Charan Sahitya Shodh Sansthan, Ajmer

Kartaviya Sahshtra

Pandit Narayan · 2010/06

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कतव्याकतन्य शास्त।
मुजफ्फरपुर निवासी
पण्डित नारायण पांड़े वी० ए०
द्वारा
अगरेजी ग्रन्थों की सहायता
से लिखित
और
काशी नागरीप्रचारिणी सभा
द्वारा प्रकाशित
वनारस
परिमका यन्त्रालय में मुट्रि

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कर्तव्याकर्तव्य-शास्त्र । प्रस्तावना। - । । मन में यह एक साधारण प्रहत्ति टेखो जाती है कि एक मनुष्य दृमरे के कर्म की प्रशंमा वा निन्दा किया करता है। यह प्रहक्ति मनुष्य को सभी अवस्था में देखी जाती है। दिहात कहानियों में. क्मिो जीवनचरित में प्रथवा किसी उपन्या सादिक मे लोगों का जी मो कारण से लगता है कि उनी एक वर्म को प्रशमा और दूसरे की निन्दा रहतो है । प्राईन दे प्रभुत्व और धर्म वी सर्वोपरि गति में भी यही प्रहत्ति देख जाती हैं। इस प्रक्ति का कारण यह है कि इस संसार में एक मनुष्य दूसरे से उत्तम या नोच, और एक कर्म दूसरे से अधिक प्रशासनीय या निन्दनीय सदा देख पहता है। यद्यपि सभी एम बात को मानते हैं कि मनुप जिस प्रकार से जोवन व्यतीत करते है और जिस प्रकार से उसे करना उचित है-इन दोनो में प्रवन्य बु.ट मैद६. तो भी किस परिमाण से रहना पारिदे-पसवा पता नही गति और यह भी नही खोजत कि उन जी में इस प्रशसा नीर निन्दा का भाव को उत्पन्न होता है पर जी बुद्ध जो में एकाएक प्राजाता है उसोसे | सन्तुर हो जाते है । लेगी 2 इस प्रचलित निरय वा विचार को जारवर मनुष्य दे पान्तरिक रूभाव और संसार की बनावट मे उनका मूल स्थान निवालना "इतव्यात शास्त्र का मुख्य पभिप्राय है। सदस्दाचार सम्पन्दी बदनामो को पुट करना. सेटवरना गोर बम रखना. इस वयातच सम्बन्धी शास्त्र का जोर । --- r १२३ ) ( २ ) । ये कल्पनाएं मनुष्यों के स्वभाव और कार्य मे सम्बन्ध रखती हैं, जो स्वभाव और कार्य केवल अपने आन्तरिक उत्पत्तिस्थानही के नहीं वरं उन बाहरी वस्तुओ के भी पायित रहते है जिनके सम्बन्ध में वे कार्य किये जाते है । मनुष्य के प्रत्येक कर्तव्यकर्म भी अवश्यही उसकी अवस्या और नियमी के अनुमार होते है। किसो विपय में मनुष्य का यथोचित मार्ग तया उसके प्रति और सांसारिक भाग को ( अर्थात् जिस अवस्था में इस संसार में वह देवर से स्थापित किया गया है ) इन दोनों को विवेचना करके नियत करना चाहिये । अतएव यह स्पष्ट है कि कर्तव्या कर्तव्य-शास्त्र आन्तरिक जांच के बाहर अावे और यह निश्चय करे कि वे पदार्थ कौन हैं जिन के सामने मनुष्य सदा रहता है, फिर उनसे क्या सम्बन्ध रखता है, और उनके सग इसका कैसा बर्ताव है? 'संसार' और 'ईखर'-येही दोनों मनुष्य के चारो ओर सदा रहते हैं। 'संसार' से 'समग्र प्रत्यक्ष वा इन्द्रियगोचर दृग्वि- पय' समझना चाहिये, और 'ईश्वर' से 'निरन्तरस्यायो तत्व और कारण जिसकी मूलवस्तु (या सार) को वे प्रत्यक्ष दृग्विपय प्रकाश करते है। ये दोनों ऐसे सगी है कि जिनको कभी कोई छोड़ हो नहीं सकता, चाहे वह कितना ही अपने स्थान, समय और समाज को बदले क्योंकि उसके चलने के पथ और देखने के स्थान में वे भरे रहते है। वे क्या है और उससे क्या नाता रखते है ये दोनों प्रश्न इस बात के निचय करने मे भी अवश्य पाते है कि उसको कैसा होना चाहिये । अतएव चाहे इन में से किसी को पहिले उठाइये पर जांच तीनों ही की एक दूसरे के सम्बन्ध में करनी होगी। परन्तु इस से बड़ा भारी भेद हो जाता है । यदि आप पहिले ससार और ईश्वर ही की खोज से प्रारम्भ करें तो इनके बारे में जैसा अनुभव होगा ( १२४ ) उमीको दिवानयोग्य मानकान में उमो मग प्राप मनुष्य के मन में यात्रा भी करेंगे। पर, यदि आप पहिते मनुष्य ३ मनमे प्रारम्भ करें तो इस भाव में कि यह अधिक जानता है, आप उनके बारे में प्रामा या मन) को कहो! हुई बातो दा विवाम गे और न कि बाला के बारे में उन को क्हो हुई वान का । मेट यह कि जद "प्रात्मानुभव" को नुय देवबागो मानते है तो एक को दृमरे में बटकर मानने । को एक बच्चन्द योग्यता (दा शहि ) का मनुप्पों में विश्वास होता है और वह हर बन्नों के गठन ढांचा मे भी देखी जाती है । पर जब बाहरी हो गुमो मे पनि जिजामा करते है तो ऐमो शहि को जानने का वोई, पायही नहीं मिलता वरच । यह सभी वन मे यावश्य वोय परिणाम वा प्रवाह (या परंपरा) दिखन्नाकर मानुषिक प्रामा भी मो रीति वा प्रकाशन मसमान दो हमलोगो के चित्त दो लोभाता है। पहिले में, "प्रति जगत को पचा- विषयक यहि.और दूसरे में "पूना को प्राकृतिक युक्ति " पाई जाती है। यह बातव्य शान दोनोरी पर नए कर सकता है चाहे सदमदाचार सम्मकी-बोध में निरन्धर जगत को इल्पना ( या क्रम । में जाय, चार जगत ६ बम से निकल कर सदसदाचारसम्बन्धी वोधने पहुंचे । परिला बम "बालिक मोर दूसरा "धन- धानिक" वरा जायगा। एस एलब पहिलेहोबा व्याख्यान लिखा गया ६. दोषियही हमार्ग पोर इसीसे यहार्यता का पानी बताई। - - .

( ४ ) अवाध्योपक्रम। इस सटसहिचार शास्त्र का मुख्य विषय 'कल' (या 'ख- धर्म') है, अर्थात् भार निर्बन्ध वा कोई विषय जो कि अवश्य होना चाहिये। अब इस भार वा निर्बन्ध का आरोपण करने वाला या देने वाला भी कोई चाहिये और वह अवश्यही हम लोगों से उत्कृष्ट होगा, क्योकि जो येट वा ऊंचा न होगा वह हमलोगों पर 'भार' नहीं रख सकता है। और आत्मा का एक प्रश दूसरे पर 'भार' दे यह कहना भी अयुक्त है। प्रत एव निज से परे कोई जीव अवश्य होना चाहिये जो 'भार' आरोपण करसके। कर्तव्याकर्तव्य विचारों में यह 'भार' प्रारोपण करनेवाला जीव 'ईखर' है तब इस दृष्टि से अध्यात्मिकमार्ग या क्रम को मूल वा सार वस्तु क्या है ? (१) आत्म-बोध होना सम्भव है अर्थात् आत्म-बोध साव्य है, और इस नीति में ओर २ ज्ञानो का यह प्रात्म--ज्ञान अग्रसर है अर्थात् मनुष्य पहिले अपने को जान लेता है तब दूसरे मनुष्य का अान्तरिक भाव जान सकता है । (२) निज के अतिरिक्त और विषयो' को भी प्राटमी प्रात्म--बोध के सहारे जान लेता है। आन्तरिक ज्ञान के साथ २ बाहरी वस्तुओ का भी सत्य २ ज्ञान होता है । इन दोनों अवाध्योपक्रमों से यह सिद्ध है कि अध्यात्मिक क्रम (क) आत्म-चिता से प्रारम्भ होता है और (ख) प्रत्येक वस्तु सम्बन्धी मानी हुई बात को जो अामानुभाव बाहरी वस्तुयों के बारे में कहता है, सच मानता है । जपर वाले दोनो भवाध्योपक्रमो को समझने के लिये और भी मुनिये। ( १२६ ) ( ५ ) (१) प्राम-बोध होना अवश्य मम्भव है, क्योंकि यह प्रति- दिन देखा जाता है कि मनुष्य अपने विचार, अनुभव और अभिप्रायों को करता रहता है तब तमन्नोग केमे कह सकते है कि इनको वह नहीं जानता और नय यह माननिया कि एन को जानता है तो अवश्य ही बाहरी वन्नों में इनका जान नही होता है. अपने अभिप्राय विचार इत्यादि को प्राग्नु में देख कर वा त्वचा से स्पर्श करके नहीं जान मकता है पर ध्यानरूपो प्रान्तरिक दृष्टि से अवलोकन करता है । अब विचा- रिये ऽम ज्ञानचन्नु से जानी दुई प्रान्तरिकभाव विषयक वाते क्या मच नहीं है। पया यह सत्य नहीं है कि न्नता का बोध मेघ गर्जन से भिन्न है और दिवोगा क्षेत्रो की तुलना वर प्रार्थना की लान्तमा से भिन्द्र है और यदि ये बात मच तो वया उनको विचारने घोर भिन्न २ मानमिक कर्मी को काम से रखने में कुछ फल नहीं १ मानसिक विपयों का क्रम अवश्य कोई हो होगा। (२) दूसरा प्रवाध्योपक्रम - मलोग अध्यात्म विद्या से निज के प्रतिरह पीर विषयो को मो जानते है पर इसका सिड करना वा स्पिर रखना पहिले परल बठिन देख पड़ता है। रम व.ठिनता की असल जह यह प्रमाणयतिरिकरहोतपक्ष है कि “वैवल सारी सदृश से जाना जा सकता है" विचार विचारती वरने से पोर पाल -ज्योति पाल-जुही से जानी जा सकती है। इसी पनुसार यह कहा जाता है कि अपने पन्तों से एम लोग वेपन्न प्रपनो भावनायो को जानसक्ने पोर बु.ट नहीं । पद स पक्ष को पमत दिखाने के • लिये मघा विरोधी पक्ष भी दिला देना दट होगा। वह या दि. "लो दाना जाता रह नकारही जानने वाले के असहस होई पद होतो । पाए टि नहीं देखती है ( १२० - ( ६ ) पर ज्योति देखती है; मन को जो वस्तु मोचने के लिये दो नाती है उसकी अपेक्षा वह अपने आकारों को कम सेचता है और आन्तरिक विषय को अवलोकन करने में भी मन अवलोकनीय विषय से अलगही खडा रहता है और टोनी मे स्थान और काल का भेट तो कुछ अवश्यही रहता है। मन सम्बन्धी और वस्तु सम्बन्धी जान अन्योन्यायित हैं और अवश्यही सग २ चलते है, एक के नष्ट होने पर दूसरा भी लुप्त हो जाता है। यह धो विश्वास इस स्वयंसिद्ध परिभाषा पर स्थिर है कि हम लोगो को अपने मन वा शरीर की शक्तियों के तात्कालिक निवेदन (वा व्याख्या) को अवश्य सच मानना चाहिये, और कि वे अवास्योपक्रम जिनके बिना मन कार्य करहो नहीं सकता यथार्थ है अर्थात् निरन्तर विश्वासनीय है ॥ यदि मन वा शरीर की एक शक्ति दूसरी शक्ति के विरुद्ध किसी विषय में साक्षो दे तो किसका कथन विखास योग्य है। यदि ससारी वस्तुओं का अवलोकन सभी में 'विना कारण अनुक्रम' ( एक के बाद दूसरे का होना) दिखलावे, और यदि सङ्कल्पशक्ति का प्रान्तरित व्यवहार सभों में बिना कारण टिस- लावे चाहे अनुक्रम हो या न हो, तो कौन मानने योग्य है। इसका उत्तर यह है कि "प्रत्येक (शक्ति ) अपनेही अधिकार ( वा मण्डल) में निर्देशक होय, और इसके प्राग नहीं अतएव "किसी (शक्ति) को दूसरे के राज्य के बारे में कुछ न्यायाधिकार या अभिज्ञान नहीं है" । सदसदाचार सम्बन्धी विषय चीखे, देखे, या सुने नहीं जा सकते है; और न चोग्वने, देखने और सुनने योग्य वस्तु सदसदाचार सम्बन्धी बोध वा शक्तियों से विचारी जा सकती है । 'मन वा शरीर की शक्तियों' से एकही व्यक्ति के भिन्न २ अधिकार ( वा कर्म ) समझने चाहिये । पर प्रत्येक कार्य का ( १२८ )

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( ० )
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काता व दिया ही नही वरन जोवाला है।
यको आमा 'कानती याममती ई.) यही प्रामा 'इच्छा
करतो या मान्य करती है और यही घाला 'अनभव
नाती है। हो तोन' मन को शानिया (या म) है। ये
प्राय' एक दुमा मग यी जाती है।
अधानिक मदमविचार मान्न भी दो प्रकार ना है (१)
विशेष अनामिका और (२) प्रतिकन-अध्यालिक । पहिले
कोपा अध्यात्मिक गेति और दूसरे को अमुद अध्यात्मिक
रोनि समझना चाहिये तब इस पुस्तक में प्रथम हो रीति
दी चाया।
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१.८
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विशेष ( वा शुद्ध ) अध्यात्मिक कर्तव्याकर्तव्य-शास्त्र । प्रथम अध्याय । । मूलक कर्तव्याकर्तव्य -विषयक तत्व । सदसदाचार सम्बन्धी अन्तर्वोध में मूल विषय या तत्व यही है कि सब जीवधारियों से 'मनुष्य ' * न्यारा होने के कारण उसमें सराहने और निन्दा करने, भले बुरे, वा उचित अनुचित, के विचारने वा निर्णय करने, की अटल वा अनिवारणीय प्रवृत्ति है । सराहनीय पुरुष में गुग्गोकर्ष और निन्दित मे गुणाभाव होते है । लोग सराहे पुरुप की आदर, मर्यादा, और निन्दित का अपमान, अनादर करते है। इस प्रकार का सोचना इतना व्यवहारिक है कि संसार की मुख्य २ भाषाओं में इस के जताने वाले सभी शब्द अभ्यास और व्यवहारद्योतक है, जैसे,ग्रीक भाषा में 'इथिक्म' (Ethics), जर्मन भाषा मे 'सिटेन' (Sitten), लैटिन में 'मारेल्म' (AIonals), फ्रेञ्च में 'मौरिस' (IMous) और पंगरेजी भाषा में 'मारेल्म' (Ionals), ये सभी शब्द अभ्याम वा व्यवहारद्योतक है। [ संस्कृत शब्द 'धर्म' ( = रोति, जाति व्यवहार) और 'न्याय' (== नीतिव्यवहार) भी इसी अभिप्राय के है मनुष्यजाति का यह व्यवहार अचानचक नहीं हो गया पर मनुष्य के प्राकृतिक स्वभावही के अनुसार यह व्यवहार प्रचलित है। * In-Lit the thinking amnal' IS maun-toot man to thul. मनुस्य = मनु+व मनु = मन+उ मन-बाध करना, मननकरना नात हाना ( १३० ) (८ -- . सन्न का मन किमी चना मर को प्रागेा करता तो 'कतंत्र धर्म वाहन प्रयोग करता 1 TET मना कि हमें ग - - सायनाना नान्।ि 'भार' का भी वही मानो वो दायिय में बाधा है. जो हमें प्रकार करना नान्।ि पने घर के भार का प्रातरित नमः श्रीमंग पर भार घागे वरना ये दोनो हो पोप्रति दो प्रकार (समानान्तर नीर सहयोगी ( मागे प्रब । न मे में कोई एक भी दमी के पहिने या पो नी सोना। इनवे. अन्नरवर्ती विपयों का विस्तारण । (६ । ममाचार - ममलो निर्णय (चा विचार ) व पाद । दमदाचार सम्पन्धी निर्गन पाद निर्यात दोन दिपय ६ जिनवा हमलोग इस रीति से निर्गय वा विचार विया वरत. (१) मनपोती की और न वि दापो थी हमलोग सरापन या निन्दा विया करते। यह बात जय पर है।। पर नटी. नारघर. नोक्षा प्रादि वम हिताहित-सान पानी । यदि इनको क्मो हराना वा निन्दा पर को उस पनीमो माला मानलेते है । रिमो घर धी मारना या विलीनीका की निन्दा वरना वन्त । हजारगर की निता को प्रशसा दा निन्दा करना है। जिमो को समर देवर सई बगाल को भी प्राव YE SPई हन्नने, नशा को मिलाण cཙྩ it : 1 སོ༑ ༑ པཎཙང་ ।

( १० )
हमलोग सब कार्य के 'आन्तरिक मृन वा कारण
र करते है और न कि उम के बाहरी व्यापार ( वा
का। कारण हो को ओर न कि कार्य की मराहना वा
होती है । इस पक्ष का मभो तत्वज्ञानी ममर्थन करते
मे से एक ने कहा है कि 'कार्य' को तोन अवस्थाए'
--(क) मनाभाव, जिममे इसकी उत्पति होती है, ( ख )
शारीरिक गति, जिममे यह देख पडता है, (ग ) परिणाम, जो
इममे निकलता है। इन तीनो मे मे प्रथम मटमटाचार - मम्बन्धी
निर्णय में मुख्य है। अभिप्राय [ मन को अवस्था ] ही बुरा या
भन्ना कहलाता है क्योंकि अभिप्राय को छोडकर केवल शारीरिक
गति मे कर्तव्याकर्तव्य - विचार कुछ नहीं है । वुरे परिणाम मे
यदि कर्ता का अभिप्राय अच्छा हो तो किसी कार्य को
बुरा
नही कह सकते है और अच्छे परिणाम से कोई कार्य अच्छा
भो नहीं हो सकता है यदि बुरे फल के अभिप्राय मे वह कार्य
किया गया हो । यदि किसी मनुष्य पर कोई जंगली जानवर
प्राक्रामण करे और उस समय मे उसका कोई मित्र उम जानवर
से बचाने की अभिप्राय से गोली चलावे, पर अभाग्यवश उस
पुरुष को वह गोली लग जाय तो वह कर्तव्याकर्तव्य - विचार
के अनुसार दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यदि किसी दास
के स्वामी की कठिन करता से दास-विक्रय उठा दिया जाय
तो उमको वह क्रूरता सराहनीय नहीं हो सकती । यदि किसी
कार्य के अभिप्राय को न जानकर प्रशसा वा निन्दा करे तो
पोछे उसके वास्तविक अभिप्राय को जानकर अपने निर्णय को
उलट सकते है, पर यदि सत्य अभिप्राय को जानकर उसकी
मगहना वा निन्दा करे और फिर यदि उसका परिणाम उसके
विरुव हो तो अपने पूर्व विशर को उलटना ठीक नहीं ॥
(३) पहिले हमलोग अपनाहो ( अर्थात् अपनेही हेतु वा
( १३२ )

न राई र मेंदू : | यह - इन विधान करना है। हिन्दिर कारे है कि इन ने प्रान्तरिक उत्तवा नविकर ना मा विचार किमो बाहरी प्रमोन्न, नई : ... हनेहन मन मोकने झालनमः . है । दूसरे न्दर का यि इच्चा बा - उनका इलः विन्द केसी हिर -- देख पहना है : इमपुर की घटना हान और ने के बाहर है और नार्य वराहति निन जाता है । यह नतो हमलोगे गे होनही केन्द्रका यदि अमित बन सनरीय परीना का अनुः के इन लोगो को पहिले त न रहे। अपने अनुभूत मनोगा ने लहर दुमरे में हमलोग तुरत ही पहिचान लेते हैं। पर रदेद दा विना अनुभव न्दि हुये दिनीमा निःपुन्हने; शोव वा बिना अनुभव किये हुये निमन्त हुये मोज करने वाले को : और बिना ईजर महिनान, देबर प्रार्थना रे जुड़े हुए हादी को. हम लोग से इड को नाई निहारते । समान हो महत्वान्ने एक दृनौ भावों को दृझ मी । जो अपने पडोसी पर गुप्त नीव वर्गव का मंटेह नंगा वह नव निर्मन्न भाव बाहो. वह भी मही मम्भव है। जैसे हम- नोग मय है वही हमोगों को मार भो देख पडता है ११ करने में विचारतंय का विचार प्राचिन्ना में ! उत्पन्ट रोता है. दोई यह न ममर्म कि एकानवामो मनुष्य की पर रोमकता है, ताकि हमलोगो के व्यवहार वा पर्गना . - (१३ ) ( १२ ) में दो अवस्था मालूम पडती है-पहिली प्रात्म-विचार को और दूसरी थोडे अन्तर के उपरान्त दूसरों पर निर्णय करने की। यह तो निःसन्देह है कि दूसरों का अवस्थान ( वा विद्यमानता) कर्तव्याकर्त्तव्य विचार के लिये अति आवश्यक है। यह सच है कि हमलोग पहिले अपना ही विचार करते है, पर बिना दूमरों को सहायता के नहीं। दुमरों के आचरण को टेख कर हमलोग अपने आचरण को रीति ( वा रूप ) को सिद्ध करते है और उनके विषय मे अपने भावो के अर्थ को ममझते है। जैसे इन्द्रियज्ञान में ज्ञाता आत्मा बस्तु ( अर्थात उसके आस्पट ) के सहारे से जाना जाता है, वैमेहो सटसटाचार निर्णय मे अन्तः करण दूसरे मनुष्यों के सहारे से जाना जाता है। सच तो यह है कि समाज और व्यक्ति टोनी दृढ़ रूप मे एक दूसरे के साथ बधे हुये है। मनुष्य का सभ्य जन होना समाज के बिना असम्भव है। पर पहिले मनुष्य जातीयता और तब व्यक्तित्त्व, यह प्रकृति और ईश्वरीय विधि के क्रम है। यह रतीय प्रास्पद बहुत सच्ची कसौटी है जिससे हमलोग कर्तव्याकर्तव्य विचार सम्बन्धी युक्तियो को असत्यता को पहि- चान सकते है। (४) केवल 'सङ्कल्प वा इच्छा'ही का विचार हमलोग करते है, न कि इच्छा रहित कार्यो' (स्वैरत्व ) का। कर्त्तव्या- कर्तव्य विचार सम्बन्धी जोवन केवल इच्छा सम्बन्धी मण्डल में रहता है। ५) पर सङ्कल्प और इच्छाराहित्य में क्या भेद है ? और जो कुछ भेद हो पर इतना तो स्पष्ट है कि इच्छाराहित्य दशा मे केवल एक चित्त संस्कार उपस्थित रहता है, सङ्कल्प दशा में दो से कम नहों । स्वैरत्व एक बल (Force) है जो केवल एक ही नियत दिशा में दौडाता है, पर केवल 'बल' सदसदाचार ( १३४ ) । - - - - मखत्री मिल का पाप नही हो मना है । दनग, अभिप्राय मंत्रित करता यान कम से कम दो प्रतिविरोधी कार्गलादक कुत्री से मे एक को पसन्न करता है। यह एक चित्त मन्नार मनमरण करता है और दुमी नगे लागता । । अतए नभावन ( पान उपमाहाग निय) इम मे घयावयव है और तुन्दना के लिये कि धान आवश्यक है । मन तो यह है कि मनोग जमा पहिले कह चुके ई. प्राभ्यन्त रिउ कार्गेपाटवन का विचार करते है पर यदि मन में एक को 7 हो तो उमत्रा मटमटाचार सम्बन्धी निर्गय यावी बलोकि मन निर्णय मात्र है और भिन्नता दिखलाने ६ प्रताव पव, मे अधिक निधी का एक मग पकिन जोना आवश्यक ६ पोर जान एक हो तु मन में परियत रमता वा सो तुलना वै निये दो भिन्न दलए देख परतो ई। (१) मन उर वार्योत्पादव ति वै मपित, और (२) मन हराई चिना ॥ (८) या समकानोन प्रष्टतियों का नेवत्व भी मदमदा- चार सम्बन्धी निर्णय वा तब तक पाद नही हो सकता है जब तवा वि. यह " ससवालोन माघ । प्रातियो " का अनेकन न मालूम परे।।व प्रहनिया प्रापम मे समकालीन होनी चारिये नोर (ख) ६ दोनो हमलोगो के लिये 'साध' वा नो पारिये (३) चे प्रतिया यदि एक साथ न उपसित होती तो जी परिक्षातो जो बानुरूर लग करते । भगवन तब तक मन जब तब दोनो बानी मन में एक माह उपस्थित न स। जो मानस उपस्थित हो त्यो प्रहर वा सम्बोजार की कर । तर रुदमदाचार सम्बन्धी .निय में प्रहक्तियो को 'स्मलीन' रोना राहि। --

( १४ )
(ख) और उन में से प्रत्येक हमलोगों के साध्य होनी चाहिये,
अर्थात्, उनमे से किसका अनुसरण हमलोग करे यह निश्चय
करना उन सभी के सम्बन्ध मे हम लोगों के हाय रहे और न
कि उन सभों के हाय मे। मान लिया कि यह हम लोगों के हाथ
है, पर उसमे क्या १ तो इसका उत्तर कोई २ यह देते है कि
'हमलोग' से 'हमन्नोगों का वर्तमान भाव (या स्वभाव),
समझना चाहिये जो स्वभाव कि पैत्राधिकार (Inhentance),
प्रहति (Temperament), अनुभव (Expenence) निमित
व्यवहार वा बान (Formed habits) और आत्म - शिक्षा
(Selt discipline) से बना है। इतना तो सच है कि ये सब
जीवात्मा के अन्तर्गत है, पर यह नहीं मान सकते है कि आत्मा
मे केवल येही है और येहो इसके सब वास्तविक पौर स्वभाविक
दृश्यों का पूरा २ हाल बतलाते है। यदि इसीके अनुसार चले तो
कार्य को स्वतत्रता के लिये कोई स्थान बाकी न बचेगा । जब
अपने कार्य का विचार हम लोग करते है तो अवश्य जानते है
कि ये कार्य हमारे है और यह इस मतलब से कहते है कि हम
उस समय इनको छोडकर दूसरे काम को भी कर सकते थे।
अतएव कर्तव्याकर्तव्य विचार दो साध्य कार्यों में से एक को
चुनने का अधिकार आत्मा को सौंपता है ॥
यदि अपने को हमलोग केवल युद्धभूमि मे समझे कि जिस
में ये विरोधो कार्योत्पादक हेतु अपना २ बल दिखलावे और एक
दूसरे को पराजित करके अपनी जय प्रकाश करें तो इसके परि-
णाम में हमलोग न शसा और न निन्दाही ले सकते है।
इच्छानुसार एक या दूसरे का अनुसरण कर सकते है और तब
यह जानमकते है कि इनको नौकरी में अधिक या कम नीचता
है । कुछ हो, पर यह नौकरो अधीनताहो है। अतएव अपने पर
टया प्रकाश कर सकते है पर धिक्कार या निन्दा नहीं। धिकार
।
( १३६ )

( १५ ) या निन्लाई मगर दिमागैत्याकचित्त- मंस्कार जा तु माग्मा मामने गये जाय जो इन सभों मे बडा मतल और न्याय और अपनो कत्रहरी से पाये हुये बनानेबान मल निर्णय करने में ममय है। पन मे कमी करना कि "चा नजन्दता (ग्वेचा ग विजाचारित ]..]) मल्ल (गा यथार्थ ), या मदमदाचार मखमी निर्णय मम । प्रात् टो में से एक तो दम मानना कीगा. यानो का खतन्त्र है, और नहीं तो कर्तव्यानातंव्य विदार झटो माया है। विमो कार्य करने के निये वर्ग को भी निग्मा या प्रशंमा करेंगे जब दृमरा मार्य एमो समय करने की मामी भी उमवी ही हो। . नद वर्तव्यावर्तव्य - विचारनिर्णय वर्तव्याकर्तव्य महली जन्तानीकार करना है और इसमे एपरी (वारो) बन्धन पी एनग्विनि प्रकाश नती करता, पर यह समझता है कि मानरिव, वार्यान्पारक त्रिो वे निर्णय बरने में पानीय शहि परिपत रहती ६ ॥ या। पर मन सदाचार सम्बन्धी निर्णय के पाद ही गाना परी । ये तमलोगो व जान 4 विवे ये कार्यों के पाल- शिवपादिवार जिनो या ने खचन्दता से ग्रहर विया या निकाल दिया। (२) सदरापार - सम्पन्धी निरय की रोति। सन विमतीति में अपने हिसार और रुकन्गे शा विचार करती-साधीरारा लिखते है। (१) १३ FIR नियम दर ६ वि ई चितार एयरीवाल ने स्परिट और एक दूसरे से टहर डे और ( ६ ) ( १६ ) एक दूसरे को रोके और बाहर निकाले । विना दूसरे मनुष्य को देखे हुये आटमी अपनी स्थिति को भी भले प्रकार से नहीं जान सकता है। इसी प्रकार नब तक दो प्रतिविरोधी चित्तसंस्कार एकही समय उपस्थित न हों अथवा एक को पाने से दूमरे को बाधा न पहुचे तब तक सटमटाचार सम्बन्धी आत्मा- न्तर्बोध सोता रहेगा। केवल भेटही होने से फल नहीं निक- लेगा यटि बहुतेरे चित्तमंस्कार हमारे मन मे क्रमश: एक के लोप होने पर दूसरे टेख पडे तो भो वे हमारे ध्यान के पात्र नहीं, होंगे । पर स्वैरत्व टशा तभो प्रात्मान्तर्बोध दशा होवेगी नंब यह भेद केवल भेटही भर रह कर बढते २ युद्ध हो जायगा ( अर्थात् जब चित्तसंस्कार आपस में लडने लगेंगे )। जब तक दो विरोधी चित्तसंस्कार ( Impulses ) हमारे अन्तर्बोध मे न देख पड़े और स्थान प्राप्ति के लिये न झगड़े तब तक उन दोनो का भेद हमलोग नही जान सकते और न उनका निर्णय वा विचार कर सकते है। पर ज्योहों यह नियम पूरा होता है त्योहीं हमलोगों को उन दोनों के भेद का ज्ञान हो जाता है। यह भेद बल या गुण सम्बन्धी नहीं है, स्वाद और रग का भेद इस में नहीं है। इस भेद को बतलाने के लिये सभों से भिन्न एक विशेष शब्द रचना की आवश्यकता है, वह यह है कि एक ( कार्योत्पादक हेतु) दूसरे से जचा वा उत्कृष्ट है, और उसकी तुलना में हमलोगा पर अपना अधिकार रखता है। यह बोध हमलोगों का अपना उत्पन्न किया हुआ नहीं है कि जिसका हमलोग हाल बतला सके, पर उन नियमों के व्यवहार ( वा अनुभव ) ही में यह सद्य: स्वाभाविक ( वा अन्त- जर्जात ) है। केवल दोनो के एक साथ अन्तर्चक्षु के सामने प्रत्यक्ष होने ही से वे दोनों अपनो २ योग्यता और प्रमाणपत्र दिखला देते है। यदि कोई लालची लड़का मुरब्बे के घर में अकेला जा . । ( १३८ ) (१०) प को बन्दी नगला खाने गा. पर अपनी इज्ञा मना करने के बाद ही हो पोकते, अपनो क्रनो पर IT कराया गाविमल-गोलता, दो मीट दिया. मघा नीत्र है, कि जिमको उमने मन किया । धीर का अपनो अधीरता से उन्माचे नग्न या मोको नागी को तोड कर अपने की मला वागधी न ममभंगा । पर यदि वह अपना क्रोध अपने मि पर ना दि हिममे उसका कोई ग फुट जाय और वागेको विधार. तो तुरती बन पाताये मे पडेगा कि | #. किमया उसने अपमान विमा ६. म ध में कही येत ६. हिमोग्ने रन्नुम दिया है। प्यामा पधिय, जगन में योजन - विमो भरना वो पावर विना समर्म बने पानी पीने गा. पर यदि उसका गीतापता और प्यास में मर रहा हो तो उमई मन में या बात अार्विगी दि तपा दया से बटकर नही और गलपद व लटे पानी का टोग परिने टूमरही मुह मे लगावेगा। इन वदामो में यदि एकतो रित्तमम्जार उपतीला तो बिना सम्म म वह पों से अपनोही या पूरी करवाना, पर दोसी दूसरा भी कमो समय पाकर उपदि काटी दोनो हो करने २ साद खान । पर FIR हो । स हिद, स्तिस्कारी का निक्टर- ति और वयसेन्ट. १ का होना दावा है इससे पित की जा नही है और हम कम है काम नहीं , । म लीग सोEिT: जागरण नहीं कर , म. सीर कोल मोर रू नदेह भी घर म । नादादार र विक मोर एम- पानी -:PREETो पता है । - - ।

( १८ ) अब तक बराबर लिखते आये है कि एक कार्योत्यादक हेतु अथवा चित्तसंस्कार दूसरे से बेष्ट वा जचा है, और दूसरा उससे नीच या नीचे है। यहां पर यह मटेह हो सकता है कि वह एक गुण्य ( positive ) वन्तु कौन है कि जिससे कोई श्रेष्ट है और कोई निकष्ट; अथवा वह वेणी कौन सी है जिस मे कोई चित्तसस्कार जपर और कोई नीचे है। यह जानना चाहिये कि जिस वस्तु से जिस प्रकार का भाव हम लोगी को उत्पन्न होता है उसो भाव को हमलोग उस वस्तु का गुण कहते है। जपरवाले प्रश्न मे कार्योत्या (टक- हेतुही एक वस्तु है जिसका गुण बतलाना है। तब उसी पन्न को इस तौर से पूछ सकते है, कि उन चित्तसस्कारों के प्रत्यक्षता से हमलोगों पर कौन सा भाव उदय होता है कि हमलोग उन हेतुओं में तारतम्य बतलाते है ? उक्त येणो हर्ष को नहीं है क्योकि हर्ष का तारतम्य होता तो चुराकर मिठाई खाने पर हर्ष के सिवाय लाज और पश्चाताप नहीं होता। यह सौन्दर्य की भी श्रेणो नहीं है, क्योकि छोटो या टेढो नाक होने से हम लोगो को पश्चाताप नहीं होता है, केवल यहो अभिलाषा होती कि यह सीधी और बड़ी होती । इन कार्योत्पाटक-हेतुओं की प्रत्यक्षता से हमलोगो को कर्तव्य कर्म तथा सटसत्, वा सदस- दाचारसम्बन्धी प्रभाव ( महात्म्य ) का बोध होता है, और यह भी ज्ञान होता है कि निम्न स्थित हेतुओं को अनुकरण करने को यद्यपि पूरी सामर्थ्य रखते है, पर तौभी उनके अनुकरण करने में स्वतंत्र नहीं है । अतएव पूर्वोक्त पदतारतम्य सदसदा- चारसम्बन्धी श्रेणी में रहता है। और यह सटसत का बोध अनुपम (या अनूठा ) है और हम इसके मूल अवयवी को पृथक नहीं कर सकते है। ( १४० ) ( १८ ) इस गुण को बतलाने के लिये यद्यपि बहुत से शब्द है पर उन सभो मे "सटमटाचारसम्बन्धी मोन्न या मान ( Moral Trorth) हो अधिकतम ग्रहणीय है क्योकि (क यह उसके उपयुक्त है जो मूत्व क्रम से सम्बन्ध रखता है, और (ख) अंतरी सा- झियो में न भो बचा है अर्थात् इसके साथ २ दूसरे भावों का उदय नहीं होता है। जहां केवल दो हेतुओ का विचार करत है. वर्तव्य' और 'उचित' ( Right ) प्राय: नहीं बोले जाते है ममूचो हेतुत्रों को श्रेणी के लिये ये नहीं बोले जा सकते है । 'धर्म' ( Trtue ) देवन्त जपरो श्रेणी में प्रयोग किया जा मकता है नीचे की गो में नहीं और इस शब्द के साथ अधिक गुण को ध्वनि पाती है। अतएव पहिलाही पट सब मे । अधिक ग्रहणीय है। (२) यदि प्रात्म- विचार की यही सनी रोति है तो इस से सटमटाचारमम्बन्धी बोध को विधि अच्छे प्रकार से प्रकाशित होती है। यदि प्रथम चित्तमस्कार के जोडे इसी प्रकार से अपने सापेक्ष मूल्य को प्रकाश करते हैं तो सभो चित्तसंस्कार इमो रीति मे अपने सापेक्ष मूल्य को प्रकाशित करेगे । प्रत्येक दूसरे वे मग प्रत्यक्ष होकर अपना मोल दिखलावेगे और सटसदाचार- सम्बन्धी गो में अपने उचित स्थान पर जा बैठेंगे। और जब इसी प्रकार से सब चित्तसंस्कार परोक्षा किये जा चुकेंगे तो जह सेणी पूरी हो सकेगी जिसमें एक दूसरे का क्रमगत स्थान नियत रहेगा। और तब ईश्वरीय नियम का ( Sustematic) । अनु क्रामिष शास्त्र वन जायगा। सच पृदिये तो ममग्रणी के लिये पूरे विषय ही मिलने कठिन है और यह रो कभी -- ( १९१ ) ( २० ) । पूरी बनीही नहीं होगी। क्योंकि मनुष्य की प्रकृति ऐमी है कि सटा नये २ चित्तसस्कार प्रगट होते है, और समाज की सुधार मे भी नये २ चित्तसंस्कारो को उत्पत्ति होती रहती है। तोमो ऊपर लिखो हुई रीति मे मानवी चित्तमस्कारों के यवार्य नियम को खोजते हुये हमलोग सदसटाचारसम्बन्धी मोलको युक्ति का आरम्भ कर सकते है। पर यदि इस मार्ग से वहक जाय तो कर्तव्याक- तव्य विचार की व्याख्या नहीं कर सकते । कर्तव्याकर्तव्य विचार सम्बन्धी नियम का समग्र तत्व इसो पर निर्भर है, कि हमलोग जानते है कि हमलोगो के स्वाभाविक चित्तसंस्कारो में उनके बाहरी फल के अनपेक्ष एक उत्कर्ष को अनुक्रमिक येणी भो है। (३) मन की इस बेणो (Scale ) के क्रम के ज्ञान को ही हमलोग हिताहित ज्ञान शक्ति ( Conscience ) अर्थात, अपनी आत्मा के संग भले और बुरे का ज्ञान कहते है, यह ज्ञान शक्ति जितनी ही उत्कृष्ट होगी, उतनही अधिक सूक्ष्म गुप्त विषय जाने जायगे । जो आदमो एक प्रकृति और दूसरी प्रकृत्ति में कोई भेद नहीं अनुभव करता है, जो सुधा या स्नेह, क्रोध या करुणा दोनो हो की समान उपेक्षा से अनुसरण करता है, और दोनो हो मे समान आनन्द अनुभव करता है, वह हिताहितज्ञान से हीन है। यदि इन मे वह भेद भी समझे पर वह भेद अन्तरी प्रभाव का भेद न होकर केवल हर्ष या वाधिक लाभ ही का हो, तौभी वह हिताहित ज्ञान से हीन ही है। अतएव, हिताहित ज्ञान ( वा अन्तः करण ) हम लोगों के भिन्न भिन्न कार्योंदिपक हेतुओं के सापेक्ष अधिकार का सूक्ष्मदर्शी बोध वा इन्द्रियज्ञान न है। इस अधिकार का ज्ञान केवल इन आदि कारणो के आभ्यन्तरिक झगड़ेही मे अनुमान से सिद्ध है। पर । । I Critical perception ( १४२ ) -- २. ) . -- 1- जब चिन्नागेमान डाग प्रल मे नाया नाता है तक यह चानुमय ( ( ) र धारर पता है पौर ने बीजीयन या न्यायममधीमानक कहता है। हिनाहिनज्ञान--कल्पना की प्रासंगिक परीना वा जांच । मदमदाचारमनी--विनार की गेमिका और हिताहित- पानी प्रशनि और उत्पति यात ग्राम्यान किमो प्रयास विद्या दिण्यम नमम ( दा परीक्षा) विधनही देख पहना और अधिकार वयातच विचार-गान रखकों के मदमदा- घारमन्त्री एनबी बाप्या में भी मुस्त्र विषयों में यह अन्नग नीकोना । पर प्रमंग पानि में यहां उसकी वई उपदेगयुन जांच लिखोडाको ६। (E) या विचार न्दीमा में प्रचलित सितितिमान यह ( वा संशोन्न, विवेवी ) सनम पिता निम्न पा जाति नको सपना . वर की जाना है। यह विव'म पूर्वोक वरना वे मंगल , बोकि यह रिताकितान को मन दी ( वा समानी३ ) शशि मिह वरना . गर्गत् वह पति जो वेपन्न मत्सदाचारमन्दी मोम का नाम दिग्पन्नती है। एक महिको प्रोव रितसरकार के बल में इस प्रयोजन नी । घर वन्न न चित्तजारो का मोन् ठह- राती । घर देवल विचार करती पर कार्य करने में कोई सारनीती तो सता है कि मनुप विवेकी सोच रविध बापरला जातो वहा धर्मवि- बेगो मनपसनद पोदर मावा नहीं है। पील दी कि मला देसी रोला है ! वह स्दा यह - ...- ( २२ ) देखता रहता है कि कहीं कोई असत् कार्य अपने से न होजाय । पर अच्छा आदमो वा उपकारी होने के लिये इस से अधिक कुछ करना चाहिये । उसको चाहिये कि अपनी हानि का ध्यान न करके उचित कर्म का अनुसरण उत्साह और अनुराग से करे। पर केवल धर्मविवेक से इसके होने को कोई आशा नहीं है। वरच कर्त्तव्याकर्तव्य ज्ञान और कार्य कुशलता एक दूसरे के विरोधी भी है ॥ (२) यस प्राय. देखा जाता है कि यद्यपि सभी मनुष्यों के लिये कर्तव्यालतव्यविचार विषयक निर्णय की एकहो रीति है, तौभो एक मनुष्य का विचार ( वा निर्णय ) दूसरे से भिन्न होता है। इसका कारण समझना कठिन नही है। कर्तव्या- कर्तव्यविचार बिषयक सम्पूर्ण येणो वस्तुत: किसी को प्रत्यक्ष नहीं है, उनमे से किसी को थोडा और किसी को बहुत मालूम है । तिस पर भी सब लोग यदि उस श्रेणी के एकही अंश से अवगत होते तो उन लोगो का विचार एक हो सकता था, सो भी नहीं है, कोई मनुष्य एक पंश के और कोई दूसरे के ज्ञाता हैं । इस भेद का परिणाम भी अवश्य हो होता है। प्रत्येक कर्तव्याकर्तव्यविचार-निर्णय मे तुलना के लिये दो वस्तु अवश्य चाहिये । पर निर्णय के समय ये दोनो स्पष्ट रूप से नहीं कहे जाते है। एकही को प्रकाशित करते हैं, और दूसरा मन मे छिपा रहता है। इसी छिपो हुई वस्तु मे भिन्न २ मनुष्यों के निर्णय में भेद पडता है, कोई किसी के साथ, और कोई किसी के साथ कथित वस्तु । (चित्तसंस्कार) को तुलना करते है। एकही अनाज को एक बनिया वीस गडे के सेर मे और दूसरा २४ गडे के सेर से तौले तो दोनो के तौल में अवश्य हो भेद जान पड़ेगा, परन्तु यह भेद तभी तक है कि जब तक दोनों सेर का भिन्न २ मान नहीं जानते है, अलग २ (१४४ )

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माम मिri -::' । माटो
मी ::-:
--'मा मो.
श्रीम-::--:.:चा गो
frrrr. 15-15 विधामा
1 ----मनु
पोलीस मानो।सपने
दररािर ६ यो लागोपा, रत
मानवी गनिमारत में समाबरते ३ ।
निन्दा र निमारो तनमा
मा.प्रमादिन पाता.
Pr:: पदार्योन्यादय हेतु
arti पर पता • पोर
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पारगे - परकार र ८.
तार का कोई बाई मनु म
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सरकार पर होते
T: E F भेद टेरह
पहार रही पा रही है
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( २४ ) सापेच पधिकार के भेद के समान है । यदि मनुष्यों के अन्त:- नरप में इस चित्तसंस्कार की कुञ्जी म रहती तो मनुष्यों के भा- पस के जंच नीच का प्रसल अभिप्राय हमलोग न जान सकते । मनुष्यों के चिन्तामुद्रा भयवा पचात्ताप को देख कर पशु केवल जामहीम खड़े रहते हैं, क्योंकि वे कर्तव्याकर्तव्यविचार से (४) हिताहित जान की युक्ति (theons ) से स्वर्ग और नरक का भी विचार सिद्ध होता है जो कि इसके बिना अयुता देख पड़ता है। पहिले दृश्य में यह प्रकृतिविरुद्ध भौर नोतिवि- रुख देख पड़ता है कि सब मनुष्य केवल दोही शेणो-भले भौर बुरे, ईखर के प्रेमी और द्रोहो–में बाटे जायें । मनुष्यों के स्व- भाव, प्रेम और द्रोह, भिन्न भिन्न प्रकार के होते है। कोई ईखर के बड़े भक्त है और कोई थोडे; कोई उनकी थोडी भवजा करते है, कोई बहुत; किसी का पाप वा पुण्य दूसरे से बहुत अधिक है किसी का थोडाही होता है । । तब सब मनुष्य केवल दोही वर्ग में महीं रक्खे जा सकते हैं, पर किसी को अधिक और किसो की कम निन्दा वा प्रशंसा करते है । तर ईखर ऐसा अन्याय कैसे कर सकता है। पर सभी देश में, सभी काल में, स्वर्ग और मरक का हैधो विचार देखा जाता है, सो भी केवल गॅयार नहीं, परन बड़े बड़े दर्शनशास्त्र के ज्ञाता भी इसको मानते है-इसका क्या कारण ! हम उत्तर देते है कि इस वाहिकहष्टि को छोड कर पम्त ष्टि से कर्त्तव्याकर्त्तव्यविचार सम्बन्धी बुराई को देखने से यह सन्देह दूर हो जायगा । सत् असत् की प्रति हमलोग दाहरी वस्तुओ से नहीं सीख सकते है पर अपने आत्म अन्त- ोध से ही सीखते है। इसी की शरण इमलोगी को लेना उ. चित है यदि हमलोग इस विषय में ईश्वर की इच्छा की सच्ची पौर मुख्य पाकाशवाणी से परामर्श लेना चाहते हैं। अब पस . दुग सा का नीचा मिनतारे जिसमें डर है, एक F EFFER: महमे उत्तम होम- TREET मग हो भने नीच FREE. सम्म म दो को कोड कर FIELF याधियार औरहमी से पियार यासार मोगी पर प्रकार होता है। उन दोनों है। टोर में Tert. और अगच्च ही पड़ी है। जीना FREETTE F६, पर ए7 में उत्तम पीर पर मनो उम समय जो - 07:31 किया और एक विना द टो7 5m aगा। मममयरममे बदकर तर दर 15 प्रतिनिशिउममे बढ़ थर र र यसर, शाररिये किरमके विधि Trum (नपिनाभिरप- रिता गया दंप ध्यान में यम हो नामानिनि दर पर ६ दोमट, दाले भी भोग्न म बता | घा • मो. नवरी पर पहनामा झरेगा कि बिमार दी IST निम सीमा तक पूरा किया : र :REET का दिया जिसको पद परम पधि- बाबा FIREा । दिदा ए५ हम में सदईतो भी it PI, कम दो घरोय विषय रहते . २. FिE पद नसी है पर यही टोनी er: नरक र दुई की । रमो कार मे । पर्य : पचतादा होता STREE , दर होतो है, दुता र है। यदि हम लोग For erreोरा सिर विदा यि तो हमसे -- ही -- ( २६) -स्वर्ग, तिसपर भी, हम लोगों को 'स्वर्ग' और नरक' का बोध हो जायगा- जिमको हम लोगों ने त्याग दिया. और नरक, जिनमें अपने ! को डाल दिया; और हैत कल्पना (वर्ग और नरक) प्रत्येक लोभ युना आमा ( वा जीय ) के अन्तरी युद्द का बाहरो पति- बिस्व है । यह भन्त.करण का स्वाभाविक विश्वास है जो ( अ- न्त. करण) जैसा अनुभव करता है वैसाहो विग्नाम भी करताहै। यदि हम लोग मनुष्य के मंपूर्ण जीवन को एक म न कर उम पर दृष्टि करे, वा उमको जाचे, ती देख पडेगा कि मनुष्य अपनी अनुयोजनीय भवस्था के पाने पर तुरतही पूर्वोना दो रोति वा बान में से एक का ग्रहण कर लेगा । दो में मे किसी एक का चस्का उसको जरूर पड़ जायगा। चाहे तो सामने पाये हुये सर्वोत्तम चित्तसस्कार को अभ्यासा- नुसार चुन लिया करेगा, चाहे सामने पाये हुये सर्वनिचट चि. तसाकार को अभ्यासानुसार पमन्द करेगा । केवल यही एक मनुथों के स्वभाव ( chuacter ) का सचमुच बड़ा भारी भेट है । मनुयो के स्वभाव के पौर और पनेक भेट उनके गठन ( constitution ) मे निकन्नत है। वे कर्तव्याकर्त्तव्य सम्बन्धी भेद नहीं है। इस प्रकार मे जब हमलोग मनुष्य के कर्मो शो हिताहित ज्ञान को दृष्टि से जाचते है और प्रत्येक कार्य को भले पौर बुरे दो चित्तसंस्कारों में से एक ग्रहीत वस्तु समझते है तब देख पडता है कि वस्तुतः मनुष्यो में दोहो वर्ग है और "स्वर्ग और नरक' का तत्व हैत हिताहितञान (वा पन्तःक- रण) के मध्या म गति से उपजा है ॥ इन अपर लिखे चार उदाहरणों से कर्तव्याकर्त्तव्यविचार सम्बन्धी कल्पमा की सत्यता प्रकाशित होती है और पब इम । * वर्ग पौर नरक के पान्तरिक तत्व का इस प्रकार अन्त:- करण से उत्पत्ति का पता सगाने में जम एसके याहरी रूप वा -- - : truth भोगो नी म मिाम पर पूग विजाम नग्ना चाहिये 6ि. मनोगों में बनवातंग्विार बली निग्य है गुप्त व मनीगाई बायाँ है जिप्रान्तरित उत्पादक है. इन वि ते बापूर्वक मना दिये जाने पर त्याग कि नि:रम निर्णय की योग्यता हम लोगों को हम होती है कि इन वित्तमंचा मे योग्यता (मोन्स, गगन, । या एक मान प्रम है, जो हम लोगों को Er ( या न ) यी ग्रन बरने और नि: (या बुरे) लागन लिवर करता है. और या जब कभी एक में बिदार्थोत्पादन 17 एक मात्र मल्लक्ष होते है, तर पवन्य की उपजला है। बदार वा प्रगए नोईपर हम इन्गे अभिप्राय का प्रतिपादन करने । ए-ताप जिम में अपने पापकर्म की समित स्मरता पाउनुमत्र Fint , नमित प्रधमता को नदा वा वर प्रदाशित करते हैं कि पसुद. पाप दे लिये बन दास तक नरय दगा ( नरक मोग ) महना पडेगा तद नि पहल परिमाप दाल पदार्थों को तन्य परिमापवाले पदानों सी नाई' एकहा बरते है । लाए 11) को प. शिमा में दीप वो हिदा रंग को दु:खभोग ६ परिसाए में नहीला मत है. क्योकि ऐमा करने से मनुष्यों सीपत योग्यता प्रशाशित होती है। मनुप के मन की यह सदा कि ती शिपाधानिब विपयो की मेही वि. पीर मुना पर कालमखनी और वेदनीय वस्तुत्रों से तु- मार ति र सम्बन्धी जातो को कार और खान समदीना परे तर मी प्रति के पनुमार पाप- पपीमियाजा भी लोग एसय टु स्भोग ६ तुभ्य मामले पर दमदाचार सम्पन्दी समिकतामसे श्री वा. 4.

( २८ )
द्वितीय अध्याय।
परिणाम दृटि ( वा पूर्व विचार ) की युति ॥
हमलोगों के कर्तव्याकर्तव्य मम्बन्धी स्वभाव का यथार्थ
लक्षण और भी अधिक स्पट हो जायगा जो इसने अन्तस्थित
वस्तुओं की कहानी और न कह कर प्रब उनकी बात कहें
जिनको कि यह भपने बाहर निकाल देता है, जैसे कि "परि-
णामदृष्टि ( वा पूर्वविचार ) । ‘सदसदाचार विषयक निर्णय'
और 'परिणामहरि विषयक निर्णय' दोनों यद्यपि उन्लझ कर
एक सग मिल जाना चाहते है, तथापि ये दोनों एकही समय
परस्पर विरोध और लगा रखते है ।
परिणामहष्टि विषयक निर्णय को
भासद वा पात्र ।
(1) कर्तव्याकर्त्तव्य विचार विषयक निर्णय के पात्र 'हम
लोगों के पास्यन्तरिक कार्योत्पादक हेतु' है, पर परिणामहष्टि
विषयक निर्णय के पाच 'हम लोगों पर ( अपने ) कार्य के फल'
है। कार्य करने जाते है उसके लिये क्या जलते रहना पडेगा ?
या इससे कोई लाभ उठावेगे । एप्त कार्य से या उस कार्य से,
हम लोग कम दुःख उठावेगे, अथवा अधिक सुख पावेगे ?
केवल ऐसेही ऐसे प्रश्न परिणामदृष्टि के विचार में पूछे जाते है।
सुख, बचाव, बप्ति, येही सब कार्य के मुख्य फल समझे जाते है
* 'I licory of Prudence
व पाम लाभ ( वा स्वार्थ ) को सब कार्यों का निर्देशक पादि
कारण समझ कर उसी (वार्थ) की गिन्ती करने को परिणाम
दृष्टि करते है। पर्यात यह सोचना कि अमुक कार्य करने से
हमें क्या हानि वा लाभ होगा।

- म नाम वा विचार होता हो अन्द्रिय जाने जात है। दिनारिन न रहने पर भी जम नोग परिणामदृष्टि र निया, पर इनानि ( consily.hir= पा मय याने गे योग्यता वा मामय) न रहने में नहीं जो माता २ । यावत्तव्यविषयक बोध हे माय नाय पगमार सिटिविण्यक जान मना रहता है. पर परिणामहरिद बोध मायक. क. बोध नदी रहता . - । -- - मादी राम मंद मेयर निवन्नना है कि परिणाम- THE प्रवाहवा बार्य और वयावतंत्र निर्णय 'अन्त- हिया वार्य । पहिला निवान्ने वार्या गुनगुन वि- पारला. मग 'प्रातुन वार्य दा । परिना भविष्यात कान्य सावा. सेर दूसरा वर्तमान मातरिव प्रावी का निर्णय दरता है । पद६ दीनी परीक्षा ( ' t t ) मग सरान री रहते । परी ई पति पूर्वदृष्टि चमधय । १. बिना परीक्षा लिये हम लोग द भी नही दम विपने वादा पर होगा। पर सन्तान (Htu tics) ६६ साल न.पारमा न पादि वारनी ६ मन में ६ विद्यमानता र पचनता बी कारकता : जिनका प: । विचार करतात, सदा खन्ना रहता है एकद१४२ दरको बन्द कर ले परीता वा मद मीर दर सन् घर धर्म . प ' घर म । मनु का घर 'म- 4. दादर वि. दर दिल वा त् वित्तसार है. और दिगेर दामा पा र रन ही बुद्धिमान । पत CE का मनोद པ་ ས་ བF་ པ་ ग. द्विार दाद ( ३० ) ) । को जानने में मनुष्य को कोई मन्टेह नहीं रहता है, पर सत्य प्रा. गय का अनुमरण करना तुरतही नहीं पा सकता है इसके लिये कुछ ममय चाहिये। अतएव अधिकाग मनुष्य बुढापे में पूर्व विचार में अधिक प्रवीण होते हैं, पर उनका लड़कपन अधिक निदीप, पवित्र, और महालयुक्त ( noble ) रहता है। अन्तर्दृष्टि उन्हीं को बनी रहती है जो इसको पवित्र गति से व्यवहार में लाते है और इसकी चौकसी करते है। विश्वासघातकता ( वा छल) से यह अवश्यही निर्बल पड जाती और भ्रष्ट हो जाती है और तब इसके बदले में मनुष्य पूर्वदृष्टि की शरण लेते है जो अवस्था के साथ साथ बढती जाती है। हिताहितज्ञान दत्तवस्तु है, पर परिणामदृष्टि को जोहना पडता है । (३) परिणामहटि जिन कार्यफलों को पहिले में देखती है वे दो प्रकार के है। (अ अ) प्रथम जिम चित्तसंस्कार ( वा हेत. आदि कारणो) से कार्य की उत्पत्ति होती है, उसका व्यक्त खुना ( durct ) आनन्द ( अर्थात उसके पूर्ण होने में प्रा- नन्द ) और (इ) दूसरा, दूर के परस्पर सलग्न फल जो हम लोगों के चारो ओर के उन पदार्थो से लौट कर आते है जिन पर हमारे कर्म का प्रभाव पहुचा है । इनमें से पहिला जो कि हमलोगो की प्रजाति का व्यता फल है, सदा अचल और अवश्य भवितव्य है; जब जब उस चित्त. सस्कार को परिपूर्ति होगी तब तब वही फल होगा। और इसमें पानन्द पथवा शान्ति अवश्य होतीही है, क्योंकि ऐसी कोई इच्छा नहीं है जिसके पूरा करने में सुख के रोक देने में व्याकु- लता न होती हो । पर हमलोग पहिले यह नहीं जानते हैं कि वह सुख किस प्रकार का होगा, यह चित्तसंस्कार का स्व- भाव है कि हमलोगों को अंधे की नाई उस कार्य में बगा देना है जिसके प्राप्त करने के लिये यह नियुक्त किया जाता है, प्यास पानी की पोर खींच ले जाती है, पर एसके खाद पौर स्वर्ग -- जमिनमोनिका । किनु मग्न अवश्य गा। जीवनी - नोगा इतना Fish पनि OF Eriगा । जिसनी म्याम. वित गीतना पानी धित ममा जान पडेगा। दु:- विचार तिनीधिय दया को होगी उमके र उदरनि घर मा बि घाम छोगा । यह नि- मयंदन प्रलं विकासघार घनता या निवन्ता हो में गा। पर सर्य में है । मोमो मनुष्य अपने लाभ में, जाभिराची माया अपनी मयाना में. या काधी सपने में बिना सीना, उनना और किमो वात में नहीं। एनपद ufFi प्रबार यापन व पिय में यह ए. ना पाFि यि प्रसन्न कम जिमणारी व प्रग करने में प्र. पिय प्रा । सरन ) सित और पतष इमरी विध माना न दिया जायका कद एमीका परिणामाहवा नियम वाना चाहिये । और परिणाम में पब दिगद भेट ERIT : परिमामयं प्रवन्ततम । दिकावार धान तो भार बधर्म' च्य हसतम चिसयाराधीन होना । सावी सदसराधार सम्धी नियमारा धार चारपानरक्षरए ' मिस व्यासान यार का हो सकती दिमिर मानन्द लिरित और परिरामों । म विदारी धरना Eft । पहिसार दो सदर REETर रोम रं दु.रह रोता:दे मद एमो . गु' ) प ( । पर कोई जाई दर के (दामोल पमीन पर पाबनरिव मन्नुटता कारही, की राधा निन्दा करते २.पा.) र र घरका हा पीडा देता . : -- ( ३२ है। ये सब फल केवल हम लोगों के हृदय में, 'समाज में, और सृष्टि के अनुशासन में सटसदाचारमम्बन्धी नियम के विद्यमानता के कारण होते है । यदि सदसटाचारमम्बन्धी नियम न होता तो हम लोगों को अपने कार्यों के प्रधान फन्नही का विचार करना होता और तब अपने प्रवलतम चित्तसस्कारों को सन्तुट करना हो सदा दूरदर्शिता समझी जाती। पर यह ऐसा नही है; ब- हुधा प्रवलतम चित्तस कार के विरुद्धही वर्णन करना दूरदर्शिता होती है, क्योंकि उस दशा में सदसटाचार सम्बन्धी नियम के कारण गौण (वा दूरस्य ) दुःखटाई परिणाम-जैसे कि पचा- ताप, सामाजिक अपमान, ईश्वरदत्त धन और स्वास्थ्य का नाश-- मुख्य ( वा निकटपर्ती ) सुखदाई परिणामो से बहुत अधिक बढ़ जाते है । ये दुःखदाई अनुभव केवल सदसदाचार निर्मित समार हो में हो सकते है। ये उस अवस्था के लक्षण है जहा पाप की भी गति है। इन बातों में जांचने पर यह निगमन निकलता है कि सदसदाचारयुक्त सष्टि में जहां पाप की भी गति है और जहां उत्कर्षकम का भी अनुभव होता है वहा को परिणामदृष्टि और और अवस्थाओं की परिगामहष्टि से भिन्न होगी और उसमे नये नये दु.ख के मूल मिलेगे। और स्वधर्म' परिणामदृष्टि' के प्रशों में नई नई दशा दिखला कर इसको सुधार देगा; पर 'प- रिणामहष्टि' म्बय अपने मूलतत्व से 'म्वधर्म की रचना नहीं कर सकती है। और ज्ञानी के समान कर्तव्याकर्तव्यज्ञान के संग भी हर्ष और खेद होता है। जहा इस हर्ष और खेद को ग्रहणशी. लता तीक्ष्ण होती है जहां यह हर्ष वा खेद इतना अधिक रहता है कि परिणामहष्टि को इसका विचार करना आवश्यक है; और उपकारी मनुष्य मूर्ख गिना जायगा यदि वह उपकारी 'छोड़ कर और कुछ हो। कर्तव्याकत्तंव्य विचार ज्ञान जहां तक कम होगा वहां तक इसका हर्ष और खेद भी कम होगा, और तब इसका विचार नहीं भी कर सकते है। और दुष्ट मनुष्य यदि - समदद ६ नित नयार- कोई म काम करे जो हि- नाधिकारी - नानिको का मुख या नहीं बामा: ।:- सन निमान में दही होता है उम में मामी की नसीगा। अपनी जानता ने उसी सालाप नीगा । प्र.निट नागरिक दुग्म और म- नुकता दर वो हायर और बम्प मनुष को अपनी प्रवन्न जानमा में नए गेम मयी । अनाव प्राम नाम बावान विना स्वधार गर्न वा प्रयत बरना निग्छक है, मग मर व नियम नायक, नौर बुनिये नि- ६ कामिट अतएव उस गीगयान्पिाटबईतु वा वित्तमंचार दो प्रकार वा 21 दिमा। पFि] समाचारमन्बन्धी । कामना ।दा सहना प्रम गरी ११और पर परिगविग, दन्न दय, म पर निर्भर । इनमें पनि बाकी". या मनावं नि एप रप १: पर दम चचा , मिमिक र ना नि भिन्न भिन्न रप धा- वरती है। मानावार वा परिकार मह मनुप्पो पर. एन! दिगई 11 पर परदा माशोन और निवर ari पर पहि. मप वितबार को निज रदि मनु". ए.-1 राम रखती है: पर निल भिसार २८ मिनिट की होती है यह E: c off" बरो. नीर चित्त- मा. परिसीमनुपी के लिये : र सPE दिसनाराम दि.१८ ६ २ ' निया है. ..:::::::::ER FE. कर RECE नगर २४.

( ३४ )
चनना अर्थात अपनी म्बकीयरुचि अपने स्वार्थ का अनुगमन
करना पाप है। पर यदि आत्म का परित्याग कर अपनी स्वकीय
रुचि को छोड कर्तव्याकर्त्तव्यविचार के अनुसार रहे तो अवश्य
हमलोग उस कर्त्तव्याकर्तव्यशाम के नियमानुमार चलते हैं जो
सर्वव्यापी और अधिकारयुक्त होने के कारण दैग्वरीय भी है-
अर्थात् हमलोग ईनर को इच्छा के अनुसार
चलते है।
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-
कोय अछाम
गम और गुगामा |
दिशामाया दमाचार सलीम श्रीराम
मिरको प्रम में या अभिप्राय नि है। भिन्द्र
भिन्न मनुष्य व सग मे ये दोनो प्रीय प्रशार मे परम्पर विपरीत
पर दिया सिन पनि ।
( , जयाम्पिादयतु या वनग्रम लपक्रम
हे विरना पा जि. घोला या सात रोगों में
पाया ता. वा] धर्म । घ तंबावर) यी में विरा-
प्राक्ति दादा हान्नती है और न द सन में पदाधिकार
परमयी भगाने न्न गना । समगहे से जपोलपोर
'गुणामाद' वा अनुभवता । अाप इधर्म ६ है।
"विकाप्रति का परारत व रते वा गुणासमोर जहां
ति' 'धर्म' दो त गुराभाद' र.
Tat। यदि धर्म में अधिध प्रबन्न नीति को परास्त
बरती पदिय गुणोता, पौर ददि निर्वल प्रहात्ति
१ धर्म परारा जाता तो अधिक 'गुणाभाई' होता है,
नीरधर्म पर शेती है। यदि क्सिो रड़ के
१८ पासन ने दे किये हाई को मार डाले, पोर
यदि एप द्वारा सनुप पपने भाई ६ मारनेवाले दुकोदरा
शाने सार राती परि मनुपको पधि र.
जा और 1 पर हर हर मनु को सतना पहा.
कार और EFFERोगे।
--
1
।
..
--
.

( २६ ) चित्तम कार की प्रवलता और निर्वलता का जॅचना भी क- ठिन है क्योंकि मनुप्यो के स्वभाव में बड़ा अन्तर रहता है, और जो एक मनुष्य के लिये अल्प प्रलोभन है वही दूमरे के लियो प्रवल प्रलोभन होता है । पर इन भेदों की भी सोमा है और व्यवहार मे इन भेटी का भी विचार किया जाता है। रुपए का थैला या एक जोड़ा जूता ले लेने के लिये मनुष्य को मारने में कौनसी प्रलोभक शक्ति है इसको हमलोग समझ सकते है । इससे यह निश्चय होता है कि जो कार्य बाहर से अत्यन्त निकट देख पडता है वह आभ्यन्तरिक सट सटाचारविषयक अति निकृष्टदशा सदा नही बतलाता है । क्योकि अच्छा मनुष्य भी कभी जान कर बुरा कर बैठता है और तब उमका टोप अ- वश्यही बड़ा भारी है यद्यपि मामान्य गणना से उमका दोष बडा भारी न पडे। इसके विपरीत अत्यन्त खोटा वा दुष्ट मनुष्य जि- सका जीवन त्रासजनक और घणोत्पादक है. प्रायः वैसाही मनुष्य होता है जो अपने जन्मही से नोचप्रवर्तक मडली में रक्षा है और इसमे अच्छे होने का संयोग जिसे कभी न मिला है; नीच संगत के कारण जिसके सब कार्योत्पादक हेतु केवल वन-श्रेणी जानते है और उत्कर्ष-श्रेणो से कुछ काम नही रखते और जो माता पिता के दोष से दूपित होगया है। इन बातो को सोचने से यह स्पष्ट होता है कि उसके अपगधी के लिये वह स्वयं जितना दोपी गिना जा सकता है उससे अधिक दोषी वे लोग है जो उसको उस नीचमंडली में रखते है । अतएव, | यद्यपि ऐ मे मनुष्यो का चरित्र हमलोगी के कर्त्तव्याकर्त्तव्यविचार से प्रत्यन्त गित जान पडता है तो भी हमलोग अपनी घणा के सदृश या अनुसार) उसकी निन्दा नहीं करते और न उसे दण्ड देते है। हृदय में पाप को अन्तिम सीमा पहुँचने के लिये कार्य में पाप की अधिकता का होना कोई आवश्यक बात नहीं है। और सर्वदर्शक चक्षु, मनुथो के आन्तरिक भावो को देख कर ऊपरी . वालोंबीरने में मानोग करते है उमको एकदम से न्टकता: पनि वा ' माझेदक हेतुत्री के उत्पबेगो और में भेट रकमान गुणोकप और गुणाभाव वो पतिको निनय करने का यह नि- चम वि. “ मदमदावार दिपक और परिणामधि वि. पव वात्याटव तु में मबमे अधिक भेट रहता है. वहां गबरे वम दोष ( दा पा) छोता है और जहाँ भेट मदमे कम जताई वा मरमे अधिक होता है। इसका अभिप्राय या कि पतंजावाजविचार विषय में 'गुणोन्नप' उम युद्ध व जय या। पारितोपिया जी मधर्म श्रीर चित्तप्रक्ति में होता है और यु जितना। घनबोरगा एकनासी गुग्गीप प्र. धिव. मोगा पोर गुणा भाव चम) युर में पगम्त पनि का टड है पीर : जितना वय वाठोर गा उतनाही गुणभाव पपिवा गा पीर एपर्व विरद जितना) अधिष वठोर युद्ध मोगा उतनामी कम गुणामाप पराजय में और जितनाही कम उठोर या होगा इतनाचो व स गुणात्वर्य ज्य में होगा। । तब एन दोनी येगियों वतंब्यावतच विचार और परिणाम भेदही का वर्णन किया है तो भी यह सरप से गादवि एनवा भेद मिट जाय और ये दोनो गी समान जाये, और एक दुसरे माय मिल जाये। यद्यपि विमी पारए मनुप में ये दोनी दभी मिन्नतो नहीं देखी जा- । श्री मावियर मान लाना सम्भव है कि दोनी वेरियो घा भेद मिट जाय और कोई युट बन्न न हो। यह दो प्रकार मता- ५ दादाचारसम्पनी रो परिराम- FF..विषयी न होडायचा रख परिणामहहि पिच पर मदरदार विषय प्रेरी में गुप्त हो जाय । परिणाम सामन्दी विचार दा व्यवहार हनना । -- ( ३८ ) बढ जा मकना है कि मढमदाचार मम्वन्धी विचार को लोप कर दे। पात्म लाभ के हेतु आत्म का परित्याग सटा करते क- रते हिताहितजान रुक जा मकता है; और ऐमा होने पर इन श्रेणियों का भेट अनुभव न हो मवेगा प्रवन्न चित्तमस्कारही उत्तम चित्तसस्कार जान पड़ेगा; मनुष्य अपनी रुचि के अनुमार चलेगा। इम विभेद का क्या फल होगा । मनुष्य को मनुष्यता चली जायगी; वह 'मनुष्य' न रहेगा; या तो वह 'पश हो जा- यगा, या बैतान' (शैतान ) बन जायगा । पशु-यदि वह अ- पने चित्तप्रवत्ति का अधे की नाई अनुसरण करे; ओर पिशाच - यदि वह सुस्थिर विचार से यह सोचे कि किस प्रकार से अपने कार्यों का फल अन्त मे प्राम-लाभ हो। (ख) इमके विपगेत कहीं सदमदाचारयणी भी प्रधान हो सकती है और परिणामटविषयक येणो को लोप कर देमकती है । आत्मा को सटसदाचारयणी के प्राधीन करते करते चित्तसंस्कारो का बन्न उनके उत्कर्ष से बढ कर नही रहने पाता है. और तब उत्तम चित्तसस्कार प्रनतम भी होता है । । निकष्ट चित्तसस्कार इतने रोक में आ जाते है कि उत्कृष्ट चित्त- संस्कार के विरुद्ध वे कुछ भी प्रतिबन्ध ( वा बाधा) नहीं डालते और बन्न थेणी पौर उत्कर्षणो में पूग मिलाप हो जाता है। इस दशा मे मनुष्य सदा उच्च-चित्तसस्कार का अनुमरण करता है और प्रान्तरिक युद्ध की कोई भी सम्भावना नही रहती है । वह पवित्रपद पर पहुंच जाता है । मनुष्य को इछा और ईश्वर को अच्छा एक हो जाती है। जब यह पद प्राप्त हो जाता है तब प्रशंमा और निन्दा व्यर्थ है क्योकि ये (सराहना और निन्दा ) केवल वहीं पाए जाते है जहा चित्तसंस्कारी में युद्ध होता है, पर जहा स्वच्छन्दता मिलीहो नहीं है अथवा बन्धन से जही मुक्ति होगयो है वहा इनका प्रयोग होताही नहीं। इस उत्कृष्ट अवस्था में इन भावो के बदले प्रशंसा (ulmmation) प्रेम और ।

() - रा: का प्रयोगोता. इतकी कामना पायाचदिवारी मना किया जाता है और अन्त में उनी मिलवानोकाना घर मम और इशा केबीनी मिल Einm बानगी का भता क्यिा क. का है. पर दुग भी कर सकता है, यदि ऐना भी करता ना६.१ मे बन्न प्रमानी नती पर प्रेम और पूजा भी की मांग पर मनोगी पर प्रेम करता है सरदगा वरनाई, सीमेचमन्नीग मी उमर प्रेम रखते हैं। . im- --- ( ४० ) १ चतुथ अध्याय। कत्तव्याकर्तव्य विचार सम्बन्धी अधिकार का लक्षण . ( १ ) कार्योत्पादक हेतुत्रो के आपस का सम्बन्ध, जो कि अन्तःकरण के चक्षु से देख पडता हे बतलाने में बहुत बार "अ. धिकार" ( authorits ) पद का प्रयोग हुआ है, जो (अधिकार) हम लोग मानते है कि उच्चस्थित चित्तमंस्कार का निमस्थित चित्तसस्कार पर रहती है । इसका क्या अभिप्राय है, यह ममझ लेना आवश्यक है। “अधिकार' ( एक के ऊपर दूसरे चित्तम स्कार का प्रभाव, दबाव । एक सरल, निराना, भाव (feeling) है जिसके अवयव अलग नहीं किये जा सकते, अर्थात जिसका विवर्ण ( व्याख्या ) नहीं हो सकता । सत् ( वा कर्त्तव्य ) का जान अनुठा है । इम अधिकार की परख यही है कि इमका हमलोगों को आध्यात्मिक ज्ञान होता है। जब कभी दो विरोधी चित्तसस्कार आपस में लड़ते है तब इसका बोध म्वयं हो आता है और चिन्ताशील पात्म ज्ञान से यह हो जाता है कि एक चित्त- सस्कार दूमरे पर अधिकार (वा प्रभुत्व दबाव रखता है, अर्थात् पहिला दूसरे से अधिक अधिक प्रभावयुक्त और गुणयुक्त है। "निर्बन्ध' वा "भार' (obligition) का भाशय अवश्य क- र्तव्यता वा आधीनो समझना चाहिये जो सत् चित्तसंस्कार और सत कार्यों में रहता है । यह निराला है। हम लोग इतनही कह माते हे कि मत् कार्य करने के लिये हम पर निर्बन्ध वा भार रवखा है । यह निर्बन्ध' यह सूचित करता है कि.जिस काम करने को लिये हम लोगी पर मार रक्खा गया है उस नाम * Nature of moral anthouty 17 21 - मा, मीनीया और किस काम के क -मनीग-ने, निनोग के । निर की यादी में अधिक मनुप्यो बार TTऔर मानेगाना दर है। सरि नदी में मने एकाको राया 1], टविस 2017 का सग भी भी उमीन हुअा हो पौर में मनुष्य या अंध या वग्न श्री गहि दी जाय नो वा अपने बार्गा वा दुग या प्रदा कम भनिगा पर अपने वाई निचे दीप वा मागीनगा और न किमानिन्ध वाधीन गा का अपवार उममे जागा व उमको भग्न र सभी जायगी, न वि दीप: घोर नी या लाम व उ- ठावंगा वर 7सकी हिमानी समसी जायगी, न वि उसका - धर्म ( वा पुगर । १ ( ) मा मनु निन्म ६ पर जा पिता वयावविचार विषय. निमसे कितना करने के जिये मनु करे इसमें अधिव, यशा पादरो कर मक्ता . - र विर ६ मा मनोगो पर ईनर ६ रचन्द र परिमाण २. ना ! यक्ष परिमार कर्तव्या- वादविचार सरीमान : मन्नई एन ईम्बर .! ...:.' . . हर है इस मार्ग की अ. प:- "i - .:: पना हम मानमिक .:: रदुहाना । इनमें : ८ मा वन , ते ई नौर ::: । विनाही वाव ... RETE पप नि. पण Feी गुगो- . माग्नं । ई. ' . ܨ ₹ ..

( ४२ ) ज्वर हम लोगों से नहीं कहते, क्योंकि हम लोगों के लिये इससे अधिक करना मुम्भवही नहीं है पर निज अनुमान के अनुसार कार्य करने में भी कभी , सन्देह लगा रहता है कि यह ( अ- नुमान ) सत्य हो वा न हो, क्योंकि अपनो असावधानो और विश्वासघातकता प्रायः इम लोगो की उचकल्पना (idenl) को धुंधला कर देती है । अतएव ईश्वर के साथ कर्तव्याकर्तव्य वि- चार विषयक सहानुभूति का सम्पूर्ण भरोसा छूट जाता है और उस शान्ति के लिये जो उग्र हिताहितज्ञान भी नहीं प्राप्त कर सकता है, हम लोगों को ईश्वर पर निःकपट भरोसा और वि- खासयुक्ता प्रेम करके उनके आधीन रहनाही पड़ता है। मनुष्यों के आपसी सम्बन्ध में कुछ दूसरीही बात है; इसमें एक मनुष्य दूसरे के सम्बन्ध में 'गुणोत्कर्ष' प्राप्त कर सकता है। भिन्न भिन्न मनुष्यों के प्रत्येक कत्य में 'स्वधर्म' का परिमाण (standard) परस्पर एक दूसरे का जाना हुआ रहता है, अर्थात् प्रत्येक कार्य में हम लोग एक दूसरे को उस परिमाण' से जांचते है जो परिमाण कि हम लोग आपस के कार्यों को विचारने के लिये नियत किये रहते है। यदि उस 'परिमाण' से अधिक कुछ करते है तो हम लोग दूसरों से अच्छे आचरण के योग्य होते है और उनके सम्बन्ध में गुणोत्कर्ष प्राप्त करते है । पर यह 'गुणोत्कर्ष' केवल मनुष्योहो के सामने है ईश्वर के सा- मने नहीं, क्योंकि इस अधिक कार्य करने के लिये यद्यपि हम लोग मनुष्यों से बद्द नहीं है पर ईश्वर के नियम के अनुसार तो उतना वरच उससे और अधिक भो करना पड़ेगा। जैसे मनुष्यों के आपस के बर्ताव में उदारता' और 'न्याय' समान नहीं है, न्याय म्वधर्म परस्परजात परिमाण का अश है. पर उदारता नही । पर जब यह सोचते है कि उदारता के कार्यों को करने के लिये भी ईश्वर से हम लोग बद्ध है तो उस दशा में न्याय और उदारता दोनोही निर्वन्ध के भीतर है ॥

- - । ) मिति निमीतरामतो है। में ताकि धिकार'मटानागमनमो-नेगो निग्नि पEिE पियकी में भी देखा जाता है ? उत्तानमापन और समाधानका बो. वन मृता और हानि- जनी मसभाबर मनी पर 'अमन ममझ कर, नोग निन्दा बी. चापि वां वो दो कर बीर किमी की भी मानि न वी । रास लीग इमान को मानते है कि किमी म- नुत को अवसर पर उप मिन्नने पर भी अपने कन्याग वा मगर वो तु वस्तु व मा ल्याग देन का अधिकार नहीं है । वि.मी की पमा वरन देव कर मनीग ममझते हैं कि वह । अपनी एका व ग्रनमार उप वन्नु वं. मात्र व्यवहार कर रहे जो वो विश्वासी जान बार उसर्व पास धार ( वा घाती) रचना गया । यति मम नागी वी एमी मरम्मा तो भी जा तुन लिया गया है वह एसव, विरा देव परता है । पृव में निरव प्राये है कि यदि किमी मनुष्य में वैवल परिणाम- रहि विषयवीरगी हो और चित्तसखारी में वन्न वलही वा भेद और विवाद हो. तो उससे सदमदाचारविषया बोध पा को खान न गा. अयंत जमको यह ज्ञान न होगा कि चोन चित्तमम्बार मत और कौन प्रसत् । अव ये दोनो क- धन से सातो रवत: यदि एमीगी का हिताहितान न होता, पर वन्त जानी पीनाई अपने कार्य के पानन्ददायक और दुखदायक पर पर निकल जाति वा भेद जान तो धर्म और निवाई कानुनी सगाई निद न होतो: यदि किमी प्रारी-है. यानदायक पन्नों को लाग र दुरदाय पी ले तो हम लोग ईवन नाही समझे जान पर : हदबीन करने दोपी न मम ना मदत पर पारिवारितनान पोर हाई प्रावित भावा का अपने - ४४ ॥ मत मन में रहना म्बी कार करेगे वोही ममृची बात बदन्न जायगी। गन्त करण के दाग जाना जाता है कि हम लोगो के चित्तम- कार कोई पौर कोई अमत है और मंमार का मटमटाचार मम्मभो अनुगामक ईश्वर है जो हम लोगो के चित्तमम्कार को मटमटाचार मम्बन्धी क्रम में रखता है । ईश्वर का यह अधि- कार मयं मम्बन्धो है, और मत् पोर अमत् का भेट सब स्थान में अपना अधिकार जमाता है, कवन्न चित्तमम्कारीहो में नही पर प्रत्येक चिन्ता ( व्याल ) और ममार के प्रत्येक कार्य में इमका प्रयोग अवश्य होना चाहिये । अतएव अपने कार्यो के हेतुश्री की विवेचना करना और टी विरोधो चित्तसंम्काग में में उच्च- स्थित चित्तमस्कार का अनुमरण करना हो हम लोगो का मुख्य कल्य (म्ब धर्म) है पर हिताहितज्ञान के ध्यान में कार्यों के फली की विवेचना करना और शुद्ध गति से चुने हुए अचे चित्तमं- कार को परिणामहटि मे कार्य या व्यवहार में लाने का उद्योग करना भी हम लोगों का ‘कृत्य' है इन कारणी में और इस प्र. कार में “परिणामदृष्टि" निर्बन्ध' के भीतर आ मकती है। "जैमा मैं चाह वैमा क्यी नहीं कर सकता हूं?' के पूछने वाले का मम्पर्ग स्वभाव आदरकारी ( 1eserential) और धर्मशाल । वा विवेकी-onentholls) स्वभाव से सब प्रकार मे विजातीय है, और इस कारण वह इसके अवर्तमानता का लक्षण ममझा जाता है और कोई प्रत्यक्ष उल्लदुर्ग (वा अपराध) न करने पर भी मम्भवनीय असीम अधर्मता ( वा दोष ) कह कर दूपित होता है । nusNA.03.

( ४५ ) 771 पश्चम अध्याय कार्यान्यात नेत्री का श्रेणी-विभाग । वाचालित काम। घर न जागत्यादक प्रादिकारणों की श्रेणो गिना या देठ पता है जिनका कि अन्त:करण विचार वरलाई । यदि यह मन को विप्रचे मदमत् के निर्णय में का एक विमरवानपने प्रनि विरोध में अमृन्य का गिना माको प्रलं व विकार या मा पेन्ट मृन्य वाको चित्त- मंजरी तुलना । निन्य वर लेना चानिये और इन नि- F: मी - Fम में एवद वरने में कत्र्तव्याक्त्तव्य सीबीएम गरी मनोगी वो प्राप्त हो जा. मो - TRोगी की सिज प्रातियों मीनरी उत्तपता की "नार नमः । इन चिताबारी, परस्पर म्योग व व. Tभाव रे रीति की नानी बनना प्रनिघय और गमा नाला की मी एममा मावा कर रहा नही इल मनाया । जानोज) नावार के काम म :दी । यपि हमाको में अभी १२. निकिटाचा बन्न परम्म ३ हेतु निरन रगा यदि यह वेबन्द 7 :': .:. दोपहर दोध र तद .: बीवित- कदमे F- मामा- - रतुर हो- ६ . . 1 ( ४ ) । योग्य ( वा स्वकीय ) विषय की ओर ठेलते है । और (२) वे मूलकारण जो आत्म बोध और अनुभव के अनन्तर आते हैं और जिनमें किसो पूर्वपरिचित अनुभव के पुनगनन्द उठाने की इच्छा पहिले मे सोची हुई रहती है। पहिले को "मुख्य" और दूसरे को “गौण” कार्योत्पादक हेतु ( वा मूल कारण ) कहते है ये शब्द विशेष करके ठीक ( योग्य ) है, क्योकि ये केवन्न गिनती ही का क्रम नहीं, पर उत्पत्ति का क्रम भी बतलाते है। "गौण" चित्तसंस्कार सम्पूर्णरूप से नये नहीं है, पर ये आत्म अन्तःबोध के प्रभाव वा व्यापार से रूप बदले हुए "मुख्य" ही है और भिन्न दल बाधना चाहते है कयोंकि आत्म-अन्तर्बोध के व्यवहार से इनके आद्य ( वा पहिले ) आकर और सदसदाचार सम्वन्धो स्थान बहुत बदल जाते है । कोई २ कहते है कि बिना प्रसन्नता की इन्श के मनुष्य किसी कार्य को नही प्रारम्भ करता है। पर ऐसा होने से, विना पहिले प्रसन्नता ( वा आनन्द ) का अनुभव कियेहुए कोई मनुष्य उसके पुनर्घाप्ति की इच्छा कैसे कर सकता है ? और यदि पूर्वा- नुभव का होना अत्यावश्यक सिद्ध है, तो बिना कार्य किये हुए किसी 'मनुष्य' को किसी कार्य के परिणाम का अनुभव कैसे हो- गा। मनुष्य तो निर्जीव पदार्थ हैही नहीं कि अचल बैठा रहेगा और बाहरी पदार्थ उसको जगाने के लिये सुख या दुख देते र- हेगे। क्या वह इस संसार में सजीव बना कर नहीं भेजा गया है और क्या सजीव प्राणी का यह लक्षण नहीं है कि उसमें वे शक्तियां हो जो उसका सांसारिक मार्ग नियत करे और यह भी निश्चय करें कि उसमें कौन २ सा कार्य उसके योग्य है। अ- नुभव-तत्वज्ञानिया को यह याद रखना चाहिये कि बिना स्वा- भाविकज्ञान ( वा पशुबुद्धि ) सम्बन्धी शक्तियों में किसी प्रकार की परीक्षा वा अनुभूति ( experience ) नहीं हो सकती है। इस मंसार में जहा आहार स्वय मुंह मे नहीं पड़ जाता है और जल - । रवीना और मन में न तो T- Pीना और न नामी गरमी का सर में सिमाना नियम है कि Fऔर ने कार को नग्न गरम मस' ! मनोमो सामायिक प्रतिही प्र. पनि गीय सीवी मी है और कार्य करती है, गदिमाश एनकातीमाम्मारिक वप्नु रान भाजार भादो की मानु वृझ पद प्रजा सब कमा वा नियम ६ न.वि र जिवी। नाव सारे वापरतुनों पा रहना निच नो सन्धी व दिना या ग्रास अनाध के योग्य दर यी पार प्रेमा वर्ग। यो पा. भाविव ान ( In Ir' ) रसमा १ दिना दि६ उम वा नही करने में प्रस्ताव रताउनजीवन और वन्दार र वीदीर एक नियम ६ दिप्यमसनुप टीव नुनी महा है।. दक्षि दावा दिन बाद भी कार्य पमबुद्धि के प्रमाद नही सोना है, तो करे और पर नुनी में । वीपी EET for Fई । पदी चोहीं, .. :: :: 'रई योग्य बीट या fari - राऊती ई जिन 11. न ! कताई प्रलंक - ...... 3. नजीवी - -! 'दना पूर्वनुभव किया होती पाद ई. व पर परो. - 1 . ..

( ४८ ) चित, फन्नन्नाभ के पथ पर रखती है। जान पडता है कि म. नुष्य का समग्र स्वभाव और माग जीवन तुद्र जीवी मे भित्र नहीं होता है, पर मनुष्यो को पशुबुद्धि के अतिरिक्त और भी शक्तियां रहती है जो उनके पशुबुद्धि के कार्यफन्नी को प्रौढ वयस में भित्ररूप कर देती है। पशुबुद्धि वा म्वाभाविकज्ञान ( Instinct ) का कर्म प्रजात है पर इसका स्पष्ट बोध होना अमम्भव नहीं है। यह त और अभ्यास से न्यारा है । इममे फल प्राप्ति के हेतु उपाय किया जाता है पर उस फन्न का कोई पूर्वज्ञान नही रहता है। अतएव पशुवुद्धि विषयक चित्तसंस्कार वही है जो पूर्वानुभव हीन फल की प्राप्ति के हेतु आप से आप उपाय ठहराता है। यह 'अभ्यास से भिन्न वस्तु है क्योकि इममें कोई मनोरथ नहीं रहता है; और 'इच्छा' से भी न्यारा है कयोकि दो विषयो में से कोई एक के पसन्द करने का अधिकार भी इसमें नहीं है। (१) “मुख्य' चित्तसम्कार । "मुख्य" चित्तसंस्कार ( वा कार्योत्पादक हेतु) चार प्रकार के है। यथा- (१) प्रकृत्ति- (अ) क्षुधा, (इ) संभोगेच्छा, (3) स्वच्छन्द अंगविक्षेप। 'प्रवत्ति'--प्रकृति की प्रेरक शक्ति है । ये (प्रतियां ) जीवन की रक्षा और मनुष्यजाति की स्थिति के लिये अत्यावश्यक है । इनके बिना मनुष्य जीवन धारण नहीं कर सकता है। ये मनु- प्यों की प्रथम प्रावश्यक वस्तु है । ये गिनती में तीन है. क्षुधा संभोगेछा, और स्वच्छन्द अंगविक्षेप । इन में से पहिनी दो 'दू- न्द्रियजनित एमा" के नाम से प्रसिद्ध है और सम्पूर्ण इन्द्रियधा- री जीवो के, यहांतक कि वनस्पतियो के भी उपयुक्त है। जिन प्राणियो मे पोपण और बढ़न्ती ( या नवोनोत्पत्ति ) की आवश्य कता है, उनके लिये ये या इनके समान विपय अति आवश्यक (१६) - है. अत्याज्य है । पहिलो दो प्रत्तियां इन्द्रियधारियों से ईसा सम्बन्ध रखती है वैनाही सम्बन्ध तोसरी प्रत्ति (स्वछन्दअंगवि. क्षेप ) प्राणधारियो से रखती है। यह अंगविक्षेप की वाभाविक प्रत्ति है. जो मांस शिरायुक्त शरीर से पृथक करने के योग्य नहीं ! है। बीच २ में इसमें वित्राम भी लेना पड़ता है। केवल शारी- । रिकहो नहीं पर मानमिक गति में भी यह प्रकाशित होता है और प्रति शक्ति के प्रयोग में इसका आनन्द अनुभव होता है, जैसे. टि को बुगे वस्तु को अोर से दूसरी ओर लेजाने में या टेढ़े हाथ को सोधा करने में या बहुत देर बैठने के बाद उठकर चन्नने में वैने हो एक विषय को त्यागकर दूमरे विषय के सोचने में इत्यादि। यह स्पष्ट है कि ये प्रवृत्तियां यथार्य में "मुस्थ" (primary) और अत्यावश्यक है, ये हमलोगो के प्रकृति को अन्तर्जात ( वा- सहज ) शक्तियां है और इनमे पूर्वानुभव या शिक्षा की आवश्य- कता नहीं है। (२) मनोविकार- (अ) घणा, (इ) भय (उ) क्रोध । चित्त संस्कारो का दूसरा वर्ग 'मनोविकार" है । ये कार्यो. त्पादक हेतु हमलोगो को प्रजाति को प्रावश्यकताओं से नहीं उपजते है वरञ्च दूसरों के हाथ से हमलोग जो कुछ दुःख सहते है उन्ही से उपजते है, और ये सदा दु:खमय और बखेड़ा और अपकार के अनेक मुन्न है । अतएव इनकी ओर मनुष्य की सदा अप्रोति का भाव होता है-हानिजनक और वेमेल वस्तुत्री को हटाना, या वयही उनमे अन्नग हट प्राना, धमकी देने वाले और आक्रमण करने वाले विषयों में अपने को बचाने के लिये और अपने नियुती जोवन के अमंगत विषयों को दूर हटा देने के लिये ये सामग्री है। ये तीन है और काल के तीन अभागी न भविष्यत व भूत) के अनुमार विभक्त है। जो वस्तु वा- भाविक विरोधी है वे यदि सामने आवे तो उनको प्रति 'वृणा - -- - ( ५० ) हाती है; जो तुरत हमारा अपकार करचुके है उनपर 'क्रोध' होता है, और ना हमारी बुराई करने का धमकाते है, उनमे 'भय' होता है। ये सब यथार्थ मुख्य" और स्वभावप्रेरित चि- तसस्कार ह ओर दुःखमय और अप्रिय वस्तुओ की परीक्षा के पहिले ही व्यापार में पाते है, यद्यपि अनुभव होने पर इनकी किया और और वस्तुपा पर भी होजाता है । जैसे कि भय, यद्यपि अनुभव होने से बहुत वस्तुभी से भय उपजता है पर तो भी अपनो प्रथम अवस्था में यह । भय ) अष्ट आपत्ति का यथार्थ भाविदर्शक पूर्वोपदेश ( वा पूर्व प्रबोध ) है । इसके अनेकदृष्टान्त है कि मनुष्य और दूसरे २ जाव दोनोही भयंकर वस्तु को प्रथम दृष्टि में, बिना भय के कारणो को जाने हुए, भयभीत होने लगते हे जैसे-भेडा के झुड जो अब तक विघ्नो से बचे हुए है, हुंडार को देखते ही चारा ओर भागने लगेगे, और दूरसे बाज को देखकर सब मादोन चिडियां अपने २ बच्चो को अपने डेने के नीचे छिपा लेती है, और दूसरे२ पक्षी भो भय खाने लगते हैं जो कि उनको पहिले कभी भी नहीं सिखलाया गया है । यद्यपि मनुष्यों को दूम हो के चिताने पर अथवा अपनी बुद्धि से बहुत से विघ्नी का जाम होता है पर तो भी पशु- बुद्धिजनित ( वा सहजज्ञानप्रयुक्त ) भय के उदाहरण भी मिलते ह । जनमतुआ बच्चे को दूरतक ऊंचा लोकाने से वह भय प्रकाश करता है जो मब लोग जानते है, पर इस भय का कारण हाथ पैर टूट जाने की भावना बतलाना अयुक्त होगा । क्रोध भरे मुह को अथवा लाल • पाव किये जगली जानवरी को देख कर लडका डर जायगा जिमने कि इन भय के चिन्ही का कभी भो पहिचानना नही सीखा है । पहिले पहल जो समुद्र मे जाता है वह हिलकार और टक्कर मे कापने लगेगा। ये सब अ- नुराव निस्सन्देह मिश्रित है पर हम समझते है कि इनमें वे मून सूत्र पहिलेही से रहते हैं जिनके द्वारा टूमरे जन्तुओ की नाई . - - मनुय में भी महाप्रया भय .--.-.: .. को ग्राम चिन्ता के हिना को प्राम==: कर लाना है। 'बो' में प्राय: जानादि का ननालाई-%D के बिना विचारे ही काम पज प्राता:हिना बिना यह अपवार करने वाले विपय की सीरप का करता है चाई व विषय मारया निक जीन कम में भी जब विप्रात्मरक्षा उत्तम उपाय तुन यः बहुन वान्न त मन्त्री वा बिम्बयानरन्तारानी निवेदनानी । ....... वह मन का नाम देता है और दुटना ६ मा प्रकार विनी- 713 सका टवाना (वा जीतना, न दि उत्पनरमा म 100 इन बातो से रम। बभावप्रेक्तिन "मी : 111 विदाम) में अवश्य ही प्राकर जमा intr: मंग। अपना मन्ध विना विचारलंद प्रकारे पापा र पपकार के विरह यह एकाएक पटरहा Fil अबतक जो कुहा है हममें और विप वर मनिता इतिधाम देखने से यह प्रत्यन होगा वि यात ५३ PAR. कति वे अतिरिक मनुप्यन्त्रभाव विपना विषय नही लिखा गया है। इनमें से एक भी चित्तमंकार 'मनुष्य से भाव श्यक (वा अनिवारणीय) मम्बन्ध नही रखते है: ये मब 'पदार्य से सम्बन्ध रखते है; वे पदार्य मजीव हो मवत है पर एममे प्र. धिन नही । यह आप कह मवत है कि इनमें में बहुत मनुष्य ममाज में अपना प्रधान कार्य करते है पर यह प्रावश्यक नहीं है, यदि हमन्नीगो में ने मनुष्यत्व निकान्न निया जाय तो भी इन की हमदोगी ने वर्तमानता हट नहीं जायगी । पर अब जाधे टूर पर, आधे चित्तनबाग का वर्णन करने पर हम उस स्थान में पहचे हे जहा से आगे शुद्ध मनुष्य म्वाभाव का वर्णन होगा। ।

( ५२ ) । उद्योगी (active) चित्तमम्कारी में से दो वगों को व्याख्या बाकी है; इनमें से पहिने मे यद्यपि क्षुद्रजन्तु पी से कुछ सम्बन्ध पाया जाता है तो भी मनुष्यत्व (personality) का विशेष तत्व इनमें इतना प्रबल रहता है और मनुष्य के माय रहने वाले पशुओं में पाये जाने से इनको इतना ऊपर चढ़ाता है कि इन (चित्तसंम्का- रो) के वर्णन करने में हमलोगों को यह मानना ही पडेगा कि अब सीमा के पार हो रहे है, और कि 'मनुष्यहीन लोक' में इन चित्मम्कारी का यथोचित (वा शुद्ध) बोध ( वा भाव ) और परि- चय न होगा। (३) स्नेह-(अ)माटपिटमम्बन्धी स्नेह, (इ) ससर्गिक स्नेह, (उ) करुणा (वा अनुकम्पक स्नेह) । मुख्य कार्योत्पादक हेतुत्री के टतोय मर्ग में भिन्न भिन्न प्रकार के 'स्नेह' है। इनमें आकर्षकशनि है; ये हमलोगों के चित्त को दूमगे को ओर खीचते है । जोवधारियों का सामने रहना कि जिममे अपने वर्ग का ध्यान आवे इनके उपजने के लिये प्रावश्यक है चाहे वे जीवधारी उमी वर्ग के (अयोत मनुष्य) हो या न हो । "मनोविकार" में इनकी भी आवश्यकता नही थी। केवल वि- रोधी वस्तु के सामने आने हो से यह उपजता है पर हा इन वि- रोध वस्तुओ में भी जीव की भाभा उस समय मान लेते है । जैसे , कार्योत्पादक हेती की क्रमशः गणना कर रहे है वैसेर उच्च • बस्तुओं (या-आस्प दों) की आवश्यकता होती जाती है। "प्रवृत्ति में चित्त से खोजे जाने पर बाहगे वस्तु मिल जाती थी। "मनोविकार' में यह क्रम उन्नट गया, यह पाक्रमण क- रने वाली वस्तु के पाने से उपजता था, पर उन वस्तुओ को उस समय जीवित के ऐमा मानलेने ही से काम चलजाता था । परतु स्नेह इसमे भी सन्तुष्ट नही होता है । इसके लिये मनुष्यो के समान शरीरधारी जीवा का रहना अपरिहरणोय है (या अत्या- वश्यक है)। कम से कम, मनुष्य के सदृश जोवो का रहना, (जो । ।

( ५३ ) :- - कि एक प्रकार से मनुष्य समझे जामकते हैं ) तो आवश्य कही है। पर इनमे स्नेह का व्यापार केवल मौन्तिक ही भर देवा जाता है। बिना मनुष्यलोक में आये हुए इनका सञ्चा बोध नहीं होने पाता। "स्नेह तीन प्रकार का होता है। इनमें से पहिला. जिमने मनुष्यत्व को आवश्यकता और सभी से बहुत कम है, 'माटपिट नेह है. जिसके नियम ये है कि जिन जीवी पर वह दिग्बनाया जाय वे (३) हमलोगो के आधीन हम लोगों के मारतत्व का प्र. तिरूप (या प्रतिमा) हो और(२ हमलोगोके आचिन यात्राधीन) हमलोगों के जीवन (या स्थिति) का अनुक्रम हो । यदि इन दोनो मृतसूत्रो में से एक भो अनुपस्थित हो यदि मन्तान मानवो हो पर अपना न हो. या अपना तो हो पर वह मनुथ न हो; तो पहिले हटान्त में यह स्नेह वठकर वन्न वनों के प्रति माधारण दया या प्रोति भर रह जाता है: और दूसरे में यह भाव उन्नट कर घणा, या भय, या त्रास, हो जाता है । यह बात चुटजन्तुग्री में इमका कार्य देखने से प्रत्यक्ष है । बालक पर माता का स्नेह और पिता का स्नेह तुन्य ही होता है, यदि कही माता में इस का अंश अधिक देखाजाय तो इसका कारण यह जानना चा- हिये कि उस सन्तान का पालन माता पर अधिक निर्भर है। जहा दोनी पर यह अधीनता बराबर रहती है, जैसे कि पक्षियों में, वहां दोनो पर मन्तान की रक्षा का भार भी बराबर रहता है। अतएव माता पिता के स्नेह में भेद का कारण इमकी घटती बढ़तो होना नही है, वरञ्च, इसके उपजने के पूर्वोक्त टो नियमो । में से, माता का स्नेह इन ध्यान से सन्तान पर होता है कि वह "माता पिता के जीवन का पराधीन अनुक्रम” है, (continu.t. tion) और पिता का इम ध्यान मे कि वह "माता पिताके मा- रतत्व का म्वतत्र प्रतिरूप (या प्रतिमा)" है | इस स्नेह की दो । भित्रसूचक रीति और क्रिया एक दूमरे को पूरा करती है और -/ घर (वा एहस्यायम) मे वो और पुरुष का यथायोग्य मम्वन्ध स्थिर करतो है-माता घर की वस्तुओं में मेवा करती है, और पिता बाहगे वस्तुओ मे; माता बच्चे को सहायताकाक्षो (अर्थात दूमरे हो पर निर्भर रहने को) अवस्था हो को रखना चाहती है पिता बच्चे की बढती हुई मतत्रा में प्रसन्न होता है; माता अपने सन्तान के बचपन बीत जाने का खेट प्रकाग करतो है, पिता जवानो के आने के लिये अधोर रहता है कि जब उसकी (indisdalits ) व्यकिता जम जायगी (स्थिर हो जायगी और प्र- तिमा (या प्रतिरूप) पूरी तय्यार होजायगो। यह स्नेह विमो टूमरे से नहो निकना है पर स्वयं मनरूप है । यह क्षुद्रजन्तुषो में अधूरे रूम से देखपडना है। मनुथ में प्रामबोध और बुद्धियुक्त प्रकृतिके होने के कारगा यह उनसे कुछ रूपान्तर होजाता है पर इसके मून (वा सार) शक्ति को उठा नही देता है। हितीय प्रकार का स्नेह "ससर्गिक स्नेह" है । यह अपने सदृश और तुन्य मनुथो के प्रति होता है। पर सम्पुर्णरूप से तुल्य होने से भी काम न चलेगा, कुक भेट और अममता अवश्य चा- हिये, और जैसे कि अपने परिवार में आपस के प्रेम के लिये बल और निर्बलता. पराक्रम और मौन्दर्य, (रक्षा पाने की प्राथा में) ऊपर देखना और (रक्षा करने को सामर्थयुक्ता इच्छा से) नीचे देखना (अर्थात बडों से आशा करना और छोटो को रक्षा क- रना) इत्यादिक मिलावट अत्यावश्यक (या तात्विक) है; उसी प्रकार से, बडो मंडनो मे, वास्तविक प्रेमबंधक कारण एक दूसरे के घटो का पूरा करना हो है, निःसन्देह, पुरुष और खी, स्याने और लडके, के प्रेम में असमता एक आवश्यक अश है, और इस .. इस देश में प्राय: देखा जाता है कि त्रियां अपने लड़की को बचपन में खेलते देखना अधिक पसन्द करती है यहां तक विवाहादिक उत्सव भो उसी अवस्था में करना चाहती है, इसका कारण एक यह भी मालूम होता है।

- ( ५५ ) - में कोई सन्देह नहीं देख पड़ता है कि वैसी ही घटी पूरी करने । को आवश्यकता साधारण मनुष्य सम्बन्ध में भी है। हां इनमें ! इतना भेट तो है कि घरज सम्पन्न में असमता या भेट प्रधान और सन्न तल नो कि प्रतति को समता के भीतर मनोहर भावी (वा चमत्कार) डालता है, सामाजिक सम्बन्धों में संगति (या महबार) या सहशता हो दया का नेव ( या जड़ ) डा- लता है और सब विरोधी विषयो में एक प्रकार की एकता पै. . ठाता है । पहिना भेद पर खिर रहता है और दूसरा 'समस्त. ता' या अखंडता ) पर: यद्यपि इनमें से कोई भी बिना दूसरे है नहीं रह सकता। घरेल और सामाजिक सम्बन्ध एक दूसरे को पूरा करते है; तिसपर भी वे दोनों स्वतंत्र है; और एक दूसरे से नही उपज सकता; ये दोनों एक दूसरे के विरोधी है। बहुत ही कम पादमी ऐसे मिलेंगे जो अपने परिवार और साथी दोनी हो पर पूरा प्रेम रख सकते हो और जो घरेज प्रेम के खिंचाव को विना कम किये ही अपने वरावर के लोगो पर (अर्थात संगियो पर ) पूर्ण ( बहुत ) स्नेह रखें । "भापा" ( या दोन्ली ) जो अान्तरिक विचार और अनुभव कहने और जानने का स्वाभाविक ज्ञान है इस करुणायुता अन्तर्वाध का चिन्ह है और यह सांसारिक सन्देह हा तक फै- लता है इसका यह सर्व-कालिक परख । परीक्षा) भी है। यह भाषा परस्सर ज्ञान का जितना हो अधिक ण्य बनाती जाती है ठोक उतनी ही अधिक शक्ति से ससर्गिक भाव अपना अधिकार प्रकाश करता जाता है। विटेशी भाषा प्रायः स्वभाव को भी विलग करती है अर्थात विदेशी भाषा बोलने वाले लोगो से स्नेह प्रायः नहीं होने पाता है; यहा तक कि एक देश वा जाति के लोगो में भी जो एक प्रकार की बोलो एक ममूह के लोगो को दूसरे समूह से पृथक् करतो है वह उन मनही के स्नेह और मन्त की सोसा वतन्ताती है । मैथिल और महाराष्ट्री वोलने -- ( ५६ ) । में वह स्नेह होना कठिन है जो मैयिन्न बोलने वालों में पापुस मे हो सकता है अतएव आज कन्न प्रत्येक गाव की बोली भिन्न ३ हो जाने मे प्रायः टेखा जाता है कि एक गाव के लोग दूमरे गांव वाले से चूरा स्नेह नहीं रख मकते । शब्दों में यह शक्ति रहने का कारण यह है कि हमलोगों को मनुष्यता की कल्पना (Ideal of humanity) से जो मिना रहता है उस से सहानुभूति और जो उससे बिरोध रखताहै या भिन्न होताहे उससे घणाहीती है। इसी कारण से शन्ट हेन्त मेल पैदा करताहै या घिन वा चिढ़) दिलाता है । और स्नेह और राणा का सजीव बिपय टेग्नु पड़ता है। अतएव संसर्गिक स्नेह वही है जो हमलोगों के स्वभाव (वा- प्रकृति) की एकता के ज्ञान से उपजता है। तीसरे प्रकार का स्नेह " क राणा" है जो दूसरे की विपत्ति (पीडा ) देख कर उपजती है। इसकी शीघ्रता ( फुर्ती ) और व्यग्रता ही से इसका स्वभाव प्रेरित होना दृढ रूप से प्रमाणित है। लडकपन में और जवानी में, सभ्य मनुष्षो मे और वैमेही जंगन्नी लोगों में यहां तक कि. जानवरों में भी जिन में मनुष्य स्वभाव (वा मनुष्यत्व) भागया है, सभी मे केवल विपत्ति देखने ही से यह तुरत उपजती है और प्रथम क्षण में जितनी उग्र (या प्रचण्ड ) देख पडेगी उतनी फिर नहीं। यह किसी स्वार्थ से नहीं उपजती है। यदि कहिये कि दुसरे के दुःख को मानो अपना समझ कर लोग उस पर करुणा या दया प्रकाश करते है पर तौ भी अपने को दूसरे के स्थान में रख कर इसका अनुभव करते है इस लिये इस कारण का पात्र वही दूसरे के स्थान में रखी हुई पात्मा है और न कि वह प्रात्मा जो कि सद्यः अपने शरीर में उपस्थित है। दूसरे के दुःख को जिस समय अपना समझ कर हम शोक प्रकाश करते है उस समय अपने को हमन्नोग भूल जाते है और सामने खडे हुए दूसरे जीव की रक्षा करने को दौड़ते है। यह भी जानना चाहिये कि यह कोई बात नहीं है कि जिस दुःख का अनुभव स्वयं न हो चुका हो उसका लक्षण दूसरे में देख कर हमलोग उसे न समझ सके और हमारे मन में कुछ न आवै। सच यह है कि जो कोई बोध हमलोगों के गसनीय है अर्थात जिसको समझने या अनुभव करने को शक्ति हमलोगों में है उसका भाव हसलोग उसके स्वाभाविक लक्षणही से समझ जायगे चाहे उसका अनुभव किये हों या नहीं। यह बहुत बार देखा जाता है कि किसो शोक वा उदासी का ज्ञान पहिले अपनो करुणाही हारा हमलोगों को होता है। दूसरे ने दुःख में सहानुभूति (Sympathy ) और दूमरे के सुख नं सहानुभूति नो तुलना वारें तो पहिले की फुर्ती [ सवरता ] पौर उग्रता देख कर, मनुष्यों के स्वभाव और उनके भाग्य के पापस को उपयुक्तता का एक प्रत्यक्ष उदाहरण मिलेगा। जो संगी सुख और हर्ष में है वह हमलोगी के प्यार का पामरा देख सकता है या प्रयोजन पड़ने पर इसको छोड़ भी दे सकता है पर दुखिये हमलोगो की सहायता चाहते है और इसी पर नि. र्भर रहते है और यदि प्यार के नाई दया में बिलख किया नाय तो वे दुखिये विलम्ब होने हो मे नष्ट होजायगे। विपत्ति ( या भायट) उद्दण्ड प्रवल पोर शोन बढ़ने वालो विमारी है जिसमें तालालिक चौकमो और सावधानो से औषधि प्रयोग को प्रा. वश्यकता है और देखने वाले के जो में करुणा जगाने की शक्ति इसमें रहने के कारण यह अपने वैद्य को तुरत हो बुन्ना लाता है और मावश्यक औषधि ले लेता है। करुणा (या दया) और इसके तात्कालिक प्रकाश के संसार में रहने से सिद्ध है कि दुःख और शोक पर प्रति में भून्त नहीं है (पर्यात कर्ता ने इन को भूल से नहीं रच दिया) क्योंकि इनके लिये योग्य उणय [ औषध] भो ईश्वर ने रचा है, और इससे मालूम होता है कि परमोत्कट या पारलौकिक लाभ पाने के लिये शोक मानो शिक्षा खरूप है। ।

( ५८ ) - [४] मन: कल्पना-[अ,शायर्य इ] अंगमा उ]सन्मान भक्ति । मे कि प्रथम वर्ग के चित्त संस्कार मनुष्यलोक के नीचे हो थे वैसे इस अन्तिम वर्ग के चित नंकार मनुप्यन्नोक के ऊपर चढते है। चतुर्थ वर्ग में "मन कचना" है जो मानसिक सम्बन्धों को पोर जातीहै अयांत जिनकी त्रास्पद के विचार चिन्ता.या बोध के विषय है जो हमलोगी ने जपर ह पर तो भी हमलोगो मे सम्बन्ध मन्यव है कि रखते है मे "प्रति' हमलोगो को अपने से बाहर ले जाती है; पर यह नही जानते कि किधर, और "मनोविकार" हम लोगी के प्रवर्ग या विजाती वस्तुओं को हमनोगी ने हटाता है चाहे वह पदार्य हो या मनुष्य हो और स्नेह' हमलोगो की मवर्गी। या सजातो] वस्तुप्रो की ओर हमलोगों को खीचना है जो वस्तु वीवल मनुष्य हो सकता है चाहे समान हो या असमान । उसी प्रकार से 'मनः कल्पना' काम [या लालमा ] यारी हमलोगो से उत्कट विपय की ओर जाती है, चाहे वह विपय मनुष्य नबन्धो हो या नहीं। यह तीन प्रकार की है और यज्ञ विभाग हमलोगी की प्रजाति के तीनों ममः शक्तियों [inenlnes | और उन पर रचित तीनों शाची (या विद्याओं ) से मिलता है. यह निन्न लिखित सारणी से स्पष्ट होगा। मनः शक्ति - [0] बुद्धि विषयक [२] भावना [या कल्पन ] विषयक [३] नीति विषयक । शाम [ या विद्या]-(१) तर्क शाख-(२) सौन्दर्यशास- (३) कर्तव्याकर्तव्य शास। मन: कल्पना-(१) प्रार्थ (२) प्रशंसा ( स्तुति)- (३) सन्मा- न (या भक्ति) भार्य वार्यों का कारण पूछता है; प्रशंसा सौन्दर्य की भोर झुकती है; और सम्मान (या भति) जपर उत्नोत्तस भलाई की पोर ताकता है।

- । पावर्य प्रथम [ या गच्च ) बुद्धिविषयक चित-मन्दार है जिसमें नव तत्वज्ञान fphilto pihr] निकलता । इमकी प्रो तर मलझने के लिये पहिले मार्य और 'विन्मय में भेद बा. न लेना चाहिये। 'विनय तभी होता है जब पनि मन, किमी एक प्रकार का ध्यान किनो विषय के बारे मेधा ग्रा है और अब उसको बिक देखते हैं: जम कि विमो मित्र को जानते है कि पाजन गन्नड़ में है और नमको पान मौज फ्फरपुर में देखें: या, कोई इन्द्रजाल हमारे कमान्न बी ने कर चिव चियरे कार डाले और फिर तुरतही उमको मनचा नि ले। जहा पूर्वज्ञान नहीं है वहा वह भाव नही उपज माता पौर इनसे यह भाव छोटे बस के मन में नही उपज मकता कि जिनमें विषयगे का अभी कोई व्यवहारिक पर्याय ( या क्रम ) नहीं बंधा है, और जिमको लिये एक विषय दूमो मे भधिवा पन- जाना या अनूठा नही है । 'मास्य नये और अनपेक्षित [या प्रावान्निवा विषय का फल है. अर्थात प्रत्येक घटना का जिसके लिये अबतक कोई वान न पड़ा है पर जो कि नवीन प्रजाति में प्रकाशित हुआ है । इसमें पुराने अनुभव या पूर्व प्रतो- क्षा की आवश्यकता नहीं है । जब तक वस्तुयो को नियत चान्न न जान लेगा तब तक 'पाचर्य हो रहेगा और अनुभव और विद्या या ज्ञान ] उपार्जन करने का समग्र व्यवहार इसी मन: कल्पना का लगातार [ या निरंतर ] माधन है । काल की गति मे यह भाव कुंठित हो जाता है और तब केवल अपूर्वही वस्तु- श्री में नवीनता पाते है। हमारी समझ मे प्राति का सच्चा क्रम यह है -(१) 'पाय' अनजाने हुए म (क) बान और प्रती. 'क्षा जाने हुए में; [३] 'विन्मय' अनोखे विषय में । 'पास' विशेष करके लड़कपन में प्रबल रहता है; और लडकपन के प्रलोभन (या पानन्द ) का मुख्य कारण इसी की विद्यमानता | लडकपन वो बाद भी यह अपनो शक्ति तब टेखलाता है १ है (..) । जब हम नोग नये नये विचार के क्षेत्र में पहुचते है चाहे वैजा- निक पाकर्षण गति वहा ले जाय, या उत्पादक प्रति जो जात बस्त में वह रग टेग्वन्नाती है जो हमलोग उसमें देना भूल गये थे और जो जीवन और संसार और हमलोगीन्वभाव में नूतन दृश्य प्रकाश ( या प्रत्यक्ष ) करता है। आलसी लोग, जो केवल जीवन के अपरिहरणीय विषयो को जान कर सन्तुष्ट हो कर मो जाते है आर्य करना क्या कहलाता है सो भी भून नाते है और तभी जागते हैं जब कभी कोई विपय स्वयं जाकर उनकी दैनिक गति में बाधा डालता है। पर यह तो अंधलापन को जड़ता है, प्रात्मा की जीवित दर्शन शक्ति नहीं । जहां तक इस आलस को रोकते रहियेगा तथा नये नये विषयों पर ध्यान दीजियेगा वहां तक यह लड़कपन का 'पायर्य' जन्म भर चिरस्थायी रहेगा। और यह बडा भारी कारण है कि किसी मनुष्य का स्वभाव थोडे दिनों में फीका पडजाता है और किसी का सदा ताजा रहता है । पद्य काव्य और धर्म का यह काम है कि पायर्य के धारा में बार २ हमलोगो को डुबोवे कि जिस से हमलोगी को प्यास बुझ जाय और यकायक जी उठे । अत- एव जानने के पहिले पाथर्य किया और अधिक जानने के पहिले फिर भी पाचर्य करना अवश्य होगा। 'प्रशंसा और आर्य भो लोग मिला देते है इसलिये इनका भी भेद जान लेना आवश्यक है । श्रापर्य कारण के खोज में गुप्त और अज्ञात की ओर जाता है; 'प्रशंसा'-अर्धात् सौन्दर्य का जान-मन में विद्यमान वस्तु की ओर जाती है, और उस वस्तु का सत्कार है । वह क्या है जिसके कारण हमलोग किसी वस्तु को सुन्दर कहते और वैसा ही अनुभव करते है; इतनी भिन्न २ वस्तुओं में सौन्दर्य का कौन सा सामान्य हेतु है;- पाकार और रग और संगीत मे, कार्य और स्वभाव में, प्राति, साहित्य और शिल्पविद्या में इतनी भिन्न २ वस्तुओं में सौन्दर्य का कौन मा सामान्य ( common ) हेतु है यह भी प्रान कठिन और लाभकारी है, पर यह विषय दूसरे जान्न का होने के कारण यहा नहीं तिखा जायगा। इसके बारे में यहा इतना ही कहना यष्ट है कि यह मनः कल्पना और मत्र दूनरों ने विशेष करके भिन्न है। एक तत्त्वज्ञानी ने कहा है कि मौन्दर्य के पहिचानने का कोई लक्षण नही है; यह वर्तमान रहता है और स्वयं प्रत्यक्ष (या व्यत, प्रकाशित ) होता है। आप इसको दिखता सकते है पर सिद्ध नही कर सकते । प्रशसा के पात्र रमणीय (या रुचिर) होने के कारण सुन्दर नहीं देख पड़ते, पर सुन्दर होने के कारण रुचिर ( रमणीय. प्रसवताकारक) देख पड़ते है। बहुत से ऐसे पदार्य है जिन में कोई सुन्दरता न रहने पर भो सुन्दर देख पड़ते है । सब मनुों में और सब जातियो में देखा गया है कि तत्वत: सौन्दर्य का परिणाम एक ही है। पर हा, संयोग से और जपरी वस्तुओ से वह मनःकल्पना बहुत रूपान्तर होने के योग्य सी है। जैसे, एक वैज्ञानिक माता- -सुह-दाग वालो वियो को बहुत सुन्दर कहा करते थे क्योकि वह तडपन में एक माता-मुँह-दाग-वाली लड़की पर स्नेह न रखते घे. और एक दूसरे तत्ववेत्ता गानेवानी वालाओं को कुरू- पा होने पर भी बहुत सुन्दर समझते थे। यह अनुभव (या प्रशंसा) मनुष्यो में एकसां नहीं रहता है किसी में बहुत और किसी में थोडा । विमो २ में यह बहुत धुं- धला और प्रज्ञात रहता है, उनके लिये चित्रकारों की सौन्दर्य- दृष्टि' (अर्थात् सुन्दरता पहिचानने की शक्ति ) अमृन्तक, कल्पित वृझ पड़ती है । जो स्वभाविक ( अर्थात जन्मही से ) चित्रकार है उसमें यह प्रबल और उग्र रहती है; सौन्दर्य की दृष्टि उसके ज्ञान में इतनी उजल और स्पष्ट रहती है कि इसको प्रकाशित करने के लिये वह इस बारम्बार प्रेरित किया जाता है; और सामान्य लोग उसके करन (या व्याख्यान को प्रकृति सिह मा.

( २ ) नते है क्योंकि यह उनके निज पाई-प्रकाशित अनुभव से मिलता है; अर्थात जो भाव उनके चित्त में कुछ २ पहिले मे था पर वे स्वयं उसको अच्छी तरह से प्रकाश नहीं कर सकते थे. वही वात जब दूसरा पाटमी न्यष्ट रूप में दिखलाता है तो वे लोग भी उसको सच्चा मानते है। यह कहावत वहुत सच है कि (poeticitill, mon fit ) 'कवि जन्म हो से (कवि) होता है न कि बनाया जाता है, अर्थात कवि स्वभाव हो से होता है न कि विद्याभ्याम से; जो कवि होने वाना रहता है उसमें काव्य करने की शक्ति जन्म हो मे रहती है । इस ईखरदत्त शक्ति को वे सभी लोग मौलिक मानेगे जिन्होंने कभी भी ऐसे लड़के को देखा होगा जिमकी श्राख ऐसी करना (या अनुभव ) गोल है जिसमे कि वह आप हो आप सौन्दर्य की भाषा को समझ मकता हे, कभी भी गंवारपन ( वेढव बनावट ) या शोभा ( मौन्दर्य ) के रूप, शब्द या गति को बतलाने से नहीं चूकता है, और अनुभव के प्रत्येक चतुर (हर्षजनक ) मेल { coonyms ) को शीघ्र ग्रहण करता है। अन्तिम मनः कल्पना “सम्मान" (भक्ति ) है जो उत्तमोत्तम सापा ( भलाई ) को पहिचानता है। प्रथम दृष्टि में सम्मान को पौर सब चित्त संस्कारो के साथ रखना असगत देख पडेगा, पर यह ऐसा नहीं है। यद्यपि सदसदाचार सम्बन्धो गौर भक्ति स- बन्धी अन्तर्बोध में प्रति निवाट ( या अन्तम्ध ) सम्बन्ध है और दोनो एक ही परिणाम की ओर झुकते है, तथापि हम उनकी समता को नहीं मानते। यह सब चित्तमंफारी से उत्कृष्ट है और अपने से उत्तम गुण ( या स्वभाव ) वाले स्नुप को देखने से उत्पन्न होता है। उत्त मोत्तम भन्नाई या उत्तमोत्तम जीवन की ओर हृदय का आपसे पाप जाना ही 'सम्मान' ( भक्ति ) है । प्रगट बोर और पुण्यात्मा. पों के अतिरिक्त अलक्ष विषयों पर भी यह भरोसा करके जाता ( ६३ ) है, जो इससे उत्तम और उत्कट है और उनके सामने नम हो कर उनका सत्कार करता है। सन्मान (भक्ति ) प्रत्युत्तम प्रकार का सदसदाचार सम्बन्धी अन्तर्बोध है । इससे और निर्वन्ध के अनुभव से घनिष्ट सम्बन्ध है, पर ये दोनो एक ही (या समान ) नहीं है। निर्वन्ध का ज्ञान निवारक है: यह निष्ट पाशायों का अनुसरण करने से रोक- ता है।'सन्मान '। भक्ति ) प्राशावान और प्रेमयुक्त है, और प्रसन्नता से उत्कृष्ट चित्तसंस्कार और उसट स्वभाव ( या गुण) वाले की ओर प्राशा के सहित ताकता है। यह बात कि हमलोग पहिले अपने ही चित्तसंस्कारों का विचार करते है, 'सम्भान' ( भक्ति) को मुख्य और स्वच्छन्द चित्तसंहार होने से नहीं रोकती है। अपने कर्तव्याकर्तव्य ज्ञान में की उत्तम भलाई को स्पष्ट रूप से विना जाने ही सम्मान (भक्ति) हमलोगों के धर्मविषयक बड़े लोगों और घर की बोर भी जा सकता है, और इस कारण से यह 'मुख्य सहज ज्ञान' है क्योंकि इसके लिये कोई प्रात्म बोध की पावश्यकता नही पड़ती है। पर यदि अपने भोतरो उत्तष्ट चित्तसंस्कार का गुप्त बोध न रहता तो उत्कष्ट स्वभाव ( या गुण) के लिये ऐसा स्वच्छन्द 'सन्मान' (सक्ति ) न हो सकता, और इस गुप्त पन्तर्वोध की कारण हमतोग 'सम्मान' (सति) के बारे में भी कह सकते है कि इसन्तोग अनुमान से पहिले ही चित्तसंस्कारों का विचार कारते है। चित्तसंस्कारों का जपर लिखा हुमा क्रम स्वाभाविक (या प्राकृतिक ) काम है घऔर अपने वाहरी परस्पर सम्बन्धियों को क्रमशः बढ़ते हुए गौरव से मिलता जुलता है। "प्रकृत्तिवां' के. वल अवस्था से परस्पर सम्बन्ध रखती है, “मनोविकार" कारण से "स्नेह" मनुष्य (शारीरिक प्रास्पट) से, और "मनाकल्पना” पूर्ण सिद्धि से परस्पर सम्बन्ध रखती है। .

( ६४ ) यद्यपि कालक्रम से मन:कल्पना आत्मबोध के अनन्तर उत्पन्न होती है और जब तक ज्ञात वस्तुप्रो से मनुष्य अपनी प्रात्सा को अलग न जानले तब तक इसका उत्पन्न होना असम्भव है, तथापि यह 'मुख्य' ही चित्तसंस्कार है, 'गौण' नहीं, क्योंकि इसको निन पात्मा या इसके भावों से कोई लगाव नहीं रहता है और यह मनुष्य को फिर भी प्रात्म-विस्मृति अवस्था में ले जाता है अर्थात् मनुष्य इसकी विद्यमानता में अपने को भूल जाता है । इसका प्राशय सदा स्वार्थहीन और निज सन्तुष्टता के ध्यान से भी हीन रहता है। (२) गौणरूपान्तर के लक्षण । पूर्वोक्ता नारहो “मुख्य” कार्योत्पादक हेतु तत्वतः कर्म करने में खार्थहीन है, ये हमलोगो को बिना इच्छा और फल के सोने का अवसर दिये हुए हमलोगों को इधर उधर देडाया करते है परन्तु जब वे प्रारम-बोध युक्ता प्रकृति में पाते है तब हम लोग तुरत उनके व्यापार को जान लेते है। उनमें से प्रत्येक अपना इष्ट प्राप्त करने में एक विशेष प्रकार की टप्ति (या सुख) देता है; और दूसरी वार इसके उपनने के समय कुछ पहलेही से इसके परिणाम का अनुभव चित्त में रहता है। यह प्रत्यक्ष है कि ये भिन्न २ हतियां स्वयं भी 'इट' हो सकती है और इनके पानेकी रुचि नए कार्योत्पादक हेतु संस्थापन करेगे। ये नये चित-संस्कार पूर्वोक्त चित्त संस्कारी को साथ अनेक प्रकार से मिल जाते है और बहुधा उनसे उत्तम गिने जाते है । वही "गौण" कार्योत्पादक हेतु कहे जाते है और लाभ-युप्ता प्रकृति या हमनोगी में कोई अवस्था उपजाने की अचल इच्छाही इनका लक्षण है। इनकी श्रेणी मुख्य चित्त-संस्करी का केवल प्राम-बोधयुक्त विरुष पक्ष है । इस विषय में भाम-बोध का पभिप्राय यह समझना चाहिये कि गौण चित्त-संस्कार में पहिले ही से यह ज्ञान रहता है कि इनके अनुसार कार्य करनेका परिणाम अपने जपर क्या होगा और इनसे क्या अनुभव होगा।

। ( ६५ ) १) गौण प्रकृति (अ) बिन्तास प्रेस (इ) धन प्रेम (उ) पराक्रम-प्रेम। "महति" गौण रुपान्तरों को मन में ध्यान कर के पहिचा- नना उतना कठिन नहीं है पर उनको पहिचानने के लिये योग्य शब्दी को रखना बहुत कठिन है क्योकि जब वे अत्यन्तता की वेणो को ग्रहण करते है तभी उनके जपर लोगों का ध्यान पड़ता है और उनकी कोई संज्ञा होती है। और तब भी एक को साथ कई एक मिले रहते है और वह संज्ञा किसी एक इच्छा को ठीक २ नहीं बतलाती है । जैसे कि 'मुधा' या 'संमोगेच्छा' के हर्षही को कार्योत्यदक हेतु माने तो इनमें से किसी के लिये कोई समपक्षी (Yeutral) नाम न मिलेगा। प्रायः लोग निम्ननि- खित शब्द गौए प्रअत्तियो लिये प्रयोग करते है। कामासक्ति विषयासक्ति, सतवालापन, मद्योन्मत्तता, प्रत्याहार, जिभचन्ता- पन, सूखाटुता, शारिरीक सुखानुराग, कामाग्नि, मैथुनेचा, लम्पटपन, इनमेंने कोईभी दोप-होन नहीं है। क्षुधा और सम्भो. गेचा ज्योहों आत्म-बोध युक्त अवस्था में पहुंच कर शुद्ध चित्त- संस्कार के बदले इष्ट होते है त्योहों उनके लिये निन्दा के शब्द प्रयोग किये जाते है। यह बात बहुत सार्थक है इससे यह प्रका- शित होता है कि यह उनकी शुद्ध और भारोग्यजनक अवस्था नहीं है और यह कि अपनो मन मानता से अपनी कामना को सन्तुष्ट करने में ये कुत्सितरूप धारण करते है। क्षुधा और संभोगज्ञा का गौग्य "विलास-प्रेम" के लग भग समपक्षी नाम से पुकारा जा सकता है क्योंकि यद्यपि इस शब्द का भी और दूसरे २ क्रिडा और प्रल्हाद की इच्छा में प्रयोग किया जाता है तथापि इस शब्द का अर्थ इसी विषय मे पहिले पहिल लगता है। स्वच्छन्द अंग-विक्षेप का गौण रुपान्तर बली लोगो को अपने वल की विद्या (जैसे कि कुस्तो मारना) में पूर्ण होने की इच्छा (६६ ) में देखा जाता है । पराकम के भानन्द लाभ का उद्योग करना "पराकम प्रेम" कहा जाता है चाहे वह पराक्रम शारीरिक प्रक- ति के विजय में दिखलाया जाय या मनुष्यों की इच्छा पर प्रभु- ता दिखलाने में । कुछ न कुछ कार्य करते रहने की इच्छा चाहे उससे दूसरे की क्षति भी हो जो बान्त की में देखी जाती है वह इसी का मौलिक ( या प्रथम ) रूप है। इसी की पक्क अवस्था में बहुत से छोटे २ विषय, जैसे कि रक्षणीय (या प्राधित) जीवों की प्रार्थना, परोपकार को इच्छा. भय को चौकसी और पूर्व-दृष्टि इत्यादिक इसमे आकर मिल जाते है । पर इसका सार लक्षण प्रतिवन्धी (या बाधाओं) को वश करने या रोकने में देखा जाता है। "धन-प्रेम” पूर्वीक्त दोनो चित्त संस्कारों-विलास प्रेम और पराकम प्रेम का केवन्त यौगिक फल है पर इसमें पराक्रम प्रेम का। अश अधिक रहता है। संपूर्णतया क्वत्रिम और प्रति निधि रूप वस्तु पर इसको गति होने ही से इसका स्वयं कृत्रिम होना प्र- त्यक्ष है। धन का बहुमान ( या मोल ) इसो मे है कि यह पाराम और विलास के पदार्थों पर अधिकार देता है और मर्यादा कोर्ति अधिकार प्रताप और अभिलापाओं को पूर्ति का साधक ( या कारण) है। इन्हीं कारणो से धन कामना का पात्र होता है । यद्यपि पोछे यह स्वयं ही इट पदार्थ और लोभी के मन में यह एक भिन्न हो लालसा होजाता है तथापि उसमें भी धन बचाव और अधिकार का चिन्ह हो यह ध्यान रहता ही है। जब सूम को देखते हैं कि अपने धन के सब लाभी को त्याग कर धन होन (वा दरिद्र) को दशा को ग्रहण करता सब अनुमान में यह पाता है कि यह मोल लेने के योग्य सब वस्तुभी से विरक्त है, अर्थात् किसी वस्तु को चाहना इसके जो में हुई ही नहीं, पर यह सत्य नहीं है। उसके मन को भी कामना विमोहित कर रही है अपने उत्तराधिकारी का वैभव म्बिर रख कर या विरोधी बाधाओं को रोक कर भविष्यत् द- रिद्रता और प्रसहायता की भय को रोकने की चिन्ता उनके ध्या. न में हो सकती है। (:) गौण मनोविकार (अ) देष (या डाह ) (इ) प्रति हिमा शीनता (उ) संदेह-शोलता। मनोविज्ञार प्रात्म बोध युक्त होकर प्रमिह और अभ्यस्तरूप धारण करते हैं। मुख्य मनोविकार मनोहर (या सुखद) न होने के कारण लोग समझेगे कि इस के बढ़ाने को चि किमी की न होगी पर ऐसा नहीं है। मनुष्य को इसकी चाट पड़ जाती है और कोई २ विना वृणा क्रोध या भय के कलपात नहीं है । सच तो यह है कि कोई कार्योत्यादक हेतु ऐसा नहीं है जो अपना इट ( End ) पाने में शान्ति और सन्तुटता न पावे यहा तक कि क्रोधादिक मनोविकार के मन में प्रा जाने से जब वे उसका कार्य पूरा करते हैं तो एक प्रकार का भार उ- तरा सा उसे मालूम पड़ता है । पृणा का अनुगग "वेष' (या डाह ) कहा जाता है। छिद्र ढूंढ़ने की वान भी इसी का रूपान्तर है । क्रोध को बढ़ाने और उमसे अनुराग रखने को “प्रति-हिमा-शीलता" कहते है पौर वैसे ही भयो चित्त में प्रत्येक विषय में बनाए रखने को 'सं. देह-शीलता या प्रविम्जास' कहते है । व्यहार में ऐसे २ स्वभाव के तोग प्रायः देखे जाते है। देषी पादमी दूसरी को देखते हो उन लोगों में जो कुछ उसको अपने विरुद्ध देख पड़ेगा उसोको प्रकाशित करेगा, प्रव- गुणो को बहुत बढ़ा चढ़ा कर कहेगा , नई पौर विरता वाती का बुरा प्रर्थ लगावेगा और उपहास करेगा । दूसरों के कलन को वड़ो चाह ( मनुराग) से डाही मनुष्य चुनता है। प्रायके मित्र में जो कुछ पवगुण उसने पाया है मो सब पापको मानो विश्वास पात्र मान कर कहेगा और यदि पाप उसकी बातों .

( ६८ ) को झूठा प्रमाणित करेंगे तो कुढ जायगा । संसार के गप्पियों में से प्राय: प्राधे ऐमे हो दुर स्वभाव के होते है। दूमरों की पालति बोनो या भाचरण में छोटी छोटो अमाधारण बाते देखकर जैसे कि टेढी नाक, विशेष रंग का बाल, नकि याना, बहुत हंसी या बहुत थोडा बोलना, इत्यादिक-नो लोग घणा करते है वे पोछे हम अभ्याम को बढाते २ अपनी इस अविचार-वुद्धि के दास हो जाते है और तब तनिक सा भो चिन्ह पाने पर पहिले अनुमान करते तब विश्वास और तब प्रकाश करते है । झूठ कलंक लगाने वालों का अधिक तरह यहो स्वभाविक, इतिहास रहना चाहिये। इसी प्रकार से प्रति-हिंसा-गीन मनुष्य क्रोध का अवकाश खोज २ कर निकालेगा और वास्तविक या कल्पित अपराधों ( या हिसा) के लिये दण्ड देगा ( या हानि पहुचावेगा ) सो भी सदा विचार-कर्ता या पंची के द्वारा नहीं पर सब लोगो के सामने टोप लगा कर अथवा गुप्त रूप से डाट कर और झिड़िका कर हानि पूर्ण करने के लिये दावा कर के । ऐसे भाजगाली थोड़ेही होगे जिन्हें ऐसे अादमी से कभी भेट न भई हो, जो सदा यह कहा करता है कि यह संसार बड़ा दुष्ट है; अमुक ने भाज मेरो यह बुराई को है इत्यादि । ऐसा आदमी सदा दूसरी से बदला लेने के लिये झगडता है। यदि अपना कुछ लाभ सोच कर वह स्वयं अपने बैरी से बदलो नहीं ले सकता है . तो वह बड़ी सन्तुष्टता से देखता रहता है कि उसके विना कियेही दैव घटना में उसका प्रतिकार हो गया। सन्देह शोल मनुष्य अपने लिये भय मानो गढ़ता रहता है। वह ऐसे डर में रहता है कि मानी किसी ने चेतावनी की चीठी उसके पास भेजी हो कि डाकूलोग पाकर थोडी देर मे उसको घेर लेगे । उसको बूझ पडता है कि समूची प्रशति और मनुष्य नाति मेल करके उसके विरुद्ध खड़े होंगे यदि उसे सर्दी होती है ।

( ६८ ) तो वह मृत्युपत्र लिखने को तत्पर हो जाता है, लडकी को बुखार माने से वह समझता है कि वे अब पच्छे न होगे, नया कपडा नहो सिलवाता है कि कदाचित्त कोई ऐसा दरजो उमे न मोये। जिस घर में लान्त बोखार जारी है, कोठी से अपना खाता उठा लेता है क्योकि नए गुसास्ते को दृष्टि उसे पच्छी नही लगतो अपनी खी को उसकी परम हितकारिनो महेन्ती की छन्तो काह कर चौकस रहने को उसको महता है। यदि कही वह विद्दान रहा तो इतिहास लिखने वालों को झूठा, कवियो को शब्द चोर, नीति लेखकी और धर्म ग्रन्यकर्ताभी को डिभा या सूठा) समझता है। राजापो को नाईं जो भोजन की मब सामग्री को पहिले दूसरे से चिखवा लेते है कि कदाचित्त किसी में विष न हो, वह अपनी सब मानसिक शक्तियों को दूसरों के इन को परास्त करने में लगाता है। जिसमें ये गौण मनोविकार उत्पन्न होते है उसमें यह व. धा पाया जाता है कि जब उनके सम्बन्धी सुख्य मनोविकार स्व. भावतः प्रारम्भ ही में प्रचंड रहता है। मनोविकार पहरूए की नाई शरीर की रक्षा किया करते है और जब तक इसी काम में लगे रहते है तबतक उपयोगी होते है पर जब ये मनुष्य के मन पर अधिकार कर बैठते है और बुराई को रोकने के बदले स्वयं भी कुछ कार्य करने लगते है तो इसका परिणाम उलटा हो जाता है । तब मानसिक शक्तियां भी इसकी सहायता फुर्ती पौर सुगमता से करने लगती है। दोषानुसंधान, बोली ठोली मारना, निवारण, विरोधोक्ति आदिक मन के लिये जितनी सु- गमता से साध्य है उतना नए विषयों का सिरजना नहीं और इसका फल यह होता है कि बहुत विवाद कर्ता और विश्वद्रोही मनुष्य संसार में होते है जो घणा और अम्वीकार के अतिरिक्त बुद्धि की कोई सामर्थ (या शक्ति ) नहीं दिखलाते है। इसके फुसलाव (प्रलोभन ) में पड़ना जीवन को औषधि को आहार ।

( ७. ) बना डालना है और इस के कडूवे रसको पोने की भी भ्रष्ट रूचि के द्वारा इसके निर्मल जल को प्यास को गंवाना है। (३) गौण स्नेह-रसिकता ( Ventimentalitr) जब स्नेह प्राम-बोध युक्त होता है और उमको पुनरानुभव करने का स्वेच्छा पूर्वक उद्योग किया जाता है तो मन की इस दशा को 'रसिकता' कहते है। यदि घरके लोगों पर निःकपटता से परिवार स्नेह दिखाने के बदले दया करने से जो लाभ अपना होता है उस लाभ का हेतु उन लोगों को समझा कर उन पर निज लाभार्थ प्रेम दिखनाया जाय, यदि माथियों और अपने बराबरो के लोगों पर संसर्गिक स्नेह दिखलाने के बदले इस स्नेह के फल को भोगने का कारण ( हेतु ) इनको जानकर के- वल समाज का प्रेम किया जाय, यदि करुणा के बदन्ने दया नगाने का चस्का या चाट पड जाय तो इस विकार की, स्वाभाविक स्वास्थ्य को रमिकता के रोग में पलटना कहना चाहिये। इम व्याधि की कुटिलता इतनी बड़ी है कि जो २ उपाय इसके रोकने के लिये किये जाते है उन्हो से यह बहुधा बढ जाती है। (8) गौण मनः कल्पना- (भ) पान शिक्षा [ या विद्योपा. जन ] (६) धर्म में अनुराग। मनः कल्पनाश्री पो भो गौण रूपान्तर होते है पर इस परि- वर्तन से उनमें स्वार्थ-हीनता नहीं रहती। कोई वैज्ञानिक पुरुष अपनी खी के मरण सेज के पास से पाकर चुपचाप अपने पुस्त- कालय में बैठ कर अपना चित्त वहलाने के लिये यह सोचने लगे कि लटू क्यो नाचता है तो वह 'पायर्य' के प्राधीन कार्य नहीं कर रहा है पर 'पाथर्य' को अपनी सेवा में स्त्रय ला रहा है। जहां विद्या के पीछे मन की शक्ति को जाने देने के बदले मन की शक्ति के पालन के हेतु विद्या उपार्जन करते हैं वहां स्वाभाविक चित्त-सम्कार के बदले भात्मा शिक्षारूपी गौण इच्छा पा वैठती है विद्योपार्जन की समग्र विधि मानसिक शिक्षाही के लिये है ।

( ७१ ) और जब बुडि प्रौढ़ हो जाती है तभी नये विषयों का अनुमं- धान कर मकती है इस मे वृझ पडेगा कि विद्यार्थी के मन में पहिले गौणही चित्त संस्कार प्राता है शौर फिर मुख्य । पर यह बात नही है, हां शिक्षक के मन में विद्यार्यों की शिक्षा है पर इससे उसके चित्त में कोई विद्या नहीं पाती वह भन्नेही विद्या ( ज्ञान ) को अपना इट मान सकता है और उस गिता नाम को बडाई नहीं की जा सकती है जिस में यह देखा नाय कि विद्यार्थी का ज्ञान नहीं है पर प्रात्स-उन्नति है। यह म तब तक पूरा नहीं कहा जा सकता है जब तक दोनो निन : चिन संस्कार एकही ममय में क्रमग: विना परस्पर विरोध के शिक्षक और शिक्षित ( विद्यार्थी ) के चित्त में रहे। और शिक्षक अपनी प्रवीएता ने विद्यार्थी के चित्त में उन वि- षयो के गनुनधान ( खोज ) को इच्चा पैदा करे जो उम की समर प्रालिको काम में लगावेगा और सब अंगो को समान रक्खेगा। बहुत दिनो के बाद या असङ्गत हेतुगों के चित्र में पैठ जाने से, सन्द जानने को तानसा के बदले परिपूर्णता प्राप्त क. रने की लालसा हो पाती है. प्रशंमा ' गौण रूपान्तर में “ गिन्प विद्या का अनुराग दाद या रुचि के प्रानन्दी में भासति या अनुराग होता है। सुन्दर बस्तु के देखने से जो एक निराला भाव उत्पन्न होता है वह इस से नष्ट हो जाता है क्योंकि यह बड़े सावधानी से उस को लय खोजता है, यह अपने को सूच्यदों विचार क बनाकर इन के टोपो पर नाक चढ़ाता है। सहज या स्वाभाविक) नि. पुराता या योग्यता) · genius ) नियम स्यापक है, पर खाद tasre ) विवेचक है । जो शक्ति । गुण योग्यता । नई छवि देख कर नये नियस बनाती है,चाहे पुगने टाची को देख कर नवे विषयों को व्याख्या करने की अभ्यास के अवश्य हो विरुद्ध ( ७२ ) । खडी होगी । अवयवों को अलग २ कर के नांचने में मुन्दरता नाश हो जाती है। यह यद्यपि अनूठो बात है पर मत्व है कि 'सम्मान' के भावों को अनुभव करने का चन्का भी पड जा सकता है । जब धर्मानुगग' ईश्वर प्रेम के स्थान मे आ जाता है . जब स्वयं ईखर नहीं, पर ईश्वर विषयक चिन्ता और भाव अन्तर्वोध में बर्तमान रहते है , जब ईश्वर के शरण मे और ईश्वर के होकर रहने के बदले कोवन्त मन को काम में लगे रहने के लिये उन के बारे में कोई बात मिलती है, तब ययार्य धर्म के बदले इस का केवल दृश्य । नाटक ) रह जाता है , सत्यता के बदले प्र तिमा रह जाती है, और 'सम्मान' (भक्ति ) मानो दर्पन में देख पड़ता है । बडे भय की बात है कि वर्तमान काल में यह गौण चित्त संस्कार निराली भक्ति ( सम्मान ) का स्थान ग्रहण कर रहा है। धर्म और ब्रह्मविद्या ( Theology .. मै यही भेद है कि धर्म मुख्य 'सम्मान ' ( भक्ति ) का, और व दाविद्या इम के गौणरूपान्तर का प्रकाश है । पूजा मे भेद, एकही धर्म में कई एक मप्रादय सी पडोमियो के धर्म के बारे में पृछ पुछाई. भिन्न भिनम तो का तोलना और समालोचना, सभी ज्ञात भेट की सोमा को और भी उजियाला करते है और मनुष्यो को एक सङ्ग निकालने के बदले टुकडे २ करते है ॥ (३) मिश्रित कार्योत्पादक हेतु । पूर्वोक्ता परीना मे प्रायः सगो मौलिक चिन सरनार आ गये है, इस से चाहिये था कि सब कार्य और चिन बिकारी की इन्द्रों मे येणो पुरो हो जाती पर बिना कुछ मियण के यह नहीं हो मकता । ये अनेक चित संस्कार मिल कर बहुतेरे मि- थित चिन संस्कार बन जाते है और कोई तो जणिक और दै- वगति-जनित होते है, जिन में से कोई • अभ्यास पड़ने ने इ तना मिल जाते है कि जुट कर एक हो जाते है । मन में दो । 1 . ( ७३ ) या अधिक चित्त सस्कारो का मिल जाना वास्तविक है. और इन के संयोगिक नाम में कुछ धोखा नहीं रहता है। इन के दृष्टा न- प्रशसा ( या बड़ाई । का अनुराग (या अभिल पा), इन्चादिक । ये सब कई मन चित्त संस्कार से मिन्न कर वन है, जैसे प्रशसा को अभिन्नापा, अर्थात दूसरी से प्रगंसा पाने की जा . इस में ये सह उपन्तक्षित होते है-प्रगंमा को ग्रहण करने का भाव, क्योकि अपने को एक प्रगमित पदार्थ के खान में रखता है । सामर्गिक स्नेह का भो अंश इस में है, और तब कुछ प्रात्मा अविश्वास भी रहता है जिम से दूमरों का भरोसा करता है और फिर यह प्रात्मा प्रविज्ञास भी कई एक चित्त-सन्कारों से विलत होकर बना है। फिर हिरका . ( या दूसो मे वढ जाने की इच्छा ) में 'पराक्रम प्रेम ( या प्रभिलाष । 'टो विषयो पर है अर्थात इस में पी को बस्तु और प्रतिपक्षी मनुय दोनो पर अपना वड़प्पन दिग्व. लाना चाहता है और फिर प्रगंमा प्रेम भी इस में विद्यमान है योकि इम में देखवैया और उन से प्रशंसा पाने की इच्छा दोनो आवश्यक है इन दो विनाहरला' उत्पन्न नहीं हो सकता। ये सिधित कागौवादक हेतु निम्न लिखित नियमी से बनते है (१) स्थानान्तर करने का नियम | किसी दुखदायक वस्तु मे घणा (या अन्लग भागना ) और दुखटायक वस्तु से प्राक- पण इस नियम मे उन वस्तुओं पर भी हो जाता है जो इन स खट वा दुःखद वस्तुप्रो के माथ रहते है , यहां तक कि एन के कारण के साथ भी हो जाते है । जैसे कि किमो डाक्टर ने एक वार पाप का घाव चोग हो तो जिस छुरी से चोरा था उसका देखना श्राप को बुरा बुझ पडेगा क्योकि इस के हाग कष्ट सह चुके है, इतनाही नहीं वरञ्च डाक्टर, उन का घर, जहां चोग गया था वह स्थान, उन को गाड़ी, इत्यादिक भी बुरे वझ प- ( ७४ ) ड़ेंगे । इसी प्रकार से यटि किमी ने अल सुखद मन्टेगा सुनाया या किमी ने कोई सम्बट पत्र भेजा तो वह मनुष्य, उस की बोली या वह पत्र लिखने वाला और उस का हस्ताक्षर इत्यादिक मनोहर बूझ पडेगे । इसी प्रकार मे, कोई २ के मनोहर बूझ प. डने का कारण भी जाना जा सकता है। (२) स्वभाव-ममता ( या महानुभूति ) का गियम । दू सरे मनुष्य में कोई मानुषी भाव को प्रचज देखने या उम का ध्यान करने से हम लोगों में भी यह गाव उत्पन्न हो जाता है। जब किसी मनुष्य के, चाहे वह अपरिचित भी हो, मग पाड जाते है तो उस के मानन्द से स्वयं भी आनन्दित और उस की उदासी से स्वयं भी कुछ उदास हो जाते है। बिना कोई कौ- शल या प्रयामही के यह भाव उत्पन होता है। लड़की के माय लडका बनते. अचेत के माय हसते है और दुग्विया के साथ खे- दित होते है | दूमर्गे का भाव अपने भाव को भिन्नरूप कर देता है यह प्रत्यक्ष है। (३) दूरी का नियम । शानन्द का आकर्षण और दुख मे घणा ( या प्रमोति ) पानन्द और घा को से जितनी दूर पर रहेगे उतना घटते जायगे। जैसे - फन्न अनुभव करने का समय पहुंचता है तैमे • पाशा बढ कर बिग्दास होतो जाती है ( अर्थात् जैमे ममय निकट पहुंचता तैमे • आशा दृढ होती जाती है), और भय बढ कर निरागा होतो जातो है ( अर्थात् भय मे बचने की आशा घटती जाती है)। इसी कारण से जब तक पापत्ति दूर देख पडती है तब तक लोग निश्चिन्त बैठे र- हते है और उसके रोकने का उपाय नही करते है और नि- कट पहुंच जाने से यकायक घबड़ा जाते है। इन्हीं नियमों के द्वारा मिथ चित्तसंस्कारी को अलग २ कर उन के मोनिक अंशी को फिर भी जान सकते है। वस्तु ( ७५ ) - (४) हार्योत्पादक ही है - 'परिनाम टि और हिताहित जान मन्द । 'परिणामष्टि ' (या पूर्व विचार ) और हिनामितान' ( या अन्त करण) वाट पहित निवप्राये है। एन में कोई सो विषमहागेकी नाईयं प्रामागिक या नियाय जाति नहीं है। कि जिन में इनकी भी गिनतो' चित्तम्नागें में ही सके। दोनों चितसंन्दागे का विचार करत और नग दोप वतनातन विचार के कर्म में यह स्पट है कि परिम- हाधिको गौर हो चित्तसहारों का विचार करने का अधिकार है. परन्तु हिताहितज्ञान नुन्थ्य और गौर मभी की विवेचना करता है ! दीकि दोन कार्य करने में कितना सुग्न अपने भी सिन्त मन्गा इनी का विच र करना परिणाम-दृष्टिका है । परन्तु अपने को अचान्नाभ दायक समझ कर वि.मो एक मुख्य चित् संस्कार को पमन्ट करें तो उस को मुख्यत का नाम हो जायगा और वह गोग हो जायगा। परन्तु हिताहित ज्ञान' (या अन्त:करण ) मब दिसं- स्वारी का मुटमदाचार सब धी मोन्य-भेद निर्णय करता है पौर यह भेद मुख्य और गौए दोनों में रहता है। प्रात्म-अन्तर्बोध ' (या गत्म चेत) (Self-consiousness) मुख्य चिक्त-संसारी का गौण रूपान्तर कर देता है और लो कि ये सभी गौण चित्त-संस्कार कुछ बार्य सुख चाहते , इम से बूझ पड़ सकता है कि ये सत्र हो मुख्य से निकृष्ट है मुत्र बुरे है और प्रानन्द के अतिरिक्त और कोई प्रकार का भेद इन में नहीं है। अतएव गौण चित्तसंस्कारों से सब मदसदाचार स. वधी मान और भेद अगल कर देनाही पात्म-चेत (या प्रात्म अन्तर्वोध) का फल देख पड़ेगा। (१) प्रात्म-अन्तर्बोध ( या आत्म-चेत ) देवन्त हमनोगी के प्रानन्दही का विचार नहीं करता है, पर हम लोगों की स-

( ६ )
-
कर
का
मन्त्री प्रकृति में छा जाता है और मब प्रकार के अनुभव ( या
पगेना ) , अोर चतुर व्याहार का मुन्न है।
• प्राम-चेन अ म मन्नान और प्रात्म दमन भी सि.
ग्वलाता है जो कि योग्य पाचरण में अवश्य होने चाहिये
नमर ( गो । मिन्नने पर भी मढ ( या बड़ बाना उचित नहीं
३) आत्म चेन केवल यही नहीं दिखताता है कि प्रमक
मुग्ध
निन संस्कार का अनुराग
ने में किस प्रकार
प्रानन्द होगा पर यह भी बनाता है कि मुख्य का रूपानर
होने मे अमुक गौण चिन संस्कार का मदमटाचार सन्धी
मौल्य क्या हो गया है। यदि इस मौल्य - परिवर्तन का ध्यान न
रखें तो यह टोप अपना है।
( ४ ) पान चेत, सच है कि मुख्य चित्तसंस्कार का पा-
नन्द दिखलाता है पर यह उस आनन्द के पाने के लिये प्रेरणा
नहीं करता।

{ ७० ) -- ܕܐ ܕܨܙܠܙܢܙܐܪ पष्टस अध्याय नार्योत्पादक. तुगी दातव्या कर्तव्य माम (MORAL ORDER | ( . ) गौण मनो बिचार पाता । कार्योत्पादक हेतुत्रो को येणी मे में ए। बर्ग :- सनो विकार, के वन्न दुसरीही को अपना न परता बुग है दूपित है और इम कारण मे ग्रमण धार न ग योग्य मी है, अतएव इस को पहिलेही निवान्न देना चायि। तीन भेद है निन्दकता, प्रतिहिमा-गोन्नता. पीर म... - लता । ये पौचि क प्रजाति के मून्न मंत्र है । ए॥arcा न तिखा है कि स्वभावत: कार्योत्पादक हेतु एक मान । अछे या एक मात्र बुरे नहीं होने परन्तु एक दूमर को प्र पेक्षा अचे या बुरे होते है । तिस पर भी ट्रोह चिन्ता अर्थात किमो प्रकार से टूमरो को पीडा देने ( या दुखाने ) की प्र कृत्ति इम नियम के बाहर है और कभी भी दुष्टता के दल से बाहर नहीं होती। (२) इडिय जनित इच्छा, मुख्य और गौण, और स्वच्छन्द भङ्ग विक्षेप वाकी चित्तसंस्कारो में मे जो सब से निकृष्ट है अर्थात् वि. याम और विलास का अनुगग- ( Love of ease & pleasure मोभी इस बरी दशा मे नही है । यद्यपि और सब चित्तसंकार इस को लज्जित वारते है, तो भी नव और कोई उपस्थित नहीं है उस समय यह ग्रहणीय है और तब कोई इसे बुरा न क- (८) - रेगा तोकि मन-जीवन में जो बहलाव और बियाम का चान मियत । परन्त इम क स्थान मुख्य इन्द्रिय प्रकृत्तियां गुना, मंभोगेका ) मे पवा नोचा है, क्योंकि केवन क्षधा को पन्तुर बारना वाटतं लिो खाने मे अवय ही उत्तम है । इमी प्रकार में मंभोगेका का भी निर्णय हो म कता है । इम का अ. नगग काहा तक का मते है इम का विचार हम मुच्य सम्कार के एम परिमाण में करना चाहिये कि मनु य-जीवन प्रांत अपने और ममाज के जीवन को पर्णतम और मब अंशो में स मान बन में पालन करना हो इम का काम है। डम का प नगग (गो । कर मे मे यह बढ़ता है यह मसो जानते ह नोबल अत्यन्तहो अनुर ग न हो ( जिमे तो मभो लोग बुग कहते है । पर उतना भी अनराग बुरा है जो प्रचलित व्य पहार मे प्रमाणिक गिना जाता है, जिस को प्रत्येक बुद्धि- मान चिकितसक अच्छी तरह से ताते है. और जिस को ब- हुर्ती मनुग अपने अन्तःकरण से लज्जित हो कर अपने चित्त मे पहिचानते है । यदि हम लोगो के इस स्वभाव की प्रत्येक अनदेख अधिकाई रुक जाती तो शारीरिक और मा- नसिक जीवन ( अर्थात् शरीर और मन ) ऐसे बलयुक्त हो जाते कि जैसा इस समय ध्यान में भी नही आ सकता है, और दिन दिन अधिक पराक्रम होता जाता, यद्यपि ससार में चिकित् सकों की संख्या आधी भी हो जाती। अतएव विलास और वि. अनुराग और विषयानुराग अपने मुख्य रूप (1) (अर्थात् क्षुधा और शभोगचा) से नीचा है, और यह इस से भी सिद्द होता है कि ये विषयानुराग उन्हीं मुख्य चित्त-संस्कारो के द्वारा रोके भी जाते है । माता पिता लड़के को कहा करते है पौर अन्तःकरण सब लोगों को कहता है कि जब तक भूख न नगे मत खात्री, और जब खाते । भूख शान्त हो जाय खाना शेड़ दो भोर यह जठा समझ छोड़ दो या अमुक वि - याम का

( 8 )
षय को तुन्हे चाह ( हीनता, घटो) है क्योंकि तम उसे पसन्द
करत हो'।
सन्द । पाप से भाप) अङ्ग-विक्षेप' अपने मुख्य रूप
को छोड़ कर गौणरूपान्तर धरने में अपने पूर्व स्थान को बहुत
दूर पीछे छोड़ देता है। मुख्य रूप में भी यह 'क्षुधा' पौर
संभोगेचा ' जपर रहता है, परन्तु वुहि-दर्शित पय पर
चन्तने से भौर एका नियमित मनोरथ धारण करने से. पर्यात्
पञ्चा पूर्वक होगे से यह उत्कट हो जाता है। पहिने या
पराक्रम प्रेम ( भनुराग ) ' ( Lore of Power ) और तव 'वि
लास और विज्ञान के अनुराग' के साथ होकर धन प्रेम'
Lore of money ) का रूप धारण करता है। व्यर्थ पपना प.
रानाम दिखलाने से किसी विशेष मनोरय प्राप्त करने के लिये
उस का दिखन्नाना अच्छा है।
( ३ ) ( लाभानुराग Lore of gain ) पौर मुख्य
मनो विकार।
'लोभेच्छा' का विरोध जितना मनो विवार करता
उतना और कोई नहीं,और इन दोनों के अधिकार (या म्बल)
के विवाद का निर्णय करना भी कठिन है । एक पक्ष में, परि-
मित व्यय सम्बन्धो लाम नबतक मनोविकार रहित न हो
तबतक सिद ( या पूर्ण ) नहीं होता है पतएव यह घणा
और क्रोध का झाड़ने वान्ना (भोमा), शान्ति (या निईन्हता)
की पाड़ (मर्थात् वह जिस को हारा शान्त रह सके) भौर
रोकने के योग्य विनो का रोकने वान्ता समझा जाता है. और
इस से इस की प्राधीनी में मोव और भय के विनष्ट हो जाने की
आशा को जा सकती है। दूसरे पक्ष में, यह कहा जाता है कि
शान्ति और धन भी बहुत महगा कहना चाहिये नब ये पारम
प्रतिठा देकर खरीदे जाय , चाहे वह मात्म-प्रतिमा स्वकीय
हो या जातीय, भौर यदि ये ( शान्ति और धन ) गर्छ . हणा

(८०) के योग्य, बस्तुओं से घृणा को, और अनुचित कार्य से प्रतिक- लता को ( या विरोध को), छिपने को कहे तो, इन का (शान्ति और धन का) त्यागही उत्तम है। यह बात केवल सदसटाचार सम्बन्धी श्रेणी पर स्थिर नही है परन्तु अधिक करके पूर्व विचार सम्बन्धी कार्य-फली पर भो। धन-प्रेम ( या लाभानुगग) को घणा ( या हेष) के विरुद्ध तीनने में यह सारण रखना चाहिये कि घणा को 'मुख्य' चित्त- संस्कार और स्वाभाविक मानते हैं. इस को अपने जीवन का साझी और भात्म-रक्षा को स्वाभाविक गति ( जो मनुष्य और पपकार को अलगर रखती है) समझना चाहिये, और इसको विचार बुद्धि ( prejudice ) और निकारण दुष्टता ( या दुष्ट- भाव ) के साथ मिलाना नहीं चाहिये । जब ये दोनों चित्त को एक ही समय अपनी ओर खीचें तो हम लोगों को उचित है कि उन के एक साथ उपस्थिति के समय ही का सामेक्ष अधि. फार (या स्वत्व ) निर्णय करे, और इस के बाद की कोई ग- पना न करें। सब भावना धीरे२ घट और लोप हो जा सकती है यदि उन का साहस व्यवहार ( अभ्यास ) से तोडत जाय, पौर तब उन का मोल ठीक , नहीं जाना जा सयाता। हणा और लाभ का एका उदाहरण लीजिये। “ कोई मनुष्य हिंसा से एणायुक्त भय करता है,उस को एक पशु बध स्थान(slaughterhouse ) में एक अच्छे दरमाहे को नौकरी मिलती है पर उस में काम कमाई का कारना होगा,क्तलाइये उसे यह नौकरी बी. कार करनी चाहिये या नहीं" भय उत्तर देने को पहिले हम इन बातों में से एक का निश्चय कर लिया चाहें कि या तो (१) इस में सड़ल्प ही के समय पर ध्यान रखिये, उस के वाद के ममय की गणना मत कीजिये, (२) यदि इम को रखना चाहिये तो भावनागो की वर्तमान दशा ( attitude ) मोर सा- पेक्षिक भाग को गत वदलिये , सदा एक सा रहने दीजिये, ( ८१ ) भोर त्याग के मोहन,प्रलोभन,से दिन दिन अनिच्छा,और घशा को धीरे लोप होने का लेखा उस को न करने दीजिये। सीधा प्रन्न यह हो जाता है कि १०) रुपया वेतन वो लिये क्या उस को अपनी घणा को घोट जाना चाहिये । व्यवहार में तो हम मन को उत्तर देने के पहले और बातों का ध्यान करना होगा, नेमे कि , क्या उस का प्रयोजन बहा भारी है। पर्यात हा वह बडो दरिद्रता में है ? क्या निज पतिरिक्त पौर लोगों का भोजन उस को जुहाना है । इत्यादि । पर पध्यात्मिक गति से विचार करने में इन बाहरी वातों को उठा देना चा. हिये । यदि यह हणा किसी निर्जीव पदार्थ से भी हो तो ऐमो ग्या को भी वैन के लिये हियाना अवश्यही कुरता करने के योग्य है, नीच है। और जब घणा (वा पमोति) किसी मनुष्य से हो तो दूस को धन के आधीन करना तो म. त्य न हो नोचता है। जब तक एक नाति वो लोग दूसरी नीच विरोधी , या विदेगी , जाति के लोगो मे या रखते है जैसे परब के नोग हबसिया से , हिन्द लोग मुमतमानी से या पंग. रेज लोग चीन देशवामियों में तब तक उच्च जाति सबनोग नीच जाति वाने से विवाहादिक बार्य सम्बन्धी (या मेल) को, कि जिन से परस्पर उपकार रहता है , तुच्छ जानते है उन से जिन करते है । उदाहरण - यदि कोई हिन्दू नीच कुन में यह समझ कर विवाह करे कि विवाह करने से बहुत धन मिलेगा तो वह उस के उच्च कुन्न का पतन ममझा जाता है और उसके माधोनी नोग भी उम को नीव कर्तव्याकर्तव्य विचार का स. मझते है । पर यह उस का नीच अभिप्राय हो है न कि नीच जन्त का सम्बन्ध जिस ने उन लोगो को दृणा ( या तिरस्कार ) होती है, क्योंकि यदि इम के बदले में उन दोनो में पहिले में प्रेम रहता और एक को लोग जानते होते तो लोग उसे दोपो न ठहराते, उस को निन्दा न करते , दण्ड न देते , पोर इस ( २ ) मामाजिक नियम के उल्लं वन करने के अपराध को तुरत नमा कर देते । प्रतएव घणा को हटा देने के लिये कोई उच्च चित्तसं स्कार चाहिये । धनप्रेम का इस के ऊपर कोई अधिकार नहीं है। तब दूसरे मना विकार 'भय' के जपर इम का कोई प्रधि कार है। गा के ऐमे भय को भी यहां सच्चा स्वाभाविक जान समझना होगा , अर्थात् भय किमी यथार्थ बुगई ( या दुटता) को प्रत्यक्ष उपस्थित टेख कर उपजा है । इन चम जनक वि. पयों को इस से अलग कर टेने पर , भय स्वय पात्म रक्षा के लिये शाम्रानुकन्न ( यथान्याय ) हेतु है और कोई इस से उच्च हेतु न रहने पर नो इस के अनुसार कार्य नहीं करता है उस को हम लोग निन्दा करते है, उस को टोपो ठहराते है । यदि समुद्र में जहाज चलते २ कुहा से में पड़ जाय और उस का क- सान भालस और वियामानुराग से उस की गति न धीमी करे यार २ पानी का थाह न लेता जाय और सोटो न देता रहे तो जो कुछ भयानक घटना होगी, जो कुछ आपत्ति प्रावगी उन सब के लिये इसी को उत्तरदाता मानेगे , सब में इसी का दोष देगे , और यदि अपने प्राण को छोड कर और किसी पर कोई पापत्ति पाने की गड्डा न हो तो भी उस को अपराधी ठहरावेंगे। जब इतिहास लेखक कहते है कि एक देश में मरी फैली हुई है और वहां के लोग इस पाकस्मक भय से घबडा कर सो पुरुप एक स्थान में एक होते और भय को भगाने के लिये खम मदिरा पीते और निर्लज्ज गान गाते है , तो इतने घोर भय को इस नोच बिन्लास मे रोकनाही सोच कर हम लोगो को भय होता है । परन्तु जब कोई मनुष्य इसी दसा मे अपने भय (घास ) को रोक कर रोगियों की सेवा करे , निरोगियों को बचाने के लिये पहिले हो मे उपाय करता रहे, और मरते हुषों की पावश्यक सेवा करे, तो ऐसे मनुष्य की इस पवित्र मु स्थिरता को हम लोग सम्मान पूर्वक्र देखते हैं । पतएव ( ८३ ) - - - बहुरे ऐसे हेतु है जिन को कोई धिकार भ्य गेरे (या निवारण करने का ) नही है. पौर बहुत ऐसे भी है है नो भय दो रोक हमकत है और ऐमा पर महि सानो भय है ही नही। उन गिन्नामि के विमा मनोग 'भय' का पक्ष करते है , और उन दयानुनों के , म ( भय के ) पराजित होने हो में पं मनाते है, । तर इन दो छोरी के बीच इमो मध्य गामा वित्त मंत्राकर नामविनाम (धन-प्रेम ), को काहा रखना चाहिये । दोनों पक्ष शांत मिल सकते है । शनुमान कीजिये कि किमी बढे पोर भयानक पर्वत को बडी ऊँची चोटो पर कोई जाना चाहता है पोर य. द्यपि वा म जोखिम को जानता है तो भी ब, पपनी ह. पणता से दो तोन पट दर्श को प्रपने मन नही ले नातार क्योकि उन को कुछ देना पडेगा,और यह नियय कर के पहाड पर चढ़ना है कि मरे या वचे पर रुपया वचना चाहिये । पव यदि यह मर जाय तो कोई उस पर दया न करेगा और वह यदि वच नाय तो कोई यह न कहेगा कि इस को वचना उचित धा। सब यही कहेंगे कि उम ने नोच कार्योत्पादक हेतु का नुम. रण किया । अब दूसरा दृष्टान्त लीजिये , अनुमान कोजिये कि किसी दरिट्र मनुष्य को समुद्र यात्रा से एक प्रकार का भय बूझ पड़ता है , नैसा प्राय बहुत लोगो को होता है । इस द- रिट्रता मे उस को एक अच्छे वेतन यो नाविक का काम मि. लता है और कोई दूमरा उपाम न मिलने पर वह इस भय को रोक कर जाने का निश्य करता है। अब इस अवस्था में उस को वह दोष लोग न लावेगे नोकि पहाड पर चढ़ने वाले को म्न गाया गया था, वरञ्च लोग यह विचारेंगे कि हम ने उत्तम चित्तसंस्कार का अनुकरण किया। मेरी समझ मे ये दोनोहो चित्तसंसार समान थे और दोनों में से किसी एक का 'मधि- कार' दूसरे पर न रहने के कारण कर्ता ने “ परिणाम दृष्टि ( ८४ ) - । के अनुमार जैमा पमन्द किया वैमा किया। उम में किमी प्र. कार से यह दोषी नहीं है। स्वयं 'भय' को मिमी एक रंग का कर्तश्या कार्तव्य सम्बन्धी मोम्न नहीं हो मकता है । भय को वस्तु का जब तक मोल ( worth ) न जाने तब तक इस का नियय नहीं कर सकते , नेमे कि इष्ट वस्तु नेमे कि इष्ट बस्तु के अनुमार 'पागा' कभी उच्च और कभी नोच हो जाती है, और मोति' हदय को जीतने वाली बस्तु के अनुमार काभी गोभायुक्त और कभी पद भष्ट समझी जातो है । सामार्थी मनुथ अपने ही लिये और प. रोपकारी अधिक कर के दूमगे के लिये भय करेगा, और इन भयों का कर्तव्याकर्तव्य सम्बन्धी मान उनहों विषयों में जाना जायगा जो इन को चित्त में डानते है। अतएव कर्तव्याकर्तव्य सम्बन्धी बिधान ( या नियम ) में यह मनो बिकार ( "भय" ) कोई निशित ( ठीक ) और भचल (अपरिवर्तनीय) स्थान नहीं मांग सकता है। पब तौमरे मनो विकार, · क्रोध' को लाभानुराग या धन प्रेम से तुलना करते है । यहा भी वही बात याद रहे कि यथान्याय स्वाभाविक जान का मुख्य रूप यह है , क्रोध, में कोई कृत्रिम मात्सर्य का धप्पा नहीं लगा है । यदि कोई ल. ड़का ऐमा हो कि थोड़ा भो छेड़ने से तुरत क्रोधित हो जाय पौर घोड़े धन के लिये भी बडा लालच करे , और यदि उस का कोधो स्वभाव छुडाने के लिये कोई पादमी उम से , यह प्रतिन्ना कर कि 'जै बार तुम अपने क्रोध को रोकोग ते वार ५) रुपया तुम्हें हम देंगे', और इस पर वह लोभ के बग हो. कर अपने क्रोध को रोकते २ बाहर से अच्छा देख पड़ने लगे, तो क्या उस की भीतरी सुधार भी वास्तविका होगो क्या उ सका वह चित्तसंस्कार जिस को वह पोस कर बढ़ा रहा है उस से कुछ उत्तम है जिस को कि उम ने भीतर रोक रक्खा है. कदापि नहीं। क्या इस रोकावट से उस का हृदय बदल ( 59 ) A...- . गया है. कोषो से जमावान हो गया है या बन 31-1 मोध पर न देख पहने पाता त्रार्थी नाना र रोकना दुग है । ता-युत नत्रता (या कोमनना) दिग्म- ताना कपट वेष (hyporar) के मामने नो उम में प्रसार से बात चीत ( व्यवहार ) करता है, अपना नाम निकालने के लिये नन्नता मे व्यहवार कर और फिर काम नियान जाने पर उस को पीठ पर उम को सरापे. तो ऐसे पादमी मे मटियार पौर पातीकोन्तीग मचा समझते हैं। जब याभो नाम थे. निये कोषको रोकते हैं. जब उचित कोष दृदय में रहने पर विनीन रहता है क्योकि वह अपना मोध प्रकाश नमी पर सवता है, तो ऐमे प्रात्म-दमन को हम लोग अधम जान कर धिन किये बिना नहीं रह सकते। ये दोनों वित्त संम्कार एफ इ. प्रकार का अपराध करते ई , पर धन के लिये जो पन्याय ( या उपद्रव ) दिया जाता है उस को क्रोध में किये हुये प. न्याय में अधिक नोच दुष्ट और घोर ममझते है । प्रतएव यह सनी विकार (मोध ) धन-प्रेम से वश्य ही उच्च पद का . धिकारी है। { ४ ) गौण स्नेह और मुख्य मनो विकार । अब उन्हीं मनो विकार के साथ गोगा स्नेह को जांचिये। एक पन से तो ये गौण सासर्गिक स्नेह और घृणा दोनों एक साथ मिल कर कार्य करेगे , एक का विरोधी दूसरा न होगा। क्योकि ये दोनो एकही कार्य करने को उद्यत होते है , प र्यात दोनों ही अपने को घणा की वस्तु मे अन्नग करते हैं, भेद इतनाही है कि गौण सासर्गिक स्नेह णित वस्तु से स्वय ही पलग हो जाता है पर 'घणा' उसी को अलग हटा देती है। पर इन दोनों का भेद निकालने के लिये दूसरे पक्ष का उदाह रण खोजना होगा । यदि कहीं कुत्तो का भोज हो पौर उस में भाप के कुत्ते को भी नेवता पहुचे पर उस को यह भी , ano ( ८६ ) ममाचार मिने कि एक लोमडी पोर एक विमी भी उस भो. जन में रंगे तो सब बतलाये कि यदि पाप का कुत्ता उम पागार में जाय तन उम को पाप अच्छा समझियेगा, या यह हम रोडे ओर अनर्गन के भोज में जाना अस्वीकार करे तब उममा अधिक पाटर कीजियेगा। यहां णा का प्रभाव : भित थे। नोकि महानभूति ( sympathy ) इम मै विगड़ जाती हे पर मामर्गिक अानन्द में विप मिन्ना इषा है। माही ऊंचा म्यान यथान्याय भय को भी मिलना चाहिये जब बाभो यह गोगा स्नेह के विपन में आवे । भय के अवसर उपस्थित होने पर ( जैमे कि ममुद्र में आधी पाने पर , देग में मरी फेनने या वैरियों से नगर परिवेटित होने पर) रक्षा का उपाय करनाहो विहित और अलावग्यक है और उस समय भानन्द के धुन में रहना अपराध । जब बैग लोग फाटवा पर पहुँच कर किले को घेरे हुये भीतर लोगों को पकड़ने की धुन में है उम ममय किले के भीतर गौण करुणा के भाव से अयांत अपने परियम में बचने के लिये टेवन्नोआ पारुणा से , किमो रोगी को प्रगोग्ना और सब के साथ मिल कर बैरियों फो न भगाना, दोप और अधम कर्म है। यहां भी गौण स्नेह नीच है और मुख्य भय उच्च है। योग्य कारण युक्त 'क्रोध' के विरुह भी गौण स्नेह पपना कोई अधिकार नहीं प्रकाश कर सकता है। यह चित्त-संचार पहिले दिखना चके है कि,किमी प्रकार के अपकार (या हानि को रोकने के लिये उपजता है और उद्योग करता है । और जब वह अपकार कोई मनुष्य इच्छापूर्वक करता है और म पराध गिना जाता है, तब पहिने पहल यह ( बोध ) क- नगामय तहको विरुद्ध खडा होता है। उस हानि-कर्ता की पोर में यह सब स्नेह रखींच (इटा) लेता है और उम के स्थान मे विमुखता का भाव और चन्तन धारण करता है। हानि - (८७) कार्ता की ओर से हितैषिता (या सुशीलता) उठा देना मनुष्यों में कर्तव्य कर्म के बचाने ( पालन करने ) की स्वाभाविक पाड़ ( पात्रय ) है और इसको छोड़ना अर्थात इसका प्रायय कदापि न करना सदसटाचार सम्बन्धी जोवन के प्रधान प्राड (चाव ) को दुर्दशा ( या जोखिम ) में डालना है । परन्तु यह पाड दुखमय ( दुष्कर ) है. और यद्यपि हानि (द्रोह) के समय अत्यन्त कोमन्न । नदु )स्वभाव वाले में भी पायी जाती है तथापि संगमिन्नू और शान्त स्वभाव वालों को तुरतही अप्रिय बझ पहने लगती है। बहुत से प्रलोभक विषय इनके मामने प्रा जाने है. ये मानो सिखलाते है कि नो हो गया सो हो गया उनको नाने दो और तब फिर भी मैन्न मिलाप का सुख उठाने लगते है मानो कभी कुछ हुआ ही नहीं था । इस प्रकार से इम बखेडे को छिपाना क्योकि यह अप्रिय बूझ पड़ता है, पौर सब लोगो का एक साथ प्रानन्द में रहना मन भावन है, इस ध्यान से इस कर्तव्याकर्तव्य सम्बन्धी विघ्न ( या वाधा। को छिपाना बुद्धि और नीति के विरुद्ध अपराध समझा जाता है और चित्त को अत्यन्त वबराहट (व्याजुलता) में ही क्षमा किया जा सकता है - यह भी मानना पडेगा कि गौण स्नेह प्राय: बहुत नहीं बढ़ने पाता है, मुख्य का बहुत कुछ अश इस में बाकी रह जाता है। हम लोग उसको दयालु ( मिलनसार ) स्वभाव का कहते है जिस में यह बावहीन हेतु विद्यमान रहता है और जो टूमर को दुख देने से हिचकता है और न कि दूसरे से पाते हुये दुख का ध्यान न करता है, और जो द्रोह चिन्ता से विमुख होने के कारण अपकार सहलेता और इसके बारे में कुछ कुलाहल न मचाता है, और न कि अपना बत्व देखलाता * पाठक को यहा पर याद रखना चाहिये कि यह वर्णन मुख्य ' क्रोध का है, गौण (प्रतिहिंसाशीलता, बदला लेने को अभिलाषि) का नहीं। .

- (८८) है। अब जो ऐसे मनुथ को केवल अपनीही हानि होती हो और वह कर्ता के दुष्टता ( या द्रोह) से न उपजी हो तो उमकी मिलनमारी या दयालुता सहजही " मुख्य क्रोध " के जपर स्थान ग्रहण करेगी । परन्तु यदि कोई इच्छा पूर्वक ( जाग बूझ कर । अपकार करे, अर्थात बुराई करने के नीयत मे बुराई करे, तो उसमे उपजे हुये कोध के रोकने के लिये मेल मिलाप को इच्छा यथेष्ट सामर्थवान नहीं है पर इसके ऊपर के चित्तसंस्कार इसको रोक सकते है। नमा करो पौर भून जाओ" इस कहावत का तब क्या प्राशय है इससे यह जानना चाहिये कि अपकार करने वाला जंब पश्चाताप करे तब उसको अपराध को क्षमा करो परन्तु भूल जाना तो हम लोगों को सामर्थ नहीं है; क्षमा और भूलना इन दोनों गन्दी को गवारों ने एक साथ मिला दिया है । अपना स्वभाव इमनोगों के अधिकार में है, पर अपनी स्मरण शक्ति नहीं। पात्र बदल जाने पर अपने चित्त को बदल सकते हैं, पर जो अनुभव एक बार हो चुका है उसको मिटा नहीं सकते है; जो एक बार हमारी दुराई कर चुवाा है उसके बारे में हमारा बिचार (समझ) वैसाही अब नहीं हो सकता है जैसा कि उसके पहले था । परन्तु इस कहावत के दो पर्थ ठीक होते हैं और वे दोनों भारी (गाढ़) उपदेश ई-~(१) पहला तो यह है कि “जब बुराई (पपराध ) करने वाले को क्षमा कर दिया तब उसके अपराध की फिर चर्चा मत करते रहो और इसका स्मरण करना छोड दो । भौर ( २ ) दूसरा अर्थ यह है कि जो तुम्हारे सामने विनीत न हुआ (जिसने अपराध न क्षमा कराया है) उस पर भी क्रोध करने की अवधि वांधी और सदा क्रोध मत * अर्थात् कर्तव्याकर्तव्य सारणो मे जो इसके ऊपर रक्डे हुये है।

1. . - - (८८) रहे रहो. बोध देवल अपकार , समय का सामान है जो उपकार कि फिर पुगना पड़ कर नाश हो जाता है यह समझाकर क्रोध को शान्त करो, नई: दगात्रों में नई : संभा- वनायें दया ( या महानुभूति ) को होती हैं। प्रधांत गौण स्नेह और शोध में एक प्रकार का झगडा होता है अपक्षार से उपजा हुमा क्रोध दीपी को दण्ड देने के लिये प्रेरण करता है। जब वह पराध किसी ऐसे से होता है जो हम तोगो रक्षा और प्रेम का पात्र है, या कोई ऐसे में होता है जो हम लोगो के माधीन है और जिस को हम लोग बयं दह दे सकते है. तो इन अवस्था में दण्ड देने में वित्त में बहो रोकावट होतो है। जो चाहता है कि दगड घटा दें या न दें। च्चोंही शोध उपजता है त्योहो टण्ड देने में पतचि होती है दोषो को जब तक छड़ डपटे या कुछ कहें इसके पहले ही यह अपराध को हनका समझने को कहती है और यह भी वतन्हातो है कि हम लोगों के कोमन्त प्रकृति ( स्वभाव लिये यह बड़ा कठोर है और अतएव इसको टाल देना चाहिये। ऐसे म्वभाव वाले माता पिता के बहुतेरे लड़के अपनी चतुगई से समझ जात है कि जैसे जन्न दृष्टि के बाद धूप जितनो क्डो होती है उतनो और कभी नहीं, वैसे ही प्रत्येक झिडकी या दण्ड के बाद उसका अधिक लाड़ प्यार होता है और जितना ही भधिक अपराध करता जाता है उतनाही अधिक दुनार होता है; और इमसे वह प्राम-क्षमा प्राप्न-स्नेह और अपने दोषों को वान बनाकर टालने का पाठ पटता है, माता पिता ने इसी स्वभाव के कारण विहानी ने कहा है कि मां बाप अपने सन्तान को आप पढ़ाने के योग्य ( उपयुक्त ) नहीं है, पौर उनको चाहिये कि अपने लड़की के लिखाने पटाने का काम किसी ऐसे पजपात रहित रक्षक (प्रतिपालक) को सोपे कि जिस में न्याय की दृष्टि उपद्रवहीन है और गौण स्नेह का -- (८.) नियय हुआ अनुराग नीत-स्नेह से बढने नहीं पाता है। इन विवाटी से यह कि मुख्य मनोविकार" का स्थान गौणस्नेह' से ऊपर है। ( ५ ) मनोविकार और परक्रमानुराग। अब मुख्य मनोविकार और पराक्रमानुगग (पर्यात किसी हेतु से अपने पराक्रम दिखलाने की अभिलापा) का परस्पर मम्बन्ध निगय करना चाहिये। इन दोनो का भेद तो स्पट ही है, बाहरी वस्तुओं के व्यापार से मनोविकार उपजता है, परन्तु पराक्रम का आनन्द तब मिलता है जब हम लोग म्वय कार्य करते है । पहले में निरुद्योगी निर्वलता अपनी रक्षा के लिये खडी होती है, और पिछले मै, पराक्रम बाहुन्ध (या पूर्ण पराक्रम ) किसी पर साक्रमगा करता है जो इसके अधीन हो जायगा । अतएव मनोविकार जीवन शक्ति के घटत की विरुद्ध कहता है, और सकारण पराकम जीवन शक्ति की बढ़ती चाहता है। "जीवन एक नाभ समझा जाता है " * इस बात को मानने पर मनो विकार का स्थान स्पष्टही परानामाभिन्नाथ के नोचे देख पडता है, क्योंकि यह जय करते हुये भागे नहीं बढ़ता है परन्तु केवल अपने प्राथय स्थान में बैरियो को पाने से रोकता है। जो वस्तु अपने अधिकार में है उसो को यह बचाये रहता है, नई वस्तुप्री को अपने अधिकार में नहीं लाता है। अब पाप यह पुछ मकते है कि यह तो शरीर सम्बन्धी या पदार्थसम्बन्धी भेद है, इससे सदसदाचार सम्बन्धो भेद का ज्ञान कैसे हो सकता है। इस विपय में तो 'पराक्रम' समपक्ष है, और थोडा या अधिक बल होना तो थोड़ा या अधिक धर्म होने के समान नही है । हा यह सच हो सकता है, परन्तु इमको रजोगुणी विगेप करके मानेंगे। - - (८१) परानामानुराग 'निन्नलिखित कारणो से 'मनोविकार' के जपर है- (अ ) यदि हम लोगों में औरो से ( किमी प्रकार का) अधिक प्रराकम है तो इसको दिखलाना हम लोगो का कर्तव्य है क्योकि इसी रोति ( प्रकार ) से मनुष्यों की उत्तमो. त्तम भन्नाई हो सकती है जो वे अपना एराकाम न दिखना तो बल होन मनुष्य दूसरों की क्या भन्नाई कर सकते है ? (६ पराक्रमो लोगो का पराक्रमाभिलाष अपने सहवा- सियों का अनुशासन करने का उद्योग करने के लिये प्रेरण करता है; इस से वह मनुष्यो के सुख दुख पर करुणा करता है और उनका ( कल्याण ) कुशन भी धारता है। (उ) अपने सामर्थ का अन्तर्बोध (ज्ञान) और इसको कार्य में लाने की इझा जब सन्मान ' ( भक्ति ) के ठीक २ प्राधीन हो तब उत्तम है, और इनही के द्वारा सब बड़े २ बीर , संसार में हुये है। परन्तु जब पराक्रमानुराग किसी उच्च चित्त- संस्कार के माधोन नही रहता है, तव्ही इस से मनुष्य उप- ट्रवी और प्रजापोड़क हो जाता है। ( २ ) स्वतंत्रता (या स्वाधीनता ) के अनुराग में भी सार अंश परालमानुराग. परन्तु यथोचित्त पराक्रम हो है। कोमल और नशील नीवन तो अच्छा है हो; पर जिस मनुष्य को स्वाभाविक (सहज ) योग्यता और शक्ति ( या उत्साह ) ने उसको मनयो का म्वाभाविक अधिपति (राजा) बना दिया है, उसके पराक्रम वी अनुगग और अभ्यास (exercisc) को सब लोगों का अन्तःकरण क्षमा कर देता है। ( अर्जुन के कार्यों को विचारिये) यह ( पराक्रमानुराग ) मनुष्यों में तुच्छ वस्तुयों की राभि- वहां पर 'वीर' शब्द से वन्तवोरही नहीं बुद्धि वोर, धर्म वीर, शास्त्रवीर, इत्यादिक भी समझना चाहिये।

(८२) रातएव अब । न पालोडर त्र की प्राकांना उपजाता है । यह मनुष्य जाति को उपकार और कन्याण की चिन्ता कराता है। पगक्रमानुगग' नि:मन्देह 'मनोविकार' से अंगा है। (# ) विद्यानगग और पराक्रमानुराग। इसके अनलर " गौण मन:कल्पना" का स्थान पोजिये । इमके यद्यपि तीन भेट है, अर्थात् बुद्धिविषयक, गोलयं विपयक, और धर्म विषयक चिन्ता, तो भी तीनों एक हो गण में पा सकते है, और “ विद्यानराग” कहलाने है, पर्यात् उच्च प्रकार के मानवी विचार और अनुभव के लिये अत्यामति युक्त (या परमोत्साहयुता ) चिन्ता (या उत्कण्ठा)। इन तीनों को यह मामान्य लक्षण है कि ये मब गौग चित्त मम्कार है और ये मुप्य के पात्रो मे सम्बन्ध नहीं रखते है पर ये पात्र मनुष्य के मन में जिन भावना ( या मति) और अनभनों को उत्पन्न करते है उनमे प्रयोजन रखते है- मति और अनुभव जो मनुष्य एक दूसरे से कहते हैं और वाक्य में गठित हो कर जिन में अनेक यक्तियां बनती है, शास रचे जाते हैं. साहित्य और दूमरे प्रकार की गिल्प विद्या सम्बन्धी वस्तुएं रचित होती है, भिन्न , मत के धर्म शाखा और भाचार बनते है, और जो अन्त में वृद्धि मे जांचे जाकर प्रजाति के इतिहास में कम से स्थान पाते है । इम विषय में हम लोग पदार्थ और जोवो के जैसे रूप है उनका विचार नहीं परन्तु उन पढार्थी और जीवो के बारे में मनष्यों ने जो कुछ सोचा और कहा है उसका विचार करते है । परन्तु यह (विद्यानुराग ) उन वस्तुभी से भी विरसा नहीं है इस में उनके लिये सच्चा विश्वास और प्रेम का भो महारा रहता है जो विश्वास और प्रेम उच्च प्रकार की विद्या के उपार्जन में प्रकाशित होते है; बुद्धि, भावना, और धर्म चित्ता को परिपूर्ण कर देना चाहते हैं । यह मनुष्य को ।

. दूसरो को अनुशासन करने के (८३) सचा उदार चित्तवान्ता बना देता है और जिन विषयों में मनष्य बुद्धिमान सपालु और महाशय ( भन्लामानुम ) हो मकता है उनसे प्रेम दिलाता और दूसरों को भी यह सब सिखलाने को प्रेरणा करता है गौर उस में प्रानन्द देता है अर्थात् मनुयाँ को नसा होना चाहिये वैसा बनने को कहता है। परन्त 'पराममानुराग निये, दूसरे पर अपना अधिकार रखने के लिये हम नोगों को प्रेरता है और जो चित्त संस्कार मनुष्यो में प्रस्तुत ( विद्यमान ) है उनहीं को यह समझता है और उतर देता ( respond ) (या पूरा करता ) है। अतएव 'विद्यानुराग' * 'पराक्रमानुराग' के जपरं अपना स्थान ग्रहण करता है। (७) 'मुख्य सेह' और पावर्य प्रशंसा । पाव देवन्त दो प्रकार के चित्तसंस्कारों का स्थान नियत करना वाकी रह गया है, मुख्य स्नेह “मुख्य मनः कल्पना स्नेह के लिये सनष्यत्व का होना अत्यावश्यक है, मनुष्य के प्रति- रित यदि और किसी वस्तु पर स्नेह प्रकाश करते है तो उसको भी उस समय मनुष्य के ऐसा समझते है । इम में मन्देह नहीं है कि मनुष्यत्व ( personality ) संमार में सब से उत्तम ( या उच्च ) विषय है, विश्व ( संसार) का मानो मुकुट रूप पोर इसके जपर भी जाने वान्ता है; इस कारण से नह. जो कि इसी के साथ २ जपर चढ़ता है, वह चिनसंस्कारों में अवश्य सब से उत्तम । या उच्च ) होगा। अतएव ' मनः कल्पना' का विचार पहले करना चाहिये, पर दोहो (पायर्य और प्रशसा ) का क्योंकि तीसरा, · सम्मान' (भक्ति), बदल कर सब से श्रेष्ठ • Lore of Culture का ठीक अर्थ विद्यानुराग' से नहीं निकलता है, पर अब तक कोई यथार्थ शब्द मुझे नहीं मिला .

- (८४) पूर्ण रूप का स्नेह हो जाता है । इसमे ‘स्नेह' का स्थान प्राययं' और 'प्रशंमा' के ऊपर है । प्रति दिन के अनुभव मे भी यह बात प्रमाणित है । यदि कोई विद्यार्थी अपनी विद्या के अनुमरण । उद्योग ) मैं, कोई चित्रकार अपनी कल्पना को अभ्यास में, अपने बाल बच्ची को भूखों छोड दे, या उन्हे गिना न दे, तो उसको मबही लोग टोप टेगे । यदि कोई मनुष्य अपने मब धन को अपने पुस्तकालय, मानमन्दिर ( ग्रहादिदर्शनस्थान ।, चित्रगाना. या दुर्लभ प्राचीन षप्त संग्रह, में उड़ा दे कि जिममे दुख मे पडे हुये अपने सुहृद् ( मित्र ) को महायता नहीं कर सके; या यदि सब लोगो पर कोई विपत्ति पा पड़े और उस समय वह इन बहुमत्य द्रव्यों को गने लगाये रहे और बेचकर उस आपत्ति को न दूर करे, तो उमका अपराध कोई नहौं क्षमा करेगा, सभी उसकी निन्दा करेंगे। . पाय' और 'प्रशंगा' के आपस के सम्बन्ध में ऐसी कोई बात नही देख पड़ती है कि जिस से किसी एक को दृमरे मे ऊंचा स्थान दें। जो दृश्य ( phenomenon ) अकस्मात् पा पडता है उम पर पायर्य ' होता है । अर्थात् अइनदर्शन मे आश्चर्य होता है) और यह पृछता है कि 'यह कहा से पाता है और कहा जाता है।' और 'प्रशंसा' विद्यमान पदार्थ या जीव ( मनष्य ) पर होती है; यह पूछती है कि यह मुझे क्या कहता है ? यह किमके सदृश है ?' इन में से पहला बुद्धि के विषय मे बड़ा उपजाज ( सफल ) है, यह प्रधान ( अग्रगख ) विज्ञानवेत्ताओ के मन का विदित लक्षण है, अर्थात् बडे , विद्वानों के मन में इसका बडा प्रभाव रहता है, अद्भुत विषयों पर पायर्य होने से उसके जानने की इच्छा होती है और उसको किमो प्रकार से जानकर मनुष्य अपने ज्ञान को बढ़ता इमरा, स्नेह' के बहुत निकट पहुचता है, यद्यपि है ।

(८५)
यह निर्जीव पदाथों पर भी हो, जैसे मैटान के फल, और
भूर्यास्त की शोभा और जब किसी प्रिय मनुष्य पर यह (प्रगमा)
जाता है उसरे देह को और भी बढ़ा देता है, और दूसरों
के नही तो, शिष्ट (या सुरस. तूम) प्रतिवान्नों में यह
सम्बन्ध काल बीतने से नट नही होने पाता है । जिस में
चित्तसंस्कार ठोक ठोक सान पर है उनके लिये प्रति नेहपात्र
का सौन्दई घटने न पावेगा।
जपर की व्याख्या से ऐसा कुछ नहीं निकलता है कि
जिस से प्रार्य 'भोर' प्रशंमा' (स्तुति) का स्थान एक
दूसरे ६ जपर हो: पर किससे मनुष्यों को कितना लाभ होता
है, यह यहां पर नित्रय करने की कोई आवश्यकता नहीं है,
यह परिणम सम्बन्धी विषय
(८) तीनों मुख्य स्नेह ।
इस पापस के सम्बन्ध को नित्य करने के पूर्व इनकी
विषय में कुछ विशेष बातें जान लेना अत्यावश्यक है । माट
पिट सम्बन्धी स्नेह-(भ) हम लोगों को सम्मति के बिना यह
पपना अधिकार हम लोगो पर नहीं दिखनाता है; हम लोगों
ने अपनी इा से अपना जीवन उनी अधीन कर दिया
है, इस से भव उनको टालना केवल प्रहति (जगत् ) को
प्राज्ञा का अनादर करनाही नहीं है, पर अपने को भापही
टोपी भी ठहराना है। (इ) इमके निवन्ध (भार) मुख्य करके
(pre-eminently) पराये ने भाधीन किये जाने के प्रयोग्य है;
हम लोगो की व्यक्तित्व में वे ऐसे घुसे हुये है (ऐसे स्वाभाविक
या अन्तजात हो रहे है) कि यदि हम लोग स्वयं उनको
न परा करें तो कोई दूसरा मनुय उसको चुन कर उठा नहीं
सकता है ( अर्थात् उनका भार अपने जपर नहीं ले सकता
है ) और उमो रीति से पूरा नहीं कर सकता है, निबाह नहीं
सकता है । इस से तोग यह न समझे कि दूसरों को बच्ची की
-

(८६) रचा का भार लेने से यह रोकता है, परन्तु यह कहता है कि यदि दूसरे लोग इमका भार अपने ऊपर लें तो यह कार्य उन प्राभ्यन्तरिक गुणों मे हीन रहता है जिनको कि ईग्वर ने माता पिता के हृदय में इस कारण रचा है कि उन्हें परिश्रम तो विधाम और रता का भार मानन्ट वझ पडे, और दोनो जीवों का सुख में एक साथ बंधा रहना ही दोगों का एक उपदेश होय । यह लक्षण दूसरे प्रकार के स्नेहों में नही पाया जाता है । माग में किसो मनुष्य को रोग से व्याकुल देग्त कर यदि एक आदमी उसकी सेवा न करे तो कोई दूसरा पाकर कर सकता है। और यदि मैं अपने स्ने दो मित्र का ध्यान छोड दूं तो इस से उसको भाशा तो भंग होगी परन्तु उसका हृदय शून्य न हो जायगा, उसके दूसरे भी मित्र होंगे जो मुझ से अधिक दृढ ( सच्चे ) मित्र हो । उस छोटे बच्चे के लिये तो एकही माता गौर एकही पिता है, यह मम्बन्ध निराला ( whique ) है और उसके निये जो कुछ है सो यही 1 (3) स्नेह के मुख्यतम स्वत्व का समय परिमित है ( पर्थात इसका पूर्ण प्रभाव, अधिकार, सदा नहीं रहता है); मे कि छोटे जानवरों में देखा जाता है कि उनको बच्चों की पराधीनता का समय जब बीत जाता है तब यह एकदम नष्ट ( लुप्त ) हो जाता है। मनुष्यो मे यह माता पिता और लड़कों के जीवन भर रहता है पर पहले की स्वाभाविक शक्ति उतनी नही रहती है और पीछे केवल समान प्रेम दोनों में रह जाता है, और सयाने पर माता पिता के प्रति पुत्र (और पुत्री ) का स्नेह उच्च प्रकार की मित्रता हो जाता है और अन्त में जब माता पोता रोगग्रसित हो जाते है तो इस स्नेह में करुणा भी पाकर मिल जाती है। पतएव इन पूर्वीत तीनो गुणों ( इसको खेछापूर्वका ग्रहण, पराये के अधीन किये जाने को अयोग्यता, और परिमित - ( ८७) - - - . - :- न ६ कान ) से 'सारपिल स्त' अवश्यही सांसर्गिक रने के अपर स्थान ग्रहण करता है। उदाहरण-एक माता अपने बच्चे को दूध पिला रही है अतएव उससे अलग नहीं हट मक्तोः यदि उसके किसी संगो को लाल बोखार (एक प्रकार का दुलहा वोखार ) आया हो तो उस साता को उचित है कि इस वोमार की सेवा करना स्वीकार न करे, दूसरे बेला चाह वह कितनी ही सेवा उस अकेले बीमार की करने को तत्पर हो । पुन: यदि समाचार किसी को मिले कि उसका मित्र एक दूर देश में वैरियों के हाथ में पड़ गया है और बहुत धन दंड देने से छूट सकता है; अब यदि उसकी अत्यन्त मित्रता के कारण वह अपना सब छ वेच कर तमको बचाना चाहे, पौर वह यदि खयं बाल बचे वाला हो तो वह ऐसा नहीं कर सकता है, क्योंकि वे लड़के सब दरिट्र हो जायंगे और पढ़ना लिखना उनका वन्द हो जायगा। साधारण सित्रता का स्खल अत्यावश्यक दया के प्रार्थना से भी नोवाही है। यदि कोई भारी कार्य (जैसे कि कोई अन्य रचना या विज्ञान मान्न का कोई प्रश्न बनाना इत्यादिक ) में मित्र की सहायता कर रहा हूं और उसी समय सड़क पर कोई आदमी गाड़ी से पिच जाय या कोई भारी बीमारी में पड़ जाय कि जिस में तुरत उपाय न करने से मर जा सकता है तो मेरा चिकित्सक होने पर भी वहां न जाना अपराध है, मुझे अवश्य मित्र के उस कार्य को छोड़ कर निस्सन्देह दां जाना चाहिये । प्रतएव तीनो प्रकार के स्नेह में से सांसर्गिक स्नेह' और दोनों से नोचा है, यद्यपि पूर्वगत चित्त संस्कारों से यह ऊंचा है। शेष दोनी प्रकार के स्नेह में भी यह भेद है कि 'करुणा एक पाकस्मिक चित्त संस्कार है, अपने समय पर बड़े झटके से घा जाती है; परन्त ' मालपिट स्नेह ' अपनी अवधि में नित्य r 1 - -- .

(८८) MAA- चुन सकते है, रहता है उसका कान्त हम लोग प्राप भी परन्तु जिन समयों में करुणा उपजती है वे हम लोगो के अधिकार से बाहर है वे उन घटनाओं से नियत किये जाते है जिनको कोई अपने वश में नहीं रख सकता है। मातृपित स्नेह' ननित कार्यो को कोई कोई पाकस्मिक कल्य के लिये रोक भी सकते हैं। इस प्रकार से इसके कार्य को क्षण भर के लिये रोकने से कुछ बिगडेगा नहीं वरच, इसका गुण और भी बढ़ ना सकता है, बच्चों का माता पिता के स्नेह में नियन्न विश्वास रखने का अभ्यास करना बुरा नहीं है। इन दोनों में किसी यास्तविक विरोध होने की कोई प्रावश्यकता नहीं है। इतना याद रखना चाहिये कि 'करुणा' की प्रेरणा में हम लोग कोई ऐसा कार्य न कर बैठे जो अपने लड़के के सनातन निवन्ध के विरुद्ध ( असंगत ) हो नैसे कि उसकी प्रयोजनीय (पाव ग्य क ) रक्षा (या प्रतिपालन ) का त्याग करना, नही तो वह स्वयं ही करुणा (दया) का पात्र हो जायगा; दया के कार्य में गये और तब दया हो के कार्य में फिरना पडेगा; पर दोनों में यह भेट होगा कि कर्तव्य करने के उत्साह से तो गये थे परन्तु फिरने के समय उत्साह के बदले चित्त में पश्चाताप रहेगा। परन्त ' करुणा' बडो तीक्षण ( प्ररवर ) होती है; 'माट- पिट स्नेह ' मे इसका फैलाव ( scope ) विश्व में अधिक है, और मनुष्य के जीवन भर यह रहती है। इन तीन लक्षणों में इसका अधिकार 'माटपिट स्नेह ' के ऊपर है, यह पिछला अपने अवमर मे कभी कभी उसमे अधिक प्रभावी, अधिकार युक्ता, पौर गामक ( inperative), हो जाता है (अर्थात कभी कभी इमो को पाना अधिक मानने की योग्य हो जाती है)। (८) सम्मान (या भक्ति ) का सर्वोत्कृष्ट स्थान । अब वन्न भन्नाई ( या साधुशीलता, कपा, उपकार ) के ( ८६ ) प्रति 'मन्मान ' (भहि ) का मात्र स्थान स्थापित करना शेष रह गया है जो ठीक • व्याख्या (या उन्या ) वरने में ईवगमति र प्रांत ईबर को महि) ममत्य हो जाता है । इम ममता ( अभिन्नता ) को बहुत मे योग्य मनुय भो नहीं मसरू मक्ते है इनको बहो मावधानी से और सन नगा कर देखना चाहिये । यह मनुष्य के गुणो को मानो गिग्बा पौर किरीट है। चित्त मंधागे का क्रम जो प्रभी लिख आये है उमको टेखने में प्रत्येक वे में निम्न निखित एक या इमरा भाव उत्पन्न होता है, कार्योत्पादक हेतु मयांदा युक्त है, पौर एमकी प्रयंमा ( बहुमान ) करता ह, इमके बन्धन में मैं हं पौर एमजी प्राजापानन करता यह परिपूर्ण चित्त वाले (अर्थात परब्रह्म ) की पाजा है. और मैं इसका मन्मान करता है। इन में से दुसरे भोर तीसरे को मिन्ताने मे उन में एक भेद वृझ पड़ता है। चित्त मस्कारी के झगडे में यदि उस चित्त संस्कार की जय होते देखते है कि जिमका निर्वन्ध कर्ता के जार है तो हम लोग उनको इस चुनावट ( preference ) को सगह है. प्रधांत हम लोग उसके प्रति गुण दोष के जांचने वाले और चाय करने वाले दर्शक का पद ग्रहण करते है कि जिमको योग्यता के अनुसार निर्णय करना और विश्वास योग्य मनुयो के पालने का अधिकार रहता है । वार्तव्याकर्तव्य विचार के विषय में हम लोगो का यही विशेष लक्षण युक्त भाव होता है, मनुष्यों के परस्पर प्राचरण में जो उचित होता है उसके प्रति यह भाव उत्पन्न होता है, चाहे वह उचित कर्म अपना हो या दूसरे का हो। इस मे मनुष्य धार्मिक तो हो जायगा परन्तु वह शुद्वात्मापन (धर्मगोलता ) से सुखा ( शुष्क, फीका ) देख पडेगा और यह मनुष्य के प्राचरण के विशेष विशेष कार्यों को एक एक करके विचार करता है, इसके ।

( १.. ) पक्षिकार ( गामन ) में जीवन खंड खंड करके देखा जाता है, एम विनार मे कि यदि प्रत्येक खड का विचार प्राने हो ममय होता जाय तो सम्पूर्ण अपना चेत पापही कर लेगा। घर हाट, पौर राज्य के मम्बन्धी को छोडकर और विषयी से भरे हये स्थायी ( अक्षय ) प्राभ्यन्तरिक जीवन प्रान्तरिक गुणों का स्थान इम मे नहीं है जो कुछ ये कर चुके है उनके बारे में कोड कर और न तो इन पर यह स्नेह दिखलाता है और नगा। परन्तु जिम मानमिक भाय ( अवस्था) को हम ' सन्मान (या भति) कहते है वह इन बातों को ठीक उलटे कम से देग्यता है । यह उचित ( right ) कार्यों को केवल अच्छा कर्म ही नही ममझता है, पर मुख्य करके उचित ( सत् । गुण ( alivetion ) का प्रकाश, स्वळ, सत्य, भात्मानुरता उच्च स्वभाव का व्यापार ( function ) समझता है । केवल फलो हो से संतुष्ट न होकर यह उम मनोहर या महान ( या उत्कृष्ट ) प्रकृति (म्बभाव ) के पाम पहुचता है कि जिम से ये फल फले थे इस प्रकार मे फन्नरूप कार्यों से उनके उत्पन्न करने वाली प्रकति के पाम जाने में चित्त स्वभाव स्वयं भी बदल जाता है। प्रशंसा ( सराहना) के स्थान में जो कि हर्ष ( संतुष्टता) के साथ नीचे देखता है, यह (मानसिक भाव) सत्कार ( सम्मान । हो जाता है जो मम्मान ( भक्ति ) के साथ अपर ताकता है, और अपने मामने किसी किये हुये कार्य को नहीं पाता है पर मजीव कर्ता को पाता है, जो कि इसका और दूसरे दूसरे अप- रिमित उचाय ( noblness ) माध्य क्रमों का करने वाला है। अतएव यह सन्तुटता के बदले में प्रेम और लालसा हो जाता है। जब तक यह पलट ( विभेद) नहीं होती है तब तक पतर्य वस्तु ने ज्ञान में कोई पावन (ईवर सम्बन्धी या धर्म मम्बन्धी अंश नहीं है। प्राचरण सम्बन्धी कर्तव्याकर्तव्य विचार (१.१) मनुष्यों के मध्य रहता है पर इस परस्पर के सम्बन्ध में भी जब किसी महात्मा के पावन चरित्र को देखते हैं तो चित में एक प्रकार की ज्योति उदय होती है, चाहे यह मानव य हो या ईशरीय। यद्यपि सम्मान ( भक्ति मनुथ के प्रति होता है, तथापि बिना किसी भेद विचार के यह उसके समग्र व्यक्तित्व पर नहीं हो सकता है, पर केवन्त उनही अशी पर होगा जो पहले सदसदाचार सम्बन्धी सगहना पा चुके है । सम्मान में सदमदा पार सम्बन्धी सराहना भो एक नियम है यद्यपि ये दोनों अनन्य नहीं है । जिसको सराहना नहीं हो चुकी है उस में सन्मान (भक्ति ) नही जा सकता। इसे यह निकलता है कि किमी मनुष्य को सम्मान (भक्ति ) पूरा पूरा विना काम के नहीं दिया जा सकता, क्योकि सर्वोत्तम मनुष्य मे भो अधुरापन या दोष पाया जाता है (जैसे कि चिड़चिड़ापन और डाह मात्सर्य तुच्छ विषयो पर व्यर्थ घमंड इत्यादि )। यह भी देखना चाहिये कि मन्मान भक्ति ) का इस प्रकार का उमंग जैसा कि आर लिखा गया है यद्यपि दूसरों की साधुशीलता ( भताई) के प्रति प्रकाशित होता है, पर लक्षित करता है कि स्त्रभाव ( character ) का अर्थ पहले पहन इम लोगो ने अपने ही में सोखा (या समझा । है, क्योंकि दसरे के भाभ्यन्तरिक प्रकृत्ति और स्वभाव, जिस पर सम्मान अब जाता है, ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो देखो सुनी या छूई जा सके, इसकी स्थिति ( विद्यमानता ) अनुमान (निगमन ) से नानी जातो है अर्थात् भाषा ( वोलो, आकार और कर्म आदिक बाहरी चिङ्गों से, जिन चिह्नों का अर्थ सब लोग एकही लगात है। हम लोग स्वभाव-समता की कुजी से दूसरी के मन का ताला खोलते है; जो कुछ दूसरे पर भारोपण करते है उसको इम लोग अपने भीतर उसके किरणों और संचरणो को देख कर ( १०२) नाम ते ।। मच तो यह है कि जब दो विरोधो चित्त संस्कार शाम में लडते है पोर अन्त:करण उन के गुण दोष को परीना पानाता है उम स्थान में उनका इतिहास पूग नहीं होता । उम अपने भीतरी विचार स्थान (कचहरी) मे जहा साधु गोलता की महिमा और मौन्दर्य, साधुत्व से पनन होने में गाद नन्जा देखते हैं (या पति हैं ), वहा हम लोगों को इस प्रकार से नज्जा दिन्नान वान्ता कुछ हम लोगो का अपना मुख नहीं है, और न यह हम लोगों के माथियों का मुख है जो न जाता है, क्योकि वे तो हम लोगों के ममानही है । यह कार में भ. तो है, हम लोगों के परिमित मन में अपरिमित मागता ( मिबि ) का ज्ञान रहता है. यह लज्जा वही दिलवाता है। अतएव मम्मान बाहर जाने के पूर्व भीतर ही दिया जाता है, वह कर्तव्या या र्तव्यविचार की नाई के वन्न पाजामचक नहीं है, इसके शब्द धर्म के घेरे को सोमा के भीतर पहुंचते है, बहुधा ऐमा होता है कि इसका प्रादेग अपनी रूचि के अनुसार न होने पर भी हम लोग मानते है, आवश्यकता या भय से नहीं पर गढ मम्मति घोर उग्र प्रेम के साथ । यद्यपि कार्योत्पादक हेतु बहुत है और कर्तव्य कर्म के प्रश्न अनगिनत है तो भी इम का अधिकार नहीं पलटता है, यह प्रत्येक प्रश्न में एक के माथ रहत ही है। अतएव टूमर्ग का विचार करने ने जो भंद कर्तव्याकरव्य विचार सम्बन्धी सगहना और सम्मान (भक्ति के भाव में देख पडता है वह भेद हम लोग अपने अन्तर्वाध में भी पाते हैं। मम्मान ( भति) का भाव कर्तव्याकर्तव्य विचार विषयक भाषा मे ऊपर कोई दूसरी उतम भापा (गेली ) में अपने को प्रकागित करता है और स्पष्ट रूप से धर्म के क्षेत्र में पहुंचता है। यह पवित्रात्मा ( या जीव ) स्वर्गीय प्रवृत्ति, पुण्यात्मा म्वभाव, और ई ग्वरीय प्रेम के सामने रहता है, और अपनो चिन्ता के इन पात्रो का केवन्त उचित (सत् या शुद्ध) । (१०३) या वन्न धार्मिक भी (virtuous) कहना न सह सकेगा, यह उनको पावन, ईखरमम्बन्धोय. कहलाता है । अतएव, इस मन: कल्पना के बल से कर्तव्याकर्तव्यविचार की समग्र वेणी एक नया ही रूप धारण करती है । " तुम्हें अवश्य करना होगा" इस की घटती या बढ़ती ही अब चित्त सस्कारों का अन्तर नही जताती है। कर्तव्याक्तव्य विचार अब परमोत्साहयुक्त हो जाता है। कर्तव्य अब प्रेम हो जाता है । ऊपर के व्याख्यान से यह सिह हुप्रा कि सर्वोत्तम मनुष्यों में भी अधूरापन ( या दोष ) टेग्नु कर जिम पूर्ण स्वभाव के हेतु व्यग्र र हते है, चित्त में गाढ़स्थित वह साधुगीलता (या भन्नाई) को उतम कल्पना जिमको पूर्ण विमलता के भागे हमनोग पञ्चात्ताप और लज्जा से अपना सिर झुकाते है; वह नित्यवाही व्यक्तित्व ( Aorless personality ) जिसके प्रति सन्मान (भक्ति ) मकार और प्रेम के सहित ऊपर ताकता ( या देखता ) है, वह पात्र जिसके सामने हमलोग पूजा पूर्वक प्राजापालन और परमोत्माह-युक्त प्रामक्ति ( उपामना ) में झुकते है (नि- हुरत है);- वह ईश्वर के प्रति (वभोव) को सर्वोत्कृष्ट मम्पूर्णता है ( अर्थात् वह मर्वोत्तष्ट अखंड, दोपहीन. ईखर की प्रकृति, स्वभाव है ) अतएव, कर्तव्याकर्तव्य विचार में जिसको " साधुशीलता ( भन्लाई ) के प्रति सन्मान ( भक्ति ) " कहते है, वह धर्म ( religion , में के “ ईश्वर के प्रति प्रेम" के सममूल्यवान है। 'सम्मान' और चित्तसंस्कारी के पहिले नहीं देख पडता पहिले यह छिपा रहता है और तब सदसटाचार के सम्बन्धी को वहुत विचारने और सदमनाचारसम्बन्धी भावो के अनुभव करने पर यह प्रत्यक्ष होता है और सब के ऊपर जा बैठता है। 'सम्मान' चित्तसंस्कारो की युद्धभूमि से सम्बन्ध नहीं रखता और न युद्ध की नियमो मे काम रखता है, पर जब झगड़ा - ( १०४ ) - ममाप्त होकर गान्ति का ममय पहुचता है उम स्थान पर यह रहता है । यह ई ग्वर तक पहुचने को लानमा ( या कामना) भारता॥ मिश्रित कार्योत्पादक हेतुओं का फतव्याकर्तव्यविन र विपयक मोन । मिश नित्तमम्कारी का कर्तव्या कर्तव्यविचार विषयक मोन मान पोर स्थान ( श्रेणी ) उनके मम्थापक अंगों के एकत्रमचित मोन हा। निणय किया जासकता है। परन्त इस मान ( मील ) को गिनता करना अमम्भव है, क्योंकि इमो लिये बड़े म्न्म और गाधित गति में मन अगी को अन्नग करना चाहिए और हममें बहतही बडे उलझाव का लेवा भी है। इस कारण मे हम विषय में जो ज्ञान हमलोगी को है यद्यपि वह अपरि- छत है पर उमो मे मन्तुष्ट रहना चाहिए । यह जान संस्थापक अंगों का एक प्रममिानिन फन है चाहे यह शीघ्र और गुप्त निग. मन व्यापार का फन्न हो, या इमको तात्कालिक जान (intuution) ममझिए । अावश्यकता पड़ने पर इन मिय चित्तसस्कारी के मोल को उनके मंस्थापक अगी में अलग अलग कर जाच सकते है पर यदि कतव्या तिव्य पिचार विगडा न हो ती इम जाच की कोई अावश्यकता नहीं है ॥ " प्रगंमा की अभिन्नापा" इनमें मे एक विव्यात मिथ-चित्तसम्कार है जो भिन्न भिन्न दगा में भिन्न भिन्न रूप धारण करता है, 'प्रशसा की अभिलाषा' ( या अनुगग) कभी ' नि.मार अभिमान' ( ranity ) और कभी ' कीर्ति या प्रताप को अभिन्नाषा या अनुगग)' होजाता है। पर इनमें एक विशेष नक्षण यह है कि प्रशंमा किमो दूसरे पर नहीं जाती है, पर मनुष्य इमका प्रानन्द स्वयं ही भोगना चाहता है; कर्ता और कर्म स्वयं ही होता है । जब मनुष्य अपनी प्रशसा अपने ही करने में यथेष्ट प्ति-लाभ

( १०५ )
करता है तब इम वहिन भात्म-मन्मान और दूसरों के दया
या पगना का प्रयाजन या चाह ) रखता है तब उसके इस
दिसत ( ashleerd ) प्रात्म-सम्मान को 'अभिमान'. गवं.
अहवार या घमंड करते हैं।
जब वह अपने प्रतोभनों पर विज्ञाम बाछ कम करता
और अपनी शिष्टता में कोई क्षत्रिम अग समझता है और जब
उमका मांसर्गिक देह भी इतना उग्र है कि वह दुमरों के भावों
के अधीन रहता है. तो हमने इस पराधीन छात्म-सम्मान को
निमार अहंकार कहते है।
६ उमकी अभिन्नाषा प्रशंसा जनित प्रानन्द भोगने को
नहीं होतो है पर प्रयमा पान को. उपार्जन करने को होती है.
यद्यपि वह प्रशंना उमके कान तक भी न पहुंचे, देवन्न उमई
बाद के लोगों को उमका नाम सुहावना ( मधुर । बझ पड़े।
जब वह तुरत प्रशंसा पाने के लिये प्रस्तुत लोगो को मंट
{ प्रमन्त्र करने का काम अपने अन्तज्ञान के विरुद्ध करना
बोकार न करे, तो उमको मदर ट प्रात्म-प्रशना को ' की-
ति को अभिलाषा ' कहत है । यह इतिहामो में दीखता है कि
से बहुत लोगो का नाम उनके जीवन में बहुत विख्यात हुश्रा,
नहीं सब मुह में रहता था, पर उनके पीछे उन्हें कोई स्मरण
तक करता है, कोई यह भी नहीं जानता कि वे कौन थे । वह
ऐमा घनस्यायो नाम नहीं चाहता; वह मनुष्यों की कता
में चिरकान्तिक (स्थायी) स्थान को अभिन्नाया करता है। इसके
मरने के बहुत दिनों के बाद भी उसका यश फैले तो प्रसार
योकि तब के लोग अधिक बुद्धिमान होंगे और इसके गुण को
समभोगे इसी में मची मर्यादा है।
धम प्रकार में 'प्रगमा की अभिलाषा ( अनुगग ) बहत
रूप बदलता है। इसका कर्तव्याकर्तव्यविचार विषयक मोन भी
वदन्नता रहता है जैसे सांसर्गिक सेह का अंश इसमें अधिक या
।

। ( १०६ ) पाम रहता है और जैमा ननण उनका हो कि जिनमे प्रगंमा पाने की पभिन्नापा तो है । जिम माय एमकी तुलना को जाती है उसके मम्बन्ध में इम का मापेक्ष मान (मोल ) तुरत मान्नम हो जाता है। गिन के कार्य में इमक पुग पुग त्र्यवहार देखा जाता है, पारितोषिक, प्रगमापन ( या प्रमाण पत्र ), विगेप लनण द्यो- तगा पट (Drgreet), विर्गप पाटर, इत्यादिक मामिग्री हमी नियम या मन कारण मे कनिम गुण धारण करती है। परन्तु इम चित्त- मम्फार को गेकानट में रग्वना अहा है, हमके हाग मन को शक्तियां जागती है और विद्यार्थी परिथम करता है पर यह मन कुछ 'पाथर्य' और ज्ञान की खोज हो मे होता है बिना उमक नहीं होमकता। गिनक और गिप्य दोनो ही में इमका (प्रांत जान को पा लालमा का पहना अत्यावश्यक है। प्रत- एव जहा 'प्रगंमा को अभिन्नापा' और 'वियाम की प्रभिन्नापा' में विगंध होता है. वहा पहना जयलाभ के योग्य है, परन्त जहा विरोध 'प्रगंमा की अभिन्नापा' और जान ( विद्या) की क्षुधा (अभिन्नाप) ' में रहता है यहा पिछले को मर्वाधिक स्वत्व को न मानना पहले को ढिठाई है, अर्थात ऐसी अवस्था 'जानकी क्षुधा' पहिले मे उच्च है । शिक्षा की गति में यह भी अवश्य नि- यय कर देना चाहिए कि कहा पर शुद्ध बुद्धि विपयक अनुसन्धान को इच्छा ( clotty ) परम गुणकारी होगी और सन्मान पाने की इच्छा शुन्य अग को उतरेगी । पर दुभाग्यवश यह बात गिनाविभाग के अाधुनिक निर्माणको के ध्यान मे हट गई है। परीक्षाप्रो पोर पारितोपिको को गति पर इतना अपरिमित भगेमा रखने में विचार-शक्ति (thought) को वृद्धि और उज्वलता के लिये बुद्धि की नाभाविक लालमा का जन ट्रोह युक्त (भ- मभ्य, निष्टर ) अवमान होता है, और यह बुद्धि को अकडाने वाने । गेकनवाने और कर्तव्याकर्तव्यविचार में निकष्ट चि .

- - तन्नागे ने दुटना में भाग ग्रान पाना विद्याया- मान 7.10. कामगः युद विद्या , मोचना हो जाता है. पा. जानने पर उन्हों की रोनि पर पत्र अनुमान कर दि. चियों को उनका उत्तर बनाना है। - 9 - : गिक न्नीग मफन्न गिनाना : यह गति अवश्य ही विचार गालि (या मोचने की । नूतनना और मोनिकता को दबा देता है, नाम र ना (भयांत इस गति से विद्याभ्याम किए ए विद्वानों की पर जो से नई नई बात सोचने का अभ्याम नहा रहता.म। बुद्धि में ताज़ापन नही पाया जाता है: परीक्षा में दम में बढ़जाने को अभिन्तापा कि जिनको इम प्रया में विद्यापासंग की इच्छा का जगानवान्ना माना है वह उत्तम मानमि- वानों के निये अनावश्यक है: भोर दूमरी की तो अब व प्रत्ति- मम्बन्धी-पर (fts-onal tiere. ) पा लेते हे मी ममय उनी विद्याभ्याम को यह ( पर्वोत राति ) समाप्त कर देती है, रोक देती है॥ गजनीतिन पुरुषों में क्षणिक प्रशंसा की प्रभिन्नापा मे वद. कर श्रेष्ठ कीर्ति (नाम ) अभिन्नापा है, पर अपने पर मना विनाम रखना और गच्च की मचाई से (या धर्म या भक्ति पूर्वक ) सेवा करने को इचा इन टोनी में उत्तम है। जावन के मिश्रित मामान्य व्यापारी (या काम काज ) में प्रगमा को अभिन्नापा' मनुष्यों को नाशक (बुरी ) लालच में डानती है और उनको कर्तव्य कर्तव्य विचार के विषय में कायर वना देती है। अपने मगियो या बडी की प्रीति या अनुग्रहन ) वाक यी नाति हिन्दुम्नानननी अगजी कगज्य के शिक्षाविभाग में प्रचलित # इस में भी आर्थिक काि या कवद्याया विद्यान्यात सात कान के साथ साथ दागर का न्वान्थ्य भी समाप्त करने।

(१.८) गवाना पडे इगो निगे नोग कितनी बाते भठ बोना करो । मगलियों से उपहाम ( या बोन्न टोन ) और तिरस्कार में बनने के लिये कितना झूठ बहाना किया जाता और दोषयुक्ता गा पाप कामों में मम्मति दोजाती है । अस्थिर (चंचल ) नित्ताने माथियों को कपा बनाए रखने के लिये उनके मन में (गा मे ) अपने बारे में कुत्सित बाते भी बतलाते हए टेग्व कर कायर को नाई चुपचाप लोग रहना है। हम प्रकार मे म चि · मंकार के अधीन होकर लोग नीच और कुत्मित कर्म लिया करते है, झूठ बोलते हे, मिय्या-प्रगमा (खगामट) करते १. और नोन ता मे ममय के योग्य बातें बनाया करते है यह वित्तमंन्कार ( प्रगंमा की अभिलाषा ) लडको के योग्य है, सया. नी क नहीं। लड कपन में जब मनमत जान केवन्त मौलिक कना (ruthunr ntary) रहता है और मयानो की बहुत मी बातें मान हो लेना होता है, और उन मयानो के लिये भी जिनका मदमत जान भी वैमही अपक्क रहता है, दमरो में प्रगंमा (सरा- ना) पान की उत्कठा म्नभाव को ऊंचा करती है नीचा नहीं। पर यह विद्यार्थिया मिपाहियो और नाविको का पग. कम ( उमाह) बढाने, प्रकाशित करने, और साहस बनाए रखने के निये प्रयोजनीय है. पर मगे में यह कर्तव्याकर्तव्य विचार विपथक नीचव दिखनाती है। उदारता - मिश्रित चित्तमंनागें में उदारता " को भी गिनती है, पर वमान: यह मख्य सामर्गिक स्नेह की उग्रना ( अत्यन्तता, पातिगग्य.) है जो विशेष कार्यो में देख पड़ती है। दान पौर क्षमा म मामगिक संह की अधिकता को उदारता' कहते है, यह धन-प्रेम और क्रोध रूपो इसके दो प्रतिरोधको को अन्नग कर देने में बडा पराक्रम रग्बती है। यह चित्तसंस्कार अपरिमित और स्वच्छन्द है। रातएव 'न्याय' इसका विरोधी है । । ॥ ( १०८ क्योंकि यह (गाय) कार्य के प्रत्येक चंगो माया नाता हैन म और न अधिक ठीक ठोक होना नानि । हो कोई किमो मो मे किमी काम के निये ठीक ठीक नियम कर निए हो-जैसे कि मानिक ने नौकर मे मा मीन मा कर लिया है और इन नियमों को पूरा करने में ही रे ने नियम में राधिक किया है उनको भी गिनती घर बिना मागे उमके ग्वत्व में नियम मे धिना - उदार या दानगोन कहते है। फिर भी यदि नी:: में जिमका नियम पूरा पूरा निवय नही दिया गया। TOT. दमी टूमी पक्षनाने का म्वत्व न रहने पर भी सपना म म ध्यान में छोड़ दें कि पापम में तो न उत्पनी न हो) तो उसको भी 'उदार' कहंगे कभी कभी माटपिटनेह ( कुट से ) चोर बरा भी इम को रोकते हैं नही तो कहीं हाय खन्ना रहने मे दान बही और परिवार और दुखियो के लिये मचित धन को एक ही बार किमी को दे न दे या व्यपन कर बैठे । हा यह तो मन है कि घरिमित ‘धन-प्रेम' मे अपरिमित उदारता है, ऐमी 'उदारता' मदा नदी प्रशमनीय है, एक पन्जान के काम के लिये अपना मब धन लुटा कर अपने परिवार को दरिद भिक्षुक बना देना एक अपराध है । अनियमित क्षमा भो सगहनीय नही और अपगधो और दर्शक दोनो के लिये उ. चित शिक्षा ( उपदेग ) इममे नट होजाती है । अतएव कर्तव्याकर्तव्य विचार मम्बन्धी मारगी में "उदारता" का कोई अचन्न ( अपरिवर्तनीय ) स्थान नियत नहीं कर म- फते । इमक प्रत्री का उत्तर के वन्न हेतुनो ही के विचार से नहीं टेना चाहिए पर इनके फल ( नतीजा) को भी सोच लेना प्रावश्यक है। परन्त ऐमी . है ( ११. ) (११) 'गुणोत्कर्ष' के सम्बन्ध । गुणोत्कप के बोध में अनेक कर्तव्याकतव्य विचार सम्बन्धी र पना उत्पन होतो है, पूर्व कथित चित्त मंस्कारों मे निकलती से. पोर नए कार्योत्पादक हेतु बनाती है गुणोत्कर्ष के बारे में जो कुछ पहने निग्व पाए है। उसमें स्पष्ट है कि यह एक मापन' कन्पना है यह दूमो के मबन्ध मे कहो जाती है पोर में मे जे मे वह टूमग बटन्नता जाता है तैमे २ इसका भी रूपान्तर होता जाता । एकही इच्छा एकही मनुण में दो भिन्न भिन्न समय में होने से या दो मनुष्यों मे उपजने से, या दो मनुष्यों के बारे में होने से, गुणोत्कर्ष (या योग्यता ) मे भिन्न भिन्न गप धार गा करती है । एक समय मे इम पूरा करने में बहुत ( गाढ ) लालच, लुभाव को रोकना पडे, दूसरे मे कर्ता की प्रति के मेनही का हो, और पुरा करने में कुछ कठिनता न पडे । या एक में अनुकूल दशा और दूमरे में प्रतिकून दशा हो मकती है, तो अनुकुल वाले को जो प्रगंमा करेगे वह प्रतिकूल वाने में बहुत प्रसन्न हो जायगी। ऋगा चुकाने में जो कुछ कठिनता महनी पडी उमकी यातनता महाजन न माने, पर जो कठिनता किमो अनजान बधुपा को बन्धन से छोडाने में होगा वह उमके पाग्व में छोडाने वाले का भारी गुणोत्कर्ष प्रकाग करगी और उमो रीति में मनुथों की साधुशीलता ( पगेपकार ) यद्यपि ईश्वर के सामने कर्ता के गुणोल्कर्ष न बतन्ना मकती थे, पर मनप्यो मे तो अवश्य ही उसयो गुणोत्कर्ष देगी । उम अनन्त माधुत्व युक्त ईश्वर के मामने हम लोग केवल यही कह मकत है कि हमन्नोग लाभकारी सेवक है। हमलोगी का जो अवश्य कर्तव्य कर्म था ( केवल ) वही इम नोगा ने किया"। अब हम अन्तिम वाक्य से एक निशेप बात और भी प्रगट भोता है यह देखनाता है कि कर्तव्य कर्म करने में काई गुणो- - ( १११) वर्ष तभी मिलना चाहिये जब निर्वन्ध और खराई (सत्यशीलता) से अधिक कर दिसन्ताव। ऐसो बात उस अवस्था में संभव है कि जब इसन्तोग आपस में किसी विषय के लिये कोई परिमित नियम बांध देते है या जब उस विषय में कोई निवित चान्न चन्नी भाती है। परन्तु जब कर्तव्य कर्म के घेरे से 'गुणोत्कर्ष' (merat) को निकाल दें. तो इसके इस पृर्वलिखित लक्षण को वदन्त टेना होगा कि जिस की सराहना करते है उसमें गुणोत्कर्ष पौर जिसको निन्दा उसमें गुणाभाव इसन्दोग भारोपण करते है क्योकि प्रलेन उचित इशा को हमलोग सराहते है । एक स्थान में गुणोतर्प और सराहना को एक ही स्थान देते है, पर दूमरै समय मराहना को तो वही स्थान भौर गुणोत्कर्ष को वैवल उममें से थोड़ा स्थान देते है अर्थात् कर्तव्य से जो पधिक बढ़ेगा उसो में गुणोत्कर्ष को रखते है । अतएव इन विरोधी व्याख्यानी को मिन्ना देने के न्तिये ठोक शब्द 'योग्यता (dcsert) है। मनुष्य सराहना के योग्य भो हो सकता है और निन्दा के योग्य भी। अतएव बंधे हुए (निवित) कर्तव्य क्रमों में 'योग्यता' प्रयोग करनी चाहिये और उससे अधिक होने से 'गुणोत्कर्ष' । यदि ख के साथ प्रतिज्ञा पूरी करने में क को कोई भयानक क्षति सहनी पड़ी हो जो उमके सत्य गीलता ( integrity ) के दृश्य फन्न ( नाम ) से कहीं बढ़कर हो, तो हमलोगों को प्रवश्यही मालूम होगा कि प्रन्नोभनी को रोकने से उसकी सत्यशोलता में कुछ वोग्त्व लक्षण भागया है और गुणोत्कर्ष के मंडन्त में वह पहुच गया है। परन्तु यह वात उसके मन में गुम रहने और ख के न जानने के कारण, ख के प्रति यह गुणोत्कर्ष उसमें नहीं है । ख से गुणोत्कर्ष पाने के लिये क को कोई ऐमा काम करना चाहिए जो सट्टे ( ठोका प्रतिज्ञापत्र ) में नहीं है और ख के हित ( या उपकार ) का है जैसे, ख का एक १०.) क के यहां पावना है और सट्टे के अनुसार उसको पुस में मिलना ( ११२) चाहिए पर ख को किसी विपत्ति में देदेकर यदि कई महीना पहिले उमको रुपया टेटे, या इमीका कुछ रुपया ख से पावना हो और पावने के ममय में वह कोई विपत्ति में पडा हो, मोर एममें वह उमी ममय रुपया न लेकर कुछ समय ख को अपने विपत्ति मे छूटने का दे; तो वह व्यवहार की येणो मे कहीं अगर बढ़ गया और तब ख की पाख में वह गुणोत्कर्ष को या ग्यता को पहुंच गया और ख उसके गुणोत्कर्ष को स्नोकार, करता है। ऊतन्नता जिम भाव (जान, बोध) मे इम ऊपर वाले अन्तिम दृशान्त में क के गुणोत्कर्ष को ख अंगीकार करता है और माधारग म? (प्रतिना ) मे बढकर कार्य होते अनुभव करता ३. उमको कृतज्ञता " कहते है। यह एक नया, प्रमिच, पर जगमग मरन चितमस्कार है। यह एक प्रकार का समर्गिक या दैहिक ( [PL9ono! ) प्रेम है जो नाम (अनुग्रह) पाने से निशय करके ( Specifically ) उपजता है और इससे पन्नटा टेने का अभिन्नाया में प्रत्युत्तर पाता है (अर्थात दूसरे से अनुग्रह या नाम पान मे कृतज्ञता उपजती है और इस में उसके अनग्रह का पन्नटा देने की लालसा रहती है )। सब प्रकार के प्रेम की यह प्रक्रति है कि जिम अनुभव की भावना से यह उपजता है उमको वह भी पैदा करना चाहता, अर्थात् दूमरा जैसा प्रेम हम पर बार हम भी उम पर उसी प्रकार करे। गुणप्रगंसा ( adml- 14*131) का उत्तर गुण प्रसंसा मे, दया का बदला दया (sympathy) मे, उनम दृष्टान्त (निदर्गन) का उत्तर उतने ही उत्तम दृष्टान्त में, और वैमेही अनुग्रह का बदला समान भनग्रह से दें अनाव कृतज्ञता में भी कोई समाधारण बात नहीं है। यह 'उदारता' का एक रूपान्तर (या भेद ) है, पर उसका पनियत प्राधिक्य (बहु व्यय) इम में पाए हुए लाभ (अनुग्रह) - 4. .. १ . (११) के विस्तार के अनुसार लगभग परिमिति (सोमा ) को पहुचता है, । अर्थात जिन मात्रा का नाम पाया है उसो गभग देना भी चाहिए ). यद्यपि इसकी सूक्ष्म गणना नहीं होती है। परन्तु यह प्रेम, अनुग्रह, जो एक आदमी किमी प्रकार में दिखनाता मत्री पाने वाला अपने ऊपर ऋण समझता है पर करने वान्ता अपना सब नहीं समझता है। या प्रेन का महन्धतता'का मन तल है: प्रतएव जो मनुव इन ऐने उदार सम्बन्ध को नही रख सकता है और तक इस ऋण को बटपट चुका कर छुटकारा नळ पार तक त चाकुन्न ( असुनो) रहता है उसमें यह टोपयुद्ध रहती है। हा यदि अनुग्रह करने वाला कोई अयोग्य मनुक हो या कोई ऐसा अनज्ञान प्रादसो हो जिससे वह मिaat (या र संग ) नहौं रख सकता है और तब वह हम पनु- रहीत दशा से छुटकारा पाने के लिये हड़बड़ो में हो तो समते इस कर्म की इस्लोग निन्दा न करेंगे । पर टूमरी भवस्थाओं ने यह हुटकारा पाने को पूचा उसबै वित्त अत्यन्त महकार टिखन्नाती है कि जिसमें वह मिकता नहीं कर सकता और उदार सम्बन्धों के योग्य नहीं है; तोकि कितना ही टानगीन्न कोई दाता क्यो न हो पर व उदार नहीं हा जा सकता यदि वह व्यवहार में महा अपने की जवा बनाए रखना चाहता है और दूसरे को नीचा बनाकर उसको नोचा टेखता है। परस्सर स्नेह का यह मार विषय है। कि स्थान के हेरफेर को सदा स्वागत करना चाहिए hि करने और पाने. अधीनता की नगीनता और उपकार या महायता) का आनन्द. टोनो ही में समान मोहन शक्ति मनोहरता ) रहे। भतएव चिड़चिड़े पन वाले (मगरा, टेटा या मलरी sullen n) (गृहोता) को वैसाही नेह रहित जानना चाहिए कि जैसा डाही दाता ( अर्थात जो charm ने न पग - ( ११४ ) गप्रमत्रता पूर्वक, कुढते या घुनघुनाते देना है ) होता है । जन दो पादमियों में जो प्रतिज्ञा हो गई है उसके किमी नियम को एक किया ओर दूमने के मामने वह अपने यो गुणाभाव के योग्य समझाता है तब उनके जी में एक प्रकार का चित्तमम्कार उपजता है, जो कृतज्ञता का उलटा ( विपरीत ) पक्ष है और जिसको ' हानिपूर्णता ( प्रतिममा- धान, सुधगव ) की इका" कहते है । जो टूमरे को हानि पहुंची है, विशेप करा जो स्नेह में प्राघात पहुचा है, उमको यह पूरा करना चाहती है । जब यह घाव न चोखाय हानि पूर्ण न हो तब उसको केवल बाहरी ही लक्षणो मे निन्दित न होना पडता है पर उसके जी में भी पाता है कि उसने अपनी पौर ममाज को गालि को विगाडा है; और इम पाप के प्रायथित के लिये पहला काम यही करना चाहिए कि अपने ऊपर जो कुछ क्षति उठाकर हो जैसे हो, इनको पूर्ववत फिर कर देना। बहुत देर तक इस बुराई को न रहने देना; अपना अपराध को एकाएक स्वीकार कर लेना चाहिए; क्षमा में एक भी वहाना न दिग्व नाना, पर अपना कलंक मब अपने ऊपर ले लेना चाहिए, और 'उमकी हानि को पूरा कर देने में परियम, धन, कुछ भी बाकी न लगाना चाहिए जमे हो तैमे पग कर देना, कि जिममे फिर भी विश्वास और स्नेह ज्यों का त्यों बन जाय । परन्तु जब तक परस्पर विश्वास की हानि ( उठजाना) अपने को अमद्य ( अमहनोय ) न बूझ पडे और जमे हो तैसे समको पूग करने में शीघ्रता पाप न करे, तब तक विश्वासा- कदि पूर्वात होने की ( लौटने की) कोई आशा करनी भारम्भ भी नहीं कर सकते है। अपर के व्याख्यान में यह सहज में देख पड़ेगा कि कृतजता नही कर्तव्या कर्तव्य सम्बन्धी मान और नियमी से बद्ध है कि जिनमे " उदारता" है । सचमुच कृतजता" उसी का भिन्न- (१५) रुप शान्त है पर यह किमो एक व्यदिति होती एक विशेष प्रकार कार्य में उपजती है। गुग ध्यान (नुभव । में एक और भी जान ( बोध उत्पन होता है। प्रत्येो मनुष को उम प्रचन. दृट, और मावशान्तिक इजा को नाय । इन शब्द के अनेक प्रयोग प्रचलित है. उन सभी को एक पr- भाषा अन्तर्गत नाना अमन्भव है: प्रतएव यहां पर प मच पक्ष लिया जायगा कि जिनमें प्राय. मत्र का वर्णन हो म । न्याय · मनुष्यों का उनकी योग्यता व अनुमार गांव करता है । इम में दो विषय बुझे हे (१ । उनव माय वाव करने वाला कोई है; और ( • ) उन बर्ताव में उमई हाच में किसी ऐमी वस्तु की बाटने का अधिकार है कि जिमा वन्नोग मोच ( परवाह ) करते है. और जिमको वह भी योग्यता के अनुमार नम और सापेक्ष भागी में बाटता है। इन दशात्रों को सुनने से एकाएक मामने एक न्याय का ( rud:-) का चित्र देख पड़ता है कि वह टो बाटो प्रतिवादियों के बल की विचार रहा है. और उन दोनों के अपगध और स्वत्व के अनुमार उनको छोड़ता या बाधता है, प्रतएव यह स्पष्ट है कि न्याय करने के लिये कम से कम तीन मनुष्यों का होना शवश्यक है-दो मनुष्य जिनका अग किसी सामान्य पच्ची या बुरी बात में सन्देह में है और तीसरा वह जो इस सन्देह को मिटाना है, अब इसी विचारकत्ता के निर्णय में न्याय और मन्याय का प्रयोग हमलोग कर है, और न कि उन दो वाडियो के बारे में । 'न्याय' का यही व्याख्यान मुन्न नड़ बूझ पड़ता है, बहो मनुष्य 'न्यायी' कहा जाता है जो सापेक्ष ययोग्यता के झगड़े में किसी बांटने के योग्य वस्तु को उनकी याग्यता अनुसार ययोचित अंगों में बांटता है।

. कोई व्यग्र, , ( १ ) पर यह विवाण हमलोगो के माधारण लोग्नमाल मे मदा नही देर पडता है। हम लोग बोनचान में कहा करती कि • Kun न गाने नौकर के नियमानुमार वेतन को 'अन्याय से गेतराला', · पिता अपने लडी को पानस ( प्रामकत ) या "ता के निगे गाय मे दगड टे मकता है निताना, मनुष्य अपने मित्र के अभिप्राय पर अन्याय में सदेह (गं 51 ) र म कता है '। इन वाको मे बुझ पडेगा कि गग' और 'उनित ' एकहो बात है और पिछले के मा पनिने में भो दोहो मनुष्या का प्रयोजन है, तोमरे का नहीं। पामा नही है । इन प्रत्येक दगानी मै तीमग मनुष्य उपलचित है। प्रत्यक वाक्य में जिम मनुष्य के बारे में गाय या अन्याय पद का प्रयोग किया है वहो तो न्यायकर्ता का स्थान ग्रहण करता है पर अब उमक निर्णय के लिये प्रार्थना करने वाले दो पायक कहां से भावेगे, यहो निकालना कठिन है क्योंकि उन में बाकी तो अब एकही बचा है। पहिले दृष्टान्त में काम लेने याना ( मालिक ) विचारकता है, और वह स्वयं और नौकर येकी दोनों में वेतन का नियम ठोक हुआ है, अतएव येही दोनों वादी प्रतिवादी है, और वह न्यायकर्ता बनकर नौकर के विरुद्ध विचार करता है । दूमरे उदाहरण में दण्ड को तब कहेंगे कि जब यह अपराध के समान हो और यह पनपात रहित दिया जाय अर्थात् और लड़कों की अपेक्षा उम पर अनुग्रह या अप्रसन्नता न दिखन्नाई जाय, अतएव इस प्रश्न में तामरा मनुष्य दूमरो अवस्थामो मे वही लडका हो मकता है, या उम घर क ओर लड़के उसके भाई बहिन आदि। प्रब तीमग दृष्टान्त जाचिए, जिस मित्र पर शका की गई है उनको उन्ही न ( विचार वार्ता ने ) उसके विरुद्ध के प्रमाण न रहन पर भी वमा ममझा है जैसा कि कोई अपराधी जिसका पपराध स्पष्ट रूप से सिद्ध हो गया है; अतएव यहां पर विचार न्यायानमार --- दिया जान . की निगर -- हममें लाया गया राधी विचार :: :::: दादी के समय मोर- का मानामा न्यतानुमार बाट १ को नायक या जिन गाभीमान नपानी: उनमें अन्याय 'विदीप का प्रयोग नहीं करते। मनुष्यों के भापम बनार में इनका प्रयोग न करने यदि कोई दाई प्रतिज्ञा के अनुमार ठोइ ठो-नमय पर वर न म छ विया की तो उमकी नामिनो उमको 'अन्याया' कभी न कहेगो । भोर यदि नौकर को ठीक ठोक ममय पर वेतन मिना करे तो वह अपने बामो को प्रगंमा 'न्यायो 'कर न करेगा। ठोरे के गनुनार चन्तना पोर प्रतिज्ञा पूरी करनी न्याय के उदाहरण नहीं है । पन्छ (नियम ) पूग करना ‘विश्व तता है, पर अब य करने दह 'न्याय' भो हो मो नहीं; करना दोष' है पर अवय करके 'अन्याय है, मो न हों। राजन्यायान्तयो के विचारकती अपराधियो को उनके अप- अनुमार अर्य दगड, कागगाग्वाम प्राटिक दगड टेी है, पर यह विधि शत्रिम है, सदमदाचार विषयक नहीं। साधारण मनुष्य इसके बदले योग्यत'नुमार स्नेह मगहना. घृणा, प्रम क्रोध, सन्मान, प्राटिक का प्रयोग करते हैं। साधा. रण मनुष्या के इस स्वभाव और अाचरण के विचार को चित्त को मचाई, निमन्त ता. ग खगपन. कहते है । ए नई समझ idea वह उन विषयो का विचार करता है जिनके जपर नाति ( lar, आईन कुछ ध्यान नहीं देता है। इस रूप में न्याय एक नया कार्यशदा है न हो जाता है निराले ओर सरल रूप में चाय कर्तव्याकर्तव्य विचार विषयक पूग न राध के ) है;

(११८) गुण का ए शबहार या अभ्याम है, परन्तु इमको तत्परता जव एक मभाग ( प्रकृति ) हा जाती है तब यह एक चित्तसम्कार पो जाता है तब यह 'न्यायानुगाग' क्या है । यह मनुयो पोर उनके स्वभाव को योग्यतानुसार मापेन भाग ने वतांव करने को अभिन्नापा ( अनुगग ) है, अर्थात् अधिक योग्य पुरुपों का अधिक अनुक न ( favourable ) मन्कार करना और कम को कम । न्यायानगग कान उचिन (कतंच) के ज्ञान का उत्कृष्ट रूप है; तयाकर्तव्य विचार सन्चा उत्कर्ष को जचा पट टेना (नहर ममझना । बायानगग है, या भाव के विनार करने में अन्त. करण ( मदसतज्ञान) का परमात्साह (अत्या- मक्ति) इमको कह सकते है। सत्यशीलता" म यगोलना, मचाई, या मच बान्नना, स्वयं कार्योत्पादक हेतु नहो है, पूर्वोत चार प्रकार के चित्तसकारो मे से यह किमा में नहीं है, प्रवति के बदले यह बोलचाल (वचन, बोन्नो, sp....h ) का अडाव प्रतिरोध, है, जो हमनागा को बहुत सी बातें बोलने में रोकना है. यह प्रारम्भक नहीं पर अनुगामक है, कुछ कहने को इच्छा टूमरो हो जगह खोजनो चाहिए । हमनाग बात बोलते है, मबा होने के लिये नह , अपना अनुभव कहने पार दमरा का सुनने के लिये या दया या वृणा उपाजाने के लिये या अपने संगो को इजा पर कक प्रभाव दिग्वनाने के लिये । अपनी इच्छा पाने के लिये चि- त्तमंस्कारो की बोनी केवल एक साधनयन्त्र (हथियार जरिया) । वचन दृमरो के कित्त पर एक प्रकार का विश्वास पैटा क- रना है या क्रिमो भावना को जगाता है. पर जो विश्वास दुसरे करना चाहते है वह हमन्नोगो का अपना विश्वास है और जो भावना जगाना चाहते है वह अपनाही अनुभाव है; नएव वालने की मुख्य उद्देश्य ही में सचाई अत्यावश्यक है, वचन पर है । पैदा . .. । ( ११८) चित्त को सत्य भवस्या को प्रकाश करने लिये बनाया गया है. यह न करना 'वचन' इस शब्द का अर्थ उलट देना है। अत- एव सचाई हदरूप से (या यवार्यत:) प्राकृतिक (या खाभाविक) है: वचन हारा अपने चित्तो भावों को प्रकाश करने की रीतिही से यह सट है। पर दूसरे दूसरे चित्तसंस्कार मनुषों को दूसरी से अपना विश्वास और भाव ( feeling) हिपाने के लिये उत्तेजित करते हैं। अपने अपराध को जान लेने पर नब्जा हमलोगो को अपना पाय हिपा रखने को कहती है। अपने मित्र के नीच कर्म को देख- कर इनलोग खयं खेद करते है, पर दया कहती है कि उसके दोष को छिपा लो । एक विरोधी हम से किसी विषय में बढ़ लाना चाहता है तो हमलोग उससे कोई प्रावश्यक समाचार (विषय ) छिपा रखना चाहते है। व्यापार में एकाएक धन 3- पार्जन करना चाहते है, तो अवसर मिल लाने से कोई झूठा समाचार उड़ाकर भी धनोपार्जन करने को प्रस्तुत होजाते है। जब ऐसे लोम चित्त पर बैठ जाते है तो वचन का लोग अनु- चित रीति से प्रयोग करते इसके ययार्य प्रागय से उलटे ही कार्य इससे लेते है । कदाचित इसी विशेष विखासघातकता को कारण असत्य को लोग अत्यन्त नीच कुत्सित, समझते है, और इसी कारण से क्षमायोग्य विषयों में इसको लोग वृणा युक्त देखते हैं । इसी ध्यान से एक तत्वज्ञानी ने कहा है कि भूट बोलना मानों मनुष की मर्यादा को त्याग देना या सत्यानाश कर देना है। झूठ बोलने से समाज में विखासनष्ट होजाता है; समाज परस्सर के विज्ञास ही पर स्थित है, मो इससे टूट जाता है। संसर्गिक स्नेह सत्यता (सचाई ) चाहता है, क्योकि विज्ञास- घातकता ( reachers ) से हानि के लिये क्रोध उपजता है और स्नेह में आघात पहुंचता है। दूसरी पर भी छल करते हुए - ।

( १२०) देखकर हम लोगों के चित्त मे वही भाव उपजता है जो अपने पर होने में होता है। कभी कभी मनुथी के परस्पर का यह विरोध भान कई पीढ़ी तक बढता ही चला जाता है। जो मनुष्य झूठ बोलता है वह दो वस्तुओ को मिथ्या प्रका- गित करता है-मख्य करके तो (अ) अपने विश्वास (प्रतीति) पोर भावों को, पर इसके अतिरिक्त (इ) उन विश्वासों और भावों को भी जो यथार्थता से प्रमाणित है, जो पदादों की प्रकृति और ससार के क्रम ( परम्परा ) से सम्पर्क ( या सम्बन्ध) रयते है । झूठ बोलने वाला पहिले के बारे में कह सकता है कि अपना विश्वास और भाव हमारे निज के विषय है, दूसरों यो हम ये प्रकागित करे या न करे तो उनका क्या. अपनी वस्तु दूसरों को न देंगे, यह हमरा धन है उनका धरोहर नहीं है। पर पिछले के बारे में वह क्या कह सकता है; मति ( thought ) और बचन में सम्बन्ध है केवल यहीं पर मति और पदार्थ में भी सम्बन्ध है। इस पिछले सम्बन्ध को बिगाड़ने का उनको क्या प्राधिकार है १ पदार्थी के यथार्थ क्रम को उसने झूठ बोल कर बिगाड़ डाला है जिसको ईश्वर ने सच्चा बना रकया था। वह चाहता है कि हम लोग उन पदायों को जैसे वे है वैसा न समझ कर जैसा उसको सोहता है वैसा समझे। वह सत्य के फल को नहीं ग्रहण करना चाहता है, संसार के सिह कम से विरोध करता है जब कभी ये उसके मनोरथ के विगद होते है । अतएव झूठ बोलना केवल मानवी अपराध नहीं है पर अधर्म भी है, ईश्वर के विरुद्ध निर्भयता से कुत्सित वर्ताव (पाचरण ) करना है। झूठ बोलने वाले को प्रत्येक झूठ के बारे में कहा जा सकता है कि 'तुमने मनुष्यों हो के प्रति झूठ नहीं कहा, पर ईश्वर के प्रति भी'। इसी अन्तर्ज्ञान मे एक प्रकार की धर्म विषयक घणा ( shrinking ) भी अभिप्रेत अमन्य की लज्जा और अनिच्छा के साथ मिल जाती है। अतएव ।

( १२६ ) जो मनुथ , सत्यशीलता ( सचाई) वन मंसर्गिक लेह दा हो नहीं र सन्मान के भो अधिकार (प्रभाव ) का प्रयोग करती है। किमो विशेष ( या पट ) धर्म का अनुगामी नहीं है. उनमें भो नो सत्यगोन्नता है वह प्रजात धर्म के ममान है मांस उस 'पता' का सत्कार करना है जो इस सटिका यथोचित वनम्ब (या अधिकार ) रहता है और जो मन पामा ( बाया. रूप. Percsc ) का अन्तरिक वास्तवाल (r:) है। यदि सत्यमोन्नता वल नमगिक स्नेह या लोगों के विचार वे दाब के बारर प्रशंसनीय कहो जातो तो मानुषो सम्बन्धी की सीमा के भीतर हो रहती और इसके बाहर दृहि न करती: पर सबही चालो में और जातियों में इसने मन्दिरों (देवालयों) को गरर ली है और हाट के व्यवहारी ( या प्रतिज्ञापों ) को तोर्यस्थानों (टेवालयों) में को ईबर प्रार्थना मे प्रमापित किया है और संपत्य और शपथी के रूप में यह इस पन्तर्दोध को खोन टेता है कि मनुष्यों से भिन्न प्रकार को प्रांखें शब्द की सरलता और सत्य की शुहि, विमलता, को सावधानी से देखती यो। अब यहां पर एक शंका हो सकती है कि यदि सचाई को सर्वोत्तम हेतु की रक्षा में रखा है तो यह सबही दगानों में निबंधयुक्त होगी (अर्थात सदा सचही बोलना पड़ेगा ) क्योकि नितर हेतु को हमने निकाल टेने का अधिकार नहीं देना चाहिए, और इससे उत्साह और कोई हई नहौं । तब क्या उन विपयो में भी असत्य बोलने (वा धोखा देने ) से हम लोग भूठ बोलना नोतिशिक्षकी ने भी नि:कलंक माना है, जहां इसने अतिरिक्त और कोई उपाय जान या जीवन विषय अपना या अपने मित्रो को बचाने का नहीं है ? क्या शत्रु, घातुक, या उन्मत्त (पागल ) को मन्त्री वात बतला देना चाहिये कि हमारे सत्यशीलता की हारा वे अपने वलि पर गए जिनमें । ( १२२ ) 'पपनी इच्छा पूरी करें। क्या चिकित्सक अपने रोगी को यह सभी बात बतला देने से कि वह एक वर्ष के भीतर मर मर जायगा उसके प्राजही मारने का विचार नहीं करलेगा। इन प्रश्नों का उत्तर टेने के लिये उचित है कि पूर्वोक्त दो सत्य- शीनता के अधिकार के मून्न ( जड़) कारणो से पूछे कि किन बातों पर विश्वास करने को कहता है । वे दोनों मूल कारण सापेक्ष सवाई और वास्तवत्व है। पहिला, जिसको साधारण ( सामान्य ) समझ भी कहते हैं, ममाज के सब लोगों के लिये है, और भाषा इसका साधनयन्त्र है। पर एक भापा बोलने और समझनेवाले सभी इस समाज में परिगणित नहीं हो सकते । जो लोग इस 'सामान्य समझ को भागय को त्याग कर उसके विरुद्ध कार्य करते है वे उसकी रक्षा के बाहर समझे जाते है। समाज के बाहर निकाल दिए जाने पर वह इसके निर्बन्ध की शरण का अधिकारी नहीं हो मकता। प्रत्येक समाज के मंडल में ऐसे ऐसे लोग देख पडते कि जो उस मंडल में तो रहते है पर उस के नहीं कहे जा सकते जो समाज की सेवा करने के लिये नहीं वहां रहते पर उसपर आक्रमण करने के लिये । गुप्तघातक, डाकू, हाथ में शव लिये शत्रु, और उन्मत्त समाज के बाहर है, और उसी प्रकार से वे लोग भी बाहर गिने जाते है जो बचन के प्रागय को व्यर्थ करते है और इसके विश्वास के द्वारा इससे विश्वासघाती का काम लेते है । सत्य बचन सुनने का इनको वैसाही अधिकार है जैमा कि शत्रु के पीर का कोई भेदिया आकर अपने दल में मिल जाय और पहचान लिया जाय तो उसको अपने संगियों में गिनने का। वह रक्षा के योग्य नहीं है, छुटकारा नहीं पा उसको फांसी पड़ना ही होगा। तब यदि उन मनुष्यों को मच्चो बात न बतनावे कि जिनको सच बतन्नाने के लिये इम नियम से बद्द नहीं है तो इससे सचाई के अन्तर्जान का मकता, .

( १२३ ) नियम टूट 11 --- -- नहीं जा सकता है। ये मनुष्य इस नियम के भीतर काभी पाए ही नहीं. क्योकि उस मंडली में ये रहते हो पर उस समाज का उचित काम नहीं करते है। अब सचाई के अधिकार ( प्रभाव ) उत्पन्न करने वाले दूमरे मन्त करण 'सन्मान ' का विचार कीजिए। पदार्थों से वार्य रूप का सम्मान' और उनको प्रययार्थ रूप में देखनाने के लिये स्वतंत्रता, ये दोनों पहिले सटा ही अमंगत (विरोधी) देख पड़ते है । पूर्वोक्ता सन्मान हम लोगो को प्रकृति और धमके यथार्थ विषयो के सामने खड़ा कर देता है, मानो बीच में कुछ दूसरा पदार्थ हई नहीं कि जिसके सहारे उनके रूप की कुछ औरहो देखला दें। परन्तु यह वात नहीं है; ऐवर सत वास्तविक रूप का सम्मान और उससे अभ्यन्तरिक प्रविरोध तभी पूरा हो जाता है कि जब हमलोगों का विचार ( समझ. बोध ) पदार्थों को स्थिति (वास्तविक रूप ) से मिल जाय । वचन तो किमी दूसरे से भी सम्बन्ध रखता है; वह दूसरा चाहता है कि जो कुछ उन वस्तुत्री के बारे में हम जानते है सो उसे कह दें। इससे एक नया ही सम्बन्ध जपर हुप्रा; यह सम्बन्ध प्रजाति को जानने के अभिलापी हमलोगो और प्रशति में नहीं है; पर हम लोग और हम लोगो की समझ को जानने का अभिलाषी उस में है। अतएव इस नए सम्बन्ध में कैसे वीव करना चाहिए इस प्रश्न के साथ यह नियम कामी घुटा नहीं रह सकता है कि हम लोगों के बोध (समझ, मति) को जानने के अभिलाषो पुरुष का स्वभाव और उसके पूछने का अधिकार (स्वत्व) जान लेना अवश्य चाहिए । यदि वह हमारे समाज का वास्तविक ( यथार्थ ) अंग या भादमी है कि जिसको हम लोग 'साधारण समझ' मे संग ले सकते है, तो अपनी सच्ची समझ उसको बतला देने के लिये अवश्य ही हम बद्ध हैं, और उसको और प्रकृति को शुद्ध ( उचित ) सम्बन्ध ।

( १२४ ) में रख देना हमारा काम है। पर यदि नम पहचान लें कि यमपि जपर मे वह हमारा भाई बन कर पाया है और वास्ता में वह कोई एली है जो हम से सच्ची बात जान कर उम को किमो बुरे काम में लगाना चाहता है और जहां तक हम सगो बात उसको बतलाते जायगे वहां तक वह जगई करता जायगा तो ऐसो अवस्था में विपयों का सच्चा मानम और क्रम न बतलाने वरच्च कुछ और ही वतन्ना देने मे हम विपयों के वास्तविक क्रम के द्रोहो नहीं हो मकते, हम उम क्रम के आन्तरिक म्वभाव ( spirit ) को बनाए रखते नहीं तो यह उमके अपराध का सहायक हो जाता है; हम इमो विश्वासघाती कहाते यदि इसके हाथ को भरे बन्दूक को किमी दुरात्मा के हाथ में थंभा देते । यदि वह स्वयं अन्धा न होता तो हमारे सच्ची बात के उस कोन वतना देने से वह हमको धन्यवाद देता, क्योंकि हमारे झूठी बात के बतला देने से वह बहुत भारी बुराई करने से बचता है। अतएव यह सिद्ध हुआ कि ' मम्मान' भी सच्चो बातो को ऐमे ऐसे मनुष्यों से छिपाने को पाना देता है । सत्य के लिये जो धर्मसम्बन्धी आदर है वह भी हममे कम नहीं होता है कीकि इस रीति में हम लोग उमकी पवित्रता के हेतु (या तत्व ground ) और तात्पर्य को ध्यान में भुला नहीं देते है। बौडहा भी मनुष्य ही है. वह भी पछ मकता और उत्तर दे सकता है पर उसको यथार्थ विपय बतना देने के लिये कोई अपने को वह नहीं समझता है क्योंकि चित्त की विक्षिप्त दगा के कारण वह अव 'समाज का अंग नहीं कहा जा सकता और 'साधारण समझ ( बोध) का वह अब अधिकारी नहीं है। एम विषय में मव कुछ वाह पाने पर भी चित्त में एक प्रकार को अस्थिरता बनी ही रहती है। साधारण ज्ञान वाले करते है कि कन्पनानुमार ( in theory ) सचाई कभी वर्जनीय -- ( १२५ ) - ? नहीं है: पर व्यवहार में भावश्यकता पड़ने पर इमको वे छोड भी देते है। मेरे देखने में तो यह पाता है कि सवाई के नियम में कोई टोप ( व्याघात. प्रतिबन्ध ) नहीं है, और न उन अादमी को सै दोपो कह सकता हूं जो उसके अनुसार चनता है: पर लब में अपने को उसी अवस्था में रखता है कि जिममें जानवम्भ कर झूठ बोन्तना पड़ता है, तो एक प्रकार को अनिर्वचनीय (अकयनीय ) भनिझा ( repugnance ) मुझ पर फिर हो भातो हे ओर उस (पूर्वोक्त कल्पना) को नन्ना कारक टेखनाती है। बूझ पड़ता है कि यह भाव साधारण (common ) अनुकन्या ( humanity ) के अनुत्खातनीय ध्यान से उपजता जो समाज के ट्रोहियों से भी मामाजिक सम्बन्ध रखता, पोर अविनाशी मात्रिक मैन्न ( एकता) के सामने प्रत्येक मनुष्य को अपने संग से किसी को बाहर निकालने को मना करता है। क्या ईश्वर के राज्य में देश निकाले का नियम नहीं है जिसको मैंने धोखा दिया है उससे मै फिर उस समय कैसे मुंह दिखनाऊंगा कि नव कदाचित हम दोनो का सम्बन्ध उन्नट जाय और वह हमारे अपराधी (पापी) को, निज रक्षा के हेतु अस्वीकार न करके, मन हरने वाले प्रेम से हमें देखे? और जब ऐसी ऐसी समझ (ख्याल ) के साथ वह वास्तवत्व ( reality ) को सम्मान भी भाकर मिल जाता है जो मनुष्य की विचारशक्ति के सारतत्व में लगा रहता है और जो इस बात को अविश्वास योग्य बतलाता है, कि असत्य भलाई का साधन हो सकता है, तब कदाचित् यह वुद्धिग्राह्य (वोधगम्य ) होता है कि बुद्धि ( understanding ) की निखितना (निःसन्देहता ) और अन्तःकरण ( सदसतन्नान ) को तात्कालिक अभिन्नता (ansight) में असाध्य भेद (विरोध ) कैसे हो सकता है। आध्यात्मिक ( परमार्थिक spiritual ) सत्य विषय के सब किरण देखे नहीं जा सकते है; थोड़ी किरणो बुद्दि विषयक परदे के उस पार भी है

( १२६ )
---
है जो अदृश्य होकर उत्तर देती है और अन्धकार में मानो
कांपती रहती अर्थात आत्मा के सब विपयो को मनुष्य नहीं
जान मकते है, बहुतो को केवन आमा भर मालूम होती है
पर उनके तत्व को नहीं जाना है, इसी वर्ग में सत्यासत्य का
जान भी है, इसमें दृढ़ता से कभी नहीं कह मकते है कि
अमुक
अमुक दशाओं में सत्य न बोलना चाहिए, या अमुक में असत्य
कभी भी बोलना उचित नहीं है ॥
कार्योत्पादक हेतुओं की सारणी ।
पूर्ववर्णित कार्योत्पादक हेतुओं के फल को एक सारणी में
लिखना लाभकारी हो सकता है, अतएव आगे वही लिखा
है। इस मे वे सब उतरते हुए मान ( मोल worth ) के क्रम में
लिखे हुए है । मुख्य मुख्य मिथित हेतु भी प्रायः ( nearly )
उचित स्थान में लिखे है, पर ये अपने अशो के अनुसार स्थान
परिवर्तन भी कर सकते है।
उत्कटतम।
(१) सम्मान की मुख्य मनःकल्पना।
(२) करुणा का मुख्य स्नेह ।
(३) माळपिटसम्बन्धी और ससर्गिक मुख्य स्नेह;- उदा-
रता ओर कृतज्ञता (अभी प्रायः शुद्ध, उचित, स्थान
यही है)।
( ४ ) प्रार्य और प्रशंसा को मुख्य मनःकल्पना ।
(५) गौण मन:कल्पना;-विद्यानुराग ।
(६) कारणिक शक्ति,~-पराक्रमानुराग, या स्वतंत्रता-
नुराग।
(७) मुख्य मनोविकार;-स्वाभाविक घणा, भय, क्रोध ।
८) गौण स्नेह ( दया वो भावी को रसिकता के साथ
सन्तुष्ट करना)।

(19) (८) धन प्रेम ( नुधा और सन्मोजा को भावना ने निधन्ना कुत्रा)। ११.) मुख्य प्राणिमात्र सम्बन्धी प्रहत्ति:-वन्द चंगाविप (इचाविहीन) (११) नुन्य इन्द्रिय सम्बन्धी प्रति:-पियामभिन्नाया और विपयामित्ताप (व्यमनसुबा भिन्ताप ) (१३) गौन मनोविकार:-निन्दकता । घौर प). प्रति हिसागोन्नता. मन्देहगीनता। निकटतम। इन चितसंस्कारों का व्यवहार विपयक मान । उपर वालो सारणे यह देखनाती है कि दो विरोधी चित्त संस्कारों की एकही समय चित्त में उपस्थित होने पर वार्तव्या. कर्तव्यविचारानुगामी मनुष्यो का क्या कर्तव्य है, पर मनुष्य यो समग्र ( सम्पूर्ण, प्रखंड ) जोवन के ध्यान से कार्योत्पाद का हेतुपी का सापेक्ष मान ( मोन्त ) नहीं वतन्नाती है। इसको निषय करने के लिये इन हेतुगो को गुण के अतिरिता 'पीन: पुन्य घटना' ( frequency ) को भी गिनती करनी चाहिए। उस चित्तसंस्कारों के उपजने का प्राय कमही अवसर मिलता है; निट चित्त- संस्कारों से प्रायःजीवन भरा रहता है । जैसे, 'वियाम और विन्दास के अनुराग' को रोकने के लिये जितना वार वार धन-प्रेम' पाता है उतना बुद्धि विषयक चित्तसंस्कार 'भाव' नहीं पात, और 'क्रोध' जितना वार बार अपवाद ( निन्दा ) के डर से ( प्रशंसानुराग ) से पराजित होता है उतना उदार स्नेह से नहीं गलता, इसमे, बहुत से मनुप्पो में जो अपने स्वभाव जपर की ओर बढ़ा रहे है कोई न कोई मध्यवर्ती चित- संस्कार प्रधान पद ग्रहण करता है; और जो असभ्य जाति अब सभ्यता पा रही है उनको इतिहास में उच्च चित्तसंस्कारों का कार्य बहुत काम मिलता है।

( १२८)
यापि मनयों की यही विद्यमान पाम्या हो, पर उनको
दमो दगा में छोड देना इस शास्त्र के उपयुक्त नहीं है। क्या हम
मोगों को यह उचित है कि जब भिन्न भिन्न हेतु स्वयं प्राकर
हमारे सामने उपस्थित हों वही उनमें से उत्कृष्ट को चुनकर
उमा अनुमरण करे । क्या अब इनके सापेक्ष मान जानने पर
भी उगो ठोक करने में पहले से कुछ नहीं बोन्न सकते है कि
उनमे मे कौन गोर कितना वि १ क्या केवल उनके गुगाही
को चिन्ता करनी चाहिए और उनकी परिमाण को कुछ नहीं
कि हम लोगों के जीवन और माया के कितने भाग ( अंग)
पर उनका अधिकार रहना चाहिए। यदि 'करुणा' (दया)
का निबन्ध मना धनामिनाप' या परिवार स्नेह' से बढ़कर
भो तो योई दानादिक को छोडकर कभी व्यापार या घर के
कामों को करने में कैमे निकलक ठहर सकता है । अतएव
निष्ट चित्तसम्कारी को कहा तक बिना अभक्ति (छल या
विग्वामवात कता ) यो ग्रहगा करते है, इसका भी निमय करने
के लिये कुछ उपाय है। इन प्रग्ना को विचारने मे प्रथम
कन्पना,
कि संयोग ( अवस्था ) पड़ने पर सटमदाचार मम्बन्धी
प्ररनो को विचार माछ थोडा भिन्न रूप हो जाना है। उपस्थित
वित्तमंबागे में में चुननाही नहीं पर उच्च अवस्था में अपने
को रखना भी मनुष्या को उचित है. हि जिममें उत्कृष्ट चित्त.
संस्कागे के उपजने का अवमर पूग पूग ( यथेट ) मिन्न सके ।
कोई पिता अपने पुत्र ( या पुत्रो ) को कोई युवा अपने को,
ऐम स्थान (या स्थिति ) और अवनाश ( समय ) में रख कर
निोपो नहीं ठहर मकना है जिममें नोच लाग्नत्र (प्रलोभन )
नियय करके ही और जी नियय हो उन कार्योत्पादक हेतुओं
को भाया और निर्बन कर देगा कि जो उन प्रलोभनों के
विमदा को दृढ़ करता।
पर कोवल बाहर के विषयों को उच्च कर्ताव्याकर्तव्य विचार के

( १२८) अनुक्ल रखने से काम नहीं बन सकता है, चाहे कहीं ज्य हम नोगी है गारोक बहुत से विपय सदा सग ही रहेंगे. अपने प्रति, मनोविकार, स्नेह से भागने का बाहरी यन्त्र करना यथेष्ट नहीं हो सकता है। मन और हृदय को पहिने हो से दूमरी ओर लगाने हो से इनको रोक सकते है. निवन कर मदते है. और मानाशा बना मयत है। कोई नए ही वित्त- संस्कार में बै परमोलाइ ( उग्रता, ने उपस्यि चिदार कोलाहन को चुन कर सकते है। यद्यपि अपने निये या पञ्चा काम या व्यापार चुने कि जिम में दो छापो यो पावन्यकता न पड़तो हो तो भी परीक्षा में शा जाता कि उनमा स्वभाव (chara r) उम उपट को न परचेगा कि नहां उसे होना चाहिए। यद्यपि संसार के जात ने मनग पनि के लिये कोई क्रिमो मठ के पुजागे या IR म.रे. पर हम दुरै चित्तसस्तार भी उसके माय हो रहेगे, वे वन मानसिक रीति से दमन करने ने उनको दुग्नु न देंगे। उमापदायाम कोवन नामहा भर का रह जायगा। बाप याद मकत है कि प्रानन्य बता (या प्रयोजन ) बचना ( free-s.!! ) को सर्वोत्तम पाठगान्ताह पर यह प्रावसकता वास्तविक होनो चाहिये और न कि सपने में अपने जपर रक्डो हुई और नही तो धोखे और पदे में हम लोग पड़ जायगे। अब यह भी ध्यान में रखना होगा कि मनुष्य को अपने व्यापार या विद्याभ्याम में इतना डब न जाना चाहिए कि जिससे उस चित्तसंस्काग के मन्ट सचरण का अमर न मिन्न सके और उनके कथित कर्तञ्च कमी के पूरा वारने का समय न मिन्न सके । ऐसा न करने में वह मानुषो और ईमरीय सम्बन्धों के स्वत्व को हटाकर (या मानकर ) अपने शाप टोपभागी होगा। ईम्बर ने जिम अवस्था में जिमको रख दिया है उसको † "Necessity is the best school of free wall” ------

(१३.)
उमो को अंगीकार करके उमको पूंजो को इच्छापर्वक सदमटुज्ञान
युता कााम मे नाना चाहिये. इसमे उमका स्वभाव अई-रचित
पार पङ्ग न रह जायगा ( पर निर्दोष हो सकता है )॥
निगमन।
बम मत गौर अमत, भने और बुरे, उचित और अनुचित
काम का ठोका (या यथार्थ ) लक्षण सुनिए । वह प्रत्येक
कार्य 'उचित' गहनाता है जो कि निकष्ट कार्योत्पादक हेतु के
गाएत (या निदामानता मे), किसी उत्बाट का अनुसरण करता
है; वह प्रत्येक कार्य 'अनुचित' है जो, किसी उत्कृष्ट कार्यो-
त्पाद हेतु के गाछत (या विद्यमानता मे ), किसी निकट का
गनमरण करता है " जैसे, भय या किमो के स्नेह के कारण
झट नोलने से मत्य गीलता के सम्मान के कारण सच बोलकर
कारागार भी जाना 'उचित है, अच्छा है कीकि सत्यशीलता
भय और स्नेह मे जपर है। दया करके दुखियों के दुख को
धन गौर परियम से छोडाना 'भन्ना' काम है, क्योंकि दया
वियामानुराग मे उत्कट है। कोई बणिक यदि किमो दूमरे
नामी बणिक के नाम से छन्न करके अपनी वस्त वेचे तो उसका
काम 'बुग' (अनुचित ) कहा जायगा क्योकि उसने उत्तम
विग्वाम ( ईमानदारो) और मत्यशीलता को सन्मान को त्याग
कर धन प्रेम का अनुमरण किया जो उनसे निकट है।
इम लक्षण में यह विशेष गुण है कि जिन शब्दो का अर्थ
यह प्रकाग करना चाहता है उनको जब मनप्य प्रयोग करते
है तब उम ममय उनके मन में जो वोतता है उसको यह सरल
रोति में देखनाता है, कहता है । कर्तव्याकर्तव्य प्रग्नी को
नियय करने के लिये इस नक्षण को व्यवहार में लाने में बार
बार (या बहुधा ) कठिनता उठेगौं, क्योकि इन प्रश्नों के
नियम (LuNa-tion-) इतने मारीत ( counples ) रहते है और
नीति के अतिरिका ( immoral ) दूमरे विपयो के संग इतना
।

(११
मिनरहनि ठीको निर्मा- ना हो
गुबगुनियपरिमा।
7) बाहर
इस विषय को समाप्त करने के पहले एक बार
नियरलेनो उचित है। बाप पक मन ई कि या-
बतच विचार में नदायक और दुम्बदायक सनी को गिनने
गचा कोई सान ही नहीं है. हा प्रकल ई, दो प्रकार
से इनको गिन सकते हैं । पन्ना एक या दून रे दार्यायान
हेतु नो बढन र समभाने में कुछ बोडी या बारु गिनती होतो
ही है. कोवि यो ज्यों एक ने दृमरा हेतु अधिर पानात
रहता है उतनाहो वह अपना फन्न मोचता है, पर एम पर
का नोचना इन कार्योपटक हेतु के विचार के पन्तर्गत ।
दृमरा. जब एक कार्यो चाटक हेतु को पोरों को त्याग पर सुन
दिया तब ता भी भो वभी प्रश्न निषित नही होता. पोकि
बाहरी दत्त नियमी के अनुसार वही एकही हेत कई टव से
पूरा हो सकता है, जैसे कि वही 'परोपकार जो एका मनष्य
में मुर्खता हो जाता है और पूरा नहीं होने पाता. दुसरे में
बुद्धिमानता होता है और अपना प्रमिलाप पूरा करता है
कार्योत्याटक हैतु के क्म को पूरा करने के लिये उपाय (mes)
का चुनना फेवन्त फलो को विचारने से होगा । यह नियम
सदसदाचारसम्बन्धी नहीं है पर बुद्धिसम्धी; कोकि इसके
प्रयोग में यदि कोई भून्त करें, तो यह केवल उसको अन्त ( या
भ्रम ) हो कहलावेगी. पर वह निन्दादा यथोचित (या योग्य)
पात्र न होगा। अतएव सबही कर्तव्याकर्तव्य विचार विषयक
प्रश्नो के विचारने में क्रमश: ( या ययानन म ) दो भिन्न भिन्न
(या न्यारे २ ) नियमो का अवलम्बन करना होता है, अर्थात्
() 'पादिकारणों का नियम' जो 'उचित' का निसय कारने
के लिये कर्तव्याकर्तव्यनिर्णयपरिमाण देता है, और तब ( २)
फलो का नियम', जो इसकी बुद्धिमानता को निश्चय करने के

( १३२ )
निये बुद्धिमानतानिर्णयपरिमाग देता है। इन में पहला स्वभाव'
Character ) को विचारने के लिये यथेट है, पर 'पाचरण'
( चलन व्यवहार, conduct ) को विचारने के लिये विकले की
भी आवश्यकता है।

- शुद्धाशुद्धिपत्र। 3 है १२ कोई. विमाननीय बानी मा विमान कना १ मारना ពុក मरान मनाराव निमित मत्यजीनता उमदुधा में का ४ वा दुधा ६ (क) यस २७ १ पृष्ठ 020 सन्हीं " २३ रखी हुई नमा रापा महति हत्तमोत्तम महाति एन्मोतम कार ५८ एन्द्रजाल पन्द्रजाली वो भागामी मंहतिया মনিয়া १८ पंक्ति पृष्ठ मागायों মনিষা हतियां घशुद्ध मुधा জিভ प्रल्हाद कदाचित पहरए नियस नांचने ३ सुधा भीडा पाहाद कटाचित पहरुए नियम नांचन प्रलग

Kartaviya Sahshtra

Author
Pandit Narayan
Title
Kartaviya Sahshtra
File name
Kartaviya Sahshtra
Text
OCR done
Citation
1906
Published
2010/06
Publisher
Printed By Banaras Yantralaya Banaras
Language
Sanskrit
Pages
136
Library
Charan Sahitya Shodh Sansthan, Ajmer
Classification
Art
Keywords
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DLI number
539761
Barcode
99999990070245.00
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