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Mumukshusarvashvsarsangrah
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श्रीमन्मुक्तिनाथमुनीन्द्रसङ्कलित
मुमुक्षुसर्वस्वसार
हिन्दा अनुवादसाहत
अनुवादक
मुनिलाल
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भूमिका प्रायः दो वर्ष हुए पूज्यपाद महात्मा श्रीशम्भुनाथजीने हायरसमें मुझे यह पुस्तकदीथी। महात्माजी परम अद्वैतनिष्ठ, तपस्थी और सदाचारकी मूर्ति थे। उन्हें यह प्रन्य यहाही प्रिय था। उनकी हार्दिक इच्छाधीशियह हिन्दी मनुवादसहित सुन्दर और सुलभरूपमें जनताको प्राप्त हो सके। उन्होंने जो मति मुझे पोथी यह प्रायः ७० वर्ष पहले प्रकाशित हुई समझी जाती है। यह कहाँ छपी थी और कौन उसका प्रकाशक था-सका उसमें कोई सरत नहीं किया गया। मैंने यह प्रति गीताप्रेसको भेज दी और उसके ५-६ मास पयार प्रेसने उसे अनुपादके लिये मेरे पास भेज दिया। धीभगवान्की कृपासे माल पद प्रकाशित की जा रही है। पेद , पूज्य महात्माजी इसका प्रकाशम नहीं देख सके प्रायः एक साल हुमा उनका परलोक्यास हो गया है। इस प्रग्यसलनकर्ता धीरधामी मुकिनाथजी महाराज ये। उन्होंने, जैसा कि इस प्रन्यके मन्तमें कहा है, 'पृहन्मुमुसु. सर्वस्व' मामक एक पहुत पहा प्रन्य सदलित किया था। पूज्य महामा सम्भुनाथजी कहते थे कि मैंने उसकी दस्त- सिपित प्रति प्रषिकेशमें धीस्थामी मलनायजीको फुटीपर देसी पोपा फलेपमें धीमागपत समान धीमांतर किसी प्रेसने उसे प्रकाशित नहीं किया। प्रस्तुत प्रन्य उसीशा राति सारमानसका संपर भी स्वयं धीमुक्तिनापजी
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(३) सम्बन्ध जोड़ते हुए येदान्त-प्रमिया योर तदुपयोगी साधनोंका प्रतिपादन किया है। इसके पाँच प्रकरण है। प्रथम प्रकरणमें अन्यके अधिकारी, विषय, सम्यन्य और प्रयोजन-इन चार अनुबन्धाका निरूपण किया गया है तथा यन्य और मोक्षके स्वरूपका निर्देश करते हुए भेदकी असत्यता और मारमाफी सुषस्यरूपताका वर्णन किया है। द्वितीय प्रकरणमें चित्तशुद्धि पौर उसके साधनोंका निरूपण है, क्योंकि चित्तके शुर हुए यिना जिज्ञासा नहीं होती और यिना जिज्ञासा धोध नहीं होता। जिस समय अविद्याफे मलरूप दोषकी निवृत्ति होनेसे चित्त स्वच्छ हो जाता है उसी समय साधरुको तत्वोपदेश- प्रहणकी योग्यता प्राप्त होती है। ऐसा साधक जिन विशिष्ट गुणोंसे सम्पन्न होना चाहिये उन्हें वेदान्त-प्रन्योम साधनचतुष्टय कहा है। विवेक, वैराग्य, शमादि पट् सम्पत्ति और मुमुक्षुता- इन चार साधनोंसे सम्पन्न हुए बिना कोई भी साधक महाविद्याका रहस्य नहीं समझ सकता; अतः तरययोधके लिये इन्दं उपार्जन करना सर्वथा अनिवार्य है। तृतीय प्रकरणमें इन्हींका विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है। यहाँ संग्रहकर्ता. मे जो पाक्य उद्धृत किये हैं ये बड़े ही मर्मस्पर्शी हैं। चतुर्थ प्रकरणमें संन्यासका निरूपण है । संन्यास दो प्रकारका होता है--विविदिपासंन्यास और विद्वत्संन्यास । जो साधक संसारके विपय-भोगाँसे अत्यन्त विरक्त होकर तत्त्ववोधकी प्रपल जिज्ञासासे संन्यास ग्रहण करता उसे विविदिषा- संन्यासी कहते हैं। संन्याससम्बन्धी जितना विधि निषेध है उसीके लिये है। किन्तु जिन्हें ब्रह्मात्मैक्यका सुदृढ बोध हो चुका है और जिनकी दृष्टिम एकमात्र अखण्ड सचिदानन्दघन के सिया अग्य यस्तुका मरयम्तामाय है उनके लिये कोई विधि-निषेध नहीं है। उनके लिये तो उनकी स्यामायिक प्रवृत्ति हो यिधिरूप है। किन्तु ऐसे ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष कोई चिरले दी होते है, सर्वसाधारणको उनका अनुकरण करके स्वेच्छाचारी न हो जाना चाहिये । इस प्रकार संन्यासका प्रतिपादन कर फिर पञ्चम प्रकरणमें घेदान्तप्रक्रियाका निरूपण किया है। यहाँ महापाक्यके तत् और त्वम् पदके चाच्यार्थ और लक्ष्यार्थका विचारकर लक्ष्यार्थमें उनकी एकता यतलाते हुप प्रत्यगात्मा और परमात्माकी अखण्डकरसता सिद्ध की है तथा गुरुके उपदेशसे शिष्यको कृतकृत्यता प्रदर्शित करते हुए प्रन्थका उपसंहार किया है। यही इस ग्रन्यके प्रतिपाद्य विषयका संक्षिप्त विवरण है। यह प्रन्थ यास्तवमें मुमुक्षुओंका सर्वस्व ही है। इसमें पतलाये हुए मार्गका अनुसरण करनेसे साधक अवश्य ही अपना ध्रुध लक्ष्य प्राप्त कर सकता है । अभीतक यह अन्य प्रायः अप्रकाशित ही था, इसे प्रकाशित कर गीताप्रेसने बड़ा उपकार किया है। इसका अनुवाद करते समय मुझे जहाँ-तहाँ कई महानुभावोंसे सहायता लेनी पड़ी है। उनमें पूज्यपाद श्रीस्वामी घनश्यामानन्दजी तीर्थ, ब्रह्मचारी श्रीस्वतन्त्रानन्दजी महाराज और पूज्य पं०परमानन्दजी महाराज मिसिपल श्रीराधाकृष्ण- महाविद्यालय खुरजाका मैं विशेष मणी हूँ। पुस्तकको छपाईके समय मूल ग्रन्थके पाठ और अनुवादके संशोधन प्रादिमें मुझे पूज्य पं० ज्येष्ठारामजी महाराज पं० श्रीरामनारायणदत्त- .
जी शास्त्रीसे बहुत सहायता मिली है। अतः इन सभी
महानुभावोंका मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। सम्भव है, मेरी अल्पक्षताके
कारण अव भी इसमें बहुत-सी त्रुटियाँ रह गयी होंगी। उनके
लिये मैं विद्वन्मण्डलीसे सविनय क्षमा माँगता हूँ और मार्थना
करता हूँ कि ये कृपा करके प्रेसको उनकी सूचना दे दें, जिससे
आगामी संस्करणमें उन्हें यथासाध्य सुधारनेकी चेष्टा की
जा सके।
गीताप्रेस, गोरखपुर
चैत्र शु. ५सं० १९९२
मुनिलाल
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श्रीहरिः विषय-सूची विषय पूछ प्रथम प्रकरण ... ... ૨ ३ ५ ... ... ... ... २० २२ ... १-मङ्गलाचरण २-उपक्रम ३-अनुबन्ध-चतुष्टय ४-अविद्या-निरूपण ५-आत्मा और अनात्माका अन्योन्याध्यास ६-अभ्यासनिरूपण ७-भेदकी असत्यता ८-भेद-निषेध ९बन्धनिरूपण १०-आत्माकी सुखस्वरूपता ११-अन्धकी सफलता द्वितीय प्रकरण १२-चित्तशुद्धिके साधन १३-दूषित अन्नका त्याग १४-स्वधर्मपालन १५-चित्तमुदिका फल १६-कलियुगमें चित्तादि कैसे होगी? १७-भक्तिकी महिमा १८-शिव और विष्णुकी एकता १९-गुरुभक्ति २०-मतिका सशण २१-प्रकरण उपसंहार ... ... ... २६ ३२ ... ५८ ६.
... . ७३ ... ७७ ... ... १०२ [२] तृतीय प्रकरण सिप २२-साधनपतुष्टय २३-नित्यानित्यवस्वविवेक २४-विवेकका अभ्यास २५-वैराग्य २६-गर्मदुःख २७-गरीरनिन्दा २८-पाल्यावस्थाके दोष २९-युवावस्थाके दोष २०-वृद्धावस्साके दोष ३१-मृत्युके दुःख ३२-नरककी यातनाएँ २३-जगचक्रवर्णन ३४-मृत्युसूचक लक्षण ३५-तीन प्रकारके साधक ३६-स्त्री-निन्दा ३७-पुत्र-निन्दा २८-घन-निन्दा ३९-पारलौकिक सुखकी हेयता ४०-इन्द्रिय-निन्दा ४१-भोक्ताओंके दोष ४२-तृष्णाके दोष ४३-थैराग्य ४-दामादि षट् सम्पत्ति ११२ १२३ १२५ १३५ १४७ ... १५६ ... ... १६८ १६९ १७२ १७५ १७५ ... ... २-दम [३] पह १८. २-उपरति ४-तितिक्षा ५-भा ६-समाधान -मुमुक्षुता १८९ चतुर्थ प्रकरण ... २.. २१. ४-न्यारानिरूपण ४७-अधिगरपिचार ४८-या मिन-भिन भेनौरा निरूपण ४१-यपि ५.-पोपनिधि ५१-दन्तपारन विधि ५२-नतिपि ५२-भाचमनलिपि ५४-देशन ५५-प्राणायामतिर २६२ २९६ २६७ ५१-fied ५.-महाराषिन ११-धान् किमि १८६ सोनिम्दा ...
पृष्ठ ... ३१३ ३१५ ३२० ३२४ ३२७ ... ... ३३४ ३३६ ३४३ . [४] 'विषय ६८-तुष्टिनिन्दा ६९-विद्वान् यतिके धर्म ७०-जिज्ञासु यतिके धर्म ७१-गुरु-शुश्रूषा-निरूपण ७२-ज्ञानाधिकारी कौन है? पश्चम प्रकरण ७३-मालाचरण ७४-गुरु-शिष्य-संयाद ७५-तत्-त्य-पदार्थ-निरूपण ७६-पञ्चकोशका बाप ७७-अवस्थात्रयनिरूपण ७८नयं-पदका निरूपण ७९-आरमाको बन्धन कैसे हुआ ! ८०-तत्-पदवा निरूपण ८१-बाकी सर्वात्मकता ८२-ठन् और स्वं-पदके याच्या और लक्ष्यार्थ ८३-वाक्यार्य-विचार ६४-अखण्डा-निरूपण ८५-वास्या-विवेक ८६-जगत्या अमत्यत्व ८७-निषेपमुम्मश्रुतिका तात्पर्य ८८-भाग्मदत्वदा निरूपण ८-हानीकी कृतस्यता १.-जोन्मुनिका मस्त १-मुनिका स्वरूप २२-यापनुमर :-ग्रन्या उमार ... ... ३४८ ३५० ३५२ ... ... ... ... ... ... ...
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भगवान् श्रीरामचन्द्रजो
सचितानन्दम्पाय गमाव सबगारमने।
पेशन्टतिरावाव दशास्त्रधानिये नमा
श्रीपरमात्मने नमः मुमुक्षुसर्वखसार प्रथममकरण सर्वशं सर्वगं शान्तं सर्वातीतं सनातनम् । सत्यासत्यविनिर्मुक्तं स्वात्मानं संस्मराम्यहम् ॥ मङ्गलाचरण सचिदानन्दरूपाय रामाय प्रत्यगात्मने। वेदान्तप्रतिपाद्याय दशास्यघातिने नमः ॥१॥ सच्चिदानन्दस्वरूप, सवका अन्तरात्मा, वेदान्तद्वारा प्रतिपादित और दशवदन रावणका वध करनेवाले भगवान् रामको नमस्कार है। संसारसागरे । मग्नं कामादिनक्रसंहृतम् । मां समुद्धृतवन्तो ये तान्यन्दे स्वगुरूनपि ॥२॥ जिन्होंने कामादि नाकोंसे गृहीत होकर संसारसमुद्र में डूबे हुए मेरा उद्धार किया उन अपने गुरुदेवकी भी मैं वन्दना करता हूँ। २ २. मुमधुमपम्पमार .woruorumorwaroParveerxn उपक्रम आप्तवाक्यम् अल्पेम्पच महद्भयच ग्रन्येभ्यो मतिमानरः। सर्वतः सारमादद्यात्पुप्पेभ्य इव पट्पदः ॥३॥ जिस प्रकार भौरा सब तरहके पुष्पोंसे उनका सार ले लेता है उसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुषको छोटे-बड़े सभी अन्योंसे उनका सार ग्रहण कर लेना चाहिये। संगृहकर्तृवचनम् इत्येवमादिवाक्यानामर्थ युद्ध्याय सादरम् । सञ्जाता तु चिकीर्षा मे श्रुत्यादिवाक्यसङ्ग्रहे ॥४॥ ऐसे वाक्योंका अभिप्राय जानकर ही आज मुझे श्रद्धापूर्वक श्रुति आदिके वाक्योंका संग्रह करनेकी इच्छा हुई है । त्रिकाण्डात्मकशास्त्रस्य गीताख्यस्य तथा मया शारीरकस्य चाप्यर्थः संक्षेपेणेह वक्ष्यते ॥५॥ इस संग्रहमें मैं [कर्म, उपासना और ज्ञान-इन ] तीनों काण्डोंका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्र तथा गीता और शारीरक शास्त्रके भी अर्थका संक्षेपसे प्रतिपादन करूंगा। शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् । इति लक्षणयोगोत्र निःसन्दिग्धमवस्थितः॥६॥ जो शास्त्रके एक देशसे सम्बद्ध और शास्त्रके किसी एक प्रथम प्रकरण GraiGauGREENER कार्यमें स्थित हो [उसे प्रकरण अन्य कहते हैं ]-इस लक्षणका यहाँ निःसन्देहरूपसे योग है। एवं वेदान्तशास्त्रीयैरनुबन्धैर्भवेदिदम् । अनुवन्धि यतस्तस्य प्रकरणं विदं स्मृतम् ।।७।। इस प्रकार यह वेदान्तशास्त्रीय अनुबन्धोंसेअनुबन्धयुक्त है क्योंकि यह उस (वेदान्त ) का प्रकरण (प्रक्रिया ) ग्रन्थ कहा गया है । अनुवन्ध-चतुष्टय शास्त्रीयाः केऽनुबन्धाः स्युरिति चेच्छृणु तानपि । अधिकार्यभिधेयौ द्वौ सम्बन्धश्व प्रयोजनम् ॥८॥ अब, यदि तुम्हें यह शंका हो कि शास्त्रीय अनुबन्ध कौन- कौन-से हैं, तो सुनो-अधिकारी और अभिधेय ( विपय ) ये दो तथा सम्बन्ध और प्रयोजन [ये ही शास्त्रीय अनुबन्ध हैं ] । इत्येते ह्यनुबन्धा वै चत्वारः सन्ति शास्त्रगाः। एतान्दृष्ट्वा तु बुद्धिमान शास्त्रादौ सम्प्रवर्तने ॥९॥ इस प्रकार ये चार ही शास्त्रोक्त अनुबन्ध हैं । बुद्धिमान् पुरुष इन्हें जानकर ही शाखादि [के अध्ययन ] में प्रवृत्त हुआ करता है। चतुर्भिः साधनैर्युक्तो योऽधिकारी स कथ्यते । जीवस्य ब्रह्मणैक्यं यत्तद्विपय इहोच्यते ॥१०॥ जो पुरुप (शमादि] चार साधनोंसे सम्पन्न है वही इसका अधिकारी कहा जाता है । तथा ब्रह्मक साप जो जीरकी एकता है वही इसका विषय कहा गया है।
४ OGISGROUNOGRADGIR मुमुक्षुसर्षखसार अशेपानर्थनाशो यो नित्यानन्दस चाप्तता। प्रयोजनमिहोक्तं तत्सम्बन्धो बहुधा स्मृतः ॥११॥ सम्पूर्ण अनर्थोका नाश और नित्यानन्दका जो प्राप्त होना है वही इसका प्रयोजन कहा गया है तथा इसका सम्बन्ध तो कई प्रकारका है। वेदान्तः प्रतिपायेन वैक्येन ब्रह्मजीवयोः । तेषां च विदुः सम्बन्धं योध्ययोधकतां युधाः ॥१२॥ बुधजन वेदान्तशास्त्रोंसे प्रतिपादित ब्रह्म और जीवकी एकताके साप शाोंका योध्य-बोधकभाव सम्बन्ध मानते हैं। वेदान्तश्चैक्यवोधस्योत्पाद्योत्पादकतां विदुः। शास्त्रमुक्त्योस्तु सम्बन्धः प्रयोजकप्रयोज्यता ॥१३॥ इसी प्रकार जीव-अह्मकी एकता ज्ञानका वेदान्तशालके साप उत्पाच-उत्पादकभाव तपा मुक्ति और शासमें प्रयोज्य- प्रयोजकमाव-रूप सम्बन्ध माना जाता है । वोधमुक्त्योच सम्बन्धः साधनसाध्यताट्वयः । एवं चतुर्विधः प्रोक्त सम्बन्धोत्र युधैः खलु ॥ १४ ॥ ऐमे ही बोध और मुक्तिमें साधन-सान्यभाव सम्बन्ध है । इस प्रकार विद्वानोंने इस वेदान्तशास्त्र में चार प्रकारका सम्बन्ध कहा है। ननु भेदस सत्यत्वादन्यसाप्यमृपात्वतः । नस्साद्विपयमंमितिः सिद्धयेचन प्रयोजनम् ॥ १५॥ -भेद सत्य है और मंगाग्वयन भी मिथ्या नहीं है-
प्रथम प्रकरण
NIRGANISriesGRNIORGRLSON
इसलिये इस प्रन्पके [जीव-ब्रह्मकी एकतारूप) विषय और उक्त
प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकते।
तदसिद्धौ च नैव स्यात्प्रवृत्ति(मतामिह ।
भेदस्य विषयत्वे तु न वेदान्तनियन्धता ॥ १६ ॥
उन दोनोंकी सिद्धि न होनेके कारण बुद्धिमान् पुरुषोंकी
इसमें प्रवृत्ति भी नहीं हो सकती और यदि भेदको ही इसका विषय
माना जाय तब तो यह वेदान्तका निबन्ध ही नहीं हो सकता ।
मैवं धन्धो भिदा चापि न सत्यौ कल्पितत्वतः ।
ततो विषयसिद्धिः स्यात्फलसिद्धिश्च सम्भवेत् ।। १७ ।।
समाधान-ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि कल्पित होनेके
कारण बन्धन और भेद दोनों ही सत्य नहीं हैं; अतः इस प्रन्यके
विषय तथा प्रयोजनकी भी सिद्धि हो सकती है।
अविद्या-निरूपण
भेदवन्धद्वयोश्चापि कल्पितत्वं त्वविद्यया ।
सातुचिन्मात्रमाच्छाद्य करोत्यत्र मिदादिकम् ॥१८॥
भेद और बन्धन इन दोनोंकी कल्पना अविद्यासे ही हुई है।
वहीं चिन्मात्र आत्मतत्वको आच्छादित कर इस लोकमें भेदादिका
प्रादुर्भाव करती है।
आच्छादितं परं ब्रम स्वाज्ञानेन पलीयसा ।
विक्षिप्तं तत्पुनस्तेन जीवेशजगदात्मना ॥१९॥
मुमुनुसर्यवसार
CONORGANE
TNERGREARRUNG
AGRICU
परग्रह्म अपने प्रबल अज्ञानसे आच्छादित है । उस (अज्ञान) के
कारण ही वह जीव, ईश्वर और जगतरूपसे विक्षिप्त हो रहा है ।
आवरणादिशक्त्या तत्समर्थमात्मसंसृती ।
अपरश्च पलं तस्यात्माश्रयत्वादिकं महत् ।। २०॥
वह अज्ञान आवरण आदि शक्तिसे ही आत्माके जन्म-
मरणादिमें समर्थ होता है । उस अज्ञानका आत्माश्रयत्व (आत्माके
ही आश्रित रहना ) आदि और भी एक महान् वल है ।
एवमात्मा स्वयाथात्म्यमखण्डाद्वयरूपकम् ।
अज्ञात्वात्मन्यनात्मानमध्यस्सायं
प्रवर्तते ॥२१॥
इस प्रकार यह आत्मा अपने अखण्ड अद्वयरूप यथार्थ
खरूपको न जानकर आत्मामें अनात्मा (अहंकार) का अध्यास
कर नाना प्रकारसे प्रवृत्त होता है।
जगदिदमसावीशो जीवोऽहं विधिनोदितः ।
काम्यादिकर्मणांकर्ता भोक्तासि तत्फलस्य च ।। २२ ॥
द्रष्टाहं स्वेष्टरूपादेः श्रोतासि गीतवाद्ययोः ।
वक्ताहं साङ्गवेदस्य गन्तास्मि स्वगुरुं प्रति ॥ २३ ॥
मनुष्योऽहं पितायं मे मातेयं मे सुतोऽस्ति मे ।
युवास्म्यहं तथा वृद्धो ब्राह्मणोऽहं बहुश्रुतः ।। २४ ।।
क्षत्रियोऽहं महाञ्च्छूरो वैश्यवाहं सुखादिमान् ।
शूद्रोऽसि द्विजमक्तोऽहं ब्रह्मचार्यस्मि नैष्ठिकः ॥२५॥
प्रथम प्रकरण .GRALIAGrous 216 गृहस्थः पुत्रवानस्मि पुने सुखिन्यहं सुखी । पुत्रनाशे च नष्टोऽहं धनाढ्योऽहं च पै सुखी ॥२६॥ पुत्रादीन्परिहायाहं वनेऽस्मिन् फलपर्णभुक् । तपस्व्यहं वनस्थोऽस्म्यग्निहोत्री ह्यतिथिप्रियः ॥२७॥ यतिश्चाहं परो हंसो मुण्डो दण्डकुसुम्भवान् । मोक्षायैव प्रवृत्तोऽहं संसाराभिधपाशतः ॥२८॥ इत्यादिव्यवहारोऽयं पण्डितमूढयोरपि । अध्यासमन्तरेणास्य नान्यत्कारणमीक्ष्यते ॥२९॥ 'यह जगत् है, यह ईश्वर है, मैं शास्त्रविधिसे प्रेरित काम्यादि कोका कर्ता और उनके फलका भोग करनेवाला जीव हूँ, मैं अपने अभीष्ट रूपादिको देखनेवाला, गाना-बजाना आदि सुननेवाला, अंगोंसहित वेदका बखान करनेवाला और अपने गुरुजीके पास गमन करनेवाला हूँ, मैं मनुष्य हूँ, यह मेरा पिता है, यह मेरी माता है, यह मेरा पुत्र है, मैं युवा हूँ, वृद्ध हूँ, मामण हूँ, और बहुत पदा-लिखा हूँ, में बड़ा शूरवीर क्षत्रिय हूँ, में सुखादिसम्पन्न वैदय हूँ, में द्विजभक्त शूद्र हूँ, मैं नैष्ठिक ब्रह्मचारी हूँ, मैं पुत्रवान् गृहस्थ हूँ, पुत्रके सुखी होनेपर ही में भी सुखी हूँ, पुरके नष्ट होनेपर मेरा भी नाश ही है, मैं बड़ा धनाद्य और सुखी हूँ, पुत्रादिको त्यागकर मैं इस वनमें फल और पत्ते खाकर रहता हूँ, मैं तपस्वी हूँ, बनवासी हूँ, अग्निहोत्री हूँ और अतिपियों- का प्रिय करनेवाला हूँ, मैं दण्ड-कमण्डलुधारी मुण्डितकेश परमहंस पति हूँ, इस समय मैं संसारनामक पारासे मुक्त होनेके
८
GROUNGries
मुमुक्षुसर्यससार
SOGRIDGUSIGuaranGRUK.
लिये ही प्रवृत्त हुआ हूँ' इत्यादि प्रकारका यह व्यवहार मूढ और
पण्डित दोनोंहीका देखा जाता है। इसका अभ्यासके सिवा और
कोई कारण नहीं देखा जाता ।
अध्यासजननेज्ञानं समर्थमेकमस्ति च।
सादृश्यस्य त्वनैकान्त्यमात्मनि जातिकल्पने ॥३०॥
इस प्रकारके अभ्यासको उत्पन्न करनेमें एकमात्र अज्ञान ही
समर्प है, क्योंकि आमामें जातिकी कल्पना करनेमें सशताका
व्यभिचार है। [ आत्मा असण्ड और एकमात्र है, जब उममें
भेद ही नहीं है तो भिन्न पदार्थोंमें रहनेवाली सदशता ही कैसे रह
सकती है ! अतः सरशताका अमात्र होनेके कारण आत्मामें प्रामण
अपया मनुष्य आदि जातिकी कल्पना भी नहीं हो सकती] ।
करणगस्य मानस व्यभिचारोऽपि दृश्यते ।
पटशानं ममोत्सनं नष्टमित्यादिज्ञानयत् ॥३१॥
इसके सिया 'मुझे घटका मान उत्पन्न हुआ अपया नष्ट हो
गया' इत्यादि शानके समान इसमें इन्द्रियगत ज्ञानका भी व्यभिचार
देखा जाता है।
तसादाविधको पन्धमेदी प्रनीचि न स्वतः।
सतम्त्वान्मा मदाशुद्ः स्वप्रकामोद्रयात्मकः ॥३२॥
अतःप्रपामा दमन और भेद अविधाजनित ही है, म्यतः
नईः। स ा तो निन्य, गुल, मयंका और अपना है।
नबनानं इतः शुद्ध मका निदात्मनि ।
न हि सूर्य नमो टं मविन्ना तु फनविन ॥३३॥
प्रथम प्रकरण 15DGroid GN अज्ञानेन विना न स्यादावृत्तिश्च चिदात्मनि । तामृते च यदाभ्यासः कथमात्मनि सम्भवेत् ॥३४॥ शङ्का-शुद्ध और स्वयंप्रकाश चिदात्मामें अज्ञान कहाँसे आया ? क्योंकि किसी भी नीरोग नेत्रोंवाले पुरुषने सूर्यमें कभी अन्धकार नहीं देखा, और अज्ञानके बिना चित्खरूप आत्मामें आवरण भी नहीं हो सकता; फिर बताओ आवरणके बिना इस आत्मामें अध्यास भी कैसे हो सकता है ! शृणु तमो यथा सूर्येऽप्युलूकदृष्टिकल्पितम् । स्वप्रकाशे तथाज्ञानमज्ञानुभूतिकल्पितम् ॥३५॥ समाधान-सुनो, जिस प्रकार सूर्यमें उल्लूकी दृष्टि से अन्धकार- की कल्पना हो जाती है उसी प्रकार अज्ञजनोंके अनुभवसे ही स्वप्रकाश आत्मामें अज्ञान कल्पित हुआ है। यथा चाम्रातः सूर्योऽभ्रादीनपि प्रकाशते । तथाज्ञानावृतोऽप्यात्मा सकार्याज्ञानमासकः ॥३६॥ जिस प्रकार• मेघोंसे टूका हुआ सूर्य उन मेघादिको भी प्रकाशित करता है, उसी प्रकार अज्ञानसे देंका हुआ आत्मा अज्ञान- को उसके कार्यसहित प्रकाशित करनेवाला है। अज्ञानं स्याश्रयानन्यविपयं सात्तमस्त्वतः । बाह्यं तमो यथा दृष्टं तथा चेदं ततस्तथा ॥३७॥ समाखरूप होने के कारण अज्ञान अपने आश्रय (आत्मा) से मिन्न पदार्थको विषय करनेवाला नहीं है। जिस प्रकार बाह्य अन्धकार मुमुक्षुसर्वस्वसार OGRAMMARGISGNIUSDGMORGENERGRNERGRIDO देखा जाता है उसी प्रकार यह आन्तरिक अन्धकार है; अतः उसी प्रकार [इसने भी अपने आश्रय आत्माको आच्छादित किया हुआ है। आत्मा और अनात्माका अन्योन्याभ्यास आत्मस्थं सत्तदज्ञानमात्मनोऽनात्मनस्तथा । अन्योन्यं तु मृपाध्यासं जनयत्येव बन्धदम् ॥ ३८ ।। वह अज्ञान आत्मामें स्थित रहकर आत्मा और अनारमामें एक दूसरेका मिथ्या अभ्यास उत्पन्न कर देता है, जो आत्माको बन्धनमें डालनेवाला है। नन्विवरेतराध्यासे त्वात्मापि स्यान्मूपा ध्रुवम् । अध्यस्तत्वाद्यया शुक्तिरुप्प रज्जूरगादिकम् I॥ ३९ ।। आत्मनः सति मिथ्यात्वे शून्यवाद समापतेत् । शशा-यदि आत्मा और अनामा अन्योन्याध्यास ( परस्पर- मिथ्यारोप) माना जाय तो अव्यस्त होनेके कारण मुक्ति-रजत और रम्ज-सर्प आदिक समान आरगा भी अवश्य ही मिथ्या हो जायगा | इस प्रकार आमाके. मिथ्या सिद्ध होनेपर शुम्प- पादकी प्राप्ति हो जायगी। मैवं यद शृणुपात्र व्यवस्यां ने बदाम्यहम् ॥ ४०॥ • अयम पदार्य किया हुआ करता है, से नि.मे रमत सपा घुमे । अत: inार यहाँ राजा और समयमा होने कारण लिप्पा उमी प्रकार यदि आग्मारो नाग्माम अप्यता माना जावा दो हमी मिथ्या मिता .
प्रथम प्रकरण नीलपृष्ठत्रिकोणत्वं यथा शुक्तर्न भासते । तथाखण्डाद्वितीयत्वं भ्रान्तौ नात्मन ईक्ष्यते ॥ ४१ ।। समाधान-ऐसा मत कहो; सुनो, इस विषयमें जो व्यवस्था है वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ। जिस प्रकार [ शुक्तिमें रजत- की भ्रान्ति होनेपर ] शुक्तिकी नीली पीठ और त्रिकोणता नहीं भासती उसी प्रकार भ्रान्तिकालमें आत्माका अखण्ड अद्वितीयत्व प्रतीत नहीं होता। शुक्तेरैवेदमंशत्वं शुक्तिरूप्ये यथेक्ष्यते । तथात्मनोऽपि चैतन्यमनात्मनि समीक्ष्यते ॥ ४२॥ जिस प्रकार शुक्तिके स्थानमें भासनेवाली चाँदीमें शुक्तिही- का इदम्-अंशत्य* देखा जाता है उसी प्रकार अनात्मामें आत्माकी ही चेतनता देखी जाती है। यथा रूप्यस्य रूप्यत्वं शुक्तीदमि प्रपश्यति । भ्रान्तो नरस्तथात्मापि कर्तृत्वाधारमनीक्षते ।। ४३ ॥ जिस प्रकार भ्रान्त पुरुष शुक्तिके इदम्-अंशमें रजतका रज- तत्त्व देखता है उसी तरह आत्मा भी [ अज्ञानवश ] अपनेहीमें कर्तुत्य आदि धर्म देखा करता है । -जिस समय सीपीमे चाँदीकी प्रतीति होती है और यह कहा जाता है कि 'इदं रूप्यमस्ति' (यह चाँदी है) तो इस वाक्यमें 'इदम्' (यह) पदसे चाँदीकी अधिष्ठानभूत सीपी ही लक्षित होती है। इस प्रकार चाँदीका अभ्यास होनेपर मी दम्-अंशसे सीपी उसमें अनुगत रहतीही।
मुमुनुसर्यम्यसार
UneuroSOCINIANPUR
रुप्पं यथा स्वरूपेण शुक्त्यध्यस्ततया मृपा ।
तथाहमादयो भावाः स्वरूपेण मृपा चिति ।। ४४ ॥
शुक्ति में अभ्यस्त होनेके कारण जिस प्रकार चाँदी स्वरूपसे
मिथ्या ही है उसी प्रकार चेतनमें ये अहंकारादि भाव स्वरूपसे
मिथ्या ही हैं।
इदमंशस्य संसर्गो रूप्येऽध्यस्ततया मृपा ।
यथा तथात्मसंसर्गोऽनात्माध्यस्ततया मृपा ॥ ४५ ॥
जिस प्रकार, अध्यस्त होनेके कारण चाँदीके साथ शुक्तिके
इदम्-अंशका संसर्ग मिथ्या ही है उसी प्रकार अध्यस्तरूपसे अनात्मा-
के साप आरमाका संसर्ग मिथ्या ही है।
नीलपृष्ठत्रिकोणस्य यथा सम्यक्प्रबोधतः ।
ज्ञाते रूप्यस मिथ्यात्वे शुक्तिरेवावशिष्यते ॥ ४६॥
तथाद्वयात्मबोधेनाहङ्कारादेर्मपात्मता
सुद्धा यदा तदात्मैवावशिष्यते सुखाद्वयः ॥४७॥
जिस प्रकार अच्छी तरह देखनेसे नील पृष्ठ और त्रिकोणता.
का ज्ञान हो जानेपर जब चाँदी मिथ्या प्रतीत होने लगती है तो
केवल शुक्ति ही शेष रह जाती है, उसी प्रकार अद्वितीय आत्माका
ज्ञान होनेपर जब अहंकारादिके मिथ्यात्वका ज्ञान होता है तो
एकमात्र आनन्दस्वरूप आत्मा ही शेष रह जाता है।
अतो न शून्यतावादप्रसङ्गोऽत्र कथचन ।
पाधावधितया शिष्टे चिति शून्यं कथं भवेत् ॥ १८॥
प्रथम प्रकरण GRUGrxi raavanGION अतः इस ( आत्मा और अनात्माका इतरेतराध्यास माननेके पक्ष ) में शून्यबादकी प्राप्तिका कुछ भी प्रसंग नहीं है। जो चित्सत्ता अनात्म-पदायोंका बाध करते-करते उस ( बाध) की अवधिरूपसे बच रहती है वह शून्य कैसे हो सकती है ! एवमाविद्यकः सर्यो भोग्यादिलक्षणचिति । अध्यस्तत्वात्सरूपेण मिथ्यास्याच्छुक्तिरूप्यवत् ॥४९।। इस प्रकार चेतनमें अविद्यासे प्रतीत होनेवाले ये भोग्यादिरूप सम्पूर्ण पदार्थ, अभ्यस्त होनेके कारण, शुक्तिमें भासनेवाली चाँदीके समान वरूपसे मिथ्या ही हैं। अध्यासनिरूपण नन्यध्यस्तस्य मिथ्यात्वं सिद्धेश्भ्यासे हिसम्भवेत् । सोऽसिद्धो लक्षणादृष्टेरिति चेचद्वदामि ते ॥५०॥ 'अभ्यस्त वस्तुका मिथ्यात्व अभ्यासके सिद्ध हो जानेपर ही सम्भव है किन्तु कोई लक्षग न देखा जानेके कारण इस आत्मामें अभीतक अभ्यास सिद्ध ही नहीं है पदि ऐगा कहो तो मैं तुम्हें बताता हूं- अध्यासोऽध द्विधा मेयो शानार्थाप्यासमेदतः । अन्यत्रान्यायमासादि ज्ञानाच्यासादिलक्षणम् ।।५१॥ यो शानाध्यास और अर्पाप्यास से दो प्रकारका अप्याम सममना धादिये । अन्य पदार्थम अन्य पदार्पा भासित होना- यही शनाप्पासादिका सभग है।
CCOUNRNIORGraparxind मुमुक्षुसर्यवसार वतोऽज्ञानेन संछन्ने चिन्मात्रे परिकल्पितम् । भोक्तृभोग्यादिकं सर्वमन्नानं चापि कल्पितम् ॥५२|| अतः अज्ञानसे आच्छादित चेतनमात्रमें ही भोक्ता-मोग्यादि समस्त भाव और अज्ञान भी कल्पित हैं। अज्ञानमपि चिन्मात्रेऽस्त्यध्यस्तं नैव वस्तुतः । खाध्यासेऽपेक्षते नान्यत्संवित्स्वकाशने यथा ॥५३॥ अज्ञान भी उस चिन्मात्रमें अध्यस्त ही है-वस्तुतः नहीं, क्योंकि उस ज्ञानस्वरूपको जिस प्रकार अपने को प्रकाशित करनेमें किसी अन्य पदार्थकी अपेक्षा नहीं है उसी प्रकार अपने अध्यासमें भी किसीकी आवश्यकता नहीं है । स्वविपयं यथैवात्मा स्वं चाप्ययं प्रकाशते । परमते तथाज्ञानं खं स्वकार्य च निर्वहेत् ॥५४॥ जिस प्रकार [ मीमांसकादि ] अन्य वादियोंके मतमें आत्मा अपने विषयोंको और अपनेको भी प्रकाशित करता है उसी प्रकार वह अपने अज्ञान और अपने कार्यका भी निर्वाह करता है। चिद्रूपेऽज्ञानसिद्धौ हि मानं नैवोपलभ्यते । अज्ञोऽहमिति चोधात्तु व्यतिरेकेण किञ्चन ॥५५॥ 'मैं अज्ञानी हूँ इस अनुभवके सिवा चेतनस्वरूप आत्मामें अज्ञानकी सिद्धि करानेमें और कोई प्रमाण नहीं देखा जाता । ततोऽज्ञानं सकार्य सान्निध्यैव शुक्तिरूप्यवत् । एवं धात्मा स्वताशुद्धोऽतो विपयादि सिध्यति ॥५६|| + 4 प्रथम प्रकरण अतः शुक्तिमें भासनेवाली चाँदोके समान अज्ञान अपने कार्यके सहित मिथ्या ही है । इस प्रकार आत्मा स्वयं तो शुद्ध ही है; उसीसे विषय आदि सिद्ध होते हैं । भेदकी असत्यता जीवस्य ब्रह्मणाभेदज्ञानं मोक्षस्य साधनम् । तयोर्भेदस्तु मिथ्यैवाध्यस्तत्वाचन्द्रमेदवत् ।।५७॥ ब्रह्मके साथ जीवका अभेद ज्ञान होना ही मोक्षका साधन है । [ नेत्रदोषसे प्रतीत होनेवाले ] चन्द्र-भेदके समान अव्यस्त होनेके कारण उनका भेद तो मिथ्या ही है। न तद्वितीयमस्तीति भेदासत्वं श्रुतिर्जगौ। स्वल्पं यः कुरुते भेदं तस्यापरा भयं जगौ ॥५८॥ श्रुतिने भी 'उससे भिन्न दूसरा कोई नहीं है' ऐसा कहकर भेदकी असत्ता बतलायी है; तया एक दूसरी श्रुतिने जो पोडा-सा भी भेद करता है उसे भयकी प्राप्ति कही है। नास्ति द्वैतं कुतो मर्त्यमित्याह स्मापरा श्रुतिः । पञ्चधा भेदमिथ्यात्वेऽनुमानान्यपि सन्ति च ॥ ५९॥ एक अन्य श्रुतिने कहा है-'द्वैत है ही नहीं, फिर नाशवान् पदार्य कहाँसे आये' इसके सिवा पाँचों प्रकारके भेदोंके* मिथ्या होने अनुमान प्रमाण भी हैं। -पाँच प्रकारके भेद ये है--(१)जीव और ईश्वरका भेद, (२) जीय और जगत्का भेद, (३) जीवोंका पारस्परिक भेद, (४) ईश्वर और जगत्का भेद, (५)जगत्का स्वगत भेद।
१६ मुमुक्षुसर्वस्वसार GOLOGROUNCTERIODERIODGAOURCED विवादाभ्यासितो भेदो मिथ्या भवितुमर्हति । भेदत्वादर्पणावादी बिम्बितास्यादिभेदयत् ॥ ६०॥ [यपा विवादसे अध्यस्त किया हुआ भेद मिथ्या होना चाहिये; क्योंकि यह भेद है। [जो-जो भेद है यह मिथ्या ही हुआ करता है ] जैसे दर्पण और पानी इत्यादिमें प्रतीत होनेवाले मुस आदिके भेद [ मिथ्या होते हैं। विमता भेदसंविच मिथ्या भवितुमर्हति । भेदसंवेदनत्याद्धि समार्थभेदधीर्यथा ॥ ६१॥ भेद-ज्ञानरूप होनेके कारणविरुदपक्षसम्मत भेद-युद्धि भी मिथ्या होनी चाहिये, जैसे कि सममें प्रतीत होनेवाले पदार्थोंका भेद-मान । भेद-निषेध एवं हि भेदमात्रस्य नसानस्यापि दणितम् । मिथ्यात्वं तस्रोिपा निषेपोऽप्यध कथ्यते ॥ २ ॥ इस प्रकार सामान्यतः मेदभाव और भेद-साना मी मिथ्यारव दिखाया | अब उमक विशेष भेदोंका भी निषेध (अनुमान- प्रभागवारा ही किया जाता है। जीगरमा अनमो नव नाचिकमेदवान् गदा । मचिदानन्दरूपवादात्मनाथ परेशरत् ॥ ६३॥ महिदानन्दाय और आमा होने के कारण जावामागे कमी माविकद नहीं है किपरमेयाका अनेगे भेद नहीं है।
प्रथम प्रकरण GGREASOGrceloneORGROGRNOORNCOGRAORo जीवात्मा सचिदानन्दो वेदवाक्यप्रमाणतः । तसान हेत्वसिद्धयादेः शङ्का युक्तह काचन ॥६४॥ वेदवाक्यों के प्रमाणसे जीवात्मा सच्चिदानन्दरूप है । अतः इसमें हेतुकी असिद्धि आदिकी कोई शंका करनी उचित नहीं है। विवादाध्यासिता जीवास्तत्त्वतः प्रतिवादिनः । न मिन्ना जीवभावनात्मत्वाद्वा प्रतिवादिवत् ॥६५॥ प्रतिवादीके विपरीत मतसे आरोपित जीव वास्तवमें जीवरूपसे अपवा आत्मस्वरूप होने के कारण परस्पर भिन्न नहीं हैं; जैसे प्रतिवादी जीव [अर्थात् जैसे प्रतिवादीके विचारसे मी जीव आत्मासे अभिन्न है उसी प्रकार भिन्न-भिन्न जीव भी आत्मासे अभिन्न होने और आत्मामें वस्तुतः कोई भेद न होनेके कारण परस्पर भिन्न नहीं हैं ] । जगजीवात्मनोआंदो न सत्यः स्यात्तु वस्तुतः। भेदत्यादिन्द्रजालान्तर्गतपदार्थभेदवत् [जो भेद है वह सत्य नहीं होता, इस व्याप्तिके अनुसार] जगत् तया जीवात्माका भेद भी वस्तुतः सत्य नहीं है क्योंकि वह भी भेद है। जैसे इन्द्रजालसे प्रतीत होनेवाले पदार्थोके भेद [सत्य नहीं होते] । ईशप्रपञ्चयोथापि भेदः सत्यो न वस्तुतः । भेदत्वात्स्वमभावानां परस्परभिदा यथा ॥ ६७॥ भेदरूप होनेसे ही ईश्वर और प्रपञ्चका भेद भी वास्तवमें सत्य नहीं है। जिस प्रकार खमके पदार्पोका पारस्परिक भेद सत्य नहीं होता। २ १८ GROURGreade Supremiance मुमुझसर्वस्वप्तार विवादाभ्यासितो भेदो जगतोऽपीतरेतरम् । न ताचिको हि भेदत्वान्मनोराज्यार्थभेदयत् ॥ ६८ ॥ विपरीत वादोंद्वारा आरोपित जगत्का पारस्परिक भेद भी,भेद- रूप होनेसे वास्तविक नहीं है। जैसे कि मनोराज्यके पदार्योंका भेद । तश्चमस्यादिवाक्यानां वहूनां खलु बाधतः । प्रत्यक्षाद्यप्रसिद्धत्त्वादफलत्वान्मृपात्वतः ॥६९॥ द्वेत्यादिभेदवाक्यानां न भित्तास्त्यर्थगोचरा । जीवादीनां ततो भेदो मिथ्यैव न च संशयः ॥७॥ [भेद माननेसे ] 'तत्त्वमसि' आदि बहुत-से वाक्योंका बाध होगा-इसलिये, तथा प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे असिद्ध, निष्फल और मिथ्यारूप होनेसे भी 'द्वा सुपर्णा' आदि भेदवाक्योंका अभिप्राय भेद नहीं है । अतः इसमें सन्देह नहीं कि जीवादिका भेद मिथ्या ही है। प्रकाशादिवदित्यादिस्ष्यौपाधिकी मिदा । दर्शिता सूत्रकारेण भाष्ये भाष्यकता तथा ॥७॥ 'प्रकाशादिवच्चावैयात्' (७० ३ ॥ २॥१५) इत्यादि सूत्रोंमें सूत्रकार (व्यासजी) ने तथा शारीरक भाप्यमें भाष्यकार (श्रीशङ्करा- चार्य) ने भी भेद उपाधिकृत ही दिखलाया है। ननु भेदस मिथ्यात्वे साकये सुखदुःखयोः । स्यादिति चेन्न मैदस्याप्यङ्गीकारादुपाधिना ।। ७२ ।। अब, यदि कहो कि भेदके मिथ्या सिद्ध होनेपर तो सुख-दुःख-
100GRIOR
प्रथम प्रकरण
NAGARIGOG
में संकरता हो जायगी, तो ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि
उपाधिसे भेद भी अङ्गीकार किया गया है।
औपाधिकेन भेदेन स्याद्वयवस्था सुखान्ययोः।
प्रकाशेत्यादिसूत्रैश्च तामप्याह स सूत्रकृत् ॥७३॥
इस प्रकार औपाधिक भेदसे सुख-दुःखकी भी व्यवस्था हो
जायगी। सूत्रकारने 'प्रकाशादिवञ्च०' आदि सूत्रोंसे उसका भी
प्रतिपादन किया है।
तसाझेदश्रुतिर्वाघ्या याधिकाभेदगा श्रुतिः ।
एवमुक्तं मिदासत्वं वन्धः स्याद्यत्तदुच्यते ॥ ७४ ॥
अतः भेद-प्रतिपादिका श्रुति बाधित होनेवाली है और
अभेद-श्रुति उसका बाध करनेवाली है । इस प्रकार भेदके
असत्यत्यका प्रतिपादन किया; अब जिसे बन्धन कहते हैं उसका
वर्णन किया जाता है।
वन्धनिरूपण
कर्तृत्वादिकवन्धः सनध्यस्तत्वाद्भवेत् खलु ।
यदित्थं तचथा दृष्टं शुक्तिरूप्यादिकं यथा ।।७५॥
कर्तृत्वादि बन्धन अभ्यस्त होनेके कारण निश्चय ही सत्य नहीं
हो सकता । जो ऐसा [ यानी अभ्यस्त होता है वह वैसा [यानी
मिथ्या] ही देखा जाता है जैसे कि सीपीमें मासनेवाली चाँदी।
तसादुद्धपविवेकेनैवात्मा पद्ध इवेक्ष्यते ।
स्ववस्तु सर्वदा मुक्तस्तत्त्वज्ञैरवघार्यते ॥७६ ॥
२० . , मुमुक्षुसर्यस्ससार OGRAMICRUIRCUGUSDGREOGaunGOOO इसलिये मुद्रिके अयिवेकसे ही आत्मा वद्ध-जैसा प्रतीत होता है। किन्तु स्वतः तो यह सदा मुक्तखरूप ही है ऐसा तत्वज्ञानी पुरुप निश्चय करते हैं। औपाधिकं तु कर्तृत्वाद्यात्मनि नैव वास्तवम् । तद्गुणेत्यादिसूत्राम्यां सूत्रकृतापि दर्शितम् ॥ ७७ ।। आत्मामें कर्तृत्वादि भाव उपाधिजनित ही हैं-वास्तविक नहीं। यहबात सूत्रकारने भी 'तद्गुणसारत्यात्त' इत्यादि दो सूत्रोंसे*दिखायी है। आत्माकी सुखस्वरूपता सादात्मा सुखरूपश्च परप्रेमास्पदत्वतः । य एवं न भवेन्नासौ प्रियतमो यथा घटः॥७८॥ परप्रेमका आश्रय होनेसे आत्मा सुखखरूप भी है । जो ऐसा [यानी परप्रेमका आस्पद ] नहीं होता, वह प्रियतम भी नहीं हुआ करता; जैसे घट। * वे स्त्र ये हैं-'तद्गुणसारत्यात्तु तद्वयपदेशः प्राशयत्' (२।३ । २९) और 'यायदात्मभायित्याञ्च न दोपस्तद्दर्शनात्' (२।३।३०)। यदि आत्मा विभु है तो उसे अणु आदि क्यों बतलाया गया है ? ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं- संसारी होने में ] आत्मामें बुद्धिके गुणोंकी प्रधानता होनेके कारण उसका बुद्धि-परिमाणरूपसे निर्देश किया जाता है। जैसे कि प्राज (परमात्मा) को अणु आदि कहकर पुकारा जाता है; यह पहले सूत्रका आशय है । इससे यह शङ्का होती है कि यदि आत्माका संसारित्व पुद्धिसे संयोग होनेके ही कारण है तो जिस समय घुरिसे इसका वियोग हो जायगा उस समय उपलब्धिका नेके कारण आत्माका असत्यत्व ही . साधन न प्रथम प्रकरण २१ 4GRIORGRusRGNNERGRUGGRISORNINGrea600 सजातीयादिभेदस्य दुःखादेच न तत्वतः । आत्मीयता यतस्तस्य सुप्तौ क्लप्ता सुखात्मता ॥७९॥ सजातीयादि भेद और दुःखादि वास्तवमें आत्माके गुण नहीं हैं, क्योंकि सुषुप्तिमें उसकी सुखस्वरूपता मानी गयी है। सुखमत्राहमखाप्समिति सुप्तेः समुत्थिताः । सरन्ति च निजानन्दं प्रत्यहं सर्वमानवाः ॥ ८॥ सभी लोग नित्य ही सुषुप्तिसे उठकर 'मैं सुखपूर्वक सोया' इस प्रकार आत्मानन्दका स्मरण किया ही करते हैं । स्मृतेस्त्वनुभवाजन्म संस्कारद्वारतो मतम् । अतः स्मृतेर्निदानस्यानुभवस्यापि मानता ॥८१॥ स्मृतिका जन्म संस्कारद्वारा अनुभवसे ही माना गया है। अतः [मैं सुखपूर्वक सोया-इस ] स्मृतिका मूलकारण अनुभव भी इसमें प्रमाण है। सौपुप्तानुभवेनेत्थं सिद्धात्मनः सुखात्मता । दुःखादिश्च भवन्मिथ्या सुप्तावनुपलन्धितः॥८२॥ निश्चित होगा। इसी शङ्काका दूसरे सूत्रसे उत्तर दिया गया है। उसका तात्पर्य यह है कि 'यह आत्मा जबतक संसारी है तभीतक इसका बुद्धिसे संयोग है। इसलिये इसमें पूर्वोक्त दोष नहीं आ सकता और ऐसा ही शास्त्रोंने प्रदर्शित भी किया है। क्योंकि वास्तयमें तो आत्मा ही एक सत्पदार्थ है, और तो जो कुछ ,बुद्धि आदि दिखलायी देते हैं वे अविद्यापश उसमें आरोपित ही है।
૨ मुमुक्षुसर्वखसार RUSOGaxsRGRIGIGRUNGISGRRIORGASOO इस प्रकार सुषुप्तिके अनुभवसे मी आत्माकी सुखखरूपता सिद्ध होती है तथा सुषुप्तिमें उपलब्ध न होनेके कारण दुःख आदि मिथ्या ही हैं। अन्यकी सफलता इत्यं वै वेदमूलेनानुमानेनेह दर्शिता । भेदमात्रस मेदानां पन्धस्य च मृपात्मता || ८३॥ इस प्रकार यहाँ वेदमूलक अनुमानसे आरमामें भेदमात्रकी तथा भेदजनित यन्धनकी असत्यता दिसलायी गयी है। जीवस्य ब्रह्मणाभेद एवं सत्युपपद्यते । साते रासिंस्तदज्ञानं सविलासं मिनदयति ।। ८४ ।। ऐमा होनेपर ही प्रामक साप जीयका अभेद सिद्ध होता है। उस (प) का ज्ञान होते ही यह अडान अपनी लीलाके सहित नष्ट हो जाता है। तसिमष्टे तु शाखस विपपः सप्रयोजनः । सिद्धयत्येवं हि शाखेऽसिन्धीमत्तिकारणम् ।। ८५॥ अडानका नाश हो जानेपर कारका विषय अपने प्रयोजनक महित सिम हो जाता है। प्रकार पाहमशाग्र युधिमानोंकी प्रवृति होनेशा कारण है। शाम्रोपयोनी: मिदा प्रत्यमामापिमिभ्यनि । मालो दिसा यस्मानस्य प्रकरचं वयम् ॥८६॥ .
प्रथम प्रकरण २३ उन शास्त्रीय विषय और प्रयोजनोंके सिद्ध होनेपर इस ग्रन्थ- का विषय भी सफल सिद्ध होता है; क्योंकि यह भी उसीका एक प्रकरण है। विपयादिविचाराख्यं ग्रन्थारम्भोपपादकम् । आय प्रकरणं पूर्ण जातं रामप्रसादतः ।।८।। इस प्रकार प्रन्पका आरम्भ करनेवाला यह 'विपयादि-विचार' नामक प्रथम प्रकरण भगवान् रामकी कृपासे पूर्ण हुआ। इति श्रीमुमुक्षुसर्वखसाराभिवे ग्रन्थे विपयाधुपपादकं प्रथमं प्रकरणम् । भी पिली नागरी प्रहार २.८५० द्वितीय प्रकरण M -- चित्तशुद्धिके साधन संग्रहकर्तृचनम् विवेकादिचतुर्भिहिं साधनः श्रुतिनोदितः । सम्पन्नस्यैव शुद्धान्तःकरणस्य यतरिह ॥१॥ अधिकारोऽस्ति वेदान्तश्रवणे अतिचोदिते । सम्यग्नमात्मनोरक्यं तुर्य्यस्य ज्ञातुमीप्सतः॥२॥ जो श्रुत्युक्त विधकादि चारों साधनोंसे सम्पन्न तथा शुद्धचित्त है और जामदादि तीनों अवम्यासे अतीत प्रन एवं आग्मा पूर्ण एकत्यकी जिज्ञासा रगता है ने यतिका ही इस श्रुनि-प्रति- पादित वेदानशासक श्रवणर्ने अधिकार है। अन्तःकरण शुद्ध मापनानीह भूरियः । वस्यन्ते नां विना सिद्धिविकादयतो न हि ॥३॥ वर पाबलःकरणको मदन गुनिय टिये अनेकों गायन बताये पार, वकि उम (चिन दि) के.शिना विवेक आदिको निति नहीं हो सकी।
२५ SOCIEX द्वितीय प्रकरण OGRUARGINOGRASRGANISRGRINDE नन्वन्तःकरणस्य स्याच्छुद्धिः केनेह हेतुना। रागादिमलदिग्धस्य पकेनेव पटस्य वै ॥४॥ शक्षा-कीचड़में लिपड़े हुए वस्त्रके समान राग आदि मलसे भरे हुए इस अन्तःकरणकी शुद्धि भला कैसे हो सकती है ! तदभावे विवेकादि स्यादन्तःकरणे कथम् । पकलिप्ते यथा वस्त्रे दुर्लभा रागरञ्जना ।। ५ ॥ और अन्तःकरणकी शुद्धि हुए बिना उसमें विवेकादिका प्रादुर्भाव भी कैसे हो सकता है ! जिस प्रकार कीचड़में सने हुए वलपर कोई भी रंग चढ़ना अत्यन्त दुर्लभ है । विवेकादेरभावे च न तत्त्वज्ञानसम्भवः तदभावे मुधैव स्याद्वेदोक्तं सर्वसाधनम् ॥ ६॥ इस प्रकार विवेकादिका अभाव रहनेपर तत्त्वज्ञानका होना किसी प्रकार सम्भव नहीं है, और उस ( तत्वज्ञान ) के अभावम तो वेदमें कहा हुआ सारा साधन व्यर्थ ही है। यापावल्क्यस्मृती मलिनो हि यथादर्शो रूपालोकस्य न क्षमः । तथाविपककरण आत्मज्ञानस्य न क्षमः ॥७॥ जिस प्रकार मलिन दर्पण रूपका प्रतिबिम्ब दिखाने में समर्थ नहीं होता उसी प्रकार जिसमा अन्तःकरण परिपफ (वासनाशून्य) नहीं है यह आत्मज्ञान प्राप्त करनेमें समय नहीं होता ।
२६. OGRESERNOOGraRICORNBOGrevORGANINGra. मुमुक्षुसर्ष ससार संगृहकर्तृवचनम् इति स्मृत्या च सम्प्रोक्तो ज्ञानाभावो हि तां विना । इस प्रकार स्मृतिने चित्तशुद्धिके बिना ज्ञानका अमाय बतलाया है। भृणु त्वं सत्वशुद्धस्तु साधनं वेदसम्मतम् । फलाशां परिहायादौ यत्स्वधर्माभिसेवनम् ॥ ८॥ समाधान-अब तुम चित्तशुद्धिके वेदविहित साधन सुनो। उनमें फलकी अभिलापा त्यागकर अपने धर्मका आचरण करना सबसे पहला साधन है। पापादीनि नरस्येह सत्याशुद्धिकराणि वै। धर्मेणेत्यादिवाक्यानि धर्म तनाशकं विदुः॥ ९॥ इस लोकमें पाप आदि मनुष्यके चित्तको अशुद्ध करनेवाले है। 'धर्मेग पापमपनुदति' * ( ना० उ० ७९) इत्यादि यास्य धर्मको उन पापादिका नाम बतलाते हैं। दूपित अन्नका त्याग कार्य सच्चविशुद्धधर्थ सरायमकर्मणाम् । अनुष्ठानं यथा त्याज्यं तया दुष्टासमक्षणम् ॥१०॥ मनुष्यो चिटकी शुद्धिक ठिये जिस प्रकार अपने वर्णाश्रम- • धर्मने पाप दूर होता है।
. द्वितीय प्रकरण २७ MURGENADA धमोंका अनुष्ठान करना आवश्यक है उसी प्रकार उसे दृपित अन्नका भोजन भी त्याग करने योग्य है। अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति पुंसां पापानि वै यतः । तसात्सत्त्वविशुद्धयर्थी दुष्टानस्याशनं त्यजेत् ॥ ११ ॥ क्योंकि मनुष्यके सम्पूर्ण पाप अनके आश्रय ही स्थित रहते हैं, इसलिये चित्तशुद्धिकी इच्छावाले पुरुषको दुष्टान्न भक्षण करना छोड़ देना चाहिये । दुष्टान्नमक्षणस्यापि सत्याशुद्धर्हि हेतुता । पराशरादिभिः प्रोक्ता तद्वाक्यानि लिखाम्यतः ॥१२॥ पराशरादि स्मृतिकारोंने भी चित्तकी अशुद्धिमें दुष्टान्न-भक्षण- को कारण बतलाया है । अतः अब मैं उनके वचन लिखता हूँ। पराशरस्मृती अन्नदोपेण चित्तस्य कालुष्यं सर्वदा भवेत् । कलुपाकृष्टचित्तानां धर्मः सम्यङ् न भासते ॥ १३ ॥ अन्नके दोपसे सदा ही चित्त अशुद्ध होता है, और जिनका 'चित्त दृपित होता है उन्हें धर्मको यथावत् प्रतीति नहीं हुआ करती। दुष्कृतं निखिलं नृणामन्नाधारे व्यवस्थितम् । तस्य प्रतिग्रहं कुर्यान्नापरीक्ष्य कथश्चन ॥ १४ ॥ मनुष्योंका सारा पाप अनके ही आधारपर स्थित है; अतः अन्नकी परीक्षा किये बिना उसे कमी ग्रहण न करना चाहिये ।
૨૮ OURGRus JIODERN Mus मुमुक्षुसर्वस्वसार अकर्तव्यमकर्तव्यं प्राणः कण्ठगतैरपि। कर्तव्यमेव कर्तव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥१५॥ जो अकर्तव्य है उसे प्राणोंके कण्ठगत होनेपर भी नहीं करना चाहिये और जो कर्तव्य है उसे ही प्राणों की बाजी लगाकर भी करना चाहिये। याज्ञवल्क्यस्मृती कर्तव्याशयशुद्धिस्तु भिक्षुकेण विशेषतः । ज्ञानोत्पचिनिमित्चत्वात्स्वातन्त्र्यकरणाय च ॥१६॥ ज्ञानोत्पत्तिकी निमित्तरूप होनेसे भिक्षुको सातव्य-प्राप्तिके लिये विशेषरूपसे चित्तकी शुद्धि करनी चाहिये । संग्रहकर्तृवचनम् दुष्टान्नान्यपि चोक्तानि धर्मशास्त्रे हि मानवे । मारतेऽपि तथोक्तान्यनुवदाम्यत्र तान्यपि ॥१७॥ इन दुशनोंका वर्णन मानव धर्मशास्त्र ( मनुस्मृति ) और महाभारतमें भी किया है। यहाँ में उनके याक्योंको उद्धृत करता हूँ। मनुस्मृती राजानं तेज आदत्ते शूद्राग्नं ब्रह्मवर्चसम् । आयुर्हि स्वर्णकाराग्नं यशचावकर्तिनः ॥ १८ ॥ राजाका अन्न प्रमायको, शूद्रका अन्न ब्रह्मतेत्रको, छनारफा आयुको और चर्मकारका अन्न यसको क्षीण करता है ।
.
द्वितीय प्रकरण
२९
ತಾಜಾಚಾರ SONGroudio
कारुकानं प्रजा हन्ति वलं निणेजकस्य च ।
गणानं गणिकानं च लोकेभ्यः परिफन्तति ॥१९॥
शिल्पकारका अन्न सन्तानका नाश करता है, धोबीका अन्न
बलको नष्ट करता है तथा गण (संघ) और गणिका (वेश्या )
का अन्न मनुष्यको शुभलोकोंसे दूर कर देता है।
पूयं चिकित्सकस्यान्नं पुंश्चल्यास्त्वन्नमिन्द्रियम् ।
विष्ठा वाधुपिकंस्थानं शस्त्रविक्रयिणो मलम् ॥२०॥
चिकित्सकका अन्न पीव, कुटटाका वीर्य, सूदखोरका विष्ठा
तथा शत्र बेचनेवालेका अन्न मटके तुल्य है ।
न राज्ञः प्रतिग्रहीयादराजन्यप्रसूतितः।
सूनाचक्रध्वजवतां वेशेनैव च जीवताम् ॥ २१ ॥
जो क्षत्रियसे उत्पन्न न हुआ हो ऐसे राजाका तया कसाई,
तेली, कलवार अपवा स्वाँग रचकर ही जीविका उपार्जन करनेवाले
पुरुषका अन्न न ले।
दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो वजः।
दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृपः॥ २२ ॥
दश कसाइयोंके समान एक तेली होता है, दश तेलियोंके
समान एक कलवार है, दश कलवारों के समान एक स्वाँगी है
और दश स्वॉगियोंके समान एक राजा है।
दशमनासहस्राणि यो वाहयति सौनिकः ।
तेन तुल्यः स्मृतो राजा पोरस्तस्य प्रतिग्रहः ॥२३॥
३० SGRRIAGRICORICS मुमुक्षुसर्वस्वसार इस प्रकार जो कसाई दश सहस्र हत्या करता है उसके समान राजा माना गया है। अतः उसका अन्न ग्रहण करना अतिभयावह है। यो राज्ञः प्रतिगृहाति लुन्धस्सोच्छात्रवर्तिनः । स पर्यायण यातीमानरकानेकविंशतिम् ।। २४ ।। जो पुरुष शास्त्रमार्गको छोड़कर चलनेवाले अर्थलोलुप राजाका अन्न ग्रहण करता है वह बारी-बारीसे इन इक्कीसों नरकोंमें जाता है। महामारते दीक्षितस्य कदर्यस्य ऋतुविक्रयिकस च । तक्ष्णवर्मावकर्तुच पुंचल्या रजकस्य च ।। २५॥ यामहस्ताहतं चाग्नं भुक्तं पर्युषितं च यत् । मुरानुगतमुन्छिएममोज्यं शेषितं च यत् ॥ २६ ॥ पक्षमें दीक्षित, अपन्न कृपा, यव-माल बेचनेवाले, यहाँ, धर्मकार, व्यभिचारिणी और घोका बन्न, तथा बाय बापने परोसा हुआ, मुक्तरोप (अपना जूठा), पर्युपिन (मासी), मदिरासे मिटा हुआ, रन्टिष्ट और इसके लिये बचाया हुआ अन्न अभोग्य है। समानमेकपक्षरयां तु मोज्यमन नरेगर । विष हालाइ मुख्ने योश्रदाय मुरजने ॥२७॥ है राजन् ! पनिमें एक समान अग्न ही माना चाहिये। जो पुरए जाने पर-मित्रों को दिना दिये अकरा हो मोबन मरता है पहलाट विरही पाता है।
द्वितीय प्रकरण
३१
GALORGAGRONTENDEDGENOGRao
मनुस्मृती
य एतेऽन्ये त्वभोज्याना क्रमशः परिकीर्तिताः।
तेपां त्वगस्थिरोमाणि बदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥२८॥
जिनका अन्न खाने योग्य नहीं है, ऐसे जिन अन्य वर्णोकी
यहाँ क्रमशः चर्चा की गयी है, उनके अन्नको मनीपिजन त्वचा, अस्थि
और रोमके तुल्य बतलाते हैं ।
संग्रहकर्तृपधनम्
क्षुधया पीड्यमानस्य मरणमापतेद्यदि ।
तदा दुष्टान्नमुक्तौ न दोपोऽस्तीत्यत्रवीन्मनुः ॥ २९ ।।
यदि भूखसे व्याकुल हुए किसी मनुष्यका मरणकाल उपस्थित
हो जाय तो उस समय उसे दूषित अन्न भोजन करनेमें कोई दोष
नहीं है-ऐसा मनुजीने कहा है।
मनुस्मृती
जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः ।
आकाशमिव पडून न स पापेन लिप्यते ॥ ३० ॥
जो पुरुष जीवनका अन्त उपस्थित होनेपर जहाँ-तहाँसे
अन्न ग्रहण कर लेता है वह कीचड़से आकाशके समान पापसे
लिप्त नहीं होता।
संग्रहकर्तृवचनम्
येन केनाप्युपायेन स्वधर्म परिपालयेत् ।
इति मन्वादितात्पर्यमतो नात्र विरोधता ॥३१॥
३२ मुमुक्षुसर्यस्यसार OGROLUSIGNERNORNOOGLE GANE यहाँ मनु आदिका यही तात्पर्य है किजैसे बने वैसे ही अपने धर्मका पालन करे। अतः उनके इस कपनमें पूर्वापर-विरोध नहीं है । स्वधर्मपालन नन्वन्तःकरणस्य प्राग्यदुक्तं शुद्धिसाधनम् । स्वधर्मस्याभिसेवाख्यं तत्सम्यक् स्यात्कथं न्विह ॥ ३२ ॥ प्रश्न-आपने पहले अपने धर्मका पालनरूप जो अन्तःकरणकी शुद्धिका साधन बतलाया था वह इस लोकमें भली प्रकार कैसे सिद्ध हो सकता है। यतो लक्षणमानाम्यां वस्तुसिद्धिः प्रभण्यते । धर्मस्य लक्षणं चातो धर्मे मानं च संवद ।। ३३ ॥ क्योंकि पदार्थकी सिद्धि लक्षण और प्रमाणसे ही कही जाती है, अतः आप धर्मका लक्षण और उसमें प्रमाण वतलाइये । लक्षणं शृणु धर्मस्य तत्र मानं तथा शृणु । जैमिन्यावृषिवाक्याम्यां तवयं हि वदामि ते ॥ ३४ ॥ उत्तर-अब तुम धर्मका लक्षण और धर्ममें प्रमाण सुनो । मैं जैमिनि आदि ऋपियोंके दो वाक्योंसे उन दोनोंका वर्णन करता हूँ। चोदनालक्षणो धर्म इति धर्मस लक्षणम् । श्रीमज्जमिनिना प्रोक्तं मानं तु मनुनेरितम् ॥ ३५॥ 'विधेयरूपसे [वेदोंका] अनुशासन हो धर्म है'-यह श्रीमान् जैमिनिने धर्मका लक्षण वतटाया है, तपा मनुजीने उसके विषयमें ये प्रमाण कहे हैं- द्वितीय प्रकरण ३३ GRNIORGANISOGRIDGINGRNORGANINGroo मनुस्मृती वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारचैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥३६॥ सम्पूर्ण धर्मका मूल वेद है । इसके सिवा वेदवेत्ताओंकी स्मृतियाँ और स्वभाव, साधु पुरुपोंका आचरण और अपने चित्त- की प्रसन्नता [ये भी धर्मके सम्बन्धमे प्रमाण हैं | संग्रहकर्तृवचनम् स्वधर्मोऽनुष्ठितः सम्यनिष्कामः सत्वशुद्धिदः । स्ववर्णाद्यनुसारेण कामो घनर्थकारणम् ॥ ३७॥ अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार सम्यक् प्रकारसे निष्काम- मावसे अनुष्ठान किया हुआ खधर्म चित्तशुद्धि करनेवाला होता है और वही सकाम होनेपर अनर्थ ( जन्ममरणरूप संसार ) का हेतु होता है। कामात्मता न प्रशस्तेत्युक्तवांश्च यतो मनुः। तस्मात्कामं परित्यज्य कार्य खधर्मसेवनम् ॥ ३८॥ क्योंकि मनुजीने 'सकामता श्रेष्ठ नहीं है' ऐसा कहा है, इसलिये मनुष्यको कामना छोड़कर अपने धर्मका सेवन करना चाहिये। सदाचारस्तथा सेन्यो धर्ममूलं यतोऽस्ति सः । आचारप्रभवो धर्म इति वाक्यात्स्मृतीरितः॥३९॥ इसके सिवा, सदाचारका मी सेवन करना चाहिये; क्योंकि ३
३४
OGRAPrasad
मुमुक्षुसर्यवसार
MiO0PAIGNERGROGREJE0
यह धर्मका मूल है, और 'धर्म आचारसे ही प्रकट हुआ है'
इस वाक्यसे स्मृतिने भी यही बात कही है।
तथान्तःकरणस्यात्र शुद्धिं कर्तुमभीप्सता ।
निष्कामकर्म कर्तव्यं गीताशास्त्रानुसारतः॥४०॥
तथा गीताशास्त्रके अनुसार भी अन्तःकरणकी शुद्धि करनेकी
इच्छावाले पुरुषको निष्काम कर्म करना चाहिये ।
श्रीमद्भगवद्गीतासु
कायेन मनसा बुथा केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ।
युक्तःकर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमामोतिनैष्ठिकीम्।। ४१ ॥
योगिजन सब प्रकारकी आसक्ति छोड़कर अन्तःकरणकी
शुद्धिके लिये केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे ही सब
प्रकारके कर्म किया करते हैं । योगयुक्त पुरुष कर्मफलका त्याग
करके स्थिर शान्ति प्राप्त करता है।
चित्तशुद्धिका फल
संग्रहकर्तवचनम्
नन्वेवं कर्मणां चास्तु सत्वशुद्धेर्हि हेतुता।
तच्छुद्धेः किं फलं प्रोक्तं यदर्थ कर्म चोद्यते ॥४२॥
शृणु विविदिपा ज्ञानं वा मुख्यं कर्मणां फलम् ।
तमेतमिति वाक्येन संयोगस पृथक्त्वतः॥४३॥
द्वितीय प्रकरण OrvDORE यदि तुम कहो कि 'इस प्रकार कर्म चित्तशुद्धिके कारण है, तो रहें, परन्तु उस शुद्धिका क्या फल बतलाया गया है जिसके लिये कर्म करनेकी आज्ञा दी गयी है ? तो सुनो-'तमेतमात्मानं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन'* (वृ० उ०४ । ४ । २२ ) इत्यादि वाक्यके अनुसार 'एकस्य तूभयत्वे संयोगटयक्त्वम्' । इस न्यायसे कर्मोका मुख्य फल जिज्ञासा अपना ज्ञान ही है। स्थाद्वारं सत्त्वशुद्धिस्तु विविदिपादिसम्भवे । द्वारत्वात्कर्मजत्वेन तस्यास्तत्फलतरिता॥४४॥ जिज्ञासा आदिकी उत्पत्तिमें चित्तशुद्धि ही द्वार है, अतः कर्मजन्य होनेसे उसका द्वार होनेके कारण वह ( चित्तशुद्धि) जिज्ञासारूप फलवाली बतलायी गयी है। सत्त्वशुद्धिप्रसूतत्वं विविदिपात्मसंविदो। अतस्तत्फलताप्यस्ति तयोर्मुख्येति निश्चिनु ॥ ४५ ॥ .इस प्रसिद्ध आत्माको ब्राझणलोग वेदानुवचन, यज्ञ, दान, तप और उपवासद्वारा जानना चाहते हैं। + एकके उभयार्थक होने में फल-संयोगकी विभिन्नता कारण है', जैसे-'खादिरो यूपो भवति' ( यज्ञमें खदिरका यूप हुआ करता है) 'सादिरं वीर्यकामस्य यूपं कुर्यात' (पीर्यकी इच्छावाले पुरुषके लिये खदिरका यूप बनावे) इन वाक्योंके अनुसार एक ही 'खादिर यूप' फल-संयोग- भेदसे यज्ञ तथा पुरुष दोनोंके ही लिये है। इसी प्रकार यहाँ फल-संयोग- भेदसे एक ही कर्म ज्ञान और जिज्ञासा दोनोंका उत्पादक हो सकता है। .
मुमुक्षुसर्वस्वसार GRUDRAGNUARCANUARGourseION आत्मतत्वकी जिज्ञासा और ज्ञान चित्तशुद्धिसे ही होते हैं; अतः यह निधय मानो कि वे ही दोनों उसके मुख्य फल है। ननु च तद्यथेत्याधयहिं निन्दितत्वतः । सचशुद्धेस्तु हेतुत्वं कर्मणां नोपपद्यते ॥ ४६॥ मैवमुक्ता यतः श्रुत्या भगवद्गीतया तथा । निप्कामकर्मणां पुंसः सचशुद्धयादिहेतुता ॥ १७ ॥ यदि कहो कि 'तपर्यह कर्मजितो लोकः क्षीयते एयमेगा. गुत्र पुष्यजितो सोकः क्षीयते' * (मा० उ०८।१।६) आदि वास्योंसे कर्मको निन्दा की गयी है। इसलिये कर्म चित्तशुद्रिके कारण नहीं हो सकते, तो ऐमा कहना ठीक नहीं, क्योंकि श्रुति और भगवदीताने भी मनुष्यको चिनादि निष्काम कोश কাল মনিহান বিষয় । नयर्थत्यादिका निन्दा मा फलाशानिधिका । धर्मरेत्यादिवास्यानि स्मृत्वा पाशदिनो भर ॥४८॥ 'तपह...'आदिवास्योंगे जो कर्मको निन्दा की गयी है वह तो काटी आदशा ही निषेध कानेगरी है। इस विषयमें *धा पासमानुदानि' ( ना ३० ७९.) आदि वारयों को स्मरण पर नुन निवांक हो जाओ। परिचया मृत्यू नाति अन्यत्यवगम्यते । पंडदा तु दिना ककृतं मयम अधिकृत ॥४९॥ -मिर कोमretri मी र सग पुष्पोनर शेर जबर।
द्वितीय प्रकरण 'अविद्यया मृत्यु तीर्वा विद्ययामृतमश्नुते' * ( ई० उ० ११) इत्यादि श्रुतिसे भी यही जाना जाता है कि फलकी इच्छाके बिना किया हुआ कर्म चित्तकी शुद्धि करनेवाला होता है । 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।' इत्यादिस्मृतिभिश्चापि फलाशैव निषिध्यते ॥५०॥ 'कर्ममें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं इत्यादि [गीता आदि] स्मृतियोंसे भी फलकी कामनाका ही निषेध किया गया है । हृच्छयादेहि नन्वस्तु कर्मजत्वं श्रुतेर्बलात् । नात्मज्ञानस्य तद्युक्तं प्रमाणनं यतोऽस्ति तत् ॥५१॥ शका-श्रुतिकी सामर्थ्यसे चित्तशुद्धि आदि भले ही कर्मजन्य मान ली जायँ परन्तु आत्मज्ञानको कर्मजनित मानना तो किसी प्रकार उचित नहीं है, क्योंकि वह तो शब्दप्रमाणसे ही उत्पन्न होता है। विमतं ह्यात्मनो ज्ञानं नैव कर्माण्यपेक्षते । खोत्पत्ति प्रति मात्वेन घटज्ञानादिकं यथा ॥५२॥ आत्माका ज्ञान इस (कर्म) से विरुद्ध है । घटज्ञानादिके समान उसे अपनी उत्पत्तिमें प्रमाणरूपसे कर्मोकी अपेक्षा नहीं होती। वाक्यश्रवणमात्रात्स्यात्तत्त्वज्ञानं यतो नृणाम् । तेन मोक्षोऽपि संसिद्धयज्ज्ञानायातः क्रिया वृथा।॥५३॥ • अविद्या (कर्म) से मृत्युको पार करके विद्या ( उपासना) से अमरत्व प्राप्त करता है।
३८
मुमुक्षुसर्वस्वसार
OGrelianceDERRIGDrust
क्योंकि मनुष्योंको महावाक्यके श्रवणमात्रसे ही तत्वज्ञान हो
जाता है, और उसी (ज्ञान ) से मोक्षकी भी सिद्धि हो सकती है।
अतः ज्ञानोत्पत्ति के लिये कर्म करना वृथा ही है।
सत्यं प्रमाणजन्यत्वं ज्ञानस्यामाकमीप्सितम् ।
कर्मजत्वं तथाप्यस्य यज्ञेनेति श्रुतेर्बलात् ।। ५४ ॥
समाधान-ठीक है, ज्ञानका प्रमाणजन्यत्व हमें भी अभीष्ट
है। परन्तु 'यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन' (बृ० उ०४।४।२२)
इत्यादि श्रुतिके बलसे यह कर्मजनित भी सिद्ध होता है।
उत्पन्नमात्मनो ज्ञानं त्वनपेक्षं फलं प्रति ।
स्वोत्पत्तिं प्रत्यपेक्षेत कर्म योग्यतयाचवत् ॥५५॥
उत्पन्न हुआ आत्मज्ञान फटके प्रति निरपेक्ष है; किन्तु अपनी
उत्पत्ति के लिये उसे कर्मकी अपेक्षा है, क्योंकि कर्ममें ही चित्तशुद्धि-
द्वारा ज्ञान उत्पन्न करनेकी योग्यता है जैसे अच [कृषिमें उपयोगी
न होनेपर भी रप खींचनेमें तो उसकी योग्यता है ही।
अज्ञानस्य न चोच्छेद ज्ञानाद्भिग्रमपेक्ष्यते ।
तस्योत्पत्ती नैवान्यद्विवेकादरपेक्ष्यते ॥५६॥
अज्ञानका नाश होनेमें तो ज्ञानके सिवा और किसीकी भी
आवश्यकता नहीं है, और ज्ञानकी उत्पतिमें भी विवेकके सिवा
और किसीकी अपेक्षा नहीं है।
वियेकादेस्तु संजन्यै सचशुद्धिरपेक्ष्यते ।
पक्ष: तु निष्कामकर्मम्यो नान्यदिप्यते ॥५॥
द्वितीय प्रकरण
OGRIDGONSORIAGEGREASOGReWERGRIEOGRUE.
विवेकादिकी उत्पत्ति के लिये केवल चित्तशुद्धिकी आवश्यकता
है और चित्तशुद्धिके लिये तो निष्काम कर्मके सिवा और किसीकी
भी अपेक्षा नहीं है।
पारम्पर्येण युक्तवं ज्ञानस्य कर्मजन्यता ।
साधनं सादतः कर्म तत्साध्यमात्मवेदनम् ॥ ५८॥
इस प्रकार परम्परासे ज्ञानको कर्मजनित मानना ठोक ही है ।
अतः कर्म साधन है और आत्मज्ञान उसका साध्य है ।
संगृहकर्तवचनम्
'कपायपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः।
कपाये कर्मभिः पक्के ततो ज्ञानं प्रवर्तते ॥५९ ॥
इत्यादिस्मृतिभिः प्रोक्ता कर्मणां ज्ञानहेतुता ।
तस्माज्ज्ञानार्थिना तावत्कार्यायागादिकाः क्रिया॥६॥
'कर्म वासनाके क्षीण होनेका साधन है और ज्ञान तो परम-
गति ही है। कर्मोद्वारा वासनाओंके क्षीण हो जानेपर फिर ज्ञान
प्रवृत्त होता है' इत्यादि स्मृतियोंने कर्मोका ज्ञानोत्पत्तिमें कारणत्व
प्रतिपादन किया है । इसलिये जिज्ञासुको ज्ञानोपलब्धिपर्यन्त यज्ञ-
यागादि कर्म करते ही रहना चाहिये ।
वेदव्यासोऽपि विद्यायाः कर्मजन्यत्वमुक्तवान् ।
सर्वापेक्षा च यज्ञादि श्रुतेरश्ववदित्यतः॥६१॥
४० OGRELIGIGRICS मुमुक्षुसर्वस्वसार 'सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्' * (प्र० सू० ३।४।२६) इस सूत्रसे वेदव्यासजीने भी ज्ञानका कर्मजन्यत्य प्रतिपादन किया है। अशुद्धचेतसो भ्रान्त्या ज्ञाने भोगादिनाशके। भवेत्पापवतो द्वेषः प्रतिबन्धस्य सत्त्वतः ॥६२॥ जिसका चित्त अशुद्ध है उस पापात्माको ज्ञानका प्रतिबन्ध रहनेके कारण भोगादिका नाश करनेवाले ज्ञानमें भ्रान्तिवश द्वेप रहा करता है। यागायैः शुद्धचित्तस्य विवेकः सत्त्वशुद्धिजः । जिहासां सत्यलोकादौ व्यनक्त्येवाशु निर्मलाम् । तसात्पापापनाशाय कार्यों धर्मो मुमुक्षुभिः ॥६३॥ परन्तु यागादिसे जिसका चित्त शुद्ध हो गया है उसके हृदयमें, चित्तशुद्धिजनित विवेक शीघ्र ही सत्यलोकादिमें विशुद्ध त्याग-धुद्धि उत्पन्न कर देता है; अतः मुमुक्षुको पापराशिका नाश करनेके लिये धर्मानुष्ठान करना ही चाहिये । ननु चित्तस्य काशुद्धिर्या स्वधर्मेण नात्यते । पापोपलेपरूपा वा विपयाकारताथवा ॥६४॥ • 'यशेन तपमानाशकेन' (बृ. उ.४।४।२२) हत्यादि श्रुति- के अनुसार विद्या [अपनी उत्पत्तिमें तो ] सम्पूर्ण वर्णाश्रमविहित कोशी अपेशावाली है [किन्नु फलमिदिमें नहीं ] जैसे घोदा [हल सीरने में तो उपयोगी नहीं है तथापि रयमें तो जोता ही जाता है।
द्वितीय प्रकरण ४१ AGRANIORGROGRIDGRESSING शक्षा-जिसका खधर्मपालनसे नाश किया जाता है वह चित्तकी अशुद्धि क्या है ? यह पापसंस्काररूपा है या विषयाकारतारूप ? किल्विषानामनन्तत्वाद्विना ज्ञानादिना क्षयः । न सम्भवति यसाद्वि तस्मान्नाद्यस्य सम्भवः ॥६५॥ पाप अनन्त हैं; अतः ज्ञानादिके बिना उनका क्षय नहीं हो सकता । इसलिये [धर्मपालनमात्रसे उसका नाश न होनेके कारण पापसंस्काररूप] प्रथम पक्ष तो हो नहीं सकता । जलादेवतादीनां तत्सत्त्वे न यथा क्षयः । चित्तसत्त्वे न तद्वत्स्याद्विपयाकारताक्षयः ॥६६॥ जिस प्रकार जलादिके धर्म द्रवता आदिका उन (जलादि) की सत्ता रहते क्षय नहीं हो सकता, उसी प्रकार चित्तके रहते हुए उसकी विपयाकारताका नाश नहीं हो सकता । धर्मिणि सति धर्मस्य न नाशोऽस्ति स्वभावतः । तस्मिन्नप्टे त्वयनेन धर्मनाशोऽपि सम्भवेत् ।। ६७॥ स्वाभाविक होनेके कारण धोके रहते हुए धर्मका नाश नहीं हो सकता। हाँ, उसके नष्ट हो जानेपर तो बिना प्रयत्नके ही धर्मका भी नाश होना सम्भव है। द्वितीयासम्भवाश्चैवमतो धर्माभिसेबने । राजानादेव सत्यागे जिन्नासोः स्याच्छूमो ध्या॥८॥ अतः ( विषयाकारतारूप] द्वितीय पशु भी असम्भव ही है, eacocrationGYEDRISm. मुमुक्षुसर्वस्वसार इसलिये धर्मपाटन करनेमें और राजाके अन्न आदिके त्यागनेमें * जिज्ञासुका श्रम वृथा ही होगा। सत्यं किल्लिपबाहुल्यं यत्त्चयोक्तं तथापि तु । विना ब्रह्मात्मविज्ञानं यद्वह्मवधादिकाः ॥६९॥ अधर्मा नाशमायान्ति प्रायश्चित्ताख्यकर्मणा । तद्वद्धर्मेण संनश्येत्पापं वित्तप्रदूपकम् ।।७।। समाधान-तुमने जो पापोंकी अधिकता बतलायी सो तो ठीक है; परन्तु जैसे आत्माके ब्रह्मत्वका ज्ञान हुए बिना भी ब्रह्मवध आदि पाप प्रायश्चित्त नामक कर्मसे ही नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार चित्तको दृपित करनेवाला पाप भी धर्मसे नष्ट हो सकता है । अतश्चित्तग्रसादस्य जनकत्वेन हेतुना । धर्मो जिज्ञासुना कार्यो यावज्ज्ञानं नसम्भवेत् ॥७१॥ अतः जबतक ज्ञान न हो तबतक जिज्ञासुको चित्तशुद्धिका जनक होनेके कारण धर्मका ही आचरण करना चाहिये। भोगेनाप्यखिलाघानां यस्त्वन्यत्रोच्यते क्षयः । स नास्त्यभिनवं यसाद्भोगकाले यमुद्भवेत् ॥७२॥ तथा अन्यत्र जो कर्मफलभोगद्वारा सम्पूर्ण पापोंका क्षय होना -चित्तकी शुद्धिके लिये ही राजा आदिक अनोंका रयाग करना पड़ता है, यदि चित्तको अगदि विषयाकारताप मानी जाय तो पा चित्त के रहते हुए नष्ट नहीं हो सकती। ऐसी दद्यामें अन-स्याग म्यर्थ ही होगा, इसलिये द्वितीय पत्र भीटीक नहीं।
४३
द्वितीय प्रकरण
PISOGream
बतलाया जाता है वह भी ठोक नहीं, क्योंकि भोगकालमें तो
और भी नवीन पाप उत्पन्न हो जायगा ।
विषयाकारताख्या या चित्तस्याशुद्विरीरिता ।
सापि नाशयितुं शक्या यतः स्वाभाविकी न सा ॥७३॥
इसके सिवाजो विषयाकारता नामकी चित्तकी अशुद्धि बतलायी
गयी है वह भी नष्ट की जा सकती है, क्योंकि वह स्वाभाविकी नहीं है।
स्वार्थसङ्गो यथा स्थूलविषयाकारतां प्रति ।
चित्तस्य जागरे हेतुर्हदः स्वमे तथा पुनः ॥७४॥
विपयाकारताहेतुर्वासना हि मनोगता ।
उभयोरत्यये चित्तं सुप्तौ निर्विपयं यतः ॥७५॥
लिस प्रकार जाग्रत्कालमें चित्तकी स्यूलविषयाकारतामें इन्द्रिय-
ग्राह्य विपयोंका संग कारण है उसी प्रकार समावस्था में हृदयकी
विपयाकारताका हेतु मनोगत वासना ही है, क्योंकि सुषुप्तिमें इन
दोनोंका क्षय हो जानेपर चित्त निर्विपय हो जाता है।
सुप्तौ न लीयते चित्तं विषयाकारता तदा ।
निमित्तापगमादेव नाशं याति ह्यतिस्फुटम् ।।७६॥
सुषुप्तिमें चित्त लीन नहीं होता । उस समय केवल [विषय
एवं वासनारूप] निमित्तका अभाव हो जानेसे ही विषयाकारता
अत्यन्त स्फुट रीतिसे नष्ट हो जाती है।
सुप्तौ लीयेत चेच्चित्तं नोत्थितस्य पुनर्भवः ।
तर्हि चित्तस्य सत्तातः सुप्तावस्तीति गम्यते ॥७७॥
४४ GENERGRIOD मुमुक्षुसखसार SUDGROGRLIERGRIDGELU यदि सुषुप्तिमें चित्त लीन हो जाता तो जागनेवाले पुरुषमें उसका फिर प्रादुर्भाव नहीं हो सकता या; अतः इससे सिद्ध होता है कि सुषुप्तिमें चित्तकी सत्ता रहती है । तदापीतेहि संसारव्यपदेशादितीरयन् । श्रीव्यासोऽपि जगी सुप्तौ मनस्सत्तां भवोद्भवाम् ॥७८॥ श्रीव्यासजीने भी 'तदापीतेः संसारव्यपदेशात्' * (७० सू० ४।२।८) ऐसा कहकर सुषुप्तिमें जगत्को कारणरूप मनकी सत्ता मानी है। अपञ्चीकृतभूतानां सात्त्विकांशाद्धि निर्मलात् । उत्पन्नं चित्तवस्तु स्यात्स्वयं तु मलिनं कथम् ॥७९॥ अपञ्चीकृत भूतोंके विशुद्ध सात्विक अंशसे उत्पन्न हुआ मनस्तत्त्व भला स्वयं तो किस प्रकार मलिन हो सकता है ? सितेभ्य इह तन्तुभ्यो नासितो जायते पटः । विषयाकारताशुद्धिर्हदोऽतो नैव वास्तवी ॥८॥ इस संसारमें श्वेत तन्तुओंसेश्याम वस्त्र की उत्पन्न नहीं हो सकता। अतः चित्तकी विषयाकारतारूप अशुद्धि वास्तविकी नहीं है। • वह मन [ 'योनिमन्ये प्रयन्ते' इत्यादि भुतिद्वारा शानमे पूर्य] संसारप्राप्तिका निर्देश किये जानेके कारण मोचपर्यन्त रहता है। + तात्पर्य यह है कि जैसे श्वेत तन्तुसे श्याम वस्र प्रकट नहीं होता उसी प्रकार शुद्ध सत्यांचसे मलिन चित्त मी उत्पन्न नहीं हो मकता। अतः चित्तकी अशुद्धि कपड़े में मैलकी तरह वास्तविक नहीं है।
AGROWOOGraNINGre द्वितीय प्रकरण OGNOR DownGi. अतः समो न दृष्टान्तः पूर्वपक्षी यमुक्तवान् । द्रवत्लादेर्भवादीनां स्वभावताक्षिगोचरा ॥८१॥ अतः पूर्वपक्षीने जो [चित्तकी अशुद्धिके विषयमे पापोपलेप और विषयाकारतारूप] दृष्टान्त दिया है, वह ठीक नहीं है क्योकि जल आदिके द्रवता आदि गुणोंकी स्वाभाविकता तो प्रत्यक्ष ही है। प्रथमाशुद्धिनाशाय धर्मानुष्ठानमीरितम् । द्वितीयाशुद्धिनाशाय ज्ञानशुद्धि नियोधत ॥८२॥ [पूर्वोक्त चित्तकी अशुद्धियोंमेंसे ] पहली अशुद्धिके नाशके लिये धर्मानुष्ठान बतलाया गया है और दूसरी अशुद्धिके नाशका हेतु ज्ञानशुद्धि (विचारशुद्धि ) समझो । आहारस्यैव संशुद्धौ सत्यशुद्धिर्भवेद्धवम् । इतिच्छान्दोग्यवाक्येन ज्ञानशुद्धिः प्रदर्शिता ॥८३॥ हेतुता सत्त्वशुद्धर्हि तथा मान्यकृतापि च । आहारो विपयज्ञानं भोक्तु गाय यद्भवेत् ।। ८४ ॥ 'आहारकी ही शुद्धिसे निश्चय सत्व-शुद्धि होती है। इस प्रकार छान्दोग्य-श्रुतिके पचनसे, तथा भाष्यकारके मतसे भी चित्तशुद्धिका कारण विचारकी शुद्धि ही बतलायी गयी है । वह आहार विपयज्ञान है, जो कि भोक्ताके भोगके लिये होता है । रागद्वेपादिराहित्यं तस्स शुद्धिरिहोच्यते । तया सत्यां च सत्त्वस्यान्ताकरणस्य शुद्धता ॥८५॥ .
४६ OGRIDGRONOT मुमुक्षुसर्वखसार POOGLISOGraRIORGRIDGund यहाँ (भाष्यकारके इस कपनमें ) उस ( भोग) की शुद्धि राग-द्वपसे रहित होना ही बतलाया गया है। उसके होनेपर ही सत्त्व अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धता होती है । इतिच्छान्दोग्यवाक्यार्थः सङ्घपेणेह दर्शितः। ज्ञानशुद्धिश्च कर्तव्या चित्तशुद्धथ हतो बुधैः ॥८६॥ इस प्रकार यहाँ छान्दोग्य-श्रुतिका अर्थ संक्षेपसे दिखाया गया है । अतः बुद्धिमानोंको चित्तशुद्धिके लिये विचारका शोधन मी करना चाहिये। रागद्वेपादिना चित्तं द्रुतं सद्विपयाकृतिम् । यात्यतस्तत्परित्याज्यं चित्तशुद्धथर्थिना सदा ॥ ८७॥ राग-द्वेषादिसे चित्त द्रवीभूत होकर विषयाकार हो जाता है अतः चित्तशुद्धिके इच्छुकोंको उन्हें सदा ही त्यागना चाहिये । रागद्वेषौ विहायैवं दुष्टान्नभक्षणं तथा । स्वधर्मश्च सदा सेव्यश्चित्तशुद्धयर्थिभिर्जनः ॥ ८८॥ इस प्रकार राग-द्वेष और दृषित अन्नमक्षणको त्यागकर चित्तशुद्धिके इच्छुक पुरुषोंको सदा होखधर्मका पालन करना चाहिये। कलियुगमें चित्तशद्धि कैसे होगी? ननु घोरे कलौ काले सर्वधर्माभिभावके । वर्णाश्रमाश्रितो धर्मः प्रायेणाल्पत्वमागतः ॥ ८९॥ शक्षा-सम्पूर्ण धोका हास करनेवाले इस भयंकर कलिकालमें वर्णाश्रमसम्बन्धी धर्म प्रायः क्षीण हो गया है ।
द्वितीय प्रकरण OGRIDGINGEOGUSGRRISOGNIORGREASON तेन चित्तस शुद्विः स्यान्नृणां नैव कलौ युगे । यथात्यल्पेन क्षारेण चक्रिवस्त्रं न शुद्धयति ॥९०॥ इसलिये कलियुगमें मनुष्योंकी चित्तशुद्धि नहीं हो सकती, जैसे कि तेलीका वस्त्र थोड़े-से क्षारसे साफ नहीं हो सकता । जना यतः कलावत्र प्रायेण स्त्रीपराजिताः। नानुतिष्ठन्ति धर्मान्स्वान्दैवमायाविमोहिताः ॥९१ ॥ क्योंकि इस कलियुगमें लोग प्रायः स्त्रीके वशीभूत हैं; इसलिये भगवान्की मायासे मोहित होकर वे अपने धमोंका पालन नहीं करते । ते तु कुर्वन्ति चेद्धर्म ख्यात्याद्यर्थ न चेतसः । शुद्धये तं परेशार्थमर्पयन्ति कलेशात् ।। ९२ ।। वे यदि धर्म करते भी हैं तो नाम कमानेके लिये ही करते हैं; कलिकालके वशीभूत होनेके कारण वे उसे चित्तशुद्धिके लिये परमात्माको अर्पण नहीं करते। नन्वल्पोऽपि यथा वहिर्दहति दणकूटकम् । तथा खल्पः कृतो धर्मोधर्म स नाशयेद्धवम् ।। ९३ ॥ सत्यमेवं त्वयोक्तं स्यादि धर्मः सुसाधितः। भवे हि न सम्पङ्ना कलौ साधयितुं क्षमः ।।९४ ॥ यदि कहो कि जिस प्रकार पोड़ा-सा भी अग्नि तृणके समूहको जला डालता है उसी प्रकार घोड़ा-सा भी धर्मानुष्टान अधर्मको अवस्य नष्ट कर देगा, तो तुम्हारा यह कयन तब तो ठीक हो सकता ४८ मुमुक्षुसर्यस्ससार OCONURDERNMKOPxuarIDCremaximusicn. था जब कि यह पोड़ा-सा धर्म भी मटी प्रकार सम्पन्न किया जाता। किन्तु इस कलिकालमें मनुष्य उसे यथावत् सिद्ध करनेमें ही समर्थ नहीं है। धर्मसङ्करता चापि दृश्यते हि यतः कलौ । धर्मवर्णाश्रमाणां स्थाचित्तशुद्धिरतः कथम् ॥ ९५ ।। इसके सिवा कलियुगमें धर्मसंकरता मी देखी जाती है । अतः वर्णाश्रमोंके धर्मोसे चित्तकी शुद्धि किस प्रकार हो सकती है ! ज्ञानशुद्धिस्तु या प्रोक्ता सापीश्वरकृपां विना । नास्त्यल्पधर्मकस्यात्र युगे हृच्छुद्धिसाधनम् ॥ ९६ ॥ तपा तुमने जिस चित्तशुद्धिकी साधनभूत ज्ञानशुद्धिका पहले वर्णन किया है वह भी इस कलियुगमें खल्पधर्मा पुरुषको भगवान्- की कृपाके बिना प्राप्त नहीं हो सकती । पराशरादिसर्वः कलेलं निरूपितम् । स्वीयेषु धर्मशाखेषु तद्वाक्यान्यनुसंध्वे ॥९७॥ पराशरादि सर्वज्ञोंने अपने धर्मशाखोंमें कलियुगके बलका निरूपण किया है। यहाँ हम उनके वाक्योंका उल्लेख करते हैं। पराशरस्मृती जितो धर्मो धर्मण जितं सत्यमनृतेन च । जिताचौरैच राजानः स्त्रीभिश्च पुरुषाः कलौ ॥९८॥ कलियुगमें धर्म अधर्मसे, सत्य मिथ्यासे, राजालोग चोरोंसे और पुरुष सियोंसे जीत लिये गये हैं।
COUCH द्वितीय प्रकरण GURGAONGrouORGROUND- विष्णुपुराणे मैक्षवृत्या तथा शूद्राः प्रवज्यालिगिनोधमाः। पाखण्डसंश्रयां चिमाश्रमिप्यन्त्यसंस्कृताः ।। ९९ ॥ सर्वे प्रक्ष यदिप्यन्ति सम्प्राप्ते तु फला युगे। नानुतिष्ठन्ति मैत्रेय शिनोदरपरायणाः ॥१०॥ [फलियुगमें ] पापी और संस्कारहीन शूदगण संन्यासके चिद धारणकर भिक्षावृत्तिका आश्रय ले पाखण्डियोंके आचरणका अवलम्बन फरेंगे। हे मैत्रेय ! कलिकाल आनेपर सभी लोग प्रम- शानकी बातें करने लगगे। वे इन्द्रिय-विलास और उदर-पोषणमें भासक्त होकर धर्मानुष्ठान नहीं करेंगे। मरिष्यपुराणे गृहे गृहे पुस्तकमारमारं पुरे पुरे पण्डित्यूपत्यम् । मठे मठे वापसान्दयन्दं न मायेचान र कर्मकर्ता ॥१.१॥ [परिशमें ] घर-घरमें बोम-की-सोम पुना होगी, नगर- नगरमें पु-के-झुग पनित होंगे, मड-मने पप-के-गप तरी शिपायी शिन्तु उनमें न तो को पानी ही होगा और नई पारनेवादा ही।
मुमुक्षुसर्यवसार OGRADURGrouOGRAPGARIOGRAMICROSS श्रीमद्भागवते तपः शौचं दया सत्यमिति पादाः कृते कृताः। अधर्माशैत्रयो भनाः सयसङ्गमदैस्तव ॥१०२॥ इदानीं धर्म पादस्ते सत्यं निवर्तयेद्यतः। तं जिघृक्षत्यधर्मोऽयमनृतेनैधितः कलिः ॥१०॥ [ राजा परीक्षित कहते हैं-'हे धर्म ! ] सत्ययुगमें तुम्हारे तप, शौच, दया और सत्य ये चार चरण थे; किन्तु अब अभिमान, आसक्ति और मदरूप अधर्मके अंशोंसे उनमेंसे तीन टूट गये हैं। हे धर्म ! इस समय क्योंकि तुम्हारा सत्य नामक केवल एक ही चरण रह गया है, इसलिये असत्यकी सहायतासे सबल हुआ यह कलियुग अब उसे भी तोड़ना चाहता है । संग्रहकर्तृवचनम् इत्थं पराशरादीनां वाक्यैर्वर्णाश्रमाश्रितम् । धर्म तिरस्करोत्येवाधर्मेण चर्चितः कलिः ॥१०॥ इस प्रकार पराशरादिके कथनानुसार भी अधर्मसे वृद्धिको प्राप्त हुआ कलियुग धर्मका तिरस्कार कर ही देता है। अतोऽन्यत्साधनं वाच्यं यत्कलिनातिरस्कृतम् । सर्वाधिकारकं यश सुकरं शास्त्रसम्मतम् ॥१०॥ अतः अब ऐसा कोई और साधन बतलाना चाहिये जो कलियुगसे तिरस्कृत न हुआ हो, जिसके सभी अधिकारी हों, जो सबके लिये सुकर हो और शाखानुकूल भी हो । -- COMusso द्वितीय प्रकरण ५१ GANSARGIC चित्तस्य शोधकं चाशु द्विविधाशुद्विनाशकम् । ताक्तु साधनं नास्ति स्थाद्धृच्छुद्धिरतः कथम् ॥१०६।। इस समय जो चित्तको शीघ्र ही शुद्ध करनेवाला और दोनों प्रकारकी अशुद्धिका नाशक हो ऐसा कोई माधन नहीं है; फिर चित्तकी शुद्धि कैसे हो सकती है ! भक्तिकी महिमा मैवं भगवतो भक्तियोगोऽस्त्येवेश्वरेरितः । द्विविधाशुद्धिनाशाय श्रीमद्भागरते खलु ॥१०७॥ समाधान-ऐसा मत कहो,क्योंकिान दोनों प्रकारकी अशुद्धियों- को नष्ट करने के लिये श्रीमद्भागरतमें कृष्णचन्द्रका कहा हुआ भगवान्या मक्तियोग तो है ही। मक्तेश महिमा नैव कलिनाप्यभिभूयते । इत्युक्तं धर्मराजेन यमस्मृती तु वै स्फुटम् ॥१०८।। और धर्मराजने यमस्मृतिमें भी यह बात परतया यही है कि भक्तिकी महिमा तो कलियुगसे भी तिरस्कृत नहीं हो सकती। प्रागिमात्रोऽधिकार्यवाः श्रीगीतायां समीरितः। मुकरत्वं च मक्ते मारते समुदीरितम् ॥१०९।। श्रीगोताजी प्राणिमात्रासमा अपियारी यतटापा है और महाभारतमें मसिपी मुकरताय भी प्रतिपादन किया है।
OGRAMIGORIOR
Graisarvachau
मुमुक्षुसर्वस्वसार
पापकर्मादिभिश्चिचं मालिन्यमुपढीकते।
मक्तशापविरोधित्वाद्भवेद्धच्छुद्धिहेतुता ॥११०॥
पापकर्मादिसे ही चित्तपर मलिनता चढ़ जाती है; अतः
पापकी विरोधिनी होनेसे भक्तिका चित्तशुद्धिमें कारण बनना
ठीक ही है।
यथापां क्षारयुक्तानां वस्त्रादिशुद्धिहेतुता ।
इति युक्तिस्तथैवोया मक्तेचित्तप्रशोधने ॥११॥
जिस प्रकार क्षारयुक्त जल वस्त्रादिकी सफाई करनेमें कारण
है, वही युक्ति चित्तको शुद्ध करनेमें भक्तिके विषयमें समझनी चाहिये।
प्रोक्तयं नवधात्वेन पुराणे वेदसंमता ।
कैर्वाक्यैरुदितं चैतदिति चेच्छृणु तान्यपि ॥११२||
यह वेदविहित भक्ति पुराणमें नौ प्रकारसे बतलायी गयी है।
अन यदि कहो कि इसका वर्णन किन वाक्योंमें हुआ है,
तो उन पाक्योंको भी सुनो।
श्रीमद्भागवते
यथामिना हेममलं नहाति
मातं पुनः स्वं भजते स्वरूपम् ।
आत्मा तु कर्मानुशयं विध्य
मद्भक्तियोगेन भजत्यथो माम् ॥११३॥
प्रोक्तेन भक्तियोगेन भवतो मामसकन्मुनेः।
कामा हृदय्या नश्यन्ति सर्वे मयि हदि सिते ॥११४॥
GREJOGEN द्वितीय प्रकरण Greus. जिस प्रकार अग्निसे तपाये जानेपर सोना मलको त्यागकर अपना शुद्ध रूप ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार मेरे भक्तियोगसे आत्मा अपने कर्मबन्धनको त्यागकर मुझे ही प्राप्त हो जाता है। जो ऊपर बतलाये हुए भक्तियोगसे मेरा भजन करता है उस मुनिकी समी हृदयस्थित कामनाएँ, चित्तमें मेरे विराजमान होनेपर, नष्ट हो जाती हैं। यमस्मृती घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वधर्मविवर्जिते । वासुदेवपरा राजस्ते कृतार्था न संशयः॥११५॥ हे राजन् ! सम्पूर्ण धोंसे रहित घोर कलिकालके आनेपर जो लोग वासुदेवपरायण होंगे वे निःसन्देह कृतार्थ हो जायेंगे । श्रीमद्भगवद्गीतासु मां हि पार्थव्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । खियो वैश्यास्तथाशूद्रास्तेऽपि यान्ति परांगतिम् ॥११६॥ किं पुनर्ताक्षणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य मजस्व माम् ॥११७॥ हे अर्जुन ! मेरा आश्रय करके तो स्त्री, वैश्य और शूह तपा जो पापयोनियाँ हैं वे भी परमगतिको प्राप्त हो जाती हैं। फिर परम पवित्र ब्राह्मण और भक्त राजर्षियोंकी तो बात ही क्या है ! अतः इस अनित्य और दुःखमय लोकको पाकर तुम मेरा मजन करो।
मुमुक्षुसर्य खसार 4GEOGROUPGROUGreuc महाभारते पत्रेषु पुष्पेषु फलेषु तोये- चक्रीतलम्येषु सदैव सत्सु । मक्त्यैकलम्ये पुरुषे पुराणे मुक्त्यै कथं न क्रियते प्रयतः ॥११८॥ बिना मोल ही मिटनेवाले पत्र, पुष्प, फल और जल आदिके सदा रहते हुए भी, भवबन्धनसे मुक्त होनेके लिये, एकमात्र मक्तिसे ही मिटनेवाठे पुराणपुरुष श्रीहरिको प्रसन्न करनेका प्रपात क्यों नहीं किया जाता ! श्रीमद्भागवते श्रवणं कीर्तनं विष्णोः सरणं पादसेग्नम् । अर्चनं यन्दनं दास्यं मख्यमारमनिवेदनम् ॥११९।। इति पुंमापिता विष्णौ भक्तिमालधणा। क्रियते भगवत्यता तन्मन्ये धीतमुत्तमम् ॥१२०॥ भगवान् विष्णुका श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादरोषन, पूजन, चन्दन, दाम्य, सम्य और आमनिवेदन । यह नौ प्रकारकी मक्ति पदि मनुष्यद्वारा भगवान् विष्णुको आग की जाय तो, मैं तो हो ही उत्तम अप्पयन ममन्ना हूँ। संप्रहकतवनम् महार्तनाग्यमत्तेस्तु महिमा प्रमोदिनः । कलिगन्नपात्यायामुपनिषधर मुटम् ॥१२१|| द्वितीय प्रकरण POLISSGRLIERGARIAGNEDGRAMI00 16Grain. ब्रह्माजीने कलिसन्तरण नामकी उपनिषद्में भी संकीर्तननाम्नी भक्तिकी महिमा तो अति स्पष्टतया वर्णन की है। तामर्थतः पठामोह तस्या मन्त्रौ च पाठतः । पठामि नुः प्रवृत्त्यर्थ भक्तौ हृच्छुद्धिमीप्सतः ॥१२२।। यहाँ चित्तशुद्रिके इच्छुक पुरुषोंकी भक्तिमें प्रवृत्ति करानेके लिये उसका भावार्थ और दो मन्त्रोंका ज्यों-का-त्यों पाठ लिखता हूँ। द्वापरान्ते समभ्येत्य नारदः परिपृष्टवान् । ब्रह्माणं खोपदेष्टारं कलिसन्तरणे विधिम् ॥१२३॥ कथन्नु भगवंश्चाहं पृथिवीं पर्यटन् सदा । सन्तरेयं कलिं पोरं सर्वधर्मप्रणाश ॥१२४॥ एक बार द्वापरके अन्तमें नारदजीने अपने उपदेशक श्रीब्रह्माजीके पास आकर उनसे कलियुगसे पार होनेका साधन पूछा । [ वे बोले-] 'भगवन् ! मैं सदा ही पृथिवीपर घूमा करता हूँ; अतः सम्पूर्ण धर्मोको नष्ट करनेवाले इस कलियुगको किस प्रकार पार कर सकूँगा ! साधु पृष्टोऽसि सर्वासां श्रुतीनां सुरहस्यकम् । शृणु येन कलिं त्वं त्वनायासात्सन्तरिष्यसि ।।१२५॥ [ तब ब्रह्माजीने कहा-] 'तुमने सम्पूर्ण श्रुतियोंका रहस्यरूप यह बड़ा सुन्दर प्रश्न किया है। अतः जिस प्रकार तुम अनायास हो कलियुगको पार कर सकोगे वह उपाय सुनो। . .
मुमुक्षुसर्यखसार
GENISOGRALISOGANDG
PRIOGRAMINOGREMIERGRID
नारायणस्य विष्णोवै नाम्ना भगवतो मुने ।
पप्रच्छ नारदो भूयस्तन्नाम भगवन्वद ॥१२६!!
'हे मुने ! तुम नारायण भगवान् विष्णुके नामद्वारा उसे पार
कर लोगे ।' तब नारदजीने फिर पूछा-'भगवन् ! उनका
यह नाम बतलाइये।
स होवाच शृणुष्वाद्य विष्णोर्नामानि नारद ।
यानि पठन्नरो याति सलोकतादिकं हरेः॥१२७।।
तब उन्होंने कहा-'नारद ! जिनका उच्चारण करनेसे
मनुष्य भगवान्के सालोक्य आदिको प्राप्त हो जाता है, अब
श्रीविष्णुके उन नामोंको सुनो।
मन्त्री
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥१२॥
इति पोडशकं नाम्नां कलिकल्मपनाशनम् ।
नातः परतरोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते ॥१२९।।
'हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृश हरे कृष्ण कृष्ण
कृष्ण हरे हरे-ये सोलह नाम कलियुगके सभी पापोंको नष्ट करनेवाले
हैं। सम्पूर्ण वेदों में इससे बड़ा उपाय और कोई नहीं देखा जाता।'
संपहातपंचनम्
इति पोहायकं जातं जीवानानं विनाशयेत् ।
ततः प्रकार प्रम मेयापाये रविर्यया ॥१३०॥
द्वितीय प्रकरण
+GROGRUENERUCOGRUERGRIDGreIOGROLOo
यह सोलह नामोंका मन्त्र जप किये जानेपर जीवके
अज्ञानको नष्ट कर देता है । फिर, मेधके हट जानेपर जैसे सूर्य
प्रकाशित होने लगता है उसी प्रकार ब्रह्मका प्रकाश होने
लगता है।
पप्रच्छ नारदो भूयः कोऽस्य विधिजपे पितः ।
स होवाच च नैवास्ति विधिरस्य जपे सुत ॥१३॥
तब नारदजीने पूछा-'पिताजी!इसका जप करनेकी क्या विधि
है !' इसपर ब्रह्माजीने कहा-'बेटा 1 इसके जपमें किसी विधिकी
आवश्यकता नहीं है।
शुचिः सम्मशुचिर्वा सन्पठन्नेति सलोकताम् ।
सामीप्यं ब्रह्मणस्तद्वत्सायुज्यं चैति वै नरः ॥१३२॥
'पवित्र हो अथवा अपवित्र, इसका पाठ करनेसे ही मनुष्य
मगरान्के लोकको प्राप्त कर लेता है । इससे प्रमकी समीपता
प्राप्त होती है और इसीसे मनुष्य सायुज्य-मोक्ष भी प्राप्त कर
सस्ता है।
पोडशकस्य चेत्साई त्रिकोटिं जपतीह यः।
तरति अनाहत्यां स चीरहत्यां तथैव च ॥१३३॥
'जो मनुष्य न सोदह नामोंग्स साडे तीन करोड़ जप कर
स्टेता है वह प्रमहत्या और पीरहत्या-जैसे पापोंसे भी मुक्त हो जाता है।
शुच्यते हेमचौर्यात्स पठीगमनाचया ।
पिटदेवमनुष्याणामृणानपनयाचया
॥१३४॥
गुमुभुसपम्पसार नारायणस्य विष्णों नाना भगवतो मुने । पप्रच्छ नारदो भूयस्तन्नाम भगवन्वद ॥१२६|| 'हे मुने । तुम नारायण भगवान् विष्णुके नामद्वारा उसे पार कर लोगे ।' तब नारदजाने फिर पूछा-'भगवन् ! उनका यह नाम अतलाइये ।' स होवाच शृणुप्याद्य विष्णोर्नामानि नारद । यानि पठन्नरो याति सलोकतादिकं हरेः॥१२७॥ तय उन्होंने कहा-'नारद ! जिनका उच्चारण करनेसे मनुष्य भगवान्के सालोक्य आदिको प्राप्त हो जाता है, अब श्रीविष्णुके उन नामोंको सुनो। मन्त्री हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥१२८॥ इति पोडशकं नाम्नां कलिकल्मपनाशनम् । परतरोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते ॥१२९॥ 'हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।हरे. .:. कृष्ण हरे हरे-ये सोलह नाम कलियुगके सभी पापोंको हैं। सम्पूर्ण वेदोंमें इससे बड़ा उपाय और कोई नहीं. संपहकर्तृवपनम् इति पोडशकं जप्त नातः ततः प्रकाशते भर
द्वितीय प्रकरण
+CRISONINGRUIDGURGANISONINGRUID.
यह सोलह नामोंका मन्त्र जप किये जानेपर जीवके
अज्ञानको नष्ट कर देता है । फिर, मेधके हट जानेपर जैसे सूर्य
प्रकाशित होने लगता है उसी प्रकार ब्रह्मका प्रकाश होने
टगता है।
पप्रच्छ नारदो भूयः कोऽस्य विधिर्जपे पितः ।
स होवाच च नैवास्ति विधिरस्थ जपे सुत ॥१३१॥
तब नारदजीने पूछा-'पिताजी! इसका जप करनेकी क्या विधि
है.' इसपर ब्रह्माजीने कहा-'बेटा । इसके जपमें किसी विधिकी
आवश्यकता नहीं है।
शुचिः समशुचिर्चा सन्पठन्नेति सलोकताम् ।
सामीप्यं ब्रह्मणस्तद्वत्सायुज्यं चैति वै नरः ॥१३२॥
'पवित्र हो अपग अपवित्र, इसका पाठ करनेसे ही मनुष्य
भगगनके लोगको प्राप्त कर देता है। इससे ब्रह्मकी समीपता
प्राप्त होती है और इसीसे मनुष्य सापुग्य-मोश भी प्राप्त कर
सम्ताहै।
पोडशकस्य घेत्साई त्रिकोटिं उपतीह यः।
तरति प्रमाहत्यां स वीरहत्या तथैव च ॥१३॥
"जो मनुष्यान सोरह नामोग्य साई तीन करोड़ जप कर
देता है यह मादन्या और पीरहापा-जैसे पापोंसे भी मुक्त हो जाता है।
मन्यते हेमचीयर्याल
पलीगमनाचया।
पिटदेवमनुष्यापारणानपनयासपा ॥१३४॥
मुमुक्षुसर्वस्वसार .GUSIGRAIGNGRUEIGNISCUSSCREOGRAM. 'वह सुवर्णकी चोरी, शूद्रागमन और पितृ-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य ऋणकी निवृत्ति न करनेके दोषसे भी मुक्त हो जाता है। स्वस्खधर्मपरित्यागपापात्सद्यः स मुच्यते । इत्युक्तयांत्रिवारं सब्जयोनि रदाय वै ॥१३५।। 'वह अपने धर्मके परित्यागरूप पापसे भी तत्काल छूट जाता है'-इस प्रकार श्रीब्रह्माजीने नारदमुनिसे तीन बार कहा । भक्तर्हि महिमा यसादेनापीत्थमीरितः । तसाधृच्छुद्धये कार्या कली सा सर्वथा बुधैः ॥१३६॥ इस प्रकार, क्योंकि वेदने भी भक्तिकी महिमा ऐसी ही कही है; इसलिये इस कलियुगमें पुद्धिमान् पुरुषोंको अपनी चित्तशुद्धिके लिये सर्वथा उसीका आश्रय टेना चाहिये । शिव और विष्णुकी एकता कस्य भक्तिर्विधेयेति चेच्छृणुध वदामि ते । विष्णोः शिवस्य वा भक्तिर्विधया श्रया सपा ॥१३७।। अब यदि कहो कि 'मकि किसकी करनी चाहिये हो सुनो, मैं वतटाता हूँ। अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार विष्णु- भगवान् और शिवजीको मनि करनी ही रचित है। नरः सपरिशुद्धयर्थी कलौ नामानि कीतयेत् । शिवस्य वापरा विनोः सखीत्यनुसारतः ॥१३८।।
द्वितीय प्रकरण OGROUNDGRIEOGREVERGRIDGradionreuIOGRUESpe चित्तशुद्धिकी इच्छावाला पुरुप कलियुगमें अपनी प्रीतिके अनुसार भगवान् शिव या विष्णुके नामोंका कीर्तन करे । न तयोर्मेंददृष्टिस्तु कर्तव्या हि कदाचन । तद्भेदज्ञस शास्त्रेषु दुःखावाप्तिः श्रुता यतः ॥१३९॥ मनुष्यको उन दोनों में भेद-दृष्टि कभी न करनी चाहिये क्योंकि शास्त्रों में उनमें भेदबुद्धि करनेवालेके लिये दुःखकी प्राप्ति सुनी गयी है। नारदीयपुराणे हरिरूपी महादेवो लिङ्गरूपी जनार्दनः । ईपदप्यन्तरं नास्ति भेदकन्नरकं व्रजेत् ॥१४०॥ श्रीमहादेवजी हरिरूप हैं और विष्णुमगवान् लिंगमय (शिवस्वरूप) हैं । इन दोनोंमें थोड़ा-सा भी भेद नहीं है । जो पुरुष इनमें भेद करता है वह नरकको जाता है। कर्मविपाके यो प्रमाविष्णुरुद्राणां भेदमुत्तमभावनः । साधयेदुदरल्याधियुक्तो भवति मानवः ॥१४॥ जो पुरुष उत्तम भावनायुक्त होकर भी ब्रह्मा, विष्णु और महादेव जीमें भेद करता है वह उदररोगवाला हो जाता है। भविष्यपुराणे विष्णोरन्यं तु पश्यन्ति ये मां ब्रह्माणमेव च । कुतर्कमठपो मृदाः पच्यन्ते नरकेवधः ॥१४२।।
OGRUKONICO Gravsn मुमुनुसर्यस्यसार [शिवजी कहते हैं- जो कुतर्कबुद्धि मूढ पुरुष मुझे और प्रह्माजीको विष्णुभगवान्से अलग देखते हैं वे नीचे नरकादिमें दुःख भोगते हैं। गुरुभक्ति संग्रहकर्तृवचनम् यथा भेदं परित्यज्य कार्या भक्तिहरीशयोः । यस्य देव इति श्रुत्या भक्तिः कार्या गुरोस्तथा ॥१४३।। [ इस प्रकार ] जिस तरह श्रीहरि और भगवान् शंकरकी भक्ति भेदभावको त्यागकर करनी उचित है उसी प्रकार 'यस्य देवे परा भक्तिर्यया देवे तथा गुरौं' (स्व० उ० ६ । २३) इत्यादि श्रुतिके अनुसार गुरुकी भक्ति भी करनी चाहिये । शिवे रुष्टे गुरुखाता गुरौ रुष्टे न कवन । इत्यादिस्मृतिवाक्यैश्च सा कार्या चित्तशुद्धये ॥१४४॥ 'शिवजीके रूठ जानेपर गुरुदेव रक्षा कर लेते हैं किन्तु गुरुजीके रूठनेपर कोई नहीं बचा सकता' इत्यादि स्मृति-वाक्योंके अनुसार चित्तशुद्धि के लिये गुरुभक्ति भी अवश्यकर्तव्य है । भक्तिका लक्षण ननु लक्षणमानाम्यां घस्तुसिद्धिर्भवेद्यतः । लक्षणं ब्रह्मतो भक्तर्मानं चाप्ययनाशने ॥१४५॥ शान्यस्तुकी सिद्धि उसके लक्षण और तत्सम्बन्धी प्रमाणोंसे द्वितीय प्रकरण हो हुआ करती है; इसलिये आप भक्तिका लक्षण और उसके पापनाशक होनेमें प्रमाण बतलाइये । शृण्वस्या लक्षणं प्रोक्तं ग्रन्थे भक्तिरसायने । पापाद्यशुद्धिदग्धृत्वं भागवते समीरितम् ॥१४६॥ समाधान-सुनो, इसका लक्षण भक्तिरसायन नामक अन्यमें किया है और इसका पाप आदि अशुद्धियोंको भस्म करना भागवतमें बतलाया गया है। भकिरसायने द्वतस्य भगवद्धर्माद्धारावाहिकतां गता। सर्वेशे मनसो चिर्भक्तिरित्यभिधीयते ॥१४७॥ भगवद्धर्मोसे द्रवीभूत हुए चित्तकी सर्वेश्वरके प्रति धारावाहिकताको प्राप्त हुई वृत्ति भक्ति' कहलाती है। श्रीमद्भागवते यथामिःसुसमिद्वाचिः करोत्येघांसि भससात् । तथा मद्विपया भक्तिरुद्धवनांसि कृत्वशः ॥१४८|| हे उद्धव ! जिस प्रकार भली प्रकार बदी हुई अमिकी ज्वाला इंधनको भस्म कर डालती है उसी प्रकार मेरी भक्ति सम्पूर्ण पापोंको सर्वथा नष्ट कर देती है। पाध्यमानोऽपि मद्भक्तो विषयैरजितेन्द्रियः। प्रायः प्रगल्भया मक्त्या विषयैर्नामिप्यते ।।१४९॥
६२ CGTNASIRENon मुमुक्षुसर्वखसार मेरा अजितेन्द्रिय भक्त विषयोंसे बाधित होनेपर भी मेरी प्रौढ़ भक्तिके प्रभावसे प्रायः उनके वशीभूत नहीं होता। संगृह कर्तृवचनम् तस्माद्विष्ण्यीशयोक्तिर्गुरुभक्तिस्तथैव वाकायमानसैः कार्या सच्चशुद्धयार्थिना सदा ॥१५०॥ अतः चित्तशुद्धिके इच्छुक पुरुषको अपने मन, वचन और शरीरसे भगवान् विष्णु, शिव और गुरुदेवकी मक्ति सदा ही करते रहना चाहिये। प्रकरणका उपसंहार पारम्पर्येण मोक्षस्य साधनत्वं समीरितम् । इच्छुद्धस्तु यतः श्रुत्यादौ ता सम्पादयेचतः ॥१५१|| क्योंकि श्रुतिने भी परम्परामे चित्तशुद्धिको मोचका साधन बनाया है। इसलिये सबसे पहले उसीका सम्पादन करना चाहिये। मैग्रेम्युनिषदि चित्तस हि प्रमादेन हन्नि कम शुभाशुमम् प्रमयात्मात्मनि पिन्वा मुग्पमव्ययमभुते ।।१५२।। चिप्रमादसे ही पुरुष गुभाशुभ कर्मो नष्ट कर सकता है। वह अपने प्रमादयुन्न चिनने गित होकर ही अप दुग पा सकता है।
द्वितीय प्रकरण AGESGRUS संग्रहकर्तृवचनम् फलाशां सर्वथा हित्वा नित्यादिकर्मणां कृतिः। भगवतो गुरोस्तद्वदृजुभावेन सेवनम् ॥१५३।। दुष्टान्नाशनसन्त्यागो ज्ञानशुद्धिस्तथैव च । चत्वार्येतानि सत्चस शुद्विहेतुतया मया ॥१५४॥ साधनानि द्वितीयेऽसिन् श्रुतिस्मृत्यनुसारतः । निरूपितानि सेव्यानि सत्वशुद्धिमभीप्सुमिः॥१५५॥ इस दूसरे अध्यायमें मैने श्रुति एवं स्मृतिके अनुसार चित्तशुद्धिके लिये फटाशाको सर्वथा त्यागकर नित्यादि कोका अनुष्टान करना, सरल भावसे भगवान् और गुरुदेवकी सेवा करना, दुष्टानभक्षणका त्याग और विचारशुद्धि इन चार साधनोंका वर्णन किया है। अतः सत्त्वशुद्धिके इच्छुकोंको इनका सेवन करना चाहिये। एवं मुमुक्षुसर्यस्खसाराख्ये सङ्ग्रहात्मके । हन्छुद्धिसाधनानां हि ग्रन्थे पूर्ण निरूपणम् ॥१५६॥ इस प्रकार इस संग्रहरूप मुमुक्षुसर्वखसार नामक अन्धमें यह चित्तशुद्धिके साधनोंका निरूपण समाप्त हुआ। इति श्रीमुमुक्षुसर्वस्वसाराभिधे प्रन्थे सत्वशुपाल्पं द्वितीयं प्रकरणम् ।
तृतीय प्रकरण साधनचतुष्टय शुद्धसत्याः पुमासो हि वियेकादीन्प्रकुर्वते । यत्स्वरूपरिचाराय तं श्रीराममहं भजे ॥१॥ जिनके सापका विचार करनेके लिये शुद्धचित्त पुरुष विवेकादि किया करते हैं उन श्रीरामको मैं मानता हूँ। निफामकमसेगहन्मुदिर्यस्य जायते। नापापस तस्यैर विवेकादहिं योग्यता ॥२॥ निष्काम कर्म आदिका सेवन करते-करते निसे तिमि प्राप्त हो जाती है, तथा सिरी सम्पूर्ण पापराशि नष्ट हो गयी है उस पुरषको ही विवरादिकी योग्यता प्राप्त होती है। नित्यानित्परिवरस्तु मुरतो यस्य वातं । हामवायौराग्यं मम्पत्तस्यैव सम्मवेत् ॥३॥ सिश निपानिमाविक मुह हो जाता है टर्गको सेशिक पौकिक मंगायांना समय है।
तृतीय प्रकरण AGRONICORNERISOGRENIORNERGREMIERGANI ततः शमादिना सार्द्ध संन्यासस्तस्य सम्भवेत् । शमादीनां हि सम्पत्तेर्मोक्षेच्छा तस्य सम्भवेत् ॥ ४॥ और ऐसा होनेपर ही उसके लिये शमादि साधनोंके साप संन्यास सम्भव हो सकता है तथा शमादिके पूर्ण होनेपर ही उसमें मुमुक्षुता होना सम्भव है। वेदान्तश्रवणस्यैव सूत्रकृदधिकारिणम् । अथात इति शब्दाम्यामाद्यसूत्रे ह्यसूत्रयत् ॥ ५॥ सूत्रकार व्यासजीने भी अपने ब्रह्मसूत्रोंके प्रथम सूत्र (अपातो ब्रह्मजिज्ञासा) में ही 'अप' और 'अतः' इन दो शब्दोंद्वारा वेदान्तश्रवणके अधिकारीका लक्षण सूत्रबद्ध किया है। सहेतुका मनाशुद्धिर्द्वितीये प्रागुदीरिता। प्रकरणे तृतीयेऽसिन्विवेकादि प्रपञ्च्यते ॥६॥ पहले द्वितीय प्रकरणमें हेतुसहित मानसिक शुद्धिका वर्णन किया गया है। अब इस तृतीय प्रकरणमें विवेकादिका विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है। म्लानचित्तस्य पुंसस्तु विवेकादि सुदुर्लभम् । अतत्वे तत्वधीत्वाधीशुद्धिस्तानिका ततः॥७॥ · मलिनचित्त पुरुषको विवेकादि होना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि उसकी असार वस्तुओंमें सारयुद्धि रहती है। अतः चित्तशुदि.ही उन (विवेकादि) को उत्पन्न करनेवाली है।
६६
OCREATOGRAur
OCUSDERE.
मुमुक्षुसर्यवसार
कारणं हि भवेत्पूर्व कार्य च तदनन्तरम् ।
हन्छुद्धयादिनिबन्धौ द्वौ पौर्वापर्यमतोऽर्हतः॥८॥
पहले कारण होता है और उसके पीछे कार्य हुआ करता
है। अतः चित्तशुद्धि और विवेक इन दोनोंमें पूर्वापर भाव रहना
उचित ही है।
नित्यानित्यवस्तुविवेक
नित्यं गात्मतत्त्वं हि दृश्यं त्वनित्यमुच्यते ।
परोक्षो निश्चयो हो यास विवेक उच्यते ॥९॥
सर्वसाक्षी आत्मतत्व नित्य है और दृश्य अनित्य कहा जाता
इस प्रकारका जो परोक्ष निश्चय है वही 'विवेक' कहलाता है।
श्रुतयस्तयथेत्याद्या विवेके यान्ति मानताम् ।
कृतकं यत्तदेवासदितिन्यायसमन्विताः॥१०॥
विवेकके सम्बन्धमें 'जो कुछ कृतक (किया हुआ) है वह
सब अनित्य है' इस न्यायसे युक्त 'तद्ययेह कर्मजितो लोकः क्षीयते
एवमेयामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते' (छा० उ० ८।१।६)
इत्यादि श्रुतियाँ प्रमाण हैं।
नित्यानित्यविवेकस्याभ्यासः सम्यगनुष्ठितः।
जनयत्याशु वैराग्यं शमादिपटककारणम् ॥ ११ ॥
इहामुत्रार्थमोगेषु सत्कारस च नाशकम् ।
सते रणिर्यथा वति मथिता दारुदाहकम् ॥१२॥
तुतीय प्रकरण AGRIERGRIVERGRUGGUSIGRUHAGRISOGRAR जिस प्रकार मन्थन की जानेपर अरणि काष्ठको जला डालनेवाला अमि उत्पन्न कर देती है उसी प्रकार नित्यानित्य- विवेकका मलीभाँति किया हुआ अभ्यास तुरन्त ही वैराग्य उत्पन्न कर देता है, जो (वैराग्य) शमादि षट् सम्पत्तियोंका कारण और लौकिक एवं पारलौकिक पदार्थोंमें स्पृहाका नाश करनेवाला होता है। विवेकस्य समात्तिर्वसिष्ठेन प्रदर्शिता । मोक्षधर्मेषु चाप्युक्तं विवेकाम्यसनं मुहुः॥ १३॥ इस विवेककी आवृत्ति वसिष्ठजीने [अपने योगवासिष्ठ नामक प्रन्पमें] दिखलायी है तथा मोक्षधर्मोमें भी विवेकका बारम्बार अभ्यास कहा है। योगवासिष्ठे अद्य ये महतां मूर्ध्नि ते दिनैर्निपतन्त्यधः । हन्त चित्त महत्तायां केयं विश्वस्तता तय ॥१४॥ अरे ! आज जो महापुरुषोंके शिरमौर बने हुए हैं वे कुछ ही दिनोंमें अध:पतित हो जाते हैं । रे चित्त । इस महत्तामें तेरा यह क्या विश्वास हो रहा है। कोटयो ब्रह्मणो पाता गताः सर्गपरम्पराः । प्रयाताः पांशुवर्भूपाः का धृतिर्मम जीवने ॥ १५॥ फरोड़ों ब्रह्मा वीत गये, अनेकों दृष्टियाँ समाप्त हो गयौं, बहुत-से राजालोग धूलिकी तरह उड़ गये। अब इस जीवनमें मेरी क्या आस्था हो।
मुमुक्षुसर्वखसार OGNUDGREJ GreuEDGEMERGENCE येषां निमेषणोन्मेपौ जगतां प्रलयोदयौ । तादृशाः सन्ति वै नष्टा मादृशां गणनैव का ॥१६॥ जिनके निमेषोन्मेष ही संसारकी उत्पत्ति और प्रलयके कारण ऐसे-ऐसे गेग नष्ट हो गये । फिर हम-जैसोंकी तो गणना ही क्या है ! उत्पातवायुरेवायुमित्राण्येवाविशत्रवः पन्धयो बन्धनान्येव धनान्येवातिनैधनम् ॥ १७ ॥ आयु ही उत्पातवायु (बबण्डर ) है । मित्र ही बहुत बड़े शत्रु हैं, बन्धुजन ही बन्धन हैं और धन ही बड़ा भारी निधन (मृत्यु) है। सुखान्येवातिदुःखानि सम्पदः परमापदः । भोगा भवमहारोगा रतिरेव परारतिः ॥१८॥ मुख ही अत्यन्त दुःख है, सम्पत्ति ही बड़ी भारी आपत्ति है, भोग ही संसारके महारोग हैं और राग ही परम दुःख है। मोगा विपयसम्भोगा भोगा एव फणावताम् । दशन्त्यपि मनाक् स्पृष्टा दृष्टा नष्टाः प्रतिक्षणम् ।। १९ मोग और विषयसामग्रीमानो सपोंके फन ही हैं। ये जरा छूते ही इस टेते हैं और प्रतिक्षण देखते-देखते नष्ट हो रहे है। मोगाशावृद्धवृष्णानामपमानं पदे पदं । आलानमवलीनानां चन्यानामिव दन्तिनाम् ॥ २० ॥ जिनकी तृष्णा मोगाशासे अत्यन्त बह गयी है उनका सम्भेमें बंधे हुए जङ्गटी हापियोंके समान पद-पदपर अपमान होता है। 3- OGUROGRus तृतीय प्रकरण GREHENGALANDGRIDGroups सम्पदः प्रमदाथैव तरङ्गोत्सङ्गभङ्गुराः। कस्तास्वहिफणाछत्रच्छायासु रमते बुधः ॥२१॥ सम्पदा और प्रमदा [अर्थात् काञ्चन और कामिनी ] तरंग- भङ्गीके समान क्षणभङ्गुर हैं । वे सर्पके फनरूप छत्रको छायाके समान हैं; उनमें कौन बुद्धिमान् अनुरक्त होता है ! संसाररात्रिदुःस्वमे शून्ये देहमये भ्रमे । आस्यांचेदनुबध्नामि धिङ्ममास्तु तदा खितिम्॥२२॥ संसाररात्रिके दुःखममें प्रतीत होनेवाले इस देहरूप पोये भ्रममें यदि मैं आस्था करूँ तो मेरी ऐसी स्थितिको धिक्कार है। संसार एच दुःखानां सीमातः किल कथ्यते । तन्मध्यपतिते देहे सुखमासाद्यते कथम् ॥ २३॥ यह संसार तो दुःखोंकी सीमा ही कहा जाता है । उसके बीचमें पड़े हुए देहमें मला सुख कैसे मिल सकता है ! न तदस्तीह यदयं कालः सकलघसरः। प्रसवे न जगजातं प्रोत्यान्धिमिव पाडयः॥२४॥ जिस प्रकार घडवानल बड़े हुए समुद्रको लील जाता है उसी प्रकार इस जगत्में उत्पन्न दुआ ऐसा कोई पदार्प नहीं है जिसे सबको निगल जानेवाला काठ न खा जाय । ये रम्या ये शुभारम्माः सुमेरुगुरवोपिये। , कालेन विनिगीर्णास्ते गरुडेनेच पनगाः॥२५॥ .
मुमसर्पससार OGRUARRAONGRELIGOROUGRAANERIENGRUION जो बड़े रमणीय और शुभारम्भ है, तथा जो सुमेरुके समान भारी हैं, वे सब मी इस प्रकार कालपस्त हो रहे हैं जैसे गरुडसे सर्प । शक्रोऽप्याकम्यते वक्त्रैर्यमोऽपि हि नियम्यते । वायुरप्येत्यवायुत्वं कैवास्था मम जीवने ॥२६॥ इस कालके मुखका इन्द्रपर भी आक्रमण होता है, यह यमका भी नियमन करता है, इसके भयसे वायु भी अवायु (न चलनेवाला) हो जाता है | फिर मेरे जीवनमें ही क्या आस्था की जाय ! अधोत्सवोऽयं मृतिरेप तथेह यात्रा वन्धवःसुखमिदंसविशेपमोगम् । इत्थं मुधैव कलयन् सुविकल्पजाल- मालोलपेलवमतिर्गलतीह लोकः ॥२७॥ आज यह उत्सव है, यह मृत्यु हुई, यहाँ यात्रा हो रही है, वे मेरे बन्धुजन हैं, यह विशेष भोगसम्पन सुख है--इस प्रकार यह चञ्चल तथा मुग्ध बुद्धिवाला पुरुप व्यर्थ ही अनेकों कल्पनाएँ करता हुआ क्षीण होता रहता है । पर्णानि जीर्णानि यथा तरूणां समेत्य तथैव लोकाः खविवेकहीना समेत्य गच्छन्ति कुतोऽप्यहोमिः ॥२८॥ जिस प्रकार वृक्षोंके पत्ते जन्म टेनेके अनन्तर पक जानेपर जन्माशु लयं प्रयान्ति । --
दतीय प्रकरण
GRUCARRIORuouODGRUPERIODru
शीघ्र ही नए हो जाते हैं उसी प्रकार आत्मवियेकसे रहित पुरुष
जन्म ले-टेकर कुछ ही दिनोंमें कहीं चले जाते हैं।
फास्ता दृशो यामु न सन्ति दोपाः
कास्ता दिशो यामु न दुःखदाहः ।
फास्ताः प्रजा यासु न मरत्वं
फास्ता क्रिया यामु न नाम माया ॥२९॥
ऐसी कौन इटियाँ हैं जिनमें दोष न हों ! ऐसी कोन दिशाएँ
जिनमें दुःराका दाह न हो ! ऐसी कौन प्रजा है जिसमें क्षणभारता
महो! और ऐसी कौन-सी किया है जिसमें माया न हो !
स्वदन्ते वायदेवते भाषा जगति धीमते ।
पाररस्मृतिपपं याति न पिनायः कुराक्षसः॥३०॥
पुद्धिमान् पुरपयो संसारमें ये पदार्थ तभीतक रुचते हैं।
जबतक कि विनाशरूप दुष्ट राक्षसकी स्मृति नहीं होती।
विपं रिपयर्वपम्यं न पिं विपमुच्यते ।
जन्मान्वरमा शिपया एफदेहहरं पिम् ।।३१ ।।
विषयसरी विमताही विच है, विर दिर नही है क्योंकि
विच तो एक हो शरीरको नए करता है रिन्तु विप तो
जन्मान्तरके देहोश भी नर कर डालते हैं।
मोक्षध
साकार्यमय पुरीत पूदि पापराद्विरुन् ।
माहितीपने मरा हनुमस न पा कुतम् ॥३२॥
७२ मुमुक्षुसर्वखसार AGRONICOGNIORGANOGRAGNNERGRISOGRASA जो कार्य कल करना हो उसे आज ही कर लेना चाहिये, और जो अपराहमें ( दोपहरके बाद ) करना है उसे पूर्वाहमें ही कर लेना चाहिये, क्योंकि मृत्यु इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने अपना कार्य समाप्त किया है या नहीं। तं पुत्रपशुसम्पन्नं व्यासक्तमनसं नरम् । सुप्तं व्याघ्रं महायेव मृत्युरादाय गच्छति ॥ ३३ ॥ जिस प्रकार जलका महाप्रवाह किसी सोये हुए आपको यहा ठे जाय उसी प्रकार यह मृत्यु पुत्र और पशु आदिसे सम्पन्न तपा उनमें आसक्तचित्त पुरुषको [चुपचाप ] उठा ले जाती है। इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत्कृताकृतम् । एवमीहासुखासक्तं कृतान्तः कुरुते यो ॥३४॥ 'मैंने यह कार्य कर लिया, मुझे यह और करना है तथा इनके सिवा ये कार्य और भी किये एवं बिना किये हुए हैं। इस प्रकार इप्टामात्रके मुसोंमें आसक पुरुषको काल अपने वशीभूत कर लेता है। जरामृत्यू हि भूतानां सादितारा प्रकायि । पलिनां दुर्वलानां च इखाना महतामपि ॥३५॥ ये चरा और मृत्यु बयान, दुर्यट एवं छोटे-यो सत्र प्रकार प्राणिय को मंदियोंके समाना जानेवाली हैं। एवं भूतेषु भूतात्मा नित्यभूनाथुरेषु । फवं हि हप्पेजातेषु मृतेषु च न मन्चरं ।। ३६ ।।
AGRICOGRAJEnd
तृतीय प्रकरण
७३
OGRUGGENIEDO
इस प्रकारके नाशवान् प्राणियोंमें यह जीवात्मा नित्यरूप
है । वह उनके जन्म लेनेपर कैसे प्रसन्न होगा ! और न यह
उनके मरनेपर शोक ही करेगा।
फेनमात्रोपमे देहे जीवे शकुनिवस्थिते ।
अनित्येऽप्रियसंवासे कथं सपिपि पुत्रक ॥३७॥
हे पुत्र ! इस फेनोपम देहमें, जो अनित्य और दुःखोंका
निवासस्थान है तथा जिसमें यह जीव पक्षीके समान स्थित है, तू कैसे
सो रहा है :
अप्रमत्तेपु जाग्रत्सु नित्ययुक्तेषु शत्रुषु ।
अन्तरं लिप्समानेपु कथं त्वं नावबुध्यसे ॥ ३८॥
जो सदा अवसरकी ताकमें रहते हैं उन अति सावधान
और नित्ययुक्त शत्रुओंके जागते रहनेपर भी तू क्यों नहीं चेतता है !
पुरा शरीरमन्तको भिनत्ति रोगसारथिः ।
प्रसह्य जीवितक्षये तपो महत्समाचर ॥ ३९॥
अरे ! जिसका सारयि रोग है वह काल भगवान् जीवनका
अन्त होनेपर इस शरीरको बलात्कारसे नष्ट कर डालता है; अतः
सबसे पहले तू महान् तपस्या कर ।
विवेकका अभ्यास
संग्रहकर्तृवचनम्
वैराग्यकारणत्वेन विवेकः सम्मतो विदाम् ।
तदम्यासस्य संसिद्धौ वाक्योदाहरणं मुहुः ॥४०॥
मुमुक्षुसर्यवसार OGRLUONGraGREVERGREJORGANINGREEOGRESS विद्वानोंने विवेकको वैराग्यका कारण माना है। उसके अभ्यासकी सम्यक् सिद्धिके लिये बारम्बार इन वाक्योंका अभ्यास करना चाहिये। अनित्यत्वादिदोषाणामालोचनं मुहुर्मुहुः। भवेऽनुभूतियुक्तिभ्यां विवेकाम्यसनं स्मृतम् ॥ ४१ ॥ इस संसारमें अनुभव और युक्तिपूर्वक अनित्यत्व आदि दोषोंका पुनः पुनः विचार करना ही विवेकका अभ्यास कहलाता है। वैराग्यस्य यतो हेतुर्विवेकाम्यास उच्यते । तसादुक्तप्रकारेण स कार्योयजिहासुना ॥४२॥ क्योंकि यह विवेकाभ्यास ही वैराग्यका हेतु कहा जाता है, इसलिये जिसे लौकिक पदार्पोको त्यागनेकी इच्छा हो उसे उपर्युक प्रकारसे विवेकाभ्यास ही करना चाहिये । विवेकाभ्यासचिबादि वसिष्ठेनोदितं तु यैः। तद्वाक्यानि लिखामीह विवेकाधवबुद्धये ॥४३॥ जिन वाक्योंसे वसिष्ठजीने विवेकाभ्यासके लक्षण आदिका वर्णन किया है, उन्हें विवेकादिका ज्ञान प्राप्त कराने के लिये यहॉलिखता हूँ। योगवासिष्ठे विचारः सफलस्तस्य विज्ञेयो यस्य सन्मतेः। दिनानुदिनमायाति तानवं भोगगृध्नुता ॥४४॥ जिस सुबुद्धि पुरुषकी भोग-लालसा दिनोंदिन मन्द पड़ती 1 विचार साल समझना चाहिये।
तृतीय प्रकरण OGUAGrouEOGRANUSSGNISOGANDGREASOGRASSO यथा सर्शन पवनः सत्तामायाति नो गिरा। तथेच्छातानवेनैव विवेकोऽस्य वियुध्यते ॥४५॥ जिस प्रकार पवनकी सत्ता स्पर्शसे ही सिद्ध होती है, वाणीसे नहीं, उसी प्रकार इच्छाकी कमी होनेसे ही जीवको विवेक हुआ समझा जाता है। यथा देहोपयुक्तं हि करोत्यारोग्यमौषधम् । तथेन्द्रियजयेऽभ्यस्ते विवेकः फलितो भवेत् ॥४६॥ जिस प्रकार शरीरद्वारा सेवन की हुई ओपधि ही उसे नीरोग कर सकती है उसी प्रकार इन्द्रियजयका अभ्यास हो जानेपर ही विवेक सफल होता है। विवेकोस्ति पचस्येव चित्रेनिरिव भासुरः । यस तेनापरित्यक्ता दुःखायैवाविवेकिता ॥४७॥ चित्रमें प्रतीत होनेवाले अहिके समान जिसके केवल वचनमें ही विवेक दिखलायो देता है उसने मानो लिये ही अभी अविवेकको नहीं छोड़ा है। चित्रामृतं नामृतमेव विद्धि चित्रानलं नानलमेव विद्धि । चित्राङ्गना नूनमनङ्गनेति वाचा विवेकस्त्वविवेक एव ॥४८॥ चित्रके अमृतको अमृत ही मत समझो, चित्रके अग्मिको दुःख भोगनेके
OGROUPROUD
मुमुक्षुसर्यवसार
OGREADRIODarun
अमि ही मत मानो, चित्रलिखित स्त्री निश्चय ही खी नहीं है तमा
पाणीका विवेक भी अविवेक ही है।
येहि प्राज्ञाः स्वनियता विदग्धाः शास्त्रशालिनः ।
रागद्वेषमयास्ते वै जम्युकास्ते धिगस्तु तान् ॥४९॥
जो लोग बुद्धिमान्, आत्मपरायण, पण्डित एवं शास्त्रज्ञ
होकर भी रागद्वेषयुक्त हैं वे तो मानो गीदड़ ही है। उन्हें
धिक्कार है।
श्रूयतां ज्ञानसर्वसं श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ।
भोगेच्छामात्रको बन्धस्तत्त्यागो मोक्ष उच्यते ॥५०॥
ज्ञानका सारसर्वस्व सुनो और उसे सुनकर चित्तमें धारण
करो, 'भोगेच्छामात्र हो बन्धन है और उसका त्याग ही मोक्ष
कहा गया है।
किमन्यैः शास्त्रसन्दभैः क्रियतामिदमेव तु ।
यद्यत्स्वाद्विह तत्सर्व दृश्यतां विषपद्विवत् ॥५१॥
और अनेकों शास्त्रसमूहोंकी क्या आवश्यकता है ! केवल
इतना ही करो कि इस लोकमें जो-जो पदार्थ स्वादिष्ट हों उन्हें
विपामिके समान देखो।
पूर्व विवेकन तनुत्वमेति
रागोज्य वैरं च समूलमेव ।
पश्चात्सरिक्षीयत एष यतः
सा पावनी यत्र विवोकितास्ति॥५२॥
७७ तृतीय प्रकरण OGRRIGAGRORISGREHENGIGNREGIERGROUS. जहाँ यह परमपावनी विवेकशीलता विराजती है वहाँ पहले तो विवेकसे राग और वैर अपने मूलसहित मन्द पड़ जाते हैं तथा उसके पीछे यत्नमें शिपिलता आ जाती है । महाजडलवाधारे संसारविपमाणवे । इन्द्रियग्राहगहने विवेकः पोतको महान् ॥५३॥ जो इन्द्रियरूप पाहोंके कारण अति गहन हो रहा है उस महान् जडरूप कणोंके आधार संसाररूप विकराल समुद्रमें विवेक- रूप एक महान् पोत ( जहाज ) है। धनानि नाभिवाञ्छयन्ते तमांसीव विवेकिना । त्यज्यन्ते विद्यमानानि संशुष्कामध्यपर्णवत् ॥५४ ।। विवेकी पुरुप अन्धकारके समान धनकी भी इच्छा नहीं करते । बल्कि जो कुछ उनके पास होता है उसे भी वे सूखे और अपवित्र पत्ते के समान त्याग देते हैं । वैराग्य संग्रहकर्तृवचनम् एवं विवेकचिद्वादि वसिष्ठोक्त्येह दर्शितम् । विवेकजं तु वैराग्यमधुनाने प्रदर्श्यते ॥५५॥ इस प्रकार यहाँतक वसिष्ठजोके कयनानुसार विवेकके चिह्न आदि दिखलाये । अब आगे विवेकजनित वैराग्य. प्रदर्शित किया जाता है।
७८ मुमुक्षुसर्वस्वसार OGRANUARGar UDGROGRESSGunariORN · भोग्येपु चीतवष्णत्वं वैराग्यमिति कथ्यते । त्यक्तेषु तेवदैन्यं यचद्वैराग्यफलं विदुः॥५६॥ भोग्य पदार्थो तृष्णा न रहना-यही वैराग्य कहलाता है, और उनके त्याग दिये जानेपर जो दीनताका अभाव हो जाता है वही त्यागका फल माना गया है। ध्वासोचार सार्थेष्वनादरो यच सर्वथा । वैराग्यस्सावधि प्राहुस्तं विरक्ता यतीश्वराः ॥५७॥ विपयोंमें जो काफ-विष्ठाके समान अत्यन्त घृणा हो जाना है उसीको विरक्त यतीश्वरगण वैराग्यकी अवधि क्तलाते हैं। परीक्ष्येत्येवमायाश्च श्रुतयो यान्ति मानताम् । वैराग्ये मुण्डकादीनां लोकादिदोपदर्शिकाः ॥५८॥ वैराग्यके विषयमें मुण्डक आदि उपनिषदोंकी 'परीक्ष्य लोका- कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायात्" (मु० उ० १।२।१२) आदि लोकादिके दोप प्रदर्शित करनेवाली श्रुतियाँ प्रमाण हैं । तदिदं शुक्रमित्याद्या गर्भोपनिषदः श्रुतिः । वैराग्यार्थ जगादोचैर्देहजन्मक्रमं स्फुटम् ।।५९॥ तथा गर्भोपनिषद्की 'शुक्र शुकशोणितसंयोगादायतते गर्भ:" १ बामणको चाहिये कि कर्मद्वारा प्राप्त हुए लोकोंकी [निःसारताकी] परीक्षा कर उपरत हो जाय। २[मनासे ] शुक्र होता है। फिर शुक्र (वीर्य) और शोणित (रज) के संयोगसे गर्भ होता है।
तृतीय प्रकरण GNIRGUESTMASOGRANOGReNase इत्यादि श्रुतियोंने भी वैराग्यके लिये ही इस देहोत्पत्तिके क्रमका उच्च स्वरसे स्फुट वर्णन किया है। तथा गर्भस्थचिन्तापि तन्मन्त्रैश्च प्रकाशिता । देहाद्विरागसंसिद्धौ भोगाधिष्ठानतोऽस्थिरात् ॥६० ॥ अस्थिपञ्जरतोऽनित्यादसृग्विण्मूत्रभाजनात् । सङ्गहामीह तान्मन्त्रान्पाठक्रमानुसारतः ॥६१॥ तया उस (गर्मोपनिषद् ) के ही मन्त्रोंने भोगोंके आश्रय- खरूप इस अस्थिर देहसे, जो केवल अस्थियोंका पञ्जर, अनित्य और रक्त एवं मूत्रादिका पात्र है, विरक्त करनेके लिये गर्भस्थित बालककी चिन्ता भी प्रदर्शित की ! मैं उन मन्त्रोंको, उनके पाठक्रमके अनुसार यहाँ संगृहीत करता हूँ। गर्भदुःख गोपनिषन्मन्त्राः आहारा विविधा भुक्ताः पीता नानाविधाःस्तनाः । जातश्चैव मृतश्चैव जन्म चैव पुनः पुनः॥६२॥ मृतथाहं पुनर्जातो जातश्चाहं पुनर्पतः । नानायोनिसहस्राणि मयोपितानि यानि वै ॥६३॥ मैंने विविध प्रकारके भोजन किये हैं और तरह-तरहके स्तन पान किये हैं। मैं [ कई बार ] जन्मा हूँ और [ कई बार ] मरा हूँ। इस प्रकार मेरे पुनः-पुनः कई जन्म मुमुक्षुसर्वस्वसार -AGRAINIGROGRIDGRIORGroGausNGANA । होते रहे हैं, तथा पुनः जन्म लेकर मी मरा हूँ और फिर मरकर जन्म लिया है । इस प्रकार ऐसी अनेक प्रकारकी सहस्रों यौनियाँ हैं जिनमें मैं रह चुका हूँ। मातरो विविधा दृष्टाः पितरः सुहृदस्तथा । अवाङ्मुखः पीडितोऽहं जन्तुभिश्च समन्वितः ॥६४।* मैंने कितनी ही माताएँ, कितने ही पिता और अनेकों सुदृद्जन देखे हैं । मैं [ गर्भाशयमें ] अनेकों कीड़ों-मकोड़ोंके सहित नीचेको मुख किये पीडित होता रहा हूँ। यन्मया परिजनस्यार्थे कृतं कर्म शुभाशुभम् एकाकी तेन दोऽहं गतास्ते फलभोगिनः॥६५॥ मैंने अपने कुटुम्बियोंके लिये जो नाना प्रकारके शुभाशुभ कर्म किये थे उनसे मैं अकेला ही दुःख भोग रहा हूँ। उनका ·फल भोगनेवाले वे कुटुम्बी तो अब चले गये । यदि योन्याः प्रमुच्येऽहं तत्प्रपद्ये महेश्वरम् । अशुभक्षयकर्तारं फलमुक्तिप्रदायकम् ॥६६॥ यदि इस योनिसे मुझे छुटकारा मिल गया तो मैं सब प्रकारके अशुभका अन्त करनेवाले और मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले श्रीमहेश्वरकी शरण लूगा । यदि योन्याः प्रमुच्येऽहं तत्प्रपद्ये नारायणम् । अशुभक्षयकर्तारं फलमुक्तिप्रदायकम् ॥६॥ • हमें श्लोक ६३ ओर ६४ गोपनिषदें नहीं मिले ।
कृतीय प्रकरण
.GNIGRSIODGNIOGRAISIGNOGRAONGRED
यदि इस योनिसे मुझे छुटकारा मिल गया तो मैं सब प्रकार-
के अशुभका अन्त करनेवाले और मुक्तिरूप फल देनेवाले श्री-
नारायणकी शरण लूंगा।
यदि योन्या: प्रमुच्येऽहं तत्सांख्यं योगमम्यसे ।
अशुभक्षयकर्तारं फलमुक्तिप्रदायकम् ।। ६८॥
यदि इस योनिसे मुझे छुटकारा मिल गया तो मैं सब
प्रकारके अशुभका अन्त करनेवाले और मुक्तिरूप फल देनेवाले
सांख्य एवं योगका अभ्यास करूँगा ।
संग्रहकर्तृवचनम्
गर्मोपनिषदो अर्थ रामाय भगवाञ्च्छिवः ।
प्रोक्तवाञ्च्छिरगीतासु तद्वचांस्यप्यनुब्रुवे ॥६९॥
शिवगीतामें भगवान् शंकरने भी श्रीरामचन्द्रजीसे गर्भोपनिषद्का
हो आशय कहा है । यहाँ हम उनके वाक्योंका उल्लेख करते हैं ।
शिवगीतासु
पश्चभूतः समारब्धो देहोऽयं पाश्चभौतिकः ।
तत्र प्रधानं पृथिवी शेषाणां सहकारिता ॥७॥
पाँच मूतोंसे आरम्भ होनेवाला यह देह पाञ्चभौतिक है।
इनमें पृपित्री प्रधान है और शेष (चार भूत) उसके सहकारी हैं ।
जरायुजोऽण्डजश्चैव स्वेदजश्वोद्भिजस्तथा ।
एवं चतुर्विधः प्रोक्तो देहोज्यं पाश्चमौतिकः ॥७१॥
८२ OURGUSIGRANURANUSSCLAIMERUKOo मुमुक्षुसर्वखसार जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज-इस तरह यह पाञ्चभौतिक देह चार प्रकारका कहा गया है । मानसस्तु परः प्रोक्तो देवानामेव स स्मृतः । तत्र यक्ष्ये प्रथमतः प्रधानत्यागरायुजम् ॥७२॥ इनके सिरा एक मनोमय देह भी होता है, जो देयताओंका ही माना गया है। उनमें प्रधान होनेसे सबसे पहले मैं जरायुनका वर्णन करता हूँ। या सीचर्मावृतिः सूक्ष्मा जरायुः सा निगपते । शुकशोणितमयोगस्तसिमेव भवेद्यतः॥७३॥ तय गर्मों भवेधसानेन प्रोक्तो जरायुजः । अण्डजाः पक्षिसायाः खेदजा मशफादयः ॥७४।। नियोंके गर्भाशय जो अत्यन्त हल्दी बिल्ली होती है जो जरा करते हैं। क्योंकि पुरुपके वीर्य और लीक रमका संयोग उनीमें हं'ना है और उमांग गर्न गित होता है, इसलिये ( उगगे इपन्न होनेवाले प्रानी] जगात करदात है। पी तथा मदि अइज है और मध्य आदिवंदन है। उद्विजा वगुल्माया मानमाथ गुरुपयः । जन्मस्मंशादेव नियनं. मामन्दिरं ॥४॥ गुर रजाममायुनं प्रय मामि नवम् । दृश्युदं कललं तसारतः पंधी मदिदम् ॥ ७॥ .
८३ तृतीय प्रकरण SORRUPERIEOGUSIGNERGRNANGALORGUSe वृक्ष और गुल्म आदि उद्भिज पदार्थ हैं तथा देवता और ऋपि मानस हैं। अपने प्रारब्ध-कर्मके वशीभूत होकर गर्भाशयमें छोड़ा हुआ वीर्य रजसे मिलनेपर प्रथम मासमें पहले तरलाकार रहता है, उससे बुबुद और बुबुदसे कलल बन जाता है । फिर उससे यह पेशीरूप हो जाता है। पेशीधनं द्वितीये तु मासि पिण्डः प्रजायते । करानिशीर्षकादीनि तृतीये सम्भवन्ति हि ।।७७॥ दूसरे महीनेमें वह पेशी पिण्डरूपमें परिणत हो जाती है और तीसरे महीनेमें उसमें हाप, पाँव और शिर आदि निकल आते हैं। अभिव्यक्तिव जीवस्य चतुर्थे मासि जायते । ततश्चलति गर्भोऽपि जनन्या जठरे खतः॥७८॥ चौथे महीनेमें उसमें जीवात्माकी अभिव्यक्ति हो जाती है। तब वह गर्भ अपनी माताके उदर में स्वयं ही डोलने-फिरने लगता है। अदानादोहदानां स्युर्गर्भस्य व्यङ्गतादयः । मातुर्यद्विपये लोभस्तदा” जायते सुतः । प्रवृद्ध पश्चमे चित्तं मांसशोणितपुष्टता ।।७९॥ उस समय गर्भिणीकी इच्छाओंको पूर्ण न करनेसे गर्भस्थ बालकमें अङ्गहीनता आदि दोष हो जाते हैं। माताका जिस विषयमें राग रहता है पुत्र भी उसी विषयके लिये आतुर रहा करता है, तथा पाँचवे मासमें चित्तका आविर्भाव होनेपर उसके मांस और रक्त पुष्ट हो जाते हैं।
मुमुक्षसर्वस्वसार OGROUNGALOG avorica - पष्टेऽस्थिस्नायुनग्वरकेशलोमविविक्तता स्लरी चोपचितौ ससमे त्वगपूर्णता ॥८॥ छठे महीनेमें अस्थि, मायु,नस, केश और लोम प्रकट हो जाते हैं तथा सातवें महीनेमें बल और कान्ति बढ़कर सब अंग पूर्ण हो जाते हैं। पादान्तरितहस्ताभ्यां श्रोत्ररन्ध्रे पिधाय सः। उद्विग्रो गर्भसंवासादस्ति गर्मभयान्वितः ॥८॥ टाँगोंमें होकर निकले हुए हापोंसे अपने दोनों कर्गन्धोंको मूंदकर यह बालक गर्भवाससे दुःसित हो पुनः गर्भमें जानेसे भयभीत हो जाता है। आविर्भूतप्रयोघोऽसौ गर्मदुःखादिसंयुतः । हर कएमितिनिर्विष्णः स्वात्मानं शोमुचीत्यय ॥८२॥ उस समय उसे ज्ञान उत्पन्न होता है और यह गर्भदुःगगे पीडिन होकर हाय ! कैमा कष्ट है इस प्रकार अनि विन होकर अपने लिये इस प्रकार शक करने लगता है। अनुभूना महासमपुरो मर्मच्छिदोसछन् । फरम्मवालुकाम्तमावादहन्तामुखाशया: ॥८३॥ अहो ! मैंने कई बार अपन्न अमद ममष्ठेदी (नारी] शरीरोंका अनुभव किया है । तथा मुन्ने अन्यन्त दुमयी और सदीई माकी बाओंने सपाया है।
तृतीय प्रकरण +rumravatevEOGRALSOGEN जठरानलसन्तप्तपित्ताख्यरसविग्रुपः गर्भाशये निमग्नं तु दहन्त्यतिभृशं हि माम् ॥८४॥ जठरानलसे तपायो हुई पित्त नामक रसकी बूंदें गर्भाशयमें पड़े हुए मुझको अत्यन्त सन्तप्त कर रही हैं । उदयक्रिमिवक्त्राणि कूटशाल्मलिकण्टकैः । तुल्यानि च तुदन्त्या पार्शस्थिक्रकचार्दितम् ।।८५॥ पसलीकी हड्डीरूप किरचोंसे पीडित होते हुए मुझको उदरमें रहने- वाले कीडोंके सेमलके काँटेके समान कठोर मुख नोच रहे हैं । गर्भे दुर्गन्धभूयिष्ठे जठराग्निप्रदीपिते । दुःखं मयाप्तं यत्तसात्कनीयः कुम्भिपाकजम् ॥८६॥ जठराग्निसे सन्तप्त इस दुर्गन्धपूर्ण गर्भाशयमें मैंने जैसे-जैसे दुःख भोगे हैं उनके सामने कुम्भीपाक नरककी पीडाएँ भी बहुत छोटी हैं। पूयासृक्छ्लेष्मपायित्वं वान्ताशित्वं च यद्भवेत् । अशुचौ क्रिमिभावश्च तत्प्राप्तं गर्मशायिना ॥८७॥ संसारमें जो पीच, रक्त और श्लेष्मा आदि पान करना, यमन भक्षण करना तथा गन्दे स्थानमें कीड़ा बनना आदि दुःख वह सब मैंने इस गर्भमें रहकर ही पा लिये हैं। एवं सरन्पुरा प्राप्ता नानाजातीश्च यातनाः । मोक्षोपायमपि
-
मुमुभुसर्वस्वसार
OGR2016DGADGEMERGENDERGRIDcreturoo
इस प्रकार पूर्वकालमें पायी हुई नाना प्रकारकी यातनाओंको
स्मरण कर तथा मोक्षप्राप्तिके साधनोंका भी विचारकर वह
अभ्यासमें तत्पर रहता है।
अष्टमे त्यस्मृती स्यातामोजस्तेजश्व हृद्भवम्
शुद्धमापीतरक्तं च निमित्तं जीवने मतम् ॥८९॥
आठवें महीनेमें उसमें खचा और गतिरूप क्रिया तथा हृदयसे
उत्पन्न होनेवाला ओज और तेज पैदा हो जाता है जो अति शुद्ध और
कुछ पीलापन लिये रक्तवर्ण होता है तथा मनुष्यके जीवनका कारण
माना गया है।
किञ्चित्कालमवस्थानं संस्कारात्पीडिताङ्गवत् ।
समयः प्रसवस्य स्थान्मासेषु नवमादिषु ॥९॥
फिर कुछ काल संस्कारवश पीडित अंगोंसे गर्भाशयमें रहना
पड़ता है। तदनन्तर नवम आदि महीनों में प्रसवकाल उपस्थित
होता है।
मातुरस्रवहां नाडीमाश्रित्यान्ववतारिता ।
नाभिस्थनाडी गर्भस्य मात्राहाररसावहा ।।९१॥
माताको रक्तवाहिनी नाड़ीका आश्रय करके एक नाड़ी फैली
हुई है। वह नाभिस्था नाड़ी ही [गर्भके लिये] माताके आहारका
रस वहन करनेवाली होती है ।
तेन जीवति गर्मोऽपि मात्राहारेण पोपितः ।
अस्थियन्त्रविनिप्पिष्टः पतितः कुक्षिवमना ॥९२॥
तृतीय प्रकरण GRANGRAHORGruODGMODERRIEDEUORRUDO उस माताके आहारसे ही पोपित होकर वह गर्भ जीवित रहता है । तदनन्तर यह अस्थियन्त्रसे पीडित होकर माताके बुद्धिमार्गसे बाहर गिर जाता है । मेदोऽमृन्दिग्धसर्वाङ्गो जरायुपुटसंवृतः। निष्क्रामन् भृशदुःखार्तो रुदनुभैरघोमुखः ॥ ९३॥ उसके सम्पूर्ण अंग मेद और टोहमें भरे रहते है और जब यह गर्भयेष्टनम लिष्टा हुआ नीचेको मुग किये बाहर निकरता है तो आयन्त दुःपसे पीडित होकर रोने लगता है। यन्त्रादेवं मिनिर्मुक्तः पतत्युत्तानशाग्युत । जातः स पायुना स्पृष्टो न सरति शुभाशुभम् ॥९४॥ इस प्रकार यह [ योनिरूप] यन्त्रसे छूटकर उतान सोपा हुआ गिरता है । उस समय जन्म स्टेनेपर उसे ज्यों ही पायुमा स्पर्श होता है क्यों हो उसको भटे-युरेका ज्ञान नहीं रहता। शरीरनिन्दा संग्रहकर्तृपपनम् तदेयं गर्भदुःखानि . देहादेराग्यमंसिद्धय ॥९५॥ म प्रसार पाँ का दिग्दर्शन उसकामाम कतापामा
८८
मुमुक्षुसर्ष स्ससार
OGROLUSICALJc
मोगानामाश्रयो देहः स च दोपगणान्वितः ।
विण्मूत्रास्थ्यादयो दोपा यतः सन्ति शरीरगाः ॥९६॥
शरीर भोगोंका आश्रयस्थान है और अनेकों दोपोंसे पूर्ण है,
क्योंकि विष्टा, मूत्र और हड्डी आदि दोष इस शरीरमें ही रहते हैं।
तसिन्विष्ठादिसङ्घाते भोक्तुं नेच्छति बुद्धिमान् ।
गर्ने विण्मति भुङ्क्ते का स्थित्वा श्वादीन्विना पुमान्।९७॥
कोई भी बुद्धिमान् पुरुष विष्टा आदिके संघातरूप इस देहमें
भोगकी इच्छा नहीं कर सकता। भला विष्टाके गडढेमें रहकर
श्वान आदिके सिवा और कौन पुरुष भोगोंको भोग सकता है !
मूढस्तु तत्र भुङ्क्ते हि प्रत्युत विषयान्मुदा ।
सम्मूढोऽतिशिशुर्यद्वद्भुङ्क्ते स्वीयं मलादिकम् ॥९८॥
किन्तु मूढ पुरुष तो इस शरीरमें बैठकर ही अति आनन्द-
पूर्वक विषयोंको भोगता है, जिस प्रकार कोई अत्यन्त मूढ बालक
अपने मल आदिको खाने लगता है।
अस्यैवार्थस्य दाढर्याय श्रीरामवचनान्यहम् ।
तथा व्यासशुकादीनां सङ्ग्रहामि समासतः ॥ ९९ ॥
इसी अर्थको पुष्टि के लिये मैं यहाँ श्रीरामचन्द्रजीके वचन तथा
व्यास एवं शुकदेव आदिके वाक्योंको संक्षेपसे संगृहीत करता हूँ।
योगवासिष्ठे श्रीरामवाक्यानि
मांसलायवस्थिवलिते शरीरपटहेऽदृढे ।
मार्जारवदहं तात तिष्ठाम्यत्र गवध्वनौ ॥१०॥
- तृतोय प्रकरण OGRUARGRONICOGNIERGARGANISIGNIGAGRevoo हे तात! मांस, मायु और हड्डियोंसे वेष्टित इस शरीररूप अदृद्ध ( कमजोर ) एवं ध्वनिहीन ढोलमें मैं बिल्लोके समान रहता हूँ। कलेवरमहकारगृहस्थस्य महागृहम् लुठत्वप्येतु वा स्थैर्य किमनेन मुने मम ॥१०१॥ यह शरीर तो अहंकाररूप गृहस्थका एक विशाल गृह है हे मुने! यह लुढ़क जाय अथवा स्थिर रहे, इससे मेरा क्या होगा ! पङ्क्तिबद्धेन्द्रियपशुं चलत्तृष्णागृहाङ्गनम् । रागरञ्जितसर्वाङ्गं नेष्टं देहगृहं मम ॥१०२॥ यह देहरूपी घर, जिसमें इन्द्रियरूप पशु पंक्तिबद्ध हैं, तृष्णारूपा गृहिणी चलती-फिरती है तथा जिसके सभी भाग राग- रूप-रंगसे रश्चित हैं, मुझे प्रिय नहीं है । चित्तभृत्यकृतानन्तचेष्टावष्टब्धसंस्थितिः मिथ्यामोहमहास्थूणं नेष्टं देहगृहं मम ॥१०॥ चित्तरूप सेवककी की हुई अनन्त चेष्टाओंके कारण ही जिसकी स्थिति है तथा जिसमें मिथ्या मोहरूप बड़े-बड़े खम्भे लगे हुए हैं वह देहरूप घर मुझे प्रिय नहीं है । दुःखार्मककृताक्रन्दं सुखशय्यामनोरमम् । दुरीहादग्धदासीकं नेष्टं देहगृहं मम ॥१०४॥ जिसमें दुःखरूप बालक रो रहा है, जो सुखरूप शय्यासे सुशोभिन है और जिसमें दुश्चेष्टारूप दुष्ट दासी रहती है वह देहरूप घर मुझे प्रिय नहीं है। - ९० OGRAON USERNIORGrous audPGROU600 मुमुक्षुसर्यवसार जिह्वामर्कटिकाक्रान्तवदनद्वारभीपणम् दृष्टदन्तास्थिशकलं नेष्टं देहगृहं मम ॥१०५|| जो जिहारूप बदरीसे आक्रान्त मुखरूप द्वारके कारण अति भयानक है तथा जिसमें दिखायी देनेवाले दाँतरूप हडोके टुकड़े लगे हुए हैं वह देहरूप घर मुझे प्रिय नहीं है । मानाबमानबहुला बहुलाममनोरमाः। शरीरमात्रबद्धास्थं नन्ति दोपदृशो नरम् ॥१०६॥ जिनमें मानापमानकी भरमार है और जो अनेकों प्रकारके लाभोंसे मनोहर प्रतीत होती हैं ऐसी अनेकों दोपमयो दृष्टियाँ शरीरमें ही आस्था रखनेवाले पुरुपको नष्ट कर देती हैं। कायोऽयमचिरापायो बुद्दोऽम्युनिधायिय । व्यर्थ कार्यपरावर्ते परिस्फुरति निष्फलः ॥१०७॥ यह शरीर समुद्रमें उठनेवाले बुलबुलेके समान शीघ्र ही नष्ट हो जानेवाला है । यह कार्यपरतारूप भँवरके रूपमें व्यर्थ और निष्फल ही स्फुरित हो रहा है। बद्धास्था ये शरीरेपु बद्धास्था ये जगत्स्थिती । तान्मोहमदिरोन्मत्तान्धिगस्त्येव पुनः पुनः ॥१०८।। जो शरीरमें आस्था रखते हैं तथा जिन्हें संसारकी स्थिरतामें भी विश्वास है उन मोहरूप मदिरासे उन्मत्त हुए पुरुषोंको बारम्बार धिक्कार ही है।
कृतीय प्रकरण GRMATOGUSIGRUECRUAmo GREARRINGS व्यासवाक्यम् सर्वाशुचिनिधानस कृतमस्य विनाशिनः । शरीरकसापिकृते मूढाः पापानि कुर्वते ।। १०९॥ हाय ! सारी गन्दगीके खजाने, कृतघ्न और विनाशशील इस देहके लिये ही मूढ पुरुष नाना प्रकारके पापकर्म करते हैं ! यदि नामास्य कायस्य यदन्तस्तद्रहिर्भवेत् । दण्डमादाय लोकोऽयं शुनः काकांश्च वारयेत् ॥११॥ इस शरीरके भीतर जो [मल, मांस, रक्त, मजा आदि दुर्गन्धमय वस्तुएँ भरी पड़ी ] हैं वे ही यदि बाहर निकल आवे तो यह लोक [ इसकी रक्षाके लिये ] हायमें डण्डा लेकर कुत्तों और कौओंको हटाता फिरेगा। शुकदेववाक्यम् अमेध्यपूर्ण कृमिराशिसङ्कलं स्वभावदुर्गन्धमशौचमधुवम् । कलेवरं मूत्रपुरीपभाजनं रमन्ति मूढा न रमन्ति पण्डिताः ॥११॥ जो गन्दगीसे भरा हुआ, कीड़ों-मकोड़ोंके समूहसे संतुलित, खभावसे ही अत्यन्त दुर्गन्धित और अत्यन्त अस्थिर है उस मटम्त्रके पात्ररूप शरीरमें महजन ही सुरा मानते हैं, पण्डितजन तो सर्वदा उससे विरत ही होते हैं।
मुमुक्षुसर्वस्वसार OGANISRGANGRALSOGANALSOGrouTORummun. विष्णुपुराणे मांसासृपयविण्मूत्रस्नायुमजास्थिसंहती देहे गेलीतिमान् मूढो भविता नरकऽपि सः ॥११२।। मांस, लाडू, पीर, विटा, मूत्र, सायु, मजा और अस्थियों के समूहरूप इस देहमें यदि किसी मद पुरुपकी प्रीति हो सकती है तो वह नरकमें भी प्रेम कर सकता है। बदेहाशुचिगन्धेन न विरज्येत यः पुमान् । पैराग्यकारणं तस्य किमन्यदुपदिश्यते ॥११३।। जिम पुरपको अपने शरीरको अपवित्र गन्धसे विराग नहीं होता उमे वेगाय और किम कारणका उपदेश दिया जाय! प्यासाचनम् म्यानाहीजादुपष्टंमाग्निम्यन्दानिधनादापि कायमापनाचत्वात्पण्डिताः पशुचि विदुः ॥११॥ उनिम्यान, बीज, आश्रय तथा जन्म और मरणो कारण দাম ব বুলি বিয়না বা এলিয়ন পাখি संग्रहप्तवनम् दोषाः पदागिनाः । ...
OGER1600 तृतीय प्रकरण AGRIEOneuOGRAISONG 'भगवन्नस्थिचर्मस्नायुमज्जा'* इत्यादि वाक्यद्वारा मैत्रायणी- शाखामें भी इस शरीरके दोष दिखलाये गये हैं। एवं भोगाश्रयास गर्ने जनौ तथा स्थिती । दोपा दुःखानि वेदादिप्रमाणेनेह दर्शिताः ॥११६।। इस प्रकार भोगोंके आश्रयभूत इस शरीरके गर्भवास, जन्म तपा स्थिति आदिमें जो-जो दोष हैं वे सब यहाँ वेदादि प्रमाणोंसे दिखला दिये। तसात्सर्वैरुपेक्ष्योऽयं देहः स्नाय्वादिपञ्जरः । तत्पुष्टिहेतुभोग्येषु त्याज्या चेच्छा मुमुक्षुमिः ॥११७।। इसलिये स्नायु आदिके ढाँचेरूप इस देहकी सभीको उपेक्षा करनी चाहिये। तथा मोक्ष-कामियोंको उसकी पुष्टिके कारणरूप भोग्य पदायोंकी भी इच्छा त्याग देनी चाहिये। नन्वात्मत्वेन सर्वेषां प्रसिद्धो देहको यतः । दुर्लभवोदितस्तस्मामोपेक्ष्यो विषयास्तथा ॥११८॥ श्रीमद्भागवते नृदेहमायं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् । • भगवनस्थिचर्मनादुमनार्मासशक्रशोणितरलेप्मादूषिते विभूषपातपित्तराहाते दुर्गन्धेनिःसारेऽस्मिन्छरीरे किकामोपभोगैः। (मैत्रा...)
.GROUNGALIGRGANISERNIG CRECRUARO मुमुक्षुसर्वखसार मयानुकूलेन नमसतेरितं पुमान् भवाब्धिन तरेत्स आत्महा ॥११९।। शका-यह देह तो सबके आत्मारूपसे प्रसिद्ध है और इसे बड़ा दुर्लभ भी कहा गया है। इसलिये यह तथा इसके विषय उपेक्षायोग्य नहीं हैं। श्रीमद्भागवतमें कहा है--यह मनुष्यदेह सबसे अग्रगण्य, [सुकृतियोंके लिये ] सुलभ, [पापात्माओंके लिये ] अन्यन्त दुर्लम और सुदृद्ध नौकारूप है । साक्षात् गुरुदेव हो इसके कर्णधार हैं। यदि मनुष्य अनुकूल वायुरूप मेरेद्वारा प्रेरित होनेपर [ इसमें बैठकर ] भवसागरको पार नहीं करता तो वह अपनी आत्माका घात करनेवाला ही है। संग्रहकर्तृवचनम् सत्यं हि दुर्लभः सोऽस्तूपेक्ष्यस्तयापि सम्भवेत् । अनात्मत्वायथा नाका नौनिभेसात्स्वधीः कथम् ॥१२०॥ समाधान-सचमुच यह शरीर अत्यन्त दुर्लभ है। तो भी अनात्मा होनेके कारण उपेशा ही करनेयोग्य है । जिस प्रकार कि नाका । मठा, इस नाकाके समान शरीरमें आत्मयुद्धि कैसे हो सकती है। दुर्लमत्वं हि शास्त्रेषु देहस पत्रकीर्तितम् । तद्भवोचरणायन नात्मत्वनानुपेक्षया ॥१२॥ शानमें जो शरीरकी दुर्द्धमता बतायी है वह उसके दाग तृतीय प्रकरण GRAMIND संसारसागरको पार करनेकी दृष्टिसे ही कही है--आत्मदृष्टिसे उसकी उपेक्षा न करनेके लिये नहीं। आत्मत्वेन च तं मत्वा यो भोगार्थ समीहते । देहस्यैवेह पुष्टयर्थ पशुतुल्यः स ना स्मृतः ॥१२२॥ जो पुरुष उसे आत्मारूप मानकर देहकी पुष्टिहीके लिये उसके भोगोंके लिये चेष्टा करता है वह पशुवत् माना गया है । यदुक्तं विषयाथापि नोपेक्ष्या इति तन्मृपा । यतस्तदनुपेक्षायां हेतु वोपलभ्यते ॥१२३॥ और यह जो कहा कि 'देहके विपय भी उपेक्षायोग्य नहीं है' सो ठीक नहीं, क्योंकि उनकी उपेक्षा न करनेका कोई कारण दिखायी नहीं देता। ननु कैश्चिन्महाभाग्यैर्लभ्यन्ते विपया यतः । अतस्तदनुपेक्षायां स्याद्दौलम्यस्य हेतुता ॥१२४॥ मैवं श्वशूकरैथापि पापिष्टैः सुरतादिकाः । लभ्यन्ते विपया यसादतस्ते नैव दुर्लभाः ॥१२५॥ यदि कहो कि ये विषय तो किन्हीं महान् भाग्यशालियोंको ही प्राप्त होते हैं; अतः उनकी दुर्लभता ही उनकी अनुपेक्षामें कारण है । तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ये मैथुन आदि विषय तो अत्यन्त पापी श्वान और शूकरादिको भी मिल जाते हैं। अतः वे अत्यन्त दुर्लभ नहीं हैं।
मुमुक्षसर्व स्पसार समाधान-सबकी प्रीतिपात्र होनेसे जो बाल्यकालकी सुखरूपता प्रतीत होती है यह ठीक नहीं, क्योंकि वह सर्वत्र सुख- रूपा नहीं है, केवल भ्रमजनित प्रेमके मुखले अन्वित है। वातादिदोपदुष्टानां स्वदेहमर्दनादिके । प्रीतिर्यथा तथा बाल्ये न सा सुखत्वसाधिका ।।१३।। जिस प्रकार वातादि दोपोंसे दृपित होनेपर अपने शरीरके मर्दन आदिमें प्रीति होती है उसी प्रकारकी प्रीति बाल्यावस्था में हुआ करती है । वह उसकी सुखरूपताको सिद्ध करनेवाली नहीं हो सकती। हेतुर्विशेषणासिद्धो विवकिनाञ्च सा यतः । स्वात्मन्यदृश्यमाने हि कापि प्रीतिर्न दृश्यते ॥१३४।। अतः यह (सर्वप्रीत्यास्पदत्वरूप ) हेतु विशेषणासिद्ध है, क्योंकि विवेकियोंकी प्रीति अपने अदृश्य आत्मामें ही देखी जाती है, अन्यत्र कहीं नहीं। पाल्यस्य सुखरूपत्वे श्रुतिर्योदाहृता त्वया । न बाल्यस्य सुखात्मत्वं वक्ति सापि कथश्चन ॥१३५।। इसके सिवा तुमने बाल्यावस्थाकी सुखरूपतामें जिस श्रुतिका प्रमाण दिया है यह भी किसी प्रकार बाल्यावस्थाकी सुखरूपता नहीं बताती। • जो हेतु विशेषणविशिष्ट होकर पशमें संघटित नहीं होता उसे फहते हैं, यहाँ 'सर्व' पदविशिष्ट प्रीत्यासदत्य'का व्यभिचार है, इसलिये यह हेतु विशेषणासिद्ध है।
OGRRIOGRU तृतीय प्रकरण ISORRUPGRELIGIOGRAEOGRRIEDO विक्षेपाभावमात्रांशे पालोपमा तयोदिता । वक्तुं यसात्प्रवृत्ता सा जीवस्य ब्रह्मरूपताम् ॥१३६॥ उसने तो विक्षेपाभावमात्र अंशमें ही बालककी उपमा दी है, क्योंकि वह तो जीयकी ब्रह्मरूपता प्रतिपादित करनेके लिये ही प्रवृत्त हुई है। सास्थार्थ हि कथं त्यक्त्वा पाल्यस्य सुखतां यदेव । उभयो?धने दोपो वाक्यभेदः समापवेत् ॥१३॥ वह अपने अभीष्ट अर्थको त्यागकर बाल्यावस्थाकी सुखरूपता क्यों बतलायेगी ! और यदि यह माना जाय कि वह इन दोनों अोंका बोध कराती है तो वाक्यभेदरूप दोपकी प्राप्ति होगी। बाल्यं विक्रियते नित्यं विकारिणि च शं कुतः । तस्माद्वाल्यं हि दुःखाय सुखाय न कदाचन ॥१३८॥ बाल्यावस्था सदा विकारको प्राप्त होती रहती है और विकारीमें सुख कहाँ ! इसलिये बाल्यकाल तो दुःखका ही कारण है, उसमें सुख कभी नहीं है। पाल्यदुःखानि दोपांच रामाय प्राब्रवीच्छियः । रामचन्द्रोऽपिवासिष्ठे याल्यदुःखानि चोक्तवान् ॥१३९॥ ‘बाल्यावस्थाके दुःख और दोपोंका श्रीरामचन्द्रजीसे शिवजीने वर्णन किया है तथा योगवासिष्ठमें रामचन्द्रजीने भी बाल्यकालके दुःख सुनाये हैं। .
१०० Groupraxis मुमुक्षुसर्यवसार GROUPareAnmun. तद्वाक्यानि लिखामीह वाद्याशापनुचये । पाक्यमानविचारेण पैराग्यस्य च सिद्धये ॥१४॥ अतः घादीकी शका दूर करनेके लिये और आप्तवाक्यरूप प्रमाणके विचारसे वैराग्यकी सिद्धिके लिये मैं यहाँ उनके वचन टिखता हूँ। शिवगीतासु अकिश्चित्तस्तदा लोकर्मासपेशीवदास्थितः । स्वमार्जारादिदंष्टिम्यो रक्ष्यते दण्डपाणिभिः ॥१४॥ उस समय कुछ भी करनेमें असमर्थ मांसकी पेशीके समान पड़े हुए उस बाटककी लोगोंको कुत्ता और बिल्ली आदि दादीवाले जीवोंसे हापमें डण्डा टेकर रक्षा करनी पड़ती है। पितृवद्राक्षसं वेत्ति मात्पहाकिनीमपि । पूर्व पयोयदनानादीर्घकष्टं तु शैशवम् ॥१४२॥ यह अज्ञानवस राससको अपने पिलाके ममान समझना है, डाकिनीको भी अपनी माता मानता है तपा पीवको दूधक समान समझता है। वस्तुतः शैशवशाल अत्यन्त पटपही है। पपा पिहिता नाही मुश्मा पारदपहि। म्पत्तवर्ग प पचनं वादन शक्यते ॥१४॥ अत एव च गर्नेपि रोदितं नैव रास्यते ॥१०॥ तक उमको मुरमा नासी कामे एका राती है दवा तृतीय प्रकरण OGununciaticarauBCLUSDA60 वह स्पष्ट असर भी उच्चारण नहीं किया जा सकता । इसीलिये गर्भस्थ बालक रोनेमें भी असमर्थ रहता है। संग्रह कर्तृवचनम् एवं पालो महादुःखी तद्वक्तुमपि न क्षमः ॥१४५।। इस प्रकार बालक अत्यन्त दुःखी रहता है और वह अपने दुःखको बतला भी नहीं सकता। योगवासिष्ठे न मृतौ न जरारोगे न चापदिन यौवने । वाश्चिन्ता विनिकृन्तन्ति हृदयं शैशवेपु याः ॥१४६॥ शैशवकालमें जैसी-जैसी चिन्ताएँ चित्तको नोचती रहती हैं वैसी मृत्यु, बुढ़ापे, रोग, आपत्ति और युवावस्थामें भी नहीं होती । सर्वाणि दुःखभूतानि सर्वे दोपा दुराधयः । बालमेवोपजीवन्ति श्रीमन्तमिव मानवाः ॥१४७॥ जिस प्रकार साधारण मनुष्य धनी पुरुपके आश्रित रहते हैं उसी प्रकार सारे दुःख, सारे दोप और सारीव्याधियाँ बाल्यावस्थाके आश्रित ही रहती हैं। वाल्यं रम्यमिति व्यर्थयुद्धयः कल्पयन्ति ये । तान्मूर्खपुरुषान् ब्रह्मन् घिगस्तु हतचेतसः ॥१४८॥ 'बाल्यावस्था सुखमयी है ऐसी जो व्यर्थबुद्धिलोग कल्पना किया करते हैं, हे ब्रह्मन् ! उन बुद्धिहत मूर्ख पुरुषोंको धिक्कार है ।
१०२ मुमुक्षुसर्वस्वसार शैशवे गुरुतो भीतिर्मात्तः पितृतस्तथा । जनतो ज्येष्ठबालाच शैशवं भयमन्दिरम् ॥१४९॥ इस शैशवकालमें गुरु, माता, पिता, दूसरे लोग तथा बड़े बालक सभीसे भय बना रहता है। सचमुच बाल्यावस्था भयका घर ही है। संग्रहकर्तृवचनम् एवं बहुविधं दुःखं बाल्येऽनुभूयते जनः । तसादाल्याद्विरज्येत खश्रेयश्चेदिहेच्छति ॥१५०॥ इस प्रकार शैशवकालमें लोगोंको नाना प्रकारका दुःख मोगना पड़ता है । इसलिये यदि संसारमें अपने कल्याणकी इच्छा हो तो बाल्यावस्थासे विरक्त हो जाय । युवावस्थाके दोप बाल्याना यौवनं याति प्रायेण दोपसंयुतम् । यहोपर्नरकं याति रतिमत्राप्यतस्त्यजेत् ।।१५१।। वाल्यावस्थासे मनुष्य यौवनको प्राप्त होता है, जो प्रापः दोपसे परिपूर्ण है तथा जिसके दोषसे वह नरकमें गिरता है। अतः मनुष्यको इसमें भी रागका त्याग करना चाहिये । दुःखान्यन्यत्र लभ्यन्ते येषां संख्या न विद्यते । तसाचतो विरज्येत श्रेयोर्थी नरकादिव ॥१५२॥ इस अवस्थामें भी उसे इतने दुसरा प्राप्त होते हैं कि जिनकी तृतीय प्रकरण १०३ DGRIDGUIRGANINGREASON कोई गणना नहीं हो सकती । अतः कल्याणकामीको उससे नरकके समान उपरत हो जाना चाहिये । यौवनस्य च ये दोपास्तस्य दुःखानि यानि च । त्यागाय शिवरामाम्यां सङ्घपात्तेऽपि दर्शिताः ॥१५३|| यौवनावस्थाके जो-जो दोष हैं और उनसे जितने दुःख उठाने पड़ते हैं उनका भी शिव और रामने, त्याग करनेके लिये संक्षेपसे दिग्दर्शन कराया है। तद्वाक्यानि लिखामीह विरत्यै यौवनादपि । सर्वतःसारसञ्चित्यै प्रयत्नोऽयं यतो मम ॥१५४॥ यौवनसे वैराग्य हो-इसलिये मैं यहाँ उनके वाक्य भी लिखता हूँ, क्योंकि मेरा यह प्रयत्न तो सब जगहसे सार संग्रह करनेके लिये ही है। शिवगीतायाम् दृप्तोऽथ यौवनं प्राप्य मन्मथज्वरविह्वलः । गायत्यकसादुच्चैस्तु तथाकसाच वल्गति ।।१५५।। मनुष्य युवावस्था पाकर मतवाला हो जाता है। वह काम- ग्वरसे व्याकुल होकर जोर-जोरसे गाने और डोंग हॉकने लगता है। आरोहति तरून्वेगाच्छान्तानुवैजयत्यपि । कामक्रोधमदान्धः सन्न किश्चिदपि वीक्षते ॥१५६।। यह बड़े वेगसे वृक्षोपर चढ़ जाता है, शान्त पुरुषोंको
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हृतीय प्रकरण
SAGAGEIODGIONERLENGLISH
सनिर्मलापि विस्तीर्णा पापन्यपि च यौवने ।
मतिः कलुपतामेति प्रावृपीव तरङ्गिणी ॥१६॥
जिस प्रकार वर्षाऋतुमें नदी मैली हो जाती है उसी प्रकार
युवावस्थामें अच्छी निर्मल, विस्तीर्ण और परमपवित्र मति भी
मलिनताको प्राप्त हो जाती है।
तावदेव विवल्गन्ति रागद्वेपपिशाचकाः ।
नास्तमेति समस्तपा यावद्यौवनयामिनी ॥१६॥
जबतक यह युवावस्थारूपी रात्रि पूर्णतया अस्त नहीं होती
तमीतक रागद्वेषरूप पिशाचगण नाच-कूद किया करते हैं ।
हार्दान्धकारधारिण्या भैरवाकारवानपि ।
यौवनाज्ञानयामिन्या विभेति मगवानपि ॥१६॥
हार्दिक अन्धकारको धारण करनेवाली इस युवावस्थारूप
अज्ञानमयी रात्रिसे भैरवाकार भगवान् भी भय मानते हैं ।
हर्पमायाति यो मोहात्पुरुपः क्षणभङ्गिना ।
यौवनेन महामुग्धः स वै नरमृगः स्मृतः ॥१६॥
जो महामुग्ध पुरुष मोहवश इस क्षणभङ्गुर यौवनसे
आनन्दित होता है. वह तो नरपशु माना गया है।
ते पूज्यास्ते महात्मानस्त एव पुरुषा मुवि ।
ये सुखेन समुचीर्णाः साघो यौवनसङ्कटात् ॥१६॥
DRUGSunaulo
१०६
मुमुक्षुसर्यम्यसार
हे साधो ! जो लोग इस योयनररूप आपत्तिसे मुखपूर्वक
पार हो गये हैं ये ही पूजनीय है, वे ही महात्मा हैं और वे ही
इस पृथ्वीतटपर पान्तविक पुरुष हैं।
वृद्धावस्थाके दोष
संग्रहकर्तृवचनम्
यौवनं भोक्तुमभ्येति जरा नुः शक्तिनाशिका ।
सर्पः सर्पान्तरं यद्वद्भोक्तुमभ्येति वैरतः ॥१६५।।
जिस प्रकार वैरवश एक सर्प दूसरे सर्पको निगलनेके
लिये आता है उसी प्रकार यौवनको हड़प जानेके लिये उसके पीछे
मनुष्यकी शक्तिको नष्ट कर डालने वाला बुढापा आता है ।
यौवनेऽस्ति यथा दुःखं दोषाश्च सन्ति भूरिशः ।
जरायां ते तथा सन्त्यतस्तत्रापि रतिं त्यजेत् ।।१६६॥
जिस प्रकार यौवनमें दुःख है और अनेकों प्रकारके दोप
हैं उसी प्रकार बुढ़ापेमें भी है । इसलिये उसमें भी अनुरागका
त्याग करना चाहिये।
ननु कामादिभिर्दोपर्नुर्मास्तु यौवने सुखम् ।
वाक्ये तदभावाद्वै न हि तदुःखसम्भवः ॥१६णा
शङ्का-युवावस्था में कामादि दोपोंके कारण मनुष्यको भले ही
सुख न मिले किन्तु वृद्धावस्था में तो उनका सर्वथा अमाव होनेसे
तजनित दुःखकी कोई सम्भावना नहीं, है ।
ORIGAMIER
तृतीय प्रकरण
१०७
cuEOGRADGAOOGLUCOGrea
कार्याशक्त्या भवेदुःखमिति चेन यतः सुताः ।
पौत्राद्याथापि वृद्धस सन्ति कार्यकराः प्रियाः॥१६८॥
यदि कर्म करनेकी असमर्थताके कारण दुःख माना जाय तो
ठीक नहीं, क्योंकि वृद्ध पुरुषके सब कार्य करनेवाले उसके प्रिय
पौत्रादि तो होते ही हैं।
सेव्यमानः स पुत्राद्यैर्दुःखी स्थान कथञ्चन ।
वार्धिक्यान्नुरतो नैव विरागः स्यात्तु धीमतः॥१६९।।
पुत्रादिके सेवा करते रहनेसे वह किसी प्रकार दुःखी नहीं होता।
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको वृद्धावस्थासे वैराग्य नहीं हुआ करता ।
मैवं यतो हि युद्धानामपि दोपास्तु चित्तगाः ।
कामाचा नैव नश्यन्त्यर्थविचारादिभिर्विना ॥१७॥
समाधान-ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वृद्ध पुरुपोंके भी
कामादिक मानसिक दोर परमार्थ-वस्तुको विचार किये बिना नष्ट
नहीं होते।
विना वस्तुविचारेण वार्धिक्यमावतो यदि ।
नश्येयुस्ते तदा वृद्धा न वाञ्छेयू रसादिकान् ॥१७॥
यदि वस्तुका विचार किये विना केवल वार्दिक्यमात्रसे ही
उनका नाश हो जाता तो वृद्धजन रस आदिकी इच्छा न किया करते।
वृद्धानां प्रत्युत वाञ्छा दृश्यते हि विशेषतः ।
मोगैः शाम्यति सा नैवेति भारते समीरितम् ॥१७॥
मुमुक्षुसर्यस्यसार
OGROGROLORRUncuEDO
ORRU634
वृद्धजनोंको तो उन रसादिकी इच्छा और भी अधिक देखी
जाती है। यह भोगोंसे शान्त नहीं हो सकती । यही बात
महाभारतमें कही है।
महाभारते
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविपा कृप्पावत्मव भूय एवाभिवर्द्धते ॥१७३॥
भोगोंकी कामना भोगोंको मोगनेसे कभी शान्त नहीं होती;
बल्कि अग्नि जिस प्रकार हविसे प्रज्यलित हो जाता है उसी प्रकार
वह और भी अधिक बढ़ जाती है ।
पूर्ण वर्षसहस्रं मे विषयासक्तचेतसः ।
तथाप्यनुदिनं तृष्णा ममैतेष्वमिजायते ॥१७॥
मुझे विषयासक्त चित्त रहते एक सहस्र वर्ष बीत गये । तथापि
इनमें मेरी तृष्णा दिनोंदिन बढ़ती जा रही है ।
जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।
गात्राणि शिथिलायन्ते तृष्णका तरुणायते ॥१७॥
जैसे-जैसे जरावस्था प्राप्त होती है केश जीर्ण होते जाते हैं, दाँत
जर्जरित तथा अंग-प्रत्यंग शिथिल होते जाते हैं किन्तु एकमात्र
तृष्णा तरुण हो जाती है।
संग्रहकर्तृवचनम्
जरायो पहवो दोपाः शिवादिमिरपीरिताः ।
लोकांस्तनिर्मिवानय विरत्यै संलिखाम्यहम् ॥१६॥
हतोय प्रकरण
GreenerationcreasoGUDGNIROGRNOOGasur
इस जरायस्था में शिवजी आदिने भी बहुत-से दोष बतलाये
हैं। अतः पैराग्यकी सिद्धिके लिये इस समय मैं उनके रचे हुए
लोक लिखता हूँ।
शिवगीतासु
महापरिभवस्थानं, जरां प्राप्यातिदुःखितः ।
श्लेष्मणा पिहितोरस्को जग्धमन्नं न जीर्यति ॥१७७॥
अत्यन्त पराभवकी स्थानरूप इस वृद्धावस्था प्राप्त होनेपर
मनुष्य बड़ा दुःखी हो जाता है तथा हृदय कफसे घिर जानेके
कारण उसका खाया हुआ अन्न भी नहीं पचता।
भनदन्तो मन्ददृष्टिः कतिककपायभुक् ।
वातभुमकटिग्रीयाकरोरुचरणोऽवल ॥१७८॥
गदायुतसमाविष्टः परिभूतः स्वयन्धुभिः ।
उसके दाँत गिर जाते हैं, दृष्टि मन्द पड़ जाती है, चरपरे,
तीखे और कसैले पदार्थोंमें उसकी रुचि हो जाती है तथा फटि,
ग्रीवा, हाप और पाँव आदिके वातग्रस्त होनेसे वह सर्वथा बल-
हीन हो जाता है। इस प्रकार हजारों रोगोंसे आक्रान्त होनेके
कारण वह अपने बन्धुजनोंसे तिरस्कृत होने लगता है।
संग्रहकर्तृवचनम्
एवं शिवेन पुत्राद्यैरुक्ता घृद्धविरस्कृतिः ॥१७९॥
पद्धस्स पुत्रपौत्रायः स्यात्सुखमिति यदचः ।
: तन्मृति शिवोक्त्या हि ज्ञायते पूर्वपक्षिणः ॥१८०॥
मुमुक्षुसर्यससार
OGLEOGRAORGANGrounGRAISGAUSAGreate
इस प्रकार शिवजीने पुत्रादिसे वृद्ध पुरुपके तिरस्कृत
होनेका वर्णन किया है । अतः 'वृद्ध पुरुषको पुत्र-पौत्रादिसे सुख
प्राप्त होता है'---ऐसा जो पूर्वपक्षीका कपन है यह शिवजीके
इस कथनसे मिथ्या ही मालम होता है।
दृश्यते चाय लोकेपि प्रायेण पितरौ सुताः ।
वृद्धौद्यशक्तिको त्यक्त्वा सेवन्ते स्वीसुवादिकान् ॥१८॥
आजकल लोकमें भी यह देखा जाता है कि पुत्रगण प्रायः
अपने वृद्ध और शक्तिहीन माता-पिताको त्यागकर खी-पुत्रादिकी
सेवामें लगे रहते हैं।
वृद्धं यथा वलीवदं स्वदासं चाप्यशक्तिकम् ।
खामी त्यजति तद्वय वृद्ध दारसुतादिकाः॥१८२॥
जिस प्रकार खामी बूढ़े बैल और अपने शक्तिहीन सेवकको
त्याग देता है, उसी प्रकार स्त्री-पुत्रादि वृद्ध पुरुषको त्याग देते हैं।
वृद्ध पितामहं दृष्ट्वा पौत्राद्या बालकाः खलु ।
प्रत्युतोपहसन्त्येनं सेवन्ते प्रीतितो न च ॥१८॥
अपने दादाको बूढ़ा हुआ देखकर पौत्र आदि बालक प्रीति-
पूर्वक उसकी सेवा नहीं करते, प्रत्युत उसकी हँसी किया करते हैं।
आप्तवाक्यम्
अधः पश्यसि किं वृद्ध तव किं पतितं भुवि ।
! .अरे मूढ न जानासि गतं मे यौवनं धनम् ॥१८॥
एतीय प्रकरण GreucocINGEET [किसो वृद्धाको नीचको शिर किये देखकर कोई पुरुष पूछता है- 'हे घृद्ध ! तू नीचेकी ओर क्या देख रही है ! 'पृषियीपर तेरी क्या चीज गिर गयी है ? [तब वृद्धा कहती है-] रिमूद ! क्या तुझे मालूम नहीं, मेरा यौवनरूप धन चला गया।' संग्रहकर्तृवचनम् इतिहासोऽपि वृद्धस्याः सम्प्रदर्शितस्तथा । जरायाय विरागाय दोपा रामेण दर्शिताः ॥१८५।। इस प्रकार आप्त पुरुषोंने वृद्ध पुरुषका इतिहास भी ऐसा ही दिखाया है, तपा श्रीरामचन्द्रजीने भी बुढ़ापेसे वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये उसके दोषोंका दिग्दर्शन किया है। योगवासिष्ठे दुःप्रेक्ष्यं जरठं दीनं हीनं गुणपराक्रमः । गृधो पृक्षमिवादीर्घगर्दोऽयम्पति घृद्धकम् ।।१८६॥ जिस प्रकार वृक्षपर गृध्र आ बैठना है उसी प्रकार जिसकी और देखा नहीं जाता उस अन्यन्त जर्जरित, दीन और गुग- पराकमहोन दृस पुरुषपर प्रबल तृष्णा आकर सवार हो जाती है। दैन्यदोपमयी दीर्घा हदि दाहप्रदायिनी । सर्वापदामेकसवी पार्द्धक पद्धते सहा ॥१८॥ वृद्धावस्था, दौनतारूप महान् दोपमयी, हदपमें सन्ताप उत्पन करनेवाली ता सम्पूर्ण आपत्तियोंको एकमात्र सहेली कामनाको पनि हो जाती है।
मुमुक्षुसखवार AGRISGK TreduDr कथं कदा मे किमिव स्वादु स्यानोजनं जनान् । इत्यजसं जरा चैपा चेतो दहति यार्द्धके ॥१८॥ 'मुझे कब किस प्रकार और कैसा स्वादिष्ट भोजन मिले !' इस प्रकारकी चिन्तासे यह वृद्धावस्या बुदापेमें लोगोंके चित्रोंको निरन्तर तपाया करती है। काचिदस्ति जगत्पसिनामङ्गलकरी तथा । यथा जराक्रोशकरी देहजङ्गलजम्बुकी ॥१८९।। इस संसारमें ऐसी अमालफारिणी और कोई यस्तु नहीं है जैसी इस दारीरमप यनमें रहनेवाली यह चीत्कार करनेवाली जरादप जम्युकी (सिपारी) है। मृत्युके दुःख संग्रह कचनम् एवं दृष्ट्वा जरादोपान्विरज्येव नतः गुधीः । संदेहाति विरागाय मृत्युदण्यं तया मरेत् ॥१९॥ इस प्रार दायस्थायदोष देकर उसमे किरा हो पुद्धिमान पुरुष अपने शारीरमे अनामुक्त होने के लिये मृत्युकंदों का स्मरण करे। मृत्युहम्मानि पोनानि रामाय भोशिन। तवान्मपुराणेपि मृत्युपं प्रदर्शितम् ॥१९॥ भृग्नु दुःयोग शिव गमाग वन vिe है सामगगने मी मयुके दुःख दिन कराया है।
OGEN तृतीय प्रकरण GRUSDGROUSGRRIEDGRIDGarls सगृहामि तयोश्चात्र श्लोकानप्यद्य काश्चन । मृत्युदुःखान्यपि श्रुत्वा विरागः साद्यथैव नुः ॥१९२।। यहाँ मैं उनके कुछ श्लोकोंका भी संग्रह करता हूँ, जिससे मृत्युके दुःखोंको सुनकर भी लोगोंको वैराग्य उत्पन्न हो । जरया कार्यमापनो मृत्यौ सनिहिते सति इमं देहं परित्यज्यान्यं देहं गन्तुमीप्सति ॥१९॥ जरावस्थासे कृशताको प्राप्त हुआ पुरुप मृत्युके समीप आनेपर इस शरीरको त्यागकर दूसरे शरीरमें जानेकी इच्छा करता है। यथैव शकटः शूर्पपिठरोलूखलादिभिः । सम्भृतो घेति मुश्चन्यै यहूञ्छन्दांस्तथा नरः ॥१९॥ वासनामारसम्पूर्ण ऊोच्छ्वासी भवेद्यदा । तदा कुर्वन्वहूञ्छब्दान्याति देहादितः परम् ॥१९५।। जिस प्रकार सूप, बटलोई और उलूखल आदिसे भरा हुआ छकड़ा बहुत-से शब्द करता हुआ जाता है उसी प्रकार मनुष्य भी जिस समय वासनाओंके भारसे परिपूर्ण होकर ऊर्ध्व निःश्वास लेने लगता है उस समय बहुत-से शम्द करता हुआ इस शरीरसे परे चला जाता है। शिवगीतासु दृष्टावाक्षिप्यमाणायां संज्ञया हियमाणया । मृत्युपाशेन पद्धस प्राता नैवोपलभ्यते ॥१९६|| मुमुक्षुसयंमसार HIRGANAParAPERXNGream उस समय ( मृत्युकाउ उपस्थित होनेपर) क्षीण होती हुई चेतनाके द्वारा टि डारनेपर मृत्युपारासे बंधे हुए उस पुरुषको कोई भी रक्षक दिखायी नहीं देता । संरुध्यमानस्तमसा महचित्तमिवाविशत् । उपाहूतस्तदा ज्ञातीनीक्षते दीनचक्षुपा ॥१९॥ तब अज्ञानसे आवृत होता हुआ भी यह पुकारे जानेपर कुछ विवेकशी-सी स्थितिमें आकर जाति-बन्धुओंको दीन दृष्टिसे देखने लगता है। हा कान्ते हाधनं पुत्राः कन्दमानः सुदारुणम् । मण्ट्रक इव सर्पण मृत्युना गीयते नरः ॥१९॥ फिर 'हा प्रिये ! हा धन ! हा पुत्र !' इस प्रकार अत्यन्त रुदन करता हुआ यह पुरुष सर्पसे निगले जाते हुए मेहकके समान कालकवलित हो जाता है। अयापाशेन कालेन स्नेहपाशेन पन्धुभिः । आत्मानं कृष्यमाणं तमीक्षते परितस्तथा ॥१९९।। उस समय वह अपनेको कालद्वारा लोहमय पाशसे और बन्धुजनद्वारा स्नेहमय पाशसे दोनों ओर खिंचता हुआ देखता है । हिकया बाध्यमानस्य श्वासेन परिशुष्यतः । मृत्युनाकष्यमाणस्य न खल्वस्ति परायणम् ॥२०॥ हिचकियोंसे पीड़ित और श्वाससे सूखते हुए उस मृत्युग्रस्त, पुरुपका उस समय निश्चय ही कोई भी शरण नहीं होता।
तृतीय प्रकरण GRADIOGROLORCrewDERMIRDCRIORGRIDGROICI0. माता पिता गुरुजनःस्वजनो ममेति मायोपमेजगति कस्य भवेत्पतिज्ञा । एको यतो ब्रजति कर्मपुरःसरोऽयं विश्रामवृक्षसदृशः खलु जीवलोकः ॥२०११॥ इस मायामय जगत्में किसकी ऐसी प्रतिज्ञा हो सकती है कि ये माता, पिता, गुरुजन और वजन मेरे हैं ? क्योंकि यह जीव तो अपने कर्मानुसार इस टोकसे अकेला ही जाता है । सचमुच यह जीवलोक [ मार्गमें लगे हुए] विश्रामवृक्षके समान ही है। सायं सायं वासवृक्षं समेताः प्रातः प्रातस्तेन तेन प्रयान्ति । त्यक्त्यान्योऽन्यं तं च वृक्ष विहङ्गा यद्वत्तज्ज्ञातयोऽज्ञातयच ॥२०२॥ जिस प्रकार पक्षिगण नित्यप्रति सायंकालमें एक वृक्षपर एकत्रित होकर सवेरा होनेपर उस वृक्षको और परस्पर एक-दूसरे- को त्यागकर चले जाते हैं उसी प्रकार ये जाति-बन्धु और विजातीय पुरुष भी मिटते-बिछुड़ते रहते हैं । मर्ममत्कृष्यमाणेषु मुच्यमानेषु सन्धिषु । यदुःखं नियमाणस्य सर्यतां तन्मुमुक्षुभिः ॥२०३॥ प्रागोंके खिंचने और सन्धियोंके शिपिल पड़नेपर मुमूर्षु पुरुषको जैसा दुःख होता है मुमुक्षुजनोंको उसे याद रखना चाहिये।
मुमुक्षुसर्यस्वसार ORIGIOUSNESDGRIORGancreducRCRua. आत्मपुराणे द्वासप्ततिसहस्राणि वृश्चिका एकहेलया । यथा दशन्ति गात्रेषु पुच्छः सूच्यग्रसनिमः । तथा तजायते दुःखं मुमूहिमोचने ॥२०॥ जैसे बहत्तर हजार बिच्छू अपने सूईकी नोकके समान तीखे डकोंसे शरीरमें एक साप काटें उसी प्रकारका कष्ट मरनेवाले पुरुषको देहत्याग करते समय होता है। कोटथर्द्धसहितास्तिस्र कोटयः सूच्यः सुतीक्ष्णकाः। यादृक्छरीरिणः कुर्युस्ताहगदुःखं मृतौ नृणाम् ॥२०५॥ देहधारीको सादे तीन करोड़ अत्यन्त तीक्ष्ण सूइयोंके चुभानेसे जैसा कष्ट होता है वैसा ही दुःख मनुष्योंको मृत्युकालमें होता है । हस्तौ पादौ क्षिपन्तश्च भूमिष्ठं गतचेतनम् । स्वजनास्तं तु शोचन्ति काकं काका यथातुरम् ।।२०६।। उस समय चेतनाशून्य होकर पृथिवीपर हाथ-पाँव पटकते हुए उस पुरुपके लिये कुटुम्बी लोग इस प्रकार चिन्ता करने लगते हैं जैसे किसी रोगी कौएके लिये अन्य कौए चिन्तातुर हो जाते हैं। बान्धवेषु भृशं शब्दान्मुश्चत्सु यमकिकराः । नयन्त्येनं यथा राजभृत्या जातापराधकम् ।।२०७॥ इस प्रकार बन्धुजनोंके अत्यन्त रोने-चिल्लानेपर भी यमदूत इसे इस प्रकार ले जाते हैं जैसे राजसेवक किसी अपराधीको ले जायें।
तृतीय प्रकरण PGRANU0. एवमेतदनौपम्यं दुःखं दुर्गिवर्तिनाम् । यथा नरकजं दुःखं वाग्वापि ततोऽधिकम् ॥२०॥ इस प्रकार कुमार्गमें चलनेवाले लोगों को यह अनुपम दुःख प्राप्त होता है । उन्हें, जैसा नरकका दुःख होता है वैसा अथवा उससे भी अधिक दुःख भोगना पड़ता है। मूच्छा मुमूर्षुरम्येति कचिद्वापि प्रयुध्यते । विमेति च भृशं दृष्ट्वा दारुणान्यमकिकरान् ।।२०९।। मरणासन पुरुष कभी मूछित हो जाता है और कभी सचेत; तपा कभी मयङ्कर यमदूतोंको देखकर अत्यन्त भयभीत हो उठता है। त एनं भर्सयन्त्यादावागत्य पुरतो भटाः । धिक्त्वा मनुष्पदंहस्थ पापिनं स्वात्मघातकम् । येन त्वया शरीरेण न कृतं स्वहितं फचित् ॥२१०॥ वे यमदूत इसके सामने आकर पहले इस प्रकार धमकाते हैं--'अपने आत्माका घात करनेवाले तुझ मनुष्यदेहस्य महापापीको धिक्कार है जिसने कि अपने शरीरसे कमी आत्मकल्याणका साधन नहीं किया । परदोपास्त्वया यद्वत्सावधानेन निश्विताः । सर्वदेव तथात्मा किं क्षणमात्र न निश्चितः ॥२१॥ 'तूने जिस प्रकार सदा ही सावधान रहकर पराये दोपोंको निश्चय किया है उसी प्रकार एक क्षणके लिये भी अपने आत्माका निश्चय क्यों नहीं किया !
. । ११८ मुमुक्षुसर्यवसार GGRASGUPGROGRAMOGRUSDarunGRAINIK अपि चेन्निर्गुणं प्रम ज्ञातुं नैव भवान् क्षमः । कसादुपासनं तस न कृतं सुखदं त्वया ॥२१॥ 'यदि तुम निर्गुण ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेमें समर्प नहीं ये तो मी तुमने उसकी सुग्यमयी उपासना ही क्यों नहीं की। त्वत्कृतं सकलं विमो दुप्कृतं यमकिकराः । वासरादिमिरत्यर्थ श्रावितं यमसंसदि ॥२१३॥ 'हम यमदुतगण तुम्हारे किये हुए सारे दुष्यमीको जानते हैं, क्योंकि उन्हें दियस आदि यमराजकी सभा खुब सुना देते थे। यासरेण मुमूर्येण कथितं दिवसे कृतम् । चन्द्रादिना तथा राम्या कथितं निम्यनुपितम् । सन्ध्ययोरपि सन्ध्याम्यां सर्वदा भूतपश्चः ॥२१४॥ 'तुम्हारे दिनों किये कृयोंको मूर्यदेवक सहित दिन गुना ट्रेना पा और रात्रिमें किये हुए कार्योको रात्रि ही चन्द्रमा आदिके द्वारा कह देनी थी तपा दोनों सन्ध्याओंमें किये हुए पायों को सम्स्याओंने ही पचभूतों द्वारा मुना दिया था। इदं त्यया कृतं पापकान्त चलना विदम् । इति ने मर्ममा पाएं गर्वे बदन्नि हि ||२१५|| 'तुमने अमुक पाय एकान, घटनेशित किया है प्रशार मुम्हारे मर्मपिटमारा (गुण पाप मी गपूर्ण भूनन Grooms. तृतीय प्रकरण GIOGROLOGROLOGROUNDER वासराया यमचराः सर्वैः सह चराः सदा । त्वादृशा यान जानन्ति मोहिता देवमायया ॥२१६॥ 'ये यासर आदि यमदत सर्वदा सपके साथ रहनेवाले हैं; जिन्हें देवमायासे मोहित हुए तुम-जैसे लोग नहीं जान सकते।' इत्यादि वचनान्युक्त्वा पघा पाशः सुदारुणैः । कशादिभिय सताड्य नयन्ति यमसादनम् ॥२१७॥ थे यमदूत इस प्रकारके यचन कहकर और कठोर पाशोंमे चाँधकर उसे कोड़ोंसे पीटते हुए यमलोकमें ले जाते हैं । संग्रहकर्तृवचनम् एवं मृत्योहि दुःखानि येक्यैिर्दशितानि च । सापासहीतानि विरत्यै तानि देहतः ॥२१८॥ इस प्रकार जिन पाक्योंसे मृत्युके दुःख दिग्याये गये है उन्हें देहमे वैराग्य कराने के लिये यहाँ संपसे संगृहीत किया गया है । नरककी यातनाएँ पापिनोऽङ्गाद्विरागाय दुःसानि नरकस्य च । उक्तान्यात्मपुराणे यः श्लोस्तानप्यनुये ॥२१९॥ • आदियचन्द्रागिनती चोभूमियो हर सम्म । अमरविम उभे च मन्ये धर्मभजानातिनासचिन ।। (मा. आदि.७४ | ३.) पूर्ण, पक्षमा पाए, अमि, भाषा दिक्षी, उर, हरप, यमराज, दिन, विदोनो माग औरष- मरम्नुपपागलीपनते ।
१२० मुमुक्षुसर्यससार OGRUPareluGORAONGraURUNGARGRUS00 आत्मपुराणमें जिन श्लोकोंसे नरकके दुःखोंका वर्णन किया गया है उन्हें भी पापी पुरुषोंको देहसे वैराग्य उत्पन्न करानेके लिये यहाँ उद्धृत करता हूँ। आत्मपुराणे अनेकशतकोटीनां योजनानि यमालयम् । स्वल्पेनैव स कालेन नीयते यमकिकरैः ॥२२०॥ यमलोक यहाँसे सैकड़ों करोड़ योजन दूर है। किन्तु यमदूत बहुत थोड़े समयमें ही उसे वहाँ ले जाते हैं। अत्र दुःखान्यनेकानि मृतानां यमशासनात् । भवन्ति तानि को नाम वक्तुं श्रोतुश्च वाक्षमः ॥२२॥ मृतक पुरुषोंको वहाँ यमराजके शासनसे अनेक प्रकारके कष्ट दिये जाते हैं। उनका कयन या श्रवण करनेमें भला कौन समर्थ है। दंट्रिणां शूकरादीनां काकगृध्रादिपक्षिणाम् । उपद्रवो महान्मार्गे यमराजपुरस हि ॥२२॥ यमराजकी पुरीके मार्गमें शूकरादि दादोंवाले जीवों तथा काक और गृध्र आदि पक्षियोंका बड़ा भारी उपद्रव रहता है। पूयविष्ठादिपूर्णानां नदीनामपि लङ्घनम् । निमअनं च तत्रैव कचिन्नक्रादितो भयम् ॥२२३।। वहाँ पीव और विष्टा आदिसे भरी हुई नदियोंको लाँघना पड़ता है, कभी उन्हीमें डुबकी लगानी होती है और कमी नाके आदिका भय उपस्थित हो जाता है।
१२१
तृतीय प्रकरण
GROUSid
वहिशस्त्रजलेलानां वायोश्चापि विकारतः ।
यमालये हि नरका दुःखदाः पापकारिणाम् ॥२२४॥
यमलोकमें अग्नि, शत्र,जल, पृथिवी और वायु आदिके विकार-
रूप अनेकों नरक हैं, जो पापकर्मा पुरुषोंको अनेकों दुःख देनेवाले हैं।
अनेककल्पपर्यन्तमसिपत्रवनादिपु
क्रूरेषु नरकेष्वेवं दुःखान्यामोति दुष्कृती ॥२२५।।
इस प्रकार वह दुष्कर्म करनेवाला अनेकों कल्पपर्यन्त असि-
पत्रवन आदि दुःखदायी नरकोंमें तरह-तरहके दुःख भोगा करता है ।
एवं स नारकं दुःखमनुभूयाथ कालतः ।
दुष्कृती बीजतां प्राप्य लोकमेतं पुनर्बजेत् ॥२२६।।
इस प्रकार वह दुष्कृती पुरुष नरकके दुःख भोगकर
कालान्तरमें बीजत्वको प्राप्त होकर इस लोकमें फिर लौट आता है।
सुकृती च तथा स्वर्गे ह्यनुभूय सुखं महत् ।
सुकृतान्ते पतत्यस्मिल्लोके पर्जन्यधारया ॥२२॥
इसी तरह शुभ कर्म करनेवाला पुरुप भी स्वर्गमें महान् सुख
भोगकर पुण्यक्षय होनेपर मेघकी धाराओंद्वारा इस लोकमें गिरता है।
जगच्चक्रवर्णन
संग्रहकर्तृवचनम्
फलं चैवं प्रसङ्गेन पुण्यस्यापोह दर्शितम् ।
विरत्यै भवचक्रस्य रूपश्चाप्यद्य दयते ॥२२८॥
१२२
मुमुक्षुसर्यवसार
OGRNINGREARRIAGNXDGURGAOGRUK.
इस प्रकार प्रसङ्गवश यहाँ पुण्यका फल भी प्रदर्शित कर
दिया। अब वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये यहाँ संसृतिचक्रका रूप
भी दिखलाया जाता है।
योगतत्तोपनिषत्सु
यः स्तनः पूर्वपीतस्तं निष्पीट्य मुदमन्नुते ।
यसाआतो भगात्पूर्व तसिन्नेव भगे रमन् ॥२२९।।
हाय ! जिन सनोंका इसने पहले पान किया था उन्हीं को
दवाकर प्रसन्न होता है, और जिस भगसे उत्पन्न हुआ था उसीमें
पुनः रमग करने लगता है।
या माता मा पुनार्या या भार्या मातरेव हि ।
या पिता म पुनः पुरो यः पुत्रः स पुनः पिता ॥२३०॥
एवं मंसारचक्रे कृपयक्रेण घटा
प्रमन्नो यान्ति जन्मानीनि श्रुतयोपिगमगुः ॥२३॥
जो (प्री-जाति परे उमसी माता होती है उनी यह
अपनी मो यना देता है और nि [पुत्रम्पग उपन होनेर)
वह पनी दी शिमरी माता बन जाती है,
प्रतिमा
वही पुपमपम उत्पन्न हो जाता है तथा यह पुत्र भी सिनि
बन गई । म प्रा . घार ममान मंगा-चक्र में
पुनेर अनेक नियोंने गत है-मा असिने भी कहा है।
एवं देशतिराग जगमरम्म गालय ।
गर्मादिनिरयान्नर महादिक मुधीः ॥२३॥
तृतीय प्रकरण १२३ इस प्रकार देइके वैराग्यसे जगचक्रको शान्तिके लिये बुद्धिमान् पुरुप गर्भवाससे लेकर नरकपर्यन्त सभी स्थितियोंमें दोपदृष्टि करे। तथा मृत्योश्च चिहानि तस्यागमनतः पुरा । ज्ञाला यतेत मोक्षार्थ सुधीः शास्त्रप्रमाणतः ॥२३३॥ तथा मृत्युके आगमनसे पूर्व उसके चिह्नोंको जानकर वह शास्त्रानुसार मोक्ष-प्राप्तिके लिये यन करे। मृत्युसूचक लक्षण स्कन्दपुराणे अथातः सम्प्रवक्ष्यामि समासेन न विस्तरात् । येन ज्ञानविशेपेण मृत्यु पश्यन्ति देहिनः ॥२३४॥ अब, जिस ज्ञानविशेषसे देहधारी पुरुष मृत्युको जान सकते है उसका विस्तारसे नहीं-संक्षेपसे वर्णन करता हूँ। सोम च्छायां ध्रुवं चैव महापथमरुन्धतीम् । अपश्यन्वत्सराचं न जीवति न संशयः ॥२३५॥ चन्द्रमाकी कालिमा, ध्रुव, महापय और अरुन्धती नक्षत्रको न देख पानेपर पुरुष एक सालसे अधिक जीवित नहीं रहता- भी सन्देह नहीं है। कपोतो वाथ गृध्रो वा काको वायदि मूर्द्धनि । स्थितः कन्यादसंज्ञो या पण्मासेन विनश्यति ॥२३६॥ इसमें कुछ १२४ मुमुक्षुसर्यवसार OGRIDGUSTERIORGreucorNUARGANINGaus. यदि कबूतर, गिद्ध, कौआ अपवा वाज इनमें से कोई पक्षी किसी पुरुपके शिरपर बैठ जाय तो वह छ: मासमें ही नष्ट हो जाता है। दर्पणे वा जले वापि परेषां वाथ चक्षुपि । अशिरस्कं तथात्मानं पश्यन्मासं न जीवति ॥२३७॥ जिसे दर्पण, जल अथवा दूसरोंके नेत्रोंमें अपनी परछाई बे-सिरकी दिखायी दे वह पुरुष एक महीने भी जीवित नहीं रहता। कृष्णा कृष्णाम्बरा स्वमेश्यामवस्त्रधरा स्त्रियः। येनैव सह गच्छन्ति दक्षिणां स न जीवति ॥२३८॥ खममें जिसके साप काले रङ्गकी, काले वस्त्रोंवाली अथवा श्याम वस्त्र धारण करनेवाली स्त्रियाँ दक्षिण दिशाको जाय वह जीवित नहीं रह सकता। कृष्णैविकेशैः पुरुपैः स्वप्ने यः पीडितः पुमान् । पापाणैस्ताव्यते यस्तु मृत्युस्तस्य गृहं गतः ॥२३९।। जो पुरुष खप्नमें काले और विकट केशोंवाले पुरुषोंसे पीडित होता है अथवा पत्परोंसे ताडित होता है मृत्यु मानों उसके घर ही आ गयी होती है। घोपं न शृणुयात्कणे ज्योतिनैत्रे न पश्यति । श्वभ्रे यो निपतेत्स्वमे तस्य मृत्युश॒हं गतः ॥२४॥ जो कानोंमें होनेवाला घोष (धर्धर शब्द ) नहीं सुनता, नेत्रोंमें ज्योति नहीं देखता अपया स्वममें किसी गड्ढेमें गिरता है मृत्यु मानों उसके घर ही आ गयी है।
तृतीय प्रकरण १२५ GRAI CRELIGIOGROUS यस्य वै भुक्तमात्रस्य हृदयं पीड्यते क्षुधा । जायते दन्तघर्षश्च स गतायुर्न संशयः ॥२४१॥ जिसके हृदयको भोजन कर चुकनेपर ही भूख सताने लगे, तथा जिसके दाँतोंमें घर्षण होने लगे, इसमें सन्देह नहीं, उस पुरुपकी आयु बीत चुकी होती है। संग्रहकर्तृवचनम् इत्यादिस्कान्दगैः श्लोकैर्मृत्य्यागमनबोधकैः । मृत्युकालापरिज्ञानाचिरजीवितवाञ्छया ॥२४२॥ विरागः स्यात्कथं पुंस इति शङ्का निराकृता । तसादेहादितः शीघ्र विरज्येदिह पुद्धिमान् ॥२४३॥ इस प्रकार स्कन्दपुराणके मृत्युके आगमनको सूचना देनेवाले श्लोकोंसे, मृत्युकालका ज्ञान न होनेके कारण चिरकालतक जीवित रहनेकी इच्छासे पुरुपको किस प्रकार वैराग्य हो सकता है-इस शङ्काका निराकरण कर दिया । अतः बुद्धिमान् पुरुप इस लोकमें बहुत शीघ्र ही देहादिसे उपरत हो जाय । तीन प्रकारके साधक विनैवारिष्टयोधं यः प्राग्जन्माभ्यासतो नरः । मोक्षाय शुकदेवादिवद्यतेतोत्तमः स वै ॥२४४॥ जो पुरुष मृत्युके चिह्नोंका ज्ञान प्राप्त किये बिना ही अपने पूर्वजन्मके अभ्याससे शुकदेव आदिके समान मोक्षप्राप्ति के लिये प्रयत्न करता है वह निश्चय ही उत्तम है।
१२६ 4GROGROUP मुमुक्षुसर्यस्खसार विविधारिष्टयोधायः परीक्षितादिवत्पुमान् । यतते दुःखनाशाय विज्ञेयः स तु मध्यमः ॥२४॥ जो पुरुष परीक्षित आदिके समान मृत्युके अनेकों चिह्न देसकर दुःखनाशमा प्रयत करता है उसे मध्यम जानना चाहिये । प्रात्यापि मृत्युचितानि मोग्यान् यो न जिहासति । स चाधमो नरो शेयः पितृविक्रिमिसनिमः ॥२४६|| और जो मृत्युक चित्रों को जानकर मी गोगों को नहीं छोपना चाहता उम अधम पुरुषको तो अपने पिताके पिछाक कारक समान ही समझना चाहिये । यानि दुग्यानि जीयस्य प्रागिह दर्शितानि त । तानि दहामिमानेन नम्मिन्नेवातिरागिणः ॥२४॥ भवन्ति देहिनो यसातसादह रति स्यजेत् । मोगाश्रयेरनि स्परला मोग्यवपिषता स्पनेन् ।।२४८॥ देहधारी जीवक, रिये पद और म म्यानपर जिन-मिन दुःगोंगा दिग्दर्शन कराया गया है. ये मय देइमें ही अपन्न राग कग्नबारे उन पुरुपको देहानिमानशा करते हैं। गर्षिय देहमें गरबा स्याग काम प्रकार भागों. आश्रपरए देने गगनका उपयोग में भी रयाग कादं। मोकामयन जीवात्मा जाया में मादयारा । में माहिनामिति अन्या मोती तो नमः ॥२४॥ ।
तृतीय प्रकरण 'उम जीयात्माने इच्छा की कि मेरे खी हो, मुझे पुत्र मिरे सपा मुझे धन प्राप्त हो'-इम प्रकार श्रुनिने भी भोगीमें गगरा माम दिगटाया है। स्त्री-निन्दा एवं प्रिरिधभोग्येषु प्राथम्यं योपितां श्रुतम् । तसाताम्यो विरागार्थ सीनिन्दा तावदुच्यते ॥२५०॥ इस प्रकार शुनिने विविध भागांमें पाला नम्पर विशंका दिया है। अतः उनमे विसग करनेकरिये यहाँखियों की निन्दा की जाती है। योपितो रूपवत्या गु किनीम्यो धिकं भयम् । डाकिन्यो गन्ति वै पालान् मा तु हन्त्यासपोरनान् २५१ मनुष्याने गपती खामे डापिनियनी अपेक्षा मी अधिक मपद, योकि नापिनियों, मो यारोपणे ही मारती है किन्तु पुथा पुरीको मार राती है। सीगहाजिदपानीमादप्यधिकं पुपः । पानी लत्येकपारं हि योपिदन्ति नरं मुहः ॥२५२।। पुधिमा पुरुषको तमामेभामापामा भी विक, मा मानना था कि मामले मनुष्य को एक ही बार amit नाश ने गाया मा सामान निरं दन्तामणि नविनारिनन् । चोनिरन्ग पादरममदत्ममिति व पाः ।।२५३।।
१२८ मुमुक्षुसर्यवसार ORIGOLDERLINGreenaraurIDERLUS. व्याघ्री तो पुरुषको दाँतोंसे काटती है परन्तु रखी तो 'अदरक- मदकम्'* इस श्रुतिके अनुसार दाँतोंके बिना केवल अपने योनिरन्भ- से ही लील जाती है। व्याघ्रथा हतो न ना याति नरकादीन्परस्त्रियः । सम्भोगाद्याति तान् कामीत्यादिकं मारते स्मृतम् ॥२५४॥ महाभारतमें भी कहा है कि पुरुष व्याप्रसे मारा जानेपर नरकादिको प्राप्त नहीं होता; किन्तु यह कामवश परत्रियोंका सम्भोग करनेसे उन्हींमें जाता है। महामारते परदारा न गन्तव्याः सर्पवर्णेषु फहिंचित् । कृत्या घेता घोररूपा मोहयन्त्यविचक्षणान् ।।२५५।। सभी वर्गों पर-स्त्रीगमन तो कभी न करना चाहिये । ये मूर्ख मनुष्यों को मोहित करनेवाली घोररूपिणी कृत्या ही है। नहीशमनायुप्यं लोक किश्शन विद्यते । यावं पुरुपस्येह परदारोपसेवनम् ॥२५६|| यावन्तारोमकूपाः स्युःवीणां गाग्रे निर्मिताः। तावद्वर्षसहस्रागि नरक पप्पामते ॥२५॥ •'लमहकमहत्व बिन्दुमामिगार (छा.उ. ८1१1१) 'मैं बिना दाँत मान कर आनेवाले इन और मिश्रिी. रिति गम्न न।'
तृतीय प्रकरण GOLOGROUPORNMONICOcruOGRIORO इस लोकमें मनुष्यकी आयुको क्षीण करनेवाला ऐसा और कोई फर्म नहीं है जैसा कि परस्त्रियोंका सेवन करना । ऐसा करनेसे वह (परस्त्रीगामी) स्त्रियों के शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं उतने ही सहस पर्प नरकमें पड़ा रहता है। परदाराभिमर्प तु कृत्वा वै जायते पृतः । स्वा शृगालस्ततो गृध्रो च्यालकको वकस्तथा ॥२५८॥ पर-खीगमन करनेसे मनुष्य क्रमशः भेड़िया, वान, गीदड़, गिद्ध, सर्प, कइ, तथा बगुला होकर उत्पन्न होता है। मरणाआयते कामो वधूनां धैर्यनाशनः । दर्शनाद्वचनास्पर्शात्कसादेष न सम्भवेत् ।।२५९॥ खियोंका तो स्मरण करनेसे ही धैर्यको नष्ट करनेवाला कामदेव उत्पन्न हो जाता है फिर उनको देखने, उनसे बातचीत करने अपना उनका स्पर्श करनेसे यह क्यों न उत्पन्न होगा ! अन्तकः परनो मृत्युः पाठालं वडवामुखम् । क्षुरधारा विपं सो वहिरित्येकतः सियः ॥२६॥ काल, पवन, मृत्यु, पाताड, वहयानर, छरेकी धारा, विष, सर्प और अग्नि-ये सर एक ओर हैं, और खियाँ एक ओर । नामिस्तृप्यति काष्ठानां नापगाना महोदपिः । नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥२६॥ अधिनसे तृप्त नहीं होता, महासागर नदियोंमे पूर्ण नहीं १३० मुमुक्षुसर्यवसार cupcauSORIAGRAK OGROLAGO होता और काल सम्पूर्ण प्राणियोंसे तृप्त नहीं होता । इसी प्रकार स्त्री कभी पुरुषों से तृप्त नहीं होती। संग्रहकर्तृवचनम् पहुना किमिहोक्तेन खीसङ्गात्सर्वदेहिनाम् । प्रायेण जायते दुःखं स्त्रीसहं सन्त्यजेदवः ॥२६२|| इस विषयमें अधिक क्या कहा जायात्री-सासेरामी देहधारियों को प्रायः दुःरा उठाना पड़ता है। अतः खो-रामका सर्वपा परित्याग करे। स्रीणां दोपास्त्वनन्तास्तान्वक्तुं शक्न्वीत का पुमान् । संक्षेपेण सयाध्याप्तेले पैराग्याय दर्शिता॥२६॥ विषयों के दोष तो अनन्त हैं। उनका कोन पुरुष वर्णन कर सकता है ! तो भी उनसे गाय उपस करनेके लिये आसपुरुषोंने उनश संक्षेपसे शिदर्शन कराया है। तवाक्यलेसनेनार नारीदोपप्रदर्शनम् । क्रियते हि सतो नाई नदोषगणने पदः ॥२६॥ उनके वाक्योंका उद्वेग करके ही में त्रियाँ दौरा दिमाता हूँ, क्योंकि मैं स्वयं उनके दोपोरी गगना कानेमें समर्प नहीं है। आमनाम्यम् अनृतं माइमं माया भूपत्वमनिनोमता । प्राचं निर्दयत्वं पनामा दोषाः ममाना॥२६॥ निष्पनारम, घाम, माया, मांग, अयान , बाचित्रग और निर्दस्तविक मानाविक दो। -
तृतीय प्रकरण
UGHEUROGram
GravOGREDA
GRLUE
दर्शनाद्धरते वित्तं स्पर्शनाद्धरते यलम् ।
मैथुनाद्धरते वीर्य नारी प्रत्यक्षराक्षसी ॥२६॥
स्त्री साक्षात् राक्षसीके समान है। यह अपने दर्शनमात्रसे
चित्तको, स्पर्शसे बलको और मैथुनसे वीर्यको हर लेती है।
भगेन चर्मखण्डेन दुर्गन्धेन प्रणेन ।
खण्डितं हि जगत्सर्व सदेवासुरमानुपम् ॥२६॥
हाय ! दुर्गन्धित व्रणके समान चामके खण्डरूप इस भगने
देवता, असुर और मनुष्योंके सहित इस सारे संसारको खण्डित
कर दिया है।
तत्र मुग्धा रमन्ते ये सदेवासुरमानवाः ।
ते यान्ति नरकं पोरं सत्यमेव न संशयः ॥२६८॥
यह बात बिल्कुल ठीक है कि देवता, असुर और मनुष्योंके
सहित जो मूढ पुरुप इसमें सुख मानते हैं वे धोर नरकमें पड़ते
हैं । इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं ।
गौडी पैष्टी तथा माध्वी विज्ञेया त्रिविधा सुरा ।
चतुर्थी स्त्री सुरा ज्ञेया ययेदं मोहितं जगत् ॥२६९॥
गौडी, पैष्टी और मावी--यह तीन प्रकारकी मदिरा मानी
जाती है । इनसे अतिरिक्त स्त्रीको चौथी मदिरा समझनी चाहिये,
जिससे कि यह सारा जगत् मोहित हो रहा है।
चर्मखण्डं द्विधा छिनमपानोद्गारवासितम् ।
तत्र मृदा रमन्ते ये प्राणैरपि धनरपि ॥२७॥
मुमुक्षुसर्यस्वसार OCRIGOROUGUScresonscreuxasat जो अपानवायुसे यासित दो भागोंमें बँटा हुआ एक चमड़ेका खण्डमात्र ही है उसमें जो लोग प्राण और घन खोकर भी रमण करते हैं ये मूर्ख ही है। स्त्रीणामवाच्यदेशस लिननाडीव्रणस्य च । अभेदेऽपि मनोभेदाजनः प्रायेण पञ्चयते ॥२७१।। स्त्रियोंके अवाच्यदेश और एक लिबलिबे नाडीव्रण (नासूर) में कुछ भी भेद नहीं है; तथापि उनमें मनोवृत्तिके भेदसे मनुष्य प्रायः ठगा हो जाता है। योगवासिष्ठे सत्कारोच्छ्वासमात्रेण भुजङ्गदलनोत्कया । कान्तयोधियते जन्तुः करम्येवोरगो विलात् ॥२७२॥ जिस प्रकार सर्पके दलन करनेमें पटु करभी ( सर्प पकड़नेके यन्त्र ) द्वारा सर्प बिलसे निकाल लिया जाता है उसी प्रकार कामिनी सत्कार और उच्दास मात्रसे ही इस जीवका उच्छेद कर डालती है। जन्मपल्वलमत्स्यानां चित्तकर्दमचारिणाम् । पुंसां दुर्वासना रजुर्नारी पडिशपिण्डिका ॥२७३॥ जो जन्मरूप तालके मत्स्य हैं और चित्तरूप कीचड़में विचरते हैं उन मनुष्योंके लिये दुर्वासना रजु है और सी [ उसमें बंधा हुआ ] मांसका टुकड़ा है। ज्वलतामतिरेऽपि सरसा अपि नीरसाः । स्त्रियो हि नरकामीनामिन्धनं चारु दारुणम् ॥२७॥ - तृतीय प्रकरण १३३ SURGROGRISRUSDram स्त्रियाँ [ देखनेमें ] अत्यन्त सरस होकर भी [ वास्तवमें ] घड़ी नीरस होती हैं। ये अत्यन्त दूर जलनेवाले नरकाग्निका अति दारुण एवं सुन्दर इंधन ही हैं । इतः केशा इतो रक्तमितीयं प्रमदातनुः । किमेतया निन्दितया करोति विपुलाशयः॥२७५।। इधर केश हैं और इधर रक्त है बस इतना ही यह स्त्रीका शरीर है । भटा, इस निन्दित शरीरसे महानुभाव क्या करते हैं ! चासोविलेपनर्यानि लालितानि पुनः पुनः । तान्यगान्यङ्ग लुण्ठन्ति क्रव्यादाः सर्वदेहिनाम् ।।२७६।। जिनका यस और अंगरागादिसे बारम्बार टालन किया पा, हे प्रिय ! देसो, उन समस्त देहधारियोंके अंगोंको मांसाहारी जीव घसीट रहे हैं। आपातरमणीयत्वं केवलं कल्प्यते खियः । मुने वदपि नास्त्पत्र मम मोहेककारणम् ॥२७७॥ [श्रीरामचन्द्रजी पहते है-] खियोंकी फेवल आपातरमगीयता कल्पना कर ली जाती है, किन्तु है मुने । मुझे तो मोहको एकमात्र फारणरूप यह भी प्रतीत नहीं होती। मर्वेपी दोपरनानां मुसमुद्रिकयानया । दुखलया नित्यमलमस्तु मम सिया ॥२७॥ सम्पूर्ण दोषरूप रोकी एकमात्र पिटारी और दुःों को गातारप इस खाने तो महाके होरिये मेरा कोई प्रपोजन न हो।
मुमुक्षुसखसार
OGENOGROLLONG LOGROLOGrea
अपुत्रः पुषिणो दृष्ट्वा चेत्थं दन्दह्यतेऽनिशम् ।
कृतपुण्या इमे धन्या पाप्यस्म्यहमपुत्रका ॥२८॥
स्थादुपायेन येनैव सुतो मेऽपीह तं त्वहम् ।
करिष्याम्यद्य यत्नेनैवं चिन्तयति नित्यशः ॥२८॥
पुत्रहीन पुरुप अन्य पुत्रवानोंको देखकर रात-दिन इस
प्रकार कुदा करता है कि 'अहो ! ये बड़े पुण्यवान् और धन्य हैं
तपा मैं निपूता बड़ा पापी हूँ । अब जिस उपायसे मेरे भी पुत्र हो
वही में यक्षपूर्वक करूँगा'-इस प्रकार वह सदा ही सोचा करता है।
सुतेच्छया सदास्तौति विष्ण्वादीन्मोक्षदानपि ।
याचते च सुतं तेभ्यो मूर्खस्तकं नृपाद्यथा ।।२८९।।
वह पुत्रेच्छासे ही विष्णु आदिकी-जो मोक्ष देनेमें भी समर्थ
है--स्तुति किया करता है। यह मूर्ख, राजासे मट्ठा माँगनेके
समान, उनसे पुत्र माँगा करता है।
तत्प्रसादात्सुतो जातो यदि स्वारब्धसंक्षयात् ।
नष्टो बालस्तदा मोहात्तेषु श्रद्धां त्यजत्ययम् ॥२९०।।
उनकी कृपासे उत्पन्न हुआ पुत्र यदि अपने प्रारब्धके क्षय
होनेसे बाल्यावस्थामें ही नष्ट हो जाय तो वह मोहवश उनमें श्रद्धा
करनी छोड़ देता है।
सात्त्रिकेपु स देवेषु श्रद्धांत्यक्त्वाथ राजसान् ।
यक्षादीन् सेवते मूढः सुतकामनयानिशम् ॥२९१॥
तृतीय प्रकरण वह मूढ सात्त्विक देवताओंमें श्रद्धा छोड़कर पुत्रको इच्छासे रात-दिन यक्ष आदि राजस देवताओंका सेवन करने लगता है। तेभ्योऽपिन सुताप्तिश्वेश्यक्त्वा तानाशुपण्डितान् । ज्योति शास्त्रस्य संवेत्तृन् पृच्छत्येप मुमुक्षुवत् ।।२९२॥ फिर यदि उनसे भी पुत्रकी प्राप्ति नहीं होती तो वह तुरन्त ही उन्हें छोड़कर मुमुक्षुके समान ज्योतिःशास्त्रज्ञ पण्डितोंसे इस प्रकार पूछने लगता है- येनोपायेन भो विप्राचिरायुर्मे सुतो भवेत् । तमुपायं वदध्वं मे ज्योति शास्त्रानुसारतः ॥२९३॥ 'हे विप्रगण ! जिस उपायसे मेरे दीर्घायु पुत्र उत्पन्न हो वह ज्योतिःशास्त्रानुकूल उपाय आप मुझसे कहिये । चिरायुर्यत्प्रसादादः सुतो मे सम्भविष्यति । तमहं पूजयिष्यामि धनवाकायमानसः ॥२९॥ 'आपमेंसे जिनकी कृपासे मेरे दीर्घायु पुत्र होगा उनका मैं मन, वचन और धनसे सत्कार करूँगा।' इत्थं तद्वचनं श्रुत्वा ग्रहपूजां वदन्ति ते । विशेषविभवैः साध्यां तदैत्यं चिन्तयत्ययम् ॥२९५।। उसके ऐसे वचन सुनकर वे बहुतसे धन आदिसे सम्पन्न होने योग्य कोई ग्रहपूजा बतलाते हैं । तब वह इस प्रकार सोचने लगता है- मुमुक्षुसर्यस्पसार Rai OGRUAGRUSOureum. इमे तु लोमिनो विना मदनं संजिहीर्षवः । यतो बहुधनैः साध्यां छलात् पूजां वदन्ति मे ॥२९६।। 'ये ग्रामण तो बहे लोभी और मेरे धनको छीननेकी इच्छायाले हैं, क्योंकि ये मुझे छलपूर्वक अधिक धनसे सम्पन्न होनेयोग्य पूजा बतलाते हैं। इति सश्चिन्त्य तांस्त्यक्त्वा धनव्ययभयादयम् सेवतेऽनादिदानेन भिक्षून्पुत्राशयानिशम् ॥२९७॥ इस प्रकार सोचकर यह धनके सर्च हो जानेके भयसे उनकी बतलायी हुई महपूजाको छोड़कर पुनप्राप्तियो इटारो अन्नादि देकर रात-दिन मिशुकोंकी सेवा करने लगता है। तेम्पोपि न मुताप्तियेत्परित्यज्याय वानपि । कुरुते च प्रतादीन् स पुत्रकामनया पुतः ॥२९८।। पिर, यदि उनसे भी पुत्रको प्राप्ति नहीं होती तो वह उस भी छोड़कर पुत्री ही आशामे युक्त हो गत आदि करने लगता है। तथापि न मुताप्तित्तदा क्षुद्रान्पिशाचकान् । घेदै श्रद्धा परित्यज्य मिशानेष्वपि मेरते ॥२९९॥ और उनमे भी पुत्र न मिटानो बेदमें श्रद्वा हराया मशानोंमें खुद पिशाचादिका पूजन करने ठाता है। स्वस्जित्वं म विस्मृरय मुनोत्पायमिनाया । रिशचमेरका नीचा यादन्ति कंगति नत् ॥३.11 तृतीय प्रकरण ONGRUSGRRIEOGRENIOGROLOGra. फिर वह अपने द्विजस्वको भूलकर पुत्र-प्राप्तिकी इच्छासे, उससे जो कुछ उन पिशाचोंके नीच सेवक कहते हैं यही करता है। मांसमयादिकं तेभ्यो ददात्येप यथेप्सितम् । तदाज्ञया पिशाचान्नं श्रद्धया स्वयमति च ॥३०॥ यह उनकी इछाके अनुसार उन्हें मांस और मद्यादि देता है, तथा उनके कहनेसे खयं भी श्रद्धापूर्वक उस पिशाचानको भक्षण करता है। एवं बहुविधोपायैः कश्चिद्धि लभते सुतम् । कविध नैवमम्पति होत्यं चिन्ता सुतार्थिनाम् ॥३०२॥ ऐसे अनेकों उपायों से भी किसीको ही पुत्र प्राप्त होता है, किसीको तो इससे भी नहीं होता। पुत्रेच्छुकोंको ऐसीही चिन्ता रहा करती है। संजातेऽप्यङ्गजे वेषां चिन्ता प्रत्युत वर्द्धते । तजीवनाय दहति पहिवत्पुत्रिणो हि सा ॥३०३॥ पुत्र उत्पन्न हो भी जाय तो भी उसके जीवित रहनेके लिये उसकी चिन्ता और भी बढ़ जाती है और यह पुत्रवानोंको अमिके समान दग्ध करती रहती है। भैरवशीवलादीस्वे यादींस्तद्वाहनांस्तथा । अर्चन्त्यात्मजरक्षार्थ द्विजा अपि परेशवत् ॥३०॥ शिर वे द्विजातीय होनेपर भी, अपने पुत्रकी रक्षाके लिये भैरव और सीतटा आदि तपा उनके वाहन पान आदिको परमेघरके समान पूजा करने लगते हैं।
१४०
मुमुक्षुसर्यस्ससार
CREAGUENGLISH
ननु यौवनमापन्नाः पुत्राः स्युः सुखदायिनः ।
इति चेन्नियमो नायं व्यभिचारस्य दर्शनात् ॥३०५।।
यदि कहो कि युवावस्था प्राप्त होनेपर वे पुत्रगण उन्हें सुख
देनेवाले होते हैं तो यह कोई नियम नहीं है, क्योंकि इसमें
व्यभिचार (विरोध ) पड़ता भी देखा जाता है।
कंसो बट्वा हि वृद्धं स्वं पितरं तूग्रसेनकम् ।
भूराज्यमकरोदुष्ट इति भागवते स्मृतम् ॥३०६॥
दुष्ट कंसने अपने वृद्ध पिता राजा उग्रसेनको बांधकर ही
भूमण्डलका राज्य किया या-यह कया श्रीमद्भागवतमें कही गयी है।
दीर्घतमऋपेः पुत्रास्तं चला रज्जुभिदृढम् ।
नद्यां चिक्षिपिरे क्रूराः स्वल्पदोपस्य कारणात् ॥३०॥
इत्येवं भारते प्रोक्तं मार्कण्डेयपुराणके ।
तथोक्तवान् ववृत्तान्तं समाधिर्नाम वै वणिक् ॥३०॥
दीर्घतमा मुनिके अति कर पुत्रोंने उन्हें थोड़ेसे ही अपराधके
कारण रस्सियोंसे खूब कसकर नदीमें डाल दिया था। इस प्रकार यह
बात महाभारत और मार्कण्डेयपुराणमें कही गयी है। तथा समाधि
नामक एक वैश्यने भी अपना वृत्तान्त इस तरह कहा है।
देवीमहात्म्य
समाधिर्नामवैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ।
पुत्रदारनिरस्तच धनलोभादुरात्मभिः ॥३०९॥
तृतीय प्रकरण GOUSNGOVERGRaMIGORELIERGRIDGRIEOGRLIS मैं समाधि नामका वैश्य हूँ और धनवानोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ। मुझे धनके लोभसे मेरे दुरात्मा पुत्र और स्त्रियोने निकाल दिया है। विहीनः स्वजनैरिः पुत्रैरादाय मे धनम् । वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः ॥३१०॥ इस प्रकार अपने खजन, स्त्री और पुत्रादिसे रहित हो, उनसे अपना धन छीन लिया जानेपर मैं अपने विश्वसनीय बन्धुजनोंसे निकाला जाकर दुःखी हो वनमें चला आया हूँ। संग्रहकर्तृवचनम् युवानः सूनवोऽप्येवं पित्रोः प्रायेण दुःखदाः । तथापि तेषु नो प्रीतिं त्यजन्ति रागिणोजनाः ॥३१॥ इस प्रकार युवक पुत्रगण भी प्रायः माता-पिताको दुःख देने- चाले ही हुआ करते हैं; तो भी रागी पुरुप उनमें प्रीति नहीं छोड़ते । यथा पुत्रास्तथैवान्ये यान्धवा अपि दुःखदाः । तस्मात्प्राज्ञ उपेक्षेत सुतादीन यूकवत्सदा ॥३१२॥ जिस प्रकार पुत्र दुःखदायी होते हैं उसी प्रकार अन्य बन्धु- बान्धव भी दुःख देनेवाले ही होते हैं । अतः प्राज्ञ पुरुप यका (जू) आदि की तरह इन पुत्रादिको त्याग दे । नन्वीशं तपसाराध्य व्यासः सुतमवाप्तवान् । सगरश्च तथा पुत्रान् सौमदनिश्च तत्पिता ॥३१३॥ शंका-व्यासजीने तपस्याद्वारा श्रीमहादेवजीकी आराधना १४२ OGROLLEDGREJOne मुमुक्षुसर्यवसार PENIORGreranceIEOGUE करके पुत्र प्राप्त किया था। इसी प्रकार अपने पुत्रोंको सगरने तया सोमदत्तके पुत्र भूरिश्रवाको उसके पिताने बड़े कष्टसे पाया था। भगवांश्चाप्तवान् कृष्णस्तपसेशप्रसादतः। पुत्रौ प्रद्युम्नसाम्बाख्यावित्यादि भारते स्मृतम् ॥३१४॥ भगवान् कृष्णने भी तपस्याद्वारा श्रीमहादेवजीकी कृपासे ही प्रद्युम्न और साम्ब नामक दो पुत्र प्राप्त किये थे—यह प्रसन्न महाभारतमें प्रसिद्ध है। पुत्रस्य पितुरात्मत्वात्स उपेक्ष्यः कथं भवेत् । पित्रात्मा पुत्रनामेतीत्यैतरेयश्रुतिर्जगौ ॥३१५॥ पुत्र तो पिताका आत्मा ही होता है, वह उपेक्षा करनेयोग्य कैसे हो सकता है । ऐतरेय श्रुतिने यह कहा ही है कि 'पुत्र पिताका आत्मा ही होता ।' सोऽस्यात्मायं सुपुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते । अथास्येतर आत्मायं कृतकृत्यो जहात्यमन् ॥३१६॥ जिसे यह (पिता) महान् पुण्योंसे प्राप्त करता है वह पुत्र इसका आत्मा ही है। फिर 'यह मेरा दूसरा आत्मा है' इस प्रकार कृतकृत्य होकर वह अपने प्राण त्याग देता है। श्रुतिश्चान्या तथैवास्ति स्मृतिश्चापि यतोऽस्त्यतः । कार्यों धर्मः सुतोत्पत्त्यै नोपेक्षास्य कदाचन ॥३१७।। इसी विषयमें एक और श्रुति तथा स्मृति भी है । अतः पुत्रोत्पतिके : धर्म करना ही चाहिये । उसकी उपेक्षा कमी न करनी चाहिये।
तृतीय प्रकरण
GRICITRUo
OGRRIEDO
श्रुतिः
पतिर्जायां प्रविशति गर्भो भूत्वा स्वमातरम्
वस्यां पुनर्नवो भूत्वा दशमे मासि जायते ॥३१८॥
पति गर्मरूप होकर अपनी जननी मार्या में प्रविष्ट होता है।
उसमें वह नवीन होकर फिर दश महीनेमें उत्पन्न होता है।
स्मृतिः
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गे नैव च नेह च ।
येन फेनाप्युपायेन कार्य जन्म सुतस्य वै ॥३१९॥
पुत्रहीनकी न तो स्वर्गमें और न इस लोकमें ही गति होती
है। अतः जैसे बने पैसे पुत्रकी उत्पत्ति करनी ही चाहिये।
सं प्रकर्तृवचनम्
मैवं त्वदुक्तगायानां श्रुतिस्मृत्योस्तथा पुनः ।
पुत्रेप्टेरर्थवादत्वात्स्वार्थे तात्पर्यता न हि ॥३२०॥
ऐसा मत कहो; क्योंकि पुत्रेटिकी अर्थवादरूप होनेसे तुम्हारी
कही हुई गाया और श्रुति-स्मृतियोंका अपने अपमें तात्पर्य नहीं है
[अर्थात् उनके शब्दोंसे जो अर्थ निकटता है यही उनका अभिप्राय
नहीं है, बल्कि धे फेवल पुत्रेष्टि यज्ञकी महिमानी ही सूचक हैं] ।
पितुरात्मैव पुत्रथेचदा फंसादिमिः कथम् ।
स्वदुलायोग्रसेनाचा पद्धा इति स्वमीरय ॥३२॥
मुमुक्षुसर्यवसार OGRIDGallaresIncreasoGreARGANOGRUDR. यदि पुत्र पिताका आत्मा ही है तो तुम्ही बताओ कि कंसादिने अपनेको दुःख देनेके लिये ही उग्रसेन आदिको क्यों बाँध लिया था । गतिशब्देन मोक्षो वा लोकद्वयसुखं हि वा। नाद्यः पुत्रवतां मुक्तौ मुक्ताः स्युःश्वादयोऽखिला।।३२२। शुकदेवगुहादीनां बन्धश्च त्वन्मते भवेत् । पुत्राभावाच्छुकादीनां यादीनां पुत्रसत्यतः ॥३२३॥ 'गति' शब्दसे मोक्ष अभिप्रेत है अपवादोनों लोकोंका सुख ! इनमें पहला तो हो नहीं सकता, क्योंकि इस प्रकार तो पुत्रवानों- का मोक्ष सिद्ध होनेसे कुत्ते आदि सभी जीव मुक्त हो जायेंगे। और तुम्हारे मतमें शुकदेव एवं गुह आदिका भी बन्धन सिद्ध हो जायगा, क्योंकि शुकदेव आदिके पुत्र नहीं थे और कुत्ते आदिके होते हैं। न द्वितीयः कुपुत्रेषु व्यभिचारस्य दर्शनात् । धर्मेण पुत्रलाभः सादित्यपि नियमो न हि ॥३२॥ इसके सिवा दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता, क्योंकि कुपुत्र प्राप्त होनेपर इसमें विरोध आता देखा जाता है। और पुत्र धर्मसे ही प्राप्त होता हो-ऐसा भी कोई नियम नहीं है। श्वादीनामपि दृश्यन्ते सूनवो यहयो यतः । तेस्तेभ्यः कः कृतो धर्म इति निर्णयतो वद ॥३२५|| क्योंकि पुत्र तो कुत्ते आदिके भी बहुत-से देखे जाते हैं। अतः तुम्ही निर्णय करके यताओ 'उन्होंने ऐसा क्या धर्म किया है !
तृतीय प्रकरण
.GRUAOGauraGROICERGRIDGRICS
धर्मात्सत्पुत्रलामः स्यादिति चेन्न यतः किल ।
व्यभिचारस्त्वदुक्तेस्तु भारते स्फुटमीरितः ॥३२६॥
यदि कहो कि 'धर्मसे तो सत्पुत्र ही प्राप्त होगा' सो भी ठीक नहीं
है; क्योंकि तुम्हारे इस कपनका विरोध महाभारतमें स्पष्ट रूपसे कहा
गया है।
महाभारते
देवानिष्ट्वा तपस्तप्या कपणैः पुत्रगृनुभिः ।
दश मासान्परिधृता जायन्ते कुलपांसनाः ॥३२७॥
अति कृपण पुत्रेच्छुकोंने जिन्हें देवपूजन और तपस्या करके
दशमासतक गर्भ में धारण किया, वे पुत्र भी कुलकलङ्क हो जाते हैं।
प्रसक्तः पुत्रपशुपु .धनधान्यसमाकुलः ।
स्नेहपाशसितो मूढो नैव मोक्षाय कल्पते ॥३२८॥
जो
पुत्र
और पशु आदिमें अत्यन्त आसक्त है, धनधान्य-
सम्पन्न है तथा स्नेहपाशमें बँधा हुआ है वह मूढ पुरुप मोक्षका
मागी नहीं हो सकता।
स्नेहेन तिलवत्सर्वः सर्गचक्रे निपीड्यते ।
तिलपीडरिवाक्रम्य क्लेशैरज्ञानसम्भवैः ॥३२९॥
स्नेह (तैल अथवा आसक्ति) के कारण तेलियोंद्वारा पेरे
जाते तिलोंके समान यह सारा जगत् अज्ञानजनित क्लेशोंद्वारा
आक्रान्त होकर सृष्टिचक्रमें पेरा जा रहा है।
जीवन्तमपि चैवैनं भरणे रक्षणे तथा ।
असमाते परित्यज्य पश्चादपि मरिष्यति ॥३३०॥
OGRIDGRIDGEOGRAOMANTMKOCOOKI. मुमुक्षुसर्यवसार मैत्रेयोब्राह्मणमें 'धनसे अमृतत्वकोआशा नहीं है' इत्यादिश्रुतिरी मो. की वित्तसाध्यताका स्पष्ट निराकरण किया है। तमा झुतिने ही 'धनसे अमृतस्य नहीं प्राप्त किया ऐसा भी कहा है। यचूक्तं श्रीमतां किन दुर्लभं स्यान्मृऔर तत् । क्षुद्राण्यपि सुवादीनि यो नैति धनेन ना ॥३४०॥ और यह जो कहा कि 'धनवानों को क्या दुर्लभ है। सो हीक नहीं, क्योंकि धनसे तो मनुष्यको पुत्रादि शुद्ध पदार्थ मी प्राप्त नहीं होते। । सूअयवित्रतुध राजानी चयनिनी । पुत्र धनेन नाप्ती से प्राप्ती नारदयाक्यतः ॥३४॥ देसी, सभप और चित्रवेन चक्रवर्ती राना धोकर भी धनसे पुष प्राप्त नहीं कर सके। उन्होंने नारदीय वचनही पुत्र मास । धनेन गाधिपुप्रय मामयं नैर सम्धवान् । महता तपमा तेन नपासमिनि अनम् ॥३४२।। विधानियत्रीको मी धनके काम प्राय प्रार नदी हम, उन्होंने घोर तान्यासे ही उसे ग्रामकिपा-मा हमने सुना है। पीिवितमया राजा नद्यापूर्भपिशातः । .... धनेन सन्धयामापरिस्परं मात श्रुतम् ॥३४॥ ऋतिक कारगारको अभागी • धनसे इस प्रतिनही हो मामलाम- तृतीय प्रकरण GRANGOVERNING आरोग्यं चापि कश्चिना न पामोति धनेन वै । विचित्रवीर्य आसीद्धि रोगाः शान्तनोः सुतः॥३४४॥ धनके द्वारा तो कोई पुरुष आरोग्य भी प्राप्त नहीं कर सकता। देखो, राजा शान्तनुका पुत्र विचित्रवीर्य रोगसे पीड़ित ही था। नामोति काञ्जिकां येन लभ्यं तेनामृतं कथम् । प्रयतेनेति दृष्टान्तोऽप्यत्र बोध्यः कुवादिभिः ॥३४५॥ यहाँ बकवादियोंको यह दृष्टान्त भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि जिस प्रयनसे कॉजी भी नहीं मिलती उससे अमृत कैसे मिल सकता है। दृश्यन्ते धनिनो लोके पुत्राभावादिपीडिताः । भारतादौ स्मृता दोपा धनस्य धनिनामपि ॥३४६।। लोकमें धनी लोग पुत्राभाव आदि दुःखोंसे पीड़ित देखे ही जाते हैं। धन और धनवानोके दोष महाभारत आदिमें मी कहे ही हैं। महामारते ईहाधनस्य न सुखा लब्ध्वा चिन्ताचभूयसी । लब्धनाशो यथा मृत्युलब्धं भवति वा न वा ॥३४७॥ घनके लिये जो चेष्टा होती है वह सुखरूप नहीं होती। इसे पाकर बड़ी चिन्ता बद जाती है । मिले हुए धनका नाश तो मानो मृत्यु ही है और धन प्राप्त होगा या नहीं यह मी निश्चित नहीं है। '.
COCONOMURGRUKO १४६ मुमुक्षुसर्घ ससार .GOOGLE पिता अपने जीवित पुत्रको भी छोड़कर उसका पालन-पोषण समाप्त होनेसे पूर्व अपवा पधात् मर ही जायगा । एवं विजानहोकेमिन् कः कस्येत्यभिनिधितः । मोक्षे निवेशय मन इति राजे द्विजोऽनवीत् ॥३३१॥ अतः ऐसा जानकर कि 'इस लोकमें कौन किसका है! दृदसकल्प होकर अपना चित मोक्षमें लगा'-ऐसा एक द्विजने राजासे कहा है। संमहकर्तृवचनम् पुत्रा यसाद्धि सर्वेषां जायन्ते म्बशुभाशुभः । पित्रोधर्म विना तसादुपेक्ष्यास्ते मुमुक्षुभिः ॥३३२।। क्योंकि सभीक पुन माता-पिताके धर्मके बिना ही अपने- अपने शुभाशुम कमोंमे ही उत्पन्न होते हैं, इसलिये मोशाभिन्नती पुरुपोंको उनकी उपेक्षा करनी चाहिये। नमान्नूदेहमामाघ समोडम्यामिवाया । यूका २ मुताम्त्याज्याःगलावग पान्धराः ॥३३॥ अतः नरदेह पाकर अपने मोची कामनामै पुपादिको आदिक सनान और क्युजनोंको जंभारके समान त्याग देना चाहिये। मुनगन्धानिन्दवं प्रागन ममुदीरिता । श्रीतम्मानुमान लिनिन्दाय वायते ॥३३॥ इम प्रसर हा पहा श्रुति अनुसार पुर और रथु. जनको निन्दा की गयी; र आगे धनरी निन्दा कान है।
कृतीय प्रकरण GUSee धन-निन्दा ननु मोक्षो धनेन स्यान्ट्रीमतां किन्नु दुर्लभम् । इत्यादेलौकिकाद्वादाकिमर्थ त्यागमाश्रयेत् ॥३३५॥ शङ्का-'धनवानोंको दुर्लभ ही क्या है ?' इस लोकोक्तिके अनुसार धनसे तो मोक्ष भी प्राप्त हो सकता है; फिर त्यागवृत्तिका आश्रय क्यों लिया जाय। मैवं मोक्षस्य सिद्धत्वान्न केनाप्यस्ति साध्यता । मोहावृतोऽद्वयानन्दः कैश्चित्यागेन लभ्यते ॥३३६।। समाधान-ऐसा मत कहो, क्योंकि खतःसिद्ध होनेके कारण मोक्ष किसी उपायसे साध्य नहीं है । अद्वयानन्द मोहसे आच्छादित है; वह किन्हीं-किन्हींको त्यागसे ही प्राप्त हो सकता है। ननु ज्ञानस्य वित्तेन मानजत्वान साध्यता । मुक्तस्तु घनसाध्यत्वं स्यात्सुखत्वेन हेतुना ॥३३७।। मैवमारण्यके श्रुत्या मैत्रेयीत्राह्मणे यतः । मोक्षस्य वित्तसाध्यत्वं साक्षादेव निराकृतम् ॥३३८॥ अमृतत्वस्य नाशास्ति वित्तेनेत्याद्यया तथा । न धनेनामृतत्वमानशुरिति जगी श्रुतिः ॥३३९॥ यदि कहो कि ज्ञान तो प्रमाणजन्य होनेके कारण धनसे साध्य नहीं है किन्तु मुक्ति सुखस्वरूप होनेके कारण धनसाध्य है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि बृहदारण्यक श्रुतिके १४८ CGLISGRRIGIOGROLOGrics GURU मुमुक्षुसर्यस्खसार मैत्रेयोत्राह्मणमें 'धनसे अमृतत्यकी आशा नहीं है' इत्यादि श्रुतिसे मोक्ष- की वित्तसाव्यताका स्पष्ट निराकरण किया है । तपा श्रुतिने हो 'धनसे अमृतत्व नहीं प्राप्त किया' ऐसा भी कहा है। यत्तूक्तं श्रीमतां किन्न दुर्लभं स्यान्मृषय वत् । क्षुद्राण्यपि सुतादीनि यतो नैति धनेन ना ॥३४०॥ और यह जो कहा कि 'धनवानोंको क्या दुर्छम है !' सो ठीक नहीं, क्योंकि धनसे तो मनुष्यको पुत्रादि क्षुद पदार्थ मी प्राप्त नहीं होते। सअपवित्रकेतुथ राजानी चक्रवचिनी । पुत्रं धनेन नाप्तौ तं प्राप्ती नारदवाक्यतः ॥३४१॥ देसो, सअप और चित्रवेतु चक्रवर्ती राजा होकर भी धनसे पुत्र प्राप्त नहीं कर सके। उन्होंने नारदजीके वचनसे ही पुत्र प्राप्त किये थे। धनेन गाधिपुत्रश्य ग्रामण्यं नैय लब्धवान् । महता तपमा तेन तच्चवाप्तमिति श्रुतम् ॥३४२॥ विश्वामित्रजीको भी धनक, यटम प्रामणन्य प्राप्त नहीं हुआ, उन्होंने घोर तपस्यासे ही उसे प्राप्त किया था ऐसा हमने सुना है। परीक्षिनम्नया राजा नष्टापुर्णपिशापतः । पनेन लन्यवानायरित्येवं मारते श्रुतम् ॥३४३॥ अब ऋषिक शापसे राजा परीक्षितको आयुध हो गयी तो उन्हें धनसे या ग्रामि नहीं हो सकी यह बात मामा में मुनी जानी .
तृतीय प्रकरण १४९ OGreANGUAGRUEDGRIA आरोग्यं चापि कश्चिन्ना न पामोति धनेन वै । विचित्रवीर्य आसीद्धि रोगातः शान्तनोः सुतः ॥३४४॥ धनके द्वारा तो कोई पुरुष आरोग्य भी प्राप्त नहीं कर सकता। देखो, राजा शान्तनुका पुत्र विचित्रवीर्य रोगसे पीड़ित ही था। नामोति काञ्जिकां येन लम्यं तेनामृतं कथम् प्रयत्नेनेति दृष्टान्तोऽप्यत्र बोध्या कुवादिभिः ॥३४५।। यहाँ बकवादियोंको यह दृष्टान्त भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि जिस प्रयनसे काँजी भी नहीं मिलती उससे अमृत कैसे मिल सकता है! दृश्यन्ते धनिनो लोके पुत्राभावादिपीडिताः । भारतादौ स्मृता दोपा घनस्य धनिनामपि ॥३४६॥ लोकमें धनी लोग पुत्रामाव आदि दुःखोंसे पीड़ित देखे हो जाते हैं। धन और धनवानोंके दोप महाभारत आदिमें भी कहे ही हैं। महामारते ईहाधनस्य न सुखा लब्ध्वा चिन्ताचभूयसी । लम्धनाशो यथा मृत्युलन्धं भवति वा न या ॥३४७॥ धनके लिये जो चेष्टा होती है वह सुखरूप नहीं होती । इसे पाकर मड़ी चिन्ता बढ़ जाती है । मिले हुए धनका नाश तो मानो मुस्य ही है और धन प्राप्त होगा या नहीं [-यह मी निश्चित नहीं है।
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Gradioprincreal
मुमुनुसर्वस्वसार
धननाशे महृदुःखं मन्ये सर्वमहत्तरम् ।
ज्ञातयो हवमन्यन्ते मित्राणि च धनाञ्च्युतम् ।
धने सुखकला या तु सापि दुःखाय केवलम् ॥३४॥
प्रथम तो मैं धनके नाशमें ही महान् दुःख समझता हूँ। और
सबसे बड़ा दुःख यह है कि धनसे हीन हो जानेपर पुरुषका जाति-
बन्धु और मित्रगण भी अपमान करने लगते हैं । धनमें जो सुखका
अंशमात्र प्रतीत होता है वह भी केवल दुःखहीका कारण है ।
धनवान् क्रोधलोभाभ्यामाविष्टो नष्टचेतनः ।
तिर्यगीक्षः शुष्कमुखः पापको भृकुटीमुखः ॥३४९॥
क्योंकि धनवान् पुरुष क्रोध और लोभमें भरकर ज्ञानशून्य हो
जाता है। उसकी दृष्टि टेढ़ी रहती है, मुख सूखा रहता है और कुटि
ही मुखका काम देती है [अर्थात् जो मुँहसे कहना है उसका वह
भौंहोंसे ही सङ्केत करता है।
निर्दशन्नधरोष्ठन क्रुद्धो दारुणमापिता ।
कस्तमिच्छेत्परिद्रष्टुं दातुमिच्छति चेन्महीम् ॥३५०।।
वह क्रोधमें भरकर अपने ओंठ और अधरोंको चबाता हुआ
वड़ा कठोर भाषण किया करता है । वह यदि सम्पूर्ण पृथिवी भी
देना चाहे तो भी उसकी ओर भला कौन देखना चाहेगा !
योगवासिष्ठे
न तादृशं जगत्यसिन् दुख नरककोटिपु ।
यादृशं यावदायुष्कमर्थोपार्जनशासनम् ॥३५१॥
तृतीय प्रकरण CREUSIGNINGRELIERRIERGRIDGRONISDGRANUS इस संसारमें सारी आयु धन कमाते रहनेका शासन (दबाव) जैसा कट है वैसा करोड़ों नरकोंमें भी नहीं है । श्रीमद्भागवते अर्थस्य साधने सिद्ध उत्कर्षे रक्षणे व्यये । नाशोपभोग आयासस्त्रासश्चिन्ता भ्रमो नृणाम् ॥३५२॥ मनुष्योंको घनके उपार्जन करने, उपार्जित हो जानेपर उसके बढ़ाने, रक्षा करने एवं खर्च करनेमें तथा उसके नाश और उपभोगमें तरह-तरहके श्रम, भय, चिन्ता और भ्रम होते हैं। स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः सयो मदः। भेदो वैरमविश्वासः संस्पर्धा व्यसनानि च ॥३५३॥ एते पञ्चदशाना ह्यर्थमूला मता नृणाम् । तसादनर्थमाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत् ॥३५४॥ चोरी, हिंसा, झूठ, दम्भ, काम, क्रोध, अभिमान, मद, भेद- बुद्धि, वैर, अविश्वास, स्पर्द्धा और [स्त्री, धूत एवं मादक द्रव्य- सम्बन्धी ] व्यसन-ये पन्द्रह अनर्थ मनुष्योको अर्थके ही कारण प्राप्त होते माने गये हैं । अतः कल्याणकामी पुरुपको अर्थरूप अनर्थका दूरसे ही त्याग कर देना चाहिये । संग्रहकर्तृवचनम् घनिनो रोगिणःप्रायो दृश्यन्ते क्षुद्विवर्जिताः । राजचोरादिभीताश्चैवान्योन्यं वैरिणो भृशम् ।।३५५।। -
૧૨
OGREGUSAGreek
मुमुक्षुसर्वखसार
OCTERISOGUENGLISRO
देखा जाता है कि धनी लोग प्रायः रोगी रहते हैं, उन्हें भूख
ही नहीं लगती, वे राजा और चोर आदिसे भयभीत रहते हैं और
एक-दूसरेके कट्टर वैरी हो जाते हैं।
तसाद्वित्तेपणा त्याज्या सदा पुत्रैपणेव सा ।
मोक्षाख्यसुखलाभाय मुमुक्षुभिः प्रयत्नतः ॥३५६॥
अतः मुमुक्षुओंको मोक्षरूप आनन्द प्राप्त करनेके लिये
पुत्रैषणाके समान ही प्रयत्नपूर्वक वित्तैपणाका भी सर्वदा त्याग
करना चाहिये।
विशां ननु धनाढ्यानां राजचौरादितोऽस्तु भी।
राज्ञां नास्ति ततो भीतिर्यतस्ते यलिनः स्वयम् ॥३५७॥
तसाद्राज्याद्विरागस्तु न कर्त्तव्यः सुखेप्सुना ।
इति चेन यतो राज्ञां भारते दुःखमीरितम् ॥३५८॥
यदि कहो कि धनाढ्य वैश्योंको भले ही राजा और चोर
आदिका भय रहे, तथापि राजाओंको तो उनसे किसी प्रकारका
खटका नहीं होता, क्योंकि वे तो वयं ही बड़े बलवान् होते है।
अतः सुखेच्छु पुरुषको राज्यसे तो वैराग्य करना उचित है ही
नहीं तो ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि महाभारतमें राजाओंके
दुःखका भी वर्णन किया है।
महामारते
परतन्त्रः सदा राजा स्वल्पेष्वपि प्रसजते ।
मन्धिविग्रहयोगे. च कुतो राज्ञः स्वतन्त्रता ॥३५९॥
तृतीय प्रकरण १५३ OGLEOGROGRRIORNIORGANOONGRE राजा तो सर्वदा परतन्त्र है; वह खल्प सुखमें ही आसक्त हो जाता है। राजाको सन्धि और विग्रह आदिके समय भला कब खतन्त्रता रह सकती है। स्वमकामो न लभते स्वप्तुं कार्यार्थिभिर्जनः । शयने चाप्यनुज्ञातः सुप्त उत्थाप्यतेऽवशः ॥३६०॥ जब उसे सोनेकी इच्छा होती है तब अन्य कार्यार्थी पुरुपोंके कारण उसे उसका भी अवसर नहीं मिलता । और यदि सोनेकी आज्ञा मिल भी गयी तो विवश होकर सोनेसे उठा लिया जाता है। खाद्यालभ पिर प्राश जुहुध्यग्नीन् यजेत्यपि । अवीहि शृणु चापीति विवशः कार्यते परैः ॥३६॥ 'खान कीजिये, ग्रहण कीजिये, पीजिये, खाइये, अग्निमें हवन कीजिये, यज्ञ कीजिये, कहिये, सुनिये' इस प्रकार अन्य पुरुषोंद्वारा यह परवश काममें जोड़ दिया जाता है। अभिगम्याभिगम्यैव याचन्ते सततं नराः। नचाप्युत्सहते दातुं वित्तरक्षी महाजनान् ॥३६२॥ लोग इसके पास निरन्तर आ-आकर माँगते हैं; किन्तु धनकी रक्षा करता हुआ यह महापुरुषोंको भी कुछ देनेका साहस नहीं करता। दाने कोशक्षयोऽप्यस्य वैरं चास्याप्रयच्छतः । क्षणेनास्योपवर्तन्ते दोपा वैराग्यकारकाः ॥३६॥ दान देनेसे तो इसका कोश क्षीण होता है और न देनेसे GUDERead मुमुक्षुसर्यवसार PERMINGINGRum. पैर बढ़ता है। अतः एक क्षणमें ही इसे पैराग्य उत्पन करनेवाले धनके दोष प्राप्त हो जाते हैं। प्राधाकट्टरांस्तथैवाध्यानेकस्थानेऽपि दाश्ते । भयमप्यमये राज्ञो यश्च नित्यमुपास्यते ॥३६॥ से एक म्यानपर एकत्रित हुए बुद्धिमान, शुरवीर अपरा धनाड्य पुरुषों के विषयमें भी सन्देह होने लगता है। इस प्रकार मिनसे किसी तरह का भय न होना चाहिये और जो सदा ही सेवा किया करते हैं उनसे भी गवाको भय रहता है। हतो देशः पुरं दग्धं प्रधानः कुरो गृतः । लोकशापारणेपु मिथ्यामान तप्यते ॥३६५।। 'देश नर हो गया, नगरमें आग दग गयी, गुम्प गरसन मर गया' इस प्रकार इन लोकमाधारण यानों में यह मिया मानो वारण सन्नम हुआ करता है। अमनो मानमरिकापमयोद्भवः । मिगेरोगादिमी रोगलथैवामिनियमिः ॥३६६।। द्वन्दनम्नानः मांतः परिमहिनः। पधुप्रायपि राज्यमुपाने गणनियाः ॥३६॥ गागरमा अगिरी बनमित दृता, गिर रोगे या धर्मचारियों द्वारा तृतीय प्रकरण OGRAISIGRIOGNIOGNISiraincreNOOGrie शङ्कितचित्त रहकर अनेकों प्रतिपक्षियोंसे पूर्ण राज्यको रात्रियाँ गिन- गिनकर भोगता है। तदल्पसुखमत्यर्थ यहुदुःखमसारवत् तृणाग्निज्वलनप्रख्यं फेनवुवुदसन्निभम् । को राज्यमभिपयेत नाप्य चोपशमं लभेत् ॥३६८॥ अतः अत्यन्त अल्प सुखबाले, नाना प्रकारके दुःखोंसे पूर्ण, तृणाग्निकी ज्वालाके समान तथा फेन और बुलबुलेके सदृश इस सारहीन राज्यको कौन लेना चाहेगा ! और लेकर भी कौन सुख प्राप्त कर सकेगा! साहमेतानि कर्माणि राजदुःखानि मैथिल ! समर्था शतशो वक्तुमथवापि सहस्रशः ॥३६९॥ [सुलभा कहती है-] हे जनक ! इन कमों तथा राजाओंके दुःखोंको मैं सैकड़ों अथवा सहस्रों प्रकारोंसे वर्णन कर सकती हूँ। ततोऽब्रवीत्कुण्डधारो दिव्यं ते चक्षुरुत्तमम् । पश्य राज्ञां गतिं विन लोकांश्चैव तु चक्षुपा ॥३७०॥ तब [ ब्राह्मणको दिव्य चक्षु देकर ] कुण्डधारने कहा- हे द्विज! तुम्हारे अत्युत्तम दिश्य नेत्र हैं; तुम अपने नेत्रोंसे राजाओंकी गति और अन्य लोकोंका अवलोकन करो । ततो राजसहस्राणि मग्नानि निरये तदा । दूरादपश्यद्विप्रः स दिव्ययुक्तेन चक्षुपा ॥३७१॥ तदनन्तर उन विश्वरने दिव्य दृष्टिसे दरहीसे हजारों राजाओं नरकमें इबे हुए देखा ।
मुमधुसर्यखसार
संग्रहकर्तृवचनम्
इत्थं वित्तस दुष्टत्वं विज्ञाय भारतादितः ।
सन्त्यजेदैहिकं भोग्यं तद्वच पारलौकिकम् ॥३७२॥
इस प्रकार महाभारत आदिसे धनको सदोष जानकर ऐहिक और
उसी प्रकार पारलौकिक भोगों का भी त्याग कर देना चाहिये ।
पारलौकिक सुखकी हेयता
नन्वैहिकस्य भोग्यस्य दुष्टत्वादस्तु हेयता ।
अदुष्टत्वान्न हेयत्वं स्वर्गभोग्यस्य सम्भवेत् ॥३७३॥
शक्षा-लौकिक भोग दोषयुक्त है, इसलिये उनका स्याग्य
होना तो ठीक है, किन्तु स्वर्गमें प्राप्त होनेवाले भोग तो दोपहीन
होनेके कारण किसी प्रकार हेय नहीं हो सकते ।
अपाम सोममक्षय्यमित्याद्याः श्रुतयो जगुः ।
स्वर्गभोग्यस्य नित्यत्वं तयादिव्यमुरपात्मवाम् ॥३७॥
'हमने अक्षयव प्राप्त करानेवाला सोमपान किया' स्यादि
श्रुतियोंने स्वर्गीय भो!की नित्यता तथा दिव्यायामकताका
वर्णन किया है।
श्रुतिः
खगें लोके न भयं किशनानि
न तय त्वं न जरया विमति ।
उमे तीत्यांगनायापिपा
शोकानिगो मोदतं मर्गलोर ॥३७॥
दतीय प्रकरण RUDDURGar [ नचिकेता कहता है- स्वर्गलोकमें किसी प्रकारका भय नहीं है। वहाँ तुम (पमराज) नहीं रहते और न यहाँ मनुष्य वृद्धायम्यासे ही डरता है। वह सर्गोको भूग और प्यास दोनोंदीको जीतकर शोकसे पार हो आनन्दित होता है। संग्रहकर्तृवचनम् सप्प स्वर्गमुखं पसादनित्यमैहिकं यथा । राजसत्याधुविधात्र प्राक्तपधेत्युदाहता ॥३७६।। ऐसा पहना ठीक नहीं, क्योंकि सर्गमुग मी राजस होनेके कारण सोफिस गुपके समान अनित्य ही है । इस सम्बन्धमें सप- संद कर्मचितो सोशः क्षीयते यमेगात्र पुण्यचितो रोकः धीयते । इत्यादि ति पहरे काह हो चुके हैं। सरगुग्वेऽतिशयमापि दर्शितस्तचिरीय। मैपेत्यादिफया श्रुत्पातोऽपिम्पर्गगुग्गं घपि ।।३७७।। निशर उपनिषदो कानन्द मीमामा माति' (१० उ० २१८) आदि तिरी सर्गसुपर सानिशपता (गनागिता ) भी मिली है। इसी भी रानगुन नागा ही। भीनियापि विराजो मकामामपितुः धुता । ग्गदनादिनिमिग्न तमिन्यादहिं पारस्तः ॥३७८।। समान भागमोद (2030१२।५) Pान, गिटको भी ग गने कि बाल अपने पिनसे मालागुनाता है।
मुमुक्षुसर्यवसार
BRUDOCUSDCRUIOGRUERIENDGAON
स्वपितुस्तु भयन्नास्ति शूकरादरपि कचित् ।
ऋते रोपणजातेः सा यादृश्यासीत्प्रजापतेः ॥३७९॥
सादि कोधी जीवोंको छोड़कर अपने पितासे तो शूकरादिको
भी कभी भय नहीं होता, जैसा कि यहाँ प्रजापतिको हुआ था।
तथेन्द्रार्कादिदेवानां जगदीशायं श्रुतम् ।
तैत्तिरीयकमन्त्रेण भीतानां स्यात्सुखं कुतः ॥३८०॥
तपा सैत्तिरीय श्रुतिके [ निम्नलिखित ] मन्त्रसे तो इन्द्र और
सूर्य आदि देवताओंको भी जगदीचरसे भय प्राप्त होता सुना गया
है; और डरे हुओंको भला सुख ही कहाँ हो सकता है !
मन्त्रः
भीपासाद्वातः पवते भीपोदेति सूर्यः ।
भीपासादमिश्वेन्द्रथ मृत्युर्घावति पञ्चमः ॥३८॥
इसके भयसे वायु चलता है, इसके भयसे ही सूर्य उदित
होता है, तथा इसके भयसेही अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है।
संमहकर्तृवचनम्
इन्द्रवातादयो ह्येवं भयाविष्टा यदा तदा ।
पित्रादीनां तु भीतत्वं किमुतन्यायढौकितम् ॥३८२॥
इस प्रकार जब कि इन्द्र और वायु आदि देवगण भी भययुक्त
हैं तो पितृगण आदिका भयभीत होना तो कैमुतिक न्यायसे सिद्ध
हो जाता है। अर्थात् उन्हें भय होता है-इसमें तो कहना ही क्या है !!
प्रजापत्यादिदेवानां सम्भीतत्वादिहेतुभिः ।
दुःखित्वं दिवि निश्चित्य नेच्छेत्स्वर्गसुखं सुधीः॥३८३॥
तृतीय प्रकरण OGRASGRRIORRIEOGRIDGANDGIRGANIEDO अतः प्रजापति आदि देवताओंके भयभीत रहने आदि हेतुओंसे वर्गमें दुःखका निश्चय कर बुद्धिमान् पुरुष वर्गसुखकी इच्छा न करे। अपामेत्यादि यद्वाक्यं तचिरस्थितियोधकम् । आभूतसम्प्लवं स्थानममृतत्वमिति स्मृतेः ॥३८४॥ महाप्रलयपर्यन्त स्थिर रहना ही अमरत्व है, इस स्मृति- वाक्यके अनुसार 'अपाम सोमम्' आदि जो वाक्य है वह दीर्घकालीन स्थितिका ही बोध करानेवाला है। स्वर्ग इत्यादि यद्वाक्यं तद्भवेद्गुणवादकम् । स्वर्गसाधनलाभार्थ नचिकेता यतोऽप्रवीत् ॥३८५।। 'स्वर्ग लोके न भयं किञ्चनास्ति' (क० उ०१।१।११) इत्यादि जो वाक्य है वह उसके गुणोंका ही वर्णन करनेवाला है, क्योंकि नचिकेताने उसे स्वर्गप्राप्तिका साधन (नाचिकेत अग्नि) प्राप्त करने के लिये ही कहा है। 'आग्रनभुवनाश्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन' । 'ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' । इत्यादिवचनैरीशोऽप्यत्रवीत्स्वाक्षयिष्णुताम् ॥३८६॥ 'हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यन्त सभी लोक पुनरागमन कराने- वाले है 'वे (स्वर्गवासी लोग) उस विशाल स्वर्गलोकको भोग- कर अपना पुण्य क्षीण होनेपर फिर मत्र्यलोकमें ही प्रवेश करते है इत्यादिवचनों. नने TA .. स न నాగాయల मुमुक्षुसर्वस्वसार दिव्यत्वं स्वर्गसौख्यस्य यदुक्तं पूर्वपक्षिणा | किं स्यात्तत्तस्य दिव्यत्वं वक्तव्यमिति तेन वै ॥३८॥ पूर्वपक्षीने जो स्वर्गसुखकी दिव्यता बतलायी है, उसकी यह दिव्यता क्या है ! यह भी उसे बतलाना चाहिये । कि देवैरेव भोग्यत्वं सात्विकत्वमथापि वा । उत्कर्पोऽन्यमुखाद्वा स्यादिवि जन्यत्वमेव का ॥३८॥ यह दिव्यता क्या देवताओंद्वारा भोगा जाना है या सात्विकता है! अपया अन्य मुखोंसे उत्कर्पता किंवा वर्गलोकमें होना है! नायोदत्या यतोदेवान् जित्वा स्वर्गसुखं गताः। हिरण्याक्षादयः शूरा इति पौराणिका जगुः ॥३८९॥ इनमें प्रथम पक्ष तो हो नहीं सकता, क्योंकि हिरण्या आदि शूरवीर दैत्योंने देवताओंको जीतकर सर्गमुरा प्राप्त कर लिया था- ऐसा पौराणिकोंने कहा है। राक्षसा राणायाथ स्वर्गमाख्यमवामुवन् । मनुप्या नहुपाचाथ सुनते स दियः सुग्यम् ।।३९०।। रावण आदि राक्षसोंने मी स्वर्गमुग नाम मिया पा तथा नाप आदि मनुष्योंने मी साय मुमका मांग किया है। न द्वितीयो यतसम्म राजमत्तमुदीरितम् । गीतामु श्रीमगवता गार्थमयोगजस्यतः ॥३९१|| दूसरा पा [ अर्थात् मासिकता ही दिव्यता है- भी तृतीय प्रकरण नहीं हो सकता; क्योकि भगवान्ने अपनी गीतामें इन्द्रिय और विषयके संयोगसे उत्पन्न होनेके कारण उस (स्वर्गसुख ) को राजस बतलाया है। श्रीमद्भगवद्गीतासु विपयेन्द्रियसंयोगायत्तदग्रेऽमृतोपमम् परिणामे विपमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥३९२॥ विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला जो सुख पहले अमृतके समान प्रतीत हो, किन्तु परिणाममें विपके समान हो वह राजस कहा गया है। संग्रहकर्तृवचनम् न तृतीयो यतो नैवाप्युत्कर्षोऽसत्सुखादणुः । स्वर्गसौख्यस्य निस्तृष्णविचारेणोपलभ्यते ॥३९३॥ तीसरा पक्ष [ यानी अन्य सुखोंसे उत्कृष्टता ] मी नहीं हो सकता, क्योंकि तृष्णाहीन पुरुष विचारद्वारा स्वर्गसुखकी हमारे सुखसे अणुमात्र मी उत्कृष्टता नहीं देखते । तैत्तिरीये तु यत्प्रोक्तं न्यूनाधिक्यं सुखस्य वै । तत्तु रागिदृशा सिद्धं वैराग्याय धनूदितम् ।।३९४॥ तैत्तिरीय-श्रुतिमें जो सुखको न्यूनाधिकताका वर्णन किया है यह रागी पुरुषोंकी दृष्टिसे ही सिद्ध होता है और उसका वैराग्यके लिये ही अनुवाद किया है।
१६२
MurariOURGUSIGRUS
मुमुसुष्पयंसार
वाघदृष्टयातु नास्ति विशेषो यहिकात्सुखान् ।
वर्गमोगसुखस्यापि खाजत्याविशेषतः ॥३९५।।
हायटिसे तो खगीय भोगोंक मुस्पकी लौकिक सुमसे कुछ मी
विशेषता नहीं है, क्योंकि दोनों ही समान भावसे इन्द्रियसम्बन्धी
विषयोंसे प्राप्त होनेवाले हैं।
उक्त आत्मपुराणेऽयमों वैराग्यसिद्धये ।
दध्याथर्वणस्योक्तेाजेनैव समासतः ॥३९६॥
इस विषयका आत्मपुरागमें पैराग्यकी सिद्धिके लिये
दयनापर्यण ऋपिकी उक्तिके मिपसे संक्षेपमें वर्णन किया है ।
आत्मपुराणे
उत्पद्यते सुखं यादृग् ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।
विष्ठाक्रिमेस्तादृगेव स्याद्योगादिन्द्रियार्थयोः ॥३९७॥
इन्द्रिय और उसके विषयका संयोग होनेपर जैसा सुख परमेष्ठी
मसाजीको होता है वैसा ही विष्टाके कीड़ेको भी होता है।
विक्रिमेरपि सन्त्येव धन्नं दाराः सुतास्तथा ।
ब्रह्मणोऽपि विशेषः स्यादनयोः केन हेतुना ॥३९८॥
विष्टाके कीड़ेके भी अन्न, स्त्री तथा पुत्र होते हैं और ब्रह्माजीके भी
होते हैं, फिर इन दोनोंमें किसीकी विशेषता किस हेतुसे हो सकती है।
जायते म्रियते ब्रह्मा विक्रिमिथ तथैव हि ।
सुखदुःखकरं तद्वत्सदेहत्त्वं समं द्वयोः ॥३९९॥
तृतीय प्रकरण OuonounusuOGRUARGAOGroup. ब्रह्मा और विष्टाका कीड़ा ये दोनों ही उत्पन्न होते और मरते है, उसी प्रकार इन दोनोंको सुख-दुःख देनेवाली सदेहता भी एक-जैसी ही है। किं पहुक्तेन देवेन्द्र सपेणावधारय । समः संसार आत्मा च मम तेऽपिशुनोऽपि च ॥४०॥ हे देवेन्द्र ! यहुत क्या कहा जाय ! संक्षेपसे इतना ही समझ लो कि संसार और आत्मा तो मेरा तुम्हारा और कुत्तैका भी समान ही है। संग्रहकर्तृवचनम् न तुरीयो यतः खर्गे सन्ति दोपा भयादयः । सुखवत्तेऽप्यहेयाः स्युः स्वर्गजन्यत्वमात्रतः ।।४०१॥ [खर्गमें होना ही दिव्यताका हेतु है-ऐसा ] चौथा पक्ष भी समीचीन नहीं है, क्योंकि वर्गमें तो भय आदि दोष भी है, और ऐसा माननेसे स्वर्गमें होनेके ही कारण सुखके समान वे भी अत्याग्य हो जायेंगे। तेपामहेयता नेष्टा प्राणिमात्रस्य कस्यचित् । एवं दिवि भवत्वं न दिव्यत्वमपि सम्भवेत् ॥४०२॥ किन्तु उनकी अत्याज्यता किसी भी प्राणिमात्रको अभीष्ट नहीं है । अतः स्वर्गमें होना भी दिव्यत्व नहीं हो सकता। तसादैहिकबद्धेयं स्वर्गभोगसुखं बुधैः । बहुना किमिहोक्तेन सर्वान्छब्दादिकांस्त्यजेत् ।।४०३॥
मुमुक्षुसर्वखसार AGROGRENIORGRIDGNIORGUAGNIRNOR. . अतः बुद्धिमानोंको ऐहिक सुखके समान स्वर्गीय भोगोंका सुख भी त्याग देना चाहिये । यहाँ बहुत क्या कहा जाय, शब्दादि सभी विषयोंको त्याग दे। न चैकान्तेन शब्दाद्याः कुत्रापि सुखदा यतः । स्वल्पसौख्यप्रदत्वेऽपि प्रायेण दुःखदाः सदा ॥४०४॥ क्योंकि शब्दादि विषय कहीं भीएकान्ततः ( सदा ही) सुस- दायक नहीं होते, इसलिये स्वल्प सुखदायक होनेपर भी वे सर्वदा प्रायः दुःख देनेवाले ही हैं। 'ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव वे' । इति श्रीकृष्णदेवोऽपि अर्थानामाह दुष्टताम् ॥४०५|| 'जो कुछ भी विषयजनित भोग है वे दुःसके उत्पादक ही है। इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्र ने भी विषयोंकी दोपयुक्तता ही बतदायी है। विषयवासनारुष्टं चितं वनादिकालतः । तासां ततः प्रहाणाय विषयाणां मुहर्मुहुः ॥४०६॥ दोपाश्चिन्त्याः प्रयनेन वायदय मुमुक्षुणा । यावन्न नागमायान्ति पर्थेप्चखिलवामनाः ॥४०७॥ यह चित्त अनादि कारमे विषयामनाओंसे आपपित हो रहा है। अतः जबतक विषयोंकी सारी वासनाएँ नष्ट न हो जायें तबतक मुमुक्षु पुरुषको उनका नाश करने के लिये प्रयास बारम्बार विषयोंश दोपोंका चिन्तन करना चाहिये।
तृतीय प्रकरण PERSOGGENIOGRLSOGANJ इन्द्रिय-निन्दा भोगाधिष्ठानभोग्यानांदोपाःप्रागिह कीर्तिताः। भोगसाधनदोषांस्तु सङ्घपात्साम्प्रतं ब्रुये ॥४०८॥ पहलेसे आरम्भ करके यहाँतक भोगोंके आश्रय (शरीर ] और भोग्य पदार्योके दोप बतलाये गये । अत्र संक्षेपसे भोगोंके साधनोंके दोप बतलाते हैं। इन्द्रियाणि तथा सत्त्वं भोगानां साधनानि वै । तेपु दोपाच बोद्धव्यास्तेभ्यो वैराग्यसिद्धये ॥४०९॥ इन्द्रिय तथा अन्तःकरण भोगोंके साधन हैं । उनसे वैराग्यकी प्राप्तिके लिये उन सबके दोष जानने चाहिये। स्वस्वविपयसंसक्तिः प्रमाथित्वं तथात्मनः । सदा पराङ्मुखत्वं चदोपाः श्रोत्रादिपु स्थिताः॥४१०॥ अपने-अपने विपयोंकी आसक्ति, प्रमयनशीलता तथा आत्मासे सदा विमुख रहना-ये दोष श्रोत्र आदि इन्द्रियों में सर्वदा वर्तमान रहते हैं। वाच्यन्तादिभापित्वं देहीदमिति याचनम् । चौर्यायाय कराङ्मयादी दोपाः कर्मेन्द्रियेष्यपि॥४१॥ कर्मेन्द्रियोंमें भी वाणीमें मिथ्या-भाषणादि तथा 'यह मुझे दो' इस प्रकार याचना करना और चोरी आदि दोष हाय-पाँच आदिमें रहते हैं। .
मुमुक्षुसर्यवसार OGRADGAOOGLEDGUAGradurNIOGRLAC. कामः क्रोधस्तथा लोभस्तृष्णामोहमदादयः । सन्त्यन्तःकरणे दोपा बहवोऽनर्थहेतवः ॥४१२॥ अन्तःकरणमें काम, क्रोध, लोभ, तृष्णा, मोह और मद आदि अनर्थके कारणरूप अनेकों दोष रहते हैं। दुष्टैःश्रोत्रादिभिर्नेव भोक्तुवै स्यात्सुखं क्वचित् । दुष्टैरदवैर्यथा नैव रथिनोस्ति सुखं पथि ॥४१३॥ जिस प्रकार दुष्ट घोड़ोंके कारण रथीको मार्गमें सुख नहीं मिलता उसी प्रकार श्रोत्र आदि दुष्ट इन्द्रियोंके कारण भोक्ता जीवको कहीं चैन नहीं पड़ता। भोगसाधनदोपाच वासिष्ठेऽपि प्रदर्शिताः । तद्वाक्यसंग्रहेणात्र कथ्यन्ते तेऽधुना पुनः ॥४१४॥ भोगकी साधनरूप इन्द्रियोंके दोय योगवासिष्ठमें भी बतलाये हैं। यहाँ उसके वाक्योंका संग्रह करके हम उनका पुनः वर्णन करते हैं। योगवासिष्ठे चिरमासु दुरन्तासु विषयारण्यराजिषु । इन्द्रियैविप्रलब्धोऽसि धूत्तलिरिवार्भकः ॥४१५॥ चिरकालतक भी जिनका पार पाना कठिन है ऐसी विषय- रूप बनावलीमें मुझे इन्द्रियोंने ठग लिया है, जैसे कि धूर्त बालक किसी छोटे बच्चेको बहका लेते हैं। आत्मम्भरीण्यनार्याणि साहसकरतानि च । अन्धकारविहारीणि रक्षांसि स्वेन्द्रियाणि च ॥४१६|| MISSGRUEDO तृतीय प्रकरण UEDGOVERGRE मेरी इन्द्रियाँ राक्षसी ही हैं। ये अपना ही भरण-पोषण करनेवाली, अनार्या, एकमात्र दुःसाहसमें ही लगी हुई तथा अन्धकार- में विहार करनेवाली हैं। मृदनि परितापीनि दृषदृढबलानि च । छेदे भेदे च दक्षाणि सुशस्त्राणीन्द्रियाणि च ॥४१७॥ इन्द्रियाँ तीक्ष्ण शस्त्र ही हैं; ये मृदु होकर भी बड़ा दुःख देनेवाली, पत्परके समान दृढ़ और बलवती तथा छेदनभेदनमें पटु होती यानि दुःखानि दीर्घाणि विपमाणि महान्ति च । अहङ्कारात्प्रसूतानि तान्यगात्खदिरा इव ॥४१८॥ जिस प्रकार पहाइसे खैरके वृक्ष उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार जो कुछ भी अत्यन्त विषम और महान् दुःख हैं वे अहङ्कार- से ही उत्पन्न हुए हैं। चेतः पतति कार्येषु विहङ्गः स्वामिषेष्विव । क्षणेन विरतिं याति पाल: क्रीडनकादिव ॥४१९॥ जिस प्रकार पक्षी अपने भक्ष्यपर झपटता है उसी प्रकार रह चित्त अपने कार्योकी ओर दौड़ता है । और जैसे बालक खिलौनेसे उदासीन हो जाता है उसी प्रकार एक क्षणमें ही उनसे निवृत्त जाता है। भोगदूर्वाधुराकानी स्वभ्रपातमचिन्तयन् । मनोहरिणको ब्रह्मन्दरं विपरिधावति ॥४२०॥ है मुमुक्षुसर्यवसार OGRRIANGRRUPEECRUIncroacruRGROUND. हे ब्रह्मन् ! यह मनरूप मृग गड्ढेमें गिरनेकी परवा न करके मोगरूप दूधके अङ्करोंकी अभिलापासे दृरतक दौड़ा चला जाता है। संमहकर्तृवचनम् एवमिष्टान्बहुविधान्प्रनानिध्यबस्थति इत्युक्त्या भारते दोपो युद्धेरपि प्रदर्शितः ॥४२१॥ 'इस प्रकार यह युनि अपने नाना प्रकारके अभीर पदापोंका विचार करती रहती है '-इस उक्तिसे महाभारतमें युद्धिका दोष मी दिसाया है। भोक्ताओंके दोष मोगानां सापनेप्पेयं प्राग्दोपाः समन्दिताः । भोक्तृदोपालयोन्यन्तेऽधुना केचित्रामासतः ॥४२२॥ यानक भोगोंके साधनोंक दोष दिगठाये; अब संशेपो भोकाओंके भी कुछ दोष यतटाये जाते हैं। मोक्तारप्रिविधा शेया उत्तमाधममध्यमाः । उत्तमाइन्द्रमुग्याः स्युर्दरिद्रा अधमाः स्मृताः ॥४२३|| उन्म, अधम और मध्यम मैदम माना तीन प्रकारके ममाने चाहिये। इनमें इन्द्र आदिदेवाण उत्तम है तथा दरिद्री टोग अरम। मध्यमाय नथा श्रेया राजानयवानिनः । धपिप्णय त म नेया मोगनिहाएमिः ॥४२४।। दावनी राजाओंगे मध्यम माता ममझना चाय । यो मोको पागना चाहते हों वे न मर्मस्पर्शल समन्।
तृतीय प्रकरण
ರ್ಚಾಟಕಾ
चतुर्दशसु लोकेषु यतो भोक्ता न कश्चन ।
ब्रह्मणो ह्यायुपो नाशे स्थास्यत्येकमपि क्षणम् ॥४२५॥
क्योंकि ब्रह्माकी आयु समाप्त हो जानेपर चौदहों भुवनोंमें
कोई भी भोक्ता एक क्षण भी नहीं ठहर सकता ।
ब्रह्मरात्र्यागमेधःस्थाः स्वर्गलोकादिवासिनः ।
मोक्तारः सम्प्रलीयन्त इति पौराणिका जगुः ॥४२६॥
'ब्रह्माजीकी रात्रि आनेपर [ब्रह्मलोकसे] नीचे रहनेवाले
खर्गादि लोकोंके निवासी सभी भोक्ता लीन हो जाते हैं,
ऐसा पौराणिकोंने कहा है।
दिव्यान्मोगानपि त्यक्त्वाप्रलीयन्ते यतोऽखिलाः।
इन्द्रादयोऽपिभोक्तारस्तसाजीवंस्त्यजेद्धि तान् ॥४२७॥
उस समय क्योंकि इन्द्रादि सभी भोक्तालोग अपने दिव्य
भोगोंको भी त्यागकर लीन हो जाते हैं, इसलिये इन्हें जीवितावस्था-
में ही त्याग देना चाहिये।
एवं भोगाश्रयाङ्गस्य भोगसाधनभोग्ययोः ।
भोक्तृणां च तथा दोपा इह प्राक्समुदीरिताः ॥४२८॥
इस प्रकार पहले इस प्रन्यमें भोगोंके आश्रयस्थान शरीर, भोग-
साधन (इन्द्रिय), मोग्य पदार्य और भोक्ताओं के दीप बतलाये गये।
तृष्णाके दोष
तान् दोषान् सम्यगालोच्य विरक्तोऽङ्गादितो नरः।
तृष्णादोपांस्तथादृष्ट्वा भोग्येषु तां त्यजेत्सुधीः ॥४२९॥
मुमुक्षुसर्यससार
ORRUARMIRROGRAMINGUICELANDARANAOTA
अतः पुद्धिमान् पुरुष उन सब दोषोंका भली प्रकार विचार
पर अपने शरीर आदिसे विरक हो जाय तथा तृष्णाके दोषोंको
देखकर मोग्य पदार्थोंमें तृष्णा त्याग दे।
तृष्णाया विषयैः पूर्तिनव कैश्वित्कृता पुरा ।
करिष्यन्ति न चान्ये तोगतृष्णां ततस्त्यजेत् ॥४३०॥
इस तृष्णाकी पूर्ति पूर्वकाटमें किसीसे भी नहीं हुई और न
आगे ही अन्य किसीसे होगी; अतः भोगोंको तृष्णा त्याग देनी चाहिये।
हष्णात्यागं विना नास्ति खानन्दाप्तिर्यतो नृणाम् ।
तसात्स्व सुखप्रेप्सुस्तृष्णां शब्दादिषुत्यजेत् ।।४३१॥
क्योंकि तृष्णाका त्याग किये बिना लोगोंको आत्मानन्दको
प्राप्ति नहीं हो सकती; अतः आत्मानन्दकी इच्छा करनेवाला पुरुष
शम्दादि विषयोंमें तृष्णा छोड़ दे ।
तृष्णाया बहवो दोषाः सम्प्रोक्ता भारतादिषु ।
तद्वाक्यानि लिखाम्यद्य तृष्णात्यागस्य सिद्धये ॥४३२२॥
महाभारत आदिमें तृष्णाके बहुत-से दोष बतलाये हैं। इस
समय तृष्णात्यागकी सिद्धिके लिये मैं उनके वाक्योंका उल्लेख
करता हूँ।
महामारते
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीयति जीर्यतः ।
योऽसौ प्राणान्तकोरोगस्ता तृष्णांत्यजतःसुखम् ॥४३॥
हतीय प्रकरण
OTOMARGruoGNERSonGPRSarsonasoo
कुबुद्धि पुरुषोंके लिये जिसका त्यागना अत्यन्त कठिन है,
जो मनुष्य के जरा-जर्जरित हो जानेपर भी जीर्ण नहीं होती तया जो
प्राणोंका अन्त कर देनेयाला महारोग है उस तृष्णाका त्याग
करनेवाले पुरुषको ही सुख प्राप्त होता है।
यत्पृथिव्यां प्रीहियवं हिरण्यं पशः नियः ।
एकसापि न पर्याप्तं तसात्तृष्णां परित्यजेत् ।।४३४॥
पृपिवीमें जितने धान्य, जी, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं
ये एक मनुष्य के लिये भी [ उसे सन्तुष्ट करने में ] पर्याप्त नहीं हैं।
अतः [इनमें ] तृष्णाका त्याग करना चाहिये ।
सूच्या सूत्रं यथा वखे स सारयति वायकः ।
तदसंसारसूत्रं हि तृष्णाच्या निरभ्यते ॥४३५।।
जिस प्रकार दर्जी यसमें सूईसे धागेको चलाता है उसी
प्रकार इस तृष्णारूप सूईसे संसाररूप धागा याँध दिया जाता है।
योगवासिष्टे
अपि मेरुसमं प्राममपि शरमपि स्थिरम् ।
राणीकरोति तृप्णका निमेषेण नरोत्तमम् ॥४३६।।
जो नरश्रेष्ठ सुमेरुक समान स्थितप्रज्ञ, अपन्त शरवीर और
स्थिरचित्त है उसको मौ पहनना अकेली ही एक क्षण तुषत्
कर देती है।
भीपयत्यपि इं धीरमन्धयत्पपि सेक्षणम् ।
खेदयत्पपि सानन्दं हप्पा कृष्णेय शर्वरी ॥४३७॥
मुमुक्षुसर्वस्वसार OGRJEIOGRAJEST अंधियारी रात्रिके समान यह तृष्णा बुद्धिमान् विवेक पुरुपको भी भयभीत कर देती है, आँखोंवालेको भी अन्धा बन देती है और आनन्दयुक्तको भी सिन्न कर देती है। क्षणमायाति पातालं क्षणं याति नभस्तलम् क्षणं भ्रमति दिक्कुञ्ज तृष्णा हृत्पमपट्पदी ।।४३८|| हृदयरूप कमलकी भौरी यह तृष्णा एक क्षणमें ही पाताल जा पहुँचती है, क्षणमरमें आकाशमें चढ़ जाती है और एक क्षणमें ही दिशा-विदिशारूप कुञ्जोंमें विचरने लगती है। संग्रहकर्तृवचनम् तसाद्विपयरागोत्या तत्त्वज्ञानामिमारिका । तृष्णाश्रेयोऽथिनात्याज्या गाडी पेष्टी गुरायथा ॥४३९॥ अतः कल्याणकामियोंको विषयरूप रोगमे उत्पन्न और तल- ज्ञानको आप्ठादिन करनेवाली इस तृष्णाको गोडी और पटरी मदिराके समान त्याग देना चाहिये । वैराग्य विरागेण विना नैव उमाईतक्षयो यनः । तसाच्छुद्धविरागं ना कुर्यातृष्णानिशान्तये ॥४४०॥ परन्तु तृणाके कारणका पैराग्यके बिना अपनी में सकता इनटिपे मनुष्यको तृष्णासप अतिकी शान्तिप्रिय विशुद दंगाप प्राप्त करना चाहिये।
तृतीय प्रकरण १७३ OGEOGRASSGRRISOGRuss स विरागः पुराणेषु चतुर्धा सम्प्रकीर्तितः । यतमानवशीकारव्यतिरेकादिभेदतः ॥४४॥ पुराणोंमें यतमान, वशीकार और व्यतिरेक आदिके भेदसे वह वैराग्य चार प्रकारमा कहा गया है । तसानदेहमासाद्य मोक्षद्वारं सुदुर्लभम् । विषयेषु न सभेत विड्गर्ते शूकरादिवत् ॥४४२॥ अतः मोक्षके द्वारभूत इस अति दुर्लभ मनुष्यदेहको पाकर मनुष्यको विष्टाके गड्ढेमें रमग करनेवाले शूकरादिके समान विषयोंमें आसक्त न होना चाहिये । स्मरन्ति चेतिसूत्रेण नरकातिरपीरिता । पापिनो विषयासक्तगर्दभत्वं च भारते ॥४४३॥ 'स्मरन्ति च' (प्र० सू० ३।१।१४) इस सूत्रसे पापी पुरुषको विषयासक्तिके कारण नरक-प्राप्ति बतलायी है । तथा महा- भारतमें पापी पुरुपकी विषयासक्तिका परिणाम गर्दभत्व कहा है। महाभारते आत्मानमात्मस्थं न वेत्ति मूढः संसारकूपे परिवर्तते यः। 'त्यक्त्वात्मरूपं विषयांश्च भुङ्क्ते स वै जनो गर्दभ एव साक्षात् ॥४४४॥ जो मूढ अपने अन्तःकरणमें स्थित आत्माको नहीं जानता, .चौथा भेद 'एकेन्द्रिय' है।
१७४ OGRAORGROUD मुमुक्षुसर्यवसार UEDGUSIGRIGOGREASON निरन्तर संसारकूपमें ही विचरता रहता है तथा आत्मखरूपको भूलकर विषयोंको भोगता है वह मनुष्य साक्षात् गधा ही है। संग्रहकर्तृवचनम् एवं शब्दादिलाभाय धीमान्नैव कदाचन । धनादिसङ्ग्रहं कुर्याद्यदीच्छेदुत्तमं सुखम् ।।४४५॥ इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुपको, यदि उसे उत्तम सुखकी इच्छा हो तो, शब्दादि विषयोंकी प्राप्तिके लिये धन आदिका संग्रह कभी न करना चाहिये । शरीरस्थितिमात्रं नुनैव सिद्ध्येद्धि यैर्विना । तानन्नादींस्तु गृहीयाच्छुकेनेति समीरितम् ।।४४६॥ शुकदेवजीने भी यही कहा है कि जिसके बिना मनुष्यके शरीरकी स्थितिमात्र भी न हो सके उन अन्नादिको हो ग्रहण करना चाहिये। श्रीमद्भागवते सत्यां क्षिती किं कशिपोः प्रयास- हिौ स्वसिद्धे धुपवईणैः किम् । सत्यञ्जलौ कि पुरुधानपाच्या दिग्वल्कलादौ सति किंदुकूलैः ॥४४७॥ पृपियाके रहते हुए बिछौनाके लिये प्रयास करनेकी क्या आवश्यकता है ! अपनी भुजाओंके रहते हुए तकियोंकी क्या जरूरत है ! अन्जलीके होते हुए तरह-तरहके भोजनके पात्रों-
.
सृतीय प्रकरण
OutOGRVEDGNUGOGROUSDGRALEDGRINOGRUE0.
से क्या लेना है ! तथा दिशा एवं बल्कलादिके रहते हुए वनोंकी
क्या जरूरत है।
चीराणि किं पथिन सन्ति दिशन्ति भिक्षां
नैवामिपाः परभृतः सरितोऽप्यशुष्यन् ।
रुद्धा गुहाः किमजितोऽयति नोपसन्नान्
कसाद्भजन्ति कवयो धनदुर्मदान्धान् ॥४४८॥
क्या मार्गामें चियड़े नहीं हैं ! दूसरोंका पालन करनेवाले
वृक्षोंने क्या भिक्षा देना छोड़ दिया है ? क्या नदियाँ भी सूख
गयी हैं ! गुहाएँ क्या रुक गयी हैं ! क्या भगवान् अपने शरणागतों-
की रक्षा नहीं करते ! फिर तत्त्वज्ञजन धनके घमण्डमें अन्धे हुए
पुरुषोंका आश्रय क्यों देते हैं।
शमादि पदसम्पचि
संग्रहकर्तृवचनम्
विरागो दर्शितश्चैवमथ पट्सम्पदुच्यते ।
तत्राप्याद्यः शमस्तावद्विरागोद्भव उच्यते ॥४४९॥
इस प्रकार वैराग्यका दिग्दर्शन कराया गया । अत्र पट्सम्पत्ति
बतलायी जाती है। उनमें वैराग्यसे उत्पन्न होनेवाला शम सबसे
पहला कहा जाता है।
[शम]
शमश्चित्तप्रशान्तत्वं वासनात्यागसंज्ञितम् ।
शुद्धाशुद्धप्रभेदेन द्विविधा वासनेरिता ॥४५०॥
मुमुक्षुसर्यस्पसार
GrouIOGRRIOGRASSGNUARGISGRUIDcou
यासनात्यागरूप चित्तकी शान्तिका नाम शम है। यार
शुद्ध और अशुद्धके भेदसे दो प्रकारकी बतलायी गयी है।
तयोः शुद्धा झुपादेया देवीसम्पत्तिरूपिणी ।
मलिना तु सदा हेया बासना हृच्छमार्थिना ॥४५१
'उनमें देवीसम्पत्तिरुपिणी शुद्ध वासना ही ग्रहण करने यो
है; किन्तु मलिन यासना तो चित-शान्तिके इच्छुकोंको सप पर
त्यागने योग्य है।
मा चोक्ता विविधा प्राजस्तपाद्या लोकवासना ।
द्वितीया देहगा प्रोक्ता तृतीया शास्त्रवासना ।।४५२।
बुद्धिमानोंने वह मलिन यामना भी तीन प्रकारको मन
है। उनमें पट्टी लोकयासना है, दरी देहयासना और नीम
शास्त्रयामना है।
परित्यागाय नामां तु विचारः माधनं परम् ।
एतन्मय पमिष्टेन तथान्येय प्रदर्शितम् ।।४५३।।
उनको त्यागने के लिये विचार ही परम साधन
बातें वनिष्ट नया अन्य मर्मीने दिपायी हैं।
वामनालक्षणं पापि शमगान्नस्तुनिम्नया ।
श्रीवमिष्टेन मम्योना नहास्यानिलियाम्यतः ॥४५४||
अंमिटईन यामनारा सन और शाम मा THANE
मुमुनि ममता की है। यही में इन्दक, पाय नि।
:
तृतीय प्रकरण GENERGravOOGLEOGRAIE. योगवासिष्ठे दृढाम्यस्तपदार्थंकभावनादतिचञ्चलम् चित्तं सञ्जायते राम जरामरणकारणम् ॥४५५।। हे राम ! जिन पदार्थोंका दृढ अभ्यास होता है एकमात्र उनकी भावनासे ही अति चञ्चल हुआ चित्त जरा-मरणका कारण हो जाता है। तस्माद्वासनया बद्धं मुक्तं निर्वासनं मनः । राम निर्वासनीभावमाहराशु विवेकतः ॥४५६॥ अतः यह चित्त वासनासे बँधता है और वासना न रहनेसे ही मुक्त हो जाता है । इसलिये हे राम! तुम विवेकसे शीघ्र ही निर्वासनत्व प्राप्त करो। सम्यगालोचनात्सत्याद्वासना परिलीयते । वासनाविलये चेतः शममायाति दीपयत् ॥४५७॥ भली प्रकार सच्ची आलोचना करनेसे वासना लीन हो जाती है तथा वासनाके लीन हो जानेपर चित्त दीपकके समान शान्त हो जाता है। दृढमावनया त्यक्तपूर्वापरविचारणम् । यदादानं पदार्थस्य वासना सा प्रकीर्तिता ॥४५८॥ पूर्वापरका विचार त्यागकर जो पदार्थको दृढ भावनासे ग्रहण करना है वही वासना कहलाती है।
मुमुक्षुसर्यवसार OGRUSOGNINGRUDGRONICOGNINGaur वासना द्विविधामोक्ता शुद्धाच मलिना तथा । मलिना जन्महेतुः स्याच्छुद्धा जन्मविनाशिनी ॥४५९॥ शुद्ध और मलिन-भेदसे यासना दो प्रकारकी बतलायी गयी है। उनमें मलिन वासना जन्मकी कारण है और शुद्ध जन्मका अन्त करनेवाली है। मानसीर्वासनाः पूर्व त्यक्त्वा विपययासनाः । मंत्र्यादिवासना राम गृहाणामलवासनाः ॥४६०॥ हे राम ! पहले मानसिक विषयवासनाओंको स्यागार तुम मैत्री आदि शुद्ध वासनाएं ग्रहण करो। अस्य संसारवृक्षस्य सर्वोपद्रयदायिनः । उपाय एक एवास्ति मनमः स्वम्स निग्रहः ।।४६११॥ सब प्रकारके उपद्रय देनेवाले इस संसारशके उच्छेद- लिये अपने मनका निग्रह करना ही एकमात्र उपाय है। इसं हस्तन सम्पीय दन्तदन्नान्विचूर्ण्य प । अहान्यो समाक्रम्य जयेदादा सकं मनः ॥४६२|| सबसे पहले हापमे हाय मठकर, दाँतों में दाँत पसार तप अहोंमें अट्ठोंको परालकर अपने मनको ही जीतना चाहिये। इच्छामा विभिनं नन्दान्तिोश उच्यते । एतारन्त्येव मायामि तपामि नियमा यमाः॥१३॥ 'इप्समात्रक हो चित माना है और इन्धाध शान्ति GRONOR तृतीय प्रकरण GraMUSICNICOGNINGrevedo मोक्ष कही जाती है। सारे शास्त्र, तप एवं यम-नियमादिका अभिप्राय केवल इतना ही है। यस्त्विच्छातानवे यत्नं न करोति नराधमः । सोऽन्धकूपे स्वमात्मानं दिनानुदिनमुज्झति ॥४६॥ जो नराधम अपनी इच्छाओंको तनु (क्षीण) करनेका प्रयत्न नहीं करता वह दिनों-दिन अपने आत्माको अन्धकूपमें छोड़ता जाता है। दुःखमुत्पादयत्युच्चैरुत्थितचित्तराक्षसः सुखायानन्तभोगाय तं प्रयत्नेन पातय ।।४६५॥ यह चित्तरूप राक्षस उत्थित होनेपर बड़ा दुःख खड़ा कर देता है। अतः सुख और अनन्त भोगोंकी प्राप्तिके लिये उसे प्रयत्नपूर्वक दवाओ। भोगाभोगतिरस्कार कार्य नेयं शनैर्मनः । रसापहारतज्ज्ञेन कालेनाजीर्णपर्णवत् ॥४६॥ विज्ञ पुरुषको भोग-विस्तारका तिरस्कार करते हुए रसापहरण- द्वारा धीरे-धीरे चित्तको क्षीण करना चाहिये जिस प्रकार काल नूतन पल्लवको उसके रसका अपहरण करते हुए सुखा देता है । अनात्मन्यात्मभावेन देहमात्रास्थया तथा । पुत्रदारकुटुम्बैश्च चेतो गच्छति पीनताम् ॥४६॥ अनात्मामें आत्मभाव करनेसे, देहमात्रकी आस्था रखनेसे तथा पुत्र, खी और कुटुम्ब आदिके कारण चित्त स्थूल हो जाता है।
९८०
Gravane
मुमुक्षुसर्वखसार
स्नेहेन धनलोभेन लाभेन मणियोपिताम् ।
आपातरमणीयेन चेतो गच्छति पीनताम् ।।४६
स्नेहसे, धनके लोभसे तथा मणि और स्त्रियोंकी आपातरम
प्राप्तिसे चित्त स्थल हो जाता है।
अस्य चित्तमहाव्याधेचिकित्साया महापधम् ।
स्वायचं मृणु वक्ष्यामि साधु खस्वादनिश्चित्तम् ॥४६
सुनो, इस चित्तरूपी महान्याधिकी चिकित्साके लिये
खाधीन, उत्तम और अपने सादसे निषित महीपधि बतलाता
शमेनासाद्यते श्रेयः शमो हि परमं पदम् ।
शमः शिवः शमः शान्तिः शमो भ्रान्तिनिवारणम्।।४७०
शमसे कल्याणकी प्राप्ति होती है, शम ही परमपद है,
ही शिय है, शम ही शान्ति है तथा शम ही भ्रान्तिकी नियति है
पुंसः प्रगमहामस्स गीतलाच्छतरात्मनः ।
शमभूपितचित्तस्य शत्रुरप्येति मित्रताम् ॥४७११
जो पुरुष शमसे तृप्त है, जिसका अन्तरामा अत्यन्त सस्
और शौतट है तथा चित्त शमसे अलङ्कृत है उसका शव
मित्र बन जाता है।
वपरिर्पकमायेन स्पेप्मिनत्यागरूपिणा।
मनाप्रशममायेण विना नालि शुमा गतिः ॥४७२]]
एकमात्र अपने पुरपार्यमे ही मिद्ध होनेवाली अभटकम
मनको शान्ति विना उनम गति नहीं हो सकती।
OGRIDERLUORO
तृतीय प्रकरण
IGRUARCreaucOGRAOOGuan.
त्यजन्नभिमतं वस्तु यस्तिष्ठति निरामयः ।
जित्तमेव मनस्तेन कुदन्त इव दन्तिना ॥४७३॥
जिस प्रकार कुत्तेको हापी जीत लेता है उसी प्रकार जो
पुरुप अपनी इच्छित वस्तुको त्यागकर निधिन्त रहता है उसीने
अपने मनको जीत लिया है।
संमहकर्तृवचनम्
खेप्सितस्य तु सन्त्यागे विचारो हेतुरीरितः ।
प्राक्तनभोगसंस्कारविक्षिप्ताशयशान्तये [৪৩৪lt
पूर्वजन्मके भोगसंस्कारोंसे विक्षिप्त हुए चित्तको शान्तिके
लिये इच्छित वस्तुओं के त्यागमें तो विचार ही हेतु बतलाया है।
ऐहिक स्वावमानायैश्चित्तं विक्रियते यदि ।
तदत्यं तच्छमायाप्तैर्विचारः कर्तुमीरितः ॥४७५॥
यदि अपने लौकिक अपमानादिसे चित्त विकृत होने लगे तो
उसकी शान्ति के लिये आप्त पुरुषोंने इस प्रकार [निम्नाङ्कित रूपसे]
विचार करना बतलाया है ।
शानाङ्कुशवाक्यम्
मन्निन्दया यदि जनः परितोपमेति
नन्वप्रयत्नजनितोऽयमनुग्रहो मे ।
श्रेयोऽथिनो हि पुरुषाः परतुष्टिहेतो.
दुखार्जितान्यपि धनानि परित्यजन्ति ॥४७६॥
मुमसर्वस्वसार OUSPoraScruncreucRUSNERISPERam यदि मेरी निन्दा करनेसे लोगोंको सन्तोष होता है तो यह बिना प्रयहके ही उनपर मेरा अनुग्रह है | कन्यागकामी पुरुष तो दूसरोंको सन्तुष्ट करनेके लिये अपना बड़े कष्टसे कमाया हुआ धन भी त्याग दिया करते हैं। आसवाक्यम् जीवन्तु मे शत्रुगणाः सदैव येपां प्रसादात्सुविचक्षणोऽहम् । यदा यदा मे विकृति भजन्ते तदा तदा मां प्रवियोधयन्ति ॥४७७|| मेरे शत्रुगण सदा ही जीवित रहें, जिनके अनुग्रहसे मैं ऐसा सावधान हो गया हूँ। वे जब-जब मेरा विकार पाते हैं तभी-तभी मुझे सचेत कर देते हैं। आत्मानं यदि निन्दन्तिस्वात्मानं स्वयमेव हि । शरीरं यदि निन्दन्ति सहायास्त जना मम ॥४७॥ वे यदि मेरे आत्माको निन्दा करते हैं तो वे स्वयं अपने ही आत्माको निन्दा करते हैं और यदि शरीरको निन्दा करते हैं तो वे लोग मेरे सहायक हैं [क्योंकि इसकी निन्दा तो मैं भी करता हूँ] संग्रहकर्तृवचनम् विचाराख्यो हि चिचस्य शमोपायः प्रदर्शितः । योगिवाक्यैश्च योगोऽपि हृच्छमायाधुनोच्यते ॥४७९।। इस प्रकार चित्तकी शान्तिका विचार नामक उपाय तो दिखला
तृतीय प्रकरण
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दिया । अब योगीके वाक्यानुसार चित्त-शान्तिके लिये योगका भी
वर्णन किया जाता है।
हठप्रदीपिकाकदात्मारामवाक्यम्
हेतुद्वयं तु चित्तस्य वासना च समीरणः ।
तयोविनष्ट एकस्मिन्नुभावपि विनश्यतः ॥४८०॥
पासना और वायु-ये दोनों ही चित्त के कारण हैं। इनमेंसे
एकका नाश हो जानेपर दोनों ही नष्ट हो जाते हैं।
पवनो बध्यते येन तेनैव बध्यते मनः ।
मनश्च बध्यते येन पवनस्तेन वध्यते ॥४८॥
जो मनुष्य वायुको बाँध लेता है वही मनको भी बाँध सकता
तपा जो मनको बाँध देता है वह पवनको भी बाँध लेता है।
योगवासिष्ठे
प्राणायामदाम्यासयुक्त्या च गुरुदत्तया ।
आसनाशनयोगेन प्राणस्पन्दो निरुद्धयते ॥४८२॥
गुरकी दी हुई युक्तिसे प्राणायामके दृद्ध अभ्यासद्वारा तथा आसन
और योग्य आहारकी सहायतासे प्राणाकीचेष्टाका निरोध हो जाता है।
शिववाक्यम्
ज्ञानं कुतोमनसि जीवति देवि यावत्
प्राणोऽपिजीवति मनो म्रियते न तावत् ।
प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं प्रयाति
मोक्षं स गच्छति नरो न कश्चिदन्यः ॥४८॥
.. मुमुक्षुसर्यवसार OGreutOMICRON हे देवि ! जबतक मन जीवित है तबतक ज्ञानका उदय हो सकता है तथा जबतक प्राण जीवित है तबतक मन भी मर सकता। जिसके प्राण और मन ये दोनों लीन हो जाते हैं। पुरुषमोक्षको प्राप्त हो जाता है, अन्य कोई किसीप्रकार नहीं पा सकत संग्रहकर्तृवचनम् ज्ञानाधिकारिणो यसान्मध्यमस्य मनशमः । योगाम्यासं विना नास्ति तस्माद्योगंस साधयेत् ।।४८४= क्योंकि मध्यम ज्ञानाधिकारीके चित्तकी शान्ति योगाभ्यास बिना नहीं हो सकती इसलिये उसे योगसाधना करनी चाहिये। योगेन प्राणसंस्पन्दे क्षीणे सति शनैः शनैः । मनः प्रशमतामेति पश्चवृत्तिविरोधिनीम् ।।४८५/- योगके द्वारा प्राणस्पन्दके धीरे-धीरे शान्त हो जानेपर मन पञ्च ज्ञानेन्द्रियोंकी वृत्तिको विरोधिनी शान्तावस्थाको प्राप्त हो जाता है एवं मनाशमं कुर्यायोगेन वा विचारतः । खश्रेयसेऽथ बाह्यानां खानामप्युच्यते दमः ॥४८६॥ इस प्रकार अपने कल्याणके लिये योग अथवा विचारकी सहायतासे मनका उपशम करना चाहिये। अब बाझ इन्द्रियों के दमनका भी वर्णन किया जाता है । [ दम] मनाशमं विधायाथ पहिरिन्द्रियसंयमम् । कुर्याना स्वहितायाप्त्यै हरन्ते तानि हृद्यतः ॥४८७|| तृतीय प्रकरण OGRALIORGENIORGROUSIGNLINGTONE मनुष्यको मनकी शान्ति करके अपने कल्याणके लिये बाह्य इन्द्रियोंका दमन करना चाहिये, क्योंकि वे चित्तको आकर्पित कर लेती हैं। पाह्येन्द्रियदमे तसात्कार्यो यत्नः पृथग्बुधैः । तानि सर्वाणि संयम्येत्युक्तयांश्च यतो हरिः॥४८८॥ अतः बुद्धिमानोंको अपनी बाह्य इन्द्रियों के दमनके लिये अलग ही यत्न करना चाहिये; क्योंकि श्रीभगवान्ने भो 'उन सबका संयमकर [ युक्त चित्तसे मेरे परायण हो जाय ]' ऐसा कहा है। शब्दादिविपयेभ्यो यो बाह्येन्द्रियविनिग्रहः । स दमो भारते प्रोक्तो दमस्तुत्यादिकं तथा ॥४८९।। शब्दादि विषयोंसे जो बाह्य इन्द्रियोंका निग्रह करना है उसीको महाभारतमें दम कहा है तथा वहीं दमकी स्तुति आदि भी की है। महाभारते दमस्तेजो वर्द्धयति पठितं च दमः परम् । विपाप्मा तेजसा युक्तः पुरुषो विन्दते महत् ।।४९०॥ दम तेजकी वृद्धि करता है तथा दम ही परम अध्ययन है। [इसके द्वारा ] मनुष्य पापरहित और तेजोयुक्त हो जानेपर उस महत्पदको प्राप्तकर लेता है। अदान्तः पुरुषः क्लेशमभीक्ष्णं प्रतिपद्यते । अनांश्च यहूनन्यान्प्रसरत्यात्मदोपजान् ॥४९१॥ दमहीन पुरुष निरन्तर क्लेश पाता है तथा वह अपने दोपसे प्रकट हुए अन्य भी बहुत-से अनोंका विस्तार करता रहता है।
मुमुक्षुसर्यवसार
OGavarNIRGUNDERGENIORGRONARY.
इन्द्रियाण्येच मेध्यानि विजेतव्यानि यलतः ।
शब्दं न विन्दच्छ्रोत्रेण त्वचा स्पर्श न वेदयेत् ।।४९२॥
रूपं न चापा विद्याजिया न रसांस्तथा ।
घेयाग्यपि च सर्वाणि जयाद्धथानेन योगवित् ॥४९३॥
अतः इन प्रबल इन्द्रियोंको प्रयापूर्वक जीतना ही चाहिये ।
योगवेत्ता पुरुष ध्यानद्वारा श्रीन्द्रियसे शब्द प्रहण न करे, पचासे
स्पर्शका अनुभव न करे, चक्षुसे रूप तथा जिदासे रस महणन करे
और प्राणेन्द्रियके भी सम्पूर्ण विषयोंको सावधानतापूर्वक त्याग दे ।
अभयं सर्वभूतेभ्यः सर्वेपामभयं यतः ।
नमस्यः सर्वभूतानां दान्तो मवति युद्विमान् ।।४९४॥
जिम सम्पूर्ण प्राणियोंमे अभय प्राप्त हो जाता है और जिससे
सभी जीर निर्भय हो जाते हैं यह दमनशीठ युद्धिमान् पुरुष सभी
प्राणियों का यन्दनीय हो जाता है।
[उपरति]
संग्रहकर्तृाचनम्
दम मममियापाथोपरनिम्बधुनोच्यने ।
शान्तम्य गेनमोनित्यं मन्दादमागुदीरितान् ।।१९५।।
दमश ग्डंग करके अब पटे वडे हुए सदादि विषोंगे
दशान हुए चिनी रतिका वर्णन किया जाता है।
दान्नानामिन्द्रियाणां च पायानामपि मया ।
योपरम प्रोतापापसानिम्नु मा ॥४९६॥
तृतीय प्रकरण OGAONGrexicaGaaunchaar आचार्योने दमन किये हुए या इन्द्रियोंका जो विपयोंसे सर्वथा निवृत्त हो जाना है उसीको उपरति कहा है। तथाखिलेपणान्यासः परमोपरतिः स्मृता । स चाग्रे विस्तरेणात्र पट्प्रकारेण वक्ष्यते ॥४९७।। तपा सम्पूर्ण एपणाओंका स्याग तो परम उपरति माना गया है। आगे उसका छः प्रकारसे वर्णन किया जायगा। [विविक्षा] विलापादीन्विना या तु सर्वद्वन्द्वसहिष्णुता । विवेकनैव सा प्रोक्ता तितिक्षा ब्रह्मवादिभिः॥४९८॥ बिना किसी प्रकारका विलाप आदि किये विकसे ही सब प्रकारके इन्द्रोंको सहन करना-इसीको ब्रह्मवादियोंने तितिक्षा तितिक्षार्थ विवेकस्त्वेकादशे भिक्षुणेरितः । भागयते तितिक्षाया विधिस्तु मारते स्मृतः ॥४९९।। भागवत एकादश स्कन्ध एकभिभुने तितिक्षाके लिये विवेक- का वर्णन किया है तथा उसकी विधि महाभारतमें कही गयी है। श्रीमदागवते नायं जनो मे मुखदुःखहेतु- नं देवतारमणकालकर्म। मनः परं ५३ १९.०॥
मुमुक्षुसर्वस्वसार GUSGRRIERGREENET ये लोग मेरे सुख-दुःखके कारण नहीं हैं और न देवता, आत्मा, ग्रह, काल अथवा कर्म ही उसके कारण हैं । इसका परम कारण तो मन ही कहा जाता है, जो कि इस संसार चक्रको निरन्तर घुमा रहा है। महाभारते धर्म पुत्र निवस्त्र सुतीक्ष्णौ च हिमातपौ । क्षुत्पिपासे च वायुच जय नित्यं जितेन्द्रियः॥५०१॥ हे पुत्र ! तू जितेन्द्रिय होकर धर्मका सेवन कर, अति प्रचण्ड हिम और आतप (घाम) को भी सहन कर । तथा नित्य ही क्षुधा, पिपासा और प्राणको भी अपने अधीन कर । अतिवादास्तितिक्षेत नावमन्येत क्रोश्यमानः प्रियं घूयादाक्रुष्टः कुशलं वदेत् ।।५०२।। सब प्रकारके विवादोंको सहन करे, कभी किसीका अपमान न करे, कोई गाली दे तो स्वयं प्रिय मापण करे तथा दूसरोंसे निन्दित होनेपर भी उसके हितकी बात ही कह। अवकीर्णः मुगुप्तथ न याचा धप्रियं यदन् । मृदुः सादप्रतिको विसन्यः सादकत्यनः ।।१०३॥ विक्षिप्त-सा रहते हुए यहृत गुरूप रहे, याणीस कमी अप्रिय भाषण न करे, नम्रता धारण करे, अपने विरोधीक प्रति भी करता न करे, विवासरात्र यने तथा आमाशंमा न करे। कन्चन ।
तृतीय प्रकरण GRRIERGRIDGUSAGRONIS [श्रद्धा संग्रहकर्तृवचनम् एवं सुधीविवेकेन सर्वद्वन्द्वसहिष्णुताम् । सम्पाद्य गुरुवाक्यादौ कुर्याच्छद्धा प्रयत्नतः॥५०४॥ इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुप विवेकद्वारा सब प्रकारके द्वन्द्वोकी सहनशीलता प्राप्त कर प्रयत्नपूर्वक गुरु वाक्य आदिमें श्रद्धा करे । ब्रह्मात्मैक्यपरे शास्त्रे गुरुवाक्ये तथानिशम् । इत्थमेवेति विश्वासो यः सा श्रद्धति भण्यते ॥५०५।। ब्रह्म और आत्माको एकता बतलानेवाले शास्त्र और गुरु- वाक्योंमें 'यह ययार्यतः ऐसा ही है। इस प्रकार जो विश्वास उत्पन्न हो जाता है वही श्रद्धा कही जाती है। श्रद्धालुनैव . सम्भाव्यं वेदान्तश्रवणार्थिना । श्रद्धत्खेत्यादिवाक्यानि श्रद्धांज्ञानाय सञ्जगुः ॥५०६॥ वेदान्तश्रवणके इच्छुकको श्रद्धालु ही होना चाहिये । 'श्रद्धत्व तात श्रद्धरस्व' (अष्टा० गी०१५1८) इत्यादि वाक्योंने ज्ञानके लिये श्रद्धाका निरूपण किया है। [समाधान] ब्रह्मण्याचार्यवाक्येषु चैकाग्रयं यत्तु चेतसः । 'समाधानं हि तत्प्रोक्तं कर्त्तव्यं श्रवणेच्छुमिः ॥५०७।। ब्रह्म और आचार्यके वाक्योंमें जो चित्तकी समाधान कहा है, जो श्रवणके मुमुक्षुसपंखसार OGRAPIGMUSERNIGRGREAUCSOGRUK MUDRAMIDO शान्त इत्यादिवास्यं याश्रित्य पट्सम्पदीरिता । मोक्षेन्छाधिकृतसाद्य विशेषणतयोच्यते ॥५०८॥ इस प्रकार 'शान्तो दान्न उपरततितिक्षुः समाहितो भूत्वात्म- न्येवात्मानं पश्यति' (पृ० उ०४।४।२३) इस वाक्यका आश्रय- कर पट्सम्पत्तिका वर्णन किया गया । अब अधिकारीके विशेषण- रूपसे मोक्षेच्छा (मुमुक्षुता) का वर्णन किया जाता है । मुमुक्षुता शृङ्खलामिर्हि पद्धस्य यष्टिभिस्ताडितस्य च । राजभृत्यैर्यथोदेति मोचनेच्छा भृशं हि नुः ।।५०९॥ तथा संमृतिपाशेन बद्धस्याज्ञानवो भृशम् । प्रतीचो मोचनेच्छा या मुमुक्षा सोच्यते युधैः ॥५१०॥ राजसेवकोंद्वारा जंजीरोंसे बाँधे हुए और डण्डोंसे पीटे जाते हुए पुरुषको जिस प्रकार उनसे छूटनेकी तीव्र इच्छा उत्पन होती है, उसी प्रकार अज्ञानवश संसृतिपाशसे बंधे हुए प्रत्यगारमाको जो उससे मुक्त होनेकी इच्छा होती है उसीको बुधजन मुमुक्षा कहते हैं । ननु कोवात्मनोयन्धः कश्चमोक्षः प्रकीर्तितः । मोक्षस्य साधनं किं च मानं तेषु तथैव किम् ॥५११॥ शक्षा-आत्माका बन्धन क्या है ! उसकामोक्ष क्या कहा गया है ! तपा मोक्षका साधन क्या है और इन तीनोंमें क्या प्रमाण है !
तृतीय प्रकरण
OGREJOGROLOROGRAUNCUEINGruperLOGUIDO
शृण्वनात्मन्यहम्भावो यः स पन्धः प्रकथ्यते ।
मूलाविद्याविनाशो यः स मोक्ष इति कथ्यते ॥५१२।।
समाधान-सुनो, अनात्मामें जो अहंभाव है वही 'बन्धन' कहा
जाता है तथा जो मूल अविधाका नारा है उसीको 'मोक्ष' कहते हैं।
निरतिशयफस्पात्र प्रादुर्भावो हि यो हृदि ।
निशेपानर्थनाशय स मोक्षः सद्भिरुच्यते ॥५१३।।
हृदयमें जो निरतिशय [आनन्द ] का आविर्भाव और सब
प्रकारके अनोंका नाश हो जाना है उसीको सरपुरुषोंने मोक्ष कहा है।
मोक्षस्य साधनं साक्षाज्ञानं चैवाभयादयः ।
पारम्पर्येण गीतामु कथिता मोक्षहेतवः ॥५१४।।
भोशका साक्षात् साधन ज्ञान है तथा श्रीमद्भगवद्रीतामें मोक्षके
परम्परागत हेतु अभय आदि ही बतलाये गये हैं।
गीतासु
अमयं सच्चसंगुदिानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमय यमय स्वाघ्यायम्तप आर्जवम् ॥५१५।।
अहिंसा सत्यमझोषस्त्यागःशान्तिरपैगुनम् ।
दया भूतपलोलुत्त्वं मार्दयं हीरचापलम् ।
तेजाधमा धृतिःशीचमद्रोहो नातिमानिता ।।५१६।।
अभय, चित्तशुदि, हान और योगमें स्थिति, दान,
दम, पर, साप्पाय, तप, सरलता, अहिंसा, सय, अकोध, स्पाग,
शान्ति, गुन (पुगी न करना), प्रगियोंपर दया, टोपता-
मुमुक्षुसर्वखसार OGREOGruomarUSIGNINDGROGrenoNGun. का अभाव, मृदुता, लजा, अचपलता, तेज, क्षमा, धैर्य, शौच, अद्रोह और अधिक मानी न होना [-ये ज्ञानाधिकारीके लक्षण है। संग्रहकर्तृवचनम् प्रमाणत्वेन बन्धादी ज्ञातव्ये स्तः श्रुतिस्मृती । सगृहाम्यद्य ते मत्तः सावधानमनाः शृणु ।।५१७।। बन्ध आदिके विषयमें श्रुति एवं स्मृतियोंको ही प्रमागरूपसे जानना चाहिये अप में उनका संग्रह करता हूँ तुम मुझसे सावधानचित्त होकर सुनो। श्रुति बन्धो हि वासनापन्धो मोक्षः स्याद्वासनाक्षयः । भोगेच्छामात्रको पन्धस्तयागो मोक्ष उच्यते ॥५१८॥ यासनाका बन्धन ही अन्धन है, तथा यासनाशप ही मोक्ष है। भोगोंकी इच्चाही बन्धन है तथा उसका त्याग ही मोक्ष कहलाता है। शिवगीतासु मोक्षस्य न हि वामोम्ति न नामान्तरमेव या । अज्ञानहदयग्रन्थिनाशी मोक्ष इति स्मृतः ॥५१९॥ मोक्षका कोई निवासस्थान अथवा प्रामास्तर नहीं है। अहानरूप हदपग्रन्थिया नाश ही मोड पदाता है। संगहनतानम् यसान्मोशमुम्पादन्यन्मुखं वापि न पियतं । नसान्याना माम्यं नैव भोगेन्ना कनिन् ।।१२।।
तृतीय प्रकरण LOGROUGORIESGROUPGRUK. क्योंकि मोक्षमुखसे पृपा और कहीं भी सुख नहीं है इसलिये मुमुक्षुको कमी भोगेच्छुक नहीं होना चाहिये । मुमुक्षुः संथ वोधाय यतेत ब्राह्मणः सुधीः । अन्यथा जन्ममृत्यू नुर्नियतां न कहिंचित् ॥५२१॥ मुद्धिमान् प्राह्मण मोक्षकामी होकर सदा ज्ञानप्राप्तिका प्रयन फरे, नहीं तो मनुष्य के जन्म-मरणकी निवृत्ति कभी न हो सकेगी। तसाद्भावात्मकस्येह नित्यमोक्षमुग्वस्य या । इच्छाधिकारिणः सापि सम्भवेद्धि विशेषणम् ॥५२२।। अतः अधिकारी पुरुषको जो भावात्मक नित्यमोक्षसुमकी इप्टा हुआ करती है. यह भी उसका विशेषण ही हो सकती है। ननु भावस्वरूपस येच्छा नित्यसुखस्स थे। सा तु रागात्मकत्वेन प्रवृत्ति जनयेद्ध्वम् ।।५२३॥ सका-विन्तु मायग्रूप नित्य सुखकी जो इम्या है यह तो रागात्मिस होनेसे निभय ही प्रवृत्ति उत्पन्न कर देगी। रागात्मवर्तमानस्य गंमारः प्रत्युतापतेन् । तसातारसुग्रेच्छास्यामाधिकारिविशेषणम् ॥५२४॥ तपा रागसे प्रवृत्त होनेयाले पुरुषको निधय ही संमारफी प्राप्ति हो जायगी। अतः इस प्रकारयी मुका अधिकारीमा विशेषण नदी हो सकती। नमावथ मुग्गंतसात्किन्तु दुपाल्पयो हितत् । लोके रोगादिपसाभारे हि गुगतोयते ।।१२५।।
मुमुक्षुसर्वस्वसार CCOUGGINISRUGGROUGUAGRUARGONION अतः सुख मी भावरूप नहीं है किन्तु दुःखको निवृतिरूप हो है, क्योंकि लोको रोगादि दुःखका अभाव हो जानेपर ही मुरा कहा जाता है। स्वस्वरूपं सुखं तचेनावेद्यं नृभिरर्थ्यते । वेद्यत्वे कर्मकर्तृत्वदोपो ोकस्य चापतेत् । उसादुःखस्स ध्वंस सान्मोक्षो न भावरूपकः॥५२६॥ यदि सुस अपना खरूप ही होता तो यह ओध होकर मनुष्योंसे प्रार्थित नहीं हो सकता था | और यदि उस अवस्थामें भी उसे वेद्य माना जाय तो एकहीमें कर्म और कर्ता होनेना दोष आ पड़ेगा। अतः दुःसका अन्त होना ही मोक्ष है, यह भावरूप नहीं है। मैवं सुग्वं च दुम्वं च भावस्पं गजास्यरत् । यतोऽनुभूयते लोके मुखस्यामावता कुतः ॥५२७।। समाधान-ऐसा मत कहो, मुग और दुम तो हापी और घोडेके समान भावरूप ही हैं, क्योंकि मुग तो लोकमें प्रपत्र अनुभव किया जाता है, अतः वह अमायरूप कैसे हो सकता है। नदतत्प्रेग इत्यादिश्रुतिमिर्मापतोदिता । नयात्मनस्तुकामायन्युक्ता मुषम्य मावता ।।५२८१ 'तदेतद् प्रेयः पुत्रायो विनायोऽयमात्' (पृ. उ०१॥ ४१८) स्यादिश्रुतियों में दम मावारपना प्रकट होता है। हा १.[पर जो भी अन्दरतम माग पुणे धनमै प्रिय दिया और मदमे मीत।
तृतीय प्रकरण GOLICROGROLUONGRESERVERGINGREASOGreap. 'आरमनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति' (पृ० उ०२ । ४ । ५) इत्यादि श्रुतियोंने भी सुखकी भावरूपता ही बतलायी है । तदेवं सुखयोः सिद्धा लौकिकवैदिकाख्ययोः । भावता लोकवेदाम्यामैकार्थ्याल्लोकवेदयोः ॥५२९॥ इस प्रकार लौकिक और वैदिक नामके सुखोंकी लोक तथा वेद दोनोंहीसे भावरूपता सिद्ध होती है। क्योंकि लोक और वेद एक ही प्रयोजनके लिये है। यदुक्तं भावरूपत्वे मोक्षे रागात्प्रवृत्तितः । मोक्षःसंसार एव सात्वत्पक्षेऽप्यस्ति तत्समम् ॥५३०॥ और तुमने जो कहा कि मोक्षके भावरूप होनेसे उसमें राग- पूर्वक प्रवृत्ति होनेके कारण वह संसाररूप ही सिद्ध होगा, सो यह दोष तो तुम्हारे पक्षमें भी [अर्थात् मोक्षको अभावरूप माननेपर भी ] ऐसा ही है। संसृतिदुःखविद्वेषाद्दुखवंसाख्यमोक्षके । प्रवृत्तेः संसृतित्वं ते मोक्षस्य न कुतो भवेत् ॥५३१॥ संसाररूप दुःखके विद्वेषसे दुःखनाशरूप मोक्षमें प्रवृत्ति होनेके कारण तुम्हारा अभावरूप मोक्ष भी संसाररूप क्यों न होगा: यत्तूक्तमपुमर्थत्वमवेद्यत्वे दि कर्तृतकस्य वेद्यत्वे नेह दोपद्वयं हि तत् ॥५३२॥ १. अपने ही लिये पति प्रिय होता है। कर्मता।
OGROUPER , मुमुक्षुसर्यवसार और यह जो कहा कि अवैध होनेपर यह अपुरुषार्यरू होगा तया वैद्य होनेपर उसमें एक ही वस्तुमें कर्मत्व और कर्तृत होनेका दोप आ जायगा, सो यहाँ ये दोनों दोष भी नहीं आ सकते सुखस्य स्वस्वरूपत्वाद्वेद्यता तत्र नेप्यते । जड एवेन्यते सा हि न तु ज्ञानसुखात्मके ||५३३॥ सुख अपना स्वरूप ही है, इसलिये उसमें वेधता नहीं हो सकती । वह तो जड पदार्थमें ही हुआ करती है-चिदानन्दरूप [ आत्मा ] में नहीं। दृश्यते त्विति तुश्रुत्या वृत्तिव्याप्यत्वमात्मनः । उच्यते नैव वेद्यत्वं यत इत्यादिवाक्यतः ॥५३४॥ 'दृश्यते त्वप्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः' (क० उ० १ । ३ । १२) इस श्रुतिसे आत्माका वृत्तिव्याप्यत्व ही कहा जाता है । 'यतो वाचो निवर्तन्ते' (तै० उ० २।४।१) इत्यादि वाक्यके कारण उसका वेद्यत्व नहीं कहा जा सकता। तदेवं लोकवेदाम्यां सुखस्य भावतेरिता । ताम्यां तुष्टिर्न चेत्तर्हि युक्ति चापीह मे भृणु ॥५३५।। इस प्रकार लोक और वेदसे सुखकी भावरूपता ही प्रतिपादन की गयी है । यदि इनसे भी तुम्हें सन्तोप नहीं है तो इस विषयने मेरी युक्ति भी सुनो। १. यह आत्मा तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषोंको अप्रभागके समान तीन और सूक्ष्म बुद्धिद्वारा ही दिखायी देता है । २. जहाँसे याणी लौट आती है।
Greus तृतीय प्रकरण OGROLEDGNISRGRIDGENIOR सुखं दुःखस्य नैवास्त्यभावस्तदनिरूपणात् । यथा घटस्तथा चेदं तसाद्धि तत्तथा भवेत् ॥५३॥ सुख दुःखका अभावमात्र नहीं है, क्योंकि ऐसा कहीं कहा नहीं गया । जिस प्रकार घट [ भावरूप ] है वैसे ही यह भी है। अतः यह उसीके समान है। विवादास्पद आनन्दो भावो भवितुमर्हति । प्रतियोग्यनिरूप्यत्वाद्यथा घटस्तथा ह्ययम् ॥५३७॥ विवादका विषयभूत आनन्द भावरूप ही होना चाहिये, क्योंकि उसका किसी प्रतियोगीद्वारा निरूपण नहीं किया जा सकता; अतः जैसा घट है वैसा ही यह ( सुख ) भी है । एवं दुःखात्ययो मोक्ष इत्यक्षपादसम्मतम् । लोकागमानुमानैःप्रादिङ्मात्रेणेह पितम् ।।५३८॥ इस प्रकार यहाँतक पो होमें 'दुःखका अन्त होना ही मोक्ष है' यह गौतमजीका विचार लोक, शान और अनुमानद्वारा सदोष सिद्ध कर दिया गया । •जिस वस्तुका अभाव होता है वह अपने अभावकी प्रतियोगी कही जाती है। जैसे घटाभावका प्रतियोगी घट है। किन्तु घटका ऐसा कोई प्रतियोगी नहीं बतलाया जा सकता, जिसके अभावका उल्लेख करके घटका निर्देश किया जा सके। इसी प्रकार सुखका भी कोई प्रतियोगी नहीं है। यदि सुखको अमावरूप मानें तो यह बतलाना चाहिये कि वह किसका अभाव है। और ऐसी कोई वस्तु वतलायी नहीं जा सकती। इसलिये यह भावरूप ही है।
मुमुक्षुसर्वस्वसार OCRUIDcroLisURI इत्थं भट्टायभिप्रेतमोक्षेपु दूषणं सुधीः । ज्ञात्वा तांश्व परित्यज्य वाञ्छेत्स्वात्मसुखं शिवम् ।।५३९।। इसी प्रकार भट्ट आदिके माने हुए मोक्षमें दोष जानकर मतिमान् पुरुप उसे त्यागकर मङ्गटमय आत्मानन्दकी इच्छा करे । तसाझावात्मकस्येच्छा नित्यमोक्षसुखस्य था । साप्येवं सम्भवेदेव ह्यधिकारिविशेषणम् ॥५४०॥ अतः उस भावरूप नित्यमोक्षसुखकी जो इच्छा है, चह भी अधिकारीका विशेपण ही हो सकती है। अतो मोक्षाय सम्पाद्या दैवी सम्पन्मुमुक्षुणा । पारम्पर्येण हेतुत्वं मुक्तस्तस्याः पुरोदितम् ।।५४१।। अतः मोक्षकामीको मोक्षप्राप्तिके लिये दैवी सम्पत्तिका उपार्जन करना चाहिये । उसे पहले हम परम्परासे मोक्षप्राप्तिका कारण बतला ही चुके हैं। ये महाव्रतवन्तो वै दैवसम्पत्समन्विताः । आसुर्या सम्पदा हीनास्ते नरा मोक्षमागिनः ॥५४२।। जो लोग महान् प्रत और दैवी सम्पतिसे सम्पन्न तथा आसुरी सम्पत्तिसे रहित हैं वे ही मोक्षके भागी होते हैं। नित्यभावसुखादन्यत्सुखं दुःखान्वितं यतः । तसाद्भोगसुखं त्यक्त्वा मोक्षेच्छामाश्रयेद्धः ।।५४३॥ क्योंकि नित्यमावरूप सुखसे अन्य सुख दुःखमय है, इसलिये मुद्धिमान् पुरुष मोगजनित मुखको त्यागकर मोक्षेच्छाका आश्नय छ ।
हतीय प्रकरण
CRELIGIOGRUGREncredicGrLIDER
DEUO.
एवं रामप्रसादेन प्रकरणं तृतीयकम् ।
समाप्तं साधनानां वै चतुणां सुनिरूपकम् ।।५४४॥
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे साधनचतुष्टयका निरूपण
करनेवाला यह तीसरा प्रकरण समाप्त हुआ।
इति श्रीमुमुक्षुसर्वखसारामिधे प्रन्ये साधनचतुष्टयनिरूपणाख्यं
तृतीयं प्रकरणम् ।
चतुर्थ प्रकरण न्यासनिरूपण पार्मिः मापन'का पम्स गानामिनाया । पनि शिरिष न्यानं तं वन्द गुनन्दनम् ॥ १॥ बिना ज्ञान प्रात करनी टागे मानवपनपन सुधरन या और आन्तरिक दोनों प्रकाश संन्यान करते हैं उन धरघुनन्दनी में वन्दना करता है। अपमन्यामिनाघमालयान्यायाधिकारिणाम् । पदन्ति यानि वास्यानि मंग्रहीयेय तान्यहम् ॥२॥ अब मैं उन वाक्योंका संग्रह करता हूँ जो संन्यासियोंके और संन्यासके अधिकारियोंके धोश निरूपण करते हैं। चतुःसाधनसम्पमः स्वगृहामा परिग्रजेन् । प्रत्यरज्ञानाय जिजामुद्विांच चिचशान्तये ॥३॥ साधनचतुष्टयसम्पन होकर जिज्ञासु पुरुष आत्मज्ञानके लिये और ज्ञानी पुरुष चित्तशान्तिके लिये अपने घरको छोड़कर परिव्राजक हो जाय ।
चतुर्थ प्रकरण २०१ GREE त्याग एव हि सर्वेषां मोक्षसाधनमुत्तमम् । इति श्रुतिर्यतः प्राह न्यासं ज्ञानाय कर्मणाम् ॥ ४॥ क्योंकि 'त्याग ही सबके लिये मोक्षका उत्तम साधन है' यह श्रुति ज्ञानप्राप्तिके लिये कोक त्यागका प्रतिपादन करती है । त्यज धर्ममधर्म चेत्याह न्यासं तथा श्रुतिः । न्यासो ब्रह्मेति चाप्याह तैत्तिरीयश्रुतिस्तथा ॥ ५॥ इसके सिवा एक दूसरी श्रुति 'धर्मको छोड़ और अधर्मको भी छोड़' ऐसा बतलाती है तया तैत्तिरीय-श्रुतिने 'न्यास ही ब्रह्म है' ऐसा भी कहा है। स संन्यासो द्विधा ज्ञेयो लिङ्गालिङ्गविभागतः । तयोश्च लिङ्गसंन्यासो ज्ञेयः पोढा पुनर्बुधैः ॥ ६॥ लिग और अलिङ्गके भेदसे उस संन्यासको दो प्रकारका जानना चाहिये । उनमेंसे लिङ्गसंन्यासको बुधजन फिर छः प्रकारका जानें। कुटीचको यहूदश्च हंसः परमहंसकः । तुर्यातीतोऽवधूतश्च पडते भिक्षवः स्फुटम् ॥ ७॥ नारदीयपरिव्राजुपनिषद्येवमीरिताः तेषां धर्मास्तथा तवान्यत्रापि च प्रकीर्तिताः ॥८॥ नारदपरिवाजकोपनिपने कुटीचक, वहूदक, हंस, परमहंस, सुर्यातीत और अवधूत-ये छः भिक्षु बतलाये हैं । तपा यहाँ और अन्य उपनिषदोंमें भी उनके धोका निरूपण किया है।
२०२ मुमुक्षुमयंमसार PRASOCaucasionaruK पदमु परमहंसो यचतुर्थः समुदीरितः । जिनामुर्गानांथेति विनेयो द्विविधो हि सः॥९॥ इन पदोंमें परमहंस नामक जो चौथा मिभु बतलाया है उसे जिज्ञासु और ज्ञानयान्-भेदसे दो प्रकारका जानना चाहिये । अधिकारविचार प्रत्यग्योधाय जिज्ञासोास आरण्यके श्रुतः । एतं वै लोकमिच्छन्तोन्यासिनः प्रव्रजन्ति हि ॥१०॥ 'इस आत्मलोककी इच्छा करनेवाले संन्यासीलोग [ धर छोड़कर] दूर चले जाते हैं। इस प्रकार आरण्यकमें आत्मज्ञानके लिये जिज्ञासुको संन्यास करना कहा है। जीवन्मुक्तस्तु संसिद्धी विद्वत्संन्यास ईरितः । एतद्ध स्मेति वाक्येन स्फुटं वाजसनेयिमिः ॥११॥ तया 'एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वासः प्रजा न कामयन्ते' (पृ० उ०४।४ । २२) इत्यादि वाक्यसे वाजसनेयी शाखावाोंने जीवन्मुक्तिकी सम्यक् सिद्धिके लिये स्पष्ट ही विद्वत्संन्यासका प्रतिपादन किया है। किं प्रजया करिष्यामोऽतिदुःखहेतुभूतया । अयमात्मा परानन्दः सदासाभिर्हि वीक्ष्यते ॥१२॥ [ उनका कहना है कि ] अत्यन्त दुःखकी हेतुभूत सन्तान- से हमें क्या लेना है ! हमें तो यह परमानन्दरूप आत्मा सदा ही उपलब्ध होता रहता है। १. इस आत्माको जाननेपाले पूर्वतन विद्वान् प्रजाकी इच्छा नहीं करते।
चतुर्थ प्रकरण २०३ OGRRIEDO AGRONUNGraicRGRIDGRAHA त्र्येकदण्डकपायाणि न्यासलिङ्गानि यानि वै । तेषु त्वधिकृतिम्प्राहुः विप्रस्य श्रुतयः स्फुटम् ॥ १३ ॥ निर्वदं ब्राह्मणो ह्यायात्प्रवजेब्राह्मणो गृहात् । व्युत्थाय ब्राह्मणा भिक्षाचर्यमित्यादिकाः किल ॥१४॥ त्रिदण्ड, एकदण्ड तथा कपायवन-ये जो संन्यासके चिह्न बतलाये गये हैं उनमें 'ब्राह्मण निर्वेदको प्राप्त हो जाय' 'ब्राह्मण घरसे दूर चला जाय' तथा 'बामणलोग गृहस्थाश्रमसे निकलकर मिक्षावृत्ति करते हैं। इत्यादि श्रुतियोंने स्पष्ट ही ब्राह्मणका अधिकार बतलाया है। क्षत्रियादित्रयाणां तु नास्ति लिङ्गाधिकारिता । स्मृतयश्च तथा प्राहुलिङ्गे विप्राधिकारिताम् ॥१५॥ किन्तु क्षत्रिय आदि तीन वर्षोंका संन्यासके चिझधारण करनेमें अधिकार नहीं है । इसके सिवा स्मृतियोंने मी लिङ्ग धारण करने में प्राह्मणके अधिकारका प्रतिपादन किया है। अविस्मृती कपायं ब्राह्मणस्योक्तं नान्यवर्णस कस्यचित् । मोक्षाश्रमे सदा प्रोक्तं धातुरक्तं तु योगिनाम् ।। १६ ।। संन्यासाश्रममें फसाय वस्त्र तो केवल ब्राह्मणके लिये ही बतलाये हैं, और किसी वर्णके लिये नहीं। अन्य योगियोंके लिये तो धातु (हरताट आदि) से रंगे हुए वस्त्र बतलाये हैं।
२०२ OREOGRAP मुमुसुमयंम्बसार OGRUARLASH पटन परमहंसो यचतुर्थः समुदीरितः । जिज्ञामु नयाँधेति विनेयो द्विविधो हि सः॥९॥ इन छहोंमें परमहंस नामक जो चौथा भिक्षु बतलाया है उसे जिज्ञासु और ज्ञानवान्-मेदसे दो प्रकारका जानना चाहिये । अधिकारविचार प्रत्यग्रोधाय जिज्ञासोास आरण्यके श्रुतः । एतं वै लोकमिच्छन्तोन्यासिनःप्रव्रजन्ति हि ॥१०॥ 'इस आत्मलोककी इच्छा करनेवाले संन्यासीलोग [ घर छोड़कर] दूर चले जाते हैं। इस प्रकार आरण्यको आत्मज्ञानके लिये जिज्ञासुको संन्यास करना कहा है। जीवन्मुक्तस्तु संसिद्धौ विद्वत्संन्यास ईरितः । एतद्ध स्मेति वाक्येन स्फुटं वाजसनेयिमिः ॥११॥ तथा 'एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वासः प्रजा न कामयन्ते" (वृ० उ०४ । ४ । २२) इत्यादि वाक्यसे वाजसनेयी शाखावालोंने जीवन्मुक्तिकी सम्यक् सिद्धिके लिये स्पष्ट ही विद्वत्संन्यासका प्रतिपादन किया है। किं प्रजया करिष्यामोऽतिदुःखहेतुभूतया । अयमात्मा परानन्दः सदासाभिर्हि वीक्ष्यते ॥१२॥ [ उनका कहना है कि ] अत्यन्त दुःखकी हेतुभूत सन्तान से हमें क्या लेना है ! हमें तो यह परमानन्दरूप आत्मा सदा ही उपलब्ध होता रहता है। १. इस आत्माको जाननेवाले पूर्वतन विद्वान् प्रजाकीरछा नहीं करते।
चतुर्थ प्रकरण २०३ GENE त्र्येकदण्डकपायाणि न्यासलिङ्गानि यानि वै । तेपु त्यधिकृतिम्प्राहुः विप्रस्य श्रुतयः स्फुटम् ॥ १३॥ निवेदं ब्राह्मणो ह्यायात्प्रव्रजेब्राह्मणो गृहात् । व्युत्थाय ब्राह्मणा भिक्षाचर्यमित्यादिकाः किल ॥१४॥ त्रिदण्ड, एकदण्ड तथा कपायवस्त्र-ये जो संन्यासके चिह्न बतलाये गये हैं उनमें 'ब्राह्मण निर्वेदको प्राप्त हो जाय' 'नाह्मण घरसे दूर चला जाय तश 'ब्राह्मणलोग गृहस्थाश्रमसे निकलकर मिक्षावृत्ति करते हैं। इत्यादि श्रुतियोंने स्पष्ट हो ब्राह्मणका अधिकार बतलाया है। क्षत्रियादित्रयाणां तु नास्ति लिङ्गाधिकारिता। स्मृतयश्च तथा प्राहुलिङ्गे विप्राधिकारिताम् ॥१५॥ किन्तु क्षत्रिय आदि तीन वर्णोका संन्यासके चिह धारण करनेमें अधिकार नहीं है । इसके सिवा स्मृतियोंने भी लिङ्ग धारण करनेमें ब्राह्मणके अधिकारका प्रतिपादन किया है । अविस्मृती फपायं ब्राह्मणस्योक्तं नान्यवर्णस्य कस्यचित् । मोक्षाश्रमे सदा प्रोक्तं धातुरक्तं तु योगिनाम् ॥१६॥ संन्यासाश्रममें कपाय यख तो केवल ब्राह्मणके लिये ही बतलाये हैं, और किसी वर्णके लिये नहीं। अन्य योगियों के लिये सो घात (हरताल आदि) से रंगे हुए पख बतलाये हैं।
। २०४ मुमुमुसर्यवसार OGRAORRIOGROUDENEOUSPERMERGReus विष्णुस्मृती मुखजानामयं धर्मो वैष्णवं लिङ्गधारणम् । बाहुजातोरुजातानां नायं धर्मो विधीयते ।। १७ ॥ वैष्णव-चिोंको धारण करना-यह तो ब्राह्मणोंका ही धर्म है । क्षत्रिय और वैश्योंके लिये इस धर्मका विधान नहीं है। याज्ञवल्क्यस्मृती चत्वारोब्राह्मणस्योक्ताःस्वाश्रमा श्रुतिचोदिताः। क्षत्रियस्य त्रयः प्रोक्ता द्वावेको वैदयशूद्रयोः ॥१८॥ ब्राह्मणों के लिये श्रुतिविहित अपने चारों आश्रम बतलाये हैं। क्षत्रियके लिये तीन आश्रमोंका विधान है तथा वैश्य और शूद्रके लिये क्रमशः दो और एक आश्रम ही बतलाये गये हैं। संग्रहकर्तृवचनम् एवं लिङ्गाधिकार्युक्तोलिङ्गस्याप्यधुनोच्यते । क्षत्रियवैश्यशूद्राद्यास्त्यागमात्राधिकारिणः ॥१९॥ इस प्रकार लिङ्गाधिकारीका निरूपण तो हुआ अब अलिङ्ग संन्यासके अधिकारियोंका भी वर्णन किया जाता है । क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र आदि केवल त्यागमात्रके ही अधिकारी हैं। तेपां पुण्यविपाकेन भवेद्विविदिपा यदि । जन्मापादककर्मादेस्त्यागः कार्योऽपि तैस्तदा ॥२०॥ यदि पुण्यकर्मविपाकसे उन्हें जिज्ञासा उत्पन्न हो जाय तो उन्हें मी जन्मकी प्राप्ति करानेयाले कर्म आदिका त्याग कर देना चाहिये।
चतुर्थ प्रकरण
OFruuNGRUNGroud
त्यागमात्रात्मकोन्यासःशूद्रस्यापि समीरितः ।
प्रवज्योपनिपच्नृत्या क्षत्रियादेस्तदा किमु ॥२१॥
संन्याससम्बन्धी उपनिषदकी श्रुतिसे त्यागमात्रका संन्यास तो
शके लिये भी कहा है; फिर क्षत्रिय आदिकी तो बात ही क्या है।
श्रुतिः
घेराग्यमासाथ तु पापयोनिः
शूद्रोऽपि संन्यासमुपेत्य मोक्षम् ।
प्रामोति पापं तु विध्य विप्रः
संन्यासमेत्य ननु मुच्यते थे ।। २२ ।।
वैराग्य प्राप्त होनेपर तो पापजन्मा गद भी संन्यास करके
पार्पोसे घटकर मोक्ष प्राप्त कर देता है; तथा द्विज तो संन्यास
करनेसे मुक्त हो ही जाता है।
संग्रहकर्तृवचनम्
पतुर्णामपि वर्णानां शान्त्यादिगुणधारिणाम् ।
त्यागमात्रात्मकं न्यामं स्फुटमाइ स्मृतिस्तथा ॥ २३ ॥
समादि गुगोंको धारण करनेवाले चारों ही यकि लिये
स्मृतिने भी रपएतया पागमार संन्यास विधान किया है।
स्मृतिः
भक्षपर्य ततः प्राहुनतस्तदर्मचारिणः ।
तथा पेम्पस राजेन्द्र राजपुषस पर हि॥२४॥
मुमुक्षुसर्यवसार
ORGROUPORUARCHURRICORUSH
है राजेन्द्र ! तपथात् भगवदोका आचरण करनेवाले वैश्य
और क्षत्रियके लिये भी भिक्षावृत्ति बतलायी है।
संग्रहकर्तृवचनम्
त्यागमात्रात्मक न्यासऽधिकारं शूद्रकत्रियो।
भाष्यकारोऽप्यभिप्रेतीति वात्तिककृदुक्तवान् ॥ २५॥
'त्यागमात्र संन्यासमें मृद्र और स्त्रियोंका भी अधिकार
है-ऐसा भाष्यकारका भी मत है' यह बात वार्तिककार
(श्रीसुरेश्वराचार्यजी) ने कही है।
पातिककवाक्यम्
विद्याङ्गतकलात्मानं गार्गीविदुरयोरपि ।
स्त्रीशूद्रयोर्भाष्यकारः संन्यासमनुमन्यते ॥२६॥
भाष्यकार तो गार्गी और विदुर-इन स्त्री और शूद्रोंके
ज्ञान और उसके फलरूप संन्यासका भी अनुमोदन करते हैं।
संग्रहकर्तृवचनम्
ननु लिङ्गं विनान्यासो न न्यास इति चेदसत् ।
तेन विनापि यसाढे न्यासो भाष्यकृतेरितः ॥२७॥
यदि कहो कि लिङ्गधारणके बिना किया हुआ संन्यास संन्यास
ही नहीं है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योकि भाष्यकारने
उनके बिना भी संन्यासका प्रतिपादन किया है।
भाष्यद्राक्यम्
हठाम्यासो हि संन्यासो नैव कापायवाससा ।
नाई देहोऽहमात्मेति निथयो न्यासलक्षणम् ॥ २८॥
चतुर्थ प्रकरण २०७ RaiSGDIOGRUSIGN GREJO संन्यास तो दृढ़तापूर्वक अभ्यास करना ही है, वह काषाय वस्त्रोंसे नहीं होता। 'मैं देह नहीं हूँ आत्मा हूँ ऐसा निश्चय ही संन्यासका लक्षण है। संग्रहकर्तृवचनम् एपणात्रयसंन्यासस्तुल्यो हि लिङ्गयलिङ्गिनोः। स एव मोक्षहेतुश्च त्यागेनैक इति श्रुतेः ॥२९॥ सलिङ्ग और अलिङ्ग दोनों ही प्रकारके संन्यासियोंके लिये तीनों प्रकारकी एषणाओंका त्याग तो समान ही है; तथा 'त्यागेनके अमृतत्वमानशुः' (कै० उ०२ ) इत्यादि श्रुतिके अनुसार वही मोक्षका हेतु भी है। स्वदेहस्योपयोगाय लोकोपकृतये तथा । दण्डादीन ब्राह्मणस्यैवमुक्तवती श्रुतिःस्वयम् ।। ३०॥ इस प्रकार अपने देहके उपयोग और लोकहितके लिये स्वयं श्रुतिने ब्राह्मणके ही लिये दण्ड आदिकी व्यवस्था दी है । मनुस्मृती अलिङ्गी लिङ्गिवेषेण यो वृत्तिमुपजीवति । स लिगिनां हरत्येनस्तिर्यग्योनौ च जायते ॥३१॥ जो लिङ्गधारणका अनधिकारी होकर भी लिङ्गाधिकारियोंका वेप धारणकर उनकी वृत्तिसे जीविका चलाता है वह लिङ्गपारियों के सम्पूर्ण पापोंको हर लेता है और तिर्यग्यौनिमें जन्म पाता है। १. किन्हींने स्यागसे अमरत्व प्राप्त किया ।
२०८ OGRMIRames मुमुक्षुसर्यस्वसार संमहकर्तृवचनम् अलिङ्गतियोग्यानां वृत्ति लिङ्गेन कुर्वताम् । इत्यत्रवीन्मनुर्दोष कपायादिग्रधारणे ॥ ३२॥ इसप्रकार जो लोग लिङ्गधारणमें अयोग्य हैं, किन्तु लिङ्ग धारण करके ही अपना पालन-पोषण करते हैं उनके कपाय आदि धारण करनेमें मनुजीने उक्त रूपसे दोप बतलाया है। तस्माद्विप्रेतरवणयं लिङ्ग न वृत्तये । स्वमोक्षार्थ तु सन्त्यागस्तै कार्यो विदुरादिवत् ॥ ३३॥ अतः प्राह्मणके सिवा अन्य वर्णोको पेटपालनके लिये संन्यास- के चिह्न धारण नहीं करने चाहिये; बल्कि उन्हें तो विदुर आदिके समान अपने मोक्षके लिये त्याग ही करना चाहिये । एवं न्यासेऽधिकारोऽयं प्रोक्तो जातिनिवन्धनः । निरूप्यतेऽधिकारोध भूयो गुणनिबन्धनः ॥३४॥ इसप्रकार यहाँतक संन्यासके जातिसम्बन्धी अधिकारका निरूपण किया गया। अब आगे गुणसम्बन्धी अधिकारका भी प्रतिपादन किया जाता है। निष्कामत्वमकोपत्वं क्षमा सत्यं शमादयः । यसिनित्यं हि वर्तन्ते स संन्यासेऽधिकारवान् ॥ ३५ ॥ जिसमें निष्कामता, अक्रोध, क्षमा, सत्य और शम आदि गुण सर्वदा वर्तमान रहते हैं वह पुरुष संन्यासका अधिकारी है ।
चतुर्थ प्रकरण २०९ GrationGRALI0. OGRAMOGRAISA लिङ्गैः सह कृते न्यासे लिङ्गेन रहिते तथा । विविदिपाहये तसिन्धिद्वन्यासे तथैव च ॥३६॥ ऋते कामादिसन्त्यागानाधिकारोस्ति कस्यचित् । कामादीन्हि ततस्त्यक्त्वा संन्यस्येत्कुशलोनरः॥३७॥ सलिङ्ग न्यास अथवा अलिङ्ग न्यासमें तथा विविदिपासंन्यास किंवा विद्वत्संन्यासमें किसी मी पुरुषका कामादिका त्याग किये बिना अधिकार नहीं हो सकता; अतः मतिमान् पुरुपको काम आदिका त्याग करके ही संन्यास करना चाहिये । इत्युक्तं वेदसारज्ञैर्वृहस्पत्यादिभिः स्फुटम् । तत्स्मृतीश्च लिखाम्यद्य न्यासाधिकृतियोधिकाः॥३८॥ ऐसा वेदके मर्मको जाननेवाले वृहस्पति आदिने स्पष्ट ही कहा है। अब मैं संन्यासके अधिकारका निरूपण करनेवाली उनकी स्मृतियोंका उल्लेख करता हूँ। वृहस्पतिस्मृती यस्मिन्कामाः प्रविशन्ति विपयेभ्योऽपसंहृताः । विषयान पुनर्यान्ति स कैवल्याश्रमे वसेत् ।। ३९ ।। जिसमें सम्पूर्ण विषयोंसे उपसंहृत हुई कामनाएँ लीन हो जाती हैं और वे पुनः विषयोंकी ओर नहीं जाती उसे ही संन्यासाश्रममें निवास करना चाहिये। यस्मिन्क्रोधः शमंयाति विफलः सम्यगुत्थितः । आकाशेसियथाक्षिप्तः स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥ ४०॥ १४
२१०
मुमुक्षुसर्वखसार
OGNIOGRRIDGEORGRIDO
आकाशमें घुमायी हुई तलवारके समान जिसके प्रति बड़े
जोरसे हुआ क्रोध भी फलहीन रहकर शान्त हो जाता है उसे
ही संन्यासाश्रममें निवास करना चाहिये ।
अतीतान्न सरेनोगान्न तथानागतानपि ।
प्राप्तांश्च नाभिनन्देद्यः स कैवल्याश्रमे यसेत् ।। ४१॥
जो बीते हुए तथा आगे आनेवाले भोगोंको स्मरण नहीं करता
तपा प्राप्त हुओंका भी आदर नहीं करता उसे ही संन्यासा.
श्रममें निवास करना चाहिये ।
श्रद्धा ध्यानं तपःशौचं यस्य वित्तं चतुष्टयम् ।
रमणं चाद्वितीयस्य स कैवल्याश्रमे यसेत् ॥ ४२ ॥
श्रद्धा, ध्यान, तप और शौच-ये चारों ही जिसके धन
हैं तथा जो अकेला ही क्रीडा करता है उसे ही संन्यासाश्रममें
निवास करना चाहिये।
अन्वस्थानीन्द्रियाण्यन्वर्वहिष्टान्विषयान् पहिः ।
शक्नोति यःसदा फर्नुस कैवल्याश्रमे परीन् ।। ४३ ॥
जो आन्तरिक इन्द्रियोंको अन्तर्मुम और याद्य विषयोंको बाहर
रवनमें सर्वदा समर्प है उसीको संन्यासाश्रममें नियास करना चाहिये।
महामारते
पसिन्वापः प्रविशन्ति पूपे प्रस्ता दिपाय ।
न वकार पुनन्ति म कैवरयानमे यमेन ॥४४॥
चतुर्थ प्रकरण २११ [ हाथी पकड़नेके लिये खोदे हुए ] कुएँमें मयभीत होकर गिरे हुए हाथीके समान जिसमें वाणी प्रवेश कर जाती है और फिर वक्ताके प्रति लौटकर नहीं आती [अर्थात् जिसको कितना ही भला-बुरा कहा जाय, किन्तु जो स्वयं कुछ भी उत्तर नहीं देता] उसीको संन्यासाश्रममें निवास करना चाहिये । यसिन् शान्तिः शमः शौचं सत्यं सन्तोप आर्जवम् । अकिञ्चनमदम्भश्च स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥ ४५ ॥ जिसमें क्षमा, शम, शौच, सत्य, सन्तोप, आर्जव, अकिञ्चनता और अदम्भ आदि गुण वर्तमान रहते हैं उसे ही संन्यासाश्रममें नियास करना चाहिये। चसिष्ठस्मृती प्राणे गते यथा देहः सुखं दुःखं न विन्दति । तथा चेत्प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥ ४६॥ जिस प्रकार प्राणके चले जानेपर शरीर सुख-दुःखका अनुभव नहीं करता उसी प्रकार यदि किसीका शरीर प्राणयुक्त रहनेपर भी न करे तो उसे ही संन्यासाश्रममें निवास करना चाहिये। व्यासस्मृती ब्रह्मचारी गृहस्सो वा वानप्रस्थोऽथवा पुनः । विरक्तः सर्वकामेभ्यः पारिवाज्यं समाश्रयेत् ॥४७॥ जो ब्रह्मचारी, गृहस्थ अपवा वानप्रस्थ सम्पूर्ण कामनाओंसे विरक्त हो उसे ही संन्यासाश्रमका आश्रय लेना चाहिये ।
२१२
GoursONGaxse
OMGOGISORUM
मुमुक्षुसर्वस्वसार
संन्यासके भिन्न-भिन्न भेदोंका निरूपण
संग्रहकर्तृवचनम्
विरागस विभागेन संन्यासस्यापि भिन्नता ।
जीवन्मुक्तिविवेक वै विद्यारण्यैः प्रदर्शिता ।। ४८॥
विद्यारण्य मुनिने अपने जीवन्मुक्तिविवेकनामक ग्रन्पमें
वैराग्यके भेदसे संन्यासका भी भेद दिखलाया है ।
जीवन्मुक्तिविवेके
संन्यासहेतुर्वराग्यं यदहविरजेचदा ।
प्रव्रजेदितिवेदोक्तस्तद्भेदस्तु
'जिस दिन वैराग्य हो उसी दिन परिवाजक हो जाय'
इस श्रुतिके अनुसार संन्यासका कारण तो वैराग्य ही है।
उसका भेद पुराणसे जानना चाहिये ।
विरक्तिर्द्विविधा प्रोक्ता तीचा तीव्रतरेति च ।
सत्यामेव तु तीयायां न्यसेद्योगी कुटीचके ।। ५०
शक्तो पहूदके तीव्रतरायां हंससंज्ञिते ।
परमहंसे साक्षाद्विज्ञानसाधने ॥५१॥
तीन और तीनतर-भेदसे वैराग्य दो प्रकारका बतलाया है ।
यदि तीब वैराग्य हो तो योगी कुटीचक संन्यास करे अथवा सामर्थ्य
होनेपर बहूदक संन्यास कर सकता है। और यदि तीव्रतर वैराग्य
हो तो उस मुमुक्षुको हंसनामक संन्यास अथवा ज्ञानका साक्षात्
साधनभूत परमहंस संन्यास करना चाहिये ।
पुराणतः॥४९॥
चतुर्थ प्रकरण
२१३
60GROUS
असिन् जन्मनि मा भूवन्पुत्रदारादयो मम ।
इति या सुस्थिरा बुद्धिः सा वैराग्यस्य तीव्रता ॥५२॥
अब इस जन्ममें मेरे पुत्र एवं स्त्रियाँ आदि न हों ऐसी जो
अत्यन्त स्थिर बुद्धि है वही वैराग्यकी तीव्रता है।
पुनरावृत्तिसहितो लोको मे मास्तु कथन ।
इति तीव्रतरत्यं स्यान्मन्दे न्यासो न कोऽपिहि ॥५३॥
मुझे पुनरावृत्तिकी प्राप्ति करानेवाला कोई भी लोक प्राप्त न
हो-यह वैराग्यकी तीव्रतरता है । तथा मन्द वैराग्यमें तो किसी
भी संन्यासका अधिकार नहीं है।
पुत्रदारधनादीनां नाशे तात्कालिकी मतिः
धिक्संसारमितीदृक् स्याद्विरक्तर्मन्दता हि सा ॥५४॥
पुत्र, स्त्री अपवा धन आदिका नाश होनेपर जो 'इस संसारको
धिक्कार है' ऐसी तत्कालीन बुद्धि होती है वही वैराग्यकी मन्दता है।
यात्राद्यशक्तिशक्तिभ्यां तीने न्यासद्वयं भवेत् ।
कुटीचको पहूदश्चेत्युभावतौ त्रिदण्डिनौ ॥५५॥
इस प्रकार तीव्र वैराग्य होनेपर यात्रा आदिकी शक्ति और
अशक्तिके अनुसार क्रमशः बहूदक और कुटोचक ये दो संन्यास
हो सकते हैं । ये दोनों ही त्रिदण्डी होते हैं।
द्वयं तीव्रतरे ब्रह्मलोकमोक्षविभेदतः ।
तल्लोके तत्वविद्धंसो लोकेशसिन्परहंसकः ॥५६॥
-
२१४
मुमुक्षुसर्यवसार
GROGRONORGRICORMISCENGLISGARH
तथा तीव्रतर वैराग्य होनेपर ब्रह्मलोक एवं इहलोकमें मुक्त
होनेके भेदसे हंस और परमहंस ये दो संन्यास हो सकते हैं ।
ब्रह्मलोकमें मुक्त होनेवाला तत्त्ववेत्ता हंस होता है तथा इसी लोकमें
मुक्त हो जानेवाला परमहंस कहलाता है।
संग्रहकर्तृवचनम्
पारिवाज्याभिधेयोपनिपद्यपि समीरिताः
नियमा ये हि भिक्षणां दर्शयाम्यद्य तानिह ॥ ५७॥
नारदपरिव्राजकोपनिपझें भिक्षुओंके जो नियम बतलाये
गये हैं उन्हें मैं यहाँ दिखलाता हूँ।
कुटीचकत्रिवारं वै स्नानं कुर्वीत यत्नतः ।
बहूदको द्विवारं चैकवारं तत्तु हंसकः ॥५८॥
कुटीचकको प्रयत्नपूर्वक तीन बार स्नान करना चाहिये, तथा
बहूदकको दो बार और हंसको एक बार करना चाहिये।
सानं परमहंसस मानसं ह्युदितं तथा ।
तुर्यातीतस्य तगासमवधूतस्य
परमहंसके लिये मानसिक मानका विधान है। तमा
तुर्यातीतका भान भस्मसे और अवधूतका वायुसे माना गया है ।
कुटीचकयतेः क्षौरमृतौ पहूदकस्य तत् ।
ऋतुद्वये च हंसस्य क्षौरं न च विधीयते ॥६॥
नापि तत्परहंसस्य स्याचेत्तदयने द्वयोः ।
तुर्यातीतस्य न क्षौरमवधूतस्य तन्त्र च ॥६१ ॥
वायुना ॥ ५९॥
चतुर्थ प्रकरण २१५ GreenNDGAONarasimrainraxc. कुटीचकका क्षौर एक ऋतु [ अर्थात् दो मास ] में होना चाहिये तथा बहूदकका दो ऋतुओंमें । हंसके लिये क्षीर करानेका विधान नहीं है और न परमहंसके लिये ही उसकी व्यवस्था है । और यदि है भी तो इन दोनोंके लिये एक अयन (छ: मास ) में क्षौर करानेका नियम है । तपा तुर्यातीतका तो क्षौर होता ही नहीं और न अवधूतका ही होता है । कुटीचकस्य चैकानं माधुकरी यहूदकः । हंसः परमहंसथ करपात्रायुभी श्रुतौ ॥ ६२ ।। कुटीचमके लिये एकानका और बहूदकके लिये माधुकरीका नियम है; तथा हंस और परमहंस ये दोनों करपात्री कहे गये हैं। तुर्यातीतय मिक्षायै मुखं गोवद्विदारयेत् । अधूतस्य वृत्तिस्तु वेदेनाजगरी स्मृता ॥३॥ तुर्यातीतको भिक्षाके लिये अपना मुख गौके समान खोल देना चाहिये तथा अवधूतके लिये वेदने आजगरी वृत्ति बतलायी है। कुटीचकस्य शाटयी द्वे पदस्पैकशाटिका । तस्या अर्द्ध तु हंसस्स परहंसो दिगम्बरः॥६४॥ कुटीचकको दो शाटी (चादर ) तपा वहूदकको केवल एक शाटी धारण करनी चाहिये । हंसको शाटीमा आधा टुकड़ा धारण करना उचित है और परमहंस दिगम्बर-वृत्तिसे रहे। पदा परमहंमस्स कोपीनकस्स संग्रहः । जातरूपधरत्वं तु तुर्यातीवावधूतयोः ।। ६५॥
मुमुक्षुसर्वस्वसार GRNINGdiancunariome अथवा परमहंस एक कौपीनका संग्रह कर; दिगम्बर वेष तो तुर्यातीत और अवधूतके लिये ही ठीक है । कुटीचकादितुर्याणां नान्योपदेशयोग्यता। तुर्यातीतोऽवधूतश्च कुर्यादन्योपदेशनम् ।। ६६॥ कुटीचक आदि पहले चार प्रकारके भिक्षुओंमें दूसरोंको उपदेश करनेकी योग्यता नहीं होती, तुर्यातीत और अवधूतको ही दूसरोंको उपदेश करना चाहिये। कुटीचको बहूदश्च वेदान्तानां पुनः पुनः । कुर्याद्धि श्रवणं नित्यं ब्रह्मज्ञानाभिवाञ्छया ॥ ६७॥ कुटीचक और बहूदक ये दोनों ब्रह्मज्ञानकी इच्छासे प्रतिदिन बारम्बार वेदान्तका श्रवण करें। हंसः परमहंसश्च कुर्वीत मननं मुहुः । तुर्यातीतोऽवधूतश्च निदिध्यासनमाचरेत् ॥ ६॥ हंस और परमहंसको बारम्बार मनन करना चाहिये तथा तुर्यातीत और अवधूत निदिध्यासनका आचरण करें । कुटीचकादिभिः पड्भिः कार्यमात्मानुचिन्तनम् । श्रेष्ठस्त्वेषां हि विज्ञेय उत्तरोत्तरतो यतिः ॥ ६९॥ कुटीचक आदि छहों भिक्षुओंको आत्मचिन्तन करते रहना चाहिये । इनमें सर्वदा प्रपमकी अपेक्षा उत्तरोत्तर संन्यासीको श्रेष्ठ समझना चाहिये।
चतुर्य प्रकरण .GROGREURRICROGRLANGresiden. यतिके धर्म अन्याम्पनिपत्स्वेवं यतिधर्मा य ईरिताः । सङ्घपात्तानपीहाई सङ्ग्रहे तेपु वृत्तये ।। ७० ॥ इसप्रकार अन्य उपनिषदोंमें जो यतिके धर्म बतलाये हैं उनमें प्रवृत्ति होने के लिये यहाँ संक्षेपसे उनका भी वर्णन करता हूँ। कामादीनां निरासाय कृशो नित्यं भवेद्यतिः । पत्रं च धारयेजीणं समर्थोऽपि नवं नहि ॥ ७१॥ पतिको कामादिका पराभव करनेके लिये सदा कृश-शरीर होना चाहिये, तथा सामर्थ्यवान् होनेपर भी पुराना वस्त्र पहनना चाहिये -नया नहीं। एकरात्रं वसेग्रामे नगरे पश्चरात्रकम् । वर्पाभ्योऽन्यत्र नासीतकवेत्युक्तं कठश्रुती ॥७२॥ उसे [ अधिक-से-अधिक ] प्राममें एक रात्रि और नगरमें पाँच रात्रि निवास करना चाहिये तपा वर्षाश्चतुके सिरा अन्य समयमें किसी एक स्थानपर कभी न रहना चाहिये-ऐसा पठश्रुतिमें कहा है। आसनं शयनं भूमी खट्वायां न कदाचन । कुर्यायतिरिति प्रोक्तमारुष्युपनिषद्यपि ॥७३॥ पतिको आसन और सायन सदा पृपिपर ही करना चाहिये, साटपर कभी न करना चाहिये-ऐसा आरगि-उपनिषदमें कहा है। -
२१८
मुमुक्षुसर्वस्वसार
SODERNERAL
NERGarum
तथा ।
भिक्षुश्चेद्यो हि रागेण हेम पश्यति मूढधीः ।
स ब्रह्महा भवेत्तं वै स्पृष्ट्वा च पौल्कसो भवेत् ॥ ७४ ॥
जो मूबुद्धि भिक्षु होकर रागपूर्वक सोनेकी ओर देखता है
वह मानो ब्रह्महत्यारा ही है; उसका स्पर्श करनेसे भी मनुष्य
चाण्डाल हो जाता है।
हिरण्यसंग्रही भिक्षुर्भवेदेवात्महा
आत्महा चातिपापीति प्रसिद्ध लोकवेदयोः ॥७५ ॥
सुवर्णका संग्रह करनेवाला भिक्षु तो आत्महत्यारा ही हो जाता
है तथा आत्महत्यारा महान् पापी है-यह तो लोक और वेदमें
प्रसिद्ध ही है।
तस्मादेतत्त्रयं त्याज्यं स्वस्य मोक्षाय भिक्षुणा ।
एवं परमहंसाख्योपनिपद्यपि
संश्रुतम् ॥६॥
अतः भिक्षुको अपनी मुक्तिके लिये इन तीनों बातोंका
त्याग करना चाहिये-ऐसा परमहंस नामक उपनिषद्ने भी
कहा है।
अखिलसंहिताख्यायामुपनिपधुदीरिताः
धर्मा ये चापि भिक्षणां दर्शयाम्यद्य तानिह ॥ ७७ ॥
सर्वसंहिता नामक उपनिपर्दो भी भिक्षुके जो-जो धर्म बतलाये
हैं उन सबका भी मैं यहाँ दिग्दर्शन कराता हूँ।
देवर्नािरदोऽभ्येत्य ब्रह्माणं परिपृष्टवान् ।
भगवन्यूहि भिक्षूणां मान् कृपयैव मे ॥७८॥
चतुर्थ प्रकरण २१९ TRENIOSGAM +GRI OGRESIDERNIERGANGA एक बार देवर्षि नारदने ब्रह्माजीके पास आकर उनसे पूछा- 'भगवन् ! आप कृपापूर्वक मुझे भिक्षुओंके नियम बतलाइये ।' एवं पृष्टः प्रजाधीशः प्राह त्वं शृणु नारद । भिक्षुर्न खाटने कुर्यात्स्वनिरोधादिकं कचित् ॥ ७९ ॥ नारदजोके ऐसा पूछनेपर प्रजापतिने कहा-'नारद ! सुनो, भिक्षुको अपने भ्रमणकालमें कोई रोक-टोक न आने देनी चाहिये । न नद्युत्तरणं कुर्याद्धस्ताभ्यां च क्वचिद्यतिः । नामिसेवां प्रकुर्वीत नैफत्राशनमाचरेत् ॥८॥ पतिको अपने हाथोंसे कभी नदी पार न करनी चाहिये । यह अग्निसेवा ( अग्निहोत्रादि ) न करे और न [अधिक दिनों- तक ] एक स्थानपर भोजन ही करे । भिक्षयाहृतमन्नं च समश्नीयायतिः सदा । मेदोवृद्धिं न कुर्वीत रक्षणम् ॥८१॥ यतिको सदा मिक्षा ही खाना चाहिये। वह ५२ । त्यजेत् ॥ ८॥ .4 - २२० मुमुक्षुसर्वखसार GGOGENGAGROGreenCnGUSICROR उसे धीको रुधिरके समान और एक ही पुरुषके अन्नको मार समान त्यागना चाहिये तथा चन्दनादिके लेपको विष्टाके लेप समान तज देना चाहिये। केवलं लवणं भिक्षुरन्त्यजेन समं त्यजेत् । स्त्रीसङ्गमित्र चाभ्यङ्ग वस्त्रं चोच्छिष्टपात्रवत् ।। ८३ । भिक्षुको [ शाकादिर्मे मिले हुएसे पृथक् ] केवल लवणको अन्त्यजके समान, उबटनको त्रीसंगके समान तथा वस्त्रको जूठे पात्रके समान त्याग देना चाहिये । मूत्रयच्च परित्याज्यं भिक्षुणोष्णोदकं सदा । मलयञ्च तनोः स्पर्श वर्जयेदात्मवान्यतिः ।। ८४ ॥ गर्म जलको भिक्षु सर्वदा मूत्रके समान त्यागे तथा जितेन्द्रिय यति दुसरेके शरीरके स्पर्शको मलके समान त्याग दे। देशो ज्ञातचरस्त्याज्यश्चाण्डालगृहवीथिवत् । नारी चाहिरिव त्याज्या भिक्षुणा स्वहितार्थिना ॥८५॥ अपना हित चाहनेवाले भिक्षुको परिचित देशका चाण्डाठोंकी गलीके समान तपा स्त्रीका सर्पके समान त्याग करना चाहिये। सुवर्ण विपयाच्याज्यं मशानवच सभास्थलम् । कुम्भीपाक इव त्याज्या राजधानी च भिक्षुणा ॥ ८६ ।। भिक्षुको सुवर्णका विपके समान, सभास्थानका स्मशानके समान और राजधानीका कुम्भीपाक नरकके समान त्याग करना चाहिये।
चतुर्थ प्रकरण २२१ GROGRISGANISe HAGRANUSSIOGICE" भिल्लानांहण्डिकादिस्थं यथा ह्यन्नं द्विजादिभिः । सन्त्यज्यते तथा भिक्षुमित्रानं च सदा त्यजेत् ॥ ८॥ जिस प्रकार ब्राह्मण आदि द्विजगण भीलोंकी हाँडीमें रखे हुए अन्नको त्याग देते हैं उसी प्रकार भिक्षु मित्रके अन्नका सर्वदा त्याग करे। दर्शनं स्वान्यदेवस्य त्यक्त्वा वै लोकरञ्जनम् । विहायैव स्वदेशं च स्वरूपं चिन्तयेत्सदा ।। ८८॥ अपने इष्टदेवसे अन्य देवका दर्शन तथा लोकरञ्जनको छोड़कर खदेशसे दूर ही रहते हुए सदा आत्मस्वरूपका चिन्तन करे। चिन्तयन्स्वस्वरूपं च त्यक्त्वा बन्धुभवस्थलम् । कारागृहविनिर्मुक्तचोरवद्रूरतो चसेत् ॥ ८९॥ अपने बन्धुजन और जन्मस्थानको छोड़कर आमस्वरूपका चिन्तन करते हुए कारागारसे छूटे हुए चोरके समान सदा दूर ही निवास करे। पत्तने तु त्रिरात्राणि क्षेत्रे पड़ावकं वसेत् । तीर्थे च सप्तरात्राण्येवं चरेदनिकेतकः ॥९॥ पत्तन (नगर) में तीन रात्रि, क्षेत्रमें छः रात्रि तथा तीर्यमें सात रात्रितक रहे । इस प्रकार अनिकेत होकर विचरता रहे।
२२२ GLISGRRIANGREASODCRAJEScreSGRRORCRAER मुमुक्षुसर्वखसार मात्सर्यादींश्च सन्दध सदैकाकी यतिश्चरेत् । पत्तननगरग्रामान कुर्वीत कदाचन ॥९॥ मात्सर्य आदि दोषोंको दग्ध करके यतिको सदा अकेले ही विचरना चाहिये। उसे पत्तन, नगर या ग्राम कभी न करना चाहिये। द्वाभ्यां ग्रामःसमाख्यातः पत्तनं च त्रिभिर्भवेत् । चतुर्भिर्नगरं तसाचयं त्यक्त्वा चरेद्यतिः ॥ ९२ ॥ दो यतियोंके साप-साथ रहनेसे ग्राम कहा जाता है तपा तीनके रहनेसे पत्तन और चारसे नगर हो जाता है । इसलिये यतिको इन तीनोंका त्याग करते हुए [ अर्थात् सर्वदा अकेले रहते हुए ही ] विचरना चाहिये । ननु न्यासस्य धर्माणां सादुदाहरणेन किम् । सति कर्माधिकारे नुर्यतो न न्याससम्भवः ॥ ९३ ।। शक्षा-संन्यासकेधमोंका निरूपण करनेसे क्या होगा! क्योंकि कर्माधिकार रहते हुए मनुष्यसे संन्यास होना तो सम्भव ही नहीं है। कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविपेच्छतं समाः । जाग्रत्स्वित्यादिवाक्येपुन्यासःस्थाजीवतः कथम् ॥१४॥ "कुर्वनेवेह कर्माणि जिजीविषेछत र समाः'* (ई० उ०२) इत्यादि वाक्योंके जामत् (मौजूद ) रहते हुए जीवित पुरुषक लिये संन्यास कैसे हो सकता है ! - कर्म करते हुए ही सो यर्यतक जोनको इच्छा करे।
चतुर्थ प्रकरण २२३ SOGRAO मैवं श्रुत्यादिवाक्यहि व्याससूत्रेण वै तथा । संन्यासाश्रमसद्मायो लभ्यतेऽपि यतःस्फुटम् ॥ ९५ ॥ समाधान-ऐसा मत कहो, क्योंकि श्रुति आदिके वाक्योंसे तथा व्याससूत्रोंसे भी संन्यासाश्रमका होना स्पष्ट सिद्ध होता है। उदाहराम्यहं चेह श्रुत्यादिवचनानि वै । न्यासासम्भवशाया विच्छित्त्यै तानि संशृणु ॥ ९६ ॥ संन्यासका होना असम्भव है-इस शंकाका उच्छेद करनेके लिये में यहाँ श्रुति आदिके वचन उद्धृत करता हूँ, उन्हें प्यान देकर सुनो। प्रमोपनिषदि सशिखं वपनं कृत्वा यहि मूत्रं त्यजेद्बुधः । यदक्षरं परं ब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् ॥ ९७ ॥ मुद्धिमान् पुरुष शिखाके सहित क्षौर कराकर बाह्यसूत्रको त्याग दे तथा जो अविनाशी परबल है उसी सूत्रको धारण करे । आगरसस्मृती संन्यसेब्रह्मचर्येण संन्यसेद्वा गृहादपि । वनाद्वा संन्यसैद्विद्वानातुरो दुःखितोऽथवा ।। ९८॥ विद्वान् माचर्य-आश्रमसे, गृहस्थाश्रमसे, वानप्रस्थाश्रमसे अपवा आतुर या दुःखी होनेपर संन्यास ग्रहण करे ।
२२४ OGROLAPraIDEOOPCricRRIORRRIOR मुमुसुसससार यमस्मृती संन्यस्तं मे जगनाथ पाहि मां मधुसूदन । पाहि मां सर्वदेवेश यासुदेव सनातन ।। ९९॥ हे जगन्नाप! मैंने संन्यास किया है; हे मधुसूदन ! आप मेरी रक्षा कीजिये । हे सर्वदेवेचर 1 हे वासुदेव ! हे सनातन ! आप मेरी रक्षा कीजिये। अहं सर्वाभयं दत्वा भूतानां परमेश्वर । युप्मच्छरणमापन्नत्राहि मां पुरुषोचम ॥१०॥ हे परमेश्वर ! में प्राणियोंको सब प्रकारका अभय प्रदान कर आपकी शरण आया हूँ। हे पुरुषोत्तम ! आप मेरी रक्षा कीजिये। लिङ्गपुराणे निष्कृत्य सशिखान् केशानुपवीतं विसृज्य च । पञ्चभिर्जुहुयादप्सु भू-स्वाहेति च वा क्रमात् ॥१०॥ शिखासहित केशोंको काटकर यज्ञोपवीतका परित्याग करे तथा ['प्राणाय स्वाहा' आदि ] पाँच आहुतियोंसे अथवा 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे क्रमशः जलमें हवन करे । संग्रहकर्तृवचनम् ऊर्द्ध रेतस्सुशब्दे हीति सूत्रेण च सूत्रकृत् । संन्यासस्यापि सद्भायं भगवान् स्फुटमुक्तवान् ॥१०॥ सूत्रकारं भगवान् व्यासजीने भी 'ऊर्ध्वरेतस्सु च शन्दे हि'. (प्र०सू०३।४।१७) इस सूत्रसे संन्यासका सद्भाव स्पष्ट बतलाया है। • वेदमें ही ऊर्ध्वरेताओंमें विद्या सुनी गयी है। , चतुर्थ प्रकरण २२५ GONIOGRONINGravsacreeDGARNEn कुर्वन्नेवेति मन्त्रस्य यावजीवमिति श्रुतेः । तर्हि त्वया गतिर्वाच्येति चेच्छृणु वदामि ताम् ॥१०३॥ यदि कहो कि '[अच्छा ऐसा ही सही किन्तु ] 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि' इस मन्त्रको तथा 'यावजीवमग्निहोत्रं जुहोति' इत्यादि श्रुतिकी क्या गति होगी, सो तो बतलाओं' तो सुनो, मैं बतलाता हूँ। कुर्वनित्यादिवाक्यान्यविरक्तविपयाणि भोः । वौँ क्षत्रियवैश्यो वा तेषां च विषयौ तयोः ॥१०४॥ लिङ्गेनधिकृतत्वाद्वै कपायमिति च स्मृतेः । बृहदारण्यभाष्येऽपि भाष्यकर्ता तथेरणात् ॥१०५।। ये 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि' आदि वाक्य अविरक्तोंके लिये हैं । अथवा क्षत्रिय और वैश्य ये दो वर्ग हो उनके विषय है। क्योंकि संन्यासके लिंग-धारणमें उनका अधिकार नहीं है और 'कपार्य ब्राह्मणस्यैव'* इत्यादि स्मृति भी ऐसा ही कहती है । तथा बृहदारण्यक- उपनिषद्के भाष्यमें भाष्यकारने भी ऐसा ही कहा है । जायमानश्रुतिश्चैवमृणानीति स्मृतिस्तथा । गृहस्थत्वेन यो जातो बोध्ये तद्विपये उभे ॥१०६॥ इसी प्रकार 'जायमानो ब्राह्मणविभिऋणै णवाञ्जायते। इत्यादि श्रुति और 'ऋगानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत् .कापायवन माझणके ही लिये हैं। + ब्राह्मण उत्पन्न होते ही तीन ऋणों से ऋणयान हो जाता है। + तीन घणोंका निराकरण करके मनको मोक्षमार्गमें नियुक्त करे।
२२६ मुमुक्षुसर्यस्वसार OGRMIREOGRASSCRIDGEOGMANGUAGRIOR इत्यादि स्मृति-ये दोनों भी उसीसे सम्बन्धित है, जो कि गृहस्थरूप- से उत्पन्न हुआ है [अर्षात् जिसने ब्रह्मचर्याश्रमसे गाईस्थ्यमें प्रवेश किया है। खाध्यायश्राद्धदानाचैर्मणापाकरणं स्मृतम् । तानि कर्तुं न शक्नोति जातमात्रो हि कश्चन ।।१०७॥ क्योंकि ऋणोंका शोधन खाध्याय, श्राद्ध और दान आदिसे माना गया है, जिन्हें कोई भी पुरुष उत्पन्न होते ही नहीं कर सकता। एवं संन्याससद्भावः सम्यगर निरूपितः । तद्धर्मकथनाक्षेपो वृथातः पूर्वपक्षिणः ॥१०॥ इस प्रकार संन्यासके सद्भावका यहाँ भी प्रकार निरूपण किया गया। अतः उनके धर्म बतलाने में जो पूर्वपशीका आक्षेप पा यह वृया ही था। श्रुत्यर्थसंग्रहेण प्राग्यनिधर्माः प्रदर्शिताः । श्रुतिस्मृतिग्रहणेह वक्ष्यन्ते ते पुनस्नया ॥१०९।। यहाँतक श्रुतिक अर्थका संग्रह करके यतिय धर्मोका दिग्दर्शन कराया गया । अब उन्हींका श्रुति और स्मृतिये यापोंको हर वर्णन किया जायगा। यतेरिरिदिपोधर्मा याक्यः प्रतिपादिनाः । प्रायेण तानि वाक्यानि ग्रहीयामीद पिनरान् ॥११॥ जिन वाक्यों में निहामु पनिक पोका प्रतिपादन किया है पहा में प्रायः उन्हीं विस्तार प्रदान करेगा।
२२७ GRum ORNCORMAN Greenceuon चतुर्थ प्रकरण धर्मबोधं विना नास्ति यतेः स्वधर्मसेवनम् । विना तेन न मोक्षः स्यात्तसात्सेव्या यमादयः ॥११॥ धर्मका ज्ञान पाये बिना यतिसे खधर्मका सेवन नहीं हो सकता और खधर्मपाटनके बिना मोक्ष नहीं हो सकता, इसलिये यम आदिका सेवन करना ही चाहिये । यमप्रभृतयो धर्माः प्रोक्ताः श्रुत्यादिमिर्यतेः । यमा नितिरूपाः स्युः प्रवृत्या नियमा युताः॥११२॥ यतिके यमादि धमोंका श्रुति आदिने निरूपण किया है। उनमें यम निवृत्तिरूप हैं तथा नियम प्रवृत्तियुक्त हैं। यमा दशविधाः प्रोक्ता नियमाश्च दश स्मृताः । याज्ञवल्क्यस्मृती तावत्तानत्रानुवदाम्यहम् ॥११॥ पाज्ञवलपरमृतिमें दश प्रकारके यम और दश नियम बतलाये है। यहाँ में उनका उल्लेख करता हूँ। यावत्क्यस्मृती अहिंसा सत्यमस्तेयं प्रमचर्य दयार्डवम् । क्षमा धृतिमिताहारः गावं स्वेते यमा दश ॥११॥ अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, आर्जव, क्षमा, धैर्य, सल्पाहार और सोच-ये दस पम है। तपः सन्तोपमास्तिरयं दानमीधरपूजनम् । सिदान्तयणं चैव हीमविय अपो हुतम् ।
२२८
GENERGRUCRNERGROUGOGRMANGraduIRGOHAAR
मुमुक्षुसर्वस्वसार
संमहकर्तृवचनम्
एते च नियमाः प्रोक्ता याज्ञवल्क्येन योगिना ॥११५॥
तप, सन्तोप, आस्तिकता, दान, ईश्वरपूजन, सिद्धान्तश्रवण,
ही (लना), मति, जप और हवन-ये योगी याज्ञवल्क्यने नियम
बतलाये हैं।
आप्तवाक्यानि
सर्वभूतसहच्छान्तः सर्वभूताभयप्रदः।
भयस्थानानि सश्चित्य वर्जयेत विचक्षणः ॥११६॥
विचक्षण पुरुष सब प्राणियोंका सुहृद्, शान्त और समस्त
जीवोंको अभयदान करनेवाला होकर सम्पूर्ण भयस्थानोंको विचार-
कर उनका त्याग कर दे।
नदीपुलिनशायी साद्देवागारेपु वा स्पेत् ।
नात्यर्थ सुखदुःखाभ्यां शरीरमुपतापयेत् ॥११७॥
[ यतिको चाहिये कि ] नदीके पुलिन (रेतीले किनारे) में
पड़ा रहे अथवा देवालयोंमें शयन करे तथा अपने शरीरको मुस-
दुःखसे अत्यन्त सन्तप्त न करे ।
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रही।
भावशुद्धिहरी भक्तिः सन्तोपः शौचमार्जवम् ।।११८।।
आहारशुद्धिवैराग्यं सम्प्रसादो दया नृणाम् ।
अस्नेहों गुरुशुश्रुपा श्रद्धा शान्तिर्दमः शमः ॥११९॥
चतुर्थ प्रकरण
२२९
OGreeDGUS.
AmericBGRRIODGUEGORIESGAR
हीस्तपो ज्ञानविज्ञाने योगो लघ्याशनं धृतिः ।
अदीनत्वमनुद्धों ब्रह्मधीः समदर्शनम् ॥१२०॥
एपखधर्मो व्याख्यातोयतीनां मुक्तिमिच्छताम् ।
अभ्युत्थानं प्रियालापं गुरुवत्प्रतिपूजनम् ॥१२१॥
यतीनां वृत्तवृद्धानां स्वीयधर्मेषु पर्तिनाम् ।
कर्तव्यमन्यथा योगी स्वधर्मात्प्रच्युतो भवेत् ॥१२२॥
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, भावशुद्धि,
भगवद्भक्ति, सन्तोप, शौच, आर्जव, आहारशुद्धि, वैराग्य, सम्यक्
प्रसन्नता, मनुष्योंपर दया, अस्नेह, गुरुसेवा, श्रद्धा, शान्ति, दम,
शम, लजा, तप, ज्ञान-विज्ञान, योग, वल्पाहार, धैर्य, अदीनता,
अत्यन्त हर्पित न होना, ब्रह्मबुद्धि और समष्टि -यह मोक्षकामी
यतियोंका वधर्म कहा गया है। स्वधर्ममें वर्तमान रहनेवाले और
अपनेसे आचारमें उत्कृष्ट अन्य यतियोंको भिक्षु अभ्युत्थान दे, उनके
साय प्रिय सम्भाषण करे तथा गुरुके समान उनका पूजन करे;
नहीं तो वह अपने धर्मसे पतित हो जाता है।
छेदभेदोपमदं च प्राकारं गृहमाश्रमम् ।
खाहा स्वधा वषट्कारो विपयाणां च सन्निधिः ॥१२३॥
स्तुतिनिन्दा क्रिया वादाः परमर्मावघाटनम् ।
तृष्णा क्रोधोऽनृतं माया लोभमोहौ प्रियाप्रियौ ॥१२॥
२३० CRISPEROLICE GROGRAKO मुमुक्षुसर्ष खसार शिल्पं व्याख्यानयोगश्व कामो रागपरिग्रहः । अहकारो ममत्वं च चिकित्सा धर्मसाहसम् ।।१२।। प्रायश्चित्तं प्रवास मन्त्रौपधगराशिपः । एकाग्नं मदमात्सर्य गन्धपुष्पविभूषणम् ॥१२॥ गाकाङ्क्षा रसायनम् । गोतिश्च क्रयविक्रयम् ॥१२॥ क्रियाकमावयादव गुरुवाक्याविलङ्घनम् । सन्धिश्च विग्रहो यान मञ्चकं शुक्लवस्त्रकम् ॥१२८।। शुक्लोत्सों दिवाखापो भिक्षाधारस्तु तैजसम् । विपं चैयायुधं वीज हिंसां तैष्ण्यं च मैथुनम् ॥१२९॥ प्रतिपिद्धानि चैतानि सेवमानो ब्रजेदयः । मैक्षदेशनृपज्ञातिपुत्रमित्रादियोपिताम् ॥१३०॥ उपचारकथास्त्वन्या मनसापि न चिन्तयेत् । आगच्छ गच्छ तिष्ठेति स्वागतं सुहृदोऽपि वा । सम्माननं च न ब्रूयान्मुनिर्मोक्षपरायणः ॥१३॥ छेदन, भेदन और उपमर्दन, परकोटा, गृह, आश्रम, साहा, सधा, वषटकार, विषयोंकी सन्निधि, स्तुति, निन्दा, कर्म, वाद- विवाद, दूसरोंका भेद खोलना, तृष्णा, झोध, अनृत, माया, लोम, मोह, प्रिय-अप्रिय, शिल्प, व्याख्यानपरायणता, काम, आसक्तिवश परिग्रह करना, अहंकार, ममता, चिकित्सा, धर्मसम्बन्धी साइस, प्रायश्चित्त कराना, एक स्थानपर अधिक ठहरना, मन्त्र, औषध विष और आशीर्वाद देना, एक घरका अन्न, मद-मत्सरता, . चतुर्थ प्रकरण २३१ OGINGrauODGUSPERIODGNIORGANISRCeue. गन्धयुक्त पुष्पोंके आभूपण, ताम्बूल, उबटन, क्रीडा, भोगवासना, रसायन, वकवाद, निन्दा करना, आशीर्वाद देना, ज्योतिष विद्या, खरीदना-बेचना, क्रिया, कर्म, विवाद, गुरुवाश्यका उल्लघन, सन्धि, विग्रह, यान, मञ्च, श्वेत वन, वीर्यत्याग, दिनमें सोना, धातुका भिक्षापात्र, विष, आयुध (शस्त्र), वीज, हिंसा, तीक्ष्णता और मैथुन-ये सब यतिके लिये निपिद्ध हैं। इनका सेवन करनेसे वह अध:पतित हो जाता है। यतिको भिक्षा माँगनेके देश, राजा, जातिवन्धु, पुत्र, मित्रादि तपा स्त्रीका एवं अन्य सेवा-शुश्रूपाको बातोंका मनसे भी चिन्तन न करना चाहिये । मुक्तिमार्गमें लगा हुआ मुनि 'आइये, जाइये, बैठिये, खूब आये' ऐसे सम्मानसूचक वचन अपने सुहृद्के लिये भी न कहे। संन्यासोपनिषदि आसनं पात्रलोपश्च सञ्चयः शिष्यसञ्चयः । दिवाखापो थालापो यतेर्वन्धकराणि पट् ॥१३२॥ आसन ( एक स्थानपर अधिक दिन रहना) पात्रलोप (पात्र न रखना), सञ्चय, शिष्यसंग्रह, दिनमें सोना और वृथा वार्तालाप- ये छ: बातें यतिको बन्धनमें डालनेवाली हैं। एकाहात्परतो ग्रामे पश्चाहात्परतः पुरे । वर्षाम्योऽन्यत्र यत्स्थानमासनं तदुदाहृतम् ।।१३३॥ वर्षाऋतुके सिवा किसी और समय प्राममें एक दिन तथा नगरमें पाँच दिनसे अधिक ठहरना-यही आसन कहा जाता है।
२३२ G-IRGAOGENIOGRNIOScreen मुमुक्षुसर्वस्वसार VIRGANICON - . उक्तालाब्यादिपात्राणामलामेऽन्यपरिग्रहः यतेः संव्यवहाराय पात्रलोपः स उच्यते ॥१३॥ यतिके व्यवहारके लिये बतलाये हुए तूंबा आदि पात्रोंके में मिलनेपर अन्य पात्रोंका रखना-यह पात्रलोप कहलाता है। शुश्रुपालाभपूजार्थ यशोऽर्थ वा परिग्रहः । शिष्याणां न तु कारुण्याच्छिष्यसंग्रह ईरितः ॥१३५।। करुणासे नहीं, बल्कि शुश्रूषालाम, पूजा अथवा यशके लिये ही शिष्योंका संग्रह करना-शिप्यसंग्रह कहा गया है । विद्या दिवा प्रकाशत्वादविद्या रात्रिरुच्यते । विद्याभ्यासे प्रमादो यः स दिवाखाप उच्यते ॥१३६।। प्रकाशरूप होनेसे विद्या दिन है और अविद्या रात्रि कही जाती है। अतः विद्याभ्यासमें जो प्रमाद किया जाता है यही दिवाखाप कहलाता है। आध्यात्मिकी कथा मुक्त्या भिक्षावातां विना तथा। अनुग्रहं परिप्रदनं वृथाजल्पोऽन्य उच्यते ॥१३॥ अध्यात्मचर्चाको छोड़कर भिक्षाचर्या, किसीपर अनुमह करना तथा [ परमार्थ-सम्बन्धी ] प्रश्नोत्तर करना-इनके सिया और सब यातें पालाप हैं। स्थावर जङ्गमं पीज तैजसं विषमायुधम् । पडेतानि न गृह्णीयाधतिमूत्रपुरीपयत् ॥१३८|| २३३ OGISAGRONICORNERGREEOGREMIERGREENGauoot चतुर्य प्रकरण यतिको [स्थानादि] स्थावर, [पशु आदि ] जंगम, बीज, तैजस (धातुजनित), विप और अस्त्र-ये छ: प्रकारके द्रव्य मलमूत्रके समान ग्रहण न करने चाहिये । स्मृतयः मधु मांसं च मयं च ताम्बूलं तैलमौषधम् । वान्यष्टौ यतेरात्तथा कान्ता च काञ्चनम् ।।१३९।। मधु, मांस, मद्य, ताम्बूल, तैल, औपध, कामिनी और काश्चन- ये आठ पदार्थ यतिको दूरहीसे त्याग देने चाहिये । न शिष्याननुयभीत नारभेत मठान् कचित् । न व्याख्यामुपयुञ्जीत न सेवेद्राजमन्दिरम् ॥१४०॥ यतिको चाहिये कि शिष्यसंग्रह न करे, मठ कभी न बनवाये, [अपने लाभके लिये] शास्त्रोंकी व्याख्याका उपयोग न करे तथा राजभवनका सेवन न करे। वानप्रस्थगृहस्थाम्यां प्रीतिं यतेन वर्जयेत् । ग्रामान्ते निर्जने देशे नित्यं कृतनिकेतनः ॥१४१॥ यतिको चाहिये कि सर्वदा प्रामके बाहर निर्जन देशमें निवास करता हुआ धानप्रस्थ और गृहस्थों के साययत्नपूर्वकप्रीतिका त्याग करे। वृद्धानामातुराणां च भीरूणां सङ्गवर्जितः । ग्रामे वाथ पुरे वापि चासो नैकत्र दुष्यति ॥१४२।। जो यति वृद्ध, रोगी अथवा भयभीत हों उनका ग्राम या नगरमें एक ही स्थानपर निःसंगभावसे रहना भी दृषित नहीं है।
२३४ मुमुक्षुसर्यवसार AGROINOGRIORIERGRICORumareuAGRICO न तीर्थसेवी नात्यन्तमुपवासपरो यतिः । न चाध्यापनशील स्थानव्याख्यानपरो भवेत् ।।१४शा यतिको तीर्थसेवी, अत्यन्त उपवासपरायण, अधिक पदाने- लिखानेवाला तथा व्याख्यान देनेवाला भी न होना चाहिये। प्रतिग्रहं न गृहीयान चैवान्यं प्रदापयेत् । प्रेरयेद्वा तथा भिक्षुर्न स्वमेsपि कथञ्चन ॥१४॥ भिक्षुको न तो स्वयं प्रतिग्रह लेना चाहिये और न दूसरेको हो दिलवाना चाहिये, और न कभी खममें भी किसीको इसके लिये प्रेरित ही करना चाहिये। दासी दासं गृहं यानं गोभूधान्यं धनं रसान् । प्रतिगृह्य यतिमं हन्यात्कुलशतत्रयम् ॥१४५॥ दासी, दास, घर, यान, गौ, पृथिवी, शुष्क अन्न, धन, रस और प्राम इन्हें ग्रहण करनेसे यति अपने तीन सौ कुलोंको नष्ट कर देता है। आविकं पट्टकं वासस्तूलिका मञ्चकं मधु । शुक्लवस्त्रं च यानं च ताम्बूलं खियमेव च । प्रतिगृह्य कुलं हन्यात्प्रतिगृहाति यस्य च ॥१४६॥ ऊनी घन, रेशमी वस्त्र, शय्या, मञ्च, मधु, श्वेत वन, सवारो, ताम्बूल और स्त्रीको ग्रहण करके यति अपने और जिससे महल करता है उसके भी कुल्लको नष्ट कर देता है। पुष्पं शाखा पल्लवं वा फलमूलवणादिकम् । मळ्यादि यस्तु संन्यासी नरके पतति ध्रुवम् ॥१४७।।
चतुर्थ प्रकरण २३५ DCRIUSDGRUERGINGOGraNERGRUAGROLLE+ जो संन्यासी होकर पुष्प, शाखा, पत्ता, फल, मूल या तृण आदिको तोड़ता है वह निश्चय ही नरकमें गिरता है। क्षेत्रं गावो हिरण्यं च यतेयस परिग्रहः । तादृशं कल्मषं दृष्ट्वा सचैलो जलमाविशेत् ॥१४८॥ खेत, गौ और सुवर्ण-ये जिस यतिके परिग्रह हैं उसका ऐसा पाप देखकर मनुष्यको वस्वसहित जलमें घुस जाना चाहिये [ अर्थात् वस्त्रसहित मान करना चाहिये । अन्नपानपरो भिक्षुर्वनादीनां च संग्रही । उमौ तौ मन्दबुद्धित्वात्पूतिनरकशायिनौ ॥१४९॥ जो भिक्षु खान-पानमें लोलुप है और जो वस्त्र आदिका संग्रह करता है वे दोनों ही मन्दबुद्धि होनेसे पूतिनामक नरकमें शयन करते हैं। आविक्यं त्वधिकं वस्त्रं तूल्यं तूलिपटीं तथा । प्रतिगृह्य यतिवैतापवते नात्र संशयः ॥१५०॥ अधिक वस्त्र, रूई भरे हुए कपड़े तपा सूती वनोंका प्रतिमह करनेसे यति नरकमें गिरता है-इसमें सन्देह नहीं। क्रोधलोभपरो नित्यं निद्रालस्यपरस्तथा । विषादीच्छेश्वरश्चैव प्रेयसो भ्रश्यते द्विजः ॥१५१॥ जो द्विज सर्वदा क्रोध-लोमपरायण, निद्रा और आलस्यमें तत्पर, विषादयुक्त और खेप्छाचारी होता है वह प्रेय (प्रिय स्थिति) से पतित हो जाता है। ऊनीवर, २३६ मुमुक्षुसर्वससार OGRAINGINGRICOGNEGREERGREERRESTE यतीनां काञ्चनं दत्त्वा ताम्बूलं ब्रह्मचारिणाम् । चौराणामभयं दचा दातापि नरकं ब्रजेत् ॥१५२॥ यतियोंको सुवर्ण, ब्रह्मचारियोंको ताम्बूल तया चोरोंको अभय दान करनेसे देनेवाला भी नरकमें जाता है। छेदने भेदने पाके यतिर्यस्तु प्रवर्तते । तादृशं कश्मलं दृष्ट्वा प्रेतशौचं विधीयते ॥१५३॥ जो यति छेदन, भेदन अथवा पाक करनेमें प्रवृत्त होता है उसका वैसा पाप देखकर देखनेवालेको मृतकशौच करना चाहिये। विधयां कञ्चुकोपेतां सधयां कञ्चुकं विना । यतिं च कञ्चुकोपेतं दृष्ट्वा चक्षुर्निमीलयेत् ॥१५४|| विधवाको चोलीके सहित, सधवाको विना चोलीके तथा यति- को अंगरखा पहने देखकर आँख मूंद लेना चाहिये। चत्वारि पातनीयानि यतीनां मनुरप्रवीत् । औषधं सन्निधानं च एकान्नं कांस्यभोजनम् ॥१५५॥ मनुजीने यतियोंको पतित करनेवाले चार काम बतलाये हैं- औषध, संग्रह, एक घरका अन्न तथा कॉसीके पात्रमें भोजन करना । एकानी कांस्यमोजी च मेपजी वस्तुसंग्रही । चत्वारो नरकं यान्ति मनुः स्वायम्भुषोऽब्रवीत् ॥१५६।। एक घरका अन्न खानेवाला, काँसीके पात्रमें भोजन करनेवाला, भोपधियाँ रखनेवाला और पस्तुओंका संग्रह करनेवाला ये चारों [संन्यासी ] नरकमें जाते हैं-ऐसा स्वायंभुव मनुने कहा है।
चतुर्थ प्रकरण GRUPERIORRHODGRUSOGROLORGROGRUE. मनुस्मृती बालमांच कृतमांश्व विशुद्धानपि धर्मतः । शरणागतहन्तुंश्च स्त्रीहन्तृच न संयसेत् ॥१५७॥ बालकोंकी हत्या करनेवाले, शरणागतोका पात करनेवाले तपा स्त्रीहत्यारे प्रायश्चित्तादि ] धर्मानुष्ठानद्वारा शुद्ध हो गये हों, तो भी उनके साथ न रहें। महाभारते ग्रामणगीतावाक्यानि अहिंसा ब्रह्मचर्य च सत्यमार्जवमेव च । अक्रोधश्चानसूया च दमो नित्यमपैशुनम् । अष्टस्येतेषु युक्तः साह्रतेपु संयतेन्द्रियः ॥१५८॥ अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, आर्जव, अक्रोध, अनसूया, दम और अपैशुन्य-इन आठ व्रतोंमें जितेन्द्रिय पुरुषको सदा ही तत्पर रहना चाहिये। नाददीत परस्सानि न गृह्णीयादयाचितः । न किश्चिद्विपयं भुक्त्वा स्पृहयेत्तस्य वै पुनः॥१५९।। दूसरोंकी वस्तुको ग्रहण न करे,बिनाप्रार्थना किये किसीकी चीज नले तथा किसी विषयको भोगकर पुनः उसे भोगनेकी इच्छा न करे। न शिल्पजीविका जीवेद्विरण्यं नोत कामयेत् । न द्वेटा नोपदेष्टा च. स्यादेवं निरुपस्कृतः ॥१६॥ १ चाई -
२३८
+CROMANOGRUGRUCRGEOGUEDGIPRACT
मुमुक्षुसर्यखसार
शिल्पसम्बन्धी जीविकाका आश्रय न ले, सुवर्णको कामन
न करे तथा किसीसे द्वेष या किसीको उपदेश करनेवाला मी न हो।
इस प्रकार सत्र तरहकी बनावटसे दूर रहे।
आशीर्युक्तानि सर्वाणि हिंसायुक्तानि यानि च ।
लोकसंग्रहधर्म च न कुर्यान्न च कारयेत् ॥१६१॥
जितने भी कामनामय अथवा हिंसायुक्त कर्म हैं तथा जो लोक-
संमहसम्बन्धी धर्म हैं, उनमेंसे न तो कोई करे और न करावे ही।
अनागतं च न ध्यायेन्नातीतमनुचिन्तयेत् ।
वर्तमानमुपेक्षेत कालाकाङ्क्षी समाहितः ॥१६२॥
किसी भात्री विषयका विचार न करे तथा अतीतका भी
चिन्तन न करे; बल्कि कालयापनकी इच्छा कर समाहित चिचसे
वर्तमानकी भी उपेक्षा करता रहे।
नारदपरिव्राजकोपनियदि
कौपीनयुगलं कन्था दण्ड एकः परिग्रहः ।
यतेः परमहंसस नाधिकं तु विधीयते ॥१६॥
परमहंस यतिको दो कौपीन, कन्या और एक दण्ड-केरल
इतना ही परिग्रह करना चाहिये; इससे अधिकका उसके लिये
विधान नहीं है।
यदि वा कुरुते रागादधिकस्य परिग्रहम् ।
: रौरवं नरकं गत्वा तिर्यग्योनिषु जायते ॥१६॥
चतुर्थ प्रकरण ACTRONIEOGRENERGEOGREVERGRA यदि रागवश वह इससे अधिकका परिग्रह करता है तो गैरव नरकमें गिरकर तिर्यायोनियों में उत्पन्न होता है । विशीर्णान्यमलान्येय चैलानि ग्रथितानि तु । कृत्वा कन्यां वहिर्यासो धारयेद्धातुरञ्जिताम् ॥१६५।। पतिको गाँठे हुए फटे-पुराने स्वच्छ चिपड़ोंकी कन्या बनाकर उसे गेरूसे रेंगकर बाह्य वनके स्थानमें धारण करनी चाहिये। भूतानां प्रियकारी स्थान परद्रोहकर्मधीः । नरा वशीकृता येन तेन देवा वशीकृताः ॥१६६॥ यतिको प्राणियोंका प्रियकारी होना चाहिये, उसे परद्रोहमें बुद्धि नहीं लगानी चाहिये । जो मनुष्योंको वशीभूत कर लेता है वही देवताओंको भी अपने अधीन कर सकता है। अजिव पण्डकः परन्धो यधिर एव च । मुग्धश्च मुच्यते मिक्षुः षड्भिरेतैर्न संशयः ॥१६॥ अजिह, नपुंसक, पंगु, अन्ध, यधिर और मुग्ध-इन छः गुणों के कारण भिक्षु मुक्त हो जाता है इसमें सन्देह नहीं । इदमिष्टमिदं नेति योऽनन्नपि न सजते । हितं सत्यं प्रियं वक्ति तमजिहं प्रचक्षते ॥१६॥ जो भोजन करते हुए भी यह प्रिय है और यह अप्रिय है- इस प्रकार आसक्त नहीं होता तया हितकारी सत्य और प्रिय सम्भाषण करता है उसे 'अजिह' कहते हैं।
२४० ACreatIOOGLEDGaucceUCGAORGaus मुमुक्षसर्वस्वसार अध जातां यथा नारी तथा पोडशवापिकीम् । शतवां च यो दृष्ट्वा निर्विकारः स पण्डकः ॥१६९।। जिस प्रकार आज ही उत्पन्न हुई स्त्रीको अथवा सौ वर्षकी खीको देखकर कोई विकारयुक्त नहीं होता उसी प्रकार सोलह वर्षको युवतीको देखकर भी जो निर्विकार रहता है वही 'नपुंसक' है। मिक्षार्थमटनं यस विष्मृत्रकरणाय च । योजनान्न परं याति सर्वथा पॉरेव सः॥१७०॥ जो मिक्षा और मल-मूत्र-त्यागके लिये ही भ्रमण करता है तथा एक योजनसे अधिक कभी नहीं चलता वही सर्वथा 'पंगु' है। तिष्ठतो व्रजतो वापि यस्य चक्षुर्न दूरगम् । चतुर्युगां भुवं त्यक्त्वा परिबाट सोऽन्ध उच्यते ।।१७१।। जिसकी दृष्टि बैठते या चलते समय भी चार धनुप पृथिवीको छोड़कर दूर नहीं जाती वह संन्यासी 'अन्ध' कहलाता है । हिताहितं मनोरामं वचः शोकावहं च यत् । श्रुत्वापि न शृणोतीच यधिरः स प्रकीर्तितः ॥१७२॥ जो हितकारी, अहितकारी, मनोरम अथवा शोकावई यचनोंको सुनकर भी मानो नहीं सुनता यह 'बधिर' कहलाता है। सानिध्ये विपयाणां यः समर्थोऽविकलेन्द्रियः । सुप्तववर्तते नित्यं स भिक्षुर्मुग्ध उच्यते ॥१७३॥ जोभिक्षु विषयोंकी सन्निधिमें, समर्थ तथा अविकलेन्द्रिय होकर भी, सर्वदा सोये हुएके समान रहता है यह 'मुग्ध' कहलाता है।
२४१
PGROUP
OGROLOGROLLEDG
चतुर्थ प्रकरण
रथ्यायां पहुवस्त्राणि मिक्षा सर्वत्र लभ्यते ।
भूमिः शय्या सुविस्तीर्णा यतयः केन दुःखिताः ॥१७॥
गलीमें बहुतसे वस्त्र पड़े रहते हैं, भिक्षा भी सर्वत्र मिल जाती
है, सोनेके लिये पृपिवीरूप बड़ी विस्तृत शय्या है; फिर यतिजन
दुःखित क्यों हों।
आप्तवाक्यानि
जायाघ्रात्सुतादीनां पन्धूनां च शुभाशुभम् ।
दृष्ट्वा श्रुत्वा न कम्पेत शोकहपौ त्यजेद्यतिः ॥१७५।।
यतिको चाहिये कि स्त्री, माई, पुत्र और बन्धु आदिके शुभाशुभ-
को देख और सुनकर कम्पित न हो तथा हर्ष-शोकका त्याग करे।
इष्टानिऐपु मोगेषु व्यसनाभ्युदयेषु च ।
उपशान्तां वदेद्वाचमपि वाणैर्हतो भृशम् ॥१७६।।
इष्ट और अनिष्ट भोगोंमें, आपत्ति और सम्पत्तिके समय, और
यदि बाणोंद्वारा अत्यन्त आहत भी हो तो भी शान्त वाणी उच्चारण करे।
सत्यां वाचमहिंस्रां च वदेदनपवादिनीम् ।
अतिवादास्तितिक्षेत अनृशंसामपैशुनाम् ॥१७७॥
जो सत्य और हिंसारहित हो और जिसमें किसीकी निन्दा,
क्रूरता तथा चुगली न हो ऐसी वाणी वोले तथा सब प्रकारकी
अपकीर्ति सहन करे ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च सत्यमस्तेयमार्जवम् ।
चेदान्तश्रवणं ध्यानं भिक्षोः कार्याणि नित्यशः ॥१७८॥
२५२ OGRULSIGreeDGMOGRENIOGREARNER मुमुक्षुसर्यवसार भिभुको ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, आर्जव, वेदान्त श्रयण और प्यान-इनका सदा ही आचरण करना चाहिये। नैवाददीत पाथेयं यतिः किमिदनापदि । कथमापत्सु गृहीयाद्यावदद्धाय भुज्यते ।।१७८।। यतिको, जबतक कोई विशेष आपति न हो तपता किसी प्रकारका पाय ( मार्गमें पानेयोग्य पदार्प) नहीं रखना चाहिये । और जबतक प्रतिदिन भोजन मिटता है तबतक आपत्तिमें भी यह क्यों ग्रहण करेगा! आददीत प्रहचेम्यः साधुभ्यो धर्मसापनम् । नादीत निवृत्तेभ्यः प्रमादेनापि शिश्चन ॥१७९|| अपने धर्मक साधनरूप मिशा आदि प्रवृतिपरायण रापुरुषोंगे ग्रहण करे निवृतिपरायण पुरुपोंमें भूटवर मी युग है। परमापद्गतेनापि न कार्य स्नेयमरूपकम् । स्तपादप्यधिक कथिनास्त्यधर्म इनि स्मृतः ॥१८॥ अयन्न आपतिमें पड़ जानेपर भी यतिको थोड़ी-सी भी गोरी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि घाग यदा और कोई नही है-पमा प्रमिद । दावतान्यनुशाप यनिः कल्याणमन्नु । पामेवाननुपानामा म ममनुतं ।।१८॥ पति दहा नो अदुष्टान कानी तो काम द्वार का हेवा है ना पाय अशान न करने ही दानाको ।
चतुर्थ प्रकरण २४३ OGROLAODGRIUCNGREJONGREEREIGNUSIGENEnd दश प्रतानि सर्वेषां यतीनां विहितानि च । अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः ॥१८२।। अक्रोधो गुरुशुश्रूपा शौचं दुर्भुक्तिवर्जनम् । वाश्मनःकायचेष्टासु प्रमादस्य च वर्जनम् ॥१८॥ अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अक्रोध, गुरुशुश्रूषा, शौच, दुष्टान्नका त्याग तथा मन वाणी एवं शरीरकी चेष्टाओंमे प्रमादका त्याग-इन दश प्रतोंका सभी यतियोंके लिये विधान है। वर्णाश्रमाणां धर्मो हि देवस्थानेषु कारणम् । लिङ्गाभावातु कैवल्यमिति ब्रह्मानुशासनम् ॥१८॥ वर्णाश्रमोंका धर्म तो देवस्थानोंकी प्राप्तिमें ही कारण है, किन्तु लिंग (आश्रमसम्बन्धी चिट्ठोंका) त्याग कर देनेपर तो कैवल्यपद प्राप्त हो जाता है—ऐसा ब्रह्माजीका आदेश है। नात्यक्त्वा सुखमामोति नात्यक्त्वा विन्दते परम् । नात्यक्त्वा चाभयं शेते सर्व त्यक्त्वा सुखी भवेत् ।।१८५।। बिना त्याग किये कोई सुख नहीं पाता, बिना त्यागके परमात्माकी प्राप्ति भी नहीं होती और न त्याग किये बिना कोई निर्भय शयन ही कर सकता है। अतः सब कुछ त्यागकर सुखी हो जाय। न भाषेत खियं काश्चित्पूर्वदृष्टां न च सरेत् । कयां च वर्जयेत्तासां न पश्यल्लिखितामपि ॥१८६॥ क्रिसी खोसे सम्भापण न करे, पहले देखी हुईका स्मरण
मुमुक्षुसर्यवसार
OGRUNGraduacamoRuPausi
न करे और उनसे सम्बन्ध रखनेवाली बातचीतका भी त्याग कर दे
तथा चित्रलिखित खीकी ओर भी देखे नहीं।
एतच्चतुष्टयं मोहाद स्त्रीणामाचरतो यते ।
चित्तं विक्रियतेऽवश्यं तद्विकारात्प्रणश्यति ।।१८८।।
खियोंके प्रति मोहवश इस चार प्रकारके आचरण करनेवाले
यतिका चित्त अवश्य विकृत हो जाता है और उसके विकृत
होनेसे यह नष्ट हो जाता है।
सुजीर्णोऽपिसुजीर्णासु विद्वान्त्रीपु न विश्वसेत् ।
सुजीर्णास्वपि कन्यासु सञ्जते जीर्णमम्परम् ।।१८९।।
विद्वान् बहुत वृद्ध हो, तो भी उसे अत्यन्त वृद्धा बियोंमें
भी विश्वास न करना चाहिये, क्योंकि बहुत पुरानी कन्पामें भी
जीर्ण-शीर्ण चिपड़ा जुड़ जाता है।
श्रीमद्भागवते
स्त्रीणां तत्सङ्गिनांसमं त्यक्त्या दूरत आत्मवान् ।
क्षेमे रिरिक्त आसीनचिन्तयेन्मामतन्द्रितः ॥१९॥
जितेन्द्रिय पुरुष स्त्री और खीसंगियोंका सहबास दही
त्यागकर किसी निरापद एकान्त देशमें बैठकर निरादस्यमावरी
मेरा चिन्तन करे।
पायुपुराणे
यस्तु प्राजितो भूत्वा पुनः मेयेत मैपुनम् ।
पष्टिरमहलागि विष्टायां जापने कमिः ॥१९॥
चतुर्य प्रकरण २५५ GRUPGRANUARGAONGu06 जो पुरुष संन्यास टेकर फिर मैथुनधर्ममें प्रवृत्त होता है यह साठ सहस्र वर्षपर्यन्त विष्टामें कीड़ा होकर जन्म लेता है। शून्यागारेषु घोरेषु आसुर्भवति दारुणः । स तिर्यक् स्यात्ततो गृध्राश्वा वैद्वादश वत्सरान् ।।१९२॥ फिर वह किसी शून्य और भयंकर घरमें भारी चूहा बनता है उसके पश्चात् तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होकर फिर गृध्र और बारह पर्पतक चान होता है। खरो विंशविवर्षाणि दश वर्षाणि शूकरः । अपुप्पोऽफलितो घृक्षो जायते कण्टकान्वितः ॥१९॥ फिर, बीस वर्षतक गधा, दश वर्ष शूकर और तदनन्तर फल- फलसे रहित काँटोंवाला वृक्ष होता है। ततो दावामिना दग्धः स्थाणुर्मवति कामुकः । स्थावराच परिम्रप्टो योनिप्वन्यासु गच्छति ।।१९४।। तत्पथात् वह कामलोलुप जीव दावाग्निसे दग्ध होकर कोई स्थावर बनता है और फिर स्थावर-योनिसे भी पतित होकर अन्यान्य योनियोंमें जाता है। पूर्णे यर्पसहस्रान्ते जायते ब्रह्मराक्षसः । क्षुत्पिपासापरिश्रान्तः क्रव्यादो रुधिराशनः ॥१९५॥ इस प्रकार पूरे एक सहस्र वर्ष बीत जानेपर वह भूख-प्यास- से व्याकुल तथा कच्चा मांस और रुधिर भक्षण करनेवाला ब्रह्म- राक्षस हो जाता है।
२४४
न करे और उनसे सा
तथा चित्रलिखित स्त्री
एतच्चतुष्टयं में
चित्तं शिक्रिया
खियोंके प्रति मो
यतिका चित्त अवश्य
होनेसे यह नष्ट हो जात
सुजीर्णोऽपि सुजी
मुजीर्णास्वपि क
विद्वान् बहुत वृ
भी विश्वास न करना
जीर्ण-शीर्ण चिपड़ा जुड़
मीणां तत्सहिना
क्षेमे विविक्त
जितेन्द्रिय पुरुष
स्यागकर किमी निगपद
मेगा चिन्तन करे।
."
यस्तु प्रजिता
२४७ OGRAISAGRONICOGRALIGNGRUK. 4GRICORNVEDERS । चतुर्थ प्रकरण मौन, योगसम्बन्धी आसन, योग, तितिक्षा, एकान्तशीलता, निःस्पृहता और समता-ये सात नियम एकदण्डीके हैं । दक्षस्मृती वैणवेन त्रिदण्डेन न त्रिदण्डीति चोच्यते । अध्यात्मदण्डयुक्तो यः स त्रिदण्डीति कथ्यते ॥२०॥ बाँसके त्रिदण्डसे कोई त्रिदण्डी नहीं कहा जा सकता । जो अध्यात्मदण्डसे युक्त है वही त्रिदण्डी कहा जाता है । वागादिदण्डयुक्तस्तु प्रत्यगात्मन्यवस्थितः । परे ब्रह्मणि लीनो यः स त्रिदण्डी व्यवस्थितः ॥२०१॥ वागादि इन्द्रियोंके संयमके सहित जो अपने अन्तरात्मामें स्थित होकर परब्रह्ममें लीन हो गया है वही त्रिदण्डी माना गया है । वाग्दण्डे मौनमातिष्ठेत्कर्मदण्डेऽल्पभोजनम् । मानसे तु कृते दण्डे प्राणायामो विधीयते ॥२०२॥ वाणीका संयम करनेके लिये मीन साधन करे और कर्म- संयमके लिये स्वल्पाहार करे तथा मनोदमनके लिये प्राणायामका विधान है। नारदपरिव्राजकोपनिषत्सु एको भिक्षुर्यथोक्तः स्याद् द्वितीयं मिपुनस्मृतम् । प्रयो ग्रामः समाख्यात अत ऊर्द्ध नगरायते ॥२०३।। पूर्वोक्त लक्षणोंवाला एक यति तो मिक्षु है, दो मिथुन कहे गये हैं, तीन मिल जानेपर प्रामकहलाते हैं और इनसे अधिक तो नगररूप हैं। 1 "A २५८ मुमुनुसर्पस्वसार नगरं नहि कर्तव्यं ग्रामो वा मिथुनं तथा । एतत्त्रयं प्रकुर्वाणः स्वधर्माच्यवते यतिः ॥२०५|| यतिको नगर प्राम अथवा मिथुन न करना चाहिये । इन तीनोंके करनेसे यति स्वधर्मसे घ्युत हो जाता है। राजवार्तादि वा तेषां भिक्षावार्ता परस्परम् स्नेहपैशुन्यमात्सर्य सनिकांन संशयः ॥२०६॥ यतियोंके एकत्रित हो जानेसे उनमें आपसमें राजवार्ता, मिक्षासम्बन्धी बातचीत तथा स्नेह, पिशुनता (चुगली ) और मात्सर्य (डाह ) आदि दोष उत्पन्न हो जाते हैं-इसमें सन्देह नहीं। आप्तवाक्यानि कथाचारे खले सार्थे पुरे गोष्ठे त्वसद्गृहे । निवसेन यतिः पट्सु स्थानेष्वेतेपु कहिचित् ॥२०७॥ व्यर्थ वार्तालापके अडे, खलिहान, जनसमूह, नगर, गोष्ठ और असत्पुरुपोंके घर-इन छः स्थानों में यतिको कभी न रहना चाहिये। एकवासा अवासा वा एकष्टिरलोलुपः । एक एष चरेन्नित्यं वर्षाखेकत्र संवसेत् ॥२०॥ यतिको चाहिये कि सर्वदा एकवस्त्र, वस्त्रहीन तथा एकाम- दृष्टि होकर सब प्रकारकी लोलुपता त्यागकर अकेला ही विचरे; केवल वर्षाऋतुमें एक स्थानपर रहे। जले जीवा स्थले जीवा आकाशे जीवमालिनि । जीवमालाकुले लोके वर्षास्कर संवसेत् ॥२०९।।
चतुर्थ प्रकरण २४९ PERMIERGRIENCRENUS0. GREJOING -- वर्षाऋतुमें जलमें, स्थलमें तथा जीवोंसे मरे हुए आकाशमें भी सर्वत्र जीव-हो-जीव हो जाते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण लोक जीव- मालासे व्याप्त हो जाने के कारण उस समय एक स्थानपर ही रहना चाहिये। यावद्वर्पत्यकालेऽपि यावत् क्लिना च मेदिनी । तावन विचरेद्भिक्षुः स्वधर्ममनुपालयन् ॥२१०॥ जबतक, समय न होनेपर भी, वर्षा होती हो और पृथिवी मीगी रहे तबतक अपने धर्मका पालन करते हुए भिक्षुको विचरना न चाहिये। चतुरोऽयं वसेन्मासान्द्वौ वा कौशिकवार्षिकौ । वृद्धाननुक्रमेणैव नमस्कृत्य विधानतः॥२११॥ यतिको चाहिये कि वह वृद्धोंको अनुक्रमसे विधिवत् नमस्कार करता हुआ चार महीने अपवा श्रावण और भाद्रपद दो महीने एक स्थानपर रहे। संग्रहकर्तृवचनम् वृद्धेम्यो नमस्कारानुक्रमश्व यतिधर्मसमुच्चयेदर्शितः । यतिधर्म समुच्चयमें गुरुजनोंको नमस्कार करनेका क्रम इस प्रकार दिखलाया है। देवं कृष्णं मुनि व्यासं माष्यकारं गुरोर्गुरुम् । गुरुं देवं गणाध्यक्षं दुर्गा देवी सरस्वतीम् ॥२१२॥ भगवान् कृष्ण, व्यासमुनि, भाष्यकार श्रीशंकराचार्यजी, गुरुके गुरु, गुरुदेव, गणेशजी, दुर्गादेवी तपा सरखतीजी इन्हें क्रमशः नमस्कार करे।
२५० OGRAIGOROUDGRICORREASOGReUOGRIDGELLER मुमुक्षुसर्यखसार द्वादश्यां पौर्णमास्यां वा कुर्यात्सङ्कल्पमात्मवित् । अनेन विधिना भिक्षुरापाट्यां सुसमाहितः ॥२१२।। स्थानाभावाद्वजेत्तावद्यावद्भवति पञ्चमी । प्रायश्चित्तेन युज्येत पञ्चम्यूद्ध मजेद्यदि ॥२१३॥ इस प्रकार आत्मज्ञ भिक्षु आपाढकी द्वादशी अपवा पूर्णमासी- को समाहित चित्तसे [ एक स्थानपर रहनेका ] सङ्कल्प करे तथा स्थानका अभाव होनेपर जबतक [ श्रावण कृष्णा ] पञ्चमी न आवे तबतक अन्यत्र भी जा सकता है; किन्तु यदि पञ्चमीके पीछे कहीं जायगा तो प्रायश्चित्तका भागी होगा। नासमानसहायेषु निवसेद्योगविद् कचित् । वसेत्समानशीलेषु सुशीलेषु तपस्विषु ॥२१॥ योगवेत्ता यतिको असहाय तथा जो अपने समान न हों उन लोगोंमें कभी न रहना चाहिये । उसे अपने तुल्य शीलवान् तपा सुशील तपस्त्रियोंमें ही रहना चाहिये । पिता माता वसा भ्रातास्नुपाजाया सुतस्तथा । ज्ञातियन्धुसुहृद्वगों दुहिता तत्सुतादयः ।।२१५॥ यसिन्देशे वसन्त्येते न तत्र दिवसं वसेत् । द्वेपः शोको भवेत्तत्र रागहर्षादयो मलाः ॥२१६।। पिता, माता, भगिनी, भाई, पुत्रवधू , स्त्री, पुत्र, जाति-माई, सुहद्गण, पुत्री और पुत्रीके पुत्र आदि-ये जिस स्थानपर रहते हो चतुर्थ प्रकरण २५१ CGeoNGRAINGAROGRIDEO m वहाँ एक दिन भी न रहना चाहिये, क्योंकि वहाँ रहनेसे द्वेष, शोक तथा राग एवं हर्ष आदि विकार उत्पन्न हो जाते हैं । अश्रुपातं यदा कुर्याद्भिक्षुः शोकेन चार्द्रितः । योजनानां शतं गत्वा तदा पापात्प्रमुच्यते ॥२१७॥ यदि भिक्षु शोकाकुल होकर अश्रुपात करता है सौ योजन दूर जानेपर उस पापसे मुक्त होता है । कार्तिक्यां वापयित्वातुस्नापयित्या त्रिविक्रमम् । परस्परं च सम्पूज्य क्षमयित्वा परस्परम् ॥२१८॥ आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यन् भिक्षुश्चरेन्महीम् । अन्धवत्कुब्जवद्वापि बधिरोन्मत्तपिशाचरत् ॥२१९॥ [चातुर्मास्य समाप्त होनेपर] कार्तिकी पूर्णिमापर क्षौर करा, भगवान् त्रिविक्रमको सान कराने के अनन्तर परस्पर सत्कार करके एक दूसरेसे क्षमा करावे और फिर सम्पूर्ण जीवोंको आत्मवत् देखता हुआ अन्धे, कुबड़े, बहरे, उन्मत्त अथवा पिशाचके समान पृथिवीपर विचरे। न चैकसिन्यसेद्रामे न चैकसिन् सरितटे । शून्यागारे न चैकसिन्यसेच्छ्न्यालये तथा ॥२२०॥ यह एक गाँव, एक नदीतीर, एक शून्य गृह अथवा एक ही शून्य आश्रममें कभी न रहे [अर्थात् उसे अपना निवासस्थान सर्वदा बदलते रहना चाहिये । हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्ये ख्यातः पुण्यतमः श्रुतौ । देशः सरस्वतीतीरे करोदायास्तु पश्चिमे ।।२२१॥
२५२
+ruROGRadio
मुमुक्षुसर्यवसार
OGRanauGROUGUST
दग्धं च वहिना पूर्व पवित्रीकरणाय वै ।
योगज्ञानतपोध्यानसिद्धयर्थ वै महात्मनाम् ॥२२३।।
तसिन्देशे सदा भिक्षुः स्वधर्म परिपालयन् ।
पर्यटेव सदा योगी वीक्षयन्वसुधातलम् ॥२२४॥
जिसे पवित्र करनेके लिये पूर्वकालमें अग्निसे दग्ध किया
गया था वह हिमालय और विन्ध्याचलके बीचका करोदा नदीके
पश्चिम ओर सरखती-तीरवर्ती देश महात्माओंके योग, ज्ञान, तप
और ध्यानकी सिद्धिके लिये श्रुतिमें सर्वोत्कृष्ट कहा गया है।
योगीको चाहिये कि अपने धर्मका पालन करता हुआ सर्वदा योगयुक्त
हो पृपिवीतलका निरीक्षण करता हुआ उसी देशमें विचरता रहे।
न रात्रौ न च मध्याह्ने सन्ध्ययो व पर्यटेत् ।
न शून्ये न च दुर्गे वा प्राणयाधकरे तथा ॥२२५।।
यतिको रात्रि, मध्याह्न अथवा दोनों सन्ध्याओंमें तपा शून्य,
दुर्गम एवं प्राणवाधक देशोंमें कभी भ्रमण न करना चाहिये ।
नामगोत्रादिचरणं देशं वासं श्रुतं कुलम् ।
वयो वृत्तं पलं शीलं ख्यापयेनैव सद्यतिः ।।२२६।।
सच्चे साधुको अपने नाम और गोत्रादि तपा देश, वासस्थान,
विद्या, कुल, आयु, आचार, बल और शील आदिकी प्रसिद्धि नहीं
करनी चाहिये।
स्कन्दपुराणे
गङ्गाकूले यसेन्नित्यं भिक्षुर्मोक्षपरायणः ।
सिद्ध क्षेत्रं तु विज्ञेयं यावद्धनुशतत्रयम् ॥२२॥
चतुर्थ प्रकरण
२५३
వెలగాటంగా
GROUAGRALEDGRMINGram
मोक्षमार्गमें तत्पर हुआ भिक्षु सर्वदा गंगातटपर रहे; गंगासे
तीन सौ धनुपकी दूरीतक सिद्धक्षेत्र जानना चाहिये।
भाविष्यपुराणे
ब्रह्मादिदेवलोकानां मुक्तेश्च प्राप्तये नृणाम् ।
गङ्गैव परमो हेतु: कलिकाले विशेषतः ॥२२८।।
मनुष्योंके लिये, विशेषतः कलिकालमें, ब्रह्मादि देवलोक तथा
मुक्तिकी प्राप्तिके लिये गंगा ही परम कारण है ।
मनुस्मृती
संरक्षणार्थ जन्तूनां रात्रावहनि वा सदा ।
शरीरस्यात्यये चैव समीक्ष्य वसुधां चरेत् ॥२२९॥
शरीर क्षीण हो जानेपर भी जीवोंकी रक्षाके लिये रात्रि अथवा
दिनके समय सर्वदा पृथिवीकी ओर देखते हुए ही भ्रमण करे ।
दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं पिबेजलम् ।
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥२३०॥
दृष्टिसे पवित्र करके चरण रखे, यखसे पवित्र करके जल
पिये, सत्यसे पवित्र हुआ वचन बोले तथा अन्तःकरणसे पवित्र
माना हुआ आचरण करे।
महाभारते
आरमोत्कर्ष न मार्गेत परेषां परिनिन्दया ।
खगुणैरेव मार्गेत विप्रकर्ष पृथगजनात् ॥२३१॥
२५४ GREJONGRALEDGERIODGRANUSSRPSCIENCEISI मुमुक्षुसर्वस्वसार दूसरोंकी निन्दा करके अपना उत्कर्ष दिखाना न चाहे बल्कि अपने गुणोंसे ही अन्य पुरुषोंकी अपेक्षा उन्नत होनेका प्रयत्न करे। निर्गुणास्त्वेव भूयिष्ठमात्मसम्माविता नराः । दोपैरन्यान् गुणवतः क्षिपन्त्यात्मगुणक्षयात् ।।२३१॥ अपनेको बहुत बड़ा माननेवाले गुणहीन पुरुष ही अपना गुण क्षीण हो जानेके कारण दोपोंके आरोपसे अन्य गुणवानोंपर आक्षेप किया करते हैं। अब्रुवन् कस्यचिनिन्दामात्मपूजामवर्णयन् । विपश्चिद्गुणसम्पन्नः ग्रामोति सुमहद्यशः ॥२३२॥ विद्वान् और गुणवान् पुरुष किसीको निन्दा तया अपनी पूजाका बखान न करके ही अति महान् यश प्राप्त कर लेता है। आकाशस्था ध्रुवं यत्र दोपं घूयुर्विपश्चिताम् । आत्मपूजाभिकामो बै को सेचत्र पण्डितः ॥२३॥ आकाशवासी देवता जिस कर्ममें विद्वानोंके लिये अवस्य दोर बतलाते हैं भला, उसीमें अपनी प्रशंसाकी इच्छासे कौन विवेकी पुरुष प्रवृत्त हो सकता है। मध्यस्थ एव तिष्ठेत प्रशंसानिन्दयोः समः । एतत्पवित्रं परमं पारिव्राजक आश्रमे ॥२३४।। प्रशंसा और निन्दामें समान रहकर सदा उदासीन मायसे ही रहे । संन्यासाश्रममें यही सबसे बढ़कर पवित्र है। ।
चतुर्य प्रकरण PrerienceutOGaGreuone प्रत्यक्षे गुणवादी यः परोक्षे चापि निन्दकः । स मानवः खवल्लोके नष्टलोकपरावरः ॥२३५।। जो पुरुष सामने गुण बखान करनेवाला और पीछे निन्दा करनेवाला होता है यह संसारमें कुत्तेके समान है। उसके इह- लोक और परलोक दोनों ही नष्ट हो जाते हैं। तागजनशतस्यापि यद्ददाति जुहोति च । परोक्षेणापवादी यस्तनाशयति तत्क्षणात् ॥२३६।। ऐसे सैकड़ों पुरुपोंको भी जो कुछ दिया अपया हवन किया जाता है उसे यह पुरुष, जो पीछे निन्दा करनेवाला है, उसी क्षण नष्ट कर देता है। तसाव्यानो नरः सद्यस्तादृशं पापचेवसम् । वर्जयेत्सापुभिर्वज्यं सारमेयामिपं यथा ॥२३७॥ अतः पुद्धिमान् पुरुषको ऐमे पापात्माका तत्काल त्याग कर देना चाहिये जिस प्रकार कि कुत्ते का मांस सत्पुरपोंके लिये सदा हो स्याग करनेयोग्य है। तं स्वकर्माणि कुर्वाणं प्रतिकतुं य इच्छति । मसाट वादिः खरो रजसि मजति ॥२३८॥ अपने धोका पाउन करनेवाले उस महारमारा जो पुरुष अपकार करना चाहता है वह महबुद्धि ग्वा मानो राखी देरी अपश डिमें रोटता है।
! २५६ OGANDGhaUDGPLOGROLOGROGRIDERLUSH मुमुक्षुसर्वस्वसार संग्रहकर्तृवचनम् एवं श्रुत्यादिवाक्यानि धर्माणां योधकानि वै । यतेर्यमप्रधानानां संगृहीतानि खलिह ॥२४०॥ इस प्रकार यहाँ यतियोंके यमप्रधान धमोंका बोध करानेवाले श्रुति आदिके वाक्योंका संग्रह किया गया है। अथ संन्यासिधर्माणां प्रायेण नियमात्मनाम् । योधकान्यपिवाक्यानि गृहामीह समासतः ॥२४॥ अब मैं प्रायः संन्यासियोंके नियमात्मक धोको सूचित करनेवाले ऋषिवाक्योंका यहाँ संक्षेपसे संग्रह करता हूँ। मेधातिथिस्मृती मिक्षाटनं तपो ध्यानं स्नानं शोचं सुरार्चनम् । फर्तव्यानि पढेतानि यतीनां नृपदण्डवत् ॥२४२॥ भिक्षाटन, तपस्या, ध्यान, स्नान, शीच और देवपूजन- उ: कोंका यतियोंको राजदण्डके समान पाठन करना चाहिये। शौचविधि मनुस्मृती मृयोधारममुत्सर्ग दिवा कुर्यादुदहमुखः । दविवामिमुग्यो रात्री सन्ध्यपोच यया दिवा ॥२।३।। पतिको दिनमै समय उत्तरमुख और रात्रि समय चतुर्थ प्रकरण २५७ roGR360GROUNRNIROGROLOGROLARGreen दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्र त्याग करना चाहिये तथा दोनों सन्च्याओंमें दिनके अनुसार हो करना चाहिये । छायायामन्धकारे वा रात्रावहनि वा द्विजः । यथासुखमुखः कुर्यात्प्राणवाधभयेपु च ॥२४॥ किन्तु छायामें, अन्धकारमें, अथवा प्राणसंकट या भय उपस्थित होनेपर द्विजको, रात्रि हो अथवा दिन, अपने सुभीतेके अनुसार मुख करना चाहिये । न मूत्रं पथि कुर्वीत न भसनि न गोबजे । न फालकृष्टे न जले न चित्यां न च पर्वते । न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदाचन ॥२४५॥ मार्ग, भस्म, गोशाला, हलसे जोते हुए खेत, जल, चिता, पर्वत, पुराने देवालय तथा वल्मीकमें कभी मूत्रत्याग न करे । न ससत्त्वेषु गर्तेपु न गच्छन्नापि च स्थितः । न नदीतीरमासाद्य न च पर्वतमस्तके ॥२४६।। इसी प्रकार जीवोंसे भरे हुए गड्ढेमें, चलते-चलते, खड़ा होकर अपवा नदीके तीरपर पहुँचकर या पर्वतशिखरपर भी [ मूत्रत्याग न करे । वायग्निविप्रमादित्यमपः पश्यंस्तथैव गाः। न कदाचन कुर्शत विण्मूत्रस्य विसर्जनम् ।।२४७॥ वायु, अग्नि, ग्राभग, सूर्य, जल तपा गौकी और देखते हुए भी कभी मल-मूत्र त्याग न करे ।
२५८ OGAMINORIANGRaste मुमुक्षुसर्य स्वसार प्रत्यग्निं प्रति सूर्य च प्रति सोमोदफद्विजान् । प्रति गां प्रति वातं च प्रज्ञा नश्यति मेहतः ॥२४॥ अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, जल, माझण, गो और यायुयी ओर मुंह करके मूत्र करनेयालेकी युद्धि नष्ट हो जाती है। आसवाश्यम् ग्रतहस्तं परित्यज्य मूत्रं कुर्याजलाशयात् । शतद्वये पुरी तु तीर्थे पैर चतुर्गुणम् ।।२४९॥ जलाशयसे सो हाय दरीपर मन और दो शो हाप दूरीपर मल त्याग करना चाहिये तथा नीर्यस्यानमें इससे चौगुनी दूरीपर करना चाहिये। विष्णुपुराणे पन्मीकम्पकोत्मात मृदमन्नर्जला तया । गौधारशिष्टां गेहाग मृदं गौर सिर्जयत् ।।२५०।। यमीक (योथी) की, पोंकी गंदी हा, जय माताकी, शोधकर्ममे बची हां नया घरसे ली हुई मृतिका शोधकर्ममें न टेना चाहिये। आमवाक्यम् अन्नप्राप्युपपा च हलोल्यानां भवत् । जिम, मकर नीद हो नपा जी हलम पनी गदा कि मोदनवन माना चाहिये।
चतुर्थ प्रकरण २५९ GOLUGOGGLINGautOGRAMJORGratioOGRLICINGOLI. यस्मिन् देशे च यत्तोयं या च यत्र च मृत्तिका । सैव तत्र प्रशस्ता स्थाचया शौचं विधीयते ॥२५॥ जिस देशमें जैसा जल हो और जहाँ जैसी मृत्तिका हो वहाँ वही प्रशस्त मानी गयी है और उसीसे शौचकर्म करनेका विधान है। तीर्थे शौचं न कुर्वीत कुर्वीतोद्धृतवारिणा । तीर्थमें शौचकर्म नहीं करना चाहिये, चल्कि जलाशयसे बाहर निकाले हुए जलसे ही करे । मनुस्मृती एका लिङ्गे गुदे तिस्रस्तथैकत्र करे दश । उभयो:सप्त दातव्या मृदः शुद्धिमभीप्सता ॥२५२॥ शुद्धि चाहनेवाले मनुष्यको लिझमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हापमें दश बार और दोनों हापोंमें सात बार मिट्टी टगानी चाहिये। एतच्छौचं गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् । त्रिगुणं साइनस्थानां यतीनां च चतुर्गुणम् ॥२५३।। यह तो गृहस्योंका शौच है । इससे दूना ब्रह्मचारियोंका, तिगुना यानप्रसोंका और चौगुना यतियोंका होता है। यापनापत्यमेघ्याक्ताद्न्यो लेपश्च वत्कृतः । तारन्मृद्वारि चादेयं सासु द्रव्यशुद्धिषु ।।२५४॥ जबतक अपवित्र पदार्थयुक यस्तुसे उसका लेप और दुर्गन्ध २६० मुमुक्षुसर्यवसार .2GuaceuoNIOGRIDGurmanane दूर न हो तबतक ऐसी समस्त वस्तुओंकी शुद्धिके लिये मृत्तिका और जलका प्रयोग करना चाहिये । स्मृतयः धर्मविदक्षिणं हस्तमधः शौचेन योजयेत् । तथैव वामहस्तेन नामरुध्वं न शोधयेत् ॥२५५।। प्रकृतिस्थितिरेपा सात् कारणादुमयक्रियाः ॥२५६।। धर्मज्ञ पुरुष अधोभागकी शुद्धि करनेमें दोये हापका प्रयोग न करे तपा नाभिसे उपरके भागका शोधन यायें हापरी न करें। यह तो सामायिक स्थिति है, किन्तु कारणविशेषरो में दोनों क्रियाएँ भी की जा सकती हैं। पदिया विहितं शांचं तदई निशि कीर्तितम् । ठदमातुरे प्रोक्तमातुरस्साईमप्यनि ।।२५७॥ दिनमें जितने सोचका विधान है उसगे आधा रागिने बताया गया है, तप उसमे आधा रुग्णायमा और गायणा. से आया मार्ग कसा है। दन्तधावन विधि हर पपुषितं नित्यं मदत्यप्रयतो नरः। तसात्मवयसेन मालियानम् ॥२८॥ मुम्ने बानी हो जानेर नियही मय प्राता म.को मर शर का दानशन यानी २६१ OGRIDGUSIGNISOGratisGRELIEOGRUCRGRELIEDO चतुर्थ प्रकरण कण्टकिक्षीरवृक्षोत्थं द्वादशाङ्गुलमत्रणम् । कनिष्ठाग्रसमं स्थूलं सकूर्चत्वगपर्वकम् ।।२५९॥ जो काँटेवाले या दूधवाले वृक्षसे ली गयी हो, बारह अंगुल लम्बी और व्रणहीन हो, कनिष्ठा अंगुलीके बराबर मोटी हो, सिरेपर कुचीवाली हो तपा छालयुक्त और प्रन्थिरहित हो । नृसिंहपुराणे अलाभे दन्तकाष्ठस्य प्रतिपिद्धे तथा दिने । अपां द्वादशगण्डूपर्मुखशुद्धिर्भविष्यति ॥२६॥ यदि दन्तधावन न मिले अपवा दन्तधावनके लिये प्रतिपिद्ध दिवस आजाय तो जलके बारह करनेसे मुखकी शुद्धि हो जायगी। संग्रहकर्तृवचनम् निपिद्धदिनानि च स्कन्दपुराणे दर्शितानि तथा च काशीखण्डे- निषिद्ध दिनोंका स्कन्दपुराणमें दिग्दर्शन कराया है, जैसा कि काशीखण्डमें कहा है- प्रतिपदर्शपष्ठीपु नवम्यां रविवासरे। दन्तानां काष्ठसंयोगो दहेदासप्तमं कुलम् ॥२६॥ प्रतिपदा, अमावस्या और पष्टी तिथिमें, तया नवमी और रविवारके दिन दाँतोंका काष्ठसे हुआ संयोग सातवीं पीढ़ीतक कुलको ध्वंस कर देता है।
२६२ मुमुक्षुसर्वखसार OGLEDGEOGROGracrediOGRALSOGREASON दन्तधावनार्थ यानि द्रव्याणि च याज्ञवल्क्येनोक्तानि- दन्तधावनके लिये जो द्रव्य वर्जित हैं उनका वर्णन याज्ञवल्क्यजीने इस प्रकार किया है- याज्ञवल्क्यस्मृती इटिकालोष्टपापाणैर्नखैरङ्गुलिभिस्तथा मृत्काचानामिकाङ्गुष्ठान वर्जयेद्दन्तधावने ॥२६॥ इंट, ढेला और पापाण तथा नख, अंगुठी, मृत्तिका, काँच, अनामिका और अंगुष्ट-इनका दन्तधायनमें त्याग करे । स्नानविधि पराशरस्मृती सानानि पश्च पुण्यानि कीर्तितानि मनीपिमिः । आग्नेयं वारुणं ब्राह्मथ वायव्यं दिव्यमेव च ॥२६॥ मनीपियोंने आग्नेय, यारुण, ग्राह्मय, यायव्य और दिव्य-ये पाँच प्रकारके मान बतलाये हैं। आमेयं भसना स्नानम्यगास तु वारणम् । आपोहि ऐतिच मामय वायव्यं गोरजः स्मृतम् ॥२६४।। मम्मसान आग्नेय है, जहमें यकी लगाकर नहाना थारून मान है, 'आपो हि ष्टा' इत्यादि [मन्त्रसे मार्जन करना) पापमान है तथा गोरज वापन्यमान माना गया है। पतु मानपयग तल्लानं दिव्यमुच्यते । तत्र स्नात्वा च गहाय खातो भवति मानवः ॥२६५|| , चतुर्थ प्रकरण २६३ OGrauENGRALICIOGREVERGROUGOGROLISOGROLLOD. जो स्लान धूपमें बरसते हुए जलसे किया जाता है वह दिव्य कहलाता है । उसमें मान करनेसे मनुष्य मानो गङ्गामें सान कर लेता है। व्यासस्मृती चतस्रो घटिकाः प्रातररुणोदय उच्यते । यतीनां स्नानकालोऽयं गङ्गाम्भासदृशः स्मृतः॥२६६॥ प्रातःकालकी चार घड़ियाँ अरुणोदय कहलाती हैं । यतियोंके लिये यही सानका समय है, यह गङ्गास्नानके समान माना गया है। कपिलस्मृती प्रातःलाने त्वशक्तश्चेत्कापिलं स्नानमाचरेत् । तत्राप्यसामर्थ्ययुक्त मन्त्रस्नानं विधीयते ॥२६७॥ यदि प्रातःसानमें असमर्थ हो तो कापिलस्नान करे और जो उसमें भी समर्थ न हो उसके लिये मन्त्रमानका विधान है। नाभेरधः प्रविश्याप्सु कटिं प्रक्षाल्य मृज्जलैः। जलाकर्पटेनाङ्गशोधनं कापिलं स्मृतम् ।।२६८।। नाभिसे नीचेका भाग जलमें डुबोकर कटिभागको मृत्तिका और जलसे धोकर जलमें भीगे हुए कपड़ेसे शरीरको शुद्ध कर लेना कापिलनान कहलाता है। सायंप्रातरसामर्थ्य सायमेवाथवा परिवर्त्य च कौपीनं मन्त्रलानं विधीयते ॥२६९।। पुनः।
२६४ मुमुक्षुसर्यससार OGROLAGAGRATOGRAGOGRAMOGRAUGGUANGREAKo+ सायंकाल और प्रातःकाल दोनों समय अथवा सामर्थ्य न हो तो केवल सायंकालको ही कौपीन बदलकर मन्त्रमान किया जाता है। पराशरस्मृती चक्षुरोगी शिरोरोगी कण्ठरोगी कफाधिकः । कण्ठस्नानं प्रकुर्मीत शिरम्लानफलं लभेत् ॥२७०॥ जो नेत्र, शिर या कण्ठका रोगी हो अथवा जिसे कफ अधिक हो वह कण्ठतक ही स्नान करे । इससे ही उसे शिरसे स्नान करनेका फल मिल जाता है । स्नानेऽप्यशक्तः स्नायीत नित्यमुष्णेन वारिणा । तैलाभ्यङ्गो न दुष्येत वणिनां वातरोगिणाम् ॥२७१॥ जिसे स्नान करनेकी सामर्थ्य न हो वह सर्वदा गर्म जलसे स्नान करे । जो व्रणयुक्त अथया यातके रोगी हैं उन [ यतियों ] के लिये तैल मलनेमें भी कोई दोप नहीं है। आचमनविधि शवस्मृती दक्षिणं तु करं कृत्या गोकर्णाकृतिवत्पुनः । मापमजनमात्रास्तु सगृह्य त्रिः पिवेदपः ॥२७२॥ दायें हाथको गौके कानके समान आकृतिवाला करके फिर उसमें उड़द डूब सकने योग्य जल लेकर तीन बार जलपान करे।
GRIDERMA . चतुर्थ प्रकरण २६५ यतिश्च ब्रह्मचारी च नाचमेच्चमवारिणा। वानप्रस्थो गृहस्थश्च दैवे पिव्ये च कर्मणि ॥२७३॥ यति और ब्रह्मचारीको चर्मपात्रके जलसे आचमन नहीं करना चाहिये तथा वानप्रस्थ और गृहस्थ भी देवता और पितृगणसम्बन्धी कर्ममें उससे आचमन न करें। मनुस्मृती सुप्त्याक्षुत्वा च भुक्त्वा च निष्ठीव्योक्त्यानृतानि च । पीत्वापोऽध्येश्यमाणश्च आचामेत्प्रयतोऽपि सन् ॥२७४॥ सोने, छींकने, भोजन करने, थूकने, [भूलसे ] अन्त भाषण करने और जल पीनेपर तथा अध्ययनके लिये उद्यत होनेपर सावधान होकर आचमन करे । शातातपस्मृती दन्तलग्ने फले मूले अप्सु यागाहुतीषु च । स्नेहे सोमे चेक्षुदण्ड नैघोच्छिष्टो भवेद्विजः ॥२७५।। फल, मूल, जल, यज्ञकी हषि, घृत, सोम और ईख-इनके दाँतोंमें लगे रहनेपर भी द्विज उच्छिष्टयुक्त नहीं होता। स्पृशन्ति विन्दवः पादौ य आचामयतः करात् । न तैरुच्छिष्टभावः स्यात्तुल्यास्ते भूमिगैः सह ॥२७६॥ आचमन करते समय यदि हायसे गिरी हुई बूंदें चरणोंका स्पर्श करें तो उनसे उच्छिष्टताको प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि वे तो पृथिवीपर पड़ी हुई बूंदोंके समान होती हैं ।
मुमुक्षुसखसार
OCARPENIORGationGRAINER
याज्ञवल्क्यस्मृती
जपश्च द्विविधः प्रोक्तो चाचिको मानसस्तथा ।
वाचिकोपांशुरुचैश्च द्विविधः परिकीर्तितः॥
जप वाचिक और मानसिक दो प्रकारका बतला
उनमें वाचिक उपांशु और उच्च दो प्रकारका कहा गया है
उधैर्जपादपांशुध सहस्रगुण
उच्यते ।
मानसश्च तथोपांशोः सहस्रगुण उच्यते ॥
उच्च जपसे उपांशु सहसगुण कहा जाता है तथा
जप उपांशुसे भी सहस्रगुण है।
आप्तवाक्यम्
यस्तु द्वादशसाहस्रं नित्यं प्रणवमम्यसेत् ।
तस्य द्वादशमासैस्तु परं ब्रह्म प्रकाशते ॥२०
जो पुरुप नित्यप्रति बारह हजार प्रणवका जप कर
उसके प्रति बारह मासमें ही परब्रह्म प्रकाशित हो जाता है।
यः शब्दो योधजननः परेषां शृण्वतां स्फुटम् ।
स्वाध्यायो वाचिकः प्रोक्त उपांशोरथलक्षणम् ।।२०
ओष्ठयोः स्पन्दमात्रेण परस्याशब्दयोधका ।
उपांशुरेष निर्दिष्टः साहसो याचिकाअपात् ॥२०
जो शन्द दूसरे सुननेवालोंको स्पष्ट बोध करानेवाला
वह वाचिक खाध्याय (जप) कहलाता है । उपांशुका लक्षण
चतुर्थ प्रकरण २६९ OGRAPGRAIGAGINIOGRNINGMUSDGalGLISH है--ओठोंके स्पन्दनमात्रसे जो दूसरोंको शब्दका ज्ञान नहीं कराता वह उपांशु जप कहलाता है। यह वाचिक जपसे सहस्रगुण है। ध्यानविधि शून्यागारे गुहायां वा पर्वतेषु वनेषु च । तत्रासीनः प्रसन्नात्मा ध्यान विधिपदाचरेत् ॥२८९॥ शून्य मन्दिर, गुहा, पर्वत अथवा वनोंमें बैठकर प्रसन्नचित्तसे विधिपूर्वक ध्यानका अभ्यास करे । अझोपनिषदि आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोचरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ।।२९०॥ आत्माको नोचेकी अरणी तथा प्रणवको ऊपरकी अरणी बनाकर ध्यानरूप मन्थनके अभ्याससे भगवान्को अपनेमें छिपा हुआ-सा देखे । नमस्कारविधि यो भवेत्पूर्वसंन्यासी तुल्यो चै धर्मतो यदि । तस्मै प्रणामः कर्तव्यो नेतरस्मै कदाचन ॥२९॥ जो अपनेसे पहले संन्यासी हुआ हो और धर्ममें अपने समान हो उसीको प्रणाम करना चाहिये, और किसीको कदापि न करे ।
२६८ OGROLAGAGRUDURGUNReucoccusaarak मुमुक्षुसर्वस्वसार याज्ञवल्क्यस्मृती जपथ द्विविधः प्रोक्तो याचिको मानसस्तथा । याचिकोपांशुरुचैश्च द्विविधः परिकीर्तितः ।।२८४ जप वाचिक और मानसिक दो प्रकारका बतलाया है उनमें याचिक उपांशु और उच्च दो प्रकारका कहा गया है। उर्जपादुपांशुश्च सहस्रगुण उच्यते । मानसथ तथोपांशोः सहस्रगुण उच्यते ।।२८५।। उच्च जपसे उपांशु सहस्रगुण कहा जाता है तथा मानस जप उपांशुसे भी सहस्रगुण है। आप्तवाक्यम् यस्तु द्वादशसाहस्रं नित्यं प्रणयमभ्यसेत् । तस्य द्वादशमासैस्तु परं ब्रह्म प्रकाशते ॥२८६॥ जो पुरुप नित्यप्रति बारह हजार प्रणयका जप करता है उसके प्रति बारह मासमें ही परब्रह्म प्रकाशित हो जाता है। यः शब्दो बोधजननः परेपां शृण्वतां स्फुटम् । स्वाध्यायो वाचिकः प्रोक्त उपांशोरथलक्षणम् ॥२८॥ ओष्ठयोः स्पन्दमात्रेण परस्साशब्दयोधकः । उपांशुरेप निर्दिष्टः साहसो पाचिकाजपाद ।।२८८४१ जो शब्द दूसरे सुननेवालोंको स्पष्ट बोध करानेयाला होता है वह वाचिक साध्याय ( जप) कहलाता है। उपांशुका लक्षण यह २६९ OGRUNGALOORNINGINGREOGRADGUED चतुर्थ प्रकरण है-ओठोंके स्पन्दनमानसे जो दूसरोंको शब्दका ज्ञान नहीं कराता वह उपांशु जप कहलाता है । यह वाचिक जपसे सहस्रगुण है। ध्यानविधि शून्यागारे गुहायां वा पर्वतेषु धनेषु च । तत्रासीनः प्रसन्नात्मा ध्यानं विधिपदाचरेत् ॥२८९॥ शून्य मन्दिर, गुहा, पर्वत अथवा वनोंमें बैठकर प्रसन्नचित्तसे विधिपूर्वक ध्यानका अभ्यास करे । ब्रह्मोपनिषदि आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाम्यासाद्देवं पश्येनिगूढवत् ॥२९॥ आत्माको नोचेकी अरणी तथा प्रणवको ऊपरकी आणी बनाकर ध्यानरूप मन्यनके अभ्याससे भगवान्को अपनेमें छिपा हुआ-सा देखे। नमस्कारविधि यो भवेत्पूर्वसंन्यासी तुल्यो वै धर्मतो यदि । तस्मै प्रणामः कर्तव्यो नेतरस्मै कदाचन ॥२९१॥ जो अपनेसे पहले संन्यासी हुआ हो और धर्ममें अपने समान हो उसीको प्रणाम करना चाहिये, और किसीको कदापि न करे।
२७० मुमधुसखसार भिक्षाविधि याज्ञवल्क्यस्मृती अप्रमत्तबरेश सायाद्वेऽनभिलक्षितः। रहिते भिक्षुकामे यात्रामात्रमलोलपः ॥२९॥ जिसमें अधिक भिक्षुक न रहते हों उस गाँवमें अपशिष्ट रहकर लोलुपता और प्रमाद न करते हुए केवल शरीररक्षणा सायंकालमें भिक्षाटन करे। मनुस्मृती न चोत्पादनिमिचाम्यां न नक्षत्राविषया। नानुशासनबादाम्यां भिक्षां लिप्सेत कहिलिद ॥२९॥ [भूकम्प आदि] उत्पातक निमित्त और नक्षत्र एवं [अंगरेगा आदि शारीरिक चित्रों फल दिगराकर तथा उपदेश और भावार्थद्वारा कमी मिक्षा पाने का सोम न करें। अमिानितलामांन्तु जुगुप्तव मशः । अमिजिनलामय यनिर्मुक्तोऽपि मध्यनं ॥२९४।। पदि कोई पदार्य आदरपूर्वक प्राग होते हों तो उना गर प्रभार निग़दर ही करें, क्योंकि मावारकी मानिरी सोपरि मुक्त होनेर मी, पुनः बन्धनों पर जाना है। एककालं गोयं न प्रमजेत रिमां। म प्रमनी हि पतिपिपि मज ॥२१५||
GraGraiDGANESGRRIEDGREJO
चतुर्थ प्रकरण
२७१
MUSGRRI.
केवल एक समय ही भिक्षाटन करे, भिक्षाके विशेष विस्तारमें
आसक्त न हो । जो यति भिक्षामें ही आसक्त होता है उसका
विषयों में भी राग हो जाता है।
दत्तात्रेयस्मृती
याचितायाचिताम्यांच भिक्षाभ्यां कल्पयेत्स्थितिम् ।
माधुकरं याचितं स्यात्प्राप्रणीतमयाचितम् ।।२९६॥
यतिको याचित और अयाचित दो प्रकारकी भिक्षाओंसे ही
निर्वाह करना चाहिये । इनमें माधुकरी याचित भिक्षा है और
प्राक्प्रणीत (माँगनेसे पहले प्राप्त हुई मिक्षा) अयाचित कहलाती है।
उशनःस्मृती
माधुकरमसङ्कटतं प्राप्रणीतमयाचितम् ।
तात्कालिकं चोपपन्नं भैक्ष पञ्चविधं स्मृतम् ॥२९७॥
विना सङ्कल्पके प्राप्त हुआ माधुकर, प्राक्प्रणीत, अयाचित,
तात्कालिक और उपपन्न-यह पाँच प्रकारकी मिक्षा मानी गयी है।
मनःसङ्कल्परहितान् गृहांस्त्रीन्पश्च सप्त वा ।
मधुवदाहरणं यत्तन्माधुकरमिति स्मृतम् ॥२९८॥
मधुकर जैसे भिन्न-भिन्न पुप्पोंसे मधु ले आता है उसी
प्रकार जिनका मनमें कोई सङ्कल्प न हो ऐसे तीन, पाँच या सात
घरोंसे, भिक्षा माँग लाना 'माधुकर' कहलाता है।
शयनोत्यापनात्याग्यत् प्रार्थितं भक्तिसंयुतः।
तत्याप्रणीतमित्याह भगवानुशना मुनिः॥२९९॥
२७२ मुमुक्षुसर्यम्बसार .DIOParelum Incounter सोनेसे उठनेके पूर्व ही जो भक्तिसम्पन्न पुरुषोंद्वान प्रार्थित होती है उसे भगवान् उशना मुनिने 'प्राक्प्रणीत' कहा है मिक्षाटनसमुद्योगात्साकेनापि निमन्त्रितम् । अयाचितं तु तद्भक्षं मोक्तव्यं मनुरब्रवीत् ।।३००|| भिक्षाटनके उद्योगसे पूर्व ही यदि कोई निमन्त्रित कर दे तो उसे 'अयाचित' कहते हैं । मनुजीने वह मिक्षा ग्रहण करनेयोग्य बतलायी है। उपस्थानेन यत्प्रोक्तं भिक्षार्थ ब्राह्मणेन हि । तात्कालिकमिति ख्यातं तदत्तव्यं मुमुक्षुणा ॥३०१॥ जब कोई ब्राह्मण [ भिक्षाटनकालमें ] अपने समीप आकर मिक्षाके लिये कहे तो उसे 'तात्कालिक' भिक्षा कहा है । मुमुक्षुको उसे ग्रहण करना चाहिये। सिद्धमन्नं भक्तजनैरानीतं यन्मठं प्रति। उपपन्नं तदित्याहुर्मुनयो मोक्षकासिणः ॥३०२|| जिस सिद्ध (पके हुए ) अन्नको भक्तजन अपनी कुटीपर ही ले आवे उसे मोक्षकामी मुनियोंने 'उपपन्न' बतलाया है । भिक्षाः पञ्चविधा घेताः सोमपानसमाः स्मृताः । तासामेकतमयापि वर्तयन् सिद्धिमाप्नुयात् ॥३०३॥ ये पाँच प्रकारकी भिक्षाएँ सोमपानके समान ही मानी गयी हैं । उनमेंसे किसी एकका भी आश्रय देनेसे पुरुष सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
चतुर्थ प्रकरण
२७३
OGRUERGauaa
+ASOLUERGRIDGRess
।
संवर्तस्मृती
अष्टौ भिक्षाः समादाय स मुनिः सप्त पञ्च वा ।
अद्भिःप्रक्षाल्य ताः सर्वास्ततोऽश्नीयाच्च वाग्यतः॥३०४॥
वह मुनि आठ, सात अथवा पाँच घरकी भिक्षा लाकर
उन सबको जलसे धोवे और फिर मौन होकर भोजन करे।
याज्ञवल्क्यस्मृती
सम्भवे बहुगेहानां न तु तेष्वेव नित्यशः ।
भिक्षाटनमुपक्रम्य कचिल्लोभेन मैक्षक् ।
नातिक्रमेद्गृहं मोहाद्यत्र बाधो न विद्यते ॥३०५॥
भिक्षुकको चाहिये कि वहुत-से घर होनेपर लोभवश नित्य-प्रति
उन्हीं-उन्हीं घरोंमें [जहाँ भिक्षा मिलती हो] भिक्षाटन करता हुआ,
मोहवश ऐसे किसी घरका कभी उल्लंघन न करे जहाँ किसी प्रकारको
बाधा न हो।
गृहातिक्रमणं कुर्याद्या लोभादिना पतिः।
प्राणायामशतं कुर्यात्प्रायश्चित्तं तथा यतिः ॥३०६॥
जब लोभादिके कारण यति घरोंका अतिक्रमण करे तो उसे
सौ प्राणायाम और उसका प्रायश्चित्त करना चाहिये ।
दत्तात्रेयस्मृती
भिक्षाटने त्रियः काश्विन्ट्रोत्रियाणां गृहे गृहे ।
तासां विलोकनं कार्य यथा मातुःखसुस्तथा ॥३०७॥
HDGADE
२७४
मुमुक्षुसर्यस्वसार
OGRAPGADGAOGENIORun
भिक्षाटनके समय, श्रोत्रिय प्राह्मणोंके घर-घरमें जो त्रियों
रहती हैं उन्हें माता और भगिनीके समान देखना चाहिये।
आत्मसम्मितमाहारमाहरेदात्मवान् यतिः।
अत्यन्तशुधितस्यापि समाधिनव जायते ॥३०॥
जितेन्द्रिय यतिको अपने पोषणयोग्य आहार ले आना चाहिये,
क्योंकि अत्यन्त भूग्वे मनुष्यको भी समाधि सिद्ध नहीं हो सकती।
यमस्मृती
आहारस्य चतुर्मागमदं पाप्याहरेद्यतिः।
पुपा चैयारुजः शक्तः प्रसङ्ग तत्र पर्जयेत् ।।३०९॥
गुया, नीरोग तपा शकिसम्पन्न यतिको अपने आहारका
चौपाई या आधा भाग ही नाना पाहिये; भोजनकी आलिया
सदा ही त्याग करें।
अममगादलं दो पियामक्तिरेव च ।
कामः कोपनया लोमः पतनं नरक तथा ॥३१०॥
मोजनकी आसकिसे वर, अभिमान और विषयासकारी
है तथा उसी में काम, क्रोध, टोम और नरक पतन भी होगा।
अधिरमतों
अनिन्य व प्रजाई निन्यं गई तु पयेत् ।
अनानं विद्यारि गेई नकात प्रचंद ॥३१॥
चतुर्थ प्रकरण GROGRAM GENERGREE H जो घर निन्दनीय न हो उसीमें [भिक्षा माँगनेके लिये] जाय-निन्दनीय घरका सर्वदा त्याग करे । जो द्वार खुला हुआ हो उसीमें प्रवेश करे-बन्द घरमें कभी न जाय । न वीक्ष्येद्वाररन्ध्रेण भिक्षा लिप्सुः कचिद्यतिः । न कुर्याद्वै कचिद्घोपं न द्वारं ताडयेत् कचित् ॥३१२॥ यतिको भिक्षाके लोमसे कहीं द्वारके छेदमें होकर नहीं झाँकना चाहिये। उसे कभी किसी प्रकारका शब्द भी नहीं करना चाहिये और न कहीं दरवाजा ही खटखटाना चाहिये । मेधातिथिस्मृती अकार्पण्यं तु बह्वनं मन्यन्ते यत्र मानवाः । निरीक्ष्यन्ते त्वनुद्विमास्तद्गृहं घनतो ब्रजेत् ॥३१३॥ जिस घरके लोग उदारताको ही बहुत बड़ा अन्न मानते हों और कभी उदास न दिखायी देते हों उसमें यतिको प्रयत्नपूर्वक जाना चाहिये। शौनकस्मृती पीडयित्वापि स्वात्मानमल्पानं सम्प्रयच्छति । सा भिक्षा हिंसिता शेया तादृशी पर्जयेद्यतिः॥३१४॥ यदि कोई अपने चित्तको पीडित करके पोड़ा-सा अन्न दे भी दे तो वह भिक्षा हिंसायुक्त मानी जाती है। ऐसी भिक्षाक यतिको त्याग करना चाहिये ।
OGRAPanews २७६ मुमुक्षुसर्यवसार UDGEOGRAINERUEnt पश्चाहं सप्तरात्रं वा यत्र मिक्षा न लभ्यते । सद्गृह वर्जयेनिक्षुधाण्डालगृहवत्सदा ॥३१५|| जिस घरमें पाँच दिन या सात रात्रि भिक्षा न मिले उसका भिक्षुको चाण्डालके घरके समान सर्वदा त्याग करना चाहिये । अविस्मृती गोदोहममपाकं वा सक्तपेपणमेव वा। एक कालं प्रतीक्षेत दर्शनेन मिना यतिः॥३१६॥ यदि कोई घरका पुरुष दिखायी न दे तो यतिको गोदोहन, [एक भिक्षाके योग्य ] अन्नपाक अपया सत् पीसनेके कालपर्यन्त प्रतीक्षा करनी चाहिये। क्षणमेकं न तिष्ठेद्वै गृहिणो दर्शनाधतिः । ससम्भ्रमं च नेक्षेत भिक्षादानार्थमुत्तमम् ॥३१७॥ किन्तु गृहीको देख लेनेपर तो यतिको एक क्षण भी नहीं ठहरना चाहिये । और किसी उत्तम गृहस्थकी ओर भिक्षादानके लिये सम्भ्रम ( उत्सुकता) पूर्वक देखना भी नहीं चाहिये । न कुप्येन च कम्पेत न हृष्येनैव कुत्सयेत् । अतिक्रम्य गृहं लोभान पुनस्तद्गृहं विशेत् ॥३१८।। यतिको न तो क्रोध करना चाहिये, न काँपना चाहिये । न हर्षित होना चाहिये और न निन्दा ही करनी चाहिये तथा किसी परसे आगे निकल जानेपर फिर लोभवश उसी घरमें प्रवेश नहीं करना चाहिये।
चतुर्थ प्रकरण GRIERGENERVEDERIOGRAMISCRELIANGREs. मेधातिथिस्मृती अदुष्टापतितं साधु यतिर्यः परिवर्जयेत् । स तस्य सुकृतं दत्त्वा दुष्कृतं प्रतिपद्यते ॥३१९॥ जो यति अदुष्ट, अपतित और साधु गृहस्थका त्याग करता है वह उसे अपना शुभकर्म देकर बदलेमें उसका दुष्कर्म पाता है । तथैव च गृहस्थस निराशो भिक्षुको गतः। हुतं दत्तं तपोऽधीतं सर्वमादाय गच्छति ॥३२०॥ इसी प्रकार यदि गृहस्थके यहाँसे कोई भिक्षु निराश होक चला जाय तो वह उसके हवन, दान, तप और खाध्याय-इन सभीको ले जाता है। बौधायनस्मृती चरेन्माधुकरी वृत्ति यतिम्लेंच्छगृहादपि । एकानं तु न मुञ्जीत वृहस्पतिसमादपि ॥३२१॥ पतिको माधुकरी तो म्लेच्छके यहाँसे भी ले लेनी चाहिये किन्तु एकका अन्न किसी बृहस्पतिके समान व्यक्तिका हो तब में न खाना चाहिये। भैक्ष्यं सर्वेषु वर्णेषु एकानं या द्विजेपु च । न चैकान्नं द्विजेषु स्यात्कामं स्यात्सार्ववर्णिकम् ॥३२२ यदि समस्त वणोंमें भिक्षा करनेका अपवा द्विजातिमें केव एकका अन ग्रहण करनेका अवसर आ पड़े तो समस्त वर्णोर २७८ GrarianRMODara मुमुक्षुसर्यवसार OGREVERGREENEDGUDERIEDO भिक्षा भले ही स्वीकार कर ले, किन्तु द्विजातियोंमें भी एकका अन्न ग्रहण न करे। अविस्मृती श्रोत्रियान्नं न भिक्षेत श्रद्धाभक्तिबहिष्कृतम् । ग्रात्यसापि गृहे भिक्षेच्छ्रद्धाभक्तिपुरष्कृतम् ॥३२३।। उसे श्रद्धा-भक्तिके बिना तो श्रोत्रियका भी अन्न नहीं लेना चाहिये; किन्तु यदि श्रद्धा-भक्तिपूर्वक दे तो संस्कारहीनके घरसे भी ले आना चाहिये। मनुस्मृती गर्भाष्टमेऽन्दे कुर्वांत प्रामणस्खोपनायनम् । गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः ॥३२४॥ गर्भाधानके आठवें वर्ष ब्राह्मणका, गर्भसे ग्यारहवें वर्ष क्षत्रियका तथा गर्भसे बारहवें वर्षमें वैदयका उपनयन-संस्कार करे। आपोडशाब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते । आद्वाविंशात् क्षत्रबन्धोराचतुर्विशतेविंशः ॥३२५।। ब्राह्मणके लिये सोलह वर्षसे, क्षत्रियके लिये बाईस वर्षसे और वैश्य के लिये चौबीस वर्ष से अधिक गायत्री-उपदेशका समय नहीं है। अत अचं योऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः। सावित्रीपतिता प्रात्या भवन्त्यार्यविगहिताः ॥३२६।।
चतुर्थ प्रकरण
+GRUESGRENIORGREMIERGANIDrainraate
इससे अधिक आयु हो जानेपर यथासमय संस्कार न होने
कारण ये गायत्रीके अधिकारसे भ्रष्ट होकर वात्य ( संस्कारहीन
तपा आर्यजनोंसे निन्दित हो जाते हैं।
अविस्मृती
द्वावेवाश्रमिणी भोज्यौ वानप्रस्थो गृही तथा ।
अभोज्यमन्त्रमन्येषां सर्वेषामपि लिगिनाम् ॥३२८
वानप्रस्थ और गृहस्थ---इन दो आश्रमियोंका ही अन्न खा
चाहिये, अन्य सब लिङ्गधारियों ( आश्रमियों ) का अन्न अभोज्य
बृहस्पतिस्मृती
यत्यन्नं ब्रह्मचार्यनमवीरानं तथैव च ।
शूद्रानं च तथा भिक्षुर्वर्जयेत्परदारवत् ।।३२८
यतिको यति, ब्रह्मचारी, अवीर ( जातिच्युत) और गृह
अन्नका परस्त्रीके समान त्याग करना चाहिये ।
व्यासस्मृतौ
यत्यन्नं तु न मोक्तव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि ।
गोमांसेन समं ज्ञेयं सुराबिन्दुसमं जलम् ।।३२
यतिका अन्न तो प्राणों के कण्ठगत हो जानेपर भी न ख
चाहिये । उसका अन्न गोमांसके समान तपा जल मदिराको व्र
समान समझना चाहिये।
२८० मुमुक्षसर्वससार OGRAOOGrouRGEOGRESORANDUSAGRANE जाबालवाक्यम् स्वधर्मात्प्रच्युता ये वै पुरुपा योपितोऽपि या । अवीरास्ते सदा शेया नित्यं सद्भिर्षिगहिताः ॥३३०॥ जो पुरुष या स्त्री अपने धर्मसे पतित हो जाते हैं ये ही सर्वदा सत्पुरुषोंसे निन्दित 'अवीर' माने गये हैं। मेधातिथिस्मृती प्रामणक्षत्रियविशां मेध्यानां भैक्षमाचरेत् । तत्राप्यसम्भव पूर्वादाददीतोत्तरोपरान् ।।३३।। मालग, क्षत्रिप और वैश्य-जो पवित्र वर्ग है उन्हीसे निशा मोंगे। उनमें भी पूर्व-पूर्वसे मिटनी असम्भव होनेपर ही पीछेयालोरी ले । द्विजामा तु सम्प्राप्त उपासनयं गते । मैक्षं शूद्रादपि प्रामं रक्षेत्लाणान् दिजोनमः ॥३३२।। जिस समय द्विजातिका अभाय हो और तीन दिन उपवास करते हो जाय तब गदसे भी मिक्षा ले टेनी चाहिये । इस प्रकार श्रेष्ठ बिजको अपने प्राणों की रक्षा कानी ही चाहिये । परासरस्मृती दामनापितगोपालबालमियादमारिणः एनं गद्रेषु मोग्यामाः यधारमानं निवेदयेत् ॥३३॥ महो दाग, ना, माले, दुर्मी तथा सरेके सामने प्ल बननेवाले और जिसने आनेको समग कर दिया होउन सशअम स्मापा जाता है।
-- MARGresiOGRLS06 चतुर्य प्रकरण २८१ मद्यमांसरतं नित्यं नीचकर्मप्रवर्तकम् । तं शूद्र वर्जयेद्रं धपाकमिय दूरतः॥३३४॥ जो निरन्तर मद्य-मांसमें ही रत रहता हो तपा नीच कर्मोका प्रवर्तक हो उस शूद्रका चाण्डालके समान दूरहीसे त्याग करना चाहिये। द्विजशुश्रूषणरतान्मद्यमांसविवर्जिताद स्वकर्मनिरतानित्यं शूद्रानानं त्यजेद्बुधः ॥३३५।। जो द्विजातिकी सेवामें तत्पर हो, मघ-मांससे बचा हुआ हो तथा अपने कर्ममें लगा हुआ हो, बुद्धिमान् पुरुपको उस शूद्रके अन्नका त्याग नहीं करना चाहिये। अत्रिस्मृती कुटुम्बसङ्कटं चैव मलिनोपहतं गृहम् । पीडयानं प्रयच्छेद्यस्तद्गृहं वर्जयेद्यतिः ॥३३६॥ जिसका परिवार [आयकी अपेक्षा ] बहुत बड़ा हो और घर अत्यन्त मैलकुचैला हो तपा जो दुःख मानकर अम देता हो उसके घरका यतिको त्याग करना चाहिये । नाश्नन्ति पशुचेर्देया नाश्नन्ति धूपलीपतेः । स्त्रीजितानं न चानन्ति तदन्नं वर्जयेद्यतिः ॥३३७॥ देवतालोग अपवित्र पुरुषके घरका अन्न नहीं खाते, और न धे कृपलीके* पति तथा स्त्रीजित पुरुषका ही अन्न खाते हैं। इसलिये इनके अलका यतिको मी त्याग करना चाहिये । •जिस कन्याका विवाह रजोदर्शनके पीछे होता है उसे 'वृषली' २८२ Gokarva HOOGLEPunceUENGALIKA मुमुक्षुसर्वस्वसार चिकित्सकस मृगयाशल्यहर्तुश्च पाशिनः । कुलटापण्ढयोरन्नमुद्यतं सन्त्यजेद्यतिः ॥३३८॥ चिकित्सक, मृगयाके लिये वाण ले चलनेवाले, फाँसी लगानेवाले तया कुलटा और नपुंसकके अन्नको यति उपस्थित होनेपर भी त्याग दे। या तु पर्युपिता भिक्षा नैवेद्ये कल्पिता तु या । तामभोज्यां विजानीयादाता च नरकं ब्रजेत् ॥३३९॥ जो भिक्षा बासी हो अपना किसी देवताकी नैवेद्य ( उपहार) करके मानी गयी हो उसे अभोज्य जाननी चाहिये । उसे देनेवाला नरकको जाता है। आयसेन तु पात्रेण यदन्नमुपदीयते । भोक्ता विष्ठासमं भुङ्क्ते दाता च नरकं व्रजेत् ॥३४॥ जो अन्न लोहेके पात्रसे दिया जाता है उसे खानेवाला तो विष्ठाके समान खाता है और देनेवाला नरकगामी होता है। उद्यतामाहृतां भिक्षा पुरस्तादप्रचोदिताम् । मोज्यां प्रजापतिर्मने अपि दुप्कृतकर्मणः ॥३४॥ पहलेसे जिसकी कोई सूचना न दी गयी हो ऐसी वर्ष ही उपस्थित अथवा लायी हुई भिक्षा, यदि किसी दुष्कर्मीकी भी हो तो भी ब्रह्माजीने उसे भोज्य माना है।
२८३ OGzIOGROLLED. . चतुर्थ प्रकरण DERIEOGrouGIGRICORIOR पितामहवाक्यम् सौवर्णलौहरौप्येपु ताम्रायश्ममयेषु अनन् भिक्षुर्न दुष्येत दुष्यते तु परिग्रहात् ॥३४२॥ सुवर्ण, लोहे या चाँदीके पात्रोंमें, अथवा ताँबे या पत्परके बर्तनोंमें भोजन करनेसे भिक्षुको दोप नहीं होता; उसे तो परिग्रह करनेमें ही दोप है। मादित्यपुराणे एकवासा विशुद्धात्मा मन्दगामी युगान्तदृक् । यथालब्ध तदनीयात्पूजासंस्कारवर्जितः ॥३४॥ एक वस्त्रधारी, विशुद्धचित्त, मन्दगामी तपा एक युग (चार हाय) पर्यन्त दृष्टि रखनेवाला भिक्षु पूजा या संस्कारसे रहित रहकर, जो कुछ मिल जाय उसीको खा ले । विष्णुस्मृती यदि भैक्षं समादाय पर्युपेद्योगवित्तमः । स पर्युपितदोपेण भिक्षुर्भवति किल्पिपी ॥३४॥ यदि कोई योगवेत्ता भिक्षा लेकर उसे बासी कर दे [ अर्थात् दूसरे दिनतक रहने दे] तो उसे बासी करनेके दोपसे ही वह दूषित हो जाता है। नारदवाक्यम् हव्यं कव्यं च राजेन्द्र नाश्नीयादात्मवान्यतिः । हव्यकव्यपरो भिक्षुः परत्येव न संशयः ॥३४५।।
२८४ मुमुक्षुसर्प स्वसार +GROASDCRUARGICORRISORRUBSCRIBE हे राजेन्द्र! आत्मज्ञ यतिको हत्य (देवताओंको समर्प हुई पस्तु) या कन्य (पितरोंको समर्पण की हुई वस्तु) खाना चाहिये । हव्यकव्यका सेवन करनेवाला मिक्षु पति ही जाता है इसमें सन्देह नहीं । श्राद्धमोजी यतिनित्यमाशु गच्छति शूद्रताम् । तादृशं कश्मलं दृष्ट्वा सचैलो जलमाविशेत् ॥३६ श्राद्धमें भोजन करनेवाला यति शीघ्र ही शूद्रत्वको प्राप्त जाता है ऐसे पापको देखकर वखसहित जलमें प्रवेश करके स करना चाहिये। जैमिनिस्मृती श्राद्धानं यस्स कुक्षौ तु मुहूर्तमपि वर्तते । भिक्षोश्चत्वारि नश्यन्ति आयुः प्रज्ञा यशो बलम् ॥३४५ जिस भिक्षुके उदर में श्राद्धका अन्न एक मुहूर्त भी रह जा है उसके आयु, बुद्धि, यश और बल चारों नष्ट हो जाते हैं। वृहस्पतिस्मृतौ श्रवणं मननं ध्यानं स्वाध्यायं ज्ञानमेव च । सन्ध्ये नश्वरतां यान्ति सकृच्छ्राद्धानभोजनात् ॥३४८/ श्रवण, मनन, ध्यान, स्वाध्याय, ज्ञान और दोनों समय- सन्ध्या-ये सत्र एक बार श्राद्धान्न खा टेनेसे ही नष्ट हो जाते हैं। अन्तःकरणशुद्धिस्तु न स्यात्तस्यैव सर्वदा । यदानं प्रेतयोग्यं च भवेत्सङ्कल्पमात्रतः ॥३४९॥ " २८५ +GROUDGRLIEDGGRALI चतुर्थ प्रकरण जब वह श्राद्यान्न संकल्पमात्रसे ही प्रेतके योग्य हो जाता है तो उससे श्राद्धभोजी पुरुपके अन्तःकरणकी शुद्धि कभी नहीं हो सकती। परानं नैव गृह्णीयाद्विक्षुः खाश्रमपालकः । परानवर्जनादेव भिक्षुर्भिक्षुरिति स्मृतः ॥३५०।। अपने आश्रमधर्मका पालन करनेवाला भिक्षु पराया अन कभी प्रहण न करे । भिक्षु पराये अनका त्याग करनेके कारण ही भिक्षु माना गया है। यतिके भिक्षापात्रका विवेचन याज्ञवल्क्यस्मृती यतिपात्राणि मृणुदालायुमयानि च । सलिलं शुद्धिरेतेषां गोपालैचावघर्पणम् ॥३५१॥ यतिके पात्र मृत्तिका, बाँस और तूंबेके होते हैं । उनकी शुद्धिका साधन जल तथा गोके वालोंसे माँजना है। अत्रिस्मृती मृद्दालायुजं पात्रं वैणवं तान्तवोपले । पार्ण तार्ण तथा क्षौमं पात्रं पर्णपुटं तथा । उक्तानि यतिपात्राणि ब्रह्मणा विश्वयोनिना ॥३५२।। विश्वविधाता मसाजीने यतिके लिये मिट्टी, काष्ठ और अलावु (तो) के, तथा बाँस, तन्तु (सूत), पत्पर, पत्ते, तृण, रेशम और पत्तोंके दोनेके पात्र बतलाये हैं।
२८६
मुमुक्षुसर्वस्वसार
AGAUR
ADER
करे कर्यटके चैव आयसे ताम्रभाजने ।
भुअन् भिक्षुर्न लिप्येत लिप्यन्ते गृहमेधिनः ॥३
हाय, वन अथवा लोहे या तौके पात्रमें भोजन क
यतिको तो पापका लेप नहीं होता;हाँ, गृहस्थियोंको अवश्य होत
विद्वान् यतिकी भिक्षाविधि
शौनकस्मृती
पाणिपात्रश्वरन्योगी नासकृद्भक्षमाचरेत् ।
तिष्ठन्भुज्याचरन्भुज्यान्मध्येनाचमनं तथा ॥३५
अपने हाथोंको ही पात्र बनाकर विचरनेवाला योगी बार'
मिक्षा न माँगे । वह बैठे-बैठे अपवा चलते-चलते ही भोजन
ले और बीच-बीच में जल पी ले।
गौतमस्मृती
पात्रमस्य भवेत्पाणिस्तेन नित्यं गृहानटेन् ।
हविः प्राश्य यथाचम्य निराहारो भवेद्गृही ।
प्राण्याचम्य तथा मिनिराहारो गृहे गृहे ॥३५५-
हाय ही यतिका पात्र है उसीसे वह नित्य-प्रति घरे
भिक्षाटन करे । जिस प्रकार गृहस हवि खाकर आचमन करने
निराहार ही रहता है उसी प्रकार घर-घरमें साकर आचम
करनेसे भिक्षु निराधार ही रहता है।
चतुर्थ प्रकरण २८७ +SIDERNSRCANERRORIEDGariENGLISGRRISRO वसिष्ठस्मृतौ भिक्षाटनं प्रकुर्वाणो ह्यमेध्यं श्वादि वा स्पृशेत् । भिक्षांगृहीत्या स्नात्वा च प्राणायामान्पडाचरेत् ॥३५६॥ भिक्षाटन करते समय यदि उसका श्वान आदि अपवित्र जीवोंसे स्पर्श हो जाय तो भिक्षा लिये हुए ही स्नान करे और फिर छः प्राणायाम करे। अमेष्यनिचयं चैव स्पृष्ट्वा दैवलकं यतिः । सपात्रो विधिवत् स्नात्वा विष्णुध्यात्वाविमुच्यते ॥३५७॥ अपवित्र वस्तुओं के समूह तया देवोपजीवी पुरुषका स्पर्श करनेपर यति पात्रके सहित विधिपूर्वक स्नान तथा विष्णुका प्यान करनेपर उस दोपसे मुक्त हो जाता है । पादत्राणे स्थिती पादावस्पृश्यं स्पृशतो यदि । पादत्राणपरित्यागे आचान्तः शुद्धिमाप्नुयात् ॥३५८॥ यदि जूते पहने हुए पैरोंसे कोई अस्पृश्य वस्तु लग जाय तो जूता उतारनेके अनन्तर आचमन करनेसे शुद्धि हो जाती है। उक्याशावचाण्डालचौरनग्नकपालिभिः स्पृष्टां मिक्षा त्यजेद्भिक्षुः सचैलो जलमाविशेत् ॥३५९॥ रजखला स्त्री, शवके साथ जानेवाले लोग, चाण्डाल, चोर, नग्न (नास्तिक) और कापालिकोंसे स्पर्श होनेपर भिक्षु भिक्षाको त्याग दे और वनोसहित जलमें घुस जाय ।
२८८ .GRICORNERGRUSOCIENCE मुमुक्षुसर्वस्वसार कुड्ये काष्ठे रथे मञ्चे नौकायां ग़जवृक्षयोः । तृणौघजलसाते स्पृष्टास्पृष्टिर्न विद्यते ॥३६०। भीत, काठ, रथ, मञ्च, नौका, हापी, वृक्ष, तृणसमूह और जलराशिमें छूआछूत नहीं होती। जमदमिस्मृती श्वकाकक्रोडवेश्याविखरोष्ट्रस्पर्शने यतिः । समिक्षस्तु जले मग्नः शुध्येअप्वाघमर्पणम् ॥३६१।। कुत्ता, काक, शूकर, वेश्या, भेड़, गधा और ऊँटदनसे स्पर्श हो जानेपर यति भिक्षाके सहित जलमें डुबकी लगाकर अधमर्पणमन्त्र जपनेसे शुद्ध होता है । पराशरस्मृती मार्जारमक्षिकाकीटपतङ्गक्रिमिदर्दुराः मेध्यामध्यं स्पृशन्तोऽपि नोच्छिष्ट मनुरवीत् ॥३६२।। बिलाव, मक्खी, कीट, पतंग, कीड़ा और मेंढक ये पवित्र अथवा अपवित्र पदार्चाका स्पर्श करें तो भी मनुजौने उससे वच्छिष्ट नहीं माना। यमस्मृतौ अष्टौ ग्रासा यतेः प्रोक्ताः पोडश वनवासिनः । द्वात्रिंशत्तु गृहस्थानां यथेष्टं ब्रह्मचारिणः ॥३६३॥ यतिके लिये आठ ग्रास कहे गये हैं तपा वानप्रसके लिये चतुर्थ प्रकरण २८९ aveDGISODERNORGxiDGuid. GREJO सोलह, गृहस्थके लिये बत्तीस और ब्रह्मचारीके लिये यथेष्ट मासोंका विधान है। आसवाक्यम् चतुरङ्गुलमुत्सेधं चतुरङ्गुलमायतम् । एतद्रासप्रमाणं तु व्याघेण परिभापितम् । भक्त्वा भक्त्योपभुञ्जीत नियमार्थ यतिरात्मवान् ।। चार अंगुल लम्बा और चार अंगुल चौड़ा -यह व्याघ्रमुनिने पासका परिमाण कहा है । आत्मवान् यति नियममें रहनेके लिये इस प्रकार विभाग करके भोजन करे। भिक्षाकी प्रशंसा मनुस्मृती नापो मूत्रपुरीपाभ्यां नानिर्दहनकर्मणा । न वायुः स्पर्शदोपेण नान्नदोपेण मस्करी ॥३६५॥ मल-मूत्रसे जल, दहनकार्यसे अग्नि, स्पर्शदोपसे यायु तथा अन्नदोपसे यति दृपित नहीं होता है। यमस्मृती गङ्गातोयामिपिक्तांच भिक्षां योऽनातियोगवित् । न तु क्रतुशतैरिएं फलं ग्रामोति मानवः ॥३६६।। जो योगवेत्ता गंगाजलमें भिगोई हुई भिक्षा खाता है उसके समान मनुष्य सौ यज्ञ करनेसे भी फल नहीं पाता।
२९० GRUHAGRAM मुमुक्षुसर्यवसार गङ्गातोयं च मैक्षं च वैष्णवानं विशेषतः । आनखान्मोचयेत्पापं मन्त्रपूतं हविर्यथा ॥३६. गंगाजल, भिक्षान और विशेषतः वैष्णवका अन्न-ये भिक्षु नखसे शिखापर्यन्त सम्पूर्ण पाप दूर कर देते हैं, जैसे कि मन्त्र पवित्र किया हुआ हवि । शातातपस्मृती भिक्षा माधुकरी नाम सर्वपापप्रणाशिनी । अवधूता च पूता च सोमपानं दिने दिने ॥३६८। माधुकरी नामको भिक्षा सभी पापोंको नष्ट करनेवाली है । या त्यागमयी और परम पवित्र है तथा प्रतिदिन सोमपान करनेके समान है भिक्षाहारो निराहारो भिक्षा नैव प्रतिग्रहः । श्रोत्रियान्नं च भैक्षच हुतशेपं च यद्धविः । आनखाच्छोधयेत्पापं तुषाग्निरिव काञ्चनम् ॥३६९॥ भिक्षाहार करनेवाला निराहारके समान है, भिक्षा प्रतिप्रह नहीं है । श्रोत्रियका अन्न, मिक्षान्न तथा हवनसे बचा हुआ हवि--- ये शिखासे नखतक सम्पूर्ण पापोंका शोधन कर देते हैं; जैसे तुषकी अग्नि सुवर्णको शुद्ध कर देती है। गङ्गायाः सलिलं पुण्यं शालग्रामशिला तथा । मिक्षान्नं पञ्चगव्यं च पवित्राणि युगे युगे ॥३७०॥ परम पावन गंगाजल, शालग्रामशिला, भिक्षान और पञ्चगव्य-ये युग-युगमें पवित्र हैं।
चतुर्थ प्रकरण २९१ ఆుగాంగాంగానుండగా याज्ञवल्क्यस्मृती नतात्परश्योपवास उपवासादयाचितम् । अयाचितात्परं भैक्षं तस्माद्भक्षेण वर्तयेत् ॥३७१॥ नक्त (दिनमें भोजन न करके केवल रात्रिके समय भोजन करने ) से उपवास श्रेष्ठ है, उपवाससे अयाचितवृत्ति उत्कृष्ट है तथा अयाचितसे भिक्षा माँगना उत्तम है । इसलिये सदा भिक्षा- वृत्तिसे रहे। निषिद्धाचारी यतिकी निन्दा आप्तवाक्यम् तितिक्षाज्ञानवैराग्यशमादिगुणवर्जितः भिक्षामात्रेण यो जीवेत्स पापी यतिवृत्तिहा ॥३७२॥ जो तितिक्षा, ज्ञान, वैराग्य और शमादि गुणोंसे होन रहकर केवल मिक्षाके आश्रयसे ही जीवित रहता है यह पापारमा यति-वृत्तिको नष्ट करनेवाला है। एकान्नाशी भवेद्यस्तु कदाचिल्लम्पटो यतिः । तस्य यै निष्कृतिर्नास्ति प्रायश्चित्तायुतैरपि ॥३७३॥ जो यति भोजनमें आसक्त होकर एक ही व्यक्तिका अन्न खाने लगता है उसका हज़ारों प्रायश्चिचोंसे भी छुटकारा नहीं हो सकता।
२९२ मुमुक्षुसर्यस्वसार .COMusaraisarexicaIOGRAIGAGRELIGIGRIL असमर्थ भिक्षुके लिये भिक्षा-विधि पराशरस्मृती यतीनामातुराणां च वृद्धानां दीर्घरोगिणाम् । एकान्ने नैव दोपोऽस्ति एकस्यापि दिने दिने ॥३७४ जो यति दुःखी, वृद्ध अथवा पुराने रोगी हों उन्हें रोज-रो एकके अथवा एक ही अन्नके खानेमें भी दोप नहीं है। फतुस्मृती अयाचितं यथालाभं भोजनाच्छादनं भवेत् । निमन्त्रितोऽथवानीयात्स्वगुणं न प्रकाशयेत् ॥३७५।। बिना माँगे जो कुछ स्वयं मिल जाय वही यतिका भोजन- वस्त्रादि होना चाहिये। अथवा वह किसीसे निमन्त्रित होनेपर भी भोजन कर सकता है; किन्तु उसे अपना गुण प्रकट न करना चाहिये। सुजीर्णोतिकशो योगी देशान्ताद्विकलेन्द्रियः । पुत्रमित्रगुरुभ्रातृपनीम्यो भैक्षमाहरेत् ॥३७६॥ जो योगी अति वृद्ध, कृश अथवा विक्लेन्द्रिय हो थाह देशमें रहता हुआ अपने पुत्र, मित्र, गुरु, भाई या पलीसे भिक्षा ले सकता है। मा चतुर्थ प्रकरण 4GRASIGNORNINGMAR . समर्थ यतिकी भिक्षाविधि दत्तात्रेयस्मृती कृते देशं त्यजेद्यामं त्रेतायां द्वापरे कुलम् । कर्तारं तु कलौ दुष्टं त्यक्त्वा मैक्षं समाचरेत् ॥३७७।। सत्ययुगमें [ दुष्ट पुरुपसे सम्बन्धित ] देशका, त्रेतामें प्रामका, द्वापरमें कुलका और कलियुगमें केवल दुष्कर्म करनेवालेका त्याग करके भिक्षावृत्तिका आचरण करे । अङ्गिरःस्मृती संन्यासं चैव यः कृत्वा पुनरुत्तिष्ठते द्विजः । न तस्स निष्कृतिः कार्या खधर्मात्प्रच्युतस्य वै ॥३७८॥ जो द्विज एक बार संन्यास करके फिर उससे उत्थान करता है, अपने धर्मसे गिरे हुए उस यतिके उद्धारके लिये कोई उपाय नहीं हो सकता। विष्णुस्मृती आरूढो नैष्ठिकं धर्म पुनरावर्त्तयेद्यदि । आरूढपतितो ज्ञेयः सर्वधर्मरहिष्कृतः ॥३७९॥ यदि नैष्ठिक धर्ममें आरूढ़ हुआ पुरुप फिर लौट आवे तो उसे आरूढपतित (चढ़कर गिरा हुआ) समझना चाहिये । वह सब धर्मोसे वहिप्कृत होता है ।
२९४ OGENERGRIDuratioGRANGreenaxAKIGRUKT मुमुक्षुसर्यवसार चाण्डालाः प्रत्यवसिताः परिमाजकतापसाः । तेषां जातान्यपत्यानि चाण्डालैः सह वासयेत् ॥३८०॥ यतिधर्मसे लौटे हुए परिवाजक और तपसी पाण्डाल ही हैं। उनसे उत्पन्न हुए पुत्रोंको चाण्डालोंके साप ही बसाना चाहिये। अगिर स्मृती आरूढपतितो इन्ति दश पूर्वान्दशापरान् । निस्तारयति तानेर यो हि सम्यग्थ्यवस्थितः ॥३८॥ आरुद्धपतित भिक्षु अपनी दश पहली और दश पीछेकी पीदियोंको नष्ट कर देता है, किन्तु जो अपने धर्ममें भली प्रकार स्थित है यह उन्हींको तार देता है। परमहंसोपनिषदि काष्ठदण्डो धृतो येन मर्यायी मानवर्जितः । स याति नरकान्योरान्महारारयमंशकान् ||३८२॥ जिसने केपट काटका दश धारण किया है, किन्तु जो सत्र कुछ मानेवाडा धीर शानमें रदित है यह मारपनामा, धीर नरकों में जाता है। दशग्मृती पारिमा गृहन्दिा तु यः मपमें न निति । वादनाइपित्या राजा मी प्रामत् ।।३८|| चतुर्थ प्रकरण OGRLINGarauraivarauBOGIOGROLAG.. जो पुरुप संन्यास ग्रहण करके अपने धर्ममें स्थित नहीं रहता, राजाको चाहिये कि उसे कुत्तेके पनसे दागकर शीघ्र ही निर्वासित कर दे। व्यासस्मृतौ द्वाविमौ न विराजेते विपरीतेन कर्मणा । निरारम्मो गृहस्यश्च कार्यवांश्चैव भिक्षुकः ॥३८४॥ उद्योगरहित गृहस्थ और व्यवहारपरायण भिक्षु-ये दोनों अपने इन विपरीत कमेकि कारण अच्छे नहीं मालूम होते । लिङ्गे सत्यपि खल्वसिन् ज्ञानमेव हि कारणम् । यदि मोक्षाय भूतानां लिङ्गग्राहो निरर्थकः ।।३८५।। यदि संन्यासके चिह्न रहनेपर भी प्राणियोंके मोक्षमें ज्ञान ही कारण है तो लिङ्गधारण तो निरर्थक ही है [इसलिये लिङ्गधारणका आग्रह छोड़कर ज्ञानप्राप्तिका ही विशेष प्रयत्न करना चाहिये। प्रायश्चित्तविधि अकामादपि हिंसेत पशून्मृगादिकान् यतिः । कृच्छातिकृच्छी कुर्वीत चान्द्रायणमथापि वा ॥३८६।। यदि सङ्कल्पके विना भी यतिसे पशु अपवा मृग आदिको हिंसा हो जाय तो उसे कृन्छु, अतिकृच्छ्र अथवा चान्द्रायण प्रत करना चाहिये।
२९६ मुमुक्षुसर्यस्ससार OGRIDGONOGRRIEReasRGENCOGRAParism मनुस्मृती तप्तच्छ्चरन् विप्रो जलक्षीरघृतानिलान् । प्रतित्र्यहं पिबेदुष्णान्सकृत्स्नायी समाहितः ॥३८७॥ तप्तकृच्छ् व्रतका आचरण करनेवाले मुनिको प्रतिदिन एक बार स्नानकर समाहित चित्तसे तीन-तीन दिनतक क्रमशः उष्ण जल, दूध, घृत और वायु पीना चाहिये। अत्रिसंहितायाम् पट्पलानि पियेदापस्त्रिपलं तु पयः पिबेत् । पलमेकं तु वै सर्पिस्तप्तकृच्छं विधीयते ॥३८८॥ [उस समय ] जल छः पल पीना चाहिये, दूध तीन पल और घृत एक पल; इस प्रकार ततकृच्छ्र व्रतका विधान है। आप्तवाक्यम् दशार्द्धगुञ्ज प्रवदन्ति मापं मापाह्वयः पोडशभिश्च कर्पम् । कचतुर्मिस्तु पलं तुलाज्ञा कर्फ सुवर्णस्य सुवर्णसंज्ञम् ।।३८९।। पाँच गुंजाको एक माप कहते हैं, सोलह मापसे एक कर्म होता है तथा तोलको जाननेवाले लोग चार कर्यका एक पल बतलाते हैं और एक कर्प सोनेका नाम सुवर्ण (अशर्फी) है।
चतुर्थ प्रकरण OGROLAGAGRRIEDGELISAGE UWAGRANUSAGNI. हारीतस्मृती अहोरात्रेण यान् जन्तून् हिनस्त्यज्ञानतो यतिः । प्राणायामान्दशाप्टौ च प्रायश्चित्तं यतिश्वरेत् ॥३९०॥ यति एक दिन-रातमें बिना जाने जिन जीवोंकी हत्या करता है उनके प्रायश्चित्तके रूपमें उसे अठारह प्राणायाम करने चाहिये । चाक्षुपे दश कुर्वीत वाच्ये विशतिमेव च । मानसे त्रिंशतं चापि पातके प्राणसंयमान् ॥३९१॥ यतिको चाक्षुप (नेत्रसम्बन्धी) पाप करनेपर दश, वाचिक करने- पर बीस तया मानसिक करनेपर तीस प्राणायाम करने चाहिये । यमस्मृती कणपिण्याकतकं वा शाकमूलफलादिकम् । पकं याप्यथयापकं पचनज्ञानतो यतिः ॥३९२।। आचरेत्त्रीणि कृच्छाणि प्राकृतान्येव शुद्धये । अभ्यासाद्युद्धिपूर्व हि पाकदोपान मुच्यते ॥३९३॥ कण, पिन्नी, तक्र, शाक, मूल और फलादि-ये पके हों अपया फच्चे-दनको अज्ञानवश पकानेपर होनेवाले पापोंका शोधन करनेके लिये यतिको तीन साधारण कृच्छ् द्रत करने चाहिये। किन्तु अभ्यासवश जान-यूझकर पकानेपर तो यह किसी प्रकार पाक- दोपसे मुक्त नहीं होता।
२९८
AGRIDGAURUSORE
मुमुक्षुसर्यस्वसार
OGreumGRANGra
देषलस्मृती
प्रस्कन् रेतो दुर्बलत्वात्प्राणायामांस्तु पोडश ।
रेत सेकं कचिद्भिक्षुः कुर्यान्मोहात्तु कामतः ।
प्राजापत्यत्रयं कृत्वा प्राणायामशतं चरेत् ॥३०
दुर्घटतावश वीर्यपात होनेपर भिक्षुको सोलह प्राणायाम
चाहिये और यदि कमी मोहयश यह जान-बूझकर पीर्यपात क
तीन प्राजापत्य प्रत करके सो प्राणायाम करने चाहिये।
मनुस्मृती
ज्यहं प्रातस्म्यहं सायं व्यहमधादयाचितम् ।
ध्यहं परं तु नाभीयात्प्राजापत्योऽयमुच्यते ॥३९
तीन दिन प्रातःकाल और तीन दिन सायंकाठमें तथा
दिन विना माँग भोजन करें। इसके पभात् तीन दिन भोजन
करे--यही प्रामाण्य प्रत फहटाता है।
पराशरमृती
मायं तु द्वादश ग्रामा'प्रातः पनदश स्मृताः ।
चतुर्दिशनयोध्याच्याः परं निराशनं स्मृतम् ॥३९६
[प्राय प्रतमें ] मापंशमें बारह और प्रात:कार पत्र
माम बताये हैं; सपा आचिनिन चौकीम माग बद।
मक अनशनका विधान है।
चतुर्थ प्रकरण २९९ OCRACOGNIERGRIDGUSIGNIEDGRIERGRANDO अशक्तं प्रत्यापस्तस्य आह स- जो इसमें असमर्थ हैं उनके लिये आपस्तम्बने कहा है- सायं द्वाविंशतिसा: प्रातः पड्विंशतिः स्मृताः । चतुर्विशतयोऽयाच्याः परे निरशनास्त्रयः। कुक्कुटाण्डप्रमाणस्तु यथा चास्ये विशेत्सुखम् ॥३९७}} सायंकालमें बाईस और प्रातःकालमें छब्बीस पास कहे हैं तथा अयाचितवृत्तिसे चौबीस पास बतलाये हैं । इसके पीछे तीन दिन अनशन कहा है । प्रास कुक्कुट (मुर्ग) के अण्डेके समान होना चाहिये, जो कि सुखपूर्वक मुखमें जा सके । देवलस्मृती स्त्रियं दृष्ट्वा यदा स्खम रेतः क्षरति वै क्वचित् । स्नात्वा सवासाः शुद्धयर्थ कुर्यात् पोडश संयमान् ॥३९८॥ जब कमी खममें स्त्रीको देखकर वीर्यपात हो जाय तो उसकी शुद्धिके लिये सचैल स्नान करके सोलह प्राणायाम करे । उपवासं यतिः कुर्यात्पुनः सुप्ते क्षयेद्यदि । प्राणायामैत्रिशुद्धात्मा विरजो जायते पुनः ॥३९९॥ यदि फिर भी सोते समय वीर्यस्त्राव हो तो यतिको उपवास करना चाहिये । प्राणायामसे शुद्धचित्त हो जानेपर फिर यह मलहीन हो जाता है।
OGRLIERGRIEOGUENGreENGAGRGELIAGES
मुमुनुसर्वस्वसार
विष्णुस्मृती
नैछिकानां वनस्थानां यतीनामत्रकीर्णिनाम् ।
शुद्धानामपि लोकेऽसिन्प्रत्यापत्तिर्न विद्यते ॥४८
नैष्टिक ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, पति और विशुद्ध त्यागि
इस लोकमें पुनरागमन नहीं होता।
आरूढो नैष्ठिकं धर्म यदि प्रच्यवते पुनः ।
प्रायश्चित्तं न पश्यामि येन शुद्धयत्स आत्महा 11४०'
यदि नैष्टिक धर्ममें आरूढ हुआ पुरुप उससे गिर जाय
उसके लिये मुझे कोई भी प्रायश्चित्त दिखायी नहीं देता, जिर
कि वह आत्महत्यारा शुद्ध हो सके।
अविस्मृती
वर्षाभेदं यतिः कुर्यायदि कविदनापदि ।
प्राजापत्येन कन्ट्रेण मुच्यते नात्र संशयः ॥४०२
यदि किसी प्रकारको आपत्ति न होनेपर भी कोई यति व
ऋतुका लघन करे [अर्थात् एक स्थानमें न रहकर विचरता रहे
तो एक कृछ् प्राजापत्य करनेसे दोपमुक्त होता है-इसमें को
सन्देह नहीं।
स्थितियोग्यान्वहन्यामान्यदि बासु लक्षयेत् ।
प्रत्येकै चरेतमेतत्यापात्प्रमुक्तये ॥४०३||
यदि भिक्षु वर्षाऋतुमे रहनेयोग्य कई मामोंका साधन पर
चतुर्थ प्रकरण OPENINGIOGRNIORGANICOGROID0. दे, तो उसे प्रत्येक प्रामके लिये एक-एक कृच्छ् व्रत करना चाहिये । तभी उस पापसे मुक्त होता है। वृदयाज्ञवल्क्यस्मृती चौररुपद्रुतं देशं दुर्भिक्षव्याधिपीडितम् । चक्रेणान्येन वा फ्रान्तं वर्षाखप्याशु सन्त्यजेत् ॥४०४॥ जो देश चोरोंके उपद्रवसे युक्त, दुर्भिक्ष तथा व्याधिसे पीडित अपवा किसी अन्य राजासे आक्रान्त हो उसे वर्षाऋतुमें भी तुरन्त त्याग देना चाहिये। मुहूर्तमपि नासीत देशे सोपद्रवे यतिः । उपद्रुते तु मनसि समाधिनोपजायते ॥४०५॥ यतिको उपद्रवयुक्त देशमें एक मुहूर्त भी नहीं ठहरना चाहिये, क्योंकि विक्षिप्त चित्तमें समाधि नहीं हो सकती। यचीर्थमनुसम्प्राप्य चितमस्य प्रसीदति । तत्र विष्ठेन्नरो विद्वान्मोक्षमागें व्यवस्थितः ॥४०६॥ जिस तीर्थस्थानमें पहुंचकर चित्त प्रसन्न हो जाय, मोक्ष- मार्गमें लगे हुए विद्वान् पुरुषको यहीपर रहना चाहिये । पृशातातपस्मृती निगृहीतेन्द्रियग्रामो यत्र यत्र बसेद्यतिः । तत्र वत्र कुरुक्षेत्रं नैमिपं पुष्करं तथा ॥४०७॥ जिसने अपने इन्द्रियप्रामको जीत लिया है यह यति जहाँ-जहाँ रहता है वहीं-यहीं पुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्करक्षेत्र हैं। -- मुमुक्षुसर्वससार ३०२ SIDEREMIERRIES OGRUAGRos दत्तात्रेयस्मृती क्षौरं मेटप्रदेशे तु कृत्वा कृच्छू समाचरेत् । प्राणायामशतं कृत्वा तसाद्भिक्षुर्विशुद्धयति ।।४०८॥ उपस्थदेशका क्षौर करनेपर यतिको कृच्छ्र व्रत करन चाहिये । उस दोषसे भिक्षु सौ प्राणायाम करनेपर शुद्ध होता है अत्रिस्मृती न स्नानमाचरेद्भिक्षुः पुत्रादिनिधने श्रुते । पितृमाक्षयं श्रुत्वा स्नात्वा शुद्धथति साम्बरः । न कुर्यात्स्तकं भिक्षुः श्राद्धपिण्डोदकक्रियाः ॥४०९। अपने पुत्रादिका मरण सुननेपर यतिको सान नहीं करन चाहिये । माता-पिताका मरण सुननेपर भी वह सचैल मान करनेसे ही शुद्ध हो जाता है। भिक्षुको सूतक अपवा श्राद्ध या पिण्डोदक क्रिया तो कभी न करने चाहिये । वायुपुराणे प्रातःस्नानं विना कामामुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् । पहुभोज्ये यतिर्युक्त्वा कुर्यादेतद्वतं पुनः ॥४१०॥ यतिको प्रातःकाल मान किये बिना इच्छापूर्वक सा टेनेपर चान्द्रायण व्रत करना चाहिये तपा बहुत लोगोंके भोजमें भोजन कर टेनेपर भी इस व्रतका आचरण करना चाहिये।
३०३
SGREMIU0
चतुर्थ प्रकरण
GRANGALEDGELIERGRIEOGRANUSSI
प्रयोगसारे
पात्रे तु पतिते भक्षे एकभिक्षां करोति यः ।
स कुर्याच्छतमश्रान्तः प्राणायामान्विशुद्धये ॥४११॥
भिक्षा-पात्र गिर जानेपर जो भिक्षु केवल एक घरकी ही
भिक्षा करता है उसे शुद्ध होनेके लिये बिना विश्राम लिये
सौ प्राणायाम करने चाहिये।
जमदग्निस्मृती
अश्नन्माधुकरी भिक्षा नैवेद्ये तु विसर्जिते ।
परपाकं न गृह्णीयात्किञ्चिदन्नमुपस्थितम् ।।४१२।।
माधुकरी भिक्षा खाते समय जब नैवेद्य (भगवान्को भोग)
लगा चुके तो फिर दूसरेका पकाया हुआ अन्न उपस्थित होनेपर
उसमेंसे थोड़ा-सा भी न ले।
अथवा यद्गुरुर्च्यात्तत्कार्यमविशङ्कया ।
निग्रहेऽनुग्रहे वापि गुरुः सर्वत्र कारणम् ।।४१३॥
अथवा जो कुछ गुरु कहे उसीको निःशंक होकर करे, क्योंकि
निग्रह और अनुग्रह दोनोंमें सर्वत्र गुरु ही कारण हैं।
यमस्मृती
यदि पर्युपितं मैक्षमद्याद्भिक्षुः कथश्चन
तदा चान्द्रायणं कुर्याद्यतिः शुद्धयर्थमात्मनः॥४१॥
मुमुक्षुसर्वस्वसार यदि भिक्षु कमी बासी (पहले दिन टायों तो उसे अपने अन्तःकरणकी गुद्धि करनेके दिन करना चाहिये। मिशुद्धिर्भोजन कुर्यात्कदाचिज्ज्ञान स्वस्थावस्यो यदा लोल्यात्तदा चान्द्रायणं जब कभी ज्ञानकी दुर्घटतावश मिक्षु लोलुपतासे दुवारा भोजन करले तो उस याज्ञवल्क्यस्मृती अष्टौ तान्यवतमानि आपो मूलं फलं हविर्ताक्षणकाम्या च गुरोर्वचस्तर्थ जल, मूल, फल, दूध, हवि, ब्राह्मणोंकी इ- घचनसे खाये हुए पदार्थ और औषध---ये करनेवाले नहीं हैं। जाबालवाक्यम् एकानं मधु मांसं च अनं विष्ठादि हन्तकारं च नैवेद्यं प्रत्यक्षं लवणं एतान्भुक्त्वा यतिर्मोहात्प्राजापत्यं समा एक घरका अन्न, मधु, मांस, विष्टा आ हन्तकार, नैवेद्य और प्रत्यक्ष (खाद्य पदार्थमें मिले हु टयण इन्हें मोहवश खानेपर भिक्षुको प्राजापत्य घर चतुर्थ प्रकरण MOGreeDERMERGREET RUGRIC. यत्यन्नं यतिपात्रस्यं यतिना प्रेरितं च यत् । अन्नत्रयं न भोक्तव्यं मुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।४१८॥ यतिका, यतिके पात्रमें रखा हुआ तथा यतिकी प्रेरणासे आया आ-इन तीन अन्नोंको कमी न खाना चाहिये और यदि खा ले तो चान्द्रायण व्रत करे । संन्यासं कुरुते यस्तु श्राद्धं तस्य विधीयते । तस्यानं नैव भोक्तव्यं मुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥४१९॥ जो संन्यास करता है उसके लिये श्राद्ध करने का विधान है। इस प्रकार वह मृतकवत् हो जाता है। अतः उसकाअन्न कभी न खाना चाहिये और खा टेनेपर चान्द्रायण व्रत करना चाहिये । विश्वामित्रवाक्यम् एकस्यानं ज्यहं भुक्त्वा निरन्तरमनापदि । प्राणायामशतं कुर्याच्छुद्धयर्थ यतिरात्मवान् ॥४२०॥ कोई आपत्काल न होनेपर तीन दिनतक निरन्तर एक ही व्यक्तिका अन्न साकर आत्मवान् यतिको शुद्धिके लिये सौ प्राणायाम करने चाहिये। अविस्मृती ज्ञातीनां तु कुले मिक्षुर्न भिधेन कयमन । आचरेच यदा मिक्षां वदा चान्द्रायणं चरेत् ॥४२१॥ २०
मुमुसुममसार
परिमिभु कभी यासी (पहले दिन टायी समि-
सो उसे अपने अन्तःकरणकी शुद्धि करने दिये धाद
करना चादि।
भिक्षुटिमोजनं कुर्यात्कदानिमानदुर्बलः
सस्थावस्यो यदा लाल्यातदाचान्द्रायणं चरेत् ।
जब कभी शनी दुर्घटतावश भिभु स्वत्याव
सोलुपनासे दुबारा मोजन करटे तो उसे चान्द्रायगमत करना
याज्ञवल्क्यस्मृती
अष्टौ तान्यवतमानि आपो मूलं फलं पयः
हविर्ताक्षणकाम्या च गुरोर्वचस्तथीपयम्
जल, मूल, पाल, दृध, हवि, ग्रामगोंकी इच्छासे र
धचनसे साये हुए पदार्थ और ओपध-ये आठ ब
करनेवाले नहीं हैं।
जापालवाक्य
एकानं मधु मांसं च अन्नं विष्ठादिप्तिम्
हन्तकारं च नैवेद्यं प्रत्यक्ष लवणं तथा
एतान्मुक्त्वा यतिर्मोहात्माजापत्यं समाचरेद
एक घरका अन्न, मधु, मांस, विष्टा आदिसे दू
हन्तकार, नैवेद्य और प्रत्यक्ष (खाद्य पदार्थमें मिले हुए लवर
यण इन्हें मोहवशखानेपर भिक्षुको प्राजापत्य मत करना
चतुर्य प्रकरण MORGRIDGUIDE यत्यनं यतिपात्रस्यं यविना प्रेरितं च यत् । अन्नत्रयं न मोक्तव्यं मुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥४१८॥ यतिका, यतिके पात्रमें रखा हुआ तथा यतिकी प्रेरणासे आया भा--इन तीन अन्नोंको कभी न खाना चाहिये और यदि खा ले चान्द्रायण व्रत करे। संन्यासं कुरुते यस्तु श्राद्धं तस्य विधीयते । तस्थानं नैव भोक्तव्यं भक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।४१९॥ जो संन्यास करता है उसके लिये श्राद्ध करने का विधान है। इस प्रकार यह मृतकवत् हो जाता है। अतः उसकाअन कभी न ना चाहिये और सा लेनेपर चान्द्रायग व्रत करना चाहिये । विश्वामिप्रवाक्यम् एकस्यानं ज्या मुक्त्वा निरन्तरमनापदि । प्राणायामशतं कुर्याच्छुद्धयर्ष यतिरात्मवान् ।।४२०॥ कोई आपत्काउ न होनेपर तीन दिनतक निरन्तर एक ही क्तिका अन पाकर आमवान् यतिको शुद्धिके लिये सौ प्राणायाम रने चाहिये। अत्रिम्मती शातीनां तु कुले भिक्षुर्न भिक्षेत कपश्चन । आचरेष यदा मिक्षा तदा चान्द्रायणं चरेत् ।।४२१॥ २०
३०६
OSTEREOGROGRAMNEDGE
मुमुक्षुसर्वस्वसार
G
भिक्षुको अपने बान्धयोंके कुलमें कभी भिक्षा न करनी
जब कभी उसे उनके यहाँ भिक्षा करनी पड़े तो चान्द्रा
करना चाहिये।
सगोत्रमसगोत्रं वा यद्गृहे सूतकं भवेत् ।
न तावच्छुद्धथते भूमिर्यावन्न स्यादनिर्दशम् ।
भिक्षाञ्चेद्रिक्षते भिक्षु क्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
जिस घरमें सूतक हो उसमें रहनेवाला उसके गोत्र
अपया गोत्रसे बाहर हो, उसकी भूमि, जबतक अनिर्दश (दशों
नहीं होता, शुद्ध नहीं होती। यदि उसके यहाँ भिक्षु भिक्ष
ले तो उसे खाकर चान्द्रायण मत करें।
निषिद्धानं यदाश्नीयादनुज्ञा यत्र नास्ति थे।
अतिकन्ट्रं तदा भिक्षुः कुर्याच्छुद्धयर्थमात्मनः ॥४
जब कभी भिक्षु, जिसके लिये आज्ञा नहीं है ऐसा दि
अन भोजन करे तो उसे अपनी शुद्धिके लिये अतिकष्ट
करना चाहिये।
सतपेपणगोदोद्दादमपाकादिकालता
ऊर्य यदि प्रतीक्षेत मिक्षार्थ मैक्षमावरन् ।।४२
द्वादशैव वदा कुर्यात्प्राणायामाविशुद्धये ।
प्राणायाममतं कुर्याद्वक्त्वा शूद्राममापदि ॥४२
यदि भिक्षा मागते समय मिनुको सत्त पीसने, गौ दुहने का
अन पकाने आदिक फारसे अधिर प्रतीक्षा करनी रे तो
चतुर्थ प्रकरण ३०७ narsunarauruwaruRGREHENERumetini. अपनी शुद्धिके लिये वारह प्राणायाम करने चाहिये, तमा आपत्ति- कालमें शद्का अन्न खानेपर उसे सौ प्राणायाम करने चाहिये । जमदग्निस्मृती आहारग्रहणे रात्री प्राणायामा दश स्मृताः । जलप्रग्रहणे रात्री प्राणायामास्तथैव च ॥४२६॥ रात्रिको आहार करनेपर दश प्राणायामोंका नियम है तपा रात्रिमें जल पीनेपर भी इतने ही प्राणायाम करने चाहिये। मुक्तरोपं न कुर्वीत प्रमादात्कुरुते यदि । प्रतिप्रासं वदा कुर्यास्त्रीस्त्रीन्प्राणायामान्यतिः ॥४२७॥ यतिको कमी जूटन न छोड़नी चाहिये और यदि प्रमादयश कभी छोड़ दे तो एक-एक प्रासके लिये तीन-तीन प्राणायाम करे । देवलरमती पवितामं सद्वक्त्वा प्रायश्चिी भवेद्यतिः । तप्तकप्रयं कृत्वा गुद्यते नात्र संशयः॥४२८॥ यति पतितका अन एक बार भी खा टेनेपर प्रायभिचका मागी हो जाता है। तब यह तीन तप्तकृष्ट करनेपर शुद्ध होना है-इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । समग्मती ताम्यूलाम्पसनं चैव कांस्सपाये तु मोजनम् । कृत्वा चोपरमेहिनः सन्गन्धादि च भूपपम् ॥४२९।।
३०८ GPUDocussiONGRMIRPUNASI मुमुसुसखसार ताम्बूलमक्षण, तैलमर्दन और कॉप्सीके पात्रमें मोजन तथा माला और गन्ध आदि धारण करनेपर भिक्षुको फरना चाहिये। उपानही विना मिचः कृत्वा मिक्षाटनादिकम् । मार्गे भूत्रसमाकीर्णे सम्यकलानेन शुद्धयति ।। किसी म्बादिसे मरे हुए मार्गमें बिना जूतोंके मित्र करनेपर भिक्षु भली प्रकार मान करनेपर ही शुद्ध होता है ज्ञानेन मुच्यते भिक्षुस्तपसा स्वर्गमामुयात् । नरकं विषयासङ्गात्नयो मार्गास्तपखिनाम् ।। ज्ञान हो जानेपर भिक्षु मुक्त हो जाता है, तपस्याद्वा प्राप्त कर सकता है और विषयासक्ति होनेपर नरकमें जात इस प्रकार तपखियोंके लिये ये तीन मार्ग हैं। जमदमिस्मृती उद्धृत्य वामहस्तेन माजनाधोऽन्नमति वै । गृद्धोच्छिष्टं च विज्ञेयं भुक्त्वा चान्द्रायणंचरेत् ॥४ जो पुरुष पात्रमेंसे बायें हायसे अन्न उठाकर भोजन कर- उसका अन्न गृद्धके उच्छिष्टके समान ही जानना चाहिये खाकर चान्द्रायण व्रत करे। यमस्मृती उद्धृत्य वामहस्तेन या पिद्राह्मणो जलम् । सुरापानेन तत्तुल्यं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।।४३ OGROLOGROID चतुर्थ प्रकरण ३०९ శాం जो ब्राह्मण बायें हाथसे निकालकर जल पीता है उसका वह जलपान मद्यपानके समान है-ऐसा स्वायम्भुव मनुने कहा है। जमदग्निस्मृती विनाङ्गुष्ठेन नाश्नीयान लिहेजिया करम् । अनन्यदि लिहेद्धस्तं तदा चान्द्रायणं चरेत् ॥४३४॥ अंगूठा लगाये बिना कभी भोजन न करे तथा हायको कभी जीभसे न चाटे और यदि भोजन करते समय हाय चाट ले तो चान्द्रायण व्रत करे। सुजानस्य यदा भिक्षोः कदाचित्स्रवते गुदम् । अन्नं चास्सगतं त्यक्त्वा कृत्वा शौचं समाहितः॥४३५॥ स्नानं कृत्वा यथान्यायं त्रिंशत्प्राणायामांश्चरेत् । अहोरात्रोपितो भूत्वा पञ्चगव्यं पिवेत्ततः ॥४३६।। यदि भोजन करते समय भिक्षुको कभी मलस्राव (दस्त) हो जाय तो मुखका अन्न थूककर सावधान चित्तसे शौचकर्म करे और मान करनेके अनन्तर नियमानुसार तीस प्राणायाम करे । फिर एक दिन-रातका उपवास करके पञ्चगव्य पान करे । पञ्चगव्यपानमन्त्रश्चान्यनिर्दिष्ट:- पञ्चगव्यपानका मन्त्र अन्य आचार्योंने इस प्रकार कहा है- यत्चगस्थिगतं पापं शरीरे पूर्वसचिवम् । तन्मे पापञ्च शोकञ्च पश्चगव्याः पुनन्तु माम् ।।४३७॥
मुमुक्षुसर्वस्वसार 16GRAMODGenresents जो पूर्वसंचित पाप हमारे शरीरमें त्वचा और अस्थियोंमें स्थित हैं मेरे उस पाप और शोकको तथा मुझे भी पचगव्य पवित्र कर दें। विश्वामित्रवाक्यम् अत्रानादुक्तमेवैतत्प्रायश्चित्तं विधीयते । अभ्यासादधिक किश्चिद्वर्द्धते दिनसंख्यया ॥४३८॥ ऊपर कहे हुए प्रायश्चित्तका बिना जाने किये हुए पापोंके लिये ही विधान है। किन्तु अभ्यासवश किये हुए पापोंमें यह दिनोंकी संख्यामें कुछ बढ़ जाता है [अर्थात् अधिक दिन करना पड़ता है। विष्णुपुराणे कृते पापेऽनुतापो पै यस्य पुंसः प्रजायते । प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं हरिसंसरणं परम् ॥४३९।। जिस मनुष्पको पाप करनेपर पश्चात्ताप होता है उगां. टिये एकमात्र हरिम्मरण ही परम प्रायश्चित्त है। तसादहनिशं विष्णु संस्मरेत्पुरुषो मुने । न याति नरफ शुद्धः सङ्गीणासिलपातकः ॥४४०॥ अतः हे मुने ! पुरुषको अहर्निश श्रीविष्णुमगराया है। चिन्तन करना चाहिये। इसमें यह सम्पूर्ण पापों के धाग होनेगे गुर हो जाने के कारण नरकगामी नहीं देता।
चतुर्थ प्रकरण ३११ BGRANGINGREDGIEDuraunaruRRIEDO स्कन्दपुराणे अभक्ष्यभक्षणात्पापमगम्यगमनादिनम् नश्यते नात्र सन्देहो गोविन्दस्य प्रकीर्तनात् ॥४४१॥ इसमें सन्देह नहीं कि श्रीगोविन्दका कीर्तन करनेसे अभक्ष्य- भक्षण और अगम्यागमनसे हुआ पाप भी नष्ट हो जाता है। तन्नास्ति कर्मजं लोके वाग्जं मानसमेव वा । यत्तु न क्षीयते पापं कलौ गोविन्दकीर्तनात् ॥४४२॥ संसारमें ऐसा कोई कर्मज, वाचिक अथवा मानसिक पाप नहीं है जो कलियुगमें श्रीगोविन्दका गुणगान करनेसे क्षीण न हो जाय । आप्तवाक्यानि जपाज्ज्ञानात्तथा ध्यानान्नान्यनिक्षोस्तु शोधनम् । तसात्सानि सदा कुर्याद्यतिः शुद्धयर्थमात्मनः ॥४४३॥ यतिके लिये जप, ज्ञान और ध्यानके सिवा और कोई शुद्धि- का साधन नहीं है, इसलिये उसे अपनी शुद्धिके लिये उन्हें निरन्तर करते रहना चाहिये । ध्यानेन सदृशं नास्ति शोधनं पापकर्मणाम् । श्वपाकेष्वपि भुञ्जानो ध्यायी नैव तु लिप्यते ॥४४४॥ ध्यानके समान पापक्रमोंका शोधन करनेवाला और कोई उपाय नहीं है, ध्यानी पुरुष चाण्डालोंके यहाँ भोजन करता हुआ भी पापलिप्त नहीं होता।
मुमधुसर्यवसार .DUDURGRIDGeoNGUAGreAICOGRALSO मंग्रहकर्तृवचनम् किम्बहुलेखनेनेह सङ्पादिदमुच्यते । त्यागो विषयमात्रस्य कर्तव्योखिलभिक्षुमिः १४४५।। इस विषयमें और बहुत लिखने से क्या टाम है, संक्षेपसे यही कहा जाता है कि समन भिक्षुओंको विषयमात्रका त्याग कर देना चाहिये। संन्यासाश्रममासाद्य सजते विपयेषु यः। स्वगुणख्यातिसञ्जीवी स भिक्षुः सर्वतोऽधमः ॥४४६|| जो संन्यासाश्रममें आकर विषयोंमें आसक्त रहता है, अपने गुणोंकी प्रसिद्धिके आश्रयसे जीवित रहनेवाला वह भिक्षु सबसे अधम है। उत्तम भिक्षुके लक्षण स्वश्रेयोऽर्थकृतायासः स्वधर्माणाञ्च गृहकः । परदोपाप्रवादी च स भिक्षुस्तूत्तमः स्मृतः ॥४४॥ जो अपने कल्याणके लिये प्रयत करता है, स्वधमोंको गुप्त रखनेवाला है और दूसरोंके दोषोंका बखान नहीं करता वह भिक्षु उत्तम कहा गया है। सर्वारम्भपरित्यागी सदैवान्तर्मुखश्च यः । प्रमाभ्यासपरो नित्यं स भिक्षुर्भिक्षुरुच्यते ॥४४८ll चतुर्थ प्रकरण RecruNGANORGANISGRRIODERMISSU40. जो सब प्रकारके आरम्भोंको त्यागनेवाला है, सदा ही अन्त- र्मुख रहता है तथा निरन्तर ब्रह्मचिन्तनमें लगा रहता है यही भिक्षु भिक्षु कहलाता है। भिक्षानमात्रसम्भोजी कन्याकोपीनसङ्ग्रही । श्रवणादिरतो यश्च स भिक्षुर्मोक्षमामुयात् ॥४४९॥ जो केवल भिक्षान्न ही भोजन करता है, केवल कन्या और कौपीनका ही संग्रह करनेवाला है तथा निरन्तर श्रवणादिमें तत्पर रहता है वह भिक्षु मोक्ष प्राप्त कर लेता है। तुष्टिनिन्दा तुष्टयो भिक्षुणा हेया मोक्षाध्यप्रतियन्धिकाः । अन्यथा न्यासतुष्टयायं मोक्षमार्गात्पवेधतिः॥४५०॥ भिक्षुको मोक्षमार्गफी विघ्नस्वरूप तुष्टियोंका त्याग करना चाहिये। नहीं तो संन्यासमात्रकी तुष्टि से यति मोक्षमार्गमे पतित हो जाता है। उपादानाभिधा या सा न्यामतुष्टिर्निगयते । न्यासलिन बोधःस्साचेन मोक्षोपि सम्भवेन् ।।४५१॥ उपादान नामकी जो तुष्टि है वही न्यासतुष्टि कही जाती है। [ उससे यति यह समझने लगता है कि ] संन्यासका चिद धारण फरनेसे ही ज्ञान हो जाता है और उसीसे मोश भी हो सकता है। अतो प्यानविरागाभ्यां किं मम स्वासपादिभिः । इति तुष्टिः सदा हेया तथान्यायाप्टतुष्टयः ।।४५२॥
३१४ मुमुसुसर्यवसार ORSDCRUARGEOGRus अतः ध्यान, वैराग्य एवं जप आदिसे मुझे क्या लेना है। इस प्रकारकी तुष्टि सदा त्याग करनेयोग्य है तथा इसके सिवा अन्य आठ तुष्टियाँ मी सर्वदा त्याज्य हैं। ताः सांख्यकारिकायां वा ईशकृष्णेन दर्शिताः । तद्वाक्यं संलिखामीह नवतुष्टिप्रदर्शकम् ॥४५३॥ चे तुष्टियाँ ईश्वरकृष्णने सांख्यकारिकामें दिखलायी हैं । यहाँ मैं उनका नौ तुष्टियोंको प्रदर्शित करनेवाला वचन लिखता हूँ। ईश्वरकृष्णवाक्यम् आध्यात्मिकायतस्रःप्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः। याह्या विपयोपरमात्पञ्च नव तुष्टयोऽभिमताः ॥५४॥ प्रकृति, उपादान, काल और भाग्य नामको चार आध्यात्मिक तुष्टियाँ हैं तथा विपयोंके निवृत्त हो जानेपर पाँच बाह्य तुटियाँ होती हैं । इस प्रकार कुल नौ तुष्टियाँ मानी गयी हैं* | • आठ प्रकारकी प्रकृतिमेंसे किसी में चित्त लीन हो जानेसे अपने को मुक्त मान लेना 'प्रकृति' नामकी तुष्टि है। संन्यासाश्रम ग्रहणसे ही अपनेको कृतार्थ मान लेना 'उपादान' तुष्टि है। समय आनेपर स्वयं ही सिद्धि मिल जायगी, ध्यानादि क्लेशकी क्या आवश्यकता है-ऐसा विचार 'काल' नामकी तुष्टि है तथा भाग्योदयसे सिद्धि हो जायगी-ऐसा विचार 'भाग्य' नामयाली तुष्टि है। इन चारोंका आत्मा (अन्तःकरण) से सम्बन्ध है, इसलिये ये आध्यात्मिक तुष्टियाँ हैं । पदार्थोके उपार्जन, रक्षण और व्यय आदिमें श्लेश देखकर उनसे उपरत हो जाना बाघ तुष्टियाँ हैं । शब्दादि बाह्य विषय पाँच हैं, इसलिये बाह्य तुष्टियाँ भी पाँच है। ये सब मिलाकर नौ तुष्टियाँ हैं।
चतुर्थ प्रकरण OGENGREOGRAISIGNOMICROGrasRGRause याज्ञवल्क्यस्मृती नाश्रमः कारणं धर्मे क्रियमाणो भवेद्धि सः । अतो यदात्मनोऽपथ्यं परेषां न समाचरेत् ।।४५५॥ धर्ममें आश्रम कारण नहीं है वह तो करनेसे ही होता है। अतः जो कुछ अपने लिये अहितकर हो उसका दूसरोंके प्रति भी आचरण न करे। विद्वान यतिके धर्म संग्रहकर्तृवचनम् अथ विद्वद्यतेर्धर्मा यैर्याक्थैः सम्प्रदर्शिताः । स पाचान्यपीहाहं सगृह्णामि प्रसङ्गतः ॥४५६॥ अब मैं प्रसंगवश उन वाक्योंका यहाँ संक्षेपसे संग्रह करता है जिनमें विद्वान् यतिके धर्म बतलाये गये हैं । ब्रह्मोपनिषदि अमेरिव शिखा नान्या यस्य ज्ञानमयी शिखा । स शिखीत्युच्यते विद्वान् नेतरे केशधारिणः ॥४५७॥ जिसके अनिके समान कोई और शिखा नहीं है बल्कि केवल ज्ञानमयी शिखा ही है वही विद्वान् शिखी (शिखाधारी) कहलाता है; उससे इतर केशधारी नहीं। ज्ञानशिखिनो ज्ञाननिष्ठा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः । ज्ञानमेव परं तेषां पवित्रं ज्ञानमुत्तमम् ।।४५८॥
गुमगांगर DOOGuacamanna भोजन ITEM मानिट र मान- पत भाग RTR जानवअंग यस्तु है; पर डान MPETITहै। परमामना मन् कामापरित्पम्प भने परमे मितिः । मानदण्टो नो येन एकदाडी म उच्चने ।।४५९।। जिगह माप मामनाओं पर अत परम मिति है और जिम गानसप : भाग किया हुआ है, वह एकरनी पहाता है। आमासम् यदात्मा प्रजयात्मानं सन्धने परमात्मनि । तेन सन्ध्या ध्यानमेव तम्मात्सम्याभिवन्दनम् ॥४६०॥ आत्मा जो बुद्विद्वारा अपनेको परमात्मा सापित कर देता है यह प्यान ही सन्न्या है । इसीसे [यतिका ] सन्ध्योपासन होता है। निरुदका ध्यानसन्भ्या वाकायल्लेशवर्जिता । सन्धिनी सर्वभूतानां सा सन्ध्या झेकदण्डिनाम् ॥४६१॥ यह जलहीन ध्यानमयी सन्ध्या वाणी और शरीरके क्लेशसे रहित, और समस्त प्राणियोंकी [परमात्माके साथ] सन्धि करानेवाली है । यही एक दण्डधारियोंकी सन्ध्या है।
चतुर्थ प्रकरण GRELIARO आत्मानमात्मना साक्षादा बुद्ध्वा सुनिचलम् । देहजात्यादिसम्बन्धान् वर्णाश्रमसमन्वितान् । वेदशास्त्रपुराणानि पादपांशुमिव त्यजेत् ।।४६२॥ एकाकी निस्पृहस्तिष्ठेन हि केन सहालपेत् । दद्यानारायणेत्येवं प्रतिवाक्यं सदा यतिः॥४६॥ अपने आत्माको बुद्धिद्वारा साक्षात् निश्चल ब्रह्मतत्त्व जानकर वर्णाश्रमके सहित देह और जाति आदि सम्बन्धोंको तथा वेद, शाख और पुराणों को पैरकी धूलिके समान त्याग दे। किसी प्रकारकी इच्छा न करके अकेला ही रहे तथा किसीसे वार्तालाप न करे तथा यतिको चाहिये कि सर्वदा उत्तरमें 'नारायण' इतना ही कहे । मुनिः कौपीनवासाःस्थानमो वा ध्यानतत्परः । अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निराशिपः । आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ॥४६४॥ मुनिको सर्वदा कौपीनधारी अथवा नग्न रहना चाहिये । वह ध्यानपरायण और अध्यात्मनिरत रहकर निरपेक्ष और निष्कामभावसे स्थित रहे तथा आनन्दकी इच्छासे केवल अपनी ही सहायतासे विचरता रहे। सन्दिग्धः सर्वभूतानां वर्णाश्रमविवर्जितः । अन्धवजडवचापि मूकवच महीं चरेत् ॥४६५।। वह सम्पूर्ण प्राणियोंका सन्देहपात्र होकर वर्णाश्रमचिह्नोंसे रहित हो अन्धे, जड और गूंगेके समान पृथिवीमें विचरता रहे।
३१८
OGRELIGRom
मुमुक्षुसर्वस्वसार
ANINGREUSIGaure
देवाग्न्यागारे तरुमूले गुहायां
वसेदसङ्गोलक्षितशीलवृत्तः ।
निरिन्धनज्योतिरिवोपशान्तो
न चोद्विजेत्प्रव्रजेद्यत्र कुत्र ।
त्यक्तैपणो झनृणस्तं विदित्या
मौनी वसेदाश्रमे यत्र कुत्र ॥४६६।।
यतिको अपने शील और आचारको अलक्षित रखते हुए
देवागार, अग्निशाला, वृक्षमूल अथवा गुहामें असङ्गभावसे निवास
करना चाहिये । तथा बिना ईधनकी अग्निके समान शान्त रहकर
जहाँ-तहाँ विचरता रहे और उद्विग्न न हो। उसे तीनों प्रकारकी
एषणाओंको त्यागकर तीनों ऋोंसे उऋण हो भगवान्का साक्षात्कार-
कर मौनावलम्बनपूर्वक जहाँ-तहाँ आश्रममें पड़े रहना चाहिये ।
महाभारते
कपालं
वृक्षमूलानि कुचैलमसहायता ।
उपेक्षा सर्वभूतानामेतावद्भिक्षुलक्षणम् ॥४६॥
कपाल, वृक्षकी जड़, मलिनवल, निरपेक्षता और सम्पूर्ण
प्राणियोंकी उपेक्षा यही भिक्षुका लक्षण है ।
अरोपमोहः समलोष्टकाचनः
प्रहीणकोशो गतसन्धिविग्रहः ।
अपेनिन्दास्ततिरप्रियाप्रिय-
वरनुदासीनवदेप मिक्षुकः ॥४६८॥
GRIDGReksOGRALISGROGROLOGROGRausa. चतुर्य प्रकरण क्रोध और मोहसे रहित, ढेले और सुवर्णमें समान दृष्टि रखनेवाला, पञ्चकोशसे रहित, सन्धिविमहशून्य, निन्दास्तुतिसे मुक्त हुआ तथा प्रिय और अप्रियकी भावना न रखता हुआ यह भिक्षुक उदासीनके समान विचरता रहे। अशिल्पजीवी गुणवांथ नित्यं जितेन्द्रियः सर्वतो विप्रयुक्तः । अनोकशायी लघुरल्पवास- वरन्देशानेकचरः स भिक्षुकः ॥४६९।। वह भिक्षु किसी प्रकारके शिल्पका आश्रय न कर, सर्वदा गुणयुक्त हो, जितेन्दिय और सब ओरसे अनासक्त रह, किसी वृक्षके तले शयन करता तया पोड़ा-थोड़ा निवास करता अनेकों देशोंमें अकेला ही विचरता हुआ घूमता रहे । लाभं साधारणं नेच्छेनाभिमुञ्जीत पूजितः । अभिजितलामं हि जुगुप्सेतैव तादृशः ॥४७०॥ कमी साधारण लाभकी भी इच्छा न करे, दूसरोंसे सम्मानित होकर भोजन न करे तथा उसी स्थितिमें रहकर सदा सम्मान-लाभ- की निन्दा करता रहे। शून्यागारं घृक्षमूलमारण्यमथवा गुहाम् । अज्ञातचर्या गत्वान्यां ततोऽन्यत्रैव संविशेत् ।।४७१॥ शून्य मठ, वृक्षमूल, वन अपवा जिसका किसीको पता न हो ऐसी किसी अन्य गुहामें जाकर या वहाँ से भी अन्यत्र जाकर रहने लगे।
३२०
OGRAPrxuaruKnoeuouOOGuacause
मुमुवमर्षवसार
यामवल्क्यस्मृती
अकार्यकारिणां दानं वेगो नद्याश शुद्विछन् ।
शोध्यस्य मृच तोयन संन्यासोऽय द्विजन्मनाम् ।।४७२॥
जो किसी प्रकारका कार्य नहीं करते उनको दिया हुआ दान
और नदीका वेग शुद्धि करनेवाले हैं तथा शोध्य पदार्गाको मृत्तिका
और जल एवं द्विजातियोंको संन्यास शुद्ध करनेवाला है।
अगिरःस्मृती
पष्टिं कुलान्यतीतानि पप्टिमागामिकानि च ।
कुलान्युद्धरते प्राज्ञः संन्यस्तमिति यो वदेद ॥४७३।।
जो प्राज्ञपुरुष 'मैंने संन्यास कर दिया ऐसा उच्चारण
करता है वह अपने साठ पहले और साठ आगामी कुलोंका उद्धार
कर देता है।
संग्रहकर्तृवचनम्
एवं विद्वद्यतेधर्माः सङ्केपेणेह दर्शिताः ।
ते च सेव्याः प्रयत्नेनान्यैरपि यतिभिः सदा ॥४७४||
इस प्रकार संक्षेपसे यहाँ विद्वान् यतिके धर्म बतलाये। उन्हें
अन्य यतियोंको भी सर्वदा प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये ।
जिज्ञासु यतिके धर्म
विविदिपुस्तु संन्यासी तत्त्वगं वेदपारगम् ।
उपेयाद्रावोधायाचार्य
शुश्रूषयान्वितः ।।४७५॥
AGRICUs चतुर्थ प्रकरण ३२१ RELUENGLISOGRasEDGauanoran. जो जिज्ञाष्ठ यति हो उसे ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये सेवा- भावसे भरकर वेदके पारगामी तत्त्वज्ञ गुरुके पास जाना चाहिये। ननु ब्रह्मविदाचार्य विना प्राक्छुतशास्त्रतः । तर्केणैवात्मबोधः स्यात्तस्मै यतः पुनर्वथा ॥४७६।। शङ्का-बोध तो ब्रह्मवेत्ता आचार्यके बिना पहले श्रवण किये हुए शास्त्र तथा मननसे भी हो सकता है। उसके लिये प्रयत्न करना तो वृथा ही है। मैवं ब्रह्मविदाचार्य विना बोधो न सम्भवेत् । प्राक्छुततर्कशास्त्रेण ह्याचार्यवानिति श्रुतेः ॥४७७।। समाधान-ऐसा नहीं है । ब्रह्मवेता आचार्यके बिना केवल पहले श्रवण किये हुए शास्त्रसे ही बोध किसी प्रकार सम्भव नहीं है, जैसा कि 'आचार्यवान् पुरुषो वेद'* (छा० उ०६।१४।२) इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है। तर्कस्य वेदयाह्यस्य नास्त्यात्मज्ञानहेतुता । नेपा तर्केण चाप्या धीरिति श्रुत्या निषेधनात् ॥४७८॥ वेदवाय तर्क आत्मज्ञानमें हेतु नहीं हो सकता, क्योंकि 'नेपा तर्केग मतिरापनेया't (क० उ० १।२१९) इस श्रुतिने इसका निषेध किया है। तज्ज्ञानार्थमिति श्रुत्या तद्विद्धीति स्मृवेस्तथा । गुरूपगमनं कार्य ब्रह्मज्ञानाय भिक्षुणा ॥४७९|| • आचार्यवान् पुरुषको ही ज्ञान होता है। + यह मति तसे प्राप्त होनेयोग्य नहीं है।
.
मुमुक्षुसर्वस्वसार
OGROLAGANAGGravarNIRGAMARRIEOGreauc.
'तज्ज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छत्समित्पाणिः'* (मु० उ०१
२।१२) इस श्रुतिसे तथा 'तद्विद्धिप्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेक्या'
(गीता ११३४ ) इस स्मृतिसे भी भिक्षुको ब्रह्मज्ञानके लिये गुरु
पास गमन करना ही चाहिये ।
अमानित्वादिभिर्युक्तो यद्वेष्ट्रत्यादिभिर्यतिः ।
शृणुयात्तच्चमस्यादिवाक्यानि सगुरोर्मुखाद ॥४८०।
यतिको [ गीतोक्त ] अमानित्य आदि तमा अद्वेष्टत्य आदि
गुणोंसे युक्त होकर अपने गुरुके मुखसे 'तत्त्वमसि' आदि याक्यों-
का प्रवण करना चाहिये।
ज्ञानाय श्रवणादीनि कार्याणीत्यावीश्रुतिः ।
तथा तल्लक्षणादीन्याचार्यरुक्तानि चे स्फुटम् ।।४८१।।
श्रुतिने भी कहा है कि ज्ञानके लिये प्रवण आदि करने
चाहिये तथा आचार्योन भी उनके लक्षण आदिका स्पष्ट निरूपण
किया
श्रुतिः
श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यथोपपतिमिः ।
श्रुत्वा च सततं ध्यायेदते दर्शनहनः ।।४८२॥
प्रथम वेदयाक्योंगे श्रवण करना चाहिये, रि युक्तिस्र्यच
मनन करना उचित है तप श्रयण करको निरन्तर ध्यान करें। ये
ही साक्षाकारके कारण है।
उसे (द्राको)जानगरिय रामममिया करा पान माय)
उसे प्रगाम, मन और सेवारद्वारा मानी।
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चतुर्य प्रकरण ३२३ OGRAAGRIOGreuSOGRAMOGRAMOGRAMOGreum. सर्वज्ञमुनिवाक्यम् शब्दशक्तिविपयं निरूपणं युक्तितः श्रवणमुच्यते बुधैः। वस्तुतत्त्वविपयं निरूपणं युक्तितो मननमित्युदीर्यते ॥४८३॥ चेतसस्तु चितिमात्रशेषता ध्यानमित्यभिवदन्ति वैदिकाः। अन्तरङ्गामिदमित्थमीरितं तत्कुरुष्व परमात्मबुद्धये ॥४८४॥ युक्तिपूर्वक शब्दशक्तिविषयक निरूपणको बुधजन श्रवण कहते हैं, युक्तिपूर्वक वस्तुतत्यविषयक निरूपणको मनन कहा जाता है । तथा चित्तका केवल चिन्मात्र शेष रह जाना—इसीको वेदवेत्ता ध्यान बतलाते हैं। इस प्रकार यह अन्तरंग साधन कहा गया है, इसे परमात्माका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये करो। आप्तवाक्यम् श्रुतेः शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि । निदिध्यासो लक्षगुणोऽथानन्तं निर्विकल्पकम् ॥४८५।। श्रवणसे सौगुना मननको समझे और मननसे भी लाखगुना निदिग्यासनको जाने तथा इससे अनन्तगुनी निर्विकल्प स्थिति है।
३२४
OCOMMAGAUR
मुमुक्षुसर्यवसार
OOGLEnreuanGOuEOGOux
वाकिरदाक्यम्
श्रवणादिक्रिया तावत्कर्चव्येह प्रयत्नतः ।
यावद्यथोक्तविज्ञानमाविर्भवति
वस्वतः॥४८६॥
जबतक यपावत् विज्ञानका वास्तविक आविर्भाय न हो तर
तक इस टोकमें श्रवणादि क्रियाओंको प्रयत्नपूर्वक करते रहना चाहिये।
संग्रहकर्तृवचनम्
अज्ञानं पन्धहेतुर्हि विज्ञानं पन्धनाशकम् ।
तमामात्मविज्ञप्त्यै कर्तव्यं श्रवणादिकम् ।।४८७॥
अज्ञान ही यन्धनका कारण है तथा विज्ञान दी मन्धनका
नाश करनेवाला है। अतः प्रम और आरमाका योध प्राप्त करनेके
टिये अषण आदि करना चाहिये।
गुरु-शुश्रूषा-निरूपण
प्यासस्मृती
गुरुमूलाः क्रियाः सर्या मुक्तिमुक्तिफलप्रदाः ।
तमात्मेय्यो गुरुनित्यं युक्तार्यस्तु समाहितः॥४८८
भोग और मोक्षमए फट देनयाली मारी क्रिपार गुरुमूला
ही हैं। अतः मदा समाहितचिन त गुती होता
करनी चाहिये।
अद्या परसा युक्त सदा दादा मध्ययो।
पहनामान दुर्रात दंतागुरुममियां ॥१८॥
ENTRA चतुर्थ प्रकरण ३२५ RUDDRUGREOGraUNDEROLAGN अत्यन्त श्रद्धासे सम्पन्न होकर दोनों सन्ध्याओंके समय सर्वदा देवता और गुरुके प्रति बारह बार दण्डवत्-प्रणाम करे । गुरो वाप्रियं कुर्यात्पण्डितेऽपण्डितेऽपि वा । नाभासयेच तद्वाक्यं नावमानं समाचरेत् ॥४९०॥ गुरु, चाहे विद्वान् हो अथवा अविद्वान् उसका अप्रिय कभी न करे, उसके वाक्यकी कभी अवहेलना न करे और न कभी उसका अपमान ही करे। गुरोध चक्षुर्विपये न यथेष्टासनो भवेत् । न कुर्यान्नियमारम्भमनिवेद्य स्वकं गुरुम् । छायाभूतोऽपरित्यागी नित्यमेव वसेद्गुरौ ॥४९१॥ गुरुजीके नेत्रोंके सामने मनमाने आसनसे न बैठे, अपने गुरुसे कहे बिना किसी नियमका भी आरम्भ न करे, और गुरुजीकी छायारूप होकर उनका कभी त्याग न करते हुए सर्वदा उन्हींके समीप बना रहे । मनुस्मृती नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम् । गुरोर्यत्र परीवादो निन्दा चापि प्रवर्त्तते । कौँ तत्र पिधातव्यो गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः॥४९२॥ गुरुजीका नाम उनके पीछे भी अकेला (बिना कोई सम्मान- सूचक उपाधि लगाये) न ले । जहाँ गुरुजीका अपवाद या निन्दा मुमुक्षुसर्वस्वसार ३२६ OETISAGra raneKIADream. होती हो वहाँ अपने कान मूंद लेने चाहिये, अपवा वहाँसे कहीं अन्यत्र चले जाना चाहिये । सम्प्रदायविदां वचनम् वेदान्तश्रवणारम्भे प्रणामा द्वादश स्मृताः। गुरोर्यथावदन्ते तु पट् प्रणामाः प्रकीर्तिताः ॥४९३॥ गुरुको वेदान्तश्रवणके आरम्भमें बारह तथा अन्तमें छः बार विधिपूर्वक प्रणाम करना बतलाया गया है । उरसा शिरसा दृष्टया मनसा श्रद्धयापि च । पद्भयां कराभ्यां कर्णाभ्यांप्रणामोटाङ्ग उच्यते ॥४९४॥ हृदयसे, शिरसे, दृष्टिसे, मनसे, श्रद्धासे, चरणोंसे, हार्योंसे तथा कानोंसे किया हुआ प्रणाम अष्टाङ्ग दण्डवत् कहलाता है । अष्टाक्षरेण मन्त्रेण यतयो ये नमस्कृताः। स्मृतनारायणा भन्ति नराणां पापपञ्जरम् ॥४९५।। जो यतिजन [ॐ नमो नारायगाय-इस ] अष्टाक्षर मन्प्रसे नमस्कार किये जाते हैं, श्रीनारायणका स्मरण कराये जानेके कारण वे मनुष्योंकी पापराशिको नष्ट कर देते हैं । संग्रहकर्तृवचनम् एवं गुरुमुपागम्य ततो ज्ञानमवाप्य च । ब्रह्मात्माज्ञाननाशेन ब्रह्मैव भवति स्वयम् ॥४९६॥ इस प्रकार गुरुके समीप आकर उनसे ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्म और आरमाके अज्ञानका नाश हो जानेसे यह खयं ब्रह्म ही हो जाता है।
OGReuroom चतुर्थ प्रकरण ३२७ ज्ञानाधिकारी कौन है? नन्वेयं ब्रह्मयोधोऽस्तु शिष्यस्य गुरुवाक्यतः । अधिकारी तथाप्यस्य जीवोऽन्यो वेति संवद ॥४९७॥ शङ्का-इस प्रकार गुरुके वाक्यसे शिष्यको ब्रह्मज्ञान होता है-सो तो ठीक है; किन्तु इस ज्ञानका अधिकारी जीव है या कोई और यह बतलाओ। शृणु त्वं ब्रह्मयोधस्साधिकारी ब्रह्म नापरः । यतोऽज्ञानेन जीवत्वं ब्रह्मणा स्वे प्रकल्पितम् ।।४९८॥ समाधान-सुनो, ब्रह्मज्ञानका अधिकारी ब्रह्म ही है, और कोई नहीं, क्योंकि अज्ञानवश ब्रह्मने ही अपनेमें जीवभावकी कल्पना कर ली है। राधेयतेव कौन्तेये सिंहे चाप्यजता यथा । राजपुत्रे च भिल्लत्वं तथा ब्रह्मणि जीवता ।।४९९।। जिस प्रकार कुन्तीपुत्र (कर्ण) में राधापुत्रता*, सिंहमें अजता (बकरापना) और राजपुत्रमें भिल्लता कल्पित है उसी प्रकार ब्रह्ममें जीवभाव है। • कर्ण कुन्तीके पुत्र थे, किन्तु अधिरथकी स्त्री राधाद्वारा पालित होनेके कारण राधापुत्र कहलाये। + जैसे किसी सिंहके बच्चेको पकड़कर बकरीके बच्चों के साथ रख दिया जाय और फिर यह अपने यास्तयिक स्वरूपको भूलकर अपनेको बकरा ही समझने लगे। +जिस प्रकार कोई राजपुत्र भीलों में रहने के कारण कालान्तरमें अपनी पूर्वस्थितिको भूलकर अपनेको मील ही समझने लगे।
३२८ aurasRGRU610 मुमुक्षुसर्यवसार ब्रह्मैव वस्तुतो मुक्तं ज्ञेयत्वं प्रतिपद्यते । जीवत्वं चाप्ययोधेनावोर्हति तन्मुमुक्षुताम् ।।५००|| वस्तुतः नित्यमुक्त ब्रह्म ही अज्ञानवश ज्ञेयत्व और जीवभाव- को भी प्राप्त हो जाता है; अतः उसीमें मुमुक्षुताका आविर्भाव हो सकता है। ननु विद्याधिकारित्वं ब्रह्मणि नाईतीति चेत् । किं नेक्षसे जगत्सर्वमज्ञानात्तत्र कल्पितम् ।।५०१।। यदि कहो कि ब्रह्ममें ज्ञानाधिकारित्वकी योग्यता नहीं है तो क्या तुम यह नहीं देखते हो कि सारा जगत् अज्ञानसे उसमें कल्पित है। अविद्योपाधिकं वेत्तु वेयश्च निरुपाधिकम् । ब्रह्मातः फर्मकर्तृत्वमेकस्यात्र न दूषणम् ।।५०२॥ अविद्याकी उपाधिसे ब्रह्म ज्ञाता है और निरुपाधिकरूपसे वही शेय है। अतः उस एकहीमें कर्तृत्व और कर्मत्व माननेमें कोई दोप नहीं है। अतोऽविद्याविनाशाय गुरुतो ज्ञानलन्धये । विविदिपुर्णरुं ब्रूयाद् गुरोऽध्यापय मामिति । स चेद्वदति पृच्छ त्वं तदा पृच्छेत्तु भक्तितः ॥५०३।। अतः अविद्याके नाश और गुरुदेवसे ज्ञान प्राप्त करनेके लिये जिज्ञासुको गुरुसे इस प्रकार कहना चाहिये- गुरो! आप मुझे उपदेश कीजिये । यदि गुरुजी कहें कि 'तू मुझसे पूछ' तो उनसे भक्तिपूर्वक प्रश्न करे । .
३२९ +ERIOGRLIERGRUSOGauscausORLUSTRUE. चतुर्थ प्रकरण एवं रामप्रसादेन प्रकरणं चतुर्थकम् । समाप्तं यतिधर्माणां विस्तरेण निरूपकम् ॥५०४॥ इस प्रकार भगवान् रामकी कृपासे यह यतिधोका विस्तारसे निरूपण करनेवाला चौथा प्रकरण समाप्त हुआ। इति श्रीमुमुक्षुसर्वखसाराभिधे ग्रन्ये संन्यासधर्माख्यं चतुर्य प्रकरणम् ।
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पञ्चम प्रकरण ३३१ AMERGREARRIEDOMIERGravsNRISOGROL956 किसी साधनचतुष्टयसम्पन्न शुद्धचित्त यतिने अपने गुरुदेवको भक्तिपूर्वक प्रणामकर उनसे मोक्षकी कामनासे पूछा-~~ भो भगवन्नहं भीतो जन्मादिदुःखसागरात् । अतस्तत्तरणोपायं सङ्क्षिप्य कृपया वद ॥ ४ ॥ 'हे भगवन् ! मैं जन्मादिरूप दुःख-सागरसे भयभीत हो रहा हूँ; अतः आप कृपापूर्वक संक्षेपसे उसे पार करनेका उपाय बतलाइये ।' स च तद्वचनं श्रुत्वा गुरुराह दयानिधिः । मा भैप्ट सौम्य दुःखात्वं त्वया पृष्टं यदाम्यहम् ॥ ५ ॥ उसके ये वचन सुनकर दयानिधान गुरुदेवने कहा-'हे. सौम्य ! तू दुःखसे भय न मान, मैं तेरी पूछी हुई बात बतलाता हूँ।' तन्यमस्यादिवाक्योत्थमात्मप्रौक्यगोचरम् । यज्ज्ञानं तत्तु दुःखाब्धेः सन्तरणस्य साधनम् ॥ ६ ॥ 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे उत्पन्न हुआ जो ब्रह्म और आरमा- की एकताका ज्ञान है वही इस दुःखसमुद्रको पार करनेका साधन है। ऐक्यज्ञानं विना नान्यदस्त्यात्माज्ञाननाशकम् । तन्नाशच विना नास्ति जन्मादिदुःखसशयः ॥ ७ ॥ ब्रह्म और आत्माकी एकताके ज्ञानके बिना आत्माके अज्ञान- का नाश करनेवाला और कोई साधन नहीं है और उसका नाश हुए बिना जन्मादि दुःखका नाश नहीं हो सकता ।
३३२ GROUGEOGRAM मुमुक्षुसर्यससार UPROGRADUSRENUED. झाते ज्ञानान्न मोक्षोऽस्ति नान्यः पन्या विमुक्तये । ज्ञात्वा वं मृत्युमत्येतीत्याद्या हि श्रुतयो जगुः ॥ ८॥ यही यात 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' 'नान्यः पन्या विमुक्तये' (कै० उ०९) 'ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति (कै० उ०९) इत्यादि श्रुतियोंने भी कही है। श्रुतिः यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः । तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥९॥ जिस समय मनुष्य आकाशको चमड़ेके समान लपेट लेंगे उस समय भगवान्को बिना जाने ही दुःखका भी अन्त हो सकेगा। संभहकर्तृवचनम् तसात्स्वीकुरु हे सौम्य जन्मादिदुःखसागरात् । जीवनीक्यविज्ञानं तवं सन्तरणाय वै ॥१०॥ अतः हे सौम्य ! तुम जन्मादि दुःखसमुद्रसे पार होनेके लिये जीव और ब्रह्मकी एकताके ज्ञानरूप नौकाको स्वीकार करो। को जीवः किं परं ब्रह्म वैक्यं स्वामिस्तयोः कथम् । कथञ्च तत्त्वमस्यादिवाक्यं तत्प्रतिपादयेत् ॥ ११ ॥ शिष्य-स्वामिन् ! जीव कौन है ! परब्रह्म क्या है ! उनकी १. ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं हो सकता । २. मुक्ति के लिये और कोई मार्ग नहीं है। ३. उसे जान लेनेपर मृत्युको पार कर लेता है।
पञ्चम प्रकरण ३३३ 4GmuSIGRIESGROGRaasaaMERGIOGROLUS. एकता किस प्रकार है ! तथा तत्वमसि आदि वाश्य किस प्रकार उनकी एकताका प्रतिपादन करते हैं ! भृणुष्व सावधानः सनान्यो जीवस्त्वमेव हि । अहमेवासि का स्वामिस्त्वं ब्रह्मासीति निश्चिनु ॥१२॥ गुरु-सावधान होकर सुनो जीव तुम्ही हो और कोई नहीं । [शिष्य-] सामिन् मैं हो कौन हूँ ! {गुरु- तुम ब्रह्म ही हो-ऐसा निश्चय करो। वेदवाक्यानि मापन्ते वत्स ते ब्रह्मरूपताम् । दुःखशान्त्यै च सन्त्यागं शृणु तानि वदामि ते ॥१३॥ हे वरस 1 वेदवाक्य तुम्हारी ब्रह्मरूपताका तथा दुःख- शान्तिके लिये त्यागका प्रतिपादन करते हैं। सुनो, ये वेदवाक्य मैं तुम्हें सुनाता हूँ। युतयः एकमाघन्तरहितं चिन्मात्रममलं ततम् । खादप्यतितरां सूक्ष्मं तब्रह्मासि न संशयः ॥१४॥ जो एक, आदि-अन्तसे रहित, चेतनमात्र निर्मल, व्यापक और आकाशसे भी आपन्त सूक्ष्म है यह ब्रह्म ही है-इसमें सन्देह नहीं । चिदिहास्तीति चिन्मात्रमिदं चिन्मयमेव च । चित्त्वं चिदहमिति च लोकाथिदिति भावय ॥१५॥ इस लोकमें फेवल चित् ही है, यह सब चिन्मात्र और चिम्मय ही है । 'तू चित् है, मैं चित् ई तथा सम्पूर्ण लोक चित् ही है। ऐसी भावना कर ।
३३४ ECRUNGAROO मुमुक्षुसर्वखसार CLICORRIDGEOGROUDGAO यत्परं ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतनं महत् । सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्यं तत्त्वमेव त्वमेव तत् ॥१६॥ जो सबका आत्मारूप परब्रह्म विश्वका महान् आयतन है तथा जो नित्य और सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूदम है वही तू है और तू ही यह है। आदिमध्यावसानेषु दुःखं सर्वमिदं यतः । तसात्सर्व परित्यज्य तत्वनिष्ठो भवानय ॥१७॥ क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् आदि, मध्य और अन्तमें दुःखरूप ही है, इसलिये हे अनय ! इस सबको त्यागकर तू तत्वनिष्ठ हो जा। सर्वव्यापारमुत्सृज्य अहं ब्रह्मेति भावय । अहं ब्रहोति निश्चित्य अहं भावं परित्यज ॥१८॥ तू सब प्रकारका व्यापार छोड़कर 'मैं प्रम हूँ' ऐसी मायना फर और 'मैं ब्रह्म हूँ ऐसा निश्चय करके अहंभावको भी रयाग दे। निद्राया लोकयातायाः शब्दादरात्मविस्मृतेः । फचिनायसरं दल्या चिन्तयारमानमात्मनि ॥ १९॥ निद्रा तथा लौकिक यातचीतसम्बन्धीशद आदिरो कभी श्राम. विस्मृति के लिये अवसर न देकर अपने अन्तःकरणमें भामाशा ही चिन्तन कर। तत्त्वं पदार्य-निरूपण संमहावनम् भगवन् सम्यगपापि पदार्यामेर येण्याम् । तवमेवनि याक्या जानीर्मा तु कयं पद ॥२०॥ F- पश्चम प्रकरण ఆయుగాండాగారాయుణంగంగా शिष्य-भगवन् ! अभीतक मैं तत् और त्वम् पदके अर्थ तो ठीक-ठीक जानता ही नहीं हूँ फिर बतलाइये 'तत्त्वमेध' इस वाक्यका अर्थ में कैसे जान सकूँगा ! सत्यं यदात्य वत्स त्वं पाक्यार्थप्रमिताविह । हेतुः पदार्थयोधोऽस्ति पदार्यान्विद्वयहं ध्रुवे ॥२१॥ गुरु-हे यत्स ! तुम जो कुछ कहते हो ठीक ही है, वाक्यार्थका ज्ञान होनेमें पदोंके अर्थों का ज्ञान ही कारण है । अब में पदोंका अर्थ बतलाता है, सो भी प्रकार समझ लो । त्वंपदार्थ इह प्रत्यक् तत्पदार्थो महेश्वरः । असीति च तयोरेक्यमे क्षेयं तु वत्विकम् ॥२२॥ इनमें 'त्यम्' पदका अर्थ प्रत्यगात्मा है और 'तत्' पदका अर्थ परमेश्वर है तथा 'असि' उनकी एकता बतलाता है। इस प्रकार इन तीनोंका भाव समझना चाहिये। यो देहेन्द्रियहत्माक्षी सचिदानन्दलक्षणः । तं नित्यानन्दमात्मानं जानीपे न कथं वद ॥२३॥ जो सचिदानन्दसराए तिम्हारी देह,इन्द्रिय और अन्तःकरणका साशी है बनाओ,उस निन्यानन्दसरूप आग्मायो दुम फैसे नहीं जानता पायेचारमन्यहम्मा त्यक्त्वा तयान्तरात्मनि । फारणाङ्गे पतं त्यक्त्वा तेपासं विद्धि साक्षिणम् ॥२४॥ मार आमा (स्यूट सरीर), अन्तरामा (सूक्ष्म शरीर) ३३६ मुमुक्षुसर्यवसार OFrOADuratUEDERRIEDGIEScretarINERASH और कारणात्मा (कारणशरीर) में अहंभाव त्यागकर अपनेको उनका साक्षी जानो। पञ्चकोशका वाघ योज्यमन्नमयः कोशो देहो रूपादिमत्त्वतः । भौतिकत्वाच नात्मायं घटादिवत्सदैव हि ॥२५॥ यह जो अन्नमय कोशनामक देह है वह रूपादिमान और भौतिक होनेके कारण घटादिके समान आत्मा कभी नहीं हो सकता। उपदेशसाहस्रथाम् पार्थिवः कठिनो धातुवो देहे स्मृतोऽम्मयः । पक्तिचेष्टावकाशाः स्युर्वदिवाय्वम्बरोद्भवाः ॥२६॥ शरीरमें कठिन धातु पृथिवीका अंश है, द्रवभाग जलमय है तथा पाचन, गति और अवकाश क्रमशः अग्नि, वायु और आकाशजनित हैं। संमहकर्तृवचनम् इति भाष्यकृता चोक्ता देहस्स भूतकार्यता । तसादनात्मके देहे त्यज त्वमात्मभावनाम् ।। २७।। इस प्रकार मगवान् भाष्यगर (श्रीशङ्कराचार्यजी) ने देहको भूतोंका कार्य बतलाया है। अतः इस अनात्म देहमें तुम आत्म- छोड़ दो। - पञ्चमप्रकरण ३३७ कPROUDGREAONGai .GRLIERGREE अनात्मा यदि देहोऽयं रूपयवादिहेतुभिः । तर्हि तद्भिन्नमात्मानं स्पष्टं स्वामिन् समीरय ॥२८॥ शिष्य-यदि रूपवत्त्व आदि कारणोंसे यह देह अनात्मा ही है, तो हे खामिन् ! उससे भिन्न आत्माका स्पष्टतया वर्णन कीजिये। देहद्रष्टा सदा भिन्नो घटद्रष्टेप देहतः । द्रष्टुत्वाचं स्वमात्मानं देहाद्भिन्नं विनिचिनु ॥२९॥ गुरु-घटदष्टाके समान देहद्रष्टा सदा हो देहसे भिन्न है । अतः तुम द्रष्टत्वधर्मके कारण अपने आपको देहसे भिन्न निश्चय करो । स्वभिन्नद्रष्टुको देहो दृश्यत्याद्धि घटादिवत् । देहद्रष्टारमेवं या स्वात्मानमवधारय ।॥३०॥ यह देह दृश्यरूप होनेसे घटादिके समान अपनेसे भिन्न द्रष्टाको प्रतीत होनेवाला है । इस प्रकार तुम अपनेको देहका द्रष्टा समझो । किश्चात्मा भासदेहा? भासकत्वाद्विभिद्यते । काष्ठादेहि यथैवानिस्तथा चायं ततस्तथा ।।३१॥ और यह आमा तो भासित होनेवाले देहसे उसका भासक होनेके कारण भिन्न ही है। जिस प्रकार काष्टादिसे अग्नि पृथक रहता है उसी प्रकार यह शरीरसे पृषक है । चेतनाधीनचेष्टावान् देहो नारमा रथादिवत् । जडत्वात्स्वं तवस्तस्य प्रेरकं त्ववधारय ॥३२॥ चेतनके अधीन ही चेष्टा करनेवाला देह जडरूप होनेसे २२ ३३८ मुमुक्षसवसार OGralICNIC RDCRADASARAN रथादिके समान आत्मा नहीं हो सकता। अतः तुम अपनेको तो उस (शरीर) का प्रेरक समझो। एवमन्नमयाद्भिन्नं ज्ञात्वात्मानं हि चिधनम् । देहे खात्ममतिं त्यक्त्वा प्राणमयेऽपि वा त्यज ॥३३॥ इस प्रकार चिन्मय आत्माको अन्नमय देहसे भिन्न जानकर देहमें आत्मबुद्धि छोड़ो और फिर प्राणमयमें भी उस (आत्मबुद्धि) का त्याग करो। भौतिकत्वात्तथा प्राणोऽनात्मा जडतयापि च । सुप्तौ यतो न जानाति चौरादीन्सश्चलनपि ॥ ३४॥ इसी प्रकार भौतिक तथा जडरूप होनेके कारण प्राण भी आत्मा नहीं है, क्योंकि यह सुषुप्तिमें सञ्चार करता हुआ भी चोर आदिको नहीं जानता। स्पर्शवत्त्वात्तथा प्राणो नात्मा व्यजनवातवत् । करणत्वाच नात्मायं प्राणेनेति श्रुतेस्तु सः॥३५॥ तया स्पर्शयुक्त होनेके कारण पंखेकी यायुके समान प्राण भी आत्मा नहीं हो सकता। इसके सिवा 'प्राणेन जिघृक्षत्तनाश- कोप्राणेन ग्रहीतुम्'* (ऐ० उ० ३१४) इत्यादि श्रुतिके अनुसार करणरूप होनेसे भी वह आत्मा नहीं है। नापानेन न प्राणेन मयों जीवति कथन । इत्युक्ता काठकथुत्या प्राणस्यानात्मता तथा ॥३६॥ • उसने [अन्नको] माणसे ग्रहण करना चाहा, किन्तु वह उसे प्राणसे ग्रहण न कर सका।
पश्चम प्रकरण
SOCUSDGUESGRUPGROUP
ROGRAMS
तथा कठश्रुतिने भी कोई भी मनुष्य प्राण अथवा अपानसे जीवित
नहीं रह सकता' ऐसा कहकर प्राणको अनात्मता प्रतिपादन की है।
क्षुत्पिपासावतः प्राणात्तथापानादितो जडात् ।
मित्रं प्रेरकमाधारं चैषां स्वमवधारय ॥३७॥
इस प्रकार तुम अपनेको क्षुधा-पिपासायुक्त जड प्राण और
अपानादिसे भिन्न तथा इन सबका प्रेरक जानो।
वागादयोऽप्यनात्मानः करणत्वात्कुठारवत् ।
यत्सानिध्याद्विचेष्टन्ते सोऽहं चिदिति निश्चिनु ॥ ३८॥
करणरूप होनेसे कुठारके समान अनात्मा वागादि मी जिसकी
सन्निधिसे चेष्टा करते हैं वह चित् ही मैं हूँ ऐसा निश्चय करो ।
प्राणमयस्य कोशस्य घुद्ध्यैवं स्वं हि साक्षिणम् ।
मनोमयाख्यकोशेऽपि त्यज सौम्यात्मभावनाम् ॥३९॥
हे सौम्य ! इस प्रकार अपनेको प्राणमयकोशका साक्षी
जानकर मनोमयकोशमें भी आरमभावनाका त्याग करो।
मनोमयोऽपि नैवात्मा करणत्वात्कुठारवत् ।
भौतिकत्वाच नात्मा स दृश्यत्वाच प्रदीपवत् ।। ४०॥
कुठारके समान करणरूप होनेसे मनोमयकोश भी आत्मा
नहीं है। वह भौतिक तथा दृश्यरूप होनेसे भी दीपकके समान
भामा नहीं हो सकता।
चक्षुर्भवति नैवात्मा करणत्वात्प्रदीपयत् ।
रूपं यथैव दीपेन लभ्यते चक्षुषा तथा ॥ ४१॥
३४० मुमुक्षुसर्प स्वसार OGRUARGraLUSIGNIEOGRUARGROUSOCISGARH करणरूप होनेके कारण दीपकके समान नेत्र भी आत्मा नहीं हो सकता, क्योंकि जिस प्रकार दीपकसे रूपकी उपलब्धि होती है उसी प्रकार नेत्रसे भी होती है। श्रोत्रादिष्वेवमेवोधमनात्मत्वं त्वया सदा । मत्प्रत्ययास्पदत्वाद्वै मौतिकत्वाच दात्रवत् ॥ ४२॥ इसी प्रकार तुम्हें श्रोत्रादिमें भी अनात्मत्वका निश्चय करना चाहिये, क्योंकि दराँतीके समान यह भी मेरी प्रतीतिका विषय और भूतोंका कार्य है। श्रोत्रादीनि मनथैवं नैवात्मेति विचारयन् । तेषां साक्षिणमात्मानं सदा स्वमवधारय ।। ४३ ।। इस प्रकार यह विचारकर कि श्रोत्रादि और मन भी आत्मा नहीं है अपनेको सर्वदा उन सबका साक्षी समझो। विकारमननुप्राप्तः सन्नयस्कान्वयत्तु यः । चालयेन्मनादीनि सोऽहं चिदिति निधिनु ॥ ५४॥ जो घुम्बक परपरके समान विकारको प्राप्त हुए बिना ही मन आदिको प्रेरित करता है यह चिद ही मैं हूँ--ऐसा निभय करो। मनोमय कोशस मालवं स्वं हि साक्षिणम् । विमानमयकोरपि जहि साम्यात्ममारनाम् ॥ ४५ ॥ हे सौम्य सी प्रकार अपने मनोमयशा मी गाशी पानकर विज्ञानमयोगाने मी धाममायनाका म्याग करो। ।
पञ्चम प्रकरण ३४१ SDGUROGRESOGRAMERGRICS. बुद्धिरपि च नैवात्मा दृश्यत्वात्करणत्वतः । तथा यया प्रदीपादिस्तथा चेयं ततस्तथा ॥४६॥ दृश्य और करणरूप होनेसे बुद्धि भी आत्मा नहीं है; जिस प्रकार दीपक आदि [देखनेवालेसे पृथक् ] हैं उसी प्रकार यह भी उससे भिन्न ही है। विज्ञानमयशब्देन श्रुत्या कर्ता प्रकीर्तितः । विज्ञानं तनुते यज्ञमित्येवमाद्यया स्फुटम् ॥४७॥ 'विज्ञानं यज्ञं तनुते' * (तै० उ० २।५) इत्यादि श्रुतिने विज्ञानमय शब्दसे [बुद्धिको ] स्पष्टतया कर्ता बतलाया है । भोक्तानन्दमयस्तद्वत्कार्यात्मा मयटेरितः। कर्चा मोक्ताच नैवत्वं किन्त्वानन्दोऽसि केवलः।। ४८॥ और इसी प्रकार 'मयट्' प्रत्ययसे कहा जानेवाला कार्यात्मा आनन्दमय भोक्ता बतलाया गया है। किन्तु तुम कर्ता या मोक्ता नहीं हो; बल्कि केवल आनन्दमात्र हो । विज्ञानमयकोशस्य पुष्वैवं त्वमनात्मताम् । सौम्यानन्दमये कोशे तथा त्यजात्ममारनाम् ॥४९॥ हे सौम्य ! इस प्रकार विज्ञानमयकोशको अनात्मता जानकर तुम इसी तरह आनन्दमयकोशमें भी आत्मभावका त्याग करो। नात्मानन्दमय कोशः शिरःपक्षादिमन्चतः। स्थैवानमयः कोशस्तथा चायं ततस्तथा ॥५०॥ विहानही यशका विस्तार करता है।
३४२ ERMANDGUSDRUEDIOGausaram मुमुक्षुसर्वस्वसार शिर तया पक्षादिमान् होनेके कारण आनन्दमयकोश मी आमा नहीं है, क्योंकि जैसा अन्नमयकोश है वैसा ही यह भी है। अतः यह भी अनामा ही है। सौम्यानन्दस्त्वमेवासि केवलोऽनन्तचिद्घनः । द्रष्टैव पञ्चकोशानां न त्वं कोशाः कदाचन ॥५१॥ हे सौम्य ! तुम तो केवल अनन्त चिद्धन आनन्दमात्र ही हो। तुम तो पाँचों कोशोंके द्रष्टा ही हो-कोश कभी नहीं हो। न त्वं हृन्नेन्द्रियाणि त्वं न जानदादिमांस्तथा । अवस्थात्रयसाक्षी यः सोऽहमित्यवधारय ।। ५२॥ तुम न हृदय हो, न इन्द्रियाँ हो और न जामदादि अवस्थावान् ही हो; बल्कि तुम तो यही निश्चय करो कि जो तीनों अवस्थाओंका साक्षी है वही मैं हूँ। देहादिभिः सहाध्यासागोक्तृत्वं ते न तु स्वतः। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुरिति श्रुतेः॥५३॥ 'आत्मा, इन्द्रिय और मन-इन तीनोंको मिलाकर भोक्ता कहते हैं" इस श्रुतिके अनुसार देह आदिके साथ अभ्यास होनेसे ही तुममें भोक्तृत्व है, स्वतः नहीं। *इस सम्बन्धमे यह तैत्तिरीय श्रुति प्रसिद्ध है-- तस्य प्रियमेव शिरः मोदो दक्षिणः पक्ष: प्रमोद उत्तरः पश: आनन्द आत्मा ब्रह्म पुष्ठं प्रतिष्ठान (२१५) उस आनन्दमयका प्रिय शिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पर है, आनन्द आत्मा (शरीर) है और बन पुन्छ यानी आधार है।
३४३ पश्चम प्रकरण డాగాడాంగాంగాలను अवस्थात्रयनिरूपण भगवन् जाग्रदादीनां लक्षणं त्वं समीरय । तद्धर्मिणाञ्च तेपो मां जानीयां येन साक्षिणम् ॥५४॥ शिम्य-भगवन् ! आप जाग्रत् आदि अवस्थाओंका तथा उनके धर्मियोंका लक्षण बतलाइये,जिससे मैं अपनेको उनकासाक्षी जान सकूँ। जाग्रतो लक्षणं सौम्य तथा तद्धर्मिणं शृणु । श्रुत्वा तयोश्च यो द्रष्टा सोऽहमित्यवधारय ॥ ५५॥ गुरु-हे सौम्य ! तुम जागृति और उसके धर्मीके लक्षण सुनो, और उसे सुनकर जो उनका द्रष्टा है वही मैं हूँ-ऐसा निश्चय करो। धीन्द्रियविपयज्ञानं सत्त्वेन च तथैव यत् । तत्तद्देवप्रसादेन घुधैर्जाग्रत्तदीरितम् ॥५६॥ भिन्न-भिन्न इन्द्रियाधिष्टाता देवताओं के अनुप्रहसे ज्ञानेन्द्रिय तथा बुद्धिय द्वारा जो विषयका ज्ञान होता है, उसे ही घुधजनोंने 'जामत्-अवस्था' कहा है। स सत्वेन्द्रियसङ्घातो जाग्रीति कथ्यते । न त्वं सत्त्वेन्द्रियग्रामस्तत्साहपसि न संशयः॥ ५७ ॥ वह युद्धि और इन्द्रियोंका समूह ही जापत्-अवस्थाका धर्मों कहा जाता है, किन्तु तुम बुद्धि और इन्द्रियसमूह नहीं हो। इसमें सन्देह नहीं, तुम तो उनके साशी ही हो ।
३४४ मुमुक्षुसर्वससार NGOGIncreturnorexiaGROUKH एवं सौम्य न ते धर्मो जाग्रदपि तु चेतसः । सेन्द्रियस्यैव तद्धर्मस्त्वं तत्साक्ष्येव केवलः ॥५॥ इस प्रकार हे सौम्य ! जाग्रत्-अवस्या सुम्हारा धर्म नहीं है, बल्कि यह तो इन्द्रियोंके सहित चित्तका ही धर्म है। तुम केवल उसके साक्षी ही हो। यथा जाग्रन्न ते धर्मस्तथा स्वमोऽपि नैव ते । त्वं तु स्वमे स्वयंज्योतिरपायमिति च श्रुतेः॥५९॥ जिस प्रकार जाग्रत्-अवस्था तुम्हारा धर्म नहीं है उसी प्रकार खम भी नहीं है । तुम तो 'अत्रायं पुरुषः स्वयंग्योतिः' (पृ. ३० १।३।९) इस श्रुतिके अनुसार सममें स्वयंप्रकाश ही हो । पायेन्द्रियोपसंहारे जाग्रत्संस्कारजो हि यः। योधः सविषयः सोऽसौ समो माप्यतेरितः॥६॥ बाह्य इन्द्रियोंका उपसंहार हो जानेपर जो जानरसंस्कारजनित सविषय योध होता है उसीकी भाष्यकारने स्वप्न कहा है। यया समो मनोधर्मो धर्मः मुप्तिम्नथा धियः । पुः कारणरूपेणावस्यानं गुप्तिरीरिता ॥ ११ ॥ जिम प्रकार सान मनका धर्म है उसी प्रकार गुमि युनिश धर्म है। युनिका यारपरसग म्पित होना ही मुशियहा गया है। जाग्रत्म्यममुपतीनां तथा दयपग च। पियाचा पमिमन्तारला गंवादमयः ॥ ६ ॥ •पाँRPात।
पञ्चम प्रकरण
OGrouTOGResuONGRUEncouOOGreucocracy
जाग्रत् , स्वप्न और सुषुप्ति तथा तीनों देहोंके अभिमानी तो
विश्व आदि हैं और तुम उनके अलप्तदृक् ( जिसकी दृष्टि कमी लात
नहीं होती-ऐसे) साक्षी हो ।
स्वमो जागरणे नास्ति जाग्रत्खने तथैव न ।
सुप्तौ तच द्वयं नास्ति सुप्तिथापि तयोर्न हि ॥ ६३ ॥
जागृतिमें खम और स्वममें जागृति नहीं है तथा सुपुप्तिमें वे
दोनों नहीं हैं और उन दोनोंमें सुषुप्ति नहीं है ।
अतस्तत्तु अयं मिथ्या गुणत्रयसमुद्भवम् ।
तासां यो निर्गुणः साक्षी सोऽहमित्यवधारय ॥ ६४ ॥
अतः गुणत्रयसे उत्पन्न हुई ये तीनों ही अवस्थाएँ मिथ्या हैं।
उनका जो निर्गुण साक्षी है यही मैं हूँ-ऐसा निश्चय करो।
त्वं-पदका निरूपण
जाग्रत्स्वमसुपुप्तीनां भारामावी धियां तथा ।
जागरस्वमयोति मनसव गमागमा ।
सुप्तौ च तवयं वेत्ति सोऽहमित्यवधारय ॥६५॥
जो जाग्रत् , स्वप्न और सुप्ति अवस्थाओंके तथा उनके
ज्ञानोंके भाव और अभावको जानता है; एवं जामत् और खम
अवस्याओंमें मनके आने-जाने और सुषुप्तिमें उसके लीन होनेको
जानता है वही मैं हूँ-ऐसा निभय करो।
घटप्रकाशको दीपो यथा न पटधर्मवान् ।
सुप्त्यादिमासकस्तद्वमात्मा सुप्त्यादिधर्मवान् ॥६६॥
३४६ मुमुक्षुसर्यखसार అంగాంగాంగాను जिस प्रकार घटको प्रकाशित करनेवाला दीपक घटके धर्मोसे युक्त नहीं होता उसी प्रकार सुषुप्ति आदिको प्रकाशित करनेवाला आत्मा सुषुप्ति आदिके धर्मवाला नहीं है। अदेहत्वाच जन्मायाः पड्विकारा न ते तथा । गोत्रवर्णाश्रमाद्याश्च न ते धर्मा हि सौम्य मोः॥ ६७॥ हे सौम्य ! देहरूप न होनेके कारण तुझमें जन्म आदि छः विकार नहीं हैं और न तुझमें गोत्र वर्ण या आश्रम आदि धर्म ही हैं । क्षुत्पिपासे न ते धौं शोकमोही तथा न ते । अप्राणो ह्यमना शुभ्र इति श्रुत्यनुशासनात् ॥ ६८॥ '[ वह आत्मा ] प्राणहीन, मनोहीन और शुद्ध है' (मु० उ० २।१।२) इस श्रुतिके उपदेशानुसार क्षुधा और पिपासा तेरे धर्म नहीं हैं और न तुझमें शोक एवं मोह ही हैं। दारपुत्रादयो भावा यदर्थत्वेन नुः प्रियाः । सर्वेभ्योतिप्रियो ह्यात्मा सोऽहमित्यवधारय ॥ ६९ ॥ जिसके लिये पुरुषको स्त्री-पुत्रादि पदार्थ प्रिय होते हैं यह सबसे अत्यन्त प्रिय आत्मा ही मैं हूँ-ऐसा निश्चय करो। परप्रेमास्पदत्वेन मा न भूवमहं सदा । भूयासमिति यो वेचि सोऽहमित्यवधारय ।। ७० ॥ परम प्रेमका आश्रय होनेके कारण जो मैं न रहूँ-ऐसा नहीं बल्कि सदा रहूँ ही' ऐसा जानता है यही मैं हूँ--ऐसा निश्चय करो।
पञ्चम प्रकरण +RRIORGELIERGROWERGROUNOGR SUPRum. आत्माको बन्धन कैसे हुआ? भगवन् सुखरूपवेदात्मायं संसरेत्कथम् । स्वतो वा परतो वास्य संसारोऽस्तीति मे वद ।। ७१ ।। शिष्य-भगवन् ! यदि यह आत्मा सुखखरूप है तो इसका संसरण कैसे होता है ! इसे संसारकी प्राप्ति अपनेहीसे हुई है अथवा किसी अन्यसे—यह मुझे बतलाइये। मृणु वत्स सतो नास्ति संसारः प्रत्यगात्मनः । किन्त्वङ्गायविवेकेन संसारोऽस्याविकारिणः ।।७२।। गुरु-हे वत्स ! सुन, प्रत्यगामाको संसार स्वतः प्राप्त नहीं है, बल्कि शरीरादिका विवेक न होनेके कारण ही इस अधिकारीको संसारकी प्राप्ति हुई है। पटजन्मादिकं यदद्घटाकाशे प्रकल्प्यते । देहजन्मादिकं तद्वत्तूटस्थे त्वयि कल्प्यते ॥७३॥ जिस प्रकार घटके जन्म आदिको घटाकाशमें भी कल्पना कर ली जाती है उसी प्रकार तुम कूटसमें भी देहके जन्मादि धर्मोका आरोप कर लिया जाता है। साधित्वमपि तदस्यादविद्योपाधिनात्मनि । अविद्यामात्रसंयुक्त सास्यात्मेति शिवोक्तितः ॥७४।। इसी प्रकार आग्मामें माक्षीभाव भी अविधाला उपाधिक कारण ही है । शिवदोके कपनानुमार अविद्यामानसे संयुक्त हुना आत्मा ही साक्षी है।
३४८ मुमुनुसखसार OGOURGRIOCreasonamUSDGUST अतोऽन्तःकरणाध्यासादविद्यायाध योगतः । संसारित्वञ्च साक्षित्वमात्मनो न तु वस्तुतः ।।७५ ॥ अतः अन्तःकरणके अध्यास और अविद्याके योगसे ही आत्मामें संसारित्व एवं साक्षित्व है यास्तवमें नहीं। बुद्धिकृतावच्छेदेन जीवत्वं चिति केचन । प्राहुरन्ये तथा प्रत्यग्युद्धौ चित्प्रतिबिम्बनात् ।। ७६ ।। किन्हीं-किन्होंने बुद्धिकृत अवच्छेदके कारण ही शुद्ध चेतनमें जीवभाव बतलाया है तथा कुछ औरोंने अन्तःस्थिता बुद्धिमें चेतनका प्रतिबिम्ब पड़नेसे जीवत्वको प्राप्ति मानी है। पन्धमोक्षव्यवस्थार्थ प्रतिदेहश्च भिन्नताम् । वदन्त्येके हि जीवस प्राहुश्चान्ये तदेकताम् ॥ ७७ ॥ कोई-कोई बन्ध-मोक्षकी व्यवस्थाके लिये प्रत्येक देहमें जीवकी भिन्नता बतलाते हैं तथा दूसरे लोग उसकी एकताका प्रतिपादन करते हैं। तत्-पदका निरूपण त्वमर्थो दर्शितो ह्येवं विस्तराद्वत्स ते मया । अधुना तत्पदार्थ ते अवे श्रुत्यनुसारतः ॥ ७८ ॥ हे वत्स ! इस प्रकार मैंने तुम्हें त्वम्पदका अर्थ विस्तारसे दिखलाया । अब मैं तुम्हें श्रुतिके अनुसार तत्पदका अर्थ बतलाता हूँ।
पश्चम प्रकरण
३४९
-OCTOBERGRUPGRANDGROUNGARIDEUSIGRU500
खादिभूतानि जायन्ते यतो धृतानि येन च ।
यसिनन्ते च लीयन्ते तद्ब्रह्मेत्यवधारय ।। ७९॥
ये आकाशादि भूत जिससे उत्पन्न हुए हैं, जिसने इन्हें धारण
कर रखा है और अन्तमें जिसमें ये लीन हो जाते हैं वही ब्रह्म
है-ऐसा निश्चय करो।
जन्माद्यस्य यतश्चेति सूत्रं यस्याह लक्षणम् ।
तटस्थं सर्वहेतुत्वं तब्रह्मत्यवधारय ।।८०॥
'जन्माद्यस्य यतः'* (० सू०१।१।२)यह सूत्र जिसका तटस्थ
सक्षण और सबका कारणत्व बतलाता है वही ब्रह्मा है-ऐसा जानो ।
जीवरूपेण देहेषु प्रवेशो यस्य चेरितः ।
प्रेरयति च यो जीवांस्तहोत्यवधारय ।। ८१॥
जिसका जीवरूपसे देहोंमें प्रवेश बतलाया गया है और जो
सकल जीवोंको प्रेरित करता है वही ब्रह्म है--ऐसा जानो।
जीवान्यश्चापि कर्माणि कारयत्यद्य चेतनः ।
तत्प्राकर्मानुरोधेन तद्रौत्यवधारय ।। ८२॥
जीवोंके पूर्वकर्मानुसार जो चेतन इस समय उनसे कर्म कराता
है वही ब्रह्म है-ऐसा जानो ।
यज्ज्ञानेनाखिलज्ञानं छान्दोग्यादिषु कीर्तितम् ।
मृदादि पहुदृष्टान्तैस्तद्रीत्यवधारय ।। ८३ ।।
• जिससे इस (जगत्) के जन्मादि (जन्म स्थिति और प्रलय) होते
हैं [वह वक्ष है।
३५० मुमुक्षुसर्यवसार OGRIDGRIOGRUIDGROUSDGreamGRAOGELast छान्दोग्य आदि उपनिषदोंमें मृत्तिका आदि अनेको दृष्टान्तों- द्वारा जिसके ज्ञानसे सम्पूर्ण वस्तुओंका ज्ञान होना बतलाया है वही ब्रह्म है-ऐसा जानो। वेदयापि यतो जातः सर्वज्ञाच्छ्वासवचितः । महत्तमाजगद्योनेस्तब्रह्म त्यवधारय ॥८४॥ जगत्के कारणरूप जिस अति महान् सर्वज्ञ चेतनसे पुरुषके थासके समान वेद भी उत्पन्न हुआ है वही ब्रह्म है-ऐसा जानो । घटादयो यथानन्या मृदादेः स्वस्खकारणात् । तथा जगद्यतोऽजन्यत्तद्रौत्यवधारय ॥८५॥ जिस प्रकार घट आदि अपने कारण मृत्तिका आदिसे अभिन हैं उसी प्रकार जिससे यह संसार अभिन्न है वही ब्रह्म है--ऐसा जानो। ब्रह्मकी सर्वात्मकता ब्रह्म सर्वात्मकं विद्धि सर्व जगच चिन्मयम् । ब्रह्मसर्वात्मताज्ञप्त्यै श्रुतीरपि वदामि ते ॥८६॥ ब्रह्मको सर्वात्मक जानो और सम्पूर्ण जगत्को चिन्मय समझो। ब्रह्मकी सर्वात्मकताके ज्ञान के लिये मैं तुमसे कुछ श्रुतियाँ भी कहता हूँ। श्रुतयः स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः स्वयमिन्द्रः स्वयं शिवः । स्वयं विश्वमिदं सर्व वसादन्यन्न किश्चन ॥ ८७॥ खयं ही ब्रह्मा है, स्वयं ही विष्णु है, स्वयं ही इन्द्र है और
पश्चम प्रकरण
TusMIRRORRUSAGaur
RAATUS
खयं ही शिव है तथा खयं ही यह सम्पूर्ण विश्व है; स्वयं (अपने ) से
अतिरिक्त और कुछ मी नहीं है ।
मरुभूमौ जलं सर्व मरुभूमात्रमेव वत् ।
जगत्रयमिदं सर्व चिन्मानं हि विचारतः ॥८॥
जिस प्रकार मरुभूमिमें [प्रतीत होनेवाला ] सारा जल मरुस्थल-
मात्र ही होता है उसी प्रकार विचारसे यह सम्पूर्ण त्रिलोकी
चेतनमात्र ही है।
एकं प्रम द्वयं ब्रह्म मोहो ब्रह्म शमादिकम् ।
दोपो ब्रह्म गुणो ब्रह्म दमः शान्तं विभुः प्रभुः ।
लोको ब्रह्म गुरुर्बल शिप्यो ब्रह्म सदाशियः ।।८९।।
एक ग्रह है, दो ब्रह्म है, मोह ब्रह्म है, शम आदिक ब्रह्म है, दोष ब्रह्म
है तथा गुण भी शान्त दान्त विभु और समय ब्रह्म ही है । इसी प्रकार
लोक ब्रह्म है, गुरु ब्रह्म है तथा शिष्य भी सर्वदा कल्याणस्वरूप ब्रह्म ही है।
सर्व च खल्विदं ब्रह्म नित्यचिद्घनमक्षतम् ।
न त्वं नाहं न चान्यद्वा सर्व प्रमैय केवलम् ।। ९० ॥
यह सारा प्रपञ्च निश्चय ही निक और अविनाशी
ब्रह्म ही है। मैं, तू या
नहीं है। सब
चुछ केवल अप ही है।
.
।१५ ॥११॥
३५२ GRIODERN मुमुक्षुसर्यवसार GRUENGreeDROIDGRAM. इन सत्र श्रुतियोंसे जिस सचिदानन्दस्वरूप ईश्वरकी सर्वात्मता- का प्रतिपादन किया है वही ब्रह्म है-ऐसा जानो। सत्यं ज्ञानमनन्तश्चेत्याह स्वरूपलक्षणम् । तैचिरीयश्रुतिर्यस्य तब्रह्मत्यवधारय ।। ९२॥ जिसका तैत्तिरीय श्रुतिने 'ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्तरूप है' ऐसा खरूपलक्षण कहा है यही ब्रह्म है-ऐसा जानो। तटस्थलक्षणं चैवं स्वरूपलक्षणं तथा। ब्रह्मणः सौम्य ते प्रोक्तं मया वेदप्रमाणतः ॥ ९३ ।। हे सौम्य ! इस प्रकार मैंने तुम्हें श्रुतिप्रमाणसे महाके तटस्थ और स्वरूप-रक्षण बतलाये। तत् और त्वं-पदके वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ तत्वमोर्यो हि वाच्यार्थो लक्ष्यार्थच गुरो त्वया । विस्तरेण पुरा प्रोक्तः सोपात्तं पुनर्वद ॥ ९४ ।। शिष्य-हं गुरो ! आपने तत् और य पदक पायार्थ और एक्ष्यापका पहले यिन्तारसे निरूपण किया था। अब उन्हें संभपसे फिर सुनाइये। भृणु माम्य गुवे तेह तज्यमी समासनः । पुनले मुसबोधार्य याश्या च प्रवृत्तये ॥१५॥ गुल-दमोम्य! सुनो, तुम्हारी गुमन्नमें गुगमतागे आनेक और [तत्वनि यायके अपमें तुम्हारी प्रनि कान मेिं तुम्हें रि संप हर और वं-पदक अपं बताता है।
पञ्चम प्रकरण ३५३ FRIDGEINDRAISOGROLORGreeCreaoNGRRIER60. चेतनोऽङ्गादिधर्मान्यो यारोप्यात्मन्यविद्यया । कर्तृत्वायभिमानी स त्वंपदवाच्य ईरितः ॥ ९६ ॥ जो चेतन शरीर आदि धमोंको अविद्यावश अपने में आरोपित कर कर्तृत्व आदिका अभिमान करता है वही त्वंपदका वाच्य कहा गया है। सर्वदेहेपु यः प्रत्यग्बोधो देहादिभासकः । कर्तृत्वादिभिरस्पृष्टो लक्ष्यार्थस्त्वंपदस्य सः॥९७ ॥ जो प्रत्यक्चैतन्य सम्पूर्ण देहोंमें देह आदिको प्रकाशित करने वाला है किन्तु जो कर्तृत्व आदि धमोंसे अछूता है वही त्वंपदका लक्ष्यार्थ है। वेदवेयं जगद्धीजं सर्वज्ञत्वादिधर्मकम् । यच्चैतन्यं हि तद्विद्धि वाच्यार्थ तत्पदस्य वै ॥९८ ।। जो चैतन्य वेदसे जाननेयोग्य जगत्का कारण और सर्वज्ञत्व आदि धर्मवाला है उसीको तत्पदका वाच्यार्थ जानो । सर्वोपाधिविमुक्तं यत्कार्यकारणवर्जितम् । निर्विशेष चिदानन्दं लक्ष्यार्थस्तत्पदस तत् ।। ९९॥ जो सम्पूर्ण उपाधियोंसे रहित, कार्य-कारणभावसे शून्य, निर्षिशेप और चिदानन्दस्वरूप है वही तत्पदका लक्ष्यार्थ है । पदानां तत्वमादीनां प्रागवार्थाः प्रदर्शिताः । वाक्यार्थयोघसंसिद्धयै वाक्यार्थ त्वद्य संभृणु ॥१०॥ ૨૨ ३५४ मुमुश्सर्वस्वसार OGRAMMEDGeuERERNAGRICOGriSOGREAKIGRAS इस प्रकार यहाँतक पहले तत् और त्वम् आदि पदोंके अ दिखलाये। अब वाक्यार्थका सम्यक् ज्ञान प्राप्त करनेके लिये वाक्यका अर्थ सुनो। वाक्यार्थ-विचार तत्त्वमस्यादिवाक्येषु तत्त्वमादिपदार्थयो। तादात्म्यमेव वाक्यार्थोऽस्त्यखण्डेकरसात्मकः ।।१०१॥ 'तत्त्वमसि' आदि वाक्योंमें 'तत्' और 'त्वम्' आदि पदोंका तादात्म्य ही अखण्डेकरसखरूप वाक्यार्थ है। प्रत्यग्योधस्त्वमर्थो यः सोऽद्वयानन्दरूपः । तदर्थों योऽद्वयानन्दः स प्रत्यग्बोधरूपकः ॥१०२।। जो प्रत्यम्बोध त्वंपदका अर्थ है वह अद्वय आनन्दखरूप है और जो अद्वय आनन्दस्वरूप तत्पदका अर्थ है वह प्रत्यग्बोधखरूप है। एवं परस्पराभेदज्ञानं यदा हि सम्भवेत् । अब्रह्मत्वमनात्मत्वं निवर्तेत तदा तयोः ॥१०३।। इस प्रकार जिस समय इनके पारस्परिक अभेदका ज्ञान हो जाता है उसी समय इनका अब्रह्मत्व और अनात्मत्य निवृत्त हो जाता है। अखण्ड एव वाफ्यार्थोवाक्यं चाखण्डयोधकम् । त्वं चाखण्डवरूपोऽसि प्रत्यग्ग्रदोक्यविग्रहः ॥१०॥ अखण्ड ही पाक्यका अर्थ है और वाक्य भी अखण्डीका बोध करानेवाला है, तथा तू मी ब्रह्मात्मैक्यखरूप असण्डमूर्ति ही है।
पञ्चम प्रकरण TRAISIGNIROGNENGEOGELama संसर्गो या विशिष्टो वा वाक्यार्थो नात्र सम्भवेत् । भाष्यवार्तिककाराम्यां तनिषेधो यतः कृतः॥१०५।। यहाँ संसर्ग (अविद्योपहित जीय) या विशिष्ट (मायाविशिष्ट ईश्वर) पाक्यका अर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि भाष्यकार ( शंकराचार्यजी) और वार्तिककार (सुरेश्वराचार्यजी) ने उसका निषेध किया है । यसादखण्डमेवाह तत्त्वमस्यादिकं वचः। न संसर्गविशिष्टार्थी ततोऽखण्डं विनिश्चिनु ॥१०६॥ क्योंकि तत्वमसि आदि वाक्यने अखण्डहीका प्रतिपादन किया है-संसर्ग या विशिष्ट पदार्थोंका नहीं; इसलिये अखण्डहीका निश्चय करो। वाच्याथौँ तत्त्वमोहित्वा लक्ष्यार्थी परिगृह्य च । तत्त्वमस्यादिवाक्यं हि समर्थमैक्यबोधने ॥१०७॥ तत्त्वमसि आदि वाक्य तत् और त्वंपदके वाच्याथोंको त्याग- कर तथा लक्ष्यार्थीको ग्रहण करके ही उनकी एकताका ज्ञान करानेमें समर्थ हैं। सर्वज्ञत्वाल्पबोधृत्वे तथा प्रत्यक्परोक्षते । एकस हि विरुद्धयते लक्षणातः प्रवर्तते ॥१०॥ क्योंकि एक ही वस्तुमें सर्वज्ञता और अल्पज्ञता तथा प्रत्यक्ता और परोक्षता रहनेमें विरोध है; इसलिये यहाँ लक्षणाकी प्रवृत्ति होती है। प्रत्यक्षादिविरोधेन शक्यार्थस्यापरिग्रहे । या शक्यार्थेन संबद्धा वृत्तिः सा लक्षणोच्यते ॥१०९|| ३५६ 4GROIDGaon मुमुक्षुसर्वस्वसार प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरोध आनेके कारण जन शक्पाका। महण न किया जाय उस समय जो शस्यार्थसे सम्बन्धित वृत्ति होतं है यह लक्षणा कहलाती है। लक्षणा त्रिविधा प्रोक्ता जहत्यादिप्रभेदतः। तस्वमस्सादिवास्येषु लक्षणा भागलक्षणा ॥११॥ जहती आदिके भेदसे लक्षणा तीन प्रकारकी यही है। उनमेंसे तत्वमसि आदि याक्योंमें भागलक्षणा की जाती है। गङ्गायां घोष इत्येवं जहतीह न लक्षणा। मरेभाजहती चार शोणो धावति पाश्यवत् ॥१११।। मोऽयं पुरुष इत्यादिवास्येधिवात्र फीर्तिता। जहदजहदाच्या हि लक्षणा याक्यकोविदः॥११२॥ यहाँ 'गझापां धोर:' (मानीपर गोशाला है) इस यापो अनुसार जहती दक्षणा नहीं हो सकती और नशोगो पायति' (साट-दाट दौड़ता है)म याम्फे अनुगार अनाही हो सस्ती है। यहाँ तो याया विशाग्दोंने 'गोऽयं पुरुषः' (यर वही पुरुष) इत्यादि यापोंके, गमान जहदारणा (भाग- स्याग लगा) ही वाया ।। • अमर पदमे अनुर अमाना थादित महारain अकाच नाणी नि नाम निमि' और उसमें भी अटिया गाउने कापायी। मारपसाला दियारागाँसमान भाली भीर m.
पश्चम प्रकरण ३५७ OCTOURGRIDGROUGOGRIDGROUSDGRIDGROUND. भागलक्षणया चैवं सोऽयमित्यादिवाक्यवत् । तत्वमस्यादिवाक्यानि योधयन्त्यैक्यमादरात् ॥११॥ इस प्रकार भागलक्षणाद्वारा 'सोऽयम्' इत्यादि वाक्यके समान तत्त्वमसि इत्यादि वाक्य भी आदरपूर्वक ऐक्यका ही ज्ञान कराते हैं । जहती नामसे तीन प्रकारकी है। जहती लक्षणामें शब्दके वाच्यार्यका सर्वथा त्याग करके उससे उपलशित नया अर्थ लिया जाता है। जैसे 'गंगाजीपर गोशाला है' इस वाक्यसे गंगाजीके प्रयाहपर गोशालाका होना सिद्ध होता है, परन्तु यह सर्वथा असम्भय है; इसलिये यहाँ 'गगा' शब्दका अर्थ 'गगाप्रवाह' न करके 'गंगातीर' किया जाता है। परन्तु 'तत्' और 'त्यम्' पदके वाच्यार्थ ईश्वर और जीयका सर्वथा त्याग कर देनेपर तो उन दोनोंकी चेतनताका भी त्याग हो जाता है और चेतनताको एकता ही अभीष्ट है। इसलिये जहती लक्षणासे इन पदोंके अर्थकी एकता नहीं हो सकती। अजहती लक्षणाम याच्यार्थका त्याग न करके उसके साथ अन्य अर्थ भी प्रहण किया जाता है । जैसे 'लाल-लाल दौड़ता है' इस वाक्यसे कोई अर्थ स्पष्ट न होनेके कारण उसका अर्थ प्रसंगानुसार लाल घोड़ा या लाल वस्त्रोवाला मनुष्य किया जाता है। किन्तु 'तत्' और 'त्यम्' पदके वाच्याथों में जो विरोध है वह कोई अन्य अर्थ सम्मिलित करनेसे निवृत्त नहीं हो सकता । इसलिये यहाँ अजहलक्षणा भी नहीं हो सकती। इन दोनोंके सिषा जहाँ वाच्यार्थका कुछ अंश छोड़ा जाता है और कुछ ग्रहण किया जाता है यहाँ जहत्यजहती या भागलक्षणा होती है। जैसे यह यही पुरुष है' इस वाक्यमे 'यह' शब्दसे प्रतीत होनेवाली पुरुषको अपरोक्षता और 'वही' शब्दसे कही जानेयाली उसकी परोक्षताका त्याग करके इन दोनोंसे रहित जो निर्विशेष पुरुष है उसकी एकता कही जाती है। इसी प्रकार महावाक्यके 'तत्' पदके वाच्य ईश्वरके सर्वज्ञता-परोक्षता आदि गुणोंका और 'स्वम्' पदके वाच्य जीवके अल्पज्ञता प्रत्यक्ता आदि गुणोंका स्याग करके केवल चैतन्यांशमें एकता यतलायी जाती है।
३५८ मुमुक्षुसर्वस्वसार sunauIOGRMIERRIAGRAMIN पदयोरिह सम्बन्धः सामानाधिकरण्यकम् । पदार्थयोस्तु सम्बन्धो विशेषणविशेष्यत्ता ॥११४॥ यहाँ पदोंमें सामानाधिकरण्य-सम्बन्ध है तथा पद और उनके अर्थमें विशेषण-विशेष्यमाव-सम्बन्ध है। लक्ष्यलक्षणसम्बन्ध पदार्थप्रत्यगात्मनाम् । सम्बन्धैखिभिराहैवमरवण्डार्थ श्रुतिः स्फुटम् ॥११५।। इसी प्रकार प्रत्यगात्मा और पदोंके अर्यका लक्ष्य-लक्षणभाव. सम्बन्ध है; इस प्रकार श्रुतिने इन तीन सम्बन्धोंसे स्पष्टतया अखण्डार्थका ही प्रतिपादन किया है। एवं तत्त्वमसीत्यादिवाक्यमखण्डवोधकम् । अतोत्र संशयो नास्ति त्वं ब्रह्मास्यद्वयं सदा ॥११६॥ इस प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य अखण्डार्यका ही बोध करानेवाला है । अतः इसमें सन्देह नहीं, तू सर्वदा अद्वितीय ब्रह्म ही है। त्वं सन्मात्रात्मक सौम्य पूर्णोद्वितीयचिद्घनः । सुखरूपोऽस्यसंसारी महावाक्यैहि लक्षितः ॥११७॥ हे सौम्य! तू महावाक्योंसे ही लक्षित सन्मात्र, पूर्ण, अद्वितीय, चिद्धन, सुखस्वरूप और असंसारी ही है। यथा तचमसीत्यादेरखण्डैकार्थतोदिता । तथा सत्यादिवाक्यानां योध्यारखण्डार्थनिष्ठता ॥११८।।
पञ्चम प्रकरण 4GLIScrewDGANISOLOGRUNGratismeroup. जिस प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि याश्यकी अखण्डार्थता कही गयी है, उसी प्रकार 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि वाक्योंकी अखण्डार्थता जाननी चाहिये। अखण्डार्थनिरूपण अखण्डार्थसबोधिन्योऽन्या अपि सन्ति भूरिशः। श्रुतयस्ता वदामीह शृणु काश्चन वत्स भोः॥११९॥ है वन्स ! असण्डाका बोध करानेवाली और भी बहुत-सी श्रुतियाँ हैं । यहाँ उनमें से कुछ बतलाता हुँ, सुनो । श्रुतयः अखण्डैकरसं शास्त्रमखण्डैकरसा त्रयी। अखण्डकरसो देहः अखण्डकरसं मनः ॥१२०॥ शास्त्र अखण्डेकरस है, वेदत्रयी असण्टेकरसा है, शरीर अखण्डकरस है तथा मन भी असण्डेकरस है। अखण्डकरसं सूत्रमरवडकरसो विराट् । अखण्डकरसा विद्या अखण्डैकरसोऽव्ययः ॥१२॥ सूत्र अखण्डकरस है, विराट् असण्डकरस है, विधा अखण्डकरसा है; वह असण्डकरस अविनाशी है। न निरोधो न चोत्पचिन बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वे मुक्त इत्येपा परमार्थता ॥१२२॥ न निरोध (प्रलय) है, न उत्पत्ति है, न बद्ध है, न साधक है, न मुमुक्षु है और न मुक ही है-पही परमार्पता है।
३६० मुमुक्षुसर्वखसार GrainRIDGROUSocraEGraunGRAIGRUTO पादाभावागविर्नास्ति हस्ताभावास्क्रिया न च । मृत्युर्नास्ति जन्माभावावुद्धथभावात्सुखादिकम् ।१२३॥ चरणोंका अभाव होनेके कारण आत्मा गति नहीं है, हाथोंका अभाव होनेसे क्रिया नहीं है, जन्मका अभाव होनेसे मृत्यु नहीं है तथा बुद्धिका अभाव होनेके कारण सुख आदि नहीं है । वाक्यार्थ-विवेक येनेक्षते भृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च । खाद्वस्वादु विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम् ॥१२४॥ [अब 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इस वाक्यका अर्थ करते हैं-1 जिसके द्वारा यह देखता, सुनता, सूंघता, व्याख्या करता और खादु तपा अखादु जानता है उसे प्रज्ञान कहा गया है। चतुर्मुखेन्द्रदेवेषु मनुष्याचगवादिषु । चैतन्यमेकं ब्रह्मातः प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि ॥१२५।। प्रझा आदि देवताओं, मनुष्यों तथा घोड़ों और गौ आदिकोंमें एक ही चेतन-स्वरूप ब्रह्म है और यह प्रज्ञान ब्रह्म मुझमें भी है। परिपूर्णः परात्मासिन्देहे विद्याधिकारिणि । युद्धः साक्षितया स्थित्वा स्फुरनहमितीर्यते ॥१२६।। [ 'अहं ब्रह्मास्मि' याक्यका अर्थ इस प्रकार है- यह परिपूर्ण परमात्मा इस विद्याधिकारी देहमें सुद्धिक साशीरूपसे स्थित होकर सुरित होता हुआ 'अहम्' ऐसा कहा जाता है।
पञ्चम प्रकरण SIRGIOGR Gra स्वतःपूर्णः परात्मात्र ब्रह्मशब्देन वर्णितः । असीत्यैक्यपरामर्शातेन ब्रह्म भवाम्यहम् ॥१२७॥ इस वाक्यमें 'ब्रह्म' शब्दसे स्वतः पूर्ण परमात्माका ही वर्णन किया गया है । 'अस्मि' इस पदसे एकत्वका परामर्श किया जाता है; अतः मैं ब्रह्म ही हूँ। एकमेवाद्वितीयं सन्नामरूपविवर्जितम् । सृष्टेः पुराधुनाप्यस तावत्वं तदितीर्यते ॥१२८॥ ['तत्त्वमसि' वाक्यका भाव इस प्रकार है-] जो एक, अद्वितीय और नाम-रूपसे रहित सद्वस्तु सृष्टिसे पूर्व थी वही इस समय भी है, उसकी तद्रूपता ही 'तत्' पदसे कही जाती है । श्रोतुर्देहेन्द्रियातीतं वस्त्वत्र त्वंपदेरितम् । एकता गृह्यतेऽसीति तदैक्यमनुभूयताम् ॥१२९॥ श्रोताके देह और इन्द्रिय आदिसे अतीत वस्तु ही यहाँ त्वं- पदसे कही गयी है, तथा 'असि' पदसे उनकी एकता ग्रहण की जाती है । अतः उनकी एकताका अनुभव करो । स्वप्रकाशापरोक्षत्वमयमित्युक्तितो अहङ्कारादिदेहान्तात्प्रत्यगात्मेति गीयते ॥१३॥ [अब 'अयमात्मा ब्रम' इस वाक्पका तात्पर्य वतलाते हैं-] 'अयम्' इस उक्तिसे [आत्माका] खप्रकाशल्य और अपरोक्षस्व माना गया है, तथा जो अहंकारसे लेकर देहपर्यन्त सबसे आन्तर- तम है यह 'आरमा' कहा जाता है। मतम् ।
३६२
मुमुक्षुसर्यवसार
ఆలయంనంనగాలంగానుందాం
दृश्यमानस सर्वस जगतस्तत्त्वमीर्यते ।
ब्रह्मशब्देन तद्ब्रह्म स्वप्रकाशात्मरूपकम् ॥१३॥
'ब्रह्म' शब्दसे सम्पूर्ण दृश्यमान जगत्का तत्त्व कहा गया है ।
वह ब्रह्म स्वयंप्रकाश आत्मखरूप है ।
मायाविद्ये विहायैवमुपाधी परजीवयोः ।
अखण्डं सच्चिदानन्दं परं ब्रह्मैव लक्ष्यते ॥१३२।।
इस प्रकार परमात्मा और जीवकी उपाधि माया तथा अविद्या-
का परित्याग कर देनेपर अखण्ड सच्चिदानन्द परब्रह्म ही लक्षित
होता है।
आद्योरा तत्पदार्थः स्यान्मकारस्त्वम्पदार्थवान् ।
तयोः संयोजनमसीत्यर्थे तत्त्वविदो विदुः ॥१३॥
['राम' नाममें ] पहला अक्षर 'रा' तत्पदके अर्थवाला
है और 'म' त्वंपदका वाचक है। तथा उनके संयोगको तत्त्ववेत्ता
पुरुष 'असि' अर्थमें मानते हैं।
क्षीरं क्षीरे यथा क्षिप्तं तैलं तैले जलं जले ।
संयुक्तमेकतां याति तथात्मन्यात्मविन्मुनिः ॥१३४॥
जिस प्रकार दूधमें डाला हुआ दूध, तैलमें डाला हुआ तेल
तथा जलमें डाला हुआ जल मिलकर एक रूप हो जाते हैं उसी
प्रकार आत्मवेत्ता मुनि परमात्मासे एकरूप हो जाता है।
घटे नष्टे यथा व्योम व्योमैव भवति स्वयम् ।
तथैवोपाधिविलये नव
प्रमवित्स्वयम् ॥१३५॥
पश्चम प्रकरण
३६३
-GOGRUGRERevaRGraUDGENUARGreNCERGREESO
जिस प्रकार घटके फट जानेपर घटाकाश खयं महाकाश हो
जाता है उसी प्रकार उपाधिका लय होनेपर ब्रह्मवेत्ता स्वयं ब्रह्म
हो हो जाता है।
संग्रहकर्तृवचनम्
एवं वाक्यैः परिज्ञाय स्वस्य ब्रह्मस्वरूपताम् ।
सर्वथा सर्वकालेषु तनिष्ठस्त्वं भवानघ ।।१३६॥
हे अनघ ! इस प्रकार महावाक्योंद्वारा अपनी ब्रह्मरूपताको
समझकर तू सब समय सब प्रकार उसीमें निष्ठा कर ।
बहुना किमिहोक्तेन सङ्घपानिर्णयं शृणु ।
अहं ब्रह्म जगन्मिथ्यैवेति ज्ञात्वा विमुच्यते ॥१३७।।
अब इस विपयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ ! संक्षेपसे यही
निर्णय सुन कि 'मैं ब्रह्म हूँ और जगत् मिथ्या है' ऐसा ज्ञान
होनेपर ही जीव मुक्त हो जाता है।
जगत्का असत्यत्व
जीवस्य ब्रह्मणाभेदस्त्वया स्वामिन् प्रपश्चितः ।
विस्तराजगतोऽसत्त्वं नोक्तं तत्साम्प्रतं वद ॥१३८॥
शिष्य-हे गुरो ! आपने विस्तारपूर्वक ब्रह्मसे जीवका अभेद
दिखलाया, किन्तु जगत्का असत्यच नहीं कहा; अतः अब उसका
वर्णन कीजिये।
मृणु सौम्य वदामि त्वां मिथ्यात्वं जगतोऽप्यहम् ।
जगन्मिथ्यैव दृश्यत्वाद्रज्जुमर्यादिवत्सदा ॥१३९॥
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३६४
मुमुक्षुसर्वस्वसार
OGENERGRUncause
गुरु-हे सौम्य ! सुन, अब मैं तुझे जगत्की असत्यता भी
बतलाता हूँ। यह जगत् दृश्यरूप होनेसे रज्जु प्रतीत होनेवाले
सर्पके समान सदा मिथ्या ही है।
श्रुतयश्च तथा प्राहुर्जगतोऽसत्स्वरूपताम् ।
शृणु ता अपि सौम्य स्वं जगतोऽसत्चबुद्धये ॥१४०॥
तथा श्रुतियोंने भी जगत्को असद्रूपताका प्रतिपादन किया है।
हे सौम्य ! जगत्की असत्यता समझनेके लिये तू उन श्रुतियोंको
भी सुन ।
श्रुतयः
प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।
मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैत परमार्थतः ॥१४॥
इसमें सन्देह नहीं, यदि प्रपञ्च होता तो निवृत्त भी हो जाता।
यह सकल द्वैत मायामात्र है, परमार्थतः तो अद्वैत ही है।
विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।
उपदेशादयं वादो ज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥१४२॥
इस विकल्पकी यदि किसीने कल्पना की होती तो यह
निवृत्त भी हो जाता; यह वाद तो केवल उपदेशके लिये ही है।
ज्ञान हो जानेपर तो द्वैत रहता ही नहीं ।
द्वितीयकारणाभावादनुत्पन्नमिदं
जगत् ।
यथैवेदं नमः शून्यं जगच्छ्न्यं तथैव हि ॥१४॥
पञ्चमप्रकरण
reluONGRALIGUEDGE
ನಿರ್ಣಾಣುಳಾ
[ब्रह्मके सिवा कोई दूसरा कारण न होनेसे यह
जगद बिना उत्पन्न हुआ ही है। जिस प्रकार यह आकाश शून्य-
रूप है उसी प्रकार सारा जगत् शून्यमय है।
वन्याकुमारवचने भीतिवेदस्त्विदं जगत् ।
शशशृङ्गेण नागेन्द्रो मृतश्चेजगदस्तु तत् ॥१४॥
यदि वन्ध्यापुत्रके वचनसे किसीको भय हो जाय तो यह
जगद् भी हो सकता है, अथवा यदि शशशृङ्गसे गजराजका वध
हो गया हो तो यह जगत् भी हो सकता है।
मृगतृष्णाजलं पीत्वा तृप्तिश्चेदस्त्विदं जगत् ।
गन्धर्वनगरे सत्ये जगद्भवति सर्वदा ॥१४५॥
यदि मृगतृष्णाका जल पीकर किसीको तृप्ति हो जाय तो यह
जगत् भी हो जाय तथा गन्धर्वनगरके सत्य होनेपर यह जगत् भी
सर्वदा हो सकता है।
गगने नीलिमा सत्ये जगत्सत्यं भविष्यति ।
मासात्पूर्व मृतो मर्यो ह्यागतश्वेजगद्भवेत् ॥१४६॥
आकाशकी नीलिमा सत्य हो तो जगत् भी सत्य हो
जाय। यदि एक मास पहले मरा हुआ मनुष्य टौट आवे तो
जगद
भी सत्य हो जाय।
गोस्तनादुद्भवं क्षीरं
पुनरारोपणे जगत् ।
ज्यालानिमण्डले पद्मवृद्धिश्वेजगदस्त्विदम् ॥१४७॥
३६६
मुमुक्षुसर्वस्वसार
OGROLORGrioOGRUSOGROLOGRAORGRINDERAIKO
गौके यनोंसे निकले हुए दूधको यदि फिर उसीमें भरा जा सके
तो जगत् भी हो सकता है तथा प्रज्वलित अग्निमण्डलमें कमलों को
घृद्धि हो जाय तो यह जगत् भी हो सकता है।
ज्ञानिनो हृदयं मूढातं चेदस्त्विदं जगत् ।
अजाकुक्षौ जगन्नास्ति ब्रह्मकुक्षौ जगन्न हि ॥१४८॥
यदि ज्ञानियोंके हृदय ( मर्म ) को मूढजन समझ लें तो भी
यह जगत् हो सकता है । जगत् तो न प्रकृतिके उदर में है और
न ब्रह्मकी ही कोखमें है।
सर्वथा भेदकलनं द्वैताद्वैतं न विद्यते ।
नास्ति नास्ति जगत्सर्व गुरुशिष्यादिकं न हि ॥१४९।।
भेदकलना तथा द्वैत या अद्वैत तनिक भी नहीं है। यह
सारा जगत् नहीं है-नहीं है और न गुरु-शिष्यादि ही हैं।
संमहकर्तृयपनम्
मिथ्याले जगतः सामिन्स्यावेदापात्मता ।
मिथ्याभवाचतो ज्ञानं प्रक्षणः सात्कथं यद ॥१५०॥
शिप्य-हं स्वामिन् ! इस प्रकार जगत्का मिथ्याश्य सिर
होनेपर तो वेद आदि भी मिथ्या हो जायेंगे। तब उन मिथ्यागत
वेदादिसे प्रदान किस प्रकार हो सकेगा, सो कहिये।
भृशु समम्स मिहन मिथ्याभूतेन पोधनम् ।
दृष्टं पर्यव निद्रानो येदादा सातयात्मः ॥१५॥
पञ्चम प्रकरण ३६७ అగ్నాగాలంగాణగారి गुरु-सुनो, जिस प्रकार खनके मिथ्या सिंहसे भी [ भयवश लोगोंको ] जागते देखा गया है उसी प्रकार वेद आदिसे आत्मज्ञान हो सकता है। एवं श्रुत्यादिभिर्वाक्यैात्या जगन्मृपात्मताम् । परिशिष्टश्च यद्ब्रह्म तत्त्वं नेतीति बोधितम् ॥१५२॥ इस प्रकार श्रुति आदि वाक्योंसे जगत्का मिथ्यात्य जानने- पर जो नेति-नेतिरूपसे बोधित अन्तमें बचा हुआ ब्रह्म है, वही तू है। निषेधमुखश्रुतिका तात्पर्य भगवन्नेति नेतीति श्रुतेरप्यर्थमीरय । येन स्वान्यनिषेधेनाहं विद्यां स्वपरात्मताम् ॥१५३॥ शिष्य-हे भगवन् ! अब 'नेति नेति' इस श्रुतिका भी अर्थ कहिये, जिससे मैं अपने और दूसरेके निपेधद्वारा अपनी परमात्म- खरूपताको जान सकूँ। उच्यतेऽनात्ममात्रस निषेधावधिरूपतः। शिष्टं यत्तत्परं ब्रह्म नेति नेतीति चोधितम् ॥१५॥ गुरु--जो परब्रह्म अनात्मपदार्थमात्रके निपेधकी अवधिरूपसे बचा हुआ कहा जाता है उसका ही नेति नेति-इस वाक्यसे बोध कराया जाता है। इतिशन्दद्वयेनानाखिलं दृश्यमनूद्यते । नकारेण निषेधश्च चीप्सया तस्स कथ्यते ॥१५५।।
३६८ GUESGROUPROUDEUSIGRALIORRUIRCRA मुमुक्षुसर्यवसार यहाँ दो 'इति' शब्दोंसे [ कार्य-कारणरूप ] सम्पूर्ण विश्वका अनुवाद किया जाता है तथा दो बार कहकर नकारसे उसका निषेध किया जाता है। मृत वामूर्चमज्ञानं वासना वाधिदैवतम् । अध्यात्म वाखिलं तद्धि नकाराम्यां निषिध्यते ॥१५६।। मूर्त, अमूर्त, अज्ञान, वासना, अधिदैवत अथवा अध्यात्म-- यह सभी इन दो नकारोंसे निषिद्ध हो जाते हैं। वातिकसारे अहंशब्दो बुद्धिवाची साक्षिणं लक्षयेद्यथा । निषेधको नकारोऽपि साक्षिणं लक्षयेत्तथा ॥१५॥ जिस प्रकार बुद्धिवाचक 'अहम्' शब्द साक्षीको लक्षित कराता है उसी प्रकार निपेवाची नकार भी साक्षीको ही लक्षित कराता है। ब्रह्मशब्दो जगद्धेतुवाची चिन्मानलक्षकः । इतिशब्दो जगन्मात्रवाची चिन्मात्रलक्षकः ॥१५८॥ 'ब्रह्म' शब्द जगत्के कारणका वाचक और चेतनमात्रको लक्षित करानेवाला है तथा 'इति' शब्द केवल जगत्वा ही वाचक और चेतनमात्रको लक्षित करानेवाला है। अखण्डैकरसस्तुल्यो वाक्यार्थो वाक्ययोयोः । उक्तार्थस्यैव दाढर्याय द्विनेंतीति वचः श्रुतम् ॥१५९॥ इस प्रकार इन दोनों वाक्योंका अर्थ समानरूपसे अखण्टक- पञ्चमप्रकरण MiGradur Grou रस ही है । उपर्युक्त अर्यकी दृढ़ताके लिये ही श्रुतिने दो बार 'नेति' ऐसा वचन कहा है। अथयात्रेतिशब्दौ द्वौ जीवेशोपाधिवाचिनी । नकाराम्यामुपाधी द्वौ निषिध्य ब्रह्म लक्ष्यते ॥१६॥ अथवा इस वाक्यमें जो दो 'इति' शब्द हैं वे जीव और ईश्वरकी उपावियोंके वाचक हैं। अतः नकारोंसे दोनों उपा- धियोंका निषेध करके ब्रह्म ही लक्षित होता है। संग्रहकर्तृवचनम् इति वार्तिकसारे त्वहं ब्रह्मासीति वाक्यवत् । तत्वमोरैक्यविज्ञप्त्यै योजितं नेति नेत्यपि । सर्वथान्यनिषेधेन यच्छिष्ट विच्वमेव तत् ॥१६१।। इस प्रकार वार्तिकसारमें 'मैं ब्रह्म हूँ' इस वाक्यके समान 'तत्' और 'स्वम्' पदकी एकताके ज्ञापनके लिये ही 'नेति नेति' इसकी योजना की गयी है। इससे अन्य पदार्थका सर्वथा निषेध कर दिया जानेपर जो चेतन वच रहता है वही तू है। आत्मतत्त्वका निरूपण खामिन्दृश्यनिषेधेनारशिष्टब्रह्मयोधिकाः श्रुतीथापि यदाय समिति चेच्छृणु ता अपि ॥१६२।। शिप्य-स्वामिन् ! अब आप दृश्यका निषेध हो जानेपर यचे हुए ब्रमका बोध करानेवाली श्रुतियाँ भी कहिये। गुरु-] अच्छा, यदि ऐसा कहते हो तो सुनो- । २४ 1 मुमुमुसर्यस्ससार OGINCRUINOGRAMOOCreaEOGRAINGrexamGE श्रुतयः कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीधरः। कार्यकारणतां हित्वा पूर्णवोघोऽवशिष्यते ॥१६॥ यह जीव कार्यरूप उपाधियाला है और ईश्वर कारणोपाधिक है । इन दोनोंकी कार्य-कारणताको त्याग देनेपर पूर्ण बोध हो बच रहता है। यावद्यावन्मुनिश्रेष्ठ स्वयं सन्त्यजतेऽखिलम् । तापत्तावत्परो लोकः परमात्मैवावशिष्यते ॥१६॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! जितना-जितना स्वयं इस सम्पूर्ण जगत्का त्याग किया जाता है उतना-उतना ही वह परमपद परमात्मा अवशिष्ट रह जाता है। ज्ञेयवस्तुपरित्यागे विलयं याति मानसम् । मानसे विलयं याते कैवल्यमवशिष्यते ॥१६५।। ज्ञेय वस्तुका त्याग हो जानेपर चित्त लीन हो जाता है और चित्तके लीन हो जानेपर कैवल्यपद ही बच रहता है सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारं वच्मि यथार्थतः । स्वयं भूत्वा स्वयं मृत्वा स्वयमेवावशिष्यते ॥१६६॥ मैं सम्पूर्ण वेदान्तसिद्धान्तका पास्तविक सार कहता हूँ। वह परमात्मा स्वयं उत्पन्न होकर और स्वयं मरकर स्वयं ही बच रहता है।
पञ्चम प्रकरण ३७१ OGRICORIANGREDGENERGRUSIGRANGOLI600 संग्रहकर्तृवचनम् य एवं सौम्य जानाति खंसदानन्दचिद्धनम् । विमुच्यते स संसारादित्यपि श्रुतयो जगुः ॥१६७॥ हे सौम्य ! इस प्रकार जो अपने-आपको नित्यानन्द चिद्धन- स्वरूप जानता है वह संसारसे मुक्त होता है-ऐसा श्रुतियोंने भी कहा है। श्रुतयः जाग्रत्स्वमसुपुप्त्यादिप्रपञ्च यत्प्रकाशते । तब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्वबन्धैः प्रमुच्यते ॥१६८॥ जो जामत्, स्वप्न और सुपूप्ति आदि प्रपनको प्रकाशित करता है वह ब्रह्म ही मैं हूँ-ऐसा जानकर मनुष्य सब बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्या विमुक्तये । तब्रह्माहमिति झात्या ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥१६९।। उसे जानकर पुरुप मृत्युको पार कर जाता है, इसके सिवा मुक्तिका और कोई मार्ग नहीं है । 'वह ब्रह्म ही में हूँ' ऐसा जान- कर फिर अक्षको प्राप्त हो जाता है। राणाप्रेष्यम्बरे मानौ नरनागामरेषु च । यस्तिष्ठति तदेवाहमिति ज्ञात्वा न शोचति ॥१७०॥ तृणके अग्रभागमें, आकाशमें, सूर्यमें, तया मनुष्य, नाग और देवताओंमें भी जो स्थित है वही में हूँ-ऐसा जाननेपर फिर शोक नहीं करता।
३७२ OGENUARURG . मुमुक्षुसर्वखसार GRelarusiasat तद्ब्रह्मानन्दमद्वन्दं निर्गुणं सत्यचिद्घनम् । विदित्वा स्वात्मनो रूपं न बिभेति कुतश्चन ॥१७॥ उस आनन्दस्वरूप, निर्द्वन्द्व, निर्गुण, सत्य और चिद्धनमूर्ति ब्रह्मको अपने आत्माका स्वरूप जान देनेपर फिर किसीसे नहीं डरता । भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तसिन्दृष्टे परावरे ॥१७॥ उस पर (कारण) और अवर (कार्य) सप परमात्माका साक्षात्कार कर लेनेपर हृदयको प्रन्थि टूट जाती है, सकल सन्देह छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और इस जीवके कर्म क्षीण हो जाते हैं। प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम् । विसृज्य ध्यानयोगेन ब्रह्माप्येति सनातनम् ॥१७॥ यह अपने पुण्यको प्रियजनोंके लिये और पापको अप्रिपोंके लिये त्यागकर ध्यानयोगद्वारा सनातन ग्रहमें लीन हो जाता है। यत्र यत्र मृतो ज्ञानी परमाक्षरवित्सदा । परब्रह्मणि लीयेत न तस्सोकान्तिरिष्यते ॥१७॥ परम अक्षर ब्रह्मको जाननेवाला शानी सर्वदा जर्स भी मरता है परब्रह्ममें ही लीन हो जाता है। उसका उन्क्रमण नहीं माना जाता। • क्योंकि ऐसा माना गया कि तस्ववेचा शरीरमे मो int होती है उसके पुण्यात मागी मान होते हैं और पार परिणाम उसके निन्दकोको मोगना पड़ता है।
पञ्चम प्रकरण ३७३ OURISOGROOGrave GRANUSAGRONICORIEDGRause स्वायत्तमेकान्तसुखं स्वेप्सितत्यागवेदनम् । यस्य दुष्करतां यातं धिक्तं पुरुपकीटकम् ॥१७५।। जिसके लिये यह अपने ही अधीन रहनेवाला, एकान्त सुख- खरूप तथा इच्छित पदार्थोंका त्यागरूप ज्ञान दुष्कर हो गया है उस पुरुष-कीटको धिक्कार है। अतिवर्णाश्रमं रूपं सच्चिदानन्दलक्षणम् । योन जानाति सोऽविद्वान् कदा मुक्तो भविष्यति ॥१७६॥ जो वर्णाश्रमसे अतीत सच्चिदानन्दमय अपने स्वरूपको नहीं जानता यह मूढ भला कब मुक्त हो सकेगा ! शास्त्राण्यधीत्य मेधावी अभ्यस्य च पुनः पुनः । परमं ब्रह्म विज्ञाय उल्कावत्तान्यथोत्सृजेत् ॥१७७।। बुद्धिमान् पुरुष शास्त्रोंको पढ़कर और उनको बारम्बार विचारकर परब्रह्मका ज्ञान हो जानेपर [मार्गकी समाप्ति होनेपर छोड़ी हुई ] मसालके समान उन्हें त्याग दे। स्वमेऽपि यो हि मुक्तः स्यााग्रतीच विशेषतः । ईदृक्चेष्टः स्मृतः श्रेष्ठो वरिष्ठो ब्रह्मवादिनाम् ॥१७८॥ जो पुरुप जागृतिके समान विशेषरूपसे स्वप्नमें भी बन्धन- मुक्त रहता है [अर्थात् उस समय भी जिसकी बोधवृत्ति जागृत रहती है] ऐसी चेष्टावाला ही ब्रह्मवादियोंमें श्रेष्ठ और सर्वोत्तम माना गया है। इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदीमहती विनष्टिः ।
मुमुधुसर्य स्वसार .GUEUEDIOGROUGreuOGENaround- ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्य थेतरे दुःखमेशपियन्ति ॥१७॥ हम यहाँ रहते-रहते ही उसे जान लें। यदि उसे न जाना तो बड़ा अनिष्ट हो जायगा । जो इसे जान लेते हैं ये अमर हो जाते हैं। इनके सिया दूसरे तो दुःसकी ओर ही जाते हैं। संग्रहकर्तृवचनम् एवं सौम्य मया तुभ्यं मानान्मोक्षप्रदर्शिकाः । श्रुतयो दर्शिताः किं त्वं भूयः प्रष्टुं हि याञ्छसि ॥१८॥ है सौम्य ! इस प्रकार मैंने तुझे ज्ञानसे मोश प्रदर्शित करने. याठी श्रुतियाँ दिरामी; अरे तुम और क्या पूछना चाहते हो । ज्ञानीकी कृतकृत्यता गुरो कि विदुषः कर्म कर्तव्यं स्वेष्टलम्धये । वयानिष्टप्रहाणाय अलि या नासि मे यद ॥१८॥ शिष्य हे गुरो ! विद्वान्यां अपनी इट-ग्रामि और अनिर- निवृत्ति के लिये क्या कर्तव्य है ! उसके लिये कुछ करप्य या नहीं, सोहम ममय मुझमे पहिये । माग्य नैवाति कर्तव्या मम्यमानरत किया। इष्टानिष्टम्म मिथ्यावाकिमिरिक रयायुधः।।१८।। गुरु-ई मोम्य ! मम्या शानवादको को भी प्रिया यश नहीं है, फिर आ अनिष्ट दोनों ही मिणा होई कारन दिन IIT किमीका और गिया!
पञ्चमप्रकरण OGROLOGRAMINGremGNORTori SUSTRO श्रुत्या स्मृत्यापि चार्थोऽयं सौम्य स्पष्टं प्रदर्शितः । सगृहाम्यत्र तेऽप्यद्य संशयच्छेदनाय ते ॥१८३॥ हे सौम्य ! इस विषयको श्रुति और स्मृतिने भी स्पष्टतया प्रदर्शित किया है। तेरे संशयका छेदन करनेके लिये मैं यहाँ उनका भी संमह करता हूँ। श्रुतिः नैष्कर्येण न तस्यार्थस्तस्सार्थोऽस्ति न कर्ममिः । न समाधानजप्याम्यां यस्य निर्वासनं मनः ॥१८॥ जिसका मन निर्वासनिक है उसको नैष्कर्म्यसे कोई प्रयोजन नहीं है, उसे कर्मोसे भी कोई काम नहीं है और न समाधान (समाधि) या जपसे ही कोई प्रयोजन है। स्मृतिः ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस योगिनः । नेवास्ति किश्चित्कर्तव्यमस्ति चेन स तत्ववित् ॥१८५॥ जो योगी ज्ञानामृतसे तृप्त और कृतकृत्य है उसे कुछ भी कर्तव्य नहीं है। यदि उसकी दृष्टिमें भी कोई कर्तव्य है तो वह तत्ववेत्ता ही नहीं है। संग्रहकर्तृवचनम् बहुना किमिहोक्तेन सझेपावमिदं शृणु । निषेधविधिवाक्यैश्च नात्मज्ञानी नियुज्यते ॥१८६।।
३७६ मुमुक्षुसर्वस्वसार GROLLOOGNIGANICORNERISPERIERNA. इस सम्बन्धमें अधिक कहनेसे क्या लाभ ! तुम संक्षेपसे यही श्रवण करो कि आत्मज्ञानीका विधि-निषेधरूप वाक्योंसे कमी नियोग नहीं होता। प्रतिपेधविधिम्यां चेन्न प्रेयों ब्रह्मविद्यादि । यथेष्टाचरणं तस्य पलादापद्यते तदा ॥१८७॥ शका-यदि ब्रह्मवेत्ता विधि-निषेधरूप यायोंसे प्रेरित ही नहीं होता तो उसके लिये बलात्कारसे स्वेच्छाचारकी प्राप्ति हो जाती है। मैवं रागवतो दृष्टं यथेष्टाचरणं यतः । ब्रह्मवेत्तुर्विरक्तस तत्प्रसक्तिः कुतो भवेत् ॥१८८॥ समाधान-ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि स्वेच्छाचार तो रागी पुरुषों में ही देखा गया है। विरक्त ब्रह्मयेनाको माया उसका प्रसा कैसे प्राप्त हो सकता है! पातिककृद्भिरर्थोभ्यं सम्यग्रुपेण शंसितः । तद्वाक्यानि पटामि त्यस्ताक्षेपनिवृत्तये ॥१८९॥ यह बात यानिककार ( श्रीमुरेश्वराचार्य) ने अच्छी तरह निरूपण की है। अतः तुम्हारे किये हुए आक्षेपकी निवृति लिये में उनके याश्य उद्धृत करता हूँ। पार्मिकदारयम पदादेवमतत्यास यशाचर यदि । गुनां तचरिदा व फो भेदोनिमाणे ॥१९०१ पञ्चम प्रकरण ORIGOcrusnaCOGRAOGINGREASOGRure जिसे तत्त्वसहित अद्वैतका बोध हो गया है उसमें भी यदि यपेष्टाचार रहा तो अपवित्र पदाकि भक्षण करनेमें कुत्तों और तत्त्ववेत्ताओंमें अन्तर ही क्या है ! अधर्मान्जायतेऽज्ञानं यथेष्टाचरणं धर्मकार्ये कथं तत्स्यायत्र धर्मोऽपि नेष्यते ॥१९॥ अधर्मसे अज्ञानकी उत्पत्ति होती है और उससे स्वेच्छाचार होने लगता है । मला, जिसमें धर्मकी भी गति नहीं है उस धर्मके कार्यरूप ज्ञानमें स्वेच्छाचार कैसे हो सकता है ! ततः। क्षुधया पीड्यमानोऽपि न विपं धत्तुमिच्छति । मिष्टानध्वस्त जाननामूढस्तजियत्सति ॥१९॥ जो पुरुष भूखसे व्याकुल है वह भी विप भक्षण नहीं करना चाहता फिर जिसकी भूख-प्यास मिष्टान्न खाते-खाते नष्ट हो गयी है वह मोहहीन पुरुष तो जानते हुए उसे खानेकी इच्छा ही नहीं कर सकता! संग्रहकर्तृवचनम् तसादागवदज्ञानां यथेष्टाचरणं भवेत् । नैव तद्वीतरागाणां जीवन्मुक्तमहात्मनाम् ॥१९३|| अतः रागयुक्त अज्ञानियोंमें ही यथेष्टाचार पाया जाता है-- योतराग जीवन्मुक्त महात्माओंमें यह नहीं देखा जाता ।
૨૭૮ मुमुक्षुसर्घखसार OGRSOGROGRMicroGraRIORNEGRANA जीवन्मुक्तिका स्वरूप जीवन्मुक्तिस्वरूपं मे जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् । तथा त्वं कृपया ब्रूहि गुरो श्रुत्यादिमानतः ॥१९॥ शिष्य-हे गुरो ! आप कृपापूर्वक श्रुति आदि प्रमाणके अनुसार मुझे जीवन्मुक्तिका स्वरूप और जीवन्मुक्तिके लक्षण यतलाइये। सौम्य रागादिदोषाणां ब्रह्माभ्यासादिनाहिया । चित्तातिरष्कृतिः सम्यक् साजीयन्मुक्तिरुच्यते ॥१९५।। गुरु-हे सौम्य ! ब्रह्माभ्यास आदिके द्वारा जो चितसे रागादि दोषोंका पूर्णतया तिरस्कार हो जाना है यही जीयन्मुक्ति कहलाती है। रागादिदोपशून्यो यचिन्माननिष्ठमानसः । सर्वत्र समपुद्धिय म जीवन्मुक्त उच्यते ॥१९६।। जो रागादि दोषमे रहित है, जिसका चित्त फेयर चेतनमात्र, रगा हुआ है तथा जो सर्वत्र समधुद्धि है यह जीवन्मुक्त कहलाता है। श्रुतिस्मृत्यादिवास्यानि मानान्यत्र भूरियः । मन्ति तेषु श्रुतीनावरमा पेण यदामि ते ॥१९७] इस अपमें अनेकों श्रुति-स्मृति आदिक वाक्य प्रमाण है। उनमेंसे में तुम्हें गंवेपमें कुछ श्रुतियों बताया।
पश्चम प्रकरण
३७९
OGRAIGNIOGRAMONSIOGROUGOPIDOGroxion.
श्रुतयः
अहं ब्रह्मास्म्यहं ब्रह्मास्म्यहं ब्रह्मोतिनिश्चयः ।
चिदहं चिदहं चेति स जीवन्मुक्त उच्यते ॥१९८॥
मैं ब्रह्म हूँ, मैं ब्रह्म हूँ, मैं ब्रह्म हूँ--इस प्रकारका निश्चय
करनेवाला और में चेतन हूँ, मैं चेतन हूँ-ऐसा जाननेवाला
पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है।
मौनवानिरहंभावो निर्मानो
मुक्तमत्सर ।
यः करोति गतोद्वेगः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥१९९।।
जो मौनी, अहंभावरहित, निर्मान, मात्सर्यशून्य और उद्वेग-
रहित होकर सारे कार्य करता है वह जीवन्मुक्त कहलाता है।
सर्वेच्छाः सकलाः शङ्काः सर्वहाः सर्वनिश्चयाः ।
धिया येन परित्यक्ताः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२०॥
जिसने अपनी बुद्धिसे सारी इच्छाएँ, समस्त शङ्काएँ, सारी
चेष्टाएँ और सभी निश्चय त्याग दिये हैं वह जीवन्मुक्त कहलाता है।
यस्य नाहकृतो भायो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
कुर्वतोऽकुर्वतो वापि स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२०१॥
जिसमें अहंभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि करते या न
करते समय भी लिप्त नहीं होती वह जीवन्मुक्त कहलाता है ।
यावती दृश्यकलना सकलेयं विलोक्यते ।
सा येन सुष्ठु सन्त्यक्ता स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२०२॥
ParekanGURGAURUS ३८० मुमुक्षुसर्यवसार OGRIOGRAP यह जितनी भी सारी-की-सारी दृश्यकलना दिखलायी देती है उसे जिसने अच्छी तरह त्याग दिया है वह जीवन्मुक्त कहलाता है। साधुभिः पूज्यमानोऽपि पीध्यमानोऽपि दुर्जनः । सममेव भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२०३॥ साधुजनोंसे पूजित और दुर्जनोंसे पीडित होनेपर भी जिसका चित्त समान ही रहता है यह जीवन्मुक्त कहलाता है । देहेन्द्रियेष्वहंभाव इदंभावस्तदन्यके । यस्य न भवतः कापि स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२०४॥ जिसका देह और इन्द्रियोंमें अहंभाव तथा उनसे अन्य पदार्थोंमें इदभाव कभी नहीं होता वह जीवन्मुक्त कहलाता है । संग्रहकर्तृवचनम् एवं श्रुतिवचोभिस्ते जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् । मयेह दर्शितं सौम्य स्मृतिवाक्यान्यथ ब्रुवे ॥२०५।। गुरु-हे सौम्य ! इस प्रकार मैंने यहाँ श्रुति-वाक्योंसे तुझे जीवन्मुक्तका लक्षण बतलाया; अब स्मृतिके वचन और सुनाता हूँ। महामारते प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥२०६।। हे पार्थ ! जिस समय पुरुष अपने मनकी सम्पूर्ण कामनाओं- को त्याग देता है और स्वयं अपने आत्मामें ही सन्तुष्ट रहता है उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
पञ्चमप्रकरण OGRLANDGRELIGIOGRUSOGreroGANISAGRONIOGRUS. अहेरिख गणागीतः सौहित्यानरकादिव । कुणपादिय यः स्त्रीभ्यस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥२०७॥ जो जनसमूहसे सर्पके समान, सत्कारसे नरकके समान और स्त्रियोंसे शवके समान डरता रहता है उसे देवगण ब्राह्मण मानते हैं। कामक्रोधानृतद्रोहलोभमोहमदादयः न सन्ति यसिन् राजेन्द्र तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥२०८॥ हे राजेन्द्र ! जिसमें काम, क्रोध, अनृत, द्रोह, लोभ, मोह और मद आदि सर्वथा नहीं हैं उसे देवगण ब्राह्मण मानते हैं। न जातिः कारणं तात गुणाः कल्याणकारणम् । वृत्तस्थमपि चाण्डालं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥२०९॥ हे तात ! कल्याणका हेतु जाति नहीं है, उसके कारण तो गुण ही हैं। जो चाण्डाल होकर भी सदाचारमें तत्पर है उसे देवगण ब्राह्मण मानते हैं। पाठकाः पाठकाश्चैव ये चान्ये शास्वचिन्तकाः । सर्वे व्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान् स पण्डितः ॥२१०॥ पदन-पढ़ानेवाले तथा जो और भी शाखचिन्तक हैं वे सत्र भी व्यसनी और मूर्ख ही हैं । वास्तवमें तो जो क्रियावान् है वही पण्डित है।
३८० मुमुक्षुसर्वस्वसार OGROOGriend OGrexianRIERacecrui यह जितनी भी सारी-की-सारी दृश्यकलना दिखलायी देती है उसे जिसने अच्छी तरह त्याग दिया है वह जीवन्मुक्त कहलाता है। साधुभिः पूज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि दुर्जनः । सममेव भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२०३॥ साधुजनोंसे पूजित और दुर्जनोंमे पीडित होनेपर भी जिसका चित्त समान ही रहता है वह जीवन्मुक्त कहलाता है। देहेन्द्रियेष्वहंभाव इदंभावस्तदन्यके। यस्य न भवतः कापि स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२०॥ जिसका देह और इन्द्रियोंमें अहंभाव तथा उनसे अन्य पदाथोंमें इदभाव कभी नहीं होता वह जीवन्मुक्त कहलाता है । संमहकर्तृवचनम् एवं श्रुतिवचोमिस्ते जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् । मयेह दर्शितं सौम्य स्मृतिवाक्यान्यथ ध्रुवे ॥२०५।। गुरु-हे सौम्य ! इस प्रकार मैने यहाँ श्रुति-वाक्योंसे तुझे जीवन्मुक्तका लक्षण बतलाया; अब स्मृतिके वचन और सुनाता हूँ। महाभारते प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान आत्मन्येवात्मना तुष्टः .. हे पार्थ ! जिस समय पुरुष अपने का को त्याग देता है और स्वयं अपने आत्मामें उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
पञ्चम प्रकरण SOGRMINGNIOGRUS. अहरिव गणागीतः सौहित्यानरकादिव । कुणपादिय यः स्त्रीभ्यस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥२०७॥ जनसमूहसे सर्पके समान, सत्कारसे नरकके समान और स्त्रियोंसे शवके समान डरता रहता है उसे देवगण ब्राह्मण मानते हैं। कामक्रोधान्तद्रोहलोभमोहमदादयः न सन्ति यसिन् राजेन्द्र तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥२०॥ हे राजेन्द्र ! जिसमें काम, क्रोध, अनृत, द्रोह, लोभ, मोह और मद आदि सर्वथा नहीं हैं उसे देवगण ब्राह्मण मानते हैं । न जातिः कारणं तात गुणाः कल्याणकारणम् । वृत्तस्थमपि चाण्डालं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥२०९॥ हे तात ! कल्याणका हेतु जाति नहीं है, उसके कारण तो गुण ही हैं। जो चाण्डाल होकर भी सदाचारमें तत्पर है उसे देवगण ब्राह्मण मानते हैं। पाठकाः पाठकाश्चैव ये चान्ये शास्त्रचिन्तकाः । सर्वे व्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान् स पण्डितः ॥२१॥ पदाने-पढ़ानेवाले वही -- ये सब
३८२
AGRIGraiDGPIDOGeo
PERMANCEURO
1
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।
मुमुक्षुसर्वस्वसार
सूतसंहितायाम्
विनष्टदिग्भ्रमस्यापि यथापूर्व विभाति दिक् ।
तथा विज्ञानविध्वस्तं जगन्मे माति तन्नहि ।
इति यो वेद वेदान्तः सोऽतिवर्णाश्रमी भवेत् ।।२११॥
जिसका दिग्भ्रम नष्ट हो गया है उसे भी तो पहलेके समान
हीदिशा प्रतीत होती रहती है उसी प्रकार विज्ञानसे विध्वस्त हुआ भी
यह जगत् मुझे भास रहा है, किन्तु वस्तुतः यह है नहीं—ऐसा जो
वेदान्तवाक्योंद्वारा जानता है वह वर्णाश्रमसे अतीत हो जाता
संग्रहकर्तृवचनम्
वसिष्ठेनापि संप्रोक्तं जीवन्मुक्तस लक्षणम् ।
तथा तन्महिमा चोक्तस्तद्वाक्यान्यपि मे शृणु ॥२१२॥
जीयन्मुक्तके लक्षण और उनकी महिमाका वर्णन वसिष्ठजीने
भी किया है । अब मुझसे उनके वचन भी सुनो ।
योगवासिष्ठे
ये तु विज्ञातविज्ञेयास्तादृशाः पापनाशयाः ।
जानन्ति तांस्त एवान्तरहः पादानिवाहयः ॥२१॥
जिस प्रकार सर्पके पैरोंको सर्प ही जान सकते हैं उसी
प्रकार उन ( बोधवान् पुरुपों) को वे ही जान सकते हैं जिन्होंने
शेय पदार्थको अच्छी तरह जान लिया है और जो उन्हींके समान
शुद्धचित्त हैं।
भावं निगृहयन्त्येते तमुचममनुत्तमाः।
ग्राम्पर्धन किलानयः कचिन्तामणिरापणे ॥२१॥
३८३ पश्चम प्रकरण OGUSDGRELUONGRESIDGUDERSION ये सर्वोत्कृष्ट पुरुष इस उत्तम मावको छिपाये रहते हैं। जिसका मोल ग्रामीण धनसे नहीं किया जा सकता ऐसा कौन चिन्तामणि बाजारमें मिल सकता है ? वसिनिगृहने भावो यतस्तेषां न दर्शने । निर्वासना गतद्वैता गतमानाः किलाङ्ग ते ॥२१५॥ क्योंकि उनका तात्पर्य अपने उन उत्कृष्ट भावोंको छिपानेमे ही रहता है, प्रकट करनेमें नहीं । हे तात ! वे निश्चय ही बड़े निर्वासनिक, द्वैतभावसे रहित और निरभिमान होते हैं । एकान्तामानदौर्गत्यजनावज्ञप्तयस्तु तान् । सुखयन्ति यथा राम न तथैव महर्द्धयः ॥२१६॥ हे राम | उन लोगोंको एकान्त, असम्मान, दुर्गति तथा मनुष्योंसे तिरस्कृत होना-ये सब जैसा सुख पहुँचाते हैं वैसा बड़ी भारी सम्पत्ति भी नहीं पहुंचा सकती । गुणं ममेमं जानातु जनः पूजां करोतु मे । इत्यहङ्कारिणामीहा न तु तन्मुक्तचेतसाम् ॥२१॥ लोग मेरे इस गुणको जानें और मेरी पूजा करें ऐसी चेष्टा अहङ्कारियोंकी ही हुआ करती है, मुक्तचित्तोंकी नहीं । शीतातपादिदुःखानि निजदेहगतान्यपि । अन्यदेहगतानीव ज्ञा पश्यत्यवहेलया ॥२१८॥ ज्ञानवान् पुरुष अपने ही शरीरमें प्राप्त हुए भी शीत और .
३८४ मुमुक्षुसर्वस्वसार OGRUPGROGREVERGRIDIOGRLUDIOGRALEDGE09 घाम आदि दुःखोंको दूसरोंके देहमें प्राप्त हुओंके समान उपेक्षा- दृष्टि से देखता है। परमात्मनि विश्रान्तं यस्य व्यावृत्य नो मनः । रमतेऽसिन्पुनदृश्ये स जीवन्मुक्त उच्यते ।।२१९॥ जिसका चित्त परमात्मामें लगा हुआ है और फिर लौटकर इस दृश्यमें सुख नहीं मानता वह जीवन्मुक्त कहलाता है। एक एव विशेपोऽस्य न समो मूढयुद्धिमिः । सर्वत्रास्थापरित्यागानीरागममलं मनः ॥२२॥ यह अन्य मूढबुद्धि पुरुपोंके समान नहीं होता, इसमें एक ही विशेपता होती है; [वह यह कि] सर्वत्र आस्था (सत्यत्वबुद्धि) का त्याग कर देनेके कारण इसका निर्मल चित्त रागरहित रहता है। यस्यानुभवपर्यन्ता बुद्धिस्तत्त्वे प्रवर्तते । तदृष्टिगोचराः सर्वे मुच्यन्ते सर्वपातकैः ॥२२१॥ जिसकी बुद्धि तत्त्वचिन्तनमें साक्षात् अनुभवपर्यन्त प्रवृत्त हो गयी है उसकी दृष्टिके विषय होनेपर सब लोग सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। संग्रहकर्तृवचनम् यः समाधि सदाश्रित्य स्वखरूपे व्यवस्थितः । संशान्तसर्वसङ्कल्पः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२२२|| जो पुरुप सर्वदा समाधिका आश्रय देकर अपने स्वरूपमें पशम प्रकरण ParxuTOGRAGOGRAORTERan. स्थित है तथा जिसके सारे सङ्कल्प शान्त हो गये हैं वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जीवन्मुक्तसमाधेर्मो स्वामिन्मे लक्षणं बद । स्वरूपारस्थितेश्चापि तद्वद श्रुतिमानतः ॥२२॥ हे स्वामिन् ! आप मुझसे श्रुतिप्रमाणानुसार जीवन्मुक्की समाधिका तथा स्वरूपस्थितिका रक्षण कहिये । ध्याभ्याने परित्यज्य निवातस्थप्रदीपरन् । ध्येयकगोचरा चिर्या समाधिरिहोच्यते ॥२२॥ ध्याता और ध्यानको छोड़कर यायुरहित स्थानमें रखे हुए दीपकके समान जो एकमात्र ध्येयको हो विषय करनेवाली धृति है यह समाधि कहलाती है। समाधेलक्षणं सौम्य स्वरूपावस्थितेस्तथा । लक्षणं श्रुतिभिः प्रोक्तं यामिस्ता अपि मे शृणु ॥२२५॥ हे सौम्य ! जिन श्रुतियों के द्वारा समाधि और सगापायस्थिति- या सक्षम कहा गया है उन्हें भी मुझसे श्रवण करो। अतपः अहमेव परं प्रय प्रसाहमिति मंस्थितिः । समाधिः स तु विज्ञेयः सर्वनिनिरोधकः ।।२२६।। में ही परमय है, मन ही मैं हूँ इस प्रकारको जो म्पिति है उसे ही सम्पूर्ण वृत्तियोंका निरोध करनेवाडी समाधि समझनी चाहिये ।
मुमुक्षुसर्वस्वसार
OGROLAGREENINGRANDGRANUSSDG
HamarNARO
ब्रह्माकारमनोवृत्तिप्रवाहोऽहकृति बिना ।
संप्रज्ञातसमाधिः स्याद्ध्यानाभ्यासनकर्पतः ।।२२७॥
ध्यानका अभ्यास बढ़ जानेपर जो अहङ्कारके बिना ही प्रक्षाकार
मनोवृत्तिका प्रवाह होता है वही संप्रज्ञातसमाधि कहलाती है।
प्रशान्तवृत्तिकं चित्तं परमानन्ददीपकम् ।
असंप्रज्ञातनामायं समाधिोगिनां प्रियः ॥२२८॥
जब यत्तियोंके शान्त हो जानेपर चित परमानन्दफा प्राश
करने लगे तो यही योगियोंकी अत्यन्त प्रिय असंप्रशात नामकी
समाधि है।
संशान्तसर्वसङ्कल्पा या मिलापदयस्थितिः ।
जाग्रनिद्राविनिमुक्ता सा स्वरूपस्थितिः परा ॥२२९।।
सम्पूर्ण सङ्कल्पोंके शान्त हो जानेपर जो जामत् और निदारो
रहित शिलाके ममान स्थिति होती है यही परम सम्पापस्थिति है।
सस्पोमा मनोनाशो जीवन्मुक्तम्य विद्यते ।
निदापारूपनामस्तु वर्ततेन्ददमुक्तक ॥२३०॥
है निदाय ! यह सम्प मनानास जीवरमुनमें रखता सपा
विदेशमुनमें चित्तका अग्रपनास रक्षा करता है।
संग्रहानपचनम्
ममापिलवणं माम्य मयंवं ने प्रदग्निम् ।
५.40 बोतुं वायमि किं पुनः ॥२३॥
पञ्चम प्रकरण MiEOGROLOGANDGaliSGRRAG0. ORIGai हे सौम्य ! इस प्रकार मैंने तुझे श्रुतिवाक्यके प्रमाणसे यह समाधिका लक्षण दिखलाया । अब तू और क्या सुनना चाहता है। विदेहमुक्तिका स्वरूप गुरो विदेहमुक्तस्त्वं लक्षणं मे यदाधुना । तथा विदेहमुक्तस लक्षणं श्रुतिमानतः ॥२३२॥ शिष्य-हे गुरो ! अब आप श्रुतिके प्रमाणानुसार मुझसे विदेहमुक्तिके तथा विदेहमुक्तके लक्षण कहिये । शृणु सौम्य वदाम्यद्य त्वया पृष्टं क्रमादहम् । प्रारब्धकर्मणां नाशे भोगेनाङ्गत्रयक्षये ॥२३३।। जीवन्मुक्तिपदं हित्वा या पूर्णात्मतया स्थितिः । ज्ञानिनः सा विदेहाख्या मुक्तिः श्रुतिभिरीरिता ।।२३४॥ गुरु-हे सौम्य ! सुन, अब मैं तेरी पूछी हुई वात तुझे क्रमशः बतलाता हूँ। भोगद्वारा प्रारब्ध कोका नाश हो जानेपर जब तीनों शरीरोंका क्षय हो जाता है, उस समय जीवन्मुक्ति- पदको त्यागकर जो परिपूर्ण आत्मखरूपसे स्थिति होती है उसीको श्रुतियोंने ज्ञानोकी विदेहनाम्नी मुक्ति कही है । प्रवाहं सदानन्द इति चिन्तापि यस्य न । यश्चिन्मात्रतया संस्थः स विदेहः समीरितः ॥२३५॥ जिसे 'मैं नित्यानन्दस्वरूप ब्रह्म ही हूँ' ऐसी चिन्ता भी नहीं है और जो केवल चिपसे ही स्थित है वह विदेहमुक्त कहलाता है।
३८८ RRPUR मुमुक्षुसर्यससार मानानि श्रुतयः सन्ति यसिष्ठस पांसापि । श्रुतीस्तायत्पठामीह यसिष्टोक्तीस्ततः परम् ॥२३॥ इस विषयमें श्रुतियों सपा पसिष्टमी गगन मी प्रमाण है। यहाँ पहले मैं शुतियाँ अताता है और राफे परगार परिय- जीफे याश्य करेगा। शुराया विदहमुक्ती मिले पदं परमपाने विदेशमुक्तविषये वभिन्गपशपारगः ॥२३७॥ पिसना सिम्पान्येन किधिदिर पियतं । न गुणा नागुणामात्र न धीनांधीनं कना ॥२२॥ दिइगुफको प्रा होनेगानाशाम पित्र और निर्मट किादमें, जो किया गिना ही है, भी नही रहा। म आगामें न गुण, गुण है, म है, न अधीन बना दी। शामेन रोपामावलि कापंधर्म नायनि पाया, प्रायनामाइट्यवधारनाय रिया नत्यानमारमा हमने मामा को परका नाम और EMA man 4GREJO पञ्चम प्रकरण ३८९ GreIEDGROGREUSGRUK. क्षीण हो जाता है । इस प्रकार तीन तरहसे आत्माकी मायाका नाश होता है। जीवन्मुक्तिपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते विशत्यदेहमुक्तित्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥२४॥ अपने देहके कालकवलित हो जानेपर जीव जीवन्मुक्तिपदको त्यागकर विदेहमुक्तिमें प्रवेश करता है; जैसे वायु निस्पन्दभावको प्राप्त हो जाता है। व्यपगतकलनाकलङ्कशुद्धे स्वयममलात्मनि पावने पदेऽसौ । सलिलकण इवाम्बुधो महात्मा विगलितवासनमेकतां जगाम ॥२४॥ वह महात्मा कलनारूप कलंकसे रहित शुद्ध एवं निर्मल आत्मा- रूप पावन पदमें वासनाओंको दूर कर इस प्रकार एकरूप हो गया जैसे समुद्रमें जलकी बूंद । इदं चैतन्यमेवेति अहं चैतन्यमित्यपि । इति निश्चयशून्यो यो वैदेही मुक्त एव सः॥२४२।। जो [सर्वदा खरूपस्य रहनेके कारण ] 'यह (सारा संसार) चैतन्य ही है और मैं भी चैतन्य ही हूँ'-इस प्रकारके निश्चयसे भो रहित है वह विदेहमुक्त ही है। यस्य प्रपश्चभानं न ब्रह्माकारमपीह न । अतीतातीतमावो यो चैदही मुक्त एव सः ॥२४३।।
૧૮૮ मुमुक्षुसर्यस्खसार OGELIERGANICOGRADGURGRIDGROADIODEL. मानानि श्रुतयः सन्ति वसिष्ठस्य वचांस्यपि । श्रुतीस्तावत्पठामीह वसिष्ठोक्तीस्ततः परम् ।।२३६।। इस विषयमें श्रुतियाँ तथा यसिष्ठजीके यचन भी प्रमाण हैं । यहाँ पहले में श्रुतियाँ बतलाता हूँ और इसके पश्चात् यसिष्ठ- जीके याक्य कहूँगा। श्रुतयः विदेहमुक्ती विमले पदे परमपावने । विदेहमुक्तविषये तमिन्सत्यक्षयात्मक ॥२३७॥ चित्तनाशे विरूपाख्ये न किनिदिह विद्यते । न गुणा नागुणास्तव न श्री श्रीन चैकना ॥२३॥ विदेहमुक्तको प्राम होनेवाले उस पित्तनाशरूप परम पवित्र और निर्मल विदेहमुक्तिपदमें, जो चितया यिग्रपनाश ही है, कुछ भी नहीं रहता । उस अवस्थामें न गुण हैं, न अगुण है, न भी है, न अग्री है और न एकता है। शाग नश्यत्परमार्यःि कार्यश्चम नम्यति पापरोशान् । प्रारम्घनामाव्यवहारनारा एवं त्रिया नापति याममाया ॥२३॥ गंमाग्ने समयबुद्धि नट होती है, Arism नाश होता है ही प्रापभयो र ..
पश्चम प्रकरण ३८९ OCIOGREASOGRALIGENUEDGRIDGELUGUID. क्षीण हो जाता है । इस प्रकार तीन तरहसे आत्माकी मायाका नाश होता है। जीवन्मुक्तिपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते । विशत्यदेहमुक्तित्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥२४०॥ अपने देहके कालकवलित हो जानेपर जीव जीवन्मुक्तिपदको त्यागकर विदेहमुक्तिमें प्रवेश करता है; जैसे वायु निस्पन्दभावको प्राप्त हो जाता है। व्यपगतकलनाकलङ्कशुद्ध स्वयममलात्मनि पावने पदेऽसौ । सलिलकण इवाम्बुधौ महात्मा विगलितवासनमेकतां जगाम ॥२४१॥ यह महात्मा कलनारूप कलंकसे रहित शुद्ध एवं निर्मल आत्मा- रूप पायन पदमें वासनाओंको दूर कर इस प्रकार एकरूप हो गया जैसे समुद्रमें जलकी बूंद । इदं चैतन्यमेवेति अहं चैतन्यमित्यपि । इति निश्चयशून्यो यो वैदेही मुक्त एव सः॥२४२॥ जो [सर्वदा खरूपस्थ रहनेके कारण ] 'यह (सारा संसार) चैतन्य ही है और मैं भी चैतन्य हो हूँ इस प्रकारके निश्चयसे भी रहित है वह विदेहमुक्त ही है। यस्य प्रपञ्चभानं न ब्रह्माकारमपीह न । अतीतातीतभावो यो वैदेही मुक्त एव सः ॥२४३।।
३९० मुमु सर्वस्वसार OGRUARGauncatuocratumcrauenceuncedin. जिसे प्रपञ्चका मान नहीं होता और न ब्रझाकारता ही होती है, इस प्रकार जो अतीतसे भी अतीत मायमें स्थित है वह विदेहमुक्त ही है। जीवात्मा परमात्मेति चिन्तासर्वस्ववर्जितः । सर्वसङ्कल्पहीनात्मा वैदेही मुक्त एव सः॥२४४॥ जो 'जीवात्मा-परमात्मा' सम्बन्धी चिन्ताओंके सर्वखसे रहित है तथा सब प्रकारके सङ्कल्पोंसे मुक्त है वह विदेहमुक्त ही है। योगवासिष्ठे द्विविधश्चित्तनाशोऽस्ति सरूपोऽरूप एव च । जीवन्मुक्तौ सरूपः स्यादरूपोऽदेहमुक्तिकै ॥२४५॥ चित्तनाश दो प्रकारका है-सरूप और अरूप । जीवन्मुक्तिमें सरूप चित्त नाश होता है और विदेहमुक्तिमें अरूप । सुखदुःखादयो धीरं साम्यान प्रोद्धरन्ति यम् । निश्वासा इव शैलेन्द्र चित्तं तस्य मृतं विदुः ॥२४॥ श्वास-प्रश्वास जिस प्रकार पर्वतराजको नहीं हिला सकते उसी प्रकार जिस धीर पुरुपको सुख-दुःख आदि उसकी साम्यावस्थासे विचलित नहीं कर सकते उसका चित्त मरा हुआ समझना चाहिये। भूयोजन्मविनिर्मुक्तं जीवन्मुक्तस्य यन्मनः । सरूपोऽसौ मनोनाशो जीवन्मुक्तस्य चोच्यते ॥२४॥ जीवन्मुक्तके मनका जो पुनर्जन्मसे मुक्त हो जाना है यही उस जीवन्मुक्तका सरूप मनोनाश कहलाता है।
पशम प्रकरण OGNIOGRAVERGRISORRNERGRUAGRANEPcations अरूपस्तु मनोनाशो यो मयोक्तो रघूदह । विदेहमुक्तावेवासौ विद्यते निष्कलात्मकः ॥२८॥ हे राघव ! मैंने जिस अरूप मनोनाशके विषयमें कहा था वह कलाहीन मनोनाश विदेहमुक्तिमें ही हुआ करता है। संग्रहकर्तृवचनम् एवं विदेहमुक्तस्ते विदेहस्य च लक्षणम् । मानं चापि तयोस्तद्वत्सङ्घ पात्सौम्य दर्शितम् ॥२४९॥ हे सौम्य ! इस प्रकार मैने संक्षेपसे विदेहमुक्ति और विदेह- मुक्तका लक्षण तथा उन दोनोंके विषयमे प्रमाण दिखला दिया । प्राक् च सौम्य मयोक्तं ते तत्तद्वाक्यप्रमाणतः । पदार्थशुद्धिमारभ्य सफलं तत्वदर्शनम् ॥२५॥ हे सौम्य ! उससे पहले मैं भिन्न-भिन्न वाक्योंका प्रमाण देकर पदोंके अर्थके शोधनपूर्वक फलसहित तत्वदर्शनका वर्णन कर चुका हूँ। मयोक्तस्यार्थजातस्य यच्चया मननं कृतम् । स्वद्वाक्यैः श्रुतिवाक्यैश्च तत्सर्व मे निवेदय ॥२५१॥ तूने मेरे कहे हुए विषयका जो कुछ मनन किया है वह सब अपने और श्रुतिके वाक्योंद्वारा मेरे प्रति निवेदन कर । शिष्यका अनुभव खामिन्मे मतिवाक्यानि तुभ्यमावेदयाम्पहम् । स्वबोधस्यैव दाढर्यार्थ न मे पाण्डित्यख्यातये ॥२५२|| ३९२ 4GEGMIGrasso मुमुक्षुसर्यवसार DERIOGRAINERMERO शिष्य-हे सामिन् ! अब मैं अपने पाण्डित्यकी प्रसिद्धिके लिये नहीं बल्कि बोधकी दृढ़ताके लिये ही अपने विचारसम्बन्धी वाक्य आपके प्रति निवेदन करता हूँ। नैवाहं स्थूलदेहोसि कूटस्थैकस्वभावतः । सूक्ष्मदेहस्तथा नाहं युद्ध्यादीनां यतोऽसि दृक् ॥२५३।। एकमात्र कूटस्थस्वभाव होनेके कारण मैं स्थूल देह नहीं हूँ। तथा मैं सूक्ष्म देह भी नहीं हूँ क्योंकि इन बुद्धि आदिका मैं साक्षी हूँ। तथा कारणदेहोऽपि नैवाहं चिद्घनो यतः । तसादेहत्रयद्रष्टा तद्धमै रहितोऽस्म्यहम् ॥२५४॥ इसके सिवा मैं कारणदेह भी नहीं हूँ, क्योंकि मैं तो चिद्धन हूँ [और कारणदेह तमोमय है] । अतः मैं तीनों देहोंका द्रष्टा और उनके धमोंसे रहित हूँ। अस्तिभातिप्रियत्वेन सर्वत्राहमवस्थितः। नामरूपादिकं सर्व मय्यध्यस्ततया न सत् ॥२५५।। मैं अस्ति, भाति और प्रियरूपसे सर्वत्र स्थित हूँ । नाम और रूप आदिक, मुझमें अभ्यस्त रहनेके कारण सत्य नहीं हैं। एक: प्रत्यक्स्वरूपोसि सर्वदेहेषु चेतनः । परंब्रह्माहमेवास्म्यहं ब्रह्मासीति वाक्यतः ॥२५६॥ मैं तो सम्पूर्ण देहोंमें एक ही प्रत्यक्षरूप चेतन हूँ। 'अहं प्रह्मास्मि' इस वाक्यके अनुसार मैं परब्रह्म ही हूँ।
३९३ पश्चम प्रकरण GREASOGROUNNGRESGROUSNER श्रुतयः ब्राह्मण्यं कुलगोत्रे च नामसौन्दर्यजातयः । स्थूलदेहगता एते स्थूलाद्भिन्नस्य मे न हि ॥२५७॥ ब्राह्मणत्व, कुल, गोत्र, नाम, सुन्दरता और जाति-ये सब स्थूल शरीरमें ही हैं। स्थूलसे अत्यन्त भिन्न मुझमें ये कुछ भी नहीं हैं। क्षुत्पिपासान्ध्यवाधिर्यकामक्रोधादयोऽखिलाः । लिङ्गदेहगता एते ह्यलिङ्गस न विद्यते ।।२५८।। क्षुधा, पिपासा, अन्धत्व, वधिरत्व, तथा काम और क्रोध आदि-ये सब लिंगदेहमें ही हैं, मुझ अलिंग आत्मामें नहीं । जडत्वप्रियमोदत्वधर्माः कारणदेहगा: न सन्ति मम नित्यस्य निर्विकारस्वरूपिणः ॥२५९।। जडत्व, प्रियत्व तथा मोदत्व आदि धर्म कारणदेहमें ही हैं । मुझ नित्य निर्विकारखरूपमें वे बिल्कुल नहीं हैं। चिद्रूपत्वान्न मे जायं सत्यत्यानानृतं मम । आनन्दत्वान्न मे दुःखमज्ञानाद्भाति सत्यवत् ।।२६०॥ चिद्रूप होनेके कारण मुझमें जडता नहीं है, सत्यस्वरूप होनेसे मिथ्यात्व नहीं है तथा आनन्दखरूप होनेके कारण मुझमें दुःख नहीं है । यह [सारा जगत् ] अज्ञानसे ही सत्यवत् प्रतीत होता है। अनात्मदृष्टेरविवेकनिद्रा- महंममस्वमगतिं गतोऽहम् ।
Gaoncurreun.
३९४
मुमुक्षुसर्यस्यसार
स्वरूपसूर्येऽम्युदिते स्फुटोक्त-
गुरोर्महावाक्यपदैः प्रयुद्धः ॥२६१॥
में अनात्मदृष्टिसे अविवेक-निद्राको तया अहं और ममरूप
खभावस्थाको प्राप्त हो गया था | अब आरमस्वरूपररूप गयो उदित
होनेपर में गुरुके स्फुटतया याहे हुए महायाक्यपदोसे जाग पड़ा हूँ।
आत्मानमअसा वेभि काप्यज्ञानं पलायितम् ।
कर्तृत्वमय मे नष्टं कर्तव्यं वापि न चिन् ॥२६२।।
अब मैं आत्मतत्वको ठीक-ठीक जान गया , इरारी मेरा
अज्ञान मानो कहीं भाग गया है । आज मेरा कर्तृय नष्ट हो गया
है और मुझे कहीं कोई कर्नव्य भी नहीं रहा है।
देवार्चनरतानशीचभिक्षादी पर्ततां पपुः ।
तारं जपतु यार तद्वत्पटत्याग्नायमस्तकम् ॥२६३।।
यह रागेर मंटे ही देयपूजन, मान, शौच और मिठा
आदिमें रहे, वागी मरे ही उमसम्से ओंकारका जप अगया पार करे।
विष्णु ध्यायतु धीर्यद्वा प्रमानन्द बिलीयनाम् ।
साश्यहं शिधिदप्यय न कुर्षे नापि कारये ।।२६४।।
बुद्धि विशुभगवान्वा पान को अपया प्रमानन्दमें निमग्न
हो जाय, मैं तो माता दी है। मेरा गांकन काना
और न करता हूँ।
किं करोमि गच्छामिटिगृहामि स्यनामिरिम् ।
यन्मया परिनं वि महारल्याम्पना यया ॥२५॥
पश्चम प्रकरण ३२५ OGRRIER ausi मैं क्या करूँ ! कहाँ जाऊँ ! किसे ग्रहण करूँ ! और किसे स्यायूँ ! क्योंकि प्रलयकालीन जलके समान मैंने तो सारे संसारको व्याप्त किया हुआ है। संग्रहकर्तृवचनम् स्वामिन् मयाधुना यैस्तु स्वतत्त्वं मननीकृतम् । तुम्यं निवेदितान्येवं मननीयवचांसि वै ॥२६६॥ हे भगवन् ! जिन वाक्योंद्वारा मैंने आत्मतत्त्वका मनन किया है अपने मननके वे सब वचन आपसे निवेदन कर दिये । त्वद्वाक्यैश्च मया बुद्धं ब्रह्मात्मैक्यं गुरोऽधुना । तेनाज्ञानं च मे नष्टं प्राङ् नित्ययोधपीडितम् ।।२६७॥ हे गुरो ! अब आपके वचनोंसे मुझे ब्रह्म और आत्माकी एकताका ज्ञान हुआ है। उससे, नित्यत्रोधद्वारा पहले ही दलित हुआ मेरा अज्ञान नष्ट हो गया है । श्रवणादित्रिमिनटाः प्रतिबन्धाश्च ते त्रयः । गुरो मे संशयाद्या येऽपराधाः पुरुषस्य वै ॥२६८॥ हे गुरो ! जो पुरुपापराध कहलाते हैं वे मेरे संशय आदि तीनों दोप श्रवण आदि तीनों साधनोंसे नष्ट हो गये हैं। गुरोऽस्म्यहं परं ब्रह्म नित्यमुक्तोऽहमद्वयः । शुद्धोधुद्धोमिचिन्मानोनित्यानन्दोनिरामयः।।२६९।। १ संशय, असम्भावना और विपर्यय । २ श्रवण, मनन और निदिध्यासन ।
OGADGAONGreriencreupanerusareas. मुमुक्षुसर्वस्वसार हे गुरो ! मैं नित्यमुक्त और अद्वितीय परब्रह्म हूँ। मैं शुद्ध, बुद्ध, चिन्मात्र, नित्यानन्दमय और निरामय हूँ। परिपूर्णोऽसि सर्वत्र सचिदानन्दविग्रहः । जाग्रदादिनयाध्यक्षः कूटस्थः सर्वदृक् सदा ॥२७०॥ मैं सर्वत्र परिपूर्ण, सच्चिदानन्दमूर्ति, जामदादि तीनों अवस्थाओंका साक्षी, कूटस्थ और सर्वदा सब कुछ जाननेवाला हूँ। निर्विशेपो निराकारो निरंशोऽहं निरञ्जनः । निर्गुणो निर्मल शान्तोऽसङ्गोऽस्म्यहं सदाभयः ॥२७॥ मैं निर्विशेष, निराकार, निरंश, निरञ्जन, निर्गुण, निर्मल, शान्त, असंग और सर्वदा भयहीन हूँ। स्वयंप्रकाशरूपोऽहं केवलानन्दविग्रहः । केवलज्ञानरूपोऽहं केवलसत्स्वरूपकः ॥२७॥ मैं वयंप्रकाशवरूप, एकमात्र आनन्दमूर्ति, केवल ज्ञान- खरूप और केवल सत्वरूप हूँ। अविद्याफार्यहीनोऽहं बन्धमोक्षौ न मे कचिन् । कालत्रयविमुक्तोऽहं देहादिरहितोऽस्म्यहम् ॥२७॥ मैं अविद्याके कार्यसे रहित हूँ, मेरे बन्धन और मोक्ष कमी नहीं होते, मैं कालत्रयसे मुक्त और देहादिशून्य हूँ। पइमिरहितोऽहं पै पटकौशिकाथ मे न हि । पविकारविहीनोऽहं सदानन्दयनोऽस्म्यहम् ॥२७॥ .
4GREVENGLIST . पञ्चमप्रकरण ३९७ OGRIDGRUIOGRASIOGRUEDO मैं छ: ऊर्मियोंसे रहित हूँ, मुझमें छः कौशिक भी नहीं हैं। तथा मैं छः विकारोंसे रहित और सर्वदा आनन्दघनखरूप हूँ। वेदवेद्यमहं विद्वन्वेदा गायन्ति मां सदा । वेदवाक्यानि मानानि सन्त्यत्रार्थे गुरो तथा ॥२७५॥ हे विद्वन् ! मैं वेदवेद्य हूँ, वेद सर्वदा मेरा ही गान करते हैं। हे गुरो ! इस विषयमें वेदवाक्य भी प्रमाण हैं । श्रुतयः मय्येव सकलं जातं मयि सर्व प्रतिष्ठितम् । मयि सर्व लयं याति तद्ब्रह्माद्वयमस्म्यहम् ॥२७६॥ सारा जगत् मुझहीमें उत्पन्न हुआ है, मुझहीमें स्थित है और मुझहीमें लीन हो जाता है। मैं वह अद्वितीय ब्रह्म ही हूँ। अहं शिष्यवदामामि ह्यहं लोकत्रयाश्रयः । अहं कालत्रयातीतो यहं वेदैरुषासितः ॥२७७॥ मैं शिष्यके समान प्रतीत होता हूँ, मैं ही तीनों लोकोंका १ छः ऊर्मियाँ ये हैं-भूख-प्यास प्राणकी, शोक-मोह मनकी और जरा-मृत्यु शरीरकी। २ अस्थि, मजा, मेद, त्वचा, मांस और रक्त ये : कौशिक कहलाते हैं, यथा- अस्थि मजा तया मेदस्त्वामांसशोणितानि च । षट्कौशिकमिदं प्रोक्तं सर्वदेहेषु देहिनाम् ॥ ३ सत्ता, जन्म, वृद्धि विपरिणाम, आय और नाश । 1 मुमुक्षुसर्वस्वसार .GRurancauseumorean आश्रय हूँ, मैं तीनों कालोसे अतीत हूँ और में ही वेदोंसे उपासित होता हूँ। अहं शाखेण निर्णीतो यह चित्ते व्यवस्थितः । आनन्दधन एवाहमहं प्रमामि केवलम् ।।२७८॥ शासने मेरा ही निर्णय किया है, मैं ही चिसमें स्थित हूँ, में आनन्दघन ही हूँ, और में ही केवल अमरारूप हूँ। आत्मनात्मनि तृप्तोऽसि परूपोऽसहमव्ययः । आकाशादपि सूक्ष्मोऽहमाघन्तामाययानहम् ॥२७९॥ में अपने अपनेहीसे सन्तुष्ट हूँ, में अरुप और अविनाशी हूँ तथा आकाशसे भी सूक्ष्म और आदि-अन्तयार हूँ। प्रमेयाहं सर्ववेदान्तवेद्य नाहं वेद्यं व्योमातादिरूपम् । रूपं नाहं नाम नाईन कर्म महापाई राभिदानन्दरूपम् ॥२८०॥ में सम्पूर्ण वेदान्तोम येच अन्न ही हूँ, किन्तु आकाश और पपनादिराप येच पदार्य नहीं है। प, नाम पाकर्म मदी है में तो सचिदानन्दसाय प्रत हो । विपु धाममु योन्यं मोक्ता भोगध परन् । तेम्यो विलमगःसायी पिन्मारोहंमदाशिषः ॥२८॥ [आमद, मन और मनि-इन निभायात्रा में भी मोगा, पञ्चम प्रकरण OGREScrasRGRUEnciaGNISOGISOGreene भोज्य और भोग हैं मैं उन तीनोंसे विलक्षण उनका साक्षी चेतन- मात्र सदाशिवखरूप ही हूँ। नित्यं शुद्धो बुद्धमुक्तस्वभावः सत्यः सूक्ष्मः सन्धिभुश्वाद्वितीयः । आनन्दाब्धिर्यत्परस्सोऽहमसि प्रत्यग्धातुर्नात्र संशीतिरस्ति ॥२८॥ मैं नित्य शुद्ध बुद्ध और मुक्तखभाव हूँ, मैं सत्य, सूक्ष्म, सत्वरूप, विभु और अद्वितीय हूँ, जो आनन्दका समुद्र और सबसे परे है. वह प्रत्यक्तत्त्व ही मैं हूँ-इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है । अहमेव महानात्मा गहमेव परात्परः । अहमन्यवदामामि ह्यहमेव शरीरवान् ॥२८॥ मैं ही परमात्मा हूँ, मैं ही परसे पर हूँ, मैं ही अन्यवत् प्रतीत होता हूँ तथा मैं ही शरीरधारी हूँ। सर्वाधिष्ठानरूपोऽस्मि सर्वदाचिद्यनोऽस्म्यहम् । चित्तवृत्तिविहीनोऽहं चिदात्मैक्यरसोऽस्म्यहम् ॥२८४॥ मैं सत्रका अधिष्टानखरूप हूँ, सर्वदा चिद्घनमूर्ति हूँ, चित्तवृत्तिसे रहित हूँ तथा चेतन और आत्माका ऐक्यरसखरूप हूँ। संग्रहकर्तृवचनम् स्वीयानुभववाक्यानि तथा वेदवचांसपि । स्वज्ञानदाय विज्ञप्त्यै तेऽपितानि मया गुरो ॥२८५।।
४००
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मुमुक्षुसर्वखसार
9
इतः परं मया कार्य यत्तद्वाच्यं त्वया पु.
शिष्य-हे गुरो ! इस प्रकार ज्ञानकी दृढ़ता प्रट
लिये मैंने आपसे श्रुतिके तया अपने अनुभवके वचन नि
अब आगे मुझे क्या करना चाहिये सो बतलाइये ।
वत्स त्वं कृतकृत्योऽसि यस्यानुभव ईदृशः
गुरु-हे वत्स ! तू, जिसका कि ऐसा अनुमय ।
हो गया है।
तीर्णस्त्वया च दुःखान्धिस्तव कार्य न शिष्यते
तथा फलं त्वया लब्धं शरणागमनस मे।
तूने दुःख-समुद्रको पार कर लिया है। अब तेरे हि
कार्य अवशिष्ट नहीं है और तुझे मेरी शरणमें आनेका फ
हो चुका है।
यावत्प्रारब्धशेपस्ते तावत्वं वत्स वायुवत् ।
जीवन्मुक्तश्चरन्भूमा प्रारब्धान्ते विमोक्ष्यसे ।।
हे वत्स ! जबतक तेरा प्रारब्ध शेष है तबतक तूप
वायुके समान जीवन्मुक्त होकर विचरता हुआ प्रारब्धका
होनेपर मुक्त हो जायगा।
अन्यका उपसंहार
गुरुशिष्योतिसंव्याजादेवं रामप्रसादतः ।
जातं प्रकरणं पूर्ण पञ्चमं झाननामकम् ॥२
-- ४०१ न पश्चम प्रकरण PARMINORNIROINSURANIRMIRERNIRA इस प्रकार भगवान् रामकी कृपासे यह गुरु-शिष्य-संवादके मिपसे कहा हुआ ज्ञाननामक पाँचवाँ प्रकरण समाप्त हुआ। अयं मुमुक्षुसर्वस्वसारनामा निवन्धकः । बृहन्मुमुक्षुसर्वस्वान्निबन्धादुद्धृतो मया ॥२९॥ सङ्क्षिप्तः स्वल्पयुद्धीनां मुमुक्षूणां हितेच्छया । सारं वृहनिवन्धानां सङ्क्षपाज्ज्ञातुमिच्छताम् ॥२९॥ मैंने यह मुमुक्षुसर्वखसारनामक निबन्ध बड़े-बड़े निबन्धोंका संक्षेपसे सार जाननेकी इच्छावाले अल्पबुद्धि मुमुक्षुओंकी हित-कामनासे संक्षिप्तरूपसे बृहन्मुमुक्षुसर्वखनामक निबन्धसे निकाला है। बृहन्मुमुक्षुसर्वस्वपाठोत्रास्ति हि भूरिशः । सङ्पेण तथान्योऽपि पाठोऽनास्तीति युध्यताम्॥२९२॥ इसमें अधिकांश पाठ बृहन्मुमुक्षुसर्वस्वनामक अन्यका ही है; इसके अतिरिक्त संक्षेपसे अन्य (ग्रन्थान्तरका) पाठ भी है- ऐसा जानना चाहिये। समाप्तश्च निबन्धोऽयं रामोमेशप्रसादतः । सौम्यकाश्याः समीपे श्रीभागीरथ्यास्तटे शुभे ॥२९३।। श्रीराम और उमापति शंकरकी कृपासे उत्तर-काशीके समीप श्रीगंगाजीके पवित्र तटपर यह निबन्ध समाप्त हुआ। श्रीमद्रामं गुरुं चापि भिक्षु भावेशनामकम् । दण्डवद्भक्त्याहमष्टाङ्गैः पुनः पुनः ॥२९॥ -
४०२
AGRANUAGALIGROUNDRUGUDGUSTRNAK
मुमुक्षुसर्यवसार
मैं श्रीराम और भिक्षु भायनाथनामक अपने गुरुदेव
बारम्बार साष्टांग दण्डवत् करके मक्तिमायसे प्रणाम करता हूँ।
सौम्यकाश्याः समीपेऽयं धनीरामद्विजेन ।
प्रन्या मंलिखितो मुक्तेरीशस घुसरिनटे ।
श्रीमुक्तिनायके इस प्रयको धनीरामनामक माहाणने उत्तर
काशीके समीप गंगानीय तटपर लिगा है।
इति श्रीगुमुक्षुसर्यसमारापिट एन्य सामान निगएणानियत
मानाएवं पागं प्रकरणं समाप्तम् ॥
गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीकृत
-गीतावली-
अनुवादक-श्रीमुनिलालजी
-
पृष्ठ ४६०, चिकना कागज, चिघ ४ रङ्गीन,
४ सादे, अच्छी छपाई, मुन्दर टाइटन, मू०१)
मजिल्द ११) मात्र ।
श्रीरामायणकी तरह इसमें भी श्री.
गोसाईजीने सात कामों में 'राम-लीला'
भजनोंमें गायी है। इसके पद बहुत सुन्दर
१। गोस्वामीजीकी रचनाओंके विषय में कुछ
कहना सूर्यको दीपक दिखाना है।
इस पुस्तक मे-ऐसे अनूठे प्रमग जिन्दै
गाते-गाते और सुनते-सुनते मनानन्दसे विभोर
हो जाना है। टीराहोनेसे पट महोमपनमें
भा बाते।
एक समन दिखते है-"जबसे आपने
'बिनय-पत्रिका प्रकाशित की तदमे यह
शिकायत जाती रही कि रक पुनस्का कोई
सुन्दर संस्करण नहीं मिलता जो मुष्टम मी
हो। इसी प्रकार भव गीतावली'ाया
मुन्दर संम्बरण मापने सो मुलम कर
दिया है।
11-गीताप्रेस, गोरगपुर
... ... .. ... श्रीमुनिलालजीद्वारा अनुवादित अन्य पुस्तके श्रीविष्णुपुराण-सटीक, बड़ा आकार, पृ० ५५०, चित्र ८, मूल्य साधारण जिल्द २॥), कपड़े की जिल्द २) अध्यात्मरामायण-सटीक, बड़ा आकार, पृ. ४०२, चित्र ८, मूल्य माधारण बिल्द १m), कपड़े की जिद एकादश स्कन्ध-सटीक, सचित्र, पृ. ४२०, मू०॥) सजिल्द ईशावास्योपनिषद्-सानुवाइ शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृ. ५०, मूल्य केनोपनिषद्-सानुबाद शाकरभाष्यसहित, सचिव, पृ० १४६, मू० ।) कठोपनिषद्-सानुवाद शाङ्करमाप्यमहित, सचित्र, पृ० १७२, 1-) मुण्डकोपनिषद्-सानुबाद शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृ० १३२, मू. प्रश्नोपनिपद्-सानुवाद शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृ० १३०, विवेक-चूडामणि-सटीक, सचित्र, दूसरा संस्करण, पृ० २२५, मू. प्रबोधसुधाकर-मटीक, दो चित्र, दूसरा संस्करण, पृ. ८०, .) अपरोक्षानुभूति-सटीक, सचित्र, मू० 0 रामगीता-सटीक, दूसरा संस्करण, मू. Dil - पता गीताप्रेस, गोरखपुर मू० .) ... .. ... ...
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