Adarsh Library, Jaipur
Chotkara
Front matter
No text on this page.
छुटकारा
No text on this page.
छुटकारा ममता कालिया
No text on this page.
है
.
क्रूएन को
--
No text on this page.
है
बड़े दिन की पूर्व सांझ
वे तीन और वह
यह जरूरी नहीं
बीमारी
अपत्नी
छुटकारा
उही शहर
जिन्दगी-सात घंटे याद की
पिछले दिनों का अंधेरा
साथ
बेतरतीब
शहर शहर की बात
वे
दो जरूरी चेहरे
७६
CG
६७
No text on this page.
बड़े दिन पूर्व की साँझ
मुझे नृत्य नहीं आता था। रुचि भी नहीं थी। मैंने ऐसा ही कहा।
वह बोला, 'आता मुझे भी नहीं है।'
मैंने सोचा बात खत्म है।
उसने हाथ में पकड़ी मोमबत्ती की तरफ देखा और हकवकाया-सा
हँस दिया, 'यह मैंने ले ली थी। मुझे पता नहीं था इसका मतलब यहाँ
पह होता है।'
सब अपनी-अपनी मोमबत्तियों और लड़कियों के साथ फ्लोर पर थे।
बैंड उसका इंतजार कर रहा था।
'देखिये प्लीज, मेरे दोस्तों में मेरी बहुत हंधी होगी बगर मैं नाच
न पाया।
वह अब तक काफी नर्वस हो गया था।
मैं उससे ज्यादा अटपटी हालत में थी। मैंने रूप की तरफ देखा,
फिर उसकी तरफ । मैंने निर्णयात्मक ढंग से कहा, 'मैं शादीशुदा है, यह
मेरे पति हैं।
१०/छुटकारा मैंने कहा उसने मुझे छोड़ रूप से प्रार्थना करनी शुरू कर दी। बड़े दिन की पूर्व-सांझ को नृत्य जाने बिना भी नाचना मैं अजीव न मानती, पर रूप ने मोमबत्ती नहीं खरीदी थी और हमारी शादी को सिर्फ पांच दिन गुजरे थे । साढ़े चार दिन हम एक ही कमरे में कैद रहे थे और उठने के नाम पर वाथरूम तक जाते थे। आज बाहर आते समय मुझे लगा, भी, 'दिन ज्यादा सफेद नहीं लग रहा तुम्हें ?' रूप सिर्फ कहा था, 'लोग अभी भी बस की क्यू में खड़े हैं।' वह रूप से वात कर चुकने पर मेरी ओर ऐसे बढ़ा कि उसे अनुमति मिल गई । मैंने रूप की ओर विलकुल पत्नियों वाली निगाह से देखा, वह चौड़ा वड़ा पैग मुंह में उंडेल रहा था । हमारे फ्लोर पर आते ही बैंड शुरू हो गया। वह लड़का खुश था । उसने मोमबत्ती जला ली थी और ढूंढ-ढूंढकर दोस्तों की ओर देख रहा था । जिस समय किसी दोस्त से उसकी आँख मिल जाती, वह मुझे अधिक कसकर पकड़ लेता जैसे बच्चा एक और बच्चे को देखकर अपना खिलौना पकड़ता है। मैं सोच रही थी वह मुझसे बोलेगा। उसे शायद नृत्य की तहजीव का पता न था। वह मुझसे बिलकुल वात नहीं कर रहा था, वस नर्वस- नेस में बार-बार मुस्करा रहा था। उसे इस बात का काफी खयाल था कि मोम मेरी साड़ी पर न गिर जाए। प्रथा के विपरीत मैंने बात शुरू की, 'तुम्हारा नाम शायद जोशी है।' उसने कहा, 'नहीं, भार्गव !' 'ऐसा नहीं लगता कि तुम पहली बार नाच रहे हो।' वह चुप रहा । थोड़ी देर बाद उसने मुझसे फिर माफी मांगी, 'मैंने आपको आज बड़ा तंग किया, पर नृत्य करना मेरे लिए जरूरी था । यह " एक...
वढे दिन की पूर्व साँझ | ११
मैंने बीच में टोक दिया, 'मैं समझती हूँ।'
वह मुझे आप कहकर सम्बोधित कर रहा था । मैंने अनुमान लगाया
कि उसकी शादी अभी नहीं हुई थी। शादी के पहले मैं भी इतने लोगों
को आप कहा करतो यो कि अब मुझे ताज्जुब होता था।
वह बहुत छोटा और अकेला लग रहा था।
हर को मैं जहाँ बड़ा छोड़ आई थी, उस ओर इस वक्त मेरी पीठ
गे। मैंने उससे कहा, 'जरा देखना मेरे पति वही खडे हैं क्या ?'
उसने कहा, 'नहीं, वह वहां नजर नहीं आते।"
पोड़ी देर के लिए उसे पर्याप्त व्यस्तता मिल गई। जल्दी ही उसने
बताया,
'हाँ वह वहाँ हैं, उन्होंने एक और पैग ले रखा है।'
वह सा को रुचि से देखता रहा।
'वह उतना पी सकेंगे, मेरा मतलब है, होश रखते हुए ?'
में हंसी । मैंने कहा, 'इस बात की चिंता मेरी नहीं।'
वह डर गया । उसने मुझे ध्यान से देखा।
मैंने बताया, 'नही, मैं नहीं पीती।'
वह दुखी हो गया था, 'मैं ज्यादा नहीं पी सकता। हमारे मेस में
सिर्फ ड्रिंक्स की पार्टियां होती है तो बड़ी असुविधा होती है।'
मैंने कहा, 'तुमने घर पर कभी नहीं पी होगी।'
उसने धमंड से बताया कि उसके घर मे अंडा भी नहीं खाया जाता।
से वह एयरफोर्स में आया तभी से उसने पहली बार यह सब देखा।
घर पर उसने घरवालो को सिर्फ दूध, चाय, या पानी पीते देखा था।
मैंने पूछा, 'तुमने चखी है ?
'हाँ, मुझे बहुत कड़वी लगी है।'
मैंने कहा, 'मुझे कड़वाहट पसंद है।
उसने मेरी तरफ ध्यान से देखा।
मैंने फिर आश्वासन दिया कि मैं वाकई नहीं पीती।
जब
१२) छुटकारा उस ओर जब तक मेरा मुँह हुआ, रूप वहाँ नहीं था। मैंने एकदम उससे पूछा, 'मेरे पति कहां हैं ?' वह सकपका गया, 'मैंने नहीं देखा; मुझे नहीं मालूम; मुझे अफसोस ।' मैंने उससे कहा, 'मैं जाना चाहूंगी।' भार्गव ने मुझे समझाना चाहा कि डांस नंबर के बीच में से जाने से उसकी स्थिति कितनी अजीव हो जाएगी। उसने कहा, 'आपके पति वार में गए होंगे, आ जाएंगे।' मुझे हंसी आने लगी। मैं रूप को ढूंढने नहीं जा रही थी। दरअसल मैं उस ऊलजलूल कवायद से तंग आ गई थी । अनभ्यस्त होने की वजह से हमारे जूते बार-बार एक-दूसरे के पैर पर पड़ रहे थे। वह मेरी साड़ी पर बहुत बार पैर रख चुका था और मुझे उसके. फटने की आशंका थी। उसने कहा, 'मेरी मोमबत्ती के नीचे एक नंबर है, अगर उद्घोष- पाओं के बाद यह शेष रहा तो मुझे कोई उपहार मिलेगा।' मैंने फ्लोर पर गिना, चार जोड़े बचे थे । उसे अपने 'लकी' होने की काफी आशा थी। उसने शर्माते हुए बताया कि वह 'रेस' में हमेशा जीता है । मैंने पूछा कि वह कितना लगाता है । उसने कभी सौ से ज्यादा नहीं लगाया था। उसने कहा कि उसकी समझ में नहीं आता वह किस घोड़े पर लगाए । वह वहां जाता है और उसके आगे खड़ा आदमी जिस घोड़े पर दांव लगाता है, उसी पर वह लगा देता है। मैंने उससे उसका जन्मदिन पूछा और उसका लकी नंबर बताया । वह खुश हो गया। उसने मुझसे कहा, 'आप बुरा न मानें तो एक बात पूर्वी ? आपके पति बुरा तो नहीं मानेंगे?' .
बडे दिन पूर्व की सांझ /१३ मुझे भार्गव पर लाड आने लगा है। लगा यह सवाल लेकर उसने काफी माथापच्ची की होगी। इस वक्त वह सहमा-ना मुझे देख रहा था। मैंने कुछ नहीं कहा, वस, जहां रूप कुछ देर पहले खड़ा था. वहाँ देख- कर चाव से हेस दी। उसे उत्तर की सख्त अपेक्षा थी। मैंने गर्दन से 'न' कर दी। 'तुम्हारी कोई लड़की नही ?' उसे लेकर मुझे जिज्ञासा हो रही थी। उसने कहा, 'मेरी अभी शादी नहीं हुई।' मैंने अंग्रेजी में कहा, 'मेरा मतलब 'लड़की-मित्र' से था।' वह और नवंस हो गया। थोड़ी देर में संयत होकर उसने बताया कि उसकी मां ने अब तक उसके लिए दर्जनों रिश्ते नामंजूर कर दिए हैं। वह खूबसूरत-सी लड़की चाहती है, बेशक वह इंटर ही पास हो। हमारा नंवर इस बार आउट हो गया । मैं हॉल में रूप को खोजना चाह रही थी। भार्गव साय-साय देख रहा था । मैंने उससे कहा कि वह परेशान न हो, मैं स्वयं ढूंढ लूंगी। मैं हाल में देखने के बाद सीधे 'बार' में गई । रूप बेतहाशा पो रहा था और उतना ही स्मार्ट लग रहा था जितना तब जब क्लव में घुसा था। हमारे यहां जाते ही रूप ने मेरे लिए 'जिन' और उसके लिए 'हिस्को' मंगाई : भार्गव डर गया। मैने रूप को इशारे से मना किया, भार्गव बहुत पी चुका है, अभी इसे मोटर साइकिल पर बारह मील जाना है।' भार्गव ने कृतज्ञ आँखो से मुझे देखा। उसने एक बार फिर रूप से सफाई में कुछ कहा ।
१२/ छुटकारा . उस ओर जब तक मेग मुंह हुआ, रूप वहां नहीं था। मैंने एकदम उससे पूछा, 'मेरे पति कहां हैं ?' वह सकपका गया, 'मैंने नहीं देखा; मुझे नहीं मालूम; मुझे अफसोस मैंने उससे कहा, 'मैं जाना चाहूंगी।' भार्गव ने मुझे समझाना चाहा कि डांस नंबर के बीच में से जाने से उसकी स्थिति कितनी अजीव हो जाएगी। उसने कहा, 'आपके पति वार में गए होंगे, आ जाएंगे।' मुझे हसी आने लगी। मैं रूप को ढूंढने नहीं जा रही थी। दरअसल मैं उस ऊलजलूल कवायद से तंग आ गई थी। मनभ्यस्त होने की वजह से हमारे जूते बार-बार एक-दूसरे के पैर पर पड़ रहे थे। वह मेरी साड़ी पर बहुत वार पैर रख चुका था और मुझे उसके. फटने की आशंका थी। उसने कहा, 'मेरी मोमबत्ती के नीचे एक नंवर है, अगर उद्घोष- णाओं के बाद यह शेप रहा तो मुझे कोई उपहार मिलेगा।' मैंने फ्लोर पर गिना, चार जोड़े बचे थे। उसे अपने 'लकी' होने की काफी आशा थी। उसने शर्माते हुए बताया कि वह 'रेस' मैं हमेशा जीता है। पूछा कि वह कितना लगाता है। उसने कभी सौ से ज्यादा नहीं लगाया था। उसने कहा कि उसकी समझ में नहीं आता वह किस घोड़े पर लगाए। वह वहां जाता है और उसके आगे खड़ा आदमी जिस घोड़े पर दांव लगाता है, उसी पर वह लगा देता है। मैंने उससे उसका जन्मदिन पूछा और उसका लकी नंबर बताया। वह खुश हो गया। उसने मुझसे कहा, 'आप बुरा न मानें तो एक बात पूर्वी ? आपके पति बुरा तो नहीं मानेंगे? - बड़े दिन पूर्व की सांझ/१३ मुझे भार्गव पर लाड आने लगा है। लगा यह मवाल लेकर उसने काफी माथापच्ची की होगी। इस वपन वह सहमा-सा मुझे देख रहा था। मैंने कुछ नहीं कहा, वस, जहाँ रूप कुछ देर पहले खड़ा था, वहाँ देख• कर चाव से हंस दी। उसे उत्तर को सख्त अपेक्षा थी। मैंने गर्दन से 'न' कर दी। 'तुम्हारी कोई लड़की नहीं ?' उसे लेकर मुझे जिज्ञासा हो रही थी। उसने कहा, 'मेरी अभी शादी नहीं हुई।' मैंने अंग्रेजी में कहा, 'मेरा मतलव 'लडकी मिन्न' से था।' वह और नर्वस हो गया। थोड़ी देर में संयत होकर उसने बताया कि उसकी मां ने अब तक उसके लिए दर्जनों रिश्ते नामंजूर कर दिए हैं। वह खूबसूरत-सी लड़को चाहती है, वेशक वह इंटर ही पास हो । हमारा नंबर इस बार आउट हो गया। मैं हॉल में रूप को खोजना चाह रही थी। भार्गव साथ-साय देख रहा था । मैंने उससे कहा कि वह परेशान न हो, मैं स्वयं ढूंढ लूंगी। मैं हाल में देखने के बाद सीधे 'वार' में गई । रूप वेतहाशा पी रहा था और उतना ही स्मार्ट लग रहा था जितनातव जय क्लब में घुसा था। हमारे वहां जाते ही रूप ने मेरे लिए 'जिन' और उसके लिए 'ह्विस्की' मंगाई । भार्गव डर गया। मैने रूप को इशारे से मना किया, भार्गव बहुत पो चुका है, अभी इसे मोटर साइकिल पर वारह मील जाना है।' भार्गव ने कृतज्ञ आँखो से मुझे देखा। उसने एक बार फिर रूप से सफाई में कुछ कहा ।
१४/छुटकारा
उसको समझ में नहीं आ रहा था, कितनी देर में उसे 'ऑलराइट'
कहकर चले जाना चाहिए। वह जेब से मोटर साइकिल की चाबी
निकालकर खेलने लगा।
रूप ने मुझे कोट पहनाना कर शुरू किया क्योंकि हमारा इतनी देर
वाहर रहना काफी साहस की बात थी, यह मानते हुए कि हमारी शादी
को सिर्फ पांच दिन हुए थे।
00
वे तीन और वह "क्या तुम लोग मेव खाओगे?" प्रपाग को वहन ने उन की ओर देखा। उन दोनों ने एक साय गर्दन हिला दी और एक ही अखबार को, जिसे वे काफी देर पहले पढ़ चुके थे, फिर से पढ़ने लगे। मेब खिला नुकने के बाद उसकी बहन ने छिलके प्लेट में से चुनकर उस लिफाफे में डाल दिये, जिस में वह सेव लायी थी । किर उस ने प्रयाग को ठीक से उढाकर कहा, "तुम कुछ देर के लिए सो जाओ । दवाई समय पर ले लेना । ज्यादा बातचीत मत करना। एक-दो बार सिकाई जरूर कर लेना । गर्म पानी की बोतल यह रही । इण्ट्रा मस्स्यूलर इन्जेक्शन सेंके बगैर ठीक नहीं होगा।" प्रयाग बच्चों जैसी धुलो-धुनी आँखों में वहन की बातें मुनता रहा। उसके एक बार और 'सो जाओ' कहने पर उस ने तभी आंखें मूंद लीं। बहन अपनी फाइलें और पसं उठाकर चली गयी। पहले ने दूसरे की ओर देखकर कहा, "तुम या में ?"
१६/छुटकारा - दूसरा हंत दिया, विना निर्णय लिये । अखवार खत्म करते ही दोनों को लेट्रीन की जरूरत महसूस होती थी। पहले ने कहा, "मैं सम्पादकीय फिर से पढ़ लूंगा, तुम जानो।" पर पहले से सम्पादकीय फिर से नहीं पढ़ा गया। प्रयाग उसकी मोर देख रहा था। आंख मिलने पर उसने कहा, "मुझे लगता है मेरी तबियत आज काफी अच्छी है।" "सुबह के समय रोज अच्छी रहती है। जब तक शाम को बुखार चढ़ना बन्द नहीं होगा, तुम्हारी तवियत ठीक नहीं होगी।" बुखार देख लूँ !" प्रयाग ने मेज पर से थर्मामीटर उठाया । दूसरा लौट आया था और अब तीनोंटूयनशों में से अपना ब्रश पहचानने की कोशिश कर रहा था। उन लोगों ने एक दिन साथ-साथ दूयवश खरीद लिये थे, क्योंकि फाउण्टेन पर उस दिन 'हर माल छह आने' वाली दुकान मे टूथब्रश आ गये थे। दूकान पर सभी टूथब्रश एक रंग के थे और वे यह सोचकर ले आये थे कि कोई पहचान बना लेंगे। वे चाहते थे कि टूथवश पर अलग-अलग रंगों का कागज चिपका लें, पर उनके पास गोंद नहीं था और फिर कागज उखड़ भी सकता था ।। सूक्ष्म निरीक्षण पर उन्होंने पाया कि हर एक के वश के बालों की दिशा ललग होती जा रही है और वे इसी बाधार पर अपना ब्रश पहचानने की कोशिश करते थे। जब दूसरा नो हाथ-मुंह धो चुका, तब पहला जाकर रसोई से डबलरोटी, मलाई और चीनी ले आया। उसने स्लाइसेज बनाते हुए प्रयाग से लेने के लिए कहा। "नहीं, मैंने सुबह-सुबह सेव खा लिया। पूरे दिन कुछ नहीं खा पाऊंगा । पेट बहुत भर गया ।" उसने गुनगुनाते हुए से स्वर में कहा ! उन्होंने स्लाइसेज खाकर एक दूसरे की बोर देखा, फिर पानी पीना ही ज्यादा ठीक समझा । चाय किसी-न-किसी को बनानी पड़ती बोर के अभी से रसोई में घुसना नहीं चाहते थे।
वे तीन और वह / १७ ये दोनों राशनिंग ऑफिस में काम करते थे और वहीं, बातचीत के दौरान उन्होने महसूस किया कि दोनों को ही मकान की तकलीफ है । दूसरे का कहना था कि अगर वे लोग मिलकर मकान लें, तो सौ रुपये में उन्हें अच्छा मकान मिल सकता है-अच्छा ऐसा कि जिसमे पडोस में घाट, गाली-गलोज न करें और जिसका पता खोली नम्बर दो सौ आठ पा चाल नम्बर बारह न हो । दलाल को दो महीने का किराया देने पर उन्हें मकान मिल गया और वे अपनी संयुक्त आमदनी का लगभग एक तिहाई हिस्सा मकान-मालिक को देने लगे। उन्होंने पाया कि अब वे पहले से भी ज्यादा परेशान हैं, क्योकि दोनो को ही सिगरेट और कॉफी की आदत थी और बचे हुए पैसे महीने की बीस तारीख के बाद नजर नहीं याते थे। ऐसी हालत में प्रयाग का शामिल होना उन्हें अच्छा लगा था, हालांकि उनके पास एक ही कमरा था, जिसमें तीसरी चारपाई लगाने के लिए उन्हें कमरे की एकमात्र कुर्सी फोल्ड कर देनी पड़ी थी। वे लोग पाना घर पर बनाते थे और वारी-बारी से रसोई में काम करते थे। प्रयाग ने कहा कि वह बाहर ही खायेगा, वह कई सालों से बाहर खा रहा है, फिर उमे खाना बनाना भी नहीं आता था। वह मकान का किराया शेयर करता था और विजली का दिल । शुरुशुरू मे जब व दोनों खाना साने बैठते या चाय पीने, प्रयाग फौरन चप्पल पहन कर वाहर चला जाता, पर अब वह अखबार उठाकर पढ़ने लगता या दूसरी तरफ मुंह करके लेट जाता । उन दोनों ने कई बार उसे शामिल होने के लिए कहा, पर वह मना करते करते घबरा जाता, फिर उसके शब्द अस्पष्ट हो जाते और चेहरा लाल । उन लोगो ने अब पूटना कम कर दिया था। जब प्रयाग बीमार हुआ, उन लोगों को समझ नहीं आया कि उन्हें क्या करना चाहिए । वे दोनों दफ्तर मे नये थे और छुट्टी लेने से डरते थे। फिर इन्स्पेक्शन के दिन थे और इन्स्पेक्शन के दिनों छुट्टी लेने से सालाना रिपोर्ट में फर्क आ सकता था। प्रयाग ने उन्हें खुद दफ्तर जाने को कह १८ } छुटकारा 'दिया, तो वे आश्वस्त हो गये। पर लौटने पर उन्होंने पाया कि प्रयाग का बुखार तेज़ था और उसने पूरे दिन में दवाई के अतिरिक्त कुछ नहीं -खाया था। उसने अटकते-अटकते बताया कि उसकी एक बहन यहाँ है। वहन से मिलने के पहले उन्होंने यह कल्पना नहीं की थी कि प्रयाग जैसे लडके की वहन बैंक में काम करती होगी और बात करते वक्त उसके माथे पर त्योरियाँ पड़ती होंगी। उसने अपनी खुरदुरी ठोड़ी खुजाते हुए 'पूछा, "प्रयाग आजकल क्या करता है ?" उन्होंने बताया, "उसे एक सौ तीन से ज्यादा बुखार है और वह 'विस्तर में पड़ा है।" "डॉक्टर ?" उसने त्योरियों के बीच कहा। "हम लेकर आये थे, दवाई दी है।" "मैं शाम को आऊंगी।" और उसे इतने मोटे लेजर पर झुकते देख वे वहां से चले गये। वे दोनों एक-दूसरे से बड़ी जल्दी खुल गये थे, इतनी जल्दी कि खुद उन्हें भी आश्चर्य हुआ था । दफ्तर में काम रूखा था और बैठने के लिए कुर्सियां बेहद सख्त और तकलीफदेह । शाम को दफ्तर से उठने पर एक संयुक्त उकताहट उन्हें पास लेती आयी थी और उन्होंने पाया कि सड़क पर दिखने वाली लड़कियों-औरतों के बारे में वे एक-सी अश्लीलता से सोचते हैं। किसी चौड़ी स्त्री को देखकर पहला कहता, "ऐसी स्त्री से मैं सिर्फ बहुत जरूरत पड़ने पर प्यार कर सकता हूँ।" दूसरा कहता, "मैं भूखा रहना पसन्द करूंगा।" फिर उनके चेहरों पर ऐसा भाव आता, जैसे भूखे तो वे रोज ही रहते हैं।
दे तीन बार वह ! १६ प्रपाम को वे बडा के ये कि उसकी बहन शाम को पायेगी। फिर भी प्रसाम मान को जानी बहन को देवकर नस हो गया। बहन ने काफी तेजी से प्रसार कि वह बीमार कैसे पड़ गया। वे दोनों कुछ देर प्रदान की चारसाई के पास खड़े रहे, जैसे डॉस्टर के आने पर खड़े हो गये थे, किरदे मामने की चारपाई पर बैठ गये। । बहन ने पुड़िया खोलकर गोलियां देवी, वुद्धार लिया और उनकी ओर मुड़कर पूछा, "डॉटर एन० बी० बी० एम० है ?" उन लोगों ने इस बात पर कभी गौर नहीं क्यिा था। डाक्टर को दूकान नीचे ही पी। पहले उन्होंने सोचा, उनमें से एक जाकर साक्टर का बोर्ड देख आये, पर सिर उन्होंने कह दिया, जहां तक वे समझते हैं, डाक्टर बहुत नायक है और उसकी दुकान पर काफी भीड़ रहती है । बहन ने अपना प खोला, जो पैन से भी बड़ा था। उसमें से उसने चीकू, केले और एक संत्र निकाला। फल उसने प्रयाग के सिरहाने रख दिये। बैठे-बैठे सारे कमरे को आंखें घुमाकर देखते हुए उसने पूछा कि प्रयाग इसका कितना किराया देता है और खाना कहाँ खाता है ! प्रयाग ने आज्ञाकारी बच्चे की तरह एक वास्य में दोनों जबाव दे चि। बहन ने मुटकर उन लोगों में कहा, "देखो, जब तक यह बीमार है. इसे बाहर न निकलने देना और इसके लिए चाप-दूध वगैरह का इनबान कर दना । विल मैं समझ लूंगी।" प्रयाग काफी अॅप गया था। उसने कोशिश की कि वह बहन को टोके, पर उसका चेहरा लाल होकर रह गया । वहन उन दोनों को इन्स्पेटरी निगाह से देखती हुई चली गयी। प्रपाम ने कहा कि वे लोग चाहें तो पड़ें या सोयें या कुछ भी करें, उने कृच नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि वे घूमने जायेंगे। दरअसल वे कहीं घूमते नहीं थे, जाकर समुद्र के किनारे बैठ जाते थे।
२०/छुटकारा पहले ने कहा, "आज खाना बनाने की तबियत नहीं है, हम लोग ईरानी रेस्तरां में असल-पाव खा लें।" दूसरा बोला, "मुझे घर की याद आ रही है।" पहला जब भी उसल-पाव की बात करता था, दूसरे को हमेशा घर याद आ जाता था । वैसे उसे पत्नी के अलावा घर का और कुछ याद नहीं आता था। समुद्र के किनारे बैठ कर पत्नी की बातें करना उसे पसन्द था। पहला भूखे की तरह मुंह फाड़े उसकी बातें सुनता । उन दोनों ने अनुमान लगाना चाहा कि प्रयाग की वहन की शादी हो चुकी होगी या नहीं। दूसरे ने कहा, "इतनी खुरदुरी खाल वाली औरत की शादी कभी नहीं हो सकती।" पहले ने दार्शनिक अन्दाज में कहा, "शादी हर औरत की हो सकती हैं, बशर्ते वह औरत हो।" "उसकी त्योरियां देखकर मेरा मन हुआ था कि पास जाकर उसके माथे की खाल खींचकर सीधी कर दूँ !" दूसरा वितृष्णा से बोल रहा था। पहले ने विषयान्तर किया, "तुम्हारी पत्नी इस समय क्या कर रही होगी?" दूसरे ने बताया कि इस समय वह धूप जलाकर पूजा किया करती है । उसे आज तक समझ में नहीं आया कि उसकी पत्नी की पूजा इतनी लम्बी क्यों होती है ! जिन दिनों वह गांव मे होता है, उसे यह पूजा जहर लगती है। बहुत वार ऐसे समय उसने पीछे मे जाकर पत्नी को छेड़ दिया है, पर उस समय उसकी पत्नी मुस्करायी नहीं है, बल्कि उसने उसको घुड़क दिया है। आवाज कुछ धीमी कर दूसरे ने बताया कि जिन दिनों वह घर जाता है, अपनी बीवी को वह एक मिनट के लिए नहीं छोड़ता है, वरन् दिन में भी बच्चों को बाहर धकेल कर मौका ढूंढ़ निकालता है। बाद में पत्नी को परेशानी होती है, क्योंकि वच्चे उन दिनों वेहद आवारा हो जाते हैं । -
Adarsh Library & Reading Rooh:
eta Bhawati Adarsh Nagar,
IPUR--302004
वे तीन और वह /२१
पहला इन बहुधा सुनी वातों को मुनता रहा और चमत्कृत होता
रहा । उसने बताया, "मैं अब तक एक लड़की देखकर नामंजूर कर चुका
हूँ और दसियों अभिभावको के खत ।"
'क्या वही लड़की, जो तुम कहते थे, पहले से ही औरत-सी लगती
थी?" दूसरे ने पूछा।
"हां, उसका बदन बहा लटका लटका-सा था। उसे यह भी नहीं
पता था कि वदन कसा रखने के लिए क्या पहनना चाहिए।"
"भेल खायें ?" दूसरे ने पूछा। उसे पता था कि बताने के लिए
पहले के पास खास बातें हैं ही नहीं।
भेल खाते हुए उन्हें महमूस हुआ कि वे काफी भूखे थे। उन्होंने पैसे
बचाने के खयाल से चाय घर पर पीने की सोची।
"फिर प्रयाग भी सोने से पहले चाय पो लेगा," पहले ने सुझाया।
सोने से पहले, पहले को रोज की तरह महसूस हुआ कि दूसरा
अपनी पत्नी को फिर याद कर रहा है ।
"वह बिस्तर पर उन अनुभवों के साथ सोयेगा, जो उसे पत्नी के
साथ-साथ हो चुके हैं," पहले ने सोचा और उसे ईर्या हुई। फिर वह
भी उसकी पत्नी के बारे में सोचने लगा। उसने पाया कि वह दिनों-दिन
दूसरे की पत्नी के बारे में ज्यादा सोच रहा है और रात में यह खयाल
उसके साथ अजीब-अजीन 'पार्टिसिपेशन' करने लगता है।
"मुझे तब तक वदति करना पड़ेगा जब तक मुझे कोई कमाने
वाली लड़की नहीं मिल जाती।" पहले ने स्वयं से कहा और सोने की
कोशिश की।
प्रयाग की बहन सबेरे फिर आयी, मोड़ी देर को। पहले को मालूम
होते हुए भी हैरानी हुई कि दिन भर में न उसके पसं का साइज घटा
था, न उसके माथे की योरियो।
२/छुटकारा "यह इन्हीं त्योरियों के साथ सो गयी होगी।" पहले ने सोचा। वहन के जाने के बाद दोनों जल्दी-जल्दी तैयार होकर दफ्तर के लिए ल पड़े। दिन भर के काम के दौरान पहले को कई बार प्रयाग की बहन का ध्यान आया । उसके पास सोचने को वहुत कम वातें होती थीं, पर फेर भी उसे ताज्जुब हुआ कि वह उसके बारे में कैसे सोच सकता है । "क्यों, क्या वह अभी तक कुंवारी होगी?" पहले ने अपनी जिज्ञासा से तंग आकर दूसरे से पूछा । वह दूसरे को ऐसी बातों में विशेष अनु- भवी मानता था। दूसरा उस वक्त नये कार्डो पर जोन नम्बर डाल रहा था। उसे पहले की बात देर में समझ आग। उसे पहले के सवाल पर तरस आया, "अगर वह औरत है, तो अस्सी साल तक भी कुंवारी रहने में उसे कोई कोशिश नहीं करनी पड़ेगी।" "सिगरेट है ?" दूसरे ने पैकेट बढ़ा दिया। शाम को वे लोग काफी देर में घर पहुँचे। उस वक्त प्रयाग को बुखार नहीं था और वह अखबार पढ़ने की कोशिश कर रहा था। उन लोगों ने जल्दी-जल्दी अपनी लुंगियाँ पहनी और लेट गये । पहले ने प्रयाग से पूछा, "तुम्हारी वहन आज नहीं आयी ?" प्रयाग ने कहा, "वह शायद सुबह आये।" दूसरे ने माथे पर त्योरियां डालने की कोशिश की और पहले की ओर देखकर मुस्करा दिया। पहला सोना चाहता था, पर उसे नींद नहीं आ रही थी । नोंद बुलाने का एक नुस्खा दूसरे ने उसे एक वार बताया था। वह कहता था कि वैसी हालत में कोई छोटी-सी अश्लील वात सोच लो, सोचते-सोचते वात बड़ी हो जायेगी और उस अनुपात में नींद तुम्हें घेर लेगी। पहले ने कहना चाहा था कि वैसी वातें तो वह हर वक्त सोचता रहता है, पर इन बातों वे तीन और वह / २३ ने उसे कभी नीद नहीं आयी । बल्कि वह फिर और भी देर तक जागता रहा है और प्रयाग के सुरटि सुनता रहा है। कि प्रयाग खुरट लेता है, यह उसकी इन्ही दिनो की खोज थी । जब उसने मुबह प्रयाग को बनाया था, प्रयाग बेहद झेंप गया था। उसने हकलाते हुए कहा था, 'देखिए आपको भ्रम'और दूसरे ने उसके कन्धे पर हाय मारते हुए कहा था, 'जाने दो यार, इसने कौन तुम्हारे तकिये के नीचे वात्स्यायन अन्य ढूंढ लिया !' सवेरे प्रयाग की बहन आयो, अपने साथ डबल रोटी और मक्खन लेकर । दूसरे ने तनिक उत्साहित होते हुए कहा कि वह चाय बना लाये तो सब लोग इकट्ठ नाश्ता कर सकते हैं । बहन ने त्योरियों के साथ कहा कि उसे नाश्ते-वाश्ते में कोई रुचि नहीं है और क्या वह सुबह के समय इसी भद्दी पोशाक मे रहता है ! पहले को सुशी हुई कि वह आज जल्दी नहा लिया था और धोबी ने इस बार पतलून बहुत साफ धोयी थी। उसने कहा, 'चाय में बना लेता हूँ, यह तब तक नहा लेगा।' दूसरा जब नहाकर आया, उसने देखा, उसकी कमीज से एक बटन गायव है । उसने कुछ देर सोचा, फिर वह आलमारी से एक पुराना ब्लेड निकाल लाया। उसने झांककर देखा, पहला अभी रसोई में ही था दूसरे ने दरवाजे के पीछे कील पर टंगी पहले की कमोज मे अन्तिम बटन सावधानी से काट लिया और अलमारी में सुई टूढ़ने लगा। पहले ने चाय के ग्लास मेज पर लगा दिये । बहन ने उसकी ओर डबलरोटी-मक्खन बढ़ाकर कहा, 'खाओ !' पहला सकुचा गया, 'नही, मैं नाश्ते का मादी नहीं । आपके लिए. टोस्ट बना दूं?" M प्रयाग की बहन ने बाप एक चूंट पी कर रखी।
२४ / छुटकारा
काफी देर तक वे लोग ग्लास हाथ में लिये-लिये इन्तजार करते
रहे।
आखिर दूसरे ने पूछा, 'आप शायद चाय भी नहीं पीती ?'
'पीती हूँ, पर इतनी तीखी नहीं।' बहन ने कहा।
पहला हकवका गया, 'माफ कीजिए, मैं फिर बना लाता मुझे
'पता नहीं था।'
'नहीं मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही है । मैं जाऊंगी।' वहन इस
तरह उठ खड़ी हुई कि उन लोगों को भी अपने-अपने ग्लास रखकर
“उठना पड़ा।
प्रयाग ने वहन से कहा, 'मैं अब विल्कुल ठीक हो गया हूँ। मैं खुद
आपके पास जाऊंगा।'
'ठीक है।' वहन ने मुड़ते हुए कहा ।
दरवाजे पर पहला ठिठका हुआ खड़ा था। उसने अटकते-अटकते
कहा, 'मुझे अफसोस है, आप चाय नहीं पी सकी, मुझे अच्छी चाय
बनाना भी नहीं आता।
वहन ने कोई ध्यान नहीं दिया । वह सीढ़ियां उतर रही थी।
00
यह जरूरी नहीं
नोग अचानक उत्तेजित हो गए । लोग बहुत उन्द रिट
पहनै वे कंधे झुकाए प्रूफ देखने या ने-बाट बन्यो ।
मे लगना जैसे उनके काड़ों का कनरनिकारrr:-
नक वे कोई बात शुरू कर देने और यार !
उनके पाल किसी भंगिमा में नगद,wिere:
हरि ने बताया, "मि की 7 tam
सम्पादक से शादी होने ।"
लोगों को पका मनः। rtment
उसने वे दुदी ही गर्ने वYurxxx
पत्र में काम करने दाzarry
हरि को ऐसे देना Enzzrar
हरि को इमले मhrary
पर न निर*
32 में कुछ
जाता,
३
२६ / छुटकारा सामान लेना था। उसकी पत्नी ने सुबह ही उसे याद दिलाया था कि घर में चीनी बिल्कुल खत्म थी। हरि ने हाल की एकरसता हटाने की कोशिश की थी। उसे पता था अब लोगों को तकलीफ होती रहेगी। वैसे वह झूठ बोल कर बात रोचक बना सकता था, पर दफ्तर के लोगों के बारे में उसने झूठ बोलना बन्द कर दिया था । एक समय उसने अपने एक साथी के बारे में कह दिया था कि उसे बवासीर है और वह साथी नाराज हो गया था। हरि ने ऐसा इस- लिए कहा था क्योंकि जब वे लोग वेल खा रहे होते तब वह नींबू का पानी पीता था। शायद हरि ने चाहा भी था कि उसे बवासीर हो जाए। उसका ख्याल था कि बवासीर तपेदिक से भी ज्यादा तकलीफदेह होता है। घर पर हरि खूब झूठ बोलता था। उसकी बीवी अव और किसी तरह खुश रह भी नहीं सकती थी। बीवी को खुश रखना उसका मकसद नहीं था, पर वह अपनी बीवी को बदसूरती से घबराता था और गुस्से में वह वेहद बदसूरत हो जाती थी। झूठ वह पड़ोसियों से भी बोलता. और धोबी से भी । वैसे उसे चकमा देना झूठ बोलने से ज्यादा पसंद था, क्यों कि चकमा चुप रहकर भी दिया जा सकता था। तीसरे दर्जे के पास से वह कई बार लोकल ट्रेन में फर्स्ट क्लास में यात्रा कर चुका था और कभी-कभी जब रात को उसकी पत्नी उसे सहलाने लगती, तव वह आंख . बंद कर सोने का अभिनय कर लेता । फिर भी चकमे वह कम दे पाता था, क्योंकि चकमे मौके से संबद्ध थे। लोग झूठ नहीं बोलते थे। सच भी नहीं । वे हमेशा ऊवते रहते थे ! जिस दिन उनमें से किसी को भी डांट नहीं पड़ती थी, वे अपने को बहुत ताकतवर पाते थे-~~चुस्त । पर डांट पड़ने पर वे उल्टे पड़े तिलचट्टे की तरह लाचार हो जाते । उनके बहुत छोटे-छोटे भय थे; देर से दफ्तर पहुँ- चने का भय, देर से घर वापस जाने का भय, दस रुपये का नोट भुनने का भय, इंकपेंसिल की रीफिल घिसने का भय, ब्लेडों का दाम बढ़ने का यह जरूरी नहीं। २७ भय आदि । इन्हीं डरों को साथ लिए लिए वे लोकल गाड़ियों के डिब्बों में झूलते चले जाते । उनको तनस्वाहें डेड-लाइन पर पहुंच जाती, फिर भी वे रोज धुली हुई ताजी कमीज पहनना अफोर्ड नहीं कर पाते थे । साल-दर-साल लोग वैसे ही रहते आते, बस, उनके जूतो के चमड़े पर सिकुड़ने पड़ती जाती और उनके रूमाल सफेद मे मटमैले होते जाते । उनके टिफिन-बाक्स का रंग उतरता जाता और उनके क्लिप ढीले होते जाते । फिर वे लोग दफ्तर से ढेर से रवर के छल्ले ले जाते और उनकी पत्नियो टिफिन-बाक्स पर रबर के छल्ले लगा देती। अपने मुख्य संपादक के बारे में वे बहुत कम जानते थे। वे उसकी क्रोध तथा प्रशंसा की मुद्राएं ही जानते थे। पर उसके बारे मे वे हमेशा अनुमान लगाते रहते । उन सव का विश्वास था कि उसकी पत्नी आया- तित साड़ियां पहनती होगी, उसके घर रोज गोस्त बनता होगा, उसके वच्चे पढिलक स्कूल में पढ़ते होगे और वह अनानास का स्वाद पहचानता होगा। हरि को इन लोगो को जिंदगी से डर लगा था। पहले-पहल उमे इतकी नाराजी का हर लगा था। पर उसने पाया, नाराज होना इनका स्वभाव नहीं । वे रूठते थे और रूठ जाने पर अपना खाना अपनी ही मेज पर खोल कर पा लेते, विना दूसरों का इंतजार किए । हरेक को खुश रखना वे अपना फर्ज समझते थे, उनकी गर्दने स्वीकारात्मक मुद्रा मे हिलती रहती, फिर मेजों पर रखी फाइलों पर लटक जाती। दफ्तर में हुई छोटी-सी-छोटी घटना पर वे उत्तेजित हो जाते और चारो तरफ सूचना के लिए देखते । मूचना न मिलने पर वे उदास हो जाते । चपरासी से दै हमेशा अच्छे सम्बन्ध रखते, क्योकि पपरासी सूचनाओं का विश्वस्त लिफाफा था। हरि को चपरासी पसन्द या। चपरासी सारे साल सहविक की वर- साती चप्पलें पहनता और हरेक की बात समान रूप से अनसुनी करता।
२८/ छुटकारा बल्कि हरि को अब लगने लगा था कि उसके विभाग में सिर्फ दो व्यक्ति प्रसन्न थे, चपरासी और मुख्य संपादक । उदासी, दुःख और खुशी को हरि अब तक निजी स्थितियां समझता माया था, पर पत्रकार बनने के बाद उसे लगा कि ऐसा सिर्फ गैर-जरूरी लोगों के साथ होता है । जरूरी लोगों के उदास होने से सारा दफर भयानांत हो सकता है नोर उनकी सराहना पर्व की तरह मनाई जाती है। उसे दफ्तर में अपना होना एक आलपीन से ज्यादा जरूरी कभी नहीं लगा पर उसने सुना कि उसके सहयोगी उससे जलते थे, क्योंकि वह पत्न के सांस्कृतिक पृष्ठ संभालता था। शुरू में वह भी खुश हुआ था । वह चाहता था कि वह निचुड़ी हुई सभ्यता, दिमागी पिलपिलेपन और दायरे में घूमते अर्थहीन संपर्को के बारे में लिखे, पर अच्छा हुआ कि वह उल्लूपने में ऐसा नहीं कर बैठा । हर जगह कोई न कोई संबंध था । उसे बताया गया कि उसे सिर्फ त्योहारों पर लिखना है या राष्ट्र-दिवसों पर या मंत्रियों की यानाजों पर । शुरू में सव-कुछ मुश्किल लगा था, बर्दाश्त के बाहर। उसने लोगों से कहा कि वे अपने हक मुंह-जुवानी याद कर लें। लंच के समय उसने मुख्य संपादक को गालियां भी दी थी, पर लोग डर गए घे, डर के मारे वे सिकुड़ गए और घिघियाने लगे कि वह सभ्यता से बर्ताव करे, वे हमेशा सभ्य रहे हैं और उन्हें अश्लीलता की आदत नहीं। धीरे-धीरे उसने पाया कि वह चीजें स्वयं बर्दाश्त करने लगा है, उसी तरह जित तरह उसकी मां ने अपना बदमिजाज पति और उसने स्वयं पत्नी के पोले दांत और खुरदरी हथेलियां बर्दाश्त को यौं। अब तो उसे खुरदरे हाथों की इतनी लादत हो गई थी कि जब पली मां के घर चली जाती, वह झावे से पी० खुजाया करता । उसने सोच लिया कि दुनिया की वाकी सब औरतें लड़कियां हैं और वे पत्नी नहीं। वह सूबर की तरह संतुष्ट रहने यह जरूरी नहीं | २६ हरि नियमित होता गया था। यहां तक कि उसने हाशिए वाले कागजों पर लिखना शुरू कर दिया था। अब वह रोज-रोज कमीज नहीं धुलवाता था वह वगलो मे टैल्कम पाउडर भर लेता था। यही पाउडर उसकी पत्नी चेहरे पर लगाती थी और उसका बच्चा कैरम-बोर्ड पर छिड़क लेता । जिस दिन चपरासी या सपादक उमसे खुश होते उसका मन कोकाकोला पीने को कुनबुलाता रहता। उसे खुशी थी कि आज- कल दोनों ही खुश थे।
बीमारी . टैक्सी की आवाज सुनते ही मैं समझ गई थी कि वे हैं । उन्होने पैसे चुका कर सामान खींच कर नीचे डाला और ऊपर आए । भाई तथा पर्स और हैंडवेग से लदी दिखने वाली उसकी पत्नी । भाई ने अटैची मेज पर टिकाते हुए कहा, 'कैसी तबियत है ? कोई नौकर होगा सामान लाने के लिए ?' मैंने कमरे में नजरें घुमाकर देखा, 'नौकर तो नहीं है। वैसे जीना वहुत चौड़ा और नीचा है।' भाई जाने लगा। उसकी पत्नी मेरे माथे पर हाथ रखते हुए वोली- 'वड़ा लम्बा सफर है, रास्ते में तकलीफ भी बहुत हुई । तुम्हारे भाई तो कुछ करते नहीं न । मुसाफिरों से जगह भी मुझे मांगनी पड़ी।' मैं मुसकराई। भाई होल्डाल घसीट कर लाने में सफल हो गया था उसने पत्नी से कहा, 'वस, वह बड़ा ट्रंक ही लाना रहा है न अव ?' उसकी पत्नी हड़बड़ा कर बोली-'उसमें किसी का हाथ न लग- वाना, जैसे भी हो, धीरे-धीरे ले आमो।'
बीमारी/३१ भाई परेशानी जताता हुआ फिर चल दिया । उसकी पत्नी ने एक हाय में ग्रेसियर को तनी कसते हुए पूछा, 'तुम ने पुराना मकान बदल क्यो लिया ? कितनी दूर है यह स्टेशन से । टैक्सी ही टैक्सी में पैतीस मिनट लगे हैं।' मैंने कहा, 'पहले मकान से ऑफिम पहुंचने के लिए मुझे बस में पचास मिनट लग जाते थे।' 'तुम्हें ट्रेन से आना-जाना चाहिए म !' उसने कहा। जब से मैं लोकल ट्रेन से भीड़ में गिर पड़ी थी. मुझे ट्रेन से नफरत हो गई थी। वैसे भी मुझे लगता था कि तीस सेकेंड का समय गाड़ी में पढ़ने के लिए नाकाफी होता है और लोकल ट्रेन हर स्टेशन पर तीस सेकेंड खड़ी होती थी। माई मोटा काला ट्रंक लिए कमरे में आ गया था। मैं सोचती थी कि इस बार मुझे काफी वहा कमरा मिल गया है। पर भाई के सामान के बाद कमरे का फर्श एकदम ढक गया था। अब कमरे में सिर्फ पलंग, दो कुसियां और सामान नजर आ रहा था । भाई ने बैठकर कहा, 'चाय का इतजाम तो है न ?' मैंने कहा, 'हो, हां, मेरे पास गैस भी है और बिजली की केतती भी।' भाई की पत्नी बोली, 'तुम कैमे गुजारा करती थीं । कम से कम एक नौकर तो रखना चाहिए था।' [मैं चुप रही। उन्हें बताना मुश्किल था कि अकेली लडकी के घर नौकर के साथ क्या-क्या अफवाहें जुड़ जाती हैं। नौकरानियों से मेरी बहुत जल्दी लड़ाई हो जाया करती थी। वे चोर होती थी और झूठी । याजकल सामने बनती एक विल्डिग का चौकीदार आकर चाप के बर्तन मांज जाया करता था और झाड़ भी लगा देता था। इससे ज्यादा काम के लिए उसमें अक्ल नही थी । डाक्टर ने अब तक दवा भी खुद मंगवा कर दी पो ३२ छुटकारा भाई की पत्नी अपना बदन संभालते हुए उठी और रसोई में पहुंची। मैंने भाई को आज का अखबार थमाकर आँखें वन्द कर लों। मैं वातों से बहुत थक गई थी। मैं थोड़ी-सी बात करने से ही थक जाती थी और सांस तेज चलने लगती थी । वल्कि डाक्टर को यह बात बार-बार कह कर मैंने इतना डरा दिया कि उसने मुझे काडियोग्राम कराने की सलाह दी। काडियोलॉजिस्ट की रिपोर्ट में ऐसा कुछ डिटेक्ट नहीं हुआ। पर मैं अस्प- ताल जाकर एक्सरे कराने में इतनी थक गई कि मुझे कई दिनों तक लगता रहा कि रिपोर्ट गलत है। भाई की पत्नी रसोई से परेशान होती हुई आई और झुनझुनाते स्वर में उसने पति से कहा, 'मैं सारी रसोई ढूंढ़ चुकी हूँ न तो चीनी मिलती है, न चाय की पत्ती।' मैंने कहा, 'सब चीजें पलंग के नीचे रखी हैं।' 'दूध भी?' हां, उसका डिब्बा भी नीचे ही रखा है।' वह फिर रसोई में घुस गई और थोड़ी देर में ट्रे लेकर आई । वह पलंग पर बैठती वोली, 'लो भई, वना लो अपनी-अपनी, मैं तो बहुत थक गई।' भाई ने चाय के प्याले बना-बना कर थमाए । मैंने कहा, 'मेरे वीमार होने से आपको बहुत तकलीफ हो रही है न । मेरा बदन विल्कुल टूट चुका है, नहीं तो खुद उठती।' भाई जल्दी-जल्दी बोला, 'नहीं, नहीं, यह तो सफर की थकान है, वरना दूसरों को तकलीफ देने की तो इसे जरा भी आदत नहीं।' भाई ने रैक पर से मेरी एक्सरे की रिपोर्ट और ब्लड-यूरीन और स्टूल टैस्ट की रिपोर्ट उठा ली थीं। मैंने कहा, 'कुछ रिपोर्ट आनी वाकी हैं । कोई लाने वाला नहीं था।' भाई ने कहा, "सिर्फ यूरीन-रिपोर्ट में शिकायत है ।'
बीमारी | ३३ उसकी बीवी ने पूछा, 'शकर तो नहीं है।' भाई ने कहा, 'नही शक्कर नहीं है, 'पस' है।' मैंने उसकी पत्नी से कहा, 'रसोई में डबल रोटी, मक्खन और जैम रगा है। आप चाहे तो ले सकती हैं।' उसने कहा, 'अचार हो तो बता दो। मठरियां हैडबैग में पड़ी हैं।' मैने कहा, 'मुझे खुद अचार खाए पांच-एक साल हो गए हैं।' उस दिन मैं सारे समय उसे पाना बनाते और परेशान होते देखती रहो । मुझे सिर्फ यह अफसोस हो रहा था कि शादी के बाद से लेकर अब तक वह वैसी की वैपी ही रही-वैसी ही वे-सलीका और वे-अक्ल । बल्कि भाई भी उसके साथ-साथ उसी अनुपात में वेवकूफ होता जा रहा था। वह उसके साथ रसोई में ऐसे लगा था जैसे पली आपरेशन कर रही हो। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि ये लोग मेरा क्या ख्याल रख पाएंगे । मुझे स्वयं पर गुस्सा आ रहा था । भावुकता के एक बचकाने क्षण में मैंने भाई को वहननुमा चिट्ठी लिख दी थी कि मैं कितनी बीमार और कितनी अकेली हूँ : भाई ने लिखा था कि 'यह बहुत अच्छा हुआ कि इस साल मैंने अपनी कैजुअल खत्म नहीं की। हम लोग आ जाएंगे।' भाई ने अगले दिन वाकी रिपोर्ट ला दी। किटनी मे इन्फैक्शन था जिसकी आपरेशन वाली स्थिति नहीं आई थी पर लंबा इलाज चलना था । डाक्टर ने दवाइयो और इंजेक्शनों की लंबी फेहरिस्त लिख दी और विस्तर पर रहने की ताकीट । डाक्टर ने कहा कि जैसे-जैसे इन्फेक्शन दूर होगा, बुखार अपने आप हटता जाएगा। भाई की बीवी ने पूछा, ६E के आगे तो नहीं बढ़ता बुखार ।' मैंने कहा, 'नहीं, पिछले ३३ दिनों से ६६ ही है।' उसने कहा, 'तुम्हारे भाई कहते है कि ६६ बुखार नहीं होता, हरारत होती है । हम तो इतने बुखार मे घर पर खाना बनाते हैं, कपडे धो लेते हैं।' उसे कभी वुधार मा सकता है, यह कल्पना भी मुझे हास्यास्पद .
३४/ छुटकारा लगी । मैं जितनी भी बार विस्तर से उठती, मुझे लगता कि कमरे का फर्श और नीचे चला गया है। मुझे आश्चर्य होता था कि कैसे बीमार होते ही मैं सबसे पहले चलना भूल गई। भाई सुबह-शाम रसोई में पत्नी की मदद करता था । वीच के वक्त में उसे समझ में नहीं जाता था कि वह क्या करे । मैं उसे अखबार देती ' तो वह उसे पढ़ने के बजाय ओढ़ कर सो जाया करता, जैसे वह सिर्फ खाने और सोने के लिए ही इतनी दूर चल कर आया हो। मुझे विश्वास नहीं होता था कि इस आदमी ने कभी दफ्तर की फाइलें भी पढ़ी होंगी। एक दिन उन लोगों को मैंने धूमने भेजा था, वे लोग डेढ़ घण्टे के अंदर फिर घर में थे । भाई ने बताया कि वे लोग स्टेशन से चार नंबर बस में बैठ गए थे और उसी बस में बैठे बैठे वापस आ गए थे। उसकी पत्नी ने पूछा, 'क्या तुम्हारे दफ्तर के लोग तुम्हें देखने भी नहीं आ सकते ?' मैंने कहा, 'जो लोग मुझे जानते हैं, एक-एक बार आ चुके हैं । उसने कहा, 'तुम्हारे भाई तो एक दिन की भी छुट्टी ले लें तो घर में दफ्तरवालों की भीड़ जमा हो जाती है।' मैंने भाई की तरफ देखकर कहा, 'सरकारी दफ्तरों में लोग ऐसे मौके तलाशते ही रहते हैं।" पर भाई विरोध के लिए उत्तेजित नहीं हुआ , उस पर पत्नी से हांफने के सिवा और किसी बात का असर नहीं होता था। बीमारी के शुरू के दिनों में मुझे दफ्तर के पांच लोग एक साथ देखने आ गए थे, पांच आदमियों के बैठने की जगह कमरे में नहीं थी। वे सब विवाहित थे, इसलिए पलंग के किनारे बैठना उनके विचार में अनैतिक था। आखिर उन लोगों ने मेज से दवाइयों की शीशियां उठा कर मेज खाली की और दो आदमी उस पर पैर लटकाकर बैठ गए। वे सब दफ्तर से सीधे आ गये थे, अपना-अपना बैग और छाता उठाए। उन्हें बराबर 'चाय की तलब होती रही थी, जिसे वे कमरे की खूबसूरती की बातें कर- बीमारी | ३५ कर के टालते रहे थे। उन्होंने रेडियो चलाया था और डिसूजा रसोई से सबके लिए पानी लाया था। मुझे वरावर दुरा लगता रहा था कि उन लोगो ने मेरी बीमारी को बाबत पर्याप्त पूछनाछ नहीं की। वे आपस में ही बातचीत करते रहे थे । विस्तर पर पड़े-पड़े और डाक्टर के नुस्खे ले- लेकर मुझे अपनी बीमारी खासी महत्वपूर्ण लगने लगी थी। मैं चाहती थी कि विस्तार से बताऊँ कि बीमारी कैसे शुरू हुई और इस बीमारी में सुधार की रफ्तार कितनी धीमी होती है, वावजूद इसके कि अव तक १५५ रुपये की दवाइयाँ आ चुकी हैं और १२५ रुपये एक्मरे में लग गए । भाई की छुट्टियां खत्म होने वाली थी और वह हर बार डाक्टर से यह जान लेना चाहता था कि में पूरी तरह ठीक कब तक होऊँगी । वह मेरी बीमारी के प्रति काफी जिम्मेदारी महसूस कर रहा था। उसने कहा, *अच्छा हो, तुम हमारे ही साय अहमदाबाद चलो। वहाँ इसके साथ तुम्हारा मन भी लग जाएगा।' वह अपनी बीवी को हमेशा सर्वनाम से ही संबोधित करता था। मैंने कहा, 'मन लगाना मेरे लिए कोई समस्या नहीं है । और सफर के लायक ताकत मेरे अंदर है भी नहीं।' वास्तव मे में उसकी पत्नी के साय मन लगाने के सुझाव से ही प्रवरा बाई यो । मुझे यह भी पता था कि कि मेरी इस वीमारी को संदिग्ध समझ रही है । उसके ख्याल में कुंआरेपन में किसी भी प्रकार का इन्फेक्शन होना, चाहे किडनी ही में सही सरासर दुश्चरित्र होने की निशानी थी। एक दिन वह मुझे सोता समक्ष यह बात अपने पति से कह रही थी। भाई की अपनी समझ शायद ऐसे मौकों पर काम नहीं करती थी, वह चुप ही रहा करता था। भाई को अचानक एक मौलिक विचार नाया । उसने कहा, 'सुनो, ऐसी तकलीफ में अस्पताल अच्छा रहता है। बल्कि तुम्हे बहुत पहले- अस्पताल चले जाना चाहिए था । यहाँ कोई टहल-फिक्र करने वाला भी तो नहीं है।'
३६ / छुटकारा मैंने कहा, 'हां, अस्पताल में काफी आराम मिलता है। भाई ऐसे कामों में खूब मुस्तैद था। उसने तीन घंटा बेतहाशा दौड़- धूप की और शाम को पसीना पोंछते हुए सफल आदमी की तरह घर लौटा, उसकी पत्नी उसकी कामयाबी से प्रसन्न होकर फौरन चाय बनाने रसोई में चली गई। मैंने आलमारी से कुछ कपड़े और जरूरी चीजें निकाली और भाई की पत्नी से कहा कि वह उन्हें अटैची में रख दे। भाई मेरे सारे डाक्टरी कागज बटोर रहा था । विस्तर पर लेटे-लेटे मैंने देखा कि उसकी पत्नी कपड़ों के वीच वैठी मेरी ब्रेसियर का नम्बर पढ़ने की कोशिश कर रही थी। मैंने भाई से पूछा, 'तुम्हारे अपने पैसे तो नहीं लगे किसी चीज में !' भाई ने झेंपते हुए अपनी जेब से पर्स निकाला और कई कागज उलट- पलट कर एक कागज मुझे थमा दिया। उनमें उन पैसों का हिसाब था, जो इधर-उधर मेरे सिलसिले में आने-जाने में खर्च हुए थे और जो फल मेरे लिए लाए गए थे। मैंने भाई से कहा-'कैश मैं अपने पास ही रख रही हूँ जरूरत पड़ सकती है । तुम चैक ले लोगे ?' उसकी पत्नी ने तुरन्त सिर हिला दिया, 'हां, हां, बैंक में एकाउण्ट है इनका।' मैंने एक चैक अस्पताल के नाम काट कर पर्स में रखा और एक भाई. को थमाया। फिर मैं टैक्सी का इंतजार करने लगी। 00 अपत्नी हम लोग अपने जूते समुद्र तट पर ही मैले कर चुके थे। जहाँ धो ऊंची सूपी रेत पी, उसमें चले थे और अब हरीश के जूतो की पॉलिश व मेरे पंजों पर लगी क्यूटेक्स धुंधली हो गयी थी। मेरी साड़ी की परतें भी इधर-उधर हो गयी थी। मैंने हरीश से कहा, 'उन लोगों के घर फिर कभी चलेंगे।' 'हम कह चुके थे लेकिन !' 'मैंने आज भी वही साड़ी पहनी हुई है', मैंने बहाना बनाया। वैसे बात सच थी । ऐसा सिर्फ लापरवाही से हुआ था । और भी कई साड़ियाँ कलफ लगी रखी थी पर में, पता नहीं कैसे, यही साडी पहन आई थी। 'तुम्हारे कहने से पहले मैं यह समझ गया था ।' हरि ने कहा । उसे हर बात का पहले से ही भान हो जाता था, इससे बात आगे बढाने का कोई मौका नहीं रहता । फिर हम लोग चुप-चुप चलते रहते, इधर-उधर के लोगो व समुद्र को देखते हुए, जब हम घर मे होते, बहुत बातें करते और वैफिक्री से लेटे-लेटे ट्रांजिस्टर सुनते । पर पता नहीं क्यो बाहर आते हम 2८/ छुटकारा नर्वस हो जाते । हरि बार-बार अपनी जेब में झांककर देख लेता कि पैसे अपनी जगह पर है कि नहीं, लौर में बार-बार याद करती रहती कि मैंने लालमारी में ताला ठीक ने लगाया या नहीं। हवा हमसे विपरीत वह रही थीं। हरीश ने कहा, 'तुम्हारी चप्पलें कितनी गंदी लग रही हैं। तुम इन्हें धोती क्यों नहीं ? 'कोई बात नहीं, मैं इन्हें साड़ी में छिपा लूंगी। मैंने कहा । हम उन लोगों के घर के सामने आ गए थे। हमने सिर उठाकर देवा, उनके घर में रोशनी थी। 'उन्हें हमारा माना याद है। मैंने कहा । उन्हें दरवाजा खोलने में पाँच मिनिट लगे। हमेशा की तरह दर- वाजा प्रबोध ने खोला। लीला लेटी हुई थी। उसने उठने की कोई कोशिश न करते हुए कहा, 'मुझे हवा तीखी लग रही थी। उसने मुझे भी साथ लेटने के लिए आमन्त्रित किया । मैंने कहा, 'मेरा मन नहीं है।" उसने विस्तर से मेरी तरफ 'फिल्मफेयर' फेंका । मैंने लोक लिया। हरि माँखें घुमा-घुमाकर अपने पुराने कमरे को देख रहा था । वह : यहां बहुत दिनों बाद आया था। मैंने आने नहीं दिया था। जब भी उसने यहाँ बाना चाहा था, मैंने बियर मगा दी थी और वियर की शर्त पर मैं उसे किसी भी बात से रोक सकती थी। मुझे लगता था कि हरि इन लोगों से ज्यादा मिला तो बिगड़ जाएगा। शादी से पहले वह यहीं रहता था। प्रबोध ने शादी के बाद हमने कहा था कि हम सब साथ रह सकते हैं । एक पलंग पर वे और एक पर हम सो जाया करेंगे, पर मैं बवरा गयी थी । एक ही कमरे में ऐने रहना मुझे मंजूर नहीं था, चाहे उससे हमारे खर्च में काफी फर्क पड़ता। मैं दूसरों की उपस्थिति में पांव भी पर समेट कर नहीं बैठ सकती थी। मैंने हरि से कहा था, 'मैं जल्दी नौकरी ढूंढ़ लूंगी, वह अलग नकान ही तलाश करे।' प्रबोध ने बताया, उसने वायत्म में गीजर लगवाया है। हरीश ने. १ अपत्नी/३६ । मेरी तरफ उत्साह से देखा, 'चलो देखें। हम लोग प्रवोध के पीछे-पीछे बाथरूम में चले गये। उसने खोलकर बताया। फिर उसने वह 'पैग' दिखाया जहां तौलिया सिर्फ खोस देने से ही लटक जाता था। हरीश बच्चों की तरह खुश हो गया। जब हम लोटकर आये, लीला उठ चुकी पी और ब्लाउज के बटन लगा रही थी। जल्दी-जल्दी में हक अंदर नहीं जा रहे थे। मैंने अपने पीछे आते हरि और प्रबोध को रोक दिया। बटन लगाकर लीला ने कहा, 'आने दो, साड़ी तो मैं इन लोगों के सामने भी पहन सकतो हूँ।' वे लोग अंदर आ गये। प्रबोध बता रहा या, उसने दो नये सूट सिलवाये हैं और मलमल का 'विवल्ट' खरीदा है जो लोला ने अभी निकालने नहीं दिया है । लीला को शीशे के सामने इतने इत्मीनान से साड़ी बाधते देख मुझे बुरा लग रहा था। और हरि था कि प्रबोध की नई माचिस की डिविया भी देखना चाहता था। वह देखता और खुश हो जाता जैसे प्रबोध ने उसे सब भेंट में दे दी हो। लोला हमारे सामने की कुरसी पर बैठ गई। वह हमेशा पैर चौड़े करके बैठती थी, हालांकि उसके एक भी वच्चा नहीं हुआ था। उसके चेहरे की वैफिक्री मुझे नापमंद थी। उसे बेफिक्र हाने का कोई हक नहीं था। अभी तो पहली पत्नी से प्रबोध को तलाक भी नहीं मिला था। और फिर प्रबोध को दूसरी शादी की कोई जल्दी भी नहीं पी। मेरी समय में लड़की को चितित होने के लिए यह पर्याप्त कारण था। उमे घर में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसने कभी अपने यहां आने वालों से नहीं पूछा कि वे क्या पीना चाहेंगे । वह तो बस सोफे पर पांव घोड़े कर बैठ जाती थी। हर बार प्रबोध ही रसोई में जाकर नौकर को हिदायत देता था। इस लिए बहुत बार जब हम चाय की आशा करते होते थे, हमारे आगे '४० / छुटकारा अचानक लेमन-स्क्वैश आ जाता था। नौकर स्क्वैश अच्छा बनाने की गर्ज से कम पानी और ज्यादा 'सिरप' डाल लाता था। मैं इसलिए 'स्क्वैश' खत्म करते ही मुंह में जिन्तान की एक गोली डाल लेती । प्रबोध ने मुझसे पूछा, 'एप्लाय कर रखा है ?' 'नहीं !' मैंने कहा। 'ऐसे तुम्हें कमी नौकरी नहीं मिलेगी । तुम 'भवन' वालों का डिप्लोमा ले लो और लीला की तरह काम शुरू करो।' मैं चुप रही। आगे पढ़ने का मेरा कोई इरादा नहीं था। बल्कि मैंने -तो वी० ए० भी रो-रोकर किया। नौकरी करना तो मुझे पसन्द नहीं था। वह तो मैं हरि को खुश करने के लिए कह देती थी कि उसके दफ्तर जाते ही मैं रोज 'आवश्यकता है' कॉलम ध्यान से पढ़ती हूं और नौकरी करना मुझे निलिंग लगेगा। फिर जो काम लीला करती थी उसके बारे में मुझे शुबहा था। उसने कभी अपने मुंह से ही बताया-वह क्या करती थी। हरि के अनुसार, ज्यादा बोलना उसकी आदत नहीं थी। पर मैंने आज तक किसी वकिङ्ग गर्ल को इतना चुप नही देखा था । प्रबोध ने मुझे कुरेद दिया था। मैंने भी कुरेदने की गर्ज से कहा, 'सूट क्या शादी के लिए सिलवाये हैं ?' प्रवोध विना झेंपे बोला; 'शादी में जरीदार अचकन पहनूंगा और 'सन एण्ड सैंड' में दावत दूंगा जिनमें सभी फिल्मी हस्तियां व शहर के व्यवसायी आएंगे। लीला उस दिन इंपोर्टेड विग लगायेगी और रूबीज पहनेगी।' लीला विग हिलाकर, चौड़ी टाँगें करके बैठेगी-यह सोचकर मुझे हंसी आ गई। मैंने कहा, 'शादी तुम लोग रिटायरमेंट के वाद करोगे क्या?' लीला अव तक सुस्त हो चुकी थी। मुझे खुशी हुई । जब हम बाये थे, उसे डनलप के विस्तर में दुबके देख मुझे ईयां हुई थी। इतनी साधारण लड़की ने प्रबोध को बांध रखा था, यह देखकर आश्चर्य होता था। उसकी
हरलो ४१
साधारडमा हरेकर हर कहापालि
लीना भोजपने करीपरिहारोतहाई
हो वारा काही
पोकु लादेना नहीं था। शायद
बस निवन्टरने और मोमोरोध को हीत न देती
पर फिर भी मुझे चित्र होती मीकि सकी पसंद इतनी सामान्य है।
प्रवीय ने मेरी और प्रान से देखा, 'दुन नोप सावधान रहते हो न बर?
मुझे नवाल अबरा एक सरप्रदोश के हास्टर से मस सेने से ही
में यह हक महतूम हो, में वह नहीं चाहती थी। और हरीन पाकि
उसकी दान का विरोध करना ही नहीं पा ।
प्रबोध ने कहा, 'आजकल उन डाक्टर ने रेट बढ़ा दिए हैं। रिष्टने
हन्त हमें दे हमार देना पड़ा।'
लोरा ने मचाकर, एक मिनट के निए पुटने बारम में जोड़ लिए।
'कसी अजीब बात है ! महीनों मावधान रहो और एक दिन के
आतन से देर हजार रुपये निकल जाएँ।' प्रयोघ गोता।
हरि मुस्कारा दिया । उसने तीला से कहा, 'बाप सेटिए, आपको
कमजोरी महसूस होती होगी।'
'नहीं।' लीला में गिर हिलाया।
मेरा मूड घराब हो गया । एक तो प्रोध का ऐनी बारा शुरू करना
ही बदतमीजी थी, पर में इस संदर्भ में हार का पीला हyle
दिधाना तो बिल्कुल नागवार या । हमारी बात और हमारी शादी
हो चुकी थी। बलिजा हमें उम्रत पड़ी थी गो गुणे सोपही लीला
का ध्यान आया था। मैंने हार से कहा था, 'मती, सातारा पूछ । उगे
ऐसे टिकाने का जरूर पता होगा।'
तौना मेरी तरफ दे रही थी। मैं भी उसकी मार देखते हुए
कहा, 'तुम तो कती थी, दुमने मंगल-मूत्र बनाने का मार दिया है।'
-
.
४२ / छुटकारा 'हां, वह कब का आ गया । दिखाऊँ ?' लीला आलमारी की तरफ वढ़ गई। . प्रवोध ने कहा, 'हमने एक नया और आसान तरीका ढूंढा है । लीला जरा इन्हें वह पैकेट भी दिखाना।' मुजे अव गुस्सा-सा आ रहा था । प्रबोध कितना अक्खड़ है-यह मुझे पता था । इसीलिए मैं हरि को इन लोगों से वचाकर रखना चाहती थी। हरि जिज्ञासावश उसी ओर देख रहा था जहाँ लीला आलमारी में पैकेट ढूंढ़ रही थी। मैंने कहा, 'रहने दो, मैंने देखा है।' प्रवोध ने कहा, 'वस, ध्यान देने की बात यह है कि एक भी दिन भूलना नहीं चाहिए, नहीं तो सारा कोर्स डिस्टर्व हो जाता है। नौकर शाम को जब चाय लाता है, मैं तो तभी गोली ट्रे में रख देता हूं।' लीला आलमारी में से सिर्फ मंगल-सूत्न लेकर वापस आ गई थी। वोली, 'कभी किसी दोस्त के घर इनके साथ जाती हूँ तो पहन लेती हूँ।' " मैंने कहा, 'रोज तो तुम पहन भी नहीं सकती ना"कोई मुश्किल खड़ी हो सकती है।' कुछ ठहर कर मैंने सहानुभूति से पूछा, 'अव तो वह प्रवोध को नहीं मिलती?' लीला ने कहा, 'वहीं मिलती।' उसने मंगल-सूव मेज पर रख दिया। प्रवोध की पहली पत्नी इसी समुद्र-लगी सड़क के दूसरे मोड़ पर अपने चाचा के यहाँ रहती थी। हरि ने मुझे बताया था, शुरू-शुरू में जब वह प्रबोध के साथ समुद्र पर घूमने जाता था, उसकी पहली पत्नी अपने चाचा के घर की वॉलकनी में खड़ी रहती थी और प्रबोध को देखते ही होंठों को दांतों में दवा लेती थी। फिर बॉलकनी की ही दीवार से लगकर वह बांहों में सिर छिपा रोने लगती थी। जल्दी ही उन लोगों ने उस तरफ.
अपली/४३
.
जाना छोड़ दिया था।
प्रबोध ने दात का आखिरी टुकडा शायद मुना हो क्योकि उसने
हमारी और देखकर कहा, 'गोली मारो मनहूसो को। इस समय हम
दुनिया के सबसे दिलचस्प विषय पर बात कर रहे हैं। क्यो हरि, तुम्हें
यह तरीका पसन्द आया ?'
हरि ने कहा, 'पर यह तो बहुत भुलक्कड़ है। इसे तो गत को दांत
साफ करना भी याद नहीं रहता।'
में
कुछ आश्वस्त हुई । हरि ने वातों को 'ओवन' से निकाल लिमा
था। मैंने खुश होकर कहा, 'पता नहीं, मेरी याददाश्त को पानी के बाद
क्या हो गया है ? अगर ये न हों तो मुझे तो चप्पल पहनना भी भूल
जाये।
हरि ने अचकचाकर मेरे पैरों की तरफ देवा । वादे के बावजूद मैं
पांव छिपाना भूल गई थी।
उठते हुए मैंने प्रवोध से कहा, 'हम लोग बरट्रोली जा रहे हैं । आज
स्पेशल सेशन है। तुम चलोगे?''
प्रबोध ने लीला की तरफ देखा और कहा, 'नहीं, अभी इसे नाचने
मे तकलीफ होगी।'
00
छुटकारा । मेरी समझ में नहीं आ रहा था मैं और क्या बात करूं। मैंने अपने नाखूनों का विस्तार से निरीक्षण शुरू कर दिया। बड़े नाखून बत्रा का खून उवालने के लिए पर्याप्त कारण रहे हैं। वह निगाह टमाटर के रस पर जमाये रहा । मेरे मुँह के एकदम सामने पैडस्टल पंखा चल रहा था और मेरे छोटे-छोटे वाल वरावर बगावत कर रहे थे। यह वैन्गर्ज की विशेषता थी कि विश्वविद्यालय वाली उसकी शाखा में कुसियां हमेशा टूटी, मेजें लंगड़ी और पंखे शरारती होते थे । गर्मियों की छुट्टियों में एक खास छान वर्ग की भीड़ होती, जो एम० ए० प्रीवियस के बाद फाइनल का घोषना तीस अप्रैल से ही शुरू करने में विश्वास रखती या जिन्हें और कहीं मिलने-मिलाने की सुविधा न होतो, शायद लड़की के मां-बाप अतिरिक्त अनुशासनप्रिय और लड़के के साथ उसके कमरे में कोई पार्टनर । मुझे वना के साथ यहाँ माना अजीब लगा था। पहले नहीं लगता था । अब इन दोनों वर्गों से हम बाहर थे । पिछले दिनों मेरे अनुसार हम छुटकारा|४५ पहली श्रेणी और उसके अनुसार दूसरी श्रेणी के छात्रों में गिने जाते थे। वता ने तीसरी बार वही पूछा, 'मौर क्या किया वहाँ !' मुझे लगा मैं बेवजह पुलिस-इंस्पेक्टर के दफ्तर मे बैठा दी गयी हूँ। 'देखो, मई मर हम पड़ते रहे, जून भर लिखते और आधी जुलाई मे तो बस यही जाओ, वहाँ जाओ, दम मारने की फुसंत नही मिली। तुम्हे जवाब तक नही दे पायी। रोज सोचती रही, फिर सोचा ट्रंक-काल ही करूंगी। सच तीन दिनों तक लगातार कोशिश की, तुम्हारा टेली- फोन ही खराय पड़ा था। 'क्या-क्या पढ़ लिया?' 'तुमने बड़ी तारीफ मारी थी मायनेस्को की। उमका 'एंमिडे' विल्कुल बकवास लगा। फिर नीग्रो कविताएं पढ़ती रही, सच इतनी पुरअसर हैं, तुम्हें दूंगी।' 'और?' मेरी कैजुएलनम चटखकर टूट गयो । बन्ना की आवाज में कोई फर्क नहीं था। वहीं ज्यादा जागे रहने की तत्परता, पर उसके वाक्य मिलकर बातचीत नहीं बन रहे थे, वे कड़े लग रहे थे। 'ऐसे क्यों बोल रहे ?' 'मैं क्या कह रहा था, दिल्ली में इस बार बहुत धूल उड़ी। सुबह उड़नी शुरू होती और रात तक उड़ती रहती। कभी-कभी हम लोग माश्चर्य करते, इतनी धूल आई कहाँ से । तुमने पीली धूल देखी है कभी, एकदम पीली!' मुझे चिढ़ाया जा रहा था। मुझे कोई चिड़ाये तो में एकदम चिढ़ जाती हूँ। पिछले साल लायब्रेरी से हम चार बजे चाय के लिए उठते थे । मेरे दिमाग में मिल्टन या हार्डी घूमता रहता और मैं भूल जाती थी कि चाय का समय रिफेश होने का समय है। दो एक विषय आजमाने के ४६ / छुटकारा - बाद बना मिल्टन पर ऐसे धाराप्रवाह बोलता कि मैं कानों पर हाथ रख लेती थी। एक बार सिर्फ 'प्रेजेण्ट' पाहने पर एक प्रोफेसर के आपत्ति करने पर पता उस क्लास में 'सर प्रेजेण्ट सर' कहने लगा था। मैंने बन्ना को भरसक ठंडेपन से याद दिलाया कि धूल में मेरी रुचि कभी नहीं थी। वना कुछ कहते-कहते रुक गया और हंस गया, 'क्या, हम हेनरी जेम्स पर बात करें ? मैं चुप हो गयी । मैं घर जाना चाहती थी। असल में मैं आना ही नहीं चाहती थी । चलते हुए मुझे यही महसूस हो रहा था। फोन पर बना फो समय देते हुए मुझे लगा था जैसे मैं शून्य में शून्य से समय नियत कर रही हूं। में वहां किसी से न मिलने का कोई अनुबंध नहीं कर आई थी, ऐसे वायदों वाली कोई साक्ष नहीं बीती थी, भाखिरी भी नहीं। पर मिलने- जुलने से मुझे विरक्ति होती जा रही थी। विना उत्साह के किसी से मिलना ऐसे लगता जैसे विना नमक के खाना । इस समय हम दोनों के गिलास खाली थे और हम थोड़ी-थोड़ी देर में खाली गिलास मुंह से लगाकर बर्फ के टुकड़ों का गीलापन महसूस कर लेते। बत्रा ने छठी सिगरेट जलायी, 'तुम चश्मा उतार कर बहुत छोटी लगती हो!' मैं यह सुनने के लिए तैयार नहीं थी या शायद यह वाक्य एक दोह- राहट थी। कहीं से आयी इसकी पहली अभिव्यक्ति कॉम्प्लिमेंट थी, यह दूसरी कमेंट । यह परिवर्तन सबने गौर किया था। मां को मैंने यह कह- कर संतुष्ट कर दिया था कि भाखें अब ठीक हो गयी हैं । परिचितों को . छुटकारा/७ पहली बार पता चला था कि मेरे चेहरे पर आंखें भी थीं। वैगजं में आकर बैठने को झुकी ही थी कि मैंने वना की निगाहों में वैरोमीटर देख लिया । इसके लिए तैयार होते हुए भी तैयार नहीं थी। बन्ना को मैं स्वस्थ दिखी। मुझे पता था, तीन महीने में दस पोष्ट अतिरिक्त वजन देह पर सही जगहों पर स्पष्ट हो आता है पर संकोच के मारे मैं झूठ बोल गयो। 'चण्डीगढ़ वाली बहन जी आयी हुई हैं ।' बता ने बताया । 'अच्छा', मैं आगे बोल नहीं पायी । बना की आँखों में एक पैनापन था, जिसकी वजह से मैं कभी उससे बहुत सारे झूठ एक साप नही बोल पायी। वह कहता कुछ नही था। उसके होठ हँसते रहने और आंखें निरीक्षण करती रहतीं। एक बार यह नाराज पा कि मैं ओडियन समय पर क्यो नहीं पहुंची। दरअसल मुझे घर से निकलने में देर हो गयी थी और स्कूटर मिल नही पाया । टैक्सी लेने लायक उदारता मुझमे कम ही आती है, इसलिए बस मे पहुँची थी-पंतालीस मिनट देर से । मैंने कहा, 'मैं सो गयी थी और देर से उठी।' बना चुप खड़ा रहा था। मैंने और जोर लगाकर बताया कि रात मैं बिल्कुल सो नहीं पायी यो और अगर दिन मे भी न सोती तो अवश्य कैश कर जाती, मैंने नीद की गोली भी ली थी। वता ने बडे आकर्षक तरीके समझाया या, 'झूठ सुद-ब-खुद होंठों से निकलना चाहिए । इतनी शक्ति सच बोलने में लगाया करो।' . मैं वत्रा के सामने ज्यादा देर चुप नहीं रहना चाह रही थी। कुछ लोगो की चुप्पी कोरी होती है, उन्हें पकड़े जाने का डर नहीं, मेरे चुप रहने पर मेरा मन मेरे चेहरे पर उभरा आता था कामो को में जबरदस्ती 'हाँ' भी कर देती तो घर पर कभी ४८/ छुटकारा करवाता नहीं था । बता के अनुसार मेरे चेहरे पर 'न' बड़ी जल्दी और बड़ा स्पष्ट लिख जाता था। मैं बन्ना को हमेशा सात सिगरेटों के बाद रोक देती थी। अधिकतर तब हम फिर कॉफी या टमाटो जूस मॅगाते थे । वना को आठवीं सिगरेट जलाते देख मुझे खुशी हुई। सिर्फ दोहराने के लिए दोहराना ऐसा हो जाता है जैसे पहाड़े रट रहे हों। बना इंतजार कर रहा था । मैं भी इंतजार कर रही थी। मैं जानती थी, वह स्वयं नहीं कहेगा। उसने कभी किसी से कुछ नहीं मांगा । जब उसने फोन किया था तब जरूर मुझे मालुम हुआ था कि वह एक 'मांग के रूप में आज का समय चाह रहा है। मैंने अपने आपको इसके विरुद्ध तैयार कर लिया था। यही एक शर्त थी, जिसे मन में रखकर मैं यहां आ गयी थी। पहले कुछ मिनटों में मुझे बना जांच- पड़ताल विभाग का अधिकारी लगा था पर फिर मैंने पाया हम दोनों हर बार उस 'मांग' को उलांककर जा रहे थे और अपने आप में और उद्विग्न हो गए । यह अजीव था, पर अब मैं घर वापस भी नहीं जाना चाह रही थी। बत्रा के साथ दिन के इस समय बैठना थोड़ा अजीव था पर गलत नहीं । मुझे अपना वहाँ होना अनुचित नहीं लगा था। वना के साथ मनुचित कुछ नहीं था। मुझे आज तक उसके साथ 'वचाव' वाली पद्धति की शरण नहीं लेनी पड़ी थी। मेरे मन में इस वक्त एक ईमानदार आकांक्षा थी। हमने अपने बीच सुस्ती के क्षण बहुत कम विताये थे । मैं वना को वैसे ही 'ग्रिन' करते देखना चाह रही थी, पर मुझे एक भी ऐसी बात नहीं सूझ रही थी जिससे मैं उसे हंसा सकू । हमारे दोस्त कहा करते थे कि हमारी दोस्ती इसलिए है क्योंकि हमारे दांत एक-से-एक सुन्दर हैं थे । यह छुटकारा/४८ और हंसते हुए हम दोनों होड़ लेते रहते हैं। मेरा बहुत मन था कि में पन्ना को सुश देख सकू, वह मेरे सामने वैसे ही पांव फैला कर बैठ ले मौर सिगरेट के धुएं में से अजीबोगरीब बातें ईजाद करे धुआं आज गम्भीर या। मेरा मन दुखी हो गया । बन्ना इस समय खाली लग रहा था, दायें वायें, अगल-बगल । पहले तो वह होता था और होती बेशुमार खबरें, अफवाहें, लतीफे, वाक्यांश, हंसी और तेवर । खाली गिलास में सिगरेट की राख झाडता वह बीता हुमा कल था। हम साथ नहीं बैठे पे सिर्फ पत्रा यहां बैठा था। उसे पता था मैं वहाँ नही थी और मेरी आँखों का फोकस हजारों मील दूर था। पर मैं बना को हल्का महसूस करते देखना चाहती थी। मैं चाहती थी, वह ऐसे अकेला न हो, पर उसके लिए में कुछ कर नहीं सकती थी। किसी के अकेलेपन का मर्म समझ कर भी उमे वोट न सक पाना करुण होता है। इतना गीलापन हमारे स्वभावों के विपरीत या । 'बहनजी आयी हुई हैं, मैंने बताया न ।' 'हो', इस बार भी मैं कह नहीं पायी। बहनजी के आने पर में रोज लाजपत नगर जाती थी। बता को वापसी में स्कूटर चलाना हमेशा अच्छा लगता था। . बत्रा ने कहा नही, 'चलें ।' उठकर खड़ा हो गया, माचिस समेटी, सिगरेट की डिबिया पिचका कर गिलास में फंसायी और मेरे साप निकल आया। बिना सिगरेट के पूरे होंठों से उसने 'बा-य' कहा तो मैं गेट की :५०/छुटकारा ओर मुड़ गयी । वह लायब्रेरी वाली छोटी सड़क पर पहुंच गया था। आभी शाम वाकी थी। लायब्रेरी में बैठने वाले सभी विद्यार्थी अभी बाहर टहल रहे थे। हमने एक-दूसरे को ओर दूर से खुलकर देखा । गहरी शाम में बना की क्रीम रंग की बुश्शर्ट सफेद नजर आ रही थी। उसका कद दूर से औसत से कम लग रहा था। वैगर्ज में उसके शरीर में एक कड़ापन था, वह अब ढोला हो आया था। दिन और रात के इस गाढ़े संधिस्थल में हमें एक दूसरे की चाल ऐसी लगी जैसे डाक बांट लेने के बाद खाली थैला हिलाते डाकिये की। 00 उसी शहर में । नही सीढ़ियां थी, लकड़ी की पहली सीढ़ी के पास टीन का लैटरवक्स । उतरने के पहले हम सम्भल लेते थे और आहिस्ता-आहिस्ता पाव खते नीचे आते थे। मां को नीद इतनी कच्ची क्यों थी, हमारी समझ । कभी नहीं आया। वे सो जाती थी, तो हम घड़े में से पानी भी निकाल र नही पी सकते थे। मां कहती थीं, जब वे सो रही हों, हमें पढ़ना वाहिए । धुपचाप पहले मैं नीचे से हो आवाज देने वाली थी, पर मुझे लगा दोपहर में पुकारना ठीक नहीं है, ऊपर जाकर देखना बेहतर है कि सब सोये हैं ना कोई जगा हुआ है। उसका कमरा खुला ही था और वह कुर्सी पर आंख बन्द किए, सिर जि पर टिकाए था । इन्तजार करने का यह उसका प्रिय ढंग था । मैंने एक बार शिकायत की थी, तो उसने कहा था, 'योर क्या लड़कियों की तरह खिड़की के पास खड़ा मिलू?' पता नहीं क्यों मैंने सोचा था, वह कहीं और मिलेगा; अन्दर वाले ५२ छुटकारा कमरे में या बालकनी में चिक डाले । वह वहीं था । मैंने सुबह से टाला था , घड़ी देखी थी, फिर लेट गई थी। रेडियो चला कर काफी देर तोई और मनी के बहुत कहने पर नहाने का मूड बनाया था। वहां से मैं सोचकर चली थी कि यहां पुर्तत होगी! ममी के जमाने में वह ऐश थी कि बस कालेज, कमरा और पलंग। पर यहाँ दूसरे दिन से ही मन नहीं लग रहा था। घर में कोई नहीं था। ममी सुवह ही पीछे क्यारियों में निकल जाती और दस बजे तक खुरपी हाथ में उठाये, इस क्यारी से उस क्यारी में घूमती रहतीं। उनका दिन ऐसे बीतता कि गत लेटते समय वे कहती, 'समय के तो पहिये लगे पड़े हैं नाजकल !' कोटा की साड़ी फूल रही थी। मैंने पूछा, 'ममी, हम मोटे तो नहीं लग रहे?' ममी मुस्करा दी, 'शुक्र मना, याद नहीं दो-दो पेटीकोट पहनकर साड़ी बांधा करती थी।' शादी के बाद शरीर से हल्कापन निकल गया था। चाल भी धीमी हो गई थी, नहीं तो कॉलेज में 'फटयर मेल' के नाम से खासी मश- हूर थी । खाने के समय ममी ने पूछा, 'वहां नहीं जाएगी ?' मन एकदम सहज हो गया। जैसे ममी के कहने भर की देर थी। बाज पहली बार यहां के लिए मैं किताव और साइकिल लेकर नहीं निकली थी। मैंने उसे छूकर उठाया । विना चौंके उसने आंखें खोल दी। 'मुझे पता था, तुम आई हो।' 'मिलने क्यों नहीं आए फिर? 'तीन ही दिन तो हुए हैं तुम्हें, मैं आने वाला था !'
उसी शहर में/५३ वह पाजामे और बनियान में था। उसने कील से उतार कर कमीज पहनी ।। 'मो?' 'सो रही हैं।' उसने कहा और हम दोनों हंस पड़े। 'इसका मतलब, पानी नहीं पिलाओगे।' 'मेरे कमरे में सुराही है।' उसके पास गिलास नहीं था । वह सुराही गर्दन से उठा बाहर ले आया मैंने ओक लगाकर पानी पिया और ठण्डा-उण्डा गीला हाथ मुंह पर फेर, रूमाल से पोंछा। "तुम क्या कर रहे हो अब?' 'कुछ नही, वही ।' 'और विश्व ?' 'वह भी, वही।' 'मरे। 'क्यों, तुम सोचती हो, छह महीने में दुनिया पलट जाती है । एक साल बाद भी पूछोगी, तो मैं मही करता होऊँगा। एल० एल० वी० में दो साल लगते हैं जनाव !' मुझे शर्म-सी आई। पता नहीं क्यों, मैं सोच रही यो, कोई बड़ा-सा परिवर्तन यहाँ मिलेगा । पर सव वैसे ही था। उसके पैरों में स्लीपर भी वही ये। 'तुम्हारी पढ़ाई ?' उसने पूछा । 'अब क्या अगले साल देखी जाएगी?' 'कहाँ, यही से? 'न, मैंने यूनिवसिटी बदलने की अनुमति मांगी है । इतनी दूर बार- चार माना आसान नहीं । फिर यहाँ आकर भी पढ़ाई ही करनी हो, वो फुसंत-सी महसूस नहीं होती।'
५४ / छुटकारा उसने मेज पर पड़ी एक पत्रिका उनकर एक दूसरी पत्रिका पर रख दी। 'मैं साइकिल पर नहीं आई।' 'मुझे पता है।' मैं सीधी और कड़ी पीठ वाली कुर्सी पर बैठ गई। जव में पड़ने आती थी, थोड़ी देर बाद कुर्सी बदल लेती थी उधर मेज के पास वैठने का एक और फायदा था । नीचे आँगन में बैठने वाला दर्जी नजर नहीं आता था। और दिखाई न देने पर मशीन की आवाज भी कम सुनाई देती थी। फिर नींद आने पर ऊँघने के लिए मेज सुविधाजनक थी। 'मैं चाय के लिए कह आता हूँ।' वह उठकर चला गया । चाय लाने वाला लड़का कोई और था। लड़का जल्दी में था । उस वाले लड़के के बारे में मैंने पूछा, तो उसने 'पता नहीं' कहकर जल्दी से टाल दिया । नारायण ने ड्रामर ते रूमाल निकाल कर मुझे दिया । गहरे स्लेटी रंग के रूमाल में लपेट कर मैंने गिलास मुंह से लगा लिया । मेरे दिए सफेद रूमाल उसने दो ही तीन महीनों में पार लगा दिए थे । उसे सफेद रूमाल कभी पसंद नहीं थे। धुलते-धुलते सफेद पीले हो जाते हैं और पीले, मटमैले, वह कहता था। उसने चारों रूमाल धोबी को दिए थे जिनमें से तीन लौटे थे। फिर एक-एक कर सब गायव हो गए। उसके घर जाने में इस चाय का माकर्षण भी जुड़ा था। गिलास में लौंग और इलायची वाली गाड़ी चाय घर पर नहीं मिलती थी। ममी वहुत हल्की चाय बनाती थीं और उसमें ज्यादा दूध डालती थी। मेरी चाय बहुत जल्दी खत्म हो गई। मैंने लगातार पी ली थी। रूमाल तह कर मेज पर रखा और गिलास दरवाजे के पीछे चाय वाले के स्टैण्ड में । नारायण अभी पी रहा था। मेरा मन अचानक भर गया । ।
उसी शहर मे /५५ वहां से मैं चाव से भरी चली थी। उन्होने कहा था, 'अकेले मन लग जाएगा तुम्हारा ?' 'वाह, पिने वीस साल जो गुजारे, वह ?' वे हंस दिये। । सारी सहेलियो यही थी, पढ़ने में मशगूल । मैं चार-पांच से मिल आई थी, पर पता नहीं क्यो, वहाँ भी, यहाँ जैसे मन नही लगा। उन लोगों ने थोड़ी बातें की, पूछी, फिर हम लोग चुप बैठे रह गए थे। चाय वगैरह ने सिर्फ कुछ देर को हमारी रक्षा की थी। सुधा और प्रभा घर पर बाई पर वे मेरी अपेक्षा आपस मे ही ज्यादा बोल रही थीं। मैंने अपने को बहुत छूटा हुआ पाया । यहाँ मैंने सबसे व्यस्त और बेफिक्र दिन बताए थे। सुबह से जो साइकिल लेकर निकलती थी, दिन का पता ही नहीं चलता। क्लास न हो, कॉलेज के लेडीज-रूम में ही दो बज जाते थे। ममी कहती, 'यह क्या दौड़-भाग मचा रखी है बेबी ?' पर मैं शहर का कोई कोना नहीं छोड़ती थी। छुट्टियों में और इत- वार को यहां आती थी। कभी-कभी नहीं जा पाती, तो दूसरे दिन नारा- यण कॉलेज में कहा, "फेल होना है ?' में हर जाती, 'तुम तो सूब पढ़े होगे।' वह एक क्षण मुझे देखता, फिर हंस जाता, 'नही, मैं भी नहीं पढ़ा।' मैंने नारायण से कहा, 'मुझे जाना है।' 'तांगा? - 'चलो, पीक पर मिल जाएगा।' तांगे के पीछे-पीछे वह साइकिल पर आ रहा था। उसके सामने ५६ / छुटकारा पर बैठना मुझे बड़ा अजीब लग रहा था । ऐसा सिर्फ एक एक वार हुआ था जब मैं कॉलेज में अचानक बीमार हो गई थी और वह मुझे घर छोड़ने साथ माया था। उसने कहा, उसे अपने प्रोफेसर के यहां जाना है। वह नसिया रोड की तरफ से निकल जाएगा। ममी क्राकरी पोंछ-पोंछ कर वारस शीशे की आलमारी में लगा रही 'थीं । मैंने पानी पीकर कहा, 'लामो ममी, हम लगाते हैं।' ममी के पीछे-पीछे हाथ वंटाते हुए मैं बहुत हल्का महसूस करने लगी। मैंने सोचा, रात, सोने से पहले आज उन्हें खत जरूर लिखूगी।
जिन्दगी : सात घंटे बाद को रविवार का दिन बहुत लम्बा सगता है। सुपह-सुबह न बिस्तर रो निकलने की जल्दी, न साड़ी प्रेस करने की हडपड़ी, मगाएता निगलने मी उतावली--वस देर तक लेटे खिड़की के कोपी पर सिपटीपूर मा निर्विकार उजलापन देखते रहो, यीच-बीच में अषयार वाला, दूध वाला, यस रोटी याला-सव की 'पलेट' पीयें मुनते रहो । फिर भी, सवेरा जल्दी विसकता नहीं । एट्टी के दिन वक्त ऐमे रेंगता है जैसे यरा का भीमकाय क्यू.......एक -एक-एक- उसने ड्रेसिंग-टेबल की ओर देपा । आईने पर धूप तिरछी पर, धूम के कणों को चमका रही थी । आत्मीया को लगा, उसका घेहरा तो यही ड्रेसिंग-टेवल पर रखा है, फाउन्डेशन मीप, 'नरिगिग प्रोम', हर मोशन, स्किन फूड, पाउडर, हज को ठिवियों में । इस समय जो यह लेकर टी है वह रात का चेहरा हैं। दिन का चेहरा कितनी ही गुलाबी, पीसी शौशियों में बन्द दुष्टना में मुस्कुराता उमकी प्रतीक्षा कर रहा है। सिरहाने पेपर फको चिकनी किताब पड़ी पी। राव यह, सेर .. 1 ५८/छुटकारा चैटरलीज़ लवर' पांचवीं बार पढ़ कर सोई थी। सोने के कमरे में यह छोटी-सी अलमारी सिर्फ सार्न, नॉबोकोव, मिलर, मोराविया और लॉरेन्स से भरी थी। मास्टर लॉक उसमें हमेशा डला रहता था, कोई पूछता तो मात्मीया हंस कर कह देती, "इसमें मां की फ़ोटो रखी हैं; रोज पूजा करती हूं।" छुट्टी के दिन का रङ्ग आत्मीया को कतई नहीं पसन्द । काम वह इतनी फुर्सी से करती है कि घर लाने को कुछ वचता ही नहीं । बस, प्रोड्यू सर-स्कीम आने का यही एक फायदा हुआ है । जिम्मेदारियां बंट गई हैं। पहले स्टूडियो और आफ़िस के चक्कर लगाते-लगाते पसीना-पसीना हो जाती थी। अब स्टूडियो से बहुत कम सम्बन्ध रह गया है, अपने कमरे में ही अधिक बैठती है । पहले वेशुमार काम रहा था; किसी मिनिस्टर को छींक भी आई नहीं कि जाकर सारे शोक-सभा के रिकार्ड एडवान्स में ढूंटू. कर रखने पड़ते; किसी आर्टिस्ट ने वक्त पर आने से इन्कार कर दिया तो पचासों टेलिफ़ोन खड़काने पड़ते; स्क्रिप्ट समय पर न पाए तो दर्जनों स्मरण पत्न भिजवाने पड़ते । अव यह सारा सिरदर्द प्रोड्य सरों के मत्थे । अभी उस दिन कोहली साहब कह रहे थे, "मिस सेन, रेडियो स्टेशन में भव रेडियो का काम हम और स्टेशन का काम आप करती हैं।' आत्मीया को भी महसूस होता है उसके पद को प्रोग्राम-एक्जीक्यूटिव नहीं, स्टेशन एक्जीक्यूटिव कहना चाहिए । मात्मीया ने लेटे-लेटे घंटी बजाई । कैलासो दौड़ती आई और पर्दे के पीछे से पूछा, "क्या चाहिए मेमसाहब ?" "एक प्याला चाय और !" आत्मीया ने हुक्म दिया। कैलासो वापस दौड़ गई । आत्मीया नौकरों से बहुत रोव रखती है । फ़िजूल बकवक करना उसे पसन्द नहीं । कैलासो, जब तक विल्कुल जरूरी न हो अन्दर नहीं आ सकती। भंगी, धोवी, चौकीदार सब को दो तारीख को तनखा मिल जाती है, मांगने की जरूरत नहीं है। - जिन्दगी : सात घंटे बाद की/ ५६ अन्य की उपस्थित का आभास पाते ही आत्मीया मिस सेन बन जाती है, तनी मुद्रा में सरकारी अफ़सर । अपने से जूनियर लोगों से बात करने में वह सिर्फ भृकुटि का प्रयोग पर्याप्त समझती है। सीनियर्स से बोलने में 'एक्जेक्टलो' 'दाइ ऑल मीन्स' 'हाउ नाइस' आदि-आदि जुबान पर रहते हैं। कैलासो ग्वालियर पॉटरी के छोटे टी सेट में चाय रख गई । आत्मीया ने घड़ी देखी--साढ़े आठ । सुवह कितनी मुश्किल से सरक रही है ! दूसरा प्याला पीने में ज्यादा-से-ज्यादा पांच मिनट बीतेंगे। ऑफ़िस में उसे समय का पता ही नहीं पता । चपरासी बार-बार यहाँ-वहाँ धूमता है तो यह योझ कर कहती है, "क्या है ?" वह डरते-डरते वुदबुदाता है, "जी, पांच बज गये।" और आत्मीया को ध्यान आता है, मॉफिस का समय पूरा हो गया । सुबह दस बजे का उत्साह, शाम पांच बजे का 'डिप्रेशन'--अपनी डॉअर लॉक करते हुए उसे लगता है पांच बज भी गए-अव से लेकर कल दस बजे का समय---वह और देवनगर का उसका फ्लैट-और कुछ .... अभी उस दिन चिट्ठी आई थी वीरेन माई की, छाया के फिर बच्चा होने वाला है, जीजी को याद किया है। चपरासी के हाय आत्मीया ने टेलिग्राम भिजवा दिया, 'अभी नहीं आ सकती, व्यस्त हूँ।' गोपाल की शादी हो गई दिसम्बर में । उस समय रिपोर्ट लिखो जाती है, वह अनुप- स्थित नहीं रह सकती थी, सौ रुपए का एम० ओ० भिजवा दिया । शुरू वह हाय से चिट्ठियाँ लिखती थी, पर फिर स्टेनो को "डिक्टेट' कराना सहज जान पड़ा 1 पहले महीनों हो जाते थे, जवाब नहीं जा पाता था। अव कहीं से चिट्ठी आई नहीं कि दूसरे दिन उसका बढ़ा साफ़-सुथरा हस्ता- पर-समेत जवाव पहुंच जाता है । आत्मीया ने फिर घड़ी देखो। पौने नौ।
६. / छुटकारा किचन से स्टोव की. भरभराहट आ रही थी। कितनी बार कैलासो को 'सायलेन्सर' मंगा कर दिया, वह जानबूझ कर निकाल देती है । एक दिन वोली, "मेमसाहब, यह गुमसुम चूल्हे पे मुझसे तो होता नहीं काम । पता नहीं चले कि जलता है या वुझ गया !" आत्मीया भी आदी हो गई है इस भरभराहट की । बल्कि छुट्टी के दिन अच्छी लगती है यह आवाज़ । ऐसा लगता है जैसे बच्चे दौड़-दौड़ कर चाभीवाली मोटर चला रहे हों । सन्नाटे में हर ध्वनि में एक व्यक्तित्व पैदा हो जाता है। सम्भवतः इसलिए कि हम उसे अतिरिक्त महत्व देते हैं या इसलिए कि वह एक नहीं को 'हाँ' से भर देता है। अत्मीया ने 'लेडी चैटरलीज़ लवर' फिर खोल कर पलटा । अन्य किताबों के समान यह भी वार-बार पढ़ने से बेमजा हो गई थी। उत्तेजना धीरे-धीरे ओस-सी जमती जा रही थी। बस आदत भर वची थी कि सोने के पहले कुछ ऐसा पढ़ा जाए जो फ़ाइलों के स्वभाव से विल्कुल पृथक हा, कुछ हो जिसमें मन आश्रय पा सके। पर सेक्स आत्मीया की प्रॉब्लम नहीं थी, इसने उसे कभी आक्रान्त नहीं किया। लोगों से काम लेते-लेते, ऑर्डर देते, मेमो 'इशू' करते-करते, पुरुष उसके लिए महज 'वर्कर' रह गया था। यह पता होते हुए भी कि ब्लाउज से निकली कमर और 'नैक' के नीचे का कसाव परख गुप्ता और चन्दन उम्र का अन्दाज लगाया करते हैं, उसे कोई जिज्ञासा या वितृष्णा नहीं होती थी। पिछले पांच, छह सालों से कॉम्प्लीमेंटों की संख्या घटती जा रही थी। जो पहले वजह बिला-वजह उसके कमरे में आ जाते थे अब एक ठंडी सौजन्यता की मुस्कुराहट ओंठ पर लिए हफ्ते-पखवारे नमस्ते कर लेते थे। उनके व्यवहार में ऐसी कुशलता थी जैसे वस के छींटों से बचने को एक कदम पीछे हट गए.हों-बस और कुछ नहीं । पर यह उसकी प्रॉब्लम नहीं है इसलिए उसे इसका पछतावा नहीं। जब वह युनिवर्सिटी से एम० ए० करके निकली ही थी, लोगों का अधिक- जिन्दगी : सात घंटे बाद को / ६१ । तम प्रिय प्रश्न था, "तुम शादी कब करोगी !" एक-दो साल रेडियो- ट्रेनिंग वगैरह वगैरह में विता दिए तो सहेलियो ने खखोरना शुरू किया, "अमि, तू शादी क्यों नहीं कर लेती?" आत्मीया बेफिकी से मुस्कुरा देती, "जल्दी क्या है, जब तक नहीं को तभी तक है । किसी दिन मजाक में भी यह हाय हागे वहा दिया तो अंगूठी लेकर ही लौटेगा, हो !" तो उसे गम नही कि उसने हाय आगे क्यों नही बढाया । कनक को वह खूब झिड़कती थी "क्या सुबह में पिचपिच में लग जाती है ! कही इसे तैयार कर, कही उसे खिला । मवके रूठने रूठने का ख्याल कर और घुडपियां सह । सण्डे-मण्डे भी तेरा वही रुटीन, छुट्टी भी नहीं मिलतो कभी।" कनक आंखों में अजीब-सी चमक भर कहती, "पूगी जव राते भारी पड़ेंगी।" आत्मीया दुष्टता से हंस देती : "तो उनके लिए दिन की किन-किच पालने की क्या जरूरत है ! मई, भैमे हीलर हा स्टेशर पर दुक-स्टॉल रखता है न, वैसे ही हर शहर में एक मिन्न रखेंगे धीरे-धोरे मित्रों को मित्रता पर उदासीनता की धूल पढ़ती गई। दीपावली पर ग्रीटिंग कार्ड पर एक्सचेन्ज करने की प्रथा वची, पर उसकी उसे कोई व्यथा नही", खुब देर लगा कर आत्मीया ने प्रश किया । फिर नहाती रही। पैरों रगड़-रगड़ कर धोया । बाहों पर साबुन लगाया; कन्धे और कुहनी के बीच की त्वचा धीरे-धीरे 'रफ' पढ़ती जा रही थी, वहाँ हाप पड़ता तो सिहर करमात्मीया आखें बन्द कर लेती। अविवाहित नारी का शरीर ढलता नहीं है, सूखता जाता है; धीरे-धीरे धिक' करता है । शीशा उसने कब से गुसलखाने से उखडवा दिया "स्वयं पर मुग्ध हो लेने की अवस्था समाप्ति पर थी ..."लोमा' लगा कर उसने गल बांधे और दिन का चेहरा ओढ़ लिया। दूर सेंट मेरी चर्च में ग्यारह के घंटे बजे। संघ सेने में अभी दो घंटे हेम" ६. / छुटकारा - . . किचन से स्टोव की. भरभराहट आ रही थी। कितनी बार कैलासो को 'सायलेन्सर' मंगा कर दिया, वह जानबूझ कर निकाल देती है । एक दिन बोली, "मेमसाहब, यह गुमसुम चूल्हे पे मुझसे तो होता नहीं काम । पता नहीं चले कि जलता है या वुझ गया !" आत्मीया भी आदी हो गई है इस भरभराहट की । बल्कि छुट्टी के दिन अच्छी लगती है यह आवाज । ऐसा लगता है जैसे बच्चे दौड़-दौड़ कर चाभीवाली मोटर चला रहे हों । सन्नाटे में हर ध्वनि में एक व्यक्तित्व पैदा हो जाता है । सम्भवतः इसलिए कि हम उसे अतिरिक्त महत्व देते हैं या इसलिए कि वह एक नहीं को 'हां' से भर देता है। अत्मीया ने 'लेडी चैटरलीज़ लवर' फिर खोल कर पलटा । अन्य कितावों के समान यह भी बार-बार पढ़ने से वेमजा हो गई थी । उत्तेजना धीरे-धीरे ओस-सी जमती जा रही थी। बस आदत भर बची थी कि सोने के पहले कुछ ऐसा पढ़ा जाए जो फ़ाइलों के स्वभाव से विल्कुल पृथक हा, कुछ हो जिसमें मन आश्रय पा सके। पर सेक्स आत्मीया की प्रॉब्लम नहीं थी, इसने उसे कभी आक्रान्त नहीं किया। लोगों से काम लेते-लेते, ऑर्डर देते, मेमो 'इशू' करते-करते, पुरुष उसके लिए महज 'वर्कर' रह गया था यह पता होते हुए भी कि ब्लाउज से निकली कमर और 'नेक' के नीचे का कसाव परख गुप्ता और चन्दन उम्र का अन्दाज लगाया करते हैं, उसे कोई जिज्ञासा या वितृष्णा नहीं होती थी। पिछले छह सालों से कॉम्प्लीमेंटों की संख्या घटती जा रही थी। जो पहले वजह विला-वजह उसके कमरे में आ जाते थे अब एक ठंडी सौजन्यता की मुस्कुराहट मोंठ पर लिए हफ्ते-पखवारे नमस्ते कर लेते थे। उनके च्यवहार में ऐसी कुशलता थी जैसे वस के छींटों से बचने को एक कदम पीछे हट गए हों-बस और कुछ नहीं । पर यह उसकी प्रॉब्लम नहीं है इसलिए उसे इसका पछतावा नहीं। जव वह युनिवर्सिटी से एम० ए० करके निकली ही थी, लोगों का अधिक- पांच, जिन्दगी : सात घंटे बाद की/६१ तम प्रिय प्रश्न पा, "तुम शादी कब करोगी !" एक-दो साल रेडियो- ट्रेनिंग वगैरह वगैरह मे बिता दिए तो सहेलियो ने सपोरना शुरू किया, "अमि, तू शादी क्यो नही कर लेती ?" आत्मीया वेफिक्री से मुस्कुरा देती, "जल्दी क्या है, जब तक नहीं को तभी तक है। किसी दिन मजाक में भी यह हाय हागे बढ़ा दिया तो अंगूठी लेकर ही लौटेगा, हो !" तो उसे गम नहीं कि उसने हाय आगे क्यो नही बढाया । कनक को वह खूब झिडकती थी. "क्या सुबह मे पिचपिच में लग जाती है ! कही इसे तैयार कर, कही उमे खिला । सबके रूठने-रूठने का ख्याल कर और घुडकियां सह । मण्डे-मण्डे भी तेरा वही रुटीन, पट्टी भी नहीं मिलतो कभी।" कनक यांखों में अजीव-सी चमक भर कहती. "पूछूगी मच रातें भारी पड़ेंगी।" आत्मीया दुष्टता मे हंस देती : "तो उनके लिए दिन की किन-किच पालने की क्या जरूरत है ! भई, जैसे हीलर हर स्टेशर पर दुक-स्टॉल रखता है न, वैसे ही हर शहर में एक मित्र रखेंगे हम ।" धीरे-धीरे मित्रों को मित्रता पर उदासीनता की धूल चढ़ती गई। दीपावली पर ग्रीटिंग कार्ड भर एक्सचेन्ज करने की प्रथा पची, पर उसकी उसे कोई व्यथा नही", खय देर लगा कर आस्मीया ने प्रश किया । फिर नहाती रही । रों को रगड़-रगड़ कर धोया । बाहों पर सावुन लगाया; कन्धे और मुहनी के बीच की त्वचा धीरे-धीरे 'रफ' पस्तीजा रही थी, वहा हाय पहता तो सिहर फरमात्मीया आखें बन्द कर मेती। अविवाहित नारी का शरीर दसता नहीं है, सूखता जाता है; धीरे-धीरे 'थिक' करता है । शीशा उमने कब से गुसलखाने से उखाया दिया."स्वयं पर मुग्ध हो सेने की अवस्था समाप्ति पर थी."लोमा' लगा कर उघने बाल बधि और दिन का पहरा ओढ़ लिया। दूर सेंट मेरी चर्च में ग्यारह के घंटे बरे। संघ मेने में भी दी पटे ।
. 4 ६२/छुटकारा को देर थो, आत्मीया वरामदे में बैठी अखवार पड़ती रही। सड़क से स्कूटर, रिक्शे, मोटर, टैक्सी गुजरती रहीं; बच्चों के झुण्ड भागते-झगड़ते निकलते रहे। हर नावाज पर जात्मीया त्योरी चढ़ा कर देखती और वाश्वस्त हो फिर अखबार में जुट जाती। धीरे-धीरे अखबार से भी मन उचट गया। सिर कुर्ती की 'वैक' पर टिकाए वह आसपास के मकानों को ओर ताकती रही। सामने अजवानी के यहाँ टैक्सी से उतर एक विस्तृत परिवार अन्दर गया । वरावर में तेजपाल सिंह और उनकी बीवी अपने मेहमान से सोत्साह विदा ले रहे थे, "तुस्ती आनाजो" ! "जरूर नावांगे !".... "नमस्ते जी ।" लोग नाते रहे, जाते रहे। साड़ी, सूट फ्रॉकों के विविध रङ्ग चमकते रहे, छुपते रहे। मात्मीया को फिर याद माया, लॉफिस का बेतहाशा कान, नाग- दौड़, फान्दे-दर फन्दे, दस से पांच तक का तापमान । बस इस पांच पर आकर आत्मीया के गले में कुछ अटक जाता है। उसे दिन-ब-दिन लगता है, पांच के बाद वह जिन्दगी जीती नहीं, विताती है। पांच बजे के बाद वह कुछ नहीं बचती। उसके व्यक्तित्व के पास रोज सिर्फ ज्ञात घंटे जीने को हैं-~-दस से पांच । दफ्तर से अलग वह कुछ भी नहीं है, फाइलों के बलावा कहीं उसके दस्तखत का मूल्य नहीं है, इस लाल इमारत के वाहर वह सड़क पर चलती महज एक परछाई है जो किसी की भी हो सकती है । अफसरी ले हट कर उसका कोई 'सेल्फ' नहीं है। उसे घर आकर कोई पार्ट लदा नहीं करना है। रोज उसे सात घंटों का वजीर बनाया जाता है बोर शेष सन्नह घंटे वह न कुछता' के बोझ से दबी जाती है। आँखों पर हाय रख-रखे उसे लगा उसके हाथ बहुत सूखते जा रहे हैं, रूखते जा रहे हैं।
पिछले दिनों का अंधेरा ' शहर चुप था । वंद दुकाने निर्विकार हो गई थीं। चौराहे अवाक् पड़े थे। घोमे चलतो हुई बसें, बसें नहीं थी; लगता था, अंधेरे के पहिये लगा दिये हैं । वस के अन्दर पहली बार पास-पास बैठे लोग अंधेरे का फायदा नहीं उठा रहे थे। वह करोलबाग उतरा, तो उसने अरनी वस्ती पहचानी नहीं गई। हमेशा चब-चख मचाने वाली अजमल खां रोड सहमी हुई थो; वैल्गा की बत्तियो ने पहली बार अपनी नीली दौड़ रोक दी थी; प्रह्लाद मार्केट अटेंशन की मुद्रा में था । कोई गुजरती मोटर सणांश के लिए बत्ती जलाती भी, तो चौंधिया कर खुद बंद कर लेती। वस से उतर कर लोग सीधे अपने-अपने घर जा रहे थे, दिना परिचितों से हाथ मिलाये। कपूर बस में बैठे हुए जहर कुछ भारी महसूस कर रहा था। उसके दिमाग में कई बातें एक साय घूम रही थीं। पहली, कि पंजाब में ठीक अम्बाला में रह रहे उसके मां-बाप का क्या होगा ? अव शामो को वह मपा किमा करेगा ? अंधेरे में टिकट बांटता कंडक्टर उसे , सहज मानव- ६४ / छुटकारा विश्वास का प्रतीक लग रहा था। वह एक बार भी रेजगारी गिन नहीं रहा था, देख नहीं रहा था। सवारियों के मुंह से कही जगह के टिकट बांट रहा था। हो सकता है, उसके पास रात बहुत से खोटे पैसे निकलें, पर ऐसा नहीं होना चाहिए । नगर की आज्ञाकारिता उसे चौंका गई। अंधेरे में हर घर का आकार स्पष्ट हो गया था । ऐसा लग रहा था, जैसे किसी आर्किटेक्ट ने बड़े से कागज पर मोटी पेंसिल से शहर का नक्शा खींच दिया हो। इस अंधेरे का आशय समझते हुए पेट के बोच में एक खालीपन महसूस होता था, जो महज दर्द नहीं था । यह अनुभव नया था और अजीब । कपूर का मन था, कोई परिचित पिल जाये तो वह जी भर कर आज की स्थिति पर बात कर ले। वह काफी दिनों से ऊवा हुआ था। रोज़ सुबह जाग कर वह अपने को वहीं पाता, जहां सोया था, तो उसे निराशा होती। चीजों की निरन्तरता उसे थकाती जा रही थी। लोग जीवन को रहस्यमय मानते थे। जीवन उसके लिये 'स्टैटिक' हो गया था। आज तक उसके साथ कोई अकल्पित बात नहीं हुई । दफ्तर में जिस दिन उसे भय था, उसी दिन अफसर से डांट पड़ी। जब उसे फोन पर रुचि की आवाज़ से महसूस हुआ कि वह आज नहीं आयेगी, वह नहीं आई। वह चाहता था, कोई बात उसे झंझोड़ जाये । पर उसने देश की कीमत पर आश्चर्य नहीं मांगा था । यह तो स्तंभित रह जाने वाला वाक़या था। रुचि को वह घर पहुंचा आया था। उसने कहा था, अब वह शाम को नहीं आ सकेगी। कपूर को यह बुरा लगा कि सारे दिन दफ्तर में काम करने, न करने के बाद शाम को रुचि उसे कमरे पर नहीं मिलेगी। घर लौटने का अर्थ होता था, रुचि के पास लौटना । आठ बजे तक वह वहां रहती, फिर वह उसे छोड़ आता। शहर चार दिन तक सोया रहा। ब्लैक-आउट का पांचवा दिन । उजाले के बिना रात और गाढ़ी हो जाती है । अंधेरे में बहुत कम काम हो सकते हैं। उसमें आप खा सकते हैं या प्रेम कर सकते हैं। खाने से पिछले दिनों का अंधेरा/ ६५ कपूर को चिढ़ यो । खाना उसके विचार से एक भौडी प्रक्रिया थी और प्रेम के लिए रुचि की उपस्थिति अनिवार्य थी। रेडियो सुना जा सकता था, पर आकाशवाणी झिझकते हुए समाचार प्रसारित करनी थी और रेडियो में जलती हल्की-सी रोशनी भी आंखो की तीखी लगती थी। उमने अपना मन बहलाने के साधन स्वयं ढूंढे हुए थे । खाली वक्त में वह ओ' नील पढ़ता था, नाखून काटता था और रुचि की संक्षिप्त देह को मट्रिक प्रलाणी की तरह याद करता। दफ्तर के लोग उससे घुल-मिल नहीं पाये थे। वे छुट्टी के दिन बुद्ध जयंती पाकं या इंडिया गेट जाते थे। वहां उनकी बीवियां चने, बच्चे आइसक्रीम और वे सिगरेट पीते सोचते थे कि जिंदगी खासी अच्छी है । उसने हमेशा पाया; विवाहित व्यक्ति जिदगी से कम और वह स्वयं ज्यादा परेशान था। पर यह समाधान अपने आप में एक समस्या था । रुचि को वह बाज काफी मिन्नत से बुलाकर लाया था। ममी को उसने 'कन्विस' कर दिया था कि वह अंधेरा होने के पहले उसे छोड़ कर जाएगा । अंधेरा होने पर उन्होंने पाया, वे साथ साय अंधेरे की प्रतीक्षा कर रहे थे। महज शालीनता ने उन्हें आज तक बीच में उजाला रखने को बाध्य किया था। ब्लैक-आउट का अंधेरा गाढा था। होम गार्ड्स की सीरिया बीच-बीच में रिमाइंडर-सी बज रही थीं । रुचि का वदन गरम पा। रुचि को वह हमेशा ऐसे पकड़ता, जैसे वह कोई तरल पदार्थ हो । उसका बदन बहुत जल्दी पिघलने लगता था। कपूर को वह ज्युएल कहती थी और उसकी बहुत कम वातो का बुरा मानती थी। उसका चेहरा हमेशा धुला-धुला लगता पा और मिलने पर उसकी ओर देखने से ऐसा नगता, जैसे सुबह-सुबह ढेर-सी ताजी सब्जियां देख कर लगता है । पहले वह इस बात से काफी चक्ति और 'कन्फ्यूज होता या । फिर उसने पाया कि रुचि के चेहरे का नयापन, उसकी आंखों पर और ताजापन, उसकी बिन्दी पर निर्भर था। इचिके देखने का ढंग एक ६६ / छुटकारा - - नहीं था। उसकी आंखों में अभिव्यक्ति की सामर्थ्य बहुत ज्यादा थी। कभी-कभी रुचि के चले जाने के बाद कपूर को लगता था, उसने रुचि को नहीं देखा, फिर्फ उसकी चमकती, गहराती, मुंदती, छिपती आंखों को ही देख पाया। रुचि अपने पीछे आंखों के कई चिन छोड़ जाती। सुचि ने उसे कभी नहीं बताया कि वह अपने पीछे क्या चित्र छोड़ जाता है । रुचि उसके बारे में बहुत कम बोलती, बस अपनी बातें सुनाती ‘रहती । पर उसे यह वात अधिक सुविधाजनक लगी थी। स्वयं से वह काफी बचता था और स्वयं को देखना रोज स्थगित कर देता। वह रुचि को बड़ी प्यास से पकड़े हुए था। उसके बाल उसके चेहरे के बिल्कुल इर्द-गिर्द थे, पर उनमें से कोई गन्ध नहीं आ रही थी। रुचि तेल तक नहीं लगाती थी और अगर उसकी आंखों में इतना गीलापन न होता, तो अवश्य उसका व्यक्तित्व रूखा लगता। रुचि रोज की अपेक्षा आज चुप थी। नहीं तो वहुन वार उसकी लगातार बातों के बीच, "उसे रुचि को याद दिलाना पड़ता था, 'रुचि वी आर मेकिंग लव ।' आज अंधेरे में चुप, वे ऐसे बैठे थे, जैसे किसी अदृश्य के सम्मान-भय में ‘यह मुद्रा जरूरी है । अंधेरा घिरते समय उसने सोचा था, आज वह रुचि मे घुल जाएगा, देर तक के लिए । पर अभी सिर्फ उसे छूना भी उसे पर्याप्त लग रहा था। रुचि उसकी ओर और सटी, तो उसने उसके ओठों को मुंह में ले लिया। वह रुचि की हर माँग समझ सकता था। अंधेरे को चीरता हुआ एक भर्राया स्वर पहले धीमे, फिर लगातार ऊंचे-नीचे शुरू हुमा, तो चलता चला गया । उस आवाज को अलार्म की तरह बंद नहीं किया जा सकता था। उसके शुरू होने के अचानकपन ने को धकेल-सा दिया; उसे पता चला कि उस चैतना में रुचि के ओंठ उसके दांतों में भिंच गए थे और वह छूटने का प्रयत्न कर रही थी। सायरन बंद हो गया, पर अपना उद्देश्य और वातावरण छोड़ गया । -चुप शहर, ज्यादा चुप और सोया मुहल्ला, ज्यादा सो गया । असल में कपूर पिछले दिनो का अंधेरा/६७ 1 सोया कोई नहीं था; आखें खोल, सब शब्द-हीन इन्तजार मे थे । रुचि और वह, अपनी-अपनी जगह पर बैठ गए थे। कोई किसी को स्तब्धता नहीं तोड़ रहा था। भय ने ओठों पर उगलियां रख दी थीं। कपूर हमेशा व्यक्तिगत खतरो से डरा था। राष्ट्र के खतरे उसने अखबारो में पढ़े थे और अगली सुबह तक भुला दिये थे। उनके छोटे गुजरते चित्र, कभी-कभी उसने देखे थे । उसे ध्यान था, रिंग रोड के किनारे पर वाढ़ पीड़ितों की झोंपडिया हैं; कनॉटप्लेस मे गेलॉर्ड के सामने भिखारियों से भी दयनीय बच्चे वेणो वेचते हैं। पर उसने सकटो मे कभी अपने को सम्मिलित नहीं पाया था। आज का खतरा उसे अपनी सिकुड़ी-झुकी मां और निस्सहाय होते बाप पर, पारे-सी तरल रुचि और स्वयं पर एक्सरे की फिल्म-सा साफ नजर आ रहा था। उसने पाया, यह अंधेरा, उनके उद्देश्य से अपनी असहमति जताने का सामर्थ रखता है, इनमें प्रेम नहीं किया जा सकता; सिर्फ सांस थाम, आखों और कानों को एक केन्द्र पर जमा, इन्तजार किया जा सकता है।
साथ
वह उसकी मदद करना चाह रहा था। दोवार वह वाश-वेसिन तक
का भी चुका था।
"क्या है ?" सुनन्दा ने पूछा ।
वह चुप रहा।
"कुछ चाहिए ?" उसने नरमो से कहा।
"नहीं मैं तुम्हारे आने तक कमरा गन्दा नहीं करूंगा।" वह वापस
अन्दर चला गया।
जव उसकी पुकार नायी सुनन्दा किसी तरह जा नहीं सकती थी।
उसने क्रॉकरी साबुन में डुबो रखी थी और इसलिए हाथों से फिसल रही
थी। कई प्लेटें उसने कमर से रोक कर गिरने से वचायी थी। फिर वह
अभी बीच में हाथ धोना भी नहीं चाहती थी।
"निन्दी, स्टिकिंग-टेप कहां होगी ?"
"यह तुम्हारा अनुवाद का समय है, तुमने तो कहा था कमरा गन्दा
नहीं करोगे !"
"मैं अब अनुवाद नहीं करूंगा।" कुछ रुक कर उसने सुधार किया, "मेरा मतलब है, मैं तब तक अनुवाद नहीं करूंगा जब तक मुझे एक प्याला चाय और न मिल जाय ।" "तुम देख रहे हो, मैं काम कर रही हूँ।" "मुझे पता है, निन्दी।" जब बहुत दिन हो गये, सुनन्दा ने शिकायत की कि अशोक ने अभी तक उसे पट-नेम भी नहीं दिया। उसने तुरन्त उसे 'नन्दा' बुलाना शुरू कर दिया । पर एक दिन उसने अखबार में गु० ल० नन्दा की तस्वीर देख ली और उसने सुनन्दा के नाम में संशोधन कर दिया। संशोधन के पहले दिन उसने उसे 'नन्दो' बुलामा पर सुनन्दा को स्कूल के दिनों से ही याद था कि नन्दी किसी बैल का नाम है। आखिरकार अशोक उसे 'निन्दी' कहने लगा। वह कमरे में आयी तो अशोक स्टिकिंग टेप ढूंढ चुका था और अब साप्ताहिक पत्रिका के बीच का पृष्ठ पार्टीशन पर चिपका रहा था। "तुम्हें क्रॉकरी पाउडर से घोनी थी, मो पाउडर से धोती थी।" उसने कागज का नाप देखते हुए कहा । "पाउडर एक-एक प्लेट और प्याले पर अलग-अलग लगाना पड़ता है, तुम्हारी मा को फुर्सत होती होगी।" अशोक ने बिना चिढ़े कहा, "हां मेरी मां को फुर्सत रहती है, वे हर काम अच्छा करना पसन्द करती है।" सुनन्दा थक गयी थी। अब वह लड़ने की अपेक्षा लेटना पसन्द करेगी, यह अशोक को मालूम था । उसने चापलूसी के ख्याल से कहा, "रैक के अलावा मैंने कही कोई चीज इधर-उधर नहीं की। बल्कि स्टि- किंग टेप भी उस पर ही मिल गयी।" रेक के तीनों खाने देतरतीब थे। अशोक को कमरे के साफ दिखने से शिकायत थी। साफ कमरा क्लिनिक लगता है, वह सोचता था।
७० छुटकारा अशोक ने 'कोश' की ओर अरुचि से देखा और पत्नी के पास लेट गया। सुनन्दा विस्तर के अलावा और कहीं, अभी उसकी पत्नी नहीं थी। पहली बीवी से तलाक लिये बिना यह मुमकिन नहीं था । पर तलाक की बात से उसे उस रकम की याद मा जाती थी जो हरजाने के रूप में उसे अपनी पहली वीवी को देनी पड़ेगी। जब सुनन्दा शादी के लिए कहती वह वार्डरोव से निकाल कर टाइयों का सेहरा सिर पर बांध लेता और सुनन्दा पर चुम्बनों का धारावाहिक सिलसिला शुरू कर देता। पर जिन दिनों सुनन्दा की जिद ज्यादा कड़ी होती उसे बैंक से पैसे निकलवा कर साड़ी खरीदनी पड़ती। वैसे समय वह विस्तर पर फुसफुसाते हुए एक से अधिक वार कहता, "यू मार मार दैन माइ वाइफ, यू आर माई लाइफ़ ।" "अव से तुम मेरे आने पर यह शब्दकोश खुला न रखा करो । मुझे घर भी दफ्तर लगने लगता है। तुम चाय और शब्दकोश साथ-साथ रख देती हो, मुझे दोनों जहर लगते हैं।" सुनन्दा ने याद दिलाया, "तुम्हीं ने तो कहा था कि रैक में से ढूंढ कर चीजें लेते, पैन में स्याही भरते काफ़ी समय वेकार हो जाता है । तुम चाय पीते ही अनुवाद करना चाहते थे।" "इस महीने अगर हमने पर्दे न खरीदे होते तो मैं कतई अनुवाद न करना चाहता।" सुनन्दा चुप हो गयी। पर्दे खरीदने में उसका हाथ था, विल्कुल वैसे जैसे पिछले महीने प्रेशर कुकर खरीदने में और उससे पहले डबल बैंड खरीदने में । अशोक ने प्रेशर कुकर खरीदते समय कहा था, 'अगर अभी हमने सब चीजें ले ली तो शादी में सब दूसरी बार आ जायेंगी। दो-दो चीजों का हम क्या करेंगे !" सुनन्दा ने कहा, "चीजें दो-दो नहीं होंगी।" वैसे यह विषय ऐसा था जिस पर सुनन्दा चुप रहना ही ठीक समझती थी। उसके बाप ने कहा था कि वह हल्दी कुंकुम की रस्म के अलावा ।
साथ/७१ कुछ देना अफोर्ड नहीं करेगा। काफी अभिमान से सुनन्दा ने वाप से कह दिया था, "मैं कुछ नहीं चाहती, उसके पास पहले से ही सब कुछ है । वह चाहे तो एक चैक से आधी रम्बई खरीद सकता है।" अशोक को चेक काटना पसन्द था। वह दूधवाले, सब्जीवाले, नौकर, लॉन्ड्री को चैक दिया करता था पर जबसे सब्जीवाले का पन्द्रह रुपये का चैक डिसऑनर होकर माया, ये लोग चैक लेने से कतराने लगे थे। वह वैईमानी करना भी नहीं चाहता था। पर वह किसी तरह सबको एक दो दिन टालते रहना चाहता था। उस से उसे लगता था उसने दो एक दिन कुछ बचत कर ली। जिम सप्ताह वह चेक काटकर लोगों को टरकाता था उस सप्ताह को वह 'बचत सप्ताह' कहता था । उसके फ़ौरन बाद वह सवका हिसाब चुकता कर अपने लिए 'वानं विटा' परीद लेता। सुनन्दा ने कहा, "मेरे सारे ब्लाउज तंग हो गये हैं।" "तुम्हें और सिलवा लेने चाहिये । तंग ब्लाउज से सांस लेने में तकलीफ होती है और 'फिगर' अच्छा नहीं दिखता।" अशोक ने फौरन सुनन्दा खुश हो गयी, "इस इतवार को चलकर हम कुछ ब्लाउज पीसेज खरीद लायेंगे।" "तुम अपनी मां के साथ शॉपिंग क्यो नहीं करती। हमें इतवार को अस्थाना के यहाँ जाना है।" सुनन्दा ने मोखें बन्द कर ली औरपाटिशन की तरफ मुंह करके लेट गयी। "यह अब काफी देर के लिए रूठ गई है, अशोक ने सोचा। दरअसल वह स्ठी नहीं थी। उसे एक बार फिर अपनी सही स्थिति पाद आ गयी पो । परलीय परिचय के पिछले दस महीनों के दौरान उसने पाया था कि अशोक औसत रूप से उस पर सो से लेकर सवा सौ रुपमै धक खर्च करता .७२/छुटकारा है । लैमिंग्टन रोड स्थित अशोक के दफ्तर में जब वह स्टैनो की इन्टरव्यू देने गयी थी तब उसका वेतन डेढ़ सौ रुपये तय हुआ था। यह वेतन वह सिर्फ दो बार ले पायी थी क्योंकि उसके बाद अशोक उसका वॉस नहीं रहा था और अशोक का महीने के तीस दिन प्रेमी और इकतीसवें दिन 'पे-मास्टर बनना वह कबूल नहीं कर सकती थी। शुरू में वह दफ्तर से उसके साथ आती थी, और नो वजे तक वापस चली जाती थी पर जवसे उसके बाप ने कहा कि इतनी देर में कोई दफ्तर नहीं छूटता और चाहे वह रात के नौ पर लौटे या दिन के नौ पर उसके लिए कोई फर्क नहीं पड़ेगा, सुनन्दा को छूट मिल गयी थी। अशोक ने ऊव कर अखबार उठा लिया था। अखबार देखने की आदत उसे उन दिनों पड़ी थी जब वह कई ग्राहकों के पैसे पी गया था और आर्डर पूरे करने के लिए उसे पैसों की जरूरत थी । अखबार में देख कर ही उसने उन दिनों एक पोर्टेबिल टेपरेकॉर्डर खरीदा था और कुछ ही दिनों में उसे साढ़े तीन सौ के नफे से वेच दिया था । बम्बई में व्यापार का गुर उसने पकड़ लिया था। वैसे कड़की के दिनों में वह अनुवाद भी किया करता था । कालेज में वी० ए० में अंग्रेजी लेते समय उसने कभी नहीं सोचा था कि यह इतनी काम आयेगी । एक सेकेण्ड को उसने सुनन्दा की पीठ की तरफ देखा, फिर आहिस्ते के उसके वालों से पिन निकाल ली। सुनन्दा तेजी से पलटी, "तुम फिर कान कुरेद रहे हो ।' "तुम कान कैसे साफ करती हो?" "तुम्हें जरूर, ओटाइटिस हो जाएगा । ममी को हो गया था।" "और ओटाइटिस के बाद तुम्हारी ममी को क्या हो गया था ?" अशोक ने उसका ध्यान वटाया। उसने खुद एक बार अशोक को बताया था कि उसके बाद ममी प्रेगनेंट हो गयी थीं।
साय/७३ अशोक ने पिन से कान को अन्दर-अन्दर टटोलते हुए कहा, "अगर तुम मुझे एक प्याला वाय दे दो तो मैं अपने को ओटाइटिस और तुम्हें प्रेगनेंट होने से वचा लूंगा।" ऐसे मौकों पर सुनन्दा रसोई की पनाह लेती थी । वह जानती थी कि अशोक के ऑफिस से ही सही, पर मिस प्रधान का मैटनिटी लीव पर जाना एक विस्फोटक घटना होगी और वह मिस प्रधान थी। उसने चाय बनाते-बनाते उंगलियों पर कुछ गिना, और अगले चार दिनों का अधि- कांश भाग रसोई में विताना तय कर लिया। अशोक ने चाय एक सिप से आगे नहीं पो। सुनन्दा बिना उसके कहे समझ गयो कि उससे चीनी ज्यादा डल गयी है। अशोक पी सकता है पर उसे सुनन्दा की यह 'कण्ट्रो-हैबिट' नापसन्द है । सुनन्दा विना सॉरी कहे, दोनों प्यालों की चाय ग्लास में डालकर कुर्सी पर अघलेटी हो गयी और आराम से चाय पीने लगी।
बेतरतीब उन्हें बहुत बुरा लगा था। अचानक मूड खराब हो गया और उठ दिये । आकर बैठे तब से वे उसके अभिनय की तारीफ कर रहे थे। थोड़ी-थोड़ी देर में वे याद करते-"और गुस्से से कांपने वाले सीन में तो कमाल कर दिया तुमने !", "पता है, उस वाले सीन में तुम्हारे लगातार हंसने पर पास बैठी लड़की के आंसू निकल आये !" वह संयत मुसकान के साथ हर बार 'ओ' 'ज्यादा कुछ नहीं' आदि कहता रहा । वे देर तक इन्तजार करते रहे थे, फिर खूब असन्तुष्ट हो चले गये। उनके मुड़ते ही आनन्द पिघल गया। मन हुआ, उन्हें पुकार कर वह एक सांस में वह सब कह दे जो सुनने के लिए वे इतनी तामझाम कर रहे थे। पर उसने उन्हें जाने दिया । लोग तारीफ दूसरों की तरफ ऐसे फेंकते हैं जैसे शटलकॉक । प्रतीक्षा करते रहते हैं उसके वापस आने की। अगर आप उसी अनुपात में नहीं देते तो आप उसकी राय में हमेशा के लिए एक खास सन्दिग्ध जीव बन जाते हैं। वह चाहता तो दो-चार रवायती शब्द कहकर काफी दिनों को उन्हें अनुकूल बना सकता था;
बेतरीय /७५ कॉफो-हाउस में अगले हफ्ते कॉफी के पैसे बच जाते, सिगरेटें भी मिल ही जाती । हो सकता है, एक दो बार बस की टिकिट भी। यह अपने फायदे खुद काटता जाता है। छह महीने पहले यह मकान-मालिक जीने को सफ़ाई पर न लड़ा होता तो उसे पहली को दौड़-धूप न कर पाच-मात तारीख तक किराया देने की मुविधा रही आती। नब पहली को तनखा नहीं मिल पाती है या एट्टी पड़ जाती है तो उसे अब उधार लाकर देना पड़ता है। ऐसी बातो को देखते हुए मानन्द बड़ा अमफल आदमी है। जब हम अपने प्रति ईमानदार रहना शुरू करते हैं, हम सिर्फ अपने तक ही रह पाते हैं, हमारा साग सफर हमसे शुरू होकर हमी तक खत्म हो जाता है। यहां तक कि कमी-कमी महसूस होने लगता है कि दूसरे की कीमत पर अपने प्रति ईमानदार रह सके हैं। कभी- कभी उसे खुशी होती है, उसने अब तक शादी नहीं की। घर में मां- वाप ने बहुत वार, आदर्श मौकों पर-सब्जी काटते, अखबार पढ़ते- उससे कहा कि अब उसकी शादी हो जानी चाहिये। इस बात से वह भी सहमत था पर उसने अभी तक यह निश्चय नहीं किया था कि शादी करनी चाहिए या होनी चाहिए। 'होनेवाली शादी से उसके शरीर के कुछ हिस्सों की जरूरतें पूरी हो सकती थी पर दिल और दिमाग के हिस्सो की जरूरतें पूरी होती इसमें उसे शक था। जिस दिन शरीर के कुछ हिस्मे उसे अधिक परेशान करते वह सोचता, दिल और दिमाग को बिना बोटे जिया जा सकता है, शादी 'हो' जानी चाहिए । पर फिर वह दिमागी कसरत के क्षणो में इस बात को नकार देता और अपने प्रति ईमानदार बना रहता। उनके जाने के बाद वह देर तक बिस्तर पर पड़ा रहा। खिडकी से सटी गली से एक सास समय पर, बराबर, रस्सी के सपने को आवाज भा रही पी। उसे पता था, वही आठ-दस साल की लड़कियां रस्सी फूद रहो यों जिनमें उसे कोई रुचि नहीं । इससे बड़ी लड़कियां खुलकर नहीं कूदतीं और उनमें उसे रुचि हो सकती है। वह लेटा-लेटा अनुमान लगाता रहा, कितनी लड़कियां खेल रही हैं। जो अकेला रहता है उसे मन बहलाने के साधन स्वयं जुटाने पड़ते हैं। रस्सी का समाचार बार टूटा तो उसने सोच लिया, चार लड़कियां हैं ! प्यास लग रही थी पर उसने पानी नहीं पिया। देखता रहा, कितनी देर बिना पिये रहा जा सकता है। पानी पिये विना इतनी देर भी रहा जा सकता है, यह अनुभव करते, ऊब कर वह पानी पी माया । उसे शाम, कला-केन्द्र में जाना था। आय का कुछ हिस्सा 'सर' कलाकारों में बांटेंगे। वह जानता है, फिर सन्तोष नहीं आयेगी और 'सर' उसका हिस्सा मानन्द के हाथ पर रख देंगे। वह इस स्थिति से बचना चाहता आया है पर सन्तोष ने 'सर' से इतनी सहजता से कह रखा है, 'सर', आप इन्हें दे दिया करें, मुझे सही सलामत मिल जाता है।' यह याद आते ही आनन्द को ढेर थकान आ गयी। फिर वही खींच. तान, घण्टों बे-मतलव बहस और वही उसका ग्रीन-रूम में उसकी गोद में लगभग लेटते हुए कहना---'अरे ठीक है आनन्द !' वह आनन्द से पैसे नहीं लेती-यह वात कोई और नहीं जानता । शायद जान ले तो चालाक माने उसे, कि वकील साहब की सारी जायदाद उसकी हो सकती है, पर वह थककर ऐसा करता है । वह सन्तोष से ऐसी बहस नहीं कर सकता कि वह चॉकलेट खाती चिपचिपी आवाज में कहती जाये- 'आनन्द ! प्लीज, अपना तो यह कॉमन पूल है, चार दिन कॉफी पिला देना तुम, वस हिसाब साफ़।' आनन्द को लगता है, सन्तोष उसे धागे का वेतरतीब ढेर समझती है, हर बात में उंगली पर एक गज ढील और लपेट लेती है। मानन्द ने 'सर' से पिछले साल कहा था, 'सर, यह 'पंजाबी उच्चारण स्टेज पर चल नहीं पायेगा।' सर बोले, 'भई, इसके फादर केन्द्र को ग्राण्ट देनी वन्द कर देंगे। छोटे-मोटे रोल दे दिया करेंगे किसी तरह ।' इन फादर साहब ने लड़की को मुक्त छोड़ रखा है ठौर । बेतरतीय/७० इने के लिए। पहले मुछ साल स्वयं मेहनत की, फिर जैसा राय पिता करते हैं, गुपपुप 'एसस्क्यूज मी' की मुद्रा मे परे हट गये । रातोप जी एक तो इतनी मोटी, पर उस , पुराने सास्टिया-सी यदकर लटको चाली । केन्द्र के हर छात्र पर उसकी मेहरयानी रह पेमी है। मानाद से उसकी एक शिकायत-'आनन्द जी, आप पर नही भामे कभी?' या नश्न - 'ययो, प्लाजा में क्या चल रहा है इरा हपते " मा पिसा-'तुम बड़े पैसिय हो आनन्द !' मानन्द की तीव्र इछा होती, कह दे-'आप फिर इतना एपिटव क्यों हैं सन्तोष यहनजी ?' लेटे-लेटे आनन्द हजारों बेतरतीय बातें सोता रहा। मान लो, कल से वह रोज मकानदार को आगे-पीछे निकलते हर पार 'सलसिरी अकाल' करना शुरू कर दे, तो स्थिति कितनी भिम हो जाये। फिर वह पहली को किराया सेयर जाये तो यह दाढ़ी सहलाते बोले, 'कोई गल्ला नही जो, फिर भा जाता। सारी को शटसकॉक की तरह उछालने पर यह संवाददाता अपवार में कहीं बीच में आस देता--'धी मानद अपने भावपूर्ण अभिनय के कारण सफलतम रहे ।' और मोटी सन्तोष को यह हंसी में भी छू दे तो यह उसे उसी वक्त टेवशी में भरकर अपने येम में डलवा ले और उसके आवास-प्रयास-राहयारा की नि:शुल्क व्यवस्था हो जाये। मानन्द तैयार होकर बाहर निकला। बहुत देर तक स्टॉप पर पा रहा, यस महीं भायी। उसे पुशी हुई कि यस नही भापी क्योंकि अब यह स्कूटर ले सरेगा। स्मूटर की बदहवारा गति रो प्रिय है। स्यूटर में उसे महसूस होता है-उसको सामर्थ्य यह गयी है। उस शहर में निरद्देश्य नहीं धूमा जा सकता। पर से निकलते ही एक उद्देश्य सामने होता है-सवारी मिलने का। यह बहुत देर तक विस्टा' पर टहलता रहा। यह उसकी तरह निएद्देश्य घूमने वाले कम ही थे। कुछ जवान सामिया सिर्फ बॉक-बार ७८ / छुटकारा खाने के इरादे से आयी थीं, उन्हें पानी में डूबी मर्करी रोशनी, नाइलॉन के तारों सी नरम घास, किनारे औंधी पड़ी नन्हीं-नन्ही नावें--कुछ नजर नहीं भा रहा था। कुछ लोग वहां प्रेम करने के खयाल से आये थे और आँख बचाकर गाहे-बगाहे अपनी प्रेमिका को कहीं सहला देते । आनन्द देर तक यों ही अनमनाया उनकी प्रेमिकाओं के चेहरों पर आती मुसकराहटें नोट करता रहा, हरेक के प्रेम की मियाद मापता रहा । काफी थक लेने पर वह कृषि-भवन तक पैदल आया। उसे कला-केन्द्र पहुंचने के लिए यहां से सीधी बस मिल जाती थी। बस-स्टॉप पर भीड़ थोड़ी थी। उनमें से कुछेक के हाथों में तीन-तीन किताबें थीं, जिससे जाहिर था वे ब्रिटिश-काउन्सिल-लाइब्रेरी से आ रहे थे; कुछ हाथों ने दफ्तर के मोटे वैग लटकाये थे। दूर से भ्रम हो सकता था ये किसी महत्त्वपूर्ण पद का भार घर ढोकर ले जा रहे हैं पर, दरअसल, वे खाने के खाली डब्बे और दफ्तर की स्टेशनरी ले जा रहे थे । वह बीस पैसे की टिकिट को मोड़ता-तोड़ता बस में बैठा रहा । केन्द्र का स्टॉप आने पर उठता-उठता वह बैठ गया। उसे आलस आ रहा था। सोचता रहा, अगर रास्ते में चेकर नहीं लाया तो इन्हीं वीस पैसों में वह चालीस पैसों की दूरी, घर तक, नाप सकेगा। .
शहर शहर की बात जिस तरह झुके कंधों से वाहें आगे किये हुए वह आया था, मुझे पहले ही समझ लेना चाहिए था कि वह विनम्न होगा। पर लोगों के बारे मै धारणाएं बना लेने की आदत मैंने छोड़ दी थी। उसने मुझे दूर से देख लिया था और चाल तेज कर दी। गायद उसकी चप्पल चलने में अड़चन डाल रही थी, उसने झुंझला कर चप्पल की तरफ देखा और फिर लाचारी से समझौता कर लिया। इस बीच मैं उस तक पहुंच गई थी। मुझे आगे जाना था, नये पुल की तरफ, पर उसने कहा, "नमस्ते, कैसी हैं ? 'अच्छी हूँ', कह कर मैं चलने ही वाली थी। 'आपने हेढ़ बजे की न्यूज सुनी ?' उसने पूछा । में चौंक गयो । मुझे लगा जरूर कोई नेता मर गया होगा या कोई नया कर घोषित हुआ होगा। मैने कहा, 'मुझे अफसोस है, मैं डेढ़ से पहले घर से निकल पायी । क्या खवर है?' 'मैंने ही कहां सुनी !' उसने अफ़सोस से कहा और अपने पास को . ८० छुटकारा किताव एक बगल से निकाल दूसरी बगल में दवा ली। जहां हम खड़े थे वहां से कुछ ही दूर पर रिक्शा-स्टैंड था, सामने वाले चौराहे के उस पार । रिक्शों के हुड ताने रिक्शे वाले ऊंघ रहे थे । उनके धड़ छांह में और पांव धूप में थे। मुझे झुंझलाहट हुई कि मैं पर्स बदलते समय गॉगल्स रखना क्यों भूल जाती हूं । अब बार-बार आंखों से पानी आ रहा था। लेकिन बावजूद इसके कि हम दोनों को धूप लग रही थी उसका इस तरह रुक कर बात करना मुझे अपने प्रति कांप्लिमेंट लगा। मैं एक रूखा ग्रस्त शहर से आयी थी। पहले पहल रुखाई से चोट लगने जैसी तकलीफ हुई थी, पर फिर आदत पड़ने लगी। मैंने रास्ता चलते आदमियों से वक्त पूछना बंद कर दिया था। सुरेंद्र को तो फिर भी खास फर्क नहीं पड़ा था । वह सुवह-सुबह अपनी दुकान लगाने में व्यस्त हो जाता था। बैंक की दीवार पर जो ओटला निकला हुआ था, उसी पर वह पहले लाल रंग के धागे आड़े बांधता, फिर उसमें कितावें फंसा देता । उस आठ फुट ओटले की हम लोगों को पांच सौ रुपये पगड़ी देनी पड़ी थी और पचास रुपये महीने किराया । पर यह आराम था कि बैंक का चौकीदार कितावें वहीं की अंदरवाली सीढ़ियों पर रखने देता था। लानी, ले जानी नहीं पड़ती थी। सुरेंद्र उन्हें एक पेटी में भर कर ताला लगा देता। दिन में वह इसी पेटी पर तौलिया बिछा कर वैठता था। पर मेरी बात और थी। मैं सुबह सुबह बीस मील दूर सफर कर स्कूल जाती। अक्सर प्रिंसिपल मुझे घूर कर देखती। जब मैं 'गुड मार्निग' कहती तो उस पर कोई अनुकूल असर न होता। कई वार गाड़ी दो चार मिनट लेट हो जाती और स्टेशन से स्कूल तक की दूरी का मेरा शेड्युल गड़वड़ा जाता। पर प्रिसि- पल को ऐसे बहाने कभी पसंद नहीं आये । उसे पता था बम्बई में लोग अपने सब दोष रेल-गड़ियों पर लादते हैं। उसने कहा, 'माप थक रही होंगी, समय-हो तो 'मनोहर' चलें ! ।
, शहर शहर की बात/१ थकान तो नहीं, पर धूप और भी तेज लग रही थी। इस लिहाज से यह शहर कपड़े धोने के लिए सर्वोत्तम पा। वम्बई में ऐसी तीखी धूप नहीं पड़ती थी। वहां अक्सर मौसम फिल्मी हो जाता। यह वात और थी कि रेल और वसों के लिए भागते रहने में हम उस मौसम को कभी फुरसत में देख नहीं पाये । इस शहर का चरित्न रात मे उभरता था, जब हमारे घर के सामने वाली सड़क से तरबूज, खरबूजे और लौकिया लादे ऊंटों की कतारें गुजरती । ऊंट की चाल इतनी कलात्मक और लयबद्ध होती है, यह मैंने अब ही जाना । उनके पैरो व गले में बंधे घुघरू धीमी ताल मे बजते जैसे मणिपुरी नृत्य हो रहा हो । उस रोज हम धूमते-घूमते चर्च की तरफ निकल गए थे । सुरेन्द्र ने पूछा, 'तुमने कौन-ना परफ्यूम लगया है, बहुत महक रहा है !' मैं चौंक गयो, 'आज तो मैं लगाना ही भूल गयी।' फिर हम दोनों बहुत झेंप गए थे । वास्तव में यह गंध उन फूलो की यो, जो चर्च के दालान में उग रहे थे और जिनके नाम हमें पता नहीं पे । सडक पर बस्तिया दूर-दूर पर लगी थी। उनकी रोशनी इतनी कम थी कि अंधेरे को हिस्टबं नहीं कर पा रही थी। हमे यह वातावरण अंतरंग लगा था, बिना देखे चीजों को महसूस करना, एक नया अनुभव। हम सम्मोहित-से बैठे रह गये थे । तरुण ने कुछ इंतजार कर चलना शुरू कर दिया । 'रिफ्लेक्स ऐक्शन' मे मैं भी चल दी। मैं इस शहर में नयी-नयी आयी थी और 'मनोहर' शब्द से मुझे तब तक कोई बोध नहीं हुआ, जब तक मैंने वहा पहुंच कर कर बड़े-बड़े अक्षरों में लिया नहीं देख लिया-मनोहर स्वीट मार्ट ।' मिठाई की दुकान में हम आखिर क्यों बैठेंगे या कोई हमे बैठने देगा, मैं यह सोच ही रही थी कि मेरे ठिठकने को दूर करते हुए उसने निस्सकोष ८२ छुटकारा दरवाजे की चिक उठा कर रास्ता बना दिया। अंदर बिना हाथों वाली छोटी-छोटी लाल रंग की मैली कुर्तियां थीं और दरार पड़े कांचबाली मेजें। तरुण मिन्न ने बगल की किताब निकाल कर मेज पर रख दी और कुरते के अन्दर वटनवाली जगह से हवा फूंकने लगा। फिर वह काउंटर की तरफ जाकर सौंफ की प्लेट उठा लाया। मैं देख रही थी कि अगर कोई नौकर जागा हुआ हो, तो उसे पानी के लिए हूँ । बास- पास को खाली जगह में दो-चार नौकर सो रहे थे। तद तक तरुण कुर्सी पर आराम से बैठ गया। इतनी छोटी कुर्सी पर भी वह फैल सकता था, मुझे आश्चर्य हुआ। उसने कहा, 'क्या लेंगी, ठंडा रसगुल्ला?' 'तौबा, इस गर्मी में मिठाई ! पहले ही हाजमा खराव है। हम कहीं और चल कर बैठते तो 'कोक' पी सकते थे। 'कोक क्या?' उसने पूछा। में उसके सवाल से अचकचा गयो, 'कोकमाने कोक और क्या !' पर उसकी मुद्रा बदली नहीं । पूरा नाम याद करने में मुझे देर लगी। मैंने जब बताया, उसके चेहरे पर परेशानी हटने का भाव लाया। 'बह-तो यहां भी मिल जाएगा !' उसने कहा। निकर संभालता हुआ एक छोटा-सा लड़का हमारी मेज के पास का कर खड़ा हो गया। तरुण ने उसने कहा 'दो कोका कोला!' फिर मुझने पुछा, 'आपको बाए कितने दिए हुए ?' मुझे ठीक से याद नहीं था। मुझे दिन गिनना कभी पसंद नहीं आया, शादी के पहले भी नहीं । वैने मेरी डायरी में मेरे जाने का दिन, विज्ञ का नम्बर और बसवाव की गिनती दर्ज थी। तरुण ने कहा, 'यहां आपको तफलीफ हो रही होगी, बबई तो बहुत बड़ा शहर है।'
शहर शहर की पात/६३ निकर वाला लड़का ग्लासों में कोक डाल कर ले आया था और स्ट्रॉ भी। मुझे योड़ी निराशा हुई । बोतल के विना कोक मुझे कोई संदिग्ध पेय लगता था । और फिर यही कोक बोतल मे कितना ज्यादा और ग्लास मे कितना कम लग रहा था । तरुण ने दो-चार घूट खीचे, सौफ के पर कोका कोला कम मीठा लग रहा है।' 'उसका तीखापन निकल गया होगा, पानी पी कर पहले मुंह फीका कर लो।' पर तरुण इससे भी पहले यह जानना चाहता था कि बम्बई को महानगर क्यों कहते हैं। 'याह, आपके रे महाशय ने तो फिल्म तक बना डाली और आप अभी सवाल पर अटके हैं। मैंने कहा । दरअसल मुझे भी नहीं पता था कि बम्बई को महानगर क्यों कहते हैं । फिलहाल मेरा खयाल था कि वहाँ बसें थाम यमों से ऊँची, रखे आम रेलों से तेज और मकान माम मकानों में मंहगे हैं, इसलिए उमे महानगर कहते हैं। तरुण को जिज्ञासा देखकर मुझे अफपोरा हुआ कि मैं स्विट्जरलैट से क्यों न आई। वह मुझे पर्याप्त पचि से देख रहा था । अब मुझे उसकी अपेक्षाओं से भय लगने लगा । मैं तो पिछले कुछ ही दिनों में अपने को वही सहूलियत में पा रही थी। जिम समय रिक्शेवाल ने मुझे स्टेगन में चौक सिर्फ चार पाने में पहुंचा दिया, मुझे ठमो लगने लगा था कि यह शहर मेरी चैव में है । जिम तमीज ये यहाँ पानवाला पान गिलाना था, उस तरह तो कभी विद्यार्यों मुझे अपनी कापी भी नहीं पकड़ा । सत्ताईम पत्ते में कॉसी, दम में माही परस्त्री और एह याने किलो गोभी साकर घमाउ हो गयी थी ! मुरेन्द्र ने भी पहली बार माने को मुान पाया था । बन पाट गारियों की विधि और निगरंट की ८४/ छुटकारा ब्लैक कीमत से। बम्बई में तो हम दोनों जल्दवाजी में एक-दूसरे के चेहरे और कपड़े भी भूलने लग गये थे। हमें वहां हर समय गैस ट्रबल और गाड़ी छूटने का खतरा बना रहा था। सच कहा जाए तो हमने बम्बई में अपने दिन ऐसे ही खतरों में बिताये थे-~-मकान छिन जाने का, नल में पानी न आने का, रेल किराया बढ़ जाने का, बरसाती न खरीद पाने का, बच्चा हो जाने का। हमें तो लगा था आजादी इस छोटे शहर में आकर ही वस गई है। पर मैं तरुण को निराश नहीं करना चाहती थी। उसने सुन रखा था कि वम्बई के हर दफ्तर में एयरकन्डीशनर है और हर घर में फ्लश की टट्टी । उसने सुना था वहाँ मूंगफली बेचनेवाला भी तीन सौ रुपये महीने कमा लेता है । वह वहां रहने वाले अपने एक अंकल की बात कर अपने को बम्बई के बहुत नजदीक या रहा था। 'तुम्हारे अंकल कहाँ रहते हैं ?' मैंने पूछा। 'घाटकोपर !' उसने मुश्किल से उच्चारण किया । मैं चुप हो गई। बम्बई के कई उपनगर मध्यवर्ग के लिए ही थे। बल्कि वहां अपने लिए उपनगर चुनना पति चुनने जितना ही महत्वपूर्ण था। आपकी सारी शेखी को आपका उपनगर एक सेकेण्ड में उधाड़ सकता था। इसलिए कई लोग वहाँ बांटा की तकलीफदेह, बसस्टाप से दूर, बस्तियों में रहना गवारा करते रहते थे वजाय इसके कि भाण्डुप में एक हवादार मकान लेकर रहें। यह वहां की वर्ग-सभ्यता का तकाजा था। पर तरुण के दिमाग में कांच का एक नमूना था, जिसे मैं तोड़ना नहीं चाहती थी। मैं उसे सतोषजनक जवाब नहीं दे पा रही थी और वह सोच रहा था मैं बम्बई के प्रति भावुकता में चुप बैठी हूं। मेरे खयाल में उस शहर के प्रति मावुक होना असम्भव था , वह मौका ही नहीं देता था । वल्कि जिन चीजों को हम सराहना शुरू करते, उन्हें । -
शहर गहर को बाद/
अगले ही दिन वह पुराना कह कर परेकर देवा।
ददम कोक खत्म कर रिसने लगा और परेशानी हे हिर
हिनादे हुरदांना, बस, कितनी लीवर पनी है, देविरेन ! यह ऐसी
बोनसस्त मुद्रा में कैमरा से रह उती को पता हो ।
'मनोहर' में पंचा गायद पुराना पा और उसके मोशे से साजों के
तेन नहीं जाना या या। वह काची कंचाई से चू-यू मार कर हा
था और हवा कम, पर मुझे अन्न लग रहा था। यह को हरीर
मुझे रोचक रिल्म की तरह पसन्द का रही था।
'स्कूल कैसा चल रहा है ?' मैंने पूग।
'वै हो, तरूण ने टाला। उसे शास समिर में हरि
नहीं दी । चण्डीगड़ में वहां हमारी मुलाकात हुई, वह अपने स्कुल
का प्रतिनिधि बनकर आया था। उस सेमिनार में शिक्षको को
कोशिश रही थी कि किस तरह हम ग्यास
सारा पर
दे सकें और हमारी यह कि किस तरह कम से कम करें, यस
उतने ही जिनके आधार पर हम प्रमाण-पत्र पा । हममे पंडीपा
के प्रति वैसा ही उत्साह था जैसे मुफ्त किसी शहर में पहुँच जाने पर
होता है। हमें यह जानकर आश्चर्य हुमा पाकि शहर में कोई पुराना
मोहल्ला या बाजार है ही नही। मेरे लिए तो यह मौका और भी
विशेष था, क्योंकि मैंने कई सातो साद घास और जमीन से उपते फूल
देखे थे।
आखिरी दिन तरुण मित्र ने मूल समापनको रिसायोनसा पर
एक छोटा-सा भाषण दिया जो सरकारी भायोगको को पसन्द
माया । हम यह भांप गये थे। इसीलिए उस समय हमने तालिया
बजायी। बाद मे हम व्यक्तिगत रूप से तरण से हसाये ( भाम
जोरदार रहा ।
अव यहां बैठी-बैठी में यह भी भूल गई थी कि घर BIHall
८६/छुटकारा । पैसे थे। थी। दरअसल में निरुद्देश्य ही निकल आई थी। सुरेन्द्र ने कहा कि उसे नाई के पास जाना है। उसके वालों की विशिष्ट शैली थी, जिसे हम दोनों आपस में रेवेल कट कहते थे । वह अपने वालों के प्रति उतना ही फस्टीडियस था, जितना सुबह की चाय और अखबार के प्रति । मैं उसके साथ यों ही चली आई थी। उसने कहा था, 'सैलून में देर लगेगी। मैंने कहा, 'कोई बात नहीं, मैं पुल तक घूम आऊंगी या विडो- शापिंग कर लूंगी।' कुछ देर घूम कर मैंने पाया था विंडो-शापिंग मुमकिन नहीं थी। सभी दुकानदार दोपहर में खाली थे और जैसे ही मैं शो-रूम की तरफ देखती, वे आवाज लगाकर अन्दर बुलाते । मैं घबरा गयी। मेरे पर्स में कुल चार रुपए और कुछ मैं पुल की ओर चली ही थी कि तरुण मिल गया। मैंने कहा, 'मैं जाना चाहूंगी । सुरेन्द्र अब तक आ गया होगा।' तरुण ने काउंटर पर जाकर पैसे दे दिये। जब हम बाहर निकले, तो धूप की तेजी से हमारी आंखें मिचने लगीं। मैं जल्दी से जल्दी सैलून के बाहर पहुंच जाना चाहती थी, पर तरुण की चप्पल की पट्टी विलकुल उखड़ गयी थी। 'रिक्शा ले लेते हैं !' मैंने कहा । तरुण अविश्वास से हंसा, 'इतनी सी दूर के लिए ?' मुझे फहने के वाद झेंप आई । दूरी वाकई बहुत कम थी, बस एक • चौराहा पार करना था। मैंने गौर किया जब से मैं यहाँ आई थी रिक्शा मैं ऐसे ले रही थी जैसे लोग टैक्सी लेते हैं। मैंने वात हल्की करते हुए कहा, 'फिर उसी रिक्शे में हम घर चले जाएंगे।' सैलून पर सुरेन्द्र करीव-करीव उतनी ही हजामत सिर पर लिए खड़ा था।
No text on this page.
प । 'क्यों भई, वस कब तक ठीक होगी?' उन्होंने तीसरी बार ड्राइवर और क्लीनर की झुकी छायाओं से पूछा । 'जी, यह गाड़ी है, वैलगाड़ी तो है नहीं। टेम लगेगा अभी।' ड्राइवर क्रम में तीसरी बार झल्लाया। वे लोग फिर अपनी जगह लौट आए। ड्राइवर ने सारी सवारियों को उतर जाने को कह दिया था बीर बैठे रहने से बचे लोग काफी देर सड़क पर खुश टहलते रहे। वस सड़क के किनारे कर ली गई थी और ड्राइवर और क्लीनर ने बारी-बारी से प्राणायाम की मुद्रा में लेटकर बस का निरीक्षण किया। उनमें घोड़ा मतभेद हुआ था कि खरावी इंजन में है या पहिये में। फिर इस बात पर समझौता हो गया कि खरावी इंजन में ही है। 'क्यों, यहाँ नासपास गाँव कस्वा कुछ नहीं है ?' 'शायद घोड़ी दूर जाकर धार आता है ।' उसने कहा । पास से गुजरते एक दूसरे यात्री ने कहा, 'योड़ी दूर नहीं साहब, वे / ८६ चौदह मील है धार। वे लोग अपने आप में सकपका गए। मीलों-मील सहक पर सिर्फ अंधेरा था। बहुत दूर-दूर पर लगी बत्तियों खास सार्थक नहीं लग रही थों । अंधेरा गहरा था, मासमान के कालेपन में अनेयता की जिद । उसे इस समय नौलखेका अंधेरा याद आ रहा था जो निहायत तरल होता था। यह अंधेरा आंखों की असमयंता इस हद तक बढ़ा रहा था कि पक कर मांखें देख नहीं रही यो। दूर से कभी दो आंखें चमक जाती यों, पर उससे कोई ग्रिल नहीं होता, क्योकि मालूम था कि रास्ते से बैलगाड़ियां यदा-कदा गुजर रही थी। कभी ट्रक निकल जाते । दनाते । लोगों ने बहुत बार ड्राइवर से अनुरोध किया कि किसी ट्रक को रुकवाकर सबका घार तक जाने का इन्तजाम कर दे, वहाँ से देख लेंगे क्या हो सकता है । ड्राइवर 'हुणेई ठीक हो जांदा ए' कह फिर इंजन 'पर झुक जाता। सव उसके आशावाद में काफी प्रसित त्रसित महसूस कर रहे थे। कुछ महिलाएं वापस बस में जाकर बैठ गई। उनके पति थोड़ी- थोड़ी देर में चौकीदार के अन्दाज में जा-जाकर अपनी बीवियो को देख आते, फिर धूमने लगते । चार-छ: बूढ़े लोगों की टोली बन गई और वे सरकार की नीति-अनीति पर काफी उत्साह से चर्चा कर रहे थे। उस बस में बच्चों की संख्या कम नहीं थी, पर वे रास्ते भर विना रुके खाते. खाते थक चुके थे और सो गए थे। उनकी समझ में नहीं पा रहा था, वे नया बात करें। बहुत विषय शुरू कर ड्रॉप कर चुके थे । उसने अब परम्परागत शैली में बात करने का प्रयोग क्यिा। 'आज सारे दिन मौसम काफी अच्छा था।' 'हां अच्छा था।' वह योड़ा झंझलाया। लड़कियां हर बात क्या ऐसे 'डिटो' करती ६ .
.६०/छुटकारा चलती हैं। वह काफी देर चुप रहा, अपने जूतों की आवाज ठोस सड़क पर सुनता रहा । उसके चलने की आवाज शायद नहीं हो रही थी। कम से कम सुनाई नहीं दे रही थी। उसने अपनी चमड़े की जैकेट और अच्छी तरह बंद कर ली। इसमें वह अपने को वहुत सुरक्षित महसूस करता था, मौसम के आगे और दूसरों के आगे। 'समय क्या है ?' -~~-उसने पूछा। 'साढ़े नौ।' उसने सिगरेट की रोशनी में घड़ी की सुइयों की नोक देखीं। 'नहीं, उसने अपनी घड़ी पर आंखें गड़ाते कहा-~'इस समय नौ पचपन है। 'तुम्हारी धड़ी तेज है।' वैसे इस समय उसका तेज या धीमे होना कोई माने नहीं रखता। 'वस विगड़े कितनी देर हो गयी ?' उसने पैकेट निकालकर सिगरेटें गिनी । पाँच सिगरेटें खत्म थीं। पंद्रह पांच पिचहत्तर । उसने कहा-'सवा घण्टा।' 'अरे, आपने ठीक बता दिया।' 'तुम्हें कैसे पता ठीक है? 'मैंने वस से उतरते ही घड़ी देखी थी।' वह फिर चुप हो गया। उसे कई बात एंगेज नहीं कर पा रही थी। वह चाहता था बस जल्दी ठीक हो जाए। उसके बैग में अधूरी पढ़ी 'एन एरिया ऑफ डार्कनेस' पड़ी थी और वह चाहता था, वह जल्दी से घर पहुंच जाए और रजाई में घुसकर नायपॉल को थोड़ा और पढ़ ले। उसे काफी जिम्मेदारी महसूस हो रही थी कि अरुणा को घर पहुंचाना है। और उसके आदर्श भाई साहब नौ बजे से बस स्टाप पर इंतजार कर रहे होंगे। अचानक ड्राइवर 'ओ मारा' कहकर खुश हो लिया और क्लीनर ने 'बादशाहो' कहकर सवारियों को बुला लिया। इस समय चलती बस में कोई नहीं बोल रहा था। सब इन्तजार से थक गए थे । वह और वह पास-पास बैठे थे, अपने मे अलग-अलग । वह ऊंघ नहीं सकता था । उसे बैठे-बैठे ऊंघने बालों से पिढ़ पी। उसने एक दो-बार परीक्षा ली उसकी 'तुम्हें गति अच्छी लगती है ?' 'हा पर शोर के बिना । यह बस तो मौत का कुआं लग रहे है। मौन गति मे महमूस होता है, जैसे अन्तरिक्ष में उड़ रहे हैं । अरुणा को एक साथ इतने वाक्य बोलते उसने पहली वार ध्यान से सुना। कुछ शब्द वस की आवाज से दब जाते थे, फिर उभर आते, जैसे थोडे खराव ट्राजिस्टर में शॉर्ट वेव स्टेशन । उसकी आवाज मे मीठापन नहीं था, ठहगव था। उसका ध्यान फिर हट गया । उसका मन नहीं लग रहा या । बहुत वार घंटों उसका मन नहीं लगता था । दफ्तर में अवे ऊबै वह काम करता रहता है और ऊबे-अवे ही घूमने, खाने के बाद सो जाता था। उसके आगे बैठी महिला का गोदी का बच्चा जाग गया था और निरुत्सुक आखों में बस का निरीक्षण कर रहा था। उसने हाथ बढ़ाकर उंगली बच्चे को थमानी बाही । बच्चा मां की तरफ मुहकर पलट गया थोड़ी देर बाद बच्चा फिर उसे देखने लगा । वह हसा । उसे लगा, जिन निष्कों में वह अब जीता है, वे सब इस बच्चे ने अभी से जान लिए हैं । वडा होकर यह आधुनिक युग की सहीतम व्याख्या कर सकेगा। वह देर तक छोटी-सी टी-शॉप के बारे में सोचता रहा, जहां उसका रोज जाना दिनचर्या बन गया था । वहीं जाना उसे दफ्तर जाने से भी ज्यादा जरूरी लगता था । एक दिन बहुत बारिश में उसने कैजुअल लोव ली थी और शाम को टैक्सी में टी-शॉप गया था। वहां का एक खास व्यक्ति-वर्ग था । उसका एक दोस्त जो सिर्फ 'कामू' पढ़ता था. 'कामू' वोलता या और आत्महत्या को वात आँखों में ऐसी चमक भर कर कहता था जैसे लोग अपनी सुहागरात के बारे में बताते वक्त २/ छुटकारा हैं। एक और था जिसे घर जाने की हमेशा जल्दी रहती थी और हमेशा सबसे देर में पहुंचता था। उसे मोरारजी देसाई से चिढ़ थी और हर वात को वह ईसाईवाद का विकृत रूप मानता था। तीसरा आदमी नाटा और वातूनी या ! वह जरा-जरा सी बात पर उत्साहित हो जाता था। जब वे लोग बात करते-करते थक जाते, वार्तालाप का धागा उसे पकड़ा देते, वह देर तक उससे खेलता रहता । उसका एक अन्य दोस्त 'वीट ग्रुप' से अनोखा तादात्म्य महसूस करता था और अजीबोवरीव कपड़े और वेतरतीव वालों में आलोवस्की, क्रीले की वात ऐसे करता, जैसे सुवह की डाक से ही उनके खत उसे मिले हों। जो उनमें सबसे छोटा और नया था, वह अक्सर चुप रहता था, इत्मीनान से चाय पीता और लगातार सड़क देखता रहता था । इस व्यक्ति-वर्ग के शौक गिने-चुने थे.-बहुत देर तक चुप रहना, फिर वहुत बात करना और चाय पीना । पास बैठी अरुणा में उसे कोई माकर्षण नहीं दीख रहा था। वह देर तक उसे देखते उसकी कैंडिड स्टडी कर सकता था । वह काफी निश्चल बैठी थी-गोद में पसं, पर्स पर हाथ रखे । वह कहीं नहीं देख रही थी, बाहर भी नहीं। महज समय काटने के लिहाज से वह अनुमान लगाने लगा कि अक्षणा इस समय क्या सोच रही होगी। शायद कॉलेज के काम, या अगली नयी पिक्चर, या अपने आदर्श भाई साहब के बारे में जो नौ बजे से ही स्टेशन आ गए होंगे और देर होने पर घड़ी से नापकर दो घण्टे नाराज होंगे। उसे महसूस हुमा, लड़कियां काफी फ्लैट बातें सोचती हैं। उसने अपनी बहन को काफी नजदीक से देखा था। उसे अपनी बहन कभी पर्याप्त रोचक नहीं लगी । वहन को चिट्ठी लिखते समय वह अन्तर्देशीय पन में ढाई इंच ऊपर और ढाई इंच जगह नीचे खाली छोड़ता था । वहन की कपड़े को पसन्द उसे विल्कुल पसन्द नहीं थीं । घर जाने पर कभी उसके साथ जाने को तैयार होती तो वह उसकी तमाम साड़ियां रिजेक्ट कर + कर देता। जब भी उसने वहन से गम्भीर किस्म की कोई मात करणी पाही, उसने पाया, उसके दिमाग में सिर्फ पॉकेटमनी, पर पुपर और फिल्मी गीत भरे हैं। बिना किसी उत्सुकता के उमने देवा, अरुणा हरे रंग की साड़ी और काला कार्डिगन पहने थी, जो उस पर विस्कुस महो राम रहे थे। यात्रा उसे फोकी लग रही पी। उमे पहरा पीजे पीकी तगती भी। खाना, दवा, बियर, इन सबके यह तो पर्याय ईजाद करणा पाहतापा वह और उसके साथी अधिकतर साहित्य और राजनीति पर कहा करते थे । उन्होंने अक्सर और विषयों पर यास करली पाही- सा, भारत पर । उन्होंने पाया, वातें फिसलकर पटरी पर मा जाती। भारत का महत्व उन्हें बस ऐसा लगता पा जैसे आइसक्रीम: एण मरोही विषय पिघल जाता और उसे जल्दी कन्ज्यूम कर सेना ५६ता । उगती अपनी परेशानियां पी, पर रन परेशानियों का साहलुक यसो, पर और दोस्तो से था। उन लोगों ने 'कामू पाना परम कर दिया पार 'मायनेस्को' और जने के बाद अब 'एसवर एल्यो' पारो थे। मग 'रूखो पीढ़ी के लोग' कहते थे, ये इसे काम्प्लीमेंट के तौर पर रोते। उसे इस बात की खुशी थी कि अक्षणा योल नहीं रही थी। रहना अच्छा लगता आया है । यह अपने पर में यानी माग पाटी चुप बैठा रहता है। उसने अरुणा से पूछा--'तुम पर से जानोगी ?' 'आप छोड़ यायेंगे, यह विश्वामरी योगी, फिर रिया- 'प्लीज । उसने कुछ नहीं कहा। इसनी रात में रेजि हर ant नहीं जाना पाहता था। वे मी उमे किमी को छोड़ने जाने, रिमाल करने जाने से चित्र दी। बहुत माता में टम दिमाग में पराग घुघना होता जा रहा था। वह घर का मामय कमरा गो कमो का १४/ छुटकारा स्टेशन पर उतरने तक उसे लगा, अब वह जल्दी से अरुणा से नमस्ते कर घर चला जाना चाहता है । पर उसके आदर्श भाई साहब वहां कहीं नहीं थे। 'तुम्हारे भाई साहब काफी चिन्तित होकर चले गए होंगे।' 'अरे नहीं, वह तो मुझे ऐक्स्पेक्ट भी नहीं कर रहे होंगे । मैंने कहा था, मैं धार में मामाजी के यहां एक-दो दिन रुककर जाऊगी।' अरुणा ऐसी निश्चिंतता से हंसी, जैसे दोपहर के बारह बजे हों। 'तो तुम उतर क्यों नहीं गयीं धार?' 'उस समय तक ग्यारह बज गए थे और मामाजी के यहां नौ बजे तक सब सो जाते हैं । मैंने सोचा, छोड़ो, और फिर आप घर पहुंचा ही देते।' अरुणा मुसकराते हुए अच्छी लगती थी । उसको हँसी मुक्त थी, यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता थी । अधिकतर लड़कियां सतत अभ्यास- प्रयोग से अपनी मुसकराहट ट्रेजी-रोमाण्टिक बना लेती हैं। वह सिगरेट का बहुत अन्दर तक कश खींचता हुआ बोला, 'टैक्सी ढूँढ़ें ? टैक्सी वालों ने मना कर दिया। रात में रेजिडेन्सी वे किसी कीमत पर नहीं जायेंगे । उनकी जिद है और टैक्सी वालों की जिद सामूहिक होती है। उसे अब अरुणा खासा बवाल मालूम हो रही थी। उसे ठण्ड लग रही थी और वह सड़क पर अधिक समय विताना रोचक नहीं मान रहा था, खासकर जब बीच याना में दो घण्टे पहले भी वे सड़क पर थे । सदियों में सड़क रहस्यमय कम और नासमय ज्यादा हो जाती है । सिगरेट खत्म कर उसने एक टैक्सी का दरवाजा खोला और अरुणा से बोला, 'वैठो।' जिस सहज ढंग से अरुणा ने साथ चलना मन्जूर कर लिया था, वह उसे अच्छा लगा। अरुणा चुप थी और चुप्पी हमेशा सुविधाजनक होती है अपने पीछे-पीछे अपनी अटैची स्वयं उठाए आती अरुणा उसे सही लग रही थी। उसे मोड़ पर पड़ी दो-एक इंटों से अरुणा को आगाह करना पड़ा और सीढ़ियो पर दियासलाई जलानी पड़ी। अरुणा ने समझदारी में घर की एक मान्न चारपाई पर सोने लायक तैयारी कर ली । गुसलखाने से आकर उसने कुछ नहीं मांगा, पानी भी नहीं। कमरे में उसकी उपस्थिति उसे उतनी ही सहज और अनाटकीय लग रही थी जितनी अपनी । अरुणा के वहां होने से जरा भी अमुविधा नहीं हो रही थी। इस बात का आश्चर्य उसे खुशी दे रहा था। इस नई उपस्थिति में उतनी भी असुविधा नही थी जितनी अकस्मात् मां के उज्जैन से आ जाने पर होती थी। तब उसे जल्दी-जल्दी सेक्सोलाजी' और 'वुमन' की प्रतियां बिस्तर के नीचे डालनी पडती थीं, सीढ़ियों पर वल्व लगाना पडता था और सिगरेट के टुकड़ों को कोट की जेब में करते जाना होता था। वह कहां सोएगा, इस पर बरुणा ने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई । उसने कहा, उसके पास यही एक कमरा है । अरुणा ने स्वीकार किया, इन्दौर में मकान की तंगी बढ़ती जा रही है । वह दीवान पर दो में से एक तकिया लेकर चला गया। खिड़की खोलकर बत्ती बुझा दी। उसके पैर दीवान से नीचे लटक रहे थे, उसने टेढ़े कर चारपाई से टेक दिये। यात्रा के बाद की नीद बड़ी गहरी होती है, निश्चेष्ट । वैसी नीद नसों को एक-एक कर ढीला करती जाती है । कमरे में नोंद थी, रजाई और कम्बल के नीचे। सिर्फ रोशनदान में कबूतर फड़फड़ा रहा था। मुबह जब उसकी आंख खुली, उसने पाया, अरुणा ने विस्तर समेट- कर चारपाई के एक ओर तहा दिया था और मुंह घोकर मेकअप कर चुकी थी। उस समय उसके चेहरे पर उतनी ताजगी तो नहीं यो जितनी नहाने के बाद होती है, पर उतनी अवश्य थी जो सुबह के साडे सात बजे मली लगे। वह सुन्दर नहीं थी पर उसके व्यक्तित्व में किसी भी ६६ / छुटकारा कोण से उसका सुन्दर होना जरूरी नहीं था। मटैची में तौलिया रखकर अरुणा ने जो मुद्रा बनाई, वह चलने की थी। वह उसे छोड़ने वाहर नहीं निकला, क्योंकि उसे दफ्तर को देर हो जाती और वह अपनी कैजुअल लीव खत्म कर चुका था। उसकी नींद भी अभी पूरी नहीं हुई थी और वह आज विना नहाये जाने की योजना वना रहा था। अब दिन पूरा निकल आया था और अरुणा ने कहा,.. 'जेल रोड उसकी जानी-पहचानी जगह है और बड़ी आसानी से वह टैक्सी ले लेगी।' रात में हम थोड़े-थोड़े असमर्थ हो जाते हैं, दिन में फिर अपनी शक्तियां जेवों में भर हम चल पड़ते हैं । अटैची उठाकर जाती हुई अरुणा उसे ऐसी लगी, जैसे टी-शॉप का. उसका कोई दोस्त, या वह खुद, या कोई अन्य उछटा-सा परिचित । वह अपनी चारपाई पर पैर फैलाकर लेट गया। । 00 दो ज़रूरी चेहरे - भाई चुप रहे। संकोच मुझे भी बहुत हुआ पा । इस तरह खाने के बाद मैंने उनसे ज्यादातर आगामी फिल्म या पाट्यप कम में जरूरी अन्य पुस्तक के लिए अनुमति मांगी थी। वे खाने के बाद हल्के हो जाते थे, बेफ़िक्र । जिन बातों को मनवाना ही होता था, उन्हें मैं तब पूछनी थी। मुझे खाना खाना भारी पड़ा था। सूप पीते ही पेट भर गया था, पर मैं उनके सामने नॉर्मल रहना चाहती थी। होता यह था कि भाई कोर अपने मुंह में डालते थे, देखते मेरी प्लेट में । फिर कहते कुछ नहीं, धीरे- धीरे खाने की सब प्लेटें मेरी कुर्सी तक खिसका देते । में सात दिन पहले अचानक बड़ी हो गई थी। इन सात दिनों में मेरी समझ में नहीं आया था कि मैं घर में कैसे रहूँ। पर ही पता नहीं कैसा कैसा हो गया था। एक कमरे से दूसरे में आती और कुछ ढूंढ़ती- ढूंढ़ती तीसरे में चली जाती, फिर वहाँ से बालकनी में खड़ी देर तक झांकती रहती बाहर । वोलती तो बातचीत में नौकर को रफीक कहने के -६८/छुटकारा - बजाय 'श्या...' कहते-कहते रुक जाती। दफ्तर से लौटने पर भाई के. ‘लिए दरवाजा खोलती और श्याम को न पाकर सुस्त हो जाती। फिर भाई की बातों पर आंखें जमीन, दीवार, फर्नीचर वगैरह पर टिकाकर हँसती और साथ में कहती, 'भाई, मैं जाऊँ जरा देर को ?" भाई बड़े अच्छे ! कभी नहीं पूछा, 'जाना कहां है ।' बस इतना, 'खाना खाने के समय तक आ जाएगी?' मेरा रोज मन हुआ था भाई को वताहूँ। भाई के इधर-उधर देखा और चुप हो गयी। कोई भी तो नहीं, भाभी, भतीजा, जिसे कह दूं पहले। और श्याम ! उसने पहले दिन ही यों उघाड़ कर सामने रख दिया, 'ले देख, यह होता है लड़का और यह होती है लड़की और यह होता है 'रिश्ता !' मैं डर के मारे चीख भी नहीं पायी। खाली आँखों में यह रहस्योद्घाटन बैठ नहीं रहा था। श्याम झुंझला कर बोला, 'तू डरेगी ही डरेगी या प्यार भी करेगी ? जिस्म है कि पानी !' मुझे बुरा लगा था । आभास हुआ, उसने मेरी शान के खिलाफ कुछ कहा है और मैं विरोध में कस गयी थी उससे । श्याम ने दूसरे दिन ही पूछो । पूछा भी कैसे ! 'कल जो हुआ रोज हो तो !' 'उई, मैं मर जाऊँ, सच !' मेरी साँस वाकई रुकने लगी थी। 'मैं मरने नहीं दूंगा अब !' मैंने कहा, 'पर लड़के तो कभी शादी नहीं करना चाहते ऐसे !' श्याम बोला, 'मैं तो ऐसे ही करता जब भी करता, ऐसे ही करूंगा।' मुझे खयाल आया था तव; 'भाई !' श्याम ने वाह में समेटा और कॉफी पिलाने ले गया। उसे शायद कभी महसूस नहीं हुआ कि हमारी पहचान कितनी नयी है। इससे पहले हम एक दूसरे को नहीं के बराबर जानते थे। वल्कि बात न्य भी थी कि श्याम का कहना था एक बार वह अपने दोस्त के साथ - 1 यो जरूरी चेहरे /६६ हमारे घर आया था और उस दिन मैंने उन लोगों को चाप घाफर की थी। पुझे विल्कुल याद नहीं था। वैशे कही भी न देखना मेरी आदत थी। सहेलियों और परिवार के लोगो के अतिरिक्त मुझे बहुत कम व्यकियों के चेहरे पाद थे। श्याम को यह भी याद था, मैंने उस रोज बाल धोये थे और सुले बालों से हो मैं ड्राइंग-रूम में आ गयी पो । मेरे अलावा श्याम को हमारे घर में सब कुछ बड़ा मिचा-भिवा लगा या। मे भाई कतई पसन्द नहीं आये और उसने नीचे उतर कर अपने दोस्त से कहा था, "ऐसे और कितने वाकिफ हैं तुम्हारे ?' लम्बा चौड़ा श्याम मुझसे एक फुट ऊंचा निकलता। उसके सामने मैं अपने को बहुत छोटा पाती । मैंने एक दिन ऊँची एडी की चप्पल पहनी, तो 'वानूजा' में ले गया, एकदम चपटी प्रे रंग की चप्पल मेरे पात्र में हलवायो और जव मेल्समैन ने पूछा, "ये पैक कर पुरानी ?' ती 'रहने दो' कह कर मुझे वाह में समेट बाहर आ गया। श्याम ऐसा कि न कुतुब जाये, न इण्डिया गेट, न जन्तर-मन्तर और न पुराना किला, बम सडकों पर साय भटकने-भटकते रुक जाये, 'मुझसे मव बर्दाश्त नहीं होता!' उनका कहना है और मेरा डर एक साथ कूद. फर हमसे चिपक जाते और फिर श्याम सल्लाना शुरू कर देता। मैंने उससे कहा, 'मैं तो घर पर नहीं कह सकनी उसका सीधा जवाब, 'तो बिना कहे आ जाओ।' मेरा हर आंखों में बदबाकर अब निकले, अब निकले ! श्याम ने सुझाया, 'शहा, मैं कहूँ !' में भाई को जानती थी। मेरे अलावा किमो और से मुनते, तो उसे जेल न भिजवाते, नौकर से बाहर न निकालते, बस ऐसी हिकारत में देखते कि वह सोचता यह क्सिी गलत घर मे तो नहीं आ गया। फिर तीन- चार, दिन बाद कभी मुझसे जिक्र करते हुए कहते, 'कैसे कैसे लोग मिमा, देखा!' और मुझे मैटिनी के लिए तैयार होने को कह देते। !" . .
१००/छुटकारा । उसे इतना दफ्तर से बाहर भाई ने मुझे छोड़ शायद ही किसी को गम्भीरता से लिया हो । सबकी वार्ते उनके ऊपर से गुजर जाती। मैं होती, तो मेरी तरफ देखते, 'डील विद इट,' न होती कहते, 'अच्छा देखेंगे।' श्याम ने कहा, 'तुम अपने भाई को 'ग्लास विद केयर' की तरह रखती हो क्या ? मैं बात करूं 'इफ ही इज ए मैन' !' मैंने इतनी जोर-ते सिर हिलाया कि सारे बाल विखर गये, 'प्लीज. न, लच्छा मैं आज कर लूंगी, डेफिनिट।' श्याम इस बीच बम्बई आया; उसके किसी दोस्त ने खुदकुशी कर ली थी और उसकी जेब में एकमान पता श्याम का था। श्याम को मैंने पहली बार दुखी देखा था और मुझे दहशत हुई थी कि दुख जड बना कर डाल देता है । वह 'गुफा' में जोर-जोर से प्याले पर चम्मच वजाता रहा था और हर बार मेरी जांखें, भिच जाती थीं। वैसे यह काफी अजीव था, क्योंकि आम तौर पर श्याम को सन्नाटा पसन्द था। मेरे साथ बैठकर वह किसी आवाज को बर्दास्त नहीं कर सकता था। इसलिए 'गुफा', उसे सबसे अधिक पसन्द थी। उसके अनुसार दिल्ली में और कहीं एकान्त पाना असम्भव था । इस समय वहां कोई भी नहीं था और 'गुफा' खाली दफ्तर-सी उजाड़ लग रही थी। श्याम उस दिन मेरे जिस्म से सटा नहीं था और रात में ही चला गया था। आज वह लौटा तो और भी अकेला व वेतन्त्र होकर । आते ही उसने कहा, 'पूछा?' मैंने गर्दन हिला दी। वह चिड़ा, 'मुझे परेशान न किया करो मिनाती। मैं इतनी बड़ी निराशा से लौटा हूँ. तुम मुझे यह खुशी भी नहीं दे सकती ?' मैं शर्मिन्दा हो गयी और मैंने बताया था, 'भाई दफ्तर में व्यस्त थे, मैं उन्हें डिस्टर्व नहीं करना चाहती घो।'
दो जरूरी चेहरे / १०१ ।' 'तुम मुझे डिस्टर्व करती हो वह मैंने अपना डर बताया, 'माई अगर !' 'माई मगर जरा भी आनाकानी करें, तो पहनना चप्पल और जीना "उतर आना, समझी। मेरा पता है ३२३-नगर ।' मुझे श्याम खूस्वार लगा था और मैं बिना काफी पिये आ गई थी। यह थी आज की शाम ! भाई आज भी हर दिन की तरह बाराम से बैठे थे, पैर फैलाये। मैंने अपनी भापा को कभी इतना कमजोर नहीं पाया। जव किसी तरह वाक्य नहीं बना, मैंने सीधे कह दिया, 'भाई श्याम हमसे शादी करेंगे।' भाई की आंखें चौंकी फिर चुप हो गयीं। उन्होने मुझे अच्छी तरह देखा और देखते रहे । इससे पहले उनकी आंखें मैंने कभी नहीं देखी थीं। मौका ही नहीं पड़ा। मचलती, ठुनकती मैं, भाई से न कभी लाट 'लेती न लताड़ 1 भाई बोलते भी नहीं थे। किसी दिन मुझे कम अच्छी • सलवार कमीज पहने देखते, तो मैं पाती अगले हफ्ते मेरी वार्डरोब में एक दर्जन सलवार कमीज के कपड़े लूंसे हुए पड़े हैं। कभी मैं पढ़ते-पढ़ते सो ‘जाती, तो दूसरी रात देखती रफीक कॉफी का प्याला लिये सामने खड़ा है कि 'साहब ने भेजा है।' भाई बोलते बहुत कम । मैंने उन्हें कमी एक साथ पन्द्रह-बीस वाक्य •बोलते नहीं सुना । ममी बताती थी पहले भाई बहे ऊंचे-ऊँचे हंसते थे। उनकी हंसी से पड़ोसी जग जाते थे, पर दो साल पहले तेरह दिसम्बर को बोइंग प्लेन क्या गिरा, भाई गूंगे हो गये । उसके मागे, तो बस यह हुआ, -दो छोटी-छोटी गठरियां हवाई अधिकारियो ने भाई को पकड़ा दी कि 'आप अन्तिम संस्कार कर लें इनका।' भाई ने घर आकर नौकर से सारे, अलबम जलवा दिये, बेडरूम से भगवान की मूर्ति जमना में फिकवायी और पिन्टू को स्कूल की सारी कितावें चौकीदार को देकर ममी को छोटी-सी चिट्ठी लिखी।
१०२/छुटकारा ममी ने खूब हुए मुझे ट्रेन में विठाया, 'भाई का मन लगाना, यह नहीं कि सहेलियां बनाकर फक्के मारती धूमो ।' भाभी के समय में कभी दिल्ली आकर नहीं रही थी। उन्हें, बस शादी में और उसके बाद दस-पन्द्रह दिन को देखा था। इतना भर याद था कि उन दिनों में भाई के कमरे में कभी कूदत्ती-कूदती पहुंच जाती थी, तो भाभी भागकर वायरून में घुस जाती थीं और भाई अचकचा कर वैठते हुए पूछते थे, 'स्कूल से आ गयी?' घर में उन्हें देखने बहुत से लोग साते थे और भाभी उनके पैर छूती, तो ममी खूब हंसती थीं, 'हमारी वह को पैर भी छूना नहीं आता।' मैं सहमी-सहमी भाई के पास आयी थी। मेरे आने के दिन घर में कोई परिवर्तन नहीं हुआ । स्टेशन पर नौकर और ड्राइवर आये थे । घर पहुंच कर मैं भाई के कमरे में गयी तो वोले, 'आ गयी, अच्छा, तेरा कमरा वहां है वायें।' फिर शाम को पूछा था, 'तू घर में अकेली सोती थी न !' भाई ने कई दिनों तक मेरे साथ टेबिल पर खाना नहीं खाया। चिबिर-विविर इतना बोलने वाली मैं, यहाँ आकर ऐसे चुप हो गयी कि खाँसी आती, तो कमरे का दरवाजा बन्द करके खांसती और दिन भर 'विस' की गोली दवाये रहती गाल में । कॉलेज से लौटकर अक्सर कहीं नहीं जाती, बस अपने कमरे में कभी नया बॉल-पेपर चिपकाती, कभी रंक की सब कितावें पलट कर जमाती, कभी वार्डरोब वहाती और ज्यादातर वस वैठी रहती बिस्तर पर 'इनिस रॉविन्स' या 'मेरी कॉरेलो' लिये। भाई एक दिन बोले, 'कहीं जाया कर घूमने ।' मैंने कहा, 'मन नहीं होता।' एक-दो बार जव भाई अपने कमरे में कै हुए थे, मैंने जाकर देखा ।
दो जरूरी चेहरे /१.३
माई वैसे ही वैठे रहे और कॉफी आने पर अपने प्याले में मुझे बना कर
भाई पूछते, 'पढाई ?'
'ठीक!
मेरे और भाई के बीच की वर्फ धीरे-धीरे कच्ची होती गई। 'ओल्ड
विक' के नाटक शहर में आये, तो मैंने कहा, 'हमारे कोर्स मे हैं, आप
चलेंगे?'
भाई चुप रहे।
अगले दिन उन्होंने हर नाटक के दो-दो टिकट मंगा लिये । 'एज यू
लाइक इट' देखते समय मैंने पहली बार भाई को मुस्कराते देखा। फिर
'मिडसमर नाइट्स ड्रीम' में तो हंसे भी। घर लौटते समय भाई ने मुझे
एक हाथ मे भींचा तो मैं कबूतर के पंख जैसी हल्की हो गई। और
अपने इन्ही भाई को मैंने चौंका दिया था।
भाई मुझे लगतार देख रहे थे।
में सकपका गयो, 'आई मौन में बताती हूँ"यह...।'
भाई ने मेरा हाय पकड़ कर छोड़ दिया।
मैंने स्लीवलेस कमीज पहन रखी थी। मुझे सी महसूस हुई और
मैंने दुपट्टा अच्छी तरह वाही पर लपेट लिया। भाई काफी देर बाद
वोले, 'कब करंगा?
मैंने कहा, 'पता नहीं, यह सब आर पर होगा, भाई।'
भाई हसे, 'कव कहा श्याम ने ?'
मैं कैसे कहती श्याम में मेरा परिवर सिर्फ सात दिन पुराना या ।।
सात दिन पहले वह मेरे लिए महज नाम था, भाई के परिचितों में एक ।
दो-एक बार उमे विश्वविद्यालय की साइरी में देखा था और तब सिर्फ.
यह सोचा पा कि यह आदमी कितना 'लकी' है, पर के रकवाली
किताबों तक भी पहुंच जाता है ।
.
।
-
१०४ / छुटकारा
मैंने गोलमोल किया, 'वे शुरू से कह रहे हैं !'
'हूं, उसकी शादी नहीं हुई अभी तक ?'
जाहिर है, मैंने सोचा और चुप रही ।
भाई बोले, 'तुम उसे जानती हो न ! मैं विलकुल नहीं जानता ।
मेरे एक वाकिफ का वाकिफ है वह
मैंने कहा, मैं उसे जानती हूँ।
भाई बोले, 'अच्छा, यह तुम्हारा पढ़ने का वक्त है, रफीक से कहना
कॉफी देगा।'
मैं असन्तुष्ट-सी उठी।
मुझे उत्तर नहीं मिला था। मैं जानती थी 'गुफा' में कल फिर
जवाबदेही होगी और वह लम्बा-चौड़ा श्याम बर्दाश्त खोकर कहेगा,
'ठीक है, मैं घर चलूगा अभी तुम्हारे साथ ।
घर से आध फर्लाङ्ग दूर ही मैं श्याम के स्कूटर से उतर जाती थी।
मुझे हर तरफ से खौफ खाता, 'देर' पढाई', 'लोग', 'भाई,' 'ठण्ड' ।
कभी-कभी कनॉट प्लेस में घूमते समय मेरी हथेलियां ठण्डी पड़ जाती,
"भाई यहाँ इस समय जरूर आ सकते हैं।'
श्याम बांह में समेट मुझे डिफेन्स कालोनी ले जाता। मैं वहाँ हजार
बार ठिठकती, "भाई यहां अपने दोस्तों से मिलने...'
श्याम खीझ जाता, 'यह भाई दो-दो जगह एक साथ कैसे आ
सकते हैं !
शनिवार को श्याम कहता, 'आगरा चलें !'
मैं जहाँ-की-तहाँ रुक जाती।
श्याम भाई से सिर्फ साढ़े तीन बार मिला था। उसका कहना था
कि इनमें से तीन बार भाई ने 'हेलो, कैसे हैं,' 'नमस्ते', 'आई सी', के
अलावा अपनी किसी शब्दावली का परिचय नहीं दिया था और साढ़
तीनवीं बार उनकी कार गुजर रही थी, तो श्याम ने हाथ हिलाया था
दो जरूरी चेहरे/१०५ और उन्होंने उत्तर में हाथ नहीं हिलाया। श्याम कॉफी के साथ-साय कभी पूछता, 'अंग्रेज उन्हें कैसे छोड़ गये ?' श्याम को पता था भाई पर क्या हादसा गुजरा है पर उनका कहना पा, 'बहुत हो चुका सोग, आदमी को कभी तो नॉर्मल हो जाना चाहिए। भाई 'सव नॉर्मल' हैं ।' ऐसे निर्णय में भाई क्या महत्व रखते हैं यह श्याम को समझाया नहीं जा सकता था। उसके अनुसार उसे मैंने जाना है, महसूम किया है, भाई उस पर कोई भी राय कैसे बना सकते हैं ! वह जिद करता, 'तुम्हें लेकर मैं तो अग्ने सिवा किसी को कन्सल्ट नहीं कर सकता।' जब वह ऐसे कहता मैं और भी असहाय हो जाती। इस समय मैं भाई से कैसे कहती कि अब कोई वक्त मेरे पढ़ने का वक्त नही रहा है । दूसरे दिन मैं 'गुफा' गयो, तो श्याम हस्वेमामूल बाहर खड़ा इन्त- जार कर रहा था। जितनी बार मैं श्याम को देखती मुझे महसूस होता, मेरा कद रात भर में एक इंच और कम हो गया है। उसको देखने के लिए मुझे सिर हल्का-सा उठाना पड़ता था और मुझे यह बहुत अच्छा लगता था, जैसे आकाश देख रही हूँ । श्याम बड़े प्यार से हंसता था और फिर आघा हंसता, आधा समेटता मुझे 'गुफा' मे ले जाता। मैंने उससे कहा, 'आध घण्टे की मोहलत दे दो, कुछ शापिंग करनी है।' 'चलो, मैं साथ चलता हूँ।' वह तैयार हो गया। मैंने दांत भौचकर कहा, 'लोग ", योर खड़ी हो गयी। उसने कहा, 'गुफा ही हमारी नियति है । में एक पुख्ता-सा पटर खरीद लूंगा जैसा 'शहर और सपना' में है। उसमे मजे से पड़े रहा करेंगे, लोग-वोग भाई-वाई सव से मुक्ति ।'
१०६/छुटकारा मैंने याद दिलाया, 'दुकानें सात बजे बन्द हो जाती हैं।' श्याम नाराज हो गया, 'तुम शापिंग करने आयी हो या मिलने ! दरअसल तुम मुझे अपनी शापिंग का एक आइटम समझती हो। फिर पौने आठ बज जायेंगे, और आठ बजे तुम्हारे अंग्रेज भाई डिनर लेते हैं।' मैं रोने रोने को हो भायी। श्याम ने बहुत प्यार से मुझे समेटा और 'गुफा' में ले गया ! भाई का जन्म दिन था कल । मैं उनके लिए ढेर से मोजे व रूमाल लेना चाहती थी। श्याम मुझ पर लगभग झुका हुआ था। मैं संकोच में सिकुड़ी तो बोला, 'मुझसे ! मैं और सिकुड़ गयी। उसने कहा, 'किसी दिन मैं तुम्हें आकांक्षा से भकभका कर जलते देखना चाहता हूं। मेरा मन होता है किसी दिन मैं 'गुफा' के वाहर खड़ा होऊ और तुम पानवाले, स्कूटरवाले गजरेवाले वगैरह-वगैरह की फिक्र किये वगैर आकर लिपट जाओ मुझसे, यो...' और मैंने बड़ी मुश्किल से अपने को छुड़ाया। जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, मुझे श्याम से डर लगने लगा था । पर यह ऐसा डर था, जिसका सामना करने में रोज पहुँच जाती थी और जाये विना अजीब फीकेपन में दिन विताती। रोज की तरह श्याम ने पूछा, 'अभी कितने दिन हैं हमारे इकट्ठे - - रहने में !' 'दो साल, मैंने फिर कह दिया। 'कम नहीं होते ?
दो जरूरी चेहरे/१०७ 'कम होंगे भी नही जब तक तुम भाई से कह नहीं देती,' श्याम सुस्त हो गया। मैंने धीरे-से याद दिलाया, 'देर हो रही है।' ध्याम जिद में आ गया, 'किसी को नहीं जाना घर ।' 'हाय ।" 'अब से मैं तुम्हें जाने नही दिया करूंगा जय तक मेरी नीद का टाइम न हो जाय । तुम जाकर अपने उस 'टाइट लिप्ड' भाई में व्यस्त हो जाती हो, मैं बिल्कुल खाली हो जाता हूँ। फिर मुझे कॉफी अच्छी नही लगती, सिगरेट भी नहीं।' पर श्याम ऐसा कहने के साथ ही उठ गया। वह अपनी इन्टेंसिटी अपने में ही भीच कर, खुद सबसे ज्यादा मन्त्रणा झेलता था। जहाँ श्याम छूता था, वहीं अजीब-सा दर्द होता रहता, जब तक किसी और जगह वैसा दर्द शुरू न हो जाता । श्याम कहता, 'कद का कोई खास फर्क तो नहीं पड़ेगा? मुझे तो नहीं पड़ता।' मैं पानी-पानी हो जाती। श्याम कहता, 'मैं तुम पर निबन्ध लिखना चाहता हूँ, जैसे बच्चे गाय पर लिखते हैं, शुरू करूं-मिन्ना पांच फुट की पारी-सी लड़की है। मिना अपने होठों से बोलने का काम नहीं लेती, सिर्फ हंसती है या रोती है । मिन्ना मुलायम है।' पहले ममी के घर और फिर भाई के यहाँ मुझे सबने बहुत छोटा माना था और इस वजह से मैंने क्लास में हमेशा फवतियां सुनी थी। कॉलेज के फिश-पॉण्ड में लड़कों ने मुझे 'लॉली पाप' और 'लाल रिबन' दिया था। श्याम ने पता नही कैसे, कहाँ छू दिया कि बचपन यह जा और वह जा। और तो और, भर में कूद-कूद कर एक बार में दो सीढ़ियां भी नहीं , १०८ / छुटकार । उतरती थी। चलते समय कपड़ों के भीतर अपने ही अंगों की गर्मी महसूस कर मैं लाल हो जाती। जब श्याम मिलता, बस यही जलती इच्छा होती कि अब यह कहीं न देखे, यों ही बैठा रहे, अपनी तीखी प्रोफाइल में । मुझे कॉलेज जाना होता था। कभी-कभी सुवह कालेज के गेट पर पहुंचती, तो देखती, श्याम खड़ा है, दफ्तर से कैजुअल लीव और चेहरे पर मुस्कराहट लिये। मन एक साथ तरंग से उछलता और दहशत से दहल जाता। 'कोजी नुक' में सबसे अंधेरे कोने में हम घण्टों बैठे रहते, बिना एक शब्द वोले । कभी हथेलियां बोलती, कभी पांव, कमी कन्धे और कभी देह का एक पूरा हिस्सा । श्याम विल देखने के लिए भी लैम्प जलाना गवारा न करता। हम यह सोचकर बाहर निकलते कि इस समय भीड़ नहीं होगी। भीड़ के आगे मैं स्वयं को अरक्षित पाती, 'यहाँ नहीं, यहाँ बिल्कुल नहीं।' मैंने बहुत बार कहा भी, 'तुम इतनी छुट्टी लेते हो, दफ्तर में कोई नाराज नहीं होता? श्याम हंसा, 'दफ्तरों में कई तरह की छुट्टी होती है कैजुअल, सिक, अर्छ।' 'तुम कौन-सी छुट्टी पर हो आज,' मैं पूछती । 'कोर्टशिप लीव ।' मुझे कान तक दहका देने में मजा आता था श्याम को । श्याम की अजीव-अजीव जिद होती छुट्टी लेकर । घर चलने की जिद भी उनमें से एक थी। मुझे वहाँ जाना हमेशा गलत-गलत महसूस होता। वक्त वेवयत सड़कों पर फिरने में कभी नहीं लगा कि यह अनुचित है, पर उसके घर की तरफ पांव मुड़ते ही ऐसा महसूस होने लगता । जिस अकेलेपन का, श्याम दफ्तर से छुट्टी लेकर प्रबन्ध करता था, प्रिय होते हुए भी वह अकेलापन मैं भोग नहीं पाती। लाख वहाने बना कर, मैं वाहर निकलने को छटपटाती और घर पहुंचकर अपनी ही प्यास से बौरा जाती।
दो जरूरी चेहरे / १०६ पढाई की किताबों में रखकर मैंने कभी श्याम के खत नहीं पड़े, पर कितावों में लिखे अक्षर कैसे अचानक गायब हो जाते हैं, यह देख लिया। ये वे दिन थे, जब मुझे पढने मे पूरी तरह जुटा होना था, पर में किसी तरह सुबह और दोपहर कॉलेज में बिता कर शाम का इन्तजार शुरू कर देती । श्याम चिढ़ाता था, 'क्या किया तुमने दिन भर ?' और मेरे कुछ कहने के पहले कहता, 'ट्यूटोरियल लिखा होगा या 'गेस पेपर' बनाया?' मेरे लिए चीजों की अनिवार्यता खत्म हो गयी थी। इस वार 'गुफा' गयी तो वहां का अंधेरा ज्यादा गहरा तगा। बाहर की रोशनी से उसमे अन्दर जाते समय कुछ न सूझा, बस श्याम के सहारे किसी मेज तक पहुंच गयी। मैंने कहा, 'मुझसे यहाँ बैठा नहीं जा रहा।' श्याम शरारत से मुस्कराया, 'घर चलें।' मैं डर गयी, 'नही, मैं एक ही मेज से, उसी-उसी अंधेरे से थक गयो हूँ।" 'और कल को तुम उसो उसी प्यार से, उसी-उसी श्याम से थक गयी तो ! लेट मी टेल यू, प्यार एक-सा ही होता है, अगर एक ही व्यक्ति का है तो ! था तो नही जाओगी उससे !' 'अपने से भी थक जाऊँगी तब !' मैंने कहा और हम उठकर बाहर आ गये। हम कनॉट प्लेस के पीछे की गलियो मे घूम रहे थे। पीछे की गलियों को देखकर कोई नही सोच सकता था कि मागे इतनी भीड़ और इतना शोर होगा, जिसे आम भाषा में रौनक कहते हैं। यहां ज्यादातर नौकरों, शोहदो की आवाजें थी, पर भीड़ नहीं थी। और हमें एकान्त की जरूरत थो, चाहे वह एकान्त श्मशान का ही क्यों न होकांट ११० छुटकारा । प्लेस वेडौल नजर आ रहा था। कनॉट प्लेस से वे खम्भे हटा लिये जाय और वह गोलाई छीन ली जाय, तो कनॉट प्लेस और इमली बाजार में ज्यादा फर्क न रहे। हर खूबसूरत दूकान का पिछवाड़ा यहां था और हम कभी फुटपाथ पर चढ़ते, कभी उतरते, जारहे थे। जैसे-तैसे अंधेरा घिर रहा था, श्याम की जिद ज्यादा होती जा रही थी कि मैं घर चलूं मैंने उससे कह दिया मैं अब उसके घर कभी नहीं आऊंगी। 'क्यों? 'वस' 'देखो, तुम्हें बुला सके, ऐसा मेरे यहाँ और कोई नहीं है। मेरे ही कहने पर एक दिन तुम्हें आ जाना है और फिर वापस नहीं जाना है, समझी। मैंने श्याम को याद दिलाया कि मुझे वैसे ही नहीं आ जाना है, भाई अभी हैं। 'जानता हूं मिन्ना, पर मैं भी हूं और अभी से हूं, मैं क्या करूं ?' इस तरह कन्धे से मुझे पकड़ लेना श्याम की आदत बन चुकी थी। 'वर्दाश्त !' मैंने कहा और श्याम की ओर देखा। यह एक शब्द था जिससे श्याम को सखत चिढ़ थी और जिसमें मेरा गहरा विश्वास । हर नाजुक मौके पर मैं श्याम को अपनी स्थिति का आभास इसी शब्द से कराती थी और श्याम झुंझलाता-झुंझलाता खुद से लड़ पड़ता। 'अगर मुझे बर्दाश्त ही करना है, तो चलो, बस स्टॉप पर चलें, श्याम मेरे साथ वापस मुड़ लिया। श्याम इतना अच्छा, कि बसव-से- वेसन क्षणों में भी वह सारी क्रूरता अपने प्रति करता। उसकी वैसवी के आगे मैंने अपने को अक्सर असहाय जरूर पाया, अरक्षित नहीं। जब से भाई को पता चला था, वे रात का खाना अकेले खा लेते ये। मैं देर होने पर अफसोस से देखती, तो वे बड़े प्यार से टाल देते ।
दो जरूरी चेहरे / १११ लौटने पर पता नहीं क्यों मेरा मन होता मैं देर तक भाई को देखती रहूँ । खाली कमरों मे घुसते वै मुझे अतिरिक्त अकेले महमूस होते। मैंने कभी भाई को यों अकेला करना नहीं चाहा था, पर मैं लौट कर भी इस घर की नहीं हो पाती थी। श्याम ने सुझाव दिया कि माई को किमी क्लव का सदस्य हो जाना चाहिये। क्लब को अपने पर्याय के रूप में माई को देना मेरे लिए सम्भव नही या । बहुत बार भाई के आगे मैं स्वयं को अपराधी पाती। भाई ने अपने को 'बाहर' से इतना बचा कर रखा था कि उनके लिए सुझाव भी मुझे क्रूर लगते । मैं जानती थी भाई अपने सारे परिचय ड्राप कर चुके हैं । दफ्तर के बाद वे ज्यादातर कोई किताब पढ़ते और बहुत बार तो मैंने देखा था, पढ़ते भी नहीं थे, किताब खोल कर बैठे रहते थे, बिना कही भी देखते। मुझे उस दिन का खौफ था, जन भाई रिटायर होगे। यह तय था भाई यह घर छोड़ कर कहीं नही जायेंगे और यहाँ मैंने नौकर, ड्राइवर, डाकिया, चपरासी और अपने अलावा बहुत कम किसी को आते देखा था। श्याम किसी तरह मान नहीं रहा था। उसने कहा, 'मैं अव और इस बेहूपी जगह पर नहीं आ सकता। जब मैं तुम्हे देखना चाहता हूँ, तो, सिर्फ तुम्हें ! यहाँ मुझे वैरा देखना पड़ता है, सामने की मेज पर बैठे लोग देखने पड़ते हैं, घड़ी देखनी पड़ती है।' तो?' 'घर!' 'न।' उसने 'हाँ' ऐसे कहा कि मैंने अपने को स्कूटर के पीछे बैठा पाया। चहत दिनों बाद मैं यहां आयी थी। कमरा वही था, वैये ही। श्याम
..
११.२ / छुटकारा
ने जूते उतारे, स्लीपर पहनी और दरवाजे तक गया।
मैं डरी, 'नहीं'
उसने दरवाजा आधा वन्द किया और हंसकर वापस खाट पर वैट
गया।
मुझसे कोई बात नही हो रही थी।
श्याम ने पहचाना, 'मुझसे डरती हो, इतना !'
'मुझे औरों से डर लगता है,' मैंने कहा ।
'नहीं, तुम अपने से डरती हो।'
मुझे श्याम बहुत बड़ा लग रहा था और वह किसी भी क्षण मुझे
लड़की से खिलौना बना सकता था। मैं उसे खुद छू रही थी और जैसे ही
वह उस स्पर्श को पूरा करने लगता, मैं अपने में सिमट जाती।
श्याम ने कहा, 'हम अब घर भी नहीं आयेंगे। यहाँ, वहां से ज्यादा
बर्दाश्त करना पड़ता है।'
दरवाजा खोलने के साथ ही मेरी निगाह दरवाजे के पीछे हल्के
भूरे रंग के सिगरेट के टुकड़ों पर पड़ी। इतनी तादाद में अब तक
चींटियों के अलावा मैने कोई चीज नहीं देखी थी।
'ये सब ?'
'हां, और तुम यह मत कहना कि न पियूं। नहीं तो तुम्हें इस कमरे
से बाहर जाने का हक नहीं होगा।'
और भाई !' मैंने कहा और अटक गयी।
श्याम ने कह दिया, 'एक साथ दो जिन्दगियां प्लान नहीं हो सकतीं,
या तुम भाई की जिन्दगी प्लान कर लो या अपनी ।'
भाई के साथ मैं किसी भी बात में हड़बड़ी नहीं कर सकती थी।
उनका ढंग ही कुछ ऐसा था कि जल्दवाजी उनके प्रति क्रूरता लगती। मैं
दो जरूरी चेहरे / ११३ तो सिनेमा जाते समय भी उनसे जिद्द नही कर सकती थी, फिर यह तो मेरे ही जाने की बात थी। श्याम एकदम विपरीत या । जो सोचता उसे उसी दम पूरा हुमा देखना चाहता । सवसे अधिक मुसीवत इसलिए मेरी थी । श्याम की वेसनी महमूस कर गुमान होता, घर आते ही उदासी में बदल जाता। ज्यादातर माई बरामदे में मिलते, बिना किताब या अखबार के । मेरे आने पर वे कमरे में जाकर समाचार सुनने लगते । ममी ने यह अच्छा ही किया था कि जब से मैं यहाँ आयी थी, मुझे एक बार भी बुलाया नहीं था । वम एक बार खुद ही आयीं, पन्द्रह दिनो को । मुझे हर था कि भाई अगर ममी को बतायेंगे, ममी महक न जाय ! श्याम के बारे में उसके सरनेम के अलावा मैं बहुत कम जानती थी। सवाल पूछने की क्षमता ममी में कितनी है, यह भी पता था । पर माई ने ममी को ऐसे कहा कि मैं सोच भी नहीं सकती थी। उन्होंने कह दिया कि मेरे लिए एक लड़का तलाश किया है उन्होंने, जब ममी चाहेंगी बातें तय हो जायेंगी। ममी ने दात टाल-सो दी, कि अभी मिनाती छोटी है, उसकी सब बहनों ने कम-से-कम एम० ए० किया है । इन सब बातों के लिए बहुत समय पड़ा है। जिन लोगों को उपस्थिति भाई को हिस्टर्व नहीं करती, उनमे भाई कभी तंग नहीं होते । वे ज्यादा आवाज बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। ममी आयी थी, तो वस बिनाई करती रही, बल्कि कभी-कभी मुझे लगता या कि ममी सिर्फ स्वेटर बिनने के लिए दिल्ली आयी हैं । ममी की बहुत परवाह करते थे भाई । वैसे उन्हें ज्यादा बात करते मैंने कभी नहीं देखा। अक्मर बातें शहर, मकान, वहनो या मुझ तक सीमित होती । बस एक बार बोमे पॉलिसी की किसी चर्चा पर मैंने देखा, ममी रो रही थी और भाई कुर्सी से सिर टिकाये, इतने चुप, इतने उदास थे कि घन्टो उस कमरे मे जाने की हिम्मत नहीं हुई मेरी ।
११२ / छुटकारा
ने जूते उतारे, स्लीपरें पहनी और दरवाजे तक गया ।
मैं डरी, 'नहीं !'
उसने दरवाजा आधा बन्द किया और हंसकर वापस खाट पर बैठ
गया।
मुझसे कोई बात नहीं हो रही थी।
श्याम ने पहचाना, 'मुझसे डरती हो, इतना !'
'मुझे औरों से डर लगता है,' मैंने कहा ।
'नहीं, तुम अपने से डरती हो।'
मुझे श्याम बहुत बड़ा लग रहा था और वह किसी भी क्षण मुझे
लड़की से खिलौना बना सकता था। मैं उसे खुद छू रही थी और जैसे ही
वह उस स्पर्श को पूरा करने लगता, मैं अपने में सिमट जाती।
श्याम मे कहा, 'हम अब घर भी नहीं आयेंगे। यहाँ, वहां से ज्यादा
वर्दाश्त करना पड़ता है।'
दरवाजा खोलने के साथ ही मेरी निगाह दरवाजे के पीछे हल्के
भूरे रंग के सिगरेट के टुकड़ों पर पड़ी। इतनी तादाद में अब तक
चींटियों के अलावा मैंने कोई चीज नहीं देखी थी।
'ये सब ?'
'हां, और तुम यह मत कहना कि न पियूं। नहीं तो तुम्हें इस कमरे
से बाहर जाने का हक नहीं होगा।'
और भाई !' मैंने कहा और अटक गयी।
श्याम ने कह दिया, 'एक साथ दो जिन्दगियां प्लान नहीं हो सकतीं,
या तुम भाई की जिन्दगी प्लान कर लो या अपनी ।'
.
भाई के साथ मैं किसी भी बात में हड़बड़ी नहीं कर सकती थी।
उनका ढंग ही कुछ ऐसा था कि जल्दबाजी उनके प्रति क्रूरता लगती। मैं
दो जरूरी चेहरे/११३ तो सिनेमा जाते समय भी उनसे जिद्द नहीं कर सकती थी, फिर यह तो मेरे ही जाने की बात थी। श्याम एकदम विपरीत या । जो सोचता उसे उसी दम पूरा हुआ देखना चाहता । सबसे अधिक मुमीवत इसलिए मेरी थी। श्याम की चेसबी महमूम कर जो गुमान होता, घर आते ही उदासी में बदल जाता। ज्यादातर भाई वरामदे में मिलते, बिना किताव या अखबार के । मेरे आने पर वे कमरे में जाकर समाचार सुनने लगते । ममी ने यह अच्छा ही किया था कि जब से मैं यहाँ मायी थो, मुझे एक बार भी बुलाया नहीं था। बस एक बार खुद ही आयी, पन्द्रह दिनो को । मुझे डर था कि भाई अगर ममी को बतायेंगे, ममी भड़क न जाय ! श्याम के बारे में उनके सरनेम के अलावा मैं बहुत कम जानती थी। सवाल पूछने की क्षमता ममी में कितनी है, यह भी पता था । पर भाई ने ममी को ऐसे कहा कि मैं सोच भी नहीं सकती थी। उन्होने कह दिया कि मेरे लिए एक लड़का तलाश किया है उन्होंने. जब ममी चाहेंगी बातें तय हो जायेंगी । ममी ने वात टाल-मो दी, कि अभी मिनाती छोटी है, उसकी सब बहनों ने कम-से-कम एम० ए० किया है । इन सब बातों के लिए बहुत समय पड़ा है। जिन लोगो को उपस्थिति भाई को डिस्टर्ब नहीं करती, उनसे भाई कभी तंग नहीं होते। वे ज्यादा आवाज बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। ममी आपी थी, सो बस बिनाई करती रहीं, बल्कि कभी-कभी मुझे लगता था कि ममी सिर्फ स्वेटर बिनने के लिए दिल्ली आयी हैं । ममी की बहुत परवाह करते पे भाई । वैसे उन्हे ज्यादा बात करते मैंने कभी नहीं देखा। अमर बातें शहर, मकान, बहनों या मुझ तक सीमित होती । बस एक बार वीमे पॉलिसी की किमी चर्चा पर मैंने देखा, ममी रो रही थी और भाई कुर्सी से मिर टिकाये, इतने चुप, इतने उदास थे कि घण्टों उस कमरे मैं जाने की हिम्मत नहीं हुई मेरी ।
११४/छुटकारा दफ्तर से आकर भाई चाय पीते हुए बैठे रहते ममी के साथ । ममी कभी दो-एक बार उनके आगे बिस्किट या तली हुई मूंग की दाल की 'प्लेट करतीं, तो मुस्करा कर न कर देते । जितने दिन ममी घर में रहीं, रसोई से अण्डा और प्याज गायव रहे । उनके आगे भाई ने अपनी आदतें इस तरह बदल ली कि जाते समय ममी को यह अन्दाजा रहा कि भाई 'एक तरह से ठीक ही हैं और दफ्तर वगैरह में व्यस्त रह लेते हैं । उनके जाते ही भाई के चेहरे पर वही खालीपन आ गया और हम दोनों देर तक, साथ बैठे रहे उस दिन । वार-बार भाई ने सिर्फ एक तर्क सामने रखा, पढ़ाई बीच में न छूटे तो अच्छा है । चाहती में भी यह थी और भाई के आगे पूरी तरह सह- मत हो जाती, पर श्याम को देखते ही मन सारी चीजें उलांककर उससे 'लिपट जाता। श्याम ने साफ कह दिया, 'परीक्षा जैसी घटिया चीज को वजह से तुम दूर रहो मुझे कतई गवारा नहीं । तुम्हारे वी० ए० करने न करने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।' मैंने धीरे-से कहा, 'पर पढ़ाई पूरी हो जायगी।' 'पढ़ाई डी० लिट० करने पर भी पूरी नहीं होती। किसने कहा पूरी हो जायेगी । एक स्वामख्वाह-सी चीज के लिए मुझे भी सताना, खुद भी सताये जाना । दरअसल तुम भी यह नहीं चाहतीं, तुम महज भाई को दोहराती हो।' श्याम की ऐसी बात मुझे चुभ जाती थी। पता नहीं क्यों वह भाई के प्रति नरम नहीं हो पाता था। उसके बजाय किसी और ने यह बात कही होती, तो मैं कभी न बोलती उससे, पर जिस सत्रो में श्याम यह कहता वह भी मैं ही जानती थी। इस बीच भाई और श्याम की कोई मुलाकात नहीं हुई थी। उन दोनों के बीच सूत्र सिर्फ में थी। यह आश्चर्यजनक था कि भाई वातों में दो जरूरी चेहरे | ११५ कभी श्याम को नहीं लाते थे । वैसे यह सुविधाजनक था, क्योंकि भाई के मुंह में श्याम का नाम आते ही मेरी आंखों के आगे से भाई अनुपस्थित हो जाते और श्याम के सैकड़ो चिन सामने दौड़ जाते । मुझे लोटने में देर हो जाती, भाई कहते : मिन्ना, तेरो पड़ाई 'सफर' करती है रे !' 'पढ़ाई पूरी हो जाये, तो अच्छा हो,' यह बात वे मुझे अकेला बैठे देखकर कहते और देर तक के लिए चुप हो जाते । फिर भाई को फ्लू हो गया । बुखार उन्हें कुल चार दिन आया, पर पता नही कैसे पैर इतने कमजोर हो गये कि उन्हे लम्बी छुट्टी लेनी पड़ी। भाई को यों बरामदे मे शाल से ढककर बैठे देख मेरे पैर बाहर जाने को नहीं उठते । वे आंखें मूंद घण्टों बैठे रहते । मैं बीच-बीच में विटा- मिन, फल या दूध लानी, तो इतने प्यार से देखते, मैं हिल जाती । मन मे अजीब किस्म का ददं रहता, जैसा रुलाई रोकने पर होता है । श्याम ने एक दिन फैसला सुनाया, 'भाई कभी हां नहीं करेंगे, देख लेना!" मैं रूठने को तैयार, 'भला क्यो ?' 'तुम्हारे भाई को गणित मे जरा ज्यादा रुचि है । उन्होंने सब कुछ गिन कर रख छोड़ा है । वे इसी तरह कभी पढाई, कभी तुम्हारी सेहत, कमी मानी सेहत के नाम पर तुम्हें भावुक करते रहेगे।' मैं उस दिन पहली बार श्याम से नाराज थी। उसे अन्दाजा हो गया था, वह बैठा रहा, अलग ! और यह मेरा मन था, जो अपने अलावा किमी को सजा देना नहीं जानता था । भाई का खयाल करते हुए श्याम का उदास, शिकायती चेहरा भूलता नहीं और श्याम के साथ देर हो रही होती, तो बरामदे, खिड़की से झांकते भाई वरावर मागे आ जाते 1 पढ़ाई का वहाना भर बचा था, वस! भाई ने चुपचार मुझे श्याम के साथ कर दिया। उन्होंने बीसियों ।
११६ / छुटकारा चीजें मंगा कर रखी थीं, पर श्याम की जिद्द कि उसने भाई से वॉर्डरोव नहीं मांगी थी, रेडियो नहीं मांगा था, मूट नहीं मांगा था; सिर्फ मिनाती मांगी थी। भाई ने विना वोले, सब मेरे कमरे में वन्द कर दिया और मुझसे कहा; 'सव तेरा है, जब चाहे, ले जाना।' अब तक छोटे-छोटे डर जाने थे, परीक्षा का डर, 'ट्यूटोरियल' का डर, घर देर से लौटने का डर, नाश्ते की भूख न होने का डर ! यहाँ पहले दिन ही महसूस हुआ एक बहुत बड़ा डर होता है, जिसमें साथ तीखा सुख न शामिल हो, तो वह आतंक वन जाय । अनुभव भय से शुरू होता और जब तक मैं विरोध करु, पता नहीं कैसे, खुशी ऊपर आ जाती, सुख शिराओं में दौड़ता, कि अचानक मैं पाती बदन मेरे काबू में नहीं है, गल्कि उसके किर्च-किर्च पलंग पर विखरे हुए हैं । मेरे लिए ढेर से कॉस्मेटिक्स मँगवाये थे श्याम ने । एक्साइज ड्यूटी में इतने रुपये देते देख, मैंने मना किया । श्याम हंस दिया 'अभी तो और चीजें आने वाली हैं।' उसके सम्बन्धियों का एक मात्र सन्दर्भ थे ये कॉस्मे-- टिक्स । मुझे सिर्फ इतना पता था कि उसका एक भाई टेंगानीका और दूसरा कनाडा में है । मैं उनके बारे में ज्यादा पूछती तो श्याम मना कर देता, 'तुम पहले पूछती हो, फिर अजीब-अजीव 'विश' करने लगती हो। तुम्हें पहले पता था, मेरे अतिरिक्त मेरे पास और कुछ नहीं है, कोई नहीं।' ऐसे मौकों पर मुझे डर लगता । इससे पहले मैंने एक और 'अकेले" भाई देखे थे । अपने में पूरा व्यक्ति कितना आधा होता है यह भी पता था । भाई चुपचाप बर्दाश्त करते थे, उनकी वांत और थी। उनके अलगाव में मैं अपना होना महत्वपूर्ण पाती। भाई को मैं हँसा सकती थी, खिझा सकती थी और बाद में तो उनका हाथ खींच कर उन्हें क्रिकेट मैच देखने के लिए दो जरूरी चेहरे/११७ स्टेडियम भी ले जा सकती थी। पर श्याम, जैसे बिना रिश्तो के फरिश्तों-सा बासमान से टसक पड़ा था । उसे मैंने कभी चिट्ठी लिखते नहीं पाया, कमी ट्रंककॉल बुक करते नहीं देखा । नया घर ऐसा था कि हम दोनो में से एक भी कभी कुछ देर को हो अनुपस्थित होता, तो छोटा होते हुए भी घर का अनुपात कुछ इस तरह बढ़ जाता कि दूसरा गुमसुम बैठा रहता, कोने मे, उदास ! ऐसे रहना शायद मेरी ही नियति थी। जितनी देर श्याम दफ्तर में होता, मेरे पास होता नौकर और मोन, दो कमरो और एक बालकनी सहित । मैं घर में फिजूल चक्कर लगातो रहती और पक फर बिना नोंद सो जाती । मैंने सुझाव दिया, मैं खाना बनाया करूं । श्याम ने प्रयास भी गवारा नहीं किया। मैंने एक बार पेण्टिग पलास या सिसाई मलारा ज्वॉइन करने की बात की। श्याम 'हो हो' फर हंस दिया और सारे कमरे में मुझे फिरकनी की तरह धुमा जाला, 'तुम्हे कमला-विमला बनना है अब ! फिर तो मुझे नन्दकिशोर या पन्नालाल बनना होगा, मिना ।' श्याम को पड़ोसियो से अॅलर्जी यो और उसने पहले दिन ही मृारी कहा था, 'इस कोशिश मे रहना कि कभी इनसे परिचय न होने पाये।' पड़ोसी मुझे भी पसन्द न थे । दोपहर भर ये ऊँचे पता कर रेडियो सुनते और दूसरी मंजिल से नीचे सड़क पर फेरीवालों को आवाज देते । कुछ तो ऐसे कि भरी शाम लुंगी और बनियान में बालकनी में पड़े हो जाते । उनके बच्चे मुझे आण्टी कहना चाहते जवकि मुझे आण्टी शब्द से सख्त चिढ़ यो। मुझे लगता, आम्टी होते ही मैं इस विलिंग की चौदह औरतों में से एक हो गयी। एक दिन चाय पीते समय मैंने कहा, 'गुफा' नहीं गये फिर ।' श्याम बोला, 'मुझे उस जगह से चिढ़ है। मैंने अपने सबसे कहिन दिन वहाँ गुजारे।'
११८ / छुटकारा से घर से । मैं नाराज हो गयी, 'वह मेरे लिए सबसे खूबसूरत जगह है । गलि- यारे के उस टुकड़े पर पहुँच कर सर ऊंचा करने की देर थी कि पहाड़ तुम, वहां खड़े होते थे।' नाराजी में मेरे होंठ थोड़े आगे निकल आये थे, श्याम ने उन्हें अपने में भर लिया। जव छोड़ा, मेरी चाय पानी हो चुकी थी। भाई कभी नहीं आये हमारे घर । मैं हफ्ते में दो बार जरूर जाती। जव जिद करती, भाई कहते, 'न मिन्ना, मेरा मन नहीं होता निकलने का।" मंगलवार और शुक्रवार को भाई घर में खूब सारी आइसक्रीम जमा कर रखते । मेरे सारे शोक, जिन पर उन्होंने कभी खास गौर नहीं किया था, वे अब पूरे कर रहे थे। यहां के अकेले घर में मेरा मन ऐसा रमता, जैसे सहेलियों का जमघट मिल गया हो । मैं दौड़-दौड़ कर सारे घर का चक्कर लगाती और थक कर सोफे पर घम् से बैठ जाती। भाई मुझसे बहुत कम वातें पूछते । बस, मुझे देख कर उन्हें ऐसा सन्तोप आता कि फिर से अपनी कितावों में जुट जाते । उन्हें अपनी कितावों से अजीब किस्म का मोह था। चाहे पढ़ते नहीं, उनकी साज-संवार, झाड़- पोंछ में अक्सर लगे रहते । खास तौर से इतवार विताने का उनका यह पुराना तरीका था । खाली और लम्बी दोपहरों में मैंने उनकी किताबें खूब खखोरी थीं। बहुत किताबों में जगह-जगह लाल पेन्सिल से निशान लगे थे। मैं उन हिस्सों को जरूर पढ़ती और सोचती, 'ये सव भाई ने कब पढ़ डालीं।' मैंने तो आज तक कोर्स व . 'डेनिस रॉविन्स' के अति- रिक्त कुछ नहीं पढ़ा था। हर किताव के दायें कोने पर, ऊपर, भाई के हस्ताक्षर होते थे और तारीख । भाई की उदासी देख कर यह यकीन करना मुश्किल था कि भाभी की एक भी निशानी घर में नहीं होगी। पर उनका अकेलापन पकते- पकते, तटस्थता बन चुका था। उनके चेहरे पर अव वह तना हुमा, खाली, ।
दो जरूरी चेहरे/११६ खोखलापन नहीं था, जो तव रहता था, जब मैं आयी-आयी थी। तब तो लगता था घर का एक कमरा, दूसरे से और दूसरा, तीसरे से सहम रहा है । रफीक जो मशीन की तरह, खाना-चाय मेज पर लगाता और बाकी इन्तजाम करता था, अब मशीन से आदमी बन गया था और बिना जरूरत भाई से पूछ चाय वगैरह लगाता था। रफीक ने ही मुझे बताया कि भाई कभी-कभी मेरे कमरे मे जाकर पढ़ते हैं । श्याम ने मुझे एक भी दिन भाई के पास रहने नहीं दिया। किसी- किमी दिन मुझे बड़ी जिद चढ़ती और मैं उसके दफ्तर से लौटने पर बहती, 'मैं जा रही हूँ।' श्याम इस कदर उदास होकर बैठ जाता कि तैयार होते-होते तक मैं माफी मांगने की हालत में होती और वह मान करने को । दिन-पर-दिन श्याम की, प्यार करने की ताकत और आदत बढ़ती जाती थी और उसकी बाहो में मेरा बदन कपूर की तरह मानो उड़ जाता । वह उन्ही हिस्सो को दुवारा प्यार करता, तो पहली झन- झनाहट दूसरी से मिल जाती और देह लपट बन कर भक-भक जल उठती। ये वे दिन ये, जब हम घर के अलावा कहीं खुश नही रहते थे और कहीं आमन्त्रित होने पर वहां दो घण्टे देर से पहुंचते । श्याम ने एक भी फिल्म पूरी नहीं देखी यो और कभी मैं जिद करती तो कहती, 'तुम सुवह देख आया करो, आइ काण्ट स्पेयर यू। और यही खूख्वार प्यार करने वाला श्याम कभी इतना अकेला हो जाता कि मुझमें से भी निकल जाना चाहता। उस समय उसकी आँखें खाली मकान-सी चुप हो जाती और मेरे पास आने पर वह हंसता नही, मुझे समेटता भी नही, बस, मुंह फेर लेट जाता। एक या, 'घर की याद आ रही है !' तब पहली बार श्याम के चेहरे पर विरक्ति देखी थी। उसका चेहरा दिन मैंने पूछा - १२० / छुटकारा जड़ हो रहा था और उसे छूने पर महसूस हुआ कि त्वचा कभी-कभी कम्यूनिकेट करना भी बन्द कर सकती है। इस 'हॉरर' को जानने के बाद मुझे श्याम और भी अमूल्य लगा था और उन दिन मैंने उसके पिघलने का बहुत इन्तजार किया था । पता नहीं, मैं कब सो गयी थी। जब श्याम का हाथ वालों में भटकते, महसूस किया, थोड़ी देर तक वह दिखा नहीं था, एक देहगन्ध आयी थी और फिर अंधेरे में उसके तीखे नक्श अपनी ओर मुस्कराते पाये थे । मुस्कररते, तरल होते ! इतनी सुबह मैं कभी नहीं उठी थी और ऐसे सकुचाये सवेरे की नीम-आभा में श्याम को पहले कभी नहीं देखा था। खिंचाव टूट जाने पर उसका चेहरा अतिरिक्त नया लग रहा था। भाई के यहां श्याम बहुत कम गया । भाई ने वैसे, कभी नहीं पूछा। बस, अगल-बगल देखते और चुप हो जाते । मैं कभी बताती कि श्याम दफ्तर में कितना व्यस्त है, तो बीच में ही कह देते, 'कोई बात नहीं।' : घर चलने के लिए मैं श्याम से बहुत जिद करती और फिर खुद दुखी जाती। यह दफ्तर से यका नाता था और फिर घर से नीचे उतरना नहीं चाहता। मैं सारे दिन घर में रहकर उकता चुकती और उसके आते ही बाहर जाना चाहती। उसने हल सुझाया कि मुझे दोपहर को 'निकलना चाहिए, पर मुझे सुनना भी 'मॉड' लगा। इससे पहले भी मैं कभी दोपहर में घर से नहीं निकली थी और फिर दोपहर में भाई भी तो दफ्तर में होते। कभी-कभी श्याम जाता, वह और भाई, आमने-सामने, चुप बैठे रहते, सिर्फ मैं शोर मचाती रहती। मैंने यह बहुत बाद में गौर किया कि मिलने पर न भाई कभी खुश हुए, न श्याम ! एक दिन मैंने हल्के से श्याम से शिकायत की, 'तुम भाई से वोलते तक नहीं ! कह दिया, 'वे 'त्री तो नहीं बोलते ! अगर वे अपने को श्याम ने दी जरूरी चेहरे| १२१ हिम्बे बन्द कर सकते हैं, तो मैं भी ! मुझे स्लोवरी से सन पिक है।' श्याम जो मेरे प्रति इतना कोमल या, अधिकांश लोगों के प्रति बहुत सख्त था । हमारे घर इतने लोग आते । श्याम शालीनता भर बोलता भी, पर मैंने कभी उसे कहते नही सुना : 'वह आदमी मच्छा था।' शायद इसीलिए, उसका मुझसे इस कदर जुड़ा होना मुझे इसना गर्व देता । मैंने अपनी सव सहेलियां छोड़ दी पी। ये मुंह बिगाड़ती : 'अरे, शादी ही तो हुई है, कौन प्रधानमन्त्री बन गई है मिनाती !' सबके प्रति पहाड़ से भी अधिक कड़ा, जिद्दी और 'रफ' रहने वाला श्याम जव मुन्न पर झुकता, मेरे पांव जमीन पर न टिकते । । , . पढाई बीच में छूट गयो, इस बात का भाई को अफसोस पा, पर उन्होंने कभी कुछ कहा नहीं। समो बड़ी नाराज थी और पार-बार कहती थी, 'मेरी कोई लड़की इतनी मामूली नही निकली !' मुझे यह नयी सामान्या असामान्य सुख दे रही थी। श्याम ने मुगो तमाम वेवकूफियों, समाशों और ओढ़े हुए बचपने से मुक्ति दिला दी थी। हम दोनों बहुत नये और छोटे लगते थे, पर जब कोई हमसे यह कहता, मेरी तीव्र इच्छा होती, वह हमारे घर आये। मेरे पेट में थोड़ा दर्द रहने लगा था। मैं भूलने की कोशिश करती, पर पता नही कैसे, ददं, चेहरे का सत् खींचकर रख देता। जिस दिन स्याम को बताया, वह चिन्तित हो गया और दफ्तर नहीं गया। मैंने मजाक किया, 'बीमार मैं, और फैजुअल लीव पर तुम !' वह हंसा नहीं, जबरदस्ती कर, मुझे डॉक्टर के पास से गया। दवाई से फायदा शायद होना ही नहीं था। दर्द यायी ओर सुबह से ही उठता और मन हर चीज से उचट जाता । कोई भी बाधाज होती, वो महमूस होता पेट से ही टकरायी है । श्याम कभी सन्देह से मुझे गुरगुण कर हम पड़ता, पर मैं साय-साथ हंस नही पाती।
१२२/ छुटकारा दिनों कम हो गयी थी और अगर श्याम में इतनी गम्भीरता और सहन- शक्ति न होतो, तो घर में रोज चीख-पुकार हो सकती थी। एक दिन किसी ने दरवाजे की घण्टी बजायी। मैं दरवाजा खोल कर पलटी थी कि पेट में तीर-सा चुभा और जब तक मैं कमरे में माऊँ; मुझे ठण्डी जमीन अपने गाल व हाथों पर कुछ क्षण को महसूस हुई। फिर लगा किसी ने खोलते कड़ाह में डालकर उठाया है। देर तक सांस की निरन्तरता पता नहीं चली और जब मैंने आंखें खोलीं, तो देखा दरवाजा था और सन्नाटा । बड़ी मुश्किल से मैं कमरे तक गयी और पलंग पर पड़ गयो । मुंह में के का स्वाद था, पर आंतों में उसके लिए ताकत नहीं थी। डूबी-डूवी मैं कब तक लेटी रही, मुझे पता न चला। जिस समय झटके से होश आया उस समय श्याम का हाथ मजबूती से मुझे हिला रहा था । आंख खोलने पर बहुत थकान शरीर में पायी और पयाम के किसी सवाल को समझ पाना मुश्किल हो गया। ग्लूकोज देने के लिए श्याम गिलास में पानी लाया और मेज से डब्बा उठाने लगा था कि चौंका, 'टाइमपीस?' मैंने कहा : रुक गयी?' 'नहीं, टाइमपीस यहां नहीं है।' मैं हकबका कर उठी । सिरहाने टटोला, ट्रांजिस्टर नहीं था, मेज की ड्रॉभर में छोटा पर्स भीर पेन नहीं था, और श्याम की छोटी कैंची टेढ़ी हुई वार्डरोब के पास पड़ी हुई थी। हमने पार्डरोब खोलकर देखा, यहां सब ज्यों-का-त्यों था । श्याम ने पूछा, 'जब तुमने घण्टी सुनकर दरवाजा खोला तो कोन था?" । बहुत जोर देने पर भी मुझे कोई शक्ल याद नहीं आ रही थी । घण्टी वजने के साथ मुझे दर्द का तीखापन और खौलते कड़ाह में अपना गिरना भर याद था।
1 दो जरूरी चेहरे/१२३ बाकी घर छेड़ा नहीं गया था, पर श्याम को फिन यह थी कि किसी ने चोर को देखा नही और यह सारा घर और सिचुएशन समझ गया है। हम किसी पड़ोसी से पूछने को स्थिति में नहीं थे। यह सब देखने से मुझे अब ऐसी दहमात हो रही थी कि मेरे लिए घर में ठहरना मुश्किल हो रहा था । श्याम की समझ में नहीं आ रहा था, क्या इन्त- जाम किया जाय । मैं घर छोड़कर भाई के यहाँ जाने को तैयार नहीं पो और यही दिन भर अकेला रहना भी मेरी हिम्मत के बाहर या । इस से बढ़कर श्याम को फिक्र मेरी तबियत की थी। एक्सरे के लिए खाली पेट मुझे वैरियम पीना पड़ा। मुझे अस्पताल कभी पसन्द नहीं जाये । सिनेमा में देखकर भी नहीं। मैंने वापस चलन की जिद की। श्याम नही माना, चिन्तित खड़ा मेरी बारी का इन्तजार करता रहा। पता चलते ही भाई आप ये घर, डॉक्टर लेकर । उसी ने एक्सरे सुझाया और कहा, अपेण्डिसाइटिस का अन्देशा है। डॉक्टर ने कहा अपेण्डिक्स का आपरेशन मामूली होता है, माठवें दिन मै चलने लगेंगी। मेरे दिमाग में आपरेशन को सिर्फ एक तस्वीर माती यो : सन्द चादर या लाल कम्बल ने ढका मरीज, डॉक्टर के हाय मैं मरीज की मोर एक मन्द. 'एक्सपायर्ड'।' इस समय लेटे हुए मुझे बहुत डर लग रहा था, पर में कुछ कह नहीं सस्ती थी। श्याम मूर्खता के अतिरिक्त सब कुछ बर्दाश्त कर सकता था। एक्सरे साफ नहीं पाया था, एक दिन छोड़, दूसरे दिन फिर जाना था। बुधवार को निकलते समय में वंग आ गयी, 'क्या रोज-रोज अस्पताल!' 'शुक्र मनाओ, मेटनिटी अस्पताल नहीं जाना पड़ता,' श्याम रहने से नहीं चूका। इस बार के एक्सरे के बाद मुझे घर नहीं कि नब्ज, १२४ / छुटकारा दिया, में अस्पताल में नहीं रहूंगी। डॉक्टर ने कहा, मुझे यहीं रहना होगा और चलना-फिरना मेरे लिए गलत होगा। कमरा बड़ा था और वीच में छोटा-सा पार्टीशन । बाहर वाले हिस्से में एक और मरीज थी, जिसे उस समय खून चढ़ाया जा रहा था। मैंने अपने वेड तक बाते ही कहा, 'यहाँ अंधेरा है, दम घुट जायेगा।' आया ने सारी खिड़कियां खोल दी। मुझे कुछ पसन्द नहीं आ रहा था। मैंने मुंह बनाया, 'आंखों को चौंध लगती है ! उसी समय गहरे नीले रंग के पर्दे टांग दिये गये । मुझे गन्ध से सख्त अली शुरू से रही। यहां सव तरफ गन्ध हो गन्ध ! कमरे में सुवह-सुवह फिनायल का कपड़ा फेरा जाता । दुनिया की हर दवाई की बू नर्स के यूनीफार्म से मुझ आती। जो भी डॉक्टर विजिट पर माता, अक्सर उसके हाथों में स्पिरिट को गन्ध होती । जव वार्डवॉय सारा कमरा, वरामदा साफ कर चुकता, मेरा मन होता, कमरे के वीचोबीच मैले कपड़ों का ढेर लगा हूँ। हर कमरे को वार्डवॉय ऐसे रगड़ता जैसे रात उसमें कोई मर चुका हो । मैंने श्याम से जिद की, 'हम अकेले यहाँ नहीं रहेंगे । श्याम ने कहा, 'दफ्तर के बाद मैं यहीं रहूंगा।' पर श्याम वैठे-बैठे थक जाता था। उसकी आदत थी कि दफ्तर से आते ही बूट समेत विस्तर पर लेट जाना । फिर मैं पहले के बाद दूसरा प्याला चाय जव लाती और उठाने का हर तरीका आजमाती, तब कहीं उता श्याम । दफ्तर से थका श्याम, यहाँ बैठा और भी चिन्तित लगता था। मुझसे कहता, 'यह भी कोई आपरेशन है ! कराना ही था तो कोई वड़ा कराती !'
योर बरामदे में जाकर उनका कारभारा, पर
नहीं !
भाई यान को पाते, बूर से लेकर। इस
नहीं पा लेता, माई नहीं जाते, श्यार ने दन्तः काटे
रहवें फिर दे लोग साय हो जाते।
घर पर अधिकटरमने बारम हो किराया। कहा जाने
में बोर वही लेटने में था। वहीं दर्द होने पर मो असर
नमा कि मैं बीमार है। यहाँ उबले आली योएक बारमो से नहीं है
पा, मन होस्टर में कहा मी विकुन टक हूँ,दर भी बन्द है,
बॉरंगन जरूरी नहीं, पर डॉटर री ऐनी फिनीबाट पराई
देवादा। चार दिन में यह हारट हो मनी कि अपना बोकार होना इक.
ग्नमरम नगने लगा और जिवनी बार डांस्टर विजिट पर आग, ने
आने को अधिक बीमार पाया। संटर मन्तुष्ट था कि बर मही
बयों में मरीज हूँ टनकी।
यांरेगन में एक दिन पहले माना-पानी बन्द कर दिया गया मान
बैठा 'मनाइन' काद-चंद मेरी कनाई में जाते देवता रहा। भाई कुछ
घदों को ददर गाय हर। मात्र अपने में अधिक नाफा पा रही
यी। ग्यान बार-बार पूछ रहा था, 'दुन्हें बात नहीं कर रही !"
उसको चिन्ता और कांदूहन देवकर पड़ा चना या वन को
चौकार नहीं देखें । दह किमी हालत में की देर शागर करों के लिए
राजी नहीं हुवा। पंट कर बोला, 'यहाँ दोन किन?
में डर मदी, 'तुम्हें दिगाट दुगनमः !"
'पी वा करती हो तुम । हित महान कलाच
बी
तुम महम करोगी।
२५. शुटकारा मेरे वालों को नर्स ने बहुत सफेद कपड़े में बांधा तो श्याम हँस पड़ा, 'योगी लग रही हो !' श्याम की हंसी देखकर मन कच्चा हो रहा था। वह आज बहुत बोल रहा था और ऐसा वह सिर्फ तव करता था, जब अपने को कमजोर पाता था। मेरे पास से एक मिनट को हिला भी नहीं था, जब कि कल मुझसे बरावर कहता था, 'हम क्या ख्वामख्वाह भावुक हो रहे हैं, अगले से अगले हफ्ते हम 'गुफा' जायेंगे, जायेंगे न !' मैंने कहा था, 'लग रहा है, हम दोनों, किसी तीसरे के लिए यहाँ आये हुए हैं। · थियेटर में ले जाने के लिए मुझे स्ट्रेचर ट्राली में डाला गया । जाने समय श्याम ओ. टी. के दरवाजे तक आया और मेरे अन्दर जाते समय, हल्का-सा ट्राली पर झुका । मेरे दिमाग में एक बार फिर उसके बालों की गन्ध बस गयी, विना तेल के बालों की रूखी गन्ध ! यही वह गन्ध थी, जो उस दिन भी आयी थी और उससे अगले रोज भी जब श्याम आगे झुकं गया था, 'लो, हम तो अव ऐसे रहेंगे जिन्दगी भर, मंजूर है !' यही गन्ध मस्तिष्क में लिये-लिये मैंने अपने चारों तरफ कैंची, चाकू, चिमटी, और जिनका मैं नाम भी नहीं जानती थी, चमचमाते वेशुमार औजारों की पंक्तियां देखी थीं, निःशब्द, पर तेज चलते सफेद चोंगे और कुछ जोड़ी सतर्क आँखें देखी थीं और देखा था, ऊपरवाली विशालकाय रोशनी के चमकदार कॉनकेव ग्लोब में अपना संक्षिप्ततम रूप । 'गिनती गिनो एक, दो, तीन, चार"..." मैंने गिनते-गिनते कहा था, 'मैं तो हजार तक गिन सकती हूँ, डाक्टर' डॉक्टर ने हँसकर कहा था, 'तो फिर अपने पति के बारे में वोलो।' मुझे हंसी आयी थी, पर होंठ खिंच नहीं पाये थे, हल्का-सा वोझ शरीर पर गिर गया था, बस ! जब होश आया, सिर के ऊपर वह कॉनकेव ग्लोब नहीं था, आसपास - डॉक्टर ने कहा था,
दो जरूरी चेहरे | १२७
एक भी मौजार और सफेद चोंगा नहीं था।
आंखें पोछे खुली थीं, पहले गति पता चली थी, पंखे जैसी किसी
चीज की।
फिर अपनी चिल्लाहट सुनी थी, 'पा""नी"!'
आँखों ने सबसे पहले वैड के ऊपर टंगी सैलाइन को वोतल देखी
'यी। अपने विस्तर से आगे का कुछ देखे विना आंखें थककर फिर पन्द
हो गयी पों।
बन्द आँखों में बदन का अनुभव समाया हुआ था । बदन में दर्द नहीं
‘या, पर विना दर्द, तकलीफ थी। नहीं, तकलीफ नहीं थी, अजीय-सा
बोझ था कि पैर, हाय, होंठ, सब काठ के हो गये थे।
वेड को पैरों की तरफ ऊंचा किया गया तो 'दूसरे' के होने का
'एहसास हुआ। फिर बदन, वापस पत्थर तले दब गया ।
पोड़ी देर में अपने गले की आवाज सुनायी दी:
'पा."नी...'
अबकी बार बर्फ की ठण्डक जुबान पर पहचानी, धीमे से ।
सारे बदन ने हिलना चाहा पर उंगली भी हिले बिना, येते हो,
बनी पड़ी रही देह ! फिर बड़ी चुभने वाली पीड़ा
'श' के साथ जुवान नै साय नहीं दिया ।
बहुत देर तक देह पत्थरों के नीचे दबी पड़ी रहीकोहरको
को झटका लगा और दिमाग पहली बार जापा: '":
हाय पकड़ा गया, तो बेहद कष्ट हमार और सहे।
बीच-बीच में बहुत बार होंठ हिले ये; टिहराम
पा: 'पा"नी ।'
बहुत-से पानी में तैरता सिर्फ एक हिरन करने
उलट-पुलट होता या और दिमाग पर ददर र
१२८ / छुटकारा पर बोझ दुसरी से ज्यादा था और शरीर ने ज्यादा बोझ को फेंक देना चाहा था। फिर सब चीजें हवा में तैर गयी थीं। लंगड़ी चींटी-सी आहिस्ता-आहिस्ता रेंगती हुई वापस आयी थीं कुछ चीजें; सफेद तकिया, लाल कम्बल का किनारा, सैलाइन वोतल और एक झुकाव किसी दूसरे का। एक वांह पर वही बोझ था, दूसरी पर एक और वोझ आया, पहली से हल्का पर बोझ, फिर पकड़, फिर कोई नाम ! नाम डूबते दिमाग में गिरा; देर बाद निकला वापस, और आंखों ने तब देखें, दो बहुत जरूरी चेहरे ।
No text on this page.