवाले हुए वह सब नाना प्रकारके शस्त्रोंको चसाहुए परस्परमें एक एकके सम्मुख गर्नतेहुए महारथी लोगोंने अच्छेमकारसे युद्ध किया तवतो वह सब अत्यन्त क्रोध भरे हुए परस्पर मारनेके इच्छावान सम्मुखहोकर गर्जना करते हुए एएकसे ईकरनेलगे हेराजा ज्ञातिके लोग अपने सातिवालोंसे परस्परकी इ के द्वारा युद्ध करतेहुए क्रोध से पूर्ण बड़े प्रोंको स्पागतेहुए सम्मुख दौड़े, फिर अत्यन्त क्रोधयुक्त दुर्योगनने चार क्षण वाणों से धृष्टद्युम्नको घायल किया ।२५॥ दुर्मर्षगने पासवाणसे चित्रसेनने पांच बाणसे दुर्मुखने नौवाणसे दुस्सहने सात वाणोंसे विविंशतिने पांचवाणोंसे दुश्शासनने तीन वाणोंसे घायळ किया इराजा उसशत्रुतासंतापी हस्तलाघव दिखानेवाले धृष्टद्युम्नने उन प्रत्येकोंको पच्चीस २ वाणोंसे घायल किया हेभरतवंशी फिर अभिमन्युने सत्यव्रत और पुरोभित्रको दश २ बाणों से घायल किया फिर माताको प्रसन्न करनेवाले माद्रीनंदन नकुल of your evil policy. 20. When the ten warriors were thus fighting bravely, your sons and the Paudav warriors looked on the scene of battle. Discharging various sorts of weapons and roaring at one another, the great warriors fought bravely. They tr.ed to bill one another and roared fearfully The kinsmen, envious of one another fought in great anger and leaving their missiles aside, rushed upon one another. „Daryodhan in great rage wounded Dhrishtadyumun with four arrows. 25. Durmarshan shot twenty arrows, Chitrasen five, Durmukh nine, Dussalı seven, Vivinsbatı tive and Dushasan three Dbrishtadympa the destroyer of enemies wounded each of them with twentyfive arrows shot dexterously. Abhimanyu younded Satyabrut And Purumitra with tzn arrows each. Then Nakul and Sabadov, [ 46081 Mahabharat (४६०८) माद्र पुनौतु समरे मातुलमातृनंदनी ॥२९॥ अयितांशस्तीगस्तददभुतमिवाभवत्। तत. शल्यो महागज स्वस्नीयों रथिनांवरी ।। ३. । शायदुभिरानछक्कतप्रति हितैपिणी छाधम नी ततस्तोतु माद्रीपुत्रौ नचेलत ॥ ३१ ॥ अथ दुर्योधनं दृष्ट्या भीमसेनो महा बलः । विपित्सु कलहस्यां त गदो जग्राह पांडवाः ॥ ३२ ॥ तमद्यतगद् दृष्ट्या फैलारा मियगिणम् । भीमसेन महावाहुं पुत्र स्त प्रादयन्भयात् ॥ ३३ ॥ दुर्योधनस्तुसकुद्धा माग समचारयन् । अनीक दश साइन कुजराणांतरस्विनाम् ॥ ३४ ॥ गजानीकनस हितस्तेन राजासयाधनः । माग पुरत छत्वा भीमसेन समभ्ययात् . ३५ आपटतम तं रघुया गजानीक वृकोदः । गदापाणि रयागंह द्रधात् सिंह इयोनदन् ॥ ३६॥ माद्रि सारमयीं गा प्रहत्यमहती गद म्। अन्यध वगजानीक व्यादितास्यइवांतक. , ३७ ! स गजान गय नि निधनन् व्यचरत्पम बली भीमपनो महाब सागवाघ और सहदेवने युद्धमें अपने मामा शल्यको पत्र वाणोस ढक दिया यह भाप साहुआ इसके पीछे हेराजा शल्यनेभी उन रथियोंमें श्रेष्ठ प्रहारकोपर प्रहार कर्म | करने के इच्छावान दानोंभानजों को बहुत से वाणोंसे ढकदिया इसके पीछेवाणों से आच्छादित होकरभी वह दोनों मकुल सहदव व्याकुल नहींहुए.।.३१ - फिर महाबली भीमतेनने दुर्योधनको देखकर युद्ध के अ तकरनेकी इच्छासे अपना गदाको हाथमें लिया कैलाश पर्वत की समान उस गदाके उठानेवाल-भीमतेन को देखकरमापके पुत्र भयमीत होकर भागे फिर अत्यन्त कोषयुक्त दुर्योधन ने राना मगको चेताया और वेगमान हाथियों की दश हजार सेनाको भाशाकी | राजा दुर्योधन उस हाथियोंकी मेना समेन राजा मगधको आगेकरके भीमसेन | के सम्मुख गया । ३५ । भीमसेन उसहायिय की सेनाको चारों ओरसे गिराता | हुआ देख कर सिंहके समान उच्चस्तरसे गजेताहुअा हाथमें गदा लिये रथ उतर। और उस मह भारी लोहे की गदाको पकड़कर उससेनाको अपना भक्षपदार्थ समझकर हाथियोंकी सेनाक सम्मुख दौड़ा पार वहां जाकर पानी गदाते हाथियों को the joy of their mother Madrı, covered their maternal uncle Shalya witu tue slower of tuon uu103. The whole was a wonder. Snaga 100 covered his siste 's sous with his ur ow, but being ove whelmed will the slower of his a rows they did not lost liealt- 31. The great wa ror, Blusen, bte 11g Duryodliau and wistung to end tuena, Loos up his mact. With that mave l...o tilu banasli moauta n, Bluw. on was the lo ror of your zond. 'Ilien Vur jouhan in great anger o dured the king on Magadh with an army of ten thu ands of elep.anls to assaille age ost Blırwser and Innoli tollowed that Scoin tuat array of elephanus coming fruin all sides Bumsen roa ed like a lwn, and dismounting, sro in luis cliprot watu muco in his haud he ran against then thinkiný chew tu, bo lila Puey: A lling thé elipānus wití niz müze roanei andst thiau arwy.likom any.35.

भीष्मपर्व Bhishma Parr 14605] वासवः ॥ ३८ । तस्य नादेन महताननोहदयगिना पचेष्टत संहापगला भीमस्य गतः ॥ ३९ ॥ ततस् द्रौपदी पुत्राः सौगदवार नकुल सहदेय वकृष्नपात ४० " पृष्ठभीमस्य PAR शाव। वारणान्यत धान्तो मेघाइव गिरीन्यथा ॥ ४ ॥ क्षु.रमेय पhiजालेकाशित । पहनुमानि पाडया गजमोपिनाम् ॥ ४२ ॥ शिभिः प्रपतदियाइमि: विभूषितः । अश्मवृशिरियामासिवानिमिश्वसहांकः ॥ ४३ ॥ garaमागास्क येथे गजानांगञ्जयाधिः । अस्पताललाग्रेप मामन शिवाय ॥ ४ ॥ पृष्ट शुम्नहतानन्यानपश्याममहामजान् । पततःपात्यमानाश्च पार्वतनमहारमना ॥४५॥ माग धोब मालो गजमावणोपमम् । प्रेषयामास समरे सौभद्रस्यायप्रति ४६ ॥ वमापतत सप्रेक्ष्य मागस्पमहागजम् । जधान पणावीर, सौभद्र परीरहा ॥ ४५ ॥ -1 मारता हुमा ऐसा घुमा जैसे दानवोंके पांच यत्रधारी इन्द्र गर्जताहुमा दौड़त.. हृदयके कानवाले भीमतेन के बड़े शब्दते सब मिलेदुए हाया भान्त चलायमान हुतिर पदाफ पांचोपत्र और महारथी मा.नान्य, कुल सहदेव घट्यम्न यह स भीमतेन के पृष्ठभाग की रक्षा करत वाण की वर्षाको करकर हाथियों के सम्मुस ऐने दोड़े जैसे कि पर्वत पर प.दल दाहते हैं। ४१ । बिजली के समन भल्लों से पाण्डवोंने युद्ध में हाथीवाना और हावीक सवारोंके शिरोको काया फिर तो हाथियों से निवाले मृतकों की शोभापायाण टीसी मालम हो। थी और हादिया के कन्धों पर पिनाशिक सवार ऐसे पड़े जो कि चलने हुए पतिपर चोटी कटे हुए होते हैं इनके आतरिक्त धृष्टद्युम्न के पारेहुए । निाये हुये पडे हुए दूसरे बड़े साथियों को देखा । ४५ । इसके पीछे मगयक गजा ने ऐरावतके समान हाधीनोयुद्ध में अभिमन्यु के स्थपर भंजा उसहाथी को प्राता हुमा देसके दात्रा के विजयी आभमन्यने उत्तको वाणों ना कर मुख Inira the wieldul of Vajra tu the midst of the Dan2123 The eleplants 11010 Duch terruited by the lack of Bhusete Tucn the five susuf Draurali with Abhimanyu, Natul, Sasdar and Duriskitadyuma. protectel Bh.m from b fund avd rushed upon the elephants showering their arrows on them hhetlouds shuser ng rain over huls. 44. The Pandásas cut down the licends of the drivers and I ders of el phants With sharp arrows bright as lizhtong and then they dropped lue storey from the banks 'lle bicadlos r.ders oa the barks of clephant. luoned like trees on mountants with ther tops clopped on... elopbants also cut and killed by Dirilitadyumnu's ATOS 45. Then the king of Magadh sent his elephant, hage as -Aimrat, on the chariot af Abhioibuya, wbO BS POOLL as he say it coming tokais-lini illed it. rich hux. ATI OE+ of goldon fealers anti-bebended tho Lung HAR Bhinson too, was con ruaming hither 4810] Malia Llistat सस्थापजितनागस्य पाणि परपुरम्य । गोरजतपुखेन मनापाइरच्छिा विगारामजानीक भीमसेनोपि पादध । यचरत्नमरे मनन् गजानिद्रोगिरीनिष ॥ १९ ॥ एकमधार निहता भीमसेनेनदंतिन । अपश्यामरणे तस्मिन् गिनाता निए ॥ ५० ॥ ममदन्तान् भन्नकटान भग्नसक्याथ पारणान् । मानपृष्ठात्रकानन्याधि हतान् पर्वतोपमान् ॥ ५९॥ नदत सीदतश्चान्याम् विमुखान समरेगतान् । लिम तान् भयस विग्नास्तथा विशकतोपरान् ॥ ५२ ॥ भीमसेगस्य मणेषु पतितापर्ष तोपमान । अपश्यनिहवाधागान राजशिष्टावतोपगन् ॥ ५३ ॥ वमन्तो रुधिरवान्ये भिन्न भामहागला । विदलतो गताभूमि शैलाहवघरातले ॥ ५४॥ मेदो रुधिरदि प्रधागोषसामना समुतित । चरमसमरे नीमो दडपाणि रियातक ॥ ५५ ॥ गजा माधिक्लिना गदा चित्रदकोदर । योर प्रतिभपचास पिनाकीय पिनाकघ्फ । ५६॥ पाले भल्लले उरा हाथी के न रोकने वाले राजा के शिरका भी काटा, फिर भीमसेन भी उसहाथियों की सेना को पवित करता हुअा ऐसा घमा जैसे कि बन्द पर्वतों को मयन करता घूमता है, हमन उस युद्ध में भीमसेन के एकही प्रहार में मरे हुए हाथियोंको ऐसा देखा से कि यन्त्र से महारित पर्वतदीखते हैं । ५० ।। भाख दांत गंडस्थान जया पाठ और कमर टूटकर मरेहुए पर्चवाकार हाथियों को मौर कितनेही झागडालकर मरहुए हाधियों को भी हमने देखा, कितनेही वडे हाथी कम दृटे रुधिरको वमन करते भपसे विकत पृथ्वीपरएसे गिरे जैसे कि पर्वतपृथ्वी पर गिरते हैं, रुधिर मन्नासे लिहुए अंग और कपालोंकी मज्जासे छिड़का हुभा भीमसेन दंडधारी मृत्यु के समान युद्धमें घुमा हाथियों के रुधिर से भीजा हुआ। गदाको धारण किये हुए भीमसेन पिनाकधारी शिवजी के समान घोर और भयानक रूपमा । ५४ । क्रोधयुक्त भीमसेन के हाथ से महुए कृष्टित हायी अकस्मात आपकी सेना को दवाते हुए भागे ॥५॥ अभिमन्यु आदि वडे २ धनुषधारी राधियों ने उस युद्ध करनवाले धार भीमसेन की चारों ओर से ऐगी रक्षाकी से इन्द्रय who was scate on tz Lach anů tluthier, destruy ing the e'opbouts as India destross lulle. 5016 cor elephants destined by thic single blows of Bluitu, falling dorsa lihc mountains destroyed iy lightning We also saw, clophuuls luge ng mauatujas dying of vuunds reeised in their eyes, tushay cliccbs thiglis and Lacks, and dropping loom from thur mouths Many slepianta fell down on is the sounded, to autong blood and falleg like mountains llumen with his blourdstaned lody morned there like Death the bearer of staff Bathed in thie bloed of elephants Bluen tbo bearer of race louhod as dreadful an appearance at Shix the learer of Pinel Hounded by the Lions of Bhumus, that phudts ran away qushlog jour arques Great ashara and warriors protected Blun on all suchen is tilos sals 55, Abhimanyu and other (४६११) भीमपर्य Bhishma Pary [46111 समयमामाये नमीमसेनेग दीतनः । सहसामादयन् पिलष्टामृनसरतपघाहिनीम् ॥ ५७ ॥ तस्विीर मयासं सौमद्रप्रमुखाः । पर्यरक्षन्त युष्यंत घमायुधमिधामा . ५८ ॥ गोणिताकागदां विप्रतितांगजशोणितः । कृतांतस्परीवात्मा भीमसेनो पारंपत ॥ ५९ ॥ पापच्छमानं गंदया दिक्षुसंघमि भारत । अपदयामरणेमीम नृत्यन्त मिवशंकरम् ॥ १० ॥ यमददोपमा गुमिद्राशनिसमस्यनाम् । अपदयाम महाराजद विशसनांगदाम् ॥ ६ ॥ विमियां फेशमजामिः दिधिरेणच । पिनाक मिवरुदस्य कुस्यामिन्नत पशून् ॥ १२ ॥ यथापना संघात यट्यापार्ल:प्रका येत् । तथाभीमो माना गयासकाझयत् ॥ ६३ ॥ गेंदयामध्यमानास्ते भागबमनसः । स्यान्यनीकामि नंतः प्रादयनजरास्तव ॥ ६४ ॥ महा पांतवाप्राणिविघमिस्वासपारणान् । अतिउत्तमुलभीमः श्मशानइयशूलभृत् ॥ १५ ॥ इति भी महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि चतुर्थदिवसे भीमयुद्ध द्विपष्टितमोऽध्यायः ६२॥ रतादेवता करते हैं, रक्त से भरे हुए और हाथियों के घिर से छिड़काई गदाको 'धारण किये भीमसेन मृत्यु के समान रद्रात्माही टिपड़ा, हे मरनवंशी हमने गदा युक्त भीमसेम को संव दिशाओंम नाचतामा शंकरजी के समान देखा, फिर हम ने पमराजे के दण्डकी समान और इन्द्र्के यजू की समान मादायमान नाश्की कर नि वाली रौद्रीरूप महाभारी गदाको देखा वह गदा केशोसे युक्त कपाल और सिंधिरसे ऐसी भरी हुईथा जैसेकि क्रोध युक्त शिवजी के हाथमें पशुओं का मारने पाला पिनाक धनुप होताहै, और जैसे गाय चराने वाला अपनी यष्टी से पशुओं के समूहों को हटाताहै इमीप्रकार भीमसेन ने भी अपनी गदांसे हाथियोंको हटाया इसके पीछे गदा औरत्राणोंमे घायल वहहाया अपनेरयोंको दवाते तो तहुए इधरउधर को भागे, जैसे कि वायु वादलों को इधर उधर तिरविरकरदता है सीमफार पुद से भिम २ हाथियोंको करके भीमसेन युद्ध भूमि में ऐस नियत हुभा जैसे कि स्म- शान भूमि में रुद्रजी नियतहोते हैं ६५ ॥ protect Jharn. Reching in Licod with the llocå-stained inace, Bhim looked as ferocious as the god of Death. We eav Bhimson the bearer of mace dancing in a}} directions like Shankar. Then like the staff bf Den't or the tajra of Indra, te sit his mace dealing bord sounding blocs with blood and hair of heads on it like the bottom of Shira the destroyer of beasts. Bhitisea lent back the elephants with his clali, as a herdsman drives cattle with his staf. Then youndai by the main and arrows, tho olephants rushed hither and thither, crash. ing the chariots on their own side Diojusiog the elephants #5 tho Wind diejícred the clouds, Bhimseh stood in great glory file Radre standing on the ctemstiol ground "63. -- - [4612] Mahabljarat । ४६१२) सञ्जय उवाच । हतेतस्मिन् गजानीके पुत्रोदुधितिय मापसेननंतरैये। सर्व सैन्याम्पचोदयत् ॥ १ ॥ ततः सण्यीकानि तवएत्रयशंसनात् । अभ्यद्र भीमसेननदनं भैरवानवान् ॥ २ ॥ तक्लीयम देवैरपिदुःसहम् । मातंत दुपार समुंद्रामिव पर्वणि ॥ ३ ॥ रचनागावलिल शंखदुन्दुभिनादितम | अनन्तरपादात नरेंद्रस्तिमितहदम् ॥ ४॥ तं भीमसेनः समरे महादधि मिवापरम । । सेनासागर मक्षोभ्य बेलेक्समधारयत् ॥ ५॥ तदाश्चर्य मपयाम पांडवाय महामन भीमसेनस्य समर राजन याति पम् ६॥ रदीनानपार्थिवान् मान स. साप कुमगन् । लसंभ्रमं भीगनी गदवासमय यत् ॥ ७॥ ससंघार्य बलोपास्तान गंदेया रविना अनिष्टत्तमुले भोगे गिरि रियाचलः ॥ ८॥ तस्मिन्मुनमले घो काले परम दारणे । प्रातरशव पुराध गुम्नध पानः ॥ ९॥ द्रौपदेशाभिमन्युभ अम्पाय ६३ ।। संजय वले कि उम हाथियों की सेना के मारे जाने पर भापके पुत्र दुर्योधन ने सब सेनाको चैतन्यकिया और आशा दी कि भीमसेन को मारो. संदन तर आपके पुत्रकी आशा से सब सेना महाभयकारी शब्दोंको करती हुई भीमसेन के सम्मुख दौड़ी, फिर उम अत्यन्त देवनामों सेभी कठिनता से साने योग्य ममुद्रके समान अत्यन्त दुस्तर रथ हाथी घोड़ों समेत कवचधारी शंख भरियों से शब्दायमान असंख्य रय हाथी पद ती लोगों से भगहुई सय बोरसे धूल उड़ाती हुई भारी समुद्र के समान अन्य कुल सेनाको भी मनेन ने रोकदिया । ५। हे राना हम ने उसे महात्मा भीमसेन के उक्त अद्भुन कर्मको देखा, अर्थात् भीमसेन ने बड़ी निर्भयता से घोड़े हाथी प्रांर रथों समेत उन सब राजाओं को अपनी गदा सेही हमादिया, वह पराक्रामे में में श्रेष्ठ भीमनेग तुमुल युद्धमें उन सेनाओं के समूहोंके। गंदा से घट कर मेरुपर्वतके समान निश्चलहोकर नियत हुभा, उसघोर और महा भयानक युद्धमें भय के उत्पन्न होनेपर भाई वेटे धृष्टद्युम्न द्रौपदक पांचोपुत्र भाभि CHAPTER LXIII «When that armyui clephants was destroyed,”: continued San jnys. "your son, Nuryodhan, addressing a}} the niny, ordered then tremendous noʻse rushed ngainst Bliimeen. Ijien that worrior, unicarnllo erau ly gods, chicked that any :oning lho tlic o can, consisting of numerous kuriols, elepinnts and font mediers and raising a storin of dust 5. IV's qaz thon the u mnclorful frossess of Bhimseu who fearlessly soleated all th04, princos itla their az nies of horses, clephants and clariplo with his kinacciand himselforemnized ithmorcille libe, wount for the Puting that dreful Eighting; in spite of the prosence of great danger illiinit o was not deserted by luis brothers, songs Dhrist tadyumna tokill Bhim. And all the nimy with a . भीमप Bhishtin Parv [4613 शिशी चापगजितः । ननाजहन ममसेन मये जाति महायलंग ॥ १०॥ ततः क्या पसी गुबी प्रगृह्य महती गाम । अरावत्ताव कान् घोघान् दण्डपाणि रियतिकः ॥१ पोथयन् ग्थवृन्दाम वाभिवृन्दानि वामिभूः। परन्पवृनामि घायंगेन: १२० विनिम्नध्यचारसंख्ये युगाने काल विभुः । ऊस येगेनसंग जाल निपाण्य: । ४.१३ ॥ वलनि सममदारा नायलनीय बुजेरः । मृहनन् यो शिनो गयो गत पोधिनः ॥ १४ ॥ सादिनचा पृष्ठम्यो भूमौ चाही पदातिनः । गयाध्यमासयान् । पातीवृक्षा निघाँजसा ॥ १५॥ भीमसेने महातयात्राप ये पलं । सागरजाप । मामांस: प्रदिग्याधिरेगध।। १६॥ महश्यत महाद्रि गानागाव पानी। तत्र तत्र तिचापि मनुष्यगण शानिमिः । १७. रणांगांसममय मृापोवास संनिमम् । मयु: और महा विजयी शिखण्डी ने उस महाबली भीमनेन को त्याग नहीं किया 12. इसके पीछे देहधारी मृत्यु के समान उस लोहेकी गदाको लेकर महारली भीमसेन आपके शरीरों पर दौड़ा, और स्य घोड़े हाथियों के समूहोंको मारता 'हुआ ऐसा घुमा जैसे युगके अन्त में अर्यात प्रलय काल में अग्नि दौड़ता है, जैसे कि प्रलय के समय में कालं सबको मारता है उसी प्रकार युद्धभूमि में कालरूप भीमसेन शूरवीरोंको मारता हुआ अपनी जंघाओं के वेग से रथको जालोंको संचतार शीघंही सेनाको ऐसे मर्दन करने लगा जैसेकि हथी नलों के जंगलोंको मर्दन करता है रथोंको स्याँस वा युद्ध करनेवाले हाथियों के सवारोंको हाथियों से मर्दन करता हुआ सवारों को पोड़ों की पीउसे पदातियों को पृथ्वीपर मर्दन परताहुआ घूमने लंगा, फिरउस महावाहु भीमपेनने अापके पुत्रकीसेनामें जाकर गदा से सबको ऐसामारा जैसे किवायु देवना अपने वलसे सदों को गिराता है । १५ । फिरवह भीमसेनी कराल भयंकर गदा मांस रुधिर से भरीहुई हाथीचे डोंकी मारनेवाली सेंद्री रूप से दृष्टि पड़ी और स्थानर में मरेहुए हाथी घोड़े और सवारों से वा युद्ध भूमि संहारभूमि के समान होगई, चारों भोर से वर्णःथम रहित पराओं के समान the five sons of Drnưpadi, Abhimanyu and Shibkandi tbe Lest of conquerers, 10. Then l'himsen, with his mace like the start of Death rusbed apor your army, and destroying the horses, chariots and cle: phants, ho ran like Agni at the end of a yug. - Kal desfrój 8 etery. thing at the end of the rug, so did Bhit destroy your armics, Lilliaz Ho warriors and dragging the nets of chariots along with his thiglis. He rozmed crusliing chariots with chariots, Lilling clephant riders, Horse nên ond font soldiers as no clephant.crushes the forest of reeas. Then Bhimsen of loag arms, entering the lists of your sons destroyed tho arriors'*ith his cute as the wind destroys the trees of the forest. 15. Bhitisea's risco of dreadful forin, filled in flesh and blood of elephants sadi horses, looked like the treapon of Rodrl Tho field of battle I *as strewa with the dead bodies of clepidats, borses and the rider ३ [46143 Mallabhirat नाकामियरुंद्रस्य शुद्धस्याभिन्नतः शून् ॥ १८ ॥ यमवंडोपमासमा भिदाशनसमें रचनाम् । दहशुभीम सेनस्य गी पिशसनींगदाम् ॥ १९ ॥ माधिपतागर्दा तस्य कोतवस्य महात्मनः । यमरुपं महाघोरे कीलीपेष युगक्षये ॥ ३० ॥ सतर्ग महतासनां प्राययंत पुन:पुनः । दृष्ट्यामृत्यु मियापांन्तं सर्वे घिमनसोभव ॥ २१ ॥ यतो पतः प्रेक्षतेस्मगदामुद्यम्य पॉण्डय । तेन तेनस्मदीयते सर्व सन्यानिमारत ॥२२॥ मदारयते सन्मान यलेनामित विक्रमम् । असमानमनीकानि व्यादितात्पमियांतकम् ॥ २३ ॥ तन्तपाममिकामणि प्रगृहीतमागदर्भ । दृष्ट्यायकोदर भीष्मः सहसैष समाययात् ॥ २४ ॥ महतारपयोग रथेनादित्यवर्चसा । छादपर शरवर्षणपत्र म्याइयवृष्टिमान् ॥ २५ ॥ तमायन्ति तथा राष्ट्रवाईपासान, मितिम् । भीमामी मनुष्यों को मारने वाले कोधर्मप रुदनी के पिनाक घनुप के समान यमदद के सदृश भयानर्फ और इन्द्र बज के समान प्रकाशित नाश करने वाली रौद्री भीम सेन की गदा को हमने देखा, गदाको मारते हुए उस महात्मा भीमसेन का रूप महा प्रकाशित और घोररूप ऐसा होगया जैसे कि संसार के नाश में गहाकालका रूपं होता है । २० । इसरीति से उत्त बड़ी सेना को पारम्बार भगातेहुए मृत्युके समान भीमसेन को भाता हुआ देखकर सवलोग चित्त से महा व्याकुलहुए है. भरतवंशी उस भीमसेनने गदा को उठाकर जिएर २ को देखा उघर उपरकी सेना व्याकुल होकर छिप भिन्न होगई जसे कि सेनाभीको छिन्न भिन्न करते हुए सना समूहोंसे भजेग अत्यन्न भक्षण करनेवाली मृत्यु के समान सेनाभोंको निगल ते भयकारी कर्म करते बड़ी गदा के उठाने वाले उस भीमसेन को देखकर सूर्य में समान प्रकाशमान यादल से शब्दायमान रयपर सवार होकर भीमजी वाणोंकी चेपी करते हुए मास्माद उसके सम्मुख भाये । २५ । इस रीति से उस मृत्युप भीमनीको भ्राता देखकर महावाहु भीमसेन यड़ा क्रोधरूप प्रग्न के समान होकर Killing the people of all orders liko lasts, the destroyer of men, the box of Shis, the staft of Yam or tho vajma of lodra, Bhimsen's maco was noen shining dreadfully. Rhiu's form, then lo wag asing his mase, looked right and drcaduti tiho Deuth himself nt the time of the destrartion of the world. 20. Thuy setting that largs army again and again to fight. Blumsen was seen thero frighteuing the look. The warrior T roomstoral in disordor, it shatover direct nad he lombed with his mix mused on high. Dispersing tho arzioinlefax tigablo by largo nunilxre, liko Denth covoaring all, doing dreadful dekls of colorm. wk kler of.the hogo nece. Bhireen was seen and anmuntorud lry Nhishuri, siloworiaz arroxa from Iris chariot bright liko tho run and rolling hko thunder, 25. At tho might of bilishini coming illo Death, Bhim vas-enragal liko firo and runlial at once to liko CTX on -- - भीष्मपर्य Bhishma Pary [46151 महाशः प्रत्युतीयादमर्पितः ॥ २६॥ तस्मिन् क्षणेसारयतिः सत्यसंघ ििनधी रोग्यपतत्पितागहम् । निम्ननिमान् घनुपाढेन संकम्पयंस्तव पुत्रस्यसैन्य५।२७॥ तंयांत जतामारीः शरान् पन्तं निशितान् पुन्यान् । नाशक्नुयन पापित तहानी सर्व गमाभारत येत्वदीयाः ॥ २८ ॥ नविध्यदेन दशामिः पृपरक रलयुनो राक्षसोःसौतदानीम् । शनतुर्मि प्रतिविद्धयतञ्च नताशिनरभ्यपतदपेन ॥ २९ ॥ अन्वागतम् वृरिमावरम निशम्यतम् शत्रुमध्ये परिधर्तमानम् । प्रद्रावयन्तं कुम्पुंगयांध पुन:पुनश्चमणदन्तमाजी ॥ ३ ॥ योचारपदीयाः शरव (वर्षन् मेघाययाघरमंग। तय पितमधारपितम् नोभध्यम् दिनेसूर्यमिवातपंतम् ॥ ३१ ॥ न त कविन्न विषण्ण मासीहते राजन्मादत्तस्य पुत्रात् । सबैसमादाय धनुर्महात्मा भूग्थिवाभारतस.मचिः उनके सम्मुख गया, उससमय महावीर सत्यसंकल्प सात्यकी बड़े दृढ़ धनुषसे शत्रुओं को मारता हुआ आपके पुत्रकी सेनाको कंपाता पितामह के सम्मुख जाभिड़ा है। भरतवंशी आपके सव मनुष्य उस चांदी के समान वेतघोड़ों के रयपर चढ़ेडए । मुन्दर पंखवाले बाणों के महार करने वाले सात्यकी के रोकने को समर्थ नहीं हुए, तत्र अलंबुष नाम राक्षस ने प्रपक्त नाम दश वाणों से उसको घायल किया फिर मात्यकी भी उसको चार वाणों से घायल करके रथकेद्वारा सम्मुख दौडा, फिर वृष्णी वीर सात्यकी को समीप भाया हुआ और शत्रुओं में घूमने वाला उत्तम कौरवों का नाशका युद्ध में वारम्बार गर्जता हुआ देखकर, आपके शूरवीर लोग उस पर ऐसी वाणों की वर्षा करने लगे जसे कि वादल जलों के वेगसे पहाड़ पर वर्षा करते हैं, मध्याहन समय के • सूर्य के समान तपाने वाले पितामह भी Pस सात्यकी के रोकने को समर्थ नहीं हुए, हे राजा वहां सोमदत्त के लड़के के सिवाय कोईभी स्थिर चित्त नहीं हुआ, हे भरतर्पम वह सोमदत्त का पुत्र । meet him. Then that bravest of Warriors of true rons, Satyali ame on destroying and shahing the armies of your sous by his hard bow and euoguntered Bhishm the grandfather. All your people, o doscendant of Bharat, were unable to withstand Satyalı who rode op his chariot drawn by bilrer Thite borses, discharging arrors of beautiful plumage. Then the rakshas named Alamrush rounded him with ten arrows. Satyali replied hin vitli foar arton rounds And rushed on to meet him. Seeing Satyaki the warrior of the Vrishoi race, roaming among the enemies and destroying the Kauratas with continuous roars, your warriors cores ed him with showers of ATOW3 83 dloudz do a mountain. Even the grandfather, glorious like the mid-day sug could not withstand Satyaki. None cxcept the son of Somdatta oould remain firm there. Bharishrara the son of [4616] Jalabharat (४६६) ॥ ३२॥ इटवारपान स्वान्व्यपनीयमानान् । प्रत्युधंयौ सायकि योनिच्छन् ।॥ ३३ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीमवषपर्वणि सात्यकि भूरिश्रवासमागमे त्रिपष्टितमोऽध्यायः ६३ ॥ समय उचाच । ततो मुश्रिवा राजन सात्या नवाभिः शरैः । प्राविध्यभृश संकुशस्तोत्र रिघमहाद्विषम् ॥ १ ॥ को सायकवेध शरैः सनतपर्धनः। मधारयदमे यात्मा सर्व लोकस्यपश्यतः ॥ २॥ ततो दुर्योधनो राजासोदयः परिवा रितः । सौमदारणेपत्त. समंतात्पर्धघारपत् ॥ ३॥ तंवपाण्डवाः स साया रभसरणे । परिवार्यस्थिता.! सख्ये समंतात्समहोमस..। भीमसेनस्तु संयोगदा मुथम्यभारत । दुर्योधनमुखान् सर्वान पत्रात यिवारयत् ॥५॥ रथरनेसास को घामपत वितः । नंदकत्तपत्रस्नु भोमसेनमहाबलम् ॥ ६ ॥ विग्याविशिखः पहभःकका शिला गतः । दुर्योधनय समरे भीमसेनं महारथम् ॥ ७ ॥ भाजधानो भूरिश्रया अपने रथी लोगों को दूरहटा हुआ देखकर महा भयानक वेग युक्त धनुष को हाय में लिये युद्ध की इच्छासे सात्यकी के सम्मुख गया १३ ॥ अध्याय ६४ ॥ संजय बोले हे राजा इसके पीछे अत्यन्त कोपयुक्त भरिश्रवाने नौ वाणों से सात्यकी को इस रीति से घायल किया जैसेकी अंकुश से बड़े हाथी को घायल करते हैं, फिर उस महा साहसी सात्यकी नेभा सबके देखते हुए गुप्त ग्रन्थी वाले पाणों से भूरिश्रवाको रोका, फिर अपने निज भाइयों समेत दुर्योधन ने युद्धने उपाय करने वाले भूरिश्रयाकी चारों भोरसे रक्षाकी इसी प्रकारसे महा पराक्रमी. सब पाण्डवलोग भी युद्धभूमि में चारों भोर से सात्यकी को रक्षितकर के नियन, हुए हे भरतशी भीमसेन को गदारठाये कोप में देखकर भापके सब क्रोधी और मसन्तोपी दुग्योधनादिक पुत्रोंने बहुत से प्रतख्य रयों को साथ लेकर उतको चारों मोरसे रोका फिर अापके पुत्रनन्दकने उतमहावली भीमसेनको शिलापर सारण किये हुए तत्रि और तेजनोक वाले वाणोंसे घायन किया इसके पीछे क्रोध Somdatta, xoeing his clariotcors gire say advanced to meet Satyati Tab his borr of dreadful relocity. CHAPTER LXIV Sanjaya continutd: " Then, o king, Bhurishrara in great meer. trounded Satyali rith nine arroirs like an elepliant with gards." Salynhi tro, of great poress, checked Bhurishrava nith his arrons of hiddea hools. Du youhrn and his b.others proleoted Bhurislırara Saving Bhimea with his mace upraised in anger, your engrazed and dissatisfied sons, Duryodhan and others, with aumerous clia jots, checked him from all sides. Then your son Nundak wounded-Bhim?' - (४६१७) Fragt Bhishma Pary [4617] रसिद्धो मागनचभिःशितः। ततो भीमी महाबाहुः स्यरथं समदायलः ।। सार रोष रयश्रेष्ठं विशोक वेदमनधीत् । एते गधारधाः शूरा धार्तगटाः समागताः ॥९॥ | मामेवभूशसंकुद्धा तुमयुद्यतायुधि । मनोरप द्रुमोस्माकं चिंतितो पहुधार्षिफः ॥१०॥ सफलः सत चाघेह योह पश्यामि सोदरान् । यत्रापि समरिता रेणारयनमिभिः ॥ ११ ॥ प्रयास्यत्यन्तरिक्षहि शरदैदिगन्तरे । तर तिति सन्नद्धःपय राजासपो धनः ॥ १२ ॥ प्रातरथास्यसनमा कुल पुनामदोत्कटाः । एतानघनिष्यामि पश्यतस्तेन संशय ॥ १३ ॥ तस्मान्ममाश्वान् संग्रामे यत्त संयच्छसारये। पचमुपत्या ततः पार्थ स्तयपत्रं विशाम्पते ॥ १४ ॥ विष्याध निशितैरतीक्ष्णैः शरैः कनकभूपर्ण, | नन्दकश्च त्रिभिर्वाण रभ्यविष्यास्तकातरे ॥ १५ ॥ तंतु दुर्योधत पटया विध्याभीम महाबलम् । 'त्रिगिरन्यै सुनिशिनर्विशोकं प्रत्य विभ्यत ॥ १६ ॥ भीमस्यच रणे गजन् धनधिउंद युक्त दुर्योधनने उस बड़ेयुद्धमें बड़ेतीक्ष्ण वाणोंसे छातीपर घायल किया इसकेपछि महावनी महावाहु भीमसेन बड़े उत्तम स्थपर सवार होकर विशोकसे बोला कि यह धृतराष्ट्र के पुत्र बड़े शूर और महावली अत्यन्त कोपित युद्धमें मेरे मारने को तैयार हुए हैं इनको निस्सन्देह मैं तेरेदेखतेही में मारूंगा । १० । इस हेतु से है सारथीं तु इसयुद्धमें बड़ी सावधानी से मेरेघोड़ों को सम्हाल ऐसा कहकर हे राजा भीमसेन न तेरे पुत्रको वड़े तक्षिण सुनहरी भूपित दश वाणों से अत्यन्त घायल किया और नन्दकको तीन वाणों से स्तनों के मध्य में विदीर्ण किया फिर दुर्योधन ने सातवाणों से उस महावली भीमसेन को घायल किया और अत्यन्त तीक्ष्ण | तीन वाणों से विशोक सारथी को घायल किया फिर युद्धभूमि में हँसते हुए दुर्यो- धन ने तीन महा पने वाणोंसे भीमसेन के उस धनुपको मूठ के स्थानपर से काट डाला । १४ । हे महाराज तव भीमसेन ने आपके धनुपधारी पुत्र के विशिखों से महापीडामान अपने विशोक सारथी को देखकर, असहनशील और महा क्रोधित होकर आपके पुत्रके मारने के लिये दिव्य धनुपको धारणाकया और क्रोधमें भर son with sharpend and piercing arrows. Duryohan in his rage wound cd Bhimsan on the breast. bhim, mounted on lits goodly chanot, said to Bishok: * These bave sops of Ohritrashtra are ready to kill me in battle, but you will see how I make their death secure You should therefore beep my horses steady." Having suid this Blinsen wounded your son with ten golden arrovs, 110 woundcd Nandak with threo ar pus in the middle of the breast. Dar. yodhan wounded that brare warrior, with seven and Bishok the driver with thiee arrows, anil with a smile, he cut down the low of Bhim from the place where he was graspingit 14 Bhinsen toverely! wounded by the arrows of your son and seeing the condition his coachman was in, tool up his divine bow to kill Duryodhan."Ho pat 10 | [46181 Mahabharat (४६१८) मासुरम् । मुष्टि देशे मृशं तीन स्त्रिभिर्भसनिय ॥ १७॥ समरे प्रेक्ष्ययतार शिशो कन्तु वृकोदर । पीडित विशिस्तीक्ष्णेलय पुत्रेण धन्धिना ॥ १८ ॥ अमृायमाग सर यो धर्दिव्य परामशत् । पुत्रस्य ते महाराज वधार्थ भरतर्षभ ॥ १९ ॥ समाधासस कुर क्षप्र लोमयादिनम् । तेन विछेद नृपतेभीम. कामेक मुत्तमम् ॥ २० ॥ सोपषि ज्यधनुश्छिन्न पुत्रस्ते क्रोधमर्छित । अन्यत्कार्मक मादत्त सरवर धेगवचरम् ॥ २१ ॥ सो बिशिखघोर कालमृत्युसमप्रभम् । तेनाजधानसकुलो भीमसेनस्तनातरे ॥२२॥ सगढ विद्धो व्यक्ति स्य दनोरस्थ विशत् । सनिपाणारयो पस्थे मूछामभिजगा मह ॥ २३ ॥ त दृष्ट्वान्यपिन भीम मा मन्धु पुरोगमा । नामप्यन्तमहेन्याला पाडवा नामहारथा ॥२४॥ ततस्ततमला शस्त्राणा तिग्मतेजसाम् । पातयामासुरव्यमाः पुत्रस्प तय मुनि ॥ २५ ॥ प्रतिलभ्य तत सज्ञा भीमसेनो महाबल । दुर्योधन निमि दिचा पुनर्विव्यापपरमि ॥२६॥ शल्यच पञ्चविंशत्या शरैर्विम्याप पाडव । रुक्म पुबर्महेष्वासः सविद्धो व्यापाद्रणात् ॥ २७ ॥ प्रत्युद्ययस्ततो भीम तवाचतुर्दश। कर वाणों के काटनेवाले तुरपू वाणको धनुषमें चढ़ाकर उसमे दुर्योधनके उत्तम धनुपको पीछेकी और को काटा, फिर महाक्रोध में भरे हुए तुम्हारे पुत्रने उस कटेहुए धनुषको डाल कर शीघही बड़े वेगवान दूसरेधनुपको लेके काल मृत्युके समान प्र- काशित बड़े भयानक विशिख वाणको चढ़ाकर बड़े कोप से भीमसेन के स्तनों के मध्यस्थान को पायल किया, फिर वह महा घायल और पीडमान रयके बैठने के स्थान में बैठकर महा अचेत होगया, । २० । फिर पांडवों के उन महारपि. योने जिनका अग्रगामी अभिमन्यु था उस पीडामान भीमसेनको देखकर मा क्रोधित होकर आप के वेटेके मस्तकपर महाउन तीक्ष्ण बाणों की तुमुल वर्षा की इसके पीछे | महाबली भीमसेन ने सचेतहोकर दुर्योधन को तीन वाणों से घायल कर के फिर पांच बाणों से व्यथित फिगा और पन्चीस वाणों से शल्पको घायल किया इन वाणों से घायलहोकर वह महाधनुधारी शल्य युद्ध से हटगया।२। इसके पीछे आपके यह चौदह १४ पुत्र इस धीरके सम्मुख गयेसेनापनि,सुपेण, नलसन्ध, मुलो. voiy sharp arors to its low and cut down hs bow from the back. Then your son in grentage throw down the low which was cut asunder and taking up mothor strong onc, he put up a drendful ortov like Dentli's biroke and sounded Bhunsen in ihe bicast Fluch caused him to fall back in lus place 20 The prent varriors of the Pandasas, hendal by Abhimanyu, finding Blusen in & swoon showuréd a hensy' shower of arrors on the ticad of your son Tien the grat warricr Bhia c1014 to himself and wounded Duryodhan with eight nrrorThe rounded Slials a sith twentyfirc artons and mado. namely Senapati, Sushen, Jalsandh, Sulochan, Ugra, Bhimrath, Bhitary him tar back much founded 21 Then f urtecnol Four cons:

Rhim-न भीमार्य Bhishma Paty [4619]. सेनापतिः सुपेणच जलसंधः सुलोचनः ॥ २८॥ उनो भीमरणे मीमो धारयाई लो ढुंगः । दुर्मुखो दुमधर्ष वियित्सुर्थिकटःसमः ॥ २९ ॥ चिजन्तो सहन् वाणान् क्रोध संरक्त लोननाः । मीमसेन मभिद्रुत्य चियधुः सहिता भृशम् ॥३०॥ पुस्तिषसंप्रे क्ष्य भीमसेनो महावल। एरिकमी चितिहयोगमध्ये यथा धुका ॥३१॥ अभि त्यमहावाहुर्गरमानिय धेगितः । सेनाले पुरण शिरचिच्छेद पांचषः ॥ ३२॥ सं प्रहस्यधारमा प्रिमिणमहाभुजः । जलसन्ध विनिधि सोनपध मसादनम् ॥३३॥ सुरेगावतो वा प्रेषयामाम मृत्यये । उग्रस्य मशिना शिस्यन्द्रोपद्मभुधि ॥३५॥ पतयामास मद्धेन हाडलम्यां विभूषितम् । वीरवाशुश्चसातत्या साश्यकेतु ससाविम् ॥ ३५ ॥ निनाप समरेपीरः परलोकाय पादयः । भीममीमरथौ चोगी भीमसेनी इस त्रिव॥ ३६॥ पुत्री ते दुर्मदी गजन् ननयद्यमसादनम्। ततः सुलोचन भीमः पुरगम सामधे ॥ ३७ ॥ मिषतां सर्व सन्याना मगयद्यमसादनम् । वास्तुतवतं दृष्ट्या भीमसेन चन, उग्र, भीमाय, भीम, वीरखाहु, अलोलुप, दुर्मुख, दुप्मघर्प, विवित्सु, विकट, सम, इन सव क्रोध भरेहुए वाणों के वरमाने वालोंने, एक सापही भीममैन के सम्मुख जाकर अत्यन्त घायल किया फिर महाबली महावाहु भीमसेन ने आपके पुत्रों को अच्छी रीतिसे देखकर भेडिये के समान होठोंको चाटकर गरुड़ के समान वेग से सम्मुख दौड़कर अपने तुरम वाणसे सेनापतिके शिर को काटा फिर उस महावाहु प्रसन्न चित्त ने अत्यन्त आनन्दित होकर तीन वाणोंसे जलसिन्ध को विदीर्ण करके यमलोकको पठाया । ३० । फिर सुपेणको मार कर मृत्यु के पास पहुँचाया, फिर एक भल्लसे उनके मुकुट समेत चन्द्रमा के समान कुंडलों से शोभित शिर को पृथ्वीपर गिगयाफिर सत्तर वाणोंसे घोड़े ध्वजा और सारथी समेत वारवाहु को मारा फिर हँसते हुए भीमसनने भीम और भीमरथ दोनों वेगवान् भाइयोंको भी मपुरको पठाया. इससे अनन्तर सेनाके देखते हुए सुलोचन Birvahu, Alolap, Durmukh, Dushpradhatsh, Viritsu, Vikat and Sam faced Bhinisen and all those enraged warriors showered their arrow at once on him with effective aim Then Bhim sec of long arms and great strength, loohing attentively at your sons and licking bis lips like a nolf, rushed upon them in great force. He beheaded Senapati with his sharp arrow and then with a checrful mind wounded jalfandt with three sharp arrows and sent him to the region o! Yam. 30. Having killed Sushon lo cut down with a single dart the head of Vgra deckod with diadem and oaringe. With soyenty arows Le killed Birvabu and at down his Lanner with the horses and the driver. Then with a smile Bhiinsen sent the two brothers Bbim and Bhimrath 10 the region of Yom. Then within eight of the whole army, ho killed Sulochan with one anow. Thin the rest of 162017 Mahabharat ।४६२०)। परामगम् ॥ ३८ ॥ शेपा येन्ये भरतत्र है भीगस्य मयादिताः। विश्नुतादिशोराजन् । पर्यमानी महामना ॥ ३९ ॥ ततोऽनपाच्छान्तनय सर्वा नेय महारथान् । एपीने रणे शोधात राष्ट्रान्महारथान् ॥ ४० ॥ यथाप्राप्रपान यथा ज्येष्ठान यपश्चिसगतान निपातयत्युग्र धन्या त प्रगृणीत माचिरम् ॥ ४१ ॥ एअमुवा तत सर्वे धार्तराष्ट्रप सैनिषा । अभ्यद्रयन्त संकुद्धा भीमसेन महायलम् ॥ ४२ ॥ मादा प्रभिनेग कुम्भ रेण विशाम्पते । अभ्ययात्ससा तत्र यमीमो व्ययस्थितः ॥४३॥ भापतत्रय धरणे भीमसेन शिलीगुपै । अदृश्य समरे चके जीमूतइयभास्करमा ४४॥ मभिम पुला स्तत्तु नामृप्यन्तमहारथा । भीमस्यास्वादन सस्पे स्यादुपसमाधिता ॥ ४५ ॥ सपने शरपण समं तात्पर्य वारयन् । गजचर वृष्टयातु विभिदुस्ते स सत ॥ ४६॥स को तुरममाण मे मारा, हे राजा तब यहां जो आपके शेपरचे हुए पुत्र थे वह भीममेन के बळको देखकर उममे घायल और भयभीत होकर युद्ध से भागे । ३६ । इसके पीछे भीष्मनी सब महाराधियों मे वाले कि यह युद्धमें क्रोधम्प भयानक धनुषधारी भीमसेन गो धृतराष्ट्र के महा शूरवीर बुद्धिमान पुनोंको गिराता और मारता है उसको पकड़ो, इसके पीछे दुर्योधन की सेनाके सपलोग इस मामले पाकर भत्पन्त क्रोध में भरकर उस महाबली भीमसेन के सम्मुख दोहे, हेराना राजाभगदत्त मनबाले हामी की सारी पर मकस्मात् यहाँ आटा जहां भीममेन नियतया । ४० । और युद्ध में गिरतेही शिपांके पिमेहुए याणों से भीमसेनको दृष्टि से ऐसा गुप्त करदिया जैसे कि पादल मूर्गको करता है यहां भपने मुभवाय नियत और रक्षित भाभिमन्यु मादि महारथी भीममेनके कोन सामो - (४६२१) ragg Bhishma Pary [4621] शमवृष्ट्याभिहतः समस्तरमहारथः । प्रयोतिष गजो राजन् नाना सिंग. सुतेजनः ॥ ४७ ॥ संजात रुधिरोपी. प्रेणीयो भवद्रणे । मस्तिमिरियारप सम्यतो जल दो महान् ॥ ४८।। सचोदितो मनाची भगदत्तेन वारणः । अभ्यधावत तान् सर्वान् कालोएंट इवांतकः ॥ ४९ ॥ द्विगुगं जव मास्थाय कम्प्यधरणेमहीम् । तस्यताम्मद दूपं दृष्ट्वासर्व महारथाः ।। ५६ ॥ असह्यं मन्यमानाश्च तिप्रमनसो भवत् । ततस्तु नृप तिखो भीमलैनस्तनांतरे ॥ ५१५॥ आजधान महाराज शरेगनत पर्या। सोति जि. सो महेन्चासंस्लेनराजामहारयः ॥ ५२ ॥ मूठयामि परीतामा ध्यजष्टि समाश्रयत् । तांस्तुभीतीन्समाक्ष्य भीमसेनश्च मूर्डितम् ॥ ५३॥ ननाद बलबहाद मंगदत्त प्रता पवान् । मतोघटोत्कचो राजन् प्रक्ष्यमीम तथा गतम् ॥ ५४॥ सद्धो राक्षसो घोरयत |वांतरधीयत । सरुत्पादारुणां माया मारणां भय पर्धितीम् ॥ ५५॥ अदृश्यत निमे तीबाणों से घायल रुधिर के श्रोतों से युद्धमें ऐमा देखने के योग्यहुंआ जैसे कि सूर्यकी.किरणों से व्याप्तं वड़ावादल होलाहै ।४४। फिर वह मदोन्मत्त कालरूप मृत्यु के समान राजा भगदत्तका पेला हुआ हाथी अत्यन्ततीत्र होकर पृथ्वी को अपने चरणों से कँपाता हुआ उन सब वारों के सम्मुख दौड़ी उसके उस बड़े रूपको देखकर वह सव महारथी, उसको सहने के योग्य न समझकर भयभीत हुए हे नरोत्तम फिर उसके अनन्तर राजा भगदत्तने महा क्रोधित होकर गुप्तग्रन्थों कैयाणों से भी- ममेन के वक्षस्थलको व्यथित किया उस राजा से अत्यन्त धापल किया हुआ वह बड़ा धनुपधारी, महारथी मूर्छा युक्तहोकर ध्वजांकी यष्टीं के सहारेसे नियत हुआ फिर उनको भयभीत और भीमसेनको मूर्छा युक्त देखकर, वह प्रतापी भगदत्त बड़े शब्दको करता हुआ गर्जा । ५० । हे राजा इसके पीछे घटोत्कच उस मूीवान् भीमसेन को देखकर अत्यन्त क्रोधयुक्त होकर उसीस्थान में गुप्त होगया और फिर घोररूप् महाभयकारी मायाको रचके घोरहीरूप में नियत होकर के wounded by the sharp and bright artOTS of the various warriors, dropped streams of blood and looled like a ciond over which the sun's Then the rad elephant, urged by Bhagdatta and assuming the form of Death in his fury, rushed upon those warriors, shaling the earth with his feet All the warriors seeing his great size and thinking themselves unable to withstand his fury were much frightened. Then hing Bhagdatta in great anger, with his sharp arrows, wounded Bhimsen who fainted with the loss of blood and lield fast the stoff of his banner to keep himself from falling down off his sent. Secing those warriors terrified and Bbimsen in 'a stroon, Bhagdatta roared a loud roar. 50. Seeing Bhimsen in this state, Ghatotkach was inuch enraged and disappeared in the very place whero ho was standing. He reappeared in a short time on his own 44 rays fall firmi in and protect I bs the strength of his own arms, could not [4620: Mahabharat । ४६२०) पराक्रमम् ॥ ३८ ॥ शेषा येन्ये भवरतत्र ते भीमस्य मार्दिताः। विद्वतादिशोराजन घधमानी भहागना ॥ ३९ ॥ ततोऽमपीछान्तनय सर्या नेष महारथान् । एपभी रणे कुद्धो धार्तराष्ट्राममहारथान् ॥ ४० ॥ यथापाग्रपान यथा ज्येष्ठान पथ शगंधसगतान निपातयत्युन धन्या त प्रगृहणीत माचिरम् ॥ ४१ ॥ एवमुक्त्वा तत सर्वे धार्तराष्ट्रस्प सैनिका । अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धा भीमसेन महायलम् ॥ ४२ ॥ भगदत्त प्रभिनेन कुञ्ज रेण विशाम्पते । अभ्ययात्सहसा तत्र यंत्रभीमो व्यवस्थितः ॥४३॥ आपनव धरणे भीमसेन शिलीमुनिः । अदृश्य समरे चक्रे जीमूतइवभास्करम ॥ १४ ॥ अभिमन्युमुखा रुतत नामृप्यन्तमहारपा । भीमयाच्छादन सष्ये स्यबायलमाथिता ॥ ४५ ॥ तपन शरवण सम तात्पर्य चारयन् । गजं च शर वृष्टयातु बिभिदुस्ते स मत ॥ ४६॥ स को सुरमवाण मे मारा, हे राजा तव वहां जो आपके शेषवचे हुए पुत्र थे वह भीमसेन के वळको देसकर उमसे घायल और भयभीत होकर युद्ध से भागे । ३६ । इसके पीछे भीष्मजी सब महारथियों मे वोले कि यह युद्धमें क्रोधरूप भयानक धनुपधारी भीमसेन गो धृतराष्ट्र के महा शूरवीर धुद्धिमान पुत्रोंको गिराता और मारता है उसको पकड़ो, इसके पीछे दुर्योधन की सेनाके सबलोग इस भागाको पाकर अत्यन्त क्रोध में भरकर उस महाबली भीमसेन के सम्मुख दौदे, हेराजा राजाभगदत्त मतवाले हाथी की सवारी पर अकस्मात् वहां आटा जहां भीमसेन नियतया । ४० । और युद्धभूमि में गिरतही शिलाके घिसेहुए घाणों से भीमसेनका दृष्टिं से ऐसा गुप्त करदिया जैसे कि बादल सूर्पको करना है वहां अपने भुजवलम नियत और रक्षित अभिमन्यु आदि महारथी भीममेनके ढकजानेको न सहसके और क्रोधित होकर उन्होंने चारों ओरसे उसको अपने पाणोंकी वर्षासे रोककर चारों दिशाओं से मारे वाणों के उसके हाथीको घायल किया, हे धृतराष्ट्र वह राजा भाग्ज्योतिपका हाथी उन सब महारथियों के नाना प्रकार के चिह्नधारी प्रकाशित your sons seo ag the great strength of Bhunsen fled from the battle fiold wounded and frightened 36 Shercupon Bhishima, addressing all the warriors, said, “This enraged and dreadful archer, Bhim tho 18 billing and felling tho Irare and wise sons of Dhntarashtra, All the warriors of Duryodhan's army, haring recensed these o durs rushed upon Blumsen in a grent rage. Ling Bhagdatti, mounted upon a mnd elephant, pounced upon and rs soon as lic came there he lid Bhungen with tho alio ro- of harrows us clourls do the sun anmpanions wounded Blingdatta's elephinnt nith the slower of their A TOW 2n) checked lum The elep'lant of the hing of Pragjyotube must becheched" and him 40 Then, Abhimanyu (४६२६) भीष्मपर्घ Bhishma Pary [4621] शमवृष्ट्याभिातः समस्तस्तमहारथैः । प्रयोतिप गजो राजन् नाना सिंग सुतेजनः ॥ ४७ ॥ संजात रुधिरोपी प्रेक्षणीयो भवद्रणे गमस्तिगिरिधारय सम्पूतो जल दो महान् ॥ ४८ ॥ सचेदितो मदवारी भगदत्तेन वारणः । अभ्यधावत तान् सर्वान् काले संए इवांतकः ॥ ४९ ॥ द्विगुगं जय मास्याय कम्पयंचरणेमहीम् । तस्यनरमुमह दूपं दृष्ट्वासर्वे महारथाः ॥ ५६ ॥ असह्यं मन्यमानाच तिमनसो भवत् । ततस्तु नृप क्रुिसो भीमलैंनिस्तनोंतरे ॥ ५१ । आजधान महाराज शरे गानत पर्वणा । सोति शि. खो महेन्यासस्तेनराज्ञामहारपः ॥ ५२ ॥ मूठयामि परीतामा ध्वजयष्टि समाधयत् । ठांस्तुभीतीन्समालख्य भीमसेनञ्च मूर्छितम् ।। ५३ ॥ ननाद बलयजाद मंगदच. प्रता पवान् । मतोघटोत्कचो राजन् प्रक्ष्यभीम तथा गतम् ॥ ५४॥ सत्रुतोरातसो घोरपत |वांतरधीयत । सफायादारुणां माया मारणां भय वर्धिनी ॥ ५५ ॥ अदृश्यत निमे तीब बाणों से घायल रुविर के श्रोतों से युद्धमें ऐमा देखने के योग्यहुमा जैसे कि सूर्यकी किरणों से-व्याप्त वडावादल होलाहै ।४४। फिर वह मदोन्मत्त कालरूप मृत्यु के समान राजा भगदत्तका पेला हुआ हाथी अत्यन्ततीत्र होकर पृथ्वी को "अपने चरणों से कॅपाता हुआ उन सब वीरों के सम्मुख दौड़ा उसके उस बड़े रूपको देखकर वह सब महारथी, उसको सहने के योग्य न समझकर भयभीत हुए हे नरोत्तम फिर उसके अनन्तर राजा भगदत्तने महा क्रोधित होकर गुप्तग्रन्थों के वाणों से भी- ममेन के वक्षस्थलको व्यधिन किया उस राजा से अत्यन्त घायल किया हुभावह बड़ा धनुपधारी, महारथी मूर्छा युक्तहोकर ध्वजांकी यष्टी के सहारेसे निपत हुमाफिर उनको भयभीत और भीमसेनको मूर्छा युक्त देखकर, वह प्रतापी भगदत्त बड़े शब्दको करता हुआ गर्जा । ६० । हे राजा इसके पीछे घटोत्कच उप्त मूर्च्छीवान भीमसेन को देखकर अत्यन्त क्रोधयुक्त होकर उसीस्थान में गुप्त होगया और फिर घोररूप महाभयकारी मायाको रचके घोरहीरूप में नियत होकर के wounded by tho sharp and bright arrors of the various warriors, arured streenas of 'Blood and lowhed 'like a tiumd over wrinku tne suni's 44. Then the wad elephant, urged by Bhagdatta and assuming the form of Death in his fury, rushed upon those warriors, shaling the earth with his feet All the warriors eeting his great size and thinking themselves unable to withstand his fury were much frightened. Then hing Bhagdatta in great anger, with his sharp arrows, wounded Bhimsen who fainted with the loss of blood and held fast the staff of his banner to keep himself from fallıog, dorn off his sent. Seeing those warriors terrified and Bbimsed in a stoon, Bhagdatta roared a loud roar. 50. Seeing Bhimsen in this state, Ghatotkach was much enragod and disappeared in the very place where ho was standing. He reappeared in a short time on his own rays fall.

[ 4622] Vabablarat (४६२२) पार्धाधोरम्प समास्थितः । पेरारण समारुहः सबै गापालतं स्वयम् ॥ ५६ ॥ tu चान्येपि दिनामा यभूपुरनुयायिनः । अमनो यामन महापद्मनसनमः ॥ ५७५ वर्ष एते महानागा राक्षसे सम धिष्ठिताः । महाकायानिधाराजन् प्रनयन्तो मई या ॥५८॥ तेजोवीर्य यलोगता महायल पराक्रमा घटात्कवस्तुस्वं नाग चादयामास तवा ५९ सग भगदत्तन्त हतुकाम. परंतपः । ते चान्ये चोदतानागा गतसैस्तैहारले ६०॥ परिपेतु सुसंरब्धाचतुर्दशाश्वतदिशम् । भगदत्तस्यत नाग विषाणैरम्पपीडयन् ।।१।। सपीयमानासनागैवेदनात. शरातः । मनवत्साहाना मिद्राशनिसरस्वनम् ।। ६२॥ हस्पतं नदतो माद सुघोर भीमनि स्थगम् । श्रुवाभीमाप्रपोट्रोण राजानंचसोधनम् ॥ ६३ ॥ पपयुध्यति संग्रामे हैडिम्वेन दुरात्मना । भगदतो महण्यासः कृष्लेष गरि अपने रचे हुए माय रूपी ऐरावत पर चढ़कर भाधे ही निमेष में दृष्टिगोचर हुमा. | और महा गुन्दर प्रभावी अंजन, वामन, महा पद्मनाम दूसरे दिग्गज उसके पारे चलने वाले हुए । ५४। हे राजा वह बड़े शरीर वाले सब अंगों से मद चूने वाले नीनों महा गजराज राक्षमों समेत नियत हुए, जोकि तेजी से पराक्रम युक्त बड़े अगवाले थे फिर घटोत्कच ने अपने हाधीको युद्ध में भेजा है शत्रुसन्तापी धृतराष्ट्र वह हाथी भगदत्त के मारनेको उपस्थित हुआ और वह दूसरे महावली हायीभी | राक्षप्तों के प्रेरित अत्यन्त क्रोधित चार २ दांतों से महा भयानकरूप दिशाओं में पहुँचे और भगदत्त के दाधीको अपने दांतों से महापीड़ामान किया तवतो इन हाथियों से महापीड़ित दुःखों से व्याकुल और वाणों से घायल उस हाथी ने इन्टके बन के समान महाघोर शन्द किया उसके महाघोर शब्दको मुनकर, भीमजी द्रोणाचार्य और राजा दुर्योधन से वोले । ६० । कि यह वड़ा घनुपधारी भगदत्त युद्ध में दुरात्मा घटोत्कचके साथ लड़ताहै और आपत्तिमें फंसा है ।११। याराम पड़े शरीरबाला है और राजापी बड़ामोधकरनेवाला है निश्चय करके कालमृत्यु elepliant followed by Anjan, Bamın, Mahapadma and other elepliants of great beauty and process. The-e huge princes of clephants with juia dropping dosn from the limbs Dere ridden over bs rakslinses of great velocity and strength. Ghatohach then urged for an! his on a elephant w duch s as soon ready to hill Bliagiatta. Tbc other powerful elcplants too, urgedly the rakshases rushed in a rage in different directions and nith tlucer rely of four tasks rounded the elephant of Bhagdatia. Woundod and lartased by those ele pliants, tho clepiant of Blagdatli mado a tremendous noiachike that of thunder. Flearing that poine Bhishm sad to Dronacharys and Duryodhana, GO "This great orcher Bhagdatta fighting with inrnatured Ghatotkach is fallen in great truble. The ralshas is very huse of kody and the king is much enraged, surely these tro raries grst भीष्मपर्व Bhishma Pare [4623] वतेते ॥ ६॥ राक्षसच मराशयः सचराजाति कोपनः एनी समेतो समरे कालमृत्यु समायुभो ६५ ॥ श्रूयतेचैव दृशनां पांडवानां महाम्वनः । स्तिनधय महान् भीत स्य कदितध्वनिः ॥ ६६ ॥ तत्र गच्छामभद्रंयो राजानं परिरक्षितुम् । अाक्ष्यमागः समरे तिर्भ प्राणान् विमोस्पति ।। ६७ ॥ तेत्वाचं महावीर्या. किंचिरेण प्रयामहे । महान् वि वर्तते रौद्रः संग्रामो लोमहर्षणः ॥ ६८ ॥ भक्तश्वकुलपुत्रम शुरच पृतनापतिः । युक्तं तस्प परित्राणं कर्तुमस्माभिरच्युत । ६९॥ भीष्मस्य तद्वचः श्रुत्वा सर्व एव महारथा. द्रोममीमी पुरस्कृत्यभगदत्तपप्सया ॥ ७० ॥ उत्तम जव मास्थाय प्रययुपत्रसोऽम वत् । तान्प्रयातान् समालोक्य युधिष्ठिर पुरोगमाः ॥ ७१ ॥ पंचालाः पांडः साधं पृष्ठ तोनु ययुः परान् । तान्यनीकान् यथा लोक्य राक्षसेंद्रः प्रतापवान् ॥ ७२ ॥ ननादसुम के समान दोनों युद्ध में जुटे हुए हैं और पांडवों के प्रसन्नता के बडे शब्द सुने जाते हैं, और उसमयभीत हाधी के व्याकुलत के भी बहुतमे शब्दमुने जाते हैं आप लोगों की भलाई के लिये हम राजाकी रक्षा के लिये वहां पर चलें, नहीं तो युद्ध में भरक्षितहोकर वह शीघ्रही माणोंको त्यागेगा हे वड़े पराक्रमियो इस हेतुसे शीघ्रता करो विलम्ब मतिकरो, यह रोमहर्पण करनेवाला महारुद्र रूप युद्ध वर्तमान है यह सेनापति भगदत्त भक्तकुल पुत्रहोकर बड़ागरहै हेविनयीलोगो हमलोगों को उसकी रक्षाकरनी योग्य ६६ भीमजीके इसवचनको सुनकर सब राजा लोग द्रोणाचार्य को आगे करके भगदत्त पर प्रीति करके वड़ी तत्रितासे उसके समीपगये उन जाते हुए शत्रुओं को देखकर पांडवों समेत पांचाल देशी अपने आगे राजा युधिष्ठिर को करके पछेिकी पोरसे चले, फिर राक्षसोंका राजा प्रतापी घटोत्कच उन सेना भों को देखकर आकाशको शब्दायमान करता हुआ बड़े शब्दसे गर्जा, उसके अन्दको सुन और लड़ते हुए हाथियों को देखकर भीष्मजी द्रोणाचार्य से बोले, कि मुझको इम महासाहसी घटोत्कच के साथ में युद्ध करना अच्छा नहीं are engaged in mortal eomlat and it is therefore that we hear the cheerful cries of the Pandaras at the terrified noise of that elephant. Lot us go to the help of the king, for in so doing lies our selfare. Unprotected in hattle the king will soon lose his life. Hasten thither, Warriors! The fight is very thick and dreadful. Bhagdatta the commander of our armies is a very brave man of a noble family. It is our duty to protect him At these tords of Bhishm all the princes led by Dronocharya, bastened to the battle field out of compassion for Bhagdatta, and seeing them adranre the Paodavas with the Panchalas led by Prince Yudhishthir followed in their rale, Brayo Ghatotkach the prince of rakshases, filled the firmament with his roers at the sight of those parriors. On hearing his war cry and at the sight of those fighting elephants, Bhishm said to Dronacharya 66. न [46241 N1 Jalliarat (४६२४) हानाद विस्फोटमशने रिय । तस्य त निनद शुत्वा वानागांव पुध्यत. ॥ ७३ ॥ भी म शातनयो भूयो भारद्वाज ममाश्त । नरोच तेमे समामो हैडियेन दुरात्मना ।७४। पलवीर्य समा विए ससहायश्च साम्प्रतम् । नेपशक्यो युघाजेतु मपिवज्रभृतास्वयम् ॥ ७५ ॥ लन्ध लक्ष प्रहारीच घयच श्रान्त दाहना । पचाल पाडवेयध दिवस क्षत पिलता ॥७६ ॥ तन्नमेरोचते युद्ध पाडर्जित काशिमि । घुप्यतामवहारोध वायो रस्पाम. पी सह ॥७७ ॥ पितामह वच. धाया तथा चक्र स्मकौरवाः । उपायेगप यानते घटात्कचगयार्दिता ॥ ७८ ॥ कौरवेषु निवृत्तेषु पाडवाजित काशिन । सिंह नाद न भृश च शखान् दध्मय भारत ॥ ७९ ॥ पव तद भवयुद्ध दिवस मरतर्पम । पाडयाना फरुणाच पुरस्कृत्यघटोत्कचम् ॥ ८ ॥ कौरवास्तुततोगजन प्रययु शिविर स्थकम् । प्रोडमाना निशाकाले पाडयै पराजिता. ॥ ८१ ॥ शरविक्षत गात्रास्तु पाहु विदित होता है क्योंकि वह इस समय वल पराक्रम से भराहुआ महामद वारा, यह इन्द्रमे भी विजय करने के योग्य नहीं है, और लक्षभेदी होकर प्रहार करने वाला है और हम थलकी सवारी वाले है, पांचाळ और पांडवों से सब दिन घायन हुए इसी हेतु से विनय से शोभा पानेवाले पांडवों के साथ युद्ध करना भच्या नहीं जात होताहै, पर विश्राम करो मातःकाल शत्रुओं से लड़ेंगे। ७४ । अत्यन्त प्रसन्न चित्त शुरवीरों ने इस पितामह के वचनको सुनकर वैसाही किया, फिर वा घटोत्कच के भय से महापीड़ित युक्ति के द्वारा युद्ध से हटगये कॉग्चों के हटनाने पर विजय से शोभापाने वाले पांडवों ने, शंख और वेशियों के शब्दों समेत सिंहनाद किये हे राना इस रीति से कौरव और पाडवोंका यह युद्ध घटोत्कच को भागे का के दिन भर हुआ तदनन्तर शीनही कौरव लोग पांडवों से पराजित-याणों से घायल लज्जा में भरे रात्रि के समय अपने २ डेरों को गपे हे महाराज धृतराष्ट्र फिर महारथी पांडवभी युद्ध में मसन्न विच भीमसेन और घटोत्कच को आगे का We donot like to fight ngainst Glz'otkach for hic is at this time from prowess and strength and uncorqueialle Lg Incra k diseil. Ile Ints thc : hs precisely, while 170 are mounted on carthly care Being wounded at the lands of thic Panchals and the Pandara? thorughout the day it is not well to fight against the conquirir Pendarns, let us tut ru to rest now We shail fight the enemes the morning" 74 'I ho trarrors with a chiceriul mind acted upor and nice of tho grandfather and bang much afra d of Nghting a rast Glato lach, they retired frutn batuc. At the setreat of the haurrak thi conquering Pandavas mired their coars Titli Llesis from the concls and truinpets Thus the Kaurasas and the Pandavas form! this whole day uddus the leadership of Glatotbaels, and thic Kaltatas va squ skice and founded by a rott's blunh away in aliame to the of (४६२५) भीष्मपर्व Bhishma Pary [4625] पुत्रामहारथाः । युद्ध सुमनसो भूत्वा जग्मु स्व शिविरं प्रति ! ८२ ॥ पुरस्काप महा गज भीमसेन घटोत्कचौ । पूजयतस्तदान्योन्यं मुदापरमया युताः ॥ ८३ ॥ नदातो विविधामादास्तूत्वनावीमश्रितान् । सिंहनाइच कुर्वतो घिमिभान् पनि स्वनः ॥ ८ ॥ विनदतो महात्मानः कम्पयन्तश्च मेदिनीम् । घट्टयन्तश्च मर्माणि तयपुत्रस्य मारिप ॥ ८५ ॥ प्रयाताः शिविराव निशाले परन्तप । दुर्योधनस्तु नृपतिदीनो भ्रातृवधेनच ॥ ८६ ॥ महत चिनयामास वापशोक समाकुलः। ततः कृत्या विधि सर्व शिविरस्य यथाविधि । प्रदध्या शोकसन्ततो भातृन्यसनकर्शितः ॥ ८७ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि चतुर्थ दियमावहारे चतुःपष्टितमोऽध्यायः ६४॥ के अपने डेरों में गये, और वहां जाकर वह शत्रुमंतापी महात्मा बड़ी प्रसन्नतासे युक्त प्रशंसा करते हुए तुरीय बाजे पनाते शोभा युक्त होकर नानामकार के शब्दों से गर्ने और सिंहनाद युक्त शंसों को बनाते गनाओं से पृथ्वी को कंपायमान करते, और भापके पुत्रों के माँ को चलायमान करते हुए सायंकाल के समय | डेरों में गये, फिर अश्रुपात युक्त चिन्ता और शोक से व्याकुल भाई विरादरियों के मरणसे दुःखित राजा दुर्योधन एक मुहूर्त पर्यन्त चिन्ता में मग्न हुआ, तदनन्तर बुद्धि के अनुमार डेरों के सब प्रवन्धको करके शोकसे खिन्न भाइयों के शब्दसे निर्बल होकर बड़े विचार में प्रवृत्त हुआ ।। ८७ ॥ camp3 for the night. The Pandaras, preceded by Bhimsen and Ghatothach went cheerfully to their tents and there they blew their horns and roared in glee, giving praises to their trarriors. With the sounds of musical instruments and roars they shook the hearts of your sons as they entered their tents for the night Prince Dur. yodhan, careworn, shedding tears for the loss of his kinsmen, remained plunged in gr.ef fo: some time, and having made arrange ments about the comforts of his army he was again plonged in grief for the death of his brothers." 83.

va: hrso porlormed, what boun they have rercised or what hoor [4626] Vlahabharat (४६२६) धृतराष्ट्र उवाच । भयंमे सुमहमा विस्मयश्चैवसञ्जय । शुस्वा पांडुकुमाराणां कर्मदेवैः सुदुष्फरम् ॥ १ ॥ पुत्राणांच पराभाचं । श्रुत्वा सञ्जय सर्पदाः चिंता मेमाती सूतभविष्यति कयत्विति ॥ २ ॥ ध्रुव विदुरपाक्यानि धपति हृदयममा पथाहि दृश्यते सर्व दैवयोगेनसञ्जय ॥ ३ ॥ यत्र भीष्म मुखान् सर्वान् खन्नन योधसत्तमान् । पांडवानामनीकेषु योधयति प्रहारिण ॥ ४ ॥ केनायायामहात्मान. पांडुपुत्रामहावलाः । केनदत्तपरास्तात किंवान्नान विदति ॥ ५ ॥ येनक्षयनगच्छति दिपितारागणाइव ॥ पुनःपुनर्नया निहतसैन्यतुपांडयै ॥ ६॥ मय्येवर पतनिदै धातारमारपः ॥ यथा ऽरघ्या पारमतायथावध्याश्चमेताः ॥ ७ ॥ एतन्मेसर्व मारवयाथातथ्येनसजय ॥ नहिपारणपश्यामिदुःखस्यास्यकथंचन ॥ ८ ॥ सन्द्र अध्याय ॥६५॥ धृतराए वोले हे संजय देवताओंसे भी कठिनता से करने के योग्य पांडवों के कर्मको मुनकर मुझको बड़ाभय और आश्चर्य उत्पन्न होता है हे संजय सब प्रकार से अपने पुत्रोंकीही पराजयको सुनकर मुझको यही चिन्ता है कि परिणान कैमा होगा, निश्चप विदुरजीके वचन मेरेहृदय को जलाते हैं हे संजय दैवयोग से | उन्हीं का कहना सत्यहोता दिखाई देता है जहां कि पांडवों की सेना के वह गूर- पीर उन युद्ध कर्ताओं से जिन में शत्रवेत्ता महामतापी भीष्म जी मुख्यह युद करतेहैं, उन महावली महात्मा पांडवों ने कौनसी तपस्या की है वा किसमे कौनमा वरदान पाया है अथवा वह किस शान को जानते हैं, जिस कारण से कि वह नाशको नहीं पाते हैं हे संजय पांडवोंते वारम्बार मारे हुए सेना के मनुष्यों को में नहीं सह सकताहूं, देवमुझ को ऐमा कठिन दंड देता है कि पांडव निर्विन है और | मेरे पुन घायल हैं, हेमंजय इसका हेनमुझसे मल समेत वर्णन करो मैं किसी दशामें भी इस दुःखका अन्त ऐसे नहीं देखताहूं जैसे कि भुनाओं से तिरता हुआ मनुष्य मा CHAPTER LIV I am awed and amazed," sa J Dhrit ashtra to Sanjaya," to hear the brave hard dcə.is on the l'andıras Haria, the defeit of my coas ou all occasions, I am afiad of the result Surely the nords of Vidur brerst. It appens that the wo tus of Sinyaja are faced to lo realisoil The Pandir warriors fight against those warriors who linse for their lader Blusliut the master of the use of weapont, sed of im in 2183 poress I dono: hn us iriat penances tlic great Pandis, they are diaster of that they donot die I cannot beír the continuous destruction of my armios by the Punday us. Gods glies me a serene prumisluncat 10 As mach as the Pandavas aro sale and sound and IF Sons are woundech. Tell me the reason of all this in detail, Sanjy; I donot see the end of my miseries like ono svimming in the midst burn my - (४६२७॥ भीमपर्व Bhishma Parr [4627] स्येवमहतो जांभ्यांप्रतरन्नः ॥ पुत्राणांन्यसनमन्ये धुवंप्राप्तसुदारुणम् ॥९॥ घात यि तिने सर्थन् एत्रान् भीमो नसशयः । गहि पश्यामितवीरयोमेरसतानणे॥१०॥ ध्रय विमानः सम्प्राप्त पुत्राणां मम संजय । तसान्मेकारणं मूत गरि चघ चिशे पतः॥ ११॥ पृन्तो या तत्वं सर्व भास्यातु मर्हसि । दुर्योधनच यचक दृष्टयास्या म् मिस न रणे ॥ १२ ॥ भीमद्रोणी सपश्चैव सौचलय जयद्रथः । द्रौणिर्चापि महे 'वामो विमोवा महारतः ॥ १३ ॥ निक्षयोदापिकस्तेषां तदाबासीन् महात्मनाम् । विमुलेय महामान्न समपुत्रेषु सजय ॥ १४ ॥ सजय उवाच ॥ शृणुराजन्नयाहितः श्रत्या चवावधारय । नेव मन्त्र छत किंचिन् नर मांयांतया विधाम् ॥ १५॥ नव विभीषिको कांचि द्राजन् कुर्वति पांडयाः । युध्यन्ति ते यथान्याप शक्तिमतश्व संयुगे ॥१६॥ धर्मप सर्व कार्याणि जीयितादीनि मारत। आरमते सदा पार्थाः प्रार्थपानरम हद्यशः ॥ १७॥ मुद्रका अन्तनहीं पाता है मैं निश्चय करके माननाहूं कि मेरेपुत्रों को महाभयानक दुःख वर्तमान हुआ मैं निस्सन्देह जाननाएं कि भीममेन मेरे सब पुत्रोंको मारेगा, मैं ऐमावीर किमीको नीं देखतीहू जो युद्धमे मेरे पुत्रों को बचाने । १० । हे संजय युद्ध में मेरेपुत्रों का नाम निश्चय होता दीखता है हे मून इम हेतुमे तुमसब हेतु पूर्वक वृत्तान्त मुझ से वर्णन करो और दुर्योधन ने युद्ध में अपने युद्धकर्ताओं को विमुख देखकर जो जो किया अपना मीम द्रोणाचार्य कृपाचार्य शकुनि जयद्रय महापनुपधारी अश्वत्थामा और महापराक्रमी विकर्ण ने जो २ किया, उस को और हे महाज्ञानी मेरेपुत्रोंके उदासीन होनेपर इन महात्माओं ने जो निश्चय किया उन मय यातोंको व्योरे समेन यथार्य मुम से वर्णन करो । १४ । संजय बोला कि हेराना सावधान होकर मुनो और मुनकर विश्वास करो कि पाण्डवों का न तो कुछ अनुप्ठानह न किसी मारकी मायाह, न वह किमी प्रकारकी भया- नकता करते हैं वह केवल युद्ध में समर्थ होकर न्याय के अनुसार लड़ते हैं, हे भरत वंशी बड़े यशको चाहने वाले पाण्डव जीवन आदिमव कर्मों को मदेव धर्मयुक्त हो- of tho ocean with the help of lus arms aloge. Surely I telere that my sons are in great trouble. il nos for certain that Bhimaan will destroy all my sons I see no warrior that can care the life of my sons. 10. I am sure of the destruction of my sors in battle. Tell me the reason of all this, Sut! Tell nie all that Duryodhan did on finding lus Tart.ors turn lach. Tell me of tbe derds dono l Bhisma, Drouacharya, Kripacharya, Shakunl, Jayedrath the great archer, ashrathama and Vitarn ofimmense preness. Tell me all that these warriors resolsed to do then 115 €ons mise in distress" 14 tively and telere me bing ! said Sanjaya "that the Pandavas hace nei ther rccoarse to aphorism nor to drception or cruelts; lat they are eadowed with strength and fight arording to lau. The Pandaras Hear atten- Pandavas yain victory without any mishap, while your sons, foolid - the Pandavas forgive all the faults of your sons and reinare frandy, and therefoio you will reap the fruit of yonr to doing together [4628] Nahabharat (४६२८) नहे युद्धा निवर्तते धर्माता महाबला । श्रियापरमया युक्ता यतो धमस्ततो जयः ॥ १८ ॥ तेनावध्यारणे पार्था जययुक्ताश्च पार्थिव । तथपत्रा दुरात्मान पापेभ्यभिरता सदा ॥ १९ ॥ निष्ठुमहीन पार्माणस्तनहीयन्तिसयुगे । सबनि नृशंसानि पुरैस्तव ज गेश्वर ॥ २० ॥ नितानीह पाडूनां नीचे रिव यथा नरै । सर्वच तदनात्य एमाणातर किल्विषम् ॥ २१॥ सापहनवा सदैवासन गाडवा पाइपूर्वज । नचैतान पहु मन्यते पुत्रास्तव विशाम्पते ॥ २२ ॥ तस्य पापस्य सतत क्रियमाणस्य कर्मण । सांप्रतं सम घोर फल प्राप्त जनेश्वर ॥ २३॥ सत्व भुक्ष्व महाराज सपुत्र ससुजन नायर ध्यसि यद्राजन बार्यमाणा मुहजनै ॥२४॥ विदुरेणाय भीष्मेण द्रोणेनच महामना । राथामयाचाप्यसद्वार्यमाणो नयुध्यसे ॥ २५ ॥ वाक्यं हितञ्च यध्यप मर्त्य पथ्य मित्री करमारंभ करते है वह धर्मवान् महाबली बड़ी शोभा पूर्वक युद्ध से मुख नहींमोड़ते जियरधर्म है उपरही विजय होती है, इस हेतुसे पाण्डवलोग युद्ध में निर्विन होकर विजयको पातेहै और आपके निवुद्धी पुत्र सदैव पापों में प्रीतिकरनेवाले, कठोरवक्ता और दुष्कर्मी है इसी हेनुसे युद्ध में पराजयको पाते हैं हे राजन् आपके पुत्रों ने पाण्डवोंके उपर हिंसायुक्त ऐसे अनेक दुष्कर्म किये जैसे कि नीच मनुष्य करते हैं। हे पाण्डके बड़े-नाता धृतराष्ट्र पाण्डव आपके पुत्रो के उनसव आप अपराधोंको क्षमा करके वैसेही निश्छल बनेरहे आपके पुत्र इनको अच्छे प्रकारसे नहीं मानते है ।२२। उसवारंवार किये हुये पाप कर्मों का बड़ाघोर फल किंपाक वृक्षफलके समान वर्तमान हुआहे, हे महाराग आपने अपने सहदों के निषेध करने से भी नहींमाना इस हेतुसे पाप प्रानपुन सहायकों समेत उसफल को भोगोगे, विदुरजी भीमा द्रोणाचार्य और अन्य श्रेष्ठलोगों समेत मैंने भी वारंवार पापको समझाया परत आपनमाने नही अबसावधान हो हो, और परिणाम आन्ददेवाले वचनोकोभी ऐमे नहीं सुनते हो जैसे कि निद्धी मनुष्य पथ्य और गुणदायी औपधी को न destrous of fam begin all their pruik in life with honesty The brave sardiory donot turn lack from fighting in just cadeo acid vutory is suia to fall on the side of justice. For those reasons the lovers of sm, are cral in words and deeds and guiler defente Your song were crul anul harsh to the Pandavas liko low corn men bus free from decop,101, yes they are not iespected by your song The dire fruit of all these stuiful deeds, committed ngrit and BERHE is alout to become lipe You did rot hear hing, the situace of society groet na-n, as well as myself remonstrateel with you ngain and more pulyvmiritlier le zilened to us lafure nur you woulds nhe creations on (१६५९) भीष्मपर्व Bhishma Pary [ 4629]] पपम् । पुत्राणां गतमाशाय जितान् मन्यसि पांडवान् ॥ २६ ॥ माणुभयोययातत्वं यन्मा स्व परिपृच्छसि । कारण भरतश्रेष्ठ पांडवानांजय प्रति ॥ २७ ॥ तत्तेहं कथयिष्यामि यथाश्रत मरिदम । दुर्योधनेनसंपृष्ट एतम पितामहः ॥ २८ ॥ दृघ्याधाताणे सन् निर्जितास्तु महारयान्। शोकसंम् हृदयो निशाकालेस्म कौरव ॥ २९ ॥ पितामह महाप्रान्नं चिनये नोपगम्याह । यदवी सुतस्तेसो तमिण जनेश्वर ॥ ३० ॥ खुर्योधन उवाच ॥ द्रोगश्चरयच शल्यश्च कृपो दौगिस्तथैधच। कृतवर्माच हार्दिक्य: कांयोजश्च सुदक्षिणः ॥ ३॥ भूरिश्रवा चिफर्णश्व.भगदत्तवीर्यवान् । गहारथा समाख्याता, कुलपुत्रास्तनत्यजः ॥ ३२ ॥ त्रयाणामपि लोकाना पपीताइति मे मति । पांडवानां सम स्ताश्च नतिष्ठन्तपराक्रमे ॥ ३३ ॥ तत्र मे सशयोजातस्तन्ममाचक्ष्य पृच्छत '। यं समा नित्य कोतेया जयं त्यम्मान् क्षणे क्षणे ॥ ३५ ॥ भीम उवाच :॥ शृण राजन् घचोमत्य पाता तुम अपने पुत्रों के मतमें नियत होकर पाण्डवोंको विजयी देखतहो । २६ । और हे भरतर्षभ जो पाण्डवोंकी विजयका हेतु तुम पूछतहो, उसकोभी मैं कहताहूं हे राजन् जैसा कि मैं सुना है और उसी को दुर्योधनने भीप्मनी से पूछा है, अर्थात् युद्धमें पराजित सब महारथी भाइयोंको देखकर शोक से व्याकुल मन आ. पका पुत्र दुर्योधन रात्रि के समय बड़ी नम्रता से महाज्ञानी भीष्म पितामह के पास जाकर जो वचन बोला वह सब मैं तुमसे कहताई। ३० । तात्पर्य यह है कि दुर्यो- धन ने कहा कि द्रोणाचार्य और तुम व_शल्य व कृपाचार्य अश्वत्थामा व कृतवर्मा यहार्दिक्य व कम्योग सदाक्षिण व भूरिश्रवा व विकर्ण व पराक्रमी भगदत्त यह सब महारथी और सब कौरव लोग शरीर के त्यागने वाले, तीनों लोकों में सामर्थ्यवान् प्रसिद्ध मेरी बुद्धि से यहसब लोग पाण्डवों के पराक्रम में नियत नहीं होतेहैं यह मुझको बड़ा सन्देहहै कि ऐस' हमारे महायकोंके होनेपरभी पाण्डव लोग हमको पद You donot give ear to advice which may bring you good in the end. Your caso is like that of a foolislı patient who takes neither wholesome food por good medicine Acting upon the opinion of your sons you see the Pandavas again and again victorious 26. '1 shail tell you the cause of the Pandavas' victory if you are inclined to hear it. I quote the words which Bhishm sa d in reply to Duryodhan's quest.on to the same effect. Finding all lys brothers defeated in battle, Dur. yodhan, uneasy of mind and much humuuated, ent to use hi-lyin tho gruodfather. I shall tell you the fu sort of what he said 30. "You and Dronacharya, Shalya, Kripachniya, Asl. wathman, Kritvartna, Hardikys, Camboj. sudahthin, Bhurshrara, Vilan and valliant Bhagdatia, all these warriors and Kauravas," said Duryodhan, arc rcady to die for me. They are fe mous througir ul the three acilds for their great strength and yet they dovot cqual in piowes to the Pendavas i have n grave doubt in my mind, for having such cele brated . / [ 14301 Nahaubarat (४६३०) यथा वक्ष्यामि कौरव । बहुशश्चमयोलोसि नच मे तत्वयारुतम् ॥ ३५ ॥ क्रियतापाई चे साध समो भरत खत्तम । एतत्सम महं मध्ये प्रश्रिव्याचवा विभो ॥ ३६॥ भुक्ष्वे मां पृथिवी गजन् भ्रातृभ सहित सुखी । दुई दस्तापयन् सर्वान् नदपश्चापिबांधवान् । ३७ ॥ नच मे क्रोशतस्तात श्रृंतवानसि वै । तदिद समनुप्राप्तं यत्पानवमन्यसे ॥ ३८ ॥ पश्च हेतुग्वध्यत्वे तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । तं शृणुमहावाहोरम कीर्तयत प्रभो ॥ ३९ ॥ नास्ति लोकेषु तद्भूत भवितानो भविष्यति । योजयेत्पांडवान्सर्वान् पालिलाग्छाई धन्वना ॥४०॥ यत्तु मे कथितं तात मुनिभिर्भावितात्ममि । पुराणगी त धर्मात मृणुष्व यथा तथम् ॥४१॥ पुराफिल सुरा सर्वे ऋपयश्च समागता । पितामह मुप सेदु पर्यते गरमादने ॥ ४२ ॥ तेषामध्ये समासीनः प्रजापतिर पश्यत । विमान प्रज्वलद्भासास्थित प्रघरघरे ॥ ४३ ॥ ध्यानेना वेद्यतद्ब्रह्माहत्या पदपर विजय करते है । ३४ । भीमजी वोले हे कौरवों के राजा मेरे कहनको मुन | मैने तुझको बहुतपार समझाया परन्तु तैने न माना भरतवंशिमोंमे श्रेष्ठ पाण्डवों से नुमसन्धि करलो हे दुर्योधन इसी में तेरी और सवसंगारकी कुशल है, हेतात भाइ- यों समेत सबमित्रों को प्रसन्न करके अपने बांधवों समेत आनन्दपूर्वक इस पृथ्वी को भोगो भौर पहलेभी हमने वारंवार कहा उसको तुमने नहीं सुना सुनो जो कोई पांडवोंका अपमान करता है उसका यहीफल बर्तमान होता है वही अब तुमकोभी वर्तमान है, हे समर्थ महाराजउन सुगमकम्मी पांडवों के अवध्य होनेका जो हेतु है उसको मुझमे सन, लोकोमें ऐसाकोई वलीनही है नाभीकोई होगा जो शाधनुप धारी के शरणमें रक्षित सवपांडवोंको विजयको । ४० । हेधर्मज्ञ जो शुद्धअन्त करण वाले मुनियों ने पुराणों में कहा है उसको तुम ठीकठीक पूर्णता से सुनो, निश्चय है कि प्राचीन समयमे सब देवता और ऋषियों ने इकठेहोकर गन्धमादन पर्चत पर पिनामहनी की उपासना की फिर उन सबोंमें बैठेहुए प्रजापति ब्रह्माजीने तेज inen for my nilics, the Pandavas gun victory over us at caclı step"34 "Ilear my worls, Puince of tho ka iravas," and Bhishm in reply, I haveaften tcnoastrated with but to no purpose ishe peace with the Pandrras best of the descendants of Bharat, for the safety of und of all tlie wold lies in t'113 Make your brothers, friends sind housinen happy, and rule over the carth I have often end this to W lioeser wush me war on the Pandavas will get thio samo result as you are about to do Hear the renson why tho Panda- 19* arc ind fruct:b'o There is no warrior in the world, nor thcrc. will cser 12, who can conquer thio Pandıras as long as they aro under the prota tion of the wicked of Shinrang Low winnt the pire nunded mun s of uld have sud In the days of gore, all the gods and ritus together rere worshipping Brahima s ko, sento cel in th ir mes, 873 ferlarious celestin in the firmament aborc you, Jou you in ram 40 JIear in detail " aga Bhishma l'ary [ 16813 घ नियतोंजजिम् । नमशार धारमा पुरुष परमेश्याम ॥ ४२ ॥ पथस्यश देवाय दृष्ट्वानलाश मुत्थितम । स्थिताः प्रांजलयः सधैं पश्यतो महददभुतम ॥ ४५ ॥ यथावच्चतमभ्ययं ब्रह्माब्रह्मविदांवरः । अगादजगतः समापरंपरमधर्म | पित् ॥ ४६ ॥ विश्वायर्षियमूतिविश्वेशो विपक्सेनोविश्वकर्मावशीच । विश्व मरो वादेयो सितम्माद्योगात्मानं दैवतंत्चामपंमि ॥ ४७ ॥ विश्वमहादेव जय लोशहिनेग्त । जयघोगीश्वर विमो जय योगपरावर ॥ ४८ ॥ पन्नगर्भ विशागत जयलोकेभ्यरेश्वर । मतमन्प भवनापजयसम्पामजात्मज ॥ ४९ ॥ असरयेय गुणाधार जय सर्व पगयण । नारायण सुदुष्पार जय शायनवर ॥ ५० ॥ जयसर्च से प्रकाशित अत्यन्त सुन्दर आकाश यर्नमान उत्तमविमान को देखा, ब्रह्माजीने ध्यानद्वारा जानकर हाथ जोड़के उस घट्यध्यासी को नमस्कार किया. फिरसर | देवता और ऋषिलोगभी वहां से रठे हुए ब्रह्माजीको और उसअपूर्व अद्भुतरूपको देखकर हायगोड़कर नियतहुए, फिर ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ धर्म संसारकेस्वामी ब्रह्मा जीने वृद्धि के अनुसार उसका पूजन करके इस परम उत्तम और पवित्र स्तोत्रको पढ़ा ।। खोत्र । विश्वावसर्विश्व मूर्ति विश्वेशो विश्वक्सेनो विश्वकर्मा घशीच ॥ विश्वेश्वरो वासुदेवो सितस्माद्योगात्मानंदैवतं त्वामुपैसि । ४७ । जयविश्वमहादेव जय लोकहितेरत ।। जय योगीश्वर विभो जय योगपरावर । ४८ । पद्म नाम विशालाक्ष जय लोकेश्वरेश्वर ॥ भूतभव्यभवन्नायजयसौभ्यात्मजात्मज । ४१ । असंख्येयगुणाधार जय सर्वपरायण । जय कृष्ण सुदृप्यार जय शाईधनुर्धर । ५० । Brahma knew him by meditation and will joino] palnız bowed down to the D-seller-within-all. The gods and the rishis stood up and casting their eyes ou Brahma as well as on the wonderful being joined their palms in token of respect. Brahma the best of those who know Brabm and dharm, worshipped Him according to his wisdom and recited the following hymu of praise:-Protector of the Universe, having the Univerze for thy form, Lord of the Universe, Reſuze of the rorld DIaker of the world, controller and Supreme Lord of tho Universe, Vasudev, I seek roluge in the the soul of Yoga and the highest Divinity. 47. Victory to thee, Supreme God of the universe. Vic. tory to thes, benefactor of the world Victory to thee Lord of yog and All-powerful. 'Victory to thee, thou befure and after the yog. 48. Thee from whose navel the lotus gres, possessor of large cyes, Victory to the Lord of lords. Lord of the Past, Prsent and Future, Victory to thee embodiment of gentleness, son of sons 49. Victory to thec, seat of untold attributes and refuge of all. Victory to thice, Narayan, uuknowable and yielder of Sharang boss, Victory to thee seat of all attributes of the form of universe and ever healthy, Victory to ।

1 [46321 Mahallar at (४६३२) गुणोपेत विश्वमू निगमय । विश्वेश्वरमहाबाहो जयलोकार्थतत्पर ॥५१ ॥ महो रगवराहाच हरिकेश विभोजय । हरिवास दिशामीश विश्वचासामिताव्यय ५२।। व्यक्ताव्यतामित स्थान नियतेंद्रियसक्रिय । असंख्ये यात्मभावजयगभीरकामद ॥ ५२ ॥ सनत विदितमान् नित्यभूत विभावन । कृतकार्य कृतमक्ष धर्मतविजया वह ॥ ५४ ॥ गुह्यात्मन् सर्व योगात्मन् स्फुटसम्भूतसंभव । भूताद्यलोक तायश जयभूत विभावन ॥ ५५ ॥ आत्मयोने महाभाग फल्पसंक्षेपतत्परम् । उद्भाचनमनो भावजयब्रह्मजनप्रिय ॥ ५६ ॥ निसर्गसर्ग निरतकामेशपरमेश्वर । समृतोद्भवसद्भाव मुक्तात्मन् विजयप्रद ॥ ५७ ॥ प्रजापति पतेदेव पद्मनाभमहावल । आत्मभूतमहा भत सत्यात्मन् जयसर्वदा ॥ ५८ ॥ पादौत रघरादेवी दिशोवाह दिशिरः । मूर्तिस्तंह जयसर्व गुणोपेत विश्व मूर्ते निरामत ॥ विश्वेश्वर महाबाहो जयलोकार्थ तत्पर ॥५१॥ महोरंगवराहाद्य हरिकेश विभोजय ॥ हरि वास दिशा मीश विश्ववासा मिताव्यय 1 ५२ ॥ व्यक्ता व्यक्त गितस्थान नियतेन्द्रिय सक्रिय ॥ असंख्ये यात्म भावज्ञ जयगं भरिकामद । ५३ । अनन्त विदित प्रदान नित्यं भूत विभावन । कृत कार्य कृतप्रज्ञ धर्मज्ञ विनया वह । ५४ । गुबात्मन्सर्य योगात्मन्स्फुटं संभूत संभव ॥ भूताद्य तत्वलो केश जय भूत विभावन । ५५ । प्रात्मयोने महाभाग कल्प संक्षेप तत्पररम् ।। उद्धा वनमनो भाव जय ब्रह्म जन मिय । ५६ । निसर्ग सर्ग निरत कामेशपरमेश्वर ॥ अमृतोद्भवसद्भाव मुक्तात्मन् विजयपद । ५७ । प्रजापतिपतेदेव पद्मनाभ महावल ॥ श्रात्मभूत महाभूत कार्मातगन् जय सर्वदा । ५८ । पादौतवधरादेवी दिशोबाहु दिवा शिरः । मूर्ति स्तेई सुराकायश्चन्द्रा दित्यौच चातुपी । ५९॥ वलं तपश्च सत्पं thee, Lord of the worlds, of mighty arals, benefactor of the world 51. Victory to thee, grcat Viag, Boar, first cause, of towny locks, Almighty, of yellow lobe: Lord of the disections, Omnipresent, Infinite and fios from decay. 52. Manifest and Unmanifest, Immessurable space, controller of senses and achievor of what is good, inmersunable, self-knowing, Deep and giver of boons, victory to thee 53. Endloss, Brahm, Eternal creatoi, Victorious, wise, just, giver of victory, mysterious soul of yog, the great causo of all bolags. Know ledge of solf, Lord of the world and cicator of all beings, Vactors Self create, hylly blessed, Destroyer of all, inspirer of thoughts and dear to thiuse who know Brahm, Victory to thing Victory to the whose works are crcation and destruction, si lo lins al vishes under control, the Supreme Lord, the fountain of Aanrit, all exis tent, Agnt of the last comilagration anủ giver of victory. 57. Devine lord of all created beings whose navel is the seat of the lotus, Almigits, sulf create, the great Cleinent and the soul of all sites, victory to the tlint givest all 58. Tho Erth represents thy fect, the directions thy arms and the heaters thy hed. I am thy form the gods ar to theo. 55.

(४६३३) भीमप Bhishma Parr [ 4633] लरा कायथंद्रादित्यौच चक्षुपी ॥ ५९ ॥ यलंतपश्च सविंध कर्मधारमय । तेजोमि.पवन मासासापरत स्येदसंभवा !! ६०॥ अश्विनी श्रयणी नित्या देवीझिापा सरस्वती । वेदाः संस्कारनिष्ठाहित्यदीयं जगदाभितम् ॥ ११॥ नसल्यानं परीमाण न तेजी न पराक्रमम् । न बल योगयोगीश जानीमस्ते न सम्मवम् ॥ ६२ ॥ त्वन्न तिनिरता देव. नियमस्यां समाश्रिताः । अर्चयामः सदा विष्णो परमेश महे श्वरम् ॥ ६३ ॥ पयो देवगन्धर्वा यक्षराक्षसपनाः । पिशाचा मानुपाचष मृगपक्षिप्तरीसृपाः ॥ ६४ ॥ एयमादि मया सृष्ट पृथिव्यां त्वत्प्रसादजम् । पत्र नाम विशालाक्ष कृष्ण दु पप्रणाशन || ६५ ॥ त्वं गति. सर्वभूत ना तात्य जगदगुरुः । त्वत्प्रसादेन देवेश सुखिनो विबुधाः सदा ॥ ६६ ॥ पृषिधी निर्भया देव त्वत्प्रसादात् सदाभवत् । तस्माद्य विशालाक्ष यदुघंशयिवर्द्धनः ॥ १७ ॥ धर्मसंस्थापनाप दैत्यानांच यथायथ । जगतो धारणाीय पिज्ञाप्य कुरुमेपिमा व धर्म कर्मात्मनं तव । तेनोग्निःपवनवासः प्रापस्ते खेद संभवाः ।६० अखि नौवणौ नित्यो देवी गिहासरस्वती॥ वेदाः संस्कार निष्ठाहि त्वदीयं जगद धित १६१ । नसंख्यांनपरीमाणनदोजनपराक्रमं । नवलंयोगयोगीशनानीमस्तेनसमवं १२। त्वद्भक्तिनिरतादेवनियमत्रांसमाश्रिताः । अर्चयमांसदाविष्णोपरमेशमहेश्वरं । ६ | ऋपयोदेवगंधर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ पिशाचामानुपाश्चैवमृगपक्षिसरीमृपा । ६५ । एवमादिमयामृष्टंपृथिव्यांत्वत्मसादनं ।। पद्मनाभविशालाक्षकृष्णड स्वप्ननाशनं । ६५ । लंगतिःसर्वभूतानांतनेतात्वं जगन्मुखं ॥ त्वत्मसादेनदेवेशसुखिनोवियुधा सदा । ६६ । पृथियोनिर्भयादेवत्वत्प्रसादारसदाभवत् । तस्माद्भवविशालाक्षयदुवंशविवर्द्धनः । ६६। धर्मसंस्थापनार्थायदेतेयानांवधायच ।। जगताधारणाय विज्ञाप्यं कुरुमेषिभ।। ६८ । thy limbs, and tho sun and the moon are thy eyes. Perances and truth, torn of morals and religicus sites, constitute thy strength Fire is thy cnergy, the wind is thy Lreath and the waters are thy sweat. 60. The tv in Astrns are thy cars and Saraswati is thy tongue. Tho Vodns are thy knowledge and the uphersc rests upon flice. Lord of yog and youis, we donot blow lliy extent, measure, enersy, prowess, might and origin. O God, Vishnu, filled with thy dvotion and dep.nding on thee with vows and observances we over spr-hip theo as the highest Lord and the God of gods The Fishis, the gods, the gandharvas, the yakshases, the rahshes the pannags, the p'sbachos, men, beasts, bids and reptiles wers created by me by Thy.grace. From, thy nayol springs the lytu, and thy eyes are large, O Krislına, dispeller yoas 65. Relugo and guide of all creatures thou hast tho Uni. verse for thy month Throngh thy grace, O lond of the gods, the gods are over happy. Through thy grace the Eartli remains free from danger: be born amongitho Yadas, large ayed one, Grant my request for the sake of onsolidating dharut, for tho destruction of of the world. Being created by Vasuder, I have in reality been created [4634] Mahabharat (४६२४) ॥ ६८ ॥ यत् परमो गुह्यं त्वत्प्रसादादिद विभो । बासुदेव तदेतत्ते मपोरगीत यथातथम् ॥ ६९ ॥ एट्या सर्पगं देवं स्वयमात्मानमात्मना । कृष्ण मारमनी साक्षी प्रद्युम्नं चात्मसम्मयम् ॥ ७० ॥ प्रद्युम्नादनिरुद्धवं य विदुर्यि थामन्ययम् । पनिरुद्धोऽसजन्मायै ग्रहाण लोकधारिणम् ।। ७२ ॥ घासुदेवमयः सो स्वास्मि विनिर्मितः । विभज्य भागशोत्माम यजमानुपतां विमो। ७२ ॥ तत्रासाप सत्या सर्व लोकमुखायवै । धर्म प्राप्य यश प्राप्प पोगं प्रायसि तत्वतः ॥७३॥ व हि ब्रह्मार्पयो लोके देवावामित विक्रम : तेस्तहिनामभिर्युका गायन्ति परमात्म कम् ॥ ७६ ॥ स्थिताध सर्वं त्वयि भूतसंघाः कृत्वाभयं त्वां घरद संधा। बनादिमध्यागत मपारयागं लोकस्य सेतु प्रयदन्ति मिमीः ॥ ७५ । इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्पवधपर्वणि विश्वोपाख्याने पंचपष्टितमोऽध्यायः ६५॥ पत्तत्परमकंगात्वत्मसादादिदंप्रभो ॥ वासुदेवतदेतत्तेमयोद्गीतंयथातथम् । ६९॥ मृष्टपासंकर्षणंदेवसयमात्मानमात्मना । कृष्णत्वमात्मनासाक्षीम्मघुम्नोस्त्रात्मसमक्ष ७० मयुम्नोच्चानिरुद्धन्तुवयंविदुविष्णुमव्ययं । अनिरुद्धोमजन्मांवेवाह्मणलोकधारिणं. | चामुदेवमय.सोऽहत्ववैयस्मिविनिर्मितः । विमृज्यभागशोज्ञानंबजमानुपतांविभो। ७२ । तत्रासुरवधंकृत्वासर्वलोकहितायवै ॥ धर्मस्थाप्ययशःमाप्ययोगमाप्स्पसितावतः ॥ त्वादिब्रह्मयोलोकेदेवाश्चामितविक्रम ॥ तैरत वर्नामाभियुक्तागायन्तिपरमादृतं स्थितश्चतत्वीयभूतमेघाःकृत्वाश्रयत्वांवरदमुवाहो । अनादिमध्यान्तमपारयोगनोक- स्पसेतुप्रवदन्तिावप्राः ।। ७५ ।।। Daityas and for the protection of the rrorld. Thy mystery has been sung by me thuough tby gace, Vasudev. Having created the di vino Sankarshan through thy grace, thou art Lorn as Pradyumna, OKrishn.re. From Pradyumn thou hast created Anirudh rho y Lnown as everlasting Vislınu I was created by Anirudh to protect by thec, Divide thyself into paits and take birth, o lord, among mco. Destroy the Asuras for the good of all erenturoa, win tenom and yog to establish rightcoueness. The twice born rishis on the face of the carth and the gods des oted to thee, sing songs in lbiy prriss, miglity ona possessor of grod aims, all creatures rest on lee and baso their refuge in thice, gner of lcons The trice lord swak of thee as the world's tridge, without beginning, middle and end, and possessed of Loundless 191 Yog. 75.

तले ॥ ८ (४६३५) भीमप Bhishma Pary [4635] भीष्म उवाच । ततः स भगवान् देयो लोकानामीधरः हणि प्रत्युवाचेदं स्निग्धगम्भीरपागि विदितं तातपोगान्भे समेतत्तवेसितम् । तन्न वितत्यक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत । २ ॥ ततो देवर्षिगन्धर्धा विस्मयं परमं गताः । कौतूहल पराः सर्वे पितामहमपावन् !! ३ ॥ कोन्वयं यो भगवता प्रणम्य विनयाद्विमों। घागभिः नुती वरिष्ठाभिः श्रोतुमिच्छामंतवयम् ॥ ४ ॥ वस्तु मगंवान् प्रत्यु चाच पितामहः । देव ब्रह्मर्पिगन्धर्वान् सर्चानं मधुरया गिरा ॥ ५ ॥ यचरपर भविष्यश्च भवितव्यंचयत्परम् । मृतात्माच प्रभुश्चय ग्रह्म यञ्चपरं पदम् ॥ ६ ॥ तेनास्मि कृतसम्बादः प्रणनेन भरर्पमाः । जगतोनुप्रहाय पाचितो मे जगत्पतिः ॥७॥ मानु लोकमातिष्ठ घासुदेव इति श्रुतः अनुमणां बंधार्थय सम्मवस्व मही ॥ संग्रामे निहता येते दैत्यदानव राक्षसाः। त इमे नृपु सम्भूता घोर अध्याय ६६ ॥ भीष्मजी बोले कि इसके पीछे वहयोगेबरोंके ईश्वर भगवान् स्निग्ध गंभीर बाणीद्वारा ब्रह्माजी से बोले, हे तात यहत्तरे मनकी इच्छा मुझको योगसे विदित है वह उसी प्रकार से होगा यहकह कर वह उसी स्थानमें गुप्त होगये, इसके अन तर देववि और गंवाने बड़ा आश्चर्य किया और सबने मिलकर ब्रह्माजी से कहा कि हे समर्थ यह कौनया जिसको आपने बड़ी नम्रनासे नमस्कार पूर्वक उत्तर वाणियों में स्तुति किया हम उतको जानना चाहते हैं । ४ । इमति से देव पिगन्या के पूछनेपर बड़ी मधुर वाणी से ब्रह्मा जी वाले, जो सर्वोत्तमरूप आगे प्रकट होनेवाला है वही श्रेष्ठ सवनीवमात्रोंका आत्मारूप प्रभु है उसीको ब्रह्म और ज्योति स्वरूपकहते हैं, हे श्रेष्ठ पुरुषो मैंने उसी प्रसन्न मार्ति परमेश्वर से वार्तालाप की है और जगत् के अनुग्रह के लिये वह जगत्पति मेरी प्रार्थना से वासुदेवनाम से मसिद्ध होगा तुमसब लोग मर्त्यलोक में नियन होकर अमरोंसे मारनेके लिये पृथ्वी पर प्रकट होनाओ । ६ । जो दैत्य दानव और राक्षस युद्ध में मारेगये हैं वही CHAPTER LXVI Blishby continued: "Then the Lord of yogis gare the follotring reply to Bralınıa in a sweet and solemin tono of roice"I know by the Passes mind. It will b• as you desire." Having said this lie disappeared at that very place. At this tbo gods and grandkårras were much astonished and unanimonly asked of Brahma to tell them all about him whom he bad bowed down and pruired in sucit high torms 3. Being thug asked ly them, Brahma replied in a very anycot cvice that the goud furm npixa ring lefore them was the soul and lord of all beings, hoown as Brahim and ligut. "I bave talked, said lie with tliat ciieerful ſoni, il.e Lord of all. Atmy request And for the good of the surld that lord of the Universe will apprer in this world Rs Vasudes, You too n ust go to the said of wortals power of yogaluat in your [94361 Mahabharat (४६३६) कामहाबलाः ॥ ९ ॥ तेषां वधार्थ भगवान नरेण सहितो वशी! मानुषी योनि भास्थाप चरिष्यति महीतले ॥१०॥ नग्नागयणी यौती पुराणावृषिसत्तमौ । साहितोमान पेलोके सम्भूताय मितधुती ॥ ११॥ अजेयौसमरे यसौ सहित रमौरीप। मूहास्ती न जानन्ति गरनारायणावृषी ॥ १२ ॥ तस्याहमग्रतः पुत्रः सर्वस्य जगतः प्रभुः। पादेशोचनीयो यः सर्व लोकमहेश्वरः ॥ १३ ॥ तथा मनुष्योयमिति कदाचिद। सक्षमा । नायज्ञेयो महावीर्यः शंखचक्रगदाधरः ॥ १४ ॥ एतत् परमगुहार मेतत्परमक पदम् । एतत् परमब्रह्म पतत्परमकं यशः ॥ १५ ॥ एतदक्षरमव्यक मेतद्वैशाश्वतमः । यत्तत् पुरुपसंहावै गीयते नायतेनच ॥ १६ ॥ एतत् परमकं तेज एतत् परमकं सुखम् । एतत् परमक सयं कीर्नित विश्वकर्मणा ॥ १७ ॥ तस्मात् सेन्ट्रैःसुरैः सधै लादैश्वामित विक्रमः । नाव यो चासुदेवो मानुपणेयमिति प्रभु १८॥ यसमानुपमानोय मिशि ब्रूयात् स मन्यधीः । हपीकेशमवज्ञानात्तमाः पुरुषाधाम, माकर इनघोररूपमहाबली मनुष्यों में उत्पन्न हुये हैं, इन्हों के मारने के निमित्त अतुल पराक्रमी भगवान् नर संयुक्त मनुष्य योनि में नियत होकर पृथ्वीपर विचरेंगे, वही दोनों पुराण पुरुष ऋपियों में श्रेष्ठनरनारायण रूप मिलेहुए सावधान युद्ध में देवतामों से भी विजय करने के योग्य नहीं हैं वही महा तेजस्वी एकसाथ नर लोक में.मगटहुए इनदोनों नरनारायण ऋपियों को अज्ञानी लोगनहीं जानते है ?? मैं जिसके प्रात्मा से उत्पन्न होनेवाला पुत्र सब जगतका पति हूं वह सब लोकोंका महेश्वरं वासुदेव तुम्हारा पूज्य है, हे उत्तम देवतामो इसी प्रकार का वह महापा कमी शंखचक्र गदाधारी ऐसा जानकर कि यह मनुष्य है कभी अपमान करने के 'योग्य नहीं है, यह अत्यन्त गुप्तरूप और परमज्योति यही परब्रहा है यहीयश है यही अविनाशी सनातन और यज्ञ पुरुष है यही दृश्यअदृश्य नाम से गायाजाता है और जानाजाता है सब यहीहै, यह परमतेन मुख और सतविश्वकर्ता कहाजाता है इस कारणसे वड़ा पराक्रमी प्रभुबासुदेव इन्द्रादिक देवता और सब असुरोंसे भी मनुष्य जानकर अपमानके योग्य नहीं है, जो इस पासुदेवको केवल तृष्य समझे and be born there to destroy the esurs The Dartyrs, Panavas and rakshases, killed in battle are born as biaye warriors among men. To destroy them, Bhagwan of matchless prowess, together witho. Nar, will be born among men and will move on earth. Both thoso nuo cient purushes, the best of rishis, known as Nar and Narayan, ars inconquerable even by gods. Both glorious ones are born anong men. Ignorant people donot know Nur and Narayan. 12. The xoʻghty lord, Vasudov whose son I uin the lord of creation, is worthy of respect by you. I llat wielder of conch, mace and liarus, of grant provoss, is not to Le despisal in huinan form, goos nost arysterious, the best light He is the Tore Brahn. famir (४६३७० भीष्मपर्व Bhishtun Pary [46371 ॥ १९ ॥ योगिनं तं महात्मान प्रविष्टं मानुषी तनुम् । अवमन्येद्वासदेयं तमाता मसंजनाः || २० ॥ देव चराचरात्मानं श्रीवत्सांक सुवर्चमम् । पद्मनाभंग बानाति तमापुस्तामसं बुधाः ॥ २१ ॥ किरीटकास्नुमघर मित्राणामभयङ्करम् । अवजानन महात्मानं घोरे तमसि मन्नति ॥ २२ ॥ पव विदित्वा तत्याच लोका नामीश्वरेश्वर । धासुदेवो नमस्कार्यः सर्वलोके सुरोत्तमाः ॥ २३ ॥ भीम उवाच । एवमुक्त्वा समगवान् देवासर्विाणान्परविरम्प सर्वभूतात्मा जगाम मयनंस्वकम् ॥ २४ ॥ रातो देवाः सगन्धर्वा मजयोप्सासापि च । यता ब्रह्मणा गीतां धुत्वा प्रीतादिवययुः ॥ २५ ॥ एतच्छुत भया सात ऋषीणां भावितारमनाम् । ‘यासदेखें कथयतां समचाये पुरातनम् ॥ २६॥ रामस्थ जामदग्न्यस्यमार्कण्डेयस्य धीमतःव्यास नारदयोश्चापि सकाशाद भरतपम ॥२७॥ एतमपंच चिताय श्रुत्वा च प्रभुमव्ययम् । वह इन्हीं हषीकेशजी के अपमान से निवन्द्री नीचपुरुप है जो इसयोगी महात्मा मानुपी शरवर्ती वासुदेवजी को अपमान करता है उसको महापुरुष लोग तामसी कहते हैं । २० । जो इस जड़ चैनन्य के आत्मा श्रीवत्मचिह्न धारी तेजस्वी पद्म नामजी को नहीं जानता है वहभी तामसीबोला जाना है, जोमुकुटकुंडल और को- स्तुभधारी शत्रु भयवर्द्धन महात्मापुरुपको अपमानकरताहै वहघोर तामित्र नामनरक में गिरताहै हे थेटदेवर्पियो इसरीति से तत्वार्थको जानकर लोकेश्वरों का ईश्वर वासुदेव सबलोकों से नमस्कार करने के योग्य है । २३ । भीम जी बोले कि पूर्व समय में भगवान ब्रह्माजी देवता और ऋपियों के समूहों से इस प्रकार कहकर सब माणियों को विदा करके अपने भवन को गये । २४ । इस के पीछे देवता गन्धर्व ऋपिाने और अप्सरादिकभी ब्रह्मानी की कही हुई इसकया को प्रीति संयुक्त सुनकर स्वर्ग को गये, हेतात इसरीति से मैंने शुद्ध अन्तःकरण वाले देवता ऋषिपाद की सभा में यह प्राचीन वृत्तान्त मुनाहै हे शास्त्रमें कुशल destructitle, eterral ard subject of sacrifices. He is sung and known as Visible and Invisbe. He is AJinall, test Liglot, Horpiness are Cicator of tho world. Tasudev the lord of great prowess is rot to te despised in human for m by India and other gods. 20. He who regards Vasudev as an ordinary Inan, is a despicable fcol. He lo lcohs down upon Vasudev the great yogi in the human form, is itu garded by great men ag fallen in darhaess. He who does not LOON this soul of the moveables and iminorcables having the mark of Shreca Ents, the glorious lotus ravelled, is fallen in darkness. He rho des. pises this grcåt kwing adorsed with dindem, erings and Kanstalk jeivel, ti is terror of foes, falls into the dire liell drown as Tamislil the Knowing these facts, good rishis dirine, Vasuder the lord of lords is worthy of worship." 23, Haring said this, to the gods and rishis," continuel Bhishim, “lord Brahma lade fare se'l to all teings and rent [1638] Mahabharat (५६३८) भासदेव मह त्यानं लोकानामीश्वरे श्वरम् ॥ २८ ॥ पंप चैमरमजो नही सस्य जगत पिता । कथन वासुदेवोयमय॑श्वेभ्यश्च मानवै ॥ २९ ॥ पारितोसि मया तात मुनिभिद पागे । मा गच्छ सयुग तेन घासुदेवेन धन्विना । ३. मा पाण्डवै सार्द्ध मति रत्व मोहार्य युध्यसे । मन्ये त्या राक्षस दूर तथा बासि तमोवृत ॥ ३१ ॥ यम्मात द्विपति गोविन्द पाण्डपन्त धनञ्जयम नग्नागपणी देवौ कान्यो द्रिष्याद्धि मानव ॥ ३२ ॥ तस्माद्ब्रवीमि ते गजन्नेपर्व शाश्वतोपय । संघलोकमो नित्य शास्ता धात्री धोन ॥ ३३ ॥ योधारयति लोकास्त्रीधरा चागुरु प्रभु । पोदा जरश्च जता च सर्वप्रकृतिरीश्वर ॥ ३४ ॥ गजन् सर्षमयो दुग्योधन जमदग्न्यजी के पुत्र परशुरामजी और बुद्धिमान् मार्कण्डेय व्यास और नारदजी सेभी सुना है, इस अर्थ को अच्छी रीति से मुन पार जानकर न्यूनता | रहित लोकेश्वर प्रभु वासुदेवगी को ध्यान करो जिमको भात्मा से उत्पन्न होने पाला ब्रह्मा सजगत्का पिता है वह वासुदेव मग्मात्मा रूप किस प्रकार से मनुष्यों से पूज्यनही है अर्थात् सबका पूज्यनम है, हेतात प्राचीन समय में तो गुरु मन्त करण वाले मुनियों ने सदैव निषेध किया है कि उम धनुषधारी वासुदेवजी से कभीयुद मनकरो । ३० । और न कभी पांडवोंसे लडो परन्तु तू अपने मोह से सावधान नहीं होताहै इसकारण मै तुझको राक्षस और निर्दय जानता है जो के तृ प्रज्ञान में डूबाहुमा है इसी कारण से तू गोविन्दनी समेत पांडव अर्जुन से श घुता करता है कौनसा ऐसामनुप्य है जो इनदोनों नर नागयण देवताओंसे शत्रु- | ताकरे, हेराजन इस हेनुसे मै तुझ से कहता कि यह मनातन भविनाशी विश्वरूप पृथ्वी का धारण करने वाला अचल है, और जो चराचर कारुप प्रभुतीनोगेको को धारण करता है वह युद्धका विनयरूप विजयी संघकी प्रकृति और ईश्वरहै, to bus nuod. Jlien the gods gmudhurias, 1 shus, inumis, apsarus and others, having cheerfully leard the words of Bmhma went to horren I heard this aucient account in the meeting of gods and rislus of pure tuind I hose heard the saine from Pai uhuradi the son of Jamadagas from wiso Marhandeya jas ard Yoad Having thoroughly heard and hnown this, think of lord 1 asudes the creator of the orld. Is not lond Vasudev bose son Bralima is the father of the world fortlis of respect! Tho pure-minded slunis of old liase forb dden all to fight against the great arcler l'n udur 30 They lase forb dden to fight against the Pandavos tco lut thou cost not anaken from thy slupo lication and thereforo I liold you to be a crel rakelias Tlicu branice coauty withi Voruder and Arun locause thicu art p'anged in to rance. Il lint man will be nn eenig to Nar sud Ninjan I therefore 673 to you hing tlint flats ancient importal ond unii er al form is the inimicable supporter of earth That lord of the impropcalies ard (४६३९) भीमप Bhishma Parr 4689 होप तमो राग विचार्जितः । यतः कृष्णातती धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ३५ ॥ तस्य मारपयोगेन योगतास्ममयेगव । ता पाण्डसुता गइन् जयप भविष्य ति ॥ ३६ ॥ श्रेयोयुक्तां सदा बुद्धिं पाण्डवानां दधाति यः । चतंचव रणे नियं भयेभ्यवराति ॥ ३७॥ स एष शाश्वतो देवः सर्पगुह्यमयः शिवः । पादेय इति पातो पन्मां व परिपृच्छसि ॥ ३८ ॥ ब्राह्मणैः क्षत्रियः शुद्धव कृतलक्ष- मेः । सेव्यतेभ्यर्च्यते चैव नित्ययुकैः स्वकर्मभिः ॥ ३९ ॥ द्वापारप युगायान्ते भादो कलियुगस्य च । सात्यतं विधिमास्थाय गीतः सर्पणेनवै ॥ ४ ॥ सएप सधै भरमर्त्यलोकं समा कल्पान्तरितां पुचि । युगे युगे मानुपञ्चैव पासं पुनः पुनः सुजते वासुदेवः ॥ ४ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपणि भीमवधपर्वणि रिश्वोपख्याने पद पष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥ ईराजन् यह सतोगुण रजोगुण तमोगुणसे जुदाहै जिघर श्रीकृष्ण है घर धर्म है जिधरधर्म है उपरही विजय है । ३५ । हेराजन् पांडवलोग उन श्रीकृष्णजी के माहात्म्य पोग श उत्तमरूप योगर्भ धारण किये हुए हैं, इन्होंकीही विजयहोगी वही श्रीकृष्ण पांडवोंकी कल्याण मिश्रित घुद्धिको और युद्धमें पराक्रम कोभी सदैव । धारण करता है और भयों से रक्षाकरताहै वही सनातन ब्राह्मणम्प शिव और | वासुदेव कहा जाता है हे भरतवंशी लक्षण युक्त स्वकर्मोसे नित्य मुक्त ब्राह्मण क्षत्री ग्यशूद्रों करके वह सदैव सेवा किया जाता है उसी को द्वापर के अन्त पर कलियुग के प्रारंभमें सतोगुणी वद्धि में नियत होकर संकर्षणजी ने गाया है, वही युग युगमें देवलोक मृत्यु लोक और समद्रान्तर वीपुरी और मनुष्यों के विश्राम स्थानों को वारंवार उत्पन्न करता है । ४१ ।। morcables is the supporter of the three worlds. That conquering sarrior is the lord of all He is separate from the qualities of Sat. Raj and Tam. Dharm is on the side of Shree Krishn and conquest is on the side of Dhaim. 5. The Pandavas u bing are supported by the greatness and yog of Shree Krishn and they will conquer. Shree Krishn helps the Pundaras by his good advice and proness and protects them from danger. 'l he same ancient Brahman is called Shiv and Vasudev. By good deeds that always free Brauman is served by Brahmans, kshatryas, Vaishyay and Shudras, Sankareban EADS of him at the end of Dwapar and the beginning of Kali. He creates again and again in every yug the regions of gods and mortals, the country beyond the sea and the habitations of human beings." 41.

॥८॥ [1440] llahallarat (४६४०) दुर्योयन आव । यसुदेको महाभूत सलोकेर कम्यते। तस्यागर्म प्रति छाच ज्ञातुमिच्छे रितामन ॥ १ ॥ भीम उवाच । घासुदेगे महदभूतं स देवन दैग्तम् । न पां पुण्डरीकाक्षाद् दृश्यते भातपंभ ॥२॥ मार्कण्डेयश्व गोविन्द कथयाय दभुतमात् । सर्वनानि भूतात्मा महात्मा पुरुषोत्तमः ॥ ३ ॥ आपो वायुध जश्व प्रमेतदकलायत् । स सुश्वा पृथिवी देवी सर्व लोकेभ्यरः प्रभुः ॥ ४ ॥ अप्सुवैशयन चक्रे महातमा पुरुषोत्तमः । सर्व तेजोमयो देवो योगात् सुम्बापतत्रह ॥ ५॥ मुखंत नग्निजत् प्राणाद्वायुमथापि च । सरस्वतीच वेदश्चि मनमः ससृजेऽच्युतः ॥६॥ एप ले कान सलज्जादी देवांश्च ऋविभिलह । निधनं चैव मृत्युञ्च प्रजानांप्रमवाप्ययौ, ॥ एपर्मश्च धमही वाद. संवकामद । एपकच कार्य च पूर्वदेवस्य पंप्रभुः । भूतंगम्य भविष्यच पूतदकम्पयत् । उभेसंध्ये देशः खन नियमांश्च जनार्दनः ॥९॥ अध्याय ६७ ॥ दुर्योधन बोले कि सवलोकों के मध्य में वासुदेव जीही महद्भूत कहे जाते हैं हे पितामह जी मैं उनके आगम और प्रतिष्ठाको जाना चाहताहूं, भीष्मनी: यौले हे भर तवंशियों में श्रेष्ठ वासुदेव जी ही महद्भूत और सब देवताओं के देवता हैं इन 'पुण्डरी कान श्रीकृष्णजी से परे कोई नहीं दिखाई देता है, मार्कण्डेय ऋषि भी गोविन्द जी को अत्यन्त अपूर्व और बड़ा कहते हैं इसी पुरुपोत्तम महात्मा जीवात्मा ने पृथिवी आदि पांचों तत्वोंको उत्पन्न किया है इसी परमेश्वरने पृथ्वीको न देखकर जलमें शपन किया फिर उस बड़े साहसी वासुदेवजी ने मुखसे अग्निको प्राणते वायुको उत्पन्न करके वेदों को प्रकट किया इसनेही गारंभ में लोकों समेत देवता और ऋ पयों के समूहको उत्पन्न किया और जन्म मरण नाश महित मृत्युको भी इसीने उत्पन्न किया, यहधर्म और धर्मात्मा घरका देनेवाला यही आदि देव प्रभुकर्ता और कर्मरूप है इसीने भूतवर्तमान भविष्य इनतीनोंकालों को उत्पन्न किया यही प्रभु आर्वनाशी जगतका की और वरदाता है इसीने सबके आदि CHAPTEL LXVII "Vasudev" said Duryodhan, "is called the great being throughout the world. I wish to hear of his incarnation and greatness." 1. "Best of Bharats," said Bhuslim, "Vasudev is the greatest of beings ant lord of lords. There is none superior to Sbrco Krishn. Mn. Landey calls Gorind matchless and great. This supreme being the greatest soul has created the five clements eartlı and othors. Tliis Parmesli var took rost on the waters which covered the face of the carth. 5 Vusudev of great protress laving created Agni from his mouth and Vaya from liis breath gave out tho Vedas. In the begining ho crcated tho gols and rislas. He created Brith and Death. He is Dharm Dharing: tmar girer of Loons, Primo God, Lord, unler and deed. He created the l'ast, Present and future. He is the indestructible creator of the (४६४१) भीमपर्व Bhishma Pary [4641] मषार्थवाहि गोविंदस्तपश्चैयाम्पकल्पयत् । नारजगतथापि महामांप्रभुरव्ययः ton अग्रज सर्च भूतानां सकपणा.फलापत् । तस्मानारायणा जन्ने देवदेव सनातनः ॥१९॥ नामापन वभ्वास्य सर्व लोकस्यसभवात् । तस्मापितामहो हरसमाजातास्त्यिमाः मज्ञाः ॥ १२५ शेपचाकल्पय देव मनतविश्वरुपिणम् । योधारयति भूतानि घरांचमांस पर्वताम् ॥ १३ ॥ ध्यान योगेर विप्राश्च तं विदति महाजसम् । कर्णोतो भश्चापि मधुनाम महासुरम् ॥ १४ ॥ तमुनमुनकर्माण मुरांबुद्धि समास्थितम् । ब्रह्मणोपचिति या अधामपुरुषोत्तमः ।। १५ । तस्य तात वधादेव देवदानव मानवा. मधुसूरन मित्यापयय जनार्दनम् ॥ १६ ॥ घराहक्षेत्र सिंहश्च त्रिविक्रमगतिः प्रमुः। एप मातपिताचैर सपांप्राणिनांहरिः॥ १७ ॥ परहि पुरीकाक्षान भूतन भविष्यति । मपतः सोएजद्विमान् वश्यांक्षत्रियस्तिया ॥ १८ ॥ वैश्याधाप्युरुतो राजनशूटा वैपादतस्तथा । तपसा नियतो देयो निधानं सर्वदेहिनाम् ॥ १९ ॥ ग्राम सम्मावास्या भूत संकर्षगनीको उत्पन्न किया उसीको शेपकल्पना करके अनन्त गायसे मसिद्ध किया । वही शपनी पर्वत और समुद्रों समेत इमपृथ्वीको धारण करते हैं उस को महातेजास्त्री कहते हैं, पुरुषोत्तमनीने ब्रह्माजी के उपकारके लिये कर्ण से उत्पन्न महा वेगसी पराक्रमी दैत्य मधुको पारा, हे तात इसी के मारनेसे इनको राय संसार मधुसूदन कहते हैं यही वराह नृसिंह अवतार धारण करने वाला तीन चरणों से सब नगन् को मारने वाला है, यहीहरि सयजीवोंका पिता और माना है इनसे बढ़ कर न कोई है न था न होगा । १५ । हे राजन् इसने ब्राह्मणों को मुखमै क्षभियों को भुनाओं से वैश्योंको चरणों से उत्पन्न किया है, इस साबधानने सपके द्वारा जीवोंकी हव्य कव्यादिक विधियों को प्रणाली अमावास्या या पूर्णमासी में उत्पन्न किया, जो इन योगरूप केशव जीकी सेवा करता है वह महा ऐचर्य को पागाई, हे राजाइन केशवजी को मुनियोंने ऐसा कहा है इसी को प्राचार्य पिता नारगुन world and girer of boons He cicated Sanlarzhon the first of lo'ngs, llo is huown by the appelations of Shiesia and Anant. 10. lhe Eato Shesh supports the Eartlı with her mountains ard teas. He is the most glorious. For tbe good of B.ahmi ho destroyed Jadbu a Dailya of great glory and prowegs, proluced from the ear, and gained the natuc of Mandusudas Ho is Baralı, Nrisinho and he who measured the universo with thrco paces. Thu's Hari is the father and mother of all beings, thicio nover was any one greater than liim por ever bljali bo.. IIo pro šuced the Brahmans from his mouth, the Bslıntryns fiom his arms, the Vaishyas from his thighs and the Shudras from his feet With his grent power he ordained the sacrifices on tho days of no woon and full mouri, Ho who ber vos this yogi, Keshav, gota grent wealth. The rnunis call this Keshav, preceptor, lathor and superior. He to 1 [4042] DIalabliaint (४६४२) पौर्णमास्यां तथैवच योगभूतं परिचरन् केशव महदाप्नुयात् ॥२०॥ फेशय परमतेजः संघ लोकपितामहः । एवमा हेपीकेशं गनयो वैनराधिप ॥ २६॥ एयमेन विजानीहि आचार्य पितरंगुरुम् । कृष्णोयस्य प्रसीदेत लोकास्तेनाक्षयाजिताः ॥ २२ ॥ यचयन भस्पाने केशवशरण व्रजेत् । सदानर पठभेद स्वस्तिमान् स सोमवेत् ॥ २३ ॥ येच कृष्ण प्रपद्यते तन मुह्यतिम नया । भयेमहति मांश्च पाति नित्यं जनार्दनः ॥२४॥ सतं युधिष्ठिरो ज्ञात्या याथातथ्येन भारत सर्वात् मनामहात्मानं केशवजगदीश्वरम् । 'अपनः शरणं राजन् योगानांप्रभुमीवाम् ॥ २५ ।। इति श्री महाभारते भीष्पपणि भीमवधपर्वणि विश्वोपाख्याने सप्तपष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ । भीम उवाच । शृणु चेद महाराज ब्रह्ममत स्तवं मम । ब्रह्मर्पिमिद्य देयैश्च य. पुरा कथितो सुचि ॥ १ ॥ साध्यानामपि देवानां देवदेवेश्वर प्रभुः । लोकभाषनभायत इतित्वां नारदोबचीत् ॥ २ ॥ भूतभव्य भवि यश मार्कण्डेयोप्युपाचह । यतत्या जानना पोप है जिसके ऊपर श्रीकृष्णजी प्रसन्न होय वह अविनाशी लोकों का विजय करने वालाहै, जो प्राणों के भयके स्थान में इनकी शरण में जाता है वह मनुष्य उसको स्मरण करना हुआ आनन्द पूर्वक निर्विन होताह और जो इनको प्राप्त होते हैं वह मनुष्य मोहमें नहीं फँसते हैं, यह जनार्दनजी बड़े भारी भय में डूबे हुये अपने भक्तोंकी सदैव रक्षा करते हैं हे महाभाग राजादुर्योधन वयधिष्ठिर इस प्रकारसे ठीक २ जानकर सर्वात्मारूपसे उस योगीश्वर जगदीश केशव मूर्तिकी शरणमें आश्रित है ।। २०॥ अध्याय ६८ ॥ भीष्मजी बोले हे महारान इसमेरे कहेहुये ब्रह्मरूप स्तोत्र को सुनों जोकि पूर्व समप में प्रथ्वीपर देव ऋषि और देवताओं ने वर्णन किया है ।१। भीष्मउवाच ।। मध्यानामापे देशानां देव देश सय लोक भावन भावश इतित्वानारदो sीत् ॥२॥ भूत भव्यं भविष्यञ्च मार्कण्डे योभ्यु वाचह ॥ यज्ञत्यां चैव देवानां whom shrco Rouyn is hind, indo structible and conqueror of the rorld. Ilenha te's historitat on foin danger, gains happiness without inte rujt. no he remembers lum. Ho ulio attains to lhiin, is neel: foolishness Janaidau always protects his durotvez croin danger. "Yudhishtlir koors these facts wol and is dovoted, liſc and soul, tv Kushiav thu lord of yogis as well as of the world."24. CILAPTER LXVIII "!Icar from me, king," said Bhishm, the song of praisc, sang is Brahma, which was reputed by divine'rislis and girls: "Narad des cribed thing as the Lord of the Saddas ans, and of the goda, god of goals nu well as foval by the world and knower of essence. 2. Afarhandeya - भीमपर्व Bhishma Pary [4643] चवदेवानां न पश्यतपसामपि ।। ३ ॥ देवानामपिदेवच त्यामाह मगवान्भः। पुराणवैध पर घिणो रूपं वेति च ॥ ४॥ वासदेचा वसूनांत्य शस्थापयिनां तथा देय देवोसि देवाना मिनि द्वैपायनोमयीत् ॥ ५ ॥ प्रजापतः सर्गे दक्षमाः प्रजापतिम् । नष्टार सर्वलोकाना महिगत्यां तथाऽब्रवीत् ॥ ६ ॥ मन्यते शरीरोत्थं व्यक्तन्ते मनसि स्थितम् । देवास्त्वत्सम्मवाश्चय देवलस्य सितोत्रवीत् ॥ ७ ॥ शिरसा ते दियं व्यासं चाभ्यां पृथियों तथा । जाते त्रयो लोका पुष्पेसिसनातनः ॥ ८॥ पयं स्थाममिजानन्ति तपसी भाविता नराः । भारमदान तृमानामृपाणां चापि सत्तमः ॥ ९ ॥ राजागामुदारागा माहवेदनिवर्तिनाम् । सर्व धर्म प्रधानानां त्यतिमधुसू दन ॥ १० ॥ इति नित्यं योगविद्धिर्भगवान् पुरुषोत्तमः । मनत्कुमारप्रमुखःस्तूयतेम्य यते हरिः ॥ ११ ॥ एपते विस्तरस्तात सक्षपच प्रकीर्तितः । केशवस्य यथातत्य. सुप्रीतो भजकेरायम् ॥ १२ ॥ सञ्जय उवाच ! पुण्यं धुत्पतदाख्यानं महाराजान तपश्च तपप्तामाप ॥३॥ देवानामपि देवच त्वा माद्द भगवान्भा ॥ पुराणं चैव परम: विष्णो रु तोनिय ॥ ४॥ वासुदेवो वन नात्वं गक्रयाप यांतया || देव देवोऽ सदेवा ना मिति द्वैपायनो बबीत् ॥२॥ पूरे प्रजापतेः सगै दक्षमाहुः प्रजापतिम् ।। मष्टारं सर्वलोकाना मांगेरास्वनियाऽब्रवीत् ।६। अन्यक्तंते शरीरोत्यव्यक्तं ते मनसि स्थितम् । देवास्त्वत् संभवाश्चैत्र देवलस्त्व सितोबवीत् ।७ शिरसाते दिवंच्याप्तं बाहु भ्यां पृथिवीतया ।। जठरते त्रयोले काः पुरुपोसिसनातनः । ८ । एवं त्वामानान न्ति तपमा भवितानगः । प्रात्मदर्शन नृमाना मृषीणां चापिमत्तयः १ राजीणामुदारा णा माहबेटा नियर्तिनाम् ।। सर्व धर्ममधानानां संगतिर्मधुसूधन । १० । इतिनित्य योगविद्धिर्भगवान पुरुषोत्तमः ॥ सनत्कुमारममुखैः स्तूयतेभ्यर्च्यतेहार । ११ एपते वितिरस्तात संक्षेपश्च प्रकीर्तित | केशरम्ययधातत्वं मुप्रीतो भव केशवम् । १२॥ speaks.of thee as the Past, the Present and the Fature, the sacrifices of the gods and the austerity of the aecuties. Bhagway Bhrigu speaks of thee as tlic goud of gods, tie nuost ancient Vislıou. Dwaipayan speaks of thee as Va-adev, Indra anong Vasks and the goi of gods, 3. Ang ra says that thou art the Prajapati of old, Dalsh the father of all. 6. Desal mpole of thee as unmanifest of body and manifest in mind and the creator of gods. 1. Thy head rervades the hearene, thy arms surrouad the eartlı, thy stomach contains tko three worlds and thoa art the eterval being 8. Thus tire asceties know thee and trae best of risliis that have an insight into self. Blagnanimous rajarshis who never turn lach from laftlernd uloare of good morals geel thy reluge, slayer of Madhu! 10. Hari the illustrious and supreme Lting is adored and worshived ly Sanatlumar and other ascctics and yogis This has bceu told tlitc in detail nrd in Lrier, turn tly licart in love to kebay. Sanjaya cart's ned: You base leand [4644] Mahabharat (४६४४) स्तव । केशब वर्गमेने स पाण्डवा महारथान् ॥ १३ ॥ तमप्रवीन्महाराज गीत शान्तनवः पुनः । माहात्म्यन्ते श्रुतं राजन् केशवस्य महात्मनः ॥ १४ ॥ नरस्य च पयारा पम्मा स्व परिपृच्छसेनृप । यदर्थ मृपुसम्भूतो गरनारायणावृषी ॥ १५ ॥ अवधौ च यथा वरीि सयुगेप्यपगाजितौ । यण च पाण्डवा राजन्नवघ्या युधिकरय चित् ॥ १६ ॥ प्रीतिमान् हि हद कृष्णः पाण्डवेयु पशस्विषु । तस्मादधीमि राजेन्द्र सो भवतु पाडयः ॥ १७ ॥ पृथिवीं भुइक्ष्व साहितो भ्रातृभियलिभिर्वशी । नरनार पणो देवारवायन शिप्पास ॥ १८ ॥ पवमुक्त्वा तव पिता तूष्णीमासीद्विशाम्पते । स्पसयच राज्ञान शयनच विषेशह ।। १९ ॥ राजाच शिविरं प्रायात् प्रणिपस्य महामने । शिष्ये च शयो शुने राति भरतर्षभ |॥२०॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने अष्टपष्टितमोऽध्यायः ६८।। सनपने कहा हे महाराग तुमने यस्ता पवित्र पाख्यान केशव तया पांडवों का माग शान्तनके पुत्र भीष्मजीने कहा तुमने केशवका महात्म्य सुना और नरकाभी रत्तान्त जसा तुमने पूछाया मैंने सुनाया यहभी सुना कि नरनारायण ने क्यों अब- तार लिया है दोनों वार मिलकर अपराजित हैं और पांडव भी अवध्य हैं कृष्ण को पांडों से अधिक भीति है इस लिये हे राजन् मैं तुम से मेलकरने को कहताई। अपने दसी भाइयों के साथ राज्य भोगो नर और नारायणका अपमान करने से तु नासको भास होगा यहकह कर बुद्धिमान् पितामह उपहोगये और राजाको भेजकर अपने शिविर में चले गये राजाभी नमस्कार पूर्वक अपने शिविर को गया और राधिका शयन किया २० ॥ this holy description of the magnanimcus Keshar end of tho Pandara warriors. Ilhislım the son of Shantanu futi er sad, "Thoa hest heard of the greatness of Kesbay and of Nar as thou askedut of we. as well as the causo of the incarnation of Nar and Narayan. You know why those tivo Warriory joined together are inconquerable and why no one can kill the Pandives. frislin bears grcat love to the cong of Pandu anu it is t':erefore that I advise you to make peace with then. 17. Denjoy the kingdom together with your brothers, Prizes By desicgaruug Nur nod Mnrayan thou shalt cout thing on swim Bariog taid this wisc Bhisha bucano silent and having bidden Good night tu trio hing, catored his og'i teat. Tlie prince too,-laring, pada wis respect to Bhishita weut away to his tent and laid liimsoli doiros for the night. 20.

1 भीमप Bhishma Pary [46151 सञ्जय उवाच । व्युपितापांत शर्या मुदिते घ दिवाकरें। इमे सेने महाराज युद्धायैव समीयतुः ॥ १॥ अभ्यधावन्तसद्धाः परस्पर जिगीपः। ते सय सहिता युद्ध समालोक्य परस्परम् ॥ २॥ पांडवाधाराष्ट्राश्च राजन् हुमंन्त्रित सघ । व्यूही च व्या संरब्धाः सम्मानहारिणः ॥३॥ रक्षन् मकराई भीमो राजन् समततः । तव पांडवा राजन् नरक्षन् व्यूह मात्मनः ॥ ४॥ स नियया महाराज पिना देच प्रत स्तव । महता रथशेन सम्वृतो रविनायरः ॥ ५॥ इतरेतर मन्वायुयामाग मस्मि ताः । रपिनः पत्तयश्चैव दन्तिनः सादिनस्तया ॥ ६ ॥ तान् दृपया युवतान् संख्ये पांड घाहि यशस्विनः । श्येनेज व्यूहगजेन तनाजय्येन संयुगे ॥७॥ यशोमत मसे तस्य भीमसेनो महाबलः । नेत्रे शिखण्डी दुर्धपों पृष्टद्युम्नल पार्यत. ॥ ८ ॥ शीतस्याभय अध्याय ६२ । संजयशेले हे महाराज रात्रिन्यतीत होने और सूर्य के उदय होने पर फिर दोनों सेना सम्मुख वर्तमान हुई, वहसव एकसाथ युद्ध में परस्पर देखकर अत्यन्त क्रोधित होके परस्पर में विजय की इच्छा से सम्मस दौड़े, हे राजा आपकी पुरी सलाहों के होने से अापके पुत्र और पांडव व्यूहों को रचकर अत्यन्त प्रसन्न और अलंकृत होके महारों को करने लगे, फिर भीप्मनीने चारों ओर से अपने मकर नाम व्गृहको रक्षाकी इसी प्रकार पांडवोंने अपने व्यूहकी रक्षाकी हे महाराज पड़े रथसमूहों समेत राथियोंमें श्रेष्ठ आपके पिता भीप्मनी पले १५। और दूसरी ओरके भी रथी हाथीपति और घोड़ों के सवार इत्यादि सब अपने २ स्थान और अधिकार में नियत होकर पाछे २ चले, यशस्वी पाण्डव कौरवोंको युद्ध में सन्नद्ध | देखकर उस युद्धमें अजेय राजश्येन नामव्यूह से युद्ध होकर सम्मुखता में वर्तमान हुए उसव्यूह के मुखपर महावली भीमसेन शोभायमान हुआ और नेत्रों पर दुर्जय शिखण्डी और धृष्टपम्न नियतहुए, सत्य पराक्रमी चली सात्यकी उसके शिर CHAPTERLXIX. Sanjaya to Dhritrashtra:.-"At the c!o:e of the night, at suprise, both the a.mies fiuced one anothe:, and rushed against on another in anger to gain victory. On account of your ill advice, King, your bons and the Hundasas, having anayed their armies and decked themselves with a cheerful mind, discharged their weapons against one ano.ber. Buisim piutected from all sides bis array which he had formed of the shape of a crocodile. The Pandavas tco, prolected their array. Your father the best of charioteers rode on followed by numberless chariuts 5. The charioteers, clephant riders, horsemen and others of the opposito party, stationed in their proper places, followed them. The glorious Pandavas, secing the Kauls.as ready for action, fucod them with their invinciblo array of the form of a royal hark. At the mouth of this array yaz Bhim the big rest of warrio:s; at the eyes [[4010] Nahabharat द्वीस सात्यकि सत्य विक्रमः । विधुन्चन गाण्डिवं पार्थो ग्रीवायांमभवत्तदा ॥९॥ अक्षौहिण्या समं तत्र वामपक्षो भवत्तदा । महात्मा द्रुपदः श्रीमान् सह पुत्रेण संयुगे ॥ १० ॥ दक्षिणवाभवत् पक्षः कैकेयोऽक्षौहिणी पतिः। पूछतो द्रोपदेयाश्च सौभद्रश्वाति वीर्यवान् ॥ ११॥ पृष्ठे समभवच्छीमान् स्वय राजा युधिष्ठिरः । भ्रातृभ्यां सहिनोधारो यमयां चारु विक्रम. ॥ १२ ॥ प्रविश्यतु रणे भीमो मकर मुखतस्तथा । भीममासा द्य संग्रामे छादयामास मायकैः ॥ १३ ॥ ततो भीमो महास्त्राणि,छादयामा भारत । महयन् पाण्डुपुत्राणां घूढ सैन्य मह हये । समुह्यति तदा सैन्ये त्वरमाणो घनलयः । भी शरसहस्रग विध्याधरणम्र्धनि ॥ १५ ॥ प्रति सवार्य चास्नागि भीममु कानि संयुगे । स्थेनानी केन हटे। युद्धाप समस्थित ॥ १६ ॥ ततो दुर्योधनोराजा माद्वा. पर विराजन न हुआ और अर्जुन आने गांडीव धनुषको चलायमान करता हुआ ग्रीवामें वर्तमान हुआ, और श्रीमान् महात्मा द्रुपद अपने पुत्रों समेत एकमती हिणी सेना समेत व्यूह के वायें पक्ष में हुआ । १० । और दाहिने पक्षमें एक अक्षौहिणी को लिये केकय नियत हुआ ओर द्रौपदी के पांचो पुत्र और महावली अभिमन्यु पीछेकी ओर हुए और उत्तम पराक्रमी श्रीमान् राजा युधिष्ठिर नकल सहदेव भाइयों समेत व्यूह के पृष्ठभाग में शोभितहुए, तबभीमसेन ने मुसके मार्ग से उम कौरवों के मकर व्यूह में प्रवेश कर के भीप्मनी को पाकर उसयुद्ध में शायकों से ढक दिया. फिर पराक्रमी भीमजी ने भी बड़े अत्रों को फेंका और वड़ायुद्ध कर के पांडवों के व्यूहको मोहित कर दिया फिर सेना के मोहित होनाने पर बड़ी शीघ्रता करनेवाले अर्जुन ने उस युद्ध भूमि में आकर हजार बाणों से भीप्पनी को घायल किया । १५ । युद्ध में भीमनी के छोड़े हुए वाणों के प्रारको सहकर अपनी प्रसन्न सेना के साथ युद्धकरने को उपस्थित हुआ wore brave Shihliaudi nnd Ilurishitadyuinna Biave Satyahi of true prowess stood at the head and Arjun, with his Gandiy bow moring hither and thither, stationed musalt at its neck. Great Drund of good forterned together welly alsheshininemr stand on the left wing. 10. And on the right wing, with an akshauhini of army, King Kailnga. 'llie five sons of Draupadi and bravo Abhinangu were on the rear, nud Prince Yudhishthir of great prowess, together with his brothers Nakul and Saliarley, brought up the rour. Bhineen ontend the mouth of ilio crocodile nimy of ile Kauritas, and secing Bl.islım thero, covered him with arrows. Then Bhishm, full of proses discharged liis powerful weapons and stupefied the armies of 1110 landasas Whicn the a-ny-was thus stupcficd the dextorous Arjun canic into tho red or battle and covered Buishun with thou-ands of arrons .15. Receiving the shower of Bhishma's • arrors lo fought nt the head of his chicorful warrior: Then lyve l'rinces stood (४६४७) भीष्मपर्य Bhishma Panv [4017] जमभाषत । पूर्व एवा वधं घोरं बलस्य बलिनांवरः ॥ १७ ॥ भातृणांघ यधं युद्ध स्मरमाणो महारथः । आचार्य सततं हित्वं हितकामो ममानघ ।॥ १८॥ ययहित्या समाश्रित्य भीष्मं चैव पितामहम् । देवानपि रणे जेतुं प्रार्थयामो न सशय ॥ १९ ॥ किंमुण्डुसुतान् युद्धे हीन वीर्य पराकमान् । स तथा कुरु भदन्ते पथ पयन्ति पाडवा. ॥ २० ॥ एवमुकत्ततो द्रोणस्तव पग माम्पि अभिनन् पाण्यानी प्रेक्षमाणस्य सात्यकः ॥ २१ ॥ सात्यकिस्त ततो दोग धारयामासमारत । तयोः प्रधवृते युद्धं घोरकर भयावहम् ॥ २२ ॥ यातुरणे क्रुद्धो भारद्वाजः प्रतापवान् । शविष्य निशितैर्वाणैर्जदेह सन्निव ॥ २३ ॥ भीमसेनस्ततः युद्धो भारद्वाजमवियत । संरक्षन् सात्याकं राजन् द्रोणान्छस्नभृताम्बरात् ॥ २४ ॥ ततो द्रोणश्च भीमता शल्यश्च मारप । भीमसेन रणे कुद्धाश्छादयाञ्चक्रिरे शरैः ॥ २५ ॥ तवाभिमन्यु: सकुद्धो द्रौपदे पाय मारिप। विष्यनिशितैः सर्यास्तानुद्यतायुधान् ॥ २६ ॥ होण इस के पीछे पराक्रमी राजादुर्योवन पूर्व दिनमें सेना समेत भाइयोंके मरणको देखकर द्रोणाचार्यजी से बोला कि हे पापोंसे रहित आचार्यगी आप सदैव मेरा हित चाहनेवाले हो हमसब आपकी और भीमजी की रक्षा होकर देवताओंकोमी निस्सन्देह युद्ध में विजय करसक्ते हैं, युद्धमें वल पराक्रम रहित पांडवों को विजय करना कितनी वातहै आपका कल्याण हो आपवही कामकरो जिसमें पांडव मारे जायँ ।२०। तदनन्तर आपके पुत्र के इसरीतिपर कहनेसे द्रोणाचार्य जीने सात्यकी के देखते हुए पांडवों की सेनाको वाणोंसे भेदा, इसके पछि हे भरतवंशी सात्यकीने द्रोणाचार्य को रोका फिरतो महाघोररूप युद्धहोनेलगा, फिर महाप्रतापी द्रोणा चार्य ने अत्यन्त कोषयुक्त होकर सात्यकी को दश व णों से शत्रुस्थान में घायल किया इसके पीछे सात्यकी की रक्षा के निमित्त उत्प्सक्रोधरूप भीमसेन ने द्रोणा चार्य जी को वाणों से बेधा फिर द्रोणाचार्य भीम और शल्य ने बड़े वाणों से भीमसेन को ढक दिया । २५ । इसके पीछे महाक्रोध भरे अभिमन्यु और द्रुपद के Duryodhan, remembering the destruction of his brotles and warriors, said to Dronacharya - Sinless acharya, you are alnays my well wisher. Protected by you and Bhishi m we aspire to win oven the gods in battle, how easy it is to conquer the weal Panda vas! Bo careful to destroy the Pandavas" 20. flearing the words of your son, Drolacharya pierced the armies of the Pandavas within sight of Satyaki. Then, o doscendant of Bharat , Satyaki checked Dionacharya and the battle was dreadful in the ortreme. Valliant Dronacharya in great anger, w ou nded Satyalı with ten arrows in the field of battle, and ir thu protection of Satyahi, Bhimsen wounded Dronacl arya. Then Dronacharya, Bhishin and Shalya covered Bhiin with their long arrows. 23. Then the enraged Ablimanyu and the sons of Drupad wounded those varriors with sharp arrows. Then the Malabladet [46461 १४६४८) भी मौ तु संकद्धावागतसो महायलो । प्रत्युद्ययौ शिखण्डीतु महेष्वासो महाहवे ॥२७॥ प्रगृह्य बलवीरो धनुर्जलदनि वनम् । अम्पवर्षपछौस्तूर्ण छादयानो दिवाकरम् २८॥ शिखण्डिन तमासाद्य भरतानां पितामह । अवर्जन समाम स्त्रीय तस्थान संस्मरन् ॥ २९ ॥ ततो द्रोणो महाराज अभ्यद्रवत तरणे । रक्षमाणस्तदाभीष्म तव पुत्रेणचो दित. ॥ ३० ॥ शिखण्डीत समासाद्य द्रोणशस्त्रभृताधरम् । अयनपतसन्त्रस्तो यगा ताग्निमिगेल्यणम् ॥ ३१ ॥ ततो क्लेन महता पुनस्तव विशाम्पते । जुगोप भाममा साय मार्थथानोनयश. ॥ ३२ ॥ तथैव पाण्डवाराजन् पुरस्कृत्यधनमयम् । भीष्ममेवा भ्यवर्तल जये कृत्वा दृढामतिम् ॥ ३३ ॥ तयुद्धमभवद् घोर देवाना दानवैरिय । जय माकांसतां सख्ये याच महादभुतम् ॥ ३४॥ इति श्री महाभारते भाष्माणि भीष्यवधपर्वणि पञ्चमदिवसयुद्धारम्भे ऊन सप्ततितमोऽध्यायः। ६९ ॥ पुत्रों ने उन सब शखगारियों को बड़े तीक्ष्ण बाणों से वेधा फिर महाधनुपधारी शिखण्डी उनमहा क्रोधरूप अतुलाराक्रमी भीष्म और द्रोणाचार्य के सम्मुखगया, ववार शीघ्री वादलके समान गर्गना करताबड़े भारी धनपको लिये बाणों से सूर्य को दककर तीनवाणों की वर्षाकरनेलगा, फिरभरतवंशिय के पितामह भीष्मजी ने इस रीति से शिवण्डीको सम्मुख पाकर उसके स्त्रीभावको स्मरणकरके उससे युद्ध | करना त्याग किया, हे महाराज इसके पीछे अापके पुत्रके करने से भागनी की रक्षाकरते हुए द्रोणाचार्यजी संग्रामभूयिमें उसके सम्मुख दौडे ३०। फिर भयभीत शिखण्डी ने उनमहाशस्त्रोत्ता प्रलयकी अग्निके समान प्रकाशमान द्रोणाचाय्य को अच्छीरीतिसे सम्मुखहोकर रोका, हे राजा इसके पीछे युद्धाभिलापी आपके पुत्र ने बड़ी सेना समेत भीमनी की रक्षाकी, और इसी रीति से पांडव अर्जुन को भगे। करके और विनयमें दृढ़ बुद्धि होकर भीप्मनी के सम्मुख हुए, वह ऐसा महापौर युद्ध हुमा जैसा कि देव और दानवों का संग्राम होता है उस युद्ध में विजपाभिला- | पा शूरवीरों कीवडीमपूर्व कीर्ति विख्यात हुई ३४ ॥ grcat archer Shikbandı faced the great wa r.ors Bluralm and Drona charya. That great warrior rolling like thunder, showered arros from lus bow and colored the sun with them. Then Blushim the grandsıro of the Kauraras, seeing Shiklandı beloru lum and renitalice ing lies woranlıood, ceased fighting, Then, at the request of your son, Dronacharya ruslied to face Shuibhandi to protect Bhishım 30 Shihlinndi, though terrified, resisted well the attack of Dronacharya the great master of the use of weapɔns and glorious like the fire of proluya Then, 0 hing your son desirous of fighting, protected Blushen with his great arty. In a like manner, the Pandavas, headed by Arjun and resolved on conquering, encountered Whish. Thc battio raged as fierco as that between the gods and tho Danavas to the great famo of the warriors desirous of conquest. 340.

॥ (४६४९) भीष्मपर्व Bhishma Pary [46491 साय उवाच ॥ मकरोत्तुमुलं युद्ध भीष्मः शान्वावस्तदा । भीमसेन मया दिन्छ न पुत्रांस्तारयितुं तव ॥ १ ॥ पूर्वाहणे तन् महारौद्र रानां युद्ध मर्तन । कुरणांपांडया नांच मुख्यशर विनाशनम् ॥ २॥ तस्मिन्नाकुल संग्रामे पर्तमाने महामये । अमयतुम लः शनःसंस्पृशन् गगनं महत् ॥३॥ नदनिथ महानाग हेपमाणधवाजिभिः। मेरी शंख निनादेश तुमुल समपद्यन ॥४॥ युयुत्सवस्ते विकारता धिजपाप महारलाः । भन्योन्यमभि गर्जन्तो गोप्टेग्घिय महर्षभाः ॥ ५ ॥ शिरसां नात्यमानानां समरे निशितैः शरैः। अश्मवृष्टि रिवाशाशे यभूव भरतर्षभ ॥६॥ कुण्डलोणीपघारीणि जातरूपोजन्य लानि च । पतितानि एम दृश्यन्ते शिरांसि मरतर्पम ॥ ७॥ विशिखोन्मसिगात्राहमि . सकाकैः सहस्ताभरणश्चान्य रभवच्छादिता मही ॥ ८ ॥ कयचोपहितावहस्ते व समलंकृतः । मुखश्व चन्द्रसंकाशे रकान्तनयनैः शुभैः ॥९॥ गजवानि मनुष्याणा अध्याय ७० संजय बोले कि आप के पुत्रों की रक्षा चाहने वाले शांतनु भीमजी ने बड़ा कठिन युद्ध किया, वह बड़ा भारी युद्ध दिनके पूर्व भाग में पांडव और कौरवों के रानाओं का नाश करने वाला हुआ, उस बड़े भयानक सत्र को व्याकुल कर ने वाले महा घोर युद्ध के होनेपर आकाश को व्याप्त करने वाला महाघोर शब्द हुभा, और हाथियों की चिंघाड़ और घोड़ों के हिनहिनाटों से वह शब्द अत्यन्त कठोर होगया, फिर वह पराक्रमी शूरवीर विनयाभिलापी होकर परस्पर में युद्ध करतेहुए ऐसे गर्ने जैसे कि गौओं की शालाओं में पकी वई गर्जना करते हैं । ५ । हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ उस युद्ध में तीक्ष्ण वाणों से कटे हुए शिरों की ऐसी दृष्टिहुई जैसी कि आकाश से पापाणों की वर्षा होती है और बड़े सुन्दर सुनहरी कुण्डल और मंडीले पहरे हुए शिर पृथ्वी पर गिरे दृष्टि गोचर विशिखों से भिदे हुए अंग और कुण्डलधारी शिर और अनेक हायों के भूषणों CHAPTER LXX Banjay: "Shantanu's son, Bhishm the wellwisher of your sons, fought a hard fight. The severe fighting in the early part of the day was destructive of the allies of the Kauravas and the l'andavas. At the compencement of that dreadful war, there was a great uproar which filled the firmament. The slirieking of clephants and the neighing of horses made the uproar yet more tremendous. The brave warriors, desirous of victory, roared so loud during the battle as bulls bellow in tho niidst of cows. 5. Obest of the descendants of. Bburat! the leads struck by sharp armws fell thick like a shosser of stones from the sky. Heads decked with beautiful gold earrings and turbaas, were seen bere and there on the ground. The bodies pierced through with darts, the hezds adorned with earrings and various ornbments of hands corcred the ground. The bodies decked with armour [4650] dlalabharat सर्व गात्रैश्च भूपते । आसीत् सर्वा समास्तीर्णा महतैन बसुन्धरा ॥ १० ॥ रजो मेध तुमुले शस्त्र विद्युत्प्रकाशिभि । आयुधानांच निधोपः स्तन यित्नु समो भयत् ॥ १ ॥ ससंग्रहारस्तुमुलः कटुकः शोणितोदकः। प्रावर्तत कुरूणांच पांडधानांच भारत ॥१२॥ तस्मिन्महाभये घोरे तुमुले लोमहर्षगे। यवृपः शरवर्षाणि क्षत्रिया युद्ध दुमंदाः ॥१३॥ आरोशन कुञ्जरास्तत्र शरवर्ष प्रतापिताः । तावकानांपरपांच संयुगे भरतपम ॥१४॥ संरधानांचधीराणां घोराणाम मितौ जसाम् । धनुर्या तल शब्देन न मानायत किंचन | ॥ १५ ॥ उत्थितेषु कबन्धेषु सवतः शोगितोदक । समरे पर्य धावन्त नूपा रिपुवधीयता 1॥ १६ ॥ शरशक्तिगदाभिस्ते खडगवानित तेजसः । निजघ्नुः समरेन्योन्यं पूरा परिष पाहवः ॥ १७ ॥ ममः कुउजरावात शर्षिद्धा निरंकुशाः । श्याश्च पर्यधावन्त हतारो से पृथ्वी व्याप्तहोकर गुप्तसी होगई, हे राजा अगों में कवच विभूषित भुजाचन्द्रमा के समान मुख और लाल नेत्रों से और हाथी घोड़े और मनुष्यों के सब अंगों से मव युद्धभूमि एक महूर्त में ही भरकर पूर्ण होगई ।१०। धूलके कठिन बादलों में शखरूप बिजली प्रकाशितथी और उन्हीं शस्त्रों के शब्दों से बादलकी गर्जनासी होतीथी हेराना कौरख और पांडवों के वह शस्त्रोंका परस्पर प्रहार महा कठिन सहने के अयोग्य हुआ जिसमें रुधिर की नदी वह निकली बत महा भयानक घोर तुमुलवाले रोम हर्पण युद्ध में दुर्मद् क्षत्रियों ने वाणों के जाये को वरसाया, यहां वाणोंकी वर्षा से अत्यन्त पीड़ामान् हाथी पुकारे और पाण्डवों के शूरवीर शास्त्रों से शोभित होकर चारों ओर से दौड़े, अत्यन्त कोपयुक्त पराक्रमी शूरवीरों के धनुपों के टंकार शब्दों से कुछ भी नहीं जान पड़नाथा । १५ । सब ओरसे जलरूप रुधिर के मध्य में दिन शिर घोड़ों के उड़ने पर शत्रुओं के मारने को उपस्थित दूसरे राजालोग चारोंओरको दौड़े बड़े तेजस्वी परिघ के समान भुजाधारी वीरोंने युद्ध में वाणवरही गदा और खड़गों से परस्पर में एक को एक ने मारा, और वाणों से घायल हाथी अंकुश के विनाही इधर उधर घूमने लगे और जिनके सवार मारेगये ऐसे घोडेभी the faces liho the moon, the red eyes and the limbs of elephants, losses nud men, filled tho whole field of battlo. 10. Weapons shonc libe lightning tlırough the clouds of dust and clasliec like thunder. The mutual strol.es of the Kauravas and the Pandavas,oking, were hard to bear and a uver of blood flowed down in that liard contest ! biave warriors showered networks of arlons. With the shomer of Arrows elcpliants shield and the Paway warriors armed with siento pons rushed from all sides. The twang of the laws of the cumstad warriors clerfenad the ours, 15. Inta that riter of Lloxl, the Are riors rusied upon tlusse ni lo were mounted on headless lorses. The Jornve narriors with their arms like clubs, discharged their arrows, spears, maces nnd sworls. The clplants sounded by arrows rushed luther and thither without the agency of the sun . 10 one another भीमपर्य Bhishtha Pury [4651] हा दिशादर्श ॥ १८ ॥ उत्पत्य निपतन्त्यन्ये शरघात प्रपीडिताः । तापकानां परेषांच घोंघा भात सत्तम ॥ १९ ॥ बाहानामुत्तगांगानां कासुकाणांच भारत । गदानां परिघा णांच हप्तानांचोरुभिः सह ॥२०॥ पादानां मपणानांच फेयगणांचसंघशः । राशयातत्र दृश्यन्ते मारत भीष्मं भीमसमागमे ॥२१॥ अयानांकुजगणांच रथांचा नियर्विनाम् । सधाता-स्मनश्यन्ते तत्र तत्र विशाम्पते ॥ २२ ॥ गदाभिरसिभिः प्रासणखत पर्वभिः । जन्नुः परम्परं तत्र क्षत्रिया-काला गते ॥ २३ ॥ अपरे पाहुभिरा नियुद्ध- कुशलायुधि । बहुधा समसजन मापसैः परिधरिय ॥ २४ ॥ मुष्टिीमीनुभिवच तले व विशाम्पते । मन्योन्यं अग्निरे धीरास्तावकाः पाण्डवै सह ॥ २५ ॥ पतितः पात्य मानव विचेटद्भिश्च भूतलं । घोरमायोधन जज्ञे तम त जरेश्वर ॥ २६ ॥ विरधारथि नांत्र निशिवरधारिणः । अन्योन्यमभिधावन्त परस्परवरिणः ॥ २७ ॥ ततो दुर्यो दशों दिशाओं में दौड़ते फिरदेथे, और कोई वागों से पीड़ितहोकर वठरकर गिरते ये और आपके व पांडवों के शूरवीर भ्रमण करनेलगे ।११। पृथ्वीपर गिरेहुए वाण वरली मंदा खड्ग और परिध जांघ और हाथों से युक्त धरण भूषण समेत कपड़ों के तोदे भीमसेन और भीप्मनी के सम्मुख पड़ेहुए दृष्टिपड़ते हैं, हेरामा जहां तहां दौड़ते हुए घोड़े और लौटतेहुए हाथियों के समूह दृष्टिगोचाहुए, वहां कालके प्रेरित क्षत्रियों ने गदा खड्ग मास और मुकेहुए पर्ववाले वाणों से एकने एक को परस्पर में मारडाला युद्ध में भुज वलकरने में कुशल शूरवीर लोहेके परिघ समान अपनी भुजाओं के द्वारा बहुत प्रकार से वहे, हे रामों पांडवोंके साथ आपके शूरवीरों ने मुष्टिका जानुतल और कीलोंसे भी परस्पर में घात किया । २५ । और जहां तहाँ गिरे और गिराये हुए पृथ्वीपर चेष्टाकरने वाले शूरवारोंसे युद्धभुमि महा भयकारी दीखने लगी, और स्थी रथमे पृथक् अथवा उत्तम खड्गके धारण करने वाले परस्पर घातके आकांक्षी एकएक के सम्मुख दौड़े, तदनन्तर बहुत से कलिङ्ग देशियों से युक्त राजा दुर्योधन युद्ध में भीमजी को आगे करके पाण्डवों के सम्मुख वर्तमान Thú riderless horses were seen running on all sides. Souc rounded by artons rose and felt again, and the warriors of your sons and those of the Pandavas roanied all through 19. Tlio arrows, spears, maces, swords, clubs, lege and arms with ornaments anti heaps of clothes were secti before Blielım and Blain. Numliers of running borses and returning clephants were to be scen all sovu. The Farrors, urged on Ly Dentit killed one auother with their maces, swords and arroirs. The brave sertiors, detterolis in the art of fgliting, with their armasiljard lile steel, rushed upon the occl.er. Jcur karrose ard those of the Pan đalos too bit lord llcrs with their fists and legs 25. 11c manicrs, fallen on the grcund made the accre li.dccus with t) eir bodies nior. ing in tarios mentcrs. Ile clictus de prired (fi) aicts and the kwordsmin wishing to use thier voords, irsi ad usan pa arnther - .

huch lihen lion's tail shon ngainst the Bly, wucli tliough lifted [46521 Mahabharat (४६५२)। धनो राजा कलियभित । पुरस्कृत्यं रणे भीष्म पाण्डयानभ्यवर्तत ॥ २८ ॥ तथैव पाण्डयाः सर्वे परिधार्य वृकोदरम् । भीष्ममस्यद्रयन क्रुद्धास्ततो युद्धमवर्तत ॥ २९ ॥ इतिश्री महाभारते भीमपर्वाणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्ध सप्ततितमोऽध्यायः॥ ७० ॥ सजय उवाच । दृष्ट्वाभीष्मेण ससकान् भ्रातृनन्यांध पार्थिवान्। समभ्यधावा नेयमुद्यतालाधनञ्जयः ॥१॥ पाचजन्यस्थ निर्घोप धनुषों गाण्डिवस्पच । वजनदृष्टवा पार्थस्यसवानोभयमाविशत् ॥२॥ सिंहलांगूलमाफाशे ज्वलन्तमिवपर्वतम् । मसजमान वृक्षेपु धमकेत मिवोरिथतम् ॥३॥ बहुवर्ण विचित्रच दिव्यं यानरलक्षणम् । अपश्याम महाराज ध्वज गाण्डीव धन्वनः ॥४॥विद्युत मेघमध्यस्थां भ्राजमाना मिवाम्यो । ददृशु डा, और इसी प्रकार युद्ध में क्रोधयुद्ध शीघ्रगामी सवारियों वाले सब पाण्डव भीमसेन को मध्य में करके भीष्मजी के सम्मुख दौड़े। २९ ॥ अध्याय ७१।। संजय बोले कि भीमजी से युक्त भाइयों और अन्य बांधवों को देखकर अस्त्रधारी अर्जुन गांगेय भीष्म के सम्मुख दौड़ा फिर पांच जन्यशंख और गांडीव धनुपका शब्द सुनकर और अर्जुनकी ध्वजा को देखकर हमसब लोगों में भय उत्पन्न हुआ, हे महाराज हमने गांडीव धनुपधारी की उसध्वजा को भाकाश 'में देखा जो सिंहलांगूलनाम भाकाशमें प्रकाशित पर्वत समान वृक्षों में न रुकने वाली ऊंची उठी हुई अनेक रंगों से युक्त श्रीहनुमान जीके चिहन से अलंकृत थी. जमे कि आकाशके वादलों में नियत शोभायमान विजली दिखाई देती है उसी प्रकार शूग्वीरों ने भारी युद्ध में मुनहरी पृष्ठवाले गांडीवधनुप को देखा, फिर हमने इन्द्र के समान सम्मुख गर्जना करते और आपकी सेनाको मारते हुए अर्जुन के लोके महाघोर शब्दों को बारम्बारसुना, जैसे कठिन वायुयुक्त बादल विजनी और भनके साथ होताहै उसी प्रकार अर्जुन ने चारों ओरसे वाणों की वर्षा से Duryodhan accompanied with a large number of Kalingu led by Bhishin cncountered the Pandavas In a like manner tho caramal Pandavas healed by Bhim, rushed upon Bhushm" 29. CHAPTER LXXI Sanjaya Suing the brothers and their hipsinen in company with Bhislım, Arjun armed with lus veapons, encountered Bulm tho coa of Gangr. ilcoring of the sounds of the Gandiy bors and of the conch knornas Punchjanyn, and the sight of Arjun's Lanner, tum We san, 0 hing, the banner of tho nielder of tho gandir on hızlı could nut ba a-reated us trees and which was decorated with thio figura nf daguman in dill rent colours The warriors fan in the tre'l ve buttle that solder of the golden Gandit lilc lightning fied us - भीष्मपर्ष Bhishma Pary [4653 गोण्डिव योधा रुपमपृष्ठं महामृधे ॥ ५ ॥ शुक्षम भृतं चास्य समस्येवाभि गर्जतः । सुघोरं तलयोः श निस्तष वाहिनीम् ॥ ६ ॥ चण्डपाती या मेघा सविद्युत् त नायित्नुमान् । दिशः संप्लावयनसर्गाः शपचः समन्ततः ॥ ७॥ असण्यधायगांगये भैरवालो धनंजयः । दियं प्राच प्रतीचीच न जानीमोल मोहिताः ॥ ८॥ कान्दिराभूताः श्रान्तपत्रा हताश्वाहतचेतसः । अन्योन्यमभि संलिभ्य योधास्त भरतर्षम ॥९॥ भोग मेवाभ्य लीयन्त सह संस्तवात्मजः। तेषामयिनमभूद्री म शान्तनयो रणे ॥ १० ॥ समुत्पतन्ति वित्रस्ता रयेभ्यो गधिनस्तथा। सादिनचाख पृष्ठम्यो भूमौ वापि पदातपः ॥ ११ ॥ श्रुत्वा गाण्डीय निघोपं विस्फूर्जित मिचाशनेः । सर्व सैम्पानि भीतानि यथा लीयन्त भारत ॥ १२ ॥ अथ काम्य जजेरवहाद्भः शीघ्रगामिभिः । गोपानां यासाह त्रैवलगोपापनवृतः ॥१३॥ मद्रसौवीरगान्धारगर्तश्च विशाम्पते । सर्वकालिगमुण्यश्व कलिगाधिपतिवृतः ॥ १४ ॥ नानानरगणोधैश्च दुःशासनपुर.सरः । जयद्रयय नृपतिः दिशाओं को चलायमान कर दिया । ५ । भयानक अस्त्रवाला अर्जुन भीमजीके सम्मुख दौड़ा उससमय हमने अस्त्रोंसे व्याकुल होकर पूर्खादि दिशाओं कोभीनहीं पहचाना, हे भरतर्षभ आपके अचेत होने वाले शूरवीर जिनकी सवारी यकी और घोड़े मरे वा किसी दशा में नियत थे, वहसव परस्पर में मिलकर आपके पुत्रों समेत भीमजी केही आश्रय में होते थे और भीष्मनी उनकी रक्षा करते थे । १०॥ भयभीत रथी अपने रथों से और सवार घोड़े की पीठसे और पदाती पृथ्वी से अत्य स्त उछलते थे, हे भरतवंशी गांडीव धनुप के वजू के समान शब्दों को सुनकर सेना के सब मनुष्यमारे भयके भागे, इसके पीछे राजा कालिंग बड़े शीघ्र गामी कांवोन देशीय उत्तमघोड़ों के द्वारा गोपायन नाम गोर्पो की असंख्य सेना युक्त भद्र सौवीर गान्धार त्रिगर्तदेशी और कलिंगों की उत्तमसेनाके शूरवीरों समेत नानामकार की के समूहों को साय लिये जिनमें मुख्य दृशासन और सवराजाओं in the clouds. 5. We heard again and again the dreadful sounds of Arjun's claps thundering like lodra and hilling your armies. He filled with the shower of his arrows all the directions like a thunderstorm of mixed clouds and lightning. Arjun the wielder of dreadful weapons rusled against Bhislıw and, distressed by his weapons we could not distinguishi the cast from west. Your fainting warriors, O hing, with their animals tired and horses killed, rallied round Bhishnu for protection and ho saved them from slaughter. 10. The terrified charioteers jumped down from their chariots, the horsemen from their Lorses and foot soldiers from the ground. Being tho vajia lile sounds of the Gandiv bow the people of the army lled with terror, Then the king of Kaling together with swift Cambojes and the nudi. berless horsemen of the Gopayans, Bhadras, Seavirs, Gandhars, Trigarts and Kalingas with armies of different sorts, headed by Da.

Jalabiniat {४६५४) [1654 ] सहित सर्वराजामि ॥ १५ ॥ यारोह वरावैध तव पुत्रेण चोदिताः । चतुर्दशसहसान सौरल पथ्र्यवारयन् ॥ १६ ॥ ततो सहिताः सर्वे विभक्तरगवाहनाः अर्जुन समरे जनस्तावका भरतर्षभ ॥ १७ ॥ रधिभियारणाश्वैः पादतिय समीरितम्। घोर मायोधन के महासहश रजः ॥ १८ ॥ तोमरप्रासगाराच गजाबरायोधिनाम् । चलेन महता भीष्मः समसज्जन् किरीटिना ॥ १९ ॥ भावन्त्यः काशिराजेन भीमसेनेने सम्बयः । अजानशत्रुद्राणामृपमेण पंशम्चिना ॥ २० । सहपत्र सहामात्यः शस्येन सममजत । विकर्णः सहदेयेन चित्रसेनः शिखण्डिगा ॥ २१ ॥मस्या पर्योधन जग्मु शनिश विशाम्पते । पाश्चेकितानध सात्यकिशमहार! 11 २२ ॥ द्रोणेन समाज त समेत राजा जयद्रथ और आपके पुत्रके भेजे हुए चौदह हजार उत्तम मा सवार इन सर्वोने चारोंओर से सौचलके पुत्रको मध्य में करलिया । १६ । इसके पीछे उन सव पांडशेने जिनके रथ और सवारियां बुद्धिके अनुसार विभाग युक्तथीं एकसाथ ही आकर आपके शूरवीरों को मारा, रथी हाथी घोड़े और पदातियोंसे अच्छेपकार से चलायमान युद्ध भूमि बड़े बादलों के समान धूल से महा भयकारी विदित हुई भीमनी तोमर मास नाराच और हाथी घोड़े रथों से युद्ध करनेवाली शूर वीरोंकी सेना समेत अर्जुन से अत्यन्त लड़े राजा अवन्ती काशी के रामा के साथ और भीमसेन जयद्रथ के साथ और राजा युधिष्ठिर पुत्र और प्रधानों समेत मद्रदेश के राना शल्य के साथ अत्यन्त शूरतासे लड़े और विकणं सहदेवसे चित्रसेन शिखंडीमे लड़ने लगा । २१ । हे राजा मत्स्यदेशी शूरवीर दुय्योधन और शकुनी के सापबड़े पराक्रम करने वाले हुए और महारथी द्रुपद चेकितान और सात्यकी महात्मा द्रोणा चार्य और उनके पुत्र से युद्ध करनेवाले हुए कृपाचार्य और कृतवर्मा दोनों धृष्ट shasan and all the hings with Jayrdı ath and the fourteen thousands of horse sent by your son, surrounded the son of Sural on all sider. 16. Then tire Patidaris i lose clariuts and ranks were divided in a regular trainer, at once ruslied upon your warriors Tith tho close rinta, clcriumts, horses and foot soldiers the field of battlo Becnicd muring Tiho clouds of disst dreadlul to ischiold. Bhisham, accompanied by ny arny of warriors, armed with Tumma, Pruses sind arrows, and niarrhx04 er clephants, horse and clur.ots, fought a severo figlit witli Arjun. Tlicking of Avanti fougiit with the king of Kitalii, Bhimsen joined int cumbit with Jayndrath, and prince Yullislethir, actoupanice by pons and cluicfu, fought brarely will the hing of Madra Vihoin fought agnir st Saladie aud Chitrasen naghinat Shikhardi :1. The rarriors of Matsyn, o king, fought limarc's artist Daryallinn and Stahuni. Iraganel, Chehilan and Satyahi fught against Drotinetarya ned dois The great warrior 1}xt! Kripcharyn and Kritsariin rirslies apmon Drielis ran (४६५५) भीमपर्य Bhishma Pary [46553 सपुत्रेण महात्मना । कृपश्च कृतपर्मा च पृष्टपन्नमभितौ ॥ २३॥ एवं प्रभाजिताश्वानि म्रान्तनागरथानिच । सैन्यानि समसज्जन्त प्रयुद्धानि समन्ततः ॥ २४ ॥ निर विद्युत |स्तीना दिशश्च रजसा वृता. । प्रादुगसम्महोल्काच सनिर्घाताविशाम्पते ॥ २५ ॥ प्रादुर्भूतो महायातः पांव पातच । नमस्यन्तर्दधे सूर्यः सायन रजसायत. २६५ प्रमोहः सर्यसत्यानामतीव समपद्यत । रजसा चाभिमूनानामलजालेय तुद्यताम् ।२७। वीरवार विस्तां सर्वावरणमेदिनाम् । सघात:शरजालानां तुमलः समपद्यत ॥२८॥ प्रकाशं चाकाशतानि भुजोत्तमैः । नक्षत्रविमलामानि शस्त्रगिभरतपम ॥२९, आर्पमाणि विचित्र मि रुक्मजालावृतानि च। सम्पतुर्दिश्च सर्व चर्माणि भरतर्षम ॥३०॥ सूर्यवर्णश्च निस्रिशः पात्यमानानि सशः। दिक्षु सीस्यदृश्यन्त शगगणि शिसि च ॥ ३१॥ भग्नचक्राक्षनीडाद निपातितमहायजा 1 तावाः पृथिवीजामु स्तत्र तत्र महारा. ॥३२॥ परिपेतुईयाश्चात्र केचिच्छखाणाः । स्थानविपरिकतो घुम्नके सम्मुख दौड़े इसरीति से स्थान पर चारोंभोरसे ऐसे युद्धहोनेलगे कि जिन के घोड़े माणगत और हाथी रय भ्रान्ति से युक्तहोगये हे राजा उस समय प्रकाश में विनाही वादलों के महातीर विद्युत्पात होनेलगा और दिशा धूल से आच्छादित होगई और महा उल्कापात होकर परस्पर में बड़े घोर शब्द प्रगट हुए। २५ । महा वापु चननेलगा और धूलकी ऐसी अत्यन्त वर्षा हुई जिसके कारण सूर्य ढककर आकाश में गुप्त होगया, धूलसे छुपे हुए और अस्त्रों के जालों से लड़नेवाले सब जीवों को बड़ी अचेतता प्रामहई, वीरों की भुभाओंसे छुटे सब पदोके भेदन करने वाले वाणों के जालोंसे महाकठोर शब्द गसन्न हुए है गरतर्षभ उत्तम भुजाओं से | उठाये हुए निर्मल नक्षत्रों के समान प्रकाशमान शस्त्रों ने प्राकाश को मकाशित करदिया, और मव दिशामों में उत्तम जड़ाऊ सुनहरी दालें पृथ्वी पर गिरी ॥३०॥ सब रीतों से मूर्य रूप खड्गों से गिराये हुए शरीर और शिरसव भोर को पहुए दिखाई दिये, जिनके पहिये भत्त भौर नीढ़े टूटगये थे और बड़ी २ ध्वजायें गिर dyumm. Thus in several places the warriors fought all round. Their horses were killed and the eleplianto Lecame mad. At that time ligutning flashed in the sky without clouds, the directions were filled with dust and tho cinde.s lell down with a hissing sound, 25, The wind bicw a gale and the storm of dust oversp ead the sun in the sky. Covered with dust and fighting with arus, the warriors hjecane insensible, Discharged from the arms of the warriors, the network of arrow: fell down with a crash. The weapons raiecd by powerful arps ht the firmament like sharing stara. The good shielda, docked with gems and gold, fell down on earth. 30 Killed by the swords, slijning like the sun, thic Lolics and licads of the warriors cresceu lying in all directions. The huge chariots (४६५७) भीष्मपर्व Bhishma Pary [4657) बौ। सरसनलिनीजालं विषक्तमिवकर्पताम् ॥ ४२ ॥ एवं संडादित तत्र वयापोधर्म महत् । सादिमिश्चपदाश्च सचश्चमहारथैः ।। ४३ ।। इतिश्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीमवधपर्वणि संकलयुद्ध एकप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ । साय उवाच ।। शिवण्डी सह मत्स्येन विराटेन विशागते । भीमण्यास माससाद सुदुर्जयम् ॥ १ ॥ द्रोण कृपं विकर्ण च महेन्यासमहाबलम् । राजश्चान्यान् रणे गुरान यहना द्धनञ्जयः ।। २ ।। सैध्यक्ष महेप्यास सामात्यं सह बन्धुभिः । प्राच्यांध दाक्षिणात्यांच भूमिपान भूमिपम ॥ ३ ॥ पुत्रञ्च ते गद्दे चासं दुर्योधनम मर्पणम् । दुःसहश्चैव समरे भीमसेनोग्यवर्तत ॥ ४॥ सहदेवस्त शकुनि मुलूकञ्चमहा रयम् । पितापुत्री मद्देश्यासावायवत दुर्जयो ॥ ५ ॥ युधिष्ठिरो महाराज गजानी हुए सब दिशाओं को दौड़े, उन खेचनेवाले हाथियों का रूप ऐसा शोभित हुआ जसे कि तड़ागों में लगे हुए सुन्दर कमलों के बैंचने वाले हाथियों का रूप शोभायमान होता है, यह युद्ध भूमि सवार पदाती पार यड़े ध्वगावाले रयों से परित होगई ॥ ४३ ॥ अध्याय ७२ ॥ संजय बोले हे राजा शिखंडी ने मद्रके राजा विराट समेत बड़ी शीघ्रतासे महारथी दुमघर्प भीप्मनी से सम्मुखताकी और अर्जुन ने द्रोणाचार्य कृपाचार्य धौर राजा दुर्योधन के बहुत से बड़ेर धनुपधारी महावली शूरवीरोंको मोहित किया, हेगनेन्द्र प्रधान और भाइयोंके साथ बड़े धनुपधरी राजासिंघ और पूर्वी पश्चिमीय व आपके क्रोधीपुत्र बड़े धनुपधारी दुर्योधन आदि अन्य अनेक राजाओं के सम्मुग्न दस युद्धमें भीमसेन वर्तमान हुए और महारथी महदेव शकुनी और उलूक के सम्मुख हुए और वह बड़े धनुपधारी दुमयप पितापुत्र भी सम्मुख वर्तमान हए 1५ । और drangol them along with themselves rushing on in all directions. The elephants dragging the chariots lonkerl Leautiful like those dragging out lotus plants from a lake, and the fuld was strewn over with Horsemen and the chariots with high banners" CHAPTER LXXI Sunjaya said to the king:-“Shihhandi and Prince Virat of Madra hastened to face invincible Bhishni, and Arjun made Dronacharya, Kripacharya and Prince Daryodhan with many other warriors insensible. And 0 hing, Bljimsen, faced the great archers, the Liogs of Sindhu-Eastern and Vestern, your evrayel son Duryadhan the great archer and other princess Brave Sahder faced Shakuni, Ulak ani the great Dushpradharsh archers, father and son 5. Brare Yudhisir [46561 Mahabharat दतेय रपयोधिपु ॥ ३३ ॥ शगहताभिन्न देहा पद्धयोताहयोत्तमाः। युगानिपर्यकर्पन्त तत्र तत्र स्मभारत ॥ ३४ ॥ अहान्त सस्ताव सावा सापयोधिनः । एकेन बलिना गजन धारणेन विमर्दिताः ॥ ३५॥ गन्धहस्तिमदसावमाप्राय यहवो रणे । सनिपाते बलोधागो घीतमाददिरेगजाः ॥ ३६॥ सतोमरैमहामात्रैर्निपतद्भिर्गतासुभिः । चभ्वायो धनंछन्नं नारावाभिरतगंजः ॥ ३७॥ सनिपातेवलौघानां पितरवारणैः । । नियुधि सभग्नाः सयोधा सध्वजागजाः ॥ ३८ ॥ नागराजोपमहस्तैनीगैराक्षिप्यसंयुगे। व्यदृश्य तमहाराजसंभग्नारपक्वराः ॥ ३९ ॥ विशीर्णरयसंघाश्च केशेग्वाक्षिप्यदतिभिः । मशाखाहवाविध्यनिणिटारधिनोरणे ॥४०॥ रणेपुच रथान युद्ध संसक्तानवरवारणाः। विकर्पतोदिशः सर्वाः संपेतु सर्वशब्दगाः ॥४१॥ तेषां तथा कर्यतोतु गजानांरूपमा. पड़ी थीं वा घोड़े भी मरगये थे ऐने बड़े २ रथ स्थान २ पर गिरे पड़े थे और कित ने ही घेड़े शस्त्रों से घायल हुए पृथ्वी में चारों ओर घूमते थे हे भरतवंशी वाणों से घायल देहवाले उत्तम घोड़े जिन के अंगोंपर ईषा दण्ड बंधाया उन्होंने जुओंको स्थान स्थान पर बैंचा । १५ । उस युद्ध में कोई २ एकही घाण से सारथी घोड़े और रय समेत मारे हुए शूरवीर दिखाई पड़े, सेना के समूहों के चढ़ाई होने पर वहुत से हाथियों ने हाथी के मद से निकली हुई गन्ध को सूंघकर वायु को भक्षण किया, और नाराचों से मारे हुए बड़े डील डौल वाले तोरनों समेत गिरे हुए मृतक हाथियों से युद्ध भूमि गुप्त होगई, फिर सेना के चलायमान होनेपर भागे हुए हाथि- यो मे घायल हुए दूसरे हाथी अपने शूरवीर सवारों समेत अवोरसे पृथ्वीपर गिरे हे महाराज उमयुद्ध में गजराज के समान हाथियों की मुंडोंसे खिंचकर रयोंके कवर अत्यन्तटूटे हुए दिखाई पड़े, जिनके रयों के बाल टूटे ऐसे रथी युद्ध में वृक्षकी समान शिरके वालोंमें हाथियों से खिंचकर और घायलहोके फँसगये और युद्ध में उत्तम हाथी रथों में चिपटे हुए रथोंको खेचते सव हाथियों के शब्दों पर चलते with broken yones, wheels and banners and the horses killed foll bere and there, and the horses wounded by weapons ran all round. The good horses founded in their bodies decked with Isha Dand, drnzged the yohos this way and that Some warriors were billed there horses, driver and chauot all-Trith single arroirs. With the ad. rance of the army, numbers of elephants sniffed in the air the stenel coming out of the juice of elephants, and the ground was covered with thu luge bodios of elephants fallen in battle. In the bustle of the battle, many elephonts wero rounded and fell down with their brare riders, by the rush of other clephants running away from the fiold. The chariots, dragged by the trunks of powerful elephants, Tero broken into piccos. The Tarriors, with their chariots broler dora, mere dragged by tho hair and dashed on the ground by the ele phantz lu the field of battle the clephants clong to chariots and 35 (४६५७) भीष्मपर्व Bhishma Part [ 4657) अभी । सम्मनलिनीजाले विपक्तमिवकर्पताम् ॥ ४२ ॥ एवं संडादि तत्र पम्यापोधर्म महत् । सादिभिश्चपदाधि सावधमहारथैः ॥४३॥ इतिश्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्धे एकसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७ । समय उवाच ॥ शिमण्डी सह मत्स्येन विराटेन विशागते । भीमाशु गहन्यास माससार सुदुर्जयम् ॥ १ ॥द्रोग कृपं विकर्ण च म पासमहायलम् । राक्षश्चान्यान् रणे शूरान बहुगाईद्धनग्नयः ॥ २ ॥ सैधयक्ष महेण्यास सामात्यं सह यन्धुभिः । प्राच्यांश्च दाक्षिणात्यांश्च भूमिपान भूमिपर्षभ ।। ३ ॥ पुत्राच ते गद्देश्यास दुर्योधनम मर्पणम् । दुःसहश्चैव समरे भीमसेनाध्यवर्तत ॥ ॥ सहदेवस्तु शनि मुलूकञ्चमहा' रमम् । पितापुत्री महेश्वासावश्यवर्तत दुर्गयौ ॥ ५ ॥ राधिष्ठिरो महाराज गजानी हुए सब दिशात्रों को दौड़े, उन खंचनेवाले हाथियों का रूप ऐसा शोभिव हुआ जैसे कि तड़ागों में लगे हुए मन्दर कमलों के बैंचने वाले हाथियों का रूप शोभायमान होता है, यह युद्ध भूमि सवार पदाती पार बड़े ध्वजावाले रथों से पूरित होगई ॥ ४३ ॥ अध्याय ७२॥ संजय बोले हे राजा शिवंडी ने मद्रके राजा विराट समेत बड़ी शीघ्रतासे महारथी दुधर्प भीमजी से सम्मुखताकी और अर्जुन ने द्रोणाचार्य कृपाचार्य और राजा दुर्योधन के बहुत से बड़े२ धनुपधारी महावली शूरवीरोंको मोहित किया, हेराजेन्द्र प्रधान और भाइयोंके साथ बड़े धनुपधरी रामसिंध और पूर्वी पश्चिमीय व आपके क्रोधीपुत्र बड़े धनुपधारी दुर्योधन आदि अन्य अनेक राजाओं के सम्मुख उस युद्ध में भीमसेन वर्तमान हुए और महारथी सहदेव शकुनी और उलूक के सम्मुख हुए और वह बड़े धनुपधारी दुप्रधर्ष पितापुत्र भी सम्मुख वर्तमान हुए 141 और draggol them along with themselves rushing on in all directions. The elephants dragging the chariuts looked Leautiful like those dragging out lotus plants fiom a lahe, and the field was strewa over with Horsemen and the chariots with high banners CHAPTER LXXII Sanjaya said to the king: Shih landi and Prince Virat of diadna hastened to face in vincible Bhishm, and Arjun made Dronachorya, Kripacharya and Prince Duryodlan with many other warriurs inseri sible. And O king, Bhimsen, faced the great archers, the lings of Sindhu-Erstern and Western, your evragel sop Duryadhan the great Archer and other princes. Brave Sander faced Shaluni, Uluk and the great Dushpradharsh archers, father and son 5. Brave Yadhish- " 43.

[4058] Mihabharat (४६५८ महारथ । समवर्तत सग्रामे पुत्रेण निकृतस्तव १६॥ माद्रीपुत्रस्त नफुल शूर सक दनोयुधि । विगतोनावले साथ समसजत पण्डव ॥ ॥ अश्यवर्तन्तसकुद्धा समरे शायकेकयान । सात्यकिश्वेकितानश्च सौभद्रश्वमहारथ । ८॥धृष्टकेतुश्च समरे राक्षस थघटोत्कच । पुनाणा ते ग्थानकि प्रयुद्याता सुदुर्नया ॥ ९ ॥ सेनापतिरमेयात्माष्ट धुम्न महावल द्रोणेन समरे राजन् समायायोग्रकर्मणा ॥ १०॥ एवमेते महेवासास्ता चका पाडयै सह । समेत्य समरे शूरा सम्प्रहार प्रचक्रिरे ॥ ११ ॥ मध्यन्दिनगतेस्र्य नमस्पाकुलतानसे । कुरय पाण्डयेयाच गिजनम्तिरेतरम् ॥ १२ ॥ ध्वजिनोहेम चिनाहा विचरतो रणाजिरे । सपर का रथा रेजुबैध घ्रपरिवारणा ॥ १३ ॥ समेता नाच समरे जिगीपूणा परस्परम् । बभूव तुमुन्न शब्द सिंहाामिवनई ताम् ॥ १४ ॥ तमा त मपश्याम सम्प्रहार सुदारुणम् । यदकुर्वन् रणे शूरा सञ्जया कुरु भसह आपके पुत्र से ठगाहुआ महारथी युधिष्ठिर युद्धमें हाथियोंकी सेनाके सम्मुख वर्त मानहा, औरयुद्ध में गर्जनेगाला माद्रीनन्दन वीरनकुल विगर्च देशियोंके यो रयों से युद्ध करनेवालाहुआ, और अजेय महावली सात्यकी व चेकितान और अभिमन्यु यद (वीनों शाल्य और केकय ले गाँस युद्ध करने के लिये उपस्थित हुए और धृष्टकेतु व घटोत्कच राक्षस युद्ध में आपके पुत्रों की रथाली सेनाके सम्मुख गये, हे राजा महारथी सेनापति धृष्टयम्न महाभयकारी कर्मकरता द्रोणाचार्यके सम्मुख जाभिडा । १० । इस प्रकार से आपके इतने धनुपधारी पराक्रमी शूरोंने पाडवों के सम्मुख होकर महारों को किया, दिवस में यूर्य के वर्तमान होने और आकाश में व्याकु लता होनेपर कौरव और पाडवों ने परस्पर में गारना प्रारम्भ किया, और सुवर्ण जटित बजा उस युद्धमें घुमने लगी और व्याघ्रचर्म से मढेहुए रथ और पताकाओं समेत महा शोभायुक्त हुए, युद्धमें भिडे हुए पर पर विजयाभिलापी सिंह के समान गर्जना करनेवाले शूरवारों के महाकठोर शब्द होनेलगे, वहां हमने बडे भयानक उस अपूर्व प्रहार को देखा जिपको वडे शूर वीर मृजय लोगों ने कोरवों के साथ किया thur, le nlio sus deceived by your son tared the line of eleplınnts in the field of battlu The joj of Vadlı, Nalui stood 10nuing to fight against tho great ar hero of Tigert. And invincible Shyakı of grest strength Chelıtan and Abuminyu all tlırse three is ei o ready to figlit ngninst tho Sinlu 13 und Kulayıs Danishtal otu and Glatothach the rahslas encountrred the char otecis of your cons. Brare Dlirishtads uinn t'i fruat coulm under of aimes fought 1121ely ngainst Dronchinrya 10 Yur brave nrcliers attacke l the Panda, as with their weapons 'Thic izhting began when the sun lind risen bild on the sl y The gol bedecked banner: Nuttereà in the shy and the bannercl clinriots conued with the lions ledo lovhed cry glorious Bmic warriors nspiring for victory rozred lih braso decus of Srinjas zx in filtır: ayust tlu hauraias 10 TVc eas the TIC “ममन्यतः भीष्मपर्य Bhishma Parv. [1059] ॥१५॥ मेघ ग्रं न दिशाराजन्नसूय शत्रुनापन । विदिशी धारिपक्ष्यामः शतमम १६ ॥ शतीन विमलाग्राणां तोमराणां तपास्यताम् । निशिानांच पीतानांनीलोत्पर निभाः प्रभाः ॥ १७ ॥ कवचानां धिचित्राणां भूपणानांप्रमास्तथा । संदेशः प्रदिप मासयामारोजसा॥ १८ ॥ वर्मिश्च नरेन्द्राणां चन्द्रमर्यसमप्रभः । विराजतदाराज स्तत्र तत्र रणाहनम् ॥ ११ ॥ रणसंधा नरव्याघाः समायतथ संयुगे। विरजः समरे राजन् प्रहा हव नमस्तले ॥ २० ॥ मीष्मस्तु रविना श्रेष्ठो भीमसेनं महायलम् । अपारयत सकुछः सर्वसैन्यम्प पश्यतः ॥ २१ ॥ ततो भीम घिनिर्मुक्का याममाः शिलाशिताः । अभ्यान समरे भीम तेलधौनाः सतेजनाः ॥ २२ ॥ तस्य शक्ति महा घेगा भीमसेनो महाबलः । कुद्धाशीविषसंकाशा मेषयामास भारत ॥२३॥ तामा पंतम्ती सहसा रुक्माण्डां दुरासदाम् । चिच्छद समरे भीमः र सनतपर्यमिः ॥ २४ ॥ ततोपरेण भईन पीतेननिशितेनचा कार्मुक भीमसेनस्य विधाचिच्छेदमारत । १५ । शत्रुहन्ता हमने च रों ओरसे छोडेहुए याणों के कारण भाकाम मूर्य दिशा विदिशा आदि किसीको नहीं देखा, तक्षिणधार परछी और छोडेहुए तोमर और विपयुक्त नीले कमल के समान खगोंके और भद्दाऊ कवचोंके वा आभूषणों के प्रकाश ने प्रकाश दिशा विदिशाओं को प्रकाशित करादेया हे राजा उसप्तमय यह रणभूमि चंद्रमा सूर्य से प्रकाशमान मुखबाले राजाओं के शरीरों से शोभा- पमान हुई, हे राजा रधियों में श्रेष्ट नरोत्तम युद्ध में जुमेहुए उप्त युद्ध में ऐसे गोमाय मान विदित होते थे जैगे कि आकाश में ग्रहों समेत भूर्य चंद्रमा शोभा देने हैं २० फिर अत्यन्त कोषयुक्त महारथी भीप्मनी ने राव सेनाकं देखने उस महाबली भीम- सेन को रोका और अपने तीक्ष्ण शिलापर विभे हुए मुंदर. प्रकाशित मुवर्ण पुंखवाले बाणों से उसके शरीरको घायलीकया हेमातवंशी फिरस महावनी भीमसेनसे शीघ्र गामी सूर्य के समान तीन चरछी को बड़े क्रोय कर के भीम के ऊपर फेंका। फिर मीम ने उस मुनहरी दण्डवाली महा असद्य अफरमात गिरनेशली परछी को अपने nun in the sky was hil from our view by the shorer of arroirs in all directions. The sharp edged spears, jarelins, Poisoned swords of the colour of blie lotus, the jewelel arruours and ornaments stoue in all directions. The battle field nas glorious to behold on account of the sun and moon like faces of the lings. The best of warriors, Ohing, engaged in lattle, kuled lustrus Ile the Juwaiparics in the sky. 20. Brave Bluisliin, in great iage, checked Lrase Blim titbit sight of all, and with lis bautifulis shining vid slipered BTTQW5 furbislied with golcka fiattes, woulded Lis loly. Ilen O descendant of Barat, Ilim tire te luis stilt spear, brglit rs the sun, against Bhisl.m; but the latter cut data writi lis ar rc iis containing hidden Lrola ilat ullcarble şprar of golden star aning sudlec y upcu bim, .

[4660] Mahabharat (४६६०) ॥ २५ ॥ सात्यकिस्तु ततस्तूर्ण भीमासाद्यसयुगे । आकर्ण हितैरतीक्ष्णैनिशितैस्ति ग्मतजनैः ॥ २६ ॥ शरैर्वहुभिगनच्छत् पितर ते जनेश्वर । तत सन्धाय चै तीक्ष्ण शर परमदारुणम् ॥ २७ ॥ वाणेयस्य रथाद्भीम पातयामास सारथिम्। तस्यावा. प्रताराजन निहते रथसारथौ ॥ २८ ॥ तेन तेनैव धावन्ति मनोमारतरहस । तत सर्वस्म सैन्यस्य नि स्वनस्तुमुलोभवत् ॥ २९ ॥ दाहाफारच सअज्ञे पाउचानामहात् मनाम् । अभिगवत् गृणीतहयान् यच्छतधावत ॥३०॥ इत्यासीत्तुमुल शब्दो युयुधाने रथप्रति । एतस्मिन्नेव कालेतु भीष्म शान्तनवस्तदा ॥ ३१ ॥ न्यहनत् पाण्डीसेना मासुरी मिव वृत्रहा। ते घध्यमानाभीष्मेण पाश्चाला सोमकै सह ॥ ३२ ॥ स्थिरांयुद्ध मति कृत्या भीष्ममेवाभिदुद्रुवुः । घृष्टयम्नमुखाश्चापि पार्था शान्तनय रणे ॥ ३३ ॥ गुप्तग्रन्थीवाले वाणों से काटा, तदनन्तर अपने तीक्ष्ण पीतरंगवाले भल्ल से भीमसेन के धनुप को काटा।२५। इसके पीछे सात्यकी ने भीमजी के सम्मुख पाकर बड़े वेग से कानोंतक बचे हुए तीक्ष्ण प्रकाशित वाणों से आप के पिता को मोहित कर दिया फिर भीमगीने वडे भयानक तीक्ष्ण वाणको चढाकर सात्यकी के सारथी कोरथ से गिराया हे राना सारथी के मरनेपर उसके घोड़े मन और वायुकी गतींके समान इधर उधर दौड़ने लगे, इस के पीछे सम्पूर्ण सेना में कठिन शब्द प्रकटहुआ और महात्मा पाण्डवोंका हाहाकार उत्पन्न हुआ । ३० । चलो दौड़ो घोडों को धामो यह कठोर शब्द केवल सात्यकी के रथ के विषय में हुआ फिर उसीसमय शंतनुके पुत्र भीष्म जी ने पाण्डवों की सेनाको ऐसे मारा जैसे कि असुरों की सेनाको इंद्र मारता है, वह पांचाल देशी सोमकों समेत भीष्म के हाथ से घायल युद्ध में उत्तम बुद्धिको करके भीष्म के सम्मुख दौड़े ओर अग्रगामी धृष्टद्युम्न समेत पाण्डव भी आपके पुत्रकी सेना के मारने की इच्छा से उस भीष्म के संमुख दौडे, हे राजा इसी प्रकार and with lus dart of yellow colour lic cut down Blnu's Loir 25 Then Satyalı coming suddenly upon Bluslın, your father fuade lumi insensillo mith lus sharp Light airoas discharged from luis bow drawn to thic car Bhislını jut up hus dieadful sharp anow to luis low and with it lic cused the chariot dus r of Satyaki to fall down frou lus sent on the chariot At the death of the inver the lorses ran litler and tluther with the speed of the mud or the wind and the noise si ns tremendons througlont the army of the Pandas ns. 30 Come, run chiech the norses," wirl the cries on 2]] sicies regarding the chiar ot of Satynh In the nicautıme Blushım de strogad t) o army of the Pau Alatas Indrı does the 25Meas Ilie Pencials uith the Sonials, sounsel by Bhishm, thought it sise to run away tran thiet pre-ener of }}}hythm lie Pamlar arres, Tre-xled by Dhrishindyamine 4 - . भीष्मपर्च Bhishmi Parv {4661] अध्यधाचन जिगीपतस्तपत्रस्य पाहिनीम् । तथैव कौरवा राजन् भीमद्रमपुरोगमाः ॥ ३४ ॥ अम्पघान्त चगेन ततो युद्धमत्तत ॥ ३५ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीमवधपर्वणि द्वन्द्वयुद्ध सप्तितमोध्याय ७२॥ सञ्जय उवाच । विपटोय धिभिभाममार्छन महारथम् । विव्यावन रंगांचास्प निमिणमहार! ॥१॥ त प्रत्यविध्यदशामिभीष्मः शांतनच. शरः । रकमबमहे वास. कृतिहस्ती महायलः ॥२॥ द्रौणिगाण्डीयावान भीमप्रन्यामहारथः। अविश्ववियु भिःपडभिदंडहम्तः स्तनान्तरे ॥३॥ कार्मुकंतस्य विच्छेद फाल्गुनापरवीरहा । अविध्यध भृशं तीक्ष्णः परिभिः शत्रकर्शन. १४॥ सोन्यत् कामुकगादाय धेगवान् शोधमूर्षिछत्तः अमृष्यमाण:पान का कच्छेदमाये ॥५॥ अघिध्यत् फाल्गुन राजन् नवस्यानिशितः आपके भीष्म प्रादिक वीर भी पाण्डवों के प्रमुख घड़े वेगसे दौड़े और युद्ध होने लगा ॥ ३४॥ अध्याय ॥७३॥ संजय बोले कि इसके पीछे राजा विराट ने तीन काणों से महारथी भीम को मोहित किया और भीष्म ने अपने तीनवाणों से उसके घोडों को घायल कर के अपने तीक्ष्ण दश वाणों से उसको घायल किया और बड़े धनुषधारी महारथी दृढ़ हस्त अश्वत्थामा ने छः बाणों से अर्जुन की छाती को घायल किया फिर शत्रुओं के मारनेवाले और वलसे हीन करनेवाले अर्जुनने उसके धनुप को काटकर बड़ेतीय पाणों से उसको घायल किया । ३१ हे राजा उस वेगवान क्रोध से मूच्छित युद्धमें अर्जुनके हाथ से दृदेहुये धनुषको असह्य मानफेर अश्वत्थामा ने दूसरे धनुप को लेकर, नौतीक्ष्ण वाणों से अर्जुन को घायल किया और सत्तर तेज व.णों से वासु encountered Blislım to destroy the armies of your sou8. Your warrious too, joined in fighting and the lattle was furious." 34. CHAPTER LXIII Sanjay a continued:--"King Virat na de lave Elishm itibe torille with three arrows and the latterlaying wounded Jus horses with three arrows, Elot at Inm ten moie Hard Landed Ashrathatua wounded Arjun in the Licart with six ? DOW#, and the latter, destroyer of (ne mica (ut dotun his lov and wouided bin with his slap inoms. 3. Tmane nills uger, A:lwatte ma could rot lerr the high liar duc'acts of Arjun in cutting duten liis loty und havirg token up antther, lourded Ivim with nipe larp 1170ks ind Vasudev with Feventy. With his eyes red in anger and with dep riglis and case worn lace on account of l asudev, Asjun possed laid the Girdir [ 4662] Mahabharat शरैः । घासुद सप्तत्या विम्याघ परगेपुभि ॥ ६ ॥ ततः क्रोधाभि ताम्राक्षः कृष्णेन मह फाल्गन । दीर्घमणच नियम्य चिन्तयित्वाणुन पुगः ॥ ७ ॥ धनुः प्रपीड्ययामेन करेणामित्रकर्शनः । गाण्डीवधन्यासंक्रुद्धः शितान समतपर्वणः ॥ ८॥ जीविता तकरान् घोरान् मगादत्त शिलीमुखान् । तैस्तूर्ण समरोवध्यद्रौणि बलवताम्बरः ॥ ९॥ तस्य ते कवचं मित्यापः शोणितमाहये । न विव्यथेच निर्भिन्नो द्रौणिगाण्डीवधन्वना ॥१०॥ तथैव च शगन् द्राणि. प्रविमुञ्चनवियलः । तस्थौ स समरे राजंत्रातुमिच्छन् महानतम् ॥११॥ तस्य तत् सुमहत्कर्म शशसुः कुरुसत्तमाः। यत् कृष्णायां समेताश्या मभ्यापततसंयुगे ॥ १२ ॥ स हि नित्यमनीकेषु युध्यतेऽभयमास्थितः । अनग्राम ससंहारं द्रोणात् प्राप्य सुदुर्लभम् ॥ १३ ॥ ममैपआचार्ध सुतो द्रोणस्यापि प्रियः सुतः । ब्राह्मगश्च विशेषेण माननीयो ममेतिच ॥ १४ ॥ समास्थाय मति धीरो भित्सुः शत्रुतापनः । पांचक रथश्रेष्ठो भारद्वाजसुत प्रति ॥ १५॥ द्रौणि त्यक्त्वा ततो युद्धे कौन्तेयः श्वेतवाहनः । युयुधे तावकाभिघस्वरमाण: पराक्रमी ॥ १६ ॥ देवजी को घायल किया, इसके पंछे श्रीकृष्णजी समेत क्रोध से लाल नेत्र अर्जुन ने बड़ी लम्बी उप्ण श्वासें लेकर बारम्बार बड़ी चिन्ता युक्त होकर वाम हाथ से गांडीव धनुष को बहुतसा दबाकर गप्पग्रन्थी युक्त जीवनके नाश करने वाले भयानक शिल मुख नाम वाणों को धनुप पर चढ़ाया और बड़ी शीघ्रता से उन वाणों के द्वारा अश्वत्थामा को घायल किया, उन वाणों ने युद्ध में उसके कवच को काटकर उसके रुधिर को पान किया फिर अर्जुनसे घायल किया हुआ पीढ़ामान अश्वत्थामाभी उसी रीति के अर्जुन को वाण मारताहुआ और महावन भीष्म- जीकी रक्षाकरता हुआ वडे धैर्य से युद्धमें नियतरहा । १० । उस के उस महाकर्म को देखकर कौरवों ने बड़ी प्रशंशा की जो युद्ध में श्रीकृष्ण के संमुख दौड़ा, और द्रोणाचार्य से अतिदुःप्राप्य संहार समेत अस्त्र समूहों को पाकर भयभीत सेना में युद्ध करने वाले शत्रु संपाती वीर अर्जुन ने इस बात को विचार करके कि यहमेरे गुरुका पुत्र गुरूको अत्यन्त प्यारा और मुख्यकर ब्राह्मण होकर मेगपूजनीय है उस को अवध्य जानकर नहींमारा । १५ । इसके पीछे श्वेत अश्ववाला शीघ्रकर्मी अर्जुन I bow with his left hand, put on his low dreadful arrows baving lidden knots destructive offe, and with them he wounded Ashvatla. ma in great baste The aiions thus slot pierced through his ai njour and drank his blood. Wounded by Arjun's arows, Ashwathame shot his arrows in turn and stood firmly for the protection of Bhishan. 10. The Kauravas highly p'a sed his liave deed as he had assailed Shreo Krishn. Arjun spared his life because he was wortlıy of respect as a Bralsman and n as the dearly loved son of Dronacharya from whom lie (Anjunt had acquired the knowledge of arms eo difficult of achieving. 15. Then dexterous Arjun, tho possessor of white horscs, leſt Ashwathama and engaged in fighting against and Lilling २० (४६६३) Årsagå Bhishwa Parv [1661 दुश्योधगस्तु दशभिगानं पत्र शिलाशिनः। भीमसमें महेन्यासं रुपमपरीः समर्पयत् ॥ १७ ॥ भीमसेनःसुसंक्रुद्धः परासुकरणं दृढम् । चित्रं कार्मुकमादत्त शगंश्च निशि. तान्दश ॥ १८ ॥ मार्गप्रहित तीरशैवेगवन्दिरजिहागैः । अविध्यत्तूमध्यमः कुरुरा महोरसि ॥ १९ ॥ तस्य काञ्चनसूत्रग सरैः छदादितोमणिः। राजोरसि से सूर्यो प्रहैरिय समावृतः ॥ पुत्रम्तु नव तेजस्वी भीमसेन ताडितः। नामृयत यथा नागस्तलशब्दमदोत्कटः ॥ २१ ॥ ततः शरैमहाराजकमः शिला शिक : भामं विव्याधसंकुद्धरासयान्ते यायिनीम् ॥ २२ ॥ तौ युध्यमानौ समरे भृशमन्योन्यविक्षती । पुत्रोते देवसङ्काशौ व्यरोचनांमहायलो ।।२३। चित्रसेनं नरब्यानं सौभद्रः परवीरहा । अविध्यदशभिर्याणैः पुरुभित्रश्च सप्तभिः ॥ २४ ॥ सत्यप्रतञ्च सप्तत्या विभाशक्रसमो युधि। नृत्यनिय रणे पीर मात्तिं न. समजीजनत् ।। २५ ॥ युदमें अश्वत्थामा को छोड़कर अापके शूरवीरों को मारताहुआ युद्ध में प्रत्त हुआ फिर दुर्योधन ने गृध्रपक्ष युक्त मुनहरी पुंखशिलापर तीक्ष्ण कियेहुए दश वाणों से बड़ेवली धनुपधारी भीमसेन को घायल किया, तब अत्यन्त कोपित भीमसेनने मृत्यु कारक रत्नोंसे जटित बड़े दृढ़ धनुष को हाथ में लिया और दश तीक्ष्णवाणों को चढ़ाकर बड़ी शीघ्रतासे अधिक बँच कर राजा दुर्योधनको छाती में घायल किया, उसकी मुवर्णित सूत्र से बँधी हुई छाती की मणि वाणों से संयुक्त होकर ऐसी शो- भायमान हुई जैसे कि आकाशमें ग्रहोंसे व्याप्त मूर्य्य होनाहै, २० फिर भीससेन से घायल आपके तेजस्वी पुत्रने ऐमे नहीं सहा जैसे कि हाथ की हथेली के शब्द से जागाडा सर्प शान्तनहीं होता है, है महाराज सेनाकी रक्षा करनेवाले अत्यन्त क्रोधयुक्त दुर्योधन ने सुनहरी पुंखके पैनेकिये हुए वाणों से भीमसेन को घायल किगा, फिर आप के वह दोनों महावली पुत्र युद्ध में लड़ते और परस्परघायल करते देवताओं के समान शोभायमान हुए, और नरोत्तम शत्रुहन्ता अभिमन्युने सात तागवाणों से चित्रसेन और पुरुमित्रको घायल किया फिर युद्ध में नृत्यकरते | इन्द्रके समान पराक्रमी अभिमन्युने सत्तरवाणों से सत्यव्रतको घायल करके हम लोगोंको पीड़ित किया । २५ । चित्रसेनने शिलीमुख नाम दशवाणोंसे और your other warriors. Then Duryodhan wounded Bhim the great warrior and archer with his ten arrows sharpened on stone having gold feathers and vulture quills stuck in them. The latter, in a rage his fatal bony decked with gems, and drawiug it swiftly and more closely lic wounded the former with ten sharp arrows in the breast. The gold thread of his breast jewel, pierced with arrows looked beautiful like the son surrounded by stars. 20. Your glorious son could not bear being younded by Bhini like a serpent awakened by the clap of hand. Duryodhán the protector of armies, in a great rage, wounded Bhimsen with his sharpened arraws having gold feathers. Both your sons, fighting with and wounding each other looktook up P [ 464 Mihablurt (४६६४) त प्रयनिक पद्दश मिश्चित्रसेन. शिलीमुले । सत्यव्रतश्च गवभिः परमित्रश्च सप्तभि ॥ २६ । स विद्धो विक्षरनक्तं शत्रुसवारणमहत्: चिच्छे चित्रसेनस्य चित्र फार्मक मानुनि ॥ २७ ॥ नित्वा चास्य तनवाण शरेणो रस्यताडयत् । ततस्ते तावकावीरा राजपुत्रामहारथा ॥ २८ ॥ समेत्ययुधि सरधा विध्यधुनिशितै शौ । ताश्च सचान शरस्तक्षिणध न परम स्रावित ॥ २०॥ तस्य दृष्ट्या तु तत्पर्म परिवसतास्तर । दन्त समरे सैप बनेका यथोरणम् ॥ ३० ॥ अपेतशिशिरे काले समिद्धमिव पायकम् । अपरोचत सौभद्रस्तव सैन्यानि नाशयन् ॥ ३१ ॥ तत्तस्य चरित दृष्ट्या पात्रतस्त विशाम्पते । लक्ष्मणो यपतत्तूर्ण सात्यतीपत्रमाहये ॥ ३२ ॥ अमिमन्य सत्यवाने नव याणोसे पुरुभित्रने सातबाणों से उसको घायल किया, उस घायल ओर रुधिर को डालने वाले अभिमन्युने चित्रसेनके उप्त जड़ाऊ शनुओंके इटाने वाले बड़े धनुषको काटा, और वाणही से उसके कवचको काटकर छातीमें घायल किया फिर आपके उन महावने राजकुमारों ने और महारथियों ने भी उमको अपने तीक्ष्ण वाणोंसे घायल किया फिर उस महा अवजने उन सबकोभी अपने तीक्ष्ण वाणोंसे घायल किया, फिर युद्ध में महाक्रुद्धके समान आपके वारोंके जलाने वाले उस अभिमन्यु के उस कर्मको आपके पुत्रों ने देखकर उसको चारों भोर से घेरलिया, 1 30 1 चैत्र वैशाखकी तीन अग्नि के समान अभिमन्यु आपकी सेना को नाश करता वड़ा शोभित हुआ, हे राजा आपका पौत्र लक्ष्मण उस चरित्र को देखकर शीघ्रही आभमन्यु के सम्मुख प्राभिड़ा, फिर अत्यन्त कोपित अभिमन्युने शुभ लक्षण वाले लक्ष्मणको छ। विशेखोंसे और सारथी को तीनवाणों से पाड़ा मान किया । ३३ । हे महाराज धृतराष्ट्र उसी प्रकार से लक्ष्मण ने भी अपने ed gloriou, like gods And Abhimanyu the best of men and destroyer of foes wounded Chitiasen and Purumitra with soven sharp arrows Then dancing in tne battle field full of prowess lihe Indra, Abhimin. yu wounded Satyabrat with seventy arrows and gave us much trouble 35 Chitrusen rounded him with ten arrows sharpened on stone, Satyabrat with nine and Pui umitra vith sevon Abhimanyu, Founded and bleeding, cut down Chitrisen's bow, jem bedeched and destroyer of enemies, and with the same arrow, piercing through huis arın var, younded him in the bierst. Then your Lrave sons and warnors too, wounded him with their sharp arrows and that great warr or wounded them with their sharp arrows. Then seeing the great bravery of enlaged Abhimanyu the destroyer of foes, your sons burrounded him on all sides Lilo the fierce fire of the Spring, Abhim inyu louled vay glorious when he destroyed youi ainules Sering his biave deuds, 0 king, your grand.on Labsliman cime at once before Abhimanyu and fought with him Abhimanyu thereupon, 30 भीमपE-Bhishma Pare {4665) रतुसंकुद्धोलम शुभलक्षणम् । विष्याघ निशित. पभिः सारपिञ्चत्रिभिः शरैः ॥३३॥ तथैव लक्ष्मणो राजन् सोम निशितैः शरैः भविष्यत महाराज तद्भुत मियाग पत् ॥ ३४॥ तस्याश्यांधतुरो हत्यामागविञ्च महाबलः । अभ्यद्रवत सोमदो लहा निशितैः शरैः ॥ ३५॥ हताश्वेतु र तिष्ठन् लक्ष्मणः परवीरहा। शधि चिक्षेप संकुशः सौभदस्य र प्रति ॥ ३६ ॥ तामापतन्ती सहसाघोररूपांदुरासदाम्। अभिमन्यु गरे तीक्ष्णविच्छेद भुजगोषमाम् ॥ ३७ ततः स्वरयारोप्य तक्ष्मणं गौतमस्तदा। अपो घार रथेनामी सर्व सैन्यस्य पश्यतः ॥ ३८ ॥ ततः समाकुले तस्मिन् वर्तमाने मरामये। मापद्रवन् जिघांसन्तः परस्परावधैषिणः ॥ ३९ ॥ सायकाय गहेमामा पापडयाश्च महारा। हवन समरे प्राणान् निजम्नुरितरतरम् ॥ ४० ॥ मुक्तकेशा विकवचा विरमाछिन्नकार्मुकाः । बाइभिः समयुध्यन्त सजया कुरुभिःसाह ॥ ४२ ॥ ततो मीमो महाबाहुः पाण्डवानां महात्मनाम् । सेनां जघान संकुद्धो दिबास्त्रमहायला चाणों से अभिमन्यु को ऐसा घायल किया जिसके देखने से पाश्चर्पसा होता फिर महारथी अभिमन्यु उमके चारों घोड़ों को सारथी समेत मारकर लक्ष्मण के समुख दौड़ा, फिर पृतक घोड़ों के स्थपर नियत शत्रु के पीरों के पारनेवाले अत्यन्त क्रोधित लक्षण ने अगिमन्यु के रथपर वरछीको फेंका, अभिमन्यु ने उस भयानक रूप असनासाकति पानेवाली दाछी को अपने तीन वाणों से काटा, फिर कृपाचार्य जी लक्ष्मण को अपने रथपर बैठाकर रायसेना के देखते हुए उसको रथकें द्वारा दूर लेगये, फिर बड़े भयकारी तुमुल युद्धके वर्तमान होनेपर परस्पर विभयामिलाप शुरपार एक एकको मारतेहुए सम्मुख दौड़े, आपके बड़े धनुपधारी और महारथी पांडव युदमें भाणोंको होमने हुए परस्पर में मारने लगे फिर छुटेवालकववरहित दे धनुष अनय लोग अपनी भुजाओं से सौरवों से अत्यन्त युद्ध करने वाले हुए, सदनन्तर महाबाहु भीमनी ने बड़े क्रोध युक्त होकर अपने in great rage, wounded Lakshman rith sis darts and lsis chariot driver with three Lakshman too, in the same manner, Oling Dhritrashtra, trounded Abhimanyu in a wonderful way. Thereapon Abliimanyu killed all luis four horses and the driver and ruslied upon him. Seated on the chariot of which the ho.ses trere dead, enraged Lakshman the destroyer of foes, hurled a spear at the chariot of Abhimanyu. The latter cut down with big aricts the unbearable spear *coming towards him likc a serpent. Kripacharya then seated Lalshman on his own chariot and carried lim far anay from the sight of tho enemy. Then there was a serve fighting and the warriors desirous of victory rushed against one wother kiling and destroying. Your great archers and the l'andar Barriors, careless of their lives fought bravely, and with disliovelled hair and destitute of armour and with broken bows the Srinjayaz and Kauravas fought a bard contested , [ 4600] Mahabhaint ॥ ४२ ॥ हतेश्वरैर्गस्ता नरैश्चैश्च पातिते । राथीभ सादिभिश्चैव समास्ती यंत मेदिनी ॥ ४३ ॥ इतिश्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीमाधपर्वणि द्वंद्वयुद्धे त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ । सञ्जय उवाच । अराजन् महापाहु सात्यकियुद्धदुर्मद । विकृय चापं समरे सारसाहमनुत्तमम् ॥१। प्रामुञ्चत्पुखसयुक्तान शगनाशीविषोपशान् । प्रगाढ मधुचित्रञ्च दर्शयन् हस्तलाघवम् ॥२॥ तस्य विक्षिपतचाप शरानन्याश्च मुञ्चत । भाददनस्थ भूयश्च सन्दधानस्य चापरान् ॥ ३ ॥ तिपराश्चपरास्तस्य रणे शवनावनिध्नत । ददृशे रूपमत्यर्थ मेघस्येव प्रवर्पत ॥ ४ ॥ तमुदीर्यन्तमालोक्य राजा दुर्योधनस्तत। रथाना मयुत तस्य प्रेपयामास भारत ॥ ५ ॥ तास्तु सर्वान्महेष्वासान् सात्यकि. सत्यविक्रमः। जघान परमेष्वासो दिय्येनास्त्रेण वर्यिवान् ॥ ६ ॥ स वृत्या दारुण कर्म प्रगृहीतशरण सन । साससारततो ची भूरिश्रवसमाहवे ॥ ७ ॥ स हि स दृश्य सेना युयुधानेन दिव्यभत्रों से महात्मा पांडवोंकी सेनाको मारा, उप्त समय विनास मी के हाथी मनुष्य घोड़ों के या रथी और अश्वारूढ़ो के गिरने से युद्धभूमि अत्यन्त व्याप्त होगई४३॥ अध्याय ७४ ॥ संजय बोले हे राजा फिर युद्ध में दुर्मद महावाहु सात्यकी ने अपने उग्र धनुषको खेंचकर, अपनी हस्तलाघवता को दिखाते सपुख सर्पाकृति तीक्ष्ण वाणों को छोड़ते और बड़ी शीघ्रता से अनेक वाणों को फेंकते शत्रुओं को मारते हुए सात्यकी का ऐसा रूप दिखाई दिया जैसे कि अत्यन्त वरसते हुए वादलका रूप दिखाई देता है। फिर राजा दुर्योधन ने उस गर्गने वाले सात्यकीको देखकर उसके ऊपर दशहजार रथियोंको भेजा ।५। फिरसत्य विक्रम महाबली उग्रधनुषधारी सात्यकी ने | अपने दिव्याखों से उन वडे २ धनुपधारियोंको मारा, फिर इसवीर धनुपधारी ने | महा कठिन कर्मको कर के भूरिश्रया को सम्मुख पाया, वह कौरवों की कीर्तिक्य battle Thien brave Buslim, in great anger, discharged his celestial Reapons at the Pandı amy At this the field was firews over with the bodies of tho riderless el plants, men, horses and char oteers CHAPTER LXXIV Sanjnyn to Dhritrishtra - Satyaka the test of warriors, Drawing lus bow and showing the dexterity of his land, discharged feathered arrows of the form af sprkes, and with grant rapidity discharging many airoprs and desti oying tbo enemies, Satyaki's 'orm appened lile that of a raining cloud Prince Duryodhan, seeing that roaring Sat yakı, sent ten thousands of chariotesis ygainst him But Satyakı the great archet of true promess killed those great archers with his And the brave archer in domng that deed of valour, found " 43 5 arrows (४६६७) भीष्मपर्व Bhishmia Paly [4667] पतिताम् । अभ्यधावत संकुद्धः पुरूणां कीर्तिवर्द्धनः ॥ ८ ॥ इन्द्रायुधसवर्ण तु वि. स्फार्य सुमहद्धनुः । एट्यान्वज्रसङ्कशान शरानाशीविधीमान्॥९॥ सहस्रशो महाराज दर्शयन पापिलोघयम्। शतान्मृत्यसंस्पर्शन् सात्यक्षपदानुगा ॥१०॥ न विपहुस्तदा गजन् दुयुस्ते समन्ततः । विहाय सत्यकि गजन् समरे युद्धदुर्मदम् ॥११॥ तं दृष्ट्या युयुधानस्य सुता देश गहावला. । महारथा समाराताश्वित्रचर्मा युधध्वजाः ॥ १९ ॥ समासाद्य महेण्यासं भूरिश्रयसमाहवे। ऊचुः सर्वे सुसंरब्धा यूगकेतु महारणे ॥ १३॥ भोभो कौरवदायाद सहास्माभिर्महाबल । पहि युध्यस्य संग्रामे समस्तैः पृथगे वया ॥ १४ ॥ यसँगान वा त्वम्पराजित्य यशः प्रापश्यसि सयुगे। वय घा त्यां पराजित्य प्रीति धास्यामहे पितुः ॥ १५ ॥ एवमुक्तस्तदा शौस्तानुवाच महादलः । वीर्यलाधी नरश्रेष्ठस्तान् दृष्ट्यासमवस्थितान् ॥ १६॥ माघिदं कथ्य ते वीरा पधेयं मति रयः। वढाने वाला भूरिश्रवा उस सेनाको सात्यकी के हाथ से पीड़ित देखकर बड़ा क्रोध युक्तहो के सम्मुख दौड़ा है राजा उसनेभी अपनी इस्तलाघवता को दिखाकर इन्द्र पत्रके ममान धनुपं को टंकारकर सपों के मान बनके सदृश हजारों वाणों को छोड़ा, और सात्यकी के साथी शूर वार उनगृत्यु के समान स्पर्श वाले वॉणों को नहीं सहसके और सब उसदुर्मद सात्यकी को युद्धमें अकेलाही छोड़कर चारों ओर को मागे । ११ । फिर सात्यकी के बड़े धनुषधारी महारथी फवों से शोभित दश पुत्रों ने उस सेना को भागता देखकर बड़ाक्रोधित होके उम यूपध्वज | बड़े धनुषधारी भूरिश्रवाके सम्मुखहोकर बोले, हे कौरवों के प्यारे पुत्र महायला आमो और युद्धमें हमसयों के माय अथवा जुटे २ के साथ युद्ध को करो, तुमसं- ग्राममें हमको विजय करके कीर्तिवानहोगे अथवा हम तुमको विजय करके पिताको पानन्ददेंगे, तबउन शूरवीरों से ऐसा कहा हुआ अपने वलसे प्रशंसा पाने वाला नरोत्तम महाबली भूरिभवा उनको मम्मुख नियत देख कर बोला । १६ । हे वारलो Bhurishirava velor,lindi. Bliurislıraya the perpetuator of the faute of the Kauravas, seeing the destruct on of the Kauraras, rushed upon lum in a rage. And showing the dexterity of his hand and twanging bis bow like the vajia of India, çlischarged thousands of arrows bile vajra or snahes. The warriors who accompanied Satyali, could not bear the wounds of those fatal arions and an array in all duections, lenvinz Satyali alone 11. Then tho ten brate sons of Satyabi, great archdrs sheathad ih arniour, secing the flight of the nrmy, faced the great archor Bhur ishrata and said, "Dailing of the Kaurarna! como and fight with us jointly os separately. Either you will gain fame by (orquering tig or we shill please fatlier by cunquering you." Tlus challenged by these warrio e, the famous warrior Bhurishrava the best of tnen, sceing then in 114 presence, ka d, 16 "Well, warriors! ।

[4665] dlahabharat थुध्यध्यं साहिता यत्ता निह निष्यामि पो रणे ॥ १७ ॥ एयमुक्कामहेप्यास्ते वीराः क्षिम कारिणः । गहता शरवर्षण अभ्यधावनरिन्दगम् ॥ १८॥ खोपराहणे महाराज सग्राम स्तुमुलो भवत् । एकस्यच बहनांच समेतानारणाजिरे ॥ १९ ॥ तमेकं रथिनां श्रेष्ठं शरै स्ते समया फिरन् । प्रावृपीय यथामेर सिपिचर्जलदानृप ।। २० ॥ तैस्तु मुक्तान शरान् घारान् यमदण्डा शनिप्रभान् । असम्माता नस भ्रांतधिच्छेदाशुमहारथः ॥ २६ ॥ परि चार्य महाबाहु निहन्तुमुपचक्रमः । सौमदत्तिस्ततः दस्तेषां चापानि भारत ॥ २२ ॥ चिच्छर समरे राजन् युध्य मानो महारथैः । तेहता न्यपतन राजन् घनभाना इध द्रुमा ॥ २३ ॥ तान् एवा निहतान्दीरा रणे पुत्रान्महायलान ! वार्णयो धिनदनगजन् गो यह बहुत उत्तम है जो अवतुम्हारी ऐसीही इच्छा है तो हमसे सब इकडे होकर लड़ो में युद्ध में तुमसव उपाय करने वालों को माम्गा, ऐसे परम्पर कहकर बड़े धनुषधारी शीघ्रता करने वाले शत्रुओंके पराजय करनेवाले उन वीरों ने वाणों की वर्षाचारों ओरसे की हे महाराज तीसरे पहर तक एक का बहुतों के साथ महा युद्ध हुमा फिर इन सबोंने उस रधियों में श्रेष्ठ अकेले को वाणों से ढक कर ऐमा सींचा जैसा कि वर्षा ऋतु में सुमेरु पर्वत को यादल सींचते हैं । २० । उम भ्रान्ति रहित महारथी ने उन सवों के छोड़े हुए यमदण्ड वा इन्द्र बज के समान प्रकाशित वाणसमूहों को बड़ी शीघना पूर्वक मार्ग में ही काटा, हे राजा हमने वहां पर सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवाके अद्भुत पराक्रम को देखा कि जो अकेलाही निर्भयके समान अनेकों से लड़ा, दश महारथियों ने बाणोंकी वर्पाको छोडकर उस महावाहुको चारोंोरसे घेरकर मारनेका विचारकिया, हेभरतर्षभ तव तो महा रथी भूरिश्रवा ने अत्यन्त कोपयुक्त होकर एक निमिपही में अपने दश काणों से उनके दशों धनुपो को काटा, तदनन्तर इन टूटे धनुपवाले वीरोंके शिरों को अपने | गुप्तग्रन्या वाले भल्लोमे काटडाला, वह माफर पृथ्वीपर ऐमे गिर जैसे कि वजूमे I shall gratify your desire by fighting with you all at once." Thus bandying words with one another, those great and dexterous warriois, destroyers of foes, showered tneii allows from all sxdes. The one 0 king, fought against many till afternoon and they all covered him with the shower of their arious as the clouds do Sumeru mountains. That warrior with a calm and collected wind, cut dıwn nll their arrows like the vajra of Indra on the staff of Yum, in the way. There we saw,oking, the matehless prores of Somdatta's son Bhumishrava who alone, like an intrepit waruior, fought against many Then tho ten wariors, stopping their showa of arrows, suriounded him from, all sides in order to kill him. Theruupon, Bhur shrava in great rago cut down in a trico the ten b»of those warriors with ton of his frawe and then cut down their lieads with his arrows having hidden 20 - - (४६६९) roga Bhislima Pary [ 4669] भूरिश्रय संमभ्ययात् ॥ २५ ॥ र रन समरे पीडयित्या महावली । तावन्योन्यहि समरे निहत्य रथवाजिनः ॥२५॥ विरशा भियगन्ती समेयातां महारथी प्रगृहीतगादा सहगी तो चर्म परधारिणी ॥ २६ ॥ गुशुमाते गाव्यात्रा युद्धाय समयस्थिती। ततः सात्यकि मभ्येत्य निशियाधारिणम् ॥२७॥ भीमसेनरमा गजरथ मारोपयत् तदा । तचापि तनयो राजन भूरिश्रय समाये ॥ २८ ॥ आपस तूर्ण पश्यतां सर्थ धन्विनाम् । तस्मिस्तण वत्तेमाने रणे भीम महास्यम् ॥ २९ ॥ अयोधयन्त संख्या पाण्डया भरतपंभालोहितापति चादित्ये त्वरमाणो धनजयः ॥ ३० ॥पञ्चविंशति साठानिजधान महारथन् । ते हि दुर्योधनादिम्नदा पागनियईणे ॥ ३१॥ सम्मा- येय गता नाश शलभाइबपायकम् । ततो मत्स्याः केकयाच धनुर्वेदविशारदाः ॥३२॥ टूटे हुए वृक्ष पृथ्वी पर गिरते हैं, हे राजा युद्धमें मरेहुए महाबली बार पुत्रों को देखकर, बड़ी गर्जना करता हुआ सात्यकी भूरिश्रवा के सम्मुख गया और दोनों महावली युद्ध में रथ से रथको टक्कर देकर रथोंके घोड़ोंको परस्पर मार विस्थ होके सम्मुख गते हुए बन्द युद्ध करने लगे, फिर यह बड़े खड्ग और दालोंको धारण किये हुए युद्धमें मत्त महा शोभायमान हुए । २६ । हे राजाइस के पाछे भीमसेन ने उत्तम खड्ग धारी सात्यकी के पास आकर उनको रथपर सवारकिया फिर भापके पुत्र ने भी सब धनुप धारियों के देखते हुए शीवही भूरिश्रवा को स्य पर सवारकिया, हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ इस प्रकार से उस युद्ध के प्रवृत्त हनेपर महा क्रोधित पांडव और भीप्मनी भी युद्ध में प्रवृत्तहुए. सूर्य के अक्षण होने पर बड़ी शीव्रता करने वाले अर्जुन ने पच्चीस हजार महारथियों को मारा । ३०॥ फिर वह दुग्योधन की भाज्ञा से अर्जुन के मारनेकी इच्छा में अर्जुन को नपाकरही ऐसे नष्ट होगये जैसे कि अग्नि में टीडीमस्म होजाती हैं, इस पीछे धद में पंडित मत्स्य और केकयों ने आकर पुत्रसमेत अर्जुनकी चारों ओर के रक्षाकी फिर knots. They fell dead on the ground lilo trees struck down by light. ning. Seeing his bravo sons dead in the field of battle, o king, Satyaki faced Bhurisbrava with a tremendous roar. The tro varriors theu dashed their chariots against each other, and liaving killed each other's horses, they disniounted from their chariots and continued their duel. Both looked very glorious with their shields and swords. 20. Then king, Bhimsen came to Satyali the wielder of good sword and mounted him on his own chariot. Your son too, within sight of all tho warriors, took Bhurishraya on his own chariot Tyhen the battle was thus ragiog, O best of the descendants of Bharat, the en raged Pandavas and Bhishnı join d in Combat. Before supset Arjun had dostrored twentyfive thonsands of warriors.30. They had come by Duryodhan's order to destroy Arjua but unable to have their hands on him they were themselves destroyed in the attempt as the locusis in [ 4670] Malioblinrat (४६७०) परिवनुस्तदा पार्य सहवं महोरकम् । एतस्मिन्नेव कालेन सूर्यस्त मुपगच्छति ॥ ३३ ॥ सर्वेषां वैध सन्यानां प्रमोहः समजायत । अपहारं ततयक्रे पितादेवमनस्तय ॥ ३४॥ सध्याकाले महाराज सैन्यानो धातवाहन। पण्डियानां कुरूणाश्च परस्परसमागमे ॥३५॥ ते सेने भृशसविने ययतु स्थग्निवेशनम् । तेत.स्वशिविरङ्गत्यान्यविशंस्तत्रभारत। गांडया सापै.साधं कुरवश्य यथाविधि ॥ ३६ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि पंचमदिवसावहारे चतु सप्ततितमोऽध्यायः ७४ ॥ अच्छे प्रकारसे उठीहुई धूल के बादलों से सूर्यास्तसा होगया उस समय सूर्यास्त के कारण सेना में वड़ा मोह उत्पन हुआ, इस के पीछे हे महाराज, भापके पिता देवत्रतगिनके घोड़े थकेहुए थे उन भीष्मनी ने सायंकालके समय सेनाको विधाम दिया, पांडव और कौरवों के परस्पर युदसे अत्यंत व्याकुल वह दोनों ओर की सेना अपने निवास्थान को गई, इसके पीछे मजयों समेत पांडव और कौरव बुद्धि के अनुसार अपने २ डेरोंमें नाकर स्थित हुए ॥ १६ ॥ file. Then the great aches of Matsya of Knikaya, protected Arjun and his son from all sides. Thsun nt that time was so covered with the rising dust tlint it appeared as if he was about to set and tho armies became insonsible on account of the darkness. Then, Oking, your father Devabrat vhose horses were tied, issued orders to then to rest for tho mght. Both the armes depressed much on account of the excessive fighting Letn ceu the Kauravas and the Pandavas, re tirel as well as the Kauravas and entered their tents," 36. क (४६७१) Hori bluislima Puri [4071 सञ्जय उवाच विश्रम्य ततो राजन् सहिता उरुणरडयाः । व्यतीतायात पुनर्मुद्धापानर्ययुः ॥ १॥ तत्रशब्दो महानासीत्तर तेषाच मरत । युज्यतारथमुपाना कल्पनाचय दतिनाम् ॥ २॥ सनह्यतापदानीना हयानाचैव भ रत। शपदुदुम नादश्च तुमल सर्वतोमवत् ॥ ३ ॥ ततो युधिष्ठिगे राजाधृष्टयाममायत । व्यूटयूटमहागहो मकरशत्रुनाशगम् ॥ ४ ॥ एवमुकस्तु पायन घृपयुम्नीमहारथ व्यादिदेशमहागज रथिनारथिनांवर ॥ ५ ॥ शिरोमद्रुपदस्तम्य पाडानजय । घरी सध्देयश्च नकुलश्चमहारथः ॥ ६॥ तुंडमासीन् महाराज भीमसेनोमहारल । भीमद्रोद्रौपदयाय राक्षसचघटोत्कच ॥ ७॥ सात्यकि धर्मगश्च व्यहनीवासमास्थिता । पृष्टमासीनमहा राज विराटीयाहिनीपति ॥ ८ ॥ धृष्टयम्नेन सहितो महायागयान । केकपाध्रातर पचघामपार्श्व समाश्रिता ॥ ९। घृष्टकतुर्नरच्याघ्रश्चकितानश्च वीर्यवान् । दक्षिणपक्षमा प्राध्याय । ७५ ॥ संजय बोले हे रामा फिर वह कौरख पांडव रात्रि को व्यर्तत करके प्रातः कानही युद्ध करने को चले, इसके पीछे उन पांडवों के और अाप के पुत्रों के उत्तम रथों के जड़ते हुए घोड़ों के महा शब्द होने लगे और सब ओरमे गंव वा दुन्दुभियों के कठिन शब्द भी सुनाई दिये तव राजा युधिष्ठिरने धृष्टद्युम्न मे कहा कि हेमहावाहु तुम मकरव्यूहको तैयार का यह व्यूह शत्रुओं का संतप्त करनेवाला है, युधिष्ठिर की आज्ञा पातेही उम महारथी धृष्टद्युम्न ने रथी शूरवीरोंको आज्ञ.की उस व्युहका शिर तो राजा द्रुपद और अर्जुन हुआ और नेत्रमें महारथी नकुत्र और सहेदवहुए ।६। और मुखमें महा वली भीममेन हुआ और व्यहकी ग्रीवा में अभिमन्यु द्रोपदी के पांचो पुत्र घटोत्कच राक्षस, सात्यकी, और धर्मराज हुए और पीठ पर बड़ी सेना युक्त सेनापति धृष्टद्युम्न और विराट उपस्थित हुए और वाम भागमें पांचों भाई केकय वर्तमान हुए, और नरोत्तम धृष्टकेतु और पराम्मी CHAPTER LXIV "st the close of the night," continued San aya, 'eariy in the morn. the Kauravas and the Paodas as started for fighting The horses which diet the chariots cf the Pandavas and those of your sons, made & tremendous noise with their neighing The peals from the couchs and trumpetk were yet more prominent. Then Princo adhishthir thus addressod Dhrrehtadyumda —"Arrange your armies in the form of a crocodile great warrior, thv army will destroy the enemies." At Yudhishthur's command, Dhrishtadsomni arranged the warriors. Kang Drupad aud Arjun were stationed at the head, and Nalul and Saba dev formed the At the month stood braye Bhim and at he neck were Abhimanyu, the five sons of Draupadi, Gha'otlach the rakshas, Satyaki and Yudhishthir On the back Tere stationed Dorish tadyumna the commander and Vira; with a large army eyes. 6 On the left [4672] Mhbhuat (६६७२) श्रिरय स्थितन्यूहस्यरक्षणे। १० ॥ पादयोस्तु महाराज स्थित श्रीमानमहारए । कुति भोज शतानीको महत्य सेनयावृत ।।११। शिखडीतुमहेप्यास सोमकै सवृतोवली । इराचाश्चतत पच्छेमकास्य व्यरस्थिती ॥ १२॥ एयमे महागाई व्यूहाभारतपाडवाः । मायादये महाराज पुनयुद्धायदशिता ॥१३॥ धौरवानभ्ययुस्तूर्ण हस्त्यावरणपत्तिभि । समन्छूि छत्रै. शस्त्रयविमलै शिते ॥ १४ ॥ प्युददृष्टवातु तत्सैन्य पितादेव प्रतस्तय । कोचेनमहताराजन् प्रत्यम्यूहतपाहिनीम् ॥ १५ ॥ तस्यतुडेमहेष्वासो भारद्धाजो ध्यरोचत । अश्वत्थामापश्चैव चक्षुगसीनरेश्वर ॥१६॥ कृतवर्मात सहित कायोजघर पालिकै । शिरम्यासी नरश्रेष्ट श्रेष्ठ सर्वघनुगताम् ॥ १७ ॥ ग्रीवायाशूरसेनश्च तय पुरश्चमारिप । दुर्योधनोमहागजगजभिबहुभिर्वृतः ॥ १८ ॥ प्राग्योतिपातु सहितोमद्रसी धीरकेक । उरस्पभूनरश्रेष्ठ महत्यासेनयावृत ॥ १९ ॥ स्वसेनयाच सहित मुशर्मा चेकितान दक्षिण पक्षमे नियत होकर ब्यूहके दक्षिण और नियत हुए । १० । और हे राजा बड़ी सेना समेत श्री मान महारथी कुन्तभोज और शतानीक व्यूहके चरणों पर स्थिर हुए, फिर बडा धनुषधारी बलवान् शिखंडीसोमकों समेत और राजा इरावान् उम मकरव्यूहकी पूंछपर नियन हुए, इस रीति से मकरव्यूहको रचकर सूर्य के उदय हानेपर मव पांडव फिर युद्ध करने को शस्त्रधारी होकर उपस्थित हुए और रथ हाथी घोड़े और बड़ी ऊंची घना वाले क्षनियों से युक्त सब प्रकार के स्वच्छ अस्त्रों समेत कौग्वों के सम्मुस गये, हे धृतराष्ट्र भापके पिता भीमगी ने उप्स अलंकृत सेनाको देखकर अपनी सेनाको भी क्रौच नामपड़ेव्यूह मे यही रचग से बनाया। १५ । उसके मुखपर बड़े धनुर्द्धर द्रोणाचार्य और नेत्रोंपर | अश्वत्थामा और कृपाचार्य हुए और शिरसी और कृतवर्मा वाल्हीक और काम्बो- न वाले हुए, और ग्रीवा में सब राजाओं समेत आपका पुत्र दुर्योधन और शूरसेन नियत और सेनासमेत राजा माग्ज्योतिप भद्र और केकयोसमेत सौवीर wing were the five Kukaya brothers, and Dhrishtaletu the best of men with brave Chelitan was stat oned on the right wing And brave huntiblioj and Shatanık stood, O bing, at the feet of that ariay Then the great aicher Slıkhandı together with the Somıkt and King Irawan stood at the tul Ihus having arrayed the army in the form of a crocodile the Pandavas armed with reapons stood redy to fight at sunrise and with chariots, elephants, horses and warriors having high banners and well polished weapons they faced the Kaurazas. And seeing Oling, that well arranged army, your father Bhishm formed his armies into an array named Kraunch 15 At its mouth was the great archer Dronacharya and Ashwathanas and Kriprcha ya were at the eyes At its head were hritvarmi, Vablik und the Cambojes and at the nech was Duryodhan your son together with all the princes and Shursen King Pragjyotish with a 10 - (४६७३) vaga Blushma Pirs [4073} प्रत्याधिए । घाम पक्ष समाश्रित्य दशित समवस्थित ॥ २०॥ तुपारा यवनाचव शकाचसह चूचुपै । दक्षिण पक्षमाश्रिन्य स्थिताव्यूहस्य भारत ॥ २१॥ भुतायुश्च शतायुश्च सौमदत्तिय मारिष । व्यूहस्य जयनेतस्थुरक्षमाणा परस्परम ॥ २२ ॥ ततो युद्धाय सजग्मु पाण्डवा. कोरवै सह । सूर्योदये महाराज युद्धमभूनमहत् ॥२३॥ प्रतीयू रपिनो नागा नागांश्च रपिनोययुः । हयारोहान् रथारोहा रथिनश्चापि सादिन ॥ २५ ॥ सादिनच हयान् राजन् रथिनश्च महारणे। हस्त्यारोहान् पयारोहा रचिन सादिनस्तथा ॥ २८ ॥ रथिन' पत्तिम. सार्द्ध सादिनचापि पतिभि । अन्योन्य समरे राजन प्रत्यधावन्नमर्पिता ॥ २६ ॥ भीमसेनार्जुनपर्म गुप्ता चा पैमहारथे । शुशुभेपाडवी सेना नक्षत्रग्विावरी ॥ २७ ॥ तथा भीष्मकृपद्रोणशल्य दुय्यांधनादीम । तथापि छातीपर नियतहुआ और प्रस्थल देशका राजा मुशर्मा अपनी सेना समेत पायें भाग में शस्त्रों को धारण करके नियत हुआ । २० । और तुपारयवन और शक चौल्कों समेन व्यूहके दाहिने भाग में बड़ी मावधानी से वर्तनान हुए, और श्रुतायु शतायु सोमदत्त मारिप यह सब . व्यूहकी जंघापर रक्षा करनेवाले हुए इम के पीछे हे राजा सूर्यके उदय होने पर पाण्डव कौरवोंके समूह युद्ध के निमित्त चने फिर युद्धहोना प्रारम्भ हुआ, हाथी रथियों के सम्मुख गये और रथी हाधियों के मम्मुख हुए अवाढ अश्वान्द्रों के औररथी अश्वारूदों के और अश्वा- मुल घोहों के सम्मुख पहुंचे और हाथी हाथी के सवारों से और रथी रथियोंके सम्मुख उपस्थित हुए हे राजा रवि और अश्वारूढ पत्तियों से युद्ध करने लगे और युद्धमें महाक्रोधित होकर परस्पर सम्मन दौड़े २६।और भीमसेन भर्जुन और नकुल व सहदेव यहमा अन्य महाधियोंमेरक्षित होकर ऐसी बड़ी शोभा को प्राप्तहुए जैसी कि नक्षत्रों मे गतिकी शोभा होती है, इमी प्रकार आपकी सेना भी भीम कृपाचार्य large army, Bladers and the Kulwgas with the Sauvus stood at the b cast The hing of Prasthal nimel Susharm, together with his armed coldiers, stood on the left side 20 Tushu yavan and Shal with the Cholhas, stood on the right wing, and Shrutagu, Shntaya, Somdatta and Marish guarded the thigh port on of the array Thent O hing, when the sun had risen, tlie armies of the Kauryas and the Pandavas ndvanced to battle and the fighting commenced The ele phants faced the chariots, the horsemen cnconntered the horsemen and chitrioteers faced the horsemen Ilepisant nders encountered the elephant aiders and chaoteers attacked charioters. The charioteers and lorsemen attached those on foot and ran against one another in anger Bhimseri, Arjun, Nakul and Sabadev, protected by other charioteers, embellished the battle field as the stars do the night. In tlic saino manner, your army s as glorious by the presence of Bhushm, 26 - - (४६७५) भीमपर्व Bhi hma Paur [4675] युध्यन्ल भाल ।। ३९ प्रतिसवार्य चात्राणि न्यान्यस्य विशाम्पते । युयुधु पाण्डवा यकोरपार महायला ॥ ३७॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वगिा भीप्सर्वनपर्वाण पष्ट दिवमयुदारम्भ पंच सप्ततितमोऽध्याय। ७ ॥ धृतग उयाच । एय पहुगुणं सैन्य मेघ याधिपुरा । प्यूदमेव पयाशास्त्रममोघय सञ्जय ॥ ॥ पृष्टमस्माकमत्यन्तमभिकामञ्चन सदा । प्रहरमन्यसनोपेत पुरस्ताद प्रषिक्रमम् ॥२॥ गातिवृद्धमयालाच नयनच पायाम् । लवृत्तायतप्राय सार योधमनामयम् ॥ ३ ॥ मात्तसनाहरानच यशवरिप्रहम् । असियुद्ध नियुद्धे च गदायुद्ध च कोविचम् ॥ ४ ॥ प्रासर्मितोमरेप्याजो परिपेयायसेपुच । भिन्दिपालेपु। शचीपु मुसलेषु च सर्यश ॥ ५ ॥ कपनेषु च धारेणु फणऐपुचसर्वश । क्षेपणीयेषु एक म्यान पा वर्तमान होकर मब युद्ध में प्रस्तहुए वह कौग पाइन उम महायुद्ध । में परस्पर मानोको महार करके युद्ध करते हुए ३७ ।। अयाय ७६॥ धृतराष्ट्र गोले हे मंगप यह मेनाबहुगुण मपान अनेक प्रकार के शास्त्रके अ- नुमार अलकत और युद्धमें मफल है, पार हमारी मेनो भी सदेवप्रसन्न सकल रूप और उदार हैं गिमफा कि पराक्रम मारंभ हो देवाजाना है, न बहुत दृद्धा न | बालक नलिन पुष्ट है किन्तु हस्तलापरता आदि उपायोंमें कुशल अत्यन्त दृढभंगवाली मार नारोगह, काच और शवोंकी धाग्गा करने वाली अनेक गस्न समूहों से पूर्ण भुना गडग गा इत्यादि मे युक्त लड़ाई में बड़ी नारद, मास दुपारासद्ग तोमर परिव लोह के भिन्टपाल वरछी प्रगल पनपनुप पनप इत्यादि शत्रों में और उनके चलाने भाटिकी अनेक अदततामें पदोन्नता के पदोंमे मग्रामविपर नियनहोकर समकार मे योग्य पियामे पूर्ण अधरामल्न युद्ध, प्रपल शान your «19 and the opposite and in, cà thcie Both the nursing anl the Pantline dikharges their nepine at one another' 37 CdAPHIR NATI 111 uralles,' gaul blutrustatur aurelieeing Satijagtt "jigar flas varmnin qualitie., a dechir ucru din to the Shaytras nmi an shillul 'm fighting Out aruna stot, nrraltrny s chtoriul Fuccessful and 1 muy mnd tur je*t $ 4*}pronul 111m the beginning Thus it nothit tu uld not too gost", sc tluu loon tiex fint They 70 na Kdexterity of linnul a stiulig of breddy wul butlls They fxcamisu Srink n d annuur nu well n duifmeent purt's vi wapnios lido Assord maan 11.d oth ra ruc rodomp in lights Ticy posmu ss and Tre utalble of u-1thg prakKR, doul tod sti our tenurs clals Llhnd- I 014 - min TORX kaina te mirc sol figlites - ।

[40] fahnhhtar (४६७५) च चमो सेना प्रहेद्यौग्धि माना ।। २८ ।। मीमसेनस्तु कौन्तेयो द्रोग दृष्ट्वा पाती। अभ्ययाज वनैरश्वैर्भारद्वाजस्य घागिनीम् ॥ २९ ॥ द्रोणस्तु समरे कुरो भीम मवाभ रायसै 1 विख्याध समरश्लाघी मर्माणयुद्दिश्य वीर्यवान् ॥ ३०१ ढाहतस्ततो भीमो भारद्वाजस्य सयुगे। सा प्रेषयामास यमस्य सदा प्रति ॥ ३१ ॥ ससंगृह्म स्वय चाहान भारद्वाज़ प्रतापवान् । व्यधमत् पाण्डयों सेनां तलराशिमिवानलः ३२॥ ते वध्यमानाद्रोणेग भीष्मेण, च नरोत्तमाः । समया. केकयै साई पलापतपासयन् ॥ ३३ ॥ तथैव तायक सैन्य भीमार्जुनपरिक्षाम् । मद्यते तत्र तत्रैव समदेव घराङ्गन ३४ , । अभियंता ततो न्यूही तस्मिन् वीरवरक्षये। मासीद्वयतिकरो घोरस्तव तेपांच भारत ॥ ३५ ॥ तद्भुतमपत्याग तावकागां पर सह । पकायनगताः सः यद द्रोणाचार्य शल्प और दुग्योधन से ऐसी शोभायमान हुई जैसे कि ग्रहों से भराहुआ आकाश शोभित होता है, फिर कुन्ती का पुत्र पराक्रमी भीमसेन द्रोणा. चाय को देखकर बड़े शीघ्रगामी घोडों की सवारी से उनकी सेना के सम्मुख गगा, फिर युद्ध में क्रोधित पराक्रमी द्रोणाचार्य ने मर्मस्थलों को ताककर नौ लोहे के वाणो से भीमसेन को घायल किया । १० । तदनन्तर उम युद्ध में द्रोणा चार्य से बहुत घायल हुए भीममेन ने उनके मारथी को मारा, फिर उस 'प्रतापी द्रोणाचार्यजी ने पाप घोड़ों को पकड़कर पांडवों की सेना काऐमा विध्वंस किया जैसे कि अग्नि रुई को भस्म करता है, हे नरोत्तम द्रोणाचार्य और भीष्मनी से घायल होकर वह संजय केकयों समेत भाग गये, इसी मकार भीमसेन और अर्जुन से भयभीत आपकी भी घायल सेना जहां तहां ऐसे भागी जैसे कि मतवाली श्रेष्ठ स्त्री जहां तहां भागती है, हे भरतवंशी इस के पीछे उस उत्तम वीरों के नाश में दोनों ब्यूह भिन्न भिन्न होगये और आपके पुत्रों को और पांडवों को महाघोर दुःख हुआ हेराजा हमने आपके पुत्रों का शत्रुओं के साथ वह पाश्चर्य देखा जो Kupacha ya, Donacharya Shalya and Duryalhan like the sky full Biarc Bluwsen the son of Kuuti sped on swatt lorsos to wards Dionycharya Diouzha full of prowess and anger ed Bhip trith nino non allons well aimed at the vital parts 30 Excessively wounded by Dronacharyd, Bhiisen billed hiu clariot driver and Dronachui ya tuling up the zeigos of his steeds hunsell destroyed the Pand at my de he does cotton Wounded by Dronscna, ya and Bhıslın, the Srınjayas and the barkayas fled from the field In the same mannei, terlibed by the attach of Bhum and Arjun, your wounded a diy dispersed in all dnections like a mad womau Then o de cendant of Bharat, both the anays itere broken on account of the dest. uction of the war110.s, leaving your sons as well as the Pan. davas pluuyed in grief. We saw, Ohing, the wonderțul fight of of stars nound.

(४६७५) भीष्मपर्व Bhishma Paur [4675] युभ्यन्त भारत ३५ ॥ प्रतिसंवार्य चास्त्राणि धान्यस्य विशाम्पते । युयुधु पाण्डया धैव कौरवाच 'महावला: ॥३७॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भाष्यबंधपणि पष्ट दिवमयुद्धारम्भ पंच-सप्ततितमोऽध्यायः ७ ॥ घृतगष्ट उपांच । एव वहाणं सैन्य में बहरिधपुरा । यदमेव यथाशास्त्रममोपचय सजय ॥ १॥ दृष्टम स्माफमत्यन्तमभिकामचनः सदा । प्रड्वमन्यसनोपेते पुरस्ताद दृप्रविक्रमम् ॥२॥ नातिवृद्धमयालश्च न कराग च पचिरम् । लघुत्तायतप्राय सार योधमनामयम् ॥ ३॥ मात्तसनाहशस्त्राच वाशनारिग्रहम् । असियुद्ध नियुद्धे च गटायुद्ध च कोपिएम् ॥ ४ ॥ प्रासापितोमरेप्चाजो परिघेवायसेपुच मिन्दिपालेषु शतीपु मुखलेषु च सर्यश.॥ ५ ॥ कपनेषु अ चापेषु कणचसश । क्षेपणीयेषु एक म्यान पर वर्तमान होकर मव युद्ध में प्रवृत्तहुए वह कौरख पात्र उम महायुद्ध ।। में परस्पर प्रात्रोको प्रहार करके युद्ध करते हुए ३७ ।। अध्याय ७६ ।। धृतराष्ट्र वाले हे मंजय यह मेनाबहुगुण मंपन्न अनेक प्रकार के शास्त्र के प्र- नुमार अलंकृत पार युद्ध में मफल है, और हमारी सेनों भी सदैवप्रसन्न सकल रूप और उदार है निमका कि पराक्रम प्रारंभही देवाजाना है, न बहुत दृद्धा न बालक नदुर्बल न पुष्ट है किन्तु हस्तलापाता आदि उपायोंमें कुशल अत्यन्न दृढमंगवाली और नीरोगहै, कवच और शत्रोंकी धारणा करने वाली अनेक शस्न समूहों से पूर्ण भुना गड़ग गदा इत्यादि मे युक्त लड़ाई में बड़ी तीनहै, मास दुपाराखड्ग तोमर परिघ लोदेके भिन्दपाल वरछी मृगल कंपनधनुप कनप इत्यादि शत्रों में और | उनके चलाने आदिकी अनेक अमृतनामें वं मदान्मनता के युदोंमे मंग्रामभूगिपर नियतहोकर सरकार से योग्य, वियाग पूर्ण प्रवामान युद्धमें प्रकल मात्र jour sons and the opprite side engaged the e. Both the Kauravas and the Pandiray dixhargel their respirn at one another"37. CHAPILR LAXYI • Thter ULJithec," sairl Duttashtat addre sang Sanjast, "iposress Various qualitie, au deckichaccu.dmg to thic Shastras nu are shillul 'ın fighting Oui arunus too, isto altrays clicorlul, successful and nav nmous and their prose-s is rell purural on the leguhing They ure nutliui lov old nui too sring, nc thu lean tior fat They Jouets dexterity of liand 010 tiong of lu dg and licnltlir They poseesy arms and armuur as well as differunt sorty of weapoos libe Awords, inaces and otliers and ory : liep in tighing They paswas and are ci pnlslo ot urlig prasca, doul lucaged skortis, trmars, cluls, Llundpilas <IKAIB,- murals loks, kruss (te ind ure goot fighters, [4076] Mahnbharat (४६७६) चिनेमुष्टियुद्धपुचश्नमम् ॥ ६ ॥ अपरोक्ष च विद्यासु व्यायामचकृतश्रमम् । शस्त्रग्रहण विद्यास सर्वासुपरिनिमितम् ॥ ७॥ थारोहेपर्यवस्कदेसरणेसातरप्लुते । सम्यानहरणे यानेव्यायानेचकोविरम् ॥ ८ ॥ नागाश्च रथयानेषु बहुश सुपरीक्षितम् । परीयन यधान्याय घेतगेनोपपादितम् । ९ ॥ नगोष्ठयानोप कारण नच बंधुनिमित्तत. सौ. हृदयलेगापि नाकुलीन परिग्रहै. ॥ १० ॥ समृद्धजन मार्य च तुष्टसधियांधवम् । कृती पकार भूयिष्ठ यशस्थिय मनविच ॥ ११ ॥ स्वजनस्तु नरैमख्यशो दृष्टकर्मभि । लोकपालो पमैस्तात पालितं लोकविश्रुतम् ॥ १२ ॥ बहुभि क्षनिगुप्त पृधि पालोक 'संमते । अस्मानाभि गते कामात्सवले सपदानुगे ॥१३। मह दधि मिधापूर्णा मापना मिसमतत 1 अप पक्षिसकाशै रफ गश्च मवृतम् ॥ १४ ॥ नानायोघ जल भीम वाहनोमितरगिणम् । क्षेपण्यास गदाशक्ति शरणाससमालम् ॥ १५ ॥ यजभूर्पण संवाद रत्नपट्टसुसचितम् । परिधावद्भिरश्वैश्च वायुवेग विकषितम् ॥ १६ ॥ अपार विद्याके शाता सब विद्यानोंपे पंडित, सवारहोने वा डेरेमें रहने वा चलने वा दोनों के अन्तरसे चलने वा शस्त्र चलाने वा चढ़ाई करने का समय देखकर हदजानेमें कुशल बुद्धि, हाथी घोडे और रथोकी सवारियों में बहुधा परीक्षा कियेहुए और परीक्षालेकर न्यायके अनुसार मासिक आदि वेतन के योग्य है । और सभा उपकार नातेदारी और मित्रों के और कुटुम्वियों के बल और, सामानों के कारण अधिकार नही पाने वाले हैं, वृद्धियुक्त वा उत्तम मनुष्य जिन मे बांधव प्रसन्न और प्रतिष्ठावान है और बहुत उपकारी यशस्वी साहसी वेगवान उत्तम कमी लोकपालों के ममान ससार में प्रसिद्ध मनुष्यों से योपित अपनी इच्छा से सेना | समेत पाछे चलनेवाले बहुत से क्षत्रियों को लेकर हमारे समीप आनेवाले चारों ओर से समुद्रके समान उमगते हाथी रयघोडों समेत अनेकशरवारों से शोभित बढ़े भयानक क्षेप खड्ग गदा परछी वाणपरशु इत्यादि अनेक शस्त्रों से अलंकृत रत्नजटित रेशमी वस्त्रा से मंडित अनेक धजामों समेत चारों ओरको दौड़नेवाली सवारियों में बैठे समुद्र having a complet knon ledge of all sorts af forlike and wrestling exercises They are learned in all sorts of sciences and are good at ho sem usłup camp management, marches, use of weapons, making assrults ou timely retroit, They hare olten been tested in a ding and during the elephants houses and chariots and are wo thy of receiving tho pay 7 Thiey a e not taken into sei viec by social influence, Lipsipan słup friendship and recommendations of friends They are of good and respectable families and are l and hearted, glorious, courageous, bimble, good, brought up by those s lo are famous like lokprls will ning to follow the armies, laying many friends among warriors, briso Ho the rising ocean, zusses bi of elephants, char ots and horses, dech. Hl with wods, nares, spirs, arrows and other Wulike Feapons, " clrd (४६७७) भीष्मपर्य Bhishnn Pnry [4617) शिघ गर्जने सांगा प्रतिमं महत् । द्रोण भामाभि मंगुप्त गतंच कृतवर्मणा ॥ १७ ॥ हादुःशामनायां च जयद्रय मुसैलया। भगवन पिकाम्यां द्रौणिमायलबादिहर ॥ १८ ॥ गुतं प्रधरिलोकेश्च सारयद्भिर्महात्ममिः । यहन्यतसप्रामे दधमत्ररातनम् ॥ १९ ॥ नैतारशं समुद्योग पर्वतो हि मानुपा । पयोषा महाभागाः पुराणाभुधि समय ॥ २० ॥ ईशोपि वलीधस्तु संयुक्तः शस्त्रसपदा । यायने पर संग्रामे किमायदा गयतः ॥ २१॥ विरीत मिद सर्व प्रतिभाति सजय ! यत्रेशं चल घोरं पांडया भासद्रणे ॥ २२ ॥ पाण्डवार्थाय नियतं देवास्ता समागताः । पुरते मामक सन्य पया वध्य संजय ।। २३ ॥ उकोहि विदुरेणा हितं पश्य च नित्यमा निचजनाहतन् मद पुत्रो दुर्योधनामम ॥ २४ ॥ तस्य मन्यमति र सर्वतघ महात्मनः । आसीद्यथागत समान के गर्जनेवाले द्रोणाचार्य और भीष्म मे राक्षत कृतवर्मा, कृपाचार्य, दुरशा- मन जयद्रय भगदत्त विकर्ण अश्वत्थामा शकुनि बालीक इनबढे २ वारों से और महात्माओं से रक्षित जो सेना युद्ध में मारी गई इसमें होनहारही प्रवलदै, हे संजय पृथ्वीपर ऐसे युद्धको बड़े २ ऋषि मुनि और महात्मा मनुष्यों ने भी कभी नहीं देखा । २० , शवधन लक्ष्मी से युक्त ऐसा सेनाका समूहभी जिस युद्धमें मारा जाता है वहां पारण्य के मिवाय क्या समझना चाहिये, हे संजय यहमब विपरीत दृष्टपड़ता है कि जहां ऐसी भयानक सेनाने युद्ध में पांडवों को नहीं जीता, हे संजय पाडवों के निमित्त देवतातो आनकर हमारी सेना से नहीं लड़ते हैं कि इतनी प्रबल सेना पायलहो जाती है. इसस्थान पर सदैव हितकारी फल दायक वचन विदुरजीने कहा है परन्तु मेरा अभागा बेटा दुर्योधन उसः वचन को नहीं मानताई मैं मानता हूं क्योंकि उस सर्वज्ञ महात्मा विदुरका पहला कहा हुआ अवसत्यहुआ हे तात उस , in jom bedecked sill. clothos, runnız kiflier and thither with ligla banners, riding good carriages, roaling lihe the oceun and protected by Drooncharya, Blishım, Krstrarma, lí ripachary a, Dushasan, Jayadrath, Blagdatta, Vikan, Ashwathama, Shabun, Vablıh and such other Marriors and great inen The destruction of such an army may be ascribed to fate alone. Rishis munis and great men of the world have never seen such awar. 20. Such a large destrution of weapons and wealth as is being done in this far, may le aseriled to fule alone. All this Is presposterous, Sanjaya, in as much as such u tremendous artny could not via the Pandaras. "Is it the gods that fight for the Pandavas and disable our strong armies! Vidur always face good advice regarding this matter, but my unfortunate sou Dura yodhan neret gaio any attention to it for that the saying of 1 {40781 M[aliabharat (७६७८) तात येनदृष्ट मिदएरा ॥ २५ ॥ अथवा भाग्य मेव हि संजय तेग सर्वथा । घामाया सृष्ट तत्त नैतन्यो ।। ६। - इतिश्री महाभारते भीष्मपर्वणि भाप्रवधपर्वणि घृतराष्ट्राचंतायां *६, पटमाप्ततितमोऽध्यायः ।। ७६ ।। संजय उवाच॥ आत्मदोपत्धया राजन् प्राप्त व्यसनमीदृशमें निहिं दुर्योधनम्ता नि पश्यो भतर्षभ ॥ १॥ यानि स्व दृष्टवान् गजन धर्मसङ्करकारिते । तब दे पात्पु । वृत्त इतमेव विशाम्पते ॥ २॥ तव दोषेण यद्धश्च प्रवृत्तं सह पाण्डवैः । त्वमेवायफलं नुक्ष्य कृत्वाकिरियष म त्ममा । ३॥ आत्मनेव कृत कमै ह्य त्मने वोपभुज्यते । इह च भय चा राजस्चयाप्राप्त यथा तथम् ॥ ४ ॥ तस्माद्राजन् स्थिरी भूत्या प्राप्येद् व्यसन गहत् । गुणयुद्ध यथावृत्तं शसतो मे नंगधिर ॥ ५॥ भीमसेन सुनिशितैर्वाणमित्या महाचम् । आससाद ततो वीर सन् दुर्योधना नजान् ॥ ६॥ दुमीसदुपिह नेपर्वही ऐसा देखाथा, हे , संजय इस प्रक र की होनहार को उस ने पूर्वही देख लिया कि ईश्वर को अब ऐसा करना है इसके विपरीत कभी नहीं होतक्ता २६ ॥ m, अध्याय ।। ७७॥ • संजय बोले हे राना तुम ने अपने दोप मे एसे दुःखों को पाया हे भरतर्षभ इसको, दुर्योधनानही देखता है। हेराजा जिनको तुम ने देखा है वह सब धर्म को अधर्म से मिलानेवाले है हे राजा पूर्व समय में आपही के दोष से यह वा जारी हुआ, आपके ही दोष से पांडवों से युद्ध मारंभ हुआ, और अब तुमी अपने पाप को करके उसके फलको भोगो, पापने ही कर्म कियाहै इसका फल इसलोक में वा परलोक में प्रापही को भोगना पड़ेगा हे राजा जैसा तुमने कियाथा वैसाही फलभी ठीकपाया, इससे हे धृतराष्टं तुम चित्त को समाधान करके इसमहादुःख को पाकर इसयुद्ध हानेका वृतान्त मुझसे सुनो।। तदनन्तर वीर भीमसेनने बड़े तीक्ष्ण पाणों से आपकी बड़ी सेनाको चलायमान करके दुर्योधन के इनसब भाइयों को l'idur the list and great has p oved true. He furesrw long ago what was commy to pass and it will never happ:n other wise" 20 CHAPTER LIXVII "Your miseases, Sard Sanjaya, frre the results of your own sus, hing Duryodha dhe es tut see this, O best of Bharats Those whom you lato feeu Okung, die mixing ádliar diy with dharın It was though your fault, hing, that the gambling tool pl ce ard the war with the Pandas as comnienced. You yourself will renp the fruit of your You will suflet the punishment of your own wicked oss either in tlus ou the vertrould You late zaped O lag, wliet jou kind sown Compose you inlod, Oling and liedr fiony me the account of this man wl Lought you so much trouble amows brave Bhimsen, winle dest oying rotn ammes, found limself 5 With sharp (४६७२) भीष्म b}IUN TIP ( 1679 दु सप्त दुर्मद जयम् । जयत्सेन विकर्णच चित्रसेन सुदर्शनम् ॥ ७ च चित्र सर र्माण दुष्कर्ण कर्ण मेयच । एतावान्याश्चमुसदन ममीपस्थान महारान् ॥ ८॥ घात राष्ट्रान ससद्धान् दृष्टयामीमी महारय भिमेण मर गुमा प्रयिश महाचमम् ॥१॥ अयालोश्य प्रविष्टन्त मस्ते सर्व एयतु । बीयप्राद निगृणीमो ययमेग नगधिया ॥ १० ॥ सते. परिमृत. पार्थो भ्रातृभि कृतनिश्चयें । प्रजासहर मर्य गरिय मदा मद ॥ ११ ॥ सम्प्राप्य मध्य सन्याय नभी पापडयमाविशत् । या वेषामो युद्ध मई न्द्र प्राप्य दानवान् ॥ १२॥ ततः शत सहसणि रचिना सशिनभो । उधतानिशर रतीयस्तम परि यदिरे ॥१३॥ स तेषा प्रवरान् योधाम् हस्त्यावरथसादिन.1 अचान समरे शोधातरामा नचितयन् ॥ १५ तेपा व्यवसित नात्या भीमसेनी जिपक्षताम् सम्मुग्न पाया, दुशासन, दुर्विपह, दुःसह दुर्मद, जयमेन, विकर्ण, विमेन मुद- र्शन, चारुमित्र, सुबर्माण दुष्कर्ण वर्ण इनके सिवाय और बहुत से रथ में चढे समीपी महारथी इनसरको माक्रोध रुप महारही भीममेन देखकर युद्ध में भाप्मनी मे रचिन बडीउन सेनामें गुप्तगया! 1 इमसेनीमें घुमेहुए भीम मेनको देखकर बहसव बोले कि हेरानामो हममर इसको जीताही पकड़े। १० । (जैसे कि समारके नाश करने में मृH बडे २ तर ग्रहो से घिराहुभा होता है इमी प्रकार यह भीममेन इन निरनय करने वाले भाइयों से घिराहुमा वर्तमान हुआ, सेना के मध्यों भी नाकर इसको ऐमे भय नहीं हुआ जैसे कि महाइन्द्र देवता असुरोंके युद्ध में दानोंको पाकर मय गीत नहीं होता है, तदनन्तर घोर 'वाणों के समूहोंको फेंकतेहुए एकलास शस्त्रधारी रथियोंने इस अकेलेको घेलिया, नगष्टके पुत्रोंको ध्याननकरके उममहावलीने उममेना के बडे जंगी हाथी घोड़े रयारसवा रोंको मारा, देराजा पकडनेके इन्ठावान उनलोगों को जानकर उस पराक्रमी भीम- सेन ने सबके मारने कोमनोरय किया, और रय को त्यागकर गदाहाय में रेके उन frco to face vita Dusbasan, Durvisliah Dassal, Durmad, Jayasen, Viken, Chitrawen, Sudarshan, Chuunutra Sulzrwan, Dushlarn and Karn the brothers of Duryodhan. Besides these there \ere many Bhimsen im great anger, seeing all the e, entered that large ariny protocted by Bhishm. See ng Blumsen there in the zuidst of the army tley all cried out wita one 10ice, Let us catch lum alire" Just as the sun is sui rounded by fierce constellations, Blumen was surrounded by the brothers re al ved ta ciptare hum, But hc was not afraid of the epemies as lodiy, during the war of the gods and asurs is vot afraid of the Danaras. Then dochargog thick showers of arrots a hundred thousand of the warriots rounded lunu but Bhiuson not caring fo the sons or Dhutrashtia in the least, des troyed the huge elephants, horses, chariots and horeen of that lar arity And hoowing them to be desirous of capturing him, be resohı. Vairrors. 10 [4680] Mnhabharat (४६८०) समस्तानां बधे एजन् म त चके महामना ॥ १५॥ ततोग्य समुत्सृज्य गदामादाय पाण्डव । जघान धार्तराष्ट्रागा तं बलोधमहार्णवम् ॥ १६ ॥ भीमसेने प्रविष्टेत धृष्टद्युम्नो पि पापत । द्रोणमुत्सृज्य तरसा प्रथयौ यत्र सौबल ॥ १७॥ निवार्य महतीं सेना ताम फाना नरर्पम । गाससाद रथ शुन्य भीमसेनस्य सयुगे ॥ १८ ॥ दृष्ट्वा विशोक समरे 'म मसेनस्य सारथिम् । धृष्टद्युम्नो महाराज दुर्भना गतचेतन ॥ १९ ॥ अपृच्छद्वापस । रद्धो निःस्वसन वाचमीरयन् । मतप्राण प्रियतम क्व भीम इति दुखित ॥२०॥ वि शोकस्तमुवाचेद धृष्टद्युम्न कृताजलि । संस्थाप्यमामिह बली पाण्डवेयः पराक्रमी २१ ॥ प्रविष्टो धार्तरापागा भेतवल महार्णयम् । मामुक्त्या पुरुषव्यान' प्रीतियुक्त मिदंबच 1॥ २२ ॥ प्रति पालय मां सूत नियम्पाश्वान्मर्त्तकम् । याच देतानिहन्यद्य य इमे धोद्यना ॥ २३॥ ततो दृश्या प्रथायन्त गदाहस्त महाबलम् । सपामेच सम्यान सहप सम जायत ॥ २४ ॥ तस्मिन् सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयानके। भिवा राजन आपके पुत्रों समेत सेनाके महा समूहको मारा । १५, फिरसेना में भीमसेन के प्रवेश करनेपर पृपतका पुत्र धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्य को छोड़कर बड़ीशीघ्रता से वहां गया जहां शकुनी वर्तमान था, उसनरोत्तम ने युद्ध में आपके पुनकी बड़ी सेनाको | हटाकर भीमसेनके रथको पाया, हे महाराज वहा भीमसेन के विशोकनाम सारथी को देखकर बड़ाखिन चित्त अचेतहो अश्रुपात युक्त गदगद कण्ठ से महादुःखित वामालेकर धृष्टद्युम्न बोला और पूछा कि मेरे प्राणों से भी प्रियतम भीमसेन कहाँ है । २० । यह सुनकर हाथजोड़कर विशोक,धृष्टद्युम्न से बोला कि महाबली भीम- | मेन मुझको यहाँ नियत करके अकेलाही धृतराष्ट्र के पुत्रों की असंख्य समुद्र रूपी सेना में घुसा है और मुझसे ऐसे प्राति पूर्वक वचन कहकर गया है कि हे मत्त तुम घोड़ों को एक मूहूर्त तक थांभ के मेरी वाट देखो मैं इन के मारने को जाताहूं जो कि मेरे मारने की इच्छा कररहे है, सो गदाहाथ में लिये उस महाबली को दौड़ता देखकरसव मेना में बड़ी प्रमाता हुई, हे राजा उसबड़े भयकारी तुमुल युद्धके ed to kill them all He Juinped down from his chariot, mace in hand and destroyd your sons along with other warriors 15. While Bhimsen was in the midst of the army, Dhrishtadyumn the son of Prasliat left Dronacharya and went there where Shakuni was 1 liat best of men pushed through the army of your son and found Bhin's chariot there and seeing Vishok the chariot drner, he with a troubled toind, faint voice, tearful oyes, choked throat and deop sighs, ashod of the whereabouts of Bhim, saying "Where is Bhın who is drearer to me than life?"20. At this, Vishok with joined palms, sud, "Brave Bhim. haying stationed me here las alone entered the innumerablo armies of tho song of Dhritrashtra. He told me in affectionate tone to keep the horses here for sometime as he was going to kill thoso who intend. ed to destroy Lim All the warriore were pleased to see him (४६८१) भीष्मपर्थ Bhishma Pary [16813 महान्यूह प्रविवेशकोदाः ॥ २५ ॥ विशोकस्य वचः श्रुत्या प्रष्टयानोपि पातः । प्रत्य पाच ततः सूतं गमध्ये महाबलः ॥ २६॥ नाहिने जोत्रितेनापि विद्यतेद्य प्रयोजनम् । भीमसन रहित्या स्नेहमसृज्य पाण्डवैः ॥ ७॥ यदि याणिविनाममिं किमति पविष्यति । एकायन गते भीमे मषिचावस्थिते, पधि ॥ स्वस्ति तस्य कति देवाः शक्रपुरोगमाः। या सहायान परित्यज्य स्वस्तिमानार ने गृहम् ॥ २९ ॥ माभीमः सत्राचैव सर्वधी च महाबलः । भक्तोरमाभक्तिमांश्चाद तमपरिनिदनम् ॥ ३० सोहत गमिष्यामि यन्त्र यातो वृकोदाः निजतं मारिपक्ष्यदानवानिय यासयम् ॥३१॥ एवमरमा ततो धीरो ययौ मध्येन-भारत । भीमसेनम्य मागंए गदाप्रति गंज ॥ ३२ ॥ स ददर्श, तदामीम दहतीप्रवाहिनीम् । वासो वृक्षानिवबलात् प्रमजत वत्तमान होने पर आपका मित्र बड़ी भेनाके व्यूहको हटाकर प्रवेश करगया है। या विशोक के वचन सुनकर वह महावी धृष्टद्यम्न जीजससूत से यह ययन बोला पाण्डवों के साथ प्रीति करके और भीमसेन को युद्धमें छोडकर प्रभावन मुझको कंछ प्रयोजन नहीं है मैंभी बिना भीमसेन के कभी न जागा क्योंकि भीमसेन के बिना नाऊंगा तो मुझको सवक्षत्री क्या करेंगे युद्ध में भारत के एक ओर जाने औरमेरे नियत होनेपर इंद्रसमेत सयदेवता उनके अकल्याणको करते हैं जो मह कोको त्यागकर जीतेघरको जाते हैं, हेशत्रहन्ता वेह महावेलीभीमसेन मेरामित्र नातदार और परमभक्तहै और मैं भी उसमे भक्ति रचनेवालाई । ३० । मो हे भूत मैंभीवहीं जाऊंगा जहां भीमसेन गया है मुझको मी तू देख कि मैं शत्रुओंको कैसामारताहूं में कि इन्द्रदानों को मारताहै, .हे राजा ऐमाकहकर वह महाबलीभीमसेन की गदा में मारे हुए हाथियों में उत्पन्न भीमसेन के मागों में होकर चला वहां उस ने 'शत्रुनाको भस्म करते और जो कि वायु नोंको काटताहै उसी प्रकार युद्धमें राजाओं को rushing macó in hand and that friend of his had !ought his way through that large army. 25. Having received this informat on from Vishok, vase Dhirishtadyumn said, "Joving the l'andavas as I do shall live no longes without Bhu. All the hshatry as will desi.se 010, if I skall lezve him here alone India and other gods will give me the reward of those who lcare their fiunds in the lunch, if I shall: desert mninon: Bharo Bhimsen is my friend, hinsman ard.derotes, and I too, ain devoted to hun. 30. J, teo, O Sut, will fullo.r, the ſdotsteps of Bhim; you will see hoir I Lill the enemies ng India des troys the Damavas." Having saud this, O hang, he rent orer the pati made by Bluunsen by killing the elephants with leis date and so him thérd dostroying tic enemies and princes as the vind fell don a trous Vodel liy 'Bhim the terrified charioteors, lorsemen, foot soldies and । [40821 Moliabhnint (४६८२) रणेरिपून ॥ ३३ ॥ तेवध्यमान समरे रधिनः सादिनस्तरा । पादाता निमय धनुरास्वमहत् ॥३४॥ हाहाकारश्च सजने तय सैन्यम्य मारिष । यभ्यतो भीमसेनेन कृतिनाचित्रयोधिना ॥ ३५ ॥ तत फतामास्ते स परिवार्यवृकोदरम् । अभीताः सम पतंत' शस्त्रवृथ्यापरतप । ३६ ॥ मभिद्रुत शस्त्रभृताधारठं सततः पाण्डलोकधीर: सैन्येन घोरेपा साहितेन दृष्टया पलीपार्वतो भीमसेनम् ॥ ३७ ॥ अथापगच्छच्छेरपि संतांग पदातिनं क्रोधषिष मंतम् । माश्यासयन् पार्वतो भीमसेनं गदाहस्त कालमिर्यातकाले ॥ ३८ ॥ विशस्य मेनचचकारतर्ण मारोपयच्यात्मरपमहात्मा : भूश परिष्यन्यच भीमसेन आभ्यासया माससशत्रुमध्ये ॥३९॥ भ्रातृनधोपेत्य तथापिपुत्रस्त स्मिन् विमर्दै महति प्रवृत्ते । अप दुरात्मा द्रुपदस्यपुत्रः समागतो भीमसेनेन सार्थम् ॥४॥ संयाम सः गहता घलेग मायोरिपुः यतामनीम् । श्रस्थातुर फ्यं तममृष्य | छिन्न भिन्न करते हुए भीमसेन को देखा, युद्ध मे भीमसेनसे घायल और पीड़ितरथी सवार पदाती और हाथियोंने महा भयभीत औरपीड़ामान होकर घोर शब्द किया, हे राजा भापती सेनामें बड़ा हाहाकार उत्पन्नहुमा और यह शब्द पुकारने लगे | कि सावधानहो अपूर्व युद्धकरनेवाले भीमसेनके हाथो सेना नाश जाती है ।३६) इसके पीछे बड़े निर्भय अखों के ज्ञाता उनवारों से भीमसेन को चारों ओरसे घर कर सय भोर से प्रस्त्रो की वर्षाकरी, फिर वलवान धृष्टद्युम्न बड़ी मिलीहुई पोर | सेना से सम्मुख हुए महावली लोक में प्रसिद्ध भीमसेन को देखकर, उसके पास गया और याणों से छिदे हुए क्रोधरूप विपको उगलते प्रलयके काल पुरंपकी समानगदा लियेहुए भीमसेन को विश्वास कराया, फिर उस महात्मा ने बहुत शीघहीं उसको वाणों से छुटाया और अपने स्थपर सनार किया और शत्रुओं के मध्यमही अच्छे प्रकार मिलकर विश्वास कराया, इस के पाछे आपका बेटाभी उम युद्ध में अकस्माद भाइयों से मिलकर बोला कि यह द्रुपद का वेटा निर्बुद्धी भीमसेन के साथमें पाया है । ४० । इस के मारने को हममव एक साथही चलें क्योंकि हमार elephant riuro wo o raising tezublo cries of distiess There was a cry of All and alas.".in www.ar.43.And soles punla haul Remetul. The army is loung destioyed by Bhimsen ot matchless prowess " 35. Thon the intreprd warilors, well knowing the sounce of allns, sul lounded hidi on all sides and pured on lum a volley of weapons Then bravo Dhirishladyumna, seeing the famous Wario2 Blue surrounded by tho»o terable to ccs, went to limn and by his presenco chosred Blum. son who boing pierced with tho alions was vomitting fo-tli the poison of luis auge, studing mace in hand I lo Death Ho soon disenlunyled his body fou tho 10: of arrows and turthici cheered lanın in the undst of the enemius by maling hidi mount luis chariot Then your son collected luis bouliers in haste und addressed them thus.--"This ron of Drupid,"sala ine, his joined foolish Bhim 40"Tret usnil guto भीष्मपर्ष Bhishun Purr [ 4683.) माणा ज्येष्ठाबयानोदिताधार्तराष्ट्राः ॥४१॥ घाय निष्पैतु लदायुधारते युगक्षये केत वो पदुमाः । प्रगृह्यचाखाणि धनपिग ज्यानेमि घोपैः प्रविकं पयन्तः ॥ ४२ ॥ शौरव गुपदाय पुत्र याबुदामघर यारि जालैः । निहत्यतांश्चापि शर. सुतीक्ष्णैर्न वि न्यथै सतरे चिंत्रयोधी ॥४३॥ समं युदीर्णावतयात्मजांस्तथा निशम्यवीरा नमितः पितान रणे । जियोरुन हगंदात्मनो युपा प्रमोहनास्त्र युयुजे महारथः ॥ ४४ ॥ क्रुद्धो भृशं तवपुत्रेधु राजन् दैत्येषु यद्वत्समरे महेंद्र । ततो व्यमधन्तरणे वीराः प्रमोहमा नाहत युद्धि सवाः ॥ ४५ ॥ प्रदुईवुः कुरवप स साजिनागाः सरपाः समंतात् । परीतं कालानि वनष्टसंवान् मोहो पेतांस्तवपुत्रानिशम्य ॥ ४६ ॥ एतस्मिन्नेय कालेतु द्रोणः शस्त्र मृतांवरः । दुपः त्रिभिरासाद्य शरविव्याध दारुणैः ॥४७॥ सोति विद्धस्त शत्रु होके हमारी सेनामें न मिले इस के पीछे वह क्रोधी पुत्र' अपने भाई दुर्योधन के इस वचन को सुनकर और आज्ञामान कर शस्त्रों को लेकर उसके मारने को ऐसे दौड़े जैसे कि प्रलयकाल में पृछलतारे वह वीर रत्नजटित धनुपधारी कवच पहरे रथके पहियों की ध्वनि से सबको कम्पायमान करते चाणों से द्रुपद के पुत्रपर ऐसी वर्षा करने लगे जैसे कि वादले पानी की झाड़ियों से पर्चतपर वर्षा करते हैं उस समय वह अपूर्व युद्ध करने वाला धृष्टद्युम्न अपने तीक्ष्ण बाणों से उनको पीड़ामान करने परभी पाप पीडा युक्त नहीं हुआ, और बड़े साहसी आपके शूर वार पुत्रोंको देखकर युद्ध में नियत हुआ फिर उस द्रुपदपुत्र महारथी मारनेकी इच्छा करनेवालेने प्रमोहननाम बड़े भयानक अस्त्रको प्रयोग किया और आपके पुत्रों पर ऐसा अत्यन्त क्रोधित हुआ, जैसे कि इन्द्रयुद्ध में दैत्योपर क्रोधित होताहै । ४५: । फिर यह सब प्राप के वीर युद्धमें परशुओं और अस्त्रों से घायल होकर बड़े अचेत होगये फिर आपके पुत्रों को कालंफांस में फंसे हुए अचेतरूप देखकर सब कौरव घोड़े और रथों के साथ पोर शब्द करते हुए चारों ओर से भागे उस समय शस्त्र Lill hmm, so that, being an enemy, he may not mx with our soldiers." The amerged minoshlesting the words of their trother, oleyed this orders, and armed with weapons to destroy him, they rushed upon him liko meteors of palay... The hulle warriors having bojs decked with jewels, bhook in asniour and shaking all with the rrunbling of their chariot wheels. They showered thein arrows on the son of Drupad es clouds pour rain over a mountain. That is onderful Tarrior Dluislitudyumn, whale sounding tlieni with their sharp ariowa, was not wounded by them and scoing youi Lrarc sons lefore him, hostood ready to fight. Drupad's son, dosiring to destroy thom, discharged his dreadful weapon known as Piamohan (cnusing sensibility)aud was enraged at your sons as Indira dos at Dartyas 45 All your Far riors, wounded by axos and other weapons, baume unconscious. Sering your song in the ineslics of Death and unconcious, all the पुगे 14684] Mahabharat तो राजा रणे द्रोणेन प्लार्थिय । अपाचागुपदो राजन पूर्वबैरमनुस्मरन ॥४८॥ नित्या तुप प्रोण शख इधर प्रतापवान् । तस्य शास स्वन शन-वित्रेसु, सर्व सोमका ॥ १९ ॥ अथ शुधार तेजस्वी द्रोण रात्र भृतावर । प्रमोह नास्त्रशरण माहिननात्म जास्त up तो ट्रोणो महाराज, त्वरितोभ्या राया रणात् । तनापश्यनमहे धाशो भारद्वाज प्रतावान् ॥ ५१ ॥ धृयुम्नच-भीमच पिचरन्ती महारणे मोहा विष्टांश्चते नपश्यत्समहारण ॥ ५२ ॥ तत प्रशास्त्राणदाय मोर नास्त्र व्यनाशयत् ! साथ प्रत्या गतमाणातवपनामहारया ॥५३ ॥ पुनद्धायसमरे प्रयभीम.पापती । ततो युधिष्ठिर प्राह समाहय स्वसैनिकान् ॥ ५४॥ गन्त पदवीं शम्या में मार्पतयोयुधि । सौभद्र प्रमुखावीरा रथाद्वादश दुशिता. ॥ ५५ ॥ प्रवृति मधि गच्छन्तु नहि शुद्धपति गे मनः । धारियों में श्रेष्ठ द्रोणाचार्यजी ने धृष्टद्युम्न को पाकर तीन उग्रयाणों से पीड़ित किरा हे राजा तब यह राजा द्रुपदका पुत्र द्रोणाचार्य से अत्यतापायला पूर्व की शत्रुनाको रमरण करके हटगया।४७। प्रतापवान द्रोणाचार्य ने द्रुपद, को जीतकर शंखको वजाया उनके शखके शब्दको सुनकर सब भयभीत हुए, इसके पीछे महा शस्त्रमेचा द्रोणाचार्य्यने युद्ध में आपके पुत्रोको भमोहन अस्वस अचेतहोना मुना ॥५॥ 'और बड़ी शीघ्रतासे संग्रामभृमि मे उनके पास आये वहां प्रवल युद्ध में, संग्राम, करते हुए धृष्टयम्न और भीमजी को देखा और आपके पुत्रोंकोभी मोहसे महा अचेत देखा फिर उन्हों ने प्रज्ञा अस्त्रको लेकर मोहन अस्त्रको काटा। इस के पीछे आप के महारथी पुतो के प्राण फिर लौट आये फिर युद्धमे लड़ने के लिये भीमसेनाऔर धृष्युम्नके संपुष गये इसके अनन्तर राजा युधिष्ठिर अपनी सेनाके यनुष्योंसे वोले कि तुम अपनीसामर्थ से संग्राम भूमि में भीमसेन और धृष्टद्युम्नके मार्ग में जानो तुम। अभिमन्युको मुख्य करके वाह धीर वहां जाकर निज वृत्तान्तको देखो । मेरा चित्त मन्देह से निहत्ता नहीं होता है वह सब शूरवीर सिंहके समान युद्ध करनेवाले Konants rushed with their canots and horses froin ull sides Monuclarya the list of wait ug wounded Dhuuht-ulytron with titree terride auron. Darpnd's Eon seriously womked lly Drenadhusa ard remomloring the former enmity, gaso wny 47 Glorious Dronacitaı ya, lan; co iquerid Dinprd's son, soumied 1119 conch, terrifying all with the peal Dromehai yr who knes the use of all weapons, licud of urconciousness of you sons by swoon bringing He coon came there liom the fiuld and saw Bhishm and Dlnishtadyoma engagid m fighting, wlule your son tic unconcious He then removed the effect of that weapon by us I'ragya wiáron and they w10 o restored Te then went on to fight against Dhrishtadyama and Bhun The eupun Prince Yudlus likhuir oued his lielve Warriors to force the way through the anls of the Taimala ther lendar to bring nws of Dhitehtadyumn and weapon 53 enemy with - , fropa Blic 118 (46801 तएर समनना। शराविकातयोधित ॥५६॥ पाद मिन्येय मुत्यादु मयं पुरुष मानि Hirमध्ये दि गते सये प्रययु सब एहिं ।। ५७ श्या होगटे यातुधीर्य पान् । अभिमन्यु पुरस्टत्व महत्यामेनावृतः ॥८॥ तलासर यह मचीमस्त्र मेरिटमा रिभिदुर्तगणा तहानीक माह ॥ २॥ तान्प्रयातामहे व सातमि भन्यु पुरोगमान् । भीमसेन मर्या विष्ठा धृष्टं गुम्न बिमाहिता । ६० मसबारयितु । तबसनार्जनाधिमिदम् छावितात्मा जगदया पनि चिता ॥ ६१ ॥ तेऽमिजाता गहन्यासा सुवर्ण विकृतजा : पसन्तोऽयधाव त घृष्धधम्नकोदा ॥ ६२ ॥ तो च दृष्टया महेमामा चभिमन्युयुगेगमान् । बभूयतु मंदाश्तो निचन्ता तयपाहि नीम ६३ वातुनहसा मान पाचात्यो गुरुमा मन । नारासत धंधीर पुत्राणांतर भारत ॥ ३५॥ ततो रथ समारोप्य केय वृशोदाम् । मभ्यय यत् संकुचो द्रोण युधिष्टिर की आज्ञा पातेही म यानके समय युद्धकी ओर गये, पांचो केक और पाचो द्रोपदी के पुत्र धृष्टकंतु यह सब अपनी भारी सना ममेत अभिमन्यु को आगे करके मस्थित हुए। और वहां युद्ध में व्युटको शृी मुख बना के धृतराष्ट्र के पुत्रों की रथवाली सेना को छिन्न भिन्न कर दिया, भीमसेन के भय- से भरे हुए और धृष्टद्युम्न के भय से जति अचेत आपकी सेना उन अभिमन्यु पाट वडे धनुपधारियों के सम्मुख होने का ममर्थ नहीहुई, और मूर्ख में भरेहुये श्त्री के समान मार्ग में नियतहुए । ६१ । वह महा धनुर्धर सुवणित बजा युक्त धृष्टद्युम्न और भीममेन के देखने को मम्मुख दौडे उन अभिमन्यु आदि पोरों को देखकर वह दोनों भीमसेन और घृष्टद्युम्न वडे आनन्दित हुए, फिर शूर वीर पृष्ट घुम्न ने अकस्मात पाये हुए अपने गुरुको देखकर आपके पत्रों को नहीं मारा तदनन्तर भीममेन को केंकय के ग्यपर मवार करके अत्यन्न काप में मराहुआ धृष्टद्युम्न Bhim a fry mind, and he to muth distrihty d on their account." all those waniors havmg obiinid Yudlurthi's orders ei tuled tho ba tlo ,fiuld at mudday Tho five kaiha bolbers, the five tons of Draupadi and Dhrisliti elu with Inige imy neie led by Abhimanyu, and having fo med themselves into a wedge lile shape, they dispersed the ai mics of the cons of Dhirit ashtra Already tirified in Bhim and soundu ly Dlirislıtady umf, your 110 les could not withstand the great achiers, Allumanyu and others, and sto We an uncommons * cn an in the tray 61 I be great uchers trith golden banncrs rushed on to set Dhrishtadyunis and Bluimsen Seng those Irase a ners, Alluin aayu ind others, Bìnin and Dlirishtadyumn voie puch ſ leased Then brave Dhrishtady unun, steing las preceptor helore him dxl not destroy your sone and woudt ing Bhını on the chinuiot of knihagy, Dhrish tady umn in a great rage, rusher] Bros cliente perfect ro Archers Roninst and oth , - 14080] Maliabhnı at मिचित्रपागम् ॥ ६५ ॥ तस्याभि पततस्तूर्ण भारद्वाज प्रतापवान् । चिच्छे दवणेन धन शनिईनः ॥ ६६ ॥ अग्योध शतशोपाणान् प्रेषयामासपार्षते । दुर्योधन हितार्थाय भर्तृ पिंदमनस्मरन् ॥ ६७ ॥ अथान्य धनुरादाय पार्षतः पर धोना । द्रोण विव्याध विंशत्यालमएसै. शिलाशिरः ॥ ६८,॥ सस्य द्रोणः पुनथार चिच्छेदा मियर्शनः ॥ हयायचतुरस्तूर्ण घर्भिः सायकोत्तमैः ॥ ६९ ॥ घेवरात क्षय घोरं पयामासभारत । सा विचास्य मनप्रेषयामास मृत्यये ॥ ७० ॥ हताश्वात्सरधा तर्ण, मवप्नु यमहारथः आरुरोह महावाहुरभिमन्योमहारथम ॥ तत. सरध मागा श्वासम पतवाहिनी । पश्यतो भीम सेनस्यपाप तस्य चपश्यतः '७२ ॥ तत्प्रभग्न बलं दृष्ट्या द्रोणेनामिततेजसा । नाशक्नुवन्वारयितुं समस्तारते महारथाः ॥ ७३ ।। चध्यमानत तत्मन्य द्रोणेन निशितैःशरैः । व्यधात्र वाण और अस्त्रों के परांगत द्रोणाचार्य के सम्मुख दौड़ा ६५ । शत्रुहन्ता मतापी द्रोणाचार्य ने वरत क्रोधित होकर बड़ी शीघना से उस सम्मुखःआनेवाले धनुष को भल्ल से काटा, और स्वामी के हित के निमित्त अन्य सैकड़ों वाणों से धृष्टद्युम्न को घायल किया, फिर शत्रु के मारनेवाले धृष्टद्युम्न ने दूसरे धनुप को लेकर शिला पर घिसे सुनहरी पुंखवाले, वाणों से द्रोणाचार्य को घायल किया, फिर शत्रुहन्ता द्रोण ने उसके दूसरे धनुप को भी काटा और बड़े तीन चारशायकों से चारों घोड़ों को यमके लोक को भेजा फिर इस के सारथी को भी एकही भल्ल से मारडाला 1501 फिर वहमिहावाहु महारथी शीघ्रही मृतक घोड़ों के रथ मे उतरकर अभिमन्यु के महारथ पर सवार हुआ. इसके अनन्तर भमसेन और धृष्टद्युम्न के देखते हुए रथ हाथी घोड़े आदि समेत सेना भयसे कम्मितहुई, पि.र द्रोणाचार्य जी से ध्याकुल सेना को देखकर वह सब महारथी उसके रोकने को समर्थ नहीं हुए, द्रोणाचार्य के तीक्ष्ण बाणों से घायल सेना समुद्र के समान महा व्याकुल weapons 65. Bravo Donncharya the destioyer of ensinios, cut down the bow of his advei sary with lus dart, and with hundreds of arrows wounded him for the good of his employer Then Dhrishtadyumn the destroyer of fous, taking up another los, wounded Dionachors a with his arrows sharpened on stone and having gold feathors Drona the destroyer of foes cut down liis sccond bow too and killed the tour boiscof his chariot yith four artus and the duiver with one 70 Thrt warrior soon jumped down fiom his chariot of which the houses were dead, and mjunted on Abhimanyu's chariot. Then within sight of Bhinsen and Dhirishtadyumn your aimies full of chaliots, ckphauts and horses,'' trenbied with fear and could not withstand the fury of Dronacharya's attack. Wounded by the shnıp arrows of Drona, the army was agitated like the ocean and (३६८७) Hisar Bluslina Paiv [40bTJ तत्रैय क्षोम्यमाणधार्णध ॥ ७५ ॥ तथा दृष्टया च तत्सम्यं जहपेतायकच लम् । श्वा चार्य मुसकुद्धं पतंतरिपुपाहिनीम ! चुनःसर्वतोयोधाः साधुसावितिमारत ।। ७५ ।। इतिश्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीमवधपर्वणि संकलयुद्धे द्रोपपराक्रमे सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥ सअप उपाच । ततो दुर्योधनो राजा मोहात्मत्यागतस्तदा । शरय. पन में प्रायवारयदव्यतम्। ॥१||,एकीभृतास्ततश्चैव तय पुत्रा महारया. समाय समरे भीम योधयामासद्यताः॥२॥ भीमसेनो पि समरे सम्पाप्य स्वाधंपुनः। महाद्या महायाहु ययों पेन तवारमशः ॥ ३॥ प्रगृह्य च महावगं पणसकरणं दृढम् । सज शराउन सहये शरविन्याय ते सुतम् ४॥ ततो दुर्योधनो राजा भीमसेन महाबलम । नाराचेन सती होन भूश मर्मण्यताइयत् ॥ ५॥ सो तिषिद्धो महेप्यासस्तवपुणन्धिना । क्रोधमरत नयनो बेगेनो क्षिप्य कार्मकम् ॥६॥दुयोधनभिवांगवाहोरर रिचार्ययत् । सतम शुशुभे होकर जहां तहां भागने लगी, फिर आपकी सेना उस 'सेना को भागती देखकर बड़ी प्रसन्न हुई, हे भरतर्षभ इम तिमे शत्रकी सेना को मारताहुआ मोधयुक्त द्रोणाचार्य को देसंकर शरवार लोग चारों ओर से घन्य २ करके पुकारने लगे ७५ ॥ अध्याय ७८॥ इसके पीछे राजा दुर्योधन ने ब्यूह से पृथक् होकर अपने वाणों की वर्षा से दुर्नय भीमसेन को रोकां, फिर आपके महारथी पुत्रभी इकट्ठे होगये और सब मिलकर भीमसेन से लड़ने लगे फिर महावाहु भीमसेन भी युद्ध में अपने स्य को पाकर उसपर चढ़के वहां को गया जहां आपका पुत्र था, वहां उस वेगवान ने जीव निकालनेवाले दृढ और जैडाक धनप को चढ़ाकर वाणों से आपके पुत्रको पाहित किया। इसके पीछे हे राजा दुर्योधन ने भी अत्यन्त तीक्ष्ण नाराचों से महाबली भीमसेन को मर्मस्थलों में पायल किया, फिर उसे महाकोष रूप धनुष धारी भीमसेन ने आपके पुत्र से घायल होकर बड़े लाल नेत्र करके उत्तम प्रयल began to run away thrus may and that your army as much pleased at the flight of the opposite party. Thus destroying the army of the enemy, Dronachai ya s as much praised by all the warriors. 75. CHAPTER LXXVIII Prince Duryodhan then sețraiated him self rom the rest of the army and checked invincible Blumen fith a shower of 2rToys, Your other sous too came togother and began to fight against Bhim Bhimsen mounted on his chariot ard went to the place where your 200 was end founded him vitit the arrors shot from his jerelled bow. Prince Duryodhan, too, wounded him in vital places with his exceedingly sharp anott's Wounded by your son, Bhim with eges red in_angel, drew up his boss and irith three arrons Founded Vur.

- [ 4688 daunlliut १४६८८) गजा शिवगिरि गाडि र ७ 1 तोदृष्टया समरेद्धौ यिनिघ्नन्तौ परस्परम। दुय्योधना नगा सर्व शूरा सत्याजी बिता ।। ८ ॥ सस्मृत्य मन्त्रित पूर्व निग्रह भीमफामा है। निब मरन कृत्वा दिगृहीन प्रनकम् ॥९॥ तानापतत एवाजी भीमसेना महाबला प्रत्यु धयो महाराज गज प्रतिगज निच ॥ १० ॥ भृशद्धश्चतेजस्वी नांगन समा चयत् । चिनसन महाराज तय पत्र महापशा ॥ ११॥ तचेतरास्तच नास्ताड याम स भारत । शरहुविधै सङ्ख्य रुपमप सतेजने ॥१२ । तत साथ प्य समरे तान्यनाकानि सशि । अभिमन्युप्रभृतयाते द्वादश महारथा ॥१३ ॥ प्रपि ताधर्म राजा भीमसेनपदानुगा 1 प्रतिजग्नुमंहाराज त पुत्रान् मह बन्नान् ॥ १४॥ दृया रथयातायात रोग्लिसमतेजस । समानव महेवासाम् भ्राजमागान् श्रियावृताने ॥ १५ । महाहवे दारमान सुवर्णविकृतोउबलान् 1 तत्यजु सारे धनुपको खेवकर अपने तीन बाणों से दुर्योधन की भुजा और छाती को घायल किया है. राजा इस गति से घायल होकर भी वह दुर्योधन पर्वत , के समान चलायमान नहीं हुआ फिर दुर्योधन के शूर वीर युद्ध मे देह के त्यांगने वाले भइयों ने दोनों पीरों को परस्पर मारने में प्रवृत्त दखकर भयकारी भीमसेन के पकडने का पूर्व कर्म स्मरगण करके बड़े निश्चय पूर्वक उस के पकडनेका उपाय किया, हे महाराजामहाबली भीमसेनभी उन युद्ध मे महत्त वारों के सम्मुख ऐसा चला जैसे कि हाथी हाथियो के सम्पुस्ख जाता है हे महाराज वडे यशस्वी तेजवान् अत्यन्त क्राधित भीमसेन ने पाप के पुत्र चित्रसेनको नाराचसे घायल किया, और इसी प्रकारसे अनेक उत्तम वाणों से आपके अन्य पुत्रों को भी-घायल किया, तदनन्तर धर्मराजके भेजे हुए भीमसेन के पीछे चलनेवाले वह अभिमन्यु आदि बारह महारथी युद्ध में अपनी सेना को सब ओर से नियंत करके उन महास्थी राज | पुत्रों के सम्मुख गये, उनशूर रथोपरमवारमूर्य अग्निके समान प्रकाशितशोभाय- मान लक्ष्मी से युक्त भूमि मे तेजस्वी सुवर्ण भूपणा से अलकृत सब बडे धनुषधारियों Jodhan in the aim and b erst Duryodha remuned iminov cabl ake a rivuntain erra after receirng the sounds Tie blare bio ius of Dutyodhad ready to di tur him seeing those tvo wnior engas in combat and rem inbouing then far mer resolution trid lard to captuio Blum The latter faced those brise warriors 19 an elephant fices other elephants Glorious Bhimren of great prowess in great anger wounded Chitrusen with 111 tirosy and with other; he wounded the others Then the twelve warriors, A blumany u and others, sent by Yudļııshthir to help Blum huing statzaned their force, all round, fuced those Inuse pinces. Song those brate mep mounted ou chariots glouons like the sun o fire, pecked with orniments of gront Talu and u med with bola, your brute sous left Buin but the latter d माप Bhishma Pare [ 46891 भीमं तर पुत्रा महाबलाः । तान्नामृष्यत कौन्तेयो जीयमाना गता इति ॥ १६ ॥ इनि श्री महाभारने भीष्मपर्वणि भीमवधपर्वणि भीमपराक्रमे असप्ततितमोऽध्यायः ७८ ॥ समय उवाच । अन्धीय च पुनः सर्वास्तव पुत्रानपीडयत् । भयामिमन्युं समरे भीममतेन मंगवम् ॥१पार्वतरच सम्प्रेक्ष्य तय सैन्ये महारथाः । दुर्योधनप्रभृतयः प्रगृहीतशरासनाः ॥ २ ॥ मुपमश्वैः प्रजावितैः प्रययुर्यग्रते रथाः । अपराहणे महा राज प्रावर्तत महारणः ॥ ३॥ तावकानाञ्च बलिना परेपचिव मारत । अभिमन्यु विकर्णस्य हयान् हावा महाहवे ॥ ४ ॥ अथेनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् । हताव रयमुत्सल्य विकर्णस्तु महारयः ॥ ५ ॥ आरोह रथ राजश्चित्रसेनस्य मारत ! स्थितावकरये ती तु भ्रातरी कुलवर्धनी ॥६॥ आर्जुनिः शरजालंनन्दादयामास को देखकर आपके महाबली पुत्रों ने युदमें भीममेन को साग दिया परन्तु भीम सेन उन जीतते जानेवालों को देखकर सह न सका १६ ॥ अध्याय ७२ ॥ संजप बोले कि इस के पाछे भीमसेन समेत अभिमन्यु ने पीछा करके भापके सब वेटों को घायल किया, फिर धनुषधारी मारथी दुर्योधनादिक आपकी सेना को धृष्टद्युम्न के हायमे महा व्याकुल देखकर बड़े शीघ्रगामी घड़ों के द्वारा वहाँ पहुँचे जहां कि वह स्थी वर्तमानये तदनन्तर मध्यानके पीछे आपके और दूसरों के यूर वीरोंका महायुद्ध प्रारम्भ हुअा हे भरतवंशी अभिमन्युने विकर्णके घोड़ों को मारकर २५ क्षुद्रकवाणों से उमको पाच्छादेत कर दिया फिर महारथी विकर्ण मृतक घोड़ों के रथको त्यागकर चित्रसेन के प्रकाशमान रथपर चढ़े हुए दोनों भाइयों को अभिमन्यु ने वाणों से ढक दिया तब दुर्जय और विकर्ण ने पांचलोईके वाणों से अभिमन्यु को पादित किया परन्तु मेरु पर्वतके समान हट अभिमन्यु उम could not bear their going away alire 16. CHAPIER LXXIX Saajaga continued. "Abhimanyu and Bhimscn then chased your sous and wounded them all. Then the great charioteers of your aring Daryo. dhanand others seeing their armies, much distressed by Dbrishtadyumn, rode on their swift horses to the place where those warriors were, and in tho afternoon there was a serere fight batween the soldiers of the two parties. Having killed the forces of Vilara, Abhimanyu wrered hin with tacnty five sharp arrows Brare Vikart, thereupon, left his chariot with the dead horses and mounted the sbining chariot of Chritrasen. Abhimanyu covered with his ANTOWS, both the brothers moup. ted on the same chariot Dorjaya and Vikarn Founded Abhimanyu with fire iron arrots, but the latter remained firm like a mountain and could not be staken with the wounds. Dashasan fought a won- [ 4600] Malinbhrunt (४६९०) भारत । चिनसेनो विकर्णश्च फाणि पञ्चभिरायसै ॥ ७ ॥ विव्यधा तेन चाफम्पत् •फार्णिमरुरिवस्थित । दु शासनस्तु समरे केकयान् पञ्च मारिप ॥ ८ ॥ योधयामास राजेन्द्रतदभुतमिवाभवत् । द्रोपदेया रणे अद्धा दुर्योधनमवारयन् ॥ ९॥ शरैराशी विषाकार पुन तव विशाम्पते । पुनोपि तव दुर्द्धो द्रौपद्यास्तनयानरणे ॥ १० ॥ साय कैर्निशितैराजन्नाजघान पृथक्पृथक । तश्चापिषिद्ध शुशुभे रधिरेण समुक्षित ॥११॥ गिरि प्रसूवर्णद्वद्गैरिकादि विमिश्रित भीप्मोपि समरराजन पाण्डवानाम नीकिनीम ॥१२॥ कालयामास वलवान् पाल पशुगणानिन । ततो गाण्डीवनिर्घोष प्रादुरासी द्विशाम्पते ॥ १३ ॥ दाक्षिणेम वरूथिन्या पार्थस्यारीन् विनिमत । उत्तस्थु समरे तत्र फवन्धानि समन्तत ॥ १४ ॥ दुरुणाचेच सन्येषु पाण्डवानाच भारत । शोणितोदशरावर्त्त गजद्वीप हयोर्मिणम् ॥ १५ ॥ रथनौभिनरव्याघ्रा प्रतेरु सैन्यसा चोटसे कंपित नहीं हुआ फिर हे राजेन्द्र दुश्शासन ने पांचों केकयों को लडाया यह एक आश्चर्यसा हुआ और युद्ध में कोपित द्रौपदी के पुत्रोंने दुर्योधन को रोका फिर प्रत्येकने तीन • वाणो से आपके बेटेको पीडामान किया और उसने भी दुर्गय द्रौपदी के सव पुत्रो को बडे तीक्ष्ण शायकों से जुदा २ घायल किया और फिरवह दुर्योधन उन पाचोसे घायल रुधिर चुना हुआ ऐसाशोभा युक्त हुभा जैसे कि पहाड़ी धातु मिश्रित झिानों से पर्चत शोभायमान होता है और हे राजा महाबली भीमजीने भी पाण्डवों की सेनाको ऐसाधायलाकिया जैसे कि ग्वाल अपने पशुओं के समूहों को ताडित करताहै । ६२ । इसके पीछे सेनाके दक्षिण और अर्जुन के शत्रु हन्ता गांडीव धनुपा शब्द सुनाई दिया, वहांभी कौरव और पांडवों की सेनाओंमें हजारों रुंडखड़े होहोकर युद्धकरनेवाले हुए, उसयुद्धमें भी नरोत्तमों ने रुधिररूप जल और वाणरूप भवर हाथी रूप टाप घोड़े रूप लहरें ऐसे सेना रूपी सागर को रथरूप अपनी नौकाओके द्वारा तरणकिया उस संग्राम derful fight with the five hul ag a brothers, and the fixo sons of Draumn di checked in Lattle the emaged Duryodhan Ench of them wound ed your son sith three arrows and the latter wounded them seprrately with his own sharp airows Duryodhan rounded and bleeding by those five various looked lloulous like a mount up with its four ums of mineral waters The any of the Pandu, 25 uns benlen down by Bhishu lil en lierd of cattle by the he: dsm in In the south of the army was heard the thang of Arjun's Gundiv bow the destroyer of foes and thousands of hordless lodres were to be seen there in the armies of the Kauravas and the Pandavas Inthat Lattle, too, the best of warriors cicssed with the canoes of then ch9110ts the ocean having blood for its waters, the arrons for its eddies, the elephants for ita islands and the houses for its billows Thousands of wainor भीमा Bhishma Part [4691] गरम । छिन्नहस्ता विफवचा विदेहाश्च नरोत्तमा ॥ १६ ॥ दृश्यन्ते पतितास्तत्र शत शोथसहमशः । निहतमत्तमातदः शोणितांघपरिप्लुतः ॥ १७ ॥ भूर्भाति भरनष्ठ पर्वतैराचितायथा । तत्राभुनमपश्यामस्तच तेषाञ्चभारत ॥ १८ ॥ न तमासीत्पुमान फश्चिद्यो युद्धं नामिकांक्षति । एवं युयुधिरे वीरा प्रार्थयाना महद्यश. । ताचकाः पाण्डवैः साई माफक्षितो जययुधि ॥ १९ ॥ इतिश्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्यवधपर्वणि संकुलयुद्धे ऊनाशीतितमोऽध्यायः ।। ७१ ।। सञ्जय उवाच । ततो दुधिनी राजालोहितायति मास्कर संग्रामरमसो मीम हन्तुकामोभ्यधावत ॥१॥तमायान्तमामिप्रेक्ष्य नृवीरं दृदयरिणम् । भीमसेन. मुसंयुद्ध रदम्बचनमब्रवीत् ॥ २ ॥ अयं सकाल. सम्प्राप्तो वर्षगाभियांक्षितः। अद्यत्यां निह निप्यामि यदि नोत्सृजसे रणम् ॥ ३ ॥ अघकुन्या परिसलेशं वनवासच कृतस्नशः। में हाथ कवच टूटे देहके अहंकार से रहित हजारों नरोत्तम पृथ्वी पर गिरे हुए दृष्टि गोचरहुए, हे भरतर्षभ मृतक हुए रुधिरोंमें भरे मतवाले हाथियों मे पृथ्वी ऐसी दिखाई दो मानों पर्वतों से भरा है, वहां हमने आपके पुत्रोंका और पांडवों का अपूर्व वृत्तान्त देखा अर्थात् कोई ऐमा वहां पुरुप नहीं था जो युद्धकरना न चाहत्ता हो, इस रीति से यदे यशके चाहनेवाले युद्ध में विजयामिलापी आपके वीरपुत्र पाएटयों के साथयुद्ध करनेवालेहुए. १.९॥ अध्याय ८०॥ संजय बोले फिर सूर्यके अरुण होनेपर युद्धमें वेगवान राजा दुर्योधन भीमसेनके मारनेको इच्छावान् सम्मुख दौड़ा, तब अत्यन्त कोपयुक्त भीमसेन उस आतेहुए नर वीर बड़ी शत्रुतारसनेवाले को अपने सम्मुख देखकर यह वचन बोला, कि बहुत वर्षों से चाहाहुआ यह समय आया है अब मैं अवश्य तुझको मारूंगा जो तू युद्धसे न भागेगा, अब तेरे मारनेमे मैं कुन्ती के और द्रौपदी के वनवासके दुखोंको दूर tvo,e seen there falling corn depised of their hands, armour and pride of powel. The ground looked full of hills with the ticeding bodies of mad ulephants To.e 11e ent the wonderful prowess of your sons and Cliat of the Pandavas There was no person there who did not desire for fight ug: 'Thu, the great sehi is alter fame and victory, your £ons (9 well as tlic Pandavas fouzlit lraicly "19. CHAITCR LXXX • Sanjaya continucd ---"Wl on tle sun is itd, Prirce Dunyadhan' of gient energy ruslied to destroy / 1 m in fight, and the latter, in a rage seeing Luis lrare enemy ci ning towards liin, said, "The longo vislied for tine las come! I shall prily Lill joil, if you do not rua Away from the field It hall reli alay wh} !ur !!ced the sorrors of kuntı and D aupadi at qui esle You ll CF Itap the fruit of [4692] Maliabharat (४६९२) द्रौपद्याश्च परिक्लेशं प्रणेष्यामि हते त्वयि ॥ ४ ॥ यत्पुरा मत्सरी सूत्वा पाण्डवानय मन्यसे । तस्य पापस्य गान्धारे पश्य व्यसनमागतम् ॥ ५ ॥ कर्णस्य मतमास्थाय सौबलस्य च यत्पुरा । अचिन्त्य पाण्डवान् कामाद्यथेष्टं कृतवानास ॥६॥याच मानञ्च यन्मोहाहाशाहमवमन्यसे । उलूफस्य समादेशं यद्ददास च हटवत् ॥ ७॥ तेन त्वा निहनिष्यामि सानुबंध सवान्धवम् । शमीकरिष्ये तलपाप यतपुराकृतवानसि ॥८॥ एवमुक्त्वा धनुर्घोर विकृष्योभ्राम्य चासकृत् । समाधत्त शरान् घोरांन महा शनिसममभान् ॥९॥ पविशतिमसं झुद्धो मुमोचाशु सुयोधने । ज्वलिताग्नि शिखा कारान् वनकल्पानजिह्मगान् ॥१०॥ ततोस्यकार्मुकं द्वाभ्यां सूतं द्वाश्याच षिव्यधे । चतुर्भिरश्वानुजयनान नयद्यमसादनम् ॥ ११॥ द्वाभ्याञ्च सुविकृष्टाभ्यां शराभ्यामरि मर्दन । छत्रंचिच्छेद समरे राशस्तस्य नरोत्तम ॥ १२ ॥ पडुभिश्चतस्य चिच्छेद ज्वलन्तं ध्वजमुत्तमम् । छित्वा तञ्च ननादाच्चैस्तव पुत्रस्य पश्यत ॥ १३ ॥ रथाच्च करूंगा, जिस हेतुसे कि पूर्वसमय में तैने ईप करके पाण्डवों का अपमान कियाथा हे गांधारी के पुत्र तू उस पापके फल को देख और जिसकारण से कितने कर्ण और शकुनी के मत में नियत होकर पांडवों को साधारण समझकर अपनी इच्छा से यह कर्म कियाहै, और जिस दशामें कि भूलमे तैंने श्रीकृष्णनी का अपमान किया है इनसब हेतुओंसे मै बांधवोसमेत तुझको मारूगा और उस पापको शांत करूंगा जो पूर्व समय में किया है, उस क्रोधरूप भीमसेन ने इस प्रकार से कहकर अपने घोर धनुप को सैंचकर वारम्बार ऊंचा घुमाकर घोर महावन के समान प्रकाशमान भग्नि शिखा के समान ज्वलित पत्रके समान मीधे चलने वाले छब्बीस वाणों को बड़े वेग से शीघता पूर्वक दुर्योधन पर फें। और दो वाणों से उसके धनुप को काटा और दोही वाणों से उसके मूत को घायल करके चार तीक्ष्ण बाणों से उनके घोड़ों को मारडाला, फिर उस शत्रुहन्ता ने अच्छे प्रकार बैचेहुए दो वाणों से उस राजा के छत्रको भी उत्तम रथ से काट गिगया, फिर तीन वाणों से । उसकी उत्तम ध्वगा को पृथ्वी पर काटकर दुर्योधन के देखते हुए बड़े शब्द jour envy and contempt of the Pandat as, son of Gandbarı 5. Aud becauso you bavc acted on the evil counsel of Karan and Shakuni have fought against the Pandavas and thought theint, le ordinary men, and have by youi slup dity lool ed duwn upon Shree Kushu, I shall thorelore destroy you and your hinsmen to avenga tho kiongs done by you in ſo bei days "Having said these sords Bhim in huis rage, drw lus bow and swinging it high forcral t mes, discharged cesse- || lessly at Duryudhnu, tironty six arons straight red shining lhe vajia and burning like n flame. 10 With two of his arrows he cut down his bw and havitg lilled his chauet driver with two more, lie killed his horses with four Then that destroyer of foes with two mno o well aweł arrows (ut down the glade from tho chariot. And (४६९३) भीमपर्य Blhishnti Patro [46031 स ध्वजः धीमान नानारलविभूषितात् । पपातमहसा भूमी वियुज्जलधरादिव ॥१७॥ ज्वलन्त सूर्यसहाश, नाग मणिमयं शुमम । कुरुपतश्छिन्नं दहशु सर्वपार्थिवाः ।। १५ ।। अथैन शिभिर्याणस्तोत्ररिव महाविपम् । आजधान रणे चोर स्मयन्नियमहा रय ॥ १६॥ ततः स राजा सिन्धूनां रथश्रेष्ठो महारथः । दुर्योधनस्य जग्राह पाणि सतपुरुतः ॥ १७ ॥ रुपश्च रथिनां श्रेष्ठः कौरव्यममितीजसम् । आरोपयद्रयराजन दुर्योधनममर्पणम् ॥ १८ ॥ स गाढवितो व्यथितो भीमसेनेन संयुगे । निषसाद रयो पस्थे राजन् दुर्योधनस्तदा ॥ १९ ॥ परिवार्य ततो भीम जेतुकामो जयद्यः । त्यैरनेक साक्षीमस्यावारयदिश ॥ २० ॥ धृएकेतुस्तता राजन्नमिमन्युश्च वीर्यवान् । फेफया द्रौपदेयाश्च तव पुत्रानयोधयन् ॥ २१ ॥ विसनः चित्रच चित्रांगदिचप्रदर्शनः । से गर्जा वह नानाप्रकार के रयों से शोभित उत्तम ध्वजा अकस्मात रथ से ऐमी गिरी जैसे कि वादल में बिजली गिरती है, सब राजाओं ने कुरुपति दुर्योधन की प्रकाशमान अग्नि के समान ज्वलित मणियों से जटित ध्वना को कटाहुमा देखा । १५ । तब अहंकार युक्त महारयी भीमसेन ने उस को दश वाणों से ऐसे घायल किया जैसे कि दण्ड से महागजेन्द्र को घायल करते हैं, इसके अनन्तर सिंधुदेशियों के राजा रथियों में श्रेष्ठ महावली ने हाय में परशों को धारण करके दुर्योधन की पाठ को पकड़ा, रधियों में श्रेष्ठ कृपाचार्य ने बड़े तेजस्वी क्रोध युक्त कोरवी दुश्योधन को स्थपर सवार किया. फिर वह राजा दुर्योधन भीमसेन के हाय से अत्यन्त घायल और पीडामान रथ में बैठ गया, तब मारने की इच्छा करनेवाले जयद्रयने भीमसेन को चारों ओरसे घेरकर हजारों पियों से उसकी सब दिशामों को रोका।२०। इसके पीछे हेराजा धृष्टकेतु व पराक्रमी अभिमन्यु व पांचों केकय व पांचों द्रौपदी के पुत्र आपके पुत्रों से युद्ध करने लगे चित्रसेन haring severed his banner with three arrows he roared within sight of Duryodban. Decked with jewels the Tanner fell suddenly from the chariol as lightning does from clouds 14. All the princes saw the fall of the jewelled and shining banner of Duryodhan the Prince of tha Kurus. Bhim then wounded Duryodhan with ten Arrows as a driver wounds an elephant. At this the king o! Sindhu a great war. rior armod with axe, protected Duryodhan on the back. Kripacharya the best of charioteers mounted the glorious prince of the Kguravas on luis own chariot Prince Duryodhan, much wounded and distressed at tho lands of Bhim, sat on the chariot And desiring to kill Bhinason, Jayadrath surrounded liitu on all sides with thousands of chariats. D}irislitketu, valliant Abhimanya, the fre Kaibayas and the five sons of Draupadi fought against your sons. Chitrasen, Suchitra, Chitrang, Chitradarshan, Sucharu, Charu. mitra, Nand and Upnandak, theso eight warriors of great process 20.

[ 4694 ] Dalabliniat. (४६९४) चार चित्र एचारुश्च तथा नयोपनंदको ॥ २२ ॥ अावेते महेप्पासा सुकुमारायश स्विन । अभिमन्युरथ, राजन् समतात् पर्यवारयन् ॥ २३ ॥ आजयान ततस्तूर्ण मभि मन्युमहामना । एकक पंचभिर्वाणे शितै सन्नतपर्वभिः ॥ २४ ॥ वमृत्यु प्रतीकाशे विचित्रायुध नि सुते । अमृष्यमाणास्ते सर्वे सौभद्रं रथसत्तमम् ॥ २५ ॥ वपुर्मार्गमै स्तीनिमिरमिवाघुदा । सपीड्य मान समरे हतास्त्रीयुद्धदुर्मद ॥ २६ ॥ अभिमन्यु महाराज तावकान् समकपयत् । यथा देवासुरे युद्धे वज्रपाणिर्महासुरान् ॥ २७ ॥ विकर्णस्य ततो भल्लानं प्रेषयामास भारत । चतुर्दश रथभ्रेष्ठो घोरानाशीविषोपमान् ॥ २८ ॥ स तैर्विकर्णस्य रथात् पातयामास वीर्यवान् । ध्वज मूतं याश्चैव नृत्यमान इवाहवे ॥ २९ ॥ पुनश्चान्यान शरान् पीतानकुण्ठाग्रान् शिला शितान् । प्रेषयामास सकुडो विकायमद्दावला ॥ ३० ॥ ते विकर्ण समासाद्य कड़वर्हिणवाससः । मित्या मुचित्र चित्रांग चित्रदर्शन सुचारु.चारुचित्र इसी प्रकार नन्द उपनन्दक, इन बड़े २ धनुपपारी सुकुमार यशस्वी आठों ने अभिम यु के रथको चारों ओर से घेरा, फिर बड़े साहमी मणिमन्यु ने शीघ्रही गुमग्रन्थीवाले पांच ५ वाणों से प्रत्येक को घायल किया, वह वाण जड़ाऊ धनुप से निकले हुए वज्ररूप मृत्युके समान थे वह मव भी क्रोधयुक्त होकर रथियों में श्रेष्ठ अभिमन्युपर ।२५। अपने तीक्ष्ण वाणों की | ऐसे वर्ग करने लगे जैसे कि मेरु पर्वत पर वादल वर्षा करते है हे महाराम उस अस्त्रज्ञ युद्ध में दुर्मद, पीडामान् अभिमन्यु ने आप के पुत्रों को ऐणा अत्यन्त कंपित किया जैस कि देवता और अनुरों के युद्ध में बनधारी इन्दू वड़े २ असुरों को कपायमान करताहै हे।२७। रामाइती प्रकार उस अभिमन्युने विप भरेहुए घोर चौदह भल्लों को विकर्ण के निमित्त भेना, फिर उस पराक्रमी ने युद्ध में नृत्य करने व ले के समान उन बाणों से विकर्ण की ध्वजा घड़े रथ सूत और धनुष को भी रथ से गिराया , ओर पीतांग के प्रकाशित नोक और सीधे चलने वाले और याणोंको विकणपर फेका । ३० । वह कंक और गेरके परोसे मंयुक्तवाण विकर्ण को पाकर surrounded Allumanyu's chariot, but the intter younded each of them with five arious conta ning ludden .nots Those arrows slot from the gem deched bus were fital iu effect like vajra and those best o wariors, in a rge, showered their arrons on Abhimanyu as clouds pour forth jain on Sunit iu That great aiclcr Abhimonyu, teing much wounded ly thon arrows, shooh your cons with his ur rows as Indır the welder of vana shakes the nauis in the war between the gods and the acurs With fourteen poisonous day is, lie wounded Like a dancer in the field of battle be filled Tihain's Lanner, horses, chariot delald bon from the charot, and discharged more Fellow colouud arrows at, bm 30 Thıse ari ows furnished with the ſenthers of vultures and peu cochs, pierced through the body of 27 Vilarm (४६ ५) भीष्मपर्व bhushm Palv [ 1035 } देह गता भूमि ज्वलन्त इव पन्नगा ॥ ३१ ॥ ते शरा हेमपुड्साप्रा व्यदृश्यन्त महीतले। विकर्णधिरक्लिन्ना वमन्त इव शोणितम् ॥ ३२ ॥ विकर्ण वीक्ष्य निर्भिन्न तस्यैवान्ये सहोदरा । अभ्यद्रवन्त समरे सौभद्रममुग्वान् रथान् । ३३ । अभियात्वा तथैवान्यान् रथास्तानमूर्यवर्चसः । भविध्यन् समरेन्योन्य संरंभायुद्धदुर्मदा ॥ ३४ ॥ दुर्मस श्रुत कर्माण विना सतभिराशुगे । ध्वनमेफेन चिच्छेद सारपिञ्चास्य सप्तभिः ॥ ३५ ॥ अश्वान्ताम्बूनदैर्जाल प्रच्छन्नान वातरहस जधान पड़ाभरासाद्य सारथि चाय पातयत् । ३६ ॥ स हताश्व रये तिष्ठन् श्रुतकर्मा महारय । शनि चिक्षेप सकुद्धो महोरका ज्वलितामिच ॥३७॥ सा दुर्मुखस्य विमलं वर्म भित्वायशस्विन । विदार्यप्रा. विशाम दीप्यमाना स्वतेजसा ।। ३८ ॥ तं दृश्या धिरथ तन सुतसोमो महारयः । उसके शरीर को घायल कर सके ममान खासलेते हुए पृथ्वी पर गिरे, फिर वह सुनहरी पुंख नोकवाले वाण विकर्णके रुधिरसे भरेरुधिर को उगलते हुए पृथ्वी पर पड़े हटाये, विकर्ण को घायल देखकर उसके दूसरे सगे माई युद्धमें अभिमन्यु आदि रथियों के सम्मुख दौड़, और इसी प्रकार उन क्रोधयुक्त युद्ध दर्मद रधियों ने उनके सम्मुख जाकर उन मूर्य के समान तेजस्वी रथियों को परस्पर में सयन किया, फिर दुर्मुखने शीघ्रगामी सात वाणों से श्रुतकर्मा को घायल करके एक बाण से उसकी चनाको काटा और सात बाणों से उसके सारथीको घायल किया।३५ फिर मुनहरी नालोंसे ढके हुए वायुके समान शीघग.मी घोड़ोंको छः वाणों से मारकर उसके सारथ को भी गिराया उसमृतक घोड़ों के स्थपर नियत उस महा वली श्रुतकर्मा ने बड़े क्रोषयुक्त होकर महाज्वलित उल्काके समान वरछी को उस के ऊपर फेंका, वह वरछी उस यशस्वी दुर्मुख के बड़े काचको काटकर अपने तेग से उसको फाइके बड़ी प्रकाशमान होके पृथ्वी में प्रविष्टहोगई वहां महाली सुतमोमने जमको विरय देखकर सब सेनाके देखते हुए अपने रथ पर " . Vikarn and tell down on the ground like hissing serpents. Jhore pointed arrows with gold feathers, yousitting forth the blood of Vakarn, were to be seen on the ground Seeing Viharn wounded, bis other b others ru-lied wunst Alluminyu and oth r'n, and those brayo wartiros, proud of their power, wounded those glorious chariot-ers in battle Durmukh wounded Shiutharma with sos en swift arrows and having cut down lus banner with an arrow he wounded the driver with seven more And with six more arrows having killed the horses covered with gold nets and so oft as the wind, he killed the driver a so Seated on the chariot with the horses dead, brave Shrutharma in great inger, lurled nt lum a jurelio bught as fire The javolin cut thougla the armour of lrnve Darmukh with [41961 Malalhatat (४६१६) पश्यतां सर्व सैन्यानां रथमारोपयत्स्वकम् ॥ ३९ ॥ श्रुतकीर्तिस्तथा वीरो जयनसेनं सुतं तव । अभ्ययात् समरे राजन् हन्तुकामो यशस्विनम् ॥ ४. ॥ तस्य विक्षिपतचाप श्रुतकीर्तमहास्वनम् । चिच्छेद समरे तूर्ण जयत्सेनः सुतस्तव ॥ ४१ ॥ क्षुरप्रेण सुती क्ष्णेन प्रहसन्नित्रभारत । तं दृष्ट्वाच्छिन्नधन्वानं शतानीका सहोदरम ॥ ४२ ॥ अभ्यपद्यततेजस्वी सिंहयन्निनदन मुहुः । शतानीफस्तु समरे दृढं विस्फार्यफार्मुफम् ॥ १३ ॥ विव्याध दशभिस्तूर्ण जयत्सेनं शिलीमुखै. । ननाद सुमहानादं प्रभिन्नइव धारणः ॥ ४४ ॥ अथान्येन सुतीक्ष्णेन सर्वावरण भेदिना । शतानीको जयत्सेनं विव्याध हदये भृशम् ॥ ४५ ॥ तथा तस्मिन् वर्तमाने दुष्कर्णो भ्रातुरन्तिके । चिच्छेद समरे चाप नाकुलेः क्रोधाञ्छित ॥ ४६ ॥ अथान्यद्धनुरादायभारसाहमनुत्तमम् । समादत्त शरान् घोरान् शतानीको महावलः ॥ ४७ ॥ तिष्ठ तिष्ठेति चामन्यादुष्कर्ण भ्रातुरप्रतः। सवार किया इस के पीछे हे राजा महावली श्रुतकीर्ति आपके यशस्वी जयसेन पुत्र के मारने की इच्छा से उसके सम्मुख गया, तब आपके पुत्र जयसेन ने उस धनुप खंचने वाले श्रतकीर्ति के धनुपको अपने तुरप्रवाणों से बड़े हास्यपूर्वक काटा फिर तेजस्वी शतानीक उस धनुषटूटेहुए अपने निज भाई को देखकर सिंहके समान बारंवार गर्नता हुभा सम्मुख आया और युद्ध में अपने दृढ धनुपको बैंचकर बड़ी शीघ्रता से दश शिली मुख बाणों से जयसेनको घायल किया और मदोन्मत्त साथी के समान महाशब्द करके गर्जा, तदनन्तर इसने बड़े २ तक्ष्णि दाल खड्गों के काटने वाले अन्य वाणोंसे जयसेनको अत्यन्त घायल किया।४५। इसी प्रकार युद्धके वर्तमान होनेपर भाई के समीप नियतक्रोधमें व्याकुल दुष्कर्ण ने शतानीकके वाण समेत धनुपको काटा, फिर महाबली शतानीकने बड़े बोझ के साधने वाले अन्य हद धनुषको लेकर बड़े घोरवाणों को हाथमें लिया। ४७ । और भाई के सम्मुखहोकर दुष्कर्ण से तिष्ट तिष्ट शब्द कहके उसके ऊपर बड़े तीक्ष्ण और ज्वलित सर्प के its sharp edge and then glancing out entered the ground below. Sutsoin of great p.010ss seong bm destitute of chariot took hın up on his own chariot within sight of tho umies. "Then biaye Shrutinti facod your valliant son Jayasen in order to bill lum; but the latter with a souling face, cut down the buw of Shrutkirti with his sharp Shatanik seeing his brother's low cut down, 10a ed agaill and again like a lion and drawing up his bow for the purpose of fighting, soou wounded Juyasen vitla ten allows sharpened on stone, and like a mad elephant roa ed a loud . Odr. Then witlı very large arrois nhich could cut shields, swords and tows, he wounded Jayasen more and more. When the lattle was thus raging, Dusbkarn stationed near his brothers, in great anger, cut down the bow and ariow of Satanik, who tvok up another Low capable of bearing great weight and put to it his dreadful arrows. 47. In the presence of his brother, he arrows.

(४६९७) भीष्मा Bhislima Parr [4637 मुमोचास्मै शितान् वाणान् सलितान् पन्नगानिर ॥ ४८ ॥ ततोस्य धनुरेकेन द्वाभ्यां सूतन्य मारिस । विछेद समरे वर्ग तञ्च विव्याध मतामिः ॥ ४१ ॥ अश्वान् मनो, जवांस्तम्य करानवातरंहसः । जयान निर्शिनस्तूर्ण मान द्वादशामि सर ॥ ५ ॥ अयापरेग मलेन संयुकनाशु पातिना । दुष्कर्ण सुदृढ़ क्रुद्धो विव्याध हृदये मुशम् ॥५१॥ स पात ततो भूमौ वजाहत इव दुमः। दुष्कर्ण व्यथितं हवा पञ्च राजन् । महारया. ॥ ५२ । जियामन्तः शतानीकं सर्वत. पर्यवारयन् । छाद्यमान शरवाते. शतानीकं यशस्थिनम् ॥ ५३ ॥ अपवायन्त संकुद्धा. केकया.पञ्चमोदरा: 1 तानध्या पतन. प्रेक्ष्य तपपुवामहारयाः ॥ ५ ॥ प्रत्युद्य गुर्महाराज गजा निर महागजा. । दुर्मुखो दुर्जय धैव तया दुर्म गो युवा ॥५५॥ शनुजय शत्रुसह सर्वे क्रुद्धायशस्विनः । प्रत्यु द्यानामहाराज के कयान् मातरः ममम् ॥ ५३॥ रौनगरसदाहियैर्य कर्मनोज । नाना समान धागों को छोड़कर एक बाण उपके धनुपको और दो बागों में उसके मारयी को काट मारकर बड़ी शीत्रताने मात बाणों से उनको घायन किया, फिर प्रसन्न मूर्ति मात्यकी ने बड़ी शीघतामे बारह तीक्ष्ण बाण से उसके सब घोड़ोंको। जो कि बन के अनुमार शीघ्रगामी और कल्मापी रंगथे मारडाला ॥५०॥ फिर हेराजा उन कोषम्पने शत्रुहन्ता और महा भयकारी भल्ल नाम वाणने दुष्कर्ण को व्यथित किया और वा उन के प्राघात मे बनने टे हुए वृक्षको समान पृथ्वीपर गिरा राजा पांचाहारथियों ने दुकर्ण को मराहुमा देखकर मारने की इच्छाकरके शानोक को चारों अरसे घेर लिया, फिर वाणों मे ढके हुए यशस्वी शतानीक को देख कर, अत्यन क्रोध में भरे पांचों निजाई केकय उनके मम्मुख दौड़े, हे राजा उन पांचों महागयों को प्राता देखकर आपके पुत्र ऐसे मम्मुग्व गरे जैसे कि हाथी महागनेन्द्रोंके सम्मुख जाय दुषि दुर्जय दुर्द्धर्मग ।५५। शत्रुनय शमह यहमा यशसी महा क्रोध युक्त होकर केकय लोगों क मम्मुख गये, मन के अनुसार challeged Duryodhan rith a crg of 'stay, stay' and discharged aliarp and bright arrows like serpents at h:0. With one arrow he cut down his low; with two mo o his cut and killed the driver and very ! soon lie pierced his byly with seven sharp arrows. Then Satyaki with a clicorful face, killod all his swift ho scs of variegated colour with twelve sharp arrows 50 And ith dreadful darls.destroyers of focs, lie woundel Dushamn, o Liny l'ounded by those darts he fell down lilo a truo struck down by lightning. The five warrio's sec. ing Dashhain dead surrrounded Sha'anik on all sides in order to full liiin. And souing Shutunik corered with their arrors, the five Kaikaya brotlicre, ruslied on to the front Sucing those five syrior: rushing on towards liim, your sons fazed them as cicplants frica elepliants. Durmukh, Darjaya. Durdharshan 55 Shatunjayn, Shatrurrh, all these in gacat anger, Faccel the Kaikayas. Mounterton amw-- [4698] Vahablurrat (४६९८) वर्णपिचिप्रामि पताकाभिररहते ॥ ५॥ यस्यापधरावीरा विचित्रफनयध्वजा । विविशुस्तै पर सैन्य सिंहा इच बगानम् ॥ ५८ ॥ तेषासु तुमुल युद्ध व्यतिपत्तरय द्विपम् । अपर्सस मरागद्र निधातामितरेतरम् ॥ ५९ ॥ अन्योन्यागस्ता राजन् यम राष्ट्रपियर्द्धनम् । मुदत्तस्तिमिते सूर्य चायुद्ध सुदारुणम् ॥ ६० ॥ रथिन सादिनचाय ध्यकार्यन्त सहमश । तत शान्तनर वुद्ध शरे सन्नतपर्वमि ॥ ६॥ नाशयामास सेनांता भीष्मस्ते'म महात्मनाम् । पन्चालानाञ्च मैन्यानि शानिन्येयमक्षयम् ॥ ६२ । एव मित्वामहेप्यास पाण्डयानामनीफिनीम् । रुत्वाऽयहार सैन्याना ययास्तशिबिर नृप ॥ ६३ ॥ धम्मराजोपि सम्प्रेक्ष्य धृष्टद्युम्नकादरी । मूनि चैतापुपामाय प्रहर शिघिर ययौ । ६५ ॥ इति भी महाभारने भीष्मपर भीष्मपर्वणि भीष्मद्रोणसवादे अशीनितमोऽध्यायः ८० ॥ शीघ्रगामी घे हों से मयुक्त नाना प्रकारके विचित्ररथों और पताकामों समेत रथों में पेठे उत्तम धनुषधारी चित्र विचित्र करच पहिरे वह पारशत्रुभोंकी सेना में भाकर ऐसे वर्तमानहुये जैसे कि सिंह एक वन से दूसरे घनमें वर्तमान होतेहैं ।५८॥हे राजा परस्पर मारते और एक एका अपराध करने वाले लोगों का यह युदायी पो? समेत महातुमुन और घोर जारी हुआ वह सब यमलोक की वृद्धि करने पाले यूर्यास्त के समप बड़े घोरयुद्धकरने वाले हुए, हजारों रथी और घुडचडे ग्य कुल हुए इस के पाछे शंतनु के बेटे कोध युक्त भीमगी ने गुप्तग्रन्थी वाले वाणों से, उन महात्मामों की उस मेनाको नष्ट करदिया और पांचलों की सेना को भी पम लोक में पहुंचाया, इसराति से वह घडे धनुपधारी पांडवों की सेनाको घापन कर के सा सेनाओं का विश्राम करके अपने डेरे को गये, धर्मरागभी एघुम्न और भीममेन को देगकर दोनों के मस्तकको मूधकर अपने डेरों को गये ६४। Innorts, chauty tirmn by liorses suift to the wind and furusheel Hath broner those breyt of a chers, sheatlied in armour, canio into the field of buttlo lilc liong cumin; from one forest to nnother 38 Killing one another and wounding those varriors, he snuglit lord ruthi the help of elephants and horses and filled th region ot Yan till sunset Tlousandy Orchar oteora and horsemen serud sible. Then Bhishm the son of Shantana, in fru ot anger, withi arrutts having Indden kr i'r, destroy a tlu urmics of the great I'nnda as and the Panchale sendinmany to the region of Yhin Thus the great a chrlaning wound the aring of the Pandang disnygel the Armies for the night and house if sent to lik tent Dinrmrny too, Belt the fort heads of Bhimsen nod Dlırıslıtady unn and then went neamp . ।

ugge Bluish ma Pary [4000 सञ्जय उवाच । साथ शुरा महाराज परस्परकृतागस । जग्मुः स्यशिविराण्येष रुधिरेण समुक्षिताः ॥ १ ॥ विश्राम्य च ययान्यायं पूजयित्वा परस्परम् । सानदाः समश्यन्त भूयो युद्धचिकोर्षया ॥ २ ॥ ततस्तव सुतो राजश्चिन्तयाभिपरिप्लुतः । विनयच्छोणिताकारः पप्रच्छेद पितामहम् ॥ ३ ॥ सैन्यानि राद्राणि भयानकानि ध्यूढानि सम्यग्वहुलध्वजानि। विदार्य हत्याच निपीड्य रास्ते पाण्डवानां त्वाता महारथाः ॥ ४ ॥ सम्मोह्य सान् युधि फीर्तिमन्तो व्यूहञ्च तं मफरं यमकल्पम् । भविश्य भीमन रणेहतोस्मि घोर. शरमृत्युदण्डप्रकाशः ॥ ५ ॥ सन्तमुदीक्ष्य भयेन राजन् सम्मूच्छितो :नलमे शान्तिमद्य । इच्छे प्रसादात्तव सत्यसन्ध प्राप्तुं जय पाण्डयेयांश्च हन्तुम् ॥ ६ ॥ तेनैवमुक्तः प्रहसन महात्मा दुर्योधनं मन्युगतं विदित्या । तंप्रत्युवाचा विमना मगस्वी गङ्गासुत शस्त्रमताम्बरिष्ठः ॥ ७ ॥ परेण अध्याय ८१॥ संजय योल हे महाराज इसके पाछे परस्पर अपराध करने वाले शूररुधिर से भरे देह अपने २ डेरोंको गये, फिर न्याय के अनुमार विश्राम कर परस्पर पूजन को करके युद्ध कर ने की इच्छा से कवच और अस्त्र शस्त्रों से,• अलंकृत दृष्टपढ़े हे राना इसके मनन्तर चिन्तायुक्त भापके पुनने गिरतेहुये रुधिरसे भरेहुये शरीर वाले भीष्मपितामइसे पूंछा कि पांडवों के वहशूर महारथी घोर भयानक और शस्त्रोंसे अलंकृत बहुत धनायुक्त सेनाओंको मार और पाड़ित करके फीतिवानहो युदमें प्रवृत्तहुये और उसबके समान मकरब्यूहमें प्रवेश कर फे मृत्युदण्ड के समान प्रकाशित भार घोर भीमसेनके याणों से मैं महाव्याल और घायल होगयाहूं ॥५॥ हे राजा उस क्रोधरूप भीम को देखके भय से मूर्छावान् होकर अबतक मैं शान्ती को नहीं पाता हूं हे सत्यसंकल्प मैं आपहीकी कृपा से पाण्डवों को मारकर विनय पाना चाहताहूं इतनी बात के मुनतेही दुर्योधन को व्याकुल और क्रोधयुक्त देख CHAPTER LXXXI Sanjaya continued, · Tlien, 0 hing, sroundmg one another, the warriors riih blood stajucd bodies went to their respective camps And loving rected during the nigfit, tley salured one another and were seen again well dekhed with arms and a mour. Then your son, plunged in grief faid to Bhishım the grandfuller wloce b dy dropped Llood - The Jhave warrors of tle Pandurs, armed with drerdful weapons, late in lattle kilkd and cut cur oldies and banners and gainal great time, rud lining entered the impri gne ble croccdile ariny of tur iniy, 1h,msen !' dedue with his dreadful ariowe shining thletle kiaft of l entli.5 Hrsg men teray form of Blingen, I fa'ntcd rit) tunc ad any wild is rot gatversosed. Observer of true 10v ! by you gracel Jore to destroy the Pandas as lind guin vittory.” Haring that there bods tul ceing Duryodhan [4700] MtInbhat (४७००) यत्नेन विगाध सेना सर्वात्मनाह तय राजपुत्र । इच्छामि दातु विजय सुषच ने चात्मान चादये । त्वदर्थे ॥ ८ ॥ एते तु गद्रा यहवो महारथा यशस्विन भर तमा इत्तास्था । ये पाण्डवानां समर सहाया जितक्लमारोपविष वमान्त ॥ ९ ॥ ने नैव शपया सहसा विजेतु चीयोद्धता कृतवैरास्त्वया च । अहसेनां प्रतियोत्स्या मि राजन् सर्वात्मना जीवित त्यज्य चोर ॥ १०॥ रणे तवाय महानुभाव न जी वित रक्ष्यतम ममाय । सर्वास्तवार्थाय सदेवदैत्यान् धोरान दईय किमु शत्रुसेनाम ॥११॥ तान् पाण्डवान योधयिष्यामिराजर प्रियश्ते सर्वमह करिष्ये । भुत्वव पताधन तरानी दुर्योधन प्रीतमना अभय ।। १२ । सर्वाणि सैन्यानि तत प्रहृष्टो निर्गच्छतेत्याह नृपाश्च सर्वान् । तदाशयातानिधिनिर्ययुद्रुतगजाश्यपादातरथायुतानि ॥१३॥ प्रहर्षयुक्ता नितुतानि राजन महान्ति नानायुधशस्त्रयन्ति रियतानि नागाश्वपदातिमन्ति घिरेज कर भीमजी सिकर बोले, हेराजपुत्र में सर्वांग पूर्वक बड़े उपायों से सेना को मझाकर विजय और सुखको देना चाहताहू और मै अपने शरीर को तेरेप्रयोजन के लिये किमी प्रकार से बचाता है, बहुतसे महारथी शूर ओर स्वरूप अस्रज्ञ पार श्रम मे अखिन्न होमरूप विप के उगलने वाले को पांडवों के युद्ध में सहायक है यह पल में बडे है उन्ही के साथ तुमने शत्रुताकरी है वह युद्ध में एकाएकी विनय करने के योग्य नहीं है हे वार राजादुर्योधन मैं इस जीवनको त्याग करके सवप्रकारसे उनके साथ लट्टना ।१० हेमहानुभाव अवयुद्धमें तेरेप्रयोजन के लिये मैं अपने प्राणों की रखापरना योग्यनहीं समझताहूं अर्थात् अपनेप्राणोंकी रक्षानहीकरसक्ताहूं मैतेरे निमिष देवताऔर दैत्यों समेत सबलोकोंकोभी जीत सक्ताह तो इस स्थानपर तेरे शत्रुओं का जीतना कितनी बड़ी बात है हे दुर्योधन मै पांडवों से लड़कर तेरे सब अभीष्टों को करंगा इम पातको मुनकर दुर्योधन भीष्मनी मे बहुत प्रसन्न हुआ, इसके अनन्तर उस प्रसन्न चित्तने सव सेनामों समेत राजाओं से कहा कि चलो चलो हे धृतराध much enrng and disturi ed in mind, Blusun replied with a smule, " With all my lienit, O Prince, I desiro to desting all tllo warrios and to gain victory and happiness For this purpose nou foi zi" enlo I cicd to lire niny hou Rany riava narrior of dreadtul form, adept m the science of weapons, somitting forth the proteon of Angor, huip the Pandans in this war You linyo made in inies of very strong men who can not casily le conquered Careless of life, I slull fight against thom Prince Darjollian' 10 I shall no house she mig life in battle fo: jour le I can, for youn eake, Istunt flies worlds with the gods xxl the Annat 29, it 19 not so difficult to conquer pour enemies here 1 sliall fulfil all your dcruies ly ngitice rgainst tlio Iandana" Duryodhan nus much pleased to lear tius froni i luman mettelitter with n cloorful mind ordered 11 o soluc! anul tlic johto s to inith At lus omninnel, o Dlirit (४७०) भीमप Bhishtin PIN [ Si011 राजी तब राजन् बलानि ॥ १४॥ वृदिः स्थिताचापि स्सम्युसरयाशिर दन्तिमणा. समन्तातं । शस्त्रास्त्रविद्भिर्नरवीरयोधराधिष्मिता सैन्यगणासवदीया ॥१५॥ रयांप पादातगजाश्चसंघा प्रयाद्भिराजी विधिवत् प्रगुन्न । ममुद्धतं धैतरणार्फ.वर्ण रजी यभीच्छादयतु मूर्यरश्मीन् ॥१६॥ रंज पताका रथदहिमस्था वातरिता नाम्यमाणा. समन्तात् । नानारङ्गाः समरे तत्र राजन् मघयुता विद्यत पे यथंध ॥ १७ ॥ धनपि वि. स्फारयतां नृपाणां वनव शम्दस्तुमुलोऽतिधोरः । विमध्यतो देवमहामुराधियथार्णवस्या दियुगे तदानीम् ॥ १८ ॥ तदुननाग बहुरूपवर्ण तयात्मज्ञानां समुदीर्णमेघम् । बभूब सम्यं रिपुमन्यहन्तुं युगान्तमेघौध निमन्तदानाम् ॥ १९ ॥ इतिश्री महाभारते भीमपर्वणि भीमवधपर्वणि मप्तमपद्धदिवमे एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ उसकी श्राझा पातेही स्थ घोड़े हाथी और पैटलों की मब सेनः शीघही लदी, ई तात फिर आपकी बड़ी सेना अति मसन्न होकर माना प्रकार के भव शन्त्र धारण करके हाथी घोड़े पैदलों ममेत संग्राम भूमि में नियत हे कर गोभायमान हुई और हाथियों के समूह अच्छे प्रकार प्रचित स्थानों में नियत होकर चारों ओरसे प्रकाशित हुए और अ पके अस्त्र शास्त्र वेत्तामाके समूह नरदेव शरवोगे, मे संयुक्त होकर अपने २ फर्मको करने लगे, फिर उन रथ घोड़े हाथी और पैदलों से उठी हुई धूल भी बड़ी उठी कि मूर्पभी हकगये, है गाना युद्ध में चारों अरसे घूमते नाना रंग- धारी रय हाय घोड़े और पदाती भौर इनके बढ़ने वाले अपनी २ सवारियों समेत ऐसे. शोभापमान हुए जैसे कि वादलों मे मयुक्त और वायु से पृथक हुई विज- लियां प्राकाग में प्रकाशित होती है, फिर धनुप चढ़ाने वाले राज ओं के शब्द ऐगे बड़े कठोर भौर घोर हुए जमे कि युगकी आदि में देवासरों के हाथ से मये हुए मपुट के शब्दहुए थे, तब वह भाप के पुत्रों की सेना भयकारी शब्दों से भौर शत्रुओं के मारने वाले भनेक म्हणों से प्रलय काल के बादलों के समानहोगई ॥१२॥ rashtra, ante a mics of chariots, horses, el plants and foct soldiers marched for bottle. Your la geirniy armed with all sm ts of seafons, marclıcd cheerfully with the elephants, liorces and foot soldiers into the field o lattle. lhe ofephants were anayod sa proper placey all round and the parties of warriors aud vulliant soldiers engaged in doing their duties... 12. - 'The dust raiselly chariots, horsee, elephants and icot.. Inen covered the san. On all sides, rhaning in the field of lattle, the clariots, elephants and horses of various colut and their rid sind the fool men lcol ed-glorious tihe lightning flaslies det celued from cloud: The sound of the latestuings of the warriors *as tremendous like that of the churning of the ocean by the godsend tleasurs in the begining of creation. I len the armies of your £ons trzth their dreadlo) nvises and the laughtej of enemics looked like the clouds of pralota" 19.

(४७०२) 1827001 Mahabbaiat संजय उवाच । अथात्मजं तव पुनर्गाङ्गेयोध्यानमास्थितम् अग्ननिरतश्रेष्ठः सम्म हर्षफर धधः १ ॥ अहं द्रोणध शल्या कृतवर्मा च सात्वतः । अश्वत्थामाविर्कणच भगवत्तीधसावल. १२ ॥ विन्दान विन्दायावन्त्यो वाल्हीक सह वालिहकै । गित राजोवलयान मागत्रश्च सुदुर्जय० ॥ ३ ॥ बहद्रलरच कौशल्यचित्रसेनो विविवाति । रथाध वहुसाहसा शोमनाश्च महायजा. ॥ ४ ॥ देशजाच हया राजन श्वारूदा हय सादिभिः । गजेन्द्राय मदोवृत्ता प्रभिन्नकरटामुखा ॥५॥ पादाप्ताश्च तथा शूप नाना रणजा । नानादेशसमुत्पन्नास्त्वदर्थे योद्ध मुद्यताः ॥ ६॥ एते चान्ये च यह | वस्त्वदर्थे त्यजीविताः । देवानाप रणे जेतुं समर्था इति में मातेः ॥ ७ ॥ अवश्यं हिमया राजंस्तव वाच्य हितं सदा । अशक्या पाण्डवा जेतु देवैरपिसवासवैः ॥८॥ चासुदेवमहोया महेन्द्रसम विझमा । सर्वथाहन्तु राजेन्द्र करिष्ये वचनन्तव अध्यायः ।। ८२॥ मंजय बोले कि हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ इसके पीछे भीममी ध्यानमें नियत हो. कर फिर आपके पुत्रकी प्रसन्नता के बचन बोले कि मैं द्रोणाचार्य शल्य कृतवर्मा अश्वत्थामा सोमदत्त और सिन्धु देशियों समेत विन्द अनुावन्द अवन्ति देश के राजा चालीकदेशी और वलवान् गजा त्रिगर्त और महादुर्जय राना मगध, | कौशल्य चित्रसेन विविंशति और बड़ी घना वाले शोभायमान हजारों रथ, और घुड़चदे समेत देशी घोड़े और मद से लाल नेत्र वाले मदोन्मत्त गजेन्द्र पदाती और नाना प्रकारके शस्त्रधारी शूग्लोग भी नाना प्रकार के देशों में उत्पन्न होने वाले सब लोग तेरेही निमित्त युद्ध करने को तैय र हैं । ६ । इन के सिवाय और बहुत से लोग नेरे लिये जीवन के त्यागने वाले हैं बहुत से इन में देवताओं को भी युद्ध में विजय करने वाले हैं यह मेरा मत है परन्तु हे राना मुझ को तेरेप्रियकरी वचन अश्य कहने के योग्य हैं उनको भी पनो कि इन्द्र समेत देवताओं से भी पांडवों का विजय करना असंभव है । ८ । क्योंकि वह वासुदेवजी को CH PIER LXXXII Sanjaya continued -"Then, O best of the descendants of Blharnt] Bluim thought for a wlulo ond pobc these words to cheer up your 800:-"1, Dronacharya, Shalva Kritsarma, Azliwathapa, Sumdatta. Vind and Anuvind with the Somals, the prinies of Avanti, Valliks, valliant' hing Trigart, the invincible hing of Magadh. Vnuadral, Kosal Chitraxen, Vivinshati, tlourindof bannered chariots of beautiful form, horsemen, mad elepliants with red eyes, footmen and ai med nol: dicre of different countries arc resdy to fight for you G Besides tlıcso there are others ready to lay donn their lives for you and many of thew can nin even the gods in battle. This is my opinion, but ! inust give you some calatory advice. Hour it attentivoly:-Even the gouls led by Indra cannot corquer thc Pandavas, because they (४७०३) भीमपर्य Bhishma Pary [44703} ॥ ९ ॥ पाण्डवांश्च रणे जेध्ये मां बा जेप्यन्ति पाण्डवाः । एवमुपाया ददायरम विशल्यकरणी शुभाम् ॥ १०॥ मोषधों वीर्यसम्पन्ना विशल्यश्यामयत्तदा । नतः प्रभाते विमल स्वेन सैन्येन चोर्यवान् ॥ ११ ॥ अन्यूहन स्वयं व्यूह भीमो न्यूह विशारदः । मण्डले मनुजफ्रेष्ठो नानाशस्त्रसमाकुलम् ॥ १२ ॥ मम्पूर्ण योधमूख्य च तथा दन्तिपदातिमिः । रथरनेकसाहसः समन्तात् परियारिनम् ॥ १३॥ अश्वथ. न्दैमहद्रिय ऋएितोमरधारिभिः । नागे नागे रयाः सप्त सप्त चाश्या रये रथे ॥ १४ ॥ अन्य दश धानुका धानुष्के दशचर्मिण.। एवं व्यूढं महाराज वध सैन्य महार- यः ॥ १५ ॥ स्थितं रणाय महने भीमेण युधि पालितम् । दशादवानां सहस्राणि दन्तिनाञ्च तथैव च ॥ १६ ॥ रयतामयुतम्चापि पुत्राश्च तव दंशिताः। चित्रसेना सहायक रखनेवाले होकर पहाइन्द्र के समान पराक्रमी । हे राजेन्द्र मै सयप्रकार मे तेरेखचनको करूंगा । ९ । पांडवों को युद्ध में विजय करूंगा अथवा पांडव मुझको विजय करेंगे इस प्रकार की बातें करके उसके निमित्त वह औषधियां जो पावको मानन्द करनेवाली और सामर्थ्य की बढ़ाने वालीयर्थी दी उनके लगातेही वह घावों से रहित हुआ तदनन्तर बड़े प्रातःकाल उठकर शुद्धहो न्यूहकी रचना में बड़े कुशन भीमनी ने अपनी सेनाके न्यूहको आप तैयार किया फिर उसनरोत्तम ने भरनी सेनाके मंडलको शत्रों से अलंकृत किया, और उत्तम शूरवीर हाथी और पैदलों से भराहुअा हजारों रयों से चारों ओरको घिराहुआ दुधारे खड्ग तोपर धारण करने वाले सवारों से व्याप्त एक २ हाथी के साथ सात २ थी और प्रत्येक रथके साय सात २ योड़े और घोड़े २ के पीछे दश २ घनुपधारी और हरएक धनुप धारी के पीछे सात २ पदाती हुए हे महाराज आपकी सेना इस रीति से महारथियों से शोभायमान हुई युद्ध में भीष्मजी से क्षित बड़े संग्राम के लिये नियत किये हुए दशहजार घोड़े और दशहजार हाथियों के समूहों के साथ आपके hava Vasuder for their ally and are themselves full of prowess like Jindra I shall do thy ludding, Privre, vilbol the means in my po- TV 3r. Ethe. I shall win t'ie Pandavas or they shall conquer me." Having said these words lle gave him inedicines for the cure of wounds and for restoration of strength. His wounds were healed as soon as the medicines were appliod to them Then baring performed his morning ablutions, Bhishm, very clever in forming phalanxes, arrayed the arries and decorated the ci rele with weapons. 12. Full of brave Warriors, slephants and foot men, surroanded by thousands of Chariots and abounding in numerous horsemen armed with double-edged swords and tomars, that array had seven chariots for each slephant, suren horso for each chariot, ten archera following each horse and cach archer followed by seven footmen. Thus, O king, your army became gica rious with the warriors. Protected by Bliishid, ready for action with । 114704] Malibhimat (१७०४) दयः शूरा अभ्यरक्षन् पितामहम् ॥ १७ ॥ रक्ष्यमाण सतै रैगोप्यमानाश्च तेनते । सन्नद्धा. समदृश्यन्त राजनश्च महाबलाः ॥ १८ ॥ दुर्योधनस्तु समरे दंशितो रथ मास्थतः । व्यराजत श्रिया जुष्टो यथा शास्त्रिविष्टपं ॥ १९ ॥ तत शब्दो महा नासीर पुत्राणां तप भारत । रयघोपश्च विपुलो वादिप्राणञ्च नि स्वनः ॥ २० ॥ भीष्मेण धार्तरायाणां व्यूढः प्रत्यं मुखो युधि। मण्डल. स महाव्यहो दुर्भेद्योऽमि प्रघातनः ॥ २१ ॥ सर्वतः शुशुभ राजन् रणेऽरीणा दुरासदः । मण्डलन्तु समा लोक्य ब्यूह परमदुर्जयम् ॥ २५ ॥ स्वयं युधिष्ठिरा राजा वनं व्यूह मथाकरोत् । तथा व्यूढेपनीकेषु यथास्थानमवास्थताः ॥ २३ ॥ रथिनः सादिनासचे सिंहनाद मथानदन् । विभत्सवस्तता व्यूहं निर्ययुद्ध फाक्षिणः ॥ २४ ॥ इतरेतरत भूरा, सह सैन्या. प्रहारिण । भारद्वाजो ययौ मत्स्यं द्रोणिचापि शिखण्डिनम् ॥ २५ ॥ स्वयं चित्रसेन भादि शूरवीरोंने पितामहको चारों ओर से रक्षित किया वह भीप्मनी उन उन शुरोंसे रक्षित और शूर उनसे रक्षित हुए और महाबली राजालोगमी शस्त्र धारण किये युद्धको तैयार दृष्ट पड़े, फिरशस्त्रों से अलंकृत स्थपर बैठाहुपा दुर्योधन भी शोभा से युक्त ऐसा प्रकाशमान हुआ जैसा कि स्वर्ग में इन्द्र प्रकाशमानहोना है इस के पीछे हे भरतर्षभ आपके पुत्रों के महाशब्द हुए और रथ और रथांगों के भी घोर शब्दहुए ।२०। फिर वह घृतराष्ट्र के पुत्रों का व्यूह भीपमजी का रचा हुआ अतिदुर्जय मंडलरूपवनामा पश्चिमकी ओरको चला, हे राजा शनुओं मे दुर्जप होनवाला वह न्यूह सपोरसे शोभित हुआ फिर उस मंडलबाले भयानक व्यूह को देखकर राना युधिष्ठिरने अपने हाथों से अपनी सेना के वज़न्यूहको तैयार जिया इस गीतिने सेनाओं के तैयार होनेपर सवरथी पदावी आदि अपने २ स्थानों पर नियत होकर सिंहनाद करने लगे इसके पीछे व्यूहके तोड़ने को युद्धाभिलापी पराक्रमी शुरवीर लोग दूसरे के सम्मुख गये, द्रोणाचार्य जी राजा मत्स्यके A myriad of la r-o and elephants, your brave sons, Chitrasen and others, protected thegiandiathe on all audeo. 17. And protected by those sarriors was Bluskum uko hymuseli protecter les. The brave winces, urned with weapons weicio y tu figlit Duryodhan mounted on his chariot and aimed withi winpous luuhed glorious like indin in liouven. Then, west of Bharnty, there iras a treniendous noise nade by your sous 20 Tlc chariots and their puts tuo, made a loud noise. Tho aray of the song of Dlinitialit a, formed by Bhislımı, made invincible in a circular form, inoved towards the west Indofatigable by cncuiex, thint ar.ny was benutıful to look at from all sidus Sving that array of formidable appearance, Vudliislıtlır him.el! arrayed tho army the form of vajr. When the arm'es vete thus prepired, all the clinriotc:ra, fuotinen and others, blationed on their stats, uttered war crics. I Intent on cahing the arriva and desirous of fighting, valliant inen in (४७०५) भीष्मपर्य Blushna Puv [47001 दुर्योधनो यजा पार्वत समुपादयत् । नकुल सहदेवश्च मद्रराजानमीयतु ॥२६॥ विन्दानु विन्दावावन्त्या वियवन्तमभिद्रुतौ । सर्वे नृपास्तु समरधाञ्जयमयोधयन् ॥ २७॥ भीममेनो रणे पात हार्दिक्य समयारयत् । चित्रसेन विफर्णञ्च तथा दुर्मर्पण विमु -॥ २८ ॥ आर्जुनि समरे राजस्तव पुत्रानयोधयत् । प्रागज्योतिपो महेप्पासो हैडिव राक्षसोत्तमम् ॥ २९ ॥ अभिदुद्राव थेगेन मतो मत्तमिव द्विपम्। अलम्बुषस्तदा राजन् सात्यार्फ युद्ध दुर्मम् ॥ ३० में ससैन्य समरे क्रुद्धो राक्षस समु पादपंत । मरिश्रया रणे यत्तो धृष्टकेतुमयोधयत् ॥ ३ ॥ श्रुतायुष च राजान धर्मपुत्र युनिष्ठिर चिकितानश्च समरे कृपमेवान्ययोधयत् ॥ ३२ ॥ शेषा प्रति ययुर्यत्ता मी ममेव-मदारवम्- ततो राज समूहास्ते परिवर्धनन्जयम् ॥३३॥ शक्तितोमरनाराच सम्नुए गये प्रश्नत्य मा शिखण्डीके सम्मुखहुअा २५ रागादुर्योधन माप धृष्टद्युम्नके सम्मुख दौडा और नकुल सहदेव राजा मटके सम्मुख गये, विन्द अनुपिन्द भवन्ति के राना लोगोंके और युधाम युके सम्मुख दौडे और सब सजालोग इकठे होकर अर्जुन मे लगनेको उपस्थितहुए फिर साबमान और ममर्थ सात्यकी ने युद्ध में भीममेन को रोका, हे राना अर्जुन, का ममर्थ पुत्र अभिमन्यु · चित्रसेन विका और दुपण नाम अापके तानों पुत्रों से युद्ध करनेलगा फिर हिडम्बा का पुत्र रातमोत्तम घोत्कच घडे वेगसे राजा प्राग्ज्योतिष के सम्मुख ऐसे दौडा मसे कि मदोन्मस हाथ। मदोन्मत्त हाथापर दौडता है हे राना युद्ध में महा कोपरूप अलवुप रातरा सेना समेत युद्ध में महादुर्मद सात्यकी के सम्मुख दौडा और युद्ध कुशल भरिया धृष्टकेतुमे लडनेलगा ३१॥ फिर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने राजा पता- युप से और चेकितान न कृपाचार्य से युद्धकरना प्रारंभ किया। शेष बचेहुए राजा | लोग महारयो भीमसेन के सम्मुख हुए, उसके पीछे हजारों राजाओं ने अर्जुको घलिया उन सत्र रानामों के हाथों परछी तोमर नाराचगदा और परिघइत्यादि fuco ono nino horn but le Donnchai yn attached the king of Mrt sya and Ashw itlum fraud Shui landı Prince Duryodhan humself fncel Dlırishta lyunin anl Iskul and Saha lev faced the king of Vilra Vaud an dolcind to pinces of Avanti attacked valamıyu Ali tlia į ings in & byly prepared to fight again't Arjan Valliant Satyzki with a collected innd check cd Blumson. A blupnayu tho villiant son of Arjun fought ngainst Chutrisan, Vihatn and Durma shan your thies bons. Hidimva's son, Ghatətkarlı the best of rabsl79ng i uslied ng inst thu hing of Prngso tigh like n inal cluplı into Ainmyusl the rahshas of deadful visngo follow od by a lirsi army, fac d villiant Sityaki and Bhu ishnıya clover in hittlo, fuuglit sith Dhriy it).etu Ludh19th r the son of Dhirm fought' with Slirutyush and Chukitan with Kraj nelirya The rest of the lubimy faced Blum Thru thousands of kings snrround cu Arjun All thos0 111r10 WC armeel with sp us tomats, [4706 Mahabharat (४७०६) गदापरिंय पाणय । अर्जुनोथ भृश हो पायमिद मधीर ॥ ३४॥ पश्य माधव सैन्यानि धार्तराष्ट्रस्य संयुगे । व्यूढानि व्यूह चिदुग गाङ्गेयेन महात्मना ॥ ३५ ॥ भाभिषामान् शराश्च पश्य माधव दशितान् । त्रिगर्तराज साहित भ्रातृभि पश्य के शव ॥ ३६॥ अयनान नाश यिष्यामि पश्यतस्ते जनार्दन ! य इमे मा यदुश्रेष्ठ योदु फामारणा जिरे ॥ ३७॥ एतदुक्त्यातुकौन्तेयो धनुर्ध्या भवमृश्यच । घवर्षशरवर्षाणि नराधिप गणान् प्रति ॥ ३८॥ ते पित परमेप्यासा शरवर पूरयन् । तडागं धारिधारा भिर्यथाप्रापि तो यदा ॥ ३९ ॥ हाहाकारो महातासीत्तय सैन्ये विशाम्पते । यध मानौ रणे कृष्णो शरैईपट्यामहारणे ॥४०॥ देवादेवर्षयश्चैय गन्धर्वाश्चसहोरगे । विस्मय परम जग्मुर्दष्ट्या कृष्णौ तथा गतौ ॥४१॥ तत खोऽर्जुनोराजन नेन्द्रर्मन गुदरयत् । तत्राद्भुत मपश्याम विजयस्य पराक्रमम ॥ ४२ ॥ शस्त्रवृष्टि परीर्मुक्ता श अनेक भात्र शस्त्र शोभायमान, थे उससमय अर्जुन अत्यन्त कोपित होकर श्री कृष्णजी से योला कि, हे माधवजी व्यूहविद्या में कुशल महात्मा भीष्ममी से न्यूहित करी हुई दुर्योधन की सेनाको सग्राम भूमि में देखो ३५ और युद्धाभिरापी शरोंको कवच भौर शस्त्र धारण कियेहुए देखो औरभाइयों समेत गनागिनकोभी देखा। हे जनार्दनजी अब आपके देखते हुए इन सत्रको मे मारूगा हे यादवेन्द्र जो यह सग्राम भूमि में मेरे मारने के लिये इच्छा कर रहेहै। इतना कहकर अर्जुन ने अपने धनुपकी प्रत्यंचा को ठीककरके रामाभों के समूहों पर वागोंकी वर्षाको वरसाया फिर उन घरे २ धनुपारियों नेी उस अर्जुनको वाणों की वर्षा से ऐसा भरदिया (जैसे कि वाग्मतु में यादल तडागों को जलसे भरदेते है, हे राजा उस घढे सग्राम।।। में दोनों कृष्ण अर्जुनको अत्यन्त वाणोंसे ढकाठमा। ४० देखकर आपकी सेनामें। यहा हाहाकारहुमा देवता मृपि गर्म और महाउरगों ने इस प्रकार पाणों से दकेहुर दोनों कृष्ण अर्जुन को देखकर बडा भाश्चर्य किया, 'इसके पाछे हे राजा महाकोप युक्त अर्जुन ने इन्द्रास्त्रको प्रकट किया उस समय हमने अर्जुन के macos clubs and other wenpous of sorte Arjun in gient anger thea suid to Shree Krishn – Look at the array of Duryodhan formed by Buslim tho shılſul in rar, O Madhav I 35 Look at the rartiom rimed with sapoas and armour Look at the king of Trignrt too I wall within sight of you, destroy all of thoso erbo are dostrous of killing me Hartog said this, Arjun (sanged his bor and showered nrroirs nt the kings. Thoso warrior princes too fill d Arjun * chariot with arros* A9 clouds fill tanks with rain water Senglioth hrshn and irjun covered with the shower ofarrors, thomo rin great cry raised from your minier Jho gods, tho rishis the gandlintas end the urn, it wondered nt the right of Irishn and Arjun so covered niharrot 3 Then, O kıng Arjun in great anger ArTOWs 10 (9) भीमपर्व,Bhishma Parv [4707.] महाणवः॥ ४६॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि सप्तमदिवंसयुद्धारम्भे '; इयशीतितमोऽध्यायः-८२ ॥ "सन्जय उवाच । तथा प्रवृत्ते.संग्रामे निवृत्ते च सुशमणि । भग्नेषु चापि धीरेषु पाण्डवेन महात्मना ॥ १॥ क्षुभ्यमाणे,पले तूर्ण सागरप्रतिमे तव । प्रत्युद्यातेच गाने ये त्वरित विजयंप्रति ॥ २॥ हट्या दुर्योधनो राजा रणे पार्थस्य विक्रममावर अपूर्व पराक्रम को देखा कि अपने बाणों के समूहों से शत्रुओं के छोड़े हुए अस्त्र समूहों को रोकदिया कोई मनुष्पभी शस्त्रों से घायल हुए बिना नहीं रही और है धृतराष्ट्र हजारों राजा घोड़े हाथी और शूरवीर लोगोंको भर्जुन ने दो २ तीन बाणों से पीडामान किया इसके पीछे वह अर्जुन से घायल हुए शन्तनु के पत्र भीष्य जी के पास आये तब भीष्मनों इन अयाई जलमें डूचे हुओंके रक्षकहुए, हे महारांग वहाँपर उन मानेवालों से आपकी सेना तिर विर होकर ऐसे महा न्याकुल हुई जैसे कि वायु से महासमुंद्र उथल पुथल होता है,४६ ।। अध्याय ।। ८३ संजय बोले कि इस रीति से युद्ध जारीहोने व राजा सुशर्मा के लौटने प महोत्मा अर्जुन के हाथ से धारों के अस्तव्यस्त होतेपर, और बड़ी शीघ्रता से समुद्र के समान मापकी सेना के व्याकुल होने शीघंही अर्जुन के ऊपर भीष्मनी के चढ़ाई करने पर राजी दुर्योधन युद्धमें अर्जुन के पराक्रम को देखकर बड़ी शीघता discliarged itho.ircapon of Indra and wo saw at that time the itumenss prowess of :Arjun who checked thos shower of enemy's-arrows with his own. There was not a, single man present who did , not receivo a'wound. He wounded thousands of varriors, forses, elephants and princes with two or three arrows each. Those warriors rounded by Arjun's arrowa, came to Bhishm, the son of Shantanu, who pro: tected, them from being drowned in that lottoinless occan. Then O king your , Aſmies, were dispersed l y, those comers as the ocean, vegitated thy the wind storm " 46. CHAPTER LXXXIII Şanjaya continued:-*Wcn the initle, tras thus going on, Prinės Sushasna gaye ray: the army. was boing destroyed ts Arjin and was dispersing like occan , waves: Buisthan attacked Arjun and on sociog. the prowess of - Arjun,: Princo Duryodian thus addressed the i [4708 ] Nahabhart (४७०८) माण समभ्येत्य सर्वास्तानवान्नृपान् ॥ ३ ॥ तेपातु प्रमुखे शूर सुशाणे महा चला । मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य भृश सहर्षयन निव ॥ ४ ॥ एष भोम शान्तनयो योद्ध पामो धनम्जयम् । सर्वात्मना कुरुश्रेष्ठस्त्यक्त्वा जीवितमात्मन ॥६॥ त प्रयान्त रणेवीर सर्व सैन्यन भारतम् । सयचा समर सर्वे पालयध्व पितामहम् । ६ वाढ मित्येवमुक्त्वातु तान्यनीकानि सर्वश । नरद्राणामहाराज समाजग्मु पितामहम् ॥७॥ तत प्रयात सहसा भीष्म शान्तनवोर्जुनम् । रणे भारतमायान्तमाससाद महायल ॥ ८ ॥ महाश्वेताश्वमुक्तेन भीमयानरकेतुना । महता मेघनादेन रथेनातिविराजता ॥ ९॥ समरे सर्वसैन्यानामुपयान्त धनञ्जयम् । अभवसुमुलोनादो भयाद्या किरीटि नम् ॥ १० ॥ अभीपुहस्त कृष्णञ्च दृश्य दित्यमिवापरम । मध्यन्दिनगत सरये नशे प्रतिवीक्षितुम् ॥ ११ ॥ तथा शान्तनव भीष्म श्वेताश्व श्वेतकार्मुकम् । नशेषः पाण्डधा --- 1 से सवराजाधों से मिलकर और इन्दी लोगों के सम्मुख सर सेनाके,मध्यमें महावली सुशर्मा को अत्यन्त प्रसन्न करताहुआ यह वचन बोला, कि यह कोरवों में श्रेष्ठ शत- नु के पुत्र भीष्पनी अपने जीवनको त्यागकरके सर्वभावसे अर्जुन से युद्ध करना चाहते हैं। तुममव सावधान होकर सेनासमेत उनशत्रुओंपर चढ़ाई करनेवाले भरतयशी पितामहकी रक्षाकरो, फिर राजाओं की वह सब सेना उस के वचनको अगीकार करके पितामहके पीछेचली, इसकेपीछे शन्तनुके पुत्र भीष्मजी अकस्मात अर्जुन की मोरको चले और वडेवेत घोडों, के कपि वनवाले घनके समान शब्दायमान महा | उत्तम रथपरचढ़े सव सेनाके सम्मुख जातेहुए महावलो अर्जुनको पाया और मर्जुन को देखतेही भयसै कठोर शब्दहुए।१०। दिवसहीमें सूर्य के वर्तमान होनेपर द्विताय सुर्य के समान बागडोर हाथमे रसनेवाले श्रीकृष्णजी को देखकर उनके सम्मुख, देखने को भी समर्थ नहींहुए, इसी प्रकार पाण्डव भी शेतघोडे ओर खेत धनुषधारी assembly of punces and wau lors, cheering bravo Susharmı yath Ins voids--I his best of tlie Kauravis, Bhislım the son of Shantana 13 desirou, of fighting agamst Arjun without cauing for las life 6 You must cartfully protect with yout armica the grandfather of Blaiat fam ly vylo 19 fighting against the enemies' The assembly of Iings and arricts in obedience to his commands, followed the grandfathon. Then Blyislıpy the son of Shantanut iushed at once towards Arjun and found 1 in mounted on the moni bx nrièred che lot, drun by large white horses tho numbhng of whose whrels was libe thunder and shich has followed by the whole army of fear irure heard at the siht of Arjun 10 In the light of the sulu, seeing Slr e Krsim lidl ling the 101g 19 lile the second 'sun," hio one could look but in tlic facx The Pandat 23 too, couldi noti faco Bi solun tlie 57 of Shantanu 'conning like a rising sun. Thug the -- ey The ci 1031 (१७०९) HIVATS Blushma Parv [4709] श्वेताहमिवोदिसम् ॥१२॥ स सर्वत परिकृतस्निगत सुमहात्मामि । भ्रातृभिःसह पुत्रश्च तथान्यैश्चमहारथे, ॥१३॥ भारद्धाजस्तु समरे मत्स्य विन्याध पत्रिणायजम्चा स्य शरेणाजी धनुश्चकेन चिच्छिदे ॥ १४॥ तदपास्य धनुर्दिछन्न विराटो वाहिनीपति । अन्यदादत्त वेगेन धनुमारसह दृढम् ॥१५॥ शराश्चाशीविपाकारान् ज्वलितान् पन्नगा निय द्रोण प्रिमिश्चविष्याघ चतुर्मिश्चास्य चाजिन । १६ । प्वजमेफेन विव्याध सारथिशास्य पञ्चमि । धनुरेकेषुणाविध्यत्तत्राध्यद्विजर्षम ॥ १७ ॥ तस्य द्रोणो वधीदश्वान शरसन्नतपर्वभिः । अष्टाभिर्भरतश्रेष्ठ सूतमेकेन पत्रिणा ॥ १८ ॥स हतारादरप्लुत्य स्यन्दनाद्धतसारथि । आरुरोह रथ तृर्ण पुत्रस्य रधिनाम्पर. ॥१९॥ ततस्तुना पितापुत्री भारद्वाज रथे स्थिती । महता शरचर्येण धारयामासतुलात श्वेतग्रहके उदय समान शन्तनु के पुत्रभीष्मजी के देखने को समर्थ नहीं हुए इसरीति से वह महात्मा भीष्म विगत दशी माइयों व आपके पुत्रों अथवा अन्य पढे २ महा रयियों से रक्षितहुए फिर देणाचार्य ने युद्ध में वाणों से राजामत्म्यको पीड़ित किया और एक २ वाण ने उसकी धजाको और धनुप को काटा फिर बाहिनीपति विराटने उसयूटे धनुष को डालकर भारमहनेवाले दूसरे दृढ धनुप को बडी तीव्रता से हाथों लिया और साकृति पनगनाम सपोंके समान ज्वलिन वाणों को लेकर सानमाणने द्रोणाचार्य को और चारवाणों से उनके घोड़ों को घायलकिया, एकसे ध्वजाको काटा और पांच से उनके मारयीको व्यथित करके एक वाणसे घनूपको तोड़ा उसस्थानार वागों में गेह द्रोणाचार्य जीने बड़े क्रोधयुक्त होकर गुप्तग्रन्थी के माठमाणों से उसके घोड़ों को और वाणने उसके सारथी को मारा, वह रोपयों में श्रेष्ठ सारथी को मरा देख, मृतकरोड़ों के रथ से कूदकर शीग्रही पुत्रके स्थार मवारहा फिर उसके पीछे रथपर नियत उनदोनों पितापुत्रों ने वलसे मारे जाणों के द्रोणाचार्य को रोका 100 । हे राजा इसके पीछे क्रोधरूप द्रोणाचार्य ने सर्प great Bhishni vas protected by the trairiors of Tug2+ and other great arcliers together with your song. Dronachriya wounded the king of Matsya with ķus arıows With one artov lie cut down his! Winner and with another his Þow Vuat the leader of armies putį down the broken þaw and spacity took up another capable of bouring Egent sttuin 13. And taking serpent like arrous, I.nou n as prnnagurj 1o wounded Dronncharyn with three arrows and his horses with four Withi ono vrrow he cut down, Juus, banner and living wounded the driver with five moro, fie cut down his boy with one charga the best of Brahmans in great angor, killed , 115 horses and drivõr with sight arrows, Souing, the driver billed, he jumped down from tho chariot of ybuch the horses were slán, and soon muunted lus son's chariot. Then dented on the same chariot the, father and son checket Dronaclizza with their strength 20 Then, 0 hing, Dro । - Then Drona - [4710] Mahabharat, - २०. ॥ मारद्वाजस्ततः अ॒दः शरमाशीविपोपमम् । चिक्षेप समेरे तूर्ण शह पनि जनेश्वरः ॥ २१ ॥ सतस्य हृदयं भित्वा पीत्वा शोणितमाहवे । जगाम धरणी घाणे लोहितावरच्छदः ॥२२॥ सपपात रणेनूर्ण भारद्वाजशराहतः । धनुस्त्यक्त्वाशरांश्चैव पितुरेव समीपत. ॥ २३ ॥ - हतं तमात्मज दृश्वा विराटः प्रांद्रवद्भयात् । उत्तराज्य समरे द्रोण व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥ २४ ॥ भारद्वाज़स्ततस्तूर्ण पाण्डवानों महाचमूम। दारयामास समरे शतशोथ सहसूशः ॥ २५ ॥ शिखंडीतु महाराज द्रौणिमासाद्य संयुगेाजघान भ्रुवोर्मध्ये नाराचैस्त्रिभिराशुगैः ॥२६॥.सावभी रयंशालो ललाटे संस्थितैस्त्रिभिः । शिखरैः काञ्चनमयैर्मेस्त्रिभिरिवोच्छितैः ॥२७ ॥ अवस्थामा ततः कुद्धो निमेपार्धाशिखण्डिन । ध्वज सूतमथो राजंस्तुरगानायुधानिच ॥ २८॥ शरै बहुभिराच्छिद्य पातयामास संयुगे । स हताश्यादवप्लुत्य रथादै रथिनाम्बरः ॥२९॥ के समान वाणको बड़ी शीघ्रता से शंख के ऊपर छोडा, वह वाण उसके हृदय में घत उसके रुधिरको पानकर लालरंग लोहमें भराहुमा पृथ्वी में गिर", वह शंख 'द्रोणाचार्य के बाण से घायल पिताकेही सम्मुख धनुपवाणको त्याग कर गिरपड़ा फिर राजी विराट अपने पुत्रको मृतक देखकर और द्रोणाचार्य को मृत्युके समान | समझकर बड़े भयमे उनको छोड़कर भागा, इसके पीछे द्रोणाचार्यने शीघ्रही पांडवोंकी हजारों बड़ी २ सेनाओं को हटाया । २५ । हे महाराज शिखण्डी ने भी बड़ी शीघ्रतासे अश्वत्थामा को पाकर तीव्रगामी तीन नारीचों से दोनों भृकुटी के मध्यभाग मस्तक को घायल किया, फिर वह नरोजम ललाटपरं नियत हुए। तीनों वाणों से ऐसा शोभायमान हुआ जैसे ऊंचे सुवर्ण के तीन शिखरों से मेरु पर्चत शोभित होताहै, फिर क्रोध भरे अश्वत्थामा ने आधेही निमप में शिखण्डी के सारथीरथ घोड़े शव और ध्वजा को अनेक वाणों से काटकर गिराया, फिर nacharya in anger, discharged his serpent like arrows at Shankh. The arrow piereed through his breast and having come out on the other side and drunk his blood, fell down on tho ground. Wounded by the arrow of Dronacharya, Shankh fon down dead within sight of his father, and his bow and arrows féll from his hand. King'Virät finding his son dead and Dranacharya ready like 'Death to pounce" üpon, 'fled away, in terror. Then Droracharya sờon dispersed thousands of the | Pandav warriors. 25. Shikhandi too, in great haste, finding. Ash:: rathama before him, wounded him with three arrows in the middle of the forehead. "That best of men, with the three arrows 'standing on his forehead, looked glorious like mount ifciu with its "tiree" Golden: peaks. Ashwatliama in thé excess of anger, cut'dowa witk* his nrroys tho chariot driver, the chariot, horses, weapons and canner of ShiKhándi. Then 'tliát best of charioteers, juôping down from his " 1 .

। (४७११ Hrana Bhislıma Parv [ 47111 खड्गमादाय सुशित विमलच शरा वरम् । श्येनदव्यचरत् अद्ध शिखण्डी शत्रुता पन ॥ ३० ॥ संखड्गस्य महाराज चरतस्तस्य सयुगे । नान्तरं ददृशे द्रोणिस्तदद् तमिवामवत् ॥ ३१ ॥ तत शरसहस्राणि वहनि भरतर्षभ । प्रेषयामास समरे द्रौणि परमकोपन ॥३२॥ तामापतन्ती समरे शरवृष्टिं सुदारुणाम् । असिना तीर्दणबारेण चिच्छेद पलिनाम्बर ॥ ३३ ॥ ततोस्यविमल द्रौणि शतचन्द्र मनोरमम् । चर्माधि नदसिञ्चास्य खण्डयामास सयुगे ॥ ३५ ॥ शितस्तुबहुशी राजन तञ्च विव्याध पत्रिभिः । शिखण्डी तु तत खड्ग खण्डित तेन सायकै ॥ ३५॥ आविध्य व्यस्त तूर्ण ज्वलन्तमिव पन्नगम् । तमापतन्त सहसा कालानलसमप्रभम् ॥ ३६ ॥ चिच्छेद समर द्रोणिर्दर्शयन पाणिलाघवम् । शिसण्डिनञ्च विव्याध शरबहुभिरायसै ॥३७॥ शिखण्डी व श राजेस्ताड्यमान शितैः शरै । आरोह स्थपूर्ण माधवस्य" रथियों में श्रेष्ठ मृतक घोटों के रथसे कूदकर अपने तीक्ष्ण सग और दालको लेकर, वडा कोर में भरा हुआ सब सेना में बाजपक्षी के समान घुमा । ३० । हेराजा' युद्ध में खट्ग लिये हुये उसारीखडी को अश्वत्थामाने कोई अवकाश नहीं देखा यह बडा आश्चर्य सा हुआ इसके पाले महाक्रोध युक्त अश्वत्यामाने हजारों वाणों की वकिरी परन्तु उसमहापराक्रमी ने अपने खगसेही उन सब घणों को काट डाला...फिर अश्वत्थामा ने इसकी सूर्य चन्द्रमावाली स्वच्छ ढालको काटकर खड्ग के भी खण्ड : फरडाले और बहुत से वाणों से उसको घायल रिया फिर शिखण्डी ने उसके वाणों से कटेहुए खड्गको देखकर शीघही-सर्प के समान महा प्रवलिन खड्गको छोड़ा तब हस्तलापरता दिखातेहुए अत्यामाने जप्त वज्र और निजली के समान शब्दायमान अकस्मात गिरतेहुए खडगको युद्धही काटडाला | और बहुत से लोहे के वाणों से शिसण्डी को घायल किया । ३७ । फिर तीन वाणों से अत्यन्त घायल शिखण्डी शीघहीमहात्मा सात्यकी के रथार सवार हुआ dhariot of which the horses were dead ran with his sword nud shield throughout the army in great anger libe a hawk Ashwathamn could not see Slukbandı staying at any place in the field of battle and this was n groat wunder Then Ashwathama în great anger sliowered thousands of arrots, but that great warrior cut them all down fith hus sword alono Ashwathama then cut into pieces huis' shiding shield pearing the sun and the moon, bis sword too was broken and he him. belf was wounded by tlio atrows Finding his sword cut down ly the prions Shikhandi flung away the sword venomous liko a serpent Then slowing the dexte ity of luis band Ashwathama cut into pieces cho sword falling with a noise like that of van r or lliunder, ind with many other arrows he wounded Shikhandı Much wounded by sharp arrows, Shikhandı mounted the chariot of Satyakı Brave - 30 37 - [+712] Mahabhut { ४०९३० महात्मन ॥ ३८ ॥ सात्यकिश्चापिसक्रुद्धा राक्षस करमाहवे । अरम्बुष शरस्ती क्ष्णैर्विव्याध पलिनावर ॥३९॥ राक्षसेन्द्रस्ततस्तस्य धनश्चिच्छेदभारत । अर्धचन्द्रेण समरे तञ्च विव्याध सायकै ॥ ४० मायाञ्च राक्षसों कृत्वा शरवरवाकिरत् । तत्राद्भुतमपश्याम शैनेयस्य पराक्रमम् ॥४१॥ असभ्रास्तु समरे वध्यमाना शितः शरै ऐन्द्रमस्त्रश्च पार्ष्णेयो योजयामास भारत ॥ ४२ ॥ विजयाद्यदनुमाप्त माधयन यशस्विना । तदस्तम्भस्मसात् कृत्वा मायान्ता राक्षसी तदा ॥ ४३ ॥ अलग्युप शर रन्यैरभ्याकिरत सर्वत । पर्वत वारिधाराभि प्रावृपीव बलाहक ॥ ४४ ॥ तत्तथा पीडितं तेन माधवेन यशस्विना । प्रदुद्राव भयाद्रसस्त्यक्त्वा सात्यफिमाहधे ॥ ४५ ॥ | ततजेय राक्षसेन्द्र सरये मघवताअपि । शैनेय प्राणदज्जित्वा योधानातवपश्यताम् ४६ न्यहनतावकाश्चापि सात्यकि सत्य विक्रम । निशितैर्यहुभिर्घाणैस्ते यन्त भया फिर महावली सात्यकी ने भी वडा क्रोध करके अपने घोर वाणो से उस मसक्रमी अलघुप राक्षस को घायल किया. फिर राक्षसाधिप अलम्प ने अपने अर्द्धचन्द्र न म वाणों से उसके घनुपको काटकर पहुन से'शायकों से उसको घायल किया १०। और राक्षनी मायाको करके वाणों की वर्षा से ढकदिया वहां हमने सा, त्यको के अपूर्व पराक्रम को देखा, कि वह युद्ध में बड़े तीक्ष्ण घाणों से घायल होकर भी व्याकुल नहीं हुआ हे भरतवंशी सात्यकी ने उस ऐन्द्र मंत्र का प्रयोग किया, जो कि महात्मा माधवजी और अर्जुन से मिलाया उस अखते सब राक्षसी माया को अत्यन्त नाश करके अपने घोरं पाणों से अलम्बुप को इसरीति से एक दिया जैते कि वर्षाऋतु में बलाहकनाम बादल अपने जलों के पर्वत को ढकते है, उस यशसी सात्यकी से पाडित होकर वह राक्षस महाभयभीत होकर' सात्यकी को त्यागकर भागगया । ४५ । सात्यकी आपके शूरवारों के देखतेहुए उस राक्षसाधिपको जो कि.इन्द्रमे भी विजयहोना कठिनथा जीतकर सिंहके समान Sitynlı too in greit anger woundu vallıunt Almyush tho rakshas Titli bis drendful 3r101 Alnmyush the prince of nakshases cut down with lus half inoon shap d arrowshis bow and wounded limu with his darts He then covered him with uravs dicharged by the demonaic art Thert ve saw the prowess of Satyal who tlouzlıın ounded with many sharp nnows was not dishenrtened and 'discharged lus Aindra Teapon which he had got from the gicat Madhavand Arjun and having desti oyed all the artfulness of the rakshas covered him with his arrows as clouds cover a incuntun with their waters Wounded by the arrows of Saty akt the rakshas in grent, terror fled away leaving in there Having concured tho rak slios clief who could not easily bo conquered eren by Indra, Satyaki' Torral like a lion Thon Satyaki rounded his sons too with shart arrows and they too rin araç in tenor - In the meantime, Dlright? 40 - 45 - (४३) भीम Bhishma Pany [4713-] हिताः पातस्मिन्नेवकोछेनु द्रुपदस्यात्मजो पली वृष्टद्युम्नो महाराज पुत्र तवं जनेश्वरम् ॥ २ सादयामान समरे शरै सन्नतपर्वभि । सच्छायमानो विशि समयतेन मारतं ॥४९॥ विव्ययेन च राजेन्द्र तय पुत्रो जनेश्वर । धृष्टद्युम्नश्च समर तूर्ण प्रिव्याघ्र प्रशिभिः ॥ ५० ॥ पथ्या च त्रियता च तद्भुतमिपाभवत् । तस्य सेनापति सुद्धो धनुचिच्छेद भारिप ॥ ५५ ॥ हयांश्च चतुरः शीघ्र निजधान महायल. शरधन मुनिशितै क्षिप्रं यिन्याध सप्तमिः ।। ५२ ॥ स हताइवान्महावाहुरय प्लुत्परमावली! पद्मविरसिमुधम्य प्रद्रवत् पार्वतप्रति १५३॥ शकमिस्तै समस्येत्यराज मृद्धीमहानल राजाने सर्वलोकम्य रथमारोपयत् स्वफम् ॥ ५॥ ततो नृप पपजित्य पात. परवीरहा.। म्यहनत्तावक सत्य वज्रपाणिरिकासुरान् ॥ ५५ ॥ कृता रण मीम-शरार्छन्-महारय-छादयामाम-चत महामेयो रविं यथा -६॥ तत. गी, फिर सत्य पराकमी. सात्यकी ने 'आपके "पुत्रों को भी बड़े तीक्ष्ण बाणों से मायन किया वह भी भयर पाइितहोकर भागे हे महारजि उसी समय द्रुपद के पुत्र घने ने ऑपरे पुन दुर्योधन को, वहां गुप्तग्रन्थों वाले वाणों से आच्छादित करदिया, 'हे राजेन्द्र धृष्टयुम्न के बाणों से ढकाहुाभी 'दुर्योधन पाडापान नहीं हुंओ और बड़ी शीमनास 'अपने वाणों" से धृष्टद्युम्न को घायल किया यह एक भाईचर्यसाहुना है राजा फिर उस क्रोधयुक्त सेनापति ने उसके घनुपको काटकर घिही चारा घोड़ों को मारा और मात तीक्ष्ण बाणों से उम को , तत्क्षण घायल किया, वहमहामाई मृतक घोड़ों के रथमे कूदकर पैदल हो खड्ग को उठाकर प्रधुम्न के उपर हाड़ा। ५ । राज्य के लोमी महावली शकुन ने समीप,प्राकर समा दुर्योधन को अपने रयपर सवार किया, इस के पीछे शत्रुहन्ता धृष्टद्युम्न ने राजा को विजय करके उमकी सेना को ऐसा मारा जैसे कि वजधारी इन्द्र प्रमुरों के ममूहों को मारता है, कृतवर्मा ने महारथी भीमको युद्ध में मोहित करके वाणों से ऐमे दादिया कि वहा वादल सूर्य को ढक देताहै. इसके पीछे शत्रु मन्तापी dyum tho sa of D apid hil yoll 801 Duryodhan with his arrows i having haddan krots, but the latter, being hiddea by the anotos of Dhrishtudyarı, ras "not terrified and soon rounded him with his own. This wasz Fonderful deed Then tho enraged commander of armas Cat down ris bow and having killed his horses, wounded him with seven sharp arrows Tlie brave warrior jumped down from the chariot ef which the horses nee derd and rushed sword in hand towards Dhrishtadyumn 53 Brave Shakuni, desirous of kingdom altanced to words Duiyo lhan and mounted bim on hs own chariot Then Dhrishtiyamú the destroyer of chemies, having defeated the hing, killed and destroyed his armies as Indra tbe wielder of tajra destroys the asdisa' hnt aruia, Laving mude' Bluzn insensible in battle covered bin-with bue arross as clouds bide the sun. Then - 1 ज [ 4711] Mahabharat (४७९४), महस्य समरे भीमसेम परन्तप । प्रेषयामास संझुद्ध. सायकान् कृतवर्मणे ॥ ५५ ।। तैरर्यमानोति रथ सात्वतः सत्यकोविद । नाकम्पत महाराज भीम बाईच्छित शरैः ॥५॥ तस्याश्वादचतुरो हत्वा भीमसनो महारथ । सारथि पातयामास सध्यजं सुपरिष्कृतम् ॥ ५१ ॥ शरहुविधेश्चनमाचिनोत् परवीरहा । शकलीतसर्वा गोहताश्व प्रत्य दृश्यत ॥ ६॥ हताश्वश्चततस्तूर्ण वृषकस्य यं ययो । स्पालस्य ते महाराज तव पुत्रस्य पश्यतः ॥ ६१ ॥ भीमसेनोपि सकुलस्तय सैन्यमुपाद्रपद , निजधान घसंकुद्धो दण्डपाणिरिवान्तः ॥ १२ ॥ इति श्री महाभारते भीमपर्वणि भीष्मवधपर्वणि रये त्रयशीतोऽधयाय ।। ८३ ।। भीमसेन ने महाक्रोधित होकर अच्छे प्रकार :सुकर कृतवर्मा के ऊपर शायकों की वर्षाकरी हे महाराज प्रति रथी कृतवर्मा उन भीमसेन के घाणों से घायल होकर कम्पायमान नहीं हुआ और फिर' भीमसेन को तीक्ष्ण पाणों से घायल किया । ५८। इसके पीछे महाबली भीमसेनने उसके चारों घोड़ों को मारकर सारथी और ध्वजायुक्त उसके उत्तम रथको भी गिराया, शत्रुहन्ताने फिर उस कृतवर्मा को-भी अनेक वाणों से ढक दिया फिर वह महापायल सब अंगों से शिथिल दृष्ट पड़ा, हे महाराज फिर वह शीघ्र ही आपके पुत्रको देखकर मृतक,घोड़ों के स्थ से कूदकर पिके उपनाम साले के 'स्थपगया, फिर यहाक्रोधरूप होकर भीमसेन भी भाप की सेना के उपर दौड़ा और मृत्यु के समान हाथ में, दण्ड लेकर बड़े काम में उसको मारा ६२॥ T 17 Bhimasen the terror of enemies in great anger, inúghed loudly and showered his arıows, upon Kritvarma "Valliant Britvårına, Founded by the arrows of Bhimsen was not shalon and again - rvound. er him with us arrows 58 Then brave Bhim killed the four horses of his chariot and cut down the banner and the chariot That destroyer of enemies again hid him with more arrows and lie was scen much wounded and tired. Then seeing your son, he jumped down from bis chariot and mounted the chariot of Visliel your brother im-law Then Bhimsen in great anger rushed upon your army and with the staff of Doath in his band destroyed it in great angor" 62 . . - ।

। भीष्मपर्व Burshma Pary [4715] धृतराष्ट्र उवाच । बहनि हि विचित्रापि द्वरयानि स्मसञ्जय ! पाडूनां मामके साध मभीष तब जल्पत ॥ १॥न चैन मामकं किंचित् दृष्ट शससि सञ्जय । नित्यं पाण्डुसुतान् शानभग्नान्सप्रशसास ॥२॥ जीयमानान विमनसो मानकान् विगतो. जस विद से सयुगे सत दिष्टमेतन्न सशयः ॥ ३ ॥ सन्जय उवाच । यथाशक्ति ययोतमाह-युद्धे चेष्टन्ति तावकाः । दर्शयाना. पर शफ्त्या पौरुष पुरुतर्पम ॥ ४ ॥ गहाया सुरनया वै स्वादुमत्वा यथोदकम् । महादधैर्गुणाभ्यासाल्लवणत्व निगच्छति। ॥ ५ ॥ तथा तत् पौरप राजस्तावकानां परतप, । प्राप्य पाण्डुसतान वीरान व्यर्थ भवति संयुगे ॥ ६॥ घटमानान् यथाशक्ति कुर्वाणान फर्म दुष्करम् । न दोपेण फुरुश्रेष्ठ कौरवान् गन्तुमर्हसि ॥ ७ ॥ तवापराधात् सुमहान् सपुत्रस्य विशाम्पते । पृथिव्याः प्रक्षयो घोरो यमरापिधर्धन ॥ ८ ॥ आत्मदोपात् समुत्पन्न शोचितु नाईसे नृप । अध्याय ८४॥ है संजय मेने तेरे कहने से अपने पुनोंके साथ पांडवों के विचित्र र युद सुने हे मूतपुत्रतू मेरी सेनाको कुन प्रसन्न नही कहता है सदैव पांडवों को, मान्न चित्त और अजेय कहा करता है, और मेरे पुत्रों को युद्ध में पराजित व ...अनुत्साह-युक्त और पायल कहता, है. निश्चय करके यही होनहार है, संजय बोले मापके पुरुषोत्तम बेटे युद्ध में बड़े पराक्रम से वारना और पुरुषार्थ को दिखलाते चल साइस के अनुसार ऐसे युद्ध करतेई जैसे कि .देवनदी गंगाजीका जल महास्वादिष्ट महा समुद्र के मिलनाने के प्रभाव से लवणताको प्राप्तहोवाद ।। है-राना इसी प्रकारसे -माप के पुत्र भी महात्मा और पीर पांडवों के पुरुषार्थको पाकर निष्फल होते है, हे कोरशेतम सामर्थ्य के अनुसार उपाय कर्ता और कठिन साध्यकों के करनेवाले माप अपने शूरवीरों को दोपके भागी करने को योग्य नहीं हो, हे राजा वेटेममेत-आपके अपराध से पृथ्वीमर का नाश अत्यन्ततासे यमराज के देशका वृद्धि कारक है, भाप अपने दोपजन्य फल के शोचने के योग्य नहीं हो, CHAPTER LYKYJY " I have heard from thee, Sanjaya," Sand Dhritrashtra, “ the wonderful account of the wai of the Pandavas, Thou sayst, Sut, Ithat my army is not cheerful Wbile the Pandırm are represented eas inconquerable and clieen ful, my sons are spo' en of as destitute of prosess, conquerod and sounded Sûrely, it is cure to happen." Your sóns, the blst of men," replied Sanjaya, ce fight brartig in'batlle and show their prowess to the bext of their strength Lut the attempts af your song thecome ſutile lefore the Panda 28 as the street waters of the divine Gangas become erit in cận tíct sith the Ocean'5 You should not blame your sons toho do hard work and try ther best ja doing their duty Through your fault and your son's the destruction of the world is sure to augment the region of Yamráj, and you should Alahabharatt. TATIES न हि रक्षन्ति राजानं सर्पयात्रापि जीवितम १ ॥ युद्ध सुकृतिनी लोका निच्छन्तो वसुधाधिपा. 1 चम विगाह्य युध्यन्ते नित्य स्वर्गपरायणा ॥ १०पूणे तुम्हार राज प्रावर्तत जनक्षय. । तन्त्वमेकमना भूत्वा शृणु देवासुरोपमम् ॥ २९. रावन्त्यो' तुमहेप्यासी महासेनी महावली । इरावन्तमभिप्रेक्ष्य समेयाता रोकटी 11, १२ तेषां प्रववृते युद्धसमहल्लोम हर्षणम् । रावांस्तुसुसंयुद्धो मत देवरूपिणी ॥१६॥ विव्याध निशितैस्तूर्ण शरैःसन्नतपर्वभिः । तावेन प्रत्यविध्येता समर चित्रण याधिनी ॥ १४ ॥ युध्यताहि तथा राजन विशेषो न व्यहश्यत यतती शंघुनाशाय" कृतप्रतिक्तपिणाम् ॥ १५ ॥ इरावांस्तु सतो राजन्मनुविन्दस्य शायभिधतुरो चाहाननयद्यमसादनम् ॥ १६ ॥ भल्लाभ्यां च मुतीक्ष्णाभ्यां धनु केतु च'मारिष चिछेद समरे राजन्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १७ ॥ त्यक्त्वानुविन्दोथ रथं किन्दस्य रथमा यहां सब राजालोग अपने जीवन की रक्षा नहीं करते हैं, राजालोग युद्ध के द्वारा उत्चम औरपवित्र लोकों को चाहते हैं और सदैव सर्गकोही उत्तम स्थान समकाली सेनामें घुसकर युद्धको करतेहैं ।१०। हेराजा माताकालके समय मनुष्योका नाशहोनी मारंभहुआ, उस देवता और अंसुरों के युद्ध समान महा संग्रामको श्राप एकचित्त होकर मुझ से मुनों, बड़े धनुपधारी महात्मा और तेजस्वी लोल नेत्रवाले प्रान्ति देश के राजा लोग इरावानको सम्मुख देखकर युद्धमिलापी हुएऔर 'उनको रोमहर्पण महातुमुल युद्ध जारी हुआ फिर अत्यन्त क्रोधित होकर इरावानने देवतारूप दोनों भाइयों को, बड़ी शीघ्रता से गुप्त ग्रंथी वाले बाणों से घायल किया और उन दोनों नेभी भपूर्व युद्धकर के उसको घायल किया, इस के पाछे शत्रुके नाश के करने में उपाय करने वाले महारपर महार वारनेकी इच्छा से युद्ध करनवालोंकी मुख्यता देखने में नहीं आई ।१५। फिर इरावानने अपने चारशायकास राजा अनु चिन्दके चारों घोड़ों को मारकर अत्यन्त तीक्ष्ण भल्ला सधिनुप और ध्वजाको काटा not Taưent at the fruit of your own Polly " All the princes dònot" kold? their lives dear for your oike They desire puie and holy regions through war and always regarding paradise as the most des sable place, they figlit in the thichest of the battle.io The destruction of the warriors began in the moruing, O king. Hear attentively the account of that great war which was like that between the gods and nsurs"- The great arehors, the princes of Avanti, with ted eres, seting Iravan before them, desired to fight and the battle between then, was very severo. Then un great anger, Irawan soon founded the two i rothers with buts arroys having hidden hnots and was laimself sounded by thera Then tho, o destroyers of enemies, wishing to thischarge weapons at asse anather could not slot their chill in the lurry of the moment, 15. Imsan killed the fou horses of Apuvind with four anows and vith very slı-rp duty cut doua L19 Lani er nnd bow All, thus it as wonderful.

(४७१३) मामा Bishna Parr [4717 स्थितन धनहीना परम भारसाधनमुत्तमम् ॥ १८॥ तावकन्या रणे पीयवायन्त्यो रपिनाम्बरी। शरान मुसुचतुस्तूर्ण मिरापतिमहात्मनि ॥ १९ ॥ ताभ्या मुक्कामहावेगा शरा-काञ्चनमूषणा । दिवाकरपये प्राप्य छादयामासुरम्परमा २॥ इरावास्तु रणे क्रुद्धो भातरा तो महारयो । वयपं शरवर्षण सारपिं चाप्यपातयत् । २६ ॥ तस्मि स्तुपतिते ममी गतसत्वेतु सारयो । रया प्रदुद्राय दिश समुद्धान्तहयस्तत।। २२ । तौसजित्या महाराज नागराजसुतामुत पिरुिष ख्यापयस्तुणव्यधमत्तवाहिनम् ॥२३॥ सा प्रन्यमाना समरे धार्तराष्ट्री महाचम् । धेगान बहुविधायक विष पीत्वं मानय ॥ २४ ॥ हेडिम्बा राक्षसेन्द्रस्तु भगदत्त समाद्रवत् । रथेनादित्यवर्णेन सध्वजेन महा पल ॥ २५॥ तत प्राग्ज्योतिपो राजा नागराज समास्थिते । यथा वज्रधर एवं सम्रा यह भी आश्चर्यसा हुआ, फिर अनुविन्द बड़े दृढ़ और उत्तम धनुप को लेकर अपने रथको छोडकर विन्द के स्थपर नियत' हुआ ये दोनों महारथी एक रथपर बैठेहुए। विन्द अनुविन्द ने बड़ी शीघ्रता से डरावान के ऊपर वाणों की वकिरी, इन दोनों के सुवर्ण से शोभित छोडे 'हुए तीक्ष्ण वाणोंने सूर्य के 'रयको "पाकर आकाशको ऑन्गदित करोदया ।२०। फिर महारथी इरावान नेभी क्रोधयुक्त होकर उन दोनों भाई महारथियोंपर वाणों की वर्षाकरके उन के सारथी को गिराया, हे राजा उस सारथी के गिरने और पैरनेपर वह रयं जिस के घोड़े भ्रान्ति में संयुक्तये इघर उधरको भागा, हे महाराज उसे नागरीज के पौत्र ने उन दोनों को विनय करके पुरपार्थ कोप्रसिद्ध करतेंदुए आपकी सेना को भी वही शीघ्रतास भस्मीभूत करदिया, दुर्योधनका युद्ध में 'मत्त उम वही सेनाने बहुत कारके ऐसे २ वेगों को किया, जसे कि विषपान करके मनुष्य किया करतेहैं। फिर राक्षसों का राजा महाबली घटोत्कच मूर्यवर्ग वनाधारी रथमें चढकर भगदत्तकेसम्मुख दांडाारदा इसके पीछे राजामाग्ज्योनिप गजेन्द्र पर ऐमे सवारहुआ जमे कि पूर्वसमय में दानवों के युद्ध में 'Anavınd thereupon tool up o largo nn l hard low, nnd lens onn chaript sented himself on the chariot of Vind Both those Warriors, Vind' and Apused, sented on the same chuiot poured a slinrp shower of ariows over Iravan The gold deci ed arrows of those two warriors covered the sun on lugh 20 The vallıut liaran too iu great angor, shos olcd lus arrows oxyr those charioteers and killed the driver At the full and death of the duryer, the hotele nandured. luthur and tluther dragging the chariot, after them. That grand£011 of the princo of ungas hasing conquered the two warriors, showed hus Prowess by destroying your ormics as well Ilio fighting warriors of Daryodhnn inade drendful attacks liko those wlo have drunk Then the prince of rakshaseg brave Ghatothach, nuounted on his banner.d rhariot bright like the sun, rushed upon Blngatta, 25 Tho ling of l'ragjyotish mounted on lus huge elephant loobed libe ins bis soison 47981 Mahabhalat (४७१८) मे तारकामये ॥२१॥ तत्र देवा सगन्धी स्यश्च समागता विशेष नस्म विवि दुहडिम्बमादत्तयोः ॥ २७ ॥ यथा सुरपति शस्त्रासयामास दानवान् । तथैव समरें। राजा द्रारयामास पाण्डवान् ॥ २८ ॥ तेन विद्राव्य माणास्ते पाण्डवा 'सवतो दिशा प्रातार नायगछन्न स्वेधनीकेषु भारत ॥ २९ ॥ भैमसनि रथस्यंन्तु तंत्रापश्याम भारताशे ग विमनसो भूत्या प्राद्रवन्त महारया ॥३०॥ निवृत्तेषुतु पाडूना पुर्न से न्ये भारत आसतिष्ठानको घोरस्तव सैन्यस्य सयुगे ॥३१॥ घटोत्कचस्ततोराजन् भगदत महारणे । शरै प्रच्छादयामास मेरु गिरि मिवाम्बुद ॥३२॥ निहत्य तान् शरान् राजा राक्षसस्य धनुश्ब्युतान् । भैमसेनि रणे तूर्ण सर्व मर्म स्वताडयत ॥३शा स तायमानो-बहुभि शरै सनत पर्वभि न विव्यथे राक्षसेन्द्रो विद्यमान इवाचल ॥३४। तस्य प्राग्ज्योतिष क्रुद्धस्तोमराव चतुर्दशा प्रेषयामास समरे ताश्चिच्छेद स वज वारी इन्द्र ऐरावत हाथी पर सवार होताथा, उस स्थान में गंधवों समेत देवता और ऋपिलोग आये घटोतंच ने भगदत्त की मुख्यता को नहीं जाना जैसे कि देवेन्द्र ने दानवों का भयभीत किया उसी प्रकार युद्ध में उस राजा ने पांडवोंको भगाया, हेभरतवंशी उम से भग येहुए, उनपांडवों ने अपनी सेनामें जाकर सब दिशा में कोई अपना, रसक नहीं पाया, हे भरतवंशी वहां मैंने अकेले भीममेन के पुत्र घटोत्कच कोही स्थपर नियत देखा और शेष महारथी अपने मनसे हार, २ कर इधर उधरको भागे-१३,०फिर पांडवोंकी सेनाके लौटनेपर युद्धमें भापकी सेनाका बाघोर निष्ठानक हिमा, इसके पीछे घटोत्कचने बाणोंसे भगदत्तको ऐसा,ढकीदया जैसेकि बादल मेरु पर्वतको देते है राजाभगदत्तनेभी घटोत्कचके फेंके हुए बाणोंको काटकर अपने वाणोंसे उसके मर्मस्थलों को घायलकिया, यह पोत्कच उन गुप्त ग्रन्धीवाले पाणोंसे || एम पीडामान नहीहुमा जसे कि घायल : पर्वतपीड़ित नहीं होता, फिर उसक्रोध भरे रानामाग्ज्योतिष ने युद्धमें चौदह तोमर उसके ऊपर फेंके उनको घटोत्कचने। Indra riding on Ajavnt in the war of dan vas The i the gods with the gandharvas and ushis came there Ghatathach Giliot know the greatness of Bhagdatta who dispersed the Pandav arm es as Indra had dond the dannvas The Pandavas terrified by the attacks of t at kungs could dot find a protector among their friends There I savd Bhim's sou Gintotkach alone seated on his chariot the rest of the warriors ran away in terror in diffi'ertt directions' 30 return of the Pandava army there was a great slaughteľ of your Gbrtothach covered Bhagđatta with lux errot's as clouds do Moru Bliagdattı too, cut down the artons of Ghatotkach and wounded hom a vital parts, but the latter was not disturbed by those wounds and stood firm like a lull * Then the enraged hoog of Pragjyotish discharged fourteen tomars at Ghatotkach 'who cut them all down 95 And having cut them down the brave prince of rakshases! Agun on the armies, (४७१९) HISATO Bluishaik Parv [471931 राक्षस ||३१मालवा महामस्तोमान्नशिशोः भारतच दियाय सत त्याकपत्रिभिः॥३६ ॥ तत माग्योतिको राजा प्रहसनियभारत । तस्याश्यांश्चनुरः संध्ये प्रेषयामास सायकैः ॥ ३७ ; स रतावे रये तिष्ठन् राक्षसेन्द्र प्रतापवान् । श किं चिक्षेप गेन प्राराज्योतिषगज प्रतिः॥ ३८ ॥ तामापतन्ती सहसा हेमदण्ड पं निनीम। त्रिधा चिच्छेद नृपतिः सात्यकीर्यत, मेदिनीम्।, ३९ विनिहतांच्या हेडिकः प्रादबद्भपात । ययेन्द्रस्प रणात पूर्व,नमुचिर्दैत्यसत्तमः ॥ ४०॥ तं विजित्य रणे गरविकान्तं करण्यातपरिणम्- अजेपं समरे धीर:पमेन घरणे, नच ॥ ४ ॥ पाण्डवी.समरे सेनां सम्ममर्द सकुञ्जर: 1.यथा यनगजो राजन् मृदनचरति पमिनीम 1133 | मद्रेश्वरस्तुसमरे: यमाभ्या: समसज्जत । स्वसायी छादयाचगरीयः पाण्डुनन्दनी,म-४३, ॥ -सहदेवस्तु समरे -मातुलं दृश्य सङ्गतम् । अवारयच्छरोपण काय ३६५ फिर तोमरों को काटकर उस महाबाहु रामसाधिप ने कंकपतवाले सत्रह बाणों से, भंगदत्त को घायल किया-फिर, भरतर्षभ राजा भगदत्त ने भी शायकों से उसके चारों घोड़ोंको गिराया, तदनन्तर उस मृतक घोड़ोंके रथपर नियत प्रतापी घटोत्कचने बड़े वेगसे भगदत्त के हाथी पर बरछी को छोड़ा राजा ने भी उसमुनहरी अकस्मात गिरती हुई. ताण बरछीके तीन टुकड़े करदिये, योक्तचअपनी परछीको हटाइआ देखकर भपसे ऐसा भागा जोकि पूर्वकाल में युद्ध भूमि को इत्येन्द्र नमाचे इन्द्र के भयो भागाथा । हेराना,उसने युद्ध में उसमसिद्ध पराक्रमी यमराज के समानः अजेय शत्रुको-विनय करके हाथीसमेत उसी, युद्धके भीतर पांडवोंकी सेना को भी ऐसे मर्दन किया जैसे कि जंगली हायी कुमुदिनियों को मईन करता हुआ चलता है, और युद्ध में नकुल और सहदेवके सायभिड़ते हुए मद्रदेश के राजाने पाणों के समूहों से दोनों पांडुनन्दन आने माननों को:भाच्छादित कर दिया फिर सह wourided his adversary. with so venteen arrors atted with Fulture quila. Then Best of Bharats. Blagdatta too killed his four horses with his sharp,arrone. Şeated on; the chariot of which the horses were dead, brave Ghatotkach swiftly, discharged a spear at the 'elephant of Bhaganttiin The, latter, cut it down in three parts with his arrows, Szing his spear cut down, Ghatotkach ran away in terror as Namuchi the prince of rakshases , had run away from before Indra..40 Haring conquered the famous warrior and invincible enemy, he enter. ed with his elephant in the midst of the Pandara army and destroyed it like an elephant crushing the lotus, plante, fighting with Nakul and Sahadev the king of Madra wounded the tivo sons of. Panda, his nepåeye. Sahadev seeing, his- maternal uncle, before him, hid bito with hir arrowsas clouds hide the sua.. Hidden by thosa. arrors, re was much pleased and loved them, the more for the sake of..their , [47 201 i Malia vhårt. '१४७२०॥ मेयो यददिवाकरम् || f४४ छाधमान शुरौधेण हप्टरुपतरोंभवत् तियोचाप्यमवत् प्रतिरतुला-मार कारणात् ॥ ४५ ॥ तत प्रहस्य समरे नकुलस्य महारया। अश्वाश्च 'चतुरो। राजश्चतुर्भेि सायकोत्तम ॥ ४६ ॥' प्रेषयामास समरे यमस्य सदनप्रात । हताश्चात्तु रथातूर्णमवप्लुत्य महारथ' ॥ ४७ मा भरुिरोह ततो यान भ्रातुरेय यशस्विन । एकस्यों तु रणे शरी इदै विक्षिप्य कार्मफ॥ ८ ॥ मद्रराजरथ तूर्गच्छाद रामास तु क्षेगात् । सछायमानो घभिगशिरा सन्नतपर्वमि ॥४९ । स्वसीयाश्या नरव्याघो नाकम्पत यथाचल प्रहसन्निय ताम्चापि शरा, जधान ह ॥ ५० ।। सहदेवस्ततः कुछ शरमुद्गृह्य धीर्यवान् । मद्रेजिमभिप्रेक्ष्य प्रेषयामास भारत 141 । स शर प्रेषितस्तेन गरडानिल' वेगवान् । मद्रराज विनिभिद्य निपपात महीतलेा-५२||स गाढयिद्धाध्यथितो रथोपस्थै' महारय.. देव ने युद्ध में सम्मुख हुए अपने मामाको देखकर वागों से ऐसे दिया जैसे कि बादल मूर्यकोटिकदेते हैं, वह वाणों से काहुधा अत्यन्त समरूप हुआ और माता के कारण से उन दोनोंकी अत्यन्त प्रति हुई, हेराजी इसके पछि उसमहारथी। ने बहुत हंसकर युद्धमें चार उत्तम शायकोंसे नकुलके चारोघोडों को मारा दि.फिर यहमहारथीमी शीयही मृतक घोड़ेवाले रथसे कूदकर अपने यशस्वी भाईकरंथपर सवार हुआ फिर एकरर्थपर सवार दोनों क्रोधंयुक्त शरभाइयोंने धनुषों को बचकर तणर्मात्रही राजामद्र के रथको वार्णो से दकदियो वह बाणों से आच्छादित होकर भी पर्वत के समान कंपायमान नहीं हुआ और इसतेही उसने उन वाणी को वर्षा | कोना किया, तदनन्तर पराक्रमी सिंहदेवने वडे क्रोध सेवाणको खचकर राजा | मद्रके गर फेंक'उसका फेंक हुआ वह गाडेसमान घाण राना मद्र को घायल करके पृथ्वी पर गिरा, फिर वह महों घायल पाटीमान महारथी बडी दृढ़ता से रथ में बैठकर अचेत होगया उसका मूत उसको अचेत हुआ देखकर उस संग्राम भूमि | से रथ के द्वारा दूर लेगया, धृतराष्ट्र के सवपुत्रोंने राजा मद्रके रयको फिरा हुला Then that tra.ror witke inde, killed the five hotees of Nakul with four allows 13 The Jatter jumped down from the chariot of which the horses yere dead and rounted on the chatıdt of his Mounted on the same charidt, the two bravé brothors drawing their hard bows, hid the chariot of the king of Madra' with a Bhower of arrons, but in spito of that the king was not discuifurted and with a'smiling facs! le destroyed tliosa arrows Theit Valliart' Sahadev, drawinn bra hing amputan 4111...d..rtv which few like ground' The bia driver had to take him'far away from the field of baktie, 'The 'sons of Dhritrashtra_Beeing the chariot' of thoLing of Madrilline leo mother b other He 13 .: the the (४७२२) भामपर्व Bhism Parv FIR निएमाद महाराज फरमलाच जगामह ॥ ५३. ॥ तं विसं निपतितं गतः सम्प्रेक्ष्य (संयुगे अपोवाह रथेनाजी यमाभ्यामभिपीडितम् ॥ ५५ ॥ श्या मदेश्वररथ धात राष्ट्राः परामुखम् । सर्वेविमनसो भूत्वा नेदमस्तीत्यचिन्तयन् ॥ ५५ ॥ निजित्य मानुलं संख्ये माद्रीपुत्री महारयो । दध्मतुर्मुदितीशंखी सिंहनादञ्च नेदतुः ॥५६॥ अभिदुद्रुव तुई.टी तय सैन्यं विशाम्पते । यथा दैत्यरम राजन्निन्द्रोपेन्द्रावियामरी..५७. 7. ' : इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि 'द्वन्दयुद्धे चतुरशीतोऽध्यायः ८४ ॥ मन्जयउवाच । ततो युधिष्ठिरोराजा मध्यप्राप्त दिवाकरें। थुतायुषमाभिमेश्य प्रेषया मासयाजिनः ॥१॥ अभ्यधांवत्ततोराजा श्रुतायुषमरिन्दमम् । विनिम्ना सायकलादणे नियमितपर्वभिः ॥ २ ॥ स सम्धार्य रणे राजा पितान धर्ममूनुना शिरान् सप्तमहे । | सेनापर दौड़ें. ५७ ॥ देखकर बड़ी व्याकुलता रो चिन्ताकरी और माना कि वह नहीं है, माद्रीफे दोना महारयी पुत्रा ने युद्ध में अपने मामाको जीतकर शंखों, को बनाके बड़े सिंह नाद से गजनाओं को किया और हेरामा वह दोनों बड़े प्रसन्न होकर आपकी सेना पर ऐसे दौड़े जाते कि इन्द्र और विष्णा दोनों देवता दैत्यों की अध्याय ८६॥ संजय बोले कि इसके पीछे प्रकाश के मध्यगत मुर्य के आजाने, पर राजा युधिष्ठिर ने श्रुतायुगको सम्मुख देखकर घोड़ों को चैतन्य किया और गमग्रन्थी वाले नौशायकों से शत्रुजित. श्रुतायुपको घायल करके उसके सम्मुख दौड़ा धनुपधारीने कोपित होकर युद्ध में वाणों को रोककर सात वाण युधिष्ठिर पर. चलाये, वह वाण उस महात्मा के प्राणों को खोजकरते हुए उसके कवच को काटकर रुधिर को पान thought that he was no more. The fons of Hadri Llew Joud blasts from their conchs at their conquest of the king and roared loud roars. 'And třith cheerful minds they rushed upon your armies lilie Indra and Vishnu rushing upon the daityas in the war between the gods and the danavas. 57. " TVhen the gun had risen on the middle of the sky," said Sanjays, "Prince Yudhishthir, seeing Shrutayush before him, moved his horses and with nine arrows having bidden kaots rounded Shrutayash thic destroyer of enemies and then rushed upon bim! Tho great archer checked the arrows in 8 rage and discharged seren arrows at yudhishtliir. I lie arroirs cutting through his armour -- । - CAAPTER LXXXY - [4722] Mahabhart (४७२२) वास. कौन्तेयाय समार्पयत् ॥३॥ ते तस्य करच भित्वा पपु शेणितमाहये। अनिव विचिन्वन्तो देहे तस्य महात्मन ॥४॥ पाण्डवस्तु भृश क्रुद्धो विद्धस्तेन महात्मना। रणे घराहकर्णेन राजान हृद्यविध्यत ॥ ५ ॥ अथा परेण भल्लेन फेतुं तस्य महात्मन । रथश्रेष्ठो रथातर्ण भूमी पार्थो न्यपातयत् ॥ ६ ॥ केतु निपतित दृष्ट्या श्रुतायु सतु पार्थिव । पाण्डव विशिस्तीक्ष्णै राजन् विव्याध सप्तभि ॥७॥ तत शोधात् प्रजज्या ल धर्मपुनो युधिष्ठिर । यथा युगान्ते भूतानि दिक्षु रिव पावक ॥ ८ ॥ द्धन्तु पाण्डव दृष्ट्वा देवगन्धर्वराक्षसा । प्रविव्यथुमहाराज व्याफुल चाप्यमज्जगत् ॥ ९॥ सर्वेपाञ्चैव भूताना मिदमासी-मनोगतम् । श्रील्लोकानद्य सक्रुद्धो नृपोऽय धक्ष्यतीति वै ॥ १० ॥ ऋषयश्चैव देवारच चकु स्वस्त्ययन महत् । लोकानां नृप, शान्त्यर्थ क्रोधिते पाण्डो तदा ॥११॥ सच क्रोधसमाविष्ट सृक्किणीपरिसलिहन । दधारात्मवपु लगे फिर उससे अत्यन्त घायलहुए युधिष्ठिर ने वराहकर्ण नाम बाणसे राजा के हृदय को घायल किया। फिर रथियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिरने दूसरे भल्लसे उस महात्मा 'की धनाको शीघ्रही काटकर रथ से नीचे गिराया, उसके पीछ उसराजा श्रुतायुपने अपनी ध्वजाको गिराहुआ देखकर सातविशिखों से धर्मराजको घायल किया, इसके पीछे राजा युधिष्ठिर ऐसा अत्यन्त क्रोधमें ज्वलित हुआ जैसे कि प्रलयकालपी अग्निदेदीप्त होती है, हेराजा देवतागंधर्व राक्षस युधिष्ठिर को क्रोधयुक्त देखकर पीड़ामान हुए और सब संसार कोभी व्याकुलता दुई और सर्व जीवों के चित्त में यह वात पर्तमान हुई कि अब यह राजा अत्यन्त क्रोध युक्तहोकर तीनों लोकों को भस्म करदेगा।१०। हे राजा तवतो युधिष्ठिरके अत्यन्त क्रोधितहोनेपर ऋषियों और देवतामोंने लोकों की शान्ती के निमित्त वडी ईश्वरसे प्रार्थनाकरी, उस क्रोधर्म भरेहोठों को चावतेहुए युधिष्ठिरने प्रलयकालके सूर्य के समान अपने भयानक रूपको धारण किया, तदनन्तर हे राजा वहा आपकी सब सेनाजीवनके विषय में निगश हुई, pierced lus body and drank his blood seeking for his life Wounded with the arrows, Yudhishthir pierced the breast of the king with a sort.of arrows known as hog's ear 5 and with another dart he cut down the banner from his chariot. Seeing his banner fallen down, Shrutryush wounded Dharmraj with seven sharp arrows The latter thercupon burnt wth anger like the fire of pralay. Seeing Yudhish. thir subject to angui, the gods gandharvas and ralshases were much disturbed in their minds ind the world shook with fear as if the hing would burn the three wyorlds 10 The gods and rishis prayed Gød to appease the wrath of Yudhıslıtlur, Biting his lips in anger, Prince Yudhıslıthir looksed glorious lile the sun and all your warriors be came hopeless of their lives But the price carefully cbecked his anger and cut nsunder the large low of Shrutayush_neu thd (४७२३) मोमपर्व Bhishma Parv [-4723} घोरे युगान्तादित्यसन्निमम् ॥ १२ ॥ ततः मन्यानि सर्वाणि नायफानि विशाम्पते । निराशान्यमयंस्तम जीयितं प्रति भारत ॥ १३ ॥ स तु धेय्येण ते कोप सन्निवाय्य महायशः । श्रुतायुष. प्रचिच्छेद मुष्टिदेशे महाधनु ॥ १४ ॥ अयन टिन्नधन्यानं नाराचैन स्तनान्तरे । निर्विभेद रणे राजा मर्वसैन्यस्य पश्यत ॥ १५॥ सत्यरं च रणे राजन तस्य चाहान्महात्मन । निजधान शर क्षिप्रं सतञ्च मुमहायलः ॥१६॥ हताश्यतु रयं त्यक्त्वा दृष्ट्या राशोऽस्य पौरपम् । विपदुद्राय पंगेन श्रुतायुः समरे तदा ॥ १७ ॥ तोस्मन् जिते महेप्याग्न धर्मपुत्रेण संयुगे । दुय्योधनवल राजन् सर्वमासीत् परांमु. समं ॥ १८॥ एतत् कृत्वा महाराज धर्मपुत्रो युधिष्टिर । व्याचाननो यथा फालस्तव सन्य जघानह ॥ १९॥ फितानस्तु याप्णया गौतमं रथिनाम्वरम् | प्रेक्षता संघसन्या. नां छादयामास सायकै ॥ २० ॥ सन्निवार्य शरांस्तांस्तु शप. शारद्वतो युधि । चेफि. तब उस राजाने धैर्यता से उसकोधको अच्छी रीति से रोककर श्रुतायुपके बड़े धनुषको मूढपर से काश, फिर राना ने भी मय सेना के देवनेहुए इस टूटे धनुप वालेको अपने नाराच याणों से छानीपर घायल किया ।१५। भौर इसी महात्मा ने शीघता से उस महात्मा के घोड़ों को वाणों से मार कर मारथी को तत्क्षणही मार डाला,'तवश्रुतायुप मृतकघोड़ों के रथ को त्यागकर राजा के पराक्रम को देखके घड़ी तीव्रता से संग्रामभुमि से भागा हे राना उम युद्ध में धर्मपुत्र युधिष्ठिर से उप धनुपधारी के विजयहोने पर दुर्योधनकी मब सेना मुख मोड़गई, फिर धर्मराज ने यह कर्म करके अत्यन्त काल मृत्यु के समानहोकर आपको सव सेना को मारा |फिर विंशी चेकितान ने सब सेना के देखते रथियों में श्रेष्ठगीतम कृपाचार्य को शायकों से ढक दिया ।२०। और कृपाचार्य्यने उन याणों को रोककर युद्ध में कुंशनचेकितानको पाणों से घायल किया फिर उसमीपताकरने वाले कृपाचार्यने दूसरे भल्लसे उसके धनुष को काट कर उसके सारथी को भी गिराया, इसके पीछे handlo, and within sight of all the armics the prince rounded him in the broast 15. and killed his horses and the driver with his arrows Leaving the chariot of which the houses were dead, Shrutagush filed from the field of battle at the sight of the hing's profess. In that battle, O bing, on Yudlııshthir the Jus 's conquering thrt archer, Duryodhan's army turned badl. and Daarm ny having dono this deed oi proiyess, assumed & dieadful form like that of Death to des troy jour armies. 1 hen Clehitan of tic l'rilor family within sight of all the variors, hid KuipacLar ya the best Goutams with his orIONB. 20. and the latter, having thecked those arrows wounded Che hitan, skilful in battle, with bis arreta The dexterous Kriracharya having cut his both another anci, billed his driver too, and Laving Lilled the borkes ard the writer, Le also billed the rear [4721] Mahabhart (४७२४) तान रणे यत्त राजन् विव्याध पप्रिमि ॥ २१ ॥ अथापरेण भल्ले न धनुचिच्छेद मारिय । फराथम्यास्य समरे क्षिप्रहस्तो न्यपातयत् ॥२२|| हश्वाधास्यावधीद्राजन्नु भौ तौ पाणि सारथी । सोवप्लुत्य रथासूर्ण गदाजग्राह सात्वत ॥ २३॥ सतया वीरघातिन्या रया गदिनाम्बर । गौतमस्य हयान् हत्वा सारथिञ्च न्यपातयत् ॥ २४ ॥ भूमिष्ठो गौतमस्तस्य शराश्विक्षेप पोडश । शरास्ते सात्वत भित्या प्राविशन् धरणीतरम्। २५५ चेकितानस्तत क्रुद्ध पुनश्चिक्षेप ता गदा। गोतमस्य वधाकाक्षी पुरस्मेव पुरन्दर् ॥ २६ ॥ तामापतन्ती विपुला मरमगर्मा महागदाम् । शरैरनेकसाह सारयामास गौतम ॥ २७ ॥ चेकितानस्तत खडग प्रोधादुद्धृत्य भारत । गाधर परमास्थाय गौमत समुपाद्रवत् ।। २८ ॥ गौतमोपि धनुस्त्यक्त्या प्रगृह्मासि सुमयत वेगेन महता राजकितानमुपाद्रवत् ॥ २९ ॥ तावुभी चलसम्पनी निस्त्रिशवरधारिणी निस्त्रिशाभ्यामुतोषणाभ्यामन्योन्य ससतक्षतु ॥ ३० ॥ निस्नरावेगाभिहती ततस्तो - घोडोंको मार कर सारथी और पाछे के रक्षक को मारा फिर उसगढा में कुशल यादव ने शीघ्रही रथसे कूदकर गदाको हाथमें लिया, और उस वीरोंकी मारनेवाली गदासे कृपाचार्य के घोड़ो को और सारथी को मारा, फिर पृथ्वी पर, वनमान कृपाचार्य ने सोलह वाणों को उसके ऊपर फेंका वह सव वाण, उम यादव को घायलकरके पृथ्वीपर गिरे ।५। फिर कृपाचार्य को मारनेकी इच्छा से महाक्रोधित चेकितान ने उस गदाको ऐसे फेंका जैसेकि इन्द्रने त्रासुर के ऊपर फेंकाया फिर कृपाचार्य ने उस लोहेकी महा स्थूल गिरती हुई गदाको हजारों वाणों से रोका इसके पीछे चेकितान खड्ग को मियान से निकालकर बड़ी तीनतासे कृपाचार्य के समीप गया, फिरवडे सावधान कृपाचार्य भी, धनुपको छोडकर बड़ी तारतासे चेकितानके पासगये, वहां उन दोनों महा पराक्रमी खड्ग धारियोंने तीक्ष्ण धारवाले खगो से परस्पर में घायल किया । ३० । फिर वह दोनों पुरुषोत्तम खड्गों के प्राधाता से यायर सपजीवां के निवासस्थान पृथ्वीपर गिरपडे, मोर मृच्छी से Thin that Yasar, skilful in mico exerc se jumped down from his chinuiot muc in hand ind with that pince, the destroyer of (nebules, lio killed the houses ind the drive of Kuprehurga who discharged at lim sistau unlows and having wounded the Yadav, those. arrors fell on the ground 20 D sning to bill Kripcharya Chel itan mn her aged hurlel y muce at hum rs Indir lzad hurled 1113 at Nimiclu Kripic'arya chec.ed with thousands of arrots that iron macefilling with zient veloity Then Chel itan die ont lus ston) from the senbbard and rushed upon Kninchry? Knpacharya mrefully luft 1113 Brord and went in haste to Chehitan and then the two Tarriors wounded each other with swotus 30 Wounded with divor cuts the two variiors full on earth the habitation of all living beings gurd (४७२५) भीमपर्ष Bhishma Pary [47253 पुरुषर्षभी धरणीसमनुप्राप्ती सर्वभूतनिषेविताम् ॥ ३१ ॥ भूत्रध्याभिपरीताङ्गी व्याया मेन तु मोहितो। ततोऽयधायद्वेगेन भरकर्षः सुहत्तया ॥ ३२ ॥ चेकितानं तथाभूतं दृष्ट्वा समरदुर्मदः । स्यमारोपयच्चैनं 'सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥ ३३ ॥ तथव शकुनि भर स्यालस्तव विशाम्पते । आरोपयद्रथं तूर्ण गौतम रथिनाम्वरम् ॥ ३४ ॥ सौमदति तथा कुद्धो पृष्टकेतुम्हारलं । नवत्या सार्यकः क्षियं राजन् विव्याध पक्षति ॥ ३५॥ सौमदत्ति सरस्थस्तभृशं वाणैरशोमत । मध्यन्दिने महाराज रश्मि भिस्तप 'नो यथा ॥ ३६॥ मरिश्रंयास्तु समरे धृष्टकेतुं महारथम । इतस्तहयं च विरयं सा यकोत्तमः ।। ३७॥ विरयंतं समालोक्य हताचे हतसारथिम् । महता शरवर्पणच्छाद यामास संयुगे ॥ ३८ ॥ सतु तं रथमुत्सृज्य पकेतुर्महामनाः । आरुरोह ततो यानं संतानीफस्यमारिप ॥ ३९॥ चित्रसेनो विकर्णच राजन् दुर्मर्पणस्तथा । रथिनो हेम सन्नाहा: सामद्रममिझुवुः ॥ ४० ॥ अभिमन्योस्ततस्तैस्तु घोरं युद्ध मवर्तत-। शरी महा व्याकुल देह होकर बड़े परिश्रमसे अचेत होगये इसके पीछे करिकर्ष उस दशा में युक्त युद्ध में दुर्मद चेकितान को देखकर मीति के कारण बड़ी तीयता से सम्मुख दौड़ा पार सेनाके देखनेहुए उसको रथपर मवार किया, इसी प्रकार हे राजा आप के साले शरशंकुनी ने उम रथियों में श्रेष्ठकृपाचार्य को भी शीघरथपर सबाराकैया इसी प्रकार में महाबली कोपयुक्त धृष्टद्युम्न ने नव्ये तीक्ष्ण वाणों से भरिश्रवा को हृदयमें घायलकिया ॥३२हेराना भूरिश्रवा उनं हृदयपर नियत वाणों से ऐसा प्रत्य- न्त शोभित हुआ जमे कि मध्याह्न के समय सूर्य अपनी किरणों से शोभित होता है, फिर भूरिया ने उत्तम शायकों से महारथी धृष्टकेतुके सारथी रथ घोड़ों को मार रथमे विस्थकर दिया, फिर इसको युद्ध में रथहीन देखकर व णों से ढक दिया हे श्रेष्ठ धृतराष्ट्र फिर यह बड़ा साहसी धृष्टकोतु उस रथको छोड़कर शतानीक के रथपर सवार हुआ इम के पाछे सुनहरी कवच धारण करने वाले चित्रसेन विकर्ण and having swooned with great exertion they became insensible. Then Kariharshi, sccing Chelitan in that condition rushed to'tho spot out of affection for him and within sight of all the armies bore him on his chariot. In the saine manner, Oking, your brother-in-law brave Shaluni put brare Kripacharya scon on the chariot. In the same manner bravc and cnraged Dhuislited; uma nourded Blurishtava in thic I reast with ninety shap arrows. 35. With the oricw standing on bis Lrcast, Bhurirbrava looked as glorious as the midday son with Bhurišltava then with his god anons, having killed the chariot driver and horses of Dirishtaletu, deprived lim of the use of liis chariot and finding him out of his chariot, he covered him with Arrows. - Thon bra ve Dhrishtketu lelt this own chariot and mounted Shenthod in golden armour, Chitrasen, Vikarn lis rays. that of Shatanik.

. [ 1726] Mahabharat (४७२६) रस्य यया राजन् पात पित्त कफेरिश्रमि ॥४१॥ विरथांस्तवपुत्रांस्तु कृत्वा राजन महाहरेन राधान नरव्याघ्र. स्मरन भीम पचस्तदा ॥ ४२ ॥ ततो रानां बहुशतैर्गमा श्वरथयायिभिः । संसृतं समरे भीष्मं देवैरपि दुरासदम् ॥ ४३ ॥ प्रयांतं शीघ्रमुहीक्ष्य परित्रातुं सुतास्तव : अमिमन्युं समुद्दिश्य पालमेकं महारथम् ॥४४॥ वासुदेवमुवा चेदं फौन्तेयः श्वेतवाहनः । चोदयाश्वान कृषीकेश यत्रैते बहुला रथा. ॥ ४५ ॥ पते हि यहय शूरा कृतारना युद्धदुर्मदा । यथा हन्युनन· सेना तथा माधव चोदय ॥४६॥ एवमुक्तः स वार्ष्णेय. कौन्तेयेनामिती जसा । रथं श्वेतहयैर्युक्तं प्रेषयामास संयुगे ४७॥ निटानको महानासीत् तवसैन्यस्य मारिप । यदर्जुनो रणे कुछ संयातस्तावकानप्रति ॥ ८॥. समासाद्यतु कौन्तेयो रानस्तान्भीप्मरक्षिण । मुशर्माणमथो राजन् निदं वचन मनधीत् ॥ ४९ ॥ जाना मित्वा युधा श्रेष्ठ मत्यन्तं पूर्व वैरिणम् । अनयस्याय दुर्मर्पण नाम तीनों स्थी अभिमन्युके सम्मुख दौड़े।४०।इसकेपोछे अभिमन्युसे और उन रथियों से ऐसा घोरयुद्ध मचा जैसे कि देह से और यात पित्त कफ इन तीनों से युद्ध होताहै, हे राजा फिर भीमसेन के वचन को स्मरण करते हुए इस नरोत्तम ने आपके पुत्रों को विरथ करके पारा नहीं तदनन्तर देवताओं से भी अजेय भी- मनी बहुत से हाधी घोड़े और रथों पर सवार हजारों राजाओं से आकर संयुक्त हुए इसमकार प्रापके पुत्रों की रक्षा के लिये बड़ी शीघ्रता से आते हुए भीष्मजी को, देसके और महारथी अभिमन्यु को अकेला देखकर श्वेत घोड़े के रथपर सवार अर्जुन वासुदेव जी से यह वचन बोला कि हे हृषीकेश घोड़ोंको तेम करिये और जहां यह बहुतमे रथहै वहां चलिये ।४५। यह अस्त्रोंके जाननेवाले युद्ध में दुर्मद यड़े शरीर जैसे कि हमारी सेनाको नहीं मारें हे माधवजी उसी प्रकारमे आप घोड़ों को चलाइये, बड़े तेजस्वी अर्जुनके कहेहुए ऐसे वचनो को मुनकर श्रीकृष्ण जी ने उन्हीं श्वेत घोड़ों के द्वाग रथको संग्राम भृमि में पहुँचाया, हे राजा यह and Durmarshan, the three great worilors rushed upon Ablumnyu, 40 and the battle amongst them up as drundiul at that of rind, bilo and phlegm tho, three humours of the Lody. And remembering tho words of Blumsen, that last of narriors made the chariots of your sons uscless, but spared their life. Then Bhishm, inconquerable oven by gods, joined them together with thousands of ciophants, doi te and charioteer prises. Thus seeing Bluslim in hasta coming for tho prelection of your 8094 and finding Abhimanyu alone, Arjun, mount dal on the chariot drawn lig white liotecs, faid to Vasudev. "Maho tho lorsea nin sailliy and go to the plaer uliere these chariots aro, 45 so that tliese great nariors shilful in the uso of arms, may not destroy our armie Dinko hosts to reach there' lInting heard the words of glorious Arjun, Shree Krislın drosc thc chariot into -7 (४७२७) भीष्मपर्य Bhishna Pary [47271 सम्माप्तं फलं पश्य मुदारुणम् ॥ ५० ॥ अद्य ते दर्शयिष्यामि पूर्व प्रेतान् पितामहान् । एवं संजल्पतस्तस्य.पीमत्सोः शत्रु धातिनः ॥ ५ ॥ श्रुत्यापि पल्यं वाक्यं मुशर्मा स्थ यूथपः । न चैनमग्रंचीत् फिञ्चिच्छुभ या यदिवाशुभम् ॥ ५२ ॥ अभिगम्बाजुने वीर राजभिर्वदुभिर्वृतः । पुरस्तात् पृष्टतश्चैव पावतश्चैव सर्वतः ।।.५३ ॥ परिवा-र्जुन संध्ये तव पुत्रमहारयः । शरः संडादयामास मेघरिव दिवाकरम् ॥ ५४॥ ततः प्रवृत्तः समहान् संग्राम: शोणितोदकः । तायकानांच समर पाण्डवानाच भारत १५॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि मीष्मवधपर्वणि सुशंमार्जुनसमागमे', पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥ श्रापकी सेना का बड़ा निप्ठानक हुआ गो युद्ध में क्रुद्ध अर्जुन आपके पुत्रों पर चढ़ाई करनेवाला हुआ, हे राजेन्द्र अर्जुन 'उन भीमजी के रक्षक राजाओं को प्राप्तहोकर राना मुशर्मा से यह वचन बोला कि मैं तुझ को शरवीरों में अत्यन्त श्रेष्ठ और पहला शत्रु जानताहूं अब इप्त- अन्याय से प्राप्तहुए भयानक फलको देखो।५०। अब 'मैं तेरेमोहुए पूर्वजोंसे तुझे पिलाऊंगा यह अर्जुन के वचन सुनकर महारयी मुशर्मा ने उसको अच्छा बुरा कोई उत्तर नहीं दिया, फ़िा बहुत गजाओं समत प्रापके महारथी पुत्रों ने महा पराक्रमा अर्जुन के सम्मुख जाकर अर्जुन को चारोंओर से घेरकर वाणों की वर्षा से ऐमा आच्छादित करादिया जैसे कि बादल सूर्य को ढकलेतेहैं हैं भरतर्षभ इसके पीछे आप के पुत्रों से और अर्जुनसे ऐमा महा भयानक युदभारंभ हुआ कि जिसे में रुधिरों की नदी बह निकली ॥५६॥ -the field of battle. That enraged Arjun's attack upon your armies was very injurious to your cause. 'Having met the princes that 'guarded 'Bhishm, Arjun said to Susharma; if Iknow iyou to be the best of warriors and first among my. enemies...See the result of this unjust war.50. I shall now sond you to your deceased predecessors." Having hoard these words of Arjun, Susharma , returned him no reply, either good or bal. . Then your brave sons with many. princes Aurrounded Arjun on all sides and hid him with the shower of lis arrows as the clouds hide the sun. The battle between your cons and Arjun was to fierce that a riper of blood flowed on the field of battle." 55. .

1281 Valjabharat (७२०) सञ्जय उवाच । सताइग्मातस्तु शरधनन्जयः पदाहतो नागवश्वसवली । चाणेन वाणेन महारथानां चिन्डेदचापानि रणेप्रसध १॥ सछिद्यापानिचतानिराहां तेपारपे वीर्यवतांक्षणेन विव्याध वायुगपमहात्मा नि शेषतातेप्यथमन्यमानः ॥ २॥ निपेतुराजौ रुधिराभिधास्ते ताडिता राममुतेनराजन् । विभिन्न गाता पतितीतोत्तमागा गतासछिनतनत्रफाया३'महींगताःपापलाभिभूताविचित्ररूपायुगपद्वितेशुमध्या हतांस्तान्युधि राजपुत्रांनिगराजःपपयोरथेनं ४॥ तेषारयानामयपृष्ठगोपा द्वात्रिं शदन्येभ्यपतन्त पार्यम् । तथैव ते तं परिवार्य पार्थ प्रकृप्य चापानि महारवाणि ॥५॥ अवीवृपन् घाणमहोघवृष्टया यथा गिरिं तोयधरां जलोधैः । मम्पीड्यमानस्तु शरोघश्या धनञ्जयस्तान् युधि जातरोषः ।। ६ । पथ्या शरैः संयति तैलधीतजधान अध्याय ८६ ॥ संजय वाले कि वाणों से घायन सर्पके समान बास लेने वाले महा पीड़ित वलवान अर्जुनने युद्ध में महा हटकरके एक २ वाणसे सब महाराययों के वाणों को और धनों को एक क्षणमें काटकर उस नाशकर्ता महात्मा अर्जुनने वाणों में सब | को एकही समय में घायल किया हे राजा इन्दके पुत्र अर्जुन के हाथ से घायल वह राजालोग रूधिर में भरे अत्यन्त टूटे अंग शिर कटै मृतकहोके कवच पहरेहुए संग्राम भूमि में गिरपड़े, अर्जुन के पराक्रम से विचित्ररूप होकर सब महारथी एक सायही नाशको प्रामहुए, युद्ध में उन राजकुमारों को मृतक देखकर राजा त्रिगर्त रयकी सवारी में चला, फिर उन रधियों के पति भी पीछे की रक्षाकरने वाले वार भर्जन के सम्मुख भाये और अर्जुन को चारों ओर से घेरकर बड़े शब्दायमान | घनुपों को चढ़ाके, हजारों वाणों को ऐसी वर्षा करने लगे जैसे कि जन समूह से वादल पहाइपर वर्षाकरते हैं फिर वाणों की वर्षा से पाहित अर्जुन ने बड़े क्रोपयुक्त होकर उन पृष्ठ रसकों को भी युद्धके भीतर तेलसे सफा किये हुए वाणों से मारा फिर उत यशस्वी प्रसन्न चित्त अर्जुनने युद्ध में उन साठ रयियों को विजय CHAPTER LXXXVI Sanjays continued -"Wounded by arrows, hissing like a sorrant and exacdingis oppressed, brase Arjun, with great exertion in battle cut dona the bows and arrows of all this warriors in an ips. tant and round.d them all at the same time with his arrows. Wounded by Arjun tho son of Indra, the princes fell down in the field of battle, bleeding out of their broken limbs, heads cut and ar. mours pierced. With the wonderful process of Arjun, the warriors There arnitilated in a monent scting those princes slain in Lattle the king of Trigart proceeded in lis chariot, and the rear guards too of those charioteurs adranoul to meet Irjun. They surrounded him on all sides and drawing their loud sounding bows showered over hins thousands of arrors as clouds pour forth rain orer mountains. fuch (४७२९) भीष्मपर्य Bhushma Pary [47293 तानप्यय पृष्ठगोपान् । रय रचतांस्तानरजित्यसख्ये धनन्जर प्रीतमनावराची अधात्वरदाप्मवधाय जिष्णुर्वलानि राजन् समरे निहत्यं निगतराजो निहतानममीक्ष्य महात्मनाती नथ बन्धवर्गान् ॥८॥ रणे पुरस्कृत्य नराधियास्तान जगाम पार्थ त्वरितो बचाया अभिदुत चास्त्रना वरिष्ट बनजय वीश्य शिण्डिमुड्या ॥ ॥ अयुध. युस्ने शितशस्त्रहता रिरक्षिपन्तो रथमर्जुनस्य । पायोपि तानापततः समीक्ष्य विगत रामा सहि नान वीरान ॥ १२॥ निधस पित्यासंतरे धतुष्मान् गगगडीयमुनिशितः पृषक । भीष्म थियाK ऍधि सन्ददर्श दुर्योधन सन्धमादीनपामगारविष्णून भिवारयित्वा मुहर्तमार्याध्य बलेन चरि'। उतएज्य राजानमनन्तनी- जयदयादव नृपान्महीजा १२..। ययो ततो भीमयलो मनस्वी गानेयमाजी शरापपाणि । युधिष्ठिरवली महात्मा समाययो त्यरितो जातकोप ॥ १३ ॥ मद्राधिप सममित्य. muni कर युद्ध में गजाओं की सेनाओं को मार भीमगी के मारने के लिये गीवना करी, फिर राना बिनाके ढायो मरेहुए वांवों के उन समूहों को देखकर राजाओं को आगे करके अर्जन के मारने के लिये बहुत शनिंगया, फिर शिसयडी भादि उत अधा अर्जुन को सम्मु व गया हुमा जानकर बड़े । तात्र अत्रों को | हाथमें लिये बड़ी शीघ्रता से अर्जुनकी रक्षा के निमित्त उसके पास गये फिर उ. बड़े धनुष गरीनने भी राना गिन के साथ आतेहुए उन नरोत्तप्रवीरोंको देपकरें । गांडीव अनुपासे छोड़े हुए तागा पक्त चारों से मारकरी भी मजी की ओर जाते हुए मार्ग में दुर्योधन और जयव्य आदि राजाओं को देखा। शफिर वह धीर उन रोकने के इच्छावानों के सम्मुख होकर और एक मुहूर्न युद्ध करके बड़े पराक्रमी राजा जयद्रथ आदि को छोड़ कर, हाथ में भाकारी घनुप लेकर मीप्मनाके | सम्मुखगया फिर भयकारी पराक्रम वाला युधिष्ठिर भी बडे शोध में भरके उन के सम्मलगया, फिर वहअत्यन कीर्तिरान् प्राने भाग में मिले हुए उस रागा मद्रको afflicted and chagriod with the slower of their arrutra, Arjun killed thoso rear guir la tos, with his will oiled anions Then glorious Arjun with a clieel ful mind, having conquered the sixty claroteers and destroyed tle roles of punces 17'ened to slay Bhishını Ser ing the partus of his relat ons, sinin in battle by Arjun, the king of Irigart, preco led by bshat-yas hasten-] to slay lum Shihhandi and others seeing Arjun engaged in combat, hastened -to help lima with tlieir Weapons The grazt archor Arjun tao seeing thos), wat riors coming on with the king of Trigart, destroyed them with his sliary arrows slot from the Gandır bost, and advancios. agua to wards Bhrshm, hestr Daryadhan, Jayadrath and other princes-11, He fied the wife lors desirous of oliechin, his ad rroca and, rought for a Failo ngunst thein Then leaving tho : at carnio 3, Jagādrats and [4730] Víahabhamt (४७३०) ज्य संख्ये स्वभागमाप्तन्तमनन्तकीर्ति साधं समाद्रीसुतभीमसेनीष्म ययौ शान्तनय रणाय ॥ १४ ॥ ते सम्प्रयुक्त स महारयाग्रचंर्गङ्गासुत समर चित्रयोधी। न विव्यथे शान्तनवो महात्मा समागत पाण्डसतै समस्तै ॥ १५ ॥ अथैत्य यजा युधि सत्यसन्धो जयदयोत्युग्रवलो मनस्वी । चिच्छेद चापानि महारथाना प्रसह्य तेवा धनग परेण ।। १६॥ युधिष्ठर भीमसेन यमौ च पार्थ कृष्ण युधि सम्जातकोप । दुर्योधन क्रोधविषो महात्मा जघान वाणेरनलप्रकाश ॥१७॥ कृपेण शल्येन शलेन चष तथा विभो चित्रसेनेन चाजी । विद्धा शरस्तेतिवितरकोपैया यथा दैत्यगणे समेतैः ॥ १८॥ छिन्नायुध शान्तनवेन राजा शिखण्डिनं प्रेक्ष्य च जासफोप । भजात शत्रु समरे महात्मा शिखण्डिन युद्ध उवाच वाफ्यम् ॥ १९ ॥ उक्त्वा तथा व पितुर 'प्रतोमा मह हनिप्यामि महावतन्तम् । भीष्म शधिर्विमार्फवणे सत्य बदामीति त्यागकरके नकुल सहदेव और भीमसेन को साथलिये भीष्मनी के सम्मुखगया युद्धमें अपर्च पराक्रम दिग्वाने वाले गगापुत्र शतनु के पुत्र भीष्मजी उनउत्तम महारपियों से सयुक्तहोकर सर पाडवों से,भिडे हुए भी पीडामान नहीं हुए ।१५। इस के पीछे भयानक वल साहमी मत्स संकल्प राजा जयद्रथने युद्धमें आकर उत्तम धनुप से उन महारथियों के धनपों को काटा, और क्रोध युक्त शत्रुता रखनेवाले दुर्योधन ने अग्नि के समान प्रकाशमान वाणों से युधिष्ठिर भीममेन नकुल और सहदेव समेत श्रीकृष्ण और अर्जुनको घायल किया हे समर्त्य वह पांडव युद्धभूमि में उन | महाक्रोध में भरे हुए कृपाचार्य शल और शल्य व चित्रसेन के बाणों से ऐसे घायल किये गये जैसे कि दैत्यों के समूह से मिलेंहुए देवता घायल होते हैं, फिर क्रोधयुक्त महात्मा युधिष्ठिर भीष्मनी के हायसे दृटे अस्ववाले शिखण्डीको देखकर महाक्रोध युक्त शिखण्डीसे यह वचन योला, कि तुमने अपने पिता के सम्मुख प्रतिज्ञा करके यहमुझ से कहाया कि मैं निर्मल मूर्य रूपी वाणोंके समूहोंसे महाव्रत भीमनी को others, he.fucod Blum with the dreadful boy in lus hand. Yudhisha thir too, of droudful rouess, faced thein in great angor Then lcaring the king of Madru allotted to lum le faced Bhishm in company With Nahul Silder and Bhim The son of Groga and Shantant, of great potess in war has not afllicted by lus encounter with the Pan davas nssisted as they wc o by so many warriors of notc. Then bipg Jayndrath of dreadlul prosess and courago and true of nord, came into the field of batt c and cut dora their bons And enraged Duryodhan of envious tempor Tith lus Lr ght nrrors like fire wounded Yudhish. tur, Bhını, Vukul, Sahdos, Shree brishn and Arjun The Pandavas, Oking were wounded in batt'c bs the enraged Kripcarya Sbal, Shalya and Clut axn as the gods and by the hosts of Danaras Swing Slubhandi boken of weapons by Bhishm, Yudhishthir thug addressed him,-' You gave 10 jour Ford in the presel.ca of your father that . (१४७३१) भीमपर्व Blusha Part [473111 कृता प्रतिक्षा ॥ २० ॥ त्वया न चैनां मफला फरोधि देवप्रत यन्न निहसिं युने। मिथ्याप्रतिको भव मात्रधीर रक्षस्व धर्मस्व कुल यशा ॥ २१॥ प्रेक्षस्व भीष्म युधि मीमवेगं सास्तपन्त मम सन्यसघान् ! शराघजालेरतितिग्मवेगै काल यथा पालकृतं सणेन ॥ २२ ॥ निकृत्तचाप समरनपेक्ष पराजित शान्तनग चाजी। विहाय पन्धू नय सोदरांव क्य यास्यसे नानुरूप तवेदम् ॥ २६ ॥ पृष्ट्वाहि भीष्म तमनन्तवीर्य भग्नञ्च सैन्यं द्रयमाणमेपम् । भीतोसिनून द्रुपदस्य पुन तथा हिते मुसयोंप्रदृष्टः ॥२४॥ अशायमानेच धनञ्जयेपि महाहये सम्मसके,नृवीरे। कय हि भीष्मात प्रथितः पृथिव्यां भय त्वमय प्रफरोपि धीर ॥२५॥ स धर्मराजस्य वची निशम्य लक्षाक्षर विप्रलापानुपद्धम् । प्रत्यादेश मन्यमानो महात्मा प्रतत्वरे भीष्मयधाय राजन् ।। २६ ।। तमापतन्त महता जयेन शिखण्डिन भीष्ममभिद्रयन्तम् । निवारयामास हि शल्य- मागा ।२०।तुम अपनी प्रतिज्ञाको पूर्ण करके क्यों नहीं भीमनीको मारते हो हे नरोत्तम तुम असत्य प्रतिज्ञावाले मतहो धर्म यश और-कुलकी रक्षा करो तुम अत्यन्त तोब प्रकाशित वाणोंके समूहों से मेरी सेनाके सब यूयोंके संतप्त करनेवाले और युद में भयकारी रूप भीमको ऐसा देखो जैसे कि कालपुष्प क्षणभरमें सक्कोमारे युद्ध | में राजालोग भीम के हाथ से टूटे घनुपपाले हुए तुमको ऐमा उचित नहीं हैकि अपने सगे भाई और वान्धवों को छोड़कर जातेहा, यह वात तुम्हारे योग्य नहीं है हे द्रुपद के पुत्र तूं उस अतुल पराक्रमी भीष्म को और इस छिन भिन्न भागी हुई सेना को देखकर अवश्य भयभीत है और तेरे मुखको शोभा बिगड़ी हुई है, वहें भारी युद्ध में चारों ओरसे जीतेहुए अर्जुनके साथ भिड़े हुए नरवार भीष्पको देखो है वीर नूपृथ्वीपर विख्यात होकर क्यों भीष्मजी से शगना करता है ।२५ । हेराना उस महात्माने धर्मराज के रूखे अनेक मर्म स्पर्श करने वाले वचनोंको सुनकर प्राज्ञाको मानकर भीमके माग्ने की शीत्रता करी, उम समय बढे देगसे भीष्मके सम्मुख आतेहुए शिखण्डीको शल्यने बड़े दुर्जयार अस्त्रोंमे रोका हेराजा महाइन्द्र के समान your arrows bright like the sun you will destroy Bhishm of dreadful vows Why do you not redeem yoti prcmize by slaying hım ! Donot break your promise, best of wen, protect Dharm Fame and family with your bright and sherp 1058 you can destroy armies. Looh at dreadful Bhuln as Death the desti oyer of all The bows of the narrois me cut downl, 1 hlm Your lear de scur Rrotleſs' srd relations is not satis, of jou It is not worthy of you: son of Drupad, that you sem hyttered at the shit of dreadful bībni and the scattered ai my leglory of tlg face xe, goce Look at trave I bíthon (Dgsged in Fght with Arju verg Terrous in the world, you call ycutself Flui m's eneo's is said " Hesrng the taunts of Dharmraj, touching his vital parts he hasteded to destroy Bhishim. Shalyachecked the ndrance of Shilbandi-against-Bhustam, 'with TATE Vilnbharat एनमस्त्रेण धोरेण म दुज्जयेन १२७१ रा. चापि दृष्टया समुदाय्यमाणमस्त युगान्ताग्नि समकार्शम् । नसममोह परस्म पुरा राजन महन्दप्रातसंप्रभाव २४ ॥ तस्यों का तब महापान शास्तदरत्र प्रतिवाधान पवादद वारमन्यास्त्र शिखज्यान प्रतिघातमस्य ॥ २९ ॥ तदस्नमस्त्रेण ग्दिाय्यंमाण सस्था. सुरा ददृशु पार्थिवाश्च । भीमस्तु राजन समरे महात्मा धनुश्चचि मध्यजीव चापि ॥३. छित्वानदत् पाण्डुसुतस्यवीरो युधिष्ठिरस्यालमाढस्य राज्ञ । तत समुत्सृज्य धन सवाण, युधि- ष्ठिरवीश्य भयाभिभूतम् । ३११ गागृयाभिपपात सरये जयद्रथ भीमसन पदाति । तमीपतन्तं सहसा जवन जयद्रथ सगद भीमसेनम् । ३२ ॥ विव्याध घोयमदण्डक स्पै शिते शर पञ्चशत समन्तात् । अचिन्त यित्वा स शरोस्तरस्वी वृकोदर मीवपरीतचेता । ३३ ।। जघान घाहान समरे समतात्पारावतान सिन्धुपजस्य संस्थे । ततोभिवादयामतिमममावस्तवात्मजस्वरमाणो रयन । ३४ ! अध्यायया भीम प्रमावाला वह छुपका पुत्र उत मल्यानिके स्मान प्रकाशित 'अस्त्रको देखकर मोहित नहीं हुआ और पडे धनुप के बाणों से उस प्रश्नको नाशकरके उसी स्थान में नियनदृया फिर शिखण्डी ने इस के नाश करनेवाले दूसरे वरुणालको न्या उसासे अस्त्रको रकेहुए को स्वर्गवानी देवना और गात्रोंने देखा फिर उस, महात्मा बीर भीष्मी ने युद्ध में अजमोद व पाण्डन युधिधिर के धर्नुपको, नाक धना ममेत काटकर बडा शर्द किया इसके पी भीमसेन युधिष्ठिर को भयभीत देवार वाणों समेत धनुपको छोडकर, गदा को हाथ में लिये.. पैदल ही सग्राम में जयदय के सम्मुख पाया, नयंत्र्य ने गदापारी भीमसेन को बड़े, वेग से। प्राता! हुमा देवका यारान के दण्ड के समान घोरे नी पाणों चार पायल किया फिर कप में पर्ण भीमसेनने वाणी को कुछ न मानकर गना सिंधु के पारात नाम सब घोडों को मारी फिर अतुल प्रभाव इन्द्र के समान अबगारी प्रापमा पुत्र विक्रोन बड़ी शीना से अपन पथ के द्वारा भीमसेन के ithi he slop artious Drapac s sou Slulbaods : tlint of Iridit it is not fight wint the sylt of luss screens einght like the firo of pilsyn lut stowl franly distroving his weapons with the arrow's dischi e fique 1119 ,luge bos Then Shuklanis drus out f.19 Varunnston to dostsos li s trene The geels learen ard tve princos sur 1119 veupane checi ed ly thic l arunnatra 30 ,1 bo great kurrior Buishur rored in treth ndous ronr after cutting sunder the Ndxall bus ni'l bina of I u ſludlıtlur l'eading, Yudhishthirietis tovit, Bindom ldlt lufsw and arrone and with mace ia, 1218 land lies į nad on fouklost' troy Juulrith Secang Dhingren omg in laste Dis matu matls run astov s ure ulful lile tho strip Ya Tundlich from all jai Bhumn in the treesmof ruge of moFCES 1ile - भीमप Bhishma Parv [47333 सेनं नियन्तुःसमुद्यतास्त्री सुरराजफैल्पः । भीमोन्यथैनं सहसा विना प्रत्युद्ययौ गंदया तर्जयानः । ३५ ॥ समुद्यता तायमदण्डकल्पा दृश्या गदान्त कुरवः समन्तात् । विहायसवे तव पुत्रमुग्नं पातं गदायाः परिहर्तुकामाः ॥ ३६॥ अपक्रान्तास्तुमुले. संप्रमः मदारणे भारत मोहीये। अमंदचेतास्त्वथ चित्रसना महागदामापतन्ती निरीक्ष्य ॥ ३७॥ रयसमुत्सृज्य पदातिराजी.प्रगृह्य खंदा विपुलश्च चर्म । अबप्लुतः प्राप्य रय सचित्र ..नंणोऽवद्वामिय संम्प्रहष्याः । सर्षे नस्थभने FREETE पड़शीतोऽध्यायः ॥८६चा:Fir im इटंगये फिर JATE - मारनेको सम्मुखंगया तब मसिनी सूत्र गंजार गंदा में उसको आ. सम्मुख गया। फिर वह कौरवोंग चहुं ओरको यमदण्ड 'यमदण्ड के समान गदा उठाये भीमसेन को देखकर मव भापक पुत्रों को छोड़कर उस भयकारी गंदा से बचने के लिये इच्छा करनेवाले हुए और उस बड़े भारी तुमुल युद्ध से प्रिसेन यातीहुई महाघोर गदा को देखकर रयको त्यागकर युद्धभूमि में पैदलही, 'निर्मल खड्ग और दाल को लेकर रथ से 'पृथ्वीपर ऐसे कदा जसे कि पञ्चत के कोगासे सिंहकूदताहाघ गदा भी बड़े जड़ाऊ रथों को पाकर घोड़े और मारपी समेत रयको विवसन करक पृथ्वीपर एसे गिरी जैसे कि आकांशसे गिराहुई वहीं बालित उल्का पृथ्वी की जाती है, आपके पुत्र पार भाई अत्यन्त प्रसन्न उस बड़े पाश्चयं को देखकर एक माय गर्ने भार चारों भार से सेनासमेत सर्वोने उसकी प्रशंसा करी। ।। ४० ।- WA TU;are, pi tue arrows ruù hinců ali'ne 'lorSES of the king of Sindh...Then your son Chitiksen 'of Indra like prowers and matchlessstrepgth;.faced Bhimsop.: The latter with a loud ionr faced him withi his máco,-35... ,Tlen ,the, Kauravas sceing-liim with his mace raised on biglio left you'rføds,t:Dd'desilcus of cserping tlie' dicadſul'i máce, 'flça away fom the fold.us, battle. f"And Clitrà een'' seeing' that'dreadful? paça left his”, chariot ends with his . Lright sword and shield"júnipėd down frourlig chariot like a dion springing i Irom the hillside. Thë' maccmeeting with thio: gen-ledecked. chariot destroyed it togetlier with tkelioregs und driver vnd fell down on corthlike lighluinig. Ally your songoaięd pbeerfully alllljøsightoi-that wonder und $11tbe': warriors,piained his worki" '40. ?',i,, ." 7 . 4734 Maljabharnt (४७३४) सम्जय उवाच । विरयं तं समासाद्य चित्रसेन यशस्विनम् । रथमारोपयामास विकर्णस्तनयस्तव ॥ १॥ तस्मिंस्तथा वर्तमाने तुमुले संकुले भृशम् : भीष्मः शान्तनव स्तूर्ण युधिष्ठिरमुपाद्यत् ॥२॥ ततःसरयनागाभ्या समफम्पत सृजयाः। मृत्योरास्य मनुप्रान मेनिरे च युधिष्ठिरम् ॥ ३ ॥ युधिष्टिरोपि कौरव्यो यमाभ्यां सहित प्रमुः। महेप्यास नरव्याघ्र भीष्म शान्तनयं ययौ ॥ ४ ॥ तत. शरसहस्राणि प्रमुञ्चन् । पांडवो युधि । भोप्पं संडादयामास यथा मेघो दिवाकरम् ॥ ५॥ तेन सम्यक प्रणीतानि शर जालानि मारिष प्रतिजग्राह गाङ्गेयः शतशोथसहनशः ॥ ६ ॥ तथैव शरजालानि भीमेणास्तानि मारिए । आफाश समदृश्यन्त खगमानां प्रजा इव ॥ ७॥ तिमेषाधन फो तये भीष्म शान्तनयो युधि । अदृश्यं समरे चक्रे शरजालेन भागशः ॥ ८ ॥ ततो. अध्याय ८७ ॥ संजय बोले कि इम के भनन्तर अापके पुत्र विकर्ण ने उम विरय और प्रसन्न चित्त चित्रसेन को पाकर रयपर सवार किया, इसरति से उस अत्यन्त कठिन तुमुल युद्धक वर्तमान होने पर शांतनु के पुत्र भीष्मजी ने बड़ी शीघ्रता से युधिष्ठिर के सम्मुख दौड़े, उसके पीछे मुंजयनाम बड़े बलवान् क्षत्रियोंने, रथहाथी ; और पोड़ों समेत अत्यन्त कोपित हाकर युधिोष्ठर को काल के मुखमें गया जाना फिर समर्थ धर्मराज युधिष्ठिर भी नकुल सहदेव दोनों अपने भाइयों समेत उस बड़े घनुपयारी नरोत्तम पीप्मनी के सम्मुख गया, इस के पीछे पांडवों ने हजारों वाणों से भीष्मको ऐसा ढक.दिया जैसे कि सूर्य को यादल दक देता ।। फिर गांगेय पीष्मनी ने उन युधिष्ठिर को अच्छी रीति से छोड़े हुये. हमारों पाणों को अपने याणों से रोक दिया है राना फिर: इसी रीति से भाप कभी छोड़े हुए पाएं आमांश में ऐसे दिखाई दिये जैसे कि पक्षियों के समूह - उड़ते हैं इन भीष्ममी ने सर्णमात्र में ही युधिष्ठिर समेव उनके सब वाण समूहों को गुप्त कर दिया फिर CHAPTER I.XXXVII " Pour son Viharn,', continued Sanjaya, finding Chitrasen" destituto of chariot with a cliccrful mind, took him np on his own. Thus 'when the battle was rying furious, Bluishin the son of Shantanu rushed upou Yudlıslıtlır, and the bravo Srinjnya warriors with their chariots, elephants and horses, much caraged, Loes Yudhishthir as if fallen in the jaws of Deati Powerful Dhornraj Yudhishthir lon, followed by his two brothers Nalul and Sabadov faced the gatext anher Blusho tlio bet of inca. Then the Panadyas hid Blita with thousands of arrows as clouds hide thesan. Bhialın luo uon Geograd checked with liis anos those thousands of well discharged ones In the same inanner, the arrowx discharged by Bhishıon looked "in the *ly like the Nights of birds and hid Yudhishichir and his arron's' in a'!

(४७३५) मोम्मपर्व Bhishma Pary [4785] युधिष्ठिरो राजा कौरव्यस्थ महात्मन । नाराचं प्रेषयामास क्रुद्ध आशीविषोपमम् ॥९॥ असंप्राप्तं ततस्तन्तु क्षुरप्रेण महारय । चिच्छेद समरे राजन् भीष्मस्तस्य धनुश्च्युतम् ॥ १० ॥ तन्तुच्छित्वा रणे भीप्मो नाराचंकालसम्मितम् । निजध्ने कौरवेन्द्रस्यहयान् काञ्चनभूषणान् । ११ ॥ हतासन्तु रयं त्यक्त्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः। आरुराहरयंत्रण नकुलस्पमहात्मनः ॥ १२यमावपि हि संकुखः समासाद्य रणे तदा। शरै सछादया मास भीष्मः परपुररुजयः ॥ १३॥ तो तु हवा महाराज भीनवाणप्रपीडिती । जगाम परमां चिन्तां भीष्मस्य यधकांक्षया ॥ १४॥ ततो युधिष्ठिरो घश्यान् रावस्तीन् सम चोदयत् । भीष्मं शान्तन' सर्वे निहनेतिसुहृद्गणान् ॥ १५ ॥ ततस्ते पार्थिवा सर्वे सुरवा पायंस्प भाषितम् । महता रयवंशेन परि धनुः पितामहम् ॥ १६ ॥ स समन्तात परिवृतः पितादेव घ्रतस्तव चिकीड धनुषा राजन पातयानो महारान् ॥ १७ ॥ तं युधिष्ठिर ने महा क्रोधित होकर सर्प के समान नाराच भाप्मनी के ऊपर फेंके फिर वहां महारथी भीष्मीनें अपने क्षुमनाम बाण से उसके छोड़े हुए वाणों को वीही में काटा । १० । उसकोल समाना नाचिको काटकर भीष्मजी ने सुवर्ण भूपित युधिष्ठिर के घोहों को मारा, फिर युधिष्ठिर उप्त मृतक घोड़ों के स्थको त्याग कर शीघ्रही महात्मा नकुल के रयपर सवार हुआ, फिर शत्रुपर के विजयी भीम ने क्रोध युक्त दोनों नकुल सहदेव कोभी बाणों से प्राच्छादित कर दिया, फिर राजा युधिष्ठिर भीष्म के वाणों से अत्यन्त पीड़ित उनदोनों भाइयों को देखकर भीष्मजी के मारने की इच्छा से बड़े चिन्ता युक्त हुए। इस के पीछे युधिष्ठिर ने उन अपने प्राशावर्ती राजाओं को और मित्र समूहों को सावधान किया और कहा कि इस युद्ध में भीमनी को मारो !१५। फिर सब राजाओंने युधिष्टिर के वचन को सुनकर बड़े रय समूहों समेत पितामह को घेर लिया हे राना चारों ओर से घिरे हुये आपके पिता देवव्रत भीष्म घाणों-से महारथियों को गिराते हुए धनुपक्रड़ा करनेवाले Yudhishthir in a rage discharged his sharp arrows like serpents at Bhishm, but the latter cut them down in the way with his sharp arrows. 10 And having cut down that fatal orrow Bhishnu killed the gold 'bedecked horses. Leaving the chariot of which the horses were dead, Yudhishthir at once mounted that of Nakul. Then Bhishm the conquerer of enemies, in the excess of anger, hid both Nakul and Sahadey with his nrrows. Secimg both hus brothers much wounded with the arrots of Bhishi, Yudhisbthir was plonged in thought, wishing to destroy him. Then he'roused the princes and alliez who obeyed lus orders and told them to slay Bhishm. By Yudhishthir's orders all the kings surrounded the grandfather with tbeir chariots on all sides, Sarronnded on all sides, your father Devabrat played with kis bow, destroying the warriors with his arrowe Roaming in the field of battle the Pandavas lookett. moment. ।

+ [4736] Nahalliart (४७३६) चरन्त रणे पार्था ददृशु कौरव युधि । मृगमध्य प्रविश्येव यथा सिंहशिशु वने ॥४॥ तजयान रणे शूरास्त्रासयानन्च सायकै । श्वा सुमहाराज सिंह मृगगणाइव १९॥ रणे भारतसिंहस्य दहशु क्षत्रियागतिम् । अग्नर्वायुसहायस्य यथाकक्ष दिधक्षत ॥२०॥ शिरासि रथिना भीष्म पातयामास सयुगे तालेभ्य परिपक्वानि फलालि कुशलो नर ॥२॥ पतद्भिश्च महाराज शिरोमिधरणीतले । बभूव तुमुलः शब्द पततामझम नामिव । २२ ॥ तस्मिन् सुनुमुले युद्ध वर्तमाने भयानके सर्वेषामेव सैन्यानामामी द्वयतिकरो महान् ॥ २३ ॥ मिन्नेषु तेषु न्यूहेयु क्षत्रियाइतरतरम्। एकमेक समाइय युद्धायैवायतस्थिरे ॥ २४ ॥ शिखण्डीतु समासाद्य भरताना पितामहम: अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥२५। अनाहत्य ततो भीष्मस्त शिखण्डिनमाहवे प्रिययौ सञ्जयान् क्रुद्ध स्त्रीत्व चिन्त्य, शिखण्डिन ॥ २६ ॥ जयास्तु ततो हटवाइटमीष्म होगये, संग्राम भूमि में घूमते हुए भी मनी को पांडवों ने ऐसा देखा जैसे कि बड़े वन के मध्यमृगों में प्रवेश करके सिंह यमता है, फिर युद्ध में शूरों को घडकते और वाणों से उड़ाते हुए भीष्म को देखकर सब पाडवी सेना ऐसी-भयभीतहुई जैसे कि सिंह को दखकर मृगों- के येथ कपित होते है, उस समय सब , क्षत्रियों ने भीष्मजी की गतिको उस युद्धभूमि में ऐसा देखा, मानों वायुका सखा, अग्नि सूखेवन को जलारहा है, वहा भीष्म ने रथियों के,शिरों को,ऐम गिराया, जैसे कि, बुद्धिमान मनुष्य ताल वृक्षके पक्के फलों को गिराताहै, हे राजा पृथीपर-गिरते हुए शिरों के ऐसे बड़े कठिन शब्द हुए जैसे कि गिरतेहुए. पत्थरों के शब्द होते है, उसमहा भयानक घोर युद्धके होनेपर सबनेना में बड़ा खेदउत्पन्न हुआ, फिर- उनन्यहाँके टूटने पर क्षत्री लोग परस्पर में एकएक को बुलाकर युद्ध के मिमित्त सम्मुख नियत हुए, फिर शिखण्डी भरतवशियों के पितामहको पाकर बडे, वेग से तिष्ठ वचनों कहता हुमा सम्मुख दौडा इसके पीछे भीष्मनी उस शिखण्डी को तिरस्कार on Bhish, like a lion roaming in a large to est in the niidst of a flock of deer Then duunting the war 10r3 in battle and killmg them with he arrows Bh ishim was the terror of the Panday armies as a lion 19 of a flock, of deer All the kshatryas looked upon his prosess in tho field of battlo as if he were Agm tle fuend of wind burning a dry lle filled the heads of mon as a shilful in ia falls down the ripe fruits of a palm tiro The heads of warriors fell down within crash like that of falling stones All the varriors more much disturba cd 10 mind by the fury of tho attrch, Then on the breaking through of the arrays, the warriors challenged one another and fought quels Then meeting the grandfather of the Bhants, Shikhandi hastened towards him with a cy of 'stay, stay. Bat distegarding him on accounts of lus furmer touranhaod, Bhislım turned towards the forest 20 (४७३७) भीष्मपर्य Bhishma Puy [ 47371 महारणे । सिंहनादारच विविधाचा शखविमिश्रितान् ॥ २७ ॥ तत प्रवरते युद्ध व्यतिपत्त रथद्विपम् । पश्चिमा दिशमासाद्य स्थिते सवितरिप्रभो ॥ २८॥ पृष्ट्युम्नाथ पाञ्चाल्य सात्यकिश्च महारय । पीडयन्ता भूश मैन्य शक्तिोमरवृष्टिमि ॥ २९ ।। शस्त्रश्च बहुभीराजन् जघ्नतुस्तारकाचरणे ! ते हन्यमाना समरे तारका भरतर्षम ॥३०॥ आर्यो युद्ध मतिं कृत्वा न त्यजन्ति स्मसंयुगम् । यथोत्साहतु समरे निजघ्नु स्तावकारणे ॥ ३१॥ तमाकन्दो महानासीत्तावकानां महात्मनाम् । उध्यतां समरे राजन पार्षतेन महात्मना ।। ३२ ॥ तश्रुत्वा निनद घोर तावकाना महारथी । विन्दानु विन्दावाचन्त्यो पात प्रत्युपस्थिती ॥ ३३ ॥ तीतस्य तुरगान हत्वा त्यरमाणी महारथी छादयामासतुरुभी शरवण पार्वतम् ॥ ३ ॥ अवालुत्याथ पाञ्चाल्यो रयातर्ण महारल । भाररोह रथ तृणे सात्यकस्त महात्मन ॥ ३० ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा करके उसके वोपने को विचारते हुए मृजयों के सम्मुख गये फिर प्रसन्न चित्त सृजय लोगों ने महारथी भीष्म को देखकर शखके शब्दोममेत बडे मिहनादको किया ।२७ तदनन्तर भीष्मती दिशामें नियत होकर सूर्य के वर्तमान होनेपर रय हार्थियों समेत युद्ध जारीहुआ हे राजा फिर वरछी तोमरों की वर्षा से सेनाको अत्यन्त पीदित करते हुए पांचालदेशी घृष्टयुम्न और महारथीं सात्यकी ने, अनेक प्रकारके धामि आपके शरवारों को घायल किया परन्नुआपके उनपायल शरोंने बड़ी बुद्धिमानी से युद्धभूमिको नहीं त्यागा और वडे उत्साहसे लोगोंको मारा ।३१। हे राजा वहां महात्मा धृष्टद्युम्नके हायमे पायलहुए आपके पुत्रों के बडे गहुए, फिर आपके पुत्रों के घोर शब्दों को मुनकर महारथी विन्द अनुविद ओर अवन्ति देश के राजा लोग समिलकर धृष्टद्युम्न के सम्मुख हुए, फिर उन शीघ्रता युक्तोनों महारथियों ने उमके पोडों मारकर वाणों की वर्षा से घृष्टयुम्न को ढकटिया, तब विन धृष्टद्युम्न शीवही रथसे कूदकर बडे महात्मासात्यकी के रयपर चढगया। फिर बडी Sunjaya ho seeing the grandfather so their puidst, cheerfully bler their conchs and ut cred war cries 27 A ficrco battle cosuéd when the sun was on the opposite side (Vest) Wounding the warriors with spears and tomars Dhrishtadyumn of Panchal and brire Sat. yal 1 discharged arrots at them, but your surriors 10 spite of wounds frisely remained firm on the field of battle and returned their bloms with great courage Wounded by the arrows of Dhrishtadyu mna your sons uttered loud ciles Vind and Anu rind the princes of Aranti lua ing tlo u loud c les lzestened to encounter Diirishla dyumn Those two brile 13 soon killed his horses and bid inim with the slower of their hrOSS. The great warrioi Dhrshtadyumn at once jumpal down from lus chariot and mounted that of Satyall Thereupon Vudlıslıthir with a lur-t a my rushed on to encounter the 31 [ 4738 ] Mahabliarat (४७३८) महत्या सेनया घृतः । आवन्त्यो समरे क्रुद्धावभ्ययात् स परन्तपो । ३६ ॥ तथैवतय पुत्रोपि सर्वोद्योगेन मारिव । वि दानुविन्दो समरे परिवार्यावतस्थिवान् ॥ ३७ ।। अर्जुनश्चापि संक्रुद्ध क्षत्रियान क्षत्रियर्षभ. । अयोधयत संग्रामे वज्रपाणिरिवासुरान् ॥ ३८ ॥ द्रोणस्तु समरे क्रुद्ध पुत्रस्य प्रियकृत्तव व्यधमत् सर्यपाञ्चालास्तूलराशिमि वानलः ॥ ३९ ॥ दुर्योधनपुरोगास्तु पुत्रास्तव विशाम्पते । परिवार्य रणे भीमं युयुधु. पाण्डवैः सह ॥ ४० ॥ ततो दुर्योधनो राजा लोहितायति भास्करे । अप्रवीत् तावकान् सर्वास्त्वरध्वामिति भारत ॥४१ ।। युध्यतान्तु तथा तेषा कुर्वता फर्म दुष्करम् । अस्तं गिरिमथारूढे अप्रकाशति भास्कर ॥ ४२ ॥ मावर्तत नदी धारा शोणितीयतर- भिणी । गोमायुगणसङ्कीर्णा क्षणेन अणदामुखे ॥ ४३ ॥ शिवाभिरशिवाभिश्च रुधाद्भिर भैरवरवम् । घोरमायोधनं जज्ञे भूतसंधै समाकुलम् ॥ ४४ ॥ राक्षसाच पिशाचाच तधान्ये पिशिताशिनः । समन्ततो व्यदृश्यन्त शतशोथ सहस्रश. ॥ ४५ ॥ अर्जुनोथ सेना समेत राजा युधिष्ठिर उन क्रोधयुक्त अवन्ति देशके राजाओं की ओर दौड़ा, और इसीप्रकार आपका पुत्रभी विन्द और अनुविन्द को रक्षित करके नियत हुआ ॥३॥ हे क्षत्रियोत्तम धृतराष्ट्र युद्धमे अर्जुन ने भी अत्यन्त कोपयुक्त होकर क्षत्रियों से ऐसा युद्ध किया जैसे कि असुरों से वजधारी इन्द्र ने कियाथा, फिर यद्ध में क्रुद्ध आपके पुत्रों के शुभाचन्तक द्रोणाचार्यने सवपांचाल देशिगो को ऐसे नष्ट किया जैसे कि तृलराशिको अग्नि भम्म करदेता है, फिर आप के दुर्योधनादि पुत्र भीमजी को क्षित करके पांडवोंसे युद्ध करने लगे।४। इस के पीछे मूर्य के अरुण होने पर राजा दुग्योधन आपके सब शूरवीरों से बोला कि शीघ्रता करो, फिर इसी प्रकार इनके लइते और कठिन कर्म करते हुए मूर्यके अस्संगत होने पर रात्रि के प्रारंभमें भयानक रुधिरको नदीवही जिसमें हजारों शमाल वर्तमानथे और भूत समूहों से व्याप्त सग्राम भूमि चारोंओर को घूमते हुए अशुभ श्रृंगालो से prince of Avantı, ule your sons stood firmly to pratect them Arjun too much emageu, fougit against those walilors, O king, as Indra the wielder of vajra had fought against the Daltyas Dronachary. the well wisher of your -ons anguly smote the Panchals as fire consumes heap of stravy Your sons, Duryodhan and others, fought against the Paadavas for the protection of Bhishim. After this, when tlıe sun hird assunel a reddish hue, Prince Duryodhan oidered your Warriors to make histo The battle continued, till at the close of the dny thicra flowed a river of blood rhero thousands of jachals were to 7 lie field of battle sticu n over with dead bodies and the Tandering of the oi nous juckals 1193 ver y (Treadful to behold Thou sands of rahaliases, prsljarlies aileniyo! QUY lroings were to be seen on all sila lavin delat d thu ainults of Sushumn and othon L 10 Lo seen (४७३१) ani Bhishma l'ary [4739] मुशर्मादीन् रामम्नान सपदानुगान् । विजित्य पृतनामध्ये या शिबिरं प्रति ॥१६॥ युधिष्ठिरोपि कारयो भ्रातृ भगांसहितस्तया । यास्पशिविरं राजा निशायां मनया वृतः ॥ ४७ ॥ भोमस नोपिं राजेन्द्र दुर्योधनमुपानरयान् । अपजित्य तत महये ययोवशिविरम्प्रति ॥ ४८ ॥ दुर्योधनोपि नुपति. परिवार्य महारग । भीमंशान्तनवं तणे प्रयान शिविरं प्रति ॥ ४२ ॥ द्रोगो द्रोणि कृप शल्य पृतवर्मा च सात्वत, । परिमार्य चम सपा प्रतयुः शिविरं प्रति ॥ ५० ॥ तर सात्यकी राजन् धृष्टद्युम्नश्च पार्यत । परिवार्यरणे योधान्ययाः शिविरं प्रति ॥५' ॥ एवनेते महाराज तायका पारडंब. सह । पर्यन्त संहिता निशाकाले परन्तप । ५२ ।। तत स्वशिविर गत्वा पाण्डका कुरबन्तया । न्यरसन्न महाराज पूज पन्त परस्परम् ॥५३ । रक्षांकृत्वा तत शून्यस्यानान् यथाविधेि । अपनीय च शाल्पानिम्नात्वा च विविधजले. ॥५३॥ कृतस्वस्त्ययना सर्वे संस्त्यंतच वन्दिाभ । गीतवादिशब्देन व्यकीडन्त महामयानक होगई और हजारों राक्षम पिशाच और अनेक मांसाहारी जीवभी चारों ओर के दृष्टपड़े इसके पीछे अनुर भी शर्मा आदि रामानों को उन के माधियों ममेम विनय कर के सेना में जाकर अपने डेरों को गये फिर युधिष्ठिर भी मेना समेत भाइयों को सायलिये गत्रि के समय अपने डेरेको गये, और भीममेन भी दुर्योधनादि महारथी राजाओं को विजय करके अपने डेरोंको गये, दुर्योधन भी भागनीको मध्यमें करके डोकोगया, और द्रोण च र्य कृपाचार्य अश्यत्यामा शल्य कृतवर्मा यादव यह सवसेनाको मध्म में करकेडेरोंको गये ।५० । इसीप्रकार मात्यकी और धृष्टयुम्न वारों को मयनकरकं डेरों को गये हेगहाराज इमरीतिसे यह शत्रु मन्तापी अके सवशावार रात्रि के समान पाण्डवोसाइतलाटे, हेरामा इमरीति से पांडव और कौरव परस्पर प्रशमा करते अपने २ डेगे में स्थितहुए, वह सब वीर अपनी रक्षारकरके और गुल्मनाम सेनाको बुद्धिके अनुसार देखकर और भालों समेन सफाई से स्नानकर ब्राह्मणों से भाशीर्वादमांग वंदीजनोंमेमशीसतहो गतिवाद्यों princes, Aljur returned to his own army and from there to lie canup. Yudhislıthir with his brothers and armies wout to camp for the night, Bhiisen tuo, haring conqured Duryodhan and other aghty princes went to camp Durjohan nith Bliisum in the middle went to camp. Drovacharya, Kupacharya, Aslı wathama, Shalya and Kritvarma tle yadav went to camp with their armies Satsiki and Murisitadyumn, having killed mizy wariiors went to camp Thus O hing, your foc skriking arriors and the Pandavas returned with the night and stayed in their camps passing one another. All thosc narriois having ſortified then camps and examined the armies, Tablied their weapons and their bodies and with benedictions of Bralı mans and the prasies of birds, joined in recrea 108. The recreation [4740] Mfahabhart (४७४० यशस्विन ॥ ५५ ।। मुहर्तादिव तत्सर्व मभवत् सर्गसन्निभम् । न हि युद्धकथाकाचि तत्रा फुर्यन् महारथा ॥ ५६ ॥ ते प्रसुप्ते चले तत्र परिश्रान्तजने नृप । हस्त्यश्ववहुले रात्री प्रेक्षणीये वभूयतु ॥ ५७ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सप्तमदिवस युद्धावहारे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७॥ माय उवाच । परिणाम्य निशान्तान्तु सुसप्राप्ता जनेश्वरा । कुरव पाण्डवाश्रय पुनर्युचाय निर्ययु ॥ १ ॥ तत शब्दो महानासीत् संन्ययोरुभयोर्नृप । निर्गच्छमानयो सख्य सागरप्रतिमो महान् ॥ २ ॥ ततो दुर्योधनो राजाचित्रसेनो विविंशति । भीष्मश्च रथिनां श्रेष्ठो भारद्वाजश्र ये नृप ॥ ३ ॥ एकीभूता सुसयत्ता फौरयाणा महाचम्म् । व्यूहायविदधूराजन् पाण्डवान् प्रति दशिता ॥ ४ ।। भीष्म कृत्वा महा-यूह पितातय पिशाम्पते । सागरमतिम घोर पाहनोर्मतरङ्गिणम् ॥ ५ ॥ अग्रत सर्वसैन्यानां भीष्म ममेत मानन्द से क्रीडा करनेलगै फिर एक मुहूर्तमेंही वह सब क्रीड़ास्थान स्वर्ग के | तुल्यहो गया वहा किमी महारथीने भी युद्धकी कथाका वर्णन नही किया फिर वह दोनोमेनामों के बार हाथी घोडों समेत वडे प्रानन्दपूर्वक सोयें ।। ५७ ।। अभ्याय ८८॥ समय बोले कि सुख पूर्वक सोये हुए कौरव और पांडवों समेत राजा लोग रानिको व्यतीत करके फिर युद्ध के निमित्त गये, और संग्राम भूमि में जाने वाले पीरों के बड़े २ शब्द समुद्र के समान हुए, तब राजा दुर्योधन चित्रसेन विविंशति भीष्मनी द्रोणाचार्य प्राह्मण इनना बड मावधान और एक मन कौरवोंके महारथीं काच शस्त्र धारियों ने पांडवों के सम्मु । ब्यूहों को अलंकृत किया फिर शतनु के पुत्र आपके पितामह भी मनो मागर के समान भयानक समारी रूपी लहरों से लहरातेहुए महाव्यूहको शोभित करके । । । मास देशी दक्षिण देशी और अवन्ति ground was lilo t'ie punelis 1111 in mnt There no mention of war rag rundo by any 11?r101 Then the namuors of this tiu rucs and their lacnets slupt soun lls for the mult 17 (HAPILR IIIXIII Sonjaya contmucl. Having sotndly slept for the mght, the prunes "ith the laurtin4 and tho Panelsng went again for battle The war of the warrior going to Inttle na lile that of time ootu Tlieu Princo Duryoullion Clutras o, Vuelinti. Bluelun and Dronn clintsa the Brlının all the c hnt as #jura, wid, anne and will uit. Armed with my** * 001 nrmetir atrans their arınıcs in front of the Pandni 13 Then Shantanu'd fou, your grandfather Bhshun, morns lile th: sura of th fan in Jus carring', unbellished (४७४१) भीष्मपर्व Bhishm Pary [4741] शान्तनवा ययौ । मालवर्दाक्षिणात्य भावन्त्यश्च, मन्वित ॥ ६ नतीनन्तरमेयासी भारद्वाज प्रतापवान् । कुलिन्दः पारदैश्चैव तथा क्षुद्रकमालवै. ॥ ७॥ द्रोणादनन्तरं यत्तो भगदत्तः प्रतापवान् । मगधश्च कलिगश्च पिशाचैश्च विशाम्पत ॥ ८ ॥ प्रागल्या तिपादनुप. कौसल्योधवृहद्वलः । मेपाले कुरु विदेश्च पुरवममन्वित ॥९॥ वृहदला तित शूरस्निगर्न प्रस्थलाधिपः । काम्बोजबहुभि साई यवनश्च सहस्रशः ॥ १० ॥ द्राणि स्तुरमसः शूरसंग दनुभारत । प्रययो सिंहनादेन नादयानो धरातलम् ॥ ११ ॥ तथा सर्वेण सैन्येन राजा दुर्योधनस्तदा । द्रोणरनन्तरं प्रायात सौदर्य परिवारितः ॥ १२ ॥ दुर्योधनादनु तत कपः शारद्वतो ययौ । एवमेष महाव्यूह प्रययौ सागरोपमः ॥१३॥ रेजुस्तत्र पताकाष श्वेतछत्राणि वा विभो । अङ्गदान्यत्र चित्राणि महाहाणि धनूपिच' ॥ १४ ॥ तंतु दृष्ट्वा महान्यूहं तावफाना 'महारथः । युधिष्ठिरोनीपूर्ण पार्पत पृतनाप देशियों से संयुक्त सब सेनाओं के अग्रगामी होकर चले इसके पाछे प्रतापवान् द्रोणाचार्यजी पुलिंदपारद तुद्रक और मालवीलोगोंके साथहए हेरामा फिर प्रतापी सावधान राजा भगदत्त मागध कलिंग और पिशाचोसमेत द्रोणाचार्य के पाछे हुआ और राजा हवल कौशल्य मेकल त्रैपुर और चिबुकर्को समेत प्राग्ज्योतिष के राजा भगदत्तके पीछे चला उसकेपीछे त्रिगत देशी महाशर पराक्रमी राजा प्रस्थळ बहुतसे काम्बोजों से युक्त होकर नियतहुआ।१०। इसके पीछे महावेगवान् शूरवीर अश्वत्यामा त्रिगर्त देशियों के पीछे अपने सिंहनाद मे पृथ्वीको शब्दायमान करताहुआ चला इमी प्रकार से इसके पीछे राजा दुर्योधन सब भाइयों समेन सब मेना के साथ अश्वत्थामा के पाछे चला इसके पीछे शारंद्रत कृपाचार्य जी दुर्योधन के पीछे चले इमराीते से सागर के सपानं वह बड़ाव्यूह चला, उस व्यूहकी पताका श्वेत छन जड़ाऊ वाजूवन्दतोमर धनुपों समेत महा शोभायमान हुई, फिर महारथी युधि- धिर आपके बेटों के उस बड़े ब्यूहको देखकर बहुत जल्दी से अपने सेनापति the gicat array The people of Nilar, South ccuntiy, Avanti and other pluces moved so with their Lailers. Then glorious Dronacharya. together with the Pulhnds, Parads, Kshudraks and malavis, joined the array. Glorious and watchful’king Bhagdatla with Magadhas, Kalings and Pishnchas, brought up the rear of Dronacharya, and Prince Vrihadval with the -Kaushalyas, Melals, Traipuras and Chibuks, followed Bhagdatta the hing of Pragjyotish Then the brave warriors of Trigart and thoir king Prasthal stationed themselves with numberless Cambojes. Ashwathiama of great glory and valóur, 'sta. troned lismself beluind the arriors of Trigart and rent 'on ringing Prince Duryodhan with his brothers and Warriors followed Aslın athama Sharad wat Kripacharya followed Duryodban Thus lile nn Ocean that huge array moved on. The arrny was decked svith banners, white shades, jewelled armlets, tothe earth with his cries वर्तमान हुआ [47421 Mahal hairnt " (४७२२) तिम् ॥ १५ ॥ पश्य व्यहं महेन्यास निर्मितं सागरोपमम् । प्रतिव्यूहन्त्वमपि हि कुरु पार्वतसत्वरम्॥ १६ ॥ ततः स पार्षत ऋरो व्यूहञ्चके सुदारुणम् । शृङ्गाटकंमहा राज परव्यूहविनाशनम् ॥ १७ ॥ शृङ्गाभ्यां भीमसेनश्च सात्यकिश्च महारथ । रथेने कमारस्तथा हयपदातिभिः ॥ १८॥ ताभ्यांवभौनरश्रेष्ठ श्वेताश्व कृष्णासारथि । मध्ये युधिष्ठिरो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डया ॥ १९ ॥ अथोत्तरे महेप्यासा सहसै न्यानराधिपा । व्यूह तं पूरयामामुम्यूहशास्त्रविशारदा ॥ २० ॥ अभिमन्युस्तत पश्चा- द्विराटश्च महारथः। द्रौपदेयाश्च संहृष्टा राक्षसरच घंटोत्कचः॥ २१ ॥ एवमेतन्म हा यह न्यूयभारत पाण्डया । तिष्ठन् समरे शूरा योद्धुकामा जयैषिणः॥ २२ ॥ भेरीशन्देश्चयिमलैर्विमित्रै. शनि स्वनैः । श्वेडितास्फोटितोत्कुष्टादिताः सर्वतो दिश ॥२३॥ तत शरा. समासाद्य समरे ते परस्परम् । नेत्रेनिमिपैराजभवक्षन्त पर धृष्टद्युम्नसे बोला ।१५। कि हे बड़े धनुपधारी, धृष्टयुम्न इम समुद्र के समान रचे हुए व्यूहको देखो और तुमभी उसके समान शीघ्रही हमारे ब्यूहको अलंकृत करो, इस के पाछे उत्तर धृष्टद्युम्न ने बड़े भयानक शत्रुओं के व्यूह के नाश करने व ले श्रृंगाटक नाम व्यूहको बड़ी उत्तमता से बनाया, उस ब्यूहमें महारथी-भीममेन और सात्यकी तो हजारों हाथी घोड़े रथ पदातियों समेत शिखररूप हुए, और | नरोत्तम श्वेत घोड़े वाला श्रीकृष्णको स रथी रखनेवाला अर्जुन नाभि के ऊपर और मध्य में राजा युधिष्ठिर और नकुल सहदेव दोनों भाईहुए, इसी प्रकार व्यूहशाख में कुशल बुद्धि बड़े धनुपधारी अन्य मारथियों ने सेना समेत उस व्यूहको पूर्ण किया।२०। और महारथी अभिमन्यु विराट् द्रौपदी के पुत्र और घटोत्कच राक्षस उसके पाछे हुए, हे राजा इमरीति से वह व्यूह्वीर पांडव अपने व्यूहको रचकर युद्धाभिलापी विजय के चाहने वाले संग्राम भूमि में आकर नियतहुए, शंखधान से युक्त भेरियों के कठोर शब्द वा सिंहनाद और mars and boss Jiglity Yudhuislıtlur, secing the grest array of your Rons, thus nddressel Dlırshtarlyumn the commander of lus armies - "alighty archer Dhrishtadyumnn, look at this ocean like array and form your own nnay like this 'The cupon blare Dharishtalye.. mn mulu ca-ofully the nrray huwa ns Sliringliatak the destroyer of the hosts of enetley In thint nrry mighty Bliinisen aud Sats ali, with thousands of elephants, logus, clinriuts and tout soldiers, for mol the horn the bestof min, Inding the whit lhos303 anl having Shree Krislın for the driver, Arjun suutional bunsolf at tho navel In thic midille waruling Yudhi-litlust aud the tso biotheis Mahul and Snides, and other Warriors shilful in furmin; arays anl great archion and warrior withi Bhim-en fillal up the stay Vallhant Abimanyu, Vinit, the song of Dinusudi and Clintothach the rinkslims followel him. Thus, o king the Pandavay, bravo in mar, lasing formini the array with a desin. to win, stational tlıçm-olm - (४७४३) भीमपर्य Bhishma Parv [+7133. स्परम् ॥ २४ ॥ नामभिस्ते मनुष्येन्द्र पूर्व योधाः परस्परम् । युद्धाय ममयन्ति समाइयेतरतरम् ॥ ॥ तत. प्रयवृते युद्ध घोररूपं भयावहम् । नायकानां परेशा निघ्ननामितरतरम् ॥ २६ ॥ नाराचा निशिता संख्ये सम्पतन्तिस्मभारत । व्यात्ताननामयकरा उरगा इच संघश ॥ २७ ॥ निष्पेनुर्विमला. शक्यस्तैलधौता मुते जनाः । अम्युर्दभ्यो यथा राजन् भ्राजमानाः शतहदाः ॥ २८ ॥ गदाश्च विमले' पट्टः पिनद्धा. स्वर्णभूषितः । पतन्त्यस्तत्र दृश्यन्ते गिरिशृगोपमाः शुभा ॥ २९ ॥ निरिंग शाश्च व्यदृश्यन्त विमलाम्बरसन्निभाः। आर्षभाणि विचित्राणि शतचन्द्राणि भारत ॥३०॥ अशोभन्त रणे राजन् पात्यमानानि सर्वश । वन्योन्यं समरे सेने युध्यमाने नराधिप ॥३१॥ अशोभेतां यया देव दैत्यसेनेसमुद्यते । अभ्यद्रवन्त समरे तेऽन्योन्यं घे समन्ततः ॥ ३२ ॥ रथास्तु रथिमिस्तूर्ण प्रपिताः परमाहये । युगयुगानि संलिप्य भुजाओं के शब्दों मे शब्दायमान सब दिशायें अत्यन्त भयानक विदित हुई इस के पीछे उन शूरवीरों ने परस्पर सम्मुख होकर एकने एकको टकटके नेत्रों से देसा हे राजा वह शूरवीर पूर्वनामों के द्वारा परस्पर में बुला बुलाकर युद्ध के निमित्त वर्तमान हुए, इसके अनन्तर परस्पर मारने वाले आपके पुत्र और पांडवी सेना का महा घोर और भयानक रूप युद्ध जारी हुआ, हे भरतर्षभ उस युद्ध में बड़ेतीक्ष्ण नारा! को ऐसी वर्पहुई जैसे कि महाभयानक दंशकग्नेवाले सर्प चारों ओरसे गिरते होगे, और तेलप्ते शुद्ध तीक्ष्णवरछियांभी चारों ओरमे ऐसी गिरी जैसे कि वादलों से प्रकाशमान बिजली गिरता है और रेशमी वस्त्रों से पहुए सुवर्णभेगटितपर्वत के शिखर के समान बडी २ गदा और निर्मल आकाग के समान खड्ग और सूर्य चंद्रमाओं से चिह्नित उत्तम ढालें यह सब गिरती हुई वडी शोभायमान हुई हे राजा वह खंडग ढाले पृथ्वीपर गिरीहुई सब ओर से शोभायमान हुई फिर वह परस्पर पद करनेवाली दोनों सेना ऐमी शोभित हुई in the field of battle. The harsh peals of trumpets vived with thio Blasts trous conclus, wer eries and relamg of arms, made a dreadfal noiso in the field of battle. Then the warriors facing one anotlier gazed at tlicir adversaries. And those warriors, Ohing, callcd one another by their vaimes and challenged to fight. Then the bittle botucou your sons and the Pundavas, killing one another, was very Sovere and awful. The shower of sharp arrows in the battle trag vey sovero and awful. Tlio shower oi' sharp AITOws in the battio was liko tlie fall of vonomous serpents biting dreidfully, Rubbed over with oil the sliarp spears fell down from all sides like lightning flashes detached from clouds. Sheathed in silk cloth, hage, gold bedecked maces lihe mountain paks, the spord: like the car shy and the laczo shields bearing suns and moons, loohed very glorious in their fall. The swords and shields fallen ou the ground, O khng, rera shing on all sides... Then the two fighting armies lovhed glorious - FT 14714] Maliallarat (४७५४) युयुधु पार्थिवर्षमा ॥ ३३ ॥ दन्तिना युध्यमानानां सघर्षात् पावकोऽभवत् । दन्तेषु भरतथष्ठ सधूम सर्वतादिशम् ॥ ३४ ॥ प्रासरभिहता फेचिद्जयोधा समन्तत । पतमाना स्म दृश्यन्ते गिरिगृगानगा इव । ३५॥ पादाताधाप्यदृश्यन्त निम्नन्तोऽथ, परस्परम् । चित्ररूपधरा शूरा नखरमासयोधिन । ३६ ॥ अन्योन्यन्ते समासाध छुरूपाण्डवसनिका । अस्त्रैर्नानाविधैोरे रण निन्युर्यमक्षयम् ॥ ३५ ॥ तत शान्तनधा भीमो रथयोण नादयन् । अध्यागमद्रण पार्थान् धनु शब्देन मोहयन् ॥ ३८ ॥ पाण्डवाना रथाधापि- नदन्ता भैरव स्सनम् अभ्यद्रधन्त सयत्ता धृप्रधुम्न पुरागमा ॥ ३० ॥ तन प्रबहते युद्ध तर तेपाञ्च भारत । नराश्यरथनागानां त्यतिपक्त परस्परम् ॥ ४० ॥ इति महा-भीमपर्वाण भीष्मयधपीण अटमदिवसयुद्धारम्भे अष्टाशीतोऽध्याय ॥८॥ जैसे कि देव दानवों की सेनाहोती है उस समय एकएकके मम्मुख दौड़े, रसी रथियों के साथ बहुत जल्दी से भेगे गये और उत्तम राना लोग ग्यके जुओं को जुओं मे मिलाकर युद्ध कालो, हे राना सवओर लडतेहुए हाथियोंकी, गसावर से दातों के ऊपर मधुम अग्नि उत्पन्न होगये कोई हाथी के सवार हो जगी फरमों | से घायल हुए सब अरसे गिरते हुए ऐसे दृष्टपडे जैसे कि पर्वतके शिखर से राज गिरतेहै और विचित्र रूपधारी शूर वार नख और फरसों से युद्ध करनेवाले पदाती पाम्पर में मारते हुए हा पडे, फिर उन कौरव और पाएडयों को सेनाके मनुष्यों ने परस्पर सम्मुख होकर युद्ध में नाना प्रकारके वाणों से एकने दमरे को यमपुर को भेजा और रथ वा धनुप के शब्दों से गर्जना करते हुए भीम जी पागडवों के सम्मुस गये, और पाडवों के,भी सावधान रथी धृष्टद्युम्न को आगे किये हुये बडे भयानक घोर शब्दों को करते हुए कौरवों के सम्मुख दोडे, इसके पीछे आपके शूर वीरोंक और पण्डवोंके वीरोंका युद्ध जारी हुआ और मनुष्य हाथी घोडे और रयोंका परम्पर मेल न हुआ ४० ॥ libo tlo nri Ls of gods and danivas Soldiors rushed a ruinst one 2nothe The curigo ru 1ushes agua tong another and yol t. to joko th y fou, nt lined 1 110 nnd smolu apparol on the tusls of fighting el planta Sma riders founded by Inttle Ares were seen filling liers nad thero lhe trees froin nonnta 1 p nhs The foot soldiers in various colour Wuro scull fightin; ritli nails and axes and killed ono another The hauray nad Pardar armes, fucing cach other, sent the war sors to the reson of Yam with their arrows Ratsings trom nijas no with ins cuirit and buv, Butyhin fumed the Panitru, mlio lud by Dlınıslı lady a man tho skilint charioteer and utter 10g load mar (1168, rylici Ho unst the Kauravas. llien a polcro bottle ensued bulan the corrion of your sons and throto of the Pandarns and there was no order among, men lopliant, lorsc9 and chr 140 (५७४५) भीष्मपर्य Bhrshma Pary [4745 सञ्जय उवाच । भीमन्तु समरे युद्ध प्रतपन्त समन्तत । न शेक पाण्डमा दृष्टुं तपन्तमिर भास्फरम् ॥ ॥ तत सणि सैन्यानि धर्मपुनस्य, शासनात् । अभ्यद्रवन्त गांगेय मईयन्त शिशिरै ॥ २ ॥ स तु भीमो रणलाघी सोमफान सहसजयान् । पाञ्चालांच महेप्पासान् पातयामास सायक. ॥ ३ ते अध्य माना भोप्मेण पाञ्चाला सोमक सह । भीष्ममेवाभ्ययुस्तूर्णं त्यकामा मृत्युकृतं भयम् ॥ ४॥ स तेपा रधिनाम्बीरो भीम शान्तनगो युधि विच्छेद सहसायजन् चाहनय शिरास च ॥ ५॥ पिरथाद्रायनश्चक्रे पिता देवनतस्तव । पतितान्युत्तमा द्भानि इयत्योहयसादिनाम् ॥६॥ निर्मनुप्याच मातङ्गान् शयानान् पर्वतोपमान अपश्याम महाराज भीप्मास्त्रेण प्रमोहितान् ॥ ५ ॥ न तत्रासीत् पुमान फश्चित पाण्डवाना विशाम्पते । अन्यने रपिता श्रेष्ठाद्गीमसेनान् महारलात् ॥ ८ ॥.स प्रयाय ८९ ॥ संजय बोले कि पाण्डव लोग युद्धमें क्रोधित चारों ओरसे मतत करने वाले भीमजीके देखनेको भी ऐम समय नहीं हुए जैसे कि अत्यन्त प्रचंड मर्य को कोई नहीं देखतक्ता है, इसके पीछे धर्म पुत्र युधिष्ठरकी आज्ञासे पारडवों की मत्र मेना भी पनी के सम्मुस दौर्डी, फिर उमप्रतापी भीष्मने मुंजय लोगों को सोमकों समेत पीर बड़े घनुपधारी पांचालदेशियों को गायकों से आच्छादित किया हुवा माध्यमें वायल हुए सोमको समेत पांचाल देशी भयको त्यागकर शीघ्र भीमनी: के मामुख जापहुंचे, तब उस शांतनु के पुत्र वलवान् भीष्म ने उन रोधयोंकी- भुजाओंको अखों समेत काटकर रथोंसे विस्थ करदिया । फिर खड्गों मे सवारोके शिर गिगये हेमहाराग हम ने भीमनीके अस्त्रने अत्यन्त मोहित विना शिरके हाथियों को ऐमा देखा जैसे कि पिना वृक्षके पर्चत होते हैं, उप काल वहाँ यियों में प्रेत महावली भभमेन के मिवाय पाण्डवोंका कोई भी मनुष्य नियत नहीं हुआ, उस ने CHAPTER LXXIX Sanjaya continued The Pandavas were unable to loo's at Bhalım burning all round in his rage, as no one can gaze at the buight sun. Then by 1 udhistir's order the whole aliny of the Pandavas Tusbed against Bluishm, but the latter hid rith bis tots the Srio Jayas, the Somaks and the great archers of Panchah Wounded by : Bhishm the Panchals and the Somaks, setting aside all fear faced Bhism but the brave son of Shantanu cut down the arms of those charioteery berring weapons and made their cliariots useless 5 Jith te stord le b headed tho lorsuinen He sate O bing elephauts.made limbiu zasil bellese buy lus respons liko hils destitute of trees No warrior oile Landıray could remain firm there creept in guty Bhin PATErariateers He checked Bhuslim m Inttle and the dee Tas great in the encountcr bet Freen thone srai el ru cncz in great cucer 10 Then [4746] Mahabhart हि भीमं समासाद्य ताडयामास संयुगे । ततो निशानको घोरो भीमभीमसमा गमे ॥ ९ ॥ यभूव सर्वसन्यानां घोररूपो भयानकः । तथैव पाण्डवा हृष्टा सिंहनाद मथानदन् ॥ १०॥ ततो दुर्योधनो राजा सौदथे. परिवारितः । भीष्म जुगोप समरे वर्तमाने जनक्षये ।। ११॥ भीमस्तु सारथि हत्या- भीष्मस्य रथिनाम्वर. विदुताव रथे तस्तिन् द्रवमाणे समन्ततः ॥ १२ ॥ सुनाभस्य शरणाशु शिरश्चिच्छेदभारत । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन स हतो न्यपतामुवि ॥ १३ ॥ हते तस्मिन् महाराज तंव पु महा रथे। नामृप्यन्त रणे शूरा. सोदराः सप्त संयुगे ॥ १४ ॥ आदित्यकेतुर्वराशी कुण्ड धारी महोदरः । अपराजिता पण्डितको विशालाक्ष सुदुर्जय. - शण्ड चित्र 'समाहा विचित्रकवचध्वजा । अश्यद्रवन्त संग्रामे योदुकामारिमईनाः ॥ १६ ॥ महोदर्रस्तु समरे भीमं विव्याध पत्रिभिः । नघभिर्वजसफाशनमचि वृत्रहीं यथा र युदमें भीष्मीको पाकर गेक दिया फिर भीम और भीमकी सम्मुखता में सर्व सेनाओं को निप्ठानक महाघोर और भयानकहुआ और पाण्डवों ने प्रसन्नहोकर वह सिंहन द किया?.०इसके पीछे बड़ेघोर नाश के वर्तमान होनेपर अपने निज भाइयोंसमेत दुर्योधनने आकर भीष्म नीकी रक्षाकरी, फिर रथियों में श्रेष्ठ भीमसेनने भीमजी के सारथीको मारकर बड़े वेगवान घोड़ेवाले रथपर बैठकर धनुपको तान वीं शीघ्रता से अपने चरमवाण से मुनाभ के शिरको काटा वह शिरके कटतेही पृथीपर गिरपदाम हे महाराज उस महारथी आपके पुत्रके मरने पर उसके आदित्यकेतु बहाशी कुण्डधार महोदर अपराजित पांडतक, विशालाक्ष दुर्जय नाम शूरवीर सगे भाई जड़ाऊ कवच अंबादिकोंसे अलंकृत होकर उस भीयसेन के सम्मुख दो।१६उस समय महोदर ने वनके समान नौवाणों से भीमसेनको ऐमा घायल किया जैसे इन्द्रने नमुचिको कियाथा, फिर आदित्यकेतु ने सत्तर वाणों से वहवाशीने पांच वाणोसे कुण्डवार ने नौ वाणले विशालाक्ष ने सात वाणमे और महारथी, अपरा. the slaughter of the arintes was great, Duryodhan and his brothers came to Bluishun and protseted lum Plum the best of chariotoors Billed tho driver of Bhishuna's chariot and mounted on 'Iis swift chariot with his bos diawn, with much dextcrtity he behonded Sunablı bý nis sharp arrow. On the death of your brave son, hrothers Adityaketu, Bihsashi, Kund dhar, Mahodar, Aparajit, Prindital, Vishalaksh and Duijaya, nrmed with weapons and golden armour rushed against Blınmn 16 Mahodar sounded Bliim severtly will wing arrows as Indra lune pieceul Namuchi. Then Adityalitu voando, el him with crvente arios, Bahwa-hi with fire, kund änar vith ninc, Vishunkan Trill seven and bavo Aprajit with wings agzin Panditak wounde 1 hin with thice frons 20 Wounded by those Artossi mighty Blinisin tho dnfroyer of foss, ifru w liis lost with his left hand o king, his -- (४७४७) Ânagyra Blushm Parv [4747] ॥ १७ ॥ आदित्येकेतु सप्तत्या वडवाशी चापि पञ्चभि । नपत्या कुण्डधारश्च विशा लाक्षथ पचमि ॥ १८ ॥ अपराजितो महाराज पराजिष्णुमहारथम् | शरबंदुभि रानदीमसन महावलम् ॥ १९ । रणे पण्डितकनन त्रिभिर्वाणे समापयत् । स सत्र ममृदे भीम शत्रुभिर्वधमाहये ।। २० । धनु प्रपीज्य यामेन करणामिप्रकाशन । शिरश्चिच्छेद समरे शरेणानतपर्वणा ॥ २१ ॥ अपराजितस्य सुनस तव पुत्रस्य संयुगे। पराजितस्य भीमेन निपपात शिरो महीम् ।। २२ ॥ अयापरेण भटेलेन धुण्डधार महारथम् । प्राहिणान्मृत्युलोकाय सर्व लोकस्य पश्चात ॥ २३ ॥ ततः पुनरमेयात्मा. प्रसन्धाय शिलीमुखम् । मेययामास समरे पण्डित प्रति मारत २४॥ स शर पण्डित हत्वा विवेश धरणीततम् । यथा नर निहत्याशु भुजग' कालचों 'दित ॥ २५ ॥ विशालासशिरछित्वा पातयामासभूतले । निम शरैरदीनात्मा स्मरन् फ्लेश पुरातनम् ॥ २६ ॥ महोदर महेप्पास नाराचनस्तनान्तरे। विव्याध जितने अनेक वाणों से मारी भीमसेन को व्याकु र कटिया, फिर पडितकने। तीनराणमे घायल किया। इसके पीछे इन सरके वाणोंसे पीड़ित शरसंतापी महा वली भीमसेनन क्रोपयुक्त हो पायें हाथते दृढ धनुपको संचकर गुम ग्रन्थी वाले बाणों से आपके पुत्र अपराजित के शिरको काटा फिर वह गिर पृथ्वी पर। गिरी, इसके पीछे सब सेनाके देखत हुए दूसरे भल्ल मे महारथी कुण्डधारकों काला किया, हे भाभि फिर बड़े साहमी भीममेनने धनुप में शिली मुख पाणको चढ़ाका पंडितक को मारा, वह वाण पंडितकको मारकर पृथ्वी में ऐसे प्रवेश करगया जैसे कि कालका भेना नर्म मनुष्य को काटकर 'पृथ्वी में घमनातीहै ।२५। फिर पूर्ण समय के दु.खोंको स्मरण करके प्रमन्नचित्त भीपानने तीनवाण से विशालाक्ष को मारकर पृथ्वी पर गिराया, हेराना बड़े धनुषधारी | महोदर को नाराचपे छाती के ऊपर घायल किया वहभी मृतक होकर भूमिमें गिरा, फिर एक वाण से आदित्यकेतु के छव को काटकर बड़े तीक्ष्ण भल्ल से उसके। 10 great inger ind with lows lavog bidden 1 nots, belieacled your con A pai ajit The heud fell donni on the ground And within sight of the ai mies with another dort le killed Kund dhor "Then, Blimsen of great prowess, put to his box in ario u shu poned on stono and killed Pandital with it Having killed l'inditz that arion entered the gronnd as 1 sez pent sent by Death dous after b ting a man 25 Then remenboring the furarer wrongs Blumsen with three arrors killed Vishnlahsh who fell down dead on earth Then lie wounded the great archer M1) oder with an ariav on tl o bieast and lie too fell down dend un cartily, Then haying cut down the umbrella of Adityaletu with an arrow he bohended him with another dut Then Bumsen in the excess of wrath with iroits rying hidden hiots sent Mah. - - 114748]] Mahabhaiat (४७४८) समरे राजन् स हतोन्यपतद्भुचि ॥ २७ ॥ आदित्यकेतो फेतुचछिपाणेन सयुगे। भल्लेन भृशतीक्ष्णेन शिरविच्छेदभारत ॥ २८ ॥ वयाशित ततो भीम शरणानत पर्वणा । प्रेपयामास समुद्धो यमस्य सदन प्रति ॥ २९ ॥ प्रदुदयुम्ततस्तेन्ये पुत्रास्तव विशाम्पते । म-यमाना हि तत्सत्य समाया तस्य भापितम् ॥ ३० ॥ ततो दुर्योध नोराजा भारान्यसनकर्शित । अघ्रवीत्तावदान योधान् भीमोय युधिवध्यताम् ॥३१॥ एपमेत महेष्वासा पुप्रास्तव विशाम्पत । भ्रातृन् सन्दृश्य निहतान् प्रास्मरस्तहि रुद्वच ॥ ३२ ॥ यदुक्तमान् महामाक्ष क्षत्ता हितमनामयम् । तदिद समनुप्राप्त पचनं दिव्यदशिन ॥ ३३ ॥ लोभमोहसमाविष्ट पुनप्रीत्या धनाधिप । न घुष्य सेपुरा पत्तत् तथ्यमुक्त वयोमहत् ॥ ३४ ॥ तथैव च वधार्थाय पुत्राणां पाण्डवो पली । नून जातो महावाहुर्यथा हान्तस्म कौरवान् ॥ ३५ ॥ ततो दुर्योधनो राजा भीष्ममासाद्य सयुगे। दु ऐन महबाविष्टो विललापसुदु खित ॥३६॥ निहतानातर. भी शिरको काटा, फिर अत्यन्त क्रोधभरे भीमसेन ने गुप्त ग्रन्थी वाले वाणों से वहवाशीको भी यमलोकको भेजा, इसके पीछे आपके और सरवेटे सभाके मध्य में कहेहुए भीमके वचनोंको सत्य जानकर युद्धभूमिसे भागे ।३०।तदनन्तर भाइयों के दु.ग्वसे पाडामान राजा दुग्योधन आपके सव पुत्रों को बुलाकर यह बोला कि हे भाइयो इस भीमसेनको मारो, इस रीति से इन धनुपधारी आपके पुत्रोंने भाइयोंको माराहुभा देख कर उस रचन को याद किया जो बडे शुभ चिन्तक विदुरजी ने हितकारी समझ कर कहाथा वही उन महात्मा का वचन अब सत्य २ वर्तमान हुआ [है हे राजा तुम लोभ मोह में भरे हुए पुत्रकी मीति से नहीं जानतेहो पूर्व ममयम सत्यहितकारी वचन कहागयाथा निश्चय कर के महावाहु बलवान् भीममेन तेरेपुत्रों के मारने के लिये ऐसाही उत्पन्न हुआहै जैसा कि कौरसों को माररहाहै।३५। इसके पीछे राजा दुर्योधन भीप्य के पाम भाकर महा सेद युक्त होकर रोदन करनेलगा कि मेरे शूरवीर भाई युद्ध में भीमसेन के हाथ मे मारेगये, इसीप्रकार और. सब सेना nahi to the region of Yam Thon tho rest of your song, bolering the words of Bhin said 111 the court to be true, fled from the field of battle 30 Sorry for the death of his brothers Prince Daryodhan called all your sons togother and said to theus - Kill this Bhim rep, brothers!' Your brire sons socing their brothers dead, romcmbered the words luch thxr vell wisher Vidur had said for their lencfit. llis words have proved tru Out of love for your avaucious nad foolish son you Junot know a liat irae and luntficial words acre Foid Sirrely brave Blumech 19 l.orn to destroy genr sena ng cll as other hrumvax 35 Then Trinco Durgiullian reut to blu-lin and wept for sror, sayings dig brothers are lilled by Binnen in battle and lio in dlestroying cur rider lou always express your drsinterested .

४७५९.) भीष्मपर्व Blushma Pary [47493 भूरा भीमसेंगन में युधि । यतमानास्नथान्येपि हन्यन्ते सर्व सालिका ॥ ३ ॥ भवाश्च मध्यस्थतया नित्यमर गनुपेक्षते । सोह कुपथगारद पश्य देव मिदमः ॥ ३८ ॥ एतच्छ्रत्यारच कर पितादेवव्रतस्तत्र । दुर्योधनमिद यायमपात साघुरोचन ॥ ३९ ॥ उक्तमेतन्मया पूर्व द्रोणेन विदुरेणत्र । गान्धार्या च यशस्विन्या ताप तात न बुद्धवान् ॥ ४॥ समयश्च मया पूर्व कृतो वै शर्शन । नाह युधि नियोक न्यो नाप्याचार्य फथम्चन ॥ ४१ ।। य यहि धार्तराटाणा भीमो द्रक्ष्यति सयुगे। हनिप्यति रणे नित्य सत्यमेतद्ब्रवीमि ते । ४२ ।। सत्ल राजन् स्थिराभूत्वा रण कृत्ला ढोमतिम । योघ यस्त्र रणे पार्थान् स्वर्ग त्या परायणम् ।। ४३ ॥ न शझ्या पाण्डया जेतुं सेंट्रैरपिसुरासुरै । तस्मायुद्धस्थिराकृत्वा मतियुध्यस्वभारत ॥४४॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि आदित्यकेतुमभृतिवधे एकोननवतितमोऽन्यायः॥ ८९ ।। के मनुष्य भी मारेजाते हैं, आप सदेन हमको उटामीनपने से त्याग करतहो मैं कुमार्ग में वर्तमानहूं मेरी अम ग्यना देखिये, संभव वाले कि इस वचन पो सुनकर आपके पिता भीप्पजी उस अश्रुपात करनेवाले दुर्योधन से यह वचन चोले कि मेने और द्रोणाचार्य विदुर गांधारी आदि ने प्रथमही कहाथा परन्तु हेतात तुमने उसको नहीं समझा, मैने प्रथम तुम्हारे साथ नियम किया है सो मैं और प्राचार्यजी दोनों किसी रीति से तुम को छोड़ने को नही, धृतराष्ट्र के पुत्रों में से युद्ध में जिस २ को भीमसेन देखेगा उसको सत्य २ ही मारे विना नहीं छोड़ेगा, सो स्वर्गको अपना स्थान समझ कर मनको स्थिर कर के पाडवों से युद्धको हेभरतर्षभ इन्द्रादिक देवता भी पाडवों के जीतनेको समर्थ नहीं है इस हेतुस युद्धमें | स्थिरबुद्धी होकर संग्रामकरो ।। ४४ ।। ness in ourcruse, while I stny in the evil path Loos my lad luck." Having heard these words," continued Sanjaya, "your father Bhishm said to the weeping Duryodhan --"I as well as Dropacharya, Vidur, Gandhari and others have already rarned you, but you were indifferent to hear thuir advice 1 hive already given you my word that the achary, and I will never forsake you It is true that whoever of the sons of Dirtrashtra will meet Blimel, till meet his denth So with a firm mind, regarding paradise to be your projer residence fight against the Pandavas. Indra and other gods, O best of Bharats, are unahlo to conquer the landarzs, therefore fight out with a firm resolution" 44 atmy ।

[ 47001 Mahabhiyat (४७५०) धृतराष्ट्र उवाच । दृश्या मे निहतान् पुत्रान् बहनेकेन सजय भीमो द्रोण कृपय फिम कुर्वत सयुगे ॥ १ ॥ अहन्यहनि मे पुत्रा क्षय गच्छन्ति सजय । मन्येह सर्वथासूत देवेनोप हता भृशम् ॥ २॥ यत्रमे तनया सर्वे जीय तेन जयत्युत । यत्र भीष्मस्य द्रोणस्य कृपस्यच महात्मन ॥ ३ ॥ सौमदत्तश्चरस्य भगदत्तस्यचोभयो अश्वत्थाम्नस्तथा तात शराणाम निवतिताम् ॥ ४ । अन्येपाचव शूराणा मध्यगास्त नयामम । यदहन्यन्त समामे किमन्यद्भागधेयत ॥५॥ नहि दुर्योधनो मन्द पुराणोक्त मथुध्यत । वार्यमाणो मयातात भीमेण विदुरेणच ॥ ६ । गाधायांचव दुर्मेधा सतत हित काम्यया । नायुध्यतपुरामोहात् तस्यप्राप्त मिद फलम् ॥ ७ ॥ यद्भीमसेन समरे पुत्रान्मम निचेतस । महन्यहनि समुद्धो नयतेय मसादनम् ॥ ८॥ सजय उवाच । इव तत्समनुप्राप्त क्षतुर्वचन मुत्तमम् । नबुद्धधानसि विभो प्रोच्यमान हित तदा ॥२॥ अभ्य य ।। ९०॥ धृतराष्ट्र ने कहा हे संजय एफ भीमसेन के हाथसे मेरेबहुत से पुत्रों को मराहुआ देखकर भीष द्रोण कृपाचार्य प्रादिने क्या ५ किया और मेरे पुत्र प्रतिदिन युद्धमें नाशहोते है इससे हेमूत मै मानताहू कि सबरीति से मारब्ध से हीन हु, कि मेरे शत्रुनाश होत? और विजय नही पाते भीष्म, द्रोणाचार्य कृपाचार्य भरिश्रा, भगदत्त, अश्वत्थामा आदि बडे २ प्रताप लोगोके मध्य में मेरे पुत्र घर्त मान होकर भी मारेजाते है यहां पारव्य से दूसरी कौनसी वातहै, हे तातमेरे भौर भीष्म विदुरआदि अनेक सुहृदों के समझाने और निपेध करने से भी निर्बुद्धी दुर्थे।धननेपहले वचनों को नहीं समझा और हितकारिणी आनी माता गाधारी केभी पचनको' उसदुर्बुद्धीने नहीं समझा उसीका यहफल पारहा है, वहमहा क्रोधी | भीमसेन युद्ध में प्रतिदिन मेरेपुनों कोही अधिकता से मारकर यमलोक में पहुँचाताई सजययोले कि हे समर्थ विदुरजीका यह उत्तम वचनर्वतमान हुआहै जोविदुर ने कहाथा CHAPTER XC Dhutanshtra said " Whint did Blushm Dronn, Kupacharya nnd olliers do nt sieng many of my sons destroyed by Bhimsen ! My sons nic killed every day in lattlo, I I elieve therefore, Sut, thint I am Tuchless My sons are destroy ed and guin no victory In the midst of great m n lilo Blushım, hriprcharya Bhurisliraya, Bhagdnt t? Asliwathama u d others the destructie n of my sons can be a cribed to nothung lut late In *p te of the nicnatintors of I hilm, Vdur, mysolf and s ther well rushers foolish Duryodl an did not become in.se. llc was unwse to drugaid lle mure of lis not) a Guichaji trd 15 rcap ng the fut of Ing co do ngre I UMLB Eh men dcstioys ruost. Inter Sujaya replied The predict 07 of Vidur is coming to He told you to stop gambling and to sud emmy with thic Pandain lou disregarded the of my Uns in lo true (४७५१ । भीमपर्व Bhishma Path [4731] नियारय सुतान् यूवात् पाण्डवान माटु हेतिच । सुद हितकामाना अपना तत्तदेयच ॥ १० ॥ न शुभूपसि यद्वाक्य मयं पध्यमियरधम् । तदेव त्यामनुप्राप्त वचन || साधुभाषितम् ॥ ११ ॥ विदुरद्रोणमीमाणा तथा हितैषिणाम् । अहत्वाचन पथ्य क्षयं गान्ति फारवा ॥ १२ ॥ तदेतत् समनुप्राप्त पूनमयविशाम्पते । तस्मात्न गृणुयत्वेन यया युद्धमार्तन ॥ १३ ॥ मध्याहने सुमहारौद्र मग्राम समपद्यत । लोफक्षयकरो राजतन्में निगदत शृणु ॥ १४ ॥ तत सर्वाणि सैन्यानि धर्मपुत्रस्य शासनात् । सरधान्यध्यवर्तन्त भीममेव जित्रासया।। १० ।। धृष्टद्युम्न शिबण्डी च सात्यकिश्च महारथ । युक्तानीका महाराज भीममेरसमभ्ययु ॥१६ । विराटो दुपदरचर सहिता सर्वसोमकै । अभ्यद्रयन्त सग्राम भीष्ममेवमहारयम ॥ १७॥ फेण्या धृष्टकेतुश्च फुन्तिभोजश्च दशित । युक्तानीका महाराज भीममेय कि पुत्रों को जुवा खेलनेसे निषेध करो और पांडवों से शत्रुतामतकरो सो उनम चिंतक मित्रों के यचनों को तुमने ऐसे नहीं माना जैसे कि गगी अपनी नारोगी करने वाली शीपपी को नहीं साता है वही 'साधुओं का कहाहुआ वचन आपके प्रागे वर्तमान हुआहे। ११ ।यह सव कौरवलोग अपने शुभचिन्तक विदुर द्रोणाचार्य भीम और अन्य बहुत से हितधारियों के वचनों को न मानकर नाशहोते जाते हैं, इसके पीछे हे गगाम याह्न के समय ससारका नाशकारी वडा भाग भयानक युद्ध को प्रारभ हुआ उसको मुझमे मुनो कि धर्मपत्र युधिष्ठिर की प्राज्ञा से पाडवों की सबसेना महाक्रोधित होकर भीष्म के मारने के लिये सम्मुख दौडी हे महाराज धृघुम्न शिखण्डी सात्यकी यहतीनों अपनी २ सेना समेत भीष्म के मम्मुख गये १६ चिराट् द्रुपद आदि महारथ भी समसोमकों समेत भीष्म के सम्मुख गये और पाचों भाई केकय धृष्टकेतु कुन्तिभोज आदि भी सबकवचधारी होकर सेना समेत भीष्म के सम्मुख गये, अर्जुन और द्रौपदी के पाचों पुत्र और पराक्रमी advice of your friends lilc a patient who doos not tale doses or curative medicince The very sime sintly picdict ons are The Kauravas who disregarded tho #dvice of their soll wishers, Vidui Dionacliaryr Bluslim and other fr etds are being destroyed Then, o ling, at midday conimenced a furious battle destructive of the world Hear from me all about it —By the order of Yudhishthir the just all the Pandav army much enraged, rushed on to slay Bhıslım 16 Dl risht dyuinn, Shibhindi and Satyrl : with their armies facod Bhishma Virt, Drupnd and other waruors too along with the Somals the five Kaikny? brothers Dhrislıtaletu, Kuntibho; and others sherthed in armour, encountered him Arjun with the fi vo sons of Draupadi and yalliant Clebitan faced the biugs sont by Duryodhan Lihotrise Abhimanyu, valliant Gbatotkach and enraged Blumsen rushed against the Kauravas.20 Two parties of the coming before you 11 [4752] Malabliaint (४७५९) समभ्ययु १८॥ अर्जुनोद्रौपदेयाश्च चेकितानश्च वीर्यवान् । दुर्योधनसमादिष्टानराश सर्वान् समभ्यय । १९ । अभिमन्युस्तथा शरा हैडिम्सथ महारथ । भीमसनश्च सक दस्तभ्यधावत कौरवान् । २० । निधाभूतरवध्यन्त पाण्डय कौरवा युधि । तथै च कौरवैराजनवध्य त पर रण । २१ ॥ द्राणस्तु रथिन थेठान सामयान मृजयै सह । अभ्यधावत सकुद्ध प्रेपयिप्यन् यमक्षयम् ॥ २२ ॥ तनाकन्द्रो महानासीत् सृजयाना महात्मनाम् । वध्यता समर राजन् भारद्वाजेन धगिना ॥ २३ ॥ द्रोणन निहतास्तत्र क्षत्रिया वहवो रण | विचए ताह्यडश्यन्त व्याधिक्लिष्टा नरा इव ॥ २४ ॥ फूजना क्रन्दताम्चेर स्तनताञ्चैव भारत । अनिश शुश्रुव शब्द क्षुत क्लिाना नृणामिव ॥ २५ ॥ तथैव कौरयाणा भीमसना महावल । चकार पदन घोर क्रुद काल इवापर ॥२६॥ वध्यता तत्र सैन्याना मन्योन्येन महारणे । प्रावर्तत चेकितान उनसवराजामों के सम्मुख गये जिन को कि दुर्योधन ने आज्ञादीथी, इसीप्रकारवीर अभिमन्यु ओर महारथी घटोत्कच और क्रोधित भीमसन भी कौरवों के सम्मुख दौडा । २० । हे राजा पांडवों के दोयूथोंसेतो कारख मारेगये और कौरवों से भी उधर के लोग मारेगये फिर महारथी द्रोणाचार्य बडे क्रोधयुक्त होकर मुजियों सहित सोम का मारतेहुए पांडवों के सम्मुख गये उसयुद्धमें द्रोणाचार्य के हाथसे मरतेहुए महात्मा मनियों के बडे २ | शब्दहुए उसस्थानमें द्रोणाचार्य के हाथसे मोहुए बहुत से क्षत्री एसे: तडफडाते दिखाई दिये जैसे कि रोगयुक्त मनुष्य विकलहोकर तडफडाते है युद्ध में बोलते गर्जते पुकारते हुए शूरवीरोके ऐसे शब्दमुने गये जसे कि भूवमे व्याकुल मनुष्योके शब्द निकला करतेहै ।१५। इसीप्रकार द्वितीयकालके समान क्रोध रूप महावली भीमसेन ने कौरवों के महाघोर नाशको किया, उस महाघोर युद्ध मे परस्पर सव सेनाओं के मरने से रुधिर की घोर भयानक नदी जारी हुई। हे महाराज कौरव और पाण्डवों की वह महायुद्ध धार लडाई यमराज के पुरको Pandavas destroyed the Kauritas and the latter killed the warriors of the opposing side Vallant Dronacharya muchº enraged destroyed the Srinjayas and the Somals and then encountered the Pandaons The Srijnya Warriors, destroyed by Dronacharya made a great no se The warriors wounded by him shools like those who are overtaken by sickness The cries and routs of the narriors resembled those of the starving people 25 In the same manner lıl e a second Derth, valliant Bhimsen much enraged, destioyed the l au ays in large numbers In that dreadful battle the opposite sides destroying one another produced a riter of blood The dieadful battle between the Kauravas and the Pandavas, 0 hing, augmented the region of Yamraj Then full of anger ard destitute of pride Bhimsen destryed the army of elephants and sent it to the region of Yam killed by the darts of Bhimsen (४७५३) भीमप Bhishma Pary [4753 नदी घोरा रुधिरोधप्रवाहिनी ॥ २७ ॥ स संग्रामो महाराज घोररूपोमवन्महान् । कुरूणां पाण्डवानाञ्च यमराषिवर्धनः ॥ २८ ॥ ततो भीमो रणे फुदोरमसम विशेषतः । गजानीकं समासाय प्रेषयामास मृत्यवे ॥ २९ ॥ तत्र भारत भीमन नाराचामिहंतागजाः । पेतुर्नेदुख सेखुश्च दिशश्च परिवम्रमुः ॥ ३० ॥ छिन्नहस्ता महानागाग्छिन्न गात्राश्च मारिप । क्रौञ्चवद्व्यनदनमतिाः पृषिधीमधिशेरते ॥ ३१ ॥ नकुल. सहदेवश्च हयानीकममिद्रुती । ते हयाः काचनापीडा रममाण्डपरिन्छवाः ॥ ३२ ॥ वध्यमाना न्यदृश्यन्त शतशोयमहतशः । पतदिस्तुरगै राजन् समास्ती यंत मेदिनी ॥ ३३ ॥ निजिवैश्च श्वसद्रिय फुजद्भिधगतासुमिः । हयैर्वमी नरश्रेष्ठ नानारूपधरधरा ॥ ३४ ॥ अर्जुनेन इतै संण्ये तथा भारत राजमिः । प्रघभी घसुधा घोरा वत्र तत्र विशाम्पते ॥ ३५ ॥ रयमग्नर्घजैछिन्ननिरुत्तच महायुधः । चामरेन्यंजन चैवच्छत्रै सुमहामभै । ३६ ॥ हारनिकैः सफेयर: शिरीमिय सकुण्डलैः । उनीपैरपविद्धय पताकामिश्च सर्वश ॥ ३७॥ अनुफ शुभैयजन् दृद्धि करने वाली हुई इसके पीछे क्रोधमें भरे निरभिमानी भीमसेन ने सथियों की सेनाको मारकर यमपुर भेना वहां भीमसेन के नाराचों से मरेहुए हाथी अचेत होकर शन्द करते दिशाभों में घूमते हुए पृथ्वीपर गिरे।३०। हे राजाघृतराष्ट्र वह मुंह और अंगों से रहित हाथी क्रौंच पक्षी के समान शब्द करते हुए पृथ्वीपर मरकर सोये, भौर नकुल सहदेव दोनों भाई घोड़ों की सेनाके सम्मुख गये वहां मुवर्ण भूपणों से अलंकृत सैकड़ों और हज़ाहों घोड़े परे कटे दृष्ट पटे उस समय वह पृथ्वी गिरे हुए घोड़ों से पूर्ण हुई, और बहुतसे निहवा से रहित श्वास लेते हुए शब्दायमान मृतकरूप अनेक रंग वाले घोड़ों से पृथ्वी बड़ी शोभायमान हुई, हे भरतपम इसी प्रकार से अर्जुन के हाथ से मरे हुए राजाभी से भी भयानक पृथ्वी महाशोभा को प्राप्तहुई ॥३५॥ बड़े पात्रों से टूटे रय ध्वजा और प्रकाशित छत्रों से वा टूटे हुए चापर और व्यजनों से भयवा हार केयूरादिक भाभूपणों से युक्तं कुंडल पारी शिर भनेक प्रकारकी पताकामों से, और रयों की अनेक रंगवाली टोरियों से युक्त रयों से ढकादुई पृषी ऐसी प्रकाशमान हुई जैसे कि वसन्त ऋतु में फूलों and made insensible the elephants fell down with bideoos cries. Devoid of trunka and limbs the elephants cried like herons and fell down dead on earth. The tivo brothers Nakul and Sahadev faced the equadron of horses and killed hundreds and thousands of horses decked with gold trappings, filling tho ground with their dead bodies The earth looked glorious with the carcases ol horses of different colours, tongueless, gasping and neighing. In the same manner, O best of Bharat3, the stene on the field of battle was arrful on account of the corpses of the kings killed by Arjan. Broken by powerful weapons, the chariots destitute of banners, bright sun shades, fly flappers, fans, garlands and other ornaments, heada decked rith cartings, banners of sorts and chariot ropes [4754] Mahabharat योक्त्रवैवसरश्मिभिः सफीर्णा घसुधाभाति घससे फुरसुमैरिव ॥ ३८ ॥ पधमेपक्षयो वृत्त पाण्डनामपि भारत । द्धेशान्तनवे नीमे द्रोणेचरथसत्तमे ॥ ३९ ॥ भवत्याग्नि रुपे चव तथैव कृतवर्माण । तथेतरेषु कुद्धेषु तारकानामपिक्षय ॥४०॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि अष्टमदिवसयुद्धे नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥ सजय उपाचा धर्तमाने तथा रोद्रे राजन् वीरवरक्षपे । शकुनि सौयल श्रीमान पाण्डवान् समुपाद्यत् ॥ १॥ तथैव सात्वतो राजन् हार्दिक्य परचीरहा। अभ्यद्रव ससग्रामे पाण्डघानावरूथिनीम् ॥२॥ तत पाम्बोज मुख्यानां नदीनानाच घाजिनाम् । भारहाना महीजानां सिन्धुजानांच सर्वश ॥ ३॥ धनायुजाना शुभ्राणां तथा पर्वतवा सिनाम । घाजिमावडभि. सख्ये समन्तात् परि वारयन् ॥४॥ ये चापरे तित्तिरिजा से शोभित होती है, जिसमकार से भीष्मजी और रथियों में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य अश्वत्थामा कृपाचार्य और कृतपर्मा इन सबके क्रोधरूप होने से पाण्डवों के शूरवीरों का नाश हुआ उसी प्रकार पाण्डयों के कोपित होने से आपके भी वारों का नाशहुमा ।। ४०॥ अगाय ९१॥ संजय बोले हे राजा इस प्रकार उनउत्तम वारों के नाशाहोनेपर सुवलका पुत्र श्रीमान् शकुनि और शत्रुओं के वीरों का मारनेवाला यादव कृतवर्षा पाण्डवों की सेना के सम्मुख गया, फिर काम्पोज देशी उत्तम घोडे व नदी के समीप उत्पन्न होनेवाले अरष्ट देशी व सिन्ध देशी आदि सब प्रकार के घोडे भार बनायुन देशी समेतरूप पहाड़ी घोडे इन सब प्रकारके अनेक घोडोंके द्वारा युद्धके चारो ओरको नियत करके दूसरे प्रकार तित्तिरिम वायुके समान वेगवान् मुवर्ण भूपणों से भरकृत श्रेष्ठ of different colours beautified the earth like flowers in the season of Spring The destruction of Panda v armes caused by Bhishm, Dro nacharya the best of charioteers Ashwathama Kripacharya and Kritvarma was as great as that of your armies caused by angry Pandavas 40 CHAPTER XCI Sanjay z said --"On the destruction of those warriors, o king, Subal's son shaluni and Kntparma the Yada y, destroyer of warlıke foes, faced the Pandav armies Then with good horses of Camboj of Aratta by the river si le and of Sindh, the white horses of mountain forosts, stationed all round in the field of battle and with horses of the colour of partridge skift like the wid, decked with gold ornaments, sheathed 10 armours of the bust mi'e Arjun's son Ilawan faced that (४७५५) frati Bhishma Pary [4755] जयनायातरंहसः। सुबी लंकृत रेतर्वमवन्दि सुकम्पितः ॥५॥ इयर्यातजवैरायः पाण्डवस्यनुतो बली। ययधर्तत तत्सैन्य हष्टरूपः परन्तपः ॥ ६॥ अर्जुनस्य सुताश्री मां निरावानाम वीर्यवान् । स्तुपायां नागराजस्य जातः पार्यन धीमता ॥ ७ ॥ ऐराप तेन सा दत्ता भनपत्या महात्मना । पत्यो हते सपणेन कृपणा दीनचेतना ॥ ८॥ मा र्यायें तांच जमाद पार्थः कामयशानुगाम् । एवमेष समुत्पनः परक्षेग्रेर्जुनात्मजः ॥९॥ सनाग लोफे संपृशो मात्राच परि रक्षित। पितृव्येण परित्यक्त. पार्यद्वेषाबुरात्मना ॥ १०॥ रूपवान् येलसेंम्पन्नो गुणवान सत्य विक्रम । इन्द्रलोकं जगामाशु श्रुत्वा तमार्जुनकतम् ॥ ११ ॥ सोभिगम्य महाबाहु. पितरं सत्य विक्रमः । मभ्ययावयदस्यमो विनयेन कृतांजलि ॥ १० ॥ न्यवेदयतचात्मान मर्जुनस्य महात्मनः । इरावानसिी मन न्ते पुसमाहं तवत्रभो ॥ १३ ॥ मातुः समागमो यच तत् सर्व प्रत्य वेदयत् । तश्च सर्व स्वना किये हुए कवचों को धारण करने वाले वायुके समान शीघ्रगामी उत्तम घोड़ों रामेन बलवान रूपवान् श्रीमान पराक्रमी भर्जुन का पुत्र इरावान् उससेना के सन्मुख हुआ यह इरावान् भर्जुन का पुत्र नाग कन्या में इस रीति से उत्पन्न हुआ था कि ऐरावत नाम नागों के राजाने गाड़जी से महा दुखित होकर अर्जुन को अपनी कामवती कन्यादी तव अर्जुनने उत्त कामासक्त को अपनी स्त्री बनाने के लिये ग्रहण किया इसरीतिसे यह अर्जुन का पुत्र दूसरे के क्षेत्र में उत्पन्न हुआ, वह माता से रक्षित होकर नागलोक में वहां हुआ और अर्जुन की शत्रुता से उसके चांगने उसको प्रयोकया। फिर यह रूपवान पराक्रमी गुणोंसे संपन्न सत्य परा क्रमी अर्जुन को स्वर्ग में वर्तमान सुनकर शीघ्रही इन्द्र लोफको गया, वहां उस सावधान सत्य पराक्रमी ने हाथ जोड़ कर पिता के पास जाकर दण्डवन् की, और अपने को अर्जुन के सम्मुख वर्णन किया कि हे मसु आप का कल्याण हो मैं इरोवान् नाम भापका पुत्र हूं और मे माता का मिलाप हुआ था वह सब वर्णन army. This Itavan the son of Arjun was born in the daughter of the king of Nazas. For Airavat the king of Nagu, much distressed by Garur, gave his daughter kiatrisati to Arjun and the latter accepted hor for his wife. Thus this son of Arjun was born in a widor. Ho was brought up by his mother in the region of Nagas; his uncle being an enemy of Arjun did not take care of him 10. Then that handsome. brave warrior of good qualities, hearing af Arjun's visit to paradise, went to the region of Indra There that wise man of true prowess went to his father and with joined palmıs having saluted him, introduced him. self thus,-"May you he happy, lord," said he, "[ am Iravan your Hon." He rolated to Arjun how he had mot his mother. Then Ar. jur remembered what had liappened, and in the palace of Indra sco ing bis son to be like himself in good qualities, enbraced "bim cheer [4756] Mahabharat (४७५६) यथावृत्त मनुसस्मार पाण्दय ॥१४॥ परिप्वज्य सतश्चापि आत्मन. सहश गुणे । प्रीतिमान नयत् पार्थों देवराज निवेशने ॥१५॥ सोर्जुनेन समाज्ञप्ती देवलोके तदानृप । प्रीति पूर्व महावाहुः स्वकार्य प्रति भारत ॥ १६ ॥ युद्धकाले त्वयास्माक साह्य देयमि तिप्रभो । वाढमित्येव मुक्त्वातु युद्धकाल इहागतः ।। १७ ।। कामवर्ण जबरदयर्वभिः संवृतो नूप ते हया कांचनापीडा नानावर्णा मनोजवाः॥१८॥ उत्तपेतुः सहसाराजन हंसा इव महादधी । ते त्वदीयान् समासाद्य हयसंघान मनोजवान् ॥ १९॥ मोडै कोडानभिनन्तो घोणाभिश्च परस्परम । निपेतुः सहसा गजन सुपेगाभिहता भुवि ॥ २० ॥ निपतद्भिस्तथा तेश्च यसधैः परस्परम् । शुभुवे दारुणः शब्दः सुपर्ण पत्तने यथा ॥२१॥ तथैव तायका राजन् समेत्यान्योन्य माहवे। परस्परवधं घोरं चक्रले हयसादिनः ।। २२ । तस्मिस्तथा धर्तमाने संकुले तुमुले भृशम् । उभयोरपि संशान्ता किया तब अर्जुन ने उसका यथार्थ वृत्तान्त जैसा हुआ था सब स्मरण किया वह अर्जुन देवराज के भवन के भीतर गुणों में अपने समान पुत्रको देखकर बहुत स्नेहसे मिलकर प्रसन्न हुआ। १५ । हे भरत बंशी धृतराष्ट्र तब इन्द्र-लोक में बह महाबाहु इराबान अर्जुन से बोला कि हे पिता आप मुझे कोई काम कर ने की प्राज्ञा दीजिये, अर्जुनने कहा कि हे पुत्र युद्ध के समय तुम को हमारी सहायता करनी उचित है उसकी आज्ञा को स्वीकार करके युद्ध के समय वह उन पूर्वोक्त उत्तम घोड़ों समेन वहां आया जो अकस्माद ऐसे ऊंचे होकर चलने लगे जैसे कि महा समुद्रमें हंस चलते हैं वह शीघ्रगामी घोड़े प्रापके पोडों के समूहों को पाकर, अपनी तीवना से पृथ्वी पर छाती से छाती को.नाकों से नाकों 'को परस्पर घायल करतेड्डुये दौड़े ।२०। इस राति से उस परस्पर दौड़ते हुये घोड़ोंके, समूहोंसे ऐसे भपकारी शब्द सुनेगये जैसे कि गरुड़ के गिरने में होते हैं, इसी प्रकार घोड़े के सवारों ने भी परस्पर में मिलकर एक ने एक का नाश किया, इस रीतिक fully. 15. Then in the region of Indra, Iravan said to Arjun--"Give me some work to do, fathe." "You must help me in the coming war." replied Arjun. The son accepted the father's offcrand in due course came there with those good losses which strode with raised heads like swang in the sea. 'bose stift hoises meeting your own aushol against them, striking with thar prozes and breasts 20. The gounds made by the i ushing of horses against one another were drvadful like the fall of Garur. Then the horsemen meeting together, destroyed one another. When the battle was raging so fariously tile horses on both sides ran os all sides The Warriors whose arrows more exhausted and the bosses were dord, wale themselves lilled. 25. Whou the squaciron of ho ses vas nearly destroyed, tlie brothers of Shakuni, brave warriors came into the field of battlo, nding horses 1 (४७५७) भीमपर्व Bhishma Pary [47573 हपसंघाः समन्ततः ।। २३ । प्रक्षीणसायकाः शूरा निहताश्या भ्रमातुराः । रिलयंसम नुप्राप्तांस्तक्षमाणाः परस्परम् ॥ २४ ॥ ततः क्षीणे हयानीफे किश्चिच्छेथे च भारत । सोयलस्यानुजाः शूरा निर्गता रणमूर्द्धनि ॥ २९ ॥ वायुवेगसमस्पर्शाद जवे घायु समांश्चते । आमहा वलसम्पमान वय स्यांस्तुरगोत्तमान् ॥ २६ ॥ गजो गवाक्षो वृष भश्चर्मवानाजव-शुकः । पडेते वलसम्पन्ना निर्ययुर्महतो वलात् ॥ २७ ॥ वार्यमाणाः शकुनिना तैश्च योधर्महाबलः । सन्नद्धा युद्धकुशलारीन्द्ररूपामहावलाः ॥ २८॥ तद नीक महाबाहो भित्या परमदुर्जयम । वलेन महता युक्ताः स्वर्गायविजयैषिणः २९॥ विविशुस्ते तदा दृधा गान्धारा युद्धदुर्मदाः । तान प्रहस्तिदा दृष्ट्वा हरायानपि धीर्यवान् ॥ ३० 1. अवधीत समरे योधान विचित्रानदारणायुधान • यथैते धाः राष्ट्रस्य गोधाः सानुगवाहनाः ॥ ३१ ॥ हन्यन्ते समरे सर्वे तया नीतिविधीयताम् । कठिन और तुमुल युद्धके होनेपर दोनों ओर के घोड़ों के समूह भी चारों ओर से भ्रमण करने लगे, जिनके कि वाण अत्यन्त निवट गये और घोड़े भी मारेगये उन शूरवीरों ने नाशको पाया ।२५। फिर घोड़ोंकी सेना के नाश होने और कुछ शेष रहजाने पर शकुनी के छोटे भाई महागूरवीर युद्ध भूमि में वायुके समान तीन स्पर्श युक्त और शीघ्रगामीपने में तीन वायु के समान मसान रूप तरुण घोड़ों पर चढ़कर आये, गज, गवाक्ष, {पभ, चर्मवान, आर्जव शुक यह छों महावीर गान्धार कुनाद युद्ध में दुर्मद बड़ीसेना समेत महा प्रवीण भयानकरूप अतिवली कवच मादि से अलंकृत शकुनि और अपने बड़े २ वीरों से निपेधित होकरभी विजयाभिलापी हो उस बड़ी कठिन सेनाको चीरकर स्वर्ग के निमित्त युद्ध में पाये उस समय पराक्रमी इगवान् भी उन राजकुमारों को माया हुआ देखकर अपनेशस्त्र प्राभूषणों से अलंकृत वार पुरुपोंसे बोला १३० कि जिस प्रकार से दुर्योधन के यह सब शूरवीर मारेजाय वही काम तुमको करना उचित है यह swift as the wind cheerful and youthful, Gaj.. Gawaksh. Vrishnbh Charmvan, Arjav and Shuk, the brave iarriors of Gandhar, invin: ciblo in battle, followed by a large army, very vise, dreadful, very strong, armed with arms and armours, although forbidden by Shakuni And other great warriors, came into the field of battle desirous of para. dise, passing through the inpregnable forces. Valliant Iravan, see. ing the advance of those priaces addressed his warriors decked with arms and ornaments;"You should cause the destruction of all these warriors of Duryodhan." Iravan's soldiers obeyed his orders and des. troyed their armies. Seeing the destruction of their warriors by those of frapan, the song of Suval, of unbearable ternper surrounded bin on all sides and rushed upon him with their clubs and battle aros. 35. Wound ed by thosa warriors and bleeding, Iravan_looked like sa elephant विदित हुआ [4758 Atahabharat, चादमित्येवमुक्त्यात सर्वे योधा इरावत ॥३२॥ जन्नुस्तेपायलानी दुर्जयममरेपरे । तदनीकमनीकेन समरे वीक्ष्य पातितम् ॥३३॥ अमृष्यमाणास्तेसवे सुबलस्यात्मजारणे। इरावन्तमभिमुत्य सर्वत. पर्य्यवारयन् ॥ ३४ ॥ ताडयन्तः शितः मासरचोदयन्तः परस्परम । ते शूरः पर्यावन्त कुर्वन्तो महवाकुलम् ॥ ३५ ॥ इराधानय निभिन्न प्रासरूणिर्महात्मभिः । अवता गधिरेणात स्तोत्रर्विद व द्विपः ॥ ३६ ॥ पुरतोपि च पृष्ठेच पार्थयोश्च भृशाहतः। पको पहुभिरत्यर्थधैर्यानाजन्न विन्यथे ।। ३७ ॥ इरावानाप संदः सर्वास्ताग्निशिते. शरैः । मोहयामास समरे बिध्या परपुरमय ॥ ३८ ॥ प्रासानुवरुष्य तरसा स्वशरीरादरिन्दम । तैरेव तायामास सुयलस्यात्मजा नरणे ॥ ३९ ॥ विकृष्य च शितं खद्गं गृहीत्याच शरत्वरम, पदाति समागच्छन्जि धासु सेवड़ान युधि ॥ ३० ॥ तत. प्रत्यागतप्राणाः सर्वे ते सुबलात्मजाः । भूय शो झनकर इरामान के शूरों ने अंगीकार कर के, उन्होंकी दुर्जन सेनाको मारा युद्ध में इस सेना से मारीहुई अपनी सेनाको देखकर, महा असहिष्ण सुचलके पुत्रों ने इनाव न को चागे ओरसे घेरलिया और बड़े परशों से और परिघोंसे प्रहार करते हुए उपके ऊपर दोड़े ॥३५॥ इरावान भी उन पीरोंसे घायल रुधिर दूबाहुआ ऐसा जैसे कि दण्डों से घायल हाथी होताहै, हे राजा यह अकेला उनसब से हाथ छाती पीठ और कुक्षिपर घायल होने पर भी पीड़ित नहीं हुम', फिर भानु के पुरको विनय करने वाले अत्यन्त क्रोधयुक्त इरावान् ने भी उन सबको अपने तीक्ष्ण वाणों से घायल किया, फिर उस शत्रुहन्ताने अपने शरीर में से सब परशों को उखाड़ कर उन्ही परशों से मुबलके पुत्रों को घायल किया, इसके पीछे अपने और धारणा करके बड़ी शीघता से उन मुबलके पुत्रों के मारनेको पैदलहीगया ४० फिर चैत यहोकर क्रोधर्म भरेहुए वह सब सुबलके पुत्रभी इरावान के सम्मुख गये तब तो इरावान् अपने रवड्गको हस्तलाघवता को दिसलाता tounded by staffs Wounded by them on his arnis, breast, back and sides, he was not disheartened in spite of his Leing alone against so many. Then Iravan the conquerer of enemies in great anger Froundcd them all with his arrow), And that destroyer of enemies having removed weapons from his Lody, rounded the sons of Suval with their ovr. Weapons Then taking upbis sharp sword and slield, he guickly rushed on 'oot to slay the sons of Sural 40 The enraged sons of Suvai carefully encountered (ravan who rushed against them all showing the dexterity of his hand. All those princes, riding their unnge, conld not match him in swiftnes of movement and sun ound- 'ing him on all sides, they desired to captura lum But singly he went to them and cut don iptheir limbs 46, i bey all died of the rounds ox cept one of them who escaped with his life by the great exortion of lus तीक्ष्ण खड्ग ढालको . (४७५९) भीमपर्व Bhishm Prry [4759 घसमाविष्टा रायन्तमभिता ॥४१॥ रापानपि खगेन दर्शयन पाणिलाययम् । मध्यवर्तत तान् सर्वान् सौपलान् पलदति ॥ ४२ ॥ लाघनाथ धरत सर्वे त सुवरात्मना । अन्तर नाभ्यगच्छन्त चरन्त' शीघ्रगैर्हयै ॥ ४३ ४ भूयिष्ठमयत सख्ये सम्मश्य तत पुन । परिवार्य भृशं सर्वे गृहीतुमुपचक्रमु ॥vi ॥ अथाभ्यास गताना स खड्गेनामित्रफर्पण । असिहस्तायापहस्तास्तेपा गात्राण्यन्तत ॥ ४५ ॥ मायुधानि च सर्वपावाहूनापित भूपितान् । मपसन्त पित्तामा मृता भूमौ गतासद ॥ ४६ ॥ पमस्तु महाराज वधा परिरक्षित । अमुच्यत महारोदातामाठीरा वर्तनात् ॥ ४७ ॥ तान् सर्वान् पतितान् रश्या सुना दुर्योधनस्तथ अभ्यभा पत सकुदो राक्षसघोरदर्शनम् ॥४८॥ मापगृह महेपास मायाविनमरिन्दमम् । वैरिण भीमसेनस्य श्यातवकरधेन वै ॥४॥ पश्यवीर यपाह्येप फाल्गुनस्य सुतोचली। हुआ उन सके सम्मुख दौडा, उस समय उन सब पुत्रों ने अपनी शीघ्र गामी सवारियों से भी उसकी तीव्रताको नहीं पाया, फिर उसको घेरकर मवने पक इना चाहा, परन्तु उस अकेले महावनी नेही पासजाकर उनसब खड्गधनुप धारिपों के अगों को काटा और अगों के कटते ही वह मय मृतक होकर पृथ्वीपर गिरे ।४61 हे महाराज उनमें से एक हपभही इस घोर रुद्र युद्धमें से वढी सहायताओं से बचा फिर भापका पुत्रइन शुरवीरोंका मराहुआ देखकर महाकोध में भराहुआ महावली शत्रुहन्ता मायावी भार्यश्रृंग राक्षस जो कि बकासुर के बघ में भीमसेनका शत्रुथा उम से बोला, हे वार देसो जैसे कि इसपराक्रमी और मायावी अर्गुन के पुत्र ने विजयकर्म से सेनाके नाश को किया है सो हे तात तूभी इच्छानुचरि मायावी अस विधा में कुशलहै।५०। और पांडवोंसे शत्रुता करनेवाला है इस हेतुसे इस इरावान् को युद्ध में तुम मारो, उसकी भाज्ञापातेही वह घोररूप राक्षस बडा सिंहनाद करता हुधा अर्जुन के पुन के पास गया भार दोसहस्र युद्धसे शेष बचेहुए घोडों से महावली इरावान के मारने का मामलापी हुश्रा, फिर अत्यन्त पराक्रमी शत्रुहन्ना assistants Seeing those warriors dead, your son, much enraged said to tho de otſulakshas, Aryashi ing the mighty destroyer of foes who was Bhim's adversary at the time of his killing Valasur --"Lool here, brava Harliort You are cuaning, skilful in war, capable of going evorywhere at will and an enomy to the Pandaras 50 kill Iravan in battle as that brave and cunning son of Aizun has conqured and destroyed my armos" At Daryodhan's commind, the dreadfulankshas rush ed upon Arjun's son with a tremendous roar, vislung to destroy him and his tryo thousand horse which romained with him after the last battlo Dexterous Iravan the m ghty destroyer of foes, checked the rabsbas desirous of killing hini Soon the wave ralsbas, seeing his ad vance, artfully conjured up rakshas' horsemen armed with weapous, and meeting the tro thousand hoisemen of Iraqan both paraties des 55 यथा [4760] Mahabhart (४७६०) मायावी विप्रिय घोरं माफा(न्मे चलक्षयम् ॥ ५० ॥ तश्च कामगमत्तात मायाख्ने च विशारदः । कृतवैरश्च पार्थेन तस्मादेनं रणे जहि ॥ ५५ ॥ वाढमित्येवमुक्यातु राक्षसो घोर दर्शन । प्रययो सिंहनादेन यत्रार्जुनसुतो युवा ॥५२॥ आरुयुद्धकुशलैर्विमल- प्रासयोधिभिः । धारः प्रहारिभियुकैः स्वैरनोकै समारत. ॥ ५३ ।। तत. शेपैर्महा राज द्विसाहपैहयोत्तमः । निहन्तुकामः समरे इरावन्त महावलम् ॥ ५५ ॥ पूरा वानपि संक्रुद्धस्त्यरमाण. पराक्रमी । हन्तुकामममित्रन्नो राक्षसं प्रत्यवारयत् ॥ ५५ ॥ तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य राक्षस सुमहावलः । त्वरमाणस्ततो मायाँ प्रयोक्तमुपचक्रमे ५६। तेन मायामयाः कृष्णा हयास्तावन्तएवहि । आरूढ़ा राक्षसैघोरैः शूलपाहिशपाणिभिः ॥ ५७ ॥ ते संरब्धा. समागम्य द्विसाहनाःप्रहारिणः। अचिरागमयामासु. प्रेतलोक परस्परम् ॥ ५८॥ तस्मिंस्तु निहते सैन्ये तावुभौ युद्धदुर्मदी । संग्रामे व्यवतिष्ठतां धै वृत्रवासवी ।। ५९ । प्रादयन्तमभिप्रेक्ष्य राक्षसं युद्धदुर्मदम् । इरावान् फ्रोधसंरब्धो धारयन् सुमहाबलः ॥ ६० ॥ समभ्यासगतस्याजो तस्य खड्गेन शीघ्रता करनेवाले इगवान्ने अपने मारने के इच्छावान उस राक्षसंको रोका ।५५ इसके अनन्तर शीघ्रता से पड़े महावली राक्षस ने उस आते हुए को देखकर मायाको प्रकट किया, अर्थात उस ने उतनेही मायारूपी घोड़े जिनपर शूल पट्टिश धारण किये हुए घोर राक्षस सवार थे प्रकट किया फिर उन दो हजार क्रोधकर प्रहार करनेवालों ने सम्मुख होकर थोड़ेही समय में परस्पर युद्ध करके एकने प्रकको तलोकमें भेजा, उस सेनाके मरने पर वह युद्ध में दुर्मद दोनों ऐसे युद्ध करने लगे जैसे कि त्रासुर और इन्द्रने युद्धकिया था, उस युद्ध में दुर्मद राक्षस को सम्मुख आया हुआ देखकर महाबली इरावान् बड़े क्रोधसे उसके ऊपर दौड़ा ६० भार उस निर्बुद्धी के धनुपको अपने खड्ग से काटकर पांच प्रकार के पांच वाणों से व्याकुल किया, फिर वह अपने धनुपको टूटा जानकर बड़े क्रोधसे इरावान् को अपनी माया से मोहित करके बड़ी तीव्रतासे आकाश में पहुँचा, इस troyed each other. On the destruction of the trvoarmies, the two war. riors fought like Indra and Vritrasur. Seeing the brave rakshas he. fore him, brave (ravan rushed upon him, and cutting down his bow with his sword he wounded him with five arrows of five sorts57. Funding his bow broken, in great anger he deprivnd Iravan of his reasoning and ascended in the air with great rapidity. Iravan too, followed him in mid air and cut down his limbs. That best of rakshases, wounded again and again became whole of body and youthful in appearance lıke Iravan who knew all Dharm and was invincible and beautiful. The maya produced from the bodies of rakshases is youthful and assumes any form at will. Thus the body of that rakslas, cut again and again, became whole When Iravan cut the body of the brave rakshas with arrows and axes again and again, he 'assumed a form (४७६३) भीष्मपर्व Bhishtna Tar [1763 राजस्तय तेषांच संकुले ॥ ८१ । अजानन्नर्जुनथापि निहतं पुनमौरसम् । जबान समरे शूरान् रामस्तान भीष्म रक्षिण- ॥ ८ ॥ तथैध तावका राजन सायाश्च सहमशः । जुड्वतः समरे प्राणाग्निजघ्नुरितरेतरम् ॥ ८ ॥ मुक्त फेशा विकवचा घिरया छिन्नका मुंका. । वामुभिः समयुध्यन्त सम वेताः परस्परम् ॥ ८४ ॥ तथा मर्मातिगामो निज धान महारथान् । कम्पयन् समरे सेनां पाण्डयानापरंतपः ॥ ८५: । तेत योधिष्ठिरे सैन्ये वहयो मानया हता । दन्तिनः सादिनश्चैव रथिनोथ हयास्तया । ८६ ॥ तत्रमारत भीष्मस्य रणे दृष्ट्वा पराक्रमम् । अत्यद्भुतमपश्याम शस्येव पराक्रमम् ॥ ८७ ॥ तयैव भीमसेनस्य पार्वतस्पच भारत। रौद्रमासीद्रणे युद्धं सात्य फस्यच धन्विनः ॥८८॥ एप्ट्या द्रोणस्य विकात पाडवानुभयमा विशत् । एफ एव रणे शकोनिहन्तु सर्व सैनिकान् ॥ ८९ ॥ किं पुनः पृथिया शरैयोधनात समावृतः । इत्यनन महाराज रणे द्रोणेन पीडिता ॥९०॥ वर्तमाने तथा रोट्टै समामेभरतर्षभ । उभयोः सनयोःगूरा नामृप्यन्त परस्परम् ॥९१॥ भाविप इव युध्यन्ते रामतामहावलाः । तायका.पाण्ड इसी रीति से उसयुद्ध में प्राणों को होमकर सूजी लोगों ने आपके शूरवीरों को पर- सर में मारा, नंगेशिर कवचों से रहिन स्थहीन टूटे धनुष परस्परमें भिड़े हुये शूरवीर. भुजामों से युद्ध करनेलगे, इसीप्रकार युद्ध में पांडवों की सेनाको कंपाते हुये पर न्तप भीमनी ने मर्म भेदी वाणोते महाराधियोंको मारा ८५। उनभीप्मनी के हायमे युधिष्ठिरकी सेनाके बहुत से रथ हाथी घोड़े नबार और पदाती मारेगये, हे भरत वंशी वहां हमने भीम के पराक्रमको देखकर इन्द्र के समान उसके अपूर्व बलको नाना और इस प्रकार में युद्ध में भीमसेन धृष्टद्युम्न और धनुरि सात्यकीकाभी पुदमहा भयानक हुआ, फिर द्रोणाचार्य के पराक्रम को देखकर पांडवों में इस प्रकारका महाभय उत्पन्न हुआ कि यह अकेलेही द्रोणाचार्य सत्र सेनाओं के मार ने को समर्थ है तो सवपृथ्वी के बड़े २ पराक्रमी शूरवारों ममेत कैसे न होंगे हे भरतपम इसीते से घोरयुदहोने पर दोनों ओरके शूरवीर लोग परस्पर में प्रस हिष्णु होकर तुम्हारे और पांडवों के शूरक्षत्री राक्षमादि अनेक प्रकारके घोर Bhishm' Seeing the gicat prowess of Blislın, we thought him to be equal in slength to Iudra. In the same manger, Bhimsen, Dhrishtadyumn and Satyabi the great archer fought very bravely. At the sight of the brave deeds of Diona barya the Pandav armies were so terrified that they thought him alune capal le of destroying all the arnies and was saio to destroy them all with the assistance of the famous warriors of the world \!}ien tlic battle was thus rag'oz, the Warriors on botir sides fouglit rechlessly. Your Karriers and those of the Pandavas fought hard in the manner of rasshases and others, (७६३) भीमप Bhishtha Tarv [4763) राजंस्तव तेषांच संकुले ॥ ८१ ।' अजानन्नर्जुनद्यापि निहतं पुत्रमौरसम् । जघान समरे शूरान् रामस्तान् भीष्म रक्षिण. ॥ ८५ ॥ तथैध तावमा राजन् सायाश्च सहसूश. । जुड्वतः समरे प्राणानिजघ्नुरितरेतरम् ॥ ८३ ॥ मुक्त फेशी विफवचा विरयाश्निका मुका । वाहुभिः समयुध्यन्त सम वेता. परस्परम् ॥८४ ॥ तथा मर्मातिगभीमो निज भाग महारथान् । कम्पयन् समरे सेनां ,पाण्डवानांपरतपः ॥ ८५: ॥ तेन यौधिष्ठिर सन्ये बहवो मानचा हता । दन्तिनः सादिनश्चैव रथिनाय हयास्तथा ॥ ८६॥ तत्रमारत भीष्मस्य रणे दृष्ट्वा पराक्रमम् । अत्यद्भुतमपश्याम शक्रस्येव पराक्रमम् ॥ ८७ ॥ तथैव भीमसेनस्य पार्षताच भारत।रौद्रमासोद्रणेयुद्ध सात्य फस्यच धन्विन ॥८॥ राष्ट्रवा द्रोणस्य चिकात पाड्यान भयमा विशत् । एफ एव रणे शकोनिहन्तु सर्व सैनिकान् ॥ ८९ ॥ किं पुन पृथिया शूरैयोधवातै समावृतः । इत्यग्रन् • महाराज रणे द्रोगेन पीडिता ॥९॥ वर्तमान तथा रौद्रे सग्रामेभरतर्षभ । उभयो सेनयो शूरा नामृप्यन्त परस्परम् ॥९॥ भावि इव युध्यन्ते रक्षोस्तामहाबलाः । तायका.पाण्डधे इमी रोति से उसयुद्धमें प्राणों को होमकर जी लोगों ने प्रापके शूरवीरों को पर- सर में माग, नंगेशिर फवचों से रहिन रथहीन । धनुप परस्परमें भिड़े हुये शूरवीर. भुनामों से युद्ध करनेलगे, इसीमकार युद्ध में पांडवों की सेनाको कंपाते हुये पर तप भीमनी ने मर्म गेदी वाणोंसे महारथियोंको मारा १८५। उनभीष्मनी के हाथमे युधिष्ठिरकी सेनाके बहुत से रथ हाथी घोड़े सवार और पदाती मारेगये, हे भरत वशी बही हमने भीम के पराक्रमको देखकर इन्द्रके समान उसके अपूर्व बलको नाना और इस प्रकार में युद्ध में भीमसेन धृष्टद्युम्न और धनुर्धार सात्यकीकाभी युदमहा भयानक हुआ, फिर द्रोणाचार्य के पराक्रम को देखकर पांडवों में इस मकारका महाभय उत्पन्न हुआ कि यह अकेलेही द्रोणाचार्य सब सेनाओं के मार ने को ममर्थ है तो मयपृथ्वी के बड़े २ पराक्रमी शूरवीरों ममेन कैसे न होंगे हे भरतर्षभ इमरीति से घोरयुदहोने पर दोनों ओरके शूरवीर लोग परस्पर में प्रस हिगा होकर तुम्हारे और पांडवों के शूरक्षत्री राक्षसमादि अनेक प्रकारके धौर . Bhuislın' Seeing the grcat prowess of Bluslim, we thought him to Iso equal in slengtli to Indra In the sanie umger, Blusen, Dirishta- (lyumn and Satyali the g? cat nicher fought very bravely At tho sight of the brave deeds of IDhonacharya the Pandav arres were so terrified that they thought luin alone capal le of destroying all the armies and was solo to destroy the in all with the assistance of the famous warriors of the world Il lien thc battle was thus ing nz, the Warriors on both sides fought sechlessly You Harriors and thoso of the Paninvas fought had in the manner of ralshuses ond olliers.

(४७६३) #ga Bluislina t'aiv [17633 राजस्तय तेपांच सकुले ॥ ८१ !' मनानन्तर्जुनधापि निहत पुत्रमौरसम् । जवान समरे शूरान् रामस्तान भीष्म रक्षिण ॥ ४५ ॥ तथैव तावका राजन एण्याच सहसूश. । जुयत. समरे प्राणानिजध्नुरितरेतरम् ॥ ८ ॥ मुक्त फेशा विकाचा विरयामिका मुंका । वाभि. समयुध्वम्त सम वेता परस्परम् ॥८॥ तथा मर्मातिगभीमो निज धान महारथान् । कम्पयन् समरे सेनां पाण्डवानांपरतप ॥ ८५॥ तेन यौधिष्ठिरे सेन्ये बहवो मानवा हता । दन्तिन. सादिनव रथिनाथ हयास्तथा ॥ ८६ ॥ तत्रमारत भीष्मस्य रणे दृष्ट्वा पराक्रमम् । अत्यभुतमपश्याम शक्रस्येव पराक्रमम् ॥ ८७॥ तवैन भीमसेनस्य पार्वतस्पच भारत।रौद्रमासीद्रणेयुद्ध सात्य फस्यच घन्विन ॥८॥ एटवा द्रोणस्य विकात पाडवान् भयमा विशत् । एफ एव रणे शकोनिहन्तु सर्व सैनिकान् ॥ ८९ ॥ किं पुन पृथिया शूरैयोधनात समावृतः । इत्यनन महाराज रणे द्रोगेन पीडिता ॥५०॥ वर्तमाने तथा रौदै सग्रामेभरतर्षभ । उभयो सेनयो शूरा नामृप्यन्न परस्परम् ॥२१॥ माविशं इच युध्यन्ते रक्षोभूनामहावला । तायका पाण्डघे | इसी रीति से उसयुद्धमें माणों को होमकर मृजी लोगों ने भापके गृरवीरों को पर- सर में पाग, नगेशिर फवचों से रहिन रथहीन टूटे धनुष परस्परमे भिड़ेहये शूरवीर भुजाओं से युद्ध करनेलगे, इसीप्रकार युद्ध में पांडवों की सेनाको कपाते हुये पर तप भीमनी ने मर्म मैदी वाणोंसे महारथियोंको मारा [८५। उनीष्मनी के हादसे युधिष्ठिरकी सेनाके बहुत से रथ हाथी घोड़े सवार और पदाती मारेगये, हे भरत वंशी वहां हमने भीम के पराक्रमको देखकर इन्द्र के समान उसके अपूर्व बलको जाना और इस प्रकार से युद्ध में 'भीमसेन धृष्टद्युम्न और धनुरि सात्यकीकाभी युद्धमहा भयानक हुआ, फिर द्रोणाचार्य के पराक्रम को देखकर पांडवों में इस प्रकारका महाभय उत्तम हुआ कि यह अकेलेही द्रोणाचार्य सब सेनाओं के मार ने फो समर्थ है तो सवपृथ्वी के बड़े २ पराक्रमी शूरवारों मर्मत कैसे न होंगे हे भरतर्षभ इसीते से घोरयुदहोने पर दोनों ओरके शूरवीर लोग परम्पर में अस हिष्णु होकर तुम्हारे और पांडवों के शूरक्षत्री राक्षसादि अनेक प्रकारके घोर Bislım Seeing the great prowess of Bluslim, we thought him to Lo equal in stengtli to Indra lu the sanje manger, Bhimsen, Danishta. dyumn and Satyalı the great archui fought very branely At the sight of the blare deeds of Diona haya thu Panduv armies were so terrified that they thought ium alone capalli of destroj m, all the ar- 111ics and was suio to destroy them all with the assistance of the famous warriors of the world Il lieu the battle was thu3 128 R2, the Warriors on both sides fought recklessly Your Farriors and thooo of the Pandavas fought bard in the manner of raishists and others.

-~ (४७६३) भीमपर्व Bhishina tar [47633 राजस्तय तेरांच संकुले ॥ ८१ |" अजानन्तर्जुनचाप निहतं पुप्रमौरसम् । जघान समरे शूरान् रामस्तान् भीम रक्षिणः ॥ ८५ ॥ तथैध तावका राजन् सायाश्च सहसः । जुध्यतः समरे प्राणानिजघ्नुरितरतरम् ॥ ८३ ॥ मुक फेशा विकरचा विरया छिनका मका । वाभिः समयुध्यन्त सम वेता. परस्परम् ॥८४ ॥ तथा मर्मातिगीमो निज धान महारथान् । कम्पयन् समरे सेनां पाण्डवानांपरंतप. ॥ ८५ ॥ तेन यौधिष्ठिर सन्य यहयो मानया हता । दन्तिनः सादिनचैव रथिनोथ हयास्तथा ॥८६॥ तत्रमारत भीष्मस्य रणे दृष्ट्वा पराक्रमम् । अत्यद्भुतमपश्याम शक्रस्येव पराक्रमम् ॥ ८७॥ तयैव भीमसेनस्य पातहाच मारत रौदमासीदणेयुद्ध सात्य फस्यच धन्विन. ८८t दृष्टया द्रोणस्य पिकात पान्डधान्भयमा विशत् । एफ एय रणे शक्तोनिहन्तु सर्व सैनिकान् ॥ ८९॥ किं पुनः पृथिया शयर्योधनात समावृतः । इत्पनन् - महाराज रप ट्रांगेन पोहिता- ॥१०॥ वर्तमाने तथा रोदै मंग्रामेमरतपम । उभयोः सेनयोरा नामृप्यन्त परस्परम् ॥९॥ सावित इव युध्यन्ते रक्षामनामहायलाः । तायफाःपाण्डधे इमी रात मे उनयुद्धमें प्राणों को होमकर मूंजी लोगों ने भापके शूरवीरों को पर- सर में पाग, नंगेशिर फयचों मे रहिन रथहीन टूटे धनुष परस्परमें भिड़े हुये शूरवीर. भुनामों से युद्ध करनेलगे, इसीप्रकार युद्ध में पांडवों की सेनाको कंपाते हुये पर नप भीमनी ने मर्म गेदी वाणोंमे महाराधियोंको मारा |८५1 उनभीष्मनी के हाथों युधिष्ठिरकी सेनाके यहुन से रथ हाथी घोड़े मबार और पदाती मारेगये, हे भरत वंशी वही हमने भीम के पराक्रमको देखकर इन्द्र के समान उसके अपूर्व बलको जाना चार इन कार में युद्धमें भीमसेन घृद्युम्न और धनु र सात्यकीकाभी युदमदा भयानक हुआ, फिर द्रोणाचार्य के पराक्रम को देखकर पांडवों में इस प्रकारका महाभय उत्सम हुआ कि यह अकेलेही द्रोणाचार्य सब सेनामों के मार ने फो ममर्थ है तो मयपृथ्वी के बड़े २ पराक्रमी शुरवारों ममेन कैसे न होंगे हे भरतपम इमरीीते मे घोरयुदहोने पर दोनों मोरके शूरवीर लोग परम्पर में प्रस हिष्णु होकर तुम्हारे और पांडवों के शूरक्षत्री रातमादि अनेक प्रकारके घोर Bhitlin Sesing the great prowess of Bliislını, he thought him to becqunl ın slength to Indra In the sanic inauger, Bhimsen, Dbrishtadyumn and Satyabi the great alther fought very brarely. At the sight of the brave deeds of Dionucliai ya the Prudny armies were 50 terrified thint they thought him alone capal le of destinying all the ar Inics and kas sulo to destroy them all with tho assistance of tho famous warriors of the world When the buttle was thus ragne, the Warriors on botir side ſought in ssly. Your warriors and thoso of tiie Pandavas fought hard in the manner of rabshases and others.

(४७६३) Aliaga Blislitna l'any [17633 पजस्तव तेपांच संकुले ॥८१ ।' अज्ञानन्तर्जुनश्चापि निहतं पुत्रमौरसम् । जयान समरे शूरान् रामस्तान् भीष्म रक्षिणः । ८५ ॥ त थैध तावका राजन सायाश्च सहसूशः । जुवतः समर प्राणाग्निजधनुरितरेतरम् ॥ ८३ ॥ मुक फेशा विकवचा चिरथा निफा मुंफा. । वाभिः समयुध्यन्त सम वेताः परस्परम् ॥ ८४ ॥ तथा मर्मातिगीणो निज पान महारथान् । कम्पयन समरे सेनां पाण्डवानांपरंतप. ॥ ८५ ते योधिष्ठिर सन्ये वहयो मानवा इता । दन्तिनः सादिनश्व रथिनाथ हयास्तथा ॥ ८६॥ तत्रमारत भीष्मस्य रणे दृष्ट्या पराक्रमम् । अत्यभुतमपश्याम शक्रस्येव पराक्रमम् ॥ ८७ ।। तथैव भीमसेनस्य पार्यतस्पच भारत। रौद्रमासोद्रणेयुद्ध सात्य फस्यच धन्विनः ॥८॥ एप्टवा द्रोणस्य विक्रात पाडवान्भयमा विशत् । एफ एव रणं शकोनिहन्तु सर्व सैनिकान् ॥ ८९ ॥ किं पुनः पृथिया शरैयोधनात समावृतः । इत्यमन् महाराज रणे द्रोगेन पीडिता ॥९०॥ वर्तमाने तथा रोदै संग्रामभरतपम । उभयोः सेनयोगरा नामृप्यन्न परस्परम् ॥९॥ मावि इव युध्यन्ते रक्षामतामहावलाः । तायका. डषे इसी रोति से उसयुद्धमें प्राणों को होमकर मुंजी लोगों ने प्रापके शूरवीरों को पर- सर में मारा, नंगेशिर कवचों से रहिन रथहीन टूटे धनुष परस्परमं भिड़ेहये शूरवीर. भुनामों से युद्ध करनेलगे, इसीप्रकार युद्ध में पांडवों की सेनाको कंपाते हुये पर तप भीष्मनी ने मर्म भेदी वाणोंते महाराधियोंको मारा ८५। उनीप्मनी के हाथसे युधिष्ठिरकी सेनाके बहुत से रथ हाथी घोड़े सवार और पदाती मारेगये, हे भरत वंशी वहां हमने भीम के पराक्रमको देखकर इन्द्रके समान उसके अपूर्व वलको जोना धार इस प्रकार से युद्ध में भीमसेन धृष्टद्युम्न और धनु र सात्यकीकाभी युद्धमहा भयानक हुआ, फिर द्रोणाचार्य के पराक्रम को देखकर पांडवों में इस प्रकारका महाभय उत्सम हुआ कि यह अकेलेही द्रोणाचार्य सव सेनाओं के मार नको समर्थ है तो सवपृथ्वी के बड़े २ पराक्रमी शूरवारों समेत कैसे न होंगे हे भरतर्षभ इसीते से घोरयुदहोने पर दोनों ओरके शूरवीर लोग परम्पर में प्रस हिष्णु होकर तुम्हारे और पांडवों के शूरक्षत्री राक्षमआदि अनेक प्रकारके घोर Bhishme. Seeg the great prowess of Bluslimi, tre thought him to be equal m slength to Iudra Iu the same manner, Bliimset, Darishtadyumn and Satyabi the yi dat archer fouglt rery bravely. At the biglt of the brave deeds of Dronacharya the Pandav armies were so te rifitd that they thought fum alone capal le of destroying all the arnies and as solo to destroy them all with the assistance of tho famous warnors of the world Wilun the battle was thus ragnt, the warriors on both sides fought rechlessly. Your Farriors and thoso of the Pandavas fought kiazd in the inaoner of raashuises and others.

(४७६३) frango Bhishma t'art [1763] राजस्तय तेषांस संकुले ॥ ८१ ।' अजानन्न नचापि निहतं पुप्रमौरसम् । जघान समरे शूरान् रामस्तान भीष्म रक्षिणः ॥ ८५ ॥ तथैव तायका राजन् सायाध सहस्रशः । जुड्वतः समरे प्राणाग्निजनुरितरेतरम् ॥ ८३ ॥ मुक्त फेशा विफवचा विस्या छिसफा मुका. । वाहुभिः समयुध्यन्त सम घेता. परस्परम् ॥८४ ॥ तथा मर्मातिनीपो निज धान महारथान् । कम्पयन् समरे सेनां पाण्डवानांपरंतपः ॥ ८५ ॥ तेन यौधिष्ठिरे सल्ये वहयो मानया हता दिन्तिनः सादिनश्चैव रथिनोष हयास्तथा ॥ ८६ ॥ तत्रभारत भीष्मस्य रणे दृष्टवा पराक्रमम् । अत्यभुतमपश्याम शकस्थेव पराक्रमम् ॥ १७ ॥ तथैव भीमसेनस्य पार्वतरच भारता रौद्रमासीद्रणेयुद्ध सात्य फस्यच धन्विन. 11८८ एएवा प्रोणस्य विक्रात पाडवानुभयमा विशत् । एफ एव रणे शकोनिहन्तु सर्व सैनिकान् ॥ ८९॥ किं पुनः पृथिया शरयोधनात समावृतः । इत्यनन्-महाराज रणे द्रोगेन पीडिता ॥५०॥ वर्तमान तथा रौद्र संग्रामेमरतपम । उभयोः सेनयोरा नामृप्यन्त परस्परम् ॥९१|| थाविधा इव युध्यन्ते रक्षामनामहायलाः । तायफा:पाण्ड इसी रीति से उसयुद्ध में प्राणों को होमकर मूंजी लोगों ने भापके शूरवीरों को पर- सर में माग, नगेशिर कवचों से रहिन रथहीन दृटे धनुष परस्परमें भिड़ये शूरवीर. भुनामों से युद्ध करनेलगे, इसीमकार युद्ध में पांडवों की सेनाको कंपाते हुये पर तप भीमनी ने मर्म भेदी वाणोंमे महारथियोंको मारा ८५। उनमीप्मनी के हाथमे युधिष्ठिरकी सेनाके बहुत से रथ हाथी घोड़े मवार और पदाती मारेगये, हे भरत वंशी वही हमने भीम के पराक्रमको देखकर इन्द्र के समान उसके अपूर्व बलको जाना और इस प्रकार में युद्धमें 'भीमसेन धृष्टद्युम्न और धनुरि सात्यकीकाभी युदमही भयानक हुआ, फिर 'द्रोणाचार्य के पराक्रम को देखकर पांडवों में इस प्रकारका महाभय उत्तम हुआ कि यह अकेलेही द्रोणाचार्य सब सेनाओं के मार ने को ममर्थ है तो सबथ्वी के बड़े २ पराक्रमी शूरवारों ममेन कैसे न होंगे हे भरतर्षभ इमरीति से घोरयुदहोने पर दोनों ओरके शूरवीर लोग परम्पर में प्रस हिष्णु होकर तुम्हारे और पांवों के शूरक्षत्री राक्षमयादि अनेक प्रकारके घोर Bhishm' Seeing the great prowess of Bliislim, me thought him to be equal in slength to Indra In the same zanger, Bhimsen, Darishtadyumn and Satyabi the great archer fought very bravely. At the night of the brave deeds of Dionachai ya the Panday armies sere terrified tlıat they thought Juni alone capal le of destroying all the ar. mies and was saio to destroy them all with the sussistance of the famous warriors of the world Il ben tlic battle was the rag'ne, the Warriors on botin sides fougiit recklessly Your warriors and triose of the Pandavas fought hard in the minaner of makslases and others.

[4702] Mahabharat (४७६२) | ताशी मायां राक्षसस्य तुरात्मन ॥७१ ॥ इरावानपि संक्रुद्धो मायां सृष्टुं प्रचक्रमे । तस्य शोधाभि भूतस्य समरेप निवर्तिन ॥ ७२ ॥ योन्वयो मातृकस्तस्य स एनमभि पेदिवान् । स नागपहुनी राजन् निराजानु संवृतो रणं ॥ ७३ ॥ दधार सुमहदूपमनन्त इव भोगवान् । ततो पछुविधर्नागेश्छादयामास राक्षसम् ॥ ७४ ॥ छाद्यमानस्तु नागः सध्यात्या राक्षसपुंगवः 1 सौपर्ण रूपमास्थाय भक्षयामास पनगान् ॥ ७५ ॥ मायया भक्षिते तस्मिन् नन्वये तस्य मातृके । विमोदित मिरावन्त न्यहनद्राक्षसोसिना ||७६॥ सकुण्डलं समुकुटं पनेन्दुसरशप्रभम् । इरावन शिरो रक्ष पातयामास भूतले ॥ ७७ ॥ तस्मिस्तु तिहते धीरे राक्षसेनार्जुनात्मजे । विशोका समपद्यन्त धार्तराष्ट्रा-सराजकाः ॥ ७८ ॥ तस्मिन् महति संग्रामे तादृशे भैरवे एनः । महान व्यतिकरों घोर सेनयोः समपद्यत ।। ७९ ॥ गजा हयाः पदाताश्च विमिश्रादन्ति भिर्हताः। रथाश्या दन्तिनवैध पत्तिभिस्त मदिताः ॥ ८० ॥ तथा पसिरथौचाश्च याश्च बहवो रणे । रथिमिनिहता हे राजा बहुतसे सोसे युक्त उस इरावान ने शेपनाग के समान अपने "महान रूप को धारण किया और अनेक नागों में उसराससको घेरा, फिर उस राक्षसों में श्रेष्ठने अपना गहरूप धारण करके उनघिरेहुए सपाको सायाँ वा माया से उमके ननसारी सपीके भक्षणहोजानेपर वह इरावान् अचेत हुआ फिर उस अत्यन्त मोहित इरावान् को राक्षस ने खड्ग से मारकर उसके कुंडल मुकुटधारी चन्द्रमाके समान | प्रकाशमान शिर को पृथ्वीपर गिराया उमराक्षसके हाथ से उस इरावान के मरने पर धृतराष्ट्र के सय पुत्र शोकसे निवृत्त होकर बड़े प्रसगडुए, फिर उस भयकारी महायुद्ध में दोनों सेनाओं का घोर नाश होना प्रारंभहुआ रथ हाथी घोड़े पदाती सवार वह सब परस्पर में युद्ध कर करके और पत्तियों के हाथों से नाशको माप्तहुये । ८० । इसी प्रकार उसतमुल युद्ध में भापके और उन्होंके भनेक घोड़े पति और रथियों के समूह रथियों के हाथों से मारे गये, और उस पुत्रको मृतक न जाननेवाले भर्जुन ने भी भीष्मनी के रक्षा उन शूरवीर राजाओं को मारा Inaran by thc raksling all the sons of Dinitraslıtra relieved of run 0%, were much pleased. Then in that dicadlul war a terriblo destruction of armies began. Chariots, elephants, horses and loot soldliers were | destroyed by the warriors In that dieadtul battle the horses, wat riors and cla inteers of by th sides word destroyou by the charioteers.80. Not knowing of tho death of his son, Arjun too, destroyed the who protectel Buslim. The Shinjayas, HAcrificing their lives in trial print binttle, destroyel yo ir mann.ors. Warriors destitute of helıncts, Arangure, chvints anul 1o1rz. fought against one another with fiste. Susing the Pandira"!!!lºs, mighty B'sishm billed the carriola willi hip arror perring the sital pnrisb5 sinuy tiinteers, elephantir dara, liortam fim's my or Yurdiislit'iir's army were d:stroyed logo । princes --..

ANN (४७६३) भीमपर्व Bhishtna Tarr [4703] राजंस्तव तेषांचं संफुले ॥,८१ ॥ अजानन्न नथापि निहतं पुत्रमौरसम् । जघान समरे शूरान् रामस्तान् भीम रक्षिणः ॥ ८॥ तथैध तावका राजन् सायाश्च सहसूशः । जुहवतः समरे प्राणाग्निजघ्नुरितरेतरम् ॥ ८३ ॥ मुक्त फेशा विकवचा विरया छिनाफा मुंका. बाहुमिः समयुध्यस्त सम घेताः परस्परम् ॥८४ ॥ तथा मर्मातिगर्भाप्मो निज धान महारथान् । कम्पयन समरे सेनां ,पाण्डवानांपरंतपः ॥ ८५: । तेन यौधिष्ठिरे सन्ये बहवो मानवा हता दिन्तिनः सादिनचैव रथिनाथ हयास्तथा ॥ ८६ ॥ तत्रमारत भीष्मस्य रणे दृष्ट्वा पराक्रमम् । अत्याभुतमपश्याम शक्रस्येव पराक्रमम् ॥ ८७ ॥ तवैव भीमसेनस्य पार्वतश्च भारतारौद्रमासोद्रणयुद्धं सात्य फस्यच धन्विनः ॥८॥ एप्या प्रोणस्य विक्रांतं पान्डयान भयमा विशत् । एफ एव रणे शकोनिहन्तु सर्य सैनिकान् ॥ ८९ ॥ फि पुनः पृथिया शूरैयोधनाते समावृतः । इत्यनन् -महाराज रणे द्रोणेन पीडिता ॥o वर्तमाने तथा रौदै संग्रामेमरतर्षभ । उभयोः सेनयोरा नामृप्यन्त परस्परम् ॥११॥ भावि इव युध्यन्ते रक्षामनामहायलाः । तायकाःपाण्डघे इमी रीति मे उसयुद्ध में प्राणों को होमकर पुँजी लोगों ने प्रापके शूरवीरों को पर- सर में मारा, नगेशिर फरचों से रहिन रथहीन ट्रे धनुष परस्परमें भिड़े हुये शूरवीर. भुजामों से युद्ध करनेलगे, इसीप्रकार युद्ध में पांडवों की सेनाको कंपाते हुये पर तप भीप्यमी ने मर्म भेदी वाणोंसे महारथियोंको मारा ८५। उनभीष्मजी के हाथ युधिष्ठिरकी सेनाके बहुत से रथ हाथी घोड़े मबार और पदाती सारेगये, हे भरत वंशावही हमने भीम के पराक्रमको देखकर इन्द्र के समान उसके अपूर्व पलको जाना और इस प्रकार में युद्ध में 'भीमसेन धृष्टद्युम्न और धनुर्दार सात्यकीकाभी युदमही भयानक हुआ, फिर द्रोणाचार्य के पराक्रम को देखकर पांडवों में इस प्रकारको महाभय उत्पहुंआ कि यह अकेलेही द्रोणाचार्य सब सेनाओं के मार ने फो ममर्थ है तो मवथ्वी के बड़े २ पराक्रमी शूरवारों ममेत कैसे न होंगे हे भरतर्षभ इमरीति से घोरयुदहोने पर दोनों ओरके शूरवीर लोग परम्पर में प्रस हिप्न होकर तुम्हारे और पांडवों के शूरक्षत्री राक्षममादि अनेक प्रकारके घोर . Bhishnt. Seeing the gicat prowcss of Bliislim, we thought him to the equal in stength to Indra. In the same manner, Bhimsen, Dhrishtadyumn and Satyali the gicat archer fought very bravely. At the sight of the brave deeds of Drona liorya the Pandav armies were so terrified that they thought him alone capal le of destroying all the armies and was suio to destroy them all with the assistance of the famous warriors of the world en tlic battle was thus ing'ną, tho warriors on both sides fought iechlessly. Your Warriors and those of the Pandavas fought hard in the manner of rakshases and others.

[4761] Malinbharat (४७६५) याध संरब्धास्तात धन्विनः ॥ ९२ ॥ नस्म पश्यामहे कंचित् प्राणान्यापरिक्षति । संग्रामे दैत्यसंकाशे तस्मिन् वीरवरक्षये ॥ २३ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भमिवधपर्वाण अष्टमदिवसयुद्धे एकनवतितमोऽध्यायः ॥९॥ धृतराष्ट्र उवाच । इरावन्तन्तु निहत दृष्ट्या पार्थामहारथाः। संग्रामे किमकुर्वन्त तन्ममाचक्ष्व सन्जय ॥ १ ॥ सञ्जय उवाच । इरावन्तन्तु निहतं संग्रामे वीक्ष्यराक्षस । पनदत सुमहानादं भैमसेनिर्घटोत्कचः ॥ २ ॥ नदतस्तस्य शब्देन पृथिवीसागरा- भ्यरा । स पर्वतवना राजश्वचाल सुभृशं तदा ॥ ३ ॥ अन्तरीक्षं दिशश्चैव साथ प्रदिशस्तथा । तं श्रुत्वा सुमहानादं तव सैन्यस्य भारत ॥ ४ ॥ अरुस्तम्भ समभवंद्र पथुः स्वेद एयच । सर्व पय महाराज तावका दीनचेतसः॥ ५ ॥ सर्वतः समवेष्टन्त पुद्ध करते हैं हमने उस देव दानवों के युद्धकी समान संग्राममें किसी को ऐमा न देखा जो अपने प्राणों की रक्षाकरताहो ९३ ।। अध्याय १२॥ धृतराष्ट्र बोले कि युद्धमें इरावान् को मरा देखकर पांडवों ने क्या किया उक्त | को मुझ से कहो, संजयवोले कि भीमसेन का पुत्र घटोत्कच राक्षस उस इरावानको 'युद्धमें मराहुमा देखकर महाध्वनि से गर्जा, उसकी गर्जना से पर्चत और समुद्रों समेत पृथ्वा चलायमान हुई, और दिशा विदिशाओं समेत आकाश भी शब्दापमान हुमा और उस महाघोर शब्दको मुनकर भापकी सेना में भी सबको मस्वेद हुआ और सब पीर महाखेदित होकर सब ओरसे ऐसे भयभीत हुए जैसे कि सिंहसे भयभीत हाथी होते हैं, उम राक्षस ने इसघोर शब्दको करके, महाज्वलित रूप Wo saw none cæring for lus vifo na that buttle like thiat of thogols and to dan03 CILJPTER XCII " Tell me Sanjaya," ashed Dhrntrshtha, whor the Pandavas bohovel nt seeing Irawan deall." • Bhini's som, Ghatotkach tho palet'144," repliel Sanjaya, "rorral a loud for at tho death of Irnvan To cartlı with lier routitains and scate trembled with his rair, and all this direction in the sky rang with the echo. Tlio bodies of you" wmos reto cosered with streat to hear that drond. fal sound. The warriors of yeur army were afraid of that sound is el pianta nro at the of a lios Hiving indo that rour élio nkhas lifti *p ar, nnl in a nurul form, cccompanied by ormel sesias, caramel liko Datli, Ingen to atrikc Seeing that 93 UP (४७६५) Ár 78 Bhishma Pary [ 4705] सिंहान्नीता गजा व नुमहानावं निर्यातमिव राक्षम.॥ ६ ॥ ज्वलितं शूलमुघन्य रूपं कृत्या विमीपण नानारूपप्रहरगतो राक्षसपुगने.॥ आजघान सुसं ऋद्धः कालान्तमयमोपमः तमापतन्तं मम्प्रेस्य संक्रुद्ध भीमदर्शनम् ॥ ८ स्वं घलञ्च भयात्तस्य प्रायशो विमुखीकृतम् । ततो दुय्योधनोराजा घटोत्कच मुपाद्रवत् ॥ ९ ॥ 1 प्रगृह्य विपुलं चापं सिंह घद्वयनदन्मुहु । पृष्ठतोनुययी चैन, प्रवद्भिः पर्वतोपर्मः ॥ १० ॥ कुञ्जरर्दशसा- हंन्नैहानामधिपः-स्वयम् । तमापतन्तं संम्प्रेक्ष्य गजानीकेन संवृतम् ॥ १ ॥ पुत्रंतप महाराज चुफोप स निशाचरः । ततः प्रववृते युद्ध तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ १२ ।। राक्षसानाञ्च राजेन्द्र दुर्योधनवलस्यच । गजानीकन्च सम्प्रेक्ष्य मेघवृन्दामियायेतम् ॥ १३ ॥ अभ्यधायन सुसकुडा राक्षसाः शस्त्रापाणयः । नदन्तो विविधान्नादान्मेघा व सबिधुतः ॥ १४ ॥ शरश कथष्टिनाराचनिनन्तो गजयोधिनः । मिन्दिगलस्तय शूलको धारण कर उग्ररूप होके नाना प्रकार के रूप और शस्त्रधारी राक्षमों को साथलिये काल मृत्यु के समान क्रोधी होकर मारना प्रारंभकिया इसक्रोधयुक्त भया नक रूप राक्षसको आता देखकर, और उसके भयसे अपनी सेना का मुख फेरना देखकर राजा दुर्योधन बड़े भारी धनुपको लेकर सिंह के समान गर्जना करता हुआ घटोत्कचके सम्मुख गया इसके पीछे बंगदेशियों का राजा चलते हुए पर्वता कार दशहजार हाथियों को सायलेकर गया उस हाथियों की सेना समेत आपके पुत्रको देखकर वह राक्षसमहाक्रोधाग्निरूप होगया ।११। फिर रोमहर्पण महातुमुल युद्ध मारहुआ, उस समय राक्षसों से और भापकी सेनासे युद्धहोनेलगा फिर बादलों के समूहों के समान युद्ध में प्रवृत्त हाथियों की सेना को देखकर, विजली से अनेक शास्त्रों को धारण किये हुए बादलों के समान गर्ननाकरत हजारों राक्षस सम्मुखदाडे, माण वरली दुधाराखड्ग नाराच मिन्दिपाल शृल.मुद्गर और परयो angry rakshas of dreadful visage coming total ds him and seeing as well the return of his army by luis fear, Prince Duryodhan took up his heavy bow and with a lion's roar faced Ghatotkach Then the king of Bang with ten thousands of elephents like moving hills, trent to the help of your con. Seeing Duryodhan accompanied by that army of elephants, the rakshas becamered hke fire with anger.11. Thereupon m furious battlo cngued between your armies and the rakshases Spread like a mass of clouds ras the army of elephants to which tho rakshases come armed with weapons like lightning and roaring like thunder. Arrows, spears, double edged swords, naraches, Bhindpals, darts, clubs and battle atas pere used by the aabshases to destroy the riders and bills and trees to destroy the elephants. We saw, O king, olephants with heads broken by the rakshases, falling down on earth with the loss of blood. When the elephants, [4766] Villiant (४७६६) शूलैर्मुद्र सपरश्वधै ॥ १५ ॥ पर्यताप्रैश्च वृक्षश्च निजानुस्ते महागज न् । भिन्नकु भान विरुधिरान मिन्नगात्राश्च धारणान् ॥ १६ ॥ अपश्याम महागज बथ्यमा नाग्निशाचर । सेयु पक्षीयमाणेषु भग्नेषु गजयोधिषु ॥ १७ ॥ दुय्याधनो महारान राक्षसान् ममुपादयत् । अमर्पवशमापन्नस्त्यक्या जीवितमात्मन ॥ १८ ॥ सुमोच निशितान् याणान् राक्षतेषु परन जघान घ महेष्वास प्रधाना स्तत्र राक्षसान् ॥ १९ ॥ सदा भरतश्रष्ठ पुत्रा दुर्योधनस्तव । वेगवन्त महारांद्राषपुजिहध प्रमाथिनम् ॥ २० ॥ शरैश्चतुभिश्च तुरा निजधान महावल । तत पुनरमेयात्मा शरध दुरासदम् ॥ २१ । सुमोच भरतश्रष्ठ निशाचरवलं प्रति । तत्तु दृष्ट्या महत्फर्म तव पुत्रस्य मारिप ॥ २२ ॥ साधनाभि प्रज-याल.भमसनिमहावल । इत्यादि शस्त्रोंमे हाथियों के सवारों को मारकर उन राक्षसों ने पर्चत और रक्षा से हाथियों को मारा हे राजा हमने राक्षसों के हाथ से दृटेहुए मातकों समेत हाथियों को रुधिर स रदिन होफर मरा हुआ देखा उन हाथी और हार्थवानों के पराजित होने पर, महाकोषरूप होके दुर्योधन प्राने जीवनको आशाका त्यागकर नन राक्षसों के मम्मुतगया हे शनुमनाप उस वहे धनुपधारी दुग्योचन ने वहां जाकर अपने तीक्ष्ण पाणों की वर्षासे बडे २ राक्षसों को मारकर अपने महातीन चारवाणों से | उसमहाभयकर घोररूपवाले घटोत्कचकोघायल किया।२॥फिर वह राक्षस इन्द्रधनुष के समान अपने धनुपको बचकर, वयेगमे दुर्योधन के सम्मुस गया उममृत्यु समान रानस को आता हुआ देखकर भापता पुत्र दुग्योधन पीडामान नहीं हुआ तब अत्यन रक्तनेत्र कोपसे युक्त वह राक्षस इसमे कहने लगा कि भत्रमैं उन अपने माता पिनामे प्रामृण होजाउगा जिनको वि तुझनिर्दयी ने वनवासी किया, और and then nders were vapushed Duryodhan much enraged and duapu 1, of 114 life fuced the a ul shas and u dostroyer of lous the great archior Duty odl an liaving destr jed great the riksliases nith the None of her owe nounded Ghatothach the dreadful rakshas 21 I lien drawing lus lox lil o tlolol of India the ralelins rushedi upon Suryochon loul fen l vi godl an was not dislentoucd ut thd sght Alonlilta comguman lim hle Death adlo latter with eyes I locd red in erger ind -los Trall Do all to satisfy the debt of ins gmrents alemis seu culty vou echt into «xile nid decurt'ully 11000 in osallik Sumul wietc' it x86 you wiolicught froup rdı into cout wille dle wasin licr u cihls << urtca a corigine forn ents Your well rosicr fuoleh Insacliath disregarding my parents abscouded - । (४७६७) 1449 Blu-lım Pars [47Gr] स विस्कार्य मदापमिन्द्राशनिसमप्रमम् ॥ २३ ॥ अभिदुद्राय पंगेन दुय्योधन मरिंदमम् । तमापतन्तसुतीक्ष्य कालराष्टमिवान्तकम् ॥ २४ ॥ न वित्र्यथ महाराज पुनो दुर्योधनस्तच अथैनमत्रवीत् क्रुद्ध क्रोधसरक्तलोचन ॥ २५ ॥ अद्यानृपय गामप्यामि पितृणां मातुरैवच । ये त्वया सुनुशसेन दीर्घकालं प्रवासिता ॥ २६ ॥ यच्च ते पाण्डवाराज छल गते पराजिता । यच्चर द्रौपदी कृष्णा एकवना रजस्वला ॥ ७ ॥ ममामानीय दुई वहुधा फ्रेशिता त्वया । तर व प्रियकामेन आश्रमस्या दुरात्मना ॥ २८ ॥ सन्धयन परामृष्ण परिभूय पितृन् मम । पतेपामपमानानामन्येपाच कुलाधम ॥ २२ ॥ अन्तमद्य गमिष्यामि यदि नोनयन्पस रणे । पर मुस्वा तु हेडिम्यो महाद स्फार्य फार्मकम् ॥ ३० ॥ सन्दश्य दर्शनरीष्ठ सक्फिणी परिसलिहन महता शरवर्षेण धुरधिनमवारत् । पर्वत परिधाराभि प्रावृपाव बलाहक ॥३१॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीप्मवयपर्वणि इरावधे द्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ १२॥ सजयदवाच ततस्तवाणन तुतु सहदान वैरपि । चारयु घिराजेंद्रो यथाय महाद्विप ॥ तत कोवसमा वियोनि श्वसन्निवरनग. । सशयं परमंप्राप्त पुत्रम्तेभरतर्षभ ॥ २ ॥ मुमोचनिशितास्ती पणानाराचान्पं चविंशति । तेऽपतन्स उलसे घूतमें जीता और पापात्मा र्निबुद्धी एकाला रजस्वला कृष्णादापढी को जो | तुमने सभा में लाकर महादःखित किया और तेरे भर्थ चाहनेवाले दुर्बुद्धी जयद्रय ने मेरे पितालोगों को निरादर करके आश्रम में नियत द्रौपदी को पकड़ कर हरण किया हे कुलध्वसी महानीच उन अपराधों का फल में अब तुझको देकर उनका प्रतीकार पाऊंगा, फिर ओठों को चबाकर घटोत्वक ने धनुष को संचार मारे बाणों के दुर्योधन को ऐसे ढकदिया जैसे कि वर्षा ऋतु में बादल जलकी धाराओं से पर्चत को ढक देते हैं ॥ २१ ।। भध्याय ९३ ॥ संजय बोले कि इसके अनन्तर राजा दुर्योधन ने दानवोंसे भी असह्य उन चाणों की वर्षा को ऐमे सहा जैसे कि यहाहाथी पानी की वर्षा को सहलेता है हे भरतवंशी इसक पीछे क्रोधमें पूर्ण सर्प की समान श्वासलेते हुए आपके पुत्रने बड़े with Draupadı from the hermitage into the forest Mean wretch, curse of thy family, I shall now give you the jeward of your viched deeds Then biting his lips in anger, Ghatothach drer bis bon and covored Duryodhan with his allows as clouds lude a hill with the shoker of rain CHAPTER XCIII Sanjaya sard - "Prince Duryodhan bole the shorer of arrows, unbearable by Dastyas, ns an elephant stands under a shower of rain. Then filled in anger and sighing, you son 11 ? great cusponse, dis . 23 [ 4768] Mahabliaiat (४७६८) हसाराजस्तस्मिन् राक्षसपुगवे ॥ ३ ॥ आशी विपाइवरुद्धा पर्वते गंधमादने । सतै र्विद्ध सघन रक्तंप्रभिन्नावकुजर ॥ ४ ॥ दभ्रेमतिविनाशावराश' सपि शिताशन । जमाहव महा शक्ति गिरोणाम दारणों ॥ ५ ॥ सप्रदीप्तांमहोल्कामा मशान ज्वलितामिव । समुदिन्छन्महा वाहुर्जि धासुस्तन यंतव। ६॥ तामुद्यताम मिने स्यवंगानाम धिपस्त्वरन् । कुजर गिरिशकाशराक्षसं प्रत्यचोदयत् ॥ ७ ॥ सनाग प्रवरणाजी बलिना शीघ्रगामिना । ततो दुर्योधनरथस्तं मागं प्रत्यवर्तत् ॥ ८ ॥ रथच वारयामास फुजरेण सुतस्यते । मार्गमावारित दृष्ट्वा राहावंगेनधी मता ॥ ९ ॥ घटोत्कची महाराज क्रोधस रक्तलोचन । उद्यतांता महा शक्ति ताम स्विक्षेपवारण ॥ १. ॥ सतयभिहतो रास्तेन घाष्ट्रप्रमुक्तया। संजातरुधिरो त्पीड पपात चममारच ॥ ११ ॥ पतत्यथगजे चापि वेगानामीश्वरोबली । जवेनसम मिन्दु सन्देइसे युक्त होकर पच्चीस नाराचोंको छोड़ा वह नाराच बाण उस राक्षस परऐसे नाकर गिरे, जैतीक गन्धमादन पर्वतपर क्रोधयुक्त सर्प गिरते हैं उन पाणोंसे घायल मदवाले हाथीक समान रुधिरगिरते, उस मांसाहारी राक्षस ने रामा के मारने का विचार किया और पर्वतोंके चीरने वाली बड़ी बरछी को लिया फिर आपके पुत्र के मारने के लिये उस महाबाहु ने उस महाघोर उलकाके समान प्रकाशमान | बरछी को उठाया उस सपय महाशीघ्रता करने वाले वंगदेशी राजाने उस उठाई वरछी को देखकर पर्वताकार अपने हाथी को उस राक्षस के ऊपर चलाया और उस शीघ्रचलनेवाले हाथी के द्वारा भाप उस मार्ग मे वर्तमान हुमा जिधर दुर्योधन का रथया अर्थात् उस हाथी से अ पके पुत्र के रयको गुप्तकरदिया उस वंगदेशके राना करके मार्गको वन्द देखकर घटोत्वक ने महा क्रोधितहोकर उस उठाई हुई पछी को हाथीपर फेंका।उस बरछी के प्रहार से वह हाथी महापीड़ित होकर charged twenty five arrows which foll over the rakslias like angry sorpents on Gandhinana bills Wounded by those arrows and en. raged like a mad elepliant with the blood dropping down, the can nibal z akshas thought of destroying the ling and took up a spear which could pierce a hill 5. Then that brave Warrior raised up the dreadful openi, bright liho fire, to kill your son Seeing this the king of Bang rushed ngainst Bhim with his olephant huge like hill and cime between him and the churjot of Daryodhan. Seeing the ling, of Bing impeding the way, Ghtotkach in a rage hurlod the spoar at tho elephant which strucl by the dart fell down dead by tlie wound Tho hing of Bang liastenod to jump dosyn from the falling olepkant 10 Duryodhan, seeing the fall of the hugo elophant and the turning bach of the army, as in sh disheartened. And remanboring tho dnties of a warrior slood firinly as a full even when tho soldiers (४७६९) भीमार्य Bhishma Pary [4769 ].1 स्यजगाम धरणीतलम् ॥ १२ ॥ दुर्योधनोपि सम्प्रत्य पतितं घरयारणम् । प्रमग्नम्च चल हया जगाम परमां व्ययाम् ॥ १३ ॥ क्षत्रधर्म पुरस्कृत्य आत्मनश्चामिमानिताम् । प्राप्तेपंक्रमणे राजा तस्थौ गिरिरिवाचल ॥ १४॥ सन्धाय च शितं याणं फालाग्निसम तेजसम् । मुमोच परमकुद्धस्तस्मिन् घोरे निशाचरे ॥ १५ ॥ तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य वाण मिन्द्राशनिप्रमम् । लाययान्मोचयामास महात्मा वै घटोत्कचः ॥ २६॥ भूयध विनना वोमं कोधसंरक्तलोचनः । प्रासयामास सैन्यानि युगान्ते जलदो यथा ।। १५॥ तं श्रुत्या निनदं घोरं तस्य भीमस्प रक्षसः । आचार्यमुपसङ्गम्यमीष्मः शान्तनवोग्रवीत् Imu । यथैप निनदो घोरः भूयते राक्षसरितः । हैडिम्यो युध्यते नूनं राक्षा पुर्योधनेन ह ॥१९॥ नव शक्यो हि संग्रामे जेतुं भूतेन केनचित् । तत्र गच्छत भद्रं पो राजानं परिरक्षत ॥ २० ।। अभितो महाभागो राक्षसेन महात्मना । पतद्धियः परं सत्यं सर्वेषां नः परं. न्तपा. ॥ २१॥ पितामहवचः श्रुत्या त्वरमाणा महारथाः । उसमं अपमास्थाय प्रययुर्थन गिरकर मर गया फिर वह बंगदेशी बलवान् राजाभी बहुत शीघ्र हावी मे उछलकर' पृथीपर पड़ी तीव्रता से गगा, दुर्योधन ने उसागरे हुये बड़े हाथी को और सेनाके हनाने को देखकर बड़े खेदको पाया, और रामा दुर्योधन क्षत्री धर्म को विचार अपने अहंकारको करके सेनाके भाग जानेपर भी पर्वत के समान अचल होकर युद्ध में खड़ागहा, फिर महाक्रोधित होकर बड़े धनुपको बैंककर एकवड़े, तीक्ष्णवाण को उस राक्षस पर छोड़ा।१५। उस इन्द्र पनके समान पातेहुयेवाणको देखकर घटो कचने वड़ी हस्तलाघवतासे निष्फल कर दिया और लालनेत्र करके पड़े क्रोध पूर्वक भयानक शब्द से गर्जा को करके सेना को ऐसा भयभीय कर दिया जैसे कि मलय काल में वादल सबको भयते पाडित करते हैं, उस राक्षस के उसघोर शब्द को मुनकर शांतनु के पुत्र भीष्मजी द्रोणाचाचार्य के पास जाकर वोले कि | यह राक्षसका घोर और भयानक शब्द मुनाजाता है निश्चय करके यह घटोत्कच ही रामादुर्योधन से लड़ताई युद्ध में इस राक्षस को कोई जीव विजय नहीं करसक्ता है आपका श्रेयहो प्रापवहीं जाकर गजाकी सब ओरमे रक्षाकरो।२०। वह महाभाग दुर्योधन बड़े साहसी राक्षससे लड़ताहै है शत्रु संनापियो तुम्हारा और हममवक had left him. Then in a rage drawing his huge but, he dischrged & sharp arrow at the rakshas 15 Seeing that arrow coming towards him like the vajra of India, Ghatotkach made it futile by his swift morement and with eyes red in anger roaring a dreadful roar, terrified tho armies as the clouds of pralaya do Henring the tremendous rour of the rakshas, Bhishım the son of Shantanu came to Didnacharya and Haid, "We hear the deep and dreadful ror of the rakshas, surely Ghatotkach in fighting with Prines Daryodhan, No mortal oan Tadquish the rahslas in battle. Go there in person and protect the king, may you be happy 20. Great Duryodhan is figtiog with the dreadful rakshas. It is our duty to protect the king, O destroyer of [ 4770] Mahabharat (४७) फौरव ॥ २२॥ द्रोण सोमदत्तश्च चाइलीकोय जयद्रथ । कृपो भरिश्रवा शल्प भावन्त्य सवृहद्वल. ॥ २३ ॥ अश्वत्थामा विकर्णश्च चिनसेनो पिविशति । राधा नेफसाहसाये तेपामनुयायिन ॥ २४ ॥ अभिद्रुत परीपसन्त पुन दुर्योधन तव । तदनीफमनाप्य पालितन्तु महारथैः ।२५। आततायिनमायान्त प्रेक्ष्य राक्षससत्तम । नाफम्पत महावाहुर्मनाक इव पर्वत ॥ २६ ॥ प्रगृह्य विपुल चाप शातिभि परिवास्ति । गलमुद्गरहस्तच नानामहरणैरपि ॥ २७॥ तत समभवद्युद्ध तुमुल लोमहर्षणम् । राक्षसानाञ्च मुरयस्य दुर्योधनवलस्य च ॥ २८ ॥ धनुषा कूजता शब्द सर्वतस्तु मुलो रणे । अश्रूयतमहाराज यशाना दह्यतामिव ॥ २९ ॥ अस्त्राणी पात्यमानानां | कवचेषु शरीरिणाम् । शब्द समभवद्राजन् गिरीणामिव भिद्यताम् ॥ ३. । वीरवाहु विस्टाना तोमराणा विशाम्पते । रूपमासीद्वियस्थाना सणामिव सर्पताम् ॥३१॥ भी उत्तमकर्म है पितामहके इसपचनको सुनकर शीघता करनेवाले महारथी द्रोणा चार्य सोमदत्त वाइलीक जयद्रथ कृपाचार्य भूरिश्रवा शल्य अवन्ति का राजा वृहदल अश्वत्थामा विकर्ण चित्रसेन विविंशति और हजारों उनके पीछे चलने वाले स्थ वह सब मिले हुये भापके पुत्र दुर्योधन की रक्षा के लिये वहां गये जहाँ राजादुर्योधन था।२५। फिरवद राक्षसोत्तम महावाहु घोत्कच उस दुर्जय महाधियों से रक्षित मारनेकी इच्छा रखने वाली सेनाको आताहुआ देखकर मेनाक पर्वत के समान भयभीत नहीं हुआ, और शूल मुद्गर आदि अनेकप्रकार के प्रखधारी राक्षसोंसे युक्त घटोत्कच वडे धनुपको खैचकर खड़ाहुमा, फिरघटोत्कच और दुर्योधन की सेना का महारोमहर्पण युद्ध जारी हुआ उस समय हे राजा धनुष की टंकारों के महाकठिन शब्द चारोंभोर से ऐसे मनाई दिये जैसे कि जलते हुये घाँसों के शब्द होत, और शरीर के कवचों पर लगनेवाले अस्त्र शस्खों के भी ऐमे शब्द होतेथे जैसे कि फटे हुये पहाड़ों के महाशब्द होतेहै।३०। हे राजा वीरोंकी भुजाओं से focs ?” (lIcaring thee words of the grandfater, desierous Dronacharya together with Somdatta, Vahik, Jayadrnth, kripacharya, Bhuri Bhrara, Shalya Brahathat the prince of Aranti, Ashrathama, Viharn Chitrsen, Vixioshati and thousands of others riding on chariots, fent to help Duryodlian and reached the place where Durgolhan Then Gutothach the best of rakshases, equing that army protected by those sparriors coming to dertroy him tas not moved liho Jenah hill A 89 stod by ink hascs armed with spaars and clubs, Ghatotbach stood with lns bun amra Thic battlo nas severe between the armies of Guntochack and lussodlian The lard sounds from tho tsaugiog bors nere herri on all sides libe the burning of bamboos and the sounds of striking the respons on the lodius nere like thio rending of morintains. 30 The tornais liurled bi varriors locked like serpents running in the str.Then nuch emageal and rouring dreadfulls, the tobia; up his liu, cut clon with a lialfinoon slaped dart thio was 25 Prince of Takshnsos (४७७१) भीमप Bhishan Pary [47713 ततः परमसंकुलो विस्फार्य सुमहद्धनुः । राक्षसेन्द्रो महायाहुविनदन भैरवं रवम् ॥ ३२॥ आचार्य्यस्थाचचन्द्रेण युद्धविच्छेद फार्मुकम् । सोमस्य मल्लेन ध्वजम्चो मध्य चानदत् ॥ ३३ ॥ पालीफच विमिर्वाणः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे । कृपमेफेन विव्याध चित्रसेनं त्रिभिः शरैः ।। ३४॥ पूर्णायतविरुष्टेन सम्यक्प्राणिहितेनच । जत्रु देश समासाध विफर्ण समताडयत् ॥ ३५ ॥ यपीदत स्थ रथोपस्ये शोणितेन परि प्लुतः। ततः पुनरमेयात्मा नाराचा दश पन्चच ॥ ३६ ।। भूरियास संकुद्धःप्राहिणो. द्भरतर्षभ । त धर्म भित्त्या तस्याशु विविशुधरणीतलम् ॥ ३० ॥ विधिशतेश्च द्रोगेश्व पन्तारी समताडयत् । ती पेततुरथोपस्थे रदमीनुत्सृज्य पाजिनाम् ॥३८॥ सिन्धुराको द्धचन्द्रेण वायहस्वर्णभूषितम् । उन्ममाथमहाराज द्वितीयेनाच्छिनधनुः ॥३९॥ चतुर्मि रय नाराचै रावन्त्यस्यमहात्मनः । जघान चतुरो चाहान् क्रोधसंरक्त लोचनः ॥ ४० ॥ पूर्णायतविस्टेन पीतेन निशितेन च । निर्विमेद महाराज राजपुमं वृहदलम् ॥४१॥ फेंके हुये तोमरोंके ऐसे रूप दिखाई दिये जैसे कि आकाश में चलतेहुये सों के आकार दिखाई देते हैं इसके पाछे अत्यन्त क्रोधरूप भयकारी गर्जना करतेहुये उस राक्षसों के राजा ने बहुतबड़े धनुप को लेकर, अर्द्धचन्द्र नाम घाणमे द्रोणाचार्य के धनुपको काटके भल्ल से सोमदत्त की धजाको तोड़ता हुआ महा गर्जना करके वाह्झाक को तीन पाणने छाती परघायल किया और एक वाणसे कृपा चार्य को तीन वाणसे चित्रसेन को, पायल करके कानतक बँचेहुए घाणसे विकर्णको घायल किया।३५॥फिर वहविकर्ण रुधिर भरे देहसेरयमें बैठा इसके पीछे उस पराक्रमी ने पन्द्रह नाराच भूरिश्रवा पर फेंके वह नाराच उसके कवचको काट कर पृथ्वी पर गिरे, फिर विविंशति और अश्वत्थामा. के सारथियों को घायल किया जिसके मारे बह घोड़ों की रस्सियों को छोड़कर पृथ्वी पर गिरपड़े और अर्दचन्द्र पाणसे राजा सिन्धुके सुनहरी वाराहको और दूसरेवाण से उसके घनुप को काटा, फिर क्रोधं से अत्यन्त रक्तनेत्र ने माने चार नाराों से महात्मा राजा tor of Drouachrya, and cutting dorn with an arror the banner of Somdatt, he wounded Vallik with three arrons in the breast with & loud roar. 'And Founding Kripacharya with one arrow and Chitra-- sen with three he pierced Vikaru with his arrows discharged from liis bow drawn to the ear.35. Blood Rowed down from the sounds of Vikarn seated in the chariot. Then that warrior discharged fifteen arrows at Bhui ishrave and they fell dora on the ground pierciag tlitough bis armour. Then he wounded the chariot drivers of Vivinshati and Ashwathama and they fell down from their seats learing the reins of horses. With a Lalf-moon-shaped arrow be pierced tho Loar of the bing of Sindh ard with acother be cut down his low., Then with eyes red in anger he hulled the four horses of the, Ling o! A tanti with four darte. And with a sharp arrow he [4772] Atababliarat (४७७२) स गाढवितो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् । भृशं क्रोधेन चाविष्टों रथस्थो राक्षसा धिप.१४२|| चिक्षेपनिशिंतांस्तीपणान्छरानाशीविपापनान् । विभिदुस्तेमहाराज शल्य युद्धविशारदम् ॥ ४३॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपधपर्वाण हैडिम्बयुद्धे त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥ संजय उवाच ॥ विमुखीकृत्य सास्तु तावकान् युधि राक्षसः । जिघांसुभरत श्रेष्ठ दुर्योधन मुपाद्रवत् ॥ १॥ तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य राजानं प्रति चेगितम्। अध्यापन जिघांसन्तस्तावका युद्धदुर्मदा. ॥२॥ तालमात्राणि चापानि विकर्पन्तो महारथा । तमेकमभ्यधावन्त नदन्त सिंहसंघवत् ॥ ३ ॥ अथैनं शरवण समन्तात् पर्यवाफिरन् पर्वतं चारिधाराभिः शरदीव बलाहकाः ॥ ४॥ स गाढविद्धो व्यथित स्रोग्रादित इप द्विप. । उत्पपात तदाकाशं समन्ताद्वैनतेयवत् ॥५॥ व्यनदत सुमहानादं जीमूत इव - अवन्तिके चारों घोड़ों को माराहे महाराज फिर बड़े तीक्ष्ण वाणसे राजा हदलको घायल किया वह भी महा घायल होकर रथमें बैठगया फिर राक्षसाधिप घटोकचने साकृति भनेक याणों से राजाशल्यको व्यथित किया ४३ ॥ अध्याय ९४॥ संजय बोले कि फिर वह राक्षस आपके सब योद्धाओं को युद्ध में भगाकर पारने की इच्छा से दुर्योधन के सम्मुख दौड़ा, उस राक्षस को रामा के ऊपर माता दसकर मारने के उच्छावाले युद्ध में दुर्मद आपके भी शूरवीर उसके समुभव दौड़े, यह मर चीर ताल वृत के समान धनुषोंको बँचेहुए सिंहोंके समान गर्जना करते हुए उप अकेले के ऊपर टोड़े, और वाणों की वर्षा से उसको चारों ओरसे ऐसे ढकोदया जो कि शरद ऋतु में बलाहक नाम वादल अपनी जल धारामों से पर्चत को ढक देते हैं।५।दराडमे घायल हाथी के समान वह अत्यन्त घायल घटोत्कचगण्ड़के समान pierced princo Brahadyal uso eat domn much troundcu in his chariot Then Gintotkach tho princo of rakshzscs wounded Shalya willi Eeroral arrous liko serpents" 47. CHAPTER XCIV Sanjngn said:-"llaving put all your warriors to flight, tho ralshas destruus of playing your son ruslied ngrinst him. Seeing liitt coming upwn the prina', your invinciblo variors desirous of slaging lim, linstoned to encounter Tuni. All those marriors with their lors Ishe pur’m trees dratn, rusled upon the makslas alono ronting like lions And in hiny with the shower of their arross as clouds in the cold Season hiden hills Like an cephant wounded by a gond, Ghatothoch much rountled libu Gartir on all sides up in the air und ringing jrang (४७७३) भीमपर्व Bhishmd Pary [47731 शारदः । दिश खं विदिशश्चैव नादयनु भैरवस्वनः ॥ ६ राक्षसस्यतु तं शब्दंशुत्वा राजा युधिष्ठिरः । उवाच भरत श्रेष्ठ भीमसेन मरिंदमम् ॥ ७॥ युध्यते राक्षसो नूनं धार्तराष्ट्रमहारथैः । पथास्य थ्यते शब्दो नदतो भैरवस्वनम् ॥ ८॥ अति भारञ्च पश्यामि तस्मिन राक्षस पुगवे। पितामहश्च संद्ध. पांचालान हन्तु मुद्यतः ॥ ९ ॥ तेषांच रक्षणार्याय युध्यते फाल्गुन परैः । एतज्ज्ञात्वा महाबाहो कार्यद्वयमुपस्थितम् ॥१०॥ गच्छ रक्षस्व हडिम्बं संशयं परमं गतम् । मातुर्वचनमानाय त्वरमाणो वृको दरः ॥ ११ । प्रययौ सिंहनादेन त्रासयन् सर्वपार्थिवान् । बेगेन महताराजन् पर्वकाले ययोदधिः ॥ १२ ॥ तमन्यगात् सत्यति सौचित्तिर्युत दुर्मदः । श्रेणिमान् वसुदानध पुत्र. फास्यस्पचा मिभः ॥ १३ ॥ अभिमन्यु मुसार्थव द्रौपदेया महारथा. 1 क्षत्र देवश्च चारों ओरसे श्रीकाश को उछला, ओर भयानक शब्द करता हुआ दिशा विदिशा ममेत आकाशको शब्दायमान करके शरदऋतु के वादलों के समान महा घोर | गर्जना करने लगा इसके पाछे हे भरतर्पभ उत्त राक्षस के शब्द को सुनकर गना युधिष्ठिर शत्रु विजयी भीमसेन से वोले, कि निश्चय वह घटोत्कच राक्षस धृतराष्ट्र के महारथी पुत्रों से लड़रहा है क्योंकि यह महाघोर शब्दकी गर्जना उसी की सुनी जाता है इस समय उस राक्षस के ऊपर मुझको पड़ी भारी - विपत्ति जान पड़ती है भोर-अत्पन्त कोपयुक्त भीमजी पांचाल देशियों के मारनेको युद्ध में प्रवृत्त हैं उन पांचालों की रक्षाके निमित्त अर्जुन ही शत्रुओं से सड़ता है हे महाबाहु इसवात को जानकर दोकाम वर्तमान हुए ११० प्रवचलकर बड़ी विपत्तिसे घटोत्कच की रक्षा | करो यहभाई के वचन सुनतेही शीघ्रता करनेवाला मीमसेन अपने मिहनादसे सब राजामों को डराता हुआ ऐसे महावेग से वहां पहुँचा जैसे कि पर्वकालमें समुद्र जाता है, और इस के पाछेही सत्यधृति युद्ध में दुर्मद सुचित्ती. श्रीणमान वसुदान और महासमर्थ काशिराजकापुत्र यहसब गये, और अग्रवः अभिमन्यु all the directions will his tremendous roars he thundred like the clouds in Winter. Hearing his sound, O king, Prince Yudhishthir said to the conquering Bhimsen, "Suroly this Ghatotkach the rakshas is kghting against the sons of Dhritrastra, for this tremendous roar can bo of no one else. Meseeras he is in a great trouble and Bhishma in the oxcess of his rage, is engaged in destroying the Panchals. For the protection of the Panchals. Arjun is fighting against the lenemies. Under these circumstance there are two things to do 10. Let us protect Ghatotkach from the great trouble." Having heard these words from his brother, dexterous Bhimsen, terrifying all the warriors with bastened to reneh there like the ocean at the full moon. Following him went tho wise warriors Suchitti, Vaşudan and the powerſul son of the king of Kashi. Led by Abhimanyu, the five brave sons of Draupadi, Kshatradev, Vikrant, Kshatradharma and his leonine roar, [4771] \talablait (४७७४) विक्रांतः क्षत्रधर्मा तथैवच ॥ १४ ॥ अनूपाधि पतिश्चैव नीलः स्थलमास्थितः। मह ताशरवंशेन हैडिम्ब पर्यवारयन् ॥ १५ ॥ कुञ्जरैश्च महामत्तै पट्सहसै. प्रहारमि मध्यरक्षन्त सहिता राक्षसेन्द्र घटोत्कचम १६॥ सिंहनादेन महता नेमियोपेण चे यह । खुरशब्दनिपातश्च फम्पयन्तो यमुन्धराम ॥ १७ ॥ तेषामापलतां श्रुत्वा शम्द न्तं तावकं बलम् । भीमसेन भयोनिग्नं विवर्ण वदनं तथा ॥ १८ ॥ परिवृत्त महाराज परित्यज्य घटोत्कचम् । तत प्रववृते युद्ध तत्र तेषां महात्मनाम् ॥ १९ ॥ तावफानां परेपांच संग्रामेष्य निवार्तनाम् । नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्नो महारथाः ॥ २०॥ अन्योन्य मभिधावन्त सम्प्रहार प्रचक्रिरे । यति वक्तं महारौद्रं युद्ध भीरभयापहम ॥ २१ ॥ हयागजैः समाजग्मु पदाता रथिभि सह । अन्योन्य समरे राजन् प्रार्थयाना. समभ्ययुः ॥ २२ ॥ सहसाचाभवत्तीनं सन्निपातान्महद्गजः । गजाश्वरथपत्तीना पद नेमि समुद्भुतम् ॥ २३ ॥ धूम्रारुणरजस्तीनं रणभूमि समावृणोत् । नैव स्वेम परे राजन के साथ द्रौपदी के महारथी पुत्र क्षत्रदेव विक्रान्त क्षत्रधर्मा और नाल नाम अनुपदेश का राजा अपनी सेना में नियत होकर चला यहसव शूर रयों के समूहों समेत घटोत्कचकी रक्षा के लिये उसके चारों ओर को नियतहुए, इनसब वोरोंके साथ तहादुर्मद मनवाले छामहस्र हाथी थे इन सबहाथियोंकी और रथोंकी गर्जना और ध्वनियों से पृथ्वी शब्दायमान होगई उन पाते हुओं के शब्दको सुनकर आप की सेना भीमसेन के भय से महा व्याकुलहोकर रूपान्तर दशाको भाप्तहुई, हे महा राज यह सेना घटोत्कचको छोड़कर चारों ओर को घूमने लगी फिर सम्मुख लड़ने वाले आपके और दूसरों के शूग्वीरों का नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्रों समेत युद्ध होना मारम्भ हुआ।२०। और परम्पर सम्मुख दौड़तेहुए महारथियोंने बड़े महार किये और अत्यन्त भयकारी घोरयुद्ध होनेलगा, घड़े हाथियों के साथ और पदाती रथि के साथ युद्ध करने लगे उस युद्धमें परस्पर एक दूसरेको चाहतेहुए सम्मुख गये उसममम भनेक हाथी घोड़े रय पैदलों के समूहों से उठोहुई बहुत भारी धूल उड़ी Nil the prince of Anup.with lus aruny, followed by the hosts of chariotzors, went to help Ghatothach nnd stationed thionselves round Six thousand olepliants of great prowess accompanied theo arriors. The sounds of these olephants and chariots rang all orer tho carth. Hering those sounds the state of your army was quite changed with fear of Bhim, and leaving Glintotkach alono all the warriors disponsod in differont directions Thon the warriors on both nidas fonght with diforont weapons and rashing against one another flicy fought lard and the latte was hard on thio two sides. Tho horsemen fought against tho clephant riders and the foot soldiora ngninst chariotecs Tlicy rurlud against one another. With tho armies of oloplnnts, horses, chariots and footsoldiers tlicro roce A gat him (४७७५) भीष्मपर्व Bhishm Pary [47751 समजानन परस्परम् ॥ २४ ॥ पिता पुत्रं न जानीते पुत्रो या पितरं तथा । निमर्यादेतथा भूते वैशसे लोमहर्षणे ॥ २५ ॥ शस्त्राणांभरतश्रेष्ठ मनुष्याणांच गर्जताम् । सुमहानमय टप्द-प्रेतानामिव मारत ॥२६ । गजवाजि मनुष्याणां शोणितांच तरङ्गिणी । मात्र तंत नदी तत्र केशर्शवलशाद्वला ॥ २७ ॥ नराणाचैव फायेभ्य. शिरसा पततां रण। श्वे ममहान्छन्दः पतता माना मिव ।। २८ । विशिरस्फर्मनुभ्यश्च छिन्नगाश्च वारणः । यश्वैः सम्मिन्न देहश्च संकीर्णामूद्वसुन्धरा ॥ २९ ॥ नानाविधानि शस्त्राणि पिजन्तो महारथाः । अन्योन्यमभिधावन्तः सम्प्रहारार्थसुद्यताः॥ ३० ॥ हया हयान् समासाद्य प्रेषिता हयमादिभिः । समाहत्य रणेन्योन्यं निपेतुर्गतजीविताः ॥३१॥ नरा नरान् समासाद्य क्रोधरक्तक्षगा भृशम् । उरांस्युमिरन्योन्य समाश्लिप निजग्निरे ॥ ३२ ॥ प्रेषिताश्च महामारणाः परधारणैः । अभ्यन्नन्त विपाणानेवारणानेय फिर उस काली और लाल रंगाली उग्र धूलिसे संग्रामभूमि ऐसी भाच्छादित होगई कि जिस में अपने पराये की कुछ पहचान न होसकी, इसमकार के रोमहर्पण करनेवाले महाप्रलयकाल में पिताने पुत्रको और पुत्रने पिताको भी नहीं पहचाना २५॥ हे भरतर्षभ उसयुद्ध में शत्रों के और गर्जना करनेवालों के मेतों कैसे महाघोर शब्दहुए, फिर वहां हाथी घोड़े रयपैदलोंके रुधिरमे नदी वह निकली उसमें शिरोंके बालही कुमुदिनी सपेन शाइबलथे उससंग्राम में मनुष्यों के गिरते हुए शिरोंके ऐने महा शब्द मुनाई दिये जैसे कि गिरतेहुए पत्थरों के शव्दहोते हैं फिर बिना शिरके मनुष्य और अंगभंग हाथी घोडों के शरीरोंसे पृथ्वी व्याप्त होगई औरवड़े र | महारथी परस्पर में नानामकारके शस्त्रको महारकरतेहुए एकएकके सम्मुख मारने को प्रवृत्तहुए । ३० । फिर सवारों से शोभित घोड़े घोड़ों से लड़ते २ मरकर पृथ्वीपर गिरे, और क्रोधसे रक्तनेत्र मनुष्यों ने दूसरे मनुष्योंको पाकर एकने दूसरेको छातीसे छाती मिलाकर मारा, फिर पीछे के हाथियों ने बड़े २ -शरीर cloud of dust and the field of battle was 80 surrounded by the black and red dust that the warriors on the two sides could not know friends from foes. In that dreadful battle like that of pralaya, the father did not know the son 25. The sounds of treapons and the roars of warriors in that battle rere like those of hobgoblins. A river of blood flowed down from the elephants, horses, charioteers and fontsoldieri, having the hair of heads for its weeds, The sounds of the fall of the heads of the warriors were like those of stones falling down. The headleas' bodies of men and parts of the bodies of elephants and horses covered the face of the earth. Great warriors discharged diffirent sorts of weapons against one another. 30. Horsemen fought against horsemen and fell dead on the field of battle. With eyes red in soger the warriors fought abreast and destroyed their adversaries. The elephants rushed against clephants and pierced their hoge bodies with their [4776] Mahabhiamat, (४७७६) संयुगे ॥ ३३ ॥ ते जातरुधिगेत्पीडा पताफाभिरलंकृताः । संसक्ताः प्रत्ययात मेघाव सविधुत. ॥ ३४ ॥ फेचिद्भिन्ना विषाणाभिनकुम्भाश्च तोमरे । विनदन्तो भ्यधावन्त गजमाना घना इव ॥ ३५ । फेचिद्धस्तैर्विधा च्छिन्नैरिछन्नगामास्तथापरे । निपेतुस्तुमुले तस्मिंश्छिन्नपक्षा इवादयः ॥ ३६ पार्वेस्तुदारितैरन्येषारणैर्यरवारणा.। सुमुचु शोणितं भूरि धातूनिव महीधरा ॥ ३७॥ नारावनिहतास्त्वन्ये तथा घिद्धाध | सोमरैः धिनदन्तो भ्यधावत विशृङ्गा इव पर्वता. ॥ ३८ ॥ केचित् क्रोधसमाविष्टा मदान्धा निरवग्रहा. । रथान् हयान् पदातीश्च ममृदु शतशो रणे ॥ ३९ ॥ तथा हया इयारोहस्ताडिताः प्रासतोमरै । तेन तेनाभ्यवर्त्तन्त फुर्वन्तो व्याकुला दिशः ॥ ४० ॥ रथिनो रथिभिःसाई कुलपुत्रास्तनुत्पजः । पर शनि समास्थाय चकुकर्माण्यमीसवत् ॥ ४ ॥ स्वयम्वर इवामर्दै प्रजहु रितरेतरम् । प्रार्थयाना यशो राजन् स्वर्ग या युद्ध मुखाले शत्रुके हा थेगों के सम्मुख होकर दांतोंकी नोकों से हाथियोंको मारा वह पताकाओं से शोभित हाथी रुधिरसे पीडितहोकर ऐसे संसक्त दिखाई देतेथे असे कि बादलेम बिजली दीखतीहै ३५ कोई हाथीदांतों की नोकों से घायल भौर तोमरों से फूटेहुए कुंभ वादलोंके समान गर्नते हुए सम्मुख दौड़े, कोई टूटी मूंडवाले वा टूटे भंगवाले हाथी युद्ध में ऐसे गिरे जैसे कि ट्रे पर्वत भौर कितनेही कुक्षों में घायल हाधियोंने वहुतसा रुधिर ऐसा डाला जैसे कि पर्वत धातुओंको गेरते हैं, और बहु तेरे तोमरोंसे और नाराचोंसे घायल और पीडितहोकर शब्द करतेहुए ऐसे दौड़े | जैसे कि विनाशिखरके पहाड़ होतेहैं, और अनेक क्रोधयुक्त मदान्ध हाथियोंने को पितहोकर हजारों रथये हे और पदातियों को मईन किया, इसीमकार अश्वसधारों के पास और तोमरोंसे घायल घोड़े दिशाओं को व्याकुल करते हुए प्रत्येक मार्गमें सम्मुख हुए। ४० ।कुलीन और शरीर त्यागने वाले रथियोंने वही सामर्थ से निर्भयता | पूर्वक राथेयोंसे युदकिया, हे राजा युद्धमें कुशल यश और स्वर्गके अभिलापी वारोंने उस स्वयंवर के समान युद्धमें एकने एकको परस्पर में हरण किया, tushs The clephants docked with banners and streams of blood Rorring from the be hes lookst ti• els ads with ingita ur 35. Sama clephants wounded rith the points of tusks and tomars rushed on thündering like clouds, others with broken trunks and limb: fo'l dorn on earth like the picses of hills Eephants rounded in their sides dropped stroams of blood as mountains drop minarala, athers rrounded by tomars and arrows tan asray shriebing with pain libe mountains without paha Hlad clephants in excessive iago trampled thousands of chariots, horses and foot-soldiers. In the same mannet, horioz trounded by prascs and tomirs rushed on all sides in anguish.40 Tho dying warriors of noble blood fought fearlessis against charioteers, Dosterous in battle, desirous of fame and paradiso the narriols took up one another liko brides in a sirayamrar. Thus when the battle . (४७७७) भीष्मपर्व Bhislim Pary [47771 शालिनः ॥४२॥ तस्मिंस्तथा वर्तमान संग्राम लोमहर्षणे। धाराष्ट्र महत सैन्यं मायशो विमुखी कृतम् ।। ४३ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि डिम्पयुद्ध चतुर्नवतितमोऽध्यायः॥ १४ ॥ समय उवाच । स्वसैन्यं निहतं दृष्ट्वा राजा दुर्योधन स्वयम् । मभ्यधावत संकुदो भीमसेन मरिन्दमम् ॥६॥ प्रगृह्य सुमहचाप मिन्द्राशनिसमस्वनम् । महता शरवण पाण्डपं समवाफिरत् ॥ ॥ अर्सचन्द्रश्च सन्धाय सुतीक्ष्णं लोमयादिनम् । भीमसेनस्य चिच्छेद चापं क्रोधसमन्वित. ॥३॥ तदन्तरच सम्मेश्य त्वरमाणो महारय.। मसन्दधे शितं पाणं गिरीणामपि दारणम् ॥ ४॥ तेनोरास महाराजगीमसेनमताडयत् । स गाद पियो व्ययितः पक्किणी परिसंलिहन ॥५॥ समाललम्बे तेजस्वी चज हेमपरिक तम् । तथा विमनसं दृष्ट्वा भीममेनं घटोत्कचः ॥ ६ ॥ क्रोधेनाभिप्रजन्याल विद्यक्ष इसी प्रकार से इस रोमहर्पा युद्ध के मारंभहोने पर दुर्योधन की प्रवल सेना बहुधा भगाई गई ॥४३॥ अध्याय ९५ ॥ संजय बोले किरामादुर्योधन अपनी सेनाका नाराष्ट्रमा देखकर अत्यन्त क्रोधि- नहोकर आपभी उस शत्रुभेता भीमसेनके सम्मुख दौड़ा, और इन्द्र धनुपके समान शन्दायमान धनुषो वाणों की वर्षा करके भीमसेनको ढक दिया, और क्रोधर्मभरकर अत्यन्त तीक्ष्ण गर्दचन्द्र वाणसे भीमतेन के धनुप को काटकर बडीशीघ्रता से समयको पाकर उसने पर्वतोंके भी तोड़नेवाले वीक्षणवाण को धनुप पर चढ़ाया, हे रामा उत्त |बाणसे भीमसेन को छाती पर चायल किया, फिर उस तेगस्त्री भीम ने होठों को चाटकर अपनी मुनहरी धजा को पकड़ लिया, उस समय उटोत्कच भीमसेन को व्याकुल देसार, फ्रोधरूपी भग्निसे ज्यालाहमा भोरमदाक्रोधयुक्त अभिमन्युभादिमझा was Tnging furiously, inang of Duryodhan'a biare Farriors jeſt the field."43. CHAPTER XCV "Seeing the destruction of his owl army," continued Sanjaye, "Prince Duryodhan, in the excess of rage, rushed against Bhimn the destroyer of foes and hid him Fitli tile al curs sko from his bots sound. ing like Indra's bow. In tho excess of rage, having cut dovn Bhim's bow with an arrow of the shape of halfmoon acd thus gaining time, he soon put up n gbarp arrot capable of piercing through a mountain. ? hat arrorr, O king, wounded Bhim in the breast. The latter, licking his lip in anger, held fast the staff of his golden banner. Ghatotkach was inflamod with the fire of wrath at the sight of Bhim's رویا ) [4778] Mabablarat निव पावक । अभिमन्युमुखाथापि पाण्डवाना महारया ॥ ७ ॥ समभ्यधावन् फ्रोश न्तो राजान जातसभ्रमा । सम्प्रेक्ष्यै तान्सपतत सद्धान् जातसम्भ्रमाद् ॥८॥ भार दाजो नवीद्वाक्य तावकाना महारयान् क्षिगच्छन भयो राजान परिरक्षत ॥९॥ सशय परम प्राप्त मजन्त व्यसनाणवे । एते सुद्धा महेवासा पाण्डेवाना महारया। ॥ १० ॥ भीमसेन पुरस्कृत्य 'दुर्योधनमुपाद्रवन् । नानाविधानि शस्त्राणि विजन्तो जयेभृता ॥ १६॥ नवन्तो भैरवानावात्रासयन्त) भूमिपान् । तदाचार्यायच धुश्या सोमदत्तपुरोगमा ॥ १२ ॥ तावफा समवर्तत पाण्यानामनीफिनीम् । कृपोमूरि श्रवा शल्यो द्रोण (ो विविशति ॥ १३ ॥ चिनो विकर्णश्च सैन्धवोथ पृहद्वल । मावत्यौ च महेवासी कौरव पर्यवारयन् ॥ १४ ॥ त विंशतिपद गत्वा सम्प्रहार' प्रचक्रिरे । पाण्डवा धार्तराष्टश्च परस्परजिघांसव ॥ १०॥ एवमुक्त्वा महावाहुमहद्धि स्कार्य फार्मुफम् । भारद्वाजस्ततो भीम पडविंशत्या समार्पयत् ॥ १६ ॥ भूयश्चन रथी राजा को पुकारते हुए सम्मुत्र दौडे अत्यन्त क्रोधयुक्त उन लोगों को आता हुआ देखकर, भारद्वाज द्रोणाचार्य जी आप के महारथियों से बोले कि तुम्हारा । कल्याणहो तुम शीघ्रजानो और घडे दु. समुद्रमें पडेहुए गजाको चारों भोर से रसाकरो, यह महाकोपयुक्त पाण्डयो के धनुषधारी महारथी अनेक प्रकार के शखों । को चलाते और शब्दों की गर्जनाओं से समाप्रोको भयभीत करते सब भीमसेन को भागे करके दुर्योधन के सम्मुख गये, द्रोणाचार्य के इस वचन को सुनकर | सोमदत्त को अग्रगामी का के वह सब आपके शूरवीर पाण्डवों के सम्मुस पहुँचे छपाचार्य भूरिश्रवा शल्य अश्वत्थामा चिविंशति । १३"वित्रसेन विकर्ण जपाय इशल और वहे धनु पधारी राजा अवन्ती ने चारों भोरसे दुर्योधन को रक्षित किया । १४ । और परस्पर मारने की इच्छा से उन पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्रों ने वास २ चरण चलकर प्रहारों को किया, फिर भारद्वाज द्रोणाचार्यने वढे धनुषको लेकर छब्बीस चाणोंसे भीमसेनको पीडित कर के अनेक wound, and Abhim uyu and other wailios much cn aged, ruxlıd on challenging the Peony Seeing the advance of those enraged var riors Bha adwaj Donacha yio did you warrious to protect the Princs fiom the coming ding - sym; Those eniag d Panday warriors using dilf rea; pores of n posal torrify ug the warriors with their roars nra lud by Bhim on y un t Duryodhan Protect luna from dan ger, may you be happy!" At the commund of Dionny our Tarriors led by Somdatta nds anced against the Pundai as. Krpachnry'a, Bhun-lunya Shalya Ashrathami Vivisiratı Chitraseo Vilarn, Jay adrati, Vrriadial and the greit rrcher prices of Avant protected Daryodhan an all sides Anlwaung to destroy one another, the Pandavas and the sus Ot Dlirit aslitru 'ndranced A enty faces on ench side and disclinrere the re? 03 I hien trhug ap 1114 mighty (४०७१) भीष्मपर्व Bhishma Pely [4779] महावाहु नगर शीनमराफिरत् 1 पर्यंत वारिधारामि मादृषीव पलाहक ॥ त. प्रत्यविध्यदृशामिभमसेन शिलीमुख । स्वरमाणो महेप्यास. मम्ये पाच महावल १८ ॥ म गाढद्धिो यथितो बयोवृद्ध भारल । प्रनसा सहसा रथोपस्य उपाविशत् ॥ १॥ गुरु प्रव्यथित दृष्टना राजा दुय्योधन स्वयम् होणायनिश्च सद्धी भामसनमभिटुतौ ॥ २० ॥ तावापतन्ती सप्रेक्ष्य काला तकयमोपमो, भीमलनी महावाहुर्गदामादाय सत्वरम् ॥ २१ ॥ सरप्लुत्य स्थापूर्ण तस्थो गिरिरियाचल । समुद्यम्य गदा गुपी पाल्दण्डोपमा रणे ॥ २२ ॥ तमुघतगद दृष्ट्या केलासमिर शृङ्गिगम् । कौरवो द्रोणपुनर्थ सहितावभ्यधावताम् ॥ २३ ॥ तावा पतन्ती माहिती सरिता बलिनावरी । अन्यधायत मंगेन त्वरमाणो वृकोदर ॥ २४ ॥ समापनन्त सम्प्रेक्ष्य सकर मीमदर्शनम् । समभ्यभावस्वरिता कीरसाणा महारथा. जपचाणोंसे ऐसे शीन ढक दिया जमे कि जलकी धारीसे लादक नाम वाढल पर्वतको ढकदेते है, बडे धनुपपारी महावली शीघ्रतायुक्त भीमसेनने शिलीमुख नाम दशवाणों से उनको घायल किया फिर वह वृद्ध द्रोणाचार्य अत्यन्त घायल और पीडन होकर प्रकरणात स्थमें बैठगय गुरू को पीडामान देखकर आप राजा दुर्योधन और प्रस्वत्थामा वडे क्रोधितहो के भीमसेन के सम्मुग्ब गये, फिर महाबली भीमसेन उन काल और मृत्युके समान दोनों को प्राता हुआ | देखकर, शीही रथ से कद यमदण्डके समान अपनी भारी गदाको लेकर | युद्ध में पर्मनाकार निश्चल होकर खडा हुअा फिर शिसरधारी पर्वतके समान उस उठी हुई गढाको देखकर दुर्योधन और अश्वत्थामा दोनों एक साथही उसके सम्युए दाडे, भीममेन भी उन तीय दौडनेवालों को सम्मुस प्राता देखकर वही शीघ्रता मे उनपर. दौडा, फिर उम बोधयुक्त भयानक भीमसेन को आता हुआ देखकर कौरवों के महारथी यह दोनों-भी शीघ्रता से दौडे और सवों ने पाकर boss Dronacharya wounded Bhuisen w th twentysix arrows and hid niin with the suo ver of arrows as Yatcr clouds ào x mountain with Iu lus (urn, the great archer Bhim of great prowess woulded fun with ten arrotrs sharpened on stone Old Dronach ry, much rounded and distressed, Eat down of a sudden In by chariot Seeing the aclipaya m distries, Tuince Dorycdban bitself together suth Ashrathana much enraged faced Bhimsen. Valliant Bhin sceng their ads arce lile that of Time and Death, at once jumped down from his chujot and with lu9 hex-y mace like the staff of Yam ştocel firmly lile a lull in the field of Lattle Sceing tliat inace upraised, Aslik atlıytua ord Duryodhan rushed together against hm Bhimren to seeing the drince of the two awitiy rubnis warriois, rushed agunt tiem diesdful Bu mstn, the shores of rain much - 11 47831 anbharat (४७८२) मश्यत्यामानमवच । प्रायशश्च महावासा ये प्रधाना सकौरचा ॥४४॥ विपस्ता रथिन सर्वे राजानश्च निपातिता । हयाशेष हयारोहा सन्निरुत्ता सहसूश ॥४५॥ तादृष्ट्या तावक सैन्य विद्युत शिविर प्रति । मम प्रामोशता राजस्तथा दधतस्यव ॥ ४६ । युध्यध्व मा पलायध्व मार्यपा राक्षसीरण । घटोत्कच प्रमुत्ते ति ना तिष्ठन्त विमाहिता ॥ ४७ ॥ नैवते श्रद्दधुभीता वदनो रावयोवंच । नाच प्रद्यतो दृपया जय प्राप्ताश्च पाण्डवा ॥ ४८ ॥ धोत्कचन सहिता सिंहनादान प्रचक्रिर । शख दुन्दुभि नि?यै सग तान मेदिरे भृशम् ॥ ४९ ॥ एव तव वल सर्व हैडिम्पन दुरालगना । मर्या स्तमन लाया प्रभग्न विद्रुत दिश ॥५॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वाण भीमवधपर्वणि हैडिम्बमायाया पवनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ आदे जो बडे धनुपधारी कौरवीय शूरवीर थे उन सवको रानालोंगों ने भी रथ मारथी हाथी घोडौं ममेत उस ने पृथ्वीपर गिराया, हे राजा उम अापकी सेना के डेरोंकी और भागता हुआ देखकर मेन और देवत्रत भमितीने बहुन २ पुकारा कि हरामत यह राक्षसी माया घनोत्वक की पढा कीहुई है इमको मुनकर भी वह 'महा अचेत होकर नियन नहीं हुए उन भयभीतोंने हम दोनोंके कहनेपर भी विश्वास नहीं किया उस सेना को भागाहुआ देखकर विजय पानेवाले पाडवों ने घटोत्कच समैन मिलकर बडे सिंहनादा किया पोर शखदुन्दुभी भी चारों आर मे अच्छी गीत से घजाई, इस रीतिप्ते सायकालको मूर्यास्त के समय दुष्टात्मा बोत्कचे की मायामे भाप का सब सेना चारोऔर को भागी ॥५०॥ sell as the kings næmproving thiên Tiere struck: dorn to the ground together with their chinnot druers elephanks and horses. Seeing them flying towards your camp Derbrit and I tr el ag un and gun to stop and confit them, saying that it has nothing bat fbedeception of the rakshase, but in spite of our efforts they would not be brought bach At the sight of ther rout the conquering Pindavas and Ghatothach tog etlier iaised a tremendous war cry and blew their conchs and trampets. Thus in the opening at sunset il your Arnuieş were di persed by the deception of mischieroos Gatot Lach und would not b liere us प 1 , M (४७८३) utana Bhislır Pars (4783] सञ्जय उवाच । तस्मिन् महहि सन्ले राजा दुर्योधनस्तदा । गाङ्गेयमुपसद्म्य विनयेनाभिवाद्यच ॥१॥ तस्य सर्व यथावृत्तमारयातु मुपचप्रमे । घटोत्कचस्य विजयमात्मनश्च पराजयम् ॥ २ ॥ कथयामास दुर्धर्यो विनि स्वस्य,पुन पुन । समधीय तदा राजन भीम फुरपितामहम् ॥ ३ ॥ भघन्त समुपाथित्य बासुदेव यथा पर । पाण्डवैर्विग्रहो घोर मारब्धो मया प्रभो ॥ ४ ॥ एकादश समाख्याता अक्षौहि ण्यश्च या मम । निदेशे तव तिष्ठन्ति मया सार्धं परन्तप ५ ॥ सोह मरतशाईल भीमसेन पुरोगमै । घटोत्कच समाश्रित्य पाण्डवैयुधिनिजित ॥ ६ ॥ तन्मे दहति गात्रानि शुष्कवृक्षमियानल । तदिशामि महाभाग त्यानुप्रसादात् परन्ता ॥ ७ ॥ राक्षसापसद हन्तु स्वयमेव पितामह । त्या समाधित्य दुर्धर्ष तन्में कर्तुत्वमसि ॥८॥ पतत्वातु वचन रामो भरतसत्तः । दुर्योधनमिद वाय भीण शान्तनवोत्रवीत ॥९॥ शृणु राजन् ममवचो यत्वा धयामि कौरव ! यया स्थया महाराज पतिव्यं अयाय ॥१६॥ समय वोले हे महाराज उमयड़े शब्द के होनेपर राजा दुर्योधन ने भीमगी के समीप जाके वढी नम्रता पूर्वक दण्वत करके, घटोत्कचकी निजय और अपनी परामय होनेके मुख्य वृत्तान्तको बडी श्वासा लेकर वर्णन किया और पितामह से कहनेलगा, कि हे प्रभु मैने वासुदेव के समान आपको अपनारक्षक समझकर बड़ी भयकारी शत्रुतापांडवों से करीह हेशत्रुहन्ताजो मेरी ग्यारह अक्षौहिणी प्रसिद्ध वहमय मुझ समेत अपकी आज्ञामें नियत । ८ । हेभरतर्षभ ऐसा योगहोने परमी में भीम मेन आदि पाडर जिनका कि घटोत्कव रक्षक है उनसे पराजय हुआ, वह भाममन मेरेअगों को ऐसा जलारहाहै जैसे सूखे रक्षको आग्निजलानाद, हे शत्रुहन्ता पितामह आपमे दुर्जय पुरुपकी रक्षा में होकर आपकी कृपासे उत नाच राक्षमको में अपने हाथमे माराचाहता हु आपमेरे मनोरयको पूराकरने को योग्यहो, दुर्योधन के इम CHAPTIR ACVI Sanjaya said, "On liearing that suund Princo Duryodhan wont t? Bhishm and humbly boning down to him, recounted the facts of the conquest of Ghatotkach and his own defeat rith deep sighs, saying "Knowing you to be my protertor liko Vasudes I have, O grandfather contacted enmity with the Pandavas I and my eleven zksliaulinis O destroyer of forg obey your orders 5 Being so united, O best of Bharats I have been defeated by Bhimeen and other Pandaras led ty Ghatot kach Bhimsen burns 1ho, ports of my body as fire does dry wood Protected by a personage like you, O grandfather, destroyer of enemies I wish to slay that despicable rakshus with my own liand You have tho ponci to satisfy the desire of my mind" To those words of Duryodhan, Bluish the son of Shantanu made the following - [4784J Nabablarat (४७८४), परन्तर ॥ १०॥ मात्मा रक्यो रगे तात सर्वावस्यास्परिन्दमाधर्मराजेन संप्रामस्त्वया कार्य सदानव ॥ ११ ॥ बनेन यमाया वा भीमसेनेन वा पुनः । राज पुरस्त्रय राजा राजानमाईति ॥ १२ ॥ अहं दोण. कृपाद्रोमिः कृतवर्मा च सात्वतः । शल्य सौमदत्तिव विकर्णच महारया: ॥ १३ ॥ तव च मातरः श्रेष्ठा दुःशासनपुरोगमाः। त्वदथे प्रतियोत्स्यामो राक्षस ते महावलम् ॥ १४ ॥ रौद्रे तस्मिन राक्षसेन्द्र यदि ते नुशयो महान् । अयं वा गच्छतु रणे तस्य युद्धाय दुर्मते ॥ १५॥ भगदत्तो महीशल: पुरन्दरसमो युधि । एतावदुक्त्या राजानं भगदत्तमथाब्रवीत् ॥ १६ ॥ समझ पार्थिवेन्द्रस्य वास्यं वाक्यविशारदः। गच्छ शी महाराज हैडिम्ब युद्धदुर्मदम् १७N चारयस्व रणे यत्तो मिपतां सर्वधन्विनाम् । राक्षसं क्रूरकर्माणं ययेन्द्रस्तारकं पुरा ॥ १८॥ दियानि तव शस्त्राणि विक्रमश्च परन्तप । समागमध बहुमि. पुरामुदमरैः वचनको सुन कर शांतनु भाप्मनी यह वचन व ले, हे कौरवेन्द्र जो मैं वचन कहताह उस को सुनकर उसीके अनुमार तुमको भी करना योग्पहै । १० । हे शत्रुहन्ना पुत्र युद्ध में सब भकारमे अपना शरीर रक्षा के योग्य है हे निप्पाप तुमको मदैव धर्म रान से युद्ध करना उचित है, और अर्जुन नहाल सहदेव अथवा भीमसेनके साथ युद्ध करना उचित है राजा राजधर्म को आगे करके किमी राना के सम्मुख होता है, मैं और द्रोणाचार्य कृपाचार्य अश्वत्थामा कृतवर्मा यादव शल्य भरिश्रवा महारथी विकर्ण औरतरे वह सब भाई जिनमें अग्रगण्य दुरशासन है, यह सवंतरे निमिच उत्त महाबली राक्षस से लड़ेंगे । १४ । उस स्ट्ररूप राक्षसों के राजा से जो तेरी पड़ी शत्रुता है तो उस दुर्वदी राक्षम के युद्ध के लिये भागदच को भेनो यह काकर राना भगदत्त से बोले कि हे महाराज तुम बड़ी शीघ्रता से उस दुर्मद घटोत्कच के सम्मुख जाओ और सब राजाओं के देखते हुए उस कठिनकर्मी राक्षसको ऐसे हटा- ओ जैसे कि पूर्व समय में इन्द्र ने तारकको हटायाधा, हे शत्रुहन्ता तुम्हारे पास reply:-"Heer my words, Princeof Kauraras. and act upon them 10. My son, destroyer of foes, one's own body is Forthy of protection by all ineans. You may lyht against Dharmraj, Arjun, Nasul, Sabader or Bhimsen by all means A bing may justly fight with anotber Ling. I as well as Dronacharya, Kripacharya, Athrathama, Kritrarma the Yadar, Shalya, Bharebrara. Talliant Vikarn and all your brothers led by Dashasan will fight for you ngainst the powerful rakshas.14. Send Bhagatts against that prince of rakshases, if are inclined to bill him" Then turning towards Bhagdatta he said, " Hasten to encounter with the dreadful yakshas, king, and within right of all the warriors defeat the dreadful rakshas of great prowess as Indra in the days of yore had defeated Tarak. You hare divide weapons, O destroyer of enemies. You are full of promess and have in former days fought many rabshases. You are worthy of fighting. you (४७८५) भीष्मपर्व Blushm Parv [4783] सह॥ १९ ॥ त्व तस्य नृपशाईल प्रतियोद्धा महाहवे । स्वघलेनोनितो राजन जहि राक्षसपुङ्गवम् ॥ २०॥ एतच्छुत्यातु वचन भीष्मस्य पृतनापते । प्रययौ सिंह | नादेन परानभिमुखो दुतम् ॥ २१॥ तमाद्रवन सम्प्रेक्ष्य गर्जन्तमिव सोयदम् । अभ्य पर्जन्त सकुशा पाण्डवाना महारया ॥२२॥ भीमसेनोभिमन्युश्च राक्षस घटोत्कच । द्रौपदेया सत्यधृति क्षत्रदेवश्च भारत ॥ २३॥ चदिपो धसुदानच दशााधिपति स्तथा । एप्रतीकेन ताथापि भगदत्तोप्यु पाद्यत् ॥ २४ ॥ तत सममघद्युद्ध घोररूप भयानकम् । पाण्डूना मगदत्तेन यमराष्ट्रविधर्धनम् ॥ २५ ॥ प्रयुका रथिभिर्याणा भीम | वेगा मुतेजना ते निपेतुर्महाराज नागेषु च रथेषुच ॥ २६ ॥ प्रभिन्नाथ महानागा विनीता हस्तिसादिभि । परस्पर समासाद्य सनिपेतुरभीतवत् ॥ २७ ॥ गदान्धा रोप सरधा विषाणाप्रमहाहवे । विभिदुईन्तमुसले समासाथ परस्परम् ॥ २८ ॥ हपाव घामरापीडा प्रासपाणिभिरास्थिता । चोदिता सादिभि क्षिप्र निपेतुरितरेतरम् ॥२९॥ | दिव्य भस्त्र है और महापराक्रमीहो और पूर्वसमय में भी तुमने बहुतसे असुरों से सम्मुख ता करी है, हे राजेन्द्र तुम इस युद्ध में उस राक्षस से युद्ध करने के योग्यहो, इस से हेराजा तुम अपनी वही सेनाके वलसे राक्षसको मारो॥२०यह भीप्मनीके चचनाको सुनकर भगदत्त वढे सिंहनाद पूर्वक शत्रुओंके सम्मुख गया और पांडवों केभी आगे लिखेहुए महावली शरमा उस क्रोध युक्त वादल के समान गर्नते भगदानको देखकर सम्मुख आफर वर्तमानहुपे भीमसेन, अभिमन्यु, घटोत्कच, द्रोपदी के पुत्र, सत्पधृति, क्षत्रदेव, चेदिकाराना, पसुदान, औरदशार्णाधिपति सुमतीक हाथी पर सवार भगदत्तके सम्मुखगगे, और भगदत्तकेसाथ पांडवोंका खवयुदहुआ वहयुद्ध, | बड़ामयानक और यमरानके पुरका दृद्धिकारक था ।२५। रथियों ने बडे २ भयानक घाणों से रथी और हाथियों को मारा और बडे • मदोन्मत्त हाथियों को हापीवानों |ने-सग्राम भूमिमें लेजाकर वडी निर्भयतामे एक एक के पीछे दौड़ाया फिर | हायिगों ने परस्परमें अपने २ तीक्ष्ण दातोंसे घायल किया, चमर और प्रासधारी win thu dreſdı ta'astries, 'stil it with the riup of your mom Having beard the words of Bholm, Bhagdreta ficed the enemies with a roar, and seeing the advance of Bhagdatta there camo on to fight against him the following warriors of the laudavas, namely Bhimsen, Abhimanyu, Ghatotkach, tho sons of Drupadi, Satya dariti, Kshatradev, the king of Chiedi Vasudan and the king of Dashara All these Warriors encountered Bhingdatta who rodo on his elephant named Supratik The battle botween the two parties was very sovore and dieadful and filled the region of Yamraj 25 The chariotears with their dreadful arrows killed the charioteers apd elephant riders and the durers of elephants gonded their beasts fearlessly against others in the field of batt'e The elephants wounded one another with their shop tushs. The horsemen armed with larbed --- । । [4786] Mahabhnrat (४७८६) पादाताध पदात्योधेस्ताडिता, शक्तितोमर न्यपतन्त तदा भूमी शतशोध सहसूश' ॥ ३० ॥ रथिनश्च रफराजन् फर्णिनालीफसायकै । निहत्य समर वीरान सिंहनादान विदिरे । ३१ तस्मिस्तथा वर्तमाने समामे लोमहर्पणे । भगवत्तो महेप्पासो, भीम सेन मथाद्रवत् ॥ ३२ ॥ कुजरेण प्रमिग सप्तधा सूपता मदम् । पर्वतेन यथा तोय सयमाणेनसर्वश ।। ३३ । किरछरसहस्राणि सुप्रतीकशिरोगत । ऐरावतस्थो मघवान परिधारी इवानघ ॥ ३४ ॥ स भीम शरधाराभिस्ताडयामास पार्थिव । पर्वत पारिधारभिस्तपाते जलदो यथा ॥ ३५ ॥ भीमसेनस्तु सफुद्ध पादरक्षान पर शतान् । निजधान महेश्वास सरध्ध शरवृमि ॥ ३६॥ तान्ट्वा निहतान यो भगदत्त प्रतापवान् । चोपामास नागेन्द्र भीमसेनरथ प्रति ॥ ३७ ॥ स नाग प्रेषित स्तेन घाणोज्यायोदितो यथा । अभ्यधावत गेन भीमसनमरिन्दमम् ॥ ३८ । तमाप घोहों के सवार नियस हुये और बड़ी शीघ्रतासे एकदूसरे पर दोडे, तब हजारों पदाती शत्रुभों के बरछी आदि शस्त्रों से मरेहुये प्रथ्वी पर गिरे । ३० । और | रथियों के शायकों से अन्य रथी घायल होकर गिरे फिर युद्ध में गिराने वाले वीरों ने सिंहनाद किये, इस प्रकार के रोमहर्पण युद्ध के मारी होने पर बहा धनुषधारी मगदत्त बढेमारी सप्तांग मदावी गजेन्द्रकी सवारी के द्वारा भीमसेन के सम्मुख ऐसे गया जैसे कि जलके छिडकनेवाले वादल बडे पर्वतके ऊपर जाते है फिरउसने उस मुमतीक हाथी के शिरपर सवार होकर हजारों बाणों को ऐसे बर्षाया जोकि ऐरावत हाथीपर चढाहुआ इन्द्रजल की धारामो को वर्षाता है, उस राजाने वाणोंमे. भीमसेनको ऐसा घायल किया जैसे कि वर्षाऋतुमें बादल जलकी धाराओंसे पर्वत, को घायल करता है । १५ । फिर बडे धनुपधारी भीमसेनने अत्यन्त क्रोधित होकर वाणों की वर्षासे सैकड़ों पादरक्षकों को मारा फिर बडे मतापवान भगदस ने उन. पादरक्षकों को माराहुमा देखकर बडे क्रोधसे अपने गजेन्द्रको भीमसेनके रथ पर पेला, जैसे कि धनुपसे चलाया हुआ वाण जाताहै उसीमकार उसकापेला हुआहाथी missiles and fly flappeis ruglied against one another Thousands of foot soldiers slain by spea s. and other weapons of enerates lay on carth. 30 Charioteers wounded by the arrows of other charioteers fell on earth The warriors 2021 od like hons When the battle was raging so furiously 'Blingdatta the great archer riding his huge elephant which dropped juice from seven places in his body faced Bbimsen 2, raining clouds pass over a mountain. From his elephant namad Sap atık he shovə ed thousands of arrows as Indra sends fortii showers of m'n from the book of Airnyat He showered his arrows over Bhimson as a cloud son for th run over a mountain 35 Then the great archor Bruin sen in giert anger killed ljundreds of the king's guards with luis arrows B lagu itta of great prowess sportig his foot guards rin n sont is hure el pinnt against Bumse in great anger??

(१७८७) भीमपर्य Bhishma Part [4787J तन्तं सम्प्रेक्ष्य पाण्डवानां महारथाः अध्यवर्तन्त वेगेन भीमसेनपुरांगमाः ॥ ३९ ॥ कायायाभिमन्युश्च द्रौपदेयाश्च सर्वशः। दशार्णाधिपति शूरःक्षपदयधमारिख । ४॥ चेदिपथिप्रतुश्च संधा. सर्व पल ते उत्तमात्राणि दिव्यानि दर्शयन्तो महायलाः ॥४१॥ तमेक कुञ्जरं झुद्धाः समन्तात् पर्यवारयन् । स विद्रो यहुमियांणय॑रांचत महाद्विपः॥ ४२ ॥ सजातरधिोत्पीडो धातुचित इवादिराट | शार्णाधिपतिश्चापि गजं भूमिधरोपमम् ॥४३॥ समास्थितोमिदुद्राव,भगदत्तस्य धारणम् | तमापतन्तं समरे गज गजपति स च ॥४४॥ दधार सप्रतीकोपि घेलेय मफरालयम् । पारितं प्रेक्ष्य नागेन्द्र दशाणस्य महात्मनः ॥ ४५ ।। साधुसाध्धिति सन्यानि पाण्डघेयान्य पजयन् । तत प्राग्ज्योतिप. क्रुद्धस्तोमराम् च चतुदश ॥ ४६॥ माहिणोत्तस्य नागस्य प्रमुख नृपमत्तन । धर्म मुख्य तनुप्राणं शातकुम्भपरिष्कृतम् ॥ ४ ॥ विवाय प्रापि. भी शत्रुजिन भीममेनके ऊपर बड़ी शीघ्रगातसे दौड़ा, उमझातेहुये दाधी को देख कर, भीमसेनके आगे चलनेवाले अभिमन्यु पांचोंकेोकप द्रोपदी के पांचों पुत्र राना दुश्शार्ण क्षत्रदेव । ४ । चदिका राजाचित्रकेतुइन सबने क्रोध युक्त होकर दिव्य भस्त्रोंके द्वारा, उस अकंले हायाको चारों ओर से घेर लिया वह महागजेन्द्र दश पाणों से घायल होकर रुधिरको डालता हुभा ऐसा महाशीमायमान हुमा जमे कि धातुओंमे चित्रित गिरिरान पर्वत शोभित होता है । ४३ । फिर पतके समान हाथी पर मवार राजा दुशार्ण भी भगदत्त के हाथी पर दौडा, तब उम हाथियोंके राजा सुप्रतीक ने उस भाते हुये हाथी को ऐसे रोका जैसे कि किनारा समुद्र को रोकता है । ४५ । महात्मा राजा दुशाण के हाथी को रुकामा देखकर पाण्डवों की सेना ने साधुसाधु करके प्रशंसा करी इस के पीछे बड़े क्रोषयुक्त रामा प्राग्ज्योतिप ने चौदह- तोमर उमहाथी के ऊपर फेंके वह सब तोमर स्वर्णमयी कवचको भेदन करके उसके शरीर में ऐसे प्रवेश करगये जोस सर्प वामी में प्रवेश Liho an arrot discharged from a bor, the elephant gowed by the Ling pashed against Bhim. Seeing that elephant coming towards them, Alhinanyu, the five Kaibaya brothers, the five song of Draupadi. hing Dusharn, Kshatrnder, 40 the king of Chedi and Chitraketa the leaders of Bhimsen's army armed with celestial weapons, surroanded the elephtat in great rage. Wounded by ten arrons, the huge elephant, bleeding from wounds, looked glorions like a mountain rarigated with its minerals 43. Mounted on his clephant huge like A muouoram, king Dusharu rtsfied against hinz Bhagdatta Sapratik the prince of elephants,' seeing that elephant coming towards him, checked him as 'the shore does the coin 45 seeing the elephant of the king of Duebám thus checked, the Pandatas raised a cry of good, goods and praigal him. Then the ling of Pragjyotish discharged (४७८९) भीमपर्ष Bhishma Pary [4789] कोच महाराज चमेवाग्नौ समाहितम् । भग्नेन्तु स्ववलं हवा भगदत्तेन धीमता ॥ ५७ घटोत्कचाय संकद्धो भगद समुपादयत् । विकटः पुरुषो राजन् दीहास्यो दीप्तलोचनः ।।५८ ।। रूपं विभीषणं कृत्वा रोपेण ज्वलनिय । जग्राह विमलं एल | गिरिणामारि दोरणम् ॥ ५९॥ नाग जिघांसुः सहसा चिक्षेप च महाबलः । सविस्फु लिङ्गमालाभिः समन्तात परिवेष्टितः ॥ ६ ॥ तमापतन्तं सहसा इश्चा प्राग्ज्योति नृपः। धिक्षेप रुचिरं सीक्षण मधचन्द्र सुदारुणम्।। '६१॥ चिच्छेद तन्महच्छ्लं तेन घाणेन वेगवान् । उत्पपात विधा च्छिन्नं शूलं हेमपरिष्कृतम् ।। ६२ ।। महाशनिर्यथा प्रया शकमुक्ता नभोगता शुलं निपतितं दवा द्विधा फत्तं च पार्थिवः ।। ६३ । रुम दण्डां महाशक्ति अग्राहाग्निशिखोपमाम् । चिक्षेप तां राक्षसस्य तिष्ठतिष्ठति चानवात् ६४. तामापतन्तो सम्प्रेक्ष्य वियतस्यामशनीमिव । उत्पत्य राक्षसस्तूर्ण जग्राह चं ननाद च ॥६५१, भन्ज चैनां परितो जानुन्यारोप्य भारत | पश्यतः पार्थिवेन्द्रस्य से पीड़ित अपनी सेना को देखकर, बड़े कोध में भराष्टुमा घटोत्कच भगदत्त के सम्मुखगया है राना सावकटरूप क्रोधले लाल, नेत्र पराक्रमी घटोत्कचने अपने रूपको भयानक करके पर्वतोंके भी तोड़ने वाले बडेउग्र शूलको हाथमें लिया और हायोके मारने की इच्छासे.अकस्मात घुमाकर फेंका. वहशूल चारों ओरसे अग्नि कंपों. करके व्याप्तथा ६० उस अकस्मात गिरते हुये शूलको देखकर राजा माग्ज्योतिष भंगदत्तने बड़ेमन्दर तीक्ष्ण भयानक अर्द्धचन्द नाम वाणको फेंककर उसशूल को कांदा तब वह सुनहरी शूल दौखण्ड होकर पृथ्वीपर ऐसे गिरा जैसे कि, इन्द्रकावजू भाकाश से गिरता है हे रामा शूलंको टा और.गिराहुभा देखकर भगदच बड़ी तीक्ष्ण मुनहरी बरछीको लेकर रातसपर फेंककर तिष्ठतिष्ट इस धचनको करने लगा, उस आकाशसे गिरतीहुई वनके समान वरछीको देखकर उसराक्षसने बड़ी शीघ्रता से उछलकर पकड़ा और महागर्जना को किया।६५। और शीघ्रही उस बरछों को पोटू by that elophant and standing as if it were in fire and wounded by the enraged Bhagdatta, the Pandav army vas much distressed. At this Ghatotkach niuch enragal ruslied against Bhagdatta. Gbatotkach of wondorful form with eyes red in anger, assamed a dreadful shape and took up a dreadful epear that could pierce through a moun. tain, he hurled it with an intention to kill the elephant. The spear had flames of fire on Nl sides. 60. Seeing the spear coming suddenly upon him, Bhegdatta 'tho king cf Pragjyotish cut it with a beautiful sharp and dreadful arrow of the shape of crescent. The golden . spear cut by thoárrow into two pioces fell down on earth like the vajra of Indra. Seeing the spear cut and fallen, Bhagdatta took up a very sharp spear made of gold and hurled it at tlie rakshas with a cry of*stay stay." Seeing the spear falling from the sky like - vajra, the rakshas within jump hold it in his hand and roared in loud roar. 65 And [4788 ] Mahabhart (४७८८) शन् क्षिप्र पल्मीकमिव पन्नगाः । स गाढवितो व्यथिती नागो भरतसत्तम ॥ ४८ ।। उपासमदः क्षिप्रमभ्यवर्तत वेगिनः । स प्रदुद्राय धेगेन प्रणदन भैरव रवम् ॥ ४९ ॥ सम्मईयानः स्ववल वायुप्रेक्षानिवौजसा । तस्मिन् पराजिते नागे पाण्डवानां महारथाः ॥ ५० ॥ सिंहनादं विनधोच्चयुद्धायैवायतस्थिरे । ततो भीमं पुरस्कृत्प भगदमुगा. द्रंयन् ।। ५१ ॥ फिरन्तो विविधान् वाणान् शास्त्राणि विविधानि च । तेषामापतता राजन् संक्रुझानाममर्षिणाम् ॥ ५२ ॥ श्रुत्वा स निनदं घोर ममद्गतसाध्वसः। भगदत्तो महेन्यास. स्थ नागं प्रत्यचोदयत् ॥ ५३॥ अंकुशांगुष्ठ नुदितः सगज प्रघरो युधि । तस्मिन् क्षणे समभवत् साम्वर्त्तक इवानलः ॥ ५४ ॥रयसंघांस्तथा नागान इयांश्च सह सादिभिः । पादातांश्च सुसंकुरः शतशोथ सहनशः॥५५॥अमृदनात्स मरे नाग संप्रधानस्ततस्ततः। तेन संलोड्यमानन्तु पांडयानायलं महत् ।। ५६ ॥ सञ्चु करता है, फिर वह महा घायल और पीड़ामान मदोन्मत्तहाथी बड़े भयानक शब्द को करके प्रथम तो सम्मुख हुआ फिर बड़ी शीघ्रता से अपनी सेना को दवाता कु-, चलताहुमा महान्याकुलहोकर ऐसा दौड़ा जैसे कि वायु अपने बल से वृक्षों को गिरा सा हुआ जाता है।५०। उस हाथी के पराजय होने पर पाण्डवोंके महारथियों ने, बड़े उच्च स्वर से सिंहनाद किया और सब युद्ध के निमित्त सम्मुख नियत हुये। इस के पाछे भीमसेन को आगे करके नाना प्रकार के अस्त्र प्रस्त्रों को फेंकते मारते भगदत्त के सम्मुख गये हे राजा उन अत्यन्त क्रोधयुक्त' आतेहुये अमद्य लोगों के भयानक शब्दों को सुनकर क्रोध से निर्भय बड़े धनुपधारी भगदत्त ने अपने हाथी को चलायमान किया, फिर अंकुशरूपी उंगलीसे पीड़ामान हाथी उसयुद्धमै संवर्तक अग्नि के समान अत्यन्त कोषयुक्त होकर हजारों रथ समूहोंको हाथी घोड़े सवार और पदातियों समेत मारता तोड़ता कुचलतापुमा इधर उधर को दौड़ा । ५५ । उस हाथी:से घायल मलयाग्नि में नियन होने के समान कोधयुक्त भगदत्त के हाथ four teen tomars which pierced through the golden armour and entered his body as a serpa at eaters an ant-hill Excessively wounded and distressed the hugo elephant shríokeď loud, and facing the enemy for A moment, ran away trampling and killing the warriors of his own party us the wind destioys the trees in its fury. 50. When tho elephant was thus vanquishect, the Panday varriors roared like lions and faced the enemy in the field of battle. Discharging different sorts of weapons and led by Bhimsen, they rushed against king Bhagdattn. Hepring the sounds of those enraged warriors coming towards him in grant' force, the intrepid Archer Bhagdatta moved his slephant in & rng.. Gorled by the Frrok the clephant, enraged like the fire of pralaya, rus’ied hithor and thitha, destroying and trampling thous: Ents of chariots, clephants, horsemen and foot soldiers 55. Wounded .

(४७८९) मीमपर्य Bhishma Parv [4789] कोचं महाराज चमवाग्नी समाहितम् । भग्नन्तु स्वरल एण्या भगदत्तेन धीमता ॥ ५७ ॥ घटोत्कचाथ सद्धो भगदसमुपादयत् । विकट पुरुषो राजन् दीप्तायो दीप्तलोचन ॥८॥ कर विभीषण कृत्या रोपेण प्रज्वलमिव । जग्राह यिमल शूल गिरिणामपि दारणम् ॥७२॥ नाग जिघासु सहसा चिक्षेप च महायल । सविस्फु लिझमालामि समन्तात परिएित ॥ ६ ॥ तमापतन्त सहसा उध्या प्राण्योतिग नृए । घिक्षेप रुचिर तीक्ष्ण मर्धचन्द्र सुदारुणम् ॥ ११॥ चिच्छेद तन्महच्छल तेन पाणेन वेगवान् । उत्पपात द्विधा छिन्म शूल हेमपरिष्कृतम् । ६२ ।। महाशनिर्यथा भ्रष्टा शवमुक्ता नभोगता शूल निपतित इथ्या द्विधा पृतं च पार्थिव ॥ ६३ ॥ रुक्म दण्डा महाशक्ति अग्रादाग्निशिखापमाम् । चिक्षेप तां राक्षसस्य तिष्ठतिष्ठति चानवात ॥ ६॥ तामापतन्तो सम्प्रेक्ष्य वियत्स्यामशनीमिव । उत्पत्य राक्षसस्तूर्ण जमाह च ननाद च ॥ ६५ वमन चैनां त्वरितो जानुन्यारोप्य भारत । पश्यत पार्थिवेन्द्रस्य से पीड़ित अपनी सेना को देखकर.- बड़े कोध में भराभा घटोत्कच भगदत्त के सम्मुखगया हे राना उतविकटरूप क्रोपने लाल नेत्र पराक्रमी घटोत्कचने अपने रूपको भयानक करके पर्वतोंके भी तोड़ने वाले बडेउग्र शूलको हाथमें लिपा, और हाथ के मारने की इच्छास अकस्मात घुमाकर फेंका वहशूल चारों ओरसे भग्नि करणों करके व्याप्तथा ६० उस मकस्मात गिरते हुये शूलको देखकर राजा माग्ज्योतिष भगदत्तने बडेमन्दर तीक्ष्ण भयानक अर्द्धचन्द्र नाम वाणको फेंककर उसशूल को काटा तब वह सुनहरी शूल दोखण्ड होकर पृथ्वीपर ऐसे गिरा जैसे कि इन्द्रकावजू माकाश से गिरता है हे रामा शूलको टुटा और गिराहुादेखकर भगदत्त बडी तीक्ष्ण मुनहरी बरछीको लेकर राक्षसपर फेंककर तिष्ठतिष्ठ इस वचनको कहने लगा, उस आकाशसे गिरतीहुई नजके समान वरछीको देखकर उसराक्षसने बड़ी शीघ्रता मे उछलकर पकड़ा और महागर्जना को किया । और शीघही उस परछो को घोटू by that elephant and standing ng if it were in fire and wounded by tie enrged Bhagdatta, the Paodav army was much distresseu this Ghatothach much enraged rushed against Bhagdatta Ghatothach of wonderful form with eyog red in anger, assamed a dreadful slippe and took up a dreadful spoar that could pierce through a moun. tain, he hurled it with an intention to kill the elephant. The spear had Mames of fire on all sides 60 Seeing the spcar coming suddonly upon hm Bhagdatta the king of Pragjyotish cut it with a beautiful sharp and dreadful arroso of the shape of crescent The golden spear cut.by tho arróty into two pieces fell down on earth like the Indra Beoing the spear cut and fallen, Bhagdatta took up a very slarp spéar made of gold and hurled it at tho rakshas with a cry of stay stay' Seeing the spoar falling from the sky liko vajra, the rakshas with a jump hold it in his liand and roared a loud roar . vajra 65 And 1 47001 Mahablamt (४७९०) सदइ तनियाभवत्।।। ६६ ।। तदवेस्य कृत कर्म राक्षसेन चलीपसा ! विपि देवा सगन्धर्वा मुनयवापि विस्मिता ॥ ६७ ॥ पाण्डवाथ महाराज भीमसेनपुरोगमा | साधुसावितिनादन पृथिवीमन्वनादयन् । ६८ ॥ त तु या महानाद प्रधाना महात्मनाम् । नामृप्यत महेष्वासो भगदत प्रतापधान ॥१९॥ स विस्फार्य मह चाप मिंदाशनिसमप्रभम् । तलयामास घेगेन पाण्डवाना महारथान् | विष जन् विमलास्तीणाभाराचान ज्वलनप्रभान । मीममेकन विव्याध राक्षस नवमि शो ॥ ७ ॥ अभिमन्यु त्रिभिधेव फेफ्यान पञ्चभिस्तथा । पूर्णायतविधऐन शरेणानत पर्वणा ॥ ४२ ॥ विभेद दक्षिग पाहु क्षत्रदेवस्य बाहवे। पपात सहसा तस्य सशरधनु रुत्तमम् ॥ ७३ ॥ द्रौपदेयास्तत पञ्च पञ्चमि समताडपत् । भीमसेनस्य च शोधा लिजधान तुरनमान् ॥ ७४ ॥ पा फेसरिम चास्य चिच्छेद विशिस्तलिभि । पर रखकर रामा के देखोही देखते तोहराला यह सवको आश्चर्यमा हुमा ॥६६॥ पराक्रमी राक्षस से किये हुय उस कर्म को देखकर भाकाश में गन्धयों समेत देवता और मुनि भी आश्चर्य करनेलगे, हेमहाराज जिनमें भीमसेन अन गणनीयई उनपाण्डव लोगों ने घ यघन्य शब्दों से पृथ्वी को शब्दापमान किया, फिर' बडा धनुपधारी मतापवान भगदत्तं पाण्डवों के उस भत्य त भानन्दकारी इन्दि को सुनकर न सइसका । ६९ । और इन्द्र के बजके समान घई धनुष को चटाकर उम ने पाण्डवों के महारार्थयों को घुटका । ५. फिर निर्मल स्वच्छ प्रकाशमान नाराचों को छोडते हुये भगदत्त ने एक.वाणसे भीमसेन को और नी बाणों से राक्षस को घायल करके तीन वाणसे अभिम यु को पाच से फैकय लोगों को व्याकुल किया और फिर अच्छे मकारसे खेंचे और मुके ग्रन्धीवाले बाणसे, क्षत्र देवकी दक्षिणभुजा को ऐसा घायल किया कि वह भुजा धनुप समेत अकस्मात पृथ्वी पर गिरपडी, फिर पाच वाणों से द्रौपदी के पुत्रों को घायल करके बडे क्रोधसे witlun sight of the king be broke it into piecas srith the help of his Seeing the wonderful deed of the rakslas tho gandharvas,..ods and mumis on high were much uwazech. The Paodas as led by Blumsen rang the dnections with their marcries. I lien the great archer Blagdatta of great prosess could not be the joylal sounds of the Panda ag and taking up his bow like the rajon of Indra challenged the Pandav vart1018 Then discharging 1138 bright arrews, Bhagdatta sounded Blizsen mith one anor, the rakshas mith nine Allun anyn with tl tre and the haikaras with, fre, and with sell drann ins d schargiug aroxs barang hidden hnots so wound ed Kslatıadava s right ai ni that it tag ises ered fiom lus tod; and Ihen wounding the sons of Draupadi in rage, he killed Bhimsen s horses. Than with three sharp arrors, he - knee. This was a wonder 70 fell down with the bom 1 - (४७६१) भीमपर्व Bhishma Pary. [-47912 निर्षिभेद त्रिमिधान्य सारपि चास्य पत्रिमिः । ७५॥ स.गाढविदो यथितो रथोपस्थ उपाविशद । विशोफी भरतश्रेष्ठ भगदत्तन संयुगे ६, ७६ ॥ ततो भीमो महायार्षिः रयो रथिनांवरः । गदां प्रगृह्य वेगेन प्रचस्फन्द, रयोत्तमात् ॥-७७ ॥ तमुद्यतगदं ध्या सगृहमिय पर्वतम् । तावकानां मयं घोरं समपद्यत भारत ॥.:५८ ॥ एतस्मिघकाळे तु पाण्डयः कृष्णसारथिः । आजगाम महाराज निग्नशन समन्ततः । ॥ यती पुरुषव्याघ्रौ पितापुत्री महावली प्रागज्योतिषण संयुक्तो भीमसनघटोत्कची ॥ ८ ॥ रवाच पाण्डवो भ्रातृन् युध्यमानानमहारथान् । त्वरितो भरतभेष्ठ, तश्रायुध्यतफिर छरांन ।। ८१ ततो दुराधनो राजा स्वरमाणो महारथः । सेनामचोदयत सिप रय नागाइघसफुलाम् ।.८२ ॥ तामापतन्ती सहसा कौरवाणां महाघमूम् । मभिवुद्रापये.. भीमसेन के घोड़ों को मारा, फिर विशिषनाम तीन बाणों से "सिंह के विहन रखनेवाली उसकी बजा को काटा और दूसरे, तीन वाणों से उसके सारथी को पायल किया७५ भरतर्षभ पद में भगदत्त भत्यन्त घायल और पीड़ित वह विशोक सारयी रयके भीतर उगया. इसके मनन्तरः रथियों में श्रेष्ठ महाबाहु भीमसेन, विर बहोकर बड़ी ,शीघ्रतासे गदाको हाथमें लेकर उस रय से: कूदा, हे रामा उस पर्वतके समान उठाई ई, गदाको देखकर आपके शूरों में बहाभय उत्पन्न हुमा, इसके पीछे श्रीकृष्ण भगवानको सारयी रखने वाला पांडव भर्जुन चारों भोर से शत्रुओंको मारताहुमा यहां. भापहुँचा जहां कि वह महावली पुरुषोत्तम पिता, पुत्र -भीमसेन और घटोतच माग्ज्योतिष के राजा भगदत्त से युद्ध कररहे थे हे भरतर्षभ या अर्जुन युदकरते हुए महारयीं भाइयों को देखकर अत्यन्त क्रोधस चाणों की वर्षा करके युद्ध में प्रवृत्तपा, उसके पीछे पहारथी राजा दुरगोधन ने बड़ी : शीघ्रता से रप हाथी घोड़ों से संयुक्त सेना को भेजा, फिर श्वेत घोड़े रखनेपाला पांडव अर्जुन बड़े वेग से उस भकस्मात् भानेवाली कौरवी महासेना के सम्मुख गया, और राजा cut down liis ensign bearing tho figure of 8 líon and with three more wounded the driver. 75. Escessively wounded and distressed by Bhagdatta, Vishok the driver sat down within the chariot. Then the best ofcharioteors, ralliant Bhimsen, destitute of chariot, jam.ped' döfin' from it mace'in hand: Your warriors were much terrified at the sight of that mace upraised like a mountain. Then Arjun the Pandav having Sliree krishn for his chariot driver, came on destroying the foes where tlié father and son, Bhimsea and Ghatotkach were fighting agáiøst princé Bhagdalta. 80. Seeing his' brare 'brothers engaged in fight, O best of Bharats,' Arjun began to fight discharging his tvēspoirs. Then the great: 'Warrior Prince: Duryodhan sent an army of chariots, 'elepha rits and horses in-great -hastā. Arjun 'the possessor of whito horses ruined against the Kaurav aring which was , -- [4792] Mahabharat (४७१२) गेन पाण्डव श्वेतपाइन ।। ८३ । भगदत्तश्च समरे तेन नागेन भारत । विमृग्ननुपाड घयल युधिष्ठिरमुपादयत् ।। ८४ ॥ तदासीत्सुमहयुद्ध भगदत्तस्य मारिष: पञ्चाले पारधेयैश्च फेकयैश्चाधतायुधै ॥ ८५ ।। भीमसेनोपि समर तावुभौ केशवार्जुनो। भधावयपथावृस मिरावधमुत्तमम् ॥ ८६ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भगदत्ताराक्रमे पडनवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥ सम्जय उवाच । पुत्र विनिहत श्रुत्वा इरावन्त धनञ्जय । दु नेन महताविष्टो नि श्वसन पन्नगो यया ॥ १ ॥ अग्रवीत् समरे राजन् वासुदेघ मिदघच ।इव नूनमहा प्राशा विदुरा हटवान् पुरा ॥२॥ कुरूणो पाण्डवानाञ्च क्षय घार महामति । स ततो निवारितवान् धृतराष्ट जनेश्वरम् ॥ ३ ॥ अन्येच बहवो वारा सग्रामे मधुसूदन । | भगदत्त उस अपने हाथी के द्वारा पांडवों की सेना को मईन करता हुमा युधिष्ठिर के सम्मुख गया, इसके पीछे हे राजा धृतराष्ट्र वहां भगदत्त का और पांडवोंका युद्ध पांचालदशी और केकयदेशी लोगों समेत बढे २ भन शस्त्रों के द्वारा,महा भयानक हुभा, फिर भीमसेन ने भी उसी युद्ध में उन फेशब और अर्जुन दोनों महात्मामों से इरावानके मारेजानेका जैसा वृत्तान्त हुआ सब पथार्थ वर्णन किया । ८६ । अध्याय ९७ ॥ संजय चोले हेरामाउस इरावान नाम पुत्रकोमराहुआ सुनकर घडे खेद और शोकसे मरा, सर्प की समान श्वाप्सा लेना हुमा अर्जुन वासुदेवजी से यह वचन बोला कि परम चतुर बुद्धिमान सत्यवक्ता विदुरभी ने पूर्वसमय में वड़े निश्चय से इस कौरव और पांडवों के महाघर नाशको देखाथा इसी कारण उन्हों ने राजाधृतराष्ट्र से निपध किया था, हे मधुसूदनगी इस के विशेष बहुतमे वीर लोग युद्ध में जैसे कौरवों thus adzancing King Bhagdatta destroying the Prodava al mics with the help of lus elephant encountered Yudhishthir Then, O king Dhritrashtra the battle between Bhagdatta and the Pandavas resisted by the larkayas and the Panchals, using weapons and missiles was very severe. Bhimsen then gave Keshav and Arjun in the field of battlo, a detailed account of the death of Irawan as it hap pened' 86 CHAPTCR XCVIII "Hearing of the death of Iravan,' said Sanjaya, “Arjun was fill ed with grief aux dismay, and sighing like a serpent said to Vasuder Surely Vidur had already foreseen the great destruction of the Kaura vas and the Pandavas as he forbado Dhrit ashtra. As many brave warriors are destroyed by the Kauravis 88 I have slain thens All this battle is being done for tho sake of wealth. I despise a wealth (४७९३) भीष्मपर्व Bhishm_Parv [4793 ] निहताः कौरवः मख्ये तथास्माभिश्च फौरवाः ॥ ४ ॥ अर्थहतार्नरश्रेष्ठ क्रियते कम्म कुत्सितम् । धिगान् यत्कृते एवं क्रियते शातिसंशयः ॥ ५ ॥ अधनस्य मृतं या नच शातिषधाचनम् । किन्नु प्रापस्यामहेकृष्ण हत्या ज्ञातीन्समागतान् ॥६॥ दुर्योधनापराधेन शकुन सावलस्य च । क्षत्रियां निधनं यान्ति फर्णदुर्मन्त्रितेनच ॥ ७॥ इदानीव विजानामि मुकृतं मधुसूदन । कृतं रक्षा महावाही याचताच. योधनम् ॥ ८ ॥ राज्या पञ्चचा प्रामा नाकार्षीत् स च दुर्मतिः । इदया हि. क्षत्रियानरान् शयानान् धरणीतले । ९ ॥ निन्दामि भृशमात्मानं धिगस्तु क्षत्रे जीविकाम । अशक्तमिति मामत दास्यन्तै क्षत्रिया रणे ॥ २० ॥ युद्धन्तु मेम मचिन शातिभिर्मधुसूदन । मञ्चोदय हयान शीघ्र धार्तराष्ट्रचमं प्रति ॥ ११ ॥ प्रतरिष्यमहा पारं भुजाभ्यां समरोदधिम् । नायं यापयितुं कालो विद्यते माधव चित् ॥ १२ ।। के हाथ से मारेगये उसी प्रकार युद्ध में मेरे हाथ से भी अनेक कौरव म रेगये हे मोत्तम यह सब युद्ध कर्म केवल धनंही के निमित्त किये जानेहें ऐसे धन प्रादि को धिक्कार है जिस के कारण ऐसा जातिवालों का नाश किया जाता । ५ इस जाति के मरने से तो निर्धनह। मरना श्रेष्ठ है हे श्रीकृष्ण जी हम जान वालोंको मार कर क्या फल पायेंगे, दायेंधन और मुवल के पुत्र शकुनी के अपराध अथवा करण की बुरी मलाहों से क्षत्रीलोगों का नाश हुआ जाताह, हे महाबाहु श्रीकृष्णजी पत्र में अच्छी रीति से जानत हूं कि राजा युधिष्ठिर ने बड़ा अच्छा काम किया कि दुग्योधन से आधेरराज्य वा पांचही गांवोंको अभिलप्पा चाही और उस निर्बुद्धी ने बंद भी उनकी अभिन्नापा पूरी नहीं की मैं इस युद्ध भाम में मोते हुए बड़े २ शर पीर क्षत्रियों को देखकर, अपनेको अत्यन्त खुराकहकर क्षत्री की जीविका को अत्यन्त धिक्कार देता हूं, हे मधुदसून जी मैं ज्ञातिबालों से युद्ध करना न चाहूं तो 'सर क्षत्री लोग मुझको युद्ध में असमर्थ समझेंगे ।१.०॥ इम कारण हे मधुसूदन यापघोड़े। को नीग्रही दुर्योधन की सेना में ले चलो, अब में भी अपनी भुजाओं से इस युद्ध रूपी महासमुद्रको शीवही तरूगा क्योंकि पह ममय किमी स्थान पर भी असामर्थ for which kinsmen are slain 5. To die in poverty is better than the destruction of hipsmell. What sliall we gain Krislin, after destroyios them. By the fault of Duryodban and Sbakuni the son of Su al and the wickrd council of Karan all this destruction of Kshatryas is taking place. I know rell, brave Krishn. that Prince Yudhishthir was right in that he wished to tabe half the kingdom or even fire villages fiom Duryodhan, lut the latter would not part witli even that much. Seeing these great warriors sleeping on the field of lattie, I blame niysolf and the work of a ksliatrya. The Ishatryas will think me to be weak, if I donot fight against my linsmen 10. Drive | therefore my horses into the field of tattle, Madhusudan. I too, [4794] Nali bliniat (६७४) पवमुक्तस्तु पार्थन केशव परवीरहा । चौदयामास नानवान् पाण्डुरान् पातरहस. ॥ १३ ॥ अथ शब्दो महानासीत् तव सैन्यस्य भारत ! मारतोबूत धेगस्य सागरस्येव पर्वणि ॥ १४ ॥ अपराहणे महाराज सग्राम समपद्यत । पर्जन्यसमनिर्घोषो भीमस्य सह पाण्डवै ॥ १५ ॥ ततो राजस्त सुता भी सेनभुपाद्रवन् । परिवार्य रणे द्रोण वसो वासव यथा ॥ १६ ॥ तत शान्तनो भी म हपश्च रथिनावर । भगदत्त मुंश मांचधनञ्जयमुपादयन् ॥ १७ ॥ हाईक्यो याहलिक व सात्यफि समभिती सम्ब ठकस्तु नृपति रभिमन्युमयस्थित ॥ १८ ॥ शेपास्त्यन्ये महाराज शेषानेव महारथान् । तत प्रववृते युद्ध घोररूप भयावहम् ॥ १९ ॥ भीमसेनस्तु सम्प्रेदय पुनोस्तव जनेश्वर । प्रजज्याल रणे क्रुद्धो हविषा हव्यवाडिया ॥ २० ॥ पुप्रास्तु तय कौन्तेय छादया चक्रिरे होने का वर्तमान नहीं है, इस प्रकार अर्जन के वचनों को सुनकर शन संहारी केशव जी ने उन श्वेतरूप वायुके समान तीब्रगामी घोड़ो को हांका, इसके पीछे है। राजा आप की सेना में ऐसा पहा शब्द हुआ जैसे कि पर्व के समय वायुसे उठे हुए। देगवान् समुद्रका घोर शब्द होताहै, हे महाराज अपराहनके समय भीमजी के और पांडालोगों के युद्ध में बादल के समान शब्द हुए ।१५। इसके पीछे हे राजा आपके पुत्र युद्धमें द्रोणाचार्यको रक्षितकरके भमसेनके सम्मुख ऐ गये जैसे इन्द्रको रक्षित करके अवमुजाते है, फिर शन्ननुकेपन भीष्मी और रथियों में थेप्ठ फूपाचार्य, भगदत्त, सुशर्मा, यह सब मर्जनके सम्मुखम्ये और, कृतवर्मा व वालीक सात्यकी के सम्मुख हुए और रामा अटक अभिमन्यु के सम्मुख वर्तमान हुआ, इन के विशेष शेष बचे हुए शुरवीर येर महारविया के सम्मु व गो फिर मा भयानक युद्ध प्रारम्भ हुआ, हे राजा फिर भीमसेन आपके पुत्रों को देखकर ऐसा क्रोविन होकर अग्निरूप हुआ जैसे कि हव्य को पाकर प्रति प्रचण्ड होवे है, फिर आप के पुत्रों ने घाणों से भीनमेन को ऐसा हक दिया, जैसे कि वर्षामृत में बाटल sball with my al ms cro s tue ocean ot lattle, tou it o no t me to stand still like a wealling On leaning the words of Aljun, Ke has the destroyer of foes diove those whuu. huise, swat as wind Then there 31&S &x upraar we zou a wy do that at the cosa camped by the wad at the full moon 33111 hm and the Pandavas thundered like cluuus in the field of battle in the afternoon 13 Ilien, o bing, your “0119 protected Dronacharya in battle who faced Bluniven like andre pron rected by the Vasus Ihen Bhishm the son of Shantanu Kupacha") a the bst of chario ees Bhagdat a und Susharına enculintered Adjud, Kntvaima and Vablik Izred Satyakı end kmg Amvashtal met Abhi manyıl he rest of the 11 ? ? 1013 encountered the romaining army on the opposite side. A dieadiul little ensued Then, O, hing, Bhunen, seeing your sous there he becams fur wu, like fire on pouring Your only lud Bhim in with their nions as cloud, in the libatio 19 (४७९५) भीमा Bushma Patv [4795] शरै । प्रापीय महाराज जलदायपर्वतम् ॥ १॥ संच्छाद्यमानी पहुधा पुस्तच विशा पते । सृविकणीमलिहन वीर शार्दूल इव दर्पितः ॥ २२ ॥ व्यूढोरस्क ततो भीम पातया मास भारत । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन सोमवगतजीवित ॥ २३ ॥ अपरेण तु मल्लेग पीते लनिशिंतननु । अपातयत् कालिन सिंह क्षुद्रमृर्ग यथा ॥ २४ ॥ ततः सुनिशितान पातान् समादत्त शिलीमुखान् । ससर्ज त्वरया युक्त पुत्रांस्ते प्राप्य भारिप ॥ २५ ॥ 4पिता भीमसेनेन शरास्ते हवधायना । अपातयन्त पुत्रास्ते रेवेश्यः सुमहारयात् ॥ २६ ॥ अनोष्टिं कुराहभेदि चराटदीर्घलोचनम् । दीर्घवाई मुघाटश्च तथैव कनक ध्वजम् ॥ २७ ॥ अपततस्म वीरास्ते विरजुर्भरतर्षभ । धसन्ते पुष्पशवलाचूताः प्रप सिताय ।। २८ ॥ तत मधु शपास्तवपुत्रा महाहवे । त फालमिव मन्यन्तो भीम. सेन महायलम् ॥ २९ ॥ द्रोणस्तु समर धीर निर्दहन्तं सुतांस्तव । यथादि चारिधारा भि समन्ताद्वपफिरच्छर ॥ ३० ॥ तत्राद्भुतमपट्याम कुन्तीपुत्रस्य पीरुपम् । द्रोणेन पर्वतको ढक देने हैं ।२१। हे राजा आपके पुत्रोंमे बहुत ढके हुए होठों को चावते साईलके समान गर्षित महारली भीमसेनने, अत्यन्त तीक्ष्ण क्षुरमवाणसे व्यूढोरस्क को पेसा गया कि वह मरगया, फिर दूसरे पाले ती ग मल्लसे कुंडली कोभी ऐसे गिराया मेमे जिछोटेमृगको सिंह गिराताहै, इसके पीछे हैराना बड़ीशीघ्रतामे भामन ने अत्यन्त तीक्ष्ण शिलीमुख वाणों को हाथों में लिया ।२५ । और आपके पुत्रोंपर छोड़े उनभीममेनके चलायेहुए वाणोंने आपके महारथी अनाधृष्ट, कुण्डभेद, रैराट दीर्घलांचन, दीर्यवाह, सुवाह, कनावन पुत्रोको पृथ्वीपर गिराया और सय चार गिर कर एमे शोभायमान हुए जैसे कि यसन्तऋतु में गिरे और पड़ेहुए लालर फूल होते है, । २८ । इसके पीछे भापके शेष बचेंहुए पुत्र भीमसेन को काल के समान जानकर युद्ध से भाग गये, फिर द्रोणाचार्य ने अापके पुत्रों के जलाने थाले भीमसेन को वाणों की वर्षा करके चारों ओरसे ऐसा ढक दिया जैसे कि चादल जलकी धाराओं से पर्वतको ढकता है, । ३० । वहां हमने कुन्ती के पुत्र sainy'suon lude a lu}} 21 Lxcessus cly hidden by your sons and butung 1119 lips, valliant Bhumben, proud as a lion, killed Vyudhorask with a sharp arrow By another yellow dort he felled Kundalı As ljon kills a small dat. Then O ling, he took up in his hand very slianp arrows grinded on stone 25 He discharged them at your sons. By those ar'ows Bhimsen caused the fall of your sons Anadlırisht, Kund blterl, Taunt, Dnghischali, Diglivahu, Suvalhu and Kanakdiaj. All these varriors, lying on the ground, lovhed glorious lile red flowers lying on earth in tho sea-on of Spring I he rest of your song, regarding lum as dangerous as Death, fled from the field of Battle. Then Drunacharya htd Bhimsen the destroyer of your sons with (114 ar1018 es clouds lude a inountain with the showers of 2017 30 Thore ne enw the prosess of Blumsen, the son of Kuntı, who -- 14790] Mababliart (४७२६) धार्यमाणोपि निजघ्ने यत् सुतास्तव ॥ ३१ ॥ यथा गोवृषभो यर्य सन्धारयति खात् पत्तत् । भीमस्तथा द्रोणमुक्त शरवर्षमदीधरत् ॥ ३२॥ अद्भुतञ्च महाराज तत्र चने ४ादर । यत पुत्रास्तेऽवधीत्सख्ये द्रोणश्चैव न्यवारयत् ॥३३॥पुत्रेपुतश्वीरेयु चित्रीका र्जुनपूर्वज । मृगेपिव महाराज घरन् व्यानो महावल ॥३४॥यथाहि पशुमध्यस्था द्वार यंत पशून् वृक । वृकोदरस्तव सुतास्तथा व्यदाययद्रणे ॥ ३५ ॥ गाङ्गेयोभगवथ गीतमश्च महारथा । पाण्डवं रभम युद्धे धारयामासुरर्जुनम् ॥ ३६ ॥ अौरस्त्राणि संवार्य तेपासोतिरथो रथे। प्रवीरास्तव सैन्येषु प्रेषयामास मृत्यये ।। ३७ ।। अभिम. 'पुत्तुराजान मम्बष्ठ लोकविश्रुतम् । विरथ रथिनाश्रेष्ठ वारयामास सायक ॥३८॥ विस्थी वध्यमानस्तु सौभद्रेण यशस्विना । अवप्लुत्य रथातूर्ण मंबष्ठोवसुधाधिप ३९॥ आम विक्षेप समर सौमद्रस्य महात्मन । आरुरोह रथ चैत्र हार्दिक्यस्य महाबल भीममेन के पराक्रम को देखा कि जिसने द्रोणाचार्य के रोकने पे भी आपके पुत्रों को मारा, है राजा जैसे कि आकाश से गिरेहुए जलको गो वृषभ जगल में सहते है उसी प्रकार द्रोणाचार्य के वाणोको भीमसेन ने सहा, फिर वहाँ भीमसेनने सरा अद्भुत कर्म किया कि आपके वेटोको मारकर द्रोणाचार्य को भी रोका, अर्जुन का बड़ाभाई आपके वीरपुत्रोंका महापीड़ा देनेवाला ऐसा हुआ गैसे कि मृगोंके मध्य में महावली व्याघ्र पीड़ा देनेवाला होताहै जैसे कि भेड़िया पधुआ के बीचमें नियत होकर पशुओं को ब्याकुल और चलायमान करता है इसी प्रकार भीमान ने,युद्ध मे आपके पुत्रोंको भगादिया । ३५ । फिर भीष्पनी भगदत्त और महारथी कृपाचार्य ने युद्ध में वेगवान अर्जुन को धारण किया अर्थात् उसके बाणों को सहा उम अति स्थी ने युद्ध में उन सब के अस्त्रोंको अपने भत्रों से रोककर आपकी सेना के बड़े २ वागको माग, और अभिमन्यु ने भी राथियों में श्रेष्ठ संसार मे विरयात राजा अबष्ट को शायकों से विस्थ कर दिया फिर उम यशः स्वी अभिमन्यु मे विस्थ हुए राजा अंबष्ट ने शीग्रही रथ से कूद महात्मा अभिम यु although checked by Diomachar yn could not be kept brch fron kill ing youi sork Bhimsen bo e the eu1096 of Dronacharya as cattle undergo the slioner of run 113 & forest Bhimson then performed anothea wonder harmokilled your sons lo checked Dionacharya The elder brother of Arjun destioyed you sons as a lion destroys a herd Af deer As a wolf entering a flock slesturls nad disperses them, so did Blinserr cause you wong to seamyr awy 35 Then Bhughm, Blog datt anuli yallinut Krpachary a boie the velocity of Arjun's arrows That lire urrio, living chechal the wenpois of other Warriors with lusion in hulled the great warriors of your army. Ablumanyu toor wt 1.19 TF0F3, (uusof the test of chariotecs, famous king Amraght to let his chariot Made destitute of chariot by Abhir.

भीष्मपर्व Blushna Puv [4797} ॥ ४० ॥ आपत तत्र निधिश युद्धमार्गविशारद । लारवाट व्यसयामास साभदा परवी रहा ४१ ० म्यसित वाक्ष्य निस्त्रिंश सौभद्रेण रणे तदा । माधुसाध्यिति सन्याना प्रणादोभूहिशाम्पते ॥ ४२ ॥ धृष्टद्युम्नमुखास्त्यन्ये तर मन्यमयोधयन् । तथैर्य तावया सर्वे पाण्सन्यमयोधयन् ॥ ४३ ॥ तत्रान्दो महानामीत्तय तेपाञ्च मारत । निघ्नता हमन्योन्य कुर्वता को दुष्करम् ॥मा अन्योन्य हि रणे गुरा. कोपामिप्यमानिन । नखदन्तरयुध्यन्त मुरिगिनुिभिस्तथा । ८५ ॥ तलवाथ निस्त्रिंशमिश्न सुमस्थितः । विवरम्प्राप्य चान्योन्यमनयन् पममादनम् ॥ ४६ ॥ न्यहनच्च पिता पुर्व पुत्रय पितर. तथा । व्याफुलीरतसर्वाङ्गा युयुधुप्तत्र मानया रणवारूणि चापानि हेमपृष्ठानि भारत । हतानामपनिद्धानि कलापाश्च महाधना ४८ जातरूपमय पुढे गजनिशिता शरा । तैलधौता घ्यगजन्त निर्मुक मुजगोपमा ।४॥ हस्तिद तत्मरुनखड्गान जातरूपपरिष्कृतान् । चर्माणि चापविद्धानि रुपमचिप्राणि के ऊपर अपने सद्ग को फेंका और बडी शीघता से महाबली कृतवर्मा के रथ पर मबार कुत्रा 1 ४० । फिर युद्ध में महाकुशल शत्रुहन्ना अभिमन्यु ने उस गिरतेहुए वड्गको अपनी तीव्रता से निष्फल किया ता अभिमन्यु से निप्फल किये हुए खड्ग को देखकर सेना के लोगों ने मांधु शब्द उच्चारण किया, और जैसे कि धृष्टद्युम्न प्रादि वीर लोग आपकी सेनासे लड़े उसी प्रकार आपके सत्र वार पुरुप भी पांडवों को सेना से लड़े हे भरतर्षभ वहां परस्पर में मारोंको मारते और कठिन कर्माको करते हुए आपके और पाडवों के वीरों के महाशब्द हुए । ४४ । युद्ध में प्रशमनीय वार लोग परस्पर में यलों को सेंचकर नस्स दांत मौर मुष्टिका और नांचों मे भी युद्ध करनेवाले हुए और अवकाश पाकर तमाचों तलवारों और भन्छे नियत भुजों से बहुतोंने बहुतोंको यमपुरीमें मैना, उसयुद्ध में पिताने पुत्रकोभी मारा अर्थात् मय मनुष्य मवीगरहित व्याकुलहो होकरभी युद्धको करतेहुए, हे राजा धृतराराष्ट्र युद्ध में परेहुए वा घायल शुरवीरों के सुनहरी पृष्ठवाले सुन्दर धनुष और manytip King A miraslat coon jumped do rn from lus chinnot ond hasing hurled his snoid it fum, inounted the chariot of krtvarwa 40 Then desterduis in lattlo Abbimanyu tho destroyer of focs mido tho fallug word ſutilc hy his own swiftness. Seeing that sword made reless by Abhimanyu, the people raised cries of gcod and sell. Your Wurricts fought as bravely hgainst the Pondar Tai nors as Dhristudyumn and other warriors fought against your aimny Kill ing one another and doing hard deeds your hair org and thic Panda vas Irinde a great noise. Bravo warriors of great merit in lattic draged others by the bar and wounded them with then nails, teeth, Loirs and' hicho. On some occasions they word slaps, swords and string Arnis to destroy their adversaries Tathors destroyed their song in - |[41] Vialiavljajtt (४७९८) धमिनाम ॥५॥ सुवर्ण वित्तप्रासान परिशान हम्मषितान् । ज्ञातम्पमयाची शकीय कनकोयला ॥५१॥ मसन्नाहाच पतिता मुसलानि गुरुणिच । परिधानपष्टि शाबर भिदिपालाश्रमारिप ॥५२॥ पतितान विविधाााचित्रान्हेम परिष्कृतान् । कुयावहुविधाकाराश्चामरानन्यजनानिय । ५३ ॥ नाना विधानि शम्माणि मगृह पति तानय । जीवन्त इव रश्यन्ते गतसरवामहारथाः ॥ ५४॥ गदाविमयितैमिलीम नमस्नका गजमाजिरपदुपा शेरतस्मनग क्षिता ॥ ५॥ तथवावन्नागाना शरी रविचमी तदा सन्ना वसुधाराजन् पर्वतरिव सर्वश ५६ ॥ समरे पनिवेदन शशिरतोमरै निस्त्रिशै पहशै प्रासे रयस्वन्तै परम्यध ॥ ५७ ॥ परिभिन्दि पालश्च मातनोमिरचमारिण। शरीरै शन निभिन्न समारतीयत मेदिनी ॥ ५८॥ विशम्दैलाशलेद शाणिताधारिष्टुत । गतासु भिरमियन रिषभौ निचितामही नगार अथवा मुनहर्ग स्पहरी पुरखवाले छोडेहुए तीक्ष्णधार वागानेलमे शुद्ध किर हुए सपों के समान शोभायमान हुए, हाथीदात की मृटपाले मुवर्ग में गन्ति सहग धनुप ढाल पराश, दुधारे, खड्ग, शक्ति, कवच, भारीमुशल, परिघ, पटिश, भिगिडपाल अनेक प्रकारके गिरेहुए धनुप और अनेक प्रकार की झलचमर पवे वा अनेक प्रकार के शस्त्रधारी महारथी और मरे मनुष्य भी जीवते मे दिखाई देते है । ५।। हे राजा गदाओं में मधे हुए अगों समेत मुगलों से टूटे शिर घायल हाथी घोडे और रथ पृथ्वी पर शयन कर रहे है अर्थात विछ हए है, उन हाथी घोडे रय और मनुष्यों मे ढकी हुई पृथ्वी मर ओर से ऐमी शोभायमान हुई जैसे कि पर्वनों में शामिन हाता है, युद्धभूमि में गिरी हई वरही और दुधारे खडा वाण तोमर पहिश पराश भल्ल लोहे के फरसे परिघ भिण्डिपाल शतम्नी और शस्त्रों मे मटे शरीरों मे पृथ्वी सविस्तर विदित होती है अल्प शब्द के वा वीर्घ शब्द के मृतक मनुष्यों के समूहों से व्याप्त हुई पृथ्वी महाशोभित चिदितईई, तन्त्र केयूर thu huus of the latti. Ti e golden lous of the warr ors billed or vuurded in batt'e qu vers ud anois Laving silver, or gold feathers sharper e land oiled looked like sei pents Tye go'd decled stronis with ivo y huudles boive sheds missiles double edged coria uriours clube ind otl er weapons lying down togellier with tin tinc tu (pros fi farina s fan made the headsofmar ors look as try i ele aine 54 Bioliss of 1 » bs rdlesds by races and club clezia ts lorses and char ots are lyz.g ou tlo ground St ewn orer watir tion to cirul luis flere la ag af covered with mountains 1 allen over ti o tit'd of Lottle of this doulle edged swords, tomats, darts ?xs duts inda's Satg me and other neapens and tle ledes aut ly threw tovar tlu s hole earth Crying low and loud, crowds of dying Farriols emlolish tiefire of ti eduth Decked with 50 rs - भीष्मपर्य Busine Pur [47935 सतलत्रै सफेयर्खाहुभिश्चन्दनीक्षिते । हनिहस्तापमैदिउने रुमभिश्च तरस्थिनाम, ।। ६. ॥ वदन्डामणिवर शिगमिश्च सण्डले । पातितःपभाक्षाणा वी भारत मेदिती ॥६॥रवै शोणिता दिग्धविप्रकीर्णश्च काचन । रराज सुमश भूमि शान्ता चिं भिरिवानले ॥६२॥ विप्रविद्ध कलापश्च परितेश्च शरामने विपकी शरैश्चैव रुक्म पुरी समन्तत ॥ ६३ ॥ रवैश्च सर्वता भने पिंकिणीजालसापित । पाजिगि चहतैर्वाण सल जिा सशोणित ॥ ६४ ॥ अनुस् पताकामि रपासनेरपि । प्रवीराणामहासखर्षिप्राणश्चपाडुरै ॥६॥ सस्तहस्तैश्चमात शयानयिमीमती । | नानारूपैरलकार प्रमदेवाभ्यलता ॥ ६६ ॥ दन्तिभिश्चापरस्तन समासर्गाढवेदने । करे शब्द विमुञ्चति शीकरच मुहुर्मुहु ॥ ६॥ विषमी तदणस्वानं स्यन्दमाने रिवाचले । नानारागै कम्बलश्च परिस्तोमेश्च दन्तिनाम् ॥ ६८.॥ वैदूर्यमणि दण्डध पतिनै रकुशै शुभैः । घण्टाभिश्चगजेन्द्राणा पतितामि समन्तन ॥ ६९.॥ विपारित रक्षक भार चन्दन चर्चित मुना हाधियों की शंड के समान की जंगा और चूडामणि वॅधे हुए उत्तम शो के कुडलधारी शिरो से पृथ्वी अपूर्वही शोभा देरही है । ६१ । और हे भरतवशी मुवर्णके फैलहुए रुधिरसे भरे कवचों से पृथ्वी ऐमी प्रकाशमान हुई जैसे कि निर्धम अग्नियों से शोभित होती है, टे घनुप तरकम और फैलहुए सुनहरी पुग्वाले वाणों से और चारो ओर से घरों से युक्त दृढे हुए रयों मे वा वाणों में मारे हुए रुधिर मे भरे निनकी गिहना मुख से बाहर निकली थी उनघोड़ोस वा खेंचीहुई पताकाओं से मोर उपासगिक ध्वजासि और वीरोंकी खोपड़ियों से वा विखरी हुई चोटियों से और. शृडटे हुए हाधियों से पृथ्वी ऐसी शोभायमान हुई जैसे ,फि नानामगार के आभूपणोंसे अलकृतस्त्री शोभित होतीहै । ६६ । वहा बहुत पीडित मुडोसे शब्दकरते हुए पराशों समेत अन्य हाथियों से वह युद्धभाम शाभित हुई जैसे कि चलने हुए पहाडों से शोभाय मान होती है, नानाम कार के रगवाले हाथियों के सम्बलो से वा परश तोमरों से मार पहार्यमणिवाले शुभ भकुशों से व चारों ओर से गिरेहुए गजेन्द्रों के घटों armlets, guards and sanad ıl paste, the soverol arms, the thigh like the trunksof tlephants and the heads of warmony wta ing carings ina head jewols inzhe the ground loob jet wio e beautiful 61 Govered with blood stained mod gold bllelmu Jurs tlic carth looked as if cover ed with firo sithout amobo Hath the broaen buws and quiveis, tle urows with golden feathers strewn all over, el t luts and their b 113 ising all ordt, tho discharged arrons, the fleeding horse nith thout tungaes lolling our, brohen banners, skuils of warniors streraorce the peaks and the trmkless elepliants, the earth looled beautiful like a damsel decked with rious sorts of o naments and jewels other olepliants, sounded in tuoks and shuehing, the field of baltk looked Lorutıful as it it had mountaus movog va it. The field of battle looked liko starht shy with the coloured irippings of elephants, 56 with 138001 Nilhabhuat (४...) विचित्राभि फुधाभि रशस्तथा । वेयश्चिवरूपैश्च सम्मकल्याभि रेवच ॥ य त्रैश्च बहुधारिउन्नस्तामरैश्चापि काचनै । अवाना रेणुकपिले रकमाउन्नराच्दै ५७१ ॥ सादिना भुजगछिन्ने पनि साह्न दस्तया । प्रासश्चविमलस्तीक्ष्णविमल मिस्तरिम ॥ ७२ ॥ उष्णीश्च तथा चित्रविमर्द्धस्ततस्तत । विचित्रवाणन जातरूपपरिष्कृत ॥ १३ ॥ अभ्यास्तापरित्तोमै राकवदितैस्तथा । नरेंद्रघडामणिमि विचित्रैश्वमहाधनै ॥ ७ ॥ अस्तथाविवरच चामरव्यंजनेती गन्दुतिमि इचव घनश्चारुकाडले ॥ ७ । समशुभिरत्यर्थ वाराणा ममलकत । अपविस महाराज सवर्गाजवल कुण्डले ॥ ७६। महनशवायोरिवासाद्वसन्ध। एवमेते महासेन मृतिते तत्र भारत ॥ ७० ॥ परस्पर समासाद्य तर नेपाच सयुगे। तेषुभ्रान्तेषु भग्नेषु मुदितच भारत ।। ७८ । रात्रि. समभवत्तत्र नापश्याम तता नुग म । सतो यहार सेन्यानाम वक्र फुलपाण्डवा ॥७२॥ रजनीमुखेम रोद्रेतु धत्तमान महामये (अय हार तत कृत्वा महिता कुरुपाण्डवा ।न्यविशन्त यथाकाल गत्यास्त्र शिविरंतदा। ८०, (इति महाभीजप. भीष्यवधप. अष्टमदिवनयुद्धावहारे सप्तनवतितमोऽ यायः॥२७॥ से और चित्रविचित्र मल और ग्रीवाओं के भूषणों से वा हाथी वाग्न वाली सवर्ण को रस्सियोंने वाजवन्दों समेत गिरीहुई भुनाओं से वा शुद्ध तीक्ष्ण परशों से मार निर्मल दुधार खड्गों से विचित्र वाणों की वर्षामे जोकि राक नाममृगके रोमोसे बनेहुए अत्यन्त मृदुथै वा राजाओंकी अमूल्य चडामणियोंसे या टूटे छत्र चामर व्यजन और चन्द्रकमल के समान मुखों के प्रकाशों से और हे महारानीरों की अच्छे प्रकार से रची हुई ड दी मूछते पृथ्वी ऐमी होगई जैसे कि नक्षत्र समूहों में प्रकाशमान आकाश होताहै ।१७। हे भरतर्षभ इसप्रकार आप की भार उन्हात पह दोनों भेना युद्ध में परस्पर सम्मुखहोकर गई मई होगई, उन सेनामों के थकने और तिरविरहोने और मर्दन हानेपर, रात्रिहोगई इसके पीछे हमने चलने वालों को नहीं देखा फिर कोरव पाडवों ने सेनाओं का विश्राम किया रात्रि के मारंभ होजानेपर कौन और पाण्डव एकसायही सदैव के समान अपने २ डेरों में नियतहुए ८० ॥ battle nres missiles, Jewelled gonds, bells of elephauts strern all over, corerings of various colouis nerblaces of elepl auts, gold chains, !!? cluines, aims of wari1013 decked with jewels, sharp axes, brightdouble pdged swords, shower of rows carered over with soft deer skin, head jevels of princes broken shados chamars and fans, faces bright as the moon or lotus flowers and with the fine beards and moustaches of Thus 0 best of Bharats the simes of both sides mot in battle and sere destroy ed When the se aimes were thus tired and dispersed or destroyed, the night came on, We could not see then going The two parties took rest for the night and buth Brujaras und Panda729 slept during the night nj uspaļ ” 80 T Warrory 17 to then camp । ir (४८०१) han Blislitua Pary [48011 सम्जय उवार । ततो दुम्योधनो राजा शंकुनियापि सोपलः । दुःशासन पुरस्ते सूतपुत्र दुर्जयः ॥ १ समागन्य महाराज मन्त्रं चर्विवक्षितम्- काय पाण्डुमुता सानो डेराम्याः सगणाति मा ततो दुर्योधनो रामा सवान्तानाह मन्त्रिणः । मत पुत्र समामाम्य सोवलम्च-महाबलम् ॥ ३ ॥ प्रोणा भीमः कपः शल्य. सौमदत्तिय संयुगेन पार्यान् प्रतिवायन्ते न जाने तच्च कारणम ॥ ४॥ अवध्यमानास्ते चापि क्षपयन्ति पलं मम । सोस्मि क्षीणवलः कर्ण क्षीणशस्त्रध संयुगे ॥ ५ ॥ निरन.पाय. शूरैरवध्यदैववैरपि । सोहं सशयमापनः प्रहरिष्ये कप रणे । समग्रवीन्महाराज सून पुत्रो नराधिपम् । ६५ कर्ण उयाव माशोच भरतश्रेष्ठ करिष्य है प्रिय तत्र । भीम शान्तनवस्तूर्ण मपयातु महारणात् ॥ निवृत्ते युधि गाड्नेये न्यस्तशचभारत ] मई प्रार्थान् हनिष्यामि सहितान् सर्वसोमकै ॥ ८ ॥ पश्यतो युधि भीमस्य शपे सत्येन ते नृप । पाण्डवेषु दयां नित्यं स हि मीष्मः करोति घे ॥९॥ मशकश्च रणे मीभो'जर्नु भव्याय ९८॥ समय बोले कि इसके पीछे राजा दुर्योधन और मुबलकापुत्र शनि दुःशासन- चौर दुर्नयकर्ण इनमयने मिलकर सलाहकरी कि पाण्डवों को सेना समेन कैमे विजय फरनाचाहिये, यह मुनकर राजा दुर्योपन महापली शकुनि और कर्ण को सम्मुख करके उनसर मन्त्रिणे से बोला कि द्रोणाचार्य, भीष्म, कृपाचार्य, शल्प, भूरिश्रया यह सब मिले हुये पाण्डवों को युद्ध में पीड़ानहीं देते हैं इसका कारण मैंनहीं সানরা ई. वहसव विना घायल हुएडा मेरीसेनाका नाशंकरे डालते हैं, हे कर्ण में युद्ध में अपनी सेना और शस्त्रों से नाशयुक्तहोकर देवताओंसे भी अजेय शूरवीर. पांडवों मे निरादर कियागयाहूं इस सन्देहमें पड़ा हुआ मैं युद्धको कैसे करेंगा। ६ । हे राजा यह सुनकर कर्ण ने कहा कि हे भरतर्षभ चिन्तामतकरो मैं तुम्हारे हितको कम्गा शंतनु के पुत्र भीष्मनी शीघही युद्धसे निटत्त होजायँ, युद्धसे भीप्मनी के हटनाने और सखोंमे रहित होनानेपर मैं सब सोमकों समेत पाण्डवों को मीप्मनी के देखनेहुएही CHAPTER XCVIII Sanjaya said, " Then Prince Duryodlian and Sbahuni the son of Suval with Dushasan and invincible Karan met in council to determire how to conquer the Pandavas. Prince Duryodban thus addressed brave Shakuni, Karan and other mmmisters:-"Dronacharya, Bhislım, Kripacliarya, Shalya and Bhurishrava together donot destroy the Pandars, what is the reason? They destroy our armies without being themselves wounded with my armed warriors, 0 kuran, I think myself in vinable by the gods and yet I am being despised los the Panda yas. Boing so doubtful how shall I fight out?' On hear. ing this, o king, Karan said, "Remove all care form your niind, best of Bharats; for I shall gratify your desire. Let Bhishm the Shantanu desist from fighting. On luis giving up arms, 1 rliall, with son of Mahnihant स - [4802] मेतान् महारथान । अभिमानी रणे भीष्मो जेतुमेतानु महारयान् । अभिमानी रणेभी मो नित्यं चापि रणप्रिय ॥ स कर्य पाण्डवान् युद्ध लप्यते सात सद्भतात् ।स त्वं शामितो गत्वा भामस्य शिरिप्रति अनुमान्य गुरु वृद्ध शलन्यासय भारत न्यस्तशले ततो भी में निहतान पश्य पाण्डदि । मयफेन रणराजन समुहद्गणवान्धवान् । एवमुक्तस्तु पणन पुत्रो दुर्योधनस्तवमरण अनानातरतत्र दुशासनमिर्द घचे । अनुयायथा सर्व संजीभवति सर्वेश'दु शासनतथा तिम सर्वमेवोपपादयी एवमुक्त्वा ततो राजन कर्णमाह जनेश्वर ॥ १५ । अनुमान्य रणे भीष्म मेपोह द्विपदाम्परम् । आगमिध्ये तत क्षिर्म स्वसफार्शमरिन्दम । अपनाते नतो भीष्मे प्रहरिष्यसि संयुगेतिपात ततस्तर्ण पुषस्तव विशाम्पते सहितो भातृभिरतस्तु देवैरिव शतकतु । ततस्त नूपशाटले शादममविक्रमगारद माहगा हे राजा पईम तेरेसम्मुख मत्य मकल्प पूर्वक प्रतिज्ञाको करता ह और शपथ से कहता कि वह भीष्म निश्चय करके पाडवों पर दया करता है। इससे भष्मिनी युद्ध में उन महारथियों के विजा करने को असमर्थ है ।१०। यह भी । युद्ध में महाभहकारी और युद्धहीको देव प्रिय मानता है तात यह सम्मुख आयें हुए पाहयों को युद्ध में कैसे विनर करेंगा सा तुम शीघही यहा से भीष्म डेरे में जाकर, उन"वृद्ध गुरुको नमीकार करके शस्त्र के त्यागने केलिये कहो हे राजा भाष्यजी के शव त्यागने" पर युद्ध में सेना और मित्रों, समन पौडचों को मुझ अकेले फेही हाथ से भराईमा देखोगे कर्ण के ऐसे वचन मनकर माप का पत्र दुर्योधन, अपने माई दुईशामन से बोला कि यात्राकी सब सामान सब मुकारसे तैयार हो । १५ । ऐसा दुशासन को यई योधन कर्ण से बोला, कि है शत्रुओं के विजय करने वाले में पुरुषोत्तम भाष्यको युद्धके लिये समभरार और प्रणाम करके "शाही तेरे सम्मुख' मागा, उसके पीछे भीमजी के इस जाने पर तुम युद्धमें प्रहार करोगे, हे राजा ऐसा कहकर आपका पुत्र अपने मा माइया 10 sight of Bhishm destroy all iljo Pundares will the Somsls. Il make a true produse in your presence and swear that Bhishin is, lud, to the Pandairs and therefore capable of conquering them 10. De is proud of his porrer and loves battle, but be can not corquer the Pandaras Yon may be p ensed to go at once to Blustım s camp, and humbly asl that old man to give up arms | Pandaya) Twith their armies and friends slịın by me alone is soon tus Blisbj giros up fighting' Hearing the words of haran your son Daryodhan, said to Dushasan lits brothor L t there le epery thung reads for py derarture" 15 ' Theh tuut ng to Karin he sand pestroyeratost I shall coon come back tog or afterášking Bhishm the local oriento Matert frour fighting and premg my respects its lintroutinent in the lietu ir huttle bén Bhilti gures un fightina liaving said 7 Lou mul see VIRTH भीष्मपर्व Bhushii Parv [4803] आरोहयद्धय पूर्ण नावा दे.शासनस्तदा अगदी वचमुकुटो हस्ताभरणवान्नप॥१॥ धार्तराष्ट्र महाराज विभा म पथि व्रजन भिण्डीपुष्पनिकाशेन तुपनीयनिभेनच २०॥ माया-09 । स्वामरा दाव।। २५ ॥ सम्पज्य राजा गाङ्गेयस्य यास्थिनः ॥ ६ एक्षिण. काले मभृत्य स्वभुज तदा ॥ २७ ॥ हस्तिहस्तापमं शैक्ष सर्वशनिवहणम। समेत मी शीबतासे, चला जैसे कि देवताग्री समेत इन्द्र जाता है, इस के पीछ राजाभा में श्रेष्ट मिह समान पराक्रमी दुर्योधनको भाई , दुश्शामन ने शीघही, घोड़े पर सवार किया जा रहे नगद पाजूबन्द और मुकुट,हस्त भूपणादे से मत पर दोधिन मार्ग में चलता हुआ भिण्डी के फूल और सुवर्ण के समान प्रकाशमान उत्तम चन्दनादि से सुगंधित देह निर्मल वस्त्रादिकों को पहरे. सिंह समान गति से ऐसा शोभायमान हुआ, जसे कि आकाश में निर्मल..किरण युक्त मूर्य, मकाशमान होता है. भीम के डेरे में जाते हुये उस नरोत्तम के पीछे सब लोकों के घड़े, धनुषधारी शरीर और महाधनुर्धर भाई लोग ऐसे चले जैसे, कि इन्द, पाछे देवतां चलते हैं. है नरोजम. इसी प्रकार कोई हाथी पर कोई रथ पर कोई ३.पर सवार होकर उसके साथ हुये, राजा की रक्षा के निमित्त वह मुहृद जिहाने शंखाको त्यागकर दिये थे. एक माथी ऐसे प्रकट हये जैसे कि बन्द की रक्षा के निमित्त देवता स्वर्ग में प्रकट होते हैं,, कौरों का, रामा अपने सवः कौरवलोगों में सेवित उन यशस्वी भीमजी के डेरेको गया, उस समय उसके पछि तो this, your ami liastened with his brothors to go to Bhishm es Indra does with the goals. Thon Dushasan helped Duryodhan, the best of kings ood full of prowess lihe a lion, to ide his horse. 19: Adorned, b.king, with armlets diadein and finger.jewels, looking like a golden flotter, liis, bodylánginted with sundul nad atlier iscents ifearing, fina clothes and walking like a lion, Daryodhan looked like to sun with 'hisrpura rays in itie shy. Going to the camp of Bliimorthat..besta bf. mon was followai hy the famous archers and yarriors of the world and his brothers, -mightyildwyers, like Indra followed.]ý gods, Spina of lig. Idll@weiß; best of mon, yere ,mqugtod on elephants, fome on, alhariotsyndrothers oli ghurse bachi.: Thqge of his,fnends,wha shad luid asido tlieir, weuppos, came at once to gaafd; the king jas gyis, in the picgyon,do ta protact, Iudra.;The prince of t'io, Kaurava., frilmeyed plv . - (४८०५) भीमप Bhishina Party [4605,J पान्य तस्मादमि गांगेय रुपाकतुं मविप्रमो.1.३७ ॥ जहि पांडसुतान्वारान महेंद्राप दानवान् । भदं मान महाराज निहनिप्यामि मोमफान ।। ३८.1 पाषालान कफयः. सधिकरूपायति भारत । यचं.. सत्यमेपास्तु जहिपाधान :समागतात् ॥ ४॥ सोमकांच मह वासान् सत्यवाग्भवभारत । दययाय दिपाराज संध्यमावान्ममग्रमो nan मंदभाग्यतयावापि ममरक्षसि परिवान् । अनुचानीहि.समरे फर्ण माहबमोमि. नम् ।।४१॥ सं जेप्यात रणे गावान् समुहमणवान्धवान् IR एवमुरवा नृपतिः पुत्री दुर्योधनस्तष । नोवाच वचनं किञ्चिन्द्रोम सत्यपराक्रमम् ॥ ४२ : .. : इति श्रीमहाभारते भीष्मपनि भीमवयपर्वणि भीष्मदयोधनसम्बादे अष्टनवतितमोऽध्यायः १८॥ इन्द्र समेत देव दानों के भी विजय करने की अभिलापा रखते है तो इन पायडवोंको उनके सहायकों समेत विजय करना कितनी बात है. गांगेय मीम. भी भाप मुझपर कृपा करने को योग्य हो पाप उनधीर पांडवोंको ऐसे मारो जैसे किं,मंडाइन्द्र धान लोगों को मारता है हे महारांन में सब सोमकों को मारूंगा फिर कैम्पोंको और पांचाली ममेत केकय चौगों को भी मारंगी भाप भर्पने वचन को मत्यकरके मम्मुख पाये हुए, पाडवों को गारों और बड़े पनुपधारी सोमकों कोभी मारकर अपने वैचनको सत्यकरो है भरतवंशी भीष्मपितामहं दयासे थामेरे वैरभावसे अथवा मेरी पारध हीनतामे जो आप पांडवों की रक्षा करते हों मो युद्ध में शोभा पानेवाले कर्ण को आझादो, बहकरण युद्ध में सब सेनाभोर मुझे समेत पांडवों को. मागेमा, आपका पुत्र इस प्रकारके वचन कहकर फिर उस सत्य पराक्रमी भीमजी से कुछ नहींवाला ४॥ gronds and datavās třith Indra, lior easy it is for us to anjner tlie Paa darns and their allist I crave your favour, Bhishin the son of Garign Will the Pandavas as lidta does the dañavat." Tishall;"Oking, des troy all tho Ecmaks and the Panchals together with the Kaikayna. your promise by killing the Pandavaş when they face you, fulfil Teo your promised killing the Somáks, Grandfather, Bhislim, des, cudautof Bharau ie through kinŲness to them, or unkindness to mo or tlorough my mislortune sou spare the Pandayas, allow the great warrme karanto do Ile work... He will destroy all the Pandayas and kreirallies izbaille" Paving said these words to Bhishm of true Proyyess tourion became silent." 42:: Fulfil H ....

[4801 ] Mahabharat (४८४) प्रगृहणनं जलीनणा सुद्यतान् सर्वतो दिरा ॥२८॥ शुभ्राय मधुप बाचो नानादेशनि वासिनाम् । संस्तूयमान सूतैश्च मागधैव महायशा ॥२९ । पूजयानवतान् सर्वान मर्गलोके घरेश्वर प्रदीपैः काञ्चनस्तत्र गन्धलायसेचित ॥ ३०॥ परवार्महाँ रज प्रज्वलङ्गि समन्तत । सतै परिवृतो राजा प्रदीपै काम्चनेवलन् ॥ ३ ॥ शुशुभे चन्द्रमा युक्तो दीप्तैरिव महाप्रहः । काम्चनोप्णीपिणस्तत्र क्षेत्रमरपाणय २॥ प्रोत्साहयन्त शनकैस्तं जन सर्वतो दिशम् । सम्प्राप्यतु ततो राजा भीष्मस्य सदग शुभम् ॥ ३३ ॥ अवतीर्य हयान्चापि भीष्म प्राप्य जनेश्वर । अभिषाध, ततो भीष्म निषषण परमासने ॥ ३४ ॥ कांचने संवतो भद्रे स्पर्णस्तरणसमे । उवाचन जलिभीष्मं वाणकठोथुलोचनः ।। ३५ । त्यांचयहि समाभित्य सयुगे शत्रुसूदन । उत्सहे मरणेजेतु सैद्रानपि मुरा भुरान् ॥ ३६॥ किमुपांडुसुतान्वीरासमुहदगणघांध वार लोग और भोर पास सब भाई बन्धु अपने सुन्दर भुज दण्डों में अंजुली साधे हुये और देशनिवासियों से मीठे वचनों को सुनता हुआ वह महायशस्वी सूत मागों से मशमित होकर उनसब अपनी प्रनामों को प्रसन्न करने लगा । ३० । वहां महात्मा पुरुषों ने मुगन्धित वस्तुओं से पूर्ण सुवर्ण के दीपकों के द्वारा उसको चारों ओरसे प्रकाशित किया, फिर उन सुवर्ण के बड़े २ दीपकों के प्रकाश से महाप्रकाशमान, वह उना ऐसा शोभायमान हुआ जैसे कि बड़े २ ग्रहों से संयुक्त चन्द्रमा प्रकाशमान होता है उम स्थान पर पुनहरी सितार आदि बाजे हाथों में रखनेवाले मनुष्य सवओर से उन मनुष्योंकी माठे वचनों से हटानेवाले हुए फिर राना भीम के शुभ डेरे को पाकर घोड़े से उतर भीष्म के सोन्मुख उनको नम स्कार करके उत्तम प्रामन पर घंटगया। १५ । वह डेरा मुनहरी उत्तम विछौनों से मर दिशा मे कल्याणस्य था उम में बैठेहुए भीष्मनी से राजा दुर्योधन हाय जोडेहुए गदगदेवाणी मे बोला कि हे शत्रुता हमलोग युद्ध में प्रायमे रहित होकर all the Edity to leut to the tent of Bhishm Followed brimmers aul sturountndly us ty others and hidarmen with umlused arms Puince Din yodlian went on healing the snect words of the dit zens and the praises of the Cartlard peased his subjects in this nhapter 38. Grest men sllumined his way from all sides with gold lands fed by scented materiala Looking gler ous in the light of gold lamphitheling appeared Ne the moon Hirrolidel by stars. A Land of musicians peaton in fiunt, playing spect tnnes to clear the way Havine rer hed the tant of Bhishnr, theking disnounteel from Ins horse, and listing pud his respects to him sat on the best seat ' 35 caibais'sere spica i alt ororithie tent here Blurayn sat, and the Price titli fuird pilms anl chokel vorce thrs xddressed him,-'Be }}yirds us of fyy, vo napre to conquer the Golden - L (४८०५) भीष्मपर्व Bhishina Pary [4805, पान् । तरूमावसि गांगेय रूपांकतुं मविप्रमी ३७ ॥ अहि पांडसुवान्वारान महेंद्राय दानवान् । महं सर्वान् महागज निहनिष्यामि मामफान ।। ३८. । पञ्चालान् केकयेः- सधिकरूपयति भारत त्याचः सत्यमेपास्तु: जहिपार्थान् ममागतात् ॥ १९॥ सोमका महेवासान सत्यवाग्भवभारत । दययाय दिवाराअम् भ्यमावान्ममनमो In मंदभाग्यतयायापि ममरक्षसि पास्यान । अनुचानीहि.समरे कर्ण माहवोमि- नम् ॥ ४१ ॥ स जयति रणे पाधान ससुहगणयान्धवान् । स एवमुक्त्वा नृपतिः |पुत्री दुर्योधनस्तव । नोषाच वचनं किञ्चिदीष्मं सत्याराक्रमम् ॥ ४२ ॥ : इति श्रीमहामारते भीष्मपर्वाग्म भीमवधपर्वणि भीष्मदर्गेधनसम्बादे • अष्टनवतितयोऽध्यायः १८ ॥ (इन्द्र समेत. देव दानवों के भी विनय करने की ममिलापा रखते हैं तो इन पाण्डवोंको उन के सहायकों समेत विनय करना कितनी बात है.हे गांगेय मीम- भी भाप मुझपर कृपा करने को योग्य हो भाप उनवीर पांडवोंको ऐसे मारो मे कि महाइन्हें दाना लोगों को मारता है हे महारान में सब मोमकों को मारूंगा फिर कैम्पाको और पांचालों समेत केकय लोगों को भी मारूंगा आप अपने वचन को मत्यकरके मम्मुख भाये हुए. पारडवों को गारों और बड़े धनुपधारी सोमकों कोभी मारकर अपने वैचनको सत्यकरो हे भरतवंशी भीष्मपितामह दयासे यामेरे वैरभावले प्रयवां मेरी पारध हीनतामे मो आप पांडवों की रक्षा करते हों जो युद्ध में शोभा पानेवाले कर्ण को माझादो, बहकर्ण युद्धौ सब सेनाभौर मुहदों समेन पांडवों को पारेमा पापको पुत्र इस प्रकारके बंचन कहकर फिर उस सत्य पराकमी भीमजी से कुछ नहींवोला ४E: gods and dataváo vřith Indta, lroit ensy it is for us to congner the Pros drong and their alliest I crave your favour, Bhishin the son of Ganga Killthe Panda mag as Indta does the Jānisvay." Tishall; O'king, des? troy all tho Somaks and the, Panchaiz, together with the Kaikasan. Fulfil your promise by killing the Pandavas when they lace you, fulfil also your promised killing the 'Somaks, Grandfather, Bhishm. descindant or Bharatl. je throdigli kimūness to them, or unkindness to mo. bretrough my mislortune you spare the Pandayas, allow the great warrior Karan: to aj tlie work, He will destroy all the Pandayas and their allies in baita". Having said these sords to Bluisham, of true rowess, our fon became silent." 42, -- ..

समानी भारत" [14800. Mahal tall finita साये उचाचीशल्यस्तव पुत्रण सोतिबियो महामनी महुवनमहताविष्ट लोपांच प्रियमपि सत्या मचिर काल दुःखरोषसमन्धित साइवर यया नांगागुनपशिलाकया ॥ २॥ उदकृत्य चक्षुषी फोपान्निई हन्निय संदेवासरगन्धव लोक लोकविदायरः ॥ ३ ॥ अवीत तव पुर्ण स समिपूर्व मिद । पची फत्व दुय्योधनवमीयामशल्यरपरन्तास घटमान पाशकिकु' पञ्चतताप्रियम्बवान समरे प्राणीस्तवव प्रियकाम्यया ॥ यदात पाण्या गुर पाण्डवेग्निमार्पयता पराजित्यरणे शक पति ताभदर्शनम् ॥ मायावत्या. महाबाहो गयई तमोजसा अमोचयत्र पाण्डसंतापय्यांततिनिदर्शनमा ७ ॥ द्रयमाणे भूरेषु सोदरेषु तवाप्रभो. सतपुत्रे च राधेये-पर्याप्तं तग्निदर्शनग ॥ ८ ! पत्र.न.-सहितानु-सर्वान-विराटनगरे तदा ।-एक एव-समुद्यातः पर्याप्तं तन्निदर्श जम ॥ द्रोणञ्च युधि सरधि माचं निर्जियमयुगे । पासांसिस समादेत पयर्सि' poftea ori que han feril on ITT! ren ITEIT T1171:1-3;) timimiriniv अध्याय ription संजय पाले किभापके िपत्रके वचनरूपी माला से पति घायल और वचन पीसताकामे मिदे हुए सर्पहती समानावासलेते बड़ेसाईसी महाकष्टामें पड़ेहुए भी मजी-पड़ी पिलम्ब तकाशोचरूपी ध्यान में मग्नहोकर अपने क्रोधसे देवं दनुजः मनुष्योंको भस्म करनेवाले यहे क्रोध से दोनों नेत्रों को खेलकर, वड़ी) मधुरांगणी दारा आपके पुत्र से वचन योले कि हे दुर्योधनाइमामकार से अपनी सामर्थ्यक: अनुमा पाप करके तेरोहितके लिये अपने प्राणों को, होपतेइंए मुझको ने अपने पबर्नरूपी भाला मे वयो-पायल पारना है। जिस दशामें किोशूरवी पाण्डवों, ने युद्ध में इन्द्र को विनय करके खांडव: उनमें अग्निको म किया और हे महावाहुत अवगन्धयों के पराक्रम मे, तुझ पकड़े एको तेरेभाई बन्धु औरकर्णादे यहे, २, शूरों के भोगनाने पर भले परिव मर्जुनने छटाया यही दृष्टान्त तुपको शोचनके योगः है.पार विराटनगर में हम सब के सम्मुख अकेला अर्जुनही हुमा बहभी दृष्टीन "CHAPTER XCIX 1sounded by'tko darts of ydiirtron's taunts and pictced bsthiode vartal-kpár," said 'Sanjaya; "grát Bhislıni temained long planged Arthoughtni prediciment, theaving deep ths of distrest, capable bidestroying gods, doua varandnion Withilis anger, he, opened wide bts liideset in anger anl'in' at very sweet" Mono And in four son Tits trying to tientikof mynthilitantrictlficing thy ifo for your pabe. I am wounded by your taunts sri You'rrust'less in mind liotta | bo l'andavas orgrered-Indre hud bum11. forest of Throder. Re. fruembor how sáu aut svår buthern captivated by this gandlarvas force litemted by Arjun the kaimund tatuer, warriots jad koen put to flight by Ant Tonnitive prinéınlxt'that-Arnih faod ng all at 114607 ] fir975 Bhishina Pars चन्निदर्शनम् IN तथा हीणि महेवासदारद्धत मथापिच गोहे:जितमानपूर्व प्रयाप्त तन्निदर्शनम् ॥ विजित्यत्र ,यदा फर्ण सदा पुरषामानिनमा उत्तराने पदो पल. पर्याप्त तत्रिदर्शनम -१,१२- निवातफयवान युद्धे यासवेनापि दुर्जयान जितवान समरे पार्य पर्याप्त तन्निदर्शनमः १३॥ कोहि मातोरणे जेतुं पापडावं, तदा यस्य गोमा नगदोप्ता शंखचक्रगदाधर मासदेवानन्तं शनि पष्टि संहारकारकः । सर्वेश्वरो देवदेवः परमात्मा सनातनः उत्तोदि बहाराज नारदामहर्षिभिवन्तु मोहान्न जानीपे वाच्या वाच्य मुयोधनः सुमति नरः सनि वृक्षान पश्यति कांचना तथा स्वमपि गान्धारे विपरीतानि पश्यसि १७ गै पानामा गणनने मर मनग युध्यम्यतानद्य रणे पश्यामापूरपामय भागमानेपर युद्ध दुर्मद-द्रोणाचार्य और सझको मंग्राम में विजय करके बस मार-लिये बहभी-इनान्तः सोम्प हे ATMAL इसी प्रकार गौ-हरण में भी धनुपधारी, अश्वत्थामा और कृपाचार्य विषय किया वहभी दृष्टान्त ठीक है। जबकि सत्रः में पड़े, धनुर्द्धर कर्णको विजय करके उत्तएके लिये वन-दिये वह इदात भी बहुत है, अर्जुन ने इन्द्रसे भी कदिनता पूर्वक विषाय होने किया भी दृष्टान्त बहुत है, तव । युद्ध में विजय करने को समर्थ होप र दुव्यायन, जसका रक्षा करन वाला जगद। का स्वामी शंख चक्र गदा एम धारण करने वाला, महाशक्तिमान सासुदेव सृष्टि संहार का करने वाला-सर्वेश्वर देव देव परमात्मा सनातन है जिसको कि नारदादि मापियों में भी तुमको समझाया ईऐसा जानकर भी हेदुर्बुद्धी तू मोहसे कहने न करने की पात्रको भी नहीं जानता है --१६...मरने की इच्छा रखने वाला पुरुष जिसे कि सब नोंको स्वर्णमयी देखता है उसी प्रकार-गान्धारी के पुत्र तू भी विपरीत बातों को देखता है, तेने पाप-पाण्डव और मंनियों से बड़ी भारी शत्रुता Virat and then your brothers had juri airay he conqnerel invincible Dronacharyz and mo and"took off our clothes. 10. At the thic and the great ateher Ashwath ſter, conquering : Kaura yas, 199,99 puntenut osuupe vu s pravery. , Arjun.com quered the rakshases known as Nibat Kahaches, whom Indra himselt could not conquer and this is a sufficient example., Who is then brave enough to conquer Arjun, in battle? He has a for his: guardian, the violder, of conch,' discus, tace and lotus, mighty Yasadevethe destroyer of the world.,lord of all. gods, eternat lord who has been Pointed out as such to souply. Narad and otherrishisaniKnoring,these, facts, a.fool. inh Daryodhan, : a dying person ने भार Com cousion of iyap the ६.ln [ 4808 ] Mahabharat (४८०८) 1.३८ ॥ अहन्तु सोमकान् सर्वान् पञ्चालाइघ समा गतान् । निहनिष्ये नरव्याघ्र बजे 'पित्वा शिखण्डिनम् । १९ निर्वाह निहत सत्ये गमिप्य यमसादनम् । तान् या निह स्पसमरे प्रीति दास्थामह तव ॥ २०॥ पूर्वे हि स्त्री सपना शिखण्डी राजधेश्मनि । घरदानात् पुमान् जात सैषा चै स्त्री शिखण्डिनी ॥२॥ तमह न हनिष्यामि प्राणत्यागे पिमारत । यासी प्रानिर्मिता धात्रा सैपाली शिखपिडनी । २२॥ सुखं स्वपिहि गान्धारे घोस्मि फची मदारणम् । य जना कथ यिप्यन्ति यायत स्थास्यति मेदिनी, २३॥ एवंमुतस्तवमुतो निर्जगाम जनेश्वर । अभिवाध गुरुं मूर्ना प्रययौ स्थ निषे शनम् ॥ ३४ ॥ आगम्यतु ततो राजा विराज्यच महाजनम् । प्रविवेश ततस्तूर्ण क्षय शत्रुक्षयकरः ॥ २५॥ प्रविष्ट सनिशा ताञ्च गमयामास पार्थिव । प्रमातापाचशर्ष करी है इस से युद्धभूमि में उन से तू संग्राय करियो हममी देखेंगे, हे नरोत्तम में शिरवण्डी को छोड़कर सम्मुख भायेहुए सब सोमकोंको और पांचालोको मारूंगा, में युद्धमें उनके हायसे मराहुमा यमलोकको आऊंगा या मैही उनको मारकर तुझको प्रसन्न करूगा । २० । षयोंकि प्रथम राजमहल में शिखण्डी स्त्री होकर उत्पन्न हुआ या फिर वरदानसे पुरुष हुआ है निश्चय करके यह शिखण्डी स्त्री है इससे रे दुर्योधन मै अपने माण जाते हुए भी उसको कभी न मारूगा जो इस को ईश्वरने मयम सी उत्पन्न किया था इसीसे यह शिखण्डी अभी निश्चय ही है हे गान्धारीके पुत्र प्रानन्द से शयनकर मैं माताकालही ऐसा महामारी युदे करूगा जिसको मनुष्य जब तक पृथ्वी नियतरबैगी तब तक कहाकरेंगे, राजा भीमजी से ऐसे बचनों को सुनकर भापका पुत्र मस्तकसे उनको दण्डवत करके देरेमे बाहर निकल अपने निवासस्थान को गया, और सब साथ के लोगों को विदाकरके शीघही अपने डेरे में मोश कर गया । २५ । वहां रात्रिभर सोया, माताकाल उठ कर , contrary to what they are you love mtentionally cuade tho Pundwas and tho Srınjayas your onomies and we shall sco wliat prowess you can show nga nst them I shall O best of men, kill all the Somahs and Panchals who face mo sa bittlo with the exception of Sluklands In!!.zithrobe Wednaktuk wil go to the regia di yum.. shall please you by thior slaughter 20 For Shilkhandi orginally nas born a woman ru the police of the hing and then was changed to maaliood through a loon, ho is suroly a winan and I shall not kill luum cien if i am in the danger of losing my life. Bocause he was born & roman, he must be regarded as such. Sic p soundly, son of Gandharni I shall in tho moriung, munke liard fight which shall be remomberel till tlio end of the world" Hearing thicso Trords from Bhrhm, Duryodhan bowed down to Izım and went out to buis residenco. Thon dismissing all his companions, he cutered lie tont 24. Thero he slept during the night and rising carts in the morning, he ordered the - भीष्मपर्म Bhushum Pery [4809 याँ प्रातरुत्यायतान्नृप ॥ २६ ॥ राक्ष ममाज्ञापयन सेनां योजयतेति ह । अद्य भीष्मी रणे क्रुद्धो निहनिष्यति सोमकान् ॥ २७ ॥ दुर्योधनम्य वन्न्या रामा विरपितंयदु । मन्यमान मत राजन् प्रत्यादेश नियात्मन ॥२८ । निद परम गाना विनिन्धर वश्यताम् । दीर्घ दध्यो शान्तनको योचुसामोर्जुन रणे ॥ ५९॥ इनिनेननु तदारया गाङ्गेयेन विचिन्तितम् । दुर्योधनी महाराज दुशामा मचोदयात् ॥ ३... दुसामन रथास्तूर्ण युज्यन्तां भीष्मरक्षिण ,द्वाविंशति मनीकानि सापेवामिचोटय ॥३॥ हि समनुमाप्त वर्षपूगामि चितितम् । पाण्डवाना ससैन्याना वधो राज्यस्यचागम ३२ तत्र कार्यतम मन्ये भीष्मस्यनामि रक्षणम् । सनो गुप्त सहाय स्यानहन्यात पार्याय सयुगे ॥ ३३ मत्रवीद्धि विशुद्धात्मा नाह हन्या शिखण्डिनम् । सी पूर्वको हानीरा अस्तस्माइन्यों मया रणे ॥ ३४॥ लोकस्मद्वेर यरह पितु प्रिय चिकीर्षया । राज्य उसने राजामों को आज्ञा करी कि सेनाको तेय लस भर मुद्धा कोर कर भीष्मनी से मकों को मारेंगे, हे राजा रात्रि में दुर्योर के उन ? भारी बिलाप को मुन और अपना निरादर सम्झ बड़े वैराग्य सा होकर दृमरे -। दोप वर्णन करने की निन्दा करके युद्ध में अर्जुन से संग्राम करने के अभिभाप्पी ने बदा ध्यान किया और दुर्योधन ने शरीर की चेष्टा Eमी की बड़ी चिन्ता को जानकर दुश्मन में कहा । ३० । विहे दुश्शापन मोमनी के रक्षा करने वाले रय बहुत शीघ तैयार हो और पाईम अनीक सेना को भी प्रेरणा करदो, कि बहुत काल से विचार किया - सम्पूर्ण सेना समेत पाण्डब लोगों का मरण अव भन्छी तरह से प्राप्त हुआ उस स्थान में भीष्मनी की रता को ही में चढ़ा कोम जानता हूं वह गक्षत फियाहुमा भीष्म हमारा महायक होकर पाण्डवों को मारेगा, क्योंकि हमने यहे शुद मन करण से कहा कि मैं शिपण्डीको नहीं मारूंगा इस निमित्त कि वह पहले स्त्रीया वह युद्ध में मुमो त्याग्य है, और मय संसार इप वातको जानताहै कि मैंने पिनाकी प्रीति के निमित्त राज्य करनेको princes to arrangr the & my, informmg them that Bhislım vrould destroy the Sumy.8 Hearing of the scule lame tak ons of Duryou dban in thought and feel nu bis dgn ty roundod, Burbm lust all love for the wild, and comment ug on the outp utice of back biting, he thought a great deal of his desire to fight against Arjun, Speing indications of thruglittumnez3 on the face of Bhish Duiso dhan said to Diisha an, Pre soon chai ots for the protrction of Blushm and order twenty five ( dersions ) of t + 3 my to be ready 31 Tho long slied lu d struct ou vf tun Pand, nad their armies sat hand. I think the protectionBishn to bot t lvgirest duty Well protected h will liep me to re roy the Pundaras, for with a true intenlion he rad that he would not slay Shikbaodi who was originally a woman and that all the world kacip that for the [48101 Mababharat (४८१०) स्फीतं महावाहो नियश्च त्यक्तवानपुरा ॥ ३५ ॥ नैव चाहं नियं जातु न खीपूर्व कय चन । हन्यांयुधि मरथेष्ठ सत्य मेतद् प्रपीमिते ॥ ३६ ॥ अयं स्त्रीपूर्वको राजछिस्त्र ण्डी यदि ते धुतः । उद्योगे फथितं यत्तत्तथा जाता शिखण्डिनी ॥ ३७॥ कम्या भाषा पुमान जातःसच मां योधयिष्यति । तस्याहं प्रमुख वाणान् न मुञ्चेये कपाचन ३८१ युद्धेहि क्षत्रियस्तिात पाण्डवाना जयेपिणः । सर्वा नन्यान् हनिष्यामि सम्प्राप्तान रण सूर्धनि ॥ ३९ ॥ पर्ष मां भरतश्रेष्ठ गाङ्गेयः प्राह शारावित् । तत्र सर्वात्मना मन्ये गाणे | यस्य पालनम् ॥४०॥ अरक्ष्य माणं हि फो हन्यात सिंह महाहवे। मा केणेव गाङ्गेयं घातयेम शिखण्डिना ॥४१॥ मातुल. शकुनिः शल्यः कृपो द्रोणो विधिशतिः। पत्तापक्षन्तु गाङ्गेयं तस्मिनगुप्ते ध्रुघोजयः ॥ ४२ ॥ एतच्छुत्वातु ते सर्वे दुर्योधन नच स्तदा । सर्वतो रय घंशेन गाङ्गेय पर्यधारयन् ॥४३॥ पुत्राश्च तव गाङ्गेयं परिवार्य पयु अदा । फम्पयन्तो भुवं धाश क्षोभयन्तश्च पाण्डवान ॥ ४ ॥ ते रथैः सुप्रसंयुक्तैर्दति और ती संग्रह को त्याग किया है । ३५। इस निमित्त हे नरोत्तम मै किसी दशा में भी युद्धमें इस जन्म की श्री को व पूर्व जन्मकी स्त्री को कभी न मारूंगा यह मैं सत्य सत्य तुम से वर्णन करता हूं, हे गजा यह शिखण्डी जिसको कि मापने मुना है पह स्त्रीया फिर उद्योग फरनेसे यह शिखण्डनी न,ममे उत्पन्नहुई जो कन्या होकर मुझसे पुद करेगी उस पर मैं कभी अपना शस्त्र न चलाऊंगा, हे तात मैं पाण्डवों की विनय चादनेवाले क्षनियों को या युद्धमें मम्मुख पाये हुए अन्य क्षत्रियों को भी संग्राम करके मारूंगा, यह भरतर्षभ गांगेय भीष्मजी ने मुझ से कहाहै इस से मैं सर्वात्मभाव से ही मीप्मनीकी रक्षाको चाहताहूं । ४० । क्योंकि बिना रहा किसे हुए सिंह को भेड़िया भी माग्मक्ता है मेरा मामा शकुनि शल्य कशाचार्य द्रोणाचार्य विविंशति यह सब मिलकर बड़ी सावधानी से भीनमी की रक्षाकरें उसके रक्षित होने से भवश्य विनय होगी, तर तो सर लोगों ने दुर्योधन के इस वचनको पनकर संघ मोर से रयों के समूहों से भीष्पनी की रसाकरी, फिर भीष्ममी की रक्षा करके lovo of his father he had forsaken the flourishing kingdom and tho rocioty of romen 35. Ho las promised to spare ono wo tas a woman in this life as well as in the former ono. Shiklandı vas formerly A spomin and therefore bo would not Ing hands on lim. With this onception ho would slay all the hohntry as of the Pandas as desirous of conquest or any othor partidry secking battle with him. All this tras said to me by Mhıslım tho kon of Gangs and thereforo with all my lienrt I ain desirous of Bhishma'a protection 40. A solf way blay an unproiected lion. My uncla Shakuni, Shalya, Kripacliarse Dronncharya at Virinshati should protect him jointly. Victory will fall on our ilo flie sell po'cct." Henring theso Fords of Duryodhan, nll tho warriors mounted on charotar pratected Thiaam from all sides. .Surrounding Busion. Jour sons went tn khaking (४८१५) भीष्मपर्व Bhishma Pary [4811] मिनु महारयाः । परिवार्य रणे भीष्म देशिताः समवस्थिता. ॥ ४५ ॥ यथा देया मरे युद्धे त्रिदशा वनधारिणम् । सर्वतेस्म व्यतिष्ठन्त रशंतस्तं महारथम् ॥ ५६ ॥ ततो दुर्योधनो राजा पुनर्घातरमप्रवीत् । सम्य धक्र युधामन्यु रुत्तमौजाच दक्षिणम् १.४७॥ गोतारापर्जुनस्यैतायर्जुनोपि शिषण्डिनः । रक्ष्यमाण. स पार्थेन तयारमा मिर्जिजितः ॥ १८ ॥ यथा भीष्मं ननो हन्या दुशासन तथा कुरु । भ्रातृस्तद्वचनं सरवा पुनो दुःशासनस्तव ॥ ४९।। भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा प्रययौ सह सेनया। भीष्णन्तु स्यवंशेन त्वा समभिसंसृतम् ॥ ५. ॥ अर्जुनो रथिना श्रेष्ठोधृष्टद्युम्न मुपाचाह । शिस्त पिनं नरम्या मीपस्य प्रमुखेनुप। स्थापयस्थायपाञ्चालय तस्य गोप्साहमित्युत॥५॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि दुर्योधनद शासनसम्बादे नवनवतितमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥ आपके बेटे पृथ्वी और भाकाश को कम्पायमान करके, पाण्डवों को भयभीत करातेहुए बड़े प्रसन्न होकर चले, वह सब महारथी बड़ी रीतिसे नियन कियेहुए राधियों से भीष्मजी को मध्य में रक्षित कर के कवच और अस शस्त्रोंको धारण | कियेहुए ऐसे सब इकट्ठे हुए जैसे कि देवता और असुरों के युद्ध में देवता और पत्रधारी इन्द्रकूदे यह सब इस प्रकारसे उत्त महारथी को रक्षित करक नियतहुए ।१६। तदनन्तर राजा दुर्योधन ने फिर अपने भाई से कहा, कि अर्जुन के वाम और का रसक युधामन्यु और दक्षिण भागका उत्तमौजा यह दोनों हैं और अर्जुन भी शिखण्डीका रक्षक है, वह अर्जुन से रक्षित और हम से त्यागाहुआ शिखण्डी जैसे भीष्मको और हमको नहीं मारे हे दुश्शासन तुम वही उपायकरो, फिर भापका पुत्र दुश्शासन भाई के इस पचनको सुनकर भीप्मनी को आगे करके सेना के साथ में चला, और राथियों में श्रेष्ठ अर्जुन रथियों के समूहों से भीष्मनी को चारों ओरसे रासित देखकर धृष्टद्युम्न से बोला कि हे राजा धृष्टद्युम्न अब नरोत्तम शिरंचडी को भीष्म के सम्मुख नियत करो मैं उस का रक्षकहूं ।। ५ ।। the earth and sky and terrifyiug the Pandavas with their cheerful mood. All theso warriors, p operly stationed round Bhishm with their chariots and elepbunts, alius and armour looked like Indra surrounded by gods in the Tar of the gods and asurs,46. Then Prince Duryodhan, again addressing his brother, said, " Yudhardmanyu protects drjun from the left and Uttamaaja from right, and Arjun himself protects Shikhandi. Let not Shikhandi, protected by Arjun and doserted by us, kill Bhishm and ourselves. You must look to this Dushasan." Your son Dushasan, hearing these words of his brother, followed the army led bg Bbislım. And Arjun the best of charioteers, koeing Bhishm well protected by the hosts of charioteers, said to Dhrishtadyumna, "Let Shikhandi faco. Bhishma, I shall guardibin." 51.

4812] Jlahabharat (४८१२) सञ्जय उवाच । तत शान्तनवो भीमा निययो सह सेनया । म्यूहचाव्यूहत महत् सर्वतोमद्रमारमन. १ ॥ कृपक्ष कृतवमा घ शेयवेव महारय. शिकुनि सन्ध पौष काम्योजश्च सुदक्षिण ॥ २ ॥ मीपमेण सहिता. सर्व पुत्रैवतय मारत । भगत सर्व सैन्पाना व्यूहस्य प्रमुखे स्थिताः ॥ ३ ॥ द्रोणो भूरिभवा शल्या मगदत्तश्च मारिप । दक्षिगं पक्षमाश्रित्य स्थिता म्यूहस्य देशिता ॥४॥ अश्वत्थामा सामदच्या पन्त्यो च महारयो ।महत्या सेनया युका धाम पक्षमपालयन् ॥ ५॥ दुराधनो महा राज त्रिगत सर्वतो घृतः । ब्यूहमध्ये स्थिता राजन् पाण्डवान् प्रति भारत ॥ ६॥ मलम्बुषा रयमेष्ठ भूतायुश्च महारय । पृष्ठत सर्वसैन्याना स्थिती व्यूहस्य देशितो ॥ ७॥ पवञ्च त तदा न्यूह कृत्वा भारत तावका सनद्धा, समरदयन्त प्रतान्तावा ग्नय ॥ ८ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा भीमसेनश्च पाण्डवः । नकुल सहदेवश्च माद्रीपु. अध्याय॥१०० ॥ संजय बोले कि इसके पीछे शंतनुके पुत्र भीष्मनी अपनी सेना को सायलेकर चले और अपनी बुद्धिसे सवतोभद्र नाम न्यूह को तैपार किया और कृपाचार्य फतवमा महारधी गन्य शकुनि सैंघर कांबोज मुदक्षिण यहसव भीष्मनी और आप के पुत्रों समेत सेनाके अग्रगामा होकर व्यहके मुखपर नियतहुए और द्रोणाचार्य भूरिया शल्प भगदत्त यह सब शस्त्र मार कवचोंका धारणकरके न्युह के दक्षिण भाग में रक्षकहो कर नियत हुए, भौर अश्वत्यामा सोमदत्त और दोनों भवन्ति देश के महारथी राजा यह सब बड़ी सेना समेत ब्यूह के वामभाग में रक्षक हुए ।५ । और हे भरतवंशी धृतराष्ट्र रामा दुर्योधन सब ओर से त्रिगत देशियों से संयुक्त यह के मध्यमें पांडवों के सम्मुख नियतहुआ, रथियों में श्रेष्ठ अलंबुप और महारथी श्रुताय यहदोनों कत्रच शनधारी न्यूहकी सब सेनामों के पीछे निपतहुए। हे भरतर्षभ उससमय आप के शूरवीर शस्त्र कवचों से अलंकृत ऐसे एपड़े ने कि अत्यन्त सनत करनवाली मग्नियां होती है, इनके पीछे राना युधिष्ठिर -भीमसेन CHAPTER C Sanjaya said "Then Bluslim the son of Shantanu sitli hisarny ponded to to m a phalanx .nown us the Best-of-ali. Kmpacharyan hatsarma, ratlhaar harya, Shakunl, Saundhar, Camboj, sudakshur Blushm and your sons, leading the aduly, slood at the mouth of the anas, Drcoscharya, Bhursluas 2, Slinly a and Bhagdatia, ajmed with artas and armoar, stood at tlic right ring, and Ashwathania, Boudatta and the two princes of Atanli, vogether Tith a large army, prolecied the lelt flank 5. Prince Duryodhan ith al} ibo Trigarlas stood un the middle to laco the Pandavas, Alanı yusii the best of cliariote 1 and railtant Surularu, armed with respons and armour, stocd behind Your sparnors decked with weapons and arponr lock ad liko larning in. Then prince Yudhrakhir. Bhimsen and all the armes (४८) भीष्मपर्ष Bhushma Parv [4813 ] साबुभावपि ॥ ९ ॥ ममत सर्वसैन्यानां स्थिताम्यूहस्य दशिता घृिष्टयुम्नो विराटन सात्यकिश्च महारय ॥ १० ॥ स्थिता सैम्येन महता परानीविनाशना । शिखण्डी विजयश्चैव राक्षसरच घटोत्कच ॥ ११ ॥ चेकितानो महावाहु कुन्तिभोजश्च पीर्य वान् । स्थिता रणे महाराज महत्या सेनया वृता ॥ १२ ॥ असिम धुर्महे वासो पद महाघल । युयुधानो महेन्घ सो युधामन्युश्च धीर्यवान् ॥ १२ ॥ किया भातरदचंय स्थिता युद्धाय दशिता । एष तेपि महाव्यूह प्रतिव्युह्य सुदुर्जयम् ॥ १४ ॥ पाण्डया समरे शूरा स्थिता युद्धाय दशिता । साधकास्तु रणे यत्ता सहसेना नराधिपा १५॥ भन्युपरणे पार्थान् भीष्म कृत्याप्रतो नप तथैष पाण्डपाराजन् भीमसेनपुरोगमा • १६ ॥ भी योभुमीपसन्त सग्रामे विजयैषिण । श्वेडा फिलफिला शहान् फचान गाविगिका ॥ १७॥ भेरीमृष्णपणवान् नादयन्तश्च पुष्करान् । पारवा मर्चन्त नदन्तो भैरवान् रयान् ॥१८॥ भेरीमृतारामानां दुन्दुभीनाञ्च नि स्वने । भौर माही के दोनों पुत्र नकुल और सहदेव भी शस्त्र और कवच धारण कियेहुए घहुन शोभा युक्त अपने व्यूहकी सब सेनाओं के मागे नियत हुए और धृष्टद्युम्न विराट महारथी सात्यकी। १० ।यह सव शत्रुहन्तापीर बहुतमी सेना ममेत नियत हुए शिखंडी घटोत्कच राक्षस, महावाहु चेकितान, कुन्तिभोज यह सब भी बहुतसी सेना समेत युद्धमें उपस्थित हुए, और महा धनुपधारी अभिमन्यु और महाबली भुपद और फेकयलोग शस्त्रादिसे अलंकृत होकर युद्धके निमित्त नियत हुए, इसरीति से। वह शूरवीर पांडवलोग भी दुर्भय व्यूइको रचकर शत्रुओं के सम्मुख संग्राम भूमि युद्धके निमित्त वर्तमान हुए, हेरामा फिर युद्ध में कुशल आपके पुत्र और सेना समेत सब राजा रोग भीष्मनी को आगे कर के संग्रामभूमि में पांडवों के सम्मुख गये । १५ । इसी प्रकार पांडव लोगमी भीममेन को भाणे करके भीप्यमे लडनेकी इच्छा से विजयाभिलाती होकर सिंहनाद पूर्वक किलोकसा शब्दों को करने और भेरी मृदंगादि बाजोंमे और दुन्दुभियोंसे शत्रुओंको भप उत्पन्न करतेहुए बड़े ममन्न चित्त कौरवों के सम्मुख वर्तमान हुए, पृथक् २ रीति से प्रत्येक से मझायेहए सिंह twa sons of Madr Nahul and Sahadet armcà ritli arnis and armour, Blood in tho yan of all the arties in front of tho array Dhush tadyumn Virat, salliant Satyahı 10 all these brave warriors, destroyer of enemies, together with a large army, stood behind Shil bandi, Gha tothach the rakshas, brave Chekitan and Kuntıbboj wero stationed Thomiglity arcici Abhimanyu, bravo Drupad and the Kaikayas, armed with weapous stood ready for batile lius tbo bravo Pandavas too, having forined the invincible array stood ready to fight facing the enemy Your sons, shilful in battle and the princes with tho arraica led by Bhisho, faced the Pandavas 15 The Pandavas too, lol by Blinser, destour of guning victory against Bhisha, barring like lions with a tremendous roar and causing four co with their armics [481] Mahabhart (४८१४॥ उत्कृष्ट सिंहनादान बल्गितश्च पृथग्विधै ॥ १९ ॥ यय प्रतिनदन्तस्तान गजामत्धरा न्विता । सहसैवाभिसकुद्धास्तदासातुमल महत २० । ततोन्योन्यं प्रधावन्त सम्हार प्रचफिरे। तत शम्देन महता प्रचकम्पे वसुन्धरा ॥ २१ ॥ पक्षिणच महायोरे व्याह रसो विषघ्रमुः। सभश्चेदित सूरहों नियम समपद्यत ॥ २२ ॥ वतुश्च पातास्तु मुला शंसन्तः सुमहद्भयम् । घोराश्च धोरनिहादा शिवास्तत्र पवाशिरे । २३ ॥ वेद परयो महाराज महशसमागतम् । दिश प्रज्वलिताराजन् पासुवर्षपपाराच ॥२४॥ रुधिरेण समुन्मिथमस्थिय तथैव च । एदता वाहनानाञ्च नेप्रेभ्य: प्रापतज्जल्म ॥२५॥ सुबुश्चसकन्मत्रं प्रध्यायन्तो विशेम्पते । अन्तर्हिता महानादा ध्यन्तेमरत पैम ॥२६॥ रक्षसा पुरुषादाना नदता भैरवान रवान् । सम्पतन्तश्च दृश्यन्त गोमायु षलवायसा ॥ २७ ॥ श्वानश्च विविध देवाशन्तस्तत्र मारिप । ज्वलिताश्च महा स्कार्य समाहत्य दिघाफरम् । निपेतु सहसा भूमौ घेदयत्यो महद्भयम् ॥ २८ ॥ महा नादों से गर्जना करते हुए हम सबलोग बड़ी शीघ्रता से उनके सम्मुख हुए, भार अकस्मात् अत्यन्त क्रोधित होकर बडे कठोर शब्दों को करते हुए परस्परसे सम्मुख दौड़कर वडे २ महार करने लगे । ३० । इसके होतेही पृथ्वी अत्यन्त कम्पायमान हुई, और बड़े भारी कठोर शब्दों को करते हुए पक्षी घुमने लगे, और बड़ा प्रकाश मान मूर्य उस समप प्रभा से रहित हुआ और पड़ी भयानक कठोर शन्दवाली वाण वायु चली, हे महाराज यहां घोरनाश के सूचक नाना रूपधारी भपानक शृंगालों के समूह भी कठोर शब्दों को करने लगे, और सब दिशाओं में दिग्दाइ हुआ भार धूलकी वासुई मार रुधिर से मंयुक्त हाड़ों की बहु, और गैने हुए वाहनाने पड़े ध्यान में महत्व होकर मूत्र और विष्ठाको परदिया २॥ मौर हेराना मांसभसी राक्षसों केभी घड़े २ अशुभ शब्द वहां गुप्त मने गये और गोमाय वा कौवों के झुर भी गिरते हुए दृष्ट पड़े और नाना शब्दों से कुत्ते घुसने और रोने लगे और मर्प को माच्छादित करके बड़े भारी उल्कापातमी वा पर हुए इसके पास पांडवों की मार दुर्योधन की बड़ी सेना शंख और मृदंगों के शब्दों tlio enoties svith tho sounds of trumpats, drums and other musical jostruments, faced the Kaurasns with clieerful quinds and much e raged of a gudden, rusling nith crevuepilous war cries, beyon lo sinto. 20. With tl is the cartli shook and thio bude screamed nith s droad ſul norse. Tlio sun lust his brightners and the storn of wind bler with a tremendous 102. Signilicant of great destruction, da ndful auchala horried unanual, the directions it up, dust tell and blood and borcs fell down from the sky The beast with tours in their oscy drelu ing and exerction 20 The cannibal rahsiaya ungan made a toici lous noise und croir* ** nowe dosi D nay luna opinourly and the sun wag luidde u by the Just there fell from the shy apyrhy (५८१५) भीष्मपर्व Bhishm Pary [4815] न्स्यनीकानि महासमुच्ये ततस्तयो पाण्डवधात्तरायो । वरिपरे शहरबानि स्वने प्रकम्पितानीव बनानि वायुना ॥ २९ । नरेन्द्रनागाश्वसमाकुलानामध्यायती नामशिने मुह । वभूय पोषस्तुमुलचना पातोदुतानामिव सागराणाम् ॥ ३० ॥ इनि श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि उत्पातदर्शने शनतमोऽध्यायः १०० ॥ सम्ञय उगव । अभिमन्यूरयोदार पिश स्तुरगोत्तम । अभिदुद्राव तेजस्वी दुर्योधनयले महत् ॥ १ ॥ विकिरन शरवर्षाणि वारिधाराइयाम्खुद । न शेतु समरे बुद्ध सौमदमरिसदनम ॥ २॥ शस्रोधिण गाहमान सेनासागरमक्षयम् । निवारयितु मप्याजी स्वदीया कुरुदलग ॥ ३ ॥ तेन मुक्ता रणे राजन राय शत्रुनिवर्हणा । क्षत्रियाननयनपुरान् प्रेतराजनिषेशगम् ॥ ५ ॥ यमदण्डोपमान घोरान् ज्वलिताशीवि. पापमान । सोम समरे कुछ प्रेषयामास मायकान् ।। ॥ सरथान रपिनस्तूर्ण हयां में ऐमी कायगान हुई कि वायु के बैग में वन कम्पायमान होते है। हे गजा हाथी घोड़े और रयों से पूर्ण अशुभ मुहूर्त में आई हुई सेनाओं के ऐसे कठोर शब्द हुए जैने कि वायु से उठे हुए समुद्र के शब्द होते है ३० ।। अध्याय १.१॥ समय बोले कि बड़ा रथी और तेजस्वी अभिमन्यु पिगल वर्ण के उत्तम घोड़ों के साग दल की जलधाराओं के समान धागों की वर्षा करता हुआ दुर्योधन की सेनाके सम्मुख गया उस के हटाने को आपके महाक्ली शत्रुहन्ता महा उत्तम शस्त्रधारी गुरवीर लगभी समर्थ नहीं हुए,, हेराजा उस के छोड़े हुए शत्रु संहारी पाणों ने युद्ध में अनेक क्षत्रियों को मारकर यमपुर को भेजा, फिर युद्ध में क्रोधित भाभिमन्यु ने यमदण्ड और अनित सर्पाकार घोरवाणों को छोड़कर बड़ी शीघ्रता से रवी समेत रया को और सवारों के साथ घोड़ों को और हाथियों समेत offite Tho at mmes of Duryodhan and the Pandayas shook with the rounds of concls and trumpets as forests shake sith the storm of wind Full of elepliants, horses and chariots collected in evil tine the army of warujors nude an uproar like that of a stoi wy ocean" 30 CHAPTER CI Sanjaya Aid - Mighty and glorious charioteora Abhimanyu, rid ing his yollon liories and showering his arrows like rain, faced the ar. my of Duryodhan, over your atrong warrio16, destroyers of fous and wioldora of arms sole unablo to cope with him A18 Artois destroyers of onemlen, klient numerous lshatryas and seat theor to the region of Yan. Then baraged Abhimanya discharging bedroadſalaod serpent Ithe Arrows sou dostroyed the chanotoors with chariots, horsemen with liorses and slophant ned 9 with elephants. All the kings cheer .

- [4816] Krabnl hart (१८९६) व तसादिन । गजारोहाच सगजान वारयामास फागुनि रास्य तत पुर्यत फर्म महत् सेक्ये महीभूत । पूजयान्यपिरेमा प्रशशंसुश्व फाल्गुनिम् १७॥ ताग्म नाकानि सौभद्रो दावयामास भारत । मूलराशी निवाकाशे मायत सर्वतो दिशम् ८५ लेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि भारत । त्रातार माध्यगच्छ तपके मन्नाव दिया ।। ९ । विद्राम्य सर्वसन्यानि वावकानि नरोसम । अभिमन्यु स्थितोराजन विधूमोग्नि रियज्वलन् ॥ १०॥ न चैन तायफाराजन् विपररिघातिनम् । प्रदीप्त पार्षक पत् प्रतक्षा कालोदिता.॥ ११॥ प्रहरन् सर्व शभ्य पाण्डवानां महारथ माश्यत महेप्यास सषन इयपासष । १२ ॥ हेमपृष्ठ धनुश्चास्य दाशे विचरदिशातोयदेषु गथा राजन् राजमाना रातहदा। १३॥ शराश्च निशिता पीता निवरन्तिस्मसंयुगे। बनाद फुल्नुमाद्राजन् भ्रमराणामिय प्रजा ॥ १४ ॥ तथैव चरतलस्य सौमदस्पमहा हाथीवानों को चूर्णकर डाला । ६ । युद्ध में ऐसे महाकर्म करनेवाले अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की सब राजाओं ने बड़ी प्रसन्न चित्ततासे धन्य २ करके प्रशंसा करी हे रामा उस सुभद्रा के पुत्र ने उन सेनाओं को ऐसे घायल किया जैसे कि वाय माफाश में ईको चारों भोर को बखेरदेता है, और हे राजा उस अभिमन्यु से भगी दुई तुम्हारी सेनाको कोई रक्षक ऐसेनहीं मिला जैसे कि कीचमें फैले हुए हाथी को कोई रक्षकनहीं मिलतका, फिरवह अभिमन्यु आपकी सघ सेंना को भंगाकर निम भग्नि के समान क्रोधमें भराडमा स्थिर होगया । १० । हे राजा इसको देखकर मापके शूरवीर लोग ऐसे नहीं सहसके जैसे कि पालके प्रेरित पतंग अत्यन्त प्रकाशमान पान को, फिर वहपांडवों का महारथ उग्रपनुपधारी मवंशत्रुभों को घायल करता हुआ अंजधारी इन्द्रके समान पड़ा, और उसका सुवर्ण की पृापाला धनुष दिशाओं में घूमता हुआ ऐसा दिखाई दिया ताकि बादलों में प्रकाशमान विजनी होती है, अत्पन्न नक्षिण नोक पातरंग विप के भरे हुए वाण पुद में घूमने लगे है राना जैसे कि फूले वृक्षवाले वन से भंवरों के समूह - fully pro ead the free rhof Abhinany a the son of Arjun. That • 108bar, 14 ipsed tby armies as the mind long the illatcscf cottoru aourate, puc to flight by Abhimanyu found 10 pri tector like an elephant sunk in mud Having dispersed your rita mo, Allimaryu stoul enmged liho smokeless fire. 10 Your war Oking wald not boat the sight of himo ng insecta 'raced to doo rannot bear tho sight of burming firo Then that mighty archer of che Panda sa-looled lilo Indra woaniling all roemips And his low of goldoniach, circling on all sides, looselite ligiitmag in the midst of rlonda Sery sliarp pointed arrote of yellow colour, Dies are the field of battle Liesirms of llock berg jogging out of my (४८१७) भीष्मपर्व Bhishma Pary [48171 रमन । येन वाचनातन ददृशुर्मान्तर जना ॥१५॥ माक्षयित्वा रुप द्रोणं दीपिञ्च सहवलम् । सैन्धवान महेष्वासो ब्यवरल्लघु मुटुव ।। १६ मण्डरीकत मेपास्प धनु पश्याममारत सिर्यमण्डलसकाशं दहतस्तव वाहिनीम ॥ १७॥ त हट्वाक्षत्रि या शूरा प्रततितरस्थिनम् । शिफाल्गुनमिम लोक मेनिरे तस्य कर्ममि१८ ( तमा दिता महाराज भारती सा महाचमू । ट्यन्नमवत्र तत्रैव योपिम्मदपशादिव ॥ १० ॥ द्रावपित्वा महासन्य पम्पयित्वामहारथान् । मादयामास मुहदी मयं नित्य पासप ॥ २०॥ तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि सयुगे। चकुयर्तस्वन घोर पर्जन्यनिनदोप मम् ॥ २१॥ त पुत्वा निनद घोर तप सैन्यस्य भारत ।मारतोद्धृतवेगस्य सागर येव निकटते हुए दृष्ट नहीं आते: उसी प्रकार मनुष्यों ने मुनहरी अंगवाले रयों से घूमते बस महात्मा अभिमन्यु का अन्तर भर्याद अवकाश नहीं देखा । १५ कि यह बड़ा धनुपधारी उत्तमहस्तमायर करनेवाला उन कृपाचार्य द्रोणाचार्य अश्वत्यामा हवल और जपदयको मोहित करके अत्पन्तता से घूमा, हे धृतराष्ट्र आपकी सेना भस्म करनेवाला उस अभिमन्यु का धनुप मूर्यमंडल के समान मंडली करनेवाला हमने देखा, बड़े २ शूरवीर क्षत्रियों ने उस बैंगवान् शीघ्रगामी कठिन दौडनेवाले अभिमन्युको देखकर उसके कमों से इम लोकको दो अर्जुनका रखनेवाला माना, हे महाराज उस अभिमन्यु से पीडामान आपकी सेना स्थान १ पर ऐसी अत्यन्तता से घूमी जैसे कि तरुणताके मद में भरी हुई स्त्री इधर उधर घूमती है, फिर सेना समेत माधियों को घायल और कम्पायमानकरके उसमभिमन्यु ने अपने मुहदों को ऐसा प्रवल किया नैसे कि इन्द्र ने मय दैत्यको जीतकर सनको ममन्न किया था। 001 और युद्ध में अभिमन्यु से भगाई हुई आपकी सेनामों ने ऐसी पीडा के भयानक शब्दकिये जैसे कि भयकारी बादल की गर्जना के शब्द होते है, उमरीति के आपकी सेनाके शब्दों को सुनकर राजा दुर्योधन आर्यभृत forest in bloom' the arrows isstuing out of -clistiots trere stitisible en account of their swiftness 15- Haring made Knpacharrar Drona charya, Ashwathama Brahadval and Jayadrath sensit le tho swift archer moved incessantly! We sawy, O Ling, the bow of Ablumang u the destroyer of your athuca, noring in a circle like ibe sun great Horrors seeing tho uxcoedingly swift movement of Abhimanyu and his braso deals thought that there were ttvo Arjudgin the world Wounded by Abhimanyu your armice,' ling, rushod bither and the thor lhe a jourg woman #lio las lost hier senses Thon brounding and ekaking the ortuy of warriors Abhimanyu made lus party as strong na Ibara had m-do all tho geple altor conquering the’Díaya danavas 20 Pat to fligut by him jour armies uttered dreudial pouke of distress 1 ko those of tbundenog cloude ?Thus bearing the distressing sounds of your warriors, Proco Durs odban said to Aryabbring the takebas The 1421s] NIuliubhaiat (४८९८) पर्वषि। 1.तुम्योधनस्तदा रामनाध्यङ्गिमभाषत । एष कारिगर्महावाहो द्वितीय व फाल्गुनः ॥ २३ ॥ चमं द्रावते क्रोधात्री देव चमिव । तस्य शान्य पश्या मिसंयुगे भेष महत् ।।.२४. ॥ अतला राक्षसश्रेष्ठं सर्व विद्यासुपारगम | स गत्वा त्वरित धीरं जहि सौभद्रमाहवे ॥ २५ ॥षयं पाथै हानिप्यामो भीमद्रोणपुरोगमाः । सं एवमुको बलवान् यक्षसेन्दः प्रतापवान् ॥ २६ ॥ प्रथयो समरे तूर्ण तय पुनरव शासनात् । नईमानो महानादं मावषीय बलाहकः ॥ २७ ॥ तस्य शब्दन महता पाण्डवानां पले महद । प्राचलत् सर्वतोयजन वातावधूतावार्णवः ।। २८ ॥ यहवश्न महाराज.तस्य नादेन भीषिताः । प्रिंयान माणान् परित्यज्य नितुर्धरणीरले ॥२९॥ पारिवापि मुदा युक्तः प्रगृह्य सशरं धनुः । त्यभिष रथोपस्थे तद्रक्षः समुपादयत ।।.३० तितः सं यक्षप्त कुंख- सम्माप्यवार्जुनि रणे । नातिहरे स्थितां तस्य द्रावयाँ नाम रांतस.से बोला कि हे महाबाहों यह दूसरे अर्जुन के समान अभिमन्यु कोष से सेनाको ऐले भगाये देता है जैसे कि देवताओं की सेना को एवामुर भगाता था नझ सर्व विद्या और शस्त्र सम्पन्न के सिवाय इस युद्ध में इसका मारने वाली मुझको कोई नहीं दिखाई देता सौ'तुम शघिही जाकर इस अभिमन्यु को मारो 1-२६ और हम सब भीम और द्रोणाचार्य को भागे करके अर्जुन को मारेंगे, इस प्रकार से वह आबादिया हुओं प्रतापी वलवान राक्षसाधिप वर्षा र पादल के समान बड़े शब्दों को करता हुआ भापके पुत्रकी भागासे शीघही युद्ध भाष में गया हे राजा उसके भयंकर शद से पांडवों की बड़ी सेना सब ओर से ऐसी चलायमान हुई जैसे कि वायु से उठांहुआ समुद्र चलायमान होता है। ।२८। बहुत से मनुष्य तो उसके भयकारी शब्दही से अपने प्यारे जीवनको त्पागकर पृथ्वी पर गिर.पड़े । २९ । परन्तु शूरवीर अभिमन्यु बड़ी प्रतमता से युक्त बाणों समेत धनु को हाथों में लेकर नाचता हुमा सा रथ में बैठकर उस राक्ष के सम्मुख पहुँचा । १० १.इस के बारे उस क्रोधयुक्त रातम ने युद्ध में मभिमन्यु को पाकर उसकी समीपी सेना को घायल किया इस रीति से उस Liku a secund Arjud much on #ged Ablimanyu is dispersing ill the grmies ns. Vritrasur did the armies of gold; I see yone of niy warriors Sapable of slaying.hin. Goat once and kil him. 25. All of us, led Wy. Blushmond Vsonacharya, will stay Arjun" Thus ordorod that bayq.warrior the.pgince 01.rabal}a:03 making a loud noise like that of fundering glondes, at opdo rushed to Latile by the order of your son, ma.mith his dreadful crica try arries tho Pandatis Tero agitarre lika thoorap with tho qtoria of sind 28. Many mga lost their dear lives is his dreadih.sound and fell down ou parthi lut bare Abhinansa cheerfully hoid juía bow and Antons and as if dancing in Isis chariot Lo fand the nakshas, 90. Ther tho enraged rakahas.coining face, 19 fu w with Ab'rinlayd round his attandont vrarriors, And againg the - ४८१९) AIAT Brislinia Pary [ 4819J मास 2 चम्म ॥ ३ ॥ तां यमानाञ्च तथा पाण्डवानां महानम् प्रत्युद्ययी रणे रक्षो देवसेनापयाघलः | ३२ ॥ विमर्दः सुमहानासीत् तस्य सन्यस्य मारिष रक्षा घोररूपेण वध्यमानस्य संयुगे।"३३ ॥ ततः शरसंहसस्तां पाण्डवानामहाचमूम् यद्रावयद्रणे रक्षो दर्शयत् स्वपराक्रमम । ३४|| सा पायमाना च तया पाण्डयानाम नीकिनी । रक्षसा घोररूपेण प्रवुद्राव रणभयात् ॥ ३५ ॥ प्रमृघ धरण सेना पद्मिनी धारणा पयाँ । ततामिद्राव रणे द्रौपदेयान् महावलाम् ॥ ३॥ 'ता कमा महेनसा द्रौपदेयाः प्रहारिणः । राक्षस दुवः सखये प्रहाः पंञ्च रवि ययों ॥ ३ ॥ पीर्य द्भिन्नत नस्तु पीरितो राक्षसोचमः। यूपा युगक्षये घोरे चन्द्रमाः पञ्चभिर्महे ॥ ३८ ॥"प्रतिविम्यानतो. रक्षो विभेद निशितः शरः । मर्वपारों | वस्तुणैकुण्ठानैर्महावलः ।। ३९ ॥ संतभिन्नतनुत्राणः शुशुभे राममोत्तमः। मरी चिंमिरिवार्कस्य संस्थतो जलदो महान् ॥ ४०॥ विषस रिचापि तपनीय पांडवकी घायल और भागी हुई बड़ी सेना को देखकर वह: राक्षस युद्ध में उसके सम्मुख ऐले गया जैसे कि देवतामों की भेना के सम्मुख दैत्यों का राजा बसिगया- पा, हे धृतराष्ट्र युद्ध में उस घोर राक्षम ने सेना का बड़ा मर्दन किया, और अपने | पराक्रम को दिखाकर हजारों वाणों को: फेंकाः; तब तो वहः पाण्डवी सेना भर से महाव्याकुल होकर भाग निकली, जैसे :कि हाथी कमलनियों को मर्दन करता है उसी प्रकार सेना-को-मर्दन करके युद्ध भूमि में द्रौपदी के पुत्रों के सम्मुख गया।:३६: संव-वह बड़े धनुपधारी प्रहार करनेवाले महावली द्रौपदी के पुत्र भी महा क्रोपरूप होकर उसके सम्मुख ऐसे गये ते कि पांच ग्रह सूर्य को सम्मुख से घरते हैं, फिर उन पांचों महावली शूरोंने उसको-ऐसा पायल किया जैसे कि यगकें अन्त में अर्थात मलय होने के समय में पांच भयकारी ग्रह चन्द्रमा को पीड़ा देते इस के अनन्तर महापली प्रतिविष ने अत्यन्त शीघ्रता से तारण धारवाले लोहे के बाणों से उप्त राक्षस को अत्यन्त घायल किया, उन-चाणों से कटेहुए-कवचवाला वह रासस ऐसा अत्यन्त शोभायमानहुआ. जैसे कि सूर्य की किरणों से गर्मित बड़ागदल होता है । ४० । हेराना वह आर्य शृंग गक्षस सुवर्ण जटिंग वाणों में army of the Pandav wounded nud disputsed, tļie rakslias faced liui'as! Bali the prince of the daityas had fuced the armies of gods. Thati dreadfal rakshas made a dreadful slaughter of the armios and discbaria ed, thousonds of arrows to show process, putting to fight the Pardav armies. And trampling the armic as an elephant trampleta elütip of lotukos, llo faced tho'sons of Draupalli. -36. The great-archers, tie souis of Draupadi faced him mucin ciraged like ive constiliations surrounding the face of tho Lárth. Then the five vårriors wourided hini's reverely aslivo dreadful constellations distrisis the moon as the-endiofa yug.. - Then brare Pratitindi rith very sharp dged . 14820] Malablarat (५.५०) परिच्छदै । आपथनियमी राजन वातथा वाचलः ततस्ते प्रातरा. पास पक्षसेन्दं महाहव । विम्यधुनिशिवर्षाणिस्तपनीयविभूषित- ॥ ४२.स नि: भिन्न शरओर जगैः कोपितैरिज बलम्युषो भूश राजन् नागेन्द्रइय हुकुधे ।। ४३॥ सोतिषिद्धो महाराज मुर्तमय मारिप । प्रविवेश -तमो दीर्घ पीडितस्तमहारयेः ॥ ४५ प्रतिलभ्य सतः संहां-क्रोधेग निगुपीकत... चिम्डेद सायफास्तवा वजवि धपि. च. ॥.४५.। एकै पञ्च मिण रामधानस्मयनिय । अल. मुंपो.रयोपस्थे नृत्पमिव महारय । ४६, ॥ त्वरमाण मुसरधो हपस्तियां ए रमनाम । अधान राक्षस क्रुद्ध मारथीच.महाबलः ॥ ४७. ॥ मिभद सुन एक पुनीनासुसशितैः शरैर्बहुविधाकारः शतशोथसहमशः । ४८॥ विरयासमाह ध्यासान करवातश्पक्षसः । मभिदुद्राय धेगेन इन्तुफामोनिशाचर ॥ ४ ॥ तानाई सावरणे तेन पक्षसेनवरात्मना । धानतःसंख्ये राक्षससमुपाद्यत् ॥ ५.यो.. भिदाहुआ ऐसा शोभित विदित होता है जैसे कि प्रकाशित शिवरखासा पर्वत शोभायमान होता है, फिर उन पांचों भाइयों ने उस राक्षस को बड़े वील ती पपी पाणों में पायल किया। तय तो महाविप भरे सपों के समान पाणी विदीण वह गजेन्द्र रूप राक्षस बड़ा क्रोधयुक्त होकर एक मुहर्त मात्र तो येत होगया, फिर 'उस क्रोध से द्विगुणित पराक्रमवाले ने उनके बाण धनुष और धमा ऑको काटा। ४५ । और रयमें बैठेहुए नाचते और पाश्चर्य करने मलम्बुप ने प्रत्येक को पांच रयाणों से घायल करके बड़ी शीघ्रतासे उन मास्या- ओं के घोड़े और सारथियों को मारा, और बहुतमारके अनेक रूपके इमारों गायों मे उनके भारीरों को पायस किया इनसबकमाको कर के उनसबके मारने का करकन रासस बहीतीमता से उनके पास गया, अर्जुन का-पुत्र मभित्र उम दुष्टात्मामे भपने भाइयों को पीड़ित देखकर शीघही उसके सम्मुख मया 1५। swift artuwe made of iron, woduded tho satehas. Piorucu Lliruusly, the armuur by go'den arrows, the rebelas gras glurious to Boholi bo a wountain of shining peak, Thon the iakolia's wounded tio'five brotliors with cry allaq goldeu anows. 42. Wounded by thore arrows like renomous sorjx.nts, the rakshas like an angry elephauh Locamo ineensible for a niowent, and then becoming doubly, cur 54646 with rage he cut their burs and arros 8. (5. Scated in his cliniut, dancing and troddzring braic Alanırash soanded each of them site Svo 4:10173 and killed their homes and drisors. Ho pierced through their bulio with thousands of atrops and bavio, dopo all this, thio rakshas desirous of wlaying thoun, rashed upon tbeo, Abimanyu Lw son of Arjun, seeing his brothers distressed by the ratihas, hastcuel to thcebm.50. The battle between them res as nevere as that bel:

२.) 1999 Bhishm Parys [48211 समनवयुर श्वासषयोरिव । शुस्तायकाः सर्वे पाण्डघाच महारया: Eng सिमेनों महायुद्ध होपदीप्ती परस्परम | महाबलौ महाराज श्रोधसरकलोचनी, ५२ परस्परमवक्षत कालानसमा युधि । तयोः समागमो घोरो षष करेफोदयः १३१ यथा देवासरे युरे शशम्बरयोः पुरा ५४ इतिश्री महामारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपूर्वणि नवमदिरसयुद्धारम्भे अलम्बुमा भिमन्युसमागमे एकाधिशततमोऽध्याय . तरराष्ट्र उवाको भार्जुनि समरेशूरं विनिमन्त महारयान् । मरम्मुषकययुमें प्रत्यनुशासंबर । आयशा कम्वैध सौभद्रा परवीरहा । तन्ममाचा सत्येन यमा संयुगे ।। ९ । धनजया कि ममसन्येषु संयुगे । भीमो पा रथिनां मेटो संझनी या घटोत्कचः । ३ नकुलो सहयपो पा सास्यकियो महारथैः । एतदा वन सत्य शोधात सय ४ संजय उवाच । इन्टताई प्रवस्यामि संग्राम वहां जां दोनों का ऐसा महायुद्ध हुआ जैसा कि इन्हें भोर त्रामर का हुभा.पा. ( पद्धती भापक सय पुत्रों ने और महारथी पापडबों ने देखा कि दोनों परस्पर कोप युक्त और लाल २ नेत्र करके अत्यन्त लड़े और युद्ध में कासाग्नि के समान दोनों वीरों ने अपने को देखा फिर दोनों का भयकारी पद ऐसा ममिय 4 पड़ा जैसा कि पूर्व समय में देवता और अमरों के पुद्र में इन्द्र और अम्बरका प्रायो-1 ५३॥ अध्याय ॥ १०३. २.॥ धृतराष्ट्र बोले हे संजय मुंद में मलम्बुप राक्षस किस तं से पांचों महा रावयों को मारता हुआ शूरवीर अभिमन्यु के सम्मुखहुआ और शत्रुमों के बारों को मारनेवास अभिमन्यु कैसे है उस भलम्बुप से लड़ा इसको पपार्थता से मुझो वर्णन करों, रथियों में श्रेष्ठ भीमसेन घोकन राशन नकुल सहदेव और महारथी सात्यकी यह सरे के लड़े और मन के युद्ध में मेरी सेना में कां क्या हमा इन तर वातानी मागे पर घणा करो, संजय बोले कि हे भाराष्ट्र Teen, Indrá ránd Yritiniue l'bie -Pandavas as well as your song witnessed the fighting of the two warriors who with eğés red in great Finger, fought with each other.. The two warriors of fiery Emper foughtlika Indra and Samrår in the war of gods and asura.*.53.700 CHAPTER CII "How did Alamvash the rakshas beat ihó Ato warriors?"* *asked Dhritrashtra of Sanjáya,"how did he face Abhiimanyu "and Lot did Abkimangủ the destroyer of focs encounter him! Prsy, tell' me all this in detail. How did Blímsen the best of charioteers, Ghatotkácii the rakébar, Nakal, Sahader and brate Satyaki fight, and phat:Ýis done is my army in the war with Arjan? Pray give á detsiled account of all these facts." "Itball tell you of that thrilling svar," seplied [48221 Mahabharat (४८२२) लोमहर्षणम् । यथाभूद्राक्ष सेन्द्रस्य सौभद्रस्य च मारिय ॥ ५॥ अर्जुनश्च यथा संख्ये भीमसन पाण्डव । नकुल सहदेवश्च रणे चक्र परामम् ।।६।। तथैव तावका सधैं भीप्पद्रोणपुर सरा. । अद्भुतानि पिचित्राणि चत्रु कर्माण्यमीतवत् ॥७॥ बलम्युपस्तु समरे अभिमन्यु महारयम् । विनध सुमहामाद् तर्जयित्वा मुहुर्महु ॥ ८॥ अभिदु द्वाघ वेगेन तिष्ठतिष्ठति चाप्रवीत् । अभिमन्युश्च वेगेन सिंहवाद्विनदार ॥९॥ भाष्य गि महेप्पास पितुरत्यन्तवैरिणम् । तत समीयतु सख्ये त्यरिती नरराक्षसी १०॥ स्थाश्या रथिनी श्रेष्ठौ यथावै देवदानवो । मायावी राक्षसष्ठो दिव्यास्तवव फाल्गुनि ॥११॥ ततः कामिमहाराज निशितै सायकॅनिमि । आH शरिणे विध्या पुनर्वि व्याध पचमि ॥१५॥ अलम्बुपोपि सकुद्ध कार्पिण नबभिराशुगे । दृदि विध्याध गेन तोरिव महाद्विपम् ॥ १३ ॥ तत शरसहस्रेण सिमकारी निशाचर पर्जुनस्य मै उस रोमहर्पण युद्धको तुम से कहनाहू जो उत्त रासस और अभिमन्यु ने किया है और जैसे कि पाण्डव अर्जुन भीमसेन नकुल सहदेव और सात्यकी ने युद्ध में पराजय किया है, और जो २ कठिन कर्म मापके उन शने किया जिनके कि अग्रगामी भीष्म और द्रोणाचार्य थे उसको और जैने २ फिर अलम्बुप युद्ध में बड़े पाब्दसे गर्नकर या घडककर महारथी अभिमन्यु के सम्मुख गया और बड़ी साना मे तिष्ठ तिष्ठ शन्द करके सिंह के समान गर्नना करता हुभा अभिमन्यु पिता के महाशष्ट भलम्प के सम्मुख जैसे गया तदनन्तर रथियों में श्रेष्ठ शीघ्रता करने वाले नर और राक्षस युद्ध में रयों के मारा देवदानर के समान सम्मुख हुए मायाका जाननेपाला रातस और अर्जुन का पुन अभिमन्यु यह दोनों दिग्य अस्त्रोंके जाननेराले थे, फिर अभिमन्यु ने तीन तीक्ष्ण याणों से अलम्बुप को घायल करके पांचबाणों से विदीर्ण किया, मोर अत्यन्त क्रोधयुक्त अन्धुप ने भी नौ वाणों से अभिमन्यु के हृदयको ऐमा घायन किया, जैसे कि अंकुश से बड़े हाथी को करते हैं। ११ । Sonyaya, "I shall tell you of the do ngs of the ralshas and Abh manyu #ftho Lravo deeds of the Panda Arjun, Bhimaen, Nahul, Salia. 10:15atyalal shall tell you of the bave dceds of your rur Tuin who wore led by Bhishm and Dronacharya as well as of Alamy usha who, roning and flashing, faced Abhimanyu and how the latter, 1001ing lulon lion and uttering forth tho crs of 'stay, stay;' rusled up-Alimi ush the great enemy of lug father. Both the o Sost of chrutcurs, nan and rahslas, mounted on strift Chariota, facer? each other like gods and DADay 13. The ralshas, shilful on the use of IngA and Ablñmangu the son of Irjun were both shilful in the uso of celo tal treapung laring sounded Alnins ush with thirco arrots, Abluunnyu picred him with fisc molo Alamrush too, mucli enres. ed, roundai Alluminyu in the breast with an ATOA as they do An clephant with a gow Then, O best of Blurrats, Alnm asit 13 (४८२३) 'भीमपर्व Bhishma Pary [48233 सुत मंध्ये पीडयामास भारत ॥ १४ ॥ अभिमन्युस्तत बुद्धो नवभिनत पूर्वमिः । वि. भेद निशितैर्वाण राक्षसेन्द्र महोरसि ॥ १५॥ ते तस्य विविशुस्तूर्ण कार्य निभिद्यमर्म म। सबैर्विभिन्नसांन शुशुभे राक्षसोत्तमः ॥ १६ ॥ पुष्पित किंशुकै राजन् संस्तीर्ण इव पर्वतः । सन्धारयाणश्च शरान हेम पुंसान महायल ॥ १७ ॥ विवमा राक्षसश्रेष्ठः सज्जाल इव परतः । तत ऋद्धो महाराज आर्य शृङ्गिरंमर्पणः ॥ १८ ॥ महेन्द्रप्रतिम कारिणं छादयामास परिभिः । तेन ते पिशिसामुक्ता यमदण्डोपमाः शिताः ॥ १९ ॥ अभिमन्यु निनिर्भिध प्राविशन्तधरातलम् । तथगार्जुनिनामुकाः शरा फनपाभूपणा, ॥ २० ॥ मलम्प धिनिर्भिव प्राविशन्त घरातलम् । सीमनस्तु रणे रक्ष शर. सा. पर्वमि ॥ २१॥ चक्रे विमुख मासाद्य मयं शक हवाहवे। चिमुरश्चरणे रक्षा प.. मान रणे रिणा ॥ २२ ॥ प्रादुश्चक्रे महामायां तामसी परतापनाम । ततस्ते तममा सर्वे हे भरतर्षभ इन के पीछे शीघ्रता करने वाले अलम्बु ने अपने हजार पाणों से अभिमन्युको पीडामान किया, फिर महानोच भरे अभिमन्यु ने भी ग्रन्धा वाले नी बाणों से रातों के राजा को बड़ी छाती पर घायल किया, वह वाण मर्मों में मोश करके शीघ्रही उसकी देर में घुसगये उन वाणों से वह रोत्तम सत्र शरीर में पायल होकर ऐसा शोभायमान हुआ, जैसे कि फूले हुए किंशुक सक्षों से पर्यंत शोभित होताहै और सुनहरी पुंखवाले घाणों से उसकी ऐमी अद्भुत शांभाहुई जैसे प्राग्न याले पहाड़की होती है इसके पीछे महाकोष युक्त असह्य अलम्बुप ने वाणों मे मनाइन्द्र के समान अभिमन्यु को ढकादया.फिर उसके बाण अनिमन्यु को घायल करके पृथी में घुनगये इमीप्रकार अभिमन्यु के छोड़े मुवर्ण जटित वाण: भी मलनुप को घायल करके पृथ्वी में प्रवेश करगये फिर अभिमन्यु ने युद्ध में अच्छे मुके हुए ग्रन्थी के पाण अलम्बुपके ऐमे मारे जिनके मारे उमने ऐसे मुख फेर लिया जैसेकि इन्द्रो मारे हुए चाणोंसे मयदैत्यने मुखफेर लियाया फिर राक्षसाधिपने अपनी तामसी बड़ी माया अन्धकार को मकटाकया उम अन्धकारमे वहसय गुप्तहोगये, तय Jarfarovaly xavoded Abbimavyo vitb flatsands of numaty, and the latter too, much enaged pierced that prince of rakshases with nine ariots ia tlie b-cast Tho arrows p erced the vital pirts in his body and the sakslia sith the wounds on his lody, looked Leautiful like kinshulk thos in blooni on a mountain. With the arrars having gold. en featliers stuch to log boly, he looked glorious like a rolcano. Then enraged Alam vaslı of unlearalle nature hid Abhihanyu with his anows like those of Indra 1118 arrolys liaving pierced through the body of Abhimanyu, entered the ground Then a bhimanyu pierced liim with his arrons of hooked twints god the rol shef tuiniet face lilo Maya daitya wounded by Indra. The inkslaus prita tlirreupon created & storm of darknosz by his art of darl.e-s ad lnd all the ombar . [4824] Mababharat 1४८२४) साधासन महीपते ॥ २३ ॥ नाभिगम्युमपश्यन्त नैव स्वान् म परान रणे । भमिमन्यु श्वतया घोररूपं महत्तमः ॥ २४॥ मायके तवत्युमं भास्कर कुरुनन्दनः । तत मफाशममवजगत् स महीपते ॥२५॥ ताम्चाभिजग्नियान माया राक्षसस्प दुरात्म मः । संक्रुमममहावीर्यो राक्षसेन्द्रं नरोत्तमः ॥ २६ ॥ अदयामास समरे शरै समत पर्वमि । यधीस्तथान्या माया प्रयुकास्तेन रससा ॥२७: सर्घाक बिदमेपारमा पारयामास फाल्गुनिः । हतमायतितो रक्षो वायमानाचसायके रयष सं स्पज्य प्राइपन महतो मयात् । तस्मिन् विनिजिते पूर्ण कुटसोधिीन राक्षसे ॥ २९ ॥ मा नि समरे सैन्य सावक सं ममर्दह । मदान्धो गन्धनागेंद्र सपना पशिनीमिय ॥३०॥ तत. शासनवो भीष्म. सैन्य दृष्ट्वाभि विद्युतम् । महता शरवर्षेण सौमद्र पर्य धारयत् ॥ ३१ ॥ कोष्टीकृत्यच तं धीर धार्तराष्ट्रा महारथाः । एफ सुबहवो युद्ध न राक्षसको न अपने शूरवीरों कोन शत्रुभोंको अभिमन्यु ने देखा इसमहाभयकारी मास मायाको देखकर अभिमन्युने प्रकाशमान तोरनाम भस्नको प्रकटकिया तबसर संसार दीखने लगा । २५ । और प्रकाश के होते ही उन निईदो दुर ला राक्षसकी प्रबल मापाको द्रकरके बड़े वार पराक्रमी नरोत्तम भनिगन्युने उस रातसाधिपको पुदमें गुप्तपन्थी बाले वाणों से दकादया फिरउस रामत ने अनेक • मायाकरी परन्तु सब मायामॉको उस महामना अभिमन्युने दूर किया फिर मायाके नाशहो- नही सापकों से घायल होकर वह रासस बड़ा भयभीत हो रयको उरी ग्यान में छोड़कर भागगया फिरउम कठिन पुद कर्चा राक्षस के शीघ्र विजय मानेपर पद्धमें महनहोकर अभिमन्युने भापकी सेनाका ऐसा विध्वंसनकिया मैने कि मदोनहन भासी गजेन्द्र निर्मल कुमुदिनियों के वनको विचंताला है । ३० । इ छ शान्तनुके पुत्र भीष्मजीने अपनी सेना को भागाभा देवकर पाएँ । रे भभिमन्युको दकदिया, फिर धृतराष्ट्र के मारयी पुत्रों ने उतारक tants under it. 23. Neither the rahalise por t1.0 Furriong Of lotr Brdes rero dinearnil lo to Abumanya_Saeing that drea.ful del 1s oat Abhimanyu discharged his light prouducia: trespon hnota rs Sour (solar) as I the firmarient ras again clear. 25. Thus dispelling driness cened by the unwise and ill natured rakshas, braro Abhr manyu hid him by his arrofs having hidden koots. The rabshos de raricus desept ons, but Abhimanyu, skilled in the use of all wes: porn, mile all biss h'ines futile. ith the destruction of lus artfulneft, the ralalie9 Tuanded by arrow and afraid, left his chariot and fled from the field of latil. After the conquest of that warrior rabelas Abhimanyu began to destroy your armos as a mnd clephant of the forest trampl v domo this h Iploss lotuks. 30 Then Buislim tho son of Sjaata 19, 50! ng hs Army put ty flight. ld Abhimanyu with‘liis sharpaborer of ArTO TLa sossf Dhritruitra llen surroanded that (२५) मागमप Bhishma Pary [4823] तरासायरिंदम ॥ ३२ ॥ स तेषां रथिनांवीर. पितुस्तुल्य पराममे । सरशी पाहु देवस्य विफमण वलेन च। ३३ ॥ उमयोः सरर्श कर्म स पितुर्मातुलस्य धारणे बहुविध चक्रे सर्वशस्त्रभृतां धरः ॥ ३४ ॥ ततो धनम्जयो पीये वित्तिय सैनिकान् । भासताद रणे भीषं पुत्रप्रेप्सुरमर्षण. ॥ ३५ ॥ तपेष समर रामन पिता देवनतस्तष । मांससाद रणे पाय स्वमातुरिव मास्करम् ॥ ३६ ॥ ततः सरयनागाश्या पुस्तक जनेश्वर । परिवन रणे माम पुम समन्वतः ॥ ३७॥ तयैव पापी राजेन् परिबार्यनजपम् । रणाय महते युसा सिता भरतर्षम ॥ ३८ ॥ शाक्तालतो राजन् भीमस्य प्रमुख स्पितम् । अर्जुन पञ्चविंशस्या सायकानां समाविनोत् ॥ ३९ ॥ प्रत्युद्गम्याय विव्याध सात्यकिल शितैः शरैः । पाण्डवप्रियकामास शाईल व कुम्मरम ॥ ४०॥ गीतमोपिस्वारायुक्तो माधवनधर्मि से घेरकर युद्धमें भनेकों ने अकेले को बहुत से 'माणों से अत्यन्त घायल किया, उस पिता के समान बली व वरू पराक्रम में बासुदेवजीके तुल्यसब शनधारियों में श्रेष्ठ धारमभिमन्युने उन रथियों के सम्मुख पिता भार मामाके समान भनेक प्रकारके कर्माको किया । ३४ । उसके पछि पुत्र को चाइते और आपकी सेनाको'मारले नेपयुक्त बार भनिने पुद में अपने पुत्रको पापा, इसी प्रकार मन्य माने दारों को भी सम्मुख लड़ते हुए पापा और भाप के पिता देवत्राने लड़ाई में अर्जुन को ऐसे सम्मुख पाया जैसे कि राह मूर्य को सम्मुख पाता है, इतके पाछे रय हाथी और घोड़ों समेत मापके पुत्रों ने युद्ध में भीवनी को चारों ओर से रक्षित किया, हे राना धृतराष्ट्र इसी मकारसे भलंकन पांडव अर्जुनको घेर कर बड़े युद्धकेलिपे मचार्ग, इसके पीछे कृपामार्य ने पच्चीस वाणों से भीष्म के प्रागे वर्तमान अर्जुन को दरदिया फिर 'सापकीने अर्जुन के प्रियकरने की इच्छा मै 'सम्मुख जाकर उनको तारण वाणों से ऐसा घायल किया जैसे कि शार्दूल हाथी को घायल करतार । ४० । और अत्यन्त कोपयुक्त शीघ्र करनेवाले कपाचार्य जीने भी कंक Warnis-ar adiules and many sity nmited together Punded the singlo. Valliant Abhimanyu the best of warriors, strong like his father and full of prowzes like hia unclo Vasudev, performed deada of Talour like those of his father and wucle. Thon out of love for his son killing your warriors, bravo Arjan, much ebraged, approached him and foond bim opposed by many. Then your father Devabrat met Arjan in comtat as Bahu popote the sun Your sons protected Bhisbi wikla Quarjata, elephonts and horses, and surrounding the Pandor Arjan they fought against him. Thor Kripackargo witli twenty five arrows hid Arjun wlio opposed Bliskim. entfaki, wishing to pean? Aijan, fuced him and wounded liim with his arr3 cs & lion wounds on els- -phant. 40. Skilful Kripacharys, much enraged, wounded Satyaki [[ 4820]. Mahabharat (४८२६) शरैः। दृति विव्याध संकुद्धः कंकपत्रपरिच्छदैः ॥ ४७ । शनयोपि ततः ऋद्धेश्चापमा नम्र वेगवान् । गौतमान्तकरं तर्ण समाधत्त शिलीमुखम् ॥ ४२ ॥ तमापतन्तं बेगेन शानिममद्युतिम् । द्विधा चिच्छेद संकुद्धो द्रौणिः परमकोपनः ॥ ४३, ॥ समुत् सम्याथ शैमयो गौतमं रयिनांवरः । अभ्यद्रवणे द्रौणि राहु: ख शशिनं यथा ॥४॥ 'तस्य द्रोणसुतश्चापं द्विधा चिच्छेदभारत । अथैनं छिन्नधान्यान ताडयामास सायकैः ॥ ४५ ॥ सोन्यत्, फार्मुफमादाय शत्रुघ्नं भारसाधनम् । द्रौणि षष्ट्या महाराज पाहवो यरसि चार्पयत् ॥ ४६ ॥ स विद्धो व्यथितश्चैव मुहूर्त करमलायुत. । निषसादरंथो पस्थे ध्वजयष्टिं समाश्रितः ॥४७॥ प्रतिलभ्य ततः संशांद्रोणपुत्रः प्रतापवान् । वार्णय समरे कुछो नाराचेन समापयत् ॥ ४८ ॥ शैनेय स तु निर्भिध प्राविशारणीतलम् । पन युक्त नौ वाणों से सात्यकी को हृदय में घायल किया फिर घेगवानं क्रोध भरे सात्यकी ने अपने धनुषको लेचाकर कृपाचार्य के नाश करनेवाले शिलीमुख नाम वाणको धनुपपर चढ़ाया उस समय अत्यन्त क्रोध से भरे हुए अश्वत्थामा ने उस तीबतासे गिरते हुए इन्द्र वज के समान चाणको दोस्थानों में काटा, इसके पाछे रथियों में श्रेष्ठ सात्यकी कृपाचार्य को त्यागकर युद्ध में अश्वत्थामा के सम्मुख ऐसे गया जैते कि आकाश में चन्द्रमा के सम्मुख राहुनाता है । ४४ । हे भरतवंशी द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा ने उसके धनुप के दो खण्ड करके उसको मारे पागों के अच्छादित करदिया फिर सात्यकी ने शत्रुओं के मारने वाले दूसरे धनुप को बँचकर साठ पाणों से अश्वत्थामाकी छाती और दोनों भुजाओं को घायस किया उन याणों से यायन और पीड़ित होकर अश्वत्थामा महाव्याकुल व अचेत | होकर कई मुहर्तता ध्वजाके आश्रयसे रथमें बैठगया, थोडेही समपमें अत्यामाने सचेतही बड़े क्रोघो सात्यकीको नाराच बाणने घायल किया, वहवाण सात्यकी को घायल करता हुआ पृथीमें ऐसे घुमगया जैसे किवसन्त ऋतु में सर्पका बलवान in the broast withi nino ariows having vulture quills, and antyahi much cnraged sitar ply brent his bow and desirous of Lilling Kripacharya, put to his bow an arrok wherted on stone Agliwathama exceedingly enrageel, cut that swift arrosy like thio vajra of India, in two pluces. Then Satyaki tho bait of charioteers lors Kripacharya and rushed Against Ashwathama as Rihu goés nga'ost the moon. 44 The lutter cut down his bow aus hid bin with 11 8 nrrowe. Snignhi tirn took up nuother bow clostructive of oneni'ct and dischargiog from it sixty Arrow", woundrel himn on tlic breast and arms. Wounded and rained by them, a slawntitaina kiccang urconscious for some time and hold bis bandur staff to keep linau}f froin falling downt. On regrining consciousnext he wounded Satynbi with a long shafted Arrow. llavo ing woundeei Sityaki that arro.x ontered the ground ns a young prorſul inale enters his luule in the stason of Spring 19. Then and (४८२७) भीष्मपर्व Bhishma Parv [4827] घसन्तकाले बलवान् पिलं सर्पशिभुर्यथा ॥ ४९ ॥ अथा परेण भल्लेन माधवस्यावतो त्तमम् । चिच्छेद समरे द्रौणिः सिंहमादं मुमोचर । ५. ॥ पुनश्चन शरवोरछादया मास भारत । निदाघान्ते महाराज यया मेधो दिवाकरम् ।। ५१ ।। सात्यकोपिमहाराज शरजालं निहत्य तत् । दीणिमश्या किरत्तूर्ण शरजालरनेकधा ।। ५२ ॥ तापयामास च द्रौणि नेय परवीरहा । विमुक्तो मेघजालेन यथैव तपनस्तथा । ५३ । शराणांच सहस्रेण पुनरेव समुद्यतः सात्यकि छादयामास ननाद च महायल. ५४ ॥ श्वा पुत्रंचतं प्रस्तं राहुणेय निशाकरम् । “ग पवन शैनेयं भारद्वाजः प्रतापयान ॥५५॥ विव्याध च सुतीयशन पृषत्केन महामृधे । परीएसन स्वसुतं राजन् घाणेये नाभिपीडितम् ॥ ५६ ॥ सात्यकिस्तु रणे हित्वा गुरुपुत्र महारधम् । द्रोणं विव्याध विशत्या सर्व पारशवे. शरः ॥ ५७ ॥ तदन्तरममेयात्मा कौन्तेयः शत्रुतापनः । मभ्य' पच्चा विलमें प्रवेश करता है ! ४१ । फिर अश्वत्थामाने दूमरे भल्ल से सात्यकी की उत्तम धनाको काटकर बड़े सिंहनाद पूर्वक उसको महाबोर वाणों से ऐसा ढकदिना जैसे कि वर्षाऋतु वादल सूर्यको दकदेता है हे महाराज फिर मात्यकीने भी बड़ी शीधनासे उस वाणोंके जालको काटकर अपने वाणसमूहोंसे ग्रसत्यामाको आच्छादित करोदया फिर उसशत्रुहन्ता सात्यकीने अश्वत्थामाको ऐमा संतप्त किया जिस कि स्वच्छ आकाशवाला मूर्य सबको अत्यन्त तपाता है, इसके पीछे पड़े उपाय करनेवाले सात्यकी ने बड़ीगर्जनाओंको करके हजारों याणोंसे अश्वत्थामाको व्याप्त करदिया, तमामे असेहुए सूर्य के समान अपनेपुत्रको देसकरमतापवान् द्रोणाचार्य जी उस सात्यकी के सम्मुख गये । ५५ । हे राजा सात्यकी के हायसे पीड़ामान अपने पुत्रको चाहते हुए द्रोणाचार्य ने उसको युद्ध में पड़े तात्र पृषकमाणसे पायल किया फिर सात्यकी ने युद्धमें गुरुके पुत्र महारथी को छोड़कर लोहमपी बाणों से द्रोणाचार्यजी को महा व्याकुल किया, उप्ती भातर में पड़ा साहसी liis own having cut down his good banner with anolher dart, Ashwathania ronrod like a lion and hid him with his arrows as clouds in the rainy season bide the sup. Satyaki with great velocity cut down that notwork of arrays and his Ashwathami with a garm' of That dostroyer of foes then heated Ashnathama as does tho sun when the sky is clear. With great skill Satyaki hid Ashwathama with thousands of arrows and uttered loud roals. Then seeing bis son liko the sun arrested by Rahu, Drona. charya facod Satyaki, 55. Out of Aflection for his son who was trounded by Satyaki, Dronacliarya wounded the latter with his very slarp arrows. Satyaki then left the son of Acharya and sounded Dronacharya with his st391 arro173, In tho meantime, gallant (48281 Mahabharat (४८२८) मपणे कुरो दोण प्रति महारयम् ॥ ५८ ॥ तो द्रोणवपापश्च समेपात महामथे। पया धुधव शुक्राश्च महाराज नमस्तले ।। ५९ ॥ इतिथी महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलपुदे द्रोणार्जुन समागमे दधिकशततमोऽध्यायः ॥ १० ॥ भूतरा उपाय । फष द्रोणो मद्रुग्यास पाण्डवश्च धनन्जय । समीपत् रणे पत्ती तामी पुषर्षभो ॥ ॥ नियोहि पाण्डयो नित्य भारद्वाजस्य धीमतः । आचार्यश्ध ( मित्य प्रिप. पापस्य सन्जय ॥ २॥ ताऽसौ रथिनी सस्ये दृष्टौ सिंहाधिपोरकटी। क समीयतुर्यची भारद्वाजधनन्जयो । ३ । सम्मय उवाच । न मोण समरे पाय जानीते प्रियमारमन क्षत्रधम पुरस्कृत्य पार्थो घा गुरमाइषे ॥ ४॥ न क्षत्रिया रणे पजन पर्खयरित परस्परम् । निर्माद हि युध्यन्वे पितृभिसि स॥ ५॥ रणे शत्रुसंतापी महारयी क्रोध भरा अर्जुन युद्ध: द्रोणाचार्य के सम्मुख गया फिर द्रोणाचारप और अर्जुन ने उस घोर युद्ध में ऐसी बड़ी सम्मुख्ता करी जैसी कि आकाश में बुध और शुकने करीबी ५९ ॥ अध्याय १.३॥ धृतराष्ट्र पोले हे संमय युद्ध में कुशल दोनों पुरुषोत्तम पर्याद बड़े धनुषधारी द्रोणाचाय्य और पाहव भर्जुन परस्पर के सम्मुख हुए, हे संजय का अर्जुन उस दिमान द्रोणाचार्य का संदेव प्यारा है और भाचार्यजी भी भर्जुन को सदैव प्यारे हैं, या दोनों महारथी युद्ध में प्रसन्न चित्त सिंहफी समान मदोन्मच और सावधान होके किस रीति से युद्धकरने को प्रवृत्तहुए, संजय पोले कि द्रोणाचा- पनी युद्ध में अर्जुन को अपना पारा नहीं जानते हैं इसी प्रकार मर्जुन भी सभी धर्मको आगे करके गुरुको युद्ध में प्यारा नहीं मानता है, हे राजा क्षत्री लोग परस्पर में एक दूसरेको स्पाग नहीं करतेहैं किन्तु पिता और भाई Arjun of great courage and destroyer of fous rent against Dronacharya muen enraged and met lum in a sovere combat like that of Budh and Shukra in heaven."59. CHAPTER CIII " Describe the oncouute between the two skilful warriors and best of mja, Fil.. Deunucharya this great a cher and Arjun tuo Pandar" said Dantraalta to Sanayx, Aijun is always dant to Usuangwa ya ud too far wer buy equal rega eldur tho latior, but did thu cws war 1., with chive ful tuinde lhe two inadd noj llops, agut nga ndoa h otar in barnesu “Dronacharya casts asida bis luva lur juo at tud tin: of bghting," replied Sanjaya, "nud likewiso Arjun's idon of kshatrya duty overcomes that of Joro for his preceptor. Kolaity as, O king, donot bpare ang ono in battle they ४८२९) भीमप Bhishma Pary [48291 माएर पाया होगा विवानिमि । नाचिन्तपच्च वान् घाणान् पार्यचापच्यु तान् युधि ॥ ६॥ शरट्या पुन पार्य रगयामास तं रणे । स प्रजयाल रोपेणगहने निराजित ७॥ ततार्जुन रणे द्रोण शरै सनतपर्वभि । छादयामास राजेन्द्र न चिरा देश भारत ॥ ८ ॥ ततो दुर्योधनो राजा सुशर्माणमचोदयत् द्वापरय समरे राजन् पारिंगमहणकारणात् ॥९॥ निगराडपि जुद्धो रामायम्यफार्मुकमा अद यामास समरे पार्य वाणैरयो मुखै ॥ १० ॥ वाभ्यां मुक्काः शरा राजनन्तरिक्षेविर जिरे। हसाव महाराज शरस्काले नमस्तले ॥ ११ ॥ ते शरा. प्राप्य फौन्तेयं समन्ता. विविशु प्रभो । फलमारनत यत् स्वाक्षं विहङ्गमाः ॥ १२ ॥ मर्जुनस्तु रणे नाद विनय रथिनापर। भिगतराज समरे सपु विध्यधे शरैः ॥ १३॥ ते विष्यमा ना पायेन कालेनेव युगक्षये । पार्यमेवाश्यवन्त मरणे तनिश्या ॥ १४ ॥ मुण्ड के साथ में भी अमर्यादा से लड़ते हैं के राजा युद्ध में अर्जुन के तीन बाणों से घ या द्रोणाचार्यनीने अर्जुन के धनुष से गिरेहुए वाणों को विचार नहीं किया, फिर अर्जुन युद्धभूमि में वाणों की वर्षा करता हुआ ऐसा झोपगुतहुआ जैसे कि बहे पन में वृद्धि पानेवाला अग्नि भएर होजाता है, फिर द्रोणाचार्य नेभी शी- घी गुतान्याहाले वाणों में अर्जुन को ढकर्दिया, तदनना राजा दुर्योधन ने युद्ध में द्रोणाचार्य की मनपा के कारण रागा सुशर्मा को प्राशाकरी, उस त्रिगर्त के क्रोधयुक्त राजा ने भी अपने धनुपको अच्छे प्रकार खेचकर लोहे की पुंसवाले वाणों में अर्जुन को आच्छादित करदिया । १० । हेपाना उन दोनों के छोड़ट्टये याण अन्तरिक्ष में रेस प्रकाशवान हुए जोरे कि शरदऋतुके शाकाश में इंसशोभित होते हैं, वह वाण चारापोरसे अर्जुन को पाकर ऐसे मवेटहुए जैसे कि फलों के बोझ से मुकेडर रक्षों में पक्षी मवेश करते है, फिर रथियों में श्रेष्ठ प्रर्जुन ने बड़ी गना करके मारे पाणों के पुन समेत त्रिगर्त के राजा को घायल कर दिया जिसे कि युग के अन्त में काल से घायल होतेहैं उसी प्रकार अर्जुन से घायल fight against their fathers and brothers Wounded with thize arluna of Arjun, 0 hing, Dronacharya took no notice of them Arjun, showering his arrows was exceedingly cnraged like the Advancing fire in & furenti Dronacharya too, hid Arjun with the sh vp of h 8 Artows liaying hidden knots Then Princo Duryodlien 0 king Slagharma to assist Donacharya, and that enraged ::.1.0 Tigart too, d ow this bow and hid Arjun with his feathered minda he arrows discharged by botb looked JM10 11 1'ko 8881 lying on high m tha Winter serson The artOrY5 antar-I tin chut noof A-jun as birds enter the foliage of & fruit bobin true fhop Arjan the bust of chamoteers with a long roar wounded the king of Trigart and his sou with the shower of arrors - 10 [ 4830] Mahabharat, शरदृष्टिश्च पाण्डघस्य रथं प्रति । शरवृष्टि ततस्तान्तु शरवः समन्ततः ॥ १५ ॥ प्रतिजग्राह राजेन्द्र तोयवृधिमियाचलः । तत्राइभुतमपक्ष्याम पीमत्सोईस्सलाधयम् ॥१६॥ विमुक्तां वाभियोधः शस्त्रवृष्टिं पुरासदाम् । यदेको वारयामास मारुतोनंग- जानिया फर्मणातेन पार्थस्य तुतुपुर्देवदानवाः । अथकुद्धो रणे पाय स्निगर्लान् प्रति भारत ||१८|| मुमोचार्य महाराज वायच्यं पृतनामुसे। प्रादुरासीत्ततो पायुः होग याणो नभस्तलम् ॥ १९ ॥ पातयन् वै तरुगणान चिनिघ्नश्चैव सैनिधान । ततो द्रोणो मिवीक्ष्येव धायग्यास्त्र सुदारुणम् ॥ २० ॥शैलमन्यामहाराज घोरमन मुमोचा । द्रोणेन युधि निर्मुक्ते तस्मिन्नने नराधिप ॥ २१॥ प्रशशाम ततो वायुः प्रसन्नाच दिशोदश । ततः पाण्डुसुतो धीरस्निगतस्थ रथवजान् ॥ २२ ॥ निरुत्साहानरणेचके विमुखान् विपराक्रमान् । ततो दुर्योधनश्चैव कृपश्च, रथिनांवरः ॥ २३ ॥ अश्वत्पा और मरने में निश्चय करनेवाले वह लोग अर्जुन केही सम्मुख पाकर बरीमान हुए । १४ । और युद्ध में उन लोगोंने अर्जुन के रथ पर बाणों की वर्षाकरी और अर्जुन ने अपने वाणों से उनके वाण जालों को ऐसे रोका जैसे कि जलकी वर्षा को पर्वत रोकता है हे राजा यहां हमने अर्जुन की इस्तमाघ पता को भी अपूर्व देखा कि जो अकेले ने बहुत से वीरोंकी छोड़ी हुई असल पाणों की वर्षाको और शस्त्रों को ऐसे रोका जैसे कि वायु बादलोके समूहोंको रोकदेता है, अर्जुन के उस कर्म से देवता और दानव भी महामसन्न हुए हेरामा मर्नुन ने महा क्रोधित होकर सेना के मुखरुप विगत देशियों के ऊपर वायव्य अत्रको छोड़ा उस में से आकाशको व्याकुल करते या देवतामोंके ममूहोंको गिराते और नामों को मारते हुए वायु प्रकटहुए फिर द्रोणाचार्य जी ने बड़े भयकारी वायव्य भर को देखकर । २०। दूसरे शैल्प नाम घोर अन्नको छोड़ा उमद्रोणाचार्य के उग भरा के छोतेही वहयायु शान्त होगई और दशोदिसा प्रसन्नहुई इस के पीछे उमवीर अर्जुन ने विगत राजा के रखों के समूहोंको, उत्साह व निर्मल व मुस फेरनेवाला like those of Death. Thus wounded by Arjun, thoy facell him Eppving in their death 14 They showered arrows at the chariot oi Aijun and the latter with the network of his arrows cliecl.cu tliem naa mountain checks a shower of rain. There sre saw, O king, the wonderful swiſtncas of Aijan who checkod tlo slower of their Arrows as the wind doos tho masses of clouds. Tlio gods and tho annars tyors plansclnt tuo prowess of Arjun. IIe discurryed liis Vasavya (niryweapin at the Trigurtas wlio led the army. It produced winds disturling the skies, taking the crowds of gols fall froin th: ir sods and destroying the arinics. Sving the nitect of that weapon Dronacharya discharged anather, hnown as Shailya, which subside thio storm of wind and thic proplo were pleascd. Then (४८३२) भीमप Bhishma Party [48311 मातथा शल्यः काम्बोजश्च सुदक्षिणः । विन्दानुविन्दायावत्यो पालिकः सह पालिके ॥ २४ ॥ महता रथवंशन पार्यस्यावारयन् दिशः। तथैव भगदत्तश्च श्रुता युश्च महावला ॥ २५॥ गजानीकेन भीमस्थ तायवारयतांदिशः । भूरिभवाः शलश्चैय सौघलश्च विशाम्पते ॥ २६ ॥ शरीधर्विमलेहताणर्माद्रीपुत्रावधारयन् । भीष्मस्तु संहत' सहये पाचराष्ट्रः ससैनिकः ॥ २७ ॥ युधिष्ठिरं समासाद्य सर्वत पर्यधार यत् । आपतन्तं गजानीकं दृष्ट्वा पार्थो वृकोदरः २८ ॥ लेलिहन सरिकणीचीरो मृगराडिय फागने । भीमस्तु रथिनांश्रेप्टो गदा गृध महाहधे ॥ २९ ॥ अवप्कृत्य रथा तूर्ण तय सैन्यान्यभीपयत् । तमुद्रीक्ष्य गदाहस्तं ततस्तै गजलादिग' !' ३०॥ परि- मनग्ये यत्ता भीमसने समन्ता । गजमध्यगनुमाप्त पाण्डव स न्यराजत ॥ ३१ ॥ भेजालस्य महतो यथा मध्यगतो रविः । यधमत् स गजानीकं गदया पाण्डवर्षभः किया, इसके पीछे दुर्योधन व रथियों में श्रेष्ठ कृपाचार्य अश्वत्थामा शल्प कांबोज मुदक्षिण मिन्द अनुविन्द अवन्तिके राजा लोग वाल्हीक देशियों समेत समा पाल्हीक इन सब वारों ने रधों के समूहों से अर्जुन की दिशाको रोकादगा। २५ । उसरकार भगाच व मारली श्रुतायु इनदोनों ने हाथियों की सेनासपेत भीमसेन की दिशागों को रोका और भूरिश्रग शल्प शकुनी इस मबने बड़े तीव क्षणों से माद्री के दोनों पुत्र नकुल सहदेव को घेरिलिया और | मेना वा धृतराष्ट्र के सय पुत्रों समेत भीष्मजी ने युधिष्ठिर को पाकर सब और से घेरलिया, फिर भीमसन ने उग गिरनी ईई हाथियों की सेना को देखकर, वनके सिंश्क समाग होठोंको चाटते हुए अपनी बड़ी गदाको लेकर शीघ्रही रथसे कूदके आपकी सेनाओं को भयभीत किया इसके पीछे युद्ध में कुशल उन हाथियों के सकारों ने भीममेन को गदा धारण किये देखकर ३० चारों ओर मे घेगलया तब वह मीमसन हाथियों के मध्यवर्ती होकर ऐसा शोभायमान दु जैसे कि बादलोके बड़े bravo Arjun made the liosts of Trigırt charioteers powerless and they turned bach out of despair. Then Duryodhan, Kripacharya tho beat of charioteers, Ashwathama, Shalya, Caniboj, Sudakshin, Vind and Anuvind tho tro princes of Avanti and Vablik with his countrymon cheokeil Arjun from al} sides 25. In the same manger, Bhage detta and mighty Shrutayu with their armies of elephants checked Blinson from all directions; and Blurishraya, Shalya and Sbakuni checked with thieu inows the adtance of Nakol and Sahadey the tro sons of Madii. Blishm with all the sons of Dhritrashtra and the armies surrounded Yudhishithir. Seving the arties of elephants falling on hini, Bliimson lichol his lips like a lion and taking np his buge maco, jumpat down fioun bl. chauct and terrifirdt your arties The elephant ridera ca Bhimsen mince in land (30 and surrounded bin on all sides. Surrounded by those liugo ole,lants Bhimisen lophed [4832] Mahabharat છે” ॥ ३२ ॥ महाजालमतुल भातरि सन्ततम् । तेभ्य माना पालिनी भीमसेनेन तिनः ।। ३३ ॥ आसनादं से चमुगान्तो अलदा व बहुधा दारितश्चैव पिगणेस्तष वन्तिभिः ॥ ३४ ॥ फुल्लाशोफ निमः पार्थ शुशुभेरणमूर्धनि । विषाणे दन्तिन गृध निजिमाकरोत् । ३५४ विषाणेन च सेनेव कुम्भस्याहत्यदन्तिनम् । पातयामास समरे दण्डहस्त इवान्तकः ॥ ३६॥ शोषिताकांगदा विभन्दू मेदोमना कृतानि । जाबर शोशितेन सहरन प्रत्यहश्रत ॥ ३॥ एव ते मध्यमानांच इतशेयामहागजाः मादत दिशो राजन विनन कंवलम् ॥ ३८ ॥ यद्भिर्म पानागः समतादरत । दुर्योधन घल सर्व पुनरासीतपरामुखम् ॥ ३९ ॥ इतिश्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि संकुलयुद्धे प्रयधिकशततमोऽध्यायः ॥ १० ॥ जालमें वर्तमान होकर सूर्य शोभित होता और पीर बीमसेनने अपनी गदास हाधियोंकी सेना को ऐसे पृथक् २ करदिया कि व यु बड़े और प्रारुप फैले इए पादलों के गालों को पृथक् २ करता है उस महाबली भीमसेन से पायत्त बादलों के समान गर्नाले हाथियों ने पीडायुक्त शब्द किये और हाथियो के दांतों से बहुत पागल हुआ भीमसेन रणभूमि में फेल हुए अशोकके समान शोभित हुधा फिर दाशीको दानपर से पकड़कर बिना दांत कर देगा मेर-उती दांत से साधी के मुखको घायल करके रणभूामे में गिराया उस समय मृत्यु समान दण्डू हाय में लिये गस्तकों की परवी से शोभिन रुधिर भरे देह से घिर में डूबी हुई "गदाका घाण पारनेवाला भीमसेन रुद्र के समान दृष्ट पड़ा इस रीति से सब हाथी गारेगये और मरने से बचेपचाये बड़े हाथी अपनीदी सेना को दवाते मर्दन करते इधर उपरको भागगये उन चारों. और को भागते हुए उनबड़े २ हाधियों के कारण से दुर्योधनकी सबमैना मुख फेरगई ३१ ।। glur.vus lthe thio aun surrounded by clouds. With his mace be dir prorud 110a-my of elephants as the wind disporses the clouds Woundol by nights Briusca the deplinnty thunde ing hilo ciouds uttered sh uis of thstress; and exceedingly wounded by crphants, Bhimer Looked beutiful lihe the a-lion tro. Ho pu' zł wat el terrh of tie cl plants and felled them in the field of lattle with the bodo Le tusha Holding the latal stuff in hund, stained with the tott hends, with his brly and mens roskio, in biosi, B1.04 Img mille Rudra Tlus norrly rdl tho el plan & sare sla n, s hile that starts ! luegre one, Bul hitlop and thiti'r crushin; ther und "?VIEW and with ilsa o lupo c'epliants al die armiy ni Daryodtan turned lock" 39.

भीष्मपर्व Bhishma Parv [48331 सम्जय उवाच । मध्यदिने: महाराज संग्राम समपद्यत लोकक्षयरो रोदो भोमस्य सह सोमः। ॥ गांगेयो रयिनों में पांडपागामनीकिनीम व्यधनि शिवागः शतशोथसइसंशः ॥ २॥ संममईच तदन्यं पिताश्वतत्तय । घाना मिबज़नानां प्रकरंगोगणाइव ॥ ३ ॥ध्रुटयुम्नः शिखण्डोच घिराटी पदस्तया । भीम मसाय समरे सजन महारयम एयुम्नं ततो विभ्या विराटच शरत्रिमिः । उपदस्य च नारायं प्रेषयामास भारत .॥ ५॥ तेनविमा महेष्वासा भीष्मेणा मित्र फर्पिणा चुर्धाधुः समरेराजन पादस्पृष्टापोरगाः ॥ ६ ॥ शिसडीतं च विम्याघ भरता मपितामह । खोमयं मनसाध्यात्वा नास्पाहरदच्युत । युम्मस्तु समरेकोधे नाग्निरिवलन् । पितामहं त्रिनिर्वाणांड्वोदसि वार्पयत ।। ८॥ दुपदः पन्यविश अध्याय १०४॥ सजय बोले कि हे रामा मध्याह्न के समय सोमकोंसे भीष्मजी का युद्ध पर्चमान हुआ वह महायोग युद्ध लोकों के नाशका करने वाला भयंकर रूप था. थियों में श्रेष्ठ गंगापुत्र भीष्मजी ने अपने साक्ष्ण वाणों से पांडवों की हजारो सेनाओं को तितिरागिरि कर दिया और पेसा मर्दन किया जैसे किलों का समूह बहुत से कटेहुए नाज के देरको करदेता है, प्रद्युम्न शिखराठी विराट् औ दुपद ने युद्ध में महारथी भीष्मको पाकर वाणों से पायल कर दिया.इस के पाठ भीष्म ने धृष्टयुम्न को घायल कर तीन वाणों से विराट को व्यथित करते हुए द्रुपद के ऊपर नागचको चलाया । ५। तब तो उसमीम से घायल शत्रुहन्ना बड़े धनुषधारी चरण से छुये हुए सर्वरूपाधयुक्त शिखण्डी ने उस भरतपेशियों के पितामह -भोप्मंत्री कोपायल किया और अपने उकोत्रीसध्यान करके इसपर महार नहीं किया फिर कोष रूप धृष्टद्युम्न ने अपने तीन वाणों से 'पितामहकी छाती और भुनामों पर पायन किया 'मुपद ने पञ्चास पाणसे विराट ने दश वाणों से और शिखएडीने CHAPTER CIV " At midday," Seid Sanjaya to Dhritrashtra, . fought against the Somaks. That severe battle was destructivo.of the world and dreadful in the extreme. Ganga's son Bhishm the best of charioteers dispersed tholisands of the Pandav charioteers with bis sharp arrows and trampled them down as n bord of oxen does n heap of cut cora. Dhrishtadyumna, Shikbandi, Virat and Drupad | met brare -Bh.shm.in.bsttle and wounded him with.their arTORS Having wounded Diishtadyumn, Bhishm. piercod Virat with three arrows and discharged an arrok-et Drupad, 5. Wonndod ly Bhishim Slikhandi the great archer and destroyer of foor, opruged like a serport trodden inder.foot, rounded Bhishm the grandfather of the Bharate; but the invincile one, knowing hiın:to te a rodian, did not discharge at him his weapons in return. Then Dari-btadyumn, ut Bhishm -- Issi] Alah ibliarat (४८३४), स्या विराटोदशनि शरः। शिग्नंहीपर रिंशत्या,मीणविन्याधसायों । ९ ॥ सौति विद्धो महाराज शोणितीयपरिप्लुतः । वसन्ते पुष्पशवलो रक्ताशोक यावभौ ॥१०॥ तान् प्रत्यविध्यद गाद्नेयस्त्रिभिविभिजिह्मगैः । द्वादस्य च भल्लेन धनुचिच्छेदमा. रिश ॥११॥ सोन्यत्या कमादाय भीम विव्याध पञ्चभिः। सारथिञ्च प्रिभिर्माण निशिनरपर्धनि ॥ १२ ॥ तथा भीमो महाराज द्रौपद्याः पञ्चचात्मजाः । फेफया प्रातर पञ्च सात्यक्षिधेव सात्वतः ॥ १३ ॥ सायदवन्त गाङ्गेयं युधिष्ठिरपुरोगमाः । रिरक्षियरत' पाञ्चाल्यं धृष्टद्युम्नपुरोगमा ॥ १४ ॥ तर्थव तायकाः सर्व भीमर हार्य मुद्यताः । प्रत्युधयुः पाण्डुसेनां सहसैयानराधिर ॥ १५॥ तत्रासीत् सुमहयुद्ध तव तेषाञ्च संकुलम् । नरावरयनागानां यमराष्ट्रनियर्धनम् ॥ १६ ॥ रथी रथिनमा साध प्राहिणाधमसादनम् । तथेतरान् ममासाद्य नरनागाश्वसादिनः ॥ १७ ॥ अनयन् पच्चीम शायकों से भीष्मजी को घायल किया, फिर अत्यन्त घायल रुधिर भरे शरीरसे वह पितामह ऐसे शोभायमान हुए जैसे कि वमन्तऋतु में फूला हुआ लाल अशोक होता है । १० । इसके पीछे गंगापुत्र भीष्मजीने सीधे चलने वाले तीन । माणों से उन सबको घायल किया और भल्ल से द्रुपद के धनुष को काटा, फिर दुपद ने दुमरे धनुष को लेकर पांच पाणों से उनके शिरको घायल किया और अत्यन्त तीक्ष्ण तीन वाणों से मारपी को व्यषित किया, इसी प्रकार मे भीमसन व द्रौपदी के पांचों भाई केकय व यादव सात्यकी जिन में अग्रगामी गुधिष्ठिर ये और पांचाल जिनका अग्रगामी धृष्टद्युम्न था रक्षा पूर्वक यह सब लोग भीष्मजी के सम्मुख दौड़े। १५ । हे राजा इसी प्रकार से आप के शरीर भीष्मनीकी रक्षा के लिये उपाय करने वाली सेनाओं समेत पांडवी सेनाके सम्मुख गये वहां भापके मार पांडवोंके मनुष्य घोड़े हाथी सगार और रथोंका पड़ा मारी युद्ध हुआ वहयुद्ध much odragod, wounded Bluishını in the least and arms with three Drupund wounded liim with twentyfive anois, t'hat with ten and Shih handi rith trentyfira, Aluch Founded and reeking in blood, the grandfather looked glorious libe the blonining ashok treo in Spring. 10. Thon Bhishin the son of Ganga wounda thou with three nrrows mach and ent down the box of Drupad with one. Tabing up another bow, Drupad woun led him in the head sith fire sharp arroirs and with tlırco mor nnors of excecling sharpness sound med his drives Iitha simu mur. Bhinseir, tholico 60118 of Draupadi, t'e five Kailnya bot'rass and Satynki l!io Yndnv, all lol lg Yudliisitlir, and the Panchal leadlol ly Dhrislila lyumn, well pratictru, rosliai ngainst Bhislım. 13. In the snrno manner,Oking. your wa-riors with the nomics, trying to protect Bhiclım, pneuntemi the Pan'ay armice. Your incn ard those of this Pandun*, 1.0inted on lierror, Ire! ante arddhtints, fought try Imsdy. Tint battle arrowa (४८३५) भीष्मपर्व Bhishna Pary [4835] परलोकाय शरी: सन्नतपर्वमिः । शरश्च घिधिोरस्ता राम विशाम्पते ॥ १८॥ रथास्तु रधिभिहींना इतसारययस्तथा । यिप्रदुताश्च समरे दिशा जग्मुः समन्ततः९९६ मृद्नंतस्तैगरानुराजन् हयांच.सुवहूनुरणे । वातायमानादृश्यन्ते गन्धर्वनगरोपमाः २० रधिनत्र रथहीना धर्मिणस्तेजसा युताः । कुण्डलोपणीपिणः स निष्काइदधिभूपणाः ॥ २१ ॥ देवपुत्रसमाः सर्वे शौर्य शमसमा युधि । ऋदया पैश्रवणश्चाति नयेनच वृहस्पतिम् ॥ १२ ॥ सर्व लोकेश्वराः शूरास्तत्र तत्र विशाम्पते । विप्रदुता व्यरश्यन्त प्राकृताइव मानवाः ॥ २३ ॥ दन्तिनदच नरश्रेष्ट हीनाः परमसादभिः । मृदनन्तः स्वान्यनीकानि निपेतुः सर्पगन्दगाः ॥ २४ ॥ धर्मभिधामभित्री पताकाभिधमारिए । छत्रः सितमदण्डेश्वासरेय समन्तत ॥५.विशीर्णर्विप्रधावन्तो दृश्यन्तेस्मदिशोदश । भी यमराजके पुरकी रद्धिका करने वाला था नहां रथीने रयी को यमलोकमें भेजा और अन्य मनुष्योंने साथी घोड़े और रथों को सम्मुख पाकर, गुप्त ग्रन्धीवाले वाणों से परलोक को पहुँचाया हे राजा जहां तदा नाना प्रकारके घोरवागोस रथी रथोंसे हान हुरजा सारथी भी मारेगये तत्र चारों गोर को भागगये हे राजा युद्धमें गंवर्य नगरके समान बहुत ते घोड़े मनुष्योंको बूदते मईन करते भागते हुए पड़े । २० । और रथी रधियोंस दीन कवचधाग और तेजयुक्त कुंडल महालाण और वानूबन्द मादि भूपण धारी, सर देवकुमारों के समान ओर युदमें वलसे इन्द्र के समान धनसे कुर को और चित्तसे यहस्पति को भी उल्लंघन करने वाले, सब संसारके शूरवीर- राजा जहां तहां मे भागे हुए दृष्टपड़े जैसे कि साधारण मनुष्ण होते हैं, हे नरोत्तम हाथी अपने श्रेष्ठ सवारों से हीन अपनी सेनाओं को मर्दन करते हुए सब शब्दों के पीछे चलने वाले दौड़े, हे श्रा हाल चमर पताका सुन्दर मुनहरी दण्डवाले क्षत्रा- दिक । २६ । चारों ओर भागे हुवों के साथ देशों दिशाओं को दौड़नेहुए दृष्टपड़े mused much increase in the population of tho rogion of Yam. Chariot cers sont charioteers to the abode of Yam and others, cncountoring elophants, horses and chariots, sent them to the other world. With dreadful arrows of difforent sorts the charioteers were deprived of chariots and drivers and ran away in all directions. As in the city of gandbořvas, niany liorses were to be seen running and trampling men.20. Charioteors, destitute of chariots, decked with armours, bright carriags, tui bans, arrows, armlets and other ornaments, lilo the soos of gods, full of prowess lil.c Indra, iyealthier than Kuyer and more inagnanimous-minded than ,Vrihaspati, the warriors and princes of tho world woru seen running hithor and thither l'hc ordinary The clephants, o lest of men, deprived of their riders ran away slıricking and trampling their own men. Shield3,. Ay flappers, bannors and shades with golden handles were ecen as il randing along with those who fled. Elopiliuits huge as tlouds, were seen as mon.

. 48361 Mahabharut (४८३६) मवषप्रतीकाशा जलदोपानि स्वना ।। २६ ॥ तथैवदन्तिभिहींना गजारोदा विशा म्पते । प्रधावन्तो न्वरश्यन्त तव तेान्य सकुले ॥ २७ ॥ मानादेशमुत्याध तुरगावहे मभूपितान् । यातायागनद्राक्ष शतशोपसहनश ॥ २८ ॥ अश्वारोहान् इतरवर्ग हीतासीन समन्तत द्रियमाणानपश्याम द्राव्यमाणांश्च संयुगे ॥ २९ ॥ गो गज समासाय द्रयमाण महाइवे । ययौप्रमृय तरसायादातान् पालिनस्तथा ॥३०॥ तथैव घ रयान राजन् प्रममईरणे गज । रथाच समासाद्य पतितास्तुरगान भुषि ॥३१॥ ध्यमृहमन् समरे रामस्तुरङ्गादच नरानणे । एष ते बहुधा गजन् प्रत्यमृत्नन् परस्परम ॥ ३२ ॥ सस्मिन् गद्र तथा युये पर्चमाने महामये । प्रावर्चत नदी घोरा शोणिता प्रतरङ्गिणी ॥ ३३॥ मस्थिसंघातसम्बाधा केशरीवलशाहला । रसदा शरापत्ताश्य मीना दुरासदा ॥३॥ शोर्शपलसमाकीर्णा इस्तिमाहसमाकुला। कवयोगीपफेनीया बादलके रूप हाथी धन कीसी गर्जना करने वाले विदितहुए, हेराजा इसी प्रकार अस तुमुल युद्धमें आपके और पांडवों के हाथियों के सवार हाथियों से गहित दौड़ते दृष्टिगोचर हुए, नानामगार के देशों में उत्पन्न होने वाले मुणित भूपणों से अलंकृत हजारों घोड़ों को भी भागता हुआ देखा, घोड़ों के मरने से चारों ओर को हाथ में खड्ग लिये भागतेहुए ये टोंके सवारों को देखा, उती बड़े युद्ध में भागतहुए हाथी को पाकर हावी वडी तत्रिता-युक्त पदातियों को भौर घोड़ों को भर्दन करता इशा गपा ३० इमी प्रकार हाथीने रथियों को और पृथ्वी पर पड़े हुए थी और घोड़ोको पाकर घोड़ों ने मनुष्पों को मई । किया और बहुतसोने परस्पर में मान किया इस प्रकार उस भयानक युद्ध में रुधिर की महा भयंकर नदीभी वर्तमान देखी खहम रास गरे हुए केशरूप शेलाल रयरूपहद पाणकप चक घोड़े रूप मठाले. पारपाली दुप्पय शिररूप पत्यरोत व्यायी रूप ग्राहोंसे न्याकुल और कपच महल रूपके फेनाले भरी धनुप रूप धेग खड्ग रूपी कछए रखने वाली, rundig slouge will tiose who ard E opnaaty, huge as clouds, wero Buen seampu ng y thu choir thuader like streks In the samo manner, Oking the ek planc riders belonging to Loth tko arnies, Horse 2] running away without thetr elephants Decked with ornaments of diferent soita thousands of horses of different countries were to le Eeen 6-2 npenis in all d ruckus, Tle kortemen with swords in thor hirndo we o to lo ern Turmg alay without ho ses. Llephants were to b_ 9 tranging done the thorse and loa: 30 In the amo svann r, the elephants trampled down the chariots, ho cherats | crushed tho horses and the horso3 cruglied those on suota Oliers crushed one another producing a dreallul rnrar tf blond on the 511 That raer, full of *no ds, having basr for its needs, charsots for its pools arrors for oddies,horzor for f sh, rare heads for stones,elephante for crocodiles arm ours and turlane for foam, bons for tortont, awards - भीष्मपर्व Bhushala Pary [4837] घनुगासिकपा३५॥ पतारामजसाण मयफूलापहारिणी। कन्यादहम सकीर्णा यमराविवर्धनी ॥ ३६॥ तां नदी क्षत्रिया भूरा रपनागहयहये । प्रते सर्वत्यो राजन् मयं त्यक्ता महारथाः ॥३७॥ अपोवाहरणे भीमन् कश्मलेनामि सहतान् । यथा वैतरणीप्रेतान प्रेतराजपुर प्रति ॥ ३८ ॥ प्राक्रोशन-क्षत्रियास्तत्र रदया वहशस मदत । दुर्योधनापरावेन गच्छन्ति क्षत्रिया क्षयम् ॥ ३९ ॥ गुणवरसु क्य द्वेष धृतराष्टी जनावर । कृतरान् पाण्डुपुत्रेषु पापात्मा लोममोहित ॥४०॥ एवघा विधावाच ध्यन्तेष्म परम्परम । पाण्डवातघसंयुक्ता पुत्राणा ते सुदारुणा ॥ १ ॥ ता निशम्य ततो पाच सर्व योध रुदाहता भागस्कृत सर्व लोकस्य पुत्री दुरपोधनत्तम ॥ ४२ ॥ भीष्मद्रोण पञ्चव शल्यचोवाच भारत ! युध्यध्वगनहरा' फि चिर पुष्पेति च ॥४३ ॥ तन प्रववृते युद्धं कुरूणांपाण्डवै सह । अजयतहत पताका वजा रूप वृत्तों से संयुक्त मृत्यरूपी किनारे रखनेवाली नाशकारी माप भी राक्षस रूप हंसों से युक्त नदी यमराज के देशकी अत्यन्त बहाने पालीथी।३०॥ दे गनाडे र सूरवीर महारथी क्षत्रियों ने भय को त्यागकर यहाथी पोटे रूप नौवाम गरा उसनदी को तरा, युद्धर्मे भयभीत मूछीवान मनुष्यों को ऐसेदूर पहुँचाया जणी नदी प्रेतराजके पुरमेंमेतोंको पहुँचाती है, वहां क्षत्रीलोग उसनही परको कर पुकारे कि दुग्योधन के अपराधसे क्षत्री लोगों का नाश होता, , पापात्मा लोनी राजा धृतराष्ट्रने गुणवान पांडवों से कैसे शभुता करी।४॥ इस प्रकार परियों की प्रशंमा से भरेहुए भापके पुत्रों समेत सेना के अनेक प्रकार के भयानक शन्द परस्पर में मुनेगये, इसके पीछ सवमंसारका अपराधी आपकापुत्र दुर्योधन उन शवीरों के कहेहए वचनोंको मुनकर. भीम द्रोणाचार्य कृपाचार्य शल्य इत्यादि में पोलावि आपलोग अहंकार को त्यागकर युद्ध करो विलम्बक्यों करतेहो, इसकेपछि पाया और कौरवोंका महाघोर भयानक युद्धनारी हुमा, रे fur tu to se budno a lor tr.04, Death for its banks and destructro canpıbal ral slia es for its $15 a 14, augmented the population of Fam's fvode 35 lughty warriors casting aside fear, crossed that river through the boats of elephants and chariots, and cast anay the terrified and the fainting for an ay Ag tho Bartosnı does the dead in the region of Yam, Seeing that great destruction, the Warriors cried out, "Kshatryas are being destroyed for the fault of Duryodhan What enmity has the sinful and ararıcious Dhritrashtra contracted with tho Pandayas?" 40. Thus eulogising the Pandavas and blaming your nons, tho cries of your warriors wero heard on all sides. Then the culprit of the whole world, jour sur Duryodhan, hearing those words of his warriors, addressed Bhishm, Dronacharya, Kripacharya, Shalya and others, saying, "Fight sithout selfishness Why do yon delay!" Then there was a severa figlit between the Kauravy and [4838] Mahabharat (४८३८) राजन् सुघोरं वैशसं तदा ॥४४॥ यत्पुरा न निगृह्णासिंधार्यमाणो महात्मभिः । चित्रवीर्य तस्येदं फलं पश्यमुदारुणम् ॥ ४५ ॥ न हि पाण्डुसुता राजन ससन्याः सपदानुगाः । रक्षन्ति समरे प्राणान् कौरवाचापि संयुगे ॥ ४६॥ एतस्मात् कारणा दोरो पर्तते स्वजनक्षयः । वैवाद्वा पुरुषव्याघ्र तप चापनयानप ॥४७॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपधपणि सहकुलपुदे चतुरधिकशतोऽध्यायः ॥ १०४ ॥ सञ्जय उवाच । अर्जुनस्तान नरव्यामःमुशर्मानुचरान्नपार । मनपत् प्रेतराजस्व सदनं साय. शितैः॥१॥ सुशर्मापि ततो वाण. पार्थ विध्याध संयुगे । षासुदेषञ्च सतत्या पार्यञ्च नवाभिः पुनः ॥ १ ॥ तन्निवार्य शरीघेण शकसूनुर्भहारयः । सुशर्म णो रणे योधान् प्राहिणोद्यमसादनम् ॥३॥ ते यध्यमाना. पार्थेन कालेनेष युगक्षये । विचित्र वीर्य के पुत्रजोपूर्व समय में महात्माओं के कहने को तुमने नहीं माना उसी का यह महाभयकारी फल तुम देखो हे राभा पांडतोष सेना और सायके चलने पालों समेत अपने प्राणों की रक्षा नहीं करने और कौरव लोगभी अपने प्राणों की रक्षा नहीं करतहै, हे पुरुषोतम धृतराष्ट्र इनहेतु से राषित होता है कि यातो देव की इच्छा से अथवा आपके अन्याय में गनुष्यों का भयकारी और प्रलय रूपी नाश पर्तमानहै ४७ ॥ अध्याय २०५॥ संजय बोले कि पुरुषोत्तम अर्जुन ने मुशर्मा के पीछे चलनेवाले उन राजाभों को तीक्ष्ण वाणों से प्रेतराज के पुरको पहुंचाया, इस के पीछे मुशर्मा ने अर्जुन को घाणों से घायल करके वासुदेव जी को सत्तर वाणों से और भर्जुन को नौ वाणों से घायल किया तब इन्द्र के पुत्र महारथी भर्जुन ने अपने बाणों से उनको रोककर मुशर्मा के शूरवीरों को यमलोक में भेजा, हे राना जैसे कि . the Pandavas Son of Vichitraviryal you paid no attontion to the prophecy of great men and therefore you see this dreadful fruit. The Pandavas with their armies and followers, O sing, donot care for their lives nor do the Kauravas care. Thus it is seen, 0 best of men, that this destruction like that of pralaya is raging on either sida through the will of God or through your injustice." 47. CHAPTER CV Best of mon, ," said Sanjaya to Dbritrashtra,' with his sharp arrows Arjun sent the attendant warriors of Susharma to the region of Yam Susharma wonded Arjun with nine arrows and Shree Krisbn with devanty. Toen brave Arjun the son of Ipdra, having cheched him with his arrows sont his followers to the region of Yam. Like thoso .

- (४८३९), भीष्मपर्व Bhishma Pary [4839] पद्रवन्त रणे राजन् भये जाते महारयाः ॥ ४ ॥ उत्सृज्य तुरगान फेचित् रयान् कच्चि मारिय। गजानन्ये समुत्सृज्य माद्रयन्त दिशो दश।। ५॥ अपरे तु तदा दाय वाजिनागरयात्रणे । स्वरया परया युका प्रादयन्त विशाम्पते ॥६॥ पादाताधापि शस्त्राणि समुत्सृज्य महारणे निरपेक्षाय्यधावन्त तेन तेनस्म भारत ॥७॥ वाय॑माणाः सुबशस्त्रगन सुशर्मणा। तथान्यः पार्थिवश्रेष्ठेनं व्यतिष्ठन्त संयुगे ॥८॥ तवलं प्रदुतं दृया पुत्रो दुर्योधनस्तव । पुरस्कृत्य रणे भीमं सर्वसैन्यपुरस्कृतः ॥ ९ ॥ सर्वोद्योगत महता धनम्जयमुपाद्रवत् । त्रिगाधिपतेरथें जीवितस्य विशागते॥१०॥सएफ समरे तस्पी फिरन् घविधान शरान् । मातृभिः सहितः सः शेषाहि प्रद्रुना नराः॥ ११ ॥ तथैव पाण्उया राजन सर्वोद्योगेन दशिताः । प्रययुः फाल्गुनार्थाय यत्रभीष्माव्यतिष्ठत ॥ १२ ॥ ज्ञापमानारगे घाय्य घोर गाण्डीयधन्वन हाहाकारकृतोत्साहा भीमजग्मुः युगके अन्त में काल से प्रेरित लोग होते हैं इनी प्रकार अर्जुन से घायल हुए वई महारथी युद्ध में भयभीत होकर कोई तो घोड़ों को त्यागकर कोई रथ कोई हाथियों को त्यागार दशौं दिशाओं में भागे । ५। और कोई शूर स्थ घोड़े भार हाथीकोही लेकरयड़ी शामतामेभागे, और पढ़ातीलोग भी उम युद्ध में शत्रों को त्यागकर अनिच्छायान् होकर जहां तहां मे भागे, उससमय मुशर्मा मनसे हारकर निगर्त के राजा और अन्य बहुत से राम रामाओं के रोकने से नहीं रुकसका तब भापका पुत्र दुर्योधन गेना समेत जन शूरवीरों को भागता हुआ देखकर युद्ध में भीष्मनी को आगे करके सर सेना के आगे बड़े उपायों समेन राजा त्रिगर्त के जीवन के लिये अर्जुन के सम्मुख गया।१०।हेराना वह युद्धमें अनेक प्रकारकेवाणों की वपी करता हुआ सप भाइयों समेत युद्ध में वर्तमान रहा और शेप सब मनुष्य भागगये, हे राजा इसीप्रकारसे पारडय लोग भी सब उपायों समेत अर्जुन के लिये कयर वान धारण किये वहांगये जहांपरकि भाप्मनी नियतथे, यह सब वीरगांडील who nro actuated by Death at the end of the sug, those warrion terrified in battle, ran bither and thither laving their borses, chariots and elephants. 5. Some of the warriors ratu atay wita' their cha. riots, horses and elophants. The foot soldiers too, leaving their arms in the Cold of battle, lort their courage and ran away in all directions, Then Susharma lost heart and ran away in spite of the chcoking of Trignrt and other warriors. Then your son Duryodban, sering the flight of those warriors hastened with a large army led by Bhishma to the rescue of the king of Trigart and encountered Arjun. 10. Show. erinz their arrows of different sorts, Duryodhan and his brothers stood firmly in the field of battle. The Pandavas too, in the same manner, armed with weapons and ardiour, went there to help Arjun ayniost Bhishm. All these Farriors KDow the protes3 of Arjun tho (१८८३) . भीष्मपर्ष Bhishna Parv [4841] | नवमिः दरिः ॥ २१॥ ननाद बलयोना सौभद्रः परवीरदा । हतास्थातु रयापूर्ण सा पकृत्य महारयः ॥२२॥ भाररांह रथ पूर्ण दुखस्य पिशाम्पते। द्रोणेशापार भित्या शरे समतपभिः॥२३॥ सारथिन्चास्य विम्याथ रखरमाणः पराक्रमी पीयमानस्त तो राजा द्रुपदो याहिनीमुने ।। २४ । अपायाजधनैरथैः पूर्वधरमनुस्मरन् । भीमसेन- पतु राजानं महादिव पाहिलफम् ॥२५॥ व्यश्वस्तरपं धने सर्वसम्यम्प पश्यतः । ससम्ममा महाराज सायं परमं गन ॥ २६ ॥ अघप्लुत्य ततो पाहावाहलीकः पुरुषो- उमः भायरोह रय तूण लक्ष्मणस्य महारणे ॥२७॥ सात्यकि रतधर्माण धारयित्वा महारणे । शरबहुविध राजन्नाससाद पितामहम् । स विध्या भारत पट्या निशितलों मवादिभिः । नृत्यनियरथोपस्ये विचुन्यानोमहवनुः२९तस्यायसामहाशक्ति विक्षेपाय को मारकर बड़े बैग से गर्ना इस के पीछे यह महारथी चित्रसेन मृतक घोड़ों के रथ से शीघही कूदकर दुर्मुख के रथ पर सवार हुमा फिर शीघ्रताकरने वाले पराक्रमी द्रोणाचार्य ने दुपद को गुमप्रन्यी वाले वाणों से घायल करके उसके सारथी को भी घायन किया फिर सेना मुलएर पाडामान रागा दुपद पूर्व शत्रुता को स्मरण करके- बहे, शीघ्रगामी. घोड़ों के द्वारा युद्ध से हट गया. फिर भीमसेन ने एक मुहूर्त में सथ सेना के देखते हुए राना बालीक को घोड़े रय और सारथी से राहत कर दिया ।२५। तदनन्तर पुरुषोत्तम वाइलीक बारी से उतरकर व्याकुल होके महा मन्देह युक्त-हुमा, और शीघ्रही लक्ष्मण के श्य परसारहोगया और मात्यकी ने- कृतवर्मा को हटाकर वहुतसे वाणों के द्वारा पितामह को पाया और तीक्ष्ण साठ वाणों से उनको घायल कर बड़े धनुष को कंपाता हुआ रय में वैठाहुमा नावता सादृट पड़ा फिर पिनामहने मनहरी बड़ी विचित्र वेगवान नाग कन्या के समान शुभ सोहे की बड़ीभारी शक्ति को उस के ऊपरफेंका उस मृत्युके Toared a tremendous roar. Then brave warrior Chitrusen jumped down from the chariot of which tlie horses were dead and mounted that of Durmukh. Then Valliant Dronacharya of great swiſtoogs, having wounded Drupad with his arron's having hidden knots, trounded the driver of his chariot. Being thus rounded, Prisco Drupad the combinador of the arroy, remembering bis former enmity, batook himself froin the field of battle by means of his swift horsos Then Blimsen, within sight of all, deprived king Vahlık of horses, chariot and driver in & moment 25. Vahlik the bast of men alighted from his carriage and in a stato of great anxiety mounted the chart of Lslobman. Satynki pushed Kritvarma eside and shorored liis arrown at the grandfather. Having wounded bim with sixty arrous, ho was seen shaking his bow and lookord as if danciug on his seat in the chariot Then the grandfather hurled at him a golden spear of Fonderful sharpness like the daughter of. & Naga, made of good . .

4840] Mababboiat (४८४०) समन्तत ॥ १३ ॥ ततस्तालाब शूर पाण्यानां रूथिनीर । छादयामास समरे शर. समतपर्वभि ॥ १४ ॥ एकीभूतास्तत सर्वे कुरव सह पाण्डवै । अयुध्यन्स' महाराज मध्य प्राप्ते दिवाकरे ॥ १५॥ सात्यकि कृतवर्माण विभ्या पायमिरायगे । अतिदाहये शूर किरन वाणान् सहसूश ॥ १६ ॥ तथैथ छुपदो राजा दोण विध्या शित शरे । पुनर्विव्याध सप्तत्या सारधिन्चास्य पश्चमि ॥१७॥ भीमसनस्तु राजान पाइलाफ प्रपितामहम् । विश्वानदन्महानाद शादार फागने ॥ १८६ मा निभित्र सेनेन घिद्धो यहुभिराशगै । प्रतिष्ठदाहपशूर किरन याणान् सहसा १९ ॥ मित्रसेन त्रिभिषांणैर्षिशाध समर भृशम् । समागतातीत र मदाम भी व्यरोयताम ॥ २२ ॥ यथादिवि महाघोरी राजन युधशनैश्वरी । तस्याबायतुरा हन्या सूतञ्च | धनुषधारी के युद्ध में पराक्रम को जानते और हाहाकार से उत्पाद को न रखनेवाले चारों ओर से भीष्मनी के मम्मुख गये फिर ताल दन भीमनी ने गुप्तप्रन्यी के वाणों से पांचों की सेना को ढक दिया, हे राज इस पीछे प्राकाश के मध्यवर्ती सूर्य के होने पर सब कौरव और पांडवों में एकत्र होकर युद्ध पारम्भ हुआ । १५ । सात्यकी वार कृतवर्मा को पांच जना से घायल करके इनारों पाश छोइता मा युद्ध में नियत हुमा इसी प्रकार राजा गुण ने द्रोणा चार्य जी को तीक्ष्ण बाणों से घायल करके फिर सत्तर दागों से घायल किया और पांच वाणी से उनके साथी को व्यथित किया. फिर भीमसेन ना धार लीक और पितामह को घायल करके ऐसी महागर्जना से गर्ना जैसे विनम मिहं गर्जवा हे चित्ररोज के बहुत वाणों से घायल भभिमन्यु ने युद्ध में चित्रसेन को सान पाणों से अत्यन्त घायल किया फिर युद्ध में भिड़े हुए यह दोनों बड़े शरीर वाले ऐसे शोभायमान हुए जैसे कि आकाश में बडे घोर युध और शनेश्चर शोभित होये हैं। २० । अनुहन्ता अभिमन्यु नौ बाणों से सूत समेत उसके चारों पोड़ों Wellor of the Gandır and bath no artifical courage opposed Bhislim yho with big l»unor of palm tiro covered the Pandur armies under the shower of luis actu#9 having luddon knots. When the sun had rezclied the middle of the sky Okug the butt o began between the Kagravas art the Pandas ag 15 Valliant Satyakı having wounded Rritrarma vith five a rons stood in the field of battle discharging thousands of anong in the same ni mpner Drupad #ounded Lions charya ngain and aguun witli seven y arruva and 1114 coachman with five. Faring suundel king balitch on the grandfather, Bhini ronred a loud roar 29 & lion dous 10 & fo est Wounded by many ATOWA of Chitresen Ad km stigu excoedingly wounded bim sth threo aroms Tagagal un fighting the tro Warriors of huge bodies looked liko mylite Balh and Satu n in tle sty 20 Haying billed Ius for horse and tho conchminn Tith nine arron 8, Aboy (४८४१) भीमप Bhishma Pary [4641] नयमितरः ॥२१॥ मनाद वलयाग्नाद सौभद्रः परवीरहा । हताश्या रयातर्ण सा पत्य महारय ।।२२॥ भाररोह रथ पूर्ण पुनस्य पिशाम्पते। द्रोणेशाप मिरया शरे समतपवमिः॥१३॥ सारथिम्चास्य विव्याध खरमाणः पराममी । पीपमानस तो राजा द्रुपदो घाहिनीमुने ॥ २४ ॥ सपायाज्जयनेरदयः पूर्वपरमनुस्मरल भीमसेन तु राजाने मुत्तदिव याहिलयाम् ॥ २५॥ व्यश्वस्तरयं बने सयमग्यस्य पश्यतः । सप्तम्भ्रमो महाराज सायं परमं गतः ॥ २६ ॥ अयप्रय ततो पाहावाहलीका पुरुषो. तमः | भाररोह रथ पूर्ण लदमणस्य महारणे ॥२७॥ सात्यकि मायमर्माण पारपित्या महारणे । सर्वहुविध राजन्नाससाद पितामहम् । स विध्या गारतं पश्या निशितैलो. मयादिभिः । नृत्यनियरयोपस्थे विन्यानो महमनुः२९तस्यायसामहाशक्ति विक्षेपाय को मारकर बड़े वेग से गर्मा इस के पीछे वह महारथी चित्रसेन पृतक योगों के रथ से शीघही कूदकर दुर्मुख के रथ पर सवार हुमा फिर शीघ्रताकरने वाले पराक्रमी द्रोणाचार्य ने ग्रुपद को गुमग्रन्या वाले वाणों से घायल करके उसके सारथी को भी घायन किया, फिर सेना मुबंपर पाडामान रागा द्रुपद पूर्च शत्रुता को स्मरण करके बड़े, शीघ्रगामी घोड़ों के द्वारा युद्ध से हट गया. फिर भीमसेन ने एक मुहून में सत्र सेना के देखते हुए राजा बालीक को पोड़े रय और सारथी से राहत कर दिया ।२५। तदनन्तर पुरुषोत्तम पालीक बारी से उतरकर व्याकुल होके महा सन्देह युक्त हुमा और शीघटी लक्ष्मण के रथ पर सवारहगया बार मात्यकी ने छतवर्मा को हटाकर वहुतसे वागों के द्वारा पितामह को पाया और तीक्ष्ण साठ वाणों से उनको घायल कर बड़े धनुष को कंपाता हुआ रय में बैठाहुमा नाचता सादृष्ट पड़ा फिर पितामहने मनहर्ग बढ़ी विचित्र वेगवान नाग कन्या के समान शुभ सोहे-की बड़ीमारी शक्ति को उस के ऊपरफेंका उस मृत्यु के roared a tremendous roar. Then bravo warrior Chitrasen jumped down from the chariot of which the horses were dead and mounted that of Durmukh. Then Valliant Dronacharya of great swiftpesa, having wounded Drupad with his arowa baring bidden Inots, wounded the driver of his chariot Being thus sounded, Princo Drupad the comdisudor of the army, remembering his former enmity. betook himself from the field of battlo by means of his swift hors03. Then Bhimson, within sight of all, deprived king Vallıh of horses, chariot and driver in & moment 25. Vahlik the best of men slighted from his carrizgo and in a state of great anxiety mounted the chariot of Lalsbman. Satyali pushed Kritvarma aside and showered liis arrows at the grandfather. Having wounded him with sixty Brrors, lio was seen shaking his bow and lookot as if dancing on his seat in the chariot Then the grandfather hurled at him & golden rrear of wonderful sharpness like the daughter of a Mnga, made, of good 14812] Nahabharat (४८४२) पितामह हेमचियां महावेगां नागकन्योपमा शुभाम् ॥ ३० ॥ तामापतन्ती सहसा मृत्युकल्पा सदुर्जयाम । व्यसयामास वार्ष्णेयो लाधमन महायशाः ॥३१॥ मनासाथ तुषाणेये शाक्त परमवारुणान्यपतवरणीपृष्ठे महोल्केव महाप्रमा! ३२॥ घाणे पस्तु ततो राजनवां शक्तिं फनकममाम् । धेगवद्गृह्य विक्षेप पितामहरयं प्रति ॥३३॥ पाणयभुजवेगेन प्रणुनासा महाहये । अभिदुद्राव वेगेन कालरात्रिर्यथा नरम् ॥ ३४ ॥ तामापतन्ती सहसा द्विधा चिच्छेद भारत । क्षुरमाभ्यां सताक्षणाभ्यां सा व्यशार्थन मेदिनीम् ॥ ३५ ॥ छित्या शक्तिन्तु गाड्नेय मात्यकि नवभिः शर आजधानोरसि क्रुद्धः प्रहसम्फर्शन-३६ तत सस्थनागाश्वाः पाण्डवा पाण्डुपुर्घजा। परियारणे भीष्म माधवत्राणकारणात् ॥ ३७॥ तत प्रयवृते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् । पाण्डवानां कुरू णाम्च समरे विजविणाम् ॥ ३८॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवयर्वणि भीष्मवाणय युद्धे पञ्चाधिकशतोऽध्यायः ॥ १०५ ।। . समान प्रास्मात् गिरती हुई शक्ति को अपने तेजसे सात्यकी ने. निष्फल करीदया 11. फिर वह शक्ती सात्यकी को न पाकर पृथ्वी पर गिरपड़ी इस के पीछ सुवर्ण के समाल अपनी वरछी को सात्यकी ने बड़ी तीव्रतासे पितामह के रथपर फेंका सात्यकीकी भुजाके वेग से वह शक्ती बड़ी तीव्रतासे उनके पास ऐसी गई नैसे कि मनुष्य के पास कालरात्रि आती है हे राजा उस अकस्मात गिरतीहुई तीव शक्तीको भीष्म जी ने तीक्ष्णचरमवाणों से दोखण्डकरके पृथ्वीपर गिरादिया फिर शत्रु सन्तापी गंगापुत्र भीष्मने उस शक्तीको तोड़ नौ वाणों से बहुत हँसतेहुए उसको छाती पर घायल किया तदनन्तर रय हाथी और घोड़ों समेत सात्यकी की रक्षा के लिये पाण्डवों ने भीष्मजी को घेर लिया फिर युद्धामिलापी पाण्डव लो. गोंका और कौरवोंका रोमहर्षणकरनेवाला महाघोर युद्ध हुआ ३८ ।। steel and very hoavy; but Satyaki by his skill inade uoless the spear falling suddenly like Death. 30. The spear fell down on earth Fithout touching Satyaki. Then Satyaki hurled with great force his golden spear at the grandfather. The spenı lerving the powerful arm of Satyaki approached hiin liko tlo biglit of Death; but Bhishm cut it down into two picces with his sharp arrows Then Bbishm tho son of Ganga, destroyer of foor, having cut it down, nounderl Ss. tynki on the breast with nino arroms smiling all the-while. Then for the protection of Satyaki t'ie Pandavas surrounded Bhishm with their chariots, eloplants and, horses and the Pandayas desirops of battlo fought a severe fight against the Kauravas " 37.

(४८४३) hraga Bhishma Pary [4843) सम्जप उपाचारधा भीमं रणे क्रुखं पापउपरमिसनम् । यथा धर्महापक सपान्ते दिषि भास्करम् ॥ १ ॥ दुर्योधनो महाराज दुशासनमभाषत । एष भूरो महेवासो भीष्म गूरनियूदम ॥ २॥ मादितः पाण्डप. शरैः समन्तागरतर्पम । सस्य फार्य त्वया धीर रक्षणं ममहात्मनः ॥॥ रक्ष्यमाणोहि समरे भीष्मीस्माकं पितामहः। निहन्यात समरे यत्तान पाचालान पाण्डपः सह ॥ ४ ॥ तत्र कार्यतमं मन्यं भीमस्ये धामिरक्षणम् । गोप्ता द्वेष महेप्यासो भीप्मास्माकमहानत ॥ ५॥ समपान सर्वसन्ये न परिचार्य पितामहम् । समर कर्म कुर्घाणं दुष्कर परिरक्षतु ॥ ६ ॥ स पयमुक्तः समरे पुत्रो दुशासनस्ताय । परिवार्य स्थितो मी सन्येन महता वृत- ७॥ ततः शतसहमाणां हयावा सुपलात्मनः । विमलपासहस्नानामृष्टितोमरधारिणाम् ॥ ८ ॥ दप्तिानां सवेशानां बलस्थानां पताकिनाम् । शिक्षितैर्युसकुशलं रुपेतानां नरोत्तमः मन्याय १०६ ॥ संजय बोले कि हे महाराग जैसे कि वर्षा ऋतुके आकाश में बादलोंमे ढके हुए सूर्य को देखते हैं इसी प्रकार युद्ध मुद्धरूप पांडवों से घिरे हुए भीष्यको देखकर दुर्योधन उस दुश्शामन से बोला कि यह बड़ा धनुपधारी शूरों का माग्ने वाला भीम चारों ओरसे बड़े वीर पांडवों से घिराहुआ है उसकी रक्षा तुमलोगों को करनी अवश्य है, क्योंकि वह हमारा पितामह भीष्म युद्ध में पांडवों समेत पांचालों को मारेगा इस स्थानपर पिम जीकी रक्षा करना ही मैंबडा काम मानता हूं यह बड़ा धनुप धारी महावत भीष्म ईमारा बड़ा भारी रक्षक है।६। सो अपनी सबसेना समेत उस कदिन युद्ध कर्मी भीमकी प्रीति से रक्षा करो इस प्रकारसे बड़े भाई की आज्ञाको मुन कर आपके पुत्र दुइशासन ने बड़ी सेना समेत भीप्मनी को चारों ओर से मध्य में करके रक्षित किया, फिर मुबलके पुत्र शकुनी ने बड़े स्वच्छ पास खड्ग तोमर पारी शुभ्रवस्रोंसे शोभित अहंकार में भरे बड़े बलवान ध्वजा धारी CHAPTER CVI Sanjayn snil, "Scolng Bhishm surrounded by the enraged Pandavas like the sun hidden by cloads, Daryadhas said to Dushagan, This great archer Bhishm the destroyer of foes is surrounded by the brava Pandavas; it is incumbont on you to protect him. Our grand. father Bhishm will slay tho Pandavas and the Panchals. The pro. tection of Bhishm is to be my highest duty at this time, for this great archər Bhishm of mighty, vots is our greatest protector. 5. Sovith all your army and love you must protect mighty Bhishm." On hearing the command of bis older brothers, pour son Dushasan eurrounded Bhishm with a large army and protected bim on all sides. Then Shakuni the sun Suval with a great mauy Warriors bearing bright swords and tomas, clad in fine clotliog, proud of proper, ban.

Mahabharat, - [4844] (४८४४) ॥९मकुलं सोयम्य धर्मराजाच पाण्डवम् । न्यधारयनरश्रेष्ठान परियार्य सम. न्ततः ॥ १०॥ ततो दुर्योधनो राजा शराणां इयसादिना । अयुतं अंपयामास पार पानी निवारणे ॥ १९ ॥ तैः प्रविमिहापंगेर्गरत्मद्भिरिवाये। खुराहता धरा राजरकम्पे एममाद च ॥ १२॥ खुरशम्दा सुमहान् घजिनां शुषे तदा । महावंशपनस्पेष वद्य मानाय पर्वते ॥ १३ ॥ उत्पतनिध तस्तत्र सद्भुतं महद्रज. । दिवाकरपथं प्य अछादयामास भाकरम् ॥ १६ ॥ धेगवद्भिई यस्तैस्तु क्षोभिना पाण्डकी धमः । निपतद्भिर्महावेगेहसरिय महत्सरः ॥ १५॥ हंपतोष शब्देन न माशायत फिश्चन। ततो युधिष्ठिरा राशर मावीपुत्री ध पांडवी ॥ १६॥ प्रत्यनस्तरसा घेगं समरे हयसादि नाम् । वृत्तस्य महाराज प्रावृदफालेतिपूर्यनः ॥ १७॥ पौर्णमास्यामरस बेग यथा पेला महोदधे । ततस्तं रपिनो राजन दारैः सनतपर्वभिः ॥ १८ ॥ यकृन्तन्नुसमानाने शिक्षित युद्ध में कुशल अनेक नरोत्तम बारों के और लाखों घोड़े रथ हाधियों के सवारों समेत मिलकर, नकुल सहदेव और धर्मराज नरोत्तम युधिष्ठिर को चारों ओर से पेरकर रोक लिया । १० 1 और राजा दुर्योधन ने दश सहस्र घोड़े के मवारोंका दूध पाहयों के बड़े युद्ध में भेजा हे राना वह युद्ध में गरुड़ के समान शीघमामी उन पहुंचने वाले घचढ़ों से घायल पृथ्वी के कंपाने वाले शचों को करते हुए वर्तमान हुए, उस समय घोड़े के खरों के ऐसे महा शब्द मुनेगये मे कि पर्जन में जलते हुए बांसों के बड़े वनमें शब्द होते हैं, उस भूमि में घोड़ों के उउलने से ऐती पूल उड़ी जिससे कि सूर्य का रथ दक गया, फिर उन शीघ्रगामी पोहों की सेनासे पांडवों की सेना ऐसी व्याकुल हुई जैसे कि गिरते हुए बड़े शीघ गामी इंसो से तडाग व्यथित होता है । १५ । वहां घोड़ों के हीसनेके शन्द से कुछ नहीं जाना गया इसके पीछे नकुल महदेवने युद्ध में अपनेवेगसे सवारों के बड़े भारी पेगोंको ऐसेरोका जैसे कि वर्षाऋ में पूर्णमासीकै दिन अत्यन्त उमगेहुए पूर्ण समुद्र के जल वेगको समुद्रका किनारा रोकता है इसके पीछे इन रथियों ने गुप्तग्रन्यावाले nored, trained and skilful in lately, and rith millions of lorsemen, olephant riders and chariotoors checkod Nakul, Salindey and Dhnrad, raj Yudbishthir the best af mon. 10. Prince Duryodha 1 sent a body of a myried horio against thy Pandaras arba oncouutored in battle the nos caming haiscwon, swift ai Garar and slinking tho enrtu with their criou Tno suunds from the hoofs of horses rere heard like the burning of a forest of bamboos on R toountain. With the bounding of harses there arasa a storm of dust biding tho bun. Two arty of this Paadavas k'ka 60 barrassed by tho swift horsonen As a lako is agitated with the fall of a light of #919. 15. No other sounds wera audiblc abro the noighing of borento Thon Xakul and Sabader checked the great ad sancs of the dorstinen as tho sho50 desiots tho riso of the mighty ocean on the day of tho full inoon. Then भीमपर्व Bhishma Parv [4845] परोसादिनाए । निपेतुमहाराज निहता परमम्धिमिः ॥ १९॥ मारित महा- माजमार गिरिगहवरे । तेपि प्रासामुनिशितैः शरैः सतपर्वभिः ॥ २०॥ यह भावनामानि विपरन्तो दियो दयामयाहता पारिनिर्भरतर्षमा बत्तजनमानि फलानीय महामाः । ससादिनो पा रास्ता तानिrar: ॥२१॥ विला: पापमानास प्रत्याश्यात सर्वशः । वाघमामा हायव प्रान्त भार्दितायपासिंई समासाच मगाः प्राणपरावणा पाजाम महाराज जिला महामु प२४॥ दध्मः शंखांघ मेरीष वासपामासुराइये । ततो दुबोधको हीमोरा सम्झ पराजितम् ॥ २५ ॥ अधीद भरतमेष्ठ मदराजमिदं वा- माता म्हो यमान्या सहितो रणे ॥ २६ ॥ पश्यता को महापाहो सेनां प्रावति प्रमोद महावाही वेलेष मकरालयम् ॥ २७ ॥ त्वं हि संभूय सेत्यर्य मसापचन गानों से घोड़े के सवारोंको काटा और इनके काटतेही वह सब मामर कर पृथ्वीपर रेल गिपरे । १९ । जैसे कि पहाड़ी वन में हाथियों से हायी गिरपड़ते हैं, फिर होने दणे दिशामों में घूमते हुए अत्यन्त तीक्ष्ण पास और गुप्त प्रन्यी वाले बाणों सिरोंको नाटा, और दुधारा खड्गों से मरेहएघोड़ों के सवारों ने शिरको ऐसे सागकरादेया जैसे कि बढारक्ष फलों को भसा कर देताहै उसयुद्धमें समारासन पोडका नाशहोगया फिर पायल घोड़े भयभीत और पीड़ित होकर ऐसे मामे, जैसे विभागोकोमियममझनेवालेग सिंहकोदेखकर महाव्याकुलता से मागते हैं, हेराना इससीत से पांच लोगोंने सब शत्रुओं को विनय कर के शंखोंको जाया और मेरी अमियों को भी वजनापा इसके पछि राजा दुर्योधन भपनीसेनाकोपराश्रित देखकर १२५ बहादुरखीहो गजामसे कहनेलगा कि हे महाबाहो पहनकुल सहदेव मौन का पापुत्र राजायुधिष्ठिरयुद्ध में तुम्हारे देखतेहुए इमारी बड़ी सेनाको पायलकर के भगाताहै, उसको तुम ऐसेरोको जैसे कि समुद्रको किनारा रोकताहै, सदैव प्राप the charioteers cut down the horsemen with their arrows having bidas knots and thoy fell dead on the ground (19) liko eleplanta wtruck down by elephanta in a hill forest. Then wandering in all directions, thoy cut down the heads with their ebarp arroms having biddaa knats. The boraemon dropped their beads, cut down by double edged swords as trees drop their flowors Thero tras a great des. imetion of horses and their riders in thist groat battlo. The boras, aded and terrified, scampered away as a herd of deer runs aray Me at the sight of a lion Thus, 0 king, the Peadara: baving Ayond the enemies sounded their conchs trucspots and boras. Prince Pradhan, finding his shy vanquisbed, (25) in great distrus said king of Madra, "Princo Yudhishthir tho oldest #3 of Pandare her with Nakul and Sabader is wounding aod putting to the within your sight; beplied to check him as the whore does (४८४६) 1.4846] Mahabharat विक्रमः । पुत्रस्य तय तद्वाक्यं श्रुत्वा शल्य प्रतापवान् ॥ २८॥ स ययो रपर्षशेन यत्र राजा युधिष्ठिरः । तदापतकै सहसा शल्यस्य सुमहतलम् ॥ २९ ॥ महायवेगे समरे धारयमास पाण्डवः । मद्रराजञ्च समरे धर्मराजो महारयः ॥३०॥ दशभिः सायकैस्तूर्ण माजघान स्तनान्तरे । मकुलः सहदेवच ते सप्तमिरजिह्मगैः ॥ ३ ॥ मदराजोपि तान सर्वानाजधान निभिस्त्रिमिः। युधिष्ठिरं पुन: पल्या विदयाध निशितैः शरैः ३२ माद्रीपुत्री च सम्भ्रान्ती दाभ्या दाभ्यामताडयत् । ततो भीमो • हापाईला राजा पमाहवे ॥३३॥ मद्रराजरथं प्राम मृत्यो रास्थगतं यथा । अभ्यपधत संग्रामे युधिष्ठिर ममित्रजित ॥ ३४ ॥ ततो युद्ध महाघोर भाषर्तत मुदारुणम् । अपर दिशमास्थाय पतमाने दिघाकरे ॥ ३५ ॥ इति श्री महामारने भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वशि शल्यधर्मराज समागमे पधिकशतोऽध्यायः । १०६ ।। - . असह्य और महावली सुनेजातेहो इसमापके पुत्र के बचनको सुनकर वह मतावान् शल्य बहुतसे रथासमेत वहां गया जहांकि राजाविष्ठिरथा वहां जाकर शल्यकी सेना अकस्माद जाकर गिर , तब महारथी पांडव धर्मराजने उसबड़ी सेनासमेत राजा भद्रके महावेगको रोककर बड़ी शीघ्रतापूर्वक दमयाणों से घायल किया, इसी प्रकार से सातहीसात याणों से नकुल सहदेवनेभी घायल किया। ३१ । फिर शल्यने भी उन सवको तीन २ वाणोंसे घायल करके बड़े तीक्ष्ण साठवाणों से राजा युधिष्ठिरको पायलकिया, और भ्रान्तियुक्तहोकर उन दोना नहुँन सहदेवको भी दो २ वाणों में व्यथितकिया इसके अनन्तर शत्रुहन्ता महाबली भीमसेन राजाको युद्ध में देखकर और कालके मुखमें वर्तमान के समान राजमद्र के आगेहुए रथको देखकर बडेवेग से उस युद्धमें रामा युधिष्ठिर के पाम जापहुँचा, उस के पाछे पश्चिम मोर नियनहोकर सर्य के चलने पर यहा घोर भयानक युद्ध नारी हुभा ॥ ३५ ॥ the sea. You are repoi ted to be the most powerlul and irresistillo" Hearing boso wo ds of your son, Shalya of great prowess attacked Yudhishthure with good many chariots Shalya's Army tell on hios all of a sudden Then Deurmay the mighty Puoday checked the ling of Madra and his a my and woundod him with ten apowa Nahul-ond Snbader wounded bim with seven arrows. 31. Shalya thien Found. od thơm with three arzows each and Punco l'udhishthil with sixty, He ngain in contus on workided 'Nakul sud Şahadey with two arrore each. Thou Blunisert the dest oya of fogs, seeing the ling engagrel in fighting nad seeing the king of Madia in his chariot coming like ons inlion in the Jass of deatil, went to help Yudhishthir. At this time when tlie sun was going towards the rest, & dreudful fightión began." 33 (४८). भीष्मपर्व Bhishma Pary [48471 magar सम्जय उपांच ततः पिता तप शो निशितः सायकोत्तमः । सानपान रणे पायर्याने सहसगान समन्ततः ॥१. भीम द्वादशभिविन्या सात्यहि नयमि-शर निकल "च त्रिमिविघा सहदेवश्च सप्तभिः ॥२॥ युधिष्ठिरं दादाभियोयोपरसि चापयेत् । युम्नन्ततो विधा ननाद सुमहायलः ॥ ३ ॥ तं बादशाध्यमलो माधयश्च निमिः शराष्टिद्युम्नच सप्तस्या भीममनश्च सप्तभिः ॥ ४॥ युधिष्ठिरोवाशामिः मत्यविध्य पितामहम् । द्रोणन्तु सात्यफि विपा भीमसेनमयिष्यत ॥ ५॥ एक पञ्चभियाण' मदण्डोपमः शितः । तो घ ते प्रत्यविध्यतां विभिनिमिरजिह्मगैः ॥ ६॥ तारिख महानाग दोग बामणग्यम् । सौवीराः कितना मंच्याः मतीच्यादीच्यमालयाः अभीगदाः शूरसेनाः शिवयोधपसातयः । संग्रामे नानानं चापमानाः शितः शतधान्ये महीपालाना देशरमागताः । पाण्टयानध्ययन्त भल्याय १.०० ।।. राजयुमोले कि मापसे पिना भीमगीने बड़े कोपमे तीक्ष्णधार फे. उत्तम वाणों से सेना समेत पांडवों को ऐसे घायल किया कि भीमसेनको बारह वाणों मे मात्यकी को नौवाणों से नकुलयो तीनवापों से और सहदेव को सातवाणों से युधिष्टिरको गरहवाणों से भुमा और उतीपरघायलकर धृष्टद्युम्नको व्यथिनकरके वड़वेगसे गर्जना की फिर नकलने वारहयापों हे सात्यकीन तीनवाणोंसे धृष्टयुम्नने सत्तरवाणोंसे भीमतेनः ने सातमागासे युधिडिरने वारहवाणा में पितामहको मापल किया. फिर द्रोणने सात्यकी को और भीमसेनको पायलकरके प्रत्येकको पांच तीक्ष्ण थाणों से व्यथित किया और दोनों ने तीन २ वाणास उन बामणोत्तम द्रोणाचार्य को ऐसापापात किया जैसे कि चावकोंसे बड़े दाधीको वायत्त करतेई सौवीर कितव पूर्वी पश्चिमी और उत्तरी मालवी, अत्रीपाह परसेन शिवय और वशातयने युद्ध में मीप्मको चापलहोकर भी त्याग नहीं किया। इसमपार नानामकारके शस्त्रों को हाथमें रखनेवाले अनेक CHAPIER CII Sinjasa zaid: Your facber Bhishm in the excess of anger with very slarp arrows wounded the Pandaras and their arpsies. Ho trounded Bhímven with nine arroits, Satyali with’hite, Nalul vith three and Saludeo with soren, and having wounded Yudhishthir with Erelve arion's on the breast and army he pierred Dhrisbtadyuton rard toarcita loud roar. Then Valul roundid hinu nith treliro arrows"(4),Satyuki with three, Durishtadyuma with screuty, Bhim- Ben ritk seven And Yudliialsthir with trrelse. Druga sounded Satyaki and Bhimeen Tith fire en urs cath, liile tlie latter wounded that'best of Bralimans vill, three arturs ereli, as a largo element is Founded with gonds. "Ilie Sialerg, the Kittsas and the Eastera, I'&tefa ádd Northern 3falaris did not dixit Bhizima. 6. In the -jane manner, aj iced with diferent sorts of weapons, the princes of 14818 ] Atabsbharat (४८५८) विविधायुधपाणप ९॥ तपेव पापाराज परिषम पितामहम् । स समन्ताद परितोपिरपराजित ॥ ॥ गहनोग्नरियोत्सर' प्रजम्वाल पार पत्र। रपाम्पगारापारिसिशक्तिगन्धन ॥ १५ ॥ शरस्फुलिङ्गो मीमानिस नियर्षमान । सुर्णखरिषुभिर्गा पक्ष सुनेजने ॥ १२॥ कर्णिनालीकनारा मामास तालमा अपातपस्वजषि रपिन शिते शरै ॥ १३ ॥ मुसाढपना जीव पहार सरयप्रजान् । निर्मनुष्यान् रयान् राजन् गजान संयुगे ॥१४॥ मकरोदस मदाबाइ समतोवर । तस्य ज्यातलनिय विस्मृतिमिवाशने ॥ १५॥ निशम्य सर्वभूतानि समकम्पन्त मारत । अमोघाखपत वाणा पिलुलेमरत म ॥ १६ ॥ नासज्जन्त तनुत्रेषु भीमचापच्युता शरा । हतपीरान पानराजन संयुकान अपनेईथे ॥ १७ ॥ अपश्याम महाराज हिंयमाणान रणाजिरे । विकाशि रूपाणा सहस्राणि चतुर्दश ॥ १८ ॥ महारथा समाख्याता कुलपुत्रास्ता। देशसि पाये हुए दूसरे राजालोग पाण्डवों के सम्मुख वर्तमानहुए, इस रीतिसे पारहोंने चारोंमार से पितामहको घेरलिया फिर अनेकरयों से घिरेणुए उन भरेष शत्रुओंके वनोंको भाग्निके समानजलानेवाले पितामहने वढे २ शूरवीर क्षत्रियों को भस्म कर दिया. और गृध्रपन युक्त सुन्दर सुनहरी पुखवाल भनेक प्रकारके नाराज नाम पाणोंसे उससनाकोभी ढककर बडे भसिधारवाले बाणोंसे राधियों के समूहों को गिराया ॥१॥ और रयों के समूहों को भी मुगड तालबनों के समान करदिपाकर उस महावाहु ने रथ हाथी घोड़ों को भी सकारों से रहित करदिया उसके मनुषकी प्रत्यचाका शन्द इन्द्र बजके समान शन्दायमानया उसके सुनने तक मीरमात्र कम्पापमानहोतेथे और हे राजा उन भापके पितामह के बाणा निष्फल न गिरने थे, हमने शीघ्रगामी पोड़ों को मृतक शूर वीरवाले रथों को मार पदरी माशी और क्रोश देशियों के चौदइहजार महारथी शूरवीर कुलीन युद्ध में देह त्यागनेवालों various lands faced the Pandavas The Pandavas surrounded the grandfather from all ades Surrounded by anymorabla chariot the invinable grandfather destroyer of fves burnt dora the hosts of Having covered the large army Luis beautiful gold feathered arrows of vulture quilla and lung stafred ones be cut donn the charioteers with his sharp edged arrows Ho made the chariots like a forest of headless palme. Then that great warrior made the elephantı, hories and cheriets riderless The sound of his bowstring rang like that of vajra and shool all the bearest The a rows of the grandfather did not fall in YHD We saw the chario.8 drawn by swift borses destitute of ridera. Foare tien thousands of the Furriors of Chandrı, Kashi and broar of Good faznilies and rendy to dwon turned back, and thousands of maniors with -- Warriors as fire does forests with 13 with tertor A भीमप Bhishma Parr 148499 अपराधिनः सः सुपर्णविसावजाः ॥ १९ ॥ संप्रामे भीममासाथ ग्यादितास्वमि, भारतकम् । निमग्नाः परलोकाय सवाजिरयकुन्नराः ॥ २०॥ भग्नाझोपस्कारागि अग्नचक्राश्च भारत । अपश्याम महाराज तोय सहमशः सवस्पेर मेरपिभिश्च निपातितः । शरः सुकपछि परिशस पिशाम्पते ॥ २९ ॥ गदामि मिन्दिाप निशितैम शिलीमुखः । मनुक्यपास यमग्नेश मारिष ॥३॥ मि कार्मुकः लगैः शिरोमिएस सकुण्डले तलघरगुलिस मजेश विनिपातितः ॥ २४ ॥ चापश्व बहुधाच्छिन्नः समाप्तीपंत मेदिनी । हतारोहा गला राजपा दयसादिनः ॥ २५ ॥ म्यपतम्व गतप्राणाः पातशोय सहमशः । पतमानापि से बात बमाणान महारथात् ॥ २३ ॥ नाशपनुपन पारयितुं भीष्मवाणम्पीरितान् । मरेन समबीपण पायमाना महावमः ॥ २७ ॥ अमग्यत महाराज न प ही साधावतः । भाविनायनागाइवे पतितपासंकुलम्।।२८ अनर्फि पाण्डपुत्राणां हाहास्तमवेतनम् । जधानात्र पिता पुत्र पुत्रश्च पिता तथा ॥२९॥ प्रियं सवायचाप्रम्दे संबादेला- तुकृतः । विमुष्प कवचानन्ये पाण्दुपुत्रस्प सैनिकाः ॥३०॥कीय केशार पावतः मत्यापश्यन्त सर्वशः । तद्गोपुलमियोद्धान्त मुधारतरययम् ॥ १ ॥ पाण्डपुत्रस्य सैम्पमातस्परं तदा । प्रमज्यमानं सम्यन्तु या यादयनन्दनः ॥ ३ ॥ उवाच पार्थ धीमत्सु निगृह्य यमुत्तमम् । अयं स काल. सम्माप्तः पायं यः कासित व ॥ ३३ ॥ महरास्मिनण्यात नवेन्मोहादिमुझसे । यत् पुराकरित जीरो को मुखफेरनेवालादेना और हजारों वीरोंको सुनहरी बनायुक्त साधारण बोड़ों समेत भीष्मनी के होयसे मरे हुए परलोक के निमित्त देखा । २० । इनके सिवाप हजारों रयोंको ऐसा देखा कि जिनके, पहिये प्रादि अनेक रयों के अंगटगयेथे, मार कवचों समेत गिरायेहुए रोममेत सार जिन के कि पापा कवचं टूटेहुये से उनको भी देखा इस युद्ध में पिताने पुत्रको पुत्र ने पिता को भी मारहाला और भारम्भके बलसे प्रेरित मित्रने प्रिय मित्रको भी मारा फिरपांडवोंकी दूसरीसेना के मनुष्य कवचको उतार शिरके पासोंको फैलातेहुए सबभोरको दृष्टप तर पापागे की गौमों के समान पृथक् चलायमान सेना को रयकूबरके समान पीडामान देखकर श्रीकृष्णानी रयको रोककर अर्जुन से बोले कि हे पर्जुन पा पा समय मान इमारे मोरा अपीष्टदै । ३३ । नरोत्तम जो तू पोहसे आान न देतो भरमार golden bannars, mogatod on elephants, chariots aarl horses, were slain by Bhishm.20. Bosides these, thousands of chariots were to be seen destituto of choriota, arrops and armour. Fathers and song sley each other in the fury of the battle Friends actoated by Fate, alex • their friends. Another army of the Pandavas, destitute of armour, were seen running in confusion with dishevelled hair. Seeing the army of the Pandaras dispersed liko & herd of cows and distressed like yoko encumbered bossts, Shree Krishn checking the roins of the chariot | .horson'said to Arjun:- " This is the time which you longed for. 33.

1 1 1 48001 Molinbharat (४८५० anसमा म ॥ ३४ ॥ विराटनगरे तातसम्जयस्य समीपत । भीष्मद्रोणमुमान सर्वाद पार ट्रस्य संकिकान् ॥ ३५ ॥ सानुघा धान् हनिप्यामि ये मां योत्स्यन्ति संगर । ति तत् कुरु कौन्तय सत्य पाक्यमरिन्दम ॥ ३६ क्षत्रधर्ममनुस्मृत्य युध्यस्थ विगतज्वर । इत्युक्ता वासुदेधेन तिर्यग्रधिरघोमुख ॥ ३७ ॥ आकाम इव बीभत्सु रिद पवनमनीत् । अयध्याना यधं कृत्या राज्य या रफोत्तरम् ॥ ३८॥ दुखानि पनवासे या किंतु गे सुरतभवेत् | चोदयाघान् यतोभीष्म करिष्ये वचनतष ॥३९॥ पातयिष्यामि दुधर्ष भीम कुरुपितामाम् । स चाश्वान रजतप्ररयाश्चोदयामास, माधव ॥ ४० ॥ यतोभीप्मस्ततो राजन दुष्प्रेश्यो रश्मियानिव । ततरतत् पुनरावृत्त । युधिष्ठिर चल महत् ॥४१॥ दृश्या पाथ महापाहु भीमायोद्यतमाहधे । ततो भीम. करवीर भाई भर्जन पूर्व समय में विराद नगरके मध्यमें उन राजाओं के मिलने में जो तुमने संजय के सम्मुख कहाया कि मै दुर्योधन की सब सेनासमेत उन भीम द्रोणाचार्यको सव साथियों समेत मारूंगा जो मुझसे सटेंगे, हे शत्रुओंके विजय करनेवाले अर्जुन नू अपने उस वचनको सत्यकर, क्षत्रीधर्म को स्मरण करके दुःख को दूरकरके युद्धकर इसप्रकार यासुदेवजी के वचनों को सुनकर अर्जुन बहुन नम्र और अधोमुखहोकर निस्पृह के समान यह वचन बोला कि अबध्यटद्ध गुरू लोगों को मारकर अन्त में नरकका देने वाला राज्यहो वा वनस में दुखहो अथवा अन्य मेरा कोईसा मयोमन सिद्धहो आपघोड़ोंको तीनकरके जहां भीष्म हैं वहां रथको लेपलिये में भापके यचनको करूंगा, वहां कौरवों के दुर्मय पितामा भीम जी को गिराऊंगा यह मुनतेही माधवजीने चांदी के समान मते घोड़ोंको अपडे प्रकारमे चलायमान किया । ४० । और जिम और को सूर्य के समान दुःख से देखने के योग्य घड़े मतापवान भीष्मनी थे वहां पहुंचे उसके पाछे युधिष्ठिरकी वह बड़ी सेना भी भो उम युद्ध में भीष्म के लिये तैयारथी अर्जुन को देखकर फिर UBD your weapon, lcst of men, if you are not out of your knEORT Do you ienvember, brave Arjun, what you formerly sad 10 Sanjaya'at Viraf in the pit of kinga! 'You said that you would way the Armies of Duryolban Ingother with Bluíslım, Dronach aija and otheos * bo should cowo ngainst you 19 Luttle Fulll your promise, Arjun the destroyer of fues! Recall the duties of I rliniry as an fight with out hasitat on lIraing the words of Vaserdes, Arjun sith his licad dorinčast fur baslıfulnes, said, "Whether the slangliter of old and respectele nen load nou to tlre kingdoni of hell, or to pangs of ezde, toru the liom ot iny chariot to the place nliero Busium 10I shall obeg yoor xders and shall blay in Lattle the inflacille grandfather of trio Kadrarat" At this Nachav drove srity the horses white as Bilver (10) tili tliny reachai the place ssliere glorious Buslin, chtical tubgred at the the siti. was stationed. Then this great army of .

(५८९९) मोमपर्व Blushma Pary [4831] बुरश्रेष्ठ सिंहयाबिनदर मुहु ॥ ४२ ॥ धनन्जयरयं शीव शरीरयाविरत सनस रयस्तस्य सक्ष्य सहसारथि ॥४३॥ शरवण महता न प्राज्ञायत भारत यादेयस्त्य सम्भ्रान्तो धैय्यमास्थाय सत्या ! चोदयामास तानवान् चिनुन्नान भीमसाय के । तत पार्थो धनुर्गुह्य दिव्य जलदनि स्थनम ॥ ४५ ॥ पातयमास भीष्मस्य घन् शिछत्वा शिस गरे । सन्निधम्या कोरग्य पुनरम्यान्मइन । ४६ निमेषान्तर मात्रेण मज्य च पिता तय ! चर्षचततोदोर्या धतुलदान स्वनम् ॥ १७ ॥ मया स्य तदपि कुदधिच्छ धनरसँग । तस्य तत् पूजयामास लाघय शान्तना सुत ॥४॥ गांगेयस्त्व नवी पाय धान्य व मरिंदम । साधुसाधु महाबाहो साधु कुन्तीमतेति च ॥ ५९॥ समामाप्पैषमपर गृह्य रुधिर धनु । मुमोच समर मीन रापन पार्य स्य प्रति ॥ ५० ॥ मदर्शपवासुदेवो इण्याने पर यलम् । मोधान् कुर्वन् सरालस्य लौटाई तदनन्ता मिहके समान पारम्पार गर्गना करते कौरवों में श्रेष्ठ मानी ने अपने चाणोंकी वासेशीधही अर्जुनके रथको दकादया तब क्षणभरमही उप्तका घोड़े और सारथी समेत स्य, भीष्मके पागों की वर्षा से दिखाई नहीं दिया इसके अनन्तर भ्रान्तीमें भरेहुए शीघ्रता करनेवाले वासुदेवाने धैर्यता में नियतहोकर जन घोडौंको जो कि भीमके पाणों से व्यथितये मत्यन्त तीन किया और अर्जुन ने वादल के समानदिन्मघनुप को लेकर अपने तीक्ष्णवाणों से भीष्मनी के भनुप को काटकर पृथ्वीपर गिराया फिर धनुप टेहुए आपके पिता ने निमिपमात्र मेंही मरे धनुपको तैयार किया और उस बादल के समान शब्दायमान धनुषको अपनी दोनों भजामों से संचा, फिर अर्जुन ने उन के इस पनुपको भी काटा शम्ननु के पुत्र भीम ने उसकी उस हस्तलाघवता की बड़ी प्रशसा करी कि है, | महावाह कुन्ती के पुत्र बहुत अच्छा बहुत अच्छा इस प्रकार की वार्ता करके दूमरे उत्तम धनुप को लेकर माणों को अर्जुन के श्यपर फेंका वहां वासुदेव जीने घोड़ों के चलाने में अपने वरे दलको दिखाया । ५. फिर भीष्म के वाणों मे घायल of Yudhishthir, ready for the encounter of Bhuslim, came Luck at the Bight of Arjun Then roaring like a hon, Boispin the best of the Kauravas, bid Arjuns chariot with the shower of luis arruf's The chariot together with the horses and durer was quite oat of sulit by the sho er of Bhishma S BITOS. Vacuder who was confused for a short timo nith the fury of the onslaught, tuollected himself and drove swiftly the horses w loch nele wounded by Bhishma's arrows Arjun took up bis divino Los like & cloud and with his sharp an098 cut down the bor of Bhishm The latter soan prepared another bowl and drew it with both arms with a wund like thander Arjun cat down this eccond bow alsa, Bhisho prazsod the desterity of Arjun's •God, brave son of Kuntir good/" Thus saying her prepared another boss and discharged arrows at tho chariot of Arjun hand, saying 14852] Mahabharat (४८५२) मारलानि निवर्शयन् ॥ ५५ ॥ शुशुमाते नान्यानो तो भीमरारषिक्षतौ । गोषाषिष सरपी विषाणोधिषिताकिती ॥५२॥ वासुदेषस्तु सम्प्रेष पार्थस्य सायुक्ताम् । श्रीमान शरवर्णणि क्षमतमनिश युधि । ५३ । प्रपपन्तमिवादित्य मम्पमासाप सेनयोः । परान परान पिनिमन्त पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान् ॥ ५४॥ युगान्तमिव कुर्वाण भीम पीमिहिर पले । मामृष्यत महाबाहुर्माधवः परबारहा ॥ ५५ ॥ उत्पम्प रजत मस्बान पान पार्षस्य मारिष । वासुदेषस्ततोयोगी प्रबस्कन्द महारयात् ॥ १६ ॥ नामिनाप भीम स मुगमहरणोयली । प्रतोदपाणिस्तेजस्वी सिंहवाहिनदामा ५॥ बारपनिय पेड़ों स जगतीं जगदीश्वर । कोषताप्रेक्षणः कणो जिघांमुरमितपतिः ॥५॥ प्रसन्त इस पेतांसि तापकानां महाहवे ।रषा माघधमाकन्दे भीमायोपत पर दोनों नरोत्तम उनके पाणों को निष्फल करते मंडलाको दिखाते हुए ऐसे शोभापमान हुए, नैसे कि सींगों के महारों से छिन्नभिन्न चिह्नित कियेहुए दृषभ होते हैं, फिर वासुदेव नीने भर्जुन के मृदु युद्धको मार पांडवों की सेनापर वही | वीजता से बाणों की वर्षा करते मार दोनों सेनामों के मध्यवतीं सूर्य के समान तपाते और परिवों के बड़े । शुरवीरों को मारतेहुए युधिष्ठिर की सेना में मलप मचाते भीमको देखकर, क्षमा न करने वाले शत्रुहन्ता माधव सामदेव |जी अर्जुन के कक्षेत घोड़ों को छोड़कर बड़े रथसे उतर हाय में बाधक लिये सिंह के समान वारंवार गर्मते घरणों से पृथ्वी को विदर्णि करते क्रोध से रतनेश | किये मारने के उत्सुक मापके शुरवीरों को भयभीत करते बड़े तेनस्त्री जगत्कर्ता बड़े पेगसे भीष्मके सम्मुख गपे । ५७ । हेराजा भीममी के सम्मुख पर्तमान मापवत्री को देखकर उस युद्ध में जहां तहां भयभीत लोग ऐसी २ पार्मा करने बगे कि भीम मारागया मारागया पीताम्बरधारी नीलमणि के समान रंगवाले Thon Vasudev showed lus skill in driving 019€8.50. Wounded by tho aprams of Blushm, the tifo best of men made his arrans futile, and performing circular novoments they loabod beautiful libo strong aren wounded by horas. Vasudev noticed the mild fighting of Arjun Avell 49 tho fast shower of arrows over the Pandav armics sent forth by Bhishin pho stunding in the midst of the two armies diffuseel liegt like the 894, slaying the great warrior of the Pandavas and spreading destruction through the armies of Yudhishthir. At this tho ualora Siring destroyer of enemies, Dadhiar gave up the reins of Arjun'. whilo iconos and alighting from the huge chariot whip in hand ruchod towards Bluishith Roaring like a lion, Luncaking the earth in der his foot, with oges red in angor Fishing ta blay and terrifying your Wartora, glariqus croator of tho porld food Bhisho. 57. Sooing Maibar face to face with Bluhma, tho torrifiod poople in the field of bratllo cried out, "Bhishm is slain, Boishm is slain" Running (१८) fremi Bluishma Pařs [48531 मतिक॥ १॥ हतो भीष्मो हतो भीमस्तत्र तन यचो महत् । सत्यत महाराज वासुदेवमयासदा ॥ ६० ॥ पीतकोशयनम्धीतोमणिश्यामो जमाईन । गुशुमे बिठवन् भीष्म विद्युन्मालीपयापुद ॥ ६१ ॥ ससिंह इच मातङ्ग यूयमचर्पमम् । समिदुदाय बेगेन दिनदन् यावर्षभः ॥ १२ ॥ तमापतन्त सम्प्रेक्ष्य पुण्डरीकाक्षमाहये । ससन्नम रणे भीष्मी विचर्ष महसनु ॥ ६३ ॥ नाच चैव गोविन्दमसम्भ्रान्तेन चेतसा। एोहि पुण्डरीकाक्ष देयदेव नमास्तुते ॥ ६४ ॥ मामय मात्वतश्रेष्ठ पानयस्व महाहवे। त्वया हि देव सयम हतस्थापि ममानर ॥ ६५ ॥ श्रेय एच पर कृष्णलो भवति मर्वत । सम्भावितोस्मि गोविन्द रैलोक्ये नायसयुगे । ६६ । प्रहरस्य यथेष्टं च दासी स्मि तव चानघ । अन्यमेव तत पार्थ समभिद्रुत्य केशवम् ॥ ६॥ निजग्राह महागाड्याहुभ्या परि गृधध । निगृघमाण पार्थेन कृष्णो राजीव लोचन ॥ ६८ ॥ ज जनाईनगी भीमकी ओर दौडने हुए ऐमे शोभायमान हुए जैसे कि विद्युतस्पमाला घारी बादल होता है और जैसे कि समुहका स्वामी सिंह उगमहाथी की ओर दौ- हता है उसीपकार यादवाम श्रेष्ठ श्रीकृष्णजी गर्जना करते तीव्रतासे मीठपके सम्मुख गये, युद्ध में आतेहुएउन कमलदललोचन को देखकरमाप्मने सावधान चित्त होकर चहे घनुपको संचकर । ६२ । बड़ी स्थिरचित्तता से उनकोहाथ जोडकर यहा हे पंडरीकाक्षजी आपआइये हे देवदेव प्रापको नमस्कार है हे यादवेन्द्र अब मुभको आपदम महायुद्ध | में गिरायो, हे निष्पाप श्रीकृष्णजी युद्ध में आपके हाथमे मुममाहुए चाभी सर और बड़ा कल्याण होता है, हे गोविन्दजी अक्मे रद्ध में तीनों रोक से मतिष्ठा पाया गया है । ६५ ।। निष्पाप में मापका निरसन्देह दामह भाप इच्छाके समानः मेंहार करो, इसके अनन्तर पीछे २ जाने वाले अर्जुन ने केदावजी के पासजाकर अपनी दोनों भुजमों में उन महागाईको दावकर पकड़ लिया, अर्जुन मे पंकडे हुए कमल लोचन पुम्पोत्तम श्रीकृष्णजी इसको लेकर पडी गीता मे towards Bhishi, Junardan in lus je'lon clothes looked glorious like a cloud garanded rich Iglitning Sirce Krislin tic best of the Yadaras rushed upon Blushim atlıloud roars as the hing ol brasts, lion rushes upon a liuge elephant Sring the lotus cgcl one coming towards hum, Bbisbn cuefully dress up luis bouT (621 and with a Çornposed m nd thus udiesscd low with joined palnie, Welcome Pandakash! I lot to you god of gods! hull me the field of batto best of ) adni as I hilled by you, soles Sluco Kri lun, I shall attaa & cst glory, I am respucted by the thrce s orlds, Gound! 6. I am surely jour slec, sınless one Discharge your freipon as you Arjun who followed the footsteps of Krislin, approached in the meu nie and cuglit lun in both lus aims Held fast by Arjun, the lotus os al Krislın, bust of male beings r had along with 10 .

--- करके दशही चरण पर 14854 Nabalharst ..(१८९५) गाम यैनमादाय वेगेन पुरुषोत्तमः । पार्थस्तु विश्न घलाचरणो परवीरहा ॥१९॥ निजमाह हपोकेश कथं चिदशमे पदे। ततएवमुघाचातः क्रोधप- कलेक्षणम . निःश्वसन्तं यथा नागम नः प्रणयात्सखा, निवर्तस्व महाबाहो नानृतं कर्तुमर्हसि ।। यत्वया कथित पूर्व म योत्स्यामीति केशव । मिथ्यावादीति लोकास्यां कप यिष्यन्ति माधव ॥ २॥मष भारः सर्यो हि हनिष्यामि पितामहम्। शप फेशव शरण सत्येन मुफ्तेन च ॥ ३ ॥ मन्तं पया गमिष्यामि शत्रणां शमदन । प्रदेष पश्य दुई पात्यमान महारयम् ॥ ४॥ तागपतिमिधापूर्णमन्तकाले. घरच्छया । माधवस्तु वचः भूत्वा फाल्गुनस्य महात्मनः ।। ५५, अकिञ्चितुफ्त्या सकोध आरोह.त्य पुनः 1.ता रयस्थी नरव्याघ्री भीम शान्तनयः पुनः ॥ ७६ ॥ यवर्ष शायण मेघो वर्षमा यथा चली । प्राणानादत्त पोधानां पिता देवनतस्तथ । ७७ ॥ गभातिभिरिया दित्यस्तेजा चले, फिर शत्रों के वीरों के मारने वाले अर्जुन ने बड़े बलसे किसी प्रकार दोनों चरणों को पकड़ लिया। तदनन्तर पीड़ामान सखा अर्जुन उन क्रोधसे व्याकल सर्पके समान घाम लेने वाले श्रीकृष्ण जीस यह वचन वोला । ७० । हे महाबाहु कीकृप्सनी आपलौटिये और अपने उम वचनको और सत्यको न छोड़िये जो आपने कहाथा कि हमनहलिडेंगे क्योंकि हे माधव जो तुम ऐसा करोगे तो संसार आपको मिथ्यावादी काँगा यह सब काम मेरा है मैं पितामह को मारूंगा, है, केशव मैं शस्त्र सत्यता और अपने उत्तम कर्मकी शपय खाताहूँ कि में शत्रयों को मारकर जीतूंगा आप इसी समय इस महादुर्जय भीष्मको गिराहुआ ऐसे देखोगे जैसे कि युग के अन्त प्रलय में दैवइच्छा से चन्द्रमा गिरता है यह सुनकर क्रधभरे माधवजी अर्जुनसे कुछ न बोलकर स्थपर सवारहए १७९३ फिर शन्तनुके पुत्र भीष्मने उनदोनों रथपर सवार नरोत्तमों पर ऐमें बाहों की वर्षाकरी जैसे कि.पर्वत पर बादल जलको बरसाते हैं, उन भापके पिता | him in great haste. Then Arjun the destroyer of the warriors of the enemies • somehow. caught with great force : both; this feet. at the tenth pace. Arjun in great distress thus addressed its enraged friend Shree Krislu who much agitated with anger breathed .hard like a serpent 70. " Tuin buck, mighly Sure Krislin", said Aijun, ": donot break your promise of. remaining :neutral. The Forli' will call you a linr, if, you will fight. It is any duty to slay ih: graudfatlie: I swoar, o Koskav, by my arins, truth and duty that I shall, slay and win.the enemies... You will sce ths invincible Bhislım fallen like the moon at thu end-of. thc yug.": . Having hcard tris, en aged Madhav returned no reply to Arjut sind muunted tilo clariut. 73. Tucu Blislim the son of Slantauu isent furth on tlie mubist of monlisshower of arrots asa cloud sends tortli raiu on (१८५५) भीष्मपर्व Bhishma Pary [43133 सि शिशिरात्यये । यथा दुरुषां मैम्पानि यमानु युधि पाया ॥ ८ पाणवसन्यानि धमज युधि ने पिता । हन विमापास्नु निकम्मा हा चितस ॥ ७९ ॥ मध्यं गतमिधादिर मतपत स्वतेजसा । यामामामेण तशीय सहमेरा ॥८. n निरीक्षितुन शेकस्ते भीष्मममातम गें। पुर्वाण समरे काण्य तिमानुपविक्रमम् ॥ ८१ . घीक्षाश्च महाराज पाण्डया मयपीडिताः । तथा पाण्डवसन्यानि द्राग्यमाणानिमारत । ८२॥ श्रासार नाभ्यगच्छन्त गाव. पंकगता हवा पिपीलिकाध्यक्षुण्णा दुषला पसिना रणे । ८३ महारय मारत दुष्पकम्प शरोपिण प्रतपन्तं मरेद्रान् । भीम मशकु प्रतिषीमितुते शर्षि समिधातप तम् ॥४॥ "विमानतस्तस्यतु पाण्डुसेनामस्तं जगामाय सहसरश्मि । ततो बलानां श्रमका* ताना मनोवहारं प्रतिमम्बभूध ॥ ५॥ इति श्री महाभारने भीष्मपर्वाण भी मवधपर्वणि नवटिवमपुदममा समाधिकशतोऽध्यायः ॥ १० ॥ देववत ने शूरवीर लोगों के माणों को ऐसे लिया जैसे कि शिशिर ऋतु में मूर्य तिनों को भाकाण करता है, और मैमे कि पाण्डवों ने कौरवों की मना को छिन्नभिन्न किया उमी प्रकार आप के पिता ने भी पांडवों की सेना को अलव्य सकरदिया, मृतक और मागेहुए प्रसाहमी व अचेत पांडवों की सेना युद्ध में - सीय भीमके देखने को भी ऐने समर्थ नहीं हुई जैसे कि मध्याह्नरी अपने तेभसे तपाने पाले मूर्यको नहीं देखमक्ते । ८० । हेमहाराज भयमे दुःखीहुए पांडवोंने दृष्टिको वाताकरी है भरतवंशी इम प्रकार से भागीहुई पांडवों की मेना ने ऐसे मानारक्षक के ई नहीं पाया जो कि कीचमें फंसीहुई गोका कोई रक्षक नहीं हो. साई और युदमें वह निर्वस सेना बड़े परीके हायसे चेंटियों के समान पायल हुई।8। उम महारथी दुनंप वाणरूपी किरणरखनेवाले राजाओं के तपानेवाले मूर्य की समान भीम के देखने को को समय नहीं हुआ फिर सूर्य अस्ताचल को प्राप्तए तदनन्तर परिश्रम से यकीहुई सेनामों के मनका विश्राम हुमा अर्थात् युद्ध समाप्त हुमा ॥ ८५॥ Your father Dovabrot took away the livo: of weu as the sun in Winter drawsan ay ligit. Your fathor destroyed the armies of the Pandavas as the latter liad done with the Kauravas. Dead and flying, tertifiod and insenssble, tlic Pandar arny was unuble to gaze at Bhıslims the walchitas warrior like the sun at widduy.'80 The terrified Puudavas loosed on at the great destruction. The dispersed srmy of the Pandavas fuurd no protector lhe a cory stuck in mud, That great ani in vinci 1, charioteer, bayng arrows for his rays was not looked at like the sug by any warrior the pun mot duwit and thic afin es ielued for the night" $1 mountain Then - t 148010] Muli bliaint माजय उवाच । युधातामेव तेपान्तु भासरेऽत्तमपागत । सन्यासमभव रा न पश्याम ततो रणंम् ॥ १ ॥ ततो युधिष्ठिर राजा सन्धयां स दृश्य भारत। यध्य गगनाच मीण स्पताल भर्यविह्वलम् ॥ २॥ स्वस-यञ्च परावृत्त पला थापरायणम् । मा मञ्च युधि सरब्ध पीडय त महारथम् ॥ ३ ॥ सामकाभ जितान् दशा निल्साहानु महारान् । चिन्तयित्वा ततो राजाअघहारमराचयत ॥ ४ ॥ तनोऽवहार या चके राजा युविष्ठर । तथैव तव सैयानामघहारा घ भूत्तर्ग ॥ ५॥ ततोवहार सैन्याना फत्या तर महारया । यशित पुरश्रेष्ठ समाम क्षशिला ॥ ६ ॥ भीष्मस्य समरे कर्म चिन्तयानास्तु पाण्डवा । माल मन्त तदा शान्ति भीमवाणगीडिता ॥ ७ ॥ भीमोपि समर जित्वा पाण्डवान् सहएन्जयान् । पू यमानस्तय सुई मानव भारत ॥ ८ । न्यपिशत् 'कुतम भयान॥१८॥ दशदिनके युद्धका भारम्भ सजयबोले कि युद्ध करते हुए सूर्य के अस्त होने के ममय भयकारी सन्या पर्तमान हुई और युद्ध करना मा ओरसे उन्द हुआ, इसके पीछे 'रामा योष्ठिर ने सयाको देवकर और भीष्म के हाथ से घायल शस्त्रत्यागने वाली' भयसे महाव्याकुल व शत्रुओं से घिरी भागने की इच्छा करने वाली अपनी सेना को जान और युद्ध में क्रोधित पीडादेनेवाले महारथी भीड़ को देख सोमकों को सहि सरहिन पराजय रूप जानकर वडीचिन्तापूर्वक विश्रामको चाहा इस प्रकार आपको मेनाका विभम हुआ हे कौरवोत्तम धृतराष्ट्र पिरयुद्ध में घायल शरीरवाले महा वहां सेनाओं का विश्रामकरके स्थित हुए । ६। और युद्धमें भीष्मकेकर्म को शोचते उन के वाणों से अपन पीडामान पाडवों ने शानी को नहीं पाया और चिन्ती से भाकुनीरहे फिरभीषभी पाडवों समेत सृजियोंको विजयकरके आपके पुत्रों से CH PIER CVIIT The lcuthaiy Sanjaya sad After the brittle at sunset the scene in the seg enn g'n as dreadful and the battle stoppoil in all gunlere Seing in the son ng lus aimy wounded ly Bhishm, lryjng Ilow n ms mich distressed with torror surrounded by enemics and ready fo flight soong as wol the high-handedness and ange of Bushm and trading tic Sour s p o yessles and almost BAD quieslo:1 Pince Yudhislıtlu with a feeling of dep ekşion gaye orlars of ret er to his army In the slidg minner your armies too went to the rest Then the wounded saruors took rest Thinking of Bh słın 3 11 orl spd much found d by his cows the Landovas could find most and pa e of mind Bashım too buying conquered the Pan lavis and the Sunjiy as, 10 u ng 1 to tlie camping ground much honoured ind p usd by y ur sons and guiouodi boy tolvo ५ (४८५) भीष्मपर्व Bhishuna Parv [4873 साध दृष्टरूपैःसमन्ततः । ततो रात्रिः समभवत् सर्वभूतममोहिनी ॥९॥ तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे पाण्डवा रियमिः सह । सृजयाध दुराधर्षा मन्त्राय समुपाविशन् ॥ १० ॥ आत्मनिःश्रेयसं सर्व प्राप्तकालं महायलाः । मन्त्रयामासुरव्यमा मन्धनिमय कोविदाः ॥ ११ ॥ ततो युधिष्ठिरोराजा मन्त्रयित्वा चिरं नृप। वासुदेवं समुद्रीक्ष्यव. वनम्चेवमाददे ॥१२॥ कृष्ण पश्य महात्मानं भीगंभीमपराक्रमम् । गजं नलवनानीय विमृद्नन्तं बलं मम ॥ १३॥ न चैवैनं महात्मानमुत्सहामो निरीक्षितुम् । लेलिहामानं मैन्येषु प्रदमिव पाचकम् ॥ १४ ॥ यथा घोरो महानागस्तक्षको चै विषोल्वणः । तया भीष्मो रणे कुद्धस्तीणशस्त्रः प्रतापवान् ॥ १५॥ गृहीतचापः समरे प्रमुञ्चनि शिताम्छरान् । शक्यो जेतुंयम बुद्धो पनपाणिश्च देवराट् ॥ १६ ॥ वरुणः पाशभृचापि सगदो या धनेश्वरः। न तु भीम. सुसंकुद्धः शश्योजेतुं महाहवे॥ १७ ॥ सोहमेवंगते पूज्य और स्तुतिमान होकर चारोंओर से प्रमशरूपकौरवों समेत निवासस्थान में वर्तमान हुए निसपीछे सवनीवोंको प्रसन्नकरने वाली रात्रि वर्तमानहुई उसयोररात्रिके प्रारंभमें दुर्जय प ण्डव मुंजय और प्णीलोग सलाहकरनेके लिये वैठे ।१०। उनसाय- धान मंत्रक निश्चयमें पंडित मवमहावलियोंने, अपनेकल्याणको विचार किया, इसके |पछि राजा युधिष्ठिरने बहुन विलम्बतक विचारांशकरके वासुदेवजीको देखकर यह वचन कहा, कि हे श्रीकृष्णगी जैसे कि हाथी कमल के वनोंको मर्दनकरता है इसी प्रकारसे मेरी सेना के मईन करनेवाले भयके उत्पन्न कर्ता महात्मा भीमको देखो,. कि इस अत्यन्त प्रवल अग्नि के समान सेनाओं के चाटने वाले महात्मा के देखने. को हम सब समर्थ नहीं होते हैं, जैसे कि वड़ा विप भरा तक्षक नाग होता है इसी मकारके यह युद्धमें, क्रोधित महातेजस्वी शस्त्रधारी भीम हैं, युद्ध में धनुप हाय में लिये तीक्ष्ण वाणों को छोड़ते क्रोधरूप यमराज और पजधारी इन्द्रको वा | पाशधारी वरुण और गदाधारी कुरेर को भी विजय करना संभव है परन्तु महा युद्ध में क्रोध संयुक्त भीष्मनी का विजय करना महा कठिन और असंभव है, हे श्री clieerful Kauravas. Then the right commenced giving happiness to all buings In the eally part of that dark night the Pandavas, the Srinjayng and the Vrishnis met in council. 10. Those wise warriors skilful in council thought of their welfare. Then Prince Yudhishtir after decp thought thus addressed Vasudev: Blislm the terror of our armies destroys my warriors as an elephant tramples down a clump of lotusss. Wo are unable to look at that destiosor of armios like a burning fire. He is like a venomous snahe múch enraged in the field of lattio. It is c.sy to conquer the enraged Yum discharging his slinrp arrows, Indra the wildcrof vajia, Varun tho bearer ci n003e or Kuver the maze berei; but it is very dffcolt to conquer the cornged Bhishun in battle. Lndored with small wisdom as I am, O Krishan, I [4858 ] Malinblayat ! ४८५८) कृष्ण निमग्न शोकसागरे । अत्मनो बुद्धिदीर्घल्या भीष्ममासाद्य सयुगे ॥ १८ ॥ वन यास्यामि दुर्धर्ष श्रेयोवै तत्रमे गतम् । न युद्ध रोचतेरप्ण हन्ति भीमो हि न सदा ॥ १९ ॥ यथा प्रज्वलित पनि पतङ्ग सममिवान् । एकतामृत्युमभ्येति तथाह भीष्म मीयिवान् ॥ २०॥ क्षय नीतोस्मि वार्णय राज्यहेतो पराक्रमी । म्रातरश्चैव मेशूरा सायफैशपीडिता ॥ २१ ॥ मत्कृते म्रातृसौहाद्रायनघा वन गता परिफ्लिप्टा तथा कृष्णा मत्कृते मधुसूदन ॥२२ । जीवित बहुमन्यह जीवित घद्य दुर्लभम् । जीवि तस्याद्य शेषेण चरिष्ये धर्ममुत्तमम् ॥ २३ ॥ यदितहमनु ग्राह्यो भ्रातृभि सह केशव । | स्वधर्मस्याविरोधेन हित म्याहर फेशय ॥ २४ ॥ पच श्रुत्वा वचस्तस्य कारण्यावधि स्तरम् ] प्रत्युवाच तत कृष्णः सान्त्वयानो युधिष्ठिरम् ॥ २५ ॥ धर्मपुत्र विपादस्य मा कृष्णजी मै अपनी बुद्धि की अल्पना से युद्ध में ऐमी दशाके द्वारा भीष्म को पाकर शोक समुद्र में डूबाहुआ हूं । १८ । हे अजेय मै वनको जाऊंगा निश्चयकरके मेरा कल्याण बन ही में वर्तमान है हे माय मै युद्ध को मन्छा नही समझताहूं क्योंकि भीमजी सदैव हमारे शरीरों को मारते है, जैसे कि पतंगपक्षी बड़ी देदीप्ति अग्निकी ओर को दौडताहुआ एक साथ भस्म होता है इसी प्रकार हम माग्न के समान भीष्म को भी देखते है कि जो इसकी ओर को गया वही भस्महुभा । २० । हे श्रीकृष्णजी राज्य के निमित्त पराक्रम करनेवाला मै नाश होने में ही हूं और मेरेशरवीर भाई भी शायकों से अत्यन्त पीडामान है, हे मधुसूदनजी वह मेरे भाई भायपपने की प्रीति से मेरेही कारण राज्य से भ्रष्टहोकर धन को गये और मेरेही कारण से द्रोपदी भी महा दुःख में पडी, मैं जीवनको बहुत मानता हूं वह जीवन अब दुःख से प्राप्त होने के योग्य है अब मै शेप अवस्था से उत्तम धर्मको करूंगा, हे केशवजी जो मै भाइयों समेत आप का कृपापात्रह तो अपने धर्म की अविरोधतासे मेरे हितको करो इसमकार के उसके विस्तार युक्त वचनों को सुनकर बड़ी करणा से श्रीकृष्णजी युधिष्ठिर को विश्वासित करके यह वचन am plunged in the oce in of grief on account of Bhishm 18 I shall sa waeris, yurish. I as bawang, meubea but in a forest. i donot trunk the war will do me any good, Madlav, for Bhishm destroys our armios Lahe u insa t which falls as soon as it looks upou a burning fire, we can not loo! Blushm in the fre 20 I mysélf am nearly dead in the attempt to win the hingdom, and my brothers too pro much wounded by ario is My brothors, O destroyer of Madhu, Tere doprived of i ungdom out of live for me and sent ito erile 'for my sale that Dirupidt under sent grent harusłups I love iny Jife, but it is diffi-ult to u» untain it I shall therefore,lne a life a virtue the rest of my dıys If you nie kind to me heslav, do nuo good ns fai as it is not contradictory to the dicta'es of your Dhorin" lezing It was (४८५९) भीष्मपर्व Blishmn Parv [48393 था. सत्यसङ्गर । यस्य ते भ्रातरः शूरा दुर्जया. शत्रुसूदनाः ॥ २६ ॥ अर्जुनोमीम सनश्च वाय्याग्निममतजसी । माद्रीपुत्री च विक्रान्ती त्रिदशानामिवेश्वरी ॥२७॥ मांशपि युक्व सौहादायोस्स्से भीष्मेणपाण्डव । त्यत्प्रयुक्ती महाराज किं न कुर्यामहा हवे ॥ २८ ॥ हनिष्यामि रणे भोप्ममाहूयं पुरुषर्षभम् । पश्यतां धार्तराष्ट्राणायदिने च्छतिफाल्गुना ॥२९॥ यदि भीष्मे हत्ते धीरे जयं पश्यसि पाण्डव । हन्तास्म्येफरये माध फुरुद्ध पितामहम् ॥ ३० ॥ पश्य मे विक्रमं राजन् महेन्द्रस्येव संयुगे। विमु चन्त महास्त्राणि पातयिष्यामि ते रथात् ॥ ३१ ॥ यः शत्रुः पाण्डुपुत्राणां मनुःप्स न संशयः । मदर्थी भवदीया ये ये मदीयास्तवैव ते ॥ ३२॥ तव भ्राता मम सखा बोले, हे धर्म पुत्र सत्पमंकल्प तुम ब्याकुलना को मतकागे तेरे शूरवीर दुर्जयभाई शत्रों के मारनेवाले हैं, अर्जुन और भीमसेन वायु और अग्नि के समान तेजती हैं और दोनों नकुल और सहदेव देवताओं के ईश्वर भगवान इन्द्रके समान पराक्रमी हे, हे पांडव तुम मुझको आज्ञा दो कि मैं भी तुम भाइयों की पीति से भीष्म के साथ लडूंगा हेराना युधिष्टिर जो हुम मुझको भी युद्ध में प्रवृत्त करोगे तो मैं भी उस महा युद्ध में सब कुछ करसक्ताहूं , जो अर्जुन नहीं चाहता है तो मैं पुरुषोत्तम भीष्म को बुलाकर धृतराष्ट्र के पुत्रों के देखते हुएही माझे हे पांडव जो तू वीर भीम के मरनेपरही विजय देयता है तो मैं एकही रथके द्वाग कौरवों के युद्ध पितामह को मारूंगा । ३० । हे राजा तुम युद्ध में महाइन्द्र के समान मेरे पराक्रम को देखो मैं बड़े ३ अनेको छोड़कर उसको योगिराऊंगा, क्योंकि जो पांडवों का शत्रु है वह मेरा भी शत्रु है जो तुम्हारे निमित्त धनादि हैं वह मेरे हैं और जो मेरे हैं वह तुम्हारे हैं। ३२ । आपका भाई मेरा पिट और Iris griefs in details, Shree Krislin felt mucli pity on Y udlirlitlir and thus consoled him, saying, "0 son of Dharm, of true rors, be mot dintir cut in mind. Thay Irve and invincible brothers are elestroyers of chemics Anjưr and Bliimsen aro glorious like Agni and Vayu, nnt both Nækuł and Salakey alo full of prowess like Indra the chief of gols. Allow mo to fight agairt Birislim for your sale. I can diy everything, ir lyttle, Pritce Yuukislıtlrir, if you till err 'sage me in fighting i sbal}, if Arjan be unwithog, challenge Bhii shm and sluall hill frim in the presette of tlige sons of Diuitrashtra- If, O Panda", you see your victory in the death of Blislım, 1 xhall with a single chariot lil the old grandfathct of the Kauaras. 30. You will sec Oking, ny provees like that of India I shall, with mighty weapers, onle hi'n fall for the leisel arct, for the ercay of the Pandaras is niy en myin y picaj city I es in your ord my wealth belcrgs to you as well. 32. Your brother is my friend. hine mi ni गा।

[ 4860] Mahabharat (१८६०) सम्बन्धी शिष्य एव च । मांसान्युतकृत्य दास्यामि फाल्गुनार्थ महीपते ॥ ३३ ॥ ५५ चापि नरव्याघ्रो मतकृते जीवित त्यजेत् । एषन समयस्तात तारयेम परस्परम्॥३४॥ समा नियुचराजेन्द्र यथायोद्धा भवाम्यहम् । प्रनिहातमुपाल ध्येयसन पार्थेनपूर्वत ।। ॥३५॥ घातयिष्यामि गाड्नेय मिति लोफस्य सन्निधौ परिरक्ष्यमिद तावद घच पार्थस्य । धीमत .॥ ३६॥ अनुशातन्तु पार्थन मया कार्यानसंशय । अथ वा फाल्गुनस्येप भार परिमितोरणे ॥३७॥ सहनिष्यति सग्राम भीष्म परपुरभयम् । अशक्यमपि कुर्यादिरा पार्थ समुद्यत ॥ ३८ ॥ त्रिदशान्या समुयुक्तान सहितान् दैत्यदानवे । निहन्यादर्जुन सख्ये किमुभीष्म नराधिप ॥ ३२ ॥ विपरीती महावीर्यो गतसत्वोरपजीवन । भीष्म शान्तनरो नून फर्तव्य नावयुध्यते ॥ ४० ॥ युधिष्ठिर उवाच । परमेतन्महाबाहोयया पदसि माधय । सर्वे होतेनपातास्तव वेगविधारणे ॥ ४१ ॥ नियत समवापस्यामि सम्बन्धी होकर शिष्यमाहै हे युधिष्ठिर मै अर्जुनके निमित्त अपने मांसको भी काटकर देसक्ताहू, और वह नरोत्तम अर्जुन भी मेरे निमित्त जीवनको त्यागकरसक्ता है हे तात हमारा पह नियम है कि हम परस्पर के दुःख से छूटे, सो तुम मुझको युद्ध करने की प्राज्ञा दो पूर्व में जो अर्जुनने प्रतिज्ञा की है उसको पहले से चार रहे है सब लोक के सम्मुख गागेय भीम को मारूंगा उस बुद्धिमान अर्जुन का यह वचन रक्षाकरने के योग्य है, मुझको अर्जुनका प्रण पूराकरना योग्य है यह निस्सन्देह है कि वह शत्रुओं का विजय करनेवाला अर्जुन युद्ध में अवश्य भीष्म को मारेगा और युद्ध में अच्छी रीति से प्रवृत्त होकर असंभव कटिन कर्मों कोभी करेगा, यह अर्जुन युद्ध में क्रोधित होकर देवता और दैत्यों को भी मारसक्ता है तो हे राजा भीष्म का मारना इसको कितनी बड़ी बात है, निश्चय करके महा पराक्रमी शतनु का पुत्र भीष्म विपरीतता और निर्वलता से थोड़ी आयु रखनेवाला होकर करने के योग्य कर्म को नही जानता है । ४० । युधिष्ठिर वोले हे महाराज महावाहु आपका यह सब कथन यथार्थही हे निश्चय कर के आपका धेग किसी and pupil, I can cut an ay my old nu h fu Arjun's she I udlush thir 1, Arjun the best of men can lay doisn his ble for my We sture to nd exch other from mers allow me to fight Ai jun's foruler piow su tu hill Gangest in the presence of all warriors worthy of respe t ind tltsile ble 1 2nm bound to entrefy AiJER'S des re Uuçloubtedly, Arzan the destinyer of focs is stiro to bi Bhislım in little anal will wllieve othici bard and impracticablo deeds When enraged in battle, Aijun can destroy the gods and dannsad the destruction of Blislın is not a very difficult Surely Shantanu's son Bluishm of gient prosess does not know what to do becnu e lio 18 dl and lus lut You are quite right Inns Punce" sac I adlıshtu in rply surely you selocity sahe Is slot"40 (४८६१) भीष्मपर्व Bhishma Parr [18011 सेयमतद्यप्सितम् । यस्य मे पुरुषव्याघ्र भवान् पक्षे व्यवस्थितः ॥ ४२ ॥ सन्द्रानपि रणे देवान जपेय जपतांयर विया नार्धन गोविन्द किमु भीमं महारयम् ॥ ४३ न तु स्वामनृतं कर्तुमुत्सद्द स्वारमा वात् । भयुष्यमानः साहाय्य पयोक्तं कुरमायव ॥४४॥ समयस्तु कृतः फश्चिन्मम भीष्मेणसंयुगे। मन्त्रयिष्य तयाय न तु यातस्ये कथश्चन ४५ ॥ दुर्योधनाय योत्स्यामि सत्यमेतदिति प्रभो ! सहि राज्यस्य में दाता मन्त्रस्य च माधव ॥ ४६ ॥ तस्मादेवव्रतं भूयो यधोपायाधमात्मन । भवताः सहिता सर्ये पायाम मधुसूदन ॥ ४७ ॥ तवयं सहितोगत्वा भीप्यमाशु नरोत्तमम् । नचिरात सर्व वाष्णय मन्त्रं पृच्छाम फौरवम् ॥ ४८॥ स वक्ष्यति हिनं यास्यं सत्य मस्मान जनार्दन । यथा च वक्ष्यते कृष्ण तथा कर्तास्मिसंयुगे ॥४९॥ स नो जयस्य दाता स्यान्मन्त्रस्य च दृढव्रतः । वालाः पित्रा विहीनाश्च तेन संवर्धिता वयम् ॥५०॥ के सहने के योग्य नहीं है, इसको अपने मन की इच्छा के अनुमार मैं अवश्य प्राप्त करूंगा जब कि भाप से कृपानिधि पारे पक्षपर खड़े हैं हे महाविजयस्वरूप | गोविन्दजी तुम से अपने नाय के साय होकर युद्ध में सब देवनाओं समेत इन्द्र कोभी हम विमय करमक्त हैं तो इन महारथी भीमजी का विजय करना कितनी वातहै मैं आपको मिथ्यावादी करना योग्य नहीं समझताहूं हे माघवनी भाप युद्ध किये विनाही अपने स्वाभाविक बल पुरुषार्थ से अपने वचन के अनुसार हमारी सहायता करो, भीष्म ने मुझसे प्रणकिया है कि युद्ध में सलाह करूंगा परन्तुतेरे अर्थ कभी न लहूंगा मैं दुर्योधन केही लिये लडूंगा इममें सन्देह नहीं है कि वह भीष्मजी मुझको राज्य की सलाह के देनेवाले हैं इस कारण से हम मर मिन्न कर आपको साथ लेकर उनके शरीर के मारने के निमित्त उस देवव्रत के पास चले, हे जनादनजी वह हमसे हमारे अभीष्ट सत्य सत्य वचनोंको करेंगे और जैसा वह कहेंगे वैसाही हम युद्धमें करेंगे, वह दृढ़ व्रत भीम हमारी विनय और कीति का देनेवाला होगा क्योंकि पिताकर के विहीन हमवालकों को उन्हीं ने सरकार is unbearable. I own that on my sºde 1 base in you an ocean of hind. Invincible Govind, having you for our noteclor ve can win Indra and the gods; it is tot difficult to conquer Blisht. But I would not make you break your word; for without engaging in battle, Sładhav, yon can tsith your notural strength and protress help us as you have promised. Bhishm has promised to givo ino ad vice in wartimo, though he will fight fur Duryodlian and not for me. No doubt lic will advise me lioir to gain kingdom; we shall therefore go You to Devabrat in order to contrive his death He will, O Janardan, tell us truly low to g in our objoet and so shall act uçon his advico in battlo: Bhishm the observer of true yowe will call us to victory and fitme; for he brought us up from childhood when we wera fathorlesa, 50. I desire, bladlav, to slay iny old grandfatber Bh shm;ato ness with 1:4862]. Malıblidat (४८६२) तचे पितामह वृखं हन्तुमिच्छामि माधव । पित पितरमिष्टच धिगस्तु क्षत्रीदि. काम् ॥ ५१ ॥ सम्जय वाच । ततोवीन्महाराज वाणयः कुरुनन्दनम् । रोचतेमे महाप्राज्ञ राजेन्द्र तय भाषितम् ॥ ५२ ॥ देवव्रत कृती भीष्मः प्रेक्षितेनापि निदहेत् । गम्रतां स ब धोपायं प्रष्टं सागरगासुनः ॥ ५३ ॥ वस्तुमर्हति सत्य स त्वयापृष्ठो विशे पतः । ते वयं तय गच्छाम' प्रयुकुरुपितामहम् ॥ ५५ ॥ गत्वा शान्तनव युई मन्त्र पृच्छाग भारत । स धो दास्थति मन्त्रं यं तेन योत्स्यामहे परान् ॥ ५५ ॥ पवमामयते धीराः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वजम् । जग्मुस्तेसहिताः सर्वे वासुदेवश्च वीर्यवान् ।। ५६ ॥ विमुक्तशस्त्रकरचा भीमस्य सदन प्रति । प्रविश्य च तदा भीमं शिरोभिः प्रणिपेदिरे ॥ ५७ ॥ पूजयन्तो महाराज पाण्डवा भरतर्पभम् । प्रणम्य शिरसाचैन भीष्मं शरण से भरण पोपणकर के इतना बड़ा किया है । ५० । हे माधवजी जो मैं अपने पिता के भी पिताटद्ध भीष्म पितामह को मारना चाहताहूं ऐसे क्षत्री धर्म को और क्षत्रियों की जीविकाको शिकार है, संजय बोले हे महाराज फिर श्रीकृष्णजी कौरवनन्दन युधिष्ठिरमे कह ने लगे कि हे बड़ेजानी राजेन्द्र तेरा कहना मुझको अच्छालगता है शुभकर्मी देवताओं के वरावर व्रतरखनेवाला जो दृष्टि सेभी दूसरे को भस्म कर मक्ता है उस भीष्मके पास उसी से उसके मारने का उपाय पूछने के निमित्त जामो, वह तेरेपूछने पर हम से सत्यही सत्य कहेगा इससे हम सब मिलकर उन कौरवों के पितामह के पास पूछने के हेतु चले, हे भरत वंशी हम, वृद्ध भीम से मिलकर सलाह को पंछे वह हमको जो सलाह देगा उसी के अनुसार हम शत्रुओंमे युद्ध करेंगे, हे पांडुके बड़े भाई धृतराष्ट्र वह वार पांडव इस रीतिसे सलाह करके सबने वासुदेवजी समेत शस्त्रों से रहित होकर उस भोप्य के डेरों में प्रवेश करके उनको बड़ीनम्रता पूर्वक प्रणाम किया, हे राजा इमरीति से श्रीकृष्ण समेत पांडवलोग शिर से प्रणाम करते हुए भीष्मजीके समीप बैठने के स्थानों में inut hskantrya dharm and hsbrati ya life blameable?" Sinjaya continued "Then, u) great king, Shce krishn said to Vudlishthil the joy of Kaunvas, " I like your dea, rise Puince. Let us go to Bhishim the virtuous, of true vous li e gods, who can liy Lis mere look burn others, in order to seek from his own lips the manner of his dea'b B-ing ash ci by you, he will sperk the truth Lot us therefore all go together to ask of the grandfatl.or of tho Kau'ayas what is to be done We shall take counsci of old Bhishm, O deseendant of Bharat, and shall act accordingly in fighting aga'nst oui enemies." Ilus Paving con ulted together, the Pandavas together with Vasndes, vent without aims in the tent of Bhi-In and humbly boned dotti to liim. And thus lowing down with their bonds, the Pandares with Shno Krishn; apptoached tie seat of Bluishm. Then Lrave - - . (४८१३) भीष्मपर्ष Bhishma Parv [4863] मध्ययुः ॥ ८॥ तानुवाच । हाराहुमाँमः कुरपितामह । स्वागत तब वार्णयस्वागत- म्तेधनञ्जय ।। ५९ ॥ स्वागतं धर्मपुत्राय भीमाय यमयोस्तदा । किं चा काय करोम्म घयुष्माकं प्रीतिवर्धनम् ॥ ६॥ ॥ सामनापि फास्ति यदपि स्यात् सदुप्फरम् । तथा प्रयाण गाङ्गेयं प्रीतियुक्त पुनः पुनः ॥ ६१ || उवाच राजा दीनात्मा प्रीतियुक्त मिदं पच । कथं जयेम सर्वज्ञ कथं राज्यं लभेमहि ॥ १२ ॥ प्रजानां मंशयोनस्यात् थ थतन्म यद प्रभो । भयान् हि नो यधोपायं प्रयीतु स्वयमात्मन ॥ ६३ ॥ भवन्तं समरेपीर विषहेम कथं चयम् । न हि ते सूक्ष्ममप्यस्ति र फुरपितामहे ॥ ६४॥ मण्डलेनेघ धनुषगर्दै दृश्यसे संयुगे सदा । माददानं सन्दधान विकर्षन्तं धनुर्न च ॥६५पश्याम स्त्वांमहावाहो रथ सूर्यमियापरम् । रथाश्यनरनागाना हन्तारं परवीरहन् ॥ ६६ ॥ को थयोत्सहते जेतुं त्या पुमान् भरतर्षभ । यर्षता शरवर्षाणि सयुगे यशमं कृतम् ॥ ६ ॥ पहुंचे, तब पौरखों के पितामह महाबाहु भीमजी श्रीकृष्ण जीमे बोले कि हे कृष्ण आपका आना शुभदायकहो और हे अर्जुन तेराभी भाना सफलहो, और युधिष्टिर भीमसेन नकुल सहदेव कामी आना मंगल कारीहो यह कहकर कहा कि अब मैं तुम्हारी प्रीति का बढ़ाने वाला कौनसातुम्हारा शिष्टाचारकम् । ६० में तुम्हारे दुःस्वसभाकरने के योग्य हितको आत्मा से करनेको उपस्थित हूं इस प्रकारकेमोतिपूर्वक वारंवार वचन कहनेवाले गांगेय भीमजी से महादुःखीचिन युधिष्ठिर बड़ी प्रीति में डूबकर यह बचन बोलाकि हे सर्वज्ञ हम कैसे सब को विजय करें और कैमे राज्यको पात्र, और फिमरीति से मजालोगों का नाशनहो हे प्रभु इम को हममे कहिये और अपने भी मरण का उपाय हमको वताइये हे महावीर हम युद्ध, को आपको सहसके हे हमप्तव के पितामह आपके किमीमुक्ष्म दोपको भी हमनहीं जानते, तुमसदैव युद्ध में घनुप मंडल के साथहीदृष्ट पड़तेहो हे महाबाहु हमलोग आपको धनुप चढ़ाते वाणलेते संधानते और द्वितीय सूर्यके समान रथपर मवारहोते Bbishım the grandtather of the Kauravas thus addressed Shirce Krislin." You are welcome Shree Kiislin and you too, Arjun, wul gain the object of your desire Yudhishtbir, Bhiilsen, Nahul and Sahdev too are irclcome" Then he said, "Vliat should I do to secure your love and peasure? 60 I z'n reuly with all my soul to do the most diffi-ult work for your sahe.” Hearing the aflection- Ate words of Blushm, repeated again and ammin, Yudhishthir, plunged in deop love said, How, O omniscience, shall we conquer all and win our kingdoin? Hor can we avoid bloodshed ? Tell me this as well as the manne of your death. How can we bear you in battle, mighty warrior ? We do not know the least yeahness of Fours grandfathor. You are always scen cícling yonr bour in the field of battlu; tre can not see you ridium sonr chariot kle second sun ॥

- (48641 Mahabharat (४८६४ सय नीताहि पृतना सयुगं महतीमम । यथा युधि जयेमस्या यथा राज्य भृशमम मम सन्यस्त्र च क्षेम त म हि पितामह । ततोप्रवीच्छान्तनष पाण्डपान् पाण्डपूर्वज ॥ ६९ ॥ न फवन कौन्तय मपि जीवति मयुगे । जयो भवतिसर्वत सत्यमेत प्रबोगिते । ७० ॥ निजिते मयि युद्धेन रणे जेप्यथ पाण्डवा । क्षिम मपि प्राहरध्ध यदीच्छथ रण जयम् । ७. ॥ अनुजानामि व पार्था महरम यथासुखम् । एर हि सुस्त मन्ये भवता विदितोयहम् । ७२ ।। हते मयि हत सर्व तस्मादेव विधी यताम् । युधिष्ठिर उवाच । बाहि तस्मादुपाय नो यथा युद्ध जयेमहि ॥ ७३ । भवन्त समरे क्रुद्ध दण्डहस्तगिवान्तकम् । शक्योषज्रधरो जेतु घरुणोथ यमस्तथा ॥ ४ ॥ न भवान् समरे शक्य सेन्ट्रैरपि मुरासुरै । भीष्म उवाच । सत्यमेत महाधाहोयथा | हुए भीनही देखते है हेशत्रुनों के वीरलोगों के मारने वाले हे रथयोहे मनुष्यों के मारने वाले, हे भरतपम भवकिसपुरुपकी सामर्थ्य है जो आपको युद्धमें विजय करमके आपने अपनेवाणों की वर्षाकरके युद्ध में प्रलयमचाकरमेरीवडी सेनाकाना- शकियाहै प्रवजेसी रीतिसे हमतुमको युद्धमें विजयकरके राज्यकोपावें और मेरी सेनावचे हे पितामह वही आपको कहना योग्यहै इसके अनन्तर पाएडुके पिताभीष्मजी सब पाण्डवोंसे बोले, कि हे सर्वज्ञ युधिष्ठिर मेरे जीवतेहुए युद्ध में जैसेकि विजय नहीं होतीहै उसको मैं तुझ से कहता हू ।। हे पाण्डव लोगो युद्ध में मेरे विजय होने पर युद्धकेही द्वारा तुम शत्रुओं को विजय करोगे जो युद्ध में विजय चाहते हो तो शीयही मुझपर प्रहार करो, हेकुन्ती के पुत्रो मै तुमको भाज्ञा देनाह तुम आनन्दसे मेरे ऊपर महार करो मै इसरीति के कर्म को बहुत उत्तम मानताह और मुझको तुम अच्छी रीति से जानतेहो कि मेरेही मरने पर शत्रुओं की सब सेना मल्पही काल में मारी जायगी इसहेतु से तुम ऐसा कर्म करो, युधिष्ठिर वोले कि वह उपाय वतलाइये जिस से कि दडहाय मे लिये मृत्यु के समान युद्धमें फुद्धरूप आपको wlon patt ag arrows to your bur Destroyc of the Harriors chariots, horses and mou of the enemy best of Bharats who can conquer jou bittle? Jou have with the shss or of your arrons, mobyleted was lar o uriny, now let me kno: giundfathor how to conquer you &* tho kingdom and savo my umies At this Bhaslım tlie lather of Pandu thus addressel the Pandavas, I shall tell yout, Wise Yudhishther, why you cannot gain victory as long as I live 70 Having conquered me in battle o Pandav, jou will defeat all the enenuis by fighting Lay hands on me if you dosiro victory I gire you permission cons of hunti, to discharge cheerfully Jour weapons I this sort of sork Hou know well tlint all the army of the enemies will to estu pated soon after my death and there foro you slould do it said Yudhisthir How we can Rt me upprove • Tell me - . (५८६५) भीष्मपर्व Bhishma Pary [4805} यदास पाण्डय ॥ ५५ ॥ नाहं जेतु रणे शक्यः सदैरपि सुरासुरैः । आत्तराखो रणे पत्तो गृहीतवरकार्मुकः ॥ ७६ ॥ ततो मा पस्तशस्त्रं तु एते हन्युमंहारथाः। निक्षिप्त शस्त्रे पतिते विमुक्तफयचध्वज । ७७ ॥ द्रवमाणे च भीते च तयास्मीति च वादिनि । स्त्रियांनीनामधेये च विफले चैफपुप्रिणि ॥ ७८ ॥ अमशस्ते नरे चैव न युद्धं रोचते मम । इमं मे गुणुराजेन्द्र संकल्पं पूर्वचिन्तितम् ॥ ७९ ॥ अमगल्यध्वज या न युध्येय कदाचन । य एप द्रौपदो राजेस्तव सैन्ये महारयः ॥ ८० ॥ शिखण्डी समरा मर्षी शूरव समितिञ्जयः । यथाभवञ्च स्त्री पूर्व पश्चात् पुंस्त्व समागतः ॥ ८१ ॥ जानन्ति च भवन्तोपि सर्वमेतद्यथातथम् । अर्जुनः समरे शूरः पुरस्सत्य शिरसण्डिनम् विजयकरें, वनधारी इन्द्र वरुण कुबेर और · यमराज भी विजय करने को योग्य हैं. परनु आप युद्ध में देवेन्द्र समेत देवता और मसुरों से भी विजय करने के योग्य नहीं हैं, भीमनी वोले हे महावाहु पांडव जो तू कहता है वह सत्यही है यथार्थ में मुझको इन्द्रसमेत देवता और असरभी विजय करनेको समर्थ नहीं होसक्ते, जोकि शस्त्रकाधारण करनेवाला युद्ध में कुशल उत्तम धनुपका बँचने वाला मैंहू इसहेतु से यह सब महारथी मुझशखों के त्यागने वालेको मारे, शस्त्र त्यागने वाले पृथ्वी पर पड़े कवच और ध्धनासे रहित भागेहुए भयभीत और शरण में आयेहुए वा स्त्रीके समान नाम रखने वाले व्याकुल वाएक पुत्र वाले | से अथवा नीच मनुष्य के साथ युद्ध करना मैं उत्तम नहीं समझताहूं, हे राजेन्द्र पूर्व विचार कियेहुए मेरे इस संकल्पको सुनों कि मैं अमंगल रूप ध्वना को देख करकभी नहींलड़ता, हेराजा तेरी सेनामें यह द्रुपदकावेटा महारथी युद्धमें क्रोधरूप र वीर युद्धको जीतने वाला शिखण्डी नामहै । ८० । यह जैसे कि स्त्री हुमा और पीछे से पुरुपके चिह्न पाये इसका जैसा कि वृत्तान्तहै उसकोतुमभी जानतेहो शूर conquer you in Lattle nhen you soam like Death the bearer of staff, Indra the rielder of vajra,Varus, Kuver and Yamraj may be conquerd, but yow are invincille lyr indra and the gods and denovar" are right," replied Blislım, "undoubtedly the gods headed by Indra and the danavas cannot conquei as long as I use my weapons dextervusly in battle and diaw my good buv. Let tlie varriors therefore slay mo when I bave laid aside my arms. I donot like to fight with one ho has laid down arms, one lying on the ground, witsout armour and banner, running anay, terrified, seeking refuge, having it wonian like maino, distressed, father of ope son or a low born. Hear, O hing the resolution which I have arrised at: I nover fight with one having ominous banner; in tly army, 0 hing, Drupad's son, Shilkhandi is a brave and invincible wrrior 80. You know alio dy how a woman at first he gained manhoxl. shall not Myau [4866] Mahabharat (४८६६) ।। ८२ ॥ मामेव विशिखेस्तीक्ष्णैरभिद्रचतु दशित । अमगत्यध्यजे तस्मिन् स्त्रीपंच विशेषत ॥ ८३ ॥ प्रहर्तुमभीप्सामिगृहीतेषु कथचन । तदतर समासाद्य पाण्डवों मांधनन्जय ॥ ८४ ॥ शौर्घातयतु क्षिप्र समन्ताद् भरतर्षभ । न त पश्यामि लोकेषुमा हन्याद्य.समुद्यतम् ॥८५॥ ऋतेकृष्णान्महाभागात पाण्डवाहा धनजयात् । एषतस्मा तूपुरोधाय कचिदन्य ममानत ॥८६॥ आत्तशस्त्रो रणे यत्तो गृहीतवरकार्मुफ । म पातयतु वीभत्सुरेव तयजयोधुवम् ।। ८७ ॥ एतत् फुरप कोतेय यथोतं ममसुप्रत । संग्रामेधार्तराष्ट्रांच हन्या सर्वान् समागतान ।। ८८ ॥ सन्जय उवाच । ते तु नात्या तत. प्रार्था जग्मु शिविरं प्रति । अभिवाद्यमहात्यान भीष्म कुरुपितामहम् ॥८९॥ तथोक्तवति गाङ्गेये परलोकाय दीक्षिते । अर्जुनो दु खसन्तप्त. सनीडमिदमप्रवीत वार युद्ध में शस्त्रोंस अलंकृत अर्जुन शिखण्डी को भागे करके विशिख वाणोंसे मेरेसम्मुख जो आयेतो धनुषवाण हायमें लिये हुएभी उसअमंगली धजावाले वा पूर्व में स्त्रीरूप रखने वाले पर भै किमी दशामें भी प्रहार करना नहीं चाहताहूं हेराजेन्द्र युधिष्ठिर उस सेनाको पाकरशीघ्रही पांडव अर्जुनमुझे चारोंमोर को बाणोंसे मारे, मैं सब लोकों में महानुभाव श्रीकृष्णजी और पांडव अर्जुनके सिवाय किसीको नहीं देखताहूं जो मुझ युद्ध में प्रत्तको विजय करसके इस कारण यह शस्त्रधारण करने बाला और उत्तम धनुषधारी अर्जुन किसी दूसरेको मेरेआगे नियते करके, मुझको | मारे निश्चय कर के इतरीति से तेरी विनय हे सुन्दरबत युधिष्ठिर तुमहदस मेरे वचनको प्रतिपालन करो और युद्धमे सम्मुख होने वाले सब धृतराष्ट्र के पदों को मारो संजय बोले कि इन वार्तालापोंके पीछे वह पांडव लोग सत्र वातों को जानकर भीष्मनीको दण्डयतकरके अपनेडेरों को गये, परलोक जानेको उत्सुकदीक्षा किये हुए गांगेय भीप्पनी के इसमकार कहने पर दुःख से शोच ग्रस्त भर्जुन वड़ी लज्जा से यह वचन बोला हे माधवना मै युद्ध कुलके वृद्ध महाज्ञानी बुद्धिमान कौरवों के discharge my weapons at Suklandı who lo an ominous Lannor and wlio was toimurly a woman, if he com s boforo ma with bon and ar low, and is followed by Arjun the bave in fight ani ai mod with Weapons Let Arjun and his army i vund me with lus arrows from all sides I seg none excopu mighty Kreslin and Aljun the Pandav that can conquan me m bat le I hon let this armed anchor Arjun preceded by tlio other, discla ye luis veipons at me This is the only to you conquest Act upon my advice, urtuous Yudhishthir, and destroy all thio 8019 of Dhirituuslitru in butulo' Srninya continu. od. - 'Having thus convo:sed together, the Pandiyas learnt all that 5n9 nocessary, and liaying buwed down to Blushm went to their Heung tho wards of Blushım the call of Gangn, desilous of doparting to the next so ld, Aljun plunged in grief and shame, tlus rudi essed Krishin -- " Hoy shnil I bhyt ngamust tha head of the way Cimp (४८६७) भीष्मपर Blushma Part [ 48071 ॥ ९ ॥ गुरुणा पुरहंद न कृतप्रोन धीमता । पितामहेन मग्राम पय यौद्धाभिमगाधर्ष ।। ९५ ॥ कीडता हि मयागाये वासुदन महामना । पामुरूपितगारेण महात्मापरपी छत ॥ ९२ ॥ यस्याहमधिल्हाद बाल फिलगदाग्रज । तातत्यनोच पितर पितु पाण्डामहात्मन ॥ ९३ ॥ नाह साततर पितुम्तातास्मि तय मारन । इति मामयची हारये य स वध्य कय मया ॥ ४॥ याम यध्यतु म य मे नाह योत्स्थे महात्मना । जयो वास्तुपयो चामे कथ वारण मन्य स ॥ ९॥ वासुदेव उवाच । प्रतिनाय वध जिष्णा पुग भीमस्त्र संयुगें । क्षत्र:स्थित पार्थ कय नेन हनिप्यसि १९६॥ पातरीन रथात् पार्थ क्षत्रिय युद्धदुर्मदम् । नाहत्वा युधि गागेय विजयस्ने माथि प्यति ।। ९७ हष्टमेतत्पुरादमिप्यति यमक्षयम् । यहि पुरा पार्थ तत्तया न पितामह भीष्मनी के माध कैमे युद्ध करूगा । ९० । हे वासुदेव जी वाल्यावस्था खेलो हुए धूठभरे टेसे मैने वडे साहनी पितामह को धूल में मिलाया. निश्चय करके हे श्रीकृष्णजी मुझ बालकने जिमकी वगलमें चढकर अपने पितामहान्माणदु के पिताको तात कहाहै, हेमाधवजी जिमने पाल्पाकायामें मुझको कहाथा कि मे तिरेपिताम तातह तेरातात नहींनू उप को मै किसमकार से मारने के योग्य वह अपनी इच्छाके अनुसार मेरी सेनाको मारे परन्तु उस महात्मा के साथनही रहगा मेरीविजय होय ना मृत्युहो हे श्रीकृष्णनी चाही आप मुझे किसी प्रकार से जानों, वासुदेव जी बोले कि हे विजय करने वाले अर्जुन तुम पूर्ण समय में युद्धके बीच भीप्पो मारने का प्रण करके क्षत्री धर्ममें नियतहुएहो सो तुमरे से उमको नहीं मारोगे, हे अर्जुन इम युद्ध में दुर्मद मत्री को रथ मे गिराओ तुमयुद्धमें गगापुत्रको दिनापारे समारमें विजय भोर कीर्ति को नहीं पाओगे, प्रागे के समय में देवताओं ने देखा था कि तुम यमलोक को जानोगे सो हे अर्जुन यह बात मिथ्या नहीं है, famly, Bhrslim tire wise grindf ither of the hauraras 90 1110, O Varulev olten made the budy of the grandfrther dirly with my dust st inod tout when I wis playing in childhoud Surely 0 Kusimy the fatho of the géit Pindu liom when in his laat Cullock fattic and who in my childliood told me that he was not my father, but my father's father, I cannot fint in my heart that I touldkill lun I et lim, at hvis de tre, destroy my armies, lut ! slial} not lig'at gunst (na slietlicr I conqner or die O Krish or hirteer jou muy blair of an 16utare rheady unde a pro thise, S: bahan " that you will hill Bhushm in battle How is it that you cay jou with rot l ull hi u? Cu tlie fall of that great it ki fiots his thumot, O Arjun Yeu tan neid er gain Victory nor #oldly late with at b llig Blr) en The gods la10 already foru:een ti t you would to ite re_101 of Wall aid tiis can not lo falc done except you not eien It did the wilder of [ 4868 ] Mahabharat (४८६८) तदन्यथा ॥ ९८ ॥ न हि भीष्म दुराधर्ष व्यात्ताननमियान्तकम् । त्वदन्य शपनुया घोखमपि वज्रधर स्वयम् । ९९ ।। जहि भीष्म स्थिरो भूत्वा शृणुचेदं वचो मम । यथोवाच पुराशक्रं महाधिवृहस्पतिः ॥ १० ॥ ज्यायां समपि चेद् वृद्ध गुणैरपि समन्धितम् । आततायिनमायान्त हन्याद् घातकमात्मम ॥ १०१ ॥ शाश्वतोयंस्थितो धर्मः क्षत्रियाणां धनञ्जय । योचव्य रक्षितव्यञ्च यमध्यश्चानुसूयुभिः । १०२ ॥ अर्जुन उवाच । शिखण्डी निधन कृष्ण भीष्मस्य भाषिताभुवम् । पृथ्वैध हि सदा भीष्म पाञ्चाल्य विनिवर्तते ॥ १०३ ॥ ते वय प्रमुख्ने तस्य पुरस्कृत्य शिखण्डि नम् । गाङ्गेय पातयिष्याम उपायेनेति में मति ॥ १०४ ॥ अहमन्यान्महेप्यासानुवार यिष्यामि सायकै । शिखण्यपि युधां श्रेष्ठ भीष्ममेवाभियोधयेत् ॥१.५ ।। श्रुतहि तेरेसिवाय आप वज्रधारी इन्द्रभी इस महाबली मृत्यु के समान अजेय भीष्म से लड़ने के लिये समर्थ नहीं है इस्से तू स्थिरहोकर भीप्मको मार और इस मेरेवचनको सुनकर जैसे कि पूर्वकाल में बड़े बुद्धिमान दृहस्पतिजीने इन्द्र से कहाथा कि अपने मारनेवाले आततायी आनेवालेको मारेचाहे वहगुणोंसे भराहुआ कुलका द्धभीहो ।१०। हे अर्जुन युद्धकरना रक्षाकरना दूसरेके गुणों में दोपलगानेवालेका पूजन न करना यहक्षत्रियोंका सनातन धर्मचनाआया है, अर्जुन बोले हे श्रीकृष्णजी शिखण्डी भीष्मनीका अवश्य कालहोगा क्योंकि भीष्मनी उस पांचालदेशी शिखण्डीको युद्ध में देखकर सदैव लैटजातेहै, इस्से हम शिखण्डीको उस के सम्मुख कर के युक्तियों से उस गांगेय भीष्मको युद्धमें अवश्य मारेंगे यह मेरा मतहै, मैं अपने शायकोंसे अन्य बड़े २ धनुपधारियों को रोकृगा और शिखंडीबड़े युद्धका भीष्मकेही आगे युद्धकोकरे, मैने उन कौरवेन्द्र भीमजी केही मुखसे सुना है कि मैं शिखंडी को नहीं मारूंगा निश्चय यह पूर्ब समय में कन्या होकर पुरुष यना है, vajra, con cope in battle with Trive Bhishm who is invincible like Death Bo therefve sta xdy in killing Bluslim and herr the words which are the same as wise Vrihaspati said to India, Kill your enemy who att icks you whether he be fell of yntues on the li ad of youi fımıly' 109 Fighting protecting and not giving respect to one cho paints a sutuous cluracter black are the old practices of lella tryas' Arjun said " Shikhindi sill surely be cruse of Bhiehn's death, 0 Krishn, for Bhishin xrays turns back from battle at We shall make Shl handi to lace Blushin and thus shall kill him with artfulness This is my resolution I shall check the other gient archers with my amous and Shikhudi will be able to fight ngainst Blushin I have hand it said by Bluist m humself that he would not hill Sluklandı who was tramsformed fiom womiood to manhool Ilus the Pandavas came to resclution sseing him (४८६९) मीपपर्य Bhishtha Part [4869 कुरुमुस्यस्यनाई हन्यां शिखण्डिनम् । कन्या ह्येषापुरा भुत्या पुरुषः समपद्यत ।१०६॥ प्रत्येनिश्चयकृत्या पाण्डवाः समाधवाः। । अनमान्यमहात्मानंप्रययुहष्टमानसाः ॥१०॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि नवमदिवसाहारत्तमोमन्त्र वाधिकशतोऽध्यायः ॥ १०८।। धृतराष्ट्र उवाच । कथं शिखण्डी गायमापवत सयुगे । पाण्डयाध कय मीण स्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥१॥ समय उपाच । ततस्तेपास्वा. सर्वे मर्पस्योदय प्रति। तापमानास भरीषु मृदङ्लेवानकेपुच ॥२॥ मायसुदाधिवर्गेषु जलजेपुसमन्ततः। शिखण्डिनं पुरस्कृत्य निर्याताः पाण्डवायुधि ॥ ३ ॥ हरयाई महाराज सर्वशत्रु निवईणम् । शिखण्डी सर्व सैन्यानामन भासीद्विशाम्पते ।। ४ । चक्ररक्षी ततस्तस्य भीमसेनयनम्जा पृष्ठतो द्रौपदेयाध सीमधेय वीर्यवान, ॥५॥सात्यफिकितानस्य तेषांगोता महारय । घृष्टयुम्नस्ततः पश्चात् पम्चालेरभिरक्षितः ॥६॥ ततों युधिष्ठिरो इस प्रकार से पांडव लोग अपने वांधवों समेत निश्चय करके और महात्मामों का प्रतिष्ठा पूर्वक स्तुति पूजन करके ममन्न चित्त अपने २ ढेरोंको गये १०७ ॥ अध्याय ॥ १०९॥ धृतराष्ट्र बोले कि शिखंडीनयुद्ध किसरीति से गांगेयनीको उल्लंघन किया और भीमजीने किसरीति से पांडवोंको उल्लंघन किया हे संजय इसको पुझे सम झाकर कहो, संजय बोले कि मातःकाल मूर्योदयके समय भेरी मृदंग ढोल आदि वाजोंके वनने और चारों ओर से दधिवर्ण शंखों के वजने पर वह सब पांडव शिखंडी को भागे करके युद्ध भूमि में गये,, हे महाराज राना धृतराष्ट्र सय शत्रुओं के नाश करनेवाले व्यूहको करके मर सेनाओं के आगे शिखण्डी हुआ, इसके पीछे भीमसेन और अर्जुन उसके चक्र के रनकहुए और द्रौपदी के बेटे और पराक्रमी अभिमन्यु पछिकी भोर हुए, फिर सात्यकी चकितान और उनके ५ and having paid respect and praises to thoir elders went chee fully to their respective comps." 106. CHAPTER CIS. How did Shillandi," As':ed Dluitrushtia of Sanjaya, "defeat Bliislım the son of Ganga in batt), and how did Bhisha annoy the Pandavas ! Pray toll me all this in detail." " la tho morning," said Sanjaya, " the Pandavas led by Shikhandi entered the field of Unulle and vere accompanied by the sounds of trumpets, drums and conchs white as the curds of milk. Having fornied an array destructiro of chemnicy, Slulbandi lod tlie army. Blusen and Arjun protected the wheels of his chariot; the cons of Draupadi and Abhimanyu wore at his back and behind them were Satyali, Cliekitan । 148101 Mfalalarit (४८७२ राजायमाश्यां सहितः प्रभुः । प्रयया सिंहगादेग नादयन् भरतर्षभ । ७॥ विराट सुनतः पश्चात स्पेन सन्येन सवृत । द्रुपदश्च महापाहो ततः पादुपाद्रवत् । ८० फेकपा मानर पञ्च धूरकेतुश्च वीर्यवान् । जघन पालयामासु. पाण्डुमैन्यस्यभारत ॥ २॥ महामहासन्यं पापवास्तर वाहिनीम् । अपद्रवन्तं सग्रामे त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ॥ १० ॥ तधव फरवो राजन् भीष्मे वृत्या महारथम ! अग्रतः ससन्धानांप्रय. पाण्डवान्प्रति ॥ ११ । पुस्तव दुराधर्षो रक्षितः मुमहाबलः । नतो द्रोणो महेवासा पुत्रश्चास्य महारल ॥ १२ ॥ भगदत्तस्ततः पधारगजानी फेन संथन. । रूपश्च कृतवर्माच भगदत्तमनुप्रतौ ॥ १३ ॥ काम्बोजराजो वलयांस्तत पश्चातसुदक्षिण । मागधश्चजयाननः सौवलश्चयुहद्वलः १ १४ । तथैवाये महेप्पासा: मुशर्मप्रमानणः । जघन पालयामासुस्तष संन्यस्यभारत ॥ १५ ॥ पीछे पांचाल देशियोंसे रक्षिक महारथी धृष्टद्युम्न उनका रक्षक हुआ इसके अननर नकुल सहदेव समेत सत्रका प्रभु, राजा युधिष्ठिर सिंहनादों को करता हुआ चला। उनके पाछे राजा विराट अपनी सेनाको साथ लेकर नली हेमायाहु उसके पाछे गगा द्रुपद चला, फिर पांचोंभाई केकय और पराक्रमी धृष्टकेतु ने पांडवी सेना के जवास्थान को रक्षित किया, इस रीति से पाण्डव लोग अपने बड़े व्यूह को रच कर और अपने जीवन की भाशा को त्याग कर युद्ध भूमि में आपको सेनाके सम्मुख आये । १० । हे महाराज इसी प्रकारसे कौरव लोगभी सब सेनों के आगे महारथी भीमको करके पाण्डवों के सम्पुर गये। यह अमेय भी आपके शूरवीर पुत्रों में रक्षित थे उनके पीछे पड़े धनुपधारी द्रोणाचार्य और उनका महावनी पुत्रया, इस के पछि हाथियोंकी सेना समेत राजा भगदी और इमकी रक्षा कृपाचाय्य और कृतवर्याथे, इसके पीछे राजा काम्बोज सुदक्षिण जप. मेन राजा मगध शनि और हदल थे, हे राजाइमीमकारमशर्मा श्रादि भन्य and Duislitnu yumn puoto, toully tlo Pamil warriors. After them fent Yeldaislicker the kidol oeld, zwaring liho a lun avud accomput ly Valul and Sabulov. Their carne le long ot Virat logeulur witly liis armics suul was followed log hiny Drupad. Tio live Kailesi brutles 8 anil Durostalo. poetled to hear of lliu Panday Armi. Tocus Coc Patussex, lia 10. Matigend their giant army apples of their lives fueto vodi armun 10). In the saine mensier, 0 hing, the Kuurns uimus lalle. Blusting faced the Bundusay. The invincibile Blinda woss glorile by your 20 is al but they were to great a refers Urunud ja and his sulluut on. Behind thou as die Blwlatta with lind muy of clplanuts protectial by Kripaching sa and irresama Thes caus the kings of Comkj. Sudihshin and Jayates. tire king of a hugelli, Shabani a sd B.al wa Susun.11. aud ulicy Wocher '7112 p vlertel the iter. Ou each day, Bindslen thing (४८७१) भीमप Bhishmm Pany [ 4871 दिवसे दियसे प्राप्त भीष्मः शान्तनयो युधि । आमरानकरोठयहान् पंशाचानथ रास सान् ॥ १६ ॥ ततः प्रयवृते युछ तय तेपाशभारत । अन्योन्यं नितां राजन् यमराष्ट्र विवर्धनम् ।। १७ ॥ अर्जुनप्रमुग्लाः पार्थाः पुरस्कृत्य शिषण्डिनम् । भीष्मं युद्धेश्यच. तन्त फिरन्तो विविधान् शान् ॥ १८ ॥ तत्र भारत भीमेन ताडितास्तावकाः शरः । कविरोधपरिक्लिन्नाः परलोकं ययुस्तदा ।। १९ । नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्चमहा रथः। तब सैन्य समासाद्य पीडयामासुरोजमा ।। २० ।। ते वध्यमाना. समर तावका भरतर्षभ । नाशक्नुघन धारयितुं पाण्डवानांमहद्वलम् ॥ २१॥ ततस्तुताधकं सन्य घध्य मानं समन्ततः । इमम्प्राप्तं दश दिशः काल्यमानं महारथैः । २२ । त्रातारं नाध्यगच्छन्त तावका भरतर्षम । यध्यमानाः शितर्वाण- पाण्डवैःसहएमयः ॥ २३॥ धृतराष्ट्र उवाच । पडियमान वल दृष्ट्वा पार्थंभीष्मः पराक्रमी । यदभाषी बड़े धनुपयारी राजाओंने भापकी सेना के जयनस्थान को रक्षित किया, प्रत्येक दिनके वर्तमान होनेपर शन्तनु के पुत्र भीमने युद्धके भीतर आसुर पंगाच और | राक्षस व्यूहों को अलंकृत किया. हे भरतवंशी उस के पीछे परस्पर में मारतेंडुए आप के पुत्रोंका और पाण्डवोंका यमराज के देशकी वृद्धि करनेवाला महाघोरयुद्ध जारीहुआ अर्जुन आदि पांडव शिखंडीको अ.गेकरके नानाप्रकारके वाणोंकी पा करतेहुए युद्ध में भीष्म के सम्मुख वर्तमानहुए, वहां आपके शूरवीर भीमसेनके वाणों से घायल रुधिर में हुए परलोकको सिधारे, और महारथी सात्यकी और नकुल सहदेवने आपकी सेनाको पाकर अपनेपराक्रमसे पीडामान किया।२०हेराजा युद्धमें घायल वह आपके शूरवीर वांडवों की बड़ी सेनाके रोकने को समर्थनहींहुए, फिर आपकी सेना चारों ओर से घायल दशो दिशाओं में प्रथक २ होकर महारंथियों के हाथमे अधिक व्याकुल होकर भागी, हेभरतर्षभ पांडवों के तीक्ष्ण वाणों से घायल मृनियों समेत आपके शूरवीरों ने कोई अपना रक्षक नहीं पाया, धृतराष्ट्र वोले हे संजय पराक्रमी भीमने पांडवों के हाथ से पाहायान सेना को देखकर युद्धमें क्रोध son of Shantanu had form. Asor, Paishach and Tahshes ways Then there was a screio fighting between your sons and the Pandavas, slaying cach other and augmenting the population of Yani's abode. Arjun and other Pandavas led by Shikliandi faced Bbisbm with showers of arows. Your warriors, srounded by the arrows of Bhimsen, went tu the rogion of Tam. Vulliaut Satyahi, Makul and Sahadev annoyed your variiors with their arion s. 20. Wounded in baltle, your Warriors were unable to check the army of the Panda Yay Your army wounded on all sides, dispersed in different dıractions and ran away much wounded. Wounded by the sharp arıows of the Papdayas and the Srinjayas your sparriors could find no propector." "Tell me Sanjaya, all that valliant Bhishım did at seeing his army - 14872) Malabhaat (४८७२) द्रणे क्रुद्धस्तन्ममाचक्ष्व सम्जय ।। २४ ॥ कथंया पाण्डवान्युद्धे प्रत्युद्यात पल्ता । गिनिनन् सोमकान धीरस्तदाचक्ष्व ममानघ ॥ २५ ॥ सञ्जय उवाच । आचक्षे ते महाराज यंदकात पितातय । पीडिते तव पुत्रम्य सैन्ये पाण्डयसुजय । २६॥ महटमनस शूरा पाण्डया पाण्दुपवज । मध्यवर्तन्त निमन्तस्तव पुत्रस्यपाहिनीम ॥ २७ ॥ त धिनाश मनुष्येन्द्र नरवारणयाजिनाम् । मामृष्यत तदा भीग सेयघात रणे परे । २८ स पाण्डपान् महेन्यास पञ्चालाश्चैघ सनयान । नाराचैर्वस दन्तश्च शितैरम्जलिफैस्तथा ॥ २९ ॥ अभ्यवर्षत दुर्धर्षस्त्यक्त्या नौषितमात्मन । स पाण्डवाना प्रवरान् प०च राजन महारथान् ॥ ३० ॥ भात्तशस्रो रणे यत्नादा रयामास सायफै । नानाशस्त्रास्त्र स्तान् घीमिर्षप्रधेरित ॥ ३१ ॥ निजम्ने समरे क्रुखो हस्त्यम धामित यहु । रथिनोऽपातयद्राजन् स्येभ्य पुरपर्पम ॥ ३२ ॥ सादि रूप होकर जो २ किया उसको मुझने कहौ, यह शत्रु सन्तापीधीर सोमकों को मारता हुआ युद्ध में कैने पाण्डवों के सम्मुख गया उसको भी हे निष्पाप मुझ से वर्णनकर, संजय बोले कि हेमहारान जो पाण्डवोंसे और मृनियोंसे पीड़ित मापकी | सेनाको देखकर जो २ आपके पिताने किया उसको मै कहता हूं, हे पांडुके बड़े भाई वह अत्यन्त प्रसन्नचित्त शूर पाण्डव आपकेपुत्रकी सेनाको मारते हुए सम्मुख वर्तमान हुए, तब भीष्मजीने शत्रुओंके हाथ से पीडित मनुष्य हाथी घोड़ों के नाश को देखकर नहीं सहा, और उस बड़े धनुपधारी अजेयने अपने जीवनको त्याग करके वत्सदन्त अंगलिक सत नाम वाणों से पाडयों के ऊपर वर्पा करी हे रामा उस शास्त्र उठानेवालेने युक्ति से पाण्डवोंके अत्यन्त प्रवल पांच महारथियों को शायक नाम वाणों से वा नानाप्रकार के क्रोध से छोड़े हुए प्रनों से रोका ) हे पुरुषोत्तम इसके विशेष उन्होंने असंख्य हाथी घोड़े और रथ से रथियों को भी गिराया शत्रुओंके रिमय करनेवाले घोड़े के सवारों को घोड़ों की पाठसे और wounded by the Pandavas, ashed Dlırıtı nshtra, "how did he slny tlu Somnhs and frco thu Pandavas. Givo a detailed account of moll this, miocon onc." Ohiag' replied Sannya "I shall toll that your father did at seeing your times wounded by the Pandavas and tho Srinjnjas. The cheerful Pandavas, 0 elder brollier of Pan du, faced him with a severo sinughtor of the armycs of your 50% Blushım could not bear the destruction of men, clophants and ho*sc by tlio vncinics and thionvinciblo archer not caring forduus boft, shorror. ad on them lile nrrows hrown as Vatsdant and Anjalih Tliat greit warrior chcchel the five walliant Pandavas with sharp arrows and other weapons dlechargel in anger 31. Besides tuus, hio filled inang rarriors from ther clephants, hores and tharrots He struck down the great lortemen from their lorses, the elopinnt riders from tho you (१८७३) भीमप Bhishma Parv [4873] नश्वाश्यपृष्ठेभ्यः पादातांश्च समागतान् ॥ ३३ ॥ गजारोहान् गजेभ्यध परेषां जय कारिण. । तमेफ समरे भीम त्वरमाणं महारथम् ॥ ३४ ॥ पाण्डवाः समवर्तन्त वनहस्तमियासुराः। शक्राशनिसमस्पर्शान् विमुञ्चन्निशितान्छन् ॥३५॥ विश्वदृश्यत सासु घोर सन्धास्यन् वपुः । मण्डलीभूतमेवास्य नित्यं धनुरदृश्यत ॥ ३६ ॥ संग्रामे युध्यमानस्य शकचापोप महत् । तद्या समरे फर्म पुत्रास्तव विशाम्पते ॥३७॥ विस्मयं परमं गत्या पितामहमपूजयन् । पार्या विमनसो भूत्वा प्रेक्षन्त पितरंतव३८ युध्यमानं रणेशूरं विमचित्तिमिवामराः । न चैनं वारयामामुन्यांचाननमिवान्तकम् ॥ ३९ ॥ दशमहान संप्राप्ते रथानीफ शिसण्डिनः । अदहनिशितैर्वाणः कृष्णवर्मेच माननम् ॥ ४० ॥ शिस्त्रग्डी प्रिभिर्याणरत्यविध्यत्स्तनान्तरे । आशीविषमिव कुछ कालसृष्टमिवान्तकम् ॥ ४१ ॥ सतेनातिभृशं पिद्धः प्रेक्ष्य भीष्मः शिवण्डिनम् । हाथी के सवारों को हायीकी पीठ से और सम्मुख आनेवाले पदातियोंको भी गिराया, फिर युद्ध में शीघ्रता करनेवाले महारथी अकेले भीमके सम्मुख पांडव लोग ऐसे हुए जैसे कि असुर लोग वजधारी इन्द्र के सम्मुख हुए थे, वहां इन्द्र वज के समान वाणों को छोड़तेहुए भीष्मजी सब दिशाओं में महा भयानक रूप को करते हुए दृष्ट पड़े और इनका धनुपभी इन्द्र धनुप के समान मंडल रूप दृष्टगोचर हुआ हे राजा आपके पुत्रों ने युद्ध में उस कर्म को देखकर बड़े आश्चर्य में होके पितामहकी प्रशंसा करी, और पाण्डवोंने उदासहोकर युद्धमें लड़तेहुए आपके शूर पिता को ऐसा देखा जैसे अमुर लोगोंने विप्रचित्ती को देखा था, दशवें दिन के वर्तमान होने पर इस मृत्युके समान भीष्मको शिखंडीकी रथवाली सेनाने नहीं रोका, जैसे कि अग्नि वनको जलाता है उसी मकार शिखडी ने अपने तीक्ष्ण वाणों से सेना को भस्मकरके अपने तीन वाणासे उसकी छातीको घायल किया । ४०। जो कि कालपुरुपकी उत्पन्न की हुई मृत्यु और डाढ़में विप धारण करने वाले सर्पकी back of elephants and the foot soldiers fruing him in battle. Bhishm of great desterty in battle alone harrassed all the Pandavas as Indra the wielder of vajra had done to the agurs. Discharging bis are rors like the vajra of Indra, Bhishma's dreadfal form was seen in all direction, and his Loir was seen moving in a circle liho Indra's boy. Your sons, O king, wondered at and praised his work in the field of battle, while the Pandavas looked sorrowfully at your brave father fighting his battle as the usurs had done at the sight of Viprachitti. On the tenth day Shikhahdi's cbarioteers could not check Bhishm like death. As fire burns a forost, eo did Shikhandi consume your Army with his arrows and pierced him witlı three arrows in the breast 40. Like tho death caused by the god of death and enraged like a venomous serpoat, brave Bhishm finding himsolf rounded by Shi.

[4874 ] Mahabharat (४८७५) अनिच्छनिय संकुद्धः प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥ ४२ ॥ काममभ्यस या मा धान त्वां योतस्ये कथञ्चन । यैव हि त्वं कृता धात्रा सैव हि त्वं शिखण्डिनी ॥ ४३ ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शिखण्डी क्रोधमूञ्छितः । उवाचन तथा भीष्मं सृकिणी परिस लिहन ॥ ४४ ॥ जानामित्वा महावाहो क्षत्रियाणां भयङ्करम् । मया श्रुतञ्च से युद्ध जामदग्न्येन सह ॥ ४५ ॥ दिव्यश्च ते प्रभावोयं मयाच बहुश श्रुतः । जानन्नपि प्रभावन्ते योत्स्येद्याहं त्वयासह ॥ ४६॥ पाण्डधानां प्रियं कुर्चनात्मनश्च नरोत्तम। अद्यत्वां योधयिष्यामि रणे पुरुषसत्तम ।। ४७ ५ ध्रुवश्चत्वां हनिष्यामि शपे शत्येन ते प्रतः । एतच्छ्रुत्वा च मद्वाक्यं यत् कृत्यं तत् समाचर ॥ ४८ ॥ काममभ्यस घामा वानमे जीवन प्रमोक्ष्यसे । सुहृष्ट क्रियतां भीष्म लोकोयं समितिञ्जय ॥ ४९ ॥ समान क्रोधी महाबली भीष्मथे वह महाधनुर्धारी अपनेको शिखंडीसे घायल देखकर अत्यन्त क्रोधयुक्त युद्धको न चाहकर हुमते हुए यह वचन बोले कि तू इच्छाके समान युद्धकर चाहै न कर परन्तु मैं किसी प्रकार से भी तुझ से नहीं लडूंगा, क्योंकि निश्चय करके ईश्वरसे उत्पन्न कीहुई तू वही शिखंडिनी है भीमके इस वचन को सुनकर क्रोध में भराहुप्रा शिखण्डी होठोंको चबाता हुआ भीष्म जीसे बोला कि हेमहाबाहु क्षत्रियों के नाशकरने वाले मैं तुझको जानताई. और तेरा परशुरामजीके साथ युद्धकरना भी सुना और बहुतसा तेरा दिव्य प्रभाव सुना, हे नरोत्तम अव मै तेरे प्रभावको जानताहुआ भी पाण्डवोंके और अपने प्रयोजनको सिद्ध करनेके निमित्त तुझसे लडूंगा, और युद्ध में संग्राम करके अवश्य तुझको मारूंगा यहतेरे आगे सत्य २ शपथ करताहूं, मेरे इस वचन को सुन कर जो तुझे करना उचितहो उसे अवश्यकर इच्छाके अनुसार चाहै युद्धकर या न कर तू मेरे हाथ से जीवता न छूटेगा, हे युद्ध में विजय करने वाले भीष्म तुम इसलोकको अच्छी रीति से प्रसन्नकरो, संजय बोले कि ऐसे २ वचनरूपी वाणों से अत्यन्त विदीर्ण हृदय करके झुकी हुई गांठवाले hhnndı, was much onraged, yet not liking to fight against him, ho said with a swile: "I shall not discharge my weapons on you, whether you do so of not; for suely thou art Shikbandini a girl produced by God" At this Shikhandi bit his lips iu unger and sand, ii Brave Bhishm, destroyer of foes, I know yon, I havc heard of your battle with Parashuram and of your great fame this, I shall fight with you for the sake of the Pandavas and for«niy sako. I shall surely hill you in battle, I mako a truo vow and swear in your presence. Do what you like after hearing this from me. Whether you figlit or not, I shall not spare your life. Mako tlie pooplo of this poild lappy, Bhishni tlie conquerer !" Sanjaya continued that liaving wounded Birishi's heart with his taunts, Shikandi Knowing all (४४७१) भीमपर्व Bhishna Pary [ 4873 सञ्जय उवाच । एवमुक्त्या ततो भीष्म पन्चाभनतपर्वमिः । यविध्यत रणे भी मणुनं वाक्यसायकं ॥ ५० ॥ तस्यतवचनं त्या मव्यसाची महारयः। फालो यमिति सञ्चिन्त्य शिखण्डिनमचोदयत् ॥ ५१ ॥ गहत्यामन्यातस्यामि परान विद्राय पन्शरः । अभिद्रव मुसरब्धी भी मीमपरामामम् ॥ ५२ ॥ न हि ते संयुगे पीडा शकः कत्तुं महाबलः । तस्मादय महाबाहो यचो भीप्मममिद्य ।। ५३ ॥ बहत्यासमरे भीष्मं यदि यास्यासि मारिए । यहास्यास्य लोकस्य भविष्यसि मया सह ॥ ५५ ॥ नावहास्या ययावीर भधे मपरमाहवे । तथा कुरु रणे यत्नं साधयस्व पितामहम् ॥ ५५ ॥ महन्त रक्षण युद्ध करिष्यामि महाबल । वाग्यन् रथिनः सर्वान् साध यस्वगितामहम् ॥ ५६ ॥ द्रोणश्च द्रोणपुत्रञ्च छपञ्चायसुयोधनम् . चित्रसेन विकर्णउन सैन्धवञ्च जयद्रथम् ॥ ५७ ॥ विन्दानुविन्दावाचन्यो काम्बोजञ्चमुद् क्षिणम् । भगदत्तं तयारं मागधश्चमहायलम् ॥ ५८ ॥ सौमदतितथा शूर माय पांच वाणों से युद्ध भूमि में भीष्मनी को घायल किया, फिर महारथी अर्जुन ने उसके इनवचनों को सुनकर यहविचार किया कि अब यही समय है ऐसाजानकार शिबंडीको प्रेरणाकरी । ५० । और कहा कि मैं शत्रुओंको वाणोंसे हटावाहुमा तेरेपीछे लडूंगा तुमअत्यंतकोयन होकर उतभयानक बलम्पवाने भीष्म के सम्मुख जाओ. यहमहावी युद्धमें तेरे पाड़ा देनेको समर्थ नहीं है इसहेतुसे हे महावाहो अब युक्ति पूर्वक भीमके सम्मुखजाओ हे शिखंडी जो तू भीष्मको विनामारेहुए गुद्धमे जायगा तो मेरी और तेरीदोनों की इसलोक में हँसीहोगी, हे वीर जैसे इस लोकमें हमारी तुम्हारी हँसी न होय वही तुमको युद्धमें उपायकरना योग्य है, हे महाबली में सब रचियोंको रोकतामा युद्ध में तेरी सहायता करूंगा तुम अवश्य पितामहको विनगकरो, में दोणाचार्य अश्वत्थामा कृपाचार्य दुयोधन चित्र सेन विकर्ण जयद्रय सिन्यका राजा विन्द अनुविन्द और भवन्ति देशके राजा pieiced him with fivc arrows having knots. Arjun bcard Skikliandi's words and knowing that it was the tinio for asti jo, instigated him to go on. 50. He said, " I shall disperse the enemies fighting from behind you; you may with much force face Bhishin of dreadfal form and strength. This valliant man is unallo to give you truble in battle; therefore, O brave wartiurs, attack Bhislım carefully. Both you and I will be laughed at by the world, if you still return from the field of battle without killing him. You should ep act today in the field of battle that you and I may not be laughed at. I shall help you, bravo man by chocking all the charioteers and yon are sure to conquer the grandfather. As the coast chiechs the waters of the Ocean, I shall check Dronacharya, Asstrathami, Krip acharya, Duryolban, Chitragen, Vikarn, Jayadratli the ling of Sindh, Viod and -- . [ 4876] Mahabharat (४८७६) निश्च राक्षसम् । त्रिगर्तराजश्च रणे सह सर्वैमहारथैः ॥५९ ॥ महमाघारयिष्यामि वलय मकरालयम् । कुरूंश्च सहितान् सर्वान् युध्यमानान् महायलान् । निधारयि. प्यामि रणे साधयस्व पितामहम् ॥६॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्यवधपर्वणि दशमदिवसयुद्धारम्भ भीम. शिखण्डिप्रलापे नवाधिकशतोऽध्यायः ।। १०९ ॥ धृतराष्ट्र स्वाच ! कथं शिखण्डी गाङ्गेय मभ्यधावत् पितामहम् । पाञ्चाल्य.समरे खो धर्मात्मानं यतव्रतम् ॥ १॥ केऽरक्षन् पाण्डवानीके शिखण्डिनमुदायुधाः । स्वर माणास्चराकाले जिगीषन्तो महारथाः ॥ २ ॥ कथं शान्तनधो भीष्म स तस्मिन् दशमेहनि । अयुध्यत महावीर्य पांडवै.सहसृङ्गये. ॥३॥न मृष्यामि रणे भीष्मं प्रत्युद्यातं शिखण्डिनम् । कचिन्नरथभगोस्य धनुर्वाशीयतास्यतः ॥४॥ सञ्जय उवाच । माशीयंत काम्बोज सुदक्षिण शूर भगदत्त महापली गजामगध सोमदति राक्षसोंके राजा आर्य श्रृङ्ग और त्रिगर्त इनसवको सब महारथियोंसमेत युद्ध में ऐसे रोकुंगा जैसे कि किनारा या समुद्रको मर्यादा समुद्रको रोकने, मैं सब सेना से लड़ताहुआ महावली फौरवों को हटाऊंगा तुम पितामह को विजयकरो ६० ।। अध्याय ११० ॥ धृतराष्ट्र बोले कि युद्ध में क्रोधयुक्त पांचालदेशी शिखंडी किसरीति से उस धर्मात्मा सावधान व्रत गांगेय भीष्मपितामह के सम्मुखदौड़ा । १। पांडवों की सेनामें युद्ध के समय कौन कौन से शस्त्रधारी विनयामिलापी शीघ्रताकरनेवाले महारार्थियोंने शिखंडी की रक्षाकरी, और वहशन्तनुके पुत्र बड़े पराक्रमी भीष्म उस दशवें दिनमें पांडव और मंत्रियों से कैसे २ युद्ध करनेवाले हुए मैं युद्धमें शिखंडी को भीमनी के सम्मुख जातेहुए शान्ती को नहीं पाताहूं अर्थात् सहनहीं सक्ताहूं चाहे इन भीष्म जीका रथ टूटगया वा बैंचते २ धनुप के खण्ड भी होगयेहों परन्तु तौभी शिक्षकी Aquviud the princes of Avanti, Casuboj, Sadakshin, Tolliant 3}ias Jatta, brave king of lIngadh, Sondatti, Aryashring the prince of raksliases nnd Trigart. Fighting against all the I shall push back the Kauravas, you may conquer the grandfather." 59. CHAPTER CX " How did Shikhandh of Panehal, omrnged in Inttle, rush upm Blislım the son of Ganga of trne yows;" ashed Dliritrashtra of Sanjaya, "and which of the Panday warriors, desirous of victory: fiastened to protect the former. How did Slantanu's son Briskin of truo pron css, figlit apainst the Punda yas and the Srinjayas tentii dy? I can ill bear thic news of Slíklınıdi guing against S'yishm. Shikliardi could not withstand liini eren wlien Bhishas chariot and Low more broken into pieces.". "Olet of Bharats," army, on the (४८७७) भीमपर्व Bhishma Pary [48771 धनुशास्य रथमो नचाप्यभूत् । युध्यमानस्य संग्रामे भीष्मस्य भरतर्षभ ॥५॥ निमनः समरे शत्रुन् शर. सन्नतपर्वमिः । अनेराशतसाहन्नाम्नायकानां महारया ॥ ६॥ तथा दन्तिगणा राजन् डपाश्चैव सुसजिताः । मध्यवर्तन्त युयाय पुरस्कृत्य पितामहम् ॥ ७ ॥ यथाप्रतिझं कौरज्य स चापि समितिमयः । पार्थानामफरोद्भीमः सततं समितिक्षयम् ॥ ८॥ युध्यमानं महेष्वासं चिनिघ्नन्तं परान् शरः । पाम्चालाः पांडपः साई सर्वे ते वाभ्यवारयत् ॥ ९॥ दशमेहनि सम्माते ततस्तारिवाहिनीम् । कीय॑माणांशिर्वाणः शतशोथसहस्रशः ॥ १० ॥ न हि भीमं महेप्यास पाण्डवाः पापपूर्वज ! अशक्नुवन् रणे जेतुं पाशहस्तमिवान्तकम् ॥ ११॥ अथोपापान्महाराज सम्यसाची धनजयः । प्रासयन रथिनः सर्वान् यीमत्सरपराजितः ॥ १२ ॥ सिंह घदिनदन्नुच्चनुयाधिक्षिपन्मुहुः । शरीधान पिसजन पार्थी व्यचरत कालवणे की सामथ्र्य न था जो उन के सम्मुख जासके, संजयवाले कि हे भरतपम युद्ध में लड़ते और गुप्तग्रन्या वाले वाणों से शत्रुओं को मारने में इस भीष्मका न धनुष टूटा न रथ खंडितहुधा हे राजा आपके पुत्रोंकेलाखों महारथी, और हजारोंही अलंकृत हाथी घोड़े पितामह को आगेरुरके युद्धकरनेके लिये सम्मुख दर्तमानहुए, उसयुद्ध में भी सत्य प्रतिज्ञ भीष्मजी ने अपने मणके अनुसार पांडवों की सेनाका वारंवार नाश किया, फिर पांडवों समेत उनसब पांचालदेशियों ने वाणों से बड़े २ शत्रुओं के मारनेवाले युद्धमें प्रवृत्त धनुषधारी भीप्मको क्षमा न किया फिर देशवें दिनके वर्तमान होनेपर शिखंडी आदि हजारों शत्रुओंको मेनासमेत बाणोंसे पृथक्र करदिया ६१०। हे राजा युद्धमें पांडवलांग बड़े धनुषधारी भीष्मजी के विजय करनेको ऐसे नहीं समर्थहुए जैसे कि पाशधारी यमराजके विजयकरनेको कोई समर्थ नहो, इसके पीछे सव्यसाची घाण फेंकनेवाला अर्थात् बाहायसे भी वाण चलानेवाला सर्वसंसारी धन काजीतनेवालाभजेय अर्जुन सबरथियोंको भयभीत करताहुआ सम्मुख आया, वह अर्जुन सिंहकेसमान ऊंचे स्वरसे गर्जना करके प्रत्यंचाको वारंपार बचता भार वाणोंकी said Sanjaya in reply, “ Bhishiu's boy was not broken when he was discharging arrows to kill the enemies, nor ras his chariot broken. Millions of your son's warriors and thousands of sell deched elephants and horses followed the grandfather to do battle. In that battle too, Bhishm of true vots again and again destroyed the arinies of tho Pandavas. But the Pandaras and the Panchals did not spare Bhishm the destroyer of enemies having sharp arrows On the tenth day of battle he dispersod thousands o! the enemias, Shikhandi and others together with their ar wies. 10. The Pandavas could not conquer in battle the great arcler Bhishin like Yam the bearor of noose. Then invincible Arjun the conqueier of wealth who could discharge arrows with both hands, camne to the front terrifying the warrior Roar. ing like a lion, Erranging bis bowstring again and again and showering , 118781 Maliabharat (४८७८)। ॥ १३ ॥ तस्य शब्देन विवस्तास्तावका भरतर्पम । सिंहस्येव मृगाराजन् व्यद्रवन्त महाभयात् ॥ १४ ॥ जयन्तं पाण्डवं दृष्ट्या तत् सन्यञ्चाभिपीडितम् । दुर्योधनस्ततो भीष्ममवत्रीद् भवपीडित. ॥ १५॥ एपपाण्डुसुतस्तात श्वेताश्व कृष्णसारथिः । दहते मामकान्सर्वान् कृष्णयताध काननम् । १६ ॥ पश्य सन्यानि गालेय द्रयमाणानि सर्वशः । पाण्डवन युधांश्रेष्ठ काल्यमानानि संयुगे १५ ॥ यया पशुगणान् पाल सङ्कालयति कानने । तथेद मामकं सैन्य काल्यते शत्रुतापन ॥ १८ । धनञ्जयशर भग्न द्रवमाण ततस्तत । भीमोप्यव दुराधर्षों विद्रावयति मे पलम् ।। १९ ।। सास्य किकिनानध माद्रीपुत्रौ च पाण्डयौ । आभिमन्यु सुविफ्रान्तो, वाहिनी द्रवतेमम२० प्रद्युम्नस्तथा शूरो राक्षसश्च घटोत्कचः । व्यद्रावयेतां सहसा सन्यं मममहारणे ॥ २१ ॥ वध्यमानस्य सैन्यस्य, सर्वरेतैर्महारथै । नान्याङ्गतिम्प्रपश्यामि स्थाने वर्षा करनाहुआ, युद्धमें काल के समान आकर विचरताहुआ, हे राजा आपके शूरवीर | उसके शब्दसेही भयभीतहोकर बड़ीभयातुरतासे ऐसभागे जैसेकि सिंहके शब्दसे मृग भागते है फिर विजय करनेवाले पाण्डवों को और आपकी पीड़ामान सेनाको देख कर अत्यन्त दुःखी दुर्योधन भीष्मजीसेवोला, हे तात यह शेत घड़ेवालाश्रीकृष्णजी को सारथीरखनेवाला पांडव अर्जुन मेरे सब शूरवीरों को ऐसे भस्मकिये डालताहै जैसे अग्नि वनको भस्मारता है हे गांयेयभीष्मजी पांडव के हाथ से सवप्रकारसे छिन्न भिन्न युद्धसे भागीहुई सेनाओंको देखो, जैसे कि वनमें गाय चराने वाला सब पशुओंके समूहोंको पृथक् २ कर के हांकता है इसी प्रकार यह शत्रुसंतापी मेरी | सेनाको हांक छिन्नभिन्न करता है, अर्जुन के वाणोंसे विदीर्ण जहां तहां से भागी हुई मेरी सेनाको महादुर्भय भीमसेनभी वैसेही भगाता है, और सात्यकी चेकितान वा माद्री के पुत्र दोनों नकुल सहदेव और बड़ावली अभिमन्युयह सब मेरी सेनाको भगारहे हैं । २० । इसी प्रकार शरवीर धृष्टद्युम्न और घटोत्कच राक्षसनेभी मेरी सेनाको भगायाहै, हे भरतर्षभ देवताओंके समान वल रखनेवाले अापके सिवाय इन h19 anows, le zonnod in the field of battle liko Yam Your warrions, Okmg, were te rufed at hus sound and ran away in torror as a floch afdor dher at the roor af lan Then swing the Pondayis son. querms and luis army distressed, Duryodlan suid to Blish m "Father, thi Arjun the Pandar possesson of white houses, having Kusliu for th.duver, buins down all the warriors as filo burns a forest. Do jou ser, son of Ganya, our à mies dispersed by the Panday li c a licrd of cows driven by the herdsman Woundłd by Aljun's arrows and disen away in al duections, my armles ato defeated by invinciblo Bhim en Satyahi, Chehitan, the two sons of Madri-Nakul and Sahadev, and alliant A blumanyu are all patting my a mits to flight 2) In the same manner, valliant Dhrishtadyumn and Ghntothach the rahslas bave caused the flight of my armes (४८७९) streaga Bhishma Pary [4879] युद्धे च भारत ।। २२ ॥ ऋते त्वां पुरुषम्यान देयतुत्याराक्रमम् । पर्याप्त स्तु भवान् शीघ्र पीडितानां गतिभय ॥ २३ ॥ एवमुक्ती महाराज पिता देव ग्रतस्तव । चिन्तयित्वा मुहूर्तन्तु कृत्वा निश्चयमात्मा. ॥ २४ ॥ तपसन्धार यन् पुत्र मबीच्छान्तनोः सुतः । दुर्योधन विजानीहि स्थिरी भत्या विशाम्पते ॥ २५ ॥ पूर्व काल तव मया प्रतिज्ञातं महायल । हत्या दशसहस्राणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ॥ २६ ॥ संग्रायायपयातव्य मेतत् कर्म ममाह्निकम् । इति तत् कृतवांधा यथोकं भरतर्षभ ॥ २७ ॥ अद्य चापि महत् कर्म प्रफरिप्ये महा घल । अहं वाद्यहतः शेष्ये हनिप्ये वाद्य पाण्डवान् ॥ २८॥ अद्य ते पुष्यन्यात्र प्रति" मोल्ये ऋणन्तव । मतपिण्डकृतं राजन् निहतः पृतनामुखे ॥२९॥ इत्युक्त्या भरतश्रेष्ठ क्षत्रियान् प्रबपञ्छरै । बाससाद दुराधर्षः पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ३० ॥ अनीक मध्ये तिष्ठन्न गाद्यं भरतर्षम । आशीविषमिय क्रुद्ध पाण्डयाः प्रत्यवारयन् ॥ ३९ ॥ महारथियों से घायल हुई सेनाका कहीं कोई आश्रय नहीं दिसाई देता है हे पुरुषोत्तम आप समर्थ हैं इममे शीघ्रही इन महादुखियों के प्राश्रय हनिये हेराना इस प्रकारसे कहेहुए आपके पिता देवव्रत भीमजी एक मुहूर्त तक शोचमें मग्नहो अपने निश्चयको करके, आपके पुत्र से मिलकर बोले कि हे राजा दुर्योधन तुम स्थिर बुद्धी से समझो, हेमहावली मैंने पुर्वमपयमें तुमसे वचन पूर्वक भगा कियाया कि दश हजार महात्मा क्षत्रियों को मारकर, युद्धसे पृथक हूंगा, यह मेरामतिदिनका कर्म है सो हे दुर्योधन मैंने अपने वचनके अनुमार उसको पूराकिया, और अबभी बड़े कर्मको कम्गा पर्याद मैं मृतकहोकर शयन करूंगा अथवा पाण्डवोंको पारंगा हेराना प्रव में स्वामी के ऋण से निवृत्त होकर सेनाके मुखपर मृतकहोकर तेरेऋण को चुका- | ऊंगा, यह कहकर क्षत्रियोंको वाणों से आच्छादित करते हुए अनेय भीष्म ने | पाण्डवों की मेनाको सम्मुख पाया।10। हे भरतर्षभ धृतराष्ट्र उस सेना में नियत | सर्पके समान क्रोधप गांगेय भीप्मनी को पाण्डवों ने युद्धभूमि में आकर रोका, host of Bharatspossor af gullig strangth, nu refuge forby, rounded warriors except yoursell. You hare the power, best of men, protect therefore theso distressed soldiers at once." Thus addressed, O king, your father Devabrat Bhishm remained plunged in thought for a short time, and then having formed a resolution in his mind, he said to your con:-"Hear attentively, Prince Duryodhan. I hare already given you word, tighty one, that I shall leayu the field of baltle after slaying ten thousand warriors. This is my daily work and I have been doing it according to my promise. I shall do it again. I shall lie down dead or shall dest oy the Pandayag. I sha)I now dio at the entrance of the army after having satisfied the delt which I owe you as my master." Thus saying, he covered the warriors who encountered him with the shower of his ariots 30. O best [ 4880] Maliabharat, [४८८०) दशमहानि भीष्मस्तु दर्शयन् शक्तिमारमन । राजन् शतसहस्राणि सोवधीत् कुरु नन्दन ॥ ३२ ॥ पञ्चालानाञ्च ये श्रेष्ठा राजपुत्रा महारथा । तेपामादत्त तंजासि जलं सूर्य इवांशुभिः ॥ ३३ ॥ हत्वा दशसहसाणि कुञ्जराणां तरस्थिनाम् । सा. रोहाणां महाराज हयानाञ्चायुतन्तथा ॥ ३४ ॥ पूर्णे शतसहसं द्वे पादातानांनरोत्तम । प्रजज्वाल रगे भीष्मो विधूम इव पायफः ॥ ३५ ॥ न चैघ पाण्डवेयानां फेचिच्छेकुनि रीक्षितुम् । उत्तर मार्गमास्थाय तपन्तमिव भास्करम् ॥ ३६॥ ते पाण्डवेयाः संरब्धा महेष्वासेन पीडिताः । घधायाभ्यद्रयन् भीष्म सञ्जयाश्च महारथाः ॥ ३७ ॥ संयुध्यमानो वहुभिर्भीष्मः शान्तनघस्तथा । अवकीर्णो महामहः शैलो मेघेरिवावृत. ॥ ३८ ॥ पुत्रान्तु तव गाङ्गेयं समन्तात् पर्यधारयन् । महत्या सेनया साई ततो युद्धमपर्यत ॥ ३९॥ इति श्री महाभाते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि दुर्योधनभीष्म संवादे दशाधिकशतोऽध्यायः ॥ ११ ॥ हे धृतराष्ट्र दश दिन अपनी सामर्थ्य को दिखाते हुये उस भीष्म पितामह ने लाखों कोही मारडाला, पांचाल देशियों में जो श्रेष्ठ और महारथी राजकुमार थे उनके पंजों को ऐसे ऐंचलिया जैमेकि सूर्य अपनी किरणों से जलको बैंचता है, हे महाराज दशहजार शीघ्रगामी हाथियोंको और इतनेही सवारों समेत घोड़ोंको मारा पूरे एक लाख पदातियों के मरने पर भीमजी युद्ध में ऐसे क्रोधयुक्त हुए जैसे निर्धूम अग्नि होताहै, पाण्डवों के शूरवीरों में से कोई भी इस सूर्य समान संतप्त करनेवाले भीष्म के सम्मुख देखने को समर्थ नहीं हुआ, तब उस युद्ध में बड़े धनुषधारी से पाड़ामान पाण्डवों के वह शूरवीर महारथी संजय भीष्म के मारने के निमित्त सम्मुख गये और जैसे कि बड़ा मेरु पर्वत बादलोसमेत जाताहै वैसेही शंतनु के पुत्र भीमभी अच्छे २ शूरवीरों समेत रक्षित होकर चले, फिर आपके पुत्रों ने बड़ी सेना समेत भीष्मजी को चारों ओर से रक्षित किया और युद्धजारी हुआ । ३९ । of Bharats, standing in the midst of the army like an angry serpent the son of Ganga was checked by the Pandavas. Showing his prowess on that tenth day, the grandfather slow thousands of warriors He drew the energy out of the Panchal warriors as the sun with bis rays draws out water, Having killed ten thousands of swift goiug elephants, ten thousands of horses together with their riders and a bundred thousand foot soldiers, Bhishm was e raged in battle lilzo smokeless fire. None of the Panday warriors could look at Bhishma's faco glorious like the sun, Wounded by that great archer, the Panday and Srinjaya warriors faced Bhishm in order to slay him. Like the huge Meru hill covered by clouds, Bhishm protected by good warriors, advanced. Your sons with a large army protected him and the battle continued,"39. .

(४८८१) भीमपर्व Bhishma. Pary [4881 ] सम्जय उवाच । अर्जुनस्तु रणे राजन् रम्या भीष्मस्य विक्रम | शिपण्डिन मथोवाच समभ्यहि पितामहम् ॥ न चापि भीस्त्वया फाऱ्या भीमादद्य फथ चन । हमेन शरस्तीपैः पातयिष्ये रथोत्तमात् ॥ २ ॥ एवमुक्तस्तु पार्थन शिखण्डी भरतर्षभ । अभ्यद्रवत गाङ्गेयं श्रुत्वा पार्थस्य भापितम् ॥ ३ ॥ धृष्टद्युम्न स्तथा राजन् सौभश्च महारथ । दृष्टापाद्रवतां भीष्म श्रुत्वा पार्थस्य भापितम् ॥ ४ ॥ विराटद्रुपदी वृक्षो कुन्तिभोजश्च दंशितः । थम्यद्वत गाङ्गेयं पुत्रस्य तय पश्यतः ॥ ५ ॥ नकुलः सहदेवश्च धर्मराजध वीर्यवान् । तथेतराणि सैन्यानि सर्वाण्येव विशाम्पते ॥६॥समाद्रयन्त गांगेय श्रुत्वापार्थस्यभापितम् प्रत्युद्य युस्तावकाध समेतांस्तान्महारथान् ॥७॥ यथाशक्ति यथोत्साहं तन्मेनिगदतःथणु । चित्रसेनो महा राज चेफिनावं समस्ययात् ॥ ८ ॥ भीमप्रेप्से रणेयान्तं नृपं व्यापशिशुर्यथा।धृष्ट अध्याय ॥ ११२॥ संजय बोले कि हे राजा फिर अर्जुन युद्धमें भीष्मके पराक्रमको देखकर शिख- एडी से बोला कि तुम पितामह के सम्मुख होजाओ, अव तुम भीप्मनी से किसी प्रकारका भय मत करो मैं इन भीष्मनी को अपने उत्तम वाणों के द्वारा रथसे गराऊंगा हे राजा अर्जुन के ऐसे वचनको सुनकर वह शिखण्डी भीष्म के सम्मुख गया, और इमी मकार धृष्टद्युम्न और महारथी अभिमन्यु यह दोनोंभी, अर्जुन के वचनों से प्रसन्न चित्त होकर भाप्मनी के सम्मुख गये, विराट और द्रुपद यह दोनों रद्ध और शास्त्रों से अलंकृत राजा कुन्तभोज यह तीनों आपके पुत्रके देखते हुए भीमके सम्मुख गये, और नकुल सहदेव और पराक्रमी धर्मराज युधिष्ठिर और अन्य सब सेनाके लोगभी उनके सम्मुख गये, उससमय नकुल और सहदेव दोनों अर्जुनके बचोंको सुनकर आपके पुत्र के देखते हुए भीप्मके सम्मुख दौड़े, फिर आप के शूरवीरभी अपनाप्सामर्थ्य और साहस के द्वारा उन इकठेहुए महाभारधियों के सम्मुख CHAPTER CXI Sanjaya continued:-"Sosing the prowess of Bhishm, Arjun thus addressed Alikhandi, "You may now faco Bhishm. You need not bo afraid of him, for I shall with my arro vs cause liis fall from his chariot." On haring these words of Arjun, Shikhandi faced Bbishm, In the samo manner, Dhrishtadyumn and valliant Abhimanyu, much pleased at the words of Arjun, cncounterod Bhishm. Virat and Drupad, tho two old warriors, and Prince Kuntbhoj adorned with Weapons, encountered Bhishm in the prosence of your sons. Nakul, Suhdev and Yudhiahthir the just with other warriors also faced hiin. Nakul and Sahdev rushed against Blislım on hearing the words of Arjun. Your warriors too, as far as it lay in their power, encountered [ 4882] Mahalharat (४८८२) धुम्नं महाराज भीष्मान्तिक मुपागतम् ॥९॥ त्वरमाण रणे यत्तं कृतवर्मा न्यधारयत् । भीमसनं सुसंक्रुद्ध गाङ्गेयस्य धपिणम् ॥ १०॥ त्वरमाणो महाराज सौमदत्तिर्यधार यत् । तथैव नकुलं रं फिरन्तं सायकान् परन् ॥ ११॥ विकर्णो धारयामास इच्छन् भीष्मस्य जीवितम्। सहदेवं तथा राजन् यान्त भीष्मरथं प्रति ॥ १३ ॥ यारयामास संक्रुद्धः कृपः शारवतो युधि । राक्षसं फरफर्माणं भैमसेनि महावलम् ॥ १३ ॥ भीमाय निधनं प्रेएवं दुर्मुखोभ्यद्रवडली । सात्पकिं समरेयान्तं तव पुत्रो न्यवारयत् ॥ १४ ॥ अभिमन्यु महाराज यान्तं भीष्मरथं प्रति । सुदक्षिणो महाराज काम्बोज. प्रत्यधारयत ॥ १५ ॥ विराटद्रुपदी वृद्धी समेतावरिमईनौ । अश्वत्थामा तत बुद्धो धारयामास भारत रक्षा तथा पाण्डुसुतं ज्येष्ठ भीष्मस्य यधकांतिणम्। भारद्वाजो रणे यत्तो धर्म. पुत्रमवारयत् ॥ १७ ॥ अर्जुन रभसयुद्धे पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् । भीष्मप्रेप्सु महाराज गये उनका वृत्तान्त मुझसे मुनो, हेमहाराज भीष्मकी रक्षाके निमित्त चित्रसेनतो चेकि- तानके सम्मुख ऐसे गया जैसे कि ब्याघ्रका बच्चा बैलके सम्मुख जाता है हे राजा भीष्मके समीप प्रायेहुए शीघ्रताकरनेवाले युद्ध में कुशल धृष्टद्युम्नको कृतवर्मा ने रोका । १० । और शीघ्रता करने वाले सोमदत्त ने भीष्मनी के मारने की इच्छा रखने -पाले महाक्रोधित भीमसेनको रोका, इसीमकार भीष्मजी के जीवनके चाहनेवाले विकर्ण ने बहुत शायकोंके फेंकने वाले शूर नकुलको रोका, ऐसेही युद्ध में अत्यन्त क्रोधी शारदत कृपाचार्यने भीम के स्थपर जातेहुए सहदेवको रोका । १३ । औरषल: वान दुर्मुख उसभीष्मके मारने में प्रवृत्त भीमसेनके पुत्र घटोत्कच राक्षस के सम्मुख हुमा, और युद्धमें जाते हुए सात्यकी को आपके पुत्रने रोका और भीष्मके रथपर जाते हुए अ. भिमन्युको, राजा कायोन मुदक्षिण ने रोका और शत्रुओं के मारने वाले विराट् और द्रुपद दोनों दृद्धोंको क्रोध युक्त अश्वत्थामाने रोका हे राजा भमि के मारनेको उत्सुक them. Hear of me what they did: for the protection of Bhishmi, Chitrascn faced Chekatan as a lion's whelp faces an ox Krityarma checked Dhrishtadyumn the doxterous in battle who was approaching Bhishm.'10. Somdatta hastened to check angry Bhimsen desirous of slaying Bhishm. In the same manner, desirous of protect. ing Bhishm's life, Vikarn checked Nakul who was discharging pang ariows. Likewise Kriracharya much enraged in battle, checked Sahadev advancing against the chariot of Bhishm 13. Valliant Durmukh faced Shatotkach the son of Bhim desirous of slaying Bhishn. Your son checked the advance of Satyaki, and Sudakishin the king of camboj checked Abhimanyu's advance. Enrager Ashwathuma checked the advance of Virat and Drupad the two old warriors. Dronacharya checked the advance of Pandu's eldest son, Yudhishthir the just desirous of Blaying Bhishm, and the great archer - (४८८३) भीष्मपर्य Bhishma Pary [4883] भासयन्त दिशी दश ॥ १८ ॥ दुःशासनो महेप्यासी यारयामास संयुगे । मन्ये च तावफा योधाः पाण्डवानां महारथान् ॥ १९ ॥ भीमस्याभिमुखान्यातान् घारयामामु. राहये । धृष्टद्युम्नस्तु सैन्यानि प्रामोशंस्तु पुनः पुनः ॥ २० ॥ अभ्यद्रयतसंरग्धों भीम मेक महारथः । एपोर्जुनो रणे मीम प्रयाति फुरुनन्दन. ॥ २१ ॥ अश्यद्रयत मामेष्ट भीष्मो हि प्राप्स्यते न यः। अर्जुनं समरे योदु नोत्महेतापि वासवः ॥ २२ ॥ किमु भीमो रणे धीरा गतसायाऽपिजीवितः । इति सेनापतेः श्रुत्वा पाण्डयानां महारथाः ॥ २३॥ अश्यद्रवन्त सहा गालेयस्य स्थाप्रति । आगच्छमानान् समरे वार्याघान् प्रल यानिय २४ अवारयन्त संहष्टास्तावकाः पुरुषर्षमाः । दुःशासनो महाराज भयंत्यफ्त्या महारथः ॥ २५ ॥ भीष्मस्य जीविताकांक्षी धनन्जयमुपादयत् । तधय पाण्याः शूरा पांडुके बड़े पुत्र धर्मराज युधिष्ठिरको द्रोणाचार्यने और शिखण्डी को आगे करके युद्धमें बेगवान् भीमको चाहने दशो दिशाओं के प्रकाश परनेवाछे अर्जुनको बड़े धनुपधारी दुश्शासनने रोका, और पापके अन्य शूरवीरों ने भीमके सम्मुख | जाते हुए पांडवों के महाराथेयों को युद्धमें रोका ।२०। इसके पीछे क्रोधयुक्त महारथी धृष्टद्युम्न अकेलाही वारंवार अपनी सेनाओं को इस रीतिमे पुकारताहुआ भीमके सम्मुखगया, कि यह कौरवनन्दन अर्जुन युद्ध में भी के सम्मुख जाता है समीप पाजामओ डरोमत भीष्पही का नाशहोगा तुम्हारा नहीं होगा, युद्ध, अर्जुन से लड़ने को इन्द्रभी साहम नहीं करमता है हे वरिलोगो फिर वह निर्यल थोडेजीयनवाला भीष्म युद्धमें पाकरमक्ता है, पांडवों के महारथी सेनापति के इस वचनको मुनकर वह सब प्रत्यन्त प्रमात्र मन होकर अर्जुनझरपके समीप गये पुरुषोंमें श्रेष्ठ अत्यन्त प्रसन्न चित्तआपके शूरवीरों ने बहुतमी सामथ्योंसे युक्त पड़े पराक्रमि योंके समानयुद्धमें आनेवालों को रोका, फिर भीष्म के जीवनका चाहनेवाला महा गयी दुश्शामन भयको त्यागकर अर्जुन के सम्मुखगया. इसीमकार शूरवीर पांडब Dashasan checked Arjun who led ly Shilliandi tras desirous of killing Bhishm and who illumined the ten directions by his glory. Your other warriors chocked the advance of the other warriors of the Pandavas ready to assail Bhishm 20. Then the enraged warrior Dlirishtadyanın alone faced Bhishim, sying again and again to his warriors:-"Arjun the joy of the Kaurav.18 is ad faucing against Bhisto; coine on nezior without lear; fur Bhishm will le killed and not you. Even India las not the courage to fight against Arjun; Viiat can B'rislim who is infirm and of small duration of life, do against him ?" Hearing those words from the brave commander of the Pandav forces, they cheerfully applied tlie chariot of Arjun. Your warriors tliebst of men, bravely and cheerfully cheched the adrano- Valliant Dushasan, desirous of protecting Blushima's I fe fearles ly encountered Arjun In the same manner thel mye l'andavas ing inen [4884] Mahablarat (४८८५) गाङ्गेयस्य रथम्प्रति ॥ २६ ॥ अभ्यद्रवन्त संग्रामे तव पुत्रान् महारथा । तत्राद्भुतमप श्याम चित्ररूप विशाम्पते ॥ २७ ॥ दु शासनरथं प्राप्य यत् पाथों नात्यवर्तत । यथा वारयते वेला क्षुब्धतोय महार्णधम् ॥ २८ ॥ तथैव पाण्डव कुलं तय पुत्रो न्यधारयत् । उभी तो रथिना श्रेष्ठावुभौ भारत दुर्जयो ॥२९॥ उभौ चन्द्रार्कसहशी काग्त्या दीप्त्या च भारत । तथा तौ जातसरम्भावन्योन्यवधांक्षिणौ ॥ ३० ॥ समीयतुर्महासंख्ये ज्य शमी यथा पुरा। दु शासनो महाराज पाण्डव विशिखैत्रिभिः ॥ ३१ ॥ पासुदेवञ्च विंशत्या ताहयामास सयुगे । ततोकुंनो जातमन्युर्याणयं वीक्ष्य पीडितम ३२ । वुशा सनं शतेनाजी नाराचाना समापयत् । ते तस्य कवचं मित्या पपु.शोणितमाहवे ॥३३॥ दुःशासनलिभि क्रुद्धः पार्थ विव्याध पत्रिभि । ललाटेभरतश्रेष्ठ शरै सन्नतपर्कभि. ३५ ललाटस्थस्तु तैर्वाण शुशुभे पाण्डवो रणे । पयामेरामहाराज श्रृङ्गरत्यथमुच्छ्रित ॥३१॥ लोगभी भीष्मजी के रथकेपास आप के महारथी पुत्रों के सम्मुखगये, हे रामा यहाँ हमने अपूर्व रूप के आश्चर्यको देखा कि अर्जुन ने दुश्शासन के रथको पाकर उल्लघन नहीं किया, जैसे कि मर्यादा वा किनारा जल से व्याकुल | समुद्रको रोकता है उसी प्रकार आपके पुत्र ने क्रोधयुक्त पांडव अर्जुनको रोका, वह दोनों रथियों में श्रेष्ठ दुर्जय पुरुष शोभा और प्रकाश से चन्द्रमा और सूर्य के समान विदित होतेथे । ३० । इसी प्रकार वह दोनों क्रोधभरे परस्पर मारने के इच्छावान युद्ध में ऐसे बढ़े जैसे कि पूर्ण समय में यमराज और इन्द्र बढ़ेथे, फिर दुश्शासन ने विशिखनाम तीन वाणोंसे अर्जुनको और बीसवाण से वासुदेवजी को घायल किया, तदनन्तर क्रोधयुक्त अर्जुन ने श्रीकृष्णजी को पीडामान देखकर युद्धभूमि में नाराचनाम वाणों के एक सैकड़ेसे दुश्शासनको घायल किया उन वाणोंने उसके कवचको काटकर उसके रुधिर को पिया फिर महाक्रोधी दुश्शासन ने गुप्तग्रन्थी वाले तीन वा पांचवाणोंसे अर्जुन को ललाटपर घायल किया उन faced your sons near Blushma's chariot. The sight we saw thero- O king, was wonderfully strange: Arjun could not pass over Dusha, gan's chariot and your son checked the euraged Pandav Arjun, as the coast does the troubled watois of the Orean The two best of chariot eers, on account of their beauty and glory, looked like the moon and the sun 30 Thus the two eni aged warriorr, desirous of slaying cach other, advanced liho Yam and Indra in the days of old With throo sharp arross Dushasan wounded Arjun and with twenty, he wounded Shri Krislın. Arjun, much enraged at the sight of Krishna's wounds, discharged, a hundied long shafted arrows at Dushsan They p erced through Ius armour and drank his blood llien Dushasan of e rccelingly hot temper rounded . Arjun on the fu-ellend with three and fiva 3 roirs, and with those arrons stuch ou ----- (४८८५) भीष्मपर्व Bhishma Pary [48851 सोतिविद्धो महेष्वासः पत्रेण तर धन्विना । म्याराजत् रणे पार्थः किंशुकः पुष पानिव ॥ ३६॥ दुःशासनन्ततः कुशः पाडयामास पाण्डवः । पर्वणीय मुसकुद्धो राहुः पूर्ण निशाकरम् ॥ ३७ ॥ पायमानो यलयता पुत्रस्तव विशाम्पते । विम्याध समरे पार्थ कंकपत्र शिलाशितः ॥ ३८ ॥ तस्य पार्थो धनश्चित्वा रथञ्चास्य प्रिभिः शरैः । श्राजधानततः पश्चात् पुत्र ते निशितैः शरैः • ३९ ॥ सोग्यरकामुंफमादायभी मस्य प्रमुखे स्थितः । अर्जुनं पंच विंशत्या बायोपरसिवायत् ॥ ४२ ॥ तस्य कुलो महाराज पांडवः शत्रुतापनः । अप्रेगद्विशिस्त्रान् घोरान् यमदण्डीपमान बहून् । ४७ ॥ अप्राप्तानेव यान् याणान् चिच्छेद तनयस्तव । यतमानस्य पार्थस्य तदा तमिवाभवत् ॥ ४२ ॥ पायव निशितैयाणरविध्यत्तनयस्तय । ततः कुद्धो रणे पार्थः ललाटपर नियत वाणों से वह अर्जुन ऐसा शोभायमान हुआ जैसे कि अत्यन्त ऊंचे ऊंचे शिखरों से मेरु पर्वत शोभित होताहै फिर वह बड़ा धनुपधारी अर्जुन आपके धनुषधारी पुत्र से अत्यन्त घायल होकर युद्धमें ऐसा शभायुक्त हुआ जैसा कि फूलाहुआ किंशुक वृक्ष होता है इसके पीछे अर्जुन ने उसक्रोधी दुःशासन को ऐसा पीड़ितकिया, जैसे कि पर्व के दिन अत्यन्त क्रोधयुक्त राहु पूर्णचंद्रमाको दुःखित करता है हे राजा पराक्रमी अर्जुनसे पीडामान आपके पुत्रने, कपक्षवाले शिलापर तीक्ष्णा किये हुए व.णों से अर्जुन को फिर पाडामान किया तवतो अर्जुन ने उसके धनुप को काटकर तीन चाणोंसे उसके रथको खंडित किया, उसके पछि तीक्ष्ण वाणों | से उसके शरीरको घायल किया फिर भीमके आगे नियत होकर उसने दूसरे धनुपको लेकर अर्जुन को पच्चीस २५ वाणों से भुना और छातीपर घायल किया हे राजा फिर शत्रु संतापी क्रोधयुक्त अर्जुन ने उसके ऊपर यमराज के | दण्ड के समान महाभयानक विशिख नाम बहुत से वाणों को चलाया तव भाप के पुत्रने अर्जुन के उन वाणों को वीचमेंही काटा । ४२ । वह आश्चर्यमा हुमा his forehead, Arjun looked glorious litc mount Meru with its very lign peaks. The great archer Arjun, excessively wounded by your son'a arroirs, looked beautiful like the Kinshuk tree in Woom. Then Arjun so wounded Dushasan of lot tempor as on the day of full moon Rahu in its grcat rage hamisses the moon. Wounded by the darts of valliant Arjun, your son again wounded him with his sharp arrows having vulture feathers. Then having cut down his bos, Arjun broko his chariot with three arrows and pierced through bis body with liš sharp arrows. Then standing before Bhishm, Dushasan wounded Arjun with twenty five arrow's on the breast and arms. Then, O king, Arjun the destroyer of focs, much enraged, discharged at him drcadlul an 0198 liko the staff of Yom, lut your son cut them dowe in the way. 42. The siglit ras wonderful to bolold. Then your [4886] Mahabharat [४८८६) शरान् सन्धाय कार्मुके ॥ ४३ ॥ प्रेययामास समरे स्वर्णपुरा छिलाशितान् । न्यजन्ते महाराज तस्य फावे महात्मनः ॥ ४॥ यथा हसा महाराज तडाग माप्य भारत । पीडितव पुत्रस्त पाण्डवेन महात्मना ॥ ४५॥ हित्वा पार्थ रणे तूर्ण भीष्ास्य रथमाव्रजत् । अगाधे मज्जतस्तस्य द्वीपो भीमोऽभवत्तदा ॥ ४६ ॥ प्रतिलभ्य तर संज्ञा पुत्रस्तर विशाम्पते । अवारयत्तत. मूरो भूयएवपराक्रमी ॥ ३७॥ दार सुनिशितै पार्थ यथा पुत्र पुरन्दर । निर्षिभेद महाकायो विव्यथे नैव चार्जुनः ४८ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि अर्जुनदुःशासनसमागमे । एकादशाधिकशतोऽध्यायः ॥ १११ ।। फिर आपके पुत्र ने ताणधारयाले वाणों से अर्जुन को व्यथितकिया, इसके पीछे | युद्धमें क्रोधभरे अर्जुन ने सुनहरी पुग्ववाले वा शिलापर धिमेहुए वाणों को धनुप पर चढ़ाकर युद्धमें फेंका, हे राजा वह वाण उसमहात्मा के गरीरमें ऐसे प्रवेश करगये जैसे कि तड़ाग को पाकर हंस प्रवेश करजाते हैं महात्मा पांडव के हाथ से पीड़ित पापकापुत्र युद्ध में अर्जुन को छोड़कर शीघही भीमनी के रथके पास गया तब भीष्मनी उस अगाध जन के डूबेहुएको आधाररूप द्वीप होगये इसकेपीछे हे राजा आपके शूरवीर पुत्रने चैतन्यहोकर फिर महा तीन वाणों से अर्जुन को | ऐसा ढकदिया जैसे कि बड़े शरीरवाले इन्द्रने त्रासुर को माच्छादित कियाथा उसके घायल करनेपरभी अर्जुन पीडामान् महीं हुआ ४८ ॥ son wounded Arjun with sliarp arrows. Thereupon Arjun, mueli enraged in tlic ficld of lattle, put to his boir arrows sharpened on stone and furnished with gold feathers, and di-charged them at him Those arios prerced through the body of that great warrior as strans enter a luhe. Wounded by the great Panday your son left Arjun and hastened to approach Bh shma's ch riot. Bhishm protected• him as an island protects a man fallen into deep sea. Then, Oling, your valliant sos, having regained his consc.onsness, again covered Arjun with very sharp arrows as Indra covered the big body of Vritrasur, but Arjun ras not disturiel in spite of those wounds." 48.

८॥ तस्य (४८८७) भीमपर्व Bhushala Parv [ 46871 सञ्जय उवाच ॥ सात्यकि दशित युद्धे भीष्मायाभ्युद्यत रणे । सायंगिसंहप्पा सो वारयामास सयुगे ।१॥ माधनस्तु मुसउदो राक्षस नमिर । भाजधान रणे राजन् प्रहसन्निव मारत ॥ २॥ तथैव राक्षसो राजन् माधव नपनि गर । मर्द पामास राजेन्द्र सकुद्ध. निशिपुद्गवम् ॥३॥ शनेय शरसघातु प्रेषयामास सयुगे। राक्षसाय मुसकुद्धो माधव परवीरहा ॥ ४॥ ततो रक्षो महाबाहु सा यफि सत्य नि क्रमम् । विम्याध विशिक्षस्तीण सिंहनाद ननादच ॥५॥ माधरस्तु भश गिद्धो राक्ष सेन रणे तदा । पार्यमाणश्च तेजस्वी जहासच ननादच ॥६। भगदत्तस्तत शुद्धो माधव निशितै शरैः । नाडयामास समरे तापरिय महागजम् ॥ ७॥ विहाय राक्षग युद्ध शैनेयो रथिनायर । प्रायोतिपाय चिक्षेप शरान सनत पर्यण । प्राग्ज्योतिषो राजा माधवस्य महवनु । चिच्छेद शतधारेण भन्लेन कृतहस्तयत् ।९॥ प्रध्याय ११२॥ संजय बोले कि युद्ध में शत्रोंसे अलंकृत भीष्म के सम्मुख जातेहए मात्यकी को वडे धनुपधारी आर्यशृगने युद्धभूमे में रोका, हे राजा फिर अत्यन्त कोधित और हँसतेहुए सात्यकी ने नौ वाणों से राक्षस को घायल किया, इसीतकार अत्यन्त कोपयुक्त राक्षसनेमी शिनियों में श्रेष्ठ सात्यकीका पीडितकिया, फिर अत्यन्त नोपयुक्त शत्रुहन्तासात्यकीने वाणोंकी वर्षा राक्षस परकी और रातसने तीक्ष्या विशिषों से उस सत्यपराक्रमी महावाहु सात्यकी को घायल करके बडे सिंहनाद को किया, फिर राक्षसके हायसे अत्यन्त घायल और रे काहुआ महातेस्वी सात्यकीभी हँस हँस करगर्जा इमपीछे क्रोधयुक्त भगदत्तने तीक्ष्णाणोंने सात्यकी को ऐसा घापल किया जैसे कि चावकों से बडे हाथी को घायल करते है फिर रथियों में श्रेष्ठ सात्यकी ने उस राक्षसको छोडकर गुप्त ग्रन्थीवाले वाणों से राजा प्राग्ज्योतिष को घायन किया और बड़े हस्तमापी राजा प्राग्ज्योतिपने उस सात्यकी के बड़े CHAPTER CXII Sanjiya continued "Arrasbrug the great cher cheched Satyalı going in the field of Lattle against Bhishm armed with werpons. Then, O king, Satyaki much enraged, yet with a smile on his face, wounded the rabshas with nine arruns In the same manner, the enraged mbshas wounded Satyalı the best of Shinis Theo Satyali the destroyer of enemies, much enraged, showered his Arrows over the ralsh7s, and the latter having rounded the former with his sharp arrors, roared a loud roar, Then much rounded by the rakshas and checked by him, Satyakı too drughed and roared Then Bhagdatta in anger wounded Satynki with his sharp arrostS an elephant with goads Then Satyali the best of charioteers left the rhshas and wounded the king of Pragjyolish with Arrows having hidden hnots. The king of Pragjjolish shorted the suiftness तथा [ 4888 ] M2: bharat (४८८८) अथान्यदनुरादाय धेगवत् परीरहा । भगदत रणे क्रुद्ध विव्याध निशितै शरै ॥ १०॥ सोतिविद्धो महेवास सृस्किणी परिसंलिहन् । शफि कनरुवर्य भूपिता मायसी हदाम् ॥ ११ ॥ यमदण्डोपमा घोपं विक्षेप परमावे । तामापतन्ती सहसा तस्य बाहुरलेरिताम् ॥ १२ ॥ सात्यकि समरे राजन् द्विधा चिच्छेद सायकै । तत पपात सहसा महोरके हतप्रभा ॥ १३ ॥ शक्ति विनिहतां दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशार ते । महता रथनशेन यारयामास माधयम् ॥ १४ ॥ तथा परिवृत हवा घाणे यानां महारथम् । दुर्योधनो भृश कुद्धो भ्रातन सर्वानुवाचह ॥ १५ ॥ फुक्त कौरव्या यथा घ सात्यको युधि । न जीवन् प्रति निर्याति महतोस्मात् रथ प्रजात् ॥ १६ ॥ तस्मिन् हते हत मन्ये पाण्डवाना महद्वलम् । तथेति च वचस्तस्य परिगृह्य महारया ॥१७॥ शैनेय योधयामासीमायाभ्युद्यतरणे । काम्पोजराजो धनुपको सौ धारखाले भल्ल से काटा, फिर उम शत्रुहन्ता ने दूसरे वेगवान धनुष को लेकर बड़े तीक्ष्ण वाणों से भगदत्त को घायल किया ।१०। फिर इस अत्यन्त घायल होठोंको चावते वड़े धनुपधारीने सुवर्ण और वैडूर्यमाणसे अलंकृत यमराज के दण्ड के समान महा भयानक लोहेकी दृढ़शक्ती को फेंका हे राजा उसके | हाथमे मोरेत उस अकस्मात् गिरतीहुई शक्तीको सात्यकी ने अपने बाणों से दो खण्ड कर के पृथ्वीपर गिराया फिर आपके पुत्र ने शक्ती को टूटाहुभा देखकर बड़े रयों के समूहों से सात्यकी को घेरा फिर उस सात्यकी को घिराहुमा देखकर अत्यन्त क्रोधयुक्त दुर्योधन अपने भाइयों सेबोला, कि हे कौरवो अब ऐसा करो जिससे कि सात्यकी हमारे इन रथसमूहोंसे नीवता न लौटे, उसके मरने पर मै पांडवों की बड़ी सेनाको भी मृतकही मानताहूं तब महारार्थियों ने कहा कि ऐसाही होगा, यह कहकर भीष्म केही आगे सात्यकीसे युद्धकिया और महावली राजा कम्बोजने भीष्मकी ओर जातेहुए युद्धमें प्रवृत्त अभिमन्युको रोका, अभिमन्युने गुप्त ग्रन्थीवाले of his hand by cutting Satyakı's box with a very sharp edged dart Then that destroyer of enemies took up another bow and rounded Bhagdatta with very sharp arrows 10. Then that great archer much wounded and biting his lips in anger discharged a hard spour iron, like the staff of Yum decked with gold and jewels, but Satyak: cut down into two pieces with his arrows the spear so hurled and coming suddenly upon him Seeing the spear cut down, your son surrounded Satyahı with a great many chariots Seeing Satyaki surrounded by them, enraged Duryodhan said to his brothers- " haurrvasi do so contrive that Satyakı may not lewe the net woik At his death I belive that all the army of the Pandavas will be destroyed The warriors said in reply that they would do as they were told and began to fight against Satyakı in the presence of Bhishm The mighty king of Kamboj of of our chariots alive " (४८८९) भीष्मपर्व Bhishma Pary [48893 बलवान धारयामास संयुगे ॥ १८ ॥ मा नि पतिर्विध्या शरैःसमत पर्वभिः । पुनरेव चतु-पल्या राजन् विव्याध तं नृप ॥ १९ ॥ सुदक्षिणस्तु समरे पुनर्विव्याध पञ्चमिः । सारथिञ्चास्य नयामि रिच्छन् भीष्मस्य जीवितम् ॥ २० ॥ तयुद्धमासीत् मुमहत्चयो स्तपसमागमे । यदाभ्यधावदाङ्गेयं शिसण्डी शत्रुफर्शनः ॥ २१ ॥ विराटपदी दृद्धी पारयन्ती महाचमूम् । भीष्मच युधि संरब्धा याद्रयन्ती महारयो ॥ २३ ॥ सावत्यामा रणे क्रुद्धः समियाद्रथसत्तमः । ततः प्रयवृते युद्धं तयोस्तस्यच भारत ॥ २३ ॥ विराटो दशभिर्मले राजधान परन्तप । यतमान महेष्वासं द्रौणिमायशोमिनम् ॥ २४ ॥ दुपश्च प्रिमिणैर्विव्याध निर्शितस्तदा । गुरुपुत्रं समासाद्य प्रहरन्ती महावली ॥ २५ ॥ अश्वत्यामाततस्ता तु विव्याध बहुभिः शरैः । विराटद्रुपदा धीरी मीर्म प्रति समुधती ॥ २६ तपाद्भुतमपश्याम वृद्धयोश्चरितं महत् । यद्रोणिसायफान् वाणोंसे राजा को घायल करके चौंसठ वाणों से फिर व्यथिन किया, इसके अन न्तर राजा सुदक्षिण ने पांच वाणोसे घायल करके नौ बाणों से उसके सारथी को घायल किया (२०१ वहां उनदोनोंकी सम्मुखता में बड़ामारी युद्धहमा और शत्रुहन्ता शिखण्डी गांगेयनीकी ओर दौड़ा औरयुद्ध में क्रोधयुक्त महारथी दोनों विरादू और द्रुपद उस सेना को हटातेहुए भीष्म की ओर को दौड़े तब महाक्रोधित महारथी अश्वत्थामा उनके सन्मुखगया तदनन्तर उसके साथ उन दोनों का बड़ा युद्ध जारी हुआ फिर राजा विराट् ने उस उपाय करनेवाले और युद्ध में शोभा पानेवाले बड़े धनुपधारी अश्वत्थामाको दश भल्लों से घायल किया फिर द्रुपदने तीक्ष्ण धारवाले तान बाणों से घायल किया फिर वह दोनों गुरु के पुत्रको सम्मुख पाकर प्रहार करने लगे, तदनन्तर अश्वत्यामाने उन भीष्मनी के ऊपर युद्ध में प्रवृत्त विराट् और द्रुपदको भनेक वाणों से घायल किया ।२६। वहां हमने उन दोनों रद्धोंके वड़ेभारी checked Abhimanyu who was coming torards Bhishm. Abhimanyu, in Town. the nrg rith Wics UUTIS kutting riderna inte, pierced him again with sixty ſour arrows. Then king Sudakshin wounded his coachman with five and nino arrous 20. The two warriors fought very hard. Shil handi the destroyer of foes rusbed upon Bhishm and the two warriors Virat and Drupad, much enraged in battlo, rushed against Bhishm, pushing aside tlie armies. Then valliant Ashwathatua much enraged faced him and the two fought very bravels. Then the king of Virat with ten darts younded the great archer Ashwathama and Drupad rounded him with three. Thon the two Farriors finding thicmselves face to face sith the son of acharya, bogan smiting him rith their arrots. Ashwathama then wounded with many arrows the tiro warriors Virat and Drupad advancing against Bhishm. 26. There we sat the bravery of the [4690] Mahabhamt { ४८९०)। घोरान् प्रत्यवारयतां युधि॥ २७ ॥ सह देवं तयायान्तं कृप शारद्रताभ्ययात् । यथा नागो घने नागं मत्ती मत्तम्पादयत् ॥ २८ ॥ रुपश्च समर शूरो माठीपुत्र महारथम् । आजघान शरस्तूर्ण सप्तत्यारुस्मभूषणैः ॥ २९ ॥ तस्य मासुतचाप द्विधा चिच्डेद सायकैः । अयन चिन्नधान्यान विन्याध नवभिः शरै ॥ ३० सोन्यत् फार्मकमादायसमरेमारसाधनम् । माद्रीपुत्रं मुसंहृष्टो दशमिनिशितैः शरै ॥३१॥ थाजयानो रसि कुद्ध इच्छन् भीष्मस्य सीवितम् । तथर पाण्डयो राजद्धारद्धनम मर्पणम् ॥ ३२ ॥ माजधानो रसि क्रुद्धो भीष्मस्य ययकाक्षया। तयोर्युवं समभवत् घोररूपं भयावहम् ॥ ३३ ॥ नकुलन्तु र सो विकर्णः शनुनापन । विव्याधसाय फै षष्टया रक्षन में महायलम् ॥ ३४ ॥ नकुलोपि भृशं विस्तव पुत्रेण धीमता। विकर्ग सप्तसप्तत्या निर्विभेद शिलीमुसे ॥३५॥ तत्रतौनरशाईलो भीष्महतोः परन्तपी। कर्मको देखा कि युद्ध में अश्वत्थामा के महाघोर भयानक बाणों को रोका, और कृपाचार्यजी उस जातेहुए सहदेवके सम्मुख ऐमे गये जैसे कि वन में मतवालाहायी । मतवाले हाथी के सम्मुख जाताहै, वहां शीग्रही शूरवीर कृपाचार्य ने बड़े तीचमचर वाणोंसे सहदेव को घायल किया, फिर नहदेव ने उनके धनुप के खण्ड २ करके नौ याणों से उनको घायल किया । ३० । भोप्पके जीवन को चाहते उस भमन्न चित्त और क्रोध में युक्त कृपाचार्य ने मादीनन्दन सहदेवको तीन दश वालों मे छाती के ऊपर घायन किया हे राजा इममकार भीमके मारने की इच्छासे असाय क्रोध भरे सहदेव ने कृपाचार्यको भी छातीपर घायल किया तब उन दोनों का महापौर और भयानक युद्धहुआ, इसके पीछे शत्रुसंतापी युद्धमें ब्रोषित महावळी विकर्ण ने नकुलको सात वाणों से घायल किया तब आपके पुत्रमे अत्य न्त चापल नकुलने भी सतत्तर शिलीमुख वाणोंमे विकर्णको घायन किया, फिर उन शत्रुसंतापी वीरोंने भीमके कारण परस्पर में ऐमे प्रहार किये जैसे कि गो- two old bids, in checking the flight of Aswathama's arroirs Kripa charya rushed upon Sahadev as one mad elephant in a forest iu hes against another. Va Lant Kripacharya coon founded Sallader frith seventy svaip TOTTS Sabadeo in his turn cut his boss into pieno and wounded him with me arronis 30 Desirous of prutect 10% Blishma's life, cheerful minded and enraged, Knpacharya founda! with ten skrift arroys Salades the son of Vain in the breast. Desi ous of slaying Bhishm, unlerable and enraged, Sabåder wounded Krpacharya on the breast n d the two warriors fuught sery bravels Then the destroyer of enemies, enraged in lattle, the brave n ITIUT, Vilar wounded Sahade nith ejen arrous Inch rounded by your Pon, Nakul, with seventy seven irrors sharpened on ston, Founded Viharn on the breast" Then those warriors, destroyers of enemies, fought against each other on amount of Bhisho like (150 ।

(४८११) Sitat: Bhi-lima Paiy [48911 अन्योन्यं जनारोगोष्ठ गोपमाविय ॥ ३६॥ घटांकाचं ग्णयान्तं निघ्नन्तं तववादि माम दुर्मुखः ममरे प्रावाद् भीमदेना. पराक्रमी ३. ॥ हडिम्बस्तु रण राजन दुमुखं शत्रुतापनम् । आजधानारमिसः शरेणानतपर्वणा ॥ ३८ ॥ भीमसेनमतचापि दुर्भगः समसः शरैः । पट्यावीरो नदन अधों विधाध रणमर्सनि ॥ ३९ ॥ धृष्टपुत्र तथायान्तं भीमस्य वधकाक्षिणम् । हार्दिक्यो वारयामास रयभ्रेष्ठं महायं ॥४॥ हार्दिक्यः पार्वत वापि विध्वान्चभिरायस. । पुनः पञ्चाशतापूर्ण तिष्ठ तिष्टेति चावात् ॥ ४ ॥ आजघान महाबाहुः पर्पिततमहारथ । तव पार्वतोराजन हार्दिक्य गभिःशरः ।। ४२ ॥ विव्याध निर्शितली. कदपरजिह्मगैः । तयोः समभवद्युद्धं भीमहनार्महाहा ।। ४३ ॥ भन्योन्याति शयेयुक्तं यथा वृत्रमहंन्द्रयोः। भीमसेनं तथा पान्त भीष्मं प्रनि महारथम् ॥ ४४ ॥ भरिप्रवाश्ययात्त तिष्ठतिष्टेति चानधीत् । सीम शाला में दो वृषभपहार करते हैं, भीष्म के कारण से पराक्रम करने वाला दुर्मुस युद्धमें प्रापकी सेनाको मारने वाले और घूपले हुए घटोत्कच के सम्मुख गया । ३७ । फिरकोपयुक्त घटोत्कच ने गुप्तग्रन्थी वाले वाणों मे उन शनुसंतापी दुर्मुख को छातीपर घायल किया, फिर गर्जना पूर्वक प्रमा चित दुर्मुखने भी मुन्दर | मुगाले माठ बाणों से भीमसेन के पुत्र धोकनको धायन किया, इसीप्रकार पारधी कृतवर्मा ने भीमफे मारनेकी इच्छा रखनेवाले रथियों में श्रेष्ठ जारोहुए धृष्टद्युम्न को रोका ।४०। फिर कृनार्मानेभी पांच तीक्ष्ग यागोंसे धृष्टद्युम्नकोपायल करके पचास वाणों से शीवही छानी में घायल किया, इसी प्रकार धृष्टद्युम्न ने तीक्ष्ण कंकपक्षवाले नौ बाणों से कृतवर्मा को घायल किया युद्ध में भीष्मके कारण उन दोनोंका ऐमाकटिन युद्धहुआ जैसाकि हवामुर और इंद्रका हुआथाइसीप्रकार भरिश्रवा उर भीप्नकी और जाते महारथी भीममेन के सम्मुल शीघ्रता से गया और तिष्ठ २ शानद बोला. उसके पीछे सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रयाने युद्ध में साक्षण angry balls in the fold Showing his pros oss lor tho sake of Blishni, Durinukh faced Ghatutkach who was roarning there and destroying jour acıies 37. Enraged Ghalutkach wounded Durmukh tho torror of enemies on tho breast with arrows having hidden knots. Then with a roar Durmukh of cheerful spirit wounlu Ghatotkach the son of Bhini with sitty arrots. In the samo manner, Krityarma checked Durishtudyumn the lest of cliarioteers, ilmuirous of playing Bhislim 40. kritrai una too, with firo and fifty jron arross wounded Dhirislstadyum on thu hrcast Dhrishta-lyumn Founder Krity. nia with nim sharp arros having vulture quille. I de twv liervi firught for illc wike o Bhishm like India and, Vrifrastir. I buríslırars Croppired laste Bhim ulio was going to uspils Blois de fi! st. liimith ac stay, stay. Then Bhurjstara the foundsste Hyder In the time manner, - [4892] Alahabhart (४८९२) दतिरथोमीममाजघान स्तनान्तरे ॥४५॥ नाराचेन पुतीक्ष्णेन रुखमपुखेन सयुगे। उरस्थेन यमी तेन भीमसेन प्रतापवान् ॥ ४६ ॥ स्फन्दशक्त्या यथा प्रौञ्च पुरा नृपतिसत्तम । तो शरान् सूर्यसफाशान् फर्मारपरिमार्जितान् ॥४७॥ अन्योन्यस्य रणे क्रुद्धौ चिक्षिपाते नरर्पभो । भीमो भीष्मवधाफाक्षी सौमदत्तिं महारथम ॥ ४८ ॥ तथा भीष्मजये गृनु सौमदत्तिस्तु पाण्डवम् । कृतप्रतिकृते यत्ती योधयामासतूरणे । ४९ ॥ युधिष्ठिरन्तु कौन्तेय महत्या सेनयावृतम् । भीष्माभिमयमाया-त भारद्वाजों न्यवारयत् ।। ५० ॥ द्रोणस्य रथनिर्घोष पर्जन्य निनदोपमम् । शुत्वा प्रभद्रका राजन समफम्पन्त मारिप ॥ ५१ ॥ सा सेना महती राजन् पाण्डुपुत्रस्य संयुगे । द्रोणेन पारिता यत्ता न चचाल पदात् पदम् ॥ ५२ ॥ चेकितान रणे पत्त भीष्म प्रति जनेश्वर। चित्रसेनस्तय सुन क्रुद्धरूपमवारयत् ॥ ५३ ॥ भीष्महतो पराप्रान्त सुनहरी पुंखवाले नाराच वाणसे भीममेनको छ में घायल किया प्रतापवान् भीम सेन उस छाती पर नियत हुए वाणसे ऐसा शोभायमान हुमा जैसे कि पूर्व समयमें स्वामिकार्तिकनी की शक्तीसे क्रौचनाम पर्वत शोभायमान हुभा था, युद्धमें क्रोधयुक्त उन दोनों नरोत्तमों ने सूर्य के समान प्रकाशित और साफ किये हुए वाणों को परस्परमें फेका, फिर भीष्म के मारने की इच्छारखने वाले भीमसेनने महारथी भूरिश्रवाको और भूरिश्रवा ने भीमसेन को घायल किया, महार पर महार करने में कुशल वह दोनों युद्धमें संग्रामकर्चा हुए फिर भारद्वान द्रोणाचार्य जी ने बड़ी सेना समेत भीष्मके । सम्मुख जाते हुए कुन्ती के पुत्र युधिष्ठिर को रोका हेराजा द्रोणाचार्य के रथका शब्द बादल के समान था उसको भुनकर १५० । प्रभद्रक नाम राजकुमार बडे कम्पायमान हुए और पाण्डवों की वह बड़ी सेना बुद्धिमान द्रोणाचार्य से रोकी हुई चरण से एक पदभी चलाने वाली नही हुई और युद्ध में कुशल भीष्म के ऊपर कोप युक्त चेकितान को भाप के पुत्र चित्रसेन ने रोका पराक्रमी चित्रसेन भीष्मनी के लिय पराक्रमकरने वाला हुआ हे राजा bon on the breast Tith shu y aroms having goldurr fertlers the arrows piercing his brevisi, Bhimcen lool ed glorious liho Kraunch mountain pieicot in the diys of old with the spear of Lord Kærtihoya Enraged in Lattle the isso best of men discharged of cach other bright trrows glorious as the sun Bhim desirous of slasa Bhishi vormdcd Blunsharia and tras lumself sounded by Lim in return The tiro clever warriors fought ralliantly Bharadwy Dronachını ya viflt ins lugo umy clicc ead the advance of Yudhisha hur the son of hunti The sound from the charsot of Dionncharya was ble the peal of thunder on horriug wluch ( 50 ) the Prabhadrats The large army of the "Panduvus checked by Dronacharya, remudel niwtionless Your son Clutrasen checked With ing sliool with ftir (४८९३) भीमपर्व Bhishma Pary [48331 चित्रसेना पराक्रमी । चेकितान पर शक्त्या योधयामाम भारत। ५४ । तपैयचाफ तानोपि चित्रमेनमवारयत् । तधुनमासीत् सुमहत् तयोस्तत्र समागमे ।। ५५ ॥ अर्जुनो पार्यमाणस्तु पहुशस्तत्र भारत । विमुखीवस्य पुत्रं ते सेना तय ममईह ॥५६॥ दुःशासने पि परया शक्त्या पार्थमधारयत । कथं भीमं ननो हन्या दिति निश्चित्य भारत ॥ ५७ ॥ सा वध्यमाना समर पुत्रस्य तय याहिनी । स्लोच्यते थिभिः श्रेष्ठस्तत्र तत्रैव भारत । ५ ।। शते श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वन्द्वसमागमे द्वादशाधिकशनोऽध्यायः ॥ १.१२ ।। सजय ज्वाच । अध धारो महेष्वासो मत्तवारणविक्र: । समादाय महच्चाप मत्तवारणवारणम ॥ १॥ विधुन्वानो नरश्रेष्ठो द्रावयाणों वरूथिनीम् । पृतना पाण्डवेयानां गाहमानो महायल ॥ २ ॥ निमित्तानि निमित्तशः सर्यतो पास्य पी. उस चित्रसेनने बड़ी सामर्थ्य से चेकितानसे युद्ध किया इसी प्रकारचेकितान ने भी चित्र- सेन को रोका, उस समय पर उन दोनों का युद्ध बहुत बड़ा हुआ और वहां पर रके हुए अर्जुन ने बहुत प्रकार से, आपके पुत्र का मुख मोड़कर आपकी सेनाकामईन किया और दुश्शासनने भी बड़ेपराक्रमसे यहनिश्चय करके अर्जुनको रोका कि यह किसी प्रकार हमारे पिनामह भीष्मीको नहीं मारे हेभरतर्पभयुद्धमें आप के पुत्रकी वह घायल हुई सेना उत्तम २ धियों समेत जहां तहां अचेत होकर गिरी और भागगई ५७ ॥ अध्याय ११.३॥ सज्जय बोले कि फिर बड़े धनुपधारी मतवाले हाथी के समान पराकमा नरोत्तम महाबली द्रोणाचार्य भी महागमेन्द्र के हटाने वाले बड़े धनुष को लेकर सवको कँपाते सेना को घायल करते हुए पाण्डवी सेना को मझाते संता करते हुए Cliekitan who came furiously against Bhishin. Chítrasen did doods of valour for the sake of Bhislım. The two wariiors fought very bravely and checked each other. Their fighting was tremendons. Arjun checked there in ſiis adı ance made your con tarn back and destroyed your armies. Dashasan too, desirons of protecting Bhislım, chocked Arjun. The army of your son sounded in battlo ſoll senseless hoe and there or left the field of Lattle." 57. CHAPTER CXIII. Sanjaya raid: Then the greal archer, full of proness like a wad elephant, best of men, vaļliant Dronacharya tcok up his large bow capable of tuining back a huge elephant, rounding and shaking the Pandav armics, and seeing signs on all sidor, said to his son Ashta.

४ ८ ॥ 14894 Math bharat ४८९४) यनान् । प्रतपन्तमनीकानि द्रोण. पुत्रमभाषत ॥ ३॥ अयं हि दिवसस्तात पत्र पार्यो महावल । जियांल. समरे भीमं परं यलं करिष्यति ॥ ॥ उत्पतन्ति हि मे वाणा धनु' प्रस्फुरतीयय । योग मस्माणि गच्छन्ति पूरे मे वर्तते मतिः ॥ ५॥ दिनशान्तानि घोसाणे व्याहरन्ति मृगहिजा. । नीचैगृध्रानि लीयन्ते भारतानां चम प्रति ॥ ६ ॥ नटम इवादित्यः सर्वतो लोहिता दिश. । रसते व्यथते भूमि फम्पतीच च सर्वश. ॥ ७ ॥ कङ्कगृध्रा चलाकाथ व्याहरन्ति मुहमहु । शिवाचवाशिवा घोरा बेदयन्त्यो महद्भयम् ॥ पपात महती चोल्का मध्ये नादित्यमण्डलात् । सम्वन्धश्च पारधा भानुमावृत्य तिष्ठनि ॥ ९॥ परिवपस्तथा घोरश्चन्द्रभास्करयोरभूत् । वेदयाना भयं घोरं राज्ञा देहावर्तनम् ॥ १० ॥ देव तायततस्थाच कौरवेन्द्रस्य देवताः । कम्पन्ते च हसंतेच नृत्यन्ति च रुदन्तिच ॥१॥ सब ओर से विहूनों को देखकर अपने पुत्र अश्वत्थामा से वोले । ३ । हे पुत्र | यह वह दिन है जिसमेंगद्धके वीच भीमको मारना चाहता महावली अर्जुन बड़े २ उपायोको करेगा क्योकिमेरे बाण उछलनेहै और धनप कंपायमान होताहै और अस्रयोग को मार होने है और मरी मात करवर्त्तमान है दिशाओंमें शान्तीमे रहित भयकारी पशु पक्षी पोलने और भरतशियोंकी सेनामें गृध्र नाच पक्षियोंकेसाथबैठे हैं.मूर्यमभासे रदिन हैं और दिशा म आरम लाल और पृथ्वी सव प्रकार से शब्दायमान और १. इन होकर कांपनी है कंक गृह और व लक वारम्बार बोलते हैं अशुभ भयानक शृगाल बड़े भय को प्रकट करतेहुए वोलतेहैं मूठमण्डल में मे बड़े उल्कापात होते हैं एक बंध परिव मूर्य को ढककर नियत है इसी प्रकार ,चन्द्रमा और सूर्य का भयकारी प्रदेश अर्थात् पारम नाम मण्डल राजाओं के शरीरों का नाश कर ने वाला महाभयको उत्पन्न करता हुआ वर्तमान हुआ है । १० । और राजा कुरु के मन्दिर में विराजमान देवता कांपते हँसते नाचते और रोवते हैं ग्रहों ने सूर्य को दक्षिण होकर चिहन से रहित कर दिया और भगवान् चन्दूमानीचे मुख होकर thamu." This is the dry on which Arjun will try his best to kill Bhishm in battlo; for my arrots jump up, the bo v shales and other weapons offer resistanco My ideas are going wrong and the beasts and buds in all directions utter ominous soundz Vul uies are perched side by side with lower lids in the army of the Kauravus Thc stin is dım an 1 the directions 110 101 The cirth gives out sounds and signs of trouble Kank birds, vultures and herons cry again and again. Omininous ond d edful jackals utter cries of distrest The sun's orly is giving out large sparks of fire and a bar is seen hiding the sun. The circles round the sun and tle moon po tend a dreadful slaughter of Linge 10 The gods in the falace of the king of Kurus are Ishing. nghing dancing and wrep ng The stus to tho right of the sun have changed their signe and the moon hangs down her faces (४८९५) ragi Blurslun Buy [48351 अपसव्य ग्रहावरलक्ष्माण शिवाकरम् । अवारशिराश्च मगपा नुपातिष्टन चन्द्रमा ॥ १२ ॥ यपूर्षि व नरेन्द्राणां विगताभानि लक्षये | धार्तराष्ट्रस्य संन्यपु नच भाजति दशिता ॥ १३ ॥ सेनयोरमयोथापि समन्नाच्छयते महान् । पाञ्चजन्यस्य नियोको गाण्डीवस्य च नि स्तन ॥ १९ ॥ अवमास्थाय शमत्सु रुतमास्त्राणि सयुगे । अपास्या न्यान् रणे येधानज्येष्यति पितामहम् ॥१५॥ दृप्यन्ति रोगपाणि सीदतीय च मे मन । चिन्तयित्ना महावाहो भीमार्जुनसमागमम् ॥ १६ ॥ तच्चेह निरः तिप्रा पाचाल्य पापचेततम् । पुरस्कल्प रणे पार्था भीष्मस्यायोधनं गत ॥१७॥ अनवाच्य पुरा भीमो नाह हन्या शिपण्डिनम् । स्त्री ोपा विहिता धापा देवाच्च स पुन पुमान् ॥ १८॥ यमगल्यध्वजश्चध याक्षसैनिर्महायलः । न चागद्गलिके तस्मिन् प्रहरेदापगामत. ॥ १९ ॥ एतद्विचिन्तयानस्य गजा सीदति मे भृशम् । वर्तमान हुए राजाओं के शरीर शोभा से रहित दीख रहे हैं वह शनधारी भलंकृत गजा लोग दुर्योधन की सेनामें शोभायमान नहीं हैं टोनों सेनाओं में चारों भोर को उसी पांचजन्य शंख और गाण्डीवधनुष के शब्द सुने जाते हैं निश्चय करके वार अर्जुन युद्ध में दिव्य प्रस्त्रों को धारण करके युद्ध करने वाले अ य शूर वीरों को छोड़कर पितामह के सम्मुख जायगा, हे महावाहु अश्वत्थामा भीम और अर्जुन की मम्मुखना को शोचकर मेरेरोयें खड़े हुए जाते है और विच भी पाड़ामान होता है वहां अर्जुन उस छली और पापात्मा गिखही को आगे करके भीष्म के मारने को गयाहे पृर्च समय में भीप्सने कहा था कि मैं शिग्दंडी को नहीं मागा क्योंकि इमको ईश्वर ने पहले स्त्री किया था फिर प्रारब्ध मे पुरुप होगया है, यह यमसेन का पुन महावनी अशुभ ध्वजावाला है इस हेतु से गांगेय भीप्पजी उस समान रूप पर प्रहार नहीं करेंगे यह विचारकर मेरेचित्त में बड़ा खेद होता The faces of the king, have lost thoir splendour: the princes armed and dooked in the armies of Duryodhan donot look splendid On all sides and in buth the armies are heard the sounds of the conch Panchjanya and the bow Gaudiv Surely brave Arjun, armed with divine wc-poos, loayı 8 other warriors aside, will face the grandfather My hair, bravo Ashwathama, stand on end when I think of the encounter between Bhishu and Arjan. My mind is distressed to thiak that Arjun under the cover of that deceitful and wicked Shilhandı has gone to slay Bluishm Bhishm has already said that ho will not lay hands on Shihlindi uho was originally a and turned to manhood as luck would bave it Thus son of Yajyason 16 of great strength and has ominous braner and therefore Bhisho will not scharge bis we ipons at him I am much distrossed when I happen to think of this Sbih handı desirous of figliting and ens vomin । ४८९४ - 1834 Muhebliai at बनान् । प्रनपनमनीकानि द्राण पुनममाषत ॥ ३॥ अय हि दिवसस्तात यन पार्थो महावल । मिताल समर भीष्म पर यल मरिष्यति ॥ ४ ॥ उत्पतन्ति हिम वाणा वनु प्रस्फुरतीवय । योग मस्माणि गच्छन्ति पूरे मे यत्तते मति ॥५॥ दिनशान्तानि घोरााण व्याहरन्ति मृगहिजा । नीचैगृधानिलीयन्ते भारताना चमू प्रति ॥ ६ ॥ नटप्रम इवादित्य सर्वतो लोहिता दिश । रसते घ्यथते भूमि कम्पनीव च सवश ॥ ७ ॥ फङ्कगृध्रा बलाकाथ व्याहरन्ति मुहुर्मटु । शिवाचवाशिवा घोरा वेदयन्त्यो महद्भयम् ॥ ८ ॥ पपात महती चोल्का मध्ये नादित्यमण्डलात् । सरुवन्यश्च पारधा भानुमावृत्य तिष्ठी |॥ ९ ॥ परिवषस्तथा घोरचन्द्रभास्करयोरभूत् । वेदयानो भव घार राज्ञा देहायकर्तनम् ॥ १० ॥ देय तायतनस्याच कौरवन्द्रस्य देवता । कम्पन्ते च हसतेच नृत्यन्ति च रुदन्तिच ॥११॥ सब ओर से चिनो को देखकर अपने पुत्र अश्वत्थामा से चोले । ३ । हे पुत्र यह वह दिन है जिसमें युद्धके वीच भरको मारना चाहता महाबली अर्जुन बडे उपायों को करेगा क्योंकिमेरे पाणउछलनेहै मोरधनप कपायमान होताहे और प्रयोग को मान होते है और मेरी मति पर्चमान है दिशाओंमें शान्तीमे रहित भयकारी पशु पक्षी योगले गौर भरत प्रशियों की सेनामे गृध्र नाच पक्षियोंकेसाथबैठे है .मूर्यमभासे रहित है और दिशा मा ओरसे लालहे आर पृथ्वी सब प्रकार से शन्दायमान | और 4. डन होकर कापती हे का या भोर व लक वारम्बार वोलते हैं अशुभ भयानक शाल वडे भय को प्रकट करतेहुए गोलते हैं सीमण्डर मेंसे बड़े उल्कापात होते हैं एक वा परिव मार्य को कार नियत हैं इसी प्रकार ,चन्द्रमा और मूर्य का भयकारी प्रदेश अर्थत् पारस नाम माडल गजाओ के शरीरों का नाश कर |ने वाला महाभयको उत्पन्न करता हुआ वर्तमान हुआ है । १० । और राजा कुरू के मन्दिर में विराजमान देवना कांपते हँसते नाचते और रोचते हैं ग्रहों ने सूर्य को दक्षिणहोकर चिह्न से रहित कर दिया और भगवान् च मानीचे मुख होकर thamn This is th day on wluch Aijn will try his best to kill Blushm in battlo, foi my artons jump up the bo v slal os and other weapons offer rosistance My ders aro going wiong and the beasts and brds in all directions utter ominous sound Vul dies are perched side by side with lover linus in the army of the Kaura vas The sun is dım un i tlic directions are nel The eirtlı gives out sounds and signs of tioulile Kirk birls vultures and lierons cry grin and agun Omnin us inlcl eadful jie 31s utt r ciles of distiest The sun's orb 1951ving out large spirls of fire ind , brir 19 seor lading tia sun Thic cicles lound the sun xnd the moon ja tond 1 dreadful slaughter of king 10. The gody in the palace of the king of Kun us ale slial inng inaghing dancing and upep ng The stars to tho right of the sun have changed their egne and the moon hongs down her face ।

. (४८९५) aga Bhishina Paiy [1895] दापसव्य ग्रहायरलक्ष्माणं दिवाकरम् । अवाशिराय मापा नुपातिष्ठत चन्द्रमाः ॥ १२ ॥ वपि च नरेन्द्राणां विगतामानि लक्षये । धार्चराष्ट्रस्य सन्यपु नव भ्रातान्ति दंशिताः ॥ १३ ॥ सनयोरुभयोश्चापि समन्ताच्छ्यते महान् । पाञ्चजन्यस्य निघाशे गाण्डीवस्य च नि:स्वनः ॥ १४ ॥ भुपमास्थाय शमत्सु रुचमास्त्राणि संयुगे । अपास्या न्यान् रणे योधानभ्येष्यति पितामहम् ॥१५॥ हप्यन्ति रोमकूपाणि सीदतीय घ मे मनः । चिन्तयित्वा महाबाहो भीमार्जुनसमागमम् ॥ १६ ॥ तचे ह निरः तिप्रमं पाञ्चाल्यं पापचैतसम् । पुरस्सत्य रणे पार्थो भीमस्यायोधनं गतः ॥ १७ ॥ अप्रवीच पुरा भीप्पो नाहं हन्यां शिपण्डिनम् । स्त्री होपा विहिता धाया देवान्च स पुनः पुमान् ॥ १८ ॥ अमद्गल्ययजश्व याक्षसेनिर्महायलः । न चामडालिके तस्मिन् प्रहरेदापगापुतः ॥ १९ ॥ एतद्विचिन्तयानस्य मज्जा सीदति मे भृशम् । वर्चमान हुए राजाओं के शरीर से रहित दीख रहे हैं वह शस्त्रधारी अलंकृत गजा लोग दुर्योधन की सेनामें शोभायमान नहीं है दोनों सेनानों में चारों भोर को उसी पांचजन्य शंख और गाण्डीवधनुष के शब्द सुने जाते हैं निश्चय करके वीर अर्जुन युद्ध में दिव्य अत्रों को धारण करके युद्ध करने वाले अन्य शूर वीरों को छोड़कर पितामह के सम्मुख जायगा, हे महावाहु अश्वत्थामा भीष्म प्रार अर्जुन की मम्मुखना को शोचकर मेरेगये सड़े हुए जाते हैं और वित्त भी पाड़ामान होता है वहां अर्जुन उस छली और पापात्मा शिवही को आग करके भीष्म के मारने को गयाहै पूर्व समय में मीप्पने कहा था कि मैं शिखंडी कोनहीं मानंगा क्योंकि इसको ईश्वर ने पहले स्त्री किया था फिर प्रारब्ध से पुरुष होगया है, यह यज्ञसेन का पुत्र महावली अशुभ ध्वजायाला है इस हेतु से गांगेय भीमजी उस अमंगल रूप पर प्रहार नहीं करेंगे यह विचारकर मेरेचित्त में बड़ा खेद होता Tho faces of the kings have lost thoir spleadour: tho princes armed and decked in the armies of Duryodhan donot look splendid. On all sides and in buth tle armies are heard the sounds of the couch Panchjanya and the bow Gandiv. Surely brave Arjun, armed with divine weapons, loaving other warriors asidle, will face tho grandfather. My hair, bravo Ashwathana, stand on end when I think of the encounter between Bhishm and Arjun. My mind is distressed to think that Arjun under the cover of that deceitful and wicked Shikhandi has gone to slay Bluishm. Bhishım has already said that he will not lay hands on Sluiblondi who was originally a and turned to manhood as luck would bave it. This son of Yajyasen is of great strength and has ominous banner and therefore Blislim will not discharge liis weapons at him. I am much distrossed when I happen to think of this. Shihhaudi dosirous of fighting and enrag. woman [ 4896] Malmubharat (४८९६) अभ्युद्यतोरणे पार्थः कुरुद्धमुपाद्रवत् ॥ २० ॥ युधिष्ठिरस्य च क्रोधो भीष्मश्चा र्जुनसगत । मम चास्त्र समारभ्भ' प्रजानामशिर्व ध्रुवम् ॥ २१॥ मनस्वी घलधान गर. कृतास्रो लघुविक्रम । दूरपाती दृढेपुश्च निमित्ताश्च पाण्डघ. ॥ २२ ॥ अजेयः समरे चाप देवैरपि सवासयैः । बलवान् धुद्धिमाधव जितक्लेशो युधावर ॥ २३ ॥ विजयी च रणे नित्यं भैरवनश्च पाण्डवः । तस्य मार्ग परिहरन द्रुतं गच्छ यतव्रत ॥ २४ ॥ पश्यात महाघोरे संयुगं वैशसं महत् । हेमचित्राणि शराणां महान्तिच शुभानि च ॥ २५ ॥ कयचान्य पदीय॑न्ते शरैः सनतपर्वभिः । छिद्यन्ते च ध्य जाप्राणि तोमराश्च धपि च ॥ २६ ॥ प्रासाश्च विमलास्तीक्षणाः शक्स्यश्व फनकोज्वलाः । पैजयन्त्यश्च नागानां संयुद्धेन फिरीटिना ॥ २७ ॥ नाय संरक्षित है युद्धमें प्रवृत्त चित्त क्रोधभरा शिखंडी भी कौरवों के वृद्ध पितामह भीष्मजी के सम्मुख गया है । २०। युधिष्ठिर को क्रोध और अर्जुन से सम्मुख हुआ भीष्म और यहॉपर मेरा युदसम्बन्धी कर्मका प्रारम्भ यह सब बातें निश्चय करके मनाओं के अकल्याण की करनेवाली हैं, पांडव अर्जुन साहसी पराक्रमी शूरवीर अस्त्र शस्त्रों का ज्ञाता बड़े तीक्ष्ण दूर गिरने वाले वाणोंका फेंकनेवाला और लक्ष्य | भेदी अर्थात् लक्ष्य का जाननेवाला है, यह अर्जुन इन्द्र समेत देवताओं से भी युद्धमें दुर्जय और अजेय है और पराक्रमी बुद्धिमान् दुःख रोगाद का जीतने वाला शूरवारों में श्रेष्ठ युद्धमें सदैव विजयी और भयकारी अखोंका फेंकने वाला है हे सावधान व्रत पुत्र तुम अर्जुन के मार्ग को रोकते हुए शीघ्र जाओ अब इस महा भयकारी युद्धमें इस बड़े नाश को देखो शूर लोगों के कवच जो सुवर्ण से जटित और बड़े मंगल स्वरूप हैं वह सब गुप्तग्रन्थी वाले वाणों से तोड़े जाते हैं और ध्वजा तोमर धनुपभी खंड २ किये जाते हैं, और अत्यंत क्रोधयुक्त अर्जुन के हाथ से साफ और तेजप्रास और सुवर्ण के समान उज्ज्वल शक्तियां और हाथियों ed in battle has also gone to face the grandfather, 20 anger, Arjun's encounter with Bhishm and my fighting here all these things portend ill to the people. Arjun the Pandav is courageous, strong, valliant and clover in the use of weapons and lie throws his sharp arrors far and hits the mark. Arjun is invincible by Indra and other gods. Ho is full of prowess, wise, conqueror of pain and sickness, best of warriors, ever conquering, terror-striking and disº charger of weapons. Haste, son, check Aljun's advance and sea the dreadful slaughter in battle. Tho armours of the warriors, gold bedecked and of beautiful make, ale being pierced by arrows having hidden knots and the banners, tonars and boys are being broken into pieces, Sharp prases, spoars bright as gold, and banners on olephants are being cut down by Arjun. It is no time, my son to remain idle and to rely or tho assistance of others Think of heaven Yushthir's [48071 भीष्मपर्य Bhishmm Pary कालः प्राणान् पुधोपजीविभिः । याहि स्वर्ग पुरस्कृत्य यशसे विजयाय च ॥ २० ॥ रथनागहयावी महाधोरां सदुर्गमाम् । रयेन संग्रामनदी तरत्येप कपिध्वजः ॥२९॥ ब्रह्मण्यता दमो दानं तपश्च चरितं महत् । इहैव दृश्यते पाय म्राता यस्य धनन्जयः ॥३०॥ भीमसेनश्व यलयान् माद्रीपुत्री च पाण्डवी । वासुदेवश्च पायेयो यस्य नाथो व्यवस्थितः ॥ ३१ ॥ तस्वैप मन्युप्रभवो धार्तराष्ट्रस्य धर्मतः । तपोदुग्ध शीरस्य कोपो दहति भारतीम् ॥ ३२ ॥ एष संदृश्यते पार्यों घासुदेवव्यपाश्र्यः । दारयन् सर्वसैन्यानि धाराष्ट्राणि सर्वशः ॥ ३३ ॥ एतदालोक्यते सैन्यं सोश्य माणं किरीटिना । महोर्मिनचं सुमहत्तिमिनेव महाजलम् ॥ ३४॥ हाहाफिलफिला शब्दाः श्रूयन्त्रेच चम्मुखे । याहि पाञ्चालदायाद महं यास्ये युधिष्ठिरम् ॥ ३५ ॥ दुर्गमंह्यन्तर राज्ञो व्यहस्यामिततेजसः । समुद्रकुक्षिप्रतिमं सर्वतोतिरथैः स्थितः की वैजयन्ती भाद पनाका टूटरही है हे पुत्र दूसरेके आश्रयसे समयव्यतीत करने वालोंसे प्राणोंकी रक्षाकग्नेका यह समय नहीं है स्वर्गको मुख्य करके यश और विजयकेनिमिचतुमनाओ, यह यानरध्वज अर्जुनस्यद्वारा हाथी घोड़े और रयाँप्ति लहराती बड़ीभयकारी अतिप्रगम्य युद्ध रूपी नदीको तरता है, इसलोकमें युधिष्ठि- रहीमें कियाहुना बड़ाभारी तप दान वा चिचकी शान्ती और ब्राह्मणोंकी रक्षा करना दृष्ट पड़ता है जिसकेमाई अर्जुन ।३० । वा महाबली भीमसेन वा मादी के पुत्र नकुल सहदेव और नाय वासुदेवजी वर्तमान । ३१ । उस दुर्बुद्धी जल कुक्कुट्ट दुर्योधनके अभिमान से उत्पन्न यह तपरूप क्रोध भरतवंशियों की सेना को मस्मकरे डालताहै, यह वासुदेवजी का आश्रय रखनेवाला अर्जुन दुर्योधन की सब सेनाओं को सब रीतिसे छि न भिन्न करता विदित होरहाहै, यह सवसेना अर्जुन के हायसे घ्याकुल बड़े तरंगोंसे युक्त नानामकारके जलजीवों से व्याकुल समुद्रकी समान देखनेमें आती है, हाय हायऔर कलकलाशब्द सेना के मुखपर सुने जातेहैं तुमराना द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न के सम्मुख जानो मैं युधिष्ठिर के सम्मुखजाऊंगा । ३५ । and go for victory and fame. Arjun of monkey's standard is crossing by means of his chariot the dreadful and hard-to-cross river having elephants, borses and chariots for its tides. It appears Yadhislithir alono is the seat of penances, charity, peace of miod and protection of Brahmang. He las on his sido his brothers Arjun, Valliant Bhimson and Nakul and Sahadev the sons of lladri and Vasudev the lord of all.31. Produced by the folly of the unviso Waterfowl Duryodhan, this ascetic anger will cousume all the armies. Arjun, relying on the help of Vasudev, is dispersing the Kauray armies, All those armies aro disturbed by Arjun like an angry sea with big waves and aquatic aninals. The sounds of grief and anger are prominent throughout the armios You may go and faco Dirishtas. dyumn the son of Drispad and I shall encounter Yudhishathir.35. that । । [4898] Maliabharat [४८९८) ॥ ३६ ॥ सत्यकिश्वाभिमन्युश्च धृष्टद्युम्नवृकोदरौ । पर्य्यरक्षन्त राजानं यमी च मनुजेश्वरम् ॥ ३७॥ उपेन्द्रसदृश श्यामो महाशाला इवोद्गतः । एप गच्छत्यनी काग्रे द्वितीय इव फाल्गुनः ॥ ३८ ॥ उत्तमास्त्राणि चाधत्स्व गृहीत्वा च महदनः। पापंतं याहि राजानं युध्यस्य च वृकोदरम् ॥ ३९ ॥ कोहि नेच्छेत् प्रियं पुत्रं जी वन्तं शाश्वतीः समाः । क्षत्रधर्मन्तु सम्प्रेक्ष्य ततस्त्वां नियुतज्म्यहम् ॥ ४० एप चाति रणे भीष्मो दहते वै महाचम्म । युद्धेषु सशस्तात यतस्य वरुणस्य च ॥ ४१ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि दोणाशत्यामसंवादे त्रयोदशाधिकशतोऽध्यायः ॥ ११३ ।। सञ्जय उवाच । भगदत्तः कृपः शल्यः कृतवर्मा तथैव च । विन्दानुवि-दावाषन्त्यो | सैन्धवश्व जयद्रथः ॥ १॥ चित्रसेनो विकर्णश्च तथा दुर्मर्पणादयः । दशैते तापका योधा बड़े तेजस्वी राजा युधिष्ठिर के बड़े व्यूहका मध्य सब ओरको नियत अति | राथियों से समुद्रकी कुक्षिके समान कठिनतासे पार उतरने के योग्य है, सात्यकी अभिमन्यु धृष्टद्युम्न भीमसेन नकुल सहदेव इन सब ने राजा युधिष्ठिर को चारों ओर से रक्षित किया है, विष्णु के समान श्याम बड़े शालि इतके समान उन्नत दूसरे अर्जुन के समान यह शुरवीर सेना के आगे जाता है, इससे नुम बड़े धनुषको ले उत्तम अस्त्रोंको धारणकर राजा धृष्टद्युम्न के सम्मुख जाकर भीमसेनसे लड़ो कौनसामनुष्य अपने प्यारे पुत्रको सदैव चिरंजीवी नहीं चाहता है मैं क्षत्रीधर्म को देखकर उसके कारण से तुम को आज्ञा देताहूं कि ॥४०॥ यह भीम महायुद्ध में बड़ी सेनाको नाश करताहै हेपुत्र यह भीमसेन युद्धमें यमराज और वरुणके समानहै ॥४१॥ अध्याय ११४ ॥ संजय वोले कि उस महात्मा द्रोणाचार्य्यके इसवचनको सुनकर भगदत्त कृपा चार्य शल्य कृतवर्मा विन्द अनुविन्द अवन्तिदेश के राजालोग वा सिन्धु का राजा The contre of glorious Prince Yudhishthur's array, having brave warriors on all sides, is hard to cross like the ocean. Satyaki, Abhimanyu, Dhrishtadyumna, Bhimsen, Nakul and Sahadev protect prince Yudhishthir on all sides. Dark-skinned like Vishnu, tall as a 811 true and brave like a second Arjun is tho commander of the armics. You may go armed with your good weapons and with your bow encounter Dlirishtadyumn and Bhimson. What man will not wish long life to his son; but I, firm on Kshatrya duty, send you against Bhim who is deš troying this large army in the field of bartle liko Yamraj or Varun.41. CHAPTER CXIV Sanjaya continued:—" Having heard the words of Dronachaiya, Bhagdatt, Kripacharya, Shalya, Kritval ma, Vind, Anuvind, the -- । मएमपर्व Bhishma Pary [48993 भीमसेनमयोधयन् ॥ २ ॥ महत्या सनया युक्ता नानादेशसमुत्थया । भीमस्य समरे राजन् माधयाना महद्यशः ॥ ३॥ शल्यस्तु नभिवाणीममेनमताडयत् । कृतवर्मा निभियांणैः रूपश्च नयमिः शरै ॥ ४ ॥ चित्रसेनो विकर्णश्च भगदत्तश्च मारिप । दशभि ईशमियाणीमसेनमताडयन् ॥ ५॥ सन्धवध मिभिर्याणभीमसनमताडयत् । विन्दानु विन्दाचावन्त्यो पञ्चभिः पञ्चभिः शर ॥ ६॥ दुर्मर्पणस्तु विंशत्या पाण्डवं निशितैः रः । स तान् सर्वान् महाराज राजमानान् पृथक पृथक ॥ ७ ॥ प्रवीरान सर्वलोफस्य घातराशून् महारथान् । जघान समरे वीरः पाण्डवः परवीरहा ॥ ८॥ सप्तभिः शल्य माविध्यत् रतवर्माणमष्टभिः । कृपस्य सशरं चापं मध्ये चिच्छेद भारत ॥९॥अथैन छिन्नधयानं पुनर्विव्याधसप्तभि. । विन्दानुचिन्दाच तथा निभिनिमिाताडयत् ॥१०॥ जयदुध चित्रसेन विकर्ण दुर्मर्पण आदि आपके इन दश शूरवीरों ने युद्धकिया, वह राजा लोग नानाप्रकार के देशों में उत्पन्न होनेवाले बड़ी सेना समेत ये और भीष्म के बड़े यशको चाइनेवाले थे उनमें से शल्य ने नौ वाणों से कृतवर्मा ने तीन वाणों से कृपाचार्य ने नौ बारहों से भीमसेनको घायल किया और चित्रसेन भगदत्त 'और विकर्ण ने दश २ बाणों से जयद्रथ ने तीन वाणों से व्यथित किया । ५। और अवन्ति देश के राजा विन्द अनुविन्द ने पांच २ पाणों से और दुर्मर्पणने तीक्ष्णवारके वाम वाणों से भीमसेन को घायल किया, हे महाराज फिर उन सब पृथक् शोभायमान महामारती धृतराष्ट्र के पुत्रोंको, युद्ध में घायलकरके शत्रुओं के मारनेवाले कर पांडव भीमसेन ने सात वाणसे शल्य को आठ से कृतवर्मा को घायलकर, कृपाचार्यके वाण समेत धनुप को बीच में से काटकर फिर उस टूटे धनुपवाले को सात बाणों से घायल किया, वैसेही अवन्तिदेश के राजा विन्द अनुविन्द को सान २ वाणों से और दुर्मर्पण को वास काणों से और चित्रसेन को princes Avanti, the king of Sindh, Jayadratli, Chitrasen, Vikarti, Durmarslian and other soll tliese ion warriors encountered Bhippsen, Thoy "clo accomp wied by the warriors of different climes and were | doirous of Bhishm's fame. Shalya wounded Bhim with nine arrows; Kritvarnia wounded lin with three, Kripacharya with nine Chitrasen Bling intta and Viharn wounded him with ton atrows cach and Jayad. rath with thirco 5. Vind and Anuvind, the princes of Avanti, wounded liim with five urrows each and Dormarshan pierced him with twenty sliaip arrons The destinyer of enemijes, Bbimsen the brave Pandav voundod all those sons of Iloritrashtra in battic, he pierced Shalya with soyen ai ross and hritvarpia sh o'ght, and having cut the low nnd anew of Krij ad arya from the tu.ddle lie rounded him with In the paine mallier lie rounded Vind ard Anayind with thres arrrows Each, Durmaushati Hath irenty and Chitrasen । ttien aroRE.

[ 4900] Mahallalat (४९००) दुर्मणञ्च विंशत्या चित्रसेन पञ्चीम । विकर्ण दशभिर्वाण पञ्चामन जयद्रथम ॥११॥ विध्या भीमोनदष्ट सैन्धवञ्च पुननिमि ! अथान्यअनुरादाय गौतमी रविना घर, ॥ १२॥ भीम विव्याध सरधो दशभिनशितै शरै । स विक्षो वशभिर्याणस्तोत्र रिव महाधिपः ॥ १३ ॥ तम ऋद्धी महाराज भीमसेन प्रतापवान् । गौतम ताडयामास शरेवहुभिराहवे । १४ ॥ सैन्धवस्य तथाश्याच सारधिन्च त्रिभि शरैः । प्राहिणो म. त्युलोकाय कालान्तकसमद्युतिः ॥ १५ ॥ हताश्वातु रथातूर्णमवप्लुत्य महारथः। शरी विक्षेप निशितान् भीमसेनस्य सयुगे ॥ १६ ॥ तस्य भीमो धनुर्गध्ये वाभ्यां चिच्छेद मारिप । भल्लाभ्यां भरतश्रेष्ठ सैन्धवस्य महात्मनः ॥ १७॥ स छिन्नधन्वा पिरयो हताश्वो हतसारथि । चित्रसेनरथ राजन्नारोह त्वरान्वित ॥ १८ ॥ अत्यद्भुतरण कर्म कृतास्तत्र पाण्य । महारथान् शर्षिया पारयित्वा च मारिप१९॥ विरष सन्धर्ष पांच वाणसे घायल किया, । १० । फिर विकर्णको दश वाणों से जयद्रथको पांच वाणसे घायलकर फिर उमी को तीन तीक्ष्ण वाणों से व्यथित कर के बड़े प्रसन्न चित्त होकर भीमसेन गर्नना करने लगे, तब रथियों में श्रेष्ठ क्रोधयुक्त कृपाचार्य ने दूसरे धनुपको लेकर तीक्ष्ण धारवाले द्वादश वाणों से भीमसेनको घायल किया वह बारह वाणोंसे ऐसा घायल हुआ जैसे कि चावकोंसे हाथी घापल होता है, इस के पीछ क्रोधयुक्त.मतापी भीमसेनने, युद्धमें अनेक वाणों से कृपाचार्य को घायल | करके तीन वाणों से जयद्रथ के घोड़े और सारथीको मृत्युके लोक में भेजा फिर उस महारथी ने मृतक घोड़ों के रथ से शीघ्रही कदकर । १५ । भीमसेनके ऊपर तीक्ष्णधारपाले वाणों को फेंका हे राजा धृतराष्ट्र भीमसेन ने दो भल्लों से उस महात्मा जयद्रथ के धनुप को मध्य में से काटा, वह टूटेधनुपरथहीन शीघ्रता करने | वाला जयद्रथ जिसके घोड़े और सारथी मरगये थे ॥१४॥ चित्रसेन के स्थपर सवार हुआ वहां पांडव भीमसेन ने युद्ध में अपर्व कर्म को फिया । १८ । अर्थात् उस ने सब लोगों के देखते बाणों से महारथियों को घायल कर के जयद्रयको विरथ किया, with five 10. Then he wounded Viba n with ten xurrows, and having wounded Jayadiath with five ind thiee arrow he began to 1oar loud Then Kupacharya the best of charioteeis, having taken bow, wounded Bhunsen with twelve at rows as an elephants is wound ed with dnts Then Bhinusen enraged and full of piowe ~, wounded Kripaclias ya sith many dais agd vith (lilee darts sent Jayadiath's horses and conchman to the region of Yam Tliat grent waritou soon leapt down froin the chariot of which the horses were diad 15. Ho then slotu ed his sharp ai rows on Bhim The latter with two darts cut dowli Jayadrath's bow from the middle Then Jayadrath with his bow cut down and depined of the use of lus chariot of which the horses and driver were dend, wounted tho chiarot of Chitrasen There Buimsen the Pandas did p o.ligies of valou: 18 Within sight of up another (४९०१) भीष्मपर्व Bhishma Parv [4001 चक्रे सर्वलोकरप पश्यतः । तदा न ममृपे शल्यो भीममेनस्य विक्रमम् ॥ २० ॥ स साधाय बारांस्तीपणान् फारपरिमार्जितान् । भीमं विम्याध समरे तिष्टतिष्ठेति चात्र धात् ॥२१॥ कृपक्ष कृतधर्माच भगदत्तश्च वीर्यवान् । विन्दानुर्विदायावन्यो चित्रसेनध संयुगे॥ २२॥ दुर्मर्पणो विकर्णयसिन्धुराजश्च वीर्यवान् । भीमं ते विव्यधुस्तूर्ण शल्य- हेतोररिन्दमाः ॥२३॥ स च तान् प्रतिविम्याध पञ्चमिः पश्चीमा शशल्यं विव्याध सप्तत्या पुनथ दशभिः शरैः ॥ २५ तं शल्यो नभिभिया पुनर्विव्याध पञ्चभिः । सारथिञ्चास्य भल्लेन गार्ट विव्याध मर्मणि ॥ २५ ॥ धिशोक प्रेक्ष्य निर्मिन भीमसेनः प्रतापयान् । मद्रराजं निभिर्वणवाहोरसि चार्पयत् ॥ २६ ॥ तथेतरान् महेष्वासांस्त्रि- भित्रिमिरजह्मगैः । ताहयामास समर सिंहवाद्विननादच ॥ २७ ॥ ते हि यत्ता मई. तब शल्यने भीमसेनके पराक्रम को नहीं सहा और बड़े तीक्ष्ण वाणों को धनुपपर चढ़ाकर । २० । भीमसेन को घायल किया और तिष्ठ २ वचनको उच्चारण किया इस को देखकर पराक्रमी कृपाचार्य कृतवर्मा भगदत्त । २१ । और प्रत्रन्तिदेश के राजा विन्द अनुविन्द दुर्मर्पण विकर्ण पराक्रमी जयद्रथ इन सब शत्रु विजयी लोगोंनेभी शल्यको देखकर शीघ्रही भीमसेनको घायल किया और उसने उन सबको पांच २ वाणों से घायल किया । ११ । शल्यको सत्तर वाणों से और दश भल्लों से घायल किया फिर शल्यने उसको नौ वाणों से घायल करके पांच वाणों से फिर व्यथिन कर दिया । २४ । और एक भल्ल से उसके सारथी को मर्मस्थल में घायल किया इसके पीछे उस प्रतापी भीमसेन ने अपने विश्वकनाम सारथी को घायल देखकर । १५ । तीन वाणों से मढ़ के राजा शल्यको भुजा और छाती पर घायल किया, इसी प्रकार सीधे चलनेवाले तीन २ वाणों से अन्य २ बड़े २ धनुपधारियों को व्यथित करताहुभा सिंह के समान गर्जना करी, फिर उन सावधान बड़े २ धनुपधारियों ने युद्धमें कुशल भीमसेन को तीक्ष्ण नोक all he wounded tho-e warıriors and inade Jagalrath chariotless. Sualya could not bear to 503 his prowess and put up sharp urrows to liis low. 20 Havivg wounded Bhimsan he cried out 'stay, stay. At this vallant Kripachary, Kutyai na, Blagdatta, Vind and Anuvind the two princes of Avauti, Durinashau, Vilara, and villiant Jayasrath, all this: con querers of foes followed the example ot Shanlyn in wounding Bhinusen and he in his tuin, woundel them will lisa arrows Cicl. 23. Ho woundul Shalya with seventy arriows and ten darts, Shalya wounded hm with 1mu and fis o arrows and his coacluuan with one. Glorious Bliinsen secing Vislı wak his coacliman wounded, piraced the ling of Madra with three nulows on the Lreast aud aling. In the sonue maner lo wounded the other great a chers with tlu ve arrows carli go ny straight and then noured like a lion Then those mighty and skilful wichert wounded Bhi..,on, clorer un fighting, [4902] Maliabharat (४५०२) पासा. पाण्डर युद्ध कोविदा । त्रिमिसिभिरकुण्ठाग्रेश मर्मस्पताडयन् ॥ २८ ॥ सतिषिद्धा महेष्वासा भीमसेनोन घि-यये । पर्वतो धारिधाराभिर्वर्षमाणरिवाम्बुदः ॥ २९ ॥ स तु क्रोधसमाविष्ट पाण्डवाना महारथ । मद्रेश्वर त्रिभिवाण शं विध्या महायशा ॥ ३० ॥ कृपञ्च नवशिर्वाणभृश विध्वा समंतत । प्राग्ज्योतिष शतैराजी राजन् विम्याध सायके ॥ ३१ ॥ ततस्तु सशर चापं सात्वतस्य महात्मनः । क्षुरप्रेण सतीषणेन चिच्छेद तहस्तवत् ॥ २२ । तथान्यद्धनुरादाय कृतवर्मा वृकोदरम् । आज घान वामध्ये नाराचेन परन्तर ॥ ३३ ॥ भीमस्तु समरे विध्या शल्यं नयभिरायसै । भगदत विभिश्चेव कृतवाणमष्टमि ॥ ३४ ॥ द्वाभ्या द्वाभ्या तु विव्याध गौतमप्रभू तीन् रयान् । ते पित समरे राजन् विन्यधुर्निशितैः शरः ।।३५ ।। स तथा पाड्यानोपि | वाले तीन २ वाणों से मर्मस्थलों में अत्यन्त घायल किया परन्तु वह अत्यन्त घायल बड़ा धनुपधारी भीमसेन ऐसे पीडामान नहीं हुआ। २८ । जैसे कि जल धारा वर्षा करने वाले वादलों से पर्वत पीड़ा नहीं पाता है फिर उस बड़े यश- स्त्री महारथी पाण्डव भीमसेन ने क्रोधमें भरके सल्य राजा को तीन वाणों से अत्यन्त घायल करके युद्धभूमि में सौ शायकों से राजा प्राग्ज्योतिप को घायल किया । ३० । इसके पीछे इसी यशस्वीने कृपाचार्य को वाणों से अत्यंत घायल करके अपनी हस्तलाघवता से महात्मा कृतवर्मा के वाण समेत धनुप को । ३१ । अत्यन्त तीक्ष्ण तुरमों से काटा और इसी प्रकार से कृतवर्मा ने दूसरे | धनुपको लेकर भीमसेन को । ३२ । दोनों भृकुटियों के मध्य में नाराच वाणसे घायल किया फिर शत्रु संताती भीमसेन न शल्य को नौ लोहेके वाणों से घायल करके । ३३ । तीन वाणों से भगदत्तको आठ कणों से कृतवर्माको और । दो २ वाणोंसे कृपाचार्य प्रादि रवियोंको घायल किया । ३४ । इन सबोंनेभी इसको तीक्ष्णधारके वाणोंसे घायन किया ।३५। फिर महारथियोंके सब शस्त्रोंसे पीडामान with thice arions ouh in the vital jarts, but that grcat arelier, though inuch wounded, was not disties ed at all as a mountain is not distressed by the full of lain. I hen the great warrior Blumsen the Pundav, much enraged, wounded the king of Mudia with three arrows and the king of Plagjj otel with a hundred &0. Then having wounded brave Kripicha ya waths bis allows, lic slioned the swift 110.39 of his hand in cutting down tle bous of Kutvarna The latter to ih up anotlıcı Low and wounded Bhim in the middlo ot the biow. Thcn Blum the destroyor of enemies, wounded Shalya with mine iron 1470*s and barn g stuck Bhagdatta with thuco, lie pierced Brit- Puma with eight and hincl anya with two 34. Those warnions 10x), wounded l m with theii sharp arrows 35. Exceedingly nounded Ly tlucir arrons, Bl mi did not care for them a straw and 10. med free (४९०३) Haga Blushina Pain [1903 } सर्वशनमहारथैः । मत्वा तृणेन तांस्तुल्यान् पिवचारगतम्यय ॥३६॥ ये चापि रथिनां श्रेष्ठा भीमाप निशितान् शरान् । प्रेषयामासुरव्यग्रा. शतशोय सहनश ॥ ३७ ॥ तस्य शांक महावेगा भगदतो महारथ । चिक्षेप समरवीर स्वर्णदण्डा महामते । ३८ ॥ तोमर सैन्धवो राजा पटिशन्चमहाभुजः । शतीच कृपा राजानउर शल्पश्च सयुगे ॥ ३९ ॥ अयेतर महेप्पासा पञ्च पञ्च शिली मुघान् । भीमसेन समुद्दिश्य प्रेषयामासरोजसा .॥ ४० ॥ तोमरन्ध द्विवा चके पुरप्रेणा निलात्मज. ॥ पशिञ्च त्रिमिनिश्चिच्छेद तिलकाण्डवत् ॥४१॥ स यिोद गतीमच नाभिः कनपत्रिमिः। मदराजप्रयुक्तच शरिमामहारथः ॥ ४२ ॥ फिचिच्छेदसहसा भगदत्त रितारणे । तयेतरानुशरान्घोरानशा सनतपर्वभिः ॥ ४३ ॥ भीमसना रगालाधी विधै कैक समाच्छिनत् । ताश्च सर्वान् महमासान् प्रितिनिधिरताडयत् ॥ ४४ ॥ ततो धनजयस्तम वर्तमाने महारणे। आजगाम रयेनानी भीमं दृश्या महारथम् ॥४५॥ यह भीमसेन भी उनको तृणके समान कर दाख से रहित प्रमन्न मुखहोकर भ्रमण करने लगा । ३६ । उन सावधान रथियों में श्रेष्ठ लोगों ने भी भीमसेन के ऊपर हजारों तीक्ष्ण वाणों को चलाया। ३७ । महावीर भगदत्त ने उस बुद्धिमानके ऊपर वही वेगवान प्रकाशित मुनहरी टण्डवाली शक्तीको और राजा जयद्रथने ते मरको महामनने पटिशको कृपाचार्य ने शनम्नीको शल्यने बाणको ३९और अन्य बड़े २ धनुपधारियों ने भीमसेनको लक्ष अर्थात निशाना बनाकर पांच २ शिलीमुस वाणों को बड़े पराक्रप से चलाया । ४० । तर वायपुत्र भीमसेन ने तोमरको तो तुरमनाम वाणने दो खण्ड किये ओर ताम वाणसे पटटिश को तिल के कांड के समान काटा । ४१ । नौ वागों से शतन्नी को तोड़ राजामद के चलाये हुए वाणको काटकर भगदत्तकी चलाईहुई शक्ती को काटडाला इसी प्रकार युद्ध में प्रशंसनीय भीमसेनने गुप्तग्रन्या वाले वाणों से अन्य भयानक वागों को काटा अर्थात् प्रत्येक के खण्ड २ कर दिये और उन सब धनुपधारियों को तीन २ वाणोंसे घायल किया। ४४ । इसके पीछे वहां पोरयुद्ध के होनेपर अर्जुन उस युद्ध of pain with a choerful mind. The viscst and best of char.oteers too, discharged thousands of arrous al him Valliant Bhagdatta d 15. charged at him a swift and bright spear with gold handle Prince Jayadrath hurled a lomar, Kupcharya a Shataghni, Shalya his arions and others great archers, having made his thor marh, discharged at hum fivo arrows caeli 10. Then Bhim the son of Vagu cut the tomar in two by ono sliarp arrow and patlish with three Ho cut the Shataghnz with nine arrows, and having cut down the arrow of the king of Madra, he cut into pieces the spear of Bhagdalta. Thus Bhinsen, clover in battle, cut down other arrows too having hidden knots and wounded those archers with threo arrows each.44. At tług when the battle was raging furiously, Arjan sar brave Bhim.

[4904] Ma'labharat (४९०४) निम्नन्त समरे शधून योधयानश्च सायकै । तो तु तत्र महात्मानी समेतो धीक्ष्य पाण्डवी ॥ ४६ ॥ न शशमुज्जय तत्र तावका पुरुषर्षभा । अथार्जुन रणे भीम | पोधयन्त महा रथान् • ४७ ॥ भीष्मस्प निधनाकाक्षी पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् । भाससाद रणे धारास्तायफान् दश भारत ॥ ४८॥ पस्म भमरणे राजन् पोधयन्तो व्यवस्थिता । थीभत्सुस्ता नधा विध्यद्भीमस्य प्रियकाम्यया ॥ ४९ ॥ ततो दुर्यो धनो राजा सुशर्माणमचोदयत् । अर्जुनस्य पार्थाय भीमसेनस्य चोभयो ॥ ५॥ सुशर्मन् गच्छ शीघ्र त्व वलीधै परिवारित । जहि पाण्डुसुतायेतो धनन्जयपृकोदरी ॥ ५५ ॥ तच्छुत्य यचन तस्य गर्त प्रस्थलाधिप । अशिद्रुत्य रणे शीम मर्जुन चैय धन्विनी ॥ ५२ ॥ रथैरनेक साहसै. समन्तात् पर्य्यवारयत् । सत प्रववृते युद्ध मर्जुनस्य पर सह ॥ ५३ ॥ इति श्री महामारते भीष्मपर्वणि भीमवधपर्वणि भीमार्जुन पराक्रमे चतुर्दशाधिकशतोऽ यायः ॥ ११४ ।। में शत्रुओं को मारता शायकों से लडता महारथी भीमसेन को देखकर रथपर बैठा हुमा युद्धभूमि में आया वहां उन दोनों महात्मा पाण्डवों को युद्धमें प्रवृत्त देखकर । ४६ । भापके शूरवीर पुरुषोंने वहां अपने विनयकी आशा नहीं की फिर युद्धमें | महारार्थियों से लड़ते हुए भीमसेन को देखकर भीष्म के मारने की इच्छाकरने वाले अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके उस युद्ध में आपके उन दश शूरों को पाया जो भीमसेन से युद्ध करने में नियतथे उनको अर्जुन ने भीमसेन की प्रसन्नता के लिये बाणों से घायल किया। ४९ । फिर राजा दुर्योधनने अर्जुन और भीमसेन इनदोनों के मारने के निमित्त राजामुशर्मा को आशाकरी । ५० । कि हेसुशर्मा तुम अपनी सेनासमेत शीघ्रही जाकर इनदोनों पांडव अर्जुन और भीमसेन को मारो।५१ फिर मस्थलाधिप राजा सुशर्माने उसके उस वचनको सुन युद्ध में जाके भीमसेन और अर्जुन दोनों धनुपधारियों को । ५२ । हजारों रथियों समेत चारों ओरसे घेर लिया फिर अर्जुन से और शत्रुओं से युद्ध होना मारभ हुआ ५३ । sen there and came on to him in lus chariot, killing the enemies in And seeing tho two Panduras engaged thero in battle your warriors desprired of their own victory Seeing Bhim engaged in fighting Arjun desirous of slaying Bhishm and lod ly Shiklandı, met in combat those ten warriors who were engaged in fight ng witli To please the latter lie wounded ihem all th his arrows 49 Prince Duryodhın ordered king Susharma to kill Arjun and Bhim, "Go, Susharma with your armies and bill both Arjun and Blum," Sasharma the king of Prısthal, at the order of Duryodhan, surrounded Bhim and Arjun with thousands of chariots and the fight was hard betwecn Arjun and the enemies " 53 the way Bhim saying.

- (४९०५) माप्मपर्य Bliishma Pary [4005] संजयउवाच ॥ अर्जुनस्नुरणेशल्यं यतमानमहारथं । छादयामाससमर रिसन्नत पर्वमिः ॥ १॥ मुशर्माणं कृपचैव विभित्रिभिरपिध्यत । प्राग्ज्योतिषं च समरे संघ. बच जयद्रथ ॥ २ ॥ चित्रसेनं विकर्गच शनयर्माणमेवच । दुर्मर्पणंचराजेंद्र हायंत्यांच | महारयो ॥ ३॥ एकैक बिमिरानईत्कंकणवाजितः । शर रतिरयोयुद्ध पाडयन याहिनीतय ॥ ४ ॥ जयद्रयो रणेपार्थ विध्यामारत सायकः । भीमयिव्याध तरसा चित्र सेनरथेस्थितः ॥५॥शल्यश्च समरे जिष्णुं कृपश्च रथिनांवरः । विव्यधाते महाराज बहुधाममभेदिभिः ॥ ६॥ चित्रसेना दयश्चैव पुत्रास्तवविज्ञपिते । पंचभिः पंचमिस्तूर्ण संयुगे निशित शीः॥ ७॥ याजन्नुरर्जुनसंख्ये भीमसेनंच मारिप । तीतत्र रथिनां | श्रेष्ठी तियो भरतर्षभो ॥ ८ ॥ अपीडयेतां समरे त्रिगर्तानां महदलं। मुशर्मापि रणे पार्थ शरैर्नवभिराशुगैः ॥ ९ ॥ ननादवलवन्नादं वासयानो महलं । अन्येच रथिनः अध्याय ११५ ॥ संजय बोले कि फिर अर्जुन ने युद्ध में उपाय करनेवाले महारथी शल्य को गुप्तग्रन्थीवाले वाणोंसे ढककर मुशर्मा कृपाचार्य राजाप्राग्ज्योतिष जयद्रय राजा सिंघ इनसबको तीन २ वाणों से घायल किया, और चित्रसेन विकर्ण कृतवर्मा दुर्म- पण और अवन्तिदेशके महारथी राजाळोग ।३। इन सबको कंक और मोरपक्षवाले तान २ वाणों से घायल किया और युद्ध में अतिरथी जयद्रथने आपकी सेनाको पाणों से पीड़ित करते हुए अर्जुन को शायकों से घायल करके चित्रसेनके रथपर बैठकर बड़ीतीव्रता से भीमसेनको घायल किया । ५ । हे राजा रथियों में श्रेष्ठ शल्य और कृपाचार्य ने मर्मभेदी काणों से अर्जुन को अनेक गीतसे घायल किया।६। और चित्रसेन आदि आपके पुत्रों ने तीक्ष्ण धारवाले पांच २ बाणों से, अर्जुन और भीमसेनको घायल किया वहां उन भरतवंशियों में और रथियों में श्रेष्ठ दोनों पांडवोंने । ८ । त्रिगत देशियों की बड़ी सेनाको पीडामान किया फिर मुशर्माभी CHAPTER CXV Sanjaya continned;"Having covered valliant Shalya with his arrows, Arjun wounded Susharma, Kripacharya, king Pragjyotish and Jayadrath the king of Sindh with three arrows each. He then wounded Chitrasen, Vikaru, Kritvarma, Durmarshan and the brave warrior princes of Avanti cach with three arrots having peacock feathors. And wounding your armics with arrows, valliant Jayadrath wounded Arjun, and having mounted upon Chitrasen's chariot he wounded Bhim with great stiftness, 5 Shalya the best of charioteers, O king. and -Kripacharya wounded Arjun in different ways. Your sons, Chitrasen and others, each of them tounded Bhim and Arjun with five arrows having sharp edges. Then the two Pandavas, best of charioteers and Bharats, cut down thic large । - 14900] Mabalharit (४२०६) शूरा भीमसेन धनंजया ॥ १०॥ विव्यधुनिशिनर्माण रकमपुखैरजिह्मगै । तेपाच रथिना मोय कौतेथी भरतमी ।। ११|| क्रीडमानौ रयोदारी चित्ररूपौव्यदृश्यतां । आमिषेप्मू गवामध्ये सिंहाविषमदोत्कटी ॥ १२॥ छित्वाधनूपिशुराणा शराश्च बहुधारणे । पात यामास तुारी शिरसि शतशोनृणा ॥ १३ ॥ रथाश्च वयोमन्ना हयाच शतशोहता । गजाश्च सगजारोहा पेतुरामहाहवे ॥१४॥ रथिन सादिनथापि तत्र तत्र निपूदिता दृश्यते वहयोराजन्वेपमाना समतत ॥ १५ ॥ हतैर्गजपदान्योधर्वाजिभिश्चनियूदित । स्थैश्च पदुधामग्ने, सतास्तीर्यतमेदिनी ॥ १६ ॥ छनैश्च धाच्छिन्नैर्घजैश्च पिनि पातिते । अकुशै रपविद्धश्च परिस्तोमैश्वभारत ॥ १७ ॥ फेयूरै रगदरै राक्वंमृद्धि तैस्तथा । उष्णीषैप्टिभिश्चैव चामरथ्यजनरपि ॥ १८ ॥ तन तनापविध धामि तात्रगामी नौ चाणों अर्जुन को घायल करके बड़ी सेनाको भयभीत करता हुआ वड़े शब्द से गर्जा और अन्य शरवीर रथियों ने भीमसेन चौर चर्जुन को सीधे चलनेवाले सुनहरी पुंखवाले तीक्ष्ण धारके बाणों से घायल किया उन रथियों के मध्य में भरतपशियों में श्रेष्ठ कु ती के पुत्र महारथी जीडाकरते हुए ऐसे अपूर्व रूपसे आये जैसे कि बैलोंके मध्य में मांसकी इन्छा रखने वाले मतवाले दो मिह आते है ।१२। उन दोनों वीरोने युद्ध में शूरों के धनुपोंको बहुत प्रकार से काटकर सैकड़ो मनुष्यों के शिरोंको गिराया । १३ । बहुतसे स्वदृटे सैकड़ों घोडे मारेगये और सवारों समेत हाधी पृथ्वी पर गिरे । १४ । स्थी और सपार भी नहां तहा नाशको माप्त चारों ओर से कॅपते हुए दृष्टिआये । १५ । मृतक हाथी घोडे पदाती और अनेकमकारसे टूटेहुए रथों से पृथ्वी सविस्तरसी होगई, हे राजा कनेक प्रकार से टूटेहुए छन और गिराई हुई ध्वजा और खडित अकुश परशे केयूर वाजूान्द हार कोमल मृगचर्म मंडील दुधारे सड्ग चामर वा व्यजनोंसे और जहातहां कटीहुई a my of I'rigartus Susharma too, hrving rounded Arjun with nine arrows, terrified the large almy and rored z luud roni And other brave charioteers too, wo inded Bhimson mu Arjun with straight gomg md sherp edged aridws havmg guiden fathers In the wist of those charioteors entered the two villiant sons of Kuntı, best of Bharats, liko two lions desirous of flcsli coining playfully in a strange way in tho m dst of a herd of balls 12 The two warriors cut down in varions ways tho bows und heads of other vari irs by hundieds Many chariots were brolen, hundreds of horses wuulilled and elopliants with their nders lay dead on the ground Chanots and their riders too, we o destíoyal here and there and were to bo sccu shaking 15 The ground was strewn over with the dend horscs, elopliants and foot soldı rs and with the broken chariots broken umbrellas, the fallen Lanncrs the brol en gords, ses armlets, bracelets soſt dior skins, turbans, double edged swords Ay Anppers The (४९०७) भीष्मपर्य Bhishma Pare [4907] वदनोशितः । ऊमिश्च नराणां मनास्तीर्यत मंदिनी ॥ १९ ॥ तत्रागतमपश्याम रणे पार्थस्य निमम् शर सवार्य तान् वीरान मद् जघान महाचल ॥ २०॥ पत्रस्तु तबतं दृमा भीमार्जुनपराकम । गांयस्य रयाभ्याश-मुपजग्मे महाबलः ॥२१॥ कृपश्र तप च सन्धाच जयदयः । विन्दातुनिन्दाचायन्त्या नाजहुः संयुग तदा ॥ २२॥ ततो भीमो हेपासः फाल्गुनश्च मलरथः । कोरवाणां च घोरी भृशं दुदुधन रणे ॥२३ ॥ ततो चर्हि मवाजानामयुतान्यदानिच ! धनकायस्ये पूर्ण पातयन्तिस्मभू मिपा. ॥२४॥ ततस्तान् शरजालेन सन्निनाय्यं महारथान् । पार्थः समन्तात् समरे प्रेषयामास मृत्यरे ॥ २५ ॥ शल्यरतु समरेडिषणं कीडनिन महारय । बाजधानोरसि शुद्धो भन्दै सनतपर्वभि ॥ ६॥ तस्य पार्थो धनुरिन्धा हस्तापापञ्च पन्चमिः। अर्थन सायकस्तीर्ण श विन्याध मर्मणि २७ ॥ अथान्यद्धनुरादाय समरे भारसा राजाओं की चन्दनचर्चिन भुना और नंगाओं मे भी पृथ्वी भान्छादित दीसती थी, वहां हमने युद्धके वीच अर्जुन के अपूर्व पराक्रम को देखा कि उम महावली ने उन सामूग्वीरों को वाणों मे ढककर घायल कर दिया । २० । फिर आपका महापली पुत्र भीमसेन और अर्जुन के उस पराक्रम को देखकर गांगेय भीमनी के पास गया । २१. 1 ता पाचार्य कृतवर्मा जयद्रय राजागिर और अवन्ति देश के चिन्द अनुपि द नाम राजाओं ने युद्धको नहीं त्यागा । २२ । इसके पीछे बड़े धरावारी भीमसेन और महारथी अर्जुन युद्धमें कौरवोंकी महाभयकारी मेनाकी ओर दौड़े। २३। उसके पीछे राजाओं ने बड़ी जीवनामे मोरके ममान चिनिन हजारों लाखों किन्तु असंख्यों वाणों को अर्जुन के रथपर गिराया । २४ । ता अर्जुनने चारों ओर मे उन महारथियों को वागोंके जालगे रोककर मृत्यु के लोकों को भेजा । २५ । फिर कोषयुक युद्धगें कीड़ा करने महारथी शल्यने गुप्त ग्रंथीवाले भल्लों में अर्जुन को छातीपर घायल किया।२दातर अर्जुनने उसके धनुपको तोड़ पांचराणोंसे उस केहातवाणको काटक तीक्ष्ण शायकों से उनके मर्मस्थलोंको अत्यन्त घायल किया and fans, tho severed arms of the fings, candal prsted, and othor tlungs covered tlır ground. Thien we sal in the field of battle the wondor svorkig prosess of Arjun ylio corcred and rounded all those warriors with his arrow9 20. Then your brave son, seeing the prowo.s of Blumm and Arjun, went to Bluralım the son of Ganga. Krspacharya, Krtvarna, Jayadrath thic lng of Sindh, and Vind and Anuvind tho tro prinics of Asant, did not desert the field of battle Then the great archier warriors, Bhim and Arjun rushed up on the dradful arny of the Kaularas and thio wan.ois 13th great di stor sty disc) arged hundreds of thousands of nrros: S, peacocl. coloured, at thu chini ot of Arjun, but ti e latter destroyed the nel forl of t) er arrows and sent them to tic reg on of Yam 25 Valltint Elly a with aircus thay mg Indren I nots, as if playing in batile, we urded [4908] Mahabhunt (४९०८) धनम् । यद्रेश्वरो रणे जिष्णु ताडयामास रोपित ॥ २८ ॥ त्रिभि शरमहाराज वासुदे घष पञ्चभिः। भीमसेनञ्च नवभि_होररसि चार्पयत् ॥ २९ ॥ ततो द्रोणो महाराज मागधश्च महारथ ।। दुर्योधनसमादिष्टौ त देशमुपजग्मतु ॥३०॥ यत्र पार्थो महा राज भीमसेनध पाण्डव । कौरव्यस्य महासेनां जानतु सुमहारथौ ॥ ३ ॥ जयत्से नस्तु समरे भीम.भीमायुध युधि । विव्याध निशितैर्वाणैरष्टभिर्भरतर्षम ॥३२॥ ते भीमो दशभिर्विध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभि । सारथिञ्चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥३३॥ भ्रान्तैस्तुरगै सथ द्रघमाणे समन्तत । मामधोपसतो राजा सघसैन्यस्य पश्यत ॥३४। द्रोणश्च विवर हटवा भीमसेन शिलीमुस । विव्याध वानिशितै पञ्चषष्टि भिरायसे ॥ ३५॥ त भीम समरश्लाघी गुरु पितृसम रणे । विव्यावपञ्चभिर्भस्तथा । २७ । फिर क्रोधयुक्त राजा मद्रने दूसरे बड़े दृढ़धनुप को लेकर वाणों से अर्जुन को व्यथित गणों अर्जुन को पांच वाणों से वासुदेवजी को ना गाणों में भीमसेन को भुजा और छाती पर घायल किया । २९ । इसके पीछे महारथी द्रोणाचार्य और राजा मगध यह दोनों दुर्योधन की आज्ञासे उस स्थानपर पहुँचे ।३०। जहां कि बड़े महारथी अर्जुन और भीमसेन ने कौरवी दुर्यो धन की बड़ी सेनाको माराया फिर जयसेन ने भयकारी शस्त्रवाले भीमसेनको तीन आठवाणों से घायल किया। ३२ । और भीमसेनने उसको दश वाणों से घायल करके पांच वाणोंसे फिर घायल किया और एक भल्ल से उसके सारथीको रथ के बैठने के स्थान से गिरादिया । ३३ । फिर वह राजा मगध सब सेना के देखतेहुए चारों ओर को वहकेहुए घोड़ों के कारण से युद्धसे दूर चलागया। ३४ । द्रोणा- चार्य ने समय पाकर तीक्ष्ण धारवाले लोहे के शिलीमुल नाम पैंसठ वाणों से भीमसेन को घायल किया । ३५ । हे भरतवंशी युद्धमें प्रशंसा पानेवाले भीमसेन ने Arjun on the brcast Arjun then cut down luis bow and having cat asundor lus hand guard with five arrots, wounded lum in the vilal parts very severely. Thereupon the king of Nindra much enragedy taking up a hard bow, wounded Arjun with three arrons, Vasudev with five and Blum with nine arroirs on the breast and arnis. In the meantime alliant Dromchai ya and the ling of Magadh cimo there by Duryodhru's ordei (30) where the great chariotecas Arjun and Bhim icre destioying tho Kuuri mies Bhiu of dicadfał Arnis with eight anons of rery heer edgc. Bhimsen wounded him with ten and five arrows and with one dart be ciused the river to full dos o fiom bus seat on the chariot Theti tho I ing of Mig uh pistiken far from the sight of the ni mies by the driseloss horses Dronacharya found 22 opportunity to p erce sisty: fire iron drops, sharpened on stond through the body of Bhim, but tho latter prisen orthy in 12*tle rounded the venerable preceptor Jay asen wounded (१९०९) भीष्मपर्व Bhishma Pary [19001 पक्ष्या च मारत ।। ३६ ॥ अर्जुनस्तु सशांण विधा बहुभिरायस । व्यधमत्तस्य तत् संन्यं महाभ्राणि ययानिलः ॥ ३७॥ ततो शीमच राजा च कौसत्यश्च वृहद्धल । समयन्त सत्रुद्धा भीमसेनधनञ्जयौ ॥ ३८ ॥ तत्रणमा भाग पृष्टयुम्नश्च पापतः । थभ्यद्रवन रगे भीष्म व्यादितास्यमिवान्तकम् ।। ३९ । शिमण्डी तु समामाद्य भार तानां पितामहम् । अभ्यद्रवत सहप्टो भय त्यक्त्वा महारथात् ।४. ॥ युधिष्ठिरमुसा पार्था पुरस्टत्य शिखण्डिनम् | अयोधयन् रणे मीम सहिता सर्वसञ्जये. ॥११॥ तथैव तावका सर्वे पुरस्कृत्य यतव्रतम्। शिखण्डिप्रमुसान् पार्थान् योधयन्तिस्म सयुगे ॥ ४२ ॥ तत प्रवने युद्ध कौरपाण भयावहम् । तत्र पाण्डुसतै साध भीमप्यरिजय प्रति ।। ४३ । तावकानां जये भीप्मो ग्लह आसीद्विशाम्पते । तत्र हि यूनमासक्त विजया येतराय वा ॥ ४४ ॥धृष्टद्युम्मस्तु राजेन्द्र सरसेन्यान्य चोदयत् । अभ्यद्वरा गानय पिता के समान गुरुको भी पैमठ भल्लोंसे घायल किया। १६ । फिर अर्जुनने बहुत से लोहेके बाणों से मुशर्मा को घायल करके उनकी उस भुजाको ऐसे अलग कर दिया जैसे कि वायु वादलों को अलग करदेताहै । 39। उनके पीछे भीम और गागा कौशल्य हद्दल यह सब अत्यन्त बोधयुक्त होकर भीममेन और अर्जुनके सम्मुख गये । ३८ । इसी गीतिसे शूर पांडव और पर्पतका पुत्र धृष्टद्युम्न उस मृत्युके समान भीमके सम्मुख गये ।३१। और अत्यन्त प्रसन्न चित्त शिखण्डी भरतवंशियों के पितामहको पाकर और उस्ले निर्मय होकर सम्मुख हुआ। ४० । और युधिष्ठिर आदि पांडव सब मुनियों समेत शिखण्डीको आगे करके युद्ध में भीप्मनी से युद्ध करनेलगे ।४१। इमीप्रसार आपके सवपुर भीप्पनीको आगे करके युद्ध में उन पांडवोंसे जिनका अग्रवर्ती शिखंडी था युद्ध करने में प्रत्तहुए । ४२ । उसके पाछे वहां पर भीष्मकी विजय के विषय में कौरवों का भयकारी युद्ध पांडवों के साथ जारीहुमा हे धृतराष्ट्र ना भीप्पजी आपके पुत्रों की विनयके ग्लह अर्थात् चौपड़के दाव हुए वहां पर विजय वा पराजय के निमित्त चूत मारम्भ हुआ फिर धृष्टद्युम्न ने सर सेनाको आज्ञाकरी कि हे श्रेष्ठ रथियो निर्भय होकर भीमके with sixty five darts 3G Arjun then wonnded Sushiarnia with many iron arrous and sovered his arm as the wind does the clouds. Then Bhishin with Princes Koral and Vrıladbal, inuch onraged, cncountered Blum and Arjun In the same manner, the bravo Panduv and Dhirislıtadyumn the descendant of Parsbnt faced deadly Blushn, and Slubhandi with a clieci ful mind ftulessly encountered the grandfather of Bharat 40 Yuddishtlu and other Pandayns with the Srınjayas, led by Shilhandı, fought against Bhishm In the sanno manunr, your sons led by Blushm encountered tho Pandavas led by Sluklandı Then for the victory of Bluslim the Kauravas and the Pandavas fought a dreadful battlo Bhishm [ 4910] Malmbhatat, [४९१०) माभेट स्वसत्तमा, ॥ ४५ ॥ सेनापतियध श्रुत्वा पाण्यानां वरूथिनी । भीष्म समय यापूर्ण प्राणाम् याल महाहवे ॥ ४६॥ भीष्मोपि चिनांश्रेष्ठः प्रतिजग्राह तां चमूम् । आतिन्ती महाराज वेलामिव महोदधि । ४७॥ इति श्री महाभारते भीमपाणि भीमाधपर्वणि भीमार्जुन पराक्रमे पंचदशाधिकशतोऽध्यायः ॥ ११५ ।। धृतराष्ट्र उवाच । कथं शान्तनको भीप्पो दशमेहनि सम्भय । अशुध्यत महा वीर्यः पाण्डवैः सह सन्नर ॥ १ ॥ पुरवश्च कथंयुद्धे पाण्डवार प्रत्यवारयनु । नाचक्ष्य गे महायुद्धं भीपास्याहवशाभिन ॥ २ ॥ सज्जय उवाच । कुरवः पाण्डवै साधं ययुध्य त भारत । यथा च तद युद्धं तत्तु वक्ष्यामि साम्भतम् ॥ ३ ॥ गमिता. परलोकाय परमात्रः किरीटिनः । अहन्यहनि संसास्तावकानां महारथा सम्मुख चलो मन में किसी प्रकार भी सन्देह मतकरो । ४५ । तब पांडवों की | सेना अपने सेनापति के वचन को सुनकर माणों के मोहको त्यागकर उस महायुद्ध में शीग्रही भीष्म के सम्मुल गई । ४६ । हे महाराज रथियों में श्रेय भीष्मजी ने उस आईहुईबड़ी सेना को ऐमा रोका जैसे कि महासमुद्र को किनारा रोकताहै ४७ ॥ अध्याय ११६॥ धृतराष्ट्र बोले हे संजय शंतनु के पुत्र बड़े पराक्रमी भीमजी दश दिन पांडव और मंजियों के साथ फैरे२ युद्धकरतेहुए और कौरवोंने युद्ध में पांडवोंको कैसे रोका हे संजय तू युद्ध में शोभापानेवाले भीष्मजीके महामारी युद्धको मुझसे वर्णन कर के कह ।२। संजय बोले कि हे भरतवंशी कौरव लोगोंने पांडवोंके साथ जैसे युद्धकिया और जैसे युद्धहुआ वह यथार्थ तुम से कहताहूं । ३ । अर्जुन के बड़े अस्त्रों से आप के महारथी अत्यन्त क्रोधपूर्वक प्रतिदिन परलोकमें भेजेगये ।४। और युद्धको विजयकरने thes was the bot in the game for victory and defest Dlırishtadyumu gave an order to all his armio, to «elvance foulessly against Bluishnu wutlinut boutation 45. Thors circles of their lipng rushed upou Bhishm ai the word of conjmand and Bluslum chochot that advancing army as tlic coast checks the waters of the occan " 47. CILAPTER CXTI 'Dhrithiashtra sud, “ Howld the son of Shantinu, Bhishm of great prowess, figlit ngiust the Pundas and the Srinjnyas on that tonth day? How did the Kauravas che.k the landıvaz? Give nic Sonjaya, a dutuled account of the g out lar of Blush m" Sanjaya- I shall tell you how the hu129 ani tlio Pandivas fought against cach oth and the ovents of the Wilt as they happened 3 By thic powerful weapuns of Arjun your emaid warmurs Helo sent orery i - (४९११) Árna Bliishina Parv [4911] ॥ ४ ॥ यथाप्रतिझं कौरव्यः स चापि समितिमयः । पार्थानामयारोद्रीप्तः सतत समितिक्षयम् ॥ ५॥ कुरुभिः सहित भीमं युध्यमानेपरन्तप । अर्जुनच सपाञ्चाल्यं संशयो विजय भवत् ॥ ६॥ दशमहान तस्मिंस्तु भीमार्जनसमागमे । भवर्त्तत महारीद्धः सततं समितिक्षयः ॥ ७॥ तस्मिनयुतशो राजन् भयशश्च परन्तपः । भीपाः शान्तनधी योधान जवान परमास्त्रवित ॥ ८ ॥ यामनातकल्पानि नामगो त्राणि पार्थिव । ते हतास्तत्र भीमेण शूराः सर्वेऽनिवर्तिनः ॥ ९ ॥ दशाहानि ततस्तप्त्या भीष्मः पाण्डववाहिनीग । निविद्या धर्मात्मा जीविता परन्तग॥ १० ॥ स शिमं वधमन्विच्छन्नारगनोभिमुझेरणे । न हन्यां मानवधान् संग्रामे सुबहनिति ॥ ११॥ चिन्तयित्वा महाबाहुः पिता देवव्रतस्तव । अभ्यासस्थं महाराज पाण्डव धाक्यमत्रवीत् ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर महामाश संशानाशारद । शृणप्य वचन वाले उम कॉरवी भीष्मने भी अपने कियेहुए सत्यसंकल्पके अनुसार पांडवोंकी सेनाका सदैव नाश किया ।५।हे शत्रुसंतापी धृतराष्ट्र कौरवों समेत भीष्म और धृष्टद्युम्नसमेत अर्जुन इनदोनों युद्धकरनेवालोकोअपने २ विनय करने में सन्देह हुआ । ६ । फिर उस दशदिन के युद्धर्मे भीम और अर्जुन की सम्मुखना में घारम्बार बड़ी भयकारी मलय वर्गमानहुई, उसदिनमें शत्रुनंतापी उत्तम अम्लों के ज्ञाता भीष्मजीने हजारों बड़े २ शूरवीरों को मारा । ८ । उनलोगों के नाम और गोत्र अज्ञातकल्पके समान धे अर्थात नहीं मालूम सेही थे वह युद्ध में पीठ न मोड़नेपाले महापूर भीष्मनी के हाथ से मारेगये । २। इसके पीछे धर्मात्मा भीष्मजी ने दशदिन तक पांडवी सेना को अच्छोरीति से सनत करके जीवन से वैराग्य पाया। १० । वह युद्ध में सम्मुख शीबही अपने मरनेका इरा गीत से विचार करनेवाला हुआ कि मैं युद्धमें बहुतसे श्रेष्ठ मनुष्यों को नहीं मारूंगा। १२. हे महाराज श्राप के पिता देवत्रत महावाहु भीमनी चि- न्ताकरके पांडवों के सम्मुख होकर यह वचनवोला । १.२ कि हे बड़े ज्ञानी सर्वशास्त्रज्ञ day to the other world. Thic conqueer in battle, Blixlım the Kaurav dostroyed crery day the army of the Pandavas according to his promise. Tho Kauravas with Bhishm and Arjun with Dlırishta. dyunın on both sides wcro doubtful of their victory. On tho tente day both Arjun and Blislım fouglit very hard. Bhishm tho destroyer of enemics and skilful in the use of worpons killed thosands of great Warriors on that tentlı day. Tlie names and families of tlic warriors who, not turning their faco from the battle met their death at the hands of Bluishń, cannot be told. Having destroyed the armies of tlie Pandavas for ten day, Bhishm, left all regard for his lifo. 10. While in the field of battle lis thoughts about liis death ran thus:-“ I shall not stay any moru good warriors in battle." Your fatlıer Derarat, batter known as Bhishm of grcat arms, with this thought uppernost Alula bhatt IM निर्पिगोस्मि भूश तात देहेनानेन भारत। नस्य मला पप्पुम्नस्ततो रामन् पाण्डया युधिष्ठिर पापस्तधा । मधे क्रिया यत्नो मम चेदिच्छार्स प्रियम् ॥ १५ ॥ तस्य तन्म | काम म गा पाएगदप्राणिनोरण १४॥ तस्मात् पाथे पुरोधाय पञ्चालान् । समामा पापमय सत्यदर्श । भीष्म प्रति यया राजा सग्रामे सह सृञ्जय ॥१६॥ तुर्षसम ॥ १७ ॥ अभियभ्य युध्यध्य भीम जयत सयुगे । रक्षिता सत्यसन्धेन | जिष्णुना रिपुजिष्णुना ॥ १८ ॥ अयञ्चापि महेप्यास पार्वतो चाहिनीपति । भीम | सेनम समरे यालयिष्यति धा ध्वम् ॥ १९ ॥ मायो भीष्माद्भय किञ्चिदस्त्वद्य युधि | सम्जया । भुष भीम विजेष्याम पुरस्टत्य शिखण्डिनम् ॥ २० ॥ ने तथासमय पुत्र युधिष्ठिर मेरे इस स्वर्ग के देनेवाले धर्मरूपी वचनों को सुन । १३ ।हे भरतवशी वेटा में | | इस शरीरसे अत्यन्त प्रीति रहित हूं और युद्ध में अनेकों जीवधारियों को मारते हुए मेरा समय व्यतीत हुआ। १४ । इस हेतुसे जो तू मेरा भला चाहता है तो तू अर्जुन को औरइसी प्रकार पांचालदेशियों को और सृजियों को आगेकर के मेरे मारने का विचार पूर्वक उपायकर। १५ सत्यदर्शी पांडव राजा युधिष्ठिर उन के इस अभिमायके मतको | (४९१२) । ध्रुत्वा भीष्मस्य ता वाच चोदयामास जानकर मनियों समेत युद्ध मे भीष्मजी के सम्मुख गया । १६ । हे राजा उसके पीछे धृयुम्न और पांडव युधिष्ठिर ने भीष्म जीके ऐसे वचनोकोमुनकर सेनाको आज्ञा करी। १७ । कि चलकर युद्ध करो और युद्धमें सत्यसंकल्पएकही रथसे विजय करने वाले अर्जुन से रक्षित होकर तुम भीष्म जी को विजयकरो। १८ । निश्चय करके यह बडा धनुपधारी सेन पाति धृष्टद्युम्न और भीमसेनभी युद्ध में तुम्हारी रक्षाकरेंग ।११। हेमृजियो अब युद्ध में तुमको भीष्मसे कोई प्रकारका भयनहींहोगा निश्चय करके हम शिखण्डी को आगेकरके भीप्मको पिजय करेंगे । २० । वह क्रोधसे in huis mind, end to the Pandavas, " Wise and learned son, Yudhis thir, hcar my words which are giver of paradise Descendant of Eburnt I son! I have lost all lovo for my body I have lost much timo in killing the living beings in battle You should, if thou would t do me good, contrive for my death with the assistance of Arjun the Srinjryrs and the Panchals” The truthful Pandav, Prince Yudhishthir learning the object of his desire, faced Bhıslım 10 compiny with the Srinjryas 16 Then Dhrishtadyumpa and Yudhishthir tho Pandav, hewing the words of the geandfrther, ordered the armies to rlvance for battle and to conquer Bhishm ander the guidance of Arjun of truº vows and conquerer with a single chariot 18 Surely tlus grort archir Dhrishtadyumn the commander of umies rad Bhimsen will protect you in battle You will have no cause of fear from Bhushm 0 Srinjava surely, led by Shul handi yt chall भीष्मपर्व Bhishma Pary [4913] दशमेहनि पाण्डवाः । ब्रह्मलोकपरा मत्या सजग्मु. क्रोधमूच्छिताः ॥ २१ ॥ व्यण्डिनं पुरस्कृत्य पाण्डवञ्च धनन्जयम् । भीष्मस्य पातने यलं परमं ते संमा स्यताः ॥ २२ ॥ ततस्तव सुतादिध नानाजनपदेश्वगः । द्रोणेन सह पुत्रेण सह सेना मह यला. ॥ ३ ॥ दुःशासनश्च यलधान सह सवै सहोदरै । भीम समरें मध्यस्य पालयाश्चक्रिरे तदा ॥ २४ ॥ ततस्तु तावकाः शूरा परस्कृत्य महानतम् । शिसंहीप्रमुखान पार्थानं योधयन्तिस्म संयुगे ॥ २५ ॥ वैदिभिस्तु सपन्चालः सहितो बानर घजः । यया शान्तनयं भीष्मं पुरस्टत्य शिखण्डिनम् ॥ २६ ॥ द्रोणपुत्रं शिनेनंता धृष्टकतस्तु पौस्यम् । याममन्युः सहामात्य दुर्योधनमयोधपत् ॥ २७ ॥ | विराटस्तु सहानीक सहसेनं जयद्रथम् । वृद्ध क्षत्रस्य दायाद माससादपरन्तप ॥२८॥ मद्रराज महेवास सहसैन्यं युधिष्ठिरः । भीमसेनोमिगुप्तस्तु नागानीकमुपादयत मूछिन पांडव दश दिन उसी प्रकार का नियम करके ब्रह्मलोक को उत्तम मानते हुए सब मिलकर चले । २१ । और शिखण्डी को और पांडव अर्जुन को आगे करके भीष्मके गिराने के लिये बड़े उपायोंमें नियतहुए । २२ । उसके पीछे आपके पुत्रकी आज्ञासे नानादेशों के राजालोग द्रोणाचार्य अश्वत्थामा और सेना समेत महायली धनुपधारी दुश्शासन सब अपने इष्ट मित्र और विरादरी वालोंसे युक्त इन सबोंने आकर युद्ध में नियत भीप्मजीको चारोंभोर से रक्षितकिया ।२४। इसके पीछे आप के शूरवीर पुत्र भीष्मनी को आगे करके उन पांडवोंसे लड़नेके लिये जिनका कि अग्रगामी शिखण्डीया युद्ध में प्राहुए ।२५। फिर वह वानरध्वन अर्जुन चंदेरी | देशके और पांचाल देशके लोगों के साथ शिखण्डी को आगे करके शंतनुके पुत्र भीप्पनी के सम्मुख गया।२६। सात्यकीने अश्वत्यामाको और धृष्टकेतुने कौरयोंको और अभिमन्युने मंत्रियों समेन उसदुर्योधनको युद्धमें सम्मुखहोकर युद्धकिया।२७, और सेना समेत राजाविराट ने पार्द्धक्षेमके पुत्र जयद्र्धसे सेनासमेत सम्मुखता करी ।२८। और युधिष्ठिरने बहेधनुषधारी सेनासमेत रानामदूको सम्मुखपायाऔर चारोंमोर से रक्षित conquer Bhishnu 20. On that tenth day, the Pandavas insesibel with anger and firm on their rezelve, went together thinking highly of the region of Bralım, and led by Shikhandi and Arjun they tried hard to slay Bhishım Tlion by the order of your son, tho princes of various countries together with Dronncharya, Ashwathama and Dushasan the mighty archer, followed by their armies, friends and allies, protected Bhishım from all sides. Then your bravo sons, led by Bhirltm, were ready to fight against the Pandavas led by Shikhand. 25 -Arjun of monkey's standard, together with the people of Chanderi and Panchal, led by Slubhandi, proceedel to encounter Bhislım the son of Shantanu. Satyaki met with Ashwathione in combat, Drustheti with, the Kauravas and Abhimanya with Dar.

Mahabharat, - [4914] ४९४) ॥ २९ ॥ अप्रधृष्यमनापाय सर्वशलतापरम । द्रौणि प्रति पयो पत्तः पाञ्चा सह सोदर ३० ॥ कर्णिकारश्वजम्चैव सिंहकेतुरारिन्दम । परयुज्जगाम सौभद्र राज पुत्रो वृहवसः । ३१ ॥शिखण्डिनञ्च पुत्रास्ते पाण्याच धनत्रयम् । राजनि समरे पार्थ मभिपेतुम्लिसंसधः ॥३२॥ तस्मिन्नतिमहाभीमे सेनयोथै पराक्रमे । साधापत् स्वीकेषु मेदिनी सम कम्गत ॥ ३३ ॥ तान्यनीकान्यमीफे समसम्स भारत । ताधकानो परेषाच हवा शान्तनपं रणे ॥ ३५ ॥ ततस्तेषां प्राप्तामा मग्यो भ्यमभिधावताम । प्रादुरासीन्महाशब्दो दि सपांमु भारत । ३५ । शबदुर भिघोष धारणानांच हितः । सिंहनादय सैन्यानां दारुण समपस ॥ ३६॥ भीमसेन बड़ीसेनाकीओर चला। २९६ और मतवाला धृष्टद्युम्न अपनेनिजभाइयों और मातेदारों समेत उसमेजेय सव शस्त्रधारिया श्रेष्ठ स्वाधीन न होनेवाले प्रश्नत्यामाके सम्मुखगया । ३० । शत्रुओंका विजयकरनेवाला सिंहकी ध्वजासे युक्त राजकुमार सहगल उसकर्णिकार वृक्षकी चिह्नवाली धजावाले अभिमन्युके सम्मुखगया ॥३१॥ आपके सव राजा सेनाओसमेत शिखण्डी और पांडव अर्जुन के मारने के इच्छावान युद्धमें अर्जुनके सम्मुख दौड़े । ३२ । उस समय उन भयानक सेनाओं समेत तुमारे पुत्रोंके दौड़ने से पृथ्वी अच्छेप्रकार मे कंपायमान हुई।३३।हे भरतर्षभ भीष्ममी को युद्धमें देखकर आपके पुत्रोंकी और पांडवों की सेनापरस्परमें बड़े २ पराक्रमोंको कर करके लड़ी ३४ । इसके पीछे उन अत्यन्त पीडामान परस्पर दौड़नेवालों का बड़ा भारी महाशब्द सब ओर को जारीहुआ । ३५ । और शंख दुन्दुभियों के शान्द वा हाथियों की चिंहाड़ अथवा सेनाके मनुष्यों के सिंहनादोंसे महाभारी मयं उत्पन्नहुमा । ३६ । सब रामाओंका चन्द्रमा और सूर्य के समान तेज वा पूर बीर yodlan and his counsellors. King Virat and his armios met Jayad." math tho son of Vardhkshem and his armies, Yudhishthir found the great archer Prince of Madra and his army face to face with him and, protected on all sides, Bhimsen rushed upon the great army. Proud Wirishtarizuan with big brothers Alice needle in ringile daha thama tho Leat of arm-boarers, 30. Prince Vralad val of lion's standard, the conquorer of focs faced Abhimanyu who led the Lamilar troo for his ensiga. All your warriors together with the armics, desirous of slaying Shikhandi and Arjun, rushed to fight against the latter. Thio carth shook with the rushing on of your sons and their armies. Sxing Bhim in tho field of battle, the armica of your sons and those of the Pandayas fought very bravely. Then thero was a tromondous noise at the raceting of the two armies,85. The Econo was very draadſul with the uproar made by the peals of concbe And trumpets, the shricks of elephants and the leonino rosts of the warriors. The sun-and-moon like glory of all tbe kings and motion -~-- -- - मोम्मप Bhishma Pary [49133 साब सघनरेद्राणां बादासानी प्रभा। वीराङ्गदाफिरीटेयु निष्प्रभासमपचत ॥३७॥ जो मेधास्तु सम्मा. शस्त्रविद्युद्भिरायताः धनुषाच्चापि निघोंपो धारणः समपघात ॥ ३८ पाणशंखमणादाश्च मेरीणाम महास्वनाः रथांपध सम्झने सेनयोरुभयो रपि । १९० पाराशक्त्यष्टिसंघश्च याणाध समाकुलम् । निष्प्रकाशमियाकार्श सेनयोः समपद्यत ॥ ४०॥ भन्योम्यं रपिन पेसुवाजिनश्च महाहवे। पुजरान फुजरा जप्नुः पाहातास पदातपः ॥ ४६॥ सत्रासीत् मुमहशुद्धं कुरुणा पाण्डः सह । भीष्महतोर्न रण्याघ्र स्पेनपोरामिरे यया ॥ १२ तेषां समागमो घोरा यभूवयुधि सङ्गतः। मापो म्पस्य वधार्थाप जिगीपूर्णा महाहये ॥ ४३ ॥ इति धीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीमवधपर्वणि भीष्मोपदेश पोड़शाधिकशतोश्याप ॥ ११६ ।। सम्प्रय उपाय । अमिमम्युमहाराज तव पुत्रमवोधयत् ।महत्या सेनया युक्र भीमसो. पराक्रमी ॥ १ ॥ दुर्योधनो रणे फाणि नपमिर्मतपभिः। भाजपानो लोगों के पापग्द और मुकुटमभामे रहितहोगपो३७ शस्त्ररूपी निनलीसे युक्त धूलके बादल उत्पहुए और धनुपों के भी भयकारी शब्दवर्तमानहए । ३८ । दोनोसना- भोंका भाकाश शक्ति पाश औरदुधारे खण्ड औरवाणोंके समूहों से व्याप्त होकर प्रभा से रहित होगया । ४०। उसबड़े भारी युद्धमॅरयो घोड़े हाथी ऐसे परस्पर में लड़े कि हाथीको हायोने पदाती को पदातीने मारा, हे नरोत्तम वहां भीमके कारण पांडव और कौरवों का ऐसामहाभारीयुद्ध हुमा जैसा कि पराये मांस के निमित्त दोबान पनियोंका युद्ध होताहै । ४२ । उनविजयामिनापी शूरवीरोंका भयानकयुद्ध परस्पर में एक एकके मारने के निमित्त वर्तमानहुआ । ४३ ॥ प्रत्याय॥ ११७॥ समय बोला हे महाराज पराक्रमी अभिमन्यु ने भीष्मके कारण वड़ी सेनासे संयुक्त प्रापके पुत्रसे युद्ध किया। १ । तव कोषयुक्त दुर्योधन ने मुकीगांठ वाले and of their bracelets and diaderus, fedeal The clouds of dust arang having bright weapons for lightning and the sounds from the bows wero treinendous. The space between the two armies was filled with nooses, double alged swords and Aights of arrows. 40. In that battle the charioteers, horsemen and elephant riders fought and slow one The battle between the Kayraras and the Panda ras on account of Bhishin Wils very scvere like that of two hawks for the flesh of anothor bird. The warriors desirous of cci quest fought to Blay one anotlier.43. CHAPTER CXVII Sanjaya tad, "Base Al himasu lought rgainet your fon and bis logro *) as Prerront of Bhislıın bien fra Fri Nomadhan - another.

Mahabham, [4914] । ४९९४) २९ अप्रभ्यमनावाय सर्वशलभताम्परम् । द्रौणि प्रति पयो पत्तः पाश्चात्यः सह सोदरः । ३० ॥ कर्णिकारवजम्चैव सिंहकेतुररिन्दम । मयुरजगाम सोमदराज पुत्रो वृहसः । ॥ शिमण्डिनश्च पुत्रास्ते पाण्यश्च धनापम् । राजमिसमरे पार्थ मनिपेतुम्लिसषः ॥३३॥ तस्मिन्नतिमहाभीमे सेनयोर्ये पराक्रमे । सम्प्रधाषत स्वनीकेषु मेदिनी सम करात ॥ ३३ ॥ तान्यनीकान्यमीफे समसजन्त भारत । ताधकानां परेपाच हवा शान्तनपं रणे ॥ ३५ ॥ ततस्तेषां प्राप्तामा मग्यो यमभिधावताम | प्रादुरासीनमहाशब्दो दिपु सांसु भारत ॥ ३५ शमग्दु मिघोष पारणानांय हितः । सिंहनादय सैन्यानां दारुण समपद्यत .. भीमसेन बड़ीसनाकीओर चला।२९। और मतवाला धृष्टद्युम्न अपनेनिजभाइयों और नातेदारों समेत उसमय सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ स्वाधीनन होनेवाले प्रश्नत्यामाके सम्मुखगया । ३० । शत्रुओंका विजयकरनेवाला सिंहकी ध्वमासे युक्त रामकुमार सरल उसकर्णिकार वृक्षकी चिनवाली धजावाले अभिमन्युके सम्मुखगया ॥३१॥ आपके सव राजा सेनाओंसमेत शिखण्डी और पांडव अर्जुन के मारने के इच्छावान युद्धमें भर्जुनके सम्मुख दौड़े । ३२ । उस समय उन भयानक सेनाओं समेत तुम्हारे पुत्रोंके दौड़ने से पृथ्वी अच्छेमकार मे कंपायमान हुई।रशदे भरतर्षभ भीममी को युद्धमें देखकर आपके पुत्रोंकी और पांडवों की सेनापरस्परमें बड़े २ पराक्रमोंको कर करके लड़ी । ३४। इसके पीछे उन अत्यन्त पीडामान परस्पर दौड़नेालों का बड़ा भारी महाशब्द सव ओर को जारीहुआ। ३५ । और शंख दुन्दुभियों के मान्द षा हार्थियों की चिंहाड़ अयवा सेनाके मनुष्योंके सिंहनादोंसे महामारी भयं उत्पन्नामा । ३६ । सब राजाओंका चन्द्रमा और सूर्य के समान तेन वा शूर वीर yodlian and his counsellor King Virst and luis armies moet Jayadrath tho son of Vardhkshem and his armies, Yudhishthir found the great archer Prince of Madra and his army face to face with him and protected on all sides, Blimsen rushed upon the great army. Proud Dhrish tadyumn with his brothors and allies faced in vincible Abbwsthama tho beat of arm-boarerr, 30. Prince Vralındval of lion's standard, the conquorer of fous faced Abhimanyu who liad the darilar tree for his onsign. All your warrions together with thie armies, desirous of slaying Shikhandi and Arjun, rushed to fight against the Intter, Tho earth shook with the rushing on of your sons and their armics. Sscing Blim in the field of battle, the arnice of your sons and those of the Pandoras fought very bravels. Then thero was a tromondori noise at the raceting of the two armies,85. Ibo scene was very dreadful with the uproar wade by tbo pesis of corte and trumpets, tbo shricks of elephants and the lonins roans of this warriors. The sun-and-moon like glory of all the kings and treation .

1४९१६) [4916] Nababharat रसिद्ध पुनश्चैव निमि शरै ॥ २ ॥ तस्य शकि रणे पाणित्योघोरा स्वसामिय। पयामास समुद्धो दुर्योधनरथ प्रति ॥३॥ तामापत ती सहसा घोररूपा विशम्पते।' विधा विच्छेदते पुत्र सुरप्रेण महारथ ! ताशक्तिपतितावाकाणि परमपोपन । दुर्योधन त्रिभणियाहाहरसिचार्पयत् ॥ ५॥ पुनश्चैन शरपोरै राजधानस्तनातरे। पशभिर्भरतश्रेष्ठ भरताना महारथ ॥६॥ तयुसमभवदोर चिनरूपञ्च भारत। इन्द्रिय प्रीतिजनन सर्वपार्थिरपूजितम् ॥ ७॥ भीष्मस्य निधनार्थाय पाथस्य जियायच । युयुधाते रण पोरी सौभद्रकुरपुङ्गवो ॥ ८ ॥ सायकि रभस युद्धे द्रौणिर्माह्मणपुङ्गव । प्राजधानोरसि क्रुद्धो नाराचेन परन्तप ॥ ९॥ शोपोपि गुगे पुभ सर्वमर्मसु भारत। सताडयद मेपामा नपभि कडपाजित ॥१०॥ हाश्वत्थामा तु समरे सात्यकि नपामे शरै । त्रिंशता व पुनस्तूर्ण बाहोररसि चार्पयत् ॥११॥ सोतिविद्धो महप्वासो द्वाणपु नर वाणों से अभिमन्युको व्यथित करके तीन वाणों से फिर उस को घायल किया 1 0 1 तब अत्यन्त कोपयुक्त अभिमन्यु ने मृत्यके समान भयकारी शक्ती को दुर्योधन के रथपर चलाया ।। हैराना आपके पुत्र महारथीने उस अकस्मात् गिरती इई भपकारी शक्तीको तुरम वाणों मे दो खड कर दिये। ४ ।फिर अत्यन्त कोषयुक्त यभिमन्यु ने उसटूटकर गिरीहुई शक्ती को देखकर दुर्योधन की भुना और छाती को तीन वाणों से घायल कर दिया हे रागा वह भयकारी युद्धमें अपूर्व रूप का चित्तका मानद देनेवाला सवराजाओंसे पूजितहुआ वह सुभद्राकापुत्र और कौरवों में श्रेष्ठ दुर्योधन दोनों आरवीर भीष्म के मारने वा अर्जुन के विषय के निमित्त युद्ध करनेवाले हुए शत्रुओंके तपानेवाले युद्ध में वेगवान व ह्मणोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा ने सात्यकी को नाराचनाम वाणसे छ तीपर घायल क्यिा । ९ । फिर बडे बुद्धिमान सात्यकांने भी गुरू के पुत्रकोनत्रवाणोंसे सबमर्मस्थलोंमें घायलकिया।१०॥ तिस पीछे अश्वत्थामा ने सात्यकी को नव वाणों से छातीपर और तास वाणों से with nine arrors having hooled jo nts wounded Al luonnyu and again pierced him with three more. Thereupon Abhimanyu much cnraged hurled a deadly spear at Duryodhans chariot but yont brave son cut with his anor the spcr coming on towards him Abhimanyu mach enrager at the sight of that falling spear foueded tho breast nod arm of Duryodhan Tith three arrows That dreadful battle o ling mas pleasing to the mind and respected by all the bin's Tho sor of Subh? Irr and Duryodhan the best of the hann tas both warrione fought for the death of Bhishm and the victory of Arjun Ashwathama the destroyer of foes clerer in lattle and lest of Brahmans wounded Satyalı on the breast with an ATOM known as Narch Satyaki the irreo too, rounded the proceptor's son mith minc arror 3 in tlie vital parts of the body 10 Arlivat an a rounded Salz nhi on the breast with nine arrors and on Tbca (४९१७) भीमप Bhishma Parv [40171 प्रेण सात्वतः। द्रोणपुत्रं त्रिमिणिराजधान महायशाः ॥ १२॥ पौरयो धृष्टकेतुश्च शो राच्छाद्य संयुगे। यहुधा दारया चक्रे महेप्यासं महारथः ॥ १३ ।' तच पोरवं युद्धे धूपकतुमहारथः । त्रिशता निशितैोणर्विव्याधाशु महानुजः ॥ १४ ॥ पारवस्तु धनु. विछत्वा धृष्टकेतोर्महान्य निनाद वलयन्नादं विग्याध च शितैः शरै ११५. सान्यत फार्मकमादाय पौरवं निशितैः शरैः। याजधान महाराजत्रिसप्तत्या शिलीमुख. ॥१६॥ तोतुत महापासी महामात्रीमहारयो । महता शरयर्पण परस्परमविध्यताम् ॥ १७ ॥ अन्योन्यस्य धनुश्छित्वा हयावहत्याचभारत । विस्यावसिद्धार समीयतुरमर्पणो१८॥ आपमे चर्मणी चित्रे शतचन्दपुरस्तते । तारफाशतचित्रं च निस्निगी सुमहाप्रमी ॥ २९ ॥ प्रगृध विगली राजस्ताबन्योन्यममिती । घासितासङ्गमे यत्ती सिंहाधिय महा यते ॥ २०॥ मण्डलानि विचिचाणि गतप्रध्या गतानि च । चेरतुदर्शयन्तौ च प्रार्थयम्ती भुजाओंपर घायल किया । ११ । द्रोणाचार्य के पुत्रमे अत्यन्त पायल बड़े धनुप धारी यशवान् सात्यकी ने अश्वत्थामा को तीन वाणों से घायलाकया। १२ । महारथी पौरवने बड़े धनुपधारी धृष्टकेतु को वाणों से ढककर अत्यन्त घायल किया, इसी प्रकार महारथी धृष्टकेतुने शीघतासे तेजधारवाले वाणोंसे पौरव कोघायल किया । १४ । फिर महारथी पौरव धृष्टकेतु के धनुषको काट कर महाघोर शब्दसे गर्मा और तीन वाणों से घायलं किया ।१५। हेमहाराज उसने दूसरे धनुपको लेकर शिलीमुखनाम तीक्ष्ण पाणोंसे पौरखको व्यथित किया ।१६ तयवहां उनदोनों बड़ेघनुपधारी शोभायमान महारीयोंने वाणोंकी बड़ीवासे परस्परमें घायल किया ।१७वहदोनों क्रोधयुक्त धनुप काटकर वा घोड़ों को मारकर विस्थ हो खड्गमहारी युद्ध करने के लिये सम्मुख हुए । १८ । हे राजा वह दोनों शूरवीर अत्यन्त स्वच्छरूप मूर्य चन्द्रमा से प्रकाशित खड्ग और उत्तम चित्रोंसे चित्रित ढालों को । १९ । कर परस्पर में ऐसे सम्मुख गये जैसे कि महा बन में सिंहनी के मिलाप में उपाय करने वाले दो सिंह होते हैं । २० । परस्पर दिखलाने और चाहते हुए दोनों the arms with thirty. Much wounded by the son of uchas ya tha great archior Satyahi of great glory, wounded him with thirce arrows. Valliant Paurav covered the great archer Dhristaketu with his arrons and wounded him much. In the same maner, brave Dhrisbt. keta wounded Paüray' with his swiſt and sharp arrow-8. The braver Paurav cut down the tow of Dirishthetu and with a loud roar wound.! ed him with his arions, 15. Ho'took op another bow and with arrows sharpened on stono pounded Pauras, Tlio tiro great archers tlion shovored their arrows and wounded each other The two onraged warrior y cut down each other's boses and having killed thic Liòrses they jumped down from their chariots and faced each other to fight with strords. The trol,raro warriors'rrith cleau stonls, bright lilo'llio sun and the moon, and good slicids worked over will figures परस्पर में [19181 Mlaliabharat (४९१८) परस्परम् ॥ २१ ॥ पौरषो पृष्टकेतुन्तु शंखदेशे महासिना | तारयामास संकुसस्तिष्ठ तिष्ठति वामयीत् ॥ २२ ॥ चेदिराजोप समरे पौरव पुरुषर्षभम् • माजघान शितामेण जप्रदेश महासिना ॥२शातावम्योन्य महाराज समासाघमहाहवे। मन्पोम्पपेगाभिहती निोतुररिन्दम।।२॥ तत स्वरयमांगन्य पौरवं तनयस्तष । अपरसेनो रपेनाजापो बाहरणाजिरात॥२५॥धृष्टकेतुरंतु समरेमाद्रीपुत्र प्रतापवानाभपोषाहरणेशूरसहरेषः पराक्रमी ॥२॥ विश्न, मुशर्माण विदा यहुमिरायसः । पुनर्विघ्याध त पश्या पुनम मभिः शरैः ॥ २७ ॥ सुशर्मा तु रणे खस्तष पुत्र विशागत । शनि दशमिवध विण्याप निशितैः शरैः ॥ २८॥ विप्रसनश्च तं राजनिशतानतपर्वभिः। भाजधान रणे कदः सपतं प्रस्पविष्यत ॥ २९ ॥ भीमस्य समेर राजन् यशो मानम्च परयन् । सोमः राजपुषन्त वृहदलमयोधयत् ॥ ३० ॥ पार्थ हेतोः वा ने विपित्र दाबायें मंडलों को किया । २१ । फिर भत्यन्त कोषयुक्त पौरख यो खड्ग से धृष्टकेतु को शंखनाम अंग में घायल करके अर्थात् पाणों के नीचे छाती के ऊपर इधर उधरके हाहों में महार करके तिष्ठतिष्ठ यह शब्दयोले । २२॥ राजा चन्देरीने भी युद्ध में पौरव को तीक्ष्ण धार वाले बड़े खड्ग से शत्रुदेश नाम अंगमें प्राव नावड़े में घायल किया । २३ । हे शत्रुहन्ना यह दोनों मा युद्ध में परस्पर भिड़े हुए हामता से घायल होकर पृथ्वीपर गिरपड़े । २।। उसके पीछे प्रापका पुत्र जितमेन युद्ध भूमि में पौरवको अपने स्थपर सवार करके उसी रथके द्वारा युद्धाम से दूर लेगया । २५ । फिर माद्रीका पुत्र प्रतापवान गू पराक्रमी सहदेव युद्धमें धृष्टकेतु को दूरगया। २६ । चित्रसेन ने मुशर्मा को परत मे मोहे के पाणों से घायल करके फिर साठ पाण से और नव वाणों में पायल किया। २८ . तब उम कोपयुक्तने भी उस चित्रसेन को की गांड वाले तीस पाणों से घायल किया फिर उमने उसको पायल किया । २९ । हे रागा भीम के युद्ध में पराकानि और मतिष्ठा को बढ़ाते हुए अभिमन्यु ने बाबत of various sorts, faced each other in battle as two furious lions wishing to Rocure a lioness, nicot esch other in a furort Showing their prorrons, and desirous of fighting they turned right and loft in circles. Then Paurar, much onrnged, wounded his adversay on too brenst and cried out 'stay, stay.' To prince of Chanderi too, Founded Paurar on the the jar bond The two Warriors Wivundoby och other, fell down on oarth. Then your bon Jitsen took op Pauray on liis chariot and carriod hins far away from the field of battle 25, Valliant Saladet tho aon of Madri lified up Dirishiokotu and took him awng out of the field of battlo Chitrasen wounded Susbaruia with many iron Anot* numbering sixty and nmo. Tho otlior too, much onraged, wounded Chitraken with thirty atrors kaving hooked points. They wounderi cach other In tho war of Bhishm, Abhinangu napiring Hra Bluslima Parv [4913] पराकान्तो मीप्मस्यायोधन प्रति । भाजनि कोसलेन्द्रस्नु विध्वा पञ्च मिरायसः ॥ पुनर्विव्याध विंशत्या शरै सतवमिः । सौभद्रः कौसले द्वन्तु विव्यापार मिरापः ॥ ३२ ॥ माकम्पयत समामे विम्य ध ध पुनः शरैः ॥ कौसल्यस्य घाश्चापि पुनश्चिम फाल्गुनि ॥ ३३ ॥ भाजयान शोश्चापि त्रिशता कर परिभिः ॥ सोन्यत् कार्मुफमादाय राजपवनः ॥ ३४ ॥ फाल्गनि समरे कुलो विम्याध बहुभिः शरे । तयोर समभवत् मीमहतोः परम्तप ॥ ३५ . सर ग्धपोर्महाराज समरे चित्रपोधिनी । क्या देवासरे युद्धे वलियासययोरभूत् ॥३६॥ भीमसमोरयानी पोषपन परपीमत । पपा शको बज्रपाणिधारयन् पर्वतोत्त मान् ॥ ३७॥ बापमाना भीमेन मातङ्गा गिरिसनिमा । निपेतुरुपयों सहिता नादयस्तो षसम्पराम R१८ गिरिमात्रा हि ते नागा भिनाश्चनचयोपमा । घिरे नाम राजकुमार से युद्ध किया । ३० ! और अर्जुन के कारण से भीष्म की युद्ध- भूमि में पराक्रम करने वाला हुआ और राजा कौशल ने अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु। को पांच लोहे के बाणों से बेघ कर । ३१ । फिर गुप्तग्रन्थी वाले बीस वाणसे पायह किया और अभिमन्यु ने राजा कोमलको प्राठलोहे के वणों से घायल और कम्पायमान करके उसके धनुप को भी काटा । ३३ । और कंकपक्षवाले साप्त माणों से भी घायल किया उस युद्ध में क्रोधयुक्त राजकुमार घइबलने दूसरे धनुपको सेकर । ३४ । अभिमन्यु को बहुत से वाणों से घ यल किया है शत्रुमों के संतप्त करनेवाले उन दोनों का युद्ध भीष्म के कारण ऐसा अच्छा हुमा जैसा कि देवता और अमुर्ग के युद्ध में गजा बलि और इन्द्रका प्राया । ३६ ॥ भीमसेन रयों की सेनासे लड़ता ऐसा शोभायमान हुभा जैसे कि बजको धारण करने वाला इन्द्र उसम पर्वतों को फाड़ता हुआ शोभित होताहै । १७ । भीमसेन के हाथ से घायल पर्वतों के समान वह सब हाथी एक सायही पृथ्वीको शन्दाय- मान करते हुए भूमिपर गिरे । ३८ । पर्वतके समान टूटेहुए वह हायी पृथ्वीपर for fame and greatness, fought against Prince Vrahadbal.co. He fought for the love of Arjun in tho battlo fleld of Bhishm. Panca Koul wounded Arjun's son Ahimanyu with five and twenty iron arrows having hidden knots and Abhimanyu having wounded and shaken his adversary with eight iron arrows, cut down bis bow. With thirty arrows laving peacock feathers he wounded him again. Eoragod in battle, Prince Vrahadbal took up another bow and wounded Abhimanyu with many arrows. The tro heroes, 0 destroyor of foos, fought like Indra and Bali in the war between the gods and the danayas 36. Bhishm fighting against the army of chariots looked graceful like Indra the Fielder of vajra breaking through mountains. Wounded by Bhimsen the elephants as buge as hills fell on earth ringing the air with their shreka. The elephants 4920] Mahabharat (४९२० जर्वसुधा प्राप्ता धिकीर्णा इव पर्वताः ॥ ३९ ॥ युधिष्ठिरो महेप्पासो मद्रराजानमा हये। महत्या सेनया गुप्तं पाडयामास सङ्गतम् ॥ ४२ ॥ मद्रेश्वरश्च समरे धर्म पुत्र महारयम् । पीडयामास संरग्धो भीमहेतो. पगक्रमी ॥ ४१। विराट सैन्धवो राजा विध्या सनतपभि । नवमि सायकस्तागैत्रिंशता पुनरार्पयत ॥ ४२ ॥ विराटश्च महाराज सन्धरं वाहिनीपतिः ।, त्रिशदिनिशितर्वाणराजधान स्तनान्तो ॥ ४३ ॥ चित्रकामुकनिशिौ चिनर्मायुधधजी। रेजनुश्चित्ररूपी तो सग्रामेमास्य | सैन्धवो ॥४४॥ द्रोणः पाञ्चालपुत्रेण समागम्य महारणे । महासमुदयं चकार, समतपर्वभिः ॥ ४५ ॥ ततो द्रोणो महाराज पापंतस्य महद्धनुः । छित्वा पञ्चाश तेपूणा पार्यतं समविध्यत ॥ ४६ ॥ सोन्यत् काकमादाय पार्वतः परवीरहा । द्रोणास्य मिषतोयुद्धे प्रेषयामास शायकान् ४७ ॥ ताच्उराच्छरघातेन चिच्छेद वर्चमान ऐसे शोभायमान हुए जैसे कि टूटे हुए पहाड़ होते हैं ३९ । बड़ी सेना रक्षित बड़े धनुपधारी युधिष्ठिर ने युद्ध में सम्मुख आयेहुए राजा मद्रको पीडामान किया । ४० । फिर क्रोधयुक्त महारथी राजा मद्र ने भीष्म के कारण से धर्म पुत्र युधिष्ठिरको पीडामान किया । ४१ । राजा सिन्धने गुप्तग्रन्थी वाले ना पाणों से विराट्को वेधकर तास बाणों से घायल किया । ४२ । फिर वाहिनीपति विरादने राजा सिम्यतो तीक्ष्ण धारवाले तास वाणों से छाती में घायल किया।.४३ । वह दोनों जड़ाऊ धनुष खड्ग चर्म वजा शस्त्रवाले अपूर्व रूप विराट और जयद्रय युद्ध में महाशोभायमान हुए । ४४ । द्रोणाचार्य ने अपूर्व युद्ध के बीच धृष्टद्युम्न के साथ बढ़कर गुप्तग्रन्थीराले वाणों से महाप्रबल युद्ध किया। ४५ । इसके पाछे द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न के बड़े धनुप को काटकर पचास उसको वेधा । ४६ । फिर पृष्टद्युम्न ने दूसरे धनुप को लेकर द्रोणाचार्य के देखते हुए शायकों को चलाया। ४७ । उस महारयी ने वाणों के महारसेही न वाणों fallen dotvn on the ground looked like huge mountains broken info pieces Protosted by a large army the great archer Yudhishthair Wounded the king of MIndra who was opposing him in battle, 40. 40. Tho vallisnt hing of Madra, much enraged on account of Bhishm, woundod Yudhishthir the son of Dhorn. The kirg of Sindh woundoi and pierced hing Virat with nino and thirty arrots haring hidden knots and king Virat founded tie king of Sendi with thirty sliarp edged arcosts on the breast. The two warriors, Virat and Jayadrath, armed with jewelled bows, srords, banners, and weapons, looked wonderfully glonous in battle. In that wonder inl batio Dronacharya and Dhirishtadyumn fought very valliantly with artois laving hidden Inots 45. Then Dronacharya cut down the bow of Dhrishladyumn and pierced lum with fifty Artos& And tho latter, tabing up another bor, discharged his arrows At वार्णमे (४९२१) भीष्मपर्व Bhishma Pary [49211 समहारयः । द्रोणोदपदपुप्राय माहिणोरपंच सायकान् ॥ ४८ ।। ततायोमहाराज पार्वतः परवीरहा । द्रोणाय धिक्षेप गदा यमदण्डोपमा रणे ॥४९॥ तामापतन्ती महसा हेमपट्टविभूषिताम् । शरै पञ्चाशता द्रोणो धारयामास संयुगे ॥ ५० ॥ सा छिन्ना बहुथा राजन् द्रोणचापच्युता शरैः । चूर्णीकृता पिंशीयन्ती पपात वसुधातले ॥५१॥ गदां षिनिहता हष्ट्रवा पार्पतः शत्रुतापनः । द्रोणाय शासि चिक्षेप सर्वपारशी शुभाम् ॥५२॥ तो शोषो नयमिणेचिच्छेद पुधि भारत । पार्पतञ्च महेम्वास पाडयामास संयुगे.॥५३॥ एवमेतम्महायुद्धं द्रोणपार्वतयारमत् । भीमं प्रति महाराज घोररूपं भयानकम् ॥ ५५ ।। अर्जुन प्राप्य गाङ्गेय पासयनिशितैःशः । मध्य यत सम्मतो बने मस मियनिपम् ॥ ५५ ॥ प्रत्युधयोच त राजा भगवत्तःप्रतापपान् । विधाभिन्नननागेन मदधेिन महायलः ॥ ५६ ॥ तमापतंते सहसा महेंद्रगज समिमं । को काटा फिर द्रोणाचार्य ने धृष्टपुम्न के लिये पांच शायकों को चलाया ।४८ इसके पीछे क्रोधयुक्त घृष्टयुम्न ने यमदण्ड के समान गदाको द्रोणाचार्य के पर फेंका । ४९ । और द्रोणाचार्य ने उस गिरने घाली गदाको पचास पाणों से रोका । ५० । हे राजा द्रोणाचार्य के धनुप से निकले हुए वाणों ने उस गदा को चूर्ण करके पृथ्वी पर गेरा । ५१। माधुसंतापी धृष्टद्युम्न ने गदाको टूटीईई देख कर सब लोहमयी हदशक्ती को द्रोणाचार्य के ऊपर फेंका । ५२ । फिर द्रोणा- चार्य ने भी उस बड़े धनुपपारी धृष्टद्युम्न को पीड़ित किया । ५३ । हे राजा इस प्रकार भीष्म के सम्मुख द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्न का महा भयानक रूप बुद्ध हुधा । ५५ । फिर तीक्ष्ण वाणों से सबको पीड़ित करता हुमा गांगेय भीमजी | को पाकर जन के सम्मुख ऐसा गया जैसे कि वन में अत्यन्त मतवाला हायी मदोन्मत्त गजेन्द्रके सम्मुखहोरे ।१५। प्रतापवान महावली राजा भगदत्त सीन अंगोंसे मदचूने वाले महा मतवाले हाथी की सवारीसे सम्मुख गया । ५६ । तब अर्जुन बड़े the former and cut down his arrows with his own. Dionacharya thon discharged five arroys at him and Dhrishtadyunin much enraged hurled at him his mace like the staff of Yam; but Dronacharya checked it with fifty arrows.50. The arrows shot from the bow Dronacharya broke the mace into pieces. Seeing his mace cut down, Dhrish tadyumn the destroyer of foes hurled a hard spear, made entirely of iron, at Dronacharya. The latter too, pounded the former with his weapons. Thus in the presence of Bhishm there was a severe fight between Dronacharya and Dhrishtadyumn. Wounding all with his sharp arrows, ho rushed agninst Dronacharya as one mad elophant rushes against another in a forest. 55. Mighty king Bongo datta of great prowess came upon the back of the elephant who dropped juice from three parts of his body. Arjun carefully faced (४२२२) [4922] Mahabharat परयत्न समास्थाय बीभत्स प्रत्यपद्यत ॥५७॥ तता गजगतोराजा भगदच प्रता पवान् । अर्जुन शरवण चारयामास मयुगे ॥५८ ॥ अर्जुनशुततानाग मायान्त रजतो पमै । विमलरायसैस्तीवणैरविध्यत महारणे ॥ ४२ ॥ शिखण्डिनन्च कौन्तेयो याहि याहीत्यचोदयत् । भीष्म प्रति महाराज जीनमिति चाननीयू ॥६०1 प्राग्ज्योतिपस्ततो हित्वा पाण्डव पाण्डपूर्वज । प्रययौ परितो राजन् द्रुपदम्प रय प्रति ॥ ६१ ॥ सतोर्जुनो महाराज भीष्ममभ्यद्रवद्रुतम् । शिसण्डिन पुरस्टत्य ततो युद्धमरर्सत ॥ ६२ ॥ ततस्ते तापका शरा पाण्डव रभस युधि । समभ्यधावन् पोशन्तस्तदभुतमिवाभवत् ॥६३॥ नानाविधान्यनीवानि पुत्राणान्ते जनाधिप । अर्जुनो व्यघमार दिचीवाभापि मारता ॥६५॥ शिखण्डीतु समासाद्य मरताना पितामहम् इयुभिस्तूर्गमध्यनो पदुमि ससमा चिनोत् ।। ६५ । रथान्यगारधापाचिरसिशत्तिगदेन्धन । भएमघमहावाल क्षत्रि पान समरेदहत् ।। ६६ ।। यथाग्नि सुमहानिद्ध फले चरति मानिल । तथा जज्वाल उपाप में नियत होकर उस गजेन्द्र ऐरावतके समान महापली गिरतेहुए हाथीके सम्मुख हुआ । ५७। उसके पीछे प्रतापवान भगदत्तने वाणों की वर्षासे ढकदिया। ५८ । फिर अर्जुनने चांदी के समानस्वच्छ लाहेके वाणों से उस आतेहुए हाथीको बेधा । ५९ हे महाराज फिर अर्जुनने शिखण्डीको भीप्मकी ओर प्रेरित किया और कहा कि जाओर इसकोमारो।६० । हेपांडके ज्येष्ठ भ्राता धृतराष्ट्र फिरराना प्राग्ज्योतिष अर्जुनको गोड कर शीघही द्रुपदके रथके समीपगया।६।इसकेपीछे अर्जुन शिखण्डीको आगेकरके शीग्रही भीष्णके सम्मुखगया और युद्ध जारीहुआ । ६२ । तदनन्तर भाप के शूरवीर पुन पुकारते हुए वढे वेगसे अर्जुन के सम्मुस दौडे वह प्राश्चर्यसा हुआ। ६३ । वहां अर्जुन ने आपके पुत्रोंकी नानाप्रकार की सेनाको ऐसे छिन्न भिन्न करादिया जैसे कि वायु आकाश वादलोंको छिन्न भिन्न करदेताहै । ६४। फिर उस साप पान शिखएडीने भरतपशियोंके पितामह भीष्मको पाकर अनेकवाणोंसे ढकदिया 1६५ । उस स्यरूप अग्निशाला और धनुपरूप ज्वाला वा खड्ग शक्तीरूप इन्धन या पाण समूहरूप प्रज्वलितरूप वाले भीष्मने युद्धमें क्षत्रियोंको भस्म कर दिया that powerful elophant coming on like Airavat the prince of oleplant: Then glorious Bhagdatta hid him with the flower of lus arroire. With iron arrows bright as xls er, Arjun wounded that advancing hlephant Then he sent Slubhandi agunst Bluhm Faying, "Go And kill him 60 Tho king of Prngjyotish o elder brother of Panda, left Arjun ind hastenod to encounter Druprd in lus chariot. Then Arjun following Shil landı 117stined against Bhishım and began fighting Then your brave sons come up roaring against Arjan. It mas a wonderful sconce Arjun disporsed the armies of your sons as the vind disperecs the clouds Clover Shibliandi corcred the grand father with the arrors.65 In tliat sacrificial ground haring charita है (४९२३) माध्मय Bhishma Pary [49231 मीमापि विग्यान्यसाग्युरियन् ॥ १७ ॥ सोमपांच रणे भीष्मो जने पार्थपदानुगान्। ग्यपारयत तत् सैन्य पाण्डवस्य महारथ.॥६८॥ मुवर्णपुखरियुमिः शि.सानपर्वभिः। नादय स विशो भीष्मः प्रदिशश्च महाये ॥ ६९ ॥ पातयम् रथिनोराजन यांसह सादिमिः । गुण्डतालबनानी चकार स रथमतान् ॥ ७० ॥ निर्मनुष्यान रयान गजन् गतानश्यांच संगुगे । चकार समरे भीष्मः सर्वशस्त्रभृताम्बरः ।। ७१ ॥ तस्य ज्यातल निर्घोपं विस्फूजितमियाशनेः । निशम्य सर्वतो राजन समफरपन्त सैनिकाः ॥ ७२ ॥ भमोघा म्यपतन वाणाःपितुस्ते मनुजेश्वर : नासज्जन्त शरीरेषु मीमचापय्युताःशराः ॥ ७३ ॥ निर्मनुप्यान रयान राजन् मयुक्तात् जवनईपः । पातापमानानद्राक्षं दियमा जान् विशाम्पते॥७॥वेदिकाशिकरूपाणां सहस्राणि चतुर्दश । महारथाः समाख्याताः । ६६ । जस कि वन में वृद्धियुक्त बड़ी भग्निवायु के साथ घूमती है उसी प्रकार दिव्यभवोंको चलाते हुए भीप्यजीभी अग्निकी वर्षा करनेवाले हुये ।६७। भीष्मनी ने अर्जुन के पछि चलने वाले मोमकों को मारकर सब सेनाको भी रोका। ६८ । हे राजा भारी युद्ध दिशा और विदिशाओंको शब्दायमान करने पर सुनहरी पुंखवाले वा गुणग्रन्थी पाने वाणोंसे । ६१ । रथी घोड़े और सवारोंको गिरासे हुए भीष्मने रथके समूहोंको मुण्ड ताल यनोंके समान कर दिया। ७० । सब शस्त्र पारियों में श्रेष्ठ भीप्मने युद्ध में रथ हाथी और घोड़ों को सवारों से रहित किया । ७१। हे राजा उसके धनुप प्रत्यंचा के पत्र के समान शब्दको सत्र भोर से सुनकर सब सेना अत्यन्त कम्पायमान हुई। ७२ । इसके पीछे वह वाण बारम्बार सफल होकर गिरे और भोप्य के धनुष मे निकले हुए वाण शरीरों में लग २ कर पारही होगये । ७३ । हे राजा मैंने तीवगामी घोड़ों से युक्त और घायुके समान चलने वाले रयों को बिना सवारों के घरेडुए देला । ७४ । चन्दरी काशी क्रोश देशियों के कुलीन महारथी शरीरके मोहको त्यागने वाले महा प्रसिद्ध युद्धसें for altor, bows for fre, swords and spears for fuel, glorious Bhishni burnt down with his arrows mảny a warrior in the field of battle Bhishm went on spreading firo as the wind carries with it firo in a burning forest Bhishm killed the Somaks rho followed Arjun and checked the whole ai my. Filling all the directions of the field of battle with sounds and slaying the riders of chariots and horses with liis Arrows having hidden knots, Bhishma mude the groups of chariots like a forost of hordless palms 70. Bhishin the best of warriors made the chariots, elephants and horses ridorless in the field of battle. Hmariog the vajra lika sounds of his buatring, all the army shook rith foar. The mrows fell again and again hitting tho marks and pierced through the lolios of those they touched. I sam, king, chariots wilt as mind mal'a riderless. The noble arriors of Chanderi, Kashi and Krosh, setting asido zl] lure for life, not turning (४९१४) में [4924] Mahabharat कुळपुत्रास्तनुत्यजः ॥ ४५ ॥ अपरायत्तिनः शूरा सुघर्णविकृतश्वनाः । समामे भीष्ममा साथ सवाजिरथकुम्जराः ॥ ७६ ॥ जग्मुस्ते परलोकाय व्यादितास्यमियान्तकम् । न तत्रासीद्रण राजन् सोमकानो महारथः ॥७७॥ य संप्राप्य रणे भीष्म जीषियतेस्ममनो दधे । तांध सर्वान् रणे योधान् प्रेतराजपुरं प्रति ॥ ७८ ॥ नीतानमन्यात जमा रमा भीष्मस्यधिक्रमम् । न कश्चिदेनं समरे प्रत्युद्याति महारथः ॥७९ ॥ ते पाण्डुसुतं मार श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् । शिखण्डिनम्च समरे पाञ्चाल्यममितौजसम् ॥८॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुरायुद्धे सप्तदशाधिकशतोऽध्यायः ॥ ११७ ।। सञ्जय उघाच शिखण्डीतुरणे भीष्म मासापपुरषर्षभम् । दशभिमिशित राज घान स्तनान्तरे ॥१॥ शिखण्डिनन्तु गानेयः क्रोधीप्वेन वपुषा । सम्प्रेक्षत कटाक्षण निईहानिधमारत ।। २ ॥ स्त्रीत्यं तस्य स्मरन् राजन् सर्वलोफस्य पश्यतः । माजधान मुख न मोड़नेवाले आते शूर सुनहरी ध्वजावाले घोड़े रथ हाथियों समेत उस मृत्युके समान भीष्मको युद्ध में पाकर परलोक को सिपारे हे राजा उसयुद्ध सोमकों का ऐसा कोई महारथी नहीं हुआ 1७७। जो युद्धभूमि में भीष्म को पाकर जीवता हुमा नावे सवमनुष्यों ने भीष्मजी के पराक्रम को देखकर उन सघ शूरवीरों । यमपुर को पहुँचा हुआही माना युद्ध में । ७१ । श्वेत घोड़ेवाले श्रीकृष्णजी को सारथी रखनेवाले वार भर्जुन भौर बड़े सेजस्वी पांचालदेशी शिखण्डी के सिवाय कोई महारथी उनके सम्मुख नहीं गया ८० ।। अध्याय ११८॥ संजय बोले हे पुरुषोत्तम धृतराष्ट्र शिखराही ने युद्ध में भीष्मनी को पाकर तीक्ष्ण धारवाले दश भल्लों से छाती में घायल किया। १ । फिर तिरछी दृष्टि से भस्मकरते हुए भीष्मनीने क्रोधयुक्त नेत्रोंसे शिखण्डीको देखा ।। हेरामा उसके स्वीपनको ध्यान करते हुए भीष्मनीने सबके देखतेहुए महार नहीं किया और उस thoir faces from the field of battlo, exceedingly brave, with golden banners, horscs, chariots and elepliants, died in battle before dreadful Bhishm. None of the Somak warriors vont away alive from the field of battle after encountering Bhishm. Tho people who sat Bhishma's prostess believed that he would rend all tho warriors to the region of Yam. No varrior could oppose him excopt Shikhandi and Arjun phoge white horars were driven by Krishn."80 CHAPTER CPVIII Sinjnyn said to Dhritrashtra, Having encountered Bhishma in Lattle, Shikhandi Founded him with ten darts in the brzast. Bhisho then turned his eyes in anger towanis Shihlindi as if lio would burn frim down; but romonibel ing his womanhood ho garo liim no reply.. vith his reapons and Shikliandi dal not know it. Then Arjna said " (५९२५) भोम्मपर्व Bhishma Pary [49253 रणे भीष्मः स च तन्नावराधान् ॥ ३॥ अर्जुनस्तु महाराज शिखण्डिनमभाषत । यमि द्रषस्व परिस सहि चैन पितामहम् ॥ ४ ॥ किन्ते पियक्षया धीर नहि भीष्मं महार थम् । नान्यममुपश्यामि कश्चिाधिष्ठिरे चले ॥ ५ ॥ य शक्तः समरे भीष्म प्रति यो मिहाहधे । ऋते रपां पुरुषव्याघ्र सत्यमेतद्मवीमि ते ॥ ६ ॥ परमुक्तस्तु पार्थन शिखण्डी भरतर्षभ । शरनांमाधिधस्तूर्ण पितामहमयाफिरत् ।। ७॥ अचिन्तयित्या ताम् वाणान् पिता देवप्रसस्तव । अर्जुन समरे कुछ धारयामास सायकैः ॥ ८॥ तथंघ च घम् सयौं पाण्डवानां महारयः। अप्रेरीत सशस्तीपणेः परलोकाय मारिष ॥९॥ तथैव पाण्डया राजन् सैम्पेन महता वृताः। भीष्म सम्छादयामामुर्मेघा इस दियाफरम ॥ १० ॥ स समन्तात् परितो भारतो भरतर्षभ । निदाहरणे शरान वने पहिरिप ज्वलन् ॥११॥ तत्राद्भुतमपश्याम तय पुत्रस्य पौरुपम् । अयोधयच्चयत् पार्थ लुगोपच पितामहम् ॥ १२॥ कर्मणा तेन समरे सप पुत्रस्य धन्विनः । दु.शासनस्य तुतुषु सबै शिखण्डीने उसको नहीं जाना । ३ । इसके पीछे अर्जुनने शिखण्डी से कहा कि शीघही इन पितामह को सम्मुख चळकर मारो । ४ । हे वीर मैंने मारनेकीही इच्छासे तुझको भागे किया है कि तुम इस महारथी भीमको मारो मैं युधिष्ठिर की सेनाभर में किसी भोरको ऐसा नहीं देखनाहूं जो तेरे सिवाय इस प्रवल युद्धमें भीष्ममी के सम्मुख युद्ध करनेको समर्थ होवे हे पुरुषोत्तम मैं यह सत्यहीसत्य कहता हूं।६। फिर अर्जुनसे इसरीति से कोहुए शिखण्डीने शीघ्रही नानाप्रकारके बाणों से पितामहको दक दिया । । इम के पीछे भापके पिता देवयत भीष्मजीने उन वाणों को तुच्छ समझकर क्रोययुक्तहोके युद्धधाम में अर्जुन को शायकोसेरोका । ८ । इसी प्रकार उसमहारथी अर्जुनने सबमेनाको अपनेवाणोंसे परलोकमें भेजा १९। इसमकार बड़ीसेना समेत पाण्डयों ने भीष्मको ऐसे घेलिया जेम कि बादल मूर्यको घेरलेते हैं ।। १० । फिर चारों ओरसे घिरेहए भोप्मनो ने शूरवीराको ऐसा भस्मीभूत किया जैसे कि कोपित आग्न वनको भस्मकरदेताहै । ११ । वो हमने भापके पुत्रके पुरुषार्थ को देखा जो अर्जुन से युद्ध करके पितामह को रक्षित किया । १२ । to Shikhandi, “Hasten to face the grandfather and alay hum. I have put you before me in order to slay him. I seo none in Yudhishthir's army exceps you, rho cam withstand him in battle, and what I say is the truth." Thua addresued by Arjun, Shikhandi soon hid the grandfatlior with his arrow Then your father Devabart Blishm, disregarding those arrows, checked Arjun with his shalts. In tho samo manner, valliant Arjun sent tlio warriors to the region of Yam. The Pandavas surrounded Bhishm as clouds do the sun. 10 Then surrounded on all sides, Bhislım began to destroy tho warriors as fire in its ſury does a forest There we say the prowess of your son who fought against Ai fun and protected the grandfather. From - [4926] Mahabharat, [४९१६) लोपा महात्मनः ॥ १३ ॥ यदेक समरे पार्थान् सार्जुमान् समयोधयत् । न धेनं पाण्डया युद्ध वाग्यामासुरल्यगम् ॥१४॥ दुशासनेन समरे रथिनोबिधीरुताः । सादि मोनध मधासा हस्तिनी गहाबला । १५॥ घिनिभिनाः शरस्तीक्ष्णनिपेतुर्यमघातले शरातुरास्तधधान्ये दन्तिनो पितादिश ॥ १६ ॥ यध मिरिन्धनं प्राप्य वले होप्ताञ्चिरायणम् । तथा जज्वाल पुनम्तै पाण्डु सनां विनिर्दहन ॥ १७ ॥ ते भारतमहामात्र पाण्डवानां महारथ । जेतुं नोत्सहते कमिभनाभ्युधातुकथञ्चन ॥१८॥ ते महेन्द्रननयान्तावात् कृष्णसारये । सहितं समरे राजन् निजित्य विज. योर्जुनः ॥ १९ ॥ भीष्ममेवाभिदुदाय सर्व सैन्यस्य पश्यतः । विजितस्तषपुत्रोपि भीष्मयाहुव्यपाश्रयः ॥ २० ॥ पुन:पुनः समाश्यस्य प्रायुधरत मदोत्कट । अर्जुनस्तु मापके धनुषधारी पुर दुशासन के फर्यमे युद्ध में मर लोगों को विश्वास हुआ कि । १३ । इस अाने नेहो अर्डन से उसके सब माथी पाण्डवों समेत युद किया और प्रत्यक्ष म उनको पाण्डव लोग युद्ध से नहीं हटासके । १४ । उम युद्ध में दुशासन के हाथ से रथी विरथ हुए और बड़े धनुषधारी सवार और महावस्ती हायो । १५ । तीक्ष्णपाणो मे घायल होकर पृथ्वी पर गिरे भोर इसी प्रकार पाणों से पीडामान अन्य हाथी चारो दिशाओं में भागे । १६ । जैसे कि आग्न इन्धन को पाकर प्रकाशन वाला होकर प्रत्यक्ष कोपयुक्त होती है उसी प्रकार पाण्डवों को मेनाका जगता हुया आपका पुत्र भी ज्वालेत भाग्न के | समान होगया ।१७। भरतवशीपाण्डवोंके किसी महारथीने स्वतघोडे वाले श्रीकृष्ण | महागज को सारयो बनानेवाले महारथी इन्दके पुत्र अर्जुन के सिवाय उस बड़े शोभायमान के विजय करनेको साहस और उत्साह नहीं किया और न किसी गाते से सम्मुख जाने का विचार किया । १९ । हे राजा फिर यह विभयो भर्मुन युद्ध में उमको जीनकर सब सेना के देखते हुए भीष्मनो के सम्मुखगया और वह पराजय पाने वाला आपका पुत्र महामदो मत उन भीमकोको भुजाओं the protress of your son Dash 29an, all the people belised that lie alono was cnpablo of withetanding Arjun are other Pandaras Detslingan destroyed the chariots of tho vairiors, and the great arrhors, horsemen and powerful clephants, rounded by sharp arrowse foll down on earth Other elephants wounded by arrots fled in all directions. As fire fed by fuol burns and blazea up furiously, so di yonr son destroying the Pundar armies 17. None of the Pandar tarrior, o king crcept the vallant son of Indra, Arjun who liad Krislinn for the driver of liig shite horses, darci to conquor liim in lbattle. nor did any one opporo him. Then Arjun the co querer: Tharing conquered him in laitle rithin sight of all the rarriors, faced Blislım, and your son, de'catalin bultle tool refugo trith Bluishm.29.

(४२२७) 1taga Bluíslıng Pary [4927 रणे राजन् योधपन संन्यराजत ॥ २१॥ शिघण्टीतुरण राजन् विव्याधेर पितामहम् । शरिरशनिसंस्पर्शस्तथा सर्ववियोपमः ।। २२ ।। न च स्म ते रजं चः पितुस्नय जने घर । स्मयमानस्तु गाङ्गेयस्तान् घाणानुजगृह तदा ॥ २३ ॥ उपयात्तो हि नरोयज जलधाराः प्रतीच्छति । तथा जग्राह गाड्याशारधाराः शियण्डिन ॥२४॥ तक्षनिया महाराज सुधौरमाइये । भीष्म दहन्तं सैन्यानि पाण्डवाना महारमनाम् ॥ २५ ॥ ततोबधीचव सुतः सर्वसन्यानि मारिष । अभियत संग्रामे फारगृनं सर्वतो रणे ॥ २६ । भीमो म. समरे सर्वान् पालयिष्यनि धर्मवित् । ते मयं सुमहत्यम्या पहियान्प्रतियुध्यत ॥२७॥ देमतालेन महता भीमस्तिष्ठति पालपन् । सर्वेषां धार्तरा- प्राणां समरे शर्म धर्मच ॥ २८ ॥ त्रिदशापि ममद्युक्तानालं भीम समासितुम् । किमुपार्था महारमानं मर्पभूता महाबलाः १२९ । तस्माद्यत मायोधा. फाल्गुनं का माश्रयलेकर । २० । वारंवार साहस्यको करके फिर युद्ध करनेलगा तब वह अर्जुन युद्ध में लड़ताहुआ महा शोभायमान हुआ। २१ हे राजा फिर शिसंही ने युद्ध में वज्के समान स्पर्शबाले विषभरे सर्पके समान बाणों से पिनामह को घायल किया। २२ । उन वाणों से आपके पिनाकुछ भी पीड़ित नहीं हुए उस समय आश्चर्य करते हुए भीमनीने टन काणों को मह लिया । २३ । जैसे प्याससे दुःखी मनुष्य जलकी धाराओं को चाहताहै उसी प्रकार भीमनी ने शिखण्डीकी वाणधाराभों को सहजहीमें सहलिया । २४ । फिर क्षत्रियोंने महात्मा पांडवों की सेनाओं के भस्म करनेवाले भीमनी को युद्ध में भयंकर देखा । २५ इसके पीछे आपका पुत्र सब सेनामों से बोला कि युद्ध में सब मोर से अर्जुन के सम्मुस जाम्रो । २६ । धर्म के जानने वाले भीमनी युद्धमें तुमसर की रक्षाकरेंगे वह भयको अत्यन्त त्यागकरके पांडवोंके सम्मुख युद्धकरते हैं युद्धमें धृतराष्ट्रक सय पुत्रों के मुखम्प चित्तकी रक्षाकरते हुए भीमनी सुनहरी तालध्वजासमेत नियन, ।२८ाबड़े २ उपाय करनेवाले देवतालोगभी भीपके सम्मुख खड़े होनेको समर्थ नहीं Again taking courage he engaged in battle. Arjun fighting there was very glorious to bolold Again Shikhande rounded tho grandfather with his kitovs hard of touob lihe vajia and poisonous like Serpents. Your father was not disturbed with those arrow's and bore thom to the great amazement of all.23. as une afflicted with thirst looks expcctantly for a shower of rain, Bhılım Lore patiently the Bhorer of Sibhandi's arrows. The hshatryas then looked at the dreadful form of Bhishin the destroyer of Pandar armias. Your son then ordered his seldiers to attach Arjun on all sides, saying, "Blushm who knows his dharm well, will protect you. in lattle. He is fighting fearlessly against the Pandaras and is standing in the battle field with his golden standard of polin t-ea. pleasing the sons of [4928] Mahabharat (४९२८) प्राप्य संयुगे । महमद्य रणे यत्तो पोधयिष्यामि पाण्इयर ॥ ३० ॥ सहितः सर्वतो पत्तैमद्भिर्यसुधाधिपः । तच्छुत्यातु पयो राजस्तवैः पुत्रस्पम्विनः ॥ ३१ ॥ सवे पोधा सुसंरब्धा वलवन्तो महावठाते विवहाँ कविताच दासेरकगणापह ॥ ३२ ॥ अभिपेतुर्निपादाध सौवीराश्च महारणे । पाइलिफा ददाश्चैष प्रती. व्योदीमालयाः ॥ ३३ ॥ अमिगहाः शूरसेनाः शिषयोय पसातयः । शाख्वाः सफालिगाश्च अम्घष्ठा केफयै सह ॥३४॥ अभिपेतू रणे पार्य पतला इय पायकम् । स ताम् सर्वान् शतानीकान् महाराज महारयान् ॥३५॥ विष्याम्यस्त्राणि सचिस्य प्रसन्धाय धमन्जयः । स तैरनैर्महायेगैर्ददाहाशु महायलाः ॥ ३६ ॥ शरमता पैमिनमुः पतगानिय पावकः । तस्य याणसहस्राणि सुजतो दृढन्धिनः ॥ ३७॥ दीप्यमानमिवाकाशे गाण्डीय समश्यत । ते शरार्ता महाराज घिमहीर्णमहारा: हैं तो मरण धर्मवाले पांडव उस महात्मा के सम्मुख होनेको कैसे समर्थ होसक्ते हैं । २९ । इस निमित्त मेरे शूरवीर लोग जाकर युद्ध में अर्जुन को पाकर संग्राम करो अव युद्ध में चैतन्यहोकर मैं तुमसय राजामों समेत पांडव युधिष्ठिरसे लडूंगा हे रामा मापके धनुषधारी पुत्रके इस पचनको मुनकर । ३१। सब शूरवीर लोग अत्यन्त क्रोधयुक्त भहावली विदेह कलिंग दासैरक गण निपाद सौवीर पाल्हीक दरदमौर पश्चिमोत्तरीय राना लोग मालव १३ । प्रमिपाइ शूरसेन शिवय वशातय शालशक विगत केकयों समेत अम्बष्ट । ३४ । यहसन उस महायुद्ध में भर्जुनके सम्मुख दौड़े हे रामा जैसे कि पतंग भौर शलभा अग्नि में गिरते हैं इसी प्रकार युद्धमें उप्त अद्रि नीय अर्जुन की ओरको दौड़े। ३५ । फिर उसमहायली अर्जुनने दिव्य भस्राको विचार पूर्वक प्रयोग करके उन बड़े उत्तम दिव्य प्रमों और वाणों के उष्ण तेजसे शीवही इन सवसेना महारपियों को ऐसे भस्म किया जैसे कि अग्नि पतंगोंको भस्म करदेता है । ३७ । उसमहावली अर्जुनका वह गांडवि धनुप हजारों Dhritrashtra Eron the great gods dare not withstand him; hort can tho Pandaras who are only portals oppose him. All my Warriors should therefore oppose Arjun and I with all my princes shall fight against Yudhishthir." Hearing those words of your son, thio arclier, (31) all the rarriors in great anger-valliant Videh Keling the Dasainks, the Nishadas, tho Sourims, the Vahliks, tho Daradns, the princes of tho North-West, tho Valvas, thc Shursenas, the Shivapas, tho Vatashayas, the Shalvashaks, the Trigareas, tho Kaikagas and tho Amvashtag-rusled upon Arjun. They rm against Arjuna inrects fall into the burning fire. 35, Valliant Arjun tien carefully discharged his divino capons and with them as well as with the fire of liis arrows, lic soon destroyed those warriors as firo doce the insecta Tuo Gnndir bor of mighty Arjun, discharging myriads of arrons, (४९२९) भीष्मपर्व Bhishma Parr [4929] ॥ ३८ ॥ नापयर्तन्त राजानः सहिता वानरध्वजम् । सध्वजा रथिनः पेतुईया रोहा हयैः सह ॥ ३९ ॥ सगजाश्च गजारोहाः किरीटिशरताडिताः । ततोर्डन मुजोत्स्वृत्तासीदसुन्धरा ॥ ४० ॥ विद्यद्भिरच पाधा घलराशा समन्ततः । अथ पार्थो महाराज द्रावयित्या वरूथिनीम ॥ ४१ ॥ दुःशासनाय सु वहून घेप यामास सांयकान् । तेतु भित्वा तव सुतं दुःशासनमयोमुखाः ॥ ४२ ॥ धरणी विविशुः सर्वे परमीक मिय पन्नगाः । हयांश्चास्य ततो जघने सारथिञ्च न्यपात पत् ॥४३॥ विविंशतिञ्च विंशत्या विरयं फतवान् प्रमुः । याजधान भृशञ्चैव 'पञ्चभिनतपर्वभिः ॥ ४४ ॥ कृपं विकर्ण शल्यञ्च विध्या यहुभिरायसैः। चकार विर यांश्चय कौन्तेय ' घेतयाहनः ॥ ४५ ॥ एवन्ते विरथाः सर्वे कपः शल्यच मारिप । दुशासनो यिकर्णध तथैवच विविंशतिः॥४६ ॥ सम्पाद्रवन्त समरे निर्मिताः सत्य वाणों को छोड़ताहुआ भाकाश में प्रकाशमान दृष्टपड़ा वह वाणोंसे पीडामान- रांगालोग जिनकी बड़ी २ ध्वजा टूटगईथीं एक साथ उस वानरध्वज अर्जुन के सम्मुख वर्तमान नहीं रहे ।३९। अर्जुनके वाणों से घायल रथी लोग ध्वनाओं समेत और घोड़ों समेत अवाह वा हाथियों समेत हाथियोंके सवार पृथ्वीपर गिरे। ४ । इमो पाछे अर्जुन के हाथोंके छुटेहुए वाणों से और चारों ओरसे रानाओंकी भागी हुई सेनामों से पृथ्वी व्याप्त होगई । ४१ । फिर अर्जुन ने सेनाको भगाकर दुश्शासन के ऊपर बहुतमे बाणों की वर्षा की ॥४२॥ वह लोहके सयवाण आपके पुत्र दुश्शासन को । ४३ । बैंकर पृथ्वी में ऐसे प्रवेश करगये जैसे कि सर्पवामी में प्रवेश करता है तदनन्तर प्रभ अर्जुन ने उस के घोड़ों को मारकर सारथी को गिराया और बांसवाण से विशितिको रथो विश्य करदिया । ४४ । और झीगांउवाले पॉन बाणों से अत्यन्त घायल भी किया इसी रीति से उसवत घोड़ेवाले अर्जुनने कृपाचार्य कर्ण और शल्यको बहुतसे लोहे के वाणोंसे वेषकर विस्थकर दिया हे श्रेष्ठ धृतराष्ट्र इस प्रकार यह सवरूपाचार्य और शल्य विरथ हुए । ४६ । looko glorious in tho air. Tlio princes afflicted by arrows, with lrohen banners, could no longer withstand his fury. Younded by his arrows, the bannerd chariotcors, horsomen with their horses and riders of olephants foll down on earth. 40. Then the ground was fillal with the arrows of Arjun and tho dead bodies of the warriors blain. Having put tho a my to flight, Arjun discharged many arrows at Dashagan. Those iron arrows having pierced through Dushasan's boly entered the ground as a sorpent enters a mole hill. lle tlien killed his horses and driver and with twenty arrotys made Vivinslati dostitute of chariot. With five arrows having bent liçads ho wounded him soverely. Thus Arjun tho possessor of white stoods, having pierced Kripacharya, Karan and Shalya with many -- [4930] Maliabharat [४९३०) साधिना । पूर्वाहणे भरतश्रेष्ठ पराजित्य महारथान् ॥४७॥ प्रसञ्चाल रणे पार्यो विधम इध पावकः । तथैव शरवर्षेण भास्करो रस्मिघानिय ॥४८॥ अन्यानगि महाराज साप यामास पार्थिवान् । परांमुपीकृत्य तथा शरचमहारथान् ॥४९॥ प्रायसयत समामे शोणितोदां महानदीम् । सभ्येन कुरसैन्यानां पाण्डवानाञ्च भारत ॥ ५० ॥ गजाघर थसंघाम यहुधा रथिमिहताः । रथाच निहता नागैर्हयाधैव पदातिभिः ॥ ५१ ॥ मात पछिचमानानि शरीराणि शिरासि च । निपेई सर्यास गजाधरपयोधिनाम ॥ ५२ ॥ छनमायोधनं राजन् कुण्डलाङ्गदधारिभिः । पतितः पात्यमाने राजपुत्रमहा रथः ॥५३॥ त्यनेमिनिफत्तैश्च गर्थयावपोधितः । पावाताधाप्यधावत सारवावह ययोधिनः ॥ ५४ ॥ गजाश्व रथयोधाच परिपेतुःसमन्ततः। विकीर्णाधरया भुमो भग्न चक्रयुगध्यमाः ॥ ५५ ॥ तद्गजाश्वरयाधाना रुधिरेण समुक्षितम् । समायोधर्म और युद्ध में अर्जुनसे पराजित दुश्शासन विकर्ण और विविंशति मुखको मोड़गये 1 ४७ । हेभरतर्षभ मध्याह्नकाल में अर्जुन महारथियों को विजय करके युद्ध में निधूम अग्निके समान प्रकाशमान हुआ। ४८ ! इसीप्रकार वाणों की वर्षासे अन्य | राजामों को वा महारथियों के मुखों को फिरवाके युद्ध में रुधिर रूप जल रखने वाली घड़ी नदी को जारी किया। ५० । फिर पांडव और कौरवोंकी सेनाओं में बहुपाहाथी घोड़े और रथोंके समूह राधियों के हाथ से मारे गये । ५१ । हाथियों | से रथ और पैदलोंसे घोड़ेमारे गये और वीचमेंसे कटेहुए हाथी घोड़े रथ और वारसवारों के शरीर दिशाओं में गिरे हे राजाकुण्डल वाजवन्द धारण करनेवालों से युद्धभूमि आच्छादित होगई ।५३। और गिरे वा गिरतेहुए -महारथी राजकुमारों सेवा रथोंकी मेमियों से कटे और मरेहुए हाथियों से भी यह युद्धभूमि ढकगई १५४ पैदल भी दौड़े और प्रश्न सबार घोड़ों समेत दोहे वा हाथी घोड़े और रथों के शूरवीर चारों ओर से गिरे । ५५ । और वह रथ जिनके पहिये जुए ध्वजा arrows of iron, caused them to leave thoir chariots. Thus Kripacharya Shalya and others, O Dhrit: ashtra, vəre forced to leave their chariots. Defeated in battle by Arjun, Dashasan, Vikarn und Vivinshati turned their faces. Having conquord those warriors by mid dny, Arjun shone in the field of battle like smokless fire, causing the other kings and warriors to turn back with the force of his arrots, ho caused large river of blood to flow, 50. Then in the armies of the Pandavas and Kauravas many olephants, horses and chariots pero destroyed by the charioteers. Chariots were destroyel by elephants and Lorås by foot soldiers. The elephants, ho sog and chariots with the dead bodies of warriors fell down in all directions and tho ground was spread over with the bodies of those who wore eat-z ings and Arulets. The foot soldiers and war horses with riders were seen in all directions.55. The chariots with their . ' and bal wheols - (४९.३१) भीष्मप Bhishma Pary [4981] से रकान मिय शारदम् ॥ ५६ ॥ ध्यानः पाकाच गृधाश्च वृफा गोमायुमिः सह । प्रणदुर्भश्यमासाद्य पिताश्च मृगद्विजा. ॥ ५७ ॥ घयुर्ययिधावप दिए सवासु मारुताः । पश्यमानपु रक्षाम् भूनेषु च गदवस च ॥ ५० ॥ फाश्चमानि च दामानि एताकाच महाधनाः ।धूयमाना व्यदृश्यन्त सहसा मारतरिता.॥ ५९॥ वेतच्चनसहस्राणि सध्वजाच महारथाः। यिफीणाः समदृश्यन्त शतशोथसहमशः ।। ६० ।। सपताकाथमातंगा दिशोजग्मुः शयतुगः । क्षत्रियाच मनुष्येष्ट्रगदाति घनु धराः ॥ ६ ॥ समंतता श्यंते पतिता धरणीतले । ततो भीमो महाराज दिग्यमन मुदीरयन् ॥ ६२ ॥ अभ्यधावत कौन्तेय मिषतां सर्वघन्यिनाम् । तंशिपण्डीरणे पात माद्रमत देशितः॥ ६३ ॥ ततः समाहरदीष्मस्तदनं पायकोपमम् । त्वरितः पांड टूट गई थी पृष्लीपर पड़े हुए हाथी घोड़े और स्य समूहों के रुधिर मे छिड़कीहुई व की वह युद्धभूमि ऐसी शोभायमान हुई जैसे कि शरदऋतुका लाल बादल होताहै फिर कुत्ते कौवे गिद्ध भेड़िये शृगाल और विपरीत रूपके पशु पक्षी अपने पक्षको पाकर शब्द करने लगे और सब दिशाओं में अनेक प्रकार की वायु चली । ५८ । राक्षमों के देखने और जीवों के शब्द करनेपर मुनहरी रस्सी व माला य बहमूल्य की पताका । ५९ । अकस्मात् इवामे चलायमान होकर दृष्टि गोचर हुई हमारों शेत छत्र व बड़े २ स्य बनामों समेत टूटे हुए दिखाईपड़े और |बाणों से पायामान हायी पताकाओं समेत चारों दिशाओं को चलेगये । ६१ । हे महाराज गदाशक्ति और धनुप के धारण करनेवाले चत्रीलोग चारों ओर से पृथीपर पड़ेहुए दृष्ट आये । १२ । इस के पाछे भीमनी ने दिव्य प्रस्त्रों को मकट किया और सब धनुपधारियों के देखते हुए अर्जुन के सम्मुख दोहे । ६३ । सर शास्त्रों से भसंकत शिखण्डी उन भाप्मनी के सम्मुस पहुँचा इसको देखतेही भीमजीने उस अग्निके समान प्रकट किये हुए अखको बैंचलिपा । ६४। हे राना broken down fell on earth, and the ground covered and besprinkled with the blool of elephants, lorses and charioteors looked glorious like the red cloud of Winter. Dogs, crows, vultures jackals, wolves and other strange looking birds and beasts bowled at the prospect of their food and the winds blew from all quarters. At the sight of rakshases and the rounds of anima's, golden ropes, chaplets and bannors were seen fluttering with the sudden gust of wind. Thousands of white umbrellas and huge chariots with banners were to be scen lying on the ground and the elephants bearing banners, rrounded with arrots, fled in all directions, G. The wielders of prases, spears and boys were soen fallen on the ground Then Bhishm druw out his dirino weapons, and in the presence of all the warriors rashed upon Arjan; but Sailhandi, arded with weapons, maina face to face with him and at the sight of lim lic sitledres his weapon . [4932] Mahabharat (४९३२) घोराजामध्यम इतवाहन ॥ ६४ ॥ निजध्ने तावफ सैन्य मोहयित्वा पितामहम्॥६५५. इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीमवधपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टादशाधिकशतोऽध्यायः ।। ११८॥ समय उवाच । सम पूढेप्यनीकेषु भूयिष्ठेप्वनिवर्तिन । ब्रह्मलोकपरा सर्वे सम पद्यन्त भारत ॥१॥ नहानीकमनीफेन समसजत सकुले। रथान रथिभिः सार्ध पादा तान पदातिमि ॥२॥ अश्वानाश्वैरयुध्यन्त गजान गजयोधिभिः । सन्मत्त यन्महाराज युध्यन्ते तत्र भारत ॥ ३ ॥ महान् व्यतिकरो रौद्र सेनयो समपद्यत । नरनागगणेष्वेष विकोण च सर्वश ॥ ४ ॥ क्षये तस्मिन्महारौद्रे निर्यिशषमजायत । तत. शल्य रूप धैव चित्रसेनरस्त्र भारत ॥ ५॥ दु शासनो विकर्णश्च स्थानास्थायभास्वरान् । पाण्ड बानो रणे पूरा ध्वजिनी समकम्पयन् ॥६॥ सावध्यमानासमरे पाण्डुसेना महात्ममि । धेत घोड़े रखनेवाले ममने पाण्डव अर्जुन ने शीघ्रही पितामह को मोहित करके आपकी सेनाको मारा ६५ ॥ अध्याय ॥११९॥ संजय बोले कि हे भरतवंशी इस रीति से उन बहुनसो सेनामों के तैयारहोंने पर युद्धमें मुख न मोड़नेवाले सब शूरवीर ब्रह्मलोक को उत्तम माननेवाले वर्तमान हुए, इस तुमुल युद्ध में सेनासे सेना नही भिड़ी किन्तु इस रीति से लड़े कि स्थी । रथियों से पदाती पदातियो से घोड़े घोड़ों से हाथी हाथियों के सवारों से युद्ध करनेवाले हुए हे राजा उन्मत्त के समान युद्ध करने वाली दोनों सेनाओंको 'वड़ा भयकारी दुःख वर्तमान हुआ अर्थात् सवप्रकार से मनुष्य और हाथियोंके मरनेपर उस भयकारी नाशका प्रलयमें अनीति जारीहुई इसके पोछ शल्य कृपाचार्य चित्रसेन दुश्शासन विकर्ण इन सब शूरों ने प्रकाशित रथों पर सवार होकर पांडवों की सेनाको बहुतकम्पायमान किया हे राजा युद्ध में महात्माआ के हायसे घायल glorious like firo Then the possessor of white horses, Arjun the unddle one of the Pandaras, soon made the grandfather in-en-ible tra destroy your dates” CHAPTER CXIX Srijaya continued:: "Thus, O descendant of Bharat, when numerous armies were roady, the mirrors unwilling to turn their faces from the field of battle and desirous of departure to the region Brbin, stood there. In that dreadful bottlo tla tuto a mios did not orat together, the chariotcors fouglit agninst charioteers, borsemen mot lioxeomen, o'opliunt riders fought against the riders of elephants Iho tuo armos figliting furiously cuno to greut gncf After the slau litor of men and clepliants in that dreadful distraction liho Pralaya, there was much harm done Then the great irarriors of (१९३३) भीमपचे Bhishma Pary [19333 भ्राम्यते यहुधा राजन् मारतेनेय नोजले ॥ ७ ॥ यथा हि शशिरः फाली गवां ममाणि छन्तति । तथा पाण्डुसुतानां वै भीष्मो मर्माणि कन्तति ॥ ८॥ तथैय तय सैन्यस्य पान च महात्मना । नयंमत्रमतीकाताः पातिता पदुधा गजाः ॥ ९ ॥ मृधमानाश्च दृश्यन्ते पार्थेन नरयूयपाः। इषुभिस्ताघ्यमानारच नारायैश्य सहसूशः ॥१०॥ पेतुरात्तस्परंपार 'कृत्वा तत्र महागजाः । आनद्धामरगैः फायनिहतानां महात्मनाम् ॥११॥ छनमायोधन रेजे शिरांमिश्च सकुण्डलः । तस्मिन्नेय महाराज महावीरवरक्षये ॥ १२ ॥ भीणेच युधि धिमान्ते पाण्डपे व धनञ्जये । ते पगफ्रान्तमालोक्य राजन् युधि पितामहम ॥ १३ ॥ अपवर्तन्त ते पुत्राः सर्वेसैन्यपुरस्कृताः । इच्छन्तो निधनं युद्ध स्वर्ग हरयाप राणम् ॥ १४ ॥ पाण्डवानभ्ययन्त तस्मिन् वीरवाक्षये । पाण्डवापि महाराज स्मरन्तो पाण्डवोंको सेना अनेक प्रकार से ऐमे घुमी जैसे कि जलमें वायु के कारण नौका घूमती है, जैसे कि अत्यंत जाड़ा गौओंको सनालाई उसापकार भीमनी पाण्डवों के मों को काटतेहैं 1८। महात्मा अर्जुन के हाथ से तुम्हारी सेनाके बहुत से हाथी जो कि नवीन पादलके समान थे युद्ध में गिराये गये ।९। अर्जुनके हाथ से सेनाकैप्रधान लोग मर्दन किये हुए दृष्टआते हैं और वहां पर नाराच नाम वाणों से घायल हुए हजारों । १०. बड़े २ हाथी दुख से महाभयानक शब्दोंको करके गिरेपड़े मृतक हुए महात्माओं के भूपणों से अलकृत शरीरों से । ११ । और कुप्रस धारी शिरों से ढकोईई युद्धभूमि वही शोभायमान हुई हे राजा उत्तम वीरॉके बड़े नाश होने पर युद्ध में भीष्म और पाण्डव अर्जुन की परस्पर में चढ़ाइयां होनेपर वह आपके सब पुत्र जिनके कि आगे सन। चलतीथी युद्ध में पितामहको पराक्रम करने वाला देखकर स्वर्गकोही श्रेष्ठ स्थान मानकर युद्ध में मरण को चाहते हुए ।-१४ । उस उत्तम वीरोंके नाश में पाण्डवों के सम्मुख हुए है Shalya, Kripacharya, Chitrnsen, Duslhasna and Vikari, mounted on glorious cliariots, destroyed the armies of the Pandavas Wounded in battle by those great men, the armies of the Pandava, torped round like a boat in the midst of stormy waters. As ajater cuts the cattle to the quick so did Bhishm with the Pandav armirs. Many clephants of your army, like new clouds, were destroyed in battle by Arjun. The principal warriors of your army are to be seen destroyed by Arjun, and younded by long shafted arross, thousands of eleplants fell down with loud shriels. The field of battle looked grand by the dead bodies of great men docked with ornamients and the heads deched with earrings. At the destruction of the great Tarriors in the war between Bhishm and Arjan the Pandar, your sons with their armies seoing the great prowers of the grandfatlier, desired to die in battle for the sake of paradise, 14. Thiey faced the Pandavas during that destruction of the warriors. Engaged in battle for tbo [ 4934] Maljabbarat (४९३४) विविधान् यहून ॥ १५ ॥ क्लेशान् कृतान् सपुत्रेण स्वया पूर्व नराधिप । भयं त्यारवा रणे शूरा ब्रह्मलोफाय तत्पराः ।।१६।। तावकांस्तव पुत्रांश्च योधयन्ति प्रहटवत् । सेनापतिस्तु समरे प्राह सेनां महारथः ॥ १७ ॥ अभिद्रवत गाङ्गेयं सोमका स्यः सह । सेनापतिवचः शुत्वा सोमकाः सुम्जयाश्चते ॥ १८ ॥ अभ्यद्र यस्त गाङ्गेयं शरवृष्टयासमाहता. । वध्यमानस्ततो गजन् पिता शान्तनषस्तष । अमवशमापनो योधयागस सृजयान् । तस्य कीर्तिमतस्तात पुरा रामेण धीमता ॥ २० ॥ सम्प्रदत्ताप्रशिक्षावै परानीकविनाशिनी। सतां शिक्षाम धिष्ठाय कुर्वन् परयलक्षयम् ॥ २३ ॥ अन्यहनि पार्यानां वृद्धः कुरुपितामहः । भीमो दशसहस्राणि जघान परवीरहा ॥ २२ ॥ तस्मिस्तु दशमे प्राप्ते दिवसे मरतर्षभ । भीमे केन मत्येयपाञ्चाले पुच संयुगे ॥ २३॥ गजाश्च ममितं हत्वा हताःसत महारथाः । महाराज ब्रह्मलोक के लिये युद्धमें महत्त शूर वीर पाण्डव पूर्व समय में पुत्र समेत आप के दिये हुए नाना प्रकार के कष्टों को स्मरण करते युद्ध में भयको त्याग कर । १६ । अत्यन्त प्रमाके समान आपके पुत्र और शूरवीरों से लड़ने हैं फिर महारथी मेनापाते ने अपनी सेनासे कहा कि सब मृजियों समेत सोमक लोग शोघ भीषके सम्मुख चलो वह सोमक और मृजयनाम तत्री सेना पति के वचनको सुनकर । १८ शों की वर्षामे घायल हुए भीमनी के सम्मुख गये हे राजा इसके पीछे भापके पिता भीमजी महा घायल और क्रोध के पशीभूत होकर उन मृजियों से युद्ध करनेलगे हे तान पूर्वसमय में बुद्धिमान | परसराममी ने उस को अच्छे प्रकार से शिक्षाकरी जोकि शघुकी सेनाके नाश करनेवाले भौर कौरवोंके वृद्ध पितामह भीष्मने उम शिक्षाको काममें लाकर शत्रु मोंकी सेनाका नाशकरते हुए प्रतिदिन पाण्डवों की दशहनार सेनाको माग । २. । हे भरतर्षभ उस दश दिनके वर्तमान होनेपर अकेले भीमने युद्धमत्स्य पार पांचाल देशी सेना ।२३। दश हजार हाथियोंका यूध मारकर सात महारयी sale of paradise, the brave Pandavas remembered the former wrongs done to them by younelf and your song and setting aside all fear in Lattle, with chicorſul dinds face y'ur sons and warriors. Thon thio brave commander ordered the armies of Srinjaya and Symak marriors to hasten against Bhislım. At the commands of their chief the Srinjagas and tho Somaks faced Bhishm who pas much moundal Then your father much wounded and enraged, fought against the Siinjayas, Bhishm the old grundinthor of the Kauravas used to his advantago the knowledge of arins whicla ho lind formerly anquind of Parasliuram and killed tan thousaDd warriors of the Pandaras ench day.20. On that tenth day Bhishm alone killed ten thousand clepliants of Jlateya and Panchal with seven warriors of (४९३५) भीष्मपर्व Bhishme Pary [49351 इन्वा पञ्चसहमाणि रथानां प्रपितामहः ॥ २४ ॥ नराणाञ्च महायुद्धे सहसाणि चतु दंश । दन्तिनाञ्च सहस्राणि हयानामयुतं पुनः ॥ २५ ॥ शिक्षाबलेन निहतं पित्रातय विशाम्पते । ततः सर्व महीपानां क्षपयित्या यसयिनीम् ॥ २६॥ विराटस्य मियोम्राता शनानीको निपातित. शितानीकञ्च समरे हत्वा भीष्मः प्रतापवान् ॥ २७ ॥ सहसाणि महाराज रानां मल्लरातयत् । उद्विग्नाः समरे योधा विक्रोशति धनञ्जयम् ॥२८॥ येच केचन पार्थानाममियाता धनन्जयम् । राजानो भीममामाय गतास्ते यमसादनम् ॥२९॥ एवं दशदिशो भीष्मः शरजालः समन्ततः । अतीत्यसेनापार्थनामवतस्ये चम्मुखे ॥ ३० ॥ स कृत्वा सुमहत् फर्म तस्मिन् वै दशमेहनि । सेनयोरन्तरे तिष्ठन् प्रगृहीतशरासनः ॥३॥ नचैनं पार्थिवाः केचिका राजन् निरीक्षितुम् । मध्यं प्राप्त यथा धीमे तपन्तं भास्करदिवि ॥३२॥ यया दैत्यचक्रस्तापया मास संयुगे। मारे फिर पांच हजार रधियोंको मारकर प्रबल युद्धमें मनुष्यों के बौदह हजार समूहको मारके हाधियोंके बहुत हजार और घोड़ों के दश हजार यूथ पराक्रम के द्वारा आपके पिता के हाथ से मारे गये इसके पछि सब राजाओं की सेना को इधर उधर करके । २६ । विराटके प्यारे भाई शतानीकको रपने गिराया हे रामा प्रतापवान् भीष्मने शतानीकको मारकर । २७ । हजारों राजानों को मल्लोंमे मारटाला और जो कोई राजा पाण्डवों के चा अर्जुन के आगे पीछे चारों ओर को चलनेवाले थे। २८ । वह रानालोगभी भीनको पाकर यमलोकको सिधारे भीष्मजीने इम रीते से वाणों के जालों से चारों ओर की दशों दिशाओं को ढक दिया । २१ । और आप पाण्डवों की सेनाको उल्लंघन करके सेना मुखपर नियत हुआ वह उस दशवें दिन में बड़े कर्मको कर के।।धनुषको हाथमें पकड़नेवाला दोनों सेनाओं के मध्यमें निपतहुआ कोई रानालोग युद्धमें उसके देखनेको ऐमे समर्थनहीं हुए । ३१. जिसे कि ग्रीष्म ऋतु में माकाश स्थल संतप्त करने मूर्य को नहीं देखसक्ता और जैसे कि इन्दने युद्ध में दैत्योंकी सेनाको तपाया । ३२ । इसी प्रकार भीष्म redov, kve thousands of charioteer, and fourteen ibopsand men. He destroyed many thousands of cl-phants and ten thousands of liorkes hy his great prowess. Then having dispersed the army of kings he felled Shatanik thc dear brother of king Virat. Having slain Suatanik, valliant Bhishm destroyed thousands of warriors with his darts and whatoper warriors of the Pandavas followed Arjun Nero sent by Bhishın to the region of Yam. With the network of his atros le filled all the directions and having crossed the army of the Pandavas ho stood at tbu entrance. He did prodigies of wonder on that teatu day.30. With the bow in his hand he stood in the midst of the two arcmios and none of the Farriors could gaze at him like the sun standing high in heaven in Summor. He destroyed the Pandav armies as Indra did the armies of the dataras Devaki's (49361 Mahal harat (४९३६) तथा भीष्म पाण्डवेयास्तापयामास भारत । तथा चैन पराक्रान्तगालोक्य मधुसूदनः। उयाच देवकीपुत्र प्रीयमाणो धनञ्जयम् ॥ ३४ ॥ एप शान्तनवा भीष्म. सेनयों रन्तेस्थितः । सनिहत्य बलादेन विजयस्ते भाविष्यति ॥ ३५ ॥ बलात् संस्तम्भयस्यैनं यत्रैषा भियतेचमः । न हि भी मशरानन्यः सोमुत्सहते विभो ॥ ३६॥ ततस्तस्मिन् क्षणे राजधोदितो धानरध्वजः। सध्वज सरय सायं भीष्ममन्तर्दधे शरैः ॥ ३०॥ सचापि कुरुमुख्याना मृपम. पाण्डवेरितान् । शरवातैः शरवातान् यहुधा विदु धावतान् ॥ ३८ ॥ ततः पन्चालराजश्व धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् । पाण्डवो भी सनश्च धुट्युम्नश्च पार्षत. ॥३९॥ यमौ च चेकितानश्च केकया. पञ्च चैयह । सात्यकिरच महापाहु. सौमद्रोयघटोत्कचः ॥ ४० ॥ द्रौपदेयाः शिखण्डी च कुन्तिभोजश्च घीय॑घान् । मुशर्मा च विराटश्च पाण्डवेया महायलाः ॥ ४१॥ एते चान्ये च बहवः जी ने पाण्डवों के शूरवीरों को भी संतप्त किया मधुदैत्य के मारनेवाले देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण नी इस प्रकार पराक्रन करनेवाले भीष्मको देखकर अपने मित्र अर्जुन से बोले कि यह शांतनुका पुत्र भीष्म दोनों सेनाओं में नियत है । ३४ बड़े क्लसे इसको मारकर तेरी विजय होगी तू बलसे इसको वहां नियत कर जहां यह रोना घायल होती है । ३५॥ हे समर्थ भीमफे वाण महने को कोई साहस नहीं करता है इसके अनन्तर उस क्षण में प्रेरित वानरध्वज अर्जुन ने । ३६ । वाणों से भीष्मको ध्वना रय और घोड़ों समेत गुप्त करदिया फिर उस मतापी भीमनेभी पांडवों के चलाये हुए वाण समूहोंको अपने वाणों से अनेक प्रकार फरके छिन्न भिन्न करदिया । ३८ । इसके पीछे राजा द्रुपद और पराक्रमी धृत. किंतु पांडव भीममेन धृष्टद्युम्न नकुल सहदेव चेकितान पांचोभाई केकय । ३१ । | महाराहु सात्यकी अभिमन्यु घोचक द्रौपदी के पांचोएत्र शिसएडी पराक्रमी राना कुन्तभोज । ४० । मुशर्मा राना विराट् यह सब पहुतसे पांडवों के शूरवीर भीष्मनीके शायकोंसे पड़ामानहुए । ४१ । अर्जुनके हाथ से पीड़ित शूरवीर शोक son Shree Krislin tlic destroyer of Madlia, Eceing tho protress of Blislın, said to lis friend Arjun: "Bhishm the son of Shantnu is standing but noen the two armies 34. Thy conquest lies in Lilling him. Forco lim with the strength of your arms to moyo from the place where the armies are Leing rounded. They are unable to withstand his arrows." Thus ndvised, Arjun of Ruonkey's standard hurd rith his errors the banner, chariot md horscs of Bhisha; but the latter destroyed with his arrows the network of the Pandava's nrrors. Then Prince Drupad, valliant Bhimsen, Dhrishtadyaran, Vakul, Sihnder, Chekitrin. the five Kaikaya brothers, Shikhandi, valliant king Kustiblioj. 40. marriors of the Pandavas vero nounded loy his arrows. Tho warriors Susharma, king Virat and other wounded by his arraw's sero plunged in tho oscan of grief. Thics - (४९३७) भीष्मपर्व Bhishma Pary [ 4907 ] पीडिता भीष्मसायकैः । सममृताः फाल्गुनेन निमग्ना. शोकसागरे ॥ ४२ ॥ ततः- शिस्त्रण्डी घेगेन प्रगृह्य परमायुधम् । भीष्ममेयामिदुद्राय रखपमाणः किरीटिना ॥४३॥ ततास्यानुचरान् हरवा सर्यान् रण पिमागवित् । भीममेषामिदुद्राय वीमतसुरपरा जितः ॥४४॥ सारयफिश्चेकितानश्च धुएघुम्नश्च पार्पतः। घिरायो दुपदश्चैव माद्री पुत्री च पाण्डवी ॥ ४५ ॥ वुद्युभीष्ममेवाजी रक्षिता एहयन्यना । अभिमन्युश्चसमरें द्रौपचाः पञ्च चात्मजाः ॥ ४६॥ दुयुः समरे भीष्मं समुद्यतमहायुधाः । ते सर्वे हद धन्वानः संयुगेप्चपलायिनः ॥ ४७ ॥ बहुधा भीममानछुर्गिणैःक्षतमार्गणेः । विध्य नान् वाणगणान् ये मुक्ताः पार्थिवोचमः ॥ ४८ ॥ पाण्डवानामदीनात्मा व्यगाहतपर- | मिमीम | चके शरविघातच क्रीडनिय पितामहः॥ ४९ ।। नाभिसन्धचपाञ्चाल्ये स्मयमानो मुंहुर्मुहुः । स्त्रीत्यं तस्यानुसंस्मृत्य भीमो थाणान् शिखण्डिने ॥ ५० ॥ ममद्रमें हुयगये इसके पीछे बड़ी तीव्रतासे शिखण्डी उत्तम पनुपको लेकर।४।अर्जुन | से रक्षाकियामा भीमकेसम्मुखचलायुद्धफे प्रकारोंकाशाता अजेयमर्जन भीमकेसव साथियोंकोमारकर उनके सम्मुखचला सात्यकी चेकितान धृष्टद्युम्न.४४ विराट् द्रुपद - मादीके दोनों पुत्र यहसब दृढ़ धनुपयुक्त अर्जुनसे रक्षित होकर युद्धभूमि में भीमके सम्मुख गये । ४५ । और अभिमन्यु वा द्रौपदीके पांचोपुत्र यह भी बड़े शस्त्रोंके धारण करनेवाले युद्ध में भीमकी ओर चले। ४६ । और दृढ़धनुपधारी युद्ध में | मुख न मोड़नेवाले वाणोसे घायत्त उन सपने भी पितामह भीष्मको वाणोंकी बड़ी वर्षसे आच्छादित किया । ४७ । फिर प्रसन्नचित्त भीष्मने उन वाण समूहों को जिनको कि उत्तम राजाओं ने छोड़ा या काटकर पांडवोंकी सेनाको ममाया ॥४८॥ क्रीड़ा करतेहुए पितामहने वाणों को निष्फलकर पारम्बार आश्चर्य युक्त होकर उसके स्त्रीपने को स्मरणकर के वाणोंको पांचालदेशी शिखण्डी पर नहीं चलाया फिर उस महारथीने द्रुपदकी सेनामें सात रथियोंको मारा । ५० । इसके अनन्तर Shikhandi tshing up his good bowy, protected by Arjun, faced Bhishm, and Arjun, shilful in all the ways of war, killed all the followers of Bhishm and encountered him. Satyaki, Cuekitan, Dhrishtadyumn, Virat, Drupad, the two sons of Madri and other great archers, protected by Arjun, fuced Bhishm in battle 45. Abhimanyu and the firo sons of Draupadi, armed with powerful weapons, rushed to. wards him Those wieldors of hard bovs, firm in the field of battle, though wounded by artojys covered the grandfather with the shower Bhishim yith a cheorful mind cut down the arrows discharged by those princo; and wounded the Pandav warriors. The grandfathor, as if in play, cutting again and again those arrows in a wonderful manner and remembering the wom hood of Shikhandi of Parchal, did not discherge his arrows at him. Then the brave warrior struck dowa seven charioters of Drapad's army. 50 • of their arrows.

के + [4988] Mahabharat [४९३८) जपान इपवानीके रयान्सप्त महारथः । ततः किलफिलाशब्दः क्षणेन सममूत्तदा ५१ मत्स्यपाञ्चालचेदीनो तमेकममिधापताम् । ते नराश्वरथमार्मागणेच परता ॥ ५२ ॥ तमेकं छावपामासुमैया इय विघाफरम् । भीष्मं भागीरथीपुत्रं प्रतपन्तरणे रिपद ।। ५३ ॥ ततस्तस्य च तेपाञ्च युके देवासुरोपमे । किरीटरी भीममानछत् । पुरस्करय शिखण्डिनम् ॥ ५ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मपराक्रमे एकोनविंशाधिकशतोतयः ।। १११ ।। - सञ्जप उयाच । एयन्ते पाण्डवाः सर्वे पुरुस्कृत्य शिखण्टिनम । विम्यधुः समरे भीष्म परिपार्य समन्ततः ॥ १॥ शतघ्नीमिः सुघोराभिः परिचष परषधे। । मुद्र रैर्मुसले प्रासैः क्षेपणीयैश्च सर्पश ॥२॥ फर. फनफपुखैध शक्तिसोमरकम्पनः । भाराचैर्वत्सदन्तश्च भशुण्डीमिश्च सर्पस ॥३॥धताडयन रणे भीष्म सहिता. सर्व क्षणमात्रही में उस अकेले की ओर दौड़ते हुये मत्स्य पांचाल और चंदेरी देशाके क्षत्रियों का कलकला शब्द उत्पन्नहुमा । ५१ । हे पात्रुसंतापी उन मनुष्यों ने रथके समूह और वाणों से उस युद्ध में शत्रुके तपानेवाले भागीरथी के पुत्र अकेले भीम को ऐसे ढक दिया जैसे कि वादल सूर्यको ढकदेते हैं पीछे देव दानोंके सपान दोनोंके युद्ध में अर्जुनने शिखंडी को भागेकरके भीष्म को मोहित किया । ५३ । अध्याय १२०॥ संजय बोले कि इसमकार से चन सब पांडवों ने शिखंडी को भागे करक भोर युद्ध में पारों ओर से भीष्मजी को घेरकर पायल किया। बड़े भयानक शतानी परिघ फरसे मुद्गल मुशल मास चपणी कनकपुंखवाले शरशकि तोमर कंपन नाराच परसदन्त भुडी आदि अनेक शस्त्रों के द्वारा युद्ध में सब मृत्रियों Immediately after this there was a great noise from the armics of Matsya, Panchal and Chunderi warriors rushing against him their numerous chariots, o destroyor of onemios, they so coveral braro Bhishm under the flight of their arrows as clouds hido the sun Thon in that war, liho that of the gods and danarns, Arjan from bohind tho baok of Shikliand: discharged his arrow's nod made Bhishm insensiblo."53. CUAPTER CEX Ennjaya continuedi-- "Thus lod by Shikhnndi, tho Pandaras burrounded Bhishm and founded him with dreadful Shalaganis, clabs, axes, fxudgais, mushals, prases, missiles, arrors with golden fcathors, speurs, comars, lampuns, dal scants, Chushundu and other treapons. All the Srinjayns discharge their waipons at once and With (४९३९) Arago Bhishma Pary [49591 छत्रया.स विशीर्णतनुत्राण पीडितो घहुमिस्तदा ॥४॥ न यिम्यये तदामीमो मिद्यमानेषु मर्मसु । सीप्तशरचापाग्निरामपहतमारुतः ॥ ५ ॥ मेमिनिहादसातापो महानोदपपाषक चित्रचापमहाज्वालो वीरक्षयमहन्धन ॥ ६ ॥ युगान्ताग्निसम प्रस्य परेषा समपद्यत । घिस्प रथसधानामन्तरेण पिनि त ॥ ॥ हरपते स्म मरेन्द्राणां पुनर्मभ्यगतवरन् । तत पाञ्चालरामच धृष्टकेतुमचिन्त्य च ॥ ८॥ पारवानीकिनीमध्य माससाद विशाम्पते । ततः सात्यफिमीमीच पापरवाच धन जयम् ॥ ९ ॥ द्रुपदश्च घिराटश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्वतम् । भीमघोपैमहागैमापरण मदिभिः १०॥ यतामिशितीम प्रविम्याधीचमै शरः । तस्य ते निशिताद याणान् सनिवार्य महारथा.॥ ११॥ दशभिदंशमिर्मीममईयामामुरोजसा। शिखण्डीतुम हाषाणान यान्मुमोच महारथ ॥ १२॥ नच कुस्ते रजतस्प स्थणांखा. शिलाशिताः। 'ने एकसाथही भीष्म को बहुत प्रकार से घायल किया तप वह भीष्म टूटे कवच पातशत्रोंसे पालामान ४. और मर्मस्यनों के घायलहोने परभी दुःखी नहींहुए जिसके वाण भार अन्नों समकटहोने वाली प्रकाशित अग्नि मोर स्थकी चक्रपारा का यादव पर्दिश आदि बड़े २ अस्त्रों का प्रकाश और जड़ाऊ पनुपवाले बड़े शूरवारोंकानाशही बड़ाइंधनया । ६ । वह प्रलयाग्निके समान शत्रुओं के सम्मुखदुमा और अवकाश पाकर रथों के समूहोंमें से बाहर निकल गया फिर राजाओं के मध्य वर्तमानहोकर घूमता पड़ा इसके पीछे राजा पांचाल और धृष्टकेतुको ध्यान न करके पापड की सेना के मध्यवर्ती होकर भीष्मजी ने सात्यकी भीमसेन अर्जुन द्रुपद विरोंट सृष्टयम्न इन छ: महारथियोंको बड़े भयकारी युद्ध में पापल करनेवाले उत्तम तीक्ष्ण वाणोंसे घायल किपा फिर उन महारापेयोंने उनके उन तीक्ष्णयाणों को दूरकरके बड़ेवेगसे दश दवावाणों के द्वारा भीप्मनीको पीड़ामान किया भौर महारयी शिखंडीने मुनहरी पुंखवाले शिनापर तीक्ष्णकिये वाणोंकोमारा वह वाण शोधही wounded Blushm on all sides Bhishm with his armour broken and wounded with different sorts of weapons in the vital parts felt no pain. Having 1119 arrors and weapons for blazing fire of which the rumbling of his chariot spheels was the dia, the mighty weapons mere the light and the dead bodies of the warriors having jewelled bors; formed the fuel Thus like the fire of pra'aya bo faced his enemies und a good tima got clear of the lines of their chariots Thôn ba was seon ruaming in the midst of the p-10883. And disregarding the king of Panchal and Dhrishtalotu, be tonnded with bus dreadfal arrows the six warriors of the Pandavas, namely Satyasi, Bhimson, Arjun, Drupad, Virat and Dhrishtadyumn Those warriors howaver retpoved his arrors and rounded bin nath ten an owa sach Tallant Shihliandi discharged bus ariows having golden fiatbers and sharponod on storic. They pierced througlı h s body. Then enraged Asjub 1 [4940] Mahabharat (४९५०) ततः फिपेटीसंरब्धो भीष्ममेवाभ्यधावत ॥१३॥ शिखण्डिनं पुरस्कृत्य धनुधास्यसमा च्छिनत् । भोप्मस्य धनुपएछेद मामृप्यन्तमहारया ॥ १४॥ द्रोणश्व कृतघांच सैन्य वक्ष जपदयः । भूरिश्रयाः शल. शल्यो भगदत्तत्तपैवच ॥ १५॥ सप्तैतेपरमधा कि रोग्निमभिता. 1 तत्र शस्त्राणि दिव्यानि दर्शयन्ती महारथाः ॥ १६ ॥ अभिपेतुर्मशं कुमा छादयन्तश्च पाण्डवम् । तेषामापततां शरदः शुश्रुधे फाल्गुने प्रति ॥ १७ ॥ उद्धृतानां यथाशब्दःसमुद्राणायुगक्षये। नतानयत गृहणीत विल्यध्वमयकर्तत ॥१८॥ इत्यासीतुमुल शब्दः फाल्गुनस्य रथं प्रति । तं शलं तुमुलं भुत्या पाण्डवानां महा रथाः ॥ १९ ॥ अश्यघापन परीप्सन्तः फाल्गुनं भरतर्षभ । सात्यफिीमसेन धृष्टद्युम्नंध पार्पतः ॥ २० ॥ विराटपदी चोमो राक्षसच घटोत्कचः । अमिमायुक 'संकुछः सप्तते क्रोधमच्छिताः ।। २१ ॥ समस्यधावस्यरिताचित्रफार्मुफधारिणः । तेषां सममयखं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ २२ ॥ संभामे भरतश्रेष्ठ , देषाना दानवैरिव । भीष्मजीके शरीरमें प्रवेश करगये इसके पीछे क्रोधयुक्त अर्जुनने शिखंडीको आगे करके भीमनोके सम्मुख दौड़कर उनके धनुपको काटा फिर द्रोणाचार्य कृत- वर्मा महारथी जयद्रथ भूरिश्रवा शल्य और भगदत्त भीष्मके धनुप को तोड़ना न सहकर बड़े क्रोधयुक्तहोकर सातोमिलकर अर्जुनके सम्मुखगये वहां दिव्य भत्रों को दिखातेहुए । १६ । पांडवोंको शस्त्रोंसे ढकते उन सबक्रोधभरे महारथी पुरुषों के ऐसे शब्द मुनेगये जमे कि प्रलयकाल में उठेहुए समुद्र के शब्द होतेहैं और अर्जुन के रथपर ऐमे कठिन शब्दहुए कि लेचलो पकड़ो घायल करो मारो । १८ हे राना पांडवों के महारयो उम काठन कोर शन्दको सुनकर भर्जुन को चाहते हुए उन महारथियों के सम्मुख दौड़े सात्यकी भीमसेन पृष्टद्युम्न विराट द्रुपद नकुल सहदेव घटोतचराक्षम और अत्यन्तक्रोधयुक्त अभिमन्यु महाक्रोधमें ज्वलित होकर अपूर्व धनुपाको लिये उनसातोंमहाराधियोंके सम्मुख दौड़े इनमबलोगोंका युद्धऐसा led by Shikhandi rushed against Bhishm and cut down liis bor. Dronacharya, Kritrarmi, valiant Jayadrath, Bhurishrava, Shalya and Bhagdatta could not borr that injary to Bhishma's l'or and all (.those seren Tarriors together faced Arjuu Then diplaying their divino seapons and corering the Pandavas with their weapons, the sounds of tliosc enraged warriors were heard liko that of the angry ocean at the end of the Yag. Approaching Arjun's chariot they cried out. "Take him, Bizo lim, wound him, kill him, The Pandar arriors beario, those crics, raslıcd amainst them for the kilo ol Arjun Satyaki, Bhimsen, Dhrishtadyumn, Virat. Drupad Natal, Sahader, Ghato'kach tlio rukshas and enraged Abhimanya, all these parriax much cnra yed ton up their fronderful lows and raslie! upon the seven, Tlien the battle between the two parties has 19 (४९४१) भीष्मपर्व Bhislima Pary [49411 शिसण्डीतु रणे श्रेष्ठो रक्ष्यमाण किरीटिना ॥ २३ ॥ अविध्यदशभिभीष्म लिन्नधल्या नमाहवे । सारथिं दरामिश्चास्य ध्वजचकेन चिच्छिदे ॥ ३४ ॥ साम्पत् कामुक मादाय गाड्यो वेगवत्सरम् । तदप्यस्य शितवाणनिभिश्चिच्छेद फाल्गुन ॥२५॥ एव स पाण्डवः क्रुद्ध आत्तमा पुनःपुनः । धनुरिचच्छेद भीष्मस्य सन्यमाचीपर तपः ॥२६॥ सछिन्नधन्या संमुखःसृस्किणी परिसंलिहन् । शजिग्राह तरसा गिरीणा माप दारणीम् ॥२७॥ ताञ्च चिक्षेप संक्रुद्धः फाल्गुनस्य रयं प्रति । तामापता सम्प्रेक्ष्य ज्वलन्तीमशनीमिघ ।। २८ ॥ समादत्त शितान् मल्लान् पञ्च पाण्डयनन्दन । तस्य चिच्छेदतां शक्ति पञ्चधा पञ्चमि शरः ॥२९॥ संक्रुद्धोमरतश्रेष्ठ भी मयाहुप्रवेरि ताम् । सापपात तयाच्छिन्ना संकुद्धेन किरीटिना ॥ ३०॥ मेघवृन्दपरिम्रा पिच्छि- महापोर रोमहर्पणहुमा ।रश जैसाकिदैत्योंसे और देवतामोंसे हुभाथा फिर युद्ध में अर्जुनमे रक्षित शिखंडीने उन टूटे पनुपवाले भीष्मको दशवाणोंसे बंधा भौरदाही वाणोंमे सारथीको घायल किया और एकवाणसे उसकीध्वजाकोभीडाला॥२४॥ गांगेय भीष्मजी बड़े वेगवान् दूसरे धनुपका लेकर युद्धकरने लगे अर्जुन ने उन के उस धनुषकोभी तीन तीक्ष्ण वाणों से काटा । २५ । इसरीति से उसशत्रुसंतापी क्रोधभरे अर्जुन ने वारंवार लिये हुए भीष्मके धनुपोंको कारा । २६ । तव उन टूटे धनुष अत्यन्त क्रोधयुक्त होगेको वावतेहुए भीमनोने पर्वतों कोभी फाड़ने वाली घोरशक्ती को हाथ में लिया । २७ । और बड़े क्रोधमे उस शक्ती को अर्जुन के स्थपर फेंका उस वज्रके समान प्रकाशमान भानीहुई शक्ती को देखकर पांडुनन्दन भर्जुन ने पांच तीक्ष्ण भल्लोंको हाथ में लिया और उनकी उस शक्ती को पायवाणों से टुकड़े टुकड़े करदिया । २१ । हे राजा अर्जुन ने भीष्मकी धुनासे फेंकी हुई शक्ती को काटा फिर अर्जुन से कटीहुई शक्ती रथसे ऐमे गिर- पड़ी । ३० । जैसे कि बादलों के समूहों से अलग होकर विजली गिरती है शत्रु- fieroe as that between the gods and danapng. Then Shibhandi, protected by Arjun, wouaded Bhishm, whose bow was cut down, wilin ton arrors, with ten more he founded his driver and with one ho pierced through his banner. Bhishm the son of Ganga then took up another bow and began fighting. Arjun cut down the other bov too, with three sharp arrows. Thus in his rage Arjun the destroyer of enemies again and again cut dorn Bhishm's low. 26 Much onraged at the cutting of his bows, Bhishm biting his lipe is anger, up a dreadfal spear capable of piercing mountains and in great rage hurled it at Arjun's chariot Seeing that spenr coming on like bright vajm, Aijun the joy of Panda, took up five darts in his hand and with thom he cut down the spear in pieces. Ilurled by the arms of Bhislım the spear was cut down by Arjan and it fell of the chariot-(80) as lightning from clouds. Bhishm the destroyer of the took ।४९४२) [ 4942] Mababharat नेय शतदा । छिन्नातां शक्तिमालोक्य भष्मः कोधसमन्धितः ॥ ३१॥ अचिन्तयद्रणे । पीरो युरणापरपरस्जयः । शवोहं धनुरेफेन निहन्तु सर्पगाण्डवान् ॥ ३२॥ यद्येशं न भवेन्गोता विवसेनो महाबलः । कारणद्वयमास्थाय नाहं योत्स्यामिपाण्डवान् ॥ ३३ ॥ अवध्यत्वाच्च पानां स्त्रीभावाच्च शिखण्टिनः । पिश तुऐन मे पूर्व पदाफाली मुदायहम् ॥३॥ स्वच्छन्दमग्णदत्त मवध्यत्वरणे तपा। तस्माग्मत्यु महं मन्ये प्राप्तकालमियानमः ॥ ३५॥ एवं शात्वा व्यवसितं भीप्पस्यामिततेजसः। यो वसवथैव वियवस्था भीष्ममग्रवन् ।। ३६॥ पत्ते व्यवसितंतात तदस्माकमपि प्रियम् । तत् कुरुप्य महायज युद्ध यांचं निषतय ॥३७॥ अस्य पाक्यस्य निधने प्रा रासीउिवोनिलः । अनुलोमः सुगन्धी च पृषतैश्च समन्वितः ॥ ३८॥ देवदुग्नुभय दचैव सम्प्रणेदुमहास्वनाः । पपात गुणवृष्टिश्च भीष्मप्योपरि मारिष ॥ ३९ ॥ नम भोंके पुरोंके विजयकरने वाले वार भीष्म ने उस टूटी हुई शक्ती को देखकर युद्ध में चिन्ताकरी कि मैं अकेले धनुप से सब पांडवों के मारने को कैसे समर्थहूंगा । ३२ । दूसरे इन्हों के रक्षक महावली श्रीकृष्णनी हैं इन दोनों कारणों से में पांडवों से नहीं लहूंगा प्रथम तो पांडवों के प्रवध्यहोने से दूसरे शिखंडी के स्त्रीपनेसे पूर्बसमय में मेरे प्रसन्न चित्त पिताने काली नाम मायाको विवाहा । ३४ । उससममय मुझको वरदान दिया था कि तू अपनी इच्छा के अनुसार | मरेगा और युद्ध में सबसे अवध्य होगा इसकारण से मैं अपनी मृत्यु को समय पर वर्तमान मानताहूं । ३५ । पड़तेजस्वी भीष्मनी के इस प्रकारके निश्चयको जान कर आकाशमें नियत ऋषियों ने और अष्ट वसुमों ने भीष्मनी. से कहा । ३६ । हे तात तुमने निश्चय किया वही हमको भी अभीष्ट है हे महाराज तुम इमी को करो और युदमे अपने चित्तको इटाभो । ३७ । इसवचन के समास होने पर चारोंमार से वह वायु प्रकटहुई जो कि आनन्दरूप त्रिविध प्रकार से सुगन्ध युक्त यी । ३८ । उस समय देवताओं की भी दुन्दुभियां अच्छे प्रकार enemies secing his spor broken down thought within himsolf: "Witb a singto bow I cau not destroy the Pandavas wlio havo nirg'ilos Shree Kaishn for their protector. I chall not fight against the - firstly they are not destractible and secondly on accouat of the womanhosd of Shikhandi. Formerly, my father of checrful spirit married my stepmnthier Kali and granted due tho Loons that I should die when I desired and should not be killed in battle Now I took that this is tlo proper time for me to die." this resolution of Flisl m there come a sound from the rishis and the cight Vasus stagirg in mid air, "Your resolution is desirable to os Do as you kny and redioTc sour miod from Lattle." As coon AS hoe vords were finished there blew from all quarters & brocze Pandavas for two reasons: -- (४९४३) भाषपर्व Bhishma Pary [4943] ताप कश्यितेषां सम्बदतां नृप । मते भीम महापाई मान्चाणि -मुनितेजसा ॥४. सम्ममाय-महानासीत् त्रिदशानां विशाम्पते। पतिप्पति रथाद्गीमे सर्वलो कप्रिये तदा॥४१रति देवगणानाञ्च यापयं श्रुत्वा महातपाः। ततः शान्तनवो भीमो बीमत्सुं नात्यथर्चत ॥ ४२ ॥ मिग्रमान. शितैर्घाणे सर्वाधरणमेदिभिः। शिमण्डीतु महाराज भरताना पितामहम् ॥ ४३ ॥ माजधानोरसि धोनीभनिशितः शरैः। सतेंना मिहतः संख्ये भीम कुरुपितामह || नाफमात महाराज क्षितिकम्यथा चलः । ततः प्रहस्य धीमत्सक्षिपन् गाण्डिय धनुः ॥४५॥ गागेयं पञ्चविंशत्या पुकाणा समार्पयत्। पुनः पुन शतरेनं त्यरमाणो धन जयः॥ ४६ ॥ सर्पगात्रेषु संसः सर्यमर्मस्वताडयत् । पयमन्धी मशं विध्यमानः सहनश ॥ ४ ॥ तानप्याशु शरैर्मोम प्रतिव्याध महारयः । तेध मुक्त श्रान् भीमा युधि सत्यपरा | से वर्जी और भीष्पजी के ऊपर पुष्पोंकीवर्या हुई, हे राजा व्यासमुनिके तेजसे मेरे और महावाहु भीष्म के सिवाय उन वार्तालाप करनेवालों के वचनको किसी, ने भी नहीं सुना । ४० । तब सब लोकके प्यारे भीष्मनी के रथ से पृथकहोने पर भीष्मके चाहने वाले सव देवताओं को बड़ा आश्चर्य हुा । ४१ । इस के पीछे दांतनुका पुत्र वेनस्वी भीष्म देवगणों के वचनको सुनकर अर्जुन के मम्मुख | नहीं रहा ! ४२ । जो कि सब पत्तों के तोड़नेवाले तीक्ष्ण वाणों से भी घायल था तो भी कोषयुक्त शिखंडी ने भरतवंशियों के पितामहको । ४३। तीक्ष्ण पार के नौ धाणों से छातीपर घायल किया वह कौरवों के पितामह भीष्मनी युद्ध में उस प्रहार से घायल होकर भी ऐमे कंपायमान नहीं हुए जैसे कि भूकम्प होने पर पर्वत नहीं हिलता इस के पाछे गांडीव धनुष को खेचनेवाले भर्जुन ने सकर गांगेप भीप्पनीको तुद्रक नामके पच्चीस वाणों से घायल किया फिर शीघ्रता करनेवाले अत्यन्त क्रोधयुक्त अर्जुन ने जैसे भीप्पको सैकड़ों वाणों से सब अंग और मर्मस्थलों पर घायल किया इसीप्रकार दूसरे शत्रुओं ने भी इनको अनेक प्रकारसे घायल किया ४७१ फिर महारथी भाप्पने शीघ्रही उनको अपने वाणों से giving pleasure and charged with greet odours Tho trumpots of the gods wounded and there was a shower of flowers over Bhishm. None oxcopt Bhishm and myself farourou of Vayas, could lear that? lalk. 40. All the gods were filled with wonder when Bhisho tho favourite of all the world fell down from his car. After hearing the Words of tho goda Bhishm onopunterod Arjun 20 more. Already woundsd by the sharp arrows, tite grandfather of the Bharats was again wounded by futious Shikhandi with pino arrons in the breast, but Bhishm did not shinko even with these fresh Founds and remainod firm as a mountain at the time of earthquake Then Arjun the wielder of Gandiy woundal the son of Ganga irith twenty fire [4944] Mahabharat (४२४४)। क्रमः ॥४८॥ निवारयामासशरैः समं सनतपर्वभिः । शिखण्डीतु रंणे घाणान् यान मुमोच महारयः ॥ ४९॥ न चकुस्ते रुजं तस्य रफमपुंखाः शिलाशिताः । तत.किरी टीसंछो भीष्ममेवाभ्यवर्तत ॥५०॥ शिखण्डिनं पुरस्कृत्य धनुश्वास्य समाख्छि नत् । अथैननयमिर्विध्या ध्वजगेफेन चिच्छिदे ।। ५१ ॥ सारथिं विशिखैधास्पदशमि . समकम्पयत् । सोन्यत् कार्मुफमादाय गानेयो बलवत्तरम् ॥ ५२ ॥ तदप्यस्य शितले विधा त्रिभिरघातयत् । निमेषार्धन कौतेय मात्तमात्रं महारणे ॥ ५३ ॥ पवमस्यधनं प्याजी चिच्छेद सुबहून्यथ । ततः शान्तनवो भीष्मो यीमतसं नात्यवर्तत ॥ ५५ ॥ अपनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् । सोतिषिद्वो महेप्पासो दुःशासन घायलकिया और उनके छोड़ेहुए वाणों को गुप्तम-धीवाले वाणों से जहाँका तहां रॉकदिया। १८ । इसके पीछे महारथी शिखंडी ने युद्ध में जिन वाणों को छोड़ा उन मुनहरीपुंखवाले तीक्ष्णधार युक्त बाणोंने उन भीष्मजी को पीड़ित नहीं किया । ४९ । इसके अनन्तर अत्यन्त क्रोधयुक्त अर्जुन शिखण्डी को आगे करके भीष्म के सम्मुख वर्तमान हुआ और उनके धनुप को काटा उसीमकार इनको दशवाणोंसे बेध कर एक वाणमे उन की ध्वना को भी काटा और दश विशिखबाणों से उनके सारथी को अत्यन्त कम्पायमान किया ।५१॥ फिर भीष्मने दूसरे मलय धनुषको लेकर तैयार किया इसघनुपके भी अर्जुनने तीन ताक्षण भल्लों से तीन खंडकिये ५२। इसीप्रकार | से अर्जुन ने प्राधेही निमिप में उप्तयुद्धभूमि में हायमें लिये हुए उनके भनेक धनुषाको काटों । ५३ । फिर शंतनु के पुत्र भीम अर्जुन के सम्मुख घर्त्तमान नहीं हुए तव अर्जुन ने उनको तुद्रक नाम पच्चीस वाणों से घायल किया । ५४ । फिर वह अत्यन्त घायल बड़े धनुपधारी भीमजी दुश्शासन से बोले कि इस पांडवों के | महारथी युद्ध में क्रोधरूप अर्जुन ने युद्ध के वाच हजारों वाणों से मुझको चापल' arrows with a smiling face. Then much enraged he pierced all parts of liis body with hundreds of arrotys. Thon valliant Bhishm soon wounded him with his arrows and chocked the flight of his arrows with his arrows having bidden knots. Shikhandi the bravo warrior again discharged his arrows, but those arrows having goldon fenthers did not troubis him much. Then Arjun much enraged, stopping bo. bind Shikbandi; encountered Bhishm and cut down his bow.50. Having wounded him with ton arrows, ho cut down his banner with ono and woundad his chariot driver with ten more? Then Bhişkın propared another strong bon which was out into threo parts by Arjun's three arrows. Bhishma. At tlu son of Shantanu cncounto el Arjan no noro, and Thon Arjun cut down screral Lots of the latler again wounded himn with twenty firo arrows. 51. Excoedingly wounded, Bhishm the mighty archer said to Dushasan, . "This mighty charioteer of 'the Pandavas, Arjun the embodiment of anger, (४९४५) भीष्मपर्व Bhishma Pary [-4945-1 मभापत ॥ ५५ ॥ एप पार्थो रणे क्रुद्धः पाण्डवानां महारथः । शरैरनेकसाहसमा मेवाश्य हनद्रणे ॥ ५६ ॥ न चैप समर शक्यो जेतुं धनभूता मपि । न चापि सहिता वीरा देवदानवराक्षसा. ॥ ५७ ॥ माम्चापि शका निजेतुं फिम मा महारथाः । एवं तयो सम्वदतोः फाल्गुनो निशितैः शरैः । ५८ ॥ शिवण्डिन पुरस्सत्य भीष्मं विव्याध संयुगे । ततो दुशासनं भूय. स्मयमानहयामधीत् ।। ५९ ॥ अतिविक्षः शितर्घाणभृशं गाण्डीवधन्धना ! धनाशनिसमस्पर्चा भर्जनेन शरायुधि ॥ ६ ॥ मुक्ताः सर्वेऽन्यपच्छिमा नेम वाणाः शिखण्डिनः । निहन्तमाना मर्माणि रदाचरणभेदिनः ॥ ६१ ॥ मुसला इव मे प्रन्ति नेमे याणाः शिखण्डिन. । यजदण्ड किया है यह भर्नुन युद्धमें वज्रधारी इन्द्रभे भी विमय करनेके योग्य नहीं है । ५५ । और धीर देवता दानव राक्षसभी सब मिलकर मेरे विजय करनेको समर्थ नहीं है फिर पृथ्वी के नर महारथी क्या पदार्थ हैं । ५६ । इस रीति से इन | दोनों के बार्तालाप होनेपर अर्जुन ने शिएंडी को आगे करके मीप्मनीको तीक्ष्ण धारवाले घाणों से फिर घायल किया । ५७ । तब तो उस गांडीवधनुषधारी के तीक्ष्ण बाणों से प्रत्यन्त घायल और आश्चर्य युक्त भीष्मजी दुशासन से कइ- ने लगे । ५८ । कि युद्ध में इन्द्रवजके समान अर्जुन के छोड़े हुए स्पर्श करने वाले वाण सव सफल हुए हैं इस से विदित होता है कि ये घाण शिखंडी के नहीं हैं। ५९ । बड़ेढ़ और मर्मस्थलों के काटने वाले पर्वतों को भेदनकरने वाले घाण मुप्तलोंके समान मुमतकोमारतेहैं यहवाण किसी प्रकार से शिखंडी के नहीं हैं । बलदण्ड के समान स्पर्शगाले वा पतके समान तीक्ष्ण कष्ट से सहने के योग्य वाण मेरे प्राणों को पीड़ा देते हैं इससे यह शिखण्डी के याण नहीं है । ६१ । यमदतों के समान अप्रिय गदा और परिव के समान स्पर्शवाले वाण मेरे has wounded mo with thousands of ariows, Surely Aijun is invinciblocven by Indra tho wiolder of rajia 55. Valliant gods, danaras and raluhisee joined together anet conquer me; s. hat to say inortal men?" When the tiro nero thus talking togother, Arjun preceded by Shuklandi agnin wounded Bhishm with liis sharp arrows. Excodingly wounded by the sharp arrows of the wielder of Gaodiv and much amazel, Bhishm thus addrossed Dushasan:--The arrors discharged by Arjun, hard to the touch liko vajia, have all done their work; I think therefore that those arrows vcro not discharged by Shikhındı. Very liard, piercing tho vital parts and capablo of brak ing through mountains, those arcows hit nio liko maces; they canot Lclong to Shiklinadi. G. IIard to the touch like Brahim-dand, sharp and unbearable like vajra, tho arrots givo me pain and therefore they could not belong to Shikhandi. Lil the unwelcono messongors of Yam, tho arrows hard as maces and clubs, draw lifo out of me [4946] Mahabharat [४२४६) समस्पर्श वज्रग धुरासदा. ॥ ६२ ॥ मम प्राणानारजन्ति नेमे याणा:शिखण्डिन । नारायन्तीय मे प्राणान् यमता इवाहिताः ॥ ६३ ॥ गदापरिघसंस्पर्ण नेमे घाणा. शिखण्डिनः । भुजगाइघ संऋक्षा लेलिहाना विषोल्यणाः ॥ ६४ ॥ समा विशन्ति मर्माणि मेमेघाणाशिपण्डिनः । सर्जुनस्य इमयाणानेमेवाणा शिवपिनः॥६॥ छतन्ति मम गात्राणि माघमासे गयाइव । सर्वे ह्यापि नमे दुःखं कुर्युरल्ये नाधिपाः ॥ ६६ । धीर गाण्डीव धन्धान मृते जिष्णु कपिध्यजम् । इति प्रपञ्छा न्तनयो दिधक्षरिव पाण्डवान् ॥६७॥ शक्तिमीम सपार्थाय ततविक्षेपभारत । वामस्य विशिवैश्छित्या त्रिधा त्रिमिरपातयत् ॥६८॥ पश्यतां कुरवीराणा सपा तथ भारत । चर्माथारूप गाङ्गेयो जातरूपपरिकृतम् ॥६९॥ सगंचान्यतर नेप्सर्मृत्योरमेजयायपा। माणों को निकालते हैं यह वाण शिखरडी के नहीं है । ६२ । सपों के समान अत्यन्त कोषयुक्त विषभरे चाटतेहुए मेरे मर्मों में प्रवेश करते है इसमे यहवाण शिखएटी के नहीं है । ६३ । यह वाण प्राश्य अर्जुन के है शिखण्डी के नहीं है क्योंकि यह याण मेरे अंगों को ऐसे चूर्ण किये डालते हैं जैसे कि भाद्रपदके महान में प्रचण्ड मूर्य अंगों को संतप्त करके चूर्णीभूत करते हैं । ६४ । विजयी गहिप पनुपधारी पानरध्वज धार अर्जुन के सिवाय अन्य पृथ्वी के समराना लोग भी मुझको व्ययित नहीं करसक्ते । ६५ । हे भरतपम इस प्रकार बोलते या पाएडवाको भस्मकरना चाहते उन शंतनु के पुत्र भीमने अर्जुन के ऊपर श- कीको छोड़ा । ६६ । इसको देखकर भर्जुन ने आपके सब कौरवी वारोंके देखते | हुए इनकी शक्तीको विशिखनाम तीनवाणों से काटकर गिराया । ६७ । फिर दोषातों में से एकको चाहते गांगेय भीमनी ने मुवर्ण जटिन दाल और तल वारको मृत्यु के लिये वा विजय के निमित्त हाथ में पकड़ा । ६८। तब अर्जुन ने उसरप से नहीं उतरेहुए की उस दालको शायकनाम बाणों से सौ टुकड़े किया यह यड़ा आश्चर्यसा हुमा । ६१ । इसके पीछे राजा युधिष्ठिर ने अपनी thoso are not Shibhandi's arruits. Lihe renomous sorpents much coraged with longues projected, the arrows enter my vital parts and thicrofore they cannot be Shiblandi's 2.2014Thoy nro cortainly Arjun's and not Sinhhandi's, for thcze anos ara withoring up my limba libu tlo sun of Bhulapach. Ercupt conquo. ing Arjua, ilo mielder of the Gandır, too has a monkey's figure on his banner, dono ol the hings of the world can sondd me" Thus talking and wishing to destroy the Pandarai, Blu18lım the son of Shantanu hurlu a star at Arjun, and seeing that sKat coming towards hini, Arjun in the presence of all thic va tlors of the Kauravas, cat it down with three arrors. Then remembarring his alored grd, Bhishm the son of Ganga took up his sword and slueld for dcath or victory; but lofum hoc cull di-mount his chariot, Arjun cut lius shield into hundred petes -- [4947) भीमपर्व Bhishma Pary तस्य तच्छता वर्म व्यधमत्सायफैस्तथा ॥ ७० ॥ स्यादनवाढस्य तदद्भुतमिया भवत् । ततो युधिष्ठिरो राजा स्वान्पनीकान्पचोदयत् ॥ १ ॥ अमियत गाङ्गय मा वास्तुमयमण्यपि । अथ ते तोमरः प्रासंर्याणीपश्च समन्ततः ॥ ७२ ॥ पटिशेध मुनि विशनाराचैश्च तथा शितैः । वत्सदन्तश्च भलैश्च तमेकमभिदुष्टुयुः ॥ ५३॥ सिंहना दम्त तो घोर पांडयानामभूत्तदा । तथैव तय पुत्राश्च नेदुर्भीमजयपिणः ॥ ७४ ॥ तमेक मम्यरक्षन्त सिंहनानाधमिरे । तत्रासात्तुमुल युद्धं तायकानां परैः सह ॥ ७५ ॥ दशमेहनि राजेन्द्र भीमार्जुनसमागमे । आमीद्गाङ्ग इवायत्तों मुहूर्तमुदधरिव ७६|| सिन्यानां युध्यमानानां निम्नतामितरतरम् । असौम्यरूप पृथियो शोणिताकामपत्तदा ॥ ७७ ॥ सम विषमञ्चैव न प्रानाश्त किञ्चन । योधानामयुत हरया तस्मिन् स सेनामों को आज्ञाकी फि भीष्म के सम्मुख जाओ तुमको थोडासामा भय न होगा । ७० । यह सुनकर वह सेना चारों ओरसे तोपर माश वाणसमूह पहिश सुन्दर (खगग तीक्ष्णनाराच । ७१ । यत्सदन्त और भल्लों समेत उस अकेले के सम्मुख गये इसके पीछे पांडवों के महाभयकारी सिंहनाद जारी हुए । ७२ । इसी मकार भीष्मको विजय चाहने वाले आपके पुत्रभी गर्ने और उम अकेले भीमके और पास बनमान होकर सिंहनाद करनेलगे । ७३ । हेराजेन्द्र वहां दश दिन भीष्म मौर मर्जुनको सम्मुखतामें आपकं पुत्रोंका युद्ध अन्य लोगोंसे महाघोर रूपहुआ । ७४१ परम्पर में मारती और लड़ती हुई सेनाके भ्रमण चक्र एक मुहूर्ण पर्यन्त गदा और समुद्रके गिव के समान हुए 1 ७५ । तपपृथ्वी अशुभरूपी औरगापरसे पूर्ण होगई उस समय अच्छा बुरा कुछनहीं मालूम हुभा । ७६ । वह भीष्म उस दवावें दिन में दश हजार वीरों को मारकर मर्मस्थलों में महाघायल होनेपर भी युद्ध में नियतरहे । ७७ । इसके पीछ उससेना मुखपर नियत धनुपपारी अर्जुन ने with his sharp arrows. It was a wonder. Then Yodbishthir ordered his armies to facc Bhishm without fear. To. At this thre warriors armed with lomare, prases, arrows, paltishas, stvords, sharp Arrows, onisdants and darts, faced Blislım. Then the Pandavas roared like lions. In the same manner, desirous of Bhishma's conquest, the Kauravas raised their war crics and baving stationad thomsolves all round bim, begin woring like liong. On that truth day in the encounter of Bhishm and Arjun, pour sons fought vory valliantly agaiust other foes. Tho rounds of the armpics hilling and lighting against one another wers like the tides of the Ganges and the ca for somo time. The ground tecrime hideous and full of blood and nothing good or lad, vas difcel uible Having lilled ten thousand svartiorg on that tenth day, Bluishan remained firm in tatilo althongh he was such n cundcu in tlo silal pants. Then, stationed on the entrance ! ७९ [4948 ] Mahabharat (४९४८ दशमेहति ॥ ७८ ॥ अतिष्ठदाह भीष्मो मिद्यमानेषु मर्मसु । ततः सेनामुखे तस्मिन् स्थितः पार्योधनुर्धरः ॥ ७९ ॥ मध्येन कुरुसैन्यानां द्रावयामास पाहिनीम् । षयम्वेत हयाद्रीताः कुन्तीपुत्राचनमयात् ॥ ८ ॥ पोड्यमाना शितैः शरैः प्रादयामरणेतदा। सौपीराः फितवा. प्राच्या प्रतीच्यादीच्यमालयाः॥ ८१ ॥ अभीषाहाः शूरसेनाः शिवयोयवशातयः । शाल्या श्रयास्निगश्च आम्घष्ठाः फफयै सह ॥ ८२ ॥ संबंपते महात्मानः शरार्ता प्रणपीडिताः । सग्रामे नाजहुर्भीष्म युध्यमान किरीटिना ८३॥ ततस्तमेकं घहवः परिवार्यसमन्ततः । परिकाल्यकुरून् सर्वान् शरवर्षैरवाधिरन ८४ निपातयत गृहणीत युध्यध्व मवन्तत । इत्यासीत् तुमुल शब्दो राजन् भीमरथ प्रति ॥८५॥ निहत्य समरे राजन् शतशोथ सहस्रशः । न तस्यासीदनिर्मिनं गात्रेयगु | लगन्तरम् ।। ८६॥ एवंभूतत्तव पिता शशिकलीकृतः। शिताः फाल्गुननाजी प्रार कौरवी सेनाक मध्यमें से सेनाको भगाया । ७८ | तब हम उस देत घोड़े रखनेवाले कुन्ती के पुत्र अर्जुनसे भयभीत व वीक्ष्ण शास्त्रों से पीढ़ामान होकर युद्ध से भागे सौवीर कितव व पूर्वी पश्चिमी और उत्तरीय राजा व मालप देशा अभीपाह शूरसेन शिवय यशातय शाल्व पाश्रय त्रिगर्त अंवष्ट केकयों समेत इनसब घाणों से पोस्त और घावोंसे दुःखी महात्माभोंने युद्ध में अर्जुनके साथ लड़तेहुए भीष्मको त्याग नहीं किया इसके पाछे बहुससे क्षत्रियों ने चारों ओरसे उस अकेले को घेरकर । ८२ । और सबकौरवों को हटाकर घाणों की वर्षा से ढकादया और गिरायो पकड़ो लड़ो काटो यह कठिन शब्द भो'म के रथ के पासहुए और युद्ध, हजारों को मारकर । ८४ उसके शरीर में दोज दलका भी अन्तर घावोंते याकी नहींरहा ऐमी दशावाले अर्जुन के तीक्ष्ण नोकवाले पाणों से अत्यन्त घायल किये हुए भापके पिता भीष्मजो कुछ सूर्य के शेष रहनेपर भापके पुत्रों के देखतेहुए स्थ परसे भाँधिशिर होकर पृथ्यो पर गिग्पड़े। ८६ । हेभरतवंशी रथ से भीष्णजी के of tho army, Arjun hit the contre of the Kuuri v army and put it to flight. Afraid of Kunti's son Arjun the possessor of white horses, and wounded by his & rrow f, we fled from the field of battle. 79. The Sauvirs, tho Kitavas, the Eastern, Western nnd Northern princes, tho Malapas, the Avishahs the Shursenas, the Shivayas, the Vasliatayas, the Shalwas, the As brayas, the Trigartas, the Amyashtas and the Kaihayna, although pierced with arrows and smarling with the Founds, did not desert Bhiplina as long as he fought against Arjun. Thon many kshatrya Tarriors having surrounded him and pushed back the Kauravas, covered lum with their artOTS and the cries of " Pull, seize, fight and cut were heard round the chariot of Bhishma Having halled thousands there was not the space of an ine) left unwoundal on bis boly. Thus wounded by the sharp pointed arrots (४९४९) भीमपर्व Bhishma Pary 14949J | शिराः प्रापतद्रयात् ॥८७ ॥ किञ्चिन्छे दिनकरे पुत्राणां तय पश्यताम् । हाइति दियि देवानां पार्थियानाच भारत ॥८८॥ पतमाने रथाङ्गीष्मे यमूब ममहास्यन । सम्पतन्त मभिप्रेक्ष्य महात्मानं पितामहम् ॥ ८९ ॥ सह भीष्मेण सर्वेषां प्रापनन् हृदयानिनः । स पपात महाबाहुर्षमुधा मनुनादयन् ॥ ९० इन्द्रध्वज इवोतएटः केतु सर्वधनुष्मताम् । घरणी न स पस्पर्श शरसंधैः समावृतः ॥२१॥ शातल्पे महेप्यासं शयानं पुरुषर्षभम् । रंथात् प्रपतितं चैनं दिय्यो भाव शमाविशत् ॥ ९२ मध्यवर्पच्च पज्जन्यः प्राकम्पत च मेदिनी। पतन् स दरशे चापि दक्षिणेन दिवाकरम् ॥ ९३ ॥ संत्रांचीपालभद्वीरः कालं सश्चिन्त्य भारत । अन्तरिक्षेच शुभाव दिव्या वाचः समन्ततः ॥ २४ ॥ पंचमहा गिरतेही राज.मों में और आकाशके देवताओं में हायर आदि बहुत मे शब्दहोने लगे। ८७ उस महात्मा पितामहको गिरतेहुर देखकर भीमके साथ मातबके भी हृदयफटगये । ८८ । वह महायाह इन्द्र धना के समान ऊंचा और सवधनुपधारे- यों में अना रूप भीष्म पृथी को अच्छी रीति से कंपायमान करता गिरा। ८९ । उन वाणसमूहों से वेधित होनेपर भी मीप्मजी ने पृथ्वी को स्पर्श नहीं किया अर्थाद घाण शय्याही के ऊपर रहे फिर उस पाणशय्या पर सोते हुए बड़े धनुप- धारी पुरुषोत्तमरूप रयते गिरेहुए भीष्मनी में दिव्यभाव प्रविष्ट हुआ बादल बर्षा करनेलगे पृथ्वी कंपायमान हुई । ९१ । उस गिरते हुए ने भी दक्षिण दिशा में नियत मूर्य को देखा हे भरतर्षभ उसमतापी शूरवीर ने कालज्ञानको विचार कर सावधानी को पाया । ९२ । और अन्तरिक्ष में चारों ओर से यह दिव्य वचन मुने कि सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ महात्मा पुरुषोत्तम भीष्म दक्षिणायन मूर्य पर्च- मान रहने पर किमी प्रकार से भी अपना शरीर नहीं त्यागेगा भीष्मनी इस वचन को मुनकर वोले कि मैं अभी नियत वर्तमान हूं । ९४ । पृथ्वीपर गिरे हुए उत्तरा- of Arjun, your father, a little before sunset, with n sight of your sons. fell down pronc from lijs chariot. At the fall of Bhishnı from tho chariot, there were crios of sorrow raised from the kings and the gods on high. Our hearts broke with his fall. That valliant nan, tall as Indra's banner, shook the earth with his fall, but pierced with arrors as he was, ho did not touch the ground and remained upraised on the bed of arrows. While lying on that bed of arrors, tho great archar, best of mon, Bhislim fallen down from his chariot, exhibited signs of his divino origin: rain fell from clouds and the earth shook. 91. At his fall ho say the sun in his southern course and thinking of the unfitness of the time he regained his senses Ho hoaid these words from the mid air:-" Mighty Bhishm the best of mon bearing arms, will not leave his mortal frame as long as the sun will stay in tho South." On hearing those words Bhislım said: "I am yet alive" and longing 14950] Malinbharat (४९५०) रमा गाङ्गेय सशस्त्रमृतावर । काल फर्ता नरभ्यान सम्प्राते दक्षिणायने ॥ १५ ॥ स्थिनोरमीति च गारपस्तन्छत्या वाफ्यमब्रवीत् । धारयामास च प्राणान् पतितोपि महीतले ॥९६॥ उत्तरायगमन्विान् भीष्म कुरुपितामहः । तस्य तम्मतमानाय गडा हिमवत गुता । ९७ ॥ महर्शन् हसम्रोण प्रेषयामास तत्र । तत सम्पातिनो हसा स्त्वरिता मानसीकस ॥९८॥ माजग्मु सहिता द्रष्टुं भीष्म कुरपिता महम् । यते नरश्रेष्ठ शरतल्पे पितामहः ॥ ९९ ॥ तेतुमीम समासाद्य अषयो हंसरूपिण । अाश्य न्छर तल्पस्थ भीम कुरकुलोढहम् ॥१..॥ ते त पृष्ट्वा महामान कृत्या चापि प्रद क्षिणम् । गाईयं भरतश्रेष्ठ दक्षिणे नच भास्करम् ॥ १.१॥ इतरेतरमामय प्राहुस्त मनीषिणः । भीम कथं महात्मासन सस्थाता दक्षिणायने ।। १०२ ॥ इत्युपत्या प्रस्थिता इंसा दक्षिणामभितो दिशम् । सम्प्रेक्ष्य थे महायुशिश्चिातपित्याच भारत ।१०३ तानत्र पग को चाहने उन कौरवों के पितामह भीष्मनी ने माणों को धारण किया ।९५॥ हिमाचल की पुत्री श्रीगंगानीने उन के अभिमायको जानकर महर्षि लोगोंको हंस रूप करके उनके समीप भेना ।१५। इसके पीछे वह बहुत उड़ने वाले शीमगामी इंस एक साथही उन कौरवों के पितामह भीष्मनी के देखनेको ।१७ उम स्थानपर भाये नहां नरोत्तम भीष्म पितामह शरशय्या पर सोतेथे वहां भाकर हमरुपमहपियों |ने उम शरशय्या पर नियाहुए कौरव भीमनी को देखा और उनको दक्षिणापन मूर्य में पड़ा हुआ देखकर बड़ी परिक्रमा कर परस्पर में सलाह करके यह कार 1१०० । कि भीष महात्मा दक्षिणायनमें कैसे जायगा ऐसा कहकर वह हम दक्षि- की भोरको चलाये । १०१ । हेभरतर्षभ यड़े युद्धिमान भीमजी अच्छी रीति से उनको देख विचारकर शोच पूर्णक योले कि हे महर्पियो में किसी रीतिसे भी दाक्षिणायन मूर्य में नहीं जाऊँगा पही मेरे मनमें दृढ़ता है उत्तरायण सूर्य होने पर में अवश्य अपने प्राचीन स्थान पर जाऊंगा। १.३॥हे हंसम्प महात्मा लोगो में आप लोगों से for the Northern course of the sun the grandfather of the Kaurafas chid not did 95 Gangn the daughter of Ilunachal, hnonings 11:0 olijct of his desire, sent to hun the Mahurrhen the disguico of Krant. TH040 strifle going trans arme a: once to ac the grandfather of tho Knuraing to tho plneo where lie me lying on the lev! arros Thuy Anit hun lyong tliete on the arrony lcd, and sering Jom lying down during the soutlocru conteso of tho sin, thus rent round lum nu saxl unanjinously. 100 This grunt Bhislım annut depart from the world lien thc son is in its southern man llavings reaid thve, therrans flor nimny towards the south the wise. lisring whed at then carefully, and, Ogrent rulsis, not to lose the rorli daring the southern counter the blli, but as soon as in thinger this Mures torants the northy . ." Thream "Imrerolreal.

(४९५१) tagg Bluishima Paly [4051] धीच्छान्तनवो नाहं गन्ता फयन्चन ।दक्षिणावर्त आदित्य एतन्मे मनसि स्थितम् १०५ गमिष्यामि स्वकं स्थानमासीय पुरातनम् । उदगाथन आदित्ये हंसाः सत्यं प्रधीमि पः॥ १०५ ॥ धारयिष्याम्यहं प्राणानुत्तरायणकाक्षया । ऐश्वर्यभूतः प्राणानामत्सों हि यतो मम ॥ १०६ ॥ तस्मात् प्राणान् धारयिंप ममपरदगायने । यश्च दत्ता घरी मछवित्रा तेन महारमना ॥ १.७॥ छ.दतो मृत्युरित्येयं तस्य वास्तु घरस्तथा । धार यिये ततः प्रागानसर्ग नियते सति ॥ १०८ ॥ इत्युपत्या तास्तदा इंसान स होते शर सम्पमः। एवं कुरुणा पतिसे शृङ्गे भीष्मे महाजसि । १०१ । पाण्डवाः सन यायंघ सिंहनादं प्रचक्रिरे । तस्मिन् हत महासस्ये भरतानां तामह ११०॥ न किञ्चित प्रत्यायन्त पप्रास्ते भरतर्षभ । सम्मोहश्चय तुमछुः कुरूणाममवत्तदा ॥ ११ ॥ कृप कहताई कि मैं उत्तरायण की इच्छा से प्राणों को धारण करूंगा। १०४ । क्योंकि अपने प्राणोंका त्यागना मेरेही स्वाधीन है इस तसे उत्तरायण मूर्य में प्राण त्यागकरने की इच्छासे मैं तबतक अपने प्राणों को धारण यऊंगा । १०५ । उस महात्मा पिताने जो मुझको अपनी इच्छाके अनुसार जब चाहे तब मरें, यह जो वर प्रदान किया है उसको मैं वैसेही समझता हूं और वास्तव में भी वह यथार्थ है । १०६ । इस कारण देहत्याग निश्चय होनाने पर भी अपने माणों को धारण करूंगा उन हंसों से ऐसा कहकर शर शय्या पर शयन कर गये। १०७ । इस प्रकार उस बड़े पराक्रमी कौरवोंके वृद्ध और प्रधान भीमजी के गिराने पर पाण्डवोंने और सजियोंने सिंहनाद किया । १०८ । हे राना उनबड़े बलिप्ठ मतापवान कौरवों के दृद्ध पितामह के आसन्न मृत्युहोने पर आपके पुत्रोंने कुछ करने के योग्य कर्म को नहीं मान। । १०९ । उस समय कौरवोंको बड़ा भारी मोह उत्पन्नहुमा उसकेपीछे कृपाचार्य औरदुर्योधनादि सबलोग स्वासामों को लेलकर बड़ारुदन करनेलगे और इसी व्याकुलतामें बहुन विलम्ब तक अचेत नियत shall depart to my old seat in hearen. I say to your great Dishis in the form of surans, that I shall live.and want all then; for wy Jilo is in my power and I will not die till the sun has changed his cuurso towards the north. 105. My nighty father granted me the boon that I should live as long as I dened. I think his words were tree to the letter. I shall therefore heop my lifu alilivugh the desertion of this body is certain." Haring said this to the stans, he lay dora again on his arrosy bed. Tlus the mighty ancestor of the Kauravas fell, and the Pundaras with the Sriojagns raised & leonine At the fall of that mighty ancestor of the Kauravas and his being at the point of deatli, your soos boes not nhat to do. The Kauraras ree then very dejected, and Duryo. dhan and others wept with dzep sigla. They remained insensiblo roar.

- [4932] Malalharat (४९५२) दुर्योधनमुखा नि श्वस्य रुरुदुस्तत । विपादाच्च चिरंकालनतिष्ठन् विगतेन्द्रियाः ।। ११२ ।। दध्युश्चैव महाराज न युद्धे दधिरे मन । ऊरुग्राहगृहीताश्च नाभ्यधावन्त पाण्डवान् ॥११॥ मवध्ये शान्तनो पुत्रे हते भीष्मे महाजास । अमावः सहसा राजन् फुरुराजस्य तर्कित. ॥ ११४ ॥ इतप्रवीरास्तु वयं निकृत्ताश्च शितैः शरैः फिर्तव्यं नामि जानीमो निर्जिता सध्यसाचिना ।। ११५ । पाण्डवाश्च जयं लब्ध्या परत्र च परां गतिम् । सर्वे दहाशंखान भगः परियवाहवः ।। ११६ । सोमकाश्च सपन्चालाः पाहण्यन्तजनेवर । ततस्तूर्यसहसेष नतुस समहाबलः ॥ ११७ ॥ मास्फोटयामास भृशं भीमसेनो ननाद च । सेनयोरुभयोश्चापि गाङ्गेये निहते विमौ ॥१८॥संन्यस्य घोग. शस्त्राणि प्राध्यापन्त समन्ततः । प्राकोशन प्राद्रवंश्चान्ये जग्मुमोह तथा परे होकर महा शोचग्रतासे युद्ध में चित्तनहीं लगाया । १११ । हृदयके ग्राह से पकड़ेहुये अर्थात् शोचसे ग्रसितहोके पाण्डवों के सम्मुख भी नहीं दौड़े । ११२ ॥ जिनके कि बड़े २ शूरवीर मारेगये ऐसे हमलोगोंने दुर्योधनका नाशहोना वित्त से विचारकिया। ११३ । अर्जुनसे परास्तहोकर हमलोगोंने करने के योग्यकर्म कोभी नहींजाना और परिघ के समान भुजाधारी सपशूरवीर पांडवोंने इसलोक में तो विजयरूपी कीर्तिको और परलेक में उत्सम गतिको पाकर बड़े , २ .शंखों को बनाया हे राजा पांचालों समेत सोमकलोग अत्यन्त प्रसन्न हुए।। ११५ । | फिर हजारों वाजों के वजने पर उस महावली भीमसेन ने भुजदण्डों के कविन शब्द किये अर्थात् दोनों खम ठोककर बड़ी गर्जनाकरी । ११६ । उस समर्थ गांगेय भीष्मजी के आसन्न मृत्यूहोने पर दोनों सेनाओं के शूरवीरों ने शलोंको त्यागकरके चारों ओरसे बड़ा ध्यान किया । ११७ । कोई पुकारा कोई भागा | कोई अचेत हुभा किसीने क्षत्रीकुलकी प्रशंसाकरी किसी ने भीष्मनी की प्रशंसा | करी । १९८ । ऋपियों ने और पितरों ने भी महावत भीष्मजी की प्रशंसा करी for a long time and did not sejoin in battle on account of sorrow. 111. Being much dojocted 10 znind they did not rush against the l'anda yao. At the death of our great sarriors, we thought that the destruction of Duryodhan was bure. Defeated by Arjun we did not know what to do, and all tho Pandav waniors with tlıcir arms liko clubs, got victury and faruc in this world and thu rogions of the righteous in the next. Ihey blew their conolis and tho Somaks vith the Panchals vore niuch pleased. 115, At the sounds of thousands of tho musical instruments, valliant Blumeen made a great noise by the beating of liis upper arms and reared a loud roar, When miglity Bluishiw the son ol Ganga rus at tlic point of death, the warriors of both the armies laid down their ar lus and romainod plunged in decp thought Some cricd out, somo hed, some became insonsible, some praised the (४९५३) भीष्मपर्व Bhishma Parv [4953] ।।११९ । क्षत्रे चान्येयनिन्दन्त भीम चान्येभ्यपूजयन् । ऋपयः पितरदचव प्रशशं सुमहानतम् ॥ १२ ॥ मरतानाञ्च ये पूर्व ते चैनं प्रशशंसिरे । महोपनिषदञ्चय योगमास्थाय वीर्यवान् । जपन शान्तनबो धीमान फालाफांसीस्थितीभवत् ।।१२१ । इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि मीमवधपर्वणि भीमपराक्रमे विंशत्यधिकशतोऽध्यायः ॥ १२० ।। धृतराष्ट्र उवाच । कयमासंस्तदा योधा हाता भीमेण सञ्जय । बलिना देय कल्पेन गुर्वषं ब्रह्मचारिणा ॥ १ ॥ तदेष निहतान् मन्ये फुरुनन्याध पाण्डयः । न प्राहरवदा मीमो पूणियाद्रुपदात्मजम् ॥ २ ॥ ततो पुःखतरं मन्ये किमन्यत् प्रमविष्यति । मद्याहं पितरं अरवा निहतं स्मसुदुर्मतिः ॥ ३ ॥ अश्मसारमयं नून हृदयं मम सज्जय । भृत्या विनिहतं भीष्म शतधा यान वीर्यते ॥ ४ ॥ यदन्य और भरतवंशियों के जो पूर्व के स्वर्गवासी पुरखालोग थे उन्हों ने भी उनकी बड़ी प्रशंसा की । ११९ । पराक्रमी और बुद्धिमान भीष्मनी महा उपनिपपी योग में वर्तमान होकर जपमें मत्त उत्तरायण मूर्य काल के इच्छावान् होकर नियत हुए'१२१ ।। अध्याय १२१ ॥ पृतराष्ट्र पोले हे संजय उन पराक्रमी देवता के समान गुरु पिता ब्रह्मचारी भीष्म से पृथक् होकर शूरवीर लोग किसदशा में होकर कौन काम करनेलगे 1१। जबकि भीमनी ने दयाकरके शिखण्डी के ऊपर किसी शस्त्रका प्रकार नहीं किया तभी से में कौरवों को पांडवों के हाथ से मृतकरूप मानता हूँ । २. हे संजय अब इससे अधिक दूसरा कौनसा दुःखहोगा कि पिता को भी मृतक सुनकर मैं निर्बुद्धी नीता हूं । ३ । हे तात निश्चयकरके मेरा हृदय लोहे से भी कठोर है जो अपने पिता भीष्मनी को भी मुनकर सौ दुकड़े नहीं होता है सुन्दर व्रत kshiatryas and como praised Bhishm. The rishis and pitars too, praised Bhishm of dreadful you and tho forefathers of the Bharats residing in heaven, gave him much praise. Valliant and wise Bhishm engagod in and jap, tvaited there for the northern courso of the yog sun." 120. CHAPTER CXXI Dhritrarhtra. said:-"What did the warriors do, Sanjaya, after boing separatad from Bhishm the grandfather, vonorable like a god ? "Thon I heard that ho, out of neroy spared Shikbandi and did not Found him in return, I thought that the Kauravas wore all slaughtered by tho Pandaras. What griof can be greater, O Sanjaya, than that I am alivo after hearing the death of my father! Surely my heart must be harder than iron as it does not break into a hundi od piocos at licuring the news of my father's dorth. Lot mo -- [4954] Mahabharat [४९५४) निहसेनाजी भीषण जयमिच्छता । ऐष्टित कुरुसिंहेन तन्मे फथय सुव्रत ॥ ५ ॥ पुनः पुनर्नमृप्यामि हतं देवत्रतं रणे । नहतो जामदग्नोन दिव्यरस्त्रैरय पुरा ॥६॥ स हतो द्रौपदेयेन पाञ्चाल्यन शिखण्उिना। सम्गय उयाच । सायाहने निहतो भूमी धाराष्ट्रान घिपादयन् ॥ ७ ॥ पञ्चालानां ददो ह भीष्मः कुरूपितामहः। स मोते शरतल्पस्थो मेदिनीमस्पृशस्तदा ॥ ८ ॥ भीमे रथात प्रपतिते प्रध्युते धरणी. सले । हाहेति सुमुलः शब्दो भताना सम पद्यत ।। ९ ॥ सीमावृक्षेनिपतते कुरूणां समि तिजये ।सेनयोरुभयोराजन् क्षत्रियान् भयमाविशत् ॥ १०॥ भीम शान्तनयं दृश्या विशीर्णफयचध्वजम् । कुरय पर्यवसन्त पाण्डवाश्च विशाम्पते ॥ ११॥ तमः संय तमवासीद्धानुर्गतप्रमः । ररासपृथिवी चव भीमे शान्तवे हते ॥१२॥: अयं ब्रह्मविदा धारी संजय यहां युद्धभूमि में विजयाभिलापी कौरवोत्तम आसम मृत्यु भीष्मजी ने जो काम किया वह मुझ से कहो। ५। मैं युद्ध में मृतक देवत्रत भीमको बारम्बार स्मरण करके अधर्य होता हूं कि जो भीम पूर्व समय में परशुरामनी के भी दिव्य अस्त्रों से नहीं मारागया वह द्रुपद के पुत्र पांचाल देशी शिखण्डी | के हाथ से मारागया । ६ । संजय योले कि सायंकाल के समय धृतराष्ट्र के पुत्रों के व्याकुल करनेवाले पांचाल देशियों को कौरवों के पितामह भीष्म जी ने आनन्द दिया, भौर वाणशय्यापर नियत पृथ्वी को विना स्पर्श किये अपन | करनेवाले हुए रथसे भीरके गिरने और पृथतिल से ऊपर पड़ने पर जीवोंका हाय हाय शब्द अत्यन्ततासे हुमा कोखों के युद्ध की सीमाके वृक्षरूप महाविजयी भीमफे गिरने पर।९।दोनों सेनामों के क्षत्रियों में महाभय उत्तमहुआ हे रामा शंतनु के पुत्र भीष्मको दृट्टा कवच और ध्वजा से रहित देखकर चारों ओरसे कौरव और पांडव वर्तमान हुए प्राकाश में अंधेरी छाई सूर्यमें अप्रकाशता आगई । ११ । औरपृथ्वी ऐसे शब्दों से शब्दायमान हुई कि यह ब्रह्मशानियों में वा ब्रह्मके जानने वालों में know, good Sanjaya, all that Blislım the best of Knurayas desirous of victory and fated to dio did in the fiold of battlo. Romomboring Desabrat Bhishma's death in the field of battle, I bocomo impatient ngain and agnin to think that ho uho was not killed by the divine weapons of Parasburam, is now destroyed by Shikhandi of Panchai tho son of Drupad."6. "By the appranch of evening," said Sanjaya, "Bhishm the grandfather pleased the Panchals to tlo great grief of the Kaurava. Lying on the bed of arrow, without touching the ground, Bhislım fallen froin his chariot causcu great grief to all tho pouple. At the fall of Blislım the great conquerer and boundary trio of the Kaurar var, great fear was cused among tho warriors of both the nrinics. Scoing Bhishin with tho armour and banner bruken tlie Knurarns and the l'andavas gathorel on all des; the sky bxcximo dark and the sun's light dimined. 11. Tho earth nas filled with the (४९५५) भीमप Bhishma Pary [4955) श्रेष्ठो ह्ययं ब्रह्म विदांपरः । इत्यभापत मतानि शयान पुरपर्वमम् ॥ १३॥ अयं पितर माशाय कामात शान्तनु पुरा । ऊयरेतसमात्मानं च फार पुरुषर्षमः ॥ १४ ॥ इति स्म शरतल्पस्थं भरतानां महत्तमम् । पपत्त्यभ्यमापन्त सहिताः सिद्धचारण. ॥१५॥ हते शाम्तनवे भीष्मे भरतानां पितामहे । न फिन्चित् प्रत्यपद्यन्त पुमास्तथ हि मारिष ॥ १६॥ विषण्णवदनाश्वासन हतधीकाश्च भारत । अतिप्टन बोरिताश्चैव हिया युक्ता यधोमुखाः ॥ १७ ॥ पाण्डवाश्च जय लब्ध्या संग्रामशिरसि स्थिता । स महा शवान् हेमजालपरिष्कृतान् ॥ १८ ॥ हात्तयंसहमे युवाद्यमानेषु चानघ । अपश्याम महाराज भीमसेन महाबलम ॥ १॥ चिक्रीडयान फान्तेय हपण महसायुतमामिहत्य तरसा शहुँ महायलसमन्यितम् ॥ २०॥ सम्मोपचाप तमल पुरूणामभवचतः। फर्ण दुय्योधनी चापि निम्म्यसेता मुहुर्मुहु ॥ २१ ॥ तथा निगतित भीष्मे फोरयाणां पिता श्रेष्ठ है । १२ । जीवों ने उस सौतहुए पुरुषोत्तम के विषय में यह वचन कहा कि पूर्व समय में इमी श्रेष्ठ पुरुपने अपने पिता शन्तनु को कामाग्नि से पीड़ित जानकर अपने को ब्रह्मचारी किया और चारणो समेत ऋपियों ने उन वाण शय्य पर नियत कौरवों के पिनामह भीष्मजी के आसन्न मृत्युहोने पर यह वचन कहा । १५ । कि आपके पुत्रों ने कुछ करने योग्य कमको नहीं जाना हे भरतपंभ धृतराष्ट्र उनशांभा में राहत खिन्न स्वरूप लज्मा युक्त इंपा से भर युद्ध में अटत्त पाण्डवों ने विजय को पाकर । १७ । मुवर्ण जालों से अलंकृत बड़े बड़े शखा को यजाया है निप्पाप बड़े प्रानन्द के हजारों वानों के वजने पर हमने महायलो कुन्तों के पुत्र भाममन को पड़ी प्रसन्नता युक्त क्रीड़ा करता हुमा देखा । १९ । यहे वली पांडव शत्रको अपने वेग से मारकर महा ममम हुए तब कोरवों में महा कठिन मोह उत्पन्न हुा । २० । इसोपकार भोप नी के परने पर कर्ण और दुय्योधन ने भो बारम्बार बास लिये । २१॥ sounds of He was the best of those who know Brahma' People remarkel about that heat of mon lying thore _“This is he who in formor timor Knowing his fathor Shantanu to be burning in the firo of lust, observed a vow of perpetual colibrcy Scoing the grandfather of the Kauravas lying on the hol of arrows from head to foot and roady to die, the rishis sad -15. "The sons of Dhritrashtra did not net wisely." Splendourless and ashamed full of enmity and engaged in battlo, thu Pandavas having got yictory blew their conchs decked with the network of gold At tlie sound of thousands of the musical instrumonts we saw mighty Bfiimsen, flie fon ot Kunti, beating timo in his glea. The valliant Pandas as having killed the enemy ły their prowess, wero clocrful 10 Alurit and the Kaurit as woro much chagrin. ed 30. At the full of Bl) in Durycolan erd harrn heaved sighs of distress All the peoplo wept for grief ord llcre as cofusion [ 4956] Mahabharat (४९५६) महे । हाहाभूतमभूत सय निर्मादमघर्तत ॥ २२ ॥ दृष्ट्याच पतितं भीष्मं पुनो दुःशा सनस्तय । उत्तम जपमास्थाप द्रोणानीकमुपाद्रषत् ॥ २३॥ भ्रामा प्रस्थापितो धीरः स्वेमानीकेन दशितः। प्रययौ पुरुषव्याघ्रः स्पसन्यंस पिपादयन् ॥ २४ातमायाग्तमभि प्रेक्ष्य कुरयः पर्यवारयन् । दुःशासन महाराज किमयं यक्ष्यतीसि च ॥ २५ ॥ ततो द्रोणाय निहतं भीष्ममावष्ट कौरषः। द्रोणस्त प्राप्रिय धुरवा मुमोह भरतपम ॥ २६ स सशामुपलभ्याशु भारद्वाजा प्रतापघान् । मियाायामास तथा स्वान्यनीकानि मारिप ॥२७॥ विनिवृत्तान् कुरुन् इट्वा पाण्डयापि स्वसैनिकान् । वृतैः शीनाश्यसंयुक्तः सम न्तात् पर्ययारयन् ॥२८॥ निवृत्तेषु च सम्येपु पापर्येण सर्वशः । निर्मुक्कफवचाः सर्वे भीष्ममायुराधिपाः ॥२९॥ पुपरम्य ततोयुवायोधा शतसहस्रशः उपतस्थुमहारमानं सब हाय हाय रूप हुआ और अमर्यादा वर्तमान हुई आपका पुत्र दुश्शानन भीष्मजी को गिरा हुभा देखकर । २२। बड़ी तीव्रता में नियत होकर द्रोणा- चार्य की सेना में गया वह भाई का भेजाहुमा अपनी सेना से अलंकृत धीर दुशासन अपनी सेनाको विह्वल करता हुमा गया हे राजा कौरवों ने उस आपे हुए दुश्शासन को देखकर चारोंभोरसे इस निमित्त घेर लिया कि देखिये यह क्या कहता है । २४ । इसके पाछे दुश्शासन ने भीष्मजी के मरने का वृत्तान्त द्रोणाचार्य जी से कहा । २५ । तब द्रोणाचार्य उसके अमिय पचनको मुन कर शौक से भवेतहोगये फिर उसमतापवान् द्रोणाचार्य ने सचेतहोकर । २६ । अपनी सेनाओं को और कौरवों ने भी लौटेहुए अपने कौरवी लोगों को देखकर अपनी मबल सेनाको निषेध करदिया । २७ । और शीघ्रगामी घोड़ों पर सवार भप- ने दूतों को इधर उधर भेमकर सब को निषेध फरवादिया । २८ । फिर सयराजालोग अपने २ फवोंको उतार २ कर भीमजी के पासगये तदनन्तर लाखों शूरवीर युद को विश्राम करके उसमहात्मा भीष्मके पास भाकर ऐसे नियतहुए जैसे कि देवता कोग ब्रह्माजी के पास इकट्ठे होते हैं हे राजा इसके पीछे सब पांडव लोग throughout. At the sight of Bhishma's fall your son Dushasan bastened to the army of Bronacharya Sent by his brother with big brare Dushasan went on upsetting the minds of the soldiers. At his arrival tho Knurayns surrounded him on all sides to liest whint ho had to say tu theni Ho related to Dronacharya the nccount of Bliishma's death, and hoaring that an Falcome nons Dronacharya Irvancıl. On regaining consciousness he ordered liis soldiers to desist from fighting and other Kauraras followed his example They sent prift iuxsengers all round the army to stop fighting Then all the varius put of their arnour and went to Bhishra, and millions of Warriort, touring the field of battle, collectwd all round him like gala pound Bohn, Thich tho l'andavas and the Kauravas, bouing army, (१९५७) भीष्मपर्व Bhishma Parv [49571 प्रजापतिमिधामराः ॥३गा ते तु भीष्मं समासाद्य शयानं भरतपमम् । अभियाधाय तिष्ठ न्त पाण्रयाः कुरुमिः सह ॥ ३ ॥ अथ पाण्ड्न कुलंय प्रणिपरयामतः स्थितान। सभापत धारमा भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥३२॥ स्वागतं योमहामागः स्वागतंयोमहा स्याः । तुष्यामि दर्शनाच्चाई युष्माफममरोपमाः ॥ १३ ॥ अमिमन्त्रयाथ तानेवं शिर सालम्पसाबपीत् । शिरो मे लम्घतेत्पर्य मुपधानं प्रदीयताम् ॥ ३४ ॥ ततो नपा सजा अहस्तनि च मृदनिध । उपधानामि मुख्यानि नैच्छत्तानि पितामहः ॥ ३५ ॥ अथानपी भररुपानःप्रहसनिय तान्नृपान् । नेतानिधीरशय्यासु युक्तरूपाणि पार्थिवाः ॥ ३६ ॥ ततो मीक्ष्य नरश्रेष्ठ मध्यमाषत पाण्डवम् । धनजयदीपघाई, सर्वलोकमहारयम ३७॥ धनजय महावाहो शिरो मे तात लम्बते । धीयतामुपधानं याकमिहमन्यसे ॥३८॥ इनि श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि दशमदिवसावहारे एकविंशत्यधिशतोऽध्यायः ॥ २१ ॥ भी कौरवों समेत उस शयनकरते हुए भीमजी को पाकर । १० । दोनों हार्योसे दण्डवत् करके नियतहुए इसके पीछे शंतनुकेपुत्र भीष्मजी सयकी यथायोग्य शिष्टाचारी करके अपनेसम्मुख वैठेहुए पांडव और कौरवोंसे योले हे महाभागो तुम्हारा आगमन सफल हो और हेमहारथी लोगो तुम्हारा प्रागमन श्रेष्ठहो । ३२ । हे देवताओंके समान पुरुप लोगो मैं तुम्हारे देखने से बड़ा प्रसन्न होताई इन सबलोगों से ऐसा कहकर फिर शिरको लटकाये हुए कहने लगे ॥३३॥ कि मेराशिर अत्यन्त लदकता है इससे मुझे तकिया दो यह सुनकर राजाभों ने बड़े उत्तम मृदृस्पर्शवाले तकिये लाकर दिये । ३४ । मन तकियों को पितामहने नहींचाहा और हँसकर राजाओं से कहा कि । ३५ । हे राजाओ यह तकिये वीरोंकी शय्याभों पर शोभित नहीं होते हैं फिरसव लोकके महारथी प्रतापी पांडव अर्जुनको देखकर बोले कि हेमहापाहु अर्जुन मेरा शिर लटकता है तू मुझको उचित तकिये देदे । ३८ । luim lying thore, stationed thepsolves after saluting him with both hands Then Bhishm the son of Shantanu, having asked of their Welfaro, said to the Kauravas and Pandayag seatod before them, "You are welcome, great men, may you be happy and prosperous, brave warriors! men like gods, I am much pleased to seo you." Having said this ho again continued with his head lying low:"My head is hanging painfully, pray give me a pillow." At this the kings brought him soft pillows; but the grandfather was not eatisfied and with a smiling face lo said to them, "* These pillows are not befitting the warrior." Then looking towards Arjun the world's bra rest warrior, he said:--"My head hangs down, brave Arjun, give me a fitting pillow,"37.

[ 1958 ] Mahabharat (४९५८) सजय उवाच । समारोप्य महच्चाप मभिवाद्य पितामहम् । नेत्रापामधुपूर्णापा मिदंवचनमकीत् ॥१॥ बामपय करुश्रेष्ठ सशस्त्रभवावर । प्रेष्योहं तवदुर्धयक्रियता किंपितामह ॥ २ ॥ तमनधीच्छारतनय शिगेमेतात लम्पते । उपधानकुरुश्रेष्ठ फाल्गुनो पद्धवस्वमे ॥३। शग्नस्थानुरूपये शनिं चोर पयच्छमे । त्वं हि पार्थ समाये श्रेष्ठ सर्व धनुष्मताम् ॥क्षधर्मस्यवेत्ताचयुद्धिसत्वगुणान्वित ।फाल्गुनौपितयेत्युक्त्वाव्यघसाय मरोचयत् ॥ ॥ गृह्यानुम-नगांडीव शरान्सनतपर्वगः। अनुमान्यमहात्मानं भारतानांमहा रथम वानिभिस्तीगमहावेगैरवगृह्णाग्छिर शरै अभिप्रायेतु विदितेधर्मात्मासव्यसा चिना ॥ ७॥ अनुष्यद्भरतश्रेष्ठो भीमो धर्मार्थतत्ववित् । उपचानेन दत्तन प्रत्यनन्दन अध्याय॥ १२२॥ संजय बोले कि इमथचनको सुननेही अर्जुन बड़े भारी धनुप को हाथमें लेके भातयुक्त हो पितामहको दण्डवकरके यह वचनयोला । १ । हे कौरवोंमें श्रेष्ठ सब शस्त्रयारियों के शिरोमणि महादुर्जय पितामह मैं आपका दामहूं भापमुझ को जो आज्ञादें वही मैं करूं । २ । भीष्मजीने कहा हे तात कौखों में श्रेष्ठ अर्जुन मेरा शिरलटकता है तू मुझको तकियादे । ३ हे वीर बहुनशीघ्र मेरे शयनके योग्य तकियादेदे हे' भर्जुन तूही समर्थहोगा तूही सब धनुपधारियों में श्रेष्ठ होगर तूही क्षीधर्मका जानने वाला बुद्धिमान सनागुणयुक्त होगा यह सुनकर अर्जुन ने भी बहुत श्रेष्ठ कहकर उपाय और परिश्रमको अंगीकारकिया । ५ । और गांडीवधनुष को हाथमें लेकर गुप्त ग्रन्धीवाले याणों को अभिमंत्रितकर भीष्मनीकी प्रतिष्ठाकरके ताण और वेग युक्त तीनवाणों से उनके शिरको सीधाकिया चित्तका मियज्ञात होने पर धर्मात्मा और मुख्यता के जाननेवाले भरतर्षभ भीष्मनी इम कर्मको देख कर अर्जुनपर अत्यन्त ममन्नहुये और इमतकिये के देनेसे अर्जुनकी बड़ी प्रशंसाकी CHAPTER CXXII "As soon as Arjun heard those words," said Sanjayn, "he took up in luis hand his largo Low with tears in his eyes, and bowing down beforo lim ho said, "Best of the Kauravas and princo of warriors, invincible grandfathcı, I am at your service to do your bolicat,"Aly head hangs down, son, best of the Kaursvas," repl ed Blhish, give ane a pillow. Hasten, Owarior, to girc ino a pillow snitntic fur my rupa-0. Thou nlond canst givo it. Thou art tho foremost of archers. Thou knowst the cluties of a shatrya and art wise and codowed with salogan." At this Arjun sau 'Vury well' and accepted the undertaking 5. Haring takon up the Gandiv bow lic pronouncoil apliorisus on luis arrows loving ludden Knols, and with thirco sharp arrows ho resprocifully uprasel the head of the grandfatlıcr. Viriuous Blishiu the best of Bharats was Otceedingly plcased with Arjud at thus giving liim the object of liis desire and culorised ljsu for giving - (४९५९) भीष्मपर्व Bhishula Pary [19591 नम्नयम ८ ॥ प्राहसान ममुद्रीय भरतान् भारतं प्रति । कुन्तीपुत्रं युष श्रेष्ठ सह दो प्रीसिवर्धनम् ॥९॥ शयनस्यानुरूप में पाण्डवोपहिनस्यया । यधन्यथा प्रपंचयाः सोपस्वामहं रुपा १०॥ एपमेध महायाही धर्मेषु परितिष्ठता । स्वतन्यं क्षत्रियणा जो शरलपगतेनये ॥ ११ ॥ एयमुफ्त्वा तु धीमतूस सर्यास्तानग्रपीढचः । राशय राज पत्रांश पंडघा नमिसस्थितान् ॥ १२॥ पश्यध्वमुपधानं मे पाण्डयेगामिसन्धितम् । शि यहमा शय्यायां यावदावत्तंन रखे ॥ १३ ॥ येतदामां गमिष्यन्ति तेच प्रेरपन्तिमा नुपाः। दिशंधश्रवणाकान्तां यदा गन्ता दिपाकरः ॥ १४ ॥ नूनं सप्ताश्य युक्तंन स्पेनोत्त मतेजसा । विमोदयह सदा प्राणान् सुहदः सुप्रियानिय ।। १५॥ परिखाःपन्यतामन ममायसदने नृपाः । उपासिप्ये विघस्वन्त मेयं शरशताचित.1 उपारमध्य संग्रामाट धेरभुतपय पापियाः ॥ १६ ॥ सन्जय उयार । उपातिष्ठन्नयो धाः शल्योररणको- 1८। और सब भरतवांशियोंके मध्यमें इस श्रेष्ठ मित्रों की प्रातिके बढ़ाने वाले कुन्ती के पुत्र अर्जुन से योले कि । ९ । हे पांडव तुमने शयनके समान मुझको तकिया दिया और जो कदाचित विपरीत कर्म करते तो में अवश्य तुमकोशाप देता ।१०॥ रे महावाहु धर्मो नियत शरशय्यापर वर्तमान क्षत्रीको युद्धभभि में निश्चय करके इसीरिति से शयनकरना योग्य है । ११ । इस रीति के वचन अर्जुन से कह कर और पास बैठे हुए राजकुमारों से बोले ।१२। कि पांडक्के लगाये हुए मेरे तकिय को देखो मैं इसशय्या पर तबतक शयन करूंगा जबतक कि सूर्य दक्षिण मार्ग से उत्तर मार्ग में अर्थात् दक्षिणायन से उत्तरायण होनायँगे । १३ । जो राना उस समय मुझको मिलेंगे यह मुझको देखेंगे । १४ । जब सूर्य सात घोड़ों के उत्तम प्रकाशवान रथपर चढ़कर कुबेर की दशा को जावेगा तब मैं भी अपने मुहृद् इष्ट मित्रों समेत प्राणों को त्यागूंगा । १५ । हे रानालोगो यहाँ मेरे निवासस्थान पद तुम खाई को खुदवामो क्योंकि मैं इमरीति से हजारों बाणों से छिदे हुए शरीरसे सूर्य की उपासना करूंगा और तुम सब शत्रताको त्यागकर युद्ध मतकरो । १६ । him the pillow. In the midst of all the descondants of Blarats, lie thus addressed Arjun tho joy of his friends: "You haro giren me. O Pandav, r pillow to mach my bol. I slould liare curs d you, if you had acted otherwise. 10. A ksliatrya, firm on duty and lying on the bed of arrows in the battle field, should certainly repose like this." Having said such words to arjun, be turned to the princes sitting by, saying, "Look at the pillow which the Punday has furnishod for me. I shall reposo on this bed as long as the sun rould take to chango his course from South to North; tho Lings sho come to me then, will see me. When the sun on his brilliant chariot drawn by seven doet horsos will turn in the direction of Kurer, I shall harc my body with my friends. Dig a ditch round me warriors; for, with by body pierced by thousands of arrots, 1 slall adore the sun. I [ 4960 ] Mihabharat (४९६०) विदा । सापकरणैर्युका. कुशलै साधुशिक्षिता. ॥ १७॥ तान् वा जाह्नवीपुत्र प्रोयाच तनय तर।धन दत्वा विस् यन्तां पूजयित्वा चिकित्सका ॥१८॥ एषगते मयेदा वैये फायमिहास्तिफि । क्षध प्रशस्ताहि प्राप्तोस्मि परमागतम् ॥१९॥ नैष धर्मों महीपाला शरतापगतस्य मे । पभिरेष शरवाह दग्धव्योस्मि नराधिपा ॥२०॥ तच्छुत्या पचन तस्य एत्रो दुर्योधनस्तप । वैद्यान् विसर्जयामास पूजयित्वा यपाईत ॥ २१ ॥ ततस्ते विस्मय जग्मुर्नानाजनपदेश्वरा। स्थिति धौ परादृष्ट्या भीष्मस्थमिततेजस ॥ २२॥ उपधानरतोदरया पितुस्तेमनुजेश्वरा । सहिता पाहवा सबै कुरवश्च महारथा ॥ २३ ॥ उपगम्यमहात्मान शपान शयने शुभे । तेभिवाद्यततो भीष्म त्याच त्रि प्रदाक्षिणम् ॥२४॥ विधाय रक्षाभीष्मस्य स एव समन्तत । धीरा स्पशिघिराण्येय ध्याय-त परमातुरा ॥ २९ ॥ निवेशायापागग्छम् सायाइने रुधिरो इसके अनन्तर हे राना वहाँ सय भूषण और चिकित्सा के यन्त्रों से अलंकृत |पडितों से स्तूयमान सर्ववैद्य लोग मानकर वर्तमानहुए । १७ । गांगेय भीमनी | उनको देखकर प्रापके पुत्र से बोले कि इन वैद्योंको सत्कार करके दक्षिणापूर्वक | तुम पिदाकरदो । १८ । अब यहा मेरी यह दशाहोने पर मुझको वैचोस क्या प्रयो. जन है क्योंकि मैं क्षत्री धर्म में श्रेष्ठ होकर परम गतिको प्राप्तई । १९ । हे राजामो मुझ वाणशय्यापर वर्चमानकापही धर्म है कि मैं इन्हीं वाणोसमेत जलायामाऊ२०॥ उन के इस पचनको सुनकर आपके पुत्र दुर्योधनने अपनी योग्पता के अनुसार उन वैचोंको पारतोपिक देकर विदाकिया । २१ । फिर नानादेश के राजामोंने | बड़े तेजस्वाभीष्मनीको अपने धर्ममें देखकर वहा आश्चर्य किया।२२।इसकेपीछे भापके पिताको ताकेया देकर वहसय महारथी राजा वा पांडव और कौरव एक | साथही शुभशग्यापर सोतेहुए महात्मा भीष्मकेपास जाकर दंडवत् पूर्वक तीनपरि- क्रमाकर । २४ । सायंकाल के समय सयवीर चारों भोर से ध्यानकरते बडे दाखी ad vise juu to give up eninity and bloodshol." In tho meantime tllery camo to the place, all tho physicians, praised by the 110, with medicinos and surgical instrumonts Buislım thc son of Ganga, casting oyoon them, sard to your son, "Disnuus these physicias with danstions and respect Il but can the physicians avail me in this state of health ' I liaye gut all that a Ishatryą, firm on liis duty, should desire. It is ny duty and do no, that, Ising on the bed of arrows as I am, I should bu Luint along with these arrots' 20 At this, your son Duryodaan dismissod the physicians rath donations befitt ng his raab, Tho p inous of different countries, Ending Bhishm firin on his duty, wero much anizal. Thon hasing furnished a pullove for your father, all tho Lings with the Kaura pas and the Pandaras bored to Blushim who was lying on the bed of arrons and basins turnal round him tlireo tincz rotired to tucir respective tents with । (४९६१) भीमपर्य Bhishma Pary [49611 क्षिता नियिष्टान्पोउपविषप्रीयमाणामहारथान् ॥२६॥ भीमस्यपतने हटानुपगम्यमहा परः। उपाचमाधवाफाले धर्मपुत्रंयुरिष्ठिरम् ॥२७॥दिएपाजयसिकौरव्य विष्टयामीनो निपातितः । अयम्यो मानुरेय सत्यसन्धोमहारयः ॥२८॥ अथवा देवतः सार्ध सर्पशा खस्य पारगः । स्वांतु चतुर्हण प्राप्पदाधो पोरेण अक्षा ॥ २९ ॥ एवमुषो धर्मराजः प्रत्युभाष जनाईमम् । तब प्रसादाद्विजयः क्रोधात्तष पराजयः ॥ ३० ॥ वहिनः शरणं कृष्ण महानाममयदर । थनाधयों जयस्तेषां येत्वमसि फेशष ॥ ३१ ॥रक्षितासमर नित्य नित्यचापि हिते रत.सर्थयात्यां समासाद्य नाधर्यमिति मे मतिः॥ ३२ ॥ पच मुकाप्रत्युषाच स्मपमानो जनार्दन ! तयैवैतयुक्तरूपं घरनं पार्थियोचमः। ३३ ।। इति मा० भीमपर्वणि भीमरथपर्वणि द्वाविंशत्यधिकशतोऽध्यायः ॥ १२२ ।। रुधिर से भरेहुए अपनेर डेरोंमें विश्राम करनेके लिये गये और महायसी माधवजी उस मसान चिच थेठेहुए महारथी भीमनी के गिरनेपर प्रसन्न हृदय पांडवोंके पास जाकर समय पाकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर से कहने लगे । २७ । हे कौरव तुममारब्ध से विजय पानेहो और यह मनुष्यों से भवभ्य सत्पतिज्ञ महारयी भीष्म मारब्ध से गिरायागया । २८ । अथवा देवताओं समेत सशस्त्रों में पूर्ण तुमानेन से मारनेवाले को पाकर घोर नेत्र से भस्महोगया । २९ । यह सुनकर पर्मराज युधिष्ठिरने श्री कृष्णनी को उत्तर दिया कि आपके मसन्नहोनेसे विजय है औरमापकेही अमसन्न होने से पराजयहै ! ३० । हे भक्तमयहारी श्रीकृपया जी आपही हमारेरखाके स्थानहो और उन लोगोंको विजयकापाना कुछ माश्चर्य नहीं है जिनके हिनकरने में सदैव मष्टत्त चित्र और युद्ध में सदैव रक्षकहो आपको सबमकार से माप्त होकर पिनपका होना कुछ भाश्चर्य नहीं है यहमेरा मतहै । ३२ । इस रीतिके युधिष्ठिर के वचनों को सुनकर श्रीकृष्णनी बड़ी मन्दमुमकान समेत वोले कि हेराजामों में श्रेष्ठ युधि- हिर यहकहना सुमी को योग्यहै ।। ३३ ॥ heavy heartı, Mighty Madhar Front to the Pandavas sitting much please:1 at the fall of Bhish'n, and in his leistire thus addressel Yudhishthir:- "You have got victory by your good lack and it was by your good fortuno that invincibia Bhishm of trae vows tvas slain. Wo may say that he was barat by thg venthful eyes which can slay all the gods armed with weapons" To treso words of Shri Krishn, Yudhishthir made the following reply:- "Victory goes hand in hand witk your pleasure and defeat goes along with your displeasure, 30. Odispoller of the fear of your devotees, Shree Krishni, you are our only sofug>. It is not dificult for them to gain victory who almay have you for their well-risher and protector in battle. I think it is not strange for us to gain victory when you are on our sitle." On hearing theso words of Yudhishthir, Shree Krishn smiled very slowly and said, " best of kings; Yudbishthir, sach worda can come from thon alone"33.

[4962] Mahabharat (४९६२) सम्मय उवाच ॥ व्युष्टायान्तु महाराज सर्वय्यां सर्यपार्थिधाः । पाण्या धार्तराष्ट्राश्च उपातिष्ठन् पितामहम् ॥ १॥ तचीरशश्नेधीर शयाने कुरसत्तमम् । अभि पाघोपतस्थुध क्षभियाःक्षत्रियर्पमम् ॥ २॥ कन्याश्चन्दनचून लाजैमाल्लैश्च सर्वशः। अयाफिरछान्तनवं तत्र गत्वा शहसश. ॥ ३॥ स्त्रियोश्चात्तथा पाला: प्रेक्षकाथपृथ ग्जनाः । समभ्ययुःशान्तनयं भूतानीयतमोनुदम् ॥४॥त्याणि शतसंख्यानि तथैवनटनर्स काशिल्पिनश्च तथा जग्मुः कुरुवृद्धं पितामहम् ॥ ५॥ उपारम्यच युद्धेश्या समाधान पिप्रमुच्यते । आयुधानि च निक्षिप्य सहित': कुरुपाण्डवाः ॥ ६॥ अन्यासन्त कुराधर्षे देवव्रतमरिन्दमम् । अन्योन्य प्रीतिमन्तो यथापूर्व यथावयः ॥७॥ सापार्थिवशताफी अध्याय । १२३ 1 संजय बोले हे महाराज रात्रिके व्यतीत होने पर सबराना या पाराव और धृतराष्ट्र के पुत्र पितामह के पास वर्तमान हुए । १ । क्षत्रीलोग उन कौरयोत्तम क्षत्रियों में श्रेष्ठ वीरशय्या पर सोतेहुए वीर भीष्मनी को दरहवत करके उनके पास नियम हुए । २ । वहाँपर हमारों कन्याओं ने जाकर चन्दन चूराखील और संव | प्रकारको मालाओं से भीष्मनी का पूजन किया । । । युद्धास्त्री वा पाला स्त्री और | देखने वाले अन्य सावधान लोगभी उनभीप्मनी के समीप ऐसे गये जैसे कि मूर्य की उपासनाको मनुष्य और स्त्री जाते हैं । ४ । तालस्वर समेत ईश्वर का वर्णनकरने पाले याजेगाने समेत नाचनेवाले नट नागर और कारीगर लोग भी वृद्ध पितामह भीष्मनी के पासगये । ५। वह कौरव पांडवयुद्धों से निस्सहो शरीर के फयचादिकों को उतार सब शास्त्रोको त्याग एकसाथ मिले हुए । ६ । उनवुर्जय शत्रुजप देववत भीमजी के पामआकर पेठगये और सब लोग पूर्व के समान भरपा के क्रमसे परस्पर में प्रीतिमान थे, यह सैकड़ों राजाओं से व्याप्त भीमनी से CHAPTER CXXIII Sanjaya continued. "At the close of thio night, all tho kings with tho Pandavas and the sons of Diritrashtra came to the grand fatbor and sat by liitu after bossing to that liest of the Kauravas and kehatryas ising on the warliho bod. Thousands of girls came thicro and worslipped him with eandal powder, friod paddy and garlands, Old and young women and wiso mon came to Blislı ns iſ to worship the sun. Singers, players, dancers, acrobats, artisans and others tow, came to sco tlo old grandfather. The Kauravas and thio Pandarag loving given up fighting and put of their armour and thoir arms came together and sntly tho invincible destroyer of caemics, Dornbrat Pilislın. As in tlic days of old tley Orbate alectionately in the orler of their ngsa Cinsisting of thousands of hings, the court of the descendants of Barat, Florion by lot presence of Blislım, looked beautiful like the sui's curl in this why, (४९६३) भीष्मपर्व Bhishma Pary [49631 समितिभीमशोमिता । मुसुमे मारतीदीसा दियीवादित्यमण्डलम् ॥ ८ ॥ घियमी च नृपाणां सा गहासुतमुपासताम् । व्यानामिय देवेश पितामहमुपासताम् ॥ ९॥ भीम स्तुवेदनां धयाग्निगृह्य भरतपम । अभितप्तः शरश्चय निःश्यमन्नुरगो यथा ॥ १० ॥ शराभितंतकायोपि शनसन्तापमूछिनः । पानीयमिात संप्रेक्ष्य राशस्तान प्रत्यमापत ॥ २१ ॥ ततस्ते क्षत्रिया राजन नपाजहुममन्ततः । भक्ष्यानुच्चायचान् राजन वारि कुम्भांच शीतलान् ॥ १२ ॥ उपानातन्तुपानीय घट्ना शान्तनवोनधीत् । नाद्यातीताया शझ्या भोगाः फेचनमानुपाः ॥१३|| सपक्रान्तो मनुष्येभ्यः शरशय्यां गतोयहम् । प्रती क्षमाणस्तिष्ठामि निर्ति शशिर्ययोः ॥ १४ ॥ एवमुक्त्या शान्तनयो निन्दन वाफ्येन पाधिवान् । म णं द्रष्टुमिच्छामोत्यम्यभापत मारत ॥१५॥अथोपेत्य महायागुरमियाच पितामह · अतिउत् प्राजलिः प्रव किंकरोमीति चानचीत् ॥१६॥ तंदृष्ट्या पाण्ड शोभायमान भरतवंशियों की सभा ऐसी शोभायमान हुई जैसे कि आकाश में मूर्य मंडल शोमिन होताहै । ८ । गंगाजी के पुत्र की उपासना करनेवाले राजाओं की यह सभा ऐती प्रकाशमान हुई जैसे कि देवताओं के ईशर ब्रह्माजी की उपासना करने वाली देवमभा होती है । ९ । भरतांशियों में श्रेष्ठ वाणों से पीडामान सर्प के समान भात सो वाणों से पीड़ित शरीर और शवोंके प्रहार से मुछीवान भीप्मनी उन राजााँको देखकर धैर्य से पीडाको सहकर यह वचन बोले कि हमारे लिये जल को लाओ । ११ । इसके पीछे उनसत्रियों ने चारों ओर से छोटे बड़े भोजन पात्र और शीतलजल के घटादिक पात्रों को मँगाया । १२ । भीष्मनी उसमकार से लाये हुए जलको देखकर बोले कि हे तात कोई मानुपी भोग मुझ से भेगाना जाना । १३ । मैं मनुष्यों से पृथक् वाणशय्यापर वर्तमान चन्द्रमा और सूर्य के लौटने की बाट देखा हुभा नियाहूं । १४ । हे धृतराष्ट्र भीमनी इस मकार मे कहकर अपने मुखमे राजाओं की निन्दा करते हुए फिर वोले कि मैं अर्जुन को देखा चाहता हूं । १५ । इस के पाछे महाबाहु अर्जुन पितामहके समीप दण्डवत् पूर्वक आकर बड़ीनम्रतामे झुका हुआ नियत हुआ और हाथ जोड़ फर The assembly of kings aloring Bhishin the son of Ganga, looked glorious like the assembly of gods adoring Bralıma Best of the desonants of Bhart, rounded by artos, sighing like a serpent on account of the youn is of ar.ols and 10 sensible on account of the wounds of other weapons, Bhishm, looking at the assemblage of kings and bearing the mugs witli patience, said, "Fetch me water to drink."11., Those keliatryas brought large and small reszels ſull of cold water; but Bhishm casting his eye on them, said, "I can no longer cajoy human things. I am lying on the bed of arrots separate froin men and iranting for the change of the Sun's course." Haring said this, Bhishm chukel those bngs, raying, "I wish to see Arjun." At this braye Aijun approached the grandfather bor.

[ 4964] Mahabharat, (४९६४) राजमिवाद्याग्रतस्थितम् । अभ्यभाषत धर्मात्मा भीष्मातोधनञ्जयम् । १७ ॥ दानीय शरीरं मे संवृतस्य तयेषुभिः । मर्माणि परियूयन्ते मुखञ्च परिशुष्यति ॥ १८ ॥ वेदमातशरीरस्य प्रयच्छापो ममार्जुन । स्वहि शक्तो महेष्वास दातुमाणे यथाविधि ॥ १९ ॥ अर्जुनस्तु तथेत्युक्त्वा रथमारुह्य धीर्यवान् । अभिष्यं पलवत फत्या गांडीय व्याक्षिपद्धनः ॥ २० ॥ तस्य उपातल निर्घोष विस्फा तमिवाशनेः । विप्रेमः सर्पभूतानि 'सर्वे भुत्वाच पार्थियाः ॥ २१ ॥ ततः प्रदक्षिणत्या रथेन रथिनाधरः शयानं भरत श्रेष्ठं सशस्त्रमृतांवरम् ॥२२॥ सन्धाय च शरं दीप्तममिमग्य स पाण्डवः । पाजंग्या खेण संयोग्य सर्वलोकस्य पश्यतः ५२३४ अविध्यत् पृथिवी पार्थः पाश्व भीष्मस्य वोला कि मुझेश्या आशाहोती है । १६ । फिर धर्मात्मा भीमजी बहुत प्रसन्न होके उसविनीत हाथजोड़े हुए यर्तमान संसारके धनादि संपक्षियों के विजय करने वाले अर्जुन को अपने सम्मुख खड़ा हुआ देखकर बोले । १७ । कि तेरे बाणोंसे भरा हुमा मेराशरीर जलरहा है और मर्मस्थलों में बड़ीपाड़ा है मुख सूखा जाता है १८ हे भर्जुन मुम दुखि से पाडावान् को अलपिलादे हे बड़े धनुपधारी तूही धुद्धि के अनुसार जलदेने को समर्थ है । १९ । इतनी वातके सुनतेही उस पराक्रमी अर्जुन ने यहुत अच्छा ऐसा कहकर रथपर सवारहो बड़े पराक्रमी गांडीवधनुप को मत्यंचा युक्त करके यळसे बँचा । २० । उसकी प्रत्यंचा का और धनुपकी टंकारका शब्द इन्द्रवजके समाम था उस शब्दको सुनकर सब जीवधारी भौर राजालोग भयभीत होगये । २१ । सदनन्तर रथियों में श्रेष्ठ अर्जुन ने रथके द्वारा उसमरतर्पभ महाशस्त्र धारी सोते हुए भीष्मनी की परिक्रमा करके धनुप पर प्रकाशवान अभिमंत्रित वाण को चढ़ाफर मेघ अस्त्र से संयुक्त करके सब लोगों के देखते हुए । २३ । मीप्मजी के दक्षिण ओर में पृथ्वी को वेधा उसके घेधतेही पृथ्वी में से निर्मल महा शुभ ing and stood there with downcast head. Thon with joined palms he said, "What is your rish?"16. Virtuous Bhishnu, much pleased with tho humble attitude of Arjun tho conquer of the world and sceing him standing in his presence, said, "Fall of thy arrors my body is burning and I feel much pain in the vital parts. My mouth is parchod. Givc ine, distressed with pain as I am, water to drink. Thou alone, O great archer, canst supply mo mater by your wisdoml" At this Aijun said, "Very well" and mounting this ohnriat, he put string to the Gandiy borr of grent strongtia and pulle! it with grant force.20. The sound of his bow and bowstring was liko thint of tho rajm of Indrn causing fear to the hings as well as thic othor living beings Then Arjun the best of chariotecrs laving gono round tho slooping warrior Bhishim, the last of Bharats, mit to liin bow bright #Tuw and boring inspired it with aphorism and united it Witle the weapon producing sator, picic.d with it the ground to - (४९.६५) भाप्मपर्व Bhishma Pary [40651 दक्षिणे । उत्पपात ततो धारा यारिणो पिमलानुमा ॥ २४ ॥शीतस्यामृतफल्पाय दिव्यगन्धरसस्य च । मतपयचतः पार्थः शीतया गलधारया ॥ २५ ॥ भीम कुरूणा मृषभं दिव्यकर्म पराक्रमम । फर्मणा तेन पार्थस्य शमस्यंच विर्यतः॥ २६॥ विस्मय परमंजग्मुस्ततस्ते पसुधाधिपाः । तत् फर्म प्रेश्य यीम सारतिमानुपविफमम् ॥ २७ ॥ संभावपन्त फुरवो गायः शीतार्दिताव । यिस्मयाच्चोत्तरीयागि व्याविष्यन् मर्यती नृपाः ॥ २८ ॥ शंनदुन्दुभिनिरस्तुमुल मर्वतोमवत् । तृप्त शान्तनयधापि राजन योमतमुनीत् । १९'सपाधिषवीराणां सन्निधी पजयनिय । नेतच्चि महा चाहो स्वयि कौरवनन्दन ॥ ३० ॥ कथितो नारदेनासपूर्वर्षिरमितपते । वामदेवमहाय स्वमहत् पर्म फरिपसि। ३१ ॥ यनोत्सहति देवेन्द्रः सह देवैरविश्यम् । विदुस्त्यां निधन पार्य सर्वक्ष प्रस्थ तद्विदः ॥ ३॥ धनुबंगामेस्व पृयिम्योपयरो नृषु ॥ ३३॥ पवित्र जलकी धारा ऊपरकी ओर फुयारे के समान निकली । २४ । बहाल महाशीतल अमृत के समान दिव्य मुगन्धित और रससे भरा हुआ था उसीतल जलकी धारा से भर्जुन ने कौरवों में श्रेष्ठ दिव्य कर्म और बलवाले भीप्यजी को तृप्तकरदिया इस के पाछे इन्द्रके समान अर्जुन के उसकर्म से । २६ । उनमय रानामों को बड़ा पाश्वर्य हुमा अर्भुन के इस अमानुपी फर्म भार वलको देखकर कौरखलोग ऐसे महाकंपायमान हुए जैसे कि शानले कंपायमानगोयें होती है राना लोगों ने बड़े भाश्चर्य से सब भोरको अपने २ दुपट्टोको हिलाया । २८ । मोर सब भोरसे शंख दुन्दुभियों के कठिनशब्द हुपे हे राजा उस जलसे तृप्तहुए भीम जी सब शूरवीर राजामों के सम्मुख बड़ी प्रशंसा करके अर्जुन में यह वचन बोले कि हे महाबाहु हे कौरवनन्दन यह तुझमें भारवर्य की चातनहीं है ॥३०॥ हे बड़े तेजस्वी तुमको नारदजीने माचीन ऋपि वर्णन किया है तुम वासुदेवनीके मंगहोकर बड़े २ कसै.करोगे ।३१। जिस कर्म के करनेको देवताओं समेत इन्द्रभी असमर्थ है वह तुम करसकोगे हे अर्जुन मुख्य वृत्तान्तकं ज्ञातालोगोंने तुझको सब खत्रीकुलमान the right of Bhishm within sight of all. As soon as tho Arrow pierced the ground, there came out of it a fountain of paro valor, cold and swcot to the taste like nectar and sizeot sccnted. With that fountain' of cold wator Arjun quenched the thirst' of rare Bhishm. All the king, rrondered at the Indra-like prowess of Arjun. Tha Kauravas frembled at the superhuman deed and stroogth of arms as cows shake by cold. The kings fluttcred their cloths at tho wonderful decd and loud peals of conchs and truwpots pero hcard on all sides. Satisfied by the drink, Bhishm praised Arjan's work in tho presence of all tbe kings, saying, “ It is not strange for you, joy of Kapra vas.30. O glorious one, thou art spoken of as an ancient rishi by Narad and, accompanied by Varsudev, you will do great deeris. Thou canst do deeds impossible to Indra and other [ 4960 Mahabharat मनुष्या जगति भ्रष्टा. पक्षिणां पतगेश्वर । सरितां सागरः श्रेष्ठो गीर्वरिष्ठा चतुष्पदाम् ॥ ३४ ॥ आदित्यस्लेजसा श्रेठो गिरीणा हिमवान् घर । सातीनांनाह्मणा घेष्ठ श्रेष्ठस्त्य मसि धन्विनाम् ॥ ३५ ॥ नवै शृत धार्तरायण वास्य मयोच्यमानं विदुरेण चैष । दोणेन रामण जनादन मुहमुह सम्जयेनापि चोक्तम् ।। ३६ ॥ परीत परिहि विसंत्र फलो दुरपोधिनो न च तच्छदधाति । सशष्यो वै निहतश्विराय शास्त्रातिगो भीम. घलाभिभूत ॥ ३७॥ एतच्छुत्वा तहचः फोरयेन्द्रो दुर्योधनो दीनमना यभूव । तमन घीचछान्तनवोभिवीक्ष्य नियोध राजन् भवगतमन्यु ॥ ३८ ॥ इष्ट दुर्योधन तत्ते यया पार्थेन धीमता । जलब्य धारा जनिता शीतस्यामृतगन्धिनः ॥ ३९ ॥ एतस्य कर्ता का नियननाना है । ३२ । तुम उत्तम धनुपधारियों में अद्वितीयहो और पृथ्वीके सब मनुष्यों में तुम अत्यन्त श्रेष्ठहो इस संसार में मनुष्य सब से उत्तम है पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ है। ३३॥ नदियों में समुद्र श्रेष्ठ है पशुओं में गो उत्कृष्ट प्रकाशनों में सूर्य श्रेष्ठ है परनों में हिमालय जातियों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है इसी प्रकार तुम धेनुप धारियों में श्रेष्ठ हो धृतराष्ट्र के पुत्र ने मेरा कहना वा विदुरजी द्रोणाचार्य परशुराम जी और श्रीकृष्ण जी का जो करना और वारंवार संजयका भी कहना नहीं मुना । ३५ । निश्चयकरके निर्बुद्धी भार अवेतों के समान दुर्योधन उम कहनेपर श्रद्धा नहीं करता है वह शास्त्र के विपरीत कर्मकर्ता भीमसेनके वलो हाराहुमा मरा हुमा यहुत काल तक सोवेगा । १६ । कौरवोंका राजा दुर्योधन उनके इस वचनको मुनकर चित्त से उदास होगया इस को उदाम देखकर भीमनी ने कहा कि हे राजा अभी समझार निरहंकारी होजामो । ३७ । हे दुर्योधन तुमने यह देखा जो कि बुद्धिमान अर्जुन ने शीतल अतकेतुल्य मुगन्धिपति च्याप्त उत्तम जलकी धारा उत्पन्नक।। ३८ । इमलोकमें इसकपकाकरने वाला दसरा कोईमनुष्य नहीं है भाग्नेय वारुण सौम्य वायव्य वैष्णव ऐन्द्र पाशुपति पारमेष्ट्य goslathusa tho know the reality, say that thou art the donth of all kshatryas. You are mateliless among rarrors and are tho leste among men Man is foremost of all brings in this world; garur is foremost among birds; the Ocean is foremost among rivers; com is the best of li nste; the sun liolis the first place amongst luminarica; Immalyns amongst mountains, Brnlupans niyong thio four orders you among the archery Tho son of Diritrashtra disregarded nurse als ice as well as that of Valur, Dronacharyn, Palasliuram, Krishnam? Sunjaya 35 Suicis, Dursedian is fulisli and unwisc cnougly to disrcgard that advice. Doing deeds against thio dictates of the Shastras, the nill sleep long defeated and alain by Bhim" Dur: paulhan tho prince of the Kauravas as displeared at these words and oceing him in that state Bhislın said, "Be wish even now Olins, and give up solf conceit. You laso seen, Duryodhan, Jiotr Arjun and (१९६७) मोमप Bhishma Parv [4907 लोकस्मिन् नान्यः कश्चन् विद्यते । आग्नेयवारणं सौम्यं चायथ्यमय वैष्णवम् ॥ ४०॥ ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राहं पारमेष्ठयं प्रजापतेः । धातुस्त्याच सवितुर्थेयस्यतमपापिया ॥ ४२ ॥ सर्वस्मिन्मानपे लोक वेत्येको हि धनन्जयः । फष्णो या देयकीयो नान्या घेदेह कश्चन ॥ ४२ ॥ अशक्यः पाण्डवस्तात युद्धे जेतुं फयंचन । समानुपाणि कर्माणि तस्य॑तानि महात्मनः॥४ातेनसत्वंवता संख्ये राणाहयशोभिना। कृतिना समरेराजन सन्धिर्मपतु माचिरम् ।। ४४ ॥ यावत कृष्णो महाबाहुः स्वाधीनः कुरुसत्तम। तापत् पार्थन भरेण सन्धि ते तात्त युज्यताम् ४५ यायनतेचम्.सर्वाः भारःसन्नतपर्वमिनाश यंत्यर्जुनस्तायत्संधिस्ते तारयुग्याताम् ॥४६॥ यापत्तिष्ठन्ति समरे हतशेषाः सहोदराः नृपाथ यहयो राजस्तावत् सन्धिः प्रयुज्यतां ॥४७॥ न निईहति ते पावन झांधर्द से क्षणथमूम् । युधिष्ठिरो रणे तावत् सन्धिस्ते तात युज्यताम् ॥४८॥ नकुलः सहदेवश्च मनापत धाता त्वष्टा और सविता के अस्त्र और सौरि इन सब पत्रों को भी इम नर लोक में अकेला अर्जुनही जानता है वा देवकीनन्दन श्रीकृष्णजी जानने हैं इनदोनों महापुरुषों के सिवाय इस लोक में दूसरा कोई नहीं जानता है । ४१ । हे तात युद्ध में इन पाण्डवों को देवता और अमुर भी जीतनेको समर्थ नहीं हैं जिस महात्मा के यह भमानुपी कर्म हे हे राजा उम युद्धमें पराक्रम शूरवीर युद्ध में शोभापाने वाले अर्जुनकै साय सन्धिकरने में विलम्ब मतकरो । ४३ ! हे कौरवोत्तम जबतक महावाहु श्रीकृष्णजी अपने स्वाधीन हैं तबतक शूरवीर अर्जुन के साथ तुझकोसन्धिकरलेना योग्य है। ४४ । हे तात जबतक अर्जुन गुप्तग्रन्थी वाले वाणों से तेरी सब सेनाका नाश नहीं करे तबतक तुझको सन्धिकरलेना अ. त्यन्तही योग्यहै । ४५ । हे राजा जबतक युद्धमें मरनेसे शेप बहुए अपने निज यांधव लोग वा यहुतप्ते राजालोग नियत तबतक सन्धिहोजाय और जबतक कि क्रोधसे अग्निरूप नेत्र युधिष्ठिर इस तेरी सेनाको भस्मनहीं करता है वा पाण्डव नकुल सहदेव और भीमसेन सब ओर से सेनाका नाशनहीं करें । १८ । तबतक the visa produced the fino fountain of water cold as Doctar and full sweet scent, Nóno in this world can do it. Nope in this world knows the uso of the weapons of Agni, Varun, Som, Vayu, Vishnu, Indra, Pashupati, Parmeshthi, Prajapati, Dhath, Twashta, Savita and Surya except Arjun and Shree Krishn. 1. Even the gols and asurs are unable to conquer the Pandavas. You in ust have no hesitation in contracting peace with one who can do such superhu. man doeds. Make peace with Arjun so long as Krishn is with us. You can make peace with Arjun so long as his arrovhaving hidden knots have not destruyed all your warriors .45. It is well to have peace so long as some of our kinsmon and many kings are alive and so long as Yndhishthir with his fiery eyes has not burnt your armies [4968 ] Malmbharat (४९६८) भीमसेनश्च पाण्डवः । यावच्च महाराज नाशपन्ति न सर्वशः ॥४९॥ तापत्ते पाण्डपरिः सौहाई मम रोचते । युछ महन्तमेपास्तु तात संशाम्य पाण्डवैः ॥ ५.। पतत्तु रोचतां चास्यं यदुक्तोसि मयानघ ! एतन क्षममह मन्ये तव चैध कुलस्यच ॥ ११ ॥ रथक्त्या मन्युव्युपशाम्य एवं पार्थः पर्याप्तमेतद्यत् कृतं फाल्गुनेन । भीष्मरयां तादस्तु वः सौद्रश्च जीपन्तु शेपा. साधु गमन प्रसीद ॥ ५९॥ राज्यस्यार्धं दीयता पाण्डयाना मिन्द्रप्रस्थ धर्मराजोभियातु । मामित्रध्रुप पाथियानां जघन्यः पापां कीत्ति प्राप्स्यसे फौरवेन्द्र ॥५३॥ ममाघसानाच्छान्तिरस्तु प्रजानां संगच्छन्ता पार्षियाः प्रीति मन्त.'i पिता पुत्रं मातुल भागिनेो नाता चैध भातर प्रेतु राजन् ॥ ५४॥ मचे देवं प्राप्तकाल वयो मे मोहाविष्टः प्रतिपस्यस्ययुशयां। तस्यस्यन्तेपतदन्ताः स्थ सधैं सत्या वार पाण्डवों के साथ तेरी प्रीतिहोना मुझको अभीष्टहो हेतात मैं चाहताहूं कि यह महामवल युद्धही मरण पर्यन्तरदै सू अवश्य पाण्डवों से सन्धिकर । ४१ । इस यातको तू मनसे समझार अंगीकारकर हे तात यह मैंने तुझको समझाया है यदि तू समझेगा तो तेरी और कुल के लोगोंकी कुशल अवश्य होगी । ५० । अहंकारको त्यागकरके पारडयों से सन्धिकर अर्जुनके इतने ही करनेको तू यहुत समझ भीमकेही मरणान्तसे तुम्हारी और पाण्डवोंकी प्रातिहो यह बहुतश्रेष्ठहै इसी मीतिमें शेष बचे हुएखत्री वचनायेंगे हे राजा मेरे इस कहनपर प्रसन्नहोके पाण्डवों के आधे राज्यको देदो और धर्मराज राजा युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थको जाय हे कौरवेन्द्र तू भित्रोंसे शत्रुता करनेवाला राजाओं नीच मतहो नहीं तो पापरूपी अपकीर्तिको | पावेगा । ५२ । मेरेनाश होने से प्रनामों को मुखहो और प्रीति रखनेवाले राजा लोग परस्पर में मिलें हे तात पिता पुत्र से मामा भानो से भाई भाई से मानन्द पूर्वक मित्तें जो मोहसे भरेहुए नियुद्धितासे समय के अनुसार मेरेकहे हुए वचन को नहीं मानेगा तो अन्व में महादुःखों को पावेगा और सबकी एकसाही दशा है मैं [.इस वातको सत्यही कहता हूं। ५४ । गांगेय भीष्मजी राजाओंके मध्य में घड़ी and the Pandavas Bhim, Nakul ond Sahadev have not destroyed thom. I liko to sce you united with the brave Pandavas. I shall be happy, if this war onds with my death. Be sure to mako pcak with tho Pandavas. Act upon my ndvice; your welfaro and that your kinsmen depends upon it 50. Give up selfishnoss and mako peace with 'tho Pandavas.' Whint Arjun has done is sufficiont Let Blixlima's death to the rostoration of friendship between the Kauravas nod the Pandavat Thus the rest of the kshatryag will not die. Bu pleased to givo knif the kingdom to tho Pandavas. Toko Prince Yudhishthir to Indraprasti. Prince of the Knurn pas, donot nchiero sinful notorioty among kings by incurring the repronchi of manness and making focs of friends Lot tho pooplo be happy with my death and the losing kings mcet together. Let fathers of । भीष्मपर्व Bhishma Pary [ 49691 मेतां भारतीमीरयामि ॥५५॥ एतद्वाक्यसीहदादापगेयो मध्ये राहां भारतं श्रावयित्या। तूणीमासीच्छल्यसवातमर्मा योज्यात्मानं वेदना सनियम्य ॥ ५६ ॥ सम्जय उवाच । धर्मार्थसहितवाक्यं धृत्या हितमनामयम् । नारोषयतपुत्ररते ममर्प रिष मेपनम् ५७॥ इतिमहा० भीष्पाणि भीष्मपर्वणि त्रयविंशधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥ समय उवाच । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे जग्मुः स्थानालपान पुनः । तुष्णीं सूते महा राज भोप्मे शान्तनुनन्दने ॥ १॥ त्या तु निहतं भीम राधेयः पुरुषर्पमः। ईवदागत सन्नासस्त्वरयोपजगामह ॥ २॥ स ददर्श महात्मानं शरतल्पगतं तदा । जामशय्या गतं धीरं कार्तिकेयमिय प्रभुम् ॥३॥ निमीलितालं ते धीरं साभुफण्ठस्तदा वृपः। मीप्मभीष्ममहायाहो इत्युवाच महायुतिः ५४ा राधेयोहं कुरुश्रेष्ठ नित्यमक्षिगतस्तथ । देप्पाहं तव सर्वत्र इति धैनसुपाचह ।। ५ ।। तछुत्या कुरुशोहि पलात्संवृतलोचनः शुभचिन्तकतासे कौरवोंके राजा दुर्योधन को यहवचन सुनाकर भालोस पीड़ित अंगों के दुःखोंको सहकर मनबुद्धिको आत्मामें लयकरके मौन होगये ।५५। संजयबोले कि आपके पुत्रने धर्म अर्थ से संयुक्तहोकर प्रियकारी निर्दोष निरुपाधि वचनोंको सुनकर ऐसे स्वीकार नहीं किया जैसे कि सन्निकट मरनेवाला पुरुपवैद्यकी औषधीको नहीं अंगीकार करताद ५६ ॥ अध्याय १२४॥ संजय वोले हे महाराज शंतनुके पुत्र भीष्मजीके मौनहोनेपर वह सब राना लोग फिर अपनेर डेरोंकोगये ।। पुरुपोत्तम कर्ण भीष्मीको मृतकमुनकर कुछेकव्याक लमाहोकर बड़ी शीघ्रतासे उनकेपासगया ।२।वहां उसने जब उसमहात्मा समर्थ शूर चार जन्मशय्या पर वर्तमान स्वामिकार्तिकके समान शाशयापर नियत भीमजीको देवा ।। तब अश्रुपातों से गदगद कण्ठहोकर वहातेजस्वी कर्ण उस निमलितासमे वोला हेमहाबाहु भीम हे कौरखोचम में राधाका पुत्र सदैव आपके नेत्रोंके आगेरहने वालाई हेसर्वज्ञ में आपकाद्वेषी हूं इन बातों को सुनकर बड़ेवलसे नेत्रों को खोलकर गांगेय भीष्मजीने अपने निवासस्थान को एकान्तरूप देखकर स्थान के रक्षकों को macet sons, maternal uncles with sisters, sons and brothers with brothors. You will fall into deep misory, if you will not give ear to my advice and all others will suffer with you. I speak the truth:' Having said thesc worda to Duryodhan the prince of the Kauravas, Bhishm suffering from the pangs of darts, became silent and fell in meditation. Sanjaya says, "Yoar syn heard those words full of wisdom and profit, but did not accept them as a poreon about to die refuses to tako medicino."56. CHAPTER XXIV Sanjaya said, "When Bhisbm the sun of Shantanu had become silent, all the kinga went away to their respective teata. Karan tho Lest of men, baving heard of Bhislain's fall, came to him with a distressed mind. Souing him on the bed of an ows, like Lord Kartikeya lying at his birth on his bed of r-ods, glorious Karan with tears in bis cyes and voice choked said to Bhishm whose eyes vero closed, "Valliant Bhishım, bcatof the Kaumans, I am Rahr's son who was always hateful [4970] Mahabharat (४९७०) शनैरुवीक्ष्य सस्नेह मिवचनमब्रवीत्दारहितं धिष्ण्यमालोक्य समुरसार्य च रक्षिणः पितेवपुत्रं गांगेयः परिरभ्यैकपाणिना ॥ ७ ॥ एहि मे विप्रतीपस्पर्धसत्वं मयासह । पदिमानाधिगच्छेथानते श्रेयोध्रुवं भवेत् ॥८॥ कौतेयस्त्वं नराधेयो नतवाधिरथ पिता। सूर्यजस्त्वं महायाहो विदितो नारदान्मया ॥ ९ ॥ कृष्णपायनाच्चैव तव्यसत्यं न संशयः। न च वेपोस्ति में तात त्वयि सत्यं ब्रवीमिते ॥ १७ ॥ तेजोवधानभित्तन्तु परुष त्याहमणवं । अकस्मात्पाण्डवान्सर्वा नवाक्षिपास मन्नत ॥ ११॥ यनासि पहुशोराशा चोदितः सूतनंदन । जातोसि धर्मलोपेन ततस्ते चुखिरीदशी ॥ १२ ॥ नीचाश्रयान्मरस रेण वेपिणी गुणिनामपि । तेनासि बहुशो रूक्ष धावित. फुरुससदि ॥ १३ ॥ जानामि समरे धीर्य शत्रुर्मिदुःसह भुभि । ब्रह्मण्यता च शौर्यञ्च दानेव परमास्थितिम् ॥१४॥ न त्वया सहशः कश्चित् पुरुपेयमरोपम । कुलभेदमयाच्चाहं सदा परुपमुक्तवान् उठाकर जैसे कि पिता पुत्रपर स्नेहकरताहै उसी प्रकारसे कर्णको एकहाथसे छातीके द्वारा मिलकर पड़े धोरर यहवचन घोले ७ कि हे मेरेद्वपी आओर तू मेरेसाथ ईर्पा करता है जो सू मुझको महीं मिलता तो निश्चयकरके तोराभला नहीं होता । तू राधाका पुत्रनहींहै किन्तु कुन्तीकाही पुत्र है और तेरापिता अधिरथीनहीं है सूर्यका पुत्र है यहभेद मुझको नारदजीन बताया है ।।। और व्यासजी वा केशवजीसेभी विदित हुमा इसमें किसी वातकाभी सन्देह नहीं है और यहवातभी मैं सत्य २ कहताई कि तेरेसाथ मेरी किसीमकारकी भी द्वेपता नहीं है ।१०। मैंने तेरे तेज नहोने के लिये कठोर वचनकहे थे हे मुन्दरबतवाले कर्ण तू अकस्मात् सब पांडवोंको मारेग।। १? हेमूतनन्दन इसीकारणसे राजा दुर्योधन ने तुमको वारवार कहकर उयुक्त किया है तू धर्मके यूपते उत्पन्न हुआ है इसहेतुस तेरी ऐसी बुद्धि है । १२ । गुणवान मनुष्यों की बुद्धिभी नाचों के संगो वा ईपास द्वेप करनेवाली होजाती है इसीहेतु से कौरवों की सभामें यहुधा फसेर वचन सुनेगये १३ में युद्धमें तेरे पराक्रमको पृथ्वी भर के भी शत्रुओंसे असा मानताहूं और वेद ब्राह्मण की रक्षाकरने में शरतामें और दान में तेरी पड़ी हड़ताको जानताई ॥१४॥ मनुष्यमात्रों में तेरेसमान देवताओं के समान in your sight." At this Bhislım oponed his oyes with great oxertion and socing his liabitation doscrted, ho orderou tlo guards to move away, and ng a father loves a son, ho cinbracoil Karan with ono arm at - (४२७१) ragg Bhislıma Parr [49711 ॥ १५॥ न चानसन्धाने लायवेलरले तथा । सरशः फाल्गुनेनासिष्णे नचमहा रमना ॥ १६ ॥ कर्ण काशिर गत्या त्वयफेनधनुष्मता । फन्याथै फुरुराजस्य राजानो मृदिनायुधि ॥ १७ ॥ तया च बलवान् राजा जरासन्धो दुरासदः । समरे समरलाधि नत्रया माशोभवत् ॥ १८ ॥ मनाप सतपायीच तजमा च बलेनच । देवगर्मममः संख्ये मनुष्यैरधिको युधि ॥ १९ ॥ व्यपनीतोच मन्युमें पस्त्वां प्रति पुरामतः । दे पुरुषकारेग न शक्यमति तितुम् ॥ २० ॥ सौदा पाण्डपानीरा भ्रातरस्तेऽग्दिन । सद्गग्तमहायाहो ममचेदिन सिप्रियम् ॥ २१ ॥ मयावनि घरमादित्यनन्दन । पृथिन्यांसर्वराजानो भयावधनिरामया ॥ २२ ॥ कर्ण उवाच । सानाम्येय महायाहो सर्वमेतम संशयः । यथावदसिमेभीष्म कौन्तेयोनमूनज. ॥२३॥ अवकीर्णस्वइकुन्त्या पराक्रमी कोई नहीं है मैंने कुलकी पिताके भयमे सदैव कटोरवषन कहे ।।दायाण और अलोंके चलानमें और हस्तलाघवतावा अनबनमें तू महात्मा श्रीकृष्णजी और अर्जुन के समान है। १६ । हे कर्ण तुझ अकेले धनुपपारी ने काशीपुरी में जाकर कुरुरानकी कन्या निमित्त बड़े राजामोंका युद्धमें मर्डन किया ।१७। इमीप्रकार पराक्रमी और दुसते विम्यहोनेवाला कीर्तिमान राजामरामन्ययुदमें तेरेममाननहीं हुप्रा ।१८। तुम वेद और ग्रामों की रक्षाकरनेवाले अपने तेज यलमे युद्धकरनेवाले देवगर्भके समान युद्धमें मनुष्यों से अधिक हो ।१९। अब वह मेराकोष दूरहुमा जो पूर्वममय में मैंने तुझपर कियाथा देवी यातको अयान होनहारको कोईभी उपायोंसे उल्लंघन नहीं करसता २०॥ हे शत्रुहन्ता यह वार पांडव तेरेसगेभाई हैं हे महावाहु जो तू मेरा हित चाहता तो उन से मिनापकरार हे मूर्यनन्दन भर तू मेरेकहनेसे शत्रुता को त्यागकर जिसमे कि पृथ्वी के सबराजालोग निर्विघ्नहों ।२२। फर्ण ने कहा हे महावाहु भीमनी में यह निस्सन्दह मरमकार मे जानताहूं कि मैं कुन्ती का पुत्रहूँ परन्तु मुझे कुन्ती ने त्यागकर दिया तब सूत ने मेरा पोपण किया इस से reason why you spolc harsh froids in the camp of the Bauravas. 1 know that thy prowess is unbcarable by all thy foes. I now alo thy regard for Brahman, thy courage and thy attachment to alms giving. Ogodlike man, thon art matthless From fear of dissen. tions I always sphe ill of thes. In bormanslup, in the use of serpons in lightness of hand and in the strength of arms thou art a nuntch for Arjun or Krislın. At Kashi you alone crushed all the kings to fetch a bride to the hing of Kurus. Lien bing Jarasandh great prowess could not withstand thee You are the protector of the Vedas and Brahmans aud lilo tlie progeny of gods you are abore men in the field of battle. All my former anger against you is sub 9ded, but nouo can Overstep Fate by worldly mcao: 20. The brave Pandavas, Odestroyer of focs, are your own brothers Jix trith them you would pleise me Tahe ng advice and leave tue side of tbe enemy so that all the princes of the world may not be destroyed." To this Karan Dide the following reply I how well that I am Kunti'a son and not of if [ 4970] Mahabharat (४९७०) शनैरुद्धीक्ष्य सस्नेह मिदंवचनमब्रवीत्॥दारहितं धिण्यमालोक्य समुरसार्य च रक्षिणः पितेवपुत्रं गांगेय. परिरयकराणिना ॥ .. ॥ एहि मे विप्रतीपस्पर्धसत्वं मयासह । पदिमामाधिगच्छेथानते श्रेयोधुवं भवेत् ॥८॥ कौतेयस्त्वं नराधेयो नतवाधिरथ पिता। सूर्यस्त्वं महाबाहो विदितो नारदान्मया ॥ ९ ॥ कृष्णद्वैपायनाच्चैव तव्यसत्यं न संशयः । न च पोस्ति मे तात त्वयि सत्यं ब्रवीमिते ॥ १० ॥ तेजोवधनिमित्तन्तु परुष स्याहमयुवं । अकस्मातूपाण्यान्सर्वा नवाक्षिपास सत्रत ॥ ११ ॥ यनासि पहुशाराहा घोदितः सूतनंदन । जातोसि धर्मलोपेन ततस्ते युखिरीदशी ॥ १२ ॥ नीचाश्रयान्मरस रेण पिणी गणिनामपि । तेनासि बहुशो रूक्ष थावितः कुरुससदि ॥ १३ ॥ जानामि समरे चीर्य शत्रुर्मिदु:सह भुभि । ब्रह्मग्यता च शौर्यञ्च दानेच परमास्थितिम् ||१४॥ न त्वया सहशा कधित् पुरुषेप्यमरोपम । कुलभेदमयाच्चाहं सदा परुषमुक्तवान् उठाकर जैसे कि पिता पुत्रपर स्नेहकरताहै उसीभकारसे कर्णको एकहायसे छातीके द्वारा मिलकर घड़े धोरर यहवचन बोले कि हे मेद्वपीआओ२ तू मेरेसाथ ईर्पा करताहै जो न मुझको महीं मिलता तो निश्चयकरके तोरामला नहीं होता ८ तू राधाका पुत्रनहींहै किन्तु कन्तीकाही पुत्र है और तेरापिता अधिरथीनहीं है गर्यका पुत्र है यहभेद मुझको नारद ने बताया है ।२। और व्यासजी या केशवजीसेभी विदित हुमा इसमें किसी वातकामी सन्देह नहीं है और यहवातभी मैं सत्य २ कहताहूं कि | तेरेसाथ मेरी किसीमकारकी भी द्वेपता नहीं है ।१०। मैंने तेरे तेज नष्टहोने के लिये कठोर वचनकहे थे हे मुन्दरबतवाले कर्ण तू अकस्मात् सब पांडवोंको मारेग।। १? हेसूतनन्दन इसीकारणसे राजा दुर्योधन ने तुमको वारवार कहकर उपुक्त किया है तू धर्मके यूपते उत्पन्न हुआ है इसहेतुस तरी ऐसी बुद्धि है ।११। गुणवान मनुष्यों की बुद्धिभी नाचों के संगस वा इपास द्वेप करनेवाली होजाती है इसीहेतु से कौरवों की सभा में यहुपा रुखेर वचन सुनेगये १३ में युद्ध में तेरे पराक्रमको पृथी भर के भी शत्रु ओंसे असा मानताएं और वेद ब्राह्मण की रक्षाकरने में शरतामें और दान में तेरी बड़ी हड़ताको जानताहूं ।१४। मनुष्यमात्रों में तेरेसमाम देवताओं के समान in your sight." At this Bhıslını oponed liis oyes with great overtion and suring his chinhitriirasantai, avalandlogunul bmxnasay and as a father loves a son, ho cinbracou Karan with one arm and said those words vory slowly:"Cornc my opponont and advcrsary. Certainly it would not by roll for thes if you had not como to me, You are tho son of Kunti nnd not of Radlin; your futher 19 Surya and not the chariot driver. I hare got this information from Narod. Vyas and heslar too, Lnow this and thero is no doubt about it. I you truly tlint I bar no oum.ty ngainst you. 10. I said harsh words in order to deprive thco of thy coal and that you runy, not destroy all tho Pandavas nt once. It is why Prico Duryodhan instigates you ngin and aguins. You ame into this world in a sinſul way and therefore thy lienrt is so inclined. Eren gual inci may leau twards wichuJncss by the society of Inul nuen nnd this was 11 tell (४२.७१) मीमप Bhishma Pare [4971] ॥१५॥पले चाखसन्धाने लाघवेखाले तथा मरमा फागनेनामि कृष्ण मचमक्षा त्मना ॥ १६ ॥ फर्ण काशिरं गत्या त्वयंफेवधनुष्मता । कन्यायें फुगराजस्य राजानो मृदितायुधि ॥ १७॥ तया च घलान यजा जरासन्धी दुरासदः। समरे समरलाधि नत्रया साशोमवत् ॥ १८ ॥नमा सययाधीच तसा घ वलेनच । देवगर्मसमः संस्थे मनुष्यैरधिको युधि ॥ १९ ॥ ध्यपनीतोच मन्युम पस्ता प्रति पुस्ति । देप पुरुषकारेग न शक्यमतिगर्तितुम् ॥ २० ॥ सोदरपा पाण्डगाचोरा मातरस्तेऽग्सूिदन । सहस्तमहागहो ममचेदिच्छसिप्रियम् ॥ २१ ॥ मयागयतुनि परमादित्यनन्दन । पृथिव्यांसनरासानो मम्वद्यनिरामया ॥ २२॥ कर्ण उवाच । सानाम्येय महायाहो सर्वमेतन संशयः । यथायदसिमेभीष्म कौन्तेयोईनमूतज ॥२३॥ टायफीर्णस्त्वाकुन्त्या पराक्रम कोई नहीं है मैंने कुलकी देपताके भपसे सदैव कटोरवचन कहे पापण और प्रमोंके चलाने में और हस्तलाघवता वा अनक्लमें तू महात्मा श्रीकृष्णजी और अर्जुन के समान है । १६ । हे कर्ण तुझ अकेले धनुपधारी ने काशीपुरी में जाकर कुरुरानकी कन्या निमित्त बड़े राजाओंका युद्ध में मईन किया १॥ इमीमकार पराक्रमी और दुससे विस्यहोनेवाला कीर्तिमान रानामरामन्ध युद्धमें तेरेममान नहीं हुमा ।१८। तुम वेद और ब्राह्मणोंकी रसाकरनेवाले अपने तेज बलभे युद्धकरनेवाले 'देवगर्भ के समान युद्धम मनुष्यों से अधिक हो ।१९। अब वह मेराकोष दूरहमा जो पूर्वममय में मैंने तुमपर कियाथा दैवी वातको अर्यान होनहारको कोईभी उपायोंमे उल्लंघन नहीं करमक्ता २०॥ हे शत्रुहन्ता यह वीर पांडव तेरेसगेभाई हैं हे महाबाहु जो तू मेरा हित चाहता है तो उन से मिलापकर।२२३ हे मूर्यनन्दन अब तू मेरेकहनेसे शत्रुताको त्यागकर निमसे कि पृथ्वी के सवराजालोग निर्विघ्नहों ।२२। कर्ण ने कहा हे महावाहु भीष्मनी मैं यह निस्सन्देह मनमकार से जानताहूं कि मैं कुन्ती का पुत्रहूं परन्तु मुझे कुन्ती ने त्यागकर दिया तब मूत ने मेरा पोपण किया इम से reason why you spol o harsh words in the camp of the Bauravas. I KDOW Wat thy_prowess is unbearable by all thy focs. I not alo thy regard for Bralımı, thy courage and thy attachment tn alas giving O godlihe man, thou art matchless From fear of disseni. trong I always apohe ill of theo In bon manship, in the use of weapons in lightness of hand and in the strength of arms thou art a match for Arjun or inshn. At Kashi you alone crushed all the 1.zogs to fetch & bride to the Ling of Kuruk Eien Ling Jarasandh of great provers could not withstand thice You are the protector of the Vedas and Brahwans and like the progeny of gous you are above men in the field of battic All my former anger against you is subsided, but nouocan overstep Fate by worldly meap: 20. The brave Pandavas, O destroyer of fuc3, are your own brothers Jis trith them if you rould please me Tahe ng advice and leave tue side of the chemy so that all the princes of tho world may not be destroyel "To thi Karan made the folloiring reply-'I low well that I am Konti's son and not - 4972] Mahabharat (४९७२) मूतेन च चिवर्शितः । भुत्यादुर्योधनैश्चर्य ग मियाकर्तुमुत्सहे ।। २४ ॥ वसुदेवसुतो पखतपाण्यायग्रतः । वसुचैव शरीरभ्य पुनदारंतषायशः ॥ २५ ॥ सर्पदुर्योधन स्याथें त्यक्तमे भूरिदक्षिण । माचैतन्याधिमरणं क्षत्रस्यादिति फौरय ॥ २६ ॥ कोपित पांडयानित्यंसमाश्रित्य सुयोधनम् । अवश्यभावीवोंय योनशक्योनिवर्तितुम् ॥ २७ देयं पुरुषकारेणको निवर्तितुमत्सहेत् । पृथिवीक्षयशंसीनि निमित्तानिपितामह ॥ २८ ॥ भवद्भिपलब्धानि कथितानिच संसदि । पाण्डवायासुदेवश्च विदिताममसर्वशः॥२९॥ अजेया पुरुषैरन्यैरिति तांश्चोत्सहामहे । विजयिष्येरणे पाण्डू मितिमेनिधितंमनः ॥३०॥ नवशक्यमवरष्टुं धैरमेतत्सुदारुणम् । धनन्जयेनयोतस्येहं स्वधर्मप्रीतमानसः ॥ ३१ ॥ अनुमानीप्यमांतात युखायकरानिधयम् । अनुज्ञातत्यया घीरयुध्येयमिति मे मतिः ३२॥ दुर्योधनके ऐश्वर्यको भोगकर उसको निष्फलकरना मैं उचित नहीं समझता हूं. जिसे कियसुदेवं जीके पुत्र श्रीकृष्णजी पांडवों के निमित्त हद प्रतवाले हैं उसमकार | मैंने भी ।२५। धन जन पुत्र स्त्री परिवार और दीति दुर्योधनके निमित्त विचारकर लियें हैं है बड़ी दक्षिणावाले कौरव कुल क्षत्री में रोगादिकों से मरना योग्य नहीं समझताहूं । २६ । मैंने दुर्योधन के आश्रय में होकर पांडवों को सदैव क्रोधित किया है और होतव्यता है वह तो अवश्यही होगी उसका मिटाने वाला कोई भी नहीं है कौन सा मनुष्य होनहारको उपायों के द्वारा लौटा सक्ताहै हेपितामह संसारके मनुष्यों के नाश फारी चिन भापलोगोंने देखे और सभामें वर्णन किये पांडव और वामदेवजी सव मकारसे मेरे जाने हुए हैं।२९। वह अन्य मनुष्य से अजेय हैं परन्तु उत्साह पूर्वक कह- ताहूं कि मैं उन पांडवों को विजय करूंगा यह मेरे पित्तका निश्चय है ।।। जोकिया | महा भयकारी शत्रुता त्यागकरने के योग्य नहीं है इस कारण अपने धर्म में मसा चित्त होकर मैं मनसे लदूंगा।३१॥ हे सात युद्ध के निमित्त तुम्हीं निश्चय करके मुगको आज्ञादो आपकोही आज्ञा से मैं युद्ध करू यही मैं चाहता हूं ॥३२ । भौर जो मैंनेनि- of the Sut. But he brought mo upwhen I was deserted by Kunti' and, having enjoyed Duryodhan's wealth, I donot like to desert him. All wealth, song, wives will I sacrifice for the good of Duryodhan and shall be as faithful to him as kirishin is to the Pandavas. Boing born a kashtrya l donot like to die of sickndis or other causes. Being attachod to Duryodhan I have always looked down upon the Pandavas. Fate will havo hor course, Dore an updo her works. You havo soen, gradfather, the signs destructive of the world and have spoken of theni in the asserably. I knor that the Pandav (Arjun) and Vasudev aro invinciblo and yot i aspire to conquer them. I am resolved to do this. 30. I shall fight agninst Arjun because I donot libo to set asido this great onmity, I ask your own permission to fight, and it is thodesire of my hcart that I sliould fight with your consent I ask your pardon for all the harde words which I crer uttered." At this Bhislım said, my 0 ܂ (४९७३) मीष्मपर्य Bhishma Pary [49731 रक्तपिप्रतीपंथा रमसाधापलात्तथा। पन्मयेहरूतं फिश्चिततन्मेत्यक्षातुमर्हसि ॥३३॥ मीम ज्याच | न धेच्छश्यमवन घेरमेतत्सुदारुणम् । अनुजानामि फर्णत्वायुष्यस्य काम्या ॥ ३५ ॥ निर्मम्युर्गतसंरम्मः कृत्तकारणेस्मह । पथाशक्तियथोत्साहंसा इत्पुरतयान् ॥ ३५ ॥ महरषामनुजानामि यदिच्छसि तदाप्नुहि । क्षत्रधर्मजिताँ लठोकानयारस्पसि धनजपात॥३६॥युध्यस्यनिरहङ्कारो पलवीय पपाश्रयः । धादि युद्धाच्छे योग्य क्षत्रियस्य न पियते ॥३०॥ प्रयहि कृतोयतः सुमहान् मुचिरंमया। न चैवस्तिः कर्तुं कर्ण सत्यं प्रधीमिते ॥ ३८ ॥ सन्जय उवाच । इत्युक्त यति गानेये अभियानोपमध्यच । राधेपो रयमारुह्य पायातप सुतंप्रति ॥ ३९ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मकासमागमे चतुर्विशत्यधिकशतोऽध्यायः ।। १२४ ।। समातचेदम्भीष्मपर्व । घुदिता व चपलता मे अत्यन्त दुरी २ विपरीत वाती करी आप उन मेरे कठोर वचनों को क्षमा करनेके योग्य हैं।३३॥ भीष्मजी बोले कि जो यह अत्यन्त भय उत्पन करने वाली शत्रुता त्याग करनेके योग्य नहीं है तो हे कर्ण मैं तुमको पाशा देताई कि स्वर्ग की इच्छांसे तू युद्ध कर !१४. कोष महंकार से रहित बल और साहस्यके अनुसार पुद्धमें क्षमा करने वाला पाक्ति और उत्साह के समान सतलोगोंकी वृत्ती करे ३५। मैं तुमको मातादेवाहू और जोनू चाहता है उसकी मांसदो क्षत्रीधर्मसे पराजय पानेश- ले निस्सादेह उत्तम लोकोंको पातेहैं ।२६। महंकार रहित बलिष्ठ अमनी सामय के प्राश्रय में रहने वाले को धर्म युदके सिवाय तत्री का कल्याण करनेवाला दूसरा कोई भी धर्म नहीं है ।पर्याद पहुनकाल तक सम्धि बहुतसा उपाय किया परन्तु करने को समर्थ नहीं हुमा हे कर्ण यह तुझमे सत्यही सरप करता हूं ॥३८. सनप बोले कि गांगेय भीमनी के इस प्रकार कहने पर राधाका पुत्र कर्ण दण्डवत् पूर्वक प्रत्यात स्तु- तिकर रोता हुआसा अपने रपपर सवारहोकर प्रापके पुत्र के पास आया ३९ ॥ "If you donot like to withdraw yourself from wor, 1 give you per. mission to fight for tho sake of heaven. Purge thyself of nnger and selfishness and be brave and forgiring in battlo. Do as yon like I give you permission. Even the conquerod in war gsin good regions.36. Free from pride, powerful and solf relying men lave no other duty tlian war. I always triol to have peaco but all my efforts vero in vain. I speak th: truth, Karan." Sanjaya said that on bearing the words of Bhishm the son of Ganga, Karan bowed down to him with tears in his and took leave of him. He thon mounted his chariot and camo back to Duryodhan, 39. eyes 4. " " १८॥ " " 1-4974] Mahnbharat (४९७४) CONTENTS OF BHISHME PARYA, अध्याय पिण्य पृष्ठ Chapter Subject l'age १ फौरव पाडवों के युद्ध में नियम ४२३५ 1. Rules in the War. 4235 २भयानक उत्पात ४० 2. Ditaiful omelis. 40 3. 45 ४ स्थावर जंगम वर्णन 4. Noveables and Immoveables 58 ५जम्यूबण्ड ६१ | 5. Jaavulhand. 61 ६ जम्यूद्वीप ६४ 6. Jainrudwip. 61 ७ मे पर्वतके उत्तरीय भाग ७१17. North ol Meru. 71 ८पर्यत पासी ७६ 8. Hill Tribes. .. .76 ९ नदी मार देश 9. Rivers and countries, 79 १० जम्यूमण्ड 10 Janiukland, 87 ११ शाकद्वीप 11. Shakılwip 89 १२ जम्यूड 12 Jimvulhand. 91 १३ भीममृत्युश्रवण ४३०१ 13. The Fntal Nens. 4.301 १९धनराष्ट्र संजय सम्बाद ३.14. Dhritrashtra and Sanjaya 3 १५ दुर्योधन दुरशासन, १३ | 15. Duryodhan and Dushasan. 13 १६ सेना का वर्णन "1६16. The uniies. 16 17. 20 18 25 १९ सेनाव्यूह २८ 19. The Ariay. 28 २० ३४/ 20. 34 २१ युधिष्ठिर भर्जुन सम्बाद ३८ | 21. Yullushthur and Arjun. 38 २२ कृष्णार्जुन सम्वाद 22. Krishna and Arjun. 40 २३ दुर्गा स्तोत्र ४३./23 Darga-stotran 43 २५ चौरा के चित्तकी दशा ४६ 24 The warriors . 46 २५ भगवद्गीता प्रारंभ ४९ / 25. The Bhagvadgita. 49 २६ सांख्य योग • ५६ / 26. Sankhya-yog. 56 २७ फर्म योग ६७/27. Karan-yog. G7 २८ ब्रह्मार्पण योग ७५ 128. Brahmarpan-yog. 74 २०. सम्पास योग ८१19. Surya-yog 81 86 ३. अध्यात्म योग ८६|30 Adhyatm-yog. ३. विज्ञान योग, ९३ 31. Vijyan. 93 97 ३२ ग्रह योग ९७32. Brahm-yog. २३राज गुह्य ४४०१33 Raj-guhyar 6 ३४षिभूमि ६ of Divine Nature. ३५ विश्वरूप १२'35. Vishwarup. २२ 36 जीय प्रम २५:37. Soul and Brahm, ३.प्रति ३० 138 Pralnti. १९ पुरुषोत्तम योग ३४ ! 39.Purshottam. ४. सम्पादिमाग ३७140.Tlic Destinies. ४० 4101 13 " 30. 34 37 ४२ तत्व निर्णय 86 on. 27 M ६३ ७० भीमप Bhishma Pary 119751 अपाय चिपय पृष्ट Chapter Subject Page ४१ श्रद्धा ४१. Faith. 41 ४५42. Salvatioir.. ४३ युद्ध की तयारी ५७/13 The War. ४४ बाण दृष्टि 1844. 'I he shows of Asrots, ४५ युद्ध का वर्णन ७५ 45 The war. ४६ ८६46. ४७ श्वेत युद .९५47. Shwetitutte." 92 ४८वत वध ४५०० 18, Shwet's death. 4500 ४९ प्रथम दिन का युद्ध १४. 49. First day's battle.' ५० क्रौंच ब्यूह २०50. The plaalanx. 20 ५१ युद्धको तयारी २७ 51. The Prernation ५२ द्रोण और द्रुपद का युद्ध 38 52 Diona and Drupad. 31 ५३ धृष्टद्युम्न का युद्ध ३९/53. Dhrishtadyumn. 39 ५४ फलिंग वध 54 hang's Death. 44 ५५ लक्ष्मण और अभिमन्यु 46 55. Labsbuman and Allimanju. 58 ५६ अर्धचन्द्र व्यूह 56. The Crescent Array. 63 ५७ घोर युन 57. The latt'e. 66 ५८ भीम और युधिष्ठिर की वीरता 58 Bravery. 70 ५९ तीसरे दिन का युद्ध ७६ 53 The.lhind day. 7G ६. चौथे दिन का युर ९५ 60 The Fourth day. 95 ६१ अभिमन्य की धीरता ४६०० 61. Aljhinauyu. 4600 ६२ भीमयुद्ध ४ 62 Bhim. 4 ६३ भीमकीचीरता Do. ६४ चौथे दिनका युद्ध १६ | The fourth day's battle 16 ६५ भीमजी की मति... २६ 65 Bhishma's advice. 26 ६६ नारायण स्तुति. gues GG, Narayan's Praise 35 ६७ नारायण महिमा 67. Narayan's greatness. 40 ६८म्रह्मास्तव ४२ 68. Bralimastav. 42 ६९ मीमकायापल होना 69 Bhislıtu wounded. 45 ७० परस्पर युख .४९] 70, The Laltles 52 ७२ मीमकायुद्ध 40 72 Bbishma's fighting. 57 ७३ GH ७४ सात्यकी और मूरिश्रया ६६ /74. Satyaki and Bhurishrava.66 ७५ मकरव्यूह 75. The Crocodils Array. 71 ७६ पृतराष्ट्र और सजय सम्बाद ७५ 76. Dhritrashtra and Sarjaya.75 ७७ ७८ 77. 78 ७८ भीमसेन व चित्रसेन 78. Bhimsen and Chitrasen. 87 ७९. भीमयुद्ध ८९ 79. Blhshma's bravery. 89 ८.भीमसेन भीष्म ९१80. Bhimsen and Bhishm. 91 ८१ भीष्म दुर्योधनसम्वाद ९९ 81. Bhishm and Duryodhan. 99 ८२ व्यूह रचना 82. ThePhalanx 4702 १२ 63. १. : " ६१.73. . .

7 45 " " " " ६99 W [4976] Malabhairt (४२७६) अध्याय विषय पृष्ठ ! Chapter Subject Page ८३ शेखपध ७.83. The Death of Shankh ८४ धृतराष्ट्र सम्मका सम्पाद १५ 84. Duritrashtra and Sanjayn. 15 ८५ अर्जुनकी वीरता 85 Arjun's bravory. 21 ८६ मजन घ भीष्म RC 8 Arjun and Blım. 28 ८७ भीम और युधिष्ठिर ३४ | 87. Bhishm and Yudhishthir. 34 ८८ भगदत्तकी धीरता 87 88. Bhagdatta's bravery.. ८९ दुर्योधन भीष्म सम्बाद 89 Duryodhan and Bhishm. ९० मत्तमातंगोकानाश ५० 30. Dostruction of Matta-fatangas. 50 ९.राधानकी उत्पति 4991. Iravan's origin. 54 ९२ घटोत्कच ष दुर्योधनयुद्ध ६४/92. Ghatotkach and Duryodhan.61 ९३ ६७| 93. 67 ९५ ७२/94. 73 ९५भीमसत अश्वत्थामा ७७ 95. Bhim and Ashrathama. 77 ९६इरावान घध <3 96. Irayan killed, 83 ९७ उटा दिन ९२ 97. The sixth day. 92 ९८ दुर्योधन भीष्म सम्याय ४८०१ / 98. Duryodhan and Bhishm, 4801 6 १०० अर्जुन और भीम १२ 100. Arjun and Bhishm." 12 १०१ अलम्वुप ध अभिमन्यु 14 101. Alam yush and Ablunanyu 15 21 २०३ द्रोणाचार्य घ भर्जुन २८ 103 Dronacharya and Arjun. 28 १०४ अर्जुन व भीम ३३ | 104. Arjun and Bhishm. 33 १०५ मर्जुन व सुशर्मा ३८ 105. Arjun and Susharma. 38 १.६ कौरवी सेना का परास्त होना ४३ | 106. Defeat of the Kaurar army. 43 १०७ पांडवों की सेना का नाश ४७ 107. Deatruction of the Pandar army. 47 १०८ भीष्म की मृत्युका उपाय' ५६ 108. Plan of Bhishme donth. 56 १०९ शिखंडीव भीम ६९ 109. Shithandi and Bhishm. 69 ११० दुर्योधन भीम सम्वाद ७६ 110. Duryodhan and Bhishm. .36 १११ दुरशासन व अर्जुन ८111. Dushasan and Arjun, 81 ११२ द्वन्द्व युद्ध. ८. 112. Duelling. 87 ११३ द्रोणाचार्य व अश्वत्थामा ११४ भगदत्तादिव भीम ९८]1 '.. 98 ११५शिखंडीव भीम 4905 २१६ दशवे दिन का युद्ध 116. The tenth day. 10 १७ १५ 117. 15 २४ | 118. 24 ३२ 119. 32 १२० भीम पध ३८ 120. Bhishm's fall. 38 १२१ वाणों का तकिया ५३ | 121. The pillow of arrows. 53 १२२ ५८.122. 58 १२३ भीमोपदेश ६२ 123. Bhishm's advice. 62 १२४ भीष्मघ करण का सम्बाद ६५ 121, Bhishm and Karan. 65 २१1 102. " " 93 १० " " " " " " " १ " 1" " " "

The Mahabharat Bhishma Parv

Author
Vedvyas
Title
The Mahabharat Bhishma Parv
File name
The Mahabharat Bhishma Parv
Text
OCR done
Citation
1933
Published
2012/08
Publisher
Muradabad.,ramkrishna & Co,
Language
Sanskrit
Pages
761
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312884
Barcode
99999990321627.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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