Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Kushal-kanti Padyatra Mahasangh-smarika
Front matter
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कुशल - कान्ति
पदयात्रा महासंघ - स्मारिका
संघ प्रस्थान
31-1-1980
बाड़मेर से
লীনা
संघ प्रवेश
23-3-1980
संयोजक
मुनि मणिप्रम सागर
हीराचंद वैद, जयपुर
सम्पादक
द्रव्य-दाता
पालीताणा पदयाला संघ समिति
बाड़मेर
प्रकाशक :
श्री जिन हरि सागर सूरि जान भंडार
कार. कात्रीलाना-3६१..270
स्मारिका
के
सयोजक
युवक मुनि श्री मणिप्रभ सागरजी
महाराज
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स्मारिका
के
सम्पादक
श्री हीराचन्द वैद, जयपुर
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९.१९ जैनाचार्य श्री जिनहरिसागर सूरीश्वरजी म० सा० ९.९.९
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श्री कुशल मुनिनी
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शुभ चिन्तक
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न्याय व्याकरण तीर्थ, साहित्य-शास्त्री
स्व०मुनिराज श्री दर्शन सागरजी म० साo
शुभ-संदेश - सुप्रसिद्ध वक्ता, प्रभावशाली व्यक्तित्वधारी, अनुयोगाचार्य श्री कान्तिसागरजी महाराजश्री की निश्रा में बाड़मेर जैसे दूरस्थ प्रदेश से निकले हुए छै:रो पालत संघ की प्रकाशित होने वाली स्मारिका हेतु मेरी शुभेच्छा मांगी गई है । जैन संघ के भावी इतिहास के लिए वर्तमान ऐतिहासिक और धार्मिक भव्य घटनाओं की जानकारी एवं विवरण औरों के लिए प्रेरक बने, इसलिये स्मारिका का प्रायोजन उचित है। अाज के विषम काल में भगवान् महावीर के त्रिकालाबाधित, अविच्छिन्न एवं प्रभावशाली शासन में ऐसी बड़ी पदयात्राएं प्रायोजित करने वाले पुन्यवंत प्रात्माएं मौजूद हैं यह जानकर प्रानन्द और अनुमोदना होती है । स्वयं के शुभाशीर्वाद और उपदेश द्वारा पदयात्रा संघ के संघपतियों के हृदय में धर्म भावना जागृत कर ऐसी महान् यात्राओं के आयोजन के उपदेशक गुरुवर्यश्री को पत: पतः धन्यवाद ! जैन धर्म की महान् प्रभावना के लिए अनुकम्पादान की प्रवृत्ति सहित की पदयात्राओं का आयोजन इस काल के लिये सर्वोपरि अंग है ऐसा मेरा मानना है, कारण किम स्वयं बम्बई से पालीताणा पदयात्रा संघ लेकर आये तब यह अनुभव हुआ है । उस संघ यात्रा द्वारा जो शासन प्रभावना व धर्म प्रभावना हुई उससे प्रेरणा लेकर अनेक पद यात्रा संघों का प्रायोजन हुमा इससे मेरे कथन की पुष्टि होती है । ऐसी यात्रायें यदि विधिपूर्वक पोर शुभ भावपूर्वक की जावें तो यात्रियों के जीवन में नया शुभ-भाव, नयी प्रेरणा, नया प्रकाश और प्रभु कृपा प्राप्त हो सकती है । इससे जोवन का वाहन सही दिशा में बहने लगता है, इस दृष्टि से ऐसी यात्रामों का मैं जोरदार गयों में प्रतिपादन करता है। मनिवयं श्री कान्तिमागरजी महाराज जैसे विद्ववर्य, समर्थ, प्रतिभाशाली मनुयोगानाय की निश्रा में और नौजन्यशाली विद्वान युवक मुनि श्री मणिप्रभसागरजी की भंगा मे निमन हम संघ का पालोनागा पहुँचने के वक्त के प्रवेशोत्सव में शामिल होने का मुन्दर र म मिला इसका प्रानन्द में अनुभव करता है। महान् तोघे भूमि में गुरु उपदेश मे पानीमाया की भाषा में मा पोग्या' और राजस्थानी भाषा में 'फले चुन्दनी' पापामार जैन मंगनी उदारमा. मंत्री भावना और अनुकम्पायान गा गौरव बदामा यादगार्गलिाम बना है. हमको हजागे लोगों द्वारा अनुमोदना हुई है। प्र में मनाना श्रीमालिनागर जी महाराज के प्रात्मीय सरकार के पति नक्षी का दान करने में मी भेटा के साथ बिजय गोरे गरि Ans.
शुभ सन्देश , अनुयोगाचार्य श्री कान्तिसागरजी मेरे पुराने स्नेही हैं । आप विद्वान् विचारक एव प्रखर प्रवक्ता हैं । आपका स्वभाव मिलनसार एव समन्वयवादी है। आपके सान्निध्य में बाडमेर से पालोताणा तक सघ की पद-यात्रा धर्म प्रचार की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। जैन-तीयं को प्रभावना की दृष्टि से इसका अपना ऐतिहासिक महत्त्व है। प्रस्तुत इतिहास को सुरक्षित रखने के लिए महासघ एक स्मारिका प्रकाशित कर रहा है, परम प्रसनता । मेरो हार्दिक शुभ-कामना है कि महासघ अपने विचार को मूर्त रूप देने में सफल हो । विरायतन, राजगृह --उपाध्याय प्रमर मुनि प्रकाशन सफल हो, यही शुभ कामना । -गणाधीश उदयसागर II शुभ - संदेश हे महान सक! भारत की धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों से विभूषित पुण्य तीर्थाधिराज की कल्याणी धागा में प्रापत्री का गुणानुवाद करते हुए सांस्कृतिक जागरण, साहित्यिक विकासोन्नयन एवं जैन ऐक्य के राष्ट्रीय संस्थान शांति विजय ज्ञानपीठ दुर्ग गौरव अनुभव करता है । गुणानुवाद का यह प्रगंग इसलिए उपस्थित हुमा क्योंकि प्रापथी ने बाड़मेर से श्री शत्रुञ्जय तीर्य की यात्रा के लिए छरी पालित संघ यात्रा का सर्जन किया और अनेक भाग्यशालियों को पुण्यानुवन्धी पुण्य उपार्जित करने का प्रवरिणम अवसर उपलब्ध कराया । जैन धर्म एवं जन संस्कृति प्राप जैसे संत मनीषियों द्वारा प्रोत्साहित धार्मिक प्रवृत्तियों की धेरणा पर ही प्रास्ता है। एक लम्चे अरसे में जिन शासन को प्रभावना के प्रादर्ण कार्यों के साथ तप पारापना का शानदार अवसर समाज को प्रापश्री ने उपलब्ध कराया। शृखलावद्ध उपधान तप की पारापना से हजारों पाराधकों ने प्रात्म-कल्याण का मार्ग पाया है। श्री नाकोड़ा में उपधान तप पारायना के बाद ही महायात्रा का उपादेय संकल्प पैदा कर लाखों लोगों की प्रात्मा में सम्यक्त्व सुधा का मिशन स्तुत्य है । भगवान महावीर के सत्य अहिंसा पर आधारित भेदभाव रहित जागृति, देशमापी दीपंदृष्टि, सुसंबद्ध सामाजिक जीवन में धार्मिक एवं प्राध्यात्मिक प्रगति तथा प्रत्यक्ष पातर हो अनुगरणीय है। इस महान् ऐतिहामिक घरी पानित यात्रा मप साहस सहित, सद्धर्म की एक. मनोरम गाथा इतिहास का प्रध्याय बन गया है। पापी ने ग माहान यात्रा द्वारा धर्म गी हरता के लिए जैगी पास्या और प्रावश्यकता होती है, उगका शानदार परिचय मारा कर जिन मानन प्रभावना भी महत्वपूर्ण फटी को उपनगि : दी है। भिनन्दनीय ।। प्रमाण....न्दी गानों के नाम पारश्री के गारचिन्द में कोटिगः पदन। सामान्य नाहर टी.मी.जन-केशरीवर कोठारी रावतमत जन 'मरिण' कार्याप्त मोतोमासाठिया, नी... मृतपान बोथरा मानबरन नामिवियभान पीददुर्ग ॥
शुभ.
संदेश
गत जनवरी माह मे, परम पूज्य अनुयोगाचाय श्री कातिमागरजी महाराज की निधा में,
बाडमेर से, वरीर एक हजार यात्रियो का, तीर्याधिराज श्री शगुन्जय वा, छ'री पालित जो मध
निकला था, यह जानकर प्रसन्नता हुई।
जिन धर्म भावनाशील श्रीमानो ने इतने बडे, 850 कि० मि० लम्चे व 52 दिन तक चलने
वाले सघ का उदारता से प्रायोजन किया और जिन छोटी बही उम के धम श्रद्धावान भाईयो-बहनो
ने पैदल यात्रा करने का कष्ट उठाया, उन्होंने मामन प्रभावना का उत्तम वार्प पिया है और वे
पयवाद के पात्र हैं।
इस सघ के स्मरण निमित्त जो स्मारिया प्रकाशित की जा रही है, वह श्री सघ यो
तीर्थ यात्रा की प्रेरणा देने वाली व सुन्दर हो, ऐसौ मेरी शुभ कामनायें भेजता हूँ।
भवदीय
धेरिणक कस्तुरमाई
अध्यक्ष
अहमदाबाद
सेठ प्रानन्दजी कल्याणजी
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पूज्य गुरुदव के साथ
मुनि श्री मणिप्रभसागरजी एव सधपति श्री भवरलालजी वाहरा
पालीताना प्रवेश सभा में-
मगला चरण करत हुय पूज्य गुरुदव
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पदयात्री सेवा सण्डल-वाडनेर
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ex सघपति • श्री मणिलालजी डासी अपन उ मुक्त विचार प्रस्तुत करत हुय- ES कमिश्नर श्री डी आर महता विशाल जन-समुदाय का पद याला सघक वाडमरस प्रयाण के समय साबाधित करत हुय- तीर्थ यात्रा का महत्त्व । प्रार्या सुलक्षणा श्री अनत उपकारी श्री तीर्थकर परमात्मा समग्र उठती है जो चचल-चित्त-वृत्तियों को स्थिर और जीवो को जिनशासन के रसिक बनाने के लिए शान्त बनाती है। तीर्थ की स्थापना करते है । (5) तीर्थभूमि के पवित्र रजकणो के स्पर्श जिससे तरा जाये उसे तीर्थ कहते है । मात्र से आत्मा कर्म रजकणों से रहित बनती है। ऐसे तीर्थ के मुख्य दो प्रकार है : (1) जंगम तीर्थ :-साधु-साध्वी, श्रावक- (6) तीर्थ स्थान मे परिभ्रमण करने वालों श्राविका रूप चतुर्विध संघ को कहते है । का भव-भ्रमण भी मिट जाता है । (2) स्थावर तीर्थ :--जो एक स्थान पर (7) तीर्थ स्थान में अपनी अस्थिर सम्पत्ति स्थिर रहता है जैसे-शत्रुजय, गिरनार, अष्टापद, का सद्व्यय करने से स्थिर और अविनाशी गुण- आबू, सम्मेतशिखर आदि । ऐसे स्थावर तीर्थो की सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। महिमा शास्त्रों में विस्तार से बताई गई है । तीर्थ (8) तीर्थपति परमात्मा की पूजा द्वारा यात्रा से कैसे श्रेष्ठ लाभ प्राप्त होते है, जरा पूजक भी पूज्यपदवी को प्राप्त करता है। देखिये-- इस तरह तीर्थ यात्रा द्वारा आत्मा अनंत पुण्य (1) परम पवित्र तीर्थ स्थानों मे जाने से प्राप्ति और अखूट आनन्द का अनुभव करता है चित्त मे शुभ अध्यवसाय उत्पन्न होते है। तीर्थ की पवित्रता जीवन को पवित्र बनाती है । स्थावर तीर्थ की महत्ता बतलाने के लिए स्वयम् तीर्थकर परमात्मा भी तीर्थभूमि मे आते (2) जहां आकर अनेक भक्त लोग भगवद् है जैसे--प्रथम तीर्थकर श्री ऋषभदेव भगवान् गुण की स्तुति मधुरालाप से सुन्दर भक्ति के गीत नव्वाणुपूर्व बार (84 लाख से 84 लाख का गाते है। जिसे सुनते ही अपना दिल भक्ति रस गुणाकार करने से जो सख्या आती है उतने वर्ष) से भर जाता है और भगवद् भक्ति में एक तान शत्रुञ्जय तीर्थ पर पधारे थे और अपने बना रहता है। निर्वाण समय को समीप जानकर अष्टापद तीर्थ (3) परम कृपालु परमात्मा की प्रशांत, पर जाकर अनशन करके मोक्ष प्राप्त किया था। मनोहर-मूर्ति के दर्शन मात्र से ही आत्मा अपनी मानसिक व शारीरिक व्यथाओ, पीड़ाओं को भूल अजितनाथ भगवान् आदि 20 तीर्थंकर कर कोई अलौकिक आनन्द का अनुभव करती परमात्मा सम्मेतशिखर तीर्थ पर अनशन करके मोक्ष को पधारे थे। (4) तीर्थंकर प्रभु की कल्याणक भूमियो की स्पर्शना से आत्मा मे भावोल्लास की सुन्दर लहरियें श्री नेमीनाथ भगवान् पुनःपुनः गिरनार तीर्थ पर आये थे और वही निर्वाण को प्राप्त हुए थे। 1 का त्याग। चलना माध्वी, श्री वासुपूज्य स्वामी भगवान् चपापुरी में मघ निकाल कर तीययात्रा का महान् लाभ प्राप्त और श्री महावीर भगवान् पावापुरी तीर्थ में अनशन विपाया। करके सिद्धपद को प्राप्त हुए। विधि पूरव तीय यात्रा करने में निम्नोत्त तीय-मसार समुद्र से पार उतरन वाली नोरा पन की प्राप्ति होती हैं है और श्री तीर्थंकर परमात्मा उम नाव यो (1) प्रारम्भनिवृत्ति चनाने वाले नियमिक (नाविर) हैं। भावुर यात्री तीय यात्रा के लिए जर से ऐसे महान् प्रभाविक तीयों को विधि पूर प्रयाग परता है तब से मभी प्रकार के घर और यात्रा करन ने महान् पन की प्राप्ति हाती है । व्यापार सवधी पाप, व्यापार का त्याग करता है जिममे प्रशुभ विचार प्राने बदहा लात हैं। शास्त्रो म निम्नोक्त प्रकार मे तीर्थ यात्रा की तया क्लिप्ट यपाय शात हो जाने मे अशुभ कर्म विधि बतलाई गई है पा वध भी नही होता है। (1) सन्वित (सजीव) प्राहार पानी आदि (2) लक्ष्मी का सदुपयोग तीर्थयात्रा में पाया हुमा यात्री प्रपनी लक्ष्मी (2) एकासन तप (कम से कम)। वा सात क्षेत्रो मे (जिनमदिर, जिनमूर्ति (3) सद्गुरुपो के साथ पैदल जिनागम माधु धावक, थाविका) (पदयाना)। मदुपयोग करने महान् पुग्योपार्जित करता है । (4) जमीन पर कनी वस्त्रो पर शयन (3) सपवात्सल्य (भक्ति) विधि पूर्वक यात्रा करने वाले का चतुर्विध सघ (5) ब्रह्मवय का पालन करना । की भक्ति का परम सौभाग्य प्राप्त होता है । मादर- (6) दोनों समय (सुबह, साय) प्रनिश्मण मविनय पूर्व साधु साध्वी महाराज आदि को पाहार पानी औषध वस्त्र प्रदान करने से सम्यग्- करना । दशन आदि गुणो की प्राप्ति होती है । गुरु मुख इन छ नियमों (करी) का पालन करते हुए से जिनवाणी का पान करने से तत्व, तीय यात्रा करने से और शक्ति हो तो चतुर्विध ज्ञान, विवेक धर्मश्रद्धा सयम आदि गुणो मघ को साय मे लेकर यात्रा कराने से तीर्थर की प्राप्ति सुलभ वनती हैं माय ही अपने स्वधर्मों पद की भी प्राप्ति हो सकती है । वधुप्रों सद्गुणो को देखकर वैसे ही गुण अपनी श्री ऋषभदेव भगवान् के मुख से तीर्थ यात्रा प्रात्मा मे प्रगटाने के शुभ मनोरय उत्पन्न होते हैं का महान् पर सुनकर भरत चक्रवर्ती ने तथा इन गुणो के प्रति प्रादर मत्तार समान श्री शत्रुजय महातोय का सघ वडी ही धूम धाम प्रगट होता है। से निकाला था और तीथ का प्रथम उदार भी (4) सम्मग्दर्शन को निर्मलता कराया था। उनके बाद दण्डवीय राजा आदि ने भी सम्यग्दृष्टि आत्मा को तीथ और तीर्थाधिपति मघ साय तीर्थ यात्रा करने तीर्थ का उद्धार परमात्मा के दर्शन वदन और स्पशना मात्र से गया था। इसी तरह विक्रम महाराजा, कुमारपाल अपूर्व भावोल्लाम प्रगटता है जिससे सम्यग्दर्शन की राजा, वस्तुपाल तेजपाल मत्री आदि ने भी वडे-बडे विशुद्धि होती है । जिसने अभी तक सम्यग्दर्शन नहीं करना । 2 लगते है। पाया है वह भी सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकता है । पति व संघ यात्रियो की उदारता जिन भक्ति तीर्थ स्थान के पवित्र वातावरण में चित्त भी गुणानुराग आदि सद्गुणों को देखकर दूसरे श्रद्धालु प्रसन्न रहता है, प्रसन्नचित्त परमात्मा के ध्यान में प्रात्मानों के हृदय में भी ऐसे सत्कार्य करने की मन प्रात्म-अनुभव प्राप्त करके आनन्द मे मग्न भावना जागृत होती है। बना रहता है। (8) जिनाज्ञापालन . "शत्रुञ्जय साधु अंनता सिद्धा सिद्धशे वलीय जिनेश्वर भगवान् ने तीर्थयात्रा को मोक्ष का अनत" इस शास्त्र वचन शास्त्र वचन से यही रहस्य प्राप्त प्रधान अग कहा है । ऐसा जानकर तीर्थयात्रा करने होता है कि तीर्थ स्थान में जाने से प्रात्मा की वाला जिनाज्ञा का भी पालन करता है। वीतराग अत्यन्त निर्मलता प्रगटती है । प्रभु की पवित्र आज्ञा को शिरोधार्य करके अवश्य (5) स्वजन स्नेहियों का हित : विधि पूर्वक तीर्थयात्रा करना चाहिये । शक्ति होते तीर्थ यात्रा पारिवारिक दृष्टि से भी हितकारी हुए भी जो तीर्थ यात्रा नही करता वह विराधना का भागी बनता है। "जिन पडिमा जिन सारखी है । तीर्थ यात्रा के बहाने स्वजन परिजन सभी एक साथ लाभ प्राप्त करते है । घर में रहते हुए कहीए सूत्र मझार" तीर्थकर भगवान् की मूर्ति तीर्थकर के समान है, इस शास्त्र वाक्य का रहस्य देव दर्शन, पूजन आदि का लाभ नही लेने वाले भी तीर्थ स्थान में जाकर धर्म कृत्य करने भावपूर्वक यात्रा करने वाले को प्रत्यक्ष अनुभव गोचर होता है। (6) जीर्ण मन्दिरों का उद्धार : (9) तीर्थकर नाम कर्म का बंध : तीर्थ यात्रा करने वाले सघ और सघपति तीर्थपति परमात्मा की मूर्ति को व तीर्थपति के तीर्थ को उनके (तीर्थपति) समान ही मान कर वगैरह को रास्ते में आते हुए गाँवों के जीर्ण मदिर तीर्थयात्रा करने वाला विवेकी आत्मा उत्कृष्ट आदि के पुनरोद्धार मे तथा जहां नवीन मदिर की आवश्यकता हो वहां पर नवीन मदिर बनाने मे भावोल्लास पूर्वक “सवि जीव करू शासनरसी' की सम्पत्ति का सद्व्यय का शुभ मगल भावना से प्रभावित बनकर तीर्थकर नाम अवसर प्राप्त कर्म का वधन करता है। होता है। (10) मुक्ति की समीपता : (7) शासन उन्नति : तीर्थयात्रा करने वाले को उपरोक्त भावोल्लास चतुर्विध संघ के साथ 'छरी' पालते हुए तीर्थ किंचित न भी उत्पन्न हो सके तो भी वह आसन्न यात्रा करने से गांव-गाव में जिन शासन की सिद्ध अवश्य बन जाता है । अर्थात् वह अल्पकाल प्रभावना होती है, जैन जैनतरो को भी सघ के दर्शन वंदन और संघ भक्ति का लाभ मिलता है मे ससार मे रहकर जल्दी से जल्दी सिद्ध पद को पाता है। इससे जिन धर्म की प्रशसा होने के साथ-साथ पारस्परिक धर्म स्नेह भी बढता है और धर्म श्रद्धा इस तरह अात्मा तीर्थयात्रा से मोक्ष को दृढ बनती है। तीर्थ माल आदि की बोली वोल समीप (निकट) करता है। कर देव द्रव्य वढाने से, तीर्थ स्थान में याचकों को (11) सुर नर पदवी : दान देने से, तीर्थ उद्धार प्रादि सत्कार्यों को करने तीर्थयात्रा करने वाला जब तक मोक्ष नही से जिन शासन की महान् उन्नति होती है । संघ मिलता तब तक वह देव और मनुष्य में जन्म 3 लेता है और वहा भी उसे राजा महाराजा स्वामी महान् सघ को देखते ही बनता था । करीन 1,000 इन्द्र आदि के उच्च उच्च पद को अवश्य पाता है । यात्रियों ने पू गुरुदेव की पावन निश्रा म विधिपूवर ऐसे व्यक्ति कभी भी दुगति में नहीं जाते हैं । धम पदयात्रा कर अमूल्य जीवन भी मायव एव सफल विवेक आदि गुणो की प्राप्ति होने से वंगग्य रस बनाया । कोटिश नमन है ऐगे गुरुदेव के चरणा म मे झोलता हुआ सभी भोगो का त्याग करके तथा शत् शत् ध यवाद है उन सघपतियो एव चारिन का विशुद्ध पालन करने अनुपम से मोक्ष यात्रियों को जिहोन अपनी मम्पत्ति और समय सुख को प्राप्त करता है। का सद्व्यय कर महान् लाभ प्राप्त विया । भव्यात्मानो को ऐसे ही महान् लाभा से ये युग द्रप्टा ह सत्यानी लाभान्वित पर प्रात्माल्यारण का माग प्रशस्त जीवन हो शीतल ज्यो चादन । करने वाला इस युग का महान् प्रभावशाली संघ हो शरद् पूरिणमा मम कान्ति गुरुत्री परम पूज्य श्रद्ध य अनुयोगाचार्य श्री कान्तिसागरजी नत मस्तर चरणो मे सदा वन्दन । म सा के पावन सानिध्य में निकला था। उस अगणित नयनो के सुखदाई Dभार्या विद्य तप्रमा खरतर गच्छ शृगार मनोहर, प्रतेवासी हरि रत्नावर जन-जन को पीयूष सिक्त कर, वाधा है है गुरुवर तुमने ॥१॥ । जिसने दर्शन तेरा पाया, पूण्योदय उसका प्रकटाया। जय-जय हो हे गुरुवर तेरी, तुमने दिव्य ज्योति प्रकटाई ॥२॥ स्व पर को भिन्नता मिटाकर, सकल विश्व वसुधा अपनाई। वधु- वधु हैं हम सब मानव, तत्व घोष यह तुमने गुजाया ॥३॥ काति नाम पावन महान् है, पुरावृत्त मे होगा उज्जवल । श्री गुरु चरण सरोज वदना, "प्रमोद" मण्डल की ग्रहो अर्चना ॥४॥ 4 चन्द्रवीरम् तीर्थङ्कर और तीर्थ लेखिका-प्रार्या सज्जन श्री -- प्रथम हम यहाँ तीर्थङ्कर और तीर्थ शब्द की स्थान निगोद है । अनन्तकाल से कर्म अर्थात् जड़ और व्युत्पत्ति पर किञ्चित विचार करे । व्याकरण जीव का सयोग चला आ रहा है। इस अनादि शास्त्र की दृष्टि से 'तृ' प्लवन तरगयोः धातु से संयोग को वियुक्त कर देने की साधना ही मुक्त तीर्थ शब्द बनता है । जिसका अर्थ है तिरना । होने की साधना है। जिन जीवों ने सयम तप की अर्थात् जिस साधना से जीव संसार समुद्र से तिर साधना के बल पर स्वयं को जड़ के सयोग से जाय उसे तीर्थ कहते है। अथवा जिस स्थान से सर्वथा मुक्त कर लिया वे सिद्ध कहलाते हैं । प्रात्मा मुक्त हो वह भी तीर्थ कहलाता है । संसारी जीवों मे से कुछ जीव क्षयोपशमलब्धि तीर्थ दो प्रकार के है-जंगम और स्थावर । से आत्म गुणो का विकास करते हुये मनुष्य गति जंगम तीर्थ, साधु-साध्वी-श्रावक और श्राविका है मे आकर उत्पन्न होते है। इनमे से भी कोई जिन्हे चतुर्विध संघ भी कहते हैं । स्थावर तीर्थ दो विशिष्ट जीव विशेष क्षयोपशम लब्धि के कारण प्रकार के है-शाश्वत तथा अशाश्वत । नंदीश्वर जिन्हे आत्म-विकास की बाह्य सामग्रियों यथा- द्वीप आदि शाश्वत तीर्थ है और प्रशाश्वत तीर्थो जैन-कुल, सद्गुरु सयोग, धर्म श्रवण, प्रभु दर्शन, की स्थापना समय-समय पर होती रहती है। इन पूजन आदि की समुपलब्धि होती है। ऐसे जीव सभी प्रकार के तीर्थो की महत्ता बतलाने वाले और स्वभाव से ही दयालु, उदार, सरल, विनयवान् स्थापना करने वाले श्री तीर्थकर भगवान् होते है। और सदाचारी होते है । तत्त्व जिज्ञासा उन्हें प्रगति पथ पर अग्रसर करती है । और वे स्वय भी तत्त्व- इस अनादि अनन्त संसार मे जड और चेतन जान की प्राप्ति का प्रयत्न करते है । उनका चिन्तन रूप में छः द्रव्य है---(1) धर्मास्तिकाय, (2) आत्माभिमुखी बन जाता है। उन्हे चेतन और अधर्मास्तिकाय, (3) अाकाशास्तिकाय, (4) काल, जड़ की भिन्नता का ज्ञान हो जाता है । वे जान- (5) पुद्गलास्तिकाय, (6) जीवास्तिकाय । इनमे जाते है कि चेतन, नित्य, शाश्वत, अखण्ड और मुख्य दो द्रव्य है-जीवास्तिकाय और पुद्गला- चिन्मय स्वरूप है । जड़-अनित्य अशाश्वत् खण्डित स्तिकाय । जीवास्तिकाय चेतन द्रव्य है तथा अर्थात् विशीर्ष स्वभावी है। वह अात्मा नही है पुद्गलास्तिकाय अचेतन । ये दोनों ही अनन्त है । उसमे चेतना शक्ति नहीं है। चेतन और जड़ का अनन्त जीव सिद्ध हो चुके है और अनन्तानन्त जीव संयोग संसार भ्रमण का कारण है । जब जड़ के संसार में ही जन्म मरण कर रहे है ! जीवों का मूल संयोग से चेतन सर्वथा मुक्त हो जाय तो उसका 5 जम मरण व ससार भ्रमण भी नहीं हो सकता। नही हुये कि तु जहाँ से अनन्त जीवो ने मुक्ति प्राप्त इसी श्रद्धा या विश्वास तथा ज्ञान को सम्यग्दगन की वे स्थान भी तीय स्त्रम्प हैं। इनके अतिरिक्त सम्यक् ज्ञान कहते हैं । ऐसे सम्यक्त्वी जीव मुक्ति- अनेको स्थान जहां प्राचीनतम जिनविम्ब विराज- पथ पर स्थित हो जाते हैं। श्रोधादि कपाया और मान हैं वे भी तीथ ही कहलाते हैं। ऐसे स्थान विषय विकारो को जीतते हुये उत्कृष्ट सयम तप दर्शनीय वदनीय, पूजनीय और बारम्बार की साधना से तीथकर नामकम का वध करके स्मरणीय है । जगत् की सर्वोच्च विभूति बनते हैं। केवल जान इन मब तीर्थों में मवाधिक महात्म्य शाश्वत केवल दशन पूर्णत प्रक्ट हो जाते हैं । उह तीय शगुञ्जय गिरीराज का है । जिसे सव प्रथम अनुत्तर रूप सम्पदा, अनुत्तर वैभव, सुरासुर पूज्यत्त्व, चौतीस प्रतिशय, पतीस वागतिशय आदि अलौकिक आदि तीथङ्कर श्री ऋपभदेव भगवान् ने श्री भरत चक्रवर्ती के सम्मुख बतलाया था। और भरत ने शक्तियां समुपलब्ध होती हैं । वे चतुर्विध संघ की म्थापना करते हैं। इस सघ का ही दूसरा नाम चतुर्विध सघ सहित यात्रा कर जीवन सफल बनाया तीय है । तीथ निर्माण के कारण ही वे तीर्थकर निर्मित कराये और उनम मणिरत्नो की प्रतिमायें था। तथा जिर्णोद्धार करा कर म्बरण्मय प्रामाद कहलाते हैं। जगत् के त्रिकालवी भावो को स्थापित की। तदन तर इस अवसपिणी काल मे जानते देखते हैं। लोक में रहे हुये पड द्रव्यो के गुण और पर्यायो को सप्त नय चार निभेप से और शत्रुञ्जय महातीय के प्रसस्य समुदार हो चुके उनके अनत घमों में से कतिपय धर्मों को सप्त- हैं उनमे सोलह मुख्य माने जाते हैं। अभी वतमान भगी द्वारा ममझाते हैं । लोक के क्षेत्रीय वन मे मे मोलहवा उद्धार डोमी वर्माशाह का है । ऐसे स्थानो का भी वणन है जहाँ शाश्वत जिन श्री शत्रुजय तीथ की महिमा का वरणन विराजमान हैं। जैसे देवताप्रो के मुवन विमान प्रागमो से लेकर जैन साहित्य की विविध विद्याप्रो आदि मे तथा नदीश्वर चक जम्बू आदि द्वीपों मे भक्ति भाव पूर्वक वरिणत हुप्रा है और आधुनिक मे जहाँ जहाँ शाश्वत जिनप्रासाद हैं और उनमें युग मे भी भक्त कवि अपने काव्यो मे शब्द बद्ध 500 धनुप शरीर प्रमाण वाली मणिरत्नमय करते रहते हैं । शास्त्रीय सगीत से लेकर साम्प्रतिक जिनप्रतिमाएं विराजमान हैं । देवादि जघा फिल्मी गीतो और लोक गीतो तजों तक मे विद्याचारण मुनि और विद्याधर ही यहां जाकर शाग्रुञ्जय तीर्थाधिराज के स्तवन यहाँ के वातावरण प्रभु भक्ति का लाभ लेते हैं। यह बात मागमो मे मे सदा गूजते रहते हैं। श्री भगवती मूत्र, जम्बू द्वीप प्रज्ञप्ति, जिवाभिगम रायप्पसेगी आदि में वरिणत है। ये शाश्वत तीर्थ तीय तो अनेक हैं किंतु इम शत्रुजय महातीय कहलाते हैं। का महत्त्व तो कुछ अद्भुत ही है। क्यो न हो- जहाँ अनन्तानत प्रात्मानो ने साधना कर सिद्धि भारतवप मे भी वे स्थान जहाँ तीयङ्करों के प्राप्त की है । भगवान् श्री ऋषभदेव जहां जमादि कल्याणक हुये हैं वे तीय रूप हैं । क्योकि पूवनव्वाणुवार समवसरे है । भगवान् नेमिनाथ के वहां का पर्यावरण उन महान् पुरुषो के मानसिक अतिरिक्त तेवीस ही तीथङ्कर यहां पधारे हैं। याचिन तथा कायिक परमाणुनो से परिव्याप्त हैं श्री अजितनाथ भगवान् एव श्री शान्तिनाथ भगवान जिनका प्रभाव दर्शको पर पड़ता है । उनके विचार ने तो वर्षावास स्थिति की है। श्री पुण्डरीक पवित्र बनते हैं। ऐसे स्थान भी जहां कल्याणक तो गणधर पाच कोटि मुनिवरो के साथ मोक्ष पधारे 6 हैं । कहाँ तक वर्णन करे इस पावन भूमि का एक (6) ब्रह्मचर्य का पालन करते हुये सघ के साथ एक करण अत्यन्त पवित्र है । यहाँ ऐसा कोई स्थान हजारो मील चलकर इन पावन तीर्थ की यात्रा नही, जहाँ से अनन्तात्मा सिद्ध न हुये हो । यहाँ का करते है। ऐसी सघ यात्रामो से जैन जगत का अणु-अणु उन महान् प्रात्माओ के आत्मानुरस से इतिहास भरा पड़ा है । सघ यात्रा के साथ तीर्थ अोतप्रोत है अतः यहाँ के वातावरण मे पवित्रता, दर्शन, पूजन और भक्ति करके भव्यजन मानव निर्मलता और विशुद्धता के साथ कुछ ऐसी अद्भुत जन्म सार्थक करते हुये मुक्ति मार्ग की ओर अग्रसर विशेषता है कि दर्शको की भक्ति विनम्र कोमल होते है । हृदय भूमि मे वोधि-बीजाङ्क र प्रस्फुटित हो जाते है और वे स्वरूपानुभव के प्रानन्द से भर उठते श्री खरतरगच्छ की सुविहित परम्परा के है और उनके अनेक भवाजित पापकर्म क्षण मात्र इतिहास के स्वर्ण पृष्ठ ऐसी अनेक तीर्थ यात्राओं मे विनष्ट हो जाते है । के वर्णन से अकित है। 1000 वर्ष से खरतरविरुद प्राप्त अनेक प्राचार्यादि की प्रेरणा से भाग्यशाली अतएव त्रैलोक्य पूज्य तीर्थकरो ने जगम नर-नारी रत्नो ने छ री-पालित सघ लेकर इस तीर्थ-साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविका रूप चतुर्विध सघ महान् तीर्थ की यात्रा की है। वर्तमान में पूज्य को इन स्थावर तीर्थों की उनमे भी विशेषतः प्रवर शासन प्रभावक प्राज्ञ पुरुष अनुयोगाचार्य श्री शत्रुञ्जय तीर्थ की नव्वाणु यात्रा चातुर्मास श्री कान्तिसागरजी म. सा० की पुनीत प्रेरणा स्थिति और वहाँ रहकर विशिष्ट तप करने का और अध्यक्षता मे मरुधर स्थित बाड़मेर नगर से पावन उपदेश दिया है। तद्नुसार अनेक आसन्न अभूतपूर्व छ.री पालित संघ यात्रा हुई उसकी भव्य प्राणिगण यहाँ विभिन्न धर्म कृत्य-दान, अपूर्व शोभा व्यवस्था आदि अत्यन्त सुन्दर व अनुपम शील, तप भावनादि करके अपनी उपलब्ध थी जो अवर्णनीय है। अनुमानतः शताधिक वर्ष शक्तियाँ-धन, वैभव, सत्ता सम्पत्ति आदि का पश्चात् खरतरगच्छ में यह संघ यात्रा हुई जो सदुपयोग कर मानव जीवन को सफल बनाते है । अपने आप में एक ही थी। इसका अंकन इतिहास के स्वर्ण पृष्ठो पर चिरकाल पर्यन्त रहेगा । गच्छ वर्तमान मे भी अनेक शासन प्रभावक प्राचार्य गुरुदेव श्री कान्तिसागरजी म. सा. एवं भाग्य- उपाध्याय गरिण पन्यास प्रादि महापुरुष छ.री . शाली सघपतियों की कीत्ति पताका को दिग- पालित संघ अर्थात् (1) एकासन भोजन, दिगन्तरो मे फहराता हुआ जैन-शासन की (2) सचित्त परिहार, (3) पदचारिता, (4) जयवन्तता का उद्घोष प्रसारण करता रहेगा। भूमि शयन, (5) शुद्ध सम्यक्त्व धारण और 7 श्रद्धास्पद शत्रुञ्जय 0 दिव्य विभूति पूज्य श्री प्र प्रमोद श्री जी म सा की बाल शिष्या "विद्युत प्रभा श्री", बाडमेर डूबते हुये समुद्र मे जिम प्रकार काष्ठ का टुकडा लालायित है पर तु जव तक ऊपर चढने के लिये वचाने में सहायक हो मरता है उसी प्रकार तीथ सीढिया न हो क्या तव तक उस स्थिति में वह भी इस अथाह भीपण अगाध समार से तिरने मे व्यक्ति ऊपर पहुँच सकेगा ? नहीं। उसी प्रकार महायता प्रदान करता है। चौरामी लक्ष जीवा अगर हमे भव मुक्त होना है सिद्ध शिला तक की योनियों में भटक्ते प्राणी ने अज्ञानतावश न जाने मजिल तय करनी है, तो कितनी मीढियो की क्तिने पाप कर्मों द्वारा अपनी आत्मा को भारी आवश्यकता है ? जब तक साधक के समक्ष पना लिया है। क्तिने कम परमाणुमो ने इस साधना के उपाय प्रस्तुत नही हो तब तक वह आत्मा को मलिन बना दिया है और सवविदित है अपनी माधना के चरमोत्कर्ष तक नहीं पहुँच कि भारी वस्तु रमातल मे ही पहुंचती है। मकता । "तीययाया" भी एक महान् माधन उध्वगमन आत्मा का मुख्य म्वभाव है, परन्तु जव है । अनेन भूले भटक पथिको ने तीर्थों की वदना तक वह हत्की नहीं होनी ऊपर उठना उसके नूतन । माग दशन प्राप्त दिया है । लिये असभव है । तीर्थ मे यह शक्ति है कि वडा भारतीय संस्कृति के प्रतीक इस समूचे भारत में में बडा हत्यारा भी भावपूवक उसकी वदना मे कितने ही तीथ हैं जिनमे सिद्धाचल तीर्थाधिराज भव मुक्त हो जाता है। जरूरत है उमके विवेक मुख्य है । इसी तीथ के ऊपर कितनी ही महान् की एव भावनायो की। जिम प्रकार शरीर का आत्मायें उर्ध्वगति को प्राप्त कर चुकी हैं, पर मवसे अत्यधिक महत्त्वपूण भाग (Important Part) रही हैं और भविष्य मे भी करेंगी। यह तीर्थ मस्तिष्क (Brain) है, हमे वह कुछ करता प्रतीत जिनेश्वरो के पावन चरणो द्वारा पावन हैं । मुनि नही होता फिर भी सारी क्रियानो का सचालक पुटवो की पीयूपवाणी पाज भी उस प्रात मे मस्तक है । ठीक उसी प्रकार हम कितनी ही धर्म गुजरित हो रही है। चुम्बकीय प्राक्पण लिये क्रियायें करें, जहा तक हमारे विचार शुद्ध न हो नित्य प्रति लक्षाधिक पानी इस तीर्थ के दर्शन हमारी भावनायें निमल न हो, हम विवेक द्वारा करते हैं । भारतीय ही नहीं अपितु विदेशी पयटक अभिसिन्चित न हो, धार्मिक प्रियायें जीवन याना भी यहा आकर सिद्धाचल की महिमा, इसकी को सुखद बनाने के लिये मक्षम न हो सकेंगी। महान् समृद्धि, देखकर आश्चर्यान्वित हो दातो तले अगुती दवाने लगते हैं । पूजा के लिये क्तारो सीढ़ियों की प्रावश्यकता मे खडे रहकर प्रतीक्षा करनी पड़ती है। विशेष प्रालीशान सप्तमजिल बगला बना हुआ है । उत्सव (function) पर तो यहां यातायात की उमका स्वामी सर्वोपरि मजिल पर पहुंचने के लिये भीड मी लग जाती है । और उनकी सुविधा के 8 3 . -- Scie S८ JA SANSAR mmmmTOTA KE NIMAL Hit THE STE 3. wa SAASANTA CHHA 11 A E S S है । गणाधीश प. श्री उदयसागरजी उपाध्याय श्री अमर मुनिजी पू. आचार्य देव श्री यशोभद्र विजयजी महाराज महाराज महाराज Poonamong জার্মা স্থ SM শী vrhulpitim भाशीर्वाद-दाता । . पू. मुनिराज श्री जिनचन्द्र विजयजी महाराज मुनि श्री मणिप्रभसागरजी महाराज । - है Pmm [... विदुपी आर्या श्री मनोहर श्रीजी साध्वी श्री सुलोचना श्रीजी महाराज महाराज - in- - . श्री भंवरलालजी वाहरा बाडमर (सघ क पमुख आयाजक) श्री कमलसिहजी धडिया कलकता (पथम सघपति) श्री मणिलालजी डानी दिल्ली (फल चुनी के आयाजका यानी सघ के सघपति भी धमव दजी जाजड श्री कुदनमलजी मेहता इन्दौर बाडमर श्री मिश्रीलालजी पाटा माहदा श्री आदमलजी बाहरा दाउमर श्री पुरुपातमजी माहवरी बाडमर Dard ur नदीपचन्टजी गोलेच्छा ऊँटी श्री भुमलजी रांका श्री धनराजजी गोलेच्छा ऊँटी ब्यावर ARE ... विशिष्ट पद याली LILL HealithaaDIA सौ कचनबाई कोचर फलौदी सौ. सम्पतबाई गोलेच्छा ऊँटी POST 1./ mmmmms Prior A ३ •nir १४१ सौ. सुशीलादेवी वावूलालजी पडाईया. बाइमेट {"i l-II श्रीमती मनोहर पा दुर्ग गाव .
, श्री लूणकरणनी छाजड श्री जीवणमलजी हाना वाइमर श्रीवरलालजी सठिया चाइमर वाइमर याली सघ के सघपति m श्री द्वारकादासजी राठी बाडमर ओ साहनराजजी लाटा पाली श्री भवरलालजी डानी वाउमर AMIN inpremony -train- श्रीभवरलालजी बाथरा श्री जवाहरलालजी रापयान दिल्ली লমললসাল मद्रास वाइमर लिये यहां अनेक भाविकों ने अपनी चंचला लक्ष्मी पावन सिद्धाचलेश्वर आदिनाथ के पावन चरणों- का सदुपयोग कर धर्मशालाएं वनवादी है । जिसमे त्पलो शत्-शत् नमन सह मै अपनी इस तुच्छ "हरि विहार" भी मुख्य है । “पापी अभवि नजरें लेखनी को विराम देती हूं। न निरखे हिंसक पण उद्धरिये शत्रुञ्जय गिरि यात्रा नवाणु करिये' उदात्त भावना सह परम जय गुरुदेव ! जय गुरुदेव !! जय गुरुदेव !!! गच्छ शिरोमरिण के गुरण गाये आर्या मनोहर श्री गाये हम सब गाये, गच्छ शिरोमरिण के गुण गाये । पाये दूर से आये, देने बधाई गुरुवर दूर से आये ।। शुष्क धरातल को सरस बनाया, जैन शासन का शान बढ़ाया। सुषुप्त जन मानस को जगाये' "॥ आये०॥ मधुर मनस्वी सरल स्वभावी, प्रखर प्रेरणा परम प्रभावी । दर्शन से मन झूम उठा है....॥ गाये० ॥ धार्मिक कृतियों का पार न पाये, अपूर्व छटा संघ की मन भाये । पावन निश्रा कान्ति सुहाये....."॥ गाये० ।। बाड़मेर संघ का भाग्य खिला है, अनुयोगाचार्य का साथ मिला है। संघ चतुर्विध सिद्धगिरि जाये......॥ प्राये० ॥ तब आदेशानुरूप मिलन है, हर्षित मन प्रमुदित जीवन है। भक्ति सुमन मनोहर वंदन है.......।। गाये० ॥ तर्ज-जागो मोहन प्यारे' 10 9 भारतीय मुनि श्री कांति सागर जी एक मवेदनशील व्यक्ति डॉ शशि जैन 'धार्मिक सद्भावो एव सव धम मम वय' के अनुयोगाचाय सवत् 1978 को राजस्थान प्रति समर्पित भारतीय मुनि श्री काति सागर जी (रतनगढ) मे जमे, छोटी वय मे ही घर परिवार का सवेदनशील व्यक्तित्व वेजोड है और हर व्यक्ति की चहार दिवारी से बाहर आ गए और सारे चाहे वह जैन कहलाता हो या हिदू, सिस, ईमाई, देश को अपना परिवार वना लिया। ५० पूज्य पारसी अथवा मुसलमान उनमे प्रभानित हुए बिना श्री जिन हरिमागरसूरीश्वर जी म सा की पारखी रह नहीं पाता। मुनि श्री कहते है "धार्मिक्ता नजरो ने जिन शासन को प्रभावना म सुवासित को तो प्रगाढ प्रेम, मंत्री और परस्पर सहयोग से होने वाले पुष्प को पहचान लिया। प्राध्यात्म की वढाना चाहिए । प्रगाढ प्रेम की भावना ही हमारी भूस वचपन मे ही थी, वह उत्तरोत्तर बढती ही शक्ति का कारण है और इसी शक्ति मे गष्ट्रीय गई । जैन धम का उहोने गहन अनुशीलन किया, ममृद्धि निहित है"। उनका यह क्थन अपूर्व अय धम प्रयो का स्वाध्याय दिया। उहोने समवय भारतीय चेतना में निहित एक गभीर एक सच्चाई को उजागर किया--जन धम मे सत्य को परिलक्षित करता है । विश्व धम होने की क्षमता है। अहिंसा का अथ भारत के जिस भी कोन मे अनुयोगाचाय है, प्रेम और मारे धम यदि वे वास्तव में धम है, श्री कातिसागर जी को जिम किसी ने भी सुना है, तो प्रेम की आधार शिला पर ही प्रतिष्ठित हो देखा है, अनुभव किया है कि उनने अपने चाग सरते हैं। आर कोई भी सवीर्ण साम्प्रदायिक दायरा नहीं पूज्य गुरुदेव श्री जिन हरिसागर मूरि जी की वनने दिया । कई सावजनिक प्रवचना मे उहोने निश्रा में जन धम के प्राचार मूलक सिद्धान को कहा "भारत के ही नहीं, सार मसार के धर्मों के रोम-रोम मे समाविष्ट कर धम का प्रचार करने मूल सिद्धात एक है-मनुष्य अच्छा मनुप्य वन के लिए अग्रसर हो गए। कठार साधना के साथ और सारे मानव समाज को प्रेम तथा वधुत्व की जन-जन तक प्रेम का महान् सदेश पहुचाने उ होने भावना से सारे देश की परिक्रमा की। इस परिक्रमा मे जिन कृष्ण जन्माष्टमी पर अनुयोगाचार्य का दिया शासन की अभूतपूर्व प्रभावना भी की। जिन गया प्रवचन का एक-एक शब्द थामिक्ता की मदिरा की प्रतिष्ठा, दादावाडियो का निर्माण, बुनियाद का विश्लेषण करता है । वस्तुत अनु- उपधान तप की आराधना, विभिन जैन पर्वो पर योगाचाय से भारतीय मानस के तत्वा वो इतने उत्साहित अनुष्ठान धाराधना, दादा जयती के निक्ट ने देखा परखा है कि उसकी मफ्लतापूर्वक अलावा सामाजिक मतभेदो की गहरी खाइयो को लोग मागलिकता की ओर उ मुख कर देने को व्यग्र पाटकर यात्मवल्याण का माग प्रशस्त करने की प्रतीत होते हैं । ऐतिहासिक कायाविति उल्लेसनीय है । यही समृद्ध करे।' 10 --- है प्रमुख है। कारण है कि महीदपुर (मालवा), खेतिया (खान । उनके सतत् प्रयासो मे मानवता की सेवा देश) खामगांव, पायधुनी, (बम्बई), ठाणा, पाली- ताना, वीकानेर, फलोदी पार्श्वनाथ, राणकपुरजी अनुयोगाचार्य जी को यदि प्रेम की साकार उदयपुर, आर्वी, भद्रावती (भाँदकजी), कुल्पाक जी, प्रतिमा कहूं तो गलत न होगा। विद्वानों तथा चांदा, गुटुर, विजयवाड़ा, राज महेन्द्री, मद्रास, समाजसेवियों का वे मुक्त हृदय से आदर करते कडलूर, सेलम, रामेश्वरम्, कन्याकुमारी, कोचीन, है । छोटा, वड़ा, धनी, गरीव की दूरी की रेखा ऊटी, कालीकट, मैसूर, हैदरावाद, बाडमेर, वे कभी न खीच सके। "जैन श्री” मासिक पत्र नाकोड़ा जी, जैसलमेर, प्रोसिया, फलोदी, जयपुर, और उसके सम्पादक मण्डल को जैन साहित्य के पाली, जोधपुर, नागौर, ब्यावर, अजमेर, ग्वालियर, प्रचार-प्रसार के लिए जिस उदारता से प्रोत्साहित कानपुर, वाराणसी, राजगृही, पावापुरी, सम्मेत- किया उससे समूचा जैन समाज लाभान्वित हो शिखर, कलकत्ता आदि स्थानो मे अनुयोगाचार्य जी रहा है। अन्यथा अासाम की वादियो मे जैन के हस्ताक्षरित कृति दस्तावेज अमूल्य सम्पत्ति है । परिवारो को जिनवारणी का सदेश न मिल पाता। अनुयोगाचार्य जी अत्यन्त ओजस्वी वक्ता है । इसीलिए जैन श्री ने आपको सर्व प्रथम प्रज्ञा पुरुप भापा पर उनका असामान्य अधिकार है। धारा कहकर संबोधित किया जो शब्दशः सत्य है । प्रवाह बोलते है। धर्म के सूक्ष्म सिद्धांतो का अनुयोगाचार्य जी को कई उपाधियों से अलकृत निरूपण वे इस प्रकार करते है कि सामान्य से किया गया है। उनकी विद्वता के लिए 'जैन सामान्य व्यक्ति भी उन्हे सहज ही समझ सकता साहित्य शिरोमणि' तथा 'अनुयोगाचार्य' आदि है । वे तात्विक विवेचन करते है। विपय कैसा अनेक उपाधि प्रदान कर जैन समाज ने अपने को भी हो किन्तु जितनी सहजता से वे प्रतिपादित गौरवान्वित किया है। किन्तु मेरी यह मान्यता कर देते है आश्चर्य होने लगता है । अनुयोगाचार्य है कि उनका व्यक्तित्व इन उपाधियो से कही ऊंचा जी ने जहां मानव चेतना को प्रबुद्ध करने के लिए है, उनके नाम के दो शब्द 'कान्ति' तथा 'सागर' अपनी उदात्त वाणी का सदुपयोग किया, वही उन्हे ऐसे स्थान पर आसीन कर देते है, जहां कोई धर्म प्रचार के लिए साहित्य को माध्यम बनाया। भी उपाधि उन्हे नही विठा सकती है। साहित्य मदिर की पूजा मे उनके शिष्य श्री मरिण- अनुयोगाचार्य जी के प्रेरक व्यक्तित्व से उपधान प्रभ सागर जी एक सुन्दर भेट होगे यह विश्वास तप तथा छरी पालित यात्रा सघो के हजारो होता है। आराधनार्थी लाभान्वित हुए है और आत्म-कल्याण अनुयोगाचार्य जहा जैन साधुओं की चर्या का मार्ग प्रशस्त कर रहे है। इन्ही शब्दों के साथ विधानो की कट्टरता से पालन करते है वही अन्य भारतीय मुनि अनुयोगाचार्य श्री कान्तिसागर जी सामान्यो के साथ सुख-दुःख मे ओतप्रोत हो जाते म. के चरणो में वदन करती हूं। बांध लिया है अखिल विश्व को सहज भाव से तुमने, जय घोष सुनाती जिनकी विजय सत्य की वाणी । संत मनीषी में तुमने भेद न कोई जाना, इतनी परम उदार सुहृदय बोली तेरी जन कल्याणी । --मरिग 11 1 प० पू० अनुयोगाचार्य श्री कान्तिसागरजी म० को निश्रा मे बाड़मेर से पद यात्री सघ का ऐतिहासिक प्रयाण बाडमेर की जनता द्वारा उपकारी गुरुदेव को सराहनीय सेवाएं प्रदान की हैं। पद यात्रा संघ भावभीनी विदाई प्रयाण का कायक्रम निश्चित होने पर वाडमेर सघ के पांच व्यक्तियो का प्रतिनिधि मण्डल भारत को पश्चिमी सीमा का सजग प्रहरी श्री नैनमलजी भंसाली के नेतृत्व मे ५० पू० गणा- बाडमेर जिला प० पू० गुरुदेव महान् उपकारी धीश श्री उदयसागरजी महाराजादि मुनि मण्डल, अनुयोगाचार्य श्री कान्तिसागरजी महाराज का प्रवर्तिनीजी एव साध्वियो की सेवा म विनती करने सदैव ऋणी रहेगा। उन्होंने इस जिले को जन हेतु देश के विभिन्न स्थानो पर पहुँचा। सभी समाज सहित समस्त कौमो पर अपनी प्रतिभाशाली स्थानो पर प्रतिनिधि मण्डल का अच्छा स्वागत व्यक्तित्व की छाप डाली है और उहे धर्म माग हुआ। पदयात्रा सघ की अनुमोदना की गई। की प्रेरणा दी है। आपके उपदेशो से नाकोडा तीथ शासनदीपिका छत्तीसगढ़ रत्न शिरोमणि में अब तक 6 उपधान आपकी ही निश्रा में हो श्री मनोहरश्रीजी ठा० 17 ने तत्काल सच मे चुके हैं। प्रनेको सार्वजनिक प्रवचनो या जनता शामिल होने की स्वीकृति प्रदान कर दी। इसी लाभ उठा चुकी है । चातुर्मास मे बाडमेर मे अपूर्व प्रकार कई मुनि भगवती एव साध्वीजी महाराजो तपस्यायें हो चुकी हैं । इसी जिले का सौभाग्य रहा की स्वीकृति प्राप्त कर प्रतिनिधि मण्डल सहप है कि महान् प्रतापी जैनाचार्य दादा बाडमेर पहुंचा। श्री जिनकुशल सूरिजी की जमभूमि भी इसी जिले के गढ सिवाना मे है । प० पू० बहुमुखी प्रतिभा के बाडमेर मे इस प्रकार के विशाल ऐतिहासिक धनी अनुयागाचाय श्री कातिसागरजी महाराज की यात्रा महासघ के निक्लने का पहिला ही अवसर प्रेरणा पाकर सर्वप्रथम धमनिष्ठ श्री भवरलालजी होने से बड़े उल्लास के साथ जोर-शोर से तैयारिया वाहरा तथा उनके साथी वाडमेर से पालीताणा की गई। देश भर के कोने-कोने मे हजारो पोस्टर, महातीर्थ के छहरी पालता यात्रा संघ के निकालने पन एव प्रामत्रण पत्रिकाएँ भेजी गई और पुर के शुभ कायं मे तन मन-धन से जुट गये। इसके भारत के संघो को अाग्रहपूण ग्रामनरण भेजे गये । अलावा इस काय को सफल बनाने के लिए बाडमेर थोडे ही समय में वाडमेर-पालीताना पद यात्रा संघ मथ के अनेक लोगो ने रात दिन एक करके प्रयाण के समाचारो की देश भर में "चलो 12 किया। पालीताना" से धूम मच गई । आकाशवाणी केन्द्रों, तारीख 31-1-80 को शुभ मुहूर्त मे पद यात्री सघ समाचार-पत्रों ने इस शुभ समाचार का प्रसारण मे प्रस्थान किया । प्रस्थान का जुलूस बड़ी धूमधाम से रवाना हुआ । जैनध्वज लिए मरुस्थल की प्रसिद्ध सवारी ऊँटों पर सवार, नगाड़े, बीजा- नये मार्ग क्षेत्र का चयन : पुर का अमृत वैण्ड, वाड़मेर का महावीर बैण्ड, प० पू० अनुयोगाचार्यजी की दूर दृष्टि और कान्ति जैन मण्डल एव विमल जैन मण्डल के शासन प्रभावना की अनुपम भावना ने पद यात्रा बालक जैन झण्डे लिए हुए चल रहे थे। सजे हुए संघ आयोजक और प्रवर्तक मडल को मार्ग दर्शन घोड़े, हाथी, भजन-मण्डलियाँ प० पू० अनुयोगाचार्य दिया फलस्वरूप सर्वथा नवीन मार्ग क्षेत्र का चयन श्री कान्तिसागरजी महाराज मुनि मण्डल देश के कर ऐसे छोटे-छोटे ग्राम-नगरो को मार्ग मे लाभ कोने-कोने से पधारे हुए खरतरगच्छ के अनेक देने का निश्चय किया गया जो कि अब तक लाभ आगेवान बाड़मेर नगर के हजारों जैन-जनेतर, से सर्वथा वंचित रहे हैं। तखतगढ़ से आये हुए सुन्दर रथ मे प्रभु आदिनाथ, पार्श्वनाथ नवपद गट्टाजी, पंचतीर्थी शोभायमान मार्ग का पूरा विवरण एवं पद यात्रा संघ के थे। साध्वी मण्डल, हजारों महिलायें मंगल गान- विश्राम स्थल का पूरा विवरण इसी अक मे है । मार्ग के सभी ग्राम-नगरो मे इस महान् ऐतिहासिक गाती हुई इस विशाल जुलूस की शोभा बढ़ा रही थी। बाड़मेर के बाजार इस उपलक्ष में बन्द रखे पद यात्रा संघ के समाचार पाकर खुशियाँ छा गई गये । जगह-जगह गहुलियाँ की गईं। अपने प्राणो और भव्य स्वागत-सम्मान के लिए असीम से प्यारे गुरुदेव श्री कान्तिसागरजी महाराज तथा उत्साह एव तैयारियो के समाचार मिले । इस महायात्रा संघ प्रयाण समारोह मे मानों पालीताना में खुशी की लहर : बाड़मेर नगर ही उमड़ पड़ा था । फुटपाथ मार्ग ५० पू० बहुमुखी प्रतिभा के धनी अनुयोगाचार्य और मकानो के आगे नर-नारी बड़ी संख्या मे 1008 श्री कान्तिसागरजी महाराज की पावन एकत्रित थे । पू० गुरुदेव एवं संघ की जयजयकार निश्रा मे इस विशाल ऐतिहासिक पद यात्रा संघ कर रहे थे। बाडमेर मे यह दृश्य एक अनुपम के पालीताना पदार्पण का समाचार पाकर देश ऐतिहासिक महोत्सव था। ऐसा विशाल जन-समूह की जनता खुशी से झूम उठी अनेक प्रकार से इससे पहले किसी समारोह मे कभी नही दिखाई स्वागत व्यवस्थाएँ की गई । इस शुभ अवसर दिया। पर पद यात्रा संघ के प्रवेश पर पालीताना एवं पधारने वाले यात्रालुप्रो के लिए फले चुनदड़ी-नव- भव्य विदाई समारोह : कारशी का आयोजन प्रवेश महोत्सव के उपलक्ष मे बाड़मेर नगर की सीमा पर चौकी चुंगी के किया गया । समीप प० पू० गुरुदेव चारित्र चूड़ामणि श्री कान्तिसागरजी महाराज तथा पालीतारणा यात्रा पद यात्रा संघ का भव्य प्रयारण : सघ को विदाई देने हेतु भव्य विशाल पडाल वाडमेर जैन न्याति नोहरा से बड़े समारोह सजाया गया था। यहाँ लगभग तीस हजार नर- पूर्वक प० पू० अनुयोगाचार्य श्री कान्तिसागरजी नारियो की विशाल उपस्थिति थी। इस समारोह महाराज की पावन निश्रा मे मुनि मण्डल तथा की अध्यक्षता श्री फतहसिंहजी चारण जिलाधीश श्रावक-श्राविकाओ ने माघ सुदी 15 गुरुवार बाड़मेर ने की । मुख्य अतिथि के रूप मे 13 , न श्री देवेद्रराजजी मेहता कमिश्नर राजस्थान अवसर प्रदान दिया। साध्वीजी ने यात्री सघ के सरकार पधारे । मगलाचरण के बाद श्री प्र० भा० लिए भी मगल-कामनाएं की। जैन श्वे. खरतरगच्छ महासघ के सहमत्री पुलिस अधीक्षक श्री मीनाजी ने यात्री सघ ये श्री गुमानमलजी मालू ने महासघ की ओर से लिए मगल कामनाएँ करते हुए प्रशासन के सहयोग प० पू० गुरुदेव श्री अनुयोगाचाय कातिसागरजी का आश्वासन दिया। श्री वल्लभचन्दजी मसाली का गुणगान किया यात्रा सघ की मगलकामना की ने पू० अनुयोगाचाय श्री कातिसागरजी को मेवानी तथा नूतन दीक्षित मुनि श्री चन्द्रप्रभसागरजी का की सराहना की। श्री कल्याण जैन मण्डल की अभिनदन क्यिा । नव दीक्षित मुनिश्री को ओर से मार्मिक विदाई गीत गायन हुग्रा ग्परतरगच्छ महासघ के कोपाध्यक्ष सेठ मणीलालजी डोसी ने महासघ की ओर से चादर प्रोढाई। उपकारो की तो है बडी कहानी, प्रापकी महिमा क्सिी ने न जानी । पद यात्रा ममिति के अध्यक्ष श्री हस्तीमलजी जावे गुरुवर भूल जाना, पहाइया ने मुख्य अतिथि श्री मेहता साहव, अध्यक्ष फिर चौमासे बाडमेर प्राना 11 जिलाधीश चारण साहब सेठ मणीलालजी डोसी प्राज विदाई दे गुरुवर की, का पुष्पहार पहनाकर अभिनन्दन दिया। पाये मैना भर-भर हमारी। सेठ मणीलालजी डोसी की ओर से वाडमेर के कान्तीसागरजी तोडने चाल्या, जैन मदिरो, स्थानक गुरुद्वारा, मस्जिद वैष्णव प्राप गुरुवर प्रीति हमारी ।। मदिरो विद्यालयो, अस्पतालो गोशाला, कबूतर- मुख्य अतिथि श्री देवेद्रराजजी मेहता ने कहा म्वाना, जैन नवयुवक मण्डलो को धनराशि देने की कि देश मे पद यात्रा की परम्पराये महान् उद्देश्य घोपणा करके सब धम समभाव का अनूठा परिचय को लेकर चलती रही हैं। आपको यह यात्रा दिया जिसकी सभी ने सराहना की। अहिंसा अपरिग्रह के सिद्धान्तो का प्रचार करने में सेठ मणीलालजी डोसी ने खरतरगच्च महा- सफल सिद्ध हो। मघ की अोर से यानी सघ की मगल कामनाएँ को जिलाधीश श्री फनेसिंहजी चारण ने कहा कि और कहा कि इस सबका श्रेय प० पू० अनुयोगा. वाडमेर से विशाल यात्रा का प्रारम्भ होना गौरव चार्यजी श्री कान्तिसागरजी को है। बाडमेर मे की बात है। इसके लिए यात्रा सघ के प्रेरक और किए हुए यत्तीस कोमो पर किये हुए उपकारो को प्रायोजक घ यवाद के पात्र हैं। अापकी यह यात्रा चर्चा की और यात्रियों से अनुरोध किया कि वे मगलमय हो । मभी अपने को सघ के संघपति सममें और माग मे भाने वाले कष्टी को भुना दें। यही आपसे श्री प्रादीश्वर जैन मण्डल की ओर से निवेदन है। श्री वशीघरजी तातेड ने पालोताना याना मघ में चलने का आह्वान गीत प्रस्तुत क्यिा-"सगला यह पद याना सघ क्यों ? पालीताना हालो दशन आदिनाथरा पालो हालो विदुषी साध्वी श्री विद्युतप्रभाश्रीजी ने अपनी हालो पालीताना प्रोजम्विनी वाणी मे फरमाया कि पद याना सघ वाडमेर थी सघ एव बाडमेर पालीताना पद पा वडा महत्व है। पू० अनुयोगाचायजी का याना समिति के अध्यक्ष श्री हस्तीमलजी पडाइया अन य उपकार है कि हम सबका ऐसा स्वरिणम ने घयवाद दिया। 14 प० पू० अनुयोगाचार्य श्री कान्तिसागरजी पाराधकों से कष्ट दूर रहेगे। अन्त में आपने महाराज ने फरमाया कि .... ..."आत्मबल से बाडमेर के सभी नागरिको को परोपकार, सदाचार मनुष्य सब कुछ कर सकता है। जो मनुष्य अपने तथा आपसी सहयोग की प्रेरणा देते हुए सभी के आदर्श, सिद्धान्त पर रहने वाला है वही मानवता लिए मंगल-कामनाये की । निभाने वाला सच्चा मानव है। प्राप अरिहन्त के यात्री संघ ने नवकार मन्त्र स्मरण तथा दादा भक्त, नमोकार मन्त्र के उपासक, भ० महावीर के गुरुदेव एवं उपकारी गुरुवर श्री कान्तिसागरजी अनुयायी है, आपके हृदय मे मानवता कूट-कूट कर महाराज की जयजयकार के साथ अपनी लगभग भरी होनी चाहिए। भ० महावीर के श्रावक 800 कि० मी० महान् पद यात्रा के लिए प्रयाण श्राविका मानवता को नहीं भूलते है । पूज्य गुरुदेव किया । ने आगे फरमाया कि सभी यात्री कुल मर्यादा के यात्री संघ के प्रथम मुकाम 14 कि० मी० दूर साथ देव, गुरु, धर्म के प्रति श्रद्धा रखें । यात्रा मे विदाई देने के लिए 3 हजार नर-नारी पैदल पहुंचे कठिनाइयो और कष्टों की चिन्ता न करें। अर्हन्त, थे। यह यात्रा सघ मार्ग मे धर्म प्रभावना करता सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु पच परमेष्ठी के हुआ आनन्दपूर्वक आगे बढ़ता रहा है । त्याग का प्रानन्द भूपला मंत्रीश्वर वस्तुपाल की वफादार और विश्वास पात्र सेविका थी। मंत्री वस्तुपाल और तेजपाल ने एक बार शत्रुञ्जय का संघ निकाला । साथ में हजारो यात्री थे । सघ के इन हजारों यात्रियो की एक ही तमन्ना थी। तीर्थाधिपति भगवान् आदिनाथ के दर्शन कर जीवन को धन्य बनाने की । संघ चलते हुये शत्रुञ्जय तीर्थ पहुँचा । यात्रियो की लम्बे समय की भावना सफल हुई । श्रीमंतो ने अथाह धन खर्च कर प्रभु की पूजा की अन्य लोगो ने स्वयं के भावोल्लास से पूजा की। वस्तुपाल तेजपाल ने तो स्वयं के देह के सारे ही अलंकार प्रभु को समर्पित कर दिये । जिनालय के एक कोने में खड़ी भूपला यह देख रही थी साथ ही मन में विचार कर रही थी। ये सब भगवान् की अनुपम भक्ति कर जीवन को कैसे धन्य बना रहे है ! आह ! मैं इन सब मे से कुछ भी तो नही कर सकती ? तालाब के पास आकर भी मुझे क्या प्यासा लौट जाना है ? नहीं, नहीं, यह नही होगा । मुझे कुछ तो करना ही चाहिये । दयालु दादा के चरणो मे कुछ तो धरना चाहिये । पर धरे क्या ? भूपला को बड़ी चिन्ता यह हो रही थी । आखिर मै तो एक दासी हूँ, मेरे पास त्रिलोकीनाथ दादा की भक्ति मे रखने योग्य कुछ भी तो नही ? इसका जीवन-निर्वाह परतंत्र था ! पर, यकायक उसे याद आया इसके पास पास स्वयं की कही जा सके ऐसी एक वस्तु है। यह सोच कर वह पुलकित हो उठी । यह वस्तु भी उसके गले में पड़ा स्वर्ण हार । मत्री वस्तुपाल की पत्नी ललिता देवी ने किसी वक्त प्रसन्न होकर भूपला को यह हार बक्षीस किया था। यह स्वर्ण हार इस वक्त उसके गले मे था । वह प्रसन्न हो गई और एक क्षण का भी विलम्ब किये वगैर स्वय के जीवन की एक मात्र पूजी यह स्वर्ण हार अपने गले से उतार कर आदिनाथ भगवान् के कंठों मे पहिना दिया । भक्ति के लिये किये हुये इस त्याग का आनन्द उसके अंतर मे प्रकाश मान बन गया । ले० मुनि : वात्सल्य दीप पर्युषण से साभार अनु० : हीराचंद बँद, जयपुर ? : 15 भारतीय प्राकाश के सास्कृतिक सूप परम श्रद्धेय पूज्य अनुयोगाचार्य कान्तिसागरजी म. सा० - लेसिफा-प्रार्या सुलोचना श्री जब भी राष्ट्र सन्ल परम पूज्य अनुयोगाचाय उत्तुंग । सहज सरल विश्वासी वालो सा निमल श्री कान्तिसागरजी म. मा० के बारे में सोचने निश्छल मन, उदात्त चिन्तन तया तप त्याग एव लगती है तो उनकी वह भव्य मूर्ति दिव्य विभूति तेज की त्रिवेणी प्रवाहित करता जीवन । ध्येय के मेरे नैन फलक पर अक्ति हो उठती ह । उनकी प्रति अविचल निष्ठा, निद्वन्द्वता मोर निर्भयता । वह मधुर मुस्कान युक्त छवि, कान्तिमय श्यामल प्रथम दर्शन में ही भारतीय ऋपि, महर्षि की प्राकृति मन मस्तिष्क के प्रागण मे चल-चित्र की प्रतिमा माकार हो उठनी है, और मन मस्तिष्क तरह घूमने लगती है । प्रशस्त तेजोदीप्त भाल, एव साय इस महामुनि के चरणो में श्रद्धा से नत विशाल वक्षस्थल प्राजानु प्रलम्ब बाहु, दुग्ध धवल हो जाते हैं। खद्दर से ग्रावेष्ठिन उनत देह यप्टि, प्रभापूण मुख- मडल । अपार वीय मे ऊजस्वित अवयव की दृढ विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं अनुयोगाचाय मास पशिया, स्वस्थ रक्त से पूरि पूरित म्फीत श्री जी। उनकी प्रतिमा की थाह पाना असभव शिराएँ और पूजीभूत पौरुप मे प्रोत प्रोत गात । नही तो कठिन अवश्य है। बडे-बडे विद्वान् और प्रवीए कलाकार के मुदक्ष करो की कुशल-नूलिका पडित उनके सामने पहुंच कर अपने को बौना मे निर्मित एक भव्य चित्र-अत्यन्त विराट अनुपम अनुभव करने लगते हैं । जब गुरुदेव श्री की वाणी और अद्वितीय । मनोमुग्धकारी, नयनाभिराम मेघ की तरह गजन करती, अकाटय तर्कों और आयत-ग, पुष्ट-देह, गत भय, अपने प्रकाश में प्रमाणों की प्रवल धारासार वर्षा करने एव विवादी नि सशय, प्रतिमा का अद्भुत परिचय मस्मारक या प्रतिपक्षी पर चोट लगाने लगती है तो उसकी वाह्य प्राकृति जितनी ग्राक्पण युक्त एव मनोहारी ममस्त निपुणता और पडिताई का चमव्यूह दिन- है अतर उससे भी अधिक महान् और विराट भिन्न हो जाता 1 अनुयोगाचाय श्री के तलस्पी, है। उमकी भव्यता एव दिव्यता की थाह पाना मात दी विचारो के प्रवाह मे वह शुष्क काष्ठवत् कदापि सभव नहीं है । गहन गभीर एव प्रगम्य या पापारण पिण्ड की तरह बहने लगता है । वह मागर मे भी अधिक गहन एव हिमशृग मे अधिक नानगवित, नानोदत सहसा विनयावनत हो जाता - 16 है । गुरु देव श्री की ज्ञान-गंगा में जो भी अवगाहन का मिहिर द्वार अनावृत कर देता है और राग- कर लेता है । वह धन्य धन्य हो उठता है । आप द्वेष कलह के विषम वज्र द्वार को तोड़कर अपार भगवन् की प्रतिभा खडन-मडन मे नही अपितु भ्रम को हर लेता है । मुझे लगता है कि गुरुदेव का सृजन में, विध्वश में नही अपितु निर्माण मे जन्म ही इसीलिए हुआ है- विश्वास करती है। यही कारण है कि उनकी करने को ज्ञानोद्धत प्रहार- प्रतिभा ने विराट साहित्य का सृजन किया है, मयण रेहा अजना आदि अनेको चरित्र अपने तोड़ने को विषम वज्र द्वार, गायन कला मे बनाकर जन समूह के समक्ष रखा उमड़े भारत का भ्रम अपार हरने को। है । आप श्री की प्रवचन शैली लेखन एवं रचना खरतरगच्छ के प्रकाण्ड विद्वान् महान् तेजस्वी की तरह वेजोड़, अनूठी एवं अनुपम है । पार्वत्य- गच्छ को चमकाने वाले है पूज्य कान्तिसागरजी कन्दरा से निर्गत कल-कल निनाद करती जलधारा म० सा० । जैन धर्म गत समस्त मुनि लक्षणो से युक्त की तरह उनके मुख से निःसृत वाणी का प्रवाह उत्कट शान्ति नवनीत शदृश्य स्निग्धता एवं प्रभूत स्रोताप्रो को पूर्णतया अपने साथ बहा ले जाने में समता से उनका मुख मंडल सदैव प्रदीप्त रहता सक्षम है। उनकी वाणी मे अनूठा जादू, विचित्र चमत्कार है । जब वे किसी विषय का प्रतिपादन है। उनके व्यक्तित्व में स्नेह औदात्य और औदार्य के साथ आकृत्तिता, निःसंगता एवं अनाग्रहता का करने लगते है तो श्रोता मंत्र-मुग्ध एवं भाव- विभोर होकर आपाद मस्तक उस भाव-गंगा मे मणि कांचनवत् संयोग है। पर सत्य के लिए निरन्तर संघर्षरत रहने से वे कभी कतराते नही । डूब जाते है। एक मन एक रस होकर तादात्म्य न मालूम कितनी बार मिथ्यावादियो के आरोपों की अनुभूति करने लगते है। उनकी शैली का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य यह है कि वह श्रोताओं को का जहर पीना पड़ा है उन्हें और पी रहे है, किन्तु वे कभी विचलित नही हुए और न होते है अपितु जब चाहे तब रुलादे, जब चाहे तब हँसादे और उसे यह पता ही नही चले कि क्षण भर पहले रो प्रसन्नता पूर्वक सदैव अमृत ही बाँटते रहते हैं। रहा था एवं अब हँस रहा है। विरल वक्तायो मे मे ही श्रोता मंडली पर इस प्रकार अधिकार करने महिमा और महानता सर्वत्र व्याप्त होकर अणु- प्रकाश और वायु के समान व्यक्तित्व की की क्षमता और शक्ति पाई जाती है । ५० पू० अणु को प्रकाशित और प्राणवान बनाती रहती कान्तिसागरजी म. सा० न केवल जैन संस्कृति, है । व्यक्तित्व की महानता के दर्शन लघुता के प्रति धर्म एवं दर्शन के निष्णात विद्वान् है अपितु समस्त सहज स्नेह मे है । अनुयोगाचार्य श्रीजी महान् सत, भारतीय दर्शन एवं वागमय के प्रगाढ़ पंडित है। प्रबुद्ध विचारक, उत्कट विद्वान् एवं प्रकाण्ड पंडित पिपासु जन उनके पास जाकर पूर्ण तृप्त और है पर एक साधारण से साधारण, व्यक्ति उनके संतृप्त हो जाता है । शास्त्रीय ज्ञान ही नहीं, बल्कि व्यक्तित्व की विराट् छाया मे शान्ति, सहानुभूति अनुभव गम्य ज्ञान की ऐसी अक्षय निधि के एक- एवं स्नेह का औदार्य पाकर पुलकित हो उठता है, से-एक अद्वितीय रत्न वे सामने रखने लगते है तो गद्गद् हो जाता है और उसका अन्तर्मन "मत्थएण चमत्कृत एवं विस्मय विमुग्ध रह जाना पड़ता है । वंदामि" कह उठता है। ज्ञान राशि का उनका यह पुष्कल आलोक किसी को भी संशय रहित, आस्थावान एवं श्रद्धालु वनाने परम श्रद्धेय गुरु देव श्री की विद्वता, संघ में सक्षम है, अज्ञान-तिमिर को विदीर्ण कर सत्य समाज और धर्म के प्रति एकनिष्ठता और सर्व 17
धर्म समन्वयात्मकता को प्रशमा बचपन से ही मैं कर भारत के मन्दर चार चाद लगवा दिये, जो
सुन रही थी। विन्तु दशन का प्रथम अवसर उस सप में गये हैं और जिन्होंने देखा है वे मुग्य
फलवर्डी नगरी में हुआ था, वहीं पर अापके हस्त कण्ठो से प्रसमा रिये थर नहीं रह सकते।
कमलो द्वारा मेरी यही दीक्षा और प० पू० समस्त मानव जाति एवं प्राणियों के प्रति अगाध
प्रवर्तीनीजी प्रमोद श्रीजी म. सा. को प्रवर्तीनी स्नेह, सहानुभूति एव पल्याण की भावनामों से
पदवी पू० कमला श्रीजी म. सा० का वर्षीतप या परिपूरित है, उनका मन । गुरदेव श्री का पुण्य ही
पारणा एव वीचन में प्रतिष्ठा इम प्रसार वहां पर ऐसा है वि उनके पर बमलो से एक के बाद दूसरा
महान् काय हुपे । उसके पश्चात् कितनी ही बडी महान् काय हाता ही रहता है। अभी अभी व्यावर
दीक्षा और उजमणे, प्रतिष्ठा विधि शाति मे माप श्री के यर-हस्त से तीन बालानी ने
स्नानादि अनेको महान् कार्य किये।
अभूतपूर्व समारोह में साथ भागवती दीक्षा ग्रहण
यो। पात् शत् वन्दन हो ऐसे महान ज्यातिधर
ऐसे ता गुरुदेव ने ५० पू० दशनसागरजी म. गुरुदेव श्री के चरणो में। वे दीधजीवी मोर
सा० के साथ अनेको सघ निकलवाये, कि तु पूज्य चिरजीवी बनकर भव्यात्माप्रो के लिये मात्म
गुरुदेव ने बाडमेर से पालोनाणा का सघ निफ्लवा पल्याण का माग प्रशस्त परते रहे।
।
..
सुवासित
ना स्वय का जीतता है, यह जगत् का नाथ बनता है।
स्वय जीत कर अयों को जिताता है यह जिनम्बर
कहलाता
हैं
जैन शास्तकारों न उनकी बहुत सुदर शब्दों में स्तुति की
है। उसमें यह शब्द आते हैं 'जगवधव' और 'जगसध्ययाह
जगत् क यधु और जगत क साथवाह !
जय करुणा निधि हैं, इससे जगत् वधु हैं और जगत क
उद्दारक इसलिय जगत के साथवाह है।
-मुनि वात्सल्यदीप
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} - भारतीय संस्कृति की गौरव गाथा में एक श्रृंखला - लेखिका : "प्रमोद" गुरु चरण रज बाड़मेर वी० पी० एस०, अखंड पृथ्वी पालक सम्राट् चक्रवर्ती श्री भरत किया । मुकुट को शेष छोड़कर सारे आभूपण उस महाराजा अपने सिंहासन पर आसीन थे। निकट प्रियंवद को देकर सेनापति की ओर मुड़े । ही अपने-अपने परिधानों में सुसज्जित माननीय सेनापति ! मेरे तुम्हारे एवं समस्त प्रजाजन मुख्यमत्री, उमराव, सामंत, राजमान्य एवं नागरिक- गण उपस्थित थे । सभा मे सन्नाटा छाया हुया है । के अहो भाग्य से प्रभु ने इस नगरी को पावन किया है। मेरे पट्ट हस्ति सहित समस्त सेना को अचानक महाराजा ने प्रसन्न मुद्रा मे निस्तब्धता को सुसज्जित करो । नगर में घोषणा करो सभी समय भंग करते हुए मुख्यमंत्री को संबोधित कर कहा- पर प्रभु के दर्शनार्थ पहुँच जायं । अमात्य प्रवर ! आज मेरा शुभ को सूचित करने वाला दायाँ अङ्ग फड़क रहा है-अमात्य-नृपवर ! "तहत्ति" कहकर सेनापति ने अदा से सिर प्रतीत होता है कि आपको आज अत्यत अभिष्ट की झुकाया एवं चल दिया। कुछ ही समय मे सारी प्राप्ति होनी चाहिये, परन्तु वाक्य पूरा होता उससे तैयारी हो गयी । राजा अपने (हरित रत्न) पर पहले ही वार्तालाप मे व्याधात पड गया । महाराणी सुभद्रा सहित आसीन हुए। समस्त सेना एवं नगर निवासी उनके पीछे चल दिये । कोई प्रभु का पदार्पण : रथ पर तो कोई घोड़े पर एवं कोई पैदल । सभी दौड़ता हुअा, हाँफता हुआ उद्यान पालक द्वार प्रभु के दर्शन को उत्सुक थे । आज उनके उद्धार- पाल की अनुज्ञा प्राप्त कर सम्राट के समक्ष उप कर्ता, प्रथम नरेश के रूप मे एवं पश्चात् संयमी स्थित हो गया। उसकी सांस भागने के कारण के रूप में प्रभु का आगमन था। जुलूस समव- तेज रफ्तार से चल रही थी। सभ्यता एवं आदर सरण के निकट पहुँचा । समवसरण दिखते ही सहित उसने अर्ज किया- सम्राट् ! अभी आप श्री सम्राट् सहित सभी अपने-अपने वाहन से उतर की उद्यान वाटिका मे ऋषभदेव प्रभु ने पदार्पण पड़े । विधियुत् सम्राट् एवं सर्व प्रभु के चरणो में किया है। बधाई सुनते ही भरत सम्राट् अपने पहुँचे। स्तुति वन्दन कर यथा योग्य स्थान पर सिंहासन से उठ खड़े हुए । उत्तरीय वस्त्र व्यवस्थित सभी बैठ गये । प्रतीत हो रहा था कि अयोध्या कर जिस दिशा मे प्रभु का समवसरण लगा था आज स्वर्गपुरी अलका है । चार योजन विस्तृत पाँच-सात कदम जाकर पंचाङ्ग सादर नमन गुण वाली प्रभु ने सुधामयी मधुर देशना दी। 19 सघ देशना के माध्यम से शृङ्गार किया है। ऊंची ऊँची प्रापाश को छूने वाली पर्वत शृखला, दुगम पथ, वरीली भूमि कण्टक प्रदेश अदि यहा की शोभा है । "जग माहे मोटो अरिहत देव, चौसठ इन्द्र करे जसुसेव । तेहथी मोटो सघ बहाय, जेने प्रगमे इस भूमि ने अपने गर्भ से अनेक महान् रत्नो जिनवर राय । तेहथी म्हारो सघवी कह्यो, भरत को उगले हैं जिनके पालोक से इतिहास के पृष्ठ सुणी ने मन गहगह्यो। भरत कहे ते किय पामिये, पालोक्ति हैं । इहीं रलो के अन्तगत इसी प्रभु कहे सेवजे याना किये ।" श्रद्धालु पाठको । स्मरणीय भूमि ने युगवीर शास्त्र विशारद सात्विक एव सरल इस पद्य मै समयसुन्दरजी अनुयोगाचाय श्री कान्तिसागरजी म. सा. जैसे महाराज ने जिनवाणी को रागात्मक शैली मे किस महान् सतो को पैदा करने का गौरव प्राप्त किया प्रकार बहाया है ? इस पद्य मे सघ को, संघपति है । उनी ऐतिहासिक चिर स्मरणीय सेवायें की एव सिद्धाचल की महिमा सक्षिप्त शब्दो में खरतरगच्छ को ही नहीं अपितु समस्त जंन शासन कूट कूट कर भरी है। प्रभु ने स्वयम् अपने श्री मुख को गौरवान्वित कर रही हैं । उनका सयमी जीवन से कितना इनको महत्त्व प्रदान किया है । प्रकाशपुज्ज की तरह भावी पीढी को प्रेरणा स्रोत एव प्रकाश देता रहेगा। भगवान् महावीर की शान्जय अविछिन ऐतिहासिक परम्परा मे पूज्य गुरुवर के 'शनून जय तीति शनुञ्जय" जो शनुग्रो पर द्वारा प्रायोजित "पालीतारणा पद यात्रा सघ" एक विजय दिलाता है उसे शनुजय कहते हैं । इसकी महिमा अपरपार है । इसका एक एक कण महान् फडी की तरह जुड़ा हुआ है। महावीर की ही नही प्रात्मानो के ससग से पावन है । अनती प्रात्मा समस्त भारतीय सस्कृति इस सघ की दिव्य आभा से भविष्य में भी दीप्त रहेगी। यहां से निवारण को प्राप्त कर चुकी हैं। "जेने शनुजे तीथ न भेटयो गर्भावाम लहत रे" महारवि घय है वो नर नारी जिन्होंने इस पैदल याना ने इस पद्य के द्वारा प्रमाणित किया है कि जिसने म सक्रिय रूप से भाग लिया। चतुर्विध सघ के सिद्धाचल जाकर अपने अपने प्रापको पवित्र नहीं साथ यात्रा करने के ऐसे सुनहरे किया है, समझना चाहिये वो अभी मां के पट में ही है । सिद्धाचल की महिमा तीन भुवन में हैं। इस सुनहरे अवसर का जनता अधिकाधिक (Golden chances) जीवन में बहुत कम पाये जाते विस्यात है। लाभ उठावे । शासन देव से कामना है कि यह निथा सघ अपने लक्ष्य में सफल रहे । अनुचित के लिये राजस्थान के प्राचल से प्रस्फुटित मरुधरा की क्षमा याचना के साथ म अपनी लेखनी को विराम धरती मधुर सौरभमयी सुपमा से सुधित चहुँ देती हूँ । भारतीय संस्कृति की यह शृखला पोर अपनी तेजोमयी रश्मियां विखेर रही थी। अमर हो। प्रकृति ने इस प्रदेश का विचित्र पाश्चयजनक "जय गुरुदेव" अवसर 20 शत्रुञ्जय तीर्थ की पद यात्रा : प्रारम्भ एवं समापन लेखक : श्री फूलचन्द चोपड़ा, भाटापारा (म० प्र०) पानी की आवश्यकता खेतो को रहती है । वे सबसे अधिक व्यापकता, विशालता और लोक- बादलों तक याचना के लिए जा नहीं सकते। ऐसे मान्यता तीर्थ यात्रा को मिली है। तीर्थ की साधन भी नहीं है कि वे मेघमाला को आमंत्रित पद यात्रा ही श्रेष्ठ मानी गयी है। प्रकृति के करने एवं बुला सकने मे सफल हो सकें। बादल सानिध्य मे उत्तम जलवायु का लाभ, सात्विक ही अपनी सहज करुणा से अपने पैरो चलकर, आहार-विहार पर निर्भरता का लाभ और प्रेरणा- अपने कंधों पर जल राशि लाद कर खेतो तक प्रद वातावरण से ऊर्जा ग्रहण का लाभ स्पष्ट पहुँचते है और आवश्यकता से अधिक जल देकर दीखता था। नई क्षमता, नई दृष्टि एवं नई उन्हे तृप्त करते है । संसार मे छाये हुए शीत का स्फुरणा के प्रत्यक्ष पुण्य फल दिखाई देने लगे। निवारण करने के लिए धरती सूर्य के समीप नही छत्तीस गुणो से युक्त प्राचार्यजी और सताइस पहुँच सकती । सूर्य ही उनकी आवश्यकता समझ गुणों से युक्त साधु-साध्वियो की प्राणवान प्रतिभायो कर स्वय उस पर अपना तेजस् बखेरते है । भूकम्प, का सामीप्य और सत्संग रहने से पद यात्रियो के बाढ, दुभिक्ष, अग्नि काण्ड, तूफान आदि दुर्घटनाग्रो साथ मध्यवर्ती 52 नगर ग्रामो का वातावरण से पीड़ित व्यक्ति तत्कालिक सहायता के लिए प्रभावित होगा। तपस्वी मनस्वियों द्वारा अपनी साधन सम्पन्नों का दरवाजा खटखटाते हुए पहुँचने तप सम्पदा निचोडकर दी जायेगी। विचारशील की स्थिति मे नही होते । उदार व्यक्तियो को ही धर्मज्ञ जन-जन मे धर्म धारणा जागृत रखने के अपनी सहज करुणा से प्रेरित होकर उन पीडितो लिए गांव-गांव से विचरेगे और धर्म, दर्शन, की सहायता करने पहुँचना पड़ता है । अध्यात्म जैसी उच्च स्तरीय अनुभूतियो का ज्ञाना- लोक फैलायेगे। परम पूज्य गुरुदेव अनुयोगाचार्य बाडमेर के जैन श्री संघ ने सोचा कि संत श्री कान्तिसागरजी महाराज साहब के सम्मुख मंडली के साथ यदि बाडमेर से पालीतारणा तक पालीताणा मे विचारको ने अपने विचार रखे। की पद यात्रा का सघ निकाला जाय तो वह लोक तप-साधना की यह एक महान् प्रक्रिया थी। कल्याणकारी होगा। राजस्थान के इस भू-भाग से महाभाग पुण्य शालियो के लिए सम्यग् दर्शन, ज्ञान सौ-राष्ट्र गुजरात के उस भू-भाग के मध्य का और चारित्र्य की प्राप्ति का प्रबल योगायोग था । विस्तृत भू-खण्ड ज्ञानालोक से आलोकित होगा। सच्चे भक्तों को अभिष्ट प्रयोजन के लिए गुरुदेव यह सर्वोच्च धर्म कृत्य भी होगा। धर्म कृत्यों मे की सहज स्वीकृति प्राप्त हो गई । इस सद् 21 ३ उपनिपद की सफलता का प्राशीर्वाद प्राप्त हो सम्मान किया गया। तीय यात्री पद यात्रा की गया। हमारे गुरुदेव तो साक्षात् कल्प वृक्ष हैं । क्प्ट साध्य प्रक्रिया से हमी-सुशी गुजरते हुए वहा जाकर खाली हाथ वापस कौन लौटा है ? दिनाक 23-3-80 को पालीताणा नगर में प्रविष्ट प्रायोजको ने पद याना वा विस्तृत कायत्रम तैयार हुए । विमल गिरि पर शोभित श्री सिद्धाचल वा किया । समुचित व्यवस्था हेतु सघपतियो का शत्रुन्जय जैन तीथ जिनेश्वर श्री ऋषभदेव प्रमु मनोनयन एव पद यात्रा सघ समिति का निर्माण के पुण्य प्रभाव का अतिशय क्षेत्र प्रापित करने दिया गया। याना माग का निर्धारण एव प्रति लगा। दशनार्य हजारो व्यक्ति यहाँ पा चुके हैं। दिन का कायक्रम मुद्रित एव वितरित हुआ। यह तीथ राज है । जन-सलाय से तीर्थ या दिनाक 31-1-80 को वाडमेर मे प्रयाण पूर्व भव्य माहात्म्य प्रकट होता है। मौका मिलते ही पद समारोह सम्पन हुआ। सहस्राधिक साधक पद यात्रियो ने तीथ के पारस का स्पश किया और याया सघ मे मम्मिलित हुए। पवित्र उद्देश्य की अपने कलुष कालिमा की लौह जैसी कठोरता को प्राप्ति के लिए कदम बढने लगे। चौवन दिवसीय बहु मूल्य स्वण सदृश बनाने का श्रेय प्राप्त किया। पद यात्रा के तप से मानवी काया सिदत्व का प्रात्मिक विधाति पायी। उद्विग्नताम्रो का समाधान उत्पादन अभिवद्ध न करने की ओर बढी । व्यक्ति हुप्रा । इस उपलब्धि की सुसद प्रतिक्रिया को देखते त्व के उच्च स्तरीय उत्कप इसी स्थिति म सनिहित हुए तप पूत मनीषियो के तत्वावधान मे पद यात्रा हैं । अरिहत, सिद्ध प्राचाय, उपाध्याय और साधु प्रारम्भ से प्रत तक की असाधारण सिद्ध हुई । इसी प्रगति याना के ग्रमिक सोपान हैं। सघ के वास्तव में धम श्रद्धा मनुष्य जीवन की बहु- क्दम निर्धारित मार्ग पर बढ़ते रहे । माग मे जो मूल्य थाती है। देशभक्ति, परमाय परायणता, भी गाव, भोपडे, नगले पुरवे मिलते थे, उनमें उदार सहृदयता, सेवा साधना, प्रात्म सयम, चरित्र- रुकते ठहरते किसी उपयुक्त स्थान पर रात्रि विश्राम निष्ठा, आदश धादिता, तप तितीक्षा आदि के करते रह । मार्ग में पड़े तीथ महातीथ के भी समस्त प्रयोजन वस्तुत धम श्रद्धा के ही रूपान्तरण दिव्य-दशन किये । पूरी यात्रा-अवधि में प्रवचन- हैं। यह चेतना जिस भी क्षेत्र में प्रयुक्त होती है, भजन, शका समाधान, सत्सग का प्रम चलता वही मानवी गरिमा को बढाने वाले महान् काय रहा । जन साधारण को असाधारण धर्म-लाभ रच कर खडे कर देती है। यह तत्व जहां भी है प्राप्त हुप्रा । पद यानियो का मनुष्य जीवन साथक उसे रत्न राशि से, स्वण खदान से बढकर वहू- हुप्रा । रोगोपचार का असाधारण प्रयोग भी सफल मूल्य माना जायेगा। प्रायोजक एव व्यवस्थापक, रहा। नस नाडिया का, मास पेशियो का उचित जैन श्री सघ एव पालीताना पद यात्रा सघ समिति, सचालन होते रहते से शारीरिक मानसिक रोगियो वाडमेर साघुवाद के पात्र हैं। सघपतियो का की व्याधिया भी दूर हुइ । 'अतिथि देवोभव' के प्रौदाय्प अभिनन्दनीय है । तीथमाल एव पूणाहूति अनुरूप ही यात्रा-मार्ग में मघ का सवत्र भाव भरा में प्राण प्रतिष्ठा हुई है। - 22 छरी पालित यात्रा संघ तैयारी के प्रारम्भिक क्षरण सम्पादक : दैनिक छत्तीसगढ़" : रावलमल जैन 'मणि' पी० एच० डी० । नवपद अोली की भव्य आराधना के दिन का यात्रा संघ निकालने का निर्णय हुआ है। यह थे । नाकोड़ाजी की यात्रा कर तूफानी बारिश से बताते हुए प्रेरणा की सफलता की मुस्कान ने क्षतिग्रस्त इलाकों को देखता बालोतरा से बाड़मेर उनका चेहरा रोशन कर दिया। मै उनके मस्तिष्क पहुँचा, 'साधुता के स्वामी श्री कान्तिसागरजी म० की गहरी लकीरों को बराबर पढ़ रहा था कि किसी सा० के दर्शनार्थ। रेल्वे स्टेशन से जैन न्याति ने सूचना दी कि एक बालमुनि अस्वस्थ हो गए। नोहरा पहुँचा था। विशाल नोहरा स्त्री-पुरुषों सूचना मिलते ही कान्तिसागरजी बहुत ही प्यार से बच्चों से खचाखच भरा था, पाक्षिक प्रतिक्रमण अस्वस्थ बालमुनि की सेवा मे सहज ही जुट गए। चल रहा था। एक बालक दौडता हुआ आया, वे अपनी सहजता की सुरभि बिखेर रहे थे । कान्तिसागरजी म० के दर्शनो को आए है क्या, पूछकर आटोरिक्शा अपने घर ले चला, जबर्दस्ती दूसरे दिन प्रातः अोली पर्व पर उनका मार्मिक उतराया बिजली की तरह-पानी, चाय का क्रम प्रभावोत्पादक प्रवचन जन-मानस को तपस्या के लगा दिया, सारा घर महाराज श्री से मिलने आए लिए प्रेरित कर रहा था। साधना के निर्माण मे मेहमान के स्वागत के लिए उमड़ पडा था । आवश्यक सोपान है अनुभूति, जिज्ञासा और अनुभव कान्तिसागरजी ने साधार्मिक भक्ति से बाडमेर को और इसे अभिव्यक्ति देते है अनुयोगाचार्यजी अपने प्लावित कर दिया । इन दिनो मे, इसका सहज ही अओजस्वी प्रवचन मे । अनुभव हुआ। संतोष ने विश्राति ली। मध्याह्न अनुयोगाचार्यजी यात्री संघ के प्रतिक्रमण के बाद अनुयोगाचार्यजी आदि प्रायोजन को अन्तिम रूप देने में जुट जाते हैं । मुनिवरों के दर्शन बदन कर आकर्षक प्रभावशाली समूचे भारत मे स्थित साधु-साध्वियों श्रावक- व्यक्तित्व से चर्चाओं मे मग्न हो गया। चर्चा के श्राविकाओ को सघ में शामिल होने के लिए निमत्रण इस क्रम में साहित्य शिल्पी कवि मनीषी मुनि भिजवाने तथा व्यक्तिगत पत्र लिखने में वे व्यस्त श्री मणिप्रभसागरजी साथ थे । प्रापश्री ने हो गये। फिर सघ समिति के पदाधिकारियो बाडमेर की भक्ति, उत्साह और तप आराधाना की सदस्यो के साथ विचार विमर्श का दौर चल पडता चर्चा करते हुए बताया कि वाड़मेर से पालीताणा है। मैने देखा प्रस्तावित आयोजन को लेकर 23 बाडमेर के हर चेहरे पर प्रसन्नता थी और इतना कर लें तो में छत्तीसगढ अचल में विहार करूगा ।" ही नहीं उन्होंने अपने आपको अपनी सेवाएं देने मे शत्रु जय यात्रा सघ को लेकर प्राप मे जो अदम्य समर्पित कर दिया था। प्रना पुरुप ने जिन शासन उत्साह था, वह पुलकित हो उठा। प्रभावना को इस सरचना को प्राणवनता से गूजता हुया प्रतीक बना दिया था । प्रापश्री ने यात्रा सघ याला समिति के सदस्यो के बीच अनुयोगा- के प्रायोजन पर प्रकाश डालते हुए वाडमेर की चायजी कुशल मार्ग-दर्शक की भूमिका निभाते । भावनामो की जो प्रशसा की उसे यथाथ की पूरी प्रावश्यक ससाधनो की व्यवस्था का निर्देश देते। प्रभावता में ढाला जा सकता है। इसी समय इसी बैठक में विभिन्न स्थलों पर विराजमान वाडमेर सघ के पदाधिकारियो सदस्यो से मेरा साधु-साध्वियो को विनति करने जाने के लिए परिचय कराया । लेखको, पनवारा के प्रति प्रज्ञा प्रतिनिधि मण्डल तैयार किया गया। प्रतिनिधि पुरुष का सम्मान माग दशन और उदार दृष्टिकोण मण्डल के लिए यात्रा कार्यक्रम को उन्होंने इस प्रशसनीय है । यात्रा सघ की तैयारी के प्रारम्भिक तरह खीचा कि समूचे भारत का नक्शा सामने क्षणों में चर्चा के दौरान प्रापश्री ने विशाल सघ "नजर आने लगा । प्रज्ञा पुरुप ने आवाज दी- की रूपरेखा बताई। इसी दौरान मैंने नगपुरा मरिणजी, गुजरात मध्य प्रदेश का रूट वताइये ताकि तीर्योद्वार के लिए शाति विजय ज्ञानपीठ की कम समय मे शीघ्रातिशीघ्र यह कार्य हो सबै" तैयारी की जानकारी दी। दूर दृष्टा ने अनेक और यात्रा रूट निश्चित किया गया। इस तरह किन्तु महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए और ज्ञानपीठ द्वारा यात्रा तयारी ये प्रारम्भिक क्षण बीतते गए मौर भावावेश में की जा रही एव दुरुह कोशिश के अतत उत्साहित वातावरण में हजारो लोगो ने लिए प्रागाह किया और अपने पारणी अनुभवो से मीलो तक फैले गाव शहरो से तीर्थाधिराज की मुगम माग प्रशस्त किया जिसे ज्ञानपीठ ने बाद में यात्रा पूरी की। प्रारम्भिक तैयारी को देखकर स्वीकार किया और तीर्थोद्वार का प्रयास उमी राह छरी पालित यात्रा सघ वी भव्यता का अनुमान चल रहा है । चर्चा के दौरान छत्तीसगढ अचल मे लगाना कठिन था। तैयारी का प्रारम्भिक क्षण विहार की चिर अपेक्षित जनाकाक्षा को मैंने प्राश्चयजनक था । भौतिक सुखो मे डूबे जन-मानस निवेदित किया तो उहाने वही ही उदारता से के लिए किन्तु इस जरिये कुछ कर जाने की ललक कहा मणिजी यदि आप साध्वी मनोहर श्रीजी को भी तो कम नहीं थी। इस ललक ने जिन-शासन प्रस्तावित यात्रा सघ में शामिल करने के लिए राजी की शानदार प्रभावना की। जैन जयति शामनम् । 24 । , THere -- " श्री शान्तिलालजी पारख, सघपति श्री जवाहरलालजी राक्यान को साफा पहिनाते हुये- श्री केवलचन्दजी खटोड़ को साफा पहिनाते हुये श्री चम्पालालजी राका एव श्री शान्तिलालजी पारख- 0 .............. मा - . 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पालिताणा प्रवेश जुलूस में महिलाएँ
वाडमेर प्रस्थान के समय विशाल जन-समूह
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सघपति श्री भवरलालजी बोहरा सधपति श्री धपवादजी छाजड
एव श्री भूरमलजी वाथरा मुनि श्री मणिप्रभसागरजी क सानिध्य में-
पदयाला महासघ क प्रवटा क अवसर पर जुलूस में
पूज्य गुरुवय श्री-
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तीर्थ यात्रा यात्रा और अनुयोगाचार्यजी लेखिका : साध्वी मनोहरश्री : श्री तीर्थपान्थ रजसा विरजीभवन्ति, करने में समय नहीं लगता। उपरोक्त श्लोक में तीर्थेपु बम्भ्रमणतोन भवे भ्रमन्ति । यही दर्शित हैं-तीर्थ के पवित्र मार्ग की रज से यात्रिक कर्मरज रिक्त बनता है। तीर्थ परिभ्रमण द्रव्य व्ययादिहनरा: स्थिर संपदः स्युः, से भवभ्रमण का समाप्तिकरण हो जाता है, तीर्थ पूज्या भवन्ति जगदीशमथार्चयन्त ।। मे द्रव्य व्यय करने से आत्मिक-समृद्धि स्थैर्य होती मानव का जीवन विभिन्न आयामो से होता है तथा जगत्वंद्य वीतराग की पूजक अंततः स्वयं पूज्य बन जाता है। हुया आगे की ओर प्रगति चरण बढ़ाता चला जाता है । उसे इस गति मे कहीं तो रंगीनियों की तीर्थ भूमियो मे यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रसरित मोक्ष- मनमोहक छटा-छबियाँ अपने कमनीय पाश में मूलक धर्म का बल, अधर्म की आसुरी बलयुक्त आवद्ध कर लेती है तो कही वीरानियो की ऊमस् विराट सेना को अंगुली मात्र से “रुक जानो" कहने मन मे कचोट पैदा कर देती है। जीवन के इस वाली सफल ताकत रखती है। तीर्थो मे भी सर्व- धूपछाँही अांचल मे मानव अशांति और असंतोष शिरोमणी शत्रुञ्जय जिसके कण-कण मे अनंत सिद्धो की डरावनी काली घटाओं को विलीन करने हेतु की साधना जीवंत है, इस पुनित वसुन्धरा के चरण-चरण पर आत्म निरीक्षण-परीक्षण करता रजाशो मे ऐसी आध्यात्मिक विद्युत् शक्ति स्फुरित हुआ एक सुसस्कृत पथ का संधान करता चला है जिस विशुद्ध व प्रकाशित परमाणु के परिणाम- जाता है। तत्पश्चात् "अात्म लाभात् परो लाभो स्वरूप प्रत्येक गुमराह आत्मा को सच्चे सुख व नास्तीति मुनयो विदुः' यह उसका जीवन सूत्र विश्व शांति की पुनीत राह एव थाह मिल जाती बन जाता है-स्वात्मरूप के प्रागट्य के लिये है । आधुनिक विज्ञान इस बात का साक्षी है- वीतराग दर्शन अनिवार्य है ठीक उसी प्रकार जैसे अत्यत सूक्ष्म "समय यत्रिका न्यूक्लियर" से पता रोग से मुक्ति पाने के लिये डॉक्टर की शरण लेनी चला है कि लोहन्यूक्लियस के प्रकम्पन से दस खरब ही होती है। प्रात्मत्व के सत्य दर्शन के लिये अन्य 10 00,00,00,00,000 लहरे (ग्रामारेज ) आलंबनो की अपेक्षा वीतराग अरिहंत प्रतिमा का निकलती है । टेलीपैथी प्रयोगो से यह ज्ञात हुआ पालबन अति उत्तम व बेजोड़ है । इसीलिये कि मानसिक तरगों की गति सर्वाधिक तीव्र है । वे ज्ञानियो ने जिनदर्शन, स्तवन, पूजन की खूब ही तत्क्षण विश्व के छोर को छू लेती है। वैज्ञानिको महत्ता बताई है । उन्ही परमपिता परमेश्वर का यह कथन “जैनफिलॉसफी" मे वर्णित परमाणु तीर्थकर भगवतों के कल्याणकों से पावन बनी हुई की तीव्रतम गति का अक्षरशः समर्थन करता है । तीर्थ भूमियो मे जब यात्रार्थ गमन होता है तब आशय यही कि सिद्ध पुरुषो की उत्कृष्ट साधना आराधक को अपनी खोई आत्म सपत्ति प्राप्त उदात्त विशाल विचारों से निकसित ग्रामारेज तीर्थ 25 - के कण-कण में व्याप्त है जिसका इफेक्ट एक्दम "मयघाशरगनास्ति" की एकाग्र भावना से हृदय पर पड़ता है। किन्तु स्मरण रहे जिनेश्वर की उपासना की जाय तो प्राज भी परमात्मा से उसी का कनेक्शन जुड़ सकता है कल्याण हो सकता है । "कलिकाल सवन जो ससार की निविड थियो से विमुक्ति चाहता हमचद्राचार्य" के शब्द हैं-"नमोस्तु कलये यत्र, है, जिसके चिंतन, मनन मे निष्ठा व एक्लयता के त्व दशनमजायत ।" अर्थात् इस कलियुग को मैं साथ कम (क्रिया) को अखड धारा बहती हो । प्रणमन करता हूं जिस युग मे आपके पुनीत दशन परन्तु आधुनिकता कुछ और ही है। लोगो के चरण पा सका हूँ। कलियुग मे भी साधक अपनी तेजी भौतिकता की ओर बढ़ रहे हैं । निष्ठात्मक साधना से स्वण युग के दर्शन कर। सकता है। प्राज "प्रास्फाल्ट रोड" तैयार हो रहे हैं, "ताज महल, शाहजहा व प्रावेराय" जैसी विराट इसी कलियुग में स्वर्णयुग के दशन पराने के होटलें खडी की जा रही हैं। खेत हरे-भरे दिखेंगे, महान् उद्देश्य को लेकर "प्रना पुरुप अनुयोगाचाय 28 28 मजिल के मकान निर्मित हो रहे हैं । एस प० पू० श्री कातिसागरजी म. सा० द्वारा सचालित । तरफ घरा आवाद होकर "अल्ट्रामाहन अमेरिका" "वाडमेर से पालीताणा पद यात्री सघ" एक मे रूपान्तरित हो रही है तो दूसरी पोर प्रजा विशिष्ट व अद्वितीय प्रायोजन था। चूकि निज (पवित्रता) बरवाद हो रही है। प्राय सस्कृति को साधना के प्रतुल समुद्र में निमग्न कर पराय का गौरव ही नहीं रहा। सभी को "फारेनमेड" का साधने वाला महान् है तो स्वमुक्ति के साथ विदेशी बनावट चाहिये । P L 480 का गेहूं साथ परमुक्ति प्राकाक्षा को क्रियाविति करने वाला खा-खा कर तथा पावडरो का दूध पी-पी कर वुद्धि "सर्व तो महान्" । विचारो का अजस् प्रवाह भ्रष्ट हो गई । प्रत्येक की अपनी अलग अलग दुनिया चिरकाल से चला भा रहा है, यह सतत् प्रवहण है राह अलग, चाह भी अलग । कुछ वर्ष पूर्व पिता- शीला स्रोतस्विनी कभी नहीं सूम्बी, कभी नहीं रुकी पुत्र के मध्य "जनरेशनगेप" पाया जाता था। प्राज यह बहती गई और अपने मधुर क्लरव से जन दो सगे भाई (2 वर्ष के अतर वाले) के मानस को प्राप्लावित करती गई। जिहोंने इसका बीच "जनरेशनगेप" प्रादुभूत हुआ है। भौतिक पान किया वे धन्य हो गये, नाद सुना वे कृत्कृत्य ऐय्याशी की क्षुधा ने मानवीय जीवन की सुख- हो गये। इन्ही महापुरुषो की शृखला मे एक शाति को हराम कर दिया। मानवीय मरण की दिव्य पुस्प भी शरीक हैं जिनका परिचय है- समाधि का उच्छेदन तया परलोक मे सद्गति का बहुमुखी प्रतिभा के धनी पुरातत्वान्वेषक, "रिजर्वेशन" अशक्य बना दिया। सस्कृति का शखनाद करने वाले प० पू० जीवन का प्रवाह अनादि अनत काल से अनुयोगाचायजी ! प्रवहित है, लाखो जम भौतिक्ता की बलिवेदी माप मे अपूर्व प्रतिभा, प्रमोघ शक्ति एव सयम पर चढा दिये किन्तु अफसोस ! हम प्रभु चरणो में समर्पित होने में आनाकानी करते हैं । समपरण का अटूट भात्मबल है । माप मे एक ऐसी सजीवनी एवं प्रारणवत्ता है जो समाज के नसो मे चैतन्य करते ही "चट मगनी पट व्याह' उक्ति को चरिताथ फू कती है। तीव्र तथा दूरदर्शी आम्खो से चौतरफ करना चाहते हैं। दुकान जाते वक्त दौडते दौडते अवलोकन करने वाले प्रभावशील, भव्य व स्मित, प्रभु दशन कर लिया, ऐसे दौडधूप का जिनदर्शन मात्मशाति दिलाने म स समय हो सकता है। हास्य सयुक्त गुरुदेव जिनके मस्तिष्क के परिवेश मे सूक्ष्म भामडल "हलो ऑफ लाइट" जय की सूक्ष्म 26 -- किरणें प्रसरित हैं । उस जय मे निडरता, आत्म आपश्री विचक्षण स्मृति संपन्न हैं। आपकी श्रद्धा, स्वपराक्रम का समावेश स्वभावतः संनिहित वैचारिक क्रांति को सांप्रदायिकता की लक्ष्मण रेखा है । जहाँ भय का प्रवेश ही नही हो सकता। में आवद्ध नहीं किया जा सकता। जिन शासन एवं दर असल, एक तेजवलय मनुष्य के अासपास गच्छ की शान को महत्तो महियान बनाये रखने होता है जिसमें विद्युत्कण, चुम्बकत्व, रेडियो, के लिये आपश्री उपधान, प्रतिष्ठा, दीक्षा, संघ, विकिरणादि चेतना युक्त ऊर्जा समाहित होती है । उद्यापन, स्मृति स्तंभ आदि अनेकों धार्मिक, वैज्ञानिक यंत्रों द्वारा इस ऊर्जा शक्ति को देखा और सामाजिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक कार्य मापा जा सकता है। व्यक्ति के शरीर से उद्भूत करते रहे है। इन्हीं कडियों में गुरु स्मृति में ऊर्जा के कारण ही पारस्परिक आकर्षण और निर्मित गौरवास्पद "जिनहरिविहार" आपश्री की विकर्षण होता है। कभी-कभी ये वलय इतने प्रबल-प्रेरणा, उदारता, समाजसेवा एवं अटूट तेजस्वी होते है जो आसपास के क्षेत्रों को प्रभावित गुरु भक्ति का अविस्मरणीय तथा सुनहरा इतिहास करते है । उस सीमा में प्रवेश वाले सभी इस प्रवाह है । वस्तुतः ! पूज्य गुरुदेव अनुयोगाचार्यजी मे बहने लगते है। दूसरे शब्दों में इस मानवीय वास्तविक अर्थो में युगदृष्टा, क्रान्तविचारक और चुम्बकत्व को "लीयर वोयेन्स" भी कहा गया है । युगवीर है । आपको देखकर सहज ही प्रतिभासित यह तेजवलय सारे शरीर में होता है जो मस्तक हो जाता है कि आपका कर्तृत्व क्या है ? की परिधि मे डेढ़ गुणा बढ़ जाता है । जिसका मैं स्वय भाग्यशालिनी रही हूँ कि मुझ विस्तार तीन से सात फुट (3 से 7) तक देखने आपश्री की कृपा, आशीर्वाद एवं सद्भाव मिला । को मिलता है । प्रकाश की गति से सभी परिचित अप्रत्यक्ष परिचय मे भी आपश्री की अमाप्य कृपा है । ब्रह्माण्ड मे कितने ही तारे जिनके प्रकाश को वर्षा होती रही थी और आज भी। पूज्य श्री के धरा पर पहुँचते हजारों वर्ष लगते है जबकि प्रकाश महज एक ही शुभ संदेश से छत्तीसगढ़ भूमि को की गति एक लाख छयासी हजार (1,86,000) यकायक छोड़कर आज जो हम मंगलमयी वसुधा माइल प्रति सैकिंड है। इससे भी अधिक आगे शत्रुञ्जय के अंचल में परमपिता परमात्मा आदिनाथ करोडों माइल की रफ्तार से सफर करने वाली की पुनीत छाया तथा पू० गुरुदेव की स्वरिणम एक शक्ति ऐसी है जो एक ही क्षण मे अपने सौर निश्रा मे स्थित है उसका समग्र श्रेय आपश्री को मंडल की परिक्रमा कर पुन: लौट जाती है । वह ही है । आपश्री के उपकारों को मैं अपने जीवन है मन की शक्ति ! जो अंतरीक्ष व्यापी चुम्बकत्व से कभी भी विस्मृत नही कर सकूगी। इस की शक्तिवत् कर कार्य करती है । ऐसे ही तेजवलय, पुण्यमय क्षणों में हृदय के कण-कण से आपके क्रांति व दृढ़ आत्मबल युक्त यथा नामधारी व्यक्तित्व के प्रति आस्था, श्रद्धा और पूर्ण निष्ठा पू० अनुयोगाचार्यजी का व्यक्तित्व ऐसा अनोखा अभिव्यक्त करके स्वयं को धन्य समझती हूँ । साथ व बेमिसाल है जिनके सामिप्य से प्रानन्द की ही शासनेश से प्रार्थना करती हूँ कि पू० गुरुदेव अनुभूति होती है । जिसकी प्रतीति मुझे प्रथम दर्शन चिरायु हों तथा प्रापश्री का ज्ञानसूर्य अधिकाधिक से हुई। सचमुच ! परम उदार, सहज, सरल, रश्मियां प्रसारित कर गच्छ एव समाज मे नई स्वभावतः मृदु विनम्र तथा "बहुजन हिताय- चेतना, जागृति, स्फूर्ति व नवीन रोशनी प्रदान बहुजनसुखाय" समर्पित व्यक्तित्व आज के युग में करता रहे । यही मेरी मंगल स्पृहा है। हाथ मे चिराग लेकर ढूढ़ने से भी न मिलेगा। || शिवमस्तु सर्वजगतः ॥ 27 नायक के अभाव का वह दिन 0 आर्या सम्यक् दर्शनाश्री प्रस्तुत है। जिदगी घटनाग्रो मे भरी है। अनेक प्रकार दूर चलते ही एक मोड लेती है और सोची सडक की घटनाए जीवन मे घटित होती ही रहती है। वाव जाती है। जिदगी का अपरनाम ही घटना है। कई घटनाए प्रात काल की सुरीली हवा मे जब सघ ने ऐसी जीवन्त होती हैं जिन्हें मानव एक पल के लिये प्रयाण किया तो सभी ढीमा की ओर मुड चले, भी भुला नही सक्ता। हर पल, हर क्षण वह क्योकि वहा पथ प्रदशक दो सिपाही पहले ही घटना दिल और दिमाग पर छाई रहती है, ऐमी नियुक्त कर दिये थे। कि तु सयोग था कि पूज्य ही एक अविस्मरणीय घटना का वणन गुरुदेव जब निक्ले तो, वहा कोई नहीं था और पूज्य गुरुदेव भी सीघे वाव की सडक पर चल 14 फरवरी का वह सूर्योदय था। पद यात्रा- दिये। पूरा सघ ढीमा पहुँचा और पूज्य गुरुदेव सघ के साथ हम थराद से ढीमा की ओर जाती थी तीन मुनियो के साथ वाव । अजीव स्थिति बन सडक पर चन रह थे। यात्रियो की कतार आगे गयी, पूरे सघ मे खलबली मच गयी। पता चलने भी थी, पीछे भी थी। यात्री समूह अपनी मस्ती मे पर श्री आदमलजी वोहरा, श्री द्वारकादासजी राठी भक्ति गीतिकाए गाता हुआ रास्ते को नाप रहा आदि प्रतिनिधि पूज्य गुरुदेव श्री के समीप पहुचे, पा। कई स्वाध्यायी, सूनो का पारायण करते हुय और सघ की स्थिति सामने रखी । गुरुदेव श्री ने आगे बढ रहे थे, कई युवक ज्ञान-वधक विषय पर परमाया, "मैं योगानुयोग से पहुच हो गया हूँ ता चर्चा करते हुए कदम पर कदम बढा रहे थे। सभी तीन दिन शान्ति से ध्यान-साधना में व्यतीत कर अपनी अपनी प्रक्रिया मे मस्त थे। उस समय उन दूगा। और तीन दिन बाद यही से शामिल हो यारियो को क्या पता था कि ढीमा ग्राम मे पहला जाऊगा।" लेकिन प्रतिनिधियो की हठ निराली कदम रखने ही हमारे श्वासा की धडकन तेज हो ही थी, उन्होंने कहा, “सचालक के अभाव मे तीन जायेगी, सव वित्त व्यविमूढ वन जायेंगे। दिन तो क्या, एक दिन भी निकलना दूभर है ।" आखिर गुरुदेव श्री दूसरे दिन प्रात विहार कर श्री हुआ भी ऐमा हो। वात यो बनी कि थराद भोरोल मे सम्मिलित हो गये। पूरे सघामे उल्लास से जो ढीमा की ओर सडक जाती है, वह थोडी छा गया। 28 + सांचोर-प्रवेश के दौरान प्रस्तुत गीतिका । मिश्रीमल जैन, M A. प्राया थे अम अांगरणीये पधारो हो राज, थे मोरा मोघेरा मेहमान हो आज, शत्रुञ्जय री जात्रा रे काज, थाने पहेरावु सोना रो ताज । लाया थे मोक्ष रो साज, थारा नायक कान्तीसागरजी महाराज, थाने लाख-लाख वंदन हो अाज, थोरा खड़ा-खड़ा स्वागत करो आज ।। बार-बार महीनो पेला संघ काढण री भावना कीधी, छः छः महीनो पेला संघ यात्रा री जे बोलवी दीधी। सघ काजे कान्तीसागरजी पालीताणा सु विहार करयो, धन्य बाड़मेर सघ ने कान्तीसागरजी रो सपनो पुरो करेयो ।। सकल भरत क्षेत्र रा मानवीयों ने सघ मे पधारण रा आमंत्रण दीधा, जेवा आमंत्रण दीधा ऐवा सघे झेली लीघा । बाडमेर नगरे सुद 14 ना दिवसे मोटो मेलो जागेयो, छ.री पालता संघे सुद 15 ना दिवसे मंगल प्रयाण करेयौ ।। पूनम री मंगल प्रभाते, देव-देवियो पण दर्शन माटे तलसेया, प्रयाण री रणभेरी बाजी ने हैय्या दादा रा दर्शन माटे झंखया । छःरी पालता संघ री शोभा न्यारी, शोभे गजराज ने शोभे ऊँट री सवारी, शोभे गजराज ने शोभे मरुधर जहाज ।। रणभेरी रा रणकार साथे चाले हजारों पाद विहारी, कान्तीसागरजी बतावे शत्रुञ्जय री महिमा अति भारी । जेणा ललाटे लखाणा लेख ऐवा संघपतियों ये उपाड़ी पा जिम्मेदारी, तीर्थो री पग पाला जात्रा करी भवो भवना कर्म खपाववा पाया व्रतधारी। व्रतधारियो ध्यान राखजो ने संघ यात्रा पछीनु पगलु लेजो विचारी, नक्की करो संघ यात्रा पछी नही रेवु संसारी ।। 29
साचोर तीयं रा श्रावको सोना रूपा रे फूलडे सप ने वधावी लेजो,
सघ ने वधावी लेजो ने साचोर यी सघ काढण रो नक्की करी लेजो।
साचोर तीर्थ ने गजावजो, मलेला पईसा रो सदुपयोग करजो,
हवे शात बैठता वीतराग पई सको ऐवा काम करजो !!
छरी पालता जे शत्रुजय जाय पातिक तेना मुक्का पाय,
जेणे भेटेया शगुजय रा दादा मादिनाय ने तेनी दुति यदी न पाय ।
सघपतियो पाप हो महाभाग्यशाली, महामाग्य वगर मा काम यदी न पाय,
चक्रवती री पदवी पण मली जाय, पण महाभाग वगर सधपति न थवाय ।।
कोटि-कोटि वदन दादा गुरुदेव को, खरतरगच्छ शिरोमणी कान्तीसागरजी को,
कोटि-कोटि वदन प्रापके परिवार को, जैन शासन के महान् समुदाय को।
साम्ब लाख घमवाद महासघ के पुपवान मघपतियों को,
लाख लाख धन्यवाद महासघ के महा यात्रियो मो॥
जद आ सघ शनुजय री तलेटीये पगला करेला,
भरत क्षेत्र मे जैन शासन रो जय-जयकार होवेला ।
जद मा सघ पवित्र गिरीराज ऊपर चढाण करेला,
जैन शासन गगने पुष्प वृष्टि होवेला ।
जद प्रा मघ नवटूकों रा मदिरो रा दशन करेला,
तीन हजार घवल मदिरो री घटहियों रणकार करेला ।
जद मा सघ मोतीसा, जावडसा, जगहसा, समरसा, वस्तुपाल, तेजापाल रा
मदिरों ने निहालेला,
पृथ्वी उपर स्वर्ग देखरण रो अनुभव करेला ।
जद मा सघ मरुदेवा माता जाया दादा प्रादिनाय ने भेटेला,
संघ रा, महायात्रियो रा, भवोभव रा वध आ पले टूटला ।
जद मा सघ रा सघपति तीथ माल पहरेला ।
(1) माल संघ अडीखम हाजिर रेवेना,
(2) कान्तीसागरजी रो सपनो पुरो होला ।
(3) याद राखजो ऐडी घडी फेर नहीं मावेला।
30
बाड़मेर का ऐतिहासिक पद-यात्री संघ लूणकरण सिंघवी, बाड़मेर (राज.) भारत की गौरव भूमि पर कई भव्य महान् गुरुदेव का यह संघ हमेशा चिरस्मरणीय एवं आत्माओं, सन्तों एवं महापुरुषों ने जन्म लेकर इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णाक्षरों से अंकित यहां की माटी को चन्दन का रूप दिया है। होगा। राष्ट्रीय, सामाजिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों एवं 31 जनवरी, 1980 की वह सुबह हमेशा हर क्रियाओं में भारत एक गौरवशाली देश रहा है। लिए ताजी एवं स्मरणीय हो गयी है । सारी अपने-अपने धर्म में कई महापुरुषों ने जन्म बाड़मेर नगरी में खुशी की लहरे दौड़ी। हर गली लिये है। जिसका नाम आज भी उजागर है । एवं मोहल्लों के लोगों में खुशी एवं उमंगें समा भारत की इस गौरवशाली मरु-भूमि पर जैन-धर्म रही थीं। प्रातः की बेला में संघ के प्रस्थान की ने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रखी है । जैन- शहनाई बज उठी जो जमीन से लेकर अम्बर तक धर्म के कई संतों, आचार्यों एवं महापुरुषो ने इस माटी में जन्म लेकर कई कुरीतियों एवं कुकार्यों श्री कांतिसागरजी महाराज की निश्रा में हाथी, गूंज रही थी। प्रातः 11 बजे पूज्य गुरुदेव का अन्त किया है। घोड़ों, ऊंटो, रथ, पालकी एवं कई बैण्डों की वर्तमान युग में ऐसे कई महापुरुप इस मरु मधुर ध्वनियों के बीच जैन न्याति नोहरे से लगभग भूमि पर अपने धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु भ्रमण 1000 यात्रियों एवं अन्य जैन-अजैनों के हजारो शील है । हमारे पूज्य गुरुदेव, प्रज्ञा-पुरुष, बहुमुखी समूहों द्वारा संघ का प्रस्थान हुआ। संघ प्रस्थान- प्रतिभा के धनी, व्याख्यान वाचस्पति, अनुयोगाचार्य जुलूस मे हजारो नर-नारी संघ को विदाई देने श्री श्री 1008 मुनिराज श्री कांतिसागरजी हेतु शामिल हुए । स्थानीय चुंगी-चौकी के प्रांगण महाराज साहब भी एक वे महापुरुष है जो में संघ विदाई-समारोह मनाया गया जिसकी देश के कोने-कोने मे अपने धर्म के प्रचार-प्रसार अध्यक्षता माननीय श्री देवेन्द्रराज जी मेहता ने मे तल्लीन है । पूज्य गुरुदेव की अमृत-सी वाणी की एवं मुख्य अतिथि बाड़मेर नगर के जिलाधीश दिल की गहराई तक प्यास बुझाकर शांति श्री फतहसिंह चारण, पुलिस अधीक्षक श्री राम- फैलाती है। गुरुदेव के चिरस्मरणीय कार्य जो जीवन मीणा एवं दिल्ली से पधारे माननीय सेठ आज भी इतिहास में स्वर्णाक्षरो से अंकित है । मणिलाल जी डोसी थे। संघ विदाई-समारोह मे पूज्य गुरुदेव का एक महान्-कार्य, जो बाड़मेर से समस्त वक्ताओ ने संघ-यात्रियो की यात्रा सफल, पालीतारणा जी महातीर्थ का पैदल यात्री संघ है सुखमय एवं आनन्दमय होने की कामनाये की। जिसमें गुरुदेव ने उन भटके हुए अन्धकार के राहियों तथा स्थानीय जैन मण्डलो द्वारा संघ विदाई गीत को उस प्रकाशमय रोशनी में पहुंचाया है । भी गाये गये । समारोह के सम्पन्न होने के तुरन्त 31 बाद सघ अपनी मजिल पी की ओर बढा । सघ महाराज की पावन निश्रा में मघ दिन-प्रतिदिन का प्रथम प्रवेश स्थल पर सघ साय छ बजे पहुंचा अपने पथ की ओर बढ़ता जा रहा था। इस तरह जिसमे सघ यानियो के अलावा कई अन्य सज्जन घोरे धीरे 23 मार्च का दिन नजदीक आ रहा था। भी पधारे । जिनके भोजन आदि की पूरी व्यवस्था यात्रियो के मन बुशी के मारे फूते नहीं समा रह बाडमेर के जैन मण्डलो ने की । इस तरह धीरे थे । यात्रियो के मन खुशी से नाच रहे थे । प्राखिर धीरे सब अपने लक्ष्य की ओर बढता गया। कई 23 माच 1980 का दिन प्राया । पालीतारणा स्थानो पर सघ के स्वधर्मीवात्सल्य भी हुए तथा तीर्थ पर हजारो नर-नारी देश वे कोने-कोने से कई स्थानो पर सघ के भव्य स्वागत हुए । धीरे सघ के स्वागत हेतु पधारे। प्रात को शुभ बेला धीरे मघ ने राजस्थान की सीमा को पार करके मे गुरुदेव सहित सघ ने पालीताना की पावन गुजरात राज्य में प्रवेश किया। गुजरात के हर भूमि पर प्रवेश किया। हजारो नर-नारी संघ के गाव मे सघ के बडे हो शानदार स्वागत हुए । स्वागत हेतु आगे बढ़ रहे थे। 23 माच के शुभ जहा जहा सघ का पडाव पडता, वहा पर नवीन दिन मघ ने अपनी अतिम मजित पा ली और नगरी वस जाती। गुजरात में जहा भी सघ का चन की साम ली। इस दिन यात्री विश्राम एव पडाव होता वहा पर रात्रि को लोग आस-पास परिजनो से मिल रहे थे तथा प्रापस में सम्पन्न से सघ को देखने पाते थे। सघ का हाथी सघ का याना को शुभकामनायें ले रहे थे। 24 माच के आकर्षण बना हुआ था जिसको देखने गावो के शुभ दिन सघ यात्री दादा श्री प्रादिश्वरजी लोग दूर-दूर से भी आते थे। इस तरह चलते- के दरबार में प्रवेश के लिए चढने लगे। यहा पर चलते सघ सौराष्ट्र की सीमा मे पहुंचा । वहा भी उहोने दर्शनादि करके खुशियो से झूम रहे थे। सघ के शानदार स्वागत हुए। वहा के प्रागरण मे सघ का समापन समारोह मनाया सघ मे बिजली, पानी, अस्पताल, पोस्ट गया जिसकी ग्राज भी साक्षात् फिल्म बनी है । आफिस, पुलिस आदि की समुचित व्यवस्था थी। सघ का समापन समारोह बड़ी धूम धाम से मनाया दैनिक कायक्रमानुमार संघ मे प्रात प्रतिक्रमण गया। नील गगन के इन्द्र-देव भीमाज प्रसन करके सघ का विहार होता। जो लगभग पाठ चित्त थे। बजे अपनी मजिन पर पहुंच लेता, वहा पर नाश्ता घय हैं ऐसे पूज्य गुम्देव को जो एक ऐसा होने के बाद पूजा-पाठ मादि का कायक्रम होता, महान् काय करके अपना नाम उजागर करें। पूज्य उसके बाद दोपहर को खाना तथा बाद मे प्रवचन गुरुदेव श्री श्री 1008 श्री कातिमागरजी होता उसके बाद थके हुए यानियो को आराम महाराज के इम पैदल संघ का नेतृत्व वाडमेर के तथा फिर शाम को खाना खाने के बाद शाम को समाज सेवी सेठ श्री भवरलालजी वोहरा तथा प्रतिक्रमण होता तथा उसके बाद रात्रि म भजन सचालन बाडमेर के जैन मण्डलो ने दिया। मण्डलिया एव भक्ति-भावना का कार्यक्रम होता "जय गुरुदेव !" और फिर वही प्रात जय महावीर' इस तरह पूज्य गुरुदेव थी कातिसागर जी "धन्य हो सघ यात्री" . 32 / C SM ha Dus growe, migrannything meroinranamorammastaram assor and he has to क SE. 1% 24- पूज्य गुरुदेव अपने मुख्य शिष्य मुनि श्री मणिप्रभ सागरजी के साथ मंतणा करते हुये । -- M .. %3D D म Shiri AmAPAN T FFERE- -- F MAHNA / w NIC -- S - 5 411 F . Ear Skill --- -- १ Xve Here A M Ham Mhar । kisi Nim womanmitram murtiymwww.mamminar mmm wr amarner www FE i dastatel 1790 Www hame . 4 -- -M.pl । । A 5. . " A r 12 4. 40/- . AmarrHA संघपति श्री मणिलालजी डोसी किया करते हुये । मुनि मणिपासागरजी निर्देश देते हुये । विशिष्ट मुदाओं द्वारा चावलों को अभिमन्तित करते हुये पूज्य गुरुदेव श्री 44 m+RAN
May
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श्री भातिलालजी पारस
जारा साफा पहात हुय
सधपति श्री मणिलालजा
डासी हास्य की मुरळ
पलो में ।
卐
अ भा ख महासघ क उपाध्यक्ष श्री सुमतिपदजी याथरा
सधपति श्री भवरलालजी वाहरा का स्वागत करत हुय ।
फूलमाला स लद सघपति श्री मणिलालजी डोसी
प्रसन मुद्रा में
SHRUT
+ L NAGAR CUMAnnar COM . Kumar -20 anmom 14 Shr Porm im MPAHR WA --- ANTRA ~ 950 GOAN 3 दान की जड़ सदा ही - FREE -1 -- s W ETE 11 S -- at 18 TE Inाल , ८ वाड़मेर से प्रस्थान के समय दान की घोषणा करते हुये श्री मणिलालजी डोसी लगन और निष्ठा K वाडमेर से प्रस्थान के समय जिलाधीश श्री फतहसिंह चारण विदाई देते हुये । RAA । A imgase 8 arkar - । Amx , . । 4 6 hamal . न ४ mite ३ . , र METRIPHindi ne Kahan
-
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Maa
पदयाली सघ में सवाये ८१ वाल भी आदिश्वर जैन मण्डल क
कायकता एव पदाधिकारी
*
दादा कल्याण जैन मण्डल, वाडमेर
Vinary Naveewan
।
छःरि पालित यात्रा संघ के अन्तिम क्षण - लेखक : मुनि मणिप्रभसागर वक्तव्य का शीर्षक तय करना जितना सरल यह तो सोचा ही नहीं, इस पर तो गौर किया ही है, शीर्षक के विषय से सम्बन्धित लिखना, उतना नही ? सरल नही जान पड़ता। क्या पालीतारणा प्रवेश के क्षरण-अन्तिम क्षण आदत है मेरी कि लेख लिखने के पूर्व विषय हो सकते है ? का चयन करता हूँ फिर अन्तःस्तल की गहराइयों नहीं, क्योकि दूसरे दिन भी सभी यात्री, कार्य- मे शीर्षक खोजता हूँ और फिर "क्या लिखना कर्ता साथ ही थे! है ?" इसका पूर्णतया विचार करने के वाद, उन विचारों को मानसिक रूप से दृढ करने के बाद तो वे क्षण अन्तिम हो सकते है जिन क्षणों कलम हाथ मे लेकर लिखने बैठ जाता हूँ ! में यात्रियों ने पालीताणा तीर्थ का शारीरिक त्याग किन्तु स्वयं की हरकत पर मुझे आश्चर्य हो किया ! अर्थात् अपने-अपने स्थान पर जाने के आया उस समय जब बिना अधिक सोचे, शीघ्र एक लिये अनेक प्रकार के वाहनों में विराजे ! पन्ने पर शीर्षक लिखा और लिखता चला गया । लेकिन वे क्षरण "यात्रा-सघ के अन्तिम क्षण वात यो बनीं- कैसे हो सकते है ? क्योकि यात्रा संघ ने तो उन ता० 17-6-1980 की डाक देखी तो सुविज्ञ सभी यात्रियों के हृदय पर गहरा प्रभाव छोड़ा है, पत्रकार श्री रावलमलजी जैन "मणि" का लेख जो मिटाये नही मिट सकता है, हटाये हट नहीं पढने को मिला। शीर्षक देखा और अन्तःस्तल सकता, जलाये जल नहीं सकता, उड़ाये उड़ नहीं मे हलचल मची ! शीर्षक था- "छ रि पालित यात्रा संघ फिर वे तो केवल शारीरिक रूप से ही पद तैयारी के प्रारंभिक क्षण" यात्रा संघ से विदाई ले रहे थे, किन्तु मन-हृदय- सोचा, श्री मरिणजी ने स्मारिका के लिये प्रात्मा, वह तो उस क्षण तक पद यात्रा संघ में प्रारभिक क्षणो के सम्बन्ध मे आलेख का प्रस्तुती- रमरण करता रहेगा, जिस क्षरण तक श्वासोच्छवास करण किया है, तो मैं "अन्तिम" क्षणो के लिये की क्रिया चलती रहेगी, विचार-प्रवाह बहता क्यो न लिखू? लेकिन फिर समझ में आया कि "यात्रा सघ फिर ! फिर मैं पद यात्रा संघ के अन्तिम क्षण के अन्तिम क्षण" ये क्षरण कौन-से हो सकते है ? किन क्षणों को मानू? सकता। रहेगा ! . फिर मैं पद यात्रा संघ के अन्तिम क्षण किन क्षणों को मानू ? 33 बाड़मेर से पालीताना पैदल यात्रा संघ के लिये साधु-साध्वी समुदाय को आमन्त्रित करने हेतु गये प्रतिनिधि मंडल की रिपोर्ट हमा। चार सदस्यो यथा श्री ननमल मसाली. प्रतिनिधि महल ने बम्बई की तरफ बूच किया । भगवानदास सेठिया, चिन्तामनदास सखलेचा एव वहाँ वडोदरा में प्रमुख पावर थो शातीलालनी आमूनाल धारीवाल का एक प्रतिनिधि महल पारिस ने भी मघ की सफलता को पूर्ण कामना श्री ननमल मसाली मत्री चौमासा कमटी एव करते हुए उसम शामिल होने की प्रवल भावना दृस्टी खरतरगच्छ वाडमेर के प्रतिनिधित्व मे दिखायो । प्रतिनिधि महल बम्बई से अमलनेर के वाडमेर से अहमदाबाद, वडोदरा, वम्बई, अमलनेर, लिये साय सवा सात बजे की गाडी से रवाना रायपुर, धमतरी, नया पारा, राजीन, जवलपुर एवं जयपुर हेतु दिनांक 7-10-79 को बाडमेर से रवाना हुआ तथा दिनाक 15-10-79 को वापिस यम्बई बाइमेर लौट पाया प्रतिनिधि महल द्वारा की दिनाक 9-10-79 को बम्बई में मच्चलगच्चीय गई विनती एव तत्सम्बधी स्वीकृति का ब्यौरा प्राचाय श्री गुणसागरजी म० मा० से विनती की स्थानवार निम्न रहा गई, जिस पर प्राचार्य श्री ने फरमाया कि वे फाल्गुन माह मे मच्चलगच्छ के अखिल भारतीय अहमदाबाद अधिवेशन में व्यस्त रहगे प्रत उनके लिये इसमे दिनाक 8-10-79 को अहमदावाद में मुनि माना सम्भव नहीं होगा। बाडमेर स्थित चार श्री कल्याणसागरजी एव श्री कैलाशसागरजी से ठाणो के लिये उन्होंने कहा कि वे उन्हें पैदल मघ विनती की गई, जिसे उन्होंने स्वीकारा । स्वीकारने मे शामिल होने हतु अलग से पत्र लिखा देंगे। ये पर भगवान् की जय-जयकार कर प्रतिनिधि महल चार ठारणा लौद्रवाजी की यात्रा समाप्त कर सघ ने बडोदरा के लिय प्रस्थान किया। में शामिल हो जायेंगे। इसके अतिरिक्त यदि कोई और ठाणे शामिल होना चाहें तो वे उहे इस हेतु वडोदरा स्वीकृति दे देगें, ताकि वे रास्ते में कही पर भी दिनाक 8 1079 को बडोदरा में साध्वी इसमें शामिल हो सकें। वहा पर प्रात व्याख्यान श्री पवित्र श्रीजी भादि ठाणा 7 से विनती की गई मे उपस्थित श्रावको एव श्राविकानो मे भी सघ में जिसे उन्हान स्वीकारते हुए 3 ठारणा पैदल सघ में शामिल होने की प्रवल भावना दिखलायी पड़ी। भेजन हेतु वाछिन माश्वासन दिया। इसके बाद वम्बई मे श्री निपूणा श्रीजी आदि ठाणा 5 ने 34 भी विनती को स्विकारा तथा उनके गुरुपानी साध्वी श्री ने प्रतिनिधि मंडल द्वारा व्यक्त श्री जिन श्रीजी की स्वीकृति आते ही संघ के लिये भावनाओं की सराहना करते हुए धमतरी सघ को प्रस्थान करने का आश्वासन दिया। भी इसमे शामिल होने की प्रेरणा दी, जिसे उन्होंने स्वीकारा । प्रात: व्याख्यान मे भी संघ में शामिल अमलनेर: होने की भावना प्रवल रही। दिनांक 12-10-79 दिनांक 10-10-79 को प्रतिनिधि मडल को प्रातः 10 बजे प्रतिनिधि मडल ने नया पारा अमलनेर पहुँचा जहाँ पर साध्वी श्री जिन श्रीजी राजीन के लिये प्रस्थान किया। धमतरी में प्राप्त आदि ठाणा 7 विराजते हैं, जिनसे विनती करने सहर्ष स्वीकृति एवं लोगों के उत्साह से प्रतिनिधि पर उन्होने फरमाया कि वे अति वृद्ध एवं बीमार मंडल बहुत प्रभावित हुआ जिससे उसने अपनी होने से संघ में पैदल चलने मे शारीरिक दृष्टि से सभी थकान को भुला दिया । अशक्त हैं, लेकिन उनकी दो शिष्याओं को छोड़ शेष सभी शिष्यायें संघ में शामिल होने के लिये नयापारा राजीन: पूर्णतः स्वतंत्र रहेंगी तथा उन्हें भेजने हेतु पूर्ण दिनांक 12-10-79 को दोपहर एक बजे प्रयास करेंगी। श्री निपूणा श्रीजी को वांछित यहाँ पर पहुँचे । यहाँ पर साध्वी श्री रमा श्रीजी स्वीकृति भेज दी जावेगी। वहाँ के प्रमुख श्रावक आदि ठाणा 2 विराजते है। बाड़मेर संघ की श्री खेतमलजी ने भी संघ की सफलता की पूर्ण विनती की उन्होंने सराहना की। लेकिन स्वास्थ्य कामना करते हुए उसमे शामिल होने की प्रबल मे अशक्त होने के कारण संघ में शामिल होने मे भावना दिखायी। अपनी असमर्थता व्यक्त की। लेकिन धावको के एक दल को प्रेरणा से भेजने का आश्वासन दिया। अमलनेर से रात्रि की ट्रेन से बैठकर प्रमुख श्रावको ने भी एकत्रित मीटिंग मे इसकी दिनांक 11-10-79 को दोपहर चार बजे रायपुर पुष्टि की। पहुँचे, जहाँ से बस द्वारा सायं 7 बजे धमतरी पहुँचे। रायपुर: प्रतिनिधि मंडल दिनांक 12-10-79 को धमतरी: दोपहर 4 बजे रायपुर पहुंचा, जहाँ पर श्री कीर्ति दिनांक 11-10-79 को प्रतिनिधि मडल श्रीजी आदि ठाणा 3 बिराजते है, जिन्होने बताया अमलनेर से धमतरी पहुंचा, जहाँ पर साध्वी कि उन्हें उनकी गुरुपानी श्री मनोहर श्रीजी का श्री मनोहरश्रीजी आदि ठाणा 9 विराजते है, संदेश मिल चुका है तथा वे कार्तिक पूर्णिमा को जिनसे विनती करने पर उन्होंने अपने कुल इस हेतु प्रयाण कर देगी। प्रमुख श्रावकों की एक 16 ठाणो के साथ सघ में शामिल होने की वांछित बैठक में भी उन्होने उन्हें पैदल संघ में शामिल स्वीकृति सहर्ष प्रदान कर दी तथा अविलम्ब बाहर होने की प्रेरणा दी। दिनांक 12-10-79 को विराजमान ठाणों को पत्रादि भी लिखा दिये । रायपुर से रात्रि की वस से दिनांक 13-10-79 पूज्य अनुयोगाचार्य कान्तीसागरजी म. सा० के को प्रातः 7 बजे जवलपुर पहुंचे। नाम भी संघ में आने की स्वीकृति बावत पत्र प्रतिनिधि मंडल को दिया। रात्रि को जैन समाज जवलपुर : के गणमान्य व्यक्तियो की एक बैठक हुई जिसमें यहाँ पर खरतरगच्छ गणाधीश 1008 35 श्री उदयसागरजी म. सा. आदि ठाणा 4 विराजते समुदाय को पैदल संघ में शामिल होने हेतु प्रति हैं। बाडमेर सघ की विनती की उहोने सराहना दोघ दिया। स्वय केंसर की विमारी से पीडित की। उहोंने बताया कि दो ठाणा अस्पताल में होने के कारण अपना आना गुरुदेव की इच्छा पर भर्ती हैं, मत उनके वाछित मॉपरेशन एव कुशल बतलाया। श्रावको के नाम भी इस दिन लिखने होने के बाद ही वे सघ मे शामिल हो सकेंगे । यदि मारम्भ कर दिये गये । जयपुर के प्रमुख श्रावको एव उनकी अस्वस्थता बनी रही तो उनका शामिल श्राविकाग्री को भी व्यक्तिगत विनती की गई, जिसे होना कठिन होगा। उन्होंने इसकी सफलता की उन्होंने स्वीकारा । रात्रि की 830 बजे की बस पूर्ण कामना की। दोपहर पौने पाच बजे की कुतुब मे बैठकर प्रतिनिधि महल दिनार 15-10-79 को एक्सप्रेस से आगरे के लिये प्रस्थान किया, वहीं प्रात 11 बजे वाडमेर पहुंचा। साढे सात दिन दिनाक 14-10-79 को प्रात पहुंचे जहाँ से सीधा की अवधि में प्रतिनिधि मडल ने करीब 5500 वस में बैठकर दोपहर दो बजे जयपुर पहुंचे। किलोमीटर की यात्रा की तथा इस दौरान सिफ धमतरी में एक बार रात्रि विश्राम किया। गुरुदेव जयपुर की अनुकम्मा से प्रतिनिधि महल अपने लक्ष्य की पूर्ति यहा पर साध्वी थी विचक्षण श्रीजी आदि कर वापिस बाडमेर लोटा, जिसे सभी ने ठाणा 40 विराजते हैं। विनती को स्वीकारते सराहा। हुए साध्वी श्री ने साध्वी समुदाय एव श्रावक 0 नैनमल जैन, मती चॉ० कमेटी जैन श्री सघ, बाडमेर 36 WAN HHANE More WARN D A- -- -- 2SRI 5 ---- M - • -- FUSS Subinatantansatiotism be RAR " BE न्द्र - SC- -- %DOORite / MI -- SARAN MITARTHA YINGalA TAMIL E IHD D... 1 -- RSS H 4IAL H Ant । MES HINDI । E । MAM P --- 3-2- - %3 H -- MAA - Wia ROINDIA : ... 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भी दौलतसिहजी जैन दिल्ली
श्री पालीतारणा में संघ प्रवेश के दिन फले-चुन्दड़ी 0 लेखक व इसके संयोजक : श्री मिलापचंद गोलेछा नया माधुपुरा, अहमदावाद "फले चुन्दड़ी" यह एक प्यारा, मीठा, सुनने इस फले-चुन्दड़ी का प्रसग तो बड़े अनूठे ढग मे कान को मधुर लगने वाला मारवाड़ी शब्द है । से पड़ा। इसका आदेश प्राप्त करने वाले महानु- इसी को गुजराती मे "जाफे चोखा" कहते है। भाव व पूज्य महाराज श्री में से किसी को इस बात इसका नाम लेते ही मारवाड़ मे आदमी मे एकदम का कोई ख्याल ही नही था कि पूज्य महाराज श्री उत्साह आ जाता है। मारवाड़ मे तो कोई बडा इसका आदेश मुझे फरमावेगे और मै उसी समय पवित्र धार्मिक प्रसग होने पर इसका खास आयोजन सहर्ष उसे स्वीकार करूंगा। और इतने बड़े इस किया जाता है। गाम के गाम धुवाड़ा बद करके प्रसग का मुझे आदेश मिलेगा। बड़े प्रेम व उत्साह से जीमने को आते है। सिर्फ बात यो बनी कि बाडमेर मे अखिल भारतीय "फले-चुन्दडी करनी है" ऐसा नकी होने पर तो श्री श्वेताम्बर खरतरगच्छ महासंघ की मीटिंग बोलियो की भरमार हो जाती है। व बाजे-बाजे रखी गई। महासंघ के प्रमुख महामंत्री व कार्य- तो दो पाटियो के आपस मे जीद पर तो इसकी कारिणी के सदस्य काफी सख्या मे पाए हुये थे । सिर्फ आदेश की बोलियाँ हजारो लाखो रुपयो पर पूज्य महाराज श्री को वन्दनार्थ सब कोई बैठे थे। चली जाती है व उसके भोजन आयोजन का खर्च बातो मे ही पूज्य श्री ने फरमाया कि बाड़मेर से तो अलग रहता है। छ. पालित पालीताणा का पैदल सघ नीकाल रहे फले-चुन्दडी का महत्त्व खास कर मारवाड़ी है। बहुत बड़ा प्रसंग है सो आपकी तरफ से फले- जैन समाज मे है । फिर भी इसके आयोजन का चुन्दड़ी धुमाडा बद सघ प्रवेश के दिन होगी। यह नकी होने पर व इसका निमन्त्रण अन्य सभी आदेश पाकर वे बड़े प्रसन्न हुये और उसी समय न्याति के आगेवानो व गाम मे टहल पड़वा कर बोले-"पूज्यवर आपकी आज्ञा सिरोधार्य करता हूँ कहने पर जैन समाज के अलावा पुरे गाम मे एक मगर इसकी पूरी व्यवस्था प्राप श्री को करानी होगी उत्साह की लहर दौड़ जाती है मानो लोगो को मै तो टाइमसर हाजर हो जाऊँगा" अाधा घटा निमन्त्रण के साथ ही शुद्ध घी से बनी मिठाई की इसके बावत और बातचीत होकर श्रीमान् की खुशबु आने लगती है। लोग इसमे सहयोग दे कर तरफ से फले-चुन्दड़ी होगी यह बात जाहिर कर इसे सफल बनाने मे उमड़ पड़ते है । दी गई । वस इतनी सी टाइम मे इतने बड़े प्रसंग 37 का प्रायोजन नकी हो गया और काम श्री जिन मघ के पहुंचने के एक महीना पहले वहां हरि विहार के ट्रस्टियो को सौंप दिया गया। इमरी व्यवस्था, नौता देना, लिम्ट तयार करना, पालीताणा में जिन हरिविहार के दृस्टियो की याति बार लिस्ट वगैरा का काम श्रीयुत् सेठ मिटिंग मिली और वे इसके प्रायोजन का नको माहब हीराभाई मोदी व श्री बानुभाई ब्रह्मभट्ट करने व व्यवस्था के लिए पालीताणा के नगर सेठ व श्री वायुभाई ब्रह्मभट्ट यो मौंप दिया गया। के घर गए। नगर सेठ श्री दलीचद भाई को मुझे ता० 16 3-80 तन सामान लेकर पालीताणा तबीयत ठीक न होने पर भी उनका उत्साह इतना पहुंचने का कहा गया । हम 3-4 व्यक्ति इस काम था कि उहोंने उमी समय नगर के प्रतिष्ठिन के लिए नयी हुवे । उसी मुताबिन मब सामान व व्यक्तियों को बुलाया और थोडी चर्चा विचारणा के रमोईया धगैरा लेकर में पालीताणा पहुंच गया बाद रूपरेखा तैयार कर दी । माल सामान मगर दूसरा कोई वहाँ नहीं पाया। इसस टाइम अहमदावाद से लान का मेरे जिम्म रख दिया गया। सम था सामान तैयार पराना था, भट्टियां सोदानी माल सामान की लिस्ट वजन उतरा दिया गया। थी वह सब काम मेरे अकेले पर पड गया, मैंने शुद्ध घी के दुदी के लड्डू सेव, चावल, चरणाका काम शुरू मरा दिया माल मामा ता. 20-3-80 साग व दाल बनाने का नको हुवा । तव तैयार हो गया । ता० 21 व 22 को वह वहाँ से श्री पानदजी कल्याणजी की पेटी में सामान न्याति वार मागेवानी को बुला कर प्रेम मैनेजर साहब श्री भट्ट साहेब से मिल कर सामान पूर्वक मम्मान के साथ उन्हें सौंपा गया तब मुझे व वडे मे सामान तैयार करने का व पहाड पर वहां ऐसा अनुभव हवा कि पने चुदडी माता श्री आदेश्वर भगवान् को पूजा व पूज्य दादा वद का अबैले मारवाह ही नहीं गुजरात में भी गुरुदेव की वही पूजा, माला प्रादि के भादेश की बहुत बडा महत्त्व है। जैन समाज सिवाय माय व्यवस्था करने की अरजी कर दी गई। वह बहुत याति म भी इसी प्रति क्तिनी श्रता व उत्साह जल्दी प्राप्त भी हो गई। है। प्रापको क्या बतावें अन्य जाति वाले ये उत्साह इधर कुछ दिन बाद ऐसा मालूम पडा कि की बात पहले फले-चुदडी मे बहुत झगडा व वातावरण सामान लेने पाने वाले मुखिया, मागेवान खराव हुवा था सो इस टाइम नहीं हो सकेगी। बडी नम्रता व प्रेम से पेश माते थे। इस पर वहा के श्रीमत सेठ स्व० श्री हीरा भाई सामान ले जाने को अपने बैलगाडी व मोदी ने निष्ठा व हिम्मत से कहा कि अगर आप लारियां सजा सजा कर ले जाते थे। धीरज, खर्च में बडा दिल व दिमाग पर काबू माल ले जाते समय पूरे नगर मे इसकी रखेंगे तो यह पने-चुन्दडी बडी शानदार व लोग इतनी प्रशसा करते कि न पूछो वात । देखते रहेंगे वैसी होगी। पहले भी झगडा मामान 4 मुस्लिम भाइयो ने अपने क्लसाने वद रमे। लेनदेन वावत हुवा था। सो यह विचार हो तो 5 जनेतर जाति के करीब-करीब सब जातियो यह काम शानदार होगा । और स्वर्गीय सेठ ने सघपति व फले-चुदही वाले सेठ श्री को श्री हीराभाई के कहने व उनके माग-दशन मे यह हार फूल तोरा बाजो से यघाया। काम बडा शानदार ढग से निपटा । योगानुयोग मास बेचने वाले भाइयों ने अपनी दुकाने इसके एक महीने बाद ही सेठ श्री हीराभाई मोदी विलकुल बद रखी। का हाट अटक से स्वगवास हो गया। यह काम 7 जीमने के बाद बढा हुवा सामान वापिस उन्हीं के प्राभार से परिपूर्ण हुवा । ला-लाकर दिया। 1 2 3 6 38 खाया। 8. समस्त ब्राह्मण समाज ने इकट्ठे होकर एक श्री कान्तीसागरजी म. सा० का जुलूस गुहलियाँ जगह भोजन किया। करते व दरवाजो से सजाए हुवे नगर के मुख्य- 9. गरीबो को जिमाने वाली संस्था मंदिर जो मुख्य सडको से गुजरता हुवा श्री जिनहरि विहार कि किसी के वहाँ का खाना नहीं लेते उनको मे करीब 10 बजे पहुँचा । प्रेम के साथ कहने पर सहर्ष सामान उसी इधर जीमन का टाइम होने पर पुरसने वालों समय स्वीकार करना । के 12 बजे तक न आने पर दूसरी व्यवस्था करनी 10. फले-चुन्दड़ी निपटने के बाद शुभकामना देने पड़ी सो तुरन्त व्यवस्था पूरे ढंग से न होने पर हेतु पूज्य महाराज श्री के पास आना। जीमने वालों को कुछ परेशानी हुई। माल सामान 11. प्रशंसा करते हुये कहना कि पूज्य महाराज के पूरी तरह से तैयारी होने पर भी एक घटा भर साहब हमें तो इतना सामान मिला कि जीमने वालो को परेशान होना पड़ा। पीछे संघ- आपकी दया से 3-3 दिन तक हमने पति श्रीयुत् द्वारकादासजी राठी ने बड़े सुन्दर ढंग से व्यवस्था की। तब 21 बजे श्री विमल मण्डल 12. बाहरे वाह फले-चुदन्ड़ी हो तो ऐसी हो । आहोर वाले आए। शांति के साथ जीमन शाम पड़ते तक चलता रहा ? हाँ तो ता० 22-3-80 को पूरे भोजन की तैयारी हो गई व पूज्य महाराज श्री ने जिमाने नगर मे बस-रेल्वे से आने वाले व अकेले का जिमा श्री विमल जैन मण्डल श्री आहोर, विना न्याति वाले झोपडों वगैरा में रहने वाले, श्री जिनदत्त सुरी सेवा मण्डल श्री मद्रास व अन्य घूमते फिरते रहने वाली जाति वाले भाई बहिनों बाड़मेर वाले सज्जनो को सौपा । पाहोर मण्डल के जीमने की व्यवस्था अलग तैयार सामान भेजकर के अध्यक्ष ने मुझसे कहा कि हम जुलूस के पूर्ण अनाथाश्रम मे की गई । होने के बाद 11 घटा आराम करके आ जायेगे । जिन-जिन जाति वालों को सामान कम पड़ा श्रीमान् जसराजजी लूणिया मन्त्री श्री जिनदत्त प्रेम से उन्हें लारियां भर-भर कर पहुंचाया गया । सूरि सेवा मण्डल श्री मद्रास ने कहा कि हम 20 प्रादमी तो 11 बजे वहाँ हाजिर हो जाएंगे। पालीताणा मे खरतरगच्छ की तरफ से तो यह पहली फले-चुन्दडी, धुमाडा वंद जाफे-चोखा ता० 23-3-80 को सुबह शानदार ढंग था। ऐसे वहाँ 25 साल बाद यह मौका पाया से पूज्य आचार्य भगवन्तो, मुनि मण्डलो, एक सरखे था । इसके पहले दो बार वहाँ फले-चुन्दडी ड्रेस वाली 108 बेडे वाली बहिनो व अन्य न्याति हुई । मगर यह फले-चुन्दड़ी दोनों से बड़ी ज्ञाति जाति के आगेवांनो के ढोल, बैड, त्रांस व शानदार, उत्साह के साथ व अलग ढग की हुई । फूलमाला हारातोरा व जयनादो की आवाज के इसलिए यह अपना अलग ही महत्त्व रखती है । साथ व नगर के प्रतिष्ठित मुख्य पुरुषो व सघ- पतियो, संघयात्रिको के साथ फले-चुन्दडी वाले इस फले-चुन्दड़ी ने पालीताणा तो क्या पूरे सेठ व और भी हजारो की मानव मेदनी के साथ गुजरात मे खरतरगच्छ की शोभा में चार चांद खरतरगच्छ भूपण पूज्य गुरुदेव अनुयोगाचार्य लगा दिये हैं। - 39 उपरीयाली का विख्यात जैन तीर्थ भूरचन्द जैन, वाडमेर हुआ है। धार्मिक, साहित्य एव सम्कृति की रक्षक एव उपलीयासर, 19वी शताब्दी मे उपरीयाली के पीपक गुजरात की मूमि सदियो से प्रसिद्ध रही है । नाम से सम्बोधित किया जाता था । आजकल यह इस भूमि में मभी धर्मों को मानने वाले देश के उपरीयाली जैन तीथ के नाम से परिचायक बना विख्यात धार्मिक स्थल ग्राज भी भक्ति एव श्रद्धा के केन्द्र बिन्दु बने हुए हैं जिनके दशनाथ प्रति उपरीयाली गाव मे जैन धम के प्रथम तीर्थकर वप देश एवं विदेशो से हजारो यानी यहा यात्रा करने का गौरव प्राप्त करते हैं । जैन धर्मावलम्बियो श्री आदिनाथ भगवान् का सुदर पाषाण एव पांच के लिये यह सदैव मर्वोत्तम पूजनीय भूमि रही है । की क्लात्मक चित्रकारी के लिये विख्यात जैन इम धरनी की गोद में जैन प्रचारको में जैनाचार्यों, मदिर बना हुआ है जिसे जैन तीर्य के रूप मे माधु-माविया, प्राचार्य भगव तो एव यहा तक कि सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। जिसके दो कई तीर्थक्गे ने यहां की याना की है और यहा प्रवेश द्वार दक्षिणाभिमुख हैं। जवकि मूल मन्दिर पर जैन शास्त्रो, आगमो प्रादि की रचना भी की का मुख द्वार पूर्वाभिमुख है । मदिर आगे से खुला है । जिनकी स्मृति में गुजरात के कोने-कोने मे है । मन्दिर मे प्रवेश हेतु नव-सीढिया बनी हुई हैं । जैन मदिरो की भरमार है। भारत के अनेको जिस पर चार खम्भो पर जैसलमेर मदिरो के जैन तीर्थों मे सवाधिक एव सर्वोपरि तीर्थ पाली. शिखरो की भाति शिल्पकला का छोटा गुम्बज ताणा, गिरनार, श खेश्वर पाश्वनाथ प्रादि बना हुअा है । जिस पर पद्मावती एव चक्रेश्वरी गुजरात म होने का गौरव प्राप्त किये हुए है । की दोनो बाजू सुन्दर प्रतिमायें बनी हुई हैं । इन गुजरात के जैन तीर्थों की कही मे उपरीयाली जैन चारो खम्भो के बीच में शिल्पकला कृतिया लिये तीय को भी प्रमुखता की पक्ति मे गिनते हैं। जैन तोरण भी बने हुए हैं। उपरीयाली प्राचीन जैन तीथ है जो वीरम मदिर के प्रवेश द्वार के चार खम्भो एव पीछे गाव से अठारह किलोमीटर पश्चिम दिशा में पाया मुल गम्भारे तक चारो ओर चार चार खम्भे बने हुअा है । इस तीथ तक पहुँचने के लिये पाटरी, हुए हैं । जो एक दूसरे से सुन्दर शिल्पक्ला कृतिया माहल मे एव वीरमगाव से पक्की सडक से जोडा लिये तोरणो से जुड़े हुए हैं। पश्चिम दिशा के गया है। वीरमगाव से साराघौडा रेलवे लाइन चार खम्भो के बीच जिन श्री आदेश्वर प्रमु का पर उपरीयानी हारट रेलवे स्टेशन बना हुआ है जिन मदिर का सभा मण्डप आया हुआ है । मूल जहा से उपरीयाली मदिर एक किलोमीटर दूर मदिर के द्वार के आजूबाजू एक-एक सभा मण्डप उपरीयाली गाव में स्थित है। जिसे प्राचीन 14वी म प्रवेश करने हेतु द्वार बने हुए है। इस चौक को माताब्दी में उपल्लिया असरी, 16वी शताब्दी मे शृगार मण्डप कहते हैं जिसकी प्राचीरो एव खम्भो 40 पर शिल्प कलाकृतियों के साथ-साथ कांच की दरवाजे बने हुए है। इन मन्दिरों पर विशाल रंग-बिरगी जड़त की हुई है। सम्पूर्ण छत में कांच शिखर एव गुम्बज भी बने हुए है । मूल मन्दिर की सुन्दर रंग-विरंगी जड़त मे स्वास्तिक के अनेको के अतिरिक्त उसके साथ जुड़े एक मन्दिर मे भी आकार, भगवान् नेमीनाथ प्रभु की बरात और श्री नेमीनाथ प्रभु की काले पापण की प्रतिमा छत के बीच में गुजरात का विख्यात गरवा नृत्य विराजमान है । पास के एक पाले मे श्री अजीतनाथ भी दृष्टिगोचर होता है। नीचे का फर्श सुन्दर रूप प्रभु की सफेद प्रतिमा के दर्शन होते है। वहां लिये संगमरमर का बना हुआ है । दूसरी वाजू बने मन्दिर मे मूलनायक के रूप मे श्री महावीर स्वामी की चाकलेटी कलर की प्रतिमा शृंगार मण्डप मे बने सभा मण्डप के तीन विराजमान है जिसके पास बने एक प्राले मे श्री प्रवेश द्वार पर संगीन काच की जड़त के द्वारपालो वासुपूज्य स्वामी की प्रतिमा बिराजमान है। की आकृति देखते ही मन मयूर नाच उठता है । सभा मण्डप के गोल गुम्बज में विविध वाद्ययंत्रो मूल मन्दिर के पीछे भमती है। भमती सहित नृत्य करती चौवीस नारियों की काच के प्रारम्भ होने से पहले एक छोटा गुरु मन्दिर बना टुकड़ों को जोड़-जोड़ कर आकृतियां बनाई गई है। हुआ है जिसमे आचार्य देव श्री विजयभक्तिसूरीश्वर जिनमें एक नारी अन्यों से छोटी है। इस सभा मण्डप की प्राचीरों पर अत्यन्त सुन्दर प्राकृतियों उसके आगे की भमती में गिरनार का सुन्दर पट्ट, जी म. सा. की प्रतिमा बिराजमान की हुई है । मे चित्रकार ने भगवान् महावीर, चडकौशिक, भगवान् श्री आदिनाथ के भवो के चार चित्र, गजसुकुमाल सौमिल के सिर पर अग्नि, मैतायंमुनि फिर श्री शखेश्वर पार्श्वनाथ की प्रतिमा, फिर सौमीना ज्वाला, नभिरार्षि दृष्ट कसौटी, खदक चार चित्र, श्री शत्रुञ्जय का सफेद पट्ट, भवों के मुनि के शरीर पर से चमडी उधेड़ने एवं सुदर्शन छः चित्र, श्री मल्लीनाथ प्रभु की प्रतिमा, भवो के सेठ व अर्जुन माली आदि के चित्र बना दिये है । छः चित्र, श्री सिद्धिशिला का पट्ट, भवो के चार जितनी सुन्दर सभा मण्डप की प्राचीरों को प्राचीन चित्र, श्री मनमोहन पार्श्वनाथ प्रतिमा, भवों के धार्मिक कथाओ से अलंकृत किया गया है उतना चार चित्र, सम्मेत शिखर का पट्ट और आगे ठीक ही इस सभा मण्डप के सुन्दर संगमरमर के फर्श गुरु मन्दिर के सामने श्री शान्तिनाथ प्रभु के पर बैठकर सामने मूल गम्भारे में प्रतिष्ठित श्री अधिष्टायक देव विराजमान है । आदिनाथ स्वामी की महान् चमत्कारी एव प्रभाविक प्रतिमा के दर्शन लाभ होते है । उपरियाली का यह मन्दिर एक विशाल मन्दिर के मूल गम्भारे के तीन द्वार है । बीच ऊची-ऊची दीवारो के बीच 42-44 के क्षेत्र मे मे मूलनायक श्री ऋपभदेव की एव उसके आजू बना हुआ है। दक्षिण की तरफ मन्दिर के दो वाजू श्री शान्तिनाथ प्रभु एवं श्री पार्श्वनाथ स्वामी प्रवेश द्वार है। मूल द्वार नया बना हुआ है जिस की प्रतिमाये विराजमान हैं। ये तीनो प्रतिमाये पर धरणेन्द्र, पद्मावती, धर्मचक्र आदि की प्रतिमायें पीले पापारण की होने से अत्यन्त ही सुन्दर एव बनी हुई है । नीचे दोनो तरफ हाथी की विशाल आकर्षक लगती है। मूल गम्भारे के दोनो बाजू प्रतिमायें बनाई हुई है । प्रवेश द्वार के सुन्दर छोटी-छोटी श्री चक्रेश्वरी एव श्री गरुड़ यक्ष की तोरण पर शिल्प कलाकृतियां कोरी गई है । इस प्रतिमाये तीर्थ रक्षक के रूप मे विराजमान है। द्वार की दीवार मे भी आगे एक छोटा प्रवेश द्वार इसी प्रकार सभा मण्डप मे से दोनो ओर दो बना हुआ है। 41 वर्तमान में श्री आदिनाथ उपरीयाली तीर्थ ममय वि म 1920 कार्तिक सुदी 15 को जैन की स्थिति है वहा वि म 1492 में यह थी समाज द्वारा एक औरही बनारर इन प्रतिमानो आदिनाथ प्रमु का मन्दिर होने के सकेत मिले हैं। को प्रतिष्ठिन किया। वि स 1944 की माघ जिमका उल्लेख जय सागर उपाध्याय द्वारा रचित सुदी 13 शनिवार तक आधुनिक रूप लिये नया परिपाटी मे उपलियानसरी के नाम से किया गया मदिर बन गया और प्रतिष्ठा सम्पन हुई। है । वि स 1525 में भी इस मन्दिर के होने के गुजरात के इस महान् धार्मिक एव पविन सकेत मिले हैं । बताया जाता है कि 17वी शताब्दी तोय पर प्रावास हेतु सुन्दर धर्मशाला एव यात्रियों के 1703 के आस-पास में इस मन्दिर पर वे खाने पीने हेतु आधुनिक भोजनशाला की उत्तम औरगजेब के सैनिको ने आक्रमण दिया उम ममय व्यवस्था भी है । यहा प्रतिवप माघ मुदी 13 एव मूर्तियो को जमीन मे भण्डार कर जनमानस अपनी फागण सुदी अष्टमी को विशाल पैमाने पर मेलों जान बचाने हेतु अन्यत्र चला गया। फिर वहां का आयोजन होता है । जिममे हजारो दर्शनार्थी, वि स 1919 वैशाख सुदी 15 को रतना नटमी यात्री श्रद्धा एव भक्ति के माय यहा पावर श्री कुम्भार को माटी खोदते प्रतिमायें मिली। कुछ आदेश्वर प्रभु के दशन, पूजा, आराधना करते हैं । 42 खरतरगच्छ की देन लेखक-सोहनराज भंसाली, जोधपुर पाटन मे दुर्लभराज की राज्य सभा में चैत्य आचार्य जिनेश्वरसूरि के व्यक्तित्व एवं वासियों से शास्त्रार्थ मे विजय प्राप्त करने पर कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री जिन- दुर्लभराज ने जिनेश्वरसूरि को “खरतर विरुद" विजयजी ने "कथा कोप प्रकरण" मे लिखा है दिया । फलतः सं. 1066 मे खरतरगच्छ का कि- प्रादुर्भाव हुआ । इसके बाद धीरे-धीरे जिनेश्वरसूरि "जिनेश्वरसूरि के प्रवल पांडित्य और उत्कृष्ट की परम्परा के सुविहित विधि (पक्ष) मार्ग के चरित्र का प्रभाव न केवल उनके शिष्य समूह मे समस्त साधु समुदाय खरतरगच्छ हो गया और ही प्रचलित हुआ अपितु तत्कालीन अन्यान्य गच्छ इसी नाम से प्रसिद्ध हुआ । एव यति समुदाय के भी व्यक्तियो ने इनके अनु- चैत्यवासियों से शास्त्रार्थ मे विजय प्राप्त सरण मे क्रियोद्धार और ज्ञानोपासना आदि की करने से प्राचार्य जिनेश्वरसूरि का नाम पाटन मे विशिष्ट प्रवृत्ति का बड़े उत्साह के साथ उत्तम ही नहीं सारे गुजरात, मारवाड़, मेवाड़, मालवा, अनुसरण किया । जिनेश्वरसूरि के जीवन कार्य से सिंध आदि प्रदेशो में प्रख्यात हो गया। अव तो इस युग परिवर्तन को सुनिश्चित स्वरूप दिया । अनेक चैत्यवासी यतिजनों ने चैत्यवास को त्याग तब से लेकर पिछले नव सौ वर्षो मे इस पश्चिम कर क्रियोद्धार किया । वे सयमी और त्यागी साधु भारत में जैन धर्म का जो साम्प्रदायिक स्वरूप वन आपके शिष्य हो गये। सैकड़ो लोग आपके प्रवाहित रहा, उसके मूल में जिनेश्वर सूरि का व्यक्तित्व एवं उपदेशो से प्रतिबोध पाकर जैन बने । जीवन सब से अधिक विशिष्ट प्रभाव रखता है। मन्दिरो की व्यवस्था मे पूजा पद्धतियो मे शास्त्रा- इस दृष्टि से जिनेश्वरसूरि को जो उनके पिछले नुकूल परिवर्तन हुए । सचमुच उस समय जैन धर्म शिष्यों ने युग प्रधान पद से सम्बोधित किया है को पतन के गर्त से बचाने तथा प्राचीन श्रमरण वह सर्वथा ही सत्य वस्तु का निर्देशक है ।" सस्कृति एव परम्परा के प्राचार की प्रतिष्ठापना निस्सन्देह जिनेश्वरसूरि और उनके शिष्य करने का प्रभावशाली कार्य करने के लिए प्राचार्य समुदाय ने चैत्यवासी परम्परा का उन्मूलन कर जिनेश्वरसूरि का चैत्यवासियो से लोहा लेना नये विधि चैत्यों की स्थापना करके श्वेताम्बर जैन कितना साहसिक कार्य था । वह तात्कालिक स्थिति समाज में एक नये युग का प्रारम्भ किया । यदि व वातावरण का अध्ययन करने पर ही अनुभव वे उस समय ऐसा नहीं करते तो आज हमारे ये किया जा सकता है। जैन मन्दिर भोग विलास के मठ और महल बन 1. कुवलयमाला प्रशस्ति व प्रभाविक चरित्र आदि प्रवन्ध ग्रों के अध्ययन से पता चलता है कि उस समय चैत्यवासियो का वर्चस्व कैसा था । 1 43 की। जाते । ये जैन साधु अय धर्म के साघुप्रो को भांति जिनेश्वरसूरि को महान् सेवाग्रो पर विचार मदिरो के मठाधीश होते । ये धम स्यान, धम साधना करने के साथ-साथ यह समीचीन होगा कि जिने- के स्थान न रहकर भ्रष्टाचार के गढ हो जाते। श्वर सूरि के गुरु बद्ध मान सूरि और उनकी शिप्य मदिरो की प्राय और अन्य करोडो रुपयो की परम्परा के जिनचन्द्र सूरि, नवागी टीकाकार अभय- सम्पत्ति इन मठाधीशो के सुख सुविधा और देव सूरि, जिनवल्लभ सूरि जिनदत्तसूरि, मणिधारी भोग विलास मे खच होती। सचमुच खरतरगच्छ जिनचन्द्र सूरि, पटत्रिशद वाद विजेता युगप्रवरा- के प्राचार्यों ने उस समय नये युग का प्रारम्भ गम जिनपति सूरि, जिनकुशल सूरि, जिनभद्र सूरि, कर जन घम और जैन सस्कृति की महान् सेवा जिनचन्द्र सूरियादि कुछ विद्वान् और प्रभाविक प्राचार्यों के सम्बन्ध मे कुछ प्रकाश डाला जाय । प्राज श्वेताम्बर जैन सघ मे जो परम्पराएं कारण इन आचार्यों ने भी चैत्यवासी विकृतियो और प्रणालिकाएँ प्रचलित हैं उसका बहुत कुछ को दूर करके जैन श्रमण सस्था को सयमशील श्रेय इन सरतरगच्छीप प्राचार्यों और मुनियो को बनाने मे तथा नये नये जैन बनाकर अोमवाल, ही प्राप्त है। इस सम्बघ में मुनि जिनविजयजी श्रीमाल, महितमयाण आदि जैन जातियो के विकास पट्टावली मग्रह के सम्पादकीय मे लिखते है- में उल्लेखनीय योगदान दिया है। "श्वेताम्बर जैन सघ जिस स्वरूप में आज इन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, महेश्वरी, कायस्थ विद्यमान है । उस स्वरूप के निर्माण में खरतरगच्छ आदि जाति के लोगो को प्रतिवोध देकर जैन धम के आचाय, मुनि, यति और श्रावक समूह का बहुत मे सम्मिलित कर उनका परस्पर रोटी बेटी व्यवहार बड़ा हिस्सा है। एक तपागच्छ को छोडकर कोई प्रारम्भ कराया जो जैन धर्म के लिए ही नहीं भी दूसरा गच्छ इसके गौरव की बराबरी नहीं बल्कि भारत देश के लिए भी एक अद्भुत एव कर सकता । कई बातो मे तो इस गच्छ का प्रभाव अनुकर तपागच्छ से भी विशेष गौरवान्वित है। भारत के प्राचीन गौरव को अक्षुण्ण रखने वाली राजपुताने बद्ध मान सूरि- समय की वीर भूमि का पिछले एक हजार वर्ष का इतिहास स 1000 से लेकर 1088 तक माना जाता है। पोसवाल जाति के शौर्य, प्रौदाय, बुद्धि चातुय आपका प्रतिमालेख कटि ग्राम में स 1045 का और वाणिज्य आदि महद गुणो से प्रदीप्त है और मिला है। आप खरतर विरुद प्राप्तकर्ता आचाय उन गुणो का जो विकास इस जाति में इस प्रकार जिनेश्वर सूरि के गुरू थे। आपने स० 1026 में हुआ, वह मुख्यतया खरतरगच्छ के प्रभावान्वित मूल मचेती 1072 मे लोढा और पीपाडा गोत्र की पुरषो के सदुपदेश तथा शुभाशीर्वाद का ही फल स्थापना की। है। इसलिए खरतरगच्छ का उज्ज्वल इतिहास जिनेश्वर सूरि- -प्रापका समय म० 1051 से यह केवल जैन सघ के इतिहास का ही एक महत्त्व 1111 तक माना जाता है । आपने 1066/74 में पूर्ण प्रकरण नहीं है बल्कि समग्र राजपुताने के खरतर विरुद प्राप्त किया। तभी से आपकी इतिहास का एक विशेष प्रकरण है।" परम्परा के सुविहित विधि पक्ष के समस्त साधु प्रोसवाल जाति का विकास एव जिनेश्वरसूरि समुदाय खरतरगच्छ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। और उनकी शिष्य परम्परा इसके पूर्व प्रापका गच्छ चद्र गच्छ था। आपने 1 पट्टावली सग्रह-मुनि जिनविजय । काय था। :-पापका लगभग । 44 श्री पति ढढा, तिलौरा, चील महता (भरणसाली) वल्लभ सूरि के पट्ट पर बिठाया गया । आप में एक आदि गोत्रो की स्थापना की। असाधारण संगठन और निर्माण शक्ति थी। उत्कृष्ट आपने हरिभद्र सूरि कृत अष्टक वृत्ति, प्रभा- चरित्र, विशिष्ठ ज्ञान, प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं लक्ष्य सवृति, कथा कोष, षट स्थानक प्रकरण आदि अद्भुत चमत्कारों के प्रभाव से आपने एक लाख की रचना की। तीस हजार नूतन जैन बनाए । आपके बनाए स्तोत्र जिनचन्द्र सूरि-आप जिनेश्वर सूरि के पट्ट स्तव आदि द्वारा भूत, प्रेत, विष, रोग आदि दूर पर थे । आपने सं. 1125 में अठारह हजार श्लोक हो जाते थे ! आप आज भी एक चमत्कारी पुरुप परिमित संवेग रंगशाला की रचना की। अापने के रूप में पूजे जाते है। देश के हर क्षेत्र के नगरों महितयाण और श्रीमाल जाति को पुनः प्रतिबोध और गाँवों मे आपकी स्मृति को ताजी रखने के दे ,जैन बनाया। आपके पट्ट पर आपके गुरुभाई लिए दादाबाड़ियों का निर्माण किया गया है नवांगी टीकाकार अभयदेव सूरि बैठे । जहां आपकी मूर्तियां व चरणपादुकाएँ पूजी जाती है । जो आपके प्रति अपूर्व श्रद्धा व कृतज्ञता के प्रतीक अभयदेव सूरि--आप आचार्य जिनचन्द्र सूरि के है। कुछ एक कट्टरपथी व्यक्तियों को छोड़ सभी पट्ट पर हुए। आपका जन्म स. 1072, आचार्य पद गच्छ और सम्प्रदाय के लोग आपके प्रति पूर्ण स 1088 और स्वर्गवास सं. 1135 मे हुआ। आप श्रद्धा और भक्ति रखते हैं। आपने मारवाड़, सिंध आगमज्ञ और धुरन्धर विद्वान् थे। आपकी लिखी पंजाब आदि प्रदेशों में विहार कर भिन्न-भिन्न समय नवांगी टीकामों को सभी गच्छ और पक्ष के लोग भिन्न-भिन्न गोत्रो की स्थापना की जिसका ब्योरा स्वीकार करते है। आपने नये जैन बनाकर खेतसी, इस प्रकार है- पगारिया और मेड़तवाल गोत्रों की स्थापना की। आपने दुबड़ों को प्रतिबोध देकर जैन बनाया । सं. 1165 में धाड़ेवा, पाटेवा, टाटिया, कोठारी जिनबल्लभ सूरि-आप नवांगी टीकाकार अभयदेव सं. 1175 में बोरड, खीमसरा, समदरिया के पट्ट पर मनोनीत किये गये । आपने भी अनेक सं. 1176 में कटोतिया स्थानो पर विधि चैत्यों की स्थापना की। अापकी सं. 1181 में रत्नपुरा कटारिया, ललवानी, डागा, विशेप आवश्यक टीका संघ पट्टक आदि पचासों मालू, भाभू आदि कई गोत्र प्राकृत व संस्कृत में लिखी रचनाएं प्राप्त हैं। सं. 1185 में सेठी. सेठिया, राका, धोका, बांका बागड क्षेत्र मे विचरण कर आपने अनेक लोगों को प्रतिबोध देकर जैन बनाया। सं. 1142 में सं. 1187 में शेखलेचा, पुगलिया, राखेचा कांकरिया सं. 1156 मे चोपड़ा, बड़ेर, साँड सं. 1192 में चोरडिया. सावनसुखा, गोलेछा, स. 1164 मे सिंघी तथा 1167 में बंठिया, लाल- लूणिया आदि वानी, वरमेचा, हरखावत, मल्लावत, साह, सोलंकी सं. 1197 ये सोनी, पीतलिया, बोहित्थरा आदि गोत्रों की स्थापना की। सं. 1198 में आयरिया, लूनावत, बापना आदि जिनदत्त सूरि-आपको सं. 1169 में जिन- सं. 1196 में भंसालिया, चंडालिया 1. ओसवाल जाति के इतिहास से । 2. पोसवाल जाति के इतिहास से । 3. वागड़ क्षेत्र डूगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ व पिलानी के आसपास का क्षेत्र भी कहलाता था। 4. प्रोसवाल जाति के इतिहास से । 45 स 1201 में आवेडा, खटोल जिनप्रभ सूरि--अापने मोहम्मद तुगलक का स 1202 मे गडवाणी, भडगतिया, पोकरण आदि प्रभावत किया। आपने भी प्रतिबोध देकर नए मणिधारी जिनचन्द्र सूरि- जन बनाये। आपने कल्पसूत्र की सर्वप्रथम टीका रची। आपकी भव्य मूर्ति शत्रुञ्जय पर खरतर स 1211 मे आप आचाय जिनदत्त सूरि के वसहि में स्थापित है। पट्ट पर मनोनीत किए गए। आप भी एक चमत्कारी जिनभद्र सूरि- पुरुष के रूप मे दूसरे दादा साहब के नाम से पूजे जाते हैं। ओसवाल जाति के विस्तार मे आपका आपने जैसलमेर, कर्णावती, खभात, नागोर भी बड़ा योगदान रहा । आपने निम्न गोत्रो की पाटन, जालोर, मांडवगढ आदि अनेक स्थानों पर स्थापना की। ज्ञान भडारो कोस्थापना की । जैसलमेर का जिनभद्र स 1214 मे यापरिया सूरि ज्ञान भडार आज भी देश-विदेश के विद्वानो स 1215 मे छाजेड का आकर्षण केन्द्र है। आपके उपदेश से गिरनार स 1215 मे मिनी, खजाची, मू गडी, श्री श्रीमाल चित्तौड, मडोर, जैसलमेर प्रादि अनेक स्यानो पर स 1217 में सालेचा, दूगड-सूगड, शेखाणी मदिरो का निर्माण हुआ। आपने संवडो जिन कोठारी, पालावत, पालावत आदि। विम्बो की अजनशालाका और उनकी प्रतिष्ठाएं कराई। जिनकुशल सूरि-- जिनचन्द्र सूरि- मारवाड के सिवाना मे छाजेड कुल में प्रापका जन्म स 1595 में पोसिया के पास 1330 मे आपका जम हुमा । 1377 में आप प्राचाय बने । अाप तीसरे प्रक्ट खेतासर नामक गाव में प्रोसवाल वश के रीहड प्रभावी दादा साहब के नाम से प्रसिद्ध हैं । आप ने गोत्र मे हुआ था। आप बादशाह अकवर प्रति- जिनदत्त सूरि कृत चैत्यवन्दन कुलक नामक 27 वोधर के रूप में प्रसिद्ध हैं। आपको बादशाह गाया की लघु रचना पर चार हजार श्लोक परि- अक्वर ने युग प्रधान पद प्रदान किया था। मित टीका की रचना की जो आपकी विद्वता की आपसे बादशाह अकवर इतना अधिक प्रभावित था परिचायक है । आपने पाटन में साह, तेजपाल से कि उसने अपनी पोती (जहागीर की पुत्री) नदी महोत्सव कराया जिसमें 2400 साधु साध्वी का जन्म मूल नक्षत्र में होने के कारण उसे अनिष्ट. अापके नाय थे । स 1380 में साह तेजपाल ने शत्रु- से अष्टोत्तरी स्नान कराने की प्राज्ञा दी। सम्राट कारक मान इस दोप की शाति के लिए जैन विधि जय का सघ आपके मानिध्य में निकाला। इसमे 1305 साधु-साध्वी थे। आपने प्रतिवोध देकर की प्राज्ञानुसार लाहोर के सुपार्श्वनाथजी के मदिर 50,000 नूतन जैन बनाए । अाप द्वारा स्थापित मे यह शातिस्नात्र महोत्सव मनी कमचन्द नै सम्पन निम्न गोत्र हैं कराया। मगलदीप और भारती के समय स्वय बावेला, सघवी, जडिया, डागा आदि 21 सम्राट अकबर का पुत्र सलीम (जहाँगीर) अनेक सेवको के साथ उपस्थित हुआ। दस हजार रुपये शाखाए। भगवान के सम्मुख भेंट किए। भगवान के स्नान स 1 प्रोसवाल जाति व महाजन वश मुक्तावली से । 2 ओसवाल जाति व महाजन वश मुक्तावली से । 3 देसो मनी कमचद वश प्रवध वृत्ति स 1650 मे लिखित तथा जय सोमजी कृत प्रश्नोत्तर प्रथ मे । 46 " जल को अपने दोनों नेत्रों पर लगाया। अन्तःपुर पर्वी आश्री जिम श्री पूज्य आसि (आदेश) ते में भी उस स्नात्र जल को भेजा। प्रमाण ॥छ।। चतुर्विध संघनी आसातना कीधी हुई मुसलमान होते हुए भी जैन विधि से जैना- ते मिच्छामि दुक्कडम् । आज पछी पांचना चैत्य चार्यों के सान्निध्य मे शांति स्नात्र कराना अकबर बांधवा ॥ तिरवाड़ा माहि श्री पूज्य परम गुरू का प्राचार्य जिनचन्द्र सूरि एवं जैन धर्म के श्री विजयदान सूरि नई “मिच्छामि दुक्कडम्" ।। प्रति अनुराग एवं भक्ति का प्रतीक है । दीघउ छई संघ समक्ष ए वोले आ श्री जीणई आपके उपदेश से अकबर ने जीव हिंसा रोकने खोटो सद्दह्यउ, हवई ते मिच्छामि दुक्कड़म्" व तीर्थ रक्षा हेतु कई फरमान निकाले जो फारसी देज्यो ।। छ । मे है । ये सरस्वती पत्रिका के स. 1912 जून मास के अक में प्रकाशित हो चुके है । इस प्रकार आचार्य जिनचन्द्र सूरि के प्रभाव- शाली महान व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि सभी सं. 1617 मे आपका चतुर्मास पाटन में गच्छ के प्राचार्यों ने प्रस्ताव स्वीकार कर धर्म- था । इस चतुर्मास मे आपने तपागच्छीय उ० सागरजी के मिथ्या प्रलापी घासलेटी रचनाओं को धर्मसागरजी द्वारा लिखित प्रवचन परीक्षा कुमति जलशरण कराया। उनके संघ से बहिष्कृत कर मत कुदाल, तत्वतरंगिणी ग्रंथों के विरुद्ध जनमत अन्त में उनसे मिच्छामि दुक्कडम् का पत्र लिखवा- तैयार किया। इसके फलस्वरूप सभी गच्छों के कर उनसे क्षमा याचना कराई। यह कार्य कर आचार्यों ने इन ग्रंथों को जल शरण कराया । आचार्य जिनचन्द्र सूरि ने खरतरगच्छ ही नहीं धर्मसागरजी को उत्सूत्र प्ररूपणा के कारण सघ से वरन् अन्यान्य सभी गच्छों की अमूल्य सेवा की है । बहिष्कृत किया। अन्त में धर्मसागरजी ने क्षमा याचना की। देखिये उनका स्वयं का लिखा पत्र इस प्रकार जिनेश्वर सूरि की परम्परा के खरतर जो जैन युग वर्ष 5 पृष्ठ 483 में छपा है धर्म- गच्छीय प्राचार्यो ने उस समय जैन समाज में प्रचलित सागरजी द्वारा लिखित मिच्छामि दुक्कड़म पत्र-4 बुराइयों एवं शीतलाचार के विरुद्ध वडी दृढता के स्वस्ती श्री शांती जिन प्रणम्य तिरवाड़ा साथ आंदोलन का संचालन किया। उन्होने गांव- नगरतः परम गुरू श्री विजयदान सूरि सेवी उ० गांव मे विहार कर अपने उच्च त्याग कठोर तप, धर्मसागर गणि लिखति । समस्त नगर साधु साध्वी प्रभावशाली प्रवचनों और चमत्कारों के माध्यम से श्रावक-श्राविका योग्य म । आज पछी अमे पांच समस्त जैन समाज को अपनी ओर आकृष्ट किया । निन्हव न कहउ पांच निन्हव कह्या हुई ते मिच्छामि उन्होंने गाँव और नगर, राजा और प्रजा, गरीब दुक्कड़म उत्सूत्र कंद कुदाल ग्रंथ न सद्दहउ पूर्वइ और अमीर सभी वर्ग के लोगों में जैन धर्म के सद्दह्यउ हुई ते मिच्छामि दुक्कडम । षटपर्ती चतुः सच्चे स्वरूप के प्रति चेतना जागृत की। 1. देखो युग प्रधान जिनचन्द्र सूरि प्रतिबोध रास व कवि ऋषभदास कृत हीर विजय सूरि रास । 2. ये फरमान फारसी में हैं जिनका अनुवाद मुशी देवीप्रसाद जोधपुर निवासी ने किया है । फरमान की मूल प्रति लखनऊ के खरतरगच्छ भंडार मे मौजूद है। 3. उस समय जो प्रस्ताव स्वीकृत हुआ उसके नीचे 32 गच्छों के प्रतिनिधि आचार्यों व साधुओं के हस्ताक्षर है। 4. यह पत्र मुनि श्री दर्शनविजयजी द्वारा संपादित पट्टावली समुचय से उद्धृत किया गया है । 47 बाड़मेर से पालीतारणा पैदल यात्रा संघ कार्यक्रम-31 जनवरी, 80 से 24 मार्च, 1980 (माह सुद पूर्णिमा 2036 से चैत्र सुद अष्टमी 2036 तक) प्रम स० तारीख मिती वार 1 माह सुदी 15 फागरण वदी 1 2 के सामन 3 31-1-80 1-2-80 2-2-80 3-2-80 4-2-80 गुरुवार शुक्रवार शनिवार रविवार सोमवार 4 2 5 3 6 4 5-2-80 6-2-80 7-2-80 " 7 8 5 मगलवार युधवार गुरुवार 6 9 7 10 11 12 " यहा से पहा तक पि०मी० स्थान बाडमेर से सेतजी प्याऊ 14 सेतजी प्याक के पास खेतजी प्याक से सनावडा 14 स्कूल समावहा से बाछडाक 11 स्कूल के पीछे वायडाक से पतरियो को बेरी 14 स्यूल व कुए के पाम सतरियो की देरी से धोरीमन्ना 12 प्रा पाठशाला के पास धोरीमन्ना से पोठाला 14 वाये की भूपी के सामने कोठाला से रामजी गोन 11 पारसमल जैन दुकान रामजी गोल से गायव 11 नार मिधी/भवरलाल पुगलिया का पट्रोल पम्प गाधव से भोटडा 15 स्यून के पास झोटडा से साचोर 15 हाईस्कूल मैदान साचोर से खोडा 11 क्लवी उमा वा खेत 13 स्कूल का मैदान पीलूडा से दूधवा 9 गाव के कुए के पास दूधवा से थराद 14 राजेद्रसूरी सोसायटी थराद से ढीमा 12 हाईस्कूल मैदान ढीमा से भोरोन 11 गाव के पास मैदान भोरोल से ढीमा 11 हाईस्कूल मैदान 11 जनवाडी में वाव से भाटवर 13 प्रजापति मोती का खेत माटवर से सुईगाव 17 भाभर सडक पर सुईगाव से उचोसर 12 रमजान खो बाबू का खेत उचोसर से भाभर 15 जैन वोडिंग जैन सोसायटी भाभर से देव 16 माताजी मन्दिर के पास 14 मसाली चेरि ट्रस्ट मैदान राधनपुर से बास्या 14 डाक वगले के सामने वास्या से सभी 10 अब्दुल अलावक्म फ्वट्री खोडा से पीलूडा 13 14 " 15 " 16 " 8-2-80 9-2-80 10-2-80 11-2-80 12-2-80 13-2-80 14-2-80 15-2-80 16-2-80 17-2-80 18-2--80 19-2-80 20-2-80 21-2-80 22-2-80 23-2-80 24-2-80 25-2-80 17 18 शुक्रवार 8 शनिवार 9 रविवार 10 सोमवार 11 मगलवार 12 बुधवार 13 गुरुवार 14 शुक्रवार 15 शनिवार फागण सुदी 1 रविवार 2 सोमवार 4 मंगलवार 5 बुधवार 6 गुरुवार 7 शुक्रवार 8 शनिवार 9 रविवार 10 सोमवार ढीमा से वाव 19 " 20 " 21 " 22 " 23 24 देव से राधनपुर 25 26 48 .6--2-80 फागण सुदी 11 मंगलवार समी से चन्दूर 10 सरपंच लक्ष्मणभाई रामसिह का खेत 7-2-80 12 चन्दूर से शंखेश्वर 11 बस स्टेण्ड के सामने 28-2-80 13 19--2-80 14 .... 1-3-80 15 बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार रविवार सोमवार मंगलवार .... 2-3-80 चैत्र वदी 1 3-3-80 2 4-3-80 3 शखेश्वर तीर्थ दर्शन शंखेश्वर शंखेश्वर से दसाड़ा दसाड़ा से पाटरी पाटरी से उपरियाली उपरियाली से फूलकी फूलकी से वीरमगांव वीरमगाव से वीठलपारा वीठलपारा से प्रोलक अोलक से कोठारिया कोठारिया से लखतर 5-3-80 3 4 6-3-80 7-3-80 .... ; " 14 15 कच्चा हाईस्कूल मैदान 15 जैन धर्मशाला 11 गाव के बाहर 12 हाईस्कूल मैदान 16 सड़क के जीवने 16 अोलक से पहले 14 सड़क के किनारे 14 सियारणी दरवाजा जैन सोसायटी मैदान 10 सडक किनारे तालाब के बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार रविवार 5 8-3-80 " 6 9-3-80 7 10-3-80 8 सोमवार लखतर से देवलिया पास 11-3-80 " .... 9 14 मंगलवार बुधवार देवलिया से सियाणी सियाणी से लीम्बड़ी गांव के किनारे जगतनाथ स्वामी आश्रम 12-3-80 . 10 15 के पास 13-3-80 " " 14-3-80 15-3-80 16-3-80 11 गुरुवार 13 शुक्रवार 14 शनिवार ..... " ....अमावस रविवार सोमवार 2 मंगलवार 3 वृधवार लीम्बड़ी से चांचाणा चांचाणा से धधूका धंधूका से भीमनाथ भीमनाथ से बरवाल वरवाल से मूलधराई मूलधराई से वल्लभीपुर वल्लभीपुर से धांधली 16 धधूका 15 कि. मी. वोर्ड 15 गनी भाई का खेत 17 डाक बगले के सामने 14 वरवाल से आगे चूनाभटा 13 नरसीभाई जीवाभाई खेत 14 सड़क पर जैन मन्दिर 15 स्कूल के पास पटेल बच्चूभा चैत्र सुदी 1 17-3-80 18-3-80 19-3-80 ... का खेत 20-3-80 4 गुरुवार 21-3-80 5 .... 22-3-80 6 घावली से सिहोर 7 गांव के बाहर मैदान जैन वोडिग सिहोर से पालीताणा मार्ग खेत 11 कुए व खेत के पास पालीताणा खेत से पालीताणा 12 पालीताणा गुरुकुल पालीताणा गुरुकुल से पालीताणा नगर प्रवेश पालीतारणा शिखर यात्रा शिखर यात्रा एवं संघपति माल महोत्सव शुक्रवार शनिवार रविवार सोमवार 23-3-80 7 24-3-80 8 49 Jainism and Modern Jainies Arya Vishalprabha Shree "O I most merciful Bhagwan Mahavir, Thou art universal light Who illuminated the world on, What is wrong and right?" errors victor of internal enemies, opener of VISION of immense knowledge teacher of doctrine of liberty and perfect man of all the virtues חו The Jainism is the most ancient religion in the world and Jainism is developed by Bhagwan Mahavir There are the social virtue and secular value the Jainism Take great principle of Ahimsa which means nonviolence is not a negative virtue but positive doctrine of universal love and peace Peace is ever beautiful A man who is really brave man can possess this excellent virtue or this doctrine of non violence 1S the symbol of the brave man The non violence 15 a principle of universal love for the single purpose of transforming human nature from the animal plane into the spiritual plane Bhagwan Mahavir preached us that conquer - the Internal enemies like anger, pride delusion, greed and materialism to obtain forgiveness, humility, frankness and contentment If you want to fight fight with yourself or internal enemies Why do you fight the external foes ? many of Lord Mahavir did not come in the world as a creator but indicator Now-a-days us have forgotten the rich and true inheritance that we are born with as the followers of Lord Mahavir May we venture to introduce ourselves as true and real Jainies ? It is a critical question in front of us During the daily life many of us pray that We always worship Lord Mahavir as the free man from the 50 "I forgive all creatures, let all creatures forgive me; I have affection for all (moving and unmoving) living being and enemity towards none." ocean of Jainism and true knowledge. It is a tragedy that we are fond of pictures and novels so we are careless of good literature, It is true........as Without realization, nobody may be free from errors. Really, success comes to those who dare and act, but it goes seldom to timid. It is true that, "A man of words and not of deeds, is like a garden full of weeds." "Like seed, Like fruit (similarly) Like reading, Like life." Let us follow the practical path which is shown to us by Bhagwan Mahavir and make ourselves worthy of his true inheritance or make ourselves to call the real and true Jainies. Let us try to spread the flag of non-violence and truth among the people. In last I heartly pray........ A long life may not be enough, but a good life may be enough. So it is our first duty to make the good use of our life. We must dip into the O ! God teach to me to be peaceful. O ! God teach to me to be bearable; O ! God teach to me to be merciful, O ! God teach to me to be servicable........ lan 5 - आवक के ग्यारह कर्तव्य एव .री पालित यात्रा सघ -ले. हीराचन्द बंद, जयपुर -uA जैन शासन में पर्वाधिराज पयु पण या पालित मध यात्रामा या प्रायोजन करते थे। अत्यधिक महत्व है। वप ये बाकी दिनों जो व्यक्ति हजारो की सस्या में यात्रिय इन में जुड़ते थे, ज्ञानी पाराधना न कर सकें वे भी पर्व ये पाठ दिनों मे गुरु भगवतों को निश्रा प्राप्त होती थी। जिनेश्वर अवश्य ही धममय जीवन जीने की भावना रखते भगवत की प्रतिमायें भव्य रथो में विराजमान हैं। पर्व के प्रारम्भिक व्याख्यानो मे श्रावक ये होती थी। जहाँ सप ठहरता, यहाँ नगर बस जाता ग्यारह प्रावश्यक फतव्यो या विवेचन होता है। था। माग के स्थानीय संघो को भक्ति का पुनीत उन प्रत्येक कतव्यो का पालन धावक को वप मे अवसर प्राप्त होता था । यात्रा में माने वाले कम से कम एक बार अवश्यमव करना ही चाहिये । देवस्यानो, उपाश्रयो की स्थिति ठीक न होने पर यदि पव की माराधना शुद्ध भाव से की जावे तो उनके जीर्णोद्धार का लक्ष्य रहता था, इससे शासन वे पव माशीर्वाद रूप बन जाते हैं। इन ग्यारह की वही प्रभावना होती थी। इस तरह की सप कतव्या का बोध होने पर हरेक को करने की यात्रा छ री पालित यात्रा कही जाती है क्योकि भावना तो होती है पर जैसे ही पव के प्रायोजन इसमे शामिल होने वाले प्रत्येक यात्री को छ री का समाप्त होते हैं वह फिर ससार की भूल भूलया पालन परला आवश्यक है । ६ नियमो का पालन मे अपने इन क्तव्यों को विस्मृत कर देता है। जिनका अन्तिम शब्द री' है कारण यह छ री फिर भी उसकी यह भावना रहती है कि यदि थोडे पालित कहा जाता है। समय में एक साथ इन क्तव्यों का पालन कर सकू १ भूमिसथारी -प्रत्येक यात्री को भूमि ता ठीक रहे। ज्ञानी भगवतो ने हर प्रश्न और पर अपना सधारा पिछा पर ही शयन करना होता परिस्थिति का समाधान किया है। तीसरा क्तव्य है। बतलाया है तीथ यात्रा और यदि श्रावक चाहे तो २ नारी सग परिहारी न्याना मे स्व नारी इस कतव्य के पालन में वापी के १० पर्तव्यो को का सग भी निषेध होता है ग्रह्मचर्य का पालन समाहित कर सकता है। तीथ यात्रा सी हो ? होता है। यह विचारणीय प्रश्न है। इन क्तव्यो का उल्लेख ३ सचित परिहारी जीव युक्त वस्तु के करते वक्त शायद प्राज सदृश्य साधन उपलब्ध नही उपयोग का त्याग किया जाता है । वनस्पति भादि थे। उस युग मे अकेले या अपने परिवार सहित का प्रग्नि से परिपक्क बनाकर ही उपयोग किया पात्रा करना सुगम नहीं था। अत सम्पन्न व भावना जाता है । फनादि का रस भी ४८ मिनिट के बाद शील व्यक्ति स्वय मात्रा करने का भाव होने पर छ री प्रचित होने पर ही लिया जा सकता है। इससे 52 --- N IANAMAN- I . Var AMVP IMACHI । ०००० " 44 - B M.36 5 COLA PRITHILI WITH Mu , -- re. -- । E MA -- -- । TH SEE :- PAN UNTH HHHH wrimitinyitluntri MirgamniaTRA MAINARIRTHA " IPIM Simil SHRA %3D%3D -rearrant आचार्य श्री जिनहरिसागर सूरीश्वरजी की मुंह बोलती प्रतिमा के पास पूज्य गुरुदेव, मुनि मणिप्रभसागरजी व जयपुर के श्री हीराचन्द वैद . r x mpMROR . in/ . htrian formayan - Kummargnen ne Anita Virabia - । पूज्य गुरुदेव श्री नन्दि में भगवान के ऊपर अभिमन्तित बासक्षेप डाल रहे हैं। Labe 440 4. *HARMAT HANN mestnanca.
-------- ma श्री शाति विजय ज्ञानपीठ क श्री मलय दजी वाथरा सधपति श्री भवरलालजी वाहरा का अभिनन्दन-पत्र भेट करते हुये- श्री विमलनाथ जैन सेवा मण्डल आहोर (राजस्थान) WHATRA- -- fr । , M For ध्यान एकाग्रता main - Arranimun चितन । m wasakar Hair Trisht vor avea West ३ विशाल जन समुदाय के समक्ष प्रवचन करते हुये- - आर्या श्री विद्युत प्रमा श्रीजी क AN पूज्य गुरुने मुनिमण्डल के साथ- V . 14 । HA * + . सेवा * -- अनुभूति एवं कर्तव्य-निष्ठा - । म HEL । - । पालीता प्रवन्न पर पूज्य गुरुदय साहित्य कला प्रमी पूज्य आवाय दव श्री विजय यनोदय सूरीश्वरजी म के साथ नाकोडा उपधान तप स्मारिका भेंट सम्पादक श्री हीरावर वेद, जय . सधपति श्री कमलसिंहजी दुघाडिया का पुष्पाहार पहिात हुय- हरि विहार क माद मती श्री नातिलालजी पारख , वक्त भोजन स्वाद त्याग व हिंसा त्याग का भाव जागृत होता विराजित भद्रबाहु को पाटलीपुत्र के संघ के आदेश है। अतः यात्रा काल में सचित वस्तु का त्याग की अवहेलना का प्रायश्चित करना पड़ा, संघ को होता है। पूजनीय बतलाया । यात्रा संघ के समय इस कर्तव्य ४. एकल पाहारी :--एक का पालन सहज है। अपनी भावना और स्थिति यानी, ऐकासना, गरम पानी का उपयोग तो करना के अनुकूल ऐसे तपस्वी संघ का बहुमान कर प्रथम ही होगा। उनोदरी तप का भी लाभ मिलेगा ही। कर्तव्य का पालन किया जा सकता है। इससे धर्म आराधना में विशेष स्फूर्ति रहती है। दूसरा कर्तव्य साधर्मी भक्ति :-साधर्मी जैन शासन का 'डेम' है । यदि वह समृद्ध है तो सातो ५. पादचारी :- वाहन का उपयोग किये वगैर पैदल चलना आवश्यक है। पैदल चलते वक्त क्षेत्र समृद्ध बनेगे। साधनहीन साधर्मी अपने को अपनी दृष्टि सड़क पर साढे तीन हाथ तक रखनी जागृत करता है यह भावना हमारे दिल में पानी चाहिये । हेमचद्राचार्य ने कुमारपाल को साधर्मी ही चाहिये जिससे जीवों की जयणा हो सके । भक्ति के लिये अनूठी प्रेरणा दी। उन्होने बतलाया ६. पावश्यकारी :-श्रावक के प्रावश्यक भूख मानव की सबसे बडी पीडा है । भू-पृथ्वी और कर्तव्यों का पालन करना जरूरी है । दोनों समय ख-पाकाश, अर्थात् आकाश पाताल एक हो जावे प्रतिक्रमण दिन भर मे हुई गलतियों का परिमार्जन् । उसी का नाम भूख है । और साधर्मी इस भूख प्रभु की पूजा अादि कर्तव्यों का पालन करने से की पीडा से व्यथित रहे तो मानों हमसे ज्यादा चित्त में प्रसन्नता व्याप्त रहती है । कर्तव्यच्युत कोई है नही । साधर्मी भक्ति से ही इस प्रकार छै री का पालन करते हुये संघ या तीर्थकर व गणधर गोत्र बाधा जाता है । प्रसन्नता यात्रायें की जाती है। यह प्रथा आज भी चालू है । से की गई सार्मिक भक्ति का दान गुणाकार बन यद्यपि आवागमन के साधन अत्यधिक सुलभ हो जाता है एव दान देकर दुःखित होने पर भागाकार गये है, फिर भी जैन शासन की बलिहारी है कि बन जाता है । पैसा पाप का मूल है पर भाव पूर्वक आज भी छैःरी पालित संघों के भव्य आयोजन उदारता से व्यय करने पर वह पुण्य सर्जन का कर पुण्यशाली जैन शासन की महिमा को बढ़ा रहे निमित्त बन जाता है । तीर्थ यात्रा मे साधर्मी भक्ति हैं, अपनी लक्ष्मी का सद्व्यय कर रहे है तथा का अनूठा लाभ प्राप्त हो सकता है। यात्रा में सार्मिकों को धर्म मार्ग मे जोड़ कर लाभान्वित हो साथ चलने वाले श्रावक श्राविकाओं की भक्ति के रहे है। साथ मार्ग में आने वाले स्थानों मे रहने वाले साधन- हम पुनः अपने मूल विषय पर आवे कि इस हीन भाई-बहिनों की भक्ति का महान् लाभ अजित तीर्थ यात्रा के माध्यम से हम श्रावक के पु:नीत किया जा सकता है । ११ कर्तव्यों का पालन एक साथ कर सकते है । तीसरा कर्तव्य तीर्थ यात्रा :-तीर्थ यात्रा यदि प्रथम कर्तव्य है संघ सत्कार :-यह सघ पिकनिक न बने तो प्रभु तक पहुँचने का सरलाति- उपकारी है. संसार से तरने का साधन है । संघ सरल मार्ग है । स्थान-स्थान पर स्थित तीर्थो-मदिरो भी उपेक्षा को तीर्थंकरों की उपेक्षा कहा गया है । के दर्शन से महान् लाभ, जगह-जगह के संघो व तीर्थकर भी संघ को नमस्कार करते है, साधना सार्मिको की भक्ति का सु-अवसर, मार्ग के स्थानो का आधार साधर्मी को मानते है तथा प्रासन पर पर विराजने वाले श्रमण भगवंतों के दर्शन, यात्रा बैठते वक्त 'नमोतिथ्यस' कहते है। वस्तूपाल तेज- के नियमो को पालकर संयम मार्ग पर चलने की पाल की संघ भक्ति कौन नहीं जानता ? नेपाल में भव्य प्रेरणा, और फिर तीर्थ यात्रा के माध्यम से 53 धावक के ग्यारह वर्तव्यो के पालन का सुयोग । लेना भी नही कल्पता। परमात्मा को अर्पित किये चौथा कर्तव्य अभिषेक -जिन मदिर को हुये द्रव्य पर अापका अधिकार ही नहीं । उस पर शुद्धि के लिये अढार अभिषेक-शान्ति स्नान व अन्य ममत्व रखना तो डूबने का निमित ही बनेगा। वृहद् पूजामो को कराना धावक के लिये आवश्यक इस तरह ये देव द्रव्य मी अभिवृद्धि करना भी बतलाया है । तीथ यात्रा में सहज ही ऐसे अवसर पतव्य कहा है। तीर्थ यात्रा मे तो अपनी शक्ति उपलब्ध हो जाते हैं । यात्रा का मूल ध्येय आराधना भनुसार द्रव्य सचो का सुनहरी अवसर प्राप्त होता होता है प्रत इस समय मे चित्त बाहरी विक्षेपो से है । सघ के साथ प्रमुजी या रथ रहता है । रोज निवृत्त बन कर प्रभु भक्ति में लीन बनता है । माग पूजा सेवा भारती में लाभ लिया जा सकता है। के बड़े नगरो मे या जहाँ भी अवसर मिले यह माग म पाने वाले देरासरी के जीर्णोद्वार में भी लाभ लिया जा सकता है-इससे स्वय के साथ योगदान किया जा सकता है। सधमाल भादि के को भी प्रेरणा प्राप्त होगी और लोग प्रभु भक्ति मे द्वारा भी देव द्रव्य वृद्धि का अवसर प्राप्त होता जुटेंगे। पाचवां फतव्य जिन द्रव्य वृद्धि --मुझे इस छठा क्तव्य धर्म जागरण -सासारिक भव मे जो लक्ष्मी मिली है वह पूव भवो मे मेरी भावनामो से परे रहकर अपनी दिनचर्या को मात्मा द्वारा की गई प्रभु भक्ति के कारण है प्रत धममय ही बनाये रखने की सर्वांग सुदर राह है मेरी कृतज्ञता यह है कि मैं उस प्राप्त लक्ष्मी यो प्रभु तीर्थ यात्रा । मोर वह भी सामिक तपस्वी भाई- भक्ति में समर्पित करू 1 आज स्त्री राग व बाल वहिनो के पाय । पर्वो या पव तिथियों पर रात्रि राग जितना है उसका कुछ प्रश भी प्रमु राग मे को भी घम जागरण का लाभ मिल जावे तो सोने परिवर्तित हो जावे तो प्रात्मा का कल्याण हो सके। मे सुहागे सदृश्य है। हाँ पाशातनामो से बचने का यदि विचारो मे दुष्काल है तो लक्ष्मी का सुकाल पूरा ध्यान रखना चाहिये । यात्रा मे इस छठे कैसे प्रावेगा। हां शक्ति के अनुसार भक्ति हो पर कनव्य का पालन बहुन सुगमता से हो जाता है । विचारो मे उदारता तो होनी ही चाहिये । प्राज सातवां पतंव्य श्रुत पूजा - 'विषम काल जिन जिन गावो मे प्रतिष्ठा महोत्सव आदि पर देवन्द्रव्य विम्ब जिनागम, भविजन को प्राधारा' ऐसे महान् की प्राय उल्लास पूवक हुई वहाँ उसी उल्लास से प्राधार श्रुत ज्ञान की पूजा का लाभ तो तोय यात्रा सम्पनता भी आ गई। राणकपुर की प्रतिष्ठा के मे मिल ही जाता है। साधु भगवतो के पास साली बाद सादडी तथा पाली, तखतगढ आदि के हाथ कैसे जाया जावे ज्ञान पूजा तो करनी ही है । उदाहरण सामने हैं ही। परमात्मा को द्रव्य अपण ज्ञान की सुरक्षा हमारा परम क्तव्य है । हजारो करने पर गरीबी रहती नहीं । हम व्यापार विश्वास लाखो ग्रयो को जलाकर छ छ माह पानी गरम कर से करते हैं तो प्रभु भक्ति में भी विश्वास का स्थान एव रसोई बनारर जैन मागम विरोधियो ने कितना दीजिये, अवश्य ही पुण्य प्रभाव प्रकट होगा। देव नुक्सान क्रिया पर सात क्षेत्रो मे ज्ञान को तृतीय द्रव्य व्यवस्था के परिणामस्वरूप ही जैन तीर्थो व स्थान देकर हमारे उपकारियो ने जो भावोल्लास मदिरो को स्थिति हजारो हजार वप से सुदृढ है । प्रदान दिया उसी कारण आज हमारा श्रुत साहित्य देव-द्रव्य के सम्बध म कठोर नियम हैं । देव के इतना समृद्ध है । देव द्रव्य के समान ज्ञान द्रव्य की निमित्त वोली हुई बोली का द्रव्य स्वय या परिवार के अभिवृद्धि भी प्रावश्यक कतव्य है। माज तो इस उपयोग मे लेवें उसे अन त दुर्भागी बताया है। देव द्रव्य की प्रोर भी अधिक मावश्यक्ता है। प्राज यदि द्रव्य भक्षण करने वाले के यहां से साधु को गोचरी जैन साहित्य और धम यथा-ईसाई प्राय व मुस्लिम 54 - की तरह जन-जन तक पहुँचाना है तो यही मार्ग है। चल कर मैं संयम मार्ग की ओर बढ़ने का प्रयास ज्ञान द्रव्य की वृद्धि करें साथ ही करें उस द्रव्य का कर रहा हूं साथ ही उद्यापन में सहयोगी बन, मैं सदुपयोग । यह समझलें आज जैन से अधिक इस यात्रा को और भी सफल बना रहा हूँ। इस जनेतर विशेष कर विदेशियो को भूख है जैन निमित्त से मेरा अहोभाग्य है जो दर्शन ज्ञान और साहित्य की। यात्रा में उपयोगी स्थानों पर श्रुत चारित्र के उपकरण समर्पित करने का अवसर मुझे पूजा के द्वारा ज्ञान द्रव्य की अभिवृद्धि की जा मिला है। सकती है। दसवाँ कर्तव्य है तीर्थ प्रभावना :-तीर्थ यात्रा पाठवों कर्तव्य है महा पूजा :- अाज तो ऐसी स्वयं ही तीर्थ प्रभावना की निमित्त है । संघ महा पूजाओं मे काफी अभिवृद्धि हुई है। शान्ति यात्रियो की भावना, संघपति का समर्पण जितना स्नात्र पूजा, अर्हन पूजा, नमिऊरण पूजा, भक्तामर अधिक होगा तीर्थ की प्रभावना भी उतनी ही महापूजा आदि । इन पूजाओं से भाव वृद्धि होगी। होगी और तीर्थ की ऐसी प्रभावना हमारे पापों का नई पीढी को संस्कार मिलेगे, प्रभु के प्रति समर्पण क्षय कर पुण्य अर्जन मे सहायक होगी ही पर जो का भाव प्रावेगा। संघ यात्रा मे बड़े शहरों में इस भी इस प्रसंग को देखेगे या सुनेगे वे भी कल्याण तरह की पूजा का आयोजन किया जावे तो स्थानीय मार्ग के पथिक बनेगे। उनका भी तीर्थ यात्रा का संघ भी लाभान्वित होगा और नई दृष्टि प्राप्त भाव जागेगा। हमारे द्वारा सर्जन की भावना तीर्थ करेगा। साधु भगवंतो का तो संघ मे योग रहता के विकास का निमित्त बनेगी । आज यदि पुराने ही है । अपने गांव मे तो स्थानिक लोग ही लाभ ले इतिहास को देखे, पढे तो हमें ज्ञात होगा कि प्रभु व सकेगे पर यात्रा मे तो जगह-जगह के अधिक लाभ तीर्थ के प्रति कैसा समर्पण पूर्वजो ने किया है । लेगे और इस सुकृत की सुवास सब अोर व्याप्त विक्रमादित्य महाराजा, कुमारपाल महाराजा एवं होगी । अत छै री पालित संघ मे ऐसी महा पूजनो महामंत्री पेथड शाह के संघों के विवरण यदि हम की व्यवस्था आठवे कर्तव्य के पालन मे सहाय भूत पढ़े तो अवश्य ही हमारे दिल मे प्रभु भक्ति व तीर्थ भक्ति का फव्वारा छूटे बगैर रहे नही । वस्तूपाल नवमां कर्तव्य उद्यापन :-उद्यापन कहें या तेजपाल द्वारा निकाले गये संघ की व्यवस्था के उजमणा, तपस्या निमित्त, या मांगलिक प्रसंगों के कुछ अांकड़े हमारे हृदय व नेत्र पटल को खोलने में निमित्त उद्यापन करने की प्रथा मंदिर पर कलश काफी होगे। आज कुछ लोग जो तीर्थ यात्रा मे चढाने सदृश्य है। ज्ञान, दर्शन और चारित्र के आडम्बर देखते है उनके लिये ये अांकड़े हृदय उपकरणो का अर्पण कर महा महोत्सव का परिवर्तन रूप बनेगे । हजार आठसौ वर्ष पूर्व प्रायोजन करना सुन्दर सुकृत में गिना गया है । वस्तूपाल के संघ मे निम्न व्यवस्था थी। भगवान ज्ञान व दर्शन के लिये तो समपर्ण के अनेक अवसर के २४ रथ, ५०० पालकी, ४००० बैलगाड़ी, प्रस्तुत होते है पर चारित्र धर्म तो जीवन मे आना २००० अतिरिक्त बैल, ४५०० सेवक, ७०० इतना शक्य नही है। मैं यद्यपि निर्मल चारित्र धर्म सुखासन तपस्वियो के लिये, २२०० श्वेताम्बर साधु, की आराधना कर पाने में सक्षम नही हूँ फिर भी ११०० दिगम्बर साधु, ४०० ऊँट, ४५० भोजक, चारित्र के इन उपकरणो के माध्यम से इस मार्ग ३३०० भाट चारण, १३५० कुम्हार, ४००० घोड़े, पर चलने वाले सुविहित श्रमण भगवंतों की भक्ति ५०० खाती, १०० लुहार ५०० सिंहासन व सात कर यह भावना भाता हूँ कि मैं भी इस मार्ग पर लाख यात्रिक गण । ऐसे बड़े १२।। संघ वस्तूपाल ने चलने के योग्य वन। छैःरी पालित संघ मे साथ अपने जीवन में निकाले थे। उसका सबसे बड़ा बनेगी । - 55 लाभ यह हुआ कि जीण शीण देरामरो का जिगोंदार महानता पाती है । जहाँ हृदय थी पवित्रता नहीं हुप्रा और अनेको नये मन्दिर बने । सारे जगत् मे यहाँ जीवा निष्फल । तीर्थों की प्रभावना हुई । सम्पन्न व्यक्ति अपने धन प्रत संघ यात्रा मे गुरु साक्षी से दिल मोलकर का सदुपयोग कर तीय प्रभावना मे सहायक हो अपने पापो की मालीपणा सेने या महान् अवसर सकते हैं और तीर्थ यात्रा के माध्यम से सघमाल मिलता है। जिनेश्वर भगवत, गुरु भगवत एव आदि के द्वारा तीर्थ द्रव्य को बढ़ावर महान् पुण्य साधामिय ये प्रति किसी भी परिस्थिति में माये का सजन कर सकते हैं। मपने प्रभाव के लिये प्रानीयता र प्रारम ग्यारहवां क्तव्य गुरु पालोपरणा है -जीवन बल्याण बरे वह महा वह भागी होता है। मे निरतर पाप होते ही रहते हैं । वास्तव में तो यह क्तव्य सम्बतसरी पव मे सम्बंधित है। सम्वत इस तरह श्रावन के ग्यारह पतयो की पातना सरी प्रतिक्रमण से पूर्व प्रात्म शुद्धि मावश्यक पही करने का सुअवसर एक साय तीय यात्रा में गई है वरना प्रतिक्रमण पूर्ण नहीं बनेगा । वस्तुत पनायास ही मिल जाता है । पय है ये भाग्यशाली पाप के शमन के लिये प्रतिवमरण प्रायश्चित है । जिनको तीथ यात्रा कराने का ऐमा अवसर मिलता है मेडता मे उपा श्री धम सागर जी महाराज 1 (जगद् मोर वे यात्री तो और भी धन्य हैं जो इन यात्रामो गुरु श्री हरी विजय सूरी जी के काल मे) से एक श्रावक मे अपने क्तव्यो वा पासन पर स्वय को मात्मा नाराज हो गया और रोज उपाश्रय पाने वाले इस के तारर बन जाते हैं माप ही पौरों के लिये प्रेरणा श्रावक ने उपाश्रय नहीं जाने का तय कर लिया। स्वरूप बनते हैं। सम्बत-सरी प्रतिक्रमण का समय प्राया । गुरुवय श्रावक के घर गये पर धावक ने अदर से विवाह छ री पालित सप मोर पावर के ग्यारह बद कर लिये । काफी देर गुरु देव बाहर कडकडाती पतयों का विचार हमने रिया है । यद्यपि वाडमेर धूप मे खडे रहे । लोगो ने कहा, जय श्राविका ने मे प्रस्थित छरी पालित सघ के उपसहार रूप यह विवाट खोले तो भी पावर' मुहूँ फेर पर सडा हो स्मारिका प्रकाशित हो रही है पर सपो के गया । गुरुदेव ने हाय जाह कर कहा में सदमस्त प्रायोजन तो होते ही रहते हैं। भविष्य में यात्रियो है गलती स्वाभाविक है यदि क्लेश सहित पो यह विवेचन उपयोगी बने इसी भावना से इसे प्रतिक्रमण करू तो निप्पल होगा । अतहृदय से स्मारिका में समावेश किया जा रहा है । क्षमापना करता है। फिर श्रावर को उपाश्रय मे तीर्थ यात्रा के प्रति उत्साह जागृत हो, लाकर साप बैठाकर प्रतिक्रमण कराया। सारा भावोल्लास बढे और यह प्रवृत्ति धममय बन सके वातावरण गद्गद् हो गया । क्षमापना से बहो में तो ही सुवृत्त को सही अनुमोदना बन सके । बाडमेर यात्री सघ के निभादाता, आयोजक व यात्रीगण सव ही वधाई के पात्र है। हार्दिक शुभ कामनायें! जोरावर भवन, जौहरी बाजार, जयपुर-3 56 TA Mer DD R Hit is the Tara - Nayers am/ Awariyar . श्री देवेन्द्रराज मेहता का अभिनन्दन करते हुये श्री जवाहरलालजी राक्यान मालारोपण की क्रिया करते हुये सघपति उदारमना श्री केवलचन्दजी खटोड को आशीर्वाद प्रदान करते हुये गुरुदेव सघपति श्री वोहराजी का स्वागत करते हुये श्री चम्पालालजी राका wwwmvad surTIT/wwwvie Amartisemeraman 42 3ERE 3 F HG . -- . - द Himes - n ka FR THE more - । - --- -WAM . . 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श्री शाति विजय ज्ञाापीठ की ओर स पूज्य गुरुदय श्री जी का
अभिनदन-पत समर्पित करत हुय श्री मलबदजी वाथरा
पूज्य गुरुदय श्री एव श्री भूटच दनी जैन
मतणा करत हुय
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-- PrakATAL । के क्षण 4 चिन्तन -kar । ३ Dramaanindinanippire -- गहन चर्चा में संलग्न पूज्य गुरुदेव एव श्री कालूरामजी वाफना Im PRATHAMARHWeate श्री मणिलालजी डोसी एव श्री आहमलजी बोहरा को मुक्त-हास्य के साथ आशीर्वाद देते हुये पूज्य गुरुदेव श्री were that there? - "" , I y ६ 6 Ran 32 . Int । M CS ifray F । । M -- 14 1 2 umkam *-
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पदयाता संघ में सम्मिलित
आर्या समुदाय
पूज्य गुरुदेव श्री मुनि मण्डल, आयावन्द एव
श्रावक-गणों क साथ तुजय पवत पर
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जीवन को को नई दिशा देने वाले निर्णायक क्षरण ले० मुनि श्री मणिप्रभ सागरजी म० । मंद, सुगंध समीर के झोको से हिलते हुए श्री देवेन्द्रराजजी मेहता पधारे थे। पुलिस अधीक्षक वृक्षो के पत्तों की छनछनाहट आवाज उद्घोष डी. आई जी. आई टी. ओ. आदि एवं बाहर से कर रही थी, संत मनीपी, प्रज्ञापुरुष के मानसिक पधारे अन्य कई महानुभाव आदि गणमान्य विचार भी कल्याणी भावना का उद्घोप कर रहे व्यक्तियो के मध्य हुआ विदाई समारोह नगर के लिये थे और विचारो के चरम मथन मे एक स्फुरण अति पाकर्पक एव अभूतपूर्व था। हाथी, घोड़े, स्फुरायमान हुई और उस स्फुरणा पर सूक्ष्म दृष्टि ऊट, निशान, नगारे, शिखरबद्ध जिनालय, मागलिक से अवलोकन सिंहावलोकन किया एवं संकल्प कर वाद्ययंत्र आदि अनेक शोभा सामग्री से सुसज्जित लिया उस स्फुरणा को कार्य रूप मे परिणित करने श्री सघ ने प्रयाण किया । और नियमित रूप से के लिये कृतसकल्पी हो गये। नियत मजिले तय करता हुअा क्रमश. लक्ष्यपूर्ति की उस कल्याणी स्फुरणा-भावना को साकार रूप देने ओर अग्रसर होने लगा। के लिये सतमनीषी ने एक व्यक्ति को चुना पद यात्रा सघ अपने आप मे गंभीर महत्त्व श्री भवरलालजी बोहरा । रखता है । केवल धार्मिक जीवन मे ही नही अपितु गुरुदेव के आदेश की अवहेलना वे स्वप्न में भी सामाजिक, शारीरिक एव प्राध्यात्मिक जीवन मे नहीं कर सकते थे । गुरुदेव के प्रति उनके मन मे भी अपना स्वतत्र दृष्टिकोण रखता है। धर्मशास्रों रही पूर्ण निष्ठा, पूर्ण भक्ति, पूर्ण समर्पण, मे जहाँ तहाँ पद यात्रा सघ की अनिवार्यता को प्रतिपल हर पल टपकता रहता है । उद्घोषित किया गया है। और उस शुभ घडी ने मानव जीवन में प्रवेश जीवन मे कुछ घड़ियां ऐसी भी आती है, जो किया, जिस पावन घड़ी मे स्फुरणा स्व-लक्ष्य की हमारे सपूर्ण जीवन को नई दिशा प्रदान कर देती ओर गति बढाने में प्रथम कदम रख रही थी। है, ऐसे निर्णायक क्षण जो संपूर्ण जीवन के लिये माघ सुद १५ के दिन प्रात कालीन शुभ मुहूर्त मे रोशन मीनार का काम दे जाते है। हमारे जीवन "वाडमेर से पालीताणा पद यात्रा संघ" का जैन मे नई रोशनी एवं खुशियाँ आ जाती है, प्रसन्नता न्याति नोहरा, वाडमेर से प्रस्थान हुआ । नगर के के झरने हमारे जीवन मे झरने लगते है, आल्हाद- वाहर विदाई समारोह का भव्य आयोजन ३०,००० कता की नई कृषि हमारे जीवन मे लहलहा उठती जनता के मध्य हुआ, जिसकी अध्यक्षता बाड़मेर है । हमे निर्णय करना है कि वे निर्णायक घड़ियां जिलाधीश श्री फतहसिहजी चारण ने की एव कौनसी है । शास्त्रकार फरमाते है कि पूज्य गुरुदेवों मुख्य अतिथि के रूप में राजस्थान के कमिश्नर के पावन श्री चरणों मे व्यतीत चन्द क्षण भी 57 हमारे जीवन की दिशा का निर्धारण करने में मघ प्रायोजक एवं प्रवतर मडल को मागदशन सक्षम हैं, और ये घडिया, ये क्षण, ये जीवन दिया, फलस्वरूप मर्वया नवीन माग एव क्षेत्र का निर्णायक पल, जीवन उनायक पल, पद यात्रा चयन कर ऐसे छोटे-छोटे ग्राम, नगरो को माग म सघ मे हमे सुलभता से प्राप्त होते हैं । लाभ देने का निश्चय किया गया जो कि अब तक इस लाभ से सर्वया वचित रहे हैं। उन छोट-छाट एक बार सही दिशा की सम्यर सप्राप्ति होने ग्राम-नगरो की भक्ति, गुरदेव के प्रति अगाध श्रद्धा के पश्चात् फिर जीवन मे ज्वारभाटा नहीं रहता, स्वामीजनों के सत्कार में तत्परता प्रादि देखवर जीवन में भटकावो की इतिश्री हो जाती है सघ यात्रियो की थकान लोप हाने लगी। और भटक्न समाप्त हुई कि जीवन गहरी ऊ चाइयो की ओर अग्रसर हो जाता है, और होता विकट माग से पसार होता हुअा, प्रतिदिन ही रहता है तब तक, जब तक आत्मा परमात्मा नवीन अपरिचित जगलो मे उतरता हुमा पद यात्रा नही बन जाती, ससारी मुक्त नहीं बन जाता। संघ प्रमश स्वगति मे प्रगति करता हुमा गलेश्वर, और सही दिशा प्रबुद्धो के सानिध्यता के भोरोल, साचोर, उपरियालाजी प्रादि मार्ग मे अभाव मे सप्राप्त होना दुष्कर है । आये अनेक तीर्यों की सम्यक् प्रकारेण पाया करता हुमा अपने स्वान्त यो निमल बनाता हुआ, झे गव है कि इस पदयात्रा सघ को जिन्होंने कमों का प्रावरण क्षीण करता हुमा, प्रमश पाद अपनी निश्रा प्रदान की, वे प्रबुद्ध गुरुदेव श्री लिप्तपुर महातीर्थ पर पहुचा । कान्तिसागरजी महाराज साहव गहरी सरलता से मार्ग मे आये बरयाला नगर मे पूवि नेमिमूरिजी स्थान-स्थान पर ज्ञानपिपासुमो को सही दिशा प्रदान करने में सक्षम रहें। म के समुदाय के वयोवृद्ध प्राचार्य श्री वि यशोभद्र- सूरिजी म जो मघ प्रेरणा दाता गुरदेव के अनन्य एक अय दृष्टिकोण से यह पदयाना सघ जैन प्रेमी हैं विराजमान थे । समन्वयता के प्रतीक धम के तत्त्वों के प्रचार प्रसार लिये सिद्ध गुरुदेव श्री ने सघ मे पधारने की विनती की जिसे साधन परिलक्षित हुआ । माग मे आये प्रत्येक छोटे स्वीकार कर प्राचार्य श्री ने सम्मिलित होकर अपने बडे, ग्राम, शहर के अनेक जैन जनेतरो के मध्य ऐक्य स्वभाव को उद्घोपित कर दिया। प्रतिदिन प्रवचन होता था और उसमे तत्त्वो का विश्लेपण सरल भाषा मे होता था। पालीताणा महातीर्थ पर भव्य प्रवेश जनत्व के प्रति, जिनेश्वर के प्रति जैनियो के प्रात काल की सुरीली हवा के मध्य सुरीले प्रति, जैन धम के प्रति, जैन मदिरो के प्रति, जन वाद्ययनो की झनझनाहट ने प्रत्येर मानव को संस्कृति के प्रति, जनेतरो के मस्तिष्क नत हो पालीतारणा स्टेशन के समीप यशोविजय जैन उठते थे, सघ का अवलोकन करने पर, उसके गुरुकुल की ओर जो आकर्षित कर दिया। कायकलापो को देखकर, उनकी प्रभु त मयता के दृष्टिगोचर करने पर । यह संघ जिस माग से सूर्योदय के कुछ ही क्षणो के पश्चात् जुलूस के रूप में मानव मेदिनी चल पडी। सबसे आगे काष्ठ निकला, वहा के निवासियो के हृदय में गहरी छाप छोडता पाया। का हाथी था, उसके पीछे इन्द्रध्वजा, अपनी ध्वजा फहराती हुई सघ प्रवेश को उद्घोषित कर रही पूज्य गुरुदेव श्री की दूरगामी दीपदृष्टि एव थी। उसके पीछे घोडे ऊट और बाद में स्थानिक शासन प्रभावना की अनुपम भावना ने पदयानी बालश्रम एव गुरुकुल के ३०० बालक ३-३ की 58 - था। लाईनो में सुव्यवस्थित ढग से कदम मिलाते हुए प्रतिवर्ष ३-४ पाते ही रहते है, लेकिन ऐसा आज बढ़ रहे थे । उसके बाद स्थानिक बैड और तक नहीं हुआ जब नगर की ६८ जातियों ने तत्पश्चात् जन-जन को अपनी ओर आकर्षित करता पृथक्-पृथक् रूप से पूज्य गुरुदेव को वंदन किया हो हुआ हाथी अपनी मस्त चाल से गतिमान था । एवं सघपतियो को पुष्पहार पहनाकर उनका उसके पीछे अहमदाबाद का प्रसिद्ध जिया वैड अभिनन्दन किया हो । अपनी भक्ति धुनो से भक्ति रसिक मानव मन को भक्ति से ओत-प्रोत कर रहा था। और उनके बाद नगर के प्रत्येक मकान के ऊपर देखो, पेड़ों पर ८ फुट ऊँची विशाल डोली में विराजमान हजारों देखो, छतों पर देखो, जहाँ देखो वहाँ मानव ही मनुष्यो के केन्द्र बिन्दु, पुज्य गुरुदेव, श्रमण शिरो- मानव । शहर का चौड़ा पथ भी संकीर्ण बन गया मणि, जैन जगत् के प्रकाश स्तम्भ, नई चेतना के ऊर्ध्वारोहक-प्रेरणा स्रोत सीमाओं से परे विशाल राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री के पदार्पण पर व्यक्तित्ववान् समन्वयता के प्रतीक प्रज्ञा-पुरुष, मानव जिस प्रकार उलटता है उसी प्रकार पूज्य अनुयोगाचार्य श्री कान्तिसागरजी महाराज गुरुदेव एवं सघ के नगर प्रवेश को देखने मानव साहब जन समूह को आशीर्वाद प्रदान करते हुए मेदिनी उलट पड़ी थी। स्थान-स्थान पर कृत पधार रहे थे। उनके साथ पूज्य आचार्य श्री गहुलियो ने नगर की धार्मिक प्रवृत्ति को उद्बोधित यशोभद्रसूरिजी म. श्री रेवतसूरिजी म, श्री लब्धि- किया। चन्द्रसूरिजी म., श्री शान्ति विमलसूरिजी म., श्री आणदजी कल्याणजी की पेढी, मोतिसुखिया, यशोदेवसूरिजी म., श्री अरिहतसिद्धसूरिजी म., श्री ब्रह्मचर्याश्रम, हरिविहार, माहेश्वरी समाज, भानुचन्द्रसूरिजी म., श्री जयचन्द्रसूरिजी म., पन्यास श्री हेमप्रभविजयजी म., गणिवर्य श्री हेमप्रभविजय- मुस्लिम समाज, आदि पालीताणा इकाई की सभी जातियों ने संघपतियों को पुष्पहार पहनाकर हर्ष जी म., आदि मुनि मंडल जुलूस की शोभा में प्रकट किया । पुरनारियाँ स्थान-स्थान पर पुष्पवर्षा अभिवृद्धि कर रहा था । तत्पश्चात् मालाओं से लदे सघपतियों की चाल तो देखने जैसी थी । द्वारा स्वयं के उल्लासों को प्रकट कर रही थी। उसके बाद विशाल मानव समूह चल रहा था। सब से महत्त्व की बात तो यह थी कि उस दिन चारो ओर मानव ही मानव नजर आ रहे थे । कसाईयों ने स्वेच्छा से कसाईखाना बन्द रखा, उनके पीछे भव्य शिखरबद्ध जिनालय शोभा को और जुलूस मे भाग लेकर अपनी धार्मिक भावना दुगुनी कर रहा था। उनके पीछे बीजापुर का का उद्बोधन किया। प्रसिद्ध वैड आकाश गुजारव कर रहा था। फिर माधवलाल जिन मन्दिर के दर्शन के पश्चात् शताधिक आर्या मडल और फिर सन्नारियें । दो हरि विहार में पदार्पण हुआ। वहाँ नवनिर्मित जिन मील लम्बा ऐसा वरघोड़ा पालीताणा की प्रथम एवं ऐतिहासिक घटना है। जिलाधीश, नगर- हरिसागरसूरि ज्ञानभण्डार का उद्घाटन दानवीर श्री केवलचन्दजी खटोड़ ने किया और मांगलिक पालीका के चीफ आफिसर, पुलिस अधीक्षक, कस्टम के आफीसर, आई. टी. ओ. आदि शताधिक सरकारी अफसरो ने पूज्य गुरुदेव को नमन कर जुलूस की और उसी दिन फलेचुनड़ी का आयोजन हुआ, अगुमानी की। जिसका सारा श्रेय संघपति सेठ श्री मणिलालजी पद यात्रा संघ, पालीताणा महातीर्थ पर डोशी को है। ऐसा प्रायोजन गत ३०० वर्षों में प्रवचन पश्चात् सभा विसर्जित की गई। 59
नहीं हुआ था । इस आयोजन में सक्रिय काय करन के साथ सुमपन्न हुग्रा । बोली बोलवर प्रथम
वाले श्री मिसापचन्दजी गोलेछा को अनेक सघपति श्रीमान् कमलसिंहजी दुबेटिया, कलकत्ता
घयवाद है । पालीताणा निवामी श्री हीग. को श्रीमान् शमुमलजी राका ब्यावर वाला ने माला
लाल भाई आदि ने इस काय को सफल एव सश्रेय पहनाई। दोपहर को ऊपर मूल टुक में दादामाहब
बनाने में जो उत्साह व तन्मयता वनाई उमका श्री भव्य पूजा पढाई गई।
दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है। उसी दिन
इम प्रकार पूरे भारत में यशस्वी बना पदयात्रा
अ०भा०प० महामघ वा स्नेह सम्मेलन था जिसम
सघ एक ऐतिहासिक एव अभूतपूर्व घटना बनी,
कई महत्वपूरण प्रस्ताव पास किये गये।
जो इतिहास म अविस्मरणीय रहगी।
द्वितीय दिन मालमहात्सव विविध कायममो
- मुनि श्री मणिप्रभसागरजी
सहिष्णुता
'प्रयत्ने प्रति वसति सिद्धि'। हम कम से कम किसी के दो शब्द
सुनने की क्षमता तो पैदा करें, किसी के दो कटु शब्द पचाने
की कोशिश तो करें। आज दो शब्द सुनेंगे तो कल दो गाली
भी सुन सकेंगे-दो प्रहार भी सहन कर सकेगे। इस प्रकार
सहते-सहते हममे भी सहिप्णुता का गुण जागृत होकर व्याप्त हो
जायेगा, फलत हम भी कभी समभाव के साधक हो जावेंगे
और चरम उपलब्धि प्राप्त कर सकेंगे ।
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-साध्वी श्री मणिप्रभा श्रीजी
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, स्वप्न -उपाध्याय अमर मुनि गहराती निद्रा में सपने, यदि देखे, तो क्या देखे ? चमत्कार है जब जागृत में, नभ-चुम्बो सपने देखें ॥ व्यक्ति, जाति, परिवार वही है, वही राष्ट्र गौरवशाली । जिसका मन-मस्तिष्क कभी भी, सपनों से ना हो खाली ।। एक दिवस मानव ने सपना, देखा था कुछ होने का । अपना यह ससार बनाया, उसने अद्भुत सोने का । अपने ज्ञान-कर्म के बल पर, धरती को स्वर्गलोक बनाया । जीते-जी मानव जीवन में, देवों-सा शुभ सुख पाया ।। प्रात्मा से परमात्मा बनकर, कहलाया त्रिभुवन स्वामी । पूर्ण पुरुष हो गया निरंजन, अणुभर भी न रही खामी ।। अधःपतन की अन्ध रात्रि के, नहीं कभी भी स्वप्न देखना । उच्च-उच्चतर, सुप्रभात के स्वप्न देखना ॥ mamann एक-एक से {naman ananam aman 61 साचोर (सत्यपुर) महातीर्थ यात्रा हेतु सादर आमंत्रण 0 २५०० वर्ष से भी अधिक प्राचीन तीर्थ सत्यपुर आज का साचोर । पुरातत्व के अवशेष १२-१२ मील तक मिलते हैं । 0 यह लोकोक्ति है कि यहा स्वय महावीर प्रभु विचरे थे तथा उनके बड़े भाई नन्दीवचन ने प्रभु महावीर को जीवित अवस्था मे प्रतिमा स्थापित की थी। 0 गौतम स्वामी ने जगचिन्तामणी चैत्यवदन मे इस तीर्थ का २५०० वर्ष पूर्व वदन किया है। 1 प्रात काल राई प्रतिक्रमण करते हरेक साधु, साध्वी, श्रावक-श्राविका 'जयऊ पीर सच्च ऊरि मण्डण' से तीर्थ को वदन करते हैं । O वि० स० ६७० मे नाहह राजा ने यहा बावन जिनालय युक्त विशाल देरासर वनवाया व भूगर्भ मे निकली प्रतिमा को प्रतिष्ठा की। 0 वि० स० १०८१ मे जैन महाकवि धनपाल, गजा भोज की धारा नगरी को त्याग कर यहा आया और 'महा वीरोत्साह' मे यहा का वर्णन किया है । 0 वि० स० १२८८ मे मनीश्वर वस्तुपाल-तेजपाल ने शत्रु जय महा तीथ पर “मत्यपुगे प्रावतार" मदिर की स्थापना कर यहा का महत्त्व बढाया । 0 वि० स० १३७० मे खरतरगच्छाचार्य मोहम्मद तुगलक प्रतिरोधक श्री जिनप्रभ सूरीश्वरजी ने तीर्थ कल्प मे विस्तृत विवरण किया है । 10 महामहोपाध्याय श्री समयसुन्दरजो तथा भावविजयजी गणियं जैसे प्रभावक महा. पुरुषो की यह जन्म भूमि है । 0 साचोर तीर्थ के तीर्थ पति भगवान् महावीर परमात्मा की प्रतिमा सम्प्रति महाराजा द्वारा भराई हुई है अत २२०० वप पुरानी है । 0 यानियो के लिये धर्मशाला, भोजनशाला, प्रायम्बिलशाला की सुन्दर व्यवस्था है । नगर मे पाच देरासर हैं। 0 साचोर के लिये अहमदावाद, पालनपुर, थराद जोधपुर, बाडमेर, जालोर, आवू रोड रानीवाडा एव बालोतरा से सीधे वस की व्यवस्था है । विनीत श्री जैन सच साचोर-३४३०४१ जिला-जालोर (राजस्थान) 62 प्यारा खरतर चमक गया AP H 0 ले० श्री मनोहर श्रीजी म० । w res més . वन्दन- वन्दन पदपद्मे प्रभु, शत्रुजय के नाथ चौरासी गच्छाधिपति, दत्तकुशल गुरुहाथ -- सन्दर्भ- 2 स्वर्णाङ्कित इतिहास पुस्तिका, खुली नवीन अध्याय जुड़ा छरिपालता संघ सिद्धिगिरि यात्रार्थ कान्ति भाव उमडा भव्यभाव का वेग थामने, दृढ संकल्पी भंवरजी वने आद्योपान्त मनोहर , वर्णन, वर्णन, लगे स्वतः क्रमशः उभरने 3 - 4 5 6 पू० गुरुदेव ! पालोतारणा में- सिद्धक्षेत्र की पावन भूमि, तीर्थपति प्रभुऋषभ जिणंद प्रतिमानगरी गिरि छाया मे, वर्तित है अहोनिश आनंद रोड तलहटी मध्यस्थली, गुरुभक्ति स्मृति का है प्रतीक विश्रु व हरिविहार नाम प्रतिदिन, आते हैं यात्री धार्मिक पटस्थित प्रसन्नवदन गुरुवर, अनुयोगाचार्यश्री थे ध्यानस्थ मम भावों का साकाररूप, श्रद्धय ! प्रतिष्ठित हो प्राणस्थ सागर की गहराई अनन्त, कर्तव्य उमग वेग अवरुद्ध प्राची लाली छिटकाव किया, चितनधारा मे बहे प्रबुद्ध शब्दातीत उपकार ही तीर्थंकर भगवन्तों पुण्यशाली शासन सेवाकर जन्म कृतार्थ करे निज मस्तिष्क पटल की छाया मे हुई ऐतिहासिक घटना चित्रित संघ सह पैदल यात्रा करने बस हृदयावाज किया प्रेरित मन ही नही आत्मा है खोई, यात्रा के पुनीत विचारों में घंटो बीते इन ख्वावों मे, सुनहले स्वप्न सितारों में 7 सदा का का 8 9 10 63 तव मनमयूर भी नाच वदन गुरदेव । शन्द सुनकर उद्घाटित क्यिा नयन द्वारी नतमस्तक खडे भवर बोहरा, धर्मलाभ शन्द गुरु उच्चारी 11 प्रथम कुशलपृच्चा सह पूज्यवर, धमप्रेमी जन लिया सभाल प्रेषित उत्तर बोहराजी का था, इस अर्जी मुनिये फिलहाल 12 प्राशा दीप प्रज्वलित यह, कृपादृष्टि स्नेह पार उठा, इच्छिन अमृत वर्षा पर 13 क्रवद्ध मस्तक पूज्य पदतलघर, वोले सुन लेना स्वामी पविन परो भूमि मरघर की, चातुर्मास हो अागामी 14 पूवकार्य उपघान तपस्या मे, नेतृत्व अपेक्षित है तीय नाकोडा पधारेंगे, स्वीकृति पर ध्यान ये पेद्रित है 15 बड़े ध्यान से श्रवण क्येि पर पूर्व विचार न विमराये बोहराजी समुख गुरुवर निजी भावना दशयि 16 पैदल यात्री सघ माथ मे लिये प्रमु आदीश्वर को नमन करे तन मन धन अर्पित भक्ति मे, भव्यात्मन् सिद्धि सहज वरे 17 हृदयस्पर्शी सक्षिप्तसार मुन बोल उठे हृदयहार आदेश सभी स्वीकृत होगा तेरी वाणी मेरे विचार 18 जय घोप मे नभमडल गूजा, घी उभय विचारो की मिद्धि परस्पर मजुरी लेकर वे खुश मिल गई हो समृद्धि 19 प्रव मम पालीताणा से बिहार दो हजार रत्तीस विक्रम सवत् कृष्णाष्टमी मिगसर पालीताणा मे प्रस्थान किया प्रात शुभ वेला मे गुरुवर 20 नूतन लघुवयी मुनिवृद सग, विचरण अरु धर्म प्रचार किया अहमदाबाद की जनता ने गुरु उपदेशामृत लाभ लिया 21 त्रिदिवसीय वाणी की वर्षा, लाखों लोगा का दिल हर्पा प्रमश साचोर मे उद्बोधन कर अय क्षेत्रो को भी स्पर्शा 22 प्रथम उपधान- प्रतीक्षा मग्न भंवरजी घे खुशियो का पारावार नही नाकोडा निक्ट पधार रहे, श्रद्धय । शासन शृगार सही 23 शुभ लग्न पोप कृष्णा पठी, नाकोडा तीय प्रवेश क्यिा सभी प्रातों के तपप्रेमी को आमनरण पत्रिका भेज दिया 24 उपचानपति वोहराजी है, अनुयोगाचार्य कातिसागर जिनकी पावन निश्रा में, स्थित हुए तपस्वीजन पाकर 25 64 शतार्ध एक, का का प्रारम्भ हुई उपधान विधि, दिन माघ वदि द्वितिया का था चौरासी ऊपर चार शतक तप जप उपधान वहन कर्ता 26 साधना अहोनिश शतार्ध एक, संयमी जीवन परिपालन तज भौतिक सुख अंतर्मुखी हो करे अशुभ भावो का परिमार्जन 27 वैज्ञानिक शोधित अणुशक्ति ने जीवन संहार किया जिन प्ररुपित तप की शक्ति, आत्मशुद्धि स्वविकास किया 28 प्रतिदिन जिनवाणी सार श्रवण, अप्रमत्त रहन सत्संगमिलन आत्मशाति की अनुभूति अरु रत्नत्रयी आराधन 29 साधनाकाल समापन भव्य मालोत्सव कार्यक्रम आयोजित दर्शक जन समूह अपार मध्य विधिवत् संपन्न क्रिया निरगीत 30 गुरुदेव ! आपकी निश्रा में बीते क्षण भूल न पायेंगे तब महर नजर प्रेरक प्रवचन, जीवन्त स्मृतिपट छायेगे 31 उदार हृदयी संघपतिजी कृत सेवा तन मन धन अनुपम अब बिछुड़ रहे आज सभी स्वीकारो हार्दिक अनुमोदन 32 दर्शक यात्री तपस्वीजन, संघपति स्वगृह की ओर चले नामानुरूप गुण कान्ति ही कर्त्तव्य क्षेत्र में सदा ढले 33 नाकोडाजी से बिहार : प्राहोर प्रतिष्ठा शासन प्रभावना करते हुए, आहोर संघ के आग्रह त्रयोदशी शुल्क बैसाखी, प्रतिष्ठित किये कुशल पर गुरुवर 34 ताराबहन दीक्षा- अति प्रशंसनीय रहा सघ का हर्षोल्लास सह हुआ काज ताराबहन को दीक्षित कर शासनप्रभा नामकरण सरताज 35 स्वर्गस्थ दर्शन- सघ की आवाज पुनः विनती हुई पधारो बालोतरा विहार किया मोकलसर पहुंचे, स्वर्गस्थ गुरु दर्शन मुनिराज 36 विभिन्न प्रान्त के लोगों ने अंतिम यात्रा मे भाग लिया बाडमेर सघ बोली लेकर मुनिश्री का दाह संस्कार किया 37 दर्शन थे सुप्रसिद्ध न्याय व्याकरण तीर्थ साहित्य शास्त्री 38 पर अहंभावका अंश नहीं, गुरुदेव भक्ति में समर्पित थे अन्त र किया अस्वस्थ रहे कई वर्षों तक नश्वर जगति में अमरत्व का दिया वोग दर किया 39 65 वानोतरा प्रतिष्ठा- मोस्लमर से विहार हुग्रा वालोतरा पधारे मृदुभाषी गुरभक्त मनोरथ पूरण हुप्रा, प्रतिष्ठा म सचें बहुगशी 40 प्रवत्तिनीजी से मिलन- प्रतिष्ठा काय हुअा सत्वर, प्रस्थान दिया जयपुर की ओर मरिण मुक्ति सुयश विमल सगमे, विद्वद् मुनिजन तप है कठोर 41 प्रत्तिनीजी विचक्षण श्रीजी वी वेदना से चितित थे सभी मुखपृच्छा दे दशन पूज्यवर, द्विदिवमीय स्थिरता किया तभी 42 बाडमेर का ऐतिहासिक चातुर्मास बाडमेर प्रवेशोत्मव- पूर्व निर्णय को ध्यान मे रस, अति तीन गति से विहार किया बाडमेर प्रवेशपूर्व मेवामदन मे पूज्यश्रीने विश्राम लिया 43 उदधितरगवत् भक्ति लहर, उत्मा अपूर्व मध छाया अनुयोगाचाय के स्वागत मे बाडमेर स्वगसा मजाया समानद्वार बहुरगी सजा, दर्शनीय लगा कान्ति मेला श्रीफल प्रभावना वितरण का द्विदिवसीय लाभ भवर झेला 45 प्रापाढ शुक्ल तेरम प्रभात, वघाने पाये सभी नरनागे सेवामदन से प्रारभ जुलूस सकीण माग हुना उस वारी 46 अशोक बैंद जयपुर वा था महावीर पाश्व बैड मधुरध्वनि जनता सारी मत्रमुग्ध वनी, सुनते खिल रही हृदयनी 47 लाखो नजरो की प्यास बुभी दशन पर विरल विभूति के "यातिनाहग मे प्रवेश किया, अप चातुर्मास वर्णन आगे 48 चातुर्मासिक कायक्रम- सावन की रिमझिम वर्षाने प्रवृतिको मुदर रूप दिया त्र्यास्यानवाचस्पति की वाणी, प्रवृति शोधन बोध किया 49 44 परमेष्ठिपद जाप- स्वाइलैंव के गतरे से, भयग्रस्त वनी पचदिवसीय परमेष्ठीपद विश्वशाति जप जनता सारी हुमा भारी 50 बाढपीडित सहायता द्वितीय सक्ट था हृदयभेदी लूणी नदी में प्रवाह बढा बाडमेर नगर के गाव नगर मैक्डो पर अाफ्न प्रान पटा 51 66 सन्देश . 52 करुणासागर ! दयनीय स्थिति का संघ को भान कराया यात्मवत् सर्वभूतेषु, महावीर सुनाया महत्त्वपूर्ण यह कार्य संघ का संतप्त शाति पहुँचाना खाद्य सामग्री वस्त्रादि बाढ़पीड़ित किया प्रदाना 53 । भगवती सूत्रवाचन- है श्रुतभक्ति हेतु भव्य जुलूस, भगवती सन्मान बढ़ाया श्रीसंघ के प्राग्रह पर प्रबुद्ध, भगवती सूत्र सुनाया 54 शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी पे प्रवचन किया प्रारंभ जैन जैनेतर श्रोतागण, संख्यातीत करते अचंभ 55 56 सार्वजनिक प्रवचन-- रक्षाबन्धन पर सार्वजनिक प्रवचन जन मानस भाया जनता के · आग्रह से गुरुवर द्वितीय प्रोग्राम वनाया पन्द्रह अगस्त जन्माष्टमी को, छात्रावास मे उद्बोधन "मानवधर्म को कृष्ण की देन" जनप्रिय विषय का शोधन जिलाधीश गणमान्य व्यक्ति, धाराप्रवाह रसपान किया जैन जैनेतर बड़ी संख्या में, गुरुदेव का गुणगान किया 57 58 केशलुचन- साधुविधि समझाने समझाने पूज्यवर पटस्थित किया केशलुचन धन्य 2 मुनिका जीवन, दर्शक कृत अनुमोदन 59 चातुर्मास अवधि मे विभिन्न प्रान्तों से आए दर्शनार्थी बाडमेर के जैन वन्धु भाग्यशाली सेवा प्रार्थी 60 जनता वन्धु थे अभिनन्दन समारोह- अखिल भारतीय महासंघ अध्यक्ष जवाहरजी राक्यान मंत्री दौलतसिंहका विराट् सभा मध्य किया सन्मान 61 ऊँट प्राकृति मानपत्र श्रीसघने सादर भेट किया अध्यक्ष मंत्रीजी गुरुवर से, आशीर्वाद वासक्षेप लिया 62 जोधपुर से सघ ले आये, बलवन्तराजजी भंसाली मालू पारख साथ में लाये गुरुदर्शन किये पुण्यशाली 63 दर्शनार्थ संघ ले आये, बाड़मेर संघ सन्मान किया अभिनन्दन पत्रक कर अर्पित, आयोजन को सफल किया 64 । 67 पर्युषण पर्व- अवणनीय उत्साह सघ मे, पर्वाधिराज व्याख्यान वाचस्पति वृत वाचन परपसूम ने मुमाया 65 अभूतपूर्व तपश्चर्या- तपस्या की तो झडी लगी थी, मासक्षमण हुये चार अघमास की सस्या उन्नीस, प्रयोदश छब्बीस बरनार 66 एक्सो दश थे दश उपवासी, नौ किये प्रग एप पचास अट्टाई तपस्वी अठ्यासी, सा सुन्दर चौमास 67 छठ्ठ अट्ठम पचरगी सभी गिनती उपर जानो प्रत्यक्ष प्रभावी गुरुदेवधी यी महिमा पहिचानो 68 विराट् जुलूस- मामान क्यिा तपस्वी जना, समारोह पा भारी विराट् जुलूम की शोभा देगने उमड पडे नरनारी 69 छात्रावास व्यवस्था-- छात्रावाम भोजनाशाला यो पुन नवीनतम मरक्षण नई कमेटी चयन, उस सस्थाका उत्थान प्राण दिया विया 70 अ०भा० स० का० का बैठर-- भव्यायोजन अमावली मै मिला सकेत गुरुवर अखिल भारतीय सरतरगच्छ सघ एकत्रित करवाने या 71 सघटित करने गच्छ को, द्विदिवसीय डेट पिया निश्चय हुई बैठक ययासमय सघ दी, प्रेपित विचार लिया निर्णय 72 सामाजिक धार्मिक एक्ता पर, क्यिा ममस्पर्शी पूज्य सवोधन दानवीर मणीडोसीजी का जैन सघ दिया अभिन दन 73 ऊँट प्राकृति मानपत्र दे, व्यक्तित्व को दर्शाया आग तुफ प्रमुखजनो का भी सन्मान बढ़ाया 74 सगीत महल- प्रमुभक्ति करने सगीत मडल तीन स्थापित किया उपकारी दादागुम्देव जीवनवृत्त पर सचित्र पुस्तिका छपी यारी 75 पुस्तक प्रकाशन विद्वशिरामणि प्रथम शिष्य मणिप्रभसागरजी कृत सपादन कल्याण चारितम्" पुस्तक "क्षमा का हुप्रा प्रकाशन 76 68 पयसाकर सतत ऐतिहासिक चातुर्मास हुआ, वर्णन कर पाना शक्य नही आमत्रणपत्र की सुन्दरता, सघभक्ति शब्दातीत रही .77 तेरी गरिमा से प्रभावित हो, जैनेतर जैन सभी हर्षित मुनिवृन्द अल्पवयी अति सुन्दर, चुम्बकत्व कर रहा आकर्षित 78 शिष्य मंडल- शिष्यरत्न मे प्रथम स्थान, सर्वोपरि श्री मणिप्रभसागर गुरुकृपादृष्टि पा धन्य हुए अभिन्न प्रेम . ज्यू 79 कर्तव्यध्यान बड़े बुद्धिमान, किंचित भी नही है अभिमान कान्ति आन ही मरिण प्राण, , परिश्रमी ज्ञानवान 80 मुक्ति सुयश विमल है साथ, साध्वीजी का चातुर्मास साध्वी प्रमुखा प्रमोदश्रीजी शिष्या मडलीसह किया आवास .81 बाड़मेर से विहार चौमासिक काल बीता सानन्द विदाई की घडिया आई विरह वेदना व्यथित सघ की हृदय कलिया मुरझाई 82 द्वितीय उपधान-- उपधानपति रामसरवासी, प्रभुलालजी मालू आग्रह पर निर्णीत उपधान नाकोड़ाजी, पधारे अनुयोगाचार्य प्रवर 83 उपधान प्रवेश प्रथम मुहूर्त, मिगसर बदी पांचम शुक्रवार छ: सौ सोलह तपस्वीजन हुए क्रियाशील विधि अनुसार प्रातः सन्ध्या मे प्रतिक्रमण, प्रभुदर्शन गुरुवदन करना काउस्सग्गमाला नियमानुसार, बह रहा वीरवाणी झरना 85 मालू परिवार भाग्यशाली, तप भक्ति मे तल्लीन बना धन अर्पित सेवा मे, उपधानपतिजी उदारमना 86 शासनसम्राट की छाया मे, तप जप का ठाठ लगा भारी पौष शुक्ल दिन एकादशी, दो हजार छत्तीस सुखकारी 87 मनोहर माला परिधान दृश्य, हजारो नेत्र निहार रहे गुरुवर उपकार महान किया, नतमस्तक हो नतमस्तक हो मालूजी कहे 88 उपधान समाप्ति पर गुरुवर, नाकोडा से बिहार किया अतिशीघ्र बाडमेर जा पहुंचे, अव द्वितीय भाग प्रारंभ हुआ 89 द्वितीय भाग नामाक्षर पद्यावली-- काली घटा मे विद्युत से तुम चमक उठे इस कलियुग में न्याति नोहरा प्रस्थित पैदल सघप्रारण नमन तव पदयुग्मे 90 84 तन मन 69 96 था दशन पाना तिर्थाधिराज गिरि प्रागण मे,' शोभे हरि पटाधीश गुरुवर 91 वामर भानु निशा शशिवत्, खरतर सम्राट है ज्योतिघर । सागरमम हृदय विशाल उदात्त विचार विश्व फैली ख्याती 92 गच्छाधिपति भाषाधिकार, प्रवचन शैली मन को भाती रग रग मे समायी गुरुभक्ति, समपण भाव साकार किया जीवनस्मृति रहे गुरुदेव की, हरि विहार निर्माण किया 93 मनोहर परिकर मध्य कान्ति, परिधि म शिष्य शोभित है हारपदक मणि दीप्तिवन्त, मोतीसा मुक्ति प्रवोधित है 94 राजमार्ग दर्शक प्रवुद्ध, प्रभु महावीर पथ अनुगामी जग उद्धारक मम श्रद्धास्पद, ग्रुटि को क्षमा करे स्वामी 95 सादर अभिनन्दन है हार्दिक व्यक्तित्व अनूठा बेमिशाल मनोहर मडल हर्पित गुरुवर, ममीप पहुंचे अस्सीको सान मघ भूमिका- महत्त्वपूण कार्य सामने, बाडमेर से पालीताणा पंदल यात्री मघ महित, पभ जिद 97 पूज्येश्वर प्रखर प्रेरणा और प्राप्त था निर्देशन चातुर्मास अवधि से ही, एक जुट हुवे कायकर्तागण 98 मधपति भवरजी बोहरा का था दिल उदार लिया सघभार हार्दिक लगन सह कायमग्न, दिनरात एक किया उसवार 99 पैदलयात्री कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार प्रचार द्वारा पूरे भारत मे सौरभ फैल गई 100 वर्तमान युग मे खरतरगच्छ की शान बढाने वाला है अनुयोगाचार्य श्री की निया म ऐतिहासिक सघ निराला है 101 खरतरगच्चीय मुनि साध्वीगण, शामिल हो पुनीत प्रवास मे प्राग्रह करने सघ प्रतिनिधि आये उत्तीमगढ प्रात में 102 मादेश निखित पुज्येश्वर का ररा सन्मुख बोल उठे सत्वर अति शीन स्वीकृत वक्षावें, वडे खुश थे मजुरी पावर 103 गुरकृपादृष्टि जीवत बने, मैं हूँ उपकारो से उपरत निधाप्रदान यात्रा हेतु, दूरी मे याद क्यिा प्रेषित 104 बाडमेर से सघ प्रस्थान प्रथम दिवस- ऐतिहासिक मघ की भव्यछटा, वर्णन करने मन झूम उठा प्रारभिक मेला दर्शनीय था, वाड़मेर मघ पत्र का अनूठा 105 70 अनुयोगाचार्य की निश्रा मे, ठहरे कई प्रान्तों में यात्री स्वकार्यलीन व्यवस्थापक, किन शब्दों में कहुं कृतखात्री 106 माघी पूनम मध्याह्न समय कर्णप्रिय मधुरध्वनि गुजित है वाजिन गीत संगीत लहर कर रहा मुग्ध स्पंदित है 107 विराट् जुलूस सह पदयात्री, अपूर्व सघ प्रयाण किया गुरु पूनम दिन सिद्धियोग, सिद्धाचल लक्ष्य में ठान लिया 108 ध्वजा व्योम मे फहर रही, मस्ती में हाथी झूम रहा गति शील अश्व अरु ऊंट स्थित रक्षक नगारा पीट रहा 109 चालीस हजार जनमेदनी मानो जन प्रवाह बाद आया मुनिवृन्द मध्य उच्चासन स्थित, सम्राट दर्श पाया 110 प्रभु महावीर की प्रतिमा एक सुन्दर रथ मे शोभ रही रथ गतिशील करने हेतु बैलों की जोड़ी दौड़ रही 111 जय तीर्थपति जय गुरुदेव, था कर्णभेदी शब्द जयकार मम हृदयहार, सजोया स्वप्न किया साकार 112 खेतजी प्याऊ के समीप सुन्दर रंग मंडप विशाल सघ पहुंचा पाच बजे वहां पर, भोजन करने बैठे पंडाल 113 विभिन्न खाद्य पदार्थो से सामीवच्छल लाभ लिया संघपति भवरजी विनम्रभावे, सुखपृच्छा सभाल लिया 114 शासन प्रसन्नवदन था का अनुकूल व्यवस्था-- शत ऊपर यात्री संख्या सहस्र रही, सेवक सेवारत बस ट्रक ठेला जलटंकी जीप, अनुकूल व्यवस्था सभी प्राप्त 115 सघ सेवा समिति के सदस्य, सबही मंडल के अधिकारी प्रदत्तकार्य संभाल रहे जिम्मेदारी 116 तन्मयता से संघ की दिनचर्या-- जंगल में मंगल वर्ताता गतिशील संघ की दिनचर्या प्रात: सन्ध्या मे प्रतिक्रमण, तपजप शक्ति अनुरूप किया 117 करते विहार प्रतिदिन प्रातः छह बजे पूज्य श्री सघसाथ हाथी रथ घोड़ा ऊँट बैन्ड अनुपम छबी क्या कहुं नाथ 118 प्रभुदर्शन स्नात्र पूजन करते, गुरुवंदन अरु व्याख्यान श्रवण दोनों टाइम अनुकूल भोजन, पश्चात रात्रि में प्रभु भजन 119 प्रज्ञापुरुप आचार्य देव, जिनके वल था जोर शोर निरिणत क्षेत्र पावन करते दशवे दिन संघ पहुंचा साचोर 120 पर 71 पाचसौ घर हैं जैनो के सघ स्वागत यो वे बने तत्पर सामेला का भव्य आयोजन, नगर सजावट अति सुदर 121 साचोर की दादावाडी म पच्चीस हजार प्रदान पिया वस्तीवालो को भोजा दे स्वधर्मी भक्ति का लाभ लिया 122 पंदत यात्री सघ की महान, विशेषतया ये रही हदम जिन गावो मे विश्राम लिया, दिया ग्रामीण को पूरा भोजन 123 गुरुदेव सघ से पृयय हुए (भूल भूलैया में) प्रतिदिन यायाश्रम है जारी प्रयोदशी बुध को पहुचा थराद गुरु को विश्राम था ढीमा में, भोरोल होवे जाना था वाव 124 थराद से आगे बढकर के, ढीमा में यात्री विश्राम पिये गुरुदेव भूलत माग दूसरे, सीधे बाव में पहुच गये 125 मणिभक्ति- मणिप्रभ मुनिजी थे कुछ पीछे, गुरुदेव साथ होने को चढे दूरी में भी जव दिखे नही, सोचे पर राह गलत पकहे 126 मैं वाव रास्ते चल भून किया, गुरुदेव चले ढीमा पथ पर यह सोच पुन लोद सत्वर, पहुँचे ढीमा नहीं थे गुरुवर 127 जल विना मीन ज्यू तडफ उठे, उस दिन का मार्मिक वर्णा है अन य प्रेम गुरुभक्ति हो, सचमुच मणि जीवन धडरन है 128 आते ही लौटने लगे पुन मध्याह्न था अतिवडा तृतीय प्रहार पच्चवारण क्येि, गुरु दशन प्रग था बडा 129 सभी नागो ने बहुत कहा रुकना होगा ना जानो पाप मदिर दशन के बहाने से चलते ही बने जा पहुचे वाव 130 ताप हाल सुनाया सभी करुणा दृश्य- श्रद्धय दर्श पदस्पशन परके बीतक रगीन पडाल भी फीका पड़ा, बसन्त धीरान हुआ है अभी 131 पलभर रुकना मुझे कठिन लगा, मभी कैसे दिवस वितायेंगे यहा पहुचेगे तीन दिन बाद सारे ही मुरझा जायेंगे 132 सरल स्वभावी गुरुदेव यू महज से कहने रागे कैलाशसागरजी - साथ ही हैं वे मारा कार्य सभालेगे 133 सूर्य ग्रहण मे जाप ध्यान करने को मुझे मिला अवकाश स्वरक्षिर अक्ति निज विचार, भेजा मगलमय हो प्रवास 134 भाव - 72 ।
प्रव तक सब - । ढीमास्थित चतुर्विध संघ में, विषाद बादली छाई गहन साध्वीजी प्रेषित निम्न लिखित पत्र में है सारा वर्णन 135 हेमाक्षर लिखित हृदय स्पर्शी पत्र पूज्यपाद श्री गुरुदेव के पावन पदपद्म शतशः सश्रद्ध वन्दन स्वीकृत हो, हो, पृच्छा करती शाता बहुशः 136 ज्ञात नहीं अद्य कैसा सूर्य उदित हुआ तिमिर वर्धक प्रकाश पुज के दर्शन से, वंचित रहा संघ दर्शक 137 प्रतीक्षारत हम बैठे थे पलक बिछाये संध्या तक जरूर पधारेंगे, गुरुवर यह प्राशा लगाये 138 राठीजी द्वारा प्राप्त पत्र पढ़ धैर्य वांध टूटा है निराश खिन्नमन हुए सभी, हमसे ही दैव रूठा है 139 हृदयस्थ गुरुदेव ! गौर करे, ग्रहण तो आते रहेंगे जप जाप तो खूब किया है और भविष्य में भी करेंगे 140 फिलहाल आपका प्रमुख कार्य है एक सघ का संचालन क्या ! शोभेगा संघ आप बिना, नहीं होता शून्य का मूल्यांकन 141 वेमिशाल व्यक्तित्व तेरा, लाखों व्यक्तित्व समाया क्या अधिक निवेदन करें आपसे, क्यों हमको विसराया है 142 प्रफुल्लित मुख विकृत है बना, सब दिखते यहां उदास घण्टों की यह हालत करेंगे विश्वास 143 सर्वोपरि आपकी आज्ञा, निर्णय मान्य ही होता है किन्तु अभी अरदास हमारी मान्य करे दिल रोता है 144 अगर पधारे नही शाम तक तो यह प्रण भी है निर्णित नहीं करेगे गोचरी कोई, शशी विकास हेमा निश्चित 145 आप पधारे छोटे बापजी भी तो छोड़ के चले गए अकेले कैलाश मुनिजी करे भक्तितार से जुड़ा कनेक्शन, सुन लेना अन्तर आत्मा हो सन्तुष्ट सभी की, पधारो संघ सरताज 147 हेमाक्षर दिव्य विकाश शशि भावों को ना ठुकराना आधारस्तंभ हो इस संघ के, शीघ्रातिशीघ्र चले है चन्द प्राप " क्या उदास भए 146 आवाज है पाना 148 . - पदार्पण- संप्राप्त पत्र पढ़कर के पुनः निज विचारों ने मोड़ लिया प्रातः विहार किया पूज्यवर, भोरोल में संघ को दर्श दिया 149 . 73 नवजीवन संचार हुग्रा, गुरुदेव पदार्पण से सघ में सूय विकासी सघ कमल विवसित प्रमुदित हपिन मन में 150 घघुका नगरी शखेश्वर सकुशल संघ पैदल चलते, फाल्गुन तेरस को शपेश्वर फाल्गुन चौमासी पवपुनीत, दर्शन सप्राप्त पाश्व प्रमुवर 151 शश्वर नीर्य को पविन घरा सघ का दिन चार जहा दर्शन पूजन हुए भक्तिमग्न, ऐमा स्वरिणम अवमर कहा 152 आगे पहुचे जब माडल मे, भव्य समारोह था स्वागत का गुजरात प्रात की गौशाला मे, दूसरा स्थान रहा जिसका 153 प्रवेश हुधा, होल्लाम सामैय्या माथ वावीस साध्वीजी यहा मिले, गुरदेव जमभूमि विस्यात 154 प्रमुखाचाय यशोभद्रसूरि है नेमिसूरि समुदाय मे इस सघ में शामिल हुए थे, वे वरवाला गाव मे 155 वल्लभीपुरी वाचना से, ऐतिहासिक नगरी धन्य है पुस्तकास्ट सिद्धान्त किए गए महिमा जिसकी अन य है 156 देवद्धिक्षमाश्रमणजी से पचशत शिप्य वाचना लेते साकार दृश्य अति सुन्दर है, हम मुग्ध बने देखते 157 वल्लभीपुर मिहोर गागली पादि विभिन्न स्थानो में पुनीत प्रयारण हुमा सन्मान सभी ग्रामो में 158 सघ - मघस्थ मुनिवन्द प्रकाशस्तभवत् माग प्रदर्शन, पूज्यवर कातिमागरजी महासघ मे जो सम्मिलित रहे, प्रस्तुत नाम पूज्य मुनिवरजी 159 अतिवृद्ध मुनि साम्यानदजी और कल्याणसागरजी महाराज सार समाल करे सघ की प्रतिदिन कैलाशसागर मुनिराज 160 प्रेरक सन्देश रहा जिनका वे थे जयानद मुनिवरजी प्रनिपल सनिकट पूज्यवरके, शोभित ये मणिप्रभसागरजी 161 है बुद्धि प्रखर गुर निर्देशन से सारा कार्य सभाल रहे अल्पवयी मुक्तिप्रभजी का हर पल उनको खयाल रहे 162 कुशल सुयश विमलप्रभजी, भक्ति अध्ययनरत सारे सेवाभावी महिमाप्रभजी, गुरु महिमा गाते हर्पा रे 163 ललित नवीन चन्द्रप्रमजी है, पूज्येश्वर की बचाया तैरह ठाणा मुनिराज साव सकल हाया 164 सघ मन 74 साध्वी मंडल- संघस्थ साध्वीजी मडल का, प्रमुख नाम दर्शित है यहाँ विद्वानश्रीजी मनोहर मंडल, विकसित विकासश्रीजी है जहाँ 165 अकलश्रीजी और विदुषीरत्ना दिव्यप्रभाश्रीजी पाए सेवाभावी कोमलश्रीजी, शशिप्रभाजी रश्मि फैलाए 166 मदनश्रीजी आदि सवही साध्वीजी ठाणाथी चालीस तीनठाणा अचलगच्छकी दो ठारगा कृपाचंद ईश 167 का witte का तन मन महासंघ के प्राधारस्तंभ ! विशिष्ट प्रमुख संघपति भंवरलालजी बोहरा संघपति भंवरजी बोहरा का तो पुण्य निराला है पुण्यानुबंधी पुण्य वंधन, खुला तिजोरी ताला है 168 चित्तउदार गुरुभक्ति का रंग प्रगाढ़ छाया सोने में सुहागा, भंवर जीवन चमकाया 169 संपत्ति सव्यय करके दो दो उपधान कराया कान्ति गुरुवर निश्रामें धन कृत्य बनाया 170 धरा जननी, परिवार सारा है धन्य धन्य भवर जीवन, लाखों से स्तुत्य प्यारा है 171 गुरुदेव कृपादृष्टि में सदा भीगा रहता है तुम्हारा मन श्रद्धावनत गुरु पदधूली, पा करके महक उठा है चमन 172 सिद्धक्षेत्र की सभा स्वयं है तेरे स्वागत को संघपति जयध्वनि प्रसारित, उर्ध्व मध्य स्तुत्य आगत को 173 महासंघ के पुनीतप्राण, युग सभी गाये कर्तव्य महक पद अमर बनेगा, किन शब्दों में वधाये 174 धन्य धन्य धन्य उद्यत युग युग जीवो है संघपतियों की नामावलि उदारवृत्त का परिचय दे, महासंघ में स्थान जो पाये निम्नोक्त नाम संघपतियो के, उनकी भी शान बढ़ाये 175 कमलसिंहजी दुधेडिया, निवास स्थान कलकत्ता रत्नत्रयी के ग्राराधक जिनवाणी पर ही श्रद्धा है 176 छाजेड़ गोत्रीय संघपतिजी संघपतिजी वाडमेर के निवासी है जीवणमलजी' अरु लुणकरणजी', गुरुदर्शन अभिलापी हैं 177 बाड़मेर स्थित धर्मानुरागी पूज्यवर के प्रेरक प्रवचन से कर पाये जीवन विकास 178 . राठीजी, द्वारकादास4 - 75 मुत्तिमाल मराहना 182 सरतरगच्छीय महासंघ अध्यक्ष जवाहरजी राश्यान दिल्ली मणिधारी छाया मे, जन एक्ता पर है ध्यान 179 बाडमेर के पुरुषोत्तमजी, माहेश्वरी गुरुभक्त बने अजन है जिन अनुरागी, ऋषभ द्वार माल पहने 180 पाली के श्रेष्ठी लोटाजी, मोहनराजजी' श्रद्धावान मानव जीवन की सार्थकता हेतु द्रव्य किया बलिदान 181 पहननेका महत्व मेहताजीने जाना इदौरवासी कुन्दनमलजी सम्यग्भावो की देवगुरु की भक्ति ही नाहटाजी के मन भाया है मिश्रीलालजी शाहदा से मघ लेकर के प्राया है 183 चचल लक्ष्मी स्थिर बन जानी जिस घर में धर्मका वास धर्मप्रेमी जेठमलजी10 गोलच्छा रहते मद्रास 184 बाडमेर निवासी तीना का है भवरलालजी गोन बोथरा सेठिया:, डोमी', चल पाए सिद्धाचल धाम 185 ममृद्धि से पुण्यवृद्धि कर जीवन सफल बनाया नारायणजी14 सिधी वाडमेर, तीय महिमा गाया है 186 भव्यात्माग्रो ने सघपति पद प्राप्त किया प्राचार्यश्री की निश्रा मे मधसह सिद्धाचल यात्रा किया 187 नाम - है उपयुक्त है सघ के पुनीत चरण गुजरात मे दत्तकुशल गुरदेव कृपा से मानद मगल वर्तित नई चेतना पुनीत प्रेरणा, गुजराती सघमे वर्धित है 188 महासघ की महिमा और काति गुरुदेव के समन्वय से गुजरात की जनता नत मस्तक हो भक्ति किया सहृदय से 189 सानद लक्ष्य की मोर चरण, बढ रहा सघ का श्रेयस्कर धर्म जागृति करता हुया, प्रकाशपुज सरतर भास्कर 190 अद्वितीय सघ निजि विशेपता से श्रद्धा का केद्र बना लाखो लाखो जन स्तुत्य अवनि अम्बर परिवाप्त चौपन दिवसीय यात्रा क्रम मे, नितनए रग उत्साह उमग प्रसन्नवदन यात्रीजनका, सहृदय सत्कार मनमोहक सुदर मेलाका, घय दिवस निक्ट अब पाने लगा महासघ का स्वागत करने सभी लोगो का भाव बना 191 प्रेम दग 192 जगा 193 76 सिद्धगिरिवासी सभी कौमों ने करदी तैयारी प्रारम्भ अभूतपूर्व हो हो स्वागत जिसे देख पाए दर्शक अचम्भ 194 ग्यारह किलो मीटर मे, पाए हजारो नर नारी स्वागतार्थ गुरुदेव संघके मनमें प्रसन्नता भारी 195 - गुरुकुल में- प्रान्त स्वर्णिम सूर्योदय आज हुआ, धन्य दिन है प्रतीक्षित मनोहारा पालीताणा यशोविजय गुरुकुलमे, संघ विराजित शनिवारा 196 गुरुकुल प्रांगण में ठाठ रहा, विभिन्न कार्यक्रम से उसदिन गुरुपूजन संघपूजन प्रसंगानुरूप पूज्यवर उद्बोधन 197 विभिन्न देशभरके हजारों जैन वन्धु पाए बस कारों की लगी शासन शोभा को बढ़ाए 198 विस्तृत प्रांगण संकीर्ण बना, जन समूह के आगमन से साधर्मी वात्सल्य उपरान्त रात्रि आनन्द प्रवधित गायन से 199 बाड़मेर आहोर और मद्रास मंडल की गीत कला मस्त बने, विभिन्न वाद्य बजे तबला 200 कतार प्रभु भक्ति में ऐतिहासिक प्रवेश अद्य उषा धन्य . चैत्री शुक्ला शुभ दिन सातम, इतिहास समृद्ध बनाया है शासन सरताज कान्तिसागरजी, पैदलयात्री संघ लाया है 201 ऐतिहासिक प्रवेश महोत्सव की पुनीत घड़ियां मन भावन है प्राची ने लाली बिखरायी पावन है 202 लाखों भक्तों के अंतर में, आनन्द उर्मियां उछल रही अलकापुरी सम सज्जित नगरी मन ही मन मचल रही 203 महासंघ स्वागत मे अनेकों स्वागत द्वार सजाये गये ध्वजा पताका तोरण आदि दर्शनीय बंधवाये गये 204 वैभव समृद्ध अनोखीशान, स्वागत की शब्दातीत रही भारी संख्या मे उपस्थिति सभी कौमों की सस्मित रही 205 हर्ष हार माला का सर्जन, आनन्द की अवधि है कहाँ प्रसन्नता का क्या ! पारावार, अद्वितीय संघ प्रवेश जहाँ 206 सोनेरी उषा सर्व प्रथम संघ दर्शन करके गुरुकुल से प्रस्थित प्रातः में अतिभव्य जुलूस दर्शनीय मणि 207 पवनवेग से लहराता अति बाड़मेर के ऊँट हाथी रथ घोड़े शोभित है अनुक्रम 208 धन्य बनी उच्च इन्द्रध्वज सर्व प्रथम 77 जन ज्यु तारो का विशाल समूह भावनगर और वीजापुर की वैण्डपार्टी भी थी अनुपम गगनभेदी मधुर स्वर लहरी मुनने को लालायित मन 209 विभिन्नप्रात की भजन मडली नृत्य गीत में लीन ने प्राग तुक दर्शनार्थी सघ यात्रीगण नमवद्ध बने 210 सघयाना के नायक दृढसकल्पी कान्तिसागर गुरुवर शिष्यवृद सहशोभ रहे में निशाकर 211 निथाप्राप्त सस्मितपदन साध्वीजी एक्मी आठ क्लश को लिये महिलाए मगल नाच्छि ग्रह 212 भव्य रजत रथ शोभित प्रभुजी, अमाप मेदिनी मानव की जय जय हो महामघ सघपनि निधादाता गुरदेव की 213 सभी गच्छ समुदाय शिरोमरिण गणिवय मुनि मार्याजी प्रवेश जुलूम में सम्मिलित हो एक्त्व भाव दर्शायाजी 214 मुख्य मार्ग पर नाच रहा उत्माह स्वतन अाज बनकर स्वागत कर रहे मप सभी जाति सस्था जैन जनेतर 215 वारी गली चौक कहीं भी दिग्वता वाली स्थान नही भारी भीड दशक की नजरें ढूढ प्रश्न विराम वही 216 चौपन दिवसीय पदयात्रा के यातिक सधपति से । निश्रादाता गुरुदेव श्री के दशनकर दर्शक हर्षे 217 मनमोहक भव्य बिराट् जुलूस, जव प्रमुख मार्ग मध्य प्राया पुष्पवृष्टि की अपूर्व शोभा, स्वागत शान को बढाया 218 प्रमुख अतिथि मणिलालजी महामघपति का मत्कार भावभरा अभिन दन करके पहनाया सुदर पुष्पहार 219 महाकौशल मूर्तिपूजक सघ ने भी पुष्प वर्षाये महावीर सिक्का बीपल और हार भेटार हपये 220 भक्त हृदय की मगल भावना गुरु चरणो मे वहने लगी कलात्मक गहुली ढेर जहाँ मनको पार्पित करने लगी 221 विधिपूर्वक वदनकर भक्ति से मुमन चढाया गुरदेव को, से 222 जयध्वनि मे नभ गूज उठा, प्रादर्श अनोखा दृप्यमान नजरे जो टिकी फिर हट न ममी नाखो जिहा से स्तुत्यवान 223 पादलिप्तपुरी का वैभवमय म्वागत और हार्दिक समान वानिपूर्ण महासभ नमर्पित, भक्ति भाव अपूर्व महान् 224 श्रद्धा परमोपगारी पूज्य अक्षत ववाया 78 पर हाथी के हौदे बैठे ताराचंदभाई रेवावहिन नकदी रुपयों का निछरावल जुलूस किया उदारमन 225 तीर्थाधिराज सिद्धाचलस्वामी, आदीश्वर प्रभु की जयकार निश्रादाता महासंघ प्राण गुरुवर असीम तेरा उपकार 226 कर्णप्रिय नारों की झड़ी कोई गाने लगे गुणगान कड़ी स्पन्दित प्रारण हुए सभी के रोम राजी साडातीन कोड़ी 227 आनन्द विभोर बनी है जहाँ, अथक अमाप उत्साह रहा हर्षसागर मे डुबकी लगाकर ऐतिहासिक यात्रा प्रवाह बहा 228 स्वयसेवक सुन्दर ढंग से, व्यवस्थित जुलूस बनाये रखे अभूतपूर्व कान्ति मनोहर स्मृतिपट अंकित जीवन्त बने 229 अव विराम का प्रथम स्थान 'माधोलाल मे सुमति जिनालय कान्ति स्वर मे प्रभु स्तुति पश्चात् प्रदक्षिणा तीन वलय 230 चैत्यवदन विधि दर्शन करके चले गुरु स्थल हरिविहार स्वर्गस्थ हरि गुरुवर सन्मुख भेट कान्ति का हार 231 हरिसागरसूरि ज्ञानमदिर मे नूतन निमित हाल द्वारोद्धाटन किया केवलचंदजी खटोड हरि विहार ज्ञान मन्दिर मे जुलूस सभा का रूप लिया सचोट प्रवक्ता प्राचार्यप्रवर की वाणी ने मत्रमुग्ध किया 233 महत्त्व है क्या ! सघयात्राका, सामाजिक धार्मिक आध्यात्मिक संक्षिप्त विवेचन सुन्दरतम, सिद्धिगिरि के परमाणु सात्विक 234 महासघपति भवरलालजी सर्वोच्च वोली मे लाभ लिया श्री जिनहरिसागरजी की मूर्तिको विराजमान किया 235 श्रद्धा का मद्रास का 232 मुख्य अतिथि सघशिरोमणि तथा संघपतियो पूज्यवरको चादर का हुया सन्मानजी अोढाये राक्यानजी 236 सभा विसर्जन पूर्व किया गया घोपित निरिणत कार्यक्रम गाम धुपाड़ा बन्द आज है फले चुनडी का आयोजन 237 धर्मनिष्ठ मणिलालजी डोसी, समाजसेवी उदारमना फले चुनड़ी का लाभ लिया है संघ स्वागतार्थ कृत पुण्यघणा 238 दोपहर मे सघ की बैठक सन्मान समारोह रात्रि मे सभा विसर्जित हुई स्वय सेवक जुटे है खात्रि में 239 मिलापचन्दजी गोलेच्छाजी निष्ठातः कार्यमग्न वने सराहनीय सहयोग दिया है सहर्प श्री हीराभाई ने 240 79 रह 241 अविरत परियम के कारण प्रायोजन सय सफर रहे सहयोगी काकुभाई और बालुभाई वक्त सफल आयोजन फले चुनडी का जनजन मे चचित है महापुरुषो की शक्ति मे ही ये विराट् काय समवत है 242 गुर गौतम की लब्धि निधि दादागुरदत्त कुशल कर्ता गौरवमयी परम्परा हरि की विस्तृत रश्मि पान्ति वरता 243 तृतीय प्रहर भान मदिर परतर गच्छीय सम्मेलन राक्यानजी की अध्यक्षता मे महासष विचार मिनन 244 अध्यक्ष महोदय ने महामघ के उद्देश्य को बतलाया सगठन मे सहयोग अपक्षित युगकी माग समभाया 245 शिक्षासमिति रिपोट को दिया प्रातमजी ने प्रस्तुत पारममलजी के विचारो में दशित गुरुभक्ति का पुट 246 कुशल जम शताब्दी अागामी फाल्गुन में मनाने यो मार्गदर्शन सहयोग अपने गटसिवाना को 247 वाडमेर कलकत्ता बालाघाट वडोदरा वासी प्राग तुर गणमान्य जनो ने ममयोचित भाव प्रवाशी 248 दत्तीसगट मनोहरपीजी का मुन्दर प्राह्वान रहा तन मन धन से गुर भक्ति मे जुट जाए यह सारा जहाँ 249 विदुपी साध्वी हेमप्रभाश्रीजी का प्रेरक उद्बोधन अतीत पृष्ठ सरतरगच्छ की वर्तमान स्थिति का शोधन 250 मणिलालजी ने बतलाये বারি स्थाई कोप की रकम बढाई कई लोगों ने वर्धित राशि उद्घोष की 251 खरतरगच्छ महामघ सजन में सहयोग करे आश्वासन के माध जयध्वनि गू जित हुई विराम घरे 252 उपवन, द्वार 253 रात्रि मे अभिनन्दन समारोह सुशोभित और परम पवित्र पालीताणा का हरि विहार रग विरगे ध्वजा पनामा से दर्शनीय स्वागत प्रशसनीय रोशनी विद्युत् की माला पहन किया शृगार राजमहल की तरह दीपता, प्यारा प्यारा हरि विहार 254 निशा ज्योतिमय नान मदिर अभिनदन काय प्रारम्भ हुआ पूज्य प्रवर गरमाय अय ममी योग्यस्थान को प्राप्त किया 255 80 समारोह जर नेता देवेन्द्रराजजी मुल्य निरि चीन इन्जिनियर जैन दुर्गाक्षसजी 256 प्रार्थना लघुमुनिवृन्द लघुमुनिवृन्द ने फरमाया स्वारगान की नरवनि विशाल हाल को गुजाया 257 नहाने के प्रेरक नायक प्राण तुम्ही कान्ति प्यारे हरतरगन्छ नहाथ दिशादर्शक अभिनन्दन स्वीकारे 258 अखिल भारतीय जैन संघ को गुरुवर तुमपे नाज है अनुमोदन कर रहे हृदय से जैन संघकी आवाज है 259 महासंघपति भंवरलालजी बोहरा का अभिनन्दन जिनके सन्मुख सर्व भाव दर्शाया कान्ति विचार करने हड़ संकल्प समय में वृहत् कार्य को मूर्तरूप देने वाले महासंघपति मनस्वी भंवर बोहराजी आले 261 पुष्पहार द्वारा महासंघने बोहराजी का किया महाकार्य स्मृति निम्न लिखित अभिनन्दनपत्र किया प्रदान 262 प्रथम यात्रा साकार बनाया। 260 अल्प सरल सन्मान जिन शासन अभिनन्दन पत्र प्रज्ञापुरुष कान्ति गुखरजी वरदहस्त है है सुखकारी महासंघ के कीतिस्तंभ भंवरजी वोहरा संस्कारी 263 कृत सेवा महान्, अमूल्य सदा अनुकरणीय समाजरत्न कर अर्पित है प्रशस्तिपत्र यह संस्तवनीय 264 हे दानवीर ! दिलदरिया मे विस्तृत महासघ सगाया है तन मन धन सब कुछ अर्पित कर जन गर्ग गी गान महागा। 205 महासंघपति पद भूपित हप Pun तिमार मरुधर भूमि बागेर मन प ग JSTI RE IT. Ph गुरुभक्त तव श्रद्धा केन्द्र ने शुगमपान गरेका खरतरगद मरताज कान्तिगागरजी रोमा गुमन सुवागित हृदयवाटिका का दर्शन भास्था र प्रगाढ़, रंग गुरु कृपा ही रहा 2018 मिनार गल है वितः और गनमयूर भी नागाला प्रथामि गिजित भवरवाग ६.शा कान्ति गत माग है, गगहनीय गन्दमगि गुरुवर अनमोल ६ ग धर्म सवा में खर्च किया दिल खोल 270 दांना अनृटा 269 81 हरि विहार निर्माण वाय में प्रापिप योग दिया भारी नाकोडातीयं अभूतपूर्व उपधान पराया दो वारी 271 व्यक्तित्व प्रसर पहुं त्व सफल, भारत गौरव यो बढाये विदेशो मे स्थान मिला उद्योग प्रसिद्ध पाये 272 धार्मिक सामाजिक व्यवहारिक विभिन्न क्षेत्रों को सभाले श्री प्रसन्नता स्वउदारता से सबको सुश कर डाले 273 है शब्दकोप सीमित असीम पृति को दर्शाना शक्य रहीं मानवता के मधुर मगायक भवरजी स्वागत प्रद्य यही 274 जैन सघ प्रेपित शुभेच्छा तुम जीवो वप हजार हार्दिक अनुमोदन अभिन दन कर लेना स्वीकार 275 प्रस्तुत है डोसीजी का स्वागत फले चुनही का प्रायोजन करने वाले दिल्लीवासी प्रसिद समाज सेवी उदात्तमन हैं मणिलालजी होसी 276 सघपति पद प्राप्त किया जनेतर जैन पद्रह व्यक्ति परिचय पूब मे दिया गया सघपति जीवन अभिव्यक्ति 277 उपरोक्त नामी भव्यात्मानो का, भावभरा समान हुमा खरतरगच्छ महासघने पहले पुष्पहार प्रदान दिया 278 स्वागतकर्ता प्रमुख शहरो की नामावली सराहनीय सत्कार समिति हरि विहार विश्रुत है 279 अध्यक्ष चपालालजी मत्री पारख शान्तिलालजी कोपाध्यक्ष मुकनचदजी, सेवारत भगवानदासजी 280 मद्रास जयपुर बडौदा वम्बई सघ प्रतिनिधि थे बलिहार अहमदाबाद वाडमेर रायपुर प्रादि जगह से हुपा सत्कार 281 अदम्य उत्साह तरगो से वातावरण था प्रतिरम्य पदयात्रा समिति का स्वागत अनुपम और दशनीय 282 अनुयोगाचाय गुरुवरजीने नवनीत दिया जिनवाणी सम्यग् श्रद्धा यदि नही उद्धार कहां फिर प्राणी का 283 ड्राइवर डॉक्टर के उद्धरण दे बोले अटल विश्वास रहे देव गुरु धर्म मे प्रास्था, जीवत जबतक श्वास रहे 284 घम देशना बाद प्रापने मांगलिक फरमान किया तीथपति जय ध्वनि प्रसारित हुई रात्रि विश्राम लिया 285 का 82 शिखर यात्रा एवं संघमाल आज का चौपनवां दिन महासंघ यात्रा का प्राण गा अष्टमी सोम मंगल प्रभात, सिद्धाचल का ध्याग पा 286 कैसी अनमोल है शिखर दर्श की प्रतीक्षित पावन पडिया एक दृश्य पर्वत का देखा, खिलने लगी हृदय गालियां 2.87 नयनों में झांखा निद्रा ने, मिला नहीं पर स्थान ही उत्तुंग शिखरस्थित आदिदेव में अर्पित সা वही 288 बाजे गाजे संघ चतुर्विध, संघ शिरोमणि साथ ग हरि विहार से तलहटी पहुंचे स्वर्ण अक्षत लिये हाथ में 289 भक्तिपूर्ण हृदय से संघने गिरिराज को बधाया पावनरज सिद्धगिरि मस्तक धर, जन्म कृतार्थ मनाया 290 तलहटी चैत्यवंदन विधि करके, हर्षोल्लास सह गिरि पर पावन पुनीत परमाणु स्पर्शतः, निर्मल भव्य भाव उमटे 2.91 अष्टकर्म की काली घटाओं से पाच्छादित है ये जीवन तारण तरण देव दर्शन से ही टूटेगा फर्म वन्धन 292 जीवन के विश्राम मेरे तुम, शरणागत पे कृपा करना शून्य हृदय सर्जन होगा फिर बुमा दीप प्रदीन बना 293 प्राण पंछी के पंख प्रमु वन्दन मश्रित्य मना अधूरे स्वप्न करने प्राणा मूर्य प्रमाग बना 294 उच्चशिखर स्थित दूर हो स्वामी ! पर सुन हदय के अनिमाप पगथिये चढ़के पहुंचे, खरतर बगही दका पात्र 295 खरतरगच्छ, शृंगार हार, ई, युग प्रधान द्वारा गुम्देव श्री दिनदन्त जुगलमूरि बरगा पादुका दर्गर किया गंटर 296 हृदयस्थित प्रत्यक्ष प्रभावी, बिनपावर, ये गम्याग, निविघ्न यात्रा महागंधी युगल या प्रमाग 297 बरतन्द्रमदि, गुरुवन्दन न्यदन दिया नाटय में प्रामा किरा की बाट नकार पहर गमी मदद में 292 में मधुर दन्टा का TITI चादकः बाटि मियन महान भामा दमन 387r 209 प्रागना प्रष्ट river में मानस ट्रान की ५५ पाद: 2017 R, घर मा मीद द्र दिया भाव साकार टाटा A - 13 अतर्नाद सुवासित माला समर्पित चरणे आदीश्वर भावो के आवेग से स्वत मुसरित हुआ भक्तामर 302 द्रव्य भाव विधि पूजन करके माता परिधान के लिये सभी वाह्य प्रागरण सुशोभित महल योग्य स्थान पा लिये तभी 303 स्मित रेखा विखरी चेहरों पर निश्छल नयन निहार रहे कृतार्थता का परम गान सह मुक्ति माल बलिहार है 304 धार्मिक उपकरण लिये सघपति हुए मालारोहण अभिमुख किया का प्रारम्भ किया पूज्येश्वर प्रतिमा समुस 305 भाग्यशाली कलकत्तावासी कमलसिंहजी दुधेडिया प्रथम माल पहनने का सौभाग्य जिन्होने प्राप्त किया 306 विधि सहित इन्द्रमाल सभी सघपतियो ने पहना सप्रेम पुनीत तिथि की यादी मे यथाशक्य लिया व्रत नेम 307 सघमाल गिरिराज की याना मे अपूर्व आनन्द रहा दादा गुरुदेव की पूजा मे भक्तिरस धार प्रखड वहा 308 हर्षपूर्ण पूर्णाहुति के पश्चात् सभी नीचे पाए प्रायोजित स्वधर्मी भक्ति व्यवस्थित अनुकूलताए 309 फिल्म दिखाई गई रात्रि मे हरि विहार के हाल मे मणिधारीजी अप्टम शताब्दि उत्सव आया त्याल में 310 विदाई सद्गुण माला' सघ विशाला, श्राकपक जादु डाला उज्ज्वल पृष्ठ निर्मित इतिहास की जडित शब्द मणि माला 311 प्रमरगान का दृश्य आखिरी विदाई की तैयारी सावन भादो की वर्षा से भीगा मधुर हृदय क्यारी 312 नवपल्लवित सघ उपवन स्मृति दीप कभी ना वुझ पाये नियमावद्ध नरनारी, अनुमोदन कर हर्षाये 313 सघयात्री सेवाभावी जन सामान्य सेवक वर्ग सभी सभी का महासघ ने किया तभी 314 प्रसनता और विरह दग्धता दोनो अनुभव साथ लिये मगलवाणी गुरु मुख से सुन यात्रीगण प्रस्थान क्येि 315 - यथायोग्य सन्मान 84 महासंघ निश्राप्रदाता पू० गुरुदेव अनुयोगाचार्यजी म० सा० को संक्षिप्त जीवनी गुरुपद सेवा तप महासंघ निश्रादाता गुरुदेव जीवन परिचय प्रेषित जन्मभूमि राजस्थान रतनगढ़ उन्नीससौ अड़सठ संवत 316 एकादशी माघकृष्णा सोहनदेवी मन हर्षाया सिघी मुक्तिमलजी कुलदीपक जन्मोत्सव मनाया 317 होनहार के शुभ लक्षण दर्शित थे बाल्यावय से ही वैराग्यरंग भीगा जीवन भौतिक व्यामोह मे फंसा नहीं 318 खरतरगच्छाचार्य हरिसागर सूरिश्वर पद अनुरागी अल्पवय मे दीक्षा लेकर तेजस्वी बाल बना त्यागी 319 कान्तिसागरजी नामकरण हुअा ज्ञानार्जन मे हुए तल्लीन तीव्र बुद्धितः अल्प समय मे विभिन्न विषय मे हुए प्रवीण 320 शासन प्रभावना मे सदैव प्रवृत्त रहे बीकानेर मे मासक्षमण करके भी अप्रमत्त रहे 321 राजस्थान लोहावट मे ज्ञान भंडार किया व्यवस्थित हरि गुरुवर की छाया. मे कान्ति सश्रद्ध थे समर्पित 322 उपधानतप सम्पन्न कराया सचेतीजी द्वारा आयोजित दो हजार पाच में हुवे अनुयोगाचार्यपद से विभूपित 323 पायधुनि स्थल दो हजार छै कठोर वज्ञाघात हुआ परम प्राराध्य हरिसागरसूरिश्वरजीका स्वर्गवास हुआ 324 टूटे दिल पर बोझ पड़ा सक्षम हो कर्तव्य वहन किया मेड़तारोड मे आपने पूज्य हरि चरणपादुका स्थापित किया 325 भारत के हर प्रान्त में विचरण करके किया धर्म प्रचार मधुर प्रखर प्रेरक प्रवचन से मुग्ध वनी जनता दरबार 326 विभिन्न विषय पर कई क्षेत्रों में पब्लिक प्रवचन सहस्र हुए पच्चीस हजार प्रति प्रवचन मे सुन सर्व प्राकृष्ट हुए 327 जगह जगह मन्दिर की प्रतिष्ठा उद्यापन सम्पन्न किये आर्वी भांदक गंटुर में उपधान आयोजन सफल किये 328 जैसलमेर यात्रार्थ पधारे पैदल यात्री संघ लेकर कापरड़ा केशरियाजी संघ साथ पधारे थे गुरुवर 329 तीर्थ नाकोडाजी मे गुरुवर छ उपधान कराये है वाड़मेर संघ मे नई जागृति लाये हैं 330 ग्राप ho 85 सुनाया 333 रहा 338 दो हजार छब्बीस मे प्रापने क्लकत्ता चौमासा किये अपार हर्ष सागर की तरगे परिलक्षित इस व्यास लिये 331 मधुर करणप्रिय देशना सुनने को लालायित मन अमाप मेदनी मानवकी, एकाग्र हो सुनते प्रवचन 332 तन मन धन से श्रुत भक्ति कर भगवती सूत्र वोहराया श्रीसंघ के समुख गुरुवरने भगवती सूत्र सहज सरस शालिय सरलता भाषा अनुपम थी प्यारी मर्मस्पर्शी प्रतिवादन शैली, विद्वद् चकित हुवे भारी 334 पयुं पण में घूम मची तपस्या का पारावार नहीं स्वधर्मी भक्ति जुलूस पूजा प्रभावना की भरमार रही 335 ग्यारह हजार की चोली लेकर पूज्य लुचित वेश मेले गुरु भक्त श्री परीच दजी सेवा मे सदा रहे पहले 336 एकसी सोलह तपस्वीजन का सामुहिक सन्मान हुमा अप्ट तपस्वी मासक्षमण के स्वहार प्रदान किया 337 तपस्वीजन के स्वागत में कई प्रभावनामो का ढेर जहाँ सुनहरा मन भावन अनुपम आयोजन दर्शनीय पुण्यभूमि शिखरजी की और गुरुदेव की निश्रा मे उपघानतप करवाने का निर्णय लिया श्रीसघने 339 प्रवरणनीय उपकार सभी कलकत्ता सघ न भूलेगा प्रसन्नवदन उदार हृदयी की पुनीत स्मृति में भूलेगा 340 चातुर्मास समाप्ति के उपरान्त पधारे शिवरजी भव्य अाराधना उपधान की करवाये कान्ति गुरुवरजी 341 यथासमय अनुकूल व्यवस्था तपस्वीजनो की भक्ति से निर्विघ्न सम्पन प्रायोजन गुरुदेव की पावन शक्ति से 342 एक लाख एकावन हजार में प्रथम माल बोली लेकर रतनचदजी मोघा ने लाभ भक्त प्रवर 343 हजार सत्ताइस आप पधारे दिल्ली जी अष्टम शताब्दि महोत्सव मणिधारी दादा गुस्वर की 344 वृहत् समारोह आपको नियामे सानद आपकी सचालन क्षमता ने पूर्ण श्रेय सप्राप्त किया 345 दो हजार तीस प्रासाढी कृष्णा सप्तमी दिन प्यारा वालमुनि मणिप्रभमागरजी ने सयमपय स्वीकारा 346 लिया सवत् दो सम्पन्न हुआ 86 पच्चीससौवीं निर्वाणतिथि उत्सव पूर्वक मनाने को महावीर निर्वाण भूमि पावापुरी दर्शन पाने को 347 उग्र विहारी पहुँच समयपर सारा कार्य संभाला सर्व संप्रदायों से समन्वयता का भाव विशाला 348 शान्ति से सहयोग प्राप्त कर, उत्सव को चमकाये राजनैतिक और पारस्परिक सारे उलझन सुलझाये 349 जैन जगत के उज्ज्वल नक्षत्र ज्योतिर्मय गुरु प्यारे युगों युगों तक मार्ग प्रशस्त तुम करते रहो हमारे 350 यह नवीन एक समीक्षा वर्तमान युग कायाकल्प किया एक सामयिक संकल्प ने आराधना का भाव जगाया, चौपन दिवसीय महासंघ ने 351 संघयात्रा की समीक्षा में इतना ही कहना बस होगा धर्मकार्य के साहस में यह नवीन दिशादर्शक होगा 352 राष्ट्रवादी समाजवादियों की नजरों को खोल रहा धर्मवादी अनादि कालीन परम्परा को बोल जैनेतर के जीवन में भी जैनत्व का संस्कार चढा तीन संघपति है अजैन भी पदयात्रा का भाव उमड़ा 354 प्रभावक परिचय जिन पथ का लाखो लाखो लोगो ने जाना पुनीत संघ यात्रा किये अमर गाथा हरदम माना 355 आर्यत्व का संस्कार जगाने मंगल घंट बजाया है जन से जिनपद पाने का पावन संदेश सुनाया है 356 रहा 353 का समापन प्रातःस्मरणीय पूज्येश्वर प्रेरक आशीर्वाद मिला आपके शिष्य पूज्य मणिप्रभजी से अनुभव वर्षात मिला 357 मनोहर अभिव्यक्ति महासंघ की सश्रद्ध समर्पित स्वीकारे दो हजार सैतीस शुक्ल चैत्री दिन रविवारे 358 ऐतिहासिक विराट् आयोजन निर्विघ्न कान्ति गुरुवर की क्रान्ति से प्यारा खरतर चमक सातम सम्पन्न भया गया 359 000 87 ऐतिहासिक महासंघ और उसके प्रेरणादाता लेखिका 'अनुनय शिशु जो कुछ है म० सा० । शासन के सुविशाल नम म सूय बने हुए मनस्थ भावो को पनपने मे परम प्रवीण है जो अनेकों भव्य कमल जिन प्रभालोक मे मुद्रित हुए देखने से अधिक बोलने लगते हैं श्वेत शुभ्र वस्त्रा शासन के महान कार्यों के पत्लवन मे अगाध से समाच्छादित प्रभावकारी एव जादूभरा बाहरी प्रेरणास्रोत रत्नत्रय के अनुराग से प्रोतप्रोत व्यक्तित्व है, पूज्य गुरुदेव श्री का जो उनके ज्ञान को गभीरता, विचारों की तेजस्विता प्रान्तरिक विशुद्ध व्यक्तित्व का निर्दोष प्रमाण है- और प्राचार की निर्मल निष्ठा से प्रदीप्त सादा जीवन उन्च विचार-Simple living and महान् व्यक्तित्व के धनी भगवत्स्वरूप गुरु-परम्परा high thinking के वाहक रत्नत्रय की कान्ति से कान्तिमान् विश्व- क्षितिज पर प्रकाशित है–सन्त गिरोमणि, गुरुदेव श्री यात्मिर अहम्म यता में कोसो दूर समन्वय साधन, प्रनापुरुप, सवतोमुखी प्रतिभा- है। कई बार उहे कहते सुना है कि- मैं कुछ मम्पन्न, अनुयोगाचाय पूज्य गुरुदेव कान्तिसागरजी नहीं हू-मरा कुछ नहीं है जो कुछ हो रहा है वह गुरुदेव का ही प्रभाव है उही की कृपा का सुपल है। मच है, मतता पूज्य गुरुदेव की समदर्शिता, मदाशयता महानता इमी का ही तो नाम है जहा मह शालीनता, प्रवरविद्वत्ता, उदारता, विशालता, की सारी दुरभिघिया निष्फल हो जाती हैं । निष्पक्षना, प्रवचनपटुता प्रवुद्धजागरवता के परि- उनका यह उदात्तस्वरूप सभी का अपनी पोर रणामस्वरूप जन-समाज म ही नहीं, इतर समाज के वरवस प्राकृप्ट कर लेता है। लोक-मानस पर भी उनके गरिमापूरण व्यक्तित्व और कृतित्व की गहरी छाप है। उनका सरन, उगता है वक्त त्वशक्ति प्रवचन पटुता निश्छल, बहुआयामी व्यक्तित्व प्राज जैन ममाज के उन्ह अपने महज पूर्वगत मस्कारो से सप्राप्त हुई आक्षण का प्रमुख केंद्र है। है। अद्भुत है उनकी वाणी का अजस्र प्रवाह, जिसमे श्रोतागण उमज्जन-निमज्जन करते हुए भरापूग शरीर कान्तिमय अघाते नहीं हैं । अपने प्रवचन मे वे जिस किसी भी स्निग्धश्यामवणं, मधुरमुस्कान एव प्रपूव शाति विषय को छू लेते हैं, फिर वह कठिन से कठिन भी से दीप्न मुख-मण्डल, विशाल भाल उन्नत-चक्ष स्थल, विपय क्यो न हो, प्रलम्बवाहु, सिर पर विरल और धवन केश राशि, क्यो न हो, उसे नयी दृष्टि पुरानी से पुरानी भी घटना उपनेत्र में से चमक्ते तेजोमय नेत्र, जो दूसरो के एक विलक्षण कलाकार की तरह रगो का अद्भुत लम्बा क्द, नया मोड देकर 88 सवत् 2017 अनूठा मिश्रण प्रस्तुत कर उसे चरम-शिखा तक बोलिया आज भी कीर्तिमान (Record) है। पहुचा देने की अद्भुत क्षमता एवं सहजयोग्यता जैनधर्म, दर्शन, जैनत्व और जैनसिद्धान्तों के है। तात्त्विक बनाने के साथ जीवन को सात्विक बनाने के प्रति उनकी अन्तर्रेरणा अधिक रहती प्रचार-प्रसार हेतु वे स्वास्थ्य और सुविधा की है । नैतिकता, संयमनिष्ठा, सासारिक सुख वैभव परवाह किये बिना महान् से महान् कष्ट झेलने को सदा सहर्ष तैयार रहते है । की तुच्छता, सम्यग्दर्शन की महिमा आदि समय- समय पर आपश्री की वाणी से प्रतिध्वनित होते की बात है जव कुछ रहते है । मानवीय मूल्यों के प्रतिष्ठापक गुरुदेवश्री मतविस्तारवादी लोगों के कुचक्र के फलस्वरूप के प्रवचनो को सुनने के लिये जैनेत्तर भी उतने ही बाड़मेर क्षेत्र में दयादान और मूर्तिपूजा विरोधी लालायित रहते हैं। आगम की पक्तियों के साथ प्रचार जोर-शोर से चल पडा था, सैकड़ो लोग उस स्थल-स्थल पर गीता, महाभारत, रामायण, भ्रामक प्रचार से राह भटक गये थे। तभी कुछ स्मृतियां, कुरान, पुराण और बाईबल के उद्धरणों धर्म-प्रेमी लोग, पालीताणा में ससमुदाय विराज- से प्रमाणित धार्मिक और नैतिक विश्लेषण मान प्रखरवक्ता प्राचार्यदेव वीरपुत्र श्री आनन्द- श्रोताओं को अपनी बात हृदयंगम कराने में पर्याप्त सागर सूरिश्वर जी म० सा० के पास पहुचे और है । वक्तृत्व के साथ-साथ स्वर-माधुर्य, गायन-कला सारी स्थिति से पूज्यश्री को अवगत कराया । भी आप में सहजसिद्ध है । प्रसिद्धयोगिराज, स्थिति को सम्भालने के लिये एक ऐसे व्यक्तित्व अध्यात्मनिष्ठ अानन्दघनजी के पदों के आप अच्छे की आवश्यकता थी जो आगमों का ज्ञाता, तत्त्वों गायक और व्याख्याता है । कई-कई दिनों तक एक का वेत्ता, समर्थ तार्किक, व्यवहार-कुशल, निर्भीक, एक पद पर आपके व्याख्यान चलते रहते है । समयज्ञ एवं सर्वतोमुखी प्रतिभा सम्पन्न हो। सूझ- व्याख्यान के बीच जब आप अानन्दघनजी के पद बूझ के धनी, मानव प्रकृति के सूक्ष्म पारखी या प्रसंगानुकूल अन्य पद गाते है, तो श्रोता आपकी आचार्य श्री ने इस दायित्व के निर्वाह के लिये सभी भाव-प्रवण स्वर लहरी से मन्त्र-मुग्ध हो असीम दृष्टि से आप श्री को सुयोग्य समझकर बाड़मेर आनन्द से झूम उठते है। तथा गुरुदेव के स्वर में जाने का तुरन्त आदेश दे दिया। पालीताणा........ स्वर मिलाकर स्वय गाने लग जाते है । कलकत्ता और........बाड़मेर ! एक लम्बा अन्तराल ! सिर्फ जैसे महानगर मे मुर्शिदावादी वाबूलोग जो कि 20 दिन का समय ! किन्तु सन्त ! सन्त जीवन आधुनिक युग के धन्ना सेठ है उनका 10-10, अपने लिये नही पर के लिये होता है। वह अपने 15-15 माइल से व्याख्यान श्रवणार्थ नियमित रूप सुख की........अपने आराम की........अपने स्वार्थ से ठीक समय पर पहुंच जाना, कभी उपाश्रय की की चिन्ता नहीं करता। वह सदा-सर्वदा दूसरों के तरफ न आने वालो का भी नित्य पाना गुरुदेव की हित मे लगा रहता है । वह प्रकृति की तरह उदार वाणी का ही जादू है। यही कारण है कि जिस भाव से विना मांगे विश्व को सुख-शान्ति और सत्य क्षेत्र में प्रापश्री का पधारना होता है-वही प्रभु- की राह दिखाता है । वह मेघ की तरह एक दिशा भक्ति, तपस्या, उपधान, संघपूजन, स्वधर्मीभक्ति में नही, दसों दिशाओं मे शत-शत धारा से बरसता अनुकम्पादान, विविध अाराधनायो की झड़िया लग रहता है । सन्त जीवन कुल मिलाकर बहुजनहिताय जाती है। निर्वाणशताब्दी में आपश्री की निश्रा और बहुजनसुखाय का अन्तर्घोप है। बस फिर मे हुई मोदक चढाने की बोलियां तथा सम्मेत क्या था अपने अनन्यसाथी प्रखरविद्वान् मुनिरत्न शिग्वर महातीर्थ मे हुई उपधान की माला की श्री दर्शनसागरजी म.सा. के साथ अनन्तसिद्धात्मायो 89 4 को भाव-नमन करते हुए प्राचायदेवेश का मगन भवरलालजी माह्य वोहरा ने । गुरुदवयी के आशीर्वाद ले, मिद्धक्षेत्र से शीघ्र ही प्रयाण दिया । तेनम्बी नेतृत्व और युगल मागदर्शन मे टम याचना भून्य प्यास ...शीत ताप सुख और मुविधा की ने सासारता ग्रहण की। 2037 की माघ शुक्ला परवाह किये बिना, बडे प्रसन-भाव मे आगे से पूणिमा को मगल घटी मे याहमेर मे इस आगे बढते जा रहे थे। सूर्योदय से सूर्यास्त तक ऐतिहासिक सघ या महाप्रम्यान हुआ । प्रत्यान रे एक ही लक्ष्य था चरवेत्ति चरैवेत्ति । सिफ दृश्य को दिव्यता और भव्यता दखने हो 17 दिन में ही वाडमेर । फिर तो प्रवचनो और बनती थी। चर्वाग्नी का वह दौर चला कि अज्ञान का प्रावरण वासना के वश हो याज तर आत्मा ने मनन्त टून-टूक हो गया । हजाो आत्मा अज्ञानाधकार में भव व्यर्य सोये । अव मुकृतो के फलस्वरूप प्राप्त भटकने मे बच गये। जो भटक गये ये उहँ माग मपत्ति का भी विषय-यासनानी के पोपररा म व्यय मिल गया। कितनी अद्भुत कितनी अनुपम. रिया । जीवन में परम-घ्पेय को भूलकर माया क्तिनी महान् है यह शासनसेवा । क्या वाडमेरवामी मरीचिका के जल से तृप्त होने के प्रयानो म गुम्देव श्री के इस उपवार को कभी भूल मकेंगे? अनन्तराल वरवाद दिया। न मालूम क्सि जम धम से अनभिन उस क्षेत्र में प्राज धर्म-ध्यान वे सचित मुश्ती के परिणामस्वरूप सद्गुरुओं का और साधना का जो मगल प्रवाह बह रहा है । यह है और प्रात्मा सत्श्यिा का कर्ता बनता है सुयोग मिलता है ये प्रति श्रद्धा जगती सद्धम मव गुरुदेव की ही अविस्मरणीय देन है। मात्मा के अनादिजय विपपराग को ताटन भगवान् महावीर की मालवाणी को जन-जन के लिये ज्ञानियो ने तीर्थयात्रा को खूब ही महत्व ता फनावर धर्म जागरण का जो भगीरथ प्रयाम पूरा बताया है। इसमें भी गिरिराज को स्पगना इस अवोध क्षेत्र में किया वह पुन -पुन अभिनदनीय के महत्त्व का तो कहना ही क्या है । अनन्त है। बाडमेरवामी भी कृतनता-प्रकट करने मे कम सिद्धात्मानो का स्थान 'कारे-वाररे सिद्ध मनना नहीं रहे। गुरुदेव के उपकारों के प्रति अपनी है जिमका कण-कण पवित्रता मे प्राप्तापित है । प्रास्यानो मे ऐसा वाघा कि गुरुदेव श्री की इच्छा आज भी कई आत्मा इसवी म्पशना से अपना न होते हुए भी गुरुदेवश्री को 3-3 चातुर्मास के खोया हुआ प्रात्मधन पुन प्राप्त करते हैं--कहा लिये दूर-दूर से खीचकर ले आये। गुरदेव श्री को ही निश्रा मे सुप्रसिद्ध नाकोडा तीर्थ पर 6-6 "श्री तीर्यपायरजसा विरजीमति उपधान, वाडमेर में कई मघ मम्मेलन और दोसानो के उत्सव रचायें हैं। गुरुदव को ही निधा तीयेषु यम्भ्रमणतो न भवे भ्रमन्ति । म बाडमेर से पालीतारणा का 1000-1100 पद- द्रव्यव्ययादिह नरा स्थिरसम्पद स्यु. यारियो का ऐतिहासिक महासघ निकालकर तो पूज्या भवन्ति जगदीश मयाचंयन्त ॥ गुरुदेव के प्रति अपनी अनन्य श्रद्धा और भक्ति में आज के इस सुविधावादी युग में भी हजारों गिपर पर क्लशारोहण किया है भव्यात्मा छरी का पालन करते हुए तीर्थ यात्रा का लाभ लेते हैं । 'छग का अर्थ है इम सघ की रूपरेखा काफी समय में गुरुदेवधी की अन्तश्चेतना म स्फुरित हो रही थी । गुरुदेव के नम्यक्त्वधारी पथि पादचारी मचित्तवारी स्वप्न को साकार करने हेतु घोडा उठाया- वरशीलधारी । बाडमेरवामी गुम्देवथी के प्रति पूणभावेन समर्पित झम्वापकागे, सुट्टी सदकाहारी विद्धा विदधाति यात्राम् ।। 90 1. सम्यक्त्वी होना 2. पैदल चलना 3. सचित्त का थी। खाने-पीने और सुख-चैन की परवाह किये त्याग 4. ब्रह्मचर्य का पालन 5. भूमिशयन और बिना प्रसन्नमुद्रा से, दिन और रात सेवारत रहने 6. एक समय भोजन । इस प्रकार 'छरी का में ही जिन्हें परम सन्तोप था । पालन करते हुए यात्रा करना ही सच्ची अनेक कठिनाइयों के बावजूद सघ ने सर्वथा तीर्थयात्रा है। नवीन रास्ता चुना । साचोर, ढीमा, भोरोल, धराद- हाथी, घोड़े, ऊंट, नगारे-निशान, शिखरवद्ध बाव होते हुए शखेश्वर पहुचे। यहा परम पूज्य जिनालय, मांगलिक तूर्यनाद, मुनि-मंडल एवं साम्यानन्दमुनिजी म.सा. प्रखरवक्ता जयानन्दमुनिजी साध्वी-मण्डल के साथ एक-डेढ किलोमीटर लम्बी म. सा. तथा कुशलमुनिजी म. सा. आदि संघ मे कतार मे अनुशासनवद्धरूप से चलते हुए 1000 मिले जिससे धर्मप्रचार और अपूर्व शासनप्रभावना 7 1100 यात्रियों के इस सघ का नयनाभिराम दृश्य का लाभ मिला। छोटे-छोटे गांवो की भक्ति, देखते ही बनता था। भजन-कीर्तन एवं मौन जाप अहोभाव, गुरुदेव के प्रति अगाध श्रद्धा, स्वधर्मी- वर्षक चलते हुए पदयात्री ऐसे लगते थे मानो मुक्ति- भक्ति आदि देखकर तो यात्रियों के दिल गद्गद् हो र के वीर सैनिक कर्मक्षय का व्रत लिये उठते थे । वनासकाठा-गुजरात और सौराष्ट्र की मुक्तिमहल की ओर कूच कर रहे हो । संघयात्रियो अपरिचित धरती पर इस सघ का जो स्वागत हुआ, की दैनिक-चर्या इतनी व्यवस्थित एव क्रमवद्ध थी वह सदा अविस्मरणीय रहेगा। सघ के दर्शनार्थ कि किसी को व्यर्थ मे भटकने, घूमने, निन्दा, लोग 50-50 माइल से दौड़े-दौड़े अाते थे। सघ विकथा तथा क्लेशादि करने का अवकाश ही नही के प्रेरक और व्यवस्थापकों के प्रति नतमस्तक हो मिलता था। गुरुदेवों की सतत् सत्प्रेरणा के उठते थे। संघ जहां ठहरता था लगता था मानो फलस्वरूप यात्रियो में आराधना की होड़ सी लगी एक छोटी सी स्वर्णपुरी धरती पर उतर आई हो । रहती थी। शंखेश्वर तीर्थ मे सामूहिक अट्ठम की धर्म प्रचार की दृष्टि से भी यह सघ खूब आराधना तथा चौविहार 5-7-11 उपवास की सफल रहा । संघ मे प्रवचन-पण्डाल का दृश्य भी आराधना, सघपतियों एवं यात्रियों द्वारा सप्तक्षेत्र देखने लायक था । व्याख्यान के लिये खासतौर मे स्थान-स्थान पर सद्व्यय मानो सुकृत की पर बनाया हुआ विशाल पण्डाल भी कम पडता झडी सी लगी थी। सघ क्या था मानो, आत्मशुद्धि था। बडे गांवों मे तो अतिरिक्त व्यवस्था करनी oft Training school at Mobile-univer पडती थी। नित्य नये विषयो पर सरल-सहज भापा sity चलता-फिरता विद्यालय था । जहा 54-54 और सरस शैली मे प्रवचन सुनकर श्रोता धन्य हो दिन तक यात्री-गण 'रत्नत्रय' की विविध एवं उठते थे । परम् पूज्य प्रखरवक्ता जयानन्द मुनिजी क्रमबद्ध आराधना मे ऐसे भाव-विभोर रहे कि म सा. के त्याग-वैराग्यमय प्रवचनों से प्रभावित 'विसरगई दुविधा तनमन की' का साक्षात् अनुभव हो सैकडो भाविकों ने रात्रि भोजन त्याग, कंदमूल कर रहे थे । संघ का वह आत्मस्पर्शी एवं शांतिमय त्याग, ब्रह्मचर्य, सिनेमा त्याग आदि के नियम ग्रहण वातावरण था कि जो 3 दिन के लिये आया वह किये थे । सघ मे पाचलगच्छीय एवं तपागच्छीय 30 दिन तक रह गया। संघ की सुव्यवस्था में साध्वीमण्डल तथा गुरुदेव के अनन्यमित्र शासन- परम पूज्य कैलाससागरजी म. सा का मूल्यवान् सम्राट के समुदाय के वयोवृद्ध प्राचार्यदेव श्री योगदान भी सदा अविस्मरणीय रहेगा । यशोभद्रसूरिजी म. सा. ने बरवाला से सघ मे संघपतियों की उदारता, व्यवस्थापको की व्यवस्था सम्मिलित होकर सघ की शोभा मे और अभिवृद्धि और कार्यकर्ताओं की सेवा तत्परता देखने ही योग्य की। । 91 , पपास प्रवर इस तरह धर्मप्रचार और महान् शासन प्रमा- वना करता हुआ यह महामघ सिद्धक्षेत्र के ममीप स्थित यशोविजय जैन गुरुकुल में पहुंचा। इस ऐतिहासिक सघ के स्वागत के लिये पालीतापावासी महीनाभर पूर्व से ही उत्सुक हो रहे थे। भारत के कोने-कोने से मघ के ऐतिहासिक प्रवेश को देखने के लिये भक्तजन बसो ट्रेनो मे भर-भर कर पहुंच रहे थे। विक्रम संवत् 2037 के चैत्रशुक्ना 7 के प्रभात की बात है। सूय पूर्वावाश से उदित हो धरती पर अपनी मुनहरी पाभा विसेर रहा था शीतल सुरभित पवन के भोके रह रहार जन-मानस को आल्हादित कर रहे थे । मगल तूर्यनाद मागलिर स्वर से चारो दिशानी को आपूरित कर रहे थे । वातावरण वडा ही उल्लासमय प्रतीत हो रहा था। चारो ओर से नर-नारियो की अपार भीड मागर की तरह उमड़ रही थी। गुरबुन का प्रान्तरिव और वाह्य प्रागरण सुविशाल होते हुए भी सकीर्ण सा नजर पा रहा था। 54-54 दिनो की निरतर आराधनापूवक पदयाना के वावजूद भी लक्ष्यसिद्धि के सतोप से यानियो के चेहरे अवर्णनीय प्रानन्द से चमर रहे थे । सभी लोग हर्पित मन और पुलक्ति तन से प्रस्थान समय की वडी उत्सुक्ता से प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रात ठीर 730 वजे 'जय मिद्धाचल जय गिरिराज' के गगनभेदी महाघोष के साथ सघ गुरफुल से प्रस्थान किया। मवमे आगे जिन शामन के गौरव और सघ प्रवेश की सूचक इद्रध्वजा फहरा रही थी। उसके पीछे नगार निशान और सवारो से सुशोभित घोडे-ऊट थे। उनके पीछे स्थानीय बालाथम एवं गुरुवुन के 300 वालक 3-3 को पक्तियो मे कदम से कदम मिलाकर जयनाद करते हुए चल रहे थे। उसके वाद म्थानीय वड तथा अपनी मस्त-चाल से जन- जन को प्रावर्पित करता हुआ गजराज था। तत्पश्चात् अहमदाबाद का सुप्रसिद्ध जीया बंड अपनी मन मोहिनी भक्ति धुनो मे मानव मन को भक्ति रग मे रग रहा था । तत्पश्चात् चादी के रय और सघ या शिसरवद्ध नयनरम्य जिनालय था । उसके पश्चात् 8 फुट ऊंची विशाल डोली म विराजमान संघ के प्रेरणास्रोत हजारो नेत्रों के केन्द्र विदु, सन्न शिरोमगि, प्रापुरुप, दिव्यता और भव्यता की मूर्ति, अनुयोगाचार्य श्री काति- मागरजी म सा नतमस्तर जन गमूह यो प्राशीर्वाद) प्रदान करते हुए पधार रहे थे । उनके साथ वयोवृक्षा यशोभद्रसूरिजी म मा श्री रेवतसूरिजी म संमे श्री लब्धिच द्रसूरिजी म मा , श्री शातिविमएस मूरिजी म मा, श्री यशोदेवमूरिजी म सा, श्री अरिहतमिदमूरिजी म सा, श्री भानुच द्रमूरिजी म सा, श्री जयच द्रसूरिजी म सा , श्री हेमप्रभविजयजी प्रादि मुनिमडल जुलूस की शोभा बढा रहे थे । तत्पश्चात् हप से भूमते हुए फूलमानायो से लदे हुए मघपति और उनके पीछे विशान जन-समुदाय था। उनके पीछे बीजापुर का सुप्रसिद्ध बैड और शताधिक साध्वी मडल हजारो सतारियो का नेतृत्व करता हुआ चल रहा था। मघ का प्रवेश जुलूस पालीताणा के इतिहास मे सदा चिरस्मरणीय रहेगा। जिलाधीश पुलिस अधीक्षक, ग्राई टी ओ आदि शताधिर सरकारी प्रफ्सरा ने नगर की 98 जातियो ने प्रारणदजी करयाएजी की पेढी, मोतीसुखिया, ब्रह्मचर्याश्रम हरिविहार, मुस्लिम समाज, माहेश्वरी समाज आदि ने पृथक्-पृथक् रूप से गुरुदेव के नमन पूवर सधपतियो एव मघ का जो अभिनन्दन किया वह वडा ही भव्य था। सबसे महत्त्व की बात तो यह थी नि उस दिन कमाइयो ने स्वेच्छा से कसाईसाना वन्द रया और प्रवेश जुलूस मे शामिल हुए। पुरनारिया स्थान-स्थान पर गहुलिया और पुष्पवर्षा कर हृदय के महान् उल्लास को प्रकट कर रही थी। जैन अजनो के द्वारा पाये गये तोरण द्वार, - 92 मार्ग के दोनों ओर एवं मकानों की छतों, हुमा । अन्य अनेकों विशेषताओं के साथ संघ की वाल्कॉनियो और दीवारों पर संघ दर्शन के लिये यह सर्वोपरि विशेपता रही कि 54 दिन की इस घण्टो से प्रतीक्षा करती हुई अपार भीड़ उसके लम्बी यात्रा मे आधी, तूफान, वर्षा आदि प्राकृतिक साक्षी है। प्रकोप, चोर आदि का भय, रोगादि का उपद्रव, उसी दिन फलेचुनड़ी का आयोजन था । अकस्मात् या अन्य किसी भी तरह की अनिच्छित जिसका सारा श्रेय दानवीर संघपति श्रीयुत् घटनायें संघ में कभी भी घटित नहीं हुई। यह मणिलालजी डोसी को है । ऐसा आयोजन सब गुरुदेव के ही जाग्रत-पुण्य का प्रभाव है पालीताणा के इतिहास मे 300 वर्षों मे नही गुरुदेव के ऐसे दिव्य और महान व्यक्तित्व का हुअा । इस नयनाभिराम और हृदयस्पर्शी दृश्य को स्मरण कर उनके चरणों में मन और मस्तक सहज देखकर कौन ऐसा होगा जिसके हृदय में अहोभाव ही झुक जाता है। केवल श्रद्धा के स्वर गूंज न जगा हो....मुख से धन्य हो जिनशासन.... उठते है-- बलिहारी हो जिनशासन की....जैनं की....जैनं जयति सन्त - मनीषी, प्राज्ञ - पुरुष, शासनम्....न निकला हो। कितना दिव्य और चरणों में शत्-शत् वन्दन । भव्य था यह सब कुछ । दूसरे दिन चतुर्विध श्रीसघ के साथ गिरिराज के दर्शन, माला-परिधान का हे ज्योतिपुञ्ज, हे ज्योतिर्धर महोत्सव भी विविध-कार्यक्रमो के साथ सम्पन्न करते तेरा अभिनन्दन ।। * चित्त दमन * . चाहे जितनी क्रिया करने में प्रावे, चाहे कितना ही ज्ञान पढ़ने में प्रावे, चाहे कितनी ही तपस्या करने में आवे और चाहे कितनी ही योग साधना करने में आवे, पर जब तक मन की अस्थिरता होवे, चित्त आकुल व्याकुल होवे, मानसिक क्षोभ होवे, वहां तक साध्य प्राप्त हो सकता नहीं। यह खास लक्ष्य में रखने का है । ज्ञान, तप और क्रिया का प्राशय मन पर अंकुश लाने का होना चाहिये । मन की अव्यवस्थित स्थिति से प्राणी के कार्य कोई भी फल दे नहीं सकते, यह शुद्ध दृष्टि की अपेक्षा से यथा तथ्य है । -अध्यात्म कल्पद्रुम 93 पूज्य गुरदेव, प्रज्ञापुन्प, अनुयोगाचार्य श्री कान्तिसागरजी म सा आदि की - उत्तराखण्ड यात्रा- -मधुर स्मृतियाँ (दिल्ली से हरिद्वार, ऋषिकेश, थीनगर, बदरी, हरिद्वार, अनूपशहर होते हुए दिल्ली तन) (दिनाक 18-3-81 से 8-7-81 तक) ले० मुनि मणिप्रमसागर व्यावर, अजमेर, मालपुरा जयपुर, कोटपूतली मे पूज्य गुरुदेवश्नी ने लगभग 1 घण्टा प्रवचन होते हुए प्रमश फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी दिया, तत्पश्चात् स्थानकवासी प्राचार्यश्री आनन्द ता 18-3-81 को प्रात महरोली पहुंचे। वहा ऋपिजी म के समुदाय को विदुपी प्रार्या श्री दादा श्री मणिधारीजी के श्री चरणो मे भक्ति प्रमोदकुमारीजी ने अपने भावपूर्ण भापण मे "पूज्य भावना-प्रपुरित हृदय से वदना की। मैं और मेर श्री के एकाएक दशन करने तथा वाणी सुनने से" छाट गुरुभाई तो प्रथम वार ही मणिधारीजी के अपने आपको व सवको भाग्यशाली बताया। दशन कर रहे थे। वहा से आधे घंटे के पश्चात् दोपहर मे विश्वधर्म सम्मेलन के प्रवत्तक छोटी दादावाडी मा गये। वहा पहुचने पर ही प्राचाय श्री सुशीलकुमारजी जो पूज्य गुरुदेव श्री के लोगो को पता चला कि महाराजजी पधार गये है। पुराने प्रेमी हैं पधारे, करीबन एक घटा तक इसमे श्री डोशीजी, श्री राक्यानजी, श्री दौरतसिंह- वार्तालाप चला, उन्होने विदेशो में चल रही अपनी जो जन, श्री शीतलदासजी राक्यान श्री घनश्यामजी विभिन्न प्रवृत्तियो के बारे में जानकारी दी। आदि मभी बडे नाराज हुए, कि आपके बिना किसी मूचना में पधारने से हम अापका जरा भी स्वागत उसी दिन केन्द्रीय वित्त मन्त्रालय सयुक्त नहीं भर सके, प्रत हमें काफी वेद हुप्रा है, किन्तु मचिव श्री टो मार मेहता दशनाथ पधारें। गुरदेवधी ने कहा, मैं प्रापके स्वागत के लिये नही, यह तो पूर्व निरिणत था कि दिल्ली में रात्रि अपितु दादा गुरुदेव के दर्शन करने आया है। छोटी विश्राम नहीं कर सकते थे, प्रत उमी रोज विहार दादावाडी मे मदिर व दादागुरु दे दान करते- कर दिया। करते भास-पास के करीबन 100-200 भाई बहिन ता 19381 को प्रात विहार कर करीवन एकत्रित हो गये। वहीं नवनिर्मित व्याख्यान हॉल 78 किमी तर पहुचे ही थे कि श्री होशीजी, 94 राक्यानजी प्रादि मिले । उन्होंने बताया कि संत, महात्मा यहां स्थिरता कर सकते हैं। राजघाट से ठीक 20वें कि. मी. पर पू. वल्लभसूरि कितना असाप्रदायिक नियम । स्मारक बन रहा है, जो करीबन 2.5 करोड रुपयों बिहार क्रम जारी रहा। पथ में पाने वाले की लागत से तैयार होगा, आज वही ठहरना है । स्कूलों में, कॉलेजों में प्रायः प्रवचन होते थे। हम हम वहा पहुचे तो वहा दिल्ली के सुप्रसिद्ध प्रकार नैतिकता का प्रचार-प्रसार करते हा भागण: जिया बैड की धार्मिक धुनों व गीतों ने स्वागत हरिद्वार पहुंचे। किया। साथ में शताधिक पंजाबी भाई थे। हरिद्वार, यह सनातनों का प्रमुग्य तीर्थ है । यह पूज्य गुरुदेव श्री ने अपने पौन घण्टे के तीर्थ दिल्ली से 200 कि. मी दूर उत्तर-पूर्व में व्याख्यान मे पू. वल्लभसूरिजी म. के प्रति अपनी आया हुअा है । इसे गंगाद्वार, स्वर्गद्वार प्रादि नामों भावना दर्शाते हुए आपको वर्तमान काल का से भी पुकारा जाता है। प्राकृतिक सौन्दर्यता से युग पुरुष बताया। वहां से बिहार कर क्रमश: भरपूर इस तीर्थ में हजारों लाखों यात्री व पर्यटक करनाल पहुचे। शहर मे प्रवेश करते ही एक गंगा स्नान करने पहुंचते है। पावागमन की सुविधा भगवत् आश्रम आता है। वहां के अधिकारी के लिये बस व रेल दोनों ही साधन उपलब्ध हैं। पं. श्री देवराजजी ने हमें जाते हुए देखा तो वे दौड़े बदरी जाने वाले प्रायः सभी यात्री यहां एक रोज हुए आये और पाश्रम में ठहरने के लिये निवेदन ठहर कर गंगा स्नान द्वारा अपने पापको पावन किया । उस रोज विहार करते-करते 12 बज गये कर, यहां के प्रधान-प्रधान दर्णनीय रथलों की यात्रा थे और आकाश बादलों से आच्छादित हो गया था, सम्पन्न कर फिर आगे बढ़ते हैं। यहां यात्रियों के ऐसा लग रहा था जैसे कुछ ही क्षणों के पश्चात् स्नान की सुविधा के लिये कई घाट बने हुए हैं, वर्षा प्रारम्भ हो जायगी। ऐसे समय में हम भी जैसे-चंडी घाट, गुभाष घाट, बंगाली घाट, , स्थान की गवेषण करते हुए ही चल रहे थे अतः रामघाट श्रादि, किन्तु मुख्य घाट, "हरि की पटी" हमने शीघ्र ही स्वीकृति दे दी। उन्होंने पूरा है। गंगा-स्नान का मुख्य केन्द्र यही है। अन्य आश्रम वताया और कहा, जहां आपकी इच्छा हो, घाटों पर स्नान करने का फल गरीर-शुद्धि है, ठहरिये । किन्तु हरि की पेंटी घाट पर रनान का फल पापों इस भगवत् प्राथम की स्थापना श्री भगवत का निराकरगा है, ऐसी सनातन-मान्यता है। यन्त्र स्वरूप ब्रह्मचारीजी ने दि 29-7-1969 को की प्रधान घाट संगमरमर का बना हुया है। दी थी। साधुसंतों के लिये अनेक कमरे बने हुए हैं बारातों को बांटने का काम मध्य में बिरलाणी तथा भोजन की व्यवस्था हर समय रहती है । द्वारा निर्मित प्लेट फार्म करता है, जहाँ घण्टाघर, आश्रम का मुख्यालय, जहां कीर्तन-प्रवचन बगैरह भी बना हुआ है । इस पैली पर, गंगाणी फी घाग होते हैं, एक हालनुमा है, जहां चारों और तस्वीरें अति वेगवान है। प्रनिट फार्म पर, ग्यले छोकर धारा लगी हुई हैं। जिनमें शंकरजी, जिनमें शंकरजी, कातिकजी, की गति दख रहा था कि एक प्रतीक यार पा हनुमानजी, पार्वती, महावीर, बुद्ध, ईशु, गुरु नानक, मीरा, विवेकानन्द मादि सभी के फोटी है। प्राथम "प्रवाह, अति नीयरिधारी गंगा का, की नियमावली को पढ़ रहा था, उसके मात नं. के गावधान रहनाशिकीपश्री पराकार | नियम को पढा तो हर्ष-विभोर हए, बिना न रहा । বলা গল্প , সাপ্ত ঋণ পা গান, बर, जाग मा पलीग गंगा सागर ।। "किसी भी धर्म के अथवा सम्प्रदाय के माध, ----14 दिन" गया। वह इस प्रकार था । 95 अच्छे से अच्छा तैराक भी गगा की मुख्य हो । यहा के मनसा माताजी बडे ही चमत्कारिक धारा में जाने से घबग जाता है। लेकिन हमने माने जाते हैं। श्रद्धा-प्रपूरित भावना से की गई देखा, कई माहमी युवक तीव्र प्रवाह को नजर भक्ति निष्फन नहीं जाती। अन्दाज करते हुए गोता लगा रहे थे। दायी अोर के पर्वत पर चण्डी देवी का मन्दिर कोई व्यक्ति प्रवाह मे वह न जाये अत हर है, वह भी चमतारिक है । यहा मप्तऋपि प्राश्रम पुल के नीचे कई जजीरें लगी हुई हैं। जिहें पकड विशेष दशनीय है। कर व्यक्ति किनारे या जाता है । तथापि वप में 10-12 दुघटनाए तो हो ही जाती हैं। ऐसे मनातन तीर्य हरिद्वार म पहुचने से पूर्व स्थान की गवेपणा आवश्यक थी। अत पूज्य वहा चारो ओर पूजापाठ कराने वाले पडे बैठे हुए दिखाई दे रहे थे, जो मीठी-मीठी बातें करने में गुरदेवश्री व अन्य मुनियो को सपन वृक्ष की घनी छाया में विराजमान कर मैंने एक व्यक्ति के नाय बडे ही प्रवीण होते हैं। प्रवेश दिया। सायवाल की आरती का दृश्य बहुत सुहावना होता है। श्रद्धालुओं की भीड उम आरती ये किन्तु सध्या को जव 8 घटे भमण के पश्चात् दृश्य को नेत्रो मे वसाने उमड पडती हैं, शायद ही लौटे तो मुप-मण्डल पर निराशा की झलक स्पष्ट कोई यात्री या पर्यटक उस समय धर्मशालामो में परिलक्षित हो रही थी। हरिद्वार-दशन और वहा रहता होगा। ठहरने सम्बधी जो भी विचार पूर्व निरिणत थे, सभी पर तुपारापात हो गया । वहा माम्प्रदायिकता हरिद्वार-कनखल में पार्श्वनाथ भगवान दिगवर की भावना कूट-बूट कर भरी हुई है। प्रत्येक जैन मन्दिर है, जव मैं वहा पहुचा तो अलीगढ का घमशाला का मैनेजर ज्योही पग्निय के रूप में चना हरीमन का 6 लीवर का वहा ताला लटक "हम जैन मुनि हैं" सुनता, तो "ना" पे सिवाय रहा था। सरक्षक महोदय दूर रहते थे। वहीं दूमरा शब्द न निकलता। लगभग 80 घमशालामो कनग्वल में दक्ष-प्रजापति का दशनीय मन्दिर है । वे चकार लगाने के बाद हमने हमारा गवेपण-कब हरिद्वार के दोनो ओर पवतमालाग्रो की भव्य प्राश्रमो की ओर मोडा, तो वह प्रयत्न भी निष्फल ” खलाए हैं । वायी ओर के पवत पर मनमादेवी रहा। कुन मिता के पालीताणा की जैन धम का मन्दिर बना हुआ है। ऊपर जाने के लिये इंटो शालाग्रो से कम सकीणता न थी। की सडक बनी हुई है। उस मडक पर स्कूटर के मिवाय अय किसी वाहन को ऊपर जाने की आसिर थके हारे हरिद्वार मे वापिस रुडकी की पोर चले । 10 कि मी पर वहादराबाद गाव इजाजत नहीं है। मह घूमती हुई जाती है। नीचे से ऊपर तक करीबन 3 कि मी पड जाता के बाहर "सत सनातन कुटिया मन्दिर" नामक एक आश्रम है, जिसमें एक छोटा सा मदिर, बरडा, है। बदरी से वापिस लौटते हुए हमने देसा कि वहा रज्जु माग (ग्राकाश मे चलने वाली कुर्सिया) व दो कमरे हैं । वहा मन्त सेवादामजी जो निर्वाण (नागा) सम्प्रदाय के हैं, रहते हैं । बन चुका था जिसे कलकत्ता की एक कम्पनी ने उहोंने प्रसन्नतापूण हृदय से हम आमन्त्रित 50-60 लाख की लागत से तैयार किया था। किया, हमने वही बाहर वरडे में अपना शायद ही कोई यात्री ऐमा होगा जो हरिद्वार आसन जमाया । प्राकृतिक सुपमा व दृश्यो से पाकर मनसादेवी के मन्दिर में न पहुचा भरपूर उम स्थान पर हमारा इतना मन लगा कि 96 हुआ। करीबन 18-20 दिन वही रह गये। ध्यान और पूज्य गुरुदेव श्री दो मुनियों के साथ वहाँ अध्ययन के सिवाय अन्य कोई कार्य नहीं था। पधारे । पूर्ण शिष्टाचार व शालीनता से परस्पर वहा हमारा परिचय दो व्यक्तियों से प्रमुख रूप से विचार-विमर्श हुआ। मंदिर व आश्रम के ऊपर करीबन 20 लाख 1-श्री रामदत्तजी शर्मा, भारद्वाज, जो रुपये लगे थे, इतने बड़े अर्थ-व्यय के उपदेशक जन्घेडी (मेरठ) के निवासी है, और मवाना में वाबाजी ने अपने शरीर पर टाट लपेट रखा था रहते है। तथा बहादराबाद इण्टर कॉलेज मे जिसे दो इन्च जाडे रस्से से कमर पर बॉध रखा था। प्रोफेसर है । हिन्दी संस्कृत और अंग्रेजी पर आपका निस्पृहता का इससे बडा उदाहरण और क्या मिल पूर्णाधिकार है । बड़े विद्वान् है। ऐसे विद्वानो की सकता है। उनके सामने एक अग्निकुण्ड था, संगति से प्रतिदिन 2-3 घटे ज्ञान-चर्चा चलती। जिसमें से करीबन डेढ फुट ऊँची लपटे निकल रही थीं, और बाबाजी अग्नि-ताप ग्रहण कर रहे थे । 2-श्री भोलूसिंहजी जो बहादराबाद ग्राम पंचायत के सरपच हैं । वे एक अच्छे व कर्मठ रात वही ठहर कर दूसरे दिन विहार कर कार्यकर्ता है। दिया। 1 कि.मी. भी नहीं चले थे कि श्री भंवर- और वहीं रहने वाले बाबा सेवादास जी लालजी बोहरा का व्यक्ति आया, और उसने कहा, शान्ति-प्रिय व सुष्ठु स्वभाव के है । श्री भवरजी व श्री दौलतसिंहजी जैन हरिद्वार मे गंगा-स्नान कर रहे है, तथा थोड़ी ही देर मे आपके वहाँ कई व्यक्तियो को मद्य पास पहुंचेगे । नियम दिलाया। पूज्य श्री का सार्वजनिक प्रवचन भी हुआ, जिसमे ग्राम के बुद्धिजीवी व गणमान्य थोडा और आगे चले थे कि दुर्ग निवासी श्री व्यक्ति उपस्थित रहे। इन्द्रचदजी बगानी सपरिवार मिल गये, मिल गये, जो कल से ही हमे इस क्षेत्र मे ढू ढ रहे थे । वहाँ बहुत दिन हो गये थे, फिर हमारा लक्ष्य तो बदरी था । अत बिहार कर हरिद्वार होते हुए उन्होने आगे जाकर वन-विभाग के एक बंगले वदरी के पथ पर चल पड़े । हरिद्वार से करीबन में हमारी व्यवस्था कर दी। वहाँ श्री भंवरजी भी 5 कि.मी. पर ही "बाबा दूधाधारीजी बर्फानीजी आ गये । कुछ आवश्यक विचारों का स्पष्टीकरण म." का एक विशाल अाश्रम बना हुआ है । हम कर वे और श्री दौलतसिंहजी जैन दिल्ली की ओर देखते-देखते आगे बढ़ रहे थे कि आश्रम के रवाना हो गये। व्यवस्थापक आये और ठहरने का आग्रह करने श्री इन्द्रचंदजी बंगानी ने पूज्य गुरुदेव श्री के लगे । उनकी भावना को देखते हुए हम इन्कार न दर्शनों के लिये ही इतना लम्बा सफर तय किया कर सके । और हमने आश्रम मे प्रवेश कर दिया । था। श्री इन्द्रचंदजी व उनके पूरे परिवार की वहाँ के 9 मंदिरों के दर्शन किये। बडे-बड़े आली भक्ति श्रद्धा, आस्था पूज्य गुरुदेव श्री के प्रति शान मंदिर और सभी मदिर मकराने के । अनूठी है। त्याग का हमने बाबा दूधाधारीजी से मिलने की इच्छा व्यक्त की तो व्यवस्थापकजी ने कहा कि चलने मे असमर्थ होने के कारण वे आ तो नही सकेगे। किन्तु मैं वही व्यवस्था कर देता हूँ। उस रोज वही ठहरकर शाम को विहार कर हम सत्यनारायण मंदिर पहुंचे । पूर्व-निरिणत व्यवस्था के अनुसार हम वहीं ठहरे। श्री वंगानी जी भी साथ ही रहे । 97 यह मदिर वावा काली कमली वागो द्वारा पवतीय क्षेत्र में रहने की यादी यहाँ के मानवो बनाया हुआ है । इस मदिर के व्यवस्थापक श्री का शरीर गठीला व पुर्तीला है | यहाँ की नालाए प मोह्नलालजी शर्मा ने अपनी सज्जनता के द्वारा भी कम कायक्षमता नहीं रखती। शीघ्र ही हमे प्रापित कर लिया। उम मदिर में और यह स्वणिम मूर्योदय हुअा जिमकी ग्राभा हमने एक नई वात देखी, वो थी गेहू पिसाई की म हमने लक्ष्य प्राप्ति की, अर्थात् वदरी पहुंचे। चक्की, उम चक्की को चलाने के लिए विद्युत् सभी मुनियो या मर्दी के मारे युग हाल था। की आवश्यकता नहीं होती थी। गगाजी ने एक ऐसे समय यदि राजस्थान में होते तो गर्मी और लू नहर काटी गई थी नहर के द्वारा पानी प्राा था, के कारण बुरा हान होता किंतु यहाँ तो ठीक उसके प्रवाह से वह चक्की चलती थी। विपरीत स्थिनि थी। हाय पर कुछ भी काम करने वहां से विहार कर ऋषिवेश पहुंचे, जहां मे इन्वार पर रहे थे । चिन्नु उन बेचारो की श्री बगानी जी ने "भजन ग्राश्रम" में व्यवस्था की क्या ताकत ? जो विरोध की आवाज बुलद कर थी। वहाँ से हमने लक्ष्मण भूना की पोर बिहार म, उन पर मन का अकुश जो था । पो मन क्यिा और वगानी जी म्वदेश की ओर रवाना हो यी भावनाए, शीघ्रन्दन तया अय विशेष याय गये। लक्ष्मणमूना पार स्वर्गाश्रम गीता भवन करने लिये उन्ह उद्दीप्त कर रही थी। परमाय निकेतन वगैरह शानदार पाश्रम बने हुए हैं, चढाई उतर पर समतर म अनवनदा और इसक्षेत्र के प्रमुख दशनीय स्थल माने जाते हैं। प्राकस्मिक कारणो से हम यहां न पहुंच सके तथा (गगा) नदी के किनारे बद्रीनाथपुरी बनी हुई है। तेरह मजिले मदिर पे दर्शन कर ही मागे वी मोर 'बदरी' ममुद्र तट से करीबन 10,300 फीट प्रस्थान करना पड़ा । फिर क्रमश देवप्रयाग, श्रीनगर ऊ चाई पर बसी हुई है। यहां घमशालामा आदि रुद्रप्रयाग, चमोली, जोशीमठ प्रादि दर्शनीय स्थला की सुविधायें पर्याप्त मात्रा में मप्राप्त है। मदिर को पार करते हुए लक्ष्य की ओर बढ रहे थे । पूज्य ही हुआ है । मन्दिरजी वा बाह्य-रूप-रग व ढांचा प्राचीन है व जीर्णोद्धार का कार्य अभी प्रारम्भ गुरुदेव श्री के लिये एक डोली की व्यवस्था की थी। सडक माग से यदि बदरी जाय तो ऋषिकेश से यायियों को प्रयवा पयटको को इतना प्रापित करीबन 300 किमी पडता है, किंतु हम तो नहीं करता मूल दरवाजे म प्रवेश करते ही कच्ची हाडी के रास्ते से जा रहे थे। दोनो ओर एक पोल पाती है फिर एक और दरवाजे को पार आकाश मे बातें करती उत्तु ग पवत श्रेणियाँ करने के पश्चात् रगमहप पाता है जहां सरकार द्वारा नियुक्त दो-तीन पुजारी व पुलिसमैन बैठ मध्य मे प्रत्य त गहरी खाइ । रहते हैं । अन्दर मूनगभारे मे बदरीनाथ की प्रतिमा और साइ मे अति वेगवती गगा। विराजमान है । मुखमण्डल को छोडकर शेष यदि पर जरा भी चूका तो 'गगा शरण' के प्रतिमा पर हर समय वस्त्र माच्छादित रहते हैं । अलावा कुछ नही । डोली वालों के परवडे सधे दाहिनी भोर कुवेर तथा गणेशजी, व बायी मोर हुए थे। रोमाचो मे भरपूर पवतीय याना का श्री लक्ष्मीजी का मदिर है । प्रानन्द प्राप्त करते हुए बढ रहे थे। मदिर के बाहर दुकानें मजी हुई हैं। यहा पवतों पर ही मानो की कतारें। और हर दुकान में प्रसाद के थाल मजे हुए हैं। और हर थाल मे पदरीजी को चढने वाला पवतो पर ही खेती। प्रमाद मजाहमा है। -- 98 करते है। के दो-तीन पंडितों को बुलाया, जो वहाँ सर्वश्रेष्ठ अर्थ की न्यूनता व अधिकता के अनुसार थाल विद्वान् माने जाते थे । हमने बदरी-तीर्थ, तप्तकुण्ड, भी छोटे-बड़े है। दर्शनार्थी वर्ग स्व-सामर्थ्यानुसार ब्रह्म-कपाल आदि की प्राचीनता, विशेषता, प्रसाद खरीदता है, व दर्शन करने जाता है । विलक्षणता आदि के बारे में जानना चाहा तत्रस्थित पुजारी उस प्रसाद को लेकर एक पाट उत्तर में उन्होंने पूरी कथा एक घंटे में पूरी की पर रखे वैसे ही अतिरिक्त प्रसाद में मिला देता है; जिसे मै सुनता जा रहा था और डायरी में लिखता तथा फिर उसमें से थोड़ा लेकर पुन: थाली में जा रहा था और उसी कथा को संक्षेप में यहां डाल देता है । जिसे दर्शनार्थी वापस ले पाता है, भी लिख रहा हूं। और उस प्रसाद को वह व्यक्ति स्वयं ग्रहण करता "असंख्य वर्षों पूर्व बना यह अति प्राचीन है, अपने स्वजनों में, परिजनो मे, संबंधियो मे, पडौसियों मे, परिचितो मे, बाँटता है, सभी स्वयं तीर्थ है, तथा इसका प्रकटीकरण भगवान् शिव ने किया।" को अहोभाग्यशाली मानते हुए प्रसाद ग्रहण फिर तप्तकुण्ड के निर्माण की कथा बताते हुए मंदिर की बनावट ठीक जैन मंदिर के जैसी है, गेहूं, चावल वगैरह जितने भी खाद्य पदार्थ हैं, कहा कि एक दफे शिवजी बड़े ही चिन्तित हुए कि उसका शिल्प जैन-शिल्प से मिलता है। अग्नि उन्हे परिष्कृत कर देती है। सोना-चांदी हम परम्परा से सुनते आ रहे है कि इस तीर्थ आदि जितने पदार्थ है, वे भी सब अग्नि का मे विराजमान प्रतिमा, जैन प्रतिमा है। यह सामीप्य संप्राप्त करते है तो शुद्ध हो जाते है । तो वास्तविक तथ्य है, या किंवदन्ति । इस प्रश्न का फिर मानवों की शुद्धि किस प्रकार से हो, क्योंकि समाधान पाने के हमारे सारे प्रयास विफल हो मानव यदि अग्नि मे कूद पड़े तो जल जाय, अतः शिवजी ने इस तप्तकुण्ड की रचना की, जिसमें हर बडे पुजारी, जो अपने आपको प्रखर विद्वान् लेता है, व शुद्ध, पवित्र बन जाता है, भले ही वह समय गर्मागर्म पानी रहता है । प्रादमी इसमें नहा व उच्च व्यक्तित्त्व वाला मानता है, उससे कहा, "हम जैन मुनि है, और हम प्रतिमा को प्रावरण- कुख्यात डकैत या खूखार हत्यारा ही क्यों न रहित दशा मे देखना चाहते है । "चूकि हमारा निवेदन युक्तिसंगत था, अतः एकाएक इन्कार करना फिर वहा के एक विशिष्ट स्थान "ब्रह्म-बापाल- उसके बस की बात नही थी। उसने कहा-“जब णिला" का माहात्म्य बताते हुए कहने लगे, "जव प्रक्षाल होगा, तब दिखा देंगे । "निर्दिष्ट समय मे ब्रह्माजी अपनी पुत्री सरस्वती पर आसक्त हुए तो जब हम यहां पहुंचे तो प्रक्षाल की विधि पूर्ण हो शिवजी ने क्रोध मे पाकर ब्रह्माजी का सिर काट चुकी थी। फिर उसने स्पष्ट इन्कार कर दिया डाला, लेकिन आश्चर्य, वह सिर शिवजी के हाथ और कहा, “यह हमारे शास्त्र तथा सिद्धान्तो के में चिपट गया । सिर, हाथ से पृथक् हो ही नहीं खिलाफ है।" बात-चीत के दौरान वहां कई अन्य रहा था! तो शिवजी पृथ्वी के सारे तीर्थो की यात्रा तो स्पष्ट था कि वे पर निकल पडे, अन्त में जब वे वदरी प्राये, सभी उसी के पक्ष मे थे, बहुमत को अनिच्छा सिर छूटकर अलकनदा के समीप जा गिरा, अतः अब वहां वह स्थान ब्रह्मकपाल कहलाया । कहते हैं- यहां पर रुकना व्यर्थ था। हम धर्मशाला मे गये और वहां प्रदत्त पिंड व तर्पण करने से पितरों को मुषित णीत्र मिल जाती है। गये । १ हो ? पंडे-पुजारी एकत्रित हो चुके थे । होते हुए भी शिरोधार्य करना पड़ा । 99 उन्ही के शब्दो से वातो ही बातो मे पता चला प्रदान कर देता है । इस तरह उसका व्यापार बढे कि बदरी की मूर्ति ध्यानस्थ मुद्रा में स्थित है जोरो मे चलता है। यात्रियो पयटकों का भी इंजे क्शन से उत्पन्न दद ये बदले एक रुपया देने म कोई उक्त बातो से यह स्पष्ट विश्वास हो जाता परेशानी नहीं होती। महप प्रादान-प्रदान हाता है, कि यह प्रतिमा जैन प्रतिमा है । यह मदिर जैन मदिर है । यह तीथ जैन-तीर्थ है । जनो के लिये इससे अधिक खेद का विषय क्या हो सकता है ? फिर हरिद्वार होते हुए हस्तिनापुर की यात्रा के लिये कडवी को प्रोर विहार किया। खर। ता 29 मई को प्रात नारसन मुद पहुचे । चारो ओर बरफ के पहाडो से घिरे बदरी पुरी वहाँ एक बगीचा था। सरक्षक वी स्वीकृति का दृश्य बडा ही सुहावना व मन लुभावना लगता सप्राप्त होने पर हम वहाँ ठहर गये। दोपहर के है । प्राकृतिक सौन्दर्य के इस क्षेत्र में लाखो यात्री 12 बजे बगीचे के मालिक, उनके भाई, पुत्र वगैरह व पयटक प्रतिवप पाते हैं । आये । देखा तो उनके हाथ मे टोरे थे । एक ऋशिकेश से ही पहाहो या चढाव-उतार टोपरे में 60-70 रोटियां थी, माथ मे परेला का प्रारभ हो जाते हैं । सडको ये मोड इतने गहरे व शार, छाछ वगैरह पूरी भोजन मामग्री। पाने खतरनार हैं कि नया ड्राईवर गाडी नही चना सकता का प्राग्रह करने लगे। हमने कहा, "अरे । ये हैं । जगह-जगह "Horn please slow drive" क्या दिया, भाई, हम तो अब घुछ नहीं लेंगे।" आदि सूचनाए लिखी हुई हैं । इन चेतावनियो के उन्होंने कहा, "ऐमा कैसे हो सकता है, अतिथि बावजूद प्रतिर्वप 4-5 बसें, कारें गगा मे पाय देवो भव । आप हमारे यहाँ ठहरें और हम विनीन हो ही जाती हैं। प्रातिथ्य सत्तार न करें, ऐमा पैसे हो सकता है यात्रा सपूण कर वापिस जव ऋषिकेश पहुंचे इतना अधिक प्राग्रह देख हम पाश्चयक्ति ता अपबार देखने पर पता चला कि दो ही दिन हो गये । जिस व्यक्ति से हमारा कोई परिचय नहीं पूव एक वस श्रीनगर के समीप गगा मे जा गिरी और वे गूजर जाति के । फिर भी इतनी हार्दिक्ता किसी के वचने का तो प्रश्न ही नहीं, बल्कि लाशें देखी तो हमने स्वीकारा कि ये भारतीय संस्कृति और बस का भी पता नही । के उज्ज्वल नक्षत्र हैं। बदरी की यात्रा करने वालो को हैजे का टीका चू कि हमारी गोचरी हो चुकी थी, फिर भी लगवाना अनिवाय है । ऋषिकेश मे टीका न लगाया उनका इतना श्रद्धा-भरपूर आग्रह देस हमे पोडा- हो तो वहां से 25 कि मी बदरी की ओर एक बहुत ग्रहण करना पड़ा। फिर सध्या को गांव वाले ग्राम आता है (डायरी म नाम न लिख सका) वहाँ आ गये तो पूज्य गुरुदेव श्री ने अपने मम-स्पर्शी लगाना पडता है । टीका लगाने पर प्रमाण पत्र और सरल प्रवचन देकर सभी को मत्र मुग्ध कर समुपलब्ध होता है। जगह जगह चैकिंग होती है, दिया। और वह प्रमाण पत्र दिखलाना पडता है । लेकिन हमने स्पष्ट अनुभव क्यिा कि वे सारे प्रमाण पन वहाँ से मुजफ्फरनगर होते हुए ता 2 जून भूठे थे । अाजकल है का टीका प्राय कोई नही श्री प्रोमप्रकाशजी सोनी का फाम है, वही ठहरे । को मीरापुर पहुंचे। मीरापुर से 3 कि मी पूर्व | टीका लगाने के लिये जो डाक्टर नियुक्त है, वह एक रुपया लेकर एक प्रमाण पत्र आस पास के करीबन 50-60 व्यक्ति एकत्रित हो गये। सभी मुसलमान थे। 2" लगवाता 100 था। पूज्य गुरुदेव श्री का व्यक्तित्व इतना प्रभाव इसके लिये हमें भारी खेद है। पूज्य श्री ने फरमाया, शाली व विलक्षण है कि आगन्तुकों ने प्रथम दृष्टि इसकी कोई आवश्यकता न थी । 6 दिन वहाँ मे ही समझ लिया कि आज तो बहुत विद्वान् ठहरे । प्रातः प्रभु दर्शन, गुरुदेव दर्शन और निरीक्षण फकीर तशरीफ लाये है। उन्होंने पूज्य श्री से आदि इन्हीं कार्यों में समय व्यतीत हो जाता तकरीर (प्रवचन) करने के लिये निवेदन किया । इस पर पूज्य गुरुदेव श्री ने कुरानशरीफ की हस्तिनापुर तीर्थ का मंदिर शिल्प की दृष्टि से आयतो को सरल भापा में समझाते हुए कहा, कलात्मक बना हुआ है । पारणे की मूर्ति जो बनी "मुसलमान' इस शब्द का अर्थ होता है, "ईमान- है, वह अति भव्य है । यहाँ दिगम्बर जैन मंदिर प्रति दार । यदि ईमान है तो मुसलमान है, नहीं तो वह विशाल बना हुआ है, धर्मशालाएं भी बड़ी बड़ी है। बेईमान है । जो भ्रष्ट-ईमान है, वह कभी भी बालाश्रम भी यहाँ बना हुआ है, जिसका संचालन अपने आपको मुसलमान कहलाने का अधिकारी जैन श्वे. महासभा, उत्तर प्रदेश करती है । जंबूद्वीप की विशाल योजना, व नशियां का जीर्णोद्धार नही हो सकता ।" विशाल पैमाने पर हो रहा है । यहाँ की दादाबाड़ी उन्होंने अपनी हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त करते भी अति भव्य व विशाल है। हुए कहा- ऐसी बात तो आज तक हमे किसी प्रोलिये, फकीर ने नही बताई । यहाँ पर ता. 7-6-81 को दिल्ली श्री संघ दूसरे रोज राम-राज पहुंचे। वहाँ श्री देशराजजी चातुर्मास विनती के लिये प्राया । भावना तथााग्रह को देखते हुए पूज्य श्री ने स्वीकृति प्रदान कर तपस्वी (प्रोसवाल) ने हमें देखा तो भक्तिपूर्वक दी। आहार लेने की विनती की, जिसे स्वीकृत किया गया। शीघ्र विहार कर संध्या के समय वहसूमा ता. 10-6-81 को यहाँ से विहार कर पहुंचे, वहाँ कालेज में हम रुके । थोड़ी ही देर हुई मवाना पहुचे, श्री रामदत्तजी शर्मा भारद्वाज थी कि 200 कि.मी. से 300 कि.मी. की स्पीड सपरिवार यही रहते है। अपने परिवार सहित से भयंकर अाँधी पायी । आये और आहारादि के लिये विनती की । 18-20 दिन हमारे साथ बहादराबाद मे रहे थे, अतः ये दादागुरुदेव की कृपा ही थी कि उस आंधी से हमे किसी भी प्रकार की कोई कठिनाई नही हमारे नियम-उपनियम जानते ही थे, श्रद्धा-पूर्वक से हमे किसी भी प्रकार की कोई कठिनाई नही आहारादि बहराया, पूरे परिवार की सद्भावनाएं आई। वास्तव मे प्रशसनीय रही। आपके पिता श्री इस दूसरे ही दिन प्रातः विहार कर ता. 4-6-81 क्षेत्र के जाने-माने लब्ध प्रतिष्ठित ज्योतिपी है। को हस्तिनापुर पहुचे । वहाँ मंदिर दर्शन कर ठहरे । श्री शान्तिभाई जो तीर्थ के व्यवस्थापक है, उन्होने फिर परीक्षितगढ, गढ मुक्तेश्वर स्थान्न अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, "हमारे यहाँ अनिवास होते हुए ता. 14-6-81 को अनूपशहर मन्त्री जी श्री निर्मलकुमार जी का पत्र, टेलीफोन पहुचे । यहाँ पर जैनों के करीबन 7-8 गृह है, वैगरह आये है, और आदेश दिया है, कि पूज्य श्री फिर भी यहां उनकी व स्थानीय नागरिको की का वैण्ड बाजे से धूमधाम से स्वागत होना चाहिये श्रद्धा-सेवा व आस्था अनूठी है । किन्तु आप तो बिना किसी पूर्व सूचना के पधारे विशेष कर हिन्दी साहित्य परिषद् के मत्री और फिर हमे आपके इतने शीघ्र आने की सभावना श्री रतनचंदजी, श्री शान्तिप्रकाशजी की निष्ठा- ही नहीं थी, अतः हम आपका स्वागत न कर सके, भक्ति परम प्रशसनीय है । 101 - उठी। अनूपशहर प्रवेश का उल्लास तो सर्वाधिक हमे एम डी ए वी इण्टर पलिज में पहुंचा, जहा था, आज पूज्य गुरुदेव श्री की दीक्षा भूमि के दर्शन सभा के रूप में परिवर्तित हो गया। शीघ्र ही कर रहे थे । पूज्य गुरुदेव श्री की दीक्षा इसी शहर दीक्षा के क्रिया-विधि विधान प्रारम्भ हो गये। में हुई थी । विशेष बात तो यह थी कि श्री रजन पूज्य गुरुदेव श्री के मुखारविन्द में उच्चरित किया- चदजी शातिप्रवाशजी के पिता दादा श्री के हाथो, विधि विधान जन-समूह बडी त मयता से श्रवण आप ही के घर से पूज्य श्री की दीक्षा सपन्न हुई कर रहा था। थोड़ी ही देर के पश्चात् मुमुक्ष थी और अव ता 26-6-81 को आपके ही श्री च द्रभानजी, "मुनि शशिप्रभसागरजी" के रूप वशजो का ओर से पूज्य गुरुदेव श्री के शिष्य की में परिवर्तित हो गये। केश राशि पृथक् कर दो दीक्षा हान वानी है। गयी । मुण्डित मस्तक प्राभा स प्रदीप्त होने लगा। मुख पर उल्लाम, उमग प्रसन्नता तथा शाति चमन अनूपशहर (उ० प्र०) में भव्य दीक्षा समारोह फिर अनूपशहर नागरिकगण द्वारा पूज्य परम् पूज्य गुरुदेव, व्याख्यान वाचस्पति, प्रज्ञापुरुप, अनुयोगाचाय श्री कातिसागरजी म सा गुरुदेवश्री यो अभिनन्दन-पत्र समर्पित किया गया, की पावन निधा मे दि 26-6-1981 को विजय- जिसका वाचन स्थानीय प्रमुख राजनेता श्री नवल- किशोरजी गग ने पिया । मुहूत्त मे मुमुक्षु श्री चन्द्रभानजी जैन की दीक्षा अभूतपूर्व उत्साह, तथा उल्लास भरे वातावरण में पूज्य गुरुदेवश्री ने फरमाया ! "अनूपशहर तो सानद सम्पन हुई। मेरी द्वितीय जन्म-भूमि है, यानी मेरी दीक्षा 49 वर्ष दा दिन पूर्व दि 24-6-81 को प्रात श्री संघ पूर्व इमी शहर में हुई थी। अत अनूपशहर से के समक्ष दीक्षा के डोरामधन का विधि विधान मेरा प्रगाढ सम्बन्ध रहा है। भव कृत अभिनन्दन सम्पन हुआ। साघुत्व का अभिनन्दन है तथा यहा के सभी नागरिकों ने अपना समय देकर इस शुभ कायक्रम जुलूस दि 26-6-81 को प्रात 9 बजे प्रारम हुमा । रमश ऊट, घोडे, गाडिया लिये बच्चे, फिर का सफल बनाने में जो सह्योग दिया। उन्हें दो भाक्यिा, पीछे चुल दशहर का प्रसिद्ध रतन घयवाद देता वैड, फिर दीक्षार्थी का रथ, फिर दो भावियें, पीछे सभा का सचालन प्रोफेसर श्री रामध्यानजी जहाजीराबाद का सुप्रसिद्ध वैट अपनी भावपूण अग्रवाल ने किया। उन्हान सभापूर्णता की भक्ति धुन तथा गीतो को गाता हुअा, चल रहा घोषणा की। था। फिर पूज्य मुनि मण्डल, फिर श्रावक, भगवान इस ममारोह में भाग लेने दिल्ली से सवधी का रथ, फिर दीक्षा के उपकरणो का छाप, फिर मणिलालजी डोशी, श्री जवाहरलालजी राक्यान, श्राविकाए । करीवा एक मि मी लम्बा विशाल श्री दौलतसिंहजी जैन, श्री सितावच दजी जुलूम अनूपशहर के इतिहास का सवप्रथम जुलूस फोफलिया आदि के अतिरिक्त दो बसें आयी थी। था। इस जुलूम को देखने नगरवासी उमड पडे व्यावर से श्री शमुमलजी राका आदि, और भी थे। मकाना की छतो पर, दुकानो के अोटालो पर, स्थानो, माण्डी, मेरठ, वुलन्दशहर, गाजियावाद, जिधर दवा उपर मानव ही मानव नजर पा रहे वर्गरा, लश्वर प्रादि अनेक स्थानो से व्यक्ति थे । परीवन 3 घण्टे तक शहर के मुख्य बाजार में पधारे थे। घूमता हुअा जुलूम पूर्व निर्धारित दीक्षा स्थल सभा में स्थानीय राजनेता, अधिकारी, - 102 - व्यापारी, बुद्धिजीवी आदि और भी सभी जातियों प्रवेश का वर्णन मन्त्री श्री दौलतसिंहजी जैन की के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। भाषा मे- स्वामीवात्सल्य का आयोजन बड़े ही सफल परम् पूज्य गुरुदेव, अनुयोगाचार्य श्री कान्ति- ढग से संयोजित हुआ। भोजन तथा परोसने की सागरजी म.सा. का नगर-प्रवेश आज दि. 7-7-81 व्यवस्था की सभी व्यक्ति मुक्त-कठ से प्रशसा कर को सानन्द सम्पन्न हुआ। रहे थे । अनूपशहर मे इतना बड़ा विशाल समारोह आपश्री के नगर-प्रवेश पर टाउन हॉल मे सानन्द सागोपाग उतरा, उसका सारा श्रेय हिन्दी स्वागत-सभा का आयोजन किया गया। इस सभा साहित्य परिषद् के मन्त्री तथा सर्राफा यूनियन के मे बहुत संख्या में नर-नारी उपस्थित थे। विशेष अध्यक्ष सर्वश्री रतनचन्दजी जैन तथा रामलीला अतिथियों में केन्द्रीय पैट्रोलियम व रसायन मंत्री कमेटी के प्रधान श्री शान्तिप्रकाशजी जैन का है । श्री पी. सी. सेठी उपस्थित थे। श्री किशनलालजी समारोह का सारा आर्थिक भार आपने ही जैन ने महाराजश्री का जीवन परिचय दिया। वहन किया । आपके पूरे परिवार के साथ तत्रस्थ चारो ओर अपार उत्साह था। इस कार्यक्रम का श्री कुशलचंदजी, श्री गुलावचन्दजी, श्री अशोकजी सचालन श्री किशनलालजी जैन ने कुशलता से श्री अनिलजी, श्री विनोदजी आदि ने इस कार्यक्रम किया । पूज्य गुरुदेव श्री के प्रवचन के पश्चात् यह को सफल बनाने मे तनतोड परिश्रम किया। सभा एक विशाल शोभायात्रा के रूप में परिवर्तित विशेषतः श्री अशोकजी, अनिलजी व विनोदजी हो गई। शोभायात्रा मे जैन ध्वज, बैड-वाजा सभी धन्यवाद के पात्र है। धार्मिक उत्सवो के भजन मण्डलिया और सैकड़ों की संख्या में लोग प्रति उत्साह समादरणीय है । उपस्थित थे। जुलूस दिल्ली के मुख्य बाजार चादनी चौक, दरीवा कला, किनारी बाजार व यह दीक्षा समारोह अनूपशहर के इतिहास में स्मरणीय रहेगा। मालीवाड़ा होता हुआ धर्मशाला मे पहुचा। जुलूस का सारा मार्ग शानदार ढंग से सुनहरी फरियों से अनूपशहर से दि. 28-6-81 को विहार कर सजाया गया था और टाउन हॉल से लेकर सारे बुलन्दशहर, गाजियावाद होते हुए दि. 3-7-81 जुलूस मार्ग में लाउडस्पीकर लगे हुए थे, जिस पर को प्रातः छोटी दादाबाडी पहुंचे। फिर एक दिन श्री किशनलालजी जो कमेन्ट्री बोलते जा रहे थे । महरोली दादाबाड़ी रुके। वर्तमान मे पूज्य गुरुदेवश्री लाल धर्मशाला, दि 7-7-81 को दिल्ली नगर-प्रवेश था । मालीवाड़ा मे चातुर्मासार्थ विराजमान है । 103
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विभाग
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उन सभी दानदाताओं के आभारी है-
जिन्होंने इस प्रकाशन मे
अपना बहुमूल्य सहयोग देकर
समिति का उत्साह बढाया है ।
པ།
क्रोध करने से कभी दूसरों से सम्मान नहीं मिलेगा।
शुभकामनाओं सहित :
चुन्नीलाल चंपालाल दुग्गड़
गोलगंज P.O. छिन्दवाड़ा (M.P.)
1
मानवता के गुण विना कोई जैन वन ही नहीं सकता । कम शत्रुनो यो जीतने वाला ही जैन,
प्रत शत्रुओ पर विजय पाने वाला ही जैन ! यहा जाति का प्रश्न ही नहीं।
With best compliments from
Phone 27267
Prakash Paper Mart
( Dealers of Papers & Boards )
22/450 Raja Street,
COIMBATORE
जगत मे कोई तेरा दुश्मन नही । जीय कर्माधीन है। किसी को स्लावर कोई हंस नहीं सकता।
स्वय को जानने वाला मनको जान लेता है।
With best compliments from
Phone 21455
S. M. OSWAL & CO. .
BHAVANA
(Jiyajee Suiting & Shirting )
No 7, Sayaji Rao Road,
MYSORE-570001
4
संसार की सारी इच्छा और तृष्णा मर जावे केवल एक इच्छा परमात्मपद प्राप्त करने की
रहे तब ही आत्मा का बोध होगा।
पीरचन्द भीखमचन्द दुग्गड़
P.0. साजा Distt. दुर्ग (M.P.)
5.
हमारी शुभ कामनायें।
चम्पालाल कोचर
लोहावट (जाटावास)
[ राजस्थान]
गुलाब चन्द राखेचा
PO धमतरी, Distt रायपुर (M.P)
श्री जय वस्त्रालय
PO खैरागढ़,
Distt राजनांदगांव (MP)
जमनालाल बंगानी
गणेश चौक, धमतरी,
Distt रायपुर (MP)
8
पूर्णता होगी वहां गम्भीरता होगी। भरे घड़े और खाली
घड़े की आवाज मे कितना फर्क होता है ।
फोन
{
३६४०८६
३६१८१२
कपड़ा विभाग :
फर्मस्
१. हिन्दुमल वंसराज
२. कान्तीलाल छगनलाल
३. छगनलाल छोगालाल
४. जसराज भरतकुमार
५. हंसमुख टैक्सटाइल्स
कपड़े के थोक व्यापारी
१४, न्यू क्लॉथ मार्केट, अहमदाबाद
अनाज विभाग :
फोन नं० ३७१००८
१. अरुणकुमार एण्ड कं०
२. मुकेशकुमार एण्ड कं०
अनाज के व्यापारी व कमीशन एजेण्ट
कालुपुर, दारणापीठ, अहमदाबाद
9
सदाचार से ही सद्गति और दुराचार से ही दुर्गति होती है ।
यतन महिला मंडल
महासमुन्द (म प्र.)
कुन्दनमल सहसमल जैन
ग्रेन मर्चेण्ट एव कमीशन एजेण्ट
गोल वाजार, पडरिया
तार महावीर
फोन २८
जिनके पांव बीमारी अथवा दुर्घटनावश कट गये हो उनके नि शुल्क कृत्रिम
पांव लगाये जाते हैं। अब तक ६ हजार से अधिक
विकलाग लाभान्वित हो चुके है।
सम्पर्क करें
श्री भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति
सवाई मानसिंह अस्पताल, जयपुर (राजस्थान)
-
10
क्रोध मे उपदेश नही दिया जाता-गरम तेल में पानी नही डाला जाता।
फोन : 541
सोनकरण राजेन्द्र कुमार मरोटी
गांधी चौक, दुर्ग-४६१००१ (म. प्र.)
कर्म का बंध करते वक्त ध्यान रखा नही अब उदय में आया है तो राजी से भोगलो ।
मेघराज बक्तावरमल श्रीश्रीमाल
महासमुन्द (म.प्र.)
11
साधना जितनी शुद्ध होगी उतने ही हम परमात्मा के निकट होगे, साधना का प्रवेश पत्र है
"मिच्छामी दुबड्ड"।
हार्दिक शुभकामनायो सहित
शुभाकाक्षी
स्व. श्री बशीलालजी कोटडिया के सुपुत्र
जसराज, मेघराज, राजमल, पारसमल कोटडिया
B. Jasraj Kotadia
48, Amman Koil Street
MADRAS-600001
परमात्मा ने कहा 'जीवो और जीने दो' । आगे बढकर कहा 'जीवो और जिलाओं' । स्वय का
भोग देकर भी दूसरे को बचाना यही है सच्चा प्रात्मघम ।
हार्दिक शुभकामनायो सहित
mooniww
शा. भवरलाल नैनमल |बवेरीलाल ललितकुमार
(कपड़े के व्यापारी व कमीशन एजेट) एव (कपडे के व्यापारी व कमीशन एजेट)
Speciality माहेश्वरी मिल
-पीरामल ग्रुप के वस्त्र विक्रता
-६२-A, मस्कती मार्केट
अहमदाबाद-३८०००२
12
प्रभु ने इन्द्र से कहा "मोक्ष की साधना उधार से नही होती।"
हार्दिक शुभकामनाओं सहित :
गुलाबचंद अमरचंद बाघरेचा
P. O. बीजा Distt. दुर्ग (M. P.)
परमात्मा का अभिपेक स्वयं के पापों को धोने का निमित्त ।
शुभकामनाओं सहित !
शांतिलाल बंगानी
P. O. नयापारा (राजिम) Distt. रायपुर (M.P.)
13
अाज लोगो ने लगभग तारको से सम्बध तोड डाला है और भवसागर
मे डुबोने वालो से पक्का सम्बध बांध रखा है ।
शुभ कामनामा साहत
राजेन्द्र इन्टरप्राइजेस
टिम्बर मर्चेण्ट फोरेस्ट कॉन्ट्रेक्टर
खरियार रोड (उडीसा)
वीतराग भक्त वीतराग के पास सासारिक राग के साधन
नही मागता है, वरन् वैराग्य के साधन मागता है ।
शुभ कामनाभो सहित
फोन { निवास 167
रामलाल मिश्रीलाल लोढ़ा
ठि सुनील ट्रेडिंग क०
राइस एण्ड दाल मिल ओनर्स
दुर्ग-491001 (मप्र)
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न सुनो गर कहे बुरा कोई, न करो गर बुरा करे कोई ।
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Shah Chhogmal Hastimal & Co.
Shah Vimalchand Vaktavarmal & Co.
Main Road, GUNTUR - 3.
&
Sree Rajalaxmi Electricals
2, Bharamanda Building, GUNTUR - 3.
अभिमान होता है वहां पात्रता नहीं आती।
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Phone : 2:2872. 243.22
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61, Kansara Chawl, Kalbadevi Rozd, POM241-41
देव गुरु के पास उन्हे मन्मान का दान देने के लिये जाना है उनसे सन्मान लेने
के लिये जाने का नहीं है।
With best compliments from
Sha Chhganlal Ghevar Chand
Astodiya Rangati Bazar
AHMEDABAD 380001
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Sha Chhganlal Mishrimal
Revdi Bazar Opp Vina Guest House
AHMEDABAD-380001
देने वाला देता ही नही लेकर आता है । पृथ्वी में देता है तब किसान पाता है । जैनो के पास
सम्पनता क्यो है उसका कारण एक ही है उनका त्याग ।
अर्थ में मुदा नही होती है जब ही मिलता है ।
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179, B, Abdul Rehman Street, 3rd Floor,
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Sha Ratanchand Khubaji
Cloth Merchant & Commission Agents
AHORE -307029
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13-A, Sakalajee Market
Avenue Road, BANGALORE - 560 002.
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Near Haji Building, Shabpur Road
AHMEDABAD-380001
हमारी शुभकामनाओं के साथ :
हमारी शुभकामनाओं के साथ :
फोन : ३८४८०१
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रतन पोल, नागौरी शाला नाका
अहमदाबाद
विमल मिल की साड़ियों के व्यापारी
चेतना लॉज के पास, रिलीफ रोड
अहमदाबाद
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सद् विचार प्राचार में आ जाये तो हम ससार का सजन नही विसजन कर पायेंगे। मुझे ममार
लूट पर मरना है लुटापर नहीं।
हमारी शुभकामनामों के साथ
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सरदारमल पाबुदान गोलछा
नवा माधुपुरा
अहमूदाबाद
पाराधना कायम करने वाला श्रमण इसीलिये नवपद मे पाना रग
श्रमण यानी यम का मूचर ।
हमारी शुभकामनामों के साथ
कान्तीलाल मणीलाल कोठारी
दादासाहेब की पोल
अहमदाबाद
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पूज्य गुरुदेव श्री का दिल्ली प्रवेश -
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पूज्य गुरुदेव, ननुयोगाचार्य
श्री कान्तिसागरजी म. सा.
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आशीर्वाद प्राप्त करते हुये-
केन्द्रीय रसायन व पैट्रोलियम मंत्री
श्री प्रकाल
सेठी
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