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Shri Kirshan Das · 2012/08

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Thanmaintenama
श्री:1
नाडीदर्पणः।
पाठकज्ञातीयमाथुरश्रीकृष्णलालतनय
दत्तरामेण संकलितःस्वकृतभापा-
टीकाविभूपितः।
सच
श्रीकृष्णदासात्मज-खेमराजेन
गुंबय्या
श्रीवेंकटेश्वरयन्त्रालयेऽङ्गित्वा प्रसिद्धिं नीतः
।
संवत् १९५० शके १८१५
भस्य RER पुनर्मुदणाधिकार १८६५ नमान्दिक राजनि-
यामानुसारेण यन्त्रोधिपत्यधीन

FDMIATIVITHIYNTyrauBHARAT
64
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श्रीः।
नाडीदर्पणः।
पाठकंज्ञातीयमाथुरश्रीकृष्णलालतनय
दत्तरामेण संकलितःस्वकृतभापा-
टीकाविभूपितः।
सच.
श्रीकृष्णदासात्मज-खेमराजेन
मुंबय्यां
श्रीवेंकटेश्वरयन्त्रालयेऽङ्कित्वा प्रसिद्धि नीतः
संवदं १९५० शके १८१५
अस्य प्रथस्य पुनर्मुद्रणाधिकारः १८६७ तमादक गजनि-
यामानुसारेण यन्नाधिपत्यधीन:

प्रस्तावना. मित्रहो नाडी देखने के अनेक ग्रंथ छपे है.जैसे नाडीज्ञानतरांगणी. नाडी- विज्ञान. नाडीप्रकाश. नाडीविवेक और बहुतसे ग्रंथ नाडीके लिखेहुएनी मौ- जूद है परंतु जैसा यह नाडीदर्पण छपा है ऐसा ग्रंथ इस विषयमें आजतक कहीं नहीं छपा. दूसरे बहुतसै ढपोलसंख वैद्य नाममात्रको नाडी देखते है परंतु वास्तवमें उनको नाडी ज्ञानही नहीं है। होय कहांसें ? वो सहरुके पास पढे तो आवे सो पढनेसैं तो उनको सरम आती है; परंतु विनापढे घरबैठे पढजावे उ- नके वास्ते मेने यह नाडीदर्पण निर्माण करा है प्रथम इसमें आयुर्वेदोक्त नाडी देखनेकी विधी विस्तारपूर्वक लिखी है फिर यूनानी ग्रंथोंके आधारसैं नज परीक्षा लिखी फिर डाकटर लोग किसप्रकार देखते है उनका क्रम लिखा है और इनके यंत्रमी देखनेकी विधि सहित लिखे है केवल इस एक नाडीदर्प- णके देसनेसैही फिर अन्य नाडीके ग्रंथ देखनेकी बिलकुल इच्छा नहीं रहे प्रियवरों यह एकवार ३००० तीनहजार छपाथा सो हाथोंहाथ विकगया अब फिर पहलेसे मोटा कागद और मोटे टाइपमें छापा है फिरभी कीमत नहीं बढाई गई यह ग्रंथ आपके हस्तगत है देखलीजिये सत्यासत्य निर्णय होजायगा आपका पं० दत्तराम चौवे मथुरानिवासी हमारे यहां दो ग्रंथ वैद्यकके बहुतही उत्तम छपरहे है. एक तो भावन- , काश भाषाटीकासहित ऐसा भावप्रकाश भापानुवादसहित न कभी छापा , और न अब फिर छपेगा. नमूना देखना होय तोऽ ॥ टिकट नीचे लिखे ठिकानेपर भेजकर मंगाय लीजिये दूसरा चिकित्साचक्रवर्ती नापाग्रंथ, हारीतसंहिता-आपारीका छपके तयार है की० ३ रु. खेमराज श्रीकृष्णदास श्रीवेंकटेश्वर छापाखाना मुंबई मुं श्री। 'नाडीदर्पणस्य विषयानुक्रमणिका। पृष्ठ | विषय .... ७ .... " पृष्ठ जल स्थल जीवोंकी गतिके अनुसार नाडीकी गति परीक्षणीय ६ सगुरुद्वारा नाडीकी गति पठनीय नाडीको कालपरत्व विलक्षणता आरोग्य और स्वस्थावस्था नाडीको विलक्षणत्त्व नाडीकी अवस्था सर्वदा ज्ञातव्यत्व ८: नाडीके स्पन्दनका कारण नाडीके नाम ९ नाडीके भेद .... .... .... .... .... -- .... P .... " . .... .... सुषुम्ना नाडीका वर्णन विषय मंगलाचरण वाग्भट २ रोगोंकआठ स्थान.. वैद्योके सुखार्थ ग्रंथनिर्माण . नाडीको मुख्यत्व. नाडीज्ञानकी आवश्यकता नाडीज्ञानविना वैद्यकी अप्रतिष्ठा.... " नाडीज्ञानविना वैद्यको अधमल सर्व रोगमें प्रथम नाडी देखना नाडी ज्ञानके -विना धन धर्म और यशकी अप्राप्ति नाडी मूत्रादि ज्ञानके पश्चात् औषध देना नाडी देखने में वीणा तन्तुका दृष्टांत " नाडीज्ञानविना निदानद्वारा रोग नि- र्णय कर्ता वैद्यको अधमल निदान और नाडीके लक्षण मिला- कर चिकित्सा करनकी आज्ञा " वैद्यके प्रति आज्ञा.... ५ नाडीपरीक्षाकयन नाडीजानकी परिपाटी नाडीज्ञानकी उत्कृष्टता नाडीदर्पण पढनेका कारण परीक्षाको मुख्यंत्व.... नाडीपरीक्षामें अभ्यासकारण योगाभ्यासके तुल्य नाडीज्ञानकथन " .... 4 नाभिमें गोपुच्छसमान नाडियोका कयन.... साडेतीनकरोड नाडी नाडियोंके साडेतीनकरोड पुत्र तिनमें एकहजार और बहत्तर स्थू- .... . ल नाडी .... .... .... .... 1111 .... " .... .... " सातसा नाडी और उनके कर्म. यह देह नाडीयासें मृदंगके तुल्य मढाहै .. चौवीस नाडियोंको मुख्यत्व देहधारियोंके कूर्मकी स्थिति और धमनी नाडियाँकी गणना 'स्त्रीके वामभागकी और पुरुषोंकि द- सिणभागकी नाडी देखना १२ छ: नाडी द्रष्टव्य... ....

.... .... असव नाडी .... " .... .... .... .... .. " " .... .... .... . .... .... जन्वल्फार गति .... ६ ... (४) अनुकमाणका । विषय विषय सुरियान नाही .... ४९ नाडीनका प्रस्तार चक्र अबैंग्लंडीयमतेन चार उंगलियास नाडी परीक्षण..., ५१ नाडीपरीक्षा. नाडीकी गिजाली गति पल्ससंज्ञा और उसका भेद ५७ मौजी गति उठने बैठने आदिमें नाडीका विचार ५८ दूदी गति अफीम आदि उष्णभोजनमें नाडी- उमली गति... की गति मिन्शार गति नाडी देखनेकी विधि आरोग्यावस्थाकी नाडी माली गति.... जुल्फिकरत गति अवस्थानुसार नाडीगतिचक रोगावस्थाकी नाही मुर्तइद गति सौदावी मुर्तइस (सौदासफरा विशिष्ट) नाडी इंग्रजी संज्ञा. मुमतिला गति ५२ / फ्रीकैट गति मुन्साफिज गति इन्फ्रीकैट गति शाहक बुलन्द गति रेग्यूलर गति दराज और तवील गति इररेग्यूलर गति कसीर अमीक और अरीज इन्टरमीटंट गति गले कसूर अरक्कात लागिति वाकियुलवस्त नाही यूनानीमतानुसार नाडीचक्र ५३ अंडीपल्स गति ... नब्ज कहनेका कारण हार्ड गति नाटी देखने के नियम " इम्बसात और इकिवाजगतिपोंका कीक गति वर्णन और चक्र .... ५४ स्ली गति खिल्त वर्णन नाहीदर्शक यंत्र अर्थात् स्फिग्मोग्रा- प्रत्येक दीपमें दो दो गुण.... फका वर्णन चक्रद्वारा इम्पसातके भेद... ५५ स्फिग्मोग्राफ लगानेकी विधि ५६ डाक्टरी मतानुसार नाहीचत्रम् कुतर अर्थात् प्रस्तार इत्पनुक्रमणिका समाप्ता ॥ .... .... .... .... .... .... " " ... इस्माल गति .... .... " .... " .... साफ्ट गति .... .... .... .... .... .... ६४ " ... दूसरा चक .... 3600 ....

स्फिग्मोग्राफ यंत्रका स्वरूप.
नाडीकी अक्स पड़ने का स्वरूप.
M
.
सूत्रजन्य पदार्थ

नजन्य हिर्नाय प्रकार के पदार्थ
Fologs खुर्दनीन.
EMARAT
सूत्रदर्शन मुर्दर्शन

• धमनी पदर्शक चित्र. इस धमनी प्रदर्वाक चित्रमे ख ग धमनी मूल यह ; भिमुखी, पश्चाद गामी तथा निम्ममुरखी ये तीन अशीमे विक्षत है। न रखा 뀗되 외위의 ग्रत गरन टज चड जर गध द न a . दक कपालस्य धमन उदरस्य गड मन गलस्य धमनी मलपारीय धमनी कटस्य धमनी जानपञ्चावधानी कक्षा नाडी प सानुम्य सन्मुन्य गटी ज धमनीररूपया यक्षम्य र नार्ट खत मध्यनर धमनी तड न्यमूल नाई हक जगनाडा दइज अपना नाकी पन्निनाईनक मणिबधया जट बाह्या बाहानी, वरिनादाग घ मकानीय मम । + । ' J श्रीशम्बन्दे श्रीनिकुअविहारिणेनमः अथ नाडीदर्पणप्रारम्भः। मङ्गलाचरणम् श्रीमन्तं जगदीश्वरं गदगदाधारञ्च धन्वन्तरि- मम्यां श्रीजगदम्बिकाप्रतिकृति श्रीकृष्णलालाभिधम् । तातं कृष्णपरावतारमहिमं नत्वा मुहुः संयतः श्रीकृष्णांनिसरोरुहद्वयसुधाधारामिलिदायितः॥१॥ श्रीमन्माथुरमण्डलाभिजननः श्रीदत्तरामाभिधो दृष्ट्वा तन्त्रसमूहमूहविधयाऽऽलोड्य स्वयं यत्नतः। बालांनां सुखहेतवे मतिमतामानन्दसंप्राप्तये नाडीदर्पणनामधेयकमिमं ग्रन्थं करोम्यादरात् ॥२॥ युग्मम् । अर्थ-श्रीमान् जगदीश्वर रोग और अरोग्यके आधार ऐसे श्रीधन्व- म्तरि भगवान् तथा जगन्माता (लक्ष्मी) के तुल्य रमा नामक अपनी मा. ताको तथा कृष्णका परावतार ऐसे श्रीकृष्णलाल (कन्हैयालालं) नामक अपने पिताको वारंवार यन्त्रपूर्वक नमस्कारकर श्रीकृष्णचरणकमलंयुगला- मृत धाराको पानकरता भमर और श्रीमधुपुरीमंडल अथवा माथुरद्विज (चोंबे ) नको मंडल कहिये समूह तामें निवास जाको, अथवा जन्म जाको ऐसा जो दत्तराम संज्ञक में सो अनेक शास्त्रसमूहको देख और स्वयं विधिपूर्व- कपलसैं मथनकर बालकोंके सुद्धकेलिये पंडितोंके आनन्दको प्राप्तीकेअर्थ नाडीदर्पण नामकथको परमआदरसे करताहूं। यह ग्रंथ यथानाम तथा (२) नाडीदर्पणः। गुणोंमेभी है अर्थात् जैसे दर्पणसे इमाणीके संपूर्ण गुणदोष प्रगटहोतेहैं। सीप्रकार इसग्रंथसें नाडियोंके संपूर्ण गुणदोष उत्तम रीतिसँ प्रगटहोतेहैं । वानरः रोगमादो परीक्षेत तदनन्तरमौपधम् ॥ ततः कर्म भिषक् पश्चाज्ज्ञानपूर्व समाचरेत् ॥३॥ अर्थ-वाग्भट ग्रंथमें लिखाहै वैद्यको उचितहै कि प्रथम रोगकी परीक्षा करे रोगजाननेके अनंतर औषधकी परीक्षा करे रोग और औषध दोनों जाननेके पश्चात ज्ञानपूर्वक अर्थात् सावधानीकेसाथ चिकित्साकरे यानी औषध देवे लक्षयित्वा देशकालौ ज्ञात्वा रोगवळावलम् ॥ चिकित्सामारभेद्वेयो यशः कीर्तिमयामुयात् ॥४॥ अर्थ-देश और कालका लक्ष करके और रोगको बली और निर्मलित्व जानके मो पैद्य चिकित्साका प्रारम्भ करताहै वह यश, और कीर्तीको पाताहै। रुग्णावस्था ततो नाडी भेपज पथ्यमेव च ॥ देश कालञ्च पात्रञ्च यो जानाति स वैद्यराट् ॥५॥ अर्थ-रोगीकी अवस्था, नाडी, औपध, पथ्य, देश, काल, और पात्रको जा- नताहै उसको चैयराज कहतेहैं। रोगोंके भाठस्थान रोगाक्रान्तशरीरस्य स्थानान्यष्टौ परीक्षयेत् ॥ भाडी मृनं मलं जिहां शब्दस्पर्शगाकृतिम् ॥६॥ मर्थ-वैश रोगी मनुष्यके आठ स्थानों की परीक्षाकरे, जैसे कि नाडीपरीक्षा, मूत्रपरीक्षा, मलपरीक्षा, जिव्हापरीक्षा, शब्दपरीक्षा, सर्शपरीक्षा, नेत्रपरीक्षा, और रोगीकी आरुतिकी परीक्षा। नानाशास्त्रविहीनानां वैद्यानामल्पमेधसाम् ॥ नाव्याघटपरीक्षाश्च सुखार्थ प्रभवन्ति हि ॥ ७॥ अर्थ-अनेक शास्त्र पढनेकरके रहित अल्प बुद्धि वैद्योंके लिये यह नाहीमा- दि अष्टविधपरीक्षा सुसके अर्थ होवेमी। - , " 4 11 आयुर्वेदोकनाडीपरीक्षा। आई तावन्नाडिकाविज्ञानादेव वातपित्तकफजनितानामा- साध्यासाध्यकष्टसाध्यसभेदकविज्ञानं सुकरत्वेन . मिषम्भिरखाप्यतेऽत एव तावनिरूप्यते ॥८॥ -तहां प्रथम वैद्योंको नाडीके देखनेसे ही वात, पित्त, और कफजनित साध्यासाध्य और कष्टसाध्य सभेदविज्ञान सहजमें प्राप्त होसक्ताहै, प्रथम उसी नाडीपरीक्षाका वर्णन करतेहै। प्रथम नाडी देखनेकी दिखातेहै। नाडीज्ञानकी आवश्यकता नाडीज्ञानं विना वैद्यो न लोके पूज्यतां ब्रजेत् ॥ अतश्चातिप्रयत्नेन शिक्षयेदुद्धिमानरः ॥ ९ ॥ विना वैद्य संसारमें पूज्य (माननीय) नहीं होता अतएर बुद्धिवान मनुष्पको उचिवहै कि नाडीज्ञानको सड्गुरुसे अति यवपूर्वक सीखे मर्याद नाडी देखनेका अनुभव करे। बोधहानं यथाशास्त्र भोजनं लवणं विना ।। पतिहीना यथा नारी तथा नाडी विना भिषक् ॥१०॥ अर्थ-जैसे बोधविना शास्त्रपढने की शोभा नहीं, विना लवण भोजनके पदार्थ नियनहीं, और पतिके विना बीकी शोका नहीं, उसीप्रकार नाही ज्ञानके वि- या वैद्यकी शोभा नहींहै,। नाडीजिह्वातवादीनां लक्षणं यो न विन्दति ।। मारयत्याशुवै जन्तून्स वेद्यो न च शोभनः॥१६॥ अर्थ-जो नाडीपरीक्षा, जिव्हापरीक्षा, और सीके आचकी परीक्षा नहीं 'जाने वह मूढवैद्य तत्काल रोगियोंको मारताहै, इसीकारण. ऐसा मूढवैद्य उ- सम नहींहै। आदौ सर्वेषु रोगेषु नाडीजिह्वाग्रनेत्रकम् ।। सूत्रात्तव परीक्षेत पश्चागुग्णं चिकित्सयेव ॥१२॥ . 14 ( (४) नाडीदर्पणः। अर्थ-वैव प्रथम संपूर्ण रोगोंमें नाडी, निहा, नेत्र, मन और आवकी परीक्षाकर फिर रोगीकी चिकित्सा करे। नाडीज्ञानं विना यो वै चिकित्सां कुरुते भिपक् ॥ स नैव लभते लक्ष्मी न च धर्म न वै यशः॥१३॥ अर्थ-जो वैद्य विना नाडीपरीक्षाके जाने चिकित्सा करताहै वह धन, धर्म और यशको नहीं प्राप्तहोता परंच उसको अपयशकी प्राप्ति और मूर्ख कहलाताहै नाड्या मूत्रस्य जिह्वायाः कुरु पूर्व परीक्षणम् ।। औषधं देहि तज्ज्ञाने वैद्य । रुग्णसुखावहम् ॥१४॥ अर्थ-हेवैद्य ! प्रथम नाडी, मूत्र, और जिन्हाका परीक्षण कर जब नाडी मूत्र और जिव्हाकी परीक्षाद्दारा रोगका निश्चय करलेवे तब रोगीको सुख- कारी ओपधी दे। यथा वीणागता तन्त्री सर्वानागान्प्रभापते ॥, तथा हस्तगता नाडी सर्वानोगान्प्रकाशते ॥१६॥ अर्थ-जैसे वीणाका तार संपूर्ण रागोंको सूचना करताहै उसी प्रकार हाथकी नाडी सर्वरोगोंको प्रकाशित करतीहे इस श्लोकका तात्पर्य यह है वीणाका तारजी जो बजाने वालेहैं उन्हीको उस तारके रागकी प्रतीत हो- तोहे उसी प्रकार हाथकी जो नाडीके जाननेवालेहे उन्हीको रोग प्रकाशित करतीह जेसे मूर्खके वास्ते तारद्वारा राग नहीं मालूमहो उसी प्रकार मूर्खदै- यको नाडी देखना निप्पयोजन है। नाडीलक्षणमज्ञात्वा निदानग्रन्धवाक्यतः॥ चिकित्सामारभेद्यस्तु स मृट इति कीर्त्यते ॥ १६॥ अर्थ-जो वैद्य नाडीके लक्षण बिना जाने केवल निदानग्रंथके वाक्योंसें रोगपरीक्षा कर चिकित्सा करताहै वह मूढ ( मुर्स) ऐसा कहलाताहै। निदानपञ्चकादीनां लक्षणं वेद्यसत्तमः ।। नाडीतु संवलीकृत्य चिकित्सामाचरेत्सलु ॥ १७॥ 4 L आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (५) अर्थ-इसीकारण उत्तमवैद्य निदानपंचक्रादिके लक्षण जानके और उ- नमें माडीके लक्षणभी मिश्रित (सामिल ) करके चिकित्साका प्रारंभ करे। ५ कियत्स्वपि च चिद्वेषु ज्ञातेष्वपि चिकित्सितम् ।। निष्फलं जायते तस्मादेतच्छृण्वेकचेतसा ॥१८॥ व कहतेहै कि बहुतसे चिन्ह जाननेपरभी चिकित्सा निष्फल अतएव इस नाडीदर्पणप्रथमें जो कहा जाताहै उसको हे वैद्य । चित्तसे सुन। . तत्रादौ प्रोच्यते नाडीपरीक्षातिप्रयत्नतः ॥ नानातन्त्रानुसारेण भिषगानन्ददायिनी.॥ १९ ॥ अर्थ-तहां प्रथम अनेक ग्रंथोंके अनुसार वैद्योंको आनंददायिनी यलपू- नाडीपरीक्षा कहते हैं। क्वचिग्रंथानुसंधानाद्देशकालविभागतः ।। क्वचित्प्रकरणाचापि नाडीज्ञानं भवेदपि ॥२०॥ .:. अर्थ-अब नाडीज्ञानकी परिपाटी, कहतेहै कि कहीं तो नाडीज्ञान ग्रंथ होताहै, कहीं देश कालके जाननेसैं, और कहीं प्रकरण वससे नाडीका होता है,तात्पर्य यहहै कि वैद्य केवल ग्रंथकेही भरोसैं न रहै, किंतु कुछ अ- बुद्धिसैं विचारे यह कौन स्थानहै,कौनसा कालहै,और ये रोगी क्या- हार विहार करके आयाहै, इसप्रकार अच्छीरीतिसें विचारकर नाडीको कहे। सदरोरुपदेशात्र देवतानां प्रसादतः ॥ नाडीपरिचयः सम्यक् प्रायः युण्येन-जायते ॥२१॥ अर्थ-अब नाडीज्ञानकी उत्कृष्टता दिखातेहै कि सद्गुरु अर्थात् सवैद्यके पतानेसे और देवताओंकी प्रसन्नता तथा पूर्वजन्मके पुण्यकरके नाडी- परिचय होताहै, किंतु अपनेआप पढनेसैं और विना देवरुपाके तथा अधर्मी नास्तिकको नाडी देखनेका ज्ञान नहीं होताहै, अतएव जिसको नाडीज्ञानकी मावश्यकता होवे वो सद्गुरु और देवसेवा तथा धर्ममें तत्पर होय । नाडीपरिचयो लोके न च कुत्रापि दृश्यते ॥ तेन यत्कथ्यते चात्र तत्समाधेयमुत्तमैः॥ २२॥ " .

* -4 (६) नाडीदर्पणः। अर्थ-नाडीका परिचय अर्थात् नाडीदेखनेका ज्ञान इससंसारमें कहीं नहीं दीखता इसीकारण जो इसग्रंथमें कहाजाताहै वो उत्तमपुरुषोंको अवश्य जानना चाहिये। परीक्षणीयाः सततं नाडीनां गतयः पृथक् ॥ न चाध्ययनमात्रेण नाडीज्ञानं भवेदिह ॥२३॥ . अर्थ-वैदाको उचितहै कि निरंतर नाडीकी गतिकी परीक्षा कराकरे क्योंकी केवल पढनेहीसे नाडीका ज्ञान नहीं होता। न शास्त्रपठनादापि न बहुश्रुतकारणम् ॥ नाडीज्ञाने मनुष्याणामभ्यासः कारणं परम् ॥ २४॥ अर्थ-नाडीके ज्ञानमें शास्त्रपठनसें अथवा बहुतनाडी संबंधी वा भोंके सुननेसैं नाडीका ज्ञान नहीं होता, किंतु नाडीज्ञानमें मनुष्योंको केवल अत्या- सही परम कारणहै इसे आयासकरे। नाडीगतिमिमां ज्ञातुं योगाभ्यासवदेकतः॥ शक्यते नान्यथा वैद्य उपायैः कोटिशेरपि ॥२५॥ अर्थ-वैद्यको इस नाडीकी गति जानने में समर्थहोना केवल योगाभ्या- सके सदृश नाडीदेखनेके अभ्याससँही होसकताहै, अन्य करोंडो उपायोंसेंमी नाडी ज्ञान नहीं होता। जलस्थलनभश्चारिजीवानां गतिभिः सह ।। गतयो झुपमीयन्ते नाडीनां भिन्नलक्षणाः॥२६॥ अर्थ-जल, स्थल, और आकाशमें विचरनेवाले जीवोंकी गति (चाल) करके भिन्नलक्षणा नाडियोंकी गति अनुमान करीजातीहै, अर्थाद जलचर जीव (जोंक मेंडक आदि) स्थलचरजीव (सर्प, हंस, मोर आदि) और आकाशचारीजीव (लवा, बटेर, आदि)ए जैसें चलते हैं इनके सहश नाडी- चलतीहै, इनमें जिस दोपकी जैसी चाल नाडीकी लिखीहै उसको उसी प्र. कारकी देसकर वैद्य नाडीको वातपिचादिककी नाडी वदावे, अन्यथा ना ज्ञान होना कठिन है।

आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (७) कीदृग्गतिस्तत्र विज्ञातव्या विचक्षणः॥ च तच्छायं सदरोनिशालिनः ॥२७॥ अर्थ-वैद्यहोनेवाले प्राणीको उचितहै कि उत्तम ज्ञानवान् शास्त्र के ज्ञाता किस जीवकी कैसी गतिहै इसको सीखे और जो.इसनाडी विषयके उनको पढे, किसी जगे हमने ऐसा लिखा देखाहै कि दशवर्षतो वैद्य- पंथ पढे, और गुरूके आगे अनुभव (आजमायस ) करे, क्योंकि यह • पढनेका समय बहुत उत्तमहै, इस समय ग्रंथ और रोगीदोनो उपस्थि- तहै जो ग्रंथमें पढे उसको गुरूके आगे रोगीपर परीक्षा करे, यदि जो वात समझमें न आवे तो उसको उसीसमय. गुरूसे पूछलेय तो संदेह निवृत्तहो फिर दशवर्ष वनमें रहकर वनवासियोंसे अर्थात् माली, काछी, भील, आदिसँ औषधका नाम और उसके गुण तथा परीक्षा सीखे तब वैवक करनेका अधिकार होता है। कल्याणमपि वारिष्टं स्फुटं नाडी प्रकाशयेत् ॥ रुजां कालिकवेशिष्टयाद्भवेत्सापि विलक्षणा ॥२८॥ अर्थ-कल्याण (शुभ) और अरिष्ट (अशुन ) इन दोनोंको नाडी प्र- प्रकाशित करहै । तथा कालके वैशिष्ट्य करके रोगके समय नाडी होजातीहै। यल्लक्षणा तु नैरुज्ये नोदितायां तथा रुजि ॥ क्यकालरुजां भेदैनिभावं विभत्ति सा ॥२९॥ अर्थ-जैसी आरोग्य पुरुषकी नाडी होतीहै ऐसी रोगावस्था में नहीं र- हती इसका यह कारणहै कि अवस्था, काल, और रोगोंके भेदकरके नाडी भावकों धारण करतीहै । अर्थात् विपरीतता ग्रहण करतीहै। (वय:कालरा भेदैः) इस लिखनेका यह प्रयोजन है कि जैसी नारी वाल्य अव- 'स्थामें होती है ऐसी यौवन अवस्थामें नहीं और जैसी यौवन भवस्या में होती है ऐसी वृद्धा- 'वस्थामें नहीं होती इसीप्रकार प्रातःकाल, मध्यान्ह, और सायंकालमें एयक एयक भाषसे है तथा प्रत्येक रोगोंमें नाडीकी गति विलक्षण होती है। अर्थात् जैसी जवानको नारी होती है ऐसा अतिसारखान्की नहीं होती और जैसी अतिसारीकी ऐसी ग्रहणीरोग पालेकी नहीं होती। इत्यादि। 1 .

F (८) नाडीदर्पणः। तदवस्थामतः प्राज्ञः सर्वथा सार्वकालिकीम् ॥ ज्ञातुं यतेत मतिमान् लक्षणेः सुसमाहितः॥३०॥ अर्थ-इसीसे चतुर चैद्यको उचितहै कि उस नाडीके सर्वकालकी सदैव लक्षणोंके जाननेका यन सावधानता पूर्वक करता रहै। नाडीके संदनकाकारण परिव्याप्याखिलं कायं धमन्यो हृदयाश्रयाः । वहन्त्यः शो- णितस्रोतः शरीरं पोषयन्ति ताः ॥ ३१ ॥ हृदयाकुञ्चना- द्रक्तं कियदुत्कुत्य धामनीम् । तत्सञ्चितं तदुत्थञ्च प्रविश्य चापरास्वपि ॥ ३२ ॥ ब्रजित्वा निखिलं देहं ततो विशति फुप्फुसम् । फुप्फुसाद्धृदयं याति क्रियेवं स्यात्पुनःपुनः ॥ ३३ ॥ रुधिरोत्सववेगेन धमनी स्पन्दते मुहुः । उत्प्लवप्र- कृतेर्भेदानेदः स्यात्स्पन्दनस्य च ॥३४॥स्थौल्यादिकं ध- मन्याश्च तत्प्रकृत्येव जायते । तत्प्रकारान्समासेन वे वत्स! निशामय ॥ ३५॥ अर्थ-अब नाडीके चलनेका कारण कहतेहै कि हृदयके आश्रित धमनी नाडी संपूर्णदेहमें व्यातहो रुधिरको स्रोतके द्वारा वहन करतीहै । उसी रुधि- रके वहने से शरीरको पोपण करतीहै । उन संपूर्ण धमनी नाडियोंका आश्रय हृदयस्थ रकाधार यंत्रहै, रक्ताधार यह एक स्थूलमांत्तनलिका ऊपरकी तरफ कुछ उठीहुईहे । यह नली समुदाय धमनी नाडीका मूलभागहै। इसी स्था- नर्स धमनी नाडियोंकी अनेक शाखा प्रशासा निकलीहै ये सपूर्ण देहमें व्या महै। इस समस्त सूक्ष्म नलारुति मांसनलीका नाम धमनी है धमनी मार्गसे हृदयका संचित रुपिर सकलदेहमें परिधिमण करके देहका पोपण करता है। हृदययंत्र समापसही सदैव खुलता मुंदता रहताहै, जैन निस्तीकी म- छिद्र जलपूर्ण ममरको ऊपर, दापनेमें उस मुनरके भीतरका जल जैमें छिमें होकर बडेवगन निकलताहै, टीप्रकार उदयक मुंद में हदयस्य रु- । कितनाही अंश उछलकर तललम म्यूल धमन में प्रवेश करहै । यह , । आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (९) हृदयका मुँदना जितनी देरमें होताहै उतने कालमे वह धमनियोंके द्वारा समस्त देहमें परिजमण करके फुप्फुसमें जाय- होताहै, फुप्फुससैं फिर दूसरीवार हृदयमें आताहै, और उसीप्रकार जीतेहुए देहमें इसीप्रकार यह क्रिया एक नियमके साथ वारंवार 6. इस रुधिरके उत्सव (उछलने ) से संपूर्ण धमनी स्पन्दन क- .फडकतीहै । रुधिर हृदयमेसे वारंवार उछलकर धमनीके छिद्रमें प्रवेश होकर बेगके साथ चलता है, इसी कारण धमनी नाडी भी वारंवार तडफ- तोहै । यह रुधिरके उत्पुव प्रकृति भेदसैं धमनीके तडफडमैं भेद होताहै। यदि रुधिर मंदवेगसे उछले तो नाडी मंद प्रतीत होतीहै, और रु- शीघ उछले तो नाडीजी शीघचारिणी होतीहै ] एवं रुथिरके स्वभावा- नाडीमें स्थूलता, सूक्ष्मता, और कठिनत्वादि धर्म उत्पन्न होतेहैं। अब जो अवस्था नाडीसें जैसे जैसे लक्षण होतेहैं उन सबको में आगे कहताहूं नाडीके नाम हिंस्रा स्नायुर्वसा नाडी धमनी धामनी धरा । तन्तुकी जीवितज्ञा च शिरा पर्यायवाचकाः॥३६॥ स्नायु, वसा, नाडी, धमनी, धामनी, धरा, तंतुकी, जीवितज्ञा, शिरा ये नाडीके पर्यायवाचक शब्द है अर्थात् ए नाडीके नामांतरहै। नाडोके भेद तत्र कायनाडी त्रिविधा । एका वायुवहा । अन्या, मूत्रविडस्थिरसवाहिनी । अपरा आहारवाहिनीति ॥ ३७॥ देहको नाडी तीन प्रकारकीहै, एक पवनको वहताहै । दूसरी मल- हड्डी, और रसको वहतीहै । तीसरी आहारको वहती है। कन्दमध्ये स्थितानाडी सुषुम्नेति प्रकीर्तिता। तिष्ठन्ते परितः सर्वाश्चक्रेस्मिन्नाडिकास्ततः॥३८॥ मध्यमें सुषुम्ना नाडी स्थितहै, इसी नाभिचा और सुषुम्ना ना- चारोंतर संपूर्ण नाडी स्थितहैं । - २ (१०) नाडीदर्पणः। नाभिमध्ये स्थितानाडी गोपुच्छाकृतिसर्वतः। तिष्टन्ते परितः सर्वास्ताभिर्व्याप्तमिदं वपुः ।। ३९॥ अर्थ-संपूर्ण नाडी नाभिके बीच में गोपुच्छके सदृश स्थित हो सर्वत्र रहींहैं । जिनसे यह देह व्याप्त होरहाहै, जैसे गौकी पूंछ अपरके भागमें होतीहै और नीचेको क्रमसे पतली होतीहै, उसीप्रकार नाडीनको जानना, ये सब नाभीस निकलकर चारोतरफ फैल गईहैं। साास्त्रिकोत्यो नाब्योहि स्थूलाः सूक्ष्माश्च देहिनाम् नाभिकन्दनिवद्धास्तास्तिर्यगूमधास्थिताः ॥१०॥ अर्थ-इन मनुष्योंके देहमें छोटी ओर बडी सब मिलकर३५०००००० साडेतीन करोड नाडीहैं, यो सब नानिसें बंधीहुई तिरछी, ऊपर, और देहके अधोभागमं स्थितहै। तिस्रः कोव्योऽईकोटी च यानि लोमानि मानुपे । नाडीमुसानि सर्वाणि धर्मविन्दून्क्षरन्ति च ॥४१॥ अर्थ-ऊपरके श्लोफमें जो साडे तीनकरोड नाडी कहींहैं. वो मनुष्यके दे- हमें जितने रोमहँ यो मब उन नाडियोंके मुसह, उनमें पसीना झडता' रहता है। द्विसप्ततिसहस्रन्तु तासां स्थलाः प्रकीर्तिताः। देहे धमन्यो धन्यास्ताः पञ्चेन्द्रियगुणावहाः ॥४२॥ अर्थ-जन साडेतीन करोड नाडियोम १०७२ एकहजार और बहनर स्थूल नाहीहै, वो धमनी देहमें पवनको धमाती हैं । और पंचेन्द्रियोंके गुण (श- ब्द-स्पर्श-रूप-रम-ग) को वहत हैं।

. आयुर्वेदोनाडीपरीक्षा। आपादतः प्रततगात्रमशेषमेपा. मामस्तकादपि च नाभिपुरस्थितेन। एतन्मृदङ्ग इव चर्मचयेन नद्धम् कायं नृणामिह शिराशतसप्तकेन ॥४४॥ सातसौं नाडीन्सैं मस्तकसै ले पैरोतक संपूर्ण देह "है जैसे मृदंगमें सर्वत्र चर्मकी रस्सी खिचिहुई होतीहैं. उसीप्रकार मनु- देह इन सांतसौं नाडियोंसें बद्ध होरहीहै। सप्तशतानां मध्ये चतुरधिकाविंशतिः स्फुटास्तासाम् । - एका परीक्षणीया दक्षिणकरचरणविन्यस्ता ॥ ४५ ॥ सातसौं नाडियो २४ चौवीस -नाडी मुख्यहैं, उनमेंनी दहने हाथ और पैरमें स्थित मुख्य एक नाडीकी परीक्षा करनी चा- ११. इसपदके कहने से यह प्रयोजनहै कि धमनी नाडीचो- जैसें लिखाहै। तिर्यक्रमों देहिनां नाभिदेशे वामे वकं तस्य पुच्छन्तु याम्ये । उर्दू भागे हस्तपादौ च वामौ. तस्याधस्तात्संस्थितौ दक्षिणौ तौ ।। ४६।। वके नाडीद्वयं तस्य पुंच्छे नाडीद्वयन्तथा । पञ्च पञ्च करे पादे वामदक्षिणभागयोः॥४७॥ अर्थ-मनुष्योंके नाभिदेशमें तिरछा कूर्म (कछवा.) स्थितहै, वांई तरफ उसका मुखह और दहनी तरफ पूंछहै, ऊपरके भागमें वाईतरफ हाथहै, और पक्षिण पैरहे उस कच्छपके मुखमें दोनाडी, पूंछमें दो, और हाथ पैरोंमें और वाई तरफ पांच पांच नांडी जाननी । फिर उसी श्लोककी व्याख्या करते हैं "तासां मध्ये एकेति" इस प- यह प्रयोजन है कि यद्यपि हाथपैरोंमें पांच पांच नाही, परंतु उ- । शतानि सप्त नाइवस्तु कविता याः शरीरिणाम्। संभ्यागुष्ठमुळे तु शिराभेकामापतिता!

. . (१२) 'नाडीदर्पणः। नमेंनी पुरुपके दहने हाथ पैरकी एक एक नाडी मुख्यहै, और स्त्रीके हाथ पैरकी एक एक नाडी मुख्यहै यह अर्थाशसे जाना जाताहै अत एव 2 यको इन्हींकी परीक्षा करनी चाहिये जैसे लिखाहै । वामे भागे स्त्रिया योज्या नाडी पुंसस्तु दक्षिणे । इति प्रोक्तो मया देवि सर्वदेहेपु देहिनाम् ॥४८॥ अर्थ-बीके वामभागकी और पुरुषके दहने भागकी नाडी देखे हेदेवि ! यह सर्व देहधारियोंमें देखनेकी विधि मैंने कहीहै, परंतु जो नपुंसक है उनमें , प्रथम यह परीक्षाकरे कि यह स्त्रीपंट है या पुरुपपंढ पश्चाद स्त्रीपंढकी वा- महाथकी और पुरुपपंढके दहने हाथकी नाडी देखें इनमें समानता सर्वथा नहीं होसकती, और कृत्रिम (वनेहुये) हिजडे होते है उनकी नाडी यथा प्र. कतिमें स्थित होतीहे और " चरणेति" इस पदके धरनेसे कोई कहताहै कि वाम पैरकी नाडीको दहनी गांठके पिछाडीके पार्थ भागमें देखनी और दहने पैरकी नाडी वाई प्रथिके पिछाडीके पार्श्वमें देखनी यह श्रेष्ठ पुरु- पोंकी आज्ञाहे कोई छः स्थानोंकी नाडी देखना लिखनाहै-पया ! अङ्गुष्ठंमूले करयोः पादयोर्मुल्फदेशतः। कपालपार्श्वयोः पड्भ्यो नाडीभ्योव्याधिनिर्णयः॥४९॥ अर्थ-हाथोकी नाडी अंगठेकी जहमें देसे, और पैगेका नाडी टकना- ऑके नीचे देखे, मस्तककी नासी दोनों पनपटीयो देखे, इस प्रकार इन छः स्थानकी नाही दसनेस व्याधिका यथार्थ निर्णय होताई । नाभ्योरपाणिपात्कण्ठनासोपान्तेषु याःस्थिताः । तासु प्राणस्य सञ्चारं प्रयत्न विभावयेत् ॥५०॥ अर्थ-नानी. होठ, पर. हाथ, पंड, और नातिका माप भाग को नाडी स्थितह उनमें प्राणोंक मंचारको यवपूर्वक जान, अर्थात् इन स्थान सदैव प्राण परनका मंचार होता है, इसी अत्यंत उपद्रव में इन स्थानों मानी देखनी चाहिये।

आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (१३) लक्ष्याः षोडशप्राणवोधकाः॥५१॥ ., पैर, कंठ, नासिका, नेत्र, कान, जिव्हाका अंतभाग और लिंग) इनके दामभाग और दक्षिणभागमें नाडी देखनी क्योंकि नाडी प्राणबोधकहै ऐसा जानना। कण्ठनाडी आगन्तुक ज्वरं तृष्णामायासं मैथुनं क्रमम् । भयं शोकञ्च कोपश्च कण्ठमाडी विनिर्दिशेव ॥ २॥ तृपा, परिश्रम, मैथुन, ग्लानि, भय, शोक, और कोप गोमाक कंठनाडी देखकर कहे। नासानाडी मरणं जीवनं कामं कण्ठरोगं शिरोरुजाम् । श्रवणानिलजान रोगानासानाडी प्रकाशयेत् ॥५३॥ -मरण,. जीवन, कामबाधा, कंठरोग, मस्तकरोग, कानके, और रोगोंको नासिकाकी नाडी प्रकाशित करताहै। उक्त नाडियोंका प्रमाण इस्तयोश्च प्रकोष्ठान्ते मणिबन्धेऽङ्गुलिद्वयम् । पादयो डि. कास्थानं गुल्फस्याधोऽङ्गुलिद्वयम् ॥५४॥ कण्ठमूलेऽङ्गुलि दैवं नासायामडलिद्वयम् । एवमप्यालिद्वंद्वमग्रतःकर्णरन्धयोः॥ अर्थ-अव अन्यनाडी किस किस भागमेहे और वो कितनी वडी यह है। तहां दोनो हाथके प्रकोष्ठाननमें जहां मणिबंध अर्थात पहुंचाहै उ- दो अंगुल नाडी देखनेका स्थानहै और पैरोंमें टकनाके नीचे दो अंगुल स्थानह तथा कंठकी जरमें अर्थात हसलीमें दो अंगुल एवं नासि- यो अंनुस नाडीका स्थानहै । इसी प्रकार दोनो कर्णके छिड़के 'मन- भी दो दो अंगुल नाडीके परीक्षाका स्थानहै । तात्पर्य यह कि अब नारी प्रीतम होगा इन स्थानोकी नाही रेलगी। .

। " (१४) नाडीदर्पणः। निस्तुपयवएकस्तत्प्रमाणाङ्गुलं स्यात् तदुभयमितसमन्येव नाडीप्रचारः। न भवति यदि तस्मिन् गेहिनी गेहमध्ये कथमिह गृहमेधी तत्र जीवस्तदा स्यात् ॥५६॥ अर्थ-छिलका रहित एक यवके प्रमाण इस जगे अंगुल माना। दो अंगुल प्रमाण स्थानमें नाडी रहती है पदि देहरूप घरमें नाडीरूप स्त्रीन, होवे तो जीवरूप जो गृहस्थीहै सो क्याकरे, अर्थात् पावत्काल नाडी रहताहै तबतक जीवहे चिना के घरमें रहना निंदितहै " धिग्गृहे । गृहिणीविना " तात्पर्य यहहै कि जीव पुरुष-नाडी स्त्री, ये अन्योन्यएक- केविन दूसरी नहीं रहसकता। परीक्षणीय वातं पित्तं कर्फ द्वंद्व सन्निपातं तथैव च । साध्यासाध्यविवेकश्च सर्व नाडी प्रकाशयेत् ॥५७॥ अर्थ-बाब पिन कफ इंद्वज दोष और मन्निपात एवं साध्यासाध्या- कारसे कष्टसाध्य ] इनकी संपूर्ण विवेचनाको नाही प्रकाशित करती है। इति श्रीमाथुररुप्णलालसूनुना दचरामेण सङ्कलिते नाडीदर्पणे प्रथमावलोक: नाडीज्ञानसमय प्रातः कृतसमाचारः कृताचारपरिग्रहम् । सुखासीनः सुखासीनं परीक्षार्थमुपाचरेत् ॥ १ ॥ अर्थ-अब नाडी देखनेका समय कहतेहै कि चिकित्सक प्रातःकालमें प्रातःसत्य समानिके अनंतर नाडीपरीक्षार्थ रोगांके समीप पात हो रोगीके, प्रातःकृत्य समानिके पश्चात उसको मुखपूर्वक बैठाकर इसीप्रकार आप सुखपूर्व वैठकर यथाविधान नाडी परीक्षा करे । इसजगे प्रातःकालमा तो उपलक्षण मात्रहै किंतु मध्यान्ह और सायंकालमें भी नाडी परीक्षा जैसे लिखाद " मध्यान्हे चोष्णतान्विता" इत्यादि। । १ आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (१५) निषिद्धकाल भुक्तस्य क्षुत्तृष्णातपसेविनः । व्यायामाका- सम्यङ् नाडी न बुध्यते ॥ २॥ तैलाभ्यक्ते भोजनान्ते तथैव च । उद्वेगादिषु नाडी च न ...॥३॥ मर्ष-तत्काल स्नानकराहो; तत्काल भोजन कराहो, अथवा "सुप्तस्य". निद्रित, क्षुधित, तृषार्त, गरमीसे घबडाया हुआ तथा व्यायाम- देह जिसका ऐसे मनुष्यकी नाडी भलेप्रकार प्रतीत नही हो, उसी- जिसने तेल लगायाहा, मैथुनान्तमें भोजनके मध्यमें उद्वेग आदि समयमें पथार्थगति निश्चय नहीं हो, अतएव वैद्य इन समयोंमें नाडीपरीक्षा किंतु रोगीका चित्त जिससमय स्वस्थहोय तव नाही देखे, परंतु वा. क्षणिक रोगोंमें यह उक्तनियम नहींहै। नाडीदेखने योग्य वैद्य स्थिरचित्तः प्रसन्नात्मा मनसा च विशारदः। स्पृशेदङ्गुलिभिर्नाडी जानीयादक्षिणे करे॥४॥ अर्थ-अव नाडी देखने योग्य वैद्य कहते हैकि जो स्थिरचिन और प्रसन्न आत्मा तथा भनकरके चतुर ऐसा वैद्य तीन उंगलियोंसे दहने हाथकी स्पर्श करके उसकी गतिकी परीक्षा करे। पीतमद्यश्चश्वलात्मा मलमूत्रादिवेगयुक् । : नाडीज्ञानेऽसमर्थः स्याल्लोभाकान्तश्च कामुकः ॥५॥ 'अर्थ-जिसने मद मीरक्साहो, और चंचल चित्त, मल मूत्र वापा लग लोगी और कामीहो ऐसे वैद्यको नाही न दिसावे, क्योंकि यह जाननेमें असमर्थ है। थ सुते व तया च भोजनान्तरे । तया न ज्ञायते नाही यया दुर्गतरा नदी । इति .. A -- (१६) नाडीदर्पणः।' नाडी देखने योग्य रोगी त्यक्तसूत्रपुरीपस्य सुखासीनस्य रोगिणः॥ अन्तर्जानुकरस्यापि नाडी सम्यक् प्रबुध्यते ॥६॥ अर्थ-अब नाडी देखने के योग्य रोगी कहतेहैं कि जो मलमूत्रका त्याग करचुकाहो, और सुखपूर्वक घोंटुओंके भीतर हाथको करे .. नासें बैठाहो, ऐसे रोगीकी नाडीको वैद्य देखे, क्योंकि ऐसे मनुष्यकी भली रीतिसे जानी जातीहैं। नाढीदर्शनमअयोग्य प्राणी धूर्त्तमार्गस्थविश्वासरहिताज्ञातगोत्रिणाम् ॥ विनाभिशंसनं वैद्यो नाडीद्रष्टा च किल्विपी॥७॥ अर्थ-अब कहतेहैं ऐसे मनुष्योंकी नाडी वैद्य न देखे, कि जो वर्त है मार्गमें चलते चलते दिखाने लगे, और जिनको विश्वास नहींहैं, जिसकी जातपाँति वैद्य नहीं जाने, और विनकहे अर्थात् जबतक : थना उस रोगी के बांधव न कहे तबतक बैश नाड़ी न देरे, यदि . को वैध नाडी देसेतो पाप जागी होताह । -- ZARL आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (१७) हाथको हटाय नाडीको दाबे, और बाए हाथसे रोगीके हाथको माडीकी परीक्षा करे। इसबने " दक्षिणकराङ्गलिकात्रयेण" यह पद केवल उपलक्षण मा- किंतु नाडी वामहाथमैं भी देखे यदि ऐसा न मानोंगे तो फिर अ- देखना किसप्रकार होगा। और वाजे वैद्य दहने हाथकी नाडी और वामहाथकी दहनेसे देखतेहैं यह ठीक है। कदाचिद कोई शंकाकरे कि एकही हाथकी नाडी देखनेंसें रोग जाना- फिर दोनों हाथकी देखना व्यर्थहै, इसलिये कहतेहै कि बहुतसे म- वामअंगही चेष्टावाले होतेहैं, अतएव ऐसे मनुष्योंके वामअंगकी क. नहीं देखीजाय तबतक यथार्थ ज्ञान नहीं होता। दूसरे दोषोंके नाडीके वाम दक्षिणमें भेद होजाताहै, अथवा यह परंपराहै, इसीसे लो- देखतेहैं। दूसरा प्रकार, ईषदिनामितकर विततांगुलीयं बाहुप्रसाररहितं परिपीडनेन ॥ ईपदिनम्रकृतकूपरवामभाग- हस्ते प्रसारितसदंगुलिसंधिके च ॥९॥ अंगुष्ठमूलपरिपश्चिमभागमध्ये नाडीप्रभंजनगतिं प्रथमं परीक्षेत् ॥ १० ॥ "अर्थ-वैध रोगीके हाथको किंचिन्मात्र नवायकर और हाथकी उंगलि- एकत्र कर तथा शुजाकों बहुत लंबी न होनेदे और हाथ पट्टी आरिसे महो क्योंकि पट्टीआदिके बंधनेसे नाडीकी गाते रुकजातीहै फिर रोगीके (कोहनीके वामभाग) को पकड अंगुली और उनकी संधिसहित हाथ- रोगी अंगुठेके पिछलेनागमें प्रथम पातकी परीक्षा करे, कारण कि आदिमें वातका स्थानहै अतएव प्रथम बातकी परीक्षा करनी चाहियो 1 (१८) नाडीदर्पणः। प्रदर्शयेदोपनिजस्वरूपं व्यस्तं समस्तं युगलीकृतं च ॥ मूकस्य मुग्धस्य विमोहितस्य दीपप्रभावा इव जीवनाडी॥" अर्थ-यह जीवनाढी गृगेके मूडके और मोहितपुरुपके पृथक् पृथक् मिले तथा इंदज दोपोंका जो निज स्वरूप है उसको दिखाती है, जैसे दी- पक अपने प्रकाशसं घरमें स्थित पदार्थोंको दिखाता है। स्त्रीणां भिपग्वामहस्ते वामे पादे च यत्नतः॥ शास्त्रेण संप्रदायेन तथा स्वानुभवेन च ॥ परीक्षेदनपच्चासावभ्यासादेव जायते।।१२|| अर्थ-वैद्य वियोंके वामहाथ और वामपरमें शास्त्रको संप्रदायसें और अपने अनुभवद्वारा रनके ममान नाडी परीक्षा करे, यह परीक्षा केवल आया-, ससाध्य है. तात्पर्य यह है कि जमैं जोहरी रनपरीक्षामें आयास करनेसें रनकी परीक्षा करता है उसीप्रकार इस नाडीका देखनानी रत्नपरीक्षाके म- मान है, अतएव इसके देखनेमें वैद्य अभ्यास करे।

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आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (१९)
'देखी है यदि उसके रोग प्रगटहोनेवाला होवे तो.उस रो-
नाडीद्वारा बहुत सुगमतासे हो सकता है. इसीसे लिखाहै यथा ।
सुस्थनाडीपरीक्षणम् ॥ १४॥.
होनहार रोगज्ञानके अर्थ वैद्यको स्वस्थ (रोगरहित) म-
करनी चाहिये।
जायते भिपक् ॥ त-
सुस्थानामपि देहिनाम् ॥ १५॥
। ॥ तासु-जी-
सञ्चारं प्रयत्नेन निरूपयेत् ॥ १६ ॥
लिखा है कि-स्पर्शनादिके आयाससे अर्थात् प्रत्ये-
देखनेसैं यह कैय नाडीका ज्ञाता होता है, अतएव यह वैद्य स्व-
नाडी देखाकरे, उस नाडीके स्पर्शसे, पीडन (दाब) से,
ऊंगलियोंमें लगनेसै ) वेदन (तडफ) से और मर्दन करना इन का-
वैद्य उन नाडियोंके जीवसंचारको निरूपण करे ।
शुरुतोऽत्र प्रयत्नेन वैद्येन शुभमिच्छता॥
ज्येष्ठेनांगुष्ठमूलेन नाडीपुच्छं परीक्षयेत् ॥ १७ ॥
यनपूर्वक गुरुसँ अर्थात् गुरुद्वारा अंगुठेकी जडमें ना-.
परीक्षा करे, तात्पर्यार्थ यह है. कि जो वैद्य अपने हितकी चाह-
वो गुरुद्वारा नाडीपरीक्षा सीखे स्वयंही न देखनेलगे, ज्येष्ठ कहनेसे
बृहन्निनभाग जानना।
नाडी वायुप्रवाहेन शास्त्रं दृष्ट्वा च बुद्धिमान् ॥
गुरूपदेशं संस्मृत्य परीक्षेत मुहुर्मुहुः॥१८॥
: पबनके संचार करके और शास्त्र अनुसार तथा
'उपदेशको स्मरणकर वारंवार नाडीकी परीक्षा करे।
वारत्रयं परीक्षेत धृत्वा धृत्वा विमुच्य च।।.
विमृश्य बहुधा बुद्धया रोगव्यक्तिं तु निर्दिझेद ॥१९॥

(२०) नाडीदर्पणः। अर्थ-वारंवार नाडीपर उँगली रखे और हटायले अर्थात् नाडीको दवायके ढीली छोडदेवे इसप्रकार करने में नाडीको सबलता और नि चौडाद लंबाव तथा शीघ्रता और मंदताका ज्ञान होता है । इसप्रकार तीन बार परीक्षाकर संपूर्ण नाडीकी व्यवस्था अपने मनमें विचार कर फिर रोग- व्यक्ति कहे अर्थात् इसरोगीके देहमें अमुक रोगहै ऐसे विना विचारे नकहे। अंगुलित्रितयः स्पृष्ट्वा क्रमाद्दोपत्रयोद्भवः॥ मन्दां मध्यगतां तीक्ष्णां विभिदोंपैस्तु लक्षयेत् ॥ २० ॥ अर्थ-नाडीको तीन उँगलियोके स्पर्शसे तीनोदोषोंकरकै मन्द, मध्य, और तीक्ष्ण गति जाननी, अर्थात् प्रथम उँगलीमें मध्यस्पर्शहोनेसे बातकी, और बीचकी उंगली में तीक्ष्णस्पर्श होनेसे पित्तकी, और अंतकी उँगली (अ- नामिका)में मंदस्पर्श होनेसे कफकी नाडी जाननी । रोगरहितमनुप्यकी नाही भूलता भुजगप्राया स्वच्छा स्वास्थ्यमयी शिरा ॥ सुसितस्य स्थिराज्ञेया तथा वलयती मता ॥२३॥ अर्थ-स्वत्य अवस्थाको नादी केचुआ और सके समान रेती गति और पुष्ट तथा जडता रहित होती है यह नैरोग्य पुरुषकी नाहीके लक्षण है तथा सुखी पुरुषको नाही स्थिर और बलवान होती है। नाडीके देवता वातनाडी भवेत् ब्रह्मा पित्तनाडी च शंकरः॥ लेप्मनाडी भवेद्विष्णुत्रिदेवा नाडिदेवताः ॥२२॥ अर्थ यातनाठीका ब्रह्मा, पित्तनाडीका शंकर, और कफनारीका पति विष्णु है। नाडीके वर्ण वातनाडी भवेत्रीला पित्तनाडी तु पाण्डुरा ॥ घेता तु कफनाड़ी स्यादेवं वर्णानि संवदत् ॥२३॥ अर्थ-पातकी नाहीका वर्ग नील है, पित्ती नारीका पीला, कफना बर्गका वेत, इमप्रकार नाडीके वर्ण कहने चाहिये। - आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (२३) नाडीका सर्श भवेदुष्णा कंफनाडी तु शीतला ।। वातनाडी भवेन्मध्या एवं स्पर्शविनिर्णयः ॥ २४॥ । नाडी स्पर्श करनेसे गरम प्रतीत होतीहै, कफकी नाडी शी- और वातकी नाडीका सर्श मध्यम होताहै इस प्रकार नाडीका . कालपरत्व नाडीकी गति प्रातःस्निग्धमयी नाडी मध्यान्हे चोष्णतान्विता ।। सायान्हे धावमानाच रात्री वेगविवर्जिता ॥ २५ ॥ मर्य-स्वभावसेंही नाडी प्रातःकाल स्निग्ध, मध्यान्हमें उष्ण, और सा- शेवंती, तश रात्रि में गवर्जित होतीहै। अथ वातादिस्वभावक्रम आदौ च वहते वातो मध्ये पित्तं तथैव च ।। अन्ते च बहते श्लेष्मा नाडिकात्रयलक्षणम् ॥२६॥ अर्थ-अब वातादिकका स्वभाव क्रम कहतेहै, जिस समय वैद्य कोहनीको हैं। उसके द्वितीयक्षणमें प्रथम वातकी नाडी फिर मध्यमें पितकी अंतमें कर्फकी नाडी चलती है। यह द्वितीयादिक्षणोंमें जाननी । कोई है कि आदिमें वातकी बीचमें पित्तकी और अंतमें कफकी नाडीच-: है यह बात सर्वथा निर्मूल है क्योंकि स्थानका नियम किसी जगे नहीं का विशेष आगे कहते है यथा । उक्त श्लोकका विरोधीवचन आदौ च वहते पित्तं मध्ये श्वेष्मा तथैव च ॥ अन्ते प्रभजनो ज्ञेयः सर्वशास्त्रविशारदैः ॥२७॥ अर्थ-आदिमें पितकी मध्यमें कफकी और अंत्यमें वातको नाडी सर्व वैद्योंकरके जाननी। पिराद्रोगविवर्जितति पाठान्तरम् । ब नाडीके नाम (२२) नाडीदर्पणः। नाडीचक्रमिदम् पित कंफ स्यामहरित पीत लाल नील. सपेद ब्रह्मा शिव विष्णु न गरम न शीतल गरम शीतल किंतु मध्यम विसम दीर्घ गंधहीन तीवगंध मध्यमगंध तिर्यग्गमन ऊर्ध्वगमन अधोगमन हलकी हलकी भारी नाडीके वर्ण नाडीके देवता नाडीका स्पर्श . नाडीमाप नाडीकी गंव नाडीका गमन नाडीका गुरुता और लघुता M रात्रिदिवावली दिवावली रात्रिबली नाडीक बलवान् होनेका समय उक्त श्लोककापुष्टिकती दृष्टान्त तृणं पुरःसरं कृत्वा यथा वातो वहेद्वली। शेपस्थंच तृणं गृह्य पृ- थिव्यां वक्रगो यथा ॥२८॥ एवं मध्यगतो वायुः कृत्वा पित्तपु- रस्सरम् ॥ स्वानुगं कफमादाय नाड्यां वहति सर्वदा ॥ २९ ॥ अर्थ-इस वाक्यको दृष्टान्त देकर पुष्ट करते हैं कि जैसे प्रवलयात अर्था- तु आंधी, तिनकाओंको अगाडी करके और कुछ पिछाडीके तिनकाओं- को लेकर आप वीचमें टेटी होकर चलती।इसीप्रकार मध्यगत वायु पिनको अगाडीकर और अपने पिछाडी कफको करके वीचमें आप टेढीहोकर अतएव च पित्तस्य नायते कुटिलागतिःविकाप्रभञ्जनस्या- पि प्रोक्ता मन्दा कफस्य च ॥३०॥ पित्ताग्रेऽस्ति गतिःशी. प्रातृणस्येति विदृश्यताम् ॥ मन्दानुगस्य वका वे मारुतो मध्यगस्य ह ॥३१॥तयात्रेव च ज्ञातव्या गतिदोपत्रिकोद्र- वा॥ नान्यथा ज्ञायते नायुगतिरेतद्विनिश्चितम् ॥ ३२ ॥ .

.. आयुर्वेदोकनाडीपरीक्षा। .(१३) गति कुटिलहै, और वातकी गति टेढी एवं क- . प्रतीत होतीहै । पित्तकी शीघ्रगति सो आंधीमें तृणके देखने से है और जैसे आंधीमें पिछाडीके तृणकी मंदगति होतीहै उसी पिछाडी कफकी मंदगतिहै। और जैसे आंधीके बीचमें पवन- तिरछी होतीहै । उसीमकार इसनाडीके वीचमें वातको गति प्रतीत होतीहै इसप्रकार ही नाडीकी गति प्रतीत होतीहै । अन्य । ॥ - हमको शंकाहै कि नाडीका और आँधीका क्या संबंधहै, क्योंकि आगे पीछे और बीचमें पवनहीं कहातीहै, परंतु नाडीमें तो न्यारे जैसे वात, पित्त, तथा कफ, और पवनका एकही कर्महै परंतु शोंके कर्म पृथक् पृथक् है, इस कारण यह दृष्टान्तही असंवह हरण कंती नहींहे। ग्रंथकचीकामत . इदानों कथयिष्यामि स्वमतं शास्त्रसंमतम् ।। मिथ्या- रोपितवादस्य खण्डनं लोकरञ्जनम् ॥३३॥ वातम- वदन्त्येके पित्तमने च केचन ।। हास्यास्पदमिदं सर्व न तु सत्यं मनागपि ॥३४॥ हम शाखसंमत तथा मनुष्योंकी रंजना (प्रसन्नता) को और वादका खंडनरूप अपने मतको कहतेहै । जैसे कोई तो वातको पितकी नाडीको आगे बतलाताहै, यह केवल उनके हास्यका किंतु किंचिन्माशी सत्य नहींहै इसपकार मानने से बड़ाभारी भन- जैसे आगे लिखतेहै। पित्तभवे व्याधी बुद्धयतिक्रमतो यदि ॥ वातकोपरशादेव- ज्ञात्वा परागतिम् ॥३५॥ प्रदे॒द्भेषजं धुणं तद्दोपविनि- ॥ तदा नूनं भवेन्मृत्युः पित्तकोपेन भूयसा ॥३६॥ किसीरोगीके पिनकी व्याधि होये और देव बुदिधमर्स नागी अमाप समझकर उस रोगीके गोबर करनेको उस . 4 R (२४). नाडीदर्पणः। उष्ण (शुंत्यादि) औषध देय तो कहो एक तो पिनदोषकी गरमी और सरे गरम ही दीनी औषध अव कहो वह रोगी पिनकी गरमीके मारे मरेमा कि बचेगा। किंतु अवश्यही मरेगा। सति वातभवे व्याधौ बुद्धयतिक्रमतो यदि ॥नाडीगति पित्तव- शादादी ज्ञात्वा ततो भिषक् ॥३७॥ प्रदेद्रेपज शीतं तदोष- विनिवृत्तये ॥ तदा नूनं भवेन्मृत्युतिकोपेन भूयसा ॥ ३८ ॥ अर्थ-इसीप्रकार रोगीके देहमें वातजन्य रोग होय और वैद्य बुद्धिके श्रम- से पित्तकी नाडी जानकर यदि उसरोगीको पित्तनाशक शीतल उपचार करे तो कहो अत्यंत शरद औपधसैं रोगी सरदीके मारे मरेगा या बचेगा? किंतु अवश्यही मरेगा। अत्याश्चर्यमिदं लोके वर्त्तते दृश्यतां यथा॥ वदन्त्येके दिनं रात्रि केपिरावि दिनं तथा॥३९॥ एवं स्वेच्छामिलापेन स्वल्पलोभेन मानवाः ॥रोगिणां सुप्रियान्प्राणान्हरन्ति ज्ञानवर्जिताः॥४०॥ अर्थ-इस संसारमें अत्यंत आवर्यहै देखो कोई दिनको रात्रि और को ईरात्रिको दिन कहताहै। इसप्रकार अपनी अपनी इच्छानुसार वकतेहे औ- रए मूर्ख वैद्य थोडेसें लोमके कारण रोगियोंके परमप्रिय प्राणोंको हरण .. रतेहै । कहो इनसे बढकर कौन पामरहै जो विना विचारे अनर्थ करतेहै मा- ई पह वैद्यविद्या खेल नहींहै। अतएवं मया चित्ते सर्वमानीय तत्वतः ।। कथ्यते नास्ति नास्तीह नाडीस्थानविचारणा ॥४१॥ किन्तु नाडीगतिः श्रेष्ठा शास्त्रकारैः प्रकीर्तिता ॥ न च तत्राहि सन्देहो लेश- मात्रोऽपि विद्यते ।। ४२।। तत्प्रकारोप्ययं ज्ञेयः सावधानत- या किल ॥ यथा सर्पजटोकादिगतिवांतस्य गद्यते ॥ १३ ॥ न तत्र कुरुते कोऽपि पित्तशेप्मभवं भ्रमम् ॥ कुलिका- ' मण्डकगतिः पित्तस्य कीत्यते ॥ १४ ॥ न तत्र कोऽपि कु-

आयुर्वेदोक्तनांडीपरीक्षा। (२५)
भ्रमम् ॥ कपोतानां मयूराणां हंसकुछ-
॥ ४५ ॥.या गतिःसाच विज्ञेया कफस्यैव गति-
॥ न तत्र कोऽपि कुरुते वातपित्तभवं भ्रमम् ॥ ४६॥
ऊपरकहेहुए सर्वकारणोंको अपने चित्तमें अलेप्रकार विचार-
कि नाडीके जो आदि मध्य और अंत्य ये स्थान किसीने
नहीं हैं नहींहैं। तो क्याहै.? इसलिये कहतेहैं कि नाडीकी जो ग-
सत्यहै क्योंकि इसमें सर्वयंथकर्ताओंकी संमति और इसमें लेश-
संदेह नहींहै, उसप्रकारको तुम सावधानताकरके सुनो, जैसे सर्प
गति वातकाहै इसमें कोई भम नहीं करे कि यह पित्तकी ना-
कफकी उसीप्रकार कुलिंग काक और मंडूककी गति पित्तकीहै इ-
तथा कफकी नाडीका कोई नम नहीं करता, इसीप्रकार कपोत मो-
और कुक्कुट इनकी जो गतिहै वह कफकी है इसमें कोई यह नहीं कहें
गति कफकी नहीं, वातपित्तकी है, इसीसे हमारा तो यही सिद्धांतहै
स्थान असत्य और गति सत्यहै।
वातादिकोंकीक्रमसै गति..
वातावक्रगता नाडी चपला.पित्तवाहिनी ॥
स्थिरा श्रेष्मवती ज्ञेया मिश्रिते मिश्रिता भवेत् ॥१७॥
... तिरछी वहतीहै, अतएव वातकी नाडी टेढी चलतीहै, अग्नि-
हो ऊपरको जातीहै अतएव पित्तकी नाडी ऊपरकी तरफ़ बहतीहै
चपलहै, जल नीचेको जाताहै, इसीसे प्रबल नहींहै अतएव कफी
स्थिरहै और जो मिश्रित नाडीहै उनकी गतिमी मिलीहुई होताहै
दिखाया कि द्विदोपजमें दोशेष चिन्ह होतेहैं, त्रिदोषजमें तीनों
चिन्ह होतेहैं, कदाचित् कोई प्रष्ण करे कि एकही नाडी चपल औ-
कैसे होसकतीहौइस्से कहते हैं कि समय मेद होनेसैं दोनों गति होसक्तीहैं
.' बातादिकी विशेषमति
सर्पजलौकादिगतिं वदन्ति विबुधाः प्रभजने नाडीम् ॥
पित्ते च काकलावकमेकादिगति विदुः सुषियः॥४॥

(२६) । नाडीदर्पणः। राजहंसमयूराणां पारावतकपोतयोः ॥ कुकुटादिगति धत्ते धमनी कफसंवृता ॥४९॥ अर्थ-सर्प और जोखकी गति पंडित जन वातकी नाडिकी गति कहते हैं, अर्थात् जैसे सर्प और जोस टेढे तिरछे होकर चलतेहैं उसीप्रकार वादीकी नाडी चलतीहै । आदि शब्दसे विच्छूकी गतिका ग्रहण है । उसी प्रकार पिच- में काक (कौआ ) लावक (लवा) और नेक (मैडका) की गतिके सहश नाडी चलती है अर्थात् जैसे कौआ, लवा, और मेंडका शुदकते उछलने चलतेहैं उसी प्रकार पित्तकी नाडी चलतीहै । आदिशब्दसे कुलिंग और चि- डा आदिकी गतिका ग्रहणहै ! एवं राजहंस (वतक ) मोर, खबूतर, कपोत (पिंडुकिया) और मुरगा इन पक्षियोंकीसी अर्थात् ए पक्षी जैसे मंदमंद गति चलतेहै इसप्रकार कफकी नाडी चलतीहै । आदिशब्दसैं हाथी और उत्तम स्वीकी चालका ग्रहण है अर्थात् जैसे हाथी और उत्तम स्त्री झूमती हुई मंद मंद चलतीहै इसी प्रकार कफकी नाडी चलताहै। बंदजनाडीकी चाल मुहुः सर्पगति नाडौं मुहुर्भकति तथा । वातपित्तद्वयोस्तां प्रवदन्ति विचक्षणाः ॥५०॥ भुजगादिगति चैव राजहंसग- ति धराम् ॥ वातश्लेष्मसमुद्भूतां भापन्ते तद्विदोजनाः॥६॥ मण्डकादिगति नाडौं मयूरादिगति तथा ॥ पित्तश्लेष्मसमुहू- तां प्रयदन्ति महाधियः॥५२॥ अर्थ-पारंवार सर्पगति (टेदी) और वारंवार मेंडकाकी गति ( उछलती) नाडी चले उसको चतुरवैद्य वातपिनकी नाडी कहतेहैं । तथा कभी सर्पमानि और कती राजहंमकी गनिम नाडी चले उसकी पंडिनजन वातकफकी नारी कहतेहैं । एवं कनी मंडक और कमी मारकी चाल चले उम नाडीको पि- सकाकी बुद्धिवान् वैद्य कहते हैं । प्रसारान्तर वातेऽधिक भवनाडी गव्यता तर्जनीतले । पित्ते व्यक्ताम- ध्यमायां तृतीयांगुटिगा कफे ॥ ५३॥ तर्जनीमध्यमामध्ये ।

आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (२७) स्कुटा। अनामिकायांतर्जन्यांव्यक्तावातक- ५४॥मध्यमानामिकामध्ये स्फुटा पित्तकफेऽधि- अंगुलित्रितयेऽपि स्यात्प्रव्यक्ता सन्निपाततः॥५५॥ नाडी तर्जनीके नीचे चलतीहै । पित्तकी नाडी मध्यमा । और कफकी नाडी तीसरी ऊंगली अर्थात् अनामिकाके । वातपित्तकी नाडी तर्जनी और मध्यमाके नीचे चलतीहीवा- नाडी अनामिका और तर्जनीके नीचे चलतीहै । मध्यमा और अ- नीचे पित्तकफाधिक नाडी चलतीहै । और तीनो ऊंगलियोंके नी- नाडी गमन करतीहै। चलति धमनी वातपित्ततः ॥ वहेदकंचमन्दञ्च त्वचः॥६६॥ उत्कुत्य मन्दं चलति नाडी ॥ वातपित्ताधिक्यसे नाडी टेढी और उछलती हुई चलतीहै । वात- और मन्द गमनकरतीहै । पित्तकफाधिक्यमें नाडी उछलीहुई मंद , 7 त्रिदोपकीनाडी उरगादिलावकादिहंसादीनांच विभ्रती गमनम् ॥ ५७ ॥ वातादीनांच सम धमनी सम्बन्धमाधत्ते ।। त्रिदोषके समान होनेसे नाडी सर्प, लवा, और हंस आदि समान गमन करतीहै। समके कहने से न्यूनाधिक्यका त्यागहै यदि दोषोंकी क्रमसें चले तो असाध्य नहींह । सन्निपाततः॥५८॥ कदाचिन्म- न्दगमना कदाचिच्छीघ्रगा भवेत् ॥ विदोपप्रभवे रोगे विजे- या हि भिषग्वरैः॥ ५९॥ अर्थ-लवा तीतर और वढेरकी चाल नाडी संनिपातके कोपस करतीहे मंदममन करे, और कभी शीघगमनकरे, ऐसी नाही त्रिदोषजन्य रोगमें 4 + (२८) नाडीदर्पणः। वैद्योंको जाननी चाहिये इस त्रिदोपमें पित्तके क्रमसे साध्यासाध्य और छ- च्छ्रसाध्य जानना अर्थात् अधिकपित्तसे साध्य, मध्यसै कष्टसाध्य और कि- त सर्वथा नाडीमं न होयतो वह रोगी असाध्यहै । सामान्यतापूर्वक सुखसाध्यत्व यदा यं धातुमानोति तदा नाडी तथागतिः ॥ तथा हि सुखसाध्यत्वं नाडी ज्ञानेन बुध्यते ॥६॥ अर्थ-नाडी जिससमय जिसधातुमें प्राप्तहोय उससमय यदि उसका प्रक- ति अनुसार चलना होय तो पीडा सुखसाध्य ऐसे नाडीज्ञानकरके जानी जा- तीहै इसका निप्कृष्टार्थ यहहै कि अपरान्हादि कालमें वातोल्वणा नाडीप्र- थम वातकी गति करके चले, फिर कमसे पित्त और कफकी चालचले, किं- तु पित्तोल्यणा वातगतिसे न चले तो सुखसाध्य जाननी यदि इस्सै विपरीत होय तो विपरीत अर्थात असाध्य जाननी जैसे किसीने कहाहै " नाडी यथा कालगतिस्त्रयाणां प्रकोपशान्त्यादिभिरेव अयः" असाध्यत्व मन्द मन्दं शिथिलशिथिलं व्याकुलं व्याकुलं वा स्थित्वा स्थित्वा वहति धमनी याति नाशं च सूक्ष्मा ।। नित्यं स्थानात्स्खलति पुनरप्यंगुलिं संस्पृशेद्धा भावरेवं बहुविधविधैः सन्निपातादसाध्या॥६॥ अर्थ-जो नाडी कमी प्रसरतारहित मंदमंद गमन कर, कनी स्खलित भावस की व्याकुल व्याकुलवत् (जैसे वासित मनुष्य चलताहै) कभी 8- हर ठहरके चले और जो संपूर्ण रूपसे लाहोनाप अथवा बहुत मुहम वह अर्थात् यह प्रतीत नहोय कि यह नारी चटहै या नहीं चले और जो नि- त्यस्थान अर्थात् अंगुष्ठमूलको परित्यागकरदे, इमीपवार कुछकालमें फिर अपने स्थानमें प्रमहोय ऊंगलियोंको आयातकर, ऐसे अनेक प्रकारक भा- वोंकरके नाडीको मृत्युको कारण जाननी । A आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (२९) शीतत्वं शीतत्वे तापिता शिरा ॥'. नानाविधगतिर्यस्य तस्य मृत्युन संशयः॥६२॥ प्राणीके देहमें अत्यंत ताप होय परंतु नाडी शीतल होय, अंत्यत शीतल होय और नाडी उष्ण प्रतीतहो, तथा जिसनाडीकी गति होय उसरोगीकी निश्चय मृत्यु होय, इस श्लोकमें महा- दाहके निवारणार्थहै। निदोषे स्पन्दते नाडी मृत्युकालेऽपि निश्चला ॥ ६३ ॥ ... मृत्युकालमें भी नाडी सामान्य ज्ञावसे चलतीहै मतीसारादि रोगोंमें हाथपैरमें स्वेदादिक करनेसे नाडीका तड- होताहे। पूर्व पित्तगति प्रभजनगति श्लेष्माणमाविभ्रतीम् स्वस्थानभ्रमण मुहुर्विदधतीं चक्रादिरूढामिव ।। तीव्रत्वं दधती कलापिगतिका सूक्ष्मत्वमातन्वतीम् . नोसाध्यां धमनी वदन्ति सुधियो नाडीगतिज्ञानिनः॥६॥ अर्ष-प्रथम पित्तगतिस चले (अर्थात् प्रथम वातगति चलना चाहिये त्याग दे यह विपरीत क्रम दिखाया) फिर वातगति और फिर कफकी चले तथा अपने स्थानको छोड वारंवार अनेक प्रकारसे चक्र (चाक) चाकफेरीके सदृश भ्रमणकरे, कजी तीवेगसें चले और कभी मोर- समान उत्तरोत्तर मंद पडजावे ऐसी नाडीको नाडीके ज्ञाता साध्य किंतु असाध्य कहते हैं। यात्युच्चा-च स्थिरात्यन्ता या चेयं मांसवाहिनी ॥ या च सूक्ष्मा च वका च तामसाध्यां विदुर्बुधाः ॥६५॥ -अर्थ-जो नाडी. अत्यंत ऊंची अत्यंत स्थिर, और जो मांसवाहिनी मांसाहारकरनेसे जैसी चले ऐसी चलने लगे और जो अत्यंत सूक्ष्म रेडीहो उसको वैद्यजन असाध्य कहतेहै । मीमत्वं दधती कदाचिदपि वा इति पाठांतरम् । -- ,

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(३०)
नाडीदर्पणः।
असाध्यनाडीकापरिहार
भारप्रवाहमूर्छाभयशोकप्रमुखकारणानाडी ॥
संमूच्छितापि गाढं पुनरपि सा जीवनं धत्ते ॥६६॥
अर्थ-अत्यंत बोझाके उठानेसें, अथवा विपवेग धाराके वहनेसै, रुधिर
देखनेके कारण जो मूर्छित हो गयाहो, राक्षसादि दर्शनकरके भयभीततासै ध-
नपुत्रादि नष्ट होनेके शोकसैं जो नाडी अत्यंत स्पन्दरहितती होगईहो वो फि-
रसी साध्यताको प्राप्त होतीहै कोई भावप्रवाह ऐसा पाठमानताहै सो असदहै।
पतितः सन्धितो भेदी नएशुक्रश्च यो नरः॥
शाम्यते विस्मयस्तस्य न किञ्चिन्मृत्युकारणम् ॥ ६७ ॥
अर्थ-जो उच्चस्थानादिसँ गिराहो, हड्डी आदिके जोडनेसे, अतिसार
रोगवाला, जिसके यक्ष्मा आदि रोगके कारण अथवा रमणकरनेके, कारण
शुक्रक्षीण होगयाहो, ऐसे मनुष्योंकी यदि नाडी अत्यंत क्षीणभी होगईहो त-
थापि मृत्युका कारण नहींहै, अर्थात् असाध्यके विस्मयको दूरकरेहै।
तथा भूताभिपङ्गेऽपि निदोपवदुपस्थिता ॥ समाङ्गा वहते नाडी
तथा च न क्रमंगता|अपमृत्युर्न रोगाझा नाडी तत्सन्निपातवत् ६८
अर्थ-एवं भूतानिपंग अर्थात् भूतप्रेतबाधा यदि नाडी सन्निपातके स-
दृश चले तथा वह नाडी वातपिन कफ समाव क्रमवालीहो किंतु वे कम
न होय तो उस सन्निपातके सदृश नाडीसनी मृत्युमा भय नहींहै ।
स्वस्थानहीने शोके च हिमाकान्ते च निर्गदाः॥
भवन्ति निश्चला नान्यो न किञ्चित्तन दूपणम् ॥ ६९ ॥
अर्थ--उच्चस्थानस शोक और हिम (बर्फ कोहल आटिकी शरद ) में
यदि नाडी निभल होय फिरनी प्रकट होप इम्मै मृत्यु शंगाका भय नहींहै।
इस श्लोकमें "निर्गदा" जो पदहै सो अमंगतहै । क्यों कि निर्मध
नाहीजी निश्चला होताहे।
स्तोक वातकर्फ जुष्टं पित्तं वहति दारुणम् ।।
पित्तस्थानं विजानीयापजं तस्य कारयेत् ॥७॥

" आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (३१) वातकफयुक्त और पित्त जिसमें प्रवल होय तो उस.. करना चाहिये, वो असाध्य नहींहै। , यावद्धमन्या नोपजायते॥ सत्त्वेऽपि नासाध्यत्वमिति स्थितिः॥७१॥ नाडी स्वस्थान कहिये अंगुष्ठमूलसै च्युत न होय, ताब- करे यह असाध्य नहींहै। प्रसङ्गवश कालनिर्णय कहतेहैं भूलता भुजगाकारा नाडी देहस्य संक्रमात् ॥ विशीर्णा क्षीणतां याति मांसान्ते मरणं भवेत् ।। ७२ ॥ नाडी कैंचुऐके सहश कश और टेढी चले, कभी सर्पके समान और तिरछी चले, तथा कभी अलक्ष और अति कशता पूर्वक- एवं कभी देह सूजन आदिसँ स्थूल होजावे और कभी कशहो जा- वह रोगी दूसरे महिनेमें मरे । क्षणाद्गच्छति वेगेन शांततां लभते क्षणात् ॥ सप्ताहान्मरणं तस्य यद्यङ्गे शोथवर्जितः॥७३॥ नाडी जल्दी चले कभी चलनेसैं. रहि जावे और देहमें शोथ तो उस प्राणीकी सातदिनमें मृत्यु होय । निरीक्ष्या दक्षिणे पादे तदा चैषा विशेषतः॥ मुखे नाडी वहेन्नित्यं ततस्तु दिनतुर्यकम् ॥७४॥ अर्थ-पुरुषके दहने परमें और वीके वामपैरमें यदि नाडी विशेष संचार- तथा आदिमें नित्य नाडी चले तो वहरोगी चारदिन जीवे । आदिशब्द- जगे तर्जनी ऊंगली जाननी। हिमवद्विशदा नाडी ज्वरदोहेन तापिनाम् ॥ त्रिदोषस्पर्शभजतां तदा मृत्युदिनत्रयात् ॥७॥ अर्थ-सन्निपात ज्वर दाहसे संतप्त रोगीकी नाड़ी यदि शीतल और नि- होय तो वह रोगी तीन दिनमें मरे । तत्स्थचिन्हस्य सत्वेपीति पालन्तरम् ।

गर (३२) नाडीदर्पणः। गतिन्तु भ्रमरस्येव वहेदेकदिनेन तु ॥ अर्थ-जिस प्राणीकी नाडी श्रमरके सदश गमन करे अर्थात् जैसे मैंग कुछ दूर उडकर चला जाताहे ओर फिर उसीजगे आय जाय जाताहै इस प्रकार नाडी चलनेसे उसकी एकदिनमें मृत्यु होय । कन्देन स्पन्दते नित्यं पुनर्लगति नागुलौ ॥७६ ॥ मरणे डमरूकारा भवेदेकदिनेन तु ॥ अर्थ-मरणमें नाड़ी डमरूके आकार होतीहै, वो दिनमें मरे । दृश्यते चरणे नाडी करे नेवाधि दृश्यते ॥ मुखं विकसितं यस्य तं दूरात्परिवर्जयेत् ।। ७७॥ अर्थ-जिसके चरणमें नाडी प्रतीत होय और हाथमें न मालुमहो, तथा जिसका मुख खुलगयाहो उसे वैध त्यागदेय । वातपित्तकफाश्चापि त्रयो यस्यां समाश्रिताः॥ कृच्छसाध्यामसाध्यां वा प्राहुर्वेद्यविशारदाः ॥७८॥ अर्थ-जिसकी नाडीमें वातपित्त और कफ ए तीनोंदोप होय उसरोगी- को बुद्धिवान् वैद्य कृच्छ्रसाध्य अथवा असाध्य कहतेहै । शीघ्रा नाडी मलोपेता शीतला वाथ दृश्यते ॥ द्वितीयदिवसे मृत्युनाडीविज्ञातृभापितम् ॥७९॥ अर्थ-जिस रोगीकी नाडी बहुधा मलपित होकर शीघ्र चले,किंवा शी. तल प्रतीतहो उस रोगीफी दूसरे दिन मृत्यु होय, इस प्रकार नाडीज्ञानपारंगत वैद्योंने कहाहे। मुरो नाडी वहेत्तीवा कदाचिच्छीतला वहेत् ।। आयाति पिच्छलस्वेदः सप्तरात्रं न जीवति ।। ८० ॥ अर्थ-वातनाडी तीव्रगति, तथा म्नी मदव नथा अगम गाना पसी- ना निकले तो वह रोगी सातरात्रि नहीं बने। देहे शैत्यं मुसे श्वासो नाडी तीना विदाहिनी ॥ मासाई जीवितं तस्य नाडीविजाभापितम् ।। ८१ ॥

. k आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (३३). शीतलता, मुखसै अत्यंत श्वास छोडे, तथा नाडी. तीव उसका अर्धमास आयुष्यहै, ऐसें.नाडीज्ञाताओंने कहाहै। नाडी यदा-नास्ति मध्ये शैत्यं बहिः कमः॥ मन्दा वहेनाडी त्रिरात्रं नैव जीवति ॥२॥ वातनाडी चले नहीं अंतर्मत शीतहों तथा बाहर ग्ला- नाडी चले तो वह रोगी तीनरात्रि नहीं जीये। अतिसूक्ष्मातिवेगा च शीतला च भवेद्यदि ॥ तदा वैद्यो विजानीयात्स रोगी त्वायुषः क्षयी।। ८३ ॥ कालमें नाडी अति सूक्ष्म किंवा अतिवेगवान और शीतल रोमी क्षीण आयुहै ऐसे वैद्य जाने । विद्युद्वद्रोगिणां नाडी दृश्यते न च दृश्यते ॥ अकालविद्युत्पातेव स गच्छेद्यमसादनम् ॥ ८ ॥ रोगीकी नाडी कभी कमी विजलीक समान फडकंजावे औ- अस्तहो जावे, वो रोगी अकस्मात् जैसे विजली गिरतीहै, इसप्रकार पमराजके घर जाय। तिर्यगुष्णा च या नाडी सर्पगा वेगवत्तरा.॥ कफपूरितकंठस्य जीवितं तस्य दुर्लभम् ॥ ८५॥ उष्ण वक्रगति तथा सर्पके समान बहुत वेगवानहो, तथा क- विरजावे ऐसा रोगीका जीवन दुर्लभ जानना। चला चलितवेगा च नासिकाधारसंयुता ॥ शीतला दृश्यते या च याममध्येच मृत्युदा।। ८६॥ नाडी कांपनेवाली तथा चंचल नासिकाके वासोच्छास चलनेवाली और शीतल ऐसी प्रतीतहो वो रोमी एकमहरमें ऐसा जानना। शीमा नाडी मलोपेता मध्याह्ननिसमो ज्वरः॥ दिन जीवितं तस्य द्वितीयेप्रति प्रियेत सः ॥७॥ -- - T २ (३४) नाडीदर्पणः। अर्थ-जिस रोगीकी त्रिदोषयुक्त नाडी बहुतजल्दी चले, तथा मध्यान्हमें अनिके समान ज्यर आये, उस रोगीको आयु एकदिनको है दिन मृत्यु होय। स्कन्देन रुपन्दते नित्यं पुनर्लगति नाडुलौ ।। मध्ये द्वादशयामानां मृत्युर्भवति निश्चितम् ॥८८॥ अर्थ-जो नाडी अपने मूलस्थानमें फडके नहीं और ऊंगलियोंका सर्श करे उसकी बारह प्रहरमें मृत्यु होय, ऐसा जानना । स्थित्वा नाडी मुखे यस्य विद्युद्दयोतिरिवेक्षते ॥ दिनैकं जीवितं तस्य द्वितीये म्रियते ध्रुवम् ॥ ८९ ॥ अर्थ-जिस रोगीकी नाडी मूलस्थानके अग्रभागमें ठहरकर विजलीके सदृश तडफजावे वह एकदिन जीवे, दूसरे दिन निश्चय मरे । स्वस्थानविच्युता नाडी यदा वहति वा न वा ॥ ज्वाला च हृदये तीना तथा ज्वालावधि स्थितिः॥ १० ॥ अर्थ-जिस रोगीको नाडी अपने स्थानसे विच्युनहो (छूट) कर क. भी चले कभी नहीं चले और हृदयमें तीव दाह होय तो जबतक हृदयमें ज्वालाहै तावत्काल रोगीका जीवन है। अङ्गुष्टमूलतो बाह्ये व्यंगुले यदि नाडिका॥ प्रहराविहिर्मृत्युं जानीयाच्च विचक्षणः ॥११॥ अर्थ-अंगुष्ठमूल अर्थात् तर्जनी उंगली धरनेके स्थलमें यदि नाडीकी गति प्रतीत नहो, केवल मध्यमा और अनामिका इन दो अंगुलीसें प्रतीतहो- य तो उम रोगीकी अर्ध प्रहरके उपरांत मृत्यु होय । सार्द्धद्वयागुलाबाह्ये यदि तिष्ठति नाडिका ॥ प्रहरैकादहिर्मुत्यु जानीयाच विचक्षणः ॥ ९२ ॥ अर्थ-नाडी मुलग्थानमै २॥ अंगुल अंतर अर्थात् यदि केवल काके शेपाई मात्रमें फडके उसकी प्रहरउपरांत अर्थाद दूसरे प्रहरमें म FL आयुर्वेदोकनाडीपरीक्षा। नाडी चञ्चला यदि गच्छति॥ दिवसस्तस्य मृत्युरेव न संशयः ॥ ९३ ॥ माडी तर्जनीको साश और मध्यमा ऊंगलीके चतुर्थांशमें होवे और मध्यमाके अवशिष्ट पादत्रय और अनामिकाके. होय.तो उस रोगीकी तीनदिनमें मृत्यु होय । पादाङ्गुलगता नाडी कोष्णा वेगवती भवेत्॥ पञ्चभिर्दिवसैस्तस्य मृत्युर्भवति नान्यथा ॥ ९४ ॥ पूर्ववत्, तर्जनी और मध्यमाके चतुर्थाशमें व्यापकहो चले और किंचिन्मात्र गरम प्रतीत होय तो उसरोगीकी चार मृत्यु होय। पादांगुलगता नाडी मन्दमन्दा यदा भवेत् ॥ पञ्चभिर्दिवसैस्तस्य मृत्युर्भवति नान्यथा ॥ ९५ ।। • पूर्ववद समग्र तर्जनी और मध्यमाके चतुर्थाशमें व्यानहो चले तो उसरोगीकी पांचवे दिन मृत्युहोय । नाडीद्वारा आयुका ज्ञान घामनाडी दीर्घरेखा बाहुमूले च स्पन्दते ॥ जीवेत्पञ्चशतं वर्ष नात्र कार्यों विचारणा ।। ९६ ॥ रोगीकी वामनाडी दीर्घरेखाके आकारसे शुजाकी जडमें त- १०५ वर्ष जीवे इसमें संदेह नहीं। दीर्घाकारा वामनाडी कर्णमूले च स्पन्दते ॥ जीवेत्पञ्चशतं साई धनिको धार्मिको भवेत् ॥ ९ ॥ वामनाडी आकारमें लंबी होकर कानकी जडमें प्रतीत सापंचशतवर्ष जीवे और धनिक तथा धार्मिक होय । वामनाडी स्वल्परेखा हनुमूले च स्पन्दते ।। पञ्चवर्षाधिकञ्चैव जीवनं नात्र संशयः ॥ १८॥ वामनाडी स्वल्परेखामें होठोगकी जडमें तडफे यो पांचवर्ष जीवे इसमें संदेह नहीं। - .

- P (३६) नाडीदर्पणः। नाडीद्वारा भोजनका ज्ञान पुष्टिस्तैलगुडाहारे मांसे च लगुडाकृतिः ॥ क्षीरे च स्तिमिता वेगा मधुरे भेकवद्गतिः ।। ९९ ॥ रम्भागु डवटाहारे रूक्षशुष्कादिभोजने ॥ वातपित्तात्तिरूपे- ण नाडी वहति निष्क्रमम् ॥१०॥ अर्थ-तैल और गुडके खानेसें नाडी पुष्ट प्रतीत होतीहै, मांसके नाही लकडीके आकार चलतीहै, दूध पीनेस मंदगतिसें चलतीहै। मधुर हारसें नाडी मेंडकके समान चलतीहै । केला, गुड, वडा, रूक्षवस्तु, और शुष्क द्रव्यादि भोजनसें जैसी वातपित्तरोगमैं नाडी चलतीहै उसप्रमाण चलेहै। अथ रसज्ञानम् मधुरे बर्हिगमना तिक्ते स्याडूलतागतिः॥ अम्ले को- ष्णात्मवगतिः कटुके भुंगसनिभा ॥ १०१॥ क- पाये कठिना म्लाना लवणे सरला द्रुता ॥ एवं द्वित्रि चतुर्योगे नानाधर्मवती धरा ।। १०२॥ अर्थ-मिष्ट पदार्थ क्षणमैं नाही मोरकासी चाल चलताहै कडुई अव्य. पक्षणसे स्थूलगति, खट्टे पदार्थ खानेसे कुछ उप्ण और मैंडकाकी गति हो- तीहै, चरपरी द्रव्य सानेसे मीराके आकार गति होतीहै, कसेली द्रव्य खा- नसे नाडी कठोर और म्लान होतीहै, निमकीन पदार्थ खानेसे सरल (सीधी) और जल्दी चलनेवाली होतीहै, इसीप्रकार भिन्न भिन्न रसके एकही स. मय सेवन करनेसें नाडी अनेकप्रकारकी गतिवाली होती है। अम्लेश्च मधुराम्लेश्च नाडीशीता विशेषतः॥चिपि- टै ष्टद्रव्येश्च स्थिरा मन्दतरा भवेत् ॥ १०३ ॥ कू- ष्माण्डमूलकेश्चैव मन्दमन्दा च नाडिका ॥ शांकेश्च कदलैश्चेव रक्तपूर्णेच नाडिका ॥१०॥ अर्थ-सट्टे पदार्थ अथवा मधुराम्ल (मिष्ट और खट्टामिला) नाडी शीतल होतीहै, चिरवा और सुनीहुई (चना, वोहरी) इध्य तिक्त स्यात्स्टता । २ कषाये कठिनाम्ला वा इति वा पाठः ।

4. आयुर्वेदोकनाडीपरीक्षा। और मंदगति चलतीहै, पेठा मूली अथवा कंदपदार्थके - पलतीहै शाक (पत्रपुष्पादिकका) और केलेकी फली रक पूर्णके सहश चलेहै। नाडी दुग्धे शीता बलीयसी ॥ गुडैः क्षीरेश्च स्थिरा मन्दवहा भवेत् ॥ १०६ ॥ वेतिकठिना कठिनापि च ॥ द्रवद्रव्यस्य काठिन्ये कोमला च॥१६॥ भक्षणसे नाडी मंदगामिनी होतीहै, दूधके पीनेसे नाडी शीतल .:ध और और पिष्टपदार्थ (चूनके, पिढी आदिके नाही चंचलतारहित मंदमामिनी होती है, द्रवपदार्थ (कढी, भोजनसे नाडी कठिन होतीहै और कठोर (लड्डू, सैं नाही कोमलहोतीहै यदि द्रवपदार्थ कुछ कठोर होयतो और कठोर उभय स्वभाववती होतीहै। उपवासाद्भवेत्क्षीणा तथा च द्रुतवाहिनी ॥ संभोगात्राडिका क्षीणा ज्ञेया द्रुतगतिस्तथा।। १०७॥ (निराहार) सैं नाडी क्षीण और शीघवाहिनी होतीहै एवं माडी क्षीण और शीघ चलनेवाली होतीहै। : कुपथ्यवसनाडीकी चाल विषमावेमा वरिणां दधिभोजनात् ॥ १०८॥ ज्वरवान पुरुष बही खाप तो उसकी नागी नरम और कि- होतीहै। श्रीमाधुरकष्णालालदसरामेण सङ्कलित मारीदर्पये दितीयावलोकः । ३ ॥ इसके उपरांव कितनेक रोगोंकी गाडीकी असी भवस्था हो- मितुई, वहाँ रोग विहान भागवा करके अपम. जर (३८) नाडीदर्पणः। ज्वरके पूर्वरूपमें अङ्गग्रहेण नाडीनां जायन्ते मंथराः पवाः॥ प्वःप्रबलतां याति ज्वरदाहाभिभूतये ॥१॥ सान्निपातिकरूपेण भवन्ति सर्ववेदनाः ॥ अर्थ-ज्वर आनेवाली अवस्थाके कितनेक क्षण पहिले अंगमें पीडा ने लगे, नाडी मंथर ( मंद ) भावसे मेंडकाकी चाल चलने लगे तथा ज्वरकी पूर्वावस्थाके वा धारामें वहनेवाले मैंडकाके समान तथा सis क ज्वरकी पूर्व अवस्थाके प्रमाण नाना आकतिसैं गमन करे । ज्वरके रुपमें ज्वरकोपेन धमनी सोष्णा वेगवती भवेत् ॥२॥ अर्थ-जिस कालमें इसमाणीको ज्वर चढआताहै उस समय नाडी गरम और वेगवती होती होती है। उष्मा पित्ताहते नास्ति ज्वरो नास्त्युष्मणा विना ॥ उष्णा वेगधरा नाडी ज्वरकोपे प्रजायते ॥ ३ ॥ अर्थ-विना पित्तके गरमी नहीं और विनागरमोके ज्वर नहीं होता अव एक ज्वरके वेगमें नाडी गरम और वेगवान् होतीहै। ज्वरे च वक्रा धावन्ती तथा च मारुतःप्वे ॥ रमणान्ते निशि प्रातस्तथा दीपशिखा यथा ॥ ४॥ अथ-ज्वरके कोपमें ओर वादीमें नाडी टेटी और दौडती चलतीही तथा मैथुनकरनेके पिछाडी रात्रिों और प्रातःकालमें नाडी दीपशिखाके - मान मंद गमन करती है। वातज्वरे सौम्या सूक्ष्मा स्थिरा मन्दा नाडी सहजवातजा ॥ स्थूला च कठिना शीघ्रा स्पन्दते तीव्रमारुते ॥६॥ वका च चपला शीतस्पर्शा वातज्दरे भवेद ॥ + आयुर्वेदोकनाडीपरीक्षा । (३९). वायुके द्वारा नाडी कोमल, सूक्ष्म, स्थिर, और मंद वेग- तीववायु द्वारा नाडीस्थूल, कठिन, तथा जल्दी चलनेवाली वातज्वरमें टेढी, चपल तथा शीतल स्पर्शवान् नाडी होतीहै । च सरला दीर्घा शीघ्रा पित्तज्वरे भवेत् ॥ नाड्याः काठिन्याञ्चलते तथा ॥६॥ गाडी शीघ चलनेवाली, सरल, दीर्घ, और कठिनताके फैडकनेवाली होतीहै। नाडी तन्तुसमा मन्दा'शीतला श्लेष्मदोषजा ॥ "मलाजीणे नातितरां स्पन्दनं च प्रकीर्तितम् ॥७॥ प्रकोपमें नाडी तंतुवर सूक्ष्म मंद वेगवाली, और शीतल औिर मलाजीर्णमें अत्यंत नहीं फडकती। .. 'द्वंद्वजनाडी चश्चला तरला स्थूला कठिना वातपित्तजा ॥ ईपञ्च दृश्यते तूष्णा मन्दा स्याच्छेष्मवातजा ॥८॥निर- तर खरं रूक्षं मन्दश्लेष्मातिवातलम् ॥ रूक्षवाते भवे- तस्य नाडी स्यात्पित्तसनिभा ॥ ९॥ सूक्ष्मा शीता स्थिरा नाडी पित्तश्लेष्मसमुद्भवा ॥१०॥ नाडी चञ्चल, तरल, स्थूल, और कठोर होतीहै। वातक कुछ मरम और मंदगामिनी होतीहै । जिस नाडीमें किंचिन्मात्र और अधिक बात होती है वह अत्यंत खर और रूक्ष होतीहै । जिसके पायका अत्यंत कोप होय उसकी पिनके सदृश अर्थाद अत्यंत वा भत्यंत स्थूल होय, पित्तकफ ज्वरमें नाडी सूक्ष्म शीतल, और मन्दवे- होतीहै। १ मंदाच सुस्थिरा शीता पिच्छा टेणिमणोभवेत् इति पाठातरम् । कठिना वातपित्तजा इति पाठान्तरं । १ --

(१०)
नाडीदर्पणः।
रुधिरकोपजानाडी
मध्ये करे वहेनाडी यदि सन्तापिता ध्रुवम् ॥
तदा नूनं मनुष्यस्य रुधिरापूरितामलाः॥११॥
अर्थ-मध्य करमें अर्थात् मध्यमांगुली निवेशस्थलमें नाडी::
कर तडफे तो जानेकि वातादि दोषत्रय रक्तप्रकोपकरके परिपूर्णहै ।
दि रुधिरसैं दुपितहैं।
आगन्तुकरूपभेदमाह
भूतज्वरे सेक इवातिवेगात् धावन्ति नाड्यो हि यथाब्धिगामाः ॥
अर्थ-भूतज्वरमें नाही अत्यंत वेगसे चलताहै, जैसे समुइमें
नदियोंका प्रवाह वेगसें चलताहै।
तथा
एकाहिकेन वचन प्रदूरे क्षणान्तगामा विषमज्वरेण ॥१२॥
द्वितीयके वाथ तृतीयतुय्ये गच्छन्ति तप्ता भ्रमिवत् क्रमेण॥
अर्थ-एकाहिकज्वरमें नाडी सरलमार्गको त्यागकर क्षणक्षणमें
मिनी होतीहे तथा द्वितीय, तृतीय (तिजारि) और चातुर्थनामक विषम-
ज्वरमें उष्ण होकर इतस्ततो धावमाना होती है ।
अन्यत्रापि
उष्णवेगधरा नाडी ज्वरकोपे प्रजायते ॥ उद्वेगकोधकामेषु भय
चिन्ताश्रमेषु च ॥ भवेत् क्षीणगतिर्नाडी ज्ञातव्या वेद्यसत्तमः।
अर्थ-गरम और वेगवान् नाडी ज्वरके कोपमें होता है उद्वेग, कोच,
मबाधा, भय, चिन्ता, और श्रम इनमें नाडी क्षीणगतिवाली होतीह
मंद मंद गमन करताहै।
प्रमडाटाह
व्यायामे भ्रमणे चेव चिन्तायां श्रमशोकतः॥
नाना प्रभावगमना शिरा गच्छति विज्चरे ॥१६॥

आमाश्रमे पुष्टिविवर्धनेन भवन्ति नाड्यो भुजगाग्रमाना ।
अर्थ-आम, और परिश्रम न करने तथा देहमें अत्यंत पुष्टता होनस
सर्पके अग्रभागके सहरा होती है इसीपकार.थोडा भोजन करनेसे या उ-
करनेसे नारी भुजाकेमभाममें सर्पके अप्रनाम समान होतीहै ।
आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। (४१)
(दंडकसरत ) करनेसें, डोलनेसैं, चिंता, श्रम, और शो-
मनुष्यकी नाडी अनेकानावसे गमन करती है।
अजीर्णरूपमाह
भवेनाडी कठिना परितो जडा॥
च द्रुता शुद्धा त्वरिता च प्रवर्तते ॥१६॥
और पक्काजीर्ण दोनोंमें नाडी कठोर और दोनोपार्थों में
इसीप्रकार की निर्मल निर्दोष तथा शीघ्रवेगवती होतीहै। ,
तत्र विशेषमाह
पक्काजीणे पुष्टिहीना मन्दं मन्दं वहेजडा ॥
अमृक्पूर्णा भवेत् कोष्णा गुर्वी सामा गरीयसी ॥१७॥
नाडी पुष्टतारहित मंद मंद चलती है तथा नारीहोतीहै ।
परिपूर्णनाडी गरम, भारी होतीहै और आमवातकी नाडी
होतीहै।
.
, लघ्वी भवति दीप्तास्तथा वेगवती मता ॥
मन्दाग्नेः क्षीणधांतोश्च नाडी मन्दतरा भवेत् ॥
मोऽनौ क्षीणतां याति नाडी हंसाकृतिस्तथा ॥ १८॥
अर्थ-दीमानिवाले मनुष्यकी नाडी हलकी और वेगवती होतीहै, मंदा-
और क्षीणधातुकपुरुषकी नाडी मंदतर होतीहै, इसीप्रकार जिस
जठराग्नि सर्वथा मंदहोगईहो उसकी नाडी हंसके समान अतिसय-
आहारमांद्यादुपवासतो वा तथैव नाड्योऽप्रभुज़ाभिवृत्ताः ॥१९॥

.. जडवद होतीहे। (४२) नाडीदर्पणे। ग्रहणीरोगे पादे च हंसगमना करे मंडूकसंपवा। तस्याग्नेर्मन्दता देहे त्वथवा ग्रहणीगदे ॥२०॥ अर्थ-जिसकी पेरकी नाडी इसके समान ओर हाथकी नाडी मैडका समान चले उसके देहमें मंदामिह अथवा संग्रहणी रोगहै ऐसा जानना । भेदेन शान्ता ग्रहणागदेन निर्वीर्यरूपा त्वतिसारभेदे । विलम्बिकायां प्रवगा कदाचिदामातिसारे पृथुता जडा च॥२१ अर्थ-संग्रहणीका दस्तहोने के उपरात नाडी शातवेगा होतीहै अतिसार रोगका दस्त होनके उपरात नाडी सर्वथा बलहीन होजातीहे विलंबिकारोगमें नाडी मैंडकाके तुल्य चलतीहै इसीप्रकार आमातिसारमें नाडी स्थूल और विचिकाज्ञानम् निरोधे मूत्रशकृतोविद्महे त्वितराश्रिताः। विचिकाभिभूते च भवन्ति भेकवक्रमाः ।। २२ ।। . अर्थ-केवल मल या फेवल भूध अथपा मलमून दोनो ए साथ बंद हो- जाये वा इच्छापूर्वक इनके वेगको रोकनेस एवं विधिका रोगमें माडीकी - गति मैंडकाकी चालके समान होतीहे। आनाहमृवरच्द्र आनाहे मूत्रकृच्छे च भवेन्नाडीगरिष्ठता। अर्थ-अनाह ( अफरा) आर मत्ररच्छ रोगमें नाडी गुरुतर अर्थाव भारी होतीहै। भूलरोगे वातेन शूलेन मरुत्युवेन सदेव वक्रा हि गिरा वहन्ती । ज्वालामयोपित्तावचेष्टितेन साध्या न शूटेन च पुष्टिरूपा ॥२३॥ अर्थ-वायुगल्म आर वायु प्रदरता निबंधनम नाटी सदेव भत्त्व टेढी चलताह । तिनके शूटमें यह अनियर गरम होती है । भीर आमज. में पुष्टियुक्त होताहै।

१. ॥२६॥प्रयाति वातिकं रूपं नाडीपावकरूपिणी २'
॥
M
आयुर्वदोक्तनाडीपरीक्षा। (४३)
प्रमेहज्ञानम्
प्रमेहे ग्रन्थिरूपा सा सुतप्ता त्वामदूषणे ।
रोगमें नाडी ग्रंथि अर्थात् गांठके आकार प्रतीत होयहै औ-
नाडी सर्वकालमें उष्ण होतीहै।
विषविष्टम्भगुल्मज्ञानं
। विपरिष्टकायां विष्टम्भगुल्मेन च वक्ररूपा ॥
अधः स्फुरन्ती उत्तानभेदिन्यसमाप्तकाले ॥२४॥
वा सादि दशजन्य अरिष्टलक्षण प्रकाशित होनसें त-
नाडी देखनेसै बोधहोयहै कि इसके यह रोग नवीन उत्पन्न होताहै
तथा गुल्म रोगमें विषके तुल्य और विशेषता यह होता है कि
चक्ररूप होतीहै । इन दोनों पीडामें अत्यंत वायुका प्रको-
नाडी अधःफुरित होय, एवं इनकी असंपूर्णावस्थामें अर्थात् पूर्वरू-
नाडी अत्यंत ऊर्ध्व गतिहोय ।
गुल्मे विशेषमाह
कम्पाथ पराक्रमेण पारावतस्येव गतिं करोति ॥२५॥
२. कंपितहो बलपूर्वक खबूतरकी तुल्य गमन.करती
अथ भगन्दरज्ञानम्
कठिने देहे प्रयाति पैत्तिकं कमम्॥ भगन्दरानुरूपेण ना-
अर्थ-व्रणरोगकी अपकअवस्थामें नाडौंकी गति पैत्तिक नाडीके तुल
भगंदर तथा नाडीव्रण रोगों नाडीकी गति वातनाडीके तुल्य अ
उष्ण होतीहै.।
वान्ताविज्ञानम्
वान्तस्य शल्याभिहतस्य जन्तोर्वेगावरोधाकुलितस्य भूयः॥
गति विधत्ते पानी गजेन्दारालमा नैव ककोल्लमेन ॥ स्त्री-
रोगादिकमा रक्तादिज्ञानक्रमेण ज्ञातव्यम् ॥२८॥

(४४) नाडीदर्पणे। . अर्थ-वमित (जिसने रद्द करीहो) शल्याभिहत (जिसके किसी कारका बाण आदि शल्य लगाहो। और वेगोषी (जिसने मल मूत्रको रण कर रक्साहो) एसे प्राणियोंकी नाडी तथा कफोल्बणा नाडी- और हंसादिकी गति के समान चलती है। इसीप्रकार रक्तादि ज्ञानकरके अ- नुक्क जो स्त्री रोग प्रदरादिक उनकोभी वैद्य अपनी बुद्धि मानीस जानलेवे यह नाडीपरीक्षा शंकरसेनके मतानुसार लिखीहे । नाडीस्पन्दनसंख्या पष्टयास्पन्दास्तु मानाभिः पट्पञ्चाशद्भवन्ति हि ॥ शिशोः सद्यः प्रसूतस्य पञ्चाशत्तदनन्तरम् ॥ २९ ॥ चत्वारिंशत्ततः स्पन्दाः पत्रिंशद्यौवने ततः ॥ प्रोट- स्येकोनविंशत्त्युवोधकेऽसौ च विंशतिः ॥ ३० ॥ अर्थ-अस नाडीफे फड कनेकी संख्या कहते है, जैसे कि ६० दीर्घ अक्षर उच्चारण करनेमें जितना काल लगताह उतने समयमें अर्थात् १ पलमें त- त्काल हुए बालकी नाडोकी संदनसम्या ५६ वार होतीहै । इसके उपरान्त अवस्था बढनके अनुसार ५० तथा ४० बार होतीहै । योवन अवस्था अ- र्थात् जवानी में ३६ वार होतीहै । और प्रौढ अवस्थामै २९ वार, ओर. दापेमें २८ वार, एकपलमें नाडी फडस्तीहै । पुंसोऽतिस्थपिरस्य स्युरेकत्रिंशदतः परम् ॥योपितां पुरुषा- णाञ्च स्पन्दास्तुल्याः प्रकीर्तिताः॥३१॥ प्रोटानां रमणी- नान्तु द्वयधिकाः सम्मता बुधैः ॥ ३२ ॥ अर्थ-अति वृहोने में नाडौरी मल्या पिर बढ़ने लगतीहै, अर्थात कपलमें ३१ पार तडपना है । यह अवस्था भेट करके संपूर्ण सन्दन संख्या लिखी गईहै । यह मंग्या म्री और पुस्प दोनों में ममान कहींह 1 परंतु केरल पीडावस्थामें चीनी नाटीमाया पुरुप नगपारी अपेक्षा अधिक अधिक र्थात् प्रौर पुरुपको सन्दन या प्रतिपलमें २९ वार हानाह। और घोडा श्रीकी मरया ३३ घार होती है। " मुहुः प्रकम्पते तद्वत्साईदयपले शतम् ॥ ३८॥ अर्थ-फिर दो वर्षस उपरांत तीन वर्ष तकक बालककी नागरी २॥ पलमें (४५) .. आयुर्वेदोकनाडीपरीक्षा। प्राणः षडात्मकः॥ स्यात्तु तत् षष्टया दण्ड इत्यभिधीयते ॥३३॥ उच्चारण करनेमें जितना समय लगता है उसको एक विमेष कहतेहै। १० मात्राका १ प्राण ६ प्राणका १ पल १.दंर होताहै। अत एव एक पलका साठ भाग उसमें एक भाग, "कहतेहै उसीको मात्रा कहते है। मतान्तरण देहिनां देहे वयोवस्थाविशेषतः ॥ ". यथा नाज्यस्तत्संख्यानमिहोच्यते ॥३४॥ मतान्तरसैं कहतेहै-कि स्वस्थ पुरुषोंके देहमें आयुकी अव- जैसे नाडी चलतीहै उनकी संख्या इसमंथमें लिखतेहै । सार्धद्वयपलः कालो यावद्गच्छति जन्मतः ॥ तावत्प्रकम्पते नाडी चत्वारिंशच्छताधिकम्।। ३५ ॥ : जन्मलेनेसैं यावत् २॥ पल व्यतीत नहीं हो उतने सम- १०.वार नाडी वारंवार कंपन होतीहै । तदूर्ध्व हायनं यावत्साईद्वयपलेन सा ॥ मुहुः प्रकम्पमाधत्ते त्रिंशद्वारं शतोत्तरम् ॥३६॥ १ वर्षकी अवस्थापयंत बालककी नाडी २॥ पलमें १३०वार उपरिष्टादाद्वितीयात्तावत्काले शरीरिणः ॥ तंतःप्रकम्पते नाडी दशाधिकशतं मुहुः॥ ३७॥ अर्थ-वर्ष दिनसे लेकर जबतक यह बालक दो वर्षका होताहै तावत्का- नाही दाई पलमें ३३० वार वारंवार तडफतीहै। ततस्त्रिवत्सरं व्याप्य देहिनां धमनी पुनः॥ 4 . . भार वारंवार नातीहै।

" (४६) नाडीदर्पणे। ततस्त्वा सप्तमाद्वानवतिः स्यात्प्रवेपनम् ॥ धमन्यास्तन्मिते काले प्रत्यक्षादनुभूयते ॥३९॥ अर्थ-फिर तीन वर्षसे सात वर्पतकके बालककी नाडी २॥ पलमें ९ वार वारंवार चलतीहै। ततश्चतुर्दशं तावत्पञ्चाशीतिः प्रवेपनम् ॥ विशदर्पमभिव्या- प्य ततोऽशीतिः प्रकीतितम्।। शताईवत्सरं व्याप्य कंपन पञ्चसप्ततिः॥ ततोऽशीतौ प्रकथितं पष्टिवारं प्रवेपनम् ॥ ११॥ अर्थ-फिर सात वर्षसे लेकर चौदह वर्पकी अवस्थातक इस प्राणीकी नाडी २॥पलमें ८५ वार तडफतीहै । और चौदह वर्षकी अवस्थास लेकर ३० वर्षकी अवस्थापयंत ढाई पलमें ८० वार तडफती है। तीस वर्षके उप- रांत पंचास वर्ष पर्यंत ७५ वार कंपन होताहै । और पंचास वर्षसे लेकर अ. स्सी वर्षकी अयस्थातक इस प्राणीको नाडी२॥ पलमें६०वार कंप होता है। वयोऽवस्थाक्रमणेवं क्षीयन्ते गतयो मुहुः ॥ सार्द्रद्वयपले काले नाडीनामुत्तरोत्तरम् ॥११॥ अर्थ-फिर जैसे जैसे अवस्था क्षीण होती जातीहै उसी प्रकार नारीका गमनभी २॥ पलमें क्षीण होता जाताहै। एवं बहुविधाद्रोगात्तत्तलिङ्गानुवोधनी ।। नाडीनां च गतिस्तद्वद्भवेत्कालात्पृथक् पृथक् ॥४३॥ अर्थ-इस प्रकार अनेकविध रोगाम उन्ही उन्ही लिवोकी बोधनकर- नेवाली नाडियोंकी गति पृथक पृथक् कालमें पृथक पृथक होतीहै । हृदयस्य बृहद्भागःसंकोचं प्राप्यते यदि ॥ प्रसारयेत्तदा नाडी वायुना रक्तवाहिनी ॥१४॥ अर्थ-निम ममय हृदयका बृहदाग मंकुनिन होताहे और मुलगाडि इ. मसमय रक्तवाहिनी माडियोंकी गति परनके बगम प्रसन्न होती है ।

बहुकालगता रोगाःसा नाडी धीरंगामिनी।।। बहुतदिनास रोगहोवे उसकी नारी धीरगामिनी होतीहै। सुखं प्रशस्तं च भवेत्तस्यारोग्यं भवेत्सदा ॥१९॥ अर्थ-जिसपाणीकी नाही हंसकीसी अथवा झवीकीसी पाडपले उस- (४७) आयुर्वेदोक्तनाडीपरीक्षा। भवेन्मलविभेदतः॥ व तादृशी ॥१५॥ निकलनेसे नाडीकी गति अत्यंत क्षीण होतीहै। उसीप्रका- अल्परुधिरसैं और दुर्बलतासैनी नाडी अतिक्षीण होतीहै। देहे व्याघातैर्गतिभेदतः॥ चञ्चला च दुर्बला क्षीणधीरकैः॥४५॥ संपूर्ण रक्तवाहिनी नाडी आघात करके और अपनी गतिके रुधिरको तर्पण करेहै अर्थात् सर्वत्र फैलातीहै। उनकी गति भेद असे तेजपुआ, चञ्चला, क्षीणदा, दुर्बला, और धीरगामिनी, ये पांच प्रकारकी गतिहै। चञ्चलाऔरतेजःपुञ्जागति रतोष्णे शीघ्रगा नाडी ज्वरे च चञ्चला भवेत् ॥ तथा वाते तेजःपुना गतिःशिरा,॥४७॥ रुधिरके कोपमें गरमीमें नाडी शीघ्र चलतीहै, उसीपकार चंचला नाडी होतीहैं और ज्वरके आरंभमें तथा वात रोगमें नाडी गति होतीहै। दुर्बला और क्षीणनाडी दुर्बले ज्वररोगे च अतिसारे प्रवाहिके। दुर्बला क्षीणदा नाडी प्रबला प्राणघातिका ॥४८॥ दुर्बलतामें ज्वरमें अतिसार और प्रवाहिकारोगमें नाडीकी दुर्बला होतीहै, क्षीणदा नाठी प्रबल प्राणोंकी नाशक होतीहै। ... सुखीपुरुषकीनाडी इंसगा चैव या नाडी तथैव गजगामिनी॥ सुसहोय और सदेव आरोग्यते।

" (१८) नाडीदपणे। सुव्यक्तता निर्मलत्वं स्वस्थानस्थितिरेव च ॥ अमन्दत्वमचाञ्चल्यं सर्वासां शुभलक्षणम् ॥५०॥ अर्थ-उत्तम प्रकारसे प्रतीतहो निर्मल अपने स्थानमें स्थिति, और चांचल्यता रहितहो ये संपूर्ण नाडीयोंके शुज लक्षण जानने। दोपसाम्याच सादृश्यादनुक्तासु रुजास्वपि । ज्ञातव्या धमनीधर्मा युक्तिभिश्वानुमानतः॥५१॥ अर्थ-यह कितनेएक रोगोंमें नाडीकी प्रकृति लिखाहै, इस निन्न समस्त रोगोंमें जैसी जैसी नाडीयोंकी गति होतीहै उसको वैव अनुमान और मुक्तिद्वारा जाने, अर्थात् जिस रोगकी जिस जिस रोगको साथ सादृश्यताई अथवा जिसकिसी रोगमें संपूर्ण कुपितदोपोंके साथ अन्य किसीरोगके कुषि- त दोपोंकी साम्यदा मिले उन उन रोग समस्तोंमें नाडीकी एकविध गती हो. तीह ऐसा जानना। नाडीदर्शनानंतरहस्तप्रक्षालन नाडी धातु यो वैद्यो हस्तप्रक्षालनं चोद ) रोगहानिर्भवेच्छीघ्रं गंगास्नानफलं लभेत्॥५२॥ अर्थ-जो वैद्य रोगीकी नाडीदेखकर हाथको जलसे धोताहै, वो जिस रोगीकी नाडी देखी उसका रोग शीघ नष्टहोय, और वैद्यको गंगास्नानका फल ल मातहोय । तथाच यो रोगिणः करं स्पृष्ट्वा स्वकरं नालयेद्यदि ॥ रोगास्तस्य विनश्यन्ति पङ्क प्रक्षालनाद्यथा ॥५३॥ अर्ध-जो वेव रोगीकी नाडी देश अपने हाथको धोताह इसमें धोनेसे कीच जाताह इसप्रकार उसरोगीका गेग दूर होनाह । इते श्रीगठकहानीय नायरकप गरमूनुना दत्तरांमग निरित आयुददोडर घटुरस्नान्तर्गत नारीदर्पणे भायुवेदोक्त नाडीक्षिावननामपरितः ॥ - + यूनानीमतानुसारनाडीपरीक्षामाह नब्ज यूनानोवेधक मतः॥ तत्क्रमं चात्र वैद्यानां कौतुकाय च ॥ १॥ वैद्य नाडीको नब्ज कहते है उस नब्जका क्रमअर्थात् न- में वैद्योंके कौतुकनिमित्त लिखताहूं। चैव नफसानी रूहद्भयमुदाहृतम् ॥ 'शिरःस्थं च देही देहसुखावहम् ॥२॥ दो प्रकारका एक हयवानो दूसरी नफसानो रूहाहयवानी । और नफ़सानो मस्तकमें रहती है । ए दोनो देहधारियोंकी तत्संगतास्तु या नाड्यः शुरियानसवः क्रमात् ॥ उत्पझे यास्तु सल्लमाः समन्तात्प्रस्फुरन्ति ताः॥३॥ रूहके साथ लगी हुई जो नाडीहै वो दो है एक शुरियान् द्- इनमें शुरियान् नाडी हृत्पद्ममें लगरहीहै उस्सै सर्वत्र स्फुरण होताहे

(५०)
नाडीदर्पणः।
शिरोन्तर्भागसम्बद्धास्वाभिश्चेष्टादिकं भवेत् ॥
श्रेष्ठो जीवनिवासोहद्राज्ञो राज्यासनं यथा ॥१॥
अर्थ-और दूसरी असव नामक जो नाडीहै, वह शिरोन्नरभाग
मस्तकके भीतर लगरहीहै, इन नाडियोंकरके इसदेहकी चेष्टादि होताहै
जैसे राजा राजसिंहासनपर स्थितहो शोजित होताहै । उसीपकार
श्रेष्ठनिवास हृदय स्थानहै।
तद्भवाधमनी मुख्या मनुप्यमणिबन्धगा ॥
परीक्षणीया भिपजा चंगुलीभिश्चतसृभिः॥५॥
अर्थ-उन हृगतनाडियोंमें मनुप्यके पहुचेकी धमनी नाडी मुख्य है। उसको दैप
चार उंगली रखकर परीक्षा करे। अपने शास्त्र में तीन उंगलीसें परीक्षा करना
लिखाहै परंतु यूनानी वैद्य चार दोपोंको चार उंगलियोंसे देखना कहतेहैं ।
यथैणगतिपर्यायस्तद्वदुत्पत्य गच्छति ॥
गिजाली गतिराख्याता पित्तकोपविकारतः॥६॥
अर्थ-जैसे मृगका बच्चा उछलता कृदता चलनाह इसप्रकार नाडीकी म.
तिको गिजाली वाहतेहै । यह पित्त कोप विकारको सूचित करताहै ।
तरङ्गनाम मोज स्यात् मोजीगतिरितीरिता ॥
निवेदयति वर्मस्थं वायोरुप्माणमेव सा ॥७॥
अर्ध-युनानी जलकी लहरको मोज कहतेह उस मोज महश नाडीकी
गतीको मोजी गति कहतेहै यह देहस्थ पवनकी गरमीको जाहिर करतीहै।
दूदस्यात्क्रिमिपयायो दुटी तस्य गतिः स्मृता ॥
श्लेप्माणसंचयं चामं प्रकटीकुरुते हि सा ॥८॥
अर्ध-दूद (कानमलाई आदि) कृपिका पर्यायह अतएव नमितिका
नाडीकी गतिको दी गति कहतहैं । यह कक संचयको और
प्रकाशित करतीहै।
रमपिपीलिकामोर उमली तद्गतिः स्मृता ।।
यस्य नाडी तथा गच्छेन्मृति तस्याशु निदिशेत् ॥९॥

और इसीसें मलपंपका ब्रान होताह यह सादावी (वादीकी) मुहरनाम साझेया सारासायविकारश्॥१५॥ 20375 (५१) . यूनानीमतानुसारनाडीपरीक्षा। बैटी (कीडी) और मोरका नामहै अतएव इन्होकीसी पति कहतेहैं। जिस पुरुषकी नाडी ऐसी अर्थात् मोर चैटी जल्दी मृत्युको प्रातहो। पर्यायो मिन्शार इति कीर्तितः॥ : काष्ठे मिन्शारी सा गतिर्भवेत् ॥१०॥ धमनी धत्ते बाह्यान्तःशोथरोगिणः॥ पर्याय यूनानीमें मिन्शार है वो जैसे लकडीके ऊपर च- नाडीके गमन करनेको मिन्शारी गति कहतेहैं । इसपका- बाहरभीतर सोथं रोगीकी चलतीहै । गतिर्मूषकपुच्छवत् ॥११॥ धमन्याः सम्भवकिल॥ नाडीकी गति मूषक ( चूहे ) की पुच्छसदृशहो अर्थात् एक और दूसरी तरफ क्रमसे पतलीहो उसको जन्वलफार गति यह पित्तकफके कोपमें होताहै। * मास्त्री शलाकासदृशी सूक्ष्मा धीरा बलात्ययात् ॥१२॥ मत्याघातद्वयं यस्यामधस्तादगुलेभवेत् ॥ जलफिकरत्तत्स्मृता पित्तश्लेप्मदग्धप्रबोधिनी ॥ १३॥ नाडी सलाईके आकार अत्यंत सूक्ष्म और धीरगामिनी होय कहातीहै यह बलनाश होनेसे होतीहै और जो नाही मध्यमा- दोवार आघातकरे वह पिनकफ दग्धको बोधन करतीहै इसको जु- कहतेहै। मूर्चइद प्रस्फुरन्ती या गतिः कोष्ठस्य रूक्षताम् ॥ विद्महत्वं च सौदादी विचारान् ज्ञापयत्यपि ॥१४॥ अर्थ-जिस नाडीके प्रस्फुरगर्स कोठगेको रक्षता प्रगट होवे उसको मुर्त- विचारसें जाने। निशाकम्पपर्यापस्तदिशिष्या तु या भवेत् ।।

(५२) नाडीदर्पणः। अर्थ-कंपो फारसी में इतिशा कहते हैं उसके समान जो नाडी सको मुर्तइस नाडी कहतेहैं यह सफरा (पित्त) और सौदा दोनोंके श्रितावस्था होतीहै। मुमतिला पूर्ति तूदियाऽसृजास्यां मुमतिली तु सा ॥ तमः कफादधोगा या मुन्खफिज सा प्रकीर्तिता ॥१६॥ अर्थ-रिपर्णको फारसी में मुम्तिला कहतेहै, अतएव जिस नाडीसे धिरकी परिपूर्णता प्रीतहो उस नाडीकी गतिको मुन्तिली कहतेहे नाडी तमोगण याम्फर्स अबोजागने गमाकरे उसको मुम्माफिज् नाठी कहते है। उर्ध्वमुत्प्लुत्य या गच्छेत्किचिन्मायुप्रकोपतः॥ शाहक्युलन्द सा ख्याता धमनी संपरीक्षकः॥ १७॥. अर्थ-जो नाडी पिच के प्रकोप से उछलकर ऊपरको गमनकरे उसको ना. डोके ज्ञाता वैद्य शाहक्युलंद नाडी कहतेहै । चतुरडा लिसंस्थानादपि दोर्या नवीलगा ॥ दराज इति पर्यायस्तस्या एवं निपातितः॥१८॥ अर्थ-जो नाडी चार अंगुलस जी अधिक लबीहो उसको तवील ऐसा कहतेह और उसी नाडीमा नामान्तर दराज है। परिमाणान्यूनरूपा सा कसीर समीरिता ॥ अमीक निग्नगा या च अरीज आयता स्मृता ॥ १९॥ अर्थ-जितना नाई.का परिमाण काहै यदि उस न्यनहा उमको क- सीर कहाँह भोरे अघोगामिनी नाढीको अमोक कहतेहै और लगी ना- ठीको अरीज कहाहै। यथा गतिस्तु दोपाणां धत्ते मान्यत्वहीनते ॥ गलवे कसूर अमात तारतम्येन निद्दिशेत् ॥२०॥ अर्थ-दोपोंके यथानि अनुसार नाई को पली भोर निर्वती जानना बली निर्बलो आन्निाडियोंको गलवे कमृग और आगलातके तारतम्प में वाकियूल्यमनिहापा स्वस्यस्य परिकीर्तिता ।। इति संक्षेपतो नाडीपरोना कधिता वुधः ॥२१॥ + নিৰী जो नाडी जलकी तरंगके समान. ममनको उसको तरीको सूचित करती है । अथवा देहकी निर्मलताको श्चित को है। जो नाडी कीडाके समान मंद मंद गमनकरे वो कफ, और आम दोषको सूचित करतीहै । इस-माडीकी गतिको दी कहते है। असे लकरके अपर आग चलता इसप्रकार सरदराट लिये जो नाही उंगलियाँका स्पर्शकरे वो बाहर और भीतर सूजनको सूचित करतीहै । इस गतिको मिन्शारी गति कहते है। जो नारी चुहेकी पूंछसदृश गमन करे उसको जनवुल्फार गति कहते हैं । यह ' कफपित्तके कोपस होती है। जो नाडी चैंटी और मोरकी गतिफ समान गमन करे उसको नुमली गति कहते है। ऐसी नाडी रोगीकी शनि मृत्यु सूचना करती है । जो नाडी सलाईक समान दोनो प्रांतों में पतली और वीचमें मोटी होकर गमन करे उसको मतलीगति कहतेहै ! यह निर्यलता सूचना करती है । जो नाडी हडिके समान उंगलियोंको वारंवार बोट देवे उसको मतरकी गति कह- तहै । यह अगंत गरर्माकी सूनना करती है । जनवल नारीदेसनेवालेको वा दिखानेवाळेको उचितहै कि किसीवस्तुका भूसकी नाडीका ज्ञान पथार्थ होगा, अन्यथा ज्ञान होना अति दुस्तर है। अनेकवार होगी देखी सदि फिर उसकी रोगावस्था में देखेगा तो उसको समान नहीं होती, कुछ नकुछ मेद रहनाहीहै वैद्य जिस स्वस्थमनुष्यकी तडफना है वह प्रत्येक मनुष्यकी प्ररुति, देश, काल, अवस्थाओंके यूनानी भाषामें नाडीको नज कहनेका यह कारणहै कि नजका अर्थ शरटी शाईहयोडा यूनानी मतानुसारनाडीकोष्टकम् . नुमूली मतली मतरको जुलाफेकर नाडीपरीक्षा कहीहै इसका विस्तार मेने भाषामें कहाहै पाणीकी निर्दोष नाडीको वाकियुल्वस्त कहते है यह मैंने सं- मया प्रोक्तो भाषायां जनहेतवे ।। युनानीमतानुसारनाडीपरीक्षा। समान शोकाक्रांत (५३) CAN 2 'जो नाडी गमन करते २ ठहर जावे उसको जुराफिकरगान कहते है । यह दिलयी कमजोरी मचित करतीहे प्राय यह शोक समय होती है। जिम नारीका टेकोरदेना जिस वटतमें देनाउनित है उससे पूर्वही जास्ती टेकोर देदेवे यह श्वासाधिक्य निर्मलतामें होती है। कोरदेना विषम KIRA १० - (५४) नाडीदर्पणः। हाथको सहारा न देवे, न कोई वस्तु पकड रक्सीहो, तथा रोगीके पट्टीआदि बंधनादिक न होये, यद्यपि बहुतसे वैद्य पहुचे, कनपटी, टकने आदि अनेक स्थानकी नाडी देखतेहै, परंतु बहुधा हाथकी यह कारणहै कि अन्यनाडी सब थोडी थोडी प्रगटहै शेप हाड मांसमें होनेके कारण अस्त होरहीहै उसजगे उंगलीयोंको स्पर्श प्रतीत नहीं है... परंतु हाथकी नाडी विशदहै अतएव इसपर उंगली उत्तमरीतिस धरी जा- तीहै परंतु मुख्य कारण इसका यहहै कि किसी स्त्रीकी नाडी देखनेकी आवश्यकता होये तो वो अन्यान्य अङ्गोकी नाडी लज्जाके वस नहीं दिखा सकती, परंतु हाथके दिखानेमें किसीकोभी संकोच नहीं होता अतएव सर्वत्र हाथकी नाडी देखना प्रसिद्धहै। अब कहतेहैकि यूनानी वैद्य नाडीकी गति दो प्रकारकी वर्णन करते है । प्रथम इम्बिसात दुसरी इन्किवाज । इम्बिसात (बाह्यगति) इन्किवाज (अत्यंतरगति) इम्बिसात उसगतिको कहतेहै जब इन्किबाज उसगतिको कहतेहै कि नाडी बाहर आनकर ऊंगलीयों का जब नाडी ऊंगलियाँका स्पर्शकर स्पर्श करती है। भीतरको प्रवेश करतीह। अव जानना चाहिये कि हिकमतमें दोप चार प्रकारके कहे है यथा.। दोपः खिल्ल इति प्रोक्तः स चतुर्धा निरूप्यते ॥ सौदा सफरा तथा वल्गम् तुरीयं खून उच्यते ॥२२॥ यूनानीमें दोष शब्दको सिदन कहते हैं वह चार प्रकारहै जैसे सोदा (वार) सफरा (पिन ) वल्गम् (कफ) और चीथा दोप सून (रुधिर ) है परंतु भ- पने शास्त्र के दूप्पहाने से इसको दोप नहीं माना यह शारीरकम लिख आरहे । प्रत्येकदोपमें दोदोगुण है यथा तत्र मौदा धरातत्वं रूसं शीतं स्वभावतः॥पित्तमग्नेः स्वरूपन्तु सफरा रूतमुष्णकम् ॥२३॥ वल्गमवारिस्वरूपं स्यात्सकफाधि ग्धशीतलः अनं वायुःसून इति खिग्धोपण तेषु तद्वरम् ॥२४॥ तहां सौदा अर्याद वातमें पृथ्वीतत्व अधिवह अब एक वातावमट्टी * (५५) युनानीमतानुसारनाडीपरीक्षा। पित्तमें अमितत्व विशेषहै अत एव सफरा (पित्त) वल्गम (कफ) में जलतत्व अधिक होनेसे स्निग्ध शी- खून (रुधिर ) में वायुतत्व अधिक होनेसे स्निग्ध और उ- अन्य दोषोंकी अपेक्षा यह रुधिर श्रेष्ठहै । दोषोंके गुणोंका विचारकर उक्त नाडीके लक्षणोंसें मिलाकर अपनी बुद्धिसैं कल्पना करै। जो नाडी दीर्घ और स्थूलहो उसको गरमतर गुणविशिष्ट होनेसे और जो नाडी दीर्घ तथा पतली होवे उसमें गरम और होने से पित्तकी जाननी जो हस्व और मोटीहो वुह शरद और तर होनेसे कफकी जाननी और जो नाडी -हस्व और पतली होवे और खुष्क गणहोनेसे वातकी नाडी जाननी चाहिये। . इम्बसातके भेद (दीर्घाकारः) अरीज (स्थूलाकार) | उयक (बहिर्गत्याकार) ! मुखफिज मुअदिल . 게 कंसीर. "तवील दीर्घ अरीज ज्येयकवा जीक मुदिल समान (कृ) सुशरिफ उमक 'बहिर्गत রর समान मोर पार गुलस न्यून हो तो की शरीक लांग वाली जाननी ' जो नाली पहुचेस भुजाके प्रति बार अंगुलसे अधिक लंगी प्रतीतहो अर्थात् परी पुरुपक शादी माममा । यो मरमीके लक्षण वाली जाननी । यार नाही तर्जनी उगलीम लेकर कनिष्ठिका पर्यत स्थूल प्रतीत होवे रुधिर और कफमें जो नाटी पतली प्रतीतहोने उस्को रक्ष अर्थान खुष्क कहतेहै । जैसे जो नादो न स्थानही न कहा कि समानहो उसमें तरी ठी- की नारी भयंत पडलकर पलपूर्वक उंगलियों को स्पर्शको उममें गर• पेस. और बात कोपर्म होती है। ster शिश्यता प्रतीत होता है। वो तर अर्थात् की कोताह जी नादी इसमें फाउंची उठे अति धार उंगलियों को स्पर्शकरे उसम रात यूनता प्रतीत होती ! कितु शग्दीको धौतन वरतीहै । जो मारीन गटुत उभरी हुई हो ने बहुत पिलंफुल देवी हुई हो जितु मानली इममें गरमी टीक होता है ।

सपल दुल (५६) समता मोतदिल रापल नाडीका - नाकावि- रणहोना -- dan पती माअदिल मृद्ध फठिण - आकृति FM तीतो प्रमाणको हकीम लोग कुतर कहते हैं । प्रत्येक प्रस्तार के नोनी भेद होनह पाव चाटार और महाल मामा माग गरम पार उनी गरे तो इपकी प्रबलना जाने । शीघ्रसारिणी itra Nो पी एवंरता न नी । मदनारी Viratीनतमन अलीने तिमी ममताको प्रगट करती है। नाश गमनारामापी fat दौतन काताई। ममता RETART TM मा आमिता गातन पाई। मदचारी "मानको नासदीरमीरी समानता र रती। hant TRAIनिरहों, इमे पासीम रीन फहो । भी पानी उमा शासीन मत्त हो। IPRIT पापा TET नम दो मादिल जाना । मोमदिर मारहार भी मामा दुई जानना प्रगया जीवन परिण जानना । मुमतिला भी को मार मोरा र धीर मदनानना। पाली भानाTAमामना कोई। इसमें मार टीक हाताई। मोदित Fran fiदो तारमी सानना । HTTREETरो तापिर माईका भाधिकरता जाने । [HTTTTTTTAन HTको सम पर है। मोअहिल कर ३५ रहा जो गेमधी। .... TITI पर नारे भार टहा सपने वो अमाह। इख्तिाप गोपटान TXIIर दस रि रगे दमश्री यज जानना । मोभदिल Patifनीन पगार यो निरमाननी। मुनपातर जोना ATTREET THIसान का। मुनपात war RIPTEM उमको मात्र स्पिदिनी मानी। मधिपूर्ण स्वल्पपिर प्रमाण अन्यचक्र नाडीदर्पणः। - समता -- - -- शीत स्पर्म TI -- MA सम पूर्वसदृश विपरीत INDIAN समता Marpur Paudel Pantat धर्य समता साकरोति या साऽपरोक्षाठिस्पशेव पश्यतः ॥२॥ ऐग्लंडीयमतानुसारनाडीपरीक्षा। (५७) एकत्र करो अर्थाद प्रस्तार करो तो दोमस्तार२७ है जैसे आगेके दोनों चक्रोमें लिखे हैं दोनों प्रस्तार कि तीनप्रकारके लंबावको तीन प्रकारोंकी चौडाईके नो होवेगे, इसीपकार लंबाई और गहराइयोंको तथा चौ- तीन तीन प्रकारोंके साथ मिलानेसैं नो नो भेद ह्येते सत्ताईस सत्ताईस भेद होते है इसका उदाहरण आगे च- इस गुणनको फारसीवाले सनाई कहते है। नाडीनां प्रस्तारचक्रमू (द्विगुण) • सलासी (त्रिगुण) द द her य क य hoy व स य क स अं य hy H to tw E द य स है द का क अं य ह क य अं य य पाय काक अंीय व य य य स अं य य में अं य य य य य स य य य स य य स अं क न य क अं , य ग दोनों चकोमें जो अक्षर है उनमें द मैं दीर्ष, ह से हस्व, और य से समान जानना । उसीप्रकार स से स्थूल, क से कश, व मैं ब- से अंतरगतकी समस्या जानलेनी चाहिये। श्रीहन्निघटुरत्नाकरे नाडीदर्पणे यूनानीमतानुसारं नाडीपरीक्षणं तरंग: PULSE EXAMIN. अथेंग्लंडीयमतेन नाडीपरीक्षा नारी पल्सेति शन्दिता॥ तस्याः परोक्षापरी- विविधा गतिः॥१॥ष्यालसंस्पर्श परोक्षान.क- (५८) नाहीदर्पणे। अर्थ-इंग्लंड अर्थात् अंगरेजीमें नाडीको पल्स Pulse कहते है वह दो प्रकारकी है एक परोक्ष और दूसरी अपरोक्ष तहां जो नाडी देखनेवालेकी ऊंगलियोंका स्पर्श न करे वह परोक्ष कहानी है और जो उंगलियोंका सर्श करे वो अपरोक्ष अर्थात् प्रत्यक्ष नाडी कहाती है। उत्थानापेक्षया पुंस आसने तदपेक्षया ॥शयने नाडिकावेगो म- न्दी भवति नानृतम् ॥३॥ सायंतनादि समयात्प्रातःकालेऽधि- कागतेः॥ वेगसंख्या भवेन्निद्राकाले न्हासं च गच्छति ॥४॥ अर्थ-खडे होनेकी अपेक्षा ( वनिसवत ) बैठनमें और बैठनेकी अपेक्षा सोनेमें नाडीकी गति घटजाती है । उसीप्रकार सायंकालकी अपेक्षाप्रातःका- लमें नाडीकी गति बढजाती है। और निद्रामें नाडीकी संख्या वटजाती है। भोजनस्याथ समये वेगसंख्या विवर्द्धते|अहिफेनसुरादीनामु- प्णानां यदि भोजनम् ॥५॥ बुभुक्षावसरेनाडीगतेदेंगो ह- सत्यलम् ॥ एपा नाडीगतेबैगचर्या सामान्यतो मता ॥६॥ अर्थ-यदि अफीम मद्य आदि गरमवस्तु साय तो उस गरम भोजनके का- रण नाडौंकी संख्या बढजाती है, और अत्यंत शीतलवस्तू खानेसे नाडीकी सं- ख्या न्यून हो जाती है, यह अथांशसे जाना जाता है। उसीपकार भोजनके समय नाडीका वेग मंद होजाताहै, यह नाडीकी सामान्य गति संख्या कहींहै। नाडीकी व्यवस्था जाननेके लिये वैद्यको प्रथम इतनी वस्तुओंका जान- ना अति आवश्यक है। जैसे प्रथम नाडी देखने की विधि दूसरे आरोग्यार- स्थाकी नाडी, तीसरे रोगावस्थाकी नाडी और चतुर्थ नाही देखने का यंत्र । १ नाडीदेखनेकी विधि-नाडी देखनेके जो नियम वैद्योंने निश्चित कर रक्खे है, यदि उनके अनुसार न देखी जावे तो हम जानते है कि नाटीकाय. थार्थ ज्ञान होना अति असंभव है। अतएव अब उन नियमांको वर्णन करते है। प्रथम-वैद्य या रोगी कहीसें चलकर आया हो तो उचित है कि बीदर विभाम लेकर फिर नाही देखे या दिखावे, तथा परिश्रमकी छटे-धैर्यरहित पुरुषोंकी या अत्यंत उसोककी नाडी देस तो उनका . ऐंग्लंडीयमतानुसारनाडीपरीक्षा। (५९) समयनी नाडी न देखे ऐसे समयकी नाडी विश्वास बिठलाकर या लिटाकर यदि कोई आवश्यकता होय तो रेडिअल आर्टरी Radial Artery. (जो पहुचेमें अंगुठेकी भीतर है) उसपर बराबर तीन उंगली रखकर नाडी देखना, पहुचेकी देखना असंभव होय तो अन्यान्य स्थानकी देखे, जैसे रोगमें कनपटीकी नाडी, तथा गठियामें पहुचेपर पट्टी बंधीहो हाथ कटगए हो तो प्रगंड ( बाजू ) की नाडी देखे, और कभी नीचे भीतरकी तरफ पोस्टीरिअर टीवीअल Posteriar नाडीको देखते हैं। वैवको रोगीके दोनों हाथोंकी नाडी देखनी चाहिये, इसका यह : कि ऐसा देखा गया है, कि एक ओरकी नाडी दूसरी नाडीसे बड़ी । और यहभी स्मरण रखना कि दहने हाथकी वामहाथमैं और हाथकी दहने हाथसे नाडी देखे इसमें सरलता रहती है। नाडी दहने हाथकी अपेक्षा वामझथको उत्तमरीतिलै वि- है इससे प्रतीत होता है कि स्त्रियोंकी वाए हाथकी नाडी कुछ ब- । हिंदुस्थानी वैद्य जो स्त्रीके वामकरकी नाडी देखते हैं कदाचि- यही कारण न होग। १. सन्दन संख्या अर्थात् शीघगति और मंदगति जान- पश्चात् उसके बलाबल जाननेको कुछ दवाकर फिर ढीली छोडदेवे, यह प्रतीत होजावे कि नाडी दबानेसे कितनी दबती है । परन्तु इतनी बावे कि जिस्सै रुधिरका भ्रमण बन्द हो जाये, केवल इतनी दावे कि नाडीकी तरफ प्रतीत होती रहे। पालापमें लनाप केगे, इसका यह कारण है कि ऐसे मनुष्यों तु.

(६०) नाडीदर्पणे । च्छकारणसे हृदयकी सटक न्यून हो जाती है । अतएव नाडीका वृत्तान्त ठीक ठीक निश्चय नहीं होता। अब कहते है कि रुदन करनेसें और मचलनेसै चालकोंके पहुचेकी ना- डीका देखना कठिन है। इसवास्ते उनको गोदी में बैठाल खिलौने आदिका लोभ देके उनके छातीपर कान लगाकर हृदयकी धडधडाटका निश्चय करना । य- दि नाडीकाही देखना जरूरी होवे तो निद्रा अवस्थामें देखनी चाहिये। सातमे-नाडी देखने के समय यहभी अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि नाडीपर किसी प्रकारका दवार नहो जैमें बंध अथवा तंगी, या रसौली, या पोटू आदिका सहारा नहोवे । क्षणिक और मानसिक रोगोंमें अनेक वार नाडी देखनी चाहिये कि जिस्सै रोग भलेप्रकार समझमें आयजावे । आरोग्यावस्थाकी नाही मध्यम श्रेणीके युवापुरुपोंकी नाही आरोग्यावस्थामें साथ प्रबंधके कुछ दखने वालीओर कुछ भरीहुई होतीहै।परंतु चिन्ह भेद और अवस्था तथा स्वभावा- दिभेदसें नाडीमें अंतर होजाताहै, और बालिकाओंकी नाडी पुरुषोंकी अपेक्षा कुछ छोटी होतीहै । और शीघचारिणी होताहै।दंभी प्रकृतिवालोंकी नाडी भरीहुई कठोर, और शीघ्रगामिनी होतीहै । कोमल स्वभाववाले मनुष्योंकी नाडी धीरे धीरे चलेहै, और नम्र होती है । वृद्धावस्था में कठोर होतीहै । नाडीकी स्पन्दनसंख्या (जिनका निश्चय करना नाडीकी और अव- स्थाओंसे सुगमहै ) सदैव हत्पदके संकुचित खटकेके समान होतीहै । इसे कदापि अधिक नहीं होती, परंतु अपस्मारआदि चित्तके रोग और मृ» आदिमें एक दो गति न्यून हो जाता है । छोटे बालककी नाडीकी गति अधिक होती है, फिर जैसे जैसे अवस्था की वृद्धि होताहे उसी प्रकार क्रमसें नाडीकी सन्दन संस्था न्यून होती जाताहै। परंतु वृद्धावस्था में फिर कुछ बढ़ती है।

गति संस्थाके सिवाय नागमें चान्त निक्षय होताई, उसको भामे कहते है। (६१). अवस्था १४० . से तो उसप्राणीके मस्तकमें किसीप्रकारके विनर्स सक्का या पक्षाघात हो- ऐंग्लंडीयमतानुसारनाडीपरीक्षा। 1. अवस्थानुसारनाडीकीगति इस चक्रमें जो नाडीकी संख्या है वह आरोग्य पुरुषके लिये ठीकहै। परंतु रोगावस्थामें न्यूनाधिक होजा- सद्यःप्रसूद बालककी तीहै । यदि नैरोग्य पुरुषकी नाडीकी इधर्मानेवाले बालककी गति १ मिन्टमें ७२ वार हो और ५ वर्षसे ६ वर्ष तकके बालककी । श्रीकी ८२ वार होय तो ठीक जा- १५ वर्षतकवाले नवयुवावस्थामें / ननी, श्रीकी २० गति पुरुषसे सदैव ३५ वर्षतक अर्थात् युवावस्था में अधिक होतीहै । और गर्मी, सूजन, ३५ वर्षसे लेकर ५० वर्ष वालोको ज्वर, अतिदुर्बलता, जागना, प्लेथोरा- अर्याद वृद्धावस्था के प्रथमदर्जासे लान् रुधिर. क्रोध, अतिवृन्दावस्या जोस आदिमें ७०या अस्सीसें १०० १२० वरंच २०० तक नाडीकी गति संख्या प्रत्येक मिटमें हो एवं शरदी आलस्य, निद्रा, कुछथकावट, क्षुधामें, हवाके दबावमें, इत्यादि कारणोंसे नाडीकी गति ऐसी न्यून होजातीहै, कि प्र- मिनटमें ६०, या ३५ तकही रहजाती है । रोगावस्थाकी नाडी रोमावस्थामें गाडीकी गति संस्था और अन्य अन्य लक्षणोंमें विशेष मतर होताहै जैसे आगे लिखतेहै । ज्वर, प्रदर, वमन, विरेचन, वुहरान्, इत्यादि रोगोंमें नाडी इतनी शीघ्र चलतीहै कि गणना करना कठिन होजाताहै यदि ज्वरावस्थायें अकस्माद • मंदपहजावे तथा उसके साथ अन्य अशुभ लक्षणोंकी आधिक्यता 1 रोगीके मरनेका भप रहताहै।

(६२) नाडीदर्पणे। नाडीकीइंग्रेजीसंज्ञा आनन्दादितरावस्थास्वानंदापेक्षया गतेः॥ वेगसंख्या वर्द्धते सा नाडी फ्रीकेंटशब्दिता॥१॥ अर्थ-आनंदकी अपेक्षा जिस नाडीकी संख्या अधिक वेगवान् हो उ. सकी इंग्रेजीमें Frequent फोकैंट कहतेहै । आनन्दादितरावस्थास्वानन्दापेक्षया गतः ॥ वेगसंख्या हसति सा नाडीन्फ्रीकेंटशब्दिता ॥२॥ अर्थ-जिस नाडीमें,आनन्दकी अपेक्षा स्पन्दन संख्या न्यून होय उस- मंदचारिणी नाडीको इंग्रेजीमें Infrequent इन्फ्रीकेंट कहतेहै। ' चिरकालधृतायां च नाध्यां संख्या न पड़ते ॥ न वा हसति वेगस्य सा च रेग्यूलराभिधा ॥३॥ अर्थ-जिस नाडीपर यहुतदेरीतक हाथधरनेपरमी कुछ न्यूनाधिक्स प्रतीत न होय उस नाडीको इंग्रेजीमें Regular रेग्यूलर कहतेहै । चिरकालधृतायाञ्च नाड्यां संख्या विवर्द्धते ॥ मन्दी भवति चावस्था सेंरेग्यूलरशब्दिता॥४॥ अर्थ-जो नाडी-बहुतदेरी हाथरसनेसे कुछ न्यूनाधिक्य प्रतीतहोय यस अवस्थाको डाक्टरलोग Irregular इरेग्यूलर कहतेहै । सकृदङ्गलिसंस्पर्शादन्तर्धानन्तु गच्छति ॥ इन्टरमिटेंटाभिधा साऽमृकफाशयपिणी ॥५॥ अर्थ-जो नाडी एकपार उँगलियोंका सर्गवर छिपजावे, वह रुधिर और कफारायको दृपितकनां हृदयसंबंरी व्याधिको उत्सनकरे इसको रंगलंडीय वैद्य Intermittent इन्टरमिंटेंट कहतेहैं । यदा रक्तेन पूर्णत्वमापना नाडिका भवेत् ॥ तदा फुल् शन्दविख्याताथवा लार्जेति विश्रुता॥६॥ अर्थ-जिस समय नाडी रुधिरम परिपूर्ण होनहि उसको गटातो फुस् मा Full Large लाज ऐना कहते हैं । * किंतु एकवारही जल्दीकरे उस तूर्णनाडीको नाडीको इंग्लैंडीप वैव यस्या मन्दगतिर्या च नाडी पूर्णा भवेत्तु सा॥ स्लोशन्दशन्दिता ज्ञेया रक्तकोपप्रकाशिनी ॥ १२॥ अर्थ-जो माडी मंदगतिहो और परिपूर्ण वह रुधिरकोपके प्रकार क- नाडीको इंग्लैंडीय वैद्य Slow स्लो कहते है । ऐंग्लैडीयुमतानुसारनाडीपरीक्षा। (६३) यस्यां हत्कमलोच्छासादक्तमल्पं वहेत्तु सा॥ रिक्तानाडों स्मॉलसंज्ञा समाख्यातांग्लभाषया ॥७॥ समय हृदयसै रुधिर अल्प प्रगटहोय उस रिक्तनाडीको पाश्चिमात्य Egual स्माल ऐसा कहतेहै । या वे गुणवदातन्वी नाडी क्षीणत्वशंसिनी ॥ रक्ताऽक्ततां द्योतयन्ती सा थ्रेडीपल्ससंज्ञिता ॥ ८॥ . प्रये-जो नाडी डोरेके माफिक बहुतबारीक प्रतीत होय वह क्षीणता रककी अल्पताको प्रकाश करनेवालीको Thready Pulse. कहतेहै । अंगुलीभिर्यदा नाडी पीडितापि न नम्रताम् ॥ व्रजेत्तदातिरूक्षत्वद्योतिनी हार्डशब्दिता ॥९॥ नाही उँगलियोंके पीडनसैंभी अर्थाद दाबनेसैनी नम्र नहोवे द्योतनकरता नाडीको डाक्टरजन Hard हार्ड ऐसा कहतेहै। अंगुलीभिर्यदा नाडी पीडिता नम्रतां व्रजेत् ॥ साईत्वद्योतिनी मृद्वी सॉफ्टशब्देन शब्दिता ॥१०॥ नाडी उंगलियोंके दबानेसे दबंजावे उस मृदुनाडीको साफूट कहतेहै यह आईत्वको द्योतन करतीहै । प्रतिस्पन्दं शीघ्रता संख्या यस्या न वर्धते ॥ सकृच्छ्रुध्यधरा तूर्णगा नाडी की शन्दिता ॥११॥ नाडीमेंकी प्रत्येक तडफ शीघभी होय परंतु स्पन्दन संख्या की ऐसा कहतेहै यह निर्वलताको द्योतन करतीहै।

नाडीदर्पणे। A (६४) खूनकी गतिके कारण नाडीके अनेक भेद है जैसें आर्योटा Poorta Water Hamr वाटरहेमर Bounding बौडिंग Lavauering लेवरिंग ThrilingPulse थ्रिलिंग पल्स Redoubled रिडवल्ड Dierratores या डाईक्रटोर्स और इसीटेटआदिहै । जो लहरके समान उंगलियोंको लगकर हटजावे उसको जर्किंग अर्थात् झटकेदार नाडी कहते हैं। किवारोंकी रिगडके माफिक आर्योटा होती है । उछल- नेवाली नाडीको बौडिंग कहते हैं, जो नाडी काँपती हो उसको शिलिंगा- ल्स कहते है । इसीप्रकार अन्यसब नाडियोंकी गतिको बुद्धिवान् डाक्ट- रद्वारा और उनके ग्रंथोंसे जाननी इसजगे ग्रंथविस्तारके भयसे नहीं लिखी। नाडीदर्शक यंत्र नाडी देखने के लिये अंग्रेजी डाक्टरोंने एक यंत्र निर्माण करा है उसको अंग्रेजी बोलीमें स्फिग्मोग्राफ Sphygmograph कहते हैं । इसमें अनेक दुकडे होते हैं विना दृष्टिगोचर उनका समझना मुसकिल् है इसलिये उस यंत्रकी तसवीर जो इस नाडीदर्पणपंथके पिछाडी उसे समझना उसके आवश्यक विनागोंका कुछ इसजगे वर्णन करते है। अ-पटलीके चलाने और रोकनेका खूटी। क-ताली लगानेकी कमानी। च- नाडीके का आधिक दवाव करनेका गोलाकार चकविशेष । ट-कजलसे रंजित कागज धरनेकी जगह । त-चिन्हित होने के पश्चात् जो कागज निकलना है। प-जिनसे कागजपर चिन्ह होते है वो मुई। इस यंत्रके लगानेके यह विधि है कि गव होनीदांतवाले स्थानको रेडि. पलपर धरकर यंत्रको काममें लाते हैं नो नाडीची तडफ कमानीको समना जिसके द्वारा सदमें कागदपर लहरदार रेखा प्रगट होनाहा कि जिसने हरपके म. २. AD सूचक संस्कृतनाम /इग्रेजीअक्षरोमें नाडीके नाम इंग्रेजी नाम नाहीयोंकी व्यवस्था हृदयके सटकाके संख्यानुसार नांदी दोपकारकीहै पहली फ्रीक्वेन्ट इसमे आरोग्य अवस्थाकी अपेक्षा गति शीघ्रचारि Friquent संख्या अधिक होतीहै। दूसरी इनफर्किट इसकी दशा फीटसे विपरीत होतीहै यह स्त्रियोंके वातगुल्म रोगमे होतीहै । मंदगामिनी Iafriquent इफ्रिकेट हृदयकी गति के प्रबंधानुमार भी नाडीकी दौअवस्था पाई जातीहै एकरेग्यूलर, नोडीनमे क्रमानुसार रुधिरजाने- सावधानता Regulars रेग्यूलर्स वाली नारीको रेग्यूलर कहते है इसपरहाथ रखनसें गति.एकसी मालूमहो और कभीवीचमे अंतर नहीं पड़ता। दूसरी दरोग्यूलर अर्थात नाहीन्मे जमके विपरीतं रुधिर जोय इस परहाथ रखनेसै गति एकसी प्रतीत असावधानता Irregulars दररेग्यूलर्स नहीं होती और वीचमें अंतर पड जाताहै रोगावस्था में नाडीका सप्रयंधित अर्थात् क्रमपूर्वफ चलना अच्छाहै। सूचक जिम नादीके तदफ होने में जितना काल आताई उस्से अधिक होजाय अर्थात् दूसरी गतिकाभी काल- व्यतीत होजावे उसको इंटरमिट कहतेई पातु गतिके भेदसे यह दोप्रकारकीडै एक रेग्युलर इन्टमिटेट सांतरिक Intermittent इंटरमिटेंट और मारी इरेग्यूलर इन्टमीटेंट है। मस्तकके मूजनेमें अन्यकारणोर्स नाहीमे अधिक रुधिर पहुचे और उंगलियोके नाचे नाडीका उत्प्लवन अधि परिपूर्ण Full या Large फुल या लाज क प्रचीतहो तो उसनादीको मुल या लार्ज कहतेहै यह अधिक काघिर वृद्धिमें अथवा कठोररोगोमें प्रतीत होतीहै।। जो नाही फुल लार्ज के विपरीतहो अर्थात् नादीयोंमें अल्प रुघिर पहुचे और नाडीका उत्प्लवन उगलियो- रिक्त Esmal को गोहा प्रतीतहो उसनाडीको स्माल अर्थात् पारीक नाही कहते है । जब नाही अत्यंत सूक्ष्मसूतके समानहो तो उसको इंप्रेजीमें अंडीपल्स कहते हैं यह रुधिरकी न्यूनावस्था Threadypulse - घेडीपट्स सूक्ष्मतर अथवा दुर्वलतामें देखी जाती है। नाहीशी दिवारकी लचके तुल्यनाडीको दोगति होतीहै एक हार्ड अर्थात् कठोर इसे किंचिन्मात्र भी ६० कठिन llard हाई गानेसे उंगलियोंको कठोरता प्रतीत होतीहै यह नाडीकी अधिक लवकके कारण होतीहै। द्वितीय सास्ट या नत्र जिसकी दशा हाई नाडीके विपरीत होतीहै यह नाडीके अनुरोध ( नाडीकीदि- गार) की लपासे भीर देदके निर्यलतामें पाई जाती है। मृदु . Soft साफ्ट, नायकी गातिमें जो समय व्यतीत होता है उसके अनुसार नाही द्विविध होतीहै एक वीर अर्थात् शीघ्र शीघ्रगामिनी quiek गणी नाडीकी प्रत्येक गति शीघ्रहो परंतु एक अथवा मानसिक रोगोमें जिनमें स्तभाव दुष्टहो उन में पाईजातीहै । नाडीके विपरीतहो अर्थात् सुस्तहोउसको स्लो नाडी कहते है । धीरगामिनी Slow स्लो अथ डाक्टरीमतानुसार नाडीचक्रम् ऐग्लैंडीयमतानुसारनाढीपरिक्षा। 0 6 की (६५) १२ नाढीदर्पणे । घढनेका हाल और रधिर चमणका वृत्तान्त उत्तम रातिसे प्रतीत होता है। प्रत्येक लहरमें एक रेखा उठनेकी होतीहै फिर मुडनेकी और फिर उतरनेकी तथा उरतनेकी लहरमें दो लहर प्रगट होतीहै इन लहरोकामी चिन्ह स्फि ग्मोग्राफ यंत्रमें लिखाहै। खरोरेसा हृदयके संकोच होनेसें होती है और मुरडनेका कोना नाडियोंके किसीमकार संकोचसैं होताहै और जिससमय हृदयके संकोचसै रुधिर अ. यार्समें पहुचताहै तो पहली रेखा प्रगट होतीहै फिर अया के किवाड बंद- होनेसे दूसरी लहर सांचेतक वनतीहै अया के सुकडनेके पीछे रुधिर आ- गेको घढजाताहै और दूसरी लहर परिपूर्ण होकर एकवार हृदयके खट- केकी चिन्हितरेखा संपूर्ण होजातीहै । इति नाडीदर्पणे ऐंग्लैंडीयनाढीपरीक्षावर्णनं नाम पञ्चमावलोकः । इति श्रीमाथुररुप्णलालपुत्रदत्नरामेण सङ्कलिते आयुर्वेदोद्धारे वृहनि- घण्टुरलाकरान्तर्गत नाडीदर्पणे एंग्लेंडीयनाडीपरीक्षावर्णनं नाम पञ्चमावन्तो कश्चारत्रिंशस्तरङ्गः । ३८ ॥ समाप्तोऽयं नाडीदर्पणाख्यो ग्रंथः।। पुस्तक मिलनेका ठिकाना. खेमराज श्रीकृष्णदास. " श्रीवेंकटेश्वर " छापसाना (मुंबई)

Nadidarpan

Author
Shri Kirshan Das
Title
Nadidarpan
File name
Nadidarpan
Text
OCR done
Citation
1924
Published
2012/08
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
74
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405941
Barcode
99999990292963.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
U1C6cdYeIEy
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