Banasthali University

मानसरहस्य

गोसाई तुलसीदास · 2009/05

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OFANARO
1.
मनलरहस्य।
जिसे
शशीनिवासी सरदार कवि ने श्रीमन्यहा-
जाधिराज खर्गवासौ सहाराज ईश्वकी-
शादनारायणसिंह बहादुर G. C. S. I.
सो आज्ञा से श्रीगोसाई तुलोदास
(जी बहाज की कविता के नितियों
पर
"
विलिये पंचा
ह
और जिसे.
बीयुत राधारमायापान गोरखामी
दरम्य तिकिशोरी
कृपा दी पाबर
रामकृष्ण वर्मा ने
काशी
रतजीवन बन्सालय में प्रकाश शिया
सन् १८८५ ई.।
"मूल्य ।)

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श्रीकृष्णाय नड । मानसरहरूया एक दिवस श्रीमहाराजमणिमुकुट काशी- प्ररिस को ससा में अनेक कवि कोविद के सा- मुहे यह चर्चा होत रही कि देखो वेद ने तीन को निरूपन कोनो। कर्म, ज्ञान, अति । तामे कोई कही ज्ञानसाधन भक्तिनिमित्त है। अरू काहू कही कौ नाहीं भक्तिसाधन ज्ञाननिमित्त है । तब कोई उत्तरकाण्ड श्रीगोसाईजी को कियो ताकी एक चौपाई पढ़ उठे कि- "ज्ञानहि अतिहि नहि कछु भेदा । उभय हरै भव सम्भव खेदा ॥” सो सुनि श्रीरामकृपापात्र महीपालपालन सहकुलसालन दारिद्घालन महाराज ने आज्ञा दई कि यह जो रामचरित- मानस गुसांईजी ने कौनो श्रुति सम्मत सहित सब ते अविरोधी रामभक्ति दृढ़ करन हेतु -

सानसरहस्य।
काह थाको सङ्गल वस्तु निर्देस है। "नानापुरा-
गानिगमागससम्मतं यद्रासायगो निगदितं क्वचि-
दन्यतोऽपि ।" तो अन्च ते संहिता काव्यभाव
ताको न जान के जे रासायन में प्रवेस करत हैं
ते बड़े पण्डित हैं। याते एक तिलक याको ऐसो
वनै कि जासे श्रुतिसम्मत बनो रहै । अरू कवि
सस्प्रदाय से विरोध न होय अस छपक की जानो
जाय श्री जो पद कठोर हैं तिनको व्याख्या
भी होय अरु मानस वरेव कवित गुन जाती ।
सो ता निमित्त सर्व अङ्ग काव्य के भी होंहि ।
जैसे बाल में-"नयन असी हग विभञ्जन ।
नाम रूप दडू ईस उपाधी ॥ धिग धर्मध्वज धं-
धक धोरी। गौतमतियगति सुरति करी ॥"
इत्यादि-सातकाण्ड के तिनको व्याख्या । श्री
जो बड़े महाराज रामचरितमानसरसिक ने बड़े
तलास ते बहुत पण्डित कविन के सम्झत ते
पोथी शुद्ध कराई ताको पाठ रहै । औ गोसांई
के ग्रन्थवाले उदाहरन । जाते सब कोई काव्य

मानसरहस्य।
३
जान रासायन को अर्थ जाने अरु सव को स्वार्थ
होय ऐसो तिलक वनि जाय ताते काव्य रीत
लिखियतु है।
अथ काव्यलक्षण रस रहस्य - दोहा ।
जग ते अद्भुत सुखसदन सब्द र अर्थ कवित्त ।
जग ते अद्भुत सुख लोकोक्ति चमत्कार
दोहा।
सरल कवित की रतिविमल सो आदरहिँ सुजान।
सहज वैर विसराय रिपु जो सुनि करहि वखान॥
काव्य प्रयोजन ।
जस सम्पति आनन्द अति दुरित न डारै खोइ ।
होइ कवित्त ते चातुरी जंगत रास वस होइ ॥
॥
जस ।
सुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई।
विमल जसहि अनुहरह सु वानी ॥
यहांली .. संम्पति।
बाहि त्राहि आरतहरंन सरन सुखद रघुबीर ।
..
प्रानन्द।
भयो हृदय आनन्द उछाइ ।

सानसरहस्य।
रुज नाम।
निजगिरापावन करनकारनरामजसतुलसीक ह्यो।
चातुरो ।
रोमेउ तोरि देखि चतुराई ।
बसीकरन.।
विनय प्रेसवस भई सवानी।
इत्यादि जानि लौजे-
अघ काव्य ।
चित्त को कारन-शक्ति, व्युत्पत्ति, अभ्यास ।
लक्षण ।
शक्ति जो है विसल प्राचीन संस्कार जन्य
होति है व्युत्पत्ति काव्य जानने ते। अल्यास जो
काव्य जाननहार की सिछा वा करने ते होय।
शक्ति यथा।
जापर कृपा करहि जन जानी।
कवि उर अजिर नचावहि बानी॥
व्युत्पत्ति
धुनि अवरेख कवित गुन जाती।
अभ्यास।
भनित मोर सब गुनरहित ।

मानसरहस्य।
५
सो तीन रीत की-उत्तम, मध्यम, अधम ।
लक्षण ।
जीर सरस पुन देह सम देहै वल जेहि ठौर ।
उत्तम में विङ्ग अधिक, मध्यस में बिन वाच्य
वरावर, अधम में वाच्यार्थ मात्र ।
उत्तम यथा।
सहसनास सुनि भनित सुनि तुलसी वल्लम नाम।
सकुचितहियहँसिनिरखिसियधरमधुरन्धरराम ॥
यहां जानकी तुलसी के बल्लभ सुनि हँसी
राम संकाच ते उपपति बिङ्ग ।
मध्यम।
नाना मरस नहात प्रयागा।
प्रयाग नहात सङ्कल्प ते जानी ॥
भरत नाम ते प्रेम अधिकाई।
सो वाच की बराबर है।
अधम ।
नामे विङ्ग नाही सो हे रीत की-शब्दचित्र,
अर्थचित्र ।
शब्दचित्र यथा ।
अंभान अंबक अंब उमग सुअंग पुलकावलि छई।

40
मानसरहस्य ।
यहां अनुप्रास को चसत्कार है।
अर्थचित्र यथा ।
नमामि सतवत्सलं-
याम अर्थ
चमत्त
शब्दार्थ निर्णय ।
जो सुनिये सो शब्द है अर्थ जु समुझे चित्त ।
सो शब्द दो रीत की-धुन्यात्मक, वर्णा-
मकर धुन्यात्मक जी बाजा ते निकसे, वर्णात्मक
तीन रीत का।
दोहा।
बाचक लक्षक विङ्ग का शब्द तीन बिधि सोय ।
बाच्च लक्ष अस बिङ्ग पुनि अर्थ तीन विधि होय॥
वाचक लक्षण ।
बाचक जी ससहाय बिनु अाप अर्थ कहि देय।
बाच्य अर्थ पद सनतही जाहि चित्त गहि लेय॥
यथा ।
जल संकोच बिकल भडू मीना।
जल सुनत पानी को ज्ञान भयो याही सों
वाच्यार्थ कहत हैं । जासो लखिये यह अरथ

मानसरहस्य।
अभिधा सो व्यवहार याही सों शक्ति कहत हैं।
दोहा ।
या पद ते एहू अरथ जाना ऐसो रूप ।
जो इच्छा भगवान की सा है शक्ति अनूप ॥
यह अविधा को तत्व लचन कयौ, अरु वा-
चक के चार भेद ॥
काव्यनिर्णय दोहा।
जाति जट्टा गुन क्रिया नाम सु चार प्रकार।
जाति यथा ।
देवदनुज भूपति भट नाना ।
देव मे देवत्वजाति, दनुज
में
दनुजत्वजाति।
जना यथा।
भइया कहहु कुशल दाउ बारे ।
गुन यथा ।
स्यामल गौर धरे धनु भाथा ।
कथा यथा ।
भये बहुरि सिसु रूप खरारी।
लक्षक।
मुख्य अर्थ को बाध जहँ शब्द लाक्षनिक हाय ।

८ मानमरहस्य । यथा। अहो मुनीस महासट मानी। लक्षनालक्षन। ॥ मुख्य अर्थ के बाध तें पुनि ताही के पास । और अर्थ जाते बनै कहैं लक्षना तास लक्षनावीज, तातपर्यानुपपत्ती, अन्वयनुप- पत्ती, तथापि तातपर्ज न मिले यह मानत, सो दो रीत का। एक निरूढ़ी एक प्रयोजनवती, जामें ध्वनि नाहीं सो निरूढी, अरु जामें ध्वनि होय सो प्रयोजनबती। निरूढ़ी यथा । बभव राउर सादर साई। कुशल हेतु सो भयो गुसाई॥ इहाँ कुशलवार को कुशल कहो चाही सो आनन्द अर्थ कौनो। प्रयोजनवती। "लिये चोर चित राम बटोही" तो चित धन नाहीं जाको चोरी होहि याते मुख्याध बाध करि आपन आसक्तता सूचित करी प्रयोजन यह सानसरहस्य। है - प्रति सुन्दर है। और प्रयोजनवती के हे भेद । प्रथम उपादान ताको लक्षन काव्यनिर्नय- "उपादान सो लक्षना परगुन लीन्हे होइ" यथा "तब चले वान कराल" तो वान आप ते नाहीं चलत पुरुष चलावनहार को गुन लीनो। लक्षितलक्षनालक्षन । "निज लक्षन औरहि दिये लक्षलक्षना जोग"। यथा--"वीच बास करि जमुनहि आये। तो जमुना से प्राइवो असम्भव है यात तौर से आये यह लक्षना जमुना शब्द ते आपनो सीतल पा- वन गुन तीर को दयो। अरु वैदै भेद शुद्धागौ- नौके । सारोपा, साध्यवसाना, ताके लक्षन । जहां जाको आरोप कीजै अरु जामे आरोप कीजै सो दोई पद पाइये सो सारोपा । और जामें आरोप कीजै सोई पद पाइयै सो साध्य- वसाना । तामें है भेद। गौनी, मुद्धा । जहां बरा बरी को सम्बन्ध होय सो गौनी, और जहां और सम्बन्ध होय बाचक सो कै कारज सो सुद्धा।

१०
सानसरहस्य ।
है
गौनी सारोपा यथा ।
"विधु-बदनौ मृगसावक लोचनि" । तो इहा
बिधु मृग शब्द विधु मृग में है परन्तु अपने
गु-
नन की प्रतीत सुख लोचन मे करावत
सुद्धासारीपा ग्या।
रघुवंसिन कर सहज सुभाऊ ।
मन कुपन्य पग धरै न काज ॥
दहा रघु को जो कौनो धर्म ताको पालनी
यह सम्बन्ध ते सुद्धा । धरम को आरोपन वंसिन
मे सो दोडू पाए याते सारोपा ।
गौनोसाध्यवसाना यथा ।
1 "मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना" । इहाँ
शास्त्र को आरोप मुकुर मे अथवा कर्म को सो
कर्म न पायो अरू ज्ञान को आरोप नयन में
सो ज्ञान भी न पायो याते साध्यवसाना। श्री
नेत्र ज्ञान बरावरी ते गौनी।
अथ सुद्धासाध्यवसाना ।
'मायाबस परछन्न जड़ जौव कि ईस समान'
.
?

मानसरहस्य।
११
तो दूहा संसार को आरोप माया में सो माया
मात्र पाई, अरु माया ईश्वर की है या सस्बन्ध
ते शुद्धा, अरु लक्षना के भेद सब ८० होत हैं
सो ग्रन्थति के भय ते नाहौं लिखे।
टोहा।
प्रथम भेद है सुद्धही गौनी सुधि के चार ।
ए ऐसी विधि जानिये छै लछना प्रकार ॥
अथ विजना।
: अर्थ बनाय कहै अधिक विंजक कहिये सोडू।
शब्द मुनै समझे अरथ होहि जु विमल विकास।
सोई विंग जु लक्षना अविधासूल विलास
लक्षना सूल विंग में लचना को फल विंग
। जानिये । अभिधामूल विंग में और अर्थन की
प्रतीति सो विंग जानिए ।
विंगहि कहै सुव्यंजना बल्य सबहि सुख देय ।
सो विंग दो भाति की । लक्षनामूल । अविधा
मूल । सो लक्षनामूल दो रीति की । गूढ़, अगूढ
ताको लक्षन।.
...

१२
मानसरहस्य ।
गूढ़ ।
L.
कवि
सुहृदय
जाको लखै विंग
सकहिये
जाका सब कोऊ लखै सो पुनि हाय अगूढ़ ॥
गूडबिंग यथा ।"
विप्रबंस की अस प्रभुताई।
अभय होहिं जे तुम्है डराई ॥
दूहा हम आप का नाहीं डरात आप के
ब्राह्मणत्व को डरात यह लक्षित लक्षन ते तुम्हे
मारने ते दोषभागी यह विंग ।
अगढ़ यथा।
325
माता पितहि चरित भए नौके ।
इहा माता-ट्राही विंग सो प्रगटही है।
अविधाभूल लक्षन ।
बहुत अर्थ के शब्द का जोगादिक अनुक्ल ।
अर्थ नियम तहँ कीजिये विंग सु अविधामूल ॥
कहुँ संयोग बियोग कहुँ कहूँ कहै पुनि संग।
कहुँ बिरोध कर अर्थ कहुँ प्रगटत विंग प्रसंग।
और शब्द के साथ पुनि चिन्ह समै अरु देश ।
ए और पुनि जानिए शक्ति विंग के भेस ॥

मानसरहस्य।
१३
संयोग यथा।
साल तिलक श्रमबिन्दु सहाए ।
दूही तिलक के संयोग ते साल लिलाट जानिए।
सहचरी यथा।
रामवियोग कहा सुनि सीता ।
इहा दासरथी जानिए।
सहचारी यया।
राम लखन सिय कानन बसही ।
इहा भी दासरथी लपवन सहचारी ते
विरोध यथा।
बार बार मुनि विप्रवर कहा राम सन राम ।
इहाँ दासरथौ परसुधर जानिए याही रीति
ते आन जान लीजै
अर्थ नु तीन प्रकार के व्यंग सबन ते होत।
वाय व्यंजकता यथा।
तो पद पदम पखारन कह हूं।
इहाँ पदपषार तर्पनादिक कर्म करी चाहत
सो वाच्य ते जानी जात पिटतारन व्यंग।

१४
मानसरहस्य।
शानक विजकता यथा।
धर्मसौलता तब जग जानौ।
इहा विपरीत लक्षना करि त अधर्मी है ।
व्यंग व्यंजकता यथा।
५ बन्दो रास नास रघुवर का
हेतु कृसानु भानु हिमकर का ।
इहा कृसानु सानु हिसकर शब्द ते ब्रह्मा
विष्णा, महेस प्रथम व्यंगता ते उत्पति पालन सं-
हारकर्ता, द्वितीय व्यंग। अब केवल अर्थही ते
व्यंजक होत है सो कहत हैं।
लक्षन ।
व्यंजक शब्द सहाय तें अर्थ जु व्यञ्जक होय ।
कहूं कहूं तिहि ठौर में प्रगट गनाऊँ सोय ॥
बता बरन सकाकु पुनि बचन अर्थ के संग ।
समा रूप. ढिग और के प्रगटत व्यङ्ग प्रसंग ।
देस समय मिलि के कहीं नी बिधि में कविराज ।
व्यंग्य हात बहु अर्थ तें लखत सुबुद्धि समाज ॥
वता वसिष्ट यथा।
कत सिख देव हमे कोई भाई।

मानसरहस्य।
।
इहा कता संथरा को बचन से व्यङ्ग है।
राजनासकरनलया छमावत ।
बोद्ध यथा।
पुनि भाउ यहि विरिया कालो।
सहा वाडा जानकी मै व्यङ्ग ।
काकु।
.
रास सलुज बस रे सह बंगा। का राम मनुज हैं
अन्च सनिध।
15
रोमाहिं राजकुँअरिछवि देखी ।
इहा आपुस में कहि नारद को सुनावत ।
दाच्य।
कुरुपथ मांगु कज व्याकुल रागी ।
वैद न दे सनहुं मुनि जोगी
ससय यथा।
उदय अक्षन अवलोकहु ताता।
इहा प्रात सूचित ।
काहू काहू चेष्टा ते भी कहत हैं ।
यथा।
खंजन मंजुल तिरछे नयना इत्यादि।

सानसरहस्य । अथ ध्वनिक लक्षन । मूल लक्षना है जहां माह व्यंग परधान सोज ध्वनि दाशांति की कहत सकल कविराज । अविविच्छित इक दूसरी कहत विविच्छित माज॥ प्राविविचित लक्षगा का निर्णय । वता की इच्छा नहीं बचनहि को जु प्रभाव । व्यंग्यक तेहिबाच्च को अविनिच्छित ठहराव ॥ । यथा। 'कहे म सेवक बारहिवारा' । इहा ते, 'सव सेवकगन गरहि गलानो' । इहा लों; बता भरतवाच्य बेचान हम चलि हैं सो ल- क्षन लचना ते जानो जात, सेवक स्वामि भाव व्यंग. वे सेक्कन को ग्लानि मई यह व्यंग । নিৰিনি দায্য जहा बक्ता को इच्छा से बिंग कढ़े सो बि- विक्षित। m यशा। Ja बहुरि गौरि कर ध्यान करिह । भूप किशोर देखि किन लेह ।

मानसरहस्य २० ? ताले दो सेद । अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनि, अत्यन्त तिरस्कृतवाच्चध्वनि । ताको लक्षन । अर्थ और लो सिलि रहै सो अन्तरसंक्रमित । अरू जहाँ व्यंग को अधिकाई कहिने को वाचक अपनो अर्थ छोड़ि देय सो अत्यन्त तिर- स्तवाच्च ध्वनि। अन्तरसंक्रमित या। 'ननु जुग नामक प्रजापान से।' यामे एक प्रजापान अरत के पाहरू टूजे सिष्ट रकार मकार अत्यंततिरस्कृत यथा। 'कुन्दकली दाडिम दामिनौ' । इहाँ ते, 'गज के हरि निज करत प्रसंसा' । उहाँ तक । 'हरणे पाहू सकल जनु राजू ।' तो इहाँ हरण छै वो असन्सब तब वाचक ने अपनो अर्थ छोड़ो अरु साध्यावसाना ते दसनादि लौनो की उपमेय ते उपमान अनादर पावत रहे यह मूढ़ व्यंग अझ तिहार वैरिन को हरष हम ते नाहीं सहो जात यह ध्वनि । अरु जे ध्वनि जुदो कहत ते यह

मानमरहस्य।
लिखत की जब व्यंग मे अधिक चमत्कार होय
सो ध्वनि । याको कळू भेद बढ़ाई के हम सा-
हित्य सरसी मे लिख्यो है
दोहा।
अर्थ व्यंग वी काम को जहँ सो ध्वनि है आति।
प्रथमहि क्रम नहि जानिये टूजो है कस काति
नहा क्रम नहीं जानिये सो असंलक्ष क्रम
व्यंग ध्वनि कहावै । अरू जहा क्रम जानिये सो
संलक्ष क्रम व्यंग ध्वनि कहावै ।
दोहा।
जेहिठा क्रम नहि जानिये सो ध्वनि बहुत प्रकास
नव रसमाव अनेक विधि पुनि तिनके आभास॥
सान्ति सन्धि अरु सबलता उदयभाव विधि और।
तहा बिराजत नास ए एहै प्रभु जेहि ठौर ॥
अलकार ए होत सब जहाँ और परधान।
वार्ता।
। जहाँ रस अंग होय मुख्य रसभावादिका होय
तही रसवदा अलंकार कहिये रस न कहिये ।

मानसरहस्य। जहाँ भाव अंग होय मुख्य कोज और होय तह प्रेयसत अलंकार । जहाँ प्रामआस अंग होय मुख्य कोज और होय तहाँ जर्जस अलंकार । नहा भाव सान्तादिक अंग होय तही समाहित । दून के उदाहरन मध्यस काव्य के प्रसंग में कहेंगे । अब रस को रूप कहियतु है। तहाँ रस को मूल भाव है यात प्रथम भाव कहियतु है। . आव लक्षण। रस स अनुकूल विकार को भाव कहत कविराज। यथा। कनकिडिनिनूपुरधुनि सुनि | कहत लखन सन रास हृदय. गुनि ॥ इहा धुनि सुनि शृङ्गार अनुकूल बिकार उ- पनो । सो साव चार प्रकार को । विभाव, अ- नुभाव, संचारी, थाई। विभाव लक्षण। जिनते जिनके नगत मे प्रगटत है घिर भाव । तई नित्य कवित्त से पावत नाम विभाव ॥

.
२.०
मानसरहस्यं ।
अनुभाव लक्षण।
थिर भावन को और को प्रगटे ते अनुभाव ।
संचारी ने साथ हो बहुत बढ़ावे हाव ॥
अरु सब रस में संचरे ते बिभाव दो भौति
श्रालम्बन, उद्दीपन ।
.
लक्षण।
जे निवास थिरभाव के ते ओलम्बन जान ।
सुधि आवत निनको लखे ते उद्दीप बखान ।
आलम्बन रति के कहत नवल नारि अमकान्त ।
उद्दीपन बहु जाति के धन बन सरद बसन्त ॥ .
पालस्वन यंथा।
.
L
। अस कहि फिर चितये तेहि श्रीरा।
सियमुख ससि भए नयन चकोरा।
उहीपन था।
प्राची दिसि ससि उये सुहावा ।
सियमुख सरद देखि मुख पावा ॥
नानकी को याही रीत । 'देखि रूप लोचन ललचाने'
पालम्बन ।
निसहि ससिहि निन्दहि बहु भाती।

मानसरहस्य।
२१
सहोपन ।
सो भी दो शैत के। घनबनसरदादि देवी,
गृहवस्त्रादि सानुषो।
पट उर लाय सोच अति कीन्हा।
अदभाव।
वचन चितवो बन विधि र जे सात्विकमाव !
आलिंगन चुम्बन जिते ते काहिए अनुभाव ॥
वचन यया।
मानहु मदन दुन्दुसी दीनी ।
चितवन यथा।
प्रभुहि चितै पुनि चितै सहि राजत लोचनलोल
खेलत मनसिज मीन जुग जजु विधुमण्डलडोल
साविक नक्षन ।
बधि रहिवो खरभंग पुनि कम खेद असुत्रान ।
रोम विधन स अंत पुनि सात्विक भाव वखान॥
यथा।
'अधिक सनेह देहभई भोरी' इत्यादि जानिए।
प्रय संचारो।
प्रथम कहत निर्वद गलान
संक अमया मद श्रम जान
॥

मानसरहस्य ।
।
।
थालम वहरि दीनंता चिन्ता
मोह श्रसित वृति लाज काहन्ता ॥
बेग चपलता जड़ता हर्ष
गर्भ विषादरु नौद अमर्ष
औत्सुक्य अपमार सोडूबो
बोध उग्रता प्रान खोइनो
बद्धि व्याधि चवहिल्या चास
उन्माद बाद पुनि ती बिलास ॥
संचारी तैतीस गनाए
नवहूं रस के संग सुहाए
संचारी लक्षण।
नेहि तेहि बिधि संसार सुख देखत उपजै खेद।
उदासीनता जगत ते सो कहिये निर्वेद
आधि व्याधि ते जो सई वलको हानि ग्लान ।
बस्तु
आवती हान ते उर पुनि संका सान
अनसहिबो पर अले को सुवह असूया होय ।
मोह जु अति आनंद ते मद कहियत है सोय ॥
बहुत उतायल काजते श्रमजु सिथिलता अंग।
उहि न सके ऐडाय तन जहां स आलस अंग ।

मानसरहस्य।
।
होय सलिनमान दुखन ते तव दीनता कहाइ।
चिन्ता नो प्रियवस्तु को ध्यानो करत विहा
चित्तविक लता मोह है स्मृति सधि कर होय ।
धृति संतोष वखानिये लाज सचिबो सोय ॥
अनहोनी को होत लखि चितवम सो आवेग।
नाज उताइल चलता नहँ सन है उदवेग ॥
सब कासन ते सुन्न झै रहिवो जड़ता सोडू ।
चित में अतिमानँद उसगि बढ़ोहर्ष तब होई॥
सब ते सवविधि हो सरस यह चितगर्भ कहाय।
दुख
ते मन तिहीं घटै यह विवाद को आय ।
जहँ कछु काम न कर सके इंद्री निद्रा होय ।
असरष सो कहिये जहाँ क्रोध अधिक थिर जोय॥
चौत्सुक्य नहँकास को चित न सहिस ढील ।
अपस्मार जई मूरछा भमरु विकलता डौल ॥
सपनो कहिये सोडूबो बोध जागिबो होडू
जग निंदन समरस्य चित कहै उग्रता सोइ ।
प्रान' मगनता मरन मति निहचे ज्ञान कहाय।
होइ जु मन संताप ते तन गद व्याधि सुभाय ।

२४ सानसरहस्य। । अवहित्या जहँ लाज ते हर्ष न सोका लखाय । चित श्रम सो उन्माद है डर पनि चास कहाय॥ सोई तर्क वादानिये जहँ विचार बहु आय संचारी तैतीस ए कह सकल कवि गाय अथ ममाप्रकाशे। माग गति चाल रूप मोई अंग करे पनि थाईही से टूटे प्रगटत निरधाग्यौ है । निर्वेद अपस्मार मरन कहत बाई संतहूं को अंग सो सिंगार में निवास्यौ है । कौस्तुभ ग्रन्थ गोरे खन का तासे तें संचारी निकायौ है ॥ भावगति ३ । तुक को अर्थ रति को गति कों चलाय देय कोप प्रगट हाय भाव रति उ- माहादिता की गति को चलाय देय सानादि अंगीकार बारे चौधौ तुक को अर्थ निर्वेद अप- स्मार मरन ये तीन संचारी करुना वीभत्सादि में होत है। अरु आन ग्रन्थ ते तौसई शृङ्गार के होत हैं सो हम साहित्य सुधाकर के मंगल में लिखे हैं।

सानसरहस्य।
२५
अघ संचारी के उदाहरण निर्वेद यथा ।
वन प्रभु कृपा करहु हि आती
सव तजि सजन करौं दिन राती ।
ग्लानि यथा।
अस कहि बचन सचिव रहि गए।
हानिग्लानि संका यथा ।
शिवहि विलोकिससं कउ सारू।
असूया यथा।
तब सिय देखि सूप अभिलाषे ।
तर कपूत सूढ़ सन साखे
रनमदसत्त निसाचर दा
सद।
त्रम।
श्रसित
सूप
निद्रा अति आई 'याही में निद्रा'।
पासला
रघुबर जाय शयन तन कीन्हा
दीनता।
पाहि नाथ काहि पाहि गोसाई
चिन्ता।
चितवत चक्रित चहुदिसि सीता
How
मोह।
लीन्हि लाय उर जनक जानकी

२६
मानसरहस्य।
सुमिरन ।
जब जब राम अवध सुधि करहीं
धति।
"सुनु मातु मैं पायो सकल जग राज आजु
न संशयं"
लाज।
गुरु जन लाज समाज बड़ देखि सीय सकुचानि।
आविग।
लछसनं दीख उमा कृत वैषा । चकित ।
प्दपलता।
करत मनोरथ आतुर धावा .
जडता।
मुनि सन साँझ अचल है वैसा
हरप।
हरषि राम में टेउ हनुमाना
गर्भग
कहुं जग मो समान को योधा
विषाद।
अति बिषाद बस लोग लुगाई
अमर्ष ।
जीते जो भट संयुग माहौं
सुनु तापस में तिन सम नाहीं

मानसरहस्य।
प्रोत्सुक्ष्य ।
वेग बलिय प्रसु ानिये अजवल रिपुदल जीत ।
सूर्छ।
अस कहि सूर्छि परो महि राज
स्नम ।
राम लखन सखि होहिं कि नाहीं ।
स्वप।
।
सपने वानर लंका जारी
बोध।
प्रात पुनीत काल प्रभु जागे
उग्रता।
जिते सुरासुर तव श्रम नाहीं
नर वानर केहि लेख माहीं
सूर्यो।
रास रास कहि रास काहि रास राम काहि राम ।
तन त्यागो ।
ज्ञान।
भयो ज्ञान उपजो नवनेहा
व्याधि ।
यह कुरोग कर औषधि नाहीं
अवहित्या।
चकित चितव सुंदरी पहिचानी
+ms?

२८
सानसरहस्य।
उन्माद।
कबहुँ कि पुनि पीछे फिरि नाई
नास ।
गुरु पहँ चले निसा बड़ जानी
२
तर्क।
जब समुझत रघुवीर सुभाऊ
स्थाई लक्षन ।
सब सावन सरदार है टार सके नहिं कोय ।
सो थिरसाव बखानिये रस सरूप जो होय
सभाप्रकाशे।
जामे आव अनेक सब होहिं रहे छपि जाहिँ ।
दसलचन।
काव्य कला धरे शंकूमते।
दोहा।
विभावादि थाई यथा दोहु न सिलि के होय ।
अनुमायक मायक कहत रस सम्बन्ध सु जोय ॥
भट्टनायक मते।
बिभावादि संयोग ते भाजक भाग्य बखान
जहाँ हाय सम्बन्ध यह तहाँ सुरस पहिचान ॥
रसतरंगिनी।
जहँ बिभाव अनुभाव मिलि सात्विकौव्यभिचार।
पूरनथाई भाव ते परपूरन संचार

सानसरहस्य।
२६
है
॥
रसरहस्ये।
जैसी सुख है ब्रह्म को मिले जगत सुधि जात।
लाई गत रस मे सगन भये सु रसना मात
सभाप्रकाशे।
सिलि बिसाव अनुभाव अरु संचारी जे आन ।
उपजावत रस रुचिर यों ज्यों निज अंगन पान!
तासे कोई कहत उत्पत्ति होत है तहा कोई
ऐसौ बहत उत्पत्ति हाय तौ लीला राम देखि
फेर रास देखिवे की चाह नाहीं चाही अस रस
दृश्य पदार्थ चाही याते अनुमान होत है, लीला
राम ते रास अनुमान भयो ऐसहीं विभावादि
तें अनुसान है तहा आन कही अनुमान ते का-
रज नाहीं होत जैसे पर्वत में धूम देखि अग्नि
अनुमान कौना तहा पाकादि क्रिया नाहीं सिद्ध
है लीला राम ते जो सादृश्य रूप हृदय मे आवै
तो कार्य होय है ऐसही रस, जैसे स्वयंभ मनु
को लीला राम देखि राम प्राप्ति भये वामें कोई
कहै देखना कहा लिखा तो गुसाई लिखी-

सानमरहस्य । 'विधि हरि हर तप देखि अपारा' इहा ते दे- खहि सो सरूप लौं विचारी बसे आनजाने याते भाग कही चाही अरू व्यञ्चक सब का मत है यासे बहुत अन्य बद्धि सय ते नाहीं लिखत तहा प्रथम शृङ्गार लक्षन । ससाप्रकाशे दोहा। रव्य देश अरू चातुरी समै आदि दै वेष । इन तिय पिय चित रंजन मधुरा रति सुचिशेष ।। वार्ता। जहाँ नायक नायका संयोग चाहै सो मधु- रा रति । दोहा ललित अंग-संचरन ते सो रति पाय प्रकष । उपजत रस शृङ्गार सो कविजन कहत सहर्ष ॥ हे प्रकार शृङ्गार रस कहि संयोग नियोग। सिलिबो अनसिल आदिदै बरनत पंडितलोग। संयोगजथा। "निज कर भूषन राम बनाये"। "सीतहि पहिराये प्रभु सादर" । इहा राम जानकी पर-

सानसरहस्य।
स्पर बालंबन विभाव कटाक्षादि अनुभाव हर्ष
संचारी तिल्याई यात शृङ्गार याके देव कृष्ण
स्यास रंग जानिये ।
प्रथवियोग । रसरहस्ये ।
अव वियोग वाहि पाच बिधि जहँ पूरब अनुराग
विरह ईरषा श्राप पुनि गमन विदेश विभाग ॥
पूर्वानुराग जथा।
लोचन मग रामहि उर बागी।
फिरी अघुन यौ पितुवस जानी ।।
विरह ।
निसहि ससिहि निन्दहि बह जाती
जुग सस सई सिरात न राती ॥
ईरषा।
गौतसतिय गतिसुरतिकरि नहिपरसतिपदपानि
मन विहसे. ।
7
वाप।
बिरह विकल अगवन्तहि देखी।
नारद मन भा छोभ विशेषी ।
मोर श्राप करि अंगीकारा।
सहत राम नाना दुग्न भारा ॥

३२
मानसरहस्य।
.
विदेसगमनयथा। ✓
चलन चहत बन जीवन नाथा ।
अथ पूर्वानुरागको दसदसा।
नयनप्रीत १ चिन्ता २ संकल्प ३ नौदनास ४
कृशता ५ रुचिहानि ६ लाजभंग ७ उन्माद ८
सूळ ६ मृत्यु १०।
नयनप्रीत जथा।
देखि रूप लोचन ललचाने ।।
चिंता।
सुमिरि पितापन मन अति छोमा।।
बरौं संभु नतु रहौं कुमारी।।
संकल्प।
क्रसता।
देखि उमहि तप छीन शरीरा।।
रुचिहान।
पुनि परिहरे पुराने परना।
J
लाज भंग।
चली उमा तप हित हरपाई।।
उन्माद।
तुम सम पुरुष न मोसम नारी।।
इत्यादि, अरू जो शृङ्गार को आलंबनविभाव
नायक नायका ताक अनेक भेद होत हैं

सानसरहस्य।
३३
नायक।
--
--
पति उपपति वैसिक विविधि नायकसेदवखान।
तिलक ।
पति जाते विवाह होय, उपपति आन को
पति, बैसिक जाते धन की चाह रतिहेतु होहि।
पतियधा।
सोहत सिया रास की जोरी।
उपपतियधा।
छल करि टारिय तासु व्रत प्रभु सुरकारज कान
इत्यादि । अरु पति के भेद अनुकूलादि बहुत
होत है। बस नायका प्रवकीया, परीकया, सा-
मान्या । नो निज पति सों रति करै सो पूव
कीया, पर पंति सो प्रीति करै सो परकीया,
जो घंन कौ चाह राखै सो सामान्या ।
स्वकीयाजधा।
पति देवता सुतीय महँ मातु प्रथम तव रेष । १
इत्यादि बहुत भेद होत हैं।
अथ हास्यरसा
जहँ अजोग को जोग पुनि उलटो लखिये काज

मानसरहस्य ।
बुरो रूप चितवन चलन हास विवरन बिमाव ।
मन्द मध्य अरु उच्च स्वर हँसिबो है अनुभाव ॥
हरष उद्देग रु चपलता ते संचारी भाव।
दूनते नित्य कवित्त में हास्य व्यंग जहँ होय ।
कबि सुहृदै सब रसन से हास्यरस्य है सोय ॥
यया।
V
नाना जिनिस देख कर कोसा।
पुनि पुनि हँसत कौशलाधीसा ॥
इहा बानर विआव हसन अनुसाव हरष सं-
चारी। हास्यव्यंग स्खेत रंग प्रथुदेव ।
अथ
कना।
दुखी देखिये मित्र को मृतक श्रापयुत बन्धु ।
इनते उपजत सोक लखि दारिदयुत अतिअन्धु।।
सदन कंग अरू रोम तन ए अनुभाव बखान ।
मोह सूरछा दीनता ते संचारी जान ॥
दूनते नृत्य कवित्त में सोकव्यंग जहँ होय ।
कवि सुहृदय सब रसन में करना रस तहँ जोय॥
अवगाह सोक समुद्र सोहिँ नारि नर
यथा।

मानसरहस्य।
३५
व्याकुल महा" । इहाँ दशरथ सरन विसाव को
उद्दीपन रास माता रुदन अनुभाव, मोह दी-
नता संचारी, सोक थाई, याते करुना । अरु.
कोई कहै करुनारस से तो अधिकारी के सेद
में रस होत है जैसे
हनूमानज
अयोध्याकाण्ड
कथा श्रवन करत आनन्द को प्राप्त होय
अरु सती सौ पति साथ ऐसेही वीभत्स में भी-
ससेत दुप्रशासन को रूधिर पियो ।
अथ रोट्ररस लक्षण ।
गर्व वचन रिपु रन लखत और कढ़े हथियार ।
इनते उपजत क्रोध है ए विभाव सरदार
भृकुटीकुटिल अरुअरुनहग अधर फरक अनुभाव
गर्भ विकलता चपलता ते संचारी भाव ॥
इनते नृत्य कवित्त में क्रोध व्यंग जहँ होय।
कवि सुहृदय सब कहत हैं रौद्ररस्य है सोय ॥
यथा।
जो सत संकर करें सहाई।"
तो मारी रन रामदोहाई ॥

मानसरहस्य।
इहा इन्द्रजीत विसाव सुजादि फरकान अनु-
आव गर्भ संचारी क्रोध थाई ताते रौद्र
अथ बीर के विसाव।
युद्धोदाक दया बहुरि धर्स सु चार प्रभाव ।
उग्र जीवं जेते जहा ते कहिये अनुमाव ॥
बचन अरुनता बदन की अरू फूलै सब अंग ।
ए अनुसाव वखानिये सब बीरन के संग ॥
ai
वार्ता।
उग्रता असूया संचारी, उत्साह थाई समता
की सुधि लौं बौर सम सुधि मूलते रौद्र इनमें
इतनो अद।
यथा ।
सुनि सेवका दुख दीन दयाला।
फरकि उठे दोउ सुजा विशाला ॥
इहा बैरी के बल को सेवक दुख उद्दीपन
बिभाव सुज फरकब अनुभाव आपनी उग्रता
बालि के बल की तारीफ न सुहानी सी असूया
उत्साह थाई याते बीर । इन्द्रदेव पीत रंग ।

सानसरहय।
अथ अयाना ।
वाघ व्याल विकराल रन सूनो वन ग्रह देखि ।
जोरावर अपराधयुत आव भयानक लेखि ।
कंप रोस प्रखेद तन ए अनुभाव वखान ।
सोह
सून छा
दीनता ते संचारी जान ॥
दूनते नृत्य कवित्त में अति भय परगट होय ।
कवि सुहृदय को मगनसन कहत भयानक सोय॥
यघा।
"हाहाकार करत सुर भागे।' इहा रावन
जोर, विभाव, देव, कप अनुभाव, दीनता सं-
चारी, भय थाई, यम देव, नौल रंग ।
अंथ वीभत्स।
अनुभावन को देखियो सुनिबो सुमिरन जान ।
और निषिद्ध क दर्ज ए ग्लान विभाव बखान ॥
निन्दा करिवो कस्य तन रोम सु है अनुभाव ।
दुःख असूया जानिये है सञ्चारी भाव
कवित नृत्य में ग्लान जह दूनते परगट होय ।
नव रस में बीभत्स रस ताहि कहत कबि लोय॥

की
मानसरहस्य.।
यथा।
.
• श्रोनित सर कादर अयकारी' पूहा ते रास
सर निकरन हये लौं अंगी बौसम जानिये ।
तहाँ सञ्चादिक विभाव अरु देखनहारन की रोम
अनुभाव, असूया संचारी, ग्लान थाई, काल देव,
नील रंग ॥
अथ अद्भुत रस को विभाब-दोहा ।
जह अनहोनी देखिये वचनरचन अनुरूप
अडत रस के नानिये ए विशाव सारूप
बचन कस्य अरु रोम तन ए कहिये अनुभाव ।
हरष संखचित मोहयुत ते संचारी भाव
दूनते कृत्य कवित्त में व्यंग आचरज होय
नौज रस में जानिये बहुत रस है लोय
-
॥
%D
यथा।
-
'सती देखि कौतुक मग जाता दहा ते 'नैन
दि बैठी' इहाँ तक, तहाँ राम विभाव, कम्प
अनुभाव, संका मोह संचारी, आचरज व्यंग,
कामदेव पौत रंग याते अद्भुत। ..

मानसरहस्य ।
३६
प्रथ सांतरमके विभाव ।
सिसंडली तपोवन वाथा जगत सससान
ए विभाव अनुभाव पुनि सब में समता ज्ञान॥
ताको लक्षगा।
तत्व ज्ञान ते कवित से जहँ उपजत निर्वेद ।
कहत सातरस तासु सों सो है नवमो भेद ।
धीरन हरष संचारी जानिये।
सोरठा।
मन हरिपद अनुराग तज कुतर्क नाना सकल ।
महामोह निसि नाग सोवत वीते काल बह ॥
हा नाना इतिहास विभाव, समता अनु-
भाव, धीरज हरष संचारी, निर्वेद थाई, विष्ण
देव, खेत रंग, याते सांत, अरु कोई तीन रस
अनुमानत दास्य सिष्य वात्सल्य अरु कोई दू-
नहीं में भाव ध्वनि मानत दास्य में देव रति.
भाव ध्वनि सिष्य में मित्र रतिभाव ध्वनि वा-
त्सल्य पुत्र रतिभाव ध्वनि।
भावध्वनि लनम।
संचारी ए व्यंग के देवराज रति होय।।
जहँ प्रधानता करि कहत भाव धनि है सोय ॥
में

४०
मानसरहस्य ।
।
संचारोभाव ध्वनि यथा।
जब जब राम अवधसुधि करहीं।
तब तब वारि बिलाचन सरहौं ॥
दूह। अवध सुमिरन ।
वरति वथा ।
भरत सुभाव न सुगम अगमहूँ।
दूहा कवि उति देवता विष है।
राजरति यथा।
इस सेवक खासी सियनाए ।
सुनि रति ।
'भानुवंस अय सूप घनेरे इहाँ ते असोस लौं।
पुनरति यथा ।
लोचनोट राम जिन होज। ।
श्रोतरति ।
'सीतारामचरन रति सोदे।' ऐसही और
जानिये अरु जहाँ अनुचित रस होय तहा रसा-
मास अनुचित भाव ते सावासास ।
सासास यथा।
|| 'प्रभु लछमन पहि फेर पठाई' 1 तो इहाँ
एक सुपनखा कालकेय राम लछसन सो रति
सात रसासास।

सानसरहस्य।
४१
भावाभास यथा।
BM
3.
गुरु सन कहा करिय प्रसु सोई
रामहि सरतहि सेंट न होई ॥
इही अनुचित चिन्ता ।
मावोव्य।
कैबई सन जो कछु रहेज।
सो विध आजु टुसहदुख दयेज ॥
इहा ईर्षाभाव को उदय ।
सावसंधि ।
वन्धुसनेह सरस इहि ओरा ।
उत साहेव से वावर जोरा ॥
इहा मोह त्रास दो भाव को सन्धि है।
:-
..
भावसवलता।
चकित चितै मदरी पहिचानी
हरष विषाद हृदय अकुलानी ॥
इहा मोह हर्ष विषाद उद्वेग को सबलता ।
भावसाति।
विसर हरष सोक सुख दुख गन ।
इहा भरत के हृदय में जो भाव रहे सो सान्ति
इहा यद्यपि रस है तदपि भावमुष्टा जानिये ।
/

४२
सानमरहस्य ।
दोहा
रस साहेब सब ठा तऊ कई भाव सरसात ।
ज्यों सेवक के व्याह में राजा चलै बरात ॥
यथा।
'हरषि चले मुनिवर के साथा' । सदा राम
संग चराचर रहत तथापि मुनिसंग काहे ।
इति असंलक्षकास व्यंग ध्वनि ।
अथ संलक्षकास व्यंगध्वनि ।
"शब्द अर्थ दून दुहुन ते आई सी परतीत"
सो तीन रीत को, शब्द शक्तिी १ अर्थ शति
उभय शंति ३ शब्दशति जहाँ आन पर नाय
शब्द एते न निकसै।
शब्दशक्ति यथा ।
पूछा गुनिन रेख तिन खाँची।
भरत सुबाल होंहि यह साँची ।।
इहा गुनिन रेख खाची भुआल ते सिद्ध होत
मान ते नाहीं जो नृप कहो राजा कहो तो गुनी
असत होय यात भरत पृथ्वी मे रहिहैं।

मानसरहस्य ।
४३
अघ अर्थशक्ति।
जहा पर नाय शक्ति दिए ते व्यंग अर्थ रहे
सो अर्थ शक्ति तामे प्रथम तीन भेद, खतः सं-
भवी कवि प्रौढ़ीति कवि निबद्धवक्ता की उक्ति।
वार्ता।
जगतप्रसिद्ध अर्थ ते स्वतः संभवी औ कवि
करो प्रौढ़ सो कवि प्रौढोक्ति जैसे जस स्वेत वा.
लंक स्यास।
दोहा।
का हैं कहावै जड़न सों बातें विविध प्रकार ।
उपमा में उपसेय..को देहिं सकल अधिकार ॥
इत्यादि, औ कविन को निषिद्धता को वक्ता
की उक्ति ते बरने सो कविनिषिद बता की
उति।
वस्तु लक्षण।
नहँ विशेषगन वाक्य को अर्थ चमत्कृत होय ।
अलंकार ते भिन्न जो वस्तु कहावै सोय ॥
अथ स्वतःसंभवीवस्तु ते वस्तु यथा ।
पलँग पीठ तजि गोदहिँ डोरा ।
सिय न दीन पग अवनि कठोरा ॥
--
..
Sures

मानसरहस्य । इहा जानकी की सुकुमारता वस्तु ते, बन जिन साथ लेहु यह दूसरौं । स्वतःसंभवीवस्तु ते प्रसार । ? पाहन कृमि जिमि कठिन सुमाज । तिनहि कलेश, न कानन काऊ ॥ इहा जानकी की सुकुमारता वस्तु ते, उ- पसा अलंकार । अथ स्वतः संभवोअलंकार ते अलंकार यथा। कल्पबेलि जिसि बहु बिधि लाली । सोच सनेह सुधा प्रतिपाली ॥ इहाँ उपसा अलंकार ते रूप अलंकार । अथ स्वत: संभवी अलंकार ते वस्तु यथा । चन्दकिरनरसरसिक चकोरी। रविसन्युख रुप सकहि न जोरी। दूहा दृष्टान्त अलंकार ते सुकुमारता वस्तु । अथ कविप्रौढ़ोक्ति वस्तु ते वस्तु । तब रिपुनारिसदनजलधारा । भरो बहोरि भयो सो खारा ॥

मानसरहस्य। इहाँ रामप्रताप वस्तु ते बैरिन को वास टू- सरी वस्तु । विप्रौढोक्ति वस्तु ते अलंकार । दण्ड जतिनकर भेद जहँ नृत्तक नृत्य समाज । जीतो मनसिज सुनिय अस रामचन्द्र के राज़ ॥ इहा रामराज वस्तु ते परिसंख्या अलंकार । कवि प्रौढ़ोति अलंकार ते अलंकार दोहा । नाश्रम सागर सान्तरस पूरन पावन पाथ सेन मनो करुनासरित लिये जात रघुनाथ ॥ इहाँ रूपक ते उत्प्रेक्षा अलंकार । कविप्रौढोक्ति अलंकार ते वस्तु । नाम पाहरू दिवस निस ध्यान तुम्हार कपाट । लोचन निज पद यन्त्रिका प्रान जाहिँ केहि बाट वहाँ रूपक अलकार ते जानको विरहवस्तु । अरु कवि निबद्ध बक्ता को उति कविन नो बॉधी सो बता कहै दूतनो भेद याते न्यारे इदाहरन नाहीं किये असशब्द अर्थते होय सो उभय धुनि यथा। 'लखन लखा प्रभु हृदय खभारू' इहा लक्ष- ४६ मानसरहस्य। मन सौमित्र काहो तो न होय याते हृदय की जाननहार ते शब्द शक्ति अरू समय धर्म में राम जानि के आई सी शत्रु सयो ता हेतु आपनी सेवकता नाहिर करत सो समय सम औसर सम कहो तो भी होय याते उभय सक्ति अरु धनि को भेद १०४०५५ अरू सध्यम काव्य के भेद ८ अपरांग १ असुन्दर २ सन्दिग्ध ३ तुल्य प्रधान ४ वाच्यसिद्धाग ५ अस्फुट ६ काकचिप्त ७ अगूढ़ ८ अपरांगता में चार भेद, रसवत प्रेयो ऊर्जस स- साहित। - रसवत लक्षन। जहाँ रस अंग होय मुख्य पान होय सो रसवत यथा। अति सुकुमार युगुल मम बारे ।। निसिचर सुभट महाबल भारे । इहा बात्सल्या को अंग भयानक ! बागपास बस भये खरारी। अविगत अलख एक अबिकारी AN.

सानसरहस्य।
इहा
अद्भुत
को असंगसान्त ।
सियहि बिलोकित क्यों
धनु
कैसे
चितव गरुड़ लघु व्यालहि जैसे ॥
इहाँ शृङ्गार का अंग वीर ।
अथ प्रेयो लक्षन ।
जहाँ साव अंग आन दाज अंग तहाँ प्रेयो।
यधा!
सोह नवल तन सुन्दर सारौ ।
जगतजननि अतुलित छवि भारी॥
इहाँ शृङ्गार को अंग देव रति भाव धूनि ।
अध जार्जस लक्षना
नहा अभाव अंग होय नान काज अंगी तहा
ऊर्जस।
यधा।
प्रभु विलोकि सर सकहिं न डारी
थकित भये रजनीचर भारी ॥
इहा शत्रु में मोह अनुचित याते वीर वा
अंग भावाभास.।

४८
सानसरहस्य ।
.
देखि रूप मुनि बिरति विसारी।
बड़ी बार लगि रहे निहारी।
दूहा मुनि में रति अनुचित सो हास्य का
अंग यात रसाभास ।
भघ समाहित
जहाँ सान्तादिक अंग होय आन अंगी होय
तहा समाहित।
यथा।
।
पुनि संसारि उठी सो लंका।
जारि पानि करि बिनयं ससंका ॥
दूहा क्रोध को सान्ति बीर का अंग।
इति अपरांग।
अथ असुंदर लक्षण ।
वाच्य व व्यंङ्ग सुन्दर न होय सो असुन्दर ।
यथा।
नाथ उसा मन प्रानप्रिय गृहकिकिरी करेह ।
छमहु सकल अपराध अब व प्रसन्न बर देहु ।।

सानसरहस्य।
४६
दूहा सती का अपराध नसा नाहीं किया
यह व्यङ्ग सो वाच्य ते
सुन्दर
नाहीं
अथ सदिग्ध।
जहाँ व्यंग का निश्चय नाहीं तहाँ सन्दिग्ध ।
यथा।
सरस वचन जब सौता बोली
हरिप्रेरित लछसनमति डोली ॥
इहा मरम बचन में बहुत अर्थ न जाने कहा
कहे, तुम भरत में मिलि गये के छत्री कहाय
धनु वान धारन करि रन ते डरत हो याका
निश्चय नाहीं याते सन्दिग्ध ।
अध तुल्यप्रधान ।
जहाँ वाच्चव्यंग बरावर होय सो तुल्य प्रधान।
यथा।
More
'दूक कहहिँ दूक कहि करहिँ अरु दूक का-
रहि कहत न बागहीं।' इहाँ हम कहत नाहीं
करि दिखाइहैं सो वाच्य की बराबर व्यंग है
याते तुल्यप्रधान ।

५०
मानसरहस्य ।
वाच्यसि हांग लक्षण ।
जहा शब्द सिद्ध अनेक अर्थवागे दोय अर्थ
को कहै सो वाच्य सिद्धांग।
यथा।
बेगि बिलम्ब न करिय नृप साजी सबै समाज ।
सुदिन सुमंगल तबहिं जब राम होहिं युवराज॥
इहा जब राम युबराज होहिं तव सुसंगल,
अरु जब वैहैं तब सुदिन बूझब अबै राम बन
गवन करिहैं।
अथ अस्फुट लक्षण ।
जो बहुत कलेश ते व्यङ्ग होय सो अस्फुट ।
यथा।
गौतमतियगतिसुरतिकरि नहिँ परसत पदपाना
मन विहँसे रघुवंशमणि प्रौति अलौकिक जान।
दूहा रामचरन पर पत्नी सरति करि अरु
प्रीत ने यद्यपि बहुत पोषण कोनो तथापिं बहुत
केश ते पाई।

सानसरहस्य।
५१
हैं
?
काकुस्वरभेद यथा।
हैं दससीस मनुज रघुनायक ।
जाके हनूसान सो पायक ॥
इहा रास का मनुज
अगढ़।
जो तुम होते मुनि की नाई।
तौ पदरज सिर धरत गुसाई॥
दूहा तुस दौर वेष बनाय आये सो प्रगटही है।
इति मध्यमकाव्य।
.
अथ गुन।
चित्त में अानन्द करै रस को मिन्न सो तीन
भाति । माधुर्ज, ओज, प्रसाद ।
माधुर्ज लक्षण।
नाके सुनत चित्त द्रवै सो माधुर्य ।
यधा।
कनकिकिनिनपुरधुनि सुनि ।
अथ ओज लक्षण।
उद्धत वन टबर्ग ते होय सो पोज ।

मानसरहस्य।
यथा।
कटकटहिँ जंबुक भूत प्रेत पिसाच खप्पर
संचहीं।
अथ प्रसाद।
जहाँ शीघ्र अर्थ जानो जाय समचि बरन
पर सो प्रसाद ।
यथा।
A
जानी तापस सूर कवि कोबिद गुन आगार ।
केहिकि लोभ बिडम्बना कोन न यह संसार
अथ अलंकार लक्षण । काव्यकलाधरे बरवा।
रस अरू व्यङ्ग टुहुन ते न्यारो होय ।
अर्थ चमत्कृत शब्दहि. भूषन सोय ॥
उपसालक्षगा चमत्कार चन्द्रिका ।
उपमानरु उपमेय जहँ बाचक धर्म सुचार ।
पूरन उपमा हौन ते लुप्तोपमा विचार ।
पूरन उपमा तथा।
तरुन अमन अंबुज व चरना ।
अमनधर्म अंबुज उपमान, इव बाचक,
चरन उपमेय।

मानसरहस्य।
AS
वाचकलुप्ता यथा।
"बदन सयक्ष तापत्रयमोचन' । वदन उपमेय
मयंक उपमान, तापमोचन धर्म
प्रध धर्मलुप्ता यथा।
'प्रभु भुज करिकर सम दस कन्वर' । भुन
उपमेय, करिकर उपमान, सम वाचक ।
अंथ उपमानलुप्ता यथा ।
'नखदुति हृदय भक्ति तम हरना' । नख
उपमेय, दुति धरम इत्यादि ।
श्रथ अनन्या।
उपसानो उपमेय कर कहत अनन्या ताहि ।
यथा।
इन सस ए उपमा उर आनी। ...
अथ उपसानोपमेय लक्षण ।
उपमा लागै परस्पर सा उपमा उपमेय।
यथा।
वे तुमसे तुम उनसम स्वामौ ।
अथ प्रतीप कंठाभरणे ।
उपमान जहाँ उपमेय हो जाय तहा पहि-
। लोई प्रतीप भने।

५४ मानसरहस्य। यथा। " उतरि नहाने जमुनजल जो सरीर सम स्याम । दुतीय प्रतीप। उपमान जहा उपमेयता लहि फिर ताहि निरादर टूजी भने। यथा। जिनके बल कर गर्भ तोहि ऐसे सनुज अनेक । अरू कोई कहै मनुष्य भर के राम उपमान है तो जब ईश्वर भए तब इन्द्रादिक सबके उ- पमान भए । वरवा.यया। का घूघट सुख सूदह अबला नारि । चन्द सरग पर सोहत इहि अनुहारि ॥ टतीय प्रतीप। वर्न वस्तु वर्न हो अबर्न को अनादरै सो तौ- सरो प्रतीप कवि दूलह गनायो है। यथा। कुलिशहुं चाहि कठोरता कोमल कुसमहु चाहि चित खगेस रघुनाथ कर बूझ परै कहु काहि ॥

सानसरहस्य ।
५५
चतुर्थप्रतीप।
ललितललाम लछन जहाँ वरन सों और
की उपमा वरनन होय ताह कहत प्रतीप है ।
यथा।
सौयबदन सम हिमकर नाहीं।
पंचमप्रतीप यथा ।
कोटि कास उपमा लघु सोज ।
प्रय रूपंक।
वरनत विषई विषै को करि अभिन्न तद्रूप ।
अधिक हीन सम उति सो रूपक त्रिविश्व अनूप
अधिक
तद्रूप
हरिहरकथा विराजतं वेनी ।
सुनत सकल सुदमंगल देनौ ।
न्यून यथा बरवा।
हो.
भुज कर हरि रघुवर मुन्दर सेस ।
एका जीभ कर लछमन हस रसेस ।
गा।
, -
समयघा.
केहरिसावक जनम न बन के ।
अधिक अभेद।
गुरूपदरज. मृदु मंजुल अंजन।

मानसरहस्य।
न्यूम।
अति खल जे विषई बक कागां ।
समयंधा।
संपति चकई भरत चक मुनि प्रायसु खलंवार।
तेहि निस आश्रम पौंजरा राख भां भिनुसार॥
अथ परिनाम ।
विषई विष हो फरै जानो परिनाम ।
कर कमलन धनुसायक फेरत ।
जियं की जैरन हरत हसि हरतं ।।
उन्लेष लक्षण ।
ललित ललाम के बहुते के एक जहँ एक
हिए उल्लेष।
प्रथमं यथा ।
'देखहि महारनधीरां ।' ते इहि बिधि
रही जाहि जैस भाज दूहा लौं।
हितीय यथा ।
राम काम सत कोटि ते सर्सि संत कोटि
लौं
,अथ सुमिरन भ्रमसंदेह के नामही लछन है.
भूप

मानसरहस्य ।
-
सुमिरन यथा।
बीच वास करि जमुनहि आये ।।
निरखि नीर लोचनजन्तु छाये !!
कपि करि हृदय विचार, दीन्ह मुद्रिका डार तक
जान अशोक अँगार, दीन हर्ष उठि कर लियो।
भ्रम संदेह।
राम लखन सखि होहि कि नाहीं।।
शुधापन्दुति लक्षण ।
और के आरोप ते साँच छपावत धर्म सुद्धा-
पन्हुति कहत हैं।
यथा।
वन्धु न होय मोर यह काला ।
हेव पन्तुति लक्षण।
जुगति सो यहै हेत्वपन्हुति ।"
यथा।
"तव प्रताप बड़वानल" ते "भरो बहोरि /
भयो तेहि खारा" लौं
दरवा।
कुछ न निसि अँधियरिया दिन नहिँ घाम !
जगत जरत अस लागत मोहि बिनु राम ।
ग

५
मानसरहस्य ।
परयस्ताज पन्दु ति लक्षन ।
परयस्तापन्हुति बखानै आन में जो बान ।
यथा।
मीन में नहिं प्रौति सजनी पंक से नहि प्रेम ॥
एक सति गति एक ब्रत यह सरतही में लेम ॥
अथ श्रांतापन्हु नि।
आन के सय ते नस बस को निवारै तहाँ
बान्तापन्हुति बखानै कवि अादरे ।
यथा ।
होहि न तड़ित न बारिद माला। तमन्दो-
दरी श्रवन ताटंका । सो प्रसु जनु दामिनी लो।
अथ छेकापन्दुति ।
जुक्ति करै जहँ पर सों बात दुराय ।
यथा।
कछु न परीच्छा लीन गुसाई ।
कौन्ह प्रनाम तुम्हारे नाई ॥
अथ कैतवापन्दुतिलक्षन ।
बैतवापन्हुति में मिस कहै आन। प? मोहि
मिस खगपति तोही। रघुपति दीन बड़ाई मोही

सानसरहस्य । ५६ अथ उत्प्रेक्षा लचन। उत्मेचा सन्मावना वस्तु हेतु फल लेखि । वस्तु विविध उत्तास्यपद अनुत्तास्पपद पेखि ॥ हेतु सुफल सिद्धास्यपद असिद्धास्यपद सान। वाचक जहाँ न बहत है गस्योत्रका जान ॥ जाको सम्भावना कोजै सो सम्भाव्यमान उ- पसान, अरू जा विर्षे सम्भावना कीजै सो आ- स्पपद उपमेय, संभाव वाकी विषय संभाव्य मान धरस संभावना को ठौर दोड़ रहै सो उत्तास्प- पद वस्तूव्ये यथा। करत बतकही अनुज सन सन सिय रुप लुभान सुख सरोज मकरन्द छवि करत मधुप इव पान मुख उपमेय, सरोज उपमान, छवि विषय मकरन्द, विषय दोइ पाये याते उक्ति विषया अनुक्ति विषया वस्तू पक्षा । जहा संभाव्यमान रहै संभावना को विषय नाहीं रहै अरु क्रिया के पाछे बाचक आवै सो अनुक्तास्पदवस्तूत्य छा। १ ६० मानसरहस्य । यथा। 'अयह सन मारुत अनुकूला ।' तो इहाँ होना किया ताके भागे बाचक है, अरु जहाँ अहेतु का हेतु माने सो हेतूत्य च्छा, सो सिद्ध विषय में हाय तो सिहविषया, अरू प्रसिद्ध वि- षय में होय तो असिद्धविषया । सिद्धविषया हेतूप्रेक्षा यथा । " मनहु प्रेस वस विनती करहीं। हमहि सोय-पद जिन परिहरहीं ॥ तो इहाँ बिनय हेतु नाहीं ताका हेतु साला अरू विषय सिद्ध है। अथ असिड विषया हेतूप्रेक्षा यथा । 'दूनहिं बिलोकत अति अनुरागा' । ते तेहि इरषा बह आन दुराये लों, तो यह अहेतु है ताका हेतु माना अरु विषय असिद्ध है अरु अ- फल का फल माने सो फल उमेच्छा। सिह विषयाफलोत्प्रेक्षा यथा । अति कटुवचन कहत कैकई मानहु नान जरे पर देई॥ -

मानसरहल्या
सिंधविषयाफलोत्यक्षा यथा ।
जनु सब साँचे हान हित सये सगुन इक बार।
साँचे होने की इच्छा फल ।
अथ रूपकान्तिशयोति अलंकार लक्षन ।
रूपक अतिशयक्ति जहँ केवलही उपमान।
वथा।
अरून पराग जलन सरि नौके।
ससिहि
सूष
अहि लास असौ के ॥
तो इहाँ कर नाहीं कमल मात्र पायो याही
रोति ते सुख नाहीं ससि पायो ।
अथ भेदकातिशयोति लक्षन ।
औरै पद ते होत है सेदकातिसय उति ।
यथा।
औरैहसनिबिलोकनिचितवनि और बचनउदार
तुलसी ग्रामवधू कित देख न रहे सँभार ॥
अथ सम्बन्धातिशयोति ।
सम्वन्धातिशयोक्ति नहँ देत अजागहिँ जोग ।
यथा
जो सम्पदा नीचगृह सोहा।
सो बिलोकि सुरनायक मोहा ।।

मानसरहस्य ।
अजोग जोग कौना दितीय जोग से अजोग
भेद दूसरो गनायो है
यथा।
.
जन्म सिंधु पुनि बंधु विष दिनमलोन सकलंक ।
सियमुख पटतर पाव किमि चन्द बापुरा रंक ॥
चन्द जाग ते अजाग कौना।
अथ अकसातिशयोक्ति यथ।।
गहि करतन्ने मनि पुलक सहित कौतुक सु
उठाय दिया । बाकी सियसन समेत हरि
हर खोजन कहियो॥ इहाँ धनु आकर्षन कारन
सिय सन कारज सो साथ अयो।
अथ चपन्नातिशयोक्ति लच्छन ।
है चपलातिशयोति जब कारन सुनते काज ।
यथा।
तब शिव तीसर नयन उघारा।
चितवत कास अयो जरि छारा ॥
इहा सुनना देखना वरावर है चितवन का-
रन कासजरन कारज ।

सानसरहस्य।
अथ अत्यंतातिशयोक्ति तना
पूरव कारज होत है पाछे कारन जान ।
अत्यन्तातिशयोति तहँ कविवर करत वखान ॥
यथा।
पद पवारि जल पान करि पाप सहित परिवार
पितर पार करि प्रभुहि पुनि मुदित गयो लै पार
इहाँ राम पार जादूबो कारन, पितर पार
करना कारज, सो कारज प्रथम है अरू वाका
बाई अभावहेतु भी कहत हैं।
अथ तुल्ययोगिता ल छन ।
तुल्ययोगिता तीन विधि लक्षन नास प्रधान ।
कहूं वनं वर्न की, कहूँ अवर्न अवर्न की, कह
वन भवन की
वर्न वन यथा ।
गुरू रघुपति सब सुनि मन माहीं।
सुदित भए पुनि पुनि पुलकाहौं ।
इहा सव वन हैं।
अवर्न श्रवन जथा ।
कमल काक मधुकर खग नाना ।
हरये सकल निसा अवसाना ॥
है

सानसरहस्य।
इहाँ कसल काकादि अवन हैं।
बर्न अर्वन यथा बरवा ।
नित्य नेम करि अरून उदै जव कीन ।
निरखि निसाकर नृप मुखमये मलीन ॥
नृप वर्न निसाकर अवर्न की तुल्यजोग्यता है।
अंथ दीपक लच्छन ।
सो दीपक निजगनन ते वर्न इतर दूल आय ।
यथा
कसे कनक मनि पारण पाये।
पुरुष परखिये सम सुहाये ।
इहाँ कनक सनि अवन, पुरुष वर्न ताका
कसन पारष पाउने अरू पुरुष उपसेय सस यात
पर सोभा पावत अरु कोई कहै तुल्याजोग्यता
दीपक में कहा सेद?।
दोहा ।
एक एक से धरम ते तुल्याजोग्यता होय ।
वर्न अवर्नहि ते कह दीपक सब कवि लोय ॥

सानतरहय।
६५-
श्रय दीपकात ।
दीपका आवत तीन हैं पद आवत का अर्थः।
पद अरु अर्थ दुहून ते भाषत सुकवि समर्थ ।।
पद जथा।
'सर्व सर्व, गति सर्व सुरालय इहाँ राम-उप-...
सेय हितोय रूप. उपमान ताका. एक धर्म यात
दीपक ची सर्व सर्व तीन बार आयो यति पद
की आति।
अति ।
'कूजहि कोकिल गुंजहि भृङ्गा । कूजहिँ
गुंजहिँ शब्द भिन्न पद एक है याते अर्थावति।
तृतीय यथा ।
पुरी विराजत राज़त रजनी ।
रानी कहहिं बिलोक सजनी ।
अथ प्रतिवस्तूपमा ।
प्रतिवस्तूपम कहत हैं समुझि दुवाक्य समान ।
यथा।
भलो मलाई लेत है लहैं निचाईनींच।
सुधा सराही अमरता गरल सराही मीच ॥

सानसरहस्य। इहाँ भले बुर उपमेय. अरू सधा गरल उप- सान ते मलाई उपमेयं अमरता उपमान कर एक सये अरू दीपकदीपकावृत्ति प्रतिवस्तूपमा में भेद, दीपक में इक धर्म नाहीं दीपकावृत्त में नेम नाहीं प्रतिवस्तूपमा में दोई हैं। अथ दृष्टान्त लच्छन । जहा बिस्व प्रतिविस्व सो दुइ वाक्य दृष्टान्त । यथा। बडे सनेह लघुन पर करहीं। अग्निभूमि गिरि सिर टन धरहौं ॥ इहा बड़े लघु गिरि टन अग्निधूम को विस्व प्रतिबिम्ब भाव है। अथ निदर्सना । जहँ उपमेय सुवाक्य में उपमा वाक्य सजोग। जो सो करत निदर्सना कहत सवै कवि लोग। यथा । सुनु खगेस हरिभक्ति विहाई। जो सुख चाहै पान उपाई॥

मानसरहस्य ।
६७
सो सठ महासिंधु बिन तरनी।"
पैर पार चाहत जड़ करनी ॥
तो इहाँ जो सुख चाहै है हरिभक्ति हौन सो
समुद्र पैरो चाहत यह जो मो को सम्बन्ध
अथ दूमरो भेट लन।
रखे जहा उपमेय में उपसा धर्म सुजान ।
यथा।
रघुपतिविरह विषमस आरी । .....
तकि तकि बार बार मोहि मारी॥
इहाँ विरह उपसेय विषमसर काम ताकी
मारन तकि तकि क्रिया धरन कीनी।
तृतीय लच्छन ।
जहा असत सत करि क्रिया करै आन उपदेश ।
यथा।
संग लाय करनी कर लेहौं ।'
मानहु मोहि सिखावन देहीं॥
अब व्यतिरेक लकन ।
व्यतिरेकहि उपमान ते उपमे अधिका लेखि ।
.

मानसरहस्य।
येथा।
निज परिताप द्रवहिँ नवनीता।
परदुख द्रवहिँ सुसन्त पुनीता ॥
इहाँ नवनीत उपमान वे सन्त उपसेय अधिक।
अथ सहोति लछन ।
सो सहाक्ति दूक साथहीं बरने दुहुन बनाय ।
यथा।
बल प्रताप बीरता बड़ाई।
नाक पिनाकहि संग सिधाई।
इहाँ नाका पिनाक संग ।
अथ विनोति।
है विनाति है जाति की प्रस्तुत कछु बिन छौन ।
अरु सोमा अधिकी लहै प्रस्तुत कछु ते हीन ॥
प्रथस ।
'बाद बसन बिलु भूषन भारू' ते 'बिनु हरि
अति जादू जप जोगा' लों।
हितीय।
सन्तहृदयं जस गतमदमोहा । ,
अथ समासोक्ति लच्छन ।
समासोति प्रस्तुत फुरै प्रस्तुत बरनन माझ
।

मानसरहस्य ।
जहाँ अप्रस्तुत फुरै प्रस्तुत वरनन कारे ते तहाँ
समासोति।
यथा।
अमन उदै अवलोकहु ताता।
पंकज लोक कोकसुखदाता ॥
इहाँ अरुन उदै पंकज कोका प्रस्तुत अन भा-
पनो वियोग अप्रस्तुत ताको वृत्तान्त जानो गयो।
अथ परिकर लक्षन ।
परिकर आश्रय लिये जहाँ विशेषन होय ।
यथा।
सुभगवन सरसीकहलोचन । । .
वदनसयन तापत्रयमोचन ॥
इहा मयंक तापमोचन है
अथ परिकरांकुर वक्षन ।
साभिप्राय विशेष जहँ परिकर अंकुर नाम ।
यथा।
सुनहु विनय मस बिटप असोका।
दूहा असोक अभिप्राय सहित है तुम सोक
रहित हो तेसही हमार सोक हरी ।

सानसरहस्य ।
श्लेष।
श्लेष अलंकृत अर्थ वह एक शब्द से होय ।
यथा।
२
'भरत सुआल होंहि यह साँची'। सुभाल
राजा अरू सू पृथ्वी तासे घर ।
अथ अप्रस्तुतप्रशंसा।
अप्रस्तुत के कथन ते है प्रस्तुत को बोध ।
अप्रस्तुत पर संस सो कहत सबै कवि सोध ।
यथा।
तुम्हार विवाह
कुपथ सांगु रुज व्याकुल रोगी।
वैद न देय सुनहु मुनि योगी ।
इहा वैद रोग अप्रस्तुत
ताते
हस न करन दे हैं यह प्रस्तुत ।
अथ परजाय कि लक्षण ।
परजायोक्ति प्रकार
कछु रचना सों बात।
सिसकरि कारज साधिये जो हित चितहिसोहात
है
प्रघम।
धरी न काहू धौर, सब कर मन सनसिज हम्यो
जेहि राख रघुबीर तेहि उबरे तेहि काल में ।

" सानसरहस्य । ७१ . गा निमि व इहाँ रघुबंश विष वीर ते अति बोरता स- चित सई। हितोय। वहत सैन कीजे सोहि तोहि भेंट सूप दिन तीजे ॥ इहा चल ते कारज कीनो । व्याजस्तुति । व्याजस्तुति निन्दा सिसहि जवै बड़ाई होय । यथा। 'अहो मनीस महाअट मानी' । मुनि को वड़ाई में निन्दा । अंघ पाय। तीनि साति बाछेप है एक निषेधाभास । पहिले कहिये आप कछु बहुरि फेोरिये तासु ॥ दुरै निषेध जो विधिवचन लचन तीनो लेष । "प्रथम । भरतविनय सादर सुनिय करिय विचार बहोरि। करव साधुमत लोकसत नृपनय निगम निचोरि इहाँ भरतबचन सुनिय पुनि आपह अपनी वावा वात को निषेध को निषेध सरस करै लगे

०२
सानसरहस्य।
हितीय।
सानुज पठड्य सोहि बन कौजिय सवहिं सनाथ
न तरु फेरिये बक्षु दोउ नाथ चलो मैं साथ ॥
इहाँ आप प्रथम कही सोहि अनुज सहित
बन से पठाइये ताको फेरि रोक्यो में साथ चलों।
.
तोय ।
राज देन कहि दौन बन सोहि न सोच लवलेस।
तुम बिनु सूपति भरतही प्रजहि प्रचण्ड कलेस॥
पुनः ।
हृदय सनाव ओर जिनि होई ।
रामहि जान कहै जिन कोई॥
सुनहु गस तुम कहँ मुनि कहहौं ।
राम चराचर नायक अहहौं।
अथ विरोधाभास ।
'शासै जबै बिरोध सों वहै बिरोधाभास ।'
'अये अलेष सोच बस लेखा' हा अलेषा लेष.
बिरोध सो जानो जाय है।
अथ विभावना लक्षण ।
हेतु बिन कारज की उपज बिभावना है।

सानसरहस्य।
७३
यघा।
विनु पद चलै सुनै विनु काना । ते
विनु बानी वत्ता वड़ योनी । लों
द्वितीय।
हेतु अपूरन ते जवै कारज पूरन होय ।
यथा ।
कास कुसुम धनुसायका लीन्हे । ...
सकल सुजन अपने बस कीन्हे ।।
हतीय।
प्रतिबन्धक के होतहीं कारज पूरन मान ।
यथा।
जो ज्ञानिन नै चित अपहरई।
वरिबाई विसाह बस करई ॥
दहा ज्ञान प्रतिबन्धक है।
चतुर्थ ।
नबै अकारन वस्तु ते कारज परगट होय ।
यथा।
बोरहि आनहि बड़हि जेहो।
भएऊ बल वोहित सम तेही ।।

मानसरहस्य ।
हा पाषाण ते काष्ट को कारन उपज्यो ।
पंचस ।
काह कारन ते जनै कारज होय विरुद्ध ।
यथा।
जेहि तरू रहत करत सो पौरा।
उरग खांस सस चिबिधि ससौरा॥
इहाँ सीतल ते तप्तता उपजी।
पष्ट ।
काह कारज ते नवे उपजे कारन रूप ।
यथा।
". जगत पिता मै सुत करि जाना।
अथ विशेषोक्ति लक्षन ।
बिशेषोक्ति जो हेतु सों कारज उपजै नाहि ।
यथा।
सकेउ उठाय असुर सुमेरू ।
सो हिय हार गयो करि फरु॥
इहाँ कारन रही अरु धनुभंग कारज नाहौं भयो
अथ असंभवलक्षन ।
कहे असम्भव हेतु जहँ बिनु सम्भावन काज ।

मानसरहस्य।
७५
यथा ।
अति सुकुमार जुगुल मम वारे ।
निसिचर सुभट महाबल आहे ॥
अथ संगति ।
तीन असंगति काज अरु कारन न्यारे ठास ।
और होरही कौजिये और ठौर का काम ॥
और नाज पारसिये और कीजिये दौर ।
प्रथम यथा।
घर
जिन बीथिन विही सब भाई।
थकित होंहिँ
लोग लुगाई ॥
इहा राम विहरी कारन, घकित लोग लु-
गाई नारज ।
द्वितीय।
ते पितु मातु सखी
कहु
कैसे
जिन पठये सखि बालक ऐसे ।।
इहा सातु पिता बन दियो।
हतोय ।
राज देन कह सुभ दिन साधा।
कधो नान बन केहि अपराधा ॥
है

७६ सानसरहस्य । इहा राज आरक्ष करि वन दियो । पाथ विषम लक्षन । विषम अलंकृत तौन बिधि अनमिलिते को संग कारन को रंग और कछु कारज और रंग ॥ और भला उद्यम किये होइ बुरा फल प्राय । प्रथम यथा। मारग अगम भूमिधर भारी । तेहि सहँ नाथ नारि सुकुसारी ॥ इहाँ राह अगस तुस सुकुमार । द्वितीय। 'उपजे यदपि पुलस्तकुलपावन' असल अ- लूप तदपि सहीसुर श्वापवस अए सकल अघ रूप' पुलस्तकुल असल कारन; रावनादि अव स्याम रुप । तृतीय । 'सानी सरलरस मातुबानी सुनि भरत ज्याकुल अए'। सम लच्छन। अलंकार सम तौनि विधि यथायोग की संग। कारज में सब पाइये कारनही का रंग ॥

मानसरहस्य।
श्रम विनु कारज सिद्धि जो उदास करते हाय ।
प्रथम ।
जस दूलह तस वनौ वराता।
शौतुक विविधि होइ संग जाता।
• हितोय ।
कास ल कहहु अस रघुकुलकेतू । ५.
तुम पालक सन्तत श्रुतिसेतू ॥
.
हतीय ।
सेतुबन्ध भडू भीर अति कपि नभपन्य उड़ाहिं ।
अपर जलचरन्ह उपर चढ़ि विनुश्रस पारहि जाहिं।।
अथ विचित्र ।
इंचित पाल विपरीत को कोजे जतन विचित्र।
यथा
जो नहिँ होत मोहि अति सोही।
मिलते नाथ कवन विधि तोही ॥
अधिक लक्षन ।
अधिक दीर्घ आधार ते जब आधेय जु होय ।
जो आधार अधेय ते अधिक अधिक ए दोय ॥

OC
मानसरहस्य।
प्रथम यथा।
बहुत उछाह भवन अति थोरा ।
मानहु उमगि चल्यो चहुँ ओरा ।
सवन अधार उछाह आधेय सो उमगि चल्यो।
हितीय।
सकाल सुवन अरि रहा उछाइ ।
जनकसुता रघुवीर विवाहू ।
इहाँ सुवन आधेय अधिक।
अथ अल्प।
अल्प अल्प आधेय ते सूछम होय अधार ।
यथा बरवा।
अब जीवन की है कपि आस न मोहिं ।
कनगुरिआ की मुंदरी ककना होहिँ ।
अथ अन्योन्या तुच्छन।
अन्योन्या दोऊ जहां आपुस में उपकार ।
मुनि रघुबीर परस्परं नवहीं॥
अथ विशेष ।
तीन प्रकार विसेष है अनाधार आधेय ।
बड़ी बात की सिद्धि को कछु अरम्भ जो देय ॥

मानसरहस्य ।
७६
बस्तु एक को कौजिये बरनन और अनेक ।
है
प्रधम।
तत्व प्रेस कर ममं अंक तारा।
नानत प्रिया एक मन मोरा ।।
इंहा प्रेम अनादर.
द्वितीय।
कपि तव दरस सकल दुख 1..
मिले आज मोहिं राम सप्रीते॥
इहा कपिदरस ते रामदरस पाये ।
तृतीय यथा ।
निज प्रभुमय देखौं जगत कासो करों विरोध
इहाँ एक राम अनेक ठौर ।
.
सथ व्याघात ।
व्याघात जु कछु और ते कौजे कारज और ।
बहुरि बिरोधी ते जहाँ ल्यावै कारज ठौर ॥
प्रथम यथा।
नामप्रभाव जान सिव नोक ।
काल कूट फल दोन अमौ के ॥

To
मानसरहय।
द्वितीय ।
ऐसे बचन कठोर सुनि जो न हृदय विलगान।
तो पुनि विषम बियोग दुख सहि हैं पासर प्रान॥
इहाँ जीवन बताय सरन दृढ़ कीन्हो ।
अथ कारनसाला।
कारन काज परंपरा कारनसाला देखि ।
यथा।
धर्स ते विरति जोग ते जाना।
ज्ञानमोक्षप्रद वेद बखाना॥
दूहा जोग कारन, ज्ञान कारज, ज्ञान कारन
मोन कारज ।
अथ एकावली
गहत मुक्ता की गति ते एकावलि पहिचानि ।
यथा।
विषय करन सुर जीव समेता।
सकल एक ते एक सचेता॥
अथ सालादीपक।
दीपक एकावलि मिले माला दीपक होत ।

मानसरहस्य ।
८१
यथा।
-
जग जप राम राम जप जेही।
.....
अथ सार लक्षण।
एक एक ते अधिक वखानो।
सार अलंकृत सोई मानो ॥
यथा।
.
तिन महँ विज हिज सहँ श्रुतिधारी।
तिन महँ निगम नीति अनुसारी ॥
यथासंख्य।
यथासंख्य वरनन विषै वस्तु अनुक्रम संग ।
• यथा।
वन्दों राम नाम रघुवर को। ..
हेतु कृसान भानु हिमकर को ॥
अथ परजाय।
dhu
परजाय अनेक को क्रस सो आश्रय एक।
फिरि क्रम सो जब एक वह आश्रय धरै अनेक
प्रथम यथा।
In
दिखरावा माताहि मुखः अद्भुत रूप अखण्ड ।
रोम रोम प्रति राजहौं कोटि कोटि ब्रह्माण्ड ।

८२
मानसरहस्य ।
द्वितीय ।
सती बिधात्री इन्दिरा देखौ असित अनूप ।
जहिजहिषअजादिसर तेहितेहि मति अनुरूप
अघ परिसंख्या लक्षण ।
परिसंख्या दूक थल बरजि दूजे थल ठहराय ।
यथा।
दण्ड नतिन कर अद जहँ नृत्यक नृत्य समाज॥
नौलो अनसिज सुनिय अस रामचन्द्र के राज॥
विकल्प।
है बिकल्प यह के वहै दूहि विधि को वृत्तान्त।
यथा।
के तन प्रान कि केवल प्राना ।
बिधि करतब कछु जात न जाना ॥
तिलक ।
उपमानोपमेय से सन्देह अरु भूत वर्तमान
में उपमान उपसेय रहित, भविष्य में विकल्प
यह अद।
अथ समुच्चय ।
दाय समुच्चय भाव बहु कहुँ दूक उपजै संग ।
एक काज चाहो करन ह अनेक दूका अंग ॥

मानसरहस्य ।
८३
प्रथम।
"सकुच सोय" ते “सुमिरि पिता पन मन
अति छोभा" लों।
द्वितीय।
देखि राम पदकमल तिहारे ।
अव पूजे सब काज हमारे ॥
इहाँ एक रामपद कमल ते अनेक काज भए।
अघ कारकदीपक लक्षण ।
कारक दीपक एक मे क्रम सों भाव अनेक ।
यथा ।
लेत चढ़ावत बँचत गाढ़े।
अथ समाध लक्षा।
सो समाध कारज सुगम और हेतु मिलि होता
यथा।
सकल अमानुज करम तुम्हारे ।
केवल कुलगुरुकृपा सुधारे।
दुहाँ कुलगुरुकृपा पाय कारज भयो।
अथ प्रत्यनीक लक्षण ।
प्रत्यनीक जी शत्रु को पक्ष देखि कर कोप ।

८४
मानसरहल्य।
यथा।
.
रे खल का मारसि कपि भालू ।
मोहिँ विलाक तार में कालू ॥
इहा राम पक्ष बानर पै काय रावन कीन्हो ।
अथ काव्यापत्ति लक्षण ।
काव्यर्थापत्ति यह किया तेहि का यह कह जान।
यथा।
पिय तेहि ते जीतब संग्रामा।
जालु दूत कर ऐसन कासा ॥
इहा जाके दूत लंका जारी ताको तुम कहा।
प्रथ काव्यलिंग।
काव्य लिंग जहँ युक्ति सों अर्थ समर्थन हाय ।
यथा।
सा नर कस दशकंध बालि बध्या जेहिं एक सर।
बीसहु लोचन बंध धिक तव जन्म कुजाति जड़॥
अथ अर्थान्तरन्यास लक्षण ।
जो विशेष सामान्य दृढ़ तौ अर्थान्तरन्यास।
यथा।
राम एका तापस तिय तारी।

सानसरहस्य।
८
रामप्रसाद सोच नहिँ सपने । इहा लों।
विवावर लक्षण ।
विकावर हाय विशेष जहँ फिरि सामान्य विशेष।
यथा।
रघुवौर निज सुख जासु गुनगन कहत अग
जगनाथ सो। काहे न होहु बिनीत परम पु-
नीत सगुन सिन्धु सो॥
अथ प्रौढ़ोति लक्षण ।
प्रोटोकति उतकर्ष कों हेतु धरै जु अहेतु ।
यथा।
कास कलम कर भुजबल सौंवा ।
अथ सम्भावना लक्षण ।
ज्यौं यो व्यों यों होय तौ सम्भावना विचार ।
यथा।
..
जो तुस होते मुनि की नाई।
जो पदरज सिर धरत गोसाई ।
अथ सिध्याध्यवसित लक्षण ।
मिथ्याध्यवसित झूठही कहै जु झूठी रीत ते।
८

८६
सानसरहदय ।
यथा ।
कमठ पीठ जासहि वरू बारा।
बंध्यासुत वरू काहू सारा ॥
अथ ललित लक्षण ।
ललित कहो कछु चाहिये ताही को प्रतिबिंब
यथा ।
सुनिय सुधा देखिय गरल सव करतूत कराल ।
जहंतहँ काक उलक पिक मानस सकृत सराल॥
इहा रामराज अभिषेक सुनन मात्र देखिने
मों बन आयो सो न कहे सुधा गरल काक
उलूक सराल कहे प्रतिबिब ।
प्रहर्षन लक्षण ।
तीन प्रहर्षन जतन विनु बाछित फल जहँ नान
बॉछित ते अधिकता टूजो करत बखान ॥
सोधत जाके जतन को बस्तु चदै कर सोय ।
प्रथम यथा।
• सोचत पंथ रह्यों दिन राती।
अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती ॥
इहा बाछित रहो।

लानसरहस्य।
द्वितीय यथा ।
सुनत वचन विसरे सव टूखा ।
टषावन्त जिमि पाय पियूखा ।।
तृतीय यथा।
इहि विधि सन विचार कर राजा।
आप गये कपि सहित समाजा ॥
अथ विषाद।
सो विषाद चितचोह ते उलटै जो कछु होस ।
यथा।
"तात जाउँ वलि वेग नहाइ" ते "सर
सस लगे” लों। अरु जो आन उपमादिक सब
विषाद की पासन करहै।
अथ उल्लास।
गुन औगुन नव और को और धरै उल्लास ।
गुन ते.गुन यथा ।
जो हरषहिँ पर सस्पति देखी। ....
दोष ते दोष यथा।
दुखित होंहि पर विपत्ति बिसेषी ।
गुन ते दोष यथा ।
नरहिं सदा पर सम्पत्ति देखो।

सानसरहस्य ।
अध लेस लक्षण ।
गुन में दोष रु दोष में गुन कल्पना सो लेस ।
यथा।
जो नहि होत मोह अति सोहीं।
मिलतेउ तात कवन बिधि तोहीं।
गुन में दोष यथा ।
सोहि दीन सुख सुनसु सुराजू ।
कीन्ह कैकई सब कर काजू ॥
अथ सुद्रा लक्षण।
सुद्रा प्रस्तुत पद विष और अर्थ प्रकास ।
यथा ।
सहसनास सुनि अनित सुनि तुलसी बल्लभ नास।
सकुचितहियहँसिनिरषिसियधरसधुरन्धरराम ॥
द्वहां तुलसीदास के बल्लभ, अरू बृन्दा के बल्लभ ।
अथ रत्नावली लक्षण ।
रत्नावलि प्रस्तुत अरथ क्रम ते और नाम ।
यथा।
सहा नगन पद प्रीति जहि जानो नगन समान।
जगन ताहि जययुत रहत तुलसी संसय हान॥
नगन भरत जगन अराम निकसो।

मानसरहस्य।
८९
अथ तहुन लक्षण ।
तहुन तजि गुन आपनो सङ्गति को गुन लेखि।
यथा।
धूमहु तजै सहज करवाई।
अगरप्रसङ्ग सुगन्ध बसाई॥
अथ पूर्वरूप लक्षण ।
पूर्वरूप लै संग गुन तनि फिरि अपनी लेय
टूनो जो गुन ना मिट किये मिटन को भेय ॥
प्रथम यथा।
.
कर सुवेष जगवञ्चक जोऊ ।
वेषप्रताप पूजियत सोज ॥
उघरहिँ अन्त न होहिं निवाइ।
कालनेमि जिमि रावन राइ ॥
द्वितीय यथा।
कामचरित नारद सब भाष।
जद्यपि बरजि प्रथम शिव राख ॥
.....
अथ अतद्गुन लक्षण ।
लागत सङ्गत गुन नहीं कहैं अतद्गुन ताहि ।

मानसरहस्य।
यथा।
खलहु करहि सल पाडू सुसंगू ।
मिटहि न सलिन सुभाव अभंगू ॥
अय अनगुन लक्षण ।
अनगुन सङ्गति तें जबै पूरब गुन सरसाय ।
यथा।
सज्जनफल देखिय ततकाला।
काक होंहि पिक बसहु मराला ॥
मीलित लक्षण ।
सीलित नो सादृश्य ते भेद जवै न लखाय ।
यथा।
तब सुर जिते एक दसकन्धर ।
अब बहु भये तकहु गिरिकन्दर ।
अथ सामान्या लक्षण।
सामान्य जु साहश्य ते जानि परै न विशेष ।
यथा।
राम लखन सखि होंहि कि नाहीं।.
अथ उन्मीलित लक्षण ।
उन्मौलित सादृश्य ते भेद फुरै तब मान ।

सानसरहस्य।
६१
यथा वर्णन।
चस्पक हरवा अङ्ग मिलि अधिक सुहाय ।
जानि परै सिय हियरे जन कुँसिलाय
अघ विशेष लक्षण ।
यहै विशेष विशेष पुनि पुरै नु समता माझ ।
यथा।
-
वेषन सो सखि तिय नहि संगा।
आगे अनी चलत चतुरंगा ।
अथ गूढोत्तर।
गूढ़ोत्तर कछु भाव ते उत्तर दीनो होय ।
यथा ।
जिन जल्पना करू सुजस नास ते ।
"दूक करत कहत” न, "बागहीं? लों ॥
अथ प्रश्नोत्तर लक्षण ।
चित्र प्रश्न उत्तर दुओ एक शब्द में होय ।
यथा।
मृत्यु निकट आई खल तोहौं,तेते उलटा होंहि लो।
अथ सूक्ष्म लक्षण ।
सूछम पर-आसै लखै करै क्रिया कछु भाय ।

६२
मानसरहस्य।
यथा
बेद नास कहि अँगुरिन खण्ड अकास ।
सूपनखा प्रमु पठई लछिमन पास ॥
अथ पिहित लक्षण ।
पिहित छिपी पर बात को जान जनावै भाय।
यथा।
.
"सती कपट जाना सुर लामो” तें।
"बिपिन अलि" लों।
अथ व्याजोति।
व्याज उक्ति कछु और विधि कहै दुरै आकार
यथा।
नास प्रताप भानुअवनीसा ।
तासु सचिब मैं सुनहु सहीसा ॥
अथ गूढोक्ति लक्षण।
गूढोकति मिस और के कौजे पर उपदेश !
यथा।
"सौ रज धीर जाहि रथ चाका"ते।
'जावी अस रथ होय" लों।

सानसरहस्य।
६३
अथ विवोति लक्षण ।
श्लेष छप्यो परगट करै विद्रोक्ति है ऐन ।
यथा।
V
वेग विलब न करिय नृप साजिय सवै समाज ।
सुदिन सुमङ्गल तवहिँ जब राम होंहि युवराज॥
प्रय मुक्ति लक्षण ।
यहै युति कीन्हें क्रिया कर्म छपायो जाय ।
यथा।
गये जासजुग सूपति आये ।
घर घर बाज अनंद वधाये ॥
तो दूहां जो राजा को निसा में निसाचर
रानी की सेज पर राख्यो सो कर्म कानन जाय
छपायो ।
अघ लोकोक्ति लक्षण ।
लोकोकति कछु बचन जो लीने लोकप्रबाद ।
यथा।
देव कहा हम तुमहि गोसाई।
ईधन पात किरातमिताई ।।
अथ कोक्ति।
लोकोकति कछु भेद सों सो छेकोकति प्रवीन।

६४ मानसरहस्य । यथा। + सत्य सराहि कह्यो बर देना। मानहुँ सागि कि लेहि चबेना । इहां चबेना लोकोक्ति अक राज न देही । अथ वक्रोक्ति लक्षण । बक्रतिष सों अर्थ फिरै तब होय । यथा। धर्मसीलता तब जग जागी । पावा दरस हमहु बड़भागी॥ एक अर्थ हस बड़े भाग्यवान दूसरी हमार आग बड़ो घटो, जैसे दिया बढ़ाय देव सो घ- टिबे को अर्थ। अथ स्वभावोक्ति। सुआवोति जहँ जानिये बरनो जाय सुभाय । यथा । रास सुसाव चले गुरु पाहीं। सियसनेह बरनत मनमाहौं । अथ भाविक लक्षण । भाविक भूत भविष्य जो परतछ कहत बनाय ।

सानसरहस्य ।
६५
यथा।
खोजत रद्यों तोहि सुतघाती।
आजु निपाति जुड़ावों छाती।
अथ उदाता
सो उदात जहँ वरनिये सस्पति को अधिकार ।
यथा।
नेहि तिरहुत तेहि समय निहारी ।
तेहि लघु लाग भुवन दसचारी ॥
अछ अत्युक्ति ।
अद्भुत झूठी वरनिये जहँ अत्युक्ति प्रमान ।
यघा ।
सर्वस दान दीन सव काइ।
नहि पावा शाखा नहि ताइ ॥
अथ निरुक्ति।
सो निरुक्ति जहँ जुक्ति सो अर्थकल्पना आन ।
यघा।
कनककलित अहिबेलि बनाई।।
लखि नहि परै सपनं सुहाई ॥
दूहां नागबेलि को अहिबेलि कडो जैसे
हाटकलोचन।

६६
मानसरहस्य।
अथ प्रतिषेव लक्षण ।
सो प्रतिषध निषिद्ध जो अर्थ निषेधो जाय।
यथा,
कालनेम सम मैं नहीं, सुनहु बचन हनुमान ।
अस कहि।
अथ विधि लक्षण।
अलङ्कार बिधि सिद्ध को अर्थ साधिये फेर ।
यथा।
विश्वसरन कर पोषन जोई।
ताकर नास भरत अस होई॥
अथ हेतु लक्षण ।
हेतु अलंकृत दोष जहँ कारन कारज सङ्ग ।
कारन कारज ये सबै
वस्तु
एकहौं रङ्ग
प्रथम ।
रघुकुलकमल सुजनसुखदाता ।
आये कुसल देव मुनित्राता ॥
हितोय ।
"जहँ लगि जगत सनेह सगाई" ।
ते “मोरे सबै एक तुम खामी" लों॥
इति अर्थालङ्कार।

सानसरहत्य।
अघ शब्दाअन्तजार-तहां प्रघस रोति लक्षण ।
चमलारचन्द्रिका में-दोहा ।
गौड़ी वैदी कहत पुनि पञ्चाली जान
लाठी ओज प्रसाद पनि माधुर्जहि की खान ॥
यह बारहूँ रीत में अोज प्रसाद साधुयं ये
तीन गुन उपजत हैं। जैसे भरत के मत में ध्वनि
काव्य बात्सा तैसे वासन के मत में रीत आत्मा।
अथ गौड़ी लक्षण।
यदि संजोगी वर्ग जहँ होहि सु वड़ो समास ।
छन्दवन्ध रचना करै तहँ गौड़ी को वास
याको परुषावृत्ति कहत हैं सो गौड़ी में
सिलत है
अथ समास लक्षण।
॥
जो सो को करि लिये ते को मे भी नहीं होया
यहै स जाके अर्थ में लहि समास है सोय
जो सो को करि इत्यादि पद में शब्दसमूह
में नाहीं रहै है अर्थ कहत में जानी जाय है ।

क
मानसरहस्य ।
३
१
जो सो यथा ।
पौत मौन अंगुली तन सोहहि ।
पीत जो झिगुली सो तन में सोहै।
को यथा।
राम गये बन प्रान न जाही।
पहा राम बन को गये।
करि यथा ।
"लोग प्रेमबस ।” इहाँ प्रेम कर बस जानी।
के यथा।
"रामहेतु।" इहा राम के हेतु ।
यथा।
"रामसुमुख निकसे वचन ।'
दूहा रासमुख
ते निकसे बचन जानिये ।
दूत्यादि।
अथ गोडी श्रीज गुन यथा ।
कटकटाइ कोटिन भट गर्जहि ।
वैदर्भी लक्षण ।
कस समास कि समास नहि अक्षर सानुखार ।
नहि टवर्ग माधुर्ज गुन वैदर्भी उच्चार ॥

सानसरहस्य।
१६
यथा।
कसन किशिनि
नूपुर
वाजहिँ
अथ पक्षालो लक्षगा ।
चौड़ी वैदर्भी मिले पञ्चाली है रीति
उपजत तहा प्रसाद गुन सुकवि लखें करि प्रीति॥
यथा।
सतानन्द पद बन्दि प्रभु हर्षे आमिष पाय
चलहु तात सुनि कहा तव पठवा जनक बुलाय ॥
इहा नन्द वन्दि वैदर्भी अरु हर्षे पठवा गौडी
याते पञ्चाली।
अथ लाटी।
कोमल पद जहँ रहत है उपजत गुन परसाद ।
यघा।
खञ्जन सञ्जुल तिरछे नयना
निज पति कहो तिनहि सिय सयना ।
लाटी में कोमलावृत्ति अन्तर्भूत है। कोई
रौति को सब्दालझार अन्तर्भूत मानत है रौति
को "वृत्ति कहत हैं।"

१००
मानसरहस्य ।
अथ अनुप्रास लक्षण ।
खर बिनु समता वन को अनुपास है सोय ।
खर को समता होय वा न होय यह आग्रह
नहीं बरनन की समता चाही।
अथ छेकाऽनुपास लक्षण ।
जहाँ सवनं अनेक की दूकबर समता होय ।
ताको छेका कहत हैं।
यथा।
अमोजअस्बक अम्बउमगसुअङ्गपुलकावलिछई ।
बहा एका वर्न अकार बकार की एकबार समता है।
अथ हत्ति अनुप्रास लक्षण ।
वृत्ति एक बहु बरन की बहु विर समता मान।
यथा।
चहत पुरानन से जि सो आनन देखो रूप
कही सुजानन जगत में एक ईश्वरी भूप
इहा एक नकार बहु बार आयो ।
अब लाटा लक्षण ।
अर्थ सहित जहँ पद फिरै भाव भेद तहँ होय ।
सो लाटालुप्रास है भाषत कवि सब कोय
॥
.

मानसरहस्य।
१.१
यधा।
-
सान प्रसिद्ध जापान प्रसिद्ध सुआन प्रसिद्ध प्रसिद्ध परायन
मान प्रसिद्ध जु दान प्रसिद्ध प्रसिद्ध सदा सरदार उपायन ॥
सील प्रसिद्ध सुडीलं प्रसिद्ध सु सत्य प्रसिद्ध प्रसिद्ध सुसायन ।
ज्ञान प्रसिद्ध प्रवान प्रसिद्ध जु धाम प्रसिद्ध प्रसिद्ध नरायन ॥
अथ नमक लक्षगा।
जसक शब्द अोही रहै अर्थ जुदा है जाय
यथा ।
b017
D
सुनस सरस विजराज ते किया पाल द्विजराज।
भूप ईपदरीसिंह नित दाटत सिंह समाज
उदाहरन सूषनन के लिख मिले जे भान
जो न मिले ते धरि दये तुलसी भूषन जान॥
पद पवार जल पान करि आप सहित परिवार।
तन त्याग्यो रघुवर बिरह राउ गयो सुरधाम ॥
रामरास कहि राम कहि रामराम कहि सम ।
तन त्याग्यो रघुबर बिरह राउ गये सुरधाम ॥
अंथ पिल गति ।
प्रथम गन नाम ।
मगन नगन भनि भगन अरु यगन सदा सुभ जान।
जगनरगनसुनुसगनपुनि तगनजुअसुमबखान ॥

१०२
मानसरहस्स।
मगन तीन गुरु जानिये नगन तीन लघु होय ।
भगन आदिगुरु आदिलघु यगन कहैं सब कोय ॥
जगन मध्य गुरु जानिये रगन मध्य लघु होय ।
सगन अन्तगुरु अन्तलघु तग न कहैं सब कोय ॥
प्रय गन देवता।
मही देवता मगन को नाग नगन को लेखि ।
जलजो जानो यगन को चन्द भगन को देखि ॥
सूरज जानो जगन को रगन अगिनि महँ मानि।
काल समुझिये सगन को तगन अकास बखान ।
अथ गन फल ।
भूमि सुख, नाग आनन्द, मङ्गल चन्द, जलजा
बुद्धिवृद्ध, सूरज सुख साखे, अग्नि अङ्ग दाहै,
काल देस उदास, अकास सुन्न ।
अथ गन जाति ।
मगन नगन ये मित्र हैं भगन यगन ये दास ।
उदासीन ज त जानिये र स रिपु केसीदास ॥

मानसरहये।
अर्थ मात्रां प्रस्ता।
देहु प्रथम गुरु के तरे लघु पुनि सम करि पाति ।
उबरे गुरु लघु दौजिये सब लघु लों या माति॥
माना नष्ट।
॥
॥
पूरब क्रम ते अङ्घ दै लिखि सब कला बनाय ।
सेष अङ्क में प्रगट पुनि पूछो अङ्क मिटाय
उबरे अब जु पुनि तहाँ तो नीचे की मत्त
पर मत्तालय होय गुरु नष्ट कहै अनुरत्त
नष्ट उद्दिष्ट ।
अन्त अङ्क में गुरु सिर के अङ्क घटाइये जैसे
एकईस में तीन + आठ = ग्यारह गये दस रहे यह
दसवां भेद ।
अथ मात्रा मेक ।
है है काठा सम लिखहु एक अस ता अन्त
आदि एक इक बीच दै गनती करहु अनन्त ॥
सौस अंक ता सौस के पर जुग अंक मिलाय ।
सूना कोठा पूरिये मत्त मेरु हो जाय
॥

१०४
मानसरहस्य।
अथ सात्रा पताका लक्षण ।
तामे क्रम
जै लकौर पताका ल्यावै खण्डकताको अलगाव
ताहीसंख्याकोठाकरियेनामपताकापातीधरिये।
पुरुब जु अलसर अंक भिन्न लिखि देखिये
अन्त अंक दूक अंक काठ तेहि रखिये
इक इक अङ्क घटाइये
बा ढिग अध ते हितिय पँगति लिखि जाइये ।
लतिय पंगति से हे हे जारि कमी करा
चौघि गति में तीन तीन चित में धरो
दून सातन प्रति पंगत दूक बढ़ अङ्क जू
घटै पताका रुप लिखी निरसंक जू
मात्रा मर्कटी लक्षण -दोहा ।
क्रम उदिष्ट सुन तीसरी पादहीन भरचार
वह पद पञ्चम हान चौछठही भर निरधार ॥
॥
अथ वरन प्रस्तार
बरवा।
गुर पहिले तर लघु धर सम करि पात
गुर ते पूरन लघु लों लिखि या भात

मानसरहस्य ।
१०५
अघ उर्णनष्ट . दोहा।
नष्ट वरन में आग करि सम भागनि लघु पान।
विषम एक दै माग करि पुनि तामै गुरु ठान ॥
वार्ता।
सम बूझे तो लघु दीजै विषस तो गुरू इच्छा
परजन्त गुरु त पूरन
कीजै।
नष्टरूप अथ वरन सहिष्ट-दोहा ।
लिखि पूछे पर अंक ते दून दून लिखि देइ ।
लघु सिर अनि जारि के एक सिला कहि देव॥
अथ वर्णन मेरु छप्प।
प्रथम जुगल पुनि तीन चार इमि कोठा कीजै।
आदि अंत दुहुँ ओर एक इक अंक धरोजै
सिखर अंक जुग जारि बहुरि तर कोठा ठहिए।
पंगत पंगत जारि तासु ते भेद सु कहिए
तरअंतसकललहुतासुउपवियएकगुरतीजहिगुरू।
नहुँअंकजौनतहँतेतिकगरवरनसैलरचनासुकुरु ॥
कप वरन मेरु का-पताका लक्षन ।
वरन पताका पहिलही है. उदिष्टं क्रम अंक ।
पर अंकन भरिये बहुरि लै पूरब के अंक ॥
॥
॥

मानसरहस्य।
पहिलेही जा पाइयै तजिये ताही अंक ।
करि गनती प्रस्तार की जानि लेहु निरसंक ॥
अथ वन मर्कटी
षट कोठा करि आदि क्रम सुगुन दूसरी पाँति ।
आदिहि सो गुन दूसरी लिखिये चौथी पाति
चौथी की आधी पँगति पचई छठई हाय ।
पचई चौथी को मिला पाति तीसरी जोय ॥
वर्न मर्कटी रूप-अथ छन्द ।
श्रीछन्द आदि सब छन्द लिखे ग्रन्थ विस्तार
होत अरु रामायन में प्रयोजन नाहीं । यातें
दोहा सारठा चौपाई गीतका का लक्षन लिखि-
यतु
दोहा।
तेरह ते ग्यारा जहां पुनि सा रौत निबाहि ।
साई पिंगल के मते दोहा छन्द कहाहि ॥..
अरु दाहा उलटे सारठा होत है।
चौपाई लक्षन।
सारह मत्ता छन्द गति रूप चौपई लेखि ।
पन्द्रह से सत्तानब जाना भेद बिसैषि
है

सानसरहस्य ।
१०७
गोतिका लक्षन ।
अट्टाइस में गीतिका आदिक कयो फनीस ।
पाँच लाख चौदह सहस इसे पर उनतीस ॥
दोहा।
फल अकाश ग्रह पातमा माघ शुक्ला बुधवार ।
काशीपति की कृपा तें किय पूरन विस्तार ॥
छप्प ।
श्रीकाशी के नाथवीर बलबण्ड उजागर
ताकी बाट महीप भए सुखमा गुनसागर
तासु पुत्र उद्दितमहीप पुनि दीपनरायन
है प्रसिद्ध सव जगत एक ते एक सुभायन
सरदार तासुसतईश्वरी भूपतिमनि जसचंदसा।
विलसतविचित्र काशीपुरी अद्भुतानंदकन्दसा।
सोरठा।
मानस कियो रहस्य, कृपा कार तिनको तकत।
सुमिरन राम अवस्य, काव्य कला के मिस भयो।
दोहा।
सुख विलास सज्जन करै दुरजन जरै हमेस ।
यह विचार सरदार कबि कोन्हों कछू कलेस ॥

१०८
मानसरहस्य ।
इति श्रीमहाराजाधिराजकाशीराज श्रीमदी-
पूवरीप्रसादनारायणस्थाभिगामीकृष्णुप्रियापुरबा-
सीहरिजमकबीश्वरात्मजेन सरदाराख्यकवीश्वरे-
णविरचिते मानसरहस्ये साहित्यसंपूर्णम् ।
दोहा।
उनइस सौ एकड्स वुधै हादसि सित बैसाख ।
छपी नकल मैं लिखि चुक्यों महादेव हरिभाष ।।
॥ इति ॥

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मानसरहस्य

Author
गोसाई तुलसीदास
Title
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File name
मानसरहस्य
Text
OCR done
Citation
1895
Published
2009/05
Publisher
रामकृष्ण वर्मा, काशी
Language
Sanskrit
Pages
112
Library
Banasthali University
Classification
Literature
DLI number
409859
Barcode
99999990067326.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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