Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Swarupanusandhan

Ojha,gori Shankar Udai Shanar · 2012/08

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आ लघु ग्रन्थ
निर्गुण तथा सगुण ब्रह्मनी उपासनामां
प्रवृत्ति थवा सारु
নখt
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ब्रह्मात्माना एकत्व विषे यथार्थ ज्ञान थवा सारु
Dos933393309350S0SS0363636300600050
सर्व मुमुक्षु अधिकारीओने
परम प्रीतिथी
ग्रन्थकाए
अर्पण कन्यो छे.

प्रस्तावना . आग्रन्यनुं नाम स्वरूपानुसन्धान पाडवामां आव्युं छे. रूप एटले पोतानुं खरं रूप अने अनुसन्धान एटले स्मरण, ध्यान. स्वरूपानुसन्धान एटले पोतानुं खरं रूप { छे तेनुं माणसने स्मरण करावनार ग्रन्थ. आ जगतमां सर्व व्यव- 'हार-'हुँ' अने 'मारु' ए रीते अविद्याकृत छे. सेमा 'हुँ' शब्दनो अर्थ वे मकारनो छे. एक 'हु सामान्यपणाए करीने सर्वमा रह्योछे ते आत्मानो वाचक छे अने वीजो देहादिकना अभिमान रूप जे 'अहम् ' शब्द छे ते मिथ्या उपाधि वा- चक छे. तेमां पारमार्थिक हुँ' कोण ए समजवू अवश्य छे. ए समजावनार विद्या तेनुं नाम आत्मज्ञान अथवा ब्रह्म विद्या अने चारे वेदनो, एटले ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद अने अथर्वणवेदनो, अन्त एटले मुख्य हेतु आत्मानुं ज्ञान सारी रीते करावयु ए छे तेथी ब्रह्मविद्याने 'वेदान्त' करी ने कहेछे. वे. दना वे प्रकार छे. जेमां कर्म उपासनानो भाग निरूपण करेलो छे तेने कर्मकांड कहेछे. जेमा ज्ञानमार्ग- निरूपण तेने ज्ञान- कांड कहछे. चारे वेदना उपनिपदमा ज्ञानमार्गर्नु निरूपण छे एज ब्रह्मविद्या अथवा आत्मनिरूपण, तो ब्रह्मविद्यानो मुख्य सिद्धान्त ए छे जे आ स्थूल शरीर अस्थि, रुधिर, मळ, मांस, मूत्रादिनुं भरेलुं छे ते काई 'हुँ' नहि. शरीर एज'लु' होय तो आ शरीर जन्म धारण करता पहेला न हत; हालमा छे अने थोडी काल जगतमा रही तेनो नाश थशे. आ जगतमा अनेक पराक्रमी पुरुपो थइ गया, थायछे, अने थशे पण तेमनी कीर्ति अने कृस शिवाय पाछळ काई . .

रघु अथवा रेहेनार नधी नाम तेनो नाश छे. अर्थात् देह
विकारी छे देह. परिणामी छे. देह छ; देह जन्मे छे; देह
वृद्धिने पामेछे; देह जुवान थायछे देह वृद्ध अथवा जीर्ण
थायछे अने अन्ते देहनो नाश थायछे. परंतु स्थूल देह तथा
सूक्ष्म इन्द्रिय, माण, मन, बुद्धि, अहंकार ए सर्वनो दृष्टा
एटले जोनारो, साक्षी, सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा ते अवि-
नाशी छे. ते अजन्मा छे नित्य छ; अनादि सिद्ध छे ते
जीर्ण थतो नथी अने जे खोळियामां ते रहेलो छे ते खोळियु
नाशने पामेछे परंतु ते पोते नाशवंत नयी.
वळी सर्व देहधारी प्राणिने विपे आत्मा छे ते एकज छे.
आत्मा ब्राह्मण नथी; आत्मा क्षत्रिय नथी; आत्मा वैश्य
नथी अने आत्मा शूद्र नथी. जेम सोनामाथी अनेक मका-
रना घाट घडाइ दागीना थायछे तेमां सोनुंज सस छ भने
लैनार वेचनार तेमां सोनु केटलुंछे अने केहेवी जातनुं छे ते
उपर नजर राखी तेनी किम्मत गणशे पण दागीना उपर
दृष्टि करता नथी. जेम नानामकारनां वस्त्र, धोतियां, शेला,
दुपट्टा, नेनमुख ए सर्व तंतुरूप छ. जेम खाट, पाट, खुरमी,
वांक ए सर्व काठरूप छ; जेम अनेक प्रकारनां माटीनां वा-
सण माटीरूप छे, तेम सर्वना घटघटने विपे अन्तर्यामी
आत्मा जुदां जुदा खोळियामां रहेलो छ तोपण एकज छै
अने ए आत्मा ईश्वर एटले परमात्माथी जुदो नयी पण एक
रुप छ. जेम अक्षरने विपे शाही भेळायली रहेली छे; शा-
हीमा अक्षरपणुं नथी तेमज आ सर्व जगत ब्रह्ममय छे .
ग्मने विषे जगतनो संभव नथी.
"एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेताः केवलो निर्गुणा"

अर्थः- देव एटले स्वयंप्रकाशं ईश्वर एकज छ; सर्व भूत माणिने विषे गूढ (ढंकायलो) रहेलो छ पण सर्व ठेकाणे व्या- पक छ सर्व भूत प्राणिनो अन्तर आत्मा छ कर्मनो अध्यक्ष छे सर्व भूतोने रेहेवानुं स्थान छ साक्षी, चैतन्य, केवल, निर्गुण छे. ए रीते शुद्ध जीव एटले आत्मा अने परमात्माना एकप- गानो साक्षात्कार जेने श्रुति, युक्ति अने अनुभवथी सिद्ध यायछे ते पछी गर्भवासादि अनेक दुःखमाथी छुटेछे. अनेक जन्ममरणयी छुटवू तेनुं नाम मोक्ष. मोक्ष यवा सारु वे प्रकारनी भक्ति अयवा उपासनानी जरूर छे. एक तो स. गुण ब्रह्मनी उपासना अने वीजी निर्गुण ब्रह्मनी उपासना. सर्व जगतने विपे परमात्मभावना राखवी एटले जगत सर्व ब्रह्ममय छ एम मान, ते सगुण उपासना; अने जगतने विषे ब्रह्मरूप रहेलो मत्यगात्मा हूं ते माझं स्वरूप सर्व इ. न्द्रियोथी अगोचर छे; आंगळीथी मने कोइ वताची शकतुं नपी. हुं आकाशनी पेठे निराकार, व्याप्त, परिपूर्ण, अचल, अकती, अभोक्ता, राग द्वेप रहित, सच्चिदानंद, अखंड, आ. नंद, एकरस, अजन्मा, अमर छ एम मानवं ते निर्गुण उपा- सना. सगुण उपासनाथी एटले सर्व जगतने विपे परमात्म. भावनाथी अन्तःकरणनी शुद्धि थायछे. अन्तःकरण शुद्ध ययेथी ज्ञान थायछे. अने ज्ञानथी मोक्ष थायछे. ज्ञान बेभकारनुं छे. परोक्ष ज्ञान अने अपरोक्ष ज्ञान. आ जगतनो नियन्ता एटले नियममां राखनार, तेनो जाता एटले पा- मनार अने तेनो संहार पटले नाश करनार कोडक ईश्वर छ एम जे जाणवू ते परोक्ष ज्ञान; अने ए जे परमात्मा ते हुं शुद्ध, सच्चिदानन्द स्वरूप हृदयने विपे रहेलोछु, दूर नयी पण नजीक छ एम समजबुं ते अपरोक्ष ज्ञान जाणवू.

हवे अन्तःकरणनी शुदि करवी एटले हृदयनो मेल का- ढवो ते क्यारे थाय? तो तेने सारु वेदान्त शास्त्रमा.पांच साधन कहेलां छे. ते मध्ये पेहेलं साधन ए के जे काइ कर्म माणसे करघु ते परमेश्वर निमित्त करवू. यज्ञ, यागादि अ- थवा जप, तप, तीर्थ, पुण्य, धर्म, दान आदि कर्म ईश्वर नि. मित्त अने ईश्वरार्पण बुद्धियी करवा. मने पुण्य थाय, मने स्वर्ग मळे एवी स्वार्थ धुद्धिथी न करवां. वीजुं साधन अन्तः- करण शुद्ध करवानुं ए जे ईश्वरपरायण रेहे, एटले ईश्वर एज मारुं रक्षण करनार छ; एज मात्र आश्रय लेवा योग्य छ माप्य पण एज छे अने एज मारी गतिरूप छे एटले के इ- न्द्रियोनी वृत्ति परमेश्वरपरायण राखवी. त्रीजु साधन ए जे परमेश्वरनी भक्ति करवी एटले सर्व विश्वमा परमात्मभावना करीने कोइनो राग, द्वेष न करवो. चोधु साधन ए जे असंग वृत्ति राखवी एटले पुत्र, मित्र, स्त्री, द्रव्य, सगां, वाहालां ए सर्व आखरे बंधनने आपनारा छे एम समजी तेमने विपे अनुराग एटले आसक्ति न राखवी. पांचमुं साधन ए जे जेम आसक्ति न राखवी तेम सर्व भूत प्राणि मात्रने विपे निर्वैर- भाव एटले शत्रुपणानी बुद्धि न राखवी. आ पांच मकारनां साधनरूप भक्तिथी अन्तःकरणमा हुं मारापणानो मेल धो. वाइ जायछे. अने ए साधनद्वारा मुमुक्षु पुरुप आत्मार्नु अपरोक्ष ज्ञान संपादन करीने गर्भवास अने जन्म मृत्युना दुःखमाथी छुटी मोक्षने पामेछे. आ प्रमाणे वेदान्तशास्त्रनो टंकामां सिद्धान्त कह्यो. हवे आ ग्रन्थ लखी प्रसिद्ध करवानो हेतु ए छ जे श्री भावनगर दरवारना माजी प्रधान रा. रा. आजम गौरीशंकर उदयशं- कर सी. एस. आई. ने स्वामि श्री सच्चिदानन्द ब्रह्मतीर्थ तथा रामकृष्ण भारती विगेरे ब्रह्मनिष्ठ महात्माओनो समागम थयोः एवा सत्समागमे करीने राजकारभारना सम्बन्धनुं काम यथास्थित रीते चलावतां छतां तेमाथी अवकाश लावी वेदान्तशास्त्रना श्रवण, मनन अने निदिध्यासनमां मन परोन्यु अने श्रुति प्रस्थान, सूत्र प्रस्थान, स्मृति प्रस्थान तथा तेमना प्रकरण ग्रन्थ विगेरेनो अभ्यास नियम पूर्वक कर्यो. भावनग- रमां ब्रह्मनिष्ठ पुरुपोनो सारो सत्कार थवाथी तथा वेदान्त उपर गगाभाइश्रीनी अत्यंत अभिरुचि जोइ घणा घणा ब्रह्म- निष्ठ परमहंस, संन्यासी, दंडी, स्वामि दूर देशथी एमनी ख्याति सांभळी आववा लाग्या. तेमना प्रसंगथी वे- दान्त विषयमा बहुश्रुतपणुं मेळव्यु. परन्तु जे लाभ तेमने मळ्यो ते लाभ मुमुक्षु पुरुपोने आत्मविचारमा उपयोगी थाय एवा विचारथी तथा सज्जनोनी सूचनाथी आ स्वरूपानुस- न्धान नामनो ग्रन्थ सात प्रक्रियामां श्रुति, स्मृति, तथा श्री शंकराचार्य आदिनां वाक्योनी ते ते स्थळमा योजना पूर्वक रचवामां आव्यो छे. अति श्रम लेई ज्ञान संपादन करवानुं फल शुं ? मात्र एज के वीजाओने तेमना ज्ञाननो लाम मळे. जगतनो व्यवहार एवों छे के जे वर्गमां जे रीतनुं आचरण पोता मध्ये वडील अने श्रेष्ठ पुरुषो करेछे ते जोइ ते वर्गना वीजा लोको पण ते प्रमाणे पत्तैछे. गीतामां कहेलं छे जे- पदाचरति श्रेष्ठस्तनदेवलरोगतः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ अर्थ:- जे जे आचरण श्रेष्ठ पुरुप करेछे ते ते आचरण चीना लोको तेमन जोईने करेछे श्रेष्ठ पुरुप जेनुं प्रमाण लेइ एटले दाखलो लेइ कार्य करेछे तेने अनुसरीने लोक पण ते प्रमाणे वःछे. माटे जेओ सजन अने श्रेष्ठनी पदवीने पोहोचेला छे ए- मनोधर्म छे, एमने माथे पोताना आचरण विपे एटली जवा- बदारी छ, के जे प्रमाणे तेओ वर्तशे ते प्रमाणे देखादेखी दु- नियांनी वर्तणूक पण तेषी थशे माटे तेमणे सदा सत्कर्म, सुजनना, परोपकार अने सारा कस करी वीजा अनुकरण करे तेवा मार्ग जगतने वतावी आपवा. ब्रह्मनिष्ठता राखवी अने राजयोग पाळयो ए परस्पर विरुद्ध नथी. असलथी आ देशमां तेवो व्यवहार चालतो आवेलो छे. जनकविदेही मोहोटा ब्रह्मनिष्ठ हता अने या- ज्ञवल्क्य ऋषि तेमना गुरु हता. नेओ निरंतर जनक राजाने वेदान्त श्रवण करावता. अर्वाचीन कालमा मरेगनुं राज्य स्था- पन करनार महा समर्थ श्री शिवाजी महाराज छत्रपति पण श्री ब्रह्मनिष्ठ रामदास स्वामिने पासे राखी ब्रह्मविद्यानो अभ्यास करता. हमणाना काळ मां पण ब्रह्मविद्यानो अभ्यास राजयो- गनी साथे चालेछे. तेना दृष्टान्तमा आक्सफर्ड (उक्षतरणाभि- धान नगरीना) मोफेसर भट्ट मोक्षमूलरे (मेक्सम्युलर साहेवे) पोताना नवा ग्रन्थ नामे " हिंदुस्थान आपणने शुं शीखवी शके तेम छ ?" तेमा लखेछे के धर्म तथा ब्रह्मविद्या संबंधि विषयमा हिंदुस्थानना लोको वेदरकार थइ गयाछे एम सांहांना लोको पोते जगतनी आगळ वारंवार पोकारेछे तो. पण तौराष्ट्र मध्येनां पेहेला वर्गनां स्वस्थान जुनागढ अने भावनगरना कारभारी वे देशी मुत्सद्दी पुरुपो गोकुलजी अने गौरीशंकर एमोना वृत्तान्त वांचेथी वेदान्तनुं मवल राज- प्रकरणमां अने आचारमा हजु केटलं छे तेनी खातरी थशे.

(७) आ पुस्तकमां वेदान्तना ग्रन्थोमांथी जे जे वाक्योनो आ- धार लेइ योजना करीछे ते वाक्योनुं गुजरातीमा भापान्तर करवामां शास्त्री भानुशंकरजीथकी मोहोटी मदद मळी छे तथा तेमां मुंबई मध्ये मसिद्ध ब्रह्मनिष्ठ आचार्य व्यास श्री जयक- पणजी जीवनरामजीनी पण सहायता मळी छे. वळी, शारदा मठना स्वामि श्री शङ्कराचार्य राजराजेश्वराश्रमजी तथा स्वामि श्री चिद्धनानन्दजीने आ ग्रन्थ निवेदन करतां ते. मणे पण प्रसन्नता जणाव्या नंतर आ ग्रन्थ छपान्यो छे. छेवट आ पुस्तक मुंबइमा रही कवि भवानीशंकर नरो- त्तमजीए छापखानामां छपावी वेळा ग्रन्थना पत्रमा शुद्धा- शुद्ध अक्षर तथा शब्दरचना घणी संभाळथी तपासी जोइछे तथा ग्रन्थने आरंभे अने अंते गुजराती कवितामा मंगलाच- रण रची ग्रन्थने शोभाव्यो छे. पुवई, चैत्र शुदि६ ता० १ एपील सन १८८४. जवेरीलाल उमयाशंकर याज्ञिक.

INTRODUCTORY The following pages contain an exposition in Gujrati of the leading principles of the Vedant plulosophy as un folded in the Upanislınds and the Inter literature on the subject The work is intended as a guide to the Gujaratı student prepintory to his entering upon a more claborate study of the subject in the Sanskrit original The author of the work is the venerable Azam Gowrishanhar Udrza shankır CSI Inte minister of Bi wangur-one of tho first class Native Stutes in Latbikwid Azam Gowrishankar lias already curned 1 high place in the roll of successful Native administmtors on this side of India having served Bhav nagur farthfully for fifty five years of wluch thirty two wero passed as Chief Karbl arı or Dewan He retired into private life in January 1879 full of years and lionors Though now bordering close upon cighty Mr Gowrı alinnkar shows that his mind is as active as ever His cnergies are directed to leisurely contemplation of pro blems of life and mind which usoul to occupy him in the intervals of his work even while pursuing in active political His name and the interest evincel by him in the Vedant studies has drawn to Bhavnagar many un itinerant note 1 Indian anchorite from Sringeri Denares Nepal and other remote prrts of In 112 and extended the fame of Bhavnagar 19 9 home of Indian philosophical speculations in Kathruwad and Gujrrat Though the philosophy of the Upanishads and the later Spoculations of Indian metupi ysical writers have not much intercat for the European scholır and philosopher tl era can be no doubt of the fact that the study of Indian philo sophy confined as it is to a sclect class of persons is still a moral force in this country It is 99 Dr Goldstücker career observed, 'the basis of the enlightened faitlı of India,' and the groundwork of many of the Hindu religious orders and Bects that are current at this day in different parts of India This unpretending little work is significant of one or two facts which no observer of the progress of Hindu thought can be blind to It shows that even at the present day the study of philosophy amongst us as blended with that of politics , that in this study there is to be observed an un broken link between the most modern and the most ancient phases of Hindu thought, and that there are still many men here who, rising above the more materialistic tendencies of the age, find real enjoyment in the study of those problems of life and mind which engaged the thoughts of their ancestors three thousand years ago. Bonday, 2nd April 1884 JUY

* शार्दूलविक्रीडित छंद.
व्याप्युं विश्व अशेप जे स्वपळथी सर्वज्ञ सर्वेश्वरे,
उत्पत्ति स्थिति नाश सौ जगतना जे योग्य रीते करे,
साक्षी स्थूल शरीर सूक्षम तणो जूदो वळी तेथि जे,
जेथी पुण्य प्रपच पाप पर छे रे' छे अविद्या विने. १
S) कालादि कम देश वस्तु मदिने कीघो परिच्छेद जे,
तेनाथी पण छे वळी रहित ए वेदोथि ना वेद्य जे;
आकाशादि पदार्थ सूक्ष्म करतां जे सूक्ष्म सौ सूक्ष्मथी,
जे चैतन्य अचिन्त्यरूप मळवा थाक्या मुनींद्रो मथी. २
जे छ दूरयकीज दूर वळि जे रे'छे कनेनो कने,
मेरेछे स्वयमेव देव सपळे सन्मार्गमा सर्वन
जे श्रोनादिक इंद्रियो सहु तणुं आपे अधिष्ठान छे,
तेनुं तेम छतां अगोचर अहो ! आनन्द विज्ञान छे.
अद्वैतामर छे जरा रहित छे मुक्त भावे भलो,
मर्वन स्थिर थै वसे तदपि छे ए ईश तो एकलो;
जेनुं ज्ञान थयेथि निश्चय मटे 'हुं आ अने माहरूं,'
एवा प्रत्यगमिन ब्रह्म प्रभुने पीते प्रणामो करूं.
* आ कविता भवानीशकर वि० नरोत्तम द्विवेदीए
रची छे.

॥ॐश्रीगणेशाय नमः॥ ॐतत्सत्परमात्मने नमः॥श्रीशंकराचार्येभ्यो नमः अथ श्रीस्वरूपानुसंधानग्रंथप्रारंभः वेदान्तनुं श्रवण यथामति थयुं तेहेना तात्पर्यार्थर्नु नियमपूर्वक अनुसंधान. श्री शंकरभगवत्पूज्यपादनां वाक्यरूप मंगलाचरणं. प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं, सञ्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् । यत्स्वप्नजागरसुषुप्तमवैति नित्यं, तब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघः॥१॥ अर्थ.- सद्रूप, चिद्रूप अने आनंदरूप, तथा परमहंस परिव्राजकोर्नु परम प्राप्य स्थान, अने तुरीय, एटले जायत्, स्वप्न, सुप्ठप्ति, एत्रण्ये अ- वस्थाओथी अतीत, तथा ते अवस्थाओने नित्य जाणनारूं (प्रकाशक) एवं, हृदयनेविपे स्फु- रणायमान जे प्रत्यगात्मतत्त्व, तेहेने प्रातः- १ "प्रति अंचतीति- प्रत्यक्' ( अन्नमयपी आरंभीने २ वरूपानुसन्धाननी काळनेवि स्मरण करूं छौं. एटले जे प्रत्यगा- त्मतत्त्व, ते निष्कल (प्राणादि पोडशकलार- हित) ब्रह्मरूपज छे, पण भूतसंघातरूप (दे- हादिरूप) नथी; ए रीते आत्मब्रह्मनुं अभेदे- करीने अनुसंधान करूं छौं ॥१॥ प्रातर्भजामि मनसो वचसामवाच्यं, वाचो विभांति निखिला यदनुग्रहेण । यन्नेतिनेतिवचनैर्निगमा अवोचुस्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरग्र्यम् ॥२॥ अर्थ:- जे प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्मस्वरूप- मन अने वाणीने अवाच्य (अगोचर ) छे, तथा स- मय वाणीओ, जेना अनुग्रहथीज प्रकाशे छे. एटले जेणे प्रकाश करी छतीज वक्तव्य विपयो उपर प्रवृत्त थायछे, तथा सर्वे वेदो, जेने "ने- ति नेति" इत्यादि वचनोथी सर्व निपेधना अवधि- रूपेकरीने एटले पृथ्वी, अप, तेज, ए त्रण मू. नै, तथा वायु, आकाश ए वे अमूर्त. ए रीते भू- मूर्तरूप जे पंचभूतो, ते तथा तेमनां कार्य भौतिकरूप जे स्थूल सूक्ष्म देह, तेपण आत्म- आनंदमय पर्यंत पाचे कोसोधी जे आन्तर रेहेनार ते साक्षी आत्मा).

.
प्रथम प्रक्रिया.
३
तत्त्व नहि. केमके उत्पत्तिविनाशवान छे माटे,
किंतु, ते सर्वेना निपेधनुं अधिष्ठानभूत जे सत्
चित् आनंदस्वरूप, एज आत्मतत्त्व छे. ए प्रका-
रे वोधन करे छे. तथा विद्वान लोको जेने ब्र-
ह्मादि देवना पण देव अने जन्मादि सर्व विकारे
रहित अने ज्युतिरहित, तथा परमोत्तम कहे-
छे. ते प्रत्यगभिन्न ब्रह्मने, प्रातःकाळनेविपे हुँ
भजु छौं ॥ २॥
प्रातर्नमामि तमसः परमर्कवर्ण,
पूर्ण सनातनपदं पुरुपोत्तमाख्यम्।
यस्मिन्निदं जगदशेपमशेपमूर्ती,
रज्ज्वां भुजंगम इव प्रतिभासितं वै ॥३॥
अर्थ.-जे प्रत्यगभिन्न ब्रह्मस्वरूप, तमधी (मा-
याथी) पर छे तथा सूर्यनी पेठे प्रकाशस्वरूप
अने “ यस्मारक्षरमतीतोहं" इत्यादि प्रमाण-
थी पुरुपोत्तम छे. एटले व्यारुत अव्याकृत
सर्वथी उत्तम छे. तथा जे पूर्ण अविनाशि पद
केहेवाय छे, तथा पूर्णस्वरूप जे अधिष्ठाननेवि-
पे आ नामरूपक्रियात्मक सर्व जगत्, रज्जुने-
विपे भुजंगनीपेठे प्रतिभास थायछे, ते प्रत्यग-
भिन्न ब्रह्मस्वरूपने हुँ नमस्कार करूं छौं ॥३॥

१ स्वरूपानुसन्धाननी (ए रीते त्रण श्लोके करीने कमथी मान- सिक, वाचिक अने. कायिक एत्रण प्रकारे- त्वं पदार्थ तथा तत् पदार्थनुं शोधनपूर्वक ऐ- क्यानुसंधान कर्यु.) शंकरं शंकराचार्य, केशवं बादरायणम् । सूत्रभाष्यकृतौ वंदे, भगवंतो पुनःपुनः १ ब्रह्मानंदं परमसुखदं; केवलं ज्ञान- मूर्ति,वंदातीतं गगनसदृशं,तत्त्वम- स्यादिलक्ष्यम् ॥ एकं नित्यं विमल- मचलं, सर्वधीसाक्षिभूतं, भावातीतं त्रिगुणरहितं, सद्गुरुं तं नमामि ॥२॥ सद्गुरुनी सेवा, नमस्कार इत्यादि श्रद्धापूर्वक करवायी निर्मल धयुं छे अन्तःकरण जेनु, एवो विवेकादिक साधनचतुष्टयसंपन्न जे पुरुप, ते अधिकारी १. वेदान्तश्रवण करवाथी परो- क्ष ज्ञान धया नंतर मनननिदिध्यासनधी अपरोक्ष एवीजे जीवब्रह्मनी एकता, तेरूप विषय २. अनर्थ जे दुःखरूप संसार तेनी निवृत्ति तथा परमानंदनी प्राप्तिरूप प्रयोजन ३. वोध्यवो- धकभाव एटले स्वरूप वोध्य अने शास्त्र वोध- प्रथम प्रक्रिया. क ए संबंध १.ए प्रमाणे वेदान्तनुं अनुबंधच तुष्टय. तथा- यावन्नानुग्रहः साक्षाज्जायते परमेश्वरात् । तावन्नसद्गुरुंकश्चित्सच्छास्त्रं वापिनोलभेत् अर्थ.-जे व्यापक परमेश्वर आ जगत्ना उ- त्पत्ति, स्थिति, लय विगेरेनो कारणभूत सर्व नामरूपक्रियात्मक भूतभौतिकमां अन्तर्यामि- रूपे रहेलो छे. एवा परमेश्वर, स्मरण, भ; जन, नमस्कारादि शुद्धभावनापूर्वक करवाथी तेनो कृपारूप अनुग्रह घायछे. ते ज्या पर्यंत न थाय, त्यांहां सुधि कोई पण पुरुष, सद्गुरुने तथा सच्छास्त्र (वेदान्तशास्त्र) ने पामे नहि. १ माटे (१) ईश्वरप्रसाद (२) गुरुप्रसाद (३) श्रुतिप्रसाद (अने) (४) आत्मप्रसाद संपादन करवा. आत्मप्रसाद एटले सद्गुरुना सत्संगथी सदसत्नो विचार तथा संतोप अने शम ए रीतना पुरुपार्थवडे निरंतर अभ्यास होवाथी ब्रह्मविद्यानी प्राप्ति थाय. ए रीते मनमा राखीने, अध्यारोपापवाद न्याये करीने ईश्वरजीवादिकना विचारविषयक प्रथम प्रक्रिया. " सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म."

w स्वरूपानुसन्धाननी विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ए श्रुतिमां कहेलां शुद्ध ब्रह्मनां स्वरूप, प्र- तिविब, शुद्ध सत्वप्रधान मायामां पडद्यं, ते स- र्वज्ञत्वादिविशिष्ट ईश्वर केहेवाणो. सर्वज्ञत्वादि- विशिष्ट एटले (१) सर्वज्ञत्व; (२) सर्वनियंत- त्व; (३) सर्वांतर्यामित्व; (४) सर्वयोनित्व; (५) सत्यसंकल्पकत्व; (६) सर्वशक्तित्व इत्या- दि गुणविशिष्ट एवा ईश्वरने पोताना स्वरूपर्नु यथार्थ ज्ञान रडुं छे, तेथी मायाने वश करीने त्रिगुणात्मक भूतभोतिक त्रिजगतनी उत्पत्ति, स्थिति, लय विगेरेनो यंत्र असंगनिर्लेप थका नियतिपूर्वक चलावे छे.॥ उपर लखेला सर्वज्ञत्वादिना अर्थो। (१)सर्वज्ञ. एटले सामान्यरूपे नामरू- पक्रियात्मक सर्व प्रपश्चने तथा भूत, भविष्य- त्, वर्तमानने जे जाणे ते. त्यांहां श्रुति.-" यः सर्वज्ञः सर्ववित्." (२) सर्व नियन्तृत्व. त्यांहां श्रुति.- "एतस्याक्षरस्य प्रशासने गाार्ग सूर्या- चंद्रमसौ विधृतो तिष्ठतः” इत्यादि. - प्रथम प्रक्रिया. अर्थ.- हे गार्गि! सूर्य, चंद्र, पृथ्वी, अन्त- रिक्ष, संवत्सरादि काल इत्यादि जे ईश्वरनी आज्ञामा वर्नेछे, तेमज एज ईश्वर सेतु जेवो छे, केमके एथिव्यादि भिन्न भिन्न लोको, तथा देव मनुष्यादि, तथा वर्णाश्रमादि, तथा भुवनो तथा सर्व प्राणियोनां असंकरपणाने माटे धारण करनार, जेम लौकिक सेतु, क्षेत्रना क्याराओने तथा तेमानां जळोने संकर थवा देतो नथी, ते- म नियममा राखे छे. (३) सर्वान्तर्यामित्व. त्याहां बृहदारण्यक श्रुति.- “यः पृथिव्यां तिष्ठन प्रथिव्या अन्त- रोयं एथिवीन वेद यस्य एथिवी शरी- रं यः पृथिवीमन्तरो यमयति.” इत्यादि. अर्थ.- जे एथिव्यादिकने विपे रहेछ, अने एथिव्यादिथकी आन्तर, तथा एथिव्यादिक देव- ता जेने जाणीशकती नथी, तथा एथिव्यादि जेनुं शरीर छे. ए प्रकारे जे सर्वेनी अन्तर रह्यो छ- तोटथिव्यादिक सर्वने नियममा राखे. एटले-पो- तपोताना व्यापारोने विपे प्रेरेछे, तथा सर्वे प्रा- णीओना अन्तरमा रह्यो छतो तेमनां करेलां पु- स्वरूपानुसन्धाननी प्यपापने जोनार अने तेना अनुसारे फलनो आपनार, ते सर्वान्तर्यामित्व.॥ (४) सर्वयोनिल. एटले सर्व नामरूप- क्रियात्मक जगत्नो उपादानकारण तथा निमि- सकारण. अर्थात् अभिन्ननिमित्तोपादानकारण. जेम व्यष्टिसुपुतिनो अभिमानी प्राज्ञात्मा, ते स्व न तथा जायत्रूपी कार्यनो कारणभूत छे. तेम समष्टिजगत्ना उत्पत्ति, स्थिति, लयनो कारण- त अव्याकतोपाधिक ईश्वर छे. जे धकी हिरण्य- गर्भ अने विराट आदि अध्यात्म, अधिदेव, अने अधिभूत कार्यरूप सृष्टि थाय छे, ते सर्वयोनि- त्व. त्यांहां तैत्तिरीय श्रुति.- “यतो वा इ- मानि भूतानि जायन्ते." इत्यादि. ॥ एज शुद्ध ब्रह्मन प्रतिबिम्ब, मलिन सत्वप्र- धान अविद्यामां पड्युं, एटले ज्ञानक्रियाशक्ति- मत् बुद्धि प्राण संयुक्त लिंग शरीरमा प्रतिफलित थयुं. ते जीव, अल्पज्ञत्वादि विशिष्ट केहेवाणो एटले पोतानां अधिष्ठानस्वरुपर्नु यथार्थ भान भूलवायी, अविद्याने वश थईने लिंग तथा स्थूल शरीरमा हुँ अने म्हारापणानां, तथा स्त्री पुत्र धनादिकमां केवल म्हारापणानां दृढ अभि- मानथी, अजन्मा, अविक्रिय छतां जन्मादिक प्रथम प्रकिया. पड़भाव विकारवान्, तथा माता, मान, मेय; ज्ञा- ता, ज्ञान,ज्ञेय; द्रष्टा, दर्शन, दृश्य इत्यादिक त्रिपु- टीरूप धईने अकर्मा अभोक्ता छतां, का भो- का पई, काम क्रोध लोभादिकने लीधे आपात- रमणीय शब्दादि विषयसुखमां आसक्तिमान थई, जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, दुःस्वरूप संस- तिमान् धयो. एवा जीवने कोइ एक प्राक्त- न पुण्यवशे, तथा स्ववर्णाश्रमधर्मेण,त- पसा हरितोपणात्" इत्यादि साधनो वडे सद्गुरुनी सत्संगति थवाथी, जे व्यापक परमेश्व- रनी इच्छा मात्रथी जगतनी उत्पत्ति, स्थिति,ल- य थायछे, एवा अन्तर्यामि परमेश्वरनु स्मरण, भजन, वंदन करवाथी, तेवं अन्तःकरण निर्मळ थये आत्मा अनात्मानो विवेक एटले आत्मा सत्य छे, अने देहादिक अनात्मा ते सर्वे मिथ्या छे. तेथी मिथ्या वस्तु उपर दोपदृष्टि एटले गी- वास, जन्म, मरण, जरा, व्याधि आदि त्रिविध ताप विगेरेथी दुःखरूप जाणीने, वैराग्य थत्तां, फाम, क्रोध, लोभादिक दुष्टगुणनो त्याग करी, ज्ञान, सत्य, दमादिक सद्गुणवान थइ, सहरुथी श्रवणमा.-"प्रथमं दशमोऽस्तीति वत्" परोक्षज्ञान थया नन्तर विचार, के हुँ कोण?

स्वरूपानुसन्धाननी नाहं भूतगणो देहो, नाहं चाक्षगणस्तथा। एतद्विलक्षणः कश्चिद्विचारःसोयऽमीदृशः १ अर्थ.-पंचीकृत पंचभूतनो थयेलोले स्थूल देह एटले अस्थि, मांस, रुधिर, चर्म, नाडी, मू- त्र, पुरीप विगेरे समुदाय ते ई नहि तथा अपं- चीकृत सत्तरतत्त्वनो सूक्ष्म देह, ते पण हुं नहि; अथवा (विवेकचूडामणिनो श्लोक ) वागादि पंच श्रोत्रादि पंच प्राणादि पंचाधमुखानि पंच। बुद्ध्यायविद्यादि च काम कर्मणी, पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहुः॥१॥ अर्थ.- वाक्, पाणि, पाद, उपस्थ, गुदा १. श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना, घ्राण २.प्राण, अपा- न, व्यान, समान, उदान ३. आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी ४. वुद्धि, मन, चित्त, अहंका- र ५. विक्षेपशक्ति ते अविद्या ६. इच्छाविशेष ए काम ७. पुण्य पाप ए कर्म ८. ए प्रकारना अष्टपुरने सूक्ष्म शरीर, वेदवेत्ताओ केहेछे १. ते पण हुं नहि.हवे "एतद्विलक्षणः कश्चि- त्" एटले ए बन्न देहथी जे विलक्षण (पृथक्) $ ។ " प्रथम प्रक्रिया. अने ते बन्ने शरीरती सत्तास्फूर्तिनो प्रदाता एवो जे आत्मा, तेनी विलक्षणता देखाडनारी कठ वल्लीनी श्रुति.- येन रूपं रसं गंधं शब्दान स्पर्शाप श्व मैथुनान्। एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते॥ एतद्वैतत् ॥१॥ अर्थ.- स्थूल, सूक्ष्म देहादिक संघातथी आन्तर एवा ज्ञानरूप जे आत्मानी सत्तास्फूर्ति- वडे सर्वलोक रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द. ए विपयोने तथा मैथुननिमित्त सुखप्रत्ययोने स्प- प्ट जाणे छे.॥ दृष्टान्त ॥जेम जेनी सत्ताथीलोह, दाह करे ते अग्नि छे ।। तेम जेनी सत्तास्फूर्तिथी, लोक, रूप रसादिकने अनुभव करे, ते चैतन्य आत्मा छे.जे आत्माने आ लोकमां अविज्ञेय (न जाणवामां आवे) एवी कोई पण वस्तु, परिशेप रेहेती नथी किंतु सर्व वस्तु, आत्मानेज जा- णवामां आवेछे. एज सर्वज्ञ आत्मा हृदया- काशमां सर्वथी आन्तर आनन्दरूप साक्षी तेज ९. एम जाणवू. (हृदयाकाशमां ते आत्माने स्पष्ट जणाववा- माटे बृहदारण्यकना छठा अध्यायनी श्रुतिमा १२ स्वरूपानुसन्धाननी याज्ञवल्क्य मुनिये जनक राजाने उपदेश कयों छ. तेनो संक्षेपार्थ). यद्यपि आनन्दस्वरूप आत्मा सर्वत्र व्यापक छे. तथापि हृदयकमळमां रेहेली बुदिनविपे विशेपेकरीने अभिव्यक्त थायछे. त्याहां ॥ष्ठां- न्त॥जेम यद्यपि सूर्यन एक ज्योति (तेज,)ब्रह्मां- डमां सर्वत्र सरखं व्यापक छे. तथापि घटनेविपे, स्फाटिक मणिनेविपे अने सूर्यकांत मणिनेविपे, अस्वच्छता तथा स्वच्छताना तारतम्येकरीने न्यूनाधिक जणाय छे. एटले घटस्थानी तामस स्थूल देहनेविपे प्रकाशमात्र जणायछे. तथा राजस प्राण इन्द्रियोने विपे स्फाटिक मणिनी पेठे विशेप प्रकाश भित्यादिकमां प्रतिबिम्बनी तुल्य जणाय छे. अने सूर्यकान्त मणिमांजेम सु. यतुं तेज दाहक तथा प्रकाशमान जणायछे तेम सात्विक अन्तःकरण जे बुद्धि, तेने विपे आत्म- ज्योति, आनन्दरूप तथा प्रकाशरूपविशेपे करी- ने अभिव्यक्त थायछे. ए रोते देहादिकथी विलक्षण कूटस्थ साक्षी, ते ९. ए प्रकारे विधि मुखे करीने स्वस्वरूपनो विचार कयों. अने देहादिकथी बाह्य जे नामरू- पक्रियात्मक भूत भौतिक सर्व प्रपञ्च. ते पण प्रथम प्रक्रिया. १३ अस्ति, भाति, प्रिय, एटले सत्, चित्, आनंद अधिष्ठान जे ब्रह्मरूप तेने विपे अध्यस्त छे. अ- र्थात् ते सर्व पण आत्मरूप छे, केमके अध्यस्तने अधिष्ठानथी अतिरिक्तपणुं नथी. त्यांहां श्लोकः- अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चे- त्यंशपंचकम् । आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् ॥ १॥ अर्थः- 'अस्ति' (विद्यमानता) 'भाति' (प्रकाश) 'प्रिय' (प्रेमास्पद) 'रूप' (ट- थु बुघ्नोदरादिक ) 'नाम' (घट पट इत्यादिक शब्दो) एपांचे मळीनेज आ वस्तु छे. आ वस्तु भासे छे. आ वस्तु प्रिय छे. आ वस्तुनुं आ रूप छे. आ वस्तुनुं आ नाम छे, ए रीते अंशपञ्च- कथी व्यतिरेके (अधिकताये) करीने व्यवहार- नोज असंभव छे.माटे लोक व्यवहारर्नु विषयभूत, भूतभौतिकात्मक सर्व पण वस्तु, अंशपंचकात्म- कज छे. ए पांचे अंशो मध्ये पेहेला त्रण, सत्; चित्, आनन्द. ए अंश ब्रह्म स्वरूपज छे अने 'नाम रूप, ए वे अंश जगद्रूप छे. १. २ १४ स्वरूपानुसन्धाननी वळी “नेति नेति" ए श्रुतिना अवलंबनधी निपे- ध मुखे पण विचार के स्थूळ, सूक्ष्म, कारण शरीर, ते हुं नहि. त्यांहां श्री आचार्य वचन:- नाहं प्राणों नैव शरीरं न मनोऽहं नाहं बुद्धिर्नाहमहंकारधियौ च । योत्र ज्ञांशः सोऽस्म्यहमेवेति विदुर्य तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे॥१॥ अर्थः- प्राण, शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त ए हं नहिं एटले प्राणथी आरंभीने चित्त पर्यंत सर्व दृश्यत्वधी तथा भौतिकपणाथी तथा सावयवपणाथी तथा ममताना विषय होवाथी त- था सुषुल्यादिकने विपे आत्मा छते पण तेमन अदर्शन छे माटे तथा उपचय अपचयादि धर्म- वाळां छे, माटे घटादिकनी पेठे अनात्मा छे ते हुँ नहि, किंतु दृश्यत्वादिक धर्मोथी रहित तथा प्रा. णादिक सर्वनो साक्षी, तथा ते प्राणादिक, व्यभि. चार पामे छते पण पोते अव्यभिचारी एवो जे चिद्धातुरूप आत्मा, एज हुँ छौं (पंचकोशा- तीत छौं.)

प्रथम प्रक्रिया. १५ ए पंच कोशोथी आत्माना विवेकनो विचार. स्थूल शरीरभूत अन्नमय कोशनुं स्वरूप. मातापिताये भोजन करेला यव, व्रीहि आदिक अन्नथी जे वीर्य उत्पन्न थयुं तेथी स्थूलदेह उ- स्पन्न थयो अने जे देह, उत्पत्तिथी अनन्तर, क्षी- र आदिक अन्ने करीनेज वृद्धि पामे छे अने ना- शानन्तर, अन्न (पृथ्वी )मांज लय पामे लेते देह, अन्नमय कोश एटले अन्ननोज विकार छे ते आत्मा नहि, केमके जन्मथी पूर्वे अने मरणथी अनन्तर तेनो अभाव छे; जेम घट अनात्मा छे तेम. सूक्ष्म शरीरमा प्राणमय, मनोमय अने विज्ञानमय ए त्रण्ये कोश छे तेनुं विवेचन. अन्नमय कोशथी अन्तर प्राणमय कोश- स्वरूप. जे वायु, देहने विपे पगथी आरंभीने मस्तक, पर्यत व्यापीने व्यानरूपे सामर्थ्य आपतो छतो चक्षुरादि इंद्रियोने प्रवावे छे ते वायु प्राणमय कोश. ए पण आत्मा नहि, केमके ते क्षुधा वृषादिक धर्मयी पीडित छे, अने आत्मा तो ते धर्मथो अतीत छे.

१६ स्वरूपानुसन्धाननी प्राणमयकोशथी अंतर मनोमय कोश- स्वरूप. देहने विपे अहंताभिमानने तथा गृहादिकने विपेममताभिमानने जे करेले ते मनोमय कोश. ए पण आत्मा नहि केमके कामक्रोधादिक अव- स्थाये करीने अनियत स्वभाव छे अने श्रुतिमा पण मनने अन्नमय केहेछे एटले विकारी छे जेम विकारी देह आत्मा नथी तेम. मनोमय कोशथी अंतर विज्ञानमय कोशनुं स्वरूप. सत्व गुणर्नु कार्य जे बुद्धि, ते स्वच्छ छे तेथी विशेष चिदाभासे युक्त छ, ते सुपुप्तिकाळने विषे लीन थाय छे अने पुनः जाग्रत्काळने विषे मस्त- कथी आरंभीने नखाय पर्यत शरीरने विषे व्यापे छे ते विज्ञानमय कोश,ते पण आत्मा नहि केम- के विलयादि अवस्थावान (सुषुप्तिमालय पामे) छे; जेम घट आत्मा नथी तेम. -विज्ञानमय कोशथी अंतर कारण शरी- रभूत आनन्दमय कोशनुं स्वरूप. भोक्ताशब्दे करीने वाच्य आनन्दमय कोशने विषे अनात्मपणुं देखाडवाने तेहेर्नु स्वरूप केहेछे के पुण्य कर्मना फलना भोगकाळने विपे जे वृत्ति, अन्तरमुख छती आनन्दना प्रतिबिंबने भजे के प्रथम प्रक्रिया. “१७ एज रत्ति पुण्य कर्म फळभोगनो उपराम छते नि- दारूपे करीने लय पामे छे ते आनन्दमय कोश. ए पण कादाचित्क एटले सुपुतिमांज अभिव्यक्त थाय छे माटे ते पण आत्मा नहि; जेम-विद्युत् अभ्रादि पदार्थो आत्मा नहि तेम. शंका:- आनन्दमयादि सर्व कोशोने विपे आत्मपणानो निरास कय छते नैरात्म्यप- णुं प्रसक्त थयु. समाधानः- बुद्धयादिकने विपे प्रतिविम्बरूपे रहेलो अने प्रियादि शब्देक- रीने वाच्य एवो जे आनन्दमय कोश, तेनो वि- बभूत (कारणभूत ) जे मुख्यअविनाशी आन- न्द, एज आत्मा होयछे, केमके सर्वकाळने विपे नित्य छे. शंका:- अन्नमयथी आरं- भीने आनंदमय पर्यंत कोशोने विपे आत्मपणुं न हो तथापि तेथी अतिरिक्त बीजो तो कोइ आ- त्मा जाणवामा आवतो नथी. समाधान:- यद्यपि आनन्दमयादि कोशोनो जे अनुभव थाय- छे ते अविद्याकत आवरणयुक्त छे; तोपण ए अ- नुभव पांचे कोशोनो जे पुच्छप्रतिष्ठारूप निरतिश- यानंद स्वरूप आत्मानाबळथीथायछे ते आत्माने कोण निवारण करीशके? माटे सातिशय आनन्द मय कोशनो पण परमार्थभूत निरतिशय परमा- स्वरूपानुसन्धाननी नंदरूप अने जेनी प्राप्तिने अथै अन्नमयादि पांच कोश केहेवाने आरंभ कर्या तथा ते ब्रह्म, पांचे कोशोथी पण आन्तरछे अने जेब्रह्मनीस- ताये करीने ए पांचे कोश आत्मा जेवा गणाय ते ब्रह्म, पुच्छरुप छे अने एज ब्रह्म, अविद्याये कल्पित सर्व दैतनुं अवधिरूप अद्वैत स्वरूप प्रति. टाछे एवं अद्वैत ब्रह्म, प्रतिष्ठारूप पुच्छ छे. ए रीते त्वंपदार्थ, शोधन करीने, तेनुं तत्प- दार्थ साये ऐक्यता जाणवा सारु श्री शंकर भगवाननु वाक्यः- सत्तामात्रं केवलविज्ञानमजं सत् सूक्ष्म नित्यं तत्त्वमसीत्यात्मसुताय। साम्नामंते प्राह पिता यं विभुमायं तंसंसारध्वान्तविनाशं हरिमीडे १ संक्षेपार्थः- 'सत्तामात्रं' एटले अस्ति एवा प्रत्यये करीने जाणवा योग्य तेमा अतिप्रमाण:- "सदेव सौम्येदमग्र आसीत्."तथा 'केवल- विज्ञानं' एटले सर्व विषयोथी निर्मुक्त चिन्मात्रस- रूप, केमके वाचारंभण श्रुतिये करीने विषयोने मिथ्यात्व छे. बळी- 'अ' (जन्म रहित) केमके “तत्सत्यं ए श्रुतिये तत्यरूप कयुं छे प्रथम प्रक्रिया. अने जे सत्य होय ते नित्य (जन्म विनाश रहि- त) होय तथा 'सूक्ष्म' एटले इंद्रियादिकनुं अविपय “स य एपोणुः” एश्रुतिनां प्रमाणी तथा 'विर्भु' (सर्वत्र व्यापक) “सऽआत्मा"ए श्रुतिनां प्रमाणथी तथा 'आय' एटले जगत्तुं अभिन्ननिमित्तोपादानरूप तदैवत प्रजायेय" ए श्रुतिनां प्रमाणधी १. एरीतेशोधित तत्पदार्थसाथेशोधित त्वंपदा- धनी एकतानुं अनुसंधान करवू एटले ईश्वरमा मायोपाधिक सर्वज्ञपणुं अने जीवमा अविद्योपा- धिक अल्पज्ञपणुं ए बन्नेमा माया, अविद्या, सर्व- ज्ञत्व अने अल्पज्ञत्व एउपाधिरूप वाच्य भागनो त्याग करीने केवल लक्ष्यार्थ जे 'ज्ञ' (चेतन) अंश तेनुं ग्रहण करी, ऐक्यपणानुं अवधारण करवू; जेमके घटाकाश तथा मठाकाश केहेवाय छे, तेमाथी घट अने मठ ए वन्ने उपाधिनो त्याग करीये, त्यारे एकज महाकाश रेहेछे, ते प्रमाणे माया अने अघिद्यानो त्याग करीने स- त्य, ज्ञान, आनन्दरूप जे ब्रह्म, तेज हूं छौं ए- वो जे दृढ निश्चय एज अपरोक्षज्ञान, जैथी अधि- या अने तेनुं कार्य जे संसृति तेनो निवृत्ति त- था परमानंदनी प्राप्ति ए प्रयोजन सिद्ध थयु.

२० स्वरूपानुसन्धानना उपर कहेली प्रक्रियाना निष्कर्थरूप एवी चार भूमिकाओ श्री वसिष्ठ मुनिये कहेली छे त्यांहां श्लोकः- (शुभेच्छा १.) स्थितः किं भूढ एवास्मि प्रेक्ष्येहंशा- स्त्रसज्जनैः । वैराग्यपूर्वमिच्छेति शुभेच्छेत्युच्यते बुधैः॥१॥ अर्थः- निष्काम कर्मोनां अनुष्ठानथी मन शुद्ध थया नन्तर संन्यास अने साधनचतुष्टय संपत्तिये सहित अने मुक्तिमा जेनुं परिअवसान एवी अने श्रवणादिकने विपे प्रवृत्ति छे फल जेनु एवी जे आत्माना साक्षात्कारनी उत्कट इच्छा, ते शुभेच्छारख्य पेहेली भूमि १. (विचारणा २.) शास्त्रसज्जनसंपर्कवैराग्याभ्यासपू- र्वकम् । सदाचारप्रटत्तिर्या प्रोच्य- तेसा विचारणा ॥२॥ अर्थः- गुरुशुश्रूषा, शौच इत्यादि जे सदा- चार धर्मों तेणे सहित जे श्रवण मननने विषे प्रवृत्ति, ते विचारणारख्य दितीय भूमि २.

प्रथम प्रक्रिया. २१ . (तनुमानसा ३.) विचारणाशुभेच्छाश्यामिंद्रियार्थेष्व- सक्तता । यात्र सा तनुताभावात् प्रोच्यते तनुमानसा॥३॥ अर्थः- साधनचतुष्टयसंपत्तिपूर्वक श्रवण म- नने सहित एवा निदिध्यासनथकी जे मननी, शब्दादि विपयोने विपे असक्ति (आसक्तिनुं रा- हित्य ) अर्थात् सविकल्प समाधिरूप सूक्ष्मता ते तनुमानसारख्य तृतीय भूमि ३. (सत्वापत्ति ४.) भूमिकात्रितयाभ्यासाच्चित्तेर्थे विर- तेर्वशात् । सत्यात्मनि स्थितिः शुद्ध सत्त्वापत्तिरुदाहृता॥४॥ अर्थः- बाह्य पदार्थो विपे संस्कारना उच्छेद- .धी जे आत्यंतिक एवी चित्तनी विरति (निर्वास- नता) तेनी स्थिरताथी शुद्ध (अविद्या अने ते- हना कार्यअवस्थात्रयथकी शोधित ) अने सर्चनुं अधिष्ठानरूप एवा सन्मात्र आत्माने विपे क्षीर उ- दकनी पेठे (क्षीरमा जेम नीर एकता पामे छे तेम) त्रिपुटीना विलये करीने साक्षात्कार पर्यन्त

स्वरूपानुसन्धान
जे स्थिति, ते निर्विकल्प समाधिरूप सत्त्वापत्ति
एटले प्रत्यक अभिन्न ब्रतक्यसन्मात्ररूपे करीने
अवस्थान, ते सत्त्वापत्त्याख्य चतुर्थ भूमि. ए भू-
मिने विपे रहेलो जे पुरुप ते ब्रह्मवित् (जीवन्मु-
त) केहेवाय छे ४.
इति श्रीमदुदयशंकरात्मज
गौरीशंकर विरचिते
स्वरूपानुसंधाने
प्रथम प्रक्रिया
समाप्ता.
॥१॥

अथ श्री स्वरूपानुसन्धाने दितीय प्रक्रिया प्रारंभः हदारण्यकनी श्रुति आत्मनिष्ठ पुरुपने विपे कायक्लेशनु राहित्य देखाडे छे:- आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुपः । किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥१॥ अर्थः-भाष्यकार, विज्ञानमय आत्माथकी वै- लक्षण्यपणुं जणाववाने अर्थे विशेपण आपे छे के "सर्वप्राणिमनीपितझं" एटले सर्वप्राणीओ- ना मनवांछित पदार्थोने जाणनार अनेतटस्थपणा- नी निवृत्तिने अर्थे विशेपण आपे छे के 'हत्स्थं" (हृदयमा रेहेनार) वळी बुदिना संबंधे (तादा- त्म्य संबंधे ) करीने प्राप्त थयु संसारीपणुं निषेध करे छे के " अशनायादिधर्मातीतं"एटले क्षु- धा तृपादिक धर्मोथी रहित एहेवा स्वरूपभूत कूट- स्य आत्माने सहस्त्र प्राणियो मध्ये कोई एक क- दाचित् जाणे (साक्षात्कार करे) एणे करीने आ.

स्वरूपानुसन्धाननी स्मविद्यानुं दुर्लभपणुं द्योतन कर्यु; शी रीते जाणे? के आ एटले अपरोक्ष अने परम तथा सर्व प्राणि- ओना बुद्धि प्रत्ययोंनो साक्षीभूत तथा " नेति नेति" इत्यादिक श्रुतिये सर्व निषेधनो अवधि- भ्रूत (परिशिष्टरूप) प्रतिपादन करेलो; वळो जेथी अन्य कोई पण द्रष्टया, श्रोता,मंता, विज्ञाता छेन- हि; वळी सम अने सर्वभूतस्थ एटले सर्व भूतो- नो अधिष्ठानरूप नित्य, शुद्ध, युद्ध, मुक्तस्वभाव जे आनंदस्वरूप आत्मा, तेज हुँ छौं ए प्रकारे जे- पुरुप जाणे, ते पोताना स्वरूपथकि अतिरिक्त फ- ळभूत केइ वस्तुनी इच्छा करतो छतो अने स्व- स्वरूपथकी अतिरिक्त कया अन्यना प्रयोजनने- . माटे शरीरनी पाछळ तप्यमान होय? (शरीर- रूप उपाधिये करेला दुःखनी पाछळ दुःखवान होय? ) अर्थात् न होय; जे अनात्मदर्शी पुरुप, ते तो आत्माथी अतिरिक्त वस्त्वंतरने विपे आ वस्तु मने प्राप्त थाय, आ वस्तु पुत्रनी, आ वस्तु भार्यानी ए प्रकारे इच्छा करतो छतो वारंवार जन्म मरणना प्रबंधने विपे आरुढ थयो छतोश- रीरना आधि व्याधिनी पाछळ तप्यमान होय छे. इत्यादिक अतिना अनुसारे विचार:- त्यांहां अन्तःकरणाविमा एटलेलिंग शरीरादिकने विपे २५ द्वितीय प्रक्रिया. जडत्वरूप हेतुथी वंध मोक्ष घटे नहि; तेमज अहं- कारादिकथी विलक्षण, स्वयंप्रकाश कूटस्थ सा- क्षीने पण जायतथी आरंभीने मोक्ष पर्यंत सं- सार घटे नहि; केमके ते असंग अने उदासीन छे. एवी शंका प्राप्त थये छते, अंतःकरणमा प्रतिविम्वित अनिर्वचनीय चिच्छायानो अंगी- कार कर्येथी समाधान पाय छ, तेमा आचार्यनी उक्तितुं प्रमाणः- चिच्छायावेशतो बुदो भानं धीस्तु द्विधा स्थिता। एकाहंकृतिरन्या स्या- दंतःकरणरूपिणी ॥१॥ अर्थः-आ ठेकाणे रजत सुवर्णादिकनी पेठे अनेक प्रकारना परिणामोने योग्य एवं जे अंतःक- रण एवानामनुं द्रव्य ते बुद्धि शब्दे करीने जाणवू; ते अन्तःकरणमा कर्तृत्व वृत्तिमान जे अंश, तेने अहंकार जाणवो, अने करण वृत्तिमान जे अंश, तेने बुद्धि जाणवी; (बुद्धि एटले जेणे करीने स्व- रूपनो बोध थाय ते ) ते बुद्धिमा साक्षी चैतन्यना प्रतिविम्बनो जे प्रवेश तेथकी भान होय छे; तात्पर्य ए के स्वभावथकी जडरूप छतां पण ए बुद्धि, प्रवेश थयेला चैतन्यना बळथकीज प्रकाशन ३ , २६ स्वरूपानुसन्धाननी मान जेवी होय छे; ते बुद्धि के प्रकारनी छे- तेमां एक अहंकार शब्दे करीने वाच्य का रूप ले अने बीजी मन शब्दे करीने वाच्य अन्तःकरणरूप छे. कामादिक सर्वे परिणाम विशेपोनोमन, बुद्धि, अ- हंकार, चित्त ए अंतःकरण चतुष्टयने विपे अंतर्भाव करवाथी अने बुद्धिनो अहंकारमा तथा चित्तनो मनमा अंतर्भाव करवाधो अने वृत्तिमान् तथा वृत्ति ए वे आकारथी अतिरिक्त बीजो कोई पण अन्तःकरणनो आकार निरूपण थइ शकतोन- थी; माटे एक बुद्धिज पोताना विकारने अनुसर- नार प्रवेश धयेला चैतन्ये सहित छति अहंकार- शब्दे करीने वाच्य कर्तृत्व वृत्तिमान रूप आकारे करीने तथा मन शब्दे करीने वाच्य करणात्मक- वृत्तिरूप आकारे करीने वे प्रकारे रही छे. १ छायाहंकारयोरैक्यं तप्तायःपिंडव- न्मतम् । तदहंकारतादात्म्यादेहश्चे- तनतामगात् ॥२॥ अर्थः- चिदाभास तथा कर्त्तारूप अहंका- रनां तादात्म्य संबंधे करीने ऐक्यपणुं, तपाय- मान अयःपिंडना जेवू मान्यु छ एटले जेम दृ- टान्तमा आ अनि अने आ लोह ए रीते पृथक- - द्वितीय प्रक्रिया, रण थइ शकतुं नथी; तेमज दान्तिकमां पण आ अहंकार अने आ चिदाभास ए रीते अहंकार तथा तेमां प्रविष्ट चिदाभास, प्रयकरण थर्बु अ- शक्य छे. ते चिदाभास सहित अहंकारना ता- दात्म्य अध्यासना संबंधी स्थूल शरीर जड- छता पण चेतनताने (ज्ञानरूप आत्मस्वरूप- ताने) पामे; जेम परीक्षा करवा माटे पयमा नारख्यो एवो मरकत मणि, निःशेष पयने पो- तानी छाया वाळु होय तेवू करी दे छे; तेमज कूटस्थ, असंग, बोधस्वरूप साक्षी चैतन्य पण अहंकारथी आरंभीने स्थूळ देह पर्यंत निःशेष युष्मदर्थने, पोतानी छाया वाळु होय तेवु करे छ.२ माटे चिदाभास, बंध मोक्षनो भाजन ठरे छे. ते चिदाभास जीवनी सात अवस्था. १ अज्ञान, २ आवरण, ३ विक्षेप, १ परोक्षज्ञा- न, ५ अपरोक्षज्ञान, ६ शोकापगम अने ७ निरं- कुशातृप्ति; तेहेमा त्रण बंधकृत अने एक अं- तरालावस्था तथा त्रण मोक्षनी. उपर लखेली ऋण बंधकृतमा प्रथम अव- स्था मूलाज्ञान एटले स्वस्वरुपर्नु अनादि काळ- थी अग्रहणरूप प्रमाद. बीजी आवरण श- क्ति, तेहेना कार्य वे- असत्वापाद तय अभा- स्वरूपानुसन्धाननी नापाद एटले पोतानो स्वरूपभूत जे कूटस्थ ते छे नहि तथा भासतो पण नथी. त्रीजी विक्षेप श- क्ति; तेहेना कार्य वे- त्रण शरीरोमां हुँ अने माहारापणानुं तथा स्त्री, पुत्र, गृह, क्षेत्र, द्रव्यादि- कने विपे केवळ माहारापणानुं दृढ अभिमान तथा देहादिक जे असत्, जड अने दुःखरूप छे तेहेने विपे वैपरीत्यथी असत्मां सत्पणानी तथा जडमा चेतनपणानी अने दुःखरूपमा सुख- रूपतानी बुद्धिने करावे अने आपातरमणीय एवा वाह्य सर्व विषयो जे के परिणामे विप तुल्य छे तेहेने विपे रमणीय (शोभन ) बुद्धिथी आसक्ति पूर्वक बहिःप्रवृत्ति करावे पण ते आसक्तिनां राहि- त्ये करीने अंतर्मुख थवा दे नहि. ए त्रण्ये अवस्था बंधात् छे. चोथी अंतरालावस्था त्यांहांश्लोकः- जातीशतेपु लभते किल मानुपत्वं तत्रापि दुर्लभतरं खलु भो विजत्वम् । तयोन पालयति लालयतींद्रियाणि तस्यामृतं क्षरति हस्तगतं प्रमादात्॥१॥ अर्थः- अनेक जातीओ मध्ये मनुष्य जाती प्राप्त थवी दुर्लभ छे, तेमा पण ब्राह्मण जाति द्वितीय प्रक्रिया. प्राप्त थवी अति दुर्लभ छे; ते ब्राह्मणल कोइ मोहोटा सुकत विशेष प्राप्त थये छते पण जे पुरुप, पोतानां इंद्रियोने अंतर्मुखतानां संपाद- नथी पालन करे नहि एटले आत्माकार करेन- हि, किंतु ते इंद्रिगोने बाह्य विपयोने विपेज आसक्त थको लालन करे (विषयोने विपे संल- ग्न रहे) ते पुरुपने, प्रमादना वशथी हाथमा प्रा. त थयेलं अमृत जतुं रेहे छे; अर्थात् तेहे जी- व्यं व्यर्थ छ. १ माटे कोई सुरुत विशेषथी मनुष्यावतार, तेहेमा ब्राह्मण शरीर प्राप्त थये प्रथम शिव, विष्णु, देवी, गणपति, सूर्य ए पं- चायतन देवर्नु पूजन तथा शिव पंचाक्षरनो जप विगेरे करवं; त्यांहां श्रुतिः- "उमासहायं परमेश्वरं प्रभु त्रिलोचनं नीलकंठंप्रशांतम् अर्थ:- अनुपम युवति रूपे वामांकने विपे रहेली उमारूप ब्रह्म विद्या छे भक्तोने कामादिक चौरथकी रक्षण करनारो सहायभूत जेहेने तथा 'परमेश्वर' एटले उत्कृष्ट अने ब्रह्मादिकनो पण नियंता तथा 'प्रभु' (समर्थ ) तथा 'त्रिलोचनं' एटले सोम, सूर्य, अग्निरूप त्रण छ नेत्र जे- स्वरूपानुसन्धाननी हेने तथा 'नीलकंठं' (विषपानथी श्याम छे कंठ जेहेनो) तथा प्रकर्षे करीने शांत एवा चिदानंद स्वरूप शिवनुं ध्यान करवू. ए रीते ईश्वरनी स्तुति, वंदन, तीर्थ, दानादि- थी पुण्य विशेपेकरी अन्तःकरण शुद्ध थ{ छ जेनु एवा साधन चतुष्टय संपन्न अधिकारीए, वेदांत शास्त्र उपर तथा वेदांत वक्ता ब्रह्मनिष्ठ गुरु उप- र श्रद्धा थये तेमना सन्निधानमा, वेदांत श्रवण- थी प्रथम सगुण ब्रह्म (माया विशिष्ट विराट् हिर- ण्यगर्भादि ) अने निर्गुण ब्रह्म (मायाथी रहित अ- क्षर अदितीय ) नुं परोक्षज्ञान थया नंतर दृश्य द्रष्टा तथा साक्ष्य साक्षीना विवेकथी त्वं पदार्थy शोधन तथा अध्यस्त अधिष्ठान अने कार्य कार- णना विवेकथी तत्पदार्थ- शोधन करवु; तेहेमां त्वं पदार्थना शोधननो प्रकार. दृश्य द्रप्टानो विवेक. नीलपीतस्थूलसूक्ष्महत्वदीर्घादि- भेदतः। नानाविधानि रूपाणि पश्येल्लोचनमेकधा ॥१॥ अर्थः- दृश्यतामां नानात्व हेतु छे तथा द्र- - द्वितीय प्रक्रिया. ३१ टापणामां एकत्व हेतु छे माटे नील, पीत, स्थूळ, सूक्ष्म, हस्व, दीर्घ इत्यादि नानावधी रूप दृश्य होय छे अने चक्षुरिंद्रिय पोताना स्वरूपनो भेद ग्रहण न करतां छतां एक रूपेज सर्व रूपोने ग्रहण करे छे माटे चक्षु द्रष्टा होय छे. १ हवे ए चक्षुने दृश्यपणुं अने तेथी आंतरीय द्रष्टा मन छे तेनो विचार:- आंध्यमांद्यपटुवेपु नेत्रधर्मेपु चैक- धा। संकल्पयेन्मनः श्रोत्रलगादौ योज्यतामिदम् ॥ १ ॥ अर्थः- सामान्य आकारे पण पोताना विषय नील पीतादि रूपना यहणन जे असामर्थ्य ते अंध केहेवाय छे तथा सामान्य आकारे विपयन जे ग्र- हण ते मांद्य केहेवाय छे अने पोताना विपयोना सुक्ष्म विशेष आकार ग्रहण करवानुं जे सामर्थ्य ते पटुख केहेवाय छे; ए रीते आंध्य, मांद्य, पटुत्व इत्यादि नेत्रना नाना धर्मोंने एक रूपेज मन, संकल्प करे छे; जेमके माहारु चक्षु अंध छे, माहारुं चक्षु मंद छे, माहारुं चक्षु पटु छे ए रीते मन, एक रूपेज संकल्प करे छे माटे ते द्रष्टा छे अने आंध्य मांद्यादि माना छे माटे दृश्य छे: ए , ३२ स्वरूपानुसन्धाननी प्रकारे श्रोत्र, वक, जिव्हा, घ्राण ए चार इंद्रि- योने विपे पण पोतपोताना विपयोनी अपेक्षाये द्रष्टापणुं तथा पोतानुं भासक मननी अपेक्षाये दृश्यपणुं अने योग्यता प्रमाणे बधिरत्वादिक पण योजना करवां. १ हवे मनने दृश्यपणुं अने तेहेना आंतरीय सा- क्षीने दृष्टापणुं तेहेनो विवेक. कामः संकल्पसंदेहौ श्रदाश्रद्धे धृ- तीतरे। हीीीरित्येवमादीन्भास- यत्येकधा चितिः॥१॥ अर्थः- रज्जुना अज्ञानथी रज्जुने विपे आ- रोपित सादिकने जेम रज्जु, एक रूपे करीने भा- समान करे; तेमज स्वरूपना अज्ञानथी स्वरूपने विपे आरोपित एवा काम, संकल्प, विचिकित्सा, श्रद्धा, ति, अति, धी, भी ए सर्वे मनज छे. १ ए प्रकारे वृहदारण्यकनी श्रुतिने विपे कहे कामादिकने तथा ऐतरेय उपनिपदा कहेला संज्ञा आदिक सर्वे अंतःकरणना वृत्तिविशेपोने स्वगत, सजातीय, विजातीय भेदे रहित तथा स- त, चित्, आनंद छे लक्षण जेहेनां एवां ब्रह्म- पी अभिन्न कूटस्थ प्रत्या स्वरुप सर्वनी साक्षीरू- द्वितीय प्रक्रिया. - पजे आनंदात्मा चिति, ते एक रूपेंज एटले नि- विकारी रूपेंज स्वभास्य अवस्तुभूत जे मन अ- ने तेहेना विकार एवा कामादिक तेने प्रकाशमा- न करे छे ते सदा काळ द्रारूपज छे रूपादिक- नी पेठे दृश्य नथी; केमके पड्भाव विकार रहित छे अने स्वप्रकाश छे. त्यांहां श्रुतिः- नहि द्रष्टुईटेविपरिलोपो विद्यतेऽविनाशिवात्" साक्ष्य साक्षीनो विवेक. शव्दस्पर्शादयो वेद्या वैचित्र्याज्जा- गरे एथक् । ततो विभक्ता तत्संवि- दैकरूप्यान्नभिद्यते ॥१॥ अर्थ:- जाग्रत अवस्थाने विषे दृश्य एवा जे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध विपयो ते ए- क बीजाथी विचित्र छे माटे भिन्न भिन्न छे अने ते शब्दादिकथी पृथक् कर्यु एवं जे ज्ञान ते एक- रूप छे; जेमके शब्द ज्ञान, स्पर्श ज्ञान, रूप ज्ञा- न, रस ज्ञान, गंध ज्ञान ए रीते सर्वे ज्ञेय विप- योमा ज्ञाननी एकरूपताछे माटे ते ज्ञान भेद पा- मर्नु नथी." , ३४ स्वरूपानुसन्धाननी ए रीते स्वप्नावस्था तथा सुपुति अवस्थामा पण जे विपयो छे ते ज्ञेयरूपछे अने तेहेनो ज्ञान- रूप साक्षी एकरूपेज वर्ने छे एटले जायदादि तथा वाल्यादि अवस्थाओ परस्पर व्यभिचारने पामेछे पण तेहेनोज्ञानरूप ताक्षी, ए अवस्थाओ- मां अनुस्यूतपणे अव्यभिचारी छतां तेहेनो अनुभव करे छे. तत्पदार्थमां अध्यस्त अधिष्ठाननो विवेक. जेम रज्ज्वादिरूप अधिष्ठानने विपे सर्प आ- दिक अध्यस्त छे, तेमज पंच भूत तथा भौतिक नामरूपात्मक सर्व प्रपंच अस्ति, भाति, प्रियरूप अधिष्टानभूत ईश्वर तत्त्वने विपे अध्यस्त (क- ल्पित) छे; त्यांहां श्री आचार्य वचन:- मूर्त्तामूर्ते पूर्वमपोह्याथ समाधी दृश्यं सर्व नेति च नेतीति विहाय । चैतन्यांशे स्वात्मनि संतं च विदुर्य तं संसारध्यांतविनाशं हरिमीडे॥१॥ अर्थः- 'समाधौ' एटले जेने विपे चित्तवें समाधान कराय एवा विष्णुरूप तथा 'चैतन्यां- शे' एटले जडांशनो परित्याग करीने अवशिष्ट चिन्मात्र स्वरूप एवा प्रत्यगात्मा (प्रत्यक् अभि- पृथ्वी, अप, द्वितीय प्रक्रिया. न विष्णुरूप अधिष्ठान )ने विपे आरोपित एवा तेजरूप मून प्रपञ्चने तथा वायु, आकाशरूप अमूर्त प्रपञ्च (दृश्यत्वे करोने भा- समान सर्व अव्यस्त वर्ग ) ने 'नेति नेति ए श्रुतिनां अवलंबनथी निपेध. करीने, ए निपेध- ना अवधिरूपे करीने विद्यमान अधिष्ठान सन्मात्र जेने विद्वानो जाणेछे ते विष्णुनो हुँ स्तुति क- से छों. १ रज्जुरूपे परिज्ञाते सर्पखंडं न ति- ष्ठति । अधिष्ठाने तथा ज्ञाते प्रपञ्चः शुन्यतां गतः॥१॥ कार्य कारणनो विवेक जेम कार्यरूप घट शरावादिक, मृत्तिकारूप कारणथी अभिन्न छे तथा कटक कुंडलादि कार्य, तेहेना कारणभूत सुवर्णथी अभिन्न छे एवो अ- नुभव सर्वने छे अने वाचारंभण श्रुति पण एमज केहेछे; तेमज नाम रूपात्मक कार्यरूप सर्व प्रप- च सत्, चित्, आनंद कारणरूप ईश्वरथी अभि- नछे; त्यांहां श्रुति “एकविज्ञानेन सर्वे विज्ञातं भवति" ब्रह्मैवेदं सर्व" इत्यादि श्रुतिना स्वरूपानुसन्धाननी प्रमाणथी. उपर प्रमाणे विवेचननां सहायभूत श्रद्धादि अंतरंग साधन संबंधि श्लोकः- श्रद्धाभक्तिध्यानशंमाधैर्यतमानै तुिं शक्यो देव इहैवाशु य ईशः। दुर्विज्ञेयो जन्मशतैश्चापि विनातै स्तंसंसार०॥१॥ अर्थः- 'श्रद्धा' ( श्रुति तथा गुरुवाक्यने विपे विश्वास ) 'भक्ति' (गुरुने विपे अने वि- ष्णुने विषे प्रेम) 'ध्यान' (गुरुना मुखथी उप- देश करेला ब्रह्मने विपे विजातीय प्रत्ययनो ति- रस्कार पूर्वक सजातीय प्रत्ययना प्रवाह संपाद- न) 'शम' (विपयोथी अंतःकरणनी व्यात- त्ति) 'आदि' शब्दे करीने दम, उपरति, तिति- क्षा, समाधान ग्रहण करवा; ए साधनोए करीने प्रयत्न करता एवा मुमुक्षु जनोने जे 'देवः' (स्वप्रकाश परमेश्वर ) इहैव' आज युगने वि- पे अने आज जन्मने विपे तथा आज देहने वि. पे शीघ्र प्रत्यक् रूपे करीने साक्षात्कार करी शका. य परंतु उपर कहेला साधनो विना तो 'जन्मश- तेः' एटले अनेक जन्मे करीने तथा अनेक शाखे , द्वितीय प्रक्रिया. करीने अने अनेक पांडित्ये करीने पण जे प्रत्यक् अभिन्न विष्णु दुर्विज्ञेय छे (साक्षात्कार थाय नहि.) त्यांहां श्रुतिः- नाविरतो दुश्चरितानाशांतो नास- माहितः। नाशांतमानसो वापि प्र- ज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥१॥ अर्थः- 'निपिद्ध' एटले अशास्त्रीय कर्मोथो विराम न पामतो तथा 'अशांत' एटले विप- योथी जेहेर्नु चिन निवृत्त थयुं नयी एको तथा 'असमाहितः' एटले समाधिनां अनुष्ठाने रहित तथा 'अशांतमानतः' एटले कई निमित्त छते काम क्रोधादिकनो करनार अने 'अपि' शब्द- थकी स्थित प्रज्ञादिकने विपे कहेला लक्षणोथी रहित एवो पुरुप 'प्रज्ञानेन' एटले संशय, अ- संभावना, विपरीतभावनारूप प्रतिबंधोये रहित ज्ञाने करीने 'एन' एटले पूर्वोक्त साधने सहित पुरुपोये अपरोक्षताथी अनुभव करेला निरतिश- यानंदरूप आत्माने पामतो नथी; साधन रहित पुरुपने प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्मना साक्षात्कारनी सं- भावना मात्र पण नथी. ए श्रुतिनो तात्पर्यार्थ. १ .

स्वरूपानुसन्धाननी वळी:- परांचि खानि व्यतणस्वयंभू- स्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दासत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १॥ अर्थः- 'स्वयंभू' एटले स्वतःज सर्वदा स्व- तंत्र होनार परमेश्वर, परांचि' एटले बाह्य विपयो- ना प्रकाशने अर्थ 'पराक्' एटले वाहार प्रवृत्त थ- नारां एवां 'खानि' एटले श्रोत्रादि इंद्रियोने 'व्य- तृणत्' एटले हिंसा करतो वो; अभिप्राय ए के, ज्यारे इंद्रियो अंतर्मुख होय त्यारेज आत्मनि- प्ठताए करीने अमृतपणाने पामे, अन्यथा नहि; माटे कर्मना अनुसारे तेने बहिर्मुख सृज्यां, एज एनी हिंसा; ते कारणथी उपलब्धा (प्रमाता) पराक् (अप्रत्यक्)रुप अनात्मभूत एवा बाह्य शब्दादि विपयोनेज 'पश्यति ' एटले जोतो छतो संलग्न रहे; सर्व लोकनो एवो स्वभाव छते पण महा नदीना प्रवाहनी सन्मुख चालवानी पेठे कोइ एकज'धीर' (धीमान विवेकी) पुरुप, प्रत्यक् आत्माने (आठेकाणे आत्मा शब्द, रूढी वृतिथी प्रत्यक् स्वरूपने विपेज लोकमां प्रसिद्ध- , n द्वितीय प्रक्रिया, छे अने व्याकरणनी रीते व्युत्पत्ति पक्षमा (यौगि- क वृत्ति विपे) पण प्रत्यक् स्वरूप विपेज आत्मा शब्दनी प्रवृत्ति छे; तेमां स्मृतिर्नु प्रमाण:- यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषया- निह । यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मा- दात्मेति कीर्तितः॥१॥ अर्थ:- ‘अति व्यामोतीति आत्मा' (जे सर्वत्र व्यापे ते आत्मा) वळी अतति आदत्ते इ- ति आत्मा' (जे सर्व जगत्ने पोताने विपे उप- संहार करे अर्थात उपादानरूप ते आत्मा)'अ- तति विपयानत्तीत्यात्मा' (जे विषयोने भोगवे एटले पोतानाज चैतन्याभासरूपे करीने उपल- व्धा ते आत्मा) वळी ' अतति सततं भवती- त्यात्मा' (जे हेतुथी ए प्रत्यक् स्वरूपनीज कल्पि- त अध्यस्तने विपे मिथ्यापणाथी निरंतर सत्ता छे माटे ते प्रत्यक् स्वरूपजआत्मा. ते प्रत्यगात्म ने) जुबे छे;शी रीते ? के 'आवृत्तचक्षुः' एट शब्दादिक विषयोथी निवृत्त धयां (पाछां वल्यां) छे चक्षुरादिक इंद्रियो जेना माटे एवा संस्का, रवाळोज पुरुष, प्रत्यगात्मानो साक्षात्कार कर' शके छे; केमके बाह्य विषयोर्नु पर्यालोचन अने १० स्वरूपानुसन्धाननी प्रत्यगात्मानुं ईक्षण ए बेउ एक पुरुपने विपे एक काळे संभवेज नहि. एवा शा फळनी इच्छाथी मोटा प्रयत्न करीने इंद्रियोनी बहिःप्रवृत्तिनो निरोध करीने धीर पुरुप, प्रत्यगात्मानो साक्षा- त्कार करे ? एवी शंका थये छते प्रयोजन कहेछ के 'अमृतत्वमिच्छन् ' एटले अमरण धर्मत्वने इच्छतो छतो; अर्थात् मुक्तस्वभावतानी जे प्राप्ति तेज फळ. १ उपर कहेलां साधनोथी प्राप्त थवा योग्य स्वस्वरूपनो विचार, त्यांहां गुरु शि- प्यना प्रश्नोत्तरनो श्लोकः- शिष्यः- 'कोयं देवः' (स्वप्रकाश चैतन्य स्वरूप देव कोण ?) गुरु:- ‘मनःसाक्षी' (अंतःकरणनो सा- क्षात् जोनार.) शिष्यः- “मनो मे दृश्यते मया' (माहारा अंतःकरणनो जोनार तो हुंज छौं.) गुरु:- 'तहिं देवस्त्वमेवासि' (त्यारे स्व- प्रकाश आत्मदेव तुंज छो.) शिष्यः-तेहेमां प्रमाण शुं? गुरु:- ‘एको देव इति श्रुतेः' त्यांहां श्रुतिः- - - द्वितीय प्रक्रिया. (श्वेताश्वतरनी) एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतांतरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्व- भूताधिवासः साक्षो चेताः केवलो निर्गुणश्च ॥१॥ अर्थः- ' एकः' ए पदे करीने पुराणोमा प्रसिद्ध एवा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रोना भेद निवा- रण जाणवु, तथा 'देवः' एटले स्वयंप्रकाश चैत- न्यरूप; ते देव क्याहो रहे छे ? एवी आशंका उपर कहेछे, के 'सर्ववृतेषु गूढः' एटले ब्रह्माथी आरंभीने पिपीलिका पर्यंत सर्व प्राणीओने विपे रहेलो; स्यारे तेहेनो अनुभव केम न थाय ? ए शंका उपर कहेछ, के गूढः' एटले गुप्त- अर्थात् अज्ञाने करीने आकृत छे; माटे सामान्य प्रज्ञावा- न पुरुषोने अनुभवमा आवतो नधी. ते देवने विपे देश, काळ अने वस्तुरूपत्रण प्रकारना परिच्छेदन राहित्यपणुं कहेछे, के 'सर्वव्यापी' एटले देश, काळ, जीव, ईश्वर अने जगत् ए सर्वने व्यापीने रहेनार. परस्पर सजातीय भेदनु निवारण करे छे, के 'सर्वभूतांतरात्मा' एटले पोते चैतन्यमात्र स्वरूपानुसन्धाननी स्वरूप एक छतो ब्रह्मादि स्थायरांत सर्व भूतोने विपे जीवरुपे करीने अंतःप्रवेश करी रहेनार; तेज आत्मदेव,शुद्धसत्वप्रधान मायाने विपे प्रतिबिंवि- त ईश्वररूप छतो सर्वेने कर्मोनां फळनो प्रदाता- छे ए वात कहेछे, के 'कर्माध्यक्षः' एटले पोते अधिष्ठातारूपे पुण्यपापरूप कमीनां फळनो प्रदा- ता. विजातीय भेदन निवारण करे छे, के “सर्वभू- ताधिवासः' एटले सर्व भूतभौतिकनुं अधिष्ठानरू- प; अर्थात् आरोपितने अधिष्ठानथी अव्यतिरिक्त पणुं छे माटे विजातीय जड भेद पण संभवतो नथी. ते आत्मदेवने जीव ईश्वररूपे रहेवाथी प्राप्त थयुं एवं पुण्य पापकर्मोनुं कर्तृत्वपणुं तथा जगत् स्त्र- मृत्वादिकनुं निवारण करे छे, के “ साक्षी' एटले पोत्ताना सन्निधानमा प्रवृत्त थता एवां कार्य का- रणादिक जगतनो तथा जगदाकारे परिणाम पा- मनारी अविद्यानो साक्षात् जोनार, साक्षित्वमा हेतु कहेछे, के 'चेताः' एटले चैतन्यमात्र स्व- रूप. आत्मदेवने साक्षित्व छते साक्ष्य विपयोने वि- पे ईक्षण कर्तृत्वरूप विकारीपणुं आवशे एवी शंका थये आत्मवस्तुने विपे साक्षित्वादिक विशेयो नुं राहित्यपणुं कहेछे, के केवलः' एटले ईक्षण कर्तृत्वादि सर्व विशेपोये रहित छे. ज्ञान आनंद द्वितीय प्रक्रिया. १३ इत्यादिकने केटला एक गुणरूप माने छे अने ब्रह्मने गुणी माने छे तेहेतु निवारण करे छे, के 'निर्गुण' एटले गुण रहित छे "विज्ञानमानं- दं ब्रह्म" ए श्रुतिनां प्रमाणथी ज्ञान आनंदा- दि स्वरूपभूतज छे गुणरूप नथी. ए प्रमाणे परोक्षज्ञानरूप चोथी अवस्था सि- द्व थया नंतर महावाक्यजन्य जीव ब्रह्मनी एक- तारूप अपरोक्षज्ञान ए पांचमी अवस्था. महावाक्य. प्रज्ञानं ब्रह्म. ( ऋग्वेदनु.) येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरो- ति च । स्वादस्वादु विजानाति तत्प्र- ज्ञानमुदीरितम् ॥ १॥ चतुर्मुखेंद्र- देवेषु मनुष्याश्वगवादिषु । चैतन्य- मेकं मातः प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि ॥२॥ अर्थः-चक्षुरिंद्रियनी द्वाराये वाह्य नीकळी अंतःकरणनी वृत्तिमा उपहित (उपाधिमा रहे- लु) जे चैतन्ये करीने पुरुप, रूपादिकने जुवे छे तथा श्रोत्र द्वारा बाहार नीकळी अंतःकरणनी - तिमा उपहित जे चैतन्ये करीने शब्दना समूह-

स्वरूपानुसन्धाननी
ने ग्रहण करे छे तथा घ्राण द्वारा वाह्य निर्गत अ-
न्तःकरणनी वृत्तिमा उपहित जे चैतन्ये करीने गं-
धना समूहने सुंघे छे तथा वाक् इंद्रिये अवच्छिन्न
जे चैतन्ये करीने शब्दना समूहने उच्चार करे छे
तथा रसनाइंद्रिय द्वाराये वहिनिर्गत अंतःकरणनी
वृत्तिमा उपहित जे चैतन्ये करीने स्वादु अस्वाह
रसने जाणे छे ते चैतन्यने 'प्रज्ञान' एप्रकारे श्रु-
तिये कयुं छे. १
उत्तम एवा ब्रह्मादिक देवोने
विपे तथा मध्यम एवा मनुप्यने विपे अने अधम
एवा अश्व गवादिकने विपे तथा आकाशादिक
भूतने विपे जे एक चैतन्य छे ते ब्रह्म जाण-
बुं अने माहारे विपे पण ते प्रज्ञानथी अभिन्न
ब्रह्मज छे. २
अहं ब्रह्मास्मि. ( यजुर्वेद.)
परिपूर्णः परात्माऽस्मिन्देहे विद्या-
धिकारिणि । बुद्धेः साक्षितया स्थि-
खा स्फुरन्नहमितीर्यते ॥ ३ ॥
स्वतः पूर्णः परात्माऽत्र ब्रह्मशब्दे-
न वर्णितः । अस्मीत्यैक्यपरामर्श-
स्तेन ब्रह्मभवाम्यहम् ॥४॥

द्वितीय प्रक्रिया ४५ अर्थ:-- देश, काळ, वस्तुथी अपरिच्छिन्न ए- वो परमात्मा, आ मायाये कल्पित अधिकारी मनुष्यादि शरीरने विषे सूक्ष्म शरीरनो साक्षी (अवभासक) रूपे रहिने प्रकाशमान छतो 'अ- हूं'पद लक्ष्य कहेवाय छे. ३ स्वभावे करी- नेज देश काळादिथी अपरिच्छिन्न एवो पूर्वोक्त परमात्माने आ महावाक्यमा 'ब्रह्म' शब्दे क- रीने लक्षणाथी कह्यो छे अने 'अस्मि' ए पदे करीने बन्नेनु सामानाधिकरण्य कर्तुं छे; माटे जे ब्रह्म तेज हुँ छौं.४ तत्त्वमति. (सामवेदनु) एकमेवाद्वितीयं सन्नामरूपविवर्जित- म् । सृष्टेः पुराधुनाप्यस्य तादृक्त्वं तदितीर्यते ॥५॥ श्रोतुर्दैहेंद्रियाती- तं वस्खा त्वंपदेरितम् । एकताग्रा- ह्यतेऽसीति तदैक्यमनुभूयताम् ॥६॥ अर्थः- “सदेव सोम्य" ए वाक्ये सृस्थिी पूर्वे नाम रूपादि रहित जे सद्वस्तु प्रतिपादन कर्यु छे ते सदस्तु, विचार दृष्टिये हमणां पण जे नाम रूपादि रहित छे ते 'तत्' पद लक्ष्य 1 १६ स्वरूपानुसन्धाननी जाणवू. ५ श्रोता शिप्यनु स्थूळ, सूक्ष्म, का- रण त्रण्ये देहथी विलक्षण एवं जे साक्षीरूप स- वस्तु, ते त्वं 'पद लक्ष्य जाणवू, 'असि' ए पदे वन्ननुं ऐक्य प्रतिपादन कर्यु छ माटे मुमु- क्षु जने ते ऐक्य अनुभव करवं. ६ अयमात्मा ब्रह्म. (अथर्ववेदन) स्वप्रकाशापरोक्षत्वमयमित्युक्तितो मतम् । अहंकारादिदेहांतात्प्रत्यगा- त्मेति गीयते ॥७॥दृश्यमानस्य सर्वस्य जगतस्तत्त्वमीर्यते। ब्रह्मश- ब्देन तद्ब्रह्म स्वप्रकाशात्मरूपकम्॥८॥ अर्थः- 'अयं' ए पदे करीने स्वप्रकाश अ- ने अपरोक्षस जाणवू अने अहंकारथी आरंभीने स्थूळ देह पर्यंत संघातथी प्रत्यक् एटले अधि- पानव साक्षित्वरूपे स्थित जे वस्तु, ते 'आत्मा' रूप जाणवू. ७ आकाशादिक सर्व जगतनुं अधिष्ठानरूप अने ते सर्वना वाधना अवधिरूपे पारमार्थिक जे सच्चिदानंदरूप छे ते 'ब्रह्म' श- ब्दे करीने जाणवू; ते ब्रह्म, स्वप्रकाश आत्माथी अभिन्नरूपज छे. ८ " द्वितीय प्रक्रिया. ए प्रमाणे “यत्साक्षादपरोक्षब्रह्म ते हुँ छौं- एटले जीव कूटस्थमा परिच्छिन्नल अ- ने ईश्वर कूटस्थमां परोक्षव ए बने वाच्य भागनो त्याग करीने लक्ष्य भाग जे अखंडार्थ तेहेर्नु“सोऽ- यं देवदत्त"नां दृष्टांतनी रीते ग्रहण करवू; जेथी ईश्वर कूटस्थ,जीव कूटस्थमा एकताने पाम्यो एट- ले तेहेर्नु परोक्षपणुं मटीने अपरोक्ष थयो अने जीव कूटस्थ, ईश्वरकूटस्थमा एकताने पाम्यो एटले तेहेनुं परिच्छिन्नत्व मटीने अपरिच्छिन्नत्व थयु. छठी अवस्था शोकापगम- त्यांहां ईशावास्यश्रुतिः- यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्वि- जानतः । तत्र को मोहः कः शोक ए- कत्वमनुपश्यतः॥ १ ॥ अर्थ:- जे ज्ञानी पुरुपने जे काळने विपे सर्व जगत् वास्तव आत्मस्वरूपनां दर्शनथी आ- त्मारूपज निष्पन्न थ ते एकत्वदर्शि ज्ञानी पुरु- पने ते काळने विपे शोक शो ? अने मोह शो ? एटले कामनानुं वीजभूत शोक मोह ते अज्ञानधी होय छे परंतु विशुद्ध अने आकाशोपम एवां

१८
स्वरूपानुसन्धाननी
आत्मैकत्वने जोनार ज्ञानीने शोक अने मोह
संभवे नहि; केमके कारणभूत जे अविद्या, तेहे-
नो वाध थई गयो छे. १
त्यांहां एकत्वमा छांदोग्य श्रुतिः-
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति
नान्यद्विजानाति स भूमा ॥
अर्थ:-जे स्वरूपतत्त्वने विपे अन्य द्रष्टा
अन्य करणे करीने अन्य द्रष्टव्यने जोतो नथी
तथा अन्य श्रोता अन्य करणे करीने अन्य श्री-
तव्यने श्रवण करतो नथी तथा अन्य विज्ञाता
अन्य करणे करीने अन्य विज्ञेयने जाणतो नधी
ते भूमा; अर्थात् लोक प्रसिद्ध दर्शन, श्रवणादि-
कनो जे अविपय व्यापक आनंद स्वरूप ते भूमा.
"आनंदं ब्रह्मणो विहानुनविभेतिकुतश्चन"
ए श्रुतिनां व्याख्यानअवधारण करईं; ए
अर्थ विपे वासिष्टमां श्री रामचंद्रजीतुं वाक्यः-
अखिलमिदमहं ममैव सर्व वहमपि-
नाहमथेतरच नाहम् । इति विदित-
वतो जगत्कृतं मे स्थिरमथवास्तुग-
तज्वरो भवामि ॥१॥

द्वितीय प्रक्रिया. १९ तात्पर्यार्थः- तादात्म्य अध्यारोपनी दृष्टि- ये तो सर्व पण अहंकारादि जगत् हुंज छौं, अने संसर्ग अध्यारोपनी दृष्टिये तो सर्व पण म्हारुंज छे; तथा अपवाद दृष्टिये तो अहंताना आरोपमा निमित्तभूत एवो अहंकार पण हुँ नहि, त्यारे इतर एवा देहादिरूप नहि होउ तेमां क- हेवुज शुं? ए रीते अध्यारोप अपवादे करोने स्व- रूपतत्त्वनो साक्षात्कार करतो एवा मने (मा- हारी दृष्टिये ) आ जगत् कृत्रिम (मायामय) एवं हो अथवा अकृत्रिम (आत्मरूप)ज हो; ए बेउ प्रकारे पण हुं आध्यात्मिकादि ज्वर रहितज छौं.१ सातमी अवस्था निरंकुशा तृप्ति. अजोहमक्षरोहं प्राज्ञोहं प्रत्यगात्म- बोधोहम् । परमानंदमयोहं परम- शिवोहं भवामि परिपूर्णः॥१॥ अर्थ:- जन्म रहित माटेज अक्षर (विकि- "या रहित ईश्वर ) अने व्यकिव्यकिने विपे प्रका- शक ज्ञानरूप अने परम आनंदमय, परम शिव- रूप अने परिपूर्ण एवो होउ छों. १ ज्ञानमहं ज्ञेयमह ज्ञाताह ज्ञानसाध- , स्वरूपानुसन्धाननी नगणोहम् ।ज्ञाताज्ञानज्ञेयविनाकृत- मस्तित्वमात्रमेवाहम् ॥१॥ अर्थ:- पदार्थनी ग्रहण करनार वृत्तिरूप ज्ञान' हुंज छौं; तथा 'ज्ञेयं' एटले ज्ञाननो वि. पय पण हुँ; तथा 'ज्ञाता' एटले निद्वाराये वि- पयनुं ज्ञानवान् पण हुँ; तथा ज्ञान- साधनभूत इंद्रिय समूह पण हुं; तथा ज्ञाता, ज्ञान अने ज्ञेय ए त्रिपुटिये रहित सन्मात्र पण हुंज छौं. १ अहंकारातीतो विपयविरहः स्वात्म- रसिको निराधारो ज्योतिभ्रमरचि- तसंबंधरहितः। श्रुतीनां सिद्धान्तो प- रिमितवपुः स्वानुभवतः स नित्यो बोधात्मा निरवधिरहं सौख्यजलधिः १ स्वतः शुद्धोबुद्धः समरसपरानंदवित- तो धियां साक्षी वृत्तेः प्रलयमुदयं- वेत्ति सततम्। क्रियां यःकरिं विप- यमथ आभासयति च स्वयंज्योतिः सोहं हृदयकमलार्कोस्मि सुखदः ॥२॥ अर्थः- हुं अहंकारथी अतीत छों; तथा बा- ह्याभ्यंतर सर्व विपयोना विरह (वैरस्य)थी स्वा- h द्वितीय प्रक्रिया. ५१ तमस्वरूपने विपेज रसिक छौं तथा निराशर छौं अने स्वप्रकाश छौं तथा भ्रांतिथी रचेला सर्व प. दार्थोना संबंधे रहित छौं; तथा सर्व श्रुतियोनो रित- द्वान्तरूप छौं; तथा अपरिच्छिन्न स्वरूप छौं तथा अनुभवरूप छौं; नित्य छौं; बोधस्वरूप छौं; निरवधि (व्यापक) छौं; अने आनंदनो सागररूप छौं. १ हु स्वतः शुद्ध छों; तथा वोधरूप छौं; तथा समरस, परम आनन्दरूप अने व्यापक छौं; तथा जे साक्षी बुद्धिनी वृत्तियोना प्रलयने अने उदयने तथा क्रियाने तथा कर्त्ताने तथा विप- योने प्रकाश करे छे ते स्वप्रकाश साक्षीरूप हैं छौं; तथा हृदय कमळनो प्रकाशक अरूप अनै सर्व प्राणियोने आनन्दनो आपनार हुंज छौं, २ उपर प्रमाणे पर्यालोचनथी निरंतर श्रद्धापूर्वक आत्मा परमात्माना एकत्वनो दृढ बोधरूप जीव- न्मुक्ति सिद्ध थई. ए अर्थने विपे वासिष्ठमा शिखि- ध्वज राजानां वाक्योनी पण संमति. (श्लोको) त्वत्प्रसादेन भगवन् दृष्टा दृश्याति- गा गतिः। प्राप्तः संसारसीमांतो ल- ब्धो लब्धव्यनिश्चयः॥१॥चिराद- तिचिरेणैव विश्रांतोस्मि निरामयः।

५२ स्वरूपानुसन्धाननी लब्धं लब्धव्यमखिलं तृप्तः संश्चि- रसंस्थितः ॥२॥नोपदेष्टव्यमस्माकं किंचिदप्युपयुज्यते । सर्वत्रैवाति- तृप्तोस्मि संस्थितोस्मि गतज्वरः॥३॥ ज्ञातमज्ञातमप्राप्तं त्यक्त्यक्तव्यमा- श्रितम् तत्त्वं परत्वं सत्वं मे स्वस्यै- वास्ति न किंचन ४ निः संमृतिर्वि- गतमोहभयो विरागो नित्योदितः समसमाशयसर्वसौम्यः। सर्वात्मकः सकलसंकलनावियुक्त आकाशकोश- विशदः सममास्थितोस्मि ॥५॥ अर्थः-भगवन हे कुंभ मुने! तमाराप्रसादे करीने सर्व दृश्य वर्गने अतिक्रमण करीने रहेनार जे स्वरूप तेहेनो साक्षात्कार मने थयो; तथा सं- सारना सीमांतने पण हुँ पाम्यो, अने जे लब्धव्य स्वरूप ते निश्चये करीने प्राप्त थयु. १ तथा चिर कालथी पण अति चिर काले करीने परम पदने विपे विश्रांत थईने निरामय थयो छौं; तथा जे लब्धव्य वस्तु ते संपूर्ण प्राप्त थयुं, अने चिर काले करीने संतृप्त थयो. २ हवे मने उपदेश करवानो कंइज उपयोग नथी. हुं सर्व प्रकारे अति तृप्त द्वितीय प्रक्रिया. ५३ अने गया छ आधिभौतिकादि ज्वरो जेना एवो संपन्न धयो.३ तथा जे अज्ञात वस्तु ते संपूर्ण जा- ण्यु, अने जे अप्राप्त ते प्राह थयु; तथा जे त्याग करवा योग्य एवं अहंकारादि ते त्याग कयु; तथा निर्वासन एवु माहारूं मन, परमात्म स्वरूपता (तदाकारता )नेज पामतुं हवू; माटे माहारां स्वरूपथी इतर वस्तु कांइज छै नहि. ज्यारे ताहारां स्वरूपथी अन्य कंइज नथी, त्यारे तुं ह- वे केवो अवशिष्ट रह्यो ? एवी आकांक्षा उपर कहेछे के, हे मुने! हुँ, गयो छे संसार (जन्म- मरणादि प्रबंध) जेने एवो तथा गयां छे मोह अने भय जेनां एवो अने गया छे राग द्वेपादि जेना एवो तथा नित्य प्रकाश अने सर्व वैषम्ये रहित छे स्वरूप जेनुं एवो माटेज पूर्ण सौम्यरूप अने सर्वात्मक तथा सर्व कलनाओथी रहित अ- ने आकाश कोशना जेवो एटले निरवयव, व्या- पक, असंग अने स्वच्छ छत्तो केवल शांत स्वरूपे , रह्यो छौं.५ इति श्री मदुदयशंकरात्मज गौरी- शंकर विरचिते स्वरूपानुसंधाने द्वितीय प्रक्रिया समाप्ता.२ अथ श्री स्वरूपानुसंधाने तृतीय प्रक्रिया प्रारंभः ३. " श्री भगवद्गीताना चोधा अध्यायमा "किं कर्म किमकर्मेति." "कर्मण्यकर्म यः पश्येत्” तथा अढारमा अध्यायमा “ अ- धिष्ठानं तथा कर्ता" " शरीरवाङ्म- नोभिर्यत" तत्रैवं सति कर्तारं० इत्यादिक स्मृति विगेरेना अनुसारे त्वं पदार्थना विवेचनमां अनात्माने कर्मरूपता तथा आत्माने अकर्मरूपतानो निर्णय स्फुट रीते समजवाथी सं- सारबंधनथकी मुक्त थवानो विचार. त्यांहां स्मृतिः- किं कर्म किमकर्मेति कवयोप्यत्र मो- हिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञा- त्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥१॥ अर्थः- “कवयः' एटले सर्व शास्त्रना जा- णनारा एवा पण पुरुषो, कर्मनुं रूप ? अने अकर्मनुं रूप ? ए विषे मोह पाम्या छ- एटले तृतीय प्रक्रिया. कोई वेदोक्त तथा स्मृत्युक एवं जे सर्व ते कर्म अने तेहेनो जे संन्यास ते अकर्म एम कहेछे; अने कोई एम कहेछे के, जे चलनात्मक ते क- म अने अचलन (तूष्णिं अवस्थान ) ते अक- मैं; माटे हे अर्जुन! तुने कर्म अने अकर्म ए वेउ- नुं खलं तत्त्व शुं छे, तेहेना लक्षणनो उपदेश क- रीश के, जेने जाणवाथी अशुभ ( संसार) ध- की मुक्त थईश. आरुरुक्षु पुरुपे संसारथी मोक्षने अर्ये कर्म अने अकर्म वेउनुं तत्त्व जाणवू जोइए; माटे ते वेउनु लक्षण हुँ तुंने कहीश ए प्रकारे जे पूर्वे प्रतिज्ञा करी हती, ते कर्म अकर्मना स्वरूपना ल- क्षणनो हवे उपदेश करे छे. कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च क- में यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १॥ अर्थ:-'कर्म' एटले देह, इंद्रियो अने अं- तःकरण विगेरेथी कराय ते- अर्थात् लौकिक अने वैदिक एवो सर्व पण व्यापार कर्म कहेवाय छे;ते चेटामात्र औपाधिक (उपाधिकृत ) कर्मने विपे जे आत्मानुं यथार्थ स्वरूपनो जाणनार वि- स्वरूपानुसन्धाननी द्वान पुरुप, ते अकर्मभावने जुचे एटले मूढ पु- रुप पोते अकर्मरूप छतो पण अन्य देहेंद्रियादि- कनां कर्मे (क्रियाये) करीने कर्मवान् होय छे, तथापि आत्मवेत्ता पुरुप तो 'ब्रह्मज हुं छो.' ए प्रकारे ब्रह्मने विपेज आत्मत्वना विज्ञानथी पोताने देहादिकना संबंधनो अभाव छे माटे देहें- द्रियादिये करेला कर्मने अकर्मरूपज जुवे छे, केमके ते देहादिककृत कर्मने विपे अहंता म. मताये करीने स्वत्वनो अभाव छ; बीजाये क- रेला कर्मने विपे बीजाने स्वकीयपणुं घटतुंज नथी, माटे विद्वान् पुरुप देहादिकरुत कर्मने अकर्मरूपज जुवे छे; तथा अकर्मने विषे (देहेंद्रि- यादिकना व्यापारनो उपरामरूप तूष्णि अवस्था- नने विषे ) कर्म(क्रिया )पणानेज जुवे छे. य- द्यपि मूढ पोताने विषे देहादिकनो अध्यास करी- 'ने ते देहादिकना व्यापारनो उपराम थये छते "हुँ तूपिण सुखे करीने बेठो छौं, पण दुःखका- रक कांईज कर्मने करतो नथी." ए प्रकारे दुःख- रूप देहेंद्रियना निरोधने विपे सुख बुद्धिथी देहादि- कनीअक्रियाये करीने पोताने विपे अक्रियपणुंमा- ने छे, परंतु मूढनी दृष्टिये जे तूष्णि भावरूप अक- म, तेहेने विपे मानसिक निरोध क्रिया रहेलीज छे;

तृतीय प्रक्रिया. माटे विद्वान्ने तूणिभावरूप अकर्मने विपे क- मंत्वन दर्शन न्यायथकी, दृष्टांतथकी अने अनुभ- चथकी सिद्ध छे; तात्पर्य ए के, विद्वान्नी दृष्टिये संघातकृत कर्मना असंगथी आत्मा अकर्मरूप छे. अने मूढनी दृष्टिये संघातहत कर्मना तादात्म्य संसर्ग अध्यासथी (स्वरूपनी जोडे संबंध रहित एवा पदार्थोनो जे संबंधपणानो अध्यास अर्था- त् संबंध रहित देह तत्कर्मादिकने विपे जे हुँ म्हा- रापणानो अध्यास तेथी) आत्मा कर्त्तारूप छे; ए रीते जे अर्थनो उपक्रम को ते विपयनो उ- पसंहाररूप १८ मा अध्यायनी स्मृतिः- अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च एथ- ग्विधम् । विविधाश्च पृथक् चेटा दै- वं चैवात्र पंचमम् ॥१॥ अर्थः-कर्मनी निष्पत्तिमां पांच हेतुओने कहेछे, के (१) अधिष्ठान' एटले मुख दुःखोना भोगर्नु आयतन अथवा सर्व करणोर्नु आश्रयभू- त एवं स्थूळ शरीर; तथा (२) 'कर्ता' एट- ले “हुँ कर्ता, हुं भोक्ता.” ए प्रकारे अहं अभि- मान वाळो विज्ञान आत्मा अर्थात् साभास अ- हंकार; तथा (३) 'पृथग्विधं करणं' एटले बा- .

स्वरूपानुसन्धाननी ह्याभ्यंतर भेदे करीने वे प्रकारनां ज्ञानेंद्रियो अने कर्मेंद्रियो, तथा मन अने.बुद्धि, ए रीते वार प्र. कारनां करणो; तथा (१) चिचिधाः पृथक चेष्टाः' एटले दश प्रकारना भेदे विशिष्ट अने ऊर्ध्व अधः गति भेदे करीने नाना प्रकारनी वायुनी चेष्टा वि- शेपरूप एवा प्राणादि पांच तथा नागादि पांच; तथा (५) 'पंचमं दैवं' एटले चक्षुरादि इंद्रि- योना प्रवर्तक एवा सूर्यादि देवताओ. १ शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पंचैते तस्य हेतवः१ अर्थः- “नरः' एटले बाह्य दृष्टिथी कर्मनी कर्ता एवो पुरुप 'शरीरवाङ्मनोभिः' एटले शरीर तथा वाणी अने मने करीने बुद्धि पूर्वक 'न्याय्यं" एटले शास्त्रीय अथवा — विपरीतं ' एटले अशा- स्त्रीय निषिद्ध एवां जे कर्मने करे छे, ते कर्मनी निप्पत्तिमा पूर्वे कहेला अधिष्ठानादि पांचज कार- णभूत छे. तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धिवान स पश्यति दुर्मतिः १ अर्थः- पूर्वोक्त प्रकारे अधिष्ठानादि पांचने- ५९ तृतीय प्रक्रिया, ज सर्व कोनी निष्पत्तिमां कारणपणानो निष्क- पै थये छते आत्मा अनात्माना तत्त्व विचारे रहित एवो जे पुरुप, अधिष्ठानादिक पांचे करेला एवां विहित निपिद्ध कर्मोने विपे “आ कर्मनो कर्ता हुं छो.” ए प्रकारे अकर्ता, एकरस, निष्क- ल, निष्क्रिय, निर्विशेष एवा आत्माने कर्तारूप जुवे; जेम के “ हुं नाह्यो, में भोजन कर्यु, हुं ग- यो, हुँ आयो, में दुष्ट अथवा अदुष्ट कर्म कर्य" ए रीते विवेक रहित एवो छतो आत्मानेज क- मनो कर्ता माने: ए तात्पर्य. ए प्रकारे निष्क्रिय एवाज निर्विकारी असंग चिदात्माने विपे अन्ये करेला कर्तृत्व भोकृत्त्वादिक धर्मोनो आरोप कर- नार ते पुरुप पोते अरुतवुद्धि (श्रवण मननादि संस्कारे रहित वुद्धिवाळो) छे; अथवा राजस तामस वासनात्मक अविद्याथी दूपित जेनो बुद्धि एवो छे; माटे ते कांईज जागतो नथी. १ उपर कहेली स्मृतिना तात्पर्यथी जे निष्कृष्ट अर्थ सिद्ध थयो तेनुं कथन:- कर्मनुं कर्तृत्व भोक्तृत्व सावयवां होय छे. निरव- यवमा घटे नहि, आकाशनी पेठे माटे पूर्वोक अधिष्ठानादि पंचकरूप संघात आत्माना सन्निधा- नथी सत्तास्फूर्ति पामीने गमनादिक चेटाओ करे , स्वरूपानुसन्धाननी छे वास्ते सक्रिय छे; केमके ते त्रिगुण निर्मित, सावयव, पाव विकारवान अने पड् ऊर्मिवान् छ माटे कर्मरूप (कर्त्ता भोक्ता) छे; अने आत्मा तो तेथी पथक् अधिष्ठानादिक संघातनो प्रकाशक तथा सत्, चित् अने आनंदरूप छे, माटे ते अकर्मरूप (अक्रिय अर्थात् अकर्ता अभोक्ता) छे; केम- के निरवयव, निर्गुण, पड्भावविकार तथा पड् ऊर्मि रहित केवल शिवरूप छे. यद्यपि दृश्य ए- वां मनरूपी उपाधिना तादात्म्य अध्यासथी अ- ज्ञाने करीने आत्माने विषे कर्तृत्व भोक्तृत्वादिक मनाय छे तथापि ते मिथ्या भ्रमात्मक छे; जेम जळमां प्रतिबिंबित चंद्रने विपे जळरूप उपाधि- थी चलनादिक धर्म वृथा भ्रांतिरूप प्रतीत थाय छे तेम. उपर प्रमाणे आत्माने विपे निष्क्रिय- पणुं सिद्ध थयु; तेहेमां गीताना १८ मा अध्या- यनी स्मृतिनुं प्रमाण:- यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हवापिस इमाँल्लोकान्न हंति न निबध्यते १ भावार्थ:- उपर प्रमाणे जे पुरुपने अहंभा- व नथी (हुं म्हारापणाथी कर्तृत्व भोक्तृत्व जे बु- दिना धर्म छे तेहेने पोताने विपे मानतो नथी) - तृतीय प्रक्रिया. ६१ ते पुरुष, शरीरादि संघात का भोक्ता छते ते- हेमा लेपायमान थतो नथी (संसार वंधनथी मुक्त रहे छे). तेमा मुण्डक श्रुतिनुं प्रामाण्यः- द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं - क्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाहत्यनश्नन्नन्योभिचाकशीति॥१॥ अर्थः-बे 'सुपर्ण' एटले पक्षीना जेवा 'स- युजौ' एटले नित्ये अवियुक्त अर्थात् संघाते र. हेनारा 'सखायौ' एटले चिद्रूप अर्थात् एक अं- तःकरणथी उपहित ( उपाधिवालो) चिदाभास तथा बीजो अंतःकरणथी अनुपहित (निरुपाधि- क) कूटस्थ, ए बेउ ‘समान' (एक एवो) 'वृक्ष' एटले तत्त्वज्ञाने करीने जेनुं समूळ उच्छेदन था- य एवो कार्य कारणोपाधिरूप शरीरने 'परिपस्व- जाते' एटले आश्रय करोने रह्या छे जेम लौकिक वे पक्षी, एक वृक्षनो आश्रय करीने रहे छे तेमा ए बेड मध्ये एक जीवात्मा, स्वादिष्ठ एवा 'पि. प्पल' ने एटले कर्मना फलरूप सुख दुःखने, क- र्तृत्वादि कार्य कारणना अविवेकथी 'अति' ए- टले भोगवे छ; अने कार्य कारणथी विवेचन क- रेलो बीजो कूटस्थ साक्षी 'अनश्नन्' एटले सु- स्वरूपानुसन्धाननी ख दुःखने न भोगवतो छतो 'अभिचाकशीति' एटले कर्तृत्व भोक्तृत्वादिरूप कार्य कारणने केव- ळ जूवे छ- एटले जेनी प्रेरणाथकीज जीव, स- नास्फूर्ति पामीने चेष्टा करे छे. दर्शनमात्रथीन ए साक्षीने प्रेरकपणुं राजानी पेठे जाणवू. १ ए रीते कर्तृत्व भोकृत्वादि रहित शरीरादिकथी पृथक् आनंदात्मस्वरूप जे हुं ते असंग नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त अखंड एकरस परिपूर्ण प्रत्यकथी अभिन्न ब्रह्मस्वरूप छौं एवं अवधारण कर. त्यां- हां कैवल्य श्रुतिः- सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चा- त्मनि । संपश्यन् ब्रह्मपरमं याति नान्येन हेतुना ॥१॥ अर्थः- आत्मा ( आनन्दात्मा ) जे हुं, ते सर्व भूतोने विपे अनुस्यूत रूपे रह्यो छौं; तथा अधिष्ठानभूत आनन्दात्मा जे हं, ते माहारे वि- पे सर्व भूतो अध्यस्तरूपे रह्यां छ; ए रीते क- ल्पित पदार्थने अधिष्ठानधी अनतिरिक्त होवाथी जगत् ब्रह्मना वास्तव अभेदयी अपरिच्छिन्न व्र- ह्मस्वरूप हुं न छौं; ए प्रमाणे पूर्वोक्त अभेद ज्ञा- नधी ब्रह्मस्वरूपने पामे, तेथी अतिरिक्त बीजा तृतीय प्रक्रिया. साधने करीने पामे नहि. १ (ए रीते सर्वात्म- भाव संपादन करवो.) पूर्वोक्त ब्रह्माकार वृत्तिनी दृढताने अर्थे निदि- ध्यासनरूप सविकल्प, निर्विकल्प (संप्रज्ञात तथा असंप्रज्ञात) समाधिनुं चिंतन. त्यांहां श्लोकः- कामाद्याश्चित्तगा दृश्यास्तत्साक्षित्वे- न चेतनम्। ध्यायेदृश्यानुविद्धोयं समाधिः सविकल्पकः ॥१॥ अर्थः- काम, क्रोध, लोभ, प्रेम, हर्प, शोक इत्यादि अनेक वृत्तिओ सत्व, रज, तमोगुणना तारतम्ये प्रसिद्ध जाण्यामां आवे छे; तथा एक वृत्ति आळशा पछी बीजी वृत्ति प्रगटे छे, ते पो- ताना स्वरूपने तथा वीजी वृत्तिना स्वरुपने अने कामने पण जाणती नथी- शाथी के, ए वृत्ति- ओ दृश्य छे अने हुं तेहेनो द्रष्टा छौं; तथा जा- ग्रत अने स्वप्नावस्थामा चित्त छे त्यांहां सुधी ते वृत्तिओ पण छे अने सुषुप्तिमा चित्त भेळी लीन थाय छे माटे ए सर्वे चित्तना धर्म छे तेथी ते वृ- तिओ साक्ष्य छ भने हुँ तेहेनो साक्षी छौं; तथा हुं चैतन्य तो ए सर्वे वृत्तिओनो प्रकाशक अने वृत्तिना भाव तथा अभाव बन्नेनो जाणनार ते हुँ; .

६४ स्वरूपानुसन्धाननी ए रीते ध्यान करता एकायपणे अखंड ध्यान करे ते दृष्ट प्रकारनो हृदयमा सविकल्प समाधि क- हेवाय. १ (ए रीते युक्तिथी कामादिक दृश्योने पृथ- क् करीने तेथी अतिरिक्त आनंदात्मा सिद्ध थयो.) असंगः सच्चिदानंदः स्वप्रभो दैत- वर्जितः। अस्मीति शब्दविडोयं स- माधिः सविकल्पकः॥१॥ अर्थ:-जे परमात्मा' असंग' एटले संग रहित छे; त्यांहां श्रुतिः- " असंगो ह्ययं पुरु- पः” “असंगो नहि सज्जते.' तथा 'सत्; चित्, आनंद' एटले सत्य, ज्ञान अने आनंदरूप छे; “स्वप्रम' एटले स्वप्रकाश छे; त्यांहां श्रु- तिः- “ अदृष्टं द्रष्ट्र अश्रुतं श्रोट न दृष्टे- टारं पश्येतू." तथा 'द्वैतवर्जित' एटले दृश्य सर्व धर्मथकी तथा स्वगत, सजातीय, विजातीय भेदयकी रहित (त्यांहां श्रुतिः- “ एकमेवाद्वि- तीयं " ) एवो जे प्रत्यक्रूप साक्षी तेज हुँ छौं; एरीते निरंतर भावना करवी. उपर प्रमाणे कामावि अशेप वृत्तिनो लय क- रनार अने असंग इत्यादि शब्दे मिश्रित अने वि- तृतीय प्रक्रिया. जातीय प्रत्यय रहित, सजातीय प्रत्ययनो प्रवा- हरूप जे चिन्मात्रनिष्ठ अनुभव ते शब्दानुविद्ध सविकल्प समाधि जाणवो.१ (उपर प्रमाणे श्रुति- थी पण आत्माने असंग द्वैतवर्जितपणुं सिद्ध थयु.) ए रीते वे प्रकारनी सविकल्प समाधिना अ- भ्यासनी पाटवताना वळथी, निर्विकल्प समाधिने देखाडे छे. त्याहां श्लोकः- स्वानुभूतिरसावेशादृश्यशब्दानुपे- क्षितुः । निर्विकल्पः समाधिः स्या- निवातस्थितदीपवत् ॥ १ अर्थः- रस एटले आनन्दस्वरूप परमात्मा, तथा अनुभवस्वरूप प्रत्यगात्मा पण परमात्मा- धकी अभिन्न होवाथी अने परम प्रेमनो आस्पद होवाथी रसरूप छे-अर्थात् ब्रह्मथी अभिन्न प्रत्य- स्वरूपभूत जे अनुभवरूप रस; तेनो आवेश एटले पूर्वोक्त बे प्रकारनी समाधिना अभ्यास ब- ळथी अंतःकरणमा स्वरूपभूत ज्ञानरूप आनन्द- नो आविर्भाव ते स्वानुभूतिरसावेश कहेवाय छे. तात्पर्य के दृश्य लईने द्रष्टा, साक्ष्य लईने साक्षी, संग लईने असंग इत्यादि परस्पर सापेक्ष छे, प- रंतु पूर्ण स्वरूपने विपे दृश्य, साक्ष्य, संग विगेरे ६६ स्वरूपानुसन्धाननी प्रतियोगीनोज असंभव छे; माटे तेनो प्रतिपेध पण नथी, केवळ शुद्ध चिदाकाश परिपूर्णज छे; अ- ने जे नाम रूप क्रियात्मक दैत भ्रमात्मक भासे छे ते तो रज्जु सर्प तथा मृगजळ तथा स्वप्नव- त् मिथ्या छे. त्यांहां गौडपाद कारिका:- आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेपि तत्तथा । वितथैः सदृशाः संतोऽवित- थाइव लक्षिताः॥१॥ अर्थः- जे मृगतृष्णादि वस्तु, आदिने विपे तथा अंतने विपेनधी ते मध्यमा पण नधी: ए प्रकारे लोकमां जेम निश्चय छे तेमज जाग्रतने विषे दृश्य एवा सर्व भिन्न पदार्थो, आद्यतने विपे अभा- वथी मध्यनेविपे पण असत्य मृगतृष्णादिकनी तु- त्यताधी मिथ्याज छे, तथापि अनात्मवेत्ता मूढ पु- रुपोये सत्य जेवा जाण्या छे.१ वळी आवेश एटले आनंदमा निमनपणुं ते पण स्वानुभूतिरसावेश; ते रसावेशथकी पूर्वोक्त कामादिक दृश्योने तथा असं- गादिक शब्दोने उपेक्षा करनार अने स्वानुभूतिरस नासना महा मगरे यस्त कर्याथी स्वातंत्र्यनो अभा- व छे एटले अनुभवरसनेज भूतावेशनी पेठे वश थवाथी परतंत्रताये रहेलो एवा पुरुपने निर्विक- तृतीय प्रक्रिया. ६७ स्प समाधि धाय; अर्थात् लय, विक्षेप, कपाया- दक प्रतिबंधना अभावथी स्वतःज होय छे; वायु- रहित देशमा स्थापित दीपनी पेठे. ए समाधि- विपे इष्टसिद्धिकार तथा बसिष्टजीनां वचन:-- यानुभूतिरजामेया वनंतानंदविग्रहा। महदादिजगन्मायाचित्रभित्तिं नमा- मि ताम् ॥१॥ अर्थः-जे पूर्ण चिदात्मानी अनुभूति (अ- नुभव ) अजा' एटले जन्मादि विकार रहित छे; तथा 'अमेया' एटले मननो अविपय; तथा 'अ- नंतानंद विग्रहा' एटले अपरिच्छिन्न आनंद छे स्वरूप जेर्नु एवी छे ते 'महदादिजगन्मायाचित्र- भित्रिं.' एटले महत्त्वथी आरंभीने स्थूळ पर्यंत सर्व जगत मायारूप चित्रनी भित्तिरूप एटले अधिष्ठानरूप आत्मानी जे अनुभूति तेने हुं न- मस्कार करुं छौं. १ अन्तः शुन्यो वहिः शून्यः शून्यकुंभ इवांवरे। अन्तः पूर्णो बहिः पूर्णःपू. र्णकुंभ इवार्णवे १ मा भव ग्राह्यभा- वात्मा ग्राहकात्मा च मा अव । भाव- नामखिलां त्यक्त्वा यदिष्टं तन्मयो .

स्वरूपानुसन्धाननी भव २ प्रशान्तसर्वसंकल्पा या शि- लावदवस्थितिः। जाग्रन्निद्राविनिर्मु- क्ता सा स्वरूपस्थितिः परा ॥३॥ अर्थ:-जेम आकाशने विपे खाली घट, वा- ह्य तथा अन्तर शून्यरूप छे एटले इतर वस्तु रहित छे; वळी समुद्रने विपे जळ पूर्ण घट, अं- तर तथा बाह्य जळमय छे; तेमज जे अधिका- री, अन्तर तथा बाह्य निर्विकल्प समाधिना ब ळधी अध्यस्त एवा सर्वे दृश्य प्रपंचे रहित छे; वळी अन्तर तथा बाह्य, चिन्मात्र स्वरूपे परिपूर्ण छे. १ ग्राह्य एटले ग्रहण करवा योग्य दृश्य वि. पयादिरूप नहि थर्बु, तथा ग्राहकरूप पण नहि थ- बुं एटले अहंकारादिरूप पण नहि थवू; किंतु नाम रूप क्रियात्मक सर्व भावनानो त्याग करीने एटले अध्यस्त जाणीने जे अवशिष्ट चिन्मात्र स्व- रूप तन्मय थवू. २ शांत थया छे सर्वे संकल्पो जेने विपे अने जाग्रत निद्रा (मोहरूप निद्रा)धी निर्मुक्त एवी जे शिलानी पेठे स्थिति तेज परम स्वरूप स्थिति, तेहेनुं नाम सर्वे चासनानी जा- ळनो उच्छेद पण कहेवाय छे. ३ (ए रीते अ- नुभवधी पण शुद स्वरूप वृत्तिमा आरुढ एटले दृढ निथल थq.)

तृत्तीय प्रक्रिया. ६९ ए प्रमाणे त्रण प्रकारे देखाडेला हृदय संबंधि समाधिने बाह्य संबंधि पण देखाडवा माटे वाहार तत्पदार्थ ब्रह्म अने सर्गनो छे विवेक जेमा तथा सत, चित्, आनन्द ब्रह्मने विपेछे निष्ठा जेनी एवो दृश्यानुविद्ध समाधिने देखाडे छे केः- हृदीव वाह्यदेशेपि यस्मिन्कस्मिश्च वस्तुनि । समाधिराद्यः सन्मात्रान्ना- मरूपष्टथकृतिः ॥१॥ अर्थ:-जेम हृदयमां कामादिकथी साक्षीने पृथक् करीने ते कामादिक संकल्पनुं जे साक्षी चै- तन्य तेज हं छौं ए प्रकारे जे चिन्तवन, ते आ- तर दृश्यानुविद्ध समाधि कहेवाय छे; तेज प्रकारे बाहार पण पोताने इष्ट एक वस्तुने अवलंबन करीने सत्, चित्, आनन्द, नाम, रूप ए पंच अंशरूप ते इष्ट वस्तुमाथी कल्पित नाम अने रूप अंशने पृथक् करीने ते वन्नेनुं अधिष्ठानभू- जे सत्, चित्, आनन्दरूप वस्तु तेज तत्पद- लक्ष्य एवं ब्रह्म अने ते ब्रह्म हुँ छौं ए रीतनुं जे चिन्तवन, ते वाह्य दृश्यानुविद्ध समाधि कहे- वाय छे. १ ए रीते बाह्य दृश्यानुविद्ध समाधिनुं ७० स्वरूपानुसन्धाननी निरूपण करीने, समष्टि व्यष्टिरूप समस्त दृश्य प्रपंचनो लय करनार वाह्य शब्दानुविद्ध समा- धिने देखाडे छे. श्लोकः- अखंडैकरसं वस्तु सचिदानन्दलक्ष- णम् । इत्यविच्छिन्नचिंतेयं समाधि- मध्यमो भवेत् ॥१॥ अर्थः- अखंड एटले देश, काळ अने वस्तु- थी अपरिच्छिन अने एकरस एटले त्रण काळने विपे पण एकरूप ए प्रकार जे वस्तु तेज ब्रह्म हुँ छौं; ए रीते विजातीय प्रत्यय रहित सजाती- य प्रत्ययनो प्रवाहरूप जे चिन्तवन ते बाह्य शब्दानुविद सविकल्प समाधि कहेवाय छे. ए प्रकारे ब्रह्मने विपे वे प्रकारनो सविकल्प समाधिने देखाडीने हवे पूर्वोक्त समस्त दृश्य तथा शब्दोनो विलय करनार निर्विकल्पक समा- धिने देखाडे छे. श्लोकः- स्तब्धीभावो रसास्वादस्तृतीयः पूर्व- वन्मतः। एतैः समाधिभिः पइभिन- येत्कालं निरंतरम् ॥१॥ अर्थः- पूर्वोक्त बाह्य तथा आंतर ए वे प्रका- तृतीय प्रक्रिया. ७१ रना सविकल्प समाधिना अभ्यासना बळे भूमा- नन्द रसना आस्वादनथी व्यष्टि समष्टयात्मक स- 4 दृश्य प्रपंचनी तथा अखंड एकरस इत्यादि शब्द समूहनी उपेक्षा करीने आस्वादन करे- ला भूमानंदनी परतंत्रताये रहेलं जे चित्त ते. हेनो वात रहित दोपनी पेठे जे स्तब्धीभाव (नि- चळता )ते त्रीजो निर्विकल्पक समाधि जाणवो; अने ते पण पूर्वोक्त समाधिनी पेठे अंतर (त्वंप- दार्थ विपयक) अने वाह्य (तत्पदार्थ विपयक) वे प्रकारनो जाणवो; ए रीते छ प्रकारना समा- धिधीज मुमुक्षुए निरंतर काळ निर्गमन करवो.१ ए प्रकारे आंतर अने बाह्य मळीने छ प्रका- रना समाधियोनुं दीर्घ काळ निरंतर सत्कार पू. क मुमुक्षुने अवश्य कर्तव्यताये विधान करीने हवे पूर्वोक्त प्रकारे अन्वय व्यतिरेक (युष्मदर्थ- नी व्यावृत्ति अने अस्मदर्थनी अनुवृत्ति )थी आं- तर अने वाह्य वे प्रकारना पदार्थनां परिशोधने करीने देहाभिमान गलित धये छते अने परमात्म- स्वरूपनो साक्षात्कार कर्ये छते पूर्वोक्त छ प्रका- रना समाधियो मुमुक्षुनुं मन, अंतः अथवा वा- ह्य ज्यांहां ज्यांहां जाय त्यांहां त्यांहां स्वतःज सिद्ध थाय छे ए वात कहेछे.

ए ७२ स्वरूपानुसन्धाननी देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमा- त्मनि । यत्र यत्र मनोयाति तत्र तत्र समाधयः॥१॥ अर्थः- सम्यक् प्रकारे कर्या एवा आंतर दृक् दृश्यना विवेके करीने अस्मत् शदनो अर्थ- भूत साक्षी आत्माने विपेज अभिमानथी, अहं- कारथी आरंभीने देह पर्यंत युप्मदोंने विपे "हुं कर्ता, हुं मनुष्य रीते अनात्माभिमान गलित थये छते, तथा बाह्य नाम रूपात्मक सर्व प्रपंच अने ब्रह्मना विवेके करीने नाम रूपात्मक सर्व मिथ्या छे; अने तेहेर्नु अधिष्ठानभूत सच्चि- दानन्दरूप ब्रह्मज सत्य छे; ए रीते परमात्माने जाण्ये छते गलित थयो छे देहाभिमान जेनो तथा जाण्युं छे परमात्मतत्त्व जेणे एवा पुरुप मन, अंतः अथवा बाहार ज्यांहां ज्यांहां जाय त्यांहां त्यांहां पूर्वोक्त छ प्रकारना समाधियो स्व. तःज सिद्ध थाय. १ तीव्र वैराग्यना वळथी प. रमहंसामनो स्वीकार पूर्वक ब्रह्मना साक्षात्का- र पर्यंत सद्गुरुना सनिधानमां शारीरक शास्त्र- नु अवलंबन करीने निरंतर पुनः पुनः करेला त- स्वंपदार्थना विवेके करीने गलित धयो छे देहा- 7

तृतीय प्रक्रिया.
भिमान जेनो अने जाण्यु छे परमात्म तत्व जे-
णे एवा पुरुपने छ प्रकारना समाधियो अनायासे
करीने स्वतःज प्रवृत्त थायछे एज तात्पर्य्यार्थ; के-
म के “ आरत्तिरसकृदुपदेशात् ' ए व्या-
स सूत्रना अनुसारे "अहंब्रह्म" ए वाक्यार्थ-
नो बोध ज्यां पर्यंत सुदृढ थाय त्यां पर्यंत स-
माधिये सहित एवो छतो श्रवणादिकनो अभ्यास
करें ए प्रकारे आचार्य कर्तुं छे.
हवे चैराग्य संन्यासादिक श्रवणनां साधनोने
विपे तथा दीर्घ काळ निरंतर सत्कार पूर्वक करेला
श्रवणादिरूप ज्ञाननां साधनोने विपे प्रयास जो-
इने तथा ब्रह्म आत्मानि एकतारूप ज्ञाननां फ-
ळनी अग्निहोत्रादिकनी पेठे तत्काळ प्राप्तिना अ-
भावने पोतानी धुद्धिथी कल्पिने साधननां अनु-
छानथी उपराम पामता शिप्य प्रत्ये फळनां प्रद-
शननी द्वाराये साधननां अनुष्ठानने विपे तेहेने
प्रवविवा माटे तथा विश्वास थवा माटे ब्रह्म
आत्मानी एकतारूप ज्ञानतुं तत्काळ फळ देखा-
इनारी श्रुतिने पठन करे छ:-
भिद्यते हृदयग्रंथिश्चिंते सर्वसंश-
याः। क्षीयंते चास्य कर्माणि तस्मि.
न्दृष्टे परावरे ॥१॥

७४ स्वरूपानुसन्धाननो अर्थः- देहथकी वाहार नामरूपात्मक स- र्व वस्तुने विषे सर्पनी आधारभूत रज्जुनी पेठे व्याप्त एवो सच्चिदानन्दरूप जे परमात्मा तेज प- र शब्दे करीने जाणवो, तथा अन्तः अहंकारादि सर्व दृश्यथी विलक्षण अने अस्मत् प्रत्ययनो अ- वलंबनभूत तथा प्रत्यक चैतन्यमात्र अने सा- क्षीरूप जे जीवात्मा ते अवर शब्दे करीने जा- णवो. अर्थात् प्रत्यक्थी अभिन्न परमात्मा तेहे- नो साक्षात्कार थये छते एटले 'तुं ते ९.' अने हुँ ते तुं.' तथा 'ब्रह्म ते हुं.' अने हुं ते ब्रह्म' एरी- ते अखंड एकरसताये करीने करतळामलकनी पे- ठे साक्षात्कार कर्ये छते ते अधिकारीनो हृदय- ग्रंथि ('हत्' कहेता अहंकार अने 'अयं' क- हेतां साक्षी ए वेहुना तादात्म्य अध्यासथी लोह अग्निनी पेठे जे एकता पामेलं रूप ते) भिद्यते (भेदाय छे) अर्थात् विशीर्ण थई जायछे, तथा सर्व संशयो छेदाय छे-एटले माहारे विपे वास्तवताथी ब्रह्मल , के नथी? अने ब्रह्मत्व छत्ता पण सा- क्षात्कार थयो छे के नहि ? अने साक्षात्कार थ. ये छते पण त्यार पछी माहारे कर्तव्य कार्य छ के नहि ? तथा कर्तव्यनो अभाव छते पण माहा.

. तृतीय प्रक्रिया. ७५ रे जीवन्मुक्ति छे के नहि ? जीवन्मुक्ति छत्ते पण वर्तमान देहना पतनथी अनन्तर भावि विदेहमु- क्ति थशे के नहि ? अने विदेह मुक्ति थवाथी प- ण काळान्तरने विपे फरीथी जन्म थशे के नहि? इत्यादिक संशयो छेदाई जायछे अर्थात् पराव- रना ऐक्य दर्शनरूप शस्त्रे करीने संशयरूप पा- शो खंडित थायछे, तथा ए अधिकारीनां कर्मो क्षीण थायछे. (संचित, अनारब्ध ए शब्दे करी- ‘ने वाच्य पुण्य अपुण्य मिश्ररूप जे कर्म तेज अहिं विवक्षित छे, प्रारब्ध कर्मनो तो भोगथ- कीज क्षय जाणवो.) उपर कहेला प्रकारनी जे स्थिति तेज जी- वन्मुक्ति कहेवाय तेहेना प्रमाणमां श्लोकः- यस्मिन्काले स्वमात्मानं योगी जा- नाति केवलम् । तस्मात्कालात्समा- रस्य जीवन्मुक्तो भवेत्सदा ॥१॥ भावार्थः- योगी एटले त्वंपदार्थ तत्पदार्थ- नां शोधनपूर्वक भागल्याग लक्षणाथी अपरोक्ष करनार पोताना स्वस्वरूप जे आत्माने जे का- ळे केवळरूप एटले अद्वैत, अखंड, एकरस अ- नुभव करे ते काळने आदि लेईने सर्वदा जीव- न्मुक्त होय छे. १ ७६ स्वरूपानुसन्धाननी उपर कहेलाज अर्थना विशेप दृढीकारने अ. थे श्री वासिष्ठमा सिद्ध गीतामांथी वाक्यो:- द्रष्ट्रदर्शनदृश्यानि त्यक्त्वा वासनया सह । दर्शनप्रथमाभासमात्मानं स- मुपास्महे ॥ १॥ यस्मिन्सर्वं यस्य सर्व यतः सर्वं यस्मायिदम् । येन सर्वं यविसर्व तत्सत्यं समुपास्महे ॥२॥ सर्वाशाः किल संत्यज्य फलमेतदवा- प्यते । येनाशाविपवल्लीनां मूलमा- ला विलूयते ॥३॥बुद्धाप्यत्यंतवैर- स्यं यः पदार्थेपु दुर्मतिः। वनाति भावनां भूयो नरो नासौ स गर्दभः॥४॥ उपशमसुखमाहरेत्पवित्रं शमवशतः शममेति साधुचेतः । प्रशमितमन- सः स्वके स्वरूपे भवति सुखे स्थि- तिरुत्तमा चिराय॥५॥ अर्थः- शुद्ध प्रत्यगात्म स्वरूपनो निष्कर्ष करीने करतलामलकनी पेठे साक्षात्कार कराव- ७७ तृतीय प्रक्रिया. ता छता कोइ सिद्धो कहेछे के द्रष्टा, दर्शन, दृश्य ए त्रिपुटीने वासनाये सहित त्याग करीने (आ ठेकाणे त्रिपुटीना त्यागे करीने शुद्ध आ- त्माने विपे जाग्रत् अने स्वप्न ए वन्ने अवस्थानो निरास सूचन को; तथा वासनाना त्यागे करी- ने ए बन्ने अवस्थानी वीजभूत अने वासनाना जाळे करीने पूर्ण एवी अज्ञानात्मक सुपुतिनो निरास सूचन कर्यो.) त्रिपुटीथी पर अने चक्षु, मन आदि इंद्रियोनी वृत्तियोथी प्रथमज तेमनी उत्पत्तियोमा साक्षीरूपे करीने भासमान अर्थात त्रिपुटीथी पूर्वसिद्ध अने सर्वने अनुभवसिद्ध एवो जे त्रिपुटीथी विवेचन कर्यों तुरीयस्वरूप प्रत्य- गात्मा तेनी उपासना करीये छैये (प्रत्यक् अ- भिन्न ब्रह्मस्वरूपे स्थिति पाम्या छैये.) १ जे ब्रह्म, नाम रूपात्मक सर्वनी आधारताथी तथा सर्वेनुं स्वामीरूप होवाथी तथा सर्वनो अभिन्न निमित्तोपादानरूप अपादान (अवधिभाव )धी त- था परार्थत्वरूप संप्रदानभावथी तथा सर्व एवा क- हॅकरणादि भावथी अर्थात् सप्तविभक्त्यर्थरूपता- थी मायाये करीने सर्व जगत् व्यवहारतुं निर्वाहक अने सर्वात्मक एवं होय छे ते सर्व अधिष्ठान परमार्थ सत्य ब्रह्मज प्रत्यगात्मारूप छे; ए रीते स्वरूपानुसन्धाननी अभेदे ऐक्य साक्षात्कार करीने ब्रह्मात्मैक्यरूपे अवस्थान पाम्या छैये.२ अन्य सिद्धो पूर्वोक्त स्वरू- प तत्त्वनी प्राप्तिने विपे वैराग्यनेज मुख्य साधन कहेछे के, सर्व आशाओना परित्यागधीज हृद- यमा रहेलं अने ज्ञान- फलरूप एवं प्रत्यक् स्व- रूप ब्रह्म प्राप्त थाय; जे स्वरूपना लाभथी आ- शारूप विप लताओनी मूलमाला ( वासना जा- लथी जटिल एवी हृदययंथि) छेदाइ जायछे- रसवर्ज रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ए भगवचननां प्रामाण्यथी. ३ पूर्वोक्त वैराग्यना- ज' दृढाकारने अर्थे कहेछे के, जे दुर्मति पुरुष, भोग्य विपयोने विपे वैरस्यपणुं जाण्या छतां पण तेमने विपे फरीथी वासना बांधे ते नर नहि, किंतु गर्दभ जाणवो.४ अन्य सिद्धो तो उपशम- ज मुख्य साधन छे अने वैराग्यादि इतर सा- धनो तो उपशमने अर्थे छे एका आशयथी उ- पसंहार करेछ के, उपशम एटले वाह्य आन्तर इंद्रियोना स्वस्वविपयोने विपे व्यापारनो उप- राम तेणे करीने सर्व विक्षेप दुःखनी शान्ति होवा- थी आविर्भाव पामनार जे आत्मसुख एज संपाद- न करवू. ते आत्मसुख, विपय सुखनी पेठे दोपनो तृतीय प्रक्रिया. हेतु नथी, किंतु चित्तप्रसाद हेतु छे माटे प- वित्ररूप छे; तथा उपशमवान जे पुरुप तेनुं चि. त निरिंधन अग्मिनी पेठे शान्ति पामे छे, अने शान्त एटले निर्वासन थयुं छे मन जेनुं एवो जे पुरुप तेने निरतिशयानन्दरूप एवां स्वकीय प- रमार्थ स्वरूपने विपे स्थिति एटले भूमिकाओ- नी परंपराने विपे आरोहणना क्रमथी उत्तम ए- वी सप्तम भूमिकाने विपे प्रतिष्ठा होय छे. ५ इति श्रीमदुदयशंकरात्मज गौरीशंकरविरचिते स्वरूपानुसंधाने तृतीयप्रक्रिया समाप्ता.

अथ श्री स्वरूपानुसंधाने चतुर्थ प्रक्रिया प्रारंभः ४. - मांडूक्य श्रुति अने ते उपर गौडपादाचार्य- नी कारिकाओना तात्पर्य्यना अनुसारे विचार. मांडूक्य भाप्यना आरंभमा मंगलाचरणः- प्रज्ञानांशुप्रतानैः स्थिरचरनिकर- व्यापिभिाष्य लोकान् भुक्त्वा भो- गान् स्थविष्ठान पुनरपि धिपणो- द्वासितान्कामजन्यान् । पीला सर्वा- विशेपास्वपिति मधुरभुङ्मायया भोजयन नो मायास-ख्यातुरीयंप- रममृतमजं ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥१॥ अर्थ:-विधि मुखे करीने वस्तु जे तुं प्रतिपादन ए प्रक्रियाने देखाडे छे के,जे पर- ब्रह्म तेने ई नमुं छौं; अस्मदर्थनुं एटले अहं प्र- त्ययनो विषय प्रत्यक् आत्मा ब्रह्मनी साथे ऐ- क्यताना अनुसंधाननु स्मरणरूप नमनने सूचन करता भाष्यकारे, ब्रह्म शब्दार्थनेज प्रत्यक्त्व ब्रह्म ते- ८१ चतुर्थ प्रक्रिया. सूचना कर्यु तथा तेणे करीने तत्पदार्थ अने त्वं पदार्थनो ऐक्यरूप विपय ध्वनित कर्यो; वळी यत् शब्दने प्रसिद्ध अर्थ द्योतकपणुं छे माटे वेदान्तमा प्रसिद्ध जे ब्रह्म तेने नमुं छौं, एवा संबंधे करोने औत मंगलाचरण पण कयु; वळी ब्रह्मने अद्वितीयपणुंछे माटेज जन्म मरणमां का- रणना अभावधी अमृतं अने अजं एम कह्यु; वळी जे जन्म मरणनो प्रबंधरूप संसार तेना निपेधे क- रीने स्वतःसिद्ध असंसारिपणाने देखाडता आ--- चार्य, संसाररूप अनर्थनी निरतिरूप प्रयोजन पण द्योतन कयु; ज्यारे अद्वितीय अने स्वतः असंसारी एवं ब्रह्म वेदान्त प्रमाणथी सिद्ध छे त्यारे अस्थवात्रय विशिष्ट एवा भोक्ता जीवो केम अनुभव थाय छे? वळी तेमने भोग करा- वनार ईश्वर श्रुतिमां श्रवण थाय छे तथा भोग्य एटले भोगववा योग्य विपय समूह पण प्रथा जाणवामां आवे छे, ए सर्व दृश्यवर्ग अद्वैत स्व- रूपने विपे विरुद्ध छे: एवी शंका थये छते अद्वैत ब्रह्मने विपेज जीव, जगत अने ईश्वर ए सर्व का- ल्पनिक संभवे छे एवा अभिप्रायथी कहेछे के 'प्रज्ञानांप्रतानैः' एटले जन्मादि विक्रिया र- हित कूटस्थ ज्ञप्तिरूप जे ब्रह्म वस्तु ते 'प्रज्ञान' . स्वरूपानुसन्धाननी कहेवाय छ, “प्रज्ञानं ब्रह्म" ए श्रुतिनां प्रमाण- थी. ए ब्रह्मनां 'अंशु'(किरण )रूप चिदाभास जीवो सूर्यप्रतिबिंवना जेवा निरूपण कर्या छता विबभूत ब्रह्मथी भेदे करीने विद्यमान छेलन- हि; ते चिदाभात जीवोनां स्थिरचर' एटले - क्षादि मनुष्यादियोना समूहने विपे व्यापनार एवा 'प्रतान' एटले विस्तारोथी लोक एटले विषयोने व्यापीने अने देवताये अनुग्रह करेला एवा बाह्य इंद्रियोनी द्वाराये बुद्धिनो जे ते ते वि- पयोंने आकारे परिणाम तेथकी जन्य छे माटे स्थूळ एवा भोग एटले सुखदुःखना साक्षात्कारो- ने भोगवीने 'स्वपिति एटले शयन करे छे; एणे करीने ब्रह्मने विपे जागरित कल्पित छे ए प्रकारे सूचन कयु. तेल ब्रह्मने विपे स्वप्न कल्पना- ने देखाडे छे के, पुनः एटले जायतमा हेतु धर्म अधर्मना क्षयथी अनन्तर स्वपना हेतु कर्मनो उ- अच पये छते स्वनने विपे वाह्य इंद्रियो तथा स्थूळ विषयो छे नहि किंतु वासनात्मक भासे छे; ते केवा छे के काम कर्म अने अविद्याथकि ज- न्य एवा ते वासनात्मक विषयोने अनुभव क- रोने शयन करे छे. वे अवस्थानी ब्रह्मने विपक- स्पना देखाडीने हये सुपुतिनी पण कल्पना दे- .

चतुर्थ प्रकिया. ८३ खाडे छे के, जागरित स्वप्नरूप स्थूळ सूक्ष्म स- । विपयोने 'पीत्वा' एटले अज्ञात स्वस्वरूपने विपे लय पमाडीने शयन करे छे (कारणभावे करीने रहेछे). ते सुपुप्तिमां आनंदने प्राधान्यना अभिप्रायथी विशेपण आपे छ के 'मधुरभुक्' एटले आनंदनो अनुभव करनार, प्रतिबिंबरूप अमोने मायाये करेलां मिथ्याभूत अवस्थात्रय- ना संबंधि( अवस्थात्रयवान )जेवा संपादन क- रीने भोगवावतुं छतुं ते ब्रह्म रहेछे; माटे ब्रह्मने विपे जे त्रण अवस्था तथा अवस्थावान् जीवो अने मायावी ईश्वर ए सर्व कल्पित छे ए वात कहेछे के 'मायासव्यातुरीयं' तुरीय (चोथु) एवा अर्थथी ब्रह्मने सदितीयपणुं प्राप्त थयुं, एवी शंका प्राप्त थये छते समाधान:- कल्पित एवा त्रण स्थानकनी अपेक्षाये जे ब्रह्मने तुरीयपणुं कमु तेथी सद्वितीयपणुं संभवे नहि. मायाविष- णाथी निरुष्टपणानी आशंका थये छते सिद्धांत कहेछे के 'परं' (शुद्ध ) यद्यपि ब्रह्मने माया उ- पाधि द्वारा मायाविपणुं छे तथापि स्वरूप द्वाराये मायानो संबंध नथी माटे निरुष्टपणुं घटे नहि. १ प्रथम श्लोकमां विधि मुखे वस्तुनां प्रतिपा- दननी प्रक्रियाने अवलंबन करीने तच्छब्दार्थथी स्वरूपानुसन्धाननी उपक्रम करीने ते तच्छब्दार्थने त्वं पदार्थ प्रत्य- गात्ममात्रत्व कथन कर्यु; तथा विपय अने प्रयो- जननी उक्तिये करीने संबंध तथा अधिकारी सू- चन कर्या; हवे निषेध द्वाराये वस्तुनी प्रतिपादन करनारी प्रक्रियार्नु आश्रयण करीने, त्वं पदार्थ- थी उपक्रम करीने ते त्वमर्थने तत्पदार्थनी सा- थे असंसारी ब्रह्ममात्रखनी प्रताति करावे छे. श्लोकः- यो विश्वात्मा विधिजविपयान प्रा- श्य भोगान् स्थविष्ठान् पश्चाच्चा- न्यान् स्वमतिविभवान् ज्योतिपा स्वेन सूक्ष्मान् । सर्वानेतान् पुनरपि शनैः स्वात्मनि स्थापयित्वा हित्वा सर्वान् विशेपान विगतगुणगणः पावसौ नस्तुरीयः ॥२॥ अर्थः- त्वं पदनो अर्थभूत अने स्वतः सि- द एवो चिद्धातु, यत् ए सर्वनाम शब्दे करीने प- रामर्प (ग्रहण) करवो. ते चिडातुने विपे जाग- रित आरोपित छे तेनुं उदाहरण आपे छे के जे चिदातु विश्वात्मा छ- विश्व एटले पंचीकृत , चतुर्थ प्रक्रिया. महाभूत अने तेहेनुं कार्यरूप स्थूळ जगरूपी विराट् शरीर एज जागरित अवस्था; तेने विपे हुँ अने म्हारुंए प्रकारे अभिमानवाळो ते विश्वात्मा कहेवाय; तेनी अर्थ क्रियाने कहेछे के 'विधिज- विषयान्' एटले अविद्या, कामधी उत्पन्न धनार एवा धर्म अधर्मथी जन्य शब्दादि विपयो, ते के- वा छे के, भोग शब्द वाच्य तथा आदित्यादिये अनुयह करेलां बाह्य इंद्रियोनी द्वाराये जे बुद्धि वृत्तिना परिणामो तेहेना विषयभूत छे; माटे 'स्थूलतम' एवा ते शब्दादि विपयोने साक्षात् अ- नुभव करीने ए प्रत्यगात्मा रह्यो छे. तेज पर- मात्माने विपे स्वप्नावस्थानो अभ्यास देखाडे छे के, जाग्रतना हेतुभूत कर्मोनो क्षयथी अनंतर स्वप्नना हेतुभूत कर्मोनो उद्भव थये छते स्थूल विपयोथी अन्य एवा अने सूक्ष्म एटले बाह्य इंद्रियो उपराम थयां छे माटे अविद्या, काम अने कर्म प्रेरी एवी पोतानी बुद्धिमानना प्र- भावथकीज उत्पन्न थनारा, अर्थात् वासनामय; चळी आदित्यादिक ज्योतिपो अस्त थइ गयां छे वास्ते जे आत्मभूत ज्योतिर तेणेज विपय क- र्या एका सूक्ष्म विपयोने अनुभव करीने अपंची- रुत पंच महाभूत अने तेनुं कार्य सूक्ष्म प्रपंच डे छे, स्वरूपानुसन्धाननी हैरण्यगर्भ शरीरने विपे तथा स्वप्नस्थानने विपे अहंममतानुं अभिमान करतो छतो तैजस हो- य छे. तेज आत्माने विषे सुषुप्तिनी कल्पना देखा- के स्थूळ अने सूक्ष्म ए विभागे करीने स्थानहयावच्छिन्न एवा पूर्वोक्त सर्व विशेपोने स्थू- ळ सूक्ष्म उपाधिदयनी द्वाराए स्थानदयने विपे जे संचार तेणे करीने श्रम प्राप्त थयाथी स्वप्नने पण त्याग करवानी इच्छाधी 'शनैः' एटले धी- रे धीरे अनुक्रमथी अथवा क्रमना राहित्यथी का- रणात्मक अज्ञान विशिष्ट स्वस्वरूपने विपे स्वप्न विपयोने स्थापन करीने एटले लय अथवा उ- पसंहार करीने अव्याहत प्रधान एवो छतो 'प्रा- ज्ञ' होय छे. हवे स्थानत्रय विशिष्ट तेज प्रत्य- गात्माने "नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रशं" इत्यादि निषेध शास्त्रथको जन्य एवा प्रामाणिक ज्ञाननी आरूढताथी कार्यकारणरुप सर्वे पण अनर्थाने प्रामाणिक ज्ञानना प्रभावधीज बाध करीने नि- रुपाधिक परिपूर्ण ज्ञप्तिमात्र परमात्मस्वरुपे क- रीने निष्पन्न थयु जे प्रत्यगात्मानुं तत्त्व तेने कहे- छे, के जे प्रत्यगात्मा सर्व विशेपोनो त्याग करी- ने अस्त थया छे गुणगण जेना एवा छता तुरी- यरूप छे पेहेला श्लोके करीने देखाडेला प्रणा- ८७ चतुर्थ प्रक्रिया. मनुं विघ्नोना प्रवाहनी शान्तिरूप जे प्रयोजन ते स्थानत्रयनी कल्पनाथी अतीत परम वस्तुनो लाभरूप छे तेनी प्रार्थना करे छ, के व्याख्या- तारूप अने श्रोतारूप एवा अमो सर्वने पुरुपा- र्थमा प्रतिपक्षिचूत जे कारणो (त्रिविध प्रतिवं- धो ) तेमनो निरास पूर्वक निरस्त थइ छे अशे- प कल्पनाओ जेथकी अने नित्य विज्ञप्ति स्वक्षा- व एवा ए परमात्मा मोक्षना प्रदाने करीने अने तेनां हेतुभूत ज्ञाननां प्रदाने करीने रक्षण करो!२ (१) ॐकारना निर्णयने अर्थे अने आत्मत- खनी प्रतिपत्तिमा उपायभूत एवं पेहेलुं ॐकार प्रकरण. (२) जेम रज्जुने विपे सादिक विक- स्पनो उपशम थये छते रज्ज्जतत्त्वनी प्रतिपत्ति (सिद्धि) थाय छे तेम जे द्वैत प्रपञ्चनो उपश- मथये छते अद्वैतनी प्रतिपत्ति थाय, ते द्वैतनुं हे- तुथी मिथ्यास प्रतिपादन करवाने अर्थे वीजं वै- तथ्य प्रकरण. (३) अद्वैतने पण वैतथ्यपणानो प्रसंग प्राप्त थये छते युक्तिथकी सिद्ध जे अद्वैतव- तेने देखाडवा माटे त्रीजुं अद्वैत प्रकरण. (४) अहेत विपे अद्वैतत्वनी सिदिमां प्रतिपक्षित एवो वीजा अवैदिक वादान्तरोने तेमनीज विरुद्ध उक्तिये करीने निराकरणने अर्थे चोथु अलात प्रकरण, स्वरूपानुसन्धाननी ॐकार छे ते सगुण ब्रह्मनो प्रतीक रूप छे अने निर्गुण ब्रह्मनो द्वारभूत छे. ए ॐकार चा. र मात्रात्मक तेनी “पादा मात्रा मात्राश्च पा- दाः" एटले दरेक मात्रा चार चार (विश्वादि १६) पादात्मक ते अध्यात्मक, अधिदैव अने अधिभूत इत्यादिक त्वंपदार्थ तत्पदार्थनां शो- धन पूर्वक अध्यारोप तथा अपवाद दृटिथी व्य- टि समष्टिनी एकतानो अने सर्वमा चैतन्य सत्ता- स्फुर्तिनी अनुस्यूतता तथा अद्वैतनो अनुभव श्रुति करावे छे तेहेनो प्रकार. १ अकार मात्रा, सत्व गुणात्मिका, जायत अ- वस्था, नेत्र स्थानक, स्थूल भोग, सप्तांग (१ द्यु लोक मूर्दा. २ सूर्य चक्षु. ३ वायु प्राण. ४ आ- काश देहनो मध्य भाग. ५ जळ वस्ति (मूत्र स्थान ).६ पृथ्वी पाद. ७ आहवनीय अग्नि मु- ख), एकोनविंशति मुख (वागादि पांच कर्मेंद्रि- य, श्रोत्रादि पांच ज्ञानेंद्रिय, प्राणादि पंचक, अ- न्तःकरणचतुष्टय एटले मन, बुद्धि, चित्त अने अहंकार ). बहिःप्रज्ञ एटले आत्माची अतिरिक्त जे अनात्मा सर्व दृश्य विपयो तेने विपे जेनी प्रज्ञा संलग्न रहे ते अर्थात् जेनु प्रज्ञत्व अविद्याथी बहिर्विपयक होय छे ते. विश्वसंज्ञिक साभास चतुर्थ प्रक्रिया. अहंकार अभिमानी भोका ते अध्यात्मक अने अधिदैव वैश्वानर तेने विराट् पण कहेछे ते सम- टि विश्वनो आयतन छे. त्यांहां पुरुषसूक्तनी श्रु- तिः- "सहस्रशी पुरुषः सहस्राक्षःसह- स्त्रपात्.” व्यष्टि समष्टिनी एकात्मकताथी स्थूल भोग तेमा अन्य श्रुतिः- “स्त्रीअन्नपानादि विचित्रभोगैः स- एव जाग्रत्परितृप्तिमेति "॥१॥ अर्थः- “स एव' एटले मायाये परिमोहित आत्मा, मनने अनुकूल स्त्रीयो तथा मनने अनु- कूल अन्नपानो अने 'आदि' शब्दथी मनने अ- नुकूल आसन, आच्छादन इत्यादि विचित्र भो. गोथी जाग्रतमां (चक्षुरादिक इंद्रिये करीने बा- ह्य विपयोनी उपलब्धिरूप अवस्थामा) सर्व त- रफथी विपयसुखजन्य तृप्तिने पामे छे एटले सु- ख दुःखनो अनुभव करे छे. १ ए रीते जायतथी सुप्ति पर्यंत शास्त्रीय अथवा लौकिक कामना- ओने करतो छतो विश्वाभिमानी श्रमित थई जाय छे; जेम शकुनि पक्षी आकाशमां चारो क- रवा फरी फरीने श्रमित थयो छतो पोताना मा- ळामां आवे छे; ए रीते जाग्रतमा वृत्तियो अमित स्वरूपानुसन्धाननी घइ गये अकार मात्रा उकारमा मळी. विश्व तै- जसमा मळ्यो अने वैश्वानर हिरण्यगर्भमां म. ब्यो ए प्रमाणे जाग्रतनो अस्तकाल अने स्वप्न- नो उदयकाळ ए बंने कालनी संधि(अंतरा- लावस्था)मा वंने उपाधिथी रहित अन्तर्यामी- नो अनुभव थाय छे. हवे- २ उकार मात्रा, रजो गुणात्मिका, स्वप्ना- वस्था, कण्ठ स्थानक, सूक्ष्म भोग, सप्तांग, एको- नविंशति मुख, अन्तःप्रज्ञ (बहिरिंद्रियोनो उप- राम थये छते वासनामय मनोमात्रता थकी अ- न्तः जेनी प्रज्ञा ते). तैजसाभिमानी (स्थूल वि- पयोए रहित अने केवल प्रकाशस्वरूप एवी वि- पयभूत जे प्रज्ञा तेने विपे विपयिपणे करीने जे रहे ते) भोक्ता ए अध्यात्मक अने अधिदैव हि- रण्यगर्भ तेने सूत्रात्मा पण कहेछे; ते समष्टि तैजसनो आयतन छे. त्यांहां श्रुतिः- "यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिंगा व्युचरंति." व्यष्टि समष्टि- नी एकात्मकताथी सूक्ष्म भोग तेमां अन्य श्रुतिः-- स्वप्ने स जीवः सुखदुःखभोक्ता स्वमायया कल्पितविश्वलोके."॥१॥ अर्थः- सर्व इंद्रियोनो उपरामरूप स्वप्नाव- चतुर्थ प्रक्रिया. स्थामा प्राणनो धारण करनार जीव, विविध प्र- कारनी वासनाये युक्त एवो छतो पोतानां अज्ञाने करीने कल्पित एवां रथ, अश्व, मार्ग इत्यादिक विश्वने विपे “हु सुखी, हुं दुःखी.” ए प्रकारे सुख दुःखनो भोक्ता होय छे. १ ए रीते स्वप्नावस्थामा रथ, घोडा तथा रथने चालवानो मार्ग पण नथी; तो पण जे गिरि, नदी, समुद्र विगेरे अनेक प्रपञ्च भोगववामां आवे छे ते सर्वे स्वयंज्योति साक्षी आत्मा अधिष्ठाननी उपर उल्लेख थाय छे; जेम सूर्यनां कीरणनी उपर जलनो उल्लेख थाय छे तेम. ए वातनो विस्तार वृहदारण्यकमा छठा अध्यायना त्रीजा ब्राह्मणमा जनक राजाने याज्ञ- वल्क्य मुनिए स्वप्नावस्थामा स्वयंज्योतिपणानो अनुभव कराव्यो छे. त्यांहां श्रुतिः- तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्था- ने भवत इदं च परलोकस्थानं च सन्ध्यं तृतीय स्वप्नस्थानं तस्मिन्स-, न्ध्ये स्थाने तिष्ठनेते उभे स्थाने प- श्यतीदं च परलोकस्थानं च अथ य- थाक्रमोयं परलोकस्थाने भवति त- - स्वरूपानुसन्धाननी माक्रममाक्रम्योभयान्पाप्मन आ- नन्दाश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपि- त्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपा- दाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वे- न भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपि- त्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति ॥१॥ अर्थः- शंका- पूर्व मंत्रमा कयुं हतुं के, जे स्थानने विपे आदित्यादिक वाह्य तेजोनो अभाव छते कार्यकारणनो संघातरूप एवो पुरु- प, बाह्य ज्योतिप अतिरिक्त स्वरूप ज्योतिपे क- रीने गमनादिक व्यवहार करे छे; ते आदित्या- दि ज्योतिपना अभाव विशिष्ट कोई स्थानकज नथी के जेने विपे विविक्त स्वयंज्योतिष उपल- भ्यमान थाय; केमके सर्व काळने विपेज ए का- र्थकारणनो संघात, बाह्य ज्योतिपे करीने संवंध- वाळोज जणाय छे वास्ते विविक्त स्वयंज्योति- ट्वरूपे करीने सत्य नथी. त्यांहां सिद्धांति- कोई एक स्थानकने विपे बाह्य आध्यात्मिक भूत्त सौ- तिक सूर्यादि तेजोना संबंधे रहित विविक स्वर्य- ज्योतिष्ट्वरूपे उपलभ्यमान थाय छे; माटे पूर्व मंत्रमा कहेल्लं सर्व पण सम्यक् छे. ए आशये चतुर्थ प्रक्रिया. करीने समाधान करे छे, के ते आत्मा जे .का- कने विपे प्रकर्षे करीने स्वापनो अनुभव करे- छे अर्थात् संधि स्थानने पामे छे त्यारे सर्वावान् एटले संसर्गमां कारणभूत एवी भूत भौतिक स- र्व मात्रावाळो आ जागरित देहनी मात्रा( एक देशरूप अवयवो )ने ग्रह्ण करीने अर्थात् दृष्ट जन्मनी वासनाये वासित एवो छतो पोतेज जा- गरित स्थूळ देहने हणीने एटले संबंध रहित संपादन करीने (आ ठेकाणे आत्माने जे देह है। तापणुं कर्तुं तेहेनो अभिप्राय ए छे के, जागरित अवस्थाने विपे आदित्यादिक देवताओनो जे चक्षुरादिक इंद्रियोने विपे अनुग्रह ते स्थूळ देह व्यवहारने अर्थे छे अने आत्मा संबंधि जे देह- व्यवहार ते धर्माधर्मफळनो जे उपभोग तत्प्रे. रित छे, अने ए देहने विपे धर्माधर्मफळना उ- पभोगनुं जे उपरमण ते कर्मना उपरामे कयु छे, माटे कर्मकत देह हनननो आत्माने विपे उप- चारथी तेहेने हंता कह्यो छे.) ते वासनावासित आत्मा वासनामय स्वप्न देहने पोते निर्माण क- रीने( आ ठेकाणे पण कर्मकत निर्माणनां उपचा- रथी आत्माने विपे निर्माण कर्तत्व जाणवं.)पो- नानी मात्रोपादानरूप दीप्तिये एटले सर्व वास- ९४ स्वरूपानुसन्धाननी नात्मक अन्तःकरणनी वृत्तिना प्रकाशे करीने ते वृत्ति स्वप्नने विषे विपयभूत अने सर्व वास- नामय एवी छत्ती प्रकाशे छे, अने ते वृत्ति स्व- नने विपे स्वयंभा कहेवाय छे. विपयि तथा वि- विक्तरूप तथा अलुप्तहत् स्वभावरूप स्वरूप ज्योतिषे करीने पूर्वोक्त विषयभूत वासनामय : तिभाने विपय करतो छतो प्रस्वाप करे छे. पूर्वे कह्या प्रमाणे जे वर्तन तेहेनेज प्रस्वाप (स्वप्न) जाणवो. ए स्वप्नावस्थामा ए आत्मा पोतेज वि. विक्त ज्योतिष (बाह्य आध्यात्मिक भूत, भौति- क सूर्यादिना संसर्गे रहित स्वप्रकाशरूप) होय छे. शंका:- ए आत्माये जायत देहनी मात्रा (वासना )नुं ग्रहण कर्यु छे माटे ते छते स्वप्नने विपे आत्मा स्वपंज्योतिप केम कहेवाय ? उत्तर:- ए दोप अहिं जाणवो नहि; केमके ते वासनामयत्व तो विपयभूत छे, माटे तेणे करी- नेज स्वयंज्योतिष आत्मा देखाडी शकाय, विप- य विना स्वर्षज्योतिप आत्मा देखाडी शका- तोज नथी; जेम सुषुप्ति काळने विपे कोई पण विपय विना स्वयंज्योतिप आत्मा देखाडीशका- तो नथी तेम. ज्यारे ते वासनात्मक विपयभूत स्वयंभा उपलभ्यमान होय, त्यारेज मियानथी माटेज ए चतुर्थ प्रक्रिया. खगनी पेठे सर्व संसर्गे रहित चक्षुरादि कार्यकार- णथी व्यावृत्त स्वरूप अलुप्तहक् ते आत्म ज्योति- पस्वस्वरूपे प्रकाशमान ग्रहण कराय; आत्मा स्वप्नने विपे स्वयंज्योतिप अनुभव थाय ए सिद्ध थयु. १ तात्पर्य ए जे- यद्यपि जायतमा अने स्वप्नमा आत्मानुं स्वयंज्योतिषपणुं सिद्ध छे परंतु जायतमा सूर्य, चंद्र, अग्नि अने वाक् ए चार ज्योति वडे संकीर्ण छे तेथी नायतमा स्वयंज्यो- तिपपणुं अनुभवमा आवतुं नथी अने स्वप्नमा ए सूर्यादि ज्योतिनो अभाव छ तेथी तेमा स्वयं- ज्योतिपणानो स्पष्ट अनुभव थाय छे. शंका:- स्वप्नने विपे आत्मा सर्यज्योतिप न कहेवाय? केमके जागरितने विपे जेम, तेम- ज याह्यग्राहकादि सर्व व्यवहार स्वासमां पण देखाय छे; वळी चक्षुरादिकना अनुग्राहक. आ- दित्यादिनो आलोक पण जागरितनी पेठेज दे- खाय छे माटे स्वप्नने विपेज स्वयंज्योतिप ए अ- वधारण केम थई शके ? समाधान:- जाग्रत स्वप्रमां वैलक्षण्यपणुं छे ते श्रवण कर! जाग- रितमां इंद्रिय, बुद्धि, मन आदिकना प्रकाशादि- क व्यापारथी संकीर्ण आत्मज्योतिष छे, अने स्वप्नमां तो इंद्रियोनो तथा तेमनां अनुग्राहक . स्वरूपानुसन्धाननी आदित्यादि प्रकाशनो पण अभाव छे; माटे ते आत्मज्योतिप केवळ विविक्त होय छे वास्ते वै- लक्षण्यपणुं छे. शंका:-जेम जागरितने विषे विपयो उपलभ्यमान थाय छे, तेमज स्वप्नमां पण उपलब्धि छेमाटे इंद्रियोना तथा अनुग्रा- हकना अभावथी वैलक्षण्यपणुं कर्तुं ते केम घटे? समाधानः- त्यांहां श्रुतिः- न तत्ररथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान रथयोगान् पथः सृजते न तत्रानन्दा मुदः प्रमुदोभ- वन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रव- न्त्यो भवन्त्यथ वेशान्ताः पुष्करि- ण्यः सवन्त्यः सृजते स हि कर्ता २ अर्थः-ते स्वप्नने विपे रथादिक विपयो नथी, तथा रथादिकने विपे जोडवा योग्य अश्वादिक पण नथी, अने रथादिकने चालवाना मार्गो पण नधी; तथापि ए आत्मा, रथोने तथा अश्वोने त- थामाीने पोतेज सजे छे.शंका:- रथादिकनां साधनभूत काष्ठादिकनो अभाव छे माटेकही रीते चतुर्थ प्रक्रिया. सजे ? समाधानः-जाग्रत लोकनी वासनामात्र- ने ग्रहण करीने अने ते देहनो विधात करीने ए आत्मा स्वाप्न लोकने वजे छे. ए वासनात्मक अं- तःकरणनी वृत्तिज स्वप्न लोकनी उपलब्धिमा नि- मित्तभूत शुभाशुभ कर्मे प्रेरी छती दृश्यरूपे रहे छ एम पूर्वे कयुं हतुं तेहेने केम भूली गयो? स्व- नने विपे करण तथा तेहेना अनुग्राहक आदि- स्यादिक प्रकाश तथा तेथी अवभास्य एवा रथा- दिक विपयो विद्यमान छ तथापि ते केवळ वा- सनामात्रज छे, अने ते सर्व कर्मनी प्रेरणाथी उद्भूत एवी अन्तःकरणनी वृत्तिने विपे देखाय छ: ते सर्व अलुप्तहक् जे ज्योतिषथी जणाय छे ते आत्मज्योतिष, ए स्वप्नने विपे कोशथी असीनी पेठे केवळ विविक्त छे तथा ते स्वप्नने विपे जा- ग्रत प्रसिद्ध सामान्य आनन्द नथी अने मुद (पुत्रादिकना लाभ निमित्त हर्प)नधी तथा प्र- हर्प ( अतिशयित आनन्द ) पण नथी: तथापि तेमने आत्मा सजे छे. वळो स्वप्नने विपे वेशा- न्त एटले अल्प जलाशय, महा सरोवर, नदी- ओ तथा गिरि समुद्रादिक नथी तथापि आत्मा तेने वासनामात्रने सजे छे. आत्माने विपे जे सृ- प्टिनुं कर्तुल कयुं, ते वासनानी आश्रयभूत चि- स्वरूपानुसन्धाननी तवृत्तिनां उद्धृतपणामां निमित्तभूत कर्मरूप हेतु- थी औपचारिक (विवर्तरूप) जाणवू, पण सा- क्षात् कर्तृत्व नहि; केमके आत्माने विपे साधन ना अभावथी क्रिया संभवतीज नथी, अने का- रक विना क्रियानो संभवज प्रसिद्ध नथी. स्वप्न- मां हस्त पादादिक क्रिया कारकोनो संभव नथी वास्ते ते आरोपित जाणवो- एटले ए स्वयंज्यो- तिपरूप अधिष्ठान विपे पूर्वोक्त सर्व अध्यस्तरूप अर्थात् विवर्तरूप जाणवं. २ उपर प्रमाणे तैजसाभिमानी उकारमात्रात्मक स्वप्नावस्थामा विचित्र सूक्ष्म भोगो भोगदीने पू. ोक्त शकुनिनां दृष्टान्तनी पेठे श्रमित थइने म- कार मात्रामा लीन थयो. तैजस प्राज्ञमां मळ्यो अने हिरण्यगर्भ अव्याहतमा मळ्यो. ए प्रमा- णे स्वप्ननो अस्त काळ अने सुषुप्तिनो उदय का- ळ ए बन्नेनी अन्तरालावस्थामां निरुपाधिक अ- न्तर्यामिनो अनुभव थाय छे. हवे मकार मात्रा, तमोगुणात्मिका, सुपुप्ति * विवर्त्तनुं लक्षण. "कारणेन विपमसत्ताकोऽन्यथाभावो विवर्तः” अर्थ:-- कारणनी साथे विपम छे सत्ता जेनी ए- वो ने अन्यथा भाव एटले रूपांतरनी प्रतीति ते विवर्त. जेम र. ज्जुने विपे भुनग.

चतुर्थ प्रक्रिया. अवस्था, हृदय स्थानक, आनंद भोग, एकोमूत्वा एकीचूत एटले जागरित अने स्वप्न ए बन्ने स्था- ने करीने प्रविभक्त ( पृथक् पृथक् ) एवं जे म. न स्पंदमात्र स्थूळ तथा सूक्ष्म द्वैत समूह ते सर्व जेवू पोतानुं विभक्तरूप छे तेहेना अपरि- त्यागे करीनेज पोताना सर्व विस्तारे सहित छतुं अव्याहत नामना कारणभावने पामे छे (का- रणात्मक होय छे) जेम दिवस निशानां तमधी ग्रस्त थयो छतो तमस्त्वपणाथीज व्यवहार थाय छे तेम स्थूळ, सूक्ष्म कार्य समूह पण कारण- भावने पाम्युं छतुं कारण शब्दे करीनेज व्यवहार थाय छे, ते अवस्थारूप उपाधिथी उपहित चैत- न्य आत्मा पण एकीभूत कहेवाय छे. चेतोमुख एटले "प्रतिवोधविदितं मतं” ए श्रुतिमा प्र- सिद्ध एवा प्रतियोध शब्दे करीने वाच्य जे स्वप्न अने जागरित तेने चेतस् कहे छे,ते चेतस् प्रत्ये द्वारभूत होवाथी प्राज्ञ चेतोमुख कहेवाय छे. सुषुप्तरूप द्वार विना स्वप्न अने जायतनो संभव- ज नथी, केमके स्वप्न तथा जाग्रत वन्ने पण सु- पुतिनां कार्यरूप छे; ए रीते सुपुतिनो अभिमा- नी प्राज्ञ स्थानदयतुं कारण होवाथी चेतोमुख ए नामनो भजनार छे. अथवा सुपुप्ताभिमानी स्वरूपानुसन्धाननी प्राज्ञनुं स्वप्न अने जागरित प्रत्ये क्रमथी वा अक- मथी जे आवागमन ते प्रत्ये चैतन्यज द्वारभूत छे; केमके चैतन्य विना कोइ पण चेष्टा सिद्धज थाय नही ए अभिप्राये प्राज्ञ चेतोमुख कहेवाय छे. धनप्रज्ञ एटले जायत तथा स्वप्ननामक मन- ना स्पंदरूप प्रज्ञानो जे अवस्थामा धनीभाव अ- र्थात् अविभक्त थाय छे ते. प्राज्ञाभिमानीभोक्ता ए- टले प्रज्ञप्तिमात्रज जेनुं असाधारण रूप अर्थात् विशेष ज्ञानना राहित्यथी ते अध्यात्मक अने अ- धिदैव अव्याहत ईश्वर तेहेने शवळ ब्रह्म पण कहे छे, ते समटि प्राज्ञनो आयतन छे. त्यांहां श्रुतिः- "न किंचित्कामं कामयते न किंचि- स्वप्नं पश्यति । तापी अतापी भ- वति विद्धोऽविदो भवति." व्यष्टि समष्टिनी एकात्मकताथी आनंद भोग तेहेमा अन्य श्रुतिः- सुपुप्तिकाले सकले विलीने तमोभिभूतः सुखरूपमेति । अर्थः-सुपुति काळने विपे एटले आनन्द- भोगना अवसरने विपे सर्व विशेप अज्ञानरूप

चतुर्थ प्रक्रिया. १०१
स्वकारणमा लय पामे छते, अज्ञाने करीने आ-
वृत एवो छतो सुखरूपने एटले स्वप्रकाश आ-
नन्दात्मक स्वरूपने पामे छे.
एरीते सुपुप्ति अवस्थामा आवरण युक्त आन-
न्द भोगवीने ते मकार मात्रा, आवरण( अज्ञान)-
नो भंग करीने शुद्ध ब्रह्मनो अनुभव थवा सारु
अर्थ मात्रामा लीन थई- एटले अर्ध मात्रा, शुद्ध
सत्वगुणात्मिका, तुर्यावस्था, हृदयाकाश स्था-
नक, परमानन्द भोग, अन्तर्यामी भोक्ता ते अ-
ध्यात्मक, अने अधिदैव शुद्ध ब्रह्मस्वरूप. ए
रीते अध्यारोप दृष्टिथी अध्यात्म, अधिदैव, अ-
धिभूत सर्व प्रपंचने विपे अधिष्ठान स्वरूपनो अ-
नुभव कराव्यो. हवे अपवाद दृष्टिथी “नेतिने-
ति" ए श्रुतिने अनुसारे अनुसंधान. त्यांहां
मांडूक्यनी श्रुतिः-
नान्तःप्रज्ञं न वहिःप्रज्ञं नोभयतःप्र-
ज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् ।
अष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणम-
चिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं
प्रपञ्चोपशमंशान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ
मन्यते स आत्मा स विज्ञेयः॥१॥

स्वरूपानुसन्धाननी अर्थ:- अवस्थात्रयथकी अतात एवां तुर्थ स्वरूपनो अध्यारोप दृष्टिथी विधि मुखे अनुभव थई शकेज नहि, माटे अपवाद दृष्टिथी निषेध मुखे तेहेनो अनुभव करावे छे. "नान्तःप्रज्ञ- मिति" आ श्रुतिमा प्रथम प्राप्त वहिःप्रज्ञ वि- श्वाभिमानीनो त्याग करीने तैजसाभिमानी अ- न्तःप्रज्ञने जे पेहेलो निपेधमां लीधो तेहेतुं का- रण एछे के, जायदादि त्रण्ये अवस्थाने स्वप्नप- गुं जणाववाने माटे; त्यांहां श्रुतिः- “त्रय आ- वसथास्त्रयः स्वप्नाः तथा आतिवाहिक पण अन्तःप्रज्ञ छे तेथी तेहेने प्रथम ग्रहण को. 'न अन्तःप्रज्ञ' एणे करीने स्वप्नाभिमानी तैजसनो निषेध; तथा 'न वहिःप्रज्ञ' एणे करीने जायत अभिमानी विश्वनो निपेधः अने 'नोभयतःप्रज्ञ' एणे करीने जाग्रत स्वप्न वेउनी अन्तरालावस्था- नो प्रतिपेध; तथा 'न प्रज्ञानयनं' एणे करीने सु- पुप्ति अवस्थानो प्रतिपेध; अने 'न प्रशं' एणे क- रीने एके काळे सर्व विषयोना ज्ञातृत्वनो निपेध; अने 'न अप्रज्ञ' एणे करीने अचैतन्य(जडप- णा)नो निपेच. शंका:-आत्माने विपे प्रत्य- क्षादि प्रमाणे करीने गम्यमान एवां अन्तःप्रज्ञ. वादिनी रन्जु आदिकने विपे सादिकना निपे.

चतुर्थ प्रक्रिया. धनी पेठे प्रतिपेध करवायी ते अन्तःप्रज्ञत्वादिनु असत्वप' केम सिद्ध धाय ? समाधान:-आत्म- स्वरूपने विषे अन्तःप्रज्ञत्वादि धर्मोनो परस्पर व्यभिचार छे: जेम रज्ज्वादिकने विपे सर्प, धारा, माला इत्यादिकनो परस्पर व्यभिचार छे, अने जेम अधिष्ठानभूत रज्जुनो व्यभिचार नथी तेम आत्मस्वरूपनो पण व्यभिचार नथी; माटे आ- त्माने विपे कल्पित अन्तःप्रज्ञत्वादिओनो सर्पा- दिकनी पेठे निषेध घटे छे. शंका:- ज्ञप्तिस्वरूप- नुं सत्यपणुं सुपुतिने विपे व्यभिचार पामे छे. समाधानः-सुषुप्ति, साधक ज्ञप्तिस्वरूप अनुभव थाय छे माटे ते विपे सत्यत्वनो व्यभिचार घटे नहि. तेमां श्रुतिना अर्थनुं प्रमाणः- “ विज्ञाता- नी विज्ञप्तिनो लोप थतो नथी, अविनाशी छे माटे.” पूर्वोक्त रीतिए तुर्यस्वरूप निर्विशेष छे माटेज 'अदृष्टं' एटले चक्षुरादि ज्ञानेंद्रियोनुं अविपय, अने अविपयताथकीज 'अव्यवहार्य एटले व्यवहारनो विपय नहि; तथा 'अग्राह्य' एटले कर्मेंद्रियोथी ग्रहण थई शके नहि; वळी 'अलक्षण' एटले लिंग रहित अर्थात् अनुमान- नु अविषय, माटेज 'अचिन्त्य' एटले मन, अ. विषय अर्थात चिंतवनमां न आवे; अने मननी , .

स्वरूपानुसन्धाननी
अविषयताथकीज 'अव्यपदेश्य' एटले शब्द
प्रमाण पण अविपय; तथा 'एकात्मप्रत्ययसारं'
एटले जायदादि अनेक स्थानोने विपे ए आत्मा
एक, ए प्रकारे जे अव्यभिचारी प्रत्यय तेणे क-
रीने अनुभव करवा योग्य; अथवा एक आत्मप्र-
त्ययज (आत्माकारवृत्तिज) जे तुर्यना अनुभ-
वने विषे प्रमाणभूत छे ते. 'नान्तःप्रज्ञ' इत्या-
दि पदोये करीने स्थानवान्ना धर्मोनो निषेध क-
; अने 'प्रपञ्चोपशमं' एटले जायदादिक स्था-
नना जे धर्मों तेणे पण रहित, माटेज' शान्त'
एटले अविक्रिय अने शिवरूप, केमके अद्वैत'
एटले भेद विकल्पे रहित एवां तुर्थ्य स्वरूपने 'म-
न्यन्ते' एटले ज्ञानी लोको माने छ; अने प्रतीय-
मान एवा जायदादि त्रण पादथी विलक्षण छे
माटे तेज तुरीय स्वरूप आत्मा तथा तेहेनोज सा-
क्षात्कार करवो; जेम प्रतीयमान एवा सर्प दंडा-
दिकधी अतिरिक्त रज्जु स्वरूपने जाणे छे, तेम
"तत्त्वमसि" इत्यादिक वाक्योनो अखंडाकार
अनुभव करवो. त्याहाँ दृहदारण्यफनी श्रुतिः-
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥१॥

चतुर्थ प्रक्रिया. १०५ अर्थः- “अदः' एटले अपरोक्ष एबुं तत्पद लक्ष्य जे ब्रह्म ते पूर्ण छे, एटले आकाशनी पे- ठे व्यापक, निर्भेद अने निरुपाधिक छे; एज सोपाधिक छतुं एटले नाम रूपमा स्थित अने व्यवहारयुक्त छतुं 'इदं' एटले त्वं पद लक्ष्य प्रत्यगात्मस्वरूप छे; ते पण पूर्णस्वरूपज छे. शंकाः-सोपाधिक प्रत्यगात्मस्वरूपने पूर्णत्व केम घटे ? समाधान:- उपाधिपरिच्छिन्न एवां वि- शेष स्वरूपे अमे पूर्णत्व कहेता नथी, किंतु अ- विशेप पारमार्थिक परमात्मस्वरूपे पूर्णव क- हीये छीये. ते विशेप स्वरूप कार्यात्मक ब्रह्म, पू- र्णब्रह्मरूप कारणथी उत्पन्न होय छे; यद्यपि का- र्यस्वरूपे उद्भव पाम्युं तो पण पोताना पारमा- र्थिक पूर्ण परमात्मभावनो त्याग करतुं नथी, ते कार्यात्मक पूर्ण ब्रह्म पूर्णत्व ग्रहण करीने ए- टले लक्ष्य एवा तत्पदार्थनी संघाते एकरसतानु संपादन करीने अर्थात् अविद्याये करेला देहे- द्विय विपयादिरूप उपाधिना संसर्गथी जन्य एवा आभासत्व, परिच्छिन्नत्खनो विद्याये करीने तिर स्कार कर्याथी अनन्तर, अवाह्य, प्रज्ञानधन, ए- करस एवं केवल ब्रह्मल अवशिष्ट रहे. १ आत्मस्वरूप दुर्विज्ञेय छे माटे सिंहावलोकन स्वरूपानुसन्धाननी न्याये करीने आचार्यनी उक्तिनो विचार. मांडूक्यप्रथम प्रकरण. अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्र- बुध्यते । अजमनिद्रमस्वप्नमद्वैतं बु- ध्यते तदा ॥१॥ अर्थः-जे आ संसारी जीव ते वीजरूप ए- यूँ तत्त्वर्नु अग्रहण, तथा कार्यरूप अन्यथा ग्रहण- स्वरूप एवो अनादि काळथी प्रवृत्त मायारूपी वे प्रकारनो जे स्वप्न तेणे करीने “ आ म्हारो पिता; आ म्हारी स्त्री; आ म्हारो पुत्र; आ म्हारो दौहि- त्र, पौत्र, क्षेत्र, तथा पशुओ; ए सर्वेनो हुँ स्वा- मी छौं, सुखी छौं, दुःखी छौं: आणे मने क्षय प- माडयो; आणे मने वृद्धि पमाड्यो.” ए प्रकार- नां स्वप्नोने जाग्रत तथा स्वप्नरूप स्थानद्वयने वि- पे जोतो छतो सुइ रहे छे (अज्ञानमां मना रहे छे); परंतु ज्यारे वेदांतोना अर्थतत्त्वनो जाण- नार परम दयालु गुरुए “तुं पूर्व कह्या प्रमाणे सुखदुःखादि हेतु फळरूप नथी; किंतु "तत्त्वम- सि"(ते ब्रह्म तुं छो)" ए रीते बोध पमा- डयो होय त्यारे ते एम जाणे छे के, ए ब्रह्मस्व- रूपने विपे वाह्य तथा आंतर एवा जन्मादि पड्- चतुर्थ प्रक्रिया. १०७ भाव विकारो छेज नहि; माटे 'अज' एटले वा- ह्याभ्यंतर सर्व भाव विकारे रहित; तथा जे आ- नंदात्मस्वरूपने विपे जन्मादिकनुं कारणभूत अ- विद्यात्मक अज्ञानरूपी बीजरूप निद्रा विद्यमान नथी, माटे ' अनिद्र;' तथा ते तुर्यस्वरूप आ- त्मा स्वप्न रहित छे, केमके अन्यथा ग्रहणरूप स्वप्ननु निमित्तभूत अविद्यानो नाश थयो छे; अ- ने जे हेतुथी अज, अनिद्र, अस्वप्नरूप छे,ते हेतु- थी' अद्वैत' एटले सर्व दैत प्रपंचथी रहित एवा तुर्य आत्मस्वरूपने जाणे छे. १ नात्मभावेन नानेदं न स्वेनापि कथ- ञ्चन । न पथकाप्टथकिञ्चिदिति तत्त्वविदो विदुः ॥ १ ॥ अर्थः- तेत्रीशमां श्लोकमा कयुं के अदैत शिवरूप छे ते शी रीते? ते उपर कहेछे के, ए- कनुं वीजाथी नानाभूत पृथक्त्व ज्यांहां जोवामां आव्युं होय त्यांहां अशिव होय, पण अद्वैत पर- मार्थ सत्यस्वरूप आत्माने विपे प्राणादिक सर्व जगत परमार्थवरूपे निरूपण कर्यु छतुं वस्त्वं- तररूप होय नहि; जेम रज्जुनु स्वरूप प्रकाशथी निरूपण कर्ये छते कल्पित एवो नानाभूत सर्प १०८ स्वरूपानुसन्धाननी मालादिक नथी तेम. वळी ए प्राणादिक जगत कल्पित छे माटे स्वतः सनाथकी पण कोइ काळे विद्यमान नथी; जेम रज्जुने विपे सर्प कल्पित छ माटे स्वतः सत्तावान् नथी तेम; तथा जेम अ. श्वथी महिप पृथक् विद्यमान छे तेम प्राणादिक जगत परस्पर पण भिन्न नथी, माटे असत्पणा. थकी परस्पर पण पृथक् नथी, तथा आत्मस्वरू- पथकी पण पृथक् नथी. ए प्रकारे आत्मतत्त्वना जाणनारा ब्राह्मणो परमार्थ तत्त्वने जाणे छे, वा- स्ते अशिवमां हेतुभूत पृथक्पणाना अभावथी जे अद्वैत स्वरूप तेज शिवरूप छे. १ तत्त्वमाध्यात्मिकं दृष्ट्वा दृष्ट्वा तत्वं तु वाह्यतः। तत्त्वीभूतस्तदारामस्तत्त्वा- दप्रच्युतो भवेत् ॥ १ ॥ अर्थ:- “हुंज परब्रह्मरूप छौं म्हाराथी अ- न्य किंचिन्मात्र पण नथी.” ए प्रकारनी स्मृति- नो प्रवाह करवो; ते पण अमुक काळे एम निय- म नथी, किंतु नित्य निरंतर करवो. ए वात कहे- छे, के कल्पित एवं वाह्य दृथिव्यादिक तथा आ- ध्यात्मिक देहादिक रज्जु सादिकनी पेठे अने स्वप्न मायादिकनी पेठे असत् छे; किंतु जे अधि- M चतुर्थ प्रक्रिया. १०९ प्ठानस्वरूप तेज 'तत्त्व' एटले सद्रूप छे; (वा- चारंभण श्रुतिनां प्रमाणधी, ) अने आत्मा तो अध्यास दृष्टियेज वाह्याभ्यंतर सहित छे अने वस्तु दृष्टिये तो अजन्मा छे; तथा पूर्व रहित, अ- पर रहित, अंतर रहित, बाह्य रहित, आकाश- नी पेठे सर्वत्र व्यापक छे, तथा सूक्ष्म, अचल, निर्गुण, निकल, निष्क्रिय अने सत्यरूप छे ए- वो जे आत्मा तेज तुं छो. ए श्रुतिना अर्थथी तात्त्विक दृष्टिये करीने पोते तत्त्वभूत तथा त- त्वस्वरूपने विपेज रमण करनार, बाह्यार्थने वि- पे नहि; जेम अतत्त्वदर्शि कोइ पुरुप, चिनने आत्मारूपे मानतो छतो, चित्तना चलननी पा- छळ आत्माने चलित मानतो छतो तत्त्वथकी चलित देहादिभूत आत्माने कदाचित् माने छे, के “हमणां हं आत्मतत्त्वथकी प्रच्युत थयो." अने मन समाहित थये छते कदाचित् तत्त्वभूत प्रसन्न आत्माने माने छे के “ हमणां हुं तत्त्वीभूत थयो.” आत्मवेत्ता पुरुप तेम होतो नथी केम- के आत्मा तो एकरूप छे वास्ते तेने विपे स्वरू- पथकी प्रच्यवननो संभवज नथी, माटे सदा का- लज “हुं ब्रह्म छौं” ए प्रकारे अप्रयुत होय. अभिप्राय ए छे के, सदा काळने विपे स्वरूपत- ११० स्वरूपानुसन्धाननी त्त्वथकी अप्रध्युत आत्मस्वरूपनो जोनार होय, ("शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शि- नः” तथा “समं सर्वेषु भूतेषु तिनां प्रमाणथी.) अजमनिद्रमस्वप्नमनामकमरूपकम् । सकृतिभातं सर्वज्ञं नोपचारः कथञ्च न अर्थ:-- जन्ममां निमित्तभूत एवी अविद्या- नो अभाव छ माटे बाह्याभ्यंतर सहित आत्म- स्वरूप 'अजं' एटले अजन्मा छे- अविद्यारूप निमित्ते करीने रज्जुसादिकनी पेठे जन्म होय ए प्रकारे पूर्वे कही आव्या छिये ते अविद्या स- त्यस्वरूप आत्माना बोधे निवारण करी छे, मा- टे आत्मस्वरूप अजन्मा छे; अने एज हेतुथी 'अनिद्र' एटले अविद्यास्वरूप अनादि माया- रूपी निद्राये रहित; मोहरूपी स्वापथको अद्वैत आत्मस्वरूपे करीने प्रवुद्ध थयो छे माटे 'अ. स्वप्नं' एटले वाह्याभ्यंतर स्वप्ने रहित;अवोधे क- रेलां आत्मा संबंधि जे नाम रूप ते प्रवोधानंतर रज्जुसर्पनी पेठे नष्ट थई गयां छे माटे ब्रह्म- स्वरूप आत्मा कोई पण नामे करीने कही श- .

चतुर्थ प्रक्रिया. १११ कातो नथी, तथा कोई पण रूपे करीने निरूपण थई शकतो नथो, माटे ‘अनामरूपक' एटले नाम रूपे रहित; (“यतो.वाचो निवर्तते' ए श्रुतिनां प्रमाणथो.) वळो 'सरुदिभातं ' एटले सर्वदाज प्रकाशरूप छे; केमके स्वरूपर्नु अग्रह- ण तथा अन्यथा ग्रहण, आविर्भाव, तिरोभावादि- थी रहित छे एटले रात्रीरूप अग्रहण तथा दि- वसरूप अन्यथाग्रहण अने अविद्यारूप तम ए सर्वे सदा अप्रभातपणामां कारण छे. ते सवैनो अभाव होवाथी नित्य चैतन्य भारूप के माटे सदाज प्रकाशमान कयुं ते युक्त छ: माटेज 'स- वैज्ञ' एटले पूर्ण 'ज्ञ' स्वरूप एवां ब्रह्मने विपे 'उपचार' एटले समाध्यादि उपाय करवा यो- ग्य नथी, जेम बीजा अनात्मवेत्ता पुरुपोने स- माधानादि उपाय करवा योग्य छे तेम विद्वान- ने नहि; अविद्या दशामांज - ध्यान समाध्यादि सर्व व्यवहार छे, विद्यादशामां तो अविद्याज न- थी, माटे ध्यानादिक कोई पण व्यवहार होयज नहि- बाधितनी अनुत्तिये करीने तो समाध्या- दि व्यवहाराभास सिद्ध होय छे. १ प्रातिभासिकजीवो यस्तज्जगत्प्रा- स्वरूपानुसन्धाननी तिभासिकम् । वास्तवं मन्यतेन्यस्तु मिथ्येति व्यावहारिकः॥१॥ अर्थः- स्वप्नमां कल्पित प्रातिभातिक नाम- नो जे जीव ते स्वप्नमां कल्पित प्रातिभासिक ना- मनां जगतने वास्तव माने छे एटले सत्य जाणे छे, पण मिथ्या नहि; केमके पोतानी ज्यां पर्यंत स्थिति त्यां पर्यंत जगतनी पण स्थिति छे; तथा प्रातिभासिकथी अन्य व्यावहारिक नामनो जे जीव ते पूर्वोक्त प्रातिभासिक जगतने तथा तेनो द्रष्टा प्रातिभासिक जीवने पण मिथ्या माने छे, सत्य माने नहि; केमके स्वप्नथी पूर्वे तथा स्वप्ना- नंतर प्रबोधने विपे ते वन्ने प्रातिभालिक दृश्य द्रष्टानी स्थिति नथी. १ व्यावहारिकजीवो यस्तज्जगद्याव- हारिकम् । सत्यं प्रत्येति मिथ्येति मन्यते पारमार्थिकः ॥२॥ अर्थः- अने जे व्यावहारिक जीव ते माया- कल्पित व्यावहारिक जगतने सत्य जाणे छे मि- थ्या जाणतो नथी; केमके पोतानी ज्यां पर्यंत स्थिति त्यां पर्यंत व्यावहारिक जगतनी पण चतुर्थ प्रक्रिया ११३ स्थिति छ; अने ते व्यावहारिक जीवथी अन्य पा- रमार्थिक जे जीव ते व्यावहारिक जगतने तथा तेनो द्रष्टा व्यावहारिक चिदाभासने मिथ्या माने छे सत्य मानतो नथी; केमके नित्य प्रलयनाम- क सुपुप्तिने विपे व्यावहारिक दृश्य जगत तथा तेनो द्रष्टा व्यावहारिक जीव ए बन्नेनी स्थितिनो अभाव अनुभव सिद्ध छे, “ नासदासीन्नोस- दासीत्' इत्यादि श्रुतिने अनुसारे. व्यावहा- रिक दृश्य द्रष्टा बेउने अनादित्व छतां पण “गताः कलाः पंचदशप्रतिष्ठा" इत्यादि श्रुतिना अनुसारे वर्तमान देहनु राहित्यरूप विदेह कैवल्य दशाने 'विपे व्यावहारिक दृश्य द्रष्टानी प्रतीतिनो पण आत्यंतिक नाश निश्चित छे माटे. श्रुति, आचार्य अने अनुभवथी स्वभावसिद्ध ब्रह्मै- कात्मत्वनो साक्षात्कार कर्ये छते भाविदेहवें राहि- त्यरूप जीवन्मुक्ति दशाने विपे व्यावहारिक जी- व जगतनी कादाचित्क प्रतीति थाय छे तो पण ते बन्नेनी सत्तानो आत्यंतिक नाश श्रुति, युक्ति अने अनुभवथी सिद्ध छे माटे. वास्ते प्रतिभा- सिक जीव जगत जेम मिथ्याभूत छे तेमज व्या- वहारिक जीव जगत पण मिथ्याभूत छे. ए तात्पर्यार्थ.२

११४ स्वरूपानुसन्धाननी
पारमार्थिकजीवस्तु ब्रह्मैक्यं पार-
मार्थिकम् । प्रत्येति वीक्षते नान्य-
दीक्षते सन्तात्मना ॥३॥
अर्थः- पारमार्थिक एटले साक्षात् परमा-
त्मस्वरूप जे जीव ते वर्तमान देहन राहित्यरूप
विदेह कैवल्यनी प्राप्ति पर्यंत ब्रह्मचित् शब्दे क-
रीने लक्ष्य अने साक्षीरूप तथा स्वगत सजातीय
विजातीयभेद रहित तथा बंध मोक्ष व्यवहारथी
अतीत सत्, चित्, आनंदरूप अने स्वस्वरूप एवां
ब्रह्मैक्यनेज पारमार्थिक जाणे छे, अन्य जोतो
नथी;" यत्र नान्यत्पश्यति यत्र खस्य-
सर्वमात्मेवाभूत् ” ए श्रुतिनांप्रमाणथी. यद्यपि
प्रवळ प्रारब्धने वशे स्वस्वरूप अवस्थानथी चिदा-
भास आकारे करीने व्युत्थान पाम्यो छत्तो कदा-
चितजीव जगत आदिकने जुवे छे, तो पण मि-
थ्यात्वरूपेज जुवे छे, सत्यत्वे करीने नहिं. ए
तात्पर्थि. ३
माधुर्य्यद्रवशैत्यानि नीरधर्मास्तरं-
गके । अनुगम्याथ तनिष्ठे फेनेप्यनु-
गता यथा ॥४॥

चतुर्थ प्रक्रिया. ११५ अर्थः- आरोपितने अधिष्ठानथी अनन्यपणुं तथा तन्मात्रपरिशेपपणुं दृढ करवा माटे दृष्टांत कहेछे के, जेम माधुर्य, द्रवत्व अने शीतलत्व ए जळना गुण छे ते जळनी उपर वायुवशथी तरंग उत्पन्न थये छते जळनो विवर्त छ, माटे जळनिष्ठ ते तरंगने विपे अनुगत थइने अनन्तर तरंगनो विवर्तरूप अने तरंगनिष्ठ एवा फेनने विपे पण अनुगत थायछे. जळ, तरंग, फेन ए प्रकारे भेद विद्यमान छते पण माधुर्य, द्रव अने शैत्यथकी अतिरिक्तताये करीने जळ, तरंग, फे- नोना स्वरूपनो अभाव छ माटे ते माधुर्यादिरू- पज छे. ए रीते पूर्व पूर्व अधिष्ठाननोज उत्तर उत्तर विवर्त्त छे वास्ते उत्तर उत्तर कार्यतुं पूर्व पूर्व अधिष्ठानथी अनन्यत्व छे. ४ साक्षिस्थाः सच्चिदानन्दाः संबंधा- द्यावहारिके । तद्वारेणानुगच्छंति त- थैव प्रातिभासिके ॥५॥ अर्थः- पूर्वोक्त दृष्टांत प्रमाणे ब्रह्मस्वरूप साक्षीने विपे रहेला अने स्वरूपलक्षण शब्दे क- रीने वाच्य एवा सत्त्व, चित्त्व, आनंदवरूप धर्मों तरंगने विपे जळगुणना संबंधनी पेठे व्यावहा- स्वरूपानुसन्धाननी रिक जीव जगतने विषे संबंध पामीने प्रातिभा- सिक जीव जगतने विपे पण अनुवृत्त होयछे; जेम पूर्वोक्त दृष्टान्तमा तरंगनो विवर्त फेन तरं- गथी अभिन्न छे, तथा जळनो विवर्त तरंग जळ- थी अभिन्न छे, अने सर्वने विपे अनुस्यूत एवा माधुर्यादि गुणो जळथी अभिन्न छ: ते प्रकारे प्रा- तिभासिक जगत जीव, व्यावहारिक जगत जी- वथी अभिन्न छे, अने व्यावहारिक जगत जीव, साक्षी चैतन्यथी अभिन्न छे, अने साक्षीनिष्ठ स- चिदानन्द धर्मो ब्रह्मचैतन्यथी अभिन्न छे. ५ पूर्वोक्त सर्व अर्थनो उपसंहाररूप चतुर्थ प्र- करणनी समाप्तिमां गौडपादीय कारिका. दुर्दर्शमतिगंभीरमजं साम्यं विशारदं । चुदापदमनानात्वं नमस्कुर्मों यथावलं॥१॥ अर्थः- 'दुर्दर्श' एटले महा दुःखे करीने जेनो साक्षात्कार थाय एवं; केमके अस्ति, ना- स्ति इत्यादिक चार कोटीथी वर्जित छे अर्थात दुर्विज्ञेय; अने एज कारणथी 'अतिगंभीरं' एटले मूढ प्रज्ञ पुरुपोने महा समुदनी पेठे दुष्प्रवेश; त्यांहां प्रमाण:- मनस्याब्धौ यथाऽक्षाणि विव्हला- चतुर्थ प्रक्रिया. ११७ नि तथाऽस्य धीः। अखंडैकरसं श्रुखा निःप्रचारा विभेत्यतः॥ १ ॥ तथा 'अजं' एटले जन्मादि विकारोए रहित; तथा 'साम्यं' एटले सर्व वैपम्ये रहित; तथा 'विशारदं' एटले अत्यंत निर्मल; तथा 'अ- नानात्वं' एटले सर्व नानात्वथी रहित एवं 'पदं' एटले आनंदात्मस्वरूपने 'बुमा' एटले यथार्थ जाणीने, आत्मस्वरूपभूत थया छता अ- मोते पदने नमस्कार करीये छैये. यद्यपि पर- मार्थ वस्तु नमस्कारादि व्यवहारर्नु अविपय छे तथापि मायाशक्तिने अनुसारे व्यवहारनी विष- यतानी कल्पना करोने नमस्कार किया जाणवी.१ मांडूक्य भाप्यना छेवट मंगलाचरणना श्लोको. अजमपि जनियोग प्रापदैश्वय्ययो- गादगति च गतिमत्तां प्रापदेकं ह्य- नेकम्। विविधविपयधर्मग्राहि मु- ग्वेक्षणानां प्रणतभयविहन्त ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥१॥ अर्थ:- जे ब्रह्म, सर्व उपनिपदोमां प्रसिद्ध छे, अने सर्व परिच्छेद (देशस्त, काळकत, व- ११८ स्वरूपानुसन्धाननी स्तुकत) तेणे रहित छे तेने प्रत्यक्भूत हुं नम- स्कार करुं छौं (ऐक्यताये करोने प्रकटीभाव करूं छौं). प्रणामर्नु प्रयोजन कहेछे, के जे प्र- णाम करनारा एटले ऐक्यताथो साक्षात्कार क- रनारा ब्रह्मनिष्ठ उत्तमाधिकारीओ तेमनी अवि- द्याने तथा तेनुं कार्य्यभूत संसार भयने आचा- य॑ना उपदेशथकी जनित जे ब्रह्माकार वृत्ति ते. मां आरूढ थयुं एवं ब्रह्मज हणे छे; केमके जड एवी वृत्ति चैतन्य वस्तुनां सामर्थ्य विना अज्ञा- नने अने तेनां कार्यने टाळवाने समर्थ नथी; अर्थात् बुद्धिमा इद एटले प्रदीप्त थयो वोध त- था बोधे करीने इन्द्ध बुद्धि अज्ञान अने तेनां का- य॑ जन्म मरणादि संसारनो नाशरूप फळने सं- पादन करे छे एज तात्पर्य, हवे ब्रह्मनां तटस्थ लक्षणने कहेछे:- यद्यपि ब्रह्म, जन्मादिक सर्व विक्रियाये शून्य छ एटले निर्विकार शुद्ध छे, त- थापि पोतानी शक्तिरूप अनिर्वाच्य अज्ञान वैभव- रूप ऐश्वर्यना योगयो आकाशादिक कार्यरूपे करी जन्मनो संबंध पामीने जगतनुं निदान एट- 'ले आदि कारण एवा व्यवहारने भजनार होय छे; (ब्रह्मने जगतर्नु कारणपणुं श्रुतिमा तथा व्यास- सूत्रमा पण प्रसिद्ध छे.) यद्यपि ए ब्रह्म, कूटस्थ- चतुर्थ प्रक्रिया. ११९ पणाधी अने व्यापकपणाथो गति रहित छे तथा- पि पूर्वोक्त अज्ञाननां महात्म्यथी कार्य ब्रह्मप- णाने पामीने गतिमानपणाने पामे छे. यद्यपि ए ब्रह्म, वास्तवताथी समस्त नानापणाये रहित, एकरस, अद्वितीय एवं उपनिपदोये प्रतिपादन कर्यु छ तथापि जीव, जगत अने ईश्वर ए प्रकारे अनादि, अनिर्वाच्य अविद्याना वशथी अनेक जे- g भासे छे. कोनी दृष्टिये ब्रह्मने विपे अनेकपणुं • भासे छे ? ते कहेछे के, विविध प्रकारना जे विप- यधर्मो तेमने सत्य तथा समीचीन बुद्धिये क- रीने ग्रहण करवाथी विवेक रहित छे अंतःकरण जेमन एवा मूढनी दृष्टिये ब्रह्मने अनेकपणुं भा- से छे; शांत एटले विवेकीनी दृष्टिये तो ब्रह्मने विपे एकत्खपणुंज प्रामाणिक छे. १ प्रज्ञावैशाखवेधक्षुभितजलनिधेर्वेद- नाम्नोऽन्तरस्थं भूतान्यालोक्य म- मान्यविरतजननग्राहघोरे समुद्रे । कारुण्यादुद्दधारामृतमिदममरैर्दुर्लभ भूतहेतोर्यस्तं पूज्याभिपूज्यं परम- गुरुममुंपादपाते तोऽस्मि ॥२॥॥ अर्थः- ग्रंथनी रचनानां प्रयोजनन प्रदर्शन- स्वरूपानुसन्धाननो, पूर्वक व्याख्यान कयु. हवे आगम शास्त्रना रच- नार परम गुरु गौडपादाचार्यने भगवान भाष्य- कार प्रणाम करेछे. जे गुरु आ ज्ञानरूपी अमृतने करुणाथी प्राणियोना उपकारने माटे उद्धार करता हवा ते आ परम गुरुने नमस्कार करूंछौं. ते परम गुरु केवा छे के, पूज्य एवा अन्य गुरुओ मध्ये अति पूज्य छे माटे पूज्यपूज्य छे. ए गुरुनां च- रणारविंदने विपे पोता, उत्तमाङ्ग एटले मस्तक- नां जे वारंवार पतन एटले नम्रीभाव, तेणे करीने नमुं छों. ए आचार्य केवां ज्ञानरूपी अमृतने उद्धरण करता हवा? ते कहेछे के, मेधा एटले धारणा सहित जे प्रज्ञा, ते रूपी मंथन दंडे करीने विलोडन कर्यो एवो वेदरूपी जे समुद्र, तेनी अंदर रहेनारी ज्ञानरूपी अमृतने उद्धरण करता हवा. ज्ञानरूपी अमृतने प्रसिद्ध अमृतथी अवांतर वैषम्यपणुं देखाडे छे के, भगवान् ना- रायणे क्षीरसमुद्रमा रहेल्लं जे अमृत उद्धरण कर्यु ते तो देवताने अनायासे प्राप्त थ{ हतुं, अ- ने आ ज्ञानरूप अमृत तो ज्ञान साधनोना प्र. यास विना देवताने पण दुर्लभ छे. श्री आचा- थ्र्ये करुणाथी ए ज्ञानरूप अमृत वेदरूप समुद्र थी प्राणियोना उपकारने माटे उदरण कयु, ते - चतुर्थ प्रक्रिया. आचार्यने करुणा केम उत्पन्न थई ? ए आका- क्षा उपर कहेछे के, जे आ समुद्रना जेवो दुस्तर संसार तेमां निरंतर जे जनन एटले अनेक देह- नां ग्रहणो, ते रूपी जे मगरो तेमणे करीने अति भयंकर एवा संसार समुद्रमा मग्न एटले डुबना- रनी पेठे परवश एवां प्राणियोने जोईने आचा- य॑ने करुणा प्रकट थई तेथी ज्ञानरूप अमृतने उद्धरण करीने सहु प्राणियोने आपीने तेमने रक्षण करता हवा. २ यत्प्रज्ञालोकभासा प्रतिहतिमगमत् स्वांतमोहान्धकारो मज्जोन्मजच घो- रे ह्यसकृदुपजनोदन्वति त्रासनेमे । यत्पादावाश्रितानां श्रुतिशमविनय- प्राप्तिरग्राह्यमोघा तत्पादौ पावनीयौ भवभयविनुदौ सर्वभावैर्नमस्ये ॥३॥ अर्थः- गुरुभक्तिने विद्याप्राप्तिने विपे अंत- साधनपणाने अंगीकार करीने गुरुनां चरणा- रविंदने प्रणाम करे छे. ते गुरुना चरणारविंदने सर्वभावथी एटले शरीर, वाणी, मनना प्रकटी- भावथी नमुंछौं. ए गुरुचरण पावनरूप छे माटे सर्वने विपे पण पवित्रता संपादन करनारा छे;

१२२ खरूपानुसन्धाननी वळी ए चरण पोताना संबंधि भक्त जनोनां सं- साररुत दुःखने कारणभूत मूलाज्ञान सहित टा- ळीने परम पुरुपार्थने विपे परिसमाप्ति करनारां छे. गुरुरुपर्नु वर्णन करे छे के, म्हारा अन्तःकर- णने विपे जे मोह तेनो हेतु त जे अविवेक तेनु कारणभूत जे अनादि अज्ञानरूप अंधकार, ते जे गुरुनी प्रज्ञारूपी जे आलोकदीप्ति, तेणे वि. नाश पमाङयुं, ते गुरुनां चरणने नमस्कार. आ- चाय॑ना प्रसादथी केवळ अज्ञानज तुच्छ यई जायछे एटलंज नहि, किंतु अज्ञान कार्य अ- नर्थजात एटले तंति पण कारणमृत मनान-

चतुर्थ प्रक्रिया. १२३
छे. आचार्यना प्रसादथी एक मनेज पूर्वोक्त फ-
ळनी प्राप्ति थइ एटलंज नहिं, किंतु ए आचार्य-
ना चरणनी सेवामां तत्पर एवा घणा पुरुपोने
पण ते फळ प्राप्त थयुंछे. ए वात कहे छे के, जे
गुरुनां चरणारविंदने आश्रय करनारा अने तेनी
शुश्रूपाने विपे प्रीतिमान् एवा अनेक शिष्योने
पण श्रुति एटले मनन,
निदिध्यासन सहरुत
श्रवण ज्ञान तथा इंद्रियोनी उपरतिरूप शांति
तथा विनय (अनुदतपणुं) ते सर्वेनी प्राप्ति श्रेष्ठ
एटले प्रतिष्ठित अने अमोघ एटले सफल सिद्ध
थायछे. ए प्रकारे आचार्यना प्रसादथी पोताने
तथा वीजा घणाएक शिष्योने पण परम पुरुपा-
र्थने विपे परिसमाप्तिनो संभव छ, वास्ते पुरु-
पार्थनो कामनावाळा पुरुपोए आचार्यनी परि-
चा काय, मन अने वाणीए करीने अवश्य,
करवी जोइये. ३ श्लोकः-
माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षूणां विमुक्तये।
तथाप्यसिद्ध चेज्ज्ञानं दशोपनिप, पठा
इति श्री मदुदयशंकरात्मज गौरीशंकर-
विरचिते स्वरूपानुसंधाने चतुर्थ
प्रक्रिया समाप्ता.॥४॥

अथ श्री स्वरूपानुसंधाने पंचम प्रक्रिया प्रारंभः ५ वेदान्तनां प्रस्थानत्रय तेमां (१)श्रुति प्र- स्थाननां १२ बार भाष्य. (२) सूत्र प्रस्थान- नुं १ एक भाष्य. (३) स्मृति प्रस्थानना ३त्रण भाग्य.ए रीते भगवत्पाद श्री शंकराचार्य प्रस्था- नत्रय उपर पोडश भाष्य कर्याछे. . श्रुति प्रस्थान एटले उपनिषदोनों बार भाष्यः- (१) ईश. (२) केन. (३) कठ. (४) मुण्डक. (५) प्रश्न. (६)माण्डूक्य. (७) तैत्तिरीय. (८) ऐतरेय. (२) छान्दोग्य. (१०) वृहदारण्यक.(११)केननु वाक्य भाष्य. (१२) उत्तरनृसिंहतापिनी.

पंचम प्रक्रिया. (१) ईशावास्योपनिपदना अनुसारे विचार. मंगलाचरण. येनात्मना परेणेशा व्याप्तं विश्वमशे- पतः। सोहं देहहयोः साक्षी वर्जितो देहतद्गुणैः ॥ १॥ अर्थः- जे परमेश्वर परमात्माये सर्व जगत् व्याप्यु छ, तेज परमात्मा हुँ छौं; तथा स्थूल, सूक्ष्म वेउ देहनो साक्षीरूप अने वेउ देह तथा तेमना धर्मोये रहित छौं. १ केटलाएक कर्मजडो माने छे के, “ ईशा- वास्यं” इत्यादि मंत्रो कर्मना शेषभूत छे, मं- त्रत्वना अविशेषथकी इपेवादि " मंत्रनी पेठे. ते प्रत्ये भाष्यकार कहेछे के, ईशावास्या- दि मंत्रों कर्मने विपे विनियोगवाला नथी; केमके ते अकर्मशेष एटले कर्मना अनंगभूत एवा आ- स्मानां यथार्थ स्वरूपना प्रकाशक छे. ते आ- माने विपे यथार्थपणुं तो शुद्धत्व, अपापविद्धत्व, एकत्व, नित्यत्व, अशरीरत्व, सर्वगतत्व इत्यादि १२६ स्वरूपानुसन्धाननी आगल कहेवाशे; ते यथार्थपणुं कर्म संघाते वि- रुद्ध छे माटे मंत्रनो कर्मने विपे विनियोगनो अभाव युक्तज छे. ते आत्मानुं यथार्थ स्वरूप उत्पाद्य, विकार्य, आप्य, संस्कार्य, कर्ता, भोक्ता नथी के जेणे करीने कर्मन शेपपणुं कही शकाय; वळी सर्व उपनिपदोनुं तथा गीता मोक्षधर्म वि- गेरे अध्यात्म शास्त्रनुं तात्पर्य आत्माना यथार्थ स्वरूपना निरूपणने विपेज उपक्रमोपसंहारादि पविध लिंगे करीने जणाय छ: माटे आत्माने विपे आविद्यकत्व, अनेकत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, अशुद्धत्व, पापविद्धत्व इत्यादि धर्मोंने लेडनेज लोक बुद्धिथी सिद्ध एवां कर्मो विधान कर्या छे. जे पुरुप दृष्टादृष्ट स्वर्गादि फलोनो अर्थी छतो "हुं ब्राह्मण छौं; काणव, कुब्जव इत्यादि अ- नधिकारना धर्मवालो नथी." ए रीते पोताने माने तेनो कर्मने विपे अधिकार ए प्रकारे अ- धिकारवेत्ताओ कहेछे; माटे ईशावास्यादिक मं- त्रो आत्माना यथार्थ स्वरूपना प्रकाशे करीने तेने विपे स्वाभाविक कर्मोपासनानु निवर्तन क- रता छता, शोकमोहादि संसारधीना वि- च्छेदनमा साधनभूत एवां जीवब्रह्मनी एकता- नां विज्ञानने उत्पादन करेछे. ए रीते ब्रह्मात्मैक्य- 2 - . पंचम प्रक्रिया. १२७ रूप विपय; प्रतिपाय प्रतिपादकभाव संबंध;शो- क मोहादि अनर्थनी निवृत्ति तथा परमानन्द प्राप्तिरूप प्रयोजन; मुमुक्षु अधिकारी ए चार अनुबंधे विशिष्ट एवा ईशादि मंत्रोनुं संक्षेपथी व्याख्यान:- ईशावास्यमिद५ सर्वं यत्किञ्चजग- त्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मागृधः कस्यस्विद्धनम् ॥१॥ अर्थ:- नाम रूप क्रियात्मक यत्किञ्चित् जे जगत् ते स्वात्मस्वरूप सर्वना नियन्ता परमे- श्वर परमात्मारूपे आच्छादन करवं एटले पर- मेश्वर परमात्माथी अभिन्न जे हुं, तेज आ सर्व जगत् छे ए रीते परमार्थ सत्य स्वरूपनी भाव- नाये करीने अनृत एवं चराचरात्मक सर्व जगत् तिरोधान करवू; जेम सूर्यनो प्रकाश सर्वत्र व्या- पक छे तेमा जे त्रसरेणुओ भासेछे ते भ्रान्ति- मात्र छे, वस्तुतः प्रकाशज सत्य छे; तेम नाम रूपात्मक सर्व जगत्, व्यापक आत्म प्रकाशने विपे भ्रान्तिमात्र छे, पारमार्थिकपणाथी तो आ- त्मस्वरूपज छे. आ मंत्रे वास्तवरूपे तो परमा- स्मारूपज सर्व छे, पण भ्रान्तिये करीने जे अ. .

१२८ स्वरूपानुसन्धाननी नीश्वर रूपे ग्रहण कर्यु हतुं ते सर्व ईश्वरन छे, अने ते ईश्वर हुंज छए रीते ब्रह्मात्माना ऐ- क्यनो छांदोग्यमा " तत्त्वमसि" ए वाक्यनी पेठे उपदेश कर्यो छे. ए प्रमाणे उपदेशजन्य ज्ञानमात्रे करीने जे पुरुपने अनृत दृष्टि निवृत्त न थाय ते पुरुषने विचारादि प्रयत्न करीने ता- त्त्विक स्वरूपनो प्रकाश थये छते अनृत दृष्टिनो तिरस्कार थशे. एवा अभिप्राये करीने दृष्टान्त कहेछे के, जेम जलादिकना संबंधे करीने शडी गयेलां चंदन काष्ठनो क्लेदथी उत्पन्न थयेलो दु- गंध ते काष्ठने घसेथी प्रकट धयेला पोताना पा- रमार्थिक सुगंधे करीने तिरोधान थई जायछे ते- म आत्माने विपे अध्यस्त एवं कर्तृत्व भोक्तृत्वा- दि विशिष्ट द्वैतरूप नाम रूप क्रियात्मक सर्व पण विकार- वृंद परमार्थ सत्य आत्मस्वरूपनी भा- वनाये करीने तिरोहित थायछे (तजाइ जायछे). ए प्रकारे ईश्वरथी अभिन्न आत्मभावनाये युक्त पुरुपने पुत्रादिक व्रण एपणाओना संन्यासने विपेज अधिकार छे, कर्मने विपे नहि; माटे ते त्यागे करीनेज हे पुरुप! स्व आत्मानुं पालन कर; केमके त्याग करेलो, अथवा मरण पामेलो पंचम प्रक्रिया.. १२९ पुत्र, अथवा भृत्य आत्माना संबंधिपणाना अभा- वथी आत्मानु पालन करी शकतो नथी; वास्ते निष्क्रिय आत्मस्वरूपे जे अवस्थान तेने विपे त्यागने अनुकूल होवाथी ते त्यागे करीनेज आ- त्मानुं रक्षण युक्त छे. शरीरना संधारणमा उप- योगी कौपीन भिक्षाशनादिथी अधिक द्रव्यना प- रिग्रहने विपे कदा राग थयो होय, तो तेना निरो- धने विपे यत्न करवो; केमके ते राग स्वरूपाव- स्थानमा विरोधिभूत छे. माटे ए अभिप्राये करीने नियम विधि कहेछे के, हे पुरुप ! त्याग करी छे एपणाओ जेणे एवो तुं पोतार्नु अथवा पर, को- ईनु पण धन आकांक्षा न कर, अथवा तुं धननी इच्छा न कर; केमके ते धन कोर्नु होयछे ? कोइ- नुं पण नहि के जेनी इच्छा राखीए. शा कारणथी के,तें आत्माज सर्व छे ए रीते आत्मभावनाये करीने नामरूपात्मक सर्व पण त्याग कयु छे माटे आत्माथी अतिरिक्त कांइ छेज नहि; वा- स्ते मिथ्या धन विषयक आकांक्षा नही करवी." उपक्रमोपसंहारावल्यासोऽपूर्वतो फलें। अर्थवादापपत्ती च लिंगं ता- त्पर्यनिर्णये ॥ १॥ , १३० स्वरूपानुसन्धाननी आ पड्विध लिंगना अनुसारे ईशोपनिपदनो तात्पर्य निर्णय. आ ईशावास्य उपनिपद्मां ईश्वररूप परमा- त्मानी भावनाये करीने नाम रूप क्रियात्मक सर्व जगत् आच्छादन कर एटले सर्वात्मभावनी भावना करवी, एवो उपक्रम करीने “सपर्य- गाच्छुक्रमगात् " ए आठमा मंत्रमा ते आ. मस्वरूप स्थूल सूक्ष्म कारण शरीरोथी तथा पाप पुण्यादिना संबंधथी रहित एवं शुद्ध ब्रह्म- रूप छे. ए रीते उपसंहार १. तथा मंत्र १ “अनेजदेकं” एटले स्थिरत्वनी प्रच्युतिरूप चलने रहित अर्थात् सर्वदा एकरूप. वळी मंत्र ५ मो “ तदन्तरस्य सर्वस्य" एटले ते आत्म- तत्त्व सर्व जगत्ना अन्तरमा तथा वाहार व्याप- क छे. ए रीते वारंवार कथनरूप अभ्यासना दर्शनथी २. अने चोथा मंत्रमांज "नैनदेवा आप्नुवन् ” एटले ए आत्मतत्त्वने मन आ- दिक इंद्रियो तथा तेना अधिष्ठाता देवताओ पामता नथी एटले साक्षात्कार करी शकता *नथी. ए रीते इतर प्रमाणे करीने अगम्यतारूप अपूर्वताना कथनथी ३. अने मंत्र ७ मो "तत्र " पंचम प्रक्रिया. को मोहः कः शोकऽ एकलमनुपश्यतः एटले आत्मैकत्खनो साक्षात्कार करनार ज्ञानी पुंरुपने शोक शो अने मोह शो? अर्थात् होयज नहि. ए रीते शोक मोहादि अनर्थनी निवृत्ति अने परमानन्दनी प्राप्तिरूप फलना कथनथी ४. अने मंत्र २ “ कुर्वन्नेवेह कर्माणि” एटले अना- स्मज्ञ एवा पुरुपे कर्म करतां छतांज जीववानी इच्छा राखवी एणे करीने जीवननी इच्छावान भेददर्शि पुरुपने कर्म करणना अनुवादे करीने मंत्र.१ "असुर्या नाम ते"एटले जे आत्मघाती अर्थात् आत्मानी विस्मृतिवाळा ते अज्ञानात आसुर लोकने पामे. ए प्रमाणे निंदाये करीने एकात्म दर्शननी स्तुतिरूप अर्थवाद दाव्यो.५ अने चौथा मंत्रमा “ तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति" एटले ते चैतन्य स्वभाव आत्मतत्त्व छतेज अर्थात तेनी सत्ताथीज वायु सर्व प्राणी- ओने चेष्टा करावे छे. ए रीते उपपत्ति एटले युक्ति दर्शावी छे.६ ए प्रमाणे पइविध लिंगोधी आ उपनिपदना सर्वे मंत्रोनुं ऐकात्म्य एटले जीव ब्रह्मनी एकताना प्रतिपादनने विपेज तात्पर्य छे. त्यांहां श्लोक- १३२ स्वरूपानुसन्धाननी सत्ये मय्येव भातं चरमचरमतोंत- बहिश्चाहमेको मत्तोन्यन्नास्ति कि- ञ्चिज्जगदपि सवितुमडले पूरुपोहं। इत्थं यस्य प्रबोधो गुरुवरकरुणापां- गतस्तस्य तृष्णा संदेहो मोहशोको भयजननजरामृत्यवो नैव संति ॥१॥ अर्थः- सत्यस्वरूप माहारे विपेज भासमा- न थयुं एवं जगत् माहाराथकी किञ्चिन्मात्र पण अन्य नथी; अने आन्तरथी पण आन्तर तथा बाह्य हुंज एक छौ; तथा सूर्य मंडलमा जे पुरु- प ते ढुज छौं. ए प्रकारे श्रेष्ठ गुरुना करुणा यु- त कटाक्षथी जेने प्रवोध प्राप्त थयो होय ते पु- रुपने तृष्णा, संदेह, मोह, शोक, भय, जन्म, जरा, मरण इत्यादि विकारो रहेज नहि, किंतु ब्रह्मरूपज होयछे. 3 (२) केनोपनिपद्ना अनुसारे विचार. मंगलाचरण. यच्छ्रोत्रादेरधिष्ठानं चक्षुर्वागाद्यगो- पंचम प्रक्रिया. १३३ चरम् । स्वतोध्यक्ष परब्रह्म नित्य- मुक्तं भवामि तत् ॥१॥ अर्थ:- जे ब्रह्म श्रोत्रादिक इंद्रियोनुं अधि- ष्ठानरूप छतां तेमनुं अगोचर छे; तथा स्वतः अध्यक्ष एटले नियंतारूप अर्थात् सर्वन प्रवर्तक अने नित्यमुक्त एवं छे तेज ब्रह्मथो अभिन्न प्र- त्या स्वरूप हुँ छौं. १ केनेपितम्" इत्यादि सामवेदीय तल- वकार शाखानी उपनिपटूनुं व्याख्यान करवाने इच्छता एवा भगवान श्री भाष्यकार- अहं प्रत्य- यनो विषयभूत आत्माने संसारित्वरूप हेतुथी उपनिपदे प्रतिपादन करवा योग्य असंसार - मभावनो असंभव छे माटे ब्रह्म आत्मानी ए- कतारूप विपयना अभावथी आ केनोपनिपत व्याख्यान करवा योग्य नथी एवी वादिनी शंका थये छते, अहंकारना साक्षी आत्माने विपे संसा- रीपणानुं ग्राहक प्रमाण कोई पण नथी, वास्ते प्रत्यक् स्वरूपने विपे ब्रह्मत्वनां प्रतिपादनमा विरोधनो संभव नथी; माटे ब्रह्मात्मैक्यरूप विपयना संभवधी आउपनिषदने विपे व्याख्यान करवा योग्यपणानी प्रतिज्ञा करेछे. , १२ १३४ स्वरूपानुसन्धाननी केनेपितम्" इत्यादि उपनिषत् परब- ह्मविषयक कहेवी छे वास्ते नवमाध्यायनो प्रारंभ. आ नवम अध्यायथी पूर्व आठ अध्यायोमा सर्व कर्मो समाप्त कर्या, तथा समस्त कर्मोनो आश्रयभूत प्राणनी उपासनाओ तथा कर्ममा अंगभूत पाञ्चभौतिक साप्तभौतिक सामवि- पयक उपासनाओ कथन करी; तदनंतर वंशा- न्त ग्रंथे करीने गायत्र सामनी प्राण दृष्टिए उ- पासना पण कथन करी ए प्रकारे पूर्वोक्त कर्म तथा उपासना सम्यक् प्रकारे अनुष्ठान करी छ- ती, निष्काम मुमुक्षु पुरुपनी सत्व शुद्धिने अर्थे होयछे, अने उपासना रहित सकाम पुरुपने तो केवल श्रौत स्मार्च को अनुष्ठान कर्या छतांद- क्षिण मार्गनी प्राप्तिने अर्थे अने पुनरावृत्तिने अ- र्थे होयछे; तथा स्वाभाविक अशास्त्रीय प्रवृत्तिथी पशुथी आरंभीने स्थावर पर्यंत अधोगति होय- छ तेमा श्रुतिः- तथैतयोः पथोर्न कतरे च न तानी- मानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृती- यं स्थानमिति॥

पंचम प्रक्रिया. १३५ अर्थ:-जे प्राणिओ दक्षिण तथा उत्तर ए वे मार्ग मध्ये एकने विपे पण प्रवृत्त न थाय, ते वारंवार आवृत्ति पामनार अति क्षुद्रभूत होय- छे-वारंवार जन्ममरणरूप तृतीय स्थान तेमने प्राप्त थायछे. अन्य श्रुतिः- "प्रजा ह तिस्रोत्यायमीयुरिति अर्थः- अंडज, स्वेदज, उद्भिज्जरूप त्रण प्रकारनी प्रजाओ पितृयाण मार्गने तथा देवयान मार्गने अतिक्रमण करीने कटरूप गतिने पामती हवी. तथा वाह्य, अनित्य, अने संस्कारविशेष- थी जन्य एवां साध्य फळथी तथा तेनां साधनो- थी तथा तेमना संबंधथकी विरक्त एवो शुद्ध स- खवान् जे निष्काम पुरुप तेनेज प्रत्यगात्मस्वरू- पने विपे जिज्ञासा प्रवृत्त थायछे ए विषे काठक श्रुतिनो संवाद. "परांचि खानि०" मुण्डकश्रु- तिः- “ परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्म- णो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन तद्विज्ञा- नार्थ स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं " इत्यादि. ए प्रकारे जे * ( आ श्रुतिनो अर्थ बीनी प्रक्रियामा लख्यो छे.)

स्वरूपानुसन्धाननी विरक्त होय तेनेजप्रत्यगात्मविषयक विज्ञान तथा श्रवण, मनन निदिध्यासननु सामर्थ्य प्राप्त थाय, अन्यथा नहि. ए वाक्ये करीने एम जणाव्यु के, बाह्य विपयथी आक्षिप्त छे चित्त जेनुं एवा अविरक्त पुरुपने आत्मजिज्ञासाजन थाय, एम करता था होय तो पण ते सफल होय नहि; जेम शूद्रने यागने विपे इच्छाज न थाय, कदापि थई होय तो ते सफल नथी तेम; वळी प्रत्यक अभिन्न ब्रह्मनां विज्ञानथी संसारनुं बीजभूत अने काम कर्म प्रवृत्तिमां हेतुभूत अज्ञान निःशेपताथी नि- वृत्त थायछे तेमां श्रुतिः- “तत्र को मोहः कः शोकऽएकत्त्वमनुपश्यतः "तरति शोकमात्मवित्." : वळी ॥ यग्रंथिश्छिद्यते सर्वसंशयाः । क्षीयंते चा- स्य कर्माणि तस्मिन्दष्टे परावरे ॥१॥ माटे बाह्य साधनोथी साध्य एवां ऐहिक, आ- मुष्मिक फलोथी विरक्त एवा पुरुपनेज प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्मविषयक जिज्ञासा थाय; ए प्रकारे केनेपितम्" इत्यादि श्रुतियो प्रतिपादन करेछे. श्रुतिमां शिष्य आचार्यना प्रश्नोत्तररूपे " भिद्यते त्वद- * (प्रक्रिया २ मां अर्थ छे.) * (प्रक्रिया ३ मा अर्थ छे.)

पंचम प्रक्रियो. १३७ करीने जे कथन ते तो सूक्ष्म वस्तु दुर्विज्ञेय छे माटे तेनो सुखे करीने बोध थवाने; अर्थ वळी प्रश्नोत्तररूपताथी ब्रह्मवस्तुने विपे केवळ तर्के करीने अगम्यपणुं पण सूचन कयु, अर्थात् गुरु शरण विना शाखथी अथवा केवल तर्कथी सम्यक् बोध न थाय तेमां श्रुतिनुं प्रमाणः- नेपा तर्केण मतिरापनीया " इति; तथा अन्य श्रुतिः- "आचार्यवान् पुरुपो वेद आ- चार्यादैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापत्" इति; तथा स्मृतिनुं प्रमाण:- "तद्विदि प्रणि- पातेन परिप्रश्नेन सेवया " इति; माटे गुरु- शिष्यनां प्रश्नोत्तररूपे उपनिषद्नो प्रारंभ. श्रुतिः- केनेपितं पतति प्रेपितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः। केनेपितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥ अर्थः-कोई एक अधिकारी शिष्य ब्रह्म- निष्ठ गुरुने शास्त्रोक्त विधिथी शरणे थइने प्रत्य- गात्माथी अन्यने विपे रक्षितापणुं न जोतो छ- तो, अने नित्य, शिव, अचल, अभयने इच्छतो - १३८ स्वरूपानुसन्धाननी छतो प्रश्न करे छे. हे गुरो! कोण कर्ताए व इ- च्छाये प्रेयु एवं मन पोताना विपयो प्रत्ये प्रवृत्त थायछे ? (आ श्रुतिना पेहेला पादमा 'ईपितम्' 'प्रेषितम्' ए वे पद जे आप्यां छे ते मन आ- दिक इंद्रियोनुं प्रेरकपणुं प्रसिद्ध एवा कार्यकारण संघातरूप जीवने छे, किंवा संघातथी अतिरिक्त कोइक स्वतंत्रने स्व इच्छामात्रथी प्रेरकपणुं ले? एवो संदेह जणाववाने माटे छे.)शंका:- स्वतंत्र एवं मन पोताना विपयोने विपे पोतेज प्रवृत्त थाय एवं प्रसिद्ध छे माटे संदेहनाज अ- भावधी प्रश्न अघटित छे. समाधान:- जो कदा मन प्रवृत्ति निवृत्तिने विषे स्वतंत्र होय तो कोई पण पुरुषने अनिष्टर्नु चिंतन होवुज न जोइए, परंतु जाणतो छतो पण अनर्थने विपे संकल्प करेछे; वळी अति उग्र दुःखदाइ कार्यने विपे निवारण कर्यु छतुं पण ए मन प्रवृत्त थायछे माटे मनने अस्वतंत्र होवाथी शिष्ये संदेह पा- मीने जे प्रश्न कर्यो ते युक्तज छे. वळी कोणे प्रेर्यो छतो प्रथम प्राण चलन क्रिया करेछे ? (आ ठे- काणे सर्व इंद्रियोना व्यापार प्राण व्यापार पूर्वक छे ते लेइने प्रथम पद आप्युंछे.) वळी कोणे प्रेरी एवी शब्दरूप वाणीने लौकिक जनो बोले- पंचम प्रक्रिया. १३९ - छे? तथा चक्षु अने श्रोत्र इंद्रियने कहो द्योत- नात्मक देव प्रेरेछे? हे शिष्य ! तेंजे पुछयु के, मन आदि इंद्रियो- नो स्व स्व विषयो विषे प्रेरक देव कोण छे? अ- ने शी रीते प्रेरेछे ? तेनो उत्तर कहुंछौं. श्रुतिः- श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनोयडाचो हवाचं स उ प्राणस्य प्राणश्चक्षुष- श्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लो- कादमृता भवन्ति ॥२॥ . अर्थः- हे शिष्य ! ते जे प्रेरक पुछचो ते वस्तुस्वरूप 'श्रोत्रस्य' एटले शब्दना श्रवणर्नु करणभूत अने शब्दनु अभिव्यंजक जे श्रोत्र इंद्रिय तेनुं श्रोत्ररूप छे. शंका:- आवा व्यापा- रवाळो आ श्रोत्रादि इंद्रियोनो प्रेरक एवो उत्तर कहेवो जोइए, त्यांहां ' श्रोत्र श्रोत्र' एवो उत्तर अयुक्त छे. समाधान:-हे शिष्य ! तें जे दोप कह्यो ते घटे नहि; केमके ए वस्तुने विपे व्या- पारादि कोइ पण विशेष छेज नहि; जो कदा श्रोत्रादि इंद्रियोना व्यापारथी अतिरिक्त व्यापार युक्त एवो श्रोत्रादिनो प्रेरक होय-जेम दात्रना व्यापारथी अतिरिक्त व्यापारवाळो लविता १४० खरूपानुसन्धाननी एटले छेदक होयछे तेम-त्यारे तो 'श्रोत्रस्य श्रोत्रं' ए उत्तर अघटित कहेवाय, पण तेम नथी; केमके श्रोत्रादियोनो प्रेरक लवितानी पेठे स्व व्यापारे युक्त छे नहिकिंतु संघातरूप श्रोत्रा- दियोनो जे श्रवण आलोचन, संकल्प, अध्यव- सायादि रूप फल पर्यंत व्यापार ते रूप लिंगे क- रीने केवल गम्यमान थायछे; शी रीते के, श्री- त्रादि संघात जेना प्रयोजनने अर्थ होयछे, ते प्रेरक ते संघातथी अतिरिक्त असंहत छे; जेम जेना प्रयोजनने अर्थे गृहादि संघात होयछे ते देवदत्त ते संघातथी पृथक होयछे, अने संघात रूप श्रोत्रादि परने अथै छे माटे तेनो प्रयोक्ता कोइ पण गम्यमान होयछे, तेथीजे उत्तर कह्यो ते युक्तज छे. त्यारे श्रोत्रस्य श्रोत्रं ए उत्तरनो भावा- र्थ शो ? श्रोत्रने बीजा श्रोत्रनी जरूर नथी; जेम प्रकाशने प्रकाशांतरनी जरूर नथी तेम.हे शिप्य! 'श्रोत्रस्य श्रोत्र' ए उत्तरनो अभिप्राय ए छे के, श्रोत्र इंद्रिय पोताना विपयने प्रकाश करवा विपे समर्थ जोयुछे, ते विषय प्रकाशन सामर्थ्य जड श्रोत्र इंद्रियने विषे स्वप्रकाश, नित्य, असंहत, सर्वान्तर एवं चैतन्यवस्तु छतेज होयछे, अन्य- था नहि, ए भावार्थ छे. तेमां श्रुति प्रमाणः- - " पंचम प्रक्रिया. १४१ "आत्मनैवायं ज्योतिपास्ते तस्य भा- सा सर्वमिदं विभाति. 'येन सूर्यस्त- पति तेजसेद्धः" स्मृतिः- " यदादित्यगतं तेजो जगदासयतेखिलम्" " क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत" कठश्रुतिः- नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानां विद्वाननेज स्वबुद्धिथी गम्य सर्वथको आंत-. रतम, कूटस्थ, अजर, अमर, अभय, अज अने श्रोत्रादिनुं पण श्रोत्रादिरूप एवं कोइ एक स्व- प्रकाश वस्तु छे के जेनाथी श्रोत्रादिकने स्व- विषय प्रकाशनुं सामर्थ्य प्राप्त थायछे ए रीतना उत्तरे करीने सर्व जनने प्रसिद्ध एवी जे श्रोत्रा- दिनेविपेज आत्मचैतन्यपगानी प्रसिद्धि ते निव- न करी; तथा जे वस्तुस्वरूप 'मनसो मनः' एटले जे आत्मचैतन्ये प्रकाश कयु छतुंज मन संकल्प अध्यवसायादि व्यापारने विपे समर्थ होयछे: तथा 'यहाचो ह वाचं' एटले जे आत्मचैतन्ये प्रकाश कयु छतुंज वाक् इंद्रिय पोताना विपयने विपे प्रवर्तछे; तथा 'प्राणस्य प्राणः' एटले जे आत्माना अधिष्ठानथील प्राणमां प्राणन साम- " , १४२ स्वरूपानुसन्धाननी र्थ्य छे; त्यांहां श्रुतिः को ह्येवान्यात कः प्राण्यात् यदेप आकाश आनंदोन स्यात्." ऊर्दू प्राणमुन्नमयत्यपानं प्रत्यगस्यति तथा 'चक्षुपश्चक्षुः' एटले चक्षुरिंद्रियमा जे रूपयहणजें सामर्थ्य ते अधिष्ठानरूप आत्मचै- तन्यथकीज छे. उपरनी श्रुतिनुं तात्पर्य एछे के, सर्व एवा करण वर्गनी जे अधिष्ठाननी सत्ता- स्फूर्तिथी प्रवृत्ति छे, ते प्रत्यक् वस्तु ब्रह्मरूप छे ए रीते प्रत्यक्थी अभिन्न ब्रह्मस्वरूपने जाणीने 'धीराः' एटले धीमान् पुरुपो, श्रोत्रादिकने वि- पे आविद्यक एवा आत्मभावनो त्याग करीने 'प्रेत्यास्माल्लोकात्' एटले पुत्र, मित्र, कलत्रादि- कने विपे अहंममताना त्यागथकी सर्व एपणा- थी रहित थइने अमृत होयछे एटले अमरणध- र्मा होयछे त्यांहां श्रुतिः- “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतसमानशुः " परांचि खानि० आरत्तचक्षुरमृतसमि- यदा सर्व प्रमुच्यते० अत्र ब्रह्म समश्नुते 'केनेषितं' ए प्रथम मंत्रे करीने मनआदिक ई- द्रियोनो स्वतंत्र प्रेरक कोण? एवां शिष्यप्रश्ननी " पंचम प्रक्रिया. १४३ द्वाराए बीजो मंत्र:-" श्रोत्रस्य श्रोत्रं" एणे करीने श्रोत्रादि इंद्रियोर्नु पण श्रोत्रादिरूप एटले सन्निधानथीज स्वसत्तास्फूर्ति आपीने तेमनुं प्रव- तक सर्वांतर एवं जे प्रत्यगात्मस्वरूप तेज ब्रह्म ए रीते ब्रह्मात्मैकवनो उपक्रम करीने द्वितीय खंडनो मंत्र ५ मो " भूतेषु भूतेषु विचि- त्य धीराः अर्थः- स्थावर जंगम सर्व प्राणियोने विपे आंतर साक्षीस्वरूपे रहेल्लं जे प्रत्यक् स्वरूप तेज ब्रह्म ए रीते उपसंहारथी १. तथा प्रथम खंडनो मंत्र यहाचान- भ्युदितम्' " मंत्र ५“यन्मनसान मनुते" “ यच्चक्षुपान पश्यति " मंत्र ७ 'यच्छोत्रेण न शृणोति" मंत्र ८" यत्प्रा- णेन न प्राणिति" समुदायनो अर्थः-जे प्रत्यक वस्तु वागा- दिक इंद्रियोथी पोतपोताना कथनादिक व्यापारे करीने विषय करी शकातुं नथी; अने जेणे ते इंद्रियोने प्रकाशमान की ते प्रत्यक स्वरूपनेज ब्रह्म तुं जाण; लोकमा जे सोपाधिक अनात्म- भूत ईश्वरादिकनु उपासन करेछे ते ब्रह्म नहि ए मंत्र ६

स्वरूपानुसन्धाननी
रीते वारंवार कथनरूप अभ्यासपी २. तथा
प्रथम खंडनो मंत्र ३
“अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि"
अर्थ:-जे प्रत्यगभिन्न ब्रह्म व्याकतथी तथा
'अव्याकृतथी अन्य छे ए रीते प्रत्यक्षादि प्रमाणे
करीने अगम्यत्वरूप अपूर्वताना कथनधी ३.
तथा प्रथम खंडनो मंत्र २ "अतिमुच्य धीराः
प्रेत्यास्माल्लोकादमृता अवन्ति"
अर्थः- श्रोत्रादिक अनात्मवर्गने विपे अवि-
द्याकत अनर्थदायक आत्मभावनो परित्याग
करीने तेमनुं अधिष्ठानभृत एवं प्रत्यक्थी अभिन्न
ब्रह्मने जे जाणे ते अमृतभावने पामे ए रीते
फलना कथनथी १. तथा तृतीय खंडमां “ब्रह्म
ह देवेभ्यः” इत्यादि बार मंत्र वडे यक्षारख्या-
यिकाना वर्णने करीने ब्रह्मात्मैकत्वनी स्तुतिरूप
अर्थवादना कथनथी ५. तथा द्वितीय खंडनो
मंत्र प्रतिबोधविदितं मतं"
अर्थः-जे प्रत्यक् ब्रह्म बुदिना प्रत्ययोने
विपेज तेमनु प्रकाशक अने तेओथी अतिरिक्त
परम काष्ठारूप एवं जाणवामां आवेळे ए रीते
उपपत्तिनां कथनथी ६.

पंचम प्रक्रिया. १४५ ए पड्धि लिंगथी तथा चतुर्थ खंडमां मंदा- धिकारीओने अन्तःकरणनी शुदिद्वारा सम्यक् वोधने अर्थ तपादिक साधनो तथा तृतीय खंडमा अध्यात्मादि उपासनो विधान कर्याछे, माटे उपर कह्या प्रमाणे केन उपनिपना सर्वे मंत्रोनुं ब्रह्मा- स्मैकत्वना प्रतिपादनमांज तात्पर्य छे. त्यांहां श्लोकः- स्वांतप्राणाक्षिवाणीप्रभृति च विपया- भासकं यस्य योगाद्यन्न प्राप्नोति चैन- द्विदितमविदितं यद्भवेन्नात्मरूपम् । इंद्राया देवमुख्या अपि किल न विदु- यस्य शक्ति निगूढां तद्बुद्धं येन सोसौ भवति नरवरोनंतसौख्यप्रतिष्ठः ॥१॥ अर्थ:-- मन, प्राण, चक्षु, वाक् इत्यादि ई- द्रियोनु कदम्ब जेनी सत्तास्फूर्तिना वशथीज वि- पयोर्नु अवभासक छे तथा जे मन आदि जेने विपय करीशकतुं नथी तथा जे तत्त्व विदित एटले जाग्रत्, स्वप्न, अने अविदितथी एटले नामरूपा- स्मक व्याकृतथी तथा अव्याकृतथी अन्य छे एटले कूटस्थ साक्षी छे; वळी इंद्रादि देवताओ १४६ स्वरूपानुसन्धाननी पण जेनी निगूढ चिच्छक्तिने जाणता नथी; ते प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्म तत्त्व जेणे साक्षात्कार कर्यु होय, ते पुरुप ब्रह्मरूप छतो अपरिच्छिन्न सुख- ने विपे प्रतिष्ठा पामे. १ (३) कठोपनिपना अनुसारे विचार. मंगलाचरण. ॐधर्माधर्माद्यसंसृष्टं कार्यकारण- वर्जितम् । कालादिभिरविच्छिन्नं न- र यत्तन्नमाम्यहम् ॥१॥ अर्थः- जे ब्रह्म पुण्यपापादिकना संबंधे रहित छे; तथा कार्यकारणथी एटले अविद्या अने तेनु कार्य प्रपंचथी रहित छे; तथा काल, देश अने वस्तु एत्रण्ये करेला परिच्छेदथी रहित छे तेने हूँ नमुंछौं एटले अभेदरूपे अनुसंधान करूंछों. १ कठोपनिपढ़े व्याख्यान करवाने इच्छता श्री भाष्यकार प्रथम "उपनिपद् ” ए शब्दनी व्याख्या करेछे. सद् धातुना शैथिल्य, गति, अवसादन एटले नाश ए त्रण अर्थ छे; ते धातुने 'उप+नि' ए वे पंचम प्रक्रिया. १४७ उपसर्ग जोडवाथी अने क्विम् प्रत्यय लगाडेथी 'उ- पनिपद' ए शब्द ब्रह्मविद्यानो वाचक सिद्ध थाय- छे; शी रीते के " उपनिपीदतीति उपनि- पद्" एटले दृष्ट श्रुत विषयोधी विरक्त थईने पोतार्नु आश्रयण करीने परिशीलन करनारामु- मुक्षुओना संसारखें वीजभूत अविद्या कामादिक अनर्थने जे नाश करे ते ब्रह्मविद्या 'उपनिपद्' ए शब्दे करीने वाच्य होयछे; त्यांहां श्रुतिः- "निचाय्य तं मृत्युमुखातू प्रमुच्यते” इति; अथवा वैराग्यादि साधनसंपन्न एवा मुमुक्षुओने ब्रह्मैक्यताने जे पमाडे ते ब्रह्मविद्या 'उपनिपद्' ए शब्दे करीने वाच्य होयछे; त्यांहां श्रुतिः- "ब्रह्म प्राप्तो विरजोभूद्विमृत्युरिति” अथवा भूरादि लोकोनो आदि एटले प्रथम जन्य एवो जे ब्रह्मा, तेथी जन्य जे अनि, तद्विषयक एवी जे विद्या स्वर्गादि फलनी प्राप्तिमा हेतु होवाथी द्वि- तीय वरे करीने प्रार्थना करी, ते पण लोकांतरने विपे प्रवृत्त थनार पुरुपना गर्भवास, जन्म, जरा इत्यादि उपद्रवोने शिथिल करवाथी उपनिष- द्' कहेवायछे; त्यांहां श्रुतिः- " स्वर्गलोका अमृतत्त्वं भजते” इति. उपर कह्या प्रमाणे ૧૪૮ स्वरूपानुसन्धाननी उपनिपद' ए शब्दे करीने वाच्य ब्रह्मविद्या अने अग्निविद्या छे ए वात सिद्ध थई. ग्रंथने विषे जे उपनिपद् शब्दनी प्रवृत्ति ते तो " आयुर्घतम्” एनी पेठे औपचारिक जाण- वी; ए रीते उपनिपदनां निर्वचनेज ब्रह्मविद्या- नो वैराग्यादिक साधन संपन्न अधिकारी तथा प्रत्यक अभिन्न ब्रह्मरूप विषय; तथा संसाररूप अनर्थनी आत्यंतिक निवृत्ति अने निरतिशय सु. खप्राप्तिरूप प्रयोजन; तथा साध्यसाधनभाव सं- बंध ए अनुबंध चतुष्टय सूचन कर्या ए रीते अनुबंध चतुष्टय विशिष्ट ब्रह्मविद्यानी करतला- मलकनी पेठे साक्षात्कार करावनार आ कगेप- निपर्नु यथामति व्याख्यान करीशुं. त्यांहां प्रथम ब्रह्मविद्यानी स्तुतिने अर्थे आ- ख्यायिकाने कहेछे के, वाजश्रवसे एटले उदा- लंक ऋपिये विश्वजित् यज्ञने विपे ब्राह्मणोने द- क्षिणामां जीर्ण, पय रहित, तृण पण खाइ न शके एवी गायो आपी त्यारे वाजश्रवसनो पुत्र नचिकेताये स्वपितानी अधोगति थशे एम जा- णीने तेने यज्ञनां संपूर्ण फलनी प्राप्तिने अर्थे क- झुं के, “हे पिता! तमे मने कोने आपशो?" त्यारे पिताये अनादर कर्यो; तो पण एज रीते

पंचम प्रकिया.
११९
वारंवार पुत्रे कर्तुं त्यारे पिताये कोप करीने कह्यु
के "हे पुत्र! तने में यमने आप्यो." त्यार पछी
नचिकेता स्वपितानुं वचन सत्य करवा माटे यम
राजाने त्यां गयो अने ते यम अन्यत्र (बीजे ठे
काणे) गया हता तेथी त्यांहां त्रण दिवस रह्यो;
पछी यमे आवीने तेनुं विधि पूर्वक आतिथ्य क-
यु अने कह्यु के “हे नचिकेता ! तुं त्रण दिव-
स रह्यो माटेत्रण वर माग." त्यारे नचिकेताये
पितानो पोता संबंधि केश मट्या पूर्वक मने
पाछो जवाथी “एज माहारो पुत्र छे.” एवी प्र-
तीति रहे ए रीते प्रथम एक वर माग्यो; ते आ-
पीने फरीथी यमे कह्यु के “ द्वितीय वर माग."
त्यारे तेणे अनिविद्या मागी; तेथी प्रसन्न थइने
ते पण आपी; त्यार पछी अग्निविद्या एटले वि-
रानी उपासना जाण्या नंतर पुत्र राज्यादि सर्व
विपयोथी वैराग्य देखाडीने नचिकेताये यम रा-
जा प्रत्ये प्रत्यक् ब्रह्मविपयक त्रीजो प्रश्न कर्यो
त्यांहां श्रुतिः-
येयम्प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्ती-
त्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्या-
मनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेप वर-
स्तृतीयः॥१॥

स्वरूपानुसन्धाननी अर्थः-आ देह मरण पामे छते शरीरेंद्रिया- दिकथी अतिरिक्त अने वीजा देहनो संबंध पाम- नार कोई आत्मा छे एम केटलाएक कहेछे; त- था नथी एटले देह मरणानंतर कोई छेज नहि एम पण कहेछे; माटे तेनो निर्णय यथार्थ रीते कहो? केमके परम पुरुपार्थ तो आत्मज्ञानने आधीन छे. (एटली वात प्रथम वल्लीमा छे.) द्वितीय वल्लीमा यम राजाये विद्या अविद्या- रूप श्रेय प्रेयर्नु कथन कर्यु त्यांहां श्रुतिः- अन्यच्छेयोऽन्यदुतेव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुपसिनीतः। तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयते ऽर्थाद्य उप्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ अर्थः- श्रेय पृथक् छे अने प्रेय पण पृथक् छे ते वेड पोताना कर्तव्यपणाथी पुरुपने चांधे छ एटले ज्यां सुधी पोतामां अकर्ता अभोक्ता- पणानो दृढ निश्चय थयो नयी त्यां सुधी; ए वेउ मध्ये केवळ श्रेयने ग्रहण करनार पुरुपर्नु शुभ एटले निश्रेयस थाय, अने केवळ प्रेयने ग्रहण करनार पुरुप परम पुरुषार्थथी भ्रष्ट थायछे. १ ए रीते प्रेयथी विरक्त होवाधी शिप्यनी प्रशंसा पंचम प्रक्रिया. १५१ करीने मे आत्मस्वरूपना उपदेशनो उपक्रम कर्यो त्यांहां श्रुतिः- तन्दुर्दर्शकॅडमनुप्रविष्टं गुहाहितङ्ग- हरेष्टम्पुराणम् । अध्यात्मयोगाधि- गमेन देवं मत्वा धीरो हर्पशोको जहाति।। अर्थः- हे शिष्य! ते पुछयो जे आत्मा ते 'दुईस'छे एटले अति सूक्ष्मताथी महान प्रयत्ने करीने जाणवाने शक्य छे; तथा 'गूढ' छे; केमके अनुप्रविष्ट'छे एटले मायिक एवां विपय विका- रनां विज्ञाने करीने आच्छादित छ; बळी 'गुहा- हित' छे एटले बुद्धिमा रह्यो छे त्यांहांज तेनी उपलब्धि थायछे; वळी गहरेष्ट' एटले महा विपम एवां अनर्थरूप संकटने विपे रहेनार; तथा ‘पुराण' एटले पूर्वेधीज नवो ने नवो छे ते आ- स्माने कोइक धीर पुरुप 'अध्यात्मयोगाधिगमेन' एटले चित्तने विपयोथी उपसंहार करीने आ- त्माने विपेज जे समाधानरूप योग तेणे करीने 'मला' एटले निश्चय करीने हर्प, शोकने त्याग करेछे; केमके आत्माने विपे उत्कर्ष अपकर्षनो अभाव छे. तृतीय वल्लीमां पूर्वे फल सहित विद्या अवि- स्वरूपानुसन्धाननी द्यानुं कथन मात्र कर्यु तेनाज निर्णयने अर्थे रथ- रूपकनी कल्पनाये करीने स्वरूपज्ञान- सुकरपणुं वर्णन कर्यछे त्यांहां श्रुतिः- आत्मान५ रथिनं विद्धि शरीरर- थमेव तु।बुद्धिन्तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ इत्यादि. अर्थः- कर्मफळनो भोक्ता जीवने तुं रथी एटले रथस्वामी जाण, अने शरीरने रथरूप जाण, तथा निश्चयात्मक बुद्धिने सारथीरूप जाण, अने मनने प्रमह एटले राशरूप जाण, तथा इंद्रि- योने अश्वरूप जाण, तथा शब्दादि विपयोने मार्गरूप जाण. तात्पर्य ए के, विवेक विशिष्ट बुद्धि छे सारथी जेने, अने निग्रहित मन छे राश जेने एवो जे पुरुप ते आ संसार मार्गनो पाररूप अने गंतव्य एवां विष्णुनां (व्यापक ब्रह्मनां) पदने एटले स्वरूपने पामे. चतुर्थ वल्लीमा आत्मज्ञाननां प्रतिबंधक, व- र्णन कर्युछे; केमके प्रतिबंध जाण्ये छतेज तेनी निवृत्तिने अर्थे प्रयत्न करी शकाय त्यांहां श्रुतिः- "परांचि खानि०१" ( आ श्रुतिनो अर्थ प्रक्रिया २ बीजीमा काँछे.) , - पंचम प्रक्रिया. १५३ पराचः कामाननुयन्ति वालास्ते मृ- त्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीराऽअमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवे- विह न प्रार्थयन्ते ॥२॥ अर्थ:- पेहेली परांचि खानि." तिमां कह्या प्रमाणे जे पराक्रूप वाह्य देहादि- कनु दर्शनरूप अविद्या ते आत्मदर्शनना प्रतिबं- धमां कारणभूत छे; ए अविद्या तथा तेणे दर्शा- वेला दृष्ट अदृष्ट भोगने विपे जे तृष्णा ए वेउथी प्रतिबद्ध थांछे आत्मदर्शन जेमने एवा पराक् दर्शि अल्प बुद्धि पुरुपो वाह्य एवा विपयो प्रत्ये दोडेछे, तेथी ते सर्वत्र व्याप्त एवा अविद्या काम कर्मनो समुदायरूप मृत्युना पाशमां बंधायेला रहेछे एटले देहेंद्रियादिकना संयोग वियोगरूप जन्म, मरण, जरा, रोगादि अनर्थ समूहने पामे- छे; माटे जे विवेकी पुरुपो ते नित्य एवां प्रत्य- कू ब्रह्मस्वरूपे अवस्थानरूप अमृतत्त्वने जाणीने अनित्य एवा सांसारिक पदार्थानी प्रार्थना करता नथी; केमके ते प्रत्यगात्म दर्शनमा प्रतिकूल छे अर्थात् पुत्रादि त्रण एषणाओथी रहित छता प्रत्यक् प्रवणनिष्ठ होयछे.

१५४ स्वरूपानुसन्धाननी पांचमी वल्लीमां आत्मतत्त्व अति दुर्विज्ञेय होवाथी शरीरने विपे पुरना रूपकथी तथा आ- त्माने विपे पुरस्वामीना रूपकथी स्वरूपनिर्धार कराव्योछे त्यांहां श्रुतिः- पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च वि- मुच्यते । एतद्वैतत् ॥ अर्थ:- जेम अनेक द्वार युक्त अने सर्व उप- करण सहित संघातरूप नगर कोइ स्वतंत्र स्वा- मीने अर्थे होयछे एम जोवामां आवेछे; तेमज इंद्रियोरूपी एकादश द्वारवाळु संघातरूप शरीर असंहत राजस्थानी आत्माने अर्थे होवाने योग्य छे ते नगरनो स्वामी जन्मादि विक्रियाये रहित अने नित्य प्रकाशस्वरूप जे प्रत्यक्थी अभिन्न ब्रह्म तेनुं सम्यक् प्रकारे ध्यान करीने एटले “ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि०॥" ए रीते जाणीने शोक करे नहि; केमके प्रत्यक् ब्रह्मनां विज्ञानथी अभय प्राप्त थये छते शोकनो अवसरज नथी एटले आज देहने विपे अविद्या- रुत काम कर्म बंधनथी विमुक्त होयछे, अने विमुक्त एवो छतो मुक्त थायछे अर्थात् पुनः शरीर ग्रहण न करे.

पंचम प्रक्रिया. १५५ छठी वल्लीमा जेम लोकमां शाल्मल्यादि वृक्ष नां तूलनां अवधारणथी मूळनुं अवधारण थायछे- तेम संसाररूप कार्य वृक्षनां अवधारणे करीने मू. भूत ब्रह्मनुं अवधारण कराव्युंछे त्यांहां श्रुतिः- ऊर्द्धमूलोऽवाक्शाख एपोऽश्वत्थःस- नातनः। तदेव शुक्रं तब्रह्म तदेवास- तमुच्यते । तस्मिल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतदैतत् ॥ अर्थः- 'अर्द्धमूलः' एटले ऊर्द्ध छे विष्णु परम पदरूप मूळ जेनुं एवो, अने 'अवाक्- शाखः' एटले स्वर्ग, नरक, तिर्यक्, प्रेत इत्यादि- रूप नीची छे शाखाओ जेनी एवो, तथा 'सना- तनः' एटले अनादि चिर काळथी प्रवृत्त थयेलो एवो आ संसाररूप अश्वत्थ वृक्ष जे मूळ तेज शुद्ध अने तेज ब्रह्म छे अने तेज अमृत छे; केमके वाचारंभण श्रुतिए ब्रह्मथी अतिरिक्त सर्वने मिथ्या कमुछे; ते परमार्थ सत्य ब्रह्मस्वरूपनेज गंधर्व नगर मरीची जळने तुल्य अने परमार्थ दर्शनना अभावथी गम्यमान सर्व लोको उत्पत्ति, स्थिति, लयने विपे आश्रय करीने रह्याछे; ते ब्रह्मने . १५६ स्वरूपानुसन्धाननी कोइ पण विकार अतिक्रमण करी शकतो नथी ते ए एटले जे ब्रह्मरूप मूळथी जगरूप वृक्ष निकळ्यो ते ब्रह्म. श्रुतिः- यदा सर्वे प्रमुच्यते कामा येस्य ददिश्रिताः। अथ मयोऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ अर्थ:-जे परमार्थदार्श पुरुपने जे काळने विपे बुद्धिमा रहेला सर्वे कामो कामयितव्यना एटले इच्छाना विपयोना अभावधी विशीर्ण थाय त्यारे प्रबोधथी पूर्वे मरणधर्मा हतो एवो ते पुरुप प्रबोधथी उत्तर काळने विपे अविद्या, काम, कर्मरूप मृत्युना अभावथी अमृत एटले अमर- णधर्मा होयछे; अने आज जन्मने विषे सर्व ब- धनोना उपशमथी ब्रह्मने पामेछे अर्थात् ब्रह्मी- भृत होयछे. उपर कह्या प्रमाणे कठवल्लीना सर्वे मंत्रोनुं ब्रह्मात्मैक्य प्रतिपादनने विपे तात्पर्य छे. त्यां- हां श्लोकः- सूक्ष्मात्सूक्ष्मो महीयान्महत उत धिया साधनेर्यो न लभ्यो बुद्धिस्थो यो शरीरो रविविधुदहना यस्य भासा विभांति।पभिर्भावः स्वभावै रहित पंचम प्रक्रिया. १५७ उपसदास्तीति रूपेण वेद्यस्तं सा- क्षात्कृत्य धीरो गुरुवचनवलाज्जा- यते नित्यशांतः॥१॥ अर्थ:-जे प्रत्यगात्मा सूक्ष्मथकी सूक्ष्मतर छे; तथा महान्थी महत्तर छे; तथा जे बुद्धिमा अंतर्यामिरूपे रह्यो छतो पण बुद्धिये ग्रहण करी शकातो नथी; तथा विवेकादि साधनचतुष्टय त- था श्रवणादिनां राहित्यथी अलभ्य छे; तथा जे त्रिविध शरीरथी रहित छे; तथा सूर्य, चंद्र, अग्नि आदि तेजो जेनी प्रभाये करीनेज भासमान था- यछे; तथा जे जन्मादि पड्भाव विकारे रहित छे; तथा जे उपनिपद् वाक्योथी अस्ति एटले सन्मात्ररूपे करीनेज वेद्य छे ते ब्रह्मनो गुरुना वचनोना बळथी साक्षात्कार करी- ने धीर पुरुप नित्य शान्त ब्रह्मस्वरूप होयछे. १ प्रत्यक् अभिन्न (४) मुण्डकोपनिपद्ना अनुसारे विचार. मंगलाचरण. ॐयदक्षरम्परं ब्रह्म विद्यागम्यमि- १५८ स्वरूपानुसन्धाननी तीरितम् । यस्मिन् ज्ञाते अवेज्ज्ञा- तं सर्व तत्स्यामसंशयम् ॥१॥ अर्थः- जे अक्षररूप परब्रह्म विद्याये करीने गम्यमान थाय एम म्होटा पुरुपोये कडंछे व- ळी जे ब्रह्मस्वरूप जाण्ये छते सर्व पण विज्ञात होय ते ब्रह्म हुँ छौं एमां संशय नहि. १ आ मुण्डकोपनिपमा विद्यासंप्रदायना प्रव- तकोनी परंपरानुं जे कथन कर्यु ते ब्रह्मविद्यानी स्तुतिथी अधिकारीओना प्ररोचनने अर्थे छे के. जेथी ते विपे अधिकारीओ प्रवृत्त थाय; ए ब्रह्म- विद्यानो प्रयोजननी साथे साध्यसाधनभाव संबंध “ भिद्यते दृदयग्रंथिः" ए ठेकाणे कहेवाशे; वळी ऋग्वेदादिरूप अपर विद्यानुं जे कथन कर्य ते विधिनिषेधात्मक अपर विद्या संसारना कार- णमृत अविद्यादि दोपनी निवृत्ति करी शकेज नहि एवं जणाववाने अर्थे छे; तथा परम पदनी प्राप्तिमा साधनभूत एवी ब्रह्मविद्या इतर सर्व साधने साध्य एवा विपयना वैराग्य पूर्वक गुरु प्रसादथी प्राप्त थाय, ए रीते "परीक्ष्य लोका- न" इत्यादि मंत्रोये करीने कथन कर्युछे; तथा ब्रह्मवित् ब्रह्मैव भवति" " परामृतात् पंचम प्रक्रिया. परिमुच्यन्ति सर्वे" इत्यादि वाक्ये करीने प्र योजन पण वारंवार कथन कर्युछे; यद्यपि सर्व आश्रमीओने ज्ञानने विपे अधिकार छ तथापि जे सन्यासनिष्ठ ब्रह्मविद्या तेज मोक्षनुं साधन छे कर्मसहित नहि ए रीते : भैक्षचर्याञ्चर- सन्यासयोगात्" इत्यादि वाक्यो- ये सूचन कर्युछे; ए प्रकारे अनुबंधचतुष्टय विशि- प्ट एवी आ उपनिषद् व्याख्यान करवा योग्य छे. शौनक ऋपि शास्त्रविधि पूर्वक अंगिरा मु- निने शरणे थइने प्रश्न करतो हवो के "हे भगवन् ! कोण एक स्वरूप जाण्ये छते सर्व वस्तु विज्ञात होय? " तेना उत्तरमां अंगिराए प्रथम तो "वे विद्ये वेदितव्ये" "परा चापरा च इति" एटले हे शौनक! पर विद्या अने अपर विद्या ए वेउ जाणवा योग्य छे एवं कहीने प्रथम ऋग्वे- दादिरूप एटले कर्म उपासनारूप अपर विद्या चित्तशुद्धिने अर्थे कथन करी; अनंतर- 'अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते"। अर्थः-जेणे करीने ते अक्षर स्वरूपनो सा- क्षात्कार थाय ते पर विद्या एटले वेद्य विषयक विज्ञान कहुंछौं एवी प्रतिज्ञा करीने- स्वरूपानुसन्धाननी यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमच- क्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादं नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनि परिपश्यन्ति धीराः॥ अर्थः- जे अक्षर ब्रह्मस्वरूप 'अद्वेश्यम्' एटले सर्व एवां ज्ञानेंद्रियोथी अगम्य छे; तथा अयाचं' एटले कमेंद्रियोर्नु अविषय छे; तथा अगोत्रम् ' एटले वंशरहित छे अर्थात् एन को- इ मूळ नथी के जेथी वंशवाळु कहेवाये; तथा 'अवर्ण' एटले स्थूलत्वादि अने शुक्लत्वादि द्र- व्य धर्मोथी रहित छे; तथा 'अचक्षुःश्रोत्रं' एटले नाम रूप छे विपय जेमनो एवां श्रोत्र अने चक्षु इंद्रियथी रहित छे; तथा 'अपाणिपादं' एटले हस्तपादादि कर्मेंद्रियोथी रहित छे, वळी 'नित्यं,' एटले अविनाशी छे: तथा — विभुं' एटले ब- माथी आरंभीने स्तंब पर्यंत प्राणि भेदे करीने विविध प्रकारे होनार; तथा 'सर्वगतं ' एटले सर्वत्र व्यापक; तथा 'सुरुक्ष्म ' एटले अत्यंत सूक्ष्म छे; वळी 'अव्ययं' एटले अवयवोना अ- पचयरूप अपक्षये रहित छे अर्थात् अवयवना राहित्यथी शरीरनी पेठे अपक्षयचाळु नयी तथा पंचम प्रक्रिया. १६१ गुण द्वाराये पण अपक्षयवालु नथी निर्गुण छ मादे; तथा 'भूतयोनि' एटले सर्व भूतोतुं का- रणभूत; तथा सर्वनुं आत्मारूप एवां अक्षर स्व- रूपने 'धीराः' एटले जे विवेक बुद्धिवाळा पुरुपो तेज ‘परिपश्यन्ति' एटले अपरोक्ष करेछे ए रीते उपक्रम करीने मुण्डक ३, खंड १, मंत्र ७- यहच तदिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच तत्सूक्ष्मतरं विभाति । दूरात्सुदूरे त- दिहान्तिके च पश्यत्स्विहेव निहित- गुहायाम् ॥ १॥ अर्थ:- ते ब्रह्मस्वरूप 'वृहत् ' एटले अति म्होटुं छे; तथा 'दिव्यं' एटले स्वयंप्रकाश अ- र्थात् इंद्रियोर्नु अगोचर अने एज हेतुथी 'अचि- त्यं' एटले जेनुं स्वरूप चिन्तवनमा महान प्रयत्ने आवे; तथा 'सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं' एटले सूक्ष्म एवां आकाशादिकथकी पण अति सूक्ष्म छे; तथा 'विभाति' एटले आदित्य चंद्रादि विविधरूपे करीने देदीप्यमान छे; वळो 'दूरात्सुदूरे' एटले दूर देशथकी पण अत्यंत दूर छे; केमके अवि- द्वानोने अत्यंत अगम्य छे; वळी 'इहान्तिके च' एटले आ देहने विपे तथा समीपने विपे पण छे;

स्वरूपानुसन्धाननी केमके विद्वानोने आत्मारूप छे, अने सर्वथकी आन्तर छे; तथा पश्यत्सु इहैव निहितगुहायाम' एटले साक्षात्कार करनार योगी पुरुपोने तो आज शरीरमा बुद्धिरूप गुहामां निगूढ रहेलं अनु- भव करवामां आवेछे१. आ प्रकारे उपसंहार कर्यो छ १. तथा मुण्डक २, खंड १, मंत्र २, दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुपः सवाह्याभ्यंत- रोह्यजः। अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥ अर्थः- जे प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्म 'दिव्यः' ए. टले स्वप्रकाशरूप छे; तथा 'अमूर्तः' एटले सर्व मूर्तिये रहित छे अर्थात् निराकार छे; तथा पुरुषः' एटले पूर्णस्वरूप अथवा शरीररूपी पुरने विषे रहेनार छे; तथा सवाह्याभ्यन्तरः' एटले बाह्य अभ्यन्तर सर्व दृश्य सहित छे अर्थात् अध्यस्त एवां सर्व दृश्यनो अधिष्ठानरूप छे; तथा 'अजः 'ए- टले जन्मरहित छे; केमके जेम जलवुद्दादि- कनी उत्पत्तिमा वायु आदि निमित्त छे; वळी जेम आकाशनां छिद्रभेदोमा घटादि निमित्तभूत छे तेम आत्माने विपे कोई पण जन्मनु निमित्त न- थी; कारण के सर्वथी आय छे. (जन्मरूप विका पंचम प्रक्रिया. १६३ रना निपेधे करीने पाव विकारोनो निपेध जाणी लेवो.) तथा 'अप्राणः' एटले यद्यपि जनोने अविद्याना वशथी देहना तादात्म्ये करीने सप्राण जेवो आत्मा भासेछे; जेम आकाशने विपे मालिन्यादि नथी, तो पण भासेछे तेम; तथापि परमार्थ दृष्टिये क्रिया शक्तिमान् चलना- त्मक प्राणथी रहित छे; तथा 'अमनाः' एटले मनधी रहित छे; (प्राण अने मनना निषेधे क- रीने अपानादि सर्व वायुभेदो तथा कर्मेंद्रियो तथा तेमना गमनादिक विषयो तथा ज्ञानेंद्रियो अने तेमना विपय शब्दादिओथी पण रहित छे एम जाणवू.) ए रीते उपाधिना राहित्यथकी अ- दयरूप छे माटे 'शुभ्रः' एटले शुद्ध छे; तथा परतः अक्षरात्परः' एटले पोताना कार्यरूप वि- कारनी अपेक्षाये पर एवं जे नामरूपन बीज- भूत अव्याहत तेथकी पण पर छे एटले निरु- पाधिक के इत्यादि मंत्रोये करीने वारंवार स्व- रूपकथनरूप अभ्यास देखाड्योछे २. मुण्डक ३, खंड १ मंत्र ८ न चक्षुपा गृह्यते नापि वाचा ना- न्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा॥ अर्थ:-जे प्रत्यक् ब्रह्म अरूप छे माटे चक्षु- स्वरूपानुसन्धाननी रिद्रियथी ग्रहण करी शकातुं नथी; तथा अवाच्य छे माटे वाह इंद्रिये करीने पण कथन करी श- कातुं नथी; तथा श्रोत्रादि इतर इंद्रियोये करीने पण विपय करी शकातुं नथी; तथा सर्वनी प्रा. प्तिमा साधनभूत एवां तपे करीने पण ग्रहण करी 'शकातुं नथी; तथा वेदोक्त एवां अमिहोत्रादि क- में करीने पण ग्रहण करी शकातुनथी एरीते प्र- त्यक्षादि इतर प्रमाणे करीने अगम्यतारूप अपू- वैता कथन करी छे. ३. तथा मुण्डक २, खंड २, मंत्र ८ भिद्यते हृदयग्रंथि०" (आ श्रुति- नो अर्थ त्रीजी प्रक्रियामां लख्योछे.) ए रीते -निःशेप अनर्थनी निवृत्ति अने परमानन्दनी प्रा- तिरूप फल कथन कयुछे ४. तथा मुण्डक १, खण्ड ५, मंत्र ७ प्लवा ह्येते अढा यज्ञरूपा अष्टादशो- क्तमवरं येपुकर्म। एतच्छ्रेयो येऽभि- नन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवा- पियन्ति ॥ अर्थः- अग्निष्टोमादि यज्ञो' अढाः' एटले शिथिल एवां वाहाणरूप छे; तेमने चलावना- पंचम प्रक्रिया. १६५ रा १६ (शोळ ) ऋत्विज, पत्नी अने यजमान ए अढार नाविक छे; तेमां यज्ञरूप वाहाणने विनाशी होवाथी तेमा रहेला नाविको पण स्व- र्गादि फळनी संघाते विनाश पामेछे; जेम कुंडना विनाशथी क्षीरदध्यादिकनो नाश थायछे तेम; एम छत्ता जे अविवेकी मूढ पुरुपो केवल कर्मनेज श्रेयरूप मानीने आनंद पामेछे ते पुरुपो कि- श्चित्काल पर्यंत स्वर्गमा रहिने पछी वारंवार जन्म, मरण, जरादिकनेज पाम्या करेछे इ- त्यादिक मंत्रे करीने अज्ञानीओनी निंदा द्वा- राये ब्रह्मात्मैक्यनी स्तुतिरूप अर्थवाद कथन कर्योछे ५. तथा मुण्डक २, खण्ड २, मंत्र १ आविः सन्निहितं गुहाचरन्नान मह- पदमत्रैतत्समर्पितम् । एजत्प्राण- निमिषच्च ॥ अर्थः- जे प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्म 'आविः' एटले श्रवण, मनन, विज्ञान इत्यादि उपाधिरूप इंद्रियोना धर्मे करीने सर्व प्राणीओना हृदयमा आविर्भूत एवं छतुं जणायछे; ते आविर्भूत ब्रह्म सन्निहितं ' एटले हृदयमा सम्यक् स्थित छे; वळी 'गुहाचरं' एटले दर्शन श्रवणादिरूप प्र.

१६६ स्वरूपानुसन्धाननी
कारे करीने हृदयगुहामां गमन करनार ए रीते
प्रसिद्ध छ; वळी सौथी पण म्होटुं छे माटे महत
कहेवायछे; तथा बुद्धयादि सर्व पदार्थोनुं अधिष्ठान
होवाथी पद कहेवायछे. जे ब्रह्मने विपे 'एज-
त्' एटले चंचल पक्षी आदि; तथा 'प्राणत'
एटले प्राणापानादिमान मनुष्य पशु आदि; तथा
निमिपत् ' एटले उन्मेप निमेपादि क्रियावाटुं;
तथा ' अनिमिपत्' एटले स्थिर एवं सर्व दृश्य,
ते 'समर्पितम्' एटले अधिष्ठानने विपे अध्यस्त-
रूपे रझुंछे ए रीते उपपत्ति कथन करीछे.६
उपर जणावेला पविध लिंगोथी आ मुण्ड-
कोपनिपना सर्वे मंत्रोनुं ब्रह्मात्मैक्यना प्रतिपा-
दनमाज तात्पर्य छे. त्यांहां श्लोक:-
जायन्ते विस्फुलिंगा अनलत इह
यद्वत्प्रदीप्तात्सरूपास्तहत्सर्वेपि भा-
वा खलु यत उदिता यांति यस्मि-
ल्लयं ते । अप्राणः सर्वविद्यः प्रणव-
वरधनुः स्वात्मवाणेकलक्ष्यस्तं
जाननामरूपे त्यजति स भवति ब्र-
ह्मरूपो विशोकः ॥१॥

पंचम प्रक्रिया.. १६७ अर्थः-जेम देदीप्यमान अग्निथी विस्फुलिंगो उत्पन्न थायछे अने अग्निमांज लय थायछे तेम- ज आकाशादि सर्व पदार्थो जेनाथी उत्पन्न था- यछे अने जेने विपेज पाछा लय पामेछे; तथा जे प्राण रहित अने सर्व वेत्ता छे; तथा जे ॐकाररू- पधनुपने विपे संधान करेला स्वस्वरूपभूत आत्मा- रूप वाणनो एकलक्ष्यरूप छे ते प्रत्यक अभिन्न ब- ह्मने साक्षात्कार करनार पुरुप नाम रूपनो त्याग करीने ब्रह्मरूप थयो छत्तो शोक रहित होयछे. १ (५) प्रश्नोपनिपना अनुसारे विचार. मुण्डकोपनिपमा प्रतिपादन करेला अर्थ- नोज विस्तारने अर्थे आ प्रश्नोपनिषद्प ब्राह्म- ण छे. ऋषियोना प्रश्न उत्तररूपे जे आख्यायिका ते तो संवत्सर पर्यंत ब्रह्मचर्य पालन इत्यादि नियमे युक्त एवा जे शिष्य तेनेज ब्रह्मविद्या ग्रह- ण करवा योग्य छ; अने पिप्पलाद मुनिना जेवा सर्वज्ञ आचार्यनेज उपदेश करवा योग्य छे; अ- न्यने नहि ए रीते ब्रह्मविद्यानी स्तुतिने अर्थे छे. आ उपनिषद्मा पेहेला त्रण ऋपियोना त्रण १६८ वरूपानुसन्धाननी प्रश्नोमा जे अपरविद्यानो विपय देखाइयोछे, ते तो वैराग्य द्वाराये परविद्याने विपे अधिकार प्राप्तिने अर्थे छे.' • (१)भारद्वाज सुकेशा; (२) शैव्य सत्य- काम; (३) सौर्यायणि गार्य; (४) आश्व- लायन कौशल्य; (५) भार्गव वैदर्भि; (६) कात्यायन कवंधि ए छ ऋपियो ब्रह्मने विपे निष्ठावाळा छता पण अपरब्रह्मने विपेज पर- ब्रह्मपणुं जाण्याथी अपरविद्यानुज अनुष्ठान क- रता छता अने परमार्थ सत्यब्रह्मने अन्वेषण एटले खोळता छता विधिपूर्वक पिप्पलाद सुनिने शरणे गया; त्यारे पिप्पलादे कह्यु के, श्रद्धा, तप, ब्रह्मचर्य इत्यादि नियमे युक्त एक संवत्सर पर्यंत आंहि रहो, त्यार पछी अमो जे जाणता हइशें ते कहिशुं; ते प्रकारे कर्या नंतर प्रथम कात्या- यन कबंधिये प्रश्न कर्यो के, हे भगवन् ! आ सर्व प्रजाओ कोनाथी उत्पन्न थायछे ? उत्तर:- हे कवंधि ! पूर्व कल्पमां कर्म उपासनानो अनुष्ठान करनार कोइ एक जीवे आ कल्पमां हिरण्यगर्भ थईने सृष्टि करवानी इच्छाथी “हुं प्रथम आ- दित्य अने चंद्रने उत्पादन करी तद्भाव पामीने, पछी चंद्रादित्यसाध्य संवत्सरभाव पामीने, पछी पंचम प्रक्रिया. तेना अवयवरूप उत्तर दक्षिण वे अपन, माल, पक्ष, दिन, रात्री ए भाव पामीने, पछी तेथी साध्य त्रीहि आदि अन्नभाव द्वारा रेतसभाव पा- मीने ते द्वारा सर्व प्रजाओने सृजूं." ए रीते चितवन करीने प्रथम अत्ता प्राणरूप आदित्य तथा अद्य एटले अन्नरूप चंद्र ए बेउनुं रयिरूप सुंगल सृज्यु; अने तद्द्वारा सूक्ष्म, स्थूल सर्व प्रजाओ सृजी; तेमा जे पुरुष इष्टापूर्नादि केवळ कर्मनुं अनुष्ठान करे ते दक्षिण मार्ग द्वारा चंद्र लोकमा जइने पुण्य ना क्षयथी अनन्तर पुनरा: त्ति पामे, ते मार्ग पितृयाण कहेवायछे; तथा जे पुरुप श्रद्धा, तप, ब्रह्मचर्य युक्त थइने उपास- नानुं अनुष्ठान करे ते आदित्य लोकनो जय क- रेछे अने पुनरावृत्ति पामतो नथी इत्यादि वात प्रथम प्रश्नना उत्तरमा निरूपण करीछे. १ भार्गव वैदर्भिये द्वितीय प्रश्न कयों के, है भगवन ! ज्ञानेंद्रिय, कर्मेद्रिय, प्राण, मन तथा पंचद्भुत ए मध्ये केटला देव आ शरीरनुं विधा- रण करेछे अने प्रकाश करेछे? तथा ए सर्व मध्ये वरिष्ठ (श्रेष्ट) देव कोण छे ? उत्तरः- हे शिष्य ! आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वा: क्, मन, चक्षु, श्रोत्र इत्यादि सर्वे शरीरने प्रका- .

१७० स्वरूपानुसन्धाननी शमान करीने प्रत्येक प्रत्येक विवाद करवा लाग्या के “हुँ शरीरनुं धारण करुंछौं.” त्यारे श्रेष्ठ प्राणे कह्यु के “तमे शरीरनां धारणनो अभिमान करो मा; हुंज पांच प्रकारे विभक्त थईने शरीरनु वि- धारण करूंछौं.” ए रीते प्राणना बोलवा उपर इतर देवोने विश्वास न आवतां प्राणे अभिमा- नथी उत्क्रमण थवा जेवू कयु, के तुरतज इतर देवो व्याकुळ थई गया, अने प्राण पाछो प्रति- ष्ठित थयो, के तुरतज बीजा देवो प्रतिष्ठित थया, अने प्राणनी स्तुति करवा लाग्या के “हे प्राण! तुंज श्रेष्ठ छो; त्हारे आधारेज सूर्य, चंद्र, पर्ज- न्यादि सर्व जगत रझुंछे; अने सूर्य, चंद्र, इंद्रादिरू- प पण तुंज छो; माटे अमारी रक्षा कर" इत्यादि वात बीजा प्रश्नना उत्तरमा निरूपणकरीछे. कौशल्य आश्वलायने त्रीजो प्रश्न कर्यो के "हे भगवन्! ए प्राण कोनाथी उत्पन्न थायछे? अने भी शरीरमां शी रीते आवे? तथा पांच प्रकारे विभक्त थइने शी रीते रहेछे ? अने शी रीते उत्क्रमण करेछे ? अने अध्यात्म, अधिदैव, अधिभूतने शी रीते धारण करेछे ? उत्तरः-जेम शरीरथी अ- सत् छाया एटले पडछायो उत्पन्न धायछे तेमज आत्मारूप अक्षर पुरुपथी अमृतरूप प्राण उत्प- पंचम प्रक्रियाः १७१ नथायछे, अने कर्मरूप निमित्ने करीने शरीरमा आवेळे; तथा राजानी पेठे सर्व इंद्रियोने पृथक पृथक् स्थानोमा पृथक् पृथक् व्यापारने विपे अ- धिकार आपेछे; तथा ए प्राण पांच प्रकारना - तिभेदे करीने शरीरमा रह्योछे; वळी ए प्राण हृदयगत सुषुम्णा नाडीनी दाराये पुण्यवानने पु- ण्य लोकमा पमाडेछे अने पापीने अधो लोक- मां पमाडेछे; तथा एज प्राण वाह्य आदित्यरूप अधिदैवतरूपे रह्यो छतो, चक्षुरादिरूप अध्यात्म- ने तथा अधिभूत एटले स्थूळ शरीर अने विपयोने अनुग्रह करेछे (चलावेछे); तथा मरण काळे जीपनु चित्त जे शरीरादिकने विषे जाय, ते जीव संकल्पात्मक चित्त अने इंद्रियोनी साथे मुख्य प्राणमा आवे. तात्पर्य ए के, मरण समये क्षीण थईछे इंद्रिय वृत्तियो जेनी एवो छतो प्राण वृत्तिरूपे करीनेज रहेछे, के जेने ज्ञाति लोको श्वास मात्र चालेछे एम कहेछे; ते प्राण उदान- वृत्तिये करीने उत्कमण करतो छतो ते भोक्ता जीवने पुण्य पापना वशथी संकल्पानुसारी लो- कने पमाडेछे ए रीते जे पुरुष प्राणने जाणीने उपासना करे तेनी पुत्रपौत्रादिरूप प्रजा वि- च्छिन्न थाय नहि; अने शरोरपात थया नंतरप्रा- .

- १७२ स्वरूपानुसन्धाननी णना सायुज्यथकी अमृत होयछे एटले सापेक्ष अमृतभावने पामे. उपर कहेला अर्थनो संग्राह- क श्लोकरूप मंत्र:- उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पंचधा। अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञा- यामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुते ॥१॥ अर्थः- पूर्वोक्त प्राणनी परमात्माथकी उ- त्पत्तिने तथा 'आयति ' एटले शुभाशुभ कर्म वशथी शरीरमा आवागमनने तथा 'स्थानं' एटले स्थितिने तथा ‘विभुत्वं' एटले सम्राट्नी पेठे सर्व इंद्रियोने पायु उपस्थादि ते ते स्थानो विषे अधिकारना प्रदानरूप स्वामीपणाने तथा प्राणादि वृत्तियोनां पांच प्रकारे स्थापनने तथा बाह्य आदित्यादि अधिदैवतरूपे अवस्थानने तथा चक्षुरादि अध्यात्मरूपे अवस्थानने जे जाणे ते अमृतभाव पामे एटले सापेक्ष अमृतभाव पामे १. इत्यादि वात त्रीजा प्रश्नना उत्तरमा निरूपण करीछे. ३ पूर्वे त्रण प्रश्नोना उत्तरे करीने चित्तशुद्धि- द्वारा परविद्याने विपे अधिकारप्राप्तिने अर्थे अप- रविद्या विपयक साध्य साधनरूप नामरूपात्मक पंचम प्रक्रिया. १७३ व्यारूतमा अंतर्गत अने अनित्य एवा संसारनी समाप्ति करी; हवे असाध्य साधनरूप तथा प्रा- जनुं अविपय माटेज क्रियात्मक कर्मेंद्रियोg पण अविषय, तथा मननु अविषय माटेज ज्ञानेंद्रियोनुं पण अविपय, तेथी सुखरूप, निर्विकार, सत्य अने परविद्याये करीनेज गम्य तथा कल्पित सर्व प्रपञ्च अधिष्ठानभूत पुरुपाख्य प्रत्यक् अभिन्न जे ब्रह्म तेना निरूपणने अर्थे उत्तर एवा त्रण प्रश्नोछे. सौर्यायणि गायें प्रश्न का के "हे भगवन् ! शिरःपाणि आदि अवयववान् एवा पुरुपने विपे कहां करणो स्वाप करेछे एटले स्व व्यापारथी उपराम पामेछे? १. तथा कहां करणो जाग- रूक होयछे एटले व्यापारथी उपराम पामतां न- थी? २. तथा कह्यो देव स्वप्नोने जुवेछे ? ३. त- था जाग्रत् स्वप्ननो उपराम धये छते श्रम रहित मुख कोने होयछे? १. तथा सुपुप्ति प्रलयने विषे करणादि संघात कोने विपे एकीभूत थइने सम्य- क् प्रतिष्ठित होयछे ? तात्पर्य एके, सुषुप्ति अने प्र- लयने विपे कार्यकरणनो संघात जेने विपे लीन होयछे ते कोण ? ५.उत्तर:-हे गार्य! जेम अस्त पामता सूर्यना किरणो सूर्य मंडलमा एकीभूत

१७४
खरूपानुसन्धाननी
होयछे अने सूर्य उदय पामे छते पाछां प्रसार
पामेछे तेमज सर्व एवां विपयेंद्रियादिक वृंद
स्वप्न कालने विषे द्योतनात्मक मनने विषे एकी-
भाव पामेछे अर्थात् अविशेषपणाने पामेछे अने
मन जागरूक थये छते पार्छ प्रसार पामेछे तेथी
सर्व पण देवदत्तादि पुरुप स्वाप कालने विषे
चक्षुरादि ज्ञानेंद्रियोये करीने बाह्य शब्दादि वि-
षयोने ग्रहण करी शकतो नथी; तथा कर्मेंद्रि-
योये करीने भापणादि व्यापार करी शकतो नथी%B
किंतु शयन करेछे एम तेने कहेछ.१आ शरीररू-
पी पुरमां पांच प्राणरूपी अग्निओज जागेछे-तेमा
अपान गार्हपत्य छे अने व्यान अन्वाहार्यपचन
एटले दक्षिणाग्नि छ; जे माटे गार्हपत्यरूप
अपानथी प्राणर्नु प्रणयन(उर्द्धगमन )थवापj
छे, तेथी प्राण आहवनीयरूप छेजे माटे उच्छा-
स, निश्वासरूप वे आहुतिने साम्ये करीने शरी-
रनी स्थितिने अर्थे पमाडेछे माटे ते वायु समान
एटले होता कहेवायछे; (होतारूप समाननी पं-
चाग्निमा जे गणना करी ते छत्री न्याये करीने
जाणवी.) तथा मन यजमानरूप छ; अने इष्ट
फलनी प्राप्तिमा निमित्तभूत होवाथी उदान वायु
इष्ट फलरूप छे; ते उदान मनरूप यजमानने

पंचम प्रक्रिया. स्वप्नत्तिथी पण प्रत्युत करीने सुषुप्ति काळने विषे दिनदिनप्रति ब्रह्मरूप स्वर्गने पमाडेछे. (आ ठेकाणे अग्निहोत्रना रूपकथी विद्वान पुरुपनो खाप पण अग्रिहोत्ररूपज छे एम जाणवू.) वळी उपर कह्या प्रमाणे प्राणनी उपासना कथन करी एम पण समजवु नहि; किंतु इंद्रियो उपराम पामे छते प्राणन जागेछे एवो अर्थ विवक्षित छे. २(उपर करेलां वर्णने करीने त्वं पदार्थना शोधनरूप ज्ञाननी स्तुति करी एवो तात्पर्यार्थ छे.) तथा सर्व इंद्रियो उपराम पामे छते अने प्राण देह रक्षाने अर्थे जागरूक रहे छते सुषुप्तिनी उत्पतिथी पेहेला अंतरालावस्थाने विषे मनरूप देव सर्वे इंद्रियो पोताने विपे एकीभाव पामे छते विषय विपयितारूप महिमानो पोताने विपे अ- नुभव करेछे एटले जाग्रत काळे जोयेला पदार्थो- ने जुवेछे, अने श्रुत पदार्थोनुं श्रवण करेछे; तथा देश काळादिकनो अनुभव करेछे, तथा दृष्ट, अ- दृष्ट, श्रुत, अश्रुत, अनुभूत, अननुभूत सर्वने जु- वेछे; ए रीते मनरूप उपाधिवाळो आत्मा स्वभीने जुवेछे. ३ ते मन देव ज्यारे चिंताख्य सूर्य तेजे क- रीने अने ब्रह्म तेजे करीने नाडीओ विषे अभिभूत (तिरस्कार) थयुछ वासनारूप हार जेनुएवो होय- १७६ स्वरूपानुसन्धाननी छे, त्यारे करणोनी साथे मननो वृत्तिरूप किरणो हृदयमा उपसंहार थायछे तेथी ते मन'चेतना' शब्दे करीने वाच्य एवां सामान्य विज्ञानरूपे करीने सर्व शरीरमा व्यापीने रहेछे; ए काळने विपे मन देव स्वप्नोने जोतो नथी, केमके वासनारूप द्वारनो तिरस्कार थयोछे; त्यार पछी आ शरीरमा विज्ञा- नरूप निर्वाध अने अविशेपे करीने सर्व शरीर व्यापक एवं जे सुप्रसन्न स्वरूप सुख तद्रूप हो- यछे; अर्थात् सुषुप्तिमा, ४ (एटला ग्रंथे करीने आनन्दमय शब्दे वाच्य अने अनभिव्यक्त तथा मन आदि वासनावाळु जे ज्ञानस्वरूप ते सुषुप्तिहुँ धर्मिरूप छे ए वात कथन करी.) हवे गाय॑ना पांचमा प्रश्ननो उत्तररूप जे तुर्य स्वरूप तेने वि- वेचना करीने आ शरीरमांज देखाडेछे के, हे शिष्य! ए सुषुप्ति काळने विपे अविद्या, काम, क- मैहेतुक कार्यकरणो उपशांत होयछे अने तेओ उपशान्त थये छते पूर्व उपाधियोथी अन्यथा भावना करेलं एवं जे आत्मस्वरूप ते अदय, ए- क, शान्त, शिवरूप होयछे; एज अर्थन दृष्टान्त- पूर्वक प्रतिपादन करेछे के, हे सौम्य ! जेम पक्षि- ओ भ्रमण करी करीने निवासने अर्थ वृक्ष प्रत्ये जायछे तेमज पृथ्वी तथा तेनी मात्रा गंध; अप पंचम प्रकिया. ৭৩৩ तथा तेनी मात्रा स्पर्श; आकाश तथा तेनी मा- त्रां शब्द अर्थात् स्थूळ सूक्ष्म भूतो; तथा चक्षु- रिद्रिय अने द्रष्टव्य; श्रोत्र अने श्रोतव्य; घाण अने घातव्य; रसना अने रसयितव्य; त्वक् अने स्पर्शयितव्य; वाक् अने वक्तव्य; हस्त अने आ- दातव्य; उपस्थ अने आनंदयितव्य; प्रायु अने विसर्जयितव्य; पाद अने गंतव्य अर्थात् वुद्धिक- मैंद्रियो अने तेमना विपयो; मन अने तेनो विषय मंतव्य; बुद्धि अने बोद्धव्य; अहंकार अने अहं- कर्तव्य चित्त अने चेतयितव्य अर्थात् अन्तः- करणचतुष्टय अने तेना विपयो; तेज अने यो तयितव्य: प्राण अने विधारयितव्य ए सर्व नाम- रूपात्मक अक्षर परमात्माने विपे लीन थाय- छे. ५. पूर्वोक्त सर्व उपाधियोथी पर अने ते उपा. धियोमा कर्तृख भोक्तृत्वरूपे प्रविष्ट एवं जे आ- त्मस्वरूप तेज द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घाता, रस- यिता, मंता, वोद्धा, कर्ता अने विज्ञानमय छे; ते प्रमाता आत्मा जेम जळमां पडेलं सूर्य प्रति- बिंब जळ शोषण थये छते विम्बत सूर्यने विपे विलय पामेछे तेमज परम अक्षरस्वरूपने विपे एटले विम्वभूत साक्षीस्वरूपने विपे विलय पामेछे. अभिप्राय ए के, उपाधिने लेइने आत्मा १७८ स्वरूपानुसन्धाननी उपहित हतो ते उपाधियोनो लय थये छते पोते अनुपहितस्वरूपज होयछे एन लय शब्दनो अर्थ ए रीते शोधित तुरीय स्वरूपर्नु शुद्ध ब्रह्मनी साथे ऐक्य, अने ऐक्य ज्ञाननु फल कहेछे के, ते शो- धित तुरीय आत्मा अच्छाय एटले तमोवर्जित तथा नामरूपात्मक शरीरोपाधिधी रहित तथा सर्व धर्मोथी रहित, शुद्ध, सत्य, निर्विकार, प्राण, मन आदिकनु अविषय, कल्पित सर्व प्रपञ्चर्नु अ- धिष्ठानरूप,शान्त एवं शिवस्वरूप होयछे. सर्वैष- णाओथी विनिर्मुक्त अने सर्वत्यांगी एवो जे कोइ अधिकारी पुरुप ए रीते ब्रह्मात्मैकत्वनो गुरुथी साक्षात्कार करे ते सर्वज्ञ होयछे एटले पूर्व अ- विद्याथी असर्वज्ञ हतो ते अविद्यानो ऐक्य ज्ञान- थी नाश थये छते सर्वज्ञ होयछे अने सर्वरूप होयछे. पूर्वोक्त अर्थनो संग्राहक श्लोक मंत्र:- विज्ञानात्मा सह देवैश्च सव्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र । तदक्षरं वेदयते यस्तु सौम्य स स- वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ अर्थ:- विज्ञानात्मा एटले प्रमाता तथा अ. ग्यादि देवताओनी संघाते सर्व इंद्रियो तथा पंचम प्रक्रिया, १७९ पृथिव्यादि सर्व भूतो जे अक्षरने विये विलय पामेछे ते अक्षर ब्रह्मने हे सौम्य ! जे जाणे ते सर्वज्ञ होयछे; अने सर्व एटले पूर्ण होयछे. एटली वात चोथा प्रश्नना उत्तरमा निरूपण करीछे.१. हवे पर अपर ब्रह्मनी प्राप्तिनुं साधनस्वरूपे करीने ॐकारनी उपासनानां विधानने अर्थे आ पांचमा प्रश्ननो आरंभ छे. शैव्य सत्यकामे प्रश्न कर्यों के, हे भगवन् ! मनुष्यो मध्ये जे कोइ पुरु- ष सत्य, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अपरिग्रह, त्याग; संन्यास, शौच, संतोप, अमायित्व इत्यादि यम नियमे युक्त थईने वाह्य विपयोथी उपसंहार की छे इंद्रियो जेणे एवो छतो यावजीव ॐकारनुं अभियान करे एटले आभिमुरव्ये करीने चिन्तवन करे ते यावजीव व्रतधारी ज्ञान कोथी प्राप्य एवा तो अनेक लोको छे एटले चंद्र सूर्यादि स्थानो छे ते मध्ये ॐकारनी उपासनाथी कहा लोकने जीते? ॐकारनुं उपासन अपर ब्रह्मना अवलंबने कर्यु होय तो अपर ब्रह्मनी प्राप्तिनुं साधन छे अने परब्रह्मना अवलंबने करीने क- यु होय तो पर ब्रह्मनी प्राप्ति साधन छे एवा अभिप्रायधी उत्तर आपेछे के, हे सत्यकाम! सत्य, अक्षर, पुरुपाख्य जे परब्रह्म तथा प्रथम-

१८० स्वरूपानुसन्धाननी
जन्य प्राणारख्य हिरण्यगर्भरूप जे अपर ब्रह्म ते
बन्ने ॐकारात्मकज छे माटे.शंका:-- ब्रह्म दृष्टि-
ये ॐकारनी उपासना उपदेश करी, ते करता
साक्षात्परब्रह्मनीज उपासना उपदेश केम न
करी? समाधान:-ब्रह्म, आत्मा, सत्य इत्या-
दिक शब्दोर्नु अविपय तथा सर्व धर्मोथी रहित
इंद्रियातीत एवं शुद्ध ब्रह्म केवळ मने करीने
चिन्तवन करी शकायज नहि माटे प्रतिमास्था-
नीय ॐकारने विपे भक्तिथो ब्रह्मदृष्टिना आवेशे
करीने जे ध्यान करे ते पुरुपने तो ब्रह्म पोतेज
प्रसन्न थाय ए प्रकारे शास्त्रना प्रामाण्यथी जणा-
यछे माटे ॐकारनी उपासना कहीछे; वास्तेज
जे पर अपर ब्रह्म तेज उपचारथी ॐकाररूप
कमुछे; ए रीते जाणनार पुरुष आत्मप्राप्तिमा
साधनभूत ॐकारे करीने पर अथवा अपर जेनु
ध्यान करे तेने पामे, वास्ते ॐकार ब्रह्मप्राप्तिमा
अत्यंत समीप साधन छे; कदापि उपासक पुरुप
ॐकारनी मात्राओना विभागने न जाणतो होय
तो पण तेने विशेप गति प्राप्त थाय. जे कोइ पुरुप
ॐकारनी एक मात्रानुज ध्यान करे ते पुरुपर्ने -
ग्वेदरूप ॐकारनी प्रथम मात्रा पृथ्वीमा साधक
एवा मनुष्य लोकने पमाडेछे; ते पुरुप श्रेष्ठ दिन

पंचम प्रक्रिया. १८१ जन्म पामीने तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा संपन्न थयो छतो विभूति( ऐश्वर्य )नो अनुभव करेछे; यथे टाचारी होय नाह योगभ्रटने कोइ काळे पण दुर्गतिनी प्राप्ति थाय नहि ए वात भगवद्गीतामा पण कहेलीछे. हि मात्रानो विभाग जाणनार जे पुरुप हि मात्रा विशिष्ट ॐकारनुं ध्यान करे ते पुरुप स्वप्नात्मक यजुर्मय अने सोमदैवत्य एवां मनने विपे संपन्न होयछे एटले एकायताये करीने मनने विपे आत्मभाव पामे; तथा ते पुरुपने द्वि- तीय मात्रारूप यजुर्वेद अन्तरिक्ष छे आधार जे- नो एवा सोम लोकने पमाडे; ते पुरुप त्यांहां विभूतिनो अनुभव करीने मनुष्य लोकने विपे पु. नरावृत्ति पामे. जे पुरुप त्रिमात्रक ॐकाररूप प्रतीके करीने सूर्य मंडलमां अंतर्गत परपुरुपर्नु ध्यान करे ते पुरुष सूर्यने विपे संपन्न होय एटले तदात्मभावने पामे; ते पुरुष सोम लोकधी जेम, तेम पुनरावृत्ति पामतो नथी; किंतु जेम सर्प त्व- चाथी निर्मुक्त थायछे तेम पुण्य पापथी निर्मुक्त थयेला ते पुरुपने तृतीय मात्रारूप सामवेद हि- रण्यगर्भ लोकने एटले जीवधनने पमाडे; (जीवो लिंगात्मा हिरण्यगर्भने विपे संहत थईने एटले घनीभाव पामीने रह्याछे माटे हिरण्यगर्भ जीवधन 92 १८२ स्वरूपानुसन्धाननी कहेवायछे.) हिरण्यगर्भभावने पाम्यो ते पुरुष ध्यान करतो छतो जीवघनथी पण पर एवा पर- मात्मपुरुषनो साक्षात्कार करे. पूर्वोक्त अर्थना संग्राहक मंत्र श्लोक २. तिस्त्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अ- न्योन्यसक्ता अनुविप्रयुक्ताः । क्रि- यासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्य- क्प्रयुक्तासु न कम्पतेज्ञः॥ १ ॥ ऋग्भिरेतं यजुझिरन्तरिक्षं ससा- मभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते । तमो- ङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विहान् यत्त- च्छान्तमजरममृतमभयं परञ्चेति॥२॥ अर्थः- ॐकारनी अकार, उकार, मकारा- त्मक एवी त्रण मात्राओ 'मृत्युमत्यः' एटले मृत्युगोचर छे; तात्पर्य ए के, ब्रह्मदृष्टि विना ए त्रण मात्राओना उपासक जे पुरुप तेमने मृत्यु अनतिकमणीय होयछे एटले जीताइ शकाय नहि, अने ब्रह्मदृष्टिये करीने जो उपासना करे तो दोप नहि ए बात कहेछे के, जे विश्वारख्य जाग्रत् पुरुप ते वैश्वानरथी अभिन्न छे अने स्थूल पंचम प्रक्रिया. १८३ शरीर तथा जागरित ए तेतुं स्थान छे; तथा तैज- सारख्य जे स्वप्न पुरुप ते हिरण्यगर्भथो अभिन्न छ अने लिंग शरीर तथा स्वप्न तेनुं स्थान छे; तथा प्राज्ञाख्य जे सुषुप्ति पुरुप ते ईश्वरथी अभिन्न , अने अव्याहत तथा सुपुप्ति तेनुं स्थान छे ए रीते तादात्म्ये करीने अभिध्यानरूप जे योगक्रियाओ तेमने विपे त्रण मात्राओ समुदायरूपे अथवा पृथक्रूपे प्रयुक्त करी होय तो ते ज्ञानी चलित होय नहि; (एणे करीने सर्वात्मक एवा ब्रह्मरूप ईश्वरने विपे ॐकारना अभेदे करीने ध्यान कथन कर्यु. )ए रीते ध्यान कर्ये छते चलन केम न होय ? एवीशंका करवी नहि केमके पोतानेज सर्वात्म- क होवाथी पोताथी अतिरिक्त चलनना हेतुनोज अभाव छे. १. प्रथम मात्रांना उपासक मेधावी पुरुपो ऋग्वेदरूप अकार मात्राये करीने मनुष्य लोकने पामेछे; अने द्वितीय मात्राना उपासक यजुर्वेदरूप उकार मात्राये करीने सोम लोकने पामेछे; तथा तृतीय मात्राना उपासक सामवेद- रूप मकार मात्राये करीने ब्रह्म लोकने पामेछे: अमेधावी पुरुप पामता नथी, ते त्रिविध लोकरूप अपर ब्रह्मने ॐकाररूपसाधने करीने पामेळे अने जे अक्षर, सत्य, पुरुपाख्य, शान्त तथा जायत् स्वरूपानुसन्धाननी स्वप्न सुषुप्त्यादिथी वर्जित, अजर, अमृत, निर- तिशय आनन्दरूप ब्रह्म तेने पण पामेछे.२. एट- लीवात पांचमा प्रश्नना उत्तरमा निरूपण करीछे. पूर्वे कार्यकारणात्मक सर्व जगत् विज्ञाना- त्मानी साथे सुषुप्ति काळमां पर अक्षर स्वरूपने विषे लय पामे एम कर्यु तेथी प्रलय काळमा पण तेज अक्षर स्वरूपने विषे सर्व जगत्नो लय थाय अने ते पर अक्षरथीज पार्छ उत्पन्न थाय ए वात पण अर्थात् सिद्ध थइ. अकारणमां का- र्यनो लय होयज नहि माटे आत्माथीज प्राण उत्पन्न थायछे ए प्रकारे आत्माने कारणपणु पूर्व कपुंछे, अने जगत्तुं जे सत्य स्वरूप भूळ तेनां परिज्ञानथकीज परम श्रेय प्राप्त थाय ए प्रकारे सर्वे उपनिषदोनो सिद्धान्त छे; बळी "स सर्वज्ञःसर्वो भवति" (जे पुरुष सर्वन लयस्थान अक्षर स्वरूपने जाणे ते सर्वज्ञ होयछे अने सर्वरूप होयछे.) ए रीत हमणांज उपर कही आव्या छैये वास्ते वेद्य एटले जाणवा योग्य पुरुपारव्य अने सत्य एवं ते अक्षर स्वरूप क्या- हो रघुछे ते कहे जोइए माटे आ छठा प्रश्नो आरंभ छे. सुकेशा भारद्वाजे प्रश्न कों के हे भगवन्! को- पंचम प्रक्रिया. १८५ सला नगरीना राजाना पुत्र हिरण्यना म्हारो पासे आवीने प्रश्न कर्यो के “हे भारद्वाज ! पोड- शकल (सोळ कलावाच ) पुरुपने तमे जाणोछो माटे मने तेनो उपदेश करो.” त्यारे तेने में कडं के “ हे हिरण्यनाभ! पोडशकल पुरुषने हुँ जाणतो नथी, जो जाणतो होउं तो केम न क- हुँ; जे कोइ वास्तव स्वरूप आत्माने जाण्या विना अन्यथा कथन करे ते अनृतवादी पुरुप उभय लोकधी भ्रष्ट थाय, माटे जाण्या विना हुँ अनृत कहेवा योग्य नहि." पछी ते राजपुत्र तूष्णीं थइने रथमां वेशीने गयो; माटे तमने पु- छुछौं के, ते पोडशकल पुरुपक्यांहां छ? उत्तरः- हे सौम्य! ते पोडशकल पुरुप आज शरीरमां अन्तःस्थित छ, देशान्तरने विपे जाणवा योग्य नथी: जेने विपे वक्ष्यमाण प्राणादि सोळ कळाओ विवर्तरूपे उत्पन्न होयछे ते सोळ कलारूप उ- पाधियोथी कला रहित छतां पण कळा सहितज जाणे होय शुं तेवो जणायछे; वास्तवथी तो वि- द्याये करीने निष्कल (कलारहित) लक्षित थाय छे. अध्यारोपित कलाओना अपनयन(अप- बाद )थी विद्याये करीने ते निष्कल पुरुपनो १८६ स्वरूपानुसन्धाननी साक्षात्कार कराववोछे माटे प्रथम तो पुरुषधी कलाओनो उद्भव कहेछे केः- हे शिष्य ! ते पुरुप सृष्टिक्रमने विपे ईक्षण करतो हवो; शी रीते के “कोण काविशेष देह- थी उत्क्रमण कर्ये छते हुंज उत्क्रमण करूं ? अ- ने शरीरमा कोण प्रतिष्ठित थये हुं प्रतिष्ठित था- उ?" ए रीते ईक्षण करीने ते पुरुप सर्व प्राणि- योना करणोनो आधारभूत अने जे उपाधिये करीने हिरण्यगर्भ एवी आख्या थाय ते लिंगात्मा समष्टि प्राणने सजतो हवो १. त्यार पछी सर्व प्राणियोनी शुभाशुभ कर्मने विपे प्रवृत्ति थवामा हेतुभूत एवी श्रद्धाने स्त्रजतो हवो २. त्यार पछी कर्मफलोना उपभोगनां साधन इंद्रियादिकना अधिष्ठानभूत माटेज कारणभूत एवां महाभूतो- ने सजतो हवो; ते महाभूतोने विषे प्रथम शब्द गुण विशिष्ट आकाशने रजतो वो ३. त्यार पछो शब्द स्पर्श दि गुण विशिष्ट वायुने स्त्रज- तो हवो १. त्यार पछी शब्द,स्पर्श, रूप त्रिगुण विशिष्ट तेजने रजतो हवो ५. त्यार पछी शब्द, स्पर्श, रूप, रस चार गुण विशिष्ट अपने स्रज- तो हवो ६. त्यार पछी शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध पांच गुण विशिष्ट पृथ्वीने सजतो हदो ७.

पंचम प्रक्रिया. १८७ त्यार पछी एज भूतोषी आरब्ध एवां ज्ञानकि- यानां साधनभूत दश इंद्रियोने स्त्रजतो हवो ८. त्यार पछी ते इंद्रियोनुं नियामक संशय संकल्पा- दिरूप मनने जतो हवो ९. ए रीते प्राणियो- नां कार्यकारणोने सजीने पछी प्राणियोनी स्थि- तिने अर्थे ब्रोहियवादिरूप अन्नने सजतो वो १०. त्यार पछी भक्ष्यमाण ते अन्नथी सर्व कर्मने विषे प्रवृत्ति थवामां कारणभूत एवां वीर्य(वळ) ने सजतो हवो ११. त्यार पछी अविशुद्ध सत्व (मलिनसत्व थी आचरण करेला पापे करीने संकीर्ण एवा प्राणियोनां पापोनुं क्षालन करीने चित्तशुद्धि थवामां साधनभूत एवां तपने खजतो हवो. १२. अने ते तपे करीने शुद्ध छे अंतर बाह्य करणो जेमनां एवा प्राणियोंने अर्थ मंत्रात्मक एवा ऋगादि चार वेदोने सजतो हवो १३. त्यार पछी अग्निहोत्रादि कोने सजतो हवो ११. त्यार पछी कौना फलभूत एवा लोकोने सजतो हवो १५. अने ते लोकोमा स्रजेला प्राणियोनां देव- दत्त, यज्ञदत्त इत्यादि नामोने स्त्रजतो हवो १६. ए रोते जेम तैमिरिक दृष्टि पुरुप हिचंद्रकेशोंड्र कादिकने सजेछे, वळी जेम स्वप्नद्रष्टा पुरुष स्वा- निक सर्व पदार्थोने सजेछे, तेमज प्राणिओनां १८८ स्वरूपानुसन्धाननी अविद्यादिक दोषरूप बीजथी ए सर्व कलाओ स्त्रजीछे; जेम लोकमां समुद्रायण एटले समुद्र छे प्राप्यस्थान जेमने एवी स्रवती नदीओसमुद्रने पामीने अस्त थायछे अनंतर तेमनां नाम अने रूप बन्ने नष्ट थायछे केवळ समुद्र एमज कहेवा- यछे,तेमज द्रष्टा ते पोडशकल पुरुपनी पुरुपायणा एटले अक्षर पुरुप छे गति जेमनी एवी पूर्वोक्त प्रा णादि कलाओनां नाम अने रूप बन्ने नष्ट थायछे केवळ अविनाशी पुरुप ब्रह्मवेत्ताओ कहेछे. ए प्रकारे गुरुये उपदेश कर्याछे कलाओना उत्पत्ति प्रलय जेने एवो छतो जे अधिकारी जाणे तेनी अविद्या काम कर्मजनित एवीप्राणादि कलाओ- नो विद्याये करीने नाश थये छते ते विद्वान अक- ल एटले प्राणादि कला रहित छतो अमृत एटले प्राणादि निमित्त मरण रहित होयछे ए विपे श्लो- करूप श्रुतिः-अरा इव रथनाऔकलायस्मि- न्प्रतिष्ठिताः।तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ जेम रथनाभिने विषे अराओ प्रतिष्ठित छे तेमज पोडश कलाओ जेने विपे प्रतिष्ठित छे ते वेद्य एवा पूर्ण पुरुपने जा- णवो के हे शिष्यो! जेथी तमोने मृत्यु व्यथा पंचम प्रक्रिया. १८९ पमाडे नहि. ते शिष्योने ए प्रकारे उपदेश करीने पिप्पलाद मुनि कहेछे के, हे शिष्यो ! तमो- ने में जे उपदेश कयु एटलुंज हुँ जाणुंछौं, एथी अधिक वीजुं कांइ पण जाणवानुनथी. शिष्यो- नी अवशिष्ट वेद्यविषयक शंकानी निवृत्तिने अ- थै ए रीते पिप्पलाद मुनिथ कयुंछे. गुरुये शि- क्षा कर्याथी कृतार्थ थया एवा ते छ शिष्यो गुरुना उपकारनो बदलो कांई पण न जोता छता गुरुचरणनी पुष्पांजलिए करीने पूजा करता हवा; अने शिरोनमन करता छता बोल्या के, " हे श्रीगुरो! तमेज अमारा पितारूप छो; के- मके विद्याये करीने नित्य, अजर, अमर, अभय ब्रह्मस्वरूप शरीर उत्पादन कयु; वळी हे गुरो! तमेज अमोने विद्यारूपी नौकाये करीने विप- रीत ज्ञानरूप अविद्या सागरथी मोक्षारख्य पर पारे उतारता हवा माटे प्रत्युपकारने बदले त- मने केवल नमस्कार करीएछैये! ब्रह्मविद्याना संप्रदायने करनारा परम ऋषिओने नमस्कार करीए छैये !! ब्रह्मविद्याना संप्रदायने करनारा परम ऋपिओने नमस्कार !!! आ उपनिपदाना तात्पर्यार्थनो श्लोक:- प्राणश्रद्धाखवायुज्वलनजलधरा १९० स्वरूपानुसन्धाननी इंद्रियं मानसं च भक्तं वीर्य तपश्चा- थ सकलंनिगमा कर्मलोकाश्चनाम। यस्माज्जाताश्च यस्मिन्विलयमुपग- ताः पोडशैताः कलायःसर्वेषां संप्र- तिष्ठा खलु तदधिगमाज्जायते वीत- मृत्युः १ अर्थः- प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इंदियो, मन, अन्न, वीर्य, तप, सर्व- वेदो, कर्म, लोक, नाम ए पोडश कलाओ जेथी उत्पन्न थइने जेमां पाछो विलय पामे अने जे सर्वनो संप्रतिष्ठारूप एटले परमाधिष्टानरूप छे ते प्रत्यक अभिन्न ब्रह्मना साक्षात्कारथी पुरुष वीतमृत्युः' एटले संसार रहित होयछे." (६) मांडूक्योपनिषद्ना अनुसारे विचार. आ उपनिषद्नो सारांश चतुर्थ प्रक्रियामा क- थन कर्योछे; अने तेनाज तात्पर्यार्थनो श्लोक:- जाग्रत्स्वप्नःसुषुप्तिस्त्रितयमपि मतेः साक्षिणी तस्य तुर्या सर्वेषां यस्तु पंचम प्रक्रिया. साक्षी गुणमलरहितोप्यात्तनानाभि- धानः । भूताद्योचिंत्य एतत्सकल- गुणनुतः प्रत्यगीशोयमात्मा ब्रह्मों- कारादिगम्यं विदितमिति भवेद्येन स ब्रह्मभूतः १ अर्थः- अकार, उकार, मकारात्मक जे जायत्, स्वप्न, सुषुप्ति ते मतिनी अवस्थाओछे एत्रणेनी साक्षीरूप अर्ध मात्राये उपलक्षित चित् छे ते सर्वनो साक्षी चिदात्मा गुणरूप मळे करीने रहित छतो पण ग्रहण करीछे विश्व वैश्वानर इत्यादि नांना संज्ञाओ जेणे एवो होयछे; तथा जे सर्व भूतोनो पण आद्य छे; तथा अचिन्त्य स्वरूप छे; तथा जे अनन्त गुणोधी स्तुत्य होयछे ते प्रत्यक अभिन्न ईशरूप आत्माज ॐकारादिये करीने गम्य एटले उपलक्षित एवं ब्रह्मरूप छे ए रीते प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्म जेणे साक्षात्कार कर्यु होय ते ब्रह्मभूत होयछे. (७) तैत्तिरीयोपनिपना अनुसारे विचार. मंगलाचरण. यस्माज्जातं जगत्सर्व यस्मिन्नेव १९२ स्वरूपानुसन्धाननी विलीयते । येनेदं धार्यते चैव तस्मै ज्ञानात्मने नमः॥१॥यैरिमे गु- रुभिः पूर्व पदवाक्यप्रमाणतः । व्याख्याताः सर्ववेदान्तास्तान नि त्यं प्रणमाम्यहम् ॥२॥ अर्थ:-जे परमात्माथकी आ सर्व जगत् उत्प- न थयुंछे, अने जेने विषेज लय पामेछे, तथा जेणे सम्यक् धारण कयुछे ते ज्ञानस्वरूप प्रत्यक्थी अ- भिन्न ब्रह्मने नमस्कार ! १.जे गुरुये पूर्वे आ सर्व वेदान्तो पदवाक्यनां प्रमाणथी व्याख्यान की ते गुरुने हं नित्ये प्रणाम करूंछौं. (विद्यानी प्रा- प्तिमा गुरुभक्ति अन्तरङ्ग साधन छे एवं जणाववा माटे आ गुरुविषयक मंगलाचरण छे.)२ आ उपनिषद्मा पूर्व बार अनुवाके करीने चित्तशुद्धिने अर्थ कर्मनी साथे अविरुद्ध एवां सं- हितादिविषयक उपासनो कथन कर्या; तदनंतर भूरादि व्याहृतिद्वाराये करीने सोपाधिक आत्म- स्वरूपर्नु प्रदर्शन कराव्यु; एटलं कोथी संसारनी बीजभूत अविद्यानो निःशेषताधी उपशम थाय नहि माटे सर्वे उपद्रवोनुं बीजभूत अज्ञानना निः- शेप नाशने अर्ये सर्व उपाधिविशेपोथी निर्मुक्त ए- पंचम प्रक्रिया. १९३ चां आत्मस्वरूप,अविद्यानारामां हेतुभूत एवं अ- परोक्ष ज्ञान थवाने अर्थे उत्तर पंधनो आरंभ छे. ए ब्रह्मविद्यानुं प्रयोजन तो अविद्यानी निर- तिथी आत्यंतिक संसारनो अभाव तथा निरति- शय सुखनी प्राप्तिरूप छे ए रीते पोतेज श्रुति आदिने विपे कहेछे के- ब्रह्मविदाप्नोतिपरम्॥ अर्थः- वक्ष्यमाण के लक्षण जेनां एवां ब्रह्मने प्रत्यक्थी अभिन्नताये करीने जे जाणे एटले अपरोक्ष करे ते ब्रह्मने पामे अर्थात ब्रह्मी- भूत होयछे. ए ब्रह्मानं लक्षण शुं? ते कहेवा माटे वीजी श्रुतिः- सयं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। अर्थः- सत्य, ज्ञान, अनन्त ए त्रण ब्रह्म- मां विशेषणरूप छे एटले इतर विशेष्य पदा- ोथी ब्रह्मने जुदं पाडनारा छे; तथा लक्षणरूप पण छे एटले ब्रह्मने जणावनारांछे. सत्यादि त्रण शब्दोनो परस्पर संबंध छे नहि, केमके परार्थ छ एटले गृहादिकनी पेठे परने माटे छे; जेम लोकमां राजाना सेवक पुरुपोनो परस्पर १७ १९४ स्वरूपानुसन्धाननी संबंध छे नहि तेम; वास्ते परस्पर निरपेक्ष एवां सत्यादि त्रण्ये विशेषणोनो प्रत्येक प्रत्येक ब्रह्म- नी साधे संबंध छ; जेम के, "सत्यं ब्रह्माज्ञा- नंब्रह्म। अनन्तंब्रह्म" सत्य एटले जे वस्तु जे स्वरूपे करीने निश्चय कर्यु ते स्वरूपे करीने को- इ काळे पण व्यभिचार न पामे ते अर्थात् त्रिका- ळावाध्य एटले नित्य. जे वस्तु जे स्वरूपे करीने निश्चय कर्यु होय ते स्वरूपथी व्यभिचार पामे ते अमृत कहेवायछे; जेम वाचारंभण श्रुतिथी घट शरावादि विकार अनृत छे, मृत्तिकाज सत्य छे तेम; माटे जे सत्य स्वरूप ते ब्रह्म छे ए रीते सत्य पदे करीने ब्रह्मने विपे जन्मादि सर्व वि- कारोनी व्यावृत्ति करी. त्यारे 'सत्यं' ए विशेषण आपवाथी ब्रह्मने विषे कारणपणुं प्राप्त थयु; के- मके मृत्तिकानी पेठे जे कारण ते सत्य कहेवायछे; वळी कारणत्व प्राप्त थवाथी कर्तृवादि कारकपणुं पण अर्थात् प्राप्त थयु; वळी मृत्तिकाना दृष्टान्ते करीने अचिद्रूपता पण प्राप्त थइ एवी शंका थये छते सर्व दोपना परिहारने अर्थे 'ज्ञानं ' ए वि- शेषण आप्पुंछे के “ज्ञानंब्रह्म' (जे ज्ञप्ति- मात्र ते ब्रह्म) एणे करीने ब्रह्मने विपे कुला- लादिकनी पेठे निमित्तकारणता व्यावृत्त करी; के- पंचम प्रक्रिया. मके में कुलालादि निमित्तकारण ते तो ज्ञाता होयछे अने ब्रह्म तो ज्ञाता नहि, किंतु ज्ञप्तिमात्र छे; तथा ज्ञप्तिरूप होपाथी मृत्तिकादिकनी पेठे अचिद्रूपता पण व्यावृत्त करी. “ज्ञानं ब्रह्म" एम कहेवायी ब्रह्मने विपे अंतवत्पणुं प्राप्त थयु; केमके लोकमां ज्ञान अंतवाळु जणायछे; जेमके घट ज्ञानानन्तर पट ज्ञान निवृत्त थायछे तेम: एवी शंका थये छते ते दोपनी निवृत्तिने अर्थे अनन्त ' ए विशेषण आप्पुंछे; "अनन्तं ब्र- झ" एटले जे त्रिविधपरिच्छेद रहित ते ब्रह्म. शंका:- सत्यादि त्रण विशेषणोथी यद्यपि ब्रह्मने विपे अनृतादिक धर्मोनी व्यावृत्ति करी,तथापि जे. म"नीलं उत्पलं" ए ठेकाणे नीलादि विशेषण विशिष्ट उत्पलरूप विशेष्य प्रसिद्ध छे तेम ब्रह्म- रूप विशेष्य तो प्रसिद्ध नथी; माटे "मृगतृष्णानां जळमां कऍछे स्नान जेणे एवो अने ख पुप्पे कयु छ शिरोभूपण जेणे एवो अने हाथमा ग्रहण क- युंछे शशशृंगनुं धनुः जेणे एवो आ वंध्यापुत्र जायछे" आ वाक्य जेम शून्यार्थ छे तेमज"सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" ए वाक्यने पण शुन्यार्थता प्राप्त भइ एवी शंका न करवी; केमके सत्यादि १९६ स्वरूपानुसन्धाननी त्रण शब्दो जेम विशेपणरूप ले तेमज ब्रह्मनां स्वरूपलक्षणरूप छे. जो कदा ब्रह्म बंध्या पुत्रनी पेठे शून्य होय तो श्रुतिये जे ब्रह्मनु लक्षण कयु ते निरर्थक पडे माटे एम जणायछे के, ब्रह्म शून्यरूप नथी. 'अनन्त' ए पदे करीने ब्रह्म अने आत्मा एकल श्रुतिने विवक्षित छे एवा अभिप्रायथी भाष्यकार आ उपनिपद् शास्त्र, तात्पर्य कहेछे के ." तस्मादाएतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः" आ श्रुतिमां ब्रह्मने विषेज आत्माशब्दना प्रयोगथी तथा "तत् सृष्ट्वा तदें- वानुप्राविशत् "आ श्रुतिमां ब्रह्मनोज जीव- रूपे शरीरमा अनुप्रवेश कहेवाथी वेदिता पुरुपर्नु जे आत्मस्वरूप तेज ब्रह्म छे. शंका: ज्यारे ब्रह्मनेज आत्मा कहिये त्यारे तेने ज्ञान प्रत्ये एटले "घटमहं जानामि" (डं घटने जाणुंछौं.) ए रीते ज्ञानक्रियाप्रत्ये कर्तृत्व प्राप्त थयु; वळी "सोकामयत" ए श्रुतिमां पण कामयिता आत्माने विपे ज्ञानकर्तृत्व प्रसिद्ध छे माटे ज्ञान- प्रत्ये कर्ता होवाथी पूर्वे 'ज्ञानं ' ए विशेषणे • करीने ब्रह्मने विपे जे ज्ञप्तिमात्रल कथन कर्यु ते अयुक्त छे; वळी ब्रह्मने ज्ञप्तिमात्र कहीये तो पण - पंचम प्रक्रिया. १९७ अनित्यत्व अने परतंत्रत्व प्राप्त धयु: केमके जे धातुना अर्थो एटले क्रियाओ तेमने कर्ता आदि कारकोना सापेक्षपणाथी परतंत्रत्व छे; तथा च ज्ञानने पण धात्वर्थ होवाथी ज्ञप्तिरूप ब्रह्मने पर- तंत्रता अने अनित्यता प्राप्त थई. समाधान:- अनेक वृनिवाळा अन्तःकरणरूप उपाधिना अ- ध्यासथी अविवेकी मूढ जनोये आत्माने विपे कापणुं तथा सोपाधिक ज्ञानने विपे धात्वर्थपणुं एटले क्रियापणुं यद्यपि कल्प्युछे तथापि आत्मा- ने विपे वास्तव कापणुं अने आत्मानाज स्व- रूपमूत निरुपाधिक ज्ञानने विपे धात्वर्थपणुं छे नहि तेथी पूर्वोक्त शंका घटित नथी; माटे सत्य- स्वरूप, ज्ञानस्वरूप, अनन्तस्वरूप ब्रह्म छे ए रीते लक्षण वाक्यनो अर्थ सिद्ध थयो. श्रुतिः-- यो वेद निहितगुहायां परमे व्योमन् सोश्नुते सर्वान् कामान् । सह ब- ह्मणा विपश्चितेति ॥१॥ अर्थ:- सत्य, ज्ञान, अनन्त स्वरूप जे ब्रह्म तेज बुद्धिरूप गुहाने विपे प्रत्यगात्मस्वरूपे रघुछे ए रीते प्रत्यक्थी अभिन्न ब्रह्मने जे जाणे एटले

१९८ स्वरूपानुसन्धाननी
श्रवणादिके करीने अपरोक्ष करे ते पुरुप सर्वज्ञ
ब्रह्मरूप थयो छतो सर्व कामोने भोगवे. १
आ उपनिपमा आनन्द वल्लीना आरंभमां
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म योवेद निहितगु-
हायां" ए वाक्ये करीने जे सत्य ज्ञानानन्तस्व
रूपन्नह्म तेज बुदि गुहामा प्रत्यक् स्वरूपे रघुछे
ए रीते ब्रह्मैकात्मत्वनो उपक्रम करीने भृगु वल्ली-
ना छटा अनुवाकनो मंत्र छेल्लो-
सैपा भार्गवी वारुणी विद्या परमे
व्योमन् प्रतिष्ठिता॥
अर्थः- ते आ वरुण पिताये उपदेश करी
अने भृगु पुत्रे सम्यक् प्रकारे जाणी एवी जे विद्या
ते हृदयाकाश गुहामा प्रत्यक स्वरुप स्थित एवां
परमानन्दस्वरूप ब्रह्मने विपे प्रतिष्ठित थइ एटले
परिअवसान पामीए रीते ब्रह्मैकात्मत्वनो उपसं-
हार कर्योछे १. तथा आनन्द वल्लीनी श्रुति२
तस्मादाएतस्मादात्मन आकाशःस
म्भूतः इत्यादि.
अर्थः- “ते प्रत्यक् ब्रह्मथी आकाश उत्पन्न
थएँ” इत्यादि अनेक श्रुतिओए आकाशादिक का-

पंचम प्रक्रिया. यनी सृष्टिर्नु कथनद्वारा तेज मूलभूत प्रत्यक् ब्र- झनो वारंवार कथनरूप अभ्यास कह्योछे २. तथा आनन्द वल्लीना अनुचाक चोथानी श्रुति. १ यतो वाचो निवर्तते अप्राप्य मनसा सह ॥ अर्थः- मननी साथै वाणी पण जे प्रत्यक् ब्रह्मने न पामीने निवृत्त थायछे एटले शक्तिवृत्ति- ये करीने वोधन करी शकती नथी ए रीते प्रत्य- क्षादि प्रमाणे करीने अगम्यतारूप अपूर्वता प्र- त्यक् ब्रह्मने विपे कथन करीछे ३. तथा आनन्द वल्लीना' अनुवाक ७ नो छेलो मंत्रः- यदा ह्येवैप एतस्मिन्नश्येऽनाम्येऽ- निरुक्तेऽनिलयनेऽभयम्प्रतिष्ठां। वि- न्दते अथ सोऽभयं गतो भवति । अर्थः- 'अदृश्ये' एटले सर्व विकार रहितः तथा 'अनात्म्ये' एटले त्रिविध शरीरोथी रहित; तथा 'अनिरुक्ते' एटले निर्वचनने अयोग्य जे सविशेष पदार्थ होय तेनुं निर्वचन थई शके; ब्रह्म तो निर्विशेष छे माटे निर्वचनने योग्य नहि; तथा ' अनिलयने' एटले अनाधार एवां ब्रह्मने विपे जे साधक पुरुष प्रतिष्ठा पामे एटले आत्म- भाव पामे अर्थात् ब्रह्मैकात्मत्वनो साक्षात्कार करे , २०० स्वरूपानुसन्धाननी ते पुरुप अभय पामे एटले भयनां हेतु अविद्या अने तत्कार्यनो उच्छेद थवाथी भूमानन्दस्वरूप होयछे एरीते अविद्या तत्कार्यनी निवृत्ति अने निरतिशय सुखनी प्राप्तिरूप फळ कथन कर्यु छे. ४. तथा उपर कहेला मंत्रनुज उत्तरार्धः- यदा ह्येवैप एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति ॥ अर्थ:- जे पुरुप ब्रह्म अने प्रत्यक् स्वरूपने विपे अल्पमात्र पण भेद जुवे तेने संसार भय होयछे ए रीते भेददर्शि पुरुपने भय प्रदर्शननी द्वाराये ब्रह्मात्मैकत्वनी स्तुतिरूप अर्थवाद कथन कर्योछे ५. तथा आनन्द वल्लीना पांचमा • अनुवाकनी श्रुति छेल्ली- आनन्दआत्मा ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा ।। अर्थः- अन्नमयादि सर्व कोशोथी आन्तर अने ते सर्वेनो अवसानरूप एवो जे निरुपाधिक आनन्दस्वरूप आत्मा तेज ब्रह्म अने ते प्रत्यक्थी अभिन्न ब्रह्म पुच्छप्रतिष्ठारूप छे ए रीते स्थूला- रुंधत्ति न्याये अन्नमयादि कोशोथी विवेचना क- रीने प्रत्यक् ब्रह्म प्रदर्शनरूप उपपत्ति एटले युक्ति कथन करीछे ६.

पंचम प्रक्रिया. २०१ 4 - उपर कहेलां पट् लिंगोथी तथा पेहेली शिक्षा वल्लीमा चित्तशुद्धिने अर्थे उपासनानां विधानथी तथा भृगु वल्लीमां ब्रह्मविद्यानी प्राप्तिने अर्षे तप आदि साधननां विधानथी आ उपनिषदना सर्वे मंत्री ब्रह्मात्मैकत्वना प्रतिपादनमा तात्प- र्य छे. त्यांहां श्लोकः-- सृष्ट्वाकाशादि देहावधि सकलमिदं तत्प्रविश्यांतरस्थो यः सर्वेपामधीशो नियमयति सदानंदचिद्रूपएकः । अन्नादीन्पंचकोशान्निजगुरुवचसा संविविच्यात्मरूपं तं विद्वान्नित्यतृप्तः, खिलभयरहितोवर्तते सर्वभूतः॥१॥ अर्थ:-जे सच्चिदानंदस्वरूप आकाशथी आ- रंभीने देह पर्यंत सर्व जगतने सजीने तेनी अं. दर प्रविष्ट थयो छतो सर्वने नियममा राखेछे ते प्रत्यक् स्वरूप गुरुवचनना बळे अन्नादि पंच कोशोथी पर छे एवी विवेचना करीने ब्रह्मथी अभेदे जे साक्षात्कार करे ते पुरुष संसार भये र- हित थयो छतो अने नित्य तृप्त छतो पूर्ण ब्रह्म रूप होयछे. १.

स्वरूपानुसन्धाननी
(८) ऐतरेयोपनिपद्ना अनुसारे विचार.
मंगलाचरण.
आसीत्प्रागेक एवेदमखिलमपि यो
यश्च खादिक्रमेणेक्षिबास्त्राक्षीहिरा-
जंतदनुसकरणं व्यष्टिदेहं सदेवम्।
तत्राथाविश्य जीवांशत उरुभयमा-
पन्न आप्तोपदेशा द्यो ज्ञानं प्राप्यमु-
क्तस्तमखिलतनुगं केवलात्मानमीडे
अर्थः-सृष्टिथी पूर्वे आ सर्व जगत् जे एक
आत्मरूपज हतु अने स्यार पछी जे आत्मा
सृष्टिचिपयक ईक्षण करीने आकाशादिना क्रमथी
विराट्ने रजतो वो; तदनन्तर ते विराटना
अवयवोये करीने वागादिक करणोये सहित अने
अग्यादि अधिदैवोये सहित एवा व्यष्टि देहने
संजतो हवो; तदनन्तर जे आत्मा ते व्यष्टि दे.
हमा जीवरूपे प्रवेश करीने अविद्याना वशथी
अथीत् सादात्म्य अध्यासे करीने उरुभयने एटले
जन्म मरणादि संसारानने पाम्यो; तदनन्तर
कोई आप्त गुरुना उपदेशथी स्वरूप ज्ञानने पा-

पंचम प्रक्रिया. २०३ मीने अविद्याना नाश पूर्वक मुक्त थयो एटले ब्रह्मभाव पाम्यो ते सर्व शरीरोमां अनुस्यूत एवा केवल आत्मस्वरूपनी हुं स्तुति करुंछौं. १. आ उपनिषद् भागथी पूर्वे अपर ब्रह्मविष- यक उपासना सहित एवं कर्म चित्त शुद्धिने अर्थे कथन कयु, अने कर्म सहित उपासनाये करीने प्राप्य एबुं प्राणाख्य सत्य ब्रह्मरूप फल पण क- धन कयु; त्यांहां जे प्राणारव्य सत्य ब्रह्मनी प्राप्ति तेज मोक्ष छे अने ते पण ज्ञान कर्म समुच्चयरूप साधने करीनेज प्राप्य छे एथी पर कांह बीजु प्राप्य नथी एम केटलाएक वादियो कथन करेछे; माटे तेमना मतनां निराकरणने अर्थे अने कर्मो- पासना रहित केवल ब्रह्मात्मज्ञाननां निरूपणने अर्थ आ उपनिपद छे. आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्य- किञ्चनमिपत् ॥ अर्थः- आ सर्व जगत् सृष्टिथी पूर्व सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, क्षुत्पिपासादि सर्व संसार धर्मोथी र. हित, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, अजर, अ- मर, अभय, अद्वैत एवो जे आत्मा तद्रूपज हतुं, आत्माधी अतिरिक्त एवं सव्यापार अथवा नि- र्व्यापार कांइ पण हतुं नहि.

स्वरूपानुसन्धाननी " स ईक्षत लोकान्नुसृजा" इति अर्थः- ते आत्मा प्राणियोना कर्म फल भोगना अधिष्ठानभुत एवा लोकोने हुँ सृर्छ ? रीते ईक्षण करतो हवो. अनन्तर आकाशादिकना कमथी अंडतुं उ- त्पादन करीने अंभ आदिक लोकोने सजतो हवो; त्यार पछी समष्टि विराट् शरीरने रजतो हवो; त्यार पछी विराटना अवयवोथी इंद्रियो तथा ते- मना अधिष्ठाता लोकपालोने सजतो हवो; त्यार पछी ते देवताओना भोगने अर्थे अल्प एवां व्य- ष्टि मनुष्यादि शरीरोने जतो हवो; अनन्तर अग्यादिक देवताओ वागादि इंद्रियरूप थईने मुखादिक गोलकोमा प्रविष्ट थइ; त्यार पछी ते ईश्वर अशना पिपासानु संयोजन करतो हवो; त्यार पछी अन्नने सजतो वो; त्यार पछी ते ईश्वरे विचार्य के “आ वधो कार्यकरणनो संघात परार्थ बज्यो तो खरो पण पुर स्वामि भोक्तारूप म्हारा प्रवेश विना निरर्थक छे." ए रीते ईक्षण करीने पछी मूईसीमा- विदारण करी भोक्ता जीवरूपे पोते प्रवेश कर्यो; त्यांहां श्रुतिः- "तस्य त्रय आवसथास्त्रयाःस्वप्नाः" ते जी- वना त्रण आवसथ एटले क्रीडानां स्थानको छे;

पंचन प्रक्रिया. जे के (१) जागरित काळने विषे चक्षुर्गोलक; (२) स्वप्न काळने विपे मन एटले मननु अ. धिकरण एवं कण्ठ स्थान; तथा (३) सुषुप्ति काळने विपे हृदयाकाश एत्रण्ये अवस्था स्वप्न- रूपज छ; अथवा वक्ष्यमाण एवां (१) पित शरीर, (२) मातृ गर्भाशय अने (३)स्व श- रीर ए त्रण स्थानो नाणवां. ए जीव पूर्वोक्त त्रण स्थानकोने विपे अनुक्रमे करीने आत्मभाव , स्वरूपानुसन्धाननी थयो; माटे सर्व शरीरोमा एक ईश्वररूपज आ- स्मा छे अन्य नहि. ते पूर्वे वर्णन को जीव अविद्याना वशथी यज्ञादिक कर्मोये करीने धूमादिक मार्ग द्वारा चंद्र लोकने पामीने पुण्य क्षयानन्तर पाछो मृत्यु लोकमां व्रीहि यवादिक्षाव पाम्यो छतो भक्षण करेला ते ब्रीहि यवादि अन्नथी पुरुपना शरीरमा रेतसभावने पाम्यो; अनन्तर पुरुषे स्त्रीने विषे सिंचन करवाथी जे रेतसन निर्गमन ते जीवनुं प्रथम जन्म एटले प्रथम अवस्था कहेवायछे; अनन्तर माताना उदरथी कुमाररूपे जे निर्गमन ते द्वितीय जन्म एटले द्वितीय अवस्था कहे- वायछे; अनन्तर आयुष्नो क्षय थये छते वर्त- मान देहनो त्याग करीने अन्य देह जे ग्रहण ते तृतीय जन्म एटले तृतीय अवस्था कहेवायछे ए रीते सर्वे पण जीवो त्रण अवस्थाये करीने जन्म मरणना प्रबंधने पामता छता संसार समु. द्रा पड्याछे; माटे जे जीव त्रण अवस्थाओ- मध्ये जे ते कोइ अवस्थामा पण श्रुत्युक्त आत्म स्वरूफ्नो साक्षात्कार करे ते जीव संसार बंधन- थी मुक्त थयो छतो रुत्तरुत्य होयछे; जेम वाम- देव ऋषि माताना गर्भाशयमांज आत्मज्ञान पा.

पंचम प्रक्रिया. २०७ म्यो छतो कृतार्थ थयो तेम. एटली वात बीजा अध्यायमा निरूपण करीछे. (आ अध्यायमांत्रण अवस्थानुं जे वर्णन कर्यु ते वैराग्य थये ज्ञानो. त्पत्तिने अर्थे छे.) पूर्व अध्यायमांत्रण जन्मना निरूपणे करोने ज्ञानोत्पचिने अर्थे वैराग्य निरूपण कयु, पण पदार्थ शोधन विना वैराग्य मात्रे करीने ज्ञानो- त्पत्ति थाय नहि; मांटे पदार्थ शोधन पूर्वक अखंड वाक्यार्थना वोधनने अर्थ आत्रीजो अ. ध्याय छे. सनकादिक अने वामदेवादिक आचार्योनी प. रंपराये करीने श्रुतिये द्योतन करी तथा ब्रह्मवे- ताओनी सभामा अत्यंत प्रसिद्ध एवी अने ब्रह्म विद्यारूप साधने करीने प्राप्य एवी सर्वात्मभा- वरूप फलनी प्राप्तिने श्रवण करता एवा अधि- कारी ब्राह्मणो वैराग्यादि साधन संपत्ति थयान- न्तर ब्रह्मने जाणवानी इच्छा करता छता अने जीवभाव पर्यंत दुःखरूप संसारथी मुक्त थवाने इच्छता छता विचार पूर्वक अन्योन्य प्रश्न करे- छे त्यांहां श्रुतिः- कोयमात्मेति वयमुपास्महे कतरः स आत्मा येन वा रूपं पश्यति येन २०८ स्वरूपानुसन्धाननी वा शब्दं शृणोति येन वा गंधाना जिघ्रति येन वाचं व्याकरोति येन वा स्वादुचास्वादु च विजानाति ॥ अर्थः- वामदेव ऋपि जे आत्मानो साक्षा- कार करीने अमृतरूप थयो ते आत्मा कह्यो एटले कोण? के जेने आपणे पण उपासना क- रीये ! (आ ठेकाणे अभेदें करीने जे अनुसन्धान ते निर्गुण उपासना जाणवी.) एरीते जिज्ञासा पूर्वक अन्योन्य प्रश्न करता एवा ते ब्राह्मणोने पूर्वे श्रवण करेली बे श्रुतिथी जन्य एवी स्मृति थइ3; शी रीते के (पूर्वोक्त श्रुतिः-) तम्प्रपदाभ्याम्प्रापद्यतब्रह्मेमम्पुरुपम् " अर्थः- ते आ पुरुष शरीरने विषे अपर व्र- ह्मरूप प्राण प्रवेश करतो हवो; तथा बीजी श्रुतिः- “स एतमेव सीमानं विदार्य तया द्वारा प्रापद्यत अर्थः- ते आत्मा मूर्द्धसीमा विदारण क- रीने ते द्वाराये पुरुप शरीरमा प्रवेश करतो हवो. ए रीते बन्ने श्रुतिनां प्रामाण्यथी प्राण अने जीव ए बनेने विपे आत्मतत्त्वनी एटले आत्मा " पंचम प्रक्रिया. कोने कहेवो? एवी शंका प्राप्त थई; केमके ते बन्ने विना पण शरीरनी स्थिति थई शके नहि एवी शंका थयानन्तर विचार कर्यो के, (उप- निपना आरंभमां श्रुतिः-) आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् ए श्रुतिये विज्ञय स्वरूप एकज आत्माना प्र- तिपादन करवानो उपक्रम कर्योछे माटे उपास्य आत्मा एकज होवो जोइए ए रीते विचार करी- ने पाछो प्रश्न कर्यो के, ते एक उपास्य आत्मा कह्यो? पछी पाछो विचार करवाथी विशेष बुद्धि उत्पन्न थई; शी रीते के, आ शरीरमा उपलब्धा एटले द्रष्टा चक्षुरादि करण संघाते करीने रूपा- दि विपयोनी उपलब्धि करेछे तेमा जे प्राणारख्य मन एज चक्षुरादि संघातरूपे करीने रघुछे; माटे करण संघातरूप प्राणारख्य मनने करणरूप एट- ले परार्थ होवाथी ते उपास्य आत्मारूप नहि; किंतु मूर्द्धसीमा द्वारा प्रविष्ट थयो जे आत्मा तेज उपलब्धा होवाथी उपास्य छे ए रीते निश्चय क- रता हवा. मनरूप उपाधिमां रहेला ते उपलब्धा प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मनी उपलब्धिने अर्थ वक्ष्यमाण एवी अन्तःकरणनी वृत्तियो जाणवी. तात्पर्य ए के यद्यपि ब्रह्मथी अभिन्न साक्षीचैतन्यने अविपय . २१० स्वरूपानुसन्धाननी होवाथी तेनुं ज्ञान साक्षात् इदंताये करीने थइ शके नहि; तो पण अन्तःकरणनी संज्ञानादिक वृत्तियोनुं प्रकाशक होवाथी ए वृत्निदाराये तेनुं ज्ञान संभवेछे. ते वृत्तियोनां नाम- 'संज्ञान' एटले संज्ञप्ति अर्थात् चेतनभाव के जेणे करीने प्राणी चेतन कहेवायछे ते. आज्ञान' एटले आज्ञप्ति अर्थात् ईश्वरभाव. विज्ञान' एटले लौकिक चतुःपष्टि कला- दिकनु परिज्ञान. 'प्रज्ञान' एटले प्रज्ञप्ति अर्थात् तात्काळि- क ज्ञान. 'मेधा' एटले ग्रंथनी धारणा करवानुं सा- मर्थ्य. दृष्टि' एटले इंद्रियद्वारा सर्व विपयोनी उ- पलब्धि. धृति ' एटले धारण अर्थात् जे वृत्निये करीने खेद पामेला इंद्रियोने थोभावी राखीये ते. मति' एटले मनन. 'मनीपा' एटले मननने विपे स्वतंत्रपणुं. .

पंचम प्रक्रिया. २११ 'जूति' एटले रोगादिकथी चित्तने दुःखी थवापj. 'स्मृति' एटले स्मरण. 'संकल्प' एटले रूपादिकनो नील पीतादि भावे करीने संकल्प.करवो ते. 'क्रतु' एटले अध्यवसाय (निश्चय). 'असु' एटले प्राणन अपाननादिरूप जीवन क्रिया निमित्त जे वृत्ति ते. 'काम' एटले दूर रहेला विषयनी आकांक्षा- रूप तृष्णा. 'वश' एटले स्त्री संपर्कादिकनो अभिलाप. ज्ञप्तिमात्र उपलब्धा साक्षिस्वरूप ब्रह्मचैतन्य. नी उपाधिभूत एवी जे पूर्वोक्त सर्व वृत्तियो ते ज्ञापक एटले जणावनार होवाथी साक्षिचैतन्य- नां नामरूप के एटले बोधकरूप छे; एज ब्रह्म- स्वरूप आत्मा प्राणादिक उपाधियोमा प्रतिवि- म्वरूपे प्रविष्ट थयो छतो हिरण्यगर्म, वैराज, इंद्र, अग्नि इत्यादिरूप कहेवायछे तथा सर्व श- रीरोनां उपादानरूप एवां एथिव्यादि पंच भूतो अने स्थावर जंगमात्मक अंडजादि चतुर्विध प्रा- णि विशिष्ट ए, सर्व पण जगत् प्रज्ञानेत्र छ ए- २१२ स्वरूपानुसन्धाननी टले साक्षिचैतन्यनी सत्तास्फूर्तिथीज सत्तास्फू- र्तिमान छे; तथा उत्पत्ति, स्थिति, लय, कालने विपे प्रज्ञप्तिस्वरूपने विपेज प्रतिष्ठित छे एटले प्रज्ञप्तिने आश्रयण करीने रघुछे, अने ए प्रज्ञप्ति- स्वरूपज सर्वनुं अधिष्ठानभूत छे; माटे “प्र- ज्ञान.ब्रह्म" एटले ते प्रज्ञप्तिस्वरूप.साक्षिचैतन्य सर्व उपाधियोथी विनिर्मुक्त थयुं छतुं एक ब्रह्म- रूपज छे ए रीते जे कोइ पुरुप प्रज्ञप्तिस्वरूप प्रत्यगात्माथी अभिन्न ब्रह्मनो साक्षात्कार करे ते अमृतरूप होयछे. आ उपनिषद्मा “आत्मा वा०" ए वा- क्ये करीने आ जगत् सृष्टिथी पूर्वे एक निर्विशे- प आत्मस्वरूपज हतुं ए रीते उपक्रम करीने अध्यारोपापवाद न्याये करीने “प्रज्ञानं ब्रह्म" ए अन्तिम वाक्ये करीने जे निर्विशेष साक्षीचै- तन्यस्वरूप ते ब्रह्मरूपज छे ए रीते प्रत्यक् स्वरू- प अने ब्रह्मनी एकतानां निरूपणे करीने उप- संहार कर्योछे; माटे आ उपनिपना सर्वे मंत्री- नुं ब्रह्मात्मैकत्वना प्रतिपादनमा तात्पर्य छे. त्याहां श्लोकः- यो लोकॉल्लोकपालान्सकलमपि पु- पंचम प्रक्रिया. २१३ रा भोग्यजातं हि तेपां सृष्ट्वान्तः सं- प्रविश्य स्थिरचरमखिलं प्रेरयत्यां- तरस्थः। दृष्ट्वा नापदन्यत्सकलज- गदधिष्ठानरूपोहमेकः प्रज्ञानं ब्रह्म- येनाधिगतमिति सनावाप्तकामोमृतः स्यात् ॥१॥ अर्थ:-जे लोकने तथा लोकपालोने तथा सर्व एवां भोग्यजातने सजीने तेनी अंदर प्र- वेश करीने स्थिरचरात्मक सर्वने प्रेरेछे एटले सव्यापार करेछे, ते प्रत्यगात्मरूप हुंज सर्व ज- गत्नो अधिष्ठानरूप ब्रह्म छौं, म्हारा स्वरूपथी किश्चिमात्र पण अन्य नथी ए रीते। प्रज्ञा- नंबहान " एटले प्रत्यक्थी अभिन्न ब्रह्म जेणे कार कर्यु होय ते प्राप्त थयाछे सर्व का- जिने अर्थात् पूर्ण काम एवो छतो अमृतरूप साक्ष हो यछे. १ () छांदोग्योपनिपद्ना अनुसारे विचार. मंगलाचरण. नमो जन्मादिसंबन्धबन्धविध्वंसहे- २१४ स्वरूपानुसन्धाननी तवे । हरये परमानंद वपुषे परमा- त्मने ॥१॥ अर्थ:- जन्म मरणादिकना संबंधरूप बंध- ने विध्वंस करवामां हेतुभूत एवा अने परम आ- नन्द छ स्वरूप जेनुं एवा परमात्मारूप श्री ह. रिने नमस्कार! आ छांदोग्य उपनिपमा प्रथम पांच अध्या- ये करीने अन्तःकरणनी शुद्धिना संपादक होवा- थी 'वस्तुतत्त्वना अवभासक छ माटे ॐकार, साम, अग्नि आदिकनां उपासनो कथन की; ते मध्ये त्रीजा अध्यायमा “ सर्व खल्विाद व- म तज्जलान" (आ सर्व जगत् ब्रह्म मात्रज छ, केमके तज्ज, तल्ल अने तदन छे एरले ब्रह्मथीज उत्पत्ति, स्थिति, लय पामनार छ.) ए रीते कथन करेलुछे. ए जगत्ना ब्रह्मथी उत्तर ति, स्थिति, लय, शी रीते थाय, तेनो विस्तार कहेवाने अर्षे आ छटा अध्यायनो आरंभ छे. उद्दालक, श्वेतकेतुना संवाद द्वाराये करीना श्रुतिः- " उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं- . पंचम प्रक्रिया. २१५ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञा- तमिति" अर्थः- " हे श्वेतकेतो! शास्त्र द्वाराये श्रवण करेलां जे एक वस्तुए करीने अन्य अश्रुत पण श्रु- त होयछे; तथा तर्कथकी मनन करेला जेणे क- रीने अन्य सर्व अमत पण मत होयछे; तथा जे एकनां विज्ञाने करीने अन्य अविज्ञात पण वि- ज्ञात होयछे ते आदेशने एटले शास्त्र आचार्यनी उक्तिथी गम्य एवं वस्तु तें आचार्य ने पुछ्युं ह- तु?" त्यारे शिष्ये कयुं के,“ हे भगवन् ! ए वात केम संभवे !" एवी शिप्यनी आशंका पूर्वक गुरुए कडं त्यांहां श्रुतिः- " यथा सोम्यैकेन मृत्पिंडेन सर्व मृन्मयं विज्ञातं स्याहाचारंभणं वि- कारो नामधेयं मृत्तिकेत्येवसत्यम् । यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्व लोहमयं विज्ञातं स्याहाचारंभणं वि- कारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम्। यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन स- व कायसं विज्ञातस्यादाचारंभणं २१६ स्वरूपानुसन्धाननी विकारो नामधेयं कृणायसमित्येव सत्यम्" अर्थः- “ हे सोम्य! जेम एक मृत्तिकानो पिंड जाण्याथी घट शरावादि सर्व पण मृन्मय जाणवामां आवेछे तेमावाणीए करीने आरभ्य- माण एवं जे नाम ते विकारमात्र छे, वास्तवथी तो मृत्तिकाज सत्य छे; वळी हे सोम्य! जेम एक सुवर्णनो पिंड जाण्ये छते कटक, कुंडलादि सर्व पण कार्य सुवर्णमय जाणवामां आवेछे तेमा जे वाणीये करीने आरश्यमाण कटक, कुंडल इत्या- दि नाम ए तो विकारमात्र छे, किंतु सुवर्णज सत्य छे; वळी हे सोम्य ! जेम एक लोह खण्ड जाण्ये छते क्षुर, असि इत्यादि सर्व पण कार्य लो- हमय जाणवामां आवेछे तेमा जे वाणीये करी- ने आरश्यमाण क्षुर, असि इत्यादि नाम ए तो विकार छे किंतु लोहज सत्य छे." इत्यादि दृष्टान्ते एक विज्ञाने सर्वन विज्ञा- न उपपादन करीने दार्शन्तिकमा निरूपण करवा माटे- " सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमे- वाद्वितीयम्" पंचम प्रक्रिया. अर्थः- “ हे सोम्य ! आ सर्व जगत् सृष्टिथी पूर्वे सजातीय, विजातीय, स्वगत भेद रहित अने सूक्ष्म, निर्विशेप, सर्वगत, एक, निरंजन, नि- रवयव, विज्ञानस्वरूप, सर्व वेदान्तोथी गम्य एवं जे सन्मात्र स्वरूप तन्मात्रज होतुं हवं." ए रीते सर्व भेद रहित एवां सहस्तुनो उप- क्रम करीने अनंतर " तबैक आहुः" ए वा- क्ये असदादनी आशंका करीने पछी "कथ- मसतः सज्जायेत" ए वाक्ये ते असद्वादनुं नि- राकरण करीने पछी सद्रूप ब्रह्मने विपे विजाती- य एवा जडना भेदनो अभाव उपपादन करवा माटे “ तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय" इत्यादि वाक्ये करीने आकाशादि सर्व जड वर्गनी ते ब- मथकीज सृष्टि कहीने पछी सजातीय भेदना निराकरणने अर्थे तेज ब्रह्मनो जीवरूपे प्रवेश कथन करीने अनंतर त्रिवृत्करण पूर्वक नाम रू- पनी सृष्टि कथन करीने पछी ब्रह्मने विपे स्व- कार्यभूत आकाशादिकथकी भेदनी निवृत्तिने अर्थे श्रुतिः- यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्या- " स्वरूपानुसन्धाननी पागादग्नेरग्नित्वं वाचारंभणं विकारो नामधेयं त्रीणिरूपाणीत्येव सत्यम् अर्थः- लोकमां प्रसिद्ध एवं अग्मिने विपे जे रोहितरूप ते अपंचीकृत एवां तेजनुं रूप छे; त- था जे शुक्ल ते अपंचीकत एवी अप्नुं रूप छे; अने जे कृष्ण ते. अपंचीकृत एवी अन्नात्मक पृथ्वीनुं रूप छे ए प्रमाणे सूर्य, चंद्र, विद्युत्, देव, मनुष्य विगेरेमा विवेक कयें छते अश्यादि सर्वे- नु वाचारंभण विकाररूप नाममात्र अश्यादिपणुं निवृत्त थई गयु; किंतु ऋणज रूप सत्य छे. हवे ए त्रण्ये रूपोने पण असत् जणाववाने अर्थे तथा ते त्रण्येनुं मूल सत्स्वरूप देखाडवाने अर्थे श्रुतिः- तस्य व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमे- व खलु सोम्यानेन शुङ्गेनापो मूल- मन्विच्छाद्भिःसोम्यशुङ्गेन तेजो मू- लमन्विच्छतेजसासोम्यशृङ्गेन सन्मू लमन्विच्छसन्मूलाः सोम्येमाः स- ःप्रजाःसदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः" पंचम प्रक्रिया. २१९ अर्थः- श्वेतकेतुए प्रश्न कर्यो के “ हे गुरो ! शरीररूप शुङ्ग, एटले कार्यनुं मूल कोण ?" ते- ना उत्तरमा “ अन्न एटले पृथ्वी एजें मूल छे; अने अन्नरूप शुङ्गे करीने तेनुं मूळ अपने जाण; तथा अपप शुङ्गे करीने तेनु मूळ तेजने जाण; तथा तेजरूप शुङ्गे करीने एकमेवाद्वितीय परमा- र्थ सत्य सदात्मरूप मूलने जाण. हे सोम्य! आ स्थावर जंगमात्मक सर्व प्रजाओ ‘सन्मूलाः एटले सत्स्वरूप छे मूल कारण जेमतुं एवी, अने स्थि- तिकालने विपे पण 'सदायतनाः' एटले स- स्वरूप छे आश्रय जेमने एवी, अने अंतने विषे 'सत्प्रतिष्ठाः' एटले सत्स्वरूप छे लयस्थान जेम- नुं एवी छे." ए रीते आकाशादि सर्व जगत्तुं मिथ्यापणुं कथन कर्या पछी देह, वाकू, प्राण अने मन ए चारेने अन्नादिकना कार्य होवाथी अनात्मापणु कथन करीने (श्रुतिः-) " स य एपोणिमैतदात्म्यमिदं सर्व तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि अर्थः- " ते ब्रह्मस्वरूप सूक्ष्म तम छ, अने आ सर्व जगत् ब्रह्मात्मकज छे, अने ते ब्रह्मस्वरू- स्वरूपानुसन्धाननी पज सत्य छे तथा तेज साक्षी आत्मारूप छ; अने हे श्वेतकेतो! ते साक्षी आत्माथी अभिन्न सत् ब्र. ह्मस्वरूपज तुं छो.” इत्यादि वाक्ये श्वेतकेतुने द्वार- भूत करीने मुमुक्षु एवा जीवोने ते ते आशंका- ओतुं निराकरण पूर्वक सूक्ष्म, सर्वात्मक, अद्विती- य,परमार्थ सत्य,आत्माथी अभिन्न ब्रह्मने नव वार गुरु उपदेश करता हवा; जेमके "प्रयतो वा- ङ्मनसी" इत्यादि वाक्ये करीने “सुषुप्ति तथा उत्क्रांति आदि अवस्थाने विपे जीव जे सतरूपे संपन्न होयछे ते सद्ब्रह्म तु छो” ए रीते पिताये उपदेश कर्ये छते (१). “सुपुप्तिने विपे सत्संपन्न थइ प्रजाओ ते ब्रह्मात्मक सत्स्वरूपने केम जाण- तीओ नथी ?" ए रीते श्वेतकेतुने आशंका थये छते " यथा सोम्य मधुं मधुकृतः” इत्यादि वा- क्ये करीने “जेम मधुकरोये आहरण करेला अने मधुत्वे करीने निष्पन्न थयेला नाना वृक्षना रसना समुदायनी पेठे विवेक करवाने अशक्य होवाथी सुपुत्यादिकने विपे सत्स्वरूपनी प्राप्ति छत्ता पण ते सर्प ब्रह्म जणातुं नथी" ए रीतेश- कानुं निराकरण करीने एज एटले “तत्त्वमसि" ए वाक्यमा कहेला तत्त्वनो उपदेश करीने (२).

पंचम प्रक्रियाः २२१ अनंतर “सुपुल्यादिकने विपे तो करणना अभावधी अविज्ञान हो, पण मुपतिथी उव्या पछी अमे स- त्वरूपथी उठ्या एम केम जाणता नथी? " एवी आशंका थये छते। इमाः सोम्यनद्यः" इ- त्यादि वाक्ये करीने “जेम मेघोये समुद्रथी आकर्षण करीने विसर्जन करेली नदीओनु रसा- नन्य होवाथी, समुद्रधी आवागमन दुर्विज्ञेय छे तेमज ब्रह्मपी उत्थित थयेला संसारीओने अमे सत्संपन्न धइने उत्थित थया एवं ज्ञान होतुं नयी" ए रीते शंकानो परिहार करीने (३). पछी सुपुतिने विषे जीवने करणनो अभाव थये छते समुद्र वी- च्यादिकनी पेठे नाशनी शंका थये छते " अ- स्य सोम्य महतो वक्षस्य" इत्यादि वाक्ये क- रीने “जेम वृक्षनो कुठारादिके करीने छेद क- ये छते पण रसस्रावी होवाथी सजीवपणुं छे ते- मज सुपुतिने विपे पण देहमा रुधिरना दर्शनधी जीवनो नाश नथी." ए रीते शंकानो परिहार करीने पूर्वोक्त अर्थमुंज स्थापन कर्ये छते(४).पछी “ अति सूक्ष्म एवां ब्रह्मयकी स्थूल जगत्नी उ- त्पत्ति केम थाय?" एवी आशंका धये छते "न्ययोधफलमत" इत्यादि वाक्ये करीने जेम वटधानामां अंतर्गत सूक्ष्म बीजरूपथी म- " स्वरूपानुसन्धाननी हा वटनी उत्पत्ति होयछे तेमज सूक्ष्म सद्ब्रह्मस्व- रूपथी जगत्नी पण उत्पत्ति संभवे" ए रीते शंकानुं निराकरण करीने पाछो पूर्वोक्तज अर्थ स्थापन कर्ये छते(५). अनंतर"जगत्तुं मूलकारण एवं सत् ब्रह्म उपलभ्यमान केम थतुं नथी? एवी आशंका थये छते " लवणमेतदुदकेव- धाय" इत्यादि वाक्ये करीने “जेम जलमा प्रक्षेप करेला लवणखण्डनो नेत्रे करीने अनुप- लंभ छे एटले अदर्शन छे तो पण जलनुं पान करवाथी लवणनो सद्भाव निश्चय थायछे तेमज चक्षुरादि इंद्रिओए करीने अदृश्य एवां ब्रह्मनो कार्यरूप लिंगे करीने सद्भाव निश्चय थायछे” ए रीते शंका, समाधान करीने पूर्वोक्त अर्थनोज उपदेश कर्यो (६).तदनंतर "ब्रह्मना साक्षात्कारने विपे उपाय कोण?" एवी आशंका थये छते "यथा सोम्यपुरुषं गंधारेश्यः' इत्यादि वा- क्ये करीने "गंधार देशमाथी चोरोये कोइ पुरुपने लइ जइने अरण्यमा मेल्यो अने जेने आंखे पाटा . चांध्या छतां आक्रंदन करते छते ते श्रवण करीने कोई एक दयालुए तेना पाटा छोडीने 'आ अमुक दिशा तरफगंधार देश छे त्यांहां तुं जा' एवो उप- देश कर्ये छते ते पुरुप त्यांहां जायछे; तेमज आ.

पंचम प्रक्रिया. २२३ चार्ये करेला उपदेशथी अविद्यानी निवृत्ति अने ब्रह्मनो साक्षात्कार होयछे” एम कहीने एज तत्त्व- नो उपदेश कर्यो (७). तदनंतर "ते विद्वान् पुरुष कहे प्रकारे ब्रह्मरूप संपन्न होय? " एवी अपेक्षा थये छते “ पुरुष सोम्योपतापिनं” इत्या- दि वाक्ये करीने “जेम ज्वरादि उपद्रवे पीडित अने मुमूर्षु एवा पुरुषने ज्यांहां सुधी वाक् मनने विपे, मन प्राणने विपे, प्राण तेजने विपे तथा तेज परदेवताने विपे संपन्न थयुं नथी, त्यांहा सु- धी तेने भान होयछे, पछी जाणतो नथी: तेमज विद्वान् पण पूर्वोक्त वागादिना कमे करीने परदे- वताने विपे संपन्न होयछे; तेमां विशेप ए के जे अविद्वान् ते उपर प्रमाणे सत्संपन्न थया छता पण उत्थान पामीने पाछो व्याघ्रादिरूप होयछे, अने विद्वान तो सत्संपन्न थइने पुनरावृत्ति पाम- तो नथी” एम कहीने एज तत्त्वनो उपदेश कर्यो (८). तदनंतर “ मरियमाण अने मोक्षमाण वेड पण सत्संपन्न थायछे त्यारे अविद्वान्नो पेठे वि- दान पण पुनरावृत्ति केम न पामे ? " एवी आशं- का धये छते “पुरुपं सोम्योतहस्तग्रहीत- मानयति" इत्यादि वाक्ये करीने “जेम चो- स्वरूपानुसन्धाननी री करेल तेने तथा न करेल ते वनेने हाथ बां- धीने राजपुरुपो राजानी पासे लेइ गया अने कडं के 'आ वेउ चोर छे' त्यारे ते वेउ बोल्या के 'अमे चोरी करी नथी' ते उपर तेनो न्याय क- रवा राजाये ते वनेना हाथमा तप्त परशु आप्या तेमा जे खोटुं वोलनार ते दग्ध थयो अने जे सत्य बोलनार ते दग्ध थयो नहि तेमज अनात्मा देहादिकने विषे आत्मताना अभिमानवाळो अनृ. ताभिसन्धि जे अविद्वान् पुरुप ते पुनरावृत्ति पामे अने देहादिक अनात्माने विपे सत्यत्वाभिमान र- हित सत्यब्रह्माभिसन्धि जे विद्वान् पुरुप ते पुन- रावृत्ति पामतो नथी." (९). "जे सत् आत्मस्वरूपना अभिसंधानथी मोक्ष अने अनभिसंधानथी बंध छ; तथा जे सदात्म- स्वरूप जगतनुं मूल छे; तथा सर्व पण जगत् यदात्मक छे एटले जे सत्स्वरूप छे; वळी जे सत्स्वरूप, अमृत, अभय, शिव, अदितीय छे एज सत्य छ; अने हे श्वेतकेतो! ते सदात्म- स्वरूप तुं छो" ए रीते उद्दालक मुनि श्वेतकेतु पुत्रने सर्व मुमुक्षुओना हितने अर्थे तत्त्वोपदेश करता हवा. एटली वात छहा अध्यायमा छे. आ छटा अध्याया मूलभूत परम तत्त्वनो पंचम प्रक्रिया. २२५ उपदेश कर्यो, तो पण अर्वाचीन एटले पाछल- थी थनारां एवां विकार तत्त्वोनो निर्देश को न- हि एटले देखाडया नहि; माटे नामथी आरंभीने । प्राण पर्यंत विकार तत्त्वोने क्रमथी निर्देश करीने तदाराधी पण शाखाचंद्र न्याये सुमारख्य निरति- शय तत्त्वनो साक्षात्कार कराववामाटे आ सातमा अध्यायनो आरंभ. नारद मुनि चारे वेद, पट्शास्त्र, इतिहास, पुराणादि विगेरे सर्व विद्याओगें अध्ययन कर्ये छते पण शोकातुर रह्या, माटे तेनी निवृत्तिने अर्थे भगवान् सनत्कुमारने उपसन्न (शरणे ) थया अने प्रश्न को त्यांहां श्रुतिः- "सोहं भगवो मंत्रविदेवास्मिनात्म- वित् श्रुतं ह्येव मे भगवदृशेभ्यस्तर- ति शोकमात्मविदिति सोहं भगवः शोचामि तं मा भगवान्छोकस्य पा- रंतारयत्त्विति॥" संक्षेपार्थः- “हे भगवन् ! उपर प्रमाणे सर्व विद्याओनुं अध्ययन कर्ये छते पण म्हारो शोक निवृत्त थयो नहि माटे ते शोकनो पार उतारो." तेना उत्तरमा सनत्कुमारे कयुं त्यांहां श्रुतिः- .

स्वरूपानुसन्धाननी "नामयाऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवे- द आथर्वणश्चतुर्थः "इत्यादि तें अध्ययन करेलु जे ऋग्वेदादि ना- म तेनेज ब्रह्मरूप जाणीने उपासना कर! प्रति- माने विपे विष्णुनी पेठे.” पछी नारदे कह्यु के “नामथी पण जे अधिक होय ते कहो?" तेना उत्तरमा सनत्कुमारे "वाक्, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, अप, तेज, आकाश, स्मर, आशा, प्राण" ए रीते प्राणान्त सर्व वि- कारोनो ते ते फल सहित निर्देश कर्ये छते, ना- रद प्राणनेज सर्वथी श्रेष्ठ अने आत्मस्वरूप जा- णीने पोताने विपे कृतार्थता मानतो छतो उप- राम (प्रश्न करवाथी विराम) पाम्यो. तदनंतर अनृत ब्रह्मना विज्ञाने करीनेज परितुष्ट एवा शि- प्य नारदने प्राणने विपे आत्मत्वना आयहथी प्रच्यावन करता (छोडावता ) छता सनत्कुमारे कडं के " हे शिष्य ! प्राण तो नामादिनी अपे- क्षाये श्रेष्ठ छे, परंतु ते प्राणथी अधिक तो सत्य छे माटे ते जाणवू जोइए." त्यारे नारदे कडं के “ए सत्यनो उपदेश करो!" पछी सनत्कु- मारे उत्तर कह्यो के “जे विज्ञानवान् एज स- पंचम प्रक्रिया. " त्यने कहेछे माटे विज्ञान जाणवा योग्य छे." ए रीते प्रश्नोत्तररूपे"विज्ञानथी अधिक मनन अ- ने तेथी अधिक श्रद्धा, तेथी अधिक निष्ठा, तेथी अधिक कृति ( इंद्रियोर्नु संयमन अने चित्तनी एकाग्रता ) तेथी पण अधिक सुख छे; केमके निरतिशय सुख म्हारे जरूर पाम, एम ज्यारे माने त्यारेज ते कृतिने विपे प्रवृत्त धाय." त्या- रे नारदे प्रश्न कर्यों के “ए निरतिशय सुखनो उपदेश करो!” तेना उत्तरमा गुरुए कयुं के “यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति' (जे भूमा एज निरतिशय सुखरूप छे, अने अ- ल्पने विपे सुख नथी.) माटे “भूमानुं स्वरूप • जाणवू जोइए.” पछी तेनो प्रश्न कर्ये छते उत्त- रमा सनत्कुमारे कयुं त्योहां श्रुतिः- " यत्र नान्यत्पश्यति नान्यंच्छृणो- ति नान्यद्विजानाति स भूमा अ- थ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्य- द्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तद- मृतमथ यदल्पं तन्मर्त्य सभगवःक- स्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिनि यदिवा न महिनीति" ॥१॥ - स्वरूपानुसन्धाननी अर्थ:- “जे स्वरूप तत्त्वने विषे अन्य द्रष्टा अन्य करणे करीने अन्य दृष्टव्यने जोतो नथी; तथा अन्य श्रोता अन्य करणे करीने अन्य श्रो- तव्यने श्रवण करतो नथी; तथा अन्य विज्ञाता अन्य करणे करीने अन्य विज्ञेयने जाणतो नथी ते भूमा; अर्थात् लोक प्रसिद्ध दर्शन श्रवणादि- कनो जे अविपय व्यापक आनंद स्वरूप ते भूमा; तात्पर्य के जे तत्त्वने विपे सांसारिक कोइ पण व्यवहार नथी ते भ्रमा; अने जे अविद्या विष- यने विपे अन्य अन्ये करीने जुवेछे, श्रवण क- रेछे तथा जाणेछे ते अल्प (अविद्या कालने विपे होनारूं ) माटे जे भूमा एन अमृतरूप छे अने जे अल्प ते मर्त्यरूप छे, अने ए भूमस्व- रूपज व्हारो आत्मा छे" ए रीते आत्माथी अ- भिन्न ब्रह्मनो उपदेश करवाथी नारदनो शोक टाळीने विराम पाम्या. यद्यपि दिक, देश, काल आदि भेदे रहित एवं ब्रह्म “सदेव सोम्येदम्" " एकमेवा- द्वितीयम्""आत्मैवेदं सर्वम्" इत्यादि वा- क्ये करीने छठा अने सातमा अध्यायने विपेद- शादी निश्चय कराव्यु; तथापि मंद बुदिओनी देशकालादि भेद विशिष्ट एवी बुद्धि सहसा पर- पंचम प्रक्रिया. २२९ मार्थ स्वरूपने विषय करी शके नहि, अने ते स्वरूप जाण्या विना पुरुपार्थनी सिद्धि पण थाय नहि, माटे तेनो निश्चय कराववाने अर्थे ह. दयपुंडरीक प्रदेशने विपे सदात्मानो उपदेश क- रवाने अर्थे, तथा आत्मतत्त्व यद्यपि निर्गुण छे तो पण मंदबुद्धिओने गुणवाळु कहेवू एज युक्त छे वास्ते सत्यकामादि गुणवत्त्व कहेवाने अथै, वळी ब्रह्मचर्यादि साधनोना विधानने अर्थे, आ आठमा अध्यायनो आरंभ छे. आ विकारी शुङ एटले कार्यरूप एवा देहने विपे नाम रूपना व्याकरणने अर्थे जे सदाख्य ब्रह्मतत्त्व ते जीवात्मारूपे करीने प्रविष्ट थयु ए रीते छहा अध्यायमा कयुंछे; माटे “उपसंहार कर्याछे करणो जेमणे एवा अने बाह्य विपयो- थी विरक्त तथा विशेपे करीने ब्रह्मचर्यादि सा- धने युक्त एवा अने सत्यकामादि गुण युक्त ब्रह्मर्नु ध्यान करनारा एवा अधिकारीओने हृदयपुंडरी- कने विपेज सदात्मस्वरूप उपलश्यमान थाय- छे.” ए रीते “अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरेद- हरम्" इत्यादि श्रुति वाक्योये वोध कर्यो, ते- नाज दृढीकरणने अर्थ इंद्र विरोचननी आरख्या- यिकाः- (श्रुति.)

२३० स्वरूपानुसन्धाननी एप आत्माऽपहतपाप्माविजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपा- सः सत्यकामः सत्यसंकल्पः " अर्थः- 'अपहतपाप्मा ' एटले धर्म अध- मारख्य पापे रहित अने 'विजरः' एटले जरा रहित, तथा 'विमृत्युः' एटले मृत्यु रहित, तथा 'विशोकः' एटले इप्टना वियोगथी जन्य एवा मनना संतापे रहित, तथा' विजिघ- सः' एटले अशननी इच्छाये रहित, तथा 'अ- पिपासः' एटले पाननी इच्छाये रहित, तथा सत्यकामः एटले सत्य छे काम जेना, तथा 'सत्यसंकल्पः' एटले सत्य छे संकल्प जे. नो एवा आत्मानुं स्वरूप इंद्र अने विरोचनना वे अनुचरो ब्रह्मसभामा हता तेमणे ब्रह्माना मुख- थी श्रवण करीने इंद्रसभामां तथा विरोचनस- भामा कही देखाडयं तेने परोक्षताये श्रवण क- रीने इंद्रे अने विरोचने, ते आत्मस्वरूपना अप- रोक्षज्ञानने अर्थे प्रजापतिने शरणे जइने आत्म- वस्तुनो प्रश्न कों; अनन्तर प्रजापतिये वन्नेने वत्रीश वर्ष पर्यंत ब्रह्मचर्य पालवा कह्यु; तेम - कर्यानंतर आत्मानो उपदेश कर्यो त्यांहां श्रुतिः- . , पंचम प्रक्रिया. २३१ य एपोऽक्षिणि पुरुपोदृश्यत एप आ- त्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति ॥ अर्थः- “जे आ अक्षिने विपे पुरुप देखाय- छे एज आत्मा अने अमृत, अभय ब्रह्म एज छे." ए उपदेश उपरथी बन्ने जणाये विचार करीने छायापुरुपनेज आत्मा जाणीने तेनी दृढताने अर्थे प्रश्न कर्यो के “ अक्षिमां, जलशरावमा अ- ने आदर्शमा जे छायापुरुप देखायछे तेमा आत्मा कह्यो?" तेना उत्तरमा कयुं के “ वस्त्रा- लंकार धरीने पछी जल शरावादि विगेरेमा जुवो, शी रीते देखायछे?" पछी ते प्रमाणे करीने जो- यु, अने कह्यु के “वस्त्रालंकार सहित छायापुरु- पने जोइए छीए." त्यारे प्रजापतिये कह्यु के “एज तमारो आत्मा." एवं सांभळी देहनेज आत्मा जाणीने गया; तेमां विरोचने तो वीजो विचार नहि करतां पोतानी सभामां जइने सर्व असुरोने “देहज आत्मा छे." एवो उपदेश कर्यो. इंद्रे मार्गमाज विचार कयों के “ विवरूप देहने विपे वस्त्रालंकारादि धर्ये छते छायापुरुपमा पण ते देखायछे; तथा बिंबने विपे अंधत्व, का- णत्व, खंजत्वादि जणाते छते प्रतिविमा पण जणायछे; माटे एवो देह अमृत, अजर, अभयरुप , स्वरूपानुसन्धाननी आत्मा शी रीते कहेवाय? " एम जाणीने ब्र- झा पासे पाछो आवी प्रश्न कर्यो; त्यारे “ बत्री- श वर्ष सुधी ब्रह्मचर्य पाळीने आव.” ते कहेवा प्रमाणे करीने इंद्र आव्यो; त्यारे ब्रह्माये कयु के “जे स्वप्नमां पुरुप छे तेने आत्मा जाण. पछी ते उपर पण विचार करीने तेमां पण दोष जोयो के “ रोदन तथा दुःखित्वादि स्वप्न पुरुपमा जणायछे, माटे ते पण आत्मा संभवे नहि." त्यार पछी फरीथी पण बत्रीश वर्प ब्रह्मचर्य प- ळाव्या नंतर ब्रह्माये कडं के “ सुषुप्तिमा जे पु- रुप स्वप्नने नथी जाणतो ते आत्मा जाण." ते उपर विचार करीने दोप जोयो के “ ए सुपुप्त पुरुप ते काळे आ हुँ छौं एम जाणतो नथी, वळी बीजा कोइ भूतोने पण जाणतो नथी, माटे ए सुषुप्ति पुरुप पण आत्मा संभवे नहि." तदनंतर पांच वर्ष ब्रह्मचर्य पळावीने ब्रह्माये कह्यु के “ हे इंद्र ! जे आ मृत्युग्रस्त शरीर ते तो आत्मानुं अधिष्ठान (भोगायतन) छे, अने आत्मा तो अमृतरूप छे, तेने प्रिय अप्रियादिकनो स्पर्श न- थी; ए आत्मा कोइ गुरुए वोध पमाड्यो छतो आ शरीरथी समुत्थान पामीने एटले देहथकी पोता- नु स्वरुप विलक्षण जाणीने देहात्मभावनानो पंचम प्रक्रिया. २३३ त्याग करी वर्षज्योतिरूपे अभिनिष्पन्न होयछे; एज आत्मा अक्षि आदिक सर्व इंद्रियोने विषेप- ण द्रटारूप छे, अने अक्षि आदिक इंद्रियो एनां करणरूप छ; अने रूपादिक सर्वे विपयरूप ए- टले दृश्य छे ए रीते द्रष्टा, दर्शन, दृश्यरूप त्रि- पुटिये करीने तेथी विलक्षण शुद्ध सदात्मस्वरूप लक्ष करावीने ब्रह्मा उपराम पाम्या. आ उपनिपना तात्पर्याधनो श्लोकः- मृद्रूपे ज्ञात एतत् घटमुखमखिलं तज्जमस्मान्न भिन्नं तद्वच्छीदेशिके- नानुभवति सततं तत्त्वमस्येवमुक्तः। -यस्मादाकाशमुख्यं भवति जगदिदं ब्रह्मतच्चाहमस्मीत्येतन्मत्तो न भिन्नं स भवति मनुजो ब्रह्मन ब्रह्मवेत्ता ॥३॥ अर्थ:-जेम मृत्तिकानुं रूप जाण्ये छते ते- थी उत्पन्न थयेला घट शरावादि सर्व पदार्थो मृ- न्मात्र जणायछे; भिन्न जणाता नथी; तेमज श्री आचार्ये "तत्त्वमसि" (ते शुद्ध ईश्वरज तुं छो) ए प्रकारे उपदेश कर्ये छते, जे थकी आ- काशादि सर्व जगत् उत्पन्न होयछे ते ब्रह्म हुँन स्वरूपानुसन्धाननी छौं, अने कार्यरूप सर्व जगत् पण हुंज छौं; म्हा- राथी भिन्न किञ्चिन्मात्र नथी ए रीते प्रत्यगभिन्न ब्रह्मस्वरूपनो जे साक्षात्कार करे ते ब्रह्मरूपज होयछे, ब्रह्मवेत्ता नहि. १ (१०) रहदारण्यकोपनिपना अ- नुसारे विचार. मंगलाचरण. यदविद्यावशादिश्वं दृश्यते रशना- हिवत् । यद्विद्यया च तद्धानिस्तं वंदे पुरुषोत्तमम् ॥ १ ॥ नमस्त्रय्यन्तसं दोहसरसीरुहभानवे । गुरवे परप- क्षौषध्वान्तध्वंसंपटीयसे ॥२॥ अर्थ:-जेना अज्ञानना वशथी रज्जुने विपे भुजंगनी पेठे आ सर्व विश्व सत्य जेवू देखायछे, अने जेनां ज्ञानथी भ्रमात्मक विश्वनी हानि था- यछे ते पुरुषोत्तम(परमात्मा)ने वंदन करूंछों. १ पंचम प्रक्रिया. २३५ वेदान्त वाक्योनां समूहरूप कमलोने प्रकाश करवामां सूर्यरूप, अने वादियोना पक्षरूप अंध- कारना समूहनो ध्वंस करवामां अत्यंत समर्थ एवा श्री गुरुने नमस्कार करूंछौं.२ आ वाजसनेयि ब्राह्मणोपनिपत् संसारथी मु- ल थवाने इच्छता एवा मुमुक्षुओने संसारनी हे- तुभूत अविद्या अने तत्कार्यनी निवृत्तिमा मुख्य साधनभूत एवी ब्रह्मात्मैकल विद्यानी प्रतिपत्ति एटले प्रतिपादनने अर्थे छे. भाष्यकार कहेछे के, (श्रुतिः-) एकधैवानुद्रष्टव्यं “ मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति" इत्यादि वाक्योये सर्व उपनिषदोमा विद्या अने अविद्याना पृथक् पृथक् विपयो दर्शाव्या छे एटले अखंडैक्यरूप अभेद ते विद्यानो विपय अने जेटलो भेद प्रपंच ते अविद्यानो विषय; ते बन्ने मध्ये जे अविद्यानो कर्म उपासनारूप विपय ते सर्व पण आ उपनिपना संपूर्ण त्रीजा अ- ध्याये करीने व्याख्यान कर्यो, अने व्याख्यान करेलो ते अविद्यानो विषय सर्व पण सूक्ष्म, स्थू- ल एभेदे करीने वे प्रकारनो छे; तेमा जे प्राणा- . २३६ स्वरूपानुसन्धाननी ख्य सूक्ष्म लिंगात्मा ते स्थूलनो उपष्टंभक (थो- भावनार) छे, अने एज प्राणने श्रुतिमा विराट् शरीरवाळो प्रजापतिरूप हिरण्यगर्भ कह्योछे; एज प्राणाख्य हिरण्यगर्भरूप ब्रह्म वस्तुतः एक छतुं शरीरादि उपाधियोमा जाणे अनेक होयनी शुं ? एम रघुछे; एथी पर एवं वेद्य ब्रह्म कोइ छे नहि ए रीते अविद्यानुं विपयभूत अने चेतनवान् काभोक्तारूप एवां प्राणारख्य अपर ब्रह्मनेज पर- मात्मारूपे करीने निश्चय करतो एवो गार्य ब्रा- ह्मण वक्ता (पूर्व पक्ष वादि ) अने तेथी पर शुद्ध आत्मस्वरूपनो जाणनार एवो अजातशत्रु श्रोता (सिद्धान्त वादि ) आ ब्रह्मविद्याना उपक्रममा कह्योछे. गार्य तथा अजातशत्रुनी आख्यायिका जे कथन करी ते तो सुखे करीने वस्तुस्वरूपनो बोध धवाने अर्थेज प्रश्नोत्तररूपथी छे. प्राणाव्य अपर ब्रह्मनो जाणनार दृप्तवालाकि नामे ब्राह्मणे अजातशत्रु नामना काशीराजानी पासे जइने ब्रह्मोपदेशनी प्रतिज्ञा करीने सूर्या- दिकने विपे अपर ब्रह्म कथन कर्यु; त्यारे अजा- तशत्रु राजाये कयुं के “ब्रह्मनु मुख्य स्वरूप तें जाण्यं नथी." ते उपरथी शरमाइने तेणे राजा पंचम प्रक्रिया. २३७ प्रत्ये कयुं के “ तमे मने मुख्य ब्रह्मनो उपदेश करो!" त्यारे राजाये दान तरीके सुपुप्त पुरुप दे- खाडीने तेने विषे प्राणात्माने भोग्य प्रतिपादन करीने विज्ञानमय, स्वयंज्योति, प्राणादिक सर्वना उत्पत्ति, स्थिति, लयनो अधिष्ठानभूत माटे सत्य एचा प्राणादिकनो पण सत्यरूप एवो आनन्दा स्मानो ब्रह्मथी अभेदे करीने उपदेश कर्यो. हवे ब्रह्मज्ञानमा अंगभूत एवो संन्यास वि- धि कहेवोछे माटे मैत्रेयिनी आख्यायिका:- याज्ञवल्क्य मुनि पारिव्राज्य (संन्यास ) ले- वाने इच्छता छता पोतानी भार्याने कहेता हवा के “हे मैत्रेयि! हवे हुँ गृहस्थाश्रमनो त्याग क- रीने संन्यासने इच्छुछौं, माटे तुं अने कात्यायनी वैउनी साथे दांपत्यभाव संबंध तोडवो छे, वास्ते तमारे वेउने जरूर अनुमति आपवी; पछी हुँ तमने वनेने द्रव्य वेंहेंची आपीने जइश.” त्यारे मैत्रेयीये कहूं के “ तमे मने द्रव्ये करीने पूर्ण एवी आखी पृथ्वी आपशो तो पण तेणे करीने हूँ अमृतभाव यामवानी नथी, माटे म्हारे द्रव्य जोइए नहि, कात्यायनीने वधु द्रव्य आपो; मने तो तमे अमृतत्वनुं साधन जे जाणोछो तेनोज उपदेश करो के जेणे करीने हुँ अमृत थाउं.

स्वरूपानुसन्धाननी त्यारे याज्ञवल्क्ये प्रसन्न थइने कहां के “हे प्रि- ये आंही आवी लज्जानो त्याग करीने सामी वेश; अने हुं व्याख्यान करीश ते एकाय चित्ते श्रवण करीने निश्चय करवो.” अमृतत्वनु साधन वैराग्यना उपदेशने अथै मुनिये की के " हे मैत्रेयि! पति, नाया, पुत्रादिक सर्व पण पत्यादिकना कामने अर्थे प्रिय नथी; किंतु आत्माना कामने अर्थ ते सर्व प्रिय छे ए वात लोकमां पण प्रसिद्ध छे के सहुने पण आत्मा अति प्रिय छेमाटे (श्रुति) "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोत- व्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रे- व्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणे- न मत्या विज्ञानेनेद सर्वविदितम् अर्थ:-हे मैत्रेयि! पति पुत्रादिक सर्व पण गौण प्रिय छे, माटे तेनो त्याग करीने मुख्य प्री- तिनो आश्रय एवा आनन्दस्वरूप आत्मानुज द- र्शन कर एटले अपरोक्ष करचो, अने आचार्य तथा अतिथी रहेQज श्रवण करवू, तदनंतर युक्तिथी एटले दृष्टान्त पूर्वक त्हेज मनन क- र, (निश्चय करवो), त्यार पछी त्हेनुज निदि- ध्यासन (ध्यान) करवू. श्रवण, मनन, निदि- " पंचम प्रक्रिया. २३९ ध्यासन एत्रण्ये अंतरङ्ग साधनो वारंवार (अभ्या- से करीने) सम्यक् प्रकारे अनुष्ठान कर्या होय तोज ब्रह्मात्मैकत्व सम्यक् दर्शन (साक्षात्कार) धाय, अन्यथा श्रवणमात्रे करीने नहि. हवे रज्जुने विपे सर्पनी पेठे अविद्याये क- रीने, आत्माने विपे अध्यस्त एवं जे धर्म अधर्म तत्फलादिक ते सर्वना अपवादने अर्थ कहेछे के " हे मैत्रेयि ! श्रवणादित्रण साधनोथी एक आत्मस्वरूप जाण्ये छते सर्व पण विदित होय- छे; केमके आत्माथी अतिरिक्त एवं कांइ छेज नहि, किंतु नाम, रूप, क्रियात्मक एवं सर्व पण आत्मरूपज छे; माटे एक आत्माना ज्ञानथी सर्वनुं ज्ञान होयज. जे कोइ पुरुप “आ ब्राह्मण जाति छ, आ क्षत्रिय जाति छे." ए रीते ब्रा- ह्मण जात्यादिक सर्वने आत्माथी अतिरिक्तरूपे (भेदरूपे)जे जाणे ते भेददर्शी अपराधी पुरुष- ने ते ब्राह्मण जात्यादिक सर्व पण अपकार करे (अनात्मारूप करे)माटे ब्राह्मण जात्यादिक सर्वने पण आत्माथीज उत्पन्न होवाथी, तथा स्थिति काळे आत्मसत्ताधीज स्थित होवाथी, त- था आत्माने विपेज लय होवाथी ए सर्व पण आत्मरूपज छे. एरीते श्रवणादिक साधने करी- २१० स्वरूपानुसन्धाननी ने सर्वात्मभावथी आत्मानो साक्षात्कार करवो. सर्वात्मभावे करीने दर्शनमां दृष्टान्त कहेछे के, जेम दुन्दुभि, शंखादिक वजाडे छते बाह्य इतर शब्दोनुं विशेपे करीने ग्रहण थयुं नथी, किंतु शब्दसामान्यरूपेज ग्रहण थायछे; तेमज सर्वनुं पण सत्मात्र सामान्यरूपेज ग्रहण क- र; जेम धूमादिकनी उत्पत्तिथी पूर्वे एक अग्निज छे एवं ग्रहण थायछे तेमज सर्व जगत् पण उत्पत्तिथी पूर्वे प्रज्ञानधन एक आत्मस्वरूपज छे एवा अभिप्राये करीने कहेछे के, जेम आर्द्र (लीलां) इंधने करीने देदीप्यमान अग्निथी प- थप जेवा धूम विस्फुलिंगादिक नीकले छे, तेमज सत् आत्मस्वरूपथीज पुरूपना निश्वास- नी पेठे अप्रयत्ने करीनेज ऋक, यजुप, साम, अ- थर्वागिरस ए चार वेदो तथा शास्त्र, पुराण, इतिहास, विद्या, उपनिपत, श्लोक, सूत्र, व्या- ख्यान इत्यादि सर्व नीकलेछे. वळी जेम वापी, कूप, तडागादिक जळोनुं एक अयन समुद्र छे, अने सर्व स्पोर्नु एक अयन वनइंद्रिय छे, तथा सर्व रसोनु एक अयन जिव्हा छ, तथा सर्व गं- धोनुं एक अयन नासिका छे, तथा सर्व रूपोर्नु एक अयन चक्षु छे, तथा सर्व शब्दोनुं एक अ- , पंचम प्रक्रिया. २४१ यन श्रोत्र छे, तथा सर्व संकल्पोर्नु एक अयन मन छे, तथा सर्व विद्याओगें एक अयन हृदय (बुद्धि) छे, तथा सर्व कर्मोनुं एक अयन हस्त छे, तथा सर्व आनन्दोनुं एक अयन उपस्थ छ, त- था सर्व विसर्गानु एक अयन पायु छे, तथा सर्व अवाओ( मार्गों )नु अर्थात् तेने विपे गमन आगमननु एक अयन पाद छे, तथा सर्व वेदोनुं एक अयन वाक् छे, तेमज सर्व जगत्नं एक अ. यन आस्मा छे. ब्रह्मज आत्मा, अने आत्माज जगत् ए रीते प्रतिज्ञा करेला अर्थने तर्क(यु. तिथी सिद्ध कर्यो. हवे ब्रह्मविद्याये करीने अ- विद्याना निरोधथी जे जगत्नो आत्यंतिक प्रलय तेने दृष्टान्त पूर्वक कहेछे के, जेम भूमिना संप- कधी कठिनभाव पामेलो जळनोज विकार एवो सैन्धव खण्ड जलमा फेंक्यो छतो विलीन पाइने जलरूप होयछे, कोइथी पण जळमाथी पाडो उ- द्धरण करीने पूर्वनी पेठे ग्रहण करी शकातो नथी तेमज हे मैत्रेयि! जे परमात्मस्वरूपथकी अवि- द्याये करीने तुं परिच्छिन्न एवी छती कारण कार्य- रूप उपाधिना संबंधथी खिल्यभाव(खण्डभाव)- ने अर्थात् संघातभावने पामीछो; वळी मा ए- टले जन्म, मरण, क्षुधा, पिपासादिक संसार - २१ २४२ स्वरूपानुसन्धाननी मैवाळी थइछो; वळी नाम, रूप, क्रियात्मकताने पामी छती “हुं अमुक नामा, अमुक रूपा, अमु. क गोत्रजा छौं.” इत्यादि भावने पामीछो ते त्हा- रोमिथ्याभ्रान्तिजनित एवो खिल्यभाव एटले ना- म,रूप, क्रियात्मक संघातभाव पोतार्नु कारण- त समुद्रस्थानीय, अजर, अमर, शुद्ध, एकरस, प्र- ज्ञानघन, अनन्त, अपार, अविद्याजनित भ्रान्ति- भेद रहित एवां परमात्मस्वरूपने विपे विद्योपदे- शे अविद्यानो वाध करीने में प्रवेश कराव्यो, अ. ने ते अविद्याकृत खिल्यभावने स्वयोनिरूप ब्रह्म- स्वरूपे ग्रास कर्ये छते त्रिकाळाबाध्य, पारमार्थि- क, सन्मात्र एवं जे वस्तुस्वरूप एज परिशिष्ट रद्यु; ते वस्तुस्वरूपने विपे कोई पण जात्यंतर छे नहि. जो कदा आत्मस्वरूप स्वच्छ अने संसार धर्मथी रहित छे त्यारे तेने विपे “हु सुखी छौं, दुःखी छौं, आ गृहादिक म्हारुं छे” इत्यादि संसा- रधर्मरूप उपद्रवे भरेलो एवो खिल्यभाव एटले परिच्छिन्नभाव शा निमिते थयो? एवी मैत्रेयीने शंका थये छते तेमां निमित्त कहेछे के, स्वच्छ एवा परमात्माने विपे जल बुहुदना जेवां नाम- रूपात्मक कार्यकारणाकारे परिणामने पाम्यां जे भूतो के विषय पर्यंत जेमतुं परमार्थ विज्ञाने क- , पंचम प्रक्रिया. रीने ब्रह्मने विपे प्रविलापन पूर्व श्रुतिमां कयुंछे ते उपाधिरूप भूतो निमित्तथी, जळरूप निमित्तथी सूर्यादिकना प्रतिबिंबनी पेठे ए परमात्मा खि- ल्यभाव पाम्यो छतो “ हुं सुखी, हुं दुःखी" इ. त्यादि उपद्रवोने पामेछे; ते निमिनरूप भूतो ज्यारे श्रुति आचार्यना उपदेशथी जन्य एवी ब्रह्मविद्याये करीने समुद्रमा नद्यादिकनी पेठे ब्रह्मस्वरूप परमात्माने विपे प्रविलापन कया छ- ता विनष्ट थाय त्यारे परमात्माने विपे खिल्य- भाव पण निवृत्त थाय: जेम जळरूप निमित्तना अभावथी सूर्यादिकना प्रतिबिंबो विलय थइने विवमात्र रहेछे तेम; त्यार पछी स्वच्छ, अनन्त, अपार, विज्ञानधन एवं परमात्मस्वरूपज अव- शिष्ट रहेछे ते परमात्माने विपे कोइ विशेप संज्ञा रहे नहि. हे मैत्रेयि ! “हुँ सुखी, दुःखी, म्हारं पुत्र धनादि इत्यादि सर्व उपद्रव पण अविद्यारुत छे ते अविद्यानो विद्याये करीने नाश थइ गयोछे माटे यद्यपि अविद्यादशामां शरीरने विपे रहेला आत्माने पण वास्तवताथी संसारभाव नथी त्यारे विद्याये करीने बाधित थयांछे अविद्या त- कार्यों जेनां एवा ब्रह्मवेत्ताने खिल्यभाव संसार नहि होय तेमां शुं कहेवु? ए रीते याज्ञवल्क्य २४४ स्वरूपानुसन्धाननी मुनि पोतानी भार्या मैत्रेयीने परमार्थ ज्ञाननो उपदेश करता हवा. ए प्रकारे बोध पमाडी छ- ती मैत्रेयी कहेछे के, हे स्वामिन ! पूज्य एवा तमे शुं मने विरुद्ध धर्मवाळां मोहक वाक्ये क- रीने मोह पमाडोछो ? (ते विरुद्ध धर्मनेज कहे- छे के,), तमे प्रथम तो “आत्मा विज्ञानघनज छे” एवी प्रतिज्ञा करीने पछी पाछा कहोछो के "न प्रेत्य संज्ञास्ति " (ते आत्माने विषे विशेष संज्ञा नथी.) प्रथम तमे आत्माने वि- ज्ञानधनरूपपणुं प्रतिज्ञा कर्यु, अने पछी पार्छ विनाशानंतर विशेष संज्ञानु राहित्य कथन कयु, वास्ते एक आत्माने विपे विज्ञानघनपणुं तथा विनाशानंतर विशेष संज्ञानु राहित्यपणुं ए व. ने विरुद्ध धर्म केम घटे? जेम एक अग्निमां शी- तत्व अने उष्णत्व बन्ने घटे नहि तेम. त्यारे मुनिए कह्यु के “ में तो कांइ विरुद्ध धर्मवालु मोहक वाक्य कह्यु नथी, पण तेंज भ्रान्तिथी आ- त्माने विपे विरुद्ध एवा वे धर्मो मानी लीधा; में तो एम कडं के, अविद्याये करेलो आत्माने विपे जे खिल्यभाव तेनो विद्याये करीने नाश थये छते ते खिल्यभाव निमित्त विशेप संज्ञा रहे पंचम प्रक्रिया. २४५ नहि; जेम गंगा यमुनादि नदीओनो समुद्रमा एकीभाव थये छते विशेष संज्ञा रहेती नथी तेम. ते आत्मा भूतभौतिक सर्वनो नाश धये छते पण वास्तवताथी नाश पामतो नथी; किंतु वाचा- रंभण श्रुतिनां प्रामाण्यथी अविद्यारत एवो खि- ल्यभावज विनष्ट धायछे माटे जे में उपदेश क- यो ते निर्दोष छे. ज्यारे विज्ञानधन स्वरूप तमने प्रामाणिक छे त्यारे "न प्रेत्य संज्ञास्ति' ए निषेध अयुक्त छे एटले विशेप विज्ञाननो निपेध अयुक्त छे एवी मैत्रेयीने आशंका थये छते, अ- विद्यारुत एवं जे विशेष विज्ञान तेना खंडनना अभिप्राये निपेध युक्तज छे ए रीते मुनि उत्तर आपेछे के, अविद्याये करीने कल्पित अने कार्य- कारण संघातरूप उपाधिये जनित एवो विशेपा. त्मक खिल्यभाव होवाथी वास्तवताये करीने अ- दैत एवां ब्रह्मस्वरूपने विषे दैत जेवू अने वस्त्वंतर जे जणायछे तेवी अविद्यादशाने विपे विवधी इतर प्रतिबिंबनी पेठे परमात्माथी इतर जेवो खिल्यभूत आत्मारूप द्रष्टा एटले प्रमाता इतर जेवां चक्षुरादि करणे करीने इतर जेवा रूपादिक विपयोर्नु दर्शन श्रवणादिरूप विशेष ज्ञान पामे- छे; ए अविद्या ज्यारे जे पुरुपे ब्रह्मविद्याये करीने २४६ स्वरूपानुसन्धाननी नाश पमाडी अने ए ब्रह्मवेत्ताये नाम, रूप, कि- यात्मक सर्व पण ब्रह्मने विपे लय पमाडघु छतुं ब्रह्मरूपज संपन्न थयु; ते विद्यावस्थाने विषे क- हो द्रष्टा कह्यां करणे करीने कह्या विपयनुं ग्रह- ण करे? अर्थात् द्रष्टा, दर्शन, दृश्य इत्यादि त्रि- पुटीना अभावथी केवळ विज्ञानधनज परिशिष्ट रहे. ए वाते करीने एम सिद्ध थयु के, अविद्या छतेज किया कारक फलादि सर्व व्यवहार छे, अने विद्या प्राप्त थये छते तो आत्माथी इतर- नोज अभाव छे माटे कोइ पण व्यवहार नहि. हे मैत्रेयि! अविद्यादशामा लोक जे साक्षी आ- स्माये प्रकाश करेलां चक्षुरादिक करणोये करीने बाह्य विपयोने जाणेळे ते करणोने वाह्यविषयक प्रवृत्तिथीज उपक्षीण होवाथी विज्ञाता एटले प्र- काशक एवा आत्माने शाथी जाणे? अर्थात नहिज जाणे; माटे श्रवणादि अंतरङ्ग साधनोनुं अभ्यासे करीने अनुष्ठान कर्यु होय तोज ब्रह्मा- स्मैकल ज्ञान थाय, अन्यथा नहि. एटली वात चोथा ब्राह्मणमा निरूपण करीछे. लोकमां परस्पर उपकार्य उपकारकरूप सर्व वस्तु एक कारण पूर्वक अने एकने विपेज उत्प- ति, स्थिति, लयवालु जोवामां आवेछे, माटे आ पंचम प्रक्रिया. २४७ सर्व जगत पण परस्पर उपकार्य उपकारकभावथी एकात्मकारण पूर्वक अने एक आत्माने विपेज उत्पत्ति, स्थिति, लयवालु होवु जोइए ए रीते हेत्वसिद्धिनी शंकानां निवर्तनने अर्थे मधु ब्राह्म- ण छ; अथवा आत्माज सर्व छे ए रीते प्रतिज्ञा करेला अर्थनो उत्पत्ति, स्थिति, लयरूप हेतु क- हीने एज अर्थना उपसंहारने अर्थ आ आगम प्रधान मधु ब्राह्मण छे. - आ प्रसिद्ध एवी पृथ्वी उपकारकत्वे करीने ब्रह्मादि स्तव पर्यंत सर्व प्राणियोने मधुरूप छे; तथा सर्व प्राणिओ उपकार्यत्वे करीने पृथ्वीनां मधुरुप छे; बळी पृथ्वीमा तेजोमय ( चिन्मात्र प्रकाशमय ) भने अमृतमय ( अमरंणधर्मा ) एवो जे पुरुप ते तथा शरीरमा रहेनारो तेजो- मय अने अमृतमय एवो जे लिंगात्मा पुरुप ते उपकार्यत्वथी सर्व भूतोनो मधुरूप छे; तथा सर्व भूतो उपकारकत्वथी पुरुपना मधुरूप छे ए रोते पूर्वोक्त चारे परस्पर उपकार्य उपकारक होवाथी कार्यरूप छे, अने ते एक कारणक एटले एक ब्रह्मस्वरूप छे कारण जेमनुं एवां छे; तथा च एक ब्रह्मज परमार्थ सत्य छे, अने इतर सर्व कार्य तो वाचारंभण श्रुतिनां प्रामाण्यथी नाम मात्र छे स्वरूपानुसन्धानंनी एं कहेवाथी जे पूर्व प्रतिज्ञा करी हती के 'सर्व जगत् आत्मरूप छे ते सिद्ध थई; अने मुनिये मै- त्रेयीने जे अमृतत्वनी प्राप्तिने अर्थे श्रवणादि साधनो कथन का ते अमृतस्वरूप ब्रह्म पण एज छे ते प्रमाणे मधुपर्यायनी चौद श्रुतियो- नो तात्पर्यार्थ छे. ए रीते अविद्याये करेलो पृथ्वीथी आरंभीने विज्ञानमय पर्यंत सर्व पण कार्यकारणसंघात ब्रह्मविद्याये करीने जेने विपे प्रवेश कराव्ये छते जे परिशिष्ट रह्यो ते अनन्तर, अबाह्य, पूर्ण, प्रज्ञा- नधनभूत एवो सर्व भूतोनो आत्मा छे, अने स- बैने उपासना करवा योग्य छे, तथा सर्व भूतो- नो अधिपति अने सर्वेनो राजा छे ए रीते मधु ब्राह्मणमां कहेला प्रकारे आचार्यथी तथा श्रुति- योथी सर्वात्मभावे आत्मानु श्रवण करीने तथा तर्कधी मनन करीने तथा निदिध्यासने करीने साक्षात्कार करीने पूर्व वास्तवताथी ब्रह्मरूप छतो पण जे अविद्याये करीने अब्रह्म हतो, अ. ने सर्व छतो पण अविद्याथीज असर्व हतो ते अविद्याने पूर्वोक्त ब्रह्मविद्याये करीने तिरस्कार करोने ते ब्रह्मवेत्ता पुरुप ब्रह्मीत छतो सर्वरूप होय; जेम रथ नाभिने विपे आराओ समर्पित पंचम प्रक्रिया. २४९ छे तेमज ब्रह्मादि स्तंब पर्यंत सर्व प्राणियो, त- था अन्यादि सर्वे देवताओ, तथा भूरादि सर्वे लो- को, तथा वागादि सर्वे प्राणो, तथा सर्वे चिदा- भासो ब्रह्मीभूत ब्रह्मवेत्ता पुरुपने विप समर्पित छे. पूर्वे कयुं हतुं के, ब्रह्मवेत्ता वामदेव गर्भमां- ज “हुँ मनु छौं, हुं सूर्य छौं.” इत्यादि सर्वात्म- भावनो साक्षात्कार करतो हवो ए सर्व व्याख्या- न कर्यु. ते ब्रह्मवेत्ता विद्वान पुरुप सर्वोपाधि स- हित छतो सर्वरूप होयछे; तथा निरुपाधिक छ- तो अनन्तर, अबाह्य, पूर्ण, प्रज्ञानघन, अज, अजर, अमर, अभय, अचळ, तथा लमनण्वहस्वं" ए श्रुत्युक्त प्रकारे सर्व निपेध- नो परमावधिभूत होयछे. ईशावास्य मंत्र-“ अनेजदेकं मनसो ज- वीयः” “तदेजति तन्नजति " " तद्धाव- तोन्या." तैत्तिरीयक मंत्र- “यस्मात्परं ना परमस्ति किञ्चित् जक्षन् क्रीडन रममाणः " आथर्वण- "दूरात्सुदूरे त- दिहान्तिके च” काठक- "अणोरणी- यान महतोमहीयान्" भगवद्गीता०- "अ- हं क्रतुरहं यज्ञः " “पिताहमस्य जगतः" अस्थू- " " " ग्र- २५० स्वरूपानुसन्धाननो " ना दत्ते कस्यचित्पापं " समं सर्वेषु भूतेषु" "" अविभक्तं च भूतेषु सिष्णुप्रभविष्णु च" इत्यादि आगम प्रतिपादित अर्थने नहि जाणनारा अज्ञानी पंडितमानी तार्किको “अस्ति आत्मा, नास्ति आत्मा, कर्ता,अकर्ता, मुक्त, ब- द,क्षणिक, विज्ञानमात्र, शून्य इत्यादि" विकल्पो करता छता अविद्याना पारने पामता नथी; माटे जे पुरुपो श्रुति आचार्य देखाडेला मार्गने अ- नुसरे एज अविद्याना पारने पामे अने एज मोहसमुद्री तरे, वीजा स्वबुद्धिनी कुशलता- वाळा तरे नहि. जे ब्रह्मविद्या मैत्रेयीये याज्ञवल्क्यने पुछी हती ते समाप्त थई. एज मधुविद्या(ब्रह्मविद्या ने दध्यड्डाथर्वण मुनिये अश्विनीकुमारने वे मंत्रे क- रीने स्तुति पूर्वक चोथा अध्यायना पांचमा व्रा- मणमा उपदेश करीछे. पांचमा अध्यायमा याज्ञवल्कीय कांडनो आ- रंभ छ:- विदेह देशोनो राजा जनके बहु दक्षिणायाळो यज्ञ कर्यो त्याहां देशेदेशना ब्राह्मणो आव्या ह- २५१ पंचम प्रक्रिया. ता; ते मध्ये ब्रह्मिष्ठतम कोण छे? एवी जिज्ञा- साथी सालंकार सहस्र गायोनो राजाये पण क- यो, अने रोकावीने कयुं के “जे कोई ब्रह्मिष्ठत- म होय ते आ सहस्त्र गायोने ग्रहण करे." त्यारे कोइ पण वोली शक्या नहि; पछी याज्ञवल्क्य मुनिये पोतानुं ब्रह्मिष्ठपणुं जणाववा सारु पोताना सामश्रवा शिष्य पासे ए गायो स्वगृह प्रत्ये मो- कलावी; ते समये बीजा ब्राह्मणोये कोप करीने कयु के "तुंज एक ब्रह्मवेत्ता छो?” एम कहीने तिरस्कार को; त्यार पछी (१)आश्वळ,(२) आतभाग, (३) भुज्यु, (१) उपस्त, (५)क- होळ, (६) गार्गी, (७) उदालक अने (८) शाकल्य ए आठ टच्छकोये जे जे युक्तिथी प्रश्नो कर्या, तेमना युक्तिथीज अनुक्रमे याज्ञवल्क्य मु- निये उत्तरो कर्या. त्यार पछी क्षुत्पिपासादि रहित, साक्षात् सर्वान्तर एवं ब्रह्म कहेवाने अर्थे आ गार्गी ब्राह्मण छे. पूर्वे याज्ञवल्क्ये उत्तर आपीने पराजय करे- ली गार्गी फरीथी प्रश्न करवा माटे ब्राह्मणोनी आज्ञा मागेछे के “ हे ब्राह्मणो ! हुं याज्ञवल्क्य प्रत्ये वे प्रश्नो करवानी छौं, पण तमारी अनुम- २५२ स्वरूपानुसन्धाननी ति होय तो पुछु; जो कदा उत्तर आपशे त्यारे तो तमाराथी कोइथी पण जीती शकाय नहि एम जाणवू.” पछी ब्राह्मणोये आज्ञा आपी छती प्रश्न करती हवी के “ हे याज्ञवल्क्य! जे- म काशीराज अथवा जनक धनुस् सज्य करी शत्रुने विधनारा वे वाण संधान करीने शत्रुनी सामे रहे तेम हुँ पण बाणरूप वे प्रश्न तैयार क- रीने त्हारी सामे रही छौं." मुनिये कडं के “क- र प्रश्न.” त्यारे गार्गीये पेहेलो प्रश्न एवो कर्यो के "जे ऊर्ध्व ब्रह्मांडकपाळथी उपर छे, तथा जे अधःकपाळथी नीचे छे, तथा वन्नेनी मध्यमां भूत, भविष्य, वर्तमानरूप सर्व जगत जेमा ए- कीभूत छे ते पूर्वोक्त सूत्रात्मा कोने विषे ओतप्रोत छे?" तेना उत्तरमा मुनिये कयुं के "ते सूत्रात्मा अव्यारुताकाशमां ओतप्रोत छे" त्यारे गार्गीये प्रसन्न थइने अने नमस्कार करीने पछी, 'जो कदा अवाच्य वस्तुस्वरूपने नहि कहेशे तो अप्रतिपत्ति, अने कदा कहेशे, तो विरुद्ध प्रतिपत्ति ए रीते घेउ प्रकारे दोपना अभिप्रायथो' बीजो प्रश्न कर्यों के “हे मुने! ते अव्याकता- काश कोने विपे ओतप्रोत छे?" तेना उत्तरमा मुनिये कह्यु के " हे गार्गि! जेने विपे अव्याहता- पंचम प्रक्रिया. २५३ काश ओतप्रोत छे ते वस्तुस्वरूप अक्षर (अ- विनाशि,) अस्थूल, अनणु, अहस्व, अदीर्घ, अ- लोहित, अस्नेह, अच्छाय, अतम, अवायु, अना- काश, असंग, अरस, अगंध, अचक्षु, अश्रोत्र, अ- वाक्, अमन, अतेज, अप्राण, अमुख, अमात्र, अनंतर, अबाह्य, अभोक्ता, अभोग्य, एकज अद्वितीय स्वरूप छे ए रीते हारा अने म्हारा म्होटेरा ब्राह्मणो एटले ब्रह्मवेत्ताओ कहेछ, हुँ कहेतो नथी; तथापि ए वस्तुने जाणुंछौं. (एणे करीने अवाच्यतुं वचनरूप विप्रतिपत्ति अने अ- ग्रहणरूप अप्रतिपत्ति एटले बन्ने दोपनो परिहार कर्यो.) हे गार्गि! सूर्य, चंद्र, काल, देव, पित्रु आदि सर्व पण एज अक्षरस्वरूपनी आज्ञामा नियमे करीने वर्ती रघुछे ए अक्षर स्वरूपने जा- ण्या विना जे होम, जप, तप आदि करे ते सर्व अंतवालु छे; ए स्वरूपने जाण्या विना जे मृति पामे ते रुपण एटले जन्म मरणना प्रबंधमांज आरूढ होयछे; जे अक्षर स्वरूपने जाणीने वर्ग- मान देहनो त्याग करे तेज ब्राह्मण ए संसार बंधनधी मुक्त होयछे; ए अक्षर स्वरूप अदृष्ट छ- तुं द्रष्ट, अश्रुत छतुं श्रोत इत्यादि; एथी अन्य कोइ द्रष्टा, श्रोता, मंता, विज्ञाता छे नहि ए , , २२ " २५४ स्वरूपानुसन्धाननी स्वरूपने विषे अव्याकताकाश ओतप्रोत छे. पछी गार्गीए कह्यु के, "हे ब्राह्मणो ! तमे कोइ पण याज्ञवल्क्यने जीती शको एम नथी, माटे नमस्कार करीने क्षमापन मागो" एम कहीने ते उपराम पामी. एथिव्यादिक सर्व भूतोनो सूक्ष्मतानां तारतम्ये करीने उत्तरोत्तरमा ओतप्रोतभावनां कथने क- रीने सर्वान्तर एवं ब्रह्म कथन कर्यु; ते ब्रह्मने नाम रूपात्मक दृथिव्यादिकनुं निपंतापणुं पण कथन कर्यु; हवे नियम्य एवी सर्व देवताओना संकोच विकाशनी द्वाराये ते नियन्तृ ब्रह्मनां साक्षात् अ- परोक्षत्वना बोधनने अर्थे शाकल्य ब्राह्मण छे. शाकल्य ऋपिये तर्क अने कुतर्कोथी अनेक प्रश्नो कर्या, तेमना उत्तर याज्ञवल्क्य मुनिये यु- तिथी यथार्थ आप्या; अनन्तर "तन्त्वोपनि- पदं पुरुष एच्छामि" ए वाक्ये करीने केवल श्रुत्येकगम्य आत्मा स्वरूप याज्ञवल्क्ये पुछ्यु तेनो उत्तर शाकल्य आपी शक्यो नहि, अने य- हा तदा बोल्यो; त्यार पछी तेनुं मस्तक पडधु. पूर्व ब्राह्मणमां शारीरादिक अष्ट पुरुपो (१ पृथ्वी, २ काम, ३ रूप, आकाश, ५ त- म, ६ रूप, ७ अप, ८ रेतस्)नो विस्तार पूर्वक पंचम प्रक्रिया. २५५ व्यवहार हृदयमा कथन करीने पछी अन्योन्य प्रतिष्ठ एवां शरीरने तथा हृदयने प्राणादि पंच वृत्त्यात्मक समानारख्य सूत्रने विपे उपसंहार करी- ने, पछी सूत्रनो अथारुतमा उपसंहार करीने ते अव्याकृतथी अतिकांत एवो जे उपनिषद् प्रमाणे करीने गम्य पुरुप " नेति नेति" वाक्ये उपदे- श कर्यो ते पुरुपने “ विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" ए वाक्ये करीने साक्षातरूपे अने उपादानरूपे करीने याज्ञवल्क्य मुनिये देखाड्यो; एज पुरुपर्नु वागादि देवता द्वाराये करीने प्रदर्शनरूप उपा- यान्तरने अर्थ छहा अध्यायनां वे ब्राह्मणोनो आ- रंभ छे. जनक राजानी जे आख्यायिका ते तो जे अधिकारी पुरुष श्रद्धादि संपन्न थइने शास्त्रो- तविधिथी गुरुने प्रपन्न थाय तेनेज गुरुये ब्रह्म- विद्यानो उपदेश करवो एवा आचारना प्रदर्श- नने अर्थ छे. त्रीजां ब्राह्मणमा याज्ञवल्क्य मुनिये जनक रा- जाने आत्माने विपे शुद्धत्व, , स्वपंज्योतिष्ट्व, अल्लु- प्पशक्तिस्वरूपत्व, निरतिशयानंदस्वभावत्व, अद्वै. तख अनुभव कराव्यु छे तेमां स्वप्नावस्थामा स्व- घंज्योतिपणानो जे स्पष्ट अनुभव कराव्योछे तेनो : स्वरूपानुसन्धाननी श्रुतिने अनुसार विस्ताररूपे अर्थ चतुर्थ प्रक्रि- यामा दर्शावेल छे. उपरनां त्रीजां ब्राह्मणमा संसार वर्णननो प्र- स्ताव को हतो अने “तत्रायं पुरुप एश्योड़े- श्यः संप्रमुच्य" (ए पुरुप ए अंगोधी संप्रमु- क्त थइने ) ए रीते पण कयुं हतुं; त्यांहां ते सं- प्रमोक्षण कह्या कालने विपे अने को प्रकारे थाय? ते कहेवा वास्ते सविस्तर एवं संसारनुं व- र्णन चोथा ब्राह्मणमां कयुछे. समस्त आरण्यकनो अर्थ अन्त्यनी एक कं- डिकामा देखाड्योछे. (कंडिका) "सवा एप महानज आत्माऽजरोs- मरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्मा- भयहि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद" अर्थः- ते आ आत्मा, 'महान् ' एटले व्या- पक, तथा ' अज' एटले अजन्मा, तथा 'अज. र' एटले विपरिणामे रहित, तथा' अमर' ए- टले अपक्षय रहित माटेज 'अमृत' एटले अघि- नाशी, तथा जन्मानंतर अस्तित्व अने वृद्धिये र- हितमाटेज काम, कर्म, मोहादि विकारे रहित छे, पंचम प्रक्रिया. २५७ अने तेथीन 'अभय' एटले भय रहित छे (जे भय ते अविद्यानुं कार्य छे तेना निपेधे करीने त- था पड़भाव विकारना निपेधे करीने तेनु मूल अविद्यानो पण निपेध अर्थात् जाणयो.) एवो जे आत्मा एज निरतिशय सुखरूप अभय ब्रह्म छे ए रीते आत्माने ब्रह्मथी अभेदे करीने जे जा- णे एटले अपरोक्ष करे ते अभय ब्रह्मरूप होयछे. एज अर्थनो एटले ब्रह्मात्मैकत्वनो सम्यक् प्रबोध थवाने अर्थ उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयादिकनी क- ल्पना तथा क्रिया, कारक फलो विगेरेनो अध्या- रोप आत्माने विपे कर्यो, अने तेना अपवादे क- रीने ब्रह्मात्मैकवरूप तत्त्व साक्षात्कार कराव्यो; जेम एकथी आरंभीने परार्थ पर्यंत संख्यानां परि- ज्ञानने अर्थ संख्याने विपे रेखानो अध्यारोप क- रीने केवल संख्या स्वरूपनो बोध करावेछे; प- ण १ थी ९ सुधी रेखा कांड संख्यान स्वरूप न- थी; वळी अकारादि अक्षरोनां प्रबोधनने अर्थे शाहीनी रेखारूप अध्यारोप करीने अकारादि वर्णोनु तत्व स्वरूपनो अनुभव करावेछे, पण ते रेखा वर्णानुं स्वरूप तत्त्व नथी एज रीते उत्पत्ति, स्थिति, लयादिकरूप उपायोर्नु अवलंबन करीने ब्रह्मात्मैकत्व तत्त्वचें ज्ञान कराव्यु; पछी “ने- स्वरूपानुसन्धाननी ति नेति" वाक्ये ते कल्पित सर्वनो अपवाद करीने केवळ ब्रह्मात्मैकलनो साक्षात्कार करा- व्यो. ए रीते समस्त आरण्यकनो अर्थ एक कंडि- कामां देखाड्योछे. पूर्व कथन करेली ब्रह्मविद्याना उपसंहारने अर्थे प्रथम कहेलं जे मैत्रेयी ब्राह्मण एज पार्छ फरीथी छठा अध्यायना पंचम ब्राह्मणरूपे करी- ने कथन कर्युछे. ब्रह्मविद्या समाप्ता. आ उपानपद्ना तात्पर्यार्थनो श्लोकः- यस्यानंदस्य मात्रा विविधसुखमिदं येन सर्वेपि जीवाः प्राणत्यव्याकृतं प्राग जगदिदमखिलं व्याकरोन्नाम- रूपैः । अन्तर्यामीऋपीकाधिप इ- ति विदितं व्यापकं ब्रह्म तत्राहं व्र- ह्मास्मीति येनैवविलयमसवस्तस्य नैवोच्छलन्ति ॥१॥ अर्थः- सार्वभौम आनंदथी आरंभीने हिर ण्यगर्भ पर्यंत उत्तरोत्तर शतगुणित एवा आनन्दो पंचम प्रक्रिया. जेनाज अंशरूप छे; तथा सर्व जीवो जेनी स- त्ताथीज प्राणन करेछे; तथा पूर्वे अव्याहत एवां जगत्ने नाम रूपे करीने जे व्याकरण करतो ह- वो; तथा जे अन्तर्यामीरूपे करीने मन आदि इंद्रियोनो अधिपति एटले प्रेरक छे ते प्रत्यक् स्वरूप हुंज व्यापक ब्रह्मरूप छौं ए प्रकारे " अ- हैं ब्रह्मास्मि' ए वाक्ये करीने प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्मनो साक्षात्कार करनार जे विद्वान् पुरुप तेना प्राणो आज देहने विपे विलय पामेछे, उत्क्रम- ण करता नथी, १. (११) केननु वाक्य भाष्य.(आनो स- मावेश केनना पद भाप्यमा जाणवो.) (१२) उत्तरनृसिंहतापिनी. ( आनो समावेश माण्डूक्यमां जाणवो.) इति श्री मदुदयशंकरात्मन गौरीशंकर विरचिते स्वरूपानुसंधाने पंचम प्रक्रिया समाप्ता.५

अथ श्री स्वरूपानुसंधाने
पष्ठी प्रक्रिया प्रारंभः६
सूत्रप्रस्थान.
श्री व्यासकृत सूत्रनां भाप्यमां श्रुतियोना
निर्णायक पविध लिंग एटले उपक्रमोप-
संहारावश्यासोपूर्वताफलें। अर्थवादोपपत्ती
च लिंगं तात्पर्यनिर्णयः ॥ १॥"
ए तात्पर्यथी कर्म, उपासना, ज्ञान त्रिकांडा-
त्मक वेदनां वाक्योनो अविरोधताये निर्णय कर्यो-
छे; तथा केटलाएक वादियोनो द्वैत मत खंडन
करीने अद्वैत मत प्रतिपादन कर्योछे; माटे पांच
ब्रह्मसूत्रोना अर्थी उपरथी अनुसंधान.
उत्तर मिमांसारूप सूत्रना अध्याय चार तेमा
(१) समन्वयाध्याय, (२) अविरोधाध्याय,
(३)साधनाध्याय, (४) फलाध्याय;
अने
ते प्रत्येक अध्यायना चार चार पाद छे.
प्रथम अध्यायना प्रथम पादनुं प्रथम सूत्र.
अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥१॥

पष्ठी प्रक्रिया. अर्थः-आ जन्ममा अथवा जन्मांतरमा क- रेलां पुण्यविशेपथी एटले यज्ञ, दान, तप तथा हरितोपण विगेरे सत्कर्मोथी अन्तःकरणनी शुद्धि थये विवेकादिक चतुष्टय साधन- (१) विवेक एटले आत्मा अनात्मानी विवेचना करवी; नीर क्षीरनी पेठे अर्थात् जड चेतनतुं तत्त्व यथार्थ समज. (२) वैराग्य एटले आत्मपुराणना पेहेला तथा छठा अध्यायमा यमदूतोए लिंग शरीराभि- मानी जीवने यमयातना भोगवावचा लेइ जतां तेने अनेक प्रकारे धिकारीने गर्भवास, जन्म, मरणादि अनेक दुःखो देखाड्यांछे ते विगेरे दोप दृष्टिथी तथा विवेके करीने जाणवामां आव्यु जे दृश्यवर्ग देहादिकन मिथ्यापणुं तेथी तेने विपे रागर्नु राहिल्यपणुं ते वैराग्य. (३)शमादि पटक.-(१) शम एटले मननो निग्रह; अर्थात् बहिर्मुख मनने अंतर्मुख संपादन कर.(२) दम एटले बाह्य चक्षुरादि इंद्रियोनो निग्रह; अर्थात् पोतपोताना विपयोने विषतुल्य जाणीने ते उपर प्रवृत्त न थवा देवा; तेमा रसना अने उपस्थ इंद्रियनो मुख्य निग्रह २६२ स्वरूपानुसन्धाननी करवो. (३) उपरति एटले पराक् प्रवण - त्तियोनो त्याग पूर्वक प्रत्यक् प्रवण वृत्तिओ रा- खवी; अर्थात् जेवी बाह्य पदार्थोमां आसक्ति हो- यछे तेवीज वाह्यमा नहि राखतां प्रत्यक् आत्म- स्वरूपने विपे राखवी. सारांश ए के, तेनो अर्थ सर्व कर्मनो संन्यास. (४) तितिक्षा एटले प्रा. रब्धयोगे प्राप्त थयां शीतोष्णादिक सुखदुःखनुं सहन करवू; अर्थात् ते विपे क्केशना राहित्यप- णाथी रहे. (५)श्रद्धा एटले ब्रह्मनिष्ठ गुरु तथा वेदान्त वाक्यो उपर विश्वास. (६) स- माधान एटले प्रत्यक्थी अभिन्न ब्रह्मने विषे चित्तनी एकाग्रता. (४) मुमुक्षुता एटले जन्म मरणादिरूप संसार बंधनयकी म्हारी मुक्ति क्यारे थशे? ए प्र- कारनी मोक्षने विपे दृढ इच्छा. ए रीते साधन चतुष्टय संपन्नतारूप अधिकार प्राप्त थया नंतर ब्रह्मस्वरूपनो विचार करवो. ने 'अतः' ए शब्द हेत्वर्थ छ एटले जे माटे चेदज पोते श्रेयनां साधन अग्निहोत्रादि कर्माना स्वर्गादि फलनो अनित्यता देखाडेछे तेमा झु- तिः- "तद्यथेह कर्म चितोलोकःक्षीयत ए- .. पष्ठी प्रक्रिया. २६३ वमेवामुत्रपुण्यचितोलोकः क्षीयते " इत्या- दि; तथा वेदज ब्रह्मविज्ञानथी परम पुरुपार्थने एट- ले मोक्षने देखाडेछे तेमां श्रुतिः-"ब्रह्मविदाप्नो- ति परम्" इत्यादि. माटे ए हेतुथको ब्रह्मख- रूपनो विचार करवो. त्यांहां वादिनी शंका:- संदेह युक्त जे वि- पय होय तेने विपे विचार करवो घटे, ब्रह्मरूप विपय तो जीवात्मारूपे करीने संदेह युक्त नथी: केमके अहं प्रत्यये करीने जीवरूपनो निश्चय थायछे, तथा "सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म ए वाक्ये करीने ब्रह्मरूपनो निश्चय थायछे. वळी सिद्धान्ती कदी एम कहे के "तत्त्वमस्यादि वाक्ये करीने जीव ब्रह्मनी एकता भासमान थायछे, अने अहंप्रत्यये करीने तो जीव ब्रह्मनो अद भासमान थायछे, माटे विपय संदेह युक्त छे" प- रंतु ए वात वने नहि केमके अबाधित प्रत्यक्ष अहंप्रत्ययना विरोधथी तत्त्वमस्यादि श्रुतिने विपे जे जीव ब्रह्मनु ऐक्य कह्युछे, ते तो औप- चारिक भासेछे. वळी कदी सिद्धान्ती कहे के तत्वमस्यादि वाक्य तो अभ्यास विशिष्ट आ- स्माविषयक छे.” ए वात पण बने नहि; केमके २६४ स्वरूपानुसन्धाननी स्वयंप्रकाश आत्माने विपे अध्यास कहेवो घट- तोज नथी. वळी प्रयोजन पण जणातुं नथी; केमके ब्रह्मज्ञान छते पण मुक्ति जोवामां आवती नथी, एटले केटलाएक जीवन्मुक्त पुरुपोने विषे पण रागदेपादि व्यवहार जोवामां आवेळे, वास्ते विचार शा माटे करवो जोइए ? एवी शंका थये समाधानः- विपयने विषे संदेह तथा प्रयोजन वेउ पण संभवेछे; शी रीते के, अशुद्ध अहं प्रत्य- यथी जीव ब्रह्मनी भिन्नता तथा ऐक्य श्रुतिथी तेनी अभिन्नतारूप संदेह युक्तज छे; ते विपे उ- पर वादिए कह्यु के, “ श्रुतिमा जीव ब्रह्मनी एक- ता तो औपचारिक छे." एवात केवल अयुक्त छे; केम जे उपक्रमादि पविध तात्पर्यलिंग स- हित अनेक श्रुति वाक्योने विपे औपचारिक अर्थ कहेवो घटेज नहि. वळी हूं मनुष्य छौं, कर्ता छौं.' इत्यादिक स्थलने विपे सर्व सिद्धा- न्तियोये पण श्रुतिना बलथकी भ्रान्तिरूप अ- ध्यास स्वीकार्यों छे माटे तेनी अनुपपत्ति नथी. वळी विषय संदेह युक्त छ एटलंज नहि, परंतु विपर्यास पण छे एटले जन्म मरणादि दुःखरू- प संसारने विपे सुखरूपतानी बुद्धि इत्यादि. वळी जीवन्मुक्तने विपे जे रागपादि जोयार्मा पष्ठी प्रक्रिया. - आवेछे ते तो अहंममताप्रयुक्त आसक्तिनां राहि- त्यथकी वाधितानुरत्तिये करीने आभासमात्र छे, वास्ते मुक्तिरूप प्रयोजन पण संभवेछे; माटे ब्रह्म विचार अवश्य करवों जोइए. हवे अध्यास एटले अन्यने विपे अन्य धर्मनो अवभास; जेम शुक्तिमा रजतपणुं भातेछे तेमज आनन्दात्माने विपेजे युष्मदर्थभूत अहंकारादिक एटले लिंग तथा स्थूल शरीरादिकनो हुँ म्हारा- पणाये करीने अवभास ते अध्यास, शंकाः- अविपयभूत प्रत्यगात्माने विपे विपयना धर्मोनो अध्यास घइ शकेज नहि केमके सहु जन पण पोतानी सन्मुख रहेला शुत्यादिक विपयने वि- पे रजतादिक धर्मोनो अध्यास करेछे. समा- धानः-प्रत्यक् आत्मा अविषयभूत एवोज नि- यम नथी; केमके आत्माने विपे अस्मत् प्रत्य- यनी एटले शुद्ध अहं प्रत्ययनी विपयता छे, त- था अपरोक्षपणुं पण छे. वळी सन्मुख रहेला विपयने विपेज अध्यास थाय एवो पण नियम नधी: केमके अप्रत्यक्ष आकाशने विपे पण अ- ज्ञानीओ मालिन्यादिकनो अध्यास करेछे, माटे प्रत्यगात्माने विपे पण अनात्मा अहंकारादिक- नो अध्यास संभवेळे; एज अध्यासने ज्ञानी लो- २३ २६६ स्वरूपानुसन्धाननी को अविद्या कहेछे अने ते अध्यासथकी विवेके करीने जे वास्तव स्वरूपर्नु अवधारण तेने विद्या कहेछे; एज अविद्या नामनो आत्मा अनात्मानो जे अन्योन्याध्यास तेने अग्रेसर राखीनेज विधि- निषेध पर सर्व शास्त्रो तथा लौकिक, वैदिक,प्र- माण, प्रमेयादि व्यवहारो प्रवृत्त थयाछे; ए रीते अनादि, अनन्त एवो मिथ्या प्रत्ययरूप जे अ- ध्यास तेज अकर्ता, अभोक्ता आत्माने विपे क- तृत्व भोक्तृत्वनो प्रवर्तक छे, माटे जन्म मरणा- दि सर्वे अनर्थोनो हेतुभूत अविद्यारूप अध्या- सना नाशने अर्थे, तथा प्रत्यक्मृत जीव ब्रह्म- नी एकतारूप विद्यानी सिद्धिने अर्थ ब्रह्म वि- चार करवो युक्त छे. त्यांहां उपरना सूचनी मू- लभूत श्रुतिः- " आत्मा या अरे द्रष्टव्यः श्रोत- व्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यः अर्थ:-हे मैत्रेयि! द्रष्टव्यः' एटले परा- ग्वृत्तिना तिरस्कार पूर्वक प्रत्यक् प्रवण वृत्तिए करीने आत्मानो साक्षात्कार करवो; ते साक्षा- त्कार करवामां साधन-'श्रोतव्यः' एटले प्रथम आचार्यथकी उपनिषद् वाक्ये करीने अद्वैत आ- " पष्ठी प्रक्रिया. त्मस्वरूपनो विचार करवो ते श्रवण; तथा 'मं- तव्यः' एटले ते आत्मस्वरूप, श्रुत्यनुसारी त. के करीने मनन करवु एटले जे श्रवण कयु तेने युक्तिये करीने आत्माने विपे घटायर्बु; जेमके दतिनि दारुविकारे दारु तिरो- भवति सोऽपि तत्रैव । जगति तथा परमात्मा परमात्मन्यपि जगत् ति- रोधत्ते " ॥१॥ अर्थः- लाकडांनो बनावेलो हस्ती बहिर्मुख वृत्तिथी जोयो होय तो तेने विपे काट तिरोधान पामेछे अने हस्तीज भासेछे; तथा आन्तर दृष्टि- थी जोयो होय तो काट मात्र भासे अने तेने विपे हस्ती तिरोहित थइ जायछे; तेम बहिर्मुख वृत्तिये जोवाथी जगत्मात्र देखायछे, अने तेने विपे परमात्मा तिरोधान पामेछे एटले जणातो नथी, तथा अन्तर्मुख वृत्तिये जोवाथी एक पर- मात्माज जणायछे अने तेने विपे जगत् तिरो- हित थइ जायछे. तथा 'निदिध्यासितव्यः' एटले श्रवण मन. नथकी निश्चय करेला आत्मतत्त्वने विपे चित्तनी स्वरूपानुसन्धाननी एकतानतारूप एटले ब्रह्माकार वृत्त्यारूढतारूप ध्यान कर.. शंकाः- श्रवण, मनन अने निदिध्यासन ए त्रण्येमाथी, एक श्रवणरूप साधने करीनेज आ- त्मानो साक्षात्कार धशे, माटेत्रण्येनां अनुष्ठाननुं शुं प्रयोजन? समाधान:-केवळ श्रवण मात्रेक- रीनेज साक्षात्कार थइ शके नहि केमके मनन नि- विध्यासन विना असंभावनादि प्रतिबंधनी अनि- वृत्तिथी फल सहित आत्मानो अपरोक्ष थायज नहि, माटे साधनोना अनुष्ठानना अभ्यासथी प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्मनो साक्षात्कार थाय ते विपे श्रुति प्रमाणः- "तस्माद्राह्मणः पांडित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेतु बाल्यं च पांडित्यं च निर्विद्याथ मुनिरमौनं च निर्वि- घाथ ब्राह्मणः केन स्यायेन स्यात्तेने- .. दृश एवातोऽन्यदातम्" अर्थः- माटे अद्य काळने विपे पण 'ब्रा- ह्मणः पांडित्यं निर्विद्य' एटले श्रुति आचार्यथी १ बीजी प्रक्रियामा अर्थ कर्योछे.

पष्ठी प्रक्रिया. २६९ वास्तवात्मविज्ञानतुं श्रवणरूप पांडित्यने निःशेष संपादन करीने, पछी ते ज्ञानने युक्तिये करीने दृढी करणरूप मननात्मक वाल्यभावने एटले ज्ञान वलने निःशेप संपादन करीने, पछी निदि- ध्यासनरूप मौनने निःशेप संपादन करीने क- तरुत्य होय. ए रीते जे ज्ञान संपादन करे तेज ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः " ए व्युत्पत्तिथी निरुपचरित ब्राह्मण्यवान कहेवाय; अने अविना- शी पण कहेवाय, एथी अतिरिक्त अविद्यानो वि- पय सर्व पण विनाशी छे, माटे एक आत्माज नित्य मुक्त छे. ए रीते मुमुक्षुये ब्रह्मविचार करवो ए वात सिद्ध थई; माटे ते ब्रह्मनु स्वरूप तथा प्रमाण शुं? ते जाणवा सारु सूत्रकार तेनुं प्रथम तटस्थ लक्षण अने स्वरूप लक्षण पण कहेछे. जन्माद्यस्य यतः" २. अर्थः- ' अस्य ' एटले नाम रूपे करीने भासमान धयेल्लं तथा अनेक कर्ता भोक्ताये युक्त अने देश, काळ, निमित्त, क्रिया, फलोर्नु आश्र- यभूत तथा मने करीने पण जेनी रचना चिंतव- नमान आवे एवां आ एटले प्रत्यक्ष जणातां एवां २७० स्वरूपानुसन्धाननी दृश्य जगतनां 'जन्मादि' एटले जे उत्पत्ति.स्थिति अने लय ते 'यतः' एटले सर्वज्ञ, सर्वशक्ति एवा जे कारणथकी थायछे ते ब्रह्म. उपरनां सूत्रनी मूळ श्रुतिः- " यतो वा इमानि भूतानि जाय- न्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्र- यन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञास- स्व तब्रह्म अर्थः- 'यतः ' एटले मायाविशिष्ट जे कारणथकी “ इमानि भूतानि' एटले ब्रह्माथी अर्थात् हिरण्यगर्भथी आरंभीने स्तंब पर्यंत सर्व भूतो 'जायन्ते' एटले उत्पन्न थायछे; तथा जातानि' एटले उत्पन्न थयां छतां 'येन- जीवन्ति' एटले जेनी सत्तावडे जीवेछे अर्थात् वृद्धि पामेछे; तथा विनाश काळने चिपे — यत्प्र- यन्ति' एटले लय पामतां छतां जे ब्रह्ममा अ- भिसंविशन्ति' एटले तादात्म्यपणाने पामे ते ब्रह्म; अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति, लय त्रण्ये काळने विपे सर्व भूतदेहो जे अधिष्ठान स्वभावताने ए- टले ब्रह्मनां तादात्म्यपणाने त्याग करता नथी ते ब्रह्म. ए रीते ब्रह्मनु तटस्थ लक्षण कयुं; त्यारे .

पाठी प्रक्रिया. ब्रह्मनु स्वरूप लक्षण केवी रीतर्नु? एवी आकांक्षा थया उपर तेविपे भाष्यकारे कह्यु के 'यतोवा' ए श्रुतिमा जे 'यतः' ए पद छे, तेणे करीने एज श्रुतिनुं निर्णायक "आनन्दादयेव खल्विमा- नि भूतानि जायन्ते आनन्देन जातानि जी- वन्ति आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति (अर्थः-आनंदस्वरूप ब्रह्मथकीज सर्व भूतो उत्प- न थायछे, तथा आनन्दवडेज जीवेछे, अने लय पामतां छतां आनंदने विपेज ऐक्यता पामेछे.) आ श्रुतिथी जे आनंद एज ब्रह्मनु स्वरूप लक्षण तथा वीजा "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इ- त्यादि स्वरूप लक्षणनां वाक्योथी पण जाणी लेवु. त्रीजां सूत्रनी अवतरणिका. सूत्रकारे चैतन्यस्वरूप ब्रह्मने विपे पूर्व सूत्रे करीने सर्व जगत्तुं मायाउपाधिथी कारणपणुं कथन कर्यु, तेथकी सर्वज्ञपणुं पण अर्थात् प्रति- ज्ञा कर्य; केमके चेतनमय सृष्टि ज्ञान पूर्वकज होयछे; तथा च जे ब्रह्म ते सर्वज्ञ छे, सर्व जगत् कारणपणुं छे माटे; जे जे कार्यनो कर्ता होयछे ते तेनो ज्ञाता होयछे; जेम कुलाल तेम. ए रीते अनुमाने करीने सिद्ध थयेलां तेज सर्वज्ञपणाने " २७२ स्वरूपानुसन्धाननी प्रधानादिकना निरासे करीने वेदकर्तृतारूप हेतु. थी दृढ करता छता सूत्रकार कहेछे:- " शास्त्रयोनिखात् ३. अर्थः- अनेक विद्यास्थानोये करीने अति महत्, तथा दीपनी पेठे सर्व अर्थने द्योतन क- रनार, तथा सर्वज्ञ जे जे ऋग्वेदादिक शास्त्र तेनुं कारण ब्रह्म छे; एवां ऋग्वेदादि महत् शा- स्वनो संभव सर्वज्ञ ब्रह्म विना इतरथी होयज नहि. जे कोइ पुरुपे एक विषय लेइने शास्त्र रच्यु होय, जेम पाणिनीये व्याकरण रच्यु तेम, ते पुरुप पण आ लोकमां विद्वत्तर कहेवायछे; त्यारे अनेक शाखाओना भेदे विशिष्ट, तथा देव, तिर्यक्, मनुष्य, वर्ण, आश्रम इत्यादिकना विभा- गां हेतुभूत, तथा सर्व ज्ञानोनो आकररूप (खाणरूप) एवां ऋग्वेदादि महत् शास्त्रनी प्र- यत्न विनाज लीलाए करीने निःश्वासनी पेठे जे जगत्कारण ब्रह्मथकी उत्पत्ति छे, ते ब्रह्म स- वज्ञ अने सर्वशक्तिमान् होय, तेमां शुं आश्च- र्य ? श्रुति पण एज प्रमाणे कहेछः- "अस्य महतो भूतस्य निश्वसित- पष्ठी प्रक्रिया. २७३ मेतद्यग्वेदो यजुर्वेदःसामवेदोऽथ- र्वाङ्गिरस" इत्यादि. अथवा ब्रह्मनां वास्तव स्वरूपज्ञानने विपे ऋ. ग्वेदादिक शास्त्रज 'योनि' एटले प्रमाणभूत छे, माटे शास्त्रयोनि. शास्त्ररूप प्रमाणथकीज जग- तना जन्मादिक कारणभूत ब्रह्म जाणवामा आवेछे; एज अर्थमां अन्य श्रुतिः- तन्त्वौपनिपदम्पुरुपम्टच्छामि" अर्थः- हे शाकल्य ! 'औपनिपदं, एटले केवळ उपनिपद प्रमाणे करीनेज गम्य, अन्य प्रमाणे करीने नहि एवा पुरुपने, विद्यानो अभि- मानी एवा तुंने पुछछौं. चोथां सूत्रनी अवतरणिका. शंका:- उपरनां सूत्रमा ब्रह्मने विपे वेदशा- स्त्रने प्रमाणरूप कह्यु, पण ते घटे नहि; केमके " आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतद- र्थानां" आ जैमिनी सूत्रमा सर्व वेदवाक्योने क्रियापर एटले कर्मने विपे विनियोगवाळांज दें- खाड्यां छे माटे वेदान्तवाक्यो कर्मपर नथी, वा- स्ते तेमनु आनर्थक्य प्राप्त थयु; माटे ते वाक्योने २७४ स्वरूपानुसन्धाननी स्तावक एटले स्तुतिपरत्वे करीने कर्मविधिवाक्यो- नां शेपरूप एटले अंगरूप निश्चय कर्याछे. वळी वेदान्त प्रकरण कर्म प्रकरणथी भिन्न छे, माटे तेने कर्मर्नु अंगपणुं घटे नहि एम कदापि सिद्धा- न्ती माने तो, वेदान्तमांज रहेलां उपासनावा- क्योविपे कहेला उपासनो कर्मनी स्तुतिपरताये करीने तेनां अंगभूत छे, माटे वेदान्तवाक्यो व्र- झनां प्रमाणभूत नहि. वळी परिनिष्ठित (शुद्ध) ब्रह्म तो प्रत्यक्षादि प्रमाणे करीनेज जाणवामा आवेछे, माटे पण वेदान्तवाक्यो ब्रह्मनां प्रमा- णरूप घटे नहि एवी वादिनी शंका थये छते सूत्रकार कहेछेः- तत्तु समन्वयात्" ४. अर्थः- “तु' शब्द पूर्वपक्षनी व्यावृत्तिने अर्थे छे. ते ब्रह्म, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, सर्व जगत्ना उत्पत्ति, स्थिति,लयोन कारण छे ए प्रकारे वेदान्त शास्त्रथकी जणायछे. शंका:- शी रीते ? उत्तरः- “ समन्वयात् ' एटले “सदेवसोम्ये- दमग्र आसीत्" "एकमेवाद्वितीयं" "आ- त्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्" "तदेतद्र- मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्र- " पष्ठी प्रक्रिया. २७५ म सर्वानुभूः" "ब्रह्मैवेदममृतम्पुरस्तात्' इत्यादि सर्व वेदान्तोनां वाक्यो तात्पर्य करीनेज सर्वज्ञल सर्वशक्तिमत्वादि अर्थनां प्रतिपादकत्व- रूपे ब्रह्मने विपे समन्वित (घटेलां)छे; ते वा- क्योमा रहेलां पदोनो ब्रह्मस्वरूपने विषे निश्चये करीने समन्वय जणाते छते कर्म उपासनादिप- रतारूप अर्थातरनी कल्पना करवी, ते केवळ अ- घटित छे; केमके औत अर्थनी (श्रुति प्रतिपा- दित मुख्य अर्थनी) हानि, अने अश्रोत गौण अर्थनी कल्पनारूप दोपनो प्रसंग आवेळे; वळी वादिना कहेवा प्रमाणे ते वाक्योने विपे कर्ता देवतादिक स्वरूप, प्रतिपादकपणुं निश्चय यतुं नथी; केमके "तत्केन कं पश्येत्' इत्यादि श्रुति- ये क्रिया, कारक अने फलनुं निराकरण करेलं छे. वळी वादिना कहेवा प्रमाणे परिनिष्ठित ब्रह्मस्व- रूपने प्रत्यक्षादि प्रमाणनां विषयपणानो पण असंभव छे; केमके “ तत्त्वमसि " ए वाक्ये प्रतिपादन करेला ब्रह्मात्मैक्यभावनो साक्षात्कार महावाक्य विना प्रत्यक्षादि प्रमाणे करीने थायज नहि. कदि चादी कहे के, “हेयत्वउपादेयत्वना राहित्यथकी ब्रह्म आत्मानी एकतानो उपदेश निरर्थक छे' ए दोप पण घटतो नथी; केमके " स्वरूपानुसन्धाननी हेयोपादेय धर्म रहित ब्रह्म आत्मानी एकताना साक्षात्कारथकीज सर्व क्लेशोनी हानि, अने निरतिशय आनन्दनी प्राप्तिरूप पुरुषार्थ सिद्ध थायछे. त्यांहां श्वेताश्वतर श्रुतिः- "ज्ञासा देवं सर्वपाशापहानिःक्षी- णैः कैशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः । अर्थः- द्योतनात्मक आत्मस्वरूपनो साक्षा- त्कार कर्ये छते अविद्यादि सर्व पाशोनी 'अपहा- निः' एटले नाश थाय, अने अविद्यादि केशो- नो नाश धये छते तेनां कार्यभूत जन्ममरणनी पण 'प्रहाणिः' एटले प्रकर्षे करीने नाथाय. शंकाः- त्यारे वेदान्तवाक्यो कर्मपर न हो, परंतु उपासनापरज एटले उपासनामां अंगभूत हो.समाधानः- प्रतिशाखामा रहेला देवताना प्रतिपादक प्राण पंचाग्नि आदिक वाक्योने तो उ- पासनापरतामां पण कोइ विरोध नथी, परंतु "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इत्यादि ब्रह्मस्वरू- पना प्रतिपादक वाक्योने तो उपासनापरत्व सं- भवेज नहि; केमके ब्रह्मैकल विज्ञानने विपे हेय उपादेयना राहित्यथी क्रिया कारक इत्यादि द्वैत पष्ठी प्रक्रिया. २७७ ज्ञाननो उपमई थायछे; माटे ब्रह्म आत्माना ए- कत्व विज्ञाने करीने उन्मथन (नाश ) थयेला दैत ज्ञाननो पुनः उत्पन्न धवानो संभवज नथी, के जेणे करीने ब्रह्मने उपासना विधिनुं शेपपणुं कही शकाय; यद्यपि कमीपासना कांडमां वेदवा- क्योनुं विधिनी शेषता विना प्रमाणपणुं जोवामां आवतुं नथी, तथापि फल पर्यंत एटले निःशे- पानर्थनी निवृत्ति अने निरतिशयानंदनी प्राप्ति पर्यत जे आत्मविज्ञान, तद्विपयक वाक्योर्नु स्व- तःज प्रमाणपणु कोइथी खंडन करी शकायज नहि. वळी वेदान्तशास्त्र प्रमाणपणुं अनुमाने करीने गम्य नथी के जेणे करीने अन्य ठेकाणे जोयेला दृष्टांतोनी जरूर पडे ! (एटले वेदान्त- वाक्योनो ब्रह्मने विपेज समन्वय छ, माटे ब्रह्मने शास्त्रप्रमाणकपणुं सिद्ध थयु.) एप्रकारे ब्रह्म आ- स्मानी एकतारूप ज्ञान छे प्रयोजन जेमनु, अने ब्रह्म आत्माना एकत्वने विपे तात्पर्ये करीने स- मन्वित ( घटेलां) एवां वेदान्तवाक्योनुं कर्मों- पासनाना संस्पर्श विनाज ब्रह्मने विपे पर्यवसान कथन कयु, अने ते ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, जगत्- ना उत्पत्ति, स्थिति, लयर्नु कारण ए वात प. , ण कथन करी. २४ २७८ स्वरूपानुसन्धाननी पांचमां सूत्रनी अवतरणिका. त्यांहां सांख्यशास्त्रवाळा एम कहेछे के, य- द्यपि सिद्ध ब्रह्मने विपे वेदान्तोनो समन्वय हो, तथापि ब्रह्मने विपे वाक्यपदोनी प्रवृत्ति शक्तिज अयुक्त छे; केमके अवाङ्मनस गोचर छे. वळी अनुमानादि प्रमाणे करीने अगम्य एवां ब्रह्मने विपे निर्विकारताथी कारणपणुं (जगत्कर्तृत्वादि) क- हेवू ते पण अयुक्त छे; वास्ते वेदान्तोनो ब्रह्मने विपे समन्वय नहि, किन्तु सर्गादि जे कार्य ते जडप्रकृतिक एटले जड छे कारण जेनुं एवं का- वरूप हेतुथकी जेम घट तेम; ए प्रकारे अनुमा- ने करीने गम्य एवं जे त्रिगुणात्मक प्रधान तेने विपेज वेदान्तोनो समन्वय घटे एम मानेछे. व- ळी काणाद मतना अनुसारीओ तो "यतो वा इमानि" इत्यादि वाक्योधकीज ईश्वरने विषे निमित्त कारणतानु अनुमान करेछे, अने परमा- गुने विपे समयायि कारणपणुं मानेछे. एप्रकारे वीजा पण बौदादि तार्किको “ असहा इदम- ग्र आसीत् " इत्यादि वाक्याभासोने तथा जे वस्तु ते शून्यावसान छे एटले शून्यमांज पर्यव- सान पामेछे, जेम दीप तेम इत्यादि गुस्याभा- पष्ठी प्रक्रिया. २७९ सोने अवलंबन करता छता वादिरूपे ब्रह्मना कारणपणामां दोष आपवा उभा थया; तेमा(१) निरीश्वरसांख्य कपिल, (२) सेश्वरसारख्य पात- जल,(३)वैशेपिक शास्त्र कणाद मुनि प्रणीत; (१) न्याय शास्त्र गौतम मुनि प्रणीत, (५) पाशुपत शास्त्र, (६) वैष्णव शास्त्र ए छ चादि- यो वेदान्तोना समन्वयमां श्रुतिना वाक्याभास- वाळा पूर्वपक्षी (द्वैत मतवाळा ); तथा(१)बौ- द, (२) आहेत, (३) चार्वाक ए त्रण वादी युक्त्याभासवाळा (नास्तिक मतवाळा ). त्यांहां पद, वाक्य, प्रमाणने विपे कुशल ए- वा श्री व्यास भगवान् वेदान्तवाक्योनां ब्रह्मपर- त्वने देखाडवाने अर्थे वाक्याभास अने युक्त्या- भासनां प्रतिपादनोने पूर्व पक्षरूप गणीने तेम निराकरण करेछे. तेमा सांख्यो त्रिगुणात्मक अचेतन प्रधानने जगत्तुं कारण मानता छता सिद्धान्तिप्रत्ये कहेछे के, तुं सर्वज्ञ, सर्वशक्ति- मान् ब्रह्मने विपे जगत्तुं कारणपणुं दर्शावनारां जे जे वेदान्तवाक्योने प्रमाणभूत कहेछे, परंतु ते ते वाक्यो प्रधानने विपे जगत्कारणत्वना प- क्षने विपे पण घटावी शकायछे; शी रीते के, प्रधानने पण सर्वशक्तिमत्पणुं पोताना विकारोने स्वरूपानुसन्धाननी विपे घटेछे, तथा सर्वज्ञपणुं पण घटेछे; कहे प्र. कारे के, हे वेदान्ति ! तुं जे ज्ञानने मानेछे, ते ज्ञान तो सत्त्वगुणनो धर्म छे “सखात् संजा- यते ज्ञानं” ए स्मृतिनां प्रमाणथी; अने ते स- स्वगुणना धर्मरूप ज्ञाने करीनेज कार्यकारणना संघातवाळा योगी पुरुपो 'सर्वज्ञ' ए प्रकारे प्र- सिद्ध छे; सत्त्वगुणनो ज्यारे निरतिशय उत्कर्ष हो- य, स्यारेज सर्वज्ञत्व प्रसिद्ध छे. वळी कार्यकारण रहित केवळ उपलब्धिमात्र पुरुपने विपे सर्वज्ञ- पणुं अथवा किञ्चिज्ज्ञपणुं कल्पना करी शका- यज नहि; अने प्रधान तो त्रिगुणात्मक छे वा- स्ते सर्व ज्ञानोनो कारणभूत सत्त्वगुण गुणनुं साम्यरूप प्रधानावस्थाने विपे पण विद्यमान छे: माटे ने अचेतन प्रधान तेने विपेज सर्वज्ञपणुं वेदान्तोमा उपचारथी कयुंछे. वळी जगत्नी उ- त्पत्तिथी प्रथम सर्व कारकोथी रहित एवं ब्रह्म ते इच्छयु छे, पण ते काळने विपे ज्ञाननां सा- धन शरीर इंद्रियादिना अभावथी ब्रह्मने विपे ज्ञाननी उत्पत्तिज संभवे नहि.वळी त्रिगुणात्मक प्रधानने विपे परिणामपणुं पण संभवेछे, माटे मृदादिकनी पेठे कारणपणुं पण तेनेज घटे, सं- घात रहित एक ब्रह्मने विपे कारणपणुं संभवे पष्ठी प्रक्रिया. नहि. ए रीते वादिनोपूर्व पक्ष थये छते सूत्रकार तेनुं निराकरण करेछे. ईक्षतेन शब्दम्" ५. अर्थः- सांख्य मतवाळाये कल्प्यु एवं अ- चेतन प्रधान जगत्नां कारणवरूपे वेदान्तोमा आश्रयण करी शकाय नहि; केमके ते अशब्द छे एटले श्रुतिये अप्रतिपादित छे अने ईक्ष- णकर्तृव जडने संभवे पण नहि; तथा श्रुतिमा तो जगतना कारणने विपे ईक्षणकर्तृत्व कमुछे एटले विचार पूर्वक सृष्टिकर्तृत्व कमुछे; तेविषे श्रुतिः " स देव सोम्येदमग्र आसीत् एकमेवाद्वितीयं ए प्रकारे उपक्रम क- रीने तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय " "त- तेजोसृजत " इत्यादि श्रुतियोमा इदं शब्दे करीने वाच्य एवं नाम रूपात्मक नगत्ने उत्प- तिथकी पूर्व सदूपे अवधारण करीने तेज सतू शब्दे वाच्य कारणने विषे ईक्षण पूर्वक तेज आदि कार्योर्नुस्रष्टापणुं दाव्यु छे; तथा "आत्मा वा इदमेक एवाय आसीनान्यत् किञ्चनमिष- त्" "सऽऐक्षतलोकान्नुसृजा" इति "सऽइ- ” - " " २८२ स्वरूपानुसन्धाननी मॉल्लोकानसृजत" इति; आ श्रुतियोमा पण ईक्षण पूर्वक सृष्टि कथन करीछे; तथा प्रोडश कलावान् पुरुपने लईने अन्य श्रुति कहेछे के " स ईक्षाञ्चक्र स प्राणमसृजत आ श्रुतिमा पण ईक्षण पूर्वक सृष्टि कर्तृत्व क- झुंछे. हवे जे वादिये कयुं हतुं के 'सत्त्वगुणनो धर्म जे ज्ञान तेणे करीने प्रधान सर्वज्ञ कहेवाशे' ते घटतुं नथी; केमके प्रधान अवस्थामा त्रण्ये गुणोना साम्यथी सत्त्वनो धर्म ज्ञान संभवेज नहि. वळी वादिये कयुं हतु के 'सर्व ज्ञान शक्तिमत्वे करीने प्रधान सर्वज्ञ कहेवाशे' ते पण घटे नहिः केमके हे वादि ! ज्यारे तुं गुण साम्य अवस्थाने विपे पण सत्त्वाश्रित ज्ञानशक्तिने लेईने प्रधानने सर्वज्ञ मानेछे, त्यारे रज तममा रहेली ज्ञाननी प्रतिबंधकता शक्तिने लेईने किञ्चिज्ज्ञपणुं पण केम कहेतो नथी? वळी साक्षी रहित केवल स- त्ववृत्ति कंइ पण जाणी शकती नथी; केमके अ. चेतन प्रधानने साक्षीपणुं होयज नहि, वास्ते प्रधानने तुं जे सर्वज्ञ मानेछे ते अत्यंत अयुक्त छे. शंकाः- साक्षीनिमिन ईक्षणकर्तृत्व प्रधानमा पण कल्पना करीशु; जेम अग्निनिमित्त वाहकर्तृ- व लोहपिंडमां कल्पायछे तेम. उत्तर:- साक्षी पठी प्रक्रिया. ૨૮૩ निमित्त ईक्षण कर्तृत्व गौण लेईने प्रधानने ज- गत्कारण कहे, तेना करतां सर्वज्ञ एवं मुख्य ब्रह्म जगत कारण कहेवू एज मुक्त छे. वळी वादिये जे कयुं हतुं के 'मृदादिकनी पेठे परि- णामि प्रधाननेज कारणपणुं घटे' ते पण 'अ- शब्दं' एटले अोतपणाथीज अयुक्त जाणवू. ए रीते सांरव्य मतना खंडनना न्याये करी- नेज उपर कहेला वाक्याभास, तथा युक्त्याभास लईने द्वैत प्रतिपादन करनारा सर्वे वादियोना मतनुं श्रुति मुक्ति विगेरेथी खंडन करीने एक अ- दैत ब्रह्म श्री व्यास भगवाने प्रतिपादन कर्युछे. उपर प्रमाणे पांचे सूत्रोनो अभिप्राय छे. त्योहां स्वाराज्यसिद्धिनो श्लोकः- (अवतरणिका.) चौदमा श्लोकमां" अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" ए सूत्रे करीने चित्तशुदिधी अनन्तर साधनचतु- टय संपन्न एवा मुमुक्ष अधिकारीने ब्रह्म विचार- नो उपक्षेप को: त्यांहां वादियोये ब्रह्म विचार- नो आक्षेप (निषेधरुप विप्रतिपत्ति ) देखाडे छते सिद्धान्ती सर्व वादिओनो पराजय करीने स्वमतना प्रतिष्ठापनने अर्थे जिज्ञासा सूत्रमा स- निहित एवा तत्पदार्थनां व्यवस्थापननी द्वाराये - - स्वरूपानुसन्धाननी उपक्रम करता छता सर्व जगत्नां अभिन्ननिमि- तोपादानरूप कारणत्वे करीने उपलक्षित एवां स- ञ्चिदानंदस्वरूप अद्वय प्रत्यक अभिन्न श्रुतिप्रतिपा- दित ब्रह्मने विपे सर्व वेदान्तोना समन्वंयनां प्र- दर्शने करीने समस्त शास्त्रार्थनो संग्रह छे जेमा एवी उत्तर त्रिसूत्रीने अर्थथी कथन करता छता प्रतिज्ञा करेछे. (श्लोक.) यस्मादुत्पत्तिएप्तिक्षतिरपि जगतां यच्च शास्त्रैकयोनिः सर्वज्ञं मायया यत्सहजसुखसदद्वैतसंवित्स्वरूपम् । तब्रह्मस्वप्रकाशं श्रुतिशिखरगिरां सैव तात्पर्यभूमिः स्वात्मासौ यं विदिखा जनिमृतिजलधिं निस्तर- न्तीह संतः॥१॥ अर्थः- अभिन्ननिमित्तोपादानरूप जेथी ज- गत्नी एटले हिरण्यगर्भथी आरंभीने चतुर्विध भूतग्राम पर्यंतनी अथवा आकाशादि स्थूल श- रीर पर्यंत कार्यवर्गनी'उत्पत्ति' (तादात्म्ये क- रीने आविर्भाव), तथा 'गुप्ति' (पालन), तथा क्षति' (कारणमात्र परिशेपरूप तिरोभाव) ' " , . पष्टी प्रक्रिया. २८५ होयछे ते.ब्रह्मा ए रीते “जन्माद्यस्य यतः एसूत्रमा देखाडेलु लक्षण कथन कर्यु, अने उभय- विधकारण ब्रह्मज छे, प्रधानादिक नहि ए रोते प्र- तिज्ञा पण देखाडी; वळी सूत्रः- "प्रकृतिश्च प्रतिज्ञा दृष्टांतानुप- रोधात् (अर्थः- ब्रह्म केवल निमित्तकारणज नहि किंतु उपादान पण अवश्य मानतुं जोइये; केमके तेम माने छतेज श्रुतिप्रसिद्ध प्रतिज्ञा अने दृष्टां- तनी साथे विरोध आवे नहि.) तेमां" उतत- मा देशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतमतं मतमवि- ज्ञातं विज्ञातमिति" आ श्रुतिमा एक विज्ञाने करीने सर्व विज्ञाननी प्रतिज्ञा प्रतीत थाय छे ते ब्रह्मने उपादान माने छतेज घटे, अन्यथा नहि; तथा " यथा सोम्यैकेन मृत्तिंडेन सर्व मृ- न्मयं विज्ञातं स्यात् " आ श्रुतिमा मृत्ति- कानुं दृष्टांत कयुंछे ते पण ब्रह्मने उपादानमाने- थीज घटे, अन्यथा नहि; तथा ब्रह्मनेज निमित्त- कारण पण अवश्य मान, जोइये: केमके जेम लोकमां उपादानश्रुत मृत्तिकादिकनो अधिष्ठाता अन्य कुलालादिक छे तेम उपादानभूत ब्रह्मनो २८६ स्वरूपानुसन्धाननी अधिष्ठाता अन्य कोई छे नहि; केमके “स देव- सोम्ये दमग्रआसीत् ” ए श्रुतिमां जगदुत्प- तिथी पूर्वे अद्वितीय ब्रह्मनुज अवधारण कर्युछे माटे ब्रह्मने विपेज अभिन्ननिमित्तोपादानत्व अं- गीकार करवू ते युक्त छे. मूळ सूत्रमा जे 'आदि' पद छे तेणे करीने स्थिति अने लय ए वेनुज ग्र- हण करईं; केमके सूत्रस्थ ‘यतः' ए पदे करीने यतो वा इमानि भूतानि जायंते येन जाता- नि जीवंति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजि- ज्ञासस्च तद्ब्रह्मेति" ए श्रुतिमा दर्शावेलां मूल- कारणने अधीन एवां जन्मादित्रयनीज प्रत्यभिज्ञा छे; पण यास्क मुनिये देखाडेला अने अवान्तर कारणने अधीन एवा “ जायते, अस्ति, वर्द्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, नश्यति. भाव विकारोनुं ग्रहण नहि एवं जणाववा माटे श्लोकमा ‘उत्पत्ति गुप्ति क्षतिः' एत्रण® उपा- दान कर्युछे. मूलकारणना लाभने अर्थ सूत्रमा जे 'यतः ए तसिल् प्रत्ययांत पद छे तेथकीज जनिकर्तुःप्रकृतिः” ए पाणिनिनां सूत्रना वलधी उपादानवनो लाभ थये छते जे स्थिति लपढें ग्रहण कर्यु, ते लक्षण त्रयना संग्रहने अर्थे " एटले छ पष्ठी प्रक्रिया. २८७ एम केटलाएक कहेछे; वीजा तो निमितमात्रने विपे पण पंचमी विभक्तिर्नु अनुशासन छे, माटे जे लयनु आधारव कयुं ते उपादानत्वना लाभ- ने अर्थे, अने स्थितिनु कारणत्व में कयुं, ते तो चेतनत्वना लाभने अर्थ, माटे नन्मादित्रयनां ग्रहणे करीने लब्ध धयु जे अभिन्ननिमित्तोपादा- न कारणत्व तेज लक्षण एम कहेछे; वास्तवथी तो जे लक्षण ते लक्ष्यना परिचयने अर्थ छे, अ- ने जे अद्वितीय एवं लक्ष्य ते अध्यारोप अपवा- दे करीने कार्यवर्गने विपे मिथ्यात्वनो निर्णय विना परिचय करी शकातुंज नथी; माटे मिथ्या- त्वना निर्णये करीने लक्ष्यना परिचयमा उपयो- गी होवाथी जन्मादि त्रय, ग्रहण कयुछे. अचि- न्त्य जेनी रचना एवां सर्व जगत्तुं रचन अचे. तन एवां प्रधानादिकथी रची शकायज नहि, माटे सर्वज्ञ, सर्वशक्ति संपन्न एवं श्रुत्युक्त ब्रह्मज बगत्तुं कारण सिद्ध थायछे, ए तात्पर्यार्थ. जगत्नी रचनाथी कारणने विपे सर्वज्ञत्वादिक सिद्ध थायछे एटलंज नहि; किंतु सृज्यतुं एक- देशभूत अने सर्व पदार्थाना प्रकाशनने विषे स- मर्थ अने समस्त एवां विद्यास्थानोये करीने उपबं- हित एवां ऋग्वेदादिरूप शास्त्रनुंजे पुरुष निश्वास- ૨૮૮ स्वरूपानुसन्धाननी नी पेठे अनायासे करीने प्रकाशन, ते पण कारण- ने विपे सर्वज्ञत्वादिक धर्मने साधवामां समर्थ छे; एवा अभिप्राये गर्भित एवां "शास्त्रयोनित्वात्" ए सूत्रने अर्थथकी पठन करेछे के यच्च शाबै- कयोनिः' एटले जे ब्रह्म ऋग्वेदादिक शास्त्रर्नु एक जनक होवाथी पण सर्वज्ञ छे; अथवा "जन्माद्यस्य यतः" ए सूत्रे करीने तथा ते- नी मूळभूत “यतोवा इमानि" ए श्रुतिये कार- णने विपे कार्यलिंगक अनुमानरूप प्रमाण प्र- दर्शन कराव्युं, ते अनुमानधीप्रधानादिकने विपे पण कारणपणुं प्राप्त थशे एवी वादिनी आशंका थये छते “ शास्त्रयोनित्वात्" ए सूत्रनां अ- धीतरने कहेछे के, जे ब्रह्म एक शास्त्रज छे यो- नि (प्रमाण )जेनुं एवं छे. 'शास्त्रैकयोनिः' ए- टले ब्रह्म वेदैक प्रमाणक छे; केमके "नावेदवि- न्मनुते तंरहतम्" (वेदनो नहि जाणनार पु- रुप ते गापक परमात्माने जाणी शके नहि.) "तन्यौपनिपदम्पुरुषम्टच्छामि "( केवल उपनिपचीज गम्य एवा पुरुपने एटले आत्माने, तुने हुँ पुछंछौं.) इत्यादि श्रुतिये ब्रह्मने शब्द- थी इतर प्रमाणोनु अगोचर कयुंछे.शंका- अ.

पष्ठी प्रक्रिया. २८९ नुमाननी द्वारायेज श्रुति ब्रह्मनुं प्रतिपादन क- रेछे एवी कल्पनाथी ब्रह्मने अनुमाननुं गोचरपणुं संभवशे. समाधानः- साक्षात् ब्रह्मनां वोधनने विपे समर्थ एवी श्रुतिने अनुमान द्वारा बोधक: व कल्पना करवू, तेमां कांइ पण प्रयोजन नथी; तथा एवी कल्पनामां श्रुतिने अनुमाननीज अनु- वादक होवाथी अप्रामाण्य प्राप्त थशे, माटे एक- ल्पना अनुचित छे. वळी जे कार्य ते कारणनां अस्तित्वमात्रने विषे लिंग (हेतु) छे, पण प्रधा- नज अथवा ब्रह्मज कारण ए रीते विशेष निर्ण- यमा लिंग नथी; केमके बहु एवा तार्किकोए अ- न्यथा अन्यथा कल्पना करीछे,अने विशेषना निर्ण- यमा हेतुनो अभाव पण छे. ब्रह्म जगत्तुं कारण कही शकायज नहि; केमके "अस्थूलमनण्व- हस्वमदीर्घ " न तस्य कार्य करणं च विद्यते" " तदेतद्ब्रह्मा पूर्वमनपरमनंतर- मबाह्यं” इत्यादि श्रुतिओए ब्रह्मने विषे सर्व धर्मशून्यत्तनुं प्रतिपादन कर्युछे. यद्यपि ब्रह्म निर्धर्मक छ तथापि “ यतोवा" इत्यादि सृष्टि वाक्योनां प्रामाण्यथी ते जेम दुग्धादि दध्यादि भा- २५ स्वरूपानुसन्धाननी वे करीने परिणाम पामेछे; तेम जगदाकारे करीने परिणाम पामे एम तमे मानशो तो, कृत्स्न प- रिणाम माने छते जगत्थी अतिरिक्तताये करीने ब्रह्मने असत्त्वनोज प्रसंग आवशे; जो कदा एक- देशे करीने परिणाम अंगीकार करशो तो, निर- वयवत्खनुं प्रतिपादन करनारी श्रुतिनो व्याकोप थो; वळी कृत्स्न अने एकदेश बन्ने पक्षमा ब्रह्म- ने विपे अनित्यत्त्वनो प्रसंग पण आवशे एवी वादिनी शंका धये छते कहेछे के, ‘मायया' एटले “मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरं" इत्यादि श्रुतिनां प्रामाण्यथी अघटि- त अर्थनां घटनने विपे समर्थ एवी मायाये क- रीने ब्रह्मने विपे कारणत्वादि धर्मो संभवेछे. अ- भिप्राय ए छे के, जो कदा परिणामवादनु आ- श्रयण करीने सर्व पण कार्यवृंद कारणनी साथे समान छे सत्ता जेनी एवं अंगीकार कयु होय, त्यारे तो कृत्स्न परिणाम अथवा एकदेश परिणा- म पक्षने विपे पूर्वोक्त दोप प्रसक्त थाय; परंतु अ- मो परिणाम पक्ष अंगीकार करता नथी, किंतु वि- १" कारणेन समसचा कोन्यथा भावः परिणामः अर्थ:- कारणनी जोडे समान छे सत्ता जेनी एवो ने अन्यया पाप ते परिणाम. जेम हेमन कुंडल.

पष्ठी प्रक्रिया. २९१ - वर्गवादनु आश्रयण करीये छैये, माटे रज्जु आ- दिकने विपे सादिकनी पेठे अविरत एवांज व: स्तुने विपे अज्ञानथी अभ्यास कर्य एवं कार्यरंद वस्तुताथी अधिष्ठाननो स्पर्श करतुंज नथी, वास्ते तेने दूपित करवाने समर्थ छे नहि. अद्वितीय व- स्तुने विषेज जगत्नां कारणत्वना निर्वाहने अर्थ कल्पी एवी माया धर्मियाहकमानथी (सृष्टिश्रु- तिनां प्रामाण्यथी) अने अधिष्ठाननी सत्ताथी मिथ्याभुतज सिद्ध थायछे, माटे मिथ्याभूत मा- याये कयु एवं जे जगत्कारणत्व तेणे करीने ब्रह्मने विकारिपणुं प्रसक्त थायज नहि. त्यांहां भाष्यः- " यत्र हि यदध्यासस्तद्गतेन दो- षेण गुणेन वाऽणुमात्रेणापि स न संबध्यत इति" अर्थ:-जेने विपे जे अध्यास कर्यु ते अधि- ठान ते अध्यस्तना अणुमात्र पण गुणे करीने वा दोपे करीने संबंध पामतुं नथी. त्यारे वास्तवथी ब्रह्मान स्वरूप केबुं? एवी आ- कांक्षा थये छते "यतोवा" ए वाक्ये करीने उ- पक्रम करेलां जगत्कारणत्वनुं निगमन (उपस- हार ) करनार एवां "आनन्दोब्रह्मेति व्यजा- २९२ स्वरूपानुसन्धाननी नात्" ए वाक्यथी तथा ब्रह्म वल्लीमां स्थित एवा "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" ए मंत्रथी सत्, चि- त्, आनन्द ब्रह्मनुं स्वरूप छे. ते स्वरूपलक्षणने कहेछे के, जे सहज ( स्वाभाविक) एबुं सुख ( परमानन्द ) एज मिथ्याभूत सर्व प्रपञ्चना बाधनुं अवधिभूत छे माटे सत्य अने एज हेतुथी अद्वैत (दैत रहित) तथा निरावरणस्फूर्तिस्वभाव- थी संवितस्वरूप एवं जे वस्तु ते ब्रह्म. त्यारे ते ब्रह्मनुं ग्राहक कोण? एवी शंकानां निराकरणने अर्थे कहेछे के, ते ब्रह्म स्वप्रकाश छे एटले भा- रूप होवाथीज जेम एक दीप अन्य दीपनी अ- पेक्षा करतो नथी तेमज ब्रह्म स्व अने पर प्रकाश- ने विषे ज्ञानान्तरनी अपेक्षाये रहित छे. उक्त स्वरूप ब्रह्मने विपे सर्व वेदान्तोना तात्पर्यनु प- र्यवसान देखाडनार “ तत्तुसमन्वयात् " ए सूत्रनु अर्थथी पठन करेछे के-'श्रुति शिखरगि- रां' एटले “ तं हत्रीन गिरिरूपानविज्ञाता- निव दर्शयांचकार" आ श्रुत्यंतरने विपे वेदोने पर्वतना आकारे प्रदर्शननी प्रसिद्धि छे माटे पर्व- तरुप वेदोनां शिखररूप जे वाक्योनी अर्थात् सर्व वेदान्तवाक्योनी 'तात्पर्यभूमि' एटले परम विश्रा- पष्ठी प्रक्रिया: २९३ ति स्थान, सैव' एटले ते ब्रह्मज छे. पूर्वोक्त प्रका- रनुं ब्रह्म हो, तेणे करीने अमारे शो अर्थ ? एवी शंका थये छते परम पुरुपार्थने विपे पर्यवसान पा- मनार वाक्यार्थने देखाडेछे के, ए पूर्वोक्त ब्रह्म 'स्वात्मैव' एटले स्वकीय प्रत्यगात्मस्वरूपज छे, तटस्थ नहि. जे स्वतःसिद्ध ब्रह्मथी अभिन्न प्रत्य- गात्मस्वरूपने 'विदित्वा' एटले श्रवणादि उपाये साक्षात्कार करीने 'संतः' एटले शान्त्यादि संप- न अधिकारीओ 'जनिमृतिजलधि ' एटले ज- न्ममरणे करीने उपलक्षित एवा अनन्त दुःख- रूप समुद्र ने आज जन्मने विपे एटले जे काळे ज्ञानोदय होय तेज काळे 'निस्तरन्ति ' एटले निःशेपे करीने तरेछे; अर्थात् जीवन्मुक्त थइने पुनः संसारने पामे नहि. सूत्रना चारे अध्यायनो संक्षेपमा निष्कृष्ट अर्थ. श्री व्यास भगवान सूत्रकार "अथातो ब्र- ह्मजिज्ञासा " १ ए सूत्रे करीने मुमुक्षु पुरुपे त्रिविध परिच्छेद रहित प्रत्यक अभिन्न ब्रह्मनो विचार करवो एवी प्रतिज्ञा करीने पछी विचारवा योग्य ब्रह्मनुं लक्षण शुं अने प्रमाण झुं? एवी आकांक्षा थये छते “ जन्माद्यस्य यतः" २ एसूत्रथी लक्षणनो तथा “शास्त्रयोनित्वात्" ३ स्वरूपानुसन्धाननी ए सूत्रथी प्रमाणनो उपन्यास करीने, शास्त्र तो कार्य पर छे, माटे सिद्धब्रह्मपरता केम संभवे ? एवी वादिनी शंका थये छते “ तत्तु समन्वया- त्" ४ ए सूत्रे करीने शास्त्रने कार्यपरतानो नि- रास पूर्वक सिब्रह्मपरतार्नु बहु प्रकारनी अनेक युक्तिथी प्रतिपादन कर्या नंतर “ईक्षते श- व्दम्" ५ए अधिकरणे करीने प्रधानने विपे जगत्कारणतार्नु खंडन अने ब्रह्मने विपेज सर्व वेदान्तोनां गतिसामान्यनी प्रतिज्ञा करीने तेज ग- तिसामान्यने “ आनन्दमयोभ्यासात् "६ अहींथी आरंक्षीने प्रथम, द्वितीय अने तृतीय पा- दे करीने अन्यार्थबनी शंकानो निरास पूर्वक उपपादन कर्या नंतर चोथा पादमा केटलाएक अधिकरणधी प्रधानने विपे अशब्दपणानो एट- ले अवैदिक प्रतिपादितपणानो विस्तार करीने प्रमाणनो उपन्यास एटले कथन कर्याथी अनन्तर " प्रकृतिश्चप्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ए अधिकरणथी ब्रह्मने विपे जगत्नु उपादानपणुं तथा निमित्तपणुं एटले अभिन्ननिमित्तोपादानप- णानु व्याख्यान करीने पेहेला समन्वयाध्यायनी समाप्ति करता हवा.

पाठी प्रक्रिया. २९५ त्यार पछी वीजा अध्यायमा पेहेला पादे क- रीने पोताना सिद्धान्त पक्षमां सारख्य, योग, वैशे- षिकादिकनी स्मृतियोना विरोधनो परिहार करीने ते सांख्यादिये अद्वैत समन्वयने विपे उद्भावन (प्रकट) करेला सर्व तर्क विरोधने पण सम्यक् प्रकारे परिहार करता हवा. त्यार पछी द्वितीय पादे करीने सांख्य, वैशेषिक, नैयायिक, बौद्ध, क्षणिक, पाञ्चरात्रादिकना पक्षोने विपे अत्यंत निःसार युक्त्याभासे करीने कल्पितपणुं स्फुट के- टलांएक अधिकरणे करीने दाविने तेमणे मा- नेला तटस्थ ईश्वरने पण प्रमाण युक्तिनां राहित्य- थकी निरास करता हवा. त्यार पछी तृतीय पादे करीने भूतभोक्तानी प्रतिपादक श्रुतिना तथा च- तुर्थ पादे करीने लिंग देहनी श्रुतियोना परस्पर विरोधने निराकरण करता हवा; ए प्रकारे अद्वै- तने विपे समन्वयना विरोधने निरास करीने वी- जा अविरोधाध्यायनी समाप्ति करता हवा. त्यार पछी त्रीला साधनाध्यायमा पेहेला पादे करीने संसारी जीवनी आ लोक पर लोकमा गति आगतिर्नु निरूपण पूर्वक संसार दोपथी विवेचना करीने अधिकारीनु विशेपणभूत वैरा- ग्यने दृढ कर्या पछी द्वितीय पादे वाक्यार्थज्ञान- २९६ स्वरूपानुसन्धाननी मां अंगपणाए करीने जाग्रदादि अवस्थाओथी विवेचना कर्या नंतर शुद्ध त्वंपदार्थने देखाडीने पछी सकळ दैत प्रपंचनो निरास पूर्वक तत्पदा- थेने पण विवेचना करी देखाडता हवा. त्यार प. छी तृतीय पादे विद्याना भेद अभेदे करी गुणना उपसंहार अनुपसंहारने देखाडता छता चतुर्थ पादना “पुरुपार्थोन्तःशब्दादिति बादराय- णः " ए प्रथमाधिकरणे करीने कर्मथकी निरपे- क्ष एवां ब्रह्मज्ञाननेज मोक्षनी साधनतानु प्रसाध- न करीने अने ते ब्रह्मज्ञाननी उत्पत्तिने विष सं- न्यास शान्त्यादि अन्तरङ्ग साधनोने तथा यज्ञ दा- नादि बहिरङ्ग साधनोने देखाडीने ज्ञानना सा. धनोनो अनुपान करनार अधिकारी पुरुपने " असति प्रतिबन्ध इहैव फलं सति चत. स्मिन्नमुत्रच" ए छेल्ला अधिकरणे फल देखा- डीने तृतीय साधनाध्यायनी समाप्ति करता हवा. त्यार पछी चतुर्थ फलाध्यायना पेहेला पादमा " आत्तिरसदुपदेशात् " ए अधिकरणे करीने ब्रह्मसाक्षात्कार पर्यंत श्रवणादिकनी आ- वृत्तिने कर्तव्यताये देखाडीने “ आत्मेति तुप- गच्छन्ति ग्राहयन्ति च"ए अधिकरणे करीने पष्ठी प्रक्रिया. २९७ जीव ब्रह्मनी ऐक्यतारूप अखंडवाक्यार्थने सम्यक् प्रकारे देखाज्या पछो सगुण निर्गुणोपासक जी- वत् पुरुषने विपे पापपुण्यनो विनाशरूप मुक्ति देखाडीने, अनन्तर सगुण ब्रह्मना उपासक पुरु- पने क्रम मुक्तिनु कथन करीने, द्वितीय पादे तेज सगुणोपासकना उत्क्रान्ति प्रकारचें वर्णन कर्या पछी त्रीजा पादे करीने तेज सगुणोपासकने उत्तर मार्गनो विचार पूर्वक कार्यब्रह्मनी प्राप्ति देखाडीने तथा निर्गुण ब्रह्मवेत्ता पुरुपने गतिउत्क्रान्तिनो प्रतिपेध करीने, अनन्तर चतुर्थ पादे ब्रह्मात्मानी ऐक्यताये अवस्थानरूप निर्गुण विद्यानुं फल व- र्णन करीने अने सगुण विद्यार्नु फलभूत ब्रह्म लोकने विपे ऐश्वर्य उपपादन करीने, अन्ते ते सगुणवेत्ताओने “ अनावृत्तिः शब्दात् अना- ए सूत्रनी मूलभूत श्रुतिः- " न स पुनरावर्त्तते न स पुनरावर्तते एरीते ब्रह्मोपदेशे करीने मुक्ति देखाडीने उपराम पामता हवा. इति श्री मदुदयशंकरात्मज गौरीशंकर विरचिते स्वरूपानुसंधाने पष्ठी प्रक्रिया समाप्ता.६ वृत्तिः शब्दात् " " - अथ श्री स्वरूपानुसंधाने सप्तम प्रक्रिया प्रारंभः ७. स्मृति प्रस्थान. जेना के (१) श्री मद्भगवद्गीता, (२) श्री विष्णुसहस्रनाम, (३) श्री सनत्सुजातीय ए त्रण भाप्य छे; तेमां प्रथम- (१) श्री मद्भगवद्गीता भाष्यना अनुसारे विचार. . मंगलाचरण. “ॐ नारायणः परोऽव्यक्तादण्ड- मव्यक्त संभवम् । अण्डस्यान्तस्वि- मे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी ॥१॥" कर्मनिष्ठा अने ज्ञाननिष्ठा ते मध्ये कर्मनिष्ठा उपायभूत छे, अने ज्ञाननिष्ठा उपेयभूत छे; ए वन्ने निष्ठाने अधिकार करीने प्रवृत्त थयेलां गीता- शास्त्रने व्याख्यान करवाने इच्छता भगवान श्री सप्तम प्रक्रिया, भाष्यकार, विनोनी शांति आदि प्रयोजननी सि- दि तथा शिष्टाचारनां प्रतिपालनने अर्थे इष्टदे- वतातत्त्वनुं अनुस्मरणरूप मंगलाचरणने संपा- दन करता छत्ता, नारायण पदथी वाकी एव पदे करीने आ गीताशास्त्र उपनिपद्रुपज छे तेनी साथे इतिहास पुराणोनी पण एकवाक्यता कर- वाना अभिप्रायथी, अंतर्यामि छे विपय जेमा एवा एक पौराणिक श्लोक उदाहरण आपेछे. 'ॐनारायण' इति. नर एटले जे ईश्वरपुरुप तेथी उत्पन्न थनार आप नारा कहेवायछे; ते नारा एटले जल जे भगवान्नु अयन(शयन स्थान )रूप छे, माटे ते भगवान् नारायण कहे- वायछे; ए रीते नारायण शब्दनो अर्थ स्थूळह- टि पुरुपोये कह्योछे. सूक्ष्मदृष्टि पुरुपो तो नारायण शब्दार्थ- व्या- ख्यान करेछे के 'नर' शब्दे करीने स्थावर जंग- मरूप सर्व शरीरो कहेवायछे, अने ते 'नर' ए- टले शरीरोने विपे नित्ये सन्निहित एवा जे चि- दाभासो ते 'नार' कहेवायछे; ते नारोनो एट-. ले चिदाभासोनो जे 'अयन' (आश्रय) अ- अप एव सस दी तासु वीर्यमथातिपत् । तदंडममवढेमं सहस्रांशुसमप्रभम् ॥ १ ॥" or स्वरूपानुसन्धाननो र्थात नियामक एवो जे अंतर्यामी ते नारायण कहेवायछे. ने नारायणने उद्देश करीने नाराय- णाख्य अंतर्यामि ब्राह्मण वेदान्तोमां पठन कयुछे, ए नारायण पदे करीने गीताशास्त्रमा प्रतिपादन करवा योग्य एवं जे उत्कृष्ट तत्त्व ते श्री भाष्य- कारे उपदेश कर्यु. त्यांहां शंकाः- परमात्माने मायाना संबंधथी अन्तर्यामिपणुं अने शास्त्र- प्रतिपाद्यपणुं कहेवू जोइए; अन्यथा एटले एम नहि मानीये तो निर्विकार, असंग, अविषय, अद्वितीय एवा परमात्माने विपे अंन्तर्यामित्व अने शास्त्रप्रतिपाद्यत्व घटे नहि, माटे मायानो संबंध अंगीकार कर्ये छते शुद्धतानी असिद्धि प्राप्त थइ तेम छतां गीताशास्त्रना व्याख्यानना प्रारंभने विपे परदेवता(शुद्धस्वरूप)नुं स्मरण केम संभवे ? शुद्ध तत्त्वनुं जे स्मरण तेज अभीष्ट फलनी पेठे अभिष्ट होवू जोइए! समाधान:- 'परोव्यक्तात् ' एटले जे नारायण अव्यक्त (मा- या)थी पर-छे एटले मायाना संस्पर्शे रहित छे त्यांहां श्रुतिः अक्षरात्परतः परः (हिरण्यगर्भादिकनी अपेक्षाये पर एवं जे अक्षर "आलोय सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनःपुनः । इदमेकं मुनिप्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥ १ ॥" . 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सप्तम प्रक्रिया. एटले अव्याहत तेथी पण परमात्मा पर छे.)य- द्यपि वास्तव स्वरूपे मायासंबंधनो अभाव छे तो पण कल्पित मायासंबंधनो अंगीकार करीने अंत- यामिल शास्त्रप्रतिपाद्यत्व कयुंछे एम समजवु.जे अव्याकृतथी ईश्वरनो व्यतिरेक एटले पृथपणुं विवक्षित छे ते अव्यक्त यद्यपि साक्षिसिद्ध छे तो पण कार्यलिंगक अनुमानने कहेछे 'अंडम- व्यक्त संभवम्' ए पदे करीने. शी रोते के अपं- चीकृत एवां जे पंचनूतो तदात्मक एवं जे हिर- ण्यगर्म तत्त्व ते अंड कहेवायछे, अने ए अंड पूर्वोक्त एवां अव्यक्तथी उत्पन्न थायछे. श्रुति स्मृ- तियोमा पण मूल कारण अव्यक्तथी हिरण्यगर्भ- नी उत्पत्ति प्रसिद्ध छे; तेम छतां हिरण्यगर्भरूप कार्यलिंगे करीने कारणभूत अव्यक्तनी सिद्धि थ- इ. यद्यपि श्रुतिस्मृतियोथी हिरण्यगर्भ जाणवामां आवेछे; तथापि तेने विपे कार्यलिंगक अनुमान पण छे एम मानता छता उत्तराई करीने चिरा- ट्नी उत्पत्ति देखाडेछे. पूक्ति एवां हिरण्यगर्भा- ख्य अंडनी अंदर विराडात्मक एवा आ भूरादि लोको रहेछे. जे कार्य ते कारणनी अंदरज रहेछे माटे हिरण्यगर्भनी अंदर रहेनारा विराडात्मक एवा भूरादि लोको हिरण्यगर्भ त्रज्या छे एरोते २६ स्वरूपानुसन्धाननी विराट्प कार्यलिंगे करीने हिरण्यगर्भरूप कारण- नी सिद्धि थई. भूरादि लोकोनेज पंचीकरण करे- ला एवां जे पंचभूतो, तदात्मक जे विराट् त. दूपे करीने सप्तदीपा' ए चोथा पादे करीने व्यु- त्पादन करेछे. “सा एथिवी अभवत् " आ श्रुतिमां पृथिवी शब्दे करीने विराट्नु कथन क- युछे, माटे सप्तदीपवाळी मेदिनीये करीने सर्व लोकात्मक एवो विराट जाणंवो. च शब्दे करीने पूर्वे हिरण्यगर्भाव्य अंडनी अंदर विराटनी स्थि- ति कथन करी हती तेनी साथे एनी उत्पत्तिनो समुच्चय सूचन कर्योछे. हि एटले निश्चे परमा- त्माज मायादाराये सर्व जगत्नु उत्पादन करीने पछी स्वस्वरूपना ज्ञानवडे स्वस्वरूपमांज अंतर्भाव करीने अखंड, एकरस, चिदात्मस्वरूपे स्वमहिमा- ने विपे रहेछे ए तात्पर्य. आ श्लोकमा नारायण पदे करीने ब्रह्मात्म- क्यरूप विषय सूचन कर्यो; शी रीते के, जे नार एटले चिदाभास जीवो ते त्वं पदना वाच्यार्थ छे: तेमनो अयन एटले आश्रयभूत जे नारायण ते तत्पदनो वाच्यार्थ छे; तेम छतां कल्पितने अ- धिष्ठानथी अनतिरिक्त होवाथी शुद्ध लक्ष्यांशमा- त्रने लइने जीव ब्रह्मनी एकतारूप विषय सूचन सप्तम प्रक्रिया. ३०३ कों; तेणे करीने अर्थात् विषयविपयिभाव संबं- ध पण ध्वनित कर्यो. 'परोव्यक्तात् ' ए पदे क- रीने मायासंस्पर्शना अभावनां कथनथी सर्वान- र्थनी निवृत्ति अने निरतिशयानंदनी प्राप्तिरूप मोक्षाख्य प्रयोजन पण सूचन कर्यु; अने तेणे करीने ते मोक्षनी कामनावाळो साधन संपन्न जे पुरुप ते अधिकारी पण द्योतन कॉ. अवशिष्ट एवा 'तु' शब्दे करीने परमार्थ वस्तुने विपे वास्तव एवं अद्वितीयत्व सूचन कयु; अने तेणे करीने परमार्थ वस्तुद्वाराये ज्ञाननिष्ठांने परम विपयत्व अने तेनी उपायभूत कर्मनिष्ठाने अ- वांतर विपयत्व पण अर्थात् कथन कयु एम अ- वधारण कर. ते नारायण भगवान आ जगत्ने स्रजीने ते- नी स्थिति(प्रतिष्ठा )ने करवानी इच्छा करता छता प्रथम मरीच्यादि प्रजापतिओने जीने तेमनी पासे वेदोक्त एवा कर्मनिष्ठारूप प्रवृत्ति लक्षण धर्मने ग्रहण करावता हवा. त्यार पछी बीजा सनकादिक मुनिओने स्त्रजीने तेमनी पासे ज्ञान वैराग्य लक्षण निवृत्ति धर्मने ग्रहण कराव- ता हवा. ते धर्मनो दीर्घ काळे हास थये छते अने अधर्मनी वृद्धि थये छते, वर्णाश्रमोना असं-

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स्वरूपानुसन्धाननो
करपणाने पालन करवाने इच्छता श्री नारायण
भगवान् वसुदेवथी देवकीने विषे कृष्णरूपे प्रकट
होता हवा. ते श्री कृष्ण शोकमोहरूप महोदधि-
ने विपे निमग्न एवा अर्जुनने अधिकारी करीने
सर्व लोकोना अनुग्रहने अर्थे कर्मनिष्ठा अने ज्ञा-
ननिष्ठारूप द्विविध धर्मने उपदेश करता हवा. ते
निष्ठायने व्यास भगवान् गीताख्य सप्तशत
श्लोकरूपे करीने निबंधन करता हवा.
भाष्यकार कहेछे के, सर्व वेदोनो सारसंग्रहरूप
ए गीताशास्त्रनुं यद्यपि बीजा अनेक पंडितोये
व्याख्यान कर्युछे, तो पण अति गूढार्थ होवाथी
मुमुक्षु जने यथार्थरूपे ग्रहण करी शकाय नहि,
किंतु विरुद्ध अर्थनुं ग्रहण थाय, माटे सुखे करीने
वास्तव अर्थ- ग्रहण कराववाने अर्थ हुँ संक्षेपे
व्याख्यान करीश.
गीताशास्त्रनां त्रण पङ्को छे; तेमां प्रथम प-
मां अंतःकरणनी शुद्धिने अर्थे यज्ञ, दान, तप
विगेरे निष्काम कर्मो प्रतिपादन कर्याछे, अने
बीजां पदमा चित्तनी एकाग्रताने अर्थे भगवद्भ-
क्तिरूप अंतरङ्ग बहिरङ उपासना प्रतिपादन क-
लोकेस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मपानघ । ज्ञानयोगेन
सांख्यानां कर्मयोगेन देहिनां ॥१॥

३०५ सप्तम प्रक्रिया. रीछे; तथा त्रीजा पदमा आत्मज्ञानतुं प्रतिपादन कयुछे. वळी सूक्ष्म दृष्टिथी एम छे के, प्रथम पङ्क त्वं पदार्थनां शोधनने अर्थे छे, अने बीजुं पढ़ तत् पदार्थनां शोधनने अर्थे छे, तथा त्रीजुं पर तत्त्वं पदार्थनी एकतारूप अखंड वाक्यार्थना प्रतिपादनने अर्थे छे. आ गीताशास्त्रमा प्रथम अध्याये करीने उ- पोद्घात(कथानी संगति )नु कथन कयु, अने सूत्ररूप वीजा अध्यायमांप्रथम देहादिकने विपे हुंपणाना तथा द्रोण भीष्मादिकने विष म्हारा- पणाना अध्यासथो अर्जुनने विपे स्वधर्मना त्या- गनी मति अने सर्वे अनर्थीना बीजभूत शोक मोहमा निमनपणुं निरूपण कयुछे. पछी अर्जुने "कार्पण्यदोपोपहतस्वभावः करीने कडं के आत्मा अनात्माना विवेकने विपे मूंढ छे चित्त जेनुं अने दैन्य दोपे करीने उपहत छे स्वभाव जेनो एवो हुँ तमने शरणे थइने पु- छंछों के, 'जे निश्चित श्रेय होय ते कृपा करीने कहो.' तेथी श्री कृष्ण भगवाने तेने शोक मो- हथी उद्धरण करवाने अर्थे “ अशोच्यान" तथा “नत्वेवाहं" इत्यादि श्लोके स्थूल सूक्ष्म देहादिकथी आत्माने प्रथक् करीने तेने विपे " एश्लोके ३०६ स्वरूपानुसन्धाननी नित्यपणुं अने देहादिकने विपे अनित्यपणुं कथन कर्या पछी वास्तव आत्मतत्त्वनी दृष्टिथी शोक मोहनी अकर्तव्यता उपसंहार करीने परमार्थ दर्शनरूप ज्ञाननिष्ठा कथन करीने तेनी प्राप्तिने विषे उपायभूत एवी निष्काम कर्मनिष्ठानो उप- क्रम करीने तेनीज प्रशंसा पूर्वक आवश्यकता कथन करी; अने ते निष्काम कर्मनां अनुष्ठाने करीने ज्यारे त्हारी बुद्धि आत्माने विपे 'निश्चल थो त्यारे तुं परमार्थ दर्शनरूप योगने पामीश. एरीते अर्जुनने उपदेश कर्ये छते आ बीजा अ- ध्यायनी समाप्ति पर्यंत स्थितप्रज्ञनां स्वसंवेद्य त- था परसंवेद्य एवां लक्षणो कथन करीने मोक्षद् कारण कहेछे के, जे पुरुप रागद्देपे रहित अने पोताने अधीन एवां इंद्रियोये करीने अवयं वि- पयोने ग्रहण करे,अने जेनुअंतःकरण स्वाधीन हो- य ते प्रसाद एटले स्वस्थताने पामे; अने प्रसाद थ- ये छते आध्यात्मिकादि सर्व दुःखोनी हानि थाय. वळी प्रसन्न छे चित्त जेनुं एवा पुरुपनी बुद्धि शीघ्र आत्माकार थइने निश्चल होयछे ए आ- त्माकार बुद्धि अयुक्त एटले असमाहित अंतःक- रणवाळाने प्राप्त थाय नहि; माटे हे अर्जुन! जे यतिये सर्व प्रकारे विपयोथी इंद्रियोने निग्रह क- सप्तम प्रक्रिया. ३०७ यी होय तेनी प्रज्ञा प्रतिष्ठित जाणवी. सर्व प्रा णीओनी जे निशातुल्य आत्मनिष्ठा तेने विपे प्रवुद्ध पुरुष जागेछे, अने जे प्राणी अहं मम अभिमानने विपे जागेछे, तेने ज्ञानी लोक नि- शारूप मानेछे; जेम इतर प्राणीओनी जे निशा ते उलूकादिकने दिवसरूप छे, अने उलूकादि- कनो जे रात्रिरूप दिवस ते इतर प्राणीओने नि- शारूप छे. तेम; माटे सर्व कामोनो त्याग क- रीने जे संन्यासी अहंममताये रहित होय, तेज शान्ति(मोक्ष )ने पामे; पूर्वोक्त ब्राह्मी स्थिति प्राप्त थये छते विमोह पामे नहि:वळी उत्तर व- यमां पण ए स्थितिमा रहिने मोक्ष पामे, तो जे पुरुप ब्रह्मचर्यधीज संन्यास करीने यावज्जीव ए स्थितिमा रह्यो छतो मोक्ष पामे तेमा युं कहे ? पूर्वोक्त अध्यायमा कथन करी जे कर्मनिष्ठा अने ज्ञाननिष्ठा तेमनांज विशेष व्याख्यानरूप त्रीजाथी आरंभीने सत्तरमा अध्याय पर्यंत छे; तेनो विस्तार स्वामि श्री चिद्घनानंदजीये करेली गीतानी भापा टीकाना त्रीजा अध्यायना प्रारंभ- मां निरूपण करेलो छे; तथा अढारमा अध्या- यमा कर्मनिष्ठा अने ज्ञाननिष्ठानो उपसंहार क- योछे. त्यांहां कर्मनिष्टाना उपसंहारनो श्लोकः- . ३०८ स्वरूपानुसन्धाननी मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्र- तिजाने प्रियोसि मे॥१॥ अर्थः- “ततोवक्ष्यामि ते हितम्" ए पाछळ- नां वाक्ये करीने प्रतिज्ञा करेला " हिततम अर्थने श्री भगवान कहेछे के, हे अर्जुन ! तुं म्हारे विपेज छे मन जेतुं एवो अने म्हारुंज भजन क- रनार, तथा म्हारुंज यजन करनार एवो था, तथा मनेज नमस्कार कर! ए रीते वासुदेवरूप जे हुँ ते म्हारेविषे समर्पण कर्याछे सर्व एवां साध्यसाधन अने फलो जेणे एवो छतो मनेज पामीश ए प्रमाणे हुं सत्य प्रतिज्ञा करीने क. हुँछौं; केमके तुं मने प्रिय छो. आ श्लोकनो ता- त्पर्यार्थ ए छे के, भगवाननी प्रतिज्ञा सत्यज छे एम जाणीने भगवाननी भक्तियकी मोक्ष फल अ. वश्य प्राप्त थशे एबुं अवधारण करीने भगवानना शरणने विपेज एक तत्परता राखवी. १ कर्मनिरानुं परम रहस्यरूप जे ईश्वरशरणता तेनो उपसंहार करीने हवे कर्म, योग, त्याग, निष्टानुं फलरूप अने सर्व वेदान्तोमा प्रतिपादन करेलु ए जे सम्यक् दर्शन तेने कहेछे.

. सप्तम प्रक्रिया. सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं खां सर्वपापेभ्यो मोक्ष- यिष्यामि मा शुचः॥१॥ अर्थ:-हे अर्जुन ! सर्व एवा धर्मोनो एटले पापपुण्यरूप कर्मोनो परित्याग करीने अर्थात् क- मैनो संन्यास करीने सर्वनो आत्मारूप अने सर्वा- स्मक तथा ईश्वर अप्रच्युतस्वरूप अने सर्वनो गुरु तथा जन्ममरणे रहित एवा एक मनेज शरणे था एटले सर्वात्मक ईश्वरथी अभिन्न हुँ छौं एम नि- श्चय कर ! ए रीते निश्चयवाळा तुंने सर्व एवां बंध- नरूप पुण्यपापोथी आत्मस्वरूपनो साक्षात्कार करावीने मोक्ष पमाडीश, माटे शोक न कर ! १ तेने विपे प्रमाणभूत एवो देशमाध्यायनो ११ मो श्लोकः- तेपामेवानुकंपार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ १ ॥ १ आ ठेकाणे धर्म पदे करीने अधर्म, पण ग्रहण करईं; के. मके "नाविरतोदुश्चरितात् "त्यजधर्ममधर्म च" इत्यादि श्रुतियोमा पाप कर्मोनो पण त्याग विधान कर्यो छे.

३१० स्वरूपानुसन्धाननी अर्थः-पूर्वोक्त एवां "मच्चित्ता मद्तप्राणाः" इत्यादि वाक्योमा कांछे ते प्रकारे प्रीति पूर्वक मने भजनार जे भक्तो तेमने श्रेय प्राप्ति शी रीते थाय, ए प्रकारे दयाधी हूं तेमना अन्तःकरणमा रह्यो छतो आत्मा अनात्माना अविवेकथी जन्य एवो जे मिथ्या प्रत्यय एटले देहादिकने विपे हुँ म्हारापणानुं अभिमानरूप जे मोह तेरूप अंध- कारने म्हारी अनन्य भक्ति तथा प्रसादरूप तैले करीने सिंचायेलो, अने म्हारी भावनानो संतत प्रवाहरूप वायुये प्रेर्यो, तथा ब्रह्मचर्यादिक साध- नोना संस्कारवाळी प्रज्ञा छे वाट जेने एवो, अने विरक्त एवं अन्तःकरण छे आधारपात्र जेने एवो अने सर्व विषयोथी व्यावृत्त अने रागादि देपे क- रीने अकलुपित एवां चित्तरूपी निवात प्रदेशमा रहेलो, अने नित्य प्रवृत्त एवं जे एकाय ध्यान ते- थकी जन्य जे सम्यक् दर्शन तेरूपी प्रकाशवाळो एवा ज्ञानरूप दीपे करीने उपर लखेलां मोहांध- कारने नाश पमाडंछौं. ए रीते ब्रह्मविद्याना उपदेश त एवी श्रीमद्भ- गवद्गीता श्री भगवाने समाप्त करीछे; तेनो निष्क्रप्ट अर्थ त्रीजी प्रक्रियामां किं कर्म किमकमैति तथा “ यस्य नाहं कृतो भावो"ए स्मृतिनां सप्तम प्रक्रिया. ३११ - व्याख्यानमा स्पष्टताथकी सूचन कोंछे. छेवटना मंगलाचरणनो श्लोकः- शोकपङ्कनिमग्नं यः सांख्ययोगोपदे- शतः। उज्जहारार्जुनं भक्तं सकृष्णः शरणं मम ॥ १ ॥ अर्थः-जे श्री कृष्ण शोकरूपी पङ्कमा नि- मग्न थयेलो अने पोतानो भक्त एवो जे अर्जुन, तेने ज्ञाननिष्ठा अने कर्मनिष्ठाना उपदेशे करीने उदार करता हवा ते श्री कृष्ण म्हारुं शरण (र- क्षक) छे. १ महावाक्यरत्नावळीतुं वाक्यः- शास्त्रण नश्येत्परमार्थदृष्टिः कार्यक्ष- मं नश्यति चापरोक्षात् । प्रारब्ध- नाशात्प्रतिक्षासनाश एवं त्रिधा- नश्यति चात्ममाया ॥१॥ अर्थः- 'शास्त्रेण' एटले स्वस्वरूपने विपे अप्रवण छे शील जेनु एवा अज्ञानी( स्वस्वरूप- ना अनभिज्ञ )ने स्वस्वरूप प्रवणतानो जे उप- देश करनार ते उपनिपद् व्याससूत्रादि अद्वैत

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३१२ स्वरूपानुसन्धाननी
शास्त्र कहेवायछे; ते अद्वैत शास्त्रना श्रवणधी
जन्य एवां परोक्षज्ञाने करीने पूर्व जे देत प्रपञ्चने
विपे पारमार्थिक सत्यपणुं हतुं तेनो नाश थाय;
अने तदनन्तर प्रपञ्चने विपे जे 'कार्यक्षमत्व'
एटले व्यावहारिक सत्यपणुं ते पण मननथकी
जन्य एवां ब्रह्मात्मैकत्वनां अपरोक्ष ज्ञानथी नष्ट
थाय; तदनन्तर जगतने विपे प्रातिभासिक स-
त्यमात्रपणुं स्फुरेछे ते प्रातिभासिक सत्यत्व प.
ण निदिध्यासनथी जन्य एवां सम्यक् ज्ञाने करीने
एटले दृढ वोधे करीने प्रारब्धादि त्रिविध कर्मों-
नो नाश थये छते नष्ट होयछे; ए रीते त्रण प्र-
कारे आत्माने विपे अध्यस्त माया नाश पामे-
छे; अर्थात् जे काळे दृढ तत्त्वज्ञान होय तेज का-
ळे विद्वान् पुरुप विदेह मुक्त होयछे. १
(२) श्री विष्णुसहस्त्रनाम भाप्यना
अनुसारे विचार.
मंगलाचरण.
सच्चिदानंदरूपाय कृष्णायाक्लिष्ट-
कारिणे । नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे
बुद्धिसाक्षिणे॥१॥

सप्तम प्रक्रिया. ३१३ अर्थः- सत्, चित्, आनन्द छे स्वरूप जेनुं एवा, अने सदुपदेशे करोने केशनी निवृत्ति कर- नार, तथा उपनिपद् वाक्ये करीने वेद्य एटले जाणवामां आवे एवा, अने सर्वना गुरुरूप, तथा बुद्धिना साक्षिरूप एवा श्री कृष्णेने नमस्कार. १ यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसार- बंधनात् । विमुच्यते नमस्तस्मै वि- ष्णवे प्रभविष्णवे ॥२॥ अर्थ:- जेनां स्मरणमात्रे करीने जन्ममर- णे उपलक्षित एवा संसाररूप बंधनधी प्राणी मु- त थाय, ते सर्वेश्वर एवा विष्णुने नमस्कार. २ अभ्युदय तथा आपेक्षित अमृतभावना हेतु- भूत एवा वेदोक्त धर्मोने निःशेषताथी श्रवण क- रीने युधिष्ठिरे भीष्मपितामह प्रत्ये वक्ष्यमाण प्र. कारे छ प्रश्नो कर्या के- हे भगवन !(१) समस्त विद्यास्थानोने विषे एक देव कोण? (२) आ लोकमां परम प्राप्य एवं वस्तु शु के, जे प्राप्त थये "भिद्यते हृदयग्रंथिः" इत्यादि श्रुत्युक्त फल प्राप्त धाय? (३) कहा १ रुपि वाचकः शब्दो णश्च नितिवाचकः । तयोरक्यं परं- ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ॥ १॥ , . ३१४ स्वरूपानुसन्धाननी देवनी स्तुति करता छता एटले गुणकीर्तन कर- ता छता-तथा (१) कह्या देवतुं वाह्याभ्यंतर अर्चन करता छता- मनुष्यो स्वर्ग अपवर्गादि फ- लने पामे ? (५) पूर्वोक्त सर्व धर्मो मध्ये तमो. ने परम संमत प्रष्ट धर्म कहो ? (६) कह्या जाप्यनो जप करतो छतो प्राणी संसार बंधन- थकी मुक्त थाय? तेना उत्तरमा भीष्मपितामह कहेछे के(१)जग- त्ना प्रभु एवा नारायण देवने सहस्रनामे करी- ने स्तुति तथा तेनुंज अर्चन, ध्यान, यजन अने न- मस्कार करतो छतो आध्यात्मिकादिक सर्व दुःखो- ने अतिक्रमण करनारो होयछे; एणे करीने एम जणाव्यु के, जे श्री नारायण ते परम दैवतरूप छे. (२) जे नारायण प्रष्ट व्यापक अने सर्वनु अ- वभासक “न तत्र सूर्यो भाति" इत्यादि श्रु- तिप्रसिद्ध परम चैतन्यरूप छे, तथा परम तपरू- प छे; तपत्याज्ञापयतीति तपः" एटले आ लोक, पर लोक तथा सर्व भूतोने आंतर र- हीने नियममा राखे ते तप; एवा नारायण देव छे. अथवा "तपति ईष्टे इति तपः" एटले अनवच्छिन्न ऐश्वर्य जे करे ते तप; अर्थात् सर्वे- सप्तम प्रक्रिया. ३१५ श्वर छे; तथा परम व्यापक ब्रह्मस्वरूप पण एजछे; तथा परम परायण (पुनरारति शंकाये रहित) निरतिशय आनन्दस्वरूप प्राप्यस्थान एज छे; तथा (३)हेनीज स्तुति, अने( ४ ) त्हेनांज अ- र्चनथकी शुभ प्राप्ति होयछे. (५) हृदयकमल- मां रहेनार प्रत्यगात्मारूप जे नारायण तेनुं गुण- संकीर्तनादिके करीने सदा सत्कार पूर्वक अर्चन करवू एज परम धर्म हुं मानुंछों; केमके एमां प- शुहिंसादिक नथी, तथा पुरुप संपत्ति अने द्रव्य संपत्तिनी पण जरूर पडती नथी, अने देश का- लादिकनो नियम पण नथी; तथा (६) ए ना- रायण देवना नामना जपथकीज संसार बंधन- थी मुक्त थाय. ए नारायण देवनां धर्म, अर्थ, काम अने मोक्ष ए चारे पुरुषार्थीनां प्रदाता एवां अने शक्तिवृत्ति- थी सगुणस्वरूपना तथा लक्षणावृत्तिथी निर्गुणस्व- रूपना प्रतिपादक सहस्रनामोने वक्ष्यमाण प्रकारे कथन करुंछौं, ते सर्व पाप अने भयनां हरण करनार सहस्त्रनामोने तुं चित्तनी एकाग्रताची श्रवण कर! ॐ विश्वं विष्णुर्वपट्कारो भूतभव्य- . स्वरूपानुसन्धाननी भवत्प्रभुः । भूतद्भूतद्भावो भू- तात्मा भूतभावनः॥१॥ अर्थः- पूर्वे “ यतःसर्वाणि भूतानि " अहींथी आरंभीने जगतना उत्पत्ति, स्थिति, लय नुं कारणभूत एवां ब्रह्मने एक परम दैवतपणुं कथन कयु; माटे प्रथम विश्व' शब्दे करीने सगुण नि- गुण एवं ब्रह्म निर्देश कर्युछे. आ विश्व(सर्व जगत् )नुं कारण होवाथी ब्रह्म पण विश्व कहेवा- यछे. कार्यरूप विश्व शब्दे करीने कारणभूत ब्रह्ममुं जे ग्रहण ते कार्यभृत एवां विरंच्यादिकनां नामे करीने विष्णुनीज एटले व्यापक ब्रह्मनीज स्तुति होयछे एवी सूचनाने अर्थे छे; अथवा आ विश्व वास्तवरूपे परम पुरुपथी भिन्न नथी, माटे विश्व कहेता 'ब्रह्म' जाणवू; तेमा प्रमाणभूत श्रुतिः- "ब्रह्मैवेदं सर्व ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरि- ष्ठं " "पुरुप एवेदः सर्वं " एटले जे आ विश्व ते श्रेष्ठ एबुं ब्रह्मज छे; तथा जे आ सर्व जगत् ते परम पुरुपरूपज छे. अथवा “ विश- तीति विश्वं ब्रह्म एटले कार्यने सजीने ते- ने विपे प्रवेश करे, ते ब्रह्म विश्व कहेवायछे; त्यां- हां श्रुतिः- “ तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् " 'सप्तम प्रक्रिया.. i एटले ते ब्रह्म भूतभौतिक देहादि कार्यने स्वजीने तेमां आत्मारूपे प्रवेश करतुं हवू. वळो “ वि. शंति सर्वाणि भूतान्यस्मिन्निति विश्वं एटले प्रलय कालने विपे सर्व भूतो जेनें विपे प्रवेश करे ते ब्रह्म विश्व कहेवायछे, त्यांहां श्रुतिः- यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति” एंटले आ सर्व तो लय पामतां छतां जे ब्रह्मने विपे प्रवेश करेछे; अथवा श्रुतिः- “ एतदेवाक्षरं ब्रह्म" एटले जे ॐकार एज अक्षर ब्रह्मरूप छे; त्यांहां श्रुतिः- "वाङ्यं प्रणवं ब्रह्म"एटले जे प्रणव ते चाहय (शब्दमय) ब्रह्मरूप छ; वळी स्मृति:- " ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म" एटले जे 'ॐ' ए अक्षर ते ब्रह्मरूप छ; इत्यादि श्रुतिस्मृतिओनां प्रमाणथी 'विश्व' शब्दे करीने ॐकार जाणवो, अने वाचकवाच्यनोजे भेद ते कल्पित छ- वास्त- वताथी अभेदल छे माटे 'विश्व' कहेता जे ॐ- कार एज ब्रह्म ए तात्पर्य. अथवा- एतदिजानता सर्व जगत्स्थावरज- गमम् । द्रष्टव्यमात्मवद्विष्णुर्यतोयं विश्वरूपधृक् ॥ १॥ ये च मूढा दुरा- - स्वरूपानुसन्धाननी i, त्मानो भिन्नं पश्यति मां हरेः। ब्रह्माणं चं तथा तेपांभ्रूणहत्या समं बघम् ॥२॥ अर्थः- शिवजी कहेछे के जाणता पुरुपे स्थावरजंगमरूप सर्व जगत् आत्मारूप जो; के- मके विश्वरूपने धारण करीने विष्णुज रह्याछे.. तथा मने, ब्रह्माने अने विष्णुने जे दुर्बुद्धि मूढ पुरुपो भिन्न भावे जुवे तेमने ब्रह्महत्या समान पा- प छे. २ः 'इत्यादि वचनोनां प्रमाणोथी हिंसादिना रा- हिल्यथी अभेद भावे स्तुति नमस्कारादि करवू, एवं जणाचवा माटे 'विश्व' शब्दे करीने ब्रह्म कथन कर्युछे. 'विष्णुः “वेष्टि व्याप्नोतीति विष्णुः एटले जे सर्वत्र व्यापीने रहे ते ब्रह्मा विष्णु कहे- वायछे; अर्थात् देश, काल अने वस्तुरूत परि- च्छेदे रहित छे; त्यांहां श्रुतिः- यच्च किञ्चित् जगत्सर्व . दृश्यते श्रूयतेपि वा । अंतर्बहिश्च तत्सर्व व्याप्य नारायणः स्थितः" ॥१॥ अर्थ:-जे आ यत्किञ्चित् एटले नाम, रूप, सप्तम प्रक्रिया. ३६९ क्रियात्मक जगत् देखायछे अने श्रवण थाय- छे ते सर्वने अन्तः अने बाह्य व्यापीने नाराय- ण रह्याछे. १. अथवा " विशतीति विष्णुः" एटले जे प्र- वेश करे ते विष्णु; त्यांहां विष्णुपुराणनुं वचनः- “ यस्माविष्टमिदं सर्वं तस्य शत्तया- महात्मनः। तस्मादेवोच्यते विष्णुर्वि- शेर्धातोः प्रवेशनात् " ॥१॥ अर्थ:- जे माटे महात्मा ते नारायणनी चिच्छक्तिये सर्व जगतमा प्रवेश कर्योछे, माटे प्रवेशार्थक 'विश' धातुने 'नु' प्रत्यय लगाड- वाथी नारायण देव विष्णु कहेवायछे.१ वपट्कारः' जेनो उदेश करीने वपट्कार कराय, अथवा जे यज्ञने विपे वपट्किया होयछे ते यज्ञरूप विष्णु वपट्कोर कहेवायछे; त्योहां- श्रुतिः- " यज्ञो वै विष्णुः” एटले जे विष्णु एज यज्ञ छे. "चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च हाश्यां पंच- भिरेव च। हूयते च पुनर्वाभ्यां तस्मै यज्ञात्मने नमः॥ १॥"

३२० स्वरूपानुसन्धाननी अर्थः- (कर्मकांडने अनुसारे.) ओ श्रावय,"? "अस्तु श्रीपट्,"२ " यज," ५ “ये यजामहे," २ " वौषट् " ए रीते ४, १, २, ५, २ मळीने १७ बडे जेने विपे होम करायछे ते यज्ञात्मा विष्णुने नमस्कार. अथवा बीजो अर्थ:- (ज्ञानकांडने अनुसारे.) ४, ४, २ एटले १० इंद्रियो, अने ५ पांच प्राण, तथा २ मन बुद्धि ए सत्तर तत्त्वोनुं चिदाभासयुक्त लिंग शरीर जे साक्षिस्वरूप विष्णुने विषे होमा- य एटले अभेदे करीने लय कराय, ते यज्ञात्मा विष्णुने नमस्कार. १. अथवा वपट्कारादि मंत्र- रूपे करीने देवताओने जे तृप्त करे ते यज्ञरूप विष्णु चपट्कार कहेवायछे. भूतभव्यभवत्प्रभुः ' एटले भूत, भवि- प्यत् अने वर्तमान एवण्येने विपे ऐश्वर्यवान अ- र्थात् अविच्छिन्न ऐश्वर्यवान जे विष्णु ते भूतभ- व्यभवत्प्रभु कहेवायछे. 'भूतकृत् ' "भूतानि करोतीति भूतकृत्" एटले रजोगुणर्नु आश्रयण करीने हिरण्यगर्भरूपे भूतोनुं उत्पादन करे ते ब्रह्म भूतकत् कहेवायछे; अथवा “भूतानि कृन्तति कृणोति इति वा- सप्तम प्रक्रिया. ३२१ भूतकृत् " एटले तमोगुणर्नु आश्रयण करीने रुद्ररूपे सर्व भूतोनो नाश करे अर्थात् पोताने विपे लय करे ते विष्णु भूतकर कहेवायछे. भूतभृत्' " भूतानि विर्तीति भूत- त् " एटले सत्त्वगुणर्नु आश्रयण करीने वि- ष्णुरूपे भूतोनुं पालन पोषण करे ते ब्रह्म भूत- भूव कहेवायछे. 'भावः' भवतीति भावः" एटले प्रपंच- रूपे करीने जे होय ते ब्रह्म भाव कहेवायछे; अथवा केवलरूपेजे होय ते ब्रह्म भाव कहेवायछे; अथवा "अवनं आवः " एटले केवल सत्तारूपे जे होय ते ब्रह्म भाव कहेवायछे. 'भूतात्मा'" भूतानां आत्मा भूतात्मा" एटले सर्व प्राणीओनो जे अन्तर्यामी ते ब्रह्म भूतात्मा कहेवायछे; त्यांहां श्रुतिः- एषत आत्मान्तर्यामी" 'भूतभावनः ' " क्षुतानि भावयति जन- यति वर्दयति वा भूतभावनः" एटले भू- तोने जे उत्पन्न करे अथवा वृद्धि पमाडे ते ब्रह्म भूतभावनः कहेवायछे.१. त्यारे'तरुव' 'भूतभृत्' इत्यादिक नामे करी- . ३२२ स्वरूपानुसन्धाननी ने सत्त्वादि गुणोने अधीनपणुं प्राप्त थयुं एवी शं- का थये छते तेनुं निराकरण करेछे. "पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां पर- मागतिः। अव्ययः पुरुपः साक्षी क्षे- त्रज्ञोक्षर एव च " ॥२॥ अर्थः- 'पूतात्मा'"पूतः आत्मा यस्येति पूतात्मा" एटले गुण, जन्म, कर्म इत्यादि दोषोथी असंस्ष्टष्ट छे स्वरूप जेनुं एवा जे विष्णु ते पूतात्मा कहेवायछे; “निर्गुणो निष्कि- यश्च"ए अतिनां प्रमाणधी. अथवा " पूत- श्वासौ आत्मा च पूतात्मा" 'पूतः' एटले शुद्ध एवा छता 'आत्मा' कहेतां प्रत्यक्प जे विष्णु ते पूतात्मा कहेवायछे; त्यांहां श्रुतिः- "केवलो निर्गुणश्च" 'परमात्मा' “परमश्चासौ आत्मा च प- रमात्मा " एटले कार्य कारणथी विलक्षण; अ- र्थात् हिरण्यगर्भादि कार्यथी तथा अव्याहत्तरूप कारणथी विलक्षण एटले नित्य, बुद्ध, मुक्तस्वभाव. 'मुक्तानां परमा गतिः' एटले मुक्तोनी परम- ' सप्तम प्रक्रिया. ३२३ गतिरूप; अर्थात् अपुनरावृत्तिथी प्राप्यस्थानरूप; त्यांहां गीतानुं वचन:- मामुपेत्य तु कौंतेय पुनर्जन्म न विद्यते।" अर्थः- हे अर्जुन ! प्रत्यक्थी अभिन्न जे हुँ तेने पामीने एटले अभेदरूपे साक्षात्कार करीने फरीथी जन्म पामे नहि. अव्ययः '"नास्ति व्ययो यस्येति अ- व्ययः " एटले नथी छे व्यय (नाश), तथा जन्मादि विकार जेने ते विष्णु अव्यय कहेवायछे; त्यांहां श्रुतिः- " अजरोऽमरोऽव्ययः", पुरि शेते इति पुरुपः" एटले शरीररूप ब्रह्मपुरने विपे शयन करे ते विष्णु पुरुप कहेवायछे; त्यांहां महाभारतनुं वचन:- " नवहारं पुरं पुण्यमेतैर्भावैः स- मन्वितम्। व्याप्य शेते महात्मा यत् तस्मात्पुरुप उच्यते॥१॥ अर्थः- नव द्वारवालं अने इंद्रियादि पदा- ोये सहित एवां शरीररूप पुरने व्यापीने जे ' पुरुपः' - - ३२१ स्वरूपानुसन्धाननी माटे शयन करेछे ते माटे पुरुप कहेवायछे; अ- थवा “ आसीत् पुरैवेति पुरुपः" एटले पू- वै जे हतोज ते विष्णु पुरुप कहेवायछे; त्यांहां श्रुतिः- पूर्वमेवाहमासमिति तत्पुरुपस्य पुरुप- वं" एटले सृष्टिथी पूर्व हुंज हतो माटे पुरुप एज पुरुप पुरुपत्व; अथवा “ पुरूणि सुनो- तीति पुरुपः” एटले मनोभिलपित बहु फलोने ग्रहण करे अथवा आपे ते पुरुप कहेवायछे; यहा “पुरूणि स्यतीति पुरुपः ” एटले सं. हार समयने विपे अनेक भुवनोनो अंत (नाश) अर्थात् पोतामां लय करे ते पुरुष कहेवायछे. 'साक्षी' “साक्षात् ईक्षते सर्वमिति सा- क्षी” एटले अव्यवधाने करीने अने स्वस्वरूप- ना बोधे करीने अभेदथी सर्वने ( बुद्धित्तिना प्रत्ययोने ) जुवे ते विष्णु साक्षी कहेवायछे. 'क्षेत्रज्ञः' "क्षेत्रं जानातीति क्षेत्रज्ञः एटले क्षेत्र(शरीर)ने जे जाणे ते क्षेत्रज्ञ कहे- वायछे; त्यांहां भगवद्गीतार्नु वाक्यः- “क्षेत्रज्ञं चापि मां विदि" सप्तम प्रक्रिया.. ३२५ 'अक्षरः' "नक्षरतीत्यक्षरः" एटले जे विनाश पामे नहि ते अक्षर कहेवायछे. 'ऐव' शब्दे करीने तत्त्वमस्यादि वाक्यनां प्रमाणथी क्षेत्रज्ञ अने अक्षर ब्रह्मनो अभेद जणाव्यो. २: इत्यादि सहस्र नामे करीने व्याकरणयी तों श्रुत्यनुसारी युक्तियकी प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्मनुंज प्रतिपादन कर्युछे. श्री भगवानुवाच. यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पांडव।सोहमेकेन श्लोकेन स्तुत ए- व न संशयः॥१॥ नमोस्त्वनंताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षि शिरोरुबाहवे । सहस्त्रनाम्ने पुरुपाय शाश्वते सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः ॥१॥ अर्थ:- 'अनन्ताय' एटले अपरिच्छिन्न ए- वा, अने 'सहस्त्रमूर्तये एटले अपरिमित छे मू- निओ जेमनी एवा, अने 'सहस्रपादाक्षिशिरोरु- बाहवे' एटले अपरिमित छे पाद. अक्षि, शिरस, ऊरु, वाहु जेमने एवा, अने ‘सहस्रनाम्ने' एटले २८ ३२६ स्वरूपानुसन्धाननी अपरिमित छ नाम जेमनां एवा, अने 'सहस्र- कोटीयुगधारिणे' एटले अपरिमित करोड युगने धारण करनार एवा, अने 'शाश्वते' एटले नि- त्यरूप एवा जे पुरुष (प्रत्यक् अभिन्न ईश्वर) तेने नमस्कार; अर्थात् अभेदे करीने अनु- संधान. १ महावाक्यरत्नावळीनुं वाक्य. निमिपाधं न तिष्ठन्ति वृत्तिं ब्रह्मम- यीं विना । यथा तिष्ठन्ति ब्रह्माद्याः सनकाद्याःशुकादयः ॥ १ ॥ अर्थः- शुकदेवने आदि लेइने ब्रह्मऋषियो तथा सनकादि नित्यमुक्तो तथा ब्रह्मादिक देव- ताओ एक निमिपना अर्धमात्र पण ब्रह्माकार - नि विना रहेता नथी; तेमज ब्रह्मवेत्ताओ मध्ये वरीयान एवा जीवन्मुक्तो रहेछे. १. (३) श्री सनत्सुजातीय भाप्यना अनुसारे विचार. मंगलाचरण, पुंसे पुराणाय पूर्णानन्दाय वि- नमः सप्तम प्रक्रिया. ३२७ ष्णवे । निरस्तनिखिलध्वान्तते- जसे विश्वहेतवे ॥१॥ अर्थः-जगत्ना हेतुभूत अने निरास कोंछे समय अविद्या तकार्यो जेणे एवं नित्य तेजरूप एटले प्रकाशरूप, तथा पूर्ण आनन्दरूप अने पु- राण (अनादि) पुरुप एवा व्यापकस्वरूप वि- ष्णुने नमस्कार. १. शोक अने मोहे करीने अभितप्त एवा धृतराष्ट्र “तरति शोकमात्मवित्" (जे आत्मवेत्ता ते शोकने तरे.) ए प्रकारे वेदान्तना वादने श्रवण करीने ब्रह्मविद्या विना शोकनी निवृत्ति अशक्य मानीने विदुर प्रत्ये कडं के “ हे विदुर ! तमें अपरविद्याविषयक एटले अन्तःकरण शुद्ध थवा अष्टाध्याय विदुरनीति कथन कयु; हवे परवि ग्रानो उपदेश करो!" त्यार पछी विदुरे “हुं शूद्र योनिने विपे उत्पन्न थयोछौं माटे ब्रह्मविद्याना उपदेशनो मने अधिकार नथी." एम कहीने योगना बळे सनत्सुजातनुं स्मरण करता तेओ आव्या; पछी विदुरे कयु के “हेभगवन् ! धृतरा- ट्रना अन्तःकरणने विपे संशय छे ते सदुपदेशे करीने निवारण करो के जेथकी सर्व दुःखने अति- ३२८ स्वरूपानुसन्धाननी कमण करीने मुक्त थाय." त्यार पछी धृतराष्ट्र बोल्या; त्यांहां श्लोकः- "ततो राजा धृतराष्ट्रो मनीपी संपूज्य वाक्यं विदुरेरितं तत्। सनत्सुजातं रहिते महात्मा पप्रच्छबुद्धिपरमां बुभूपन " ॥१॥ अर्थः- महात्मा (अधिकारी) एवोधृतरा- ट्र राजा विदुरे संनत्सुजात प्रत्ये कहेला पूर्वोक्त वाक्यनी प्रशंसा करीने प्रास्त जन वर्जित एवां एकान्त स्थळने विपे सनत्सुजात प्रत्ये पूर्ण, आ- नन्द, अदितीयविपयक एवी उत्तम बुद्धिने ब्रह्म- विद्याये करीने आत्मस्वरूपने पामवाने इच्छतो छतो पुछतो हवो. त्याहाँ श्लोकः- सनत्सुजात यदिदं शृणोमि मृत्युर्हिनास्तीति तवोपदिष्टं। देवासुराआचरन्ब्रह्मचर्य .. ममृत्यवे तत्कतरन्नुसत्यं ॥ ३ ॥" सनत् एटले सनातन एवो हिरण्यगर्भ तेना मनथी स. म्यक् प्रकारे एटले ज्ञान वैराग्यादिये युक्त एवो छतो जे उत्पन्न थयो ते सनत्सुजात कहेवायछे; अर्थात् सनत्कुमार. . १ " सप्तम प्रक्रिया. ३२९ ! अर्थः- हे सनत्सुजात! "मृत्यु छेज नहि" ए प्रकारे शिप्यो प्रत्ये तमारो उपदेश छे एम विदुरे मने कडंछे; तथा “देव अने असुरो तो अमृत्युने अर्थे एटले मृत्युना अभावने अर्थे अ- र्थात् अमृतत्वनी प्राप्तिने अर्थे ब्रह्मचर्य- आच- रण करता छता गुरुगृहने विपे निवास करता हवा.” ए रीते छांदोग्योपनिपमा “ तदोभये देवासुराः " आंहींथी आरंभीने “ तौह द्वा- त्रिंशतं वणि ब्रह्मचर्यमूपतुः " आंहीं पर्य- त ग्रंथे करीने इंद्र अने विरोचनने प्रजापतिना निकटने विपे वत्रीश वर्ष पर्यंत ब्रह्मचर्य आ- चरण कथन कयुछे; तथा "एकशतं हवै वर्षा- णि मघवानु प्रजापती ब्रह्मचर्यमुवासेति जो कदा मृत्यु छेज नहि एवो तमारो पक्ष छे त्यारे देव अने असुरोने मृत्युना निवारणने अ- थै ब्रह्मचर्य आचरण शा माटे करवू पडयुं ? अने ते ब्रह्मचर्यनां आचरणथी एम जणायछे के, 'मृत्यु छे.' माटे मृत्युनो सद्भाव सत्य छे के असद्भाव सत्य छे ? ते निश्चय करीने कहो, आ श्रुतिनो अर्थ छादोग्योपनिषद्मा लख्योछे." and ३३० स्वरूपानुसन्धाननी श्री सनत्मजात उवाच अमृत्युः कर्मणा केचित् मृत्यु स्ती- ति चापरे। शृणु मे ब्रुवतो राजन् य- थैतन्माविशंकिथाः ॥ १ ॥ अर्थः-हे राजन् ! अविद्याने विपे अधिरूढ एवा केटलाएक पुरुपो वास्तवरूपे मृत्युनो स- गाव मानता छता वेदोक्त कर्मे करीने 'अमृ- त्युः' एटले अमृतत्वनी प्राप्ति होय एम मानीने अमृत्युने अर्थे वेदोक्त कर्मनुं आचरण करेछे; तथा अन्य एवा विपयि पुरुपो विपयथी अति- रिक्तताये करीने मोक्षने न मानता छता कम करीनेज अमृत्युने एटले अमृतत्वने अर्थात् दे- वादिभावने वर्णन करेछे. (एज अर्थने विपे रा- गीना श्लोकहुँ उदाहरण आपेछे के,) "अपि वृंदावने शून्ये सृगाललं स इच्छति। न तु निर्विपयं मोक्षं कदा चिदपि गौतम, अर्थः- हे गौतम! ते रागी पुरुप शून्य एवां वृंदावनने विपेसृगालपणाने इच्छेछ, तथापि को- इसमे पण निर्विपय एवा मोक्षने इच्छतो नथी.

सप्तम प्रक्रिया. ३३१ तथा परमात्माथी अतिरिक्तताये करीने द्वि- तीयने न जोता एवा केटलाएक पुरुपो ज्ञानक- मैना समुचये करीने अमृतत्वतुं वर्णन करेछे; त- था अद्वितीय आत्मदर्शि एवा ज्ञानी पुरुपो आ- त्माथी अतिरिक्तताये करीने दितीयने न जोता छत्ता मृत्यु छेज नहि एवं वर्णन करेछे; माटे मृ- त्युनो सद्भाव अने असद्भाव ए वेड पक्षने विपे जे रीते विरोध न आवे तेम कहुंछौं, तुं श्रवण कर ! अने म्हारा उपदेशने विपे शंका न राखीश. 3. उझे सत्ये क्षत्रियाद्य प्रवृत्ते मोहो मृत्युःसंमतो यः कवीनां। प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि सदाऽप्रमादममृतत्त्वं ब्रवीमि ॥१॥ अर्थ:-हे क्षत्रिय! पूर्वोक्त एवा मृत्यु- रस्ति मृत्यु स्ति ए वेड पक्षो आदि सर्गथी आरंभीने प्रवृत्त थयाछे माटे सत्य छे. ज्यारे मृत्यु सत्य होय त्यारे तेनु स्वरूप गुं? एवी आशंका थये छते मुनि कहेछे के, जे मोह एटले अनात्मा देहादिकने विपे आत्मत्वनु अ- भिमानरूप मिथ्याज्ञान ते मृत्यु ए रीते केटला- एक कवियो कहेछ; अने हुं तो एम कहुंछों के, " " '" ३३२ स्वरूपानुसन्धाननी जे प्रमाद एटले स्वाभाविक ब्रह्मभावयकी प्रज्यु- ति ते प्रमादने एटले देहाद्यात्मभावरूप मिथ्या- ज्ञानर्नु पण कारणभूत एवां आत्मानां अज्ञानने मृत्यु कहुंौं अर्थात् जन्म मरणादि सर्व अनर्थो- नुं वीज कहुंछों; तथा सदा (निरंतर) जे अप्र- माद एटले स्वाभाविक स्वरूपे करीने अवस्थान त्हेने अमृतत्व कहुंछौं; श्रुति पण जे स्वस्वरूपे करीने अवस्थान तेने मोक्षारख्य अमृतत्वने क- हेछे के, "परंज्योतिरूपं संपद्यते स्वेनरूपे- णाभिनिष्पद्यते " इति. अर्थ:-जे ज्ञानी ते परमज्योतिषरूप संपन्न होयछे एटले स्वस्वरूपे करीने अवस्थित होयछे; अर्थात् अमृतत्वरूप होयछे. तथा अनुगीतामां पण स्पष्ट कझुंछे के, एकः प्रज्ञोनास्ति ततो द्वितीयो यो हृच्छयस्तमहममृतं ब्रवीमि” इति. अर्थः- एक प्रज्ञानस्वरूपज सद्रूप छे “प्र- ज्ञानमानन्दंब्रह्म तेथी अन्य द्वितीय कोइ छेज नहि; जे प्रज्ञस्वरूप हृदयाकाशमां रघुछे तेने हुँ अमृत कहुंछौं.

, सप्तम प्रक्रिया. ३३३ जे हेतुथी स्वरूपावस्थानरूपन मोक्ष छ माटे- ज ते मोक्षने उत्पाद्य, आप्य, संस्कार्य, विकार्य ए चार प्रकारनां क्रिया फलोथी विलक्षण होवा- थील कर्मसाध्य अमृतपणुं नथी; तथा ज्ञानकर्म समुच्चयलाध्य पण अमृतत्व नथी; किंतु स्वाभा- विक अमृतत्व छे. (एम कहेवाथी " अमृत्युः कर्मणा केचित " ए श्लोकमां कहेला वादि- योना पक्षो अघटित छे एवी सूचना करी.) १. हे भगवन् ! जे प्रमाद ते मृत्यु अने जे अप्र- माद ते अमृत्यु ए रीते तमे शाथी जाण्युं ? ए- वी धृतराष्ट्रनी शंका थये छते मुनि उत्तर आ- पेछे के, प्रमादादा असुराः पराभवन्न प्रमादाहा ब्रह्मभूताः सुराश्च । नैव मृत्युाघ्र इवाति जन्तून नाप्यस्य रूपमुपलभ्यतेह ॥१॥ अर्थ:- प्रमादयकी एटले स्वाभाविक ब्रह्म भावथी प्रच्यवनथकी अनात्मा देहादिकने विपे आत्मभाव होवाथी विरोचन आदि अनुरो परा- जय पामता हवा. त्यांहां श्रुतिः- ३३४ स्वरूपानुसन्धाननी " अनुपलायात्मानमसुरा वा प- राभूता” इति. अर्थः- आत्मस्वरूपनी उपलब्धि नहि हो- वाथी असुरो पराजय पाम्या; तथा अप्रमादधी एटले स्वाभाविक सत्, चित्, आनन्द, अद्वितीय ब्रह्मात्मरूपे करीने अवस्थानथी इंद्रादि देवता- ओ ब्रह्मभूत होता हवा; अर्थात् अमृत होता ह- वा. त्यांहां श्रुतिः- "ते देवा आत्मानमुपासते तस्मात् तेषां सर्वे चलोका आप्ताः सर्वं च कामा" इति. अर्थः- ते देवताओ आत्मानी उपासना करेछे एटले ब्रह्मात्मनो अभेदे करीने साक्षा- त्कार करेछे माटे ते देवीने सर्वे लोको अने स- र्वे कामो प्राप्त थयाछे इत्यादि.अथवा 'असुराः “ असुष्वेव रमते इति असुराः" एटले ई- द्वियोने विषे जे रमण करे ते अनात्मवेत्ता विप- यि प्राणीओ असुर कहेवायछे; अर्थात् आसुरी संपत्तिवान्. ते असुरो स्वाभाविक ब्रह्मभावनु अ- तिक्रमण करीने अनात्मा एवा देहादिकने विपे सप्तम प्रक्रिया. ३३५ आत्मभावनो स्वीकार करता छता पराजय पाम्या एटले तिर्यगादि योनियोने पाम्या. त्यांहा वढच ब्राह्मणनी श्रुतिः- " तस्मान्न प्रमाद्येत" इति. एटले जे माटे प्रमादि पुरुप तिर्यगादि यो- नियोने पामे; माटे प्रमाद करवो नहि. तथा " स्वस्मिन् आत्मन्येवरमंते इति सुराः एटले आत्माने विपेज जे रमण करे ते आत्म- वेत्ता पुरुपो सुर कहेवायछे अर्थात् दैवी संपत्ति- वान्. ते सुरो अप्रमादथी एटले स्वाभाविक ब- मात्मस्वरूपने विपे अवस्थानथी ब्रह्मभूत थया एटले निवृत्त थयांछे अज्ञान तत्कार्य जेमनांए- वा छता ब्रह्मरूपल होता हवा. शंका:- सर्व जंतुओनो संहार करनार यम- राजा मृत्यु तो लोकमां अन्यज प्रसिद्ध छ; माटे प्रमादनेज मृत्युरूप केम कहोछो? समाधान:- एवी शंका करवी नहि; केसके मृत्यु प्राणीओने भक्ष करतो नथी; जो कदा भक्ष करतो होय, तो तेनी व्याघ्रनी पेठे उपलब्धि थवी जोइए ते थती नथी; माटे मृत्यु छेज नहि.. हे राजन् ! जे माटे प्रमादज सर्व अनानुं बी- ज छे वास्ते तेनेज हुँ मृत्यु कहुंछौं, यमने नहि; किंतु विषयरूपो विप करीने अंध एवा केटलाए- यम, तेने ३३६ स्वरूपानुसन्धाननी क अज्ञानी पुरुपो आत्माथी अतिरिक्त द्वितीयने जोता छता पितृ लोकने विपे राज्य करनार अने पुण्यवान् प्राणीओने सुखनो प्रदाता तथा पापी प्राणीओने दुःखनो प्रदाता, अने बुद्धिने विपे रहे- नार अने ब्रह्मने विपे रमण करनार जे यम, में कहेला प्रमादरूप मृत्युथी अन्य मृत्युरूप ए- वाने कहेछे. यमने बुद्धिने विपे रहेवापणुं कर्तुं त्यांहां म. नुस्मृतिनुं प्रमाणः- "यमो वैवस्वतो राजा यस्तवैप ह- दि स्थितः। तेन चेदविवादस्ते मा गंगां माकुरून व्रज ॥१॥" अर्थः- हे प्राणि ! विवस्वान्नो पुत्र जे यम राजा ते त्हारी बुद्धिने विपेज रह्योछे ए प्रकारे जो तने दृढ निश्चय होय तो गंगा प्रत्ये अने कुरुक्षेत्र प्रत्ये गमन न कर. १. तथा यमने ब्रह्मनिष्ठतामा श्रुतिः- "कस्तं मदा मदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति" अर्थः- ए सहर्प छतो अहर्प एटले विरुद्ध धर्मवान् माटेज जाणवाने अशक्य एवा आत्मा- सप्तम प्रक्रिया. देवने म्हाराथी बीजो कोण जाणी शके (ए प्र- कारे जे प्रमाद ते मृत्यु ए निर्धारण कयु.) हवे एज प्रमादर्नु कार्यरूपे करीने अवस्थान देखाडेछे:- आस्यादेपनिःसरते नराणां क्रोधःप्रमादो मोहरूपश्च मृत्युः। अहं गते नैव चरन विमार्गा- न चात्मनो योगमुपैति कश्चित् ॥१॥ अर्थ:-जे प्रमादाख्य मृत्यु प्रथम अहंकाररूपे करीने परिणाम पामेछे, पछी अहंकाररूपे रहीने अनंतर कामरूपे करीने परिणाम पामेछे ते का- म, स्वविपय उपर प्रवृत्त थतां कोईए प्रतिघात कर्यो छतो क्रोधरूप होयछे; त्यार पछी मोहरूप होयछे; वास्ते अहंकाररूपे परिणाम पान्डे जे अ- ज्ञान तेथकी अनात्मा देहादिकने विपे आत्मभाव पाम्यो छतो “हुं ब्राह्मण छौं; क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र छौं ; हुँ कृश छौं; स्थूल छौं; अमुकनो पुत्रछौं" इत्यादि रोते रागदेषादिये युक्त छत्तो, अने उन्मार्ग चालतो छतो, कोइ पण आत्मस्वरू- पनो जणावनार समाधियोगने पामतो नथी. १ ३३८ स्वरूपानुसन्धाननी ते मोहितास्तदशे वर्तमाना अतः प्रेतास्तत्र पुनः पतंति । ततस्तं देवा अनुपरिप्लवंते ततो मृत्यु मरणादभ्यपैति ॥१॥ अर्थ:- अहंकारादिरूपे रहेलां प्रमादाख्य अज्ञाने मोह पमाड्या एटले देहादिकने विपे आत्मभावने अर्थात् हु म्हारापणाने पमाड्या एवा जीवो आ लोकथी मरण पाम्या छता धूमादि मार्गे परलोकमांजइने त्यांहां, ज्यांहां सुधी पुण्य पोहोंचे त्यांहां सुधीरहीने पछी पाछा आकाशादि- कना क्रमे करीने देह ग्रहणने अर्थे मृत्यु लोकमां पडेछे; पछी देह ग्रहण अवस्थाने विपे इंद्रियोने अनुसरीने चारे तरफथी कर्मोनुं आचरण करेछे तेथी मरण पामेछे; तदनंतर पाछा जन्म पामेछे ए रीते जन्ममरणनी परंपराने विपे आरूढ थया छता एटले चक्रवत् भ्रमण करता छता संसारथी मुक्त थता नथी. हवे कर्मोंने विपे बंधहेतुत्व कहेछे:- कर्मोदयेकर्म फलानुराग- स्तत्रानुयांति न तरन्ति मृत्युम् ।

सप्तम प्रक्रिया. ३३९ सदर्थयोगानवगमात्समंता- प्रवर्तते भोगयोगेनदेही ॥१॥ अर्थः-केटलाएक कर्मे करीने अमृतभावने कहेछे तेमना मतनुं निराकरण करेछे. केवल कमै करीने अमृतत्व होतुं नथी; किंतु कर्मोनी उत्पत्ति थये छते तेमना फलने विपे रागी छता तेने पा- मेछे, माटे मृत्युने तरता नथी; किंतु जन्म मर- णात्मक संसारने विपे वारंवार भ्रमण करेछे. कर्मफलने विपे राग थवामां हेतु कहेछे के,. सच्चिदानंदस्वरूप ब्रह्मात्मैकत्वना अवोधथी विप- यने विपे रस बुद्धिये करीने प्राणी ऊर्ध्व अधो लोकने विपे भ्रमण करेछे. १ तद्वै महामोहनमिंद्रियाणां मिथ्यार्थयोगेऽस्य गतिर्हि नित्या। मिथ्यार्थयोगाभिहतांतरात्मा स्मरन्नुपास्ते विपयान्समंतात् ॥१॥ अर्थ:-रागे करीने अभिभूत एवो जे प्राणी तेना इंद्रियोर्नु जे विपयोने विपे प्रवर्तन, एज म- हामोह कहेवायछे; अने इंद्रियोनी विषयो उपर प्रवृत्तिथी ते अविद्या कल्पित मिथ्या विपयोनो योग एटले संबंध होयछे, अने तेथी संसार गति , ३४० स्वरूपानुसन्धाननी पण नित्य एटले नियत होयछे केमके मिथ्या विपयोना संबंधथी हणायोछे स्वाभाविक ब्रह्म- भाव जेनो एवो प्राणी स्त्री आदिक विषयोर्नु स्म- रण करतो छतो तेमनी उपासना करेछे पण आत्मानी नहि. १ पूर्वोक्त रीते प्रमादरूप मृत्युने तथा तेनुं का- र्य कामक्रोधादि संसारने कहीने हवे ते प्रमाद- रूप मृत्युना विनाशनो उपाय कहेछे के, हे रा- जन् ! जे पुरुप सर्व अनोनुं वीजत प्रमाद- रूप मृत्युने जाणीने वैराग्यादि साधनसंप- तिथी सच्चिदानंदाद्वितीय ब्रह्मात्मस्वरूप स्थितिनु संपादन करे ते पुरुष मृत्युथी भय पामतो नथी; अर्थात् मृत्युनो नाश करे; त्यांहां श्रुतिः- " आनन्दं ब्रह्मणो विद्यान्न बिभेति कुत- श्वन". ए रीते मृत्युना विनाशनो ज्ञानरूप उपाय कहीने पछी विस्तारथी जनात्मदर्शीनी निंदा अने आत्मदर्शीनी प्रशंसा करीने मान अने मौन बन्नेना विषय भिन्न भिन्न देखाडीने, जे पुस- पने मान होय तेने मोक्षनो अभाच कथन कर्या पछी महा दुःखे आचरण करी ज्ञकाय एवां (७) सत्य (यथार्थ भापण), (२)आर्जव (अकौटि- , सप्तम प्रक्रिया. ३४१ ल्य ), (३)न्ही (अकार्य करवा विपे लज्जा), (१)दम (अन्तःकरणनो तथा बाहोनियोनोनि- ग्रह), (५) शौच (पापर्नु प्रक्षालन ), (६) विद्या (ब्रह्मज्ञान )ए छ मान अने मोहना तो- डनार एवां ब्रह्मलक्ष्मी(ब्रह्मविद्या )ने विपे प्र- वेश धवानां द्वारो कथन कर्या. प्रथमाध्याय समाप्त. पूर्वे कहेला मौननु माहात्म्य श्रवण करीने धृतराष्ट्रे प्रश्न कर्यो के, हे मुने ! पूर्वोक्त एबुं वा- गादिकनो उपरामरूप मौन कोने प्राप्त थाय? तथा जे असंभाषणरूप मौन अने आत्मस्वरूपर्नु निदिध्यासनरूप मौन ए वन्ने मध्ये खरु मौन को- ण? तथा पुरुप मौनभाव(ब्रह्मभाव )ने वाक्नो उपरामरूप मौने करीने पामे के अन्य उपाये एटले निदिध्यासने करीने; तथा ते मौनतुं शीरी- ते आचरण करे ते कहो? मुनिये उत्तर आप्यो के, हे राजन् ! जे माटे सर्वे वेदो मननी साथे जेने पामी शकता नथी, ते परमात्माज वाणीनो अगोचर होवाथी मौन कहेवायछे; त्याहां श्रुति:-" यतो वाचो निव- तते, ते परमात्माना लक्षणनी आकांक्षा धये छते कयुं के, जे वेद शब्दे करीने तात्पर्य रत्तिधी ३१२ स्वरूपानुसन्धाननी प्रतिपाद्य ते सत्, चित, आनन्दस्वरूप परमात्मा ए रीते हैं श्रुति अने स्वअनुभवनां प्रमाणथी कहुंछौं. वेदस्वभावनी जिज्ञासाथी धृतराष्ट्र प्रश्न कर्यो के, हे मुने ! जे पुरुप पापर्नु आचरण करतो छतो ऋगादि वेदनु पठन करे ते वेदाध्ययनथी शुद्ध थाय के नहि ? ते कहो. उत्तरः-हे राजन् ! ऋगादि वेदो पठन कर्या छता पण पापाचारि पुरुपने शुद्ध एटले रक्षण करी शकता नथी ए रीते हुं सत्य कहुंछों; जेम पारख उत्पन्न थया पछी पक्षीओ जता रहेछे ते- मज पापी धर्मध्वजी पुरुपने मरणकाले वेदो तजीने जायछे. त्यांहां राजाने एवीशंका उत्पन्न थई के, नि- त्यनैमित्तिक कर्मो की छतां मननी शुद्धिनां हेतु छे, अने न कयौं होय तो प्रत्यवायना हेतु छे; तथा काम्य कर्मों अने उपासनाओ ब्रह्मलोकादि अने पितृलोकादिकना हेतु छे; तथा निपिद कर्मों नरकनां हेतु छे; माटे जरूर वेदाध्ययन, तेमना अर्थy ज्ञान अने तदुक्त कौतुं अनुष्ठान संपा- दन करबुज जोइए; वास्ते 'वेदो पापीनी रक्षा क- री शकता नथी' एम केम कहोछो ?

सप्तम प्रकिया. उत्तर- हे राजन् ! जो कदा ते जे कर्तुं तेज वेदार्थ होय,त्यारे तो त्हारीशंका सत्य होय; परंतु मोक्षारख्य परम पुरुपार्थरूप वेदार्थ एटले वेदता पर्यार्थ तो स्वर्गादिकथी अन्यज छे. वेदोमांजे क- मोपासनानुं प्रतिपादन ते तो मोक्षनु परम सा- धन ज्ञाननी प्राप्तिमा अन्तःकरणनी शुद्धि द्वारा परंपराथी साधनभूत छे, माटेज “अनंदा ना- म ते लोकाः" इत्यादि श्रुतिवाक्ये अविद्वानोनी निंदा करीछे,अने "आत्मानं चेदिजानीयात्" इत्यादि वाक्योये विद्वान्नी स्तुति करीछे; तथा " प्वाह्येते " इत्यादि वाक्ये कर्मोनी निंदा करीछे; माटे ईश्वरार्पण बुद्धिधी मननी शुद्धि दा- राये आत्मज्ञाननां संपादनथीज वेदो पुरुपना रक्षक छे, अन्यथा नहि. ए रीते उपदेश करीने पछी चित्तशुद्धिमा हे- तुश्त तपने विपे क्रोधादि वार दोपोनुं तथा ज्ञानादि वार गुणोतुं कथन करीने, दमने विपे अकृतादि १८ दोपो कहीने, पछी याचना कर- नार योग्य पुरुपने (१) पुत्रदान, (२) वि- नदान, (३) इष्ट एटले औत कर्ममा दान, (१) पूर्व एटले स्मार्ट कर्ममा दान, (५) दोपदृष्टि- थी वैराग्य पूर्वक धनादिकनो त्याग, (६) काम- , ३१४ स्वरूपानुसन्धाननी त्याग ए रीते छ प्रकारना त्यागो कहीने वैराग्य पू- वक धनादि त्याग अने काम त्यागनुं दुष्करपणुं कहीने, पछी कामादि दोपोनो त्याग पूर्वक ज्ञानादि गुणे करीने अप्रमादनी सिद्धि कथन करी. पछी राजाये प्रश्न कर्यो के, चार वेद अने पांचमो इतिहास पुराणादि तेमणे करीने कोई पंचवेदी, कोई चतुर्वेदी, त्रिवेदी, द्विवेदी, एकवेदी कहेवायछे ते मध्ये श्रेष्ठ ब्राह्मण कोण? मुनिनो उत्तर:-जेब्राह्मण स्वाभाविक सच्चि- दानंद अद्वितीय ब्रह्मात्मस्वरूपे स्थित होय, ते ए- कवेदी ब्राह्मण सर्वोत्तम छे; अने जे ऋगादि ब- हु विभागो ते तो सत्य ब्रह्मात्मस्वरूपना अनव- वोधथकीज छे, माटे जे सत्यथी प्रच्युत न थाय तेज श्रेष्ठ ब्राह्मण छे; वास्ते सत्यपरज रहेवू, अ. नृत विपयपर रहेवु नहि.ते सत्यपरत्वथी आत्म- साक्षात्कार थाय माटे आत्माथी अतिरिक्त सर्वनो परित्याग करीने केवल तूपणी भावथी आत्मानुज उपासन करवु; तेथी आत्मा स्वतःज अपरोक्ष था- यछे; अने जे आत्मवेत्ता एज मुनि कहेवायछे, अरण्यवासी मुनि नहि; तथा जे आत्मज्ञानी एज सर्व अर्थीनां व्याकरणथी एटले आत्मभावे जा- जवाथी वैयाकरण कवायछे, केवल शब्दात्मक सप्तम प्रक्रिया. ३१५ व्याकरण शास्वनो पठन करनार वैयाकरण नहि; तथा जे सर्वात्मदर्शी एज सर्वज्ञ, इतर नहि. द्वितीयाध्याय समाप्त. हवे ब्रह्मचर्यादि साधनांतरने तथा तेणे करीने प्राप्य एवां ब्रह्मने प्रतिपादन करवा माटेत्रीजो अने चौथो अध्याय छे. राजाये प्रश्न कर्यो के, हे मुने! श्रवण करवाने अशक्य एवी अने उत्कृष्ट तथा प्रपञ्चने विपे दुर्लभ एवी ब्रह्मसंबंधी कथा कहो. उत्तर:-हे राजन! ए ब्रह्म खराथी प्राप्य नथी; किंतु निश्चयात्मक बुद्धिने विपे संकल्प वि- कल्पात्मक मन लीन थये छते एटले विपयोथी परावृत्त थइने आत्माने विपेज निश्चल धये छते, वक्ष्यमाण ब्रह्मचर्ये करीने ब्रह्मविद्या प्राप्त थाय. जे पुरुप आचार्यने शरणे थईने ब्रह्मचर्य- एटले गुरुशुश्रूपादिक आचरण करे ते पुरुप आलो. कने चिपे पंडित होयछे पछी श्रवण, मनन, नि- दिध्यासने करीने ब्राह्मण (ब्रह्मज्ञ ) थइने प्रार- ब्ध कर्मनो क्षय थये छते देहनो त्याग करीने प- रम पदने पामेछे. ब्रह्मचर्पना चार पाद; तेमां गुरुशुश्रूपादिकना क्रमथी जे विद्या प्राप्ति ते प्रथम पाद; तथा जेवो स्वरूपानुसन्धाननी गुरुने विषे वृत्ति तेवीज गुरुपत्नीने विषे अने त- त्पुत्रने विषे जे वृत्ति ते द्वितीय पाद; तथा आ- चार्य करेला उपकारने अने परम पुरुषार्थने जा- णीने “गुरुए मने सच्चिदानंदाद्वितीयस्वरूपे उत्पा- दन को." ए रीते चितवन करतो छतो, अने आचार्यप्रत्ये हर्षयुक्त छे बुद्धि जेनी एवो छतो, पोतानी कृतकृत्यता माने ते त्रीजो पाद; तथा प्राणे करीने, धने करीने, कमें करीने, वाणीये क- रीने जे आचार्यने अर्थ प्रिय करवू ते चोथो पाद. पूर्वोक्त ज्ञानादि बार गुणोथी, तथा छ प्रकारना त्यागथी, तथा चतुष्पाद ब्रह्मचर्यधीज ब्रह्मात्मस्व- रूपे स्थिति होय, अन्यथा नहि. हे राजन ! कर्मे करीने तो अंतवाळाज लोक नीतायछे अने ज्ञाने करीने तो त्रिकालावाध्य नित्यस्वरूप जीतायछे; माटे नित्य स्वरूपनी प्राप्ति विपे ज्ञान विना वीजो कोइ मार्ग नथी. राजाये प्रश्न कर्यो के, हे मुने ! ते प्राप्य एवं नित्य ब्रह्म शुक्क, पीत, कृष्ण, रक्त छ के केवी रीतर्नु छ ? उत्तर:-हे राजन् ! ए ब्रह्म शुकादि रूप न- थी, तथा एथिवी आकाशादिकने विपे ए ब्रह्मर्नु रूप जणातुं नथी; किंतु पूर्वोक्त ब्रह्मचर्यादि सा- सप्तम प्रक्रिया. ३४७ धने संपन्न जे उनमाधिकारी तेनेज खमहिमाने विपे प्रतिष्ठित एवं अपरोक्ष थायछे, पण घटादि- कनी पेठे इदंताये करीने नहि; ए ब्रह्मने विपे- ज सर्व जगत् प्रतिष्ठित छे, अने आत्मज्ञानीने ब्रह्मरूपज जणायछे. तृतीयाध्याय समाप्त. जेथकीज सूर्यादियो प्रकाश पाम्याछे, तथा जेने देवताओ नित्ये उपासना करेछे ते शुद्ध ब्रह्मने जे योगी तेज पामेछे, इतर नहि ए रीते उपदेश करीने पछी ए ब्रह्मधीज हिरण्यगर्भादिक- नी उत्पत्ति कहीने अनंतर " द्वासुपर्णा " ए मंत्रनो अर्थ कथन करीने, पछी ते ब्रह्मात्मस्व- रूपे ज्ञानीनु अवस्थान कथन कर्यु; अनंतर ए ब्रह्मने सदृश कोई नथी, तथा चक्षुरादिकनुं पण अगोचर छे एवां ब्रह्मने योगयुक्त बुद्धिये करीने जे जाणे एज अमृत होयछे ए रीते कथन करीने, प- छो इंद्रियोनी विपयोने विपे जे प्रवृत्ति ते अन- र्थनी हेतु छ एम कहीने, पछी ब्रह्मर्नु अपरिच्छि- नपणु प्रतिपादन करीने तेने जे जाणे एज अ- मृत होयछे ए रीते उपसंहार कर्यो; पछी कह्यु के, सर्व प्राणीओने विपे आन्तररूपे अर्थात् ओ- तप्रोतरूपे करीने एकज आत्मा रह्योछे एम जे . ३४८ स्वरूपानुसन्धाननी जाणे एटले साक्षात्कार करे ते शोक करतो नथी; त्यांहां श्रुतिः- “तत्र को मोहः कः शोकएक- खमनु पश्यतः " वळी एज वात कहेछे के, जे- म चारेतरफथी भरपूर एवां सरोवरने विपे यद्यपि जल घणुं छे, तो पण पोताने अपेक्षित अंजलि- मात्रथी अधिकचें कांइज प्रयोजन नथी; तेम वे- दमां घणा प्रकारनी विद्याओ छे, तो पण ज्ञानी- पुरुपने ब्रह्मस्वरूपना साक्षात्काररूपज प्रयोजन छ विशेपनी अपेक्षा नथी; त्यांहां गीतानुं वचनः- " न चास्य सर्व वेदेषु कश्चिदर्थ व्यपा- श्रयः हवे सनत्सुजात पूर्वे कहेली विद्यानाज दृढीकरणने अर्थ वामदेवादिकनी पेठे पोता- ना अनुभवने देखाडेछे के, हे धृतराष्ट्र ! त- मारी सर्वनी मातारूप हुंज छौं; तथा पिता- रूप पण हुंज छौं; तथा पुत्ररूप पण हुंज छौं; किंवहुना" (बहु कहेवाथी शुं ?) चरा- चर सर्व प्राणीनो आत्मारूप हुज छौं; वळी ई- द्रादिक देवनो वृदपितामह एटले परमेश्वर अ- र्थात् अव्याहत पण हुंज छौं; तथा पिता एटले हिरण्यगर्भ पण हुंज छौं; तथा हे राजन् ! तमे , सप्तम प्रक्रिया. ३१९ सर्वे अध्यारोप दृष्टिथी म्हारां स्वरूपने विपेज र- ह्याछो; जेम रज्जुने विपे सर्प, धारा, मालादि रह्मांछे तेम; अने परमार्थ दृष्टिथी तो म्हारे विपे तमे कोई पण रह्या नथी, तेम हुँ पण तमारे विपे रह्यो नथी; तथा नाम, रूप, क्रियात्मक जगतनो आश्रयरूप आत्मा हुज छौं; तथा सर्वनो उत्प- त्तिनुं कारण पण हुंज छौं; त्यांहां श्रुतिः-“आ- मन एवेदं सर्वमिति" तथा ओतप्रोतरूपे क- रीने पण हुंज रह्योछौं, अने जन्म मरणे वर्जित एवा स्वमहिमाने विपे प्रतिष्ठित हुन छौं; तथा सूक्ष्म एवा आकाशादिथकी पण सूक्ष्मतर एवो हुंज छौं; तथा राग, देप, लोभ, मोह, मात्सर्य, शोकादि धर्मे रहित छे केवल सचिदानंदाद्वितीय ब्रह्माकार मन जेतुं एवो पण हुंज छो; तथा सर्व प्राणीओना हृदयकमलने विपे एक प्रत्यगात्म- स्वरूपे हुंज रह्योछौं. ए प्रमाणे सनत्मजात मुनि स्व अनुभवे करीने सर्व जीवोना कल्याण सारु पृतराष्ट्रने अ- धिकारी करीने तेने ब्रह्मविद्यानो दृढ साक्षात्कार करावीने पछी उपराम पाम्या. आ आरव्याननु सविस्तर वर्णन स्वामि श्री स- स्वरूपानुसन्धाननी चिदानंदब्रह्मतीर्थे गुजराती भाषामा करेलुछे ते- थी विशेष जाणवु. महावाक्यरत्नावळीतुं वाक्यः- त्यज धर्ममधर्म च उभे सत्यानृते त्यज । उसे सत्यानृते त्यक्ता येन त्यजसि तत्त्यज ॥१॥ अर्थः- हे शिप्य ! श्रुति स्मृतिये जे अर्थ विधान करेलो ते धर्म; तथा श्रुति स्मृतिये जे अ- र्थ निषेध करेलो ते अधर्म; तथा चक्षुरिंद्रिये करी- ने जे विपय करेलो अर्थ ते सत्य; तथा मने क- रीने विपय करेलो जे अर्थ ते अनृत ए सर्वेने आत्मस्वरूपथी अनतिरिक्त जाणीने त्याग कर. वळी जे आत्माकार वृत्तिये करीने तुं सत्य अनृ- तनो त्याग करेछे, ते वृत्तिनो पण त्याग कर एट- ले सर्वोपाधि रहित शुद्ध ब्रह्ममात्र हो. १. उपर कहेली प्रक्रियाओना विचारथी जे ब्रह्मात्मैकत्व अवधारण थयुं तेना दृढ अनुभ- वमा श्री आचार्यरुत उपदेशसहस्रीनां वाक्योः- चिति स्वरूपे स्वत एव मे मते रसादियोगस्तव मोहकारितः।

सप्तम प्रक्रिया.
अतो न किञ्चित् तव चेष्टितेन मे
फलं भवेत्सर्वविशेपहानतः॥१॥
विमुच्य मायामयकार्यतामिह
प्रशान्तिमायाह्यसदीहितात्सदा ।
अहं परब्रह्म सदाविमुक्तवत्
तथाजमेकं व्यवर्जितं यतः॥२॥
सदा च भूतेपु समोस्मि केवलो
यथा च खं सर्वगमक्षरं शिवम् ।
निरंतरं निष्कलमक्रियं परम्
ततोन मेस्तीह फलं तवेहितेः॥३॥
अहं ममैको न तदन्यदिष्यते
तथा न कस्याप्यहमस्म्यसंगतः।
असंगरूपोहमतोन मे खया
कृतेन कार्यं तव चाहयत्वतः॥४॥
दशि स्वरूपं गगनोपमं परम्
सकृतिभातं खजमेकमक्षरम् ।
अलेपकं सर्वगतं यदद्वयम्
तदेव चाहं सततं विमुक्त ओम् ॥५॥

३५२ स्वरूपानुसन्धाननो दृशिस्तु शुद्धोहमविक्रियात्मको न मेस्ति कश्चिद्विपयः स्वभावतः । पुरस्तिरश्चोर्ध्वमधश्च सर्वतः संपूर्णभूमात्वज आत्मनिस्थित ओम्॥६॥ अजोमरश्चैव तथाजरोमृतः स्वयं प्रभः सर्वगतोहमद्वयः। न कारणं कार्यमतीवनिर्मलः सदैक तृप्तश्च ततो विमुक्त ओम्॥७॥ उपरना सप्त श्लोकरूप वाक्योना नीचे प्रमाणे अनुक्रमे अर्थो:- सातमा प्रकरणमा कह्या प्रमाणे विद्या अने अविद्या ज्यारे बुद्धिगत छे, त्यारे सारख्य सिद्धान्त- नो प्रसंग आवशे; केमके ते सारख्यो मानेछे के, बुद्धिज पुरुपना मोक्ष अने भोगने अर्थे ज्ञान अने अज्ञानरूपतार्नु आचरण करेछे' एवी वादि- नी शंकानुं निराकरण करता छता श्री आचार्य स्वअनुभवना अनुसारे साधेला ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानने आत्मा बुद्धिनो संवादरूप आठमा प्रकर- णे करीने दृढ करेछे. विवेकी आत्मा बुद्धिने कहेछे के, हे मते !

सप्तम प्रकिया. म्हारां स्वतःज शुद्ध चित्स्वरूपने विपे जे रसादि योग एटले रागादि हेतुक एवो भोक्तृत्वादिक संबन्ध ते व्हारो जे मोह (अविवेक ) तेणे करा- व्योछे अर्थात् मिथ्या छेमाटे सर्व विशेगोना रा- हित्यथी म्हारे विपे त्हारो चेष्टाये करोने कोई पण प्रकारर्नु फल एटले अतिशय प्राप्त थाय तेम नथी. १. जे माटे सर्व विशेपोना राहित्यधी म्हारा विपे स्हारी चेष्टाये करीने अतिशयरूप फल प्राप्त था- व तेम नथी, माटे हारे शान्त थQ एज युक्त छे. ए अर्थने कहेछे के, हे मते ! तुं मायामयकार्य- ता(मिथ्या चेष्टित )ने त्याग करोने असत् ई- हितथी एटले निरर्थक प्रयासथी प्रत्यगात्मरूप म्हारे विपे प्रकट शान्तिने प्राप्त था एटले म्हारे विपे लय पाम, (आ ठेकाणे 'मायामयकार्य- ता' अने असदीहित' ए वे शब्दे करोने वुद्धिनां चेष्टितने विपे आविद्यकत्व एटले मिथ्यात्व सूच- न कयु, तेथीज सांख्यमतनी शंकानुं निराकरण जाणवू; केमके सांख्यो तो बुद्धिचेष्टितने स. त्य मानेछे.) प्रत्यगात्माने विपे मननो लय शा माटे क. ह्यो सत्य, ज्ञान, आनन्दस्वरूप ब्रह्मने विपेज केम स्वरूपानुसन्धाननो दृशिस्तु शुद्धोहमविक्रियात्मको न मेस्ति कश्चिद्विषयः स्वभावतः । पुरस्तिरश्चोर्ध्वमधश्च सर्वतः संपूर्णभूमात्वज आत्मनिस्थित ओम्॥६॥ अजोमरश्चैव तथाजरोमृतः स्वयं प्रभः सर्वगतोहमद्वयः। न कारणं कार्यमतीवनिर्मल सदैकतृप्तश्च ततो विमुक्त ओम्॥७॥ उपरना सप्त श्लोकरूप वाक्योना नीचे प्रमाणे अनुक्रमे अर्था:- सातमा प्रकरणमा कह्या प्रमाणे विद्या अने अविद्या ज्यारे बुद्धिगत छे, त्यारे सांख्य सिद्धान्त- नो प्रसंग आवशे; केमके ते सारख्यो मानेछे के, 'बुद्धिज पुरुपना मोक्ष अने भोगने अर्थ ज्ञान अने अज्ञानरूपतानुं आचरण करेछे' एवी वादि- नी शंका निराकरण करता छता श्री आचार्य स्वअनुभवना अनुसारे साधेलां ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानने आत्मा बुद्धिनो संवादरूप आठमा प्रकर- णे करीने दृढ करेछे. विवेकी आत्मा बुद्धिने कहेछे के, हे मते !

सप्तम प्रक्रिया.. म्हारां स्वतःज शुद्ध चित्स्वरूपने विपे जे रसादि योग एटले रागादि हेतुक एवो भोक्तृत्वादिक संवन्य ते ल्हारो जे मोह (अविवेक ) तेणे करा- योछे अर्थात् मिथ्या छे; माटे सर्व विशेषोना रा- हित्यथी म्हारे विपे व्हारो चेप्टाये करोने कोई पण प्रकारर्नु फल एटले अतिशय प्राप्त थाय तेम नथी.१. जे माटे सर्व विशेपोना राहित्यथी म्हारा विपे हारी चेष्टाये करीने अतिशयरूप फल प्राप्त था- य तेम नथी, माटे हारे शान्त थर्बु एज युक्त छे. ए अर्थने कहेछे के, हे मते ! तुं मायामयकार्य- ता( मिथ्या चेष्टित )ने त्याग करोने असत् ई- हितथी एटले निरर्थक प्रयासथी प्रत्यगात्मरूप म्हारे विपे प्रष्ट शान्तिने प्राप्त था एटले म्हारे विपे लय पाम. (आ ठेकाणे 'मायामयकार्य- ता' अने असदीहित' ए वे शब्दे करोने बुद्धिनां चेष्टितने विपे आविद्यकत्व एटले मिथ्यात्व सूच- न कयु, तेथीज सारख्यमतनी शंकानुं निराकरण जाणवू कैमके सांख्यो तो बुदिचेष्टितने स- त्य माने.) प्रत्यगात्माने विपे मननो लय शा माटेक- ह्यो; सत्य, ज्ञान, आनन्दस्वरूप ब्रह्मने विपेज केम ३५४ स्वरूपानुसन्धाननी न कह्यो ? एवी आशंका थये छते कहेछे के, स- दैव प्रत्यगात्मरूप हुंज ब्रह्म छौं, माटेज सदा विमुक्त जेवो छौं. (आ ठेकाणे 'जेवो' ए इव शब्दार्थथी एम जणाव्युं के, बंधना अभावधी म्हारे विपे मुक्ति पण वास्तव नथी.) वळी हुँ अ- ज एटले जन्मादि पविकार रहित छौं, तथा द्वैत वर्जित एक स्वरूप एटले सजातीय, विजा- तीय, स्वगत भेद रहित छौं.(आत्माने ब्रह्मथी अ- भिन्न होवाथी " परेव्यये सर्वमेकी भवति अर्थः- अविनाशी परब्रह्मस्वरूपने विपे स- र्व पण एकीभाव पामेछे. आ श्रुतिनो विरोध न- थी एम जाणवं.) बीजी व्यारव्याः- हे मते ! असत् एटले स्वतःज स्वरूप शून्य एवा देह, इंद्रिय, विपयोने विपे जे ईहित एटले दृष्टादृष्ट फल, तेथकी सदा एटले जायदादित्रण्ये अवस्थाने विपे पण प्रशान्ति पाम; अर्थात् फ- लार्थ व्यापारनो त्याग कर, अने व्यापारथकी शान्त थयां छतां पण त्हारां बुद्धिस्वरूपर्नु अनु- सन्धान करीश नहि ए बात कहेछे के कार्यतां' एटले बुदिरूप कार्यस्वरूपताने त्याग करीने 'मा- - सप्तम प्रक्रिया यां अय' एटले कारणभूत प्रकृतिस्वरूपने पाम अर्थात् तदात्मक हो. 'त्यारे प्रकृतिस्वरूप थईने पाछी उद्भव पामी- श' एवी बुद्धिने आशंका थये छते कहेछे के,'इ- है' एटले कारणरूपतानो पण त्याग करीने म्हा- रांस्वरूपने विपेज अय' एटले प्रवेश कर; अ. र्थात् तप्त एवा अयःपिंडने विपे जलविंदुनी पेठे म्हारा स्वरूपेज ग्रस्त एवी था. मुखनी अंदर कवलरूप काँछे कोटी ब्रह्मां- डो जेणे एवी मने, मेंज इतः ततः चलायमान कर्यो एवो तुं शी रीते ग्रसीश ? एवी मतिनी शंका थये छते कहेछे के, जेने आत्मविद्यानो विवेक न होय तेने तो हुँ चलायमान करी शके; परंतु हुँ तो जन्मादि पविकार अने सर्व दैतथी रहित माटेज सदा विमुक्त छौं, वास्ते तुं मने चलायमान करी शके तेम नथी. हं आत्माने च- लायमान करूंछौं ए तो तने भ्रान्ति मात्र छे. २. अजवादिक- प्रतिपादन करनारां श्रुतिवा- क्यनां प्रामाण्यथी यद्यपि निर्विशेषताये करीने ब्रह्मने विपे नित्य मुक्तपणुं सिद्ध थायछे, तो प- ण देहादिकने विपे अन्वित एवा आत्माने नि- .

, स्वरूपानुसन्धाननी विशेपत्ताथी ब्रह्मरूपत्वनो संभव केम घटे? ए- वी शंका थये छते कहेछे के, हुं केवल एटले अविद्या अने हेनां कार्यरूप सर्व विशेपोथी र- हित छौं, तथा सर्व भूतोने विपे समज छौं; के- मके उपाधिना परामर्श विना म्हारे विपे कोई पण विशेपनो उल्लेख थई शकतोज नथी. सर्वमा अनुस्यूत छतां पण आत्माने असंग स्वभावताथी निर्विशेपपणामां दृष्टान्तः- जेम आकाश सर्वत्र व्यापक तथा अक्षर (अविनाशी ), शिव (निरुपद्रव) निरंतर (निर्भेद ), निष्कळ (कळा रहित), तथा अ- क्रिय (क्रिया रहित ) छे तेमज हुँ पण उक्त विशेपणोये विशिष्ट छौं: माटे हे मते ! त्हारां चेष्टिते करीने म्हारे विपे कोई पण अतिशयनुं आधान थाय तेम नथी. ३. ब्रह्मभूत एवा तने म्हारां चेष्टिते करीने य- द्यपि अतिशय नथी, तो पण म्हारी चेष्टाथी त्हारो संबंधि एवो गौण पदार्थ अथवा मुख्य पदार्थनो उपयोग तने थशे एवीमतिनी आशंका थये छते, ते गौण मुख्य पदार्थ पण म्हारे विपे संपादन थई शके तेम नथी ए वात कहेछे के, हुँ एकज छौं, माटे चित्स्वरूप एवा म्हारे विपे सप्तम प्रक्रिया. ३५७ परमार्थथी सजातीय,विजातीय स्वगत भेदमा प्र- माणना अभावथी म्हारी अपेक्षाये गौण एवं काइ पण वस्तु इच्छचा योग्य नथी, तथा कोई पण प्र- धान पदार्थनो गौणभूत हुँनथी,केमके असंग छौं; वास्ते त्हारी चेष्टाथी म्हारे काइज प्रयोजन नथी. वळो तुंज नथी, तो त्हारा चेष्टित तथा ते- मनुं फल क्यांहांधीज होय? एवा आशयथी क- हेछे के, वास्तवथी तुं पण अद्वैत ब्रह्मरूपज छो एटले म्हारा स्वरूपनां अज्ञानथी कल्पित अध्य- स्तरूप एवी व्हारो अधिष्ठानभूत म्हारा स्वरूपी व्यतिरेक एटले पृथक् स्वरूपसिद्धिनोज अभाव छे माटे तुं मद्रूप छोए रीते अभेद सिद्ध थये छ- ते उपकार्य उपकारकभाव संबंधनोज असंभव छे. माटे विकल्पनाओने छोडीने म्हारां स्वरूपने विपेज प्रशान्त था. ४. आत्माने विपे निर्चिपय ज्ञानस्वभावल पूर्वे प्रतिपादन कर्यु, तेनेज स्व अनुभवे करीने प्रकट करताछता श्री आचार्य कहेछ के, 'सहिभात' एटले सदैव स्पष्ट प्रकाशमान, तथा अज' ए- टले जन्मादि रहित, तथा 'एक' अने 'अक्ष- र' एटले अविनाशी ए ई; तथा आकाशनी छे उपमा जेने एवं अने अलेपक सर्वत्र व्यायक, तथा स्वरूपानुसन्धाननी अद्वैत एबुं जे ब्रह्म तेज दृक्स्वरूप हुँ छौं; माटे सदैव विमुक्त छौं. उक्त एवं ब्रह्माभिन्न आत्मस्वरूप ॐकार द्वा- राथीज मुमुक्षुनी बुद्धिने विपे अभिव्यक्त थायछे एवी सूचनाने अर्थे ॐकारनो निर्देश कर्योछे; अ- धवा उक्त एवं ब्रह्माभिन्न आत्मस्वरूपना बोधनो अंगीकार शिष्य पासे कराव्यो एम जाणवं. ५. आकाशनी पेठे अलेपकपणुं स्वरूप आ- त्माने विपे घटे नहि; केमके दृश्यना संवन्धथी अशुद्धि, विक्रिया इत्यादिक दोपनो संभव आवे- छे एवी आशंका थये छते दृक्स्वरूप आत्माने विपे नित्य शुद्धत्वादि श्रुतियेज निर्धारण कयुछे, माटे शंकानो अवकाश नथी एवा अभिप्रायथी श्रुति सिद्ध अर्थने प्रकट करेछे के, हं तो ज्ञान- स्वरूप छौं माटेज शुद्ध छौं; केमके अज्ञान हेतुक अशुद्धत्वादिक तो आभासमात्र होवाथी मिथ्या छे; त्यांहां श्रुतिः- “शुद्धमपापविद्धं ". वळी विकियात्मक एवा प्राणादियोथी अन्य छौं माटे अविक्रिय; त्यांहां श्रुतिः- “अप्रा- णो ह्यमनाः शुभ्रः " अस्थूलमनण्व- हस्वमदीर्घमिति" १ ॐ शब्दनो अगीकाररूप अर्थ कोशमा प्रसिद्ध छे.

सप्तम प्रक्रिया. वळी "नतदश्नाति किञ्चन न तदना- ति कश्चन" अर्थः- ए आत्मस्वरूपने कोई पण व्यापतुं नथी, तथा आत्मा कोईने व्यापतो नथी. ए श्रुतिनां प्रामाण्यथी आत्माने विपयनो संबंध नथी ए वात कहेछे के, वास्तवताथी म्हारे कोइ पण विपय नथी. (एणे करीने विक्रियाना हेतुभूत विशेपना अभावथी पण अविक्रियपणुं कथन कयु.) तथा विपयना अभावे करीने अद्वैतात्मस्वरू- पर्नु प्रतिपादक भूम वाक्यने अर्थथी पठन करेछे के, हुं आगळ, पाछळ, पडखाने विपे तथा चो- तरफ, उंचे, नीचे तथा सर्वत्र व्यापक इदमनि- दमात्मक जे संपूर्ण भूमानन्दस्वरूप स्वमहिमाने विपे प्रतिष्ठित छे तेज हुँ छौं. ६. आत्माने विपे जन्म जरादि विक्रियाना अभा- वे करीने कूटस्थ अदय स्वभावत्वने प्रतिपादन क- रनारी श्रुतियोतुं स्वरूपथकी अने अर्थथकी पठन करेछे के, हुँ ' अज' एटले अजन्मा छौं; त्यांहां श्रुतिः- " अजोनित्यः शाश्वतः". तथा 'अमर' अने अजर ' एवो छौं; त्यांहां " स्वरूपानुसन्धाननी श्रुतिः- “स वा एप महानज आत्माऽजरो- ऽमरोऽभयो ब्रह्मेति". तथा 'स्वयंप्रभः' एटले स्वप्रकाश छौं; त्यांहां श्रुतिः " अत्रायं पुरुपः स्वयं ज्योतिः " तच्छु, ज्योतिपां ज्योतिः" तथा सर्वत्र व्यापक छौं; त्यांहां श्रुतिः- " नित्यं विभुं सर्वगतं तथा अद्वयरूप छौं; त्यांहां श्रुतिः- "एको- देवः " " एकमेवाद्वितीयं " तथा हुँ कारणरूप पण नहि अने कार्यरूप प- ण हुँ नहि; त्यांहां श्रुतिः- तदेतद्ब्रह्मा पू. वैमनपरमनन्तरमबाह्यं". तथा 'निर्मल' छौं त्यांहां श्रुतिः- “निरं- जनः परमं साम्यमुपैति ". तथा एक तृप्त एटले निजानंदे करीनेज तृप्त छौं; त्यौहाँ श्रुतिः- " आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न विक्षेति कुतश्चन " आनंदरूपममृतं यद्विभाति". “ विमुक्तश्च विमुच्यते " ए श्रुतिर्नु आ. श्रयण करीने कहेछे के, हुं विमुक्त छौं.७.

सप्तम प्रक्रिया. श्रुतिवाक्यः- न निरोधो न चोत्पत्तिर्न वदोन च साधकः । न मुमुक्षुर्न वैमुक्त इत्ये- पा परमार्थता ॥१॥ अर्थः-आत्माने विपे सर्व उपाधियोना नि- पेधे करीने सिद्ध थयुं जे निष्प्रतियोगिकपणुं तेणे करीने परमपणुं घटेछे; तो पण जीवरूपे करीने संसारवल, तथा ते बंधना निरासने अर्थे साध- कत्व, तथा स्वस्वरूपना बंधनथो मुमुक्षुत्व एटले मोक्षनी इच्छा, तथा ज्ञाने करीने मुक्तत्व ए सर्व वास्तविक केम न होय? एवी वादिनी शंका थ- ये छते उत्तर कहेछे के, परमात्मा कोई काळे पण बद्ध, साधक, मुमुक्षु अने मुक्त नथी; केमके, निष्प्रतियोगिक परमात्मानो निरोध एटले लय नधी, अविनाशी छे माटे; तथा उत्पत्ति पण न- थी; केमके अजन्मा छे तथा बदख एटले वं- धविशिष्टत्व पण नथी; तथा साधकल एटले बंध नितिने अर्थे उपाय कर्तृत्व पण नथी; तथा मु- मुक्षुख एटले बंधनथी मोक्षनी इच्छा पण नथी; तथा वंधना अभावधीज मुक्तत्व पण नधो; अर्था- स्वरूपानुसन्धाननी त् आत्माने विपे निष्प्रतियोगिक जे शुद्धस्वरू- प मात्र तेज परमार्थ छे. १. अहंकारादिकनु निराकरण करीने ब्रह्मथी अ- भेदे करीने आत्मतत्त्वना साक्षात्कार थवामा श्री वसिष्ठजीनुं वचन:- ज्ञानस्य ज्ञेयतापत्तिर्वध इत्यभिधी- यते । तस्वैव ज्ञेयता शांतिक्षि- इत्यभिधीयते ॥१॥ अर्थः- हे राम! ज्ञानस्वरूप आत्माने जे ज्ञेयतानी आपत्ति एटले दृश्यतानी प्राप्ति ते वंध कहेवायछे; तथा एज आत्माने जे ज्ञेयता( ह. श्यता)नी शांति एटले निवृत्ति ते मोक्ष कहेवा- यछे. १. ए रीते उपक्रम करीने तेना उपसंहारनो श्लोकः- या व्यापारवतीरसाद्रसविदां काचि- कवीनां न वा दृष्टिा परिनिष्ठि- तार्थ विपयोन्मेपा च वैपश्चिती । ते दे अप्यवलंव्य विश्वमखिलं निर्व- णितं निर्वृतं यावदृष्टि दृशो न सन्ति कलिता नोशून्यता नोभ्रमः ॥१॥ :- सप्तम प्रक्रिया. अर्थ:-हे राम! त्रण प्रकारनी दृष्टि शा- स्त्रमा प्रसिद्ध छ; जे के (१) पामर दृष्टि, (२) यौक्तिक दृष्टि अने (३) तत्व दृष्टि; तेमां पेहे- लो पामर दृष्टि एटले मूढ दृष्टिचं उत्तर एवी वे दृष्टिए करीने निराकरण करवं, अने वीजी यौ- क्तिक दृष्टिन त्रीजी तत्त्व.दृष्टिए करीने निराकर- ण करवू एवा आशयथी में यौकिक अने तत्त्व बन्ने दृष्टि अवलंबन करीने आ सर्व जगत् त- 'स्वरूपे एटले चिन्मात्ररूपे वर्णन कयें. ते बन्ने दृष्टिनु स्वरूप कहेछ के- सारमाथी पण सारनुं मथन करीने जाणवाने समर्थ, तथा प्रमाणतत्त्व अने प्रमेयतत्त्वनी परीक्षाने विषे कुशल एवा पुरुपोनी सम्यक् प्रकारे विचाररूप व्यापारवाळी अने अति निष्कर्परूप एवी जे दृष्टि ते यौक्तिक दृष्टि; तथा विचार शास्त्र श्रवण मनन निदिध्यासनोना परिपाके करीने परिनि- ठित एवा परमार्थतत्त्वमात्र विषय छ अपरो- क्षलथी स्फुरण जेने विपे एवी जीवन्मुक्तोने विपे प्रसिद्ध जे चरम साक्षात्काररूप ब्रह्माकार वृत्ति ते तत्त्व दृष्टि. ए बन्ने दृष्टिनु अवलंबन करीने जगत् क्या- हां सुधी वर्णन कर्यु एवी आकांक्षा थये छते क- ३६४ स्वरूपानुसन्धाननी हेछे के, ज्यांहां सुधी सर्व संसारदृष्टिओ तथा तेमना जोनार जीवो त्रिकालने विपे पण छेज नहि, अने शून्यतानो पण संदेह रहे नहि, तथा भ्रान्तिमय पण जणाय नहि त्यांहां सुधी; अर्थात् नित्य, अपरोक्ष, परम आनन्दस्वरूप ब्रह्मात्मै- कवरूपे स्थिति पर्यंत वर्णव्युंछे. २. अन्तमा मङ्गलाचरणः खानिलाग्न्यब्धरित्र्यन्तं सक्फ- णीवोद्गतं यतः । ध्वान्तच्छिदे नम- स्तस्मै हरये बुद्धिसाक्षिणे ॥ १ ॥ अर्थः- आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी इत्यादि भूतभौतिकरूप त्रिगुणात्मक सर्व जगत् रज्जुने विपे भुजंगनी पेठे जेने विपे उद्भूत एट- ले भासमान थयुं ते ध्वान्त( अज्ञान )ना छेदन करनार अने बुद्धिना साक्षीरूप एवा हरिने नम- स्कार. आश्लोकमां रज्जु भुजंगर्नु दृष्टान्त आरंभ अने परिणामवादना निराकरणने अर्धेछे; तथा हरिने बुद्धिसाक्षीनी जोडे सामानाधिकरण्य जे कथन कर्यु ते प्रत्यगात्मा अने परमात्मा ए बन्नेना अ-

सप्तम प्रक्रिया.
३६५
खंडैक्य वोधने अर्थे छे; तथा 'ध्वान्तच्छिदे ' ए
पद अज्ञाननी निवृत्तिरूप प्रयोजनने अर्थ छे. १.
नारायणं पद्मभवं वसिष्ठं
शक्तिं च तत्पुत्रपराशरं च।
व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं
गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य शिष्यम् ॥१॥
श्रीशंकराचार्यमथास्य पद्म-
पादं च हस्तामलकं च शिष्यम् ।
तंत्रोटकं वार्तिककारमन्या-
नस्मद्गुरून्सन्ततमानतोऽस्मि ॥२॥
इति श्री मदुदयशंकरात्मज
गौरीशंकर विरचिते स्वरू-
पानुसन्धाने सप्तम
प्रक्रिया समाप्ता.
॥७॥

भुजंगी छंद. ADD- परब्रह्म ने जीवन ऐक्य जेमां, जुवो सत्य वेदान्त सिद्धान्त तेमां; जय श्रेष्ठ प्रस्थान छे ग्रन्थ सारो, स्वरूपानुसन्धान स्नेहे स्वीकारो. १ वडा ग्रन्थ वेदान्तना पांचवाने, वनेछे क्यमे व्हौ श्रमे कोइ बहाने परंतु लिधो आ स्थळे सार सारो, स्वरूपानुसन्धान स्नेह स्वीकारो.२ थयु ग्रन्थ वेदान्तमां ज्ञान जेर्नु, खरूं तत्त्व ते जाणशे 'छे मजे-;' तदर्थेज छे ग्रन्थ आ' एम धारो, स्वरूपानुसन्धान स्नेहे स्वीकारो. ३ सदा सच्चिदानन्द छे एक सत्य, गणो ए विना वस्तु सर्वे असत्य सदा चित्तमां सत्य वस्तु विचारो, स्वरूपानुसन्धान स्नेहे स्वीकारो.४ * रचनार भवानीशंकर वि. नरोत्तम द्विवेदी.

MAYAVAT
न श्रुत्युक्त आत्मस्वरूपावलोक्युं,
निशामांह खाधा किधुं खूब झोकुं;
कहो आवशे एथकी क्यांथि आरो,
स्वरूपानुसन्धान स्नेहे स्वीकारो. ५
जुवो वामदेवादिओ ज्ञान पाम्या,
महा पाश संसारमाथी विराम्या;
न धारो जरा काममा ए उधारो,
स्वरूपानुसन्धान स्नेहे स्वीकारो. ६
दिसे सर्व माया तणी कष्टकारी-
महा काळ विकाळ छे जाळ भारी;
खरेखात निःसार संसार धारो,
स्वरूपानुसन्धान स्नेहे स्वीकारो. ७
असत्पंथ ने ग्रन्थना तंत तेवा,
गणी तुच्छ ने तुर्त ते छोडि देवा;
करो ब्रह्म सिद्धान्तनो पक्ष प्यारो,
स्वरूपानुसन्धान स्नेहे स्वीकारो. ८
VHAVAVAVAVAAVAVITA

शुद्धिपत्र. पंक्ति. २ १० १८ २७ १२ १ ५४ अशुद्ध. शुद्ध. दुःस्वरूप दुःखरूप सोयऽमीदृशः सोऽयमीदृशः ते जे तथ तथा अपरोक्षब्रह्म अपरोक्षाहह्म विरहः विरह अढारमा अढारमा छौं छौं परमात्मा परमात्मा छ, अस्थवान्य अवस्थात्रय कार्यकारणनो कार्यकरणनो ज्योतिष ज्योतिपथी कार्यकारणनो कार्यकरणनो निर्माणना निर्माणना कार्यकारणी कार्यकरणथी तेमनां तेमना अतात अतीत श्रुतिमा श्रुतिमा वाक्योनो वाक्योक्त अर्थनो ८१ ९ ९२ १५ ९२ २० १ २२ १ १०२ १०२ १०४ १०६ ८ थवाने अर्थे छठी थवाने अर्थे; ਤਵੀਂ १ पृष्ठ. , १० १८२ १९० २०३ २०४ २४० २५४ २५४ २६० २६० २८४ २८५ ૨૮૭ पंक्ति. अशुद्ध शुद्ध. २ दक दिक २ माटे ( वधारे छे.) ६ अनुविप्रयुक्ताः अनविमयुक्ताः २ निगमा निगमाः चीज वीजें २१ स्त्रयाः स्त्रयः थयुं थतुं सामान्यरूप २२ रूप विशेषरूप तात्पर्यथी लिंगोथी ९ वाक्योनो वाक्योनां तात्पर्यनी गुप्ति गुप्ती श्रुतमतं श्रुतममतं १५ रची करी आपेक्षित आपेक्षिक

Swarupanusandhan

Author
Ojha,gori Shankar Udai Shanar
Title
Swarupanusandhan
File name
Swarupanusandhan
Text
OCR done
Citation
1806
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,nirnay Sagar Press
Language
Sanskrit
Pages
382
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311497
Barcode
99999990320378.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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TpYUda6jGng
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