Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun

Pawamchariwo Vol-2; (1958)

Jain ,devandra · 2010/02

PDF Proofread

Front matter

Bharatiya Jnana-Pitha Kashi als 463 FOUNDED BY VA-S, SETH SHANTI PRASAD JAIN Ju ? In Memory of his late Benevolent Mother SHRI MURTT DEVI BHARATIYA JNANA-PITHA MURTI DEVI JAIN GRANTHAMALA Apabhransk Granatha No. 2. In this Granthamala critically edited Jain agamic philosophical, pauranic, literary, historical and other Original texts available in prakrit, sanskrit, apabhiansha, hindi, kannada and tamil etc., will be published in their respective languages with their translations in modern languages AND Catalogues of Jain Bhandalas, inscriptions, studies of competent scholarts & popular jain literature will also be published General Editor Publisher Ayodhya Prasad Goyaliya Dr. Hiralal Jain, MAD Litt. Secy, Bharatiya Jnanapitha DrAN Upadhye MAD Litt Durgakund Road, Vaianaşı, Founded on -Vikrama Samavat 2000 Phalguna Krishna 9 All Rights Reserved, 18th Feb, 1944, Vira Sam, 2470 glan ११ विषय-सूची का वर्णन वर देना ७ इक्कीसवीं संधि विद्याधर चन्द्र गति द्वारा जनक के अपहरणका आदेश १३ विभीषण-द्वारा जनक और दशरथ चपलवेगका घोडा बनकर जनक को मरवानेका असफल प्रयत्न ३ को ले आना १३ दशरथ और जनकका कौतुक- विद्याधर चन्द्रगतिका प्रस्ताव १५ मङ्गल नगरके लिए जाना, नगर ५ धनुपयज्ञ द्वारा सीताके विवाह कैकेयीका स्वयंवरमें आकर दशरथ का निश्चय स्वयंवरकी योजना का वरण करना राम-सीताका विवाह १७ युद्धमें दशरथका कैकेयीको दो वाईसवीं संधि दशरथ-द्वारा जिनका अभिषेक १६ जनकके यहॉ सीता और भा रानी मुप्रभाकी शिकायत, कंचुकी मण्डलकी उत्पत्ति, भामण्डल का के बुढ़ापेका वर्णन अपहरण ७ दशरथकी विरक्ति और रामको जनक द्वारा शवरोंके विरुद्ध राज्य देनेका निश्चय २१ दशरथ से सहायताकी याचना है श्रमण संघका आगमन राम और लक्ष्मणका प्रस्थान ६ भामंडलकी विरह वेदना २२ शवरोके परास्त करनेके बाद सीताको बलपूर्वक ले आनेके जनक द्वारा विदा लिए प्रस्थान २३ नारदका सीतापर कोप, उसका २५ चित्रपट भामडलको दिखाना ११ कामावस्थाका नाश २५ भामंडलका कामासक्त होना ११ अयोध्या जाना २५ दशरथके पुत्र-जन्म " पूर्व भव स्मरण ४७ ६ पउमचरित कैकेयीका सभामण्डपमें जाना २७ नदीका वर्णन ४७ और वर मांगना २७ राम द्वारा सेनाको वापसी दशरथ द्वारा रामको वनवास २७ दक्षिणकी ओर प्रस्थान ४७ भरत द्वारा विरोध २६ सैनिकोंका वियोग-दुख ४६ दशरथ द्वारा समाधान ३१ चौवीसवीं संधि तेईसवीं संधि अयोध्यावासियोका विलाप ४६ कवि द्वारा फिरसे स्तुति ३१ राजा दशरथकी सन्यास लेनेकी भरतको तिलककर रामको वन घोषणा गमन की तैयारी ३३ भरतकी हठ ५१ दशरथकी सत्यनिष्ठा ३३ दशरथ द्वारा दीक्षा लेना ५५ रामका अपनी मासे विदा उनके साथ और भी राना मॉगना ३५ दीक्षित हुए उनका वर्णन ५५ कौशल्याकी मूर्छा और विलाप ३५ भरतका विलाप और रामको मॉको समझा-बुझाकर रामका मनानेके लिए प्रस्थान ५७ प्रस्थान ३७ भरतकी रामसे लौटनेकी प्रार्थना ५७ सीताका भी रामके साथ जाना ३६ राम-द्वारा भरतकी प्रशसा ५६ लक्ष्मणकी प्रतिक्रिया और पिता कैकेयी का समाधान ५६ पर रोप ३६ भरतका लौटकर रामकी माताको रामका लक्ष्मणको समझाना और समझाना ६१ टोनोका एक साथ वनगमन ४१ रामका तापस वनमें प्रवेश सिद्धवरकूटमें विश्राम ४१ ६१ ४३ भीलवस्तीमे राम और लक्ष्मण रामका सुरति युद्ध-देखना ४५ ६३ वीरान अयोध्याका वर्णन ४५ वनके बीचमें प्रवेश रामका गम्भीर नदी पहुँचना तथा चित्रकूटसे दशपुरनगरमें प्रवेश ६५ धानुष्कवनका वर्णन जिनकी वन्दना का निवास विषय-सूची ७ वसन्तका वर्णन ಕ ಕ लक्ष्मणको बुलवाना ८७ सीरकुटुम्बिकसे भेंट ६५ रामका कूबर नगरमें प्रवेश ८३ पच्चीसवीं संधि ५३ सीरकुटुम्बिक द्वारा वज्रकर्ण और लक्ष्मणका पानीको खोजमें जाना ८३ सिंहोदरके युद्धका उल्लेख ६७ कूबरनगरके राजाकी विद्युदंग चोरका उपाख्यान ६७ जलक्रीड़ा सेनाका वर्णन ६६ राजाका लक्ष्मणको देखना राम और लक्ष्मणका सहस्रकूट राजाका कामासक्त होकर जिनभवनमें प्रवेश ७३ जिनेन्द्रकी स्तुति ७५ दोनोका एक आसनपर बैठना ८७ लक्ष्मणका सिहोदरके नगरमें प्रवेश७७ दोनोका तुलनात्मक चित्रण सिंहोदरकी प्रसन्नता ७७ कूबरनरेशका आधिपत्य පළි सिंहोदर द्वारा रामादिको वालिखिल्यकीअन्तर्कथाका संकेत६३ भोजन कराना ७६ भोजनकी व्यवस्था ६७ लक्ष्मण द्वारा सिहोदरको सहायता, रामको बुलाने जाना ६६ राम सीताका अलंकृत वर्णन १०१ युद्धमें वज्रकर्णकी हार ७३ जलक्रीड़ाका आयोजन १०३ लक्ष्मणकी शूर वीरता ८५ जलक्रीड़ाके प्रसाधनोंका वज्रकर्णको पकड़कर लक्ष्मणका वर्णन १०५ लौटना भोजन १०७ छन्वीसवीं संध सुन्दर वस्त्र पहनना १०६ राम-द्वारा साधुवाद ८६ कूबरनरेशका कल्याणमालाके विद्युदङ्गकी प्रशंसा रूपमें अपनी सारी कहानी वज्रकर्ण और सिहोदरकी मैत्री ८१ वताना १०६ वडकर्ण और सिंहोदर द्वारा लक्ष्मणका अभयदान कन्योके पाणिग्रहणका प्रस्ताव ८१ दूसरे सवेरे तीनोका प्रस्थान १११ वज्रकणसे युद्ध पारित मार ११३ गती यनगन गिनायत १३३ পৰী ৰখি मागमाग गालाणकी कमी १३५ पानी में परमान না না না १३५ नाम नगमानन १३५ मामीने मगर समागम निवेदन १३७ पक्ष भनुषीदाया मपिलती गमले जन-यानना १३६ विमान १२६ मनिका उपदेश १३ मानती निशाना ११६ मनतातागत-ग्रहण १४१ का विमा गमन लक्षमणको देगार यस्लिमा रनमा आग भयमान होना १४१ मामिला और नानिगे ब्रागण माग अर्थकी प्रशंमा १४३ १२५ उनतीसवीं सन्धि गमलक्ष्मणका तानि पार गमलक्ष्मण जीवन्त नगरमें १२५ प्रोग १४५ गमने मीना देवीको पौरन এখায়া जीवन्त नगरले गजाके पास १२७ कपिल घालणके घरमें प्रवेश १२७ भरतका लेख-पत्र आना ब्रामण देवतासे भिडन्त १२६ वनमालाकी आत्म-हल्याको चेष्टा १४७ गले पांसी लगाते ही लक्ष्मण प्रल्याति और बट-गृचका १५२ वर्णन १२६ दोनोका गमके सम्मुख जाना १५३ सैनिकोका आक्रमण १५३ १५५ रामका चटके नीचे बैठना और कृत्रिम वर्षाका प्रकोप १३१ १५७ १३१ कन्यादान फा प्रस्ट होना अट्ठाईसवीं सन्धि राजाका अभियान राजाका लक्ष्मणको सहर्प अलकृत वर्णन विषय-सूची 8 वनका वर्णन तीसवीं सन्धि अरिदमनकी क्षमा याचना १८७ भरतके विरुद्ध अनंतवीर्यकी रामका नगरमें प्रवेश १८६ सामरिक तैयारी बत्तीसवीं सन्धि भिन्न-भिन्न राजाओंको लेखपत्र १५६ वंशस्थ नगरमें प्रवेश १८६ रामका गुप्तरूपसे अनन्तवीर्यको मुनियोंपर उपसर्ग १८ हरानेका निश्चय १६१ १६३ नंदावर्त नगर में प्रवेश रामका सीताको नाना पुण्य प्रतिहारसे कह सुनकर उनका वृक्षोंका दर्शन कराना १६३ दरबारमें प्रवेश १६३ रामका उपद्रव दूर करना १६५ रामका नृत्यगान १६५ मुनियोंकी वन्दना-भक्ति १६७ अनन्तवीर्यका पतन १६७ लक्ष्मणने शास्त्रीय सङ्गीत अनन्तवीर्यकी विरक्ति १६६ प्रारम्भ किया १६७ कई राजाओंके साथ उसका फिर उपसर्ग १६ दीक्षा ग्रहण १६६ रामका सीताको अभय वचन २०१ रामका जयंतपुर नगरमें प्रवेश १७१ धनुषकी टवारसे उपसर्ग इकतीसवीं सन्धि होना, मुनिको केवलज्ञानकी लक्ष्मणकी वनमालासे विदा १७१ प्राप्ति २०१ गोदावरी नदीका वर्णन १७३ देवों द्वारा वन्दना भक्ति २०१ क्षेमञ्जलि नगरका वर्णन १७५ तैतीसवी सन्धि हड्डियोके ढेरका वर्णन । १७५ मुनि कुलभूषण द्वारा उपसर्गके लक्ष्मणका नगरमे प्रवेश १७७ कारणपर प्रकाश डालना २०५ लक्ष्मणका अरिदमनकी शक्ति पूर्व जन्मकी कथा २०७ झेलना १७६ चौतीसवी सन्धि दोनोंमें संघर्ष और वनमालाका रामकी धर्म-जिज्ञासा और मुनिका धर्मोपदेश २२१ बीचमें पड़ना १ पउमचरित पूर्वभव प्रसङ्ग रामका टण्टकवनमे प्रवेश २३१ उसका राम-लक्ष्मणपर यासक्त दण्टक अटवीका वर्णन २३१ होना २६३ गोकुल वस्तीका वर्णन २३३ कामावस्थाएँ २६५ यतियोको आहारदान २३३ रामका नीति-विचार २६७ आहारका श्लेपमं वर्णन २३५ दोनोका दोनोका उसे ठुकराना २६७ पैतीसवीं सन्धि सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार देवताओं द्वारा रत्न-वृष्टि ૨૩૭ स्त्रियोका वर्णन २६६ जटायुका उपाख्यान २३६ सैंतीसवी सन्धि २३६ चन्द्रनखाका विद्प रूप २७१ दार्शनिक वाद-विवाद २४१ लक्ष्मणको रोष २७३ राजा द्वारा मुनियोंकी यन्त्रणा २४७ चन्द्रनखाका पतिको सब हाल मुनियो-द्वारा उपसर्ग टालना २४७ बताना २७५ राजाको नारकीय यातना २४६ खरका पुत्र शोक ૨૭૭ जवायुका व्रत ग्रहण करना, चन्द्रनखाका बात बनाना २७७ रत्नोकी आभासे उसके पक्ष भाइयोमें परामर्श २७६ स्वर्णमय हो जाना २५३ खरकी प्रतिज्ञा २८१ छत्तीसवीं सन्धि रावणको खबर भेजेकर युद्धको रथपर राम-लक्ष्मणका लीलापूर्वक तैयारी २८३ विहार २५३ युद्धका प्रारम्भ २८५ क्रौचनटीके तटपर विश्राम २५५ लक्ष्मणकी शूरवीरता २८५ लक्ष्मणका वंशस्थलमे प्रवेश २५५ लक्ष्मणकी विजय २८७ सूर्यहास खगकी प्राति २५७ २५७ शम्बूक कुमारका वध अड़तीसवीं सन्धि सीता देवीकी चिन्ता २५६ रावणके नाम दूषणका पत्र २८७ चन्द्रनखाका प्रलाप २५६ रावण द्वारा लक्ष्मणकी सराहना २८६ विषय-सूची सीताको देखकर रावणकी जटायुसे रामकी भेट ३०६ कामवासना उत्पन्न होना २८६ जायुका प्राण त्यागना सीताका नखशिख वर्णन २६१ रामकी मूर्छा और मुनियोका रामसे ईष्या २६१ समझाना रावणका उन्माद २६३ रामका प्रत्युत्तर अवलोकिनी विद्यासे सहायताकी मुनिका उत्तर ३२१ याचना और उसका उत्तर २६५ रामका विलाप ३२३ सिंहनादकी मुक्तिका सुझाव २६७ कुमार लक्ष्मणकी युद्धक्रीड़ा २६E चालीसवीं सन्धि सिंहनाद सुनकर रामका युद्धमें कविकी मुनिसुव्रतनाथकी वन्दना३२३ पहुंचना २६६ युद्धका वर्णन ३२३ लक्ष्मणकी आशंका और रामको लक्ष्मणकी शूरवीरता ३२५ वापस करनेका प्रयास करना ३०१ विराषितको लक्ष्मण द्वारा सीता देवीका अपहरण और अभयदान ३२७ ३०१ लक्ष्मणकी तरफसे विराधितका जटायुका पतन युद्ध ३२६ सीता देवीका विलाप घमासानयुद्ध दशाननका विद्याधर द्वारा लक्ष्मण द्वारा खरका वध प्रतिरोध और उसका पतन ३०५ लक्ष्मण द्वारा राम और सीता सीता द्वारा रावणका प्रतिरोश ३०७ देवीकी खोज करना सीताका नगरके बाहर नन्दन लक्ष्मणका रामको शोकमग्न वनमें रह जाना। रावणका देखना ३३७ लङ्कामे प्रवेश ३०६ विराधितका रामको समझाना ३३६ उनतालीसवीं सन्धि तमलङ्कार नगरमें रामका लौटकर रामद्वारा सीताकी खोज ३०६ आश्रय लेना जटायुका सघर्ष पउमचरित खरदूषणके पुत्र सुण्डका अपनी सीताका आत्मपरिचय और मॉके कहनेसे विरत होना ३४३ हरणकी घटना बताना ३६५ जिनकी स्तुति ३४५ विभीषणका रावणको समझाना३६७ इकतालीसवीं सन्धि रावणका सीताको यानसे लङ्का चन्द्रनखाका रावणके पास घुमाना ३६६ जाना ३४५ रावणका सीताको प्रलोभन ३७१ रावणका चन्द्रनखाको सीताकी भर्सना ३७१ आश्वासन ३४७ रावणकी निराशा ३७१ मन्दोदरीका रावणको समझाना३४६ नन्दनवनका वर्णन ३७३ रावणका सीतासे अनुरोध ३५५ रावणकी कामदशाएँ ३७५ सीताका प्रति उत्तर ३५७ मन्त्रिमण्डलकी चिन्ता और रावणका आक्रोश विचार विमर्श ३७७ व्यालीसवीं सन्धि नगरकी रक्षाका प्रबन्ध ३७७ विभीषणका सीता देवीसे संवाद३६३ [२] पउमचरिउ कइराय-सयम्भुएव-किट पउम चरिउ बीअं उज्झाकण्ड २१. एकवीसमो संधि सायरवुद्धि विहीसणण परिपुच्छिउ 'जयसिरि-माणणहों। १ कह केत्तडउ कालु अचलु जउ जीविउ रजु दसा ढसाणणहाँ' ॥ [१] पभणइ सायरवुद्धि भडारउ । कुसुमाउह--सर-पसर--णिवारउ ॥ १ ॥ 'सुणु अक्खमि रहुवंसु पहाणउ । दसरहु अस्थि अउज्जहें राणउ ॥ २ ॥ तासु पुत्त होसन्ति . धुरन्धर । वासुएव-वलेएव धणुद्धर ॥३॥ तेहिं हणेवउ रक्खु, महारण । जणय-णराहिव-तणयह कारणे ॥ ४ ॥ तो सहसत्ति पलितु विहीसणु । य घय-घडऍहिँ सित्तु हुआसणु ॥ ५ ॥ 'जाम ण लङ्का-चलरि सुक्कइ । नाम ण मरणु उसासणे ढुक्इ ॥ ६ ॥ तोडमि ताम ताहुँ भय-भीस । दसरह-जणय-णरोहिव-सीस: ॥ ७ ॥ तो तं वयणु सुणवि कलियारउ । बद्धावणहँ पधाइउ णारउ ॥ ८ ॥ 'अनु विहीसणु उप्परि पुसइ । तुम्हहें विहि मि सिरइ तोडेसई' ॥ ६ ॥ घत्ता दलरह-जणय विर्णासरिय लेप्पमउ थवेप्पिणु अप्पणउ । णियई सिरई विजाहरहिँ परियणहाँ करेप्पिणु चप्पणउ ॥१०॥ .

पद्मचरित
अयोध्याकाण्ड
इक्कीसवीं सन्धि
[१] एक दिन विभीपणने सागरखुद्धि भट्टारकसे पूछा कि
"जयलक्ष्मीके प्रिय, रावणकी विजय, जीवन और राज्य, कितने
समय तक अविचल रहेगा। तब उन्होंने कहा-"सुनो, मैं बताता हूँ,
अयोध्याके रघुवंशमे दशरथ नामका मुख्य राजा होगा, उसके दो
पुत्र धुरंधर धनुर्धारी, वासुदेव और वलदेव होंगे, राजा जनककी
कन्याको लेकर, होनेवाले महायुद्धमें रावण उनके द्वारा मारा
जायगा" यह सुनकर विभीपण एकदम उत्तेजित हो उठा मानो
घीका बड़ा आगमें पड़ गया हो। उसने कहा-'लंकाकी बेल न
सूखे और रावणका मरण न हो, इसलिए क्यों न मै, भयभीपण
दशरथ और जनकके सिरोको तुड़वा दूं"। यह जानकर
कलहकारी नारद वर्धमान नगर पहुंचा! उसने दशरथ और
जनकसे कहा कि आज विभीपण आयगा और तुम दोनोके सिर
तोड़ देगा। तब, वे दोनो अपनी लेपमयी मूर्ति स्थापित करवा कर
वहाँसे चल दिये। विद्याधर आये और उन्हीं लेपमयी मूर्तियोंके
सिर काटकर ले गये ॥ १-१०॥

पउमचरिट । [२] दसरह-जणय वे वि गय तेत्तह । पुरवरु कउत्तुकमङ्गल जेत्तहें ॥ १ ॥ जेम्मइ जेत्यु अमग्गिय-लद्धउ। सूरकन्त-मणि-हुयवह-रदउ ॥२॥ जहि जलु चन्दकन्ति-णिज्मरणहिं । सुप्पइ पढिय-पुष्फ-पत्थरणेहिँ ॥३॥ जहिं णेउर-झङ्कारिय-चलणहिं । रम्मइ अञ्चण-पुप्फक्खलणहिं ॥ ४ ॥ जहिं पासाय-सिहर णिहसिजइ । तेण मियड्ड वढ्दु किसु किजइ ॥५॥ तहिं सुहमइ-गामेण पहाणड । णं सुरपुरहाँ पुरन्दर रणउ ॥ ६॥ पिहुसिरि तहो महएवि मणोहर । सुरकरि-कर कुम्मयल-पोहर ॥ ७ ॥ गन्दणु ताह टोणु उप्पज्जइ । केक्ष्य तणय काई वणिजइ ॥ ८ ॥ सयल - कला • कलाव - संपण्णी । णं पञ्चव लच्छी अवइण्णी | ६ || घत्ता ताह सयम्वर मिलिय वर हरिवाहण-हेमप्पह-पमुह । णाई समुह-महासिरिह थिय जलवाहिणि-पवाह समुह ॥१०॥ [३] तो करेणु आरहवि विणिग्गय । णं पञ्चक्र महासिरि-देवय ।। १ ।। पेक्खन्तहँ परवर - संघायहुँ । भूगोयर - विजाहर - रायहुँ ॥ २ ॥ वित्त माल इससन्दण - णामहाँ । मणहर-गइऍ रइएँ णं कामहाँ ॥३॥ तहि अवसर विल्ड हरिवाहणु । धाइड 'लेहु भणन्तु स-साहणु ।। ४ ।। 'वर आहणहाँ कण्ण उहालहों । रयणई जेम तेम महिपालहाँ ॥ ५ ॥ सुहमइ रहु-सुएण विण्णप्पइ । 'धीरउ होहि माम को चप्पई ॥६॥ मई जियन्त अणरणहाँ णन्दण। एउ भणेवि परिटिउ सन्दण ।। ७ ॥ केकइ धुरहिँ करेप्पिणु सारहि । तहिँ पयटु जहिँ सयल महारहि ॥ ६ ॥ . . ।

है।"
एकवीसमो संधि
[२] जनक और दशरथ दोनों ही वहाँसे कौतुकमंगल
नगर चले गये, उस नगरमें सूर्यकांतमणिको आगमै पका हुआ
भोजन, बिना माँगे ही खानेके लिए मिलता था और चंद्रकांत
मणियोंके झरनोंसे पानी। फूलोंसे ढके ऐसे पत्थर सोनेके
लिए मिल जाते थे जो नूपुरोंसे झंकृत चरणों और पूजाके
कुसुमोके गिरनेसे सुन्दर हो रहे थे। चन्द्रमा वहाँके प्रासादोंके
शिखरोंसे घिसकर टेढ़ा और काला हो गया था। उस
नगरका शासक शुभमति था । वैसे ही जैसे सुरपुरका
शासक इन्द्र है। उसकी सुन्दरी कुंभस्तनी पृयुश्री रानीसे दो
सन्तान उत्पन्न हुई । उनमें से कैकेयीका वर्णन किस प्रकार किया
जाय । वह सभी कलाओंके कलापसे संपूर्ण थी। वह ऐसी जान
पड़ती थी मानो साक्षात् लक्ष्मीने अवतार लिया हो | जिस प्रकार
समुद्रकी महाश्रीके सम्मुख नदियोके नाना प्रवाह आते हैं उसी
प्रकार, उसके स्वयंवरमें हुरिवाहन हेमप्रभ प्रभृति अनेक राजा
आये ॥१-१०॥] ती
[३] वह, हथिनीपर बैठकर ऐसे निकली मानो महालक्ष्मी
ही हो । नरवर-समूहों, मनुष्य, तथा विद्याधर राजाओके देखते-
देखते, उसने दशरथके गलेमें माला ऐसे डाल दी, मानो कमनीय
गतिवाली रतिने ही कामदेवके गलेमें माला डाल दी हो। उस अवसर
पर हरिवाहन विगड़ उठा, 'पृकड़ो' यह कहकर, वह सेना सहित
दौड़ा । वह फिर वोला, "इस राजासे कन्या वैसे ही छीन ले
जैसे सर्पसे मणि छीन लिया जाता है ।" तब दशरथने अपने
ससुर शुभमतिको धीरज बॅधाते हुए कहा, "आप ढाढ़स रक्खे ।
अगरणके पुत्र मेरे जीतेजी, कोन इसे चॉप सकता है।" वह
रथ पर चढ़ गया और कैकेयो धुरा पर सारथि बनकर जा
बैठो। वह महारथियोके वीच गया। उसने अपनी नई पत्नीसे

६ पउमचरित الم घत्ता तो वोल्लिनइ दसरहेण 'दूरयर-णिवारिय-रवियरई । रहु वाहवि तहिँ णेहि पियएँ धन-वृत्तई जेन्यु गिरन्तर ।। [2] तं णिसुणवि परिओसिय-जणएं । वाहिड म्हवर पिहुसिरि-तणएं ।।। तेण वि सरहिं परजित साहणु । भन्गु स-हेमप्पहु हरिवाहणु ।। २ ।। परिणिय रेवड़ दिण्णु महा-वर । चवई अस्मापुर - परमेसत॥३॥ 'सुन्दरि मगु मग्गु जं चई' । सुहमइ-सुयएँ णवेप्पिणु वुच्चइ ।। ४ ।। 'दिण्णु देव पईं मग्गमि जइयहुँ । णियय-सच्चु पालिजइ तझ्यहुँ ॥५॥ एम चबन्तई धण-कण-संकुले । थियई वे वि पुर कउनुक्मइले ॥६॥ बहु - वाहिं अरस्म इट्टई । सइ-वासर्व इव रजे वइगुइँ ॥ ७ ॥ सयल-क्ला- कला-संपण्णा । ताम चयारि पुत्त उप्पण्णा ॥८॥ घत्ता . --- रामबन्दु अपरजियह सौमित्ति सुमित्तिहँ एक्कु जणु । भरहु धुरन्धरु केकइहे मुप्पहहें पुत्तु पुणु सत्तुहणु ॥ ६ ॥ [५] 'एय चयारि पुत्त तहाँ रायहाँ । णाई महा- समुह महि-भायहाँ ॥ ३ ॥ णाई दन्त गिब्याण - गइन्दहाँ। णाई मणोरह सजण-विन्दहाँ ॥२॥ जणड वि मिहिला-णयर पइट्टउ । समर विदेहएँ रज णिविट्टङ ॥३॥ ताह विहि मि वर-विक्कम-चीयर । भामण्डलु उप्पण्णु स-सीयर ॥१॥ पुद-बइर संभरवि अव । दाहिण सेटि हरवि णिउ देव ॥५॥ तहिं रहणेउरचकवाल - पुर । वहल-धेवल छुह - पापण्डर ॥६॥ चन्द्रगइह बन्दुजल - दयणहाँ । णन्दणवण-समात्र तहाँ स्यणहाँ ॥ ७॥ घत्तिर पिङ्गलंग अमरिन्द । पुष्फबइहें अलविउ गरिन् ॥८॥ ।

एकवीसमो संधि " . कहा "प्रिये रथ हाँककर वहाँ ले चलो जहाँ अपने तेजसे सूरजको हटानेवाले अनेक छत्र और ध्वज हैं" ॥१-२॥ [४] यह सुनकर, जनोंको संतुष्ट करने वाली कैकेयीने रथ हॉका । तव दशरथने भी वाणोंसे शत्रु सेनाको रोककर हेमप्रभु और हरिवाहनको भग्न' कर दिया । कैकेयीसे विवाह हो चुकनेपर दशरथने उसे दो महा वर दिये। अयोध्याके अधिपति दशरथने उससे कहा "सुन्दरी मॉगों माँगो, जो भी अच्छा लगता हो।" तव शुभमतिकी कन्या कैकेयीने माथा झुकाकर कहा, "देव, जव मै माँगू तव दे देना। तव तक अपने सत्यका पालन करते रहिए।" ऐसा कह सुनकर वे दोनों कुछ दिनों तक धन- धान्यसे व्याप्त कौतुकमंगल नगरमें रहे । फिर बहुत समयके वाद उन्होंने अयोध्या नगरीमे प्रवेश किया। वे दोनो इन्द्र और शचीकी तरह राजगद्दी पर बैठे । दशरथ राजाके सकल कलाओसे संपूर्ण चार पुत्र उत्पन्न हुए, सबसे बड़ी कौशल्यासे रामचन्द्र, सुमित्रासे लक्ष्मण, कैकेयीसे धुरन्धर भरत, और सुप्रभासे शत्रुघ्न उत्पन्न एक पुत्र हुआ ॥ १-६॥ [५] राजा दशरथके वे चार पुत्र मानो भूमण्डलके लिए चार महासमुद्र, ऐरावत हाथीके दॉत या सज्जनोके मनोरथोंके समान थे । जनक भी मिथिलापुरीमें जाकर विदेहका राज्य करने लगे। उनके भी दूसरे विक्रमकी तरह भामंडल, तथा सीता देवी उत्पन्न हुई। परन्तु भामंडलको, पिछले जन्मके वैरका स्मरणकर पिंगल देव उसे हरकर विजया पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमे ले गया, और उसने उसे, स्वच्छ सुधा चूर्णसे सफेद रतनू पुरचक्रवाल- पुरमे चन्द्रमुख और चन्द्रगति नामके विद्याधरोके उपवनके समीप डाल दिया। विद्याधरने उठाकर उसे अपनी पत्नी पुष्पावतीको

पउमचरित
.
114
पत्ता
ताव रज्जु जणयहाँ तणउ उद्धु महाडइ-वासिऍहि ।
वन्चर-सवर-पुलिन्दऍहिं हिमवन्त-विन्म-संचासिऍहि ॥ १।।
[६]
, वेढिय जणय-कणय दुप्पेच्छहिँ । वन्वर-सवर-पुलिन्दा - मेच्छहि ॥ १ ॥
गरुयासङ्घऍ, वाल - सहायहाँ । लेहु विसजिउ,दसरह-रायहाँ ॥२॥
तुर देवि सो वि सण्णज्झइ । रामु स-लक्खणु ताव विरुज्झई ॥३॥
'मई जीयन्त ताय तुहुँ चलहि । हणमि वहरि छुड हत्थुत्थल्लहि' ॥ ४ ॥
वुत्तु णराहिवेण 'तुहुँ वालउ । रम्भी-खम्भ - गम्भ-सोमालउ ॥५॥
किह ऑलग्गहि णरवर-विन्दहुँ । किह घड भाहि मत्त-गइन्दहुँ ।। ६ ।।
किह रिउनहह महारहु चोयहि । किह वर-तुरय तुरङ्गहुँ ढोयहि ॥ ७ ॥
पभणइ रामु 'ताय पल्लहि । हउँ ज पहुचमि काइँ पयहि ॥ ८ ॥
-
।
30
ग
घत्ता
2
कि तुम हणइ ण वालु रवि कि वाल दवग्गि ण डहइ वणु ।
किं करि दलइ ण वालु हरि किं वालु ण डङ्कइ उरगमणु ॥६॥
[७]
पहु पल्लटु पयदिउ
राहउ । दूरासघिय - मेच्छ - महाहउ ॥१॥
दूसहु सो जि अण्णु पुणु लक्खणु । एक्कु पवणु अण्णेच्छु हुआसणु ॥ २ ॥
विणि मि मिडिय पुलिन्द्रहों साहणे । रहवर - तुरय-जोह-गय-चाहणे ॥३॥
दीहर - सरहिं वइरि संताविय । जणय-कणय रण उवेढाविय ॥ ४ ॥
धाइड समरगण तमु राणउ । ववर-सवर-पुलिन्द - पहाणड ॥५॥
तेण कुमारहाँ चूरिउ रहवर । छिण्णु छत्तु दोहाइउ धणुहरु ॥ ६ ॥

8 एकवीसमो संधि दे दिया। ठीक इसी समय, महाअटवी हिमवन्त, और विन्ध्या- चलमें रहनेवाले वर्बर शवर, पुलिंद और म्लेच्छोंने राजा जनकके राज्यको छीनना शुरू कर दिया ॥ १६ ॥ [६] वर्वर शवर, पुलिंद और म्लेच्छोंसे अपनी सेना घिर जानेपर राजा जनकने बहुत भारी आशंकासे बालकोकी सहायताके लिए राजा दशरथके पास लेखपत्र भेजा । उस पत्रसे यह जानकर राजा दशरथ स्वयं जानेकी तैयारी करने लगे। तव इसपर राम और लक्ष्मणने आपत्ति प्रकट की । रामने कहा, "मेरे जीवित रहते हुए आप जा रहे है। आप तो केवल यह आदेश दें कि मैं शीघ्र शत्रुका संहार करूँ।" इसपर राजाने कहा, “तुम अभी बच्चे हो, केलेके गाभकी तरह अत्यन्त सुकुमार तुम बड़े-बड़े राज- समूहोंसे कैसे लड़ोगे ? हाथियोकी घटा कैसे विदीर्ण करोगे ? महारथसे शत्रुओंके रथको कैसे प्रेरित करोगे ? अपने उत्तम अश्चोंसे अश्वांके निकट कैसे पहुँचोगे ?" तब रामने कहा-"तात, आप लौट जाइये, हम लोग ही काफी है, आप क्यों प्रवृत्ति कर रहे हैं। क्या बालरवि अन्धकार नष्ट नहीं करता ? क्या छोटी दावाग्नि जंगल नहीं जला देती ? क्या साँपका बच्चा नहीं काटता?"||१-६॥ [७] तब दशरथ घर लौट आये। और राघव दूरसे ही म्लेच्छोके महायुद्धकी सूचना पाकर चल पड़े। उनके साथ दूसरा केवल दुःसह लक्ष्मण था, मानो एक पवन था तो दूसरा आग । वे दोनों श्रेष्ट रथ, अश्व, योधा और गजवाहनों सहित म्लेच्छोंसे लड़े। अपने लम्बे वाणोकी मारसे शत्रु-सेनाको नन्त्ररत कर उन्होंने मीताका उद्धार किया। तब शवर और पुलिन्दीका प्रधानतम नामका गजा युद्धमें आया। उसने कुमारके रथको नष्ट कर दिया, और छत्र छिन्न-भिन्न । धनुपके दो टुकड़कर दिये । तब रामने नान ?

पउमचरिउ तो राहवेण लइज्जइ वाहिँ । णाइणि-णाय- काय-परिमाणहिँ ॥ ७ ॥ साहणु भग्गउ लग्गु उमगहिँ । करयहिँ ओलम्विय-खग्गहि ॥ ८ ॥ शु घत्ता हो युर में 7 itin - १ जणय-तणय अमरिस-कुद्धद्धाइय दसहि तुरङ्गहिं णोसरिउ भिल्लाहिउ भजवि आहवहाँ। जाणइ जणय-णराहिवण तहिं काले वि अप्पिय राहवहाँ ॥६॥ ८] मो. mint वञ्चर - सवर - वरूहिणि भग्गी । जणयहाँ जाय पिहिवि आवग्गा ॥ १ ॥ णाणा - रयणाहरणहिँ पुजिय । वासुएव - वलएवं विसज्जिय ॥ २ ॥ 'सीयह देह रिद्धि पावन्तिह । एक्कु दिवसु दप्पणु जोयन्तिहें ॥ ३ ॥ पडिमा- छलण महा-भय-गारउ । आरिस-वेसु णिहालिउ गारउ ॥४॥ सहसत्ति पट्ठी। सीहागमण कुरभि व तट्ठी ॥ ५॥ 'हा हा माएँ' भणन्तिहि सहियहिँ । कलयल किउसझस-गह-गहियहि ।। किङ्कर । उक्खय-वर-करवाल-भयङ्कर ॥ ७ ।। मिलेवि तेहिं कह कह विगमारिउ। लेवि अद्ध चन्दहिं णीसारिउ ।। ८ ॥ 24 घत्ता गउ स-पराहउ देवरिसि पडे पडिम लिहवि सीयह तणिय । दरिसाविय भामण्डलहाँ विस-जुत्ति णाई णर-धारणिय ॥ ६ ॥ [] दिछ जं जे प. पडिम कुमारे । पञ्चहिँ सरहिं बिद्ध ण मारे ॥ ५ ॥ सुसिय-वयेणु घुम्मइय-णिडालउ । वलिय-अङ्गु मोडिय-भुव-डालउ ॥ २ ॥ पक्खोडिय -वच्छ । नरिसात्रिय-दस-कामावत्थड ॥३॥ चिन्त पढम-थाणन्तर लग्गइ । वीयएँ पिय-मुह-दसणु मग्गइ ॥ ४ ॥ तइयएँ ससइ दीह-णीसास । कणइ चटत्थर जर-विण्णास ॥५॥ ९.NCE वद्ध-केसु एकवीसमो संधि [ और नागिनीके आकारके वाणोंसे उसका सामना किया। तब उसकी सेना, तलवार झुकाये हुए इधर-उधर भागने लगी। युद्धमें आहत होकर भिल्लराज दशों ही घोड़ोंसे किसी तरह भाग निकला। तब जनकने उसी समय रामके लिए जानकी अर्पित कर दी ॥ १-४॥ ८] वर्वर शवराकी सेना नष्ट होने पर जनककी घरा स्वतन्न हो गई। उन्होंने रामलक्ष्मण (बलभद्र और वासुदेव) का तरह-तरहके आभरणों और रत्नोंसे आदर-सत्कारकर उन्हें विदा किया लेकिन इस समय तक सीता देवीकी देह-ऋद्धि (यौवन) विक- सित हो चुकी थी । तब एक दिन दर्पण देखते हुए उसने (दर्पणकी) परछाईमें महाभयंकर नारदको ऋपिवेपमें देखा । वह तुरन्त ही उसी तरह मूर्छित हो गई जिस तरह कुरंगी सिंहके आनेपर भीत हो जाती है । आशंकाके ग्रहसे अभिभूत सहेलियोंने "हाय माँ, हाय मॉ" कहते हुए कोलाहल किया । ( उसे सुनकर) अनुचर असर्प और क्रोधसे भरकर तलवार उठाये हुए दौड़े। नारदको पाकर मारा तो नहीं परन्तु तो भी गर्दनिया देकर बाहर निकाल दिया। अपमानित होकर देवर्षि चले गये। उन्होंने तव, पटपर सीताका चित्र अंकित किया । और जाकर, विपयुक्तिकी भाँति उस प्रतिमा को भामंडल के लिए 'गृहपत्नी के रूपमे दिखाया ॥१-६॥ [६] कुमार भी उस चित्र प्रतिमाको देखकर कामदेवके पंच- वाणासे आहत हो गया। उसका मुख सूखने लगा। मस्तक घूमने लगा । अंग-अंगमे जलन होने लगी । भुजा रूपी डाले मुड़ने लगी। बाल ध हुए होने पर भी वक्षस्थल खुला हुआ था। कामको दशो दिशाएं इस प्रकार साफ प्रकट होने लगी-पहली अवस्थाम चिना. तो दुनरी अवस्थामे प्रियको देखनेको अभिलापा हो रही थी। तीसरीमें लम्बी सांसे खीचना और चौथीम ज्वरका आ

पटनयन्ति
पशम , , 7 गुन । गुमशः ॥ ६ ॥
गोमा नाम Pari अगे गगशुमार ETE ||॥
पमं
मामा गरम 1ि नुप: ।। ||
मना
ri पारित कि 'पर डार र पुन नउ ।
काम, मोसमी गामारय ग
पागड ॥३॥
[10]
भाग - परामर - कुकी गाड गमगा परिपुति जाग्ट ॥ 1 ॥
'विगगिया I मा पुगी प्रिया पट्टी ॥२॥
ক্ষক সামি 'নিমিত্ত। এত মজা ঘাস
मा मुट गर म दिए । गारयणु निलोय-टिड ॥ ४ ॥
मट माग, आयनो पिE पुरन्दर नायही ॥४॥
नं शिमगेत्रि विकार •णा' । पेमिट सावट अमगा ॥ !
'जाति विना विउ । म विवाह-संबन्धु करेबर' ॥ ७ ॥
गउ सो चन्मगा मुटु जोवि । सन्दुर पु नुरगामु जोगवि ॥ ८॥
कौटुं पटिट गराहिर जा । दाणि मेडि पराइउ नाहिं ॥ ६ ॥
मिहिला-गाए मुप्पिणु जिगनारें। चालोउ पडसइ पुर मगर रे ॥ १० ॥
।
.
.
।
घत्ता
माणिउ जणय-णराष्ट्विड णिय-णाहो अस्विष्ठ स-रहमण ।
चन्दणहत्तिण सो वि गड सहुँ पुतं विरह-परप्वमण ॥११॥

एकवीसमो संधि जाना। पॉचवीमें जलनका अंगोंको नहीं छोड़ना, छठीमें मुंहमें कोई भी चीज अच्छी नहीं लगना, सातवीमें एक कौर भी भोजन नहीं करना । आठवींमें चलना और जम्हाई लेना बंद हो जाना। नवीमें प्राणोंमें संदेह होने लगना और दशवीमें मृत्युका किसी भी तरह नहीं चूकना ॥१-८॥ उसकी यह हालत देखकर, अनुचरोंने जाकर राजासे कहा "देव, अब आपके पुत्रका जीवित रहना कठिन है। किसी लड़कीके (प्रेममें) वह कामकी दसवीं अवस्थाको पहुँच गया है" [१०] जव विद्याधर चन्द्रगतिने, “नाग नर और अमर- कुलोंमें कलह करनेवाले नारदजीसे पूछा, “कहिए आपने कहीं कोई ऐसी भी कन्या देखी है जो मेरे पुत्रके हृदयमे बस सकती है।" यह सुनकर महर्पि बोले-"मिथिलामें चन्द्रकेतु नामका राजा हुआ था। उसके पुत्र जनककी कन्या सीता तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ है। वही इस कुमारके योग्य है अतः पुरंदरराज जनकसे उसका अपहरण कर लाओ।" यह सुनकर, विद्याधरस्वामी चंद्रगतिने, अकुंठित-गतिवाले चपलवेग नामके विद्याधरसे कहा-"जाओ, विदेहराज जनकको हरकर ले आओ, मुझे उससे विवाह-सम्बन्ध करना है।" वह भी चन्द्रगतिका मुंह देखकर चला गया,और घोड़ा वनकर राजा जनकके भवनमें पहुंचा । राजा जनक कौतुकसे जैसे ही उस घोड़े पर चढ़ा, वैसे ही वह दक्षिण श्रेणीमे पहुंच गया। विद्याधर मिथिला-नरेश जनकको जिन-मंदिरमें छोड़कर, अपने सुन्दर नगरमें प्रविष्ट हुआ, और अपने स्वामौके पास जाकर कहा, "मै राजा जनकको ले आया हूँ।" यह सुनते ही, विरह- परवश अपने पुत्रके साथ चंद्रगति जिन मंदिरमें, वंदना भक्तिके लिए गया।॥ १-११॥ .

परमचरित
.
[११]
विज्ञाहर - णर - णयशाणन्दहिँ । टि नभासणुविहि मिरिन्दहि ॥३॥
पभणइ चन्द्रगमणु तोसिय-मणु । विष्णि वि किण्ण करहुँ सयणतणु ॥२॥
दुहिय तुहारी पुच महारउ । होर विवाहु मणोरहनारिउ' ॥ ३ ॥
अमरिसु णवर पहिर जणयहाँ । 'विष्ण कृण्ण मई इसरह-तणयहाँ ॥ll
रामहाँ जयलिरि-रामासत्तहाँ । सबर: वहिणि चूरिय-गत्तहों ॥ ५ ॥
तहिं अवसर पहिय-अहिमाण।
बन्दपल्याण ॥
'ऋहिँ विनाहरु कहिँ भूगोयत -मस्य? बट्टारड अन्तर ॥ ७ ॥
माणुस-रेत जे ताम ऋणिहट । जीविउ तहिँ अहि तणर विसि ||
गरिन्छ
घत्ता
नणइ णराहिउ 'कैत्तिएण जगे माणुस-वेतु ज अगलउ ।
जलु पासिट तिन्यङ्करहिं सिद्धत्तणु लहर केवल ।।
[२]
में णितुणवि भामण्डल-अप्पं । बुचड़ बिना-बल-माहप्पं ॥१॥
'पगुण-गुणई बाइ-दुनय-भाइँ । पुर अञ्छन्ति पुन्थु वे बावई ।। २ ।।
वभावत्त- समुहावत्तई 1 क्वारक्खिय-पक्खिय-गत्तई ॥३॥
किं भामण्डलेण कि राम । ताई बडाबइ जो आयामें || ४ ॥
परिणउ सो कण ऍट पणि । तं जिपमाणु करवि पहु भणियट !!!
गय स-सरासणु मिहिला-पुरवरु । बट मञ्च आटत्तु सयम्बरु ।। ६ ॥
मिलिय णराहिब जे लग जाणिय। सयल वि वणु-पयाव-अवमाणिय ॥७॥
को वि जाहिँ जो ताईं बाबइ । जश्व-सहालहुँ मुहु दरिसावइ ।। ६ ॥
घत्ता
--
जाम ण गुणहिँ बडन्ताई महिनायई कड सुह-लंसण. ।
अवलं जणहाँ मणिहाई कुकलत्तई जेम नरालाई ॥६॥

एकवीसमो संधि हुए भी, गुण (प्रत्यंचा और 'अच्छे गुण) पर नहीं चढ़ रहे थे, इसलिए अवश्य वे लोगोंको अनिष्टकर थे।॥ १-६ ।। [१३] सब राजाओंके पराजित होनेपर वलभद्र और वासुदेव सीताके स्वयंवर-मंडपमें पहुंचे । तव लाखो राजाओंको दूरसे ही हटानेवाले रक्षक यक्षोंने दोनों धनुप बताते हुए उनसे कहा, "लीजिये, अपने-अपने प्रमाणके अनुरूप इनमेंसे एक-एक चुन लें। उन्होने समुद्रावर्त और वज्रावर्त धनुप हाथमें लेकर मामूली धनुपोकी भाँति, उनपर डोरी चढ़ा दी, तब देववृंदने फूलोंकी वर्षा की । राम-सीताका विवाह हो गया, जो राजा स्वयंवरमे आये थे वे उदास होकर अपने-अपने नगर चले गये । दिन-चार-नक्षत्र गिन लगनके योग्य ग्रहोको देखकर, ज्योतिपियाने भविप्यवाणी की, "इस कन्याके कारण वहुतसे राक्षसोका विनाश होगा" ॥१-६।। [१४] शशिवर्द्धन नामक राजाकी अठारह लड़कियाँ थी। सभी चन्द्रमुखी कमलदलकी तरह आयत नेत्रवाली, कोयल और वीणाकी तरह सुन्दर स्वरवाली थी। उसने उनमेसे दस रामके छोटे भाइयो (भरत और शत्रुघ्न ) को तथा शेप आठ लक्ष्मणको विवाह दो । द्रोणने भी अपनी सुन्दर कन्या लक्ष्मणको विवाह दी । वैदेहीके अयोध्या आनेपर राजा दशरथने धूमधामसे उत्सव किया। त्रिपथ चतुष्पथ और कथा-स्थान केशर और कपूर-धूलिसे पूरित थे। चन्दनका छिड़काव हो रहा था । तरह-तरह के गायन और गीत गाये जा रहे थे। देहली मणियोसे रचित थी, और मोतियोके दानोंसे 'रंगावली' वनाई जा रही थी । सुवर्ण और मणियोसे वने, देवताओका भी मन चुराने- वाले तोरण वॉधे जा रहे थे । सीता और रामके (गृह) प्रवेशपर लोगोने जयजयकार किया। वे दोनों भी, साकेतमे अविचल रति सुखका आनन्द लेते हुए रहने लगे॥१-१०॥ २ [२२. वावसमो संधि] कोसलणन्द्रणण स-कलत्त णिय-धरु भाएं। आसाहमिहिँ किउ ण्हवणु जिणिन्दहाँ राए । नि [१]. ५ : पदृविचई सुर-समर-सहासहिं दुम्महेण । किड ण्हवणु जिणिन्दहाँ दसरहेण ॥५॥ जिण-तणु-धोवयाई। देविहिं दिव्वई गन्धोदयाई ॥२॥ सुप्पहह णवर कञ्चइ ण पत्तु । पहु पभणइ रहसुच्छलिय-गत्तु ॥ ३ ॥ 'कह काई णियम्विणि मणे विसण । चिर-चित्तिय भित्तिव थिय विवण्ण पक्षा पणवेप्पिणु वुच्चइ सुप्पहाएँ । 'किर काई महु तणियऍ कहा ॥५॥ जइ हउँ जे पाणवलहिये । तो गन्ध-सलिलु पावइ ण केम' ॥६॥ तहिँ अवसर कञ्चुइ ढुक्कु पासु । इण-समि व णिरन्तर-धवलियासु ॥ ७॥ गय-दन्तु अयंगम (१) दण्ड-पाणि । अणियच्छिय-पहु पश्यलिय-त्राणि Rajiv घत्ता गरहिउ इसरहण 'पई कजुइ काई चिराविट। जलु जिण-वयणु जिह, सुप्पहह दवत्ति ण पाविउ' ।। ।। [२] पणवेप्पिणु तेण वि वृत्तु एम । 'गय दियहा जोवणुल्हमिट देव ।। ३।। पढमाउसु जर धवलन्ति आय । णु असइवमीम-बलग जाय ॥२॥ गड़ नुटिय विडिय मन्धियन्ध । न मुगन्ति मगलोयण गिरन्य ॥ ३ ॥ लित सम्पद मुढे पसलद वार । नय दन्त सरीरहों जहदाय ॥ ४ ॥ परिगलिड रहिरु थिटणवर चन्मु । महु पल्धु जेट णं अबरु जग्मु ।।२।।

वाईसवीं संधि अपने घर आकर, कौशल्यानन्दन रामने सपत्नीक, आषाढ़की अष्टमीके दिन जिनेन्द्रका अभिषेक किया । [१] हजारो देवयुद्धोमें अजेय राजा दशरथने भी जिनका अभिषेक किया, उन्होंने जिन-प्रतिमाके प्रक्षालनका दिव्य गंधोदक रानियोंके पास भेजा । परन्तु बूढ़ा कंचुकी रानी सुप्रभाके पास उसे नहीं ले गया । इतने में राजा दशरथ रानीके पास पहुंचे, और उसे (दीनमुद्रामें) देख, हर्षसे गद्गद स्वरमें वोले "हे नितम्बिनी, तुम खिन्नमन क्यों हो ? चिर चित्रित दीवालकी तरह तुम्हारा मुँह फीका क्या हो रहा है। इसपर प्रणाम करके रानी सुप्रभा बोली-"देव मेरी कहानीको सुननेसे क्या, यदि मैं भी औरोंकी तरह प्रिय होती तो गंधोदक मुझे भी मिलता । ठीक इसी समय कंचुकी उसके पास आया। चेहरा पूर्ण चन्द्रकी तरह एकदम सफेद, दाँत लम्वे, हाथमे दण्ड, वोली लड़खड़ाती हुई, राजाको भी देखनेमें असमर्थ । देखते ही राजाने उसे खूब डाँटा, कंचुकी तुमने इतनी देर क्यों की, जिससे जिन-वचनकी तरह ही पवित्र गंधोदक रानीको शीघ्र नहीं मिल सका ।।१-६॥ [२] तव प्रणाम करके कंचुकीने निवेदन किया, “महाराज, मेरे दिन अब चले गये, मेरा यौवन ढल चुका है। पहलेकी अवस्थापर सफेदी पोतती हुई यह जरा आ रही है। और दुरा- चारिणी स्त्रीकी तरह जबर्दस्ती मेरे सिरसे लग रही है, मेरी गति टूट चुकी है, हड्डियोके जोड़ ढीले पड़ गये है, कान सुनते नहीं, आँखे देखती नही (अन्धी हो चुकी हैं ), सिर कांप रहा है और बोली मुंहमें ही लड़खड़ा जाती है, दॉत भी चले गये और शरीरकी कांति भी क्षीण हो गई। खून सव गल गया है, केवल पटमचरित गिरि-गइ-पवाह ण वहन्ति पाय । गन्धोवड पावउ म राय ॥६॥ font- वयणेण तेण किउ पहु-वियप्पु । गउ परम-विसायहाँ राम-वप्पु ॥ ७ ॥ चंञ्चसउलु, जीविउ कवणु सोकावु। त किजइ सिजइ जेण मोक्खु ॥८॥ घत्ता सहु महु-विन्दु-समु दुहु मेरु-सरिसु पवियम्भइ । वरि त कम्मु हिट जं पउ अजरामरु लमइ ॥ ६ ॥ 5...[३] के दिवसु वि होसइ आरिसाहुं । कञ्चइ-अवस्थ अम्हारिसाहुं ॥१॥ को हउँका महि कहाँ तणउ दन्छ । सिंहासणु छत्तई अथिरु सब्बु ॥२॥ जोवणु सरीरु जीविउ धिगत्थु । संसार असार अणत्थु अत्थु ॥३॥ विसु विसय वन्धु, दिठ-वन्धणाई । घर-दारई परिहव-कारणाई ॥en सुय सत्तु "विढत्तउ अवहरन्ति । जर-मरणहँ किङ्कर किं करन्ति ॥५॥ ., जीवाउ वाउ हय हय वराय । सन्दण सन्दण गय गय जे णाय ॥६॥ तणु तणु जे खणखें खयहाँ जाइ । धणु धणु जि गुणेण वि वड्डु थाइ॥७॥ दुहिया वि दुहिय माया वि माय । सम-भाउ लेन्ति किर लेण भाय ॥८॥ धत्ता ३. १ आयई अवरइ मि सव्वई राहवहाँ समप्पवि। अप्पुणु तउ करमि' थिउ दसरहु एम वियप्पवि ॥६॥ [४] तहिं अवसर आइउ सवण-सड । पर-समयसमीरण-गिरि-अलड्डु ॥१॥ दुम्महमह चम्मह-महण-लील । भय-भगुर भुअणुदरण-लोलु ॥२॥ सोअहि-विसम-विसय-विस-चेय-समणु। खम-दम-णिसेणि-किय-मोक्ख-गमणु।३। - गो बावीसमो संधि २१ चमड़ी ही चमड़ी है यहाँ मै ऐसा ही हूँ जैसे दूसरा जन्म हो । अब पहाड़ी नदीके वेगकी तरह मेरे पैर सरपट नहीं चलते, अब आप ही बताइए देव ! गंधोदक सभीको कैसे मिलता ॥१-६।। कंचुकीके वचन सुनकर राजा दशरथने जब उनपर विचार किया तो वह गहरे विपादमें पड़ गये। उन्हें लगा-सचमुच जीवन अस्थिर है, कौन सा सुख है इसमे। इसलिए मुझे वह काम करना चाहिए जिसमें मोक्ष सध सके" (दुनियामें) सुख मधुकी बूंदकी तरह है और दुख मेरु पर्वतकी तरह फैल जाता है । अतः वही कर्म करना ठीक है जिससे मोक्षकी सिद्धि हो ||७-६॥ [३] किसी दिन मेरी भी, इस बूढ़े कंचुकीकी तरह हालत हो जायगी, कौन मैं ? किसकी यह धरती ? किसका धन ? छत्र और सिहासन ? सभी कुछ अस्थिर है, यौवन शरीर और जीवनको धिक्कार है। संसार असार है और धन अनर्थकर है। विपय विप है, और वंधुजन बढ़वन्धन । घरको स्त्रिया अपमानकी कारण है। पुत्र केवल विन्न करनेवाले शत्रु है, बुढ़ापे और मौतमे ये नौकर चाकर क्या करते है, जीवकी आयु वायु है, हय भी वेचारे हत हो जाते है। रथ खण्डित हो जाते है। और गज भी रोगको जानते है। तन तृणकी तरह है जो आधे पलमे ही नष्ट हो जाता है। धन धनुपकी तरह है जो गुण (डोरी) से भी टेढ़ा होता है। दुहिता दुष्ट हृदय ही होती है। माताको माया ही समझो । समभाग (धनका) वॅटानेवाले होनेसे भाई भाई है। यह, और जो भी है वह सब 'राम' को अर्पितकर मै तप करूँगा" राजा दशरथने यह विकल्प अपने मनमें स्थिर कर लिया ॥१-६।। [४] ठीक इसी समय एक श्रमणसंघ वहाँ आया। जो परमत- रूपी पवनके लिए अलंध्य पर्वत, दुर्दम कामदेवको मथनेवाला, भयभीत जनोका उद्धारक, विपयरूपी सॉपके विपका शमन

पउमवरिउ
पता
२२
Mad
तवसिरि-वररामालिङ्गियी । कलि-कलुस-सलिल सोसण-पयड्ड॥४॥
तित्यङ्कर-चरणम्बुरुह-भमरु । किय-मोह-महासुर-णयर-डमरु ॥ ५ ॥
तहिँ सञ्चभूइ णामेण साहु । जाणिय-ससार-समुह-थाहु
॥६॥
मगहाहिउ विसय-विरत्त-देहु । अवहल्थिय-पुत्त-कलत्त-णेहु ॥ ७ ॥
गिधाण-महागिरि धारिमाएँ । रयणायर-गुरु गम्भीरिमाएँ ॥८॥
घत्ता
रिसि-सङ्घाहिबइ सो आउ अउझ भडारउ ।
'सिनपुरि-गमणु करि' दसरहहों णाई हकारट mil
[५]
"पडिवण्णएँ तहिं तेत्तडएँ काले । तो पुरै रहणेउरचक्कवाल ॥१॥
भामण्डलु मण्डलु परिहरन्तु । अच्छा रिसि सिद्धि व सभरन्तु ॥२॥
वइदेहि-विरह-वेयण सहन्तु । दस कामावत्थउ ढक्खवन्तु ॥३॥
पिडिहन्ति ण विजाहर-तियाउ । णउ णाण-खाण-भोयण-कियाउ ॥४॥
ण जलह ण चन्दण कमल-सेज । ढुक्कन्ति जन्ति अण्णोण्ण वेज ॥५॥
वाहिजइ विरहें दूसहेण । णउ फिटइ केण वि ओसहेण ॥६॥
णीसासु सुएप्पिणु दीहु दीहु । पुणरवि थिउ थक्कवि जेम सीहु ॥७॥
'भूगोयरि भुञ्जमि मण्ड लेवि' । णीसरिउ स-साहणु सण्णहेवि ॥८॥
.
घत्ता
६
पून
--
पत्तु वियड्ड-पुरु तं गिऍवि जाउ जाईसरु ।
'अण्णहिं भव-गहण हउँ होन्तु एत्थु रज्जेसर ॥ ६ ॥
[६]
मुच्छाविउ तं पेक्खवि पएसु । सभरवि भवन्तर जिरवसेसु ॥ १ ॥
सम्भावे पभणित तेण ताउ । 'कुण्डलमण्डिङ णांमेण राउ ॥२॥

No text on this page.

२४ maenel पउमचरित न हउँ होन्तु एत्थु अखलिय-मरटु । पिङ्गलु णामेण कुवेर-भटु ॥३॥३॥ ससिकेउ-दुहिय अवहरवि आउ । परिवसइ कुडीरऍ किर वराउ ॥ ४ ॥ लिइहालिउ मई तहाँ त कलत्त । सो वि मरवि सुरत्तणुहि मि पत्त ॥५।। मुउ हउ मि विदेहह देह आउ । जिउ देव जाणइ-जमल-जाउ ॥६॥ वर्ण घत्ति कण्टेण वि ण भिण्णु । पुप्फवइह पइँ सायरण दिण्णु ॥ ७ ॥ 14 (. घत्ता वद्धिउ तुम्ह घर जणु सयलु वि ऍउ परियाणइ । जणउ जणेरु महु मायरि विदेह सस जाणई' ॥ ८ ॥ 1. [७] वित्तन्तु कहेप्पिणु गिरवसेसु । गउ वन्दणहत्तिएँ त पएसु ॥ १॥ जहिँ वसइ महारिसि सच्चभूइ । जहिँ जिणवर-ण्हवण-महाविभूइ ॥२॥ वइरग्ग-कालु जहिं दसरहासु । जहिं सीय-राम-लक्खण-विलासु ॥३॥ सत्तुहण-भरह जहिं मिलिय वे वि । गउ तहिं भामण्डलु जणणु लेवि ॥ ४ ॥ आ41 int जिणु वन्दिउ मोक्ख-चलग्ग-जङ्घ । पुणु गुरु-परिवाडिएँ सवण-सड्धु॥५॥ पुणु किउ संभासणु समउतेहिं । सत्तुहण-भरह-वल-लक्खणेहिँ ॥६॥ जाणाविउ सीयह भाइ जेम । जिह हरि-वलं-साला सावलेच ॥ ७ ॥ सुउ परम-धम्मु सुह-भायणेण । तवचरणु लय चन्द्रायणेण ॥ ८ ॥ घत्ता दसरहु अण्ण-दिण किर रामहाँ रज्जु समप्पइ । केकय ताव मण उण्हालए धरणि व तप्पा

No text on this page.

पउमचरिउ و ۱۳ - میرا [८] गरिन्दस्स सोऊण पव्वज्ज-यज । स-समाहिरामस्स रामस्स रज ।। १ ।। ससा दोणरायस्य भग्गाणुराया । तुलाकोडि-कन्ती-लयालिद्ध-पाया ॥ २ ॥ स-पालम्ब-कञ्ची-पहा-भिण्ण-गुज्झा । थणुत्तुग-भारेण जा णित्त-मॅज्झा ॥३|| णवासीय-वच्छच्छयाछाय-पाणी । वरीलाविणी-कोइलालाबू-धाणी ॥ ४ ॥ और 12.1 जिस महा-मोरपिच्छोह-संकास-केसा । अणगस्ल भल्ली व पच्छण-वेसा ॥५॥ गया केल्या जत्थ अत्थाण-मग्गो । णरिन्दो सुरिन्दो व पीढ वलग्गो ॥६॥ वरो मग्गिो 'णाह सो एस कालो । मह णन्द्रणो ठाउ रजाणुपालो ॥७॥ पिए होउ एवं तओ सावलेबो । समायारिओ लक्खणो रामएवो ॥८॥ १ KInान घत्ता MER 'जइ तुहुँ पुत्तु महु, तो एत्तिउ पेसणु किजइ । छत्तइँ वइसणेउ, वसुमइ भरहहाँ अप्पिजइ ।।६।। [] अहवइ भरहु वि आसण्ण-भन्दु । सो चिन्तइ अथिरु असारु सव्वु ॥१॥ धरु परियणु जीविउ सरीरु वित्तु । अच्छ। तवचरण-णिहित्त-चित्तु ।।२।। त: मुऍवि तासु जइ दिष्णु रज्जु । तो लक्खणु लक्खइ हणइ अजु ॥३॥ ण वि हउँ ण विभरहु ण केकया वि । सत्तुहणु कुमारु ण सुप्पहा विrel न णिसुणवि पप्फुल्लिय-मुहेण । वोल्लिजइ दसरह-तणुरुहेण ||५|| 'पुत्तहाँ पुत्तत्तणु एत्तिउं जे ! जं कुलु ण चढाइ वसण-पुन्जे ॥६॥ जं णिय-जणणहाँ आणा-विहेउ । जं करइ विवक्खहाँ पाण-छेउ ।। ७ ।। कि पुत्ते पुणु पयपूरणेण । गुण-हीणें हियय-विसुरणेण ।।८।। । ५० बावीसमो संधि २७ [5] राजा दशरथके दीक्षायज्ञ और लक्ष्मीके अभिराम रामको राज्य (मिलनेकी) बात सुनकर द्रोणराजकी वहन कैकेयीका अनुराग भग्न हो उठा। नूपुरोंकी कांतिलतासे उसके चरण लिप्त हो रहे थे। उसका मध्य लम्बी करधनीके प्रभावसे उद्भिन्न हो रहा था। ऊँचे स्तनोंके भारसे कमर मुकी जा रही थो। उसके हाथ नव-अशोक वृक्षकी कान्ति समान आरक्त थे। वह कोयलके आलापकी तरह वहुत ही मधुर बोलती थी। श्रेष्ठ मोरके पंख समूहके सदृश उसकी केशराशि (अत्यन्त चमकीली) थी। प्रच्छन्न वेप, कामदेवकी भल्लिकाके समान थी वह । कैकेयी वहाँ गई जहाँ दरबारका मार्ग था, और राजा दशरथ, इन्द्रकी तरह सिंहासनपर बैठे हुए थे। उसने (उनसे) वर माँगा, "स्वामी यही वह समय है (कि जब) आप मेरे पुत्र (भरत) को राज्यपाल बनाएँ। तव दशरथने यह कहकर कि प्रिये तुम्हारी यह अपराधपूर्ण (बात) होगी, लक्ष्मण और रामको बुलाया ॥१-८॥ उन्होंने कहा, "यदि तुम मेरे पुत्र हो तो इस आज्ञाको मानो। छन सिंहासन और सारी धरती भरतको सौंप दो ॥६॥ [६] अथवा भरत आसन्न भव्य है, वह समस्त संसार, घर- परिजन, जीवन शरीर और धनको असार समझता है। उसका मन तो तपश्चरणमें रखा है। यदि मै तुम्हें छोड़कर उसे राज्य दे दूं तो लक्ष्मण आज ही लाखोंको साफ कर देगा। तब न मै, न न भरत, न कैकेयी, न कुमार शत्रुघ्न और न सुप्रभा, कोई भी उससे नहीं बचेगा।" यह सुनकर प्रफुल्ल मुखसे रामने कहा- "पुत्रका पुत्रत्व तो इसीमें है कि वह अपने कुलको संकटके मुखमें न डाले, और अपने पिताकी आज्ञा न टाले । शत्रुपक्षका संहार करे । अन्यथा, हृदयपीडक, गुणहीन, पुत्र शब्दकी पूर्ति करनेवाले पउमचरित घत्ता लक्खणु ण वि हणइ तबु भावहाँ मन्चु पयामहाँ । भुञ्जट मरहु महि हउँ जामि ताय वण-वामहो' ॥६॥ [१०] हधारित भरहु, गरेसरेण । पुणु बुञ्चइ णेह-महामरेण ॥ १ ॥ 'तर छत्तई तट वईसणउ रज्जु । साहेवउ मई अप्पणट काजु' ॥२॥ वयणु सुणवि दुम्मिय-मणेण । धिकारिट केछय-णन्दणेण ॥३॥ 'तुहूं ताय धिगत्थु धिगत्यु रज्जु । मायरि धिगत्यु सिर पडड वज्जु ॥१॥ जड जाणहुँ महिलहँ को सहाउ । जोवण-मगुण ण गन्ति पाठ ॥५॥ पउ युष्महि तहु मि महा-मयन्धु । किं राम मुऍवि महु पट्ट-वन्धु ॥ ६ ॥ सप्पुरिस वि चञ्चल-चित्त होन्ति । मण जुत्ताजुत्त ण चिन्तवन्ति ।। ७ ।। माणिकु मुवि को लेड कच्चु । कामन्यहाँ किर कहिँ तणउ सच ।। ६ ।। तं पत्ता अच्छहु पुणु वि घर सत्तुहणु रामु हउँ लक्खणु । अलिट म होहि तुहुँ महि भुल भडारा अप्पुणु' ॥ ६ ॥ [११] सुय-वयण-विरम उससन्दणेण । नुच्चइ अणरणहाँ णन्द्रणेण ॥ १ ॥ 'केक्कयह रजु रामहाँ पवासु । पवन मझु एउ जगे पगासु ॥ २ ॥ तुहुँ पाले घरासउ परम-रम्मु । णड आयहाँ पासिव को वि धम्मु ॥३॥ दिजइ जइवरहुं महप्पहाणु । सुअ - भेसह-अभयाहार-ढाणु ॥ ४ ॥ रक्खिजइ सील कुसीम-णासु । किनइ जिणु-पुज महोववासु ॥५॥ जिण-वन्दण वारापेक्ख-करणु । सल्लेहण-कालु समाहि-मरणु ॥ ६ ॥ एहु सबहुँ चम्म? परम-धम्मु । जो पालइ तहाँ सुर-मणुय-जम्मु ॥७॥ तं वयणु सुणेवि सइत्तणेण । चुच्चइ सुहमइ-दोहित्तएण ।।८।।

वावीसमो संधि पुत्रसे क्या लाभ ? हे तात ! लक्ष्मण भी घात नहीं करेगा। आप तप साधे और सत्यको प्रकाशित करे । भरत धरतीको भोगे, और मै वनवासके लिए जाता हूँ॥१-६।। [१०] तब स्नेहसे भरे हुए राजाने भरतको बुलाकर कहा "यह छत्र सिहासन और राज्य तुम्हारा है, अब मै अपना काम साधूंगा। यह सुनते ही कैकेयीपुत्र भरतने धिक्कारते हुए कहा- "पिताजी, तुम्हें और तुम्हारे राज्यको धिक्कार है । मॉको धिक्कार है। उसके सिर पर वज्र क्यो नहीं गिर पड़ा ? पर क्या आप भी नही जानते, महिलाओंका क्या स्वभाव होता है ? यौवनके मदमें वे पाप नहीं गिनती। महामदान्ध तुम भी यह नहीं समझ सके कि गमको छोड़कर राज्यपट्ट मुझे वॉधा जायगा ? सज्जन पुरुप भी चञ्चलचित्त हो जाते है और उचित-अनुचितका विचार नहीं कर पाते ? माणिक्य छोड़कर कॉच कौन लेगा, कामान्धके लिए सच कैसा ? अथवा आप घर पर ही रहें, शत्रुघ्न, राम, लक्ष्मण और मै वनको जाते है, आप धरतीका भोग करें, आपका वचन भी मुठा नहीं होगा ॥१-६॥ [११] भरतके कह चुकनेपर, अण रण्णके पुत्र दशरथ वोले, "जगमे प्रकट है कि भरतको राज्य,रामको प्रवास और मुझे संन्यास मिलेगा । अतः घर रह कर तुम धरतीका पालन करो । इससे बढ़- कर दूसरा धर्म नहीं हो सकती । यतिवरोंको बड़प्पन देना, शास्त्र, औपध, अभय और आहार दान करते रहना, अपना शील रखना, कुशीलका नाश करना, जिन पूजा उत्सव और उपवास करते रहना, जिन वंदनाके बाद द्वार पर अतिथिकी वाट देखना, सल्ले- बनाके समय समाधिमरण करना, बस, सब धर्मामें यही परम- धर्म है, जो इसका पालन करता है वह देव या मनुष्य योनिमें उत्पन्न होता है। यह वचन सुनकर सहृदय भरतन फिर कहा

३०
पउमचरित
घत्ता
'जइ घर-चासे सुहुँ एउ ज ताय वडिबजहि । ।
तो तिण-समु गणवि कजेण केण पब्वजहि ॥६॥
[१२]
--
तो खेदु मुऍवि दसरहण वुत्तु । 'जह सञ्चड नुहुँ महु तणउ पुत्तु ॥ १॥
तो कि पचज है करहि विग्घु । कुलबस-धुरन्धरु होहि सिग्यु ॥२॥
केकयह सच्चु जं दिण्णु आसि । तं गिरिणु करहि गुण-रयण-रासि' ।३।
तो कोशल - दुहिया - दुल्लहेण । वोल्लिजइ मीया -वलहेण ॥ ४ ॥
'गुणु केवलु वसुहह भुत्तियाएँ । कि खण खण उत्त-पउत्तियाएँ ॥ ५॥
पालिजउ तायहाँ तणिय काय । लइ महु उवरोहे पिहिविभाय' ॥ ६ ॥
तो एम भणन्तें राहवेण । णिवूढाणेय-महाहवेण
खीरोवमइण्णव-णिम्मलेण । गिधाण-महागिरि-अविचलेण ॥८॥
।
घत्ता
पेक्खन्तहाँ जणहाँ
सुरकरि-कर-पवर-पचण्डहिं।
पटु णिवद्ध सिरे रहु-सुऍण स यं भुव-दण्डहिं ॥ ६ ॥
[२३. तेवीसमो संधि
तहिँ मुणि-सुव्वय-तित्थ वुहयण-कण्ण-रसायणु ।
रावण-रामहुँ जुज्झु तं णिसुणहु
णिसुणहु रामायणु ॥
[१]
णमिऊण भडारउ रिसह-जिणु । पुणु कन्वहाँ उपरि करमि मणु ।।१।।
जग लोयहुँ सुयणहुँ पण्डियहुँ । लहत्य सत्य परिचहियहुँ ॥२॥
किं चित्तइँ गेण्हवि सकियई। वासेण वि जाई ण रञ्जिय॥ ३ ॥

तेवीसमो संधि ३१ तात, आपने जो यह कहा कि घरमें रहनेमें सुख है, तो आप उसे तिनकेके समान छोड़कर संन्यास क्यों ग्रहण कर रहे है ? ॥१-l [१२] इसपर अपनी खिन्नता दूर करते हुए दशरथने कहा, "यदि तू मेरा सच्चा पुत्र है, तो प्रव्रज्यामें विघ्न क्यो करता है। तुम अपने कुलवंशके धुरन्धर तुम सिंह वनो, कैकेयीको जो सच्चा वचन मैं दे चुका हूँ, उसे हे गुणरत्नराशि, तुम पूरा करो । तव (बीचमे टोककर) कोशल नरेशकी पुत्री अपराजिताके लिए दुर्लभ सीतापति रामने कहा, "अव तो धरतीका भोग करनेमे ही भलाई है, क्षण-क्षणमें उक्ति प्रति उक्तिसे क्या लाभ ? अपने पिताका वचन पालो, अच्छा भाई मेरे अनुरोधसे ही तुम यह पृथ्वी स्वीकार कर लो," यह कहकर, अनेक महायुद्धोंको निपटानेवाले, क्षीरसागरकी तरह निर्मल, मंदराचलकी तरह अविचल,,रघुसुत रामने लांगोके देखते-देखते, अपने प्रचंड हाथो (ऐरावतकी सूंड़ की तरह विशाल) से भरतके सिरपर राजपट्ट बाँध दिया ॥१-६।। तेईसवीं संधि इसके बाद, मुनिसुव्रत तीर्थकरके तीर्थ-कालमे राम और रावणका भयंकर युद्ध हुआ । अतः बुधजनोंके कानोंके लिए 'रसा- यन स्वरूप' उस रामायणको सुनो। [१] भट्टरिक जिनको नमन करके मैं-काव्यके ऊपर अपना मन कर रहा हूँ । शब्दार्थ समूहसे अच्छी तरह परिचित, संसारमे जो सन्नन और पण्डित हैं, और जिनके चित्तका अनुरञ्जन व्यास भी नहीं कर पाते क्या वे इस काव्यको मनसे ग्रहण कर सकेंगे ? अथवा व्याकरण और आगमसे होन हम जैसे लोगोंका [काव्यका

३२
पउमचरित
।
॥६॥
तो कवणु गहणु अम्हारिसहिं । वापरण-विहणेहिं आरिसंहिं ॥४॥
कइ अस्थि अणेय भेय-भरिय । जे सुयण-सासहिं आयरिय ॥५॥
चकलऍहिं कुलऍहिं खन्दऍहिं । पवणुझुअ-रासालुद्धऍहिँ
मञ्जरिय - विलासिणि - णक्कुडहिं । सुह-छन्देहिं सहेहिं खडइडहिँ ॥ ७ ॥
हउँ कि पि ण जाणमि मुक्खु मण । णिय बुद्धि पयासमि तो वि जण ॥८॥
जं सयले वि तिहुवर्ण वित्थरिउ । आरम्भिउ पुणु राहवचरिउ ॥ ६ ॥
घत्ता
भरहहाँ वद्धएँ प? तो णिवूढ-महाहउ ।
पट्टणु उझ मुएवि गउ वण-वासहाँ राहउ ॥ १० ॥
[२]
जं परिवधु पटु परिओसे । जय-मङ्गल-जय-तूर-णिघोसे ॥ १ ॥
दसरह-चरण-जुयलु जयकारवि । दाइअ-मच्छरु मणे अवहारवि ॥ २ ॥
सम्पय रिद्धि विद्धि अवगणवि । तासही तणउ सच्चु परिमण्णवि ॥ ३ ॥
णिग्गउ वलु वलु णाई हरेप्पिणु । लक्खणो वि लक्खण िलएप्पिणु ॥ ४ ॥
संचल्लेहि तेहि विहाणउ । ठिउ हेटामुहु दसरहु राणउ ॥ ५ ॥
हियवएँ गाई तिसूले समिउ । 'राहउ किह वण-वासहाँ घल्लिउ ॥ ६ ॥
धिगधिनत्थु' जणएण पवोल्लिड । 'लद्धिउ कुल-कमु चि सुमहल्लउ ॥ ७ ॥
अहवइ जइ मई सच्चु ण पालिउ । तो णिय-णामु गोत्तु मई मइलिउ ॥८॥
वरि गउ रामु ण सञ्चु विणासिउ । सच्चु महन्तड सव्वहाँ पासिउ ॥ ६ ॥
सच्चे अम्बरें तवइ दिवायर । सन्चें समउ ण चुक्इ सायरु ॥१०॥
सच्चे वाउ वाइ महि पञ्चइ । सच्चे ओसहि खयहाँ ण वच्चइ ॥११॥

तेवीसमो संधि ग्राहक कौन हो सकता है ? फिर कवियोके अनेक भेद हैं और जो हजारों सज्जनों द्वारा आदरणीय हैं । जो चक्रलक, कुलक, स्कन्धक, पवनोद्धत, रासालुब्धक, मञ्जरीक, विलासिनी, नकुड, और खडहड शुभछन्द तथा शब्दमें निपुण हैं। मैं कुछ भी नही जानता, मनमें मूर्ख हूँ तो भी लोगोंके सम्मुख अपनी बुद्धिको प्रकाशित करता हूँ। तीनों लोकोंमें जो प्रसिद्ध है मैं उस राघव- चरितको आरम्भ करता हूँ ॥१-६॥ भरतको राज्यपट्ट बाँधे जानेपर महायुद्धमें समर्थ राम अयोध्यानगरी छोड़कर वनवासके लिए चले गये ।।१०॥ [२] जय मंगल और जय तूर्यके नि?पके साथ, रामने परि- तोपपूर्वक [भरतको राजपट्ट बाँध दिया। अपने पिताके चरणोंकी जय बोल, मनमें दैव-मत्सर, और ऋद्धि-वृद्धिकी उपेक्षाकर, केवल अपने पिताके सत्य वचनको मानते हुए, राम अपने भवनसे निकल पड़े, उन्होने अपना साहस नहीं खोया। सब लक्षणोंसे युक्त लक्ष्मण भी उनके साथ हो लिया । उन दोनो भाइयोंके जाते ही, खिन्न दशरथ नीचा मुख करके रह गये। मानो किसीने उनके हृदयमे त्रिशूल ही छेद दिया हो। उन्होने कहा, "रामको वनवास कैसे दे दिया धिक्कार-है।" दश- रथने] महान् कुल परम्पराका उल्लंघन किया है । अथवा यदि मैं अपने सत्य वचनका पालन नहीं करता, तो अपने नाम और गोत्रको कलंक लगाता, अच्छा हुआ जो राम वनको चले गये, मेरा सत्य तो नष्ट नहीं हुआ। सबकी अपेक्षा सत्य ही महान है। सत्यसे हो आकाशमे सूरज तपता है, सत्यसे ही समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता। सत्यसे ही हवा चलती है और सत्यसे ही धरती सब कुछ सहन कर लेती है। जो मनुष्य सत्यका पालन ३ पउमचरिट घत्ता जो ण वि पालइ सन्चु मुह दाढियउ वहन्तउ । - णिवडइ णरय-समुद्दे वसु जम अलिउ चवन्तउ' ॥१२॥ [३] चिन्तावण्णु णराहिंउ जावहिं । वलु णिय-णिलड पराइउ तावहिं ॥१॥ दुम्मणु एन्तु णिहालिउ मायएँ । पुणु विहसेवि वुत्तु पिय-वायएँ ॥ २ ॥ 'दिव दिव चडहि तुरङ्गम-णाएँहिँ । अजु काइँ अणुवाहणु पाएँहिं ॥ ३ ॥ दिवे दिववन्दिण-विन्द हिँ थुम्वहि । अनु काइँ थुव्वन्तु ण सुन्वहि ॥ ४ ॥ दिव दिव धुव्वहि चमर-सहाहिं । अज्जु काई तउ को विण पासहि ॥ ५॥ दिव दिव लोयहिँ वुच्चहि राणउ । अनु काई दीसहि विद्याणउ ॥ ६ ॥ तं णिसुणेवि चलेग पजम्पिङ । 'भरहहाँ सयलु वि रज्जु समप्पिउ ॥ ७ ॥ जामि माऍ दिढ हियवएँ होजहि । जं दुम्मिय तं सव्वु खमेजहि ॥ ८ ॥ घत्ता जे आउच्छिय माय हा हा पुत्त' भणन्ती । अपराइय महएवि महियल पडिय रुयन्ती ॥१॥ [४] रामे जणणि जंज आउच्छिय । णिरु णिञ्चेयण तक्खण मुच्छिय ॥१॥ लजियाहि 'हा माएँ' भणन्तिहिं । हरियन्दणण सित्त रोवन्तिहिं ॥ २ ॥ चमक्खेवहिँ किय पडिवायण । दुक्खु दुक्खु पुणु जाय स-चेयण ॥३॥ अङ्गु वलन्ति समुट्ठिय राणी । सप्पि व दण्डाहय विद्याणी ॥ ४॥ णीरामुम्माहिय । पुणु वि सदुक्खउ मेल्लिय धाहिय ॥५॥ 'हा हा काई वुत्तु पइँ हलहर । दसरह-वस-दीव जग-सुन्दर ॥६॥ पइँ विणु को पल्लङ्के सुवेसइ । पइँ विणु को अस्थाण वईसइ ॥ ७ ॥ पइँ विणु को हय-गयहुँ चडेसइ । पइँ पइँ विणु को मिन्दुएंण रमेसइ ॥८॥ णालक्खण तेवीसमो संधि ३५ नहीं करता वह मुंहमें दाढ़ी रखकर भी, नरक-समुद्रमें उसी प्रकार पड़ता है जिस प्रकार राजा वसुको मूठ बोलकर नरक जाना पड़ा था ॥१-१२॥ [३] इधर राजा दशरथ चिन्तातुर थे, और उधर राम अपने भवनमें पहुँचे । माँने दुर्मन आते हुए उन्हें देख लिया। फिर भी वह हँसकर प्रियवाणीमें बोली, “प्रति-दिन तुम घोड़ों और हाथियोंकी सवारीपर चढ़कर आते थे। परंतु आज पैदल ही कैसे आये ? प्रतिदिन बंदीजन तुम्हारी स्तुति करते थे, परंतु आज तुम्हारी स्तुति क्यो नहीं सुन रही हूँ ? प्रतिदिन तुम्हारे ऊपर सैकड़ों चमर डुलाये जाते थे; परंतु आज तुम्हारे निकट कोई भी नहीं है। प्रतिदिन लोग तुम्हें 'राजा' कहकर पुकारते थे; पर आज तुम्हारा मुख मलीन क्यो है ?" यह सुनकर रामने कहा, "माँ भरत को सब राज्य अर्पित कर दिया, मै जा रहा हूँ। अण्ना हृदय दृढ़ कर लो और जो भी अविनय मुझसे हुई हो उसे क्षमा करो।" रामने जो यह पूछा उससे अपराजिता महादेवी "हा पुत्र हा पुत्र" कहकर रोती हुई धरतीपर गिर पड़ी ॥१-६।। ४] रामने मॉसे जो पूछा, उससे वे तत्काल चेतनाहीन हो मूर्छित हो गई। तब 'हा मॉ' यह कहती हुई दासियोने हरि- चन्दनका उनपर लेप किया। चमरधारिणी स्त्रियोके हवा करनेपर वह धीरे-धीरे बड़े दुखसे सचेतन हुई। अपने अंगोंको मोड़ती हुई,, दंडाहत म्लान नागिनकी तरह रानी उठी। उसकी आंख नीली और अश्रुजलसे डबडबाई हुई थीं। फिर वह दुखके आवेगसे डाढ़ मार कर रोने लगीं-हे बलभद्र, तुमने यह सब क्या कहा ? दथरथकुलके दीपक, जगसुंदर राम ! तुम्हारे बिना अब कौन पलंगपर सोयेगा। तुम्हारे विना कौन अब दरबारमें बैठेगा। तुम्हारे विना कौन अब हाथी-घोड़े पर .

पउमचरित
पइ विणु रायलच्छि को माणइ । पई विणु को तम्बोलु समाणइ ॥ ६ ॥
प: विणु को पर-वलु भजेसइ । पई विणु को मइँ साहारेसई' ॥ १० ॥
घत्ता
त कूबारु सुणेवि अन्तेउर मुह-वुण्णउ ।
लक्खण-राम-विओएं धाह मुएवि परुण्णउ ।। ११ ।।
[५]
ता एत्थन्तर असुर-विमहे । धीरिय णिय-जणेरि वलहहे ॥ १ ॥
'पीरिय होहि माएँ कि रोवहि । लुहि लोयण अप्पाणु म सोयहि ॥ २ ॥
जिह रवि-किरणहिं समिण पहावइ । तिह मई होन्ते भरहु ण भावइ ॥ ३ ॥
त कर्ज वण-वास वसेवउ । तायहाँ तणउ सच्चु पालेवट ॥ ४ ॥
ढाहिण-देसे करेविणु यत्ति । तुम्हहें पास एइ सोमित्ति' ॥ ५ ॥
एम भणेप्पिणु चलिड नुरन्तड । सयल वि परियणु आउच्छन्तड ॥ ६ ॥
धवल-कसण -ालुप्पल-सामहि । घरु मुञ्चन्तउ लक्खण-रामहि ॥ ७ ॥
सोह ण देइ ण चित्तहाँ भावइ । गहु णिचन्दाइचउ गावइ ॥ ॥
ण किय-उद्ध-हत्थु धाहावइ । वलहाँ कलत्त-हाणि ण दावइ ॥ ६ ॥
भरह गरिन्टहाँ ण जाणावइ । 'हरि-वल जन्त णिवारहिणरवई' ॥१०॥
पुणु पाआर-भुछड पसरेप्पिणु । णाई णिवारइ आलिङ्गे प्पिणु ॥११॥
.
घत्ता
चाव - सिलोमुह - हत्थ वे वि समुण्णय - माणा ।
तहाँ मन्दिरहों रुयन्तहाँ गाई विणिग्गय पाणा ||१२||
[६]
तो एत्यन्तर णयणाणन्हें । संचल्लन्ते राहवचन्द ॥१॥
सीयाएविहे वयणु णिहालिउ । णं चित्तेण चित्तु संचालिउ ॥ २ ॥

नेवीसमो मंधि
३७
चंदगा? तुम्हारे विना गेंद कौन खलेगा ? तुम्हारे बिना राजलक्ष्मी
को कौन मानेगा? तुम्हारे बिना ताम्बूलका आनन्द कौन
करंगा ? तुम्हारे बिना कौन शत्रुसेनाको परास्त करेगा ?
तुम्हारे बिना अब कौन मुझ सहारा देगा, रानीका करण क्रन्दन
सुनकर अन्तःपुरका मुख म्लान हो गया। राम और लक्ष्मणके
वियोगमं वह अन्तःपुर डाढ़ मारकर रो पड़ा ॥ १-११॥
[५] इसी बीच अमुरसंहारक रामने अपनी मॉको धीरज बॅधाते
हा कहा. "मां, धीरज धारण करी । गती क्यो हो ? आँख लाल
लालकर अपने आपको शोकम मत डालो । मूर्यको किरणोंके रहते
जने चन्द्रमा शोभायुक्त नहीं हो पाता वैसे ही मेरे रहनेसे भरनकी
गोभा नहीं होगी। केवल इसीलिए मै बनवासके लिए जा रहा
2 I मैं वहीं रहकर नानके वचनका पालन करूंगा। दक्षिण देशम
निवान बनाकर, लक्ष्मण नुम्हारे पाम आ जायगा ।" यह कहकर
गम नुग्न्त, नत्र परिजनों ने पूछकर चल पड़े। धवल और कृष्ण
नील कमलको नग्न लन्मण और गमके छोड़ते ही. घर न तो
माना था और न मनको हो भाता था, वैमे ही जने सूर्य और
चन्नम गहन आकाश अन्छा नहीं लगता। वह भवन हाथ ऊपर
स्टाफर और मारकर चिलाता हुआ. मानो गमको उसकी
पानीका दिपा रहा था या नरेन्द्र भग्नको यह जता
मामा फिजानी गमी मनाको गेको । चा फिर माना
रामारी जाओगी फैलाये गए. आलिंगन कर. उममा
var mm । धनुष-बाग हाथमे लेकर नमान
नाम नयन न चले गये मानी जमक
पगा
[ii. अनमय. नयनप्रिय गमनं माताका
TAmi. माना गनन दिनो को नचाग्नि कर दिया

पउमचरित णिय-मन्दिरहों विणिग्गय जाणइ । णं हिमवन्तहाँ गग महा-णइ ॥ ३ ॥ णं छन्दहाँ णिग्गय गायत्ती । ण सहहाँ णीसरिय विहत्ती ॥ ४ ॥ णाई कित्ति सप्पुरिस-विमुक्की । णाई रम्भ णिय-थाणहाँ चुक्की ॥ ५॥ सुललिय-चलण-जुयल-मल्हन्ती ।ण गय-घड भड-थड विहडन्ती ॥ ६ ॥ णेउर-हार-डोर-गुप्पन्ती । बहु-तम्बोल-पङ्क खुप्पन्ती ॥७॥ हेटा-मुह कम-कमल णियच्छवि । अवराइय-सुमित्ति आउच्छति ॥ ८॥ घत्ता णिग्गय सीयाएवि सिय हरन्ति णित-भवणहाँ। रामहो दुक्खुप्पत्ति असणि णाई दहवयणहाँ ।। ६ ।। [७] राय-चारु वलु बोलिउ जावहिं । लक्खणु मण आरोसिउ तावहिं ॥ १ ॥ उहिउ धगधगन्तु जस-लुद्धड । णाई घिएण सित्तु धमदउ ॥२॥ णा महन्दु महा-धण-गज्जिएँ । विह सोमित्ति कुविउ गमसजिएँ ॥३॥ 'के धरणिन्द-फणा मणि तोडिड । के सुर-कुलिस-दण्ड भुऍ मोडिउ ॥ ४ ॥ के पलयाणले अप्पउ ढोइउ । के आराउ सणि अवलोइउ ॥ ५॥ के रयणायरु सोसवि सक्किउ । के आइच्चों तेउ कलङ्कित ॥ ६ ॥ के महि-मण्डलु वाहहिँ टालिउ । के तइलोक-चक्क संचालिउ ॥७॥ के जिउ कालु कियन्तु महाहवे । को पहु अण्णु जियन्तऍ राहवें ॥८॥ घत्ता अहवइ किं वहुएण भरहु धरेप्पिणु अज्जु । रामहो णीसावण्णु देमि सहत्थे रज्जु ॥ ६ ॥ [८] फुरन्त-रत्तन्त-लोयणो । कलि कियन्त-कालो व भीसणो ॥ १ ॥ तो

तेवीसमो संधि
हो, वह भी अपने भवनसे वैसे ही निकल पड़ी, जैसे, हिमालय
से गंगा, छंदसे गायत्री, शब्दसे विभक्ति, सत्पुत्रसे कीर्ति, या
अपने स्थानसे चूककर अप्सरा रंभा ही निकल पड़ी हो। वह
सुललित अपने सुघर पैरोंसे ऐसी अल्हड़ चल रही थी-मानो
गजवटा भटसमूहको पराजित कर रही हो । नूपुर और हार डोरसे
व्याकुल, प्रचुर ताम्वूलोंकी लालीमें निमग्न अपना मुँह वह नीचे
किये थी। अपराजिता और सुमित्राके पैर पड़कर और उनसे
पूछकर सीता देवी भी घरसे निकल आई । अपने भवनको
शोभा का हरण करती हुई सीता देवी इस तरह निकल आई
मानो वह रामके लिए दुख का उत्पत्ति और रावणके लिए
वज्र थीं ॥१-धा
[७] रामके राजाज्ञा सुनाते ही लक्ष्मणको मन ही
मन असह्य वेदना हुई। यशका लोभी यह तमतमाता हुआ उठा,
मानो किस ने आगको घीसे सींच दिया हो। जैसे महामेघ
गरजते हैं, वैसे ही लक्ष्मण जानेकी तैयारी करने लगा। उसने
कहा, "किसने आज धरणेद्रके फनसे मणिको तोड़ लिया है ?
देववज्रदंडको किसने हाथसे मोड़ दिया है ? प्रलयकाल में
कौन अपनेको बचा सका है, शनिको देखकर कौन उचित हो
सका है, समुद्रका शोपण कौन कर सकता है ? सूर्यको कौन
कलंक लगा सकता है ? कौन पृथ्वीमंडलको अपनी भुजाओंसे
टाल सकता है, त्रिलोक चक्रको कौन चला सकता है, यमका
काल पूरा हो चुकनेपर महायुद्धमें कौन बचा सकता है, ठीक
इसी प्रकार रामके जीतेकी राजा दूसरा कौन हो सकता है ?
अथवा बहुत बकवादसे क्या, मैं ही आज भरतको पकड़ कर,
अशेप राज्य अपने हाथसे रामको अर्पित किये देता हूं।
[] लक्ष्मणकी लाल-लाल आंखें फड़क रही थीं, वह कलि, यम

१० पउमचरित दुणिवार दुग्यार-वारणो । मुउ चवन्तु ज एम लक्खणी ॥ २ ॥ भणइ रामु तइलोक्क-सुन्दरो। 'पई विल्हें किं को यि दुहरो ॥ ३ ॥ जमु पन्ति गिरि सिंह-णाऍण । कत्रणु गहणु वो भरह गऍण ॥ ४ ॥ कवणु चोज्जु ज दिवि दिवायरे । अमिउ चन्हें जल-णिवहु मायरे ॥ ५ ॥ सोस्खु मोरव दय-धम्मु जिणवरे । विमु भुयह वर लील गयवरे ॥ ६ ॥ धण' रिद्धि सोहग्गु बम्महे । गइ मराले जय-लच्छि महुमहे ॥ ७ ॥ पटसं च पई कुविर लक्खणे । भणवि एम करें धरिउ नक्खणे ॥ ८ ॥ । पत्ता 'रज्जे किजइ काई तायहाँ सञ्च-विणास । मोलह वरिम जाम वे वि बसहुँ वण-यासं' ॥ ६ ॥ [] पुह वोल्न णिम्माइय जावहिं । ढुक्कु भाणु अस्थवणहाँ तावहि ॥ ३ ॥ जाइ सन्म आरत्त पर्दासिय । णं गय-घड सिन्दूर-विहृसिय ॥२॥ सूर - मंस - रुहिरालि - चञ्चिय । णिसियरि च आणन्दु पच्चिय ॥३॥ गलिय सम्म पुणु रमणि पराइय । जगु गिलेइ ण सुत्तु महाइय ॥ ४ ॥ कहि मि दिन्च दीवय-सय बोहिय । फणि-मणि ब्व पजलन्त सु-मोहिय ।।५।। तिन्थु काले णिरु णिच्चं दुग्गमें 1 णीसरन्ति रयणिहें चन्दुग्गम ॥ ६ ॥ वासुएव वलाएन महन्बल । साहम्मिय साहम्मिय-वच्छल ॥ ७ ॥ रण - मर-णिग्वाहण णिवाहण । णिग्गय णीसाहण णीसाहण ॥८॥ विगयपभोलि पवोलवि खाइय । सिद्धकृड जिण-भवणु पराइय ॥ ६ ॥ जं पायार - वार - विष्फुरियउ । पोत्थासिस्थ-गन्य-विथरियउ ॥३०॥ तरङ्गहँ रहसमुज्जलु । हिमइरि-कुन्द-चन्द-जस-णिम्मलु ।।११।। वत्ता तहाँ भवणहाँ पासेहिं विविह महा-दुम दिट्टा । ण संसार-भएण लिणवर-सरण पइट्टा ॥ १२ ॥ ।

तेवीसमो संधि ४ , और कालसे भी अधिक भयंकर हो रहा था। दुर्वार हाथीको तरह दुर्वार, लक्ष्मणको ऐसा कहते सुनकर रामने कहा-"तुम्हारे विरुद्ध होनेपर भला क्या कोई दुर्द्धर हो सकता है, पहाड़ सिंह और हाथीतक गिर पड़ते हैं, तो फिर भरत राजाको पकड़नेमें क्या रक्खा है ? यदि सूर्यमे दीप्ति, चंद्रमामें अमृत, समुद्रमें जल का समूह, मोक्षमे सुख, जिनवरमें दया धर्म, सॉपमें विप, गजवर में वरलीला, धनमें ऋद्धि, वामामें सौभाग्य,मरालमें गति, विष्णुमें जयलक्ष्मी, और कुपित होनेपर तुममें पौरुप रहता है, तो इसमें अचरजकी कोई बात नहीं ----यह कहकर रामने भाई लक्ष्मणका हाथ पकड़ लिया । वह बोले, "तातनाशक राज्यके करनेसे क्या ? चलो सोलह वर्पतक हम दोनो वनवासमे रहें। ॥१-६।। [६] जब राम यह वचन कह ही रहे थे कि सूर्यका अस्त हो गया, आरक्त सन्ध्या ऐसी दिखाई दी मानो सिंदूरसे अलंकृत गजघटा हो या वीरके रक्तमांससे लिपटी हुई निशाचरी आनन्दसे नाच रही हो । सांझ वीतो और रात आ गई मानो वरिष्ट उसने सोते हुए विश्वको लोल लिया हो। कहींपर सैकड़ो जलते हुए दीपक शेपनागके फणमणियोंकी तरह चमक रहे थे। गतके उस सतत दुर्गमकालमे जव चॉद उग आया, तो महाबली, युद्धभार उठानेमें समर्थ राम और लक्ष्मणने माताओं तथा स्नेहीजनोंसे विदा माँगी, और सबारी, शृङ्गार तथा प्रसाधनसे हीन वे नगरका मुख्यद्वार और खाई लॉपकर सिद्धवरकूट जिन- भवनमें पहुंचे। वह मंदिर परकोटा और द्वारोंसे शोभित, और पोथियो तथा ग्रन्थासे भरा था। गंगाकी तरंगोंके समान उज्ज्वल, तथा हिमगिरि कुंद पुष्प चन्द्रमा और यशकी तरह निर्मल था। उसके चारों ओर लगे, बड़े-बड़े पेड़ ऐसे मालूम होते थे मानो संसारके भयसे वे जिनको शरणमें आ गये हों।॥१-१२॥

पउमचरित
[१०]
तं णिऍवि भुवणु भुवणेसरहाँ । पुणु किउ पणिवाउ जिणेसरहाँ ॥ १ ॥
जय गय-भय राय-रोस-विलय । जय मयण-महण तिहुवग-तिलय ॥ २ ॥
जय खम-दम-तव-वय-णियम-करण । जय कलि-मल-कोह-कसाय-हरण ॥३॥
जय काम-कोह-अरि-दप्प-दलण । जय जाइ-जरा-मरणत्ति-हरण ॥ ४ ॥
जय जय तव-सूर तिलोय-हिय । जय मण-विचित्त-अरुणे सहिय ॥५॥
जय धम्म - महारह • वी ठिय । जय सिद्धि-वरङ्गण-रण-पिय ॥ ६ ॥
जय संजम - गिरि-सिहलग्गमिय । जय इन्द-णरिन्द-चन्द-णमिय ॥ ७ ॥
जय सत्त - महाभय - हय-दमण । जय जिण-रवि णाणम्वर-गमण ॥८॥
जय दुक्यि - कम्म - कुमुय-डहण । जय चउ-गइ-रयणि-तिमिर-महण ||६||
जय इन्द्रिय - दुहम - दणु-दलण । जय जक्ख-महोरग-थुय-चलण ॥१०॥
जय केवल - किरणुज्जोय - कर । जय - भविय - रविन्दाणन्टयर ॥११॥
जय जय भुवणेक्क-चक्क-भमिय । जय-मोक्ख-महीहर अथमिय ॥१२॥
घत्ता
भावे तिहि मि जणेहि वन्दण करवि जिणेसहों।
पयहिण देवि तिवार पुणु चलियई वण-वासहाँ ॥१३॥
[११]
रयणिहें मज्म पयहइ राहवु । ताम णियच्छिउ परमु महाहवु ॥ १ ॥
कुइँ विद्धइँ पुलय-विसट्टई । मिहुणहँ वलई जेम अन्भिट्टई ॥२॥
'वलु वलु' एक्कमेक् कोकन्त। 'मरु मरु पहरु पहर' जम्पन्त ॥ ३ ॥

तेवीसमो संधि [१०] भुवनेश्वरके उस भवनको देखकर, उन्होंने जिनेश्वर की वंदना शुरू की-“गतभय तथा राग और रोपको विलीन करने वाले आपकी जय हो, कामका मथन करनेवाले त्रिभुवनतिलक आपकी जय हो, क्षमा दम तप व्रत और नियमोंका पालन करने वाले आपकी जय हो, कलियुगके पाप क्रोध और कषायोका हरण करनेवाले आपकी जय हो। काम क्रोधादि शत्रुओंका दर्प दलन करनेवाले आपकी जय हो, जन्म जरा और मरणके कष्टोंका हरण करनेवाले आपकी जय हो । त्रिलोक हितकर्ता और तपसूर्य आपकी जय हो । मनःपर्यय रूपी विचित्र सूर्यसे सहित आपकी जय हो। धर्मरूपी महारथकी पीठपर स्थित आपकी जय हो। सिद्धिरूपी वधूके अत्यन्त प्रिय आपकी जय हो । संयमरूपी गिरिके शिखरसे उदित आपकी जय हो। इन्द्र नरेन्द्र और चन्द्र द्वारा वंदनीय आपकी जय हो। सात महाभयरूपी अश्वोंका दमन करनेवाले आपकी जय हो । ज्ञानरूपी गगनमे विचरनेवाले जिन रवि आपको जय हो। पापरूप कुमुदोके लिए दहनशील, और चतु- गैतिरूपी रातके तमको उच्छिन्न करनेवाले आपकी जय हो, इन्द्रियरूपी दुर्दम दानवोका दलन करनेवाले आपकी जय हो । यक्ष और नागेश द्वारा स्तुत चरण आपकी जय हो। केवलज्ञानकी किरणसे प्रकाश करनेवाले और भव्यजन रूपी कमलोंको आनन्द देनेवाले आपकी जय हो । विश्वमें अद्वितीय धर्मचक्र प्रवर्तक आपकी जय हो । मोक्षरूपी अस्ताचलमें अस्त होने वाले आपकी जय हो । इस प्रकार भावसे जिणेशकी वन्दना और तीन प्रदक्षिणा देकर वे तीनों पुनः वनवासके लिए चल पड़े ॥१-६।। [११] रातके मध्यमें राम जैस ही आगे बढ़े वैसे ही उन्हें एक महायुद्ध दिखाई दिया । कुपित विद्ध और रोमांच सहित जोड़े, सेनाकी तरह आपसमे लड़ रहे थे । 'वल-बल' कहकर एक ।

पटमचरित पर हुकार - मार मेल्लन्तई । गरअ - पहारह उरु उडन्नई ॥ ४ ॥ खणे ओवडियई अहर इसन्तई । खणे किलिविण्डि हिण्डि नरिमन्तई ॥५॥ वण बहु वालालुचि करन्त' । खण णिप्फन्दई मेउ फुमन्नई ॥ ६ ॥ तं पेन प्पिणु सुरय-महाहट । मीयह क्यणु पजोयड गहउ ॥ ७ ॥ पुणु वि हसन्तई केलि करन्तई । चलियई हह-मग्गु जोगन्तई ॥ ८ ॥ घत्ता । जे वि रमन्ता आमि लक्वण-रामहं यहवि । णाबइ मुरयाम्पत्त आवण थिय मुहु ढक्षेवि ॥ ६ ॥ [-]] उज्महे दाहिण-दिमाग त्रिणिग्गय । णाई णिरहम मत्त महा-गय ॥ १॥ ण महड पुरि बल-लखण-मुक्की । मुक्छ कु-गारि व पेमण चुकी ॥ २ ॥ पुणु थोवन्तर वित्थय-णामहो । तन्वर णमिय सुभिश्च व रामहों ॥ ३ ॥ रहिय विजय मालु करन्ता । णं बन्दिण मगलई पदन्ता ॥ ४ ॥ अह-कोमु सपाइय जाहि । विमल विहाणु चउहिमु ताहि ॥ ५ ॥ णिनि-णिनियगिग आमिजं गिलियट । गाइ पडीवउ जउ रग्गिलियर ॥ ६ ॥ इ मृग-वियु उगन्तर । णावट सुस्इ-कन्यु पहचन्तर ॥ ७ ॥ पन्या माणु नाम पधाइट । लहु हलहेइह पामु पगइर ॥ ८ ॥ वत्ता माय मलारपणु गमु पणमिड वर-चिन्द। ण ग्रन्टिड अनिमे निणु बत्तीमहि इन्दहि ॥ ॥ [१३]] मन्त यारणंग । पयिरिर गमु गिय मारणंग ॥1॥ पनिम-गर गला पयः उन्नु । नं दंमु पगार पनि ॥ ॥ अण्णु त्रिशोचन्ना जा जान बार मागः दि गाम : || .

तेवीसमो संधि ४५ । दूसरोको पुकार रहे थे। कभी 'मारो-मारो, प्रहार करो प्रहार करो' यह कह रहे थे । हुंकार करनेमें श्रेष्ठ वे कामोत्पादक शब्द कर रहे थे, गुरुपहारसे वे उसे उड़ा रहे थे, कभी क्षणमें गिर कर अधर काटने लगते, तो दूसरे ही क्षणमें किलकारी भरकर शरीरयुद्ध दिखाने लगते । क्षण भरमें बाल नोचने लगते और क्षणभरमें ही निष्पन्द होकर प्रस्वेद पोंछने लगते, ऐसे उस काम-महायुद्धको देखकर रामने सीताके मुखकी ओर ताका और फिर हँसते क्रीड़ा करते बाजार- मार्ग देखते हुए वे चल पड़े। सुरतासक्त रमण करती हुई जितनी भी आपण स्त्रियाँ थी, राम लक्ष्मणकी आशंकासे मानो वे मुंह ढक कर रह गई ॥१-५॥ [१२] निरंकुश महागजको तरह वे लोग अयोध्यासे दक्षिण दिशाकी ओर निकले । परन्तु राम और लक्ष्मणसे मुक्त अयोध्या नगरी, सेवासे भ्रष्ट कुनारीकी तरह नहीं सोह रही थी। थोड़ी दूर चलनेपर प्रसिद्धनाम रामको पेड़ोने, अच्छे अनुचरकी तरह नमस्कार किया। कलकल करते हुए पक्षी उसमेंसे ऐसे उठने लगे मानो बन्दीजन मंगलगान पढ़ रहे हों, जब वे लोग आधा कोश और चले तो चारो ओर सुंदर सवेरा फैल गया। रात रूपी निशाचरीने जो सूरजको पहले निगल लिया था उसने अब उसे उगल दिया । बादमें रामकी सेना भी उनके पीछे दौड़ी और शीघ्र ही उनके पास जा पहुँची । नरवरोंके समूहने लक्ष्मण और सीता सहित रामको उसी प्रकार प्रणाम किया जिस प्रकार अभिपेकके समय बत्तीस तरहके इन्द्र जिनको नमन करते है ।। १-६॥ [१३] राम हॅसते हुए बोड़ोकी सवारीसे सहित अपनी सेनासे घिर गये । पर वह दिग्गजकी भॉति अल्हड़तासे पैर रखते हुए पारियात्र देशमे पहुंचे। उससे आगे थोड़ा और चलनेपर पउमचरिउ w परिहच - मच्छ - पुच्छुच्छलन्ति । फेणावलि - तोप-तुलार देन्ति ॥ ४ ॥ कारण्ड - डिम्म - इम्भिय-सरोह । वर-कमल-करम्विय-जलपमोह ॥५॥ हंसापति - परख - समुल्हसन्ति । कल्लोल - बोल - सावत्त दिन्ति ॥ ६ ॥ सोहइ बहु-बणगय-जूह-सहिय । डिण्डोर-पिण्ड दरिसन्ति अहिय ॥ ७ ॥ उच्छलइ बलइ पडिखल धाइ । मल्हन्ति महागय-लीलणाई ॥८॥ घत्ता ओहर-मयर-रउह सा सरि जयण-कडरिखय । इत्तर दुप्पइसार णं दुग्गइ दुप्पेक्खिय nt. सरि गम्भीर णियच्छिय जाहि । सयलु वि सेण्णु णियत्तिउ ताहि ॥१॥ 'तुम्हहिं एवहिं आणबडिच्छा । भरहहों मिञ्च होह हियइच्छा ॥ २ ॥ उज्म मुएप्पिणु दाहिणएसहाँ । अम्हहिं जाएवड वा-वासहाँ ॥३॥ एम भणेप्पिणु समर-समत्या । सायर • वजावत्त विहत्या ॥४॥ पइसरन्ति तहिं सलिल भयङ्कर । रामहो बडिय सीय वामए कर ॥ ५ ॥ सिय अरविन्दहाँ उप्परि णावइ । णावइ णियय-कित्ति दरिसावइ ॥ ६ ॥ पणं उजोउ करावइ गयणहाँ । णाई परिसइ धण दहबयणहाँ ॥ ७ ॥ लहु जलदाहिणि-पुलिणु पवण्ण: । णं भवियई गरयहाँ उतिण्णईं ॥८॥ -- घत्ता वलिय पडीवा जोह ने पहु-पच्छले लगा। कु-मुणि कु.बुद्धि कु-सील गं पचजह भग्गा ॥ ६ ॥ वलु वोलावेवि राय णियत्ता । णाबइ सिदि कु-सिद्ध र पत्ता ॥ ५ . वालय के विणीसासु मुअन्ता ! खग खग 'हा हा राम भणन्ता..

तेवीसमो संधि उन्हें गम्भीर नामको महानदी मिली । वेगशील मछलियोंकी पूछे उसमें उछल रही थीं। फेनधारासे युक्त जलकण हिमकण उड़ा रहे थे, तरंगमाला गजशिशुओंसे आन्दोलित हो रही थी। जल- प्रवाह कमलोंके समूहसे भरा हुआ था। हंसमालाके पंख उसमें उल्लसित हो रहे थे। तरंगोके प्रहारसे आवर्त पड़ रहे थे। वन- गजाके बहुतसे झुण्डोसे वह शोभित हो रही थी। फेनका समूह अधिक दिखाई पड़ रहा था, वह नदी, महागजकी तरह लीला करती हुई, गिरती-पड़ती उछलती-मुड़ती दौड़ती हुई वह रही थी। ओहर और मगरोंसे भयंकर, और दुष्प्रवेश्य उस नदीको रामने ऐसे देखा मानो वह दुर्गति हो ॥१-६॥ [१४] रामने गम्भीर नदीको देखकर अपनी सेनाको लौटा दिया । वह बोले, "आज्ञापालक तुम लोग आजसे भरतके सैनिक वनो। हमलोग भी अयोध्या छोड़कर, वनवासके लिए दक्षिण देशकी ओर जॉयगे।" यह कहकर, समरमे समर्थ रामने नदीके भयंकर जल में प्रवेश किया। समुद्रावर्त और बचावर्त धनुप उनके हाथमे थे। तब सीता उनके बायें हाथ पर चढ़ गई, वह ऐसी जान पड़ रही थीं मानो लक्ष्मी कमलपर बैठकर अपनी कीर्ति दिखा रही हों, या आकाशको आलोकित कर रही हों या राम ही अपनी धन्या सीता, रावणको दिखा रहे हो। शीघ्र ही वे नदीके दूसरे तटपर पहुँच गये मानो भव्यों ही को नरकसे किसीने तार दिया हो । रामके पीछे लगे योधा लोग भी अयोध्याके लिए उसी प्रकार लौट गये जिस प्रकार संन्यास ग्रहण करनेपर कुमति कुशील और कुबुद्धि भाग खड़ी होती है ॥१-६॥ [१५] रामको विदा देते हुए राजा लोग बहुत व्यथित हुए। ठीक उसी तरह जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त न होनेपर खोटे साधक दुखी होते है। कोई निश्वास छोड़ रहा था । कोई 'हाराम' कहता ४८ पउमचनिट के वि महन्त दुक्खे लइया । लोड करेवि के वि पप्वइया ॥३॥ के वि तिमुण्ड-बारि बम्भारिय । के वि तिकाल-जोइ वय-चारिय ॥ ४ ॥ के वि पवण-धुय-धवल-विसालऍ। गम्पिणु तहिं हरिसैण-जिणालऐं ॥५॥ थिय पध्वज लएप्पिणु णरवर । सढ - कढोर - वर - मेदु-महाहर ॥ ६ ॥ विजय-विय-विओय-विमण । धीर - सुबीर - सच्चे-पियबद्धण ॥ ७ ॥ पुङ्गम - पुण्डरीय - पुरिसुत्तम । विउल - विसाल-रणुम्मिय उत्तम ॥ ८ ॥ घत्ता इय एक्कक-पहाण जिणवरचलण णमसत्रि । संजम-णियम-गुणेहिँ अप्पड थिय सइ भू सवि ॥ ६ ॥ [२४. चउवीसमो सन्धि] गए वण-वासहाँ राम उम ण चित्तहाँ भावइ । थिय णीसास मुअन्ति महि उपहालऍ णावइ ।। [] सयलु वि जणु उम्माहिजन्तउ । खणु वि ण थक्का णामु लयन्तउ ॥ १॥ उब्वेल्लिजइ गिजइ लक्खणु । मुरव - वजे वाइजइ लक्खणु ॥ २ ॥ सुइ-सिद्धन्त-पुराणेहि लक्खणु । ओङ्कारेण पढिजइ लक्खणु ॥३॥ अण्णु विज जं किं वि स-लक्खणु । लक्खण-णामे बुच्चइ लक्खणु ।। ४॥ का वि णारि सारङ्गि व बुण्णी । वडी धाह मुएवि परुणी ॥ ५ ॥ का यि णारि जं लेइ पसाहणु । तं उल्हावइ जाणइ लक्खणु ॥ ६ ॥ का वि णारि जं परिहइ कङ्कणु । धरइ सु गाढउ जाणइ लक्खा ॥ ७ ॥ का वि णारि जं जॉयड दप्पणु । अण्णु ण पेक्खड़ मेल्लवि लक्खणु ॥ ८ ॥ तो एत्यन्तर पाणिय-हारिउ । पुरै वोल्लन्ति परोप्परु णारिउ ॥ ६॥ 'सो पल्लङ्कु तं न उबहाणड । सेज वि स तं जे पच्छाणउ ॥ १० ॥ ।

चवीसमो सन्धि ४ कहता हुआ लौट रहा था। कोई घोर दुःख पाकर प्रबजित हो गये। कोई त्रिपुण्ड लगाकर सन्यासी हो गये । कोई व्रत धारण करनेवाले त्रिकाल योगी बन गये। कोई जाकर हरिपेण राजाके विशाल धवल जिनालयमें ठहर गये। वहाँ पर मेरु महीधर विजय वियई वियोगविमर्दन धीर सुवीर सत्य प्रियवर्द्धन पुंगम पुण्डरीक पुरुषोत्तम विपुल विशाल और रणोन्मद और उत्तम प्रकृतिके राजाओंने दीक्षा ग्रहण कर ली। इस प्रकार सभी राजाओने जिन चरणोंकी वन्दनाकर अपने आपको संयम नियम और गुणोंकी साधनामें अर्पित कर दिया। चौबीसवीं सन्धि रामके वन जानेपर, अयोध्या नगरी किसीको भी अच्छी नहीं लग रही थी । ग्रीष्मकी संतप्त धरतीकी भाँति, वह उच्छास छोड़ती हुई जान पड़ रही थी। [१] उन्मादग्रस्त सभी लोग रामका नाम लेकर भी क्षण भरको नहीं रह पा रहे थे। नृत्य और गानमें लक्षण (लक्ष्मण-लक्षण) ही कहा जा रहा था। मृदंगमे भी लक्षण बजाया जा रहा था। श्रुति सिद्धान्न और पुराणमें भी लक्खणकी ही चर्चा थी। ओंकारके साथ भी लक्षण पढ़ा जारहा था । और जी भी लक्षण सहित था, वह लक्ष्मणके नामसे ही कहा जाता था। कोई नारी हरिनीकी तरह विषण्ण हो, डाढ़ मारकर रो रही थी। कोई नारी प्रसाधन करती हुई लक्ष्मण समझकर उल्लसित हो उठती। कोई स्त्री कंगन पहनते समय उसे ही लक्ष्मण समझकर उसे और मजबूतीसे पकड़ लेती। कोई नारी दर्पण देखती, पर उसम लक्ष्मणके सिवा उसे और कुछ दीखता नहीं था। नगरमें पनहारिन भी आपसमें यही चर्चा कर रही थीं कि वही पलंग वे ही उपधान वही सेज और वहीं प्रच्छादन (चादर), बही घर,

५०
पउमचरित
वत्ता
तं घरु रयणइ ताइ तं चित्तयम्मु स-लक्खणु ।
णवर ण दीसइ माएँ रामु ससीय-सलक्खणु ॥११॥
[२]
ताम पडु पडह डडिपहय पहु-पगणे । गाइँ सुर-दुन्दुही दिण्ण गयणाङ्गणे ॥१॥
रसिय सय सङ्घ जायं महा-गोन्दलं । टिविल-टण्टन्त-घुम्मन्त-वरमन्दलं ॥२॥
ताल - कंसाल - कोलाहल काहल । गीय संगीय गिज्जन्त-वर-मङ्गलं ॥३॥
ढमर-तिरिडिकिया-झल्लरी-रउरवं । भस्म-मम्मीस गम्भीर-भेरी-रवं ॥४॥
घण्ट - जयघण्ट • संघट्ट - रङ्कारव । घोल-उल्लोल-हलवोल-मुहलारव ॥५॥
तेण सहेण रोमञ्च-कचुद्धआ । गोन्दलु हाम-बहु-वहल-अञ्चम्भुआ ॥६॥
सुहड-संघाय सव्वा य थिय पडणे । मेरु-सिहरेसुणं अमर जिण-जम्मणे ॥७॥
पणइ-फम्फाव-णड-छत्त-कइ वन्दणं । 'णन्द जय भहजय जयहि'वर सेहणं ।।
पत्ता
लक्खण-रामहुँ वप्पु णिय-भिच्चहि परियरियड।
जिण-अहिसेयहाँ कज्ज णं सुरवइ णीसरियड ॥ ६ ॥
[३]
जं णीसरिउ राउ आणन्दे । वुत्तु णवेप्पिणु भरह-णरिन्दें ॥३॥
'हउ मि देव पइँ सहुँ पब्वजमि । दुग्गइ-गामिउ रज्जु ग भुलमि ॥२॥
रज्जु असारु वारु ससारहों । रज खणेण गेइ तम्बारहों ॥३॥
रज्जु भयङ्करु इह-पर-लोयहाँ । रज्जे गम्मइ णिच्च-णिगोयहाँ ॥ ४ ॥
रज्ज होउ होउ महु सरियड । सुन्दर तो किं पइँ परिहरियउ ॥ ५॥

चटीसमो संधि वे ही रतन, लक्षण सहित वही चित्रकारी सब कुछ वहो है। हे माँ, केवल लक्ष्मण और सीता सहित राम नहीं दीख पड़ते ॥१-११|| [२] इतने ही में राजा दशरथके आँगनमे नगाड़े बज उठे मानो गमनांगनमे देवोंकी टुंदुभि ही बज उठी हो। सैकड़ों शंख गूंज उठे। उससे खूब कोलाहल हुआ। टिविलकी टंकारसे मंद- राचल हिल उठा। ताल और कंसालका कोलाहल मच गया। उत्तम मंगलोंसे युक्त गीत और संगीत हो रहा था। डमरु तिरि- डिकि और मल्लरीसे भयंकर, भम्भ भम्भीस और गंभीर भेरीका शन्द गूंज उठा। घंट और जयघंटोंके संघर्षकी टंकार तथा घोल उल्लोल हलबोल और मुहलकी ध्वनि फैल गई। इस ध्वनिको सुन- कर युद्धमै उत्कट पुलकित कवच पहने और अत्यंत आश्चर्यसे भरे हुए सभी सुभट-समूह राजाके ऑगनमे आकर ऐसे एकत्र हो गये मानो जिनजन्मके समय, सुमेरु पर्वतके शिखरपर देवसमूह ही आ गये हों। प्रणत चारग नट छत्र कवि और बंदीजन कह रहे थे-बढ़ो, जय हो, कल्याण हो, जय हो। अपने अनु- चरोसे घिरे हुए राम लक्ष्मणके वाप (दशरथ ) ऐसे जान पड़ते थे मानो जिनंद्रका अभिषेक करनेके लिए इन्द्र ही निकल पड़ा हो ।।१-६॥ [३] राजा जैसे ही आनन्दपूर्वक निकलने को हुआ वैसे ही भरतन प्रणाम करके कहा, "ह देव, मैं भी आपके साथ संन्यास ग्रहण करूंगा। दुर्गतिम ले जानेवाले इस राज्यका मै भोग नहीं करूंगा। राज्य असार और संसारका कारण है। राज्य गणभरमै विनाशकी ओर ले जाता है। दोनो लोकमें राज्य भयंकर होना है। गम्यसे नित्य निगोदमें जाना पड़ता है। राज्य रहे । यदि बाद मुन्दर और मधुकी तरह मोठा होता तो आप क्यों

પુર
पडमचरिट
।
रज्जु अकजु कहिट मुणि - छेयहिँ । दुइ-कलत्तु व भुत्तु अणेयहि ॥ ६ ॥
दोसवन्तु मयलन्छण - विम्वु व । बहु-दुक्खाउर दुग्ग-कुडुम्बु व ॥ ७ ॥
तो वि जीउ पुणु रजहाँ कसइ । अणुदिणु आउ गलन्तु ण लक्खइ ॥८॥
घत्ता
जिह महुविन्दुहें कज़ करहु ण पेक्खइ कारु ।
तिह जिउ विसयासत्तु रज्जं गउ सय-सकर' ॥ ६ ॥
[५]
भरहु चवन्तु णिवारिउ राएं। 'अज वि तुझु काई तव-वाएं ॥ १ ॥
अज वि रजु करहि सुहु भुञ्जहि । अन्ज वि विसय-सुक्खु अणुहुञ्जहि ॥२॥
अज वि तुहुँ तम्बोलु समाणहि । अज वि वर-उजाणई माणहि ॥ ३ ॥
अजु वि अगु स-इच्छऍ मण्डहि । अज वि वर-विलयर अवरुण्डहि ॥ ४॥
अज वि जोग्गउ सम्वाहरणहाँ। अज वि कवणु कालु तव-चरणहाँ ॥ ५ ॥
जिण-पध्वज होइ अइ-दुसहिय । के वावीस परीसह विसहिय ॥ ६ ॥
के जिय चउ-कसाय-रिड दुजय । के आयामिय पञ्च महब्वय ॥ ७ ॥
के किउ पञ्चहुँ विसयहुँ गिग्गहु । के परिसेसिउ सयलु परिग्गहु ॥ ८ ॥
को दुम- मूल वसिड वरिसालए। को एक्कड़े थिउ सीयालएँ ॥ ६ ॥
के उण्हालएँ किड अत्तावणु । ऍड तव-चरणु होइ भीसावणु ॥ १० ॥
घत्ता
भरह म वडिउ बोल्लि तुहुँ सो अज वि वालु।
भुञ्जहि बिसय सुहाई को पवजहें कालु, ॥११॥
[५]
तं णिसुणेवि भरहु आउ । मत्त - गइन्दु व चित्तं दुदृट ॥ १ ॥
विल्यर ताव वयणु प. वृत्तड । किं वालहों तब-चरणु ण जुत्तड ॥२॥

चवीसमो संधि
उसे छोड़ते, और फिर राज्य तो अन्तमें अनर्थकारी होता है।
दुष्ट
स्त्री की तरह अनेकोने उसका भोग किया है। चन्द्रविम्बकी
तरह वह दोपयुक्त है और दरिद्र कुटुम्बकी तरह वहुतसे दुखोंसे
भरा है। फिर भी मनुष्य राज्यकी ही कामना करता है, प्रति
दिन गलती हुई अपनी आयुको नहीं देखता । जिस तरह मधुकी
बूंदके लिए करभ कंकड़ नहीं देखता, उसी तरह जीव भी राज्यके
कारण अपने सौ-सौ टुकड़े करवा डालता है ।।१-६।।
[४] तब दशरथ राजाने भरतको बोलतेमें ही टोककर
कहा-"अभी तुझे तपकी बात करनेसे क्या ! अभी तुम
राज्य और विपय-सुखका भोग करो। अभी तुम ताम्बूलका
सम्मान करो। अभी अच्छे उद्यानोंको मानो। अभी अपनी
इच्छासे शरीरको सजाओ। अभी, उत्तम बालाका आलिंगन करो।
अभी तुम सभी तरहके अलंकार पहनने योग्य हो । अभी तुम्हारे
तपका यह कौन-सा समय है। फिर यह जिन-दीक्षा अत्यंत कठिन
है। बाईस परीपह कौन सहन कर सकता है ? चार कपाय रूपी
अजेय शत्रुओंको कौन जीत सकता है ? पॉच महाव्रतोंका पालन
करनेमें कौन समर्थ है ? पांच इन्द्रिय विपयोंका निग्रह कौन कर
सका है ? समस्त परिग्रहका त्याग करनेमें कौन समर्थ है ? वर्पा-
कालमें कौन वृक्षके मूलमें निवास कर सकता है ? शीतकालमें
कौन नग्न रह सकता है ? ग्रीष्मकालमें तप कौन साध सकता
है ? यह तपश्चरण सचमुच भीपण है, भरत बढ़-चढ़कर मत
बोलो, तुम अभी बच्चे हो! अभी विषयसुखका आनन्द लो, यह
मंन्यास लेने का कौन-सा समय है।" ॥१-११||
[२] यह सुनकर, भरत रूठ गया, मत्तगजकी तरह उसका
मन विकृन हो गया। वह बोला, "तात, आपने अत्यंत अशोभन
?

५४ पउमचरित किं वालत्तणु सुहहिं ण मुच्चइ । किं वालहों दय-धम्मु ण रुचइ ॥ ३ ॥ कि वालहाँ पध्वज म होओ। कि वालहों दूसिउ पर- लोओ ॥ ४ ॥ किं वालहाँ सम्मत्तु म होओ। किं वालहों णउ इद्व-विओओ ॥ ५ ॥ किं वालहाँ जर-मरणु ण दुकइ । कि वालहों जमु दिवसु वि चुक्कइ ॥ ६॥ तं णिसुणेवि भरहु णिन्भच्छिउ । 'तो कि पहिलउ पटु पडिच्छिउ ॥ ७ ॥ एवहिँ सयलु वि रजु करेवउ । पच्छले पुणु तव-चरणु चरेवउ' ॥ ८॥ धत्ता एम भणेप्पिणु राउ सञ्चु समप्पवि भजहें । भरहहाँ वन्धेवि पटु दसरहु गउ पव्वजहें ॥६॥ [६] सुरवर - वन्दिएँ धवल - विसालएँ । गम्पिणु सिद्धकूड़े चइतालए ॥ १ ॥ दसरहु थिउ पध्वज लएप्पिणु । पञ्च मुहि सिर लोड करेप्पिणु ॥२॥ तेण समाणु सणेहें लइयउ । चालीसोत्तरु सउ पव्वइयउ ॥ ३ ॥ कण्ठा - कडय - मउउ अवयारवि । दुद्धर पञ्च महन्वय धारेवि ॥ ४ ॥ थिय णीसङ्ग णाग णं विसहर । अहवइ समय-वाल ण विसहर ॥ ५॥ णं केसरि गय - मासाहारिय । णं परदार-गमण परदारिय ॥ ६ ॥ केण वि कहिउ ताम भरहेसहाँ । गय सोमित्ति-राम वण-वासहाँ ॥ ७ ॥ तं णिसुणेवि वयणु धुय - वाहउ । पडिउ महीहरो ब्व वजाहउ ॥ ८॥ घत्ता जं मुच्छाविउ राउ सयलु वि जणु मुह-कायर । पलयाणल-संतत्तु रसेंवि लग्गु ण सायरु ॥ ६ ॥ [७] पव्वालिजन्तउ । चमरक्खेवहि विजिजन्तउ ॥ १ ॥ चन्देणेण चउवीसमो संधि ? कहा, क्या वालकको तपस्या युक्त नहीं। क्या बालकपन सुखोंसे वंचित नहीं होता ? क्या वालकको दया धर्म नहीं रुचता? क्या चालकको संन्यास नहीं होता? वालकका परलोक आप क्यों दूषित करते हैं ? क्या वालककोसम्यग दर्शन नहीं होता? क्या वालकको इष्ट-वियोग नहीं होता, क्या वालकके पास वुढापा और मृत्यु नहीं फटकती, क्या उसे यमका दिन छोड़ देता है ?" तव भरतको डाँटते हुए दशरथने कहा, "तो फिर तुमने पहले राज्य पदकी कामना क्यों की ? इस समय समस्त राज्यको सम्हालो, तप फिर वादमे साध लेना!" यह कह, कैकेयीको वरदान दे, और भरत को राज्यपट्ट वॉधकर दशरथ दीक्षा लेनेके लिए चल दिये ।।१-धा [६] वह, देववंदित, धवल विशाल सिद्धकूट चैत्यालयमें पहुँचे। और पञ्चमुष्टि केशलोंचकर उन्होंने दीक्षा ग्रहण कर ली। उनके प्रेमके वशीभूत होकर एक सौ चालीस दूसरे राजाओंने भी दीक्षा ग्रहण की। कंठहार, मुकुट और कटक उतारकर, पंच महाव्रत धारणकर वे तप साधने लगे। अनासंग वे मुनि नागकी तरह, विपधर (धर्म या विष धारण करनेवाले) थे, अथवा वर्ग- कालके समान विपधर (जलचर धर्मवाले) थे। सिंहकी तरह मांसाहारी (एक माहमें भोजन करनेवाले मासाहारी) थे। परदार- गामीकी तरह परदारगामी (मुक्तिगामी) थे। इतनेमे किसीने आकर भरतको यह खबर दी कि लक्ष्मण और राम वनको चले गये हैं। यह सुनते ही कांतशरीर भरत मूर्छित होकर, वज्राहत पहाड़की तरह गिर पड़े। उनके मूर्छित होते ही, सव लोगोंके मुख कातर हो उठे। मानो प्रलयकी आगसे संतप्त होकर समुद्र ही गरज उठा हो।" [७] चन्दनका लेप और चामरधारिणी स्त्रीके हवा करनेपर,

पउमचरिउ
दुक्खु दुक्खु आसासिउ राणउ । जरढ-मियङ्क व थिउ विद्याणउ ॥२॥
अविरल - अंसु-जलोल्लिय - णायणउ । एम पजस्पिउ गग्गर-वयणउ ॥३॥
णिवडिय अनु असणि आयासहाँ । अजु अमङ्गल दसरह-वंसहो ॥ ४ ॥
अजु जाउ हउँ सूडिय-पक्खउ । दुह-भायणु पर-मुहहँ उवेक्खउ ॥ ५॥
अजु णयर सिय-सम्पय - मेल्लिउ । अज्जु रज्जु पर-चक्के पेलिउ ॥ ६ ॥
एम पलाउ करेवि सहग्गएँ । राहव-जणणिह गउ ओलग्गएँ ॥ ७ ॥
केस - विसण्ठुल दिड रुमन्ति । अंसु - पत्राह धाह मेल्लन्ती ।।८।।
घत्ता
धोरिय भरह-णरिन्दे होड माएँ महु रज्जें।
आणमि लक्खण-राम रोवहि काइँ अकज्ज ॥६॥
[-]
एम भणेवि भरहु संचल्लिर । तुरिट गवेसहाँ हत्युत्याल्लिड ॥१॥
विष्णु सङ्खु जय-पडहु पवजिउ । णं चन्दुग्गम उवहि पगजिउ ॥ २ ॥
पहु - मग्गेण गराहिउ लग्गउ । जीवहाँ कम्मु जेम अणुलग्गउ ॥ ३ ॥
छट्टएँ दिवस पराइड तेत्तहें । सीय स-लक्खणु राहउ जेत्तह ॥ ४॥
छुडु छुडु सलिलु पिएवि णिविट्टई । सरवर-तार लयाहर दिइँ ॥५॥
चलहिँ पडिउ भरहु तग्गय - मणु । णाई जिणिन्दहों दससय-लोयणु ॥६॥
'थक्कु देव मं जाहि पवासहाँ । होहि तरण्डड दसरह-वंसहों ॥ ७ ॥
हउँ सत्तुहणु भिच्च तउ वे वि । लक्खणु मन्ति सीय महएवि ॥ ८ ॥
घत्ता
सुर-लोए।
जिह णक्खत्तहिं चन्दु इन्दु
जेम
तिह तुहुँ भुनहि रज्जु परिमिउ वन्धव-लोएं ॥४॥

चटवीसमो संधि राजा भरत बड़ी कठिनाईसे आश्वस्त हुए। परंतु वह राहु ग्रस्त चन्द्रमाकी तरह म्लान दीख पड़ रहे थे। नेत्रोंसे अविरल अश्रु धारा प्रवाहित हो रही थी । गद्गद स्वरमे उन्होंने कहा, "आज अाकाशसे वज्र टूट पड़ा है। आज दशरथ-कुलका अमंगल आ गया है। आज, अपने पक्षका नाश होनेसे मै परमुखापेक्षी और दीन हो गया हूँ। आज इस नगरकी श्री और सम्पदा जाती रही। आज हमारे राज्य पर शत्रु-चक्र घूम गया है। ऐसा प्रलाप कर वह शीघ्र ही रामकी माताकी सेवामे पहुंचे। उन्होंने देखा कि कौशल्याके बाल बिखरे हैं, ऑसुओंकी धारा वह रही है। वह, डाढ़ मारकर रो रही हैं। उन्होंने धीरज वॅघाते हुए कहा- "मां लो, मै राज्य करनेसे रहा, अभी जाकर राम लक्ष्मणको ले आता हूँ। रोती किसलिए हो ७ ||१-६।। [1] यह कहकर, भरतने ( अनुचरोंको) आदेश दिया "शीत्र खोजो।" वह स्वयं भी चल पड़ा। उसने शंख और जय- पटह बजवा दिये, मानो चन्द्रोदयमें समुद्र ही गरज उठा हो । गजा भरत प्रभु रामके मार्ग पर उसी तरह लग गये जैसे जीवके पोछे पीछे कर्म लगे रहते हैं। छठे दिन वह वहां पहुंच सके, जहां सीता और लक्ष्मणके साथ रामथे। सरोवरके किनारे पर लतागृहमें, शीघ्र ही पानी पीकर निवृत्त हुए उन्हें भरतने देखा। तल्लीन भरत दौड़कर प्रभु रामके चरणों में उसी तरह गिर पड़े जिस तरह इन्द्र जिनेन्द्र के चरणोमे गिर पड़ता है। वह बोले, "देव, ठहरिये, प्रवासको मत जाइये, नहीं तो दशरथकुलका नाश हो जायगा, शत्रुघ्न और मै आपके सेवक हैं, लक्ष्मण मंत्री, और सीता महादेवी आप अपने बन्धुजनांसे घिरे हुए उसी तरह राज्यका भोग करें, जैसे नक्षत्रांसे चंद्र और मुरलोकसे घिरकर इन शासन फरता ह ।।१-६॥

पउमचरिउ
तं
वयणु सुर्णवि दसरह - सुएण । अवगूढ भरहु हरिसिय-भुएण ॥ १ ॥
सञ्चउ माया - पिय - परम - दासु । पइँ मेल्लवि अण्णहाँ विणउ कासु'॥२॥
अवरोप्पर ए आलाव
जाम । तहिं जुवइ-सयहिं परियरिय ताम॥३॥
लक्खिज्जइ भरहहाँ तणिय माय । णं गय-घड भड भान्ति आय॥ ४ ॥
णं तिलय - विहूसिय बच्छराइ । स- पोहर अम्बर-सोह णाई ॥ ५ ॥
ण भरहहाँ सम्पय - रिद्धि - विद्धि । णं रामहाँ गमणहाँ तणिय सिद्धि ॥६॥
ण भरहहाँ सुन्दर - सोक्ख-खाणि । ण रामहाँ इट-कलत्त - हाणि ॥ ७ ॥
जं भणइ भरहु 'तुहुँ आउ आउ । वण-वासहाँ राहउ जाउ जाउ' ॥ ८॥
घत्ता
सु-पय सु-सन्धि सु-णाम वयण-विहत्ति-विहूलिय ।
कह वायरणहाँ जेम केक्य एन्ति पदीसिय ॥६॥
[१०]
सहुँ सीयऍ टसरह - णन्दणेहिं । जोक्कारिय राम - जणहणेहिं ॥ १ ॥
पुणु वुच्च सीर - प्पहरणेण । 'किं आणिउ भरहु अकारणेण ॥२॥
सुणु माऍ महारउ परम - तच्चु । पालेवउ तायहाँ तणउ सच्चु ॥ ३ ॥
णउ तुरऍहिँ णउ रहवरहिँ कज्जु । णउ सोलह वरिस करमि रज्जु ॥४॥
ज दिण्णु सच्चु ताएं ति - वार। तं मइ मि दिण्णु तुम्ह सय-वार' ॥५॥
ऍउ वयणु भगेप्पिणु सुह - समिछु । सइँ हत्थे भरहहाँ पटु वढु ॥ ६ ॥
आउच्छवि पर - वल - मइय - वटु । वण-वासह) राहउ पुणु पय१ ॥७॥
गउ भरहु गियत्तु सु - पुज्जमाणु । जिण-भवण पत्तु मिच्चहिँ समाणु ॥८॥

चउवासमो संधि [६] यह सुनकर दशरथ-पुत्र रामने अपनी प्रसन्न भुजाओंसे भरतको हृदयसे लगा लिया, और कहा, "भरत, तुम ही माता- पिताके सच्चे सेवक हो। भला इतनी विनय तुम्हें छोड़कर और किसमें हो सकती है ?" आपसमे उनकी इस तरह वाते होही रही थी कि इतनेमें उन्हें सैकड़ो स्त्रियांने घेर लिया। उनके बीच आती हुई, भरतकी मॉ ऐसी दीख पड़ी मानो भटसमूहको चीरती हुई गजघटा ही आ रही हो। या तिलक वृक्षसे विभूपित वृक्ष राजि हो । या सपयोधर (मेघ और स्तन) अम्बर, कपड़ा, आकाश, की शोभा हो । या मानो भरतकी रिद्धि और वृद्धि हो । या रामके वन-गमनकी सिद्धि हो । या भरतके सुन्दर सुखोंकी खान हो और रामके इष्ट तथा स्त्रीको हानि हो। मानो वह कह रही थी- "भरत तुम आओ आओ और राम तुम वनवासको जाओ, जाओ।" रामने कैकेयीको व्याकरण-शास्त्रकी तरह जाते हुए देखा, वह, सुपद (पद और पैर) सुसंधि (अंगोके जोड़ और शब्दोंकी संधिसे युक्त) तथा वचन विभक्ति (तीन वचन, सात विभक्तियाँ, और वचन विभागसे) विभूपित थी ॥१-६॥ [१०] तब दशरथ-पुत्र जनार्दन रामने सीतासहित उसका अभिनन्दन किया। वह बोले, “मॉ, भरत तुम्हें अकारण क्यों लाया। मॉ, मेरा परमतत्त्व (सिद्धांत) सुनो । मै पिताके वचनका पालन करेगा। न तो मुझे घोड़ोसे काम है, और न श्रेष्ट रथोंसे । तातन जो वचन तुम्हें तीन बार दिया है, उसे मैं सौ बार देता है।" यह वचन कहकर, सुख और समृद्धिसे सपन्न उन्होने राज पट्ट भरतके सिरपर बाँध दिया। तदनन्तर, शत्रु-बलनाशक राम, मांने पूछकर वहां से आगे बड़ गये। व्यथित मन भरत भी, अपने अनुचगेके साथ पूज्य जिन-चैत्यमें पहुंचा। भरत तथा

६०
पउमचरित
घत्ता
विहुं मुणि-धवलहुं पास भरहे लइड अवग्गहु ।
'हिट' राहवचन्द महु गिवित्ति हय रजहाँ
[११]
एम चत्रवि उच्चलिउ महाइउ । राहव-जणणिह भवणु पराइड ||१||
विणउ करेप्पिणु पासु पटुकिउ । 'रामुमाएँ मई धरविण सक्किउ ॥२॥
हउँ तुम्हेवहिं आणवडिच्छउ । पेसणयारउ चलण-णियच्छउ' ।।३।।
धीरवि एम जणणि दणु - दमणौँ । भरहु णराहिउ गउ णिय-भवणहाँ॥४॥
जाणइ हरि हलहरु विहरन्तई । तिणि मि तावस-वणु सपत्तइँ ॥५॥
ताक्स के वि दिट जड - हारिय । कु-जण कु-गाम जेम जड-हारिय ॥६॥
के वि तिढाडि के वि धाडीसर । कुविय परिन्ट जेम धाडीसर ॥ ७ ॥
के वि
रुढङ्कुस - हत्था । मेटु जेम रुढङ्कस - हत्था ॥ ८॥
वत्ता
तहिं पइसन्ती सीय लक्खण-राम-विहूसिय ।
विहिँ पक्खेहिँ समाण पुण्णिम णा पदोलिय ॥६
[१२]
अण्णु वि थोवन्तर बिहरन्त । वणु धाणुक्कह पुणु सपत्तईं ॥ १ ॥
जहिं जणवउ मय-मत्थ - णियत्थउ । वरहिण-पिच्छ-पसाहिय हत्थउ ॥२॥
कन्द - मूल- बहु-वणफल - भुजउ । सिर-वड-माल वद्ध गल गुञ्जउ ॥३॥
जहिं जुवइड छुडु जाय विवाहउ । मयकरि-रय वलयविय-वाहउ ॥ ४॥
मयकरि - कुम्भु करेप्पिणु उक्खलु । लेवि विसाण-मुसलु धवलुजलु ॥५॥
मोत्तिय - चाउल - दलणोवइयउ । चुम्विय-वयणउ मयणभइयउ ॥६॥

चवीसमो संधि शत्रुन्न, दोनोंने धवल मुनिके पास जाकर यह प्रतिज्ञा ग्रहण की कि रामके देखनेपर (वनसे वापस आते ही।) हय और राज्यसे निवृत्त हो जायेंगे।" [११] (उक्त व्रत लेकर) भरतने वहाँसे प्रस्थान किया और वह सोधे रामको माताके भवनमे पहुंचे। पास जाकर उन्होंने विनय की, "मॉ, मै रामको नही ला सका, मै तुम्हारा आज्ञाकारी, सेवक और चरणोंका दास हूँ।" उन्हें इस तरह धीरज वॅधाकर, भरत अपने भवनको चले गये। इधर राम जानकी और लक्ष्मण तीनो ही घूमते हुए तापस वनमें जा पहुंचे। उसमें तरह-तरहके तपस्वी थे। वहाँ पर कितने ही तपस्वी जटाधारी दिखाई दिये जो कुजन और खोटे गॉवकी तरह-जड़हारिय (मूर्ख और जटाधारी) थे। कोई त्रिदंडी और धाड़ीश्चर थे जो कुपित राजाकी तरह धाड़ीसर (तीर्थ जानेवाले, जोरसे चिल्लानेवाले !!! ) कोई त्रिशूल हाथमे लिये रुद्र थे, जो महावतकी तरह रुद्राकुंश (अंकुश और त्रिशूल लिये थे। वहॉपर लक्ष्मण और रामसे विभूपित सीता इस प्रकार प्रतिष्टित हो रही थी जिस प्रकार समान दोनों पक्षोंके मध्य पूर्णिमा प्रतिष्टित हो ॥१-६।। [१२] थोड़ी दूर और आगे जानेपर उन्हें धानुक वन मिला, वहाँके लोग मृगचर्म और कांबलीसे अपनेको ढके हुए थे, उनके हाथ मोर पंखासे सजे थे। कंदमूल और बहुतसे वनफल ही उनका भोजन था. उनके सिरपर वटकी माला, और गलेमे गुज्जे पड़े थे। वहाँ युवतियोकी शादी छुटपनमें शीन हो जाती थी। उनके हाथोमे हाथीदांतकी चूड़ियाँ थीं। वे हाथियोके कुंभ- स्थलोंकी ओखलियोमें हाथीदांतके बने सफेद मूसलोसे मोतीरूपी चावलोंको कूट रही थी। कामसे उत्तेजित होकर वे शीघ्र मुँह

६
पउमचरित
त तेहउ वणु भिल्लहुँ केरउ । हरि-वलएवहिँ किउ विवरेरर ॥७॥
घत्ता
तं मल्लवि घरवार लोयहिं हरिसिय-देहहि ।
छाइय लक्खण-राम चन्द्र-सूर जिम मेहहिं ।।८।।
[१३]
स - हरि स-भज्जउ रामु धणुद्धरु । अण्णु वि जाम जाइ थोवन्तरु ॥१॥
दिट्ट गोट्टय गाउँ सु - वेस: । परवइ-मन्दिर सु-वेसइँ ॥२॥
जुज्मन्त ढेक्कार मुअन्तइँ । णलिणि-सुणाल-सण्ड तोडन्त: ॥३॥
कथइ वच्छ - हण णीसगइँ । पब्बइया व णिरु णीसङ्गई ॥४॥
कत्थइ जणवउ सिसिरे चचिउ । पढम-सूइ सिरे धरवि पणचिउ ॥५॥
कथइ मन्था - मन्थिय - मन्थणि । कुणइ सहु सुरए व विलासिणि ॥६॥
कत्थइ णारि - णियम्ब सुहासिउ । णावइ कुडउ कुणइ मुहवासिउ ॥७॥
कत्थइ डिम्भउ परियन्दिज्जइ । अम्भाहीरउ गेउ झुणिज्जई ॥८॥
घत्ता
तं पेक्खेप्पिण गोडु णारीयण-परियरियउ ।
णावइ तिहि मि जणेहिँ वालत्तणु संभरियउ ॥६॥
[१४]
त मेल्लेप्पिणु गोटु रवण्णउ । पुणु वणु पइसरन्ति आरण्णउ ॥ १ ॥
जं फल - पत्त - रिद्धि-सपण्णउ । तरल-तमाल-ताल- सछण्णड ॥२॥
वणं जिणालयं जहा स-चन्दणं । जिणिन्द-सासणं जहा स-सावयं ॥३॥
महा - रणङ्गणं जहा सवासणं । मइन्द-कन्धरं जहा स-केसर ।। ४ ।।
णरिन्द - मन्दिर जहा स-माउयं । सुसञ्च-णच्चियं जहा स-तालय ॥ ५ ॥

चउवीसमो संधि ३ चूम लेती थीं। भीलोकी ऐसी उस वस्तीमें राम और लक्ष्मणने निवास किया। उन्हें देखकर भील बहुत प्रसन्न हुए, और पुल- कित होकर उन्होंने उनकी कुटियाको ऐसे घेर लिया, मानो सूर्य और चन्द्रको मेघोने घेर लिया हो ॥१-८॥ [१३] भाई लक्ष्मण और पत्नी सीताके साथ थोड़ी दूर और जानेपर रामको सुवेश गोठ ऐसे दीख पड़े मानो शोभन द्वार और भंपन सहित राजभवन ही हों । कहीं पशु ढेक्कार ध्वनि करके लड़ रहे थे। कही पर सींग रहित बछड़े ऐसे जान पड़ते थे मानो निसंग (परिग्रह रहित) नये दीक्षित साधु ही हो । कहीं लोग दधिसे अर्चित थे, कही नई धानोंके अंकुरको सिरपर रखकर नाच रहे थे। कहीं मट्ठा विलोनेवाली मथानी, विलासिनी स्त्रीको सुरतिकी तरह मधुर ध्वनि कर रही थी, कहींपर नारी-नितम्ब ऐसे शोभित थे मानो मुख सुवासित नागवृक्ष ही हों। कहीं पालने में बच्चे झुलाये जा रहे थे। और उनकी सुंदर लोरियॉ सुनाई पड़ रही थीं। स्त्रियोंसे घिरे हुए उस गोठको देखकर, उन तीनोंको जैसे अपने वचपनकी याद आ गई ।।१-६।। [१४] उस गोठ स्थानको छोड़कर, भयानक वनके भीतर उन्होंने प्रवेश किया। वह वन फल और पत्तोंसे संपन्न था । तरला तमाल और तालके पेड़ोंसे आच्छन्न था। वह वन जिनालयके समान चंदन (चंदन और पीपल) से सहित था, जिनशासनकी तरह सावय (श्रावक और श्वापद-कुत्ता) से युक्त था । महायुद्धके आँगनकी तरह, वासन (मांस और वृक्षविशेप) से सहित था। सिंहके कंधेकी तरह, केशर (अयाल और एक वृक्ष लता) से युक्त था, राजभवनकी तरह माउय (मंजरी और वृक्ष विशेप) से सहित था, सुनिवद्ध नाटयकी तरह, ताल (ताल और इस नामका --

६४
पटमचरिट
६५
जिणेस - पहाणयं जहा महासरं । कु-तावसे तवं जहा मयासवं ॥ ६ ॥
मुणिन्द-जीवियं जहा स-मोक्खयं । महा-णहङ्गणं जहा स-सोमयं ॥ ७ ॥
मियङ्क - विम्वयं जहा मयासयं । विलासिणी-मुहं जहा महारसं 11
वत्ता
तं वणु मेल्लेवि ताई इन्द-दिसए आसण्ण' ।
मासहि चउरद्धेहि चित्तकूड वोलीगड़ें ।। ६ ॥
[५]
तं चित्तउड मुएवि तुरन्त । दसउरपुर- सीमन्तर पत्त ॥ १ ॥
विट्ठ महासन कमल - करम्विय । सारस-हसावलि-वग-चुम्विय ॥२॥
उजाण सोहन्ति सु - पत्तई । मुणिवर इव सु-हलाई सु-पत्तहुँ ॥३॥
सालित्रण पणमन्ति सु - भत्तई । णं सावयई जिणेसर - भत्तइँ ॥ ४॥
उच्छुवणई ढल - दोहर - गत्तई । गिय-वइ-लवणई व दुकलतइँ ॥५॥
पक्ष्य - णव - णीलुप्पल - सामहिं । तहिं पइसन्तहि लक्खण-रामहि ॥६॥
सीरकुडुम्बिउ मणुसु पदीसिउ । वुण्णु कुरड्ड व वाहुत्तासिउ ॥ ७ ॥
हडहड-फुट - सीसु चल - णयणउ । पाणकन्तु समुन्मड - वयण ॥ ८ ॥
घत्ता
सो णासन्तु कुमारे सुरवर-कीर-चण्डहि ।
आणिउ रामहाँ पासु धरवि स इं भुव- दण्डहिं ॥ ६ ॥

चउवीसमो संधि ६५ पेड़) से युक्त था। जिनेन्द्रके अभिपेककी तरह महासर (स्वर, और सरोवर) से सहित था। कुतापसके तपकी तरह, मदासव (मद्य और मृग) से युक्त था। मुनीन्द्रके वचनकी तरह, मोक्ष (मुक्ति और इस नामके वृक्ष) से सहित था। आकाशके आँगनकी तरह सोम (चंद्र और वृक्षविशेप) से सहित था। चंद्रविम्बकी तरह मयासय (मद और मृग) से आश्रित था, विलासिनीके मुखकी तरह महारस (लावण्य और जल) से युक्त था। उस वनको इसी तरह छोड़ते हुए वे लोग इन्द्रकी दिशामें अग्रसर हुए और दो माहमें ही चित्रकूटमे पहुँच गये ॥१-६।। [१५] चित्रकूटको भी तुरत छोड़कर उन लोगोंने दसपुर नगरकी सीमाके भीतर प्रवेश किया। वहाँ उन्हें कमलोंसे भरा सरोवर मिला। वह सरोवर सारस हंसमाला और वगुलोंसे चुम्बित हो रहा था । उद्यान बढ़िया पत्तोंसे शोभित थे, मुनिवरों- की तरह जो अच्छे फलों और पत्तोंवाले थे, सुविभाजित शालि उपवन सुभक्तकी तरह ऐसे प्रणाम कर रहे थे मानो जिन-भक्तिसे भरे हुए श्रावक हो। लम्चे आकारवाले ईखके वन खोटी स्त्रीकी तरह, णियवइ (पति और वाटिका) का उल्लंघन कर रहे थे। कमल और नव नीलोत्पलके समान राम और लक्ष्मणने उसमे प्रवेश करते हुए एक सीरकुटुम्बिक नामके आदमीको देखा। वह शिकारीसे भयभीत हिरनकी तरह विपन्न था। उसके बाल विखरे हुए थे और आखें चंचल । उसके प्राण सहमे-से थे और चेहरा विद्रूप था । कुमार लक्ष्मण, सूडके समान प्रचंड अपने हाथों पर, मरते हुए उसे उठाकर रामके पास ले आये ॥१॥ ॥

२५. पञ्चवीसमो संधि धणुहर-हत्यण दुव्वार-वइरि-आयामे । सीरकुडुम्बिउ मम्मीसवि पुच्छिउ रामें ॥ १ ॥ [१] दुद्दम-दाणविन्द-महण-महाहवेणं । भो भो किं पिसन्थुलो वुत्तु राहवेण ॥ १ ॥ त णिसुणेवि पजस्पिउ गहवइ । वजयण्णु णामेण सु-गरवइ ॥२॥ सीहोयरहों भिन्चु हियइच्छिउ । भरहुव रिसहहों आणवडिच्छिउ ।।३।। दसर - णाहु जिणेसर - भत्तउ । पियवद्धणह पास उवसन्त ॥४॥ जिणवर - पढिमङ्गुट' लेप्पिणु । अण्णहों णवइण णाहुमुएप्पिणु ॥५॥ ताम कु-मन्तिहिं कहिउणरिन्द्रहों। "पइँ अवगणविणवइ जिणिन्दों"॥६॥ तं णिसुणेवि वयणु पहु कुद्धउ । णं खय-काल कियन्तु विरुद्धउ ॥७॥ सीहोयरु । ण गिरि-सिहर मइन्द-किसोयरु ॥८॥ 'जो मई मुऍवि अण्णु जयकारइ । सो कि हय गय रज्जु ण हारइ ॥६॥ घत्ता अह किं वहुऍण कल्लएँ दिणयर अत्यन्तएँ। जइ ण वि मारमि तो पइसमि जलणे जलन्तएँ ॥१०॥ [२] पइज आहवे अभो। ताम पटु चोरु णामेण विजुलङ्गो ॥ १ ॥ पइसन्ते त्यहि मझयाले । अलिउल-कज्जल-सण्णिह-तमाले॥२॥ ते दिडु णराहिउ विप्फुरन्तु । पलयाणलो व्व धगधगधगन्तु ॥३॥ कोवाणल - पलितु करेवि जाम २५. पच्चीसवीं सन्धि दुर्वार वैरीके लिए समर्थ, हाथमें धनुप लिये हुए रामने, अभय देकर सीरकुटुम्बिकसे पूछा। [१] दुर्दम दानवेंद्रका मर्दन करनेवाले सहायोधा रामने उससे पूछा, “तुम विपन्न क्यों हो ?” यह सुनकर वह गृहपति बोला-"वनकर्ण नामका एक अच्छा राजा है, वह सिहोदरका उसी तरह अधीन अनुचर है जिस तरह भरत ऋपम जिनका आज्ञाकारी था। "दशपुरका वह शासक जिनेन्द्र-भक्त है। एक वार उसने प्रियवर्धन मुनिके पास, जिन-प्रतिमाका अंगूठा छूकर यह प्रतिज्ञा की कि मैं जिनवरको छोड़कर किसी दूसरेको प्रणाम नही करूँगा। यह वात किसी (चुगलखोर) कुमंत्रीने जाकर राजा सिहोदरसे जड़ दी कि वज्रकर्ण आपकी अवहेलना करके केवल जिनकोही नमस्कार करता है। यह सुनकर राजा सिंहोदर क्रोधको आगसे ऐसे उबल पड़ा मानो किसी पर्वतकी चोटीपर कोई सिंह- शावक ही गरजा हो। उसने कहा, "जो मुझे छोड़कर किसी दूसरेकी जय करता है, उसे अपने हय गय राज्यसे क्यो न वंचित किया जाय । अधिक कहनेसे कोई लाभ नहीं। यदि कल सूर्यास्त होनेके पहले मैं उसे न मार पाया तो (निश्चय) ही आगमें प्रवेश- कर लेगा।" ॥१-१०॥ [२] युद्धमे अक्षत सिंहोदर जब यह प्रतिज्ञा कर ही रहा था कि विद्युदंग नामका चोर (उसके महलमे) घुस आया । भ्रमर- समूह या काजलकी तरह अत्यंत कालो उस मध्य निशामें प्रवेश करते हुए विद्युदंगने राजा सिंहोदरको प्रल्याग्निकी तरह धधकते

६८
पउमचरित
रोमञ्च - कञ्चु - कञ्चुइय
देहु । जल-गन्भिणु णं गज्जन्तु मेहु ॥ ४ ॥
सण्णद्ध - बद्ध - परियर - णिवन्धु ! रण-भर-धुर-धोरिट दिण्ण-खन्धु ॥५॥
वलिवण्ड-मण्ड - णिड्डरिय - णयणु । ढट्ठोटु सुटु-विप्फुरिय - वयणु ॥ ६ ॥
"मारवड रिड' जम्पन्तु एम । खय-काल सणिच्छरु कुविउ जेम ॥७॥
'त पेक्सवि चिन्तइ भुभ - विसालु । "किं मारमि णं ण सामिसालु ॥८॥
साहम्मिय - वच्छलु किं करेमि । सन्वायरेण गम्पिणु कहेमि" ॥ ६ ॥
गउ एम भणवि कण्टइय - गत्तु । णिविसद्ध दसउर-णयरु पत्तु ॥ १० ॥
घत्ता
छुडु अरुणुग्गम सो विजुलड्नु धावन्तउ ।
दिलु गरिन्द्रण जस-पुञ्ज गाई आवन्तउ ॥११॥
[३]
पुच्छिड वजयण्णण हसेवि विजुलडो ।
"भो भो कहिँ पय? बहु-वहल-पुलझ्यनो" ॥१॥
तं णिसुणेप्पिणु वयण - विसाले । बुच्चइ वजयण्णु कुसुमाले ॥२॥
"कामलेह - णामेण विलासिणि । तुङ्ग-पओहर जण-मण-भाविणि ॥३॥
तह आसत्तर अस्थ - विवजउ । कारण मणि-कुण्डलहें विसज्जिउ ॥४॥
पुणु विज्जाहर - करणु करेप्पिणु । गउ सत्त वि पायार कमेप्पिणु ॥५॥
किर वर - भवणु पईसमि जावहिं । पइज करन्तु राउ सुउ तावहिं ॥६॥
हउँ वयणेण तेण आदण्णउ । वहइ बज्जयण्णु उच्छण्णउ ।। ७ ।।
साहम्मिउ जिण - सासण - दीवउ । एम भणेप्पिणु वलिउ पडीवउ ।।८॥
पूर्ण
वि वियड - पय-छोहहिँ धाइड । णिविस तुम्हहुँ पासु पराइउ ॥ ६ ॥
घत्ता
कि ओलग्गएँ जाणन्तु वि राय म मुज्झहि ।
पाण लएप्पिणु जम णासहि रण जुज्झहि ॥ १० ॥

पञ्चवीसमो संधि ६६ हुए उद्दोम देखा। उसका शरीर रोमांचसे कटीला हो रहा था। वह इस प्रकार गरज रहा था मानो सजल मेघ ही गरज रहा हो । अत्यंत समर्थ उसने समूचा परिकर वॉध रखा था। युद्धकी सामग्रीसे सजी हुई सेना तैयार खड़ी थी। उसके नेत्र (सचमुच) बलशाली जबर्दस्त और डरावने थे। वह अपने होंठ चवा रहा था। उसका चेहरा तमतमा रहा था। क्षय कालके शनि देवता को तरह अत्यन्त क्रुद्ध वह कह रहा था कि शत्रु को मारो। तब विद्युदंगने सोचा कि मै इसे मार दूं। नहीं नहीं, यह श्रेष्ठ स्वामी है, पर वज्रकण भी मेरा साधर्मी भाई है। तब क्या करना चाहिए । क्या फौरन जाकर उसे बता दूं । यह विचार कर पुलकित शरीर वह चल पड़ा। आधे ही पलमे दशपुर पहुँच गया। सूर्योदय वेलामें राजा वनकर्णने देखा कि विद्युदंग इस तरह दौड़ता हुआ आ रहा है, मानो उसका यशपुंज ही हो ॥१-११|| [३] वज्रकर्णने हँसकर उससे पूछा "इतने अधिक प्रसन्न और पुलकित कहाँसे आ रहे हो"। यह सुनकर, विशालमुख विद्युदंग चोर ने कहा, "तुंग पयोधरा और जनमनको लुभानेनाली, कामलेखा नाम की एक वेश्या है । मैं उस पर आसक्त हूँ। पर धनके अभाव में जब मैं उसके लिए मणिकुंडल नहीं वनवा सका तो उसने मुझे ठुकरा दिया । तब मै मन्त्रका प्रयोग कर, सातों ही परकोटोको लांघता ( राजा सिहोदर) के महलमें घुस गया। घुसते ही राजा सिहोदरकी प्रतिज्ञा सुनकर मै विकल हो उठा । (मै समझ गया) कि अब वज्रकर्णका अन्त होने वाला है। यह सोचकर कि तुम साधर्मी और जिनधर्मके दीपक हो, मै (यह कहनेके लिए) लौट पड़ा। और परक्षोभसे दौड़कर पलमात्रमे तुम्हारे पास आया । उसकी सेवामे क्या रक्खा है। यह समझ लो और उससे ऐसा युद्ध करो कि वह समाप्त हो हो जाय ॥१-१०॥

७० पउमचरित [५] अहवइ काई बहु जस्पिएण राया । पर-वल पेक्खु पेक्खु उट्ठन्ति धूलि-छाया ॥१॥ पेक्खु पेक्खु आवन्तर साहणु । गलगज्जन्तु महागय - वाहणु ॥ २ ॥ पेक्खु पेक्खु हिसन्ति तुरङ्गम । णहयले विउल भमन्ति विहङ्गम ॥३॥ पेक्खु पेक्खु चिन्धई धुव्वन्त' । रह-वाकई महियले खुप्पन्तई ॥ ४ ॥ पेक्खु पेक्खु वजन्तई तूरइ । णाणाविह-णिणाय - गम्भीरइ ॥ ५ ॥ पेक्खु पेक्खु सय सङ्घ रसन्ता । णाई सदुक्खुउ सयण रुअन्ता ॥६॥ पेक्तु पेक्खु पचलन्तड णरवइ । गह-शक्खत्त-मज्झ सणि णावई" ॥७॥ दसउर • णाहु णिहालइ जाहिँ । पर-बलु सयलु विहावइ तावहिं ॥८॥ “साहु साहु" तो एम भणेप्पिणु । विजुलगु णिउ आलिङ्गेप्पिणु ॥ ६ ॥ थिउ रण-भूमि पसाहवि जावहिं । सयलु वि सेण्णु पराइउ तावहिँ ॥१०॥ घत्ता अमरिस-कुद्धहि चउपासहिं णरवर-विन्दहिं । वेड्डिर पट्टणु जिम महियलु चउहि समुहिं ॥ ११ ॥ [५] किय जय सारि-सज्ज पक्खरिय वर-तुरङ्गा। कवय-णिवद्ध जोह अभिट्ट पुलइयङ्गा ॥ १ ॥ अभिटु जुन्छु विण्ह वि वलाह । अवरोप्परु वड्ढय-कल्यलाहँ ॥ २ ॥ तुर कोलाहलाहं । उचसोह-वडाविय-मयगलाहे ॥३॥ मुक्तकमेक सम्वलाह । भुअ-छिण्ण-भिण्ण-वच्छत्थलाह ॥४॥ लोहाविय धय - मालाउलाह । पडिपहर - विहुर-विहलइलाहं ॥५॥ णिड्डरिय णयण - डसियाहराह । असि-मस-सर-सत्ति-पहरण-धराह।। सुपमाण - चाव - कड्डिय - कराह । गुण-दिद्वि-मुठि-सन्धिय-सराहँ ॥७॥ दुग्योह श्र लोहावणाह। कायर - णर-मण-सतावणा: ॥ ८ ॥ वजन्त - - सर पञ्चवीसमो सन्धि [४] अथवा इस तरह वहुत कहनेसे क्या लाभ ? देखो देखो, राजन्, शत्रु-सेनाकी धूलि छाया उठ रही है । देखो देखो, सेना आ रही है । महागजोंके वाहन गरज रहे है। देखो, देखो, घोड़े हींस रहे है और पक्षी आकाशमें उड़ रहे है । देखो देखो, पताकाएँ उड़ रही हैं और रथ-चक्र धरतीमें गड़े जा रहे हैं। देखो देखो, नाना स्वरोसे गंभीर तूर बाजे बज रहे हैं और सैकड़ों शखोंकी ध्वनि हो रही है मानो दुखी स्वजन ही रो रहे हो। देखो देखो, नरपति ऐसे चला आ रहा है, मानो ग्रह और नक्षत्रोंके बीचमे शनि ही हो ।” दशपुर-स्वामी वज्रकर्णने ज्यों ही मुड़ा, तो उसे शत्रु सेना आती हुई दिखाई दी। “साधु-साधु" कहकर उसने विद्युदंग को अपने हृदयसे लगा लिया। सज्जित होकर जैसे ही वह रणक्षेत्रमें पहुंचा वैसे ही समस्त सेना आ पहुँची । अमर्ष और क्रोधसे भर राजाओने नगरको चारों ओरसे वैसे ही घेर लिया जैसे समुद्र धरती को घेरे हुए है ॥ १-११ ॥ [५] अम्बारीसे सजे हाथी और कवच पहने घोड़े तैयार थे। सनद्ध योधा पुलकित होकर भिड़ गये। दोनो दलोंमें लड़ाई ठन गई । बजते हुए नगाड़ोका कोलाहल होने लगा। हाथी फूलोंसे सजे हुए थे। वे एक दूसरे पर सव्वल और वाण फेक रहे हाथोंसे वक्षःस्थल छिन्न-भिन्न हो रहे थे। पताकाओकी पंक्तियाँ लोट-पोट हो रही थीं। प्रहार और प्रति प्रहारोसे सैनिक खिन्न और विकलांग हो रहे थे। दोनोके नेत्र भयंकर थे। उनके ओठ कॉप रहे थे। तलवार झष सर और शक्ति आदि आयुधोंसे दोनों ही लैस थे। वे डोरी खीचे हुए और तलवार निकाले हुए थे। उनकी दृष्टि डोरी मुट्टी और तीरोंके संधान पर थो। गजघटाओंको लोट- पोट कर देनेवाले वे कायरोके मनको अधिक सताने वाले थे।

पउमचरित जयकारहों कारण दुद्धराह । रणु वन्जयपण - सीहोयराह ॥ ६ ॥ घत्ता विहि मि भिडन्तहिं समरगण दुन्दुहि वजइ । विहि मि णरिन्दहॅ रणे एकु वि जिणइ ण जिजइ ॥ १० ॥ [६] "हणु हणु [हणु]" भणन्ति हम्मन्ति आहणन्ति । पउ वि ण ओसरन्ति मारन्ति रण मरन्ति ॥ १॥ उहय-वहिँ पडियग्गिम - खन्धइँ । उहय-वहिँ णञ्चन्ति कवन्धइँ ॥२॥ उहय-वहिँ मुसुमूरिय धयवड । उहय-बहिं लोटाविय भड-थड ॥३॥ उहय-चलहिं हय गय विणिवाइय । उहय-वलहिं रुहिरोह पधाइय ॥४॥ उहय-वहिं णित्तंसिय खग्गई। उहय वलहिं डेवन्ति विहङ्गइँ ॥ ५ ॥ णीसह तूरइँ । उहय-वलई पहरण-खर-विहुरइ ॥६॥ उहय-चल गय-दन्तहिं भिण्ण: । उडय-वलइ रण-भूमि-णिसण्णइ ॥७॥ उहय-वलई रुहिरोल्लिय - गत्तई। हक्क-डक्क-लल्लक मुअन्त: ॥ ८ ॥ एम पक्खु चट्टइ सद्भामहों । अक्खइ सीरकुडुम्बिउ रामहाँ ॥६॥ घत्ता तं णिसुणेप्पिणु मणि-मरणय-किरण-फुरन्तर दिण्णु ज हत्थण कण्ठउ कडउ कडिसुत्तउ ॥ १० ॥ [७] पुणु संचल्ल वे वि वलएव-वासुएवा । जाणइ-करिणि-सहिय गय गिल्ल-गण्ड जेवा ॥१॥ चाव-विहत्थ महत्थ महाइय । सहसकूडु जिणभवणु पराइय ॥२॥ जं इटाल - धवल - छुह - पङ्किउ । सजण-हियउ जेम अकलङ्कित ॥३॥ जं उत्तुङ्ग - सिहरु सुर - कित्तिउ । वण्ण-विचित्त-चित्त-चिर-वित्तिउ॥४॥ उहय-चलहि ।

पञ्चवीसमो संधि वनकर्ण और सिहोदर दोनोंका विजयके लिए अत्यन्त कठोर युद्ध हो रहा था। युद्ध छिड़ने पर दोनोकी दुंदुभि बज रही थी । उन दोनों राजाओंमें से एक भी न तो जीत रहा था और न जीता जा रहा था ।। १-१०॥ [६] योधा 'भारो मारो' कहकर, मरते और मारते, परन्तु वे एक भी कदम पीछे नहीं हटाते थे, भले ही युद्ध में मारते-मारते मरते जा रहे थे। दोनों ही दल आगे बढ़ते हुए धड़ोको नचा रहे थे। दोनों दलोंने एक दूसरेके ध्वजपटोंको मसल दिया। भट- समूह को गिरा दिया, और अश्व-गजोको भूमिसात् कर दिया । रक्तकी धारा प्रवाहित हो उठी। दोनो दलोंने अपनी अपनी तीखी तलवारे निकाल ली, दोनोने पक्षियोको कॅपा दिया। दोनों दलोने अपने तीखे प्रहारोसे ढुंदुभियोको छिन्न-भिन्न कर, निःशब्द कर दिया । हाथियोके दंतप्रहारसे दोनो छिन्न-भिन्न हो गये। दोनो दल युद्धभूमिमें सो-से गये। दोनों दल रक्तरंजित शरीर थे। दोनों दल, एक दूसरे पर हुंकारते ललकारते और चुनौती देते हुए मरने लगे।" सोरकुटुम्बिकने रामसे कहा, "इस प्रकार युद्ध होते-होते एक पखवाड़ा हो गया है कि यह सुनकर रामने उसे अपने हाथ से मणि और हीरोकी किरणोंसे जगमगाता हुआ कंठहार तथा कटक और कटिसूत्र दिया ॥१-१०॥ [७ ७] फिर वे दोनो ( वासुदेव और वलभद्र) सीताको साथ लेकर उसी प्रकार चले जिस प्रकार मत्तगज हथिनीको साथ लेकर चलता है। हाथमें धनुप लिये, परम आदरणीय राम सहस्रकूट जिन-भवनमें पहुंचे, वह जिन-भवन ईटों और सफेद चूनासे निर्मित, सजनके हृदयके समान निष्कलंक था। उसकी शिखरे देवोंकी कीर्तिकी तरह ऊँचो थौं । विविध और चित्र-विचित्र

परमचरिउ
तं जिणभवणु णियवि परितु । पयहिण देवि ति-चार वइट्टई ।।५।।
तहिं चन्दप्पह-विम्वु णिहालिड । जं सुरवरतरु-कुसुमोमालिउ ॥ ६ ॥
जं णागेन्द - सुरेन्द्र - णरिन्दहिँ । वन्दिउ मुगि-विजाहर-विन्दहि ॥७॥
दिडु सु-सोहिउ मोम्मु सु-दसणु । अण्णु मि सेय-चमरु सिहासणु ॥८॥
भा-मण्डलु । लच्छि-विहूसिउ वियड-उरत्थलु ॥६॥
छत्त-त्तउ असोट
सभव
धत्ता
कि वहु (ए) चविऍण जग को पडिविम्वु उविजइ ।
पुणु वि पडीवउ जइ णाह णाहुवमिजइ ॥ १० ॥
[८]
ज जग - णाहु दिटु वल - सीय • लक्खणेहि ।
तिहि मि जणेहि वन्दिओ विविह - वन्दणेहि ॥ ३ ॥
'जय रिसह दुसह - परिसह-सहण । जय अजिय अजिय-चम्मह-महण ॥२॥
संभव - णिहलण । जय अहिणन्दण णन्दिय • चलण॥३॥
जय सुमइ - भडारा सुमइ - कर । पउमप्पह पउमप्पह - पवर ॥ ३ ॥
जय सामि सुपास सु - पास - हण । चन्दम्पह पुण्ण-चन्द - वयण ॥ ५॥
जय जय पुप्फयन्त पुप्फञ्चिय । जय सीयल सीयल-सुह-संचिय ॥६॥
जय सेयङ्कर सेयस जिण । जय वासुपुज पुजिय-चलण ॥ ७ ॥
जय विमल - भडारा विमल - मुह । जय सामि अणन्त अणन्त-सुह ॥८॥
जय धम्म - जिगेसर धम्म - धर । जय सन्ति-भडारा सन्ति-कर ॥ ६ ॥
जय कुन्थु महत्थुइ-थुअ-चलण । जय अर-अरहन्त महन्त-गुण ॥१०॥
जय मल्लि महल्ल - मल्ल - मलण । मुणि सुन्वय सु-व्वय सुद्ध-मण' ॥११॥

पञ्चवीसमो संधि रंगोसे चित्रित उस जिन-भवनको देखकर, राम वहुत संतुष्ट हुए । वह तीन प्रदक्षिणा देकर बैठ गये। वहाँ उन्होंने चन्द्रप्रभुकी अत्यंत शोभित दर्शनीय और सौग्य प्रतिमाके दर्शन किये । वह प्रतिमा कल्पवृक्षके फूलोसे अर्चित और नागेन्द्र सुरेन्द्र नरेन्द्र मुनि तथा विद्याधरो-द्वारा बंदित थी। और भी उन्होंने वहॉ, सफेद चमा, सिहासन, छत्र, अशोकवृक्ष तथा विस्तीर्ण शोभासे अंकित भामंडल देखा। बहुत कहनेसे क्या, जगमें कैसी भी प्रतिमा स्थापित हो जाय, फिर भी भगवानसे उसकी उपमा नहीं दी जा सकती || १-१०॥ [८] राम लक्ष्मण और सीताने जगन्नाथ-जिनके दर्शन कर विविध वंदनाओंसे उनकी भक्ति प्रारम्भ की, “दुःसह परिपहोको सहन करने वाले ऋपभ, आपकी जय हो। अजेय कामका दलन करने वाले अजितनाथकी जय हो। जन्मनाशक संभवनाथकी जय हो। नंदितचरण अभिनंदनकी जय हो। सुमतिदाता भट्टारक सुमतिकी जय हो। पद्मकी तरह कीर्तिवाले पद्मनाथकी जय हो। बंधन काटने वाले सुपार्श्वनाथकी जय हो । पूर्णचन्द्रकी तरह मुख वाले चंद्रप्रभुको जय हो। फूलोसे अर्चित, पुष्पदन्तकी जय हो, शीतलसुखसे अंचित शीतलनाथकी जय हो । कल्याणकर्ता श्रेयांस- नाथकी जय हो । पूज्यचरण वासुपूज्यकी जय हो। पवित्रमुख भट्टारक विमलकी जय हो। अनंतसुखनिकेतन अनंतनाथकी जय हो। धर्मधारी धर्मनाथकी जय हो । शांतिदाता भट्टारक शांतिनाथ की जय हो । महास्तुतियोंसे वंदित-चरण कुंथुनाथकी जय हो । महागुणोसे संपन्न अरहनाथकी जय हो। बड़े-बड़े योधाओंको पछाड़ने वाले मल्लिनाथको जय हो। सुव्रती और शुद्धमन मुनि- सुव्रतकी जय हो। इस प्रकार वीस जिनवरोंकी वंदना करके

पउमचरित
वत्ता
वीस वि जिणवर वन्देप्पिणु रामु वईसइ ।
जहिं सीहोअरु त णिलउ कुमार पईसइ ॥ १२ ॥
[]
ताम णरिन्द - वारे थिर थोर - वाहु - जुअलो।
सो पडिहारु दिदु सदृत्य - देसि - कुसलो ॥ १ ॥
पइसन्तु सुहड ते धरिड केम । णिय-समएं लवणसमुदु जेम ॥२॥
तं कुविउ वीरु विप्फुरिय - वयणु । विहुणन्तु हत्थ णिडरिय-णयणु ॥३॥
मण चिन्तइ वहरि - समुह - महणु । 'किं भारमि णं णं कवणु गहणु' ॥४॥
ग3 एम भणवि भुइ - दण्ड-चण्डु । णं मत्त-महागउ गिल्ल-गण्डु ।। ५॥
तं दसउर - जयरु पइडु केम । जण-मण-मोहन्तु अणमु जेम ॥ ६ ॥
दुचार - वहरि - सय - पाण-चोरु । णीसरिउ णाई केसरि-किसोरु ॥७॥
जं लक्खणु लक्खिर राय • वार । पडिहारु वुत्तु 'मं मं णिबारे ॥६॥
तं वयणु सुणेवि पइदु वीर । चक्कवइ-लच्छि-लन्छिय - सरीरु ॥६॥
घत्ता
दसउर - गाहण लक्खिजइ एन्तउ लक्खणु ।
रिसह - जिणिन्दण णं धम्मु अहिसा - लक्खण ॥१०॥
[१०]
हरिसिउ वजयण्ण दिहण लक्खणेण ।
पुणु पुणु णेह - णिन्भरो चविउ तक्खणेणं ॥ १ ॥
'कि देमि हस्थि रह पुरय - थट्ट । विच्छुरिय-फुरिय-मणि-मउड-पह ॥२॥
कि बत्यहिँ कि रयणेहिं कजु । किं णस्वर-परिमिउ देमि रज्जु ॥३॥
किं देमि स - विभमु पिण्डवासु । कि स-सुउ स-कन्तउ होमि दासु' ॥४॥
त वयणु सुगवि हरिसिय - मणेण । पडिबुत्तु णराहिउ लक्खणेण ॥ ५ ॥

पञ्चवीसमोसंधि राम वहीं बैठ गये। परन्तु लक्ष्मण उस भवनमें घुसे जहाँ सिंहादर था ॥ १-१२॥ ६] इतनेमे राजाके द्वारपर एक प्रतिहार दिखाई दिया। स्थिर और स्थूल वाहुओं वाला वह शब्द अर्थ और देशी बोलीमें वड़ा कुशल था। आते हुए इस सुभटको उसने उसी तरह पकड़ लिया जिस तरह लवण-समुद्रको उसकी वेला ग्रहण करती है। इससे वह कुपित होकर तमतमा उठा। वह हाथ हिलाने लगा। उसके नत्र भयानक हो उठे। शत्रु-समुद्रका मथन करनेवाला वह (लक्ष्मण) मनमे सोचने लगा, "क्या मार दूं, नहीं, नहीं इससे क्या मिलेगा?' यही विचारकर बाहुओंसे प्रचंड, वह भीतर ऐसे चला गया मानो भरते गंडस्थल वाला मत्त महागज हो।" इसके बाद लक्ष्मणने दशपुर-नगरमे वैसे ही प्रवेश किया जैसे, कामदेव आते ही जन-मन मुग्ध कर देते है । दुर्वार सैकड़ो शत्रुओ के प्राणोंको चुराने वाला वह सिंहके बच्चेकी तरह निकल पड़ा। जैसे ही लक्ष्मणको राजद्वारपर देखा, प्रतिहारने कहा, "मत रोको, आने दो।" यह वचन सुनकर, चक्रवर्तीकी लक्ष्मीसे लांछित शरीर लक्ष्मण प्रविष्ट हुआ। दशपुर-नरेश बज्रकर्णने लक्ष्मणको आते हुए उसी तरह देखा जैसे ऋषभ जिनन अहिंसा धर्म- को देखा था।॥ १-१०॥ [१०] लक्ष्मणको देखकर वनकर्ण बहुत प्रसन्न हुआ। बार-बार नहले वह उसी नण वोला-"क्या हूँ, हाथी, रथ और या का समूह या चमकते हुए मणियोका मुकुटपट्ट ? क्या आपको चलो और रनोने काम है ? क्या आपको भेष्ट मनुष्योसे युक्त राज्य हूँ ? क्या सम्भ्रात सेवक दूं ? या पुत्र तथा पत्री सहित में ही तुम्हारा सेवक बन जाऊँ।" ये

७८
पउसचरिउ
'कहिँ मुणिवरु कहिं संसार-सोखु । कहिँ पाव-पिण्ड कहिं परम-मोक्षु ॥६॥
कहिँ पायउ क्थु कुडुक्क - वयण । कहिँ कमल-सण्डु कहि विउलु गयणु।७
कहिं मयगल हलु कहिँ उह घण्ट । कहिँ पन्थिउ कहिँ रह-तुरय-थट्ट ॥८॥
तं वोल्लहि ज ण बडइ कलाएँ । अम्हई वाहिय मुक्खए खलाएँ ॥६
वत्ता
तुहुँ साहम्मिउ दय - धन्मु करन्तु ण थक्वहि ।
भोयणु मग्गिउ तिहुँ जणहुँ देहि जइ लकहि ॥ ११ ॥
[११]
बुच्चइ वजयण्णण सजल - लोयणे ।
'मग्गिउ देमि रज्जु कि गहणु भोरणेणं' ॥१॥
एम भणेप्पिणु अण्णुच्चाइउ । णिविसं रामहों पासु पराइउ ।।२।।
खण कचोल थाल ओयारिय परियल-सिप्पि-सव वित्यारिय ॥३॥
बहुबिह - खण्ड - पयारहिं वट्टिड । उच्छु-वण पिव मुह-रसियट्टिउ ॥४॥
उजाणं पिव सुटु सुअन्धउ । सिद्धहाँ सिद्धि-सुहं पित्र मिद्धट ||५||
रेहइ असण-वेल बलहहहाँ। गाउँ विणिग्गय अमय-समुहहाँ ॥६॥
धवल - प्पउर-कूर - फेणुज्जल । पेजावत्त दिन्ति चल
दिन्ति चल चन्चल ७॥
घिय-कल्लोल-बोल पवहन्ती । तिम्मण - तोय - तुसार मुअन्ती ॥८॥
सालण-सय-सेवाल-करम्विय । हरि-हलहर - जलयर-परिचुम्विय ॥६॥
घत्ता
कि वहु-त्रविऍण सच्छाउ सलोणु स-विजणु ।
इट-कलत्तु व तं भुत्तु जाहिच्छएँ भोयणु ॥३०॥

पञ्चवीसमो संधि । वचन सुनकर प्रसन्नचित लक्ष्मणने राजासे कहा, "कहाँ मुनिवर कहाँ पंसाग्मुख, कहाँ पापपिंड और कहाँ परम मोक्षसुख ! कहाँ प्राकृत और कहाँ कुडुक-कौतुक वचन ! कहाँ कमलोंका नमूह और कहाँ व्यापक आकाश ! कहाँ मदमाते हाथीकी घंटी और कहाँ ऊँटका घंटा! कहाँ पथिक और कहाँ रथ-घोड़ोंका समूह ! वह वान कहिए जो एक भी कलासे कम न हो, हमलोग दुष्ट सुधागे बाधित हो रहे है । तुम-सा धर्माजन ही दयाधर्म करने मे नहीं चूकते । भोजन मॉगता हूँ यदि हो सके तो तीन आदमियों- का भोजन दो ॥१-१०॥ [११] तत्र वनकर्णने सजल नेत्रोसे कहा, "भोजन ग्रह्ण कनिकी क्या बात ? मांगो तो राज्य भी दे सकता हूँ।" यह का कर अन्न (भोजन) लेकर वह पल भर में रामके निकट जा पांचा। एक क्षणमे उसने कटोरे और थाल रख दिये । अन्न- भांड और तृणके बने आसन बिछा दिये। सब प्रकारके व्यंजनो मबह भोजन उत्तम था। वह ईख वनकी तरह मधुर रससे भरा था. उमानकी नरह अत्यन्त मुगन्धित था, और सिद्धाके सिद्धिसुख की नगर सिद्ध था । बलभद्र गमकी भोजन-बेला ऐसी सोह रही थी माना वह अमृतसमुद्रसे ही निकली हो । वह, धवलपूर और करके पनो सवल थी। उसमें पेयोंके चंचल आवर्त उठ रहे थे। घीकी स्टारगंगा नगृह बह रहा था। कढ़ीका जल और तुपार प्रकट हो हा या! नालनल्पी नैकड़ों शबालोसे वह अंचित थी । और वह समाहलधर (गम और लक्ष्मण) रूपी जलचरोंसे चुम्बित हो गोधी । अधिका कहनने क्या, उन्होंन, इष्टकलत्रके समान, माय (गन्दर कान्निवाला). नलोण (सुन्दरता और नमक) मांजन (पकवान और अलंकार) सुन्दर भोजन यथेच्छ- पउमचरित [१२] भुवि रामचन्देण पणिो कुमारो। 'भोयणु ण होइ ऍउ उवयार-गरुअ-भारो ॥१॥ पडिउवयारु कि पि विषणासहि । उभय- भय-वलहि अप्पाणु पगासहि ॥२॥ त सीहोयरु गम्पि णिवारहि । अद्धे रजहाँ सन्धि समारहि ॥३॥ बुञ्चइ भरहे दूर विसजिउ । दुजउ वजयण्णु अपर जिउ ॥४॥ तेण समाणु कवणु किर विग्गहु । जे आयामिउ समर परिग्गहु ॥५॥ तं णिसुणेवि वयणु रिउ-महणु । रामहाँ चलहिं पडिउ जणहणु ॥६॥ 'अज्जु कियत्थु अज्जु हउँ धण्णउ । ज आएसु देव पई दिण्णउ' ॥७॥ एम भणेवि पया महाइउ । गउ सीहोयर-भवणु पराइउ ॥८॥ मत्त-गइन्दु जम गलगन्जवि । तं पडिहारु करग्गे तज्जवि ॥६॥ पत्ता तिण-समु मण्णेवि अस्थाणु सयलु अवगणवि । पइछु भयाणणु गय-जूहें जेम पञ्चाणणु ॥१०॥ [१३] अमरिस-कुन्द्धएण वहु-भरिय-मच्छरेण । सीहोयरु पलोइमो जिह सणिच्छरेण ॥१॥ कोवाणल - सय - जाल - जलन्ते । पुणु पुणु जोइउ णाई कयन्ते ॥२॥ जउ जउ लक्खणु लक्खइ समुहु । तउ तउ सिमिरु थाइ हेठ्ठा-मुहु ॥३॥ चिन्तिउ 'को वि महा-बलु दीसइ । णउ पणिवाड करइ णउ वइसई' ॥४॥ तं जि णिमित्तु लएवि कुमारे । युत्तु राउ 'कि वहु-वित्थारे ॥५॥ भरह-णरिन्हें । करइ केलि को समउ मइन्हें ॥६॥ को सुर-करि-विसाण उप्पाडइ । मन्दरसेल-सिन को पाडइ ॥७॥ कोऽमयवाहु करग्गे ढकइ । वज्जयण्णु को मारेंवि साइ ॥८|| सन्धि करहाँ परिभुञ्जहाँ मेइणि । हियय-सुहरि जिह वर-कामिणि ॥६] एम विसज्जिर

पञ्चवीसमो संधि
[१२] भोजन करनेके उपरान्त रामने लक्ष्मणसे कहा-
"यह भोजन नहीं किन्तु तुम्हारे ऊपर उपकारका बहुत भारी
भार है, इनका कोई प्रत्युपकार करो । (न हो तो) दोनों सेनाओं-
में अपने आपको प्रकट करो। जाकर सिहोदरको रोको और
आधे राज्यकी शर्तपर उससे संधि कर लो, फौरन दूत भेजकर
उससे कहो कि वज्रकर्ण दुर्जेय और अपराजित है। उसके साथ
युद्ध कैसा ? जो तुमने युद्धके इतने साधन जुटाये हैं।" यह
सुनकर शत्रुका दमन करनेवाला जनार्दन लक्ष्मण रामके पैरोंपर
गिरकर वोला-"आपका आदेश पाकर आज मैं धन्य और कृतार्थ
हूँ।" यह कहकर आदरणीय वह सीधा सिंहोदरके भवनमें गया ।
हाथीकी तरह गरजकर तथा प्रतिहारको तर्जनीसे डॉटकर भयंकर
मुख वह समूचे दरवारको तिनकेके समान समझता हुआ उसी
तरह भीतर प्रविष्ट हुआ जैसे गजघटाके वीचमें सिंह प्रवेश
करता है ॥ १-१०॥
[१३] तव अमर्पसे भरे और क्रुद्ध लक्ष्मणने सिंहोदरको
ऐसे देखा-जैसे शनिने ही देखा हो। वह जिस ओर देखता
वहीं सैनिक नीचा मुख करके रह जाता। सिहोदर मन ही मन
सोच रहा था कि यह कोई महाबली होना चाहिए । न तो यह
प्रणाम करता है और न वैठता ही है, इतनेमे मौका पाकर कुमार
लक्ष्मणने सिहोदरसे कहा-"बहुत विस्तारकर कहनेसे क्या, मुझे
राजा भरतने यह कहनेके लिए भेजा है कि सिहके साथ क्रीड़ा
कौन करता है, कौन ऐरावतका दांत उखाड़ सकता है, कौन
मंदगचनकी शिखर गिरा सकता है, और कौन चन्द्रको हाथसे
रोक सकता है। कौन वनकर्णको मार सकता है ? अतः उसके
साथ संधि कर, मुन्दर बीकी तरह हृदयसे तुम इस धरतीको
६

८२
पउमचरिउ
उठ्ठिठ पहु
घत्ता
अहवइ णरवइ जइ रज्जहाँ अदु ण इच्छहि ।
तो समरगण सर-धोरणि एन्ति पढिच्छहि, ॥१०॥
[१४]
लक्खण-वयण-दूसिमो अहर-विप्फुरन्तो ।
'मरु मरु मारि मारि हणु हणु' भणन्तो ॥१॥
करवाल-विहत्थउ । 'अच्छउ ताम भरहु वीसत्यउ ॥२॥
दूवहाँ
दूवत्तणु दरिसावहाँ । छिन्दहाँ णासु सीसु मुण्डावहाँ ॥३॥
लुणहाँ हत्थ विच्चारवि धाडहाँ । गहह चढियउ णयर भमाडहाँ' ॥४॥
तं णिसुणेवि समुष्टिय णरवर । गलगज्जन्त णाई णव जलहर ॥५॥
'हणु हणु हणु' भणन्त वहु-मच्छर । णं कलि-काल-कियन्त-सणिच्छर ॥६॥
ण णिय - समय-चुक्क रयणायर । णं उम्मेठ पधाइय कुञ्जर ॥७॥
कर करवाल को वि उग्गामइ । भीसण को वि गयासणि भामइ ॥८॥
को वि भयङ्कर चाउ चडावइ । सामिह भिञ्चत्तणु दरिसावइ ॥६॥
एव णरिन्दहिं फुरियाहर-भिउडि-करालहिं ।
वेदिउ लक्खणु पञ्चाणणु जेम सियालहिँ ॥१०॥
[१५]
सूरु व जलहरेहिँ जं वेडिओ कुमारो ।
उहिउ धर दलन्तु दुव्वार-वइरि-वारो ॥ १ ॥
रोकइ वलइ धाइ रिउ भइ । णं केसरि-किसोरु पवियम्भइ ॥ २ ॥
णं सुरवर-गइन्दु मय-विम्भलु । सिर-कमलई तोडन्तु महा-बलु ॥३॥
दरमलन्तु मणि-मउड गरिन्दुहुँ । सीहु पढुविउ जेम गइन्दहुँ ॥४॥
को वि मुसुमूरिउ चूरीउ पाएँहिं । को वि णिसुम्भिउ टक्कर-धाएँहि ॥५॥

पञ्चवीसमो संधि ८३ भोगो। और यदि राजन्, आधे राज्यको नहीं चाहते तो कल समरांगणमें आती हुई वाणोकी बौछारको झेलनेके लिए तैयार रहो। ॥ १-१०॥ [१४] लक्ष्मणके इन शब्दोंसे सिहोदर कुपित हो उठा, उसके अधर फरकने लगे, वह वोला, "मरो मरो, मारो मारो हनो हनो।" तलवार हाथमें लेकर उठते हुए वह बोला, "अच्छा जरा ठहरो, भरतने भेजा है न ।” उसने फिर आदेश दिया, "इस दूतको दूतपन दिखला दो, नाक काट लो, सिर मूंड़ लो। हाथ काट लो और फिर गधेपर चढ़ाकर खूब चिल्लाकर नगर मे घुमाओ । यह सुनते ही नरवर उठे, मानो नये जलधर गरज उठे हो, वे मत्सरसे भरकर, 'मारो मारो' कहने लगे, मानो वे कलिकाल यम और शनि हों या फिर समुद्रने अपनी मर्यादा छोड़ दी हो, या उन्मत्त कुंजर ही दौड़ पड़े हो । कोई हाथमे तलवार उठा रहा था, तो कोई भीपण चक्र और गदा धुमा रहा था। कोई भयंकर धनुष चढ़ा रहा था। इस प्रकार वे स्वामीके प्रति अपनी वफादारी (दासता) दिखा रहे थे। कंपित-अधर और विकराल भौहा वाले उन्होंने लक्ष्मणको वैसे ही घेर लिया जैसे गीदड़ सिंहको घेर लेते है ।। १-१०॥ [१५] कुमार लक्ष्मणको वैसे ही घेर लिया जैसे मेघ सूर्यको घेर लेता है, तब वह वीर शत्रुओका दलन करता हुआ उठा । कभी वह रुकता, कभी मुड़ता, कभी दौड़ता और शत्रुपर धौस जमाता। वह ऐसा जान पड़ता मानो सिंहशावक ही उछल रहा हो । महाबली वह, मदविह्वल ऐरावत हाथीकी तरह, (शत्रुओं) के सिर- कमलोंको तोड़ने लगा। और मणिमुकुटोको चूर-चूर करता हुआ वह राजाओके निकट जा पहुंचा। वैसे ही जैसे सिह हाथीके

पउमचरित
गयवर
को वि करग्गेहि गयण भमाडिउ । को वि रसन्तु महीयल पाठिउ ॥६॥
को वि जुज्झविउ मेस-झडक्कएँ । कों वि कडुवाविउ हक्क-दडक्कएँ ॥७॥
लग्गण - खम्भुप्पा वि । गयण-मग्गपुणु भुअभिमावि ॥८॥
णाइँ जमेण दण्ड पम्मुक्कउ । वइरिहिँ ण खय-कालु पढुक्कउ ॥६॥
घत्ता
आलण-खम्भण भामन्ते पुहइ भमाडिय ।
तेण पडन्तेण दस सहस गरिन्दहुँ पाडिय ॥ १० ॥
[१६]
जं पडिवखु सयलु णिहलिउ लक्खणेण ।
गयवर पट्टवन्धणे चडिउ तक्खणेणं ॥ १ ॥
अहिमुहु सीहोयर सचलिउ । पलय-समुदु गाई उत्थल्लिउ ॥२॥
सेण्णावत्त निन्तु गजन्तउ । पहरण - तोय - तुसार-मुअन्तउ ॥३॥
तुज-तुरङ्ग तरज समाउलु । मत्त - महागय - घड-वेलाउलु ॥४॥
उन्भिय - धवल - छत्त - फेणुजलु । धय - कल्लोल - चलन्त-महावलु ॥५॥
रिउ-समुदु ज दिछु भयङ्करु । लक्खणु ढुक्क गाइ गिरि मन्दरु ॥६॥
चलइ वलइ परिभमइ सु-पञ्चलु । णाई विलासिणि-गणु चलु चञ्चलु ॥७॥
गेण्हेंवि पहउ परिन्दु गरिन्टे । तुरएं तुरउ गइन्दु गइन्दे ॥८॥
रहिएं रहिउ रहड्ड रहङ्गे । छत्ते छत्तु
-
छत्तु धयग्गु धयग्गें ॥६॥
वत्ता
चउ जउ लक्खणु परिसका मिउडि-भयङ्करु ।
तउ तउ दीसइ महि-मण्डलु रुण्ड-णिरन्तरु ॥ १० ॥
[१७]
जं रिउ-उअहि महिउ सोमित्ति-मन्दरेण ।
सीहोयरु पधाइओ समउ कुञ्जरेणं ॥ १ ॥

पञ्चवीसमो संधि निकट पहुँच जाता है। उसने किसीको मसलकर पैरसे कुचल दिया, किसीको टक्करकी मारसे ध्वस्त कर दिया, किसीको अंगुली से आकाशमें नचा दिया । कोई चिल्लाता हुआ आकाशसे धरती पर गिर पड़ा। कोई मेप की तरह भडक्कसे जूझ गया । कोई हुंकारकी चपेटमे ही कराह उठा। हाथी बाँधनेके आलान स्तंभों को उखाड़, और आकाशमें घुमाकर वह ऐसे छोड़ देता था, मानो यमने ही अपना दंड फेका हो, या वैरियोंका चयकाल ही आ गया हो । आलान-स्तंभके घुमानेसे धरती ही हिल उठी, और उसके गिरते ही दस हजार राजा धराशायी हो गये ।। १-१०॥ [१६] जव लक्ष्मणने समस्त शत्रुपक्षका दलन कर दिया तो वह पट्टवंधन नामके उत्तम गजपर चढ़ गया। तब सिंहोदर भी सम्मुख युद्धके लिए चला । लक्ष्मणने सामने शत्रुसेना रूपी भयंकर समुद्रको उछलते हुए देखा। सेनाका आवर्त ही उसका गरजना था, हथियाररूपी जल और तुपार-कण छोड़ता हुआ, ऊँचे ऊँचे अश्वोकी लहरोंसे आकुल, मदमाते हाथियोके मुंडरूपी तटोसे व्याप्त, अपर उठे हुए सफेद छत्रोके फेनसे उज्ज्वल और ध्वजारूपी तरंगोसे चंचल और जलचरोंसे सहित था। उसे देखते ही लक्ष्मण सुमेरु पर्वतकी तरह उसके पास जा पहुंचा । कभी वह चलता मुड़ता, और सहसा ऐसा धूम जाता, मानो वेश्यागण ही चंचल हो उठा हो, द्वंद्व युद्ध शुरू हो गया । राजासे राजा, घोड़ेसे घोड़ा, हाथीसे हाथी, रथसे रथ, चक्रसे चक्र, छत्रसे छत्र, और ध्वजाग्रसे ध्वजाग्र पराजित हो गये। लक्ष्मण जिस ओर अपनी भयंकर भौहोंको फैलाता उसी ओर उसे धरती-मंडल संडों से पटा हुआ दिखाई देता ॥ १-१० ॥ [१७] मंदराचलकी भाँति लक्ष्मणने नष्ट शत्रुसेनारूपी समुद्र को मथ डाला। तब महागजकी भाँति सिंहोदर उसपर दौड़ा।

८६
पउमचरित
मयमत्त
-
अभि? जुज्झु विण्णि वि जणाहँ । उज्जेणि - णराहिव - लक्खणाहँ ॥२॥
दुव्वार - वइरि - गेण्हण - मणाहँ । उग्गामिय - भामिय - पहरणाहँ ॥३॥
गइन्दु हारणाह । पडिवक्ख - पक्ख - संघारणाहँ ॥४॥
सुरवहुअ
सस्थ - तोसावणाहँ । सीहोयर - लक्खण - णरवराह ॥५॥
। भुअ-दण्ड-चण्ड-हरिसिय-मणा: ॥६॥
एत्थन्तर सीहोयर धरेण । उर पेल्लिड लक्खणु गयवरेण ॥३॥
रहसुब्भड पुलय - त्रिसट्ट - देहु । ण सुक्क खीलिउ स-जलु मेहु ॥८॥
ते लेवि भुअग्गे थरहरन्त । उप्पाडिय दन्तिह वे वि दन्त ।।
कडुआविउ मयगलु मणण तट्छ । विवरम्मुहु पाण लएवि णटु ॥१०॥
धत्ता
ताम कुमारण विजाहर करणु करेप्पिणु ।
धरिउ णराहिउ गय-मत्थऍ पाउ थवेप्पिणु ॥ ११ ॥
[१८]
गरवइ जीव-गाहि जं धरिउ लक्खणेणं ।
केण वि वजयण्णहो कहिउ तक्खणेणं ॥ १॥
है णरणाह
णाह अच्छरियउ । पर-बलु पेक्खु केम जजरियउ ॥२॥
रुण्ड णिरन्तरु सोणिय-ञ्चित । णाणाविह-विहङ्ग - परियञ्चित ॥३॥
को वि पयण्ड-वीरु वलवन्तउ । भमइ कियन्तु व रिउ-जगडन्तउ ॥l
गय-घड भड-थड सुहड वहन्तउ । करि-सिर-कमल-सण्ड तोडन्तउ ।।५।।
रोक्कइ कोकइ ढुक्कड़ थक्कइ । ण खय-कालु समर परिसक्कइ ॥६॥
भिउडि-भयङ्कर कुरुडु समच्छरु । थिउ अवलोयण णा सणिच्छरु ॥७॥
णउ जाणहुँ कि गणु किं गन्धवु । कि पच्छण्णु को वि तउ वन्धषु ॥८॥
किण्णरु कि मावु विजाहरु । कि वम्भाणु भाणु हरि हलहरु ॥६॥
तेण महाहव माण-मइन्दह । विणिवाइय दस सहस णरिन्दह ॥१०॥
अण्णु वि दुजउ मच्छर-भरियउ । जीव-गाहि सीहोयर धरियउ ॥११॥

पञ्चवीसमो संधि उज्जैननरेश सिंहोदर और कुमार लक्ष्मण द्वंद्व शुरू हुआ। दोनों दुर्वार बैरीको पकड़ना चाह रहे थे, दोनों हथियार उठाकर धुमा रहे थे । दो! मत्तगजकी तरह दारुण और प्रतिपक्षका संहार करने वाले और देवबालाओंको सुख देनेवाले थे। दोनोंकी भुजाएँ प्रचंड और मन प्रसन्न था । इतनेमें सिंहोदरने लक्ष्मणकी छाती पर हाथी दौड़ाया, वह ऐसा लगता था मानो हर्पसे उद्भिन्न रोमांचित शरीर सजल मेघ शुक्र तारासे क्रीड़ा कर रहे हों ॥१-८॥ तव लक्ष्मणने अपने हाथसे थर्राते हुए उस हाथीके दोनों दाँत उखाड़ लिये । पीड़ित होकर, रुष्टानन खोखले मुखका वह हाथी जब तक अपने प्राण छोड़े, इसके पहले ही, लक्ष्मणने उसके मस्तक पर पैर रख, और हाथ खींचकर सिंहोदरको पकड़ लिया॥१-११॥ [१८] जब लक्ष्मणने उसे जीवित ही पकड़ लिया तो किसीने तत्काल वनकर्णसे जाकर कहा, "हे राजराज, देखिए शत्रुपक्ष किस तरह जर्जर हो गया है। घड़ निरंतर खूनसे लथपथ हो रहे हैं। . तरह-तरहके पक्षी उनपर वैठे हुए हैं। कोई प्रचंड वीर कृतान्तकी तरह झगड़ता हुआ घूम रहा है। गजघटा, भटोंके समूह और सुम- टोको खदेड़ता, हाथियोके सिरकमलोंके समूहको तोड़ता, रोकता वोलता, पहुंचता और ठहरता हुआ वह ऐसा लगता है मानो युद्ध- भूमिमे क्षयकाल ही घूम रहा हो। भयंकर भौहोवाला मत्सरभरा कठोर वह, देखनेमें ऐसा लगता है मानो शनि हो, मै नहीं जानता, वह कौन है ? कोई गंधर्व या प्रच्छन्न कोई आपका भाई। किन्नर है भारत, विद्याधर है ! ब्रह्मा है या भानु ? हरि है या हलधर। दस हजार राजाओको युद्ध में मार गिराया है। और भी मत्सरसे भरे दुर्जेय उससे सिंहोदरकी जीवित ही पकड़ लिया है। ।

पउमचरित
।
घत्ता
एक्के होन्तण वलु सयलु वि आहिन्दोलिउ ।
मन्दर-वीण णं सायर-सलिलु विरोलिउ ॥ १२ ॥
[१६]
तं णिसुणेवि को वि परितोसिओ मणेणं ।
को वि णिएहुँ लग्गु उद्धेण जम्पणेण ॥ १ ॥
को वि पजम्पिउ मच्छर-भरियउ । 'चङ्ग जं सीहोयरु धरियउ ॥२॥
जो मारेवउ वइरि स-हत्थे । सो परिवधु पाउ पर-हत्थे ॥३॥
वन्धव-सयणहिँ परिमिउ अज्जु । वजयण्णु अणुहुञ्जउ रज्जु ॥४॥
को वि विरुद्ध पुणु पुणु णिन्दइ । 'धम्मु मुएवि पाउ किं गन्दइ' ॥५॥
को वि भणइ 'जे मग्गिउ भोयणु । दीसइ सोज्ज णाई एहु वम्भणु' ॥६॥
ताम कुमार रिउ उक्खन्धवि । चोरु व राउलेण पिड वन्धवि ॥७॥
सालङ्कारु स-दोर स - णेउरु ।
णेउरु । दुम्मणु दीण-वयणु
अन्तेउरु ।।
•धाइड असु-जलोल्लिय - णयणउ । हिम-हय-कमलवणु व कोमाणउ ॥६॥
घत्ता
केस-विसन्थुलु मुह-कायरु करुणु रुअन्तउ ।
थिउ चउपासहि भत्तार-भिक्ख मग्गन्तउ ॥ १० ॥
[२०]
ताम मणेण सकिया राहवस्स घरिणी ।
ण भय-भीय काणणे वुण्णुयण्ण हरिणी ॥१॥
'पेक्खु पेक्खु वलु वलु आवन्तउ । सायर-सलिलु जेम गजन्तउ ॥२॥
लइ धणुहरु म अच्छि णिञ्चिन्तउ । मल्छुड लक्खणु रण अत्यन्तउ' ॥३॥
तं णिसुणवि णिवूढ - महाहदु । जाम चाउ किर गिण्हइ राहवु ॥४॥
ताम कुमार विट्ठु सहुँ णारिहिं । परिमिउ हत्यि जेम गणियारिहिं ॥५॥

पन्चवीसमो संधि अकेले होते हुए भी उसने सेनामें हलचल मचा दी है। ठीक वैसे ही जैसे मदराचलकी पीठ समुद्रके जलको मथ देती है ।।१-१२॥ [१६] यह सुनकर किसीका मन सन्तुष्ट हो उठा तो कोई ऊपर मुख उठाकर कहने वालेका मुख देखने लगा। कोई ईर्ष्यासे भर- कर कह उठा, "अच्छा हुआ कि सिंहोदर पकड़ा गया, जैसे वह अपने हाथसे शत्रुको मारता था, वैसे ही वह भी दूसरेके हाथसे पकड़ा गया, अतः वज्रकर्ण तुम सैकड़ों परिजनोंके साथ अपने राज्यका भोग करो । तव कोई विरुद्ध होकर, वार-बार ऐसा कहने वालेकी निन्दा करते हुए बोला, “अरे धर्म छोड़कर पापसे आनं- दित क्यों हो रहे हो।" तव किसी एकने कहा, "अरे भोजन माँगने वाले ये ब्राह्मण नहीं है।' इतनेमें कुमार लक्ष्मण शत्रुको अपने कंधेपर टॉगकर ले आया वैसे ही जैसे राजकुल चोरको बाँधकर ले आता है । सिंहोदरका अन्तःपुर,अलंकार डोर और नूपुरों सहित भी दीन मुख और अनमना हो उठा। हिमसे आहत, और मुरझाये हुए कमलवनकी तरह डवडवाये नेत्रोंसे यह उसके पीछे दौड़ा। उस (अन्तःपुर) के वाल विखरे हुए थे और मुंह कातर था। चारों ओरसे घेरकर उसने लक्ष्मणसे अपने पतिकी भीख माँगी ॥१-१०॥ [२०] परन्तु इधर सहसा, रामकी पत्नी सीता आशंकित हो उठीं, मानो वनकी भोली हिरनी ही भयभीत हो उठी हो, वह चोली,-"देखिए देखिए, समुद्रजलकी तरह गरजती हुई सेना आ रही है, निश्चल मत वैठे रहो, धनुप हाथमें ले लो, शायद युद्ध में लक्ष्मणका अंत हो गया है ।" यह सुनकर, महायुद्धमें समर्थ राम जबतक हाथमें धनुप लेनेको हुए कि तवतक स्त्रियोंके साथ लक्ष्मण, आता हुआ ऐसा दिखाई दिया मानो हथिनियोंसे घिरा पउमचरित तं पेक्खेप्पिणु सुहड-णिसामें । भीय सीय मम्भीसिय रामें ॥६॥ 'पेक्खु केम सीहोयरु वद्धउ । सीहेंण व सियालु उदृद्धउ ॥७॥ एव वोल्ल किर वइ जाहिँ । लक्खणु पासु पराइड तावहिं ।।। चलणहि पडिउ वियावड-मत्थउ । भविउ व जिणहाँ कियञ्जलि-हत्थउ ॥१॥ घत्ता 'साहु' भणन्तण सुरभवण-विणिग्गय-णामें । स : भु अ-फलिहिँ अवरुण्डिउ लक्खणु रामें ।। १० ॥ २६. छव्वीसमो संधि लक्खण-रामहुँ धवलुजल-कसण-सरीर । एक्कहिँ मिलियइ ण गडा-जउणह णीर । [१] अवरोप्पर गोलिय - गत्तेहिं । सरहसु साइउ देवि तुरन्तहिं ॥१॥ सीहोयरु णमन्तु बहसारिउ । तक्खणे वजयण्णु हक्कारिउ ।।२।। सहुँ गरवर-जणेण णीसरियउ । णाइ पुरन्दर सुर-परियरिया ॥३॥ रेहइ विजुलमु अणुपच्छएँ । पडिवा-इन्दु व सूरहों पच्छऍ ॥४॥ तं इटाल - धूलि - धुअ-धवलउ । सहसकूडु गय पत्त जिणालउ ॥५॥ चउदिसु पयहिण देवि तिवारऍ। पुणु अहिवन्दण करइ भडारए ॥६॥ तं पियवद्धण-सुणि पणवेप्पिणु । वलहॉ पास थिउ कुसलु भणेप्पिणु ॥७॥ दसडर - पुर - परमेसह रामें । साहुकारिउ सुहड-णिसामे ||८|| पञ्चवीसमो संधि हाथी ही आ रहा हो। उसे देखकर, सुभटश्रेष्ठ रामने डरी हुई जीताको अभय वचन देते हुए कहा, "देखो सिहोदर कैसा बॅधा हुआ है, सिहने शृगालको मानो ऊपर उठा लिया है ।" वह ऐसा कह ही रहे थे कि कुमार लक्ष्मण एकदम निकट आ पहुंचा, उन्होंने अपना विकट माथा रामके चरणों में ऐसे ही रख दिया मानो जिनके सम्मुख हाथ जोड़कर भव्य ही खड़ा हो ॥१-६॥ तव देवभवनोमें विख्यात नाम रामने 'साधु' कहकर अपनी विशाल भुजाओमें लक्ष्मणको भर लिया ॥१०॥ छब्बीसवीं सन्धि लक्ष्मण और रामके गोरे काले शरीर एकत्र मिले हुए ऐसे मालूम होते थे मानो गंगा और यमुनाके जलका संगम हो । १] पुलकितशरीर उन दोनोने तुरत एक दूसरेका आलिंगन किया । तदनन्तर, रामने, प्रणाम करते हुए सिहोदरको बैठाया। और तत्काल उन्होंने वज्रकर्णको भी बुलवा लिया। वह अपने उत्तम मनुष्योके साथ इस प्रकार निकला मानो देवताओंको लेकर इन्द्र ही निकला हो। प्रतिपदाके चन्द्रके पोछे जैसे सूरज रहता है वैसे ही विद्युदंग चोर भी उस (वनकर्ण) के पीछे-पीछे आ रहा था। तब वे लोग चूना और ईंटसे निर्मित सहस्रकूट जिना- लयमें पहुंचे। उन्होंने उसकी तीन वार प्रदक्षिणा की । भट्टारक रामने उनका अभिवादन किया। वनकर्ण भी प्रियवर्धन मुनिको नमस्कार कर रामको कुशल पूछ उनके पास बैठ गया ॥१-७॥ तव सुभट श्रेष्ट रामने दशपुर-नरेश वनकर्णको साधुवाद पटमचरिट घत्ता 'सच्चड गरवइ मिच्छत्त-सरहिं गड भिजहि । दिढ-सम्मत्तण पर तुम जे तुहुँ उवमिन्नहि ॥६॥ [२] तं णिसुणेवि पम्पिट राए । 'एउ सन्छ महु तुम्ह पसाएं' ॥१॥ पुणु वि तिलोय-विणिग्गय-णाम । विजुलगु पोमाइट राम ॥२॥ 'भो दिढकठिण-विअड- वच्छत्यल । साहु साहु साहम्मिय-वच्छल ॥३॥ सुन्दर किउ जं णरवइ रक्खिड । रणे अच्छन्तु ण पई उच्वेक्खिड' पधा तो पुत्थन्तर वृत्तु कुमार । 'जम्पिएण किं बहु - वित्यारे ॥५॥ हे इसउर-णरिन्द्र विसगइ-सुअ। जिणवर-चलण - कमल-फुल्लन्धुज ॥२ जो खलु खुट्टु पिसुणुमरियउ | अच्छइ ऍहु सीहोयर धरियड ॥७॥ कि मारमि कि अप्पुणु मारहि । णं तो उय करि सन्धि समारहि ॥८॥ घत्ता आण-चडिच्छ ऍहु एवहिँ मिच्चु तुहारउ । रिमह-जिणिन्दहाँ सेयसु व पेसणयार' ।। ६ ॥ [३] पभणइ बजयण्णु बहु-जाणउ । 'हउँ पाइक्कु पुणु वि ऍहु राणउ ॥१॥ णवर एक्कु वर भइ पालेवउ । जिण मेल्लेवि अण्णु ण णमेवर' ॥२ तं णिसुणेविण लक्खण-रामहि । सुरवर-भवण - विणिग्गय-णामेहिं ।।३।। इसउरपुर • उज्जेणि - पहाणा । वजयपण - सीहोयर • राणा ॥४॥ वेण्णि वि हत्ये हत्थु धराविय । सरहसु कण्ठग्गहणु कराविय ॥५॥ अद्धोनदिए महि भुनात्रिय । अग्ण वि जिणवर-धम्मु मुणाविय ।।। कामिणि कामलेह कोलाविय । विजुलअङ्गहाँ करयल लाविय ॥७॥ दिग्ण मणि-कुण्डलइ फुरन्त' । चन्दाइचहुँ तेड हरन्तइँ ॥ ताम कुमार बुत्तु विक्खाएँहि । वजयण्ण- सीहोयर - राहिँ ll छन्चीसमो संधि दिया और कहा-"जैसे मिथ्यात्वके वाणोंसे सत्यका भेदन नहीं किया जा सकता, वैसे ही दृढ़ सम्यक्त्वमें तुम्हारी उपमा केवल तुम्हींसे दी जा सकती है ।" 14-|| [२] यह सुनकर वज्रकर्णने निवेदन किया,-"यह सब आपके प्रसादका फल है।" तदनन्तर रामने त्रिलोक विख्यात, विद्य- दंग चोरकी प्रशंसा की-"तुम्हारा वक्षस्थल कठोर विशाल और विकट है । तुम्हारा साधर्मी-प्रेम स्तुत्य है, तुमने रोजाकी रक्षा कर वहुत बढ़िया काम किया। युद्धमें होते हुए भी तुसने इसकी उपेक्षा नहीं की। तव इसी वीचमें कुमार लक्ष्मण बोल उठे, “बहुत कहना व्यर्थ है, हे विश्वमति-नृपसुत जिनवर-चरण-कमल-भ्रमर ! यह क्षुद्र ईर्ष्यालु राजा पकड़ लिया गया है, क्या इसे मार डालें ? या चाहे आप ही मारे अथवा दयाकर इससे संधि कर लें।" इस पर रामने कहा,-"आजसे यह तुम्हाराआज्ञापालक अनुचर होगा, ठीक उसी तरह जिस तरह राजा श्रेयांस; ऋपम जिनका अनुचर था ॥१-६॥ [३]तव बहुविज्ञ वनकर्णने कहा, "यह राजा है और मै साधारण आदमी। मै तो केवल इसी व्रतका पालन करना चाहता हूँ कि जिनको छोड़कर मैं किसी औरको नमन नहीं करूँगा” यह सुनकर देवलोकमें प्रसिद्ध नाम राम और लक्ष्मणने उन दोनोका (सिंहो- दर और वज्रकर्ण) का हाथ पर हाथ रखवा कर एक दूसरेका हर्पपूर्वक मिलाप करवा दिया। धरती आधी-आधी वॉट दी। तथा उन दोनोंको जिनधर्मका भी उपदेश दिया। कामिनी काम- लेखाको बुलाकर, रामने उसे विद्युदंगके लिए सौंप दिया। और उसे, सूर्य तथा चन्द्रमाका भी तेज हरण करनेवाले, मणिकुंडल दे दिये । तर प्रसिद्ध राजा वनकण और सिंहोदरने कुमार लक्ष्मणसे पटमररिट 'णव कुवलय-इल- दीहर-गयणहुँ । मयगलगाइननगहुँ सचिवयगहुँ ।३०॥ उच्च - गिलाडालयि - विलहुँ । बहु-सोहाग-नोग-गुग-गिलयहुँ ॥११॥ विन्मन - भाउन्मिण - सरीरहुँ । तणु-मई यग-हर गम्नाहुँ ॥१२॥ घत्ता हिणव-बहुँ लायग्ग-वण्ण-संपुण्गहुँ । लड़नो लक्नग वर तिणि सयई नुहुँ ऋग्गहुँ ॥ १३ ॥ [2] तं गिमुर्गप्पिशु इलरह - णन्द्रणु । पुन पजम्पिट हलवि जणइणु ॥१॥ 'अछर ति-यणु तान विल्बन्ला । मिसिगि-णिहाउवरवियर-द्विता ॥२॥ मई जाएवर दाहिण - देवहाँ । कोङ्का - नल्य - पण्डि- उनहाँ ॥३॥ तहिं कलह हाँ गिल्ड गसनि । पच्चर पागिरगहण करेममि ॥२॥ पुन कुमान पन्पिट जं जे । मणे विसण्णु कण्णायणु तं जे ॥१॥ ड्दु हिमण वर्णालणि-अनुचः । नुह-मुह णाई दिग्गुमनि-चुचः ॥ जान नाम वगह बन्नहि । विविहहि नलेहि निनन्तहि ॥७॥ विगैहिँ 'जय जयं' पभगन्तहिं । बुजय - बानणेहिं णचन्तहि ॥८॥ नीय स-लम्बणु बलु पलारिट । ग - इन्दु व जयजयकान्टि REM तहि गिवसेष्पिगु गयर स्वग्गएँ । अदत्ति-अवसर पडिबग्गम् ॥३०॥ घत्ता वर-गारायग गय दमउन नुवि नहाइय । वत्तहाँ नारहाँ । कुश्वर-गयन पराइच ॥ ११ ॥ [५] पुत्र-गायन पराइय जावहि । मागुग-भानु पोलिट नाहि ॥१॥ पट मन्नु - रा भगन्। चाइल कल्यल- नल-मह॥ अलि-निहुर्हि बन्दिनहि पटन्नहिँ । बहिण वावहिं गचन्तहि ॥ - छन्वीसमो संधि विनय करते हुए कहा,-"रंग और सुंदरतामें पूर्ण, अभिनव रूप- वती इन तीन सौ कन्याओंको ग्रहण करें। इनके नेत्र नवकमल दलकी तरह विशाल हैं। मुख चन्द्रमाके समान है, चाल मत्त गजकी भाँति है और इनके ऊँचे ऊँचे भाल पर तिलककी शोमा है। ये प्रचुर भाग्य और भोगके गुणोंकी निकेतन हैं, विलास और भावोंसे पूर्ण शरीर उनका मध्यभाग क्षीण और स्तन गंभीर है।" ॥१-१३॥ [४] यह सुनकर लक्ष्मणने हंसते हुए कहा “अच्छा. ये तव तक उसी प्रकार विलाप करे जिस प्रकार कमलिनियॉ रविके किरण- जालके लिए विलाप करती हैं। अभी मुझे दक्षिण देश जाना है, जहाँ कोकणमलय और पुंड्र आदि देश है वहाँ वलभद्र रामके लिए आवासकी व्यवस्था करनो है। वादमें में इनका पाणिग्रहण कर सकता हूँ। कुमारके इस कथनसे उन कुमारियोका मन खिन्न हो उठा। मानो कमलिनी-समूहको पाला मार गया हो, या मानो किसीने सबके मुंहपर स्याहीकी कूची फेर दी हो। इसके अनंतर लक्ष्मण और सीताके साथ, रामने विविध मंगलगीतोके बीच, नगरमे प्रवेश किया। वंदीजन जय-जयकार कर रहे थे। कुब्ज चामन नाच रहे थे। दूसरे इन्द्रकी तरह उनका सवने जय जय- कार किया। उस सुन्दर नगरमें निवास कर, आधी रात होनेपर आदरणीय वे तीनों (वलभद्र राम, नारायण लक्ष्मण और सीतादेवी) दशपुर नगर छोड़कर चले गये। चलकर वे चैतके माहमें नलकूवर नगरमे पहुँचे ॥ १-११ ॥ [५] उस नगरमें उनके पहुंचते-पहुंचते फाल्गुनका महीना चोत चुका था और वसंत राजा कोयलके कलकल मंगलके साथ आनन्दपूर्वक प्रवेश कर रहे थे। भ्रमररूपी बंदीजन मंगलपाठ पढ़ रहे थे, और मोर रूपी कुजवामन नाच रहे थे। इस तरह अनेक

१६
पउमचरित
अन्दोला - सय - तोरण • वारहि । ढुक्कु वसन्तु अणेय-पयारहि ॥ ४ ॥
कत्थइ चूअ - वण' पल्लविय' । णव-किसलय-फल-फुल्लब्भहिय ॥५॥
कत्थइ गिरि - सिरह विच्छायइ । खल-मुहब मसि-वण्ण णायइ ॥६॥
कत्थई माहव मासहाँ मेइणि । पिय-विरहेण व सूसइ कामिणि ॥७॥
कन्थइ गिजइ वज्जइ मन्दलु । णर-मिहुणेहि पणच्चिउ गोन्दलु ॥८॥
तं तहाँ णयरहाँ उत्तर - पासहि | जण-मणहरु जोयण-उहेसहि ॥ ६ ॥
दिट्छ वसन्ततिलउ उज्जाणउ । सज्जण-हियर जेम अ-पमाणउ ।।१०।।
घत्ता
सुहलु सुयन्धउ डोल्लन्तु वियावड - मत्थउ ।
अग्गएँ रामहों णं थिउ कुसुमञ्जलि - हत्थउ ॥११॥
[]
तहिँ उववणे पइसेंवि विणु खेवें । पणिउ वासुपुवु वलएवें ॥ १ ॥
'भो असुरारि - वहरि - मुसुमूरण | दसरह-वंस -मणोरह - पूरण ॥ २ ॥
लक्खण कहि मि गवेसहि त जलु । सज्जण-हियउ जेम जं णिम्मलु ॥३॥
दूरागमणे सीय तिसाइय । हिम-हय-णव-णलिणि व विच्छाइय ॥४॥
तं णिसुणेवि वड-दुम - सोवाहिं । चडिउ महारिसिव्व गुणथाणेहिँ ॥५॥
ताव महासरु दिट्छु रवण्णउ । णाणाविह-तरुवर - संछण्णउ ॥ ६ ॥
सारस • हंस-कुञ्च - वग - चुम्बिउ ।णव-कुवलय-दल-कमल-करम्विउ॥७॥
तं पेक्खेवि कुमार
पधाइउ । णिविसे तं सर-तीर पराइउ ॥ ८ ॥
घत्ता
पइ महावलु जले कमल - सण्ड तोडन्तउ ।
माणस - सरवर णं - गइन्दु कीलन्तउ ॥ ६ ॥
[७]
लक्खणु जलु आडोहइ जाहि । कुन्चर-णयर-णराहिउ तावहिँ ॥१॥

छब्बीसमो संधि प्रकारके हिलते-डुलते तोरण-द्वारोंके साथ वसंत राजा आ पहुंचा। कही आमके पेड़ोमें नये किसलय फल-फूलोंसे लद रहे थे। कही कांतिरहित पहाड़ोके शिखर काले रंगवाले दुष्ट मुखोंकी तरह दिखाई दे रहे थे। कही-कही वैशाख माहकी गर्मीसे सूखी हुई धरती ऐसी जान पड़ती थी मानो प्रिय-वियोगसे पीड़ित कामिनी हो । कहीं गीत हो रहा था, और कहीं मृदंग बज रहा था। कही मनुष्योंके जोड़े रति कर रहे थे। उन लोगोने नगरके उत्तरकी ओर, वसंततिलक नामका, जन मन-हर, एक योजन विस्तृत उद्यान देखा । वह उद्यान सज्जनके हृदयकी तरह अप्रमेय था । सुफल सुगंधित और नतमस्तक वह मानो हाथमे कुसुमांजलि लेकर रामके आगे स्वागतके लिए स्थित हो गया था ॥ १-११ ॥ [६] बिना किसी देरीके उस वनमें प्रवेश करके रामने लक्ष्मणसे कहा, "अरे असुर और शत्रुओंको मसलनेवाले और दश- रथकुलके इच्छापूरक लक्ष्मण, कही पानी खोजो, जो सज्जनके हृदयकी तरह निर्मल हो। बहुत दूरसे चलकर आनेके कारण सीताको प्यास लग आई है। वह हिमाहत कमलिनीकी तरह कातिहीन हो रही है ।" यह सुनते ही लक्ष्मण वटवृक्ष रूपी सोपान पर चढ़ गये, उसी तरह जैसे महामुनि गुणस्थानो पर चढ़ते है। वहाँसे उसे सुंदर और तरह तरहके पेड़ोसे आछन्न एक सरोवर दीख पड़ा। सारस हंस क्रौञ्च और बगुला पक्षियोसे चुम्बित, उसे देखकर, कुमार ( उतरकर) दौड़ा और पलभरमे उसके किनारे पहुँच गया | कमल-समूहको तोड़ते हुए, महावली कुमार उसके जलमे ऐसे ही घुसा मानो ऐरावत हार्थी क्रीड़ा करता हुआ मान- सरोवरमे घुसा हो ।। १-६॥ [७] जिस समय लक्ष्मण सरोवरके पानीको विलोडित कर टा पउमचरिउ आरूढ़ छुड छुडु वण - कीलए णीसरियउ । मयण-दिवस परवर-परियरियउ ॥२॥ तरुवर तरुवर मन्चु णिवद्धड । मञ्च मञ्च थिउ जणु समलद्धउ ॥३॥ मन्न मन्च जरेसर । मेरु-णियम् णाई विज्जाहर ॥ ४ ॥ मञ्च मञ्च आलावणि वज्जइ । महु पिज्जइ हिन्दोलउ गिज्जइ ॥५|| मञ्च मञ्च जणु रसय - विहत्थउ । घुम्मइ घुलइ विश्रावड-मत्थउ ॥६॥ मन्च मञ्च कीलन्ति सु - मिहुणई । णव-मिहुणई कहिँ णेह-विहूण ॥७॥ मञ्च मञ्चे अन्दोलइ जणवउ । कोइल वासइ भाइ दमणउ ॥८॥ घत्ता कुन्वर - णाहण किउ मञ्चारोहणु जावहिं । सूरु व चन्दण लक्खिज्जइ लक्खणु तावहि ॥ ६ ॥ [८] लक्खिउ लक्खणु लक्खण - भरियउ । णं पञ्चक्खु मयणु अवयरिउ ॥ १ ॥ रूउ णिऍवि सुर - भवणाणन्दहों। मणु उल्लो हिँ जाइ णरिन्दहाँ ॥२॥ मयण - सरासणि धरवि ण सकिउ । वम्महु दस-थाणेहिँ पटुक्किउ ॥ ३ ॥ पहिलए कहाँ वि समाणु ण वोल्लइ । वीयएँ गुरु णीसासु पमेल्लइ ॥ ४ ॥ तइयएँ सयलु अङ्गु परितप्पइ । चउथएँ ण करवत्तेहिं कप्पइ ॥५॥ पञ्चम पुणु पुणु पासेइज्जइ । छहएं वारवार मुच्छिज्जइ ॥ ६ ॥ सत्तम जलु वि जलह ण भावइ । अहम मरण-लील दरिसावइ ॥ ७ ॥ णवमएँ पाण पढन्त ण वेयइ । दसमए सिरु छिज्जन्तु ण चेयइ ।।३।।

88 छच्चीसमो संधि रहे थे उसी समय, अनेक श्रेष्ठ मनुष्योंसे घिरा हुआ, नलकूबर नगरका राजा कामदेवके दिन (वसंतपंचमोको) वनक्रीड़ाके लिए वहाँ आया । प्रत्येक पेड़पर ऊँचे ऊँचे मच (मचान) बनवा दिये गये। और प्रत्येक मंचपर एक-एक आदमी नियुक्त कर दिया गया। एक एक मंच पर एक एक राजा ऐसे वैठ गया, मानो मेरुपर्वतके शिखर पर विद्याधर बैठे हों। मंच-मंचपर आलापिनी (वीणा) बज रही थी, लोग मधु पी रहे थे। और हिन्ताल गीत गा रहे थे। मंच-मंचपर लोगोके हाथमे मधु-प्याला था, मस्तक हिलाकर, वे उसे हिला-डुला रहे थे, मंच-मंचपर मिथुन क्रीड़ा कर रहे थे। नये जोड़े (दम्पति) स्नेह हीन अला कहाँ होते है ? मंच-मंचपर लोग झूम रहे थे, और कोयल शीघ्र अपने आवासको भागा जा रहा था ॥ १-६॥ नलकूवर नरेशने मंच पर चढ़ते ही लक्ष्मणको ऐसे देखा मानो चंद्रने सूरको देखा हो ॥ ६ ॥ [=] अनेक लक्षणोंसे युक्त लक्ष्मणको देखकर उसे लगा मानो कामदेव ही अवतरित हुआ हो । स्वर्गलोकके लिए भी आनंद- दायक लक्ष्मणके रूपको देखकर, राजाके मनमें हलचल होने लगी। कामके वाणोसे वह अपनेको बचा नहीं सका, शीघ्र ही वह कामकी दस अवस्थाओं (वेगों) में पहुंच गया। पहले वेगमे वह किसीसे बात नहीं करता था, दूसरेमे लम्बे-लम्बे निश्वास छोड़ने लगा, तीसरेमे उसके शरीरमं तपन होने लगी। चौथेमें करपत्रसे मानो काटा जाने लगा। पाचवेमे, वारवार पसीना आता, छठेमे रह-रहकर गर्दा आने लगी। सातवमें जल और गीली वस्तुसे अरुचि होने लगी। आठवेमें मौनकी चेष्टा दिखने लगी। नवमें जाते हुए प्राणांका ज्ञान नहीं हो रहा था । दसवमे सिर फटने लगा और

१००
पउमचरिट
घत्ता
एम वियन्भिउ कुसुमाउहु दसहि मि थाहिँ ।
त अच्छरियउ जं मुक्कु कुमार ण पाहिँ ॥ ६ ॥
जं कण्ठ-टिड जावु कुमारहाँ । सग्णएँ वुत्तु 'पहिउ हक्कारहों ॥३॥
पहु आणऍ पाइक पधाइय । णिविसद्ध तहाँ पासु पराइय ॥२॥
पणववि वृत्तु ति-खण्ड-पहाणउ । 'तुम्हहँ काइ मि कोछइ राणां ॥३॥
तं णिसुणवि उच्चलिउ जणणु । तिहुलण-जण-मण-णयणाणन्द्रणु ॥
वियण पओह देन्तु गं केसरि । कन्दइ भारवन्त वसुन्धरि ॥५॥
दि कुमार कुमारे एन्तउ । मयणु जेम जण-मण-मोहन्तड ॥६॥
खण कल्लाणमालु रोमञ्चित । णडु जिह हरिस-विसाऍहिणचिड ॥७॥
पुणु वइसारित हरि अद्धासण । भविउ जेम थिउ दिदु जिण-सासणे।।
घत्ता
वइ जणदृणु आलाढ' मञ्च रवण्गएँ ।
णव-वरइत्तु व पच्छण्णु मिलिउ सहूं कण्णाएँ ॥६॥
[३०]
वे वि वइट्ट वीर कासण । चन्दाइच जेम गयणगणे ॥
एक्कु पचण्ड तिखण्ड-पहाणउ । अण्णेक्कु वि कुम्वर-पुर-राणड ॥२॥
एकहों बलण-जुअलु कुम्मुण्णड । अण्णेन्हों रत्तप्पल-वगट ॥३॥
एकहाँ ऊरू (1) जुअलु सु-वित्यरु । अण्णेकहाँ सुकुमार सु-मच्छरु ॥४॥
पच्चाणण-कडि-मण्डलु एकहो । णारि-णियम्ब-विम्बु अण्णेकहो ||
एकहाँ तुललिड सुन्दर अङ्ग । अण्णेद्यहाँ तणु-तिबलि-तरहउ ॥६॥

छवीसमो संधि चेतना गायव हो चली । इसी तरह दसों दौर में कामदेव अत्यधिक फैल गया। केवल अचरज इस वातका हो रहा था कि किसी तरह कुमारके प्राण नही निकले ।। १-६ ।। [६] कुमारका जीव कंठमें अटका था, होश आनेपर उसने इतना ही कहा, “पथिकको बुलाओ। प्रभुकी आज्ञासे अनुचर दौड़े गये, और पलभरमें लक्ष्मणके पास जा पहुंचे। उन्होनें प्रणाम करके तीनो खंडके प्रधानसे कहा,-"किसी कामसे राजाने आपको बुलाया है" यह सुनकर त्रिभुवन जनके मन और नेत्रोको आनंद देनेवाले जनार्दन लक्ष्मण चल पड़े, मानो सिंह ही अपने विकट पैर रखता हुआ जा रहा हो, धरती उसके भारसे काँप-सी उठी । 'कामदेवकी तरह जन-मनको मोहते हुए कुमारको आते देखकर कल्याणमाला (राजा) वैसे ही पुलकित हो गई, जैसे हर्प और विपादमे मग्न नाचता हुआ नट मग्न हो जाता है। फिर उसने लक्ष्मणको अपने आधे आसनपर बैठाया। वह भी जिन- शासनमे दृढ़ भव्यकी तरह स्थित हो गया। सटे हुए सुन्दर मंच- पर कुमार लक्ष्मण ऐसे बैठ गये मानो कन्याके साथ मिलकर प्रच्छन्न नया वर ही बैठा हो ॥ १-६॥ [१०] आकाशके आँगनमे सूर्य और चन्द्रकी तरह वे दोनों वीर एक ही आसनपर बैठ गये। उनमें एक अत्यन्त प्रचण्ड और तीनों लोकोका प्रधान था। जब कि दूसरा केवल नलकूबर नगरका गजा था। एकके चरण-कमल कूर्मकी तरह उन्नत थे जब कि दूसरेके पैर रक्तकमलके रंगके थे। एकका वक्षःस्थल विस्तृत था जब कि दूसरेका सुकुमार और नवनीतकी तरह था । एकका मध्य- भाग सिहकी तरह कृश था। जबकि दूसरेका नारी-नितम्बोंकी तरह था। एकके अंग सुललित और सुन्दर थे जब कि दूसरेका

१०२
पउमचरिट
एक्कहाँ सोहइ वियडु उरत्थलु । अण्णेकहाँ जोवणु थण-चकल ॥७॥
एकहों वाहउ दोह-विसालउ । अण्णेकहाँ णं मालइ-मालउ ॥८॥
वयण-कमलु पप्फुल्लिड एक्कहाँ । पुण्णिम-चन्द-तन्दु अण्णेकहाँ ॥६॥
एकहाँ गो-कमल वित्थरियडै । अण्णेकहाँ बहु-विन्भम-भरियई ॥१०॥
एक्कहाँ सिरु वर-कुसुमहिं वासिउ । अण्णेकहों वर-मउड-विहूसिउ ॥६॥
।
घत्ता
एक्कु स-लक्खण लक्खिजड़ जणण असेसे ।
अण्णेक्कु वि पुणु पच्छण्ण णारि गर-से ॥१२॥
[११]
दणु - दुग्गाह – गाह - अवगाहे । पुणु पुणरुत्तहिँ कुव्वर-गाहें ॥१॥
णयण-कडक्खिर लक्खण-सरवरु । जो सुर-सुन्दरि-गलिणि-सुहङ्कर ॥२॥
जो कत्थूरिय - पङ्कप्पविउ । जोअरि-करिहिण डोहवि सहित ॥३॥
जो सुर-सउग-सहासेंहिं मण्डिउ । जो कामिणि-थण-चक्कहिँ चड्डिड ॥४॥
तहिं तेहए सर सेय-जलोल्लिड । लक्खण-वयण-कमलु पप्फुल्लिउ ॥५॥
कण्ठ - मणोहर - दीहर-णालउ । वर - रोमञ्च-कञ्चु - कण्टालउ ॥६॥
दसण-सकेसर
अहर-महादलु। वय-मयरन्दड कण्णावत्तलु ॥७॥
लोयण - फुल्लन्धुय - परिचुम्बिउ । कुडिल-बाल-सेवाल- करम्विउ ॥८॥
घत्ता
लक्खण-सरवर हड भुक्ख-महाहिम-वाए।
तं मुह-पकड लक्खिजइ कुच्चर-राए l
[२]
जं मुह-कमलु दिठ्ठ आहुल्लिट । वालिखिल्ल - तणएण पोलिउ ॥१॥
'हे णरणाह - णाह भुवणाहिव । भोयणु भुञ्जहु सु-क्ल पिच ॥२॥

छन्वीसमो संधि १०३ शरीर त्रिबलिसे तरंगित था। एकका वक्षःस्थल विकट था और दूसरेका यौवन और स्तनचक्रसे सहित था। एककी भुजाएँ विशाल थीं तो दूसरेकी मालतीमालाको तरह सुकोमल । एकका मुखकमल खिला हुआ था जबकि दूसरेका पूर्ण चंद्रके समान सुन्दर था। एकके नेत्रकमल विखरे हुए थे जबकि दूसरेके नेत्र विभ्रम और विलाससे भरे हुए थे। एकका सिर उत्तम फूलोसे सुवासित था तो दूसरेका सिर सुन्दर मुकुटसे अलंकृत। सभी लोगोंने समझ लिया कि एक लक्षणयुक्त लक्ष्मण हैं और दूसरी नरवेशमें छिपी हुई नारी ।। १-६॥ [११] दानवरूपी दुष्ट ग्रहोंके भी ग्रह लक्ष्मणको पानेकी आशासे नलकूबर नरेश कल्याणमालाने देववाला रूपी नलिनियो के लिए शुभंकर लक्ष्मणरूपी सरोवरको बार-बार तीखे कटाक्षोंसे देखा । वह लक्ष्मणरूपी सरोवर कस्तूरीके पंकसे भरा था, शत्रु- रूपी हाथी. उसे विलोडित करनेमे असमर्थ थे। हजारों देवतुल्य स्वगुणरूपी पक्षियोंसे मंडित और जो स्त्रियोंके स्तनरूपी चक्रपर चढ़ चुका था उस वैसे लक्ष्मणरूपी सरोवरमें प्रस्वेदरूपी जलसे उल्लसित लक्ष्मणका मुख-कमल खिला हुआ था । सुन्दर कंठ ही उसकी लम्बी मृणाल थी। सुन्दर रोमांच-समूह, काँटे, दांत, पराग। अधर पंखुड़ियाँ, और कान पत्ते थे। वह नेत्ररूपी भ्रमरोंसे चुंवित टेढ़े-मेढ़े वालोंके शैवालसे चिह्नित हो रहा था। नलकूबर नरेशने लक्ष्मणरूपी सरोवरके उस मुखकमलको देखकर समझ लिया कि वह भूखकी महाहिम वातसे आहत है ।। १-६ ।। [१२] उसका मुखकमल नीचा देखकर, वालिखिल्यकी लड़की कल्याणमालाने कहा-“हे भुवनाधिप नरनाथ ! भोजन कर लीजिए। यह भोजन सुखीकी तरह, सगुलु (मधुर ?? और

पटनचरित
सगुलु ल-लोगड सर नाइन्छ । नहरु सुन्धु सम्णेहु सु-पन्छ ।शा
तं मुप्पिणु पडम-पियालणु । पच्छल कि पि करहु संनालणं ॥१॥
तं णितुणेत्रि पजम्पिर लरखणु । स्मर - वरण-गवण कान्तणु ॥
'उहु जो दीसइ रूख रवगड । पतल - बहल-बाल-संहगड ॥३॥
आयहाँ विउल मूले दए-दारट । अच्छइ सानिसालु हार
घत्ता
1
लालण-वयणहिं बलु कोकित लिड मन्त।
चरिणि-विहूनिट गं वण-इन्दु महन्तड 11
[३]
गुलगुलन्तु हलहेइ' नहगड । तत्वर-गिरिकन्दरहों विगिजात
सेय - पवाह - गलिय - गण्डत्यल। तोणा-जुयल-विउल-कुम्भयतु ॥२॥
पिचावलि-अलिडल - परिनालि । चिड़िाणि - गेजा-मालोनाल्डि ॥३॥
विधिय - वाण - विसाण-स्यङ्कर । थोर-एलन्द-चाहु-लन्विय - ३९ ॥१॥
घणुवर लगणसम्सुम्मूलणु । दुद्वारह
मेह - पडिकूलणु ॥
सर-सिकार महाबलु । तिस-भुक्रए तलन्नु विहला
छाहिह वेमाई देन्नु विड। जिणवर-वयणलण गिरदड us
जाणइ - घर - गणियारि-विहूलिड । तं पेलेवि जणबड उति ॥३॥
घत्ता
मञ्चारणहाँ उतिणु असेलु वि राय-गण (?)।
मेरु-णियन्वहाँ गं शिवडिड गह-तारायणु ॥क्षा
[४]
हरि · कहागमाल दुगु-इलहिँ । पडिय वे वि वल्एवहीं चलाहिं ।।।
'महुँ ताव दे जल कीलए । पञ्चएं भोयणु भुन लीलएँ ॥२॥

छब्बीसमो संधि गुड़), सलवण (सुन्दरता और नमक) सरस (रस, जल), सइच्छ (ईच्छा और ईख) से सहित है तथा मधुर, सुगंधित, धृतमय और सुपथ्य है। पहले आप यह प्रिय भोजन ग्रहण कर ले, फिर वाढमे संभाषण करना।" यह सुनकर, देवघालाओंके कटाक्षोंसे देखे गये लक्ष्मणने कहा, "वह जो सामने आप बड़े-बड़े पत्तों और डालोसे आच्छन्न बड़ा पेड़ देख रही है उसके विशाल तलमें हमारे श्रेष्ठ स्वामी है।" लक्ष्मणके वचन सुनकर उसने अपनी सेनाको पुकार लिया और कांतके साथ ऐसे चल पड़ी मानो हथिनीसे विभूपित वन गजेन्द्रही मल्हता हुआ जा रहा हो ॥ १-६॥ [१३] इतनेमें गरजता हुआ रामरूपी महागज, उस विशाल वृक्षको गिरि-कंदरासे निकल आया। दो तूणीर ही उसका विपुल कुंभम्थल था। पुंखावली रूपी भ्रमरमालासे वह व्यान हो रहा था । करधनीकी घंटियोसे भंकृत हो रहा था। विशाल बाणो रूपी दॉतासे वह भयंकर था। स्थूल और लम्वे वाहु ही उसकी विशाल मॅड थी। वह धनुपरूपी आलानखंभके उन्मूलनमें समर्थ, और मट दुष्ट शत्रु रूपी महावतके लिए प्रतिकूल था । ऐसा वह महाबली गम-महागज शब्दरूपी सीकर छोड़ रहा था, विह्वलांग वह भूख- प्याससे स्खलित हो रहा था। अपनी ही छायाके विरुद्ध आघात करने वाला वह केवल जिन-वचनरूपी अंकुशसे रोका जा सकता था। जानकी रूपी हथिनीसे वह विभूपित था। उसे देखकर लोग हर्पित हो उठे ॥ १-८॥ तत्र शेप राज-समूह भी मचानसे उतर पड़ा। मानो मेनके नितम्बमे ग्रहताग समूह ही टूट पड़ा हो ॥ ६ ॥ [४] राक्षस-मंहारक लक्ष्मण और कल्याणमाला दोनों ही गमके चरणाम गिर पड़े। "पहले देव. जल-क्रीड़ा हो ले तब बादमें

१०६
पउमचरित
एम भणेप्पिण दिण्णइ तुरई । झल्लरि तुणव-पणव-दडि-पहरई ॥३॥
पइठ स - साहण सरवर-णहयले । फुल्लन्धुअ - भमन्त-गहमण्डल ॥४॥
धवल - कवल - णक्खत्त-विहूसिएँ । मीण-मयर-कक्डए पीसिए ॥५॥
उत्थल्लन्त - सफरि - चल - विजुल । णाणाविह - विहङ्ग-धण-सड्डुले ॥६॥
कुवलय - दल - तमोह- दरिसावण । सीयर-णियर-वरिस-वरिसावणे ॥७॥
तरङ्ग - सुरचावारम्भिए । वल-जोइसिय-चक्र-पवियम्भिए ॥८॥
जल
घत्ता
तहिं सर णहयले स-कलत्त वे वि हरि-हलहर ।
रोहिणि-रण्णाहिं ण परिमिय चन्द्र-दिवायर ॥६॥
[१५]
तहि तेहए सर सलिल तरन्तई । सचरन्ति चामीयर - जन्तइँ ॥१॥
णा विमाणइ सग्गहाँ पडियई । वण्ण-विचित्त - रयण-वेयडियई ॥२॥
णस्थि रयणु जहिं जन्तु ण घडियउ । णथि जन्तु जहिं मिहुण ण चडियउ।३।
णत्थि मिहुणु जहिं णेहु ण वडिउ । णस्थि गेहु जो गउ सुरयट्टिउ ॥४॥
तहिं णर-णारि - जुवइ जल-कीलए । कीलन्ताइ ण्हन्ति सुर-लीलए ॥५॥
सलिलु करगिहिं अप्फालन्तइ । मुरव-वज-घायइँ दरिसन्त ॥६॥
खलिए हि वलिएहिं अहिणव-गऍहिं । वन्धहिं सुरक्खित्तिय -भेए हिं ॥७॥
छन्देहिं तालहिं वहु - लय - भॉहिं । करणुच्छित्तहिं गाणा - भङ्गेहिं ॥८॥
घत्ता
चोक्नु स-रागउ सिङ्गार-हार-दरिसावणु ।
पुक्खर-जुज्झुवतंजल-कीलणउ स-लक्खणु ॥६॥

१०७ छच्चीसमो संधि लीलापूर्वक भोजन करें।" यह कहकर उन्होने तूर्य बजा दिया, झल्लरि तुणव, प्रणव और दडि भी आहत हो उठे । सेनासहित वे सरोवर रूपी महाआकाशमे घुस गये । भ्रमर हो मानो उसमें घूमते हुए ग्रहमंडल थे। वह धवल कमलके नक्षत्रोंसे विभूपित, मीन-मकर आदिको राशियोंसे युक्त उछलती हुई मछलियोंकी चंचल विजली से शोभित, और नानाविध विहंगरूपी मेघांसे व्याप्त था। कुवलय- दल जिसमें अंधकारके समूहकी भाँति था। जलकणोके समूह ही वर्षाकी बौछारें थीं, जलतरंगें इन्द्रधनुषकी भॉति मालूम हो रही थी और सेना तारामंडलके समान फैली हुई थी। उस सरोवर- रूपी नभस्तलमें स्त्रियोसहित, राम और लक्ष्मण दोनों ऐसे मालूम होते थे मानो रोहिणी और रत्नाके साथ चंद्र और सूर्य हो ।।१-६।। [१५] उस सरोवरके जलमे वे तैरने लगे, उसमें सोनेके यंत्र चल रहे थे, जो ऐसे लगते थे मानो रंगविरंगे रत्नोसे निर्मित देवविमान ही स्वर्गतलसे गिर पड़े हैं, उनमें एक भी रत्न ऐसा नहीं था जिसमें यंत्र न लगा हो, और यंत्र भी ऐसा नही था जिसमे एक मिथुन (युगल ) न चढ़ा हो । मिथुन भी ऐसा नहीं था जिसमें स्नेह न बढ़ रहा हो, और स्नेह भी ऐसा नहीं था जिसमें सुरति न हो । उस सरोवरमें युवक-युवतियोंका समूह देवलीला- पूर्वक जलक्रीड़ामें रत होकर स्नान कर रहा था। कोई अंगुलीसे पानी उछालता, कोई मृदंगपर अपना हाथ दिखा रहा था। स्खलित होकर, मुड़कर, अभिनव गीतों, सुरति-भेदों, बंधो, विविध ताल, लय और भंगों करणुच्छित्तियो ??? नाना भंगिमाओंसे आश्चर्यपूर्ण रागपूर्ण, अहंकारको दिखानेवाली लक्षण-सहित पुष्कर युद्धकी तरह जलक्रीड़ाका (आनन्द ले रहे थे ?)। उससे सराग नेत्र और अंगहार दिखाई दे रहे थे। सलक्षण (लक्ष्मण और लक्षण सहित) मानो वह जल-क्रीड़ा पुष्कर युद्धकी तरह थी ॥ १-६ ।। ,

पउसचरित
।
समर
[१६]
जले जय - जय - सहे पहाय गर । पुणु णिग्गय हल-सारङ्ग - धर ॥१॥
पुत्यन्तर समथए ण । सिर-णमिय-कयञ्जलि-हत्थएण ॥२॥
तणु • लुहणइ देवि पहाणऍण । पुणु तिणि वि कुबर-राणएण ॥३॥
पच्छण्ण भवणे पइसारियइँ । चामियर - वीढ वइसारियई ॥४॥
वित्यारिट विस्था भोयणउ । सुकलत्तु व इच्छ ण भञ्जणउ ॥५॥
रनं पिव
पह - विहूलियउ । तूरं पिव थालालतियउ॥६॥
सुरयं पिव स-रसु स - तिम्मणउ । वायरणु व सहइ स-विजणउ पणा
तं भुत्तु सइच्छएँ भोयणउ । ण किउ जग-गाहें पारणउ ॥८॥
वत्ता
विष्णु विलेत्रणु दिण्णइ देवगई वत्थई ।
सालकरइ णं सुकइ-कियइ सुइ-सत्थई ॥६॥
[१७]
तीहि मि परिहियाई देवगई । उवहि-जलाइव वहल-तराई ॥३॥
दुल्लह-लम्भइ जिण-वयणाई व । पसरिय-पट्टई उच्छ-बणाई व ॥२॥
दीहर - छेयई अस्थाणाई व । फुल्लिय-डालई उजाणाई व ॥३॥
गिच्छिदई कइ-कन्ध-पयाई व । हलुबई चारण-जण-वयणाई व ॥क्षा
लण्हई कामिणि-मुह-कमलाइव । बड्डइँ जिणवर-धम्म-फलाइव ॥५॥
समसुत्तई किण्णर - मिहुणाई व । मह - संमत्तइँ वायरणाई व ॥६॥
तो एत्थन्तर
कुम्वर - सारे । ओयारिउ सण्णाहु कुमारं ॥७॥
सुरवर • कुलिस - मम - तणु-अझं । णावइ कञ्चउ मुस्कु सुअङ्गं ॥८
घत्ता
तिहुअण णाहण सुरजण-मण-णयणाणन्हें ।
मोक्खहाँ कारण ससारु व मुक्कु जिणिन्दै ॥६॥

छच्चीसमो संधि [१६] 'जय जय' शब्द पूर्वक लोगोने जलमे स्नान किया, फिर राम और लक्ष्मण बाहर निकले। उसी वीचमे युद्धमे समर्थ, नलकूवर नगरका राजा कल्याणमालाने हाथोकी अंजली बांधकर नमस्कार किया और उनका शरीर पोंछा । बादमें अपने भवनमें ले जाकर सोनेके आसन-पीठपर उन्हें बैठाया और खूब भोजन परसा । वह, सुकलत्रकी तरह इच्छित और भोग्य था। राज्यकी तरह पट्टविभूपित था। तूरको समान थालसे अलंकृत सुरतिके समान सरस और सतिम्मण (आई और कढ़ी सहित) था, व्याकरणकी तरह वह व्यञ्जनों (व्यञ्जनवर्ण और पकवान) शोभित था। उन्होने इच्छाभर भोजन किया, मानो जगन्नाथ अपभने ही पारणा की हो। फिर उसने विलेप करके दिव्यदेवांग वस्त्र दिये। वे वस्त्र, मानो सुकवि कृत शास्त्रके समान सालंकार थे ॥१-६॥ [१७] जैसे समुद्रजल अपनी ही बहुल लहरोंको धारण करता है, वैसे ही उन्होने वे दिव्य देवांग वस्त्र पहन लिये । जिन-वचनोंकी तरह अत्यंत दुर्लभ, ईखवनकी तरह विशालय (जलसारिणी और कपड़ा) वाले सभाभवनकी तरह दीर्घछेद (सीमा और छेद) वाले, उद्यानकी तरह फूल शाखा (और पत्तियों) से सहित, कवि- वरके काव्यपदोंकी तरह दोपरहित, चारणोंके वचनोंकी तरह हलके, कामिनीके मुख-कमलकी तरह सुंदर, जिनधर्मके श्रेष्ठ फलको तरह भारी, किन्नरोंके जोड़ेकी तरह अच्छी तरह प्रथित, व्याकरण की तरह अत्यंत परिपूर्ण थे। इतनेमे, इन्द्रके वज्रकी तरह क्षीण मध्यभाग वाले. नलवर नगरके श्रेष्ठ उस कुमारन अपना कवच इनार दिया। मानो सॉपने अपनी केचुली ही उतार दी हो, या मानी सुरजनीक मन और नत्रोको आनंद देनेवाले, त्रिभुवननाथ जिनेन्द्रने मोक्ष लिए संसारका त्याग कर दिया हो ।।१।।

११० पउमचरिउ [१८] तहिं एक्वन्त - भवणे पच्छण्णए । ज अप्पाणु पगासिउ कण्णएँ ॥१॥ पुच्छिय राहवेण परिमोसें । 'भक्खु काइँ तुहु धिय णर-वेसे ॥२॥ तं णिसुणेप्पिणु पगलिय - जयणी । एम पजम्पिय गरिंगर-वयणी ॥३॥ 'रुभुत्ति - णामेण पहाणउ । दुज्जउ विझ-महीहर-राणउ ॥४॥ तेण धरेफ्णुि कुवर - सारउ । वालिखिल्लु णिउ जणणु महारउ ॥५॥ त कजे थिय हउँ पर - वैसे । जिह णमुणिजमि जण असेसें' ॥६॥ तं णिसुणेवि वयणु हरि कुद्ध । ण पञ्चाणणु मामिस-लुद्धउ ॥७॥ अञ्चन्तन्त - णेत्तु फुरियाहरु । एम पजम्पिउ कुरुड समच्छरु || पत्ता 'जइ समरगणे तं रुभुत्ति णड मारमि । तो सहुँ सीयए सीराउहु णउ जयकारमि' ॥६॥ [१६] कल्लाणमाल मम्भीसिय । लहु णर-वेसु लइउ आसासिय ॥१॥ ताव दिवायरु गउ अथवणहाँ । लोउ पढुक्कउ णिय-णिय-भवणहाँ ।। णिसि-णिसियरि दस-दिसहिँ पधाइय । महि-गयणो? डसेवि सपाइय ॥३॥ गह णखत्त - दन्त - उद्दन्तुर । उवहि-जीह-गिरि-टाढा-भासुर ॥४॥ घण-लोयण-ससि -तिलय-विहूसिय । सन्झा-लोहिय- दित्त-पदीसिय ॥५॥ तिहुयण-वयण - कमलु दरिसेप्पिणु । सुत्त णाई रवि-मडउ गिलेप्पिण ॥६॥ ताव महावल - वलु विण्णासवि । तालवत्त णिय-णामु पगाविस ॥७॥ सीयएँ सहुँ वल-कण्ह विणिग्गय । णित्र णीसन्दण णिग्गय ॥८॥ घत्ता ताव विहाणउ रवि उद्विउ रयणि-विणासउ । गउ अच्छन्ति व णं दिणयरु आउ गवेसड ॥६॥ [२०] उदृवि कुन्वरपुर परमेसरु । जाव स-हत्थें वायइ अक्खरु ॥१॥ 4. - -

पउमचरिउ
M
M
[१३]
जं गरवइ असेस अवाणिय । दसरह-तणय चयारि वि आणिय ॥१॥
हरि - वलएन पेटुक्किय तेतह । सीय-सयम्बर - मण्डउ जेत्तह ॥२॥
दूर-णिवारिय- णरवर - लक्खहिँ । धणुहराई भल्लवियई जवखेहि ॥ ३ ॥
'अप्पण - अप्पणाई सु-पमाणई । णिव्वाडेवि लेहु वरन्चीबई ॥ ४ ॥
लइयई सायर • वजावत्तई । गामहणां इव गुणहिँ चढन्तई ॥५॥
मेल्लिट कुसुम-वासु सुर-सत्थे । परिणिय जणय-तणय काकुत्थें ।। ६ ।।
जे जे मिलिय सयम्बर राणा । णिय-णिय णयरहों गय विहाणा ।। ७ ।।
दिवसु वारु णक्खत्तु गणेप्पिणु । लग्गु जोग्गु गह-दुत्थु णिएप्पिणु ॥ ८ ॥
पत्ता
जोइसिऍहिँ आएसु किउ 'जउ लक्खण-रामहुँ सरहसहुँ ।
आयह कण्णह कारणण होसइ विणासु वहु-रक्ससहुँ' mein
[१४]
'ससिवन्द्धणेण ससि - वयणियउ । कुवलय-दल-ढीहर- णयणियउ ॥ १ ॥
कल - कोइल - वीणा - वाणियउ । अट्टारह कण्णउ आणियर ॥ २ ॥
दस लहु-भायरहुं समप्पियर । लक्खणहों अट्ट परिकप्पियट ॥३॥
दोगेण विसल्ला - सुन्दरिय । कण्हहाँ चिन्तविय मणोहरिय ॥ ४ ॥
वइदहि अउस्मा-णयरि गिय । दसरहण महोच्छव-सोह किय ।। ५ ।।
रह तिका - चउकहिं चञ्चरहिं । कुडम - कप्पूर - पवर - वरहिं ॥६
चन्दन - छडीह • दिजन्तऍहि । गायण - गीयहि गिजन्तऍहिं ।। ७
मणिमट्यउ रहयर देहलिउ । मोत्तिय कगऍहिँ रगावलिउ ।।८
गोवाण - दण्ड - मणि -तोरगई । वन्दई सुरवर - मण - चोरण. ॥६
।
घत्ता
मीय-वलई पइसारियई जण जय-जय-कारिजन्ताई।
थियई अझहें अवचलई रइ-सोक्ख-स यं भुञ्जन्ताई ॥१०॥

एकवीसमो संधि १५ [११] विद्याधर और मनुष्योके नेत्रोको आनन्द देनेवाले चंद्रगति और जनकमे वाते होने लगी। संतुष्टमन चंद्रगतिने कहा, "हम दोनों स्वजनता (रिश्तेदारी) क्यो न कर लें, तुम्हारी लड़की और मेरा लड़का, यदि दोनोका विवाह हो जाय तो मेरा मनोरथ सफल हो।" पर इस बातसे जनकका केवल क्रोध बढ़ा । उन्होने कहा, “परंतु मैने अपनी लड़की दशरथ-पुत्र रामको दे दी है, विजयश्री रूपी कामिनीमे आसक्त उन्होंने भीलोंकी सेनाको ध्वस्त किया है। इस प्रसंग पर, चन्द्रगतिने अहंकारके स्वरमे कहा- "कहाँ विद्याधर और कहाँ धरतीवासी मनुष्य ? इन दोनोंमे वहीं अन्तर है जो हाथी और मच्छरमे, और फिर मनुष्य क्षेत्र अत्यंत तुच्छ है। वहॉका जीवन स्तर भी कुछ विशेप ऊँचा नहीं है।" तव जनकने उत्तरमे कहा,-"विश्वमें मनुष्य क्षेत्र ही सबसे आगे और अच्छा है। उसमे ही तीर्थकरोने भी मुक्ति और केवलज्ञान प्राप्त किया है" ॥१-६॥ [१२] यह सुनकर भामंडलके पिता चन्द्रगतिने, जो विचार और शक्तिमें बड़ा था, कहा-"अच्छा हमारे नगरमे, मजबूत प्रत्यंचाके दो दुर्जेय धनुप हैं, उनके नाम हैं वत्रावर्त और समुद्रा- वर्त । यक्ष-राक्षसों द्वारा वे सुरक्षित है । भामंडल और राममेसे जो उन्हें चढ़ानेमे समर्थ होगा, सीता उसीको व्याही जाय ।" जनकने यह शर्त मान ली । और उन धनुषोको लेकर वह अपनी नगरीको चले गये । मंच (और मंडप) वनवाकर उन्होंने स्वयंवर बुलवाया। दुनियाके जिन राजाओको मालूम हो सका, वे सब उसमे आये, परन्तु धनुषके प्रतापके आगे सबको पराजित होना पड़ा। उनमें एक भी ऐसा नहीं था जो धनुषको चढ़ा सकता। हजारों यक्ष भी अपना मुँह दिखाकर रह गये । वे दोनो धनुष, कुत्रीकी तरह शुद्धवंश (बांस और कुल) के और शोभन होते ।

छच्चीसमो संधि [१८] एकान्त भवनमे उस कन्याने जब अपने आपको प्रकट किया, तब रामने परितोपके साथ पूछा, "बताइये, आप नरवेशमे क्यो रहती थीं। यह सुनकर गलितनेत्र वह, गद्गदवाणीमे बोली, "विध्याचलका रुद्रभूति नामक दुर्जेय राजा है। उसने मेरे पिता नलकूवर नगरके राजा वालिखिल्यको बंदी बना लिया है। इसी कारण मैं नरवेशमें रह रही हूँ, कि कोई मुझे पहचान न ले । यह सुनते ही लक्ष्मण आमिप-लोभी सिंहकी भॉति क्रुद्ध हो उठा। मत्सरसे भरकर, आरक्तनेत्र, कंपिताधर, क्रूर वह बोला, “यदि मै उस रुद्रभूतिको समर-प्रांगणमें नही मार सका तो सीता सहित गमकी जय नहीं बोलेंगा ॥ १-६॥ [१६] अभयदान और आश्वासन पाकर कल्याणमालाने नरवेश हमेशाके लिए त्याग दिया। सूरज डूब चुका था। लोग अपने-अपने घर चले गये । निशारूपी निशाचरी चारों ओर दौड़ पड़ी। धरती आकाश सब कुछ उसने लील लिया। ग्रह नक्षत्र उसके लंवे और नुकीले दॉत थे, समुद्र जीभ, पर्वत भयंकर दाढ़, मेघ नेत्र और चन्द्रमा उस निशा-निशाचरीका तिलक था। सांझकी अरुणिमासे वह ऐसी उद्दीप्त हो रही थी मानो वह सूर्य शव !! को त्रिभुवनके मुख कमलके लिए दिखाकर लीलकर सो गई हो । इसी बीच महावली वे अपनी तैयारीकर और तालपत्रपर अपना नाम अंगितकर, सीता देवीके साथ, विना किसी रथ अश्व के चल दिये । सवरे निशाका अन्त करनेवाले सूर्यका उदय हुआ। वह मानो यही खोजता हुआ आ रहा था कि क्या वे लोग चले गये ॥ १-६॥ [२०] नलकृवरका राजा-कल्याणमालाने सवेरे उठकर उस तालपत्र-लेखको पढ़ा और जब उसने त्रिलोकमे अतुल प्रतापी, देव- ११२ पउमचरित ताव तिलोयहाँ अतुल - पयावइ । सुखर-भवण - विणिग्गय-गायई. ॥२॥ दुइम - दाणवेन्द - आयाम । दिइँ लक्खण-रामहुँ णावई ॥३॥ खणे कल्लाणमाल मुच्छगय । णिवडिय केलि व खर-पवणाहय ॥४॥ दुक्खु दुक्खु आसासिय जावहिं । हाहाकार पमेल्लिड 'हा हा राम राम जग-सुन्दर । लक्खण लक्खणलक्ख - सुहङ्कर ॥६॥ हा हा सीए सीए रपेक्खमि । तिहि मिजणहुँ एक पिण पेक्खमि'n७ एम पलाउ करन्ति ण थकई । खणे णीससइ ससइ खणे कोक्का ॥5 ताहि ॥५॥ घत्ता खणखणे जोयइ चउदिसु लोयणेहिं विसालहि । खणे खणे पहणइ सिर-कमलु सइ भुव-डालहिं ॥६॥ २७. सत्तवीसमो संधि तो सायर-बजावत्त-धर सुर-डामर असुर-विणासयर । णारायण-राहव रण अजय गं मत्त महागय विझ गय ॥ [१] ताणन्तर णम्मय दिट्ट सरि । सरि जण-मण - णयणाणन्द -करि ॥१॥ करि - मयर - कराहय - उहय-तड । तडयड पडन्ति णं वज्म-झड ॥२॥ मड - भीम - णिणाए गीढ-भय । भय - भीय • समुट्ठिय - चक्हय ॥३॥ हय-हिसिय-गज्जिय-मत्त - गय 1 गयबर -अणवरय-विसह - मय ॥en मय - मुक्क - करम्विय वहइ महु । महुयर रुटन्ति मिलन्ति तहु ॥५॥ तहाँ धाइय गन्धव - पवह - गण । गण - भरिय-करजलि तुढ-मण ॥६॥ ।

सत्तवीसमो संधि लोकमें विख्यात, दुष्ट दानव-राजोंको वशमें करनेवाले राम-लक्ष्मण को नहीं देखा तो उसी क्षण वह पवनाहत कदली वृक्षकी भॉति मूचित होकर गिर पड़ी। बड़ी कठिनतासे जैसे-तैसे उसे जव चेतना आई तो उसने हाहाकार मचाना शुरू कर दिया, "हे राम! हे जगसुंदर राम, लाखों लक्षणोंसे अलंकृत हे लक्ष्मण ! हे सीता! ऊपर देखती हूँ, पर तीनोमेंसे एकको भी नहीं देख पाती।" इस प्रकार प्रलाप करती हुई वह, एक पल भी विश्राम नही ले पा रही थी। एक क्षणमे उच्छ्वास लेती और फिर उन्हें पुकारने लगती । क्षण-क्षणमें वह चारो ओर देखती अपनी बड़ी बड़ी आँखोंसे। (और उन्हें न पाकर ) अपने ही हाथो अपना शिर-कमल धुनने लगती ॥१-६॥ सत्ताईसवीं संधि समुद्रावर्त और बज्रावर्त धनुप धारण करनेवाले, असुर संहारक, रणमें अजेय, राम और लक्ष्मण, महागजकी भॉति विन्ध्याचलकी ओर गये । [१] मार्गमें उन्हें जनोके मन और नेत्रीको आनन्द देनेवाली नर्वदा नदी मिली। हाथी और मगरासे आहत उसके दोनों तट ऐसे लगते थे मानो तड़तड़ करके घातक चोट ही पड़ रही हो। उस आघातकी ध्वनिसे अत्यधिक भय उत्पन्न हो रहा था। चकोर उड़कर वहाँसे भाग रहे थे । अश्व हींस रहे थे और गज चिग्वाड़ भर रहे थे। उत्तम गजोसे वढ़िया मदजल भर रहा था । कस्तूरी मिश्रित मधुजल वह रहा था। भ्रमर उसका पान करनेके लिए गुञ्जन करते हुए उड़ रहे थे। गन्धर्व देवता दौड़ रहे थे। संतुष्टमन उनकी अञ्जलियॉ भरी हुई थीं। वैल सुन्दर ८

पउमचरिउ
मणहर ढेकार मुअन्ति चल । वल-कमल - करम्विय सङ्ग-दल ॥७॥
दलों भमर परिठिय केसरहाँ। केसरु णित णवर जिणेसरहाँ ॥८॥
घत्ता
तो सीराउह-सारङ्गधर सहुँ सीयएँ सलिल पइट्ट गर ।
उबयारु करेप्पिणु रेवयएँ गं तारिय सासण-देवयएँ ॥६॥
[२]
थोवन्तर महिहर भुअण - सिरि । सिरिवच्छे दीसइ विझरि ॥१॥
इरिणप्पहु ससिपहु कण्णपहु । पिहुलप्पहु णिप्पहु झीणपहु ॥२॥
मुरवो व्व स-तालु स - वंसहरु । विसहो व्व स-सिङ्गु महन्त-डरु ॥३॥
मयणो व्व महाणल - दद्ध - तणु । जलउ व्व स-वारिभदु व्व स-चणु ॥४॥
तहिं तेहए सेले अहिटियइ । दुणिमित्तई ताव समुष्टिय. ॥५॥
फेक्वारइ सिव वायसु रसइ । भीसावणु भण्डणु अहिलसइ ॥६||
सरु सुणेवि पकम्पिय जणय-सुअ । थिय विहि मि धरेप्पिणु भुए हिँ भुभ ॥७॥
'कि ण सुउ चवन्तु वि को वि णरु । जिह सउणउ माणिउ देइ वरु' ।
घत्ता
तं णिसुणेवि असुर-विमहणेण मम्भीसिय सीय जणहाण ।
'सिय लक्खणु वलु पच्चक्खु जहिँ कउ सउण-विसउणेंहिँ गणु तहिं ॥४॥
एत्यन्तर रहस - समुच्छलिउ । आहेडए रुभुत्ति चलिउ ॥६॥
ति - सहासेंहिँ रहवर - गयवरहिँ । तहण - तुगहि
परवरहिं ॥२॥

सत्तवीसमो संधि
रंभा रहे थे। भ्रमर कमलदलोंके परागमे घुस रहे थे। केशर
जिनेश्वरकी तरह शोभित हो रही थी ॥१-ना
तव राम लक्ष्मण और सीतादेवीको लेकर उसके जलमें
घुसे
। रेवाने भी, मानो शासन देवीकी भॉति उपकार करनेके
लिए उन्हें उस पार कर दिया (तार दिया ) ||६||
[२] (गौतम गणधरने कहा) हे राजन् (श्रेणिक ) थोड़ी देर
के अनन्तर रामको पृथ्वीका सौन्दर्य विंध्याचल पर्वत दीख पड़ा।
उस पर्वतराजके निकट ही ईरणप्रभ, शशिप्रभ, कृष्णप्रभ, निष्प्रभ,
क्षीणप्रभ पहाड़ थे। वह विन्ध्याचल मृदङ्गकी तरह, ताल (ताल
वृक्ष और सङ्गीतका ताल) से सहित सुवंशधर (उत्तम बाँस
धारण करनेवाला), वैलकी तरह सशृङ्ग (सींग और शिखरवाला)
तथा भयानक था। कामदेवके समान महानल (दावानल व शिवके
तीसरे नेत्रकी आग ) से उसका शरीर जल रहा था। मेघकी तरह
सजल, और योधाकी तरह व्रणसहित (धाव और जङ्गल) था।
परन्तु उस ऐसे पर्वतमे अधिष्ठित होते ही रामको कुछ अपशकुन
हुए। सियार फेक्कार कर रहे थे। कौवा (कॉव २) वोल रहा
था और भीपण मांस चाह रहा था। उसके स्वरको सुनकर
जनकसुता सीता काँप उठीं। अपने दोनों हाथसे रामको पकड़कर
वोली-"क्या आपने नहीं सुना, जैसे कोई सोता हुआ आदमी
वड़बड़ाता है, वैसे ही इसे समझिए ।" यह सुनकर असुर-संहारक
जनार्दन राम सीताको अभय देते हुए बोले-"जहाँ लक्ष्मणके
समान शक्तिशाली व्यक्ति स्पष्टरूपसे हमारे साथ है, तब यहाँ
तुम्हें शकुन और अपशकुनकी चिन्ता कैसी ?"||१-६
[३] ठीक इस अवसरपर, हर्पसे मूलता हुआ रुद्रभूति
शिकारके लिए निकला। वह तीन हजार हाथी, श्रेष्ठ रथों और

पउमचरित सचल्ल विन्म - पहाणऍण । लरिखबह जागर रागण प'फुल्लिय - धवल - कमल-बयण । इन्दीवर • दल - दोहर - जयण ॥४॥ तणु मम णियम्व वच्छे गल्ल । ज णयण-कविषय जगय सुध ।। उम्मायण - मयणे हिं मोहणे हि । वाण हिँ सहायण - सोमा हि ॥ आयक्लिड मल्लिड मुच्छियउ । पुणु दुक्खु दुबम्बु ओगुन्जियर ॥७॥ कर मोउइ अनु बलइ हसइ । उससद सस: पुणु णीसया ॥८॥ । घत्ता मयरदय-सर-जजरिय-तणु पहुएम पजम्पिउ कुदय-मणु । 'चलिमण्डएँ वणवसि वशवस? उताले विभागही पासुन [४] त वयणु मुणेपिणु गर-णियरु । उत्थरित गाई र अगर ॥॥ गजन्त - महागय - घण- पवलु । तिरसग्ग-पग-विजा-यालु || हय-परह - पगजिय - गयणयलु । सर-धारा - धारणि • पार-बार थुन- धयल - छत्त-विपढीर-घर । मण्डलिय - चार - मुरचार-परा मय - सन्दण - बीड - भयाबहुल । मिय-चमर-बलाग - पन्नि-पिटrj M बोरसित - मा - ददर - पउल । तोगार - मोर - जाम - गहिर net तं परवि गुन्नपुतणयणु । होट • स्ट- रोगिय • पशु 183" भारत-तोणु धणार अम: । धाइड पशु 35 घत्ता रा निहार विणायामापर मांग पर । जग मन-पापारशुम श्वशुहंगशुपषित मामाणु ॥

सत्तवीसमो संधि इनसे दूने अश्वोसे सहित था। उसने सीताको देखा। उसका मुख खिले हुए सफेद कमलके समान था । उसकी आँखें बड़ी-बड़ी, मध्यभाग दुबला-पतला तथा नितम्ब और स्तन विशाल थे। सीता को देखते ही वह उन्मादक कामके मोहक, सन्दीपक और शोपक तीरोंसे पीड़ित हो उठा। वेदनासे मूर्छित उसे बड़ी कठिनाईसे चेतना आई। कभी वह हाथ मोड़ता, कभी अङ्ग हिलाता, उच्छास भरता और निःश्वास छोड़ता । तव कामसे जर्जर शरीर उस राजा ने कहा-"उस वनवासिनी (सीताको) उन वन-वासियोंसे छीन- कर ले आओ ॥१-६॥ [४] यह शब्द सुनते ही मनुष्योंका दल उछल पड़ा। मानो नये जलधर ही उमड़ आये हों । गरजते हुए महागज रूपी मेघोसे प्रवल, तीखी तलवारोंकी विजलीसे चपल, आहत नगाड़ोंकी गर्जनासे आकाशको गुंजाता हुआ, तीरकी पंक्तियोंकी जलधारासे व्याप्त, कंपित श्वेत छत्र रूपी इन्द्रधनुषको, हाथमें लिये हुए, सैकड़ो रथपीठोसे भयावह, सफेद चमररूपी बगुलोंकी कतारसे विपुल, वजते हुए शटोंके मेढ़कोसे प्रचुर, तूणीर रूपो मोरके नृत्यमे गंभीर, मनुष्योके उस दलको देखकर जयशील, निडर, लक्ष्मण धनुप लेकर दौड़ा । ओठोंको चबाते हुए उसका चेहरा क्रोधसे तमतमा रहा था । उनके नेत्र मृगसमूहकी तरह आरक्त थे । उनकी पीठपर तरकस बँधा हुआ था। इस प्रकार हेमंत वनकर लक्ष्मण उसके (भिल्लराजके) पास जा पहुंचे। शत्रु रूपी वर्पाके संहारक वह; हलहेति (कृषक और रामके भाई ) सीतावर (ठंडीहवासे युक्त और सीताके लिए उत्तम) जनमनको कम्पित कर देनेवाले, वाणरूपी पवनसे युक्त थे ॥१-६।।

११८
पउमचरित
अप्फालिउ महुमहणेण धणु । धणु-सहें समुट्टिउ खर-पवणु ॥१॥
खर-पवण-पहय जलयर रडिय । रडियागमे वज्जासणि पडिय ॥२॥
पडिया गिरि सिहर समुलिय । उच्छलिय चलिय महि णिलिय ॥३॥
णिहलिय भुअङ्ग विसग्गि मुक् । मुक्कन्त णवर सायरहुँ ढुक्क ॥४॥
ढुक्कन्तहिं वहल फुलिङ्ग चित्त । घण सिप्पि-सङ्घ-संपुड पलित्त ॥५॥
धगधगधगन्ति मुत्ताहलाई। कढकढकढन्ति सायर-जलाई ॥६॥
हसहसहसन्ति पुलिणन्तराई । जलजलजलन्ति भुअणन्तराई ॥७॥
धणुहर-सहे णि टुरेण | रिट मुक्क पयाव-मडप्फरेण ॥८॥
ते
घत्ता
भय-भीय विसण्ठुल पर पवर लोट्टाविय हय गय धय चमर ।
धणुहर टङ्कार-पवण-पहय रिउ-तरुवर ण सय-खण्ड गय ॥४॥
[६]
एल्थन्तर तो विन्झाहिवइ । सहुँ मन्तिहिँ रुभुत्ति चवइ ॥१॥
'इमु काई होज तइलोक-भउ । कि मेरु-सिहरु सय-खण्ड गउ ॥२||
कि दुन्दुहि हय सुरवर-जणेण । किं गजउ पलय-महाघणण ॥॥
कि गयण-मग तडि तडयडिय । कि महिहर वजासणि पडिय ॥४॥
कि कालु कयन्त-मित्तु हसिउ । कि वलयामुहु समुदु रसिउ ॥५॥
किं इन्द्रहों इन्दत्तणु टलिउ । खय-रक्खसेण कि जगु गिलिड ॥६॥
कि गउ पायालहों भुवणयलु । वम्भण्डु फुटु कि गयणयलु ॥७॥
कि खय-मारुड ठाणहाँ चलिउ । किं असणि-णिहाउ समुच्छलिउ ॥३॥

सत्तवीसमो संधि [५] लक्ष्मणने पहुंचते ही धनुपकी टंकार की। उसकी ध्वनिसे पवनका प्रचण्ड वेग उठा । उस वेगसे आहत मेघ गरज उठे। उसके गर्जनसे वन गिरने लगे। वज्रपातसे पर्वतोकी चोटियाँ उछलने लगीं। उनके उछलनेसे कम्पमान धरती चरमराने लगी। उसकी चरमराहटसे सर्प विषकी ज्वाला उगलने लगे। उनकी उगली हुई आग समुद्र तक जा पहुंची । वहाँ तक पहुँची हुई आगकी चिनगारियोंसे सीप और शंखोंके सम्पुट जल उठे । मोती धकधक करके जल उठे । समुद्रका जल कड़कड़ाने लगा । किनारोंके अन्तर हस हस करके धसने लगे। इस प्रकार विश्वका अन्तराल जल उठा । उस धनुपके कठोर शब्दने शत्रुका अहङ्कार और प्रताप चूर-चूर कर दिया । भयभीत श्रेष्ठ योधा अस्त- व्यस्त हो उठे । गज, अश्व, ध्वज, चमर सव लोट-पोट हो गये। धनुपकी टंकारकी हवासे आहत होकर शत्रुरूपी महावृक्ष मानो सौ-सौ खण्डोमे खण्डित हो उठा ॥१-६।। [६] तव, विन्ध्याचल नरेश रुद्र-भूतिने अपने मन्त्रियोंसे कहा, "आखिर तीनों लोकोंमें इस तरहका भय क्यों हो रहा है ? क्या मेरु पर्वतके शिखरके शत-शत खण्ड हो गये हैं ? क्या इन्द्रने अपना नगाड़ा बजवा दिया है ? क्या प्रलयके महामेघ गरज उठे हैं ? या आकाश-मागमे तड़तड़ विजली चमक रही है या पहाइपर वज्र टूट पड़ा है, या यमका मित्र काल अट्टहास कर रहा है या गोलाकार समुद्र हँस उठा है ? या किसीने इन्द्रके इन्द्रत्वका अतिक्रमण कर दिया है, या फिर विनाशके राक्षसने ही समूचे संसारको निगल लिया है। क्या भुवनतल पाताल लोकमे चला गया है। या कि ब्रह्माण्ड ही फूट गया है। या आकाशतल ही फट गया है। क्या क्षयपवन ही अपने स्थानसे पउमचारत घत्ता कि सयल स-सायर चलिय महि किं दिसि-गय किंगजिय उवहि । एउ अक्खु महन्तउ अच्छरिउ कहाँ सट्टे तिहुअणु थरहरिउ ॥६ [७] जं णरवइ एव चवन्तु सुउ । पभणइ सुभुत्ति कण्टइय-भुउ ॥१॥ 'सुणि अक्खमि जं तइलोक्क-भड । णउ मेरु-सिहरु सय-खण्ड गड ॥२॥ णउ दुन्दुहि हय सुरवर-जणण । णउ गजित पलय-महाघणण ॥३॥ गड गयण-मग तडि तडयडिय । णड महिहर वजासणि पडिय ॥४॥ णउ कालु कियन्त-मित्तु हसिउ । णउ वलयामुहु समुदु रसिउ ॥५॥ णउ इन्दहाँ इन्दत्तणु टलिउ । खग्र-रक्खसेण णउ जगु गिलिउ ॥६॥ गड गड पायालहाँ भुवणयलु । वम्भण्डु फुटु गउ गयणयलु ॥७॥ णउ खय-मारउ थाणहाँ चलिड । णड असणि-णिहाउ समुच्छलिउ ॥८॥ णड सयल स-सायर चलिय महि । णड दिसि-य णउ गजिय उवहि ॥६॥ घत्ता सिय-लक्षण-बल-गुण-चन्तए ण णीसेसु वि जउ धवलन्तएण । सु-कलत्ते जिम जण-मणहरण ऍउ गजिउ लक्खण धणुहरेण ॥३०॥ [] सुण परवइ असुर-परायणहुँ । जं चिण्हई वल-शारायणहुँ ॥१॥ तं अस्थि असेसु वि वणवसहुँ । सुरभुवणुच्छलिय - महाजसहुँ ॥२॥ एकहाँ ससि-णिम्मल-धवलु तणु । अण्णेकहाँ कुवलय-धण-कसणु ॥३॥ एकहाँ महि-माणदण्ड चलण । अण्णेकहाँ एकहाँ तणु मज्नु पर्दासियउ । अण्णेयहाँ कमल-विहूसियउ ॥५॥ दुहम-दणु-दलण था सत्तवीसमो संधि चल पड़ा है, या कि समुद्रसहित समूची धरती ही चलायमान हो गई है ? या दिग्गज दहाड़ रहे हैं या समुद्र गरज रहा है ? आखिर यह किसके शब्दसे सारा संसार थर्रा उठा है ? वतामो यह क्या है ? मुझे वड़ा विस्मय हो रहा है" ॥१-६॥ [७] राजाको यह कहते हुए सुनकर, सुभुक्ति नामके मन्त्रीने पुलकसे भरकर कहा-"सुनिये मै बताता हूँ, क्यो तीनों लोकोमें इतना भय उत्पन्न हो रहा है । न तो मेरुपर्वतके सौ टुकड़े हुए हैं और न इन्द्रका नगाड़ा ही वजा है। न प्रलयकालके मेघ गरजे हैं और न आकाशमार्गमें बिजली गरजी है। न पहाड़पर वज्रपात हुआ है और न यमका मित्र काल ही हँसा है। न तो वलयाकार समुद्र हँसा है और न इन्द्रका इन्द्रत्व ही अतिक्रान्त हुआ है । न तो क्षयके राक्षसने संसारको निगला है और न ब्रह्माण्ड या गगन तल ही फूटा है, न क्षयमारुत ही अपने स्थानसे चलित हुआ है । न तो वनका आघात हो उछला है और न समुद्र सहित धरती ही उछली है । न तो दिग्गज दहाड़ा और न समुद्र ही गरजा । प्रत्युत यह धनुर्धारी लक्ष्मणकी हुंकार है । वह सीता और रामके साथ हैं और अपने गुणोसे समूची धरतीको उन्होने धवल कर दिया है। वह सुकलत्रकी तरह जनमनके लिए सुन्दर लगते हैं ॥१-१०॥ [८] असुरोको परास्त करनेवाले वलभद्र और नारायणके जो चिह्न हमने सुने हैं, वे सब, इन, स्वर्ग तकमे प्रसिद्ध वनवा- सियोंमे मिलते है। उनमेसे एक शशिकी तरह गौर वर्ण है और दूसरा इन्दीवर या मेघकी तरह श्याम वर्ण है। एकके चरण मानो धरतीके मानदण्ड हैं, और दूसरेके दुर्दम शत्रुओके संहारक । एक का शरीर मध्यम कृश है, और दूसरेका शरीर कमलोंसे अंचित है। 1 १२२ पउमचरिउ ॥२॥ एकहाँ वच्छत्थलु सिय-सहिउ । अण्णेकहाँ सीयाणुग्गहिउ ॥६॥ एकहीं भीसावणु हेइ हलु । अण्णेकहाँ धणुहरु अतुल-वलु ॥७॥ एक्कहाँ मुहु ससिकुन्दुज्जलउ । अण्णेक्कहाँ णव-धण-सामलउ' ॥८॥ वत्ता तं वयणु सुणेप्पिणु विगय-भउ णीसन्दणु णिग्गउ णित्तरउ । वलएवहाँ चलहिँ पडिउ किह अहिसेऍ जिणिन्दहाँ इन्दु जिह ॥९॥ [] जं रुभुत्ति चलणहिँ पडिउ । तं लक्खणु कोवाणले चडिउ ॥१॥ धगधगधगन्तु । थरथरथरन्तु 'हणु हणु' भणन्तु । णं कलि कियन्तु ॥३॥ करयल धुणन्तु । महि णिहलन्तु ॥४॥ विप्फुरिय - वयणु । णिड्डरिय-णयणु ॥५॥ महि • माणदण्डु । परवल - पचण्डु ॥६॥ सो चविउ एव । 'रिउ मेल्लि देव ॥७॥ एण । पुज्जइ हएण' ॥८॥ घत्ता तं वयणु सुणेप्पिणु अतुल-बलु 'सुणु लक्खण' पचविउ एव वलु । मुक्काउहु जो चलण हिं पडइ ते णिहए को जसु णिव्वडई' ॥६॥ [१०] थिउ लक्खणु वलेण णिवारियउ । णं वर-गइन्दु कण्णारियड ॥१॥ णं सायरु मजायएँ धरिउ । पुणु पुणु वि चविउ मच्छर-भरिउ ॥२॥ 'खल खुद्द पिसुण तउ सिर-कमलु । एत्तडेण चुक्कु ज णविउ वलु ॥३॥ वरि वालिखिल्लु मुएँ वन्दि लहु । ण तो जीवन्तु ण जाहि महु' ॥४॥ त गिसुणवि णिविसे मुक्कु पहु । णं जिणवरेण णं गह-कल्लोले अमिय-तणु । णं जं पइज ससार-पहु ॥५॥ उरगमणु ॥६॥ गरुड-विहङ्ग

No text on this page.

१२४
पउमचरित
णं मुक्कु सुअणु दुजण-जणहाँ । णं वारणु वारि-णिवन्धणहाँ ॥७॥
णं
मुक्कु
भविउ भव-सायरहाँ । तिह वालिखिल्लु दुक्खोयरहों ॥८॥
घत्ता
ते रुभुत्ति-चल-महुभहण सहुँ कुम्बर-णिवेण चयारि जण ।
थिय जाणइतेहिं समाणु किह चउ-सायर-परिमिय पुहइ जिह ॥६॥
[११]
तो वालिखिल्ल-विभाहिवइ । अवरोप्पर णेह-णिवद्ध-मई ॥१॥
कम-कमलहिँ णिवडिय हलहरहों । णमि-विणमि जेम चिरु जिणवरहाँ ॥२॥
सई हत्थें वलण समुहविय । उवहि व समएहि परिहविय ॥३॥
भरहहाँ पाइक वे वि थविय । लहु णिय-णिय-णिलयहुँ पट्टविय ॥४॥
उत्तिण्ण तिणि वि महिहरहों । णं भवियई भव-दुक्खोयरहों ॥५॥
णं मेल-णियम्वहाँ किण्णरइ । णं सग्गहाँ चवियइँ सुरवर ॥६॥
विणु खेवें तावि पराइयई। किर सलिलु पियन्ति तिसाइयहुँ ॥७॥
वरुण्हड रवियर-तावियउ । सु-कुटुम्वु व खल-सतावियउ |८||
घत्ता
दिणयर-वर-किरण-करम्बियउ जलु लेवि भुएँ हि परि चुम्वियउ ।
पइसन्तु ण भावइ मुहहाँ किह अण्णाणहों जिणवर-वयणु जिह ॥३॥
[१२]
पुणु तात्रि तरेप्पिणु णिग्गयइ । णं तिण्ण मि विज्झ-महागयई ॥१॥
वइहि पजम्पिय हरिवलहाँ । सुरवर-करि-कर - थिर-करयलहाँ ॥२॥
'जलु कहि मि गवेसहाँ णिम्मलट । जतिस-हरु हिम-ससि-सीयलउ ॥३॥
तं इच्छमि भविउ व जिण-वयणु । णिहि णिद्धणु जच्चन्धु व णयणु' ॥४॥

सत्तीसमो संधि १२५ भी रुद्धभूतिसे उसी प्रकार मुक्त हो गया जिस प्रकार सज्जन दुर्जनसे, गज आलान-स्तम्भसे, और भव्य जीव सांसारिक दुःखसे मुक्त हो जाता है। इस प्रकार रुद्रभूति, राम, लक्ष्मण और वालिखिल्य चारों मिलकर एक हो गये, उनके साथ सीतादेवी ऐसी जान पड़ती थी मानो चारों समुद्रोसे वेष्टित धरतो ही हो ॥१-६।। [११] रुद्रभूति और वालिखिल्य, एक दूसरेके प्रति स्नेहकी वृद्धि रखकर, श्रीरामके चरणोंमें नत हो गये। ठीक उसी तरह जिस प्रकार नमि और विनमि ऋपम जिनके चरणों में नत हुए थे। तब अपने हाथों उन्हें उठाते हुए रामने, उन्हें समुद्रकी तरह अपनी मर्यादामे स्थापित किया। उन दोनोंको रामने राजा भरतकी प्रजा बनाकर अपने-अपने घर भेज दिया। फिर उन तीनोने पर्वतराज विध्याचलको उसी प्रकार पार किया जिस प्रकार भन्यजीव भव- दुख-सागरको पार करते हैं । या किन्नर मेरु-शिखरको । या सुरवर देवलोकको पार करते हैं। अविलम्ब वे तीनों ताप्ती नदीके तटपर जा पहुँचे । प्यास (लगनेपर ) वे उसका पानी पीने लगे। सूर्यसे संतप्त वह पानी, दुष्टसे पीड़ित कुटुम्बकी तरह उष्ण था। सूर्य किरणोसे मिश्रित उस जलको यद्यपि उन लोगोंने हाथमे लेकर पिया, परन्तु वह उन्हे उसी प्रकार अच्छा नहीं लगा जिस प्रकार अज्ञानीको जिनवरके वचन अच्छे नहीं लगते ॥१-६॥ [१२] ताप्ती नदी पारकर वे तीनो विंध्याचलसे दूर निकल आय । तत्र वैदही सीताने गजसुण्डवाले विशालबाहु रामसे पूछा, "कहीं हिमशीतल और शशि की तरह स्वच्छ जलकी खोज कीजिये जो प्यासको बुझानवाला हो ? मुझे जल पीने की इच्छा इस प्रकार हो रही है जिस प्रकार भव्यजन जिन वचनकी, निर्धन व्यक्ति धनकी और अन्धा व्यक्ति नेत्राको इच्छा करता है ।" तव १२६ पउमचरित वलु धीरइ 'धीरी होहि धणें । मं कायर मुहु करि मिगणयणे' ॥५ थोवन्तर पुणु विहरन्त" हि । मल्हन्तहिं पउ पउ देन्तएँ हिँ ॥६॥ लक्खिजइ अरुणगामु पुरउ । वय-बन्ध-विहूसिउ जिह मुरउ ॥७॥ कप्पदुमो व्व चहिसु सुहल । णटावर णाडय-कुसलु ॥६॥ घत्ता तं अरुणगामु संपाइयई मुणितर इव मोक्ख-तिसाइयइ । सो णउ जणु जेण ण दिट्टाई घर कविलहों गम्पि पइहाई ॥६॥ [१३] णिज्झाइड तं घर दियवरहीं। ण परम-याणु थिरु जिणवरहाँ ॥३॥ णिरवेक्खु णिरक्सरु केवलउ । णिम्माणु पिरजणु णिम्मलउ ॥२॥ णिवत्थु णिरत्थु णिराहरणु । णिदणु णिभत्तउ णिम्महणु ॥३॥ तहि तेहएँ भवण पइट्ठाई । छुडु छुडु जलु पिऍवि गिविट्ठाई ॥४॥ कुन्जर इव गुहँ आवासियई । हरिणा इव वाहुत्तासियइ ॥५॥ अच्छन्ति तात्र तर्हि एकु खणु । दिउ ताव पराइउ कुइय-मणु ॥६॥ 'मर मरु णीसरु णीसरु' भणन्तु । धूमद्धउ व्व धगधगधगन्तु ॥७॥ भय-भीसणु कुरुड सणिच्छरु च । वहु उवविस विण्णउ विसहरु च्व ॥८॥ । । घत्ता 'कि कालु कियन्तु मित्त वरिउ कि क्सरि केसरग्गे धरिउ । को जम-मुह-कुहरहाँ णीसरिउ जो भवण महारऍ पइसरिउ' ॥

सत्तवीसमो संधि १२७ . वलभद्र रामने सीतादेवीको धीरज बंधाते हुए कहा-"देवी ! धैर्य रक्खो । कातर मुख न बनो।" इस प्रकार विहार करते और अल्ह- ड़तासे आगे पग बढ़ाते हुए रामको थोड़ी दूर चलनेपर बुधजनोंसे घिरा हुआ अरुण नामका एक गॉव मिला। वह गाँव उन्हें ऐसा लगा मानो वह वयवन्ध (चमड़ा और वगीचा) से विभूषित- हो कल्पवृक्षकी तरह चारों ओरसे शोभित वह नटकी भॉतिमें कुशल था। मोक्षपिपासासे व्याकुल मुनियोकी भॉति वे सव उस अरुण गाँवमे पहुँचे । वहाँ एक भी आदमीको न पाकर वे लोग किसी कपिल नामके ब्राह्मणके घरमें घुस पड़े ।।१-६।। [१३] द्विजवरका वह घर (वास्तवमें) जिनवरके परम स्थान मोक्षकी तरह दीख पड़ा। निर्वाणकी तरह एकदम निरपेक्ष, अक्षररहित तथा केवल (केवलज्ञानसे रहित और पास पड़ोससे रहित ) निर्मान (अहंकार और गौरवसे शून्य ) निरंजन (पाप और अलिंजरसे रहित ) निर्मल (कर्म और धूलिसे हीन) निर्भक्त (भक्ति और भोजनसे होन) था । उस घरमें घुसकर शीघ्रतासे पानी पीकर वे लोग उसी प्रकार निपटे जैसे सिंहकी चपेटसे मन्त गज गुफाम पहुँचकर निवृत्ति प्राप्त करता है। वे उस घरमें क्षणभर ही ठहरे थे कि क्रुद्धमन कपिल (महोदय) वहाँ आ धमके । आगकी तरह धधकता हुआ वह बोला "मरो मरो, निकली निकलो । शनिकी तरह अत्यन्त कठोर, भयभीपण और विपाक्त सर्पकी तरह वह ब्राह्मण अत्यन्त खिन्न मनका हो रहा था। उसने कहा, "क्या तुमने (आज) काल या कृतान्तको अपना भित्र चुना है या सिंहकी अयालके अग्रिम वालोका पकड़ा है। यमकी मुख-गुफासे कॉन निकल सका है, तुमने (फिर ) मेरे घरमं से प्रवेश किया" ॥१-६।।

१२८ पउमचरिउ मत्त-नाउ॥७॥ [१५] तं वयणु सुणेप्पिणु महुमहणु । आरु समर-भर-उव्वहणु ॥१॥ णं धाइउ करि थिर-थोर-करु । उम्मूलिट दियवर जेम तरु ॥२॥ उग्गा वि भावि गयणयलें । किर विवइ पडीवड धरणियलें ॥३॥ करें धरिउ ताव हलपहरणण । 'मुए मुऍ मा हणहि अकारणेण ॥४॥ दिय-वाल-गोल - पसु-तवसि-तिय । छ विपरिहरु मेल्ल विमाण-किय ॥५॥ तं णिसुणे वि दियवर लक्खणेण । णं मुक्कु अलक्खणु लक्खणेण ॥६॥ ओसरिट वीर पच्छामुहउ । अङ्कस-णिरुद्ध गं पुणु हियऍ विसूरइ खण जे खण । 'सय-खण्ड-खण्ड परि हूउ रणें ॥८॥ घत्ता वरि पहरिउ वरि किउ तवचरणु वरि विसु हालाहलु वरि मरणु । वरि अच्छिउ गम्पिणु गुहिल-वणे णवि णिविसु वि णिवसिउ अवुहयण ॥६॥ [१५] तो तिपिण वि एम चवन्ताइ । उम्माहउ जणहाँ जणन्ताई ॥१॥ दिण-पच्छिम-पहर विणिग्गयाइ । कुञ्जर इव विउल-वणहाँ गया ॥२॥ वित्थिण्णु रण्णु पइसन्ति जाव । णग्गोहु महादुमु दिहु ताव ॥३॥ गुरु-वेसु करवि सुन्दर-सराइ । ण विहय पढावइ अक्खराइँ ॥४॥ बुक्कण-किसलय कका रवन्ति । वाउलि-विहग कि-क्की भणन्ति ॥५॥ वण-कुक्कुड कु-कू आयरन्ति । अण्णु वि कलावि के-कइ चवन्ति ॥६॥ पियमाहवियउ को-कउ लवन्ति । कंका वप्पीह समुल्लवन्ति ॥७॥ गुरु-गणहर-समाणु । फल-पत्त-वन्तु अक्खर-णिहाणु ॥८॥ घत्ता पइसन्तहिं असुर-विमहर्णे हि सिरु णामवि राम-जणहणे हिँ। परिअञ्च वि दुम दसरह-सुऍहिँ अहिणन्दिउ मुणि वस इभुऍहिँ ॥६॥ सो तरुवरु सत्तवीसमो संधि [१४] यह सुनते ही समरभार उठानेमें समर्थ लक्ष्मण एक- दम ऋद्ध हो उठा और उस द्विजपर उसी प्रकार झपटा जिस प्रकार स्थूलझुण्ड गज पेड़ उखाड़ने दौड़ता है। वह उसे उठाकर और आकाशमें घुमाकर पटक देता, परन्तु रामने उसे शान्त कुरते हुए कहा, "छिः छिः व्यर्थ ही उसे मत मारो। नीति है कि मनुष्योंको इन छ:की हत्या नहीं करनी चाहिए। ब्राह्मण, वालक, गाय, पशु, तपस्वी और स्त्री ।" यह सुनकर लक्ष्मणने उस द्विजवरको कुलक्षणकी भॉति छोड़ दिया। अंकुशसे निरुद्ध, महागजको भॉति वह अपना मुँह मोड़कर पीछे हट गया । तव वे अपने मनमे वार-बार यह सोचकर पछताने लगे, "युद्धमें सौ-सौ खण्ड हो जाना अच्छा, प्रहार करना अच्छा, तपस्या करने चला जाना अच्छा, विष या हलाहल पीकर मर जाना अच्छा, एकान्त वनमे चला जाना अच्छा पर मूल्के वीच पलभर ठहरना भी ठीक नहीं" ||१-६॥ [१५] यह गुनते हुए उन तीनोने लोगोके मार्ग दर्शन करने पर, दोपहरके बाद उसी प्रकार कूच कर दिया जिस प्रकार गज दुर्गम वनकी ओर चल देता है । तव एक विस्तीर्ण वनमें प्रवेश करते ही, उन्हें वटका एक विशाल वृक्ष दिखाई दिया। वह वट- वृक्ष मानो शिक्षकका रूप धारणकर पक्षिरूपी शिष्योंको सुन्दर स्वर और व्यञ्जनके पाठ पढ़ा रहा था। कौआ कक्का कह रहे थे, बाउल विहंग किक्की बोल रहे थे । मयूर केक्कई कह रहे थे, कोकिल कोक्कड और पपीहा कंकाका उच्चारण कर रहे थे। वह महावृक्ष मानो गुरु गणधरकी भॉति फल-पत्रसहित नाना अक्षरोका निधान था। उस महावटके निकट जाकर असुरसंहारक दशरथ पुत्र राम और लक्ष्मणने उसकी परिक्रमा की तथा माया भुकाकर उसका अभिनन्दन किया ॥१-६|| ६ सीय स-लक्खणु दासर । [ २८. अट्ठावीसमो सन्धि] तरुवर-मूल परिट्रिय जावे हि । पसरइ सु-कइहें कन्यु जिह मेह-जालु गयणगणे तावे हि ॥ [१] पसरह मेह-विन्दु गयणझण। पसरइ जेम सेण्णु समरहण ॥१॥ पसरइ जेम तिमिरु अण्णाणहाँ । पसरइ जेम वुद्धि वहु-जाणहाँ ॥२॥ पसरइ जेम पाउ पाविठ्ठहाँ । पसरइ जेम धम्मु धम्मिट्ठहाँ ॥३॥ पसरइ जेम जोह मयवाहहाँ । पसरइ जेम कित्ति जगणाहहाँ ॥४॥ पसरइ जेम चिन्त धण-हीणहाँ । पसरइ जेम कित्ति सुकुलीणहाँ ॥५॥ पसरइ जेम सदु सुर-तूरहाँ । पसरइ जेम रासि गहें सूरहाँ ॥६॥ पसरइ जेम दवम्गि वणन्तरें । पसरइ जेह-जालु तिह अम्वरें ॥७॥ तडि डतयडइ पडइ घणु गजइ । जाणइ रामाँ सरणु पवजह ॥८॥ घत्ता अमर-महाधणु-गहिय-कर मेह-गइन्द च. वि जस-लुद्धउ । उप्परि गिम्भ-णराहिवहाँ पाउस-राउ गाइँ सण्णद्धउ ॥६॥ [२] जं पाउस-गरिन्दु गलगजिउ । धूली-रउ गिम्भेण विसजिउ ॥१॥ गम्पिणु मेह-विन्द आलग्गउ । तडि-करवाल-पहारहि जं विवरम्मुहु चलिउ विसालउ । उहिउ 'हणु' भणन्तु उण्हालउ ॥३॥ धगधगधगधगन्तु उद्धाइउ । हसहसहसहसन्तु जलजलजलजलजल पचलन्तउ । जालावलि फुलिङ्ग मेल्लन्तउ ॥५॥ धूमावलि-धयदण्डन्भेप्पिणु । वर-वाउल्लि-खग्गु कड्डोप्पिणु ॥६॥ झडझडझडझडन्तु पहरन्त । तस्वर-रिउ-भड-थड भजन्तउ ॥७॥ मेह-महागय-घड विहडन्तउ । जं उण्हालउ दिछ भिडन्तउ ॥८॥ पत्ता धणु अप्फालिउ पाउसैण तडि-रङ्कार-फार दरिसन्ते ।' चोएवि जलहर-हत्थि हड णीर-सरासणि मुक्त तुरन्त ॥६॥' भग्गउ ॥२॥ सपाइउ ॥४॥ - अट्ठाईसवीं संधि गम लक्ष्मण और सीतादेवीके साथ जैसे ही उस तस्वरके नीचे बैठे वैसे ही, नुकविके काव्यकी तरह, आकाशम मेघजाल फैलने लगा। [१] जैसे लमगङ्गणमें सेना फैलती है, अज्ञानी में अन्धकार फैलता है, बहुनानीम वुद्धि फैलती है, पापिष्टमे पाप फैलता है, धमिष्टमें धर्म फैलता है, चन्द्रमाकी चाँदनी फैलती है, धनहीनको चिन्ता फैलती है और जैसे सुकुलीनकी कीर्ति फैलती है, जैसे नगाईका शब्द फैलता है, जैसे सूर्यको किरणे फैलती हैं, आर बनमें दावानल फैलता है, वैसे ही आकाशमें मेघजाल फैलने लगा। उन लमय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो पावस राजा यशी कामनासे मेघ महागजपर बैठकर, इन्द्रधनुप हाथमे लेकर, प्रीम नगधिपपर चढ़ाई करनेके लिए सन्नद्ध हो रहा हो ॥१-६।। [२] जब पावन गजाने गर्जना की तो ग्रीप्म राजाने धूलि- का वेग सोश, वह जाकर मेघ-समूहसे चिपट गया। परन्तु पावस गजान बिजलीको नलवारांक प्रहारसे उसे भगा दिया। जब वह धूलिवंग (बबण्डर ) उलटे मुंह लौट आया, तो ग्रोप्मवेग पुनः उठा ! धकधकाना और हस हस करता हुआ वह वहाँ पहुँचकर जान जलकर प्रदान हो उठा। इससे चिनगारियों छूटने लगी। उपने मालिके यजदण्ट उवाडकर नृफानकी तलबारसे मड़गाड़ पर मार करना प्रारम्भ कर दिया । तन्वररूपी शत्रु-समूह भग्न निलंगे। मंयचटा विर्याटन हो उठी। इस प्रकार ग्रीप्मगजा, पावनगजान मिल गया नय पावनने विजलीकी टंकार फरके इन्द्र- धरण पर लोग नहाली । जलपरकी गजघटाको प्रेरित किया. और होप मागेको चीर शुरु कर दी ॥१-६।।

पटनचरिट [३] रवि लाग जल-बागाणि-वायहिँ घाइड । निम्म-गगहिट रणें विणिवाइट ॥१॥ दव गं सम्मण । णं णञ्चन्ति मोर खल दुमण ॥२॥ णं पून्ति सरिट अछन् । गं कइ विलिन्ति आणन्हें ॥३॥ णं उन्योन। णं वरहिण लवन्ति परिमास या गं सखर बहु-अंमु-जलोलिय । णं गिरिवर हरिस गलिय ||५|| गं उपहविन दवग्नि विओएं । णं णचिय महि विविह-विणाएं ॥६॥ णं अत्यमिठ निवायर दुक्ख । गं पइसाइ त्यणि सई सुक्ने ||७|| रत्त-पत्त तर पत्रणाकम्पिय । 'केण वि बहिट गिम्भु णं जस्पिय II परहुय विमुक्छ घत्ता तहए काले मयाउरएँ वेणि मि वामएव-बलपुत्र । तलर मूलेंस-लीय थियजोगु लएविणु मुणिवर जैन l [2] हरि-वल रुक-मूल थिय जाबेहिं । गयमुहु जन्न्छ पणावि तावहिं ॥३॥ गट णिय-णिवहाँ पासु वेवन्तठ । 'देव देव परिताहि' भणन्तट ॥२॥ 'ण जागहुँ कि सुरवर कि णर । किं विजाहर-गण कि किण्णर ||३|| घणुघर धीर बडायट उमवि । सुत्त महारट णिल गिलम वि ॥l तं णिमणेविणु वयणु महाइट । पूषणु मम्मीसन्नु विम-महीहर-सिहरहाँ भाइठ । तरखणे तं उसु पराइट मा ताम णिहालिय वेण्णि वि दुदर । सायर-बजावत-धणुदर अवहीं-णाणु पटन्नड़ जावे हि । लक्खणराम मुणिय मणे ताहि ।।८ पधाइट || ||७||

अट्ठावीसमो संधि
[३] जलके वाणों से आहत होकर ग्रीष्म राजा धरतीपर
गिर पड़ा। उसके पतनको देखकर मेंढक सज्जनों की भाँति
रोने लगे। और दुष्टजनों की तरह मयूर नाचने लगे।
आकन्द्रनसे ऐसे नदियाँ भर उठी, मानो कवि आनन्दसे
किलकिला उठा हो, मानो कोयल कूक उठी हो, मानो मयूर
परितोषसे नाच उठा हो, मानो सरोवरका जल अत्यधिक
परिमावित हो उठा हो, मानो गिरिवर हर्पसे रोमांचित
हो उठा हो, मानो वियोगका दावानल नष्ट हो गया हो।
मानो धरावधू विविध विनोदोसे नाच उठी हो, मानो दुःखके
अतिरेकसे सूर्यका अस्त हो गया हो । मानो सुखसे रजनी फैल
गई हो। हवामें हिलते-डुलते लाल कोपलवाले वृक्ष मानो इस
बातकी घोपणा कर रहे थे कि ग्रीष्मराजाका वध किसने कर दिया।
उस घोर समयमें राम, लक्ष्मण और सीता उस वट महावृक्षके
नीचे इस प्रकार बैठे हुए
थे मानो योग साधकर महामुनि ही
बैठे हों ॥१-६॥
[४] इतनेमें एक यक्ष, वर्षासे क्षतविक्षत होकर, टिठुरता हुआ
अपने राजाके पास गया और ( यक्षराज से) बोला, "देव देव,
मैं नहीं जानता कि वे कौन है, सुरवर हैं कि नरवर, विद्याधर
है या कि किन्नर । दोनों ही वीर धनुष चढ़ाकर हमारे घर
वटवृक्षको घेरकर सो रहे हैं ।" यह सुनकर, उस यक्षको अभयदान
देकर, वह यक्षराज दौड़ा और शीघ्र ही पर्वत की उस शिखर पहुंचा
जहाँ, वनावर्त और सागरावर्त धनुप लिये हुए वे दोनों
(राम लक्ष्मण) वैठे हुए थे । अवधिज्ञानके प्रयोगसे उस यक्षराजने
फौरन जान लिया कि ये राम और लक्ष्मण हैं । वलभद्र और

१३१ पटमचरिट घत्ता पेक्वेवि हरि-वल वे विजण पूर्वण-जलं जय-जस-लुद्ध । मणि-कञ्चण-धण-जण-पटर पणु किड णिमिसद्धहाँ अढें ॥३ [५] पुणु रामटार पोसिय लोए । णं णारिह अणुहरिय णिओएं ॥१॥ दीहर - पन्य - पसारिय-चलणी । कुसुम - णियस्य - वत्य-साहरणी ॥२॥ खाइय-तिवलि-तरहं - विह्वसिय । गोउर-थणहर - सिहर - पीसिय ॥३॥ बिडलाराम - रोम - रोमञ्चिय । इन्दगोत्र - सय - कुङ्कुम - अश्चिय ॥२॥ गिरिवर-सरिय - पसारिय-वाही । जल - फेणावलि - वलय-सणाही ॥५॥ सरवर-गयण - घणक्षण-अक्षिय । सुग्धणु-मटह - पदीसिय-पब्जिय ॥॥ देटल-बयण-कमलु दरिसेप्पिणु । वर-मयलब्लण-तिल छुहेप्पिणु ॥७॥ णाई णिहालइ द्रिणयर-दप्पणु । एम विणिम्मउ सयलु वि पट्टणु ॥८॥ वइलैंवि बलहाँ पास वीसत्यत । आलावड़ आलावणि-हत्य | पत्ता एकवीस वर-मुच्छणड सत्त वि सर ति-गाम इरिसन्तउ । 'युमि भडारा दासरहि सुप्पहार तर' एव भणन्तउ ॥१०॥ [६] सुप्पहाड उच्चारित जाहिं । रामें चलें वि पलोइड ता हिँ ॥१॥ दिन्छु णयह जं जक्ख-समारिट । णाई णहङ्गणु दूर-बिहूसिउ ||२|| स-घणु स-कुम्भु स-सत्रणु स-सहर । स बुहु स-तार सगुल्ससकर ॥३॥ पुणु वि पडीवर णयह णिहालिड । णाई महावणु कुसुमोमालिट ॥ell अट्ठावीसमो संधि नारायण दोनोंको एक साथ देखकर, जयशील और यशलोलुप उस यक्षराजने पलभरमें एक नगरी खड़ी कर दी, जो मणि- माणिक्य और धन-धान्यसे पूरित थी ॥१-६।। [५] लोगोंने उसका नाम ही रामपुरी रख दिया । रचना और आकार-प्रकारसे बह नगरी नारीकी तरह प्रतीत होती थी। लम्बे-लम्वे पथ उसके पैर थे। फूलों के ही उसके वस्त्र और अलङ्कार थे। खाईकी तरङ्गित त्रिवलीसे वह विभूपित थी। उसके गोपुर स्तनोके अग्रभागकी तरह जान पड़ते थे। विशाल उद्यानोंके रोमोंसे पुलकित, और सैकड़ों वीर-वधूटियोके केशरसे अन्चित थी। पहाड़ और सरिताएँ मानो उस नगरीरूपी नारीकी फैली हुई भुजाएँ थीं। जल और फेनावलि उसकी चूड़ियाँ और नाभि थीं। सरोवर नेत्र थे, मेघ काजल थे और इन्द्रधनुप भौहें। मानो वह नगरीरूपी नव-वधू चन्द्रमाका तिलक लगाकर दिनकर-रूपी दर्पण मे अपना देवकुल रूपी मुख देख रही थी। इस प्रकार उस यक्षने क्षणभरमे समूची नगरीका निर्माण कर दिया। विश्रब्ध होकर, रामके पास बैठकर और अपने हाथमे वीणा लेकर बजाने लगा। इक्कीस मूर्छनाओं, सात स्वर और तीन ग्रामोंका प्रदर्शन करते हुए अपने गीतमें उस यक्षराजने कहा, "हे राम, यह सब आपका ही सुष्पहाव (सुप्रभाव और सुप्रभात) है।।१-१०॥ [६] सुप्रभात शब्द सुनते ही, रामने जो मुड़कर देखा तो उन्हें यक्षोंसे भरा हुआ नगर दीख पड़ा । मानो सूर्यसे आलोकित गगनांगन ही हो। गगनांगनमे धन, कुंभ, श्रवण, चन्द्रमा, बुध, तारक, गुरु और जल होता है। उस नगरमे धन घड़ा श्रमण पंडित उपाध्याय और मार्ग थे। रामने फिर घूमकर देखा तो वह उन्हें कुसुमोसे व्याप्त महावनकी तरह लगा। वह नगर सुकविके कान्यकी

१३६
पउमचरित
गाइँ सुकइहें कन्वु पयइत्तिउ । णाई गरिन्द-चित्तु बहु-चित्तउ ॥५॥
णाई सेण्णु रहवरहँ अमुफउ । णाई विवाह-गेहु स-चउक्कट ॥६॥
गाई सुरउ चञ्चरि-चरियालउ । णावइ डिग्भउ अहिय-छुआलउ ॥७॥
अह किं वण्णिएण खण जे खण । तिहुअणे णत्थि ज पि तं पदणें ॥८॥
घत्ता
तं पेक्खेप्पिणु रामउरि भुअण-सहास-विणिग्गय-णामहाँ।
मन्छुडु उज्झाउरि-णयह जाय महन्त भन्ति मण रामहाँ ॥
७]
जं किउ विम्भउ सासय-लक्खें । वुत्तु गवेप्पिणु पुअण-जखें ॥१॥
'तुम्हारउ वण-बसणु गिएप्पिणु । किउ मई पट्टणु भाउ धरेप्पिणु' ॥२॥
एम भणेवि सुविस्थय-णामहाँ। दिण्ण सुघोस वीण ते रामाँ ॥३॥
दिण्णु मउडु साहरणु विलेवणु । मणि-कुण्डल कडिसुत्तउ कङ्कणु ॥४॥
पुणु वि पजम्पिउ जक्ख-पहाणउ । 'हउँ तउ मिच्चु देव तुहुँ राणउ' ॥५॥
एव वोल्ल णिम्माइय जावे हिं । कविले गयरु णिहालिउ तावहिं ॥६॥
जण-मणहरु सुर-सग्ग-समाणउ । वासवपुरहाँ वि खण्डइ माणउ ॥७॥
तं पेखें वि आसकिउ वम्भणु । कहिं वित्यिण्णु रण्णु कहिँ पट्टणु ॥८॥
घत्ता
थहरन्तु भय-मारुऍण समिहउ विवि सणासइ जावेंहि ।
मम्भीसन्ति मियङ्कमुहि पुरउ स-माय जक्खि थिय ताहिँ ॥६॥

अट्ठावीसमो संधि तरह पद (पद और-प्रजा) से सहित तथा नरेन्द्र के चित्तकी तरह बहुत ही चित्र-विचित्र था। सेनाकी तरह रथश्रेष्ठोसे सहित, विवाहके घरकी तरह, चौक (चौमुहानी और भूमिमंडन) से सहित था। सुरतिके समान वक्र चेष्टाओसे युक्त, बच्चेकी तरह अत्यधिक सुधित, (भूखा और चूनेसे पुता हुआ) जान पड़ता था । अथवा अधिक कहनेसे क्या, संसारमें एक भी ऐसा नगर नहीं था जिसकी उससे तुलना की जा सके। हजारों भुवनोंमें विख्यात नाम रामको उस नगरको देखकर यह भ्रांति हो गई कि कहीं यह दूसरी ही अयोध्या न हो।। १-६ ।। [७] (इसके अनन्तर ) यह सब आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले- अपलक नेत्र उस यक्षने प्रणामपूर्वक रामसे निवेदन किया, "आपके वनवासकी वात जानकर ही मैंने सद्भावनासे इस नगरका निर्माण किया है ।" यह कहकर उसने रामको सुघोष नामकी वीणा प्रदान की तथा दूसरी, मुकुट, आभरण, विलेप, मणि, कुंडल, कटिसूत्र और कंगन आदि चीजे दी। तदनन्तर यक्षोके प्रमुख उसने कहा, "मै आपका अनुचर हूँ, और आप मेरे स्वामी ।" वह इस प्रकार निवे- दन कर ही रहा था कि इतनेमे उस कपिल ब्राह्मणने इस नगरको देखा । जनमन हारी, देवोके स्वर्गके समान सुन्दर उस नगरको देखकर उसने समझा कि यह अमरावती का ही एक खंड है। यह सव (कौतुक) देखकर वह सोचने लगा, "कहाँ वह धना जंगल और कहाँ यह सुन्दर नगरी । भय रूपी हवासे वह कॉप गया । लकड़ियोका गट्ठर फेंककर वह मूर्छित होनेको ही था कि चन्द्रमुखी नामकी यक्षिणी उसके सम्मुख आई और 'डरो मत' कहकर माताके समान उसके आगे बैठ गई ॥ १-६॥

१३८ पउमचरिउ [-] 'हे दियवर चउचेय-पहाणा । किण्ण मुणहि रामउरि अयाणा ॥१॥ जण-मण-वल्लहु राहव-राणउ । मत्त-गइन्दु व पगलिय-दाणउ ॥२॥ तकुव-भमर-सएहिँ ण मुच्चइ । देइ असेसु वि जं जसु रचइ ॥३॥ जोयह (१) जिणवर-णामु लएइ । तहो कढप्पिणु पाणइँ देइ ॥४॥ ए2 ज वासव-दिसऍ विसालउ । दीसइ तिहुअण-तिलउ-जिणालउ ॥५॥ तहिं जो गम्पि करइ जयकारु । पट्टणं णवरि तासु पइसार' ॥६॥ तं णिसुणेप्पिणु दियवरु धाइउ । णिविसें जिणवर-भवणु पराइउ ॥७॥ तं चारित्तसूर मुणि वन्देवि । विणत करवि अप्पाणउ णिन्दै वि ॥८॥ घत्ता पुच्छिउ मुणिवरु दियवरण 'दाणहाँ कारण विणु सम्मत्तें । धम्म लइएकवणु फलु एड देव महु अक्खि पयत्ते ॥६॥ [] मुणिवरु कह वि लग्गु 'विउलाई। किं जणे ण णियहि धम्मफलाई ॥१॥ धम्मै भढ-थड हय गय सन्दण । पावे मरण-विमओयकन्दण ॥२॥ धम्में -सग्गु भोग्गु सोहगु । पावं रोग्गु सोगु दोहगु ॥३॥ धम्में रिद्धि विद्धि सिय संपय । पावे अस्थ-हीण जर विद्दय ॥४॥ धम्म कडय-मउड-कडिसुत्ता। पाव णर दालिहें भुत्ता ॥५॥ धम्म रज्जु करन्ति णिरुत्ता। पावें पर - पेसण-सजुत्ता ॥६॥ धम्में वर - पल्लङ्क सुत्ता । पावें तिण-संथार विभुत्ता ॥७॥ धम्में णर , देवत्तणु वत्ता। पावे जरय-घोर संकन्ता | अट्ठावीसमो संधि [=] वह बोली, "अरे अजान द्विजवर, चारों वेदोमें विद्वान् होकर तुम यह नहीं जानते कि यह रामपुरी है। और इसमें जनमनके प्रिय राजा राघव हैं। मत्तगजकी तरह वह शीघ्र ही दान (मदजल, दान ) देनेवाले हैं । सैकड़ों याचकजन उन्हें नहीं छोड़ रहे हैं, जिसे जो अच्छा लगता है, वह उसे वही दे डालते है। जिनवरका नाम लेकर जो भी उनसे मांगता है उसके लिए वे अपने प्राण तक उत्सर्ग कर देते है । यह जो इन्द्रकी दिशामें त्रिभुवन श्रेष्ठ जिनालय देख पड़ रहा है। पहले तुम उसमे प्रवेश कगं नहीं तो नगर प्रवेश नहीं मिल सकता।" यह सुनकर वह प्राण दौड़कर गया और एक पलमें ही उस जिनालयमे पहुंच गया। उसने वहाँ चारित्रसूर्य यतिकी वन्दना की। उनकी विनय करनके बाद वह अपनी निन्दा करने लगा। फिर उस बाम गने उनसे पूछा, "सम्यक्त्वके बिना, दानके लिए धर्म-परिवर्तन करनका क्या फल है। हे देव, मुझे यह बनाए ॥११॥ [2] यह नुनकर गुनिवर बोले, "क्या तुम लोकमे धर्माके नाना फल नहीं देखते । धर्म से भटसमूह, य, गज और रथ मिलते । पापन्ने गगण. वियोग और आक्रन्दन मिलता है। धर्मसे स्वर्ग- भीग और सौभाग्य होता है। पापसे गंग, शोक और अभाग्य । धर्म प्रतिसिलिनि श्री और सम्पदा मिलती है। पापसे मध्य धनान और दयाविहीन होता है। धर्मसे कटक, मुकुट र मात्र मिलने में और पापन्ने मनुष्य दरिद्रताका भोग मानाने जीर निशय ही गय करता है और पापसे की ममा परना है। धर्मले पर. उत्तम पलंगपर शयन पाच निनांकी मेजपर सोता है। धर्मसे करन पाऔर पोर पापने नाकमें जाता है। धर्मन्ने

१४०
पउमचरित
धम्मै गर रमन्ति वर-विलयउ । पावे दूहविउ दुह-णिलयउ ॥६॥
धम्म सुन्दर अङ्ग णिवद्धउ । पावें पङ्गु लउ वि वहिरन्धर ॥१०॥
घत्ता
धम्म-पाव-कप्पह महुँ आय जस-अवजस-बहुलाई।
वेणि मि असुह-सुहङ्कर जाइँ पियइँ लइ ताई फलाई ॥११॥
मुणिवर-वयणे हिँ दियवरु वासिउ । लइड धम्मु जो जिणवर भासिउ ॥१॥
पञ्चाणुव्वय
पधाइउ । णिय-मन्दिरु णिविसेण पराइड ॥२॥
गम्पिणु पुणु सोम्महँ बजरियउ । 'अजु महन्तु दिडु अचरियउ ॥३॥
कहिँ वणु कहिँ पट्टणु कहिँ राणउ । कहिँ मुणि दिछु अणेय जाणउ ॥४॥
कहिँ मइ कहिँ लद्धई जिण-वयण । वहिर कण्णऽन्धेण व णयण ॥५॥
तं णिसुणेवि सोम्म गोल्लिय । 'जाहुँ णाह तहि' एम पवोल्लिय ॥६॥
पुणु संचल्लइँ वे वि तुरन्तइँ । तिहुयण-तिलउ जिणालउ पत्तइँ ॥७॥
साहु णवेप्पिणु पासँ णिविहई। धम्मु सुणेप्पिणु णयर पइट्टई ॥८॥
घत्ता
दिट्ठ गरिन्दत्थाणु णहु जाणइ-मन्दाइणि-परिचड्डिउ ।
णर-णक्खत्तहिँ परियरिउ हरि-वल-चन्द-दिवायर-मण्डिउ ॥९॥
[११]
हरि अस्थाण-मग्ग जं दिढउ | दियवरु पाण लएवि पणहउ ॥१॥
ण छ कुरङ्ग व वारणवारहो । णट्छ जिणिन्दु व भव-संसारहाँ ॥२॥
ण हु मियक व अव्भपिसायहो । ण ठु दवग्गि व पीर-णिहायहाँ ॥३॥
ण छ भुअङ्ग व गरुड-विहङ्कहाँ । णट् टु खरो व्व मत्त-मायनहीं ॥४॥
जट / अणड व सासय-गमणहाँ । गट्ठु महाघणो व्व खर-पवणहाँ ॥५॥
ण महीहरो व्व सुर-कुलिसहाँ। णट् टु तुरङ्गमो ब्व जम-महिसहाँ ॥६॥
तिह णासन्तु पीसिउ दियवरु । मम्भीसन्तु पधाइड सिरिहरु ॥७॥

भट्ठावीसमो संधि मनुष्य उत्तम निलयमें रमण करता है, और पापसे दुर्भाग्यपूर्ण दुख-निलयमें। धर्मसे सुन्दर शरीरको रचना होती है, पापसे (मनुष्य ) पंगु और अन्धा होता है। धर्म और पाप रूपी कल्पतरुओके यश और अपयशसे युक्त शुभ और अशुभ दो ही फल होते है। इनमेसे जो प्रिय लगे उसे ले लो" ॥१-१२।। [१०] मुनिवरके वचनोंसे पुलकित होकर उस द्विजने जिन- वर-द्वारा प्रतिपादित धर्म अंगीकार कर लिया। पाँच अणुव्रत ग्रहण कर लिये । एक पलमें ही वह अपने घर पहुँच गया । जाकर उसने अपनी पत्नीसे कहा-"आज मैंने बहुत बड़ा अचरज देखा। कही मैने वन देखा और कहीं नगर । कहीं राजा और कहीं मुनि, कही अनेक यान मिले और कहीं मुझे जिनवचन सुननेको मिले। मानो बहरेको कान और अन्धेको नेत्र मिले हों।" यह सुनकर, पुलकित पत्नीने कहा,-"शीघ्र ही वहाँ जाइए।" तदनन्तर वे दोनो वहाँके लिए चल पड़े। वे उस त्रिभुवनतिलक जिनालयमें पहुंचे, और मुनिवरको प्रणामकर वहाँ बैठ गये। धर्मका श्रवणकर वे नगरमें घुसे । वहाँ उन्होंने राजा रामका दरबाररूपी आकाश देखा, उसमें सीता रूपी मन्दाकिनी (आकाशगंगा) अधिष्ठित थीं। और वह मनुष्य रूपी नक्षत्रोंसे घिरा हुआ था । राम और लक्ष्मण रूपी चन्द्र और सूर्यसे वह अलंकृत था ॥१-४।। (११) परन्तु जैसे ही राज-दरबारके मार्गमें उस द्विजवरने लक्ष्मणको देखा तो उसके प्राण उड़ गये । जिस प्रकार सिंहको देखकर हरिण, या भवसंसारसे जिन, राहुसे चन्द्र, मत्तहाथीसे गर्दभ, मोक्षगामीसे काम, प्रबलपवनसे मेघ, इन्द्रवज्रसे पर्वत, यममहिपसे अश्व नष्ट हो जाता है, वैसे ही लक्ष्मणसे उस कपिल द्विजको प्रनष्ट होते हुए देखकर, उसने उसे अभय दिया। ।

१४२ पउसचरित मण्ड धरेवि करेण करग्गएँ । गम्पि चित्तु वलएवहाँ अग्गए ॥८॥ दुक्खु दुक्खु अप्पाणउ धीरवि । सयलु महन्भउ मनें अवहेरेंवि ॥६॥ दुहम - दाणविन्द - वल-मदहों । पुणु आसीस दिण्ण वलहहहाँ ॥१०॥ घन्ता - 'जेम समुहु महाजलेण जेम जिणेसरु सुकिय कम्मै । . चन्द-कुन्द जस-णिम्मलण तिह तुहुँ वढु णराहिव धम्म' ॥११॥ [१२] तो एत्यन्तरे पर-बल-महणु । कहकह-सद्दे हसिउ जणहणु ॥१॥ भवणे पइह तुहारऍ जइयहुँ । पई अवगणेवि घल्लिय तझ्यहुँ ॥२॥ एत्थु काले पुणु दियवर कीसा। विणउ करवि पुणु दिग्ण असीसा ॥३॥ णिसुणेवि भणइ वेयायरु । अत्यहाँ को ण वि करइ महायरु ॥५॥ जिह आणन्दु जणइ सीयालएँ । एत्थु ण हरिसु विसाउ करेवउ ॥५॥ काल-बसेण कालु वि सहेवउ । एत्थु ण हरिसु विसाउ करेवउ ॥६॥ अत्थु विलासिणि-जण-मण-चल्लहु । अस्थ-विहूणड वुच्चइ घलहु ॥७॥ अत्थु वियदु अत्थु गुणवन्तउ । अस्थ-विहूणु भमइ मग्गन्तउ ।। अत्थु अणड्नु अत्थु जग सूहउ । अत्थ-विहूणु दीणु णरु दूहउ ॥६॥ अत्थु सइच्छिउ भुजइ रज्जु । अत्थ विहूणे कि पि ण कज्जु' ॥१०॥ घत्ता 'साहु' भणन्ते राहवेण इन्दणील-मणि-कञ्चण-खण्ड हि । कडय-मउढ-ऋडिसुत्तयहि पुजिउ कविलु सई भुव-दण्डेहिँ ॥११॥ .

अट्ठावीसमो संधि १४३ अपने हाथसे उसकी अंगुली पकड़कर लक्ष्मणने उसे लाकर रामके सम्मुख डाल दिया। जैसे तैसे अपने आपको धीरज बॅधा, और मनसे समस्त भयको दूर कर उस कपिल द्विजवरने दुर्दम दान- वेन्द्रोंके संहारक रामको आशीर्वाद दिया-"जिस प्रकार समुद्र महाजलसे बढ़ते है, जिनेश्वर पुण्य कर्मसे बढ़ते हैं, उसी प्रकार आपका भी यश चन्द्र और कुन्द पुष्पके समान बढ़ता रहे" ॥१-११॥ [१२] तब पर-बलसंहारक लक्ष्मण कहकहा लगाकर हँस पड़ा। और बोला,-"जब हम तुम्हारे घरमे घुसे थे तब तो तुमने अवहेलनाके साथ निकाल दिया। और अब आप, कैसे द्विजवर हैं जो इस तरह विनय पूर्वक आशीर्वाद दे रहे है ?” यह सुनकर उस ब्राह्मणने कहा,"अर्थका महान् आदर कौन नहीं करता। सूर्य जिस प्रकार शीतकालमे आनन्द देता है, उसी प्रकार क्या उष्णकालमें अच्छा नहीं लगता। समयके अधीन होकर हमें (जीवन मे ) सब कुछ सहन करना पड़ता है। अतः इसमें हर्ष विपाद की क्या बात है। विलासिनी स्त्रियों को अर्थ बहुत ही प्रिय लगता है। अर्थहीन नरको वे छोड़ देती हैं। (संसार में) अर्थ ही विदग्ध है और अर्थ ही गुणवान् है । अर्थ विहीन भीख मॉगता हुआ फिरता है । अर्थ ही कामदेव है, अर्थ ही जगमें शुभ है, अर्थहीन नर दीन और दुर्भग है । अर्थसे ही इच्छित राजभोग मिलता है । अर्थहीनसे कुछ काम-काज नहीं होता।" तव रामने साधु-साधु कहकर उस ब्राह्मण देवता को, इन्द्रनील मणियों और सुवर्णसे वने कटक मुकुट और कटिसूत्र देकर अपने हाथसे स्वयं उसका खूब आदर-सत्कार किया ॥१-११।।

[ २६. एगुणतीसमो संधि]
सुरडामर-रिउ-डमरकर कोवण्ड-धर सहुँ सीयएँ चलिय महाइय ।
वल-णारायण वे वि जण परितुह-मण जीवन्त-णयरु सपाइय ॥
[१]
पट्टणु तिहि मि तेहिं आवजिउ । दिणयर-विम्वु व दोस-विवजिउ ॥३॥
णवर होइ जइ कम्पु धएसु । हउ तुरएसु जुझ सुरएसु ॥२॥
घाउ मुरवेसु भङ्ग चिहुरेसु ॥३॥
जड रुहेसु मलिणु चन्देसु ॥४॥
खलु खेत्तेसु
दण्ड छत्तेसु ॥५॥
(बहु-)कर गहणेसु पहरु दिवसेसु ॥६॥
धणु दाणेसु
चिन्त माणेसु ॥७॥
सुर सग्गेसु
सीहु रण्णेसु ॥८॥
कलहु गएसु अङ्क कव्वेसु ॥४॥
डरु वसहेसु वेलु गयणेसु ॥१०॥
वणु रुखेसु
माणु मुक्खेसु ॥११॥
अहवइ कित्तिउ णिव वणिजइ । जइ पर त जितासु उवमिजइ ॥१२॥
घत्ता
तहाँ णयरहों अवरुत्तरण कोसन्तरण उववणु णामेण पसत्थउ ।
णाइ कुमारहाँ एन्ताहों पइसन्ताहा थिउणव-कुसुमञ्जलि-हत्यउ ॥१३॥
[*]
तहिं उववर्ण थिय हरि-वल जाहिँ । भरहें लेहु विसजिउ ताहि ॥१॥
अग्गए चित्तु णरेण गरिन्दहौं । भविउ वचलणे हि पडिउ जिणिन्द्रहों॥२॥
लइउ महीहरेण सइँ हत्थे । जिणवर-धम्मु व मुणिवर-सत्यं ॥३॥
वारि-णिवन्धहाँ मुक्कु गइन्दु व । दिट्ठ अङ्घ तहिँ णहयले चन्दु व ॥४॥

उनतीसवीं सन्धि
देवों के लिए भयंकर शत्रुओके संहारक और धनुर्धारी राम
और लक्ष्मण चूमते हुए जीवंत नगर पहुंचे।
[१] उन तीनीने उग्न नगरको सूर्यविम्ब की तरह दोप
(अवगुण और गत ) से रहित देखा। उस नगरम कम्पन केवल
पनाकाओ में था. हन (घाव ) अश्वोमे, इन्द्व सुरति में, आघात
मृगग, भंग कशीम, जड़ता नद्रम, मलिनता चन्द्रम, खल खेतोम,
नांग: बहुल कर ग्रहण करनका अक्सर (कर टैक्स और
बाग) प्रहर दिनम. धन दान में चिन्ता ध्यानमें, सुर (स्वर और
शगव नगीनम, सिंह अरण्यम. कलह गजाम, अंक काव्योमें, भय
चलने. बल ( नानुल और मी) आकाशमे, वन (व्रण, वेत)
जंगल न. और ध्यान मुक्त नगन था। इनके लिए दूसरी
जगार नीधीं। (गौतम गणधग्ने कहा ) अथवा ई गजन्
(भागक) उसनगर का वर्णन करना सम्भव नहीं, उस नगरकी
मा प.वल उनी नगरसे दी जा सकती है। उस नगरके उत्तरम
प्रशन नामक एक उपवन था. यह सा लगता था मानो आते
प्रवेगा एनागके न्यागतने हाथम अंजलि लेकर
}:-

१४६ पउमचरित 'रज्जु मुएवि वे वि रिउ-मद्दण । गय वण-चासही राम-जणहण ॥५॥ को जाणइ हरि कहिउ आवइ । तहाँ वणमाल देज जसु भावई' ॥६॥ लेहु घिवेप्पिणु णरवइ महिहरु । णाई दवेण दड्डु थिउ महिहरु ॥७॥ णाई मियतो कमिउ-विडप्पं । तिह महिहरु गरिन्दु माहप्पें ।।। घत्ता जाय चिन्त मणे दुद्धरहाँ धरणीधरहों सिहि-गल-तमाल-घण-वण्णहाँ। 'लक्खणु लक्खण-लक्ख-धरु तमुए विवरमई दिण्ण कण्ण कि अण्णहाँ ॥६॥ [३] तो एत्यन्तर णयण-विसालएँ । एह वत्त जं. सुय वणमालए ॥१॥ आउलिहुय हियएण - विसूरइ । दुक्खं महणइ व्व आऊरइ ॥२॥ सिरे पासेउ चडइ मुहु सूसइ । कर विहुणइ पुणु दइवहाँ रूसइ ॥३॥ मणु धुगुधुगइ देहु परितप्पइ । वम्महो णं करवत्ते' कप्पइ ॥४॥ ताव णहङ्गणेण धणु गजिड़ । णाइ कुमार दूउ विसज्जिउ ॥५॥ घोरी होहि माएँ' णं भासिउ । 'उहु लक्खणु उववणे आवासिउ' ॥६॥ गरहिउ मेहु तो वि तणु-अनिए । दोस वि गुण हवन्ति ससग्गिएँ ॥७॥ 'तुहुँ किर जण-मण णयणाणन्दणु । महु पुणु जलहर णा हुआसणु ।।८।। - .: पत्ता. तुज्छु ण दोसु दोसु कुलहाँ हय दुह-कुलहों जलें जलणें पवण जं जायउ । तं पासेउ दाहु करहु णीसासु महु तिण्णि वि दक्खवणहाँ आयउ ॥६॥ -

एगुणतीसमो संधि
१४७
पत्रमें यह लिखा था, "राज्य छोड़कर शत्रुसंहारक राम और लक्ष्मण
दोनो वनवासके लिए गये हैं। क्या पता वे कब तक लौटें ?
इसलिए जिसको ठीक समझो उसको वनमाला दे दो।' लेख
पढ़कर राजा सन्न रह गया। वह वैसे ही गौरवहीन हो उठा
जैसे दावानलसे भस्मीभूत पहाड़ या राहु से ग्रस्त चन्द्रमा गौरव
रहित हो जाता है । मयूरकण्ठके समान श्याम वर्ण उस राजाको
अब यह चिन्ता उत्पन्न हुई कि मैं, अपनी कन्या वनमाला, अनेक
लक्षणोंसे युक्त लक्ष्मणको छोड़कर, और किसे दूँ ॥१-६।।
।
[३] इतनेमें यह वात विशालनयना, वनमालाके कानों तक
पहुँची । यह सुनते ही वह आकुल होकर मन ही मन विसूरने
लगी। महानदीकी तरह वह दुखसे भर उठी। सिरमे पसीना हो
आया । मुख सूख गया । हाथ मलती हुई वह अपने भाग्यको
कोसने लगी। मन धुक-धुक कर रहा था । देह जल रही थी । मानो
कामदेव ही करपत्रसे उसे काट रहा हो । उसी समय आकाशके
आंगनमे मेघ ऐसा गरज उठा, मानो कुमार लक्ष्मणने दूत ही भेजा
हो, और जो मानो यह कह रहा था,-"मॉ धीरज धरो, वह
कुमार लक्ष्मण उपवनमे ठहरा हुआ है ।" तब भी उस तन्वंगीने
मेघकी निन्दा ही की, ठीक भी है क्योकि संसर्ग से, गुण भी दोप
हो जाते है । उसने कहा,-"मेघ, तुम भले ही जनोके मन और
नेत्रीको आनन्द देनेवाले हो, परन्तु मेरे लिए तो दावानलकी तरह
हो । इसमे तुम्हारा दोष नहीं, दोप तुम्हारे हत और दुखद कुलका
है । तुम जल आग और हवासे उत्पन्न जो हुए हो, उसीसे
पसीना और जलन उत्पन्न करते हो और निःश्वास देते हो। तुमने
मुझे तीनों ही चीजे दिखा दीं ॥१-६।।
,

१४८
पउमचरिउ
[४]
दोच्छिउ मेहु पणछ णहङ्गणें । पुणु वणमालए चिन्तिउ णिय-मण॥१॥
'कि पइसरमि वलन्त हुआसण । कि समुहूँ कि रण सु-भीसणें ॥२॥
किं विसु भुजमि कि अहि चप्पमि । कि अप्पर करवत्त कम्पमि ॥३॥
कि करिवर-दन्तहिं उर भिन्दमि । कि करवालहिं तिलु तिलु छिन्दमि॥४॥
किं दिस लडमि कि पन्वजमि । कहाँ अक्खमि कहाँ सरणु पवजमि ॥५॥
अहवइ एण काई गसु सन्जमि । तरुवर-डालए पाण विसजमि' ॥६॥
एम भणेप्पिणु चलिय तुरन्ती । ककल्ली-थड उग्घोसन्ती ॥७॥
गन्ध-धृव-वलि - पुप्फ - विहत्थी । लीलए चिकमन्ति वीसी ॥८॥
घत्ता
चउविह-सेण्णे परियरिय धण णीसरिय 'को विहिं आलिङ्गणु देसई'।
एम चवन्ति पइदु वर्णे रवि-अत्थवणे 'कहिँ लक्खणु' णा गवेसइ ॥६॥
[५]
दिठु असोयवच्छु परिअञ्चिउ । जिणवरो ब्व सब्भावें अञ्चिउ ॥१॥
पुणु परिवायणु कियउ असोयहाँ । 'अण्णु ण इह-लोयहाँ पर-लोयहो ॥२॥
जम्में जम्म मुअ-मुअहँ स-लक्खणु । पिय-भत्तारु होज महु लक्खणु' ॥३॥
पुणु पुणु एम णमसइ जावै हिँ । रयणिहें वे पहरा हुय ताहिं ॥४॥
सयलु वि साहणु णिहोणलउ । णावइ मोहण-जाले पेल्लिउ ।।५।।
णिग्गय पुणु वणमाल तुरन्ती । हार-डोर-णेउरै हिँ खलन्ती ॥६॥
हरि-विरहम्बु-पूर उन्भन्ती । वुण्ण-कुरसि व चित्तम्भन्ती ॥७॥

एगुणतीसमो संधि [४] अपनी भर्त्सना सुनकर मेघ आकाशमे ही नष्ट हो गया। तब फिर वनमाला अपने मनमें सोचने लगी,-"क्या मै जलती आगमे कूद पड़ या समुद्र या वनमें घुस जाऊँ, क्या विपपान कर लूं या सॉपको चॉप दूँ? क्या अपनेको करपत्रसे काट ले ? क्या हाथीके दाँतसे छाती फाड़ लूँ या करवालसे तिल- तिल छेद दूँ ? क्या दिशा लॉघ जाऊँ या संन्यास ग्रहण कर लें ? किससे कहूँ और किसकी शरण जाऊँ ? अथवा इस सबसे क्या काम वनेगा ? तरुवरकी डालसे टंगकर मै ही अपने प्राण छोड़े देती हूँ।" मनमें यह सोचकर, और अशोक वनके लिए जानेकी घोषणा करके वह तुरन्त घरसे चल पड़ी। उसके हाथमें गन्ध, दीप, धूप और पूजाके फूल थे। वह चमकती-दमकती, लीला पूर्वक चली जा रही थी। चारों ओर सैनिकोसे घिरी हुई वह धन्या अपने मनमे यह सोचती हुई, अपने घरसे निकल पड़ी कि देखू , दोनो (अशोक वृक्ष और लक्ष्मण ) मेसे कौन मुझे आलिगन देता है । सूर्यास्त होते-होते वह वनमें प्रविष्ट हुई । वह मानो यह खोज रही थी कि लक्ष्मण कहाँ है ।।१-६॥ [५] वनमालाके लिए अशोक वृक्ष ऐसा लगा सानो सद्भावोसे अंचित जिनेन्द्र ही हों। फिर उसने अशोक वृक्षसे निवेदन करते हुए कहा,-"इस जन्ममे और दूसरे जन्समें, मेरा दूसरा नहीं है । सुलक्षण लक्ष्मण ही जन्म-जन्मान्तरमें बार-बार मेरा पति हो ।" इस प्रकार आत्म-निवेदन करते हुए उसे रातके दो प्रहर बीत गये । सारे सैनिक नीदके झोकोमें ऊँघकर ऐसे लोट- पोट होने लगे मानो मोह-जालसे फंस गये हो । तब बनमाला बाहर निकली । हार डोर और नूपुरसे वह स्खलित हो रही थी। प्रियके विरहाश्रुओंसे भरी हुई वह; विपन्न हरिणीकी भाँति उद्भ्रान्त मन हो रही थी। एक ही पलमें वह वटके पेड़ पर चढ़ गई।

१५०
पवमचरित
णिविसद्ध जग्गोहें वलग्गी । रमण-चवल णं गोह-वलग्गी ॥८॥
घत्ता
रेहइ दुम वणमाल किह घण विज्जु जिह पहवन्ती लक्खण-कद्धिणि ।
किलिकिलन्ति जोडावणिय भीसावणिय पञ्चक्ख णाई वड-जक्खिणि ॥६॥
[६]
तहिं वालएँ कलुणु पकन्दियउ । वण-ढिम्भउ णं परिमन्दियउ॥१॥
'आयण्णहाँ वयणु वणस्सइहाँ। गङ्गाणइ - जउण - सरस्सइहाँ ॥२॥
गह-भूय-पिसायहाँ विन्तरहीं। वण-जक्खहाँ रक्खहाँ खेयरहाँ ॥३॥
गय-बग्यहाँ सिद्धहाँ सम्वरहो । रयणायर - गिरिवर - जलयरहों ॥४॥
गण-गन्धवहाँ विजाहरहों। सुर - सिद्ध - महोरग-किण्णरहाँ ॥५॥
जम - खन्द - कुवेर • पुरन्दरहौँ । वुह - भेसइ - सुक्क - सणिच्छरहाँ ॥६॥
हरिणकहाँ अकहाँ जोइसहाँ। वेयाल दइचहीं
रक्खसहाँ ॥७॥
वइसाणर - वरुण पहजणहाँ। तहाँ एम कहिजहाँ लक्खणहाँ ॥८॥
घत्ता
बुच्चइ धीय महीहरहों दीहर-करहों वणमाल-णाम भय-वजिय ।
लक्खण-पइ सुमरन्तियएँ कन्दन्तियएं वड-पाय पाण विसजिय' ॥६॥
-
एम भणेप्पिणु णयण-विसालएँ । असुअ-पासउ किड वणमालएँ ॥१॥
सो ज्ज गाउँ सइँ मम्भीसावइ । णाई विवाह-लील दरिसावइ ॥२॥
णं दियवरु दाणहाँ हकारिउ । णाई कुमार हत्थु पसारिउ ॥३॥
गले लाएवि हल्लावइ जा हिँ । कण्ठे धरियालिङ्गे वि ताहिं ॥४॥
एम पजस्पिड मम्भीसन्तउ । 'हउ सो लक्खणु लक्खणवन्तउ ॥५॥
दसरह-तणउ सुमित्तिए जायउ । रामें सहुँ वणवासहाँ आयउ' ॥६॥
तं णिसुणे वि विम्भाविय णिय-मणे । कहिं लक्खणु कहिँ अच्छिउ उववणे ॥७॥
ताम हलाउहु कोकइ लग्गउ । 'भो भो लक्खण भाउ कहि गउ' ॥८॥

एगुणतीसमो संधि वैसे ही जैसे कोई चपल रमणी, अपने जारके निकट लग जाती है ? लक्ष्मणको चाहने वाली क्रांतिमती वह वटके पेड़पर ऐसी मालूम हो रही थी मानो धनमे बिजली चमक रही हो या, वनमें किलकती, कौतुक करती हुई सक्षात् भयंकर यक्षिणो हो ॥१-हा [६] (आत्मघातके पूर्व) उसने अपना विलाप ऐसे शुरू किया, मानो वनगज-शिशु ही चीख उठा हो । उसने कहा, "वन- स्पति, गंगा नदी, जमुना, सरस्वती, ग्रह, भूत, पिशाच, व्यंतर, वनयक्ष, राक्षस, खेचर, गज, बाघ, सिंह, संवर, रत्नाकर, गिरिवर, जलधर, गण, गंधर्व, विद्याधर, सुर, सिद्ध, महोरग, किन्नर, कार्तिकेय, कुवेर, पुरन्दर, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनिश्चर, चन्द्र, सूर्य, ज्योतिष, वैताल, दैत्य, राक्षस, अग्नि, वरुण और प्रभंजन ! मेरे वचनोंको सुनो, तुम्हें यदि कहीं लक्ष्मण मिलें तो यह कह देना कि विशालबाहु राजा महीधरकी वनमाला नामकी लड़की, निडर हो, अपने पति लक्ष्मणके ध्यानमे रोती कलपती, हुई, गिरकर मर गई॥१-६॥ [७] यह कह कर विशालनयना वनमालाने कपड़ेका फन्दा वना लिया, स्वयं नहीं डरती हुई, वह मानो विवाह-लीलाका प्रदर्शन कर रही थी। मानो द्विजवरने कन्यादानके लिए उसे पुकारा हो और कुमार (वर) ने हाथ फैला दिया हो। वह, गलेमें फन्दा लगा ही रही थी कि इतनेमें कुमार लक्ष्मणने गलेसे पकड़कर उसका आलिंगन कर लिया और यह कहा, "डरो मत ! मै ही वह सुलक्षण लक्ष्मण हूँ ! दशरथका सुमित्रासे उत्पन्न पुत्र मै, रामके साथ वनवासके लिए आया हूँ " यह सुनकर आश्चर्यचकित हो वनमाला अपने मनमें सोचने लगी, "अरे लक्ष्मण कहा, वह तो उपवनमे है।' इतनेमे, रामने पुकारा,-"ओ लक्ष्मण, इधर आओ,

१५२
पउमचरित
घत्ता
तं णिसुणेवि महिहर-सुभएँ पुलइय-भुअए णडु जिह णञ्चाविउ णिय-मणु ।
'सहल मणोरह अज्जु महु परिहूउ सुहु(१) भत्तारु लधु ज लक्खणु' ॥६॥
[-]
तो एत्थन्तरै भुवणाणन्दे । दिटु जणणु राहवचन्दें ॥१॥
णावइ तमु दीवय-सिह-सहियउ । णावइ जलहरु विज्जु-पगहियउ ॥२॥
णावइ करि करिणिहें आसत्तउ । चलले हिं पडिउ वलहों स-कलत्तउ ।।३।।
'चारु चारु भो णयणाणन्दण । कहिं पई कण्ण लद्ध रिडमहण' ॥४॥
वुत्त कुमारे 'विज व सगुणिय । धरणीधरहाँ धीय कि ण मुणिय ॥५॥
महु पुचयण्ण-उवदिट्ठी । सा वणमाल एह वर्ण दिट्ठी' ॥६॥
हरि अप्फालइ जाव कहाणउ । ताम रत्ति गय विमल विहाणउ ॥७॥
सुहड विउद्ध कुद्ध जस-लुद्धा । 'केण वि लक्ष्य कण्ण' सण्णद्धा ॥८॥
जा
घत्ता
ताव णिहालिय दुजएँ हिँ पुणु रह-गएँ हिँ चाउहिसु चवल-तुरहिं ।
वेढिय रणउह वे वि जण वल-महुमहण पञ्चाणण जेम कुरङ्गहिं ॥६॥
[1]
अभिटु सेण्णु कलयलु करन्तु । 'जिह लइय कण्ण तिह हणु' भणन्तु ॥१॥
तं वयणु सुणेप्पिणु हरि पलित्तु । उद्धाइउ सिहि णं घिऍण सित्तु ॥२॥
एकल्लउ लवखणु वलु अणन्तु । आलग्गु तो वि तिण-समु गणन्तु ॥३॥
परिसकइ थक्कइ चलइ वलइ । तरखर उम्मूलवि सेण्णु दलइ ॥४॥

एगुणतीसमो संधि १५३ कहाँ चले गये ?" | यह सुनकर महीधर राजाकी पुत्री, पुलकित वाहु वनमालाने नटकी तरह अपना मन नचाते हुए कहा,-"आज मेरे सभी मनोरथ सफल हो गये, कि जो मुझे लक्ष्मण जैसा पति मिल गया ।।१-६॥ [८] तदनन्तर, भुवनानंददायक राघवचन्द्रने लक्ष्मणको वन- मालाके साथ आते हुए देखा। वह ऐसा लग रहा था मानो दीप- शिखा तमके साथ हो, या बिजली मेघके, या हथिनीमे आसक्त गजराज हो। अपनी पत्नी वनमालासहित वह रामके चरणों में गिर पड़ा । रामने तव उससे पूछा, अरे प्रिय लक्ष्मण,.. सुन्दर- सुन्दर यह कन्यारत्न तुमने कहाँ प्राप्त किया।” (यह सुनकर) कुमारने उत्तर दिया-"क्या आप महीधर राजाकी गुणवती पुत्री विद्याधरी वनमालाको नहीं जानते"। वह मुझे पहले ही निर्दिष्ट कर दी गई थी। वही मुझे ( अचानक) इस वनमे दीख गई।" इस प्रकार कुमार लक्ष्मणके पूरी कहानी बताते-वताते ही (पहले ही) रात्रि समाप्त हो गई और निर्मल प्रभात हो गया। उधर (उपवनमे ) कन्याको न पाकर, यशलोलुप रक्षक सैनिक विरुद्ध हो उठे। वे कहने लगे "कन्याका हरण किसने किया।" तव रणमे दुर्जेय सैनिकोने चपल अश्व, रथ और गजोंसे युद्ध क्षेत्रमे दोनो ( राम लक्ष्मण ) को इस प्रकार घेर लिया जिस प्रकार हरिण सिंहको घेर ले ॥१-६॥ [] कलकल करती हुई सेना उठी, और यह चिल्लाने लगी, "जिसने कन्या ली हो उसे मारो" यह सुनकर लक्ष्मण प्रदीप्त हो उठा। मानो घी पड़नेसे आग ही भड़क उठी हो। सेना असंख्य थी और लक्ष्मण अकेला । तब भी उसे तिनकेके समान समझकर वह भिड़ गया। वह ठहरता, चलता, मुड़ता, पेड़ उखाड़

१५४
पउमचरित
उबडइ भिडइ पाडइ तुरङ्ग । महि कमइ भमइ भामइ रहन ॥५॥
भवगाहइ साहइ धरइ जोह । दलबइ लोहड़ गयवरोह ॥६॥
विणिवाइय घाइय सुहड-थट्ट । कडुआविय विवरामुह पयह ॥७॥
णासन्ति के विजे समर चुछ । कायर-णर-कर-पहरण
मुछामा
पत्ता
गम्पिणु कहिउ महीहरहाँ 'एकहाँ गरहाँ आवट्टु सेण्णु भुव-दण्डएँ ।
जिम णासहि जिम भिडुसमर विहिँ एक्कु करें वणमाल लइय वलिमण्डएँ' ॥६॥
[१०]
तं वयणु सुणेप्पिणु थरहरन्तु । धरणीधर धाइड विप्फुरन्तु ॥१॥
आरुद्ध महारहें दिण्णु सखु । सण्णधु कुथु जय-लच्छि-कल ॥२॥
तो दुजय दुदर दुण्णिवार । 'हणु हणु' भणन्त णिग्गय कुमार ॥३॥
वणमाल - कुसुम - कल्लाणमाल । जयमाल - सुमाल - सुवण्णमाल ||
गोपाल-पाल इय अटु भाइ । सहुँ राए णव गह कुइय णाई ॥५॥
एत्यन्तर
बहु-मच्छरेण । हकारिट
लक्खणु महिहरेण ॥६॥
'वलु वलु समरगगें देहि जुन्छु । णिय-णामु गोत्त कहें कवणु तुझु' ॥७॥
तं णिसुणे वि वोल्लिड लच्छिनोहु । 'कुल-णामहाँ अवसर कवणु एहु ॥८॥
रण
घत्ता
पहरु पहरु जं पहुँ गुणिट किण्ण वि मुणिउ जसु भाइ महन्तउ रामु ।
रहुकुल-णन्दणु लच्छि-हरु तड जीवहरु णरवइ महु लक्खणु णामु' ॥६॥
[११]
कुलु णामु कहिउ जं सिरिहरेण । धणु वत्तवि महिहँ महीहरेण ॥१॥

एगुणतीसमो संधि कर शत्रुओंका दलन करता, उछलता, भिड़ता, घोड़ोंको गिराता, धरतीको चॉपता, चक्रको घुमाता, अवगाहन करता, सहता, योधाओको पकड़ता, गजसमूहको दलकर लोट पोट करता हुआ (दीख पड़ा)। आघातसे उसने सुभट-समूहको गिरा दिया। पीड़ित होकर वे पराङ्मुख हो गये । कितने ही मारे गये, और कितने ही कायर योधा चूककर, उसके खर-प्रहारसे बच गये। तब किसीने राजा महीधरसे जाकर कहा, "एक नरने अपने भुजदण्डसे समूची सेनाको रोक लिया है, जिस तरह हो युद्धमें भिड़कर उसे नष्ट कीजिये । भाग्यसे वह एक हाथमे बलपूर्वक वनमालाको लिये है" ॥ १-६ ।। [१०] यह सुनकर राजा महीधर क्रोधसे थर्रा उठा। वह तमतमाता हुआ दौड़ा । महारथ पर आरूढ़ होकर उसने शंख वजवा दिया, इस प्रकार क्रुद्ध और विजय-लक्ष्मीका आकांक्षी वह संनद्ध हो गया। तब उसके दुर्जेय दुर्बार कुमार भी "मारो-मारो' कहते हुए निकल पड़े। इस तरह, वनमाल कुसुम कल्याणमाल जयमाल सुकुमाल सुवर्णमाल गोपाल और पाल ये आठ भाई तथा राजा, कुल मिलाकर नौ ही लोग क्रुद्ध हो उठे । ईर्ष्यासे भरकर महीधरने लक्ष्मणको ललकारते हुए कहा, "मुड़ो मुड़ो, युद्धमें लड़ो, बताओ तुम्हारा नाम गोत्र क्या है।" इसपर लक्ष्मणने उत्तर दिया, "कुल नाम पूछनेका यह कौन अवसर है । प्रहार करो जो तुमने सोचा है। कुछ भी समझ सकते है मुमे । जिसका राम सा महान् भाई है। मै रघुकुलका पुत्र लक्ष्मीका धारक और तुम्हारा अन्त करनेवाला हूँ। मेरा नाम लक्ष्मण है" ॥१-६॥ [११] लक्ष्मणके अपने कुल गोत्रका नाम बताते ही महीधरने धनुप-वाण फेककर स्नेहोचित अपने विशाल बाहुओमे (गजशुण्डकी ।

१५६
पउमचरित
सुरकरि-कर-सम - भुअ - पक्षरेण । अवरुण्डिड णेह-महाभरेण ॥२॥
हवि सरिखकरवि अपरायणासु । सइँ दिण्ण कण्ण णारायणासु ॥३॥
आरूद्ध
महीहरु एक-रहें । अट्ठ वि कुमार अण्णेक-रहें ||
वणमाल स-लक्खण एकरहें । थिय स-वल सीय अण्णेक्क रहें ॥५॥
पडु - पडह - सङ्घ • वद्धावणेहिं । णञ्चन्त हि खुजय-वामणेहिँ ॥६॥
उच्छाहें हिं धवले हि सगलेहिं । कसालेंहि तालहि महलेहि ॥७॥
आणन्द्र णयर पइहाइँ । लीलए अत्याण वइडाइँ ॥८॥
घत्ता
गहुँ वणमालए महुमहणु परितुद्व-मणु जं चेहह जन्तु पदीसिउ ।
लोऍहिँ मङ्गल गन्तएहिं णचन्तऍहिं जिणु जम्मणें जिह सइ भू सिउ ॥९॥
[३०. तीसमो संधि]
तहि अवसरे आणन्द-भरे उच्छाह करें जयकारहाँ कारणे णिकिड ।
भरहहाँ उप्परि उच्चलिउ रहमुच्छलिउ णरु णन्दावत्त-णराहिउ ।।
[१]
जो भरहहाँ दूउ विसजियउ । आइड
सन्माण-विवजयउ॥१॥
जन्दावन-णराहिवहाँ। वजरिड अणन्तवीर-णिवहाँ ॥२॥
'हउँ पेक्खु केम विच्छारियउ । सिरु मुण्डें वि कह वि णमारियउ ॥३॥
सो भरहु ण इच्छइ सन्धि रणे । ज जाणहाँ तं चिन्तवहाँ मणें ॥४॥
अण्णु वि उक्खन्धे आइयउ । सहु सेण्णे विन्झु पराइयउ ॥५॥
तहिं गरवइ वालिखिल्लु वलिउ । सीहोयरु वजयण्णु मिलिउ ॥६॥

एगुणतीसमो संधि १५७ तरह प्रचण्ड) (भरकर ) उसे गलेसे लगा लिया। उसने अग्निकी साक्षी (मानकर) अपनी कन्या वनमाला अपराजितकुमार लक्ष्मणको अर्पित कर दी । वादमे राजा महीधर एक रथपर बैठ गया । वनमाला और लक्ष्मण एक रथ पर और सीता और राम दूसरे पर । चलकर जब उन्होने नगरमे प्रवेश किया तो पट- पटह शंख तथा तरह-तरहके वाद्य वज उठे । कुब्ज ब्राह्मण नाच रहे थे । कंसाल ताल और मर्दल की उत्साह और मंगलपूर्ण ध्वनि हो रही थी। वे लोग लीला पूर्वक दरवारमें जा बैठे ॥१-८॥ वनमालाके साथ वेदीपर जाता हुआ संतुष्ट मन लक्ष्मण ऐसा मालूम हो रहा था मानो जन्मके अवसर पर, लोगाने गाते वजाते हुए, जिनको विभूपित कर दिया हो ॥६॥ तीसवीं संधि आनन्द और उत्साहसे परिपूर्ण इसी अवसरपर, निर्दय नन्दा- वर्तके राजा अनन्तवीर्यने, हर्षसे भरकर जय पानेके लिए राजा भरतके ऊपर चढ़ाई कर दी। [१] उसने भरतके पास जो अपना दूत भेजा था वह अपमानित होकर वापस आ गया। शीघ्र उसने नन्दावर्तके राजा अनन्तवीर्यसे कहा-"देखिये मेरी "देखिये मेरी कैसी दुर्गति की, मेरा सिर मुड़वा दिया, किसी तरह मारा भर नहीं है, वह भरत राजा युद्धमे सन्धि नहीं चाहता, अब जो जानो वह मनमें सोच लो, एक और आपका बैरी आया है वह सेनाके साथ विंध्याचल तक पहुँच गया है। वहाँ नरपति बालिखिल्य सिहोदर १५८ पउमचरिउ तहिँ रुभुत्ति सिरिवच्छ-धरु । मरुभुत्ति सुभुत्ति विभुत्ति-करु ॥७॥ अवरेहि मि समउ समावडिउ । पेक्खेसहि कल्लए अन्भिडिउ' ॥८॥ घत्ता ताम अणन्तवीरु खुहिउ पइजारुहिउ 'जइ कल्लएँ भरहु ण मारमि । तो अरहन्त-भडाराहाँ सुर-साराहाँ गउ चलण-जुवलु जयकारमि' ॥६॥ [२] पइजारूढु णराहिउ जाहिँ । साहणु मिलिउ असेसु वि ताहिं ॥१॥ लेहु लिहेप्पिणु जग-विक्खायहाँ । तुरिउ विसजिउ महिहर-रायहाँ ॥२॥ भग्गएँ वित्त वधु लम्पिक्कु व । हरिणक्खरहिँ लीणु णण्डिक्कु व ॥३॥ सुन्दर पत्तवन्तु वर-साहु व । णाव-वहुल सरि-ग-पवाहु व ॥४॥ दिट्ठ राय तर्हि आय अणन्त वि । सल्ल-विसल्ल - सीहविकन्त वि ॥५॥ दुजय-अजय-विजय - जय-जयमुह । णरसदूल - विउल-गय - गयमुह ॥६॥ रुहवच्छ - महिवच्छ - महद्धय । चन्दण - चन्दोयर - गरुडद्धय ॥७॥ केसरि - मारिचण्डु - जमघण्टा । कोकण - मलय - पण्डियाणहा ॥८॥ गुजर गज वज - मङ्गाला । पइविय - पारियत्त पञ्चाला ॥३॥ सिन्धव कामरूव - गम्भीरा । तजिय- पारसीय परतीरा ॥१०॥ मरु-कण्णाड - लाड - जालन्धर । टक्काहीर - कीर - खस - वन्वर ॥११॥ अवर वि जे एक्क-पहाणा । केण गणेप्पिणु सक्किय राणा ॥१२॥ . - - तीसमो संधि १५६ और वज्रकर्ण भी मिल गये हैं। रुद्रभूति श्रीवत्सधर भरुभूति सुभुक्ति विभुक्तिकर आदि दूसरे राजा भी आकर उससे मिल गये । अब समय आ गया है,देखिएगा ही युद्ध होगा।" यह सुनकर अनन्तवीर्य एकदम क्षुब्ध हो गया, और उसने प्रतिज्ञा की “यदि मैं कल तक भरतका हनन न करूं तो सुरश्रेष्ठ भट्टारक अरहंतके चरण-कमलकी जय न बोलू" ॥१-६।। [२] इस प्रकार अनन्तवीर्य जब प्रतिज्ञा कर रहा था तभी अशेष सेना उससे आ मिली। तब उसने तुरन्त ही एक लेखपत्र लिखवाकर विश्वविख्यात राजा महीधरके पास भी भेजा। वाहकने वह पत्र लाकर महीधरके सम्मुख डाल दिया। वह लेखपत्र चोर की तरह बँधा हुआ, व्याधकी तरह वाडिक्क (चितकबरे मृगचर्म और चितकबरे अक्षरों) से सहित, उत्तम साधुके समान सुन्दर पत्र वाला (पात्रता और पत्ता), गंगाके प्रवाह की भॉति (नाम और नावोसे सहित) नावालऊ' था। उस लेख पत्रको पढ़ते ही, वहुतसे राजा अनन्तवीर्यके यहाँ पहुँचने लगे। शल्य, विशल्य, सिहविक्रांत, दुर्जय, अज, विजय, नरशार्दूल, विपुलगज, गजमुख, रुद्रवत्स, महिवत्स, महाध्वज, चन्दन, चन्द्रोदर, गरुडध्वज, केशरी, मारिचण्ड, यमघण्ट, कोंकण, मलय, आनर्त, गुर्जर, गंग, बंग, मंगाल, पइवई ? पारियात्र, पांचाल, सैंधव, कामरूप, गंभीर, तर्जित, पारसीक, परतीर, मरु, कर्णाटक, लाट, जालंधर, टक्क, आभीर, कीरखस, वर्वर, आदि (के) राजा, उनमेंसे प्रमुख थे। और भी जो दूसरे एकाकी प्रमुख राजा थे उन्हें कौन गिना सकता है। तब श्यामवर्ण राजा महीधर सहसा उन्मन हो उठा। मानो उसके सिरपर वन गिर पड़ा हो । उसके सिरपर यह चिन्ता सवार

पउमचरित
घत्ता
तामणराहिउ कसण-तणु थिउ विमण-मणु णं पडिउ सिरत्यले वज्जु ।
'किह सामिय-सम्माण-भरु विसहिउ दुदर किह भरहहाँ पहरिउ अनु' ||१||
[३]
।
ज णरवइ मणे चिन्तावियउ । हलहरु एकन्त-परखें थियउ ॥१॥
अट्ठ वि कुमार कोकिय खर्गेण । वइदेहि आय सहुँ लक्खणेण ॥२॥
मेल्लेप्पिणु मन्तिड मन्तणउ । वलु भणड 'म दरिसहाँ अप्पणउ ॥३॥
रह-तुरय-महागय परिहर वि । तिय-चारण-गायण-वेसु करवि ॥४॥
रिउ-अत्याणु
पईलरहों । गच्चन्त अणन्तवीरु धरहाँ' ।।५।।
तं वयणु मुवि परितुट-मण | थिय कामिणि-वेस कियाहिरण ॥६॥
वलएवं जोइड पिय-चयणु । कि होइ ण होइ वेस-गहणु ॥७॥
'लइ सुन्दरि ताव तिह णयरें। अम्हें हिं पुणु जुज्मेवउ समर' ॥८॥
त
घत्ता
लग्ग कडच्छऍ जणय-सुय कण्टइय-भुय 'लहु णरवर-णाह ण एसहि ।
मई मेल्लें वि भासुरएँ रण-सासुरए मा कित्ति-बहुभ परिणेसहि ॥६॥
[४]]
खेड्डु करवि सचल्ल महाइय । णिविस णन्दावत्तु पराइय ॥१॥
दिठु जिणालर खणे परिसन्चवि । अग्गएँ गाएँ विवाएँ वि णच वि ॥२॥
सीय ठवेवि पइट पुर-सरवर । रहवर - तुरय-महागय - जलयर ॥३॥
देउल - वहल - धवल कमलायर । णन्दणवण - घण-तीर - लयाहर ॥४॥
चारु-विलासिणि-णलिणि-करम्विए । छप्वण्णय-छप्पय - परिचुम्बिए ॥५॥

तीसमो संधि थी कि मैं अव स्वामीके सम्मान-भारको कैसे निभाऊँ और राजा भरतकी किस प्रकार रक्षा करूँ ॥१-१३।। ३] राजा महीधरको मन ही मन चिन्तित देखकर राम एकांतमें जाकर बैठ गये । एक ही क्षणमें उन्होंने महीधरके आठों कुमारोको धुलवा लिया । लक्ष्मण सहित सीता देवी भी आ गई। तव मन्त्रियों और मन्त्रणाको छोड़कर रामने कहा-"अपने आपको प्रकट मत करो। गज, अश्व और महागजको छोड़कर, स्त्री भाट और गायकका वेप बनाकर शत्रुके दरवारमें घुस पड़ो और नाचते हुए अनन्तवीर्यको पकड़ लो।" यह वचन सुनकर संतुष्ट मन उन लोगाने स्त्रीका वेप बना लिया और गहने पहन लिये । तब रामने सीता देवीसे कहा, "शायद तुमसे यह रूप धारण करते वने या न वने, इसलिए तुम तब तक इसी नगरमे रहना, हम युद्ध मे जाकर लड़ेगे।” परन्तु पुलकितवाहु सीतादेवी कुछ तिरछी देखकर उनके साथ हो ली। वह वोली-“हे नरनाथ ! तुम शीघ्र नहीं लौटोगे, क्या पता कहीं तुम युद्ध रूपी ससुरालमें चमक-दमक वाली कीर्ति-चधूसे विवाह न कर लो" ||१-६॥ [४] तब महनीय वे लोग खेल करते हुए चले और पल भरमे ही नन्दावर्त नगरमें पहुंच गये। उन्हें ( पहले) एक जिनालय दीख पड़ा । तव उसके सम्मुख गा बजा और नाचकर उन लोगोने उसी मन्दिरकी परिक्रमा दी। फिर सीतादेवीको वहीं छोड़ राम लक्ष्मण आदिने नगरमे प्रवेश किया। उस नगर रूप सरोवरमें प्रचुर देवकुल रूपी कमलाकर थे। रथ श्रेष्ट अश्व और गजरूपी जलचर भरे थे। नन्दन वन ही, उसके तटवर्ती घने लतागृह थे। सुन्दर विलासिनीरूपी कमलिनियोसे वह नगर सरोवर चित था। और विटरूपी भ्रमरोंसे चुम्बित । उसमे जनरूपी निर्मल जल ११

१६२
पउमचरित
सज्जण-णिम्मल - सलिलालङ्किएँ । पिसुग-वयण-घण - पड्कुप्पड्किएँ ॥६॥
कामिणि-चल-मण - मच्छुत्यल्लिए । णरवर-हंस-सएहिँ अमेल्लिएँ ॥७॥
तहिं तेहएँ पुर-सरवर दुजय । लीलए गाइँ पइट दिसागय ।।८।।
घत्ता
कामिणि-वेस कियाहरण विहसिय-वयण गय पत्त तेत्थु पडिहारु ।
वुच्चइ 'आयइ चारणाइँ भरहहाँ तण जिव कह जिव देइ पइसारु ॥६॥
[५]
तं वयणु सुर्णे वि पडिहारु गउ । विण्णत्तु णराहिउ रण अजउ ॥१॥
'पहु एत्तइँ गायण आयाइँ । फुहु माणुस-मेत्तेण जाया. ॥२॥
णउ जाणहुँ किं विजाहरडॅ । किं गन्धव्वइ कि किण्णरडॅ ॥३॥
भइ-सुसरई जण-मण-मोहण. । मुणिवरहु मि मण-सखोहण ।।४।।
तं वयणु सुणेवि णराहिवण । 'दे दे पइसारु' वुत्तु णिवेण ॥५॥
पडिहार पधाइड
तुट्ठ-मणु । 'पइसरहाँ' भणन्तु कण्टइय-तणु ॥६॥
तं वयणु सुणेवि समुच्चलिय । णं दस दिसि-वह एक्कहिँ मिलिय ॥७॥
घत्ता
पइठ णरिन्दत्थाण-वण रिउ-रुक्ख-घणे सिहासण-गिरिवर-मण्डिएँ ।
पोढ-विलासिणि-लय-वहलें वर-वेल्लहलं अइ-वीर-सीह-परिचडिएँ ॥८॥
[६]
तहिं तेहए रिट-अस्थाण-वणे । पञ्चाणण
जेम
पाठ
सण ॥१॥
णन्दियढ-णराहिउ दिछु किह । णश्वत्तहँ मम मियट्नु, जिह ॥२॥

तीसमो संधि भरा था, और जो चुगलखोरोंकी वाणीरूपी कीचड़से पंकिल था। कामिनियोंकी चञ्चल मनरूपी मछलियाँ उसमें उथल-पुथल कर रही थीं। उत्तम नररूपी हंस उस नगरसरोवरका कभी भी त्याग नहीं करते थे। इस प्रकारके उस अजेय नगररूपी सरोवरमें, दिग्गजोंकी भॉति लोला करते हुए उन लोगोंने प्रवेश किया ॥१-८॥ स्त्रीका वेष बनाकर और आभरण पहनकर, हँसी मजाक करते जब वे चले तो (पहले) उन्हें प्रतिहार मिला । उनमेंसे एकने कहा,--"हम राजा भरतके चारण हैं, अपने राजासे इस तरह कहो कि जिससे हमे (दरबार) में प्रवेश मिल जाय" ॥६॥ [५] यह वचन सुनकर प्रतिहार गया। और उसने अजेय राजा प्रतिहारसे निवेदन किया, "प्रभु ! कुछ गाने-बजानेवाले आये हैं। वैसे तो वे मनुष्य रूपमें हैं, पर मै नहीं कह सकता कि वे गंधर्व हैं या किन्नर, या विद्याधर । जन-मन-मोहक उनके स्वर अत्यन्त सुन्दर मुनियोंके मनको भी क्षुब्ध करनेवाले हैं। यह सुनकर राजाने कहा,-"शीघ्र भीतर ले आओ।" तब तुष्टमन प्रतिहार दौड़ा-दौड़ा वाहर गया और पुलकित होकर उनसे बोला, "चलिए भीतर ।" उसके वचन सुनकर वे लोग भीतर गये। मानो दशो दिशापथ एक ही में मिल गये हों। वे उस दरबार रूपी वनमें प्रविष्ट हुए। वह शत्रुरूपी वृक्षोंसे सघन, सिंहासनरूपी पहाड़ोंसे मण्डित और प्रौढ़ विलासिनीरूपी लताओसे प्रचुर, अनन्तवीर्य- रूपी वेलफलसे युक्त, और अतिवीररूपी सिंहोसे चित्रित था॥ १-८॥ [६] उस शत्रुके दरवाररूपी वनमें वे लोग सिंहकी भॉति घुसे । नन्दावर्तका राजा अनन्तवीर्य उन्हें ऐसा दीख पड़ा, मानो तारोसे सहित चन्द्र हो । उसके आगे उन्होंने अपना प्रदर्शन

पउमचरित
आरम्भिउ अग्गएँ पेक्खणउ । सुकलत्त व सवलु सलक्खणउ ॥३॥
सुरयं पिव
वन्ध-करण-पवरु। कन्व पिव छन्द-सह-गहिरु ॥४॥
रणं पिव वंस-ताल-सहिड । जुज्मं पिव राय सेय-सहित ॥५॥
निह जिह उज्वेल्लइ हल-वहणु । तिह तिह अप्पाणु णवेइ जणु ॥६॥
मयरद्धय सर - सखोहियउ । मिग-णिवहु व गेएं मोहियउ ॥७]]
बलु पढइ भणन्तवीर सुणइ । 'को सीहे समउ केलि कुणइ ॥८॥
-
ঘI
जाम ण रणमुह उत्थरइ पहरणु धरइ पइँ जीवगाहु सहुँ राएं हि ।
ताम अयाण मुएवि छलु परिहर वि वलु पडु भरह गरिन्दहाँ पाएँ हिँ' ॥६॥
[७]
राहवचन्दु मणेण ण कम्पित । पुणु पुणल्त हिं एव पजम्पिङ ॥१॥
'भो भो णरवइ भरहु णमन्तहुँ । कवणु पराहउ किर अणुणन्तहुँ ॥२॥
जो पर-वल समुह महणायइ । जो पर-वल-मियङ्के गहायइ ॥३॥
जो पर-वल-गयहिँ चन्दाथइ । जो पर-वल-गाइन्दै सीहायइ ॥४॥
जो पर चल रयणिहिँ हंसायइ । जो पर-बल-तुरङ्गै महिंसायइ ॥५||
जो पर-बल-भुयङ्ग गल्डायइ । जो पर-बल-वणो, जलणायइ ॥६॥
जो पर-वल-घोहें पवणायइ । जो पर-बल-पवणोहँ धरायइ ॥७॥
। जो पर-चल-धरोह वजायई ॥८॥

तीसमो संधि १६५ प्रारम्भ कर दिया। उनका वह प्रदर्शन, अच्छी स्त्रीको तरह सवल (अंगवल, और रामसे सहित) और सलक्खन [लक्षण और लक्ष्मण सहित] था। सुरतिके समान बंधकरणमें प्रवल, कान्यकी तरह छन्द और शब्दोमें गंभीर, अरण्यकी तरह [वंश और ताल] से भरपूर, युद्धकी तरह [राजा और प्रस्वेद, तथा कुंकुम और प्रस्वेद ] से युक्त था। राम जैसे-जैसे उद्वेलित होते, श्रोता लोग वैसे-वैसे झुकते जाते । कामके वाणोसे क्षुब्ध होकर मृगसमूहकी तरह, वे गानसे मुग्ध हो उठे। तव अनन्तवीर्यने रामको यह गाते हुए सुना, "सिहके साथ क्रीड़ा कौन कर सकता है, जब तक वह (भरत) रणमुखमे नही उछलता, आयुध नहीं उठाता और दूसरे राजाओंके साथ तुम्हें जीवित नही पकड़ता, तव तक हे मूर्ख, सव छल प्रपंच छोड़कर और अपनी सेना हटाकर भरत राजाके चरणोमें गिर जा ॥१-६।। [७] रामचन्द्र जरा भी नहीं कॉपे, बार-बार वह यही दुहरा रहे थे, "अरे राजन् , भरतको राजा मानकर, उनकी आज्ञा माननेमें तुम्हारा क्या पराभव है ? वह भरत शत्रुरूपी सेनासमुद्र के लिए मेरुमंथनकी तरह है। जो शत्रु सेनारूपी चन्द्रके लिए राहुके समान है, जो शत्रुसेनारूपी आकाशमें चन्द्रमाकी भॉति चमकता है, जो शत्रुरूपी गजराजके लिए सिंह है, शत्रुवलरूपी निशाके लिए सूर्य है, शत्रुबलरूपी वनके लिए दावानल है। परवलरूपी अश्वके लिए महिपके समान है। परवलरूपी सर्पके लिए जो गरुड़ है। परवलरूपी मेघसमूहके लिए पवनका आघात है । परबलरूपी पवनसमूहके लिए पर्वत है। और पर- बलरूपी पर्वतसमूहके लिए वनकी तरह है।" यह सुनकर अनन्त

पटमचरिट
घत्ता
तं णिसुणेवि विरुद्धऍण मगें कुद्धाण अइवीरें अहर-फुरन्त ।
रतुप्पल-दल-लोयणेण जग-भोयणेण णं किउ अवलोउ कियन्ते ॥६॥
[-]
भय-भीसणु अमरिस-कुइय-देहु । गजन्तु समुहिउ जेम मेहु ॥१॥
कर असिवरु लेह ण लेह जाम । णहें उठें वि राम धरिउ ताम ॥२॥
सिर पाउ देवि चोरु व णिवद्ध । णं चारणु वारि-णिवन्धे छुद्ध ॥३॥
रिउ चम्पवि पर-वल-मइयव टु । जिण-भवणहाँ सम्मुहु वलु पय१ ॥४॥
गुत्थन्तर महुमहणेण
'जो
हुक तं मारमि णिरुतु' ॥५॥
तं सुणवि परोप्पर रिड चवन्ति । 'किं एय परकम तियह होन्ति' ॥६॥
एतढिय वोल्ल पडिवक्ख जाम । णर दस वि जिणालड पत्त ताम ॥७॥
जे गिलिय आसि पुर-रक्खसेण । णं मुक पडीवा भय-वसेण ॥८॥
वृत्त।
घत्ता
4.
तावन्तेउरु विमण-मणु गय-गइनामणु वहु-हार-दोर-खुप्पन्तउ ।
आयउ पासु जियाहवहाँ तहाँ राहवहाँ 'टे दइय-भिक्ख' मग्गन्तर ॥६॥
[]
एव वुत्तु वणियायणेण । पहु पणिउ दसरह-गन्दणेण ॥३॥
'जइ भरहहाँ होहि सुभित्चु अज्जु । तो अज्जु वि लइ अप्पणउ रज्जु' ॥२॥
तं वयणु सुणे वि परलोय-भीर । विहसेप्पिणु भणइ अणन्तवीरु ॥३॥
'पाडेवउ जो चलणेहिँ णिच्चु । तहाँ केम पडीवउ होमि मिच्चु ॥४॥
वलिमण्डएँ तव-चरणेण जो वि । पाडेवउ पाहिँ भरहु तो वि' ॥५॥
त वयणु सुणेप्पिणु तुछ रामु । 'सच्चउ जै तुझु भइवीरु णामु ॥६॥
पुणरुत्त हिँ वुच्चइ 'साहु साहु' । हकारिउ तहाँ सुउ सहसवाहु ॥७॥

तीसमो संधि १६७ वीर्य अपने मनमे भड़क उठा। अपने ओंठ चवाने लगा। उसने लाल-लाल आँखोंसे ऐसे देखा मानो जगसंहारक कृतान्तने ही दंग्या हो ॥१-६॥ [=] भयभीपण और अमर्पसे क्रुद्ध कलेवर वह मेघकी भोति गरज उठा । वह अपनी तलवार हाथमें ले या न ले, इतनेमे गमनं उछलकर (आकाशमे ) उसे पकड़ लिया । उसके सिरपर पैर रखकर चौरकी तरह ऐसे बाँध लिया मानो हाथ की पाली वनाकर जलको बाँध लिया हो । तव शत्रुसेना-संहारक राम अनन्त- वीर्यको वोधकर जिन-मन्दिर पहुंचे। लक्ष्मणने इतनेमें कहा, "जो इधर आयगा निश्चय ही मै उसे मालेगा।" यह सुनकर शत्रु लोग आपसमें बात करने लगे, "क्या बियोंमे इतना पराक्रम हो सकता है। इस तरहकी वाते उनमें हो ही रही थी कि शेप जन भी इस जिन-मंदिरमे, ऐसे आ पहुंचे मानों पहले जिन्हें पुररक्षकन पकड़ लिया था परन्तु बादमे मारे डरके छोड़ दिया । इसी बीच अनन्तवीर्यका अन्तःपुर युद्धविजेता रामके पास आया। विमन, गजगामी वह प्रचुर हार डोरसे स्खलित हो रहा था। पर यह याचना कर रहा था कि "पतिकी भीख दोगा-ह।। [:] सीजनको इस प्रार्थनापर दशग्यपुत्र रामने कहा, "दि का भरतका अनुचर बन जाय तो वह आज ही अपना राज्य पा मफ्ना है।" यह सुनकर पग्लोकभीर अनन्तवीर्य बोला, "अरे जी जिन लदेव अपने चरणाम डाले रहेगा उसे छोड़कर में और फिनका अनुचर बने । प्रत्युत मै तपश्चरण कर. भरनको मग यापूर्वक अपने पैग पर मुकाउंगा।" यह सुनकर गमने कहा " मग माग अनन्नवी नाम सच है। उन्होंने यही दुह- गया. "माघमा नाम उनके पुत्र नन्नवाहुको बुला उसे पउमचरित सो णिय संताणहाँ रइड गउ । अण्णु वि भरहहाँ पाइक्कु जाट ॥८॥ घत्ता रिट मेल्लेप्पिणु दस वि जण गय तुट-मण णिय-णयह पराइय जाहि । गन्दावत्त-णराहिवइ जिण करवि मइ दिक्खह समुहिउ ताव हि ॥६॥ समन्तभह ॥२॥ - एत्यन्तर पुर-परमेसराहें । दिक्वाएँ समुठिट सर गराह ॥१॥ सर्ल • विउल - वरवीरभह । मुणिमह · सुभट्ट गरुडद्य मयरद्वय पचण्ड । चन्दण - चन्दोयर मारिचण्ड ॥३॥ जयवण्ट - महद्धय - चन्द - सर । जय विजय-अजय-दुज्जय-कुकूर ॥ell इय एत्तिय पहु पन्चइय तेत्थु । लाहण-पत्रए जय-णन्दि जेत्थु ॥५॥ थिय पञ्च मुटि सिर लोउ देवि । सइँ वाहहिं आहरण मुएवि ॥६॥ णीलङ्ग वि थिय रिसि-सद्ध-सहिय । ससार वि भव-संसार-रहिय ॥७॥ णिम्माण वि जीव-सयहुँ समाण । णिग्गन्य वि गन्थ-पयत्य-जाण ॥ घत्ता इय एक्छ-पहाण रिसि भव-तिमिर-ससि तव-सूर महावय-धारा । छट्टम-दस-बारसँ हिँ वहु-उववसें हिँ अप्पाणु सवन्ति भडारा ॥९॥ [११] तब-चरण परिडिउ जं जि राउ । तहाँ वन्दण-हत्तिएँ भरहु भाउ ॥१॥ ते दिछ भढारर तेय-पिण्डु । जो मोह-महाहर वज-दण्ड ॥२॥ जो कोह-हुवासणे जल-णिहाउ । जो मयण-महाघण पलय-वाउ ॥३॥ जो दप्प-गइन्द महा-मइन्दु । जो माण-भुअगम वर-खगिन्दु ॥४॥ सो मुणिवर दसरहणन्दणेण । वन्दिर णिय-गरहण-णिन्दणेण ॥५॥ भो साहु साहु गम्भीर धीर । पई पूरिय पइजाऽणन्तवीर ॥६॥ जं पाडिउ हउँ चलणेहिँ देव । तं तिहुअणु काराविय सेव ॥७॥ ।

तीसमो संधि १६६ मस्त राज्य दे दिया। इस प्रकार भरतका एक और अनुचर ढ़ गया । शत्रुको इस प्रकार मुक्त कर, वे सब अपने नगर वापस 1 गये। उधर राजा महीधरने अपनी सारी आस्था जिनमें केन्द्रितकर दीक्षाके लिए कूच कर दिया ॥१-६।। [१०] पुरपरमेश्वर महीधरके साथ और भी दूसरे राजा हीताके लिए प्रस्तुत हो गये । शार्दूल, विपुल, वीरभद्र, मुनिभद्र, सुभद्र, समंतभद्र, गरुडध्वज, मकरध्वज, प्रचण्ड, चन्दन, चन्द्रोदर, गरिचण्ड, जयघण्ट, महाध्वज, चन्द्र, सूर, जय, विजय, अजय, दुर्जय और कुकरने भी उसी पर्वतपर जाकर दीक्षा ग्रहण कर ली जहाँ आचार्य जयनन्दी दीक्षा दान कर रहे थे। अपनी पाँच मुठ्ठियोसे केश लोंचकर सवारियोंके साथ आभूषणोंका त्याग कर, अनासंग वे सब मुनिसंघके साथ हो लिये। वे मुनिजन मानरहित होकर भी जीवोके मानके साथ थे। और निर्ग्रन्थ होकर भी ग्रन्थोंके प्रशस्त जानकार थे। उस संघमें प्रत्येक ऋषि मुख्य थे। जो भवरूपी अन्धकारके लिए चन्द्रः तपःसूर और महाव्रतोका धारण करनेवाले थे। वे छह, आठ और बारह तक उपवास करके अपने आपको खपाने लगे ॥१-६।। [११] जब राजा अनन्तवीर्य तप साधने चला गया तो भरत राजा भी वहाँ उसकी बन्दना-भक्तिके लिए गया। उसने तेजके पिंड भट्टारक अनन्तवीर्यको देखा । वह, मोहरूपी महीधरके लिए प्रचण्डवन, क्रोधाग्निके लिए मेघसमूह, काम-महा-घनके लिए प्रलय वात, दर्पगजके लिए सिह, मानसूर्यके लिए गरुड़ थे। मनमें अपनी निदा करते हुए भरत वन्दनापूर्वक वोला, “साधु ! धीर वीर अनन्तवीर्य, तुमने, सचमुच अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। लो तुमने आखिर मुझे अपने चरणोंमे नत कर ही लिया। और

पउमचरिउ
गउ एम पसंसाव भरहु राउ । णिय-णयरु पत्तु साहण-सहाउ ॥८॥
घत्ता
हरि-वल पइठ जयन्तपुर धण-कण-पउर जय-मगल-तूर-वमा हिँ ।
लक्खणु लक्खणवन्तियए णिय-पत्तियएँ अवगूढ स इंभु व-डालहिं ।।६।।
[ ३१. एकतीसमो संधि ]
धण-धण्ण-समिद्धहाँ पुहइ-पसिद्धहाँ जण-मण-णयणाणन्दणहाँ।
वण-वासहाँ जन्तेहिं रामाणन्तहिं किउ उम्माहट पट्टणहो ।
[१]
छुडु छुडु उहय समागम-लुइँ । रिसि-कुलई व परमागम-लुद्ध ॥१॥
छुडु छुडु अवरोप्पर अणुरत्तई । सन्म-दिवायरई व अणुरत्त: ॥२॥
छुड छुडु अहिणव-बहु-वरइत्तई । सोम-पहा इव सुन्दर-चित्तइँ ॥३॥
छुड चुम्विय-तामरसाइ । फुल्लन्धुय इव लुद्ध-रसाई ॥४॥
ताम कुमारे णयण-विसाला | जन्तें आउच्छिय चणमाला ॥५॥
मालूर-पवर-पीवर-थएँ । कुवलय-दल - पष्फुल्लिय-लोअण ॥६॥
हंस-गमण गय-लील-विलासिणि । चन्द-वयण णिय-णाम पगासिणि ॥७॥
जामि कन्त हउँ दाहिण देसहाँ। गिरि-किक्किन्ध - णयर - उडेसहाँ ॥८॥
'
हे
घत्ता
सुरवर-वरइत्ते णव-वरइत्ते जं आउच्छिय णियय धण ।
ओहुल्लिय-वयणी पगलिय-णयणी थिय हेट्ठामुह विमण-मण ॥९॥

एक्कतीसमो संधि १७१ त्रिभुवनसे अपनी सेवा करा ली ।" इस प्रकार उसकी प्रशंसा कर, राजा भरत सेनासहित अपने नगरको चला गया। राम और लक्ष्मणने भी जयमंगल और तूर्यध्वनिके साथ, धनकनसे भरपूर जयंतपुर नगरमें प्रवेश किया। तब लक्ष्मणकी सुलक्षणा पत्नीने अपनी भुजारूपी डालोसे उसका आलिङ्गन किया ॥१-६।। इकतीसवीं संधि कुछ समय के उपरांत राम और लक्ष्मण, धन-धान्यसे सम्पन्न पृथ्वीमें सुप्रसिद्ध, जनोंके मन और नेत्रोको आनन्ददायक, उस नगरको छोड़कर वनवासके लिए कूच कर गये । [१] इस अवसरपर लक्ष्मण वनमालासे मिलनेके लिए एक- दम आतुर हो उठे । क्योंकि वे दोनो-मुनिकुलकी तरह परमागम लुब्ध (परमशास्त्र और दूसरेके आगमके लोभी) थे । एक दूसरे पर आसक्त वे दोनो एक दूसरे पर अनुरक्त हो उठे । वैसे ही जैसे सूर्य और चन्द्र अनुरक्त हो उठते है। वे दोनों अभिनव वर-वधू चन्द्र और उसकी प्रभाकी तरह, सुन्दर चित्त थे। रक्तकमलका चुम्बन करनेवाले भ्रमरकी तरह वे दोनो रसलुब्ध हो रहे थे । जाते समय कुमार लक्ष्मणने विशालनयना वनमालासे कहा, हे हंस- गामिनी गजलीला विलासिनी चन्द्रमुखी, स्वयं अपना नाम प्रसिद्ध करनेवाली वनमाले ! मै किष्किध नगरको लक्ष्य वनाकर दक्षिण देशके लिए जा रहा हूँ"। पूतन यक्षसे वर प्राप्त करनेवाले कुमार लक्ष्मणके यह कहने पर (पूछने पर) विमना गलितनेत्र म्लानमुख, वह अपना मुख नीचा करके रह गई ॥१-धा

१७२
पउमचरित
।
[२]
वहलुप्पील - स्वाहें । महि पवालिय संसु-पवाहे ॥३॥
'एतिउ विरवड नाणुस-लोड । जंजर-जन्मग - मरण - विलो' ॥२॥
धारिय लक्षणेग एन्धन्तर । रामहाँ गिलउ अरेवि वणन्तर ॥३॥
काहि मिविण हि पडीवड आनि । सयल स-सायर नहि भुक्षामि ॥ll
बइ पुणु कहवि तुल-लग णाय । हई ण होमि सौमिति जायउ ॥५॥
वाणु वि स्थगिह जो भुञ्जन्तः । संस-भक्ति महु न पियन्त शा
जीव वहन्तउ अलिड वन्तर । पर-धणे पर-कलत अणुरत्तउ ॥७॥
जो णरु आऍहि वसणेहि भुत्तड । हउँ पावेण तेण संजुत्तड ॥३॥
घत्ता
जइ एन वि णामि क्यणु ण दापनि तो पिचूड-महाहवहाँ ।
णव-काल सुनोमल णह-पह-उजल द्वित्त पाय मई राहवहाँ
[३]
वर्णमाल णिवत्तवि भन्गमाण ! गय लक्खणरान सुपुज्जमाण ॥१॥
थोवन्तर नछुन्यल्ल. देन्ति । गोला-गइ वि समुन्नहन्ति ॥२॥
सुंसुअर - घोर • बुल्पुल्हरन्ति । गरि - सयरहोहिय - बुहुहुहन्ति ॥३॥
डिण्डीरसण्ड-मण्डलिड बैन्ति । ददुरय - रडिय - दुरदुदुरन्ति ||en
क्लोलुहोलह रवहन्ति । उग्घोस - घोस घवघवघवन्ति ॥५॥
पडिसलग-चलण-तलसलसलन्ति । खलबलिय-सलक-महक्क देन्ति ॥६॥
सलि-सक्ष कुन्द • धवलोमरेग । कारण्डुड्डात्रिय उन्वरेण ॥७॥
घत्ता
फेगावलि बलिय बल्यालतिय गं महि-कुलबहुअहं तणिय ।
जलणिहि भतारहों भौत्तिय-हारहाँ वाह पलारिच दाहिणिय ॥८॥

एक्कतीसमो संधि १७३ [२] काजल मिश्रित अश्रुधारासे वह धरतीको प्लावित करने लगी । तव लक्ष्मणने धीरज बंधाते हुए कहा-"संसारमे यही बात तोचुरी है कि यह बुढ़ापा,जन्म, मरण और वियोगहोता है। किसी अन्य वनमे रामका आश्रय बनाकर मै कुछ ही दिनोंमें वापस आ जाऊँगा,और फिर तुम्हारे साथ धरतोका भोग करूँगा । यह कहकर भी, यदि मै तुलालग्नमे वापस नहीं आया तो सुमित्राका वेटा नहीं, और भी, निशाभोजन, मांसभक्षण, मधु और मद्यका पान, जीव- हत्या, झूठ बोलना, परधन और परस्त्रीमें अनुरक्त होना इत्यादि व्यसनोमे जो पाप लगता है, वह सब पाप मुझे लगे । यदि मै लौटकर न आऊँ, या अपना मुंह न दिखाऊँ । मै महायुद्धमे समर्थ, श्रीरामके नव कमलकी तरह कोमल, और नव प्रभासे उज्ज्वल रामके चरण छूकर कह रहा हूँ" ॥१-६॥ [३] इस प्रकार भग्न वनमालाको समझा-बुझाकर, सुपूज्य राम और लक्ष्मणने वहाँसे प्रस्थान किया। थोड़ी दूर जाने पर उन्हें गोदावरी नदी मिली। उसमे मछलियाँ उछल-कूद मचा रही थीं। शिशुमारोमे घोर घुरघुराती हुई, गज और मगरोंके आलोड़नसे डुहडुहाती हुई, फेन-समूहके मण्डल बनाती हुई, मेंढकोको ध्वनिसे टर्राती हुई; तरङ्गोके उद्वेलसे बहती हुई, उद्घोषके शब्दसे छप-छप करती हुई, वह गोदावरी नदी शशि, शंख और कुन्द कुसुमोसे धवल हो रही थी। कारंडवके उड्डयनसे भयहर, जलप्रपातीके स्खलन और मोड़से खल-खल करती हुई और चट्टानो पर सर-सराती हुई वह बह रही थी। वलय (आवर्त और चूड़ी) से अंकित, वह मानो धरती रूपी नव-वधूकी कुल पुत्री ही हो जो अपने प्रिय समुद्रके आगे मुक्ताहारके लिए अपना दोया हाथ पसार रही थी ।।१-८||

१७४
पउमचरित
[४]
थोवन्तर वल-णारायणेहिँ । खेमञ्जलि-पट्टणु दिछ तेहिं ॥१॥
अरिदमणु णराहिउ वसइ जेत्थु । अइचण्डु पयण्डु ण को वि तेत्थु ॥२॥
रज्जेसरु जो सवह वरिछ । सो
पहु
पहियाह मि मूलं दिछ ॥३॥
णह-भासुरु जो लड्गृल-दीहु । सो मायझेहि मि लइठ सीहु ॥४॥
जो दुदृम-दाणव - सिमिर-चूरु । सो तिय-मुहयन्दहाँ तसइ सूरु ॥५॥
जं रायहँ तं छत्तह मि छित्तु । जं सुहडतं तं कुड्डह मि चित्तु ॥६॥
तहों णयरहाँ थिउ अवरुत्तरेण । उज्जाणु
अद्ध - कोसन्तरेण ॥७॥
सुरसेहरु णामे जगें पयासु । णं अग्घ-विहत्थउ थिउ वलासु ॥८॥
घत्ता
तहि तेहए उववण णव-तरुवर -धणे जहिँ अमरिन्दु रइ करइ ।
नहिँ णिलट करेप्पिणु वे वि थवेप्पिणु लक्खणु णयर पईसरइ ॥६॥
[५]
पइसन्त पुर-चाहिर करालु । भड-मडय-पुजु दीसइ विसालु ॥१॥
ससि-सह-कुन्द-हिम-दुद्ध - धवलु । हरहार - हस - सरयव्भ-विमलु ॥२॥
तं पेखें वि लहु हरिसिय-मणेण । गोवाल पपुच्छिय लक्खणेण ॥३॥
'इउ ढीसइ काइँ महा-पयण्ड । ण णिम्मलु हिमगिरि-सिहर-खण्डु' ॥४॥
तं णिसुणे वि गोवहिं वुत्तु एम । 'कि एह वत्त प ण सुअ देव ॥५||
अरिदमण-धीय जियपउम-णाम । भड-थड-संघारणि जिह दुणाम ॥६॥

एक्कतीसमो संधि १७५ [४] थोड़ी दूरपर राम-लक्ष्मणको क्षेमंजली नगर दीख पड़ा। उसमें अरिदमन नामक राजा रहता था। उसके समान प्रचण्ड वहाँ दूसरा कोई व्यक्ति नहीं था। वह राजेश्वर, सवमें श्रेष्ठ था। रास्तागीरों तककी बात भाँप लेनेमें वह समर्थ था । वह सिंहकी तरह, नखोसे भास्वर, लंगूलदीहु (लम्बी पूंछ और हथियार विशेपसे सहित) था। सिंह मातंगो (हाथियोंसे) अग्राह्य होता है, पर वह राजा मातंग (लक्ष्मीके अंगों) से ग्राह्य था। अर्थात् लक्ष्मी उसे प्राप्त थी। पर दुर्दम दानव-समूहको चूरनेवाला वह स्त्रियोंके मुख-चन्द्रको सतानेके लिये सूर्य था । जैसे वह राजाओंसे, वैसे ही छत्रोंसे स्पृष्ट था। और जैसे सुभटोंसे वैसे ही उड्ड (गहना विशेप) से भूपित था। उस नगरसे, वायव्य कोणमें आधे कोसकी दूरी पर, सुरशेखर नामसे जगत्में प्रसिद्ध एक उद्यान था, मानो वह उद्यान बलभद्र रामके लिए हाथोंमे अर्घ लेकर खड़ा था। नये वृक्षोंसे सघन उस उपवनमें देवेन्द्र क्रीड़ा करता था। लक्ष्मणने वहीं घर बनाया। और राम-सीताको वहीं ठहराकर उसने उस नगरमें प्रवेश किया ॥१-६॥ [५] घुसते ही उसे नगरके बाहर भटोंका भयङ्कर और विशाल, शव-समूह मिला। वह ढेर शशि, शंख, कुन्द, हिम तथा दूधकी तरह सफेद; हर, हार, हंस और शरद् मेघकी तरह स्वच्छ था । उसे देखकर, हर्पितमन होकर लक्ष्मणने एक गोपालसे पूछा, “यह महाप्रचण्ड क्या दिखाई दे रहा है ? यह ऐसा लगता है मानो हिमालयके निर्मल शिखर हों।" यह सुनकर गोपालने उत्तर दिया, "देव, क्या आपने यह नहीं सुना, यहाँके राजा अरिदमनकी जित- पद्मा नामकी एक लड़की है, वह, महाभट समूहोंका नाश करने वाली, मानो साक्षात् डाकिनी है। वह आज भी वर-कुमारी है,

१७६
पउमचरिउ
सा अज वि अच्छइ वर-कुमारि । पञ्चक्स गाइ आइय कु-मारि ॥७॥
तह कारण जो जो मरइ जोहु । सो धिप्पइ तं हड्डइरि एहु ॥८॥
घत्ता
जो घई अवगण वि तिण-समु मणे वि पञ्च वि सत्तिउ धरइ णरु ।
पडिदक्ख-विमणु णयणाणन्दणु सो पर होसइ ताहें वरु' ॥६॥
[६]
तं वयणु सुणेप्पिणु दुण्णिवारु । रोमञ्चिउ खण लक्खण-कुमारु ॥१॥
वियड-प्पय-छोह हिँ पुणु पयट्टु । णं केसरि मयगल-मइय-व१ ॥२॥
कत्थइ कप्पम दिट्ट तेण । णं पन्थिय थिय णयरासएण ॥३॥
कत्थइ मालइ कुसुमइँ खिवन्ति । सीस व सुकइह जसु विक्खिरन्ति ॥४||
कत्थइ लक्खइ सरवर विचित्त । अवगाहिय सीयल जिह सुमित्त ॥५॥
कत्थइ गोरसु सव्वह रसाहुँ । ण णिग्गउ माणु हरेवि ताहुँ ॥७॥
कत्थइ आवाह डज्झन्ति केम । दुजण-दुव्वयणे हिँ सुयण जेम ॥७॥
कत्यइ अरहट्ट भमन्ति केम । ससारिय भव-ससार
ण धउ हक्कारइ 'एहि एहि । भो लक्खण लहु जियपउम लेहि ॥६॥
जेस ॥८॥
घत्ता
वारुभड-चयण
दीहिय-णयणे देउल-टाढा-भासुरण।
णं गिलिट जणणु असुर-विमहणु एन्तउणयर-णिसायरण ॥१०॥
पायार-भुइँहि पुरणाइँ तेण । अवरुण्डिड लक्खणु णाई तेण ॥१॥
कथइ कुम्भा सहु णाडएहिँ । गं णड णाणाविह णाडएहि ॥२॥

. एक्कतोसमो संधि १७७ मानो वह धरती पर प्रत्यक्ष मौत वनकर ही आई है । जो योधा उसके लिए अपनी जान गवाता है, उसे इस हड्डियोंके पहाड़में डाल देते है । जो सुभट अपनी उपेक्षा करते हुए, प्राणोंको तिनकेके बराबर समझकर, पाँचों ही शक्तियोंको धारण कर लेगा, शत्रु-संहारक और नेत्रोके लिए आनन्ददायक वह, उसका वर होगा"।।१-६ ।। [६] यह वचन सुनकर दुर्निवार लक्ष्मणको एक क्षणमें रोमांच हो आया। विकट क्षोभसे भरकर वह नगरमें ऐसे प्रविष्ट हुआ मानो मत्तगजके संहारक सिंहने ही प्रवेश किया हो । कहीं उसने कल्प वृक्षोंको इस तरह देखा मानो नगरकी आशासे पथिक ही ठहर गये हो । कहीं मालतीसे फूल झड़ रहे थे, मानो शिष्य ही सुकविका यश फैला रहे थे। कहीं पर विचित्र सरोवर दीख पड़ रहे थे। जो अवगाहन करने में अच्छे मित्रकी तरह शीतल थे। कहीं पर सव रसोंका गोरस था मानो वह उनका मान हरण करते ही निकल आया हो। कहीं पर ईखके खेत ऐसे जलाये जा रहे थे मानो दुर्जन सन्ननको सता रहा हो । कहीं पर अरहट ऐसे घूम रहे थे जैसे जीव भवरूपी चक्रमें घूमते रहते हैं। हिलती डुलती पताका मानो लक्ष्मणसे कह रही थी,-"हे लक्ष्मण, आओ आओ और शीन ही जितपद्माको ले लो", आते हुए असुरसंहारक लक्ष्मणको नगररूपी निशाचरने मानो लील लिया । द्वारही उसका विकट मुख था, वापिकाएँ नेत्र थीं, और देवकुलरूपी डाढों से बह भयकर था॥१-६॥ [७] अथवा उस नगररूपी कोतवालने अपनी प्राकार की भुजाओंसे लक्ष्मणको रोक लिया । (अर्थात् उसने नगरके परकोटेके भीतर प्रवेश किया)। कहीं पर रस्सियोंके साथ घड़े थे, कहीं मानो नाना नाटकोंके साथ नट थे। कहीं पर विशुद्ध वंशवाले १२ , ।

१७८
पटमचरित
.
कन्यइ वंसारि समुद्ध-वंस । णाइव सु-कुलीण विशुद्ध-वंस ॥३॥
कन्थइ धय-वड णचन्ति एम । वरि अम्हि सुरायर सग्ग जेम ॥४॥
कत्थइ लोहार हिँ लोहखण्ड । पिटिजइ गरए व पावपिण्डु ॥५॥
तं हट्टमग्गु मेल्लेंवि कुमारु । णिविसेण पराइड रायवारु॥६॥
पडिहारु वुत्तु 'कहि गम्पि एम । वरु वुच्चइ आइड एक्कु देव ॥७॥
जियपउमह माण-मरह-दलणु । पर-वल-मसक्कु
दरियारि-दमणु ॥८॥
रिउ-संघायहाँ संघाय-करणु । सहु सत्तिहिँ तुझ वि सत्ति-हरणु ॥६॥
घत्ता
(अह) किं वहुए जम्पिएण णिप्फल-चविएण एम भणहि तं अरिदमणु ।
दस-वीस ण पुच्छह सउ वि पडिच्छइ पञ्चहँ सत्तिहिं को गहणु' ॥१०॥
पसाउ ॥२॥
।
.]
तं णिसुणेवि गउ पडिहारु तेत्थु । सह-मण्ड सो अरिदमणु जेत्थु ॥१॥
पणवेप्पिणु वुञ्चइ तेण राउ । 'परमेसर वित्तिएँ
भड काले चोइउ आउ इकु । ण मुणहुँ किं अनु मियडु सक्कु ॥३॥
कि कुसुमाउहु अतुलिय-पयाउ । पर पञ्च वाण णउ एक्कु चाउ ॥४॥
तहाँ परहाँ णवल्ली भङ्गि का वि । फिट्टइ ण लच्छि भङ्गहाँ कयावि ॥५॥
सो चवइ एम जियपउम लेमि । किं पञ्चहि दस सत्तिउ धरेमि ॥६॥
तं णिसुणेवि पभणइ सत्तुदमणु । 'पेक्खमि कोक्कहि वरइत्तु कवणु' ॥७॥
पडिहारे सहिउ आउ कण्हु । जयलच्छि-पसाहिउ जुज्म-तण्ड
॥4॥
घत्ता
अच्चुटभड-वयणहिँ दोहर-णयहिँ गरवइ-बिन्दहिँ दुजएहिँ ।
लक्खिजइ लक्खणु एन्त स-लक्खणु जेम मइन्दु महागऍहिँ ॥६॥

एक्कतीसमो संधि सुकुलीनोंकी भाँति उत्तम वंशके हाथी थे । कही पर ध्वज-पताकाएँ ऐसी फहरा रही थीं मानो वे स्वर्गके देव-समूहकी तरह अपनेको भी ऊपर समझ रही हों। कहीं पर लोहार लोहखंडको उसी प्रकार पीट रहे थे जिस प्रकार पापी नरकमें पीटे जाते हैं। बाजार के मार्गको छोड़कर लक्ष्मण राज्यद्वारके निकट पहुँच गया। तब प्रतिहारने टोककर पूछा, “इस प्रकार कहाँ जाओगे”। इस पर कुमारने कड़ककर कहा, “जाओ और राजासे कहो कि जितपद्माका मान जीतनेवाला आ गया है। पर-वलका संहारक, गर्वितशत्रुका दमनकर्ता, रिपु-समूहका घातक तथा शक्तियों सहित अरिदमनका भी हरण करनेवाला एक देव आया है । अथवा बहुत कहने से क्या ? उस गजासे कहना कि मैं दस वीसकी वात तो कौन पूछे (कमसे कम) सौ शक्तिको पानेकी इच्छा रखता हूँ। पाँच शक्तियोंका ग्रहण करनेसे क्या होगा | १-६॥ [८] यह सुनकर प्रतिहार, मण्डपमे आसनपर बैठे हुए राजाके पास गया। प्रणाम करके उसने निवेदन किया, “परमेश्वर, विनप्तिसे प्रसन्न हों। यमसे प्रेरित एक योधा आया है, मै नहीं जानता कि वह चन्द्र है या इन्द्र, या अतुलित प्रतापी कामदेव है। पर उसके पास पॉच वाण हैं और एक धनुप नहीं है। उस नरकी कोई अनोखी ही भंगिमा है कि उसके शरीरके एक भी अंगकी शोभा नष्ट नहीं होती। वह कहता है कि मैं जितपद्माको लेकर रहूँगा। इन पॉच शक्तियोंको क्या तू ?" यह सुनकर गजा अरिदमनने आवेशमें कहा, "बुलाओ, देखें कौन-सा आदमी है।" तव प्रतिहारके पुकारने पर, जय-लक्ष्मीको प्रसन्न करने- वाला. युद्धका प्यासा कुमार लक्ष्मण भीतर आया। भयङ्कर मुग्व. दीर्घनत्र बहुतसे अजेय नर-पतियाने सुलक्षण लक्ष्मणको आते हुए ऐसे देखा सानो महागज सिंहको देख रहे हों ॥ १-६॥

पउमचरिट
लखणु पासु पराइउ जं जे । वुत्तु णिवेण हसेप्पिणु नं जे ॥१॥
'को जियपउम लएवि समत्थु । केण हुवासण ढोइट हत्थु ।।२।।
केण सिरेण पडिच्छिड वजु । केण कियन्तु वि घाइड अज्जु ॥३॥
केण णहङ्गणु छित्त करग्गें । केण सुरिन्दु परज्जिउ भोगें ॥४॥
वेण वसुन्धरि दारिय पाए । केण पलोहिड दिग्गड घाएं ॥५॥
केण सुरेहहाँ भग्गु विसाणु । केण तलप्पएँ पाडिड भाणु ॥६॥
लहिउ केण समुदु असेसु । के फण-मण्डवे चूरिउ सेसु ॥७॥
केण पहाणु वधु पडेण । मेरु-महागिरि टालित
केण ॥
घत्ता
जिह तुहुँ तिह अण्ण वि णीसावण्ण वि गरुयइँ गन्जिय वहुय गर ।
महु सत्ति-पहारै हिँ रण दुब्बारहि किय सय सक्कर दिट्ट पर' ॥६॥
[१०]
अरिदमणे भडु जं अहिखित्तु । महुमहु जेम दवन्गि पलितु ॥३॥
'हउँ जियपउम लएवि समत्थु । मइ नि हुआसण ढोइड हत्थु ॥२॥
मई जि सिरेण पडिच्छिउ वज्जु । मई जि कियन्तु वि घाइड अज्जु ॥३॥
मइँ जि णहगणु छित्तु करग्गें । म जि सुरिन्दु परजिउ भोग्गे ॥४॥
मई जि वसुन्धरि दारिय पाएं । मइँ जि पलोहिट दिग्गउ घाएं ॥५॥
म. जि सुरेहहाँ भग्गु विसाणु । मई जि तलप्पएँ पाडिउ भाणु ॥६॥
लड्दिउ मई जि समुदु असेसु । म. फण-मण्डव चूरिउ सेसु ॥७॥
मई जि पहाणु वधु पडेण । मेरु महागिरि टालिड जेण ॥८॥
घत्ता
हउँ तिहुअण-डामरु हउँ अजरामरु हउँ तेत्तीसहुँ रण मजउ ।
खेमालि-राणा अधुह अयाणा मेल्लि सत्ति जइ सत्ति तउ' ॥६॥

एकतीसमो संधि
१८१
.
[६] लक्ष्मणके निकट आने पर अरिदमनमें हँसकर कहा,
"अरे जितपद्माको कौन ले सकता है, आगको हाथसे किसने
उठाया, किसने सिर पर वज्रकी इच्छा की, कृतान्तको आज तक
किसने मारा? अंगुलीसे आकाशको कौन छेद सका है, भोगमें
इन्द्रको किसने पराजित किया, कौन पैरसे धरतीका दलन कर
सका। आघातसे मृगेन्द्रको कौन गिरा सका? ऐरावतके दाँत
किसने उखाड़े, सूर्यको तल पर किसने गिराया, अशेप समुद्रको
कौन वाँध सका, धरणेन्द्रके फनको कौन चूर-चूर कर सका, हवाको
कपड़ेसे कौन वॉध सका, मंदराचलको कौन टाल सका ? तुम्हारी
ही तरह और भी बहुतसे युवक अपनेको असाधारण बताकर
यहाँ गरजे थे पर युद्धमे दुर्धर मेरी शक्तियोने अपने प्रहारोंसे
उनके सौ सौ टुकड़े कर दिये ॥१-६।।
[१०] अरिदमनने जब सुभट लक्ष्मण पर इस प्रकार आक्षेप
किया तो वह दावानलकी तरह भड़क उठा, उसने कहा, "मै
जितपद्माको लेनेमें समर्थ हूँ, मैने हाथ पर आग उठाई है, मैने
सिर पर वन झेला है, मैं आज भी कृतान्तका घात कर सकता
मैंने अंगुलोसे आकाशमे छेद किया है, मैंने भोगमे इन्द्रको
पराजय दी है, धरतीको मैंने पैरोसे चॉपा है, मैने आघातसे
गजको भूमिसात् किया है, मैने ऐरावत हाथीका दाँत उखाड़ा है,
मैंने सूर्यको तल पर गिराया है, मैने अशेप समुद्रका उल्लंघन किया
है, मैने धरणेन्द्र के फनको चूर-चूर किया है, वस्त्रसे मैने हवाको
बांधा है, मैं वही है जिसने मेरुपर्वतको भी टाल दिया । मैं तीनों
भुवनामे भयंकर हूँ। मै अजर अमर हूँ, तेतीस करोड़ देवोके रणमें
अजेय है। क्षेमंजलिराज, तुम अपंडित और अनानी हो, यदि
तुममे शक्ति हो तो अपनी शक्ति मुझ पर छोड़ो" ॥१-६||

पटमचरित [११] तं णिसुण वि खेमञ्जलि-राणउ । उटिड गलगज्जन्तु पहाणउ ॥१॥ सत्ति-विहत्यड सत्ति-पगासणु । धगधगधगधगन्तु स-हुआसणु ॥२॥ अम्बर तेय-पिण्डु गट विणयरु । णिय-मज्जाय-चत्तु णउ सायरु ॥३॥ जण अणवरय-दाणु णड मयगलु । परमण्डल-विणासु णड मण्डलु ॥४॥ रामायणहाँ मज्म णड रामणु । भीम-सरीर ण भीमु भयावणु ॥५॥ तेण विमुक सत्ति गोविन्दहाँ। णं हिमवन्ते गड समुहहाँ ॥६॥ धाइय धगधगन्ति समरहण। तडि तडयडन्ति णह-अङ्गणें ॥७॥ सुरवर गहें बोल्लन्ति परोप्पर । 'एण पहारं जीवइ दुक्कर' ॥८॥ वत्ता पुत्थन्तर कण्हे जय-जस-तण्हे धरिय सत्ति दाहिण-करेण । संस्यहाँ दुछी थाणहाँ चुछी णावइ पर-तिय पर-गरेण ॥६॥ । [१२] धरिय सत्ति में समर समत्थे । सेल्लिड कुसुम-वासु सुर-सत्थे ॥१॥ पुण्णिम-इन्दु-रुन्द -मुह - सोमह । वेण वि कहिट गम्पि जियपोमहें ॥२॥ 'सुन्दरि पेक्खु पेक्खु जुज्मन्तहाँ। णोखी का वि भनि वरइत्तहाँ ॥३॥ जा तउ ताए सत्ति विसज्जिय । लग्ग हत्थें असइ चालज्जिय ॥४॥ एण अकलङ्कर । पर चुम्वेवर तुह मुह-पङ्कट' ॥५॥ तं णिसुणेप्पिणु बिहसिय-वयणएँ । णव-कुवलय-दल- दीहर-णयणए ॥६॥ जाल-गवरखए जो अन्तर-पछ । णाई सहत्थें फेडिट मुह-वडु ॥७॥ लक्खणु णयण-कउक्खिउ कण्णएँ । णं जुमन्तु णिवारिट सण्णए ॥८॥ ताम कुमार दिछु सुदंसणु | धवलहरम्बर मुह-मयलन्छशु ॥६॥ सुह-णखत्तै सुजोग्गे सुहङ्करु । णयणामेलउ जाउ परोप्पल ॥१०॥ गर-भमरेण ।

एलतीसमो संधि [११] यह सुनते ही क्षेमंजलि-राज गरजकर उठा, कुछ शक्तियोंको प्रकाशित करता और कुछ को हाथमें लिये हुए वह धक-धककर रहा था। वह ऐसा लगता था मानो आकाशमें तेजपिंड सूर्य हो, या मर्यादारहित समुद्र हो या अनवरत मद भरता हुआ महागज हो। या परमण्डलका नाश करनेवाला मांडलिक राजा हो, या रामायणके बीचमे रावण हो। या भीम शरीरवाला भीम ही हो। उसने तब लक्ष्मणके ऊपर उसी तरह शक्ति फेकी जिस तरह हिमालयने समुद्र में गंगा प्रक्षिप्त की । वह शक्ति धकधकाती हुई समरांगणमें इस तरह दौड़ी मानो नभमे तड़-तड़ करती विजली ही चमक उठी हो । (यह देखकर ) देवता आकाशमे यह बाते करने लगे कि अब इसके आघातसे लक्ष्मणका वचना कठिन है। परन्तु यश और जयके लोभी लक्ष्मणने अपने दाहिने हाथमें उस शक्तिको उसी तरह धारण कर लिया जिस तरह संकेतसे चूकी हुई परस्त्रीको पर-पुरुप पकड़ लेता है ॥१-६॥ [१२] लक्ष्मणके युद्धमे शक्तिके झेलते ही सुरसमूह -पुष्प- वर्षा करने लगा। किसीने जाकर पूर्ण चन्द्रमुखी जितपद्मासे कहा, "सुंदरी, सुंदरी, लड़ते हुए लक्ष्मणकी अनोखी भंगिमा तो देखो, तातने जो शक्ति छोड़ी थी वह असती स्त्रीकी तरह लक्ष्मणसे जा लगी । यह नररूपी भ्रमर तुम्हारे मुख-कमलको अवश्य चूमेगा ।" यह सुनकर नव-कमलकी तरह दीर्घनयन, विहसितमुख उसने अपने मुखपटकी तरह, जालीदार झरोखेके अन्तःपटको हटाकर लक्ष्मणको अपने नेत्र-कटाक्षसे देखा मानो उसने संकेतसे लड़ते हुए उसे निवारण किया हो, इतने मे ही कुमारने भी धवलगृहके आकाशमे सुदर्शन मुखचन्द्र देखा। इस तरह शुभ नक्षत्र और सुयोगमें उन दोनोकी ऑखोंका परस्पर शुभकर मिलाप हो गया।

१८४ पउमचरित घत्ता एत्यन्त दुद मुझाल्हें लहु अण्णेच सत्ति गरेण । स वि धन्यि सरग्ग वाम-करग्गे णावइ णव-बहु णव-वरैंण ॥१६॥ [१३] अण्णेक्क सुक्क बहु-मच्छरेण । बजासणि णाई पुरन्दरेण ॥१॥ स हि दाहिण-कक्खहिँ छुद्ध तेण । अवरुण्डिय वेस व कामुएण ॥२॥ अण्णेक विसजिय धगधगन्ति । णं सिहि-सिह जाला-सय मुअन्ति ॥३॥ स विधरिय एन्ति णारायणेण । वामद गोरि व तिणयणेण nam णं महिहरु देवइणन्दणेण । पञ्चमिय मुक्त बहु-मच्छरेण ॥५॥ पम्मुक्क पधाइय गरवरासु । णं कन्त सुकन्तहाँ सुहयरासु ॥६॥ स विसाणे हिँ एन्ति णिरुद्ध केम । णव-सुरय-समागम जुबइ जेम ॥७॥ एस्यन्तरे देवहिँ लक्खणासु । सिर मुक्क पडीबउ कुसुम-वासु ॥८॥ अरिदमणु ण सोहइ सत्ति-हीणु । खल-कुपुरिसुव्व थिट सत्ति-हीणु ॥६॥ । घत्ता हरि रोमञ्चिय-तणु सहइ स-पहरणु रण-मुहँ परिसदन्तु किह | रत्तुप्पल-लोयणु रस-वस-भोयणु पञ्चाउहु वेयालु जिह ॥१०॥ [१४] परायणेण । अरिदमणु युत्तु णारायणेण ॥३॥ 'खल बुह पिसुण मच्छरिय राय । मह जेम पडिच्चिय पञ्च घाय ||२|| तिह तुहु मि पडिच्चहि पछ सत्ति । जइ अत्यि का वि मण मणुस-मत्ति' । किर एम भणेप्पिणु हणइ जाम । जियपउमएँ पत्तिय माल ताम || समरङ्गण असुर एक्कतीसमो संधि इसी वीचमें उस दुष्ट और क्रोधी अरिदमनने एक और शक्ति लक्ष्मणके ऊपर छोड़ी परंतु लक्ष्मणने उसे भी वायें हाथमें वैसे ही ले लिया जैसे नया वर नई दुलहिनको ले लेता है ॥१-धा [१३] तव उसने इन्द्रके वज्रकी भॉति एक और शक्ति छोड़ी उसने उसे भी दाहिनी काखमें ऐसे ही चाप लिया जैसे कामुक वेश्याको आलिगनबद्ध कर लेता है। राजाने एक और शक्ति छोड़ी जो धक-धक करती हुई वालशिखाकी तरह सैकड़ो लपटें उगलने लगी । लक्ष्मणने आती हुई उसे वैसे ही धारण कर लिया, जैसे शिवजीने पार्वतीको अपने वायें अर्धांगमे धारण कर लिया था । तव अत्यंत मत्सरसे भरकर देवकीपुत्र राजा अरिदमनने पाँचवीं शक्ति विसर्जित की । वह भी नरश्रेष्ठ लक्ष्मणके पास इस तरह दौड़ी मानो कांता ही अपने सुभगराशि कांतके पास जा रही हो। किंतु कुमार लक्ष्मणने उसे भी अपने दाँतोसे वैसे ही रोक लिया, पति जैसे सुहागरातमें आती हुई युवतीको रोक लेता है। तब देवोंने पुनः लक्ष्मणपर फूल वरसाये । शक्तिसे हीन होकर राजा अरिदमन विलकुल भी नहीं सोह रहा था। तब वह शक्ति- हीन दुष्ट पुरुप की तरह स्थित हो गया। पुलकितशरीर युद्ध- स्थलमे इधर-उधर दौड़ता हुआ सशस्त्र लक्ष्मण वैसे ही सोह रहा था, जैसे रक्तकमलकी तरह नेत्रवाला, रसमज्जाका भोजी पंचायुध वैताल शोभित होता है ॥५-६।। [१४] समगंगणमे असुरोको पराजित करनेवाले लक्ष्मणने अरिदमनसे कहा,"खल, क्षुद्र, दुष्ट, नीच ईर्ष्यालु राजन् ! जिस तरह मैंने तेरे पॉच आघात मेले । उसी तरह यदि तेरे मनमें थोड़ी भी मनुष्यशक्ति हो तो मेरी एक शक्ति मेल । यह कहकर कुमार लक्ष्मण जव तक मारने लगा तव तक जितपद्माने उसके गले में

१८६
पउमचरिउ
'भो साहु साहु रण दुणिरिक्स । म पहरु देव दइ जणग-भिक्ख ॥५॥
जे समरे परजिउ सत्तुदसणु । पई सुऍ विभण्णु वरइत्तु कवणु' ॥६॥
तं वयणु सुणेपिणु लक्खगेण । आउद्धई चित्त तखणेण ॥७॥
मुक्काउहु गउ अरिदमण-पासु । सहसक्खु व पणविउ जिणवरासु ॥३॥
घत्ता
'जं अमरिस-कुई जय-जस लुढ़े विप्पिउ किउ तुम्हेहिँ सहुँ।
अण्णु वि रेकारिउ कह वि ण मारिउ तं मरुसेजहि माम महु' ॥६॥
[१५]]
खेमञ्जलिपुर परमेसरेण । सोमित्त
कुत्त
रज्जेसरेण ॥३॥
'किं जम्पिएण वहु-अमरिसेण । लइ लइय कण्ण पई पउरिसेण ॥२॥
तुहूं दीसहि दणु-माहप्प-चप्पु । कहें कवणु गोत्तु का माय वप्पु' ॥३॥
महुमहणु पवोल्लिउ 'णिसुणि राय । महु दसरहु ताउ सुमिति माय ॥४॥
अण्णु वि पयडउ इक्खक्कु वसु । वड्डारउ जिह तरुवरहाँ वंसु ॥५॥
वे अम्हइँ लक्खण-राम भाय । वणवासह) रज्जु मुएवि माय ॥६॥
उजाणे तुहारएँ असुर-मदु । सहुँ सीयएँ अन्इ रामभदु' ॥७॥
वयणेण तेण कण्टइउ राउ । संचल्लु णवर साहण-सहाउमा
घत्ता
जण-मण-परिओसें तूर-णिघोसें णरवइ कहि मि ण माइयउ ।
जहिं रामु स-भज्जड वाहु-सहेजउ त उहेसु पराइयउ ॥६॥
[११]
एत्थन्तर पर-वल-भड-णिसामु । उहिउ जण-णिवहु णिएवि रामु ॥३॥
करें धणुहरु लेइ ण लेइ जाम । सकलत्तड लक्खणु दिट्छु ताम ॥२॥

१८७ एकतीसमो संधि माला डाल दी और वह बोली, "हे रणमें दुर्दर्शनीय, साधु-साधु, प्रहार मत करो, पिताकी भीख दो मुझे। तुमने युद्धमें अरि- दमनको जीत लिया । तुम्हें छोड़कर और कौन मेरा पति हो सकता है।" यह सुनकर लक्ष्मणने तुरंत अपने हथियार डाल दिये। और अरिदमनके पास जाकर उसने वैसे ही उसको प्रणाम किया जैसे इन्द्र जिनको प्रणाम करता है। उसने कहा-"अमर्प और क्रोधसे, तथा यश और जयके लोभसे मैंने आपके साथ बुरा- वर्ताव किया है और भी 'रे' कहकर बुलाया। किसी तरह मारा भर नहीं । हेमामा (ससुर) वह क्षमा कर दीजिए! ॥१-६।। [१५] तब क्षेमंजलिका राज-राजेश्वर अरिदमन बोला, "बहुत अमर्पपूर्ण प्रलापसे क्या, तुमने अपने पौरुपसे कन्या ले ली । तुम दानवोंके माहात्म्यको चाँपनेवाले दिखाई देते हो, बताओ तुम्हारा गोत्र क्या है ? मॉ और बाप कौन है ?" इसपर लक्ष्मण बोला, "सुनिये राजन् ! दशरथ मेरे पिता है और सुमित्रा मॉ। और भी मेरा प्रसिद्ध इक्ष्वाकु कुल तरुवरके वंशकी तरह बड़ा है। हम राम और लक्ष्मण दो भाई हैं, जो राज्य छोड़कर वनवासके लिए आये है। असुरसंहारक भद्र राम सीता देवीके साथ तुम्हारे उद्यानमे ठहरे हैं।" यह सुनकर राजा पुलकित हो उठा और सेनाको लेकर चल पड़ा। जनोंके मनके परितोप और तूर्यके निर्धोपसे वह नरपति अपने तई नहीं समा सका। शीघ्र ही वह उस स्थान पर जा पहुंचा जहाँ अपने ही बाहुओंका भरोसा करने- वाले राम अपनी पत्नीके साथ थे॥१-६।। [१६] यहाँ भी शत्रु-सेनाके सुभटोका संहार करनेवाले गम जनसमूहको देखकर उठे । जब तक वह अपने हाथमे धनुप ले या न ले तब तक उन्होंने स्त्रीसहित लक्ष्मणको आते देखा ।

पउमचरित
सुरवइ व स-भजउ रहँ णिविछ । अण्णेकु पासे अरिदमणु दिछ ॥३॥
सन्दणहाँ तरेप्पिणु दुण्णिवारु । रामहाँचलणे हिँ णिवडिठ कुमार ॥४॥
जियपडम स-विमम पउम-णयण । परमच्छि पफुल्लिय-पउम-वयण ॥५
पउमहाँ पय-पउमै हिं पडिय क्ण्ण । तेण वि सु-पसत्यासीस दिण्ण ॥६॥
एत्यन्तरै मामें ण किंउ खेट । कणय-रहें चढाविउ रामएउ ॥७॥
पडु पडह पहय किय-कलयलेहिँ । उच्छाहहिँ धवलॅहिं मङ्गलेहि ॥८॥
वत्ता
रह एहै णिविट्ठई णयएँ पइट्टई सीय-वल्हू बलवन्ताई।
णारायणु णारि वि थियई चयारि विरज्जुस ई भुक्षन्त इँ ॥६॥
[३२. वत्तीसमो संधि]
हलहर-वकहर परचक हर जिणवर-सासणे
अणुराइय
मुणि-उवसग्गु जहिं विहरन्त तर्हि वंसत्यलु णयर पराइय ॥
[]
ताम विसन्थुलु पाणवन्तड । दिट्छ असेसु वि जणु णासन्तड ॥१॥
दुम्मणु दीण-वयणु विहाणउ । गउ विच्छत्त व गलिय-विसाणट ॥२॥
पण्णय-णिवहु व फणिमणि-तोडिउ । गिरि-णिवहु व वजासणि-फोडिउ ॥३॥
पङ्कय-सण्ड व हिम-पवणाहट । उभड-वयणु समुभिय-बाहट ॥२॥
जणवउ जं णासन्तु पीसिट । राहवचन्हें पुणु मम्भीसिट ||५||
'यहाँ में भज्जहाँ मं भज्जहाँ । अभउ अभउ भउ सयलु विवजहो
ताम दिछु ओखण्डिय-माणउ । णासन्तर वंसत्यल - राणउ ॥७॥

बत्तीसमो संधि १८६ इन्द्रकी भाँति वह पत्नीके साथ रथपर आरूढ़ था। उसके निकट दूसरा अरिदमन था। (रामको देखते ही) दुनिर कुमार लक्ष्मण उनके चरणापर गिर पड़ा। खिले हुए कमलकी तरह मुख- वाली कमलनयनी कन्या जितपद्मा विलासके साथ रामके चरण- कमलोंपर नत हो गई। उन्होंने भी उसे प्रशस्त आशीर्वाद दिया। इतनेमे मामाने (ससुरने) जरा भी देर नहीं की। उसने रामदेवको सोनेके रथ पर बैठाया। पटु पटह वज उठे ! कलकल ध्वनि और धवल तथा मंगल गीतोंके साथ, एक ही रथमें बैठकर वलवंत राम और सीताने नगरमें प्रवेश किया । ऐसे मानो वे विष्णु और लक्ष्मी हों। वे चारो इस तरह राज्यका उपभोग करते हुए वहीं रहने लगे ॥ १-६॥ बचीसवीं संधि जिनशासनमे अनुरक्त, दूसरेके चक्रका हरण करनेवाले वे दोनो राम और लक्ष्मण वहॉसे चलकर उस वंशस्थल नगरमें पहुंचे जहाँ मुनियों पर उपसर्ग हो रहा था। [१] वह नगर जैसे सिसक रहा था, उन्होने देखा सारे जन नष्ट हो रहे हैं, दुर्मन, दीनमुख और विद्र प वे लोग दन्तहीन हाथीकी तरह एकदम कान्तिहीन हो उठे थे। वह जनपद वैसे ही नष्ट हो रहा था जैसे, फणमणि तोड़ लेनेपर सर्पराज, वज्रसे विदीर्ण पर्वतसमूह और हिमपवनसे आहत होकर कमलसमूह नष्ट हो जाता है । हाथ उठाये और मुंह ऊपर किये हुए उन्हें देखकर, रामने यह अभय वचन दिया, "ठहरो ठहरो, भागो मत !” इतने ही में उन्हें वंशस्थलका गलितमान राजा दीख पड़ा। उसने कहा,

१९०
पउमचरित
तेण
बुन्तु
'मं णयर पईसहाँ। तिणिमि पाण लएप्पिणुणासहाँ ॥८॥
घत्ता
एत्तिउ एत्थु पुरै गिरिवर-सिहर जो उहइ गाउ भयङ्करु ।
तेण महन्तु डरु णिवडन्ति तरु मन्दिर जन्ति सय-सकरु ॥६
[२]
एउ दीसइ गिरिवर-सिहरु जेत्थु । उवसग्गु भयङ्करु होइ तेत्थु ॥१॥
वाओलि धूलि दुवाइ एइ । पाहण पडन्ति महि थरहरेइ ॥२॥
धर भमइ समुहद सीह-णाउ । वरसन्ति मेह णिवडइ णिहाउ ॥३॥
तें कजे णासइ सयलु लोउ । मं तुम्ह वि उहु उवसग्गु होउ' ॥४॥
तं णिसुणेवि सीय मणे कम्पिय । भीय-विसन्थुल एव पजम्पिय ॥५॥
'अम्हहुँ देसे देसु भमन्तहुँ । कवणु पराहउ किर णासन्तहुँ' ॥६॥
त णिसुणेवि भणइ दामोयरु । 'वोल्लिउ काई माएँ पइँ कायरु ॥७॥
विहि मि जाम करें अतुल-पयावउँ । सायर - वजावत्तइ चावई ॥८॥
जाम विहि मिजय-लच्छि परिट्ठिय । तोणीरहिँ णाराय अहिटिय ॥६॥
ताम माएँ तुहुँ कहाँ आसङ्कहि । विहरु विहरु मा मुहु ओवङ्कहि ॥१०॥
L
धीर वि जणय-सुय कोवण्ड-भुय संचल्ल वे वि वल-केसव ।
सग्गहाँ अवयरिय सइ-परियरिय इन्द-पडिन्द-सुरेस व ॥११॥
[३]
पहन्तर भयङ्करो । झसाल - छिण्ण - कक्करो ॥१॥
वलो ब्व सिङ्ग दीहरो । णियच्छिओ महीहरो ॥२॥
कहिं जें भीम-कन्दरो । झरन्त-णीर - णिज्मरो ॥३॥
कहि जि रत्तचन्दणो । तमाल-ताल - वन्दणो ॥४॥

बत्तीसमो संधि १९१ "नगरमें मत घुसो, नहीं तो तीनोंके प्राण चले जॉयगे । यहाँ इस नगरमे पहाड़की चोटीपर जो भयङ्कर नाद उठता है, उससे वहुत भय होता है, बड़े-बड़े पेड़ तक गिर जाते है, और प्रासाद सौ-सौ खण्ड हो जाते हैं। ॥१-६|| [२] जहाँ यह विशाल पर्वत दीख पड़ता है, वहाँ भयङ्कर उत्पात हो रहा है। तूफान, धूलि और दुर्वात आ रहे है । पत्थर गिर रहे है और धरती कॉप रही है। घर घूम रहे है, वज्राघात और सिहनाद हो रहा है। मेघ बरस रहे है । अतः समूचा नगर ही नष्ट हुआ जाता है। तुमपर भी कहीं उत्पात न हो जाय" यह सुनते ही सीता देवी अपने मनमें कॉप उठीं। वह भयकातर होकर बोली, “एक देशसे दूसरे देशमें घूमते और मारे-मारे फिरते हुए हम लोगोपर कौन-सा पराभव आना चाहता है।" यह सुनकर कुमार लक्ष्मणने कहा, "माँ तुम इस तरह कायर वचन क्यों कहती हो । जव तक वज्रावर्त और सागरावर्त धनुप हमारे हाथमे है और जब तक तूणीर और बाणोसे अधिष्ठित विजय- लक्ष्मी हमारे पास है तब तक मॉ तुम आशङ्का ही क्यों करती हो, आगे चलनेमें मुंह मत विचकाओ" । इस तरह जनकसुताको धीरज बधाकर और हाथमे धनुप-बाण लेकर वे लोग चल दिये । जाते हुए वे ऐसे लगते थे मानो स्वर्गसे उतरकर, इन्द्र प्रतीन्द्र ही शचीके साथ जा रहे हो ॥१-११|| [३] थोड़ी दूरपर उन्हें कंकड़ और पत्थरोसे आच्छन्न एक भयङ्कर पर्वत दिखाई दिया। उसके शृङ्ग (चोटी और सींग) चलकी तरह विशाल थे। कही भीषण गुफाएं थीं और कहीं पर पानी गारते हुए करने । कही रक्तचंदनके वृक्ष थे और कहींपर तमाल. ताल तथा पीपलके पेड़ थे । कहीं कांतिसे रंजित मत्त मयूर पटमचरिड कहिं जि नि-चारया । लबन्त मत्त - मोरया ॥५॥ यहि जि साहाण्या । धुणन्त पुच्छ-दण्डया ॥६॥ कहिं नि मत्त-णिभरा । गुलगुलन्ति कुरा ॥७॥ कहिं जि दाढ-भासुरा । घुरुग्घुरन्ति सूयरा ॥ कहि जि पुच्छ-दीहरा । किलिकिलन्ति वाणरां ॥ कहि नि थोर-कन्धरा । परिम्भमन्ति सम्बरा ॥१०॥ कार्हि जि तुग-अनन्या । हयारि · तिक्ससिङ्गया ॥१॥ कहि जि आणणुण्गया । करा वुण्ग-ऋगया ॥१॥ घत्ता तहिं तेहएँ सइलें तवर-वहलें आरूढ वे वि हरि-हलहर । जाणइ-विजुलएँ धवलुजलए चिञ्चइब गाई गव जलहर ॥१३॥ [१] पिहुल-णियम्ब - विम्ब रमणीयह । राहउ दुम दरिसावइ सीयहँ ॥१॥ एहु सो धणे गग्गोह-पहाणु । जहि रिसहहाँ उप्पण्णउ णाणु ॥२॥ एहु सो सत्तवन्तु कि न मुणिउ । अजिउ स-णाग देहु जहिँ पथुणिउ॥३॥ ऍहु लो इन्दवन्छु सुपसिद्धट । जहि संभव-जिणु णाण-समिद्धउ ॥या ऍहु सो सरलु सहलु संभूजउ । अहिणन्दणु स-णाणु जहिँ हूअउ ॥५॥ एहु पीयङ्गु सीए सच्छायउ । सुमइ स-णाणपिण्डुजहिं जायउ ॥३॥ एहु सो साल सीएँ णियचिट । पउमप्पहुस-णाणुजहिँ अच्छिउ ॥७॥ ऍहु सो सिरिसु महमु जागइ । णाणु सुपास भगेवि जगु जाणइ ॥८॥ णागातु चन्दपहँ । णाणुप्पत्ति जत्थु चन्दप्पहें ॥६ एहु सो मालइल्नु पीसिउ । पुप्फग्रन्तु जहिं णाण-विहूसिड ॥१०॥ घत्ता एहु सो पक्खता फल-फुल्ल-भर तेन्दुइ-समाणु दुह-णासहुँ । जहिं परिहूया. संभूबाई सीयल सेयंसहुँ ॥११॥ एहु सो वत्तोसमो संधि १६३ थे और कहीं पर अपनी पूंछ घुमाते हुए सिंह और मेढ़े। कहीं पर मदमाते गज गुरगुरा रहे थे और कहीं भयङ्कर दाढ़वाले सुअर घुर-धुरा रहे थे। कहीं मोटी और लम्बी पूंछके वन्दर किल- कारी भर रहे थे। कहीं स्थूल कंधोंके सांभर घूम रहे थे, कहीं लम्वे शरीर और तीखे सौगोके भैंसे थे और कहींपर ऊपर मुख किये खिन्न कानवाले हिरन थे। ऐसे उस वृक्षोंसे सघन पर्वत पर दोनो भाई (आगे बढ़ते) चले गये । अत्यन्त गोरी जानकीके साथ वे दोनों भाई ऐसे ज्ञात हो रहे थे मानो बिजलीसे अंचित मेघ ही हो ॥१-१३॥ ४] तव राम सीताको, (मोटे नितम्बों और अधरोंसे रमणीय) अच्छी तरह पेड़ दिखाने लगे । उन्होंने कहा, "धन्ये, देखो वह मुख्य वटवृक्ष है जहाँ आदि तीर्थङ्कर आदिनाथको केवलज्ञान प्राप्त हुआ था। क्या तुम इस सत्यवंत वृक्षको जानती हो जिसके नीचे अजित केवलीकी खूब स्तुति हुई थी। और यह वह इन्द्र वृक्ष है जहाँ सम्भव-जिनने केवल ज्ञान प्राप्त किया था। यह वह सरल द्रुम है जहाँ अभिनंदन स्वामी केवलज्ञानी बने थे। यह वह सच्छाय प्रियंगु वृक्ष है जहाँ सुमतिनाथने केवलज्ञान प्राप्त किया । सीतादेवी देखो, यह वह शाल वृक्ष है जहाँ पद्मप्रभ-जिन केवलज्ञानी हुए थे और हे जानकि, यह शिरीषका महाद्रुम है जहाँ भगवान् सुपार्श्वने ध्यान धारणकर समस्त विश्वको जाना था। चन्द्रमाके समान देखो यह नाग वृक्ष है जिसके नीचे चन्द्र प्रभु भगवान्ने केवलज्ञान प्राप्त किया था। यह वह मालती वृक्ष है जहाँ पुष्पदंत जानसे विभूपित हुए थे। फल-फूलोंसे लदा हुआ यह वह तेंदुकी की तरह प्लक्ष वृक्ष है जहाँ दुखनाशक शीतलनाथ और श्रेयांस भगवान्को केवलजानकी उत्पत्ति हुई थी ॥१-११॥ १३

१९४
पटमचरित
[५]
एह सा पाडलि सुहल सुपत्ती । वासुपुज्ज जहिं गाणुप्पत्ती ॥१॥
ऍसु सो जम्बू एहु असत्थु । विमलाणन्तहुँ णाण-समत्थु ॥२॥
उहु दहिवण्ण-णन्दि सुपसिद्धा । धम्म-सन्ति जहिँ गाण-समिद्धा ॥३॥
उहु साहार - तिलउ दीसन्ति । कुन्थु-अरहुँ जहिँ गाणुप्पत्ति ॥४॥
सो तरु कङ्केल्लि-पहाणु । मल्लिजिणहाँ जहिं केवल-णाणु ॥५॥
एहु सो चम्पउ किण्ण णियच्छिउ । मुणि सुन्वउ स-णाणुजहिं अच्छिउ॥६॥
इय
वि
वन्दइ । जणु कज्जेण तेण अहिणन्दई' ॥७॥
एम चवन्त वल-लक्खण । जहिं कुलभूसण-देसविहूसण ॥८॥
दिवस चयारि अणग-वियारा । पडिमा-जोगें थक्क भडारा ॥३॥
उत्तिम-तरु इन्दु
पत्त
घत्ता
वेन्तर-घोणसें हिं आसीविसें हिँ अहि-विच्छिय-वेल्लि-सहासै हिँ ।
वेढिय वे वि जण सुह-लुद्ध-मण पासण्डिय जिस पसु-पासें हिं ॥१०॥
[६]
जं दिट्टु असेसु वि अहि-णिहाउ । वलएउ भयङ्करु गरुडु जाउ ॥१॥
तोणीर-पक्खु
वइदेहि-चन्चु । पक्खुज्जल - सर - रोमञ्च - कन्चु ॥२॥
सोमित्ति-वियड-विप्फुरिय-वयणु । णाराय - तिक्ख - णिड्डरिय-णयणु ॥३॥
दोणि वि कोवण्डई कण्ण दो वि । थिउ राहड भीसणु गरुड होवि ॥४॥
तं णयण-कडक्खें वि दुग्गमेहँ । परिचिन्तिउ कज्जु भुअङ्गमेहिं ॥५॥
'लहु णासहुँ किं णर-सगमेण । खज्जेसहुँ गरुड-विहङ्गमेण ॥६॥
एत्थन्तर विहडिय अहि मयन्ध । गय खयहाँ णाई मुणि-कम्मवन्ध ॥७॥
भय-भीय विसन्थुल मणण तह । खर-पवण-पहय घण जिह पण? ॥८॥

चत्तोसमो संधि [५] यह अच्छे पत्तोंवाली पाटली लता है जिसकी छायामें वासुपूज्यको केवलज्ञान उत्पन्न हुआ था। ये वे जामुन और पीपल के वृक्ष हैं जिनके नीचे विमलनाथ और अनन्तनाथ ज्ञानसे समर्थ हुए थे । वे दधिपर्ण और नन्दीवृक्ष हैं जिनके नीचे धर्मनाथ और शान्तिनाथ ज्ञानसे समृद्ध हुए। ये वे तिलक और सहकार वृक्ष दिखाई दे रहे हैं जहाँ कुंथुनाथ और अरहनाथको ज्ञानको उत्पत्ति हुई । यह वह अशोक वृक्ष है जहाँ मल्लिनाथ जिनने केवलज्ञान- प्राप्त किया। क्या तुम वह चंपक पेड़ नहीं देख रही हो जहाँ केवल ज्ञानी, मुनिसुव्रत ध्यानके लिए बैठे थे। इस उत्तम वृक्षकी तो इन्द्र तक वन्दना करता है और इसीलिए लोग भी इसका अभि- नन्दन करते हैं ।" इस प्रकार वाते करते हुए वे लोग वहाँ पहुंचे जहॉपर भट्टारक, जितकाम, देशभूपण और कुलभूपण मुनि प्रतिमा योगध्यानमें लीन बैठे थे । शुद्धमन वे दोनों यति घूरते हुए व्यन्तर देवों, विपाक्त सॉपी-बिच्छुओ और लताओंसे इस प्रकार घिरे हुए थे जैसे पाखंडीजन घर, स्त्री आदि परिग्रहसे घिरे रहते हैं ॥१-१०॥ [६] रामने जब वहाँ सब ओर सर्प-समूह देखा तो स्वयं भयकर गरुड़ वनकर बैठ गये। तूणीर उनके पंख थे, सीतादेवी चोच थीं। रोमांच और कंचुक उजले पंखके वाण थे। लक्ष्मण ही बुला हुआ विकट मुख था । तीखे तीर डरावने नेत्र थे। दोनोके दो धनुप, उस (गरुड़) के कान थे। इस तरह राम भीषण गरुड़ का रूप धारण करके बैठ गये। उस (रामरूपी गरुड़) को देखकर सपा के लिए अपने प्राणोंकी चिन्ता होने लगी कि इस नरसंगममें हम शीघ्र ही नष्ट हो जायेंगे । यह गरुड़ पक्षी हमें खा लेगा। इस प्रकार उन सपोका नाश वैसे ही हो गया जैसे मुनिके कर्मबन्धका नाश हो जाता है। मनसे त्रस्त, भयभीत और कातर वे ध्वस्त होने

पउमचरित
घत्ता
वेल्ली-सङ्घलहाँ वंसत्थलहाँ विसहर-फुकार-करालहों।
जाय पगास रिसि गहें सूर-ससि उम्मिल णाई घण-जालहों ॥४॥
[७]
अहि-णिवहु जं जै गउ ओसरं वि । मुणि चन्दिय जोग-भत्ति कर वि ॥१॥
जे भव-ससारारिह डरिय । सिव-सासय-गमणहाँ भइतुरिय ॥२॥
विहि टोसहि जे ण परिग्गहिय । विहि वज्जिय विहि झाहिं सहिय ॥३॥
तिहिं जाइ-जरा-मरणे हि रहिय । दंसण - चारित - णाण - सहिय ॥४॥
जे
चउगइ-चउकसाय-महण । चउ-मङ्गल-कर चउ-सरण-मण ॥५॥
जे
पञ्च-महन्वय-दुधर-घर । पञ्चेन्दिय-दोस-विणासयर ॥६॥
छत्तीस-गुणट्टि-गुणे हि पवर । छज्जीव-णिकायहुँ खन्ति कर ॥७॥
जिय जेहिं समय सत्त वि णरय । जे सत्त सिवकर अणवरय ॥८॥
कमह - मयह-दुट्ठ दमण । अविह-गुणड्डी-सरसवण
Man
-
घत्ता
एक्ककोत्तरिय इय गुण-भरिय पुणु वन्दिय वल-गोविन्द हि ।
गिरि-मन्दिर-सिहर वर-वेइहर जिण-जुवलु व इन्द-पडिन्दै हिँ ॥१०॥
[]
भावे तिहि मिजणे हिँ धम्मजणु । किउ चन्दण-रसेण सम्मज्जणु ॥१॥
पुप्फञ्चणिय छुद्ध-सयवत्त हिँ । पुणु आडत्तु गेउ मुणि-भत्तै हिँ ॥२॥
रामु सुघोस वीण अप्फालइ । जा मुणिवरहु मि चित्त चालइ ॥३॥
जा रामउरिहिं आसि रवण्णी । तूसवि पूयण-जक्खें दिण्णी ॥४॥
लक्खणु गाइ सलक्खणु गेउ । सत्त वि सर ति-गाम-सर-भेउ ॥५॥
एक्कवीस वर-मुच्छण-ठाण. । एक्कुणपञ्चास वि सर-ताण ॥६॥

वत्तीसमो संधि लगे। उसके अनंतर, लताओंसे संकुल, और सोकी फूत्कारोंसे कराल उस वंशस्थल प्रदेशमे प्रकाश करते हुए उसी प्रकार प्रवेश किया जिस प्रकार मेवमुक्त आकाशमें सूर्य और चन्द्र चमकते हैं ॥१-६।। [७] सर्पसमूहका नाश होने पर रामने उचित भक्तिके साथ मुनिकी वन्दना की कि "आप दोनों ही भवसागरसे डरे हुए मोक्ष जानेको शीघ्रतामें हैं, आप दोनों दोपरहित और दृढ़ है। दोनों ही ध्यानमें स्थित जन्म, जरा और मृत्यसे हीन हैं। दर्शन ज्ञान और चारित्रसे संपन्न चारों गतियों और कपायोंका नाश करनेवाले धर्मकी शरण अपने मानसमें धारण करनेवाले, पाँच महाकठोर व्रतोके पालक, पाँचो ही इन्द्रियोंके दोषों को दूर करने- वाले, छत्तीस उत्तम गुणोंसे सम्पन्न, छह प्रकारके निकायोंके जीवोंके प्रति क्षमाशील, सप्त महाभयङ्कर नरकोंके विजेता, सप्त कल्याणोको निरन्तर धारण करनेवाले, दुष्ट आठ कर्मोका नाश करनेवाले आप आठगुण-ऋद्धियोंसे परिपूर्ण हैं ।" इस प्रकार एकसे एक उत्तम गुणोंसे भरपूर उन मुनियोंकी उसी तरह बन्दना-भक्ति की जिस तरह, मंदराचलकी वेदी पर इन्द्र और उपेन्द्र वाल जिनकी वन्दना- भक्ति करते हैं ।।१-१०॥ [=] फिर राम लक्ष्मणने भावपूर्वक धर्मलाभ किया और स्वच्छ कमलोसे उनकी पुष्प-पूजा की। तदनन्तर मुनियोकी भक्तिले प्रेरित होकर उन्होंने गीत प्रारम्भ किया। और मुनियोंके मनको डगमगा देनेवाले सुघोप वीणाका बादन किया। यह वही सुन्दर चीणा थी जिसे राम-पुरी में प्रसन्न होकर पूतन वक्षने रामको प्रदान की थी। लक्ष्मणने शास्त्रीय संगीत प्रारम्भ किया। उसमें सात स्वर, तीन ग्राम और दूसरे दूसरे स्वर-भेद थे। मूर्छनाके सुन्दर इक्कीस स्थान और उनचास स्वर-तानें थीं। तालपर पटमचरित ताल-विताल पणञ्चइ जाणइ । णव रस अट्ट भाव जा जाणइ ।।७।। दस दिहिउ वावीस लयाई । भरहें भरह-गविट्टई जाई ॥८ घत्ता भावे जणय-सुय चउसहि भुय दरिसन्ति पणञ्चइ जाव हिं। दिणयर-अत्यवों गिरि-गुहिल-वण उवसग्गु समुहिउ ता हिँ ॥६ [] तो कोवग्गि-करम्विय - हासई । दिइँ णहयलें भसुर-सहासई ॥१॥ भण्णई विप्फुरियाहर-चयण' । अण्णइँ रत्तम्मिल्लिय-णयण ॥२॥ अण्ण पिझगई पिङ्गखइँ । अण्ण णिम्मसइँ दुप्पेस्खइँ ॥३॥ अण्णइँ णचन्ति विवत्थई । अण्णइँ तहिँ चामुण्ड-विहत्य ॥॥ अण्णई वेयालइँ । कत्तिय-मडय-करई विकरालई ॥५॥ अण्णई मसि-वण्ण अपसत्थई । णर-सिर-माल - कवाल-विहत्थई ॥६॥ अग्णइ सोणिय-मइर पियन्तइ । णञ्चन्तई घुम्मन्त-घुलन्त ॥७॥ अण्णई किलकिलन्ति चउ-पासें हिँ । भण्णइ कहकहन्ति उपहास हि ॥ C कङ्काल घत्ता अण्णई भीसणइ दुइरिसणई 'मरु मारि मारि' जम्पन्तई। देसविहूसणहें कुलभूसणहें आयइ उवसग्गु करन्तइँ ॥६॥ [१०] पुणु अण्णइँ अण्णण्ण-पयारहि । दुई विसहर-फण-फुक्काहिं ॥३॥ अण्णइ जम्वुव-सिव-फेक्कार हि । वसह - मडक्क - मुक्-डेक्कार हिँ ॥२॥ अण्णइ करिवर-कर - सिक्कार हिं । सर-सन्धिय-धणु-गुण - टङ्कार हि ॥३॥ अण्णइँ गदह - मण्डल-सह हिँ । अण्ण बहुविह-भेसिय-ण हिं ॥४॥ अण्णइ गिरिवर-तरुवर-धाएहि । पाणिय-पाहण - पवणुप्पाएँ हिँ ॥५॥ अण्ण अमरिस-रोस पुरन्तई। णयणहिँ अग्गि-फुलिङ्ग मुयन्तई ॥६॥ ।

वत्तीसमो संधि १३३ सीता नाच रही थीं। वह भी नौ रस, आठ भाव, दस वष्टियों और वाईस लयोको जानती थीं। इन सबका भरतके नाट्यशास्त्रमें भलीभाँति वर्णन है। इस प्रकार चौसठ हस्त-कलाओंका प्रदर्शन करती हुई सीतादेवी जब नाच रही थीं, तभी सूर्यास्त होने पर उस गहन वनमें फिर घोर उपसर्ग होने लगा ॥१-६॥ [६] क्रोधसे भरे हुए हजारों राक्षस आकाशमें दिखाई देने लगे। उनमेसे कितनों ही के अधर और मुख काँप रहे थे। कईके नेत्र आरक्त थे। कितनोंकी आँखें पीली-पीली थीं । कई निर्मास और दुर्दर्शनीय हो रहे थे । कितने ही आकाशमें नग्ननृत्य कर रहे थे। कई चामुण्ड हाथमे लिये हुए थे। कितने ही कंकाल और वेताल थे। कई कृत्तिका और शव अपने हाथ रखते थे। कोई अप्रशस्त काले रंगके थे। कईके हाथों में मुण्डमाला और खप्पर थे। कई रक्तकी मदिरा पीकर, और नाच-घूमकर मत्त हो रहे थे। कई चारों ओर खिलखिलाकर उपहास कर रहे थे। कितने ही दुदर्शनीय 'मारो मारो चिल्ला रहे थे। इस प्रकार वे सव कुलभूषण और देश- भूपण मुनियों पर उपसर्ग करनेके लिए आये ॥२-ता [१०] दूसरे (उपद्रवी) सर्पके फों और फूत्कारों के साथ वहाँ उपसर्ग करने पहुंचे। कितने ही शृगाल और जम्बूककी फेकार ध्वनि कर रहे थे। कई गजशुंडके शीत्कार, सरसंधान और धनुषको डोरीके साथ आये। दूसरे गर्दभ मण्डलकी ध्वनि तथा और और ध्वनियों के साथ आये। दूसरे पेड़ों और पहाड़ों के आधात, पानी, पत्थर और पवनका उत्पात करते हुए आये। दूसरे कई, क्रोध और अमर्पसे भरकर आये। कई आँखों से चिनगारियाँ बरसाते हुए दस-दस और सौ-सौ मुख बनाकर आये । दूसरे

२००
पउमचरित
अण्णइ दह-वयणइ सय-वयण' । अण्णई सहस-मुहई वहु-णयण' ।
तहि तेहए वि काले मइ-विमलहुँ । तो वि ण चलिउ माणु मुणि-धवलहुँ।।
घत्ता
वहरु सरन्ता पहरन्ताइ सवल-हुलि-हल-मुखलगा हिँ ।
काले अप्पणड भीसावणउ दरिसाविउ णं वहु-मङ्ग हिँ ॥६॥
[११]
उवसग्गु गिएँ वि हरिसिय-मण हि । णीसहि
वल-णारायण हिँ ॥१॥
मम्भीसवि सीय महावलेंहिँ । मुणि-चलण-धराविय करयल हि ॥२॥
धणुहरई विहि मि अष्फालिय।। णं सुर-भवण संचालिय ॥३॥
वुण्णइ भय-भीय - विसण्ठुलइ । णं रसियइ णहयल-महियलई ॥४॥
तं सद्दु सुणे वि भासदिय । रिउ-चित्त माण-कलङ्किय ॥५॥
धणुहर-टङ्कार हिं
वहिरियइँ । णट्टइ खल-खुइ वइरियई ॥६॥
णं अट्ठ वि कम्मइ णिजियई। णं पञ्चेन्दिय पजियई ।।७।।
णं णासै वि गयई परीसहइ । तिह असुर-सहासइँ दूसहई ॥८॥
घत्ता
छुटु छुड्ड गट्ठाई भय-तहाई मेल्लेप्पिणु मच्छरु माणु ।
ताव भण्डाराहु वय-धाराहुँ उप्पण्णउ केवलणाणु ॥६॥
[१२]
ताव मुणिन्दहँ णाणुप्पत्तिए । आय सुरासुर-वन्दणहत्तिएँ ॥१॥
जेहिँ कित्ति तइलोक पगासिय । जोइस वेन्तर भवण-णिवासिय ॥२॥
पहिला भावण
सङ्ख-णिण । वेन्तर
तूरयफालिय - सहें ॥३॥
जोइस-देव वि सीह-णिणाएं । कप्पामर जयघण्ट - णिणाएं ॥४॥
संचलिए चउ-देवणिकाए । छाइउ णहु णं घण-संघाए ॥५॥
वहइ विमाणु विमाणे चप्पिड । वाहणु वाहण-णिवह-भडघिउ ॥६॥

बत्तीसमो संधि
२०१
हजारों मुखों और असंख्य नेत्रों को बनाकर आये । यह सब
होनेपर भी उन विमलवुद्धि दोनों मुनियों का ध्यान डिगा नहीं।
(आततायी) सब्बल हलि हल और मूसलसे प्रहार कर रहे थे,
अपनी तरह-तरह की भंगिमाओं से वे यमकी तरह कराल जान
पड़ रहे थे ॥१-६॥
[११] उस भयानक उपसर्गको देखकर हर्पितमन, निःशंक,
महावली राम और लक्ष्मणने सीताको अभयवचन दिया और
अपन करतलसे मुनियों के चरण-कमल पकड़कर, दोनों धनुप
चला दिये । उनकी कठोर ध्वनिसे सुमेरु पर्वत भी हिल उठा।
धरती और आसमान दोनों भयकातर हो गूंज उठे । उस शब्दसे
शत्रुओं के हृदय दहल गये। उनका मान खण्डित हो गया।
उन धनुपों की टंकारसे बड़े-बड़े सुब्ध राक्षस वैसे ही प्रणष्ट हो
गये जिस प्रकार जिनके द्वाग आठ कर्म और पॉचों इन्द्रियों
विजिन कर ली जाती हैं। इस प्रकार मान और मत्सरसे भरे हुए
गनसोंके नष्ट होते होत, उन व्रतधारी मुनियों को केवलज्ञान उत्पन्न
हो गया ॥१-६॥
[१२] तत्र सुर और असुर उनकी वन्दना भक्तिके लिए आये।
और उनकी कीर्ति चागं लोकों में फैल गई । ज्योतिप, भवन और
व्यनग्याली देव आने लगे। सबसे पहले भवनवासी देवों ने
शवध्वनि की। फिर व्यन्तर देवों ने अपना तुर्य बजाया और
ज्योतिप देवान सिंहनाद किया तथा कल्पवासी दबाने जय-घण्टोका
निनाद किया । इन प्रकार चारों निकायों के दयों के प्रस्थान करते
आकाश इस प्रकार टक गया मानो मेघों से ही आच्छन्न हो
टा। विमान विमानको चापकर उड़ रहे थे। सवारीसे नवारी
उमा गई । अवों से अश्व और रथों से रथ अवन्द्व हो उठे।

२०२
पउमचरिउ
।
ताव
।
तुरउ तुरङ्गमेण ओमाणिउ । सन्दणु सन्दणेण संदाणिउ ॥७॥
गयवर गयवरेण पडिखलियउ । लग्गवि मउ. मउडु उच्छलियउ ||
घत्ता
भावे पेल्लियड भय-मेल्लियर सुर-साहणु लीलए आवइ ।
लोयहु मूढाहुँ तम छूडाहुँ णं धम्म-रिद्धि दरिसावइ ॥६॥
[१३]
पुरन्दरेण अइरावउ । साहिउ जण-मण-णयण-सुहावउ ॥१॥
सोह दिन्तु चउसट्ठी-णयौँ हिँ । गुलगुलन्तु वतीसहि वयणे हिँ ॥२॥
वयण वयण अह विसाण. । णाई सुवण्ण - णिवद्ध-णिहाण ॥३॥
एक्कक्कएँ विसाणे जण-मणहरु । एकेकड जें परिदृउ सरवरु ॥४॥
सरै सर सर-परिमाणुप्पण्णी । कमलिणि एक-एक णिप्पणी ॥५॥
एक्केचहें पउमिणिहें विसालई । पश्या वतीस स-णालई ॥६॥
कमले कमल वत्तीस जि पत्तई । पत्त पत्ते णटाइ मि तेत्तइँ ॥७॥
वद्धिड जम्बूदीव पमाणे । पुणु जि परिट्ठिउ तेण जि थाणे ॥८॥
तहिँ दुग्घोटें चहुँ वि सुर-सुन्दरु । वन्दणहत्तिएँ आउ पुरन्दरु ॥६॥
पुरउ सुरिन्दहाँ णयणाणन्देहिं । गुरु पोमाइड वन्दिण-वन्दहि ॥१०॥
घत्ता
देवहाँ दाणवहाँ खल-माणवहाँ रिसि चलणे हि केव ण लग्गहाँ।
जेहिं तवन्तऍहिँ अचलन्तए हिँ इन्दु वि अवयारिउ सग्गहाँ ॥११॥
[१४]
जिणवर-चलण कमल-दल-सेवहिं । केवल-णाण-पुज्ज किय देवहिं ॥१॥
भणइ पुरन्दर अहाँ अहाँ लोयहाँ । जइ सकिय जर-मरण-विओयहाँ ॥२॥
जह णिविण्णा चउ-गइ-गमणहाँ। तो कि ण दुकहो जिणवर-भवणहाँ ॥३॥
पुत्तु कलत्तु जाव मणे चिन्तहाँ । जिणवर-विम्वु ताव किण चिन्तहाँ ॥४॥

वत्तीसमो संधि २०३ गजसे गज और मुकुटसे मुकुट टकराकर उछल पड़े। भावविह्वल और अभय देवसेना वहाँ इस तरह आई मानो मूढलोकका अन्धकार दूर करनेके लिए धर्मऋद्धि ही चारों ओर विखर गई हो ॥१-६॥ [१३] तव इन्द्रने भी अपना ऐरावत हाथी सजाया । जनों के मन और नेत्रों के लिए सुहावने उस गजकी चौसठ ऑखें अत्यन्त शोभित हो रही थीं। अपने वत्तीस मुखों से वह गुरगुरा रहा था। उसके एक-एक मुखमें आठ-आठ दाँत थे जो स्वर्णिम निधानकी तरह लगते थे। एक-एक दॉतपर एक-एक सरोवर था, प्रत्येक सरोवरमें उसीके अनुरूप आकार-प्रकारकी कमलिनी थी। एक-एक कमलिनीपर मृणालसहित बत्तीस कमल थे। एक-एक कमलमें बत्तीस पत्ते थे और पत्ते-पत्तेपर उतनी ही अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। जम्बूद्वीप प्रमाण वह गज अपने स्थानसे चल पड़ा । उसपर सुरसुन्दर पुरन्दर भी मुनिकी वन्दना-भक्ति करनेके लिए आया। इन्द्रके सम्मुख नयनानन्द दायक देवसमूहने जिनकी स्तुति प्रारम्भ की। देव, दानव, खल और मनुष्यों में उस समय कौन ऐसा था जो उन मुनियोंके चरणोंमें नत न हुआ हो और तो और, स्वयं इन्द्र तकको स्वर्गसे उतरकर आना पड़ा॥१-१२॥ [१४] जिनवरके चरण-कमलोंके सेवक देवों ने केवलज्ञानी उन मुनियोंकी खूब अर्चना की। फिर इन्द्रने कहा-"अरे, अरे! तुम्हें यदि जन्म, जरा, मरण और वियोगसे आशंका हो, और यदि तुम चारगतियोंके भ्रमणसे छूटना चाहते हो तो जिनवर भवनकी शरणमें क्यों नहीं आते । जितनी पुत्र-कलत्रकी अपने मनसे चिन्ता करते हो उतनी जिन-प्रतिमाकी चिन्ता क्यों नहीं करते । जितना तुम मांस और कामका चिन्तन करते हो, उतना जिन-शासनका

२०४
पउमचरिउ
चिन्तहाँ जाव मासु मयरासणु । कि ण चिन्तवहाँ ताव जिणसासणु ॥५॥
चिन्तहाँ जाव रिद्धि सिय सम्पय । किणचिन्तवहाँ ताव जिणवर-पय ॥६॥
चिन्तहाँ ताव रूढ धणु जोवणु । धण्णु सुवष्णु अण्णु घरु परियणु ॥७॥
चिन्तहाँ जाव वलिउ भुव-पारु । कि ण चिन्तवहाँ ताव परमक्खरु ॥८॥
घत्ता
पेक्खहु धम्म-फलु चउरङ्गवलु पयहिण ति-वार देवाविउ ।
स इभु वणेसरहाँ परमेसरहों अस्थाकए सेव कराविउ' ॥६॥
[३३. तेत्तीसमो संधि]
उप्पण' गाण पुच्छइ रहु-तणउ ।
'कुलभूसण-देव किं उवसग्गु कउ' ।
[१]
तं णिसुणे वि पभणइ परम-गुरु । 'सुणु जक्खथाणु णामेण पुरु॥१॥
तहिँ कासव-सुरव महामविय । एयारह गुणथाणग्धविय ॥२॥
एक्कोवर
किकर पुरवइहें । णं तुम्वुरु-णारय सुरवइहें ॥३॥
हम्मन्तु विहङ्गमु लुद्धएँ हिँ । परिरक्खिड तेहि पवुद्धए हिँ ॥४॥
खगवइ तुणु वहुकालेण मुउ । विन्झाचलें भिल्लाहिवइ हुउ ॥५॥
तो कासव-सुरव वे वि मरै वि । थिय अमियसरहाँ घर ओभरवि ॥६॥
उवओवादेविह दोहलहिं । उप्पण्णा वडुहिं सोहलॅहिं ॥७॥
वद्धावउ आयउ वन्धुजणु । किउ उइय-मुइय णामग्गहणु ॥८॥

तेत्तीसमो संधि २०५ चिन्तन क्यों नहीं करते ? जितनी चिन्ता तुम ऋद्धि, श्री और सम्पदा को करते हो उतनी जिनवरके चरणोंकी क्यों नहीं करते ? जितनी चिन्ता तुम्हें रूप, धन और यौवनकी है, और भी धान्य, सुवर्ण, घर और परिजनोंकी है, जितनी चिन्ता तुम्हें नश्वर भव- पञ्जर (शरीर) की है, उतनी चिन्ता परमाक्षरोंवाले (जिनवर) की क्यों नहीं है ? जरा, धर्मका फल तो देखो कि चतुरंग देवसेना मुनिवरकी तीन वार प्रदक्षिणा दे रही है। वह भुवनेश्वर-परमेश्वर जिनकी सेवा कर रही है ॥१-६॥ । तेतीसवीं संधि केवलबान उत्पन्न होने पर रामने पूछा, "कुलभूषण देव आप पर यह उपसर्ग क्यों हुआ।" १] यह सुनकर वह परम गुरु बोले, "सुनो वताता हूँ। यक्षस्थानपुर नामका एक नगर था। उसमें कर्पक और सूरप नामके दो ग्यारह प्रतिमाधारी भाई रहते थे। वे दोनों एक राजाके उसी प्रकार अनुचर थे जिस प्रकार इन्द्रके तुम्बुरु और नारद अनुचर है। प्रबुद्ध उन दोनोंने एक दिन व्याधसे आहत एक पक्षी की रक्षा की । बहुत दिनोंके बाद मरने पर वह पक्षी विध्याटवीमें भिल्लराज हुआ। सूरप और कर्पक, दोनों भाई भी मरकर राजा अमृतसरकी पत्नीसे उत्पन्न हुए। उनके जन्म दिनका उत्सव खूब धूमधामसे मनाया गया। वन्धुजन वधाई देने आये । उनके २०६ पटमचरित घत्ता णं अमर कुमार दुहु सरगहाँ पढिय । गाणस-हत्य जोग्दण-गए चडिया [२] तो पडमिणिपुर - परमेसरहाँ । दरिमात्रिय विजय-महीहरहों ॥१॥ तेण वि णिय-सुअहाँ जयन्धरहाँ । किय किङ्कर वड्डिय-रणभरहाँ ॥२॥ अन्ति जाम भुञ्जन्ति लिय । तो ताम लगेरहाँ गमण-क्रिय ॥३॥ पट्टविउ गरिन्द ममियसरु । अइनूमि • लेह - रिब्दोलि-धरु ॥धा वसुभूइ सहेजट तातु गट ते णवर पाण-विच्छोड कड ॥५|| पल्ला पहाडि भगवि । ते उइय-मुइय तिण-समु गवि ॥३॥ सो उबउवाएविए सहुँ जियइ । अनिओवमु बहर-पाणु पियइ ॥७॥ परियावि जेढे दुचरिट । वसुभूइह जीवित अवहरित ॥८॥ घत्ता उप्पण्ण विन्म होप्पिणु पल्लिबइ । पुवक्किर कामु सच्वहाँ परिणवइ ॥६॥ [३] पवरुनाणु जहि । रिसि-सङ्घ पराइड ताब तहिं ॥१॥ किय रूखे रक्त आवास-किय । णं रक्त त अबइण्ण लिय ॥२॥ संजायई अङ्गई कोमलई । अहियई पपगईं फुल्लई फल ॥३॥ रिति ल्स वअविचल होवि थिय । किसलए परिवेडावेडि किय पक्षा रिलि लस व तवण-ताव तविय । रिलि स्त्र व मूल गुणवविय ॥५॥ जय-पवय - ।

तत्तीसमो संधि २०७ नाम दिन और मुदित रक्खे गये। वे दोनों ऐसे प्रतीत होते थे मानो अमर कुमार ही स्वर्गसे अवतरित हुए हों। धीरे-धीरे वे चीयनस्पी महागज पर आरूढ़ हो चले । तो भी उन पर विवेक का अंश उनके हाथमें था ॥५-६।। [२] (कुछ समयके बाद) पिताने पद्मिनीपुरके राजा विजयको अपने पुत्र दिखाये । उसने उन दोनोंको युद्धभार उठानेमें ममध जानकर अपने पुत्र जयन्धरका अनुचर नियुक्त कर दिया। म प्रशार मापदाका उपभोग करते हुए वे दोनों रहने लगे। म.लिन उनका पिता अमृतसरको (किसी कामसे) वाहर जाना पा गजाने उन्ले भूमिसंबन्धी कोई लेखमाला देकर बहुत दूर भेजा। पति नामका प्रामण भी उसके साथ गया। वह वहाँ । पलंगमें कुछ और नहीं कर सका तो अमृतसरके प्राणोंको माम फर बैठा। (उसका अमृतसरकी पत्नीसे अनुचित भा) माहाने लाटकर पतिको मरा समझ वह ब्राह्मण "म पानी, नाथ आनन्दोपभोग करने लगा। उसे उदित- मुलगभी पाया नहीं थी । वह इस प्रकार उपभोगके साथ माया पान करने लगा। तब बड़े भाईने उसे दुश्चरित्र माया का भी भरकर विंध्याटवीमें भीलोंका राजा पकार मनमीको भोगने परते है ॥१-४॥

पउमचरिट
रिसि रुख च भालचाल-रहिय । रिसि रुख व मोक्स-फलमहिय ॥६॥
गउ णन्दणवणित तुरन्तु तहिं । सो विजय-महीहर-राउ जहि ॥७॥
"परमेसर केसरि - विक्षमहि । उजाणु लइड जइ-पुङ्गवहि ॥
घत्ता
करवि ।
वारन्तहाँ मज्भु उम्मग्गिम
रिसि-सीह-किसोर (व) थिय वर्ण पइसरवि" ॥६॥
[१]
तं णिसुणवि गरवह गयउ तर्हि । आवासिउ महरिसि-सत्थु जहिं ॥१॥
वोल्लाविय अहाँ “अहाँ मुणिवरहीं। अचुहही भयाण • परमक्खरहों ॥२॥
परमप्पड अप्पर होवि थिउ । कजेण केण रिसि-वेसु किउ ॥३॥
भइदुल्लहु लहाच मणुअत्तणउ । के कजे विणडहाँ अप्पणउ ॥४॥
कहाँ केरउ परम-मोक्ख-गमणु । वरि माणिउ मणहरु तरुणियणु ॥५॥
सच्छा। आयई अङ्गाई । सोलह • माहरणहँ जोग्गाई ॥६॥
विस्थिण्णइ आयइँ कढियलई । हय - गयरह - वाहण-पञ्चलकें ॥७॥
लायण्ण रूवह जोवण । णिप्फलई गयइ तुम्हहँ तण ॥८॥
घत्ता
सुपसिद्ध लोए एक वि तउ ण कउ ।
पुम्हाण किलेसु सयलु णिरत्थु गउ" ॥६॥
[५]
तो मोक्ख-रुक्ख - फल - वर्णण । महिपालु वृत्तु मइवद्धणण ॥१॥
"पद् अप्पउ' काई विडम्वियउ । अच्छहि सुह - दुक्ख-करम्वियउ ॥२॥
कहाँ घर कहो पुत्त-कलत्ताइ । धय चिन्धइँ चामर-छत्ताई ॥३॥

तेचीसमो संधि २०६ उन्हें बार-बार ढक लेते थे । वह वृक्षको ही तरह तपनशील (तप और घामको सहनेवाले) उन्हीकी तरह मूलगुणों (अट्ठाईस मूल गुण और जड़) से महान् थे। फिर भी वे महामुनि वृक्षांक समान आलवाल (परिग्रह और लता आदि) से रहित थे । परन्तु फल (मोक्ष) से सहित थे। उन्हें देखकर वनपाल राजा विजयक पास दौड़ा गया और जाकर बोला, "परमेश्वर सिंहकी भाँति पराक्रमी, उत्तम मुनियोंने बलात् उद्यानमें प्रवेश कर लिया है।" मना करने पर भी वे वैसे ही भीतर घुस आये है जैसे किशोर सिंह वनमे घुस आता है ।।१-६॥ सुन्दर कान्तिमय ४] यह सुनते ही राजा वहाँ जा पहुँचा जहाँ वह मुनि- संघ विराजमान था । जाकर उसने भर्त्सना करते हुए कहा, "अरे अपण्डित परममूर्ख यतिवरो! तुम तो स्वयं परमात्मा बनकर बैठे हो। तुमने मुनिका यह वेष किस लिए बनाया ? अत्यन्त दुर्लभ मानव शरीर पाकर उसका नाश क्यों कर रहे हो ? फिर परममोक्ष किसने आज तक प्राप्त किया ? इसलिए सुन्दर स्त्री- जनको ही बढ़िया समझो। ये अङ्ग सोलह शृङ्गारके योग्य हैं। यह चौड़ा कटिभाग हय, गज और रथोंकी सवारीके लिए है। तुम्हारा लावण्य, रूप और यौवन सभी कुछ व्यर्थ गया। लोकमे प्रसिद्ध (मौजकी) तुमने एक भी वात नही की। तुम्हारा यह सब क्लेश उठाना एक प्रकारसे व्यर्थ गया॥१-६॥ [५] तव मोक्ष महावृक्षके फलको बढ़ानेवाले मतिवर्धन नामके यतिने राजासे कहा "तुम अपनी विडम्बना क्यों कर रहे हो, सुख-दुखमें सने क्यों बैठे हो, किसका यह घर, किसके पुत्र- "

२१०
पउमचरित
स-विमाणईं जाणजोग्गाई । रह तुरय - महग्गय - दुग्गाई ॥२॥
धण-धण्णई जीविय-जोवण । जल-कीलड पाण. उववण ॥५॥
वइसणउ वसुन्धरि वनाइँ । णड कासु वि होन्ति सहजाई ॥॥
भायहि वहुयहिँ वयारियई । वम्माणहँ लक्खइँ मारियई ॥७॥
सुरवइहिं सहासई पाडियई । बक्वइ-सयई णिवाडियई ॥८॥
घत्ता
एय वि भवरे वि काले कवलु किय ।
सिय कहाँ समाणु एक्कु वि पड ण गय"
[६]
परमेसर पुणु वि पुणु वि कहइ । “जिउ तिण्णि अवस्थउ उच्चहइ ॥१॥
उप्पत्ति जरा मरणावसरु । पहिलड जे णिवद्धड देह-घर ॥२॥
पुग्गल-परिमाण - सुत्तु धरै वि । क्र-चलण चयारि खम्भ करें वि ॥३॥
वहु-अस्थि जि अन्तहिं ढकियट । मासिट्टु चम्म छुह - पदिय ॥४॥
सिर - कलसालङ्किट संचरइ । माणुसु वर-भवणहाँ अणुहरइ ॥५॥
तल्णत्तणु जाम ताम वहइ । पुणु पच्छएँ जुण्ण-भाउ लहइ ॥६॥
सिरु कम्पइ जम्पइ ण वि वयणु । ण सुणन्ति कण्ण ण णियइ णयणु ॥७॥
ण चलन्ति चलण ण करन्ति कर । जर-जजरिहोइ सरीरु
घत्ता
पुणु पच्छिम-काल णिवढइ देह-घर ।
जिउ जेम विहङ्गु उड्डइ मुएँ वि तरु ॥६॥
[७]
तं णिसुणे वि गरवइ उवसमिउ । णिय-णन्दणु णिय-पए सण्णिमिउ ॥३॥
अप्पुणु पुणु भाव-गाह-गहिउ । णिक्खन्तु णराहिव-सय-सहिउ ॥२॥
पर ॥5॥

तेत्तीसमो संधि ३११ कलत्र ' ध्वजचिह्न, चामर, छत्र, विमान, वढ़िया योग्य रथ, अश्व, महागज, दुर्ग, धन-धान्य, जीवित, यौवन, जलक्रीड़ा, प्राण, उपवन, आसन, धरती और हीरा रत्न किसीके भी साथी नहीं होते। इन्होंने वहुतोंको खंडित किया है, लाखों ब्रह्मज्ञानियो ब्राह्मणोंको मार दिया है। इनसे हजारों इन्द्र धराशायी हो गये। सैकड़ों चक्रवर्ती विनष्ट हो गये। इनको और दैत्योंको भी कालने कवलित किया है। सम्पदा किसीके भी साथ एक भी पग नहीं गई ।।१-६॥ [६] तब परमेश्वरने वार-बार यही कहा-"जीवकी तीन अवस्थाएँ होती हैं । जन्म, जरा और मृत्यु । पहले ही (पूर्वजन्ममे) जो जीवने देहरूपी घर किया था (उसका बन्ध किया था।) उन्हीं पुद्गल परमाणुओंके सूत्रको लेकर हाथों और पैरोंके चार खम्भ बनाये जाते हैं फिर बहुत-सी हड्डियों और आंतोंसे उसे ढककर, मांस और चमके चूनेसे पोत दिया गया है। फिर सिर रूपी कलशसे अलंकृत होकर वह चलने लगता है। इस तरह मनुष्यका तन एक उत्तम भवनसे मिलता-जुलता है। यौवनको तो यह जिस किसी तरह ढकेलता है पर बादमें जीर्ण-शीर्ण हो जाता है। सिर कॉपने लगता है, मुखसे वात नही निकलती । कान सुनते नहीं, आंखें देखती नही । पैर चलते नहीं। हाथ काम नहीं करते, केवल शरीर जर्जर हो उठता है। फिर मरण-कालमें यह देहरूप घर ढह जाता है और जीव उससे उसी तरह उड़ जाता है जिस तरह पक्षी पेड़को छोड़कर उड़ जाता है ।।१-६।। [७] यह सुनकर राजा शान्त हो गया । अपने पुत्रको उसने अपने पदपर नियुक्त कर दिया। वह स्वयं भवरूपी ग्राहसे गृहीत होकर दूसरे सौ राजाओके साथ दीक्षित हो गया। वहींपर २१२ पटमचरित - तहिं उइय-मुइय णिग्गन्य थिय । कर-कमले हिं सुप्पाड किय ॥३॥ पुणु सत्रण सधु तहाँ पुरवरहों । गट बन्दणहत्तिा जिणवरहीं ॥४॥ सम्मेयहाँ जन्त जन्त वलिय । पहु खड्डे वि उम्पहेण चलिय ॥५॥ ते उड्य-मुझ्य दुइ णिचडिय । वसुभूइ-भिल्ल - पल्लिहें पढिय ॥३॥ धाइड धाणुस्कु वद-बहला गुनाहल-णयणु पीय-महरु ॥७॥ दुप्पेच्च - बच्छु घिर-धार-करु । अप्फालिय धणुहर गहिर-सरु | वत्ता वहरण कुहन्ति होन्ति ण जजरई। हर हणइ णिरुतु सत्त-भवन्तर ।। [-] हकारिय विणि वि दुहरेण । णिय-वइयर - वइर-विरुद्धएण ॥३॥ "अहाँ संचारिम-णर - वणयरहाँ । कहिँ गम्मइ एवहिँ महु मरहों" ||२|| तं सुणे वि महावय-धारऍण । घीरिट लहुवर वड्डारण ।।३।। "म भौहि थाहि अण्णहाँ भवहाँ । टवसग्ग-सहणु भूसणु तवहाँ" ॥४॥ तहिँ तेहएँ विहुरे समावडिएँ । अधुरन्धर गरुअ-भार पडिए |५|| थिर खन्धु समडेवि एक्कु जणु । मिल्लाहिट भन्भुदरण - मणु ॥४॥ जो पुग्ध - भवन्तर पक्खियड । पुर जक्खयाण परिरक्खियड ॥७॥ "लोदा ओसरहि । को मारइ रिसितुहुँ महुमरहि" ॥८॥ तबुचड़ घत्ता वोलाविय तेण कालान्तरण मय । दयचढेवि णिसेणि लीलए सग्गु गय || तेत्तीसमो संधि उदित-मुदित भी दिगम्बर हो गये । अपने करकमलोंसे ही उन्होंने केश लोंच कर लिया। फिर वह श्रमणसंघ उस नगरसे जिनवरकी वंदना-भक्ति करनेके लिए चल पड़ा। परन्तु सम्मेदशिखरजीको जाते-जाते उदित-मुदित दोनों भाई मुड़कर, पथ छोड़कर गलत मार्गपर जा लगे। भूले भटके वे दोनों वसुमति भीलराजके गांव में पहुंच गये । उन्हें देखते हो आरक्त नेत्र, मदिरा पिये हुए वह वैर-भाव कर उनपर दौड़ा। उसका वक्ष दुर्दर्शनीय था और हाथ स्थूल और विशाल थे। उसने अपना गम्भीर स्वरवाला धनुप चढ़ा लिया। ठीक ही है कि वैर न तो नष्ट होता है और न जीर्ण। यह निश्चित है कि आहत व्यक्ति सात भवान्तरों में भी मारता है ॥१-६॥ [८] अपने शत्रुओंके वैरसे विरुद्ध होकर दुर्धर उसने उन दोनोंको ललकारा, "हे हेरिको ! कहाँ जाते हो ? मैं तुम्हें मारता हूँ।" यह सुनकर महाव्रतधारी बड़े भाईने छोटे भाईको धीरज वेधाते हुए कहा, "डरो मत, दूसरे भवका मनमें विचार करो, उपसर्ग सहन करना ही तपका भूपण है। उस ऐसे विधुर समयमें, अंधाधुन्ध घोर संकट आ पड़नेपर, एक और भिल्लराज उनके उद्धारकी इच्छासे कन्धा ऊँचा करके स्थित हो गया। यह पूर्व- भवका वही पक्षी था जिसकी यक्षस्थानमें इन्होंने रक्षा की थी। उसने कहा, "अरे लुब्धक, हट ! ऋपिको कौन मार सकता है, तू मुझसे मारा जायगा। इस तरह उसने उससे हमें छुड़वा दिया। कालान्तरमें मरकर वह दयाकी नसैनी चढ़कर लीलापूर्वक स्वर्ग चला गया।।१-६॥

२१४ पउमचरित [[] पावासउ पउर पाउ करवि । वहु-कालु णरय-तिरियहिँ फिरवि ॥१॥ वसुभूइ-भिल्लु धण-जण-पटर । पट्टण उप्पण्णु अरिहउर ॥२॥ णामेण अणुद्धरु दुहरिसु । कणयप्पह-जणणि - जणिय-हरिसु ॥३॥ दुल्लङ्घहाँ णिय-कुल-पव्वयहाँ । णन्दण गरवइह पियव्वयहाँ ॥४॥ ते उइय-मुइय तासु जि तणय । विण्णाण - कला - पर-पार-गय ॥५॥ गिरि-धीर महोवहि-गहिर-गुण । पय-पालण रज्ज-कज्ज-णिउण ॥६॥ णामकिय रयण-विचित्त - रह । पउमावइ-सुअ ससि-सूर-पह ॥७॥ छहिवस सल्लेहणु करवि । गउ सग्गु पियवट वहि मरवि ।।८।। जगडन्तु अणुद्धरु डामरिउ । रण रयण-विचित्तरहें धरिउ ॥६॥ घत्ता पञ्चण्डहि तेहिं छड्डाविय,डमरु । हुउ अवर-भवेण अग्गिकेड अमरु॥१०॥ वहु-काले - [१०] रयण- विचित्तरह । तउ करवि मरवि परिभमै वि पह ॥१॥ उप्पण्ण वे वि सिद्धत्थपुर । कण-कञ्चण-जण-धण-पय - पउर ॥२॥ विमलग्गमहिसि खेमङ्करहुँ । अवरोप्परु णयण - सुहङ्करहुँ ॥३॥ कुलभूसणु पढमु पुत्तु पवरु । लहु देसविहूसणु एक्कु अवरु ॥४॥ अण्णु वि उप्पण्ण एक दुहिय । कमलोच्छव रुन्द-चन्द-मुहिय ।।५।। वेणि मि कुमार सालहिँ णिमिय । आयरियहाँ कहाँ वि समुल्लविय ॥६॥ पढमाण जुवाण-भाव चडिय । णं दइवे वे अणङ्ग घडिय ॥७॥ वित्थय - बच्छयल पलम्व-भुअ । ण सग्गहाँ इन्द-पडिन्द चुअ III ।

तेत्तीसमो संधि २१५ [६] परन्तु पापाशय वह भीलराज खूब पाप कर, बहुत समय तक नरक और तिर्यञ्च गतियोंमें सड़ता रहा। फिर धन- जनसे पूर्ण अरिष्ट नगरमे उत्पन्न हुआ। उसका नाम था अनुद्धर । दुर्दर्शन वह अपनी मां कनकप्रभाके लिए बहुत हर्षदायक था। वे उदित-मुदित भी, अपने कुलके दुलंध्य पर्वत सदृश प्रियव्रत नामक राजाके पुत्र हुए। वे दोनो ही विज्ञान और कलामें पारङ्गत थे । पर्वतकी तरह धीर, समुद्रकी भांति गम्भीर, प्रजापालन और राज- काजमें निपुण । उनके नाम थे रत्नरथ और विचित्ररथ । शशि और सूर्यकी तरह प्रभावाले वे रानी पद्मावतीसे उत्पन्न हुए थे। (कुछ समयके बाद) छह दिनका सल्लेखना व्रत करके जव उनका पिता प्रियव्रत राजा मरकर स्वर्ग चला गया तब उन दोनो भाइयोंने विद्रोही और झगड़ालू अनुद्धरको पकड़ लियो । और उसका विद्रोह कुचल दिया। मरकर दूसरे जन्ममे वह अग्निकेतु नामका देव हुआ ||१-६।। [१०] बहुत कालके अनन्तर रलरथ और विचित्ररथ तप करके स्वर्गवासी हुए। और फिर घूम-फिरकर सिद्धार्थपुरमें उत्पन्न हुए। वह नगर धनकण कांचन जन और दुग्धसे खूव भरपूर था । परस्पर एक दूसरेके नेत्रोके लिए शुभकर विमला और क्षेमकर उनके माता-पिता थे। उनमे बड़ेका नाम कुलभूपण और छोटेका देशभूपण था । एक और कमलोत्सवा नामकी चन्द्रमुखी कन्या उत्पन्न हुई। वे दोनों कुमार शासनमें आचार्य नेमिको सौंप दिये गये। पढ़ लिखकर जब वे युक्क हुए तो ऐसे मालूम होते थे जैसे दैवहीने उन्हें गढ़ा हो । उनके वक्षस्थल विशाल, वाहुऍ लम्बी थीं वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो स्वर्गसे इन्द्र उपेन्द्र ही अवतरित हुए पउमचरिट घत्ता कमलोच्छन ताम कहि मि समावडिय । णं वम्मह-भल्लि हियएँ मत्ति पडिया [११] कुलभूसण देसविहसणहुँ । णिय-बहिणि-रूव - पेसिय-मगहुँ ।।३।। पडिहाइ ण चन्द्रण-लेब-छवि । धदलामल-कोमल कमलु ण वि ॥२॥ जल जलह दाहिण-पवणु । कुसुमाउहेण ण डिउ कवणु ॥३॥ पेत्तेप्पिणु पयई सु-कोमलई 1 ण सहन्ति रुड् - रत्तप्पलई ।। पेक्वेवि यणवई चकलइ । उञ्चिट्टई करि - कुम्भत्यलई ॥५॥ पेक्लेप्पिणु मुहु बालह तणड । पडिहाइ ण चन्द्रणु चन्दिणउ ॥६॥ लोयणई व पगुत्ताई । ढोरा इव कम खुत्ताई ॥७॥ पेखेप्पिणु क्स-कलाउ मणे । ण सुहन्ति मोर णञ्चन्त वर्णं ।।। ण वि घत्ता सयल वि मरई ॥३॥ । दिहि-विस वाल सप्पहाँ अणुहरइ । जो जोभइ को वि सो [१२] तहिँ अवसर पणइहिं पहु भगिट । तेमङ्कर तुहुँ जणगिएँ जणिउ ॥१॥ तुर्ह महियल धण्णउ एक्कु पर । कमलोच्छव दुहिय जासु पवर ॥२॥ फुल देसविहसण जमल सुय । तं णिसुर्णेवि गाइँ कुमार मुय ॥३॥ हय-हियय काइँ चिन्तयसि तुहुँ । पाविजाइ जेहिं महन्तु दुहु men खल-खुई दुझिय-गाराई । णारइय णरय-पइसारा ॥५॥ गय- वाहि- दुक्ख- हहाराई । सिव- सासर- गमण- णिवाराई ॥६॥ तित्यङ्कर-गणहर- णिन्दियई । णड खञ्चहि पञ्च-वि-इन्दियई ॥७॥ ल्वेण पयग, नाणु रसण । मिगु सवर्णे भसलु गन्धवसैंण NEn ।

तेत्तीसमो संधि २१७ हों। एक दिन कमलोत्सवा कहींसे आती हुई उन्हें दिख गई। कामकी अनीकी तरह वह शीघ्र ही उनके हृदयमें विंध गई ।।१-६।। [११] अपनी ही बहिनके रूपमें आसक्तमन होकर उन दोनोंको चन्द्रलेखाकी छबि भी नहीं भाती थी। न तो धवल, अमल, कोमल, कमल अच्छा लगता और न जल या जलाद्र दक्षिण-पवन । उसके सुकोमल चरण देखकर उन्हें सुन्दर रक्त- कमल अशोभन लगते थे। उसके गोल सुडौल स्तनोको देखकर उनका मन हाथोके कुम्भस्थलसे उचट गया। उस बालाका मुख देख लेनेपर, उन्हें चॉद या चॉदनी अच्छी नहीं लगती थी। उसके सौन्दर्य में उन दोनोंकी ऑखें ऐसी लिप्त हो गई मानो ढोर ही कीचड़मे फंस गये हों। उसके केश-कलापको देखकर उनके मनको वनमे नाचता हुआ मोर अच्छा नही लगा। अपनी दृष्टिमे विप छिपाये हुए वह वाला सांपके समान थी जो भी उसे देखता वही मारा जाता ।।१-६॥ [१२] उस अवसरपर वन्दीजनोंने राजासे कहा-"क्षेङ्कमर! सचमुच मांसे उत्पन्न तुम्हीं हुए हो, महीमण्डलपर तुम्ही एक धन्य हो, कि जिसकी कमलोत्सवा जैसी पुत्री है और कुल-भूषण देश- भूपण जैसे दो पुत्र हैं ।" यह सुनकर वे दोनो कुमार जैसे सन्न रह गये। वे अपने तई सोचने लगे-"अभागे हृदय ! तुम क्या चिन्तन कर रहे हो, इससे तुम घोर दुख पाओगे, इन पॉच इन्द्रियोमे तुम मत फॅसो, ये तुद्र और दुष्ट बहुत ही अनर्थ करने- वाली है, ये नारकीय नरकमे ले जानेवाली हैं। ये, रोग-व्याधि और दुखांको आमन्त्रण देती हैं, और शाश्वत शिवगमनका निवारण करती है । तीर्थकरो और गणधरोंने इनकी निन्दा की है। रूपसे

२१८
पउमचरिड
घत्ता
फरिसेण विणासु मत्त-गइन्दु गउ ।
जो सेवइ पञ्च
तहाँ उत्तारु कडा
कम्म
[१३]
तो किय णिवित्ति परिणेबाहाँ । सावज्जु रज्जु भुजेवाहाँ ॥१॥
पारख पयाणउ तव-पहेण । णिय-देहमएण
महारहण ॥२॥
विहि विण्णाणिय उप्पाइएण । दुष्ट पच्छाइएण ॥३॥
इन्दिय- तुरङ्ग- संचालिएण । सत्तविह- धाउ वन्धालिऍण ॥
चल- चलण- चक्छ- संजोइएण । मण पछल- सारहि- चोइऍण ॥५॥
तव- संजम-णियम-धम्म-भरण । आइय णिय- णिय-तणु-रहवरण ॥६॥
थिय पडिमा-जोग्गें गिरि-सिहर । सो अग्गिकेट तेहएऽवसर ॥७॥
सचलिड णहङ्गणे कहिँ विजाम । गड अम्हहें उप्परि खलिङ ताम ||
पुस्वभउ सरवि कोहे जलिउ । थिउ रुन्धविणहयल किलिकिलिउ HEM
उक्सग्गु जाम पारम्भियउ । वहु-रुवे हिँ गयण वियम्भियउ ॥१०॥
पडिवण्णए तहिं तेहएऽवसर । वट्टन्तए गुरु-उवसग्ग-भरें ॥११॥
तुम्हह ज पहावे तहाइ । असुर धणु-रवण
पणहाई ॥१२॥
-
घत्ता
तो अम्हहें वप्पु कालन्तरण मुड ।
सो दीसइ एत्थु
गाल्ड देउ हुए ॥१२॥
[१४]
तो गरुडे परिओसिय-मणण | वे विजड दिण्णउ तखणण ॥१॥
राहवहाँ सीहवाहणि पवर । लक्खणहाँ गरुडवाहणि अवर ॥२॥

तेत्तीसमो संधि शलभ, रससे मछली, शब्दसे मृग, गन्धसे भ्रमर और स्पर्शसे मत्त गज विनाशको प्राप्त होता है। पर जो पाँचोंका सेवन करता है उसका निस्तार कहाँ ? ॥ १-६।। [१३] यह विचारकर उन्हें विवाह और दोषपूर्ण राज्यके भोगसे विरक्ति हो गई। अपने देहमय महारथसे उन्होने तपके पथपर चलना प्रारम्भ कर दिया। और इस प्रकार हम दोनों विवेकशील (कुलभूषण और देशभूपण) दुष्ट आठ कर्मोसे प्रच्छन्न, इन्द्रियरूपी अश्वोंसे संचालित, सात धातुओंसे आबद्ध, चञ्चल चरण चक्रसे संजोये मनरूपी मुख्य सारथिसे प्रेरित, एवं तप, संयम, नियम, धर्म आदिसे भरे हुए अपने-अपने इस शरीर रूपी महारथोसे चलकर इस पर्वत पर आये । और एक शिखरपर प्रतिमायोगमे लीन होकर बैठ गये। इसी अवसर पर अग्निकेतु आकाश-मार्गसे कहीं जा रहा था कि उसका विमान हम लोगोके ऊपर आते ही अचानक स्खलित हो उठा। इसपर पूर्व जन्मके वैरका स्मरणकर वह क्रोधसे आगबबूला हो गया। अवरुद्ध हो वह आकाशमे किलकारी भरकर स्थित हो गया। (बादमें) उसने हम लोगोके ऊपर अपना उपसर्ग करना प्रारम्भ कर दिया । वह नाना रूपोंसे आकाशमें विस्मय दिखाने लगा। तब उस घोर संकटके समय गुरुओपर भारी उपसर्ग देखकर तुम्हारे प्रभावसे राक्षस अब त्रस्त हो गये और धनुपकी टंकार सुनते ही भाग खड़े हुए । कालान्तरमें मरणको प्राप्त हुए हमारे पिताजी भी गरुड़ हुए यहां दिखाई दे रहे है ।।१-१३॥ [१४] तब तत्काल प्रसन्न होकर-गरुड़देवने उन्हें दो विद्याएँ प्रदान की। राघवको प्रवर सिंहवाहिनी और लक्ष्मणको प्रवर गरुड़वाहिनी । पहली सातसौ और दूसरी तीनसौ शक्तियोसे ।

- २२० पउमचरित पहिलारी सत्त-सएँ हिँ सहिय । अणुपच्छिम तिहिं सऍहिँ अहिय ॥३॥ तो कोसल-सुऍण सु-दुल्लहण । वुच्चइ वइदेही- वल्लहण ॥४॥ 'अच्छन्तु ताव तुम्हहुँ ज घर । अवसर पडिवण्ण पसाउ करें ॥५॥ सहुँ गरुडे संभासणु करवि । गुरु पुच्छिउ पुणु चलहिँ धरवि ॥६॥ 'अम्हहुँ हिण्डन्तहुँ धरगि-वह । जं जिम होसइ तं तेम कह ॥७॥ कुलभूसणु अक्खइ हलहरहाँ । 'जलु लद्धवि दाहिण-सायरहों ॥८ घत्ता संगाम-सया विहि मि जिणेवा। महि-खण्डइँ तिण्णि स इ भुजेवाइँ ॥६॥ [३४. चउतीसमो संधि] केवलं केवलाह उप्पण्णए चउविह-देव-णिकाय-पवण्णएँ । पुच्छइ रामु महावय-धारा 'धम्म-पाव-फलु कहहि भडारा ॥ [१] काइँ फल पञ्च-महन्वयहुँ । अणुवय-गुणवय - सिक्खावयहुँ ॥७॥ का फलु लइए अणथमिएँ । उववास-पोसवएँ संथविएँ ॥२॥ फलु कइँ जीव सम्भीसियएँ । परहण परदार अहिंसियए ॥३॥ काई फलु सच्चें वोल्लिएँण । अलिअक्सरेण आमेलिए ण ॥४॥ काई फलु जिणवर-अश्चियएँ । वर-विउल घरासण वञ्चियएँ ॥५॥ काई फलु मासें चण्डिए ण । रत्तिहिट देहें दण्डिए ण ॥६॥ काइँ फलु जिण-संमजणण । वलि- दीवङ्गार विलेवणण ॥७॥ घत्ता कि चारित णाणे वए दसणे अण्णु पसंसिए जिणवर-सासणे । जं फलु होइ अणग-वियारा तं विण्णासँ वि कहहि भण्डारा || ।

चडतीसमो संधि २२१ सहित थी। तब कौशल पुत्र सीतापति, दुर्लभ रामने (गरुड़से) कहा, "तवतक आप घरपर रहें और अवसर आनेपर प्रसाद करे।" इस प्रकार गरुड़से सम्भापणकर और फिर गुरुके चरण छूकर रामने पूछा, "धरतीपर घूमते हुए हम लोगोंको क्या-क्या होगा ? वताइए ?" यह सुनकर कुलभूपणने कहा, “दक्षिण समुद्रको लांघकर तुम लोग शत युद्धोसे जीतकर तीनों लोकोकी धरतीका उपभोग करोगे" ॥१-६ चौंतीसवाँ संधि [१] चारों देव-निकायोको जाननेवाला केवलज्ञान जब कुल- भूपण महाराजको उत्पन्न हो गया तो रामने उनसे पूछा, "हे भट्टारक, धर्म और पापका फल वताइए । पाँच महाव्रत, अणुव्रत, गुणव्रत और शिक्षावतका क्या फल है ? अनर्थदण्ड व्रत ग्रहण करनेका क्या फल होता है ? उपवास और प्रोपधोवपासका क्या फल है ? जीवोंको अभयदान करने, और परस्त्री तथा परधनमें अभिलापा न करनेका क्या फल है ? सच बोलने और मूठ छोड़नेका क्या फल है ? जिनवर पूजाके अनुष्ठान तथा गृहस्थाश्रमके प्रपञ्चसे वचनेमे क्या फल है ? मांस छोड़ने और दिन-रात संयमके पालनमे क्या फल प्राप्त होता है ? जिनका अभिषेक करने और नैवेद्य तथा दीप धूप और विलेपन करनेका क्या फल है ? चारित्र व्रत ज्ञान दर्शन आदिका जिन-शासनमें जो फल वर्णित ही उसे वताइये । हे जित- काम! केवलनानसे उसे जानकर प्रकट करें।।१-411

पडसबरिट
[२]
।
पुणु पुणु वि पडीबउ भणइ वलु । 'कहें सुचिय-दुक्किय कम्म-फलु ||
कम्मेण केण रिउ-उमर-कर । सयरायर महि भुञ्जन्ति गर ॥२॥
कामेण केण पर-चक्र-वर । रह-तुरय-गएँ हिँ वुज्झन्ति गर ॥३॥
परियरिय सु-णारिहिं णरवरहिं । विजिजमाण
वर-चामरहिँ ॥
सुन्दर सच्छन्द मइन्द जिह । जोहहिँ जोह बुज्झन्ति किह ॥५॥
कम्मेण केण किय पङ्गुलय । पर कुण्ट मण्ट
वहिरन्धलय ॥६॥
काणीण दीण-मुह-काय-सर । वाहिल्ल मिह णाहल सवर ॥७॥
दालिहिय पर-पेसण कर । के कम्मे उप्पजन्ति
णर ॥८॥
घत्ता
धीर-सरीर वीर तब-सूरा सच्चहुँ जीवहुँ आसाजरा ।
इन्दिय-पसवण पर-उवयारा ते कहिणर पावन्ति भडारा ॥६
पत्ता ॥
के वि अण्ण णर दुह-परिचत्ता । देवलोएँ देवत्तणु
चन्दाइच- राहु- अङ्गारा । अण्णहाँ अण्ण होन्ति कम्मारा ॥३॥
हंस-स-मेस-महिस-विस कुञ्जर । मोर- तुरङ्ग- रिच्छ- मिग- सम्बर ॥३॥
जइ देवहु जे मम संभूमा । तो किं कजे वाहण हुआ ॥४॥
ऍहु जो दीसइ कुलिस-प्पहरणु । सहसणयणु
अइरावयचाहणु ॥५॥
गिनइ किण्णर-मिहुण-सहासहिं । सुरवर जय भणन्ति चउपासहि ॥६॥
हाहा- हूहू- तुम्वुरु णारा । तेजा-तण्णा
जसु चचारा॥७॥
चित्तको वि मुरव पडिपेल्लइ । रम्भ तिलोतिम सइ उच्चेलइ ॥८॥

चउतीसमो संधि [२] रामने दुवारा उनसे पूछा-"पुण्य-पापका फल भी वतलाइए । शत्रुके लिए भयंकर और चराचर धरतीका उपभोग करनेवाला किस कर्मके उदयसे जीव वनता है ? किस कर्मसे दूसरेके चक्रको ग्रहण करता है ? रथ, अश्व और गजसे युद्ध होता है। किस कर्मसे वह सुन्दर स्त्रियों और उत्तम मनुप्यासे घिरा रहता है और उसपर उत्तम चॅवर डुलाये जाते हैं और योधा- गण उसे स्वच्छन्द मत्त गजकी भाँति समझते हैं ? किस कर्मसे मनुष्य पंगु, कुबड़ा, बहरा और अंधा बनता है ? किस कर्मके उदय से वह कुँवारा तथा मुख-स्वर और शरीरसे दीन-हीन और रोगी वनता है ? भील, नाहर व्याध, शवर, दरिद्र और दूसरोंका सेवक किस कर्मसे बनता है ? दृढ़शरीर तपासूर सब जीवोके आशापूरक जितेन्द्रिय और परोपकारी कौनसी गति प्राप्त करते हैं ? हे भट्टारक, बताइए॥ १-६॥ , [३] और भी मनुष्य, दूसरे-दूसरे दुखोसे मुक्ति पाकर स्वर्ग कैसे जाते हैं ? चन्द्र, सूर्य, मङ्गल, राहु आदि एक दूसरेसे भिन्न कर्म करनेवाले क्यो है ? हंस, मेप, महिप, बैल,गज, मयूर, तुरन, रीछ, मृग, सांभर आदि देवोके वीच उत्पन्न होकर उनके वाहन कैसे बनते हैं ? और जो यह वज्रसे प्रहार करनेवाले, ऐरावत गजपर आरूढ़ इन्द्र है, जिसकी सहस्रों किन्नर-दम्पति और बड़े- बड़े देव चारों ओरसे जय बोलते हैं, हा हा, हू हू नारे वोलते हुए तुम्बुरु तेज और तेण्ण जिसके चाकर हैं। चित्राङ्ग जिसके लिए मृदङ्ग वादक है। स्वयं तिलोत्तमा अप्सरा जिसके लिए प्रकट होती है। आखिर यह सब किस कर्मके फलसे होता है ? जो स्वयं २२४ पउमचरित घत्ता अप्पणु असुर-सुरहुँ अव्भन्तर मोक्खु जेम थिउ सव्वहु उप्परें। दोसइ जसु एवहु पहुत्तणु पत्तु फलेण केण इन्दत्तणु' ॥६॥ [४] तं वयणु सुर्णे वि कुलभूसणेण । कन्दप्प दप्प- विद्ध सणण || सुणु अक्खमि वुच्चइ तेण वलु । आयणहि धम्महाँ तणउ फलु ॥२॥ महु मज मंसु जो परिहरइ । छजीव-णिकायहाँ दय करइ ॥३॥ पुणु पच्छइ सल्लहणे मरइ । सो मोक्ख महा-पुरे पइसरइ ॥१॥ जो घई दरिसावइ पाणिवह । अण्णु वि महु-मॅसहाँ तणिय कह ॥५॥ सो जोणी जोणि परिभमइ । चउरासी लक्ख जाम कमइ॥६॥ एउ सुक्किय-दुकिय कम्म-फलु । सुणु एवहिं सच्चहाँ तणउ फलु ॥७॥ तुल- -तोलिय महि स-महीहरिय । स-सुरासुर स-धण स-सायरिय ॥८॥ घत्ता वरुणु कुबेरु मेरु कइलासु वि तुल-तोलिउ तइलोक्कु असेसु वि । तो वि ण गरुवत्तणउ पगासिउ सञ्चु स-उत्तरु सव्वहँ पासिउ ॥६॥ जो सञ्चउ ण चवइ कापुरिसु । सो जीवइ जणवएँ तिण-सरिसु ॥१॥ जो णरु पर-दवु ण अहिलसइ । सो उत्तिम-सग्ग-लोए वसइ ॥२॥ जो घई रत्तिहिणु मूढ-मणु । चोरन्तु ण थक्का एक्कु स्वणु ॥३॥ सो हम्मइ छिजइ भिवई वि । कपिजइ सूले भरिजइ वि ॥४॥ जो दुद्धरु वम्भचेरु धरइ । तहाँ जमु भारुढउ किं करइ ॥५॥ जो धई तं जोणि चारु रमइ । सो पङ्कएँ भमरु जेम मरइ ॥६॥ जो करइ णिवित्ति परिग्गहहाँ। सो मोक्खहाँ जाइ सुहावहहाँ ॥७॥ जो घई अविअण्हु परिग्गहहाँ । सो जाइ पुरहों तमतमपहहाँ ॥८॥ ।

चउतीसमो संधि २२५ असुरों और देवों के बीच मोक्षको तरह सबसे ऊपर रहता है, और जिसकी इतनी प्रभुता दीख पड़ती है, वह इन्द्रत्व किस फल से मिलता है"॥१-६॥ [४] रामके वचन सुनकर, कामका भी मान खण्डित करने वाले कुलभूपण मुनिने कहा-"सुनो, राम बताता हूँ। धर्मका फल सुनो । मधु, मद्य और मांसका जो त्याग करता है, छह निकायके जीवोपर दया करता है और (अन्तमे) संल्लेखनापूर्वक मरण करता है, वह तो मोक्षरूपी महानगरमे प्रवेश करता है। परन्तु जो मधु-मांसका भक्षण करता है, प्राणियोका वध करता है वह योनि- योनिमें घूमता हुआ चौरासी लाख योनियोंमें भटका करता है, यह पुण्य-पापका फल है, अब सत्यका फल सुनो । महीधर, सुर, असुर, धन और समुद्र पर्यन्त यथेच्छ धरती है, तथा वरुण, कुवेर, मेरु, कैलाश प्रभृति जितना भो त्रिभुवन है वह भी सत्यका गौरव व्यक्त करनेमे असमर्थ है । सत्य सबसे उत्तम महान है ।।१-६॥ [५] जो मनुष्य सत्यवादी नहीं, वह समाजमे मृगकी तरह नगण्य होकर जीता है । और जो दूसरेके धनकी इच्छा नहीं करता है वह स्वर्ग लोकमे जाता है । जो मूढ़बुद्धि दिन-रात एक क्षण भी चोरीसे वाज नहीं आता वह माराजाता है और नरक-निकाय मे छेदा भेदा-काटा जाता है । परन्तु जो दुर्धर ब्रह्मचर्य व्रत धारण करता है उसका यम रूठकर भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जो व्यक्ति खो-योनिमें खूब रमण करता है कमलमे भौरेकी तरह उसकी मृत्यु हो जाती है । जो परिग्रहसे निवृत्त होता है वह मोक्षके सुखद पथपर अग्रसर होता है । और जो सदैव परिग्रह से अतृप्त होता है वह महातमप्रभ नरकम वास करता है। अथवा कितना वर्णन किया जाय । जव एक-एक व्रत पालन करनेमे इतना फल १५

२२६
पउमचरित
घत्ता
अहवइ णिव्वणिजइ केत्तिउ एककहाँ वयहाँ फलु एत्तिउ ।
जो घई पच्च वि धरइ क्या तासु मोक्खु पुच्छिज्जइ काइँ ॥६॥
फलु एत्तिउ
[६]
पञ्च-महन्वयहाँ। सुणु एवहिं पञ्चाणुव्वयहाँ ॥१॥
जो करइ णिरन्तर जीव-दया । पविरलु असच्चु सञ्चउ मि सया ॥२॥
किस हिंस अहिस सउत्तरिय । ते णरय-महाणइ-उत्तरिय ॥३॥
जे पर स-दार-सतुट-मण । परहण- परणारी- परिहरण ॥४॥
अपरिग्गह-दाण-करण पुरिस । ते हेन्ति
पुरिस । ते हेन्ति पुरन्दर-समसरिस ॥५॥
फलु एत्तिउ पञ्चाणुव्वयहुँ । सुणु एवहिं तिहि मि गुणव्वयहुँ ॥६॥
दिस-पञ्चक्खाणु पमाण-वउ । खल-संगहु जासु ण वड्डियउ ॥७॥
घत्ता
इय तिहिं गुणवएहिँ गुणवन्तउ अच्छइ सग्गै सुहइ भुञ्जन्तउ ।
जासु ण तिहि मि मज्म एक्कु वि गुणु तहाँ संसारही छेउ कहिं पुणु ॥
[७]
फलु एत्तिउ तिहि मि गुणव्वयहुँ । सुणु एवहिँ चउ-सिक्खावयहुँ ॥१॥
जो पहिलउ सिक्खावउ धरइ । जिणवर तिकाल-वन्दण करइ ॥२॥
सो गरु उम्पजइ जहिँ जे जहिँ । वन्दिजइ लोऍहि तहि ज तहिं ॥३॥
जो घ. पुणु विसयासत्त-मणु । घरिसहाँ विण पेच्छइ जिण-भवणु ॥४॥
सो सावउ मन्म ण सावयहुँ । अणुहरइ णवर वण-सावयहुँ ॥५॥
जो वीयउ सिक्खावउ धरइ । पोसह-उववास-सय
करइ ॥६॥

चउतीसमो संधि २२७ प्राप्त होता है तो पाँचौं व्रतोके धारण करने पर 'जीव' के मोक्षका क्या पूछना॥१-६॥ [६] पांच महाव्रतोंका यह फल है अपरं च-अणुव्रतों का फल सुनिए | जो सदैव जीव दया करता है, तथा मूठ थोड़ा और सच बहुत वोलता है, हिंसा थोड़ी और अहिंसा अधिक करता है, वह नरक रूपी महानदीका संतरण कर लेता है। जो मनुष्य अपनी स्त्रीमे संतुष्ट रहकर परस्त्री और परधनका त्याग करता है और परिग्रहसे रहित होकर दान करनेमें समर्थ है, वह इन्द्रके समान हो जाता है । पाँच अणुव्रतोंका यह फल है । अव तीन गुणवतोंका फल सुनिए । जिसने दिखत और भोगोपभोग परि- माणव्रत लिया है, और जो दुष्ट जीव, मुर्गा, विल्ली आदिका संग्रह नहीं करता, वह इन तीन गुणोसे अन्वित होकर स्वर्गलोकमे सुखका भोग करता है, और जिसके इन तीनों से एक भी नहीं है, कहो उसके संसारका नाश कैसे हो सकता है ।।१।। [७ ७] इस प्रकार तीन गुणवतोका इतना फल है। अब चार शिक्षा व्रतोका फल सुनो । जो पहला शिक्षा व्रत धारण करता है और जो तीन समय जिनकी वन्दना करता है। वह मनुष्य फिर कहीं भी उत्पन्न हो, लोकमें वन्दनीय हो उठता है। परन्तु जिसका मन विषयासक्त है, जो वर्पभरमें एक भी वार जिन- भवनके दर्शन करने नहीं जाता, वह श्रावकोंके वीचमे (रहकर) भी श्रावक नहीं है । प्रत्युत वह शृगालकी भॉति है। जो दूसरा शिक्षानत धारण करता है । वह सैकड़ो प्रोषधोपवास करता है, वह मनुष्य देवत्वकी कामना करता है और सौधर्म स्वर्गमें अप्सराओं के वीचमै रमण करता है । जो तीसरा शिक्षाव्रत धारण करता है, तपस्वियोको आहारदान देता है और सम्यक्त्व धारण करता २२८ पउमचरित लहइ ॥६॥ सो णरु देवत्तणु अहिलसइ । सोहम्मै वहुव-मज्झे रमा॥७॥ जो तइयउ सिक्खावउ धरइ । तवसिहि आहार-दाणु करइ ॥८॥ अण्णु वि सम्मत्त-भारु वहइ । देवत्तणु देवलोएँ जो चउथउ सिक्खावउ धरइ । सण्णासु करेप्पिणु पुणु मरइ ॥१०॥ सो होइ तिलोयहाँ वडियउ । णउ जम्मण-मरण-विओअ-भउ ।।११॥ घत्ता सामाइउ उववासु स-भोयणु पच्छिम-कालें अण्णु सल्लेहणु । चउ सिक्खावयाइँ नो पालइ सो इन्दहाँ इन्दत्तणु टालइ ॥१२॥ [८] एंड फलु सिक्खावए संथविएँ । सुणु एवहिँ कहमि अणस्थमिए ॥१॥ वरि खद्ध मंसु वरि मज्जु महु । वरि अलिउ वयणु हिंसाएँ महुँ ।।२।। वरि जीविउ गउ सरीरु ल्हसिउ । णड रयणिहिँ भोयणु अहिलसिउ ॥३॥ पुन्चण्णउ गण-गन्धव्वयहुँ । मज्जण्हउ सव्वहुँ देवयहुँ ॥४॥ अवरोहउ पियर-पियामहहुँ । णिसि रक्खस-भूय-पेय-गहहुँ ॥५॥ णिसि-भोयणु-जेण ण परिहरिउ । भणु तेण काइँ ण समायरिउ ॥६॥ किमि-कीड-पयन-सयई असइ । कुसरीर-कुजोणिहिं सो वसइ ॥७॥ जो घइँ णिसि-भोयणु उम्महइ । विमलत्तणु विमल-गोत्तु लहई' ॥८॥ घत्ता सुअउ ण सुणइ ण दिट्ठउ देक्खइ मेण वि वोल्लिउ कहाँ वि ण अक्खइ । भोअणे मउणु चउत्थउ पालइ सो सिव-सासय-गमणु णिहालई' ॥६॥ [.] परमेसरु सुट्छु एम कहइ । जो जं मग्गइ सो तं लहइ ॥१॥ सम्मत्तई को वि को वि वयइँ । काँ विगुण-गण-चयण-रयण-सयइ ।।२।। ॥३॥ पत्यिवण । वंसत्थल-णयर-णराहिवण तवचरणु लइज्जइ चउतीसमो संधि है, वह देवलोकमें देवत्वको पाता है। जो चौथा शिक्षाव्रत धारण करता है और संन्यासपूर्वक मरण धारण करता है वह त्रैलोक्य में भी वृद्धिको पाता है। उसे जन्म मरण और वियोगका भय नहीं होता। इस प्रकार सामायिक, उपवास, आहारदान और मरण- कालमे संलेखना इन चार शिक्षाबतोंका जो पालन करता है, वह इन्द्रका इन्द्रपन टालनेमें भी समर्थ है ॥१-१२|| [८] शिक्षाव्रतका फल यह है । अब अनर्थदंडव्रतका फल सुनो । मांस खाना, मद्य और मधु पान करना, हिंसा करना, झूठ वोलना, किसीका जीव अपहरण कर लेना अच्छा, पर रात्रिभोजन करना ठीक नहीं, चाहे शरीर स्खलित हो जाय। गंधर्व देव दिनके पूर्वमें, सभी देव दिनके मध्यमें, पिता पितामह दिनके अंतमे तथा राक्षस भूत पिशाच और ग्रह रातमे खाते है । इसलिए जिसने रात्रिभोजन नहीं छोड़ा बताओ उसने कौनसा आचरण नहीं किया (अर्थात् सभी कुछ किया)। वह सैकड़ों कृमि पतंगों और कीड़ों का भक्षण करता है और कुयोनियोमें वास करता है । (इसके विपरीत ) जो रात्रिभोजनका त्याग करता है वह विमल शरीर और उत्तम गोत्रमे उत्पन्न होता है। जो भोजन करनेमें मौनका पालन करता है, सुनकर भी नहीं सुनता, देखकर भी नहीं देखता, किसीके बुलाने पर भी नहीं वोलता वह शाश्वत मोक्षको पाता है ॥१-६॥ [६] जब परमेश्वर कुलभूपणने इस प्रकार (धर्मका) सुंदर प्रतिपादन किया और जिसने जो व्रत मॉगा उसे यह व्रत मिल गया । किसीने सम्यक्त्व ग्रहण किया तो किसीने किसी और व्रत को। किसीने गुणसमूहसे भरे वचन रूपी रत्नोंको ग्रहण किया। वंशस्थलके राजाने तपस्या अंगीकार कर ली। देवता लोग उनकी २३० पउमचरित गय वन्दणहत्ति करेवि सुर । जाणइऍ धरिज्जइ धम्म-धुर ॥४॥ राहवेण वि वयई समिच्छियइ । गुरु-दिग्णई सिरण पडिच्छियइँ ॥५॥ वउ णवर ण थका लक्षणहाँ। वालुअपह - णरय - णिरिक्खणहों ॥६॥ तहिं तिणि विकइ वि दिवस थियई। जिण-पुजउ जिण-ण्हवणइँ कियइ ॥७॥ णिग्गन्थ सय भुजाविय । दीणहँ दाणई देवावियई ॥८॥ घत्ता तिहुअण-जण-मण-णयणाणन्दहाँ बन्दणहत्ति करेवि जिणिन्दहाँ। जाणइ-हरि-हलहरइँ पहिटइँ तिणि वि दण्डारण्णु पइटई ॥६॥ [१०] दिट्ठ महाडइ णाई विलासिणि । गिरिवर-थणहर-सिहर-पगासिणि ॥१॥ पञ्चाणण - णह - णियर - वियारिय । दीहर-सर-लोयण - विष्फारिय ॥२॥ कन्दर-दरि-मुह - कुहर - विहूसिय । तरुवर - रोमावलि - उद्धृसिय ॥३॥ चन्दण-अगरु-गन्ध - डिविटिक्किय । इन्दगोव - कुङ्कुम - चञ्चिक्किय ॥४॥ अहवइ कि वहुणा वित्थारे । ण णचइ गय-पय-संचारे ॥५॥ उज्झर - मुरवप्फालिय सहे । वरहिण - थिर-सुपरिठिय-छन्दें ॥६॥ महुअरि-तिय - उवर्गीय - वमाले । अहिणव - पल्लव - कर - सचाले ॥७॥ सीहोरालि - समुट्टिय • कलयलु । णाई पढइ मुणि-सुव्वय-मङ्गल ॥८॥ - घत्ता तहाँ अन्भन्तर अमर-मणोहरु णयण-कडक्खिउ एक्कु लयाहरु । तहिं रह करें वि थियइ सच्छन्दइ जोगु लएविणु जेम मुणिन्दइ ॥६॥ [११] तेहि तेहए वणे रिउ-डमर-करु । परिभमइ समुहावत्त-धरु ॥१॥ आरण्ण-गइन्हें समारुहइ । वण-गोवड वण-महिसिउ दुहइ ॥२।।

चटतीसमो संधि । वंदना-भक्ति करके चले गये । तव सीतादेवीने भी धमकी (धुरा) शीलत्रतको ग्रहण किया। रामने भी व्रत ग्रहण किया । परंतु वालुक- प्रभ नरकमे जानेवाले लक्ष्मणने एक भी व्रत ग्रहण नहीं किया। कितने ही दिनों तक वे लोग वहीं रहे। वहाँ उन्होंने जिन-पूजा और जिनका अभिषेक किया। दीनोंको दान दिलवाया। सैकड़ों निग्रंथ साधुओंको आहारदान दिया । उसके बाद, त्रिभुवनानंद- दायक जिनवरकी वंदना-भक्ति करके उनलोगोंने बड़े हर्पके साथ दंडक वनकी ओर प्रस्थान किया ॥१-६।। [१०] दंडकवनकी वह अटवी उन्हें विलासिनी स्त्रीकी तरह दिखाई पड़ी। वह सिहोंके नखसमूहसे विदारित, चोटियोंके रूपमें अपने स्तन प्रकट कर रही थी। बड़े-बड़े सरोवर रूपी नेत्रोसे विस्फारित, कंदरा और घाटियोके मुखकुहरोंसे विभूपित, वृक्ष रूपी रोमगजिसे अलवंत, चंदन और अगरु (इस नामके वृक्ष) अनुलिप्त, तथा वीरवहूटी रूपी केशरसे अंचित थी। अथवा अधिक विस्तारसे क्या, मानो वह दंडक अटवी गजोंके पदसंचार के बहाने नृत्य कर रही थी । निझरोके स्वरोंमे मृदंगकी ध्वनि थी, मयूगके स्वर ही प्रतिष्टित छंद थे। मधुकरियोंकी सुंदर कल-कल ध्वनि गीत थे । नव पल्लवोके से वह अपने हाथ मटका रही थी। सीहोरालीसे उठा हुआ कल-कल स्वर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वह अटवी मुनिसुव्रत (भगवान् ) का मंगल पाठ गान कर रही हो । उसके भीतर उन्हें, अमरोंकी भाँति सुन्दर एक लतागृह दिखाई दिया । स्वच्छंद क्रीड़ा करते हुए वे लोग उसमें उसीप्रकार रहने लगे जिम प्रकार मुनींद्र योग ग्रहण कर रहने लगते हैं ।।१-१०॥ [११] शत्रुभयङ्कर लक्ष्मण उस वनमें अपना समुद्रावर्त धनुप लेकर घूमने लगे। कभी वह वनगजपर जा चढ़ते और पटमचरित तं खीर वि चिरिडिहिल्लु महिउ । जाणइह समप्पइ घिय-सहिउ ॥३॥ स वि पकावइ घण-हण्डियहिं । वण-धण्णन्दुलेहिं सुकण्डिऍहि ॥४॥ णाणाविह - फल-रस - तिम्मण हिं । करवन्द-करीरहि सालण हि ॥५॥ इय विविह-भक्ख भुञ्जन्ताहु । वण-वासें तिहि मि अच्छन्ताहुँ ॥६॥ मुणि गुत्त-सुगुत्त ताव अइय । असुदाणिय दोड्ड-महन्वइय ॥७॥ भगव । मुणि सकर तवण तवसि गुरव ॥८॥ कालामुह-कावालिय घत्ता वन्दाइरिय भोय पन्चइया हवि जिह भूइ-पुज-पच्छविया । ते नर-जम्मण-मरण-वियारा वण-चरियए पइसन्ति भडारा ॥६ [१२] जं पइसन्त पीसिय मुणिवर । सावय जिह तिह पणविय तरुवर ॥१॥ अलि-मुहलिय खर-पवणायम्पिय । 'थाहु थाहु' ण एम पजम्पिय ॥२॥ के वि कुसुम-पव्भारु मुअन्ति । पाय-पुज गं विहि मि करन्ति ॥३॥ तो वि ण थक्क महन्वय-धारा । रामासम पइसन्ति भडारा ॥४॥ रिसि पेक्खेप्पिणु सीय विणिग्गय । णं महा-वणदेवय ॥५॥ 'राहव पेक्खु पेक्षु अच्छरियउ । साहु-जुअलु चरियएँ णीसरियउ' ॥६॥ वलु वयणेण तेण गजोल्लिड । 'थाहु थाहु' सिरु ण वि पवोल्लिड ॥७॥ विणयड्डसँण साहु-गय वालिय । किउ सम्मजणु पाय पखालिय ॥८॥ पञ्चक्ख चउतीसमो संधि २३३ कभी वनकी गायों और भैसोंका दूध दुहने लगते । कभी दूध, दही और घी सहित मट्ठा (मही) लाकर जानकीको देते और सीता उनसे भोजन बनाती। इस प्रकार धन-हंडिय, वनधान्य, तन्दुल, सुकंड, तरह तरहके फलरस कढ़ी, करवंद, करीर, सालन आदिका विविध भोजन करते हुए वे तीनों अपना समय यापन करने लगे। एक दिन जीवदयाके दानी, गुम और सुगुप्त नामके महाव्रती दो महामुनि आये। वे काला मुख (एक सम्प्रदाय और त्रिकाल भोगी) कापालिक (सम्प्रदाय विशेप और कामकपायसे दूर) भगवा (भगवा वस्त्र धारी और पूज्य शंकर ) शंकर (शिव और सुख देनेवाले ) तपन शील (आदित्य और ऋद्धिसे युक्त ) वन- वासी ( एक सम्प्रदाय और वनमें रहनेवाले) गरु महान्, वन्दनीय सेवनीय, संन्यासी और यज्ञकी तरह धूलिसे आच्छादित थे । जरा जन्म मरणका नाश करनेवाले वे दोनो (महामुनि) चर्याके लिए निकले ॥१-६॥ [१२] आते हुए उन यतियोको देखकर मानो वृक्ष श्रावकोकी भॉति नत हो गये । भ्रमरोसे गुञ्जित और पवनसे कंपित वे मानो कह रहे थे, "ठहरिए ठहरिए"। कोई वृक्ष फूलोकी वर्षा कर रहे थे मानो विधाता ही उनकी फूलोसे पादपूजा कर रहा था। तब महाव्रत धारी वे ठहरे नही । चलकर वे दोनों भट्टारक रामके आश्रमके निकट पहुंचे। मुनियोको देखते ही सीता देवी बाहर निकली मानो साक्षात् वनदेवी ही बाहर आई हौं । वह बोली 'राम देयो दवा अचरजकी बात है दो यति चर्या के लिए निकले हैं।' यह सुनकर गम एकदम पुलकित हो उठे । और माथा झुका- कर. आह्वान करते हुए उन्होंने कहा-"ठहरिए ठहरिए। तब विनयरूपी अदुशसे वे दोनों साधुरूपी महागज रुक गये । रामने भी

पउसचरिउ
दिग्ण ति-चार धार सलिलेण वि । कम चञ्चिय गोसीर-रलेण वि ॥
पुप्फक्खय - वलि - दीवगार हिँ । एम पयञ्च वि अट्ठ-पयार हिँ ॥१०॥
धत्ता
वन्दिय गुरु गुरु भत्ति करेवि लग्ग परीसवि सीयाएवि ।
मुह-पिय अच्छ पच्छ मण-भाविणि भुत्त पेज कामुएँ हिं व कामिणि ॥११॥
[१३]
दिण्णु पाणु पुणु मुहहाँ पियारउ । चारण-भोग्गु जेम हलुवारउ ॥१॥
सिद्धउ सिधु जेम सिद्धीहउ । जिणवर-आउ जेम अइदीहउ ॥२॥
पुणु अग्गिसउ दिण्णु हियइच्छिउ । जिह सु-कलत्तु सु णेहु-स-इच्छड ॥३॥
सुद्धई पुणु सालणई विचित्त । तिक्खई णाई विलासिणि-चित्तईं ॥४॥
दिण्णई पुणु तिम्मण मणिहई । अहिणव-कइ-वयणा इव मिट्ट ि॥५॥
पच्छइ सिसिरु स-मच्छरु सुद्धउ । दुट्ठ-कलत्त
जेम भइ-थद्धउ ॥६॥
पुणु मय-सलिलु दिण्णु सीयालउ । णं जिण-वयणु पाव-पक्खालउ ॥७॥
लोलए जिमिय भडारा जावहिं । पञ्चच्छरिड पदरिसिउ ताहि ॥८॥
घत्ता
दुन्दुहि गन्धबाउ रयणावलि साहुक्कार अण्णु कुसुमञ्जलि ।
पुण्ण-पवित्तई सासय-दूअइँ पञ्च वि अच्छरियइ स ई भू अइ ॥६॥

चउतीसमोसंधि उनके चरण साफकर, तीन वार जलकी धारा छोड़कर उनका प्रक्षालन किया। उसके अनन्तर, चंदन रसका लेपकर आठ प्रकारके द्रव्य (पुष्प, अक्षत, नैवेद्य, दीप धूपादि) से पूजा की । खूब वन्दना-भक्तिके अनन्तर सोता देवीने आहार देना शुरू किया । कामुकके लिए कामिनीकी तरह मनभाविनी सीता देवीने बाद में मुखमधुर भोजन और पेय दिया ॥१-११॥ [१३] फिर उसने मुखको प्रिय लगनेवाला स्वादिष्ट, तपस्वीके योग्य हलका भोजन दिया । वह भोजन सिद्धि के लिए अभिलापी सिद्धकी तरह सिद्ध था, जिनवरकी आयुकी तरह सुदीर्घ था। फिर सीताने उन्हें सुन्दर दाल वगैरह दी। वह दाल, सुकलत्रकी तरह सस्नेह (प्रेम और घी से युक्त ) और वांछनीय थी। फिर उन्हें विलासिनियोके चित्तकी भाँति शुद्ध विचित्र शालन परसा गया । उसके अनन्तर अभिनव कवि-वचनोंकी तरह मीठी मनप्रिय कड़ी दी। दुष्ट कलत्रकी भॉति थद्ध (गाढ़ी और ढीठ ) दही मलाई दी। उसके अनन्तर, पाप धोनेवाले जिन-वचनोकी तरह, अत्यन्त शीतल और सुगन्धित जल दिया। इस प्रकार जव लीला- पूर्वक उन परम भट्टारकोंने भोजन समाप्त किया तो पाँच आश्चर्य प्रकट हुए। दुंदुभिका वज उठना, सुगन्धित पवनका वहना, रलोकी वृष्टि, आकाशमे देवोंका जय-जय कार, और पुष्पोकी वर्षा । पुण्यसे पवित्र शासन दूतोंकी तरह ये आश्चर्य प्रकट हुए ॥१-६॥

[३५. पञ्चतीसमो संधि]
गुत्त-सुगुत्तहँ तणण पहावें रामु स-सीय परम-सम्भावें ।
देव हिं दाण-रिद्धि खणं दरिसिय वल-मन्दिरै वसुहार पवरिसिय ।।
[१]
जाय महाध रयण सु-पगासइँ । लक्खह तिणि सयाँ पञ्चासइँ ॥१॥
वरिस वि रयण-वरिख सई हत्थे । रामु पसंसिर
सुरवर-सन्थें ॥२॥
'तिहुवणे णवर एक्कु वलु धण्णउ । दिन्बाहारु जेण वर्ण दिण्णउ' ॥३॥
मण परितुइँ अमर-सयाई । 'अण्णे दाणे किज्जइ काई ॥४॥
अण्णे धरित भुवणु सयरायरु । अण्ण धम्मु कम्मु पुरिसायरु ॥५॥
अण्णं रिद्धि-विद्धि वंसुटभड । अण्णे पेम्मु विलासु स-विन्भमु ॥६॥
अण्णे गेउ वेड सिद्धक्खरु । अण्णे जाणु झाणु परमक्खरु ॥७॥
अण्णु सुएवि अण्णु कि दिजइ । जेण महन्तु भोगु पाविजइ ॥८॥
घत्ता
अण्ण-सुवण्ण-कण्ण-गोढाणहुँ मेइणि-मणि-सिद्धन्त-पुराणहुँ ।
सब्बहुँ अण्ण-दाणु उच्चासणु पर-सासणहुँ जेम जिण-सासणु' ॥६॥
[२]
दाण-रिद्धि पेक्खेवि खगेसरु । णवर जडाइ जाउ जाईसा ॥३॥
गग्गर-वयणउ मुणि-अणुराएं । पहउ णाई सिर मोग्गर-धाएं ॥२॥
जिह जिह सुमरइ णियय-भवन्तरु । तिह तिह मेलइ असु णिरन्तरु ॥३॥
'मई पावेण तिलोयाणन्दहु । पञ्च-सयइ पीलियइ मुणिन्दहुँ' ॥४॥

पैतीसवीं संधि गुप्त सुगुप्त मुनिके प्रभाव तथा राम और सीताके सद्भावसे, देवोंने दानका प्रभाव दिखानेके लिए रामके आश्रममें ( तत्काल) रत्नोकी वृष्टि की। [१] उन्होंने साढ़े तीन लाख बहुमूल्य रत्नोंकी वृष्टि की। इस प्रकार अपने हाथों रत्नोंकी वर्षा करके देवोंने रामको प्रशंसा की, "तीनों लोकोंमें एक राम ही धन्य हैं जिन्होने वनमें भी मुनियोके लिए आहार दान दिया। उन्होंने आपसमें चर्चा की कि अन्नदान ही उत्तम है, दूसरे दानसे क्या ? अन्नसे चराचर विश्व पलता है । अन्नसे ही धर्म, अर्थ और काम पुरुपार्थ है । अन्नसे ही ऋद्धि वृद्धि और वंशकी समुत्पत्ति होती है । अन्नसे ही हाव- भाव सहित प्रेम और विलास उत्पन्न होते हैं। अन्नसे ही गेय वाद्य और सिद्धाक्षर होते हैं। अन्नसे ही जान, ध्यान और परमाक्षरपद (सिद्धपद) प्राप्त होता है। अतः अन्नको छोड़कर और क्या दान किया जाय । अन्नदानसे बड़े भोग प्राप्त होते हैं। अन्नदान सुवर्ण, कन्या, गौ, धरती, मणि,शास्त्र और पुराणोंके दानसे महत्त्व- पूर्ण है। उनमे उसका स्थान वैसे ही ऊँचा है जैसे दूसरे शासनोमें जिन शासनका स्थान ऊँचा है ॥१-६।। [२] दानकी ऋद्धि देखकर पक्षिराज जटायुको अपना जाति- म्मरण हो आया। मुनिके प्रति भक्तिसे वह गद्गद हो उठा । उसे लगा जैसे उसके सिरपर वज्रका झटका लगा हो। ज्यो-ज्यो वह अपने जन्मान्तरोकी याद करता त्यों-त्यों उसे अश्रु वेगसे वहने लगते । वह बार-बार पश्चात्ताप करता कि "मुझ पापीने त्रिभुवना- नंददायक पॉच सौ मुनियोंको पीड़ित किया था। इस प्रकार

२३८
पउमचरित
एम पहाउ करन्तु विहङ्गउ । गुरु-चलणेहिँ पडिउ मुच्छगउ ॥५॥
पय-पक्खालण - जलणासासिउ । राहवचन्द पुणु उवयासित ॥६॥
सीयएँ वुत्तु 'पुत्त महु एवहिँ । छुड्डु बद्धउ छुडु धरउ सुखेवहि' ॥७॥
ताव रयण-उजोवें भिण्णा । जाय चामीयर-वण्णा ॥२॥
पक्ख
घत्ता
विद्रुम-चन्चु णील-णिह-कण्ठउ पय-वेरुलिय-वण मणि-पट्टउ ।
तक्खणे पञ्च-वष्णु णिवडियउ वीयउ रयण-पुन्जु णं पडियउ ॥६॥
[३]
भावे विहि मि पयाहिण देहन्तउ । गड्ड जिह हरिस-विसाएँहि जन्तउ ॥१॥
दिट्टु पक्खि जं जयणाणन्दणु । भणइ गवेप्पिणु दसरह-गन्दणु ॥२॥
'हे मुणिवर गयणगण-गामिय । चउगइ-दुक्ख- महाणइ - गामिय ॥३॥
कहि कज्जेण केण सच्छायउ । पक्खि सुवण्ण-वण्णु ज जायउ' nen
तं णिसुणेवि वुत्तु णीसझे । 'सयल वि उत्तिम-पुरिस-पसङ्गे ॥५॥
णरु हलुवो वि होइ गरुआरउ । खुवि सेल-सिहरै वड्डारउ ॥६॥
मेरु-णियम्। तिणु वि हेमुज्जलु । सिप्पिउडेसु जलु चि मुत्ताहलु ॥७॥
तिह विहड्गु मणि-रग्रणुजोएं । जाउ सुवण्ण-वण्णु मुणि-तोएं ll
घत्ता
तं णिसुणेवि वयणु असगाहें पुच्छिउ पुणु वि णाहु णरणाहें ।
'विहलवल धुम्मन्तु विहङ्गा कवणे कारणेण मुच्छगउ' ॥६॥
[४]
भणइ ति-णाण - पिण्ड - परमेसरु । 'एहु विहड्ड भासि रज्जेसरु ॥१॥
पहष्णु दण्डाउरु भुञ्जन्तउ । दण्डड णामु वउद्धह भत्तउ ॥२॥
एक-दिवसें वारद्धिए चलियउ ।ताव तिकाल-जोगि मुणि मिलियउ॥३॥

पञ्चतीसमो संधि प्रलाप करता हुआ वह मुनिके निकट गया। उनके चरणोंपर गिरते ही वह मूर्छित हो गया। तब रामने चरणोके प्रक्षालनका जल छिड़ककर उसको मूर्खा दूर की। यह सब देखकर सीता देवीने कहा-"इस समयसे यह मेरा पुत्र है ।" और उसे उठाकर सुखसे रख दिया । रत्नाकी आभासे उस पक्षीके पंख सोनेके हो गये। चोंच मूंगेकी, कंठ नीलमका, पीठ मणिकी, चरण वैदूर्य मणिके । इस प्रकार तत्काल उसके पाँच रंग हो गये । वह ऐसा जान पड़ रहा था मानो दूसरी पंच रत्न-वृष्टि हुई हो ॥१-।। [:] हर्ष और विपादसे भरे हुए नटकी भाँति उस पनि- गजने दोनों मुनियोंकी भावसहित प्रदक्षिणा दी। उस आनंद- दायक पक्षीको देखकर, दशरथ-पुत्र रामने प्रणामपूर्वक मुनिसे पूछा, 'हे आकाशगामी और दुखरूपी महानहीके लिए नौका तुल्य, (कृपया) वताइए, यह सुन्दर कान्तिवाला पक्षी सोनेके रंगका कैसे हो गया ?" यह सुनकर वह अनासंग मुनि बोले, "उत्तम नरकी संगतिसे सब कुछ संभव है । संगतिसे छोटा आदमी भी बड़ा आदमी बन जाता है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार पेड़ पर्वत की चोटीपर बड़ा हो जाता है और सुमेरु पर्वतपर तिनका भी सोनके रंगका दिखाई देता है। सीपीमे पड़ा हुआ पानी मोती बन जाता है। इसी प्रकार यह पक्षी भी मणि-रत्लोकी आभा और गंधोदकके (प्रभावसे) स्वर्णिम रंगका हो गया ।" यह सुनकर गमन विना किसी बाधाके पूछा-"विकलांग यह पक्षी, घूमता हुआ; किस कारणसे मूर्छित हो गया ?" ॥१-६|| [४] तर विज्ञानपिंडके धारक परमेश्वर बोले, "पहले या पनी दंडपुरमे दंडक नामका गजा था। वह बौद्ध धर्मका अनुयायी था। एक दिन वह आग्यटके लिए बनमें गया । वहाँ

२४०
परमचरिउ
थिउ अत्तावर्ग लम्विय-वाहउ । अविचलु मेरु जेम दुग्गाहउ ॥४॥
तं पेखें वि आठ महब्बलु । "अवसु अन्जु अवसवणु अमङ्गलु" ॥५॥
एम चवन्ते विसहरु घाऍवि । रोले मुगिवर कण्ठे लाऍवि ॥६॥
गउ णिय-णयह णराहिउ जाहिँ । थिउ णीसगु गिरोहें ताहि ॥७॥
"एउ को वि फेडेसइ जइयहुँ । लम्विय हत्थुञ्चायमि तइयहुँ" ॥८॥
घत्ता
जावण्णेश-दिवस पहु आवइ तंज भडारट तहिजे विहावइ ।
गलए भुभगम-मडउ णिवद्धउ कण्ठाहरणु णाई आइद्धउ ॥६॥
[५]
जं अविचलु वि विठ्ठ मुणि-सरि । फेवि विसहर-कण्ठा-मञ्जरि ॥१॥
वोल्लाविउ "वोल्लहि परमेसर । तब-चरणेण काइँ तवणेसर ॥२॥
खणिउ सरीरु जीउ सण-मेत्तउ । जो झायहि सो गयउ अतीतउ ॥३॥
तुहु सि खणिउ णऽज वि सिद्धत्तणु । आयहाँ किं पमाणु कि लक्खणु ॥४॥
सयलु णिरथु वृत्तु जं राए । मुणिवर चर्वेवि लग्गु णयवाएं ॥५॥
"जइ पुणु सो ज पन्तु वोल्लेबउ । ता खण-सद्भु ण उच्चारेवउ ॥६॥
खणिउ खयार णयार वि होसइ । खण-सहाँ उच्चार ण दीसह ॥७॥
घत्ता
अघडिट अघडमाणु अघणन्तउ खणिएं खणिउ खणन्तर-मेत्तउ ।
सुणे सुण्ण-चयणु सुण्णासणु सब्बु णिरत्थु वउद्धहु सासणु" ॥८॥

पञ्चतीसमो संधि । उसे त्रिकालज्ञ मुनि दिखे । वह आतापिनी शिलापर बैठे, हाथ ऊपर उठाये, ध्यानमें अवस्थित थे। सुमेरु पर्वतकी तरह अचल और दुर्ग्राह्य उन्हें देखते ही वह आगबबूला हो उठा। "आज अवश्य कोई न कोई अमंगल अपशकुन होगा"-यह सोचकर एक सॉप मारा और उसे मुनिके गलेमें डाल दिया। राजा अपने नगर वापस आ गया । मुनि उस विरोधमें अनासंग रहे। उन्होने अपने मनमें यह बात जान ली कि जब तक कोई (अपने आप) इस सॉपको अलग नहीं करेगा, तबतक मै अपने हाथ ऊपर ही उठाये रहूँगा। दूसरे दिन जब वह दंडक राजा फिर वहॉ गया तो उसने भट्टारकको वहीं देखा। उनके गलेमें पड़ा हुआ वह साँप कंठहारकी तरह शोभित था ॥१-६॥ [५] उन मुनिसिंहको (पहलेकी तरह ) अविचल देखकर, उसने सर्पकी वह कंठ-मञ्जरी दूर कर दी। फिर उसने कहा- "बताइये परमेश्वर, इस तपके अनुष्ठानसे क्या होगा? यह शरीर क्षणिक है। जीव भी क्षण भर ठहरता है। जिसका ध्यान करते हो वह अतीत हो चुका है। तुम भी क्षणिक हो, और सिद्धत्व आज भी प्राप्त नहीं है, और फिर इस मोक्षका क्या प्रमाण है। उसका लक्षण क्या है ?" परन्तु इस प्रकार राजाने जो कुछ कहा वह सव निरर्थक ही था क्योंकि मुनिने नयवादसे उसका उत्तर दे दिया । (उन्होने कहा) “यदि क्षणिक पक्ष कहते हो, तो 'क्षण' शब्दका उचारण भी नहीं हो सकता। फिर तो 'क्ष' और 'ण भी क्षणिक हो जायेगे। तब क्षणिक शब्दका उचारण नहीं होगा। अघटित, अघटमान और अघटत, क्षणिक, क्षणांतमात्र, शून्यसे शून्यासन कैसे सम्भव है। अतः वौद्धोंका सत्र शासन व्यथ है ।।१-८॥ -

२१२
पउमचरित
[६]
खण-सहेण णिरुत्तर जायउ । पुणु वि पवोल्लिउ दण्डय-रायउ॥६॥
"वो घ. सव्वु अस्थि जं दीसइ । पुणु तवचरणु कासु किज्जेसइ" ॥२॥
तं णिसुणेप्पिणु भणइ मुणीसरु । जो कइ-गवय वाइ वाईसरु ॥३॥
"अम्हइ राय ण वोल्हुँ एव । णेआइऍहिं हसिजहुँ जेवं ॥४॥
अस्थि णथि दोण्णि वि पडिवजहुँ । तुहुँ जिह णउ खणवाए भजहु" ॥५॥
तं णिसुणेवि भणइ दणुदारउ । “जाणिउ परम-पक्खु तुम्हारउ ॥६॥
अस्थि ण अस्थि णिच्च-सदेहो । पुणु धवलड पुणु सामल-देहो ॥७॥
पुणु वि मत्त-करि पुणु पञ्चाणणु । खत्तिउ वइसु सुदु पुणु वम्भणु" ॥८॥
घत्ता
भणिउ भडारउ "कि वित्थारे एक्कु चोरु चिरु धरिउ तलारें।
गीवा-मुह-णासच्छि गविहर सीसु लएन्तहुँ कहि मि ण विट्ठउ ॥६॥
[-]
अहवइ
एण काई संदेहे । अस्थि वि णस्थि वि णीसदेहे ॥३॥
जेत्थु अस्थि तहिं भत्थि भणेवउ । जहिण अस्थि तहिं णस्थि भणेवट"॥२॥
सच्छन्देण णराहिउ भाविउ । लइउ धम्मु पुणु मुणि पाराविड ॥३॥
साहुहुँ पञ्च सयई धरियाई। णिसुभई तेसष्टि वि चरियाई ॥४॥
तो एस्थन्तर जण-मण-भाविणि । कुइय खणडे दुग्णय-सामिणि ॥२॥
पुणु मयवद्धणु पुत्तु महन्तउ । "णरवइ जाउ जिणेसर-भत्तड ॥॥
घत्ता
तो वरि मन्तु कि पि मन्तिजइ जिणहर सन्चु दन्छु पुञ्जिनम् ।
जेण गवेसण पहु कारावइ साहुहु पञ्च-सयइ मारावह" ॥७॥

V २४३ पञ्चतीसमो संधि [६] इस प्रकार क्षणिक शब्दसे निरुत्तर होकर राजा दंडकने फिर कहा, "जव सव अस्ति दिखाई देता है, तो फिर तप किसके लिए किया जाय ।" यह सुनकर कवियों और वादियोंके वाग्मी वह मुनि बोले, "जैसे नैयायिकोंकी हँसी उड़ाई जाती है वैसे हमसे नहीं कह सकते। हम अस्ति और नास्ति दोनो पक्षोंको मानते है। अतः तुम्हारे क्षणवादको तरह हमारे (मतका) खण्डन नहीं हो सकता।" यह सुनकर दंडकराजने कहा, "तुम्हारा परम पक्ष मैंने जान लिया। अस्ति और नास्तिमे नित्य संदेह है। क्योंकि यह जीव कभी धवल होता है और कभी श्याम । फिर कभी मत्तगज तो कभी सिंह । फिर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र ।" इसपर भट्टारकने उत्तर दिया, "एक चोरको चिरकालसे तलार (कोतवाल) ने पकड़ रखा है । गर्दन, मुख, नाक, ऑखसे रचित, श्वास लेता हुआ भी वह किसीको दिखाई नहीं देता। अधिक विस्तारसे क्या ॥१-६॥ [७] अथवा इस प्रकार सन्देह करना व्यर्थ है। अस्ति और नास्ति दोनो पक्ष सन्देहसे परे है। जहाँ अस्ति हो वहॉ अस्ति कहना चाहिए और जहाँ नास्ति हो वहाँ नास्ति कहना चाहिए । स्वच्छन्दतासे इस प्रकार विचार करनेपर राजा दण्डकने जैनधर्म अङ्गीकार कर लिया। उसने मुनिको घर आनेका आमंत्रण दिया। त्रेसठ प्रकारके चारित्रमे पारङ्गत, पाँच सौ साधुओके साथ वह मुनि राजाके घर पहुंचे। यह देखकर जनमनको प्रिय लगनेवाली दुर्नयस्वामिनी उसकी पत्नी आधे ही पलमें आगववूला हो उठी। वह अपने पुत्र मयवर्धनसे वोलो, "राजेश्वर जिनका भक्त हो गया है । अच्छा हो कोई मन्त्र उपाय सोचा जाय । सब पूँजी इकट्ठी करके मन्दिरमे रख दो। राजा उसे खोजता हुआ वहाँ जायगा, और उन पॉच सौ मुनियाको मरवा देगा ॥१-६॥

२४४
पउमचरित
ते
[]
एक्क-दिवस तं तेम कराविउ । जिणहर सव्वु दब्बु पुक्षाविउ ॥१॥
मयवद्धणण णिवहाँ वनरियउ । “तुम भण्डारु मुणिन्दै हिँ हरियउ" ॥२॥
आलावें दण्डयराए । हसियउ पुणु पुणु सीह-णिणाए ॥३॥
"पत्तिय सेल-सिहर सयवत्त । पत्तिय महियलं गह-णक्खत्त ॥४॥
पत्तिय विवरिय चन्द-दिवायर । पत्तिय परिभमन्ति रयणायर ॥५॥
पत्तिय गहें हवन्ति कुलपन्वय । पत्तिय एकहि मिलिय दिसा-गय ॥६॥
पत्तिय णउ चउवीस वि जिणवर । पत्तिय णड चक्कवइ ण कुलयर ॥७॥
पत्तिय गउ तेसहि पुराण' । पञ्चेन्दिग्रइ ण पञ्च वि जाण ॥८॥
सोलह सग्ग भग्गई उप्पत्तिय । मुणि चोरन्ति मन्ति मं पत्तिय" ॥६॥
घत्ता
जंणरवइ वोल्लिड कइवारें मन्तिउ मन्तु पुणु वि परिवारे ।
"लहु रिसि-रूड एक्कु दरिसावहुँ पुणु महएवि-पासु वइसारहुँ ॥१०॥
[]
भवस रोस पुर-परमेमरु । मुणिवर घल्लेसइ रजेस" ॥१॥
एम भणेवि पुणु वि कोक्काविउ । तक्खणे मुणिवर-वेसु धराविउ ॥२॥
तेण समाणउ जण-मण-भाविणि । लग्ग वियारे हिँ दुग्णय-सामिणि ॥३॥
तो एत्यन्तरें गोलिय-तणु । गउ णिय-णिवहाँ पासु मयवद्धणु ॥४॥
णरवइ पेक्वु पेक्नु मुणि-कम्मइँ । ढुक्कु पमाणहाँ चोल्लिट ज म. ॥५||
मूढा अवुह ण वुमहि अज वि । हिउ भण्डारु जाव हिय भज वि" ॥६॥

पञ्चतीसमो संधि २४५ [८] एक दिन उसने वैसा ही करवा दिया। सारा खजाना जिन-मन्दिर में रख दिया गया। मयवर्धनने राजासे कहा कि तुम्हारा भण्डार मुनियोंने चुरा लिया है। कुमारके इस प्रलापपर राजा सिंहनादमे अट्टहास करके बोला,"विश्वास करलो कि शैल शिखर- पर कमलपत्र हो सकते हैं, विश्वास कर लो कि ग्रह नक्षत्रधरतीपर आ सकते हैं । विश्वास कर लो कि सूर्य और चन्द्र पूर्वकी अपेक्षा पश्चिममें उग सकते हैं । विश्वास कर लो कि समुद्र घूम सकता है, विश्वास कर लो कि कुल पर्वत आकाशमें होते हैं, विश्वास कर लो कि चारो दिग्गज एक हो सकते हैं, विश्वास कर लो कि चौवीस तीर्थङ्कर नहीं हुए, विश्वास कर लो कि चक्रवर्ती और कुलधर नहीं हुए, विश्वास कर लो कि त्रेसठ पुराणपुरुप, पाँच इन्द्रियाँ, पाँच ज्ञान, सोलह स्वर्ग तथा जन्म और मरण नहीं होते, पर यह विश्वास कभी मत करो कि जैन मुनि चोरी करते हैं।" जब राजाने आदर पूर्वक ऐसा कहा तो फिर रानीने अपने परिवारके लोगोंके साथ मन्त्रणा की। और यह निश्चय किया कि किसी एकको मुनिका रूप बनाकर रानीके निकट बैठा दिया जाय ॥१-१०॥ ६] तब अवश्य राजा क्रोधमें आकर इन मुनिवरोंको मरवा देगा।" यह विचारकर तत्काल किसीको मुनिरूपमें वहाँ बैठा दिया तथा जनमनभाविनी रानी दुर्नयस्वामिनी उसके साथ विकार चेष्टाका प्रदर्शन करने लगी। तब इसी वीचमें पुलकित- शरीर पुत्र मयवर्द्धन दौड़ा-दौड़ा राजाके पास गया और बोला- "राजन् , देखो देखो, मुनियोंका कर्म,जो कुछ मैंने निवेदन किया था उसका प्रमाण मिल गया । मूर्ख अज्ञानी तुम आज भी नहीं समझ सकते । भण्डारका तो उसने हरण किया ही था और आज स्त्रीका भी हरण कर लिया है। तुम जानबूझकर अपने मनमें मूर्ख बनते

२४६
पउमचरिउ
घत्ता
जाणन्तो वि तो वि मणे मूढउ गरवइ कोव-गइन्दारूढउ ।
दिण्णाणती गरवर-विन्दहु धरियइँ पञ्च वि सयइ मुणिन्दहुँ ॥७॥
[१०]
पहु-आएसे धरिय भडारा । जे पञ्चेन्द्रिय - पसर-णिवारा ॥१॥
जे कलि-कलुस-कसाय-वियारा । जे ससार - घोर उत्तारा ॥२॥
जे चारित्त-पुरहों पागारा । जे कमट्ठ - दु:- दणु - दारा ॥३॥
जे णीसङ्ग अणग-वियारा । जे भवियायण
अन्भुद्धारा ॥४॥
जे सिव-सासय-सुह - हकारा । जे गारव पमाय - विणिवारा ॥५॥
जे दालिह-दुक्ख - खयकारा । सिद्धि - वरङ्गण - पाण - पियारा ॥६॥
जे वायरण-पुराणइ जाणा । सिद्धन्तिय एकक-पहाणा ॥७॥
ते तेहा रिसि जन्त छुहाविय । रसमसकसमसन्त पीलाविय ॥८॥
।
ঘরা
पञ्च वि सय पीलाविय जावेंहिँ मुणिवर वेण्णि पराविय तावहि ।
घोर-वीर-तवचरणु चरेप्पिणु आताधणे तक्-तवणु तवेप्पिणु ॥९॥
[११]
केण वि ताम वुत्तु "मं पइसहाँ । वेणि वि पाण लएप्पिणु णासहाँ ॥१॥
गुरु तुम्हारा आवइ पाविय । राएं जन्त छुहें वि पीलाविय"
त णिसुणेवि एक्कु मुणि कुद्धउ | णं खय-कालें कियन्तु विरुद्धउ ॥३॥
घोरु रउदु झाणु आऊरिउ । वउ सम्मत्तु सयलु सचूरिउ ॥४॥
अप्पाण्णप्पाणु विहत्तिउ । तक्खणें छार-पुन्जु परिअत्तिउ ॥५॥
जो कोवाणलु तेण विमुक्कउ । गड णयरहाँ सवडम्मुहु ढुक्कउ ॥६॥
॥२॥

पञ्चतीसमो संधि २४७ हो।" यह सुनते ही राजा दण्डक क्रोधरूपी महागज पर आसीन हो वैठा। उसने तुरन्त अपने आदमियोंको आदेश दिया कि इन पॉच सौ मुनियोंको पकड़ लो ॥१-७॥ [१०] राजाके आदेशसे वे पाँचसौ मुनि वन्दी बना लिये गये। वे पञ्चेन्द्रियोके प्रसारका निवारण करनेवाले, कलयुगके पाप और कपायोंको नष्ट करनेवाले, घोर संसारसे पार जानेवाले, चारित्ररूप नगरके प्राचीर, अष्ट दुष्ट कर्मोंको चूरनेवाले जितकाम, अनासङ्ग, भविकजनोंके उद्धारक, शाश्वत शिव सुखके उद्धारक, गर्दा और प्रमादके निवारक, दारिद्रय और दुखके नाशक, सिद्धिरूपी नववधूके लिए प्राणप्रिय, व्याकरण और पुराणोमें पारङ्गत, सिद्धान्त प्रवीण उनमे प्रत्येक अपनेमे प्रधान था। उस वैसे मुनि-समूहको, यन्त्रांसे क्षुब्ध कर कसमसाता हुआ वह राजा पीड़ित करने लगा। जिस समय पाँच सौ ही साधु इस प्रकार पीड़ित हो रहे थे उसी समय आतापिनी शिलापर तप करके दो मुनिवर नगरकी ओर आ रहे थे ॥१-६॥ [११] उन्हें आते हुए देखकर किसीने कहा, "तुम दोनों नगरके भीतर प्रवेश मत करो, नहीं तो प्राणोंसहित समाप्त कर दिये जा सकते हो । तुम्हारा गुरु आपत्तिमें है । राजा उन्हें यन्त्रसे पीड़ा दे रहा है ।" यह सुनते ही उनमेसे एक मुनि एकदम क्रुद्ध हो उठा । मानो क्षयकालमें यम ही विरुद्ध हो उठा हो । वह घोर रौद्रध्यानमे उतर आया। उसका समस्त व्रत और चारित्र नष्ट-भ्रष्ट हो गया । आत्मा आत्मासे विभक्त हो गई। उसी समय उसने अग्निपुंज छोड़ा। इस प्रकार उसने जो क्रोध-ज्वाला मुक्त को वह शीघ्र ही नगरके सम्मुख चली, चारों ओरसे वह नगर जलने लगा।

२४८
पउमचरित
यत्ता
पट्टणु चाउदिसु संदीविट म-धरु स-राउलु जालालोविउ ।
जज कुम्भ-सहसें हि विप्पइ विहि-परिणामें जलु वि पलिप्पइ ॥७॥
[१२]
पट्टणु ददु असेसु वि जावे हि । खल जम-जोह पराविय तावहिं ॥६॥
ते तइलोक्कु वि जिणे वि समत्था । असि-वण-सहल-णियल-विहत्या ॥२॥
ककड-कविल-केस भीसावण । काल-कियन्त - लील-दरिसावण ॥३॥
कसण-सरीर वीर फुरियाधर । पिङ्गल-णयण झसर-मोग्गर-धर ॥४॥
जीह-ललन्त
ढन्त-उहन्तुर । उमड-वियढ-ढाढ भय-भासुर ॥५॥
जम-दूएहिं तेहिं कन्दन्तउ । गरवइ जिउ स-मन्ति स-कलत्तउ ॥६॥
गम्पिणु जमरायहाँ जाणाविउ । “एण मुणिन्द-णिवहु पीलाविउ" ॥७॥
त णिसुणेप्पिणु कुइउ पयावइ । “तीहि मि दरिसावहाँ गरुयावइ" ॥
घत्ता
पहु-आएसे दुग्णय-सामिणि घत्तिय छहिँ पुढविहिँ पाविणि ।
जहिं दुक्खइँ भइ-घोर-रउई गवराउसु वाचीस-समुह ॥६॥
[ १३ ]
अण्णोण्णेण जेत्थु हकारिउ । अण्णोण्णेण पहर-णिहारिउ ॥१॥
अण्णोण्णेण दले वि दलवहिउ । अण्णोण्णेण हण वि णिवाहिउ ॥२॥
अण्णोण्णेण तिसूल भिण्णउ । अण्णोण्णेण दिसा-वलि दिण्णउ ॥३॥
अण्णोण्णेण कडाहें पमेल्लिउ । अण्णोण्णेण हुभासणे पेल्लिउ ॥४॥
अण्णोण्णेण वइतरणिहँ पत्तिउ । अण्णोण्णेण धरवि णिजन्तिउ ॥५॥
अण्णोण्णेण सिलहु अप्फालिउ । अण्णोण्णेण दुहाएहि फालिउ ॥६॥
अण्णोण्णेण धरै वि आवीलिउ । अण्णोण्णेण वत्थु जिह पीलिउ ॥७॥
अण्णोण्णेण घरहए दलियउ । अण्णोण्णेण पयरु जिह मिलियड ॥८॥
अण्णोण्णेण वि कूवें पमुक्कर । अण्णोण्णेण धरैप्पिणु
।
।
रुकउ ॥६॥

पञ्चतीसमो संधि २४६ सारी धरती और राजकुल आगकी लपटोमें घिर गये । उसपर जो सहस्रो घड़े जल डाला जाता वह भी भाग्यके परिणामसे जल उठता था ॥१-७॥ [१२] इस प्रकार सम्पूर्ण नगरके जलकर राख हो जानेपर यमके योधा आ पहुँचे। तलवार, मजबूत सांकलें और निगड उनके हाथमे थे । रूखे और कपिल रंगके वाणोसे वेअत्यन्त भयानक थे। वे तरह-तरहको लीलाएँ करने लगे। कंपित अधर पीतनेत्र और श्याम शरीर वे वीर भसर और मुद्गर लिये हुए थे। उनकी जीभ लपलपाती, दाँत लम्बे, और दाढ़े निकली हुई थी। भयङ्कर वे यमदूत पत्नी सहित विलखते हुए राजाको वहाँसे ले गये। आकर उन्होने यमराजसे कहा, "इन्होने मुनिसमूहको पीड़ा दी है। यह सुनकर प्रजापति यम एकदम क्रुद्ध होकर वोला, “इन घम- ण्डियोंको भी वही पीड़ा दो।" प्रभु यमके आदेशसे उन्होंने दुर्नय- स्वामिनी को छठे नरकमें डाल दिया। उसमे घोर दारुण दुःख थे और आयु वाईस सागर प्रमाण थी ॥१-६॥ [१३] वहॉ एक दूसरेको ललकारकर प्रहार करते, एक दूसरे पर आक्रमणकर चकनाचूर करते, मार-मारकर, एक दूसरेको भगा देते। एक दूसरेका त्रिशूलसे भेदन करते, एक दूसरेको दिशा वलि देते, एक दूसरेको कड़ाहीमें डाल देते, एक दूसरेको आगमें झोक देते, एक दूसरेको वैतरणीमें डाल देते, एक दूसरेको पकड़ कर पराजित कर देते, एक दूसरेको चट्टानपर पटकते, एक दूसरेको दुहागसे खंडित करते । एक दूसरेको पकड़कर पीड़ा देते । एक दूसरेको (जड़) वस्तुओकी तरह चपेटते, एक दूसरेको चक्की में पीस देते । एक दूसरेको वाणोसे वेध देते, एक दूसरेको पकड़कर रोक लेते । एक दूसरेको कुँएमे फेक देते, एक दूसरेको रोक लेते

છ0
पटमचरित
-
घत्ता
अण्णोण्ग पलोइड रागे अण्णोण्गेण विद्यारिउ खग्गे ।
अण्गोग्गेण गिलिबइ जेत्यु दुग्गय-सामिणि पत्तिय तेन्थु ॥१०॥
[१४]
अपणु
वि कियउ जेण मन्तित्तणु । घत्तिड असिपत्तवणे अलावणु ॥६॥
जहिं तंतिणु नि सिलीमुह-सरिसर । अण्णु वि अग्गि-वण्णु गिएफरिसट ॥२॥
जहिं तेलोह-रुस्ख क्ण्टाला । मसि-पत्तल असराल विसाला ॥३॥
दुग्गम दुगिरिक्त दुल्हलिया । णाणाविह - पहरण - फल-मरिया ॥४॥
अहिं णिवडन्ति ताहँ फल-पत्तई । तहि दिन्दन्ति णिरन्तर गत्तई ॥५॥
तं तेहर वणु मुएँ वि पट्टड । पुणु वइतरणिह गम्पि पइड ॥an
जहिं तं सलिलु वहइ दुग्गन्धट । रस-बस-सीणिय-मंस - समिद्धत ॥७॥
उण्हड खारु तोर अइ विरसर । मण्ड पियाविड पूर्व-विमिस्स !
।
पत्ता
ताव
इय संताव दुक्ख-संतत्तउ खण खणे उप्पज्जन्तु मरन्तउ ।
विट सत्तमए णरएमयवद्वणु मेडणि जाम मेरु गयणगणु nen
[१५]
विद्वएहिं हछारित । णरवइ णारएहिँ पञ्चारिड ||१||
"मल मरु संभर दुचरियाई । जाई आसि पई संचरियाई ॥२॥
पञ्चसयई मुणिवरहुँ हयाइ । लइ अणुहुनहि ताई दुहाइ" ॥शा
एम भणेप्पिणु बग्गै हिँ दिण्ड । पुणु वाणे हिं भल्लेहि मिण्गउ ॥४॥
पुणु तिलु तिलु करवत्तहिँ कप्पिर । पुणु गिदहुँ सिव-सागहुँ अप्पिर ।।५।।
पुणु पेल्लाविड मग्ग-गइन्दहि । पुणु वेढाविड़ पण्गय-विन्द हि ।।।।
पुणु खण्डिर पुणु जन्त छुहाविउ । अधु सहासु वार पीलाविउ ॥७॥
दुक्ख दुक्खु पुणु कह वि किलेस हिँ । परिममन्तु भव-जोणि-सहास हि ॥३॥

पञ्चतीसमो संधि एक दूसरेको रागसे देखकर, फिर कृपाणसे टुकड़े टुकड़े कर देते । एक दूसरेको लील जाते । दुर्नयस्वामिनी इसी नरकमे पहुंची ॥१-२०॥ [१४] और भी जिसने मंत्रणा की थी, गुणहीन उसे असि- पत्रवन नरक मेडाल दिया गया। वहाँके तिनके तक वाणोके समान हैं। और पेड़ आगके रंगके है वहाँ तेलोहके कटीले झाड़ है। तलवारकी तरह उसके पत्ते है। वह बड़ा विकराल, दुर्गम और दुर्दशनीय है तथा दुर्ललित है। तरह-तरहके अस्त्रोके समान फलोसे लदा हुआ है । जहाँ भी उसके पत्ते गिरते है उनसे शरीर निरन्तर छिन्न-भिन्न होता रहता है। उनसे नष्ट होकर, फिर वह वैतरणी नदीम जा गिरता है जो अत्यन्त दुर्गन्धित पानी, पीव तथा मांस और रक्तसे भरी हुई है। उसका जल उष्ण, खारा और अत्यन्त- विरस है। पीपमिश्रित जल जबर्दस्ती वहाँ पिलाया जाता है। इस तरह सन्ताप और दुखोंको सहन करता हुआ जीव उसमे क्षण-क्षण जन्मता और मरता रहता है। मयवर्द्धन भी तव-तकके लिए सातवे नरकम गया है कि जब-तक धरती, सुमेरु पर्वत और आकाश विद्यमान रहेंगे ॥१-६॥ [१५] इसके अनन्तर उन विरुद्ध नारकीयोने राजाको भी ललकाग, “तूने जो-जो खोटे आचरण किये हैं, उन्हें याद कर । तून पाँचसौ मुनियोंको मारा, अब इसका दुःख भोग ।” यह कहकर उनहोंने उसे तलवारसे काट-कूट दिया। फिर बाणों और भालोंसे भेदा। उसके बाद करपत्रसे तिल-तिल काटकर उसे गीध, कुत्तों और शृगालीको दे दिया। हाथीके पॉपके नीचे दबोचकर सॉपोसे लपेट दिया। फिर खण्डितकर, पॉचसौ-पॉचसी बार उसे यन्त्रसे पीड़ित किया। इस प्रकार कष्ट पूर्वक हजारो यातनाओंको सहन करता पमा वाद नाना योनियों में भटकता फिरा । वही अब इस वनमे पउमचरित . पुत्यु विहगु जाउ णिय-काणणें । एवहिं अच्छइ तुम्ह-घरगणे ॥६॥ घत्ता ताव पक्खि मण पच्छुत्ताविउ 'किह मई सवण-सड्धु संताविउ । एत्तिय-मत्तें अभुद्धरणउ महु मुयहाँ वि जिणवरु सरणउ' ॥१०॥ [१६] जं आयण्णिउ पक्खि-भवन्तरु । जाण-कन्त पभणिउ मुणिवर ॥॥ 'तो वरि अम्हहु वय. चडावहु । पक्खिहँ सुहय-पन्थु दरिसावहु' ।।२।। तं वलएवहाँ वयणु सुणेण्पिणु । पञ्चाणुब्बय उच्चारेप्पिणु ॥३॥ दिण्ण पडिच्छिय तिहि मिजणेहिँ । पुणु अहिणन्दिय एक-मणेहिं ॥धा मुणिवर गय आयासहाँ जाहिँ । लक्खणु भवणु पराइड ताहिं ।।५।। 'राहव एड का अच्छरियड । ज मन्दिर णिय-रयौँ हिँ भरियउ॥॥ तेण वि कहिउ सन्चु जं वित्त । 'म आहार-दाण-फलु पत्तउ' ॥७॥ तक्खणे पञ्चच्छरित परिसिउ । मेहें हिं जिह अणवरउ परिसिउ । घत्ता रामहों वयणु सुणेवि अणन्तं गेहवि मणि-रयणइ वलवन्तें। वढ-पारोह-कमेहि पचण्डहि रहवरुघडिउ सयंभुव-दण्डहि ॥४॥ [३६, छत्तीसमो संधि] रहु कोड्डावण मणि-रयण-सहास हिँ घडियउ । गयणहाँ उच्छलॅवि णं दिणयर-सन्दणु पडियउ ॥ [] तहिं तेहएँ सुन्दर सुप्पवहँ । आरण्ण - महागय धुरै लक्खणु रहवर दासरहि । सुर-लीलए पुणु विहरन्ति महि ॥२॥ - जुत्त- रहें।

छत्तीसमो संधि २५३ (जटायु नामका ) पक्षी हुआ है। और इस समय तुम्हारे आश्रमके ऑगनम उपस्थित है। यह सुनकर वह पक्षी अपने मनमें बहुत पछताया। मैंने नाहक श्रमणसंघको यातना दी। इतने मात्रसे मेरा उद्धार हो गया । अब तो मैं बार-बार जिनकी शरणमें हूँ ॥१-१०॥ [१६] पक्षिराज जटायुके जन्मान्तर सुनकर राम और सीताने पूछा, "तो फिर अच्छा हो आप हमें भी कुछ व्रत दे और इस पक्षीको भी सुपथ दिखावें ।" बलभद्र रामके वचन सुनकर मुनिवरने पॉच अणुव्रतोंका नाम लेकर उन्हें दीक्षा प्रदान की । उन तीनोने मुनिका अभिनन्दन किया। मुनियोंके आकाश-मागसे प्रस्थान करनेपर जव लक्ष्मण घर लौटकर आया तो उसने कहा, "अचरज है यह सब क्या । घर रत्नोंसे भर गया है।" तव गमन कहा कि यह सब हमें अपने आहार-दानका फल प्राप्त हुआ है । तत्क्षण उन्होने वे पॉच आश्चर्य रन दिखाये कि जिनकी निरन्तर वर्षा हुई थी। तब बलवान् लक्ष्मणने रामके वचन सुन- कर उन (बहुमूल्य ) मणियोंको इकट्ठा कर लिया । फिर वटप्ररोह की तरह प्रवल अपने भुजदण्डोंसे लक्ष्मणने रत्नविजडित उत्तम रथ बनाकर तैयार किया ॥१-६॥ छत्तीसवीं संधि हजारौं मणियों और रत्नोंसे रचित कुतूहल-जनक वह रथ गमा लगता था मानो सूर्यका ही रथ आकाशसे उछलकर धरती- पर आ गिरा हो ।।१-६॥ [१] सुन्दर और कान्तिपूर्ण, तथा वनगजोंसे जुते हुए उन ग्धको धुगपर लक्ष्मण बैठे हुए थे, और भीतर राम और सीता । इस प्रकार वे धरती पर लीलापूर्वक विहार कर रहे

२५४
पउमचरिट
तं कण्हवण्ण-णइ मुए वि गय । वणे कहि मि णिहालिय मत्त गय ॥३॥
कन्थ वि पञ्चाणण गिरि-गुहें हिँ । मुत्तावलि विक्खिरन्ति पहें हि ॥४॥
कत्थ वि उड्डाविय सरण-सय । णं अढविहं उडेंवि पाण गय ॥५॥
कत्थ वि कलाव पञ्चन्ति वर्ण । णावइ पहावा जुबइ-जणें ॥३॥
कत्थ इ हरिण भय-भाया । संसारहाँ निह पन्चझ्या ॥७॥
कत्थ वि णाणाबिह-रुक्स-राइ । णं महि कुलबहुमहँ रोम-राइ ||८||
घत्ता
तहाँ दण्डयवहाँ अग्गएँ दीसइ जलवाहिणि ।
णाम कोचणइ थिर-गमण णाई वर-कामिणि ॥en
[२]
कोचणइह वारण संठियई । लय-भण्डव गम्पि परिठियई ॥३॥
छुड में डु में सरयहाँ आगमणे । सच्छाय महादुम जाय वणे ॥२॥
णव-णलिणिहें कमलइ विहसिया । णं कामिणि-चयण पहसियई ॥३॥
ववलेण णिरन्तर-णिग्गएण । घण-कलसें हिं गयण-महग्गएण ||
अहिसिञ्चवि तक्त्रणे वसुह-सिरि । णं थविय अवाहिणि कुम्भइरि ॥५॥
तहिं तेहए सरए सुहावणाएँ । परिभमइ जणहणु काणणएँ ॥३॥
कोवण्ड - सिलीमुह - गहिय-करु । गज्जन्त मत्त • मायग-धर ॥७॥
वणे ताम सुगन्धु वार अइड । जो पारियाय-कृसुमन्महिर ॥८॥
-
-
घत्ता
कट्टिउ ममरु जिह तें वाएं सुख सुमन्धे ।
धाइउ महुमहणु जिह गउ गणियारिहं गन्धं ॥९॥
[३]
थोत्रन्तर परिओसिय-मणण । वंसत्थल लक्खिट लक्खणेण ॥३॥
णं सयण-विन्दु आवासियट । णं मयउलु वाहें तासियर ॥२॥

छत्तीसमो संधि थे । कृष्णा नदी पार करने पर कही उन्हें मदभरते वनगज दिखाई पड़े और कहीं सिंह जो गिरि-गुहाओमे अपने नखोंसे मोती बखेर रहे थे। कहीं पर सैकड़ो पक्षी इस भॉति उड़रहे थे मानो अटवीके प्राण उड़कर जा रहे हो । कहींपर वनमोर इस प्रकार नृत्य कर रहे थे मानो युवतीजन ही नाच रहा हो। कहींपर भयभीत हरिन इस प्रकार खड़े थे मानो संसारसे भीत संन्यासी ही हों । कहींपर नाना प्रकारको वृक्ष-मालाएँ थीं जो मानो धरारूपी वधूकी रोम- राजी ही हो । ऐसे उस दण्डक वनके आगे उन्हें क्रौंच नामकी नदी मिली वह सुन्दर कामिनीकी मन्थर-गतिसे वह रही थी ॥१-६॥ [२] क्रौचके तटपर जाकर वे एक लतागृहम वैठ गये। (इतनमे) शरदके आगमनसे वनवृक्षांकी कान्ति और छाया ( सहसा) सुन्दर हो उठी। नई नलिनियोके कमल ऐसी हँसी वयर रह थे मानो कामिनीजनोके मुख ही स्मयमान हों। (और वह दृश्य ऐसा लगता था) मानो अपने निरन्तर निकलनेवाले घनरूपी धवल कलशोसे आकाशल्पी महागजने (शरदकालीन) वसुधाकी सौन्दर्य लक्ष्मीका अभिषेककर उस अबोधिनीको कुंभ- कार पर्वतपर अधिष्टित कर दिया हो। ऐसी उस सुहावनी शरदऋतु में, मत्तगजाको पकइनवाले लक्ष्मण, अपना धनुपवाण लिये हुए घूम रहे थे। (इन में अचानक) पारिजात कुसुमोके परागसे मिश्रित सुगन्धित पपनका झोंका आया । उस सुगन्धित पवनसे, भ्रमरकी तरह आकृष्ट होकर कुमार, लक्ष्मण उसी तरह दौड़े जिन प्रकार हाथी हथिनीकी बांहासे (आकृष्ट होकर) दौड़ पड़ता है ॥१६॥ [३] थोड़ी दूर चलनेपर सन्तुष्ट मन लक्ष्मणको एक वंश- स्थल नामक स्थान दीख पड़ा। वह ऐसा जान पड़ा भानो स्वजन-

२५६
पउमचरिउ
-
अणेक-पास कोडावणउ । जम-जीह जेम
भीसावण ॥३॥
गयणगणे खगु णिहाफियउ । णाणाविह कुसुमोमालियउ ॥४॥
लक्खणहाँ णाई अन्भुद्धरणु । णं सम्वुकुमारहों
जमकरणु ॥५॥
तं सूरहासु णामेण असि । जसु तेएं णिय पह मुअइ ससि ॥६॥
जसु धारहों काल-दिहि वसइ । जसु कालु कियन्तु वि जमु तसइ ॥७॥
त हत्धु पसार वि लइड किह । पर-णर-णिप्पसरु कलत्तु जिह ।।
घत्ता
पुणु कीलन्तएण असिवत्त हड वंसत्थलु ।
ताव समुच्छलवि सिरु पढिउ स-मउडु स-कुण्डलु ॥६॥
[४]
जं दि विवाइउ सिर-कमलु । सिरिवच्छे विहुणिउ भुय-जुअलु ॥१॥
'धिम्मई णिचारणु वहिउ गर । वत्तीस वि लक्षण-लक्ख-धरु' ॥२॥
पुणु जाम णिहालइ वंस-वणु । गर-रुण्डु दिछ फन्दन्त-तणु ॥३॥
तं पेक्स वि चिन्तइ खग्गधर । 'थिउ माया-रूवे को वि गर' ॥४॥
गउ एम भणेप्पिणु महुमहणु । णिविसेण परायड णिय-भवणु ॥५||
'भो सुहड-ससि । कहिँ लधु खग्गु कहिँ गयउ असि ॥६॥
तेण वि तं सयलु वि अक्खियउ । वंसस्थल जिह वणे लक्खियड ॥७॥
जिह लधु खग्गु तं अतुल-बलु । जिह खुडिउ कुमारहाँ सिर-कमलु ।।८
राहवण दुतु
घत्ता
घुच्चई राहवणा 'मं एत्तिय मुहिवएँ साडिय।
असि सावण्णु णवि पई जमहाँ जाह उप्पाढिय' ॥६॥
[५]
जं एहिय भीसण वत्त सुय । वेवन्ति पजम्पिय जणय - सुय ॥३॥

२५७ छत्तीसमो संधि समूह ही ठहरा हो, या व्याधसे पीड़ित मदगज ही हो । तव अत्यन्त निकट जाकर, उसने आकाशमें लटका हुआ एक खड्ना देखा। यमकी जीभकी तरह भयानक वह, पुष्पमालाओंसे लदा हुआ था । वह मानो, लक्ष्मणका उद्धारक और शम्बूक कुमारके लिए जमकरण था। यह वह सूर्यहास खड्ग था जिसके तेजसे चन्द्रमा भी अपनी आभा छोड़ देता है, जिसकी पैनी धारमें कालदृष्टि वसती है, यम कृतान्त भी जिससे सन्त्रस्त हो उठते हैं। लक्ष्मणने हाथ फैलाकर उस खड्गको उसी प्रकार झेल लिया जिस प्रकार कोई विट परपुरुषगामी स्त्रीको पकड़ ले। जव खेल-खेलमै कुमार लक्ष्मणने उस खड्गसे वंशस्थलपर चोट की तो उसमेंसे मुकुट और कुंडल सहित एक सिर उछल पड़ा ।।१।। [४] उस मूक सिरकमलको देखकर, लक्ष्मण दोनों हाथसे अपना सिर धुनकर पछताने लगा, "मुझे धिक्कार है कि व्यर्थ ही मैने बत्तीस लक्षणोंसे युक्त एक आदमीका वध कर दिया है।" जब उसने उस वंश-समूहको देखा, उसमें एक तड़फड़ाते मनुष्यका धड़ दिखाई दिया। उसे देखकर खड्गधर लक्ष्मणने सोचा शायद कोई मायाका रूप धारणकर इसमें बैठा था। यह विचारकर वह पलभरमें अपने डेरेमें पहुंच गया । तब रामने पूछा, “हे शुभ, यह खड्ग तुमने कहाँ पाया, तुम कहा गये थे। तब लक्ष्मणने जिस तरह वंशस्थल देखा था और कुमारका सिर काटकर वह खड्ग प्राप्त किया था वह सब हाल कह सुनाया। इसपर राम बोले, "अरे तुमने इस तरह (उसे) काट डाला, निश्चय ही तुमने यमकी डाढ़ उखाड़ ली है । वह कोई मामूली व्यक्ति नहीं था ॥२-६।। [५] यह बात सुनते ही सीतादेवो कॉप-सी गई । वह बोली, "चल, लतामंडपमें घुस चले । इस वनमें प्रवेश करना शुभ २५८ पउमचरित 'लय-मण्डव विउल णिविट्ठाहुँ । सुहु णाहि वणे वि पइट्ठाहुँ ॥२॥ परिभमइ जणणु जहि ज जहिं । दिदिव कडमहणु तहिं जै तहिं ॥३॥ कर-चलण-देह-सिर - खण्डणहुँ । णिविण्ण माएँ हउँ भण्डणहुँ॥४॥ हउँ ताएँ दिण्णी केहाहुँ । कलि - काल - कियन्तहुँ जेहाहुँ' ॥५॥ तं वयणु सुणेप्पिणु भणइ हरि । 'जइ राजु ण पोरिसु होइ वरि ॥६॥ जिम दाणे जैम सुकइत्तणेण । जिम आउहेण जिम कित्तणेण ॥७॥ परिभमइ कित्ति सव्वहाँ णरहाँ। धवलन्ति भुवणु जिह जिणवरहाँ ॥८॥ घत्ता आयहुँ एत्तियहुँ जसु एक्कु वि चित्त ण भावइ । सो जाउ जि मुठ परिमिसु जं जमु णेवावई' ॥९॥ एत्थन्तर सुर - संतावणहाँ । लहु वहिणि सहोयर रावणहाँ। पायाललङ्क लङ्घसरहाँ । धण पाण-पियारी तहाँ खरहाँ ॥२॥ चन्दणहि णाम रहसुच्छलिय । णिय - पुत्तहो पासु समुच्चलिय ॥३॥ 'लइ वारह-वरिसइँ भरियाई । चउ-दिवसहिं पुणु सोत्तरिया ॥४॥ अण्णहि तहिँ दिवसहि करें चडइ । तं खग्गु अज्जु णहँ णिवडई ॥५॥ सो एव चवन्ती महुर - सर । वलि - दीवङ्गारय - गहिय - कर ॥६॥ सजण - मण - णयणाणन्दणहाँ। गय पासु पत्त णिय-णन्दणहाँ ॥७॥ ताणन्तर असि • दलवट्टियउ । वसस्थलु दिटु णिवटियउ ॥८॥ घत्ता दिट छ कुमार-सिरु स-मउडु मणि-कुण्डल-मण्डिउ । जन्तहि किण्णरॅहिं वर-कणय-कमल णं छण्डिउ ॥६॥ [-]] सिर-कमलु णिएप्पिणु गीढ-भय । रोमन्ती महियल मुच्छ - गय ॥१॥ कन्दन्ति रुवन्ति स - वेयणिय । णिजीव णिच्चेयणिय ॥२॥ पुणु दुक्खु दुक्खु संवरिय-मण । मुह-कायर दर-मउलिय - णयण ॥३॥ जाय २५६ छत्तीसमो संधि नही है । कुमार लक्ष्मण तो दिनोंदिन वहीं घूमते रहते हैं जहाँ युद्ध और विनाश (को सम्भावना) रहती है। हाथ, पैर, सिर और शरीरका नाश करनेवाले इन युद्धोसे मुझे बहुत विरक्ति हो उठी है। इससे मुझे उतना हो सन्ताप होता है जितना कलिकाल और कृतान्तसे।" यह सुनकर कुमार लक्ष्मणने कहा-"जिसमें पुरुपार्थ नहीं वह राजा कैसा ? मनुष्यकी कीर्ति दान, सुकवित्व, आयुध और कीर्तनसे ही फैलती है वैसे ही जैसे जिनवरसे यह यह संसार धवल वनता है। इनमेंसे जिसके मनको एक भी अच्छा नही लगता वह मर क्यों नहीं जाता, वह व्यर्थ ही यमका भोजन बनता है ॥१॥ [६] इसी वीच चन्द्रनखा हर्पसे उछलती हुई, वहाँ आई। वह रावणको सगी छोटी बहन और पाताललंकाके राजा खरकी पत्नी थी । “चार दिन ऊपर वारह वर्प हो चुके हैं, दूसरे ही दिन खड्ग आकाशसे गिरकर मेरे पुत्रके हाथमें आ जायगा," मधुर स्वरमें यह गुनगुनाती हुई, नैवैद्य, दीप, धूप वगैरह पूजाका सामान हाथमें लिये जैसे ही वह सज्जनोके मन और नेत्रोंको आनन्ददायक अपने पुत्रके निकट पहुँची वैसे ही उसने खड्गसे छिन्न उस वंश- स्थलको गिरा हुआ देखा । कुमारका मुकुट-कुंडलसे सहित कटा हुआ सिर देखकर उसे ऐसा जान पड़ा, मानो किन्नरोंने आते-जाते वन-कमलको तोड़कर फेक दिया हो ॥१-६।। [७] (छिन्न) सिरकमलको देखकर वह भयभीत हो उठी । रोती हुई वह, मूर्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। क्रन्दन करती, रोती और वेदनासे भरी हुई वह एकदम निर्जीव और निश्चेतन हो उठी। फिर बड़े कष्टसे उसने अपना मन सम्हाला । उसका मुख कमल कातर हो रहा था, आखें भयसे मुकुलित थीं।

२६० पउमचरित णं मुच्छए किउ सहियत्तणउ । जं रक्खिउ जीवु गवणमणउ ॥४॥ पुणु उहें वि विहुणइ भुअजुअलु । पुणु सिरु पुणु पहणइ वच्छयलु ॥५॥ पुणु कोकइ पुणु धाहहिँ रडइ । पुणु दीसउ णिहालइ पुणु पडइ ॥६॥ पुणु उदुइ पुणु कन्दइ कणइ । पुणुरुत्तहिं अप्पर आहणइ ॥७॥ पुणु सिरु अप्फालइ धरणिवहँ । रोवन्ति, सुर रोवन्ति पहें ॥८॥ घत्ता जे चउदिसहि थिय णिय डाल पसार वि तरुवर । 'मा रुव चन्दणहि' णं साहारन्ति सहोयर ॥४॥ [८] अप्पाणउ तो वि ण संथवइ । रोवन्ति पुणु वि पुणु उहवइ ॥१॥ 'हा पुत्त विउज्झहि लुहहि मुहु । हा विरुअऍ णिहएँ सुत्तु तुहुँ ॥२॥ हा किण्णालावहि पुत्त मई । हा कि दरिसाविय माय प: ॥३॥ हा उवसंहारहि स्त्रु लहु । हा पुत्त देहि पिय-वयणु महु ॥४॥ हा पुत्त काइँ किड रुहिर-वडु । हा पुत्त एहि उच्छङ्गै चडु ॥५॥ हा पुत्त लाइ मुह मुह-कमलु । हा पुत्त एहि पिउ थण-जुअलु ॥६॥ हा पुत्त देहि आलिङ्गणउ । जें णचमि वण वद्धावण ॥७॥ णव-मासु छुद्ध जं म. उअर । तं सहल मणोरह अज्जु जणें ॥८॥ घत्ता हा हा दड्ड विहि कहि णियउ पुत्तु कहाँ सङ्घमि । काई कियन्त किउ हा दइव कवण दिस लडमि ॥६॥ [] हा अज्जु अमनलु विहि पुरहूँ । पायाललङ्क लक्षाउरहँ ॥१॥ हा अज्जु दुक्खु बन्धव-जणहाँ । हा अज्जु पडिय भुभ रावणहाँ ॥२॥ हा अज्जु खरहाँ रोवावणउ । हा अज्जु रिउठे बद्धावणउ ॥३॥ .

छत्तीसमो संधि मूर्छाने एक प्रकारसे उसकी बहुत बड़ी सहायता की जो उसके गमनशील प्राणोंको बचा लिया। उठकर वह फिर दोनों हाथ पीटने लगी। कभी वह सिर पीटती और कभी छाती। कभी वह (अपने पुत्रको ) पुकार उठती और कभी डाढ़ मारकर रोने लगती। देखती, गिरती पड़ती, उठती और फिर वह क्रन्दन करने लगती। इस तरह वार-बार, अपनेको प्रताड़ित करती, और कभी धरतीपर सिर पटक देती । उसके रोदनका स्वर आकाशमे गूंज रहा था। चारों ओर लगे हुए वृक्ष, मानो अपनी डालोसे यह संकेत कर रहे थे कि "चन्द्रनखा रो मत" और भाईकी तरह उसे सहारा दे रहे थे ॥१-६॥ [=] तो भी वह, किसी भी प्रकार अपने आपको ढाढ़स नहीं दे पा रही थी। रोती हुई वह बार-बार कह उठती," हे पुत्र! तुम विद् प महानिद्रामें क्यो निमग्न हो, हे पुत्र ! मुझसे क्यों नहीं बोलते, हे पुत्र ! तुमने मॉको यह सव क्या दिखाया, अहा ! अपने रूपको तुम फिरसे खोल दो, हे पुत्र ! मुझसे मीठी वातें करो। हे पुत्र ! तुम्हारे वस्त्र रक्तरञ्जित क्यों हैं ? हे पुत्र आ, और मेरी गोदमे चढ़। हे पुत्र अपना मुखकमल मेरे मुंहसे लगा। हे पुत्र ! आ और मेरा दूध पी, हे पुत्र, मुझे आलिंगन दे, जिससे मैं वनमें वधावा नाच सकूँ, मैने जिसके लिए, तुझे नौ माह पेटमें रखा, मेरे उस मनोरथको सफल कर । हा हा, हे रुठे हुए देव, तूने मेरे पुत्रको कहाँ ले जाकर रख दिया । मैं उसे कहाँ खो ? कृतान्तने यह सब क्या किया, हे देव ! मैं किस दिशामें जाऊँ?॥१-६।। [६] आज सचमुच विधाताने पाताललंका नगरका बहुत बड़ा अमंगल किया है। आज वॉधवजनीको घोर दुख है, आज रायणकी मानो एक भुजा टूट गई है। आज खरको रोदन आ

२६२
पउमचरित
हा अज्जु फुटु कि ण जमहाँ सिरु । हा पुत्त णिवारिउ मइ मि चिरु ||
तं खग्गु ण सावण्णहाँ णरहों। पर होइ भद्ध-चक्केसरहाँ ॥५॥
किं तेण जि पाढिड सिर-कमलु । मणि-कुण्डल - मण्डिय-गण्डयलु' ॥६॥
पुणु पुणु दरिसावइ सुरयणहाँ । रवि-हुअवह - वरुण - पहाणहाँ ॥७॥
अहो देवहाँ वालु ण रक्खियर । सबै हिं मिलेवि उपेक्खियड ||4||
घत्ता
तुम्हइ दोसु गवि महु टोसु जाह मणु ताविउ ।
मन्छुडु अण्ण-भवे मई अपणु को वि संताविउ' ॥६॥
[१०]
एत्थन्तर सोए परियरिय । डि जिह तिह पुणु मच्छर-भरिय ॥३॥
णिड्डरिय-णयण विप्फुरिय-मुह । विकराल गाइँ खय-काल-छुह ॥२॥
परिवद्धिय रवि-मण्ड मिलिय । जम-जीह जेमणहें किलिगिलिय ॥३॥
'ले घाइउ पुत्तु महु-तणउ । खर-णन्दणु
रावण-भायण ॥४॥
तहाँ जोविउ जइ ण अजु हरमि । तो हुयवह-पुजें पईसरमि' ॥५॥
इय पइज करेप्पिणु चन्दणहि । किर वलवि पलोवइ जाम महि ॥६॥
लय-मण्डव लक्खिय वे वि गर । णं धरणिहँ उन्मिय उभय कर ॥७॥
तहिँ एक्कु दिट करवाल-भुट । 'लइ एण जि हउ मह तणउ सुउ ॥८॥
घत्ता
एण जि असिवरण णियमत्यहाँ कुल-पायारहाँ।
सहुँ बसस्थलण सिरु पाडिउ सम्बुकुमारहाँ ।।६।।
[११]
जं ट्ठि वणन्तर वे वि णर । गड पुत्त-विओड कोउ णवर ॥१॥
आयामिय विरह-महाभण । णच्चाविय
मयरद्धय-गण ॥२॥

छत्तीसमो संधि २६३ गया, आज सचमुच शत्रुओंकी बढ़ती होगी, हा आज उस यमका सिर क्यों न फूट गया जिसने मेरे पुत्रका हमेशाके लिए अपलाप कर दिया। वह खड्ग किसी मामूली आदमीके लिए नहीं था, किसी अर्ध चक्रवर्तीके लिए था, क्या उसीने मणिमय कुण्डलोंसे मण्डित गण्डस्थलवाला उसका सिरकमल काटकर गिरा दिया है। वह वार-बार रवि, अग्नि, वरुण और पवन आदि देवोंको उसे दिखाकर कह रही थी, "अरे तुम लोग मेरे लालको नही वचा सके । तुम सवने मिलकर इसकी उपेक्षा की । परन्तु इसमे तुम्हारा दोप नहीं। दोप है मेरा, शायद दूसरे जन्ममें मैने किसी दूसरेको सताया होगा||१-६।। [१०] इस प्रकार शोकातुर वह, जिस किसी प्रकार ईर्ष्यासे भरी हुई नटीकी तरह जान पड़ती थी। उसकी आँखें डरावनी, मुख खुला हुआ, और तुन्ध । वह क्षयकालको भॉति विकराल थी । बढ़कर वह सूर्य-मंडलमे जा मिली और यमको जिह्वाकी तरह किलकिलाती हुई वह बोली-“जिसने आज, खरके नन्दन, रावणके भानजे और मेरे पुत्रकी हत्या की है, उसके जीवनका यदि मै हरण नहीं करूँ तो आगकी लपटोंमे प्रवेश कर लूंगी।" यह प्रतिज्ञा करके वह ज्यो-ही धरतीकी ओर मुड़ी त्यों-ही उसे लता- मंडपमे दो आदमी ऐसे दिखाई दिये मानो वे धरतीके ही उठे हुए दो हाथ हों ? उनमेसे एक, हाथमे तलवार लिये हुए दिखाई दिया । उसने सोचा, शायद इसीने मेरे पुत्रको मारा है। इस तलवारसे इसने मेरे कुलकी प्राचीरको तोड़ दिया है, वंशस्थलके साथ ही मेरे कुमारका सिर भी काटकर गिरा दिया है ।।१-६॥ [११] वनके वीचमे जैसे ही उसने उन दोनों नरोंको देखा वैसे ही उसका पुत्रवियोगका क्रोध चला गया । और अव वियोग

२६४
पउमचरित
पुलइज्जइ पासेइज्जइ वि । परितप्पड़ जर-खेइज्जइ वि ॥३॥
मुच्छिज्जइ उम्मुच्छिज्जइ वि । रुणुरुणइ वियारहिँ भज्जइ वि ॥४॥
'वरि एउ रूउ उवसंघरमि । सुर-सुन्दरु कण्ण-वेसु करमि ॥५॥
पुणु जामि एत्थु उम्वर-भवणु । परिणेसइ अवसें एक्कु जणु' ॥६॥
हियइच्छिउ तक्खण रूड किउ । ण कामहों कोड(१) 0 ति विहिउ ॥७॥
गय तहिँ जहिं तिणि विजणवणे। पुणु धाहहिं अहिं लग्ग खणें ॥८॥
घत्ता
पभणइ जणय-सुय 'वल पेक्खु कण्ण किह रोवइ ।
जं कालन्तरिउ तं दुक्खु गाइँ उक्कोवई' ॥६॥
[१२]
रोवन्ती वड्डे मलहरण । हक्कारवि पुच्छ्यि हलहरण ॥५॥
'कहि सुन्दरि रोवहि काई तुहुँ । किं पडिउ किं पि णिय-सयण-दुहु ॥२॥
किं केण वि कहिँ वि परिव्मविय' । तं वयणु सुणेवि वाल चविय ॥३॥
हउँ पाविणि दीण दयावणिय । णिव्वन्धव रुवमि वराय णिय ॥४॥
वर्णं भुल्ली गड जाणमि दिसउ । णउ जाणमि कवणु देसु विसउ ॥५॥
कहिँ गच्छमि चक्वूहँ पडिय । महु पुण्णेहिँ तुम्ह समावडिय ॥६॥
जइ अम्हहुँ उप्परि अस्थि मणु । तो परिणउ विण्ह वि एक्कु जणु ॥७॥
तं वयणु सुणेवि हलाउहण । किय णक्वच्छोडी राहवेण ॥८॥

छत्तीसमो संधि महाभटने उसपर धावा बोल दिया। कामदेव उसे नचाने लगा। वह सहसा पुलकित हो उठी । वह पसीना-पसीना हो गई। वह सन्तप्त होने लगी, उसके ज्वरकी पीड़ा बढ़ गई । कभी वह मूर्छित होती तो कभी उच्छास छोड़ती। कभी रुन-मुन कर उठती । इस प्रकार वह विकारसे भग्न हो उठी। उसने मनमें सोचा, "अच्छा मैं अब अपने इस रूपको छिपा लूँ और सुर-सुन्दरीका नया रूप ग्रहण कर लूं तव इस, उत्तम लताभवनमें प्रवेश करूँ । इनमेंसे एक-न-एक अवश्य मुझसे विवाह करेगा।" यह विचारकर उसने तत्काल यथेच्छ सुन्दर रूप बना लिया। वह अब ऐसी लगने लगी मानो कामदेवने ही साक्षात् कोई कौतुक किया हो । कुछ दूरीपर जाकर वह ढाढ़ मारकर रोने लगी, उसके क्रन्दनको सुन- कर सीतादेवीने रामसे कहा,-" आर्य, देखो तो वह लड़की क्यों रो रही है, जान पड़ता है जो दुःख कालसे अन्तरित था, वही अब इसपर प्रकट हो रहा है" ॥१-६॥ [१२] तब वलभद्र रामने ऊँचे स्वरमें पुकारकर रोती हुई उस वालासे पूछा "सुन्दरी, बताओ तुम क्यों रो रही हो? क्या किसी स्वजनका दुख आ पड़ा है या कहीं किसीने तुम्हारा पराभव कर दिया है ।" यह वचन सुनकर वह वाला वोली-"मैं पापिनी, देवसे दयनीय, भाई-बन्धुओंसे हीन एक दम अनाथ हूँ। इसी लिए रो रही हूँ । इस वनमें भूल गई हूँ। दिशा मैं जानती नहीं, और न ही मैं यह जानती हूँ कि कौन मेरा देश या प्रान्त है। कहाँ जाऊँ समझमें नहीं आता । मै जैसे चक्रव्यूहमें पड़ गई हूँ। अव मेरे पुण्यसे तुम अच्छे आ गये हो, यदि मेरे ऊपर आपका मन हो तो दोमेसे कोई एक मेरा वरण कर ले ।” यह वचन सुनते ही

२६६
पउमचरिट
घत्ता
करयल दिण्णु मुह किय वङ्क मउँह सिरु चालिउ ।
'सुन्दर ण होइ बहु' सोमित्तिह वयणु णिहालिउ ॥६॥
[१३]
जो परवइ अइ - सम्माण-करु । सो पत्तिय अत्थ - समत्थ - हरु ॥१॥
जो होइ उवायणे वच्छलउ । सो पत्तिय विसहरु केवल ॥२॥
जो मित्तु अकारणे एइ घरु । सो पत्तिय दुटु कलत्त - हरु ॥३॥
जो पन्थिउ अलिय-सणेहियउ । सो पत्तिय चोर अणेहियउ ॥४॥
जो णरु अत्यकएँ लल्लि - करु । सो सत्त णिरुत्तउ जीव - हरु ॥५॥
जा कामिणि कवड-चाडु कुणइ । सा पत्तिय सिर-कमलु वि लुणइ ॥६॥
जा कुलबहु सवहें हिं ववहरइ । सा पत्तिय विरुय - सयई करइ ॥७॥
जा कण्ण होवि पर-णर वरइ । सा किं वहन्ती परिहरइ ।।८।।
घत्ता
आयहुँ अट्टहु मि जो गरु मूढउ वीसम्भइ ।
लोइउ धम्मु जिह छुडु विप्पड पऍ पऍ लभइ ॥६॥
[१४]
चिन्तेप्पिणु थेरासण - मुहण । सोमित्ति वुन सीराउहण ॥१॥
'महु अस्थि भन्ज सुमणोहरिय । लइ लक्खण बहु लक्खण-भरिय' ॥२॥
जं एव समासएँ अक्खियउ । कण्हेण वि मणे उवलक्खियउ ॥३॥
हउँ लेमि कुमारि स-लक्खणिय । जा आगमैं सामुहए भणिय ॥४॥
- अहङ्गय वट्ट - थण । दोहर - कर - मक्खड्डुलि - जयण ॥५॥
रत्तहि गइन्द
णिरिक्खणिय । चामीयर
वरण सपुजणिय ॥६॥
जा उण्णय णास णिलाड तिय । सा होइ ति - पुत्तहुँ मायरिय ॥७॥

२६७ छत्तीसमो संधि रामने फौरन खुट्टी कर ली। मुंहपर दोनों हाथ रखकर, भौहें टेढ़ीकर, उन्होंने अपना मुख फेर लिया और कहा-"वधू, यह सुन्दर न होगा । तुम लक्ष्मणका मुख जोहो ॥१-६।। [१३] राम सोचने लगे-"जो राजा अत्यन्त सम्मान करने वाला होता है उसे अवश्य अर्थ और सामर्थ्यका हरण करनेवाला होना चाहिए। जो दान देनेमे अधिक ममत्व रखता है उसे अवश्य ही विपधर जानो। जो मित्र अकारण घर आता है उसे अवश्य स्त्री हरण करनेवाला दुष्ट समझो। जो पथिक मार्गमें मूठा स्नेह जताता है उसे अवश्य ही अहितकारी चोर समझो । जो नर जल्दी-जल्दी चापलूसी करता है उसे अवश्य जीवहरण करने- वाला समझो। जो स्त्री कपटसे भरी हुई चाटुता करती है वह निश्चय ही सिरकमल काटेगी। जो कुल-वधू वार-बार शपथ करती है वह अवश्य सैकड़ों बुराइयाँ करनेवाली है, जो कन्या होकर भी पर-पुरुपको वरण करती है क्या वह बड़ी होनेपर ऐसा करना छोड़ देगी। लौकिक धर्मकी भाँति, जो मूढ़ इन वातोमें विश्वास नहीं करता, वह अवश्य ही पग-पगमे अप्रिय पाता है ।।१-६॥ [१४] तब कमल-मुख रामने सोच-विचारकर लक्ष्मणसे कहा-"मेरे पास एक सुन्दर स्त्री है, तुम अनेक लक्षणोंसे युक्त हो, चाहो तो इसे ले लो।" जब रामने अत्यन्त संक्षेपमे यह कहा तो लक्ष्मणने भी तुरन्त बात ताड़ ली। उन्होंने कहा-"नही, मै तो सुलक्षणा स्त्री लॅगा जिसका सामुद्रिक शास्त्रोंमे उल्लेख है। जिसकी जॉच, उर, अभङ्ग हो। हाथ, नख, अंगुली, आँखें लम्बी हों। जिसके पद आरक्त हों और (गति) गजेन्द्रकी भॉति दर्शनीय हो जो सुनहले रगको सम्माननीय हो । जिसका भाल और नाक उन्नत २६८ पउमचरित कायति स - गग्गर तावसिय । सम - चलणगुलि अचिराउसिय ॥८॥ जा हंस - बंस - वरवीण - सर । महु - वण्ण महा - घण-छाय-धर ॥६॥ सुह-भमर-णाहि-सिर-भमर-थण(?)। सा बहु-सुय बहु-धण वहु-सयण ॥१०॥ जहँ वामएँ करयल होन्ति सय । मीणारविन्द - विस • दाम-धय ॥११॥ गोउरु घर गिरिवर अहव सिल । सु-पसत्य स-लक्खण सा महिल ॥१२॥ चक्कस - कुण्डल उद्धरिह । रोमावलि वलिय भुयड्ड जिह ।।१३।। अद्धेन्दु - णिडालें सुन्दरण । मुत्ताहल - सम दन्तन्तरण ॥४॥ घत्ता आऍहि लक्खणे हिँ सामुहए वणि [य] सुणिजइ । चक्काहिवहाँ तिय चक्वइ पुत्तु उप्पजइ ॥१५॥ [१५] - वहु राहव एह अलक्खणिय । हउँ भणमिण लक्खणेण भणिय ॥१॥ जडोर करेहि समसलिय । चल लोयण गमणुत्तावलिय ॥२॥ कुम्मुण्णय - पय विसमगुलिय । धुय कविल-केसि खरि पङ्गुलिय(?) ॥३॥ सम्बन - समुट्ठिय रोम-रइ । तहे पत्त वि भत्तारु वि मरइ ॥१॥ कडि-लन्छण भउँहावलि-मिलिय । सा देव णिरुत्तर झेन्दुलिय ॥५॥ दालिहिणि वित्तिर - लोयणिय । पारेवयच्छि जण भोजणिय ॥६॥ विरसउह - दिहि विरसउह-सर । सा दुक्खहुँ भायण होइ पर ॥७॥ णासग्ग थोरें मन्थरण । सा लक्षिय कि बहु-वित्थरेण ।।८।। कडि-चिहुर-णाहि(?)मुह-मासुरिय । सा रक्खसि बहु-भय-भासुरिय ॥६॥ कदु-अङ्गिय मत्त गइन्द-छवि । हउँ एहिय परिणमि कण णवि' 100 छत्तीसमो संधि हो, वह तीन-तीन पुत्रोंकी माता होती है। जिसके पैर और स्वर काककी तरह हों और पैरकी अंगुलियाँ वरावर हों, और शोभा क्षणिक हो वह तापसी होती है। जो हंस-वंश, और वीणाके उत्तम स्वरवाली हो। मेरे रङ्गकी भॉति अत्यन्त कांतिमती हो तथा जिसकी नाभि, सिर और स्तन सुन्दर तथा सुडौल हो वह वहुपुत्र- वी, धनवती और कुटुम्बवाली होती है। जिसकी वाई हथेलीमें चक्र, अकुश और कुण्डल उभरे हों, रोमराजि सॉपकी तरह मुड़ी हुई हो, ललाट अर्धचन्द्रकी तरह सुन्दर हो, दॉत मोतीकी तरह चमकते हो, इन लक्षणोंसे युक्त वनिताके विपयमे यह कहा जाता है (सामुद्रिक शास्त्रमे) कि वह चक्रवर्तीकी पत्नी होती है और उसका पुत्र भी चक्रवर्ती होता है 12-६।। [१५] परन्तु राघव, यह वधू कुलक्षणी है। यह मैं नहीं, सामुद्रिक शास्त्र कह रहा है । जिसकी जंघा और पिंडरी स्थूल हां, आँखें चञ्चल, और जो चलनेमे उतावलो करती हो, जिसके पैर कछुएके समान ऊँचे हो, अंगुलियाँ विपम और बाल कपिल वर्णके चंचल हो, सारे शरीरमें रोमराजी उठी हुई हो उसके पुत्र और पति दोनो मर जायेंगे । जिसकी कमर लांछित और भौह मिली हुई हो, हे देव ! वह निश्चय ही पुंश्चली होती है, दरिद्र, तीतर या कवृतर-सी आँखवाली स्त्री निश्चय हो नरभक्षिणी होती है । काकके समान दृष्टि और स्वरवाली जो हो वह अवश्य ही दुखकी पात्र है। जिसकी नाक आगे कुछ चिपटी वालंजिता होती है. बहुत विस्तारसे क्या, जिसके बाल कमर तक नहीं होते और जो ममाली होती वह बहुत भयावनी राक्षसिनी होती है। जिसकी पगर पतली और छवि मत्त गजराज की भांति हो, ऐसी कन्यासे मैं विवाह नहीं कर सकता।" यह सुनकर चन्दनखाने अपने २७० पउमचरित घत्ता पभणइ चन्दणहि किं णियय-सहावं लजमि । जइ हउँ णिसियरिय तो पइ मि अज्जु सइ भु अमि' ॥११॥ [ ३७. सत्ततीसमो संधि] चन्दणहि अलजिय एम पगजिय 'मरु मरु भूयहुँ देमि वलि' । णिय-रूवे वडिय रण-रसँ अडिय रावण-रामहुँ णाई कलि ॥ [१] पुणु णु पुवि पवडिय किलिकिलन्ति। जालावलि-जाला-सय मुअन्ति ॥३॥ भय-भीसण कोवाणल-सणाह । णं धरए समुटिभय पवर वाह ॥२॥ णह-सरि-रवि-कमलहाँ कारणत्थि । अहवइ णं अभुद्धारणस्थि ॥३॥ णं घुसलइ अन्भ-चिरिड्डिहिल्लु । तारा-वुव्वुव-- सय- विड्डिरिल्लु ॥४॥ ससि-लोणिय-पिण्डउ लेवि धाइ । गह-डिम्भहाँ पीहउ देइ णाई ॥५|| अहवइ कि वहुगा वित्थरेण । णं णहयल-सिल गेण्हइ सिरेण ॥६॥ ன் हरि-वल-मोत्तिय-कारणेण । महि-गयण-सिप्पि फोडइ खणेण ॥७॥ वलएवें वुच्चइ 'वच्छ वच्छ । तुहुँ वहुयह चरियइ पेच्छ पेच्छ ॥८॥ वत्ता चन्दणहि पजस्पिय तिणु विण कम्पिय 'लइड खग्गु हउ पुत्तु जिह । तिण्णि वि खजन्तई मारिजन्तई रक्खेजहाँ अप्पाणु तिह॥

सत्ततीसमो संधि
२७१
मनमें सोचा तो क्या मैं अपने स्वभावपर लज्जित होऊँ ? कभी
नहीं । यदि मैं सच्ची निशाचरी होऊँगी तो अवश्य तुम्हारा भोग
करूँगी ।।१-६॥
सैतीसवीं सन्धि
तब चन्दनखा एक दम लज्जाहीन होकर गरजती हुई बोली,
"मरो मरो, मैं तुम्हारी वलि भूतोको दूंगी । अपने रूपका विस्तार
करती हुई, रण-रससे ओतप्रोत वह, राम और रावणकी साक्षात्
कलहकी भाँति जान पड़ती थी।
[१] बार-बार बढ़ती हुई वह कभी खिलखिला पड़ती
और कभी आगकी ज्वालामाला छोड़ने लगती । कोपानलसे
जलती हुई और भयभीपण वह ऐसी लगती थी मानो वसुधाकी
बाधा ही उत्पन्न हो गई हो। या रवि और कमलोके लिए
आकाश-गंगा ऊपर उठती चली आ रही हो। या बादलरूपी
दहीको मथ रही हो, या तारारूपी सैकड़ो बुदबुद बिखर गये हों,
या शशिरूपी नवनीतका पिण्ड लेकर ग्रहरूपी बच्चेको पीठा
लगानके लिए दौड़ पड़ रही हो। अथवा बहुत विस्तारसे क्या
मानो वह आकाशरूपी शिलाको उठा रही थी या राम और
लक्ष्मण रूपी मोतियोंके लिए, धरती और आसमान रूपी सीपीको
एक क्षणमे तोड़ना चाहती थी। (यह देखकर) गमने लक्ष्मणसे
फरा-"वत्स वत्स, तुम इस वधूके चरित्रको देखो ।" यह
सुनकर तृण बराबर भी नहीं डरती हुई चन्द्रनखा बोली, "जिस
तरह तुमने मेरे पुत्रको मारकर वह खड्ग लिया है उसी तरह
तुम तीनों मारे और पाये जाओगे, अपनी रक्षा कगे" ॥१-६॥

२७२
पउमचरिउ
[२]
वयणेण तेण असुहावणेण । करवालु पदरिसिड महुमहेण ॥१॥
दढ- कढिण- कढोरुप्पीलणेण । अङ्गुलि अङ्गुठ्ठावीलणेण ॥२॥
तं मण्डलग्गु थरहरइ केम । भत्तार-भए सुकलत्तु जेम ॥३॥
अणवरय-मउज्झरें णर-णिसुम्भ । तहिं दारिजन्त गइन्द-कुम्भं ॥४॥
जो धारहिँ मोत्तिय-णियरु लग्गु । पासेव-फुलिङ्गु बहु व वलग्गु ॥५॥
तं तेहउ खग्गु लएवि तेण । विजाहरि पभणिय लक्खणेण ॥६॥
'जे लइड सीसु तुह णन्दणासु । करवालु एउ तं सूरहासु॥७॥
जइ अस्थि को वि रण-भर-समत्थु । तहाँ सव्वहाँ उम्भिउ धम्म-हत्थु ॥८॥
खर-घरिगिए वृत्त 'ण होइ कज । को वारइ मारइ मइ मि अज्जु ॥६॥
घत्ता
सा एव भगेप्पिणु गलगजेप्पिणु चलहि अप्फालेवि महि ।
खर-दूसण-वीरहुँ अतुल-सरीरहुँ गय कूवारे चन्दहि ॥१०॥
[३]
रोवन्ति पधाइय दीण-वयण । जलहर जिह तिह वरिसन्ति णयण ।।
लम्वन्ति लम्ब-कडियल-समग्ग । ण चन्दण-लयह भुअन लग्ग ॥२॥
वीया- मयलन्छण- सण्णिहहिं । अप्पाणु वियारिड णिय-णहेहि ॥३॥
रुहिरोलिय थण-धिप्पन्त-रत्त । णं कणय-कलस कुङ्कम विलित्ति ॥४॥
ण दावइ लक्खण-राम-कित्ति । णं खर-दूसण-रावण-भवित्ति ॥५॥
णं णिसियर-लोयहाँ दुक्ख-खाणि । णं मन्दोयरिह सुपुरिस-हाणि ॥६॥
पइसारन्ति सङ्क। णिविसेण पत्त
णिय-मन्दिर धाहावन्ति णारि । णं खरदूसणहाँ पइट मारि ॥ll
णं लङ्कह
पायाललङ्क |॥७॥

सत्ततीसमो संधि २७३ [२] तव उसके असुहावने वचन सुनकर दृढ़ कठोर कठिन और सन्तापकारी लक्ष्मणने अँगुली और अंगूठेसे दवाकर उसे तलवार दिखाई । उसका मण्डलाय थर-थर काँप रहा था, मानो पतिके भयसे सुकलत्र ही थर-थर काँप रही हो । अनवरत मदजल झरते नरनाशक गजोंके कुम्भस्थलोंको विदीर्ण करनेसे उस खण्डकी धारमेंजोमोती समूह लग गया था मानो वही उसके प्रस्वेदकण रूपी चिनगारियाँ थीं। उस वैसे खड्गको लेकर लक्ष्मणने विद्याधरीसे कहा, "यह वही सूर्यहास खड्ग है जिसने तुम्हारे पुत्रके प्राण हरण किये, यदि कोई (तुम्हारा) मनुष्य रण-भार उठानेमें समर्थ हो तो उसके लिए यह धर्मका हाथ बढ़ा हुआ है।" यह सुन खर-पत्नी चन्द्रनखा वोली, "यह काम क्या नहीं हो सकता। देखू आज कौन मुझे मार या हटा सकता है। यह कहकर गरजती हुई और पैरोंसे धरतीको चपाती हुई, विलपती वह, अतुल देह खर और दृपणके निकट पहुँची ।।१-१०॥ [३] जब वह उनके पास पहुंची तो उसका मुख दीन था, वह रो रही थी और आँखोंसे मेघधाराको तरह अश्रुधारा प्रवा- हित थी । अपनी लम्बी केशराशि उसने कटिभाग तक ऐसी फैला रक्खी थी मानो सर्पसमूह चन्दनलतासे लिपट गये हों। दोजके चन्द्रकी तरह अपने नखोसे उसने अपने आपको विदीर्ण कर लिया था। रक्त-रजित उसके लाल स्तन ऐसे लगते थे मानो कुंकुममण्डित म्वणिम कलश हो । या मानो रामलक्ष्मणकी कीर्ति चमक उठी हो या मानो खर, दृपण और रावणकी भवितव्यता ही हो, मानो निशाचर के लिए दुखकी खान हो, मानो मन्दोदरीके पतिको हानि हो, या मानो ललाम प्रवेश करती हुई आशका ही हो। वह पलभर में पाताललझा जा पहुंची और अपने भवनम ढाढ़ मारकर ऐसे

२७४
पटमचरिउ
पत्ता
कूवारु सुणेप्पिणु धण पेक्खेप्पिणु राए वलें वि पलोइयउ ।
तिहुयणु संघारैवि पलउ समावि णाई कियन्त जोइयउ ॥
।
[४]
कूवारु सुणेवि कुल-भूसणेण । चन्दणहि पपुच्छिय दूसणेण ॥१॥
कह केणुप्पाडिउ जमहाँ णयणु । कह केण पजोइउ काल-वयणु ॥२॥
कहि केण कियन्तहाँ कियउ मरणु । कहि केण कियउ विस-कन्द-चरणु ॥३॥
कहि क्ण वद्ध पवणेण पवणु । कहि केण दड्ड
जलणेण
जलणु
॥१॥
कहि केण भिण्णु वजेण वज्जु । कहि वेण धरिउ जलु जलेंण अन्जु ॥४॥
कहि केण भाणु उण्हेण तविउ । कहि केण समुदु तिसाएँ खविउ ॥६॥
कहि केण खुडिउ फणि-मणि-णिहाउ । कहें केण सहिउ सुर-कुलिस-घाउ ॥७॥
कहि केण हुआसडें झम्प दिण्ण । कहें कण दसाणण-पाय छिण्ण ॥८॥
घत्ता
चन्दणहि पवोल्लिय अंसुजलोल्लिय 'जण-वल्लहु महु तणउ सुउ ।
ओलग्गइ पाणेहिं विणय-समाणेहिं णरवइ सम्वुकुमारु मुउ ॥६॥
[५]
आयण्णे वि सम्वुकुमार - मरणु । सतावण - सोय-विओय - करणु ॥१॥
पविरल-मुह वाह-भरन्त-णयणु । दुक्खाउरु दर
ओहुल्ल-वयणु ॥२॥
खरुरुयइ स-दुक्खइ 'अतुल-पिण्डु । हा अज्जु पडित
हा अज्जु जाय मणे गरुम सङ्क । हा अज्जु सुण्ण पायाललङ्क ।।।।
हा गन्दण सुर - पञ्चाणणासु । कवणुत्तर देमि दसाणणासु ॥५॥
एत्यन्त ताम तिमुण्ड-धारि । वहु -बुद्धि पजम्पिउ वम्भयारि ॥६॥
मह वाहु-दण्डु ॥३॥

सत्ततीसमो संधि रोने लगी जैसे खर-दूषणके लिए भारी ही घुस पड़ी हो। विला सुनकर, अपनी धन्याको देखनेके लिए खर इस तरह मुड़ जिस तरह संहार और प्रलय करनेके विचारसे कृतान्त मुड़क देखता है ।।१-६॥ [४] उसका क्रन्दन सुनकर कुलभूषण दूपणने चन्द्रनखासे पूछा, "कहो किसने (आज) यमके नेत्र उखाड़े, कहो किसने कालका मुख देखा है ? कहो किसने कृतान्तका वध किया, कहो वैलके स्कन्धको किसने चपेटा? कहो पवनसे पवनको किसने वाँधा, वताओ आगसे आगको कौन जला सका ? कहो वज्रसे वज्रका भेदन किसने किया? जलसे जलको धारण, आजतक किसने किया । सूर्यको उष्णताको आजतक कौन तपा सका ? कहो समुद्रको प्यास किसने शान्त की ? सॉपके फनसमूहको किसने तोड़ा ? इन्द्रके वज्रका आघात कौन सहन कर सका ? कहो वनकी आगको कौन बुझा सका है ? कहो रावणके प्राण कौन छीन सकता है ?" (यह सुनकर ) आँखोमे ऑसू भरकर चन्द्रनखाने कहा! “राजन् मेरा जनप्रिय सुन्दर पुत्र कुमार शम्बूक, विनयके समान अपने प्राणोको लेकर मर गया॥१-६ll [५] अपने पुत्रकी, सन्ताप, शोक और वियोग उत्पन्न करने- वाली मृत्युकी बात सुनकर, म्लानमुख गलिता दुःखातुर और भयकातर खर रो पड़ा। (वह विलाप करने लगा) हे अतुल शरीर, आज मेरा वाहुदण्ड ही टूट गया है, आज मेरे मनसे बड़ी भारी आशंका उत्पन्न हो गई है। आज पाताललंका सूनी-सूनी लग रही है। हे पुत्र, देवसिंह रावणके लिए मैं अब क्या उत्तर दूंगा।" इसी बीचमे एक त्रिपुण्डधारी बहुवुद्धि ब्रह्मचारीने

२७६
पउमचरित
'हे परवइ मूढा रुअहि काइँ । संसार भमन्तहु सुभ - सयाइँ ॥७॥
आयाई मुआई गयाइँ जाई । को सक्कइ राय गणेवि ताई ॥८॥
घत्ता
कहाँ घरु कहाँ परियणु कहाँ सम्पय-धणु माय वप्पु कहाँ पुत्तु तिय ।
के कजे रोवहि अप्पड सोयहि भव संसारहाँ एह किय' ॥६॥
.
जं दुक्खु दुक्नु सथविउ राउ । पडिवोल्लिउ णिय-घरिणिऍ सहाउ ॥१॥
'कहें.केण वहिउ महु तणउ पुत्तु' । तं वयणु सुर्णेवि धणिआएँ वुत्तु ॥२॥
'सुणु णरवइ दुग्गम दुप्पवेसें । दुग्धोड - थट्ट घहण
पवेस ॥३॥
पञ्चाणण - लक्खुक्खय - कराल । तहिं तेहएँ दण्डय-वणे विसाल ॥४॥
मणुस दिट्ट सोण्डीर वीर । मेहारविन्द सण्णिह सरीर ॥५॥
कोवण्ड-सिलीमुह - गहिय-हत्थ । पर - वल-वल-उत्थल्लण - समत्थं ॥६॥
तहि एकु दिट्ट तियसहुँ असमु । ते लइउ खग्गु हड़ पुत्तु मझु ॥७॥
अण्णु वि अवलोवहि देव देव । कक्खोर वियारिउ पेक्खु केव ।।८।।
व
घत्ता
वणे धरै वि रुयन्तो धाह मुअन्ती कह वि ण भुत्त तेण णरण ।
णिय-पुण्यहिँ चुक्की णह-मुह-लुक्की णलिणि जेम सरै कुञ्जरण' ॥६॥
[७]
तं वयणु सुर्णेवि वहु-जाणएहिँ । उवलक्खिय अर्णोहि राणएहिँ ॥१॥
'मालर - पवर - पीवर - थणाएँ । पर एयइ कम्मई अडयणाएँ ॥२॥
मन्छुडु ण समिच्छिय सुपुरिसेण । अप्पर विद्धसवि आय तेण ॥३॥
एत्यन्तर णिवइ णिएइ जाव । णह - णियर-वियारिय दिड ताव ॥४॥

सत्ततीसमो संधि २७७ कहा, "हे मूर्ख राजन् ! तुम रोते क्यों हो, संसार में तुम्हारे सैकड़ों पुत्र घूम रहे हैं इनमें जो मर गये हैं उनको कौन गिन सकता है। किसका घर, किसके परिजन, किसकी सम्पत्ति और धन, आखिर तुम रोते किस लिए हो, अपनेको शोकमें मत डालो, संसारका यही क्रम है ॥१-धा [६] बहुत कठिनाईसे सचेत होनेपर खर अपनी पत्नीसे कहा, "मेरे पुत्रको किसने मारा ?” यह सुनकर वह बोली, "दुर्गम और दुःप्रवेश्य गज-संघर्पसे आकुल प्रदेश, तथा लाखों सिंहोंसे विकराल उस वनमें मैने दो प्रचण्ड वीर देखे हैं। उनमेंसे एकके शरीरका रंग मेघवर्ण है और दूसरेका कमलके रंगका | धनुपबाण हाथमें लिये हुए वे दोनों शत्रुसेनाको परास्त करनेमे समर्थ है। उनमेंसे एकके पास सुन्दर कृपाण थी, उसीने उस खड्गको लिया है और मेरे पुत्रका वध भी किया है और हे देव ! यह भी तो सुनिए । उसने किस तरह मेरा वक्षस्थल विदीर्ण कर दिया है । वनमें रोती और ढाढ मारती हुई भी मुझे पकड़कर किसी तरह वे मेरा भोग भर नहीं कर पाये। नखाग्रसे विदीर्ण होने पर भी मै किसी प्रकार अपने पुण्योदयसे उसी प्रकार बच सको जिस तरह सरोवरमें कमलिनी हाथीसे बच जाय ।।१-६॥ [७] चन्द्रनखाके वचन सुनकर, सयानी और जानकार दूसरी दूसरी रानियोंको यह ताड़ते देर नहीं लगी, कि यह सब इसी (वेलके समान स्थूलस्तनी) कुलटाका कर्म है। शायद उस पुरुपने इसे नहीं चाहा होगा, इसी कारण अपनी ऐसी गत बनाकर, यह यहाँ आ गई। नखोंसे क्षत-विक्षत चन्द्रनखा खरको ऐसी लगी कि मानो लाल पलाशलता हो, या भ्रमरोंसे आच्छन्न

२७८
पउमचरित
किंसुय-लय व्व आरत्त-वण्ण | रतुप्पल-माल व भमर - छष्ण ॥५॥
तहिं अहरु दिड दसणग्ग-भिण्णु । ण बाल-तवणु फग्गुण उइण्णु ॥६॥
तं णयण-कढक्खवि खरु विरुद्ध । णं केसरि मयगल - गन्ध - लुइ,
भड मिउडि-भयङ्करु मुह-कराल । णं जगहों समुट्ठिउ पलय-काल ॥८॥
॥७॥
।
घत्ता
अमर वि आकम्पिय एम पजम्पिय 'कहाँ उप्परि आरु खरु' ।
रहु खञ्चिउ अरुणे सहुँ ससि-वरुणे 'भई वि गिलेसइ णवर णरु' 10
[८]
उढन्ते उटिड भड - णिहाउ । अस्थाण-खोहु णिविसेण जाउ ॥१॥
चूरन्त परोप्परु सुहड दुक्क । णं जलणिहि णिय-मजाय चुक्क ॥२॥
सीसेण सीसु पट्टेण पटु । चलणेण चलणु करु कर-णिहट्ट ॥३॥
मउडेण सउदु तुचि लग्गु । मेहलु मेहल - णिवहेण भग्गु ॥४॥
उहन्ति के वि तिण-समु गणन्ति । ओहावण - माणे ण वि णमन्ति ॥५॥
अह णमइ को वि किवणतणेण । पडिओ वि ण उहइ भडु भरेण ॥६॥
दूसणेण णिवारिय वद्ध - कोह । विहडप्पड सण्णज्झन्ति जोह ॥७॥
'जइ पउ वि देहु आरूसमाण । तो होमइ रायहाँ तणिय आण III
घत्ता
मं कजु विणासहाँ ताम वईसहाँ जो असि-रयणु मण्ड हरइ ।
सिरु खुडइ कुमारहों विजा-पारहों सो कि तुम्महि भोसरइ ॥६॥
[]
तो वरि किजउ मह तणिय बुद्धि । णरवइ असहायहाँ गस्थि सिद्धि ॥१॥
णाव वि ण वहइ विणु तारएण । जलणु वि ण जलइ विणु मारुएण ॥२॥
एक्कल्लड गम्पिणु काई करहि । रयणायरें सन्त तिसाएँ भरहि ॥३॥

सत्ततीसमो संधि
२७8
रक्तकमलोंकी माला हो। दन्ताय भागसे कटे हुए उसके अधर
ऐसे लगते थे मानो फागके महीनेमे सूर्योदय हुआ हो !" यह सब
देख सुनकर खर उसी तरह भड़क उठा जिस तरह गजको गन्ध
पाकर सिंह भड़क उठता है। उस योधाकी भृकुटि भयंकर और
आरक्त हो उठी । मानो जगमें प्रलय ही आना चाहता हो । देवता
काँपकर आपसमें कहने लगे "अरे, खर आज किसपर कुपित
हुआ है !” तदनन्तर शशि और वरुणके साथ रथमें चढ़कर खरने
कहा कि मैं भी उस पामरको कवलित करूँगा ॥१-६।।
[८] इस प्रकार उसके उठते ही भट-समूह उठ खड़ा हुआ।
पल-भरमें उसके दरवारमें खलबली मच गई। एक दूसरेको
चपेटते और चूर-चूर करते हुए योधा वहाँ पहुंचने लगे मानो
समुद्रने अपनी मर्यादा छोड़ दी हो। सिरसे सिर, पट्टसे पट्ट, पैरसे
पैर और हाथसे हाथ टकराने लगे। मुकुटसे मुकुट और मेखलासे
मेखला भग्न हो उठी। कितने ही योधा तृणके बराबर परवाह न
करते हुए उठे । दीनता या मानके कारण वे नमस्कार तक नहीं
कर रहे थे, यदि कृपणतावश कोई झुकता भी तो गिरकर सेनाके
भारके कारण उठ ही नहीं पाता। इस प्रकार अहङ्कारसे भरे,
क्रुद्ध तैयार होते हुए योधाओंको रोककर दूपण बोला, “यदि तुम
क्रुद्ध होकर एक भी पैर रखोगे तो राजाको अवज्ञा होगी, अपना
विनाश मत करो। तुम लोग बैठ जाओ। जिसने वल पूर्वक तलवार
(सूर्यहास) को हरण किया, और शम्बूक कुमारका सिरकमल
तोड़ा है, विद्यामें पारङ्गत क्या तुम लोगोंसे हटेगा ।।१-६॥
[६] इसलिए अच्छा यह हो कि तुम लोग हमारी बुद्धिके
अनुसार चलो, देखो विना तारकके नाव वह जाती है। बिना
पवनके आग तक नहीं जलती। इसलिए तुम अकेले गमन क्यों
,

२८०
पटमचरिट
सन्ते वि महग विसह चडहि । जिण अच्चिए वि संसार पडहि ||
जमु सारहि फुड मुवणेवीरु । सुन्वर-पहरण-चड्डिय
मगराया
जग केसरि अरि-कुल-पलय कालु । पर-बल-बगलामुहु मुभ-विसालु ॥३॥
दुहम- दागब- दुग्गाह- गाहु । सुरकरि-र- सम-थिर-थोर-बाहु ॥७॥
तलोक- मुबग्गल- मड- तडक्छ । दुइरिसग भीसण जम-मडक्क ॥८॥
घत्ता
तहाँ तिहुअण-महहाँ सुरमण-सन्हहाँ तियस-बिन्द-मंताबगहाँ।
गट सन्तु सुहगइ पई मोलगइ गप्पि कहिजइ रावणहाँ ॥३
[10]
आयोगवि तं दृसणहाँ बयणु । बरु खट पत्रोहिट गुङ्ग-गयणु ॥३॥
'विद्धिं लाननइ सुपुरिसाहुँ । पर एयई कम्मई कुपुरिसाहुँ ॥२॥
साहीणु • जोड दहन्यु जान । किह गम्मड़ अण्णहाँ पासु ताव ॥२॥
जाएं जीव भरिएनट । तो चरि पहरित वर-वरि-पुब्जें ॥
ल
लग्नइ साहुकाल लाए। अजरामर की वि ण नञ्च-ला ॥५॥
जिम मिडिल अनुरि-घर-समुहूँ। जिम तणिय मणोरह सत्रण-बिन्दै ॥३॥
जिम असि-सच्चल-कोन्तहिँमिष्णु। जिम जन्म-पहर तहलोके विष्णु ॥७॥
निमणहें तोसाविट नुस्-णिहाट। निन मह मि मनु खत्र-कालु आर [८]
1
वत्ता
जिम सत्तु-सिलायले बहु-सोणिय-जले भुट परिहव-पड अष्यणट ।
जम स-घट स-साहणु स-महस-पहरणु गट गिय-पुत्तहाँ पाहुणट
॥३॥

सत्ततीसमो संधि करते हो । (अरे) समुद्र पास होते हुए भी प्यासे क्यों मरते हो ? महागजके होनेपर भी चैलपर क्यों बैठते हो ? जिनेन्द्रकी पूजा करके भी संसारचक्रमें पड़ते हो? जिसका सारथि भुवनमें अद्वितीय वीर है, जिसका शरीर वज्रसे भी बढ़कर हद है जो विश्वसिंह अरिकुलके लिए प्रलयकाल है, शत्रु सेनाके लिए बड़वानल है, विशालबाहु दुर्दम-दानव ग्राहोंको पकड़नेवाला ऐरावतकी सँड़की तरह स्थूलवाहु त्रिलोककी भटशृङ्खलाको तोड़नेवाला दुर्दशनीय भीपण, और यमकी तरह चपेटनेवाला है ऐसे उस, देवोके लिए शल्य स्वरूप और सुरसंतापक रावणसे जाकर कहो कि शम्बूक कुमार मारा गया है। आप (उसके हत्यारेका) पीछा करें॥१-६।। [१०] खर कड़ककर बोला, "धिकार धिक्कार तुम्हें, तुम सुपुरुपोंको लजा रहे हो, यह कापुरुपोंका कर्म हो सकता है। साहसी पुरुपके जब तक देहमे प्राण रहते हैं तब तक क्या वह दूसरेके पास जाता है। जो उत्पन्न हुआ है उसे जब मरना हो है तो अच्छा यही है कि शत्रु-समूह पर प्रहार किया जाय । उससे लोकमे साधुकार (शावाशी) तो मिलेगा, फिर इस मर्त्यलोकमें अजर-अमर कौन है ? आज मैं अरिसमुद्रसे अवश्य भिड़ेगा जिससे स्वजनोका मनोरथ पूरा हो, असि, सव्वल और कोतसे इस तरह भिड़ें गा, इस तरह तीनो लोकोमे यशका डड्का वजाऊँगा, आकाश लोकमें सुरसमूहको इस तरह सन्तुष्ट करूँगा, भले ही इस तरह मेरा क्षयकाल आ जाय । आज मैं, बहु रक्तरञ्जित शत्रुरूपी शिलातलपर, अपने पराभवके पटको इस तरह धोऊँगा कि जिससे अपने पुत्रकी ही तरह उसे अतिथि (परलोक) का अतिथि बना सकूँ॥१-३॥

२८२ परमचरिट [११] तं णिसुणवि णिय-कुल-भूसणेग । लहु लेहु विसजिउ दूसग ॥१॥ सण्णद्ध खरु वि वहु-समर-सूरु । अपफालवि वले संगाम-नूरु ॥२॥ विहढप्फड भड सण्गद्ध के वि । सम्माण - दाणु रिणु संभरेवि ॥३॥ केण वि करेण करवालु गहिड । केण वि धणुहरु तोणार-महिउ ॥४॥ वेण वि मुसण्डि मोग्गरु पचण्डु । केण वि हुलि केण वि चित्तदण्ड ॥५॥ णाणाविह • पहरण-गहिय-हत्य । सण्गद्ध सुहड रण - भर-समस्य ॥६॥ णीसरिउ सेण्णु परिहवि सड़। णं वमेवि लग्ग पायाल - लई ॥७॥ रह - तुरय -गइन्द-णरिन्द-विन्द । ण सु-कइ-मुहहाँ णिग्गन्ति सह ॥८॥ घत्ता खर-दूसण-साहणु हरिस-पसाहणु अमरिस-कुद्ध धाइयउ । गयणगग लोयड णावइ वीयउ जोइस-चक्कु पराइयउ ॥६॥ [१२] जं दिटु णहङ्गगें दणु-णिहाउ । वलएवं वुत्त सुमित्ति - जाउ ॥१॥ 'गुड दीसइ काई णहग्ग-मग्गें। किं किण्गर-णिवहु व चलिउ मागें ॥२॥ किं पवर पक्वि कि घण विसह । कि वन्दग-हत्तिएँ सुर पयह ॥३॥ तं वयणु सुणेप्पिणु भगइ विण्हु । 'वल दीसह वइरिहि तणउ चिहु ॥धा बग्गेण विवाइड मीनु जासु । कु. लग्गड मन्छुडु को वि तामु अवरोप्पल ए मालाव जाव । हकारिउ रक्तशु खरण ताव ॥an 'जिह सन्युकुमारहाँ रइय पाण । तिह पाव पडिच्चहि एन्न वाग ॥७॥ जिह लइड खणु पर-णारि भुत्त । तिह पहरु पहरु पुग्णालि-पुत्त' 11 सत्ततीसमो संधि २८३ [११] यह सुनकर निजकुलभूषण दूषणने शीघ्र रावणके पास लेख भेजा। उधर, अनेक युद्धोमें वीर खरने भी तैयार होकर रण- भेरी वजवा दी। अभिमानी कितने ही योधा, अपने प्रभुके सम्मान दान और ऋणकी याद करके तैयारी करने लगे। किसीने अपने हाथमे तलवार ली । किसीने तूणीर सहित धनुप ले लिया। किसीने प्रचण्ड भुसुंडि और मुद्गर, किसीने हुलि, किसीने चित्रदंड, इस तरह नाना अस्त्रोंको हाथमें लेकर, युद्धभार उठानेमें समर्थ आशंका छोड़कर सेना निकल पड़ी। पाताललंकामें कल-कल शब्द होने लगा। रथ, घोड़े, गजेन्द्र, और नरेन्द्र ऐसे निकल पड़े मानो कविके मुखसे शब्द ही निकल पड़े हो। खर दूपणकी सेना हर्षसे सन्नद्ध होकर, अमर्प और क्रोधसे भरकर, आकाशसे जा लगी। उस समय ऐसा लगता था मानो आकाशमें दूसरा ही ग्रहचक्र आ पहुँचा हो ।।१-६॥ [१२] आकाशमें निशाचरोंका समूह देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा, "देखो यह क्या दीख रहा है, क्या कोई किन्नर-समूह स्वर्गको जा रहा है, या ये बड़े-बड़े पक्षी हैं, या विशेप महामेष या कि यह देवसमूह है जो जिनकी धन्दना-भक्तिके लिए जा रहा है।" यह सुनकर लक्ष्मणने कहा, “यह तो शत्रुकी सेना दिखलाई पड़ रही है, पहचानिए । मैने तलवारसे जिसका सिर काटा था शायद उसीका कोई आत्मीयजन कुढ़ गया है। इस तरह उनकी आपसमे वाते हो ही रही थी कि खरने लक्ष्मणको ललकारा-"तुमने जैसे शम्बूक कुमारके प्राण लिये है । पाप, अब वैसे ही, आते हुए मेरे वाणोकी प्रतीक्षा कर । तूने यह खड्ग क्या लिया दूसरेकी स्त्रीका हो भोग किया है । हे पुंश्चलीपुत्र ! वचा-बचा

२८१
पउमचरित
घत्ता
एकेक-पहाणहुँ खरण समाणहुँ चउदह सहस समावडिय ।
गय जेम मइन्दहाँ रिउ गोविन्दहाँ हकारेप्पिणु अभिडिय ॥९॥
[१३]
एत्थन्तर भड-कडमद्दणेण । जोक्कारिउ रामु जणहणेण ॥१॥
'तुहुँ सीय पयत्ते रक्खु देव । हउँ धरमि सेण्णु मिग-जूहु जेम ॥२॥
जव्वेल करेसमि सीह-णाउ । तब्वेल एज धणुहर-सहाउ' ॥३॥
तं वयणु सुणवि विहसिय-मुहेण । आसीस दिण्ण सीराउहेण ॥॥
'जसवन्तु चिराउसु होहि वच्छ । करें लग्गउ जय-सिरि-वहुभ सच्छ ॥५॥
तं सेवि णिमित्तु जणणेण । वइदेहि णमिय रिउ-महणेण ॥६॥
तं णिसुणे वि सीयएँ वुत्तु एम । 'पञ्चिन्दिय भग्ग जिणेण जेम ॥७॥
वावीस परीसह चउ कसाय । जर-जम्म- मरण सण-काय-वाया ॥८॥
घत्ता
जिह भग्गु परम्मुहु रणे कुसुमाउहु लोहु मोहु मउ माणु खलु ।
तिह तुहुँ भन्जेजहि समर जिणेजहि सयलु वि वइरिहिँ तणउ वलु' ॥६
[ १४ ]
आसीस-वयणु तं लेवि तेण । अप्फालिउ धणुहरु महुमहेण ॥१॥
ते सहें वहिरिउ जगु असेसु । थरहरिय वसुन्धरि डरिउ सेसु ॥२॥
खरलक्खण वे वि मिडन्ति जाव । हकारिउ हरि तिसिरेण ताव ॥३॥
ते भिडिय परोपर हणु भणन्त । णं मत्त महागय गुलगुलन्त ॥४॥
णं केसरि घोरोरालि देन्त । वाणेहिं वाण छिन्दन्ति एन्त ॥५॥
मोग्गर-खुरुप्प-कण्णिय पडन्ति । जीवेहि जीव णं खयहाँ जन्ति ॥६॥
एत्यन्तर अतुल
परक्कमेण । अद्धेन्दु मुक्कु
पुरिसोत्तमेण ॥७॥
तहाँ तिसिरउखुकण कह वि भिण्णु । धणुहरु पाडिउ धय-दण्डु छिण्णु ॥८॥

सत्ततीसमो संधि २८५ अपनेको।" इस प्रकार खरके समान एक-से-एक प्रमुख योधाओंने लक्ष्मणको घेर लिया तब वह भी हुंकार भरकर युद्धमें जाकर भिड़ गया ॥१-६॥ [१३] उसी बीच शत्रुसेनाका संहार करते हुए लक्ष्मणने रामसे कहा, “देव ! आप सीताकी रक्षा प्रयत्नपूर्वक कीजिये । मैं इस शत्रु-सैन्यको मृगमुंडकी तरह अभी पकड़ता हूँ। आप धनुप लेकर मेरी सहायताके लिए तब आयें जब मैं सिंहनाद करूँ।" यह सुनकर रामने लक्ष्मणको आशीर्वाद दिया और यह कहा, "वत्स तुम चिरायु बनो, यशस्वी हो, जयश्री वधू तुम्हारे हाथ लगे।" यह बात सुनकर रिपुसंहारक लक्ष्मणने सीतादेवीको प्रणाम किया। तव सीता बोली "जिस प्रकार जिनने पाँचौं इन्द्रियोको भङ्ग किया, बाईस परीपह, चार कपाय-जरा, जन्म, मरण, मन, वचन, कायको वशमे किया, तथा रणमुखमे कामदेवको पराजित किया, लोभ, मोह, मद, मानको जीता उसी प्रकार तुम भी युद्ध में जीतो और समस्त शत्रुसेनाका नाश करो ॥१-६।। [१४] इस आशीर्वादको लेकर धनुर्धारी लक्ष्मणने अपना धनुप चढ़ाया । उसकी ध्वनिसे ही सारा जग वहरा हो गया। धरती कॉप उठी और शेप नाग डर गये। खर और लक्ष्मण भिड़ने ही वाले थे कि वीर त्रिशिराने लक्ष्मणको ललकारा । मानो सिंह ही दहाड़ उठा हो, या मदगज ही चिग्घाड़ा हो । मुद्गर, खुरपा, कर्णिक इस तरह पड़ने लगे मानो जीवसे जीव ही नाशको प्राप्त हो रहा हो । इतनेमे पुरुपोत्तम अतुल पराक्रमी लक्ष्मणने अर्धचन्द्र छोड़ा, उससे त्रिशिराका शिर किसी प्रकार बच गया। वह भग्न नहीं हुआ । उसका धनुप और ध्वजदण्ड छिन्न-भिन्न होकर गिर पड़े।

२८६
पउमचरित
भण्णुण्णु पुणुप्पुणु समर बहुग्गुणु जं जं तिसिरउ लेवि धणु ।
तं तं उक्कण्ठइ खणु वि ण संख्इ दइव-विहूणहाँ जेम धणु ॥९॥
[१५]
धणुहरु सरु सारहि छत्त-दण्ड । जं वाणहिँ किउ सय-खण्ड-खण्ड ॥१॥
तं अमरिस-कुढे दुन्दरेण । संमरिय विज विज्जाहरेण ॥२॥
अप्पाणु पदरिसिठ वद्धमाणु । तिहिं वयण हिँ तिहिंसीस हिँ समाणु ॥३॥
पहिलउ सिरु ककाड-कविल-केसु । पिङ्गल-लोयणु किय-बाल-चेसु ॥२॥
वीयउ सिरु वयणु विणव-जुवाणु । उभिण्ण-वियड-मासुरि - समाणु ||५||
तइयउ सिरु धवलउ धवल-वयणु । फुरिभाहरु दर-णिडुरिय-णयणु ॥६॥
दुरिसणु भीसणु वियड-दादु । जिण-भत्ता जिणवर-धम्म-गाहु ।।७।।
एल्थपतर
पर-चल-महणेण । वच्छत्यले विधु जगहणेण ॥८॥
पत्ता
णाराऍहि मिन्हें वि सीसइ छिन्दै वि रिट महि-मण्डले पाडियट ।
सुरवर हिँ पचण्ड हि स इँ भुव-दण्ड हि कुसुम-वासु सिर पाडियट ॥६॥
[३८. अट्टतीसमो संधि
तिसिरउ लक्खणण समरङ्गण घाइउ जाव हिं।
तिहुअण-डमर-कर दहबयणु पराइड ता हिँ ॥
[१]
लेहु विसजिउ जो सुर-सीहहाँ । अग्गए पडिउ गम्पि दसगीवहाँ ॥५॥
पडिउ गाई वहु-दुक्खहँ भारु । णाई णिसायर-कुल-संघारु ॥२॥

अद्वतीसमो संधि
२८७
बहुगुणी त्रिशिरा बार-बार युद्ध में दूसरा धनुष लेता पर वह भग्न
होकर गिर पड़तो। वह वैसे ही क्षणभर भी नहीं ठहरता जैसे
भाग्यसे आहत व्यक्तिका धन ॥१-६।।
[१५] धनुप वाण-सारथि छत्र दण्ड सभीको बाणोंसे जव
लक्ष्मणने सौ-सौ टुकड़े कर दिये तब विद्याधर त्रिशिरा अमर्प और
क्रोधसे भर उठा । तब उसने अपनी विद्याका स्मरण किया।
तत्काल वह तीन मुख और तीन सिरका हो गया। उसका आकार
बढ़ गया । उनमें पहले सिरपर कठोर और कपिल केश थे। वह
छोटा (वालरूप ) था। आँखें पीली थीं। दूसरा मुख और सिर
नवयुवकका था । उद्भिन्न और विकट मासुरिके सत्श । तीसरेके
मुख और सिर, दोनों सफेद ही सफेद थे। अधर काँप रहे थे
और आँखे अत्यन्त भयावनी थीं । अति दुदर्शनीय भीपण
विकराल डाढ़ थी । जिनधर्मकी तरह प्रगाढ़ और जिन भक्त ।
परन्तु परवलसंहारक लक्ष्मणने उसे वक्षस्थलमे वेध दिया।
लक्ष्मणके वाणोसे उसके तीनो सिर कट गये और शत्रु धरणी-
मण्डलपर गिर पड़ा। यह देखकर सुरवरोने अपने प्रचण्ड बाहुओसे
उसके ऊपर फूलोको चर्पा को ॥१-६||
अड़तीसवीं संधि
जब तक लक्ष्मणने समराङ्गणमें त्रिशिराको मारा, तब तक
त्रिभुवन भयंकर रावण भी वहाँ आ पहुंचा।
[२] सुरसिह रावणके पास दूपणने जो लेखपत्र भेजा था,
वह उसके सम्मुख ऐसे पड़ा था मानो रावणपर दुखका (भार)
पहाड़ ही टूट पड़ा हो, मानो राक्षसकुलका संहार हो, या मानो

पटमचरिट
गाई भयङ्कर क्लहहाँ नृल । णाई दसाणणन्मत्या-चूल ॥३॥
लेहें कहिट सत्रु अहिणाणहिँ । 'सम्बुकुमार उलग्गइ पागें हिँ ॥
अण्णु वि तग-रयणु उहालि । खर-परिणिहें हियवर विद्यारिट ॥५॥
तं णिसुवि वे वि जसभूसण । पर-वले भिडिय गम्पि खर-दृसण ।।
णारि-रयणु गिल्बनु लोहगर । अच्छइ रावण नुस्मु जे जोग्गड'
लेहु गिवि अत्याणु विस वि । पुप्फत्रिमाणे चढिड गलगर्जे विमा
कर करवालु करेप्पिणु धाइट । णिविलें दण्डारणु
पराइट |
घत्ता
ताब जगहणण वरसग साहणु ल्दछ ।
विर बउर वलु णहँ णिचलु संसऍ युद्धा
[२]
तो एत्यन्त दोहर-णयणे । लक्खणु पोमाइट दहवयणें ॥३
'वरि एछल्लो वि पञ्चागणु । र सारङ्ग-णिवहु वृण्णाणणु ॥२॥
चरि एकलओ वि मयलब्णु । ण च णवत्त-णिवहु णिहशु ॥३॥
वरि एकलओ वि रयणायन । णड जलवाहिणि-णियह स-विस्यरु ॥धा
वरि एकहो वि वइसाणरु । णउ वण-णिबहु स-रक्च-गिरिवर ॥५॥
चउन्ह सहस एक्कु जो लमइ । सो समरङ्गण मइ मि णिसुम्मइ ॥६॥
पेस्तु म पहरन्नु पईमइ । धणुहरु सर संघाणु ण दोसइ ॥७॥
घत्ता
णहि गय णहि तुरय णहि रहवर णहि धय-दण्डई
णवरि पढन्ताई दीसन्ति महियले रण्डई ॥
[३]
हरि पहरन्तु पसंसिड जावहिं । जाणइ णयणकडत्तिय ताहि ॥5॥
सुकइ-कह वसु-सन्धि सु-सन्धिय । सु-पय सुचयण सु-ससु-बदिय ॥२॥

भट्टतीसमो संघि २८० कलहका भयङ्कर मूल हो या रावणके मस्तकका शूल हो । उस लेखने अपने अभिज्ञानसे ही बता दिया, कि शम्बुकुमारके प्राणोंका अन्त हो गया । खग रन छीन लिया गया, और खरकी बीके अङ्ग विदीर्ण कर दिये गये । यह सुनकर यशोभूषण दोनों भाई खर और दूपण जाकर शत्रु-सेनासे भिड़ गये हैं। वहाँ एक सुभग और अनुपम नारी रत्न है, हे रावण, वह तुम्हारे योग्य है।" वह लेख पढ़कर रावणने दरवार विसर्जित कर दिया । वह गरजकर, अपने पुष्पक विमानपर चढ़ गया। हाथमें तलवार लेकर वह दौड़ पड़ा और पलभरमें दण्डक वनमें जा पहुँचा। इतनेमें वहाँ लक्ष्मणने खर-दूपणको सेनाको अवरुद्ध कर लिया ! संशयमें पड़ी हुई चतुरङ्ग सेना आकाशमें निश्चलरूपसे स्थित थी। वह सब देखकर, विशाल नेत्र रावणने लक्ष्मणकी प्रशंसा की-सिंह अकेला ही अच्छा, मुंह ऊपर उठाये हरिणोंका मुण्ड अच्छा नहीं; मृगलांछित चन्द्रमा अकेला अच्छा, पर लांछनरहित वहुत-सा तारा-समूह अच्छा नहीं; रलाकर अकेला ही अच्छा, विस्तृत नदियोंका समूह ठीक नहीं। आग अकेले अच्छी, पर वृक्ष पर्वत समन्वित वन- समूह अच्छा नहीं। जो अकेला ही चौदह हजार सेनाको नष्ट कर सकता है, वह मुझे भी नष्ट कर देगा। देखो प्रहार करता हुआ वह कैसे प्रवेश कर रहा है। उसके धनुपचाणका संघान दिखाई ही नहीं देता। न अश्व, न गज, न रथवर और न ध्वज-दण्ड केवल धड़ ही धड़ धरती पर गिरते हुए दिखाई देते हैं ॥१-५॥ [३] प्रहार-शील कुमार लक्ष्मणकी जब वह इस प्रकार प्रशंसा कर ही रहा था कि इतनेमें ही उसने सीताको देखा। वह मुक्रविकी कथाकी तरह सुसंधि (परिच्छेद, अङ्गोंके जोड़) १४ पउमचरित थिर-कलंहस-गमण गइ-मन्थर । किस मज्झार णियम्बे सु-वित्थर ॥३॥ रोमावलि मयरहरुत्तिण्णी । णं पिम्पिलि-रिन्छोलि विलिण्णी ॥४॥ अहिणव - हुण्ड-पिण्ड - पीण-स्थण | ण मयगल उर-खम्भ-णिसुम्भण ॥५॥ रेहइ वयण-कमलु अकलङ्कउ । णं माणस-सर वियसिउ पङ्कट ॥६॥ सु-ललिय-लोयण ललिय-पसण्णहूँ । णं वरइत्त मिलिय वर-कण्णहें ॥७॥ घोलइ पुटिहि वणि महाइणि । चन्दण-लयहि ललइ णं गाइणि ll घत्ता कि बहु-जम्पिएण तिहिं भुवणे हिं जं जं च । तं तं मेल वि दइवें णिम्मिउ अङ्ग हा [४] तो एत्यन्तर णिय-कुल-दीवें । रामु पसंसिउ पुणु दहगीवें ॥१॥ 'जीविउ एक्कु सहलु पर एयहाँ । जसु सुहवत्तणु गउ परि यहाँ ॥२॥ जेण समाणु एह धण जम्पइ । मुह-मुहेण तम्बोलु समप्पइ ॥३॥ हत्थे हत्य धरै वि आलावइ । चलण-जुअलु उच्छङ्ग चडावइ ॥४॥ आलिङ्गइ वलय-सणाहहिं । मालइ - माला - कोमल-वाहहिं ॥५|| पेल्लावइ-थण-मायङ्गै हिँ । मुहु परिचुम्वइ गाणा-भौं हिँ ॥६॥ जं अवलोयइ णिम्मल-तार हिँ । जयणहिँ विन्मम-भरिय-वियारहि ॥७॥ जं अणुहुञ्जइ इच्छेवि णिय-मणे । तासु मल्लु को सयलॅ वि तिहुअणे ॥८॥ सी. . सी. डा.

अठतीसमो संधि , सुसन्धिय (शब्द-खण्डके जोड़, अवयवोंके जोड़से सहित) सुपय (सुवन्त तिङत पद और चरण) सुवयण (वचन और मुख) सुसद्द (वर्ण और स्वर) और सुबद्ध थीं। कलहंसगामिनी, और मन्थरगतिसे चलनेवाली, उसका मध्यभाग कृश था, नितम्ब अति विस्तृत थे। कामदेवसे अवतीर्ण रोमराजि ऐसी ज्ञात होती थी मानो चीटियांकी कतार ही उसमें संलग्न हो गई हो । अभिनव मुख-हीन पीन-स्तन ऐसे जान पड़ते थे मानो उररूपी स्तम्भको नष्ट करनेवाले मदमाते हाथी हो । सीताका अमल मुख-कमल ऐसा सोहता था मानो मानसरोवर में कमल खिल गया हो । उसके सुन्दर नेत्र ऐसे लगते थे, मानो ललित प्रसन्न सुन्दर कन्याओंको वर ही मिल गये हों, उसकी पीठपर बड़ी-सी चोटी ऐसी लहरा रही थी कि मानो चन्दन लतासे नागिन ही लिपट गई हो। अधिक कहने से कोई लाभ नहीं, त्रिभुवनमें जो कुछ अच्छा था उसे लेकर ही विधाताने सीताके अङ्गोंको गढ़ा था ॥१-६।। [४] फिर निजकुलदीपक रावणने रामकी प्रशंसा करते हुए कहा, "केवल एक इसी रामका जीवन सफल है, क्योंकि इसकी सज्जनता अपनी चरम सीमापर पहुंच चुकी है। इसके साथ यह धन्या संलाप करती है, बार-बार पान देती है, उसके पैरोंको अपनी गोदमे रखती है, हाथमें हाथ लेकर बात-चीत करती है। मालती-मालाकी तरह कोमल और चूड़ियो सहित अपने हाथोसे आलिङ्गन करती है । नाना भंगिमावाले संघर्षशील स्तनरूपी मातंगासे मुँह चूमती है। विभ्रमभरित और विकारशील निर्मल तारावाले अपने नेत्रोसे इन्हें देखती है। अपने मनसे कामना करके यह सीता जिस रामका भोग करती है, भला समस्त त्रिभुवनमें उसका प्रतिमल्ल कौन हो सकता है। यह मनुष्य धन्य पउमचरित घत्ता । धण्णउ एहु णरु जसु एह णारि हियइच्छिय । जाव ण लइय मई कउ अङ्गहाँ ताव सुहच्छिय' ॥९॥ [५] सीय णिएवि जाउ उम्माहउ । दहमुहु चम्मह-सर-पहराहउ ॥३॥ पहिलए वयणु वियारेहि भन्नइ । पेम्म-परब्बसु कहाँ वि ण लज्जइ ॥२॥ वीयएँ मुह-पासेउ वलग्गइ । सरहसु गाढालिगणु मग्गइ ॥३॥ तइयएँ भइ विरहाणलु तप्पइ । काम-गहिल्लउ पुणु पुणु जम्पइ ॥४॥ चउथए णीससन्तु णउ थक्कइ । सिरु संचालइ भउँहर वकइ ॥५॥ पञ्चमें पञ्चम-झुणि मालावइ । विहसैं वि दन्त पन्ति दरिसावइ ॥६॥ छट्टएँ अङ्गु वलइ करु मोडइ । पुणु दाढीयउ लएप्पिणु तोडइ ॥७॥ वह तल्लवेल्ल सत्तमयहाँ । मुच्छउ एन्ति जन्ति अटुमयहाँ ॥८॥ णवमउ वहइ मरणहाँ दुक्कउ । दसमए पाहिँ कह व ण मुक्कउ ॥६॥ घत्ता दहमुहु 'दहमुहँ हि जाणइ किर मण्डएँ भुमि'। अप्पउ संथवइ 'णं णं सुर-लोयहाँ लज्जमि' ॥१०॥ [६] तो एत्यन्तरें सुर-संतासें । चिन्तिउ एक्कु उवाउ दसास ॥१॥ अवलोयणिय विज मणे झाइय । 'दे आएसु' भणन्ति पराइय ॥२॥ 'किं घोटेण महोवहि घोहमि । कि पायालु णहङ्गणे लोहमि ॥३॥ किं सहुँ सुरहिं सुरेन्दु परजमि । किं मयरद्धय-पुरि-गउ भक्षमि ॥४॥ किंजम-महिस-सिगु मुसुमूरमि । किसेसहाँ फणिमणि संचूरमि ||५|| किं तक्खयहाँ दाढ उप्पाडमि । काल-कियन्त-वाणु कि फाढमि ॥६॥ कि रवि-रह-तुरन उहालमि । किं गिरि मेरु करग्गे टालमि ॥७॥ । ।

२६३ अतृतीसमो संधि है जिसकी ऐसी हृदय-वांछिता पत्नी है। जब तक मैं इसे ग्रहण नहीं करता तव तक मेरे अङ्गोंको सुखका आसन कहाँ ॥ १-६॥ [५] सीताको देखते ही रावणको उन्माद होने लगा। वह कामके वाणोसे आहत हो उठा । कामकी प्रथमावस्थामें उसका मुख विकारोंसे क्षीण हो गया। प्रेमके वशीभूत होकर वह तनिक भी नहीं लजा रहा था, दूसरी दशामें उसका मुख पसीना-पसीना हो उठा, और हर्पपूर्वक वह आलिङ्गन माँगने लगा, तीसरीमें वियोग की आगसे वह जल उठा और कामग्रस्त होकर बार-बार वह वकने लगा। चौथी दशामें उसके अनवरत निश्वास चलने लगे। कभी वह सिर हिलाता और कभी भौंहें टेढ़ी करता । पाँचवी अवस्थामे वह पञ्चम स्वरमें बोलने लगा और हँसकर अपने दॉत दिखाने लगा। छठीमें अङ्ग और हाथ मोड़ता और दाढ़ी पकड़कर नोचने लगता । आठवीमे उसे मूर्छा आने लगी, नौवींमें मृत्यु आसन्न प्रतीत होने लगी । दशवी अवस्थामे किसी प्रकार केवल उसके प्राण ही नहीं निकल रहे थे। तब रावणने अपने आपको यह कह- कर सान्त्वना दी कि "बलपूर्वक सीताका अपहरणकर मैं दशों मुखोंसे उसका उपभोग करूँगा। अन्यथा सुरलोकको लजित करूँगा"।।१-१०॥ [६] सुरपीड़क रावणको इसी समय एक उपाय सूझा । और उसने अवलोकिनी विद्याका चिन्तन किया। तुरन्त ही वह 'आदेश दो कहती हुई आई और बोली, "क्या पानकर समुद्रको मोग्य दूँ, या देवोंसे सहित इन्द्रको पराजित करूँ या जाकर काम- देवको ध्वस्त कर दूं, या यममहिपके सींग उखाड़कर फेंक दूं, या शेपनागके फण-मणियोंको चूर-चूर कर दू या तक्षककी दाढ़ उसाड़ दूं या कृतान्तका मुख फाड़ डालें। या सूर्यके रथके अश्व

पउमचरिउ
कि तइलोक्क चक्कु संघारमि । किं अस्थक्कएँ पलउ समारमि' ॥८॥
घत्ता
वुत्तु दसाणणण 'एक्केण वि ण वि महु कज्जु ।
तं सङ्केउ कह में हरमि एह तिय भज्जु ॥६॥
[७]
'जाव समुहावत्तु
चाउ
दहवयणहाँ वयणेण सु-पुजएँ । पणिउ पुणु अवलोयणि विजए ॥१॥
करेकहों। वजावत्तु
अण्णेकहाँ ॥२॥
जावग्गेउ वाणु करें एकहाँ । वायवु वारुणत्थु
अण्णेकहाँ ॥३॥
जाम सीरु गम्भीरु करेकहाँ। करयले
ताव णारि को हरइ दिसेवहुँ । मण्डएँ
वासुएव-वलएवहुँ ॥५॥
इय पच्छण्ण वसन्ति वणन्त । तेसट्टा-पुरिसहुँ अन्भन्तर ॥६॥
जिण चउवीस अद्ध गोवद्धण । णव केसव राम णव रावण ॥७॥
चक्काउहु अण्णेकहाँ ॥४॥
घत्ता
ओए भवट्ठम इय वासुएव वलएव ।
जाव णव हिय रण तिय ताम लइज्जइ केव ॥८॥
[-]
अहवइ एण काइँ सुर्णे रावण । एह गारि तिहुअण-संतावण ॥१॥
लइ लइ जइ अजरामर वट्टहि । लइ लइ जइ उप्पहण पयहि ॥२॥
लइ लइ जइ वडत्तणु खण्डहि । लइलइजइ जिण-सासणु छण्डहि ॥३॥
लइ लइ जइ सुरवरहुँ ण लज्जहि । लइ लइ जइ णरयहाँ गमु सज्जहि ॥४॥
लइ लइ जइ परलोउ ण जाणहि । लइ लइ जइ णिय-आउ माणहि ॥५॥
लइ लइ जइ णिय-रज्जु ण इच्छहि । लइ लइ जड़ जम-सासणु पेच्छहि ॥६॥

अद्वतीसमो संधि छीन लूँ, या मन्दराचलको अपनी अंगुलीसे टाल दूं। क्या त्रिलोकचक्रका संहार कर दूँ, या फौरन प्रलय मचा दूं।” (यह सुनकर) रावणने कहा-"यह सब करनेसे मेरा एक भी काम नहीं सधेगा। कोई ऐसा उपाय वताओ जिससे मैं उस स्त्रीको प्राप्त कर सकूँ" ॥ १-६॥ [७] रावणके वचन सुनकर समादरणीय अवलोकिनी विद्याने कहा, "जब तक एकके हाथमे समुद्रावर्त और दूसरेके हाथमें वज्रावर्त धनुप है। जब तक एकके हाथमें आग्नेय वाण है और दूसरेके हाथमे वायव्य और वारुण आयुध है। जब तक एक हाथमें गम्भीर हल और दूसरे हाथमें चक्रायुध है, तबतक पथिक राम और लक्ष्मणसे सीता देवीको कौन छीन सकता है। ये लोग त्रेसठ महापुरुपोंमें से एक हैं और प्रच्छन्न रूपसे वनवास कर रहे हैं। वे प्रेसठ महापुरुष हैं-बारह चक्रवर्ती, नौ नारायण, नौ वलभद्र, नौ प्रतिनारायण और चौवीस तीर्थकर । उनमें भी ये वासुदेव और बलभद्र बहुत ही बलिष्ठ हैं । जब तक तुम्हारे मनमें युद्धको इच्छा नहीं तब तक तुम इस स्त्रीको कैसे पा सकते हो ?" ॥१-८॥ [=] अथवा इससे क्या यह नारी, हे रावण! त्रिभुवनको सतानेवाली है। यदि तुम अपनेको अजर-अमर समझते हो तो इस नारीको ग्रहण कर सकते हो । यदि तुम उन्मार्ग पर चलना चाहते यो, यदि तुम अपना बड़प्पन धूलमें मिलाना चाहते हो तो इसे ले लो। यदि जिन-शासन छोड़ना चाहते हो तो इसे ले लो, यदि तुम सुरश्रेष्ठासे नहीं लजाते तो इसे ले लो। यदि तुम नरक जानेका साज सजाना चाहते हो तो इसे ले लो। यदि तुम परलोकको नहीं जानते तो इसे ले लो। यदि अपने राज्यको तुम्हें इच्छा नई रे नो इसे ले लो। यदि तुम यमशासनकी इच्छा करते हो तो २९६ पउमचरित लइ लइ जइ गिविण्णउ पाणहुँ । लइ लइ जइ उरु उड्डहि वाणहुँ' ॥७॥ तं णिसुणेवि वयणु असुहावणु । अइ-मयणाउरु पभणइ रावणु ||८|| घत्ता 'माणवि एह तिय जं जिज्जइ एक मुहुत्तउ । सिव-सासय-सुहहाँ तहाँ पासिउ एउ वहुत्तउ' || [६] विसयासत्त-चित्तु परियाणे वि । विज्जएँ वृत्तु णिरत्तउ जाणेवि ॥१॥ 'णिसुणि दसाणण पिसुणमि भेउ । वेण्ह वि अस्थि एक्कु सङ्घउ ।।२।। एहु जो दीसइ सुहड रणगणें । वावरन्तु खर-दूसण-साहणें ॥३॥ एयहाँ सोहणाउ आयणें वि । इट-कलत्त व तिण-समु मणे वि ॥४॥ धावइ सीहु जेम ओरालवि । वज्जावत्तु चाउ ओरालवि । वज्जावत्तु चाउ अप्फालेवि ॥५॥ तुहुँ पुणु पच्छए धण उहालहि । पुप्फ-विमाणे छुहवि संचालहि' ॥६॥ तं णिसुणेप्पिणु पणिउ राउ । 'तो घई पई जे करेवड गाउ' ॥७॥ पहु-आएसें विज्ज पधाइय । णिविसें तं संगामु पराइय ॥८ । घत्ता लक्खणु गहिय-सरु ज णिसुणिउ गाउ भयङ्करु । धाइउ दासरहि गहें स-धणु णाई णव-जलहरु ॥६॥ [१०] भीसणु सीह-णाउ णिसुणेप्पिणु । धणुहरु करें सज्जीउ करेप्पिणु ॥३॥ तोणा-जुवलु लएवि पधाइउ । 'मन्छुडु लक्खणु रण विणिवाइउ' ||२|| कु लग्गन्त राम सुणिमित्त । सउणु ण देन्ति होन्ति दु-णिमित्तइँ ॥३॥ फुरइ स-वाहउ वामउ लोयणु । पवहइ दाहिण-पवणु अलक्खणु ॥४॥ r अतीसमो संधि ले लो। यदि तुम्हें अपने प्राणोंसे विरक्ति हो गई है तो इसे ले लो। यदि अपने वक्षको वाणोंसे भिदवाना चाहते हो इसे ले लो, इन असुहावने वचनाको सुनकर अत्यन्त कामातुर रावणने कहा, "यही तो एक मनुप्यनी है जो एक मुहूर्तके लिए मुझे जिला सकती है। शाश्वत शिवस्वरूपकी मुझे अपेक्षा नहीं, मुझे यही बहुत है" ॥१-६॥ [६] तब उसे अत्यन्त विपयासक्त समझकर और उसके निश्चयको जानकर, विद्या बोली, "सुन दशमुख ! मैं एक रहस्य प्रकट करती हूँ। उन दोनों (राम और लक्ष्मण) के बीच में एक संकेत है। यह जो सुभट (लक्ष्मण) रणांगणमें दीख पड़ता है और जो खर-दूपणकी सेनासे लड़ सकता है, इसके (लक्ष्मण) सिंहनादको सुनकर दूसरा (राम) अपनी प्रिय स्त्रीको तृणवत् छोड़कर, वसावर्त धनुप चढ़ाकर सिंहकी भॉति गरजता हुआ दौड़ पड़ेगा। उसके पीछे ( अनुपस्थिति में) तुम सीताको उठाकर पुष्पक विमानमें लेकर भाग जाना।" यह सुनकर रावणने कहा कि यदि ऐसा है तो सिंहनाद करो। प्रभुके आदेशसे विद्या दौड़ी और पलभरम संग्रामभूमिमें पहुंच गई । इतनेमे लक्ष्मणका भयङ्कर और गम्भीर स्वर सिंहनाद सुनकर नये जलधरकी तरह राम धनुष लेकर दौड़े ॥१-६॥ [१०] सिंहनाद सुनते ही हाथमें धनुप, और दोनों तरकस लेकर गम दौड़े यह मोचकर कि कहीं युद्धमें लक्ष्मण आहत होकर ना नाी गिर पड़ा । गमके पीछा करने पर, उन्हें सुनिमित्त ( शान ) दिवाई नहीं दिये । अपशकुन ही हो रहे थे। उनका यांचा हार और नत्र फड़कने लगा। नाकके दाएँ रंध्रसे हवा निएर गया। कौआ विटप बोल रहा था। 'सयार' गे रहा -

२६८
पउमचरिउ
वायसु विरसु रसइ सिव कन्दइ । अग्गएँ कुहिणि भुअङ्गमु छिन्दह ॥५॥
पड़गुरन्त उद्धाइय । णाई णिवारा सयण पराइय ॥६॥
दाहिणेण पिङ्गलय समुट्ठिय । पहें णत्र गह विवरीय परिट्रिय ॥७॥
तो वि वीर अवगण वि धाइउ । तक्खणें तं सद्भामु पराइड ॥८॥
घत्ता
दिहइ राहण लक्खण-सर-हंस हि खुढिय।।
गयण-महासरहाँ सिर-कमलइ महियल पडियई ॥६॥
[११]
दिछ रणगणु राहवचन्द । रमिट वसन्तु णाई गोविन्दे ॥१॥
कुण्डल-कडय-मउड-फल-दरिसिय । दणु-दवणा-मञ्जरिय पदरिसिय ॥२॥
गिद्धावलि - किय - चक्कन्दोलउ । णरवर-सिरइ लएप्पिणु केलउ ॥३॥
रणे खेल्लन्ति परोप्परु चच्चरि । पुणु पियन्ति सोणिय-कायम्वरि ॥॥
तेहउ समर-वसन्तु रमन्तउ । लक्सणु पोमाइउ पहरन्तउ ।।५।।
'साहु वच्छ पर तुमु जि छज्जइ । अण्णहाँ कासु एउ पडिवज्जइ ॥६॥
पइँ इक्खाउ-चंसु उज्जालिउ । जस-पढहउ तिहुमणे अम्फालिउ' ॥७॥
तं णिसुणेप्पिणु भणइ महाइड । 'विरुअउ कियउ देव ज माइउ ।।८।।
घत्ता
मेल्लेवि जणय-सुय कि राहव थाणहाँ चलियउ ।
अक्खइ मझु मणु हिय जाणइ केण वि छलिय' ॥६॥
[१२]
पुणरवि वुच्चइ मरगय-वण्णे । 'हरण करेमि गाउ किउ अण्णे ॥१॥
तं णिसुणेवि णियत्तइ जावे हिँ । सीया-हरणु पढुक्किड तावहिं ॥२॥

अट्टतीसमो संधि २६६ था, आगे साँप रास्ता काटकर आ रहा था ? जम्बूक लड़खड़ाकर ऐसा उठा मानो स्वनिवारित मन ही लौटकर आया हो। दाहिने ओर खुसुर खुसुर शब्द होने लगा । आकाशमें ग्रहोंकी उल्टी स्थिति दीख पड़ने लगी। तो भी वीर राम, इन सबकी उपेक्षा करके दौड़े गये और पल भरमें युद्धभूमिमें जा पहुंचे। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि लक्ष्मणके वाणरूपी हंसोंसे उच्छिन्न आकाश रूपी महासरोवरके सिररूपी कमल धरातलपर पड़े है ॥१-६।। [११] राघवने युद्ध-स्थलमें लक्ष्मणको इस प्रकार देखा कि मानो वह चसन्त क्रीड़ा कर रहा हो । उसके कुण्डल, कटक और मुकुट फलके रूपमें देख पड़ रहे थे, दानवरूपी दवण मञ्जरी थी। गृद्धावलि ही मानो चक्रांदोलन था। तथा नरसिरोंके कन्दुक लेकर वे लोग परस्पर रणमें चर्चरी खेल खेल रहे थे। वादमें रक्तकी मदिराका पान कर रहे थे। इस प्रकार युद्धरूपी वसन्तमें क्रीड़ा करते हुए आक्रमणशील लक्ष्मणकी रामने प्रशंसा की, "साधु वीर साधु, यह तुम्हें ही शोभा देता है, दूसरे किसके लिए यह उपयुक्त हो सकता है। तुमने सचमुच इक्ष्वाकुकुलको उज्ज्वल किया ! तुमने सचमुच तीनों लोकोंमें अपने यशका डंका पीटा है।" तब यह सुनकर आदरणीय लक्ष्मणने कहा, "देव बहुत बुरा हुआ यह । आप सीताको छोड़कर उस स्थानसे क्यों हटे । मेरा मन कह रहा है कि किसीने छल करके सीताका अपहरण कर लिया है॥१-६॥ [१२] मरकत मणिके रंगकी तरह श्याम लक्ष्मणने फिर कहा, "मैंने (सिह) नाद नही किया, किसी और ने किया होगा । यह सुनते ही राम जव तक लौटकर (डेरेपर) आये, तब तक दशानन सीताका हरण कर चुका था। (उनकी अनु-

३००
पउमचरित
आउ दसाणणु पुप्फ-विमाणे । णा पुरन्दरु सिविया-जाण ॥३॥
पासु पढुक्किउ राहव-घरिणिहँ । मत्त-गइन्दु जेम पर-करिणिहें ॥४॥
उभय-करहिं संचालिय-थाणहाँ । णाई सरीर-हाणि अप्पाणहाँ ॥५॥
णाई कुलहाँ भवित्ति हक्कारिय । लङ्कह सङ्क गाइ पइसारिय ॥६॥
णिसियर-लोयहाँ णं वज्जासणि । णाई भयङ्कर-राम-सरासणि ॥७॥
ण जस-हाणि खाणि वहु-दुक्खहुँ । णं परलोय कृहिणि किय मुक्खहुँ ।।८।।
घत्ता
तक्खणे रावणॆण ढोइर विमाणु आयासहाँ।
काले कुद्धऍण हिउ जीविउ णं वण-वासहाँ ॥६॥
[१३]
चलिउ विमाणु ज जै गयणगणें । सीयरें कलुणु पकन्दिउ तक्खणें ॥१॥
तं कूवार सुणेवि महाइउ । धुणे वि सरीरु जडाइ पधाइउ ॥२॥
पहउ दसाणणु चन्चू-घाएँ हिं । पक्खुक्खेवहि णहर-णिहाएँ हिं ॥३॥
एक्क-वार ओससइ ण जावहिं । सयसय-चार झडप्पइ ताहिँ ॥४॥
जाउ विसण्ठुलु वइरि-वियारणु । चन्दहासु
मण
सुमरइ पहरणु ॥५॥
सीय वि धरइ णियड्गु वि रक्खइ । लज्जइ चउदिसु णयणकडक्खइ ॥६॥
दुक्खु दुक्खु ते धीरवि अप्पड । कर-णिट्ठुर-दढ-कढिण - तलप्पउ ॥७॥
पहउ विहङ्गु पडिड समरगणे । देवहिं कलयलु कियउ णहगणें ॥८॥
।
घत्ता
पडिड जडाइ रण खर-पहर-विहुर-कन्दन्तउ ।
जाणइ-हरि चलहुँ तिहि मि चित्तइ पाडन्तउ ॥६॥

अहवीसमो संघि
पस्थितिमें ) पुष्पक विमानमें बैठाकर रावण वैसे ही आया जैसे
इन्द्र अपनी शिविकामें बैठकर आता है। मन्दोन्मत्त हाथी जिस
तरह दूसरेकी हथिनोके पास पहुंचता है, उसी तरह रावण रामकी
पत्नीके निकट पहुंच गया। अपने दोनो हाथोंसे उसने
सीता देवीको उठा क्या लिया हो, मानो अपने ही शरीरकी
हानि की हो, या अपने ही कुलके लिए सर्वनाशका आह्वान किया
हो, या लंकाके लिए आशंका उत्पन्न कर दी हो। वह सीता देवी
मानो निशाचर-लोकके लिए वज्र थी या रामका भयङ्कर धनुष
थी, क्या यशकी हानि, और बहुदुःखोंकी खान थी। या मानो
मूोंके लिए परलोकके लिए पगडंडी थी। शीघ्र ही रावण अपना
विमान आकाशमें ऐसे चढ़ा ले गया मानो ऋद्ध कालने एक
वनवासीका जीवन हरण कर लिया हो ॥ १-६॥
[१३] आकाश-प्रांगणमें जैसे ही विमान पहुँचा सीता देवीने
अपना क्रंदन करना प्रारम्भ कर दिया। उस विलापको सुनते ही
आदरणीय जटायु दौड़ा आया। और उस पक्षीराजने चोंचकी
मार, पंखोंके उत्क्षेप और नखोके आघातसे रावणको आहत कर
दिया। वह उसे एक बार पूरा हटा नहीं पाता कि वह पक्षी
सौ सौ वार झपट पड़ता। शत्रुसंहारक रावण (प्रहारो से)
एकदम खिन्न हो उठा। उसने अपने चन्द्रहास खड्गका चिंतन
किया। कभी वह सीताको पकड़ता, कभी वह अपनी रक्षा करता,
कभी लन्जित होकर चारों ओर देखता, फिर किसी तरह बड़े कष्टसे
अपनेको धीरज वधाता, अन्तमें अपने कठोर निष्ठुर आघातसे
समरांगणमे जटायुको आहत कर दिया। देवताओने आकाशमें
कलकल शब्द किया। जानकी, राम और लक्ष्मणको स्मरण करता
हुआ वह धरती पर गिर पड़ा ।। १-६॥

३०२
पउमचरिउ
[१४]
पडिड जडाइ ज ज फन्दन्तउ । सीयएँ किउ अक्वन्दु महन्तउ ॥१॥
'अहाँ अहाँ देवहाँ रणें दुवियड्डहाँ । णिय परिहास ण पालिय सण्ढहाँ ॥२॥
वरि सुहडत्तणु चन्चू-जीवहाँ । जो अभिट्टु समर दसगीवहाँ ॥३॥
णउ तुम्हें हिं रक्खिउ वडत्तणु । सूरहाँ तणउ दिट्छ सूरत्तणु ॥४॥
सञ्चउ चन्दु वि चन्द-गहिल्लउ । वम्भु वि सोत्तिउ हरु दुम्महिलउ ॥५॥
वाउ वि चवलत्तणेण दमिज्जइ । धम्मु वि रण्ड-सएहि लइज्जइ ॥६॥
वरुणु वि होइ सहावं सीयलु । तासु कहि मि कि सङ्कइ पर-चलु ॥७॥
इन्दु वि इन्दवहेण रमिज्जइ । को सुरवर-सण्ढे हिँ रखिज्जइ ॥८॥
घत्ता
जाउ कि जम्पिऍण जग अण्णु ण अन्भुद्धरणउ ।
राहड इह-भवहाँ पर-लोयहाँ जिणवर सरणउ' ॥९॥
[१५]
पुणु वि पलाउ करन्ति ण थक्कइ । 'कुठे लग्गउ लग्गउ जो सका ॥१॥
हउँ पावेण एण अवगणे वि । णिय तिहुअणु अ-मणूसउ मण्णे वि॥२॥
पुणु वि कलुणु कन्दन्ति पयट्टइ । 'एहु अवसरु सप्पुरिसहों वटइ ॥३॥
अह मइ कवणु णेइ कन्दन्ती । लक्खणराम वे वि जइ हुन्ती ॥४॥
हा हा दसरह माम गुणोवहि । हा हा जणय जणय अवलोयहि ॥५॥
अपराइएँ हा हा केकइ । हा सुप्पह सुमित्ते सुन्दर-मइ ॥६॥
हा सत्तुहण भरह भरहेसर । हा भामण्डल भाइ सहोयर ॥७॥
हा हा पुणु वि राम हा लक्खण । को सुमरमिकहाँ कहमि अ लक्षण ॥८॥
घत्ता
को संथवइ मई को सुहि कहाँ दुक्खु महन्तउ ।
जहिँ जहि जामि हउँ तं त जि पएसु पलित्त' ॥६॥

अट्ठीसमो संधि ३०३ [१४] तड़फड़ाकर जटायुके गिर पड़नेपर सीता और भी उच्चस्वरसे विलाप करने लगी, "अरे अरे रणमें दुर्विदग्ध देवो! तुम अपनी प्रतिज्ञाका भी पालन नहीं कर सके । तुमसे तो चंचु- जीवी जटायु पक्षीका ही सुभटपन अच्छा है । ( कमसे कम )वह युद्ध में रावणसे लड़ा तो। तुम अपना बड़प्पन नहीं रख सके । सूर्यका सूर्यपन भी मैने देख लिया, चन्द्रमा वास्तवमें राहुग्रस्त हैं। ब्रह्मा तो ब्राह्मण ही ठहरे, विष्णु दो पत्नीवाले हैं। वासुदेव भी अपनी चपलतासे दम्भी हो रहे है, धर्मदेव भी सैकड़ों राडोंसे लज्जित हो रहे हैं। वरुण तो स्वभावसे ही शीतल हैं। शत्रु-सेनाको उनसे क्या शङ्का हो सकती है। इन्द्र भी अपने इन्द्रपनको याद कर रहे हैं । भला देव-समूहने (आजतक ) किसकी रक्षा की है । और फिर क्या दुनियामे चिल्लानेसे किसीका उद्धार हुआ है । अब तो इस जन्ममे राम, और दूसरे जन्ममें जिनवरकी ही शरण मुझे प्राप्त हो ॥१-६॥ [१५] सीतादेवी बार-बार विलाप करती हुई नहीं अघा पा रही थीं, जो सम्भव था उससे उन्होंने दशाननका सामना किया । बार-बार वह (सीता देवी) यही सोच रही थीं कि तीनों लोकोंमे मुझे अनाथ समझ, इस प्रकार अपमानित करके ले जा रहा है। सत्पुरुपका यही तो अबसर है । यदि राम और लक्ष्मण यहॉ होते तो इस तरह विलपती हुई मुझे कौन ले जा सकता था। हा दशरथ, हे गुणसमुद्र मामा, हा पिता जनक, हे अपराजिता, हे कैकयी, हे सुप्रभा, हे सुन्दरमति सुमित्रा, हा शत्रुघ्न, हे भरतेश्वर भरत! हा सहोदर भामंडल। हा राम, लक्ष्मण ! अभागिनी मैं (आज) किससे कहूँ। किसको याद करूँ। मुझे कौन सहारा देगा। अपना इतना भारी दुख किससे निवेदित करूँ। मैं जिस प्रदेशमें जाती हूँ वही आगसे प्रदीप्त हो उठता है ॥१-६॥

पउमचरित [१६] तहिँ अवसर वहन्त सु-विउलए । दाहिण-लवण-समुहहाँ कूलएँ ॥१॥ अस्थि पचण्ड एक्कु विज्जाहरु । वर-करवाल-हत्थु रणे दुद्धरु ॥२॥ भामण्डलहों चलिउ ओलग्गएँ । सुभ कन्दन्ति सीय तामग्गए ॥३॥ वलिउ विमाणु तेण पडिवक्खहाँ। 'णं तिय का विभणइ म. रक्खहाँ ॥४॥ लक्खण-राम वे वि हक्कारइ । भामण्डलहों णामु उच्चारइ ॥५॥ मन्छुडु एह सीय ऍहु रावणु । अण्णु ण ण पर-कलत्त-संतावणु ॥६॥ अच्छउ णिवहाँ पासु जाएवउ । एण समाणु अज्जु जुन्झवउ' ॥७॥ एम भणेवि तेण हकारिउ । 'कहिं तिय लेवि जाहि' पच्चारित ॥८॥ घत्ता 'विहि मि भिडन्ताहुँ जिह हणइ एक्कु जिह हम्मइ । गेण्हें वि जणय-सुय वलु वलु कहिँ रावण गम्मई' ॥९॥ [१७] । वलिउ दसाणणु तिहुअण-कण्टउ । सीहहाँ सीहु जेम अभिट्टउ ॥१॥ जेम गइन्दु गइन्दही घाइड । मेहहाँ मेहु जेम उद्धाइड ॥२॥ भिडिय महावल विज्जा-पाणे हिँ । वे वि परिट्ठिय सिविया-जाणे हि ॥३॥ वे वि पसाहिय णाणाहरणे हि । वेणि वि वावरन्ति णिय-करणहि ॥४॥ वेण्णि वि धाय देन्ति अवरोप्परु । मणे विरुद्ध भामण्डल-किङ्कर ॥५॥ वर-करवालु करेप्पिणु करयलें । पहउ दसाणणु वियड-उरत्थलैं ।।६।। पडिउ घुलेप्पिणु जण्हुव-जोत्तहि । रुहिरु परिसिउ दसहि मि सोते हि ॥७॥ पुणु विज्जाहरण पञ्चारिउ । 'सुरवर-समर-सएहि अ-णिवारिउ ।। तुहुँ सो रावणु तिहुवण-कण्टउ । एक्के घाएं णवर पलोहिउ' ॥६ अद्वतीसमो संधि ३०५ [१६] उस अवसरपर दक्षिण समुद्रके विशाल तटपर अत्यन्त प्रचण्ड एक विद्याधर रहता था। हाथमैं खड्ग लिये, युद्धमें दुर्धर, वह भामण्डलका अनुचर था जो उसकी सेवामें कही जा रहा था। उसने सीतादेवीके विलापको सुन लिया। उसे लगा कि कोई स्त्री पुकार रहो है कि मेरी रक्षा करो, वह राम और रावणका नाम बार-बार ले रही है। फिर वह भामण्डलका भी नाम लेती है। कहीं यह सीता और रावण न हो। क्योंकि दशाननको छोड़कर और कौन परस्त्रीका हरण कर सकता है। "चाहे मैं राजा भामण्डलके पास न जा सकूँ पर मुझे इस दुष्टसे अवश्य जूझना चाहिए ।" यह निश्चयकर वह रावणको ललकारकर व्यङ्गमें कहा, "अरे अरे, स्त्रीको उड़ाकर कहा जा रहा है। आओ हम दोनो लड़ ले । जिससे एक मरे और या दूसरा। रावण ! मुडो, मुड़ो सीताको लेकर कहाँ जा रहे हो" ॥ १-६॥ [१७] तब त्रिभुवनकण्टक दशानन उस विद्याधरसे उसी प्रकार भिड़ गया जिस प्रकार सिह सिंहसे, गजेन्द्र गजेन्द्रसे और मेय मेघसे टकरा पड़ते हैं। दोनोंके हाथमें विद्याएँ थीं। दोनों ही शिविकामे बैठे थे। दोनों ही विविध आभूपणोसे भूपित थे। दोनों ही अपने हाथोंसे प्रहार कर रहे थे। दोनों एक दूसरेपर आघात करना चाह रहे थे। अपने मनमे क्रुद्ध होकर भामण्डलके अनुचर उस विद्याधरने अपनी उत्तम कृपाण हाथमे लेकर रावणकी छाती पर आघात किया । आहत होकर वह घुटनोके वल गिर पड़ा ? दशी धागऑमें उसका रक्त प्रवाहित हो उठा। तब वह विद्याधर व्यद्गके स्वरमै बोला-"देवताओके शत-शत युद्धोंमे दुर्निवार और त्रिभुवनकण्टक रावण तुम्ही हो, जो आज केवल एक ही आघात में लोट-पोट हो गये। इतनेमें सचेतन होकर और युद्धमत्सरसे परमचरिट घत्ता चेयणु लहें वि रणे भडु उटिड कुरुडु स-मच्छरु । तहाँ विज्जाहरहाँ थिट रासिहि णाई सणिच्छरु ।।१०॥ [१८] उटिउ वीसपाणि असि लेन्तड । णाई स-विज्जु मेहु गज्जन्तउ ॥१॥ विज्जा-छेड करें वि विज्जाहर । पत्तिउ जम्बूदीवन्भपत ॥२॥ पुणु दससिर संचल्लु स-सीयट । णहयल णाई दिवायर वीयउ ॥३॥ मम समुहहाँ जयसिरि-माणणु । पुणु वोल्लेबएँ लग्गु साणणु ॥४॥ 'काइँ गहिल्लिए मइँण समिच्छहि । किं महएवि-पटु ण समिच्छहि ।।५।। किं णिक्कण्टड रन्जु ण भुजहि । किं ण वि सुरच-सोक्खु अणुहुजहि ॥३॥ कि महु केण वि भगगु मढप्फरु । कि दूहड किं कहि मि असुन्दर' ॥७॥ एम भणे वि आलिङ्गइ जाहिं । जणय-सुयएँ णिव्भच्छिउ ता हिँ ।।८।। घत्ता 'दिवसेंहि थोवएँ हिँ तुहुँ रावण समरें जिणेवउ । अम्हहुँ वारियएँ राम-सरें हिं आलिङ्गंवर' [११] । णिटुर-बयणे हि दोच्छिर जावहिं । दहमुहुहुमउ विलक्खड ताव हि ॥१॥ 'जड़ मारमि तो एह ण पेमि । वोल्लड सव्वु हसेप्पिणु अच्छमि ॥२॥ अवसें के दिवसु इ इच्छेसइ । सरहसु कण्ठ-प्रगहणु रेस ॥३॥ 'अण्णु वि मइँ णिय-बट पालेब्वट । मण्डएँ पर-कलत्तु ण लगब्बर' || एम भणेवि चलिड सुर-ढामल । लङ्क पराइट 1 लह-महावर ॥॥

अहुतीसमो संधि भरकर दशानन उठा। वह विद्याधरके सम्मुख इस प्रकार स्थित हो गया मानो राशियोके समक्ष शनि-देवता ही आ बैठे हो ॥१-६॥ [१८] रावण खड्ग लेकर ऐसे उठा, मानो विजली और महामेघ ही गरजा हो । तव उसने विद्याधरकी विद्याको छेदकर उसे जम्बूद्वीपके भीतर कहीं फेंक दिया। (वादमे ) रावण सीताको लेकर चल दिया। (वह आकाशमें ऐसा चमक रहा था) मानो दूसरा ही सूर्य हो। फिर समुद्रके वीचमें, जयश्रीका अभिमानी रावण बार-बार सीता देवीसे कहने लगा-"हठीली, तुम मुझे क्यो नही चाहतीं। क्या तुम्हें महादेवी पदकी चाह नहीं है, क्या तुम निष्कण्टक राज्यका भोग करना नहीं चाहती। क्या सुरति-सुखका आनन्द लेना नहीं है । क्या किसीने मेरा मान भग किया है। क्या मै दुर्भग हूँ या असुन्दर", ऐसा कहकर व्यो ही उसने सीता देवीका आलिंगन करना चाहा त्योही उसने उसकी भर्त्सना की और कहा-"रावण, थोड़े ही दिनमे तुम जीत लिये जाओगे और हमारी परिपाटीके अनुसार रामके वाणांसे आलिंगन करोगे" ||१-६॥ [१६] इन कठोर वचनांसे लांछित रावण मनमें बहुत ही दुम्बी हुआ। उसने मन ही मन विचार किया कि यदि मैं मारता है तो इसे फिर देख नहीं सकता, इसलिए सब बातोंको हँसकर टालते रहना ही अच्छा है। अवश्य ही कोई न कोई ऐसा दिन होगा कि जब मुझे चाहने लगेगी और हर्पोत्फुल्ल होकर मेरे (कण्ठ का) आलिङ्गन करेगी। और भी फिर मुझे अपने इस व्रतका पालन करना है कि मैं परन्त्रीको बल-पूर्वक ग्रहण नहीं करूंगा। एस अग्नमंजसमें पड़ा हुआ देव-भयङ्कर बड़े-बड़े वरोंको प्राप्त

पउमचरिट
सीयएँ वुत्तु 'ण पइसमि पट्टणें । अच्छमि एत्थु विउले णन्दणवणे ॥६॥
जावे ण सुणमि वत्त भत्तारहों। ताव णिवित्ति मज्मु आहारहाँ' ॥७॥
तं णिसुणे वि उववणे पइसारिय । सीसव-रुक्ख-मूल वइसारिय ॥८॥
घत्ता
मेल्लं विसीय वणे गउ रावणु घरहाँ तुरन्तउ ।
धवलहि मङ्गलहिँ थिउ रज्जु स इंभु अन्तउ ॥६॥
[३६. एगुणचालीसमो संधि ]
.
कुढे लग्गोप्पिणु लक्षणहाँ वलु जाम पडोवउ आवइ ।
तं जि लयाहरु तं जि तर पर सीय ण अप्पर दावइ ।।
[१]
जीसीय
वणु अवयज्जियउ । णं सररहु लच्छि-विसज्जियउ ॥१॥
पं मेह-विन्दु णिन्चिज्जुलउ । णं मुणिवर-वयणु अ-चच्छलउ ।।२।।
णं भोयणु लवण-जुत्ति-रहिउ । अरहन्त-विम्वु णं अ-चसहिउ ॥३॥
णं दत्ति-विवज्जिउ किविण-धणु । तिह सीय-विहूणउ दिछ वणु ॥४॥
पुणु जोअइ गुहिले हिँ पइसर वि । थिय जाणइ जाणइ ओसर वि ||५||
पुणु जोवइ गिरि-विवरन्तरहि । थिय जाणइ ल्हिक्कवि कन्दर हि ॥६॥
ताणन्तर दिछ जढाइ वणे । ससूडिय-गत्तउ पढिउ रणें ॥७॥

पुगुणचालीसमो संधि करनेवाला रावण चला और लङ्कामें पहुंच गया। तब सीता देवीने कहा-"मैं नगरमें प्रवेश नहीं करूँगी, मैं इसी विशाल नन्दन वनमें रहूँगी और जबतक मै अपने पतिका समाचार नहीं सुन लेती तवतक मै आहारका त्याग करती हूँ " तव रावण सीता देवीको नन्दन वनमें ले गया और वहाँ शिंशपा वृक्षके नीचे उन्हें छोड़ दिया। इस प्रकार सीता देवीको नन्दनवनमे छोड़कर वह तुरन्त अपने घर चला गया । धवल और मङ्गल गीतोके साथ वह अपने राज्यका भोग करने लगा ॥१-६॥ उनतालीसवीं संधि इधर राम लक्ष्मणकी बात मानकर जैसे ही लौटकर आये तो उन्होंने देखा कि (आश्रम) मे लतागृह वही है, वृक्ष भी वही है, पर सीता देवी कही भी दृष्टि-गोचर नहीं हो रही हैं। ] सीता देवीसे विहीन वह वन रामको ऐसे लगा मानो शोभासे हीन कमल हो, या विद्युत्से रहित मेघ-समूह हो या वात्सल्यसे शून्य मुनि-वचन हो, नमकसे रहित भोजन हो, या मानो देवगृहोचित आसनसे विहीन जिन-प्रतिविम्ब हो या कि दानसे रहित कृपण हो । सीता देवीसे रहित वन रामको ऐसा ही दीख पड़ा। यह सोचकर कि जानकी शायद कहीपर जान-बूझकर छिपकर बैठी हैं उस लतागुल्मोमें खोजने लगे। फिर उन्होंने उन्हें पर्वतोंकी कन्दराओंमें दृढ़ा, हो सकता हो वह वहीं जा छिपी हो । इतनेमें रामको जटायु पक्षी दीख पड़ा । क्षत-विक्षत होकर (वह)

३१०
पउमचरित
घत्ता
पहर-विहुर-घुम्मन्त-तणु जं दिट्छ पक्खि णिहलियउ ।
तावहिं बुज्झिउ राहवण हिय जाणइ केण वि छलियउ ॥८॥
[२]
पुणु दिग्ण तेण सुह वसु-हारा । उच्चारवि पञ्च णमोकारा ॥१॥
सारभूय जिण-सासणहाँ । जे मरण-सहाय भव-जणहाँ ॥२॥
लद्धेहिं जेहिं दिढ होइ मइ । लद्धेहि जेहिं परलोय-गइ ॥३॥
लद्ध हिँ जेहिं संभवइ सुहु । लद्ध हिं जेहिं गिजरइ दुहु ॥४॥
ते दिण्ण विहङ्गहाँ राहवण । किय-णिसियर-णियर - पराहवेण ।।५।।
'जाएज्जहि परम-सुहावहण । अणरण्णाणन्तवीर पहण ॥६॥
तं वयणु सुर्णेवि सन्वायरण । लहु पाण विसज्जिय णहयरेण ॥७॥
जं
मुड जडाइ हिय जणय-सुअ । धाहाविउ उभा करवि भुभ ॥८॥
ज
धत्ता
'कहिँ हउँ कहि हरि कहिँ घरिणि कहिँ घरु कहिँ परियणु छिण्णउ ।
भूय-चलि व्व कुडुम्बु जगें हय-दइवे कह विविखण्ण' ॥६॥
[३]
वलु एम भणेवि पमुच्छियउ । पुणु चारण-रिसिहि णियच्छियउ ॥३॥
वारण वि होन्ति अट्टविह-गुण । जे णाण-पिण्ड सीलाहरण ॥२॥
फल फुल्ल-पत्त-णह - गिरि-गमण । जल • तन्तुअ - जला - सचरण ||३||
तहिं वीर सुर्धार विसुद्ध-मण । णह-चारण आइय वेण्णि जण ||
ते अवहीं-णाणे जोइयउ । रामहाँ कलत्त विच्छोइयउ ।।५।।
आऊरवि गल-गम्भीर-झुणि । पुणु लग्गु चवेवर जेठ-मणि ॥६॥
'भो चरम-देह सासय-गमण । के कज्ज रोवहि मूढ-मण ॥७॥

एगुणचालीसमो संधि युद्ध-भूमिमें पड़ा हुआ था। प्रहारोंसे अत्यन्त विधुर कम्पित-शरीर और अधकुचले हुए उस जटायुको देखकर रामने पूछा-"कौन सीताको छल करके हर ले गया । ॥१- [२] फिर रामने णमोकार मन्त्रका उच्चारण करके उसे आठ मूलगुण दिये । ये मूलगुण जिन-शासनके सार-भूत हैं, और मृत्युके समय भव्य जनोके लिए अत्यन्त सहायक होते है। इनको ग्रहण करनेसे बुद्धि दृढ़ होती है । परलोककी गति सुधरती है । जिनको ग्रहण करनेसे सुख सम्भव होता है । जिनको ग्रहण करनेसे दुखका क्ष्य होता है । निशाचर-समूहके संहारक रामने ऐसे मूल गुणोंका उपदंश करते हुए कहा-"तुम अनरण्य और अनन्तवीरके शुभ- मार्गसे जाओगे।" यह सुनते ही महनीय जटायुने अपने प्राणोका विसर्जन कर दिया। उसकी मृत्यु और सीता देवीके अपहरणको देखकर राम अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर डाढ़ मारकर विलाप करने लगे-"कहां मैं ? कहां लक्ष्मण और कहां कुटुम्बि-जन । कठोर भाग्य देवताने भूत-बलि की तरह मेरे कुटुम्बको कहीका कहीं बखेर दिया है ॥ ॥१-६।। [३] यह कहकर राम मूर्छित हो गये। तब दो चारण ऋद्विधारी मुनियों ने रामको देखा । चारण होकर भी वे दोनों आठ गुणोंसे सम्पन्न जान शरीर शीलसे अलंकृत फल, फूल, पत्र, नभ और पर्वतपर गमन करनेवाले ? जल-जन्तु ( मृणाल) की तरह जलाओंसे चलनेवाले ? वीर, सुधीर और विशुद्ध आकाश- गामी वे दोनों वहाँ आये (जहाँ राम थे)। अवधिज्ञानका प्रयोग करके उन्होंने जान लिया कि रामको पत्नी-वियोग हुआ है। तदनन्तर करणासे भरकर ज्येष्ठ-मुनि, अपनी गम्भीर ध्वनिमें बोले-"अरे मोक्षगामी और चरमशरीर राम! तुम मूढ़ वनकर

३१२
पउमचरित
तिय दुक्खहुँ खाणि विओय-णिहि । तह कारण रोवहि काइँ विहि ॥८॥
घत्ता
कि पई ण सुइय एह कह छज्जीव-णिकाय-दयावरु ।
जिह गुणवइ-अणुअत्तणेण जिणयासु जाउ वणे वाणरु' ॥६॥
[४]
जं णिसुणिउ को वि चवन्तु णहें । मुच्छा-विहलवलु धरणि-वह ॥१॥
'हा सीय' भणन्तु समुठियउ । चउ-दिसउ णियन्तु परिट्रियउ ॥२॥
ण करि करिणिहँ विच्छोइयउ । पुणु गयण-मग्गु अवलोइयउ ॥३॥
तहि ताव णिहालिय विण्णि रिसि । संगहिय जेहिं परलोय-किसि ॥१॥
ते गुरु गुरु-भत्ति करेवि थुय । 'हो धम्म-विद्धि सिरि-णमिय-भुय ॥५॥
गिरि-मेरु-समाणउ जेत्थु दुहु । तहँ कारणे रोवहि काइँ तुहुँ ॥६॥
खल तियमइ जेण ण परिहरिय । तहों णरय-महाणइ दुत्तरिय ॥७॥
रोवन्ति एम पर कप्पुरिस । तिण-समु गणन्ति जे सप्पुरिस ।।८।।
घत्ता
तियमइ वाहिहँ अणुहरइ खणे खण दुक्खन्ति ण थक्कइ ।
हम्मइ जिण-वयणोसहण जे जम्म-सए वि ण दुक्का ॥६॥
[५]
तं वयणु सुणेप्पिणु भणइ वलु । मेल्लन्तु णिरन्तर अंसु-जलु ॥१॥
लिनमन्ति गाम-वरपट्टण। सीयल-विउलइ णन्दण-वण ॥२॥
लभन्ति तुरङ्गम मत्त गय । रह कणय-दण्ड
लब्भन्ति भिच्चवर आण-कर । लब्भइ अणुहुन्ज वि स-धर धर ॥४॥
लन्भइ घर परियणु वन्धु-जणु । लन्भइ सिय सम्पय दवु धणु ॥५॥
धुन्वन्त-धय ॥३॥

एगुणचालीसमो संधि रोते क्यों हो ? स्त्रियाँ दुखकी खान और वियोगको निधि होती है। तो उसके लिए तुम क्यों रोते हो? क्या तुमने यह कहानी नहीं सुनी कि छह कायके जीवापर दया करनेवाले गुणव्रत और अणु- व्रतके धारण करनेवाले जिनदासको किस प्रकार वनमे वानर बनना पड़ा।॥१-६॥ [४] तब धरतीपर मूर्खासे विह्वल रामने सुना कि कोई मुझसे आकाशमें बातें कर रहा है तो वह 'हा सीता' कहकर उठे वह चारों ओर देखने लगे। मानो हथिनीके वियोगमें हाथी चारो ओर देख रहा हो । फिर उन्होंने आकाशकी ओर देखा। आकाश में उन्हें दो मुनि दीख पड़े। वे दोनों मुनि अपने परलोककी खेती संगृहीत कर चुके थे। और गुरुभक्तिमें स्तुत्य थे। उन्होंने रामसे कहा-"अरे धर्मबुद्धि और श्रीसम्पन्न बाहु राम ! तुम उस वातके लिए क्यो रोते हो जिसमें सुमेरु-पर्वत बराबर दुख है । जिसने दुष्ट स्त्रीको नहीं छोड़ा उसके लिए नरकरूपी नदीका संतरण बहुत कठिन है । कायर-पुरुप ही इस प्रकार रुदन करते हैं । सत्पुरुप तो स्त्रीको तृणवत् समझते है । स्त्री वह व्याधि है जो क्षण-क्षण दुःख देती हुई भी नहीं अघाती। परन्तु जो जिनके उपदेशसे उत्साहित होकर उसे छोड़ देते हैं उन्हें सैकड़ों जन्ममे भी दुख नहीं होता ॥१-६॥ [५] यह वचन सुनकर, अविरल अश्रुधारा बहाते हुए रामने "गाँव और पत्तन मिल सकते हैं, शीतल बड़े-बड़े उद्यान मिल सकते हैं, उत्तम अश्व और गज प्राप्त हो सकते है, स्वर्ण- दंडपर फहराती हुई पताका मिल सकती है, आज्ञाकारी अनुचर मिल सकते हैं. और भोगके लिए पर्वतसहिन वसुंधरा प्राप्त हो सकती है। परिजन पुरजन मिल सकते है । शोभा, सम्पत्ति और द्रव्य

३१४
पउमचरित
लब्भइ तम्बोलु विलेवणउ । लब्भइ हियइच्छिउ भोयणड ॥६॥
लभ
भिगारोलम्वियउ । पाणित
कप्पूर-करग्वियउ॥७॥
हियइच्छिउ मणहर पियवयणु । पर एहु ण लब्भइ तिय-रयणु ॥८॥
घत्ता
तं जोवणु तं मुह-कमलु तं सुरउ सबट्टण-हत्थउ ।
जेण ण माणिउ एत्थु जगँ तहाँ जीविउ सन् णिरत्थउ' ॥६॥
परमेसरु पभणइ वलें वि मुहु । 'तिय-रयणु पससहि काइँ तुहुँ ॥१॥
पेक्खन्तहुँ पर
वण्णुज्जलउ । अब्भन्तरें
रुहिर-चिलिबिली ॥२॥
दुग्गन्ध-देहु
घिणि-विट्टलउ । पर चम्मे हड्डहु पोद्दलउ ॥३॥
मायामें जन्ते परिभमइ । भिण्णउ णव-णाडिहिं परिसवइ ॥४॥
कम्म? - गण्ठि - सय - सिक्किरिउ । रस-चस - सोणिय-कहम-भरिउ ॥५॥
वहु-मंस-रासि किमि-कीड-हरु । खहह वइरिउ भूमीह भरु ॥६॥
आहारहाँ पिसिबउ सीवियउ । णिसि मडउ दिवसँ संजीवियउ ॥७॥
णीसासूसासु करन्ताहुँ । गउ जम्मु जियन्त-मरन्ताहुँ ॥८॥
घत्ता
मरण-काले किमि-कप्परिउ जे पेक्स वि मुहु वहिज्जइ ।
घिणिहिणन्तु मक्विय-सऍहि त तेहउ केम रमिज्जइ ॥६॥
[७]
तं चलण-जुअलु गइ-मन्थरउ । सउहिँ खजन्तु
तं सुरय-णियम्बु सुहावणउ । किमि-विलविलन्तु चिलिसावणउ ॥२॥
त णाहि-पएसु किसोयरउ । खजन्त-माणु थिउ भासुरउ ॥३॥
तं जोवणु
अवरुण्डण-मणउ । सुजन्तु णवर भीसावणउ ॥॥
तं सुन्दर वयणु जियन्ताहुँ । किमि-कप्पिट णवर मरन्तार्ह ॥५॥
भयकरउ ॥३॥

एगुणचालीसमो संधि भी मिल सकते है, पान और विलेपन तथा अनुकूल उत्तम भोजन मिल सकता है । श्रृंगार (भ्रमर) चुम्बित और कर्पूर-सुधासित जल मिल सकता है, परंतु हृदयसे वांछित सुन्दरमुखी यह स्त्री- रत्ल नहीं मिल सकता । वह यौवन, वह मुख कमल, वह सुरति, सुडौल हाथ, ( इन सबको ) जिसने इस जगमें बहुत नहीं माना उसका समस्त जीवन व्यर्थ है" ॥१-६।। [६] थोड़ा मुख विचकाकर तब फिर परमेश्वर बोले- "तुम स्त्रीकी प्रशंसा क्यों करते हो, तुम उसका केवल उज्ज्वल रंग देखते हो। पर भीतर तो वह रक्तसे लिप्त है । शरीरसे दुर्गन्धित, घृणाकी गठरी और चामवेष्टित हड्डियोकी पोटली है। मायाके यन्त्रसे वह घूमती है । नौ नाड़ियोंसे भिन्न होकर चल रही है। आठ कर्मोकी गाँठोसे संघटित रस, मज्जा और रक्तपंकसे भरी उसे केवल प्रचुर मांसका ढेर समझिए, कृमि और कोड़ोंका घर है। तथा खाटकी शत्रु और धरतीको भार है। आहारके लिए पीसना और रातमें मृतककी भॉति सो जाना, दिनमें जीवित रहना । इस प्रकार श्वास लेते छोड़ते तथा जीते मरते हुए स्त्रीका जन्म व्यतीत हो जाता है। मरणकालमें कीड़े उसे ऐसा काट खाते है, कि उसे देखकर लोग मुख टेढ़ा कर लेते हैं। सैकड़ों मक्खियोंसे घिनौने उस वैसे स्त्री-शरीरसे किस प्रकार रमण किया जाता है।॥१-६॥ [७] उसके मंथर गतिवाले चरण-युगलको पक्षी बुरी तरह खा जाते है, वह सुहावना सुरति-नितम्ब कीड़ोंसे विलविलाता हुआ घिनौना हो उठता है । वह चमकीला क्षीण मध्यभाग केवल खा लिया जाता है। आलिंगनकी इच्छा रखनेवाला यह यौवन भयंकर रूपसे क्षीण हो उठता है । जीवित अवस्थाके उस सुन्दर पउमचरित । तं महर-विम्यु वण्णुजलउ । लुञ्चन्तु सिवहिं विणि-विट्ठलर ॥६॥ तं णयण-जुअलु विभम-भरिट । विच्छायउ काऍहिँ कप्परिट ॥७॥ सो चिहुर-भारु कोडावणउ । उड्डन्तु णवर भोसावणड | घत्ता तं माणुसु तं मुह-कमलु ते थण तं गाढालिङ्गणु । गवर धरेप्पिणु णासउडु वोल्लेबर "घिधि चिलिसावणु" ॥६॥ [८] तहिं तेहए रस-वस-पूय-भरें । णब मास वसेवउ देह-धर ॥३॥ णव-णाहि-कमलु उत्यल्ल जहिं । पहिलट जे पिण्ड-संवन्धु तहिं ॥२॥ दस-दिवसु परिटिट रहिर-जलें । कणु जेम पइण्णट धरणियलें ॥३॥ विहिँ दसरत्तेहिं समुट्ठियट । णं जल डिण्डीरु परिट्रियउ ॥४॥ तिहिं दसरत्तेहि बुबउ घडिउ । णं सिसिर-बिन्दु कुङ्कुम पडिउ ॥५॥ दसरत चउत्यए वित्यरिउ । णावइ पवलङ्कुरु णीसरिउ ॥६॥ पञ्चमें दसरत जाव वलिड । णं दस-दसरत्तहिं कर-चरण-सिरु । वीसहिँ णिप्पण्णु सरीरु थिरु ॥८॥ णवमासिउ देहहाँ णीसरिउ । वढन्तु पढीवर वीसरिट 80 सूरण-कन्दु चउप्पलिट ॥७॥ घत्ता जेण दुवार आइयर जो तं परिहर वि ण सक्कइ । पन्तिहिं जुत्त वइल्लु जिह भव-संसार भमन्तु ण थक्कइ ।।१०।। एउ जाणवि धीरहि अप्पणउ । कर कङ्कणु जोवहि दुप्पणउ ॥१॥ भमन्तऍण । आवन्त जन्त-मरन्तएण ॥२॥ चउगइ-संसार एगुणचालीसमो संधि मुखड़ेको, मरते समय कृमि खा जाते हैं। उजले रंगवाले, धृणित और उच्छिष्ट अधरविम्ब सियार लुंजित कर देते हैं। विभ्रमसे भरे, कान्तिहीन दोनो नेत्रोको कौए खण्डित कर देते हैं। कुतूहलजनक वह केशकलाप भी भयंकररूपसे बिखर जाता है। वह मनुष्य, वह मुख कमल, वे स्तन, वह प्रगाढ़ आलिंगन-ये जब नष्ट होने लगते है तो लोग यही वोल उठते है, "छिः छिः कितने घिनौने है ये॥१-६॥ [=] उस वैसे रस, मजा और मांससे भरे देहरूपी धरमें यह जीव माह रहता है । वहीं पहले नया नाभिकमल (नरा) उत्पन्न होता है। पहला पिंड सम्बन्ध तभी होता है। फिर दस दिन वह रुधिर-रूपी जलमें रहता है, ठीक वैसे ही जैसे बीज धरतीमे पड़ा रहता है। फिर बीस दिनमें वह और उठता है, मानो जलमें फेन उठा हो, तीस दिनमे वह बुबुद् (वुब्बुक्) वनता है मानो परागमें हिमकण पड़ा हो। चालीस दिनमें वह फैल जाता है मानो नया प्रबल अंकुर फैल गया हो । पचास दिनमें वह और पुष्ट होता है मानो चारों ओरसे विकसित सूरन कन्द हो । फिर सौ दिनमें हाथ, सिर, पैर वन जाते है और वीस दिनमें शरीर स्थिर हो जाता है । इस प्रकार : माहमें जीव शरीर (माँके उदर ) से निकलता है। और बढ़ता हुआ, यह सब भूल जाता है। (आश्चर्य है ) कि जीव जिस द्वारसे आता है वह उसीको नहीं छोड़ सकता। जुएमे जुते हुए तेलोके वैलकी तरह भव-संसारमें भटकता हुआ कभी नहीं थकता ॥१-१०॥ [.] यह समझकर अपने मनमे धीरज रखना चाहिए । जरा हाथका कड़ा और दर्पण तो देखो। चार गतियोंसे संकुल इस संसारमें आते-जाते और मरते हुए जीवने जगमें किसे नहीं रुलाया,

पउमचरित
जग जीवे को ण रुवावियउ । को गरुअ थाह ण मुआवियर ॥३॥
को कहि मि णाहिं सतावियउ । को कहि मि ण आवइ पाविया ॥१॥
को कहि ण दड्दु को कहिँ ण मुउ । को कहि ण भमिड को कहिँ ण गउ ॥५॥
कहिण विभोयणु कहिण विसुरउ । जगें जीवहाँ किं पि वाहिरड ॥६॥
तइलोक्कु वि असिउ असन्तऍण । महि सयल दड्ड डझन्तऍण ॥७॥
घत्ता
सायरु पीउ पियन्तएंण अंसुऍहिं रुअन्तें भरियउ ।
हह-कलेवर-संचऍण गिरि मेरु सो वि अन्तरियउ ॥८॥
[१०]
अहवइ कि बहु-चविएण राम । भवे भमिउ भयङ्करै तुहु मि ताम ॥१॥
णडु जिह तिह बहु-रूवन्तर हिँ । जर- जम्मण- मरण- परम्पर हिँ ॥२॥
सा सीय वि जोणि-सएहिँ आय । तुहुँ कहि मि वप्पु सा कहि मि माय॥३॥
तुहुँ कहि मि भाउ सा कहि मि वहिणि। तहुँ कहि मि दइउ सा कहि मिरिणि।४
तुहुँ कहि मिणरए साकहि मि सग्गें। तुहुँ कहि मि महिहिं सा गयण-मागें ॥५॥
तुहुँ कहि मि णारि साकहि मि जोहु । किं सविणा-रिन्द्विहँ करहि मोहु ॥५॥
उम्मेछ विओअ-गइन्दएसु । जगडन्तु भमह जगु गिरवसेसु ॥७॥
जइ ण धरिउ जिण-चयणकुसेण । तो खजइ माणुसु माणुसेण |८||
घत्ता
एम भणेप्पिणु वे वि मुणि गय कहि मि णहङ्गण-पन्थें ।
रामु परिहिउ किविणु जिह धणु एक्कु लएवि स-हत्थे ॥६॥
[११]
विरहाणल- जाल- पलित्त- तणु । चिन्तेवएँ लग्गु विसण्ण-मणु ॥१॥
सच्चड संसार ण अस्थि सुहु । सञ्चर गिरि-मेरु-समाणु दुहु ॥२॥

एगुणचालीसमो संधि डाढ़ मारकर कौन नही रोया, कहो कौन नहीं सताया गया, किसे कहाँ आपत्ति नहीं भोगनी पड़ी। कौन जला नहीं और कौन मरा नहीं । कौन भटका नहीं, कौन गया नहीं, कहाँ किसे भोजन नहीं मिला और किसे कहाँ सुरति नहीं मिली। संसारमें जीवके लिए वाह्य कुछ भी नहीं है । खाते हुए उसने तीनों लोक खा डाले और जल-जल कर सारी धरती पूंक डाली। पी-पीकर समस्त सागर पी डाला, और रो-रोकर उसे भर भी दिया। हड्डियो और शरीरोके सञ्चयसे उसने सुमरुपर्वतको भी ढक दिया ॥१-|| [१०] अथवा हे राम ! बहुत कहने से क्या, तुम भी भव- सागरमे अवतक भटकते रहे हो । नटकी तरह मानो रूप ग्रहणकर जन्म, जरा और मरणकी परम्परामें भटकते रह हो । वह सीता भी सैकड़ा योनियोमे जन्म पा चुकी है। कभी तुम वाप वने और वह मॉ वनी । कभी तुम भाई वने और वह बहन बनी । कभी तुम पति वने तो वह पत्नी वनी । कभी तुम नरकमे थे वह स्वर्गमें थी। कभी तुम धरतीपर थे तो वह आकाशमार्गमे । कभी तुम स्त्री थे तो वह पुरुप थी। अरे स्वप्नमें प्राप्त इस वैभवमे मुग्ध क्यों होते हो ? महावतसे रहित यह वियोगरूपी उन्मत्त महा- गज सारे संसारमे उत्पात मचा रहा है। यदि जिन-वचन रूपी अङ्कुशसे इसे वशमे न किया जाय तो वह सारे विश्वको खा जाय ।" यह कहकर वे दोनों आकाश-मार्गसे कहीं चले गये। केवल राम ही कृपणकी भॉति एक, धन ही (धन्या और रुपया- पैसा) अपने हाथमें लेकर बैठे रह गये ॥५-६।। [११] रामका शरीर वियोग-ज्वालामे जल रहा था। खिन्न- मन होकर वह सोचने लगे, "सचमुच संसारमे सुख नहीं है, सचमुच संसारमे दुःख सुमेरु पर्वतके बराबर है। सचमुचमे जन्म,

३२०
पउमचरित
जर-जम्मण-मरण-मउ । सच्चउ जीविउ जल-विन्दु-सउ ॥३॥
कहाँ घर कहाँ परियणु वन्धु-जणु । कहाँ माय-वप्पु कहाँ सुहि-सयणु ॥४॥
कहो पुत्तु मित्तु कहाँ किर परिणि । कहाँ भाय सहोयर कहाँ वहिणि ॥५॥
फलु जाव ताव वन्धव सयण । आवासिय पाय जिह सउण' ॥६॥
वलु एम भणेप्पिणु णीसरिउ । रोवन्तु पीवउ
वीसरिउ ॥७॥
घत्ता
णिद्धणु लक्खण-वज्जियउ अण्णु वि वहु-वसहिँ भुत्तउ ।
राहउ भमइ भुअड्ड जिह वण 'हा हा सीय' भणन्तउ ॥८॥
[१२]
हिण्डन्ते भग्ग - मडप्फरेण । वण-देवय पुच्छिय हलहरैंण ॥१॥
'खणे खण वेयारहि काइँ मई। कहँ कहि मि दिह जइ कन्त पइँ ॥२॥
वलु एम भणेप्पिणु सचलिउ । तावग्गएँ वण-गइन्दु मिलिउ ॥३॥
'हे कुञ्जर कामिणि-गइ-गमण । कह कहि मि दिट्ट जइ मिगणयण ॥४॥
णिय पडिरवेण वेयारियउ । जाणइ सीयएँ हकारियउ॥५॥
कत्थ दिट्टई इन्दीवर । जाणइ धण-णयण दीहरइँ ॥६॥
हल्लियउ । जाणइ धण : वाहा-डोल्लियड ॥७॥
वणुं सयलु गवेसवि सयल महि । पल्लटु पडीवउ दासरहि ॥८॥
-
कथइ असोय-तरु
घत्ता
तं जि पराइड णिय-भवणु जहिं अच्छिउ आसि लयत्थले ।
चाव-सिलिम्मुह-मुक्क-करु वलु पडिउ सई भु व-मण्डले ॥६॥

एगुणचालीसमो संधि जरा और मरणका भय है । और जीवन जल-बुदबुदकी तरह क्षणभंगुर है। किसका घर ? किसके परिजन और वन्धुजन किसके माता-पिता और किसके सुधीस्वजन । किसके पुत्र, किसके मित्र, किसकी स्त्री, किसका भाई, किसकी बहन, जब तक कम- फल है तभी तक बन्धु और स्वजन वैसे ही हैं जैसे पक्षी पेड़पर आकर बसेरा कर लेते है । यह विचारकर राम उठे किन्तु रोते हए वह अपनी सुध-बुध फिर भूल गये। राम, विटकी तरह कामातुर होकर 'हा सीता' कहते हुए घूमने लगे। वह निधन (धन्या और धनसे रहित ) लक्खणवर्जित (लक्ष्मण और गुणोंसे शून्य) और बहुव्यसनो (दुःख और बुरी आदत ) से युक्त थे ॥१-धा [१२] तब भग्नप्राय और स्वाभिमानी रामने वनदेवीसे पूछा-"मुझे क्षण-क्षणमे क्यों दुखी कर रही हो । वताओ यदि तुमने मेरी कान्ता देखी हो।" यह कहकर वह आगे बढ़े ही थे कि उन्हें एक मत्त गज मिला। उन्होने कहा “अरे मेरी कामिनीकी तरह सुन्दर गतियाले गज, क्या तुमने मेरी मृगनयनीको देखा है?"अपनी ही प्रतिध्वनिसे प्रतड़ित होकर वह यही समझते थे कि मानी सीता देवीने ही उन्हे पुकारा है। कहीं वह नील कमलाको अपनी पत्नी के विशाल नयन समझ बैठते, कहीं हिलते हुए अशोक नयी वे यह समझ लेते कि सीतादेवीको बांह हिल जुल रही है।म प्रकार ममम्न धरती और वनको खोज करके गम वापस मा गये. और या अपने सुन्दर लतागृहमं पहुँचे । अपना धनुप चाग (नारपार) एक और गफर वह धरती पर गिर पड़े॥१-६।।

[४०. चालीसमो संधि]
दसरह-तव-कारणु सव्वुद्धारणु वज्जयण्ण - सम्मय-भरिउ ।
जिणवर-गुण-कित्तणु सीय-सइत्तणु तं णिसुणहु राहव-चरिउ ।।
[१]
ध्रुवक
तं सन्तं गयागसं धीसं संताव-पाव-संतासं (१)।
चार-रुचा - रएणं वंदे देवं संसार-घोर-सोसं ॥१॥
असाहणं । कसाय-सोय-साहणं ॥२॥
अवाहणं ।पमाय-माय-वाहणं ॥३॥
अवन्दणं । तिलोय-लोय-वन्दण ॥४॥
अपुज्जणं । सुरिन्दराय-पुज्जण ॥५॥
असासणं | तिलोय-छेय-सासणं ॥६॥
अवारणं
। अपेय-भेय - वारणं ॥७॥
अणिन्दियं
। जय-प्पहुं अणिन्दिय॥
महन्तयं । पचण्ड-वस्महन्तय ॥६॥
रवणयं । घणालि-वार-वणयं ॥१०॥
घत्ता
मुणि-सुव्वय-सामिउ सुह-गइ-गामिड तं पणवेप्पिणु दिढ-मणेण ।
पुणु कहमि महन्वलु खर-दूसण-वलु निह आयामिउ लक्खणेण ॥११॥
[२]
दुवई
हिय एतहें विसीय एत्तहे वि विओउ महन्तु राहवे ।
हरि एत्तहँ वि भिडिउ एत्तहें वि विराहिउ मिलिउ आहवे।।१।।
ताव तेत्थु भीसावणे वणे । एकमेक्क-हक्कारणे
रणे ॥२॥
कुरुड-दिहि-वयणुमडे भडे । विरइए महा-वित्थडे थडे ॥३॥
वावरन्त - भय-भासुरे सुरे । जज्जरङ्ग - पहराउरे उरे॥धा
असि-सबाहु-पडियफरे फरे । जम्पमाण-कडुअक्सरे
खरे ॥५॥

चालीसवीं सन्धि (फिर कवि निवेदन करता है कि) अव उस गधवचरितको सुनिये जो दशरथके तपका कारण, सवका उद्धारक, वज्रवर्णके सम्यक्त्वसे परिपूर्ण, जिन-वरके कीर्तनसे शोभित और सीताके सतीत्वसे भरपूर है। [१] मैं कवि (स्वयम्भू ) शान्त और अठारह प्रकारके दोपोसे रहित बुद्धिके अधीश्वर मुनिसुत्रत जिनको प्रणाम करता है। वेद, कपाय और पापोंके नाशकर्ता, सुन्दर कान्तिसे परिपूर्ण सवारी आदिसे रहित, माया और प्रमादके वंचक, दुष्टोंसे अपूज्य और सुरेद्रोंसे पूज्य है । वह उपाध्यायसे रहित होकर भी त्रिलोकके विदग्धोके शिक्षक हैं। वह वारण रहित होकर भी मद्य मधु आदिके निपेधकर्ता हैं। निन्द्रा रहित और जितेन्द्रिय, महान् प्रचण्ड कामके संहारक और सुन्दर निधियोंके अधिपति । मैं ऐसे उन शुभगतिगामी मुनिसुत्रत स्वामीको प्रणाम करता हूँ । अब मैं दृढ़सकल्प होकर इस बातको बता रहा हूँ कि लक्ष्मणने किस प्रकार खरदूपणको मारा और उसकी सेना पगम्त की ॥१-११॥ [२] यहीं (इस प्रसंगम) सीतादेवीका हरण हुआ, यहीं गमको वियोग दुख सहन करना पड़ा, यहीं जटायुका घोर युद्ध हुआ, यही विराधिन विद्याधरसे भेट हुई । इस समय उस भीपण बनमे भयंकर युद्ध हो रहा था। मुभट एक दूसरेको ललकार रहे थे। वे अत्यन्त ऋर और विकट दृष्टिसे उद्भट थे। बहुत बड़े- बड़े दल बने हुए थे, आक्रमणशील, भयले भयंकर गैठ जर्जर अंग, और घावोंसे भरे हुए थे। तलवार सहित हाथ इधर-उधर कटकर

पउमचरित
दलिय-कुम्भ-वियलङ्गए गए । सिरु धुणाविए आहए हए ।।६।।
रुहिर-विन्दु-चञ्चिक्किए किए । सायरे व्व सुर-मन्थिए थिए ॥७॥
छत्त-दण्ड - सय-खण्ड - खण्डिए । हड्ड - रुण्ड - विच्छड्ड-मण्डिए ।।८।।
तहिं महाहवे घोर-दारुणे । दिछ वीरु पहरन्तु साहणे ॥६॥
घत्ता
तिल तिलु कप्परियइ उरॅजज्जरियइँ रत्तच्छई फुरियाणणई ।
दिई गम्भीरइ सुहट-सरीरइँ सर-सलिलयह सवाहणइँ ॥१०॥
[३]
दुवई
।
को वि सुभदु स- तुरङ्गमु को वि सजाणु सल्लिओ।
को वि पडन्तु ट्ठि आयासहाँ लक्खण सर-विरल्लिओ ॥
भटो को विदिट्ठो परिच्छिन्न-गत्तो । स-दन्ती स-मन्तीस-चिन्धोस-छत्तो॥२॥
भडो को विवावल्ल-भल्लेहि भिण्णो। भटो को वि कप्पदुमो जेम छिण्णो ॥३॥
भडो को वितिक्खग्ग-णाराय-विद्धो। महा-सत्थवन्तो च सत्येहि विद्धो ॥४॥
भडो को वि कुद्धाणणो विप्फुरन्तो । मरन्तो वि हक्कार-डकार देन्तो ॥५॥
भटो को विभिण्णो स-देहोसमत्थो । पमुच्छाविओ को वि कोवण्ड-हत्यो ॥६॥
मुओको वि कोवुठभडो जीवमाणो । चलचामर-च्छोह - विज्जिज्जमाणो ॥७॥
वसा-कहमे महवे को वि खुत्तो । खलन्तो वलन्तो णियन्तेहिं गुत्तो ॥८॥
भडोको विभिण्णो खुरुप्पेहि गन्तो। णियन्तो कुसिद्धोच्च सिद्रिण पत्तो ॥६॥

चालीसमो संधि ३२५ पड़े थे । वे तीन और कठोर शब्द बोल रहे थे, हाथियोंके शरीर विकलांग थे। उनके कुम्भस्थल टूट फूट चुके थे। सिर फूटनेसे अश्व भी आहत हो उठे थे । रक्तरंजित वह युद्ध, समुद्रमें हुए देव मन्थनकी तरह जान पड़ता था। छत्रो और ध्वज-दण्डोंके सौ-सौ टुकड़े हो चुके थे । हड्डियो और धड़ासे मण्डित उस भयंकर युद्धमें लक्ष्मण सेनापर प्रहार करता हुआ दिखाई दे रहा था । योधाओके शरीर सवारियों और वाणकी अनीकोंसे सहित थे । उनकी बोटी- बोटी कट चुकी थी। वक्षस्थल जर्जर थे। रक्तरंजित ध्वजाएँ काप रही थीं ॥१-१०॥ [३] स्वयं कुमार लक्ष्मणके तीरोंसे आहत होकर, कोई योधा अश्व सहित और कोई यान सहित खण्डित हो गया या। कोई आकाशसे गिरता हुआ दिखाई दे रहा था । कोई योधा गजयंत्र (अंकुश ) और चिह्नके साथ छिन्न शरीर दीख पड़ा । कोई योधा वावल्ल और भालोंसे विधकर पड़ा हुआ था। कोई कल्पद्रुमकी तरह छिन्न-भिन्न हो गया था । कोई योधा तीखे तीरोसे विद्ध हो उठा । बड़े-बड़े अस्रोसे सम्पन्न होने पर भी कोई योधा बन्दी बना लिया गया । क्रुद्ध होकर कोई सुभट कॉपता और मरता हुआ भी गरज रहा था । कोई समर्थ योधा सशरीर ही छिन्न-भिन्न हो गया । कोई योधा हाथमें धनुप-तीर लिये हुए ही मूर्छित होकर गिर पड़ा । क्रोधसे उद्भट कोई योधा, चञ्चल चमरोंकी शोभासे ऐसा चमक रहा था कि मृत भी जीवित लग रहा था । कोई योधा मांस-मज्जाकी धनी कीचड़में फंस गया । कोई गिरता पड़ता, अपनी ही आँतोमै दिप ला गया । आता हुआ कोई भट खुरपोसे छिन्न-भिन्न हो गया । कुसिद्धकी तरह नियंत्रित होने पर भी, वह सिद्धि प्राप्त नहीं कर पा रहा था। लक्ष्मणके तीरोंसे आहत, पउमचरित वत्ता लक्खण-सर-भरियड अधुचरियउ खर-दूसण-बलु दिट्छु किह । साहारु ण वन्धइ गमणु ण सन्धइ णवलर कामिणि-पेम्मु जिह ॥१०॥ [४] दुबई परधण-परकलत्त-परिसेसहुँ परवल-सण्णिवायहुं । एक लक्खणेण बिणिवाइय सत्त सहास रायहु॥१॥ जीवन्तऍ अदएँ वारि-सेणें । अदएँ दलवटिए महि-णिसणें ॥२॥ तहिं अवसर पवर-जसाहिएण । जोकारिड विण्हु विराहिएण ॥३॥ 'पाइकहाँ वइ एहु कालु । हउँ भिच्चु देव तुहुँ सामिसालु ॥४॥ कहिओ सि आसि जो चारणेहिं । सो लक्खिओ सि सई लोयणेहिँ ॥५॥ तं सहल मणोरह अज्जु जाय । जं दिट्ट तुहारा वे वि पाय ॥६॥ णिय-जणणिह हउँ गन्भत्थु जइड । विणिवाइड पिउ महु तणउ तइउ ॥७॥ ताएं महु पाइक्क-पवरु । उहालिड तमलङ्कार-णयरुमा ते समर - महब्भय भीसणेहिं । सहुँ पुव्व-वहरु खर-दूसणेहिँ' ॥६॥ घत्ता जय-लच्छि-पसाहिउ भणइ विराहिउ 'पहु पसाउ महु पेसणहाँ। तुहुँ खरु आयामहि रणउहँ णामहि हउँ अभिट्टमि दूसणहाँ' ॥१०॥ [५] दुवई तं णिसुणेवि वग्रणु विज्जाहरु मम्भीमित कुमारण । 'वइसरु ताव जाब रिउ पाडमि एक्वे सर पहारेणं ॥१॥ एउ सेण्णु खर-दूसण-केरउ । वाणहिँ करमि अज्जु विवरेरउ ॥२॥ स-धउ स-वाहणु स-पहु स-हत्य । लायमि सम्वु-कुमारहाँ पन्थे ॥३॥ तुज्झ वि जम्म-भूमि दरिसावमि । तमलङ्कार-णयरु भुक्षावमि ॥४॥ - चालीसमो संधि ३२७ खर-दूपणकी अधउवरी सेना कामिनीके नवल प्रेमकी तरह जान पड़ती थी। क्योंकि न तो वह (नवल प्रेम और सेना) जाही पाता था और न ढाढस ही वाँध पाता था ॥१-१०॥ [४] इस प्रकार दूसरेके धन और बीका अपहरण करने- वाले, शत्रु सेनाओमें तोड़-फोड़ करनेवाले सात हजार योधा राजाओंको अकेले लक्ष्मणने ही मारकर गिरा दिया। इस प्रकार आधी सेनाके धराशायी हो जानेपर जव आधी सेना ही शेप वची तो परम यशस्वी विराधितने कुमार लक्ष्मणका अभिनंदन करते हुए कहा-'हे देव, आज अवश्य ही आप मेरी रक्षा करें, आप मेरे स्वामी है और मैं आपका अनुचर | चारण मुनियोने जो कुछ भविष्यवाणी की थी उसे मै आज अपनी ऑखोंसे सच होता हुआ देख रहा हूँ। आज मैंने आपके चरणयुगलके दर्शन कर लिये। जब मैं अपनी माताके गर्भ में था तभी इसने (खर-दूपणने) मेरे पिताका वध कर दिया था। और साथ ही उत्तम प्रजासे सहित मेरा तमलंकार नगर भी छीन लिया। इस प्रकार इस महा- समरमें खर-दूषणसे बहुत पुरानी शत्रुता है।" विजय-लक्ष्मीके इच्छुक विराधितने और भी कहा, "मुझ सेवकपर प्रसाद करें। आप युद्ध मुखमें जाकर खरसे लड़कर उसे नत करें और तबतक मै दूपणसे निपटता हूँ" ॥१-२०॥ [५] विद्याधर विराधितके वचन सुनकर कुमार लक्ष्मणने उसे अभयदान दिया। उसने कहा-"जबतक मैं एक ही तीरसे शत्रुको मार गिराता हूँ तवतक तुम यहीं बैठो । खरदूपणकी सेना को मैं आज ही अपने तीरोंसे तितर-बितर करता हूँ। और पताका, वाहन, राजा, गजोंके साथ सभीको शम्बूक कुमारके पथपर प्रेषित किये देता हूँ। तुम्हें मै अपनी जन्मभूमिके दर्शन करा दूंगा । मैं

३२८
पउमचरिउ
हरि-चयहि हरिसिउ विज्जाहरु । चलहिँ पडिउ सीसें लाऍवि करु ॥५॥
ताव खरेण समर णिवूढें । पुच्छिर मन्ति विमाणारूढं ॥६॥
'दीसइ कवणु एहु वीसत्थउ । णरु पणमन्तु कियालि-हत्थउ ॥७॥
वाहुवलेण वलेण विवलियउ । णं खय-कालु कियन्तहों मिलिय' ॥८॥
पभणइ मन्ति विमाण पइट्टउ । 'किं पइँ वइरि कयाविण दिउ ॥६॥
घत्ता
णामेण विराहिउ पवर-जसाहिउ वियड-वच्छु थिर-थोर-भुउ ।
अणुराहा-णन्दणु स-वलु स-सन्दणु ऍहु सो चन्दोअरहाँ सुउ' ॥१०॥
[६]
दुवई
मन्ति-णिवाण विहि मि अवरोप्परु ए आलाव जावे हि।
विण्हु-विराहिएहिँ आयामिउ पर-बलु सयलु ताहि ॥१॥
तो खरोऽरिमहणेण । कोक्किमओ जणहणेण ॥२॥
एत्तहे स-सन्दणेण । सोऽणुराह - णन्दणेण ॥३॥
आहवे समथएण । चाव - वाण-हत्थएण ॥४॥
गुञ्ज-वण्ण - लोयणेण । भीसणावलोयणेण
कुम्भि-कुम्भ-ढारणेण । पुव्व-चइर - कारणेण ॥६॥
दूसणो जसाहिवेण । कोकिओ विराहिएण ॥७॥
एहु वे(?)हओ हयस्स । चोइओ गओ गयस्स ॥८॥
वाहिओ रहो रहस्स । धाइओ गरो परस्स ।।६।।
घत्ता
स-गुड-स-सण्णाहइँ कवय-सणाहइँ मप्पहरणइँ स-वाहणईं ।
णिय-वइरु सरेप्पिणु हकारेप्पिणु मिडियई वेण्णि मि साहणई ॥१०॥
[७]
दुवई
सेण्णहाँ भिडिउ सेण्णु दूसणहाँ विराहिउ खरहों लक्खणो ।
हय पडु पडह तूर किउ कलयलु गल-गम्भीर-भीसणो ॥१॥
॥५॥

चालीसमो संधि भी तमलंकारनगरका उपभोग करूँगा । इस प्रकार लक्ष्मणके आश्वासन देनेपर विद्याधर विराधित प्रसन्न हो उठा। वह सिर झुकाकर चरणोमे नत हो गया। इसी बीच, युद्धसे निपटनेपर खरने अपने मंत्रीसे पूछा कि “यह कौन है कि इस प्रकार एक दम निराकुल होकर और हाथमें अंजलि लेकर (लक्ष्मणको) प्रणाम कर रहा है। वह बाहुवलि (विराधित) लक्ष्मणसे उसी प्रकार जा मिला है जिस प्रकार क्षयकाल जाकर कृतान्तसे मिल जाता है।” इसपर, विमानमे बैठे-बैठे ही मंत्रीने कहा कि "क्या आपने अपने शत्रु विराधितको नहीं देखा। प्रवल यशस्वी विशालवाहु वह, अनुराधाका पुत्र विराधित है। रथ और अपनी सेना लेकर वह, चंद्रोदरका पुत्र है" ॥१-१०॥ [६] राजा खर और मंत्रीमें जब इस प्रकार बात-चीत हो रही थी तभी लक्ष्मण और विराधितने मिलकर शत्रुसेनाको घेर लिया । अरिदमन लक्ष्मणने खरको ललकारा और विद्याधर विरा- धितने रथ बढ़ाकर दूपणको । सचमुच युद्धमे समर्थ, हाथमे धनुप- वाण लिये हुए, आरक्तनयन, गज कुभंस्थलोको विदीर्ण करनेवाला वह (विराधित ) देखनेमे अत्यन्त भयंकर हो रहा था । अपने पूर्व वैरका स्मरणकर उसने दूपणको ( ललकारकर) चुनौती दी। बस, अश्वपर अश्व और गजपर गज प्रेरित कर दिये गये। रथपर रथ हाँके जाने लगे। और योधापर योधा दौड़ पड़े। इस प्रकार दोनों ही सेनाएँ एक दूसरेके निकट जाकर आपसमें लड़ने लगीं। वे दोनो ही सेनाएँ सगुड ? संनद्ध कवच आयुध और वाहनोंसे परिपूर्ण थीं ॥१-१०॥ [७] उस तुमुल युद्धमे सेनासे सेना भिड़ गई। विराधित दूपणसे, लक्ष्मण खरसे भिड़ गये। पट-पटह वज उठे, तूर्योका

पउमचरिउ
तहिं रण-संगमे । वुण्ण - तुरङ्गम ॥२॥
रह-गय-गोन्दल । वजिय - मन्दले ॥३॥
भड - कडमहण । मोडिय-सन्दण ॥४॥
गरवर-दण्डिएँ । किय-किलिविण्डिए ।
वाला-लुञ्जिएँ । रह-सय-खञ्चिए ॥६॥
तहिँ अपरायण । खर - णारायण ॥७॥
भिडियमहन्वल । वियट- उरत्थल ॥८॥
वे वि समच्छर । वे वि भयङ्कर ॥६॥
वे वि अकायर । वे वि जसायर ॥१०॥
वे वि महभड । वे वि अणुब्भड ॥११॥
वे वि धणुहर । वेण्णि वि दुद्धर ॥१२॥
वत्ता
वेण्णि वि जस-लुद्धा अमरिस-कुद्धा तिहुयण-मल्ल समावडिय ।
अमरिन्द-दसणण विप्फुरियाणण णाई परोप्परु अन्भिडिय ॥१३॥
[]
दुवई
ताम जणद्दणेण अद्धेन्दु विसजिउ रण भयङ्करो।
णं खय-काल कालु उद्धाइउ तिहुअण-जण-खयङ्करो ॥१॥
संचल्लु वाणु । णहयल
समाणु ॥२॥
रिउ-रहहाँ ढुक्कु । खरु कह वि चुक्कु ॥३॥
सारहि वि भिण्णु । धय-दण्डु छिण्णु ॥४॥
घणुहरु वि भग्गु । कत्थ वि ण लग्गु ॥५॥
पाडिउ विमाणु । विजए
समाणु ॥६॥
खरु विरहु जाउ । थिउ असि-सहाउ ॥७॥
धाइउ तुरन्तु । मुह - विप्फुरन्तु ॥८॥
एत्तहँ वि तेण । णारायणेण ॥६॥
तं सूरहासु । किउ करें पगासु ॥१०॥
अभिह वे वि । असिवर लेवि ॥११॥

चालीसमो संधि भीपण और गम्भीर कलकल होने लगा। अश्वोंके मुख ऊपर थे। रथ और गजोंकी भीड़ मची थी। ढोल बज रहे थे। योधाओंका संहार होने लगा । रथ मुड़ने लगे। नरवर ध्वस्त हो रहे थे। केश घसीटे जा रहे थे। सैकड़ो रथ वहीं खच गये थे। इस प्रकार उस युद्धमै अपराजित कुमार लक्ष्मण और खरमें मुटभेड़ हो रही थी। दोनोंके उर विशाल थे, दोनो मत्सरसे भरे हुए भयङ्कर हो रहे थे। दोनो ही वीर यशको आकांक्षा रखते थे ! दोनों ही उद्धत और धनुर्धारी थे। दोनों ही यशके लोभी, अमर्शसे क्रुद्ध और त्रिभुवन- मल्ल थे। वे ऐसे भिड़े मानो दशानन और इन्द्र ही भिड़े हो ॥१-१३|| [८] तब लक्ष्मणने भयङ्कर अर्धचन्द्र तीर छोड़ा वह तीर मानो तीनो लोकोको क्षय करनेवाला क्षयकाल ही था। आकाशतलमे सर्राता हुआ वह तीर खरके रथके निकट पहुँचा। खर तो किसी प्रकार बच गया, परन्तु उसका सारथि और ध्वज-दण्ड छिन्न-भिन्न हो गये । उसका धनुष भी टुकड़े-टुकड़े हो गया । किसी तरह वह तीर उसे नही लगा। विद्या सहित उसका रथ खण्डित हो गया। अव खर विरथ हो गया, केवल उसके हाथमें तलवार थी । तब तमतमाकर दौड़ा। यह देखकर नारायण लक्ष्मणने भी सूर्यहास खड्ग अपने हाथमे ले लिया। अब उत्तम खगोसे इनमे द्वन्द्व होने

पडमचरित
॥६॥
॥७॥
घत्ता
णाणाविह-याणहिँ णिय-विण्णाणे हि वावन्ति असि-गहिय-कर ।
क्सणङ्गय दीसिय विजु-विहूलिय णं णव-पाउसें अम्बुहर ।।२।।
[]
दुबई
हत्यि व उद्ध-सोण्ड सीह व लड्यूल-बलग-कन्धरा।
पिट्ठूर महिहर च अइ-खार समुद्द व अहि व दुदरा ॥३॥
अभिट्ट वे वि सोण्डीर वीर । संगाम धीर IRL
एत्यन्तर अमर-वरङ्गणाहँ । हरिसिय-मणाह ।
अवरोप्पर वोहालात्र हूय । 'कहाँ गुण पहूच ॥क्षा
तं णिसुणे वि कुवलय-णयणियाएँ । ससि- वयणियाएँ ॥५॥
णिमच्छ्यि अच्छर अच्छाएँ । बहु-मच्छराएँ
'खर मुएँ वि अण्णु किं को विस्त । पर-सिमि-रचूर
अण्णोक्ष पजम्पिय तखणेण । 'सहुँ लक्षणेण मा
खरु गहु विह किनइ समाणु । जो अघडमाणु ॥
पुन्यन्तर णिलियर-कुल-पइव । खरु
पहड गांव mon
घत्ता
कोवाणल-णालड कटि-कण्टालर दसण-सत्सर महर-दलु।
महुमहण-सरणे असि-णहरग्गें चुप्टेंवि घत्तिउ सिर-कमलु ।।११
[१०]
दुवई
एत्तह लक्खणेण विणिवाइड णिसियर-सेण्ण-सारनो।
एत्तई दूसणेण किउ विरह विराहिड विण्णि वारो ॥१॥
खुड छुड समर परजित साहणु । रह-गय- वाहणु ॥२॥
कुहु छुडु जीव-गाहि आयामिउ । पर-चल-सामि ॥३॥
छुडु छुह बिहुरहँ हत्थु पलास्टि। वह विण मारिउ पा
ताव सरहाँ सिरु खुवि महाइड । लक्खणु धाइउ ॥५॥

चालीसमो संधि लगा। हाथमें खड्ग लिये हुए वे नाना स्थानोंसे अपनी पैतरेबाजी दिखाने लगे। श्याम (गौर) वर्ण वे दोनों ऐसे जान पड़ते थे मानो नव वर्पागम कालमे विजलीसे शोभित मेघ हो ॥१-१२॥ [६] वे दोनों ऐसे लगते थे मानी सूंड उठाये हुए हाथी हो या पीठपर पूंछ लहराये हुए सिंह । पर्वतकी तरह निष्ठुर, समुद्रकी तरह खारे, और सर्पराजकी तरह दुर्धर हो रहे थे। युद्धधीर वे दोनों वीर आपसमें भिड़ गये। इसी बीच आकाशमें देवबालाएँ प्रसन्न होकर आपसमें वात-चीत करने लगीं। एक वोली-“वताओ, किसमे अधिक गुण हैं ?” यह सुनकर, चन्द्रमुखी और कमलनयनी दूसरी अप्सराने मत्सरसे भरकर उसे मिड़कते हुए कहा-'अरे युद्धमे शत्रु-शिविरको खरको छोड़कर दूसरा कौन चकनाचूर कर सकता है।" इस अवसरपर कई अप्सराओने कहा-"अरे लक्ष्मणके साथ इस खर (गधे) की तुलना क्यो करती हो । उसकी तुलनाम खर तो एक दम निकम्मा है।" इतनेमे खर कण्ठमे आहत हो उठा। लक्ष्मणके तीरोंकी नोक और सूर्यहास खड्गके नखाग्रसे खरका सिरकमल तोड़कर लक्ष्मणने फेक दिया। कोपाग्नि? उसकी मृणाल थी। युद्धसे कटकटाते उसके दॉत पराग थे। और अधर पत्ते ॥१-११॥ [१०] जिस समय कुमार लक्ष्मणने निशाचर-सेनाके सार श्रेष्ट खरको मार गिराया उसी समय विराधितको दृपणने स्थ- विहीन कर दिया। उसकी सेना रथ, गज और वाहनोंके साथ शीघ्र ही पराजिन होने लगी। इस प्रकार शत्रु-सेनाका स्वामी जीते जी पकड़ लिया गया। हाथ फैलाफर उसने विराधितके वाल पकड़ लिये किसी प्रकार उसे मारा भर नहीं। इसी बीच खरका सिम्फमल काटकर लक्ष्मण उस ओर दौड़े जहाँ विगधित था।

३३४
४
पउमचरिट
णिय-साहणं मम्भीस करन्तउ । रिउ कोकन्तउ ॥६॥
दूसण पहरु पहरु जइ सकहि । अहिमुहु थक्कहि ॥७॥
तं णिसुणेवि वयणु आरटउ । चित्तें
वलिउ णिसिन्दु गइन्दु व सीहहाँ। रण- सय- लाहहाँ ॥६॥
दुट्टउ ॥८॥
घत्ता
दससन्द्रण-जाएं वर-णाराए वियड-उरत्थल विधु अरि ।
रेवा-जल-वाह मयर-सणाहें णाई वियारिउ विन्झइरि ॥१०॥
[११]
दुवई
उडुअ - पुच्छ - दण्ड - वेयण्ड - रसन्तय-मत्त-वाहणं ।
पाडिएँ अतुल-मल्ल खर दृसण पडियमसेस-साहणं ॥१॥
सत्त सहास भिडन्ते मारिय । दूसणेण सहुँ सत्त वियारिय ।।२।।
चउदह सहस गरिन्दहुँ घाइय । ण कप्पद्रुम ब्व विणिवाइय ॥३॥
मण्डिय मेइणि गरवर-छत्तै हिँ । णावइ सरय-लच्छि सयवत्त हिँ ॥४॥
कत्थइ रत्तारत्त पीसिय । गाइ विलासिणि धुसिण-विहूसिय ॥५॥
तो एत्थन्तरै रह गय-वाहणें । कलयलु घुछ विराहिय-साहणे ॥६॥
दिपणाणन्द-भेरि अणुराएँ । रणु परिअनिउ दसरह-जाएँ ॥७॥
'चन्दोअर-सुअ महु करें वुत्तउ । ताम महाहवे अच्छु मुहुत्तउ ॥८॥
जाव गवेसमि भाइ महारउ । सहुँ वइटेहिए पाण-पियारउ' ॥६॥
।
घत्ता
खर-दूसण मारै वि जिणु जयकारें वि लक्खणु रामहाँ पासु गउ ।
णं तिहुअणु धाऍवि जम-पहें लाए वि कालु कियन्तहाँ सम्मुहउ ॥१०॥

चालीममा संधि अपनी येनाको अभयदान देकर और शत्रुको ललकारते हुए उन्होंने फला-"दपण, सम्मुख में है, यदि सम्भव हो तो मुझपर प्रहार कगे। यह दुष्ट धचन मुनते ही दूपण भड़क उठा। शत-शत बुद्धीमें प्रवीण दूपण लक्ष्मणके सम्मुख वैसे ही आया जैसे सिंहक नम्मुग्न गज आता है। लक्ष्मणने उसे भी तीरसे आहत कर दिया। मानो मगरसे महिन रेवा नदी के प्रवाहने विन्ध्याचलका ही विदीर्ण कर दिया हो ॥१-१०॥ [११] इस प्रकार अतुल बली घर और दृपणका पनन होने पर, उनकी सेनाको भी पगजित होना पड़ा । उनको पताका गांधी 1 और रणनयमे उन्मत्त उसके चारन थे । सान हजार मनिकना पाले ही मारे जा चुके थे.अब शेष सात हजार दूपर्णक गुनी काम आ । मनमा गुल मिलाकर उसनं चौदह हजार गजाभाका से माफ कर दिया मानो कपयनको पाट दिया। (मममय ) नग्यमेरे पान पटीई धनी गली मानमानी को मानी एमल-माने यम शरद-लामी 11 की परत lanी र आगन चिलागिनी का मीर पानी श्रीम. ग. यानवाली विधिनको नेनान पलरन मामि भी गनुमा मानन्दया मग जगाकर IIT- नप में माना जाता मामा ना ना ग मी !" म 1:.::.TA.RA मा: TRIME "Ti:- o- .

पउमचरित
[१२]
दुवई
हलहरु लक्खणेण लक्खिजइ सीया-सोय-णिन्भरो।
घत्तिय तोण-बाण महि-मण्डलें कर-परिचत्त-धणुहरो ॥१॥
विओय - सोय - तत्तओ । करि व्व भग्ग-दन्तओ ॥२॥
तरु व्व छिण्ण-डालओ । फणि व्व णिप्फणालओ ॥३॥
गिरि व वज-सूडिओ । ससि व्व राहु-पौडिओ ।।४।।
अपाणित व्व
मेहवो । वणे विसण्ण-देहओ ॥५॥
वलो सुमित्ति-पुत्तिणं । पपुच्छिओ तुरन्तिण ॥६॥
'ण दीसए विहङ्गओ । स-सीयो कहिं गओ' ॥७॥
सुणेवि तस्स जम्पिय । तमक्खिय ण जंपियं ॥८॥
'वणे विण जाणई । ण को वि वत्त जाणई ॥६॥
घत्ता
जो पक्खि रणेऽजउ दिण्णु सहेजउ सो वि समर संघारियउ ।
केणावि पचण्ड दिढ-भुभ-दण्डे णेवि तलप्पएँ मारियड' ॥१०॥
[१३]
दुवई
ए आलाव जाव वदृन्ति परोप्परु राम-लक्खणे ।
ताव विराहिओ वि वल-परिमिउ पत्तु तहिं जि तक्खणे ॥१॥
कियञ्जलि-हत्यएण । महिवाढोणामिय
विज्जाहरेण । जिणु जम्मणे जेम पुरन्दरण ॥३॥
आसीस देवि गुरु-मलहरेण । सोमित्ति पपुच्छिउ हलहरेण ॥४||
'सहुँ सेण्णे पणमिउ कवणु एहु । ण तारा-परिमिउ हरिणदेहु ॥५॥
तं वयणु सुणेप्पिणु पुरिस-सीहु । थिर-थोर-महाभुअ - फलिह-दीहु ॥६॥
सम्भावें रामहाँ कहइ एम । 'चन्दोयर-णन्दणु
खर-दूसणारि महु परम-मित्तु । गिरि मेरु जेम थिर-थोर-चित्तु'
तो एम पसंसवि तखणेण । 'हिय जाणई' अक्खिउ लक्खणेण ॥६॥
घत्ता
कहि कुढे लग्गेसमि कहि मि गवेसमि दइवे परम्मुह किं करमि ।
वलु सीया-सोएं मरइ विओएं एण मरन्तें हउँ मरमि' ॥१०॥
तो ताव
-
मत्थएण ॥२॥
बलएउ णमिट
एहु देव ॥७॥

चालीसमो संधि अव [१२] लक्ष्मणने जाकर देखा कि राम सीताके वियोगमें दुःखसे परिपूर्ण हो रहे हैं । धनुप तीर और तूणीर, सभी कुछ हाथ से छूटकर धरतीपर पड़ा है। वियोगके शोकसे आकुल राम, ऐसे ही म्लान शरीर हो रहे थे जैसे भग्नदन्त गज, छिन्नशाखा वृक्ष, फणरहित सर्प, वन पीड़ित पर्वत, राहुग्रस्त चन्द्र, और जल-रहित मेघ मलिन होता है। तुरन्त ही लक्ष्मणने रामसे पूछा-"अरे जटायु दिखाई नहीं देता, सीताके साथ वह कहाँ गया " यह मुनकर रामने जो कुछ कहा, लक्ष्मणको वह किसी भी प्रकार अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कहा-"सीता वनमें नष्ट हो गई, मै और कोई बात नहीं जानता" तथा जो अजेय पक्षिराज जटायु था उसका भी रणमें संहार हो गया-किसी बढ़ बाहु और प्रचंडवीरने उसे धरतीपर पटक दिया ||१-६।। [१३] इस तरह राम और लक्ष्मणमें बातें हो ही रही थीं, तभी अपनी गिनी-चुनी सेना लेकर विराधित वहाँ आया। हाथोंमें अंजलि लेकर और पीठ तक माथा झुकाकर विद्याधर विराधितने रामको वैसे ही प्रणाम किया जैसे इन्द्र जन्मके समय जिनेन्द्रको प्रणाम करता है। निर्मल रामने भी उसे आशीर्वाद देकर लक्ष्मण कि "यह कौन है जो तारोंसे वेष्टित चंद्रकी तरह, सेना सहित मुम नमस्कार कर रहा है।" यह सुनकर लक्ष्मणने सद्भाव- पूर्वक कहा, "देव, मंदराचलकी तरह विशाल और दृढ़ हृदय चंद्रोदरका पुत्र विगधित है, मंग पफा मित्र और खरदूपणका कट्टर शत्रु है। इस प्रकार उसकी प्रशंसा करके लक्ष्मणने तत्काल कहा.-"सीता हर ली गई हैं. उन्हें अब कहाँ खोजूं। देवके विगुम होनेपर क्या करें। राम सीताके वियोग मर रहे हैं। उनके मरनपर मैं भी मर जाऊँगा" ॥१-५॥

पउमचरित
[१४]
दुवई
तं णिसुणेवि वयणु चिन्ताविउ चन्दोयरहों गन्दणो।
विमणु विसण्ण-देहु गह-पीढिउ गं सारम-लन्छणो ॥१॥
'जं जं कि पि वत्थु भासतमि । तं तं णिप्फलु कहिं भवठम्भमि ॥२॥
पुय मुएवि कालु किह खेविउ । णिन्द्वणो वि बरि वट्टर सैविउ ॥३॥
होउ म होउ तो वि ओलग्गमि । मुणि जिह जिण दिदु चलणहिँ लग्गमिrel
विहि कत्तडउ कालु विणडेसइ । अवसें कं दिवसु वि सिय होसई' ॥५॥
एम भणेवि वुत्तु णारायणु । 'कुढे लग्गेवउ कत्तिउ कारणु ॥६॥
ताव गवेग्महुँ जाम णिहालिय' । लहु सण्णाह-भेरि अप्फालिय ॥७॥
साहणु दस-दिसेहिँ संचल्लिउ । आउ पढीवर जय-सिरि मेल्लिड ॥८॥
जोइस-चक्कु णाई परियत्तउ । णं सिद्धत्तणु सिद्धि ण पत्तउ ॥६॥
पत्ता
विजाहर-साहणु स-धउ स-वाहणु थिउ हेटामुहु विमण-मगु ।
हिम-वाएं दडउ मयरन्दउ णं कोमाणउ कमल-वणु ॥१०॥
[१५]
दुवई
वुत्त विराहिएण 'सुर-डामर तिहुमण-जण-भयावणे ।
घणे णिवसहुँ ण होइ खर-दूसणे मुए जीवन्त रावणे ॥१॥
सम्वुक्कु वहवि असि-रयणु लेवि । को जीवइ जम-मुहँ पइसरेवि ।।२।।
जहिँ अच्छइ इन्दइ भाणुकण्णु । पञ्चामुहु मउ मारिच्चि अण्णु ॥३॥
घणवाहणु जहिं अक्खय-कुमारु । सहसमइ विहीसणु दुण्णिवारु ॥४॥
हणुवन्तु णीलु णलु जम्ववन्तु । सुग्गीड समर-भर-उव्वहन्तु ||५||
अङ्गङ्गय-गवय - गवक्ख जेत्थु । तहाँ वन्धु वहवि को वसइ एत्यु' ॥६॥

चालीसमो संधि [१४] यह सुनकर राहुग्रस्त चंद्रकी तरह खिन्नशरीर और विमल चन्द्रोदरपुत्र विराधित चिंतित हो उठा। वह अपने मनमें सोचने लगा कि "मैं जिसकी आशंसा (शरण) में जाता है वहीं असफल क्या हो जाता है। इनके विना मैं अपने समयका यापन कैसे करूँगा? निर्धन होनेपर भी वड़ेकी सेवा करना अच्छा। हो न हो मैं इनकी ही सेवामें रहूँगा। आखिर भाग्यकी विडम्बना कवतक रहेगी। एक न एक दिन अवश्य संपदा होगी। यह विचारकर उसने लक्ष्मणसे कहा, "पीछा करना कौन बड़ी वात है, मैं तबतक सीतादेवीकी खोज करता हूँ, कि जवतक वह मिल न जाय !" यह कहकर उसने तुरन्त भेरी वजवा दी। दशो दिशाओं मे सेना इस प्रकार चल पड़ी मानो विजय-लक्ष्मी ही लौट रही हो या फिर ज्योतिषचक्र ही घूम रहा हो या सिद्धको सिद्धि प्राप्त हो रही हो । किंतु (प्रयत्न करनेके अनंतर) विद्याधर सेना ध्वज और वाहनों सहित अपना मुख नीचा करके ऐसे रह गई मानो हिम- वातसे आहत, म्लान और परागविहीन कमलिनीवन हो ॥१-१०॥ [१५] तदनन्तर विराधितने आकर रामसे कहा, "खरदूपण के मारे जानेके अनंतर रावणके जीवित हुए, देवभीषण और त्रिभुवनके जनोके लिए भयंकर इस वनमें रहना ठीक नहीं। शम्बूकका वधकर सूर्यहास उत्तम खड्गको लेकर एवं (इस प्रकार) कालके मुखमे प्रवेशकर कौन (यहाँ) बच सकता है । जहाँ इन्द्रजीत भानुकर्ण पंचमुख मय और मारीच है। तथा जहाँ मेघ- वाहन अक्षयकुमार तथा सहस्रबुद्धि और दुर्निवार विभीषण विद्य- सान है। हनुमान नल नील जाम्बवंत तथा युद्धभार उठानेम समर्थ सुग्रीव वर्तमान हैं, जहाँ अंग अंगद गवय और गवान हैं । वहाँ उसके बहनोईको मारकर कौन जीवित रह सकता है ।" यह मुन-

३४०
पउमचरित
।
ण
क्यणेण तेण लक्खणु विरुधु । गय-गन्धे गाइँ मइन्दु कुद्ध ॥७॥
'सुट्ठ वि रुदेहि मग्रामहि । कि रुम्भइ सीहु कुरङ्गमेहिं ।।।
रोमग्गु वि वर्ण होइ जेहिं । कि णिसियर-सपढहिँ गहणु तेहिँ ॥६॥
घत्ता
जे णरवइ अविखय रावण-पश्खिय ते वि रणनों णिवमि ।
छुडु दिन्तु णिरुत्तउ जुझु महन्तउ दूसण-पन्थें पटवामि' ॥१०॥
[१६]
दुवई
भणइ पुणोवि एम विजाहरु 'अच्छेवि किं करेसहुँ ।
तमलझार-णयरु पइसेप्पिणु जाणइ तहिँ गवसहुँ' ॥७॥
वलु वयणेण तेण, सहुँ साहणेण, सचल्लिउ ।
णाई महासमुदु, जलयर-रउद्ध, उत्थल्लिउ ॥२॥
दिण्णाणन्द-भेरि, पडिवक्स-खेरि, खर-वजिय ।
मयरहर-वेल, कल्लोलवोल, गलगन्जिय ॥३॥
उन्भिय कणय-दण्ड, धुन्चन्त धवल, धुअ-धयवढ ।
रसमसकसमसन्त-, तडतडयदन्त-, कर गय-घड ॥४॥
कथइ खिलिहिलन्त, हय हिलिहिलन्त,णीसरिया।
चञ्चल-चडुल-चवल, चलवलय पवल, पक्खरिया ॥५॥
कत्थइ पहें पयट्ट, दुग्धो-थट्ट, मय-भरिया ।
सिर गुमुगुमुगुमन्त, - चुमुचुमुचुमन्त, चञ्चरिया ॥६॥
चन्दण - वल-परिमलामोय-सेय - किय-कहमें।
रह-खुप्पन्त-चक - वित्थक्-छडय - भड-महवें ॥७॥
एम पयट्टु सिमिरु,ण वहल-तिमिर, उद्धाइउ ।
तमलङ्कार-णयरु णिमिसन्तरेण
पय-विरहेण रामु, भइ-खाम-खामु, झीणगउ ।
विय-मग्गेण तेण, कन्तहँ तणेण, गं लग्गउ ॥६॥
घत्ता
दहवयणु स-सीयउ पाणहँ भीयउ मन्छुडु एत्तहे णट्छु खलु ।
मेइणि विहारवि मग्गु समावि गं पायाले पइछ वलु ॥१०॥
सपाइउ ॥८॥

चालीसमो संधि २११ कर लक्ष्मण मदांध गजकी तरह एकदम भड़क उठा। वह बोला, "क्यों क्या सिह रुष्ट गजों या मृगोंसे अवरुद्ध हो सकता है, जिसका कोई भी वाल वाँका नही कर सकता भला उसे निशाचर- समूह क्या खाक पकड़ सकता है । तुमने रावणके पक्षके जिन राजाओका उल्लेख किया है मैं उन्हें भी युद्ध में नष्ट कर दूंगा।" ॥१-१०॥ [१६] इसपर विद्याधर विराधितने निवेदन किया, 'यहाँ रहकर भी आखिरकार हम करेगे क्या ? चलो तमलंकार नगरमे चलें, फिर सीताकी खोज की जाय ।" उसके अनुरोध करनेपर राम और लक्ष्मण सेनाके साथ ऐसे चल पड़े मानो जलचरोंसे भरा हुआ महासमुद्र ही उछल पड़ा हो। शत्रुको चब्ध करनेवाली आनन्दकी भेरी वज उठी। मानो समुद्र ही अपनी तरंग-ध्वनि से गरज पड़ा हो । गजघटाएँ कसमसाती रसमसाती और तड़-तड़ करती हुई निकल पड़ी। वख्तर पहने, अपनो चंचल गर्दन झुकाये और अश्व हिनहिनाते और खलवलाते वलयसे चले जा रहे थे। उनके सिरोंपर गुनगुनाते हुए भ्रमर घूम रहे थे। इस प्रकार घनी- भूत तमकी तरह उस सेनाने प्रस्थान किया। तब, प्रचुर चंदनरेणु और प्रस्वेदसे मार्ग पंकिल हो उठा । गड़े हुए रथ चक्रोसे निरुद्ध सैनिकोंमें रेल-पेल मची हुई थी। सेना उड़कर पलभरमे तम- लंकार नगर जा पहुंची। प्रिया-विरहमे अत्यंत क्षीणाङ्ग राम ऐसे लगते थे मानो वे सीताके ही मार्गका अनुगमन कर रहे हों। धरती विदीर्ण करती हुई सेना, उस पानाल नगरमे माना यह सोचती हुई घुस रही थी कि कहीं दुष्ट रावण अपने प्राणांसे भयभीत, सीतो देवीके साथ यही तो नहीं आया ॥१-१०॥

३४२
पउमचरित
जायं च
[१७]
दुवई
ताव पचण्ड वीरु खर-दूमण-णन्द्रणु तण्णिवारणो ।
सो सण्णहें वि सुण्ड पुर-वारें परिटिड गहिय-पहरणो ॥१॥
जं थक्कु सुण्डु रणमुह रउद्दु । उद्धाइड राहव - वल-समुदु ॥२।।
णवर कलयलाराबु उटिड दोहि मि सेण्णेहिं अभिट्टमाणेहि
जुमं महा - गोलुहाम-घोरारुणं मुक्क-हाहारवं ।।३।।
विरसिय-सय-सस - कंसाल - कोलाहलं काहलं-टहरी-झल्लरी-
महलुल्लोल - वजन्तभम्भीस - भेरी सरुजा - हुदुकाउलं ||था
पसहिय-गय-गिल्ल - कल्लोल - गजन्त-गम्भीर-भीसावणोरालि-
मेल्लन्त-रण्टन्त, घण्टा-जुभं पाठिय मेट-पाइक्यं भिण्ण-वच्छत्थल ।।५।।
सललिय-रह - चक
खोणी-पखुप्पन्त-धुप्पन्त-चिन्धावलि-हेम-
दण्डजलं-चामरच्छोह-विजिजमाण स-जोहं महासन्दणावीढयं ॥६॥
हिलिहिलिय - तुरङ्गमुव्वुण्ण - पण चल चञ्चलन महा-दुजय
दुद्धरं दुण्णिरिक्खं मही - मण्डलाबत्त-देन्तं हयाणं वल ॥७॥
हुलि-हल-मुसलग्ग-कोन्तेहिं अद्धेन्दु-सूलेहि वावल्ल-भल्लेहिँ णाराय-
सल्लेहि भिण्णं कराल ललन्तन्त-माल अ-सीसं कवन्धं पणञ्चावियं ।।८
-
घत्ता
तहिं सुन्द-विराहिय समर-जसाहिय अवरोप्परु वढन्त-कलि ।
पहरन्ति महा-रण मेइणि-कारण णं भरहेसर-बाहुबलि ॥६॥
[१८]
दुवई
चन्दणहाएँ ताव जुमन्तु णिवारिउ णियय-णन्दणो ।
'दीसइ मोहु जोहु खर
दूसण-सम्वुकुमार-महणो ॥१॥
जुज्मेवउ सुन्द ण होइ कन्जु । जीवन्तहँ होसइ अण्णु
वरि गम्पिणु सुर-पञ्चाणणासु । कूवारड
ओसरिउ सुण्ड वयणेण तेण । गउ लङ्क पराइड तक्खणेण ॥४॥
रज्जु ॥२॥
करहु दसाणणासु ॥३॥

चालीसमो संधि
३४३
[१७] सेना आती हुई देखकर खर-दूपणका वीर पुत्र प्रचंड
मुण्ड उमका निवारण करने के लिए तैयारी करने लगा। हाथों में
अन्त्र लेकर वह आकर द्वारपर जम गया । रणमुखमै अत्यन्त
भयङ्कर गुण्डके स्थित होते ही गमका सेना-समुद्र उचल पड़ा ।
दोना सेनाआम कल-कल ध्वनि होने लगी । अत्यन्त भयकर तथा
स्कट हाहाग्ब मच गया। सैकड़ो शल, कंसाल, काहल, टहनी,
मानग, मृदा आदि वाद्यो, मम्भीस, भेरी, सरल, और हुडएका
कोलाहल पूरित हो उठा। मन्जित मद मरते और गरजते हुए
गजीक घण्टासे भीषण ग्ब उठा । वक्षस्थलोंमें आहत होकर समर्थ
फैल सेना धगशाची होने लगी। सुन्दर रथचक्रोको कनारे
धग्नी धेनने लगी। टूटी हुई पताकाओके स्वर्णिम दण्डी और
चामगको कान्ति चमक उठी। ग्धकी पीठके साथ योधा गिग्न
लंग। चपला महान. अजेय. दुदर्शनीय. दिनहिनाते और कान
पकिय जग जमा धन्नी पर मंडलायन बना रहे थे। लि, हल,
नगलाय. भाला. अर्धचन्न शल, चावल. माला. वाण और शल्याने
भिन्न कगार मन्तफलीन घर धनीपर अपनी मालाको हिलाते
नारनं
कस प्रकार उन तुमुल युद्धम यशस्वी विगधित और
नाक वीर मामान भिन्न चार मी नगा. जिस तरह
धरतीय लिग भग्न और बालि नोचर भी ॥१॥

३४४
पटमचरिट
.
पत्भु मदिराहिउ पट्छ रामु । णं कामिणि-जणु मोहन्तु कामु ॥५॥
सर-दसण - मन्दिरें
पड्सरेवि । चन्दोयर पुत्तहों रजु देवि ॥६॥
साहार ण बन्ध कहि मि रामु । बदहि-विक्षाएं खामु सामु ॥७॥
रह-तिष. • चटफोहि परिभमन्नु । दीहिय - विहार - मह परिहरन्तु ॥८॥
गउ ताम जाम जिण-भवणु दिछ । परिभजे वि अन्भन्तर पइछ ॥६॥
घत्ता
जिणवर णिजाप वि चित्तं झाथि जाइ णिरारित विउलमइ ।
आहि भासे हि थोत्त-सहास हिं धुभउ स यंभु वणाहिवइ ॥३०॥
[४१. एकचालीसमो संधि]
स्वर-दूसण गिलपि चन्दहिहं तित्ति जाइय ।
ण खय-काल-छुह रावणहों पडीवी धाइय ॥
[]
सम्बुकुमार-वीर अत्यन्तएँ । खर-दूसण-सगामें समत्तएँ ॥३॥
दूरोसारिए सुन्द-महब्वलैं। तमलक्षार-णयर गएँ हरि-वलें ॥२॥
एथएँ असुर-मल्ल सुर-डामरौं । लवाहि
बहु-लद्ध-महावर ॥३॥
पर-चल-वल - पवाणाहिन्दोलणें । वहरि - समुद्द - रउह - विरोलणें ॥४॥
मुक्ड्कुस- मयगल - गलथल्लणें । दाण-रणन] हत्थुत्थल्लण ॥५॥
विहडिय-भड-थड-किय-कडमहण । कामिणि-जण-मख - णयणाणन्दण ॥६॥
सीयएँ सहु सुरवर-संतावण । छुडु छुडु लङ्क पहह' रावणें ॥७॥
तहि अवसर चन्दणहि पराइय । णिवडिय कम-कमलेहिं दुह-घाइय ॥८॥

पुचवालीसमा संधि ही लक्षाके लिए प्रस्थान किय। इधर तमलंबार नगर्ग, रामने विगवितरे साथ वैसे ही प्रवेश किय जैसे काम ज्ञानिनीजननें प्रवेश करता है। खरदूषण भवन में जाकर विरावितन गजाः सौप दिया । परन्तु गम किसी भी प्रकार अपनको सान्त्वना नहीं दे पा रहे थे। नीताक दिगंगमें वह जीगतम हो रहे थे। गन्य त्रिपय और चतुष्पयों में भ्रमण करते हुए वह विशाल विहार और मठोंको छोड़ते हुए एक जिन मन्दिरने पहुंचे। तीन बार उसकी प्रदक्षिणा देकर उन्होंने भीतर प्रवेश किया वहाँ जिनवरका दर्शन और व्यानकर निल बुद्धि राम एकदम निगल हो गये। अपनट (अपभ्रंश) भावाने हजारों श्लोकोसे वनाति मानने स्वयं जिनकी न्तुति की ॥१-धा इकतालीसवीं सन्धि बन्दृष्पगके मारे जानेपर भी चन्दनखात्री तृति नहीं हुई। जयबालनी भूवनी तन्ह, वह गवणले पास दौड़ी गई। [१] वर गेर शन्वृकका अन्त हो चुका था वन्दूषन भी युद्ध में नमाम्नाय थे। वीर नुम्डची स्ना हट चुकी थी। गम और लन्मग समन्य ननलार नगन प्रवेश कर चुके है। उबर देव- भयंत निशाचर वीर गण भी अनेक वरान कर चुका था। वह अत्यन्त ही समय था. नानी पवनको आन्दोलित करने, भयंकर गान मंचन निकापाजार गजानन दान- युद्धों. मुहान बग्नमें. विटिन भटनमूहको कुचलने समिनिगरे मन और नवीन मानन्द इन। मुरड़क उननं नीतामाजिनाममय लंगमें प्रवेश किया, जमीनमय बुटकी

पउमचरित
घत्ता
सम्बुकुमार मुड खर-दूषण जम-पहें लाइय ।
पई जीवन्तएँण एही अवत्थ हउँ पाइय' ॥६॥
[२]
तं चन्दणहिहं वयणु दयावणु । णिसुणे वि थिउ हेटामुहु रावणु ॥१॥
णं मयलन्छणु णिप्पहु जायउ । गिरि व दवग्गि-दड्ड विच्छायउ ॥२॥
ण मुणिवरु चारित्त-विभट्टउ । भविउ व भव-संसारहाँ तहउ ॥३॥
वाह-भरन्त-णयणु
मुह-कायरु । गहण गहिउणं
दिवायरु ॥४॥
दुक्खु दुक्खु दुक्खणामेल्लिउ । सयण-सणेहु सरन्तु पवोल्लिउ ॥५॥
'घाइउ जेण सम्वु खरु दूसणु । तं पटवमि अज्जु जमसासणु ॥६॥
अहवइ एण का माहप्पं । को ण मरइ अपूरें मप्पे ॥७॥
धीरी होहि पमायहि सोओ । कासु ण जम्मण-मरण-विओओ ॥८॥
घत्ता
को वि ण वजमठ जाएं जीवे मरिएवड ।
अम्हें हिं तुम्हें हि मि खर दूसण-पहें जाएवउ ॥६॥
[३]
धीरे विणियय वहिणि सिय-मागणु । रयणिहिँ गउ सोवणएँ दसाणणु ॥१॥
वर-पल्लक चडिउ लङ्घसरु । णं गिरि-सिहरै मइन्दु स-केसरु ॥२॥
णं विसहरु णीसासु मुअन्तउ । ण
सज्जणु खल-खेइज्जन्तउ ॥३॥
सीया-मोहें मोहित रावणु । गोयडू वायइ पढइ सुहावणु ॥४॥
णञ्चइ हसइ वियार हिँ भन्जइ । णिय-भूम जि पडीवउ लजाइ ॥५॥
दंसण - णाण - चरित्त - विरोहड । इह-लोयहाँ पर-लोयहाँ दोहउ ॥६॥

एक्कचासीसमो संधि मारी चन्द्रनखा भी उसके निकट पहुँची। चरणोंमें गिरकर वह बोली, "शम्बूक कुमार मारा गया, खरदूषणने भी यमका रास्ता नाप लिया है। आपके जीते जी मेरी यह दशा” ॥१-६॥ [२] चन्द्रनखाके दीन हीन वचनोको सुनकर, दशानन शीश झुकाकर ऐसे रह गया मानो चन्द्र ही कान्तिसे हीन हो उठा हो, या पर्वत दावानलमें जलकर प्रभाहीन हो उठा हो । या मुनि ही चरित्रसे भ्रष्ट हो गया हो, या भव्य जीव संसारसे त्रस्त हो उठा हो । उसकी आँखोसे अश्रु प्रवाह निरन्तर जारी था। उसका मुख एकदम कातर हो उठा मानो सूर्य ही राहुसे ग्रस्त हो गया हो । वड़े कठसे किसी प्रकार अपने दुखको दूरकर, दशानन स्वजनके स्नेह स्वरमें वोला, "कुमार शम्बूक और खरदूपणका जिसने वध किया हैं मै उसे आज ही यमके शासनमें भेज दूंगा। अथवा इस माहात्म्यसे क्या । (अपूरे माप ?? ) असमयमें कौन नही मरता । धीरज धारण करो। शोक छोड़ो। जन्म जरा मरण और वियोग किसे नहीं होता, वज्रसे कोई नहीं बनता । जो जन्मा है वह मरेगा अवश्य । हम तुम भी ( एक दिन) आखिर खर- दूपणके पदपर जायेंगे ।।१-६॥ [३] लक्ष्मीका अभिमानी रावण अपनी वहिनको समझा वुझाकर रातको सोनेके लिए गया। वह लंकेश्वर उत्तम पलंगपर चढ़ा मानो अयाल सहित मृगेन्द्र ही गिरिशिखर पर चढ़ा हो, मानो विपधर ही निश्वास छोड़ रहा हो, या दुष्टजनोंसे सताया हुआ सज्जन ही हो । सीताके मोहमें विह्वल होकर रावण कभी गाता, कभी बजाता, कभी सुहावने ढंगसे पढ़ने लगता, नाचता और हँसता । इस प्रकार वह विकारग्रस्त हो रहा था । इन्द्रियसुख- की आकांक्षाम वह उल्टा लज्जित हो रहा था। दर्शन ज्ञान और

३४८
पउमचरित
मलण-परब्बसु एउ ण जाणइ । जिह संधार करेसइ जाणइ ॥७॥
अच्छइ मयण-सर हिँ जजरियउ । खर-दूसण-णाउ मि वीसरियउ ॥८॥
धत्ता
चिन्तइ दहवयणु 'धणु धण्णु सुवण्णु समस्यउ ।
रज्जु वि जीविउ वि विणु सीयएँ सन्बु णिरत्थउ' ॥६॥
[४]
तहि अवसर भाइय मन्दोवरि । सीहहाँ पासु व सीह-किसोयरि ॥१॥
वर-गणियारि व लीला-गामिणि । पियमाहविय व महुरालाविणि ॥२॥
सारङ्गि व विप्फारिय-णयणी । सत्तावीसंजोयण-वयणी ॥२॥
कलहंसि व थिर-मन्थर-गमणी । लच्छि व तिय-रूवं जूरवी ॥४॥
अह पोमाणिहँ अणुहरमाणी । जिह सा तिह एह वि पउराणी ॥५॥
जिह सा तिह एह वि वहु-जाणी । जिह सा तिह एह वि वहु-माणी ॥६॥
जिह सा तिह एह वि सुमणोहर । जिह सा तिह एह वि पिय-सुन्दर ॥७॥
जिह सा तिह एह वि जिण-सासण । जिह सा तिह एह विण कु-सासणें ॥८॥
घत्ता
किं वहु जम्पिए ण उवमिजइ काहें किसोयरि ।
णिय-पडिछन्दएण थिय सइँ जणाई मन्दोयरि ॥६॥
[५]
तहिं पल्लङ्क च. वि रज्जेसरि । पभणिय लङ्कापुर - परमेसरि ॥१॥
'अहाँ दहमुह दहवयण दसाणण । अहाँ दससिर दसास सिय-माणण ॥२॥
अहाँ तइलोक्क - चक्क-चूडामणि । वइरि • महीहर - खर-वजासणि ॥३॥
वीसपाणि णिसियर-णरकेसरि । सुर-मिग-चारण दारण-अरि-करि ॥४॥
- णरवर - पायार-पलोट्टण । दुहम - दाणव - वल -
जइयहुँ भिडिउ रणगणे इन्दहाँ । जाउ कुल-क्खड सज्जण-विन्दहाँ ॥६॥
तहिं वि काले पइँ दुक्खु ण णायउ । जिह खर-दूसण-मरणे जायउ' ॥७॥
.
पर
दलवण ॥५॥

एकचालीसमो संधि चारित्रका विरोधी इहलोक और परलोकमें दुर्भाग्यजनक और कामके अधीन वह यह नहीं जान पा रहा था कि जानकी उसका कितना विनाश करेगी। कामके वाणोसे इतना जर्जर हो बैठा था कि खर और दूपणका नाम तक भूल गया। रावण सोचता,-"धन-धान्य, सोना, सामर्थ्य, राज्य और यहाँ तक जीवन भी, सीताके विना सव कुछ व्यर्थ है" ॥१-६॥ [४] इसी अवसरपर उसके पास मन्दोदरी आई मानो सिह के निकट सिंहनी आई हो। वह वन-हथिनीकी तरह लीला-पूर्वक चलनेवाली थी, प्रिय कोयलकी तरह मधुर आलाप करनेवाली थी, हिरनीकी तरह विस्फारित नेत्र थी। चन्द्रकी तरह मुखवाली थी, कल-हंसिनीकी तरह मन्थर गतिवाली, अपने स्त्रीरूपसे लक्ष्मीकी तरह सतानेवाली, इन्द्राणीको तरह अभिमानिनी और उसीकी तरह यह पटरानी थी। जैसे वह (इन्द्राणी) वैसे यह भी बहुपण्डिता थी । जैसे वह वैसे यह भी सुमनोहर थी। जैसे वह, वैसे ही यह भी अपने पतिकी बहुत प्रिय थी। जैसे वह वैसे ही यह जिन- शासनको मानती थी। जैसे वह, वैसे यह भी कुशासनमे नहीं रहती थी। अधिक कहनेसे क्या उस सुन्दरीको उपमा किससे दी जाय, अपने प्रति-उपमान के समान वहो स्वयं थी ।।१-४॥ [५] पलङ्गपर चढ़कर लङ्का परमेश्वरी राजेश्वरीने कहा- "अहो दशमुख, दशवदन, दशानन, दशशिर, दशास्य, लक्ष्मीके मानी, अहो, त्रिलोकचक्रचूड़ामणि, शत्रुरूपी कुलपर्वतोके लिए वन, वीस हाथवाले निशाचरराज सिंह, सुरमृगगज, शत्रुरूपी गजको नष्ट करनेवाले, शत्रुमनुष्योकी प्राचीरको तोड़नेवाले, दुर्दम दानव सेनाको चूरनेवाले, जब तुम इन्द्रसे लड़े थे उस समय अपने कुल का कितना माथा ऊँचा हुआ था। परन्तु उस समय तुम्हें उतना AA

३५०
पउमचरित
भणइ पडीवउ णिसियर-णाहो । 'सुन्दरि जइ ण करइ अवराहो ॥८॥
घत्ता
तो हउँ कहमि तउ णउ खर-दूषण-दुक्खुऽच्छइ ।
एत्तिउ डाहु पर जं मइँ वइदेहि ण इच्छई' ॥ ६ ॥
[६]
तं णिसुणेवि वयणु ससिवयणएँ । पुणु वि हसेवि वृत्तु मिगणयणए ॥१॥
'अहाँ दहगीव जीव-संतावण । एउ अजुत्तु वुत्तु पइँ रावण ॥२॥
कि जग अयस-पडहु अप्फालहि । उभय विसुद्ध वस किं मइलहि ॥३॥
किं गारइयहाँ गरऍ ण वीहि । पर-धणु पर-कलत्तु ज ईहहि ॥४॥
जिणवर-सासणे पञ्च विरुद्ध । दुग्गइ जाइ णिन्ति अविसुद्धइँ ॥५॥
पहिलउ वहु छजीव-णिकायहुँ । वीयउ गम्मइ मिच्छावायहुँ ॥६॥
तइयउ जं पर-दन्छ लइजइ । चउथउ पर-कलत्त सेविजइ ॥७॥
पञ्चमु गउ पमाणु घरवारहौँ । आयहिँ गम्मइ भव-संसारहों ॥८॥
घत्ता
पर-लोएं वि ण सुहु इह-लोएँ वि अयस-पडाइय ।
सुन्दर होइ ण तिय ऍय-वेसें जमउरि आइय' ॥६॥
[७]
पुणु पुणु पिहुल-णियम्ब किसोयरि । भणइ हिमयत्तणेण मन्दोयरि ॥१॥
'ज सुहु कालकूडु विसु खन्तहुँ । जं सुहु पलयाणलु पइसन्तहु ।।२।।
जं सुहु भव-संसार भमन्तहुँ । जं सुहु णारइयहुँ णिवसन्तहुँ ॥३॥
जं सुहु जम-सासणु पेच्छन्तहुँ । जं सुहु असि-पारै अच्छन्तहुँ ॥४॥
ज सुह पलयाणल-मुह-कन्दर । ज सुहु पञ्चाणण - दाढन्तर ॥५॥
ज मुहु फणि-माणिक्कु खुडन्तहुँ । तं सुहु एह णारि भुञ्जन्तहुँ ॥६॥
जाणन्तो वि तो वि जइ बन्छहि । तो कज्जेण केण मइ पुच्छहि ॥७॥

एक्कचालीसमो संधि दुख नहीं हुआ था जितना खर और दूषणके वियोगमें अभी हुआ। तब निशाचरनाथने कहा-'हे सुन्दरी, यदि अपराध न माना जाय तो मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि मुझे खर-दूषणके मरणका कुछ भी दुख नहीं है, दुख केवल यही है कि सीता मुझे नहीं चाहती" ।।१-६॥ [६] यह वचन सुनकर शशिवदना मृगनयनी मन्दोदरीने हँसकर कहा-"अरे दशग्रीव, जीव-संतापकारी रावण, यह तुमने अत्यन्त अनुपयुक्त कहा ! क्यों दुनियामे अपने अयशका डका पिटवाते हो, दोनो ही विशुद्ध कुलोंको क्यों कलङ्कित करते हो, नरकके नारकियोंसे क्या नहीं डरते, जो तुम परस्त्री और परधन की इच्छा करते हो। जिनवर शासनमे पॉच चीजे विरुद्ध हैं। ये दुर्गतिमें ले जानेवाली और नित्यरूपसे अशुद्ध हैं। पहले छह निकायों के जीवोका वध, दूसरे मिथ्यात्ववाद लगाना, तीसरे पर-द्रव्यका अपहरण, चौथे परखी सेवन करना और पॉचवे अपने गृहद्वार (गृहस्थी ) का परिमाण न करना । इनसे भव-संसारमें भटकना पड़ता है, परलोकमें तो अयश फैलता ही है। स्त्री सुन्दर नहीं होती, इसके रूपमे मानो यमपुरी ही आई है" ॥१-६॥ [७] पृथुलनितम्बा कृशोदरी मन्दोदरी वार-बार हृदयसे यही कहती-“कालकूट विप खानेमे जो सुख है, जो सुख प्रलय की आगमे प्रवेश करने में है, जो सुख भव-सागरमे घूमनेमे हैं, जो सुख नारकियाके वीच निवास करनेमे है, जो सुख यमका शासन देखनमें है, जो सुख, तलवारकी धारपर बैठनेम है, जो सुख प्रलयानल मुख-गुहामें प्रवेश करनेमे है, जो मुख सिंहको दंष्ट्राके नीचे आनने हैं, जो सुख शेषनागकी फगमणि तोड़नेमे है, वही सुख इस नारीका भोग करनेमे है, जानते हुए भी यदि तुम इसे

३५२
पउमचरिउ
तउ पासिउ कि कोई वि वलियउ । जेण पुरन्दरो वि पडिखलियउ |
घत्ता
जं जसु आवडइ तहाँ तं अणुराउ ण भन्नइ ।
जइ वि असुन्दरउ जं पहु करेइ तं छजई' ॥६॥
[5]
तं णिसुणेवि वयणु दहवयणे । पमणिय णारि विरिल्लिय-णयणें ॥१॥
'जइयहुँ गयउ आसि अचलिन्दहाँ । वन्दण-हत्तिएँ परम-जिणिन्दहा ॥२॥
तहहु दिछु एक्कु मई मुणिवरु । गाउँ अणन्तवीर .परमेसह ॥३॥
तासु पासें वउ लइउ ण भक्षमि । मण्डएँ पर - कलत्तु णड भुमि ॥४॥
अहवइ एण काई मन्दोभरि । जइ णन्दन्ति णियहि लङ्काउरि ॥५॥
जइ मग्गहि धणु धण्णु सुवण्णउ । राउलु रिद्धि - विद्धि-संपण्णउ ॥६॥
जइ आरुहहि तुरङ्ग-गइन्देहि । जइ वन्दिजइ वन्दिण-वन्दै हिँ ॥७॥
जइ मग्गहि णिक्कण्टउ रज्जु । जइ किर मई वि जियन्तण कन्जु l
घत्ता
सयलन्तेउरहाँ जइ इच्छहि गउ रण्डत्तणु ।
तो परि जाणइह मन्दोयरि कर दूअत्तणु' ॥६॥
तं णिसुणे वि वयणु दहवयणहाँ । पमणिय मन्दोयरि पुरि मयणहाँ ॥१॥
'हो हो सन्खु लोउ जग दूहउ । पइँ मेल्लेविणु अण्णु ण सूहउ ॥२॥
सुरकरि-अहिसिञ्चिय-सिय-सेविहं । जो आएसु देहि महएविहें ॥३॥
एव वि करमि तुम्हारउ वृत्तउ । पहु-छन्देण अजुत्तु वि जुत्तउ' ॥४॥
ए आलाव परोप्परु जाहिँ । रयणिह चड पहरा हय ताहिं ॥५॥
अरुणुग्गम अञ्चन्त-किसोयरि । सीयह दूई गय मन्दोयरि ॥६॥
सहुँ अन्तेउरेण उद्धृसिय । गणियारि व गणियारि-विहूसिय ॥७॥

एक्कचालीसमो संधि ३५३ । चाहते हो, तो फिर मुझसे क्यों पूछते हो, तुझसे अधिक बलवान और कौन है । तुमने तो इन्द्रप्रभको परास्त कर दिया। जिसपर जो आ पड़ता है उससे उसका प्रेम नष्ट नहीं होता? यद्यपि यह अशोभन है फिर भी आप जो करेंगे वह शोभा ही देगा। [८] यह वचन सुनकर विशालनयन रावणने अपनी पत्नीसे कहा, "जब मैं जिनको वन्दना-भक्तिके लिए मन्दराचल पर्वतपर गया हुआ था तो वहाँ अनन्तवीर्य नामक मुनिसे मेरी भेट हुई थी, उनसे मैने यह प्रतिज्ञा ली थी कि जो स्त्री मुझे नहीं चाहेगी उसका मै बलपूर्वक भोग नहीं करूंगा। अथवा इससे क्या ? हे मन्दोदरी, यदि तुम इस लङ्का-नगरीमें आनन्द करना चाहती हो, यदि धन-धान्य सुवर्णकी इच्छा करती हो, यदि ऋद्धि और वृद्धिसे पूर्ण राज्यका भोग करना चाहती हो, यदि तुरङ्ग और गजोपर बैठना चाहती हो, यदि वन्दीजनोंसे अपनी स्तुति करवाना चाहती हो, यदि निष्कंटक राज्य चाहती हो, यदि मुझे भी जीवित देखना चाहती हो, और यदि यह भी चाहती हो कि समूचे अन्तःपुरका रड़ापा न आये तो जानकीके पास जाकर मेरा दौत्य-कार्य कर दो"॥१-६॥ [६] यह वचन सुनकर, कामकी नगरीके समान मन्दोदरीने कहा, "हो हो, सब लोक दुखद है, तुम्हे छोड़कर मुझ अन्य कुछ भी सुभग नहीं है, ऐरावत द्वारा अभिषिक्त, श्रीसे सेवित, इस महादेवीको आप जो भी आज्ञा देंगे, वह मै अवश्य करूंगी। क्योकि पतिके स्वार्थके लिए अनुचित भी उचित होता है । इस प्रकारकी वाते होते-होते रातके चारों पहर बीत गये । सूर्योदय होते ही मन्दोदरी सीतादेवीके निकट दूती वनकर गई । अपने अन्तःपुरके साथ वह वैसी ही विभूपित थी जैसे हथिनियोंसे २३

३५४
पउमचरित
वणु गिब्वाणरवणु संपाइय । राहव-धरिणि तेत्यु णिज्झाइय ॥८॥
घत्ता
वे वि मणोहरिउ रावण-रामहु पिय-णारिउ ।
दाहिण-उत्तरण ण दिस-गइन्द-गणियारिउ ॥९॥
[१०]
राम-घरिणि जं दिड किसोयरि । हरिसिय णिय-मणेण मन्दोयरि ॥१॥
'अहिणवणारि-रयणु अवइण्णउ । एउ ण जाणहुँ कहिँ उप्पण्णउ ॥२॥
सुरहु मि कामुक्कोयण-गारउ । मुणि-मण-मोहणु णयण-पियारउ ॥३॥
साहु साहु णिउणोऽसि पयावइ । तुह विण्णाण-सत्ति को पावइ ॥४॥
अह किं वित्थरेण वहु-बोल्लएँ । सइँ कामो वि पडइ कामिल्लएँ ॥५॥
कवणु गहणु तो लड्दा-राए' । एम पससँवि मणे अणुराएं ॥६॥
पिय-वयणेहिं दसाणण-पत्तिएँ । चुच्चइ राम-घरिणि विहसन्तिएँ ॥७॥
'कि वहु-जम्पिएण परमेसरि । जीविउ एक्कु सहल तउ सुन्दरि ॥८॥
घत्ता
सुरवर-डमर करु तइलोक्क-चक्क-संतावणु।
काई ण अस्थि तउ जहँ आणवडिच्छउ रावणु' ॥६॥
[११]
इन्दइ - भाणुकण्ण - घणवाहण । अक्खय-मय-मारिच्च - विहीसण ॥१॥
जं चलणेहि घिवहि आरूस वि । त सीसेण लयन्ति असेस वि ॥२॥
अण्णु वि सयलु एउ अन्तेउरु । सालङ्कार स-दोरु स-णेउरु ॥६॥
अट्ठारह सहास र-विलयहुँ । णिच्च-पसाहिय-सोहिय - तिलयहुँ ॥४॥
आयहुँ सव्वहुँ तुहुँ परमेसरि । णोसावण्णु रज्जु करि सुन्दरि ।।५।।
रावणु मुए वि अण्णु को चङ्गउ । रावणु मुए वि कवणु तणु-अङ्गउ ॥६॥
रावणु मुएँ वि अण्णु को सूरउ । पर-वल-महणु
कुलासा-पूरउ ॥७॥

एक्कचालीसमो संधि . विभूपित हथिनी होती है । वह नन्दन वनमें पहुंची । वहाँ उसे रामकी पत्नी सीतादेवी दिखाई दीं। उस अवसर पर राम और रावणकी सुन्दर पत्नियाँ ऐसी शोभित हो रही थी मानो दक्षिण तथा उत्तरके दिग्गजांकी हथिनियाँ ही हो ॥१-६।। [१०] कृशोदरा रामकी पत्नी सीताको देखकर मंदोदरी मन ही मन खूब प्रसन्न हुई, वह सोचने लगी, “यह तो अद्भुत नारी- रत्न अवतीर्ण हुआ है। यह कहाँ उत्पन्न हुई, यह तो देवोको भी काम उत्पन्न करनेवाली, मुनियोका मन मोहित करनेवाली अत्यंत नयनप्रिय है । साधु, साधु, विधाता ! तुम बहुत चतुर हो, तुम्हारी विनानकलाको कौन पा सकता है। अथवा बहुत कहनेसे क्या, इसे देखकर तो साक्षात् काम भी कामासक्त हो सकता है। रावण द्वारा इसका ग्रहण कैसे हो । मन ही मन अनुरागसे इस तरह उनकी प्रशंसा कर, रावणकी पत्नी मन्दोदरीने हँसकर रामकी पत्नी सीतादेवीसे प्रिय वचनोंमे कहा, “हे परमेश्वरी, बहुत कहनेसे क्या, एक तुम्हाग ही जीवन (दुनियामे) सफल है। तुम्हारा (अव) क्या नहीं है जो मुरवरोको भ्रम उत्पन्न करनेवाला, त्रिलोक चक्र-संतापक, रावण भी तुम्हारा आज्ञाकारी है ॥१-६।। [११] इन्द्रजीत, भानुकर्ण, धनवाहन, अक्षय, मय, मारीच और विभीपण, जिस किसीको अपने पैरोसे ठुकरा देते हैं, वे ही सब गवगको अपने सिर-माथे लेते हैं। और भी यह समस्त, अलंकार, डोर और नृपुगेसे सहित, अन्तःपुर है तथा उत्तम चूड़ियों और नित्य सजाये गये तिलकोंवाली अठारह हजार सुन्दर दिया है। भाग्यशील चे सब तुम्हारी हैं, तुम इनपर शासन करी, (अच्छा तुम्ही बताओ) रावणको छोड़कर, अन्य कौन, शत्रुसेनाका नंहारक, अपने अलका आशापूर्वक है। रावणके

पउमचरिउ
रावणु मुए वि अण्णुको वलियउ । सुरवर-णियरु जेण पडिखलियउ ।।।।
रावणु मुए वि अण्णु को भल्लउ । जो तिहुयणहाँ मल्लु एक्कलउ ॥६॥
रावणु मुएँ वि अण्णु को सूहउ । जं आपेक्दैवि मयणु वि दूहउ ॥१०॥
घत्ता
तहाँ लकेसरहीं
कुवलय-दल-दीहर-णयणहों।
भुञ्जहि सयल महि महएवि होहि दहवयणहाँ' ॥११॥
[१२]
तं तहें कटुअन्वयणु आयणें वि । रावणु जीविउ तिण-समु मण्णवि ॥१॥
सील-वलेण वलिय णउ कम्पिय । रूस वि णिट्ठुर वयण पजम्पिय ॥२॥
'हल हलें काई काई पड़ वृत्तउ । उत्तिम-णारिह 'एउ ण जुत्तउ ॥३॥
किह दइयहाँ दूअत्तणु किजइ । एण गाइँ महु हासउ दिज्जइ ॥४॥
मन्छुडु तुहुँ पर-पुरिस-पइद्धी । ते कब्जे महु देहि दुवुद्धि ।।५।।
मत्थए पडउ वज्जु तहाँ जारहाँ । हउँ पुणु भत्तिवन्त भत्तारहाँ' ॥६॥
सीयह वयणु सुणे वि मणें डोलिय । णिसियर-णाह-णारि पडिवोल्लिय ॥७॥
'जइ महएवि-पटू ण पडिच्छहि । जइ लङ्काहिउ कह वि ण इच्छहि ॥५॥
।
।
घत्ता
तो कन्दन्ति पई तिल तिलु करवत्तहिं कप्पइ ।
अण्णु मुहुत्तएण णिसियरहँ विहन्ज वि अप्पइ' ॥६॥
[१३]
पुणुपुणुरुत्तहिँ जणयहाँ धीयएँ । णिन्मच्छिय मन्दोवरि सीयए ॥१॥
'केत्तिउ वारवार वोल्लिज्जइ । जं चिन्तिउ मणेण तं किजइ ॥२॥
जइ वि अज्जु करवत्तहिँ कप्पहाँ । जइ वि धरै वि सिव-साणहाँ अप्पहाँ ।
जइ वि वलन्त हुआसणे मेल्लहाँ । जइ वि महग्गय-दन्तहिं पेल्लहों ॥४॥
तो वि खलहाँ तहाँ दुक्किय-कम्महाँ। पर-पुरिसहाँ णिवित्ति इह जम्महाँ ॥५॥
एक्कु जि णिय-भत्तारु पहुच्चइ । जो जय-लच्छिए खणु विण मुच्चइ ॥६॥

एकचालीसमो संधि ३५७ सिवाय, कौन ऐसा वलवान है जिसने सुरसमूहको सहसा परास्त कर दिया हो, तीनों लोकोंमें रावणको छोड़कर दूसरा वीर नहीं। रावणके अतिरिक्त और कौन सुभग है जिसे देखकर कामदेव भी विकल हो उठता है । तुम, कमलदलकी तरह विशालनयन लंकेश्वर उस रावणकी समस्त धरतीका भोग करो ॥१-११|| [१२] रानी मन्दोदरीकी इन कड़वी बातोंको सुनकर भी सीताने रावणको तिनके की तरह तुच्छ समझा और अपने शीलके तेजसेवह जरा भी नहीं डरी । और क्रुद्ध होकर वह एकदम कठोर शब्दोंमें वोली,-"हला-हला, तुमने क्या कहा, एक भद्र महिलाके लिए यह उचित नहीं है, तुम रावणका दूतीपन क्या कर रही हो। इस तरह मेरी हँसी मत उड़ाओ, जान पड़ता है तुम्हारी किसी परपुरुषमे इच्छा है, इसीसे यह दुर्बुद्धि मुझे दे रही हो। तुम्हारे यारके माथे पर वन पड़े, मैं तो अपने ही पतिमें दृढ़ भक्ति रखती हूँ।" सीताके वचन सुनकर मन्दोदरीका मन चञ्चल हो उठा। उसने कहा, "यदि तुम महादेवीका पट्ट नहीं चाहती, यदि तुम लंका-नरेशको किसी भी तरह नहीं चाहती, तो क्रन्दन करती हुई तुम्हें करपत्रसे तिल-तिल काटा जायगा, और दूसरे ही क्षण, निशाचरोंको वोट दी जाओगी ॥१-६।। [१३] तब जनककी पुत्री सीताने वार-बार मन्दोदरीकी भर्त्सना करते हुए कहा, "बार-वार कितना वोलती हो जो तुम्हारे मनमें हो वह कर डालो, यदि तुम आज ही करपत्रसे काट दो, यदि तुम आज ही पकड़कर शानपर चढ़ा दो, यदि जलती हुई आगमें डाल दो, यदि गजराजके दॉतोंके आगे ठेल दो, तो आज ही, उस दुष्टके पापकर्म और परपुरुपसे इस जन्ममे ही छूट जाऊँगी। मुझे वही एक, अपना पति पर्याप्त है जिसे विजयलक्ष्मी कभी 1

३५८
पउमचरित
मा
जो असुरा-सुर-जण-मण-वल्लहु । तुम्हारिसहुँ कुणारिहिं दुल्लहु ॥७॥
जो
णरवर-मइन्दु भीसावणु । धणु-लगृल-लील-दरिसावणु
घत्ता
सर-णहरारुणण धणुवेय-ललाविय-जीहे ।
दहमुह-मत्त-गउ फाडेवउ राहव-सहि' ॥६॥
[१४]
रामण रामचन्द्र • रमणीयहुँ । जाम वोल्ल मन्दोवरि-सीयहुँ ॥१॥
ताव दसाणणु सयमेवाइउ । हत्थि व गङ्गा-वेणि पराइउ ॥२॥
भसलु च गन्ध-लुद्ध विहडफड । जाणइ-वयण-कमल-रस - लम्पडु ॥३॥
करयल धुणइ झुणइ वुक्कारइ । खेड्दु करेवि देवि पच्चारइ ॥४॥
विण्णत्तिए पसाउ परमेसरि । हउँ कवणेण हीणु सुर-सुन्दरि ॥५॥
किं सोहग्गे भोग्गे अणउ ! कि वित्यउ कि अत्थ-विहूणउ ॥६॥
किं लावणे वण्णे हीणउ । किं संमाणे दाणे रणे दीणउ ॥७॥
कहे कज्जेण केण ण समिच्छहि । जे महएवि-पटु ण पडिच्छहि ॥८॥
घत्ता
राहव-गेहिणिए णिव्भच्छिउ णिसियर-राणउ ।
'ओसरु दहवयण तुहुँ अम्हहुँ जणय-समाणउ ॥६॥
[१५]
जाणन्तो वि तो वि म मुज्झहि । गेण्हें वि पर-कलत्तु कहिँ सुज्झहि ॥१॥
जाम ण अयस-पडहु उभासइ । जाम ण लढाणार विणासइ ॥२॥
जाम ण लक्खण-सीहु विरुज्झइ । जाम ण राम-कियन्तु विवुज्झइ ॥३॥
जाम ण सरवर-धोरणि सन्धइ । जाम ण तोणा-जुअलु णिवन्धइ ॥१॥
जाव ण वियड-उरत्थलु भिन्दइ । जाव ण वाहुदण्ड तउ छिन्दइ ॥५॥
सरवर हंसु जेम दल-विमलइँ । जाव ण तोडइ दस-सिर-कमलइँ ॥६॥

एक्कचालीसमो संधि ३५६ ? नहीं छोड़ती, जो सुर और असुरोके मनको प्रिय है, और जो तुम जैसी खोटी स्त्रियोके लिए दुर्लभ है। वह मनुष्योमें सिह है जो धनुपकी पूँछसे अपनी लीला दिखाता है, वाणरूपी अरुणनखोंसे सहित, धनुपकी चपल जीभवाला रामरूपी सिंह रावणरूपी मद- गजको अवश्य विदीर्ण करेगा ||१-६॥ [१४] राम तथा रावणकी पत्नियाँ (सीता और मन्दोदरी) इस तरह वातें हो रही थी कि इतनेमे दशानन ऐसा आ धमका मानो गङ्गा नदीके तटपर हाथी आ गया हो या जानकीके मुखरूपी कमलका लम्पट गन्धलुब्ध भ्रमर ही व्याकुल हो उठा हो। हाथ वजाता, ध्वनि करता और कुछ बुदबुदाता और क्रीड़ा करके पुकारता हुआ वह बोला-"देवी, परमेश्वरी ! मुझपर कृपा करो, मै किसी वातमें हीन हूँ क्या ? सौभाग्य या भोगमें हीन हूँ क्या ? या अर्थ हीन हूँ ? क्या सौन्दर्य या रङ्गमें कम हूँ, क्या सम्मान, दान, युद्ध की दृष्टिसे होन हूँ, कहो किस कारणसे तुम मुझे नहीं चाहती ? और जिससे तुम महादेवीके पढ़की भी इच्छा नहीं करती ।" तव राघवकी गृहिणी सीताने रावणकी भर्त्सना करते हुए कहा- "रावण मेरे सामनेसे हट, तू मुझे पिताके बराबर है" ॥१-६|| [१५] जानकर भी तुम मुझपर मोहित हो रहे हो, परस्त्री ग्रहण करके कैसे शुद्ध होओगे, इसलिए जब तक तुम्हारी अकीर्तिका डंका नहीं पिटता, जब तक लंका नगरी नहीं ध्वस्त होती, जव तक लक्ष्मण रूपी सिंह क्रुद्ध नहीं होता, जब तक रामरूपी कृतान्त इसे नही जान पाते, जब तक वह तीरोकी धाराका संधान नही करते, जब तक दोनों तरकस नहीं बाँधते, जब तक तुम्हारा विकट उरस्थल नहीं भेदते, जब तक तुम्हारा वाहुदण्ड छिन्न-भिन्न नहीं करते, जब तक सरोवरमे हंसकी तरह दलमल नहीं करते, जब

३६०
पउमचरिउ
जाम ण गिद्ध-पन्ति णिन्वइ । जाम ण णिसियर-वलु भावइ ॥७॥
जाम ण दरिसावइ धय-चिन्ध । जाम ण रण णञ्चन्ति कवन्धई ॥८॥
घत्ता
जाम ण आहयण कप्पिजहि वर-णारायहि ।
ताव णराहिवइ पडु राहवचन्दहाँ पायहिँ ॥६॥
[१६]
तं णिसुणे वि आल्ट् छ उसाणणु । गं घण गजमाण पञ्चागणु ॥१॥
कोवाणल-पलित्तु लझेसरु । चिन्तई विजाहर-परमेसर ॥२॥
'किं जम-सासण-पन्थे लायमि । कि उवसग्गु किं पि दरिसावमि ॥३॥
अवसें भव-वसेण इच्छेसइ । महु मयणग्गि समुल्हावेसई' ॥४॥
तहिँ अवसर स-तुरड्गु स-रहवरु । गउ अत्थवणहाँ ताम दिवायरु ॥५॥
आय रत्ति णाणाविह-रूव हि । अट्टहास मेल्लन्तहिं भूएँहि ॥६॥
खर-साणउल- विराल-सियाले हिँ । वहु-चामुण्ड - रुण्ड - वेयाले हिँ ॥७॥
रक्खस-सीह-वग्ध-गय · गण्डै हिँ । मेस-महिस-वस-तुरय-णिसण्डहिं ।।८।।
तं उवसग्गु णिएवि भयावणु । तो विण सीयह सरणु दसाणणु ॥६॥
घोरु रउद्दु झाणु संचू वि । थिय मण धम्म-माणु आउरें वि ॥१०॥
।
घत्ता
'जाव ण णीसरिय उवसग्ग-भयहाँ गम्भीरहों।
ताव णिवित्ति महु चरविह-आहार-सरीरहाँ ॥११॥
[१७]
पहय पओस पणासवि णिग्गय । हल्थि-हढ व्व
णिसियरि च गय घोणावदिय । भग्ग-मडप्फर माण-कलक्ष्यि ॥२॥
सूर-भएण गाई रणु मेल्लें वि । पइसइ णयह कवाडई पेल्लें वि ॥३॥
सूर-पहराहय ॥३॥

एकचालीसमो संधि - तक तुम्हारा दस मुखरूपी कमल नहीं तोड़ते, जव तक गीधोंकी पॉत नहीं झपटती, जब तक निशाचर-सेना नहीं मथी जाती, जब तक उनके ध्वजचिह्न नहीं दीख पड़ते, जब तक युद्ध-स्थलमें कबन्ध नहीं नाचते, जब तक तुम युद्धमे बाणोंसे नहीं काटे जाते तव तक, हे राजन् ! तुम रामके पैरों में पड़ जाओ" ॥१-६॥ [१६] यह सुनकर रावण कुपित हो उठा, वैसे ही जैसे मेघ गरजने पर सिंह गरज उठता है। कोपकी ज्वालासे प्रदीप्त होकर, विद्याधरोंका राजा और लंकाधिपति रावण सोचने लगा- "क्या इसे यमके शासन पथपर भेज दूं, या किसी घोर उपसर्गका प्रदर्शन करूं, अवश्य ही यह उस समय मुझे चाहने लगेगी और मेरी कामज्वालाका शमन करेगी। ठीक उसी समय रथ और अश्वोंके साथ, सूर्यका अस्त हो गया। नाना रूपोंसे रात आ पहुंची, भूत अट्टहास करने लगे, खर (गधा) श्वानकुल, शृगाल, चामुण्ड, मण्ड, वेताल, राक्षस, सिंह, गज, मेड़ा, मेप, महिप, बैल, तुरग और निसुण्डोंसे उपसर्ग होने लगा। उस भयङ्कर उपसर्गको देखकर भी रावणको सीताकी शरण नहीं मिली। घोर रौद्र ध्यानको दुरकर, वह धर्मध्यानकी अवधारणाकर अपने मनमें लीन होकर बैठ गई । और उसने यह नियम ले लिया कि जब तक मै गम्भीर उपसर्ग-भयसे मुक्त नहीं होती तब तक चार प्रकारके आहारसे मेरी निवृत्ति है ॥१-११॥ [१७] गतका प्रहर नष्ट होकर वैसे ही चला गया जैसे शूरवीरके प्रहारने आहत होकर गजघटा चली जाती है, गत, मन्त्रोने ताड़ित, भन्न अहाहार, और मान कलद्वित करनेवाली निशाचरीकी तरह चली गई। नरके भयसे मानो वह रण छोड़कर किवादीको धफा देकर नगर में प्रवेश कर रही थी। शयन-स्थानमें

पउमचरिउ
दीवा पजलन्ति जे सयण हिँ । ण णिसि वलवि णिहालइ णयणे हिँ ॥४॥
उहिउ रवि अरविन्दाणन्दउ । ण महि-कामिणि-केरउ अन्दउ ॥५॥
णं सम्झाएँ तिलउ दरिसाविउ । णं सुकइह जस-पुल्नु पहाविउ ॥६॥
णं मम्भीस देन्तु वल-पत्तिहँ । पच्छल गाइँ पधाइउ रत्तिहँ ॥७॥
ण जग-भवणहाँ वोहिउ दीवड । णाइ पुणु वि पुणु सो ज पीवउ ॥८॥
घत्ता
तिहुअण-रक्खसहाँ दारवि दिसि-बहु-मुह-कन्दरु ।
उबर पईसर वि णं सीय गवेसइ दिणयरु ॥६॥
[१८]
रयणिहँ तिमिर-णियर-रए भग्गएँ । णिव रावणहाँ आय ओलग्गए ॥१॥
मय - मारिच - विहीसण - राणा । अवर वि भुवणेक्क-पहाणा ॥२॥
खर-दूसण-सोएण णयाणण । णं णिकेसर वर पञ्चाणण ॥३॥
णिय-णिय-आसणेहि थिय अविचल । भग्ग-विसाण णाई वर मयगल ॥४॥
मन्ति-महल्लएहिँ एत्थन्तरें । णिसुणिय सीय रुअन्ति पडन्तर ॥५॥
भणइ विहीसणु 'ऍहु को रोवइ । वारवार
अप्पाणउ सोअइ ॥६॥
णावइ पर-कलत्तु विच्छोइउ' । पुणु दहवयणहाँ वयणु पजोइउ ॥७॥
'मन्छुडु 'एउ कम्मु तुह केरउ । अण्णहाँ कासु चित्त विवरेरउ' ॥८॥
णिसुणेवि सीय आसासिय । कलयण्ठि व पिय-वयहि भासिय ॥६॥
एहु दुजणहाँ मज्म को सजणु । णिम्व-वहाँ अन्भन्तर चन्दणु ॥१०॥
.
घत्ता
विहुरे समावडिए ऍहु को साहम्मिय-वच्छलु ।
जो मइँ धीरवइ एवड्डु कासु सई भु व-चलु' ॥११॥

एक्कचालीसमो संधि जो दीप जल रहे थे मानो रात उनके वहाने अपने नेत्रोंको मोड़कर देख रही थी, अरविन्दोंको आनन्द देनेवाला रवि उदित हो गया। वह मानो धरतीरूपी कामिनीका दर्पण था, या मानो सन्ध्याका तिलक था, या मानो कवि यशःपुञ्ज चमक रहा था, या मानो रामकी पत्नी सीतादेवीको अभय देता हुआ रातके पीछे दौड़ा हो । या विश्व-भुवन दीपक जला दिया गया हो। और वार-बार वही लौट आ रहा हो। त्रिभुवनरूपी निशाचरकी दिशा-वधूके मुख-कन्दराको फाड़कर और ऊपर आकर मानो सूर्य सीता देवीको खो रहा था ॥१-६॥ [१८] रातके अन्धकार-पटलकी धूल भग्न होनेपर राजा लोग रावणकी सेवामे उपस्थित हुए। उनमें मय, मारीच, विभीपण तथा और भी दूसरे प्रधान राजा थे। खर और दूपणके शोकमें उनके मुख ऐसे आनत थे जैसे बिना अयालके सिंह हों। सभी अपने अपने आसनपर अविचल भावसे वैठे थे मानो भग्नदन्त गज हो। मन्त्रियो और सभ्यजनोंने इसी समय पर्देके भीतर रोती हुई सीता देवीकी आवाज सुनी । तब विभीपणने कहा-"यह कौन रो रही है ? कौन यह वार-बार अपनेको सन्तप्त कर रही है। कहीं यह कोई वियोगिनी स्त्री न हो ?" फिर उसने रावणके मुखको लक्ष्य करके कहा, "शायद यह तुम्हारा काल तो नहीं है । क्योंकि दुनियामें तुम्हें छोड़कर और किसका चित्त विपरीत हो सकता है ।" यह सुनकर सीता देवी आश्वस्त हो उठी और उन्होंने अपने कोकिल की तरह मधुर स्वरमे कहा-"अरे दुर्जनोके वीचमें यह सन्नन कौन है वैसे ही जैसे नीमके वनमें चन्दनका वृक्ष ? घोर संकटमे यह कौन मेरा साधर्मी जन है कि जो इस प्रकार मुझे धीरज बंधा रहा है। किसका इतना प्रवल बाहुवल है ?"||१-१२॥

[ ४२. वायालीसमो संधि ]
पुणु वि विहीसणण दुवयण हिँ रावणु दोच्छइ ।
तेत्थु पढन्तरण भासण्णउ होऍवि पुच्छइ ।।
[]
'अक्खहि सुन्दर वत्त णिभन्ती । कहिं आणिय तुहु एत्थु रुवन्ती ॥१॥
कासु धीय कहि को तुम्हहँ पइ' । अवख वहन्तु विहीसणु जम्पइ ।।२।।
'कवणु ससुरु कहि को तुह देवरु । अस्थि पसिद्धउ को तुह भायरु ।।३।।
सप्परियण कहि तुहुँ एक्कल्ली । अक्खहि केम वणन्तर भुल्ली ॥४॥
के कजण वणवासु पइट्ठी । चक्केसरण केम तुहुँ दिट्ठी ।।५।।
कि माणुसि कि खेयर-णन्दिणी । किं कुसील किं सीलहाँ भायणि ॥६॥
अण्णु वि कवणु तुम्ह देसन्तर । कहहि वियारेवि णियय-कहन्तर' ॥७॥
एम विहीसण-वयणु सुणेविणु । लग्ग कहेवऍ जिम णिसुणइ जणु ।।८।।
घत्ता
'अह कि वहुएण लहुअ वहिणि भामण्डलहौँ ।
हउँ सीयाएवि जणयहाँ सुअ गेहिणि वलहाँ ॥६॥
[३]
वन्धेवि राय-पटु भरहेसहाँ । तिणि वि संचल्लिय वणवासहीं ॥१॥
सीहोयरहाँ मडप्फरु भन्ज वि । दसउर-गाहहाँ णिय-मणु रज्जवि ॥२॥
पुणु कल्लाणमाल मम्भीसें वि । णम्मय मेल्लवि विन्मु पईसेवि ॥३॥
रुभुत्ति णिय-चलणे हिँ पाउँवि । वालिखिल्लु णिय-णयरहाँ धावि ॥४॥
रामउरिहिं चउ मास वसेप्पिणु । धरणीधरहों धीय परिणेप्पिणु ॥५॥
फे. वि अइवीरहों वीरत्तणु । पइसरेवि
खेमालि-पट्टणु ॥६॥
तेत्थु वि पञ्च पडिच्छे वि सत्तिट । सत्तदवणु मसि-वण्णु पवित्तिउ ॥७॥

बयालीसवीं सन्धि वार-वार विभीषणने रावणकी खोटे शब्दों में निन्दा की। उसने पटकी ओटमें बैठी हुई सीता देवीसे पूछा। [१] "हे सुन्दरी! तुम अपनी वात निर्धान्त होकर कहो।रोतो हुई तुम्हें यह (दशानन ) किस प्रकार ले आया । तुम किसकी कन्या हो, और तुम्हारा पति कौन है ?" चिंतित होकर, विभीषणने पुनः कहा,"तुम्हारा ससुर कौन है, और कौन तुम्हारा देवर है ? तुम्हारा सुप्रसिद्ध भ्राता कौन है, तुम्हारे कोई कुटुम्बीजन है, या तुम अकेली हो ? वताओ इस वनमें तुम भूल कैसे पड़ो ? किस कारणसे तुम्हें वनवासके लिए आना पड़ा । चक्राधिपति रावणने तुम्हें किस प्रकार देख लिया? तुम मनुष्यनी हो या खेचरपुत्री कुशीला हो या शीलकी पात्र हो ? तुम्हारा देशान्तर कौन-सा है ? अपनी कहानी जरा विस्तारसे कहो।" विभीषणके इन वचनोको सुनकर सीतादेवीने उत्तर में कहा, "(और विभीषण शान्तिसे सुनता रहा) बहुत कहनेसे क्या मैं भामण्डलकी बहन सीता देवी हूँ । जनककी पुत्री, और रामकी पत्नी ॥१-६।। २] भरतेश्वर भरतको राज्यपट्ट वाँधकर हम तीनों वनवासके लिए निकल पड़े थे। सिंहोदरका मान नष्ट कर, दशपुर- नाथके मनका अनुरंजन कर, कल्याणमालाको अभयदान देकर रेवा नदीको छोड़कर हम लोगोने-विन्ध्याटवीमे प्रवेश किया। वहाँपर रुद्रभूतिको अपने पैरोमैं झुकाकर, बालिखिल्यको उसके अपने नगरमें पुनः प्रतिष्टित किया। रामपुरीमें चार माह रहकर राजा धरणीधरकी कन्यासे पाणिग्रहण कर, अतिवीर्यकी वीरताको खण्डितकर वह क्षेमंजलि नगरमे पहुंचे। वहाँ भी पॉच शक्तियोंको

पउमचरित
घत्ता
हरि-सीय-चलाइँ आयइँ सज्जइँ आइयई ।
णं मत्त-गयाइँ दण्डारण्णु पराइयई ॥६॥
[३]
तहिँ मि कालें मुणि-गुत्त-सुगुत्तहँ । सजम - णियम - धम्म-सजुत्तहँ ॥१॥
वणे आहार-दाणु दरिसावें वि । सुरवर-रयण-वरिसु वरिसाव वि ॥२॥
पक्खिहँ पक्ख सुवण्ण समारवि । सम्वुकुमार वीरु सघारवि ॥३॥
अच्छहुँ जाव तेथु वण-कीलए । एक्क कुमारि आय णीय-लीलए ॥४॥
पासु वढुक्किय करिणि व करिणहाँ । पुणु णिलज भणइ "मइ परिणहों"
वल-णारायणेहि उवलक्खिय । पुणु थोवन्तर जाय विलक्खिय ॥६॥
गय खर-दूसणाहुँ कूवार हिँ । मिडिय ते वि सहुँ समर कुमारहि ॥७॥
1५
घत्ता
किं मुक्कु ण मुक्कु सीह-णाउ रणे लक्खणेण ।
सदु सुणेवि रामु पधाइड तक्खणेण ॥८॥
तं
[४]
गउ लक्खणहाँ गवेलउ जाहिँ । हउँ अवहरिय णिसिन्द तावहिं ॥१॥
अज्जु वि जण-मण-णयणाणन्दहों। पासु णेहु म. राहवचन्दहाँ' ॥२॥
लइउ गाउँ ज दसरह-जणयहुँ । हरि-हलहर - भामण्डल-तणयहुँ ॥३॥
चित्तु विहीसण-रायहाँ डोल्लिउ । 'तुम्हें हिं सुयउ सुयउ ज बोल्लिउ ॥४॥
ते हउँ आउ आसि विणिवाएँ वि । णवर जियन्ति भन्ति उप्पाएवि ॥५॥

वायालीसमो संधि पराजितकर, अरिदमन राजाका मुख कालाकर, उसकी कन्याका ! पाणिग्रहण किया। फिर वहॉसे (चलकर) उन्होंने दो मुनियोंका उपसर्ग दूर किया । उसके बाद राम, लक्ष्मण और सीता देवी, यहाँ इस साज से आये मानो मत्तगजने ही दण्डकारण्यमें प्रवेश किया हो ॥१-६॥ [३] वहाँ उस समय संयम, नियम और धर्मसे युक्त मुनिवर गुप्त और सुगुप्तको वनमे हमने आहार दिया। जिससे सुरवरोने रत्नोकी वर्षा की । पक्षिराज जटायुके पंख सोनेके हो गये। फिर लक्ष्मणने वीर शम्बुक कुमारको मारा। इस प्रकार जब हम वनमे क्रीड़ा कर रहे थे। तभी लीलापूर्वक एक कुमारी वहाँ आई। वह राम लक्ष्मणके पास उसी प्रकार पहुँची जिस प्रकार हथिनी हाथीके पास पहुंचती है। निर्लज्ज वह बोली कि मुझसे विवाह कर लो। फिर राम-लक्ष्मणसे तिरस्कृत होकर, वह थोड़ी दूर पर जाकर अत्यन्त विद्रुप हो उठी । क्रन्दन करती हुई वह खर- दूपणके पास पहुंची। वे भी गम-लक्ष्मणसे युद्ध करने आये थे। युद्धमे चाहे लक्ष्मणने सिहनाद किया हो या नहीं, किन्तु उस शब्दको सुनकर गम तत्काल दौड़े ॥१-८|| [2] जब तक वह लक्ष्मणकी खोज-खबर के लिए गये कि इतनम निशाचर गवणने मेग अपहरण कर लिया । आज भी मेरा प्रेम जनोके मन और नेत्रीको आनन्द देने वाले गमचन्दके प्रति है। इस प्रकार जब सीता देवीन दशरथ पुत्र राम, लक्ष्मण और भामण्डलका नाम लिया तो गजा विभीपणका चित्त जल उठा। उसने कहा. "गवण, तुमने सुना है क्या ? जो कुछ इसने कहा। अरे, मैं तो उन दोनों (दशरथ और जनक) को मारकर आया था। मुझे बड़ी भारी भ्रान्ति है। क्या वे दोनो जीवित हैं। तो -- ३६८ पउमचरिउ रावण । ढुक्कु पमाणहों मुणिवर-भासिउ । जिह"खउ लक्खण-रामहापासिउ"॥६॥ एव वि करहि महारउ वुत्तउ । उत्तिम-पुरिसहुँ एउ ण जुत्तउ ॥७॥ एक्कु विणासु अण्णु लज्जिज्जइ । धिद्धिकार लोएँ पाविजइ ॥८॥ घत्ता णिय-कित्तिहँ राय सायर-रसण-खलन्तियहें । मं भञ्जहि पाय तिहुयणे परिसक्कन्तियह ॥६॥ [५] जे रमन्ति परदार । दुक्खइँ ते पावन्ति अपार ॥३॥ जहि ते सत्त णरय भय-भीसण । हसहसहसहसन्त स-हुवासण ॥२॥ हुहुहुहुहुहुहुहन्त स-उपद्दव । सिमिसिमिसिमिसिमन्त-किमि-कहमा। रयणि-सकर - वालुय - पङ्क-प्पह । धूमप्पह - तमपह - तमतमपह ॥४॥ तहिं असरालु कालु अच्छेवउ । पहिलए उवहि-पमाणु जिवेवउ ॥५॥ तिणि सत्त वीसद्ध रउद्दस् । सत्तारह वावीस समुह ॥६॥ पुणु तेतीस-जलहि-परिमाणई । जहिँ दुक्खइँ गिरि-मेरु-समाण ॥७॥ जो पुणु णरउ णिगोउ सुणिज्जइ । मेइणि जाव ताव तहिं छिज्जइ ।।८।। तें कज्जे पर-दारु ण रम्मइ । तं किज्जइ जं सुगइहि गम्मइ' ॥६॥ घत्ता आरुट्छ दसासु 'किं पर-दारहों एह किय । तिहुँ खण्डहुँ मज्में अक्खु पराइय कवण तिय ॥१०॥ [६] तो अवहेरि करेवि विहीसणें । चडिउ महग्गएँ तिजगविहूसणें ॥१॥ सीय वि पुप्फ-विमाणे चडाविय । पट्टणे हट-सोह दरिसाविय ॥२॥ संचल्लड णिय-मण-परिओसें । मल्लरि - पडह - तूर - णिग्योसें ॥३॥ 'सुन्दरि पेक्खु महारउ पट्टणु । वरुण - कुवेर - वीर - दलवणु ॥४॥ सुन्दरि पेक्खु पेक्खु चउ-वारइ । णं कामिणि-वयण स-वियारइ ॥५॥ ।

वायालीसमो संधि फिर मुनिवरका कहासच होना चाहता है। अब तुम्हारा राम-लक्ष्मग- से विनाश होगा । अव भी तुम मेरा कहना मानो। उत्तम पुरुपके लिए यह उचित नहीं है। एक तो विनाश और दूसरे लोक-लाज । फिर दुनिया थूथू करेगी । हे राजन, तीनों लोकोमें व्याप्त समुद्रके स्वरसे स्खलित अपनी कीर्तिको नष्ट मत करो। उसकी रक्षा करो ॥१-६॥ [५] रावण, जो परस्त्री-रमण करते है वे अपार दुख प्राप्त करते हैं। आग-सहित हस हस करते हुए जो सात भयङ्कर नरक है उनमे उपद्रव और हूहू शब्द होते रहते हैं। सिम-सिमाती कृमि और कीचड़से वे सराबोर हैं । उनके नाम हैं। रत्न शर्करा, वालुका, पकप्रभा, धूमप्रभा, तमप्रभा और तमतमप्रभ । उनमें तुम अनन्त काल तक रहोगे। पहले नरकमें एक सागरप्रमाण तक, उसके बाद फिर तीन, सात, दस, ग्यारह, सत्तरह और वाईस सागरप्रमाण समय दूसरे-दूसरे नरकोमे रहना पड़ेगा। उसके अनन्तर तेतीस सागरप्रमाण काल तक वहाँ रहोगे जहाँ सुमेरु पर्वत बरावर बड़े-बड़े दुख हैं । फिर निगोद सुना जाता है उसमें भी तुम तब तक सड़ते रहोगे कि जब तक यह धरती है। इसलिए पर-स्त्रीका रमण करना ठीक नहीं । ऐसा काम करो जिससे देवगति प्राप्त हो । यह सुनकर गवणने ऋद्ध हो कहा-"क्या परस्त्रीमें यह कृत्य है ? अरे, तीनों लोकांमे किसी स्त्रीने इन्द्रियोंको पराजित किया ॥१-१०॥ [६] तव विभीषणको उपेक्षा करके रावण अपने निजग- भूपण हाथीपर चढ़ गया और सीता देवीको पुष्पक विमानमें बैठा- कर नगरम बाजारकी शोभा दिखानेके लिए ले गया । मल्लग, पटह और तृर्यके निर्धोपसे अपने मनमे सन्तुष्ट होकर बह निकला। उसने नीता देवीसे कहा-"देवी ! मेरा नगर देखो, वह वरुण और कुबेर जैसाको धूलमं मिलानेवाला है । सुन्दरी, देखो-देखो ये चार

३७०
पउमचरिउ
सुन्दरि पेक्खु पेक्खु धय-छत्तइ । पाफुल्लियइ गाइँ सयवत्तइँ ॥६॥
सुन्दरि पेक्खु महारउ राउलु । हीर-गहणु मणि-खम्भ-रमाउलु ॥७॥
सुन्दरि करहि महारउ वुत्तउ । लइ चूडउ कण्ठउ कडिसूत्तउ ॥८॥
सुन्दरि करि पसाउ लइ चेलिउ । चीणउ लाडु घोडु हरिकेलिउ ॥६॥
घत्ता
महु
जर्जाविउ देहि वोल्लहि वयणु सुहावणउ ।
चडु गयवर-खन्ध लइ महएवि-पसाहणउ' ॥१०॥
[७]
सम्पइ दक्खवन्तु इय सेन्जएँ । दोच्छिउ रावणु राहव-मजए ॥१॥
'केत्तिउ णियय-रिद्धि महु दावहि । अप्पउ जणहाँ मज्म दरिसावहि ॥२॥
एउ ज रावण रज्जु तुहारउ । त महु तिण-समाणु हलुभारउ ॥३॥
एउ जं पट्टणु सोमु सुदसणु । तं महु मणहाँ णाई जमसासणु ॥४॥
एउ जं राउलु णयण-सुहङ्करु । तं महु णाई मसाणु भयङ्करु ।।५।।
एउ जं दावहि खण जोवणु । त महु मणहाँ गाइ विस-भोयणु ॥६॥
एउ जंकण्ठउ कडउ स-मेहलु । सील-विहूणहँ त मलु केवलु ॥७॥
रहवर-तुरय-गइन्द-सयाइ मि । आयहिं मसु पुणु गण्णु ण काइ मि ॥८॥
घत्ता
सग्गेण वि काई जहिं चारित्तहाँ खण्डणउ ।
कि समलहणेण महु पुणु सीलु जै मण्डणउ' ॥६॥
[2]
जिह जिह चिन्तिय आम ण पूरइ । तिह तिह रावणु हियएँ विसूरइ ॥१॥
'विहि तेत्तडउ देइ जं विहियउ । कि वढ जाइ णिलाढए लिहियउ ॥२॥
हउँ कम्मेण वेण संखोहिउ । जाणन्तो वि तो वि ज मोहिउ ॥३॥
धिधि अहिलसिय कुणारि विलीगी । वुण्ण-कुरति जेम मुह-दीणी ॥४॥

बायालीसमो संधि द्वार हैं । जो विकार-पूर्ण कामिनियोंके मुखोके समान लगते है। सुन्दरी, देखो-देखो ये ध्वज और छत्र हैं। मानो कमल ही खिल उठे हो । सुन्दरी ! देखो-देखो, होरोसे गम्भीर और मणियोके खम्भों से सुन्दर यह मेरा राजकुल है। सुन्दरी, तुम मेरा कहना भर कर दो। और लो यह चूडामणि कण्ठा और कटक-सूत्र । सुन्दर चीनी वस्त्र, ताड़, अश्व और हरिकेल लेकर मुझपर प्रसाद करो। मुझे जीवन दो। मीठे शब्द बोलो। इस महागजपर आरूढ़ होकर महादेवीका प्रसाधन अङ्गीकार करो ॥१-१०॥ [७] इसपर राघवकी पत्नी आदरणोया सीतादेवीने भर्त्सना करते हुए रावणको उत्तर दिया-"अरे, मुझे कितनी अपनी ऋद्धि दिखाता है, अपने लोगोंको ही दिखा। यह जो तुम्हारा राज्य है, वह मेरे लिए तिनकेकी तरह तुच्छ है, चन्द्रमाकी तरह सुन्दर जो यह नगर है वह मेरे लिए मानो यमशासनकी तरह है। नयन- शुभङ्कर तुम्हारा यह राजकुल, मेरे लिए भयङ्कर श्मशानकी तरह है। और जो तुम बार-बार अपने यौवनका प्रदर्शन कर रहे हो, वह मेरे लिए विष-भोजनकी तरह है। और जो यह मेखला- सहित कण्ठा और कटक है, शीलविभूपिताके लिए केवल मल है। सैकड़ों रथवर तुरग और गज भी जो हैं उन्हें मैं कुछ भी नहीं गिनती । उस स्वर्णसे भी क्या जहाँ चारित्र्यका खण्डन हो, यदि मै शोलसे विभूषित हूँ तो मुझे और क्या चाहिए” ॥१-६|| [=] जैसे-जैसे अचिन्तित आशा पूरी नहीं होती वैसे-वैसे रावण मनमे दुखी होने लगा। विधाता उतना ही देता है जितना भाग्यमें होता है, जो ललाटमें लिखा है, उससे क्या बढ़ती होता है, मै किस कर्मके उदयसे इतना पतित वना, जो जानते हुए भी इसपर मोहित हुआ। मुझे धिक्कार है कि जो मैने विपन्न हिरनीकी

३७२
पउमचरित
आयहँ पासिउ जाउ सु-वेसउ । महु घरै अस्थि अणेयउ चेस' ॥५॥
एव विचित्तु चित्तु साहार वि । दुक्खु दुक्खु मण-पसरु णिवारे वि ॥६॥
सीयए समउ खेड्डु आमेल्लेंवि । तं गिव्वाणरमणु वणु मेल्लें वि ॥७॥
णरवर-विन्डे हिं परिमिउ दहमुहु । संचल्लिउ णिय-णयरिहँ अहिमुहु ।।८।।
वत्ता
।
गिरि दिछ तिकूडु जण-मण-णयण-सुहावणउ ।
रवि-डिम्भहाँ दिण्णु ण महि-कुलवहुअऍ थणउ ॥६॥
[]
णं धरु धरह गम्भु णीसरियउ । सत्तहिं उववणेहिं परियरियड ॥१॥
पहिलउ वणु णामेण पइण्णउ । सज्जण-हियउ जेम वित्थिण्णउ ॥२॥
वीयउ जण-मण-णयणाणन्दणु । णावइ जिणवर-विम्वु स-चन्दणु ॥३॥
तइयउ वणु सुहसेउ सुहावउ । जिणवर-सासणु णाई स-सावउ ॥४॥
चउथउ वणु णामेण समुच्चउ । वग-वलाय - कारण्ड - सकोञ्चड ||५||
चारण-वणु पञ्चमउ रवण्णउ । चम्पय - तिलय-वउल - सछण्णउ ॥६॥
छट्टर वणु णामेण णिवोहउ । महुअर-रुणुरुण्टन्तु सुसोहउ ॥७॥
सत्तमु वणु सीयल सच्छायउ । पमउजाणु णाम-विक्खायड ॥६॥
घत्ता
तहिं गिरिवर-प? सोहइ लक्षाणयरि किह ।
थिय गयवर-खन्ध गहिय-पसाहण बहुअ जिह ॥६॥
[१०]
घत्ता
ताव तेन्थु णिज्माइय वावि असोय-मालिणां ।
हेमवण्ण स-पओहर मणहर णाई कामिणी ॥१॥

यायालीसमा मधि
नगह दीन मुग्यवाली विलाप करनेवाली कुमार्गकी अभिलाषा
को। इसके पास जो सुन्दर म्प है, मेरे घर तो उनसे भी सुन्दर
अनेक रूप है ? इस प्रकार अपने विचित्र-चित्तको महाग देकर
और बड़े ऋष्टमे मनक प्रसारको रोककर, मीताके साथ कोडाका
त्यागकर उसे उसने नन्दन वनमें छोड़ दिया। और श्रेष्ट पुम्स्पोंने
घिग हुआ वह अपनी नगर्गकी ओर चला ! मार्गमं उसे जनीक
मन और नेत्रोंको मुहावना लगनेवाला त्रिकूट नामक पहाड़ मा
दीन्य पड़ा, मानी पूर्वन्पी बालकके लिए धरतीरूपी बुलवधूने
अपना रनन दे दिया हो !!
[१] या मानी धगका गर्भ ( अन्नर)ही निकल आया
या मान उपयनीने चिग हुआ था। उसमेन्मे परले पण
वन मन्नान, हदयकी नार विग्नाणं जन-मन-नयनाय. मग
पचन. जिन किनकी नग्ह चन्दन (पेन और चन्दन) मे
पनि था. महायना नीनग ननन ? वन जिनकलालनको
नग. मात्रय (श्रावक और विगेप) मे महिन । चौथा
मगर नामका यन बलाका. काव्य और नौच पक्षियोंने भग
साया । पाचवा नन्दा नारण यन था. बठा नियोधित नामक
वन और मांगन गाँठन था और जानवा प्रनित प्रमट बन
भागनाया मगन और मानल था। गिरियका पाठपर
मंका मागणी भिनगांधी नानी मागजमा पोटार
नानी12-
[...] मागिनी नाम र वापिका
सामना. मारेकरी पयोधर (न

३७४ पउमचरिट चउ-दुवार-चउ-गोउर - चट-तोरण - रवणिया । चम्पय - तिलय-बउल-णारङ्ग- लवङ्ग - णिया ॥२॥ तहि पएम वइदेहि ट्वेप्पिणु गउ दसाणणो । मिजमाणु विरहेण विसथुलु विमणु दुम्मणो ॥३॥ मयण-वाण-जनरियड जरिउ दुवार-बारओ । दृइआउ आवन्ति जन्ति सयवार-चारो॥॥ वयणएहिँ खर-महुरेहिँ मुहु सूसइ बिसूरए । छोह छोह णिवढन्तएँ जुआरो व्व जूरए ॥५|| सिर धुणेड़ कर मोडइ अङ्गु वलेइ कम्पए । महरु लेत्रि णिज्झायइ कामसरेण जम्पए ॥६॥ गाइ वाइ उच्वेल्लइ हरिस-विसाय दावए । मुच्छिनइ मरणावस्थ चन्द्रणेण सिञ्चिजह चन्द्रण-लेट दिजए। चामरहिं विजिजइ तो वि मणेण झिजए |८|| वारवार पावए ॥७॥ घत्ता . किं रावणु एक्कु जो जो गाई गजियर । जिण-धवलु मुएवि काम को ण परजियउ || [११] थिए दसाणणें विरह-भिम्भले । जाय चिन्त वर-मन्ति-मण्डले ॥१॥ 'एत्थु मल्लु को कुइस लक्खणे । सिधु नासु असि-रयणु तक्खणे ॥२॥ णिहर सम्बु जें दूसणो खरो । होड कु-इ ण सावण्णु सो णरों' ॥३॥ भणइ मन्ति सहममइ-णामणं । 'कवणु गहणु एक्रेण रामणं ॥४॥ लक्षणेण सह साहणेण वा । रह-तुग्ग-गय-वाहणेण दुत्तरे पएसु विच्ची-भयङ्करे ॥३॥ दुसञ्चार-सायरे । कहि बायालीसमो संधि ३७५ और जल) से सहित थी। चार द्वार, चार गोपुर और तोरणोंसे रमणीय थी। चम्पक, तिलक, मौलश्री, नारंगी और लवंगसे आच्छन्न उस प्रदेशमे सीताको छोड़कर रावण चला गया। विरहसे क्षीण और अस्त-व्यस्त, विमन दुर्मन, कामवाणोंसे जर्जर द्वार- पालकी तरह बूढ़ा वह रावण दूतोकुलकी तरह बार-बार आता और लौट जाता । कठोर और मधुर वचनोसे उसका मुख सूख रहा था ? क्षोभसे जुआरी की तरह गिरता पड़ता वह कभी अपना सिर धुनने लगता, कभी हाथ मरोड़ता, कभी अंग-अंग झुकाकर कॉप उठता। कभी अधर पकड़कर चितामग्न हो जाता । कभी कामके स्वरमे बोल पड़ता । गाता बजाता हुआ, कभी-कभी हप और विपादकी दीप्तिसे उद्वेलित हो उठता । बार-बार मूर्छित होकर वह मरणदशाको पहुँच गया। चंदनके (जल) सिंचन और उसीके लेपसे तथा चामरोसे हवा करनेसे वह मन ही मन छीज रहा था । क्या रावण अकेला ही पीड़ित हुआ ? जिनको छोड़कर, कौन ऐसा है जो गर्वसे गरजता नहीं और कामसे पराभूत नहीं । हुआ ।।१-६॥ [११] इस प्रकार रावणके विरहव्याकुल होने पर रावणके मंत्री-मंडलमे चिता व्याप्त हो गई। वे विचार करने लगे कि लक्ष्मणके क्रुद्ध होने पर, यहाँ कौन-सा वीर है । जिसे तत्काल सूर्यहास खड्ग सिद्ध हो गया । जिसने खरदूपण और कुमार शम्बूक की हत्या की, वह कोई साधारण मनुष्य नही है । इसपर सहस्र- मति नामके मंत्रीने कहा कि एक रामको पकड़नेकी क्या वात है । सेना, रथ, तुरंग, गज और वाहनी सहित लक्ष्मणको पकड़ने मे भी क्या रखा है। रावणको सेना दुस्तर लहरोसे भयंकर पउमचरिट - रावणस्स पवलं वलं महा । अस्थि वीर एक्केच दूसहा ॥७॥ कि मुण्ण दूसणेण सम्वुणा । सायरो किमोहु विन्दुणा' ॥८॥ घत्ता त वयणु सुणेवि विहस वि पञ्चामुहु भणइ । 'कि बुच्चइ एक्कु जो एक्कु जे सहसइँ हणइ ॥६॥ [१२] अण्णुए णिसुभ वत्त मइ एहिय । रावण-मन्दिर णीसन्देहिय ॥१॥ जे जे गरवइ के-इ कइद्धय । जम्बव सुग्गीवनगय ॥२॥ समउ विराहिएण वण-सेवहुँ । मिलिया वासुएव-बलएवढं' ॥३॥ तं णिसुणेवि ढसाणण-भिच्चे । वुच्चइ पञ्चामुहु मारिच्चे ॥४॥ 'एह अजुत्त वत्त पइँ अक्खिय । रावणु मुए वि ण अण्णहों पक्खिय ॥५॥ का वि अणङ्गकुसुम वलवन्तहाँ । दिणी खरेण धीय हणुवन्तहाँ ॥६॥ तं किं माम-चइरु वीसरियड । जे पडिवक्ख मिलइ भय-डरियड' ॥७॥ तो एत्थन्तरे भणइ विहीसणु । 'केत्तिउ चवहु वयणु सुग्णासणु ॥८॥ एवहिं सो उवाउ चिन्तिजइ । लङ्का-णाहु जेण रक्खिजई' ॥६॥ एम भणेवि चउहिसु ताडिय । पुरै आसालिय विन भमाडिय ॥१०॥ घत्ता तियसहु मि दुलघु दिदु माया-पायारु किउ । णीसड्डु णिसिन्दु रज्जु स यं भु जन्तु थिउ ॥११॥ अउज्मा कण्डं समत्तं! . आइच्चुएवि-पडिमोवमाएँ आइच्चम्विमाए (!)। वीअमउज्झा-कण्डं सयम्भु-घरिणीए लेहवियं ॥

बायालीसमो सधि ३७७ द्रसे भी प्रवल है । उसका एक-एक योधा असाध्य है । शम्बूकके तसे क्या ? एक बूंद पानी सूख जानेसे समुद्रका क्या विगड़ता यह सुनकर पंचमुखने हँसकर उत्तर दिया,"अरे, एक क्या कहते अकेले ही वह हजारोका काम तमाम कर देगा ॥१-६।। [१२] तब उसने और भी निवेदन किया, “दूसरोके मुखसे ने यह सुना है कि जाम्बवंत, नल, सुग्रीव, अंग और अंगद प्रभृति । कपिध्वज है, निसंदेह वे सब राजा विराधितके साथ, वन- समे ही राम और लक्ष्मणसे जा मिले है" | यह सुनकर रावणके नुचर मारीचने पंचमुखसे कहा, "उन्हें रावणके सिवा किसी सरेसे नही मिलना था । खरने अपनी कन्या अनंगकुसुम हनु- मानको दी थी। क्या वह भी उसकी माताके शत्रुको भूल गया नो इस प्रकार डरकर प्रतिपक्षीसे जा मिला है। तब वीचमे हो टोककर विभीषणने कहा-"खाली विचार करनेसे क्या लाभ, कोई उपाय सोचना चाहिए। जिससे लंकानरेश रावणको बचाया जा सके ।" यह कहकर उसने आशाली विद्याको बुलाया और नगरके चारों ओर उसकी परिक्रमा दिलवा दी । इस प्रकार देवों द्वारा अलंध्य दृढ माया प्राचीर बनवाकर निशाचरराज वह निश्शंक होकर राज्य करने लगा ॥१-११॥ अयोध्याकाण्ड समाप्त आदित्य देवीकी प्रतिमासे उपमित स्वयंभू कविकी पत्नी आदित्य देवी द्वारा लिखित यह दूसरा अयोध्याकाण्ड समाप्त हुआ।

हमारे सुरुचिपूर्ण हिन्दी प्रकाशन उर्दू शायरी 5 श्री बच्चन ६) ३) १. शेर-ओ-शायरी श्री अयोध्याप्रसाद गोयलीय 5) २. शेर-ओ सुखन [भाग १] श्री अयोध्याप्रसाट गोयलीय ३. शेर-ओ-सुखन [भाग २] श्री अयोध्याप्रसाद गोयलीय ३) ४. शेर-ओ-सुखन [भाग ३] श्री अयोध्याप्रसाद गोयलीय ३) ५. शेर-ओ-सुखन [भाग ४] श्री अयोध्याप्रसाद गोयलीय ३) ६. शेर-ओ-सुखन भाग ५] श्री अयोध्याप्रसाद गोयलीय ३) कविता ७. वर्धमान [ महाकाव्य ] श्री अनूप शर्मा ८. मिलन-यामिनी ४) ६. धूपके धान श्री गिरिजाकुमार माथुर १०. मेरे बापू श्री हुकमचन्द्र बुखारिया २) ११. पञ्च-प्रदीप श्री शान्ति एम० ए० २) ऐतिहासिक १२. खण्डहरोका वैभव श्री मुनि कान्तिसागर ६) १३. खोजकी पगडण्डियाँ श्री मुनि कान्तिसागर ४) १४. चौलुक्य कुमारपाल श्री लक्ष्मीशङ्कर व्यास ४) १५. कालिदासका भारत [भाग१-२] श्री भगवतशरण उपाध्याय 5) १६. हिन्दी जैन साहित्य-परिशीलन १-२ श्री नेमिचन्द्र शास्त्री ५) नाटक १७. रजत-रश्मि श्री डा० रामकुमार वर्मा २॥ १८. रेडियो नाट्य शिल्प श्री सिद्धनाथ कुमार २) १६. पचपनका फेर श्री विमला लथरा २०. और खाई बढ़ती गई श्री भारतभूषण अग्रवाल २|| २१. तरकश के तीर श्रीकृष्ण एम० ए० ३ ३ ) ៣ २) ३) ज्योतिष २२. भारतीय ज्योतिप श्री नेमिचन्द्र जैन ज्योतिषाचार्य ६) २३. करलक्खण [ सामुद्रिकशास्त्र प्रो० प्रफुल्लकुमार मोटी 110 कहानियाँ २४. सधपके बाद श्री विष्णु प्रभाकर २५. गहरे पानी पैठ श्री अयोध्याप्रसाद गोयलीय २) २६. आकाशके तारे : धरतीके फूल श्री कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' २) २७. पहला कहानीकार श्री रावी रा) २८. खेल-खिलौने श्री राजेन्द्र यादव २६. अतीतके कम्पन श्री आनन्दप्रकाश जैन ३०. जिन खोजा तिन पाइयाँ श्री अयोध्याप्रसाद गोयलीय २|| ३१. नये बाटल श्री मोहन राकेश २) ३२. कुछ मोती कुछ सीप श्री अयोध्याप्रसाद गोयलोय || ३३. कालके पंख श्री आनन्दप्रकाश जैन ३) ३४. नये चित्र ३५. जय-दोल श्री अज्ञेय उपन्यास ३६. मुक्तिदूत श्री वीरेन्द्रकुमार एम० ए० ५) ३७. तीसरा नेत्र श्री आनन्दप्रकाश जैन ३८. रक्त-राग श्री देवेशदास ३) ३६. सस्कारोकी राह राधाकृष्ण प्रसाद २) संस्मरण, रेखाचित्र ४०. हमारे आराध्य श्री बनारसीदास चतुर्वेदी ४१. संस्मरण श्री बनारसीदास चतुर्वेदी ३). ४२. रेखाचित्र श्री बनारसीदास चतुर्वेदी ४) ४३. जैन जागरणके अग्रदूत श्री अयोध्याप्रसाद गोयलीय ५) श्री सत्येन्द्र शरत् 3J ३) श) ३) ६) ६) सूक्तियाँ ४४. ज्ञानगङ्गा [ सूक्तियाँ] श्री नारायणप्रसाद जैन ४५. शरत्की सूक्तियाँ श्री रामप्रकाश जैन २) राजनीति ४६. एशियाकी गजनीति श्री परदेशी साहित्यरत्न निबन्ध, आलोचना ४७. जिन्दगी मुसकराई श्री कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'४) ४८. संस्कृत साहित्यमे आयुर्वेद श्री अत्रिदेव 'विद्यालङ्कार' ३) ४६. शरत्के नारी-पात्र श्री रामस्वरूप चतुर्वेदी ४) ५०. क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ? श्री रावी २) ५१. बाजे पायलियाके घुघरू श्री कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'४) ५२. माटी हो गई सोना श्री कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'२) दार्शनिक, आध्यात्मिक ५३. भारतीय विचारधारा श्री मधुकर एम० ए० २) ५४, अध्यात्म-पदावली श्री राजकुमार जैन ४।। ५५. वैदिक साहित्य श्री रामगोविन्द त्रिवेदी भाषाशास्त्र ५६. सस्कृतका भाषाशास्त्रीय अध्ययन श्री भोलाशकर व्यास ५) विविध ५७. द्विवेदी-पत्रावली श्री बैजनाथ सिंह 'विनोद' २) ५८. ध्वनि और सगीत श्री ललितकिशोर सिंह ४) ५६. हिन्दू विवाहमें कन्यादानका स्थान श्री सम्पूर्णानन्द भारतीय ज्ञानपीठ, दुर्गाकुण्ड रोड, वाराणसी ६) १)

Pawamchariwo Vol-2; (1958)

Author
Jain ,devandra
Title
Pawamchariwo Vol-2; (1958)
File name
Pawamchariwo Vol-2; (1958)
Text
OCR done
Citation
1958
Published
2010/02
Publisher
Kashi., Bhartiya Gyanpeth
Language
Sanskrit
Pages
389
Library
Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun
Classification
Jain Sahitya
DLI number
344714
Barcode
99999990236006.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
TuCqvEZNMfF
Download PDF

Pawamchariwo Vol-2; (1958)