Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Vikendrit
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विकेन्द्रित
(उपन्यास)
मूल लेखक
नरेन्द्रपाल सिंह
अनुवादक
विलोक दोप
GIFTED BY
RAJA RAMMOHAN ROY
LIBRARY FOUNDATION
CALCUTTA-700088.
प्रकाशक
प्रतिमान प्रकाशन
नई दिल्ली-110064:
हिन्दी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित ।
© नरेन्द्रपाल सिंह
प्रथम संस्करण : 1990
आवरण : अमित चक्रवर्ती
मूल्य : पैतीस रुपये
प्रकाशक : प्रतिमान प्रकाशन
यू-सी/13, ऊपा पार्क, जेल रोड
हरी नगर, नयी दिल्ली-110064
मुद्रक : जालान पिंटर्स,
नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
VIKENDRIT (Novel) by Narenderpal Singh
Transfated by Trilok Deep. Pr.35.00
प्रलय के सूत्रधार
और
अकाल के भी सूत्रधार,.
को
दो शब्द नरेन्द्रपाल सिंह का विकेन्द्रित अंतरिक्ष युग का उपन्यास है । भविष्य का पंगंबर, एक भविष्य का सृजक और एक का हत्यारा, प्रलय का सूत्रधार और अकाल का सूत्रधार भी। विकेन्द्रीय या विमुख और केंद्रमुखी या कुदरती ताकत का घोल है। एक तो है आकर्षण-शक्ति की खीच और एक है विकेन्द्रीय शक्ति का आकर्षण । यह विकेन्द्रीय शक्ति का ही आकर्षण है जो कला, यत्रों या मानवीय कला को अन्तरिक्ष मे बस सीधी लीक में और बिना रुके उड़े और फेंके जाने से बचाती है। यह उपन्यास एक यंत्र है जो भिन्न-भिन्न द्रव्यों को तेज चाल से एक-दूसरे से अलग करता है। यह एक बिंदुपथ है जो शुद्ध केंद्र की क्रमवार स्थितियों के साथ पदचिह्न करता है । जगह-जगह पर विकेन्द्रित केन्द्रमुखियों का जामा पहनता है । इस उपन्यास में हमे पात्रों के नाम नहीं मालूम । आधुनिक काल में नामों की क्या जरूरत? नामो के साथ निजीपन और व्यक्तित्व उभरता है और हम ये दो वस्तुएं समाज मे से खारिज करना चाहते हैं (3) मराज- कता। नरेन्द्रपाल सिंह का कहना है कि उनका अगला उपन्यास रोबोट (यत्र मनुष्य) होगा, पात्र, लेखक, लेखनी सब कुछ रोबोट में । विकेन्द्रित, प्रान्तिकारी दृष्टिकोण और चिंतन मागता है। सब चौपायो और दोपायों में एक मनुष्य ही ऐसा दोपाया है जो मुह की मुंदरता पर भरता है - बुद्धिजीवी को क्या प्यार करना है ? अगर उसे सुंदरता मिलती है, तो वह ज्ञान के पीछे है, और अगर प्यार और सूझ झोली में है, तो कहता है कुछ देखने और पहचानने के लिए भी हो" """प्यार और इश्क का रोना सब झूठ है । शून्यवादी तकवाद । आज इन शब्दों का कोई भाव, कोई मूल्य नहीं रहा। हमारे शब्दों का आधार बदल गया है । भाषा की उन्नति अब अनिवार्य सौमित दायरे मे है सभी धर्मस्थान भीतर से काले होने चाहिए, कालिय मे ही ब्रह्म का गहनतम अहसास प्रज्वलित होता है । कालिख ही अरूप, अनूप, अभेद और अलेख है। विकेन्द्रित, प्यार की अर्थी है और यह अर्थी मोहब्बत की विश्व- अर्थी का चिह्न है । बुद्धिजीवियों को निमंत्रण है 'रामनाम सत्य का उच्चारण करते हुए वे इस अर्थी के पीछे हो लें। विकेन्द्रित एक प्रतिभाशाली कृति है-एक कलाकार व्यक्ति की अनूठी और अनोखी देन । यह भारतीय गल्प साहित्य मे बीससाला भविष्य की मजिल है। नरेन्द्रपाल सिंह-~'सर्वरंगी, बहुरंगी, बहुरूपी और बहुमुखी प्रतिभा संपन्न । राजसी ठाठ, लेकिन फकीराना अंदाज । ऊंचा संनिक अधिकारी बाहर कुछ और भीतर से कुछ और-मन वस्त्रहीन और लचीला तथा अंतड़ियों से महकती हुई कुछ पाने को लालायित, कुछ अनूठापन, तूफान आये, आधी आये, बर्फ पड़े, परन्तु फिर भी तृष्णा शांत न हुई। आशा क्या चीज है ? और क्या लेना है ? देश-देशांतर की सरकारों और दरवारो तक पहुंच अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक वैठकों और गोष्ठियों मे भाग लिया, पुरस्कार प्राप्त किये, पद भी याद आया तो क्या है ! क्यों भूख, नंगेज, प्यास? किसी अंदरूनी शक्ति का आकर्षण है। क्या यह संसार का प्रयोजन --जसबीर सिंह अहलुवालिया
लेखक की अन्य कृतियां
पंजाबी उपन्यास
1. मलाह
2. सेनापति
3. उन्ताली वरे
4. इक राह इक पड़ा
5 शक्ति
6 त्रिया जाल
7. अमन देराह
8 खन्यो तिक्खी
१ वालो निक्की
10. ऐत मार्ग जाना
11 इक सरकार वांझो
12 पुनिया कि मस्सया
13. चानन खड़ा किनारे
14. टापू
15. विकेन्द्रित
16. सिर दीजे कान न कीजे
17. बा मुलायजा होशियार
18. सूत्रधार
19. गगन गंगा
20 काल अकाल
21. मेरे तो गिरधर गोपाल
कवितायें
22. अगम्मी वहिन
23 किल ते कामें
24. अगम्मी वहिन (मन्ची-2)
लेख
25. निकशुक
26. अलमी ते अऊले
(यात्रा संस्मरण) 27. देसांप्रदेसां विच्चों 28. मेरा रूसी सफरनामा 29. आरीयाना 30. परिस देपोटरेट इतिहास, सभ्याचारक और अन्य पुस्तके 31. पंजाब दा इतिहास (1469-1839) 32. भारत दे त्योहार 33. जंग ते अमन दे लोकगीत 34. अफगानिस्तान 35. नावल कला ते मेरा अनुभव 36. मेरी साहित्यिक स्वजीवनी (काव्य माट) 37. कॉफले अनुवाद (अग्रेजी से पंजाबी मे) 38. पश्चिमी दुनिया दे निर्णयजनक जग (पहला भाग) 39. पश्चिमी दुनिया दे निर्णय जनक जंग (दूसरा भाग) 40. पश्चिमी दुनिया दे निर्णय जनक जंग (तीसरा भाग) मूल लेखक : जनरल जे० एफ० सी० फूलट 41. परवासी-मूल लेखक : स्टीफन गिल (फ्रांसीसी से पजाबो में) 42. बाल शहजादा- मूल लेखक : आनतूआनद सेंत अग्जुपरी 43. अजनबी- मूल लेखक : एलबर कामीओ 44. प्लेग मूल लेखक : एलबर कामीओ (हिन्दी में) 45. शक्ति (उपन्यास) 46. शान्ति के पथ पर 47. प्रकाश की छाया में 48. अन्धेरे का काफला 49. टापू . 50. उन्तालीस वर्ष 51. कड़िया टूट गई 52. 'बा मुलायजा होशियार 53. त्रिया जाल " " " . " 54. कहानी पाच लाख गावों की (उपन्यास) 55. विकेन्द्रित 56. रंग-बिरगे ये त्यौहार অনলে বলল IN ENGLISH 57. New Horizons Military Science 58. Furrows in the Show Travel ogue 59 Gleanings From the Poctry' Masters. 60. Zero Hour 61. Light Stands Aside Novei 62 Flaming Hills 63. On the Crest of Time 64 Trapped 65 Holy Dips 66. Never a Noontide 67. Scandal Village 68. The New Moses Novel (Translation) 69. Great Mother' Biography 70. Mohan Singh 71. Puran Singh as a Poet 72. Torch of Non-Alignment, General 73. Afghanistan IN FRENCH 74. Chants Spirituels des Sikhs 75. Saintes Immersions 76. Les Histoires des Sikhs 77. L'Amour en Nagaland , 78. Jamaisde Jour नोट-परलिखित पुस्तकों में कई भारत की प्रादेशिक भापाओं और विदेशी भाषाओं में अनुवादित हैं। 2. इसके अतिरिक्त नरेन्द्रपाल सिंह के अनेक फुटकल लेख और कविताएं लगभग तीस देशी और विदेशी भाषाओं में अनुवादित हैं। " एक वाह कैसा मुखड़ा है। मुखड़ा है कि थोबड़ा। दोनों चलते है। ऐसे वेसिरे मुंहों को चाहे मुखड़ा कहो या थोबड़ा । भाषा की लचक, व्याकरण के बन्धनों, वाक्य-विन्यास, लिंग, पुल्लिग, अलकार आदि शब्द तो सुन्दर वस्तुओं के लिए हैं। ऐसे मुंह का क्या है ! या ऐसे अन्य मुंहों का ? क्या मुंह लटकाये फिरना है : क्या मुह दिखाये फिरना है। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। क्षमा भगवन्, मैं यह बोल-कुबोल बोल रहा हूं। क्या ऐसे भी किसी से छुटकारा पाया जाता है। क्या ऐसे भी किसी को ऐसी-तैसी की जाती है। चेहरा-मोहरा, शरीर आदि तो तुम्हारी देन हैं। तुम से सदा डरना चाहिए । कब किसी के मुह के साथ क्या बीत सकती है । सुन्दरतातो कांच की कोठरी है, ठोकर लगी और चूर-चूर हो गयी। मान, अहंकार बिखर गया, दरार पड़ गयी परन्तु ये जो कलाकार हैं न भगवन्, ये बड़े ही मुंहफट हैं । ये तुमसे उरते भी हैं और नही भी डरते और डर कर भी नहीं डरते । यह कलाकार और बुद्धिजीवी ! ये तुमसे भी विद्रोही होकर बैठ जाना चाहते हैं । ये तो तुमको भी चूर-चूर करने की जरूरत समझते हैं । और फेर यही तो है जिनके सहारे तेरी अजमत कायम है--इन्हीं का बैठाया ही तो स्वर्ग सजता है भगवन् तुम्हारा । हैं ये सयाने बुद्धिजीवी और कलाकार । यथार्थवाद, अहंवाद और वास्तविकता के नाम पर ये लोग न्योछावर करते हैं अजमतें और मजाक उड़ाते हैं कुरूप तन और सुन्दरता का। वैसे उस मुह को मुखड़ा या थोबड़ा कहने का कोई प्रत्यक्ष कारण है 10 विकेन्द्रित नहीं। रंग वैशक काते और पक्के के बीच के हैं, स्याही की तरह, परन्तु मैंने उसके देश की उससे अधिक काली सूरतें देखी हैं । अगर सच पूछो तो मुझे रंग का परहेज नहीं। एक बार केन्या की हशिन को देखकर मेरी हृदय- गति ही रुकती दिखी थी। आह ! कैसी छवि थी उसकी और कैसा उसका सुडौल शरीर था। कदम उठाती तो कयामत आती थी । मुस्कराती तो मन- मयूर नाच उठता । यह बात जुदा है कि हन्शियो की मुस्कान और हंसी उनके साथ सबसे बड़ी ठिठोली या मजाक करना है । काली चमड़ी और बीच मै सफेद दात-- -देव, वनमानुष या चुडैलें-परन्तु वह थी कि उसकी मुस्कान से बलिहारी जाने की इच्छा होती थी। उफ ! अगर कभी मैं उस हशिन के साथ सो सकता, सभोग कर सकता, कम-से-कम उसे चूम सकता । परन्तु वह फिसल गयी। कुछ हातात ही ऐसे थे । पति उसका राजदूत था और मैंने कहा कि कौन-सा अन्तर्राष्ट्रीय मसला खड़ा करना है। मेरा भाव कहने का यह था कि मैं केवल रंग पर फिदा होने वाला या मरने वाला नहीं। अगर मैं स्त्री होता तो कृष्ण भगवान् पर मोहित होने से न रह सकता। रंग तुम्हारा काला-स्याह है और चमड़ी तुम्हारे मुह की मुलायम । इस चमड़ी की मुझे जरूर इसरार है-गड्ढे वेशक हजार हों, अपार हों, परन्तु जो चमड़ी मुलायम या रसीली हो तब ऐसी स्त्री को चूमने में मुझे कभी कोई इनकार,नही रहा। खुरदरे मास पर ओठ रगड़कर अपना मन क्यो खराब करू । चमड़ी भी मुलायम है और गाल भी फूते और उभरे हुए --शायद गाल जरूरत से ज्यादा उभरे हुए है । यदि थोड़ा तराश कर तुम गाले कुछ सिकोड़ लो तो ठीक है। गालो मे गड्ढे तो फिर भी नही पड़ेंगे, परन्तु ओंठ फेरते हुए और गालों को चूमते शायद मजा न आये, शायद नहीं-- . अवश्य । हां, तुम्हारा नाक बेशक बहुत बेहूदा है। नथुने चिपके-से है और अखरने वाली बात तो यह है कि एक नयुना दूसरे से अधिक चिपका हुआ है । नाक माफ करते समय तुम्हें बहुत तकलीफ होती होगी, खास कर तब जब तुम्हें जुकाम होता होगा, नही ? ओंठ, काम चलाऊ है, परन्तु चूमते समय किसी विशेष लग्जत की आशा नहीं की जा सकती। ऊपर वाले ओठ •विकेन्द्रित का बामा कोना कुछ कटा हुआ है । बेचारी को छुटपन में किसी मां, बहन भाई या सहेली ने किसी नुकीली चीज के साथ मार दिया होगा य सीढियों से गिर पड़ी होगी, या ठोकर खाकर किसी पत्यार चिता होगी। ठोड़ी ऐसे ही है, किसी प्रकार की टीका-टिप्पणी के योग्य नहीं। बाकी रही आखें। उन पर उसने बड़े भारी-भरकम शीशे वाली ऐनक चढ़ा ली है । कइयो को ऐनके खूब जंचती है, जैसे उसे । लगता है भगवान् ने ही ऐनक जड़कर पैदा किया हो और उसका कोई खास देवता ही उसे रोज-ब-रोज फिट करता हो, झम बदलता हो, नजर टेस्ट करता हो। परन्तु उसके चेहरे पर तो ये शीशे खोपो के समान है- क्या मुखड़ा है ? और गले के पास दो गहरी लकीर है। भई, यह करामात है। किसी गले पर मैंने ऐसी गहरी लकीरें नही देखी। डबल चिन--ठोड़ी-दर-ठोड़ी देखी है और गले पर पतली लकीरें भी, परन्तु ऐसी उभरी दरारें नहीं देखी। यह क्या कौतुक है, भगवन् ! इस मुह को अनोखा मुखड़ा न कहे तो क्या मुखारविन्द, चांद, सूर्य, वीनस या यूरेनस कहे । जब मुह ऐसा है तो शरीर को व्याख्या करने की क्या आवश्यकता है। सुन्दरता का पहला आकर्षण या मनमोहक चीज नहीं तो गठे हुए शरीर में क्या हो सकता है। कई बार तो इस प्रकार का भी ख्याल आया कि इस कुरुप मुखोटे वाली के जिस्म पर नजर तो घुमाकर देखा जाये, परन्तु मन माना नहीं। कई कहते है कि वेसिर मुह वाली लिंग-तृप्ति में कही अधिक प्रवीण होती है, परन्तु कलाकारया बुद्धिजीवी कही लिंग-तृप्ति के लिए थोड़े ही अतृप्त है । यदि मुह मेरी कमजोरी समझो, तो दरअसल यह कमजोरी हमारे पूरे विकास की है। इससे मेरा अभिप्राय है, मानव-विकाम हमारी पैतुक, शारीरिक, विज्ञान से सम्बन्धित और उन्नत सभ्य रचियां-जिनको हम उन्नत सभ्य रचिया कहते है और इनकी समस्याएं। भला किसी ने साहसपूर्वक भयंकर शेर के मुह की तरफ देखा है ! शरी के मुह किसने धोये है भई? नजर तो पहले उनके शरीर पर ही टिकती है। उनका शरीर ही उनकी मौलिकता परिलक्षित करता है, उनका मुह नही । शरीर का गठन ही वास्तविक सुन्दरता है। अपने पुरखे बन्दरों को हो ले लीजिए। इनका मुंह देखकर तो मादमी सहम जाता है 12 विकेन्द्रित मुलायम, मूक्ष्म बालो वाली चमड़ी पर हाथ फेरने को मन करता है । लम्बी और धीरे-धीरे पतली होने वाली पूंछ के साथ खेलते रहिए। तीतर, मुरगाबी, तोता, चिडिया ही ले लीजिए-मुंह वाद में और शरीर पहले। सभी चौपायो और दोपायों मे से मनुष्य ही एक ऐसा दोपाया है जो मुंह पर मरता है । धत् तेरे कपड़ों को ! अगर मनुष्य नंगा होता है तो सही परन्तु बगर नंगा रहता-तो इसकी भी असली कीमत इसकी शारीरिक सुन्दरता के आधार पर ही होती, जैसे बाकी नगे दोपायों या चौपायों की । सभ्यता ने सब कुछ स्वाहा कर दिया है। आज कद्र है नंगेज की, मुंह नंगा है तो शेष हैं कपड़े, लिहाजा बाकी कद्र तो हुई कपड़ों की, जो कपड़ों के नीचे है, उसकी नहीं। फिर भी मैंने तुम्हे कल्पना में नंगा करके देखने का तुम पर अहसान किया है। नहीं, कोई विशेष उपलब्धि नहीं हुई। देखो भई लोगो, ऐसी वदमूरत स्त्री मेरे पड़ोस में आ वसी है । अब क्या मेरी हालत हो सकती है और क्या मेरी कला की ।
दो किस दिन आये थे आप मेरे पड़ोस में ? शायद कार्तिक का महीना था और इतवार का दिन । ठीक से कुछ याद नही पड़ रहा है। मेरे जैसे, तीव्र-स्मरण शक्ति रखने वाले आदमी के लिए भी कितना कुछ भूल जाता है, कुछ सालो में। महीना कार्तिक का ही होगा, क्योकि मैं बाहर धूप में खडा था और कार्तिक के पहले धूप में दिल्ली मे एक पल भी कहां खड़ा हुआ जाता है । इतवारवाली बात तो मैंने ऐसे ही लेखन-शैली के सामर्थ्य के तौर पर साथ मे जोड़ ली है । धिक्कार है गल्पेकार पर। कहानी पर सच्चाई का मुलम्मा चढाने के लिए कितना झूठ बोलता है--और झूठ को सत्य में, बदलने के लिए कौन-कौन-सी उदंडता और आडम्बर नही रचता । कौन, एतवार करे किसी कलाकार पर। कैसे यह जनता की आवाज और भविष्य- जाता माने जाते है। परले दर्जे के झूठ, मक्कार, दगाबाज, चोर । वैसे कलम और द्रश इनके हाथ में है, अपने आपको जो चाहे वताते, दिखाते और मानते फिरें। आखिर अपढ़ और बुद्धिहीन जनता को इनकी रचनाए पढ़कर ही तो परीक्षाएं देनी है और शिक्षाशास्त्री तथा बुद्धिजीवी बनना है । झूठ! झूठ ! झूठ ! और फिर भी सच, सच, सच! कोई क्या समझे। क्या जाने। हां, आप (यह मुझे सचमुच याद है), तीनों कार मे थे और सामान. आपका टैम्पो या छोटे ट्रक में। आप तीन-तुम, तुम्हारा पति और तुम्हारी लगभग पांच बरस की लड़की । पर खूब ! तुम और तुम्हारी लड़की तो पीछे बैठी थी और पति तुम्हारा मगली सीट से उतरा | मैं हैरान हुआ। सोचा, कैसा असभ्य परिवार है, गंदार कमीने, परन्तु बाद में पता चला 14 विकेन्द्रित - 1 - कि दिल्ली मे नया-नया आया है, नया-नया काम होगा, नये दफ्तर की कार होगी और वह ड्राइवर का विश्वास प्राप्त करना चाहता होगा। हेकडीबाजी कहा चलती है आजकल । क्या ड्राइवर और क्या चपरासी । वे भी सरकार के चौथी श्रेणी के अफसर नियुक्त है भई ! हर कोई अफमर है। जनता की भी अफसरी शान है। तुम्हारे पति ने सामान उतरवाया । ड्राइवर के साथ सलाह कर उसने टैम्पो वाले को पैसे दिये। किराये के लिए सिर्फ एक-दो मिनट ही तकरार हुई । समझ लो, तुम्हारे पति ने उसे खुश कर दिया । वहुत बड़ी चीज है। बधाई । देखा तुमने जहां कही भी मुबारकवादया प्रशंसा की जरूरत होती है, मैं कितना उदार-चित्त हू । लिखू मैं चाहे कितना ऊंचा-नीचा, भला-बुरा परन्तु जीवनयापन के सभी आयामों से परिचित हूं, दयालु हू और श्रद्धालु भी हो जाता है। चौकीदार ने घर खोला। ड्राइवर उससे ऐसे ही ऊंचे-ऊंचे बोला,, डांटा, डपटा परन्तु चौकीदार ने भी तो कौन-सा बेपरवाही और लापरवाही.. का इजहार नहीं किया। ड्राइवर ने तुम्हारे पति को घर दिखाया, तुम और तुम्हारी लडकी पीछे थी। आगे-आगे क्यो नहीं? सभ्यता और शिष्टाचार के तौर पर तो स्त्री-आगे-आगे चलती है। कैसा असभ्य परिवार पड़ोस में मिला है। भला भीतर जाते समय तुमने चोरी से मेरी तरफ क्यों देखा था? अपने पड़ोसी की तरफ ! तुम्हें मालूम था क्या कि कोई तुम्हारी तरफ देख रहा है । औरतो की तरफ कोई देखे तो बिना आखें मिलाये ही इस तथ्य का ज्ञान हो जाता है। बड़ी ही चालाक होती है यह स्त्री जाति, निर्बल जो हुई। पशु-जगत में भी मदीना का यही हाल है। कितने ढंग आते है इसे अपनी ओर आकर्षित करने के । ऐसे पल्ले सवारती जाती है और बेमतलब मिमट-सिमट कर चलती जाती है । वेशरमी की हद है। तुमने अवश्य मुझे देखते हुए देख लिया होगा, ऐसे तो नहीं तुमने साड़ी का पल्लू सवारा था और अपने आपको और सिकोड़ा था। जानते-बूझते और सयाना होते हुए भी मैं तुम्हारी अदा से आहत हो गया। कितना मसकीन और निबंल हो. 1 आदमी, निर्वल स्त्री के सम्मुख । मुंह देखने की ललक खूटी पर ।
विकेन्द्रित 151 म । टांग देती है वेचारे को। "थोड़ी देर के बाद तुम्हारी लडकी बाहर आयो । मैं अभी तक बाहर ही खडा था। शोहदा मैं, परन्तु यह भी क्या कोई शोहदापन है ? यह तो आदमी का स्वभाव समझो। मैंने लड़की का ध्यान अपनी तरफ खींचा। 'छोटी थी आखिर । खिंच गयी। मैंने उसे अपने बगीचे में से फूल तोड़कर" दिये । डिफेंस कालोनी के मकानों का यही फायदा है और यही नुकसान - भी। कोई हिलना-जुलना-डुलना गुप्त नहीं, कोई रहस्य नहीं । चार फीट ऊंची दीवार बीच में है । टांगों से या आंखों से फांदते फिरो। कहते है फ्लटों की विधि नहीं चलती गरम देशो में । क्या चलता है। गरम देशों में कोई पूछे। ठंडे देश हैं, महल और इमारतें सिर ताने खड़ी' की गयी है--मजिल दर मंजिल हैं, फ्लैट है, लिफ्ट है, सीढ़ियों हैं । कोई आये, कोई जाये, कोई चोरी करे या यारी, सब चलता है। मेहतरो या "भंगियों का मुहल्ला हो, सब्जी मण्डी हो, डिफेंस कालोनी हो, चाणक्यपुरी हो। उसके-तुम्हारी लड़की के-नक्श तो अच्छे हैं और रंग सांवला। महिलाओ जैसी मुस्कान थी। मैं तुम्हारे नयन नक्शों, तुम्हारी शक्ल और तुम्हारे स्वभाव का अनुमान लगा रहा था। मन को ढाढ़स बंधा । तुम देखने योग्य तो होगी ही, बातचीत में रसिक भी। उस रात सोते-सोते मैंने तुम्हारे कई काल्पनिक चित्र बनाये--तुम्हारे मुंह और तुम्हारे शरीर के । तुम्हारा कद वगैरह तो मैंने देख ही लिया था, बाकी अपनी सूझ-बूझ और समझ से चित्रित कर लिया । संतुष्ट या कि तीन महीने के बाद पंडोस मिला है, परन्तु जंचता। स्त्री की उम्र अधिक नहीं परन्तु आदमी थोडा उजबक है । निकटता बढ़ने की आशा है। मुझे डर था कि पिछले पड़ोस की तरह स्त्री साठ की और पुरुष बहत्तर का कही न हो । खैर आदमी की उम्र से भला मुझे क्या, परन्तु स्त्री तो कुछ देखने-भालने योग्य हो । पहली पडोसन तो मुझे फुत-फुत करती रहे । मुझे इससे कोफ्त होती । मैं कहता हम आपके फूत-फुत से वाज आये। दंतसाज के पास जाकर नये दांत जंडाओ और फिर मुझे फुत-फत या पुत-पुत'' कहना । अपने चार फुत कम है क्या? फुत ही फुत ! कोई लड़की भी तो ।
16 विकेन्द्रित जनी होती। अब तक जवान होती। न कोई लड़की और न ही बहू और आ बैठे डिफेंस कालोनी में मेरे पड़ोस में चार पुत्रों के साथ । सच जानो, जो दो साल वे मेरे पड़ोस में रहे, मैं कोई मौलिक काम न कर सका । जो चाहता था कि किसी और शहर जा बसू या विदेश चला जाऊं परन्तु कुछ महत्वपूर्ण गोष्ठियों और दो अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक विचार-गोष्ठियों ने माता जी का माप छोड़ने का अवसर प्रदान न किया। उनसे पूर्व पड़ोस था पडोस । दोनों गुजराती ये-नवविवाहित । अधिक नये भी नहीं थे। दो साल पुराने । बाल-बच्चा अभी तक नहीं था और पता नहीं होना भी या कि नहीं। पहले वर्ष तो वे चौकसी का सामान बरतते रहे थे, परन्तु हैरत की बात यह थी कि दूसरा बरस भी बिना किसी प्रसंग के गुजर गया। लेकिन वे अभी चिन्तित होने की मंजिल तक नहीं पहुचे थे। काम-प्रवृत्ति, हैवानी भूख-अभी प्रबल थी। बच्चों की हाजिरी के विना अभी वह साफ-साफ थी। अच्छी तरह सजी-संवरी . रहती थी वह स्त्री। नाजुक भी और काम मे तेज भी और सबसे बढ़कर साहित्यिक भी। पत्र-पत्रिकाओ में से रसिक, रोमासकारी तथा रोमांचकारी चीजें पढ़ती। मैंने अपनी कहानियां और उपन्यास दिये थे। कहती थी, उसे 'बहुत अच्छे लगते हैं। बेसक, वह अपने पति के पास सोते हुए भी मेरे सपने लेती होगी। मैं भी उसे खूब याद करता था। हमारा एक-दूसरे के यहां आना- जाना भी श। हर पार्टी में में अपने पड़ोसियों को पड़ोसियो की तरह बुलाता, यद्यपि सच्चाई इतनी ही थी। चोर, कमीने, नीच । हम सभी ही हैं, भई । मै कोई अकेला नहीं। मैं भी जाता था उनके घर। एक-दो बार उसका पति बाहर दौरे पर, गया, तब भी हम मिले। सिनेमा भी इकट्ठे जाकर देखा। हायों मे हाय डालकर भी चले थे। शरीर के साथ शरीर जोड़कर भी बैठे थे। और भी कुछ कर सकता था, परन्तु किया कुछ नहीं । वैसे दिल का मैं बुरा नहीं जैसा कि आपने इन सब पन्नों पर देखा होगा। मैं गुजरातियो और गुजरातिनों को पहले अच्छी तरह नहीं जानता या। इस जोड़े ने मुझे उनका अन्ध-भक्त बना दिया। पजाविनों जैसी १ शान नही । न ही हाय में जूती मौर न ही प्रेम-मुहब्बत में अधिक - विकेन्द्रित 17 रोब-दाब। पंजाबन प्रेम करती है मानो परेड में लाकर खड़ा करती है। धर, गुजरातियो मे, न ही दक्षिण की स्त्रियों की भाति अत्यधिक विनय-. लता और न जी-हजूरी। हर नजर पर शरमा जाना, हर मुस्कान के बाद रहम जाना । एक अच्छे रसिक और रुचि वाले आदमी के लिए गरिमापूर्ण और निश्चित साय । सदा याद रहेगी सुन्दरी गुजरातन । भगवान् तुम्हारा मला करे-सात बच्चे दे। कितने हुए हैं अभी तक ? तेरे पति की दीर्घायु. हो । उसने भी हमारी मित्रता में कभी कोई टाग नही अड़ाई और न ही अविश्वासी बना । ऐसे ही तो आदमी होते है न दुनिया मे। गुजरातन मे पहले एक जर्मन जोडा था। जर्मन दूतावास में संयोजक पाथर्ड सैक्रेटरीथा। उनकी और विशेषकर उनकी बातें, बहुत आनन्द आया परन्तु इस उपन्यास का न कोई पडोस, पड़ोसी या पड़ोस के साथ मिलता- जुलता कोई संयुक्त नाम थोड़े है कि मैं सब पड़ोसियों का इतिहास देने के लिए बाध्य हूं। अच्छा, नये पड़ोस तथा पड़ोसन की लड़की के साथ मित्रता की। लड़की काफी मोहक, आकर्षक, चंचल और उत्सुक थी। अच्छी अंग्रेजी बोलती थी। उस उम्र में भी। उससे मुझे बहुत कुछ पता चला। वे मद्राम से आये थे। ब्रड न्यू जनरल इंश्योरेस कम्पनी मे उसका पिता अफसर था । अफसरो पर लोग आजकल ज्यादा जोर देते हैं । मेरा डंडी, या मेरा पिता, या मेरा पापा या कोई मिनिस्टरी मे अफसर है, बेशक चाय ही बाटता हो वहा । लड़की कहती कि उसकी मा बहुत अच्छी है। सुन्दर भी है। पहली बार वे दिल्ली आये थे। बहुत खुश थे वे दिल्ली आकर, क्योकि अव उसका पिता पहले से भी बड़ा अफसर था। मां भी खुश थी, क्योकि मद्रास मे अक्सर घर में ही रहना पड़ता था। काफी छोटे-मोटे अझट थे इसलिए मा को अधिक काम भी करना पड़ता था। यहा सुख से थे। वह अकेली लड़की थी साय, परन्तु बहुत सयानी । अपने कपड़े स्वयं संभालती थी। खुद नहाती-धोती थी। बहुत बातूनी हो लड़की--परन्तु वह समझ न सकी। मुस्कराकर वह मेरे और निकट आ गयी-शारीरिक तौर पर नही, मानसिक तौर पर। लड़की ने बताया कि उसका एक भाई भी था। वह मद्रास कॉलेज में .
: 4 । :18 विकेन्द्रित पढता था। कब आयेगा वह, परीक्षा देकर पढ़ाई में बहुत तेज है और पढाई मे किसी तरह का विघ्न नही डालना चाहता। हमेशा प्रथम रहता है अपनी कक्षा में। बी० ए० करके दिल्ली आयेगा और फिर शायद इंजीनियरी करे। 'तुम्हें इतनी सब बातों का कैसे पता है?' 'पता है।' 'तो बताओ तुम्हारा भाई तो सत्रह-अठारह बरस का होगा और तुम पाच की। बीच में और कोई नही हुआ क्या ?' 'क्या?' 'भाई तुम्हारा इतना बड़ा है और तुम इतनी छोटी। इतना अन्तर क्यों ? 'मम्मी से पूछकर बताऊंगी।' 'नहीं, अरे भई, नहीं।' 'नहीं, मैं अपनी ओर से पूछंगी, सहज स्वभाव से। आप चिन्ता मत -कीजिए। 'नही, इसकी कोई जरूरत नहीं । मैं जानता हूं इसका कारण।' 'क्या?' 'दो या तीन बच्चे, होते हैं बहुत अच्छे ।' मैं हंसा । वह भी हंसी। काम खत्म हुआ। कुछ और इधर-उधर की बात कर मैंने यह किस्सा उसके मन से निकलवा दिया। उसने भी शायद 'मिसार दिया था। परन्तु उसकी मां के मन से वह बात कैसे निकले । वह तो रात को ऐसे मेरे साथ कमरे में घुसी कि वह बाहर ही न निकली। मेरे अन्दर भी और अपने-अर्यात् अपने घर के अन्दर भी । आदमी ही उसका प्रय-वित्रय करता लगता था और लड़की अपने आप ही आइस नीम वगैरह खरीदती और पैसे देती। हर फेरी वाले के साथ गिटपिट करती। आप भी बाहर निकलिए महाराज । यह मदाम नही, दिल्ली है। भीतर पुटे-पुटे छठे तो तपेदिक आ पकड़ता है। मेरा मकान तीन तरफ से गुला । आपके मकान से ज्यादा हवादार है । आइए-जाइए। चलिए-किरिए।
विकेन्द्रित 19 जैसी आपकी लड़की है, उससे आपके बारे में सहज ही अनुमान हो जाता है। इसे अपना ही घर समझिए। परन्तु तीन दिन तक वह स्त्री अपने घर से बाहर न निकली । घर 'बिलकुल सजा-संवार लिया होगा। जवाब नहीं तुम्हारा । स्त्री मिले तो ऐसी ही मिले । केवल घर के काम और घर को बनाने-संवारने से सरोकार, बाकी सब कुछ फोकट । तीन दिन के बाद जब वह घर से निकली तो मैं जरा चकरा गया। मैंने उसकी लड़की को मजबूर कर दिया था कि वह अपनी मम्मी को उस शाम को बाहर सैर कराने के लिए जरूर लाये । समय भी लगभग निश्चित 'था। लड़की अपने मिशन में सफल निकली। परन्तु लगता था कि मैं असफल रहा । जब मैंने उसकी मां का मुंह देखा तो मैं चकरा गया। लीजिए। सारी मेहनत स्वाहा हो गयो। अच्छा होता, जो वह कभी भी घर से न निकलती। भीतर पडे-पड़े ही-तपेदिक हो जाता, चाहे और कुछ हो जाता। एक बुढ़िया गयी तो दूसरा मुखोटा आ गया है मैरी -कला का कल्याण करने के लिए। परन्तु फिर मैंने अपने आपको ढांढस बंधाया, साहस बंधाया। पहली दृष्टि है । उसका पूरा मुंह भी मेरी तरफ नहीं था। रंग जरूर सांवला था •परन्तु नक्श बुरे नहीं थे। रंग का क्या होता है ? अगर रंग का कुछ नहीं तो नक्शों का क्या है ? मैं अच्छा पड़ोस ढूंढ़ता हूं, कोई कोठी वाली नहीं। फिर सन्न करो भई। अच्छी तरह देखो तो सही। नजर गड़ा कर -देखो । चाल अच्छी है कि नहीं। शरीर में भी नजाकत और दम है कि नहीं। नींद खराब न कर अपनी । भगवान सहायक होगा। लेते रहो रंगीन सपने, मधुर, अनिश्चित और सांकेतिक | TA अपनी। - AT 7 तीन परन्तु मेरी अगली दो-तीन मुलाकातों ने यह सिद्ध कर दिया कि मेरे रंगीन, मधुर, अनिश्चित तथा सांकेतिक सपनों और मेरी कला का मेल हो गया है। पड़ोसन है, सपने तो फिर भी आयेंगे, यादें भी आयेंगी परन्तु डरावने और घिनौने । सपनों से मनुष्य कैसे बच सकता है। दुनिया और जीवन आधे से बढ़कर सपना है और आधे से कम वास्तविकता। मनुष्य के विचार भी तो सपने ही है आखिर । सपनों और विचारों का और कला का भी मेल। मैंने यह आजमा कर देखा है कि मेरी कला उस समय निखरती और. घमकती है जब मैं सौन्दर्य और रोमांस से घिरा-हूं। दो-चार स्त्रियों के. साथ घुट रही हो। उनके ख्याल, उनकी याद मन को बेचन करती हो, तनाव भरी स्थिति हो और उनके ख्याल में डूबा रहू। किसी पर विजय. पाने की लालसा हो, किसी से हार मानने की इच्छा। कही कोई परेशान कर रही हो। किसी की मीठी-मीठी अदाएं याद आती हो और किसी के साथ सम्बन्ध दो-टूक न हो। कही हंसी-मजाक, किसी के साथ चुम्बन-, खोरी, किसी के साथ उससे भी आगे जाने की लालच। कोई कहे मर ; जाऊगी तुम्हारे बिना। क्यों नहीं अपनाते मुझे? कभी सुनू : क्या पाया मैंने तुमसे दिल लगाकर, दुख ही दुख पाया है। कोई सिहर कर कहे : कभी तो प्यार से कहो तुम मेरी हो। कोई अदा-अदा में कहे : बहुत देखे है तुम्हारे जैसे, तुम्हारा ख्याल है, बिना तुम्हारे नीद नही आयेगी। जाओ-जाओ. न्हा, अपना मुंह धोओ। - 1 विकेन्द्रित 21 हां, ऐसा वातावरण हो, आस-पास ऐसे लोग हों, तो मेरी कला खिलती है, गुलजार खिल उठता है, महक उठता है। यदि ऐसे खिले गुलजार में मेरी पडोसन जैसे संय्याद हो, तो कल्पना कहां चहकती है, विचार और भाव कहां उड़ते हैं। न अलंकारों की ठनका, न रूपों की झंकार, वह दिन नहीं भूलते जब गुजरातन मेरे पड़ोस में थी। दो वर्षों में चौबीस कहानियां, दो उपन्यास, दो यात्रा संस्मरण और न जाने क्या-क्या लिखा था। अब तो मेरा सर्वनाश हुआ समझो। आह ! मुश्किल से मुश्किल 'निकलती है और बड़ी मुशिल यह आ पड़ी है कि अब उसके विना भी नहीं रहा जाता : ज्यादातर उसकी लड़की के बिना । बेचारी ने पांच साल तक मेरे लिए क्या नहीं किया। अपनी मां से पहली मुलाकात करायी। 'निश्चित समय, निश्चित दिन उसे सैर कराने के लिए बाहर लायी। फिर वैचारी ने जिद करके मेरे घर से ठंडा पानी मंगवाने के लिए मां को मजबूर किया। फिर मेरे फ्रिज मे उसने पिता से आग्रह करके कोका कोला रखवाया। कितना मस्कीन बनकर आया था वह मेरे पास । 'मेरी पुत्री बड़ी जिद्दी है, सरदार साहब ! क्या करें। हमारा अपना फ्रिज यावे अभी देर लगेगी। शायद अगली गर्मी में ही लें। उधर गमियां आ रही हैं और इधर यह लड़की बर्फ, आइसक्रीम और ठंडा कोका कोला पीने के लिए जिद्द करती है।' 'स्वागत है, भाई साहब ! कोका कोला ही क्यों, जो मर्जी है, करो इस फिज के साथ या इसमें। सब्जी, फल, पानी, बची हुई चीजें रखो। मैं अकेला हूं। फ्रिज तो खाली ही रहता है।' बेशक अपनी पत्नी को भी ठंडा होने के लिए भेज दो। हां, मेरे पास गरम रखने की जुगाड़ भी है । सदियों में गरम, गर्मियों में सर्द। मैं अपने हाथों पर सरसो जमा सकता हूं। और वेचारी बेटी अपने मां-बाप को मेरे घर लायी। यह रस्मी आना था मेरे घर। बेटी ने मति या सुमति दी थी अपने मां-बाप को कि जो उनका इतना अच्छा पड़ोस है, क्या उनके घर जाना उनका फर्ज नही? यह लड़की हाड़-मास की लडकी थी या कि परमाणु-शक्ति से प. A.
22 विकेन्द्रित फिरकी। यह कोई आने वाले समय का रोबोद-सोचने बोलने वाली मशीन-तो नहीं थी। या कोई ऐसा अजूवा जिनके बारे में कभी-कभार अखबारों में पढ़ने को मिलता है। पिछले युगों में पिछले जीवन की जानकार । कोई गणित विद्या की आवार्य आदि। इसको यदि मैं कहूं कि मुझे प्रधानमन्त्री बना दे, तो शायद वह भी बनवा दे। आप मेरे घर आये तो मेरी सिट्टी-पिट्टी भुला गये । उस दिन मैंने खूब तुम्हारे मुह की तरफ देखा। नही, वास्तव में ऐसा कोई नक्श नहीं था जिससे मेरे भीतर झुन-झुनाहट पैदा न होती या जो मेरे ताल को न पिघलाता न ही कोई नक्श और न ही कोई आचार-व्यवहार । जव किसी को पहली बार मिलते है तोखुशी और गर्मजोशी का इजहार करते-वेशक ऊपर-ऊपर से ही पर तुम तो बोय की लोय मेरे सोफे पर टिक गयी और फिर न ही तुम्हारा शरीर हिला और न ही जवान । वैसे तो आप कहते है कि आप बड़े सभ्य है । यही सभ्यता थी आपकी मैंने तुम्हारे लिए खास तौर पर दक्षिण की काफी बनाई थी, दक्षिणी क्यो, मद्रासी काफी। नया ब्राह्मण, पर क्यूलेटर सोचा था, पूछोगे तो बताऊगा, निकालकर दिखाऊंगा। बातचीत बढ़ेगी। खरीदकर लाया था । खूब दूध गर्म किया था। इतनी खातिर तो मै उन महेलियों की भी नहीं करता जिन्होंने मेरी कला पर कई अहसान किये हैं। इतना तो कह दो कि काफी बढिया है, मैं या मेरे नौकर ने ऐसी स्वादिष्ट मद्रामी काफी वनानी कहा से सीपी है, न अक्त न शक्ल आ गये हैं दिल्ली शहर तुझे दिल से चाहने की कोशिश मैंने उसी समय से शुरू कर दी थी परन्तु तुम्हारी बेटी मेरा पीछा ही न छोड़े। कुर्वानी को पुज । कुर्बानी को धकरी। मैं इस बेचारी को कैसे मायूस करता? और फिर तुम्हारा पति ? उस दिन के बाद वह भी वक्त-वेवक्त मुझे सुबह या शाम नमस्कार कहने का वहाना ढूढ लेता। अब शायद उसकी इच्छा कभी भी अपना फिल खरीदने को नहीं थी। मेरे माथ मित्रता ही शायद उसका फ्रिज हो। तुम्हारा नौकर भी अब तक मेरे फ्रिज का अंदाई हो गया था। सुअर का बेटा। कहता है, वाह जी वाह, बड़ा अच्छा लगता है इसको बन्द करना और पोलना। इसके अन्दर तो बहिश्त है बहिश्त । उसके बाद तुम्हारा विकेन्द्रित 23 to नौकर और मेरा नौकर मित्र हो गये । कमाल की बात थी। मेरा नौकर तो आस-पास के मेमो और साहबों को भी मुंह नही लगाता था परन्तु उनके फुटवाली नौकर पर कैसे लट्टू हो गया। कोई और ऐसा फुटबाल होता तो वह उसे ठोकर भी न मारता परन्तु उससे गले मिलता। फ्रिज के ठण्डे पानी की उसे कभी कमी नहीं आने देता। न जाने और क्या-क्या देता होगा? यह अकेला मालिक, रसोई और फ्रिज का कितना ख्याल रख सकता है। और इस पर मुझ-सा मालिक? एक दिन कहने लगा: 'नान तमिल पड़ीतु केंडू ईरूकिरेन / - 'क्या?' 'नान तमिल पड़ीतु केंडू ईरूकिरेन ।' 'अरे, इसका क्या अर्थ हुआ?' 'इसका अर्थ है कि मैं तमिल सीख रहा हूँ। जी हां, मैं तमिल सीख रहा हूं। "उस फुटबाल से ?' 'जी?' 'क्यो, किसी मद्रासी के घर नौकरी करना चाहते हो ?' 'लीजिए, पहले आप ही तो कहा करते थे कि इन्सान को सदैव नयी-नयी चीजें सीखनी चाहिए और फिर आप ही आरोप लगाते है।' 'आरोप क्या, जो मर्जी है करो परन्तु मेरा घर, मेरी नीद हराम न कर। मैं उस थोबडे से भागता हूँ और तू उसके फुटबाल को भी चूमता फिरता है।' फिर एक दिन उसने फुटबाल की मालकिन की तारीफ शुरू कर दी। बहुत अच्छी है जी-ज्यादा वेमतलब की बात नहीं करती (और मुझे वैमतराय की बातें करने के और कोई काम नहीं ?) और कभी आप उसकी हिन्दी सुनें तो हंस-हंसकर लोट-पोट हो जायेंगे--(तो अब तुमने उसे हिन्दी सिखानी शुरू कर दी है। मैंने तुझे सिखाई है और तुम आगे शागिर्द पालो। तुम जैसे नौकर मिलें सवको और मुझ जैसे मालिक जो नौकरों को हिन्दी ५ 24 विकेन्द्रित पढ़ायें, अंग्रेजी सिखायें तपा नयी-नयी चीजें सीखने के लिए उत्साहित क घोल नहीं सकती, परन्तु समझ जाती है। पर बड़ा साफ-सुपरा रस है-देखिए, अब मेरे भी स्टेनलेस स्टील के वर्तन कितने चमकते हैं- उससे यास पाउडर मंगवाया है-कहता है कि अब हमें घरीदने जरूरत नहीं । (अच्छा, तो निकटता यहां तक पहुंच गयी है । यह फ्रिज उपयोग का बदला है ?) परमाणु शक्ति चालित फिरकी से मित्रता तो मेरा और मेरी कर का मेल कराने तक ले आयी है परन्तु फुटवाल की मित्रता मेरे नौकर कर्मकांड तक पहुंचाती लगती है। अपने नौकर द्वारा अपनी पड़ोसन ‘लिए प्रशंसा सुनकर मैंने सोचा कि पता नहीं यह दोनों एक-दूसरे के का तक प्रशंसक हो गये हैं। भाड़ में जामें सब । मरें या जियें। काश ! मैं साधारण, सरल सामान्य व्यक्ति होता। काश ! लिखने "पढने की जिल्लत न होती। काम करता, विवाह कराता, बच्चे पै कराता खाता-पीता और मर जाता । न मेरी बीवी मुझे धुतकार और न मैं उसे छोड़ता। न बच्चों की जिन्दगी खराब होती। न मैं इ सौन्दर्य, रसिकता और रोमांस के चक्कर मे माता । ऐसे तरह-तरह की बलायें गले में डाल ली हैं। - चार बला और सजा है यह असाधारणता उत्कृष्ट शिष्टता, लालित्य, कृपा। हर असाधारण जीव की आकाश की उड़ान और पाताल की ढलाई गहन है। उसमें ईश्वरीय इप्टि भी है और शैतानी जज्ब भी। जहां समानता, मद्भावना और सुपात्रता है वहां अशिष्टता, असमानता और निराशा भी है। लेकिन इस असाधारणता के विभिन्न दायरे में एक अनूठी संपूर्णता है। निराशा के बहाव में उतार-चढ़ाव के बावजूद कोई अदृश्य शक्ति पीछा नहीं छोड़ती। ज्वार-भाटे उठते हैं, ज्वालामुखी फूटते हैं लेकिन बर्फ के नीचे गजब की गरमाइश होती है, ऐसी बातो की उड़ान का कोई अन्त नहीं। यह तो सब शब्दों का तिलस्म है, असाधारणता का जादू । वैसे मुझे ऐसी आलंकारिक और शिल्पी लेखनी से चिढ है। चिढ़ से बढकर भी नफरत । यह सामंतवादी बुर्जुआ शैली है। नहीं? फिर क्यों दुखी होकर और कठिनाई मे पड़कर शब्द ढूंढने की कमर बांधते शब्दकोश उलटते हैं। अपनी असाधारणता का सिक्का और सिप्पा जमाने और जतलाने के लिए। इसमें कुछ और भी जोड़ा जा सकता है अस्तित्ववाद, अभिव्यंजनावाद, उपयोगितावाद, संवेदनावाद इत्यादि । शर्म ! बेशर्मी ! शर्म और धिक्कार या मुबारक और शाबाश । हाँ, मैं असाधारण हूं इसमें कोई संदेह नहीं। प्रतिभा ही जानो। जो कुछ है तब ही तो दुनिया पढ्ती है न मेरी रचनाएं, मेरा काव्य, ऐसा अ-उपन्यास भी उपन्याम कहलायेगा; कड़ा, साहित्य बनेगा। अगर असाधारण न होता तो पत्नी के साथ क्यों बिगाड़ता।
26 विकेन्द्रित हम दोनो लायलपुर के हैं। आह ! लाहौर से अस्सी मील पश्चिम की तरफ लायलपुर कैसी जगह थी। घंटाघर से आठ वाजार निकलते थे। सारे देश में अपनी आप मिसाल था लायलपुर । अब पाकिस्तानी इसे पाकिस्तान का मानचेस्टर कहते है-इतनी औद्योगिक उन्नति हुई है इस सारे जिले मे। मै जन्म से ही अनोखा हूं। पिता के पास खासा धन था। रूई के दो कारखाने अलग थे । खाने-पीने की कमी नही थी। उस समय सन् 47 और उससे पहले भी हमारे पास मोटर थी। खूब चलती थी हमारी मोरिश माइनर । जब वह घंटाघर जाते थे उसे देखने के लिए प्रशंसकों की भीड़ जुड जाती थी। बड़ा पुत्र होने के नाते पिता ने मुझे एक साल के लिए विलायत भी भेजा था। बहाना पढाई का था लेकिन हम दोनो जानते थे कि इसका असली मतलब सैर ही है। सैर और हैकड़बाजी। मेरा पिता बेसाख्ता कहा करता था कि उसने अपने बेटे को विलायत भेजा है। बस तब से ही मेरे पैरो मे चक्कर पड़ गये। एक हविश, एक रस, एक चीस- पता नही कौन-सी ऐसी शक्ति थी जो मुझे चलने-फिरने के लिए प्रेरित करती रही। उसका पिता दुकानदार था। काच की दुकान अच्छी चलती थी लेकिन हमारा मुकाबला न था। हम लोगों के मुकावले वह अधिक मेहनती. भी था लेकिन वह बहुत सुन्दर थी । इतवार के इतवार, सिंह सभा के गुरुद्वारे जाना मेरा काम था। पिता के आदेश से बढ़कर मेरा अन्तर मुझे गुरुद्वारे ग्रंथसाहिब-अदृश्य शक्ति के चिह्न के आगे सिर झुकाने के लिए प्रेरित करता। वह भी श्रद्धालु थी गुरुद्वारे की। बैठे-बैठे एक-दूसरे को देखते । विशेष अवसरो पर लंगर या छबील (जहां सगत को पानी पिलाया जाता है) के पास मिलते। फिर कही और मिले। फिर कही और । फिर अकेले पहला आधुनिक प्रेम था यह लायलपुर में। इश्क की हवा लगने से उसकी सुन्दरता और निखर आई। विलायत गया, वहा भी कोई ऐसी मेम नही दिखी जो उसका पासग भी हो। विभाजन से चार मास पूर्व हमारी शादी हो गई। पिता ने सारा लायलपुर बुला लिया या-लाहोर और अमृतसर भी मेहमान आये थे। शुक्र है लाटसाहब को नहीं बुलाया । यद्यपि बुलाया विकेन्द्रित 27 उसे भी जाना था। पाकिस्तान के नारे लगते थे लेकिन किसी को यह सपने मे भी उम्मीद नहीं थी कि चन्द महीनो में ही खून की होली खेली जाएगी। सम्पूर्ण मानयता का नंगा नाच होगा। धर्म-धर्म पर से कुर्बानिया की जाएंगी। सच्चाई और विश्वास चूर-चूर होकर पैरो के नीचे रौदे जाएगे। हनीमून के लिए शायद हम मसूरी गये। उन दस दिनो के बारे में एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है । शायद लिखूगा भी। विभाजन के समय वह अपने चाचा के यहां लखनऊ में थी । चाचा के सड़के वा विवाह था। उसका एक भाई भी उसके साथ गया था, पयों को गठरियां बांधकर और चेकों की पोटली जेब में रखकर । विवाह के बाद उसका वहां ही रह जाने का इरादा था और चाचा के भाजे के साथ पत्ती करके वह कोई धंधा शुरू करना चाहता था । नौजवान और महत्त्वा- कांक्षी पुन लायलपुर पिता के कहने में नही आता था और न ही पिता को उस पर काबू था और न ही वेटे का पिता पर । विभाजन हुआ और मेरे ससुराल वाले बादशाह बन गए और हम राजा से रंक। ऐसा कई बार हुआ है इतिहास और भथिहास में। यह होनी भी है और अनहोनी भी। किसी का क्या दोप, किमी को क्या कोपना। विभाजन ने आपबीती और जगबीती ने ही मुझे कितने सालों तक होनी और अनहोनी का कायल बनाये रखा। कुछ तो है जिसको पर्दादारी में वह परवरदिगार ऐसे नीचे गिराता है, महल झुग्गी बनते हैं और झोपडिया महल। कारखाने मिट जाते है और राख सोना बन जाती है। कोई विवेकशील इसका सुझाव नहीं ढूंढता । कोई तर्कपूर्ण संयोग या रिश्ता नहीं बनता और जब तर्क तथा विवेक को रास्ता न मिले तो कुजीबरदार सर्वक्तिमान है। बस यह उसका खेल और माया है। यह उसी दिव्य दृष्टि और उसको ही कृपा और मेहरबानी है। उसके आगे माथा झुकाने और रगड़ने में ही संतोप है जो बादशाह बने उनके राज में उसकी रजा थी और जो रक बने उनको भी उसका आसरा, उसकी रजा बिना कोई काम सिद्ध नहीं होता। जुलाई 47 मे बिगड़ती परिस्थितियों को देखकर कुछ 28 विकेन्द्रित । ईर्ष्यालुओ ने मेरे पिता को पानी में जहर मिलाकर पिलाने का पड्यन्त्र रचा । पड्यंत्रकारियो का नेता मलेर कोटला का एक धर्माध नवाब था जो दस साल पहले लायलपुर में आकर बस गया था। उसका भी रूई का एक कारखाना था लेकिन वह चलता नहीं था । इसीलिए वह दुखी था। बात चीत में उसने कही मेरे पिता के सामने नवाबी शान वधारी थी और मेरा पिता उसे उलटा पड़ गया था। बस तबसे ही उसने ईर्ष्या और बैर की गांठ बांध ली थी। वह ऐसे पाकिस्तान की कहानियां करता जैसे कायदेआजम जिन्ना भी नहीं करते थे। उसने भी, नये देश का प्रधानमन्त्री या राष्ट्रपति बनना हो, ऐसी बातें किया करता था। 22 जुलाई सन् 47 की कहर भरी शाम को कहर बरपा । पहले दिन ही उन्होने लायलपुर के प्रसिद्ध और धनाढ्य को मिसाल बनाकर काटा । पांच हजार मुसलमानो का जत्था अचानक हमारे कारखाने पर टूट पड़ा। उनकी खूब तैयारी थी और उनके खासे जासूस थे। मा-बाप हमारे नहा- घो रहे थे और हम पांच भाई-बहन शहर आये हुए थे। हमलावरो ने हमारे कारखाने को आग लगा दी और मेरे मां-बाप को तरसा-तरसा कर मारा। ऐसे ही अठारहवीं सदी में हुआ करता था जब एक सिक्ख के सिर की कीमत हुआ करती थी और आये दिन उत्तर की तरफ से लहू की नदियां उतरा करती थी। मेरी मां का उन्होने अंग-अंग काटा। होनी या अनहोनी? हम आइसक्रीम खा रहे थे जब अश्रुरत लोगों ने हमारी तबाही की कहानी आकर सुनाई। बस फिर हमने कारखाने क्या जाना था और घर की तरफ क्या मुडना था। घंटाघर से ही तीन मील दूर हमें अपने जलते हुए कारखाने और महल नजर आने लगे पिता और माता के साथ हुई अन्याय की खबर भी पहुच गई। देखते-ही-देखते हजार हिन्दू-सिख इकट्ठे हो गए। बाहि-त्राहि, हाय- हाय उनके मुह से निकले, कई बच्चे और बूढ़े रोये । मेरी वहनों के आसू भी नही रुक रहे थे। मेरे दोनो भाई मां-बाप के पास जाने की जल्दी में थे। कर किसी ने जयकारा छोड़ा,फिर क्या था? बोले सो निहाल और सतश्री विकेन्द्रित 29 अकाल चारों ओर गूंजने लगा । हर-हर महादेव और बजरंगवली के नारे लगाते हुए अनेक हिन्दू भी आकर शामिल हो गए और हमें गुरुद्वारे ले गए। यह 22 जुलाई 47 को शाम थी। जयकारे आज भी छूट रहे हैं परन्तु हमें सुनाई नही दे रहे। हम बहरे हो गये थे, अन्धे हो गए थे। जयकारे अभी भी छूट रहे थे। परन्तु मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। मैं आज भी अन्धा और बहरा हूं। जब कभी ऐसा दर्दनाक हादसा सामने हो तो शायद हम सभी अन्धे और बहरे हो जाते है। दिल और दिमाग काम नहीं करते । तर्क विफल हो जाता है। अनव आंखें है हमारी और अजय इनकी परीक्षण-शक्ति । अजीब हमारे कान हैं और अजीब इनकी श्रवण- शक्ति । विचित्र हमारी बुद्धि है । कुछ विचित्र ही उसकी विचारधारा। कुछ ऐसी ही स्थिति बिना कहे उल्लास के मय मनुष्य पर हो जाती है। अधिक उल्लास के पलों और क्षणों की यादें भी सच्ची बुद्धि कर देती है। मुझे तो लगता है कि उन्नति और सभ्यता के मार्ग पर मनुष्य अभी पहली सीढ़ी पर ही पहुंचा है। हम मनुष्य हैं परन्तु बौने । हमारा आकार, हमारा हाड़-मांस, हमारी बुद्धि, हमारी पाचों इन्द्रियां अभी कोई संतुलन और तालमेल ढूढ रही है। अभी हम अंधकार में हैं । प्रकाश की किरणें ही बस कही यदा-कदा दीख जाती हैं। हमारे अंग सुन्दर है लेकिन कुछ ग्रहण करते नही प्रतीत होते। हमारी पलकें, पुतलिया झपकने की अभ्यस्त नही, हनारा नाक सूध-सूप परखा हो जाता है। हमारे कानो के लिए अधिक स्वरों और लय का कोई आंतरिक भाव नहीं। हमारे मुह को स्वाद और बेस्वाद का अहसास नहीं और हमारा भेजा, हमारा मन सब इन्द्रियों और सब कर्मों को एक ताल, एक सहकारिता में बांधने में असमर्थ है। लगता है बुद्धि और सभ्यता की किसी मंजिल पर कभी हमे पहुंचना है। मनुष्य अभी बच्चा है। बच्चों की तरह ही रोज-रोज नये अध्याय पढ़ता और सीखता है। नयी तरह ही चलता है और उसकी याददाश्त भी नयी है और स्वादो को ग्रहण करने का ढंग भी नया है। आज चन्द्रमा से दिखाई देती अपनी धरती एक खिलौना है । मनुष्य खेल रहा है, जी बहला रहा है । आंतरिक रहस्य अभी अप्रत्यक्ष 30 विकेन्द्रित है। हाथ और मन खाली है। अगर बीसवीं सदी की महान उपलब्धियों और आविष्कार है तो विश्वयुद्ध भी महान थे । महानता श्रेष्ठता की तरफ, महानता उन्नति की तरफ, महानता प्राप्ति की तरफ एक पग है । अगर चांद पर विजय है तो परमाणु और मिसाइलों पर विजय कहां है ? किसी महत्त्वपूर्ण और शोभा के स्थान पर पहुंचने में असमर्थ मन डावाडोल है । कोई तार हिलती कही-कही दिखाई पड़ती है परन्तु हाथ नहीं लगती। किसी भावपूर्ण ताल की झंकार कानों में पडती है परन्तु सम्पूर्ण रूप से साकार नही होती । अजब प्रकाश धुएंधार है, अजव ताल-वेताल ।
पांच नारे तब भी छूट रहे थे और अब भी छूट रहे है। परन्तु जय- जयकार पता नही किसकी है। किसलिए है और क्यों है? हम जय- जयकार अलापते है परन्तु स्वयं निलेप हैं और वह भी निलंप है जिसकी जय-जयकार अलापी जाती है । बहरापन जय-जयकार प्रस्तावना है। अन्धापन, अनुभव-शक्ति का स्पप्टीकरण । जय-जयकार की गूंज लगाकर हिन्दू-सिख जनता ने लायलपुर से शरणार्थियों को निकाल कर हवाई जहाज पर विदा किया। कोई दस हजार हिन्दू-सिख हमें छोड़ने के लिए आए होगे । 22 जुलाई को शाम के बाद और नगर सच पूछे तो पाकिस्तान अस्तित्व में आ ही चुका था। उस शाम और शायद अंगले दिन इक्के-दुक्के हमलों और छुरी के साथ पचास-साठ आदमी घायल हुए होंगे और 30-40 आग की लपेट मे आकर जले भी होंगे। परन्तु उस' रात के बाद हत्याएं कम हो गयीं, लगभग बन्द ही हो गयीं। क्योंकि अकेला हिन्दू या मुसलमान अब कही से भी नहीं निकलता था। कम से कम सौ-सौ का जत्था होता था दोनों तरफ । नारे बुलंद कर-करके दस हजार हिन्दू-सिख जनता ने हमें लायलपुर से विदा किया और नारे लगाती हुई जनता ने जालन्धर के साथ आदम- 'पुर हवाई अड्डे पर हमारा स्वागत किया। मेरी पहली और आखिरी सार्वजनिक विदाई और सार्वजनिक स्वागत । राजनीति की मसल्लत है मुझे और मैं चाहता तो राजनीति मे पड़कर कोई छोटा-बड़ा मन्त्री जरूर बन जाता। परन्तु इन स्वार्थों के डर ने इस रास्ते पर मुझे चलने ।
32 विकेन्द्रित दिया। बकवास है यह विदा और स्वागत की नारेबाजी। कुते भौंकते हैं जमे। तार में जैसे यूषारी होती है । न जान न पहचान, न सूझ न समझ नारे जमे किसी अवसर के स्वरूप की अरथी हों। इस नारेबाजी के बीच हम पांच भाई-बहनों को आदमपुर से जालंधर लाया गया। हम लायलपुर के सबसे बड़े और धनाड्य की संतान थे। और हमारे साय मुसलमानों ने अत्याचार किया था। हमारे माता-पिता के साथ कहर बरपा था। जल्सा हुआ । भाषण हुए। छुरे तेज हुए। खून हुए। इसान से जानवर बनने की उत्सुकता बढ़ी । बड़ा जैसा इंसान किसी उन्नति की मजिल पर पहुच चुका था कि पूर्ण उल्लास जैसे उसे पुकार रहा हो। अगले दिन जलंधर मे हमे न कोई जानने वाला था, न पहचानने वाला । दिन चढ़ता और रात पड़ जाती। न हम किसी को जानते- पहचानते थे न कोई हमे। और कुछ दिन बाद विधिवत पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का विभाजन हो गया। पुनर्वास की एक लम्बी जद्दोजहद शुरू हो गई जिसका डिफेंस कालोनी मे मेरे पड़ोस में रहने वाली मद्रासन के साथ कोई खास ताल्लुक नहीं । हा, इस पुनर्वास की कहानी के साथ मेरी पत्नी का सम्बन्ध जरूर है । मेरी पत्नी का और मेरा बिछुड़ना मेरे मौजूदा बौद्धिक और मानसिक जीवन पर सीधा प्रभाव डालता है। इसकी व्याख्या भी कुछ शब्दो में कर ही दी जाए, जलंधर से हम कहा.जाते ? अमीरों की सारी दुनिया मित्र है परन्तु जब उन्हें टटोलने लगो तब कोई नही अपना बनता । असली मित्रता बुद्धिमानो मे या चोर-उचक्को में या मजदूर श्रेणी मे भी होती है। आज हमें कोई भी मित्र दिखाई नहीं पड़ रहा था। महलों मे रहते आदमी इतना कट जाता है कि आवश्यकता पड़ने पर उसको कोई सहायक या मददगार याद ही नहीं आता। और फिर मेरे भाई और मेरी बहनो ने तो लाहौर की सीमा भी नही लाघी थी। कहा जाते । महीना भरघूम-घूमकरअन्त मे लखनऊ पहुंचे, ससुराल । "इते है कि हम नहीं जाना चाहिए था यद्यपि मुझे इसमे कोई बुराई नजर विकाFos नहीं आई । भूसे मर जाना चाहिए था परन्तु ससुराल नहीं जाना चाहिए था। जाने दीजिये । कहा किससे भूखा मरा जाता है। यह तो। मुनी-सुनाई बातें हैं और फिर मरे भी क्यों भूया आदमी इस समय तक समुराल वाले जम चुके थे । एक तो मेरी सौला पहले ही कुछ रुपये ले आया था, वाकी गाड़ी से आए और खासा धन लेकर आये। लखनऊ वाले उनके रिश्तेदार भी सम्पन्न थे और सहृदय भी। परन्तु मेरे ससुराल वालो ने उनसे कुछ न सीखा । हम जब पहुंचे तो पहले दिन से ही उनका मुह लटक गया। मेरा छोटा भाई बहुत समझदार है। हालात देखते ही वह अगले दिन दिल्ली चला गया। वहां उसने खोज-पड़ताल चालू की । मित्र रिश्ते-- दार खोजे । बैंकों के साथ दोस्ती-यारी और लड़ाई की जिसके फलस्वरूप 15 दिन सीतर उसने दोनों भाई और दोनों वह्नों को भी बुला लिया। और मैं? और मैं निखट्ट वहां क्या करता । न इधर का रहा न उधर का । समुर ने कहा कि वहीं टिका रहूं । देखिये क्या होता है। कारखानो का खामा मुआवजा मिलेगा। पत्नी-प्यारी पत्नी-भी आसू बिखेरने लगी। न जाओ मेरे प्रियतम । मेरी जान, मेरे देवता । भगवान सहायता करेगा। पहा ही कुछ देख-भाल कीजिये,'पिता जी के साथ जम जाइये । ससुर और पत्नी के साथ तो मिल बैठता परंतु सास का क्या करता । वह तो किसी को बैठा देखकर खुश न होती। कमाल की महिला है मेरी सास । अक्ल से भी और शक्ल से भी। रचयिता उसके बारे में कोई महाकाव्य या भारी-भरकम उपन्यास रच डाले। मैं बेचारा किस योग्य था। सारा परिवार का उद्भव आर्य वंश का है परन्तुं पता नही कौन-सी अशुद्ध श्रेणी का यह प्रतिफल था। रंग काला है और माथे पर तीन मोटे सफेद निशान अलंग-अलग रंग और दंग वाले । बाल शायद वीस में, ही भूरे और सफेद होने शुरू हो गये थे । एक टांग मारी हुई है। सर्दियो में डंडे की सहायता की जरूरत भी पड़ जाती है। ऐसी सास की बेटी के साथ मैंने शादी की थी। उसकी बेटी के साथ प्यार जरूर था (प्यारं या दिखावा ?) परन्तु प्यार (क्या प्यार?) और । ।
34 विकेन्द्रित चीज है और विवाह गौर । ठीर है इस देश में विवाह किये दिना भी तो काम नहीं बनता। गाजीप्यार के साथ ही आदमी जिम मंजिल तक पहुच मकता है और फिर तापलपुर जैमी जगह पर। यह भी सोचा था कि जब लड़को हमारे कारणानं आ यरोगी तो मैं कौन-सा रोज इम कलमुंही साम के माथे लगूगा। दे मारी। समय प्रबल होता है । भविष्य का तकाजा। मैं उनके यहां जा यमा। कलमुही के गेज माये रागना पड़ता। ताने देने में भी यह बड़ी तेज थी। वडी चतुराई से वह भिगो-भिगोकर मारती । ददं भी हो और निशान भी न पड़ें। ज्यू-धू उनमो पांव लखनक मे पक्के होते चले गये त्यों-त्यों उसकी चोटें भी गहरी और करारी होती गयीं। हमारे कारनाने वह मुझे गुनाती । विवाह के समय पिता ने बरात की खातिर तवज्जह के लिए कोई रकम दी होगी । अव उसने वह मेरे मुह पर परन्तु दिल से वह खुश थी कि मुझे झुकाने में वह सफल हुई है। मुझे उसने कुठाली में पा लिया है । और अपनी बुद्धि के बल पर वह मुझे खूब पीट भी सकती थी। इन दिनों मुझे यह भी समझ मे आ गया कि मेरी पत्नी केवल सुन्दर ही थी परन्तु दिमागी तौर पर बस राम-राम । प्यार करती थी मुझे देख कर । प्यार जो कुछ भी हो परन्तु समझती नही थी मुझे। शायद प्यार और समझ की सदा से अनबन रही है । मुझे कहती : 'कुछ कीजिये न मेरी जान ! इस तरह वेकार बैठे-बैठे कब तक काम चलेगा। इन कुछ महीनों मे देखो लोग कहां-कहा पहुंच गये है।' प्यारी मेरी सुन्दर पत्नी। मैं जन्म से ही कारखानों का मालिक, मोटरो पर चढने वाला, यूरोप में घूमा-फिरा और अब मैं दुकानदारी करूं और तराजू उठाऊं और फिर वह भी कांच की दुकान पर। अगर वहाँ सच्चाई होती तो वह भी कोई बात थी । या फिर इस कांच में कुछ मच होता । यह तोवडा घटिया कांच था। फुटकर ग्लास फैक्टरी । वे लोग कुछ अन्य फर्मों का व्यापार करते और अगर कांच का थोक व्यापार होता तो विकेन्द्रित 35 - 'भी मैं दिलचस्पी लेता। कम से कम तरह-तरह के नमूने देख लेता तो मजा आता, तरह-तरह के कट वाले काच देख के तृप्ति तो होती । कांच और कट ग्लास के बारे में सोचा । मुझे अहसास हुआ कि हो न हो में इस क्षेत्र का वास्तविक पारखी हूं, असली कलाकार । काच और सच को अलग करने वाला। कमी पकड़ने वाला। अच्छाई-बुराई वाला तराजू तोलने वाला। छोटी उम्र में तुकबन्दी की थी। अब फिर कविता "लिखनी शुरू कर दी। परन्तु जल्दी ही अनुभव गद्य की तरफ चला गया । कविता और गद्य लिखना कांच और कट ग्लास जैसी ही समस्या है। मैंने लेख लिसे । फिर कहानियां और फिर उपन्यास । मैंने धर्मपत्नी से कह दिया: . न "सुन्दरी, मैं तो कुछ करने योग्य नही । अमीर बचपन ने हड्डियों में पानी भर दिया है । अब मुझसे बैठकें नही निकाली जाती और न सलाम- दुआ ही मेरे बस की है । और न ही व्यापार की अन्य चालबाजियां। पता नहीं दिमाग में क्यूं थोड़ा-बहुत प्रकाश दिखायी देता है। अगर बन सकता हूं तो बुद्धिजीवी और अगर कुछ कर सकता हूं तो लिखाई-पढ़ाई।' मेरी खूबसूरत पत्नी के मुह पर एक रग आया और एक गया। बुद्धि- जीवी लेखन और लेखक की चर्चा उसकी सुन्दरता पर फिसल-फिसल गये । उसने कोशिश जरूर की। उसने अपने हाथ और अपनी सूझ-बूझ का -सहारा लेना चाहा लेकिन उसकी स्थूल बुद्धि फिसल-फिसल जाती थी। जब सास ने कहानी सुनी तो खूब हंसी । 'लीजिये लेखक वनने चले हैं दामाद जी। अपने कुल को तो लीक लगायेगा ही और फिर हमारा कुल कहां बख्शेगा। पहले ही आधा "लखनऊ हमें जानता है और अभी तोहम आये ही आये है। 'मैं भी खूब हंसा । कहाँ से कहाँ आ गये भाई साहब । गुदडी के लाल हर जगह नहीं समाते । काश, इन लोगों का काम भी लखनऊ में न बनता । उजड़े उजड़े ये लोग भी लखनऊ आते। लेकिन किस्मत तेज है । काच की ‘दुकान रास आयी। मजा तो तब आता अगर ईश्वर इनको भी हमारी तरह नंग-धडंग करके निकालतर लायलपुर से ! परन्तु ऐसी प्रार्थनाओ पर रंग नहीं चढ़ता। जब भगवान देता है तो...
36 विकेन्द्रित छप्पर फाड़कर देता है । किसी की वद आशीश क्या चीज है। ज्यू ही मेरी बुद्धि के पंख उड़ने लगे, मुझे लगा कि जब तक यह पनी अपनी मा की छाया से नहीं निकलेगी इसके साथ गुजारा मुश्किल होगा परन्तु कैसे बचाता पत्नी को। इस जलती हुई छाया से । कहां ले जाता शावाश छोटे भाई के । उसकी पिता जैसी ही व्यापारिक सुझ-बूझ थी किसी से पैसे लेकर उसने रुई इकट्ठी करनी शुरू कर दी। रुई जगह ज्यादा धेरती है लेकिन भार उसका कुछ नहीं होता। दूसरे को प्रभावित करती है। लेकिन कभी अन्य धंधों की तरह मुंह काला नहीं करती। दूध की तरह सफेद-सफेद रुई। पता नही मैंने यह कलम-दवात को ही क्यू अपनी धरोहर बनाया। वास्तव में अगर फाउंटेनपेन और पेंसिलो का आविष्कार न हुआ होता तो मैं कभी भी लेखक न बन सकता। भाई कुछ महीनों के बाद लखनऊ से गुजरा। रात भर उसे रुकना था। मैंने अकड़कर उसे एक दिन और रख लिया। वह तो मेरी हालत मिनटों मे भांप गया था लेकिन मैंने फिकर नहीं किया। मुझे यह कहकर कि मैं किसी बात की चिंता न करूं, वह दूसरे दिन गाड़ी चढ़ गया। दम दिन बाद तार आया कि मेरे लिए घर और पैसे का प्रबन्ध हो गया है । उसकी भाभी तथा मैं दिल्ली आ जाऊं। लेकिन सास नही,मान रही थी। वह कह रही थी:- 'मेरी लड़की तो बडी नाजुक है। पता नही कैसा घर है और कैसा काम । इतनी जल्दी यह लोग कैसे टिक गये। जाइये आप (अपने पति को सुनाते हुए) जाकर देख आइये, कैसा है घर-घाट । अपनी नाजुक कली के गले में फदा थोड़े डालना है । खैर, पत्नी आ गयी परन्तु हर चौथे-पांचवें महीने लखनऊ से कोई न कोई उसे किसी बहाने लेने के लिए 'भा जाता। मां उमकी उसके लिए उदाम हो जाती। मैंने पत्नी को समझाया, वह समझी, पर वह मजबूर थी । मां की मजबूरी के सामने । मैं अपनी जगह मजबूर था। सास की यही जिद थी कि हम लपनऊ वाले हैं। पैसों की कमी नहीं है। मैं घर-जवाई बनू, यह इच्छा यी मेरी सास की। मेरा छोटा भाई बहनो के लिए नहीं मेरे लिए ज्यादा काम करता। मैं ।
विकेन्द्रित 37 केवल किताबें, पत्रिकाएं और अखबार पढता । थोड़ा-बहुत लिख भी लेता। कभी-कभी कही से सौ-पचास रुपया पारिश्रमिक भी आ जाता । बाकी सब कुछ भाई के सिर पर था । कुल दस माल पत्नी मेरे पास टिकी। हमारे तीन बच्चे हुए । लड़का, लड़की और लडका। धीरे-धीरे देश में मेरा नाम जाना जाने लगा। मैरी पुस्तकें करने लगीं । पैसा वेशक नही था परन्तु नाम और आदर था। फिर हमे पाकिस्तान में छोड़ी हुई सम्पत्ति का मुआवजा मिल गया। तव भाई ने किसी गरीव सैनिक मे डिफेंस कालोनी का यह प्लाट भूस के भाव खरीद कर मेरे लिए एक मंजिला मकान बनवा दिया। धीरे-धीरे कुछ पैसा उसमें मेरे नाम सुरक्षित ढंग के रूप में रख दिया ताकि मुझे मासिकपेंशन मिलती रहे । ऐमे भाई इम सदी में कम ही किसी के होते हैं, मुझे और अपने तीन छोटे बहन-भाइयों का समझिये, उमी में लालन-पालन किया । अपना और तीन छोटो का विवाह भी किया। इतना तो मा-बाप भी नहीं करते, मइया ! जितना तूने अपनी जान को मार कर हमारे लिए किया है । यह सब कुछ होता रहा, चलता रहा परन्तु पत्नी देवी के साथ गाठ टूटती ही रही। हम राजा से रंक और अब फिर रंक से अपने पैरों पर खडे हो गये थे। परन्तु मेरे ससुराल वाले तो आकाश में उड़ रहे थे। उनको 'पकड़ पाना हमारे बस की बात नहीं थी। एक बार की गयी मेरी पत्नी वापस न आयी या मैं उसे लेने न, गया। ऐसे लगा कि वह लखनऊ की भूल-भुलय्यों में गुम गयी है। मैंने उसे कहा था: 'ऐसे नहीं निभ पायेगी, भलीमानस ! स्पप्ट है कि मां पति की जगह नहीं संभाल सकती, सोच ले ।' उसने सोचा जितना वह सोच सकती थी। परन्तु मां उसको उम वैचारी को ज्यादा सोचने का अवसर ही न देती। तुम पर हमारा विवाह कुर्बान हो गया। मां जी, सास जी । अगर सच पूछिये तो यह वात भी जरूर थी कि मेरी पत्नी अब पहले जैसी सुन्दर नहीं रह गयी थी। और मुझे भी इधर-उधर मुंह मारने की आदत पड़ गयी थी। अपने ऊपर कुछ तो दोप लगाना ही चाहिए। आखिर उसकी भी तो बात रखनी है।
पन्द्रह साल बीत गये है मुझे पत्नी से अगल हुए। पगली कहीं को पागल पत्नी (मालो लिखने को जी करता है । हरा) मेरी सास । योथी, बैबुनियाद । कितनी जल्दी उन पर पागलपन सवार हो गया नयी अमीरी मिलने से । खाली वर्तन कितना खड़खड़ाता है, कितना खनकता है लेकिन भीतर से तो उसमें कुछ नहीं होता। इसीलिए तो कहते है कि भगवान गजे को नाखून न दे । पैसा कमा लेना आसान है, पैमा खर्चना और उससे जीना आमान नहीं। यही हमारी आज की समस्या है। नव धनाढ्य हमारी सभ्यता की सफेद चोटियों है। यही हमारे समाज की सबसे बड़ी गन्दगी । सभ्यता अगर पीडियो में ग्रहण नहीं की जाती तो कुछ दशकों से तो वह जरूर ग्रहण की जाती है और उसका हमारे आज से सोच-विचार और विचारधारा पर जरूर प्रभाव पड़ता है। वे शायद नही जानती थी कि मेरा नाम बहुत जल्दी देश में गूजेगा।' आधिर स्त्रिया थीन । परन्तु फिर मैं सोचता हूं कि अगर मेरा नाम गूंजता है तो उन्हे कया। उन्होने न तो कभी अखवार पड़नी है न ही कभी पुस्तक । उन्हें क्या कि किसी लेखक या पत्रकार की क्या कीमत होती है। शोभा भी कितनी अशुभ हो सकती है कुछ तवको मे। इन पन्द्रह वर्षों में हम तीन बार मिले। गरमा-गरमी हुई । उसकी मां ने तलाक की मांग की। मैंने नहीं दी। कुछ दिनो के बाद मैंने तलाक मांगा उसकी मा को नागवार गुजरा जमे वह नही, उसकी मां मेरी पली हो। " विकेन्द्रित 39- लड़की को वश में इस तरह कर लिया है परन्तु अव उम्र बड़ी हो रही है, शायद ढल भी रही है । अव शायद किसी स्थायी साथ की जरूरत महसूस होती है । मेरा ख्याल है जोर-जबरन मे तलाक ले ही लू । परन्तु यह मेरी निजी समस्याए है, यहा इसके उल्लेख का क्या कायदा। मैं तो अलबत्ता यह जानना चाहूंगा कि मेरा और मेरी पत्नी का कर्म से या बाहर से आपस में क्या रिश्ता है। जहां तक लिंग-भोग का सवाल है, वह या, तीन बच्चे जो पैदा हुए, इकट्ठ खाना-पीना, रहना, उठना-बैठना। परन्तु और क्या? और क्या? प्रेम ? अमर रिश्ता? यदि प्रेम था तो उसका क्या हुआ? किसके साथ था प्यार उसका? उसकी सुन्दरता के साथ, उसके भीतरी दिल के साथ. उसके लिंग के साथ, या काम-वासना के साथ । इसी समस्या ने ही मेरे हर प्रेम पर दार्शनिक परछाई डाले रखी है। और जहां दार्शनिकता है वहां कविता और रोमांस नहीं। जब यूनान जवान था उसने होमर और एसलीज पैदा किये। उम्र भर रोमाचक कविता की जगह सुकरात की दार्शनिक रगत थी, कला की जगह विज्ञान था। बलवले की जगह बुद्धि, खेलो की जगह दन्त-कथानक और दन्त कथानको के स्थान पर भौतिकवाद । सुकरात और अफलातून ने डेल्फी मे अपालो के मन्दिर पर लिखवाया-किसी लीक या परम्परा में अधिकता की मनाही है। जव यूनान बूढ़ा हुआ तब योरेपिडीज़ पैदा हुआ। तर्क ने मथिहास और प्रतीकवाद मिटा दिया। मुझ पर कयं जवानी: थी? मेरे देश की कब जवानी थी? परन्तु नही, यौवन भी आये है, भीतर खोखला भी और बुढ़ापा भी आया है। यह तो सोना हमामों वाली बातें हैं। उवलते हुए और भाप निकलते हुए पानी से नहाकर ठंडे पानी मे छलाग दे मारनी या इमसे उल्ट कर देना । यही कारण है कि हमारे मानमिक स्वास्थ्य ऐसे हैं चश्मेबद्दर । बुद्धिजीवी ने भला क्या प्रेम करना होगा! यदि उसे सुन्दरता मिलती है तो यह ज्ञान के पीछे है और अगर ज्ञान की कृपा है तो कहता है कुछ खाने-पीने और देखने को भी तमन्ना है। सुन्दरता और बुद्धि के टीके-यां टिप्पणिया रोज बदलती है। यदि हुस्न क्षणभंगुर है तो बुद्धि मे पिचन्.. दृष्टिकोण और इन दष्टिकोणों की पुष्टि करते तरीके या तकंवादी . । ५ -40 विकेन्द्रित कौन-सी कम क्षण-भंगुर है । किसमें है सुन्दरता, हुस्न । निर्माण में, बेढब्बे और बे-डील-डौल में या सुन्दर वनावट में । और क्या? समानता भी अच्छी नही लगती । प्रकृति के निर्माण में बनावट है तो इसी बनावट में एक सर्व- व्यापी एकता या एकता का अहसास । कांट ने में भी तो यही कहा था न कि समान वनावट को देखने और विश्लेषण करने का स्वाभाविक मजा आता है । अनेक दौरो में कुदरत के अन्दर इस बनावट की निपुणता किसी सूझवान निर्माता-भगवान की महानता का विश्वास दिलाती लगती है। परन्तु कही बेढंगापन भी निपुण है, जीवन है परन्तु किसके खून की कीमत पर, कहां कितनी बेहूदगी और असभ्यता है। फिर सुन्दरता कहा हुई ? दर्शक की आंख मे ? जैसे लैला-मजनू के बारे में कहा-सुना जाता था । दर्शक को किसने दी है यह नपुंसक दृष्टि ? विद्या, ज्ञान, सूझ, बुद्धि ने ? फिर कहां है यह ज्ञान-मान' चमत्कार ? कहां से आये यह प्रेम के ढग और तरीके ? बस, बढ़ते जाइये दलदल में, डूबते जाइये वाद-विवाद में और सोच के बताइये हमे सीधा-सादा देहाती सवाल, मुर्गी पहले हुई कि अंडा? उत्तर तो इसका भी दिया जा सकता है। डार्विन ने दिया था। परन्तु चिन्तक कसौटी पर कौन-सा उत्तर सही उतरा है। और फिर हुस्न की सीरत क्या है ?'सुन्दरता गुण है ? गुणों की पोटली के साथ दिमागी मण्डल 'तो गिनूं परन्तु बिस्तर में पास सुला के सहलाऊं किसे ? किसी जानवर को? कुत्तों को भी स्त्रियां सहलाती हैं और रबड़ स्त्रियों को प्यार करते हुए पुरुष कुछ सनकी जरूर हैं । और मैं कोई सनकी थोड़े ही हूं? और अगर मुझे पूछे तो यह प्यार और इश्क का रोना सब झूठ है। शून्यवादी तकंवाद। क्या प्यार, क्या इश्क ! आज इन शब्दों का कोई भाव, कोई मूल्य नहीं रहा। हमारी भापा और हमारे शब्दों का आधार बदल गया है। ये शब्द बने हैं, सदियो और हजारों साल पहले । आज न वह माहील, न वह आदमी। आज हम सभ्य, ज्ञानवादी, विज्ञानवादी और वैज्ञानिक तथा तकशास्त्री हैं । वर्नार्ड शा ने अंग्रेजी भाषा को किया। शब्दों को जोड़ने में परिवर्तन, उच्चारण और घ्याकरण को सही करने के आमन्त्रित किया। वह भी तंग आ गया। हम उस मीढ़ी की . 1 विकेन्द्रित .41 पर है कि सहज ही में एक नयी भाषा गढ़ सकते है और यह आवश्यक भी है। बस ! कोई 3-4 हजार शब्द हौं। भाषा की उन्नति अब अनिवार्य रूप से कुछ चीजों को समेटने और कुछ को उभारने में है । यहां इतना खुला भण्डार है, विमान और अतरिक्ष यान के साथ ही हमारी समानता है । अब वहां कठिन या गूढ भाषा की कौन-सी जरूरत रह गयी है। आधे मे बढकर फसाद की जड़ यह शब्द है, इनका पारम्परिक रूप और वर्तमान युग मे इस रूप और इनके पारम्परिक भावो को संयुक्त करने की अड़चन । कहते है हम कुछ और हैं मतलब हमारा कुछ और होता है । क्या का क्या कह जाते है और इसका प्रतिफल या परिणाम, कर भी क्या का क्या जाते है । आखिर शब्द और अर्थ, कारण और कार्य की तरह ही 'तो सम्बन्धित हैं। मैं क्या प्यार करता हूं पत्नी को, असली प्यार तो मेरे एक मित्र को * है अपनी पत्नी से। नीम पागल है। महीना भर ठीक रहती है और फिर हफ्ते-डेढ-हफ्ते के लिए दौरा पड़ जाता है । अनाप-शनाप बोलती है, उठा- पटक करती है, बर्तन तोड़ती है, कपड़े फाड़ती और बच्चों को पीटती है । सीस साल हो गये है शादी हुए परन्तु रोता-धोता मेरा मित्र उसको गले 'लगाये फिरताहै। उसको हमेशा तारीफ ही करता है । उसकी तस्वीर अपने पास रखे रहता है । तीन लड़के और चार लड़कियां हैं । उनमें पांच भौंडे । • कोई सीधा चल नही सकता तो कोई सीधा देख नही सकता। एक बहरा है 'तो दूसरे के लिए बैठना भी मुश्किल है । परन्तु मेरा यह साथी, कुर्वानी का • देवता, पत्नी और परिवार के प्यार में डूबा घर का और बाहर का काम करते अधाता नहीं। किसी समय भी यह जंजाल गले से उतार सकता है, परन्तु नहीं, कदाचित नहीं। परन्तु यह प्यार है कि मानसिक रोग? मैं क्या जानूं अगर वह स्वयं 'ही अपनी पत्नी के पागलपन का वास्तविक कारण नहीं ? अच्छा और नेक कहलवाने को हविश कौन-सा जुल्म नहीं करवा सकती इन्सान से । पैच के भीतर पेंच हैं भाई। हकी ही रहे तो ठीक है । और फिर उस चपटी नाक और मुह से बू आने वाले, टेढ़े-मेढ़े नक्शों वाले मेरे मित्र को और कौन-सी मिलने लगी है । नीम पागल है तो क्या हुआ, स्त्री तो है ना?
42 विकेन्द्रित प्यार था श्रवण पुत्र का मां के साथ-बहंगी पर उठाकर दर-दर गांव- गांव फिरा। प्यार था सीता और राम का। था क्या? लोगों के बहकावे और बातो में आकर अग्नि-परीक्षा के लिए मान गया । प्रजा प्यारी कि सीता? यह प्यार की परीक्षा है कि फर्ज की, कि शासन की? आजकल छह महीने के लिए गया लास-बैगास या लोंजेजलस मे प्यार में अन्धा होकर भागता फिरूं हालीवुड में ? जी हां, इश्क ठीक, अगर कुछ मिल न सके । एक गांव, एक शहर में कितने को मिल सकती हैं ? कोई लेने देता है क्या? परन्तु इस जमाने में कमी भी क्या है ? जहा जाइये, हुस्न की नुमाइश है, आखें चौंधिया जाती हैं। मन को आनन्द आता है, अंग निढाल हो जाते है। और पूछिये बताइये ! परन्तु क्या पूछना और क्या बताना । इश्क, असली इश्क तो रबी इश्क है। प्रथम काल में आंखें मिलते ही सब कुछ हो जाता है । रूप है ना । न समस्या सुन्दरता की, न ही वीमारी, न कोई अनहोनी न कोई निशान, न मुंह, न बातचीत, न गाले, न ओठ, न ओठी के बीच का रस, न कोई और रस ! एक वार का इश्क कैसे बदल सकेगा। फिर उसके साथ जो मरजी है -वाद-विवाद करो। जवाब नदारद । यह सुन्दरता भी है और बुद्धिमानी भी। जितनी मरजी है गूढ ज्ञान की बातें उसके सिर मे भरते जाओ। सवाल पाइये भी तो उत्तर भी दे दीजिये। इनका परमेश्वर भी सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक आदि के साथ किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं। यह गुण उसके अस्तित्व या अस्तित्वहीन होने का नहीं बल्कि वास्तव मे यह है कि एक इश्क है, एक इबादत जिसमें मायूद की शकसियत अर्थहीन है। मिजाजी प्यार में मानसिक और शारीरिक तन्दोलियां और खामिया प्यार की हकीकत को स्वाग बना देती हैं। 1 अपनी पत्नी के प्यार की दास्तां को यहां यत्म करता हूं। लेकिन यह कहानी कहां खत्म होती है ? जब तक सांस तब तक आस । इस जिन्दगी के माय कुछ न कुछ घटता ही रहता है। मूले से झूले पर ही छलांगें
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लगायी जाती हैं और एक गड्ढे से दूसरे गड्ढे मे ही फेंका जाता है, या
फेंक दिया गया हूं।
और मदरासन के साथ इश्क पता नहीं झूले की उड़ान थी कि दलदल
से भरा गड्ढा परन्तु वास्तविकता यह कि जल्दी ही यार डुबकियां ले रहे
थे।
सात । अपने नौकर को उसे, उसकी लड़की और उसके बुर्जुआ पति को गले से उतार फेंकने में सफल हुए । मुझे कुछ ही महीने हुए थे कि एक दुर्घटना ने मुझे उनके नजदीक आने के लिए मजबूर कर दिया । न सोचा और न ही उम्मीद थी कि ऐसा फिसलूगा कि जानते-बूझते हुए भी संभल न पाऊगा। अपनी तरफ से मैंने बड़ी होशियारी वरती फुटबाल के साथ अधिक मेल-मिलाप बढ़ाने से रोकता रहा। उसके तमिल के पाठ खत्म करा दिए । एक बार उसके साथ मुझे गरम भी होना पड़ा था। रेफ्रीजरेटर तो हुआ, पड़ोसियो के साथ रसोई की साझेदारी की भी हद हो चुकी थी। छोटी लड़की को मेरा नौकर तरह-तरह के स्वादिष्ट खाने पकाकर चोरी-चोरी खिलाता । मुझे इससे भी डर था कि कहीं छोटी लड़की के साथ वह कुछ कर न बैठे। यद्यपि इस तरह की बात अनहोनी-सी लगती है, परंतु है नहीं। मुझे याद है कि मेरी बहन के नौकर ने पड़ोसी की बस इतने ही सालो की लड़की को पकड़ लिया था। मैं अपने आपको भी अलग रखकर पड़ोसियों की तरफ कम देखता,नतो लडकी को अधिक पुचकारता और न ही उसके पति को। अगर उसके पति के साथ दुआ-सलाम हो जाती तो वह भी सरसरी-सी औपचारिकता के नाते । उसे शायद पता चल गया था कि मुझे उसमे कोई दिलचस्पी नहीं। उसकी तरफ भी कभी ऊची नगर से न देखा । क्या अपनी दृष्टि या नजर जलानी थी मुझे ? अभी तीन-चारवार ही मिले थे। वातचीत भी हुई थी। उन्होंने मुझे खाने पर भी बुलाया था। परंतु मैंने उसकी तरफ कोई खास विकेन्द्रित 45. ध्यान नहीं दिया था। उसने कभी कहा था- एक बात पूछ् ? तुमने मेरी बेरुखी से क्या अंदाजा लगाया था ?. क्या तुम्हे पता था कि हमारे आने से और उसके बाद अगली तीन-चार रातों, तीन-चार दिनों तक मैं तुममें ही जीता, सोता, जागता रहा था और यह कि तुम्हारी वजह से मै कितना हैरान और परेशान भी हुआ? क्या तुम्हे मालूम था कि मैं तुम्हारी मूरत देखकर तुमसे और तुम्हारे परिवार मे दूर चला गया था? मेरे ख्याल मे तो नहीं । तुम्हें इस बात का कभी गुमान भी नहीं हो सकता था। और खासकर वह औरत जो अपने आपको सुंदर नही समझती । यही तो उसकी कमजोरी है । सुदर तो अधिक सुदर बने और लिपस्टिक लगा तथा अन्य शृंगार कर सज-धज बैठती हैं। फिर भी तुम्हारे मेरे बारे में क्या ख्यालात थे ? मेरा डील-डौल तुम्हें अच्छा लगता था? मेरी कस कर बंधी हुई पगडी ? मेरा मदरासियों के बारे में परिचित होना, तुम्हारे सारे प्रांत का मैने मीटर-मीटर देखा है। तुम भी कॉलेज के दिनों में गाइड होती थी और यात्रा करने की काफी शौकीन । पक्षीपुरम में भाने वाले तीन वाजो पर हमारी तकरार हुई थी। कहते हैं वह तीन बाज रोज पुरी, कैलाश और ? और रामेश्वरम से उड़ कर वहां आते है, पंडित से भोजन करते है । इनकी मुक्ति अभी होनी है। मैं कहता था कि यह क्या बकवास । और तुमने कहा था कि मेरे जैसे प्रसिद्ध लेखक को ऐसे अशुद्ध शब्द कहते अच्छे नही लगते । मैं हंसा और बहस जारी रही । और तकरार मेरी पुरानी और अमर आदत है। तुम इतनी निश्चल और मासूम हो? दकियानूसी और रुढियों तथा परंपराओं के साथ तुम्हारा इतना गहरा प्यार (?) है, तुम यह भी नहीं देखती कि कोई झूठ-मूठ तुम्हे सब्जयांग दिखाकर सीधे रास्ते ले जा रहा तुम मुझे पसंद करती थी। मैं ठीक से नहीं रह सकता। लेकिन यह मुझे यकीन है कि मैं तुम्हे याद जरूर आता था। मेरी लंबी उमर के बाव- जूद मेरी चुस्ती, मेरी शोभा, मेरी लेखनी, मेरा सर्वव्यापी शान और मेरा तुम्हारे प्रांत को अच्छी तरह जानना। तुम इतनो प्रोत भक्त हो कि 46 विकेन्द्रित नहीं जा सकता । जब मैं महाबलिपुरम् और कांजीवरम् के ऐतिहासिक पन्नों को पलट रहा था तो तुम टकटकी लगाये मेरे चेहरे की तरफ देखे जा रही थी। यह छोटी-छोटी घटनाए तो मुझे अभी तर्क याद आ रही है । जब मैं तुममे खो चुका था, तब यह मेरा मनोरंजन हुआ करता था क्योकि मैंने तुम्हे कभी किसी गभीरता का अधिकारी पात्र नही समझा । यह आठ-नौ महीने मैं तुमसे बिलकुल वेलाग था। कभी-कभी अच्छे पड़ोसी होने के धर्म से भी चूक जाता था। ऐसे साधारण ताल्लुकात थे जब तुमने एक सुबह मुझे बुलाया । तुम्हारा नौकर भागता हुआ आया था कि लड़की बेहोश हो गयी है और तुम घबरा रही हो। अच्छा था मैं तैयार था, नहीं तो 11 बजे तक मैं रात के पायजामे में ही बैठा रहता था। मैं आया । तुमने कांजीवरम् की काले पल्लू वाली बसंती साडी पहन रखी थी और तुम्हारे मुह पर चिंता की लीकीरें थी । शुक्र है तुम्हारे चेहरे पर कोई संवेदनशील भाव उत्पन्न हुए। आमतौर पर तो तुम्हारे मुह और तुम्हारे भावों के बीच जैसे फौलाद का तख्ता जड़ा हो। मैं हैरान हुआ करता था कि तुम्हारी शारीरिक और मानसिक बनावट अन्य स्त्रियों से अलग कैसे है । परंतु उस दिन मुझे पता चला कि नहीं, तुम हो तो इंसान हो । यद्यपि केवल दुर्घटनाओ के समय ही साधारणता की ऊंची पदवी तक पहुंचती हो। शुक्र है, मैंने तुम्हें चिंतातुर देखा परंतु अफसोस तुम्हारी लड़की की हालत बुरी थी । वह वरामदे में लकड़ी के चौरस ढाचे के साथ घर बना रही थी। दो मंजिले मकान को सफल बनावट पर वह तुम्हे खुशखबरी सुनाने के लिए दौडी कि सोने वाले कमरे के खुले दरवाजे के साथ उसका सिर जोर से लगा, वह गिर पड़ी और दिमाग के पास खून निकलने लगा। बाल भी भीग गये और कुरता भी। परतु इससे भी बुरा कि वह बेहोश हो गयी । वह बेचारी यहां की वहा लेटी थी। तुम ठगी की ठगी खड़ी थी, न तुमने उसे . न ही उमके मुह में पानी डाला । मैं जब आया तो तुमने - - विकेन्द्रित 47 मेरी तरफ देखा । देखा क्या, जैसे तू मुझे भगवान समझकर दंडवत करती हुई पूरी की पूरी लेट गयी, जैसे दक्षिण में कई लोग करते हैं । तुम्हारे हाय जुड़े थे और तुम नाक रगड़ रही थी। उठ भई, इतनी मसकीनगी भी क्या है । पाच तत्त्व के ससारी विहारी आदमी के सामने ऐसी वंदना क्यों । भीतर से मैं इतना काला हूं कि मुझे अगर कोई हाथ जोड़कर प्रणाम या नमस्कार भी करे तो भी मैं शर्म से पानी-पानी हो जाता हूं। परंतु शायद तुम्हारी यह दंडवत कुछ अनोखी थी। तुम्हारे पति ने मुझे बाद में बताया कि तुम्हारे जीवन में बिल्कुल ऐसी ही एक घटना पहले भी हो चुकी थी। तुम्हारी छोटी बहन लकडी के चौरस टुकड़ों के घर बनाती हुई इसी प्रकार अपनी मां को खुशखबरी देने के लिए दौड़ी थी कि दहलीज में ठोकर खाकर गिर पड़ी। ऐसे ही उसे भी चोट आयी, ऐसे ही यह भी बेहोश हुई परंतु अफसोस कि ऐसी वेहोशी हुई जो उसे फिर होश मेन ला सकी । उस दुर्घटना की याद करना आज स्वाभाविक ही था। चंचल और चुस्त थी तुम्हारी लड़की और चंचल तथा चुस्त को जख्म सहन करने की शक्ति कम होती है। मैंने उसे उठाया, मोटर में पिछले सीट पर लिटाया, पैरो में फुटबाल को और तुम्हें अपने पास दायी तरफ विठा कर (मेरी मोटर यूरोपीय मॉडल की थी) अपने प्रसिद्ध डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने टीका लगाया, लड़की ने आंखें खोली, पट्टी बांधी गयी और वह उठ खड़ी हुई। ऐसे लगा जैसे वह बेहोशी का बहाना ही कर रही थी। मैंने तुम्हारी तरफ देखा और मुस्करा दिया। मैंने ऊंची आवाज में कहा : 'लगता है इसने नाटक किया है । हमें मिले काफी दिन हो गए थे।' तुम फिर भी न मुस्करायीं और अपनी लड़की की तरफ देखती रहीं। मेरी इच्छा हुई कि मैं तुम्हें कंधो से पकड़कर झकझोरूं। मैंने एक और कोशिश की तुम्हें हेमाने की । लड़की को कहा : 'अब तो तुम ठीक-ठाक हो, पैदल चलोगी कि मोटर में?' तुम फिर भी चुप थीं। लेकिन मैं भी कब बाज आने वाला था। अगर एक स्त्री को हंसा न सका तो बेमतलब ही समझो यह जिंदगी । न ही 48 विकेन्द्रित . डर और संकोच है किसी स्त्री को हाथ लगाने में । मन वेशक मैला हो लेकिन दिखावा ऐसा साफ और पाक होने का दावा करता हूं और तब- तक, जब तक तुमसे संबंध है, यह पाक ही था । मैंने एक हाथ से तुम्हारे कधे को पकड़कर झकझोरा : 'मह ठीक है अब चिंता छोड़ो मुस्कराओ।' और तुम मुस्करा पड़ी। उस गाम मैं तुम्हारे घर गया । तुम सभी बाहर बैठे थे । तुम लोगों को यहां आए लगभग साल हो चुका था। और एक बार फिर बदलती ऋतु के चिह्न फिजा में थे। तुम्हारा पति भी तुम्हारी ही तरह मेरे चरणो' 'धन्यवाद, अति धन्यवाद ! अगर आप न होते तो पता नहीं क्या हो जाता । इस लड़की के बारे मे यह हमेशा ही चिंतित रहती है (उसने मुझे . तुम्हारी बहन की मौत के बारे में पूरी बात बतायी)। हमारा सौभाग्य कि आप जैसा पड़ोसी मिला है। आप शाम को हमारे यहां आ जाया कीजिए । अकेला घवरा नहीं जाते क्या?' परतु तुम्हारा व्यवहार विचित्र था। तुम फिर पहले की तरह घुटी- घुटी-सी थी। किसी और देश, किसी और गृह मे विचर रही थी। फिर झकझो तुम्हे ? बाद मे तुम्हारे मुंह से साधारण 'शुक्रिया भी निकला। लड़की सदा की तरह उछल-कूद रही थी। और फिर खुद ही कहने मे गिर पड़ा-- लगी: 'म तो नाटक कर रही थी। साधारण जिंदगी से उक्ता जाती है। स्कूल भी तो बंद है । क्यू अंकल, अभिनेत्री बनने के योग्य हूं कि नहीं ?' 'तुम अभिनेत्री बनो कि नहीं परंतु मुझे तो अभिनेता बना ही दिया। और कैसे दुखात का अभिनेता (दुखांत की दुस-सुखात का?) । अभिनेता का दूसरा नाम वंदर है । हाँ, एक प्रकार का बदर ही बना दिया तुमने ।' क्योकि उस रात सोते समय तेरी मां के लिए मेरे दिल की कोई एक रग खिव गयी।
आठ . मेरे दिल की एक रग खींची गई। किसी के साथ दिल लगाने का तथ्य दगाने का क्या यही सबसे बढ़िया साधन और यही बढ़िया शब्द है ? और कैमे कहे और कैसे कोई बताये यहां आकर तो भाषा भी संगड़ा . जाती है और शायद सदा ही लंगड़ाती रहेगी। यदि अभी तक यह लंगडाती रही या अधूरी रही है तो बाद में कब पूर्ण होने का अवसर मिलेगा। रोमांचक काल वीत गए । इस परमाणु युग में कोई क्यों दिल लगाने का असली समय नापे, वर्णन करने के लिए सही शब्दों की पड़ताल करे, इत्यादि । दिल लगाया, या जो कुछ भी कहिये या समा लीजिये लग गया, दो व्यक्ति मिले, शारीरिक मजबूरी खत्म हुई या विवाह हुआ। और भी जो कुछ समझिए हुआ, अब तो यह सब यात्रिक तत्व है । अरमानों और सवेदनों की पूछ-पड़ताल थोड़े ही है। परन्तु भगवान जाने कि मुझे कैसी-कैसी आदतें है । जय युथफ था तो इस विषय के बारे में सदा जानने को आतुर रहता था। अब यूढा हो रहा हूँ तो भी सही उत्तर की उत्सुकता है । बस, अगर मारण पहले रोमानका ये तो अब यांत्रिक यां वैज्ञानिक या मनोवैज्ञानिक है, कभी किसी के साथ आंखें चार होते ही अरमान थिरकते हैं, अपने व्यक्तित्व का एक भाग उप कर अगले प्राणी मे जा समाता है। कभी महीनों बेलगाम रहने के पार एकाएक आदमी जा फंसता है। टूटे दिल में भी यही बात होती है । कभी लम्बा समय बीत जाने के बाद, कभी पतक झपकते ही। मुझे याद है. एक प्रेमिका । लगभग तीस साल हम एक-दूसरे के प्रति . जैसे एक-दूसरे पर जान देते रहे हों। विवाह के बारे में भी सोपा -50 विकेन्द्रित जानते है वह टूटा कैसे ? एकदम ! चुटकी मारने समान । उसे जुखाम हुआ। जिमखाना क्लव मे बैठे हुए उसे ऐसी खांमी आई कि खू-खू करते उसके नथुने से एक बड़ी गन्दी-सी चीज उसकी हथेली पर आ गई। उधर वह चीज गिरनी थी और उसके बाद मेरा प्यार बरखास्त । आप नहीं जानते कि कितनी मुश्किल के साथ मैंने उस शाम उसे उसके घर तक पहुंचाया। मिचली आती थी उसके पास से । बाद मे उसे हाथ लगाना या उसे सूघने या चूमने का प्रश्न ही पैदा नहीं हुआ। बाद में उसने लाखों फोन किये, लाखों बार मिलना चाहा परन्तु मैं तो जैसे उसका शहर ही छोड गया था, देश ही छोड गया था। किस स्थान, किस पदवी का पात्र है ईमान ? मैं ही नहीं, जिसको भी देखिए ऐमा ही कमीना निकलेगा। शायद यह कमीनापन एक मजबूरी है । मेरा किसी के साथ या किसी का या इंसानियत का इसमें कोई दोष नहीं । परन्तु छोडिए भाई साहब | वेमतलब की थोयी बातें अपना उपन्यास आगे बढ़ाएँ और हमें बताइये वाद में क्या हुआ । न कहानी, न कहानी का रस और वैठ गये उपन्यास लिखने । आगे क्या होना था ? मन में एक तकरार शुरू हो गई। किमकी और किसके बीच में थी यह तकरार, कौन जाने ? बुद्धि को पटक-पटक कर फेंक रहा था तन मे उठता हुआ उभार मदरासन के लिए । चारपाई पर लेटूं तो वह सामने, उसके विचार सामने । उसी रात मुझे सपना भी आया, अस्पष्ट और धुंधला-सा। मैं उसे तोड़-मरोड़ कर झटक-मटक कर फेंक परन्तु वह, उसका विचार, उसका आकार, बार- बार मुझे, मेरे भावों, मेरे मन को झकझोरे जा रहा था। बड़ी कठिन होती है यह अवस्था। आदमी का आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। जरजर हुआ आदमी मूछित होकर जमीन पर गिर पड़ता है। कमाल है मई, हमारा अपना मन, दिल, बुद्धि परन्तु हम स्वय ही वैबस हैं इसके आगे। दीवारें पडी होने से पहले ही टेढ़ी हो जाती हैं। मड़ें बांधने के पहले ही भीतर और बाहर सैलाब लग जाता है। उस रात के बाद मैं अकेले सोने में घबराने लगा। विवाह का शायद विकेन्द्रित 51 सबसे बड़ा लाभ यही है। सोते समय कोई तुम्हारे पास होता है, मन भटकता नहीं। अगले दिन मैंने अपनी उस समय की प्रेमिका को तार दी। वह पत्रकार थी और उस समय विश्व उद्योग मण्डल की बैठक की कार्यवाही के लिए कानपुर गयी हुई थी। बड़ी प्यारी थी मेरी प्रेमिका। गतिशील और बुद्धिमान भी । उम्र 26-27, साल और वेमिसाल सुन्दरता की मलिका थी । विभाजन से पहले वह रावलपिंडी में पैदा हुई थी और आयु के पहले 3-4 साल वहां हो 'बिताये। पिता कट्टर मिख था और वीर सेवक जत्थे का जत्थेदार । जब मार-काट शुरू हुई तो किसने छोडना था वीर सेवक जत्थे के नेता को । उसे परिवार समेत कत्ल कर दिया गया। वह चार साल की बच्ची बच निकली। कैसे ? इसका उत्तर कोई क्या दे। न वह जानती है न ही कोई और । मेरी अक्ल तो यह कहती है कि जब हत्यारे आये, परिवार के सदस्य ऊपर छत पर सोये होगे। हडवड़ाहट में तो सारे परिवार के सभी सदस्य नीचे उतर आये होगे परन्तु इसे गहरी नीद आई होगी कि यह वहीं सोती रही। या शायद जब अचानक आख खुली होगी तो दो कदम 'चलके उसने आंगन से झांका होगा तो नोचे खून का दरिया बहता देखा होगा जिससे उसका मासूम दिल दहल गया होगा। जो भी हो सारे घर के लोग मर गए और यह बच्चे । अगले दिन यह गली में मां-बाप को आवाज मारती फिरती थी कि किसी जान-पहचान वाले ने इसे पहचान 'लिया। उनके साथ ही वह भारत आ गई। कुछ एक साल एक चाचा ने और चंद साल किसी मौसी ने इसे रखा। परन्तु जब होश सम्भाली तब कौन सम्भाले । ठोकरें खाती अन्त में यह दिल्ली आ पहुंची। यहां नौकरी करने वाली लड़कियों के होस्टल में मुश्किल से जगह मिली और जो भी काम मिलता, कर लेती। कभी स्कूल की अध्यापिका बनी तो कभी क्ली की, कभी टाइप की तो कभी दुभापिया बनी। अब पत्रकार है, पैसे के लिहाज से सुखी है परन्तु मानसिक दिक्कत कभी-कभी परेशान करती है।
52 विकेन्द्रित दो साल बीत गये हैं हमें मिले हुए। विज्ञान भवन में फिल्म स्टारों को पुरस्कार दिये जा रहे थे। कुदरती हम दोनों के बैठने का स्थान साय- साथ था। वह मुझे पहले से ही नाम से जानती थी और 'शक्ल से पहचानती थी। हम लोग वेझिझक होकर मिले। 15 मिनट भीतर जमीन-आसमान मिला दिये, पूर्व-पश्चिम एक कर दिये। ब्रह्माण्ड का आरम्भ और अन्त का लेखा-जोपा किया। जहन्नुम भी हो आए और स्वर्ग भी। 15 मिनट पहले समारोह शुरू होने में हमने खूब गप-शप की और बाद मे बिजली के चले जाने में हम खुलकर मिले । लेखक और पत्रकार में स्वाभाविक आकर्षण है, लिहाजा हम लोगो ने एक-दूसरे को अपने-अपने टेलीफोन नम्बर दिये और लिये। इस प्रकार हमारा मेल-मिलाप शुरू हो गया, मित्रता की नीव तो पड़ ही चुकी थी, अब पौधा भी फूट चला और हम प्रेमी की कोटि में आ गए। हम लोगों ने एक साथ रहने के एक-दूसरे को वचन भी दिये लेकिन साथ ही एक-दूसरे को मजबूरियों को भी समझते थे और अहसास करते थे। एक-दूसरे के व्यक्तित्व मे लीन होते हुए भी बौद्धिक तौर पर हम दूर रहे। वह हफ्ते में एक बार और कभी-कभी दो बार मेरे घर रह जाती है । रहने को तो अधिक भी रह जाए परन्तु फिर डिफेंस कालोनी सदाचार की श्रेप्टता से इतनी पिरी हुई थोड़े ही है कि मुझ पर कोई उंगली न उठाये । सफेदपोशी की हविश न उड़ने देती है और न ही गिरने देती है। सभी तरह के आयामो से सफेदपोशी का आयाम सबसे अधिक मलीन है। जिस रात पड़ोसन ने मेरी आत्मा की किसी रग की पिरकन को तो मैं कांप गया। यह क्या हो रहा था? उस रात मैंने बहुत अकेला अपने आप को महसूस किया । सालों-साल बीत गये थे मुझे पत्नी से अलग हुए। या पत्नी को छोड़े। अथवा सास ने हमे एक-दूसरे से छुडवाया। उसके बाद मैंने हजारों रातें अकेले बिताई थी परन्तु कभी भी पहले जैसा डरा नही था। मेरा जी किया, हो न हो पत्नी को बुलवा लूं, कैसे न कसे । खुद लखनऊ चला जाऊं, कुछ करूं। परन्तु पत्नी से बढ़कर कही अधिक उस समय मेरी प्रेरणा का स्रोत विकेन्द्रित 53 4 - । पत्रकार प्रेमिका मेरे निकट थी। मैंने उसे तार दी और टेलीफोन पर भी संदेश छोड़ा। और तुम मित्र-ममारोह बीच में छोड़ कर ही आ गई। मुझे मालूम है यह काम आसान नहीं था। अखवार वालों के साथ तेरा समझोता है, पैसे का भी और अंतःकरण का भी मवाल था । परन्तु सभी समझौतों को और आपत्तियों को ताक पर रखकर तुम दौड़ी आयौं, आखिर इस तरह मेरे सारे भविष्य का प्रश्न था । यहां प्रश्न यह पैदा होता है कि मैं मैं हूँ कि मैं कुछ भी नहीं। एक शून्य भी नहीं-मैं, अपने आप को बुद्धिमान समझने वाला, बुद्धिजीवी प्रचारित करने वाला। मैं जिसका अपने मन के साथ आज तक इतना सहयोग रहा है, मैं उस मन को जीत नही सका। जैसे शास्त्रों का आदेश है। मुझे इसकी आवश्यकता भी अनुभव नही हुई । परन्तु मन ने भी मुझे नहीं जीता । हम दोनों मित्रों या साथियों की तरह रहे । परन्तु आज मेरी राह का मेहराब मेरे सामने था। आज मेरा मन विचलित होकर मुझे दवाने, मुझे जीतने के लिए उठ खडा हुआ। क्या गुस्ताखी हुई थी मुझसे, ‘मेरे मन जी। इतने सालों की मित्रता क्यों तोड़ रहे हो । क्यों मजबूर करते हो मुझे, क्यों नीचा दिखाते हो मुझे, कुछ बताओ भी ना? अच्छा अगर लडाई है तो लडाई ही सही। मैं भी चूड़ियां पहन के 'नही वैठा हूं। अवश्य जीत मेरी होगी। मेरे पास भी सेना है, बम है और अगर जंगी नाव की बदौलत लड़ाई बढी तो मैं परमाणु हथियारों का भी इस्तेमाल करूगा। हा, लड़ाई में सभी पैतरे जायज होते है। तुम जो भी चाहती हो कर लो और मैं भी जो कुछ हो सका, कर लूगा। सबसे पहले मुझे किसी सहायक की जरूरत है । और मेरी सहायक आ गई। शाम का समय था, जब वह पहुंची । अपना संतुलन कायम रखते हुए मैंने मुस्कराकर उसका स्वागत किया । वह हैरान : 'यह मुस्कान दिखाने के लिए आपने मुझे इतनी दूर से बुलाया है ?' 'हां, प्रिये ! और तुम्हारी मुस्कान चखने, चूसने के लिए। हमने एक-दूसरे को गले लगाया और चूमा । कितनी मिठास थी उसके चुम्बन मे । उसके ओठों का रस जीवन प्रदान करता था। आलिंगन 54 विकेन्द्रित करते हुए उसने पूछा : 'बताओ तो सही, मैंने समझा कोई दुर्घटना हो गई होगी। चारपाई पर लेटे हुए सिसक रहे होगे या कोई और संकट आ गया होगा।' 'सकट तो है ही प्रिये ! परन्तु चारपाई पर लेटे यह जीता नही जा सकता। इसके लिए तो मानसिक तौर पर तैयार होना होगा। अब तुम आ गई हो । मुझे धीरज रहेगा।' 'नाटक पेलने का स्वांग रच रहे हैं क्या? या लेखक से अभिनेता बनने का विचार है?' 'धीरे-धीरे बताऊगा पहले मेरे गले लगो, ओंठों पर मुंह धरो, मुझे चूमने दो, और जब मैं थक जाऊं तो तुम मुझे चूमती जाओ, जब तक मैं तुम्हें न रोकू ।' मेरी बांहो में समाने वाली मेरी चन्द्रमुखी, मेरी जान, मेरी आत्मा। और उसने मुझे अपने आप में समा लिया।
नौ हम दोनों विस्तर में लेटे हुए थे-नंगे। मेरी दायीं वाह उसके कान" के आस-पास थी और वह सीने के बालों से खेल रही थी। 'तुम्हारी सुडौल छाती और गोरे रंग पर कुछ भूरे और सफेद हो रहे बालों का यह संगम मुझे बडा प्यारा लगता है।' जरूर लगता होगा क्योकि मेरे गालों और ओंठों के सम्मुख वह अपनी गाले सदा मेरी छाती के बालों के साथ सहलाना चाहती। मैंने अपनी छाती की तरफ देखा । हा, बाल रंग-बिरंगे थे। अच्छे लगते थे । शुक्र भगवान का मेरे सीने के बालो के गुच्छे के गुच्छे नहीं थे । एस्किमों को देखकर बेशक ग्लानि न हो परन्तु यदि मै खुद एस्किमोनुमा बालदार होता तो कभी कोई काम सिर पर न चढ़ सकता । सीने के बीच में एक मोटा उभरा-सा तिल है। छोटी उम्र मे, सुना था कि यह सौभाग्य का चिह्न है । जीवन में कभी किसी चीज की कमी नहीं आएगी। हां, किसी चीज की कमी भाई भी नहीं । खुशी भी देखी और गम का पहलू भी देखा। उसे मेरी छाती के रंग-बिरंगे बाल प्यारे लगते हैं और मुझे उसकी छातियों के नीचे और नाभि से जरा ऊपर दो अदद गेरुए बाल बड़े दिलचस्प लगते थे। इनका वहां पर उगना परमात्मा का कोई करिश्मा लगता था। रेत के नीचे या मूखी पहाड़ी पर अकेले-दुकेले पेड़ों का होना ठोक तुलना नहीं क्योकि यहां तो बहार में अनोखी बहार खिली है उसकी नाभि और छातियो के बीच यह दो भूरे बाल अनेक और का 56 विकेन्द्रित मे मुझे भगवान की विद्वता का कायल करते हैं । मैंने उसके इन दो यालों को धीरे से गीचते हुए कहा : 'और मुझे तुम्हारे ये दो बाल उकसाते हैं।' 'शुक्र है कि आपने सही शब्द का इस्तेमाल किया है । 'उकमाते' कहा है, प्यार नहीं कहा।' 'सही शब्द इस्तेमाल करने की तो मैं सदा कोशिश करता हूं। परन्तु तुम क्या समझी हो?' 'मेरे प्यार और तुम्हारी उकसाहट में वेपनाह भिन्नता है।' 'क्या?' 'मेरा प्रेम संवेदनशील है और तुम्हारी उकसाहट बुद्धिमान । अजीब है मेरी चन्द्र, कि स्त्री की सुन्दरता भी आपको आकर्षित नहीं करती। नीचे गहराई में आपकी विद्वता और बुद्धि सदा कोई न कोई विश्लेषण करती रहती है, ताकिक उधेड़बुन ।' मैं मुस्कराया। 'और तुम्हारे इन दो बालो में जो अलौकिक सुन्दरता है ! आखिर यह दो बाल ही तो है, शरीर के अन्य वालो की तरह, या पशुओ के बालो की भाति ।' 'शर्म नही आती क्या आपको ? सुन्दर लड़की को साथ लिटाकर ऐसे घृणित तुलना के शब्द ढूढते हो। छी-छी, लगता है मैंने गलती ही की आकर।' मैंने अपने पैर के अंगूठे के साथ वाली उंगली के साथ उसकी पिंडली पर चिकोटी काटी। 'परन्तु बात इन दो बालों की हो रही थी सिर्फ । अगर तुम्हारे शरीर के किसी अन्य अंग की बात हो तो देखो किस श्लाघा में कहानी रचता हूं। अच्छा शुरू करूं फिर ? तेरी इन छातियो, तेरे धडे-जाघे, तेरी ठोड़ी, तेरी नाक.. वह शर्मा गई कपड़े पहन के तो आदमी या औरत शर्माये, वस्त्रहीन भला क्यू शर्माये ? और मेरी छाती पर गालें रखकर कहने लगी : 'बक-बक वन्द, अच्छा मुझे बताओ, मुझे क्यो बुलाया है ?' - .
विकेन्द्रित 57 - क्षण-क्षण बाद वह सच्चाई जानना चाहती थी और में उसे झूठ बोल कर बहलाना चाहता था। कभी कहता सिर्फ तुम्हें मिलने की इच्छा हुई, कभी कहता मेरे विदेश जाने का कार्यक्रम बन रहा था तो तुम्हारे साथ सलाह करना चाहता था। परन्तु प्रेम करती हुई स्त्री को आप बुद्धू नहीं बना सकते-कम-से-कम उसे बुद्ध बनाना आसान नहीं । इस बार मैंने कहा- 'अगर सच हो जानना चाहती हो तो सुनो, मैंने एक सपना देखा था कि तुम इस अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में किसी विदेशी अखबार के विदेशी सम्पादक के पल्ले पड़ गयी हो और मैं घबरा गया था। सो मैंने तुम्हें वुला लिया।', बहुत पक्का-सा मुह करके मैंने यह शब्द कहे । उसने पूछा- .'सच?' ""हां, सच ।' वह मुझसे लिपट गई- "नहीं, आप झूठ बोलते हैं। 'नही, तेरे इन दो बालों की कसम ।' “इन दो बालों की कसम पर मुझे एतबार नहीं । दिमाग वाली नहीं, किसी दिल वाली चीज की कसम खाइये।' और मेरे मुह से अचानक निकल गया--- '. 'यही तो अड़चन है। जिसके लिए...' जैसे ही अपनी भूल का अहसास हुआ मैं चुप कर गया। 'कहा था न, आप झूठ बोल रहे हैं।' 'अच्छा, ठहरो एक मिनट, गर्मी हो रही है। एयरकंडीशनर का स्विच लगाएं।' 'नही, मुझे सर्दी लगेगी एयरकंडीशनर से।' 'सर्दी या गर्मी, परन्तु तुम जानती हो कि मुझे पसीने से नफरत है, खास कर जब दो नंगे शरीर साथ-साथ लगे हों।' 'अच्छा, सामने वाली खिड़की खोल दो।' 'और अगर किसी ने बाहर से झांका तो?' - 58 विकेन्द्रित . . 'ऐसी की तैसी किसी की । यह डिफेंस कालोनी है कि देवनगर । यहाँ लोग झांकते थोड़ा रहते है। अच्छा, पहले समारोह के उद्घाटन के बारे में मेरी रिपोर्ट पढ़ो।' उसने करवट बदली, हाथ बढ़ाया (मैंने उसकी पीठ पर फैलाकर हाथ फेरा) और अपना लिखने वाला बैग उसने उठाया। डबल बेड के कितने सुख होते हैं। एक तरह का यह घर का घर है। प्यार करो, बातें करो, लेटो, करवटें बदलो । रोटी टूक-ट्रक कर खाओ, हाथ-पैर लम्बे करके चीजें उठाओ, बत्तियां बुझाओ-अगर अकेला भी हूं तो भी मुझे चौड़ें पलंग के बिना नींद अच्छी तरह नहीं आती। मुझे याद है जब मैंने यह पलंग खरीदा था। मेरी पत्नी मुझसे नाराज हो गई। 'यह लायलपुर का महल थोड़े ही है या लखनऊ की मंजिल । डिफेंस कालोनी की कोठरियां है कोठरियां । यहां इतना बड़ा पलंग बिछा दिया तो दीवारों के साथ ठोकरें खाते फिरेंगे।' मुझे लगता है कि उसके इन विचारों ने ही अंत में मुझे उसके साथ लगी तोड़ने पर मजबूर किया। सुसरी, लखनऊ जांकर सम्यता और सदाचार के तौर-तरीके भी भूल गई थी । उफ ! यह नयी अमीरी ! मैं जानता था कि मैं उसके साथ दिमागी संतुलन स्थापित करने में असमर्थ था परन्तु फिर भी कोई-न-कोई स्तर तो होना ही चाहिए। यह भी ठीक है कि लायलपुर में और आम तौर पर उस उम्र में मैं भी कोई वुद्धिजीवी नही था और अगर मैं विभाजन के बाद इस लीक पर गजव की प्रगति की है तो उस पर भी सारा दोष मैं नही ठोंक सकता। परन्तु उसने तो अब जसे दिमाग न इस्तेमाल करने की सौगन्ध खा ली हो। केवल सुन्दरता को क्या मैंने चाटना था? और फिर सुन्दरता भी कमतर होती गई । भला जो स्त्री मेरे साथ पलंग पर लेटकर छोटी-मोटी बातें न कर सके, उसके साथ मैं सारा जीवन कैसे गुजार सकता हूं। उजड्ड, गंवार। उमने अपनी रिपोर्ट पढ़कर सुनाई। उसकी इस तरतीबवार लेखनी मे साहित्यिक अंश या और उसका यही अंश मुझे अच्छा लगा। जैसे उसकी रपट में साहित्यिक रंग पा वैसे ही उसकी सुन्दरता और उसके विकेन्द्रित 59 स्वभाव में एक बौद्धिक तत्त्व। हां, मैं उसे प्यारं (?) कर सकता था, वह मेरी मित्र बनने के योग्य थी, वह मेरी साथी बनने के योग्य भी और अगर कभी जीवनसाथी की जरूरत हो, तो वह भी । उसने अपनी रपट खत्म की और मैंने प्रशंसक दृष्टि से उसकी तरफ देखा। उसे चूमा। । -- 'पयों? 'अगर तुम मुझसे शादी कर लो तो सच जानो तुम एक कवि या सेखक बन जाओ।' 'तुमसे शादी? छी-छी...' 'छी-छी की वच्ची। 'अच्छा, तो अब बताओ, मुझे क्यों बुलाया ?' फिर वही कहानी। । मैंने फिर 'टाल-मटोल के लिए अपने अधूरे उपन्यास के चार पाने सुनाये जो मैंने पिछले दो दिनों में लिखे थे। गौर से सुनने के बाद पह बोली- 'आपको क्या होता जा रहा है, प्रियतम !' 'मैं मानती हूं कि बढ़िया लेखनी वही है जो यथार्षवाद और .. हो । जो मानवता की समकातीन स्तर का सही प्रतिषिय हो शब्द, हर वाक्य, हर संकल्प, हर भावना बौद्धिक सरल पाटीne परखे नहीं जा सकते।' 'तुम्हारा मतलब है कि इन्हें परखा नहीं जाना जा 'नहीं, मेरा मतलब तो वही है जो कुछ गले मारा साता। हमारी सभ्यता का यह स्तर इस पर नहीं मानवता में अच्छाई, न लालित्य, न श्रेष्टमा et रहा है। भाई साहय, आखिर मनुष्य को UITMENT मैं टो- अष्टाई का अंश है न ।' 'पिस्तुल नहीं, अगर है तो शाप मानव मी अधिकतर प्राकृतिक दा. हो मानय पे ओंठ पून से रंग या 60 विकेन्द्रित पछाड़ता और शिथिल को दवाता आया है । वह" 'और फिर भी ऐसे समय मे गुरु अर्जुन, श्री रामचन्द्र, ईसा मसीह और अन्य कुर्वानी के पुज पैदा हुए हैं।' 'यह अपवाद व्यक्तित्व हैं जिनसे आम नियमों की पुष्टि नहीं होती और फिर इस हालत मे अगर हम इन दो-चार व्यक्तियों के कामों का अवलोकन कर सही तरीके से आधुनिक मनोविज्ञान का विश्लेषण करें तो शायद उनकी कुर्बानी के जज्बे के नाम न जाने कौन-कौन से अनुचित कारण मिलें। खूनी, वलिदान के बाद खून की भावना भी हो सकती है, और कत्ल और खून के लिए किसी निर्दोष को भी दोपी बनाया जा सकता है।' 'हर हालत में अगर लेखक, वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी का, इन्सान की तथ्यात्मक आदर्श ढांचे मे विश्वास उठ गया तो हमारी सभ्यता का कोई भविष्य नहीं। 'कोई भविष्य नही डियर, यही तो मैं कहता हूं।' 'तुम्हारे जैसा बुद्धिमान, बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक से भी बदतर है । वैज्ञानिक क्या और क्यों दो उत्तर ढूंढ़ता है । उसमें कुर्वानी और बलिदान का अंश है । वह कही भी भगवान या लालित्य के साथ सीधी टक्कर नहीं लेता । उसके हाथ से बने विनाश के वसीले उसके अनुसन्धान और उसके परिणामो के अपुष्ट परिणाम है, पुष्ट नहीं। परन्तु आप जैसे बुद्धिजीवी जान-बूझकर मनुष्यता को गुमराह करने पर तुले हुए हैं । स्वतन्त्र राय और स्वतन्त्र लेखनी की स्वाधीनता बल्कि आप जैसे पुरुषों से ले लेनी चाहिए । आप लोगों की रचनाए जला देनी चाहिए।' 'तैश मे न आओ बहन जी । हम जैसे घर से निकाले गये लेखकों की लेखनी कौन-सी सदी और कौन-सी पीढ़ी में नहीं जलायी गयी ? ढाई हजार वर्ष पहले सुकरात जैसे दार्शनिक के शहजादे पर आरोप लगाया गया कि उसने देवताओं के विरुद्ध लिखा है। अन्त में उसे जहर पीने के लिए विवश किया गया । अरस्तु की भी कितारें जलायी गयी। और दिमास यनीज ने जहर पी। स्पिनोजा को देश से निष्कासित किया गया, लुई सोलहवें ने वाल्टेयर को रचनाएं जलवा दी। फिर डी० एच० लारेन, - ।
विकेन्द्रित 61 कापका और जेम्स जायस । और अभी ही गुरु अर्जुन और ईसा की बात की है उनका बलिदान भी अगर सच पूछो तो उन्नति, सभ्यता और गतिशीलता का बलिदान था। जिनके साथ संयुक्त अनेक अज्ञानी और राजसी कारण हैं । शोक उस लेखक या कवि पर जो मानवता को इतनी तेजी के साथ चलने, और बढ़ाने की कोशिश करे कि मानवता उसका पार न पा सके कलम के पैगम्बर को निकालकर मानवता ने सिर ऊपर उठाया है । मेरे साथ भी शायद ऐसा ही हो। मैं भविष्य का पैगम्बर हूं- नहीं, मैं भविष्य का हथियार हूं। क्रांति का सूत्रधार।' 'परन्तु अब समय बड़ा खतरनाक है। अब तुम लोग बहुत हानि पहुंचाने के योग्य हो । मानवता कगार पर खड़ी है और इस समय जरूरत है गहरे चिन्तन की और गहरी स्फूर्ति की। मैं मुस्कराया : 'अच्छा जी, तो मैं यह पन्ने फाई देता हूं।' मैंने दो पन्ने फाड़ने का बहाना किया। उसने वे पन्ने मुझसे छीन लिये और उनको चूमते हुए कहा- 'हाय! यह तो मुझे अपनी जान से भी ज्यादा प्यारे हैं । मैं तो तक 'हैरानी है कि तुम मुझे ऐसा तार्किक बुद्धिजीवी समझती हो। जबकि मैं इस समय जज्बातों के संकट से घिरा जा रहा हूं।' 'क्या?' उसके कान खड़े हो गये। 'यही कि मैं तुम्हारे प्यार में धंसता जा रहा हूं।' 'नहीं । आप कुछ और कहने लगे थे। बताइये न । वताओं मेरे प्रियतम ! आपके मन में क्या है ?' 'बुरा तो नहीं मानोगी। मैं जानता हूं, बताना तो मुझे पड़ेगा ही; बुलाया जो है तुमको। और हमारा रिश्ता छोटी-मोटी रुकावटो के लिए काफो पक्का है । और फिर यह हमारे रिश्ते की बात नहीं, यह एक ऐसी मुश्किल है जिसमें मैं तुम्हारी सहायता के विना मुक्त नहीं हो सकता।' 'बताओ न, प्रिय' 'कसे बताऊँ ?' बहुत धीरे-धीरे सभी शब्द नापता-तौलता मैं बोला।
62 विकेन्द्रित 'यह मेरी पड़ोसन है न ? लगता है मैं इसके इश्क में तबाह होने लगा हूं। परसों तो वह मेरे ख्यालो, मेरे सपनों तक में आने लगी।' एक झटका-सा लगा उसे । क्षणभंगुर भूचाल-सा आया था। चांद के आगे वादल का एक टुकडा आ गया। मैंने उसके हाथ की उगलियों में अपनी उंगलियां डालकर दवाया-- 'कहा था न, युरा न मानना। इसीलिए तो मैंने डियर, तुम्हें बुलाया है। वह मेरे योग्य नहीं। न ही सुन्दर, न ही"" 'हर वक्त सुन्दर-सुन्दर क्या चिल्लाते रहते हो।' 'तो क्या झूठ बोला था तुम्हारे सामने । लिखने-लिखाने के लिए वेशक कोढ़ पड़े, वेशक झूठ परन्तु वास्तव में अपने आसपास सुन्दरता के विना मेरा सास घुट जायेगा। और फिर यह तुम्हारे हक की बात है।' मैं मुस्कराया। 'यह कोई मजाक नहीं, यही मुश्किल है। यह कसली और काली- कलूटी मेरे ख्यालों में रच रही है और मुझे डर लगता है । मुझे बचा लो, मेरी रानी ! मुझे अपने में समा लो, मुझे ढक लो, सभी कठिनाइयां, सभी संकटों से सुरक्षित रखो।' और मेरी रानी ने मुझे अपने आप मे समा लिया-सुरक्षित कर . लिया।
दस परन्तु कब तक वह मुझे समाये रखती। आखिर दिन तो चढ़ना हो पा। वह तो शायद मुझे अपने भीतर ढककर और समाकर सदा के लिए संसार से सुरक्षित रख सकती थी लेकिन मेरी सदा की मानसिक कठिनाई, रात के समय प्रकाश की आरजू, दिन के समय कुशलता और 'परमार्थ, फुहार की तमन्ना। 'हमने कितने ही साधन सोचे और कितने ही तोड़े लेकिन जो अहं है 'न, इंसान मे वही उसकी हार और उसकी कठिनाइयों का सबसे बड़ा कारण है । वेदों और उपनिषदों के ऋषि-मुनियों ने इसीलिए आदेश दिया था--अहंकार को मारो। भगवान कृष्ण की राय में जब तक अहंकार आदमी के.कमों का रथवान है, उसके जीवन का रथ वैसे ही चलेगा। बुद्ध भगवान, ने कहा था कि कोई बारहमुखी शक्ति इतनी मारक नही जितनी हमारे अन्दर का अहंकार । गुरुनानक ने दुनियावी और परमार्थ दोनों रास्तों "पर सफलता के साथ आगे बढ़ने के लिए अहकार को दबाने का प्रचार किया। गुरु ग्रंथ साहब में आशा की वार ने एक पूरे का पूरा श्लोक अहंकार के बारे मे लिखा है। फौजी जनरल, राजनीतिक नेता, सरकारी कर्मचारी और निम्न स्तर का मजदूर भी तब ही दुखी होता है जब उसमें अहकार की भावना घर कर जाती है और आज मैं लेखक-भी अहंकार के कारण ही फिसला। मैं प्रेम की खेल का खिलाड़ी, मैं अनुभवी प्रेमी, मैं - अनेक सच्चे-झूठे पारों वाला, मैं गुजरातनों, मदरासनों, जर्मनों या फ्रांसीसियों इत्यादि : F . में 64 विकेन्द्रित जानने वाला, मैं मह, मैं वह क्या इम अपने वैमालूमै जग्वे के आगे अर्थात् फेंककर दौड़ जाऊं, धिक्कार मेरी अनख की, धिक्कार मेरे जिगर को। भला कोई पूछे कि ऐसे संकट मे अहंकार के पोछे लगकर अपने जीवन का नुकसान करने मे मुझे क्या फायदा था सरदार साहब । परन्तु यही तो कठिनाई है। मैं अहकार के काबू में आ गया। आदमी यह कभी नही मोचता कि उसके इरादे कभी विनाश का कारण भी बन सकते है। इधर अहकार का चक्कर और उधर नियत बद हो रही थी। पूरे साल भर मे सिवाय पहले कुछ साथियो के न ही अचेत और न ही सचेत । कभी किसी से इतनी मुलाकातें हुई, जितनी अव पिछले दस-पन्द्रह दिनो हुई थीं । आज दस बजे पैजामा पहने ही बाहर निकला तो वह डाकिये से रजिस्ट्री ले रही है । भई, पिछले सारे साल तो तुम्हें कोई रजिस्ट्री नहीं आई । आज जो नौ बजे बाहर निकले हो तो कोई रोहतक का जाट तुमसे किसी घर का पता पूछ रहा है। हिन्दी अच्छी तरह तुम्हारे पल्ले नही पड़ती तो रोहतको तू खाक समझेगी और तुम कहती हो कि मैं उसकी मदद करूं (तुम्हें खुद किसी सहायता की जरूरत नहीं ?) सिर धोकर जब एक इतवार बाहर मै बाल सुखाने के लिए आया तो तुम सारा परिवार बाहर धूप तापने के लिए बैठे हुए थे । भई, पिछले साल सर्दियो मे क्यो नहीं बाहर बैठते थे। उस इतवार मैंने पहली बार तुम्हारे लड़के को देखा। मुझे तो तुम्हारे खसम की तरह ही वह टट्ट का टटू लगा । एक तुम्हारा टेलीफोन खराब हो गया, पहले कभी क्यों नहीं हुआ था और तुमने नौकर को कार्यालय में शिकायत दर्ज करवाने के लिए भेजा। फिर तुम्हारी लड़की आंमी डंडी के साथ कोई जरूरी बात करने के लिए। क्योकि तुम्हारी लड़की ठीक तरह बात समझा नहीं सकी थी या समझ नहीं सकी थी सो तुम खुद आयो। (आ जा, आ जा, तेरा ख्याल है मैं तुमसे डरता हूं, कई देखी हैं वेरी जसी । तुम जैसी को तो नौकरानी भी न रखू, क्या समझती हो मुझे) । अब तुम्हारे और मेरे नौकर में फिर मेल- मिलाप बढ़ने लगा है। शुक्र भगवान का तुम लोगों ने अपना रेफ्रीजरेटर दिन लिया था।
। एकदिन कशमिजारा हा नकररर हरवितोसोरकिशोनी, रहो कोई नोचा। कालाादोदा और निर दीरशेट दास परन्तु वहाँ न शनी न जानवर मुझे रुस्त दुम्हारा साल । ने कुछ दिनों में मुक देने रसर देगने को मिले थे कि सामना को मोल शैड़ने का। या नहीं कि पदो पल के लिए हरदा शररि दुर्जीपर और मोशे से शहर देवने ना। पुस्तक खोतकर नारे रखो पन्नु पड़ना भी शुरू नहीं कर नया पा। मानौतुक है और इसका तुम्हारे साप का सम्बन्ध, पही सोच रहा पाऔर अन्त में इसका सम्बन्ध तुमसे ही निरता। पर तोपरी पार पन्टी बरने परे में बाहर गा तो पेट के पास पड़ी तुम्हारी लड़को खिलखिलाकर हंत रही पो और हंसते-हंसते बक रही पी- 'हर गये न? डरोदिया न?' कितनी वेलीस, मासूम और प्यारो हंसी थी यह । मेरा डर और मेरा गुस्ना पिपल गया। मैंने भी एक व्हाका मारा। 'टहर तेरे शैतान की'-मैंने हंसते-हंसते कहा। मैंने सोचा दौड़ जायेगी परन्तु यह यही बड़ीयड़ी ही दौड़गे का वहाना करती रही । दोनों पर यार-बार तेजी के साप उठाती और जमीन पर पटाख-पटाख मारती। मैंने उसे उठा लिया। पहली बार उसे उस पा, उसे गले लगाया था। मैंने उसे चूमा, पहली बार ही मैंने किसी कारो रंग वाले मानव जीव को चूमा था। मद्रास में रहने के सायद मैने किसी काले को नहीं चूमा या और न ही मेरे पास पूमने का अवसर पाया चूमना नहीं चाहता था। हां, कोई फर्क नहीं था और पैरो मैंने पहले कहा था कि अगर घमड़ी मुलायम हो तो क्या फर्क पड़ता है। (काले यो है कि में ?) मैंने उसे क्यों चूमा? पहले कभी क्यो नही गुमा? भारमप्रेरणा घुस थी ? क्या यह तुम्हें पूमने का बहाना पा? क्या यह ५ F 66 विकेन्द्रित का तजुर्बा था? मेरा ख्याल है, नही । जव ऐसा प्यारा बच्चा, ऐसा प्यारा मजाक करे, ऐसे खिलखिला कर हंसे, ऐसे अगले को गद्गद कर दे तो अनायास ही उसे चूमने, उसे गले लगाने का जी करता है । ठीक है, अच्छी वह मुझे पहले ही लगती थी परन्तु पहले उसने कभी मुझे गद्गद नहीं किया था। नही, तुम इसका कारण, इसकी प्रेरणा नहीं थी। मैंने उसे चूमा और उसने दोनों हाथों से मेरी दाढ़ी को सहलाया फिर खुजली की और फिर मेरे फिक्सो के साथ जड़ी सारी की सारी दाडी घराय कर दी । बड़ा मजा आया मुझे। मुद्दत हो गयी थी ऐसे दिन-दहाड़े किसी ने मेरी दाढी खराब करने की जुरंत की है । जब तुम और मैं और नजदीक आये तो याद है एक दिन तुम्हारी लडकी ने पता नहीं किस रहस्यमय प्रेमावेग से विवश होकर मुझे तुम सब लोगो के सामने चूम लिया था। और फिर तुमने बार-बार सुनाते हुए कहा था। हमारे रस्मों के अनुसार तो बच्चों को भी नही चूमते । कभी किसी दादी-परदादी या दादे-परदादे ने साल या दो साल के छोटे बच्चे को चूम लिया । परन्तु साल-दो साल से बड़े बच्चे को कदाचित नहीं चूमते । हमें हमारी सभ्यता में किसी तरह का कोई विश्वास नहीं। मैंने शरारत की। कोई उत्तेजना या उत्साह भी नहीं होता, क्या ? आखिर यह स्वाभाविक बात है। तुम झेंप गयी। भाड़ में जाये आपकी सभ्यता और आपके रस्मो- रिवाज । आप फिर-चुम्बन शब्द ही का क्यों इस्तेमाल करते हो ? निकाल दो न इसे अपनी भाषा मे से। तो क्या आप पति-पत्नी भी नहीं चूमते एक-दूसरे को, प्रेमी-प्रेमिका के बारे में पूछना होगा। तुम्हारे साथ बीती घटनाएं नौकर और तुम्हारे और तुम्हारी लडकी तो रहे परन्तु इन दिनों तुम्हारे पति ने मोटर खरीद ली। मुबारक हो आपको अपनी फोएट परन्तु मोटर क्या खरीदी-उसने कि मेरी शामत आ गयो । तो तुम्हारे पास गैरज नहीं और दूसरे तुमने मोटर जिन्दगी मे पहली . ५.1 फिजूल और बेकार ग ।
चार दी। हन्दुर विमरमरे रहर में होने से
मैटर मात्र करि तनी परिस स्टेनार करत
हिर इस टो मारन है। परन्तुनिना नहा रहर पहाड़ी
और नहीन्दही बरत नहीं हो जाती:"
इसे निरव नहीं
गा? (इन्हें कोह हर नहीं निकाय नातेको सानोडर
हौनकिन बर:-)ी आत कहाँ बन्नई कप है, पुलाई
कराते हैं?"का नही मर दाद हर हाल में इक बन्ने सन
'वहिर?
नैनोट में उन्ना नाजिर यह प्रलनिन । परन्तु निर
भोटका और तुन्दारे परिवार का वाद उन्मापा। नोटर टोदुन्हारे
निरखने में बहकर नदी यो। पंट पर नर है बीज हार
कारदारीनेनिन कार और नंनदेनी पड़े" और ना बन यात्रा
है कुन्त में। तुम्हें तो नोट पर देवी नीट को रमीत चुम्जीको मार
यह कि काला कर रखने वाले रसौनसकिर ली
विसकर टूट न जाए। ददाबा चोर दन्द ररले तुम्हारा दिन को
बादा, नहीं कोई पुरजा न बड़ बार, रंगन हजार लेकिन दरवारा दो
दिना शेर में वन्द दिन्द होता ही नहीं। कार दरवाना रद करने
के लिए सम्मान को बहल है, मुझे याद है कि पोस्ट मल्ल दुन
मेरी दिदेवीकारला तोदखाता ही न निकाल हानोरमई, सर दरबारा
भारी हो दो और में मारने की इतनी उस्त नहीं होती।
मैं तुम्हारी ऋठिनाइयां और मजदूरियां समाजा पाल्नु पर्न
तुम्हारे कारण कन्निाइयों और मजदरिदों को मोटा नहीं देना सहसा
था। एक दम्र होती है निस्दार्प और निम्मान होने को और मेरी यह
उन निकन चुटी थी। मैं तुम्हारे चाव और मा समानता पा! परन्तु
मेरे एंने बाद और मंग तो दचान से हो जाते रहे थे। (नौर मा.
वार का बेटा-बेटी होना भी एक तरह को बिना ही है । अचान में हो
इतना कुट देव निया पाता है कि वानी और मोड़ उसको
या उमंग नहीं रह जाती।)
68 विकेन्द्रित अगर मैं नही था समझता तो आप लोगों का 'खास कर तुम्हारा दकियानूसी रवया। बीसवीं सदी में तुम ऐसी लगती हो या रहने की कोशिश करती हो जैसे वुर्जुआ सत्रहवीं सदी अभी ही आयी हो । या यह ऋषि- मुनियों का सतयुग हो। और हमारी पहली लम्बी मुलाकात के समय तुमने यही समझाने की कोशिश की। तुम्हारे अन्दर चोर था कोई ? शुरू से ही था कि लड़की को चोट लगने पर और बाद में तेरे मन में आकर बैठा? चोर ! चोरनी!
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70 विकेन्द्रित - वैभव की प्रतिनिधि सुपुत्री । वह अपने आपको देवी समझती है और मुझे देवता बनने की प्रेरणा देती है। भई, अगर मुझे देवता बनना है तो इन्द्र देवता ही बनूगा और तुम्हें मेरी मन-मरजी माननी होगी । देवता को खुश करना होगा, रिझाना होगा । देवी-देवता पर हर काम पवित्र गिना जाता है। नही? जिमखाना के पश्चिमी लॉन मे बैठी वह मुझसे कहने लगी-परन्तु पहले यह तो बताओ कि हम क्लब पहुंचे कैसे ? मैं एक शनिवार की शाम को बाहर क्लब जाने के लिए निकला कि उन दोनों के दर्शन हो गये । वह कह रहा था: देखो नहीं चलती। स्पष्ट था कि पिछले एक-आध घण्टे से वह कार चलाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन वह चलने से इनकार कर रही थी। मैं क्या करूं? मुझे पुरुषों के काम की क्या सूझ है। " सच कहती थी वह, मर्दाना काम क्या जाने "क्या वह स्त्रियो के सारे काम समझती थी, मुझे इस पर भी हैरानी,थी।" रुआसे आदमी ने मेरी तरफ देखा, मुझे जाना। वरतते हुए मैंने उससे पूछा- क्या बात है ? उसने बताया। मैंने बोनट उठा कर देखा। बैटरी का एक टरमिनर उतरा हुआ था। सूट मैंने क्लब जाने के लिए पहन रखा था। मेरा जी कालिख से खेलने के लिए नहीं कर रहा था। लेकिन भगवान था कि खामख्वाह उन्हें मेरा बनाना चाहता था। खैर, मैंने "कोट की आस्तीन ऊपर करके टरमिनर ठीक जगह पर जड़ दिया। मोटर चालू हो गयी। आप लोग खुशी से फूलकर कुप्पा हो गये और बाछे खिल गयी।, मोटर के चालू होने की आवाज सुनकर वह भी बाहर आ गयी। आदमी ने कहा- 'देखो कितने अच्छे हैं पड़ोसी। हर मुश्किल के समय काम आते है। हम तो इनका कुछ भी नही संवारते।' (पत्नी देदो अपनी ! दोगे? अगर मांगता तो शायद ही-ही करते हुए तुम हा-हा कर देते। हर पूछ पर तो पहले हा-ही तो करते हो।) परन्तु तुमने किसी प्रकार की प्रशंसा ध्यक्त नहीं की। क्या हुआ पड़ा। उदारता 'विकेन्द्रित 71 आखिर इतनी बड़ी तोप तो नहीं दाग दी। इसमे प्रसन्नता दिखाने की या जतलाने की क्या वात है। मैंने कौन-सी तोप 'दागी थी। मैंने अपने मंडू को आवाज दी कि हाथ धोने के लिए पानी ले आये लेकिन तुम्हारे पति ने कहा कि तुम्हारे अन्दर ही जाकर मैं धो लू । मैं चला गया और फिर तुम लोगों ने पूछा-'आपको देर तो नही कर दी। आप कहां जा रहे हैं ?' 'नहीं देर काहे की। जिमखाने ही जा रहा था। एक आध घंटा पहले क्या और बाद में क्या?' और फिर मुझे पता नहीं क्या सूझा, मैं कह बैठा- 'आप लोग भी क्यों नहीं चलते, क्या कर रहे है आज शाम को।' मुझे सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि आप उठ खड़े होंगे। मेरे अहसान का बदला उतारने के लिए शायद आप लोग तैयार हो गये। इतने तेज तो नही आप लोग परन्तु पता नहीं कैसे आंखों ही आंखों में इस बारे में कैसे फैसला कर लिया। मेरे लिए यह सदा एक रहस्य रहेगा । तुमने कहा कि अभी तुम्हें तैयार होना है और मैंने भी सोचा, तुम्हें कौन-सी विशेषता बरतनी है। तैयार हो जाओ अच्छी तरह । देबूं तो सही तुम तैयार हुई कैसी लगती हो । सो मैंने कहा, कि आप आराम से तैयार हो कर वहां पहुंच जाना । मैं दरबान को बताता जाऊंगा कि मैं कहां बैठा है । क्लव का रास्ता तो आता है न आपको ? 'हां, मैं एक बार हो आया हूं।' 'अच्छा!' और वह बेचारा झेंप गया। जैसे अपने आपको ऊंचा बतलाने और जतलाने का उससे कोई गुनाह हो गया हो । बस एक बार गया था। यूरोप से हमारी कम्पनी के कुछ सलाहकार आये हुए थे और उनके लिए वहां एक पार्टी की थी। एक बार क्यों रोज-रोज आओ, स्वागत है। (खाक स्वागत है, तुम जैसों को तो हम जिमखाने की सदस्यता के लिए फार्म भी नहीं देते। मुझसे पता नहीं कैसे भूल हो गयी कि मैं तुम्हे बुला बैठा, नहीं तो तुम जैसे आदमी तो वहा पर मेहमान बनकर भी नहीं आ सकते ।) 7 .
72 विकेन्द्रित काले वैसे आप लोग मेरे मेहमान बनकर जिमखाना आये । रस्म के अनुसार पूछा- क्यापीयेंगे। तुमने तो भला क्यापीना था । तुम्हारा मदं भी ना-ना कर रहा था। वैसे उसकी ना-ना को आवाज मे मुझे लगा कि उसने चली जरूर है और मजबूर करने पर पी भी लेगा। तुम्हारी तरफ देख रहा था। परन्तु फिर मैंने कहा-इन पर अपनी ह्विस्की क्यों बर्बाद करूं (अब तो देशी का भाव भी दिनोदिन बढ़ता जा रहा है) और मैंने मजबूर न किया। तुम दोनों नीबू के पानी के योग्य ही थे। तुम लोगो को जिमखाना दिखा दिया, यह कोई कम मेहरवानी है। तुम मेरे सामने बैठ गयी और ऊंची वत्ती को रोशनी में मुझे ऐमे लगा कि तुम इतनी बुरी नहीं। रात के समय 'चल' सकती हो। चेहरे पर सफेद पाउडर नहीं था, उसे थोपा जैसे कई लोग करते हैं । यद्यपि तुमने शृगार किया जरूर था। रूप का चाव था मुझे ही क्योकि मैं ध्यान के साथ देख रहा था और वैसे भी मैं अनुभवी हूं वेशक और कोई पहचान न लेता। लिपस्टिक भी हल्की और अच्छी थी, गहरी नहीं । बैठने-उठने का भी तुझे तरीका आता था। मतलब यह कि तुममें थोड़ी-बहुत मिलनसार शिष्टता थी। मैंने निर्णय किया कि तुमसे नफरत करने की जरूरत नही और न ही तुमसे लड़ने की । तुम्हें प्रेम करना मेरे बस की बात नहीं थी लेकिन तुम्हारे साथ उठने-बैठने और वाद-विवाद करने में मुझे अब हिचक नहीं थी। अन्य कई पहलुओं से भी और इस पहलू मे भी कि आखिर हम सामाजिक प्राणी हैं और फिर लेखक ! और वह भी हर जीवन मे उस नूरानी ज्योति का नूर देखने वाला या दूसरे शब्दो मे तो समाजवादी । इतने में मेरा एक परिचित मेरे पास से निकला। मैंने बुलाया और ह्विस्की का लालच दिया। वह बैठ गया या यूं कहिये, मैंने उसे जोर-जबरन बैठा लिया। थोड़ी देर के बाद मैं उसे और तुम्हारे पति को बातचीत में व्यस्त कराने में सफल हो गया। और फिर मैंने कुर्सी जरा तुम्हारे नजदीक कर ली। यह जतलाते हुए कि शायद तुम धीरे बोल रही हो ओर मुझे ठीक तरह सुनाई नहीं दे रहा है । 'अब बताओ, तुम क्या कह रही थी?' 'यह कि आप लोग उत्तर वाले काफी खुले स्वभाव के हैं। हमारे विकेन्द्रित 73 समाज में स्त्री-पुरुष का अकेले मिलना, क्लबों में जाना और नाचने की मनाही है।' 'आप जानती हैं आप किसके साथ बात कर रही हैं । मैं भी मद्रास में रह चुका हूं। मद्रास जिमखाने में कई मदरासनों के साथ में नाच चुका हूं। और (मैंने सोचा कि नाहीं कर दू परन्तु ऐसे ही रोब गांठने की गरज से मैंने यह कह दिया। यद्यपि वाद में जाकर पता चला कि इसका असर ठीक नहीं हुआ 1) कुछ मद्रासी लड़कियों के साथ शराब भी पी है। अकेले । यदि और जानना चाहें तो वह भी बता सकता हूं।' 'परन्तु सभी उंगलियां तो समान नहीं होती।' मैंने उसकी उंगलियों की तरफ देखा, अच्छी थी। लम्बी और पतली और गेरए रंग की नेल पालिश । 'यह तो मैं मानता हूं परन्तु अगर आप सारे मद्रास को असभ्य बनाने, की कोशिश करें तो मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं।' चोट करारी थी। वह तमको । 'तो क्या सभ्यता क्लबों और नाचों में ही है। हमारा सभ्यता का पैमाना अलग ही लगता है।' 'अलग क्यों । हजारों सालों मे विकास करता हुआ इंसान क्या उस स्तर पर भी नहीं पहुंचा कि सभ्यता और असभ्यता जैसे शब्दों के भावों मे भेद ढूंढ़ सके।' 'हां, जरूर हैं । सभ्यता का भाव अमेरिकनों और फांसीसियों, भारतीयों और यहूदियों तथा अफ्रीका के हब्शियों के लिए अलग-अलग हो सकता है। माहौल, नस्ल और अन्य कई कारण भी।' 'वाह ! खूब गहरा ज्ञान बखान रही हैं।' 'और भारत में भी उत्तरी और दक्षिणी वासियों में भिन्न ?' 'मैं नहीं, यह आप सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं।' 'लीजिये, आप तो पल-पल रंग बदलने लगे। कभी कुछ, पल-भर बाद कुछ। चलिये, यही तो स्त्री को महानता है । हां, उस दिन बख्शीपुरम से आने वाले बाजो के बारे मे हुई बातचीत आपको याद है क्या ?' 'वाह, उसका और इस चर्चा का क्या सम्बन्ध. और तालमेल ? कहां ।
74 विकेन्द्रित घोड़ा, कहां ऊंट। 'जरा और तमकिये, देख रहा हूं आप कितने गहरे पानी में हैं।' 'क्या आप नाचते हैं ?' 'क्यों? 'वस, ऐसे ही पूछ लिया । क्यों, यह कोई राज है क्या ?' 'नहीं।' 'आपने 'नहीं' तो ऐमे कहा जैसे 'हां' कहते-कहते रुककर 'ना' कर दी हो।' 'पश्चिमी नृत्य में क्या है । चार वारी देखो तो आदर्मी कदम के साथ कदम मिलाकर चल मकता है।' 'बड़ी छुपी रुस्तम हो । एक तो नाच के विरुद्ध और दूसरे स्वयं नृत्य करना या करने की स्वाहिश और तमन्ना रही । तुम्हारी वनावट में कोई रहस्य जरूर है ? क्या है वह ? जी करता है पकड़ लूं।' 'अच्छा ! तो एक दिन कदम के साथ कदम मिलाकर मंच पर चलेंगे। 'नही-नही, यह कैसे हो सकता है ?' उमने आंख के कोने से अपने पति की ओर देखा। 'क्यो?' 'मुझे तो आता ही नहीं।' 'चलो, अगर नही आता तो मैं सिखा दूगा। मुझे एक प्रकार से इस व्यवमाय का उस्ताद माना जाता है। कई लड़कियों और स्त्रियो को यह सिखाया है। केवल सिखाने के पैसे नहीं लेता।' यह क्या? मैं तो इस स्त्री के साथ आगे-ही-आगे बढता जा रहा हूं। इसका मतलब यह हुआ अब कभी-न-कभी इसे नाच के लिए बुलाना पड़ेगा । आखिर एक बार का बढ़ा हुआ हाथ वापस पीछे तो नहीं खीचा जा सकता। मुझे क्या हो रहा है ? कुछ नहीं। क्या होना है। मेरा स्वभाव है। बात आयी-गयी हो जायेगी। नहीं बुलाया तो न सही। यहां कौन-सा लिखकर दे दिया है सुसरी को। और अगर वह मुकर तो इसने कौन-सा कचहरी में मामला दर्ज करा लेना है । इसके साथ नृत्य हुए मुझे क्या मिलेगा। पहले तो,नौसिखिया है और अगर यह उठ . चुलबुलाहट गया .
विकेन्द्रित 75 भी बैठी तो छाती साथ लगने से घबरायेगी। न ही इसकी छातियां इतनी रसिक हैं । गालों के साथ गालें तो यह कभी जोड़ने नहीं देगी। वैते देशक उसको गालें है मुलायम । छोड़िये जी, भूलिये इस विषय को । लड़कियों की कमी है क्या, कि इस थकी-टूटी बूढ़ी हो रही के बारे में इतना सोचने पर मजबूर हों। इतने में तुम्हारा रुमाल घास पर गिर पड़ा। मैं उसे उठाने के लिए झुका । तुम भी। परन्तु तुम नजदीक थी, मैं जरा दूर । हमारे हाथ टकराने ही वाले थे परन्तु टकरा न सके । बस एक-आध सेन्टीमीटर की दूरी रह गयी। मैं तुम्हारे हाथ फिर देखने के लिए मजबूर हो गया। लम्बी. पंतली उंगलियां। इनका स्पर्श कसे होगा, देखना चाहता था, चखनी चाहता था। तेरे वाकी शरीर के मुकाबले में तुम्हारे हाथ आकर्षक थे। " अच्छा भई, मिला लेंगे हाय भी यह कौन-सी बड़ी बात है ? हाथं ही हाथों में लेकर देखने है, कोई सोना थोड़े ही है उसके साथ ।
बारह सचमुच ही तुम्हारे साथ हाथ मिलाने की हविश एक मुहिम बन गयी। यह कैसी सभ्यता है, इस का मैं पारावार नहीं पा सकता। सारी दुनिया में स्त्री और मर्द हाथ मिलाते है, बस एक हमारे देश मे ही यह गुनाह है। क्या गरमी इसका कारण है । पसीने से सराबोर हमारे हाथ किसी के साथ क्या मिलाने हैं ? लेकिन अब हमार पास रूमाल है। पसीना पोंछा जा सकता है और फिर कभी सर्दी का भी मौसम होता है। वह पसीने के डर से यही अति सुदर और लुभावना तौर-तरीका हम भुला बैठे हैं। एक स्त्री के साथ तुम स्त्रिया पुरुष के सामने अपनी औकात कैसे बढ़ाओगी? हाय मिलाने से तो आप लोग परहेज करती है, हिचकती है। हाथ ही दबाता है आदमी कोई तुम्हारी गालें, ओठो या छातियो को तो मुह नही लगाता। पश्चिम की तरफ देखो ! जहा सूरज डूबता है, हम कहते है--वाह-वाहा, कितनी मौज-बहार है। हाथ मिलाना तो क्या लोग एक-दूसरे को चूम- चूम कर स्वागत-सत्कार और विदाई करते हैं । पेरिस में हर कोई हाथ मिलाना चाहे, कोई ऐसा खिचाव था उस को छूने मे । बेचारी जब किसी पार्टी पर जाती, हाथ पलास्टर मे डाल लेती । और तुम तुम्हारे तो वैसे ही सदा प्लास्टर में रहते हैं हाथ । यहा तो किसी बहाने से भी स्त्री के हाय के साथ हाथ नहीं लगाया जा सकता । मिलने और विछुड़ने के समय वैसे न मिलना हुआ । आदमी भी कौन-मा हाथ मिलाते हैं। सदियों के अनाभाव के कारण शायद इतनी । और मिठास ही नही छोडी कि किसी के साथ अच्छी तरह दवा कर ?
विकेन्द्रित 77 हाथ परोसा जाये । और उसके व्यक्तित्व मे से कुछ ग्रहण किया जाये और अपने व्यक्तित्व से उसे कुछ दिया जाये। तुम्हारे साथ हाथ मिलाने के लिए मैंने कई बार बहाने गढ़। तुम्हारे पति का हर मुलाकात के समय हाथ पकडने लगा (वेशक वह कितना ही बुरा लगता था मुझे, शिथिल, डरा हुआ उसका हाथ । मरे हुए सद और ठंडे हुए बांस का एक टुकड़ा था। तेरी लडकी को लाड़-लाड़ में मैं कहता-चल, लड़की, हाथ मिलाकर दिखाओ। मैंने कहा बस एक दिन मिलने या बिछुड़ने के बाद तेरी लड़की और तेरे पति से हाथ हटा कर तेरी तरफ बढ़ा दूंगा। इस प्रकार का नाटक करते हुए जैसे मैं भूल रहा हूँ। परंतु तुमने परों पर पानी नहीं पड़ने दिया। मैं उनसे हाथ मिलाता और तुम अलग खड़ी हो जाती। अपनी तरफ से मैंने बड़ी कोशिश की थी परंतु तुमने मुझे विफल कर दिया। फिर कभी जय भी तुम मेरे नजदीक होती, मैं तेरे नजदीक होने की कोशिश करता।.मोटर से उतरते-चढ़ते, दरवाजे में से निकलते, कोई कुर्सी या पीज उठाते, मैं उसकी तरफ हाय बढ़ाता परंतु क्या कमाल कि वह मौका ही न देती। मैं तुम्हारे नजदीक हुआ नही कि तुम सिकुडी नहीं। यो पलक मारते ही दूर जा हटी। फिर मैं तुम्हे हाथों की करामात के किस्से सुनाने लगा। पढ़ा-लिखा तो में वैसे ही काफी हूं परंतु यह ध्येय सामने रखकर कि एक-दो विशेष पुस्तकें और पढ़ डालीं । तुम्हे मालूम है हाथ कैसे बने ? यह तुम जानती ही हो (उम्मीद है) कि आदमी को बंदर से आदमी बने कोई 1 5 लाख वर्ष लगे। पहले क्योकि बदर पेड़ो पर रहते थे। उनको बलवान परन्तु चंचल उंगलियों की जरूरत थी। ताकि टहनियों को मजबूती के साथ पकड़ सकें । मैं उस समय के हाथों और पैरों में कोई फर्क नहीं समझता और न ही तब इस प्रकार का कोई अंतर समझा ही जाता था। जब जंगल कम होने शुरू हो गये तो बदरो को पेड़ छोड़कर घरती पर विचरण करना पड़ा । यह समय हमारे इतिहास मे निर्णायक समय समझा जाता है । परों को टहनियां और शाखाएं आदि पकड़ने की जरूरत न रही अब उन्होंन धरती पर जानवर का भार संभालना था सो हाथो की आज की महत्ता का आरंम + 1 " . 78 विकेन्द्रित हुमा । रामही? और फिर उंगलियों में अंगूटा अन्नग हुआ यह भी एक अति आवश्यक दौर था और एक गमय ऐसा आया जब हाथ मनुष्य का सबसे जरूरी अंग यन गया । ऋषि-मुनि हाय की परछाई द्वारा कोड़ियों के कोई दूर करते थे। बुद्ध भगवान का मदा आशीर्वाद देने वाला हाय तुमने देखा है यया ? र नानक ने पूरी की पूरी पहाड़ी को हाय के द्वारा ही रोगा। काली के कितने हाथ थे? वताओ । पता नही। अभी दस थे । गणेश भगवान के भी अनेक हाय थे। ईसाई फकीर भी हाथ को करामात जानते-मानते और समझते थे। 18वी सदी में बेचारे लुई सोलहवे को अपनी ताजपोशी के समय चौबीस सौ कोढ़ियों को अपने करकमलो का स्पर्ण करने की छूट देनी पड़ी । स्यात था कि शहंशाह के स्पर्श से रोग लोप हो जाते है। देखो कितनी पढ़ाई और मेहनत की है मैंने तुम्हारे लिए। चलो, लाओ अब फेंको हाय मे हाथ, मुस्कराओ और चाहो तो गले भी लग नही ? कमाल की औरत हो तुम। तुम जैसी डोल-मटोल और चुप रहने वाली स्त्री मैंने आज तक नहीं देखी। जाओ फिर दफा हो जाओ। इतनी मेहनत तो मैं हूरो और परियो के लिए भी नहीं करता..तुम ऐसे ही उठती- फिरती हो, न अक्ल न शक्ल । गाय जैमी दूधी और नाम लालपरी बेर : परंतु क्यों बेहयाही दफा करूं--तुम्हें । हर कदम पर तुम्हें जीतने ही दू, बड़ी आई हो। हर कदम तुम मेरे लिए चुनौती बना देती हो।न फिर छोड़ा जाता है और न ही पकड़ा जाता है। अच्छा, एक बार तो तुम्हें फिसलना ही पड़ेगा। वस यारो ने सभी कुछ कर गुजरने की योजना बना डाली। अगली भेट मे हमने हाथ देखने वाले और किस्मत बताने वाले ज्योतिषी का भेष धारण किया । तुम्हारी लडको तुम्हारे पति और तुम्हारे लड़के (वह भी उन दिनों में दिल्ली आया हुआ था) और वहां पर उपस्थित एक और थी और-फिर-मैंने तेरा हाथ खीच लिया । अब बताओ, बच्चू? जाओ। ।
विकेन्द्रित 79 . रह गयी न हाथ मलती। हमने हाथों पर सरसों जमा दी। अव पूछो क्या पूछती हो? कुछ नहीं ? पूछ लो न । अगली-पिछली सब जानता हूं। लगता है तुम्हारी जिंदगी में कोई अनहोनी वात घट गयी है। ठीक है न ? साफ-साफ बता दो न ? छुपाने से क्या लाभ । यह सत्तबली सब कुछ जानता है, सब कुछ पहचानता है । तुम्हे किसी पराये मर्द में दिलचस्पी भी है । है ? शर्माती क्यू हो? यह कोई पाप तो नहीं, लड़की ! दिल तो लग ही जाया करते हैं । आदमी बेचारा क्या कर सकता है। क्या? क्या पूछा है ? यह तुम्हारे पति के साथ ज्यादती नहीं ? पगली, विल्कुल नहीं । तुम्हारा यह प्रेम तुम्हे अपने पति से अलग होने के लिए योड़े ही कहता है । अगर मन आया ही है तो थोड़ी-बहुत इश्कबाजी कर लो। अपने मन को ठिकाने पर भी रखो और संतुष्ट भी रहो। आखिर मन की मौज ही तो है जिदगी। और क्या ! धर्म, कर्म, शास्त्रों के बारे मे ? नही, नहीं, पगली ! यह पुराने ख्यालात हैं । जागीरदारी और सामंतवादी 'आज लोकतंत्र का बोलबाला है। अगला क्या प्रश्न है ? क्या वह आदमी भी तुम्हारा प्यार तुम्हें लोटाता है ? अच्छा--इसके बारे में पक्की तरह नहीं कह सकता। क्यों? क्योकि यह जो तूने आदमी चुना है । यह विचित्र है । इसने तुम्हारी जैसी कई देखी हैं और फिर तुम तो सुन्दर भी नही । उसे जीतने के सिर्फ दो उपाय ‘वताता हूं तुम्हें । उसकी रचनाओ में रुचि लो और उन्हे पढो । मे भी साहित्यिक रुचिया पैदा करो। वेशक यह सब ऊटपटाग ही हो परन्तु वुद्धि- जीवी और गंभीर बातचीत का घपला और दायरा बनाया करो। फिर हसा-खेला भी करो। गंभीरता और चंचलता के मिलाप पर वह मरता है। समझी। हां, और उसे चुनौतियां न दिया करो इस मामले मे। वह बड़ा तगड़ा है उसके साथ हमना वैमे तुम्हारी खुद-किस्मती की निशानी है । ठीक ! खुश हो न । देखो कितना कुछ बताया है तुम्हें बिना तुमसे कुछ जाने। तुम्हारा हाथ मैंने पकडा परन्तु तुम अगर सच पूछो तो कोई मजा नहीं आया। मैं अपनी विजय पर इतना फूला कि मजा लेना ही भूल गया। . । - 80 विकेन्द्रित - - साथ ही तुम्हारे मुह पर एक रंग आ रहा था और दूसरा जा रहा था, मैं डरा कि कहीं तुम्हारी हृदय-गति न रुक जाये। ऐमे और ऐसे ही और किस्से अगर समझो तो सब कुछ ही हैं और यह बातें मैं अपनी पत्रकार सहेली को बताया करता था। हम अक्सर मिलते थे। मैं जानता हूं कि स्त्री के साथ कभी किसी दूसरी स्त्री की बातें नही करनी चाहिए । परतु मेरी पत्रकार केवल स्त्री ही नहीं थी मेरे लिए। यदि स्त्री की भाति वह मेरे साथ सोती है तो मुझे प्यार भी करती थी। और वह मेरी एक मित्र भी थी, हा, मेरी सबसे करीबी मित्र, कम से कम उस समय । अगर मैं उसके साथ ऐसी घटनाओं का आदान-प्रदान न करता, और किसे ढूढता। वह भी तो मुझे अपनी सभी कठिनाइया बता देती थी। लेकिन उसके दिल में एक शंका थी जिससे मैं परिचित था । मुझे कहती- 'चलो कही चलें बम्बई चलते हैं । तुम्हें भी और मुझे भी छुट्टी की जरूरत है-- कश्मीर चलें । वर्फ में एक-दूसरे के करीब की गरमी का मजा लें। याद है वह हाउसबोट जिसमे हम पिछले साल ठहरे थे ? मुनीम उसको मुनि-मुनि और उसके बच्चे ने हमे मुफ्त रखने का वचन दिया था और हम भी उनसे वादा कर आये थे। बर्फ के ढेले बना-बना कर एक-दूसरे को मारेंगे-चलो, विदेश चलें । मेरा पासपोर्ट बन गया है। आप हजारों चक्कर लगा आये हैं। क्या अपनी प्रेमिका को एक बार भी मही ले जायेंगे?' मैं कहता 'मैं तुम्हारी लगी समझता हूं। तुम फिकर मत करो। अब मेरे पैर पक्के हैं तुम्हारी कृपा से । अब मैं नहीं फिसलता। अगर तुम न होती तो अब तक कुछ न कुछ हो जाता। मैं सब लाभ-हानि पहचानता हूं और तुम्हारे साथ अपना रिश्ता भी-बस ! देखो ना, मुझसे हार नही सही जाती। अगर कोई चुनौती दे तो कमर कसकर उसे पछाड़ने की सोच लेता हूं। सैनिक न बाप था न दादा, न हमने कभी चाकू के साथ उगलिया ही काटी हैं । परन्तु फिर भी जूझने के लिए तत्परता है--दिमागी झूश । खून विकेन्द्रित 81 नहीं बहता ना (वह हंसी---) कभी-कभी उसका भूत जानने की इच्छा होती। किन घटनाओं ने उसे यह वर्तमान रूप दिया था। नृत्य की इच्छा लेकिन उसकी गुलामी नहीं। क्लबों में घूमने की उत्तेजना परन्तु बदतमीजी नहीं अजीब बात है । आदमी के साथ प्रेम जरा भी नहीं परन्तु वफादारी गजब की। न ही अपने मां-बाप से और न ही अपने ससुराल वालो से मेल- मिलाप । विचित्र लक्षण है । केवल एक ही घटना जानता हूं। उसकी बहन दरवाजे की ठोकर खाकर उसकी आंखों के सामने मर गयी-परन्तु और भी कुछ जरूर है। कई और घटनाओं का तालमेल है । बस-शायद एक लेखक के तौर वह उत्सुकता है, उपन्यास गढ़ने का एक अनोखा तरीका परन्तु उपन्यास का क्या है । जितना जान लिया उतना ही काफी है बाकी खुद गढ़ा जा सकता है। मैं उपन्यास जीवन मे नहीं लेता, उपन्यासों द्वारा जीवन गढ़ता हूं। तुम महान हो,मेरे नायक ! और सर्वशक्तिमान का तुम्हारे सिर पर हमेशा हाय रहे- तुम ! मैं हंसा। आज सर्वशक्तिमान कैसे याद आ गया । जब मन डोले तो याद आ ही जाता है । अभी तक इसकी जरूरत ही महमूस नहीं हुई थी- और शायद पड़े भी नहीं । आत्मविश्वास दृढ़ रखो, मेरी चंद्रिका । r T तेरह आज रात हम फिर इकट्ठ लेटे हुए थे। एक साल बीत गया था । नया साल आया था। पिछले साल की रातऔर नये साल की सुबह हमने इकट्ठी ही वितायी थी। (सालों का क्या होता है ? आदमी के लिए अपने आप को भूलने का बहाना चाहिए कमे-न-कैसे अपना अस्तित्व मिट जाय और कोई और बनकर जीवित होकर आ जाये। यही है मनुष्य, यही उसकी आत्मा चाहती है । परन्तु अफमोस, यह संभव नहीं। जो जून भोगने की सजा मिली है उमे भोगना ही पड़ेगा दोस्त !) पिछले माल और उससे 'पिछले भी हम इकट्ठे ही थे। आखिर जनवरी की मर्दी, दीवारों, किवाड़ों और विस्तरो से हड्डियों तक पहुंच रही थी। मेरी प्रेमिका सर्दी का बहुत अनुभव करती थी। ऐसे ही ठर-उर करती खिड़की गर्मियों में भी एयरकंडीशनर सगाओ तो उमे कम कर देती। मेरी प्रिय, अति प्रिय ! आज यह रजाई ऊपर ही ऊपर तानती जा रही पी। जब मैंने उससे या किसी स्त्री के साप-विस्तरे मे हूं तो मुझे कपडे काटने को दौड़ते हैं । भई, कपडे तो चलने फिरने और मध्य कार्यकतार्यों के लिए होते हैं । जब आदमी घिरतर में हो तो वह साहनीय-यापना जानवर पोड़ा गिना जा मरता है। राय तो एक आम जानवर की तरह ही है। और रोर-गा आम या अगली जानवर हे फार नहीं फोगा? देगी मेरी मसार । वस्त्र पहने और गानीन गम में मम्म मनुन श्री है म 1 . विकेन्द्रित 83 एक हीटर कमरे में पहले ही लग रहा था। मैं उठा और दूसरे कमरे में से एक और हीटर लाकर जलाया। कमरा गर्म हो गया और अब उसे रजाई में गर्मी लगने लगी। एकाएक पता नहीं उसके मन में क्या आया कि बेहताशा वह मेरी छाती के वालों पर हाथ फेरने लगी।। बाल मेरे तोडने लगी दर्द हो रही थी। मैंने कहा तो कुछ नही और न ही सी की परतु दोनों हाथों के साथ उसकी गालों को पकड़ा। फिर अपना मुह उठाकर वह मुझे चूमने लगी। पहले छाती पर, फिर गर्दन, फिर गालों और फिर ओठों को । जब थक गयी तो अधमुंदी-सी होकर अपना मुंह मेरी छाती पर रख दिया । शरीर उसका इतना ढीला हो गया, था जैसे उसमे जान तक न रही हो । मैंने उसकी गालों,गर्दन, कान के बालों को धीरे-धीरे प्यार किया । सचमुच ही उसके शरीर में अब वह पहले वाला यौवन नही रह गया था। मैंने उसे हिलाया-डुलाया। कान से पकडकर ऊंचा किया। ::क्या बात है डियर ?' उसने कुछ पल तक मेरी तरफ टकटकी लगा कर देखते हुए पूछा--- . जीवित और अजीवित शरीर मे क्या फर्क है ?' ‘गहरा ज्ञान भरा वाद-विवाद हमारी कमजोरी थी। परन्तु आज मैं कुछ डर-सा गया। ' क्या वात है डालिंग ! बड़ी खोई-खोई-सी हो।' "लगता है कुछ खो रही हूं, खोई-खोई न रहूं तो क्या करूं ।' मैंने ठंडी सास ली। नही, तुमने कुछ नही खोया । और...' अब उसने गहरी सास ली। वह उठी। उसने अपना सिर झंझोड़ा । और मुस्करायो। 'अच्छा कुछ, नहीं खो रही थी परन्तु मेरे प्रश्न का उत्तर ?' "जीवित और अजीवित शरीर." मैं रका यह कोई नयी बात थी । लगता था कि वह इस प्रश्न से मुने किसी तरह फंसाना चाहती है। 'मैं बताऊं?'
84 विकेन्द्रित '- वह मेरे से जरा-सी दूर हट गयी ताकि मेरी आंखों में अपनी आँखें डाल सके। एकटक उसने मेरी तरफ देखा । फिर वह जरा सहमी और उसने दीवार का ढासना ले लिया । घुटने अपनी ठोडी के नीचे जोडे और हाथो मे पिंडलियों को इकट्ठा किया। वैसे ही वह सुन्दर थी, इस पोज मे वह और सुन्दर लगी। किस प्रकार का सौदर्य था उसका? क्या बताऊं और कैसे बयान करूं? सौंदर्य की परिभाषा क्या है ? इसका कैसे वर्णन और विवेचन किया जा सकता है ? हा, बता सकता हूं कि वह कैसे लगती थी। ऐसे ! अल्पाकार थी वह । नाक पतला और नुकीला, हाथ पतले और नुकीले, पर, परों की उंगलियां उंगलियों के नाखून पतले और नुकीले, 'सारे शरीर की बनावट ही अलग-अलग और नुकीली । माथा भी जमे वालों की बनावट की तरह मिमटता जाता । हां, छातिया जरा छोटी थीं। बाल उसके भखियार फैशन के, मतलब कि सिर पर शहद के भले की तरह फूल फूले, फले- फैले । अल्पक अंगों के सामने वालों का मखियार कुछ अटपटा-सा लगता। लेकिन वावजूद इसके उसके शरीर और उसकी जात के लिए एक उमंग एक ललक-सी उठती। उसको आलिंगन में लेने काजी करता। बारिश आमे, अंधेरी ही, सर्दी हो, गर्मी, दिन हो या रात, काम हो या आराम बात उसके मखियार । पहले-पहले मुझे यह जंचे नहीं परन्तु जल्दी ही ऐसे लगने लगा कि अगर उसने ऐसे बाल न बनाये तो यह कोई और ही हो जायेगी । यह बाल उसके व्यक्तित्व और निखार का भाग थे। यह बाल वह थी वह खुद। ठोड़ी के नीचे पालथी मारे और घुटनों के आस-पाम हाथों की जंजीर बनाये वह मेरी तरफ देखती गयी। बंदरी! मैंने यह कहा ती उठकर उसके पैरो, उसके घुटनों चूमा। मुग्ध दृष्टि से वह मेरी तरफ देखती रही। मानिये बदरी... मैंने दोहराया, मान जान बंदरी। भापके साय फोन नाराज हो सकता है, मेरे प्रियतम ! .. हाथों को विकेन्द्रित 85 काश! मरने से पहले मैं तुम्हारे मुंह से आप और तुम्हारे की जगह तू और तेरा सुन सकू। कितनी बार मैंने उमे कहा था कि 'आपका' यह बुर्जुआ चिह्न या शब्द समाप्त करो। सीधी तरह बुलाया करो। तुम कोई मेरी पत्नी थोड़े हो हो ? मित्र हो। वह मानती परन्तु कहती पता नहीं 'तुम' कहते-कहते कैसे 'आप' बन जाता है। कहती कि शायद उसके ओंठो और दातो में कोई कमी है । मैं कहता कि नही तुम्हारे भेजे में कोई कमी है । कहती : आप फिकर न करें आपको 'आप' कह कर मैं अपना नाम भी पति तसवर करती हूं और न ही पत्नी बनने के लिए वर्गलाती ही हूं। कैसे हूँ, जैसे भी हूँ। मुझे जीवन में इतना रस मिला है, वह क्या कम है ? मैं और कुछ नहीं चाहती। स्वाभाविक तौर पर और हंसी-हसी मे बातें करती वह कभी-कभी अधिक अधीर हो जाती और कोई ऐसा- वाक्य बोल जाती कि मेरी काया तड़प उठती। मुझे याद है उपन्यास और उपन्यास की रचना के बारे में चर्चा करते-करते एक दिन उसने कहा : • कही मेरी जिन्दगी का ऊंट-पटाग उपन्यास न गढ़ दीजियेगा? यह उपन्यास अगर कभी लिखने योग्य हुआ तो लेखक को जला देगा और पाठक को सडा देगा। हैरानी है कि लाखों साल की इतनी उन्नति के बाद भी मनुष्य अपनी आपबीती और अपने जज्बातों का कागज पर सही तजमानी करने में असमर्थ है। तुमने मुना और समझा प्रिये ! मैंने सुना और समझा । यदि मुझे भक्ति मिलती रही तो आखिरी उपन्यास यही होगा जिसके बाद जलती हुई चिता मे जा भिराजूगा . मैं सोच रहा था और वह मेरे मुंह पर उठते उतार-चढ़ाव देखे जा रही थी। मेरे प्रश्न का उत्तर? अभी तक भूली नही क्या ? मेरे प्यारे, शरीर तो शरीर ही रहता है चाहे वह जीवित हो, चाहे मुर्दा। बीच में से रूह उड़ जाती है। रूह या जो कुछ मरजी है उस वस्तु को निश्चित कीजिए । वह यस्तु उड़ी तो यह लोप बनी" 86 विकेन्द्रित मैं उसकी तरफ देसे जाता"कोई देवतुल्य वानी वह किये जा रही थी। ऐसे ही जिस शरीर में से प्यार उड़ जाये यह शरीर लोथ बन जाती है जाति मसला खत्म हो जाता है। मैं भाषण नही दे रही और न ही उपन्यास ही रच रही हूं। जिस शरीर के परो के नाखूनों को चूमा हो, जिस शरीर का पसीना अमृत रहा हो, जिस शरीर का टट्टी-पेशाब भी पुनीत और पवित्र जाना गया हो, जब उस शरीर से अपनत्व के लिए प्यार गया तो उस शरीर की लुभावनापन, बुद्धि और महानतां लोथ होती है । डियर ! मैंने पुकारा। मेरे प्रियतम। वह बोली। अगर हम एक-दूमरे मे समा गये, शरीर हमारे एक-दूसरे में कित और मूर्तिमान हो गये। शरीर की लोयें ? नेत्र हमारे वंद-बंद कि अंधे ? मैंने अंधे नेत्रो से उसे देखा । अपना उसका दुनिया का, दुनियादारी का और खंड ब्रह्माड का संपूर्ण अंत । जहां-जहां भी कोई जीव था वह लोय वनती गयी । सांस, रूह या चलती-फिरती कोई वस्तु पिघलती गयी। हरकत खत्म होती गयी.। गाड़ियां, विमान, जहाज, मोटरें, तांगे सब रुक गये। सारी दुनिया पक्षियों और जानवरो के समेत वस्तु-विहीन धरती पर बिछ गयी थी और फिर मैंने क्या देखा कि पृथ्वी की चाल में भी कोई बाधा पैदा हो गयी है । उसको गति कमतर होती जा रही है। हा, बडी तेजी के साथ उसकी रफ्तार कम हो रही थी । जव' धरती इतनी धीमे घूम रही थी कि मैं उसका चक्र-चक्र गिन सकता था । और अंत में पृथ्वी की चाल भी रुक गयी । समूह, सर्वशून्य, सुनसान और फिर जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उगलियों में कोई बटन दबाया हो और सूर्य को रोशनी मद्धिम होने लगी"पश्चिम होती चली गयी होती गयी और वुझ गयी, अरबद- नरवद संधुकारा।
चौदह " अव मुझे अनुभव करते देर न लगी कि मैं अपनी पड़ोसन मद्रासन से प्रेम करता था। कभी प्यार ऐसे भी हो सकता है, इस बात का मुझे कभी गुमान नहीं था, न ही अनुभव और न ही कभी किसी किस्से-कहानी, उपन्यास मे ही सुना था। मैं नीलाम हो रहा था और नीलाम हो रही निर्जीव या बेजुबान वस्तु या जानवर की तरह अज्ञान रहा । गया गया ""दो "कई बार ऐसे शब्द दिमाग में पडते और नीलामी दृश्य सामने आ जाता। परंतु मन में एक और ही शोर मचा कि मैं इस नीलामी की लड़ी का तीसरा शब्द न चुनता। यह अनोखी नीलामी थी और बोली वाले ने इतनी जोर से घंटा बजाया कि मेरा कल्पित मन चुप था और मैंने सुना, गया "गया"(और फिर तीसरी बार) गया। एक "दो (और फिर अंतिम शब्द) तीन । मैं बिक गया, नीलाम हो गया। मुझे प्रेम से घृणा है। घिनौना यह शब्द ! घिनौनी यह भावना! घिनौना ही इस शब्द या जज्बात को छूना या बतियाना, और इसके अधीन हो जाना। प्रेम की अधीनगी मे मनुष्य का मूल्य, कौड़ी समान हो जाता है । नीलामी हुई तो भूसे के भाव सोना विक गया । प्रेम मनुष्य के आत्मसम्मान का प्रतीक है। प्यार में ऐसे मनुष्य किसी के पैरों मे लोटपोट होता है और इस प्रकार की किलकारियां मारता है कि दूसरा पक्ष कहता है-छी-छी भिखमंगा, दुरदुर कुत्ता। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि दो जीव एक-दूसरे के प्रेम का आदान-प्रदान करते हैं। यदि अन्तर है तो सिर्फ इतना कि एक नहीं बल्कि दोनों ही छी-छी भिखमंगे हैं और दुरदुर कुत्ते।
88 विकेन्द्रित दूसरे के सामने लोटते फिरते हैं । गालें फेंकते फिरते रहते हैं। अगर उस समय अहंकार जागता भी है तो दूसरे पल सिमट जाता है । प्यार के इस शक्तिशाली परन्तु मलीन क्लबले के सामने कोई आत्मचिंतन और आत्म- चैतन्य कार्य करने का साहस नहीं कर सकता। इसीलिए तो मैं कहता हूं कि सच्चा प्रेम (?) केवल भीतरी सच्चाई के साथ सर्वव्यापी या सर्वव्यापकता के साथ अदृश्य वस्तु के साथ संभव है। उसके सामने अहंकार का मरना विजय है, इंसान के आगे अहंकार को मारना पराजय । गुरुद्वारों में संगत जोड़े (जूते) झाड़ती है तो पुण्य समझा जाता है, इंसान के जोड़ों को हाथ लगाना पाप । भीतर ही भीतर अपने आपको कोसते जाना और यह समझना जैसे वह कह रहा है और फिर भी झुकते जाना मिट्टी के साथ- --मिट्टी हो जाना यह महानता है। परन्तु किसी इंसान से ऊंचा कहलवाना भी निरादर । बस उसके पैरों पर गिरे तो इस संसार का कोई भी प्राणी, कोई भी अधिकारी, कोई भी बादशाह, कोई भी अफसर आखों के नीचे नही टिकेगा । एक अह मरा, एक अहं जन्मा। आध्यात्मिक विश्लेपण तो मैं हजार करता हूं परंतु सच पूछो तो मैं इम परमार्थी पद पर चलने मे खोखला हूं। उसके सामने मैंने अहकार मारने का कभी कोई प्रयास ही नहीं किया और दुनियावी अहंकार टे की टीसी होती है । हे भगवान, किसी को खाते-पीते घर मे पैदा न करना। उजड्ड अमीरों के घर पैदा होना, गरीबों के घर पैदा होने के समान है । परन्तु सभ्य बुद्धिमान बचपन मनुष्य के भविष्य के लिए अत्यंत हानिकारक है । आस-पास के जिस वातावरण में दुनियावी अहं की टै किसी को भी आंखों तले नही टिकाती और इमीलिए उसके व्यक्तित्व के लिए विनाश• इसी असाधारण परवरिश और विकास के कारण में प्रेम करने की माधारण हिमाकत कभी नही कर सका। कहा करता था कि मुझे अपनी पत्नी से प्रेम है परन्तु यह प्यार शब्द और प्यार जग्बात को गलत व्याख्या है । कोई प्यार वगैरह नही था। मैं उसे गुरद्वारे देखता, फिर लुक-छुप कर फिर रौव-दाब से और फिर मैंने अपने पिता से कहकर उसके बाप को " कारी है।
विकेन्द्रित 89 शादी के लिए मनवा लिया। मनवा क्या लिया वे तो हमारे इशारे पर घुटने रगड़ते हुए आये । वह अपनी चढ़ती जवानी मे मुझे सुन्दर लगी, औरों से अधिक सुन्दर । कुछ चुलबुली थी बस दिल आ गया जिसमें लिंग- संतोष का हिस्सा अधिक था। लायलपुर में और कोई मुझे जंची नही और भारतवर्ष का जन्मा-पला युवक नया-नया यूरोप जाकर तो मेले पर गये जाट की तरह ही होता है। वहां का जीवन और सभ्यता उसके लिए पहेली ही रहती है। पूर्ण संस्कृति का मान राजनीतिक गुलामी और पिछड़ा- पन, लिंग से घबरा-घबरा जाने के बुनियादी संस्कार और उनका आपके प्रति एक चिडियाघर छुटकारा पाये और कच्चा मांस खाने की अभी-अभी आदत छोड़े एक मानव जानवर वाला बर्ताव, आपको भारत में छोड़ी- अपनी सुंदर, सुघड़, सहज पत्नी के प्रति वफादार बनाये रखने पर मजबूर कर देता है। कोई सनकी.ही ऐसे संस्कारों से ऊपर उठकर सोच सकता है और मैं सनकी नहीं। - हां,..जब आप वहां जाकर रहे, बसें तो आप का बौद्धिक स्तर किसी पाये तक जा पहुंचे तो और स्थिति है । फिर खुशकिस्मती यह कि पत्नी से अलग होना पड़ा। रोज की टोय; दाय से जान छूटी । रोज की खिधा-खिंची मनुष्य की वास्तविक बुद्धिमत्ता और बुद्धिजीवी बनने मे एक दीवार है। अलावा इसके, मेरे छोटे भाई ने मुझे बिना किसी काम पर लगाये या काम बताये आय के साधन से मुक्त रखा । अब आप ही बताइये कि सांसारिक अहंकार से मेरी मति क्यों न प्रष्ट होती। और फिर क्यू न मेरी मति फिरे, किसी का लेकर खाता हूँ क्या ? किसी की इकंती की है क्या ? सो ऐसा आदमी जब नीलाम हो तो यह कोई मजाक नहीं । तड़पन, सपन, खपन, सड़न, जलन का कोई खास अनुभव नही । मित्र प्यारे, मैं क्या कर। उसके प्यार में अब मुझे तड़पना और जलना पड़ रहा है । सारे पूर्व और सारे पश्चिम की सुन्दर से सुन्दर लड़कियों को आँख मारी नहीं कि वे भुस्करायी नही । परन्तु यह एक ऐसी स्त्री है जिसे मुस्कराना ही नहीं पातो वह मुझे प्यार न करे तो जुदा बात है । प्यार मुझे वह जरूर करती है । याद नही मुझे कि वह मूक प्रश्न, जो उसने मुझसे पूछे, जब मैं . आता।
90 विकेन्द्रित । उसका हाथ पकड़ रहा था? और कैसे देवती थी तब वह मेरी तरफ अपने नयनों के कोनो से ? यदि अपने आपको मेरे प्रेम में गहरी तरह उतराने की चाहवान नही थी तो क्यो जिमयानों में बैठकर अपनी मजबूरी की कहानियां छेड़ बैठी । वह मुझे कह रही थी : . 'समझ लो मेरे दिल में क्या है परन्तु मैं खुद बता नहीं सकती। मेरी मजबूरियां है । मेरे सस्कार हैं, मेरा लालन-पालन है। तुम जैसा खुले स्वभाव का और सफेदपोशी दृष्टिकोण नहीं। हमारे समाज में पराये मर्द से बस प्यार करना है, उसका इजहार करना नही । जान दे सकती हूं परन्तु' उंगलियों के साथ उंगलियां नहीं छूने दे सकती। तेरे इश्क में घुल-धुलं कर मर सकती हूं, परन्तु तुम्हारे साथ मुस्करां नहीं सकती। क्या ? तुम्हे यह पसन्द नहीं। तुम मेरी मुस्कानों, मेरे शरीर को स्पर्श करने को लालायित हो । हां, मैं जानती है परन्तु"परन्तु मैं मजबूर हूं।' 'अगर तुम मजबूर हो सुन्दरी, तो मैं भी मजबूर हूं। अगर तुम्हारी सभ्यता है तो मेरी भी है। मैं तुम्हे छू के छोडूंगा, दवा के छोडूंगा, चूम के छोड़ गा और यह भी कोई रास्ता है अगले को तरसाने का जो इस बीसवी सदी के दूसरे मध्य में नहीं जमता।' परंतु फिर मन कहता: पगले अगर प्यार है तो प्यार में झुक कर देख । दुनियावी और हकीकी इश्क मे कोई भिन्नता नहीं। जब प्रेम का आवेश हो तो मनुष्य भगवान बन जाता है। ऐं, मनुष्य भगवान बन सकता है परन्तु यारों ने तो कभी भगवान को परवाह नही की, उसके नितम्बो पर भी ठोकर मारी है परवाह तो हमारी भगवान ने की है। ऐसे संयोग बनाये हैं कि न कभी रोटी की चिन्ता रही और न किसी और चीज की। भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय खून-खराबे के बाद भी उसने पैरों पर खड़ा कर दिया । सो जो कुछ आप चाहते हैं वह मुश्किल है। हमारे वस का रोग नहीं। क्या करोगे फिर? क्या करना है, देखेंगे। पहले तो अब उसको आकर्षक मुख के नारे में ही-सोचने से फुर्मत नहीं । - विकेन्द्रित 91 मिलती । तंग आया हुआ था मैं सफेद और गोरी लड़कियो से । असली रग, रंग गेहुंआ । सिर्फ अनुभव करने की चाह नही। वास्तव में इस रग मे अपना एक आकर्षण है और फिर उसके मुख का आकर्षण? आधुनिक नवीन चित्र ! आजकल सुन्दरता, संघर्ष, असमानता, अतुल्य मे बमती है न कि समतुल्य मे समानता में । तुम्हारे नाक, गाले, ओठ, ठोडी, कानो पर रेखाएं, इन सभी अंगो की असमानता ही तुम्हे खूबसूरत बनाती है। लोगों की तो आखें ही नहीं। वे अधे है, वुर्जुआ हैं । वह तुम्हारी भीतरी खूबसूरती पहचान ही नही पाते। पल-पल तुम्हारा मुख सामने आता है, पल-पल तुम्हारे हाथ, तुम्हारा शरीर दिमाग में झुनझुनी छेड़ते है। कभी तो इन्हे छूने का सौभाग्य मिलेगा, कभी तो तुम्हारे करीब जगह मिलेगी ही सुन्दरी ! हां, सुन्दरियों, में सुन्दरी, मैं तुम्हें प्यार प्यार करता हूं। .
पन्द्रह वे भी रातें थीं और यह भी रातें हैं । तब जब मैं अपने चौड़े पलंग पर लेटता तो मैं इस विशाल ब्रह्माड़ का एक महत्त्वपूर्ण जुज होता । देश-विदेश, आकाश-पाताल का ज्ञान मेरे मस्तिष्क मे घूम रहा होता, कभी मै पेरिस, कभी लन्दन, कभी न्यूयार्क, कभी लासएंजलीस, कभी टोक्यो। मैं धरती को घूमते हुए प्रत्यक्ष देख सकता। चार लाख किलोमीटर दूर मैं चन्द्रमा पर विचरण करता। मंगल, वृहस्पति, वीनस और यूरेनस भी उड जाते । वाह-वाह चाद पर घूमती धरती को देखने की बहार ! बड़ी दुरवीन के साथ मैं भारत और पाकिस्तान पहचान सकता था। और मैं कहता-यह मेरा-जन्म स्थान है-लायलपुर। कभी लेटे-लेटे गुरु नानक या गुरु अर्जुन की वाणी का कोई पद जवान पर घूमने लगता और कभी मैं सारा पाठ ही मन ही मन गुनगुना देना कभी बांका गुरु गोविन्द सिंह अपने नौले घोड़े और सफेद बाजों के मार लहरता, खेलता, मुस्कराता, तीर खीचता, शमशीर निकालता मेरे नयनों के सामने निकल जाता और मैं ओंठों में ही उसकी स्तुति करता और वाणी विचारता । इस दौर मे बहते-बहते फिर मुझे भगवान कृष्ण अपने साथ वृदावन ले जाते और कहते : 'कल आओ तुम्हे इस जगत मे परलोक की संर कराऊ ।' कभी कृष्ण के साथ मैं महाभारत का युद्ध लडता, अर्जुन और दुर्योधन के माथ वाद-विवाद करता (लड़ाई के ढग कितने बदल गये हैं) फिर मुली पर टंगे ईमा मसीह मुझे पल ही पल के लिए उदास कर देता विकेन्द्रित 93 परन्तु जब वह संजीदा और दृढ़ मुझे कहता : सूली चढकर मैं अमर हो गया हूं ताकि तुम लोग भी सभी अमर हो जाओ। या हो जाने की आशा कर सको। तो मैं भी दृढ़चित्त होकर दुनिया के मिद्धान्तों और उसूलों के लिए जूझने की हिम्मत अपने आप में अनुभव करता । (धर्मो और पैगम्बरों के नाम मैंने इसलिए नहीं गिनाये कि मैं 'हिन्दू-मुसलमान-सिख-ईसाई; और यह सभी हैं भाई-भाई' के फीके नारे का समर्थन करू । नही, यह सब व्यक्तित्व वास्तव में बिस्तर पर लेटे मेरे सामने आती।) कृष्ण और ईसा के बारे में सोचते हुए सहज ही मे तब और अब का तुलनात्मक रूप सामने आ जाता है । वह उन्नति जो मनुष्य ने की इस समूचे विकास की कड़ियां और पडाव धर्म के लिए अधर्म की इन्तहां और अधर्म के लिए धर्म का बलिदान ! धर्म से दार्शनिकता की तरफ आता वेदान्त और वेदान्त की व्याख्या करते अनेक टीका-टिप्पणिया। हमारे दर्शन के छह चरण-महात्मा बुद्ध का अप्ट-पथ, उच्च विश्वास, उच्च अभिव्यक्ति, । उच्च विचार, उच्च संस्कार, आदि शंकराचार्य और उसके मठ प्लेटो, अरस्तु, मुकरात, सोफीनियोर, रूसो, हीगल, वरक्सन । (पिछली बार यूरोप गया तो रूसो का जन्म-स्थान देखा।) दार्शनिकता और साहित्य पड़ोसी हैं लिहाजा जिन लेखकों और कवियों ने मेरे व्यक्तित्व पर प्रभाव हाला उनके नाम, उनकी रचनाएं सोये-सोये याद आती है । शकुन्तला से बढ़कर कालिदास का 'विक्रमोर्वशीयम्' क्योकि शायद कभी यह कोर्स में पढ़ा 'या। होमर, टाल्सटाय, विक्टर ह्य गो, टैगोर, शरद् चन्द्र, डिकन्स; बोकलेयर, विटमैन, खलील जिब्रान (मेरे ज्ञान से प्रभावित हुए कि नही?)। अपने चौड़े पलंग पर रात को सोने के लिए लेटना मेरे लिए एक रोचक समय होता । कभी कोई किसी समारोह में मेरे गले मे हार पड़ रहा होता (काफी नाम कमाया है ?) कभी किसी अन्तर्राष्ट्रीय बैठक में गरमा- गरम वहस कर रहा होता। आज प्रशंसकों के पत्रों की फाइलें पलटने का जो करता । नहीं, आज नही कल, यह पलंग कौन छोडे । वे लडकियां और औरतें जिनको मैंने आकर्षित किया किसी के साथ सिर्फ दिल्लगी, किसी के साथ हाय-मिलाई, किसी के साथ चुम्मन, किसी के साथ भोग । कोई विचरण करने के समान है। परन्तु सरकारी अजायबघर नही, अजायबघर .94 विकेन्द्रित वनी-ठनी सजी-सवरी मेरे साथ किसी क्लव में नाच रही है। कोई धीरे- धीरे और एक-एक करके अपने वस्त्र उतार रही है और तह करके रख रही है । मैं नीचता हूं : 'इस ममय इसकी क्या जरूरत है ? जल्दी करो मैं तिलमिला रहा हूं।' कोई अधढकी ही बिस्तरे में घुसने को दौड़ती है तो मैं लौटा देता हूं; यह भी कोई तरीका है विस्तरे में पड़ने का? आह ! यह कसी विचित्र शारीरिक बनावट है। आह ! यह कैसी उभरी हुई छातियां सुन्दरता तो है परन्तु कुरूपता कौन-सी कम है । यह सात-रिंग रोड पर मजदूरों की झोंपड़ियां । चार अदद इंटें जिसके लिए चोरी का इल्जाम । चार बांस के टुकड़े जिनके लिए मीलों का सफर परन्तु महलों और कोठी वालों के लिए यह भी भार हैं। ऐसे घृणित नमूने उनकी आंखों को काटते है-इनको हटा दो, जला दो। बच्छा! इनको हटा और जला दें, तो फिर अमीरों के महलों और कोठियों की दीवारें क्यों साबुत रहें ? गरीब, अनाथ, भूखे, बिलबिलाते वच्चे भारत में और अन्य पूर्वी देशों मे । वीएतनाम में लूले-लंगड़े और अन्धे पैदा होते बच्चे। मध्य यूरोप जंगी अमन । पिछले दो विश्व युद्ध और वर्तमान परमाणु बमों के खजाने ! : (बस यही विकास है मानवता का !) अफ्रीका और अमेरिका के हब्शी--- काली शक्ति । वाह-वाह, कैसे बाजार भरे हैं रौनक है, झाड़-फानूस के प्रकाश में नैन चौंधिया रहे है । बाजार भी भरे है और दुकानें भी भरी हैं। कपड़ो की दुकानें, कहवाघर, रेस्तरां, मिठाइयों और चाकलेटों के बाजार हैं परन्तु" परन्तु मैं भूखा और अधनगा इस बाजार के बीच से निकल रहा हूं। मेरी भूख और मेरी नंगेज को दूर करने में असमर्थ है यह सजा-संवरा बाजार। मैं नंगा और भूखा ही मर जाऊंगा परन्तु यह बाजार भरा रहेगा। मरो या -जियो हमे क्या? भारी-भरकम पलग पर लेटना एक बडे विशाल अजायबघर में मेरा अपना, निजी । कभी कोई अजूबा उठाकर झाड़-पोंछ रहा था, कभी ी चीज की प्रशंसा कर रहा हूं तो कभी अदल-बदल कर उलटा-फिरा मे - विकेन्द्रित कर देगता हूं। अजापरपर भी और पुस्तकालय भी। कभी कोई पुस्तक : उठाकर माहता हूं, कभी किसी में पडी निगानी सोचता है । लाइभेरी प्री तो अनुसंधानगाला है। एक दराज धींचना हूं तो अपनी पत्नी को लिग्री कुछ चिट्टियां हैं। दूसरे दराग में रूस-याा के चित्र हैं। एक फाइल में. सिर्फ इविहारा मे गम्यन्धित ऐतिहासिक उपन्यास लिगने के ममय इकट्ठी की गयी सामग्री है आह । और देग्रो इसमें मे क्या निकला? उम जर्मन सहकी को चिट्ठियां जिसे मैंने घोषा दिया और यह क्या है ? बड़ा सम्भाल- सम्भाल कर रखा हुआ है ? हां, यह चीज ही सम्भालने योग्य है । कोढ़ के समय हजारों को मार सकता हूं। कैसे ? देखिए तो सही युद ही जान जायेंगे। देखो यह महारमा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, राधा कृष्णन, रवीन्द्रनाथ टैगोर, वटेंड रगेल, या पॉल सारे, द गाल, विसटन चपिल, खुश्चेय, आन्द्रे मनरो, जान केनेडी के पत्र (रह गया है वर्तमान सदी का कोई और श्रेष्ठ महान पुरप ?) और भी हैं जरा देखो तो सही। और इस आकर्षक जिल्द में समाये हैं कई महान व्यक्तियों के हस्ताक्षर। इस पलंग पर लेटे ही मैंने अपने सब महान उपन्यासों की रचना की। यहा ही मैंने अपने पात्रों के नक्श गढ़े और उनकी दलीलों कोखीचा । अनेक पार, अद्भुत पात्र, चोर-डाकू पात्र, खूखार पात्र (जिनसे मुझे खुद भी डर लगता) विनम्र, सुगम पात्र (जिनके लिए मैं खुद सब कुछ करने के लिए तैयार), अपने दुखान्त पात्र (जिनके लिए वास्तव में मैं रोया) और प्रधान पनि, सहायक पात्र, अल्प पात्र, छाया पात्र, मध्यम पात्र, गोले पात्र" मैं आप ही अपनी प्रतिभा पर हैरान हुआ करता था । मुझे सदा ऐसा लगता कि मैं किसी न किसी महान और उत्कृष्ट घटना के किनारे खड़ा मुनती हो सुन्दरी, कैसी रातें होती थी वे जब तुम भद्दी, बेशक्ल, मुखौटे वाली थी? और आज तेरे सुन्दर मुखड़े ने इन रातों की क्या हालत कर दी है । आज तेरी मुहब्बत ने क्या-क्या सितम ढाये हैं ? जानती हो? सारी पढ़ाई-लिखाई, गहन-ज्ञान और बुद्धिमत्ता पर पानी फिर गया है । हा, पानी की बाढ आ गयी है। बुद्धि और ज्ञान की विशाल .
96 विकेन्द्रित आकाश उसके नीचे डूब गये हैं। समझो सारा ज्ञान सागर में समा गया है और इस सागर पर मिर्फ एक तुम "तुम ही मुस्करा रही हो, कल्लोल कर रही हो, ऐंठ रही हो, इतरा रही हो। इस असीमित सागर पर एक तुम ही नाव हो, एक तुम ही अप्सरा। और सारी धरती, सारे चाद और तारे, मगल, शनि, वीनस, यूरेनस और वृहस्पति पर तुम ही पसर गयी हो । सारी मूर्य की, ब्रह्मांड की काया और जितने भी और गृह कर्म हैं वह भी सब तेरे व्यक्तित्व ने अलोप कर दिये है । अब तो सब तुम्हारा ही तुम्हारा साम्राज्य छाया हुआ है और तुम्हारे ही आस-पास सभी ग्रह और उपग्रह घूमते हैं। तेरे इश्क ने खण्ड ब्रह्माड में उथल-पुथल मचा दी है (वैज्ञानिकों को अव नये सिरे से अपनी खोज शुरू करनी पड़गी।) अब सय कविता, गद्य, पद्य, रचना, वाणी, गुरुवाणी भूल गयी है और बस तुम्हारा ही नाम जपना है । तुम्हे मालूम है मेरे धर्म मे नाम जपने की कितनी पुष्टि की गयी है ! नाम जपने से मनुष्य मुक्त हो सकता है । जितनी बार मैं तुम्हारा नाम जपता हूं अगर उसका चौथा हिस्सा भी अकाल पुरख की तरफ लगाऊं तो मैं जन्म-मरण से मुक्त हो जाऊं ! अब मेरा तुम ही धर्म हो और तुम ही कर्म (और तुम ही शायद अधर्म और कुकर्म मेरे पुस्तकालय मे जड़ित सभी पुस्तको पर सफेदी बिसर गयी है जिस पुस्तक को भी हाथ लगाता हूं और जिसका भी पन्ना पलटता हूं उस पर वस तुम्हारा चित्र ही उभरा हुआ दीखता है और तुम्हारा नाम ही छपा रहता है । वाकी सब खाती है। मेरे दराज, मेरी अलमारियां, भरी तो वैसी की वैसी ही है परन्तु उनके भीतर पड़ी फाइलें और कापियों के अन्दर सब पत्र, कागज और अन्य सामग्री गायब है। जिस चीज को भी देखता हू वीच से तुम ही निकलती हो। कभी मुस्करती हुई, कभी गम्भीर और कभी मुझे मुकड़ती, सकोचती अपना हाथ दिखाती, कभी मेरे साथ नाचने, मेरे साय भोग करने की चाह करती हुई। अब इस चौड़े पलग पर सिवाय हमारे और मेरे और कोई नहीं । कभी-कभी मैं भी नदारद सिर्फ तुम ही तुम लेटी रहती हो ।
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96 विकेन्द्रित आकाश उमके नीचे डूब गये है। समझो सारा ज्ञान सागर में समा गया है और इस सागर पर मिर्फ एक तुम "तुम ही मुस्करा रही हो, कल्लोल कर रही हो, ऐंठ रही हो, इतरा रही हो। इस असीमित सागर पर एक तुम ही नाव हो, एक तुम ही अप्सरा । और सारी धरती, सारे चाद और तारे, मंगल, शनि, वीनस, यूरेनस और वृहस्पति पर तुम ही पसर गयी हो। सारी सूर्य की, ब्रह्मांड की काया और जितने भी और गृह कम है वह भी सब तेरे व्यक्तित्व ने अलोप कर दिये है । अब तो सब तुम्हारा ही तुम्हारा साम्राज्य छाया हुआ है और तुम्हारे ही आग-पास सभी ग्रह और उपग्रह घूमते हैं । तेरे इश्क ने अण्ड ब्रह्माड में उथल-पुथल मचा दी है (वैज्ञानिको को अब नये सिरे से अपनी योज गुरु करनी पड़गी।) अब सब कविता, गद्य, पद्य, रचना, वाणी, गुरवाणी भूल गयी है और बम तुम्हारा ही नाम जपना है । तुम्हें मालूम है मेरे धर्म में नाम जपने की कितनी पुष्टि की गयी है ! नाम जपने से मनुप्य मुक्त हो सकता है । जितनी बार में तुम्हारा नाम जपता हूं अगर उसका पौधा हिस्सा भी अकाल पुरण की तरफ लगाऊं तो मैं जन्म-मरण से मुक्त हो जाऊं । अब मेरा तुम ही धर्म हो और तुम ही कर्म (और तुम ही शायद अधर्म और जुर्म भी)। मेरे पुस्तकालय में जहित गभी पुस्तको पर सफेदी गिर गयी है जिम पुस्तक को भी हाप सगाता हूँ और जिमका भी पना पलटता हूं उस पर यम तुम्हारा मित्र ही उमरा हुआ दीयंता है और तुम्हारा नाम ही पा रहता है । यात्री गय पाती है। मेरे दरान, मेरी अलमारिया, भरी तो वंगी को बंगी ही है, परन्तु उनके भीतर पर्टी फाइलें और मारियों में अन्दर गय पत्र, कागज और अन्य गामग्री मापर है। गिग पीर मो भी देता योग ग तुम ही निरसी हो। कभी मुग्करसी , कभी गम्भीर भौर सभी मो गुरहती, गरोगी अपना हाप दियाती, सभी में गाय मापन, मेरे माप मांग पर पानी। मश :म गौह पर पर मिसार हमारे और मेरे और कोई मही भीभी भी नारदमि नुम हो तुमटी पहनी हो।
विकेन्द्रित 97 अब यहां न तो मलिन, न बकिंघम पैलेस, न ही ऐलिजे, न ही राष्ट्रपति भवन और न ही ह्वाइट हाउस (जिन सब जगहों पर मैं रह चुका हू) के सपने हैं और न ही रिसती हुई झुग्गिया, लू से जलती झोपड़ियां, ठण्ड में सर्द होते तम्बू, (इनमे भी मैं रह चुका हूं) की याद । अब तो गोरी, अगर राष्ट्रपति भवन या एतिजे महल है तो भी तुम हो और अगर ठण्डे तम्बू और जलती झोपडी है तो भी वहां तुम हो। अब मैं क्या नावल लिखूगा । अव क्या घटनाओ को जोडना, तोड़ना, फिर जोड़ना और फिर तोड़ना । अगर जोडना है तो भी बीच में तुम हो और अगर तोडता हूं तो भी एक से दो होती, दो से तीन और तीन से अनेक "फिर भी सही-सलामत । तुम सभी जगह पर विराजमान हो । और सर्वव्यापी हो। अब मैं भला क्या पात्र गढूगा, सवारूंगा और लिखूगा।' अब सब अद्भुत सुगम, दुखान्त और निरर्थक पात्रो में तुम ही एक पात्र हो । अब तुम ही प्रधान पात्र और तुम ही सब पात्रो मे विचर रही हो। अब.इस पलंग पर नींद नहीं आती। निश्चित होकर सोने वाला आदमी अब करवटें बदलता रहता है। रोज नौकर को विस्तर अच्छी तरह झाड़ने के लिए कहता है फिर भी कोई चीज चुभती रहती है । अब कभी यह पलग मेरे लिए बहुत छोटा और कभी मेरे लिए बहुत बड़ा हो जाता है। और फिर जानती हो, मैंने क्या किया? मैं पलंग की जगह बैठक में जाकर तस्तपोश पर सो गया। कीमती अफगान कालीन के साथ सजा यह तस्तपोशं दीवार के साथ टिका है । भला कौन-सी दीवार? जो दीवार हमारे बीच में है। क्या मैं जानता हूं कि मैंने क्यों पलंग छोडकर तख्तपोश पर सोना शुरू कर दिया है ? हां, भई ! तस्तपोश पर सोने से गरदन सीधी रहती है और पलगों पर सो-सोकर पीठ मे निरन्तर हल्की-हल्की-सी दर्द रहने लगी है। और किसी ने क्या समझा था कि इस दीवार के साथ सोया । मैं तुम्हारे नजदीक रहूगा। नहीं, यह बात नहीं "परन्तु अगर सच पूछो तो असली बात यही है । अब क्या अपने आपको झुठलाना ।
सोलह प्रेम पवित्रता है, प्रेम मासूस है, प्रेम की मूर्ति, दिल, हृदय, प्रेम का माहौल पाकीजगी । प्रेम की कसौटी, कुंवारापन । मुझ बिगडैल को आज उसके प्यार ने संवार दिया। छोटी उम्र में मेरे लिए परायी नारी मां या वहन के समान रही हो परन्तु यूरोप से लौटने के बाद और खास तौर पर विभाजन के पश्चात मुझे ऐसी कोई तमीज नही रह गयी थी। और उससे भी खासकर जब मेरा पहला उपन्यास छपा तो मैंने समझा कि अब मुझे जो मरजी हो, करने का लाइसेंस मिल गया है। बुद्धिजीवी होना और चीज है और अपने आपको बुद्धिजीवी समझने वाला महसूस करता है कि वह मानवता, सदाकत, सदाचार के उसूलों और बन्धनों से ऊपर है। बुद्धिजीवी इसीलिए सम्यता और समाज के लिए कलंक भी हो सकते हैं। जहां तक मेरा सम्बन्ध है, मैं बहुत नीचे नहीं गिरा। सिर्फ इन स्त्रियों के मामले मे मैं, आजाद सम्बन्धों का इच्छुक रहा हूं और प्रचारक भी परन्तु इस लीक के लिए मेरे पास कारण हैं (किस लीक के लिए किसको कारण नहीं मिल सकते?) आज उसके प्यार ने मुझे कुठाली मे डाल दिया है। वहाँ मैं बहुत गर्भ हुआ, खूब गर्म हुआ और इस प्रकार धीरे-धीरे मैं पवित्र होने लगा। जो मुझमें पोट थी वह गल गयी। कच्चापन भी ढल गया। बस, अब सच ही सच था--भीतर और बाहर । पत्र-प्रेरक ने तो जाना ही था उसको याद, उसके ख्याल भी गये। अब और सहेलियां भी गयीं। अब न किसी की सरफ चूमने न उसके साथ भोग करने की इच्छा रखते हुए देखा । मैं विकेन्द्रित 99 वास्तव मे कुंवारा था। और तुम ! क्या तुम भी मेरे प्यार मे कुंवारी हो रही थी या हो गयी थी? क्या तुमने भी अपने पति के साथ भोग करना छोड दिया था। तुम्हारी जिन्दगी मे तो सिर्फ तुम्हारा पति ही था। जो तुम्हारे कुवारेपन का खण्डन कर सकता है । और तुम किसी के माथ क्या मन बहलाओगी। सचमुच तुमने अपने पति के सिवाय किसी का हाथ नहीं छुआ। अपने पति के अतिरिक्त क्या कोई आदमी तुम्हें अच्छा-अच्छा, मीठा-मीठा सुन्दर-मुन्दर नहीं लगा? यह अजीब बात है, हम रोज मिलते हैं, बातचीत भी करते हैं परन्तु फिर भी मैं तुम्हारे वारे कुछ अधिक जानता नहीं लगता । अभी तक तुम मुझे यह अनुभव कराने में सफल हुई हो कि तुम परम्परावादी माहौल में जन्मी-पली । तुम पढ़ी-लिखी जरूर (मद्रास और मैसूर में) परन्तु इस माहौल के असर तले तुम निकल न सकी। तुम्हारी शादी परम्परागत तरीके से हुई। तुम्हारे मैके और तुम्हारे ससुराल तथा तुम्हारे अन्य सब रिश्तेदार भी उपचारवादी हैं। परन्तु मैं जानता चाहता हूं कि तुम्हारा निजी उपचारवाद कितना असली है और कितना नकली । क्या तुम स्वयं भी विश्वास करती हो यह विश्वास सिर्फ, मुलम्मा है कुछ मानों में वैज्ञानिक कारणो का परिणाम ? 'मुझे लगता है कि जरूर तुम्हारे जीवन मे ऐसी घटनाएं या दुर्घटनाएं घटी होंगी जिनके कारण तुम खुलती नहीं । काश, उनका पारावार मैं भी पा सकता । मैंने तुम्हारे पति मे पूछा है परन्तु वह तो निरा बुद्धू है। पता नहीं अपने दफ्तर का काम कैसे करता है। यदि मैं इस इंश्योरेंश कम्पनी का मैनेजर या डायरेक्टर होऊतो उसे बर्खास्त करने में एक क्षण भी न लगाऊं । एक तो वह तुम्हारी बहन की तुम्हारी आंखों के सामने हुई मौत के बारे मे बताता है जिसका मुझे पहले ही पता है। फिर तुम्हारा एक बच्चा समय से पहले पैदा हो गया और तुम मरती-मरती बची। 15 दिन अस्पताल रहना पड़ा। बस और कुछ क्यों नहीं कहता, बताता और बोलता। शायद उसे आता-जाता ही कुछ नही। तुम्हारे घर के वाकी हालातों और तुम्हारे मैके और ससुराल वालों 102 विकेन्द्रित वातें, और तुम्हारे साथ भी, तुम शायद मेरी चाल समझती हो, टोकती रहती हो, हर हालत में वह तो मेरा दीवाना था। फिर उसे मैंने ह्विस्की का चस्का डाला। कहा-एक-दो पैग शाम को पी लेना सभ्यता की निशानी है और स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। उसे अपनी सेहत के बारे मे अक्सर शिकायत रहती थी और उसका बटन भी मैने दवाया। साथ में यह भी कहा कि आजकल ह्विस्की आदि के बिना काम-काज मे भी तरक्की नहीं, खासकर इंश्योरेंस के क्षेत्र में। आखिर उनकी कम्पनी के विदेशी सलाहकार भी तो है । अगर ह्विस्की पियोगे-पिलाओगे और विदेशियों के साथ मिलने-बैठने-उठने के योग्य बनोगे तो शायद तुम्हें विदेश यात्रा का अवसर भी मिल जाये । मेरे मधुर शब्दों ने उसे बिना पिये मस्त कर दिया। फिर मैं उसे हर आये दिन ह्विस्की की बोतलें देता, कहता कि मुझे फौजी अफसर से मिल जाती है । उसके बाद उसे मैंने क्लव का चस्का डाला। और कहा कि वह तुम्हें भी जरूर लाया करे । यही उन्नति का रास्ता है। तुम जानती-बूझती थीं । कभी-कभी तुम्हारी आंखो से मेरे प्रति रोप भी टपकता था कि मैं तुम्हारे पति को बुरी आदतें सिखा रहा हूं। कभी तुम संतुष्ट रहतीं कि चलो इसी बहाने हमारा मिलन भी हो जाता है। जीवन की मौज-बहार की बातें करनी भी नसीब हो जाती हैं। तुमने अपनी जिन्दगी मे क्या देखा है, मेरी प्यारी ! लगता है जन्म से ही तुम पर कोई ग्रहण लगा है। अगर तुम मेरी बन सको, मेरी झोली में गिर सको, तो देखो कैसे तुम्हे चांद-तारो की दुनिया की सैर कराता हूं। और अन्त मे मैंने उसे पश्चिम नृत्य सीखने के लिए डोरे डाले । जब डोरे मेरे डाले हों तो सफल कैसे न हों। और इस प्रकार कुछ रातें मुझे नैनीताल को वोट-क्लवं में तुम्हें अपनी बाहों में लेने का अवसर मिला। पहले तुम्हारी लड़को को आती गर्मियों में किसी पहाड़ पर जाने के लिए जिद करने का चारा डाला। हेढ़ साल में वह जैसे चार साल और सथानी हो गयी हो। हमारा रिश्ता उसे अच्छा लगा और रास आया और फिर तुम्हारा लड़का जब छुट्टियो मे आया तो उस पर भी मैंने अपना जादू डाला। उत्तर में कितने ही पहाड़ी शहर है-एक से एक बढ़कर । .
विकेन्द्रित 103 गिमला, मंसूरी, मनाली, कमौली, नैनीताल, रानीयेत-महारा से आकर दिल्ली रहो और गर्मियों में पहाड़ न गये। अन्त तुम्हारा पति युद मुममे मसाह नेने के लिए आया । कहताच जिद करते हैं । मैंने कहा कि उन्हें मुरभी जिद करनी चाहिए यह बडी वाजिव जिद है । उसने सलाह मांगी। पूरा-मेरा जी इम यार ननीताल जाने को पा, ननीताल और तुम्हारे साथ में दिन होंगे। कसी रातें। तुम चारों को अपनी कार में ही साद लिया। कहा, मेरी कार बड़ी है । फोएट तो पढ़ाई घड़ने से पहले ही गरम-सदं हो जायेगी। और फिर मेरा अब और था भी कौन । तुम्हारा परिवार मेरा परिवार था। मुझे अब सिर्फ तुम पारों के साथ ही सरोकार था मेरी जायदाद, मेरी कमाई सब तुम्हारे लिए पी। मैं तुम्हें प्यार करता था।
सतह पर्वतों ने हमारी आत्मा को झकझोरा जैसे घाटो के, पीछे से घाटी “उभरती और वादी के पीछे से वादी उतरती जाती, तुम्हारा मुंह, तुम्हारी आत्मा खिलती जाती। एक बंद कली, एक बंद जीवन खुल रहा था। काश, इन वादियों और घाटियों का कहीं अंत न होता। न ही नैनीताल, न ही काले, न ही रानीखेत, न ही कैलाश । काश, हम ऐसे ही बढ़ने जाते और कहीं आकाश में जा विराजते । पर्वतों ने तेरे चेहरे पर हुस्न की भी और प्रसन्नता की भी मुनहरी धूल छिड़क दी । तुम कोई आकाश मे उतरी अप्सरा थी जो धरती की यात्रा के बाद वापिस गगन की तरफ जा रही थी। पहली बार मैंने तुममें चंचलता जागृत होते देखी। तुमने मुझसे प्रश्न 'पूछे इन पहाड़ों के वारे, मैं हिमालय की अर बाहों और शाखाओं के बारे मैं । पहाड़ी शहरों और घाटों के बारे मे, पहाड़ी लोगो और उनके रस्मो- रिवाजों के बारे मे । निजी प्रश्न भी कि मैं कत्र यहां आया, कितनी बार आया, किसके साथ आया ? तुम अपने मन की घुडिया भी खोलने लगी, तुमने मुझे बताया कि आज तुमने पहली बार पर्वत देखे हैं यद्यपि तुम्हारा सदा ही जी करता रहा है। इस तरह का दृश्य देखने को। तभी तो तुम्हारा मन पल अभिलापा करता कि इस सफर का कभी अंतन हो। परंतु ननीनाल इस सफर का अंत था। वंगला हमारा वोट-क्लब के मजदीक या । पही बोट-क्लब के मैनेजर को मेरी हिदायत थी, बाकी विकेन्द्रित 105 मब इंतजाम भी हो चुका था। रोटी और नौकर तैयार थे तुम्हे बस केवल नहा-धो कर हाट-शृंगार करने का काम था। ऐसे लग रहा था जैसे तुम आज इतनी जल्दी तैयार होकर बाहर आ गयी हो ।,किसी.सुराग से शायद. मुझे बाहरं लकड़ी के बने जगले के पास खड़े देख लिया था। तुम आपीं- मैंने तुम्हे पहचान न सका, तुम इस धरती की तो नहीं लगती थी, क्या सचमुच परीलोक से उतरी थी? तुम आकर मेरे पास खड़ी हो गयी । अपने दोनों हाथ तुमने जगले पर. रख दिये । हमारे पैरों मे महान नैनीताल झील विछी हुई थी । सामने , पर्वतों की अनगिनत शृंखलाएं थीं।. ऊपर वेपनाह छोटे-मोटे ..आकाश अंदर-अंदर पता नहीं क्या-क्या कुछ था, झीलें भी पहाड़ियां भी, गगन: भी, पार भी और आग भी, मनुष्य का मन, इसीलिए श्रेष्ठ है ।. . मैंने तुम्हारी छोटी उंगली के साथ अपनी छोटी उंगली छुआई ।'तुम, थोडा-सा घबरा गयी। मैंने उंगली तुम्हारी उंगली पर रख दी और फिर', अपना हाथ तुम्हारे हाथ पर। तुम महसूस कर रही थी मेरा शरीर, मेरी- मर्दाना हथेली की गरिमा को। नहीं, तुम गुम थी अपने आपको ढूढ़ लेने : मे कि अपनी प्राप्ति को:गुम करने की कोशिश कर रही थी। ', : एकाएक तुमने कहा : लगता है यह दृश्य हू-ब-हू मैंने पहले भी देखा है । मैं पहले भी कभी यहां बिल्कुल इसी स्थान पर खड़ी हुई हूं." min 'और मैं तुम्हारे साथ हूं।' उसने मेरी तरफ देखा। हां, वह मेरी काया मे समा गयी। मैं उसके कण-कण में । यह आत्मिक भोग था: फिर एकाएक उसे चक्कर आ गया। वह गिरने लगी, मैंने उसे संभाला। मैंने उसे उठाया और वेमुघ को अंदरले गया। चारपाई पर लिटाया। उसके पति को बोट क्लब के मैनेजर के पास भेजा कि डॉक्टर का प्रबंध करो। उसके लड़कों को उसके पैरो के तलुओं पर घिसाई करने के लिए कहा और खुद मैं उसके हाथों की हथेलियों को दबाने लगा। उसकी लड़की को : दिलासा दिया कभी पहाड़ों पर नहीं आई तेरी मा, चक्कर आ: डॉक्टर ने भी यही कहा।
106 विकेन्द्रित परंतु मैं जानता था कि उसे वास्तव में कौन-सा चक्कर आया था। मैं तो खुद ही बेहोश होने वाला था। यह तो अच्छा ही हुआ कि उसने पहल की। इस प्रकार अंदर की घुटन का इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव को सहन करना आसान काम नहीं होता। यह पूर्व जन्म था, कि पूर्व से भी पूर्व । अगली रात हम बोट क्लब गये।मैंने तुम्हें नृत्य करने के लिए कहा। तुम मेरी बाहों में उमड़ आयो । धीरे-धीरे हम रक्स करते घूमते रहे । मैं तुम्हारी तरफ देखू, कभी झील की तरफ और कभी पहाड़ियों की तरफ । तुम्हारी भी नजरें घूम रही थी परंतु फिर भी ऐसे लगता था कि हम एक-दूसरे की तरफ एकटक देख रहे हैं। तुम अपने पति से बेखबर थीं जो हमें देख रहा था। तुम सारी दुनिया से बेखबर थी। मैंने तुम्हें अपने नजदीक किया और तुम मेरे साथ लग गयीं। उस दिन मैं तुम्हें जो भी करने के लिए कहता, तुम मान जातीं। परंतु मुझे क्या कहना था, पूछना था। मैं तो खुद भी मुग्ध था। जिस स्वर्ग में मैं सांस ले रहा था, वह स्वर्ग लिंग-भोग से कंचा और पवित्र था । हां, मुझे तुमसे पवित्र प्रेम था। प्रेम पवित्र है उसमें पाकीजगी है। और याद है जब दूसरे दिन मैंने तुम्हें नृत्य करने के लिये कहा तुम कैसे चौंकी: 'मुझे नाचना कहां आता है जी । आपको कितनी बार कहा है । क्यों क्लब मे मेरी खिल्ली उड़ाते हैं ?' परसों के पवित्र नृत्य की याद मैंने तुम्हें न दिलाई। 'ठीक परसों का नृत्य नाच नहीं था। वह तो भगवान के सामने ईश्वर के साथियों की तरफ से एक नतंक श्रद्धांजलि दी। यह दो आत्मिक नर्तक घेअदृश्य के सामने नाचते हुए। परंतु रूह को भी तो मांस की जरूरत होती है आखिर । । मैं मजबूर करके तुम्हें मंडप में ले आया और सचमुच ही आज तुम थिरक रही थी, मेरे पैरों पर पैरं घर रही थी और मुझे भी पामख्वाह गिरा रही थी। उस रात जब मैंने तुम्हें अपने करीब धीचने की कोशिश की तब भी तुम अकड़ गयीं । तुम्हारा शरीर और तुम्हारा मन दोनों न , . . " . T' .
- विकेन्द्रित 107 गये. । मेरे कंधे पर तुम अच्छी तरह अपना हाथ भी न रख रही थीं। देवी और दुनिया में कितना थोड़ा फासला है। दिव्य से दैत्य बनते पल नहीं लगता । अप्सरा या परी से कोढ़ी की शक्सीयत के दो पहलू हैं। 15 दिन हम नैनीताल रहे। एक दिन मौत दूसरे दिन जिंदगी। एक दृष्टि से आलिंगन दूसरी से दूरी। एक पल उल्लास दूसरे पल विनाश । एक सांस गरम एक सांस सदं । कैसा प्यार था यह ? कैसा खेल ! किस तरह की लीला? मेरा कमरा तुम्हारे कमरे के साथ था और हमारे बीच दीवार थी। क्या यह दीवार हमेशा ही हमारे बीच रहेगी। जहां डिफेंस कालोनी की दीवार पतली परंतु पुख्ता थी वहां यह दीवार पतली भी थी और कच्ची भी । डिफेंस कालोनी में यदि मैं कान लगाकर कोई आवाज सुनना भी चाहूं तो भी नहीं सुन सकता था, कई बार कोशिश कर चुका था। सोता तो तस्तपोश पर था। तख्तपोश से धरती और धरती से वृक्षों में जाना होगा। मनुष्य को फिर बंदर की योनि ग्रहण करनी होगी। तख्तपोश पर सोता-सोता या जागता? मोहब्बत में सोना कहाँ ? मोहब्बत में सोना भी जागने की तरह है और मैं दीवार को प्यार करता, दीवार को चूमता, दीवार को गले लगाता (परंतु कोई चीज भी आगोश मे न आती) । सिर्फ दीवार के साथ अपना शरीर रगड़ा ही जा सकता था। इस दीवार के दूसरी तरफ तुम थीं"तुम, जिसके साथ मुझे इस नैनीताल वाली हमारी बीच की दीवार मली थी, उसे मैं दबा या घूम नहीं सकता था। फिर भी उस पर हाथ फेरता, तुम्हें महसूस करता सुनने की कोशिश करता। जब तुम लोग वोलते तो कुछ सुनाई पड़ता परंतु तुम इतना कम बोलती हो कि आवाज आती सिर्फ तुम्हारे पति की या तुम्हारे दो बच्चों की । अरे भई, बोला करोन । तुम जैसा सुंदर मुख और सुदर शरीर चुप रहने के लिए नहीं बना। चुप रहने वाला आदमी बुद्धिजीवी नहीं बन सकता। बातचीत, वार्तालाप, चर्चा, तक, दलील द्वारा ही मसले सिद्ध होते हैं । मन की मुश्किलातें सुलझती हैं, कठिनाइयों के लिए समाधान ढूंढ़ते हैं । बोला करो माई। यद्यपि मुझे तुम्हारे बोल नसीब । था।
Too विकेन्द्रित नहीं। मुझे तुम्हारा बोलना, चहचहाना, मुस्कराना, हंसना, नसीव नहीं। परतु अच्छा लगता है चाहें किसी के साथ भी हो। तुम्हारी चुप्पी मुझे काटती है मैं, तुम्हे प्यार करता हूं और तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है । तुम्हें चुप, उदास और खोया हुआ देखकर मेरा मन भर जाता है, मेरा जीवन तुम्हारे लिए और मेरे जीवन में जो कुछ है वह भी तुम्हारे लिए। मेरा मन और धन जैसा चाहो वैसा उसका प्रयोग करो या फेंक दो इसे । परंतु खुश रहो, हसती रहो, वेशक एक दीवार नहीं हजार दीवारें बीच मे हों। मुझे तुम्हारी खुशी, तुम्हारी प्रसन्नता की जरूरत है। दीवारें तो गौण होती है। मेरे भीतर-बाहर तुम ही तुम हो। मेरे शरीर के कण-कण में और मेरी आत्मा की सीमारहित विश्वात्मा में तुम ही तुम पसरी हो। - .
अठारह T एक नजर मेरी हिमालय की फैली हुई शृंखलाओं पर थी तो दूसरी नजर तुम्हे देखे जा रही थीं। तुम मुझे हिमालय की इन फैली हुई शृंखलाओ में उभरती एवरेस्ट, ज़दा देवी, कंचनजघा या अन्नपूर्णा चोटियों की भांति ही एक चोटी लगती थी : निरंतर बर्फ से लदी हुई । एक तो तुम तक पहुंचना मुश्किल, और पहुंचकर भी ठंड में ठड,होना है। दाद दो तुम मेरी हिम्मत की कि मैं फिर भी तुम तक पहुंच गया। मोटर के पहिये फिसलने.,वाली और सीधी जाने वाली यह चढ़ाई नहीं घो कई मेड़े बनी हुई थी। कई तरह की नखरे वाली और स्वांग भी मुझे रचने पड़े, कई राह कुराह भी मुझे चुनने पड़े। उफ, तब कहीं जाकर मैं तुम तक पहुंचा। इतनी एकाग्रता, इतनी तन्मयता, इतनी दीक्षा, इतना समर्पण मैंने आज तक अपनी किसी रचना रचने में भी नहीं किया । और न ही कभी ईश्वर की प्राप्ति के लिए ही किया है । लेकिन तुमने मुझसे यह सब कुछ करवाया और तब कही जाकर तुम्हारी प्राप्ति हुई। प्राप्ति तो हुई,परंतु न मेल हो सका न मिलाप । बर्फ को भला कोई क्या गले लगाये । टड का क्या आलिंगन करे ! लिहाजा एक और प्रयास, एक और मुहिम, एक और चढ़ाई। अपने शरीर और अपने मन में, मैंने मानो मूरज विठा लिया, साकार सूर्य जिसमें हजारों डिग्री.जितनी गरी है और जिम गरमी के साथ हिमालय भी पिघल जाये। मैंने तुम्हे -पिघला लिया। मैंने तुम्हें गले लगा लिया परंतु "परंतु, ज्यों ही,तुम मुझसे अलग हुई तो पुनः उह से तुम, लादी, गयी, ढकी गयी। और, मदा तो मैं ही 110 विकेन्द्रित सूर्य अपने अदर नही विठा सकता था। थोड़ा-थोड़ा करके में जोड़ता हूं और जब कुछ जोड़ चुकता हूं तो तुम ठोकर मारकर उसे बहा देती हो । तिनका-तिनका इकट्ठा कर घरौंदा बनाता हूं और तुम अपनी एक अदा से उसे छिन्न-भिन्न कर देती हो। क्या है तुम्हें ? क्या बीता है तुम्हारी जिंदगी में ? इसी जिंदगी में कि पूर्व जन्मों का जंजाल भी तुम्हारे भीतर पालथी मारे बैठा है। मैं अपने आपको और मेरे चिर-परिचित भी मुझे अनोखा और टेढ़ा व्यक्ति कहते हैं । परंतु मैं तो तेरे इश्क में सीधा हो गया हूं। परंतु तुम्हारा टेढ़ापन अभी तक बना हुआ है । तुम कर सीधी होओगी? दिखाओ मुझे अपना सम्पूर्ण भीतरी मन । मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सभी मानसिक रोगों का यही बढ़िया इलाज है इसीलिए मैं कहता हूं कि तुम बोला करो हरेक के साथ, किसी से भी बोल-बोल-बोल ताकि तुम्हारे मन की भूल-मुलय्या में आवाज का प्रकाश पहुंचे,'तुम्हारी आत्मा के बन्धन टूटे। कभी-कभी मैं निराश हो जाता हूं और यक भी जाता हूं। इतनी मेहनत, अपने भीतर इतनी गरमी पैदा करना, इतना मन मारना, आसान नहीं होता प्रिय, और मैं अपने आप से पूछता हूं : यह सब किसके लिए? सचमुच तुम्हारे साथ लिंग-भोग की कोई तृष्णा नहीं । अब मैं तुम्हारे साय विवाह भी नहीं करना चाहता, बेशक तुम्हारा पति मरे और वह तुम्हें मेरे पास छोड़ दे। हां, तुम्हारी दीद'की तमन्ना जरूर है । तुम्हें कही करीवं- करीब रखने की। तुम्हे छू सकने और गले लगा सकने की। परन्तु इस इच्छा की पूर्ति करने के लिए इतना परिश्रम और इतनी पीड़ा क्या जायज है? मेरे मन में शंका पैदा होती है और विवेक अनायास पूछता है परन्तु कहीं भीतर से ही प्रेम का एक छोटा-सा पड़ता है और सभी सवाल, सभी शंकाएं, सभी संदेह, सभी कठिनाइयां शान्त हो जाती हैं। निराशा और तिलमिलाहट की शिकायत भरी कहानी मूक हो जाती है। जी हां, 'मैं जनाव को मोहब्बत करता हूं। तुम्हारा भाई और भाभी आये दो-ढाई सालों में पहली बार तुम्हारे ३ T + विकेन्द्रित 111 यहां तुम्हारा कोई रिश्तेदार आया। तुम लोग कितने कोरे हो ! किसी के साय बनाकर क्यों नहीं रखते । यार-दोस्त भी कम ही आते है। और अगर आयें-जायें तो अच्छा रहता है । मेल-मिलाप होता रहता है और इस प्रकार सम्बन्ध बढ़ते रहते हैं। ज्यादा आदमियों के साथ बातें करने से दृष्टिकोण भी,विशाल होता है और झिझक खत्म हो जाती है । " तुम्हारे भाई की शादी हुए अभी तीन वर्ष ही हुए थे। मैसूर विश्व- 'विद्यालय में प्रोफेसर था। मेरा परिचित था। और मुझ एम० ए० के विद्यार्थी को पढ़ा रहा था। जब तुमने जान-पहचान करवायी तो वह हैरान ही रह गया। उसको ख्याल था कि अब मेरे साथ उसकी मुलाकात होना अनहोनी बात थी। मेरी तारीफ कर-कर उसने मुझे आसमान पर चढ़ा दिया और जब उसने तुम्हारे प्रति मेरा आकर्षण देखा तो तुम्हे उसने कितना खुशकिस्मत जाना । आखिर मेरी महानता की सभी तरफ चर्चा है। प्रिये, मैं कोई आम, ऐरागरा नत्यू-खरा नहीं। लाखो मे एक हूं। तुमने शायद पढ़ा तो है मुझे परन्तु ध्यान से नहीं। या शायद मेरी प्रतिभा का अनुमान लगाना तेरे वश की बात नहीं । परन्तु आज किसको इस बात की 'चिन्ता है, यह तो लिखने के लिए लिख रहा हूँ। तुम्हारे प्रेम का एक भाग ही समुद्र के बराबर है मेरी प्रशंसा का । लिखने के लिए लेख कितना कुछ लिख जाता है ऐसे कल्पित आवम्बर रचता है कि मासूम पाठक और विद्यार्थी उन आडम्बरों को वास्तविक जानकर उनको समझना-बूझना कहते हैं । ऐसे भूठ के अन्दर निर्मित करता है उपन्यासकार की भविष्यवादी उनमें माये रगड़ते-रगड़ते थक जाते हैं। कभी दार्शनिक या आम गद्य लेखक पर तो बेशक विश्वास कर लो सापियो, 'परन्तु गल्पकार का कतई विश्वास न करो। उसके हर शब्द पर मन्देह करो। पढ़ो, सिर्फ शान और बुद्धि के लिए परन्तु कभी भी न उसे उदाहरण बनाओ और न ही सच या आदर्श तथा सिद्धान्तों की कसोटी ही बनाओ। लिखने के लिए लिखता है गल्पकार बिना जिम्मेदारी के । क्या जिम्मेदारी है उसकी आधिर अगर किसी ने जीयन नष्ट कर लिया सो कहेगा: यह तो कल्पना थो,. गल्प पा, वास्तविक नही । मेरा क्या कसूर मैंने तो पुस्तक के पहले पन्ने पर ही लिय दिया था कि मेरे उपन्याम के 112 विकेन्द्रित । सभी पात्र और कहानी काल्पनिक हैं ! उसने मजे के लिए लिया और आप अपनी जान खो बैठे हैं | क्यों मेरी प्यारी के प्यारे प्रोफेसर भाई जी, अगर यह उपन्यास आपको कॉलेज में पढाना पड़ गया तो क्या कौजियेगा? इसमें तो हमें किसी पात्र का नाम ही नहीं मालूम । कैसे प्रश्न करेंगे और कमें उत्तर मागेंगे। पराये हुए छात्र-छात्राएं जब कहेगे कि यह क्या उपन्यास है तो सिर्फ इतना कहकर कि यह 'आधुनिक मर्जन उपन्यास है; काम नहीं बनेगा। तनिक और गहराई में उतरना पडेगा।' तो कीजिए न फिर गहरा और गहन,' विचारइसीलिए तो मैं 'मुश्किल बनता जा रहा हूं। इमी मुश्किल से ही तो आपकी सूझ-बूझ का दायरा बढ़ेगा। यही मेरा आदर्श है और यही मेरा दुनिया और दुनियादारी पर अहसान । हर हालत में इस आधुनिक काल में नामों की क्या जरूरत? नामों के साथ अपनत्व और व्यक्तित्व उभरता है और हम यह दो वस्तुएं 'समाज में से खत्म करना चाहते हैं। यह समाजवाद है, साम्यवाद है, अराजकतावाद है । निजीपन क्यों नम्बर एक दो, तीन, चार, पांच, छ:, सात या सात सौ एक, आठ सौ दो, 'एक हजार ग्यारह, दो लाख दस, सीन करोड चवालीम क्यों नहीं। इस तरह अराजक निजाम के लिए सब सरकारी और निजी क्रियाएं कितनी आसान हो जायेंगी। हम भविष्य के मतवाले है मतवालों को भला नामों से क्या डर। सो अगले उपन्यास में मैं भी मतवाला हूँगा, मेरी लेखनी भी, पात्र भी; जिनके नम्बर होंगे एक, दौ, छ: सौ पांच, एक अरव छ: आदि। न चैप्टर होगे, न पैरे, कामा, कारक, प्रतिक्रिया, वर्गीकरण और वाक्य विचार तो मैं अपने किसी पहले उपन्यास में ही उड़ा चुका हूँ और नाम अब उड़ा दिये हैं। चलिये, इस बार स प्रतिभा का होमला तो है प्रोफेनो, विद्याथियों, दार्शनिको, कवियो को चला रहा हू, एक नया रास्ता दिपा रहा हूँ ताकि एक दिन आप लोग दौड़ने के योग्य बन सकें। कही आप घुटनो के बल ही न चलते रहें और हम आसमान पर छा जायें। 'उसका प्रोफेसर भाई मेरी लेखनी से पहले ही प्रभावित था अब मेरे 1 मंगा।
विकेन्द्रित 111 व्यक्तित्व से भी अति प्रभावित हुआ। परन्तु मैंने उसे प्रभावित करने की कोई कोशिश नहीं की। भला प्रेम में असोर पक्षी क्या, 'किसी को प्रभावित करने की कोशिश करेगी है । उसे तो पिंजड़ा ही प्यारा है, वह तो रिहाई चाहती हो नहीं । उसका संगीत सभी के लिए है, किसी वाहवाही का वह मोहताज नहीं। मैंने तुम्हारे भाई की खातिर की, यह बात तुम्हें अच्छी लगी। मैं उसे क्लब ले गया सिनेमा ले गया, उसकी पत्नी को एक फ्रांसीसी इत्र की शीशी भेंट की। चुस्त, सुशील और मुन्दर थी वह, शायद कभी फिर मेल-मुलाकात हो जाये। और उसे अपना नया उपन्यांसः। वह चले गये और जमे घर खाली हो गया। जैसे तुम और मैं अकेले तुम और मैं अकेले ही थे अपने दोनों घरों मे, सारी डिफेंस कालोनी में, मारी दिल्ली में, सारे संसार में। तुम मेरी दुनिया थी, मैं तुम्हारा " रह गये। विश्व । - मुझे याद है जब पिछले साल सर्दियों में मुझे बुखार हो गया था। जालंघर लेक्चर देने के लिए जाना था और वहा से मलेरिया चिपका लाया था। तुम सुबह अपनी लडकी के साथ और शाम को अपने पति के साथ मेरे दवा-दारू के लिए आती थीं । अकेली क्यों नहीं आती थी। किसी बात से डर लगता था क्या। मैं तो चारपाई पर पड़ा था और अगर स्वस्थ भी होता तो भी तुम्हारी मरजी के बिना हाथ न लगाता । और यह भी तुम्हें बता दूं अगर मेरी हाथ-हूथ लगाने की मरजी होती तो मैं तुम्हे अपने वश में कर लेता। खुद बेवश न होता । मैंने तुम्हारी लड़की के सामने तुमसे पूछा भी था: 'यह संतरी सदा क्यों माय लाती हो?' तुम मुस्करायों नही, अगर मुस्करा देती तो मुझे एक तरह का उत्तर मिल जाता। मुस्कराइये हुजूर । क्यों दुखी करती हो अपने आप को । मुस्कराने से आप का शील भंग तो नहीं होता। मैंने जिद करके उससे फिर पूछा तो उसने कहा : 'आप जानते तो है।'
114 विकेन्द्रित
'नहीं तो, सचमुच में कुछ नहीं जानता तुम्हारी कसम ।'
तुम चुप हो गयी। मैंने कहा :
'वह उठना-बैठना, परवरिश, तुम्हारा समाज, हमारा माहौल, सम्यता
का तकाजा इत्यादि।
तुमने कहा :
'छोड़ो भी परवरिश, माहौल और उठने-बैठने की बातचीत ।
नैनीताल के बोट क्लब में कहां गयी थी तुम्हारी परवरिश ? वही तुम्हारा
असली रूप था, जब तुम असली थीं-अब नकली। स्वांग धारण करके
जीना क्या जीना है। उतार दो इस ताबूद को जो तुमने अपने आस-पास
मढ़े हुए हैं।"
'परन्तु तुम ताबूद को उतारो और फिर जड़ो। तुम भूलो अपनी
परवरिश और फिर जा फंसो कहीं और ।'
उन्नीस एक रात तुम्हारी याद बड़ी प्रबल हुई। तस्तपोश पर लेटे-लेटे मैंने वर्षश दीवार को चूम लिया"आलंकारिक रूप में या काल्पनिक रूप में नहीं बल्कि सचमुच । कभी-कभी प्रेम में ऐसा होना स्वाभाविक ही है। नदियों मे आये प्रवाहों और समुद्रों में उठे तूफानों की तरह प्रेम मंडल पर भी बाढ़ का कारण नहीं लादा जा सकता। जागते हुए भी तुम्हारी याद सताती है और सोते हुए भी। और सपनों में भी तुम ही आया करती हो । नींद खुली तो मैं दीवार को लिपटने की कोशिश कर रहा था। सो गया तो फिर तुम्हारा सपना आया और फिर मैं दीवार से जा लिपटा । एक तरह की ग्लानि हुई मुझे अपने आप से । क्या या और क्या रह गया पाजो पाहूं पा सकता था और आज सपनों में दीवारों का आलिंगन ? में उठकर बैठ गया। पाहा कुछ लियूं परन्तु लिय न सका । तिनी और हो गयी पी कुछ लिखे हुए। पढ़ना पाहा लेकिन मन न लगा क्योंकि तुम दिलो-दिमाग मे सामने पी। मुबह होने वाली थी जब मैंने फिर मोने पोकोशिश की और मन से निवेदन किया कि अब तुम्हारे सपने न पाएं। सभी मन को हुक्म देकर सुमाया करता था। याद में तुम्हारा मपना सोन आया परनु अब सगभग दयं यो नीर घटी और में उठ पढ़ा तो तुम्हारी याद पुनः प्ररत हो उठी। रोमिन परने पर भी पारप न सका। मौर अपेत ही म तपार हो गया और तुम्हारा दरवारा रा मारपटारा। तुमने सिटकनी पोली भोर मारन भरी नारों से मेरी 116 विकेन्द्रित देखने लगी जैसे कोई अजनबी तुम्हारे दरवाजे पर आ खड़ा हो । मैं तुम्हारी हैरानी पर हैरान था। जब न तो तुम हिली और न ही तुम बोली तो मैंने पूछा, 'क्यों" 'आप' ?, मैंने यह प्रण किया मैंने दोहराया : 'क्यों?' अनमने भाव से तुमने दरवाजा खोला। अन्दर घुसते हुए मैंने सिर धुमाकर देखा सामने घर की दोनों स्त्रिया-ऊपर वाली और नीचे वाली -इधर देख रही थी । बस ! इतनी-सी बात थी। तो क्या हुआ। हमारा रोज का आना-जाना है, इसे सारी दुनिया जानती थी । इकट्ठे क्लब जाना, इकट्ठे छुट्टिया मनाना। लेकिन तुम घबरा गयी। तुमने मुझे अच्छी तरह बिठाया भी नहीं पूछा भी नती नि जाने जा ने पलाने का कोई प्रस्ताव ही, रखा। है कि रात गया था उसके बारे मे मैं तुम्हें कुछ न कुछ बताऊंगा क्योकि मुझे तुम्हारी और तुम्हारे सेहत के वारे में फिक्र है। tip ..! में अपने आप बैठ गया। परन्तु तुम अवाक् एक ओर खड़ी रही। मैंने कहा.. 11.: 'बैठ जाओ। • 'हं!': नौकर है नही रसोई मे,हो.आऊ ।', रसोई में तुमने काफी देर लगा दी। क्या. सारी की सारी रोटी पकाने के लिए बैठ गयी थी मा, मुझ पर फेंकने के लिए पानी उबालने लग गयी थी। एक मुद्दत के बाद तुम लौटी और फिर दूर पडी कुर्सी पर गुमसुम-सी वंठ गयी। तुम्हारा पर है भई, खुलकर बैठो । अगर दुनियादारी से डरती हो तो तुम्हारे यह डर बेबुनियार हैं। मुझे कई अवसर मिल चुके है। मैं तो तुम्हारे प्रेम में गुम, तुम्हारे दर्शनों के लिए आया था। मेरा, मन प्रकाश पाहता था बस !., में मुस्कराया ! किस तरह आया था और किस प्रकार जाना होगा। F -- * विकेन्द्रित 11 मुझे लगा जैसे कोई चीज मेरे भीतर मे घुल-घुलकर जमीन पर गिरे जा रही हो। तुम्हारी हरकतों ने मुझे बेजुबान कर दिया। मैं उठ आया शायद मेरे लिए तुम्हे अचम्भित करना ठीक नहीं था। कैसे सोचता, सोचा नहीं जा रहा था। प्रेम मे प्रेम पर क्या दोष थोपा जा सकता है। जो कुछ होता है या बीतता है उसे अपने आप पर ही महना पड़ता है। मैं लौट आया परन्तु आराम नसीब न हुआ। न बाहर जाने की, इच्छा करती, बैठने की । मैं खामख्वाह नौकर को लाल-पीला हुआ सम्पादकों और प्रकाशकों को ऐसे ही सख्त चिट्ठिया लिख डाली, रामराज के सम्पादक के साल के लिए पेरिस जाने के निमन्त्रण को दूसरी बार रद्द, इस बार उसे बड़े ही प्रेम से पत्र लिखा था (प्रेम ! प्रेम !! प्रेम !!! कैसां वेहूदा शब्द है जिसका हर बार गलत तौर पर प्रयोग किया जाता है)। कहता था : कोई कारण तो वताओ दोस्त । नही जाना, नहीं जाना ! और तुम्हें क्या चाहिए। चार हजार फेक माहवार, आने-जाने का खर्च, और हफ्ते में, सिर्फ, , एक रपट । अगर तुम नहीं गये तो मैं डाइरेक्टरों के बोर्ड के सामने कच्चा पड़ जाऊंगा क्योकि उनके सामने मैंने , ही तुम्हारा नाम पेश किया था। जबकि डाइरेक्टर अपने भांजे को भेजने को इच्छुक थे। उस शाम तुम्हारी लड़की मेरे घर आई और कहने लगी 'हम आज रात की गाड़ी से मद्रास जा रहे है । मेरी नानी बीमार है । ब्लडप्रेशर बहुत बढ़ गया है। कर दिया। r . वह उदास श्री जैसे तुम सुबह डरी हुई थी वह अब सहमी हुई थी। जैसे नानी का ब्लडप्रेशर नहीं मा का बढा हो बड़ा प्यार करती थी तुम्हारी लड़की मुझे । मैंने उसे उठा लिया और.. छाती के साथ लगाया । उसे चूमा, उसने भी मुझे चूमा। उसकी सहमी हुई आंखें और लहजा खत्म हो गया। खिलखिल हंसते हुए उसने पूछा आपकी दाढ़ी विखार दूं? मैंने उसे गुदगुदाया और उसने मेरी दाढ़ी 118 विकेन्द्रित बिखेर दी। अव मैं तुम्हारे सुबह वाले भय का कारण समझा। तुम मानसिक तौर पर सतुलित नहीं थीं । तुम्हारे भीतर ज्वार-भाटा उठ रहा था। और तुम उनका आधार नहीं जानती थी। मैंने तुम्हें माफ कर दिया। तुम्हारी विदा से मेरे मन में तरह-तरह के विचार आ-जा रहे थे। कैसे मैं तुम्हारे बिना रह सकूँगा? पिछले हफ्ते तुम एक शाम मुझे बताये बिना अपने पति की कम्पनी के डाइरेक्टर के यहां चली गयी थी और मैं तुम्हारी याद में आधा रह गया था। अगर शुरू से ही तुम आम तौर पर बाहर आती-जाती तो और बात थी और फिर जब से हम प्रेमी बने थे, हम एक-दूसरे को रोज या दूसरे-तीसरे दिन मिलते । तो मुझे तुम्हारा सब प्रोग्राम पता चल जाता। तुम, तुम्हारा पति या तुम्हारी लड़की मुझे सब कुछ बता देती । उफ ! परन्तु उस दिन मेरी जानकारी के लिए तुम्हारा जाना कहर था। याद है तुम्हे, मैंने तुम्हें कहा था: 'बिना बताये कहीं न जाया करो दिल टूट-सा जाता है। बता कर वैशक महीना भर लगा आओ।' और आज मुझे बताकर तुम महीने भर के लिए जा रही थी और फिर भी मेरा दिल टूट रहा था। स्टेशन पर बड़ी मुश्किल से तुमने मेरे साप अकेले बात करने का अवसर ढूंढा । तुमने कहा: 'मुबह की गुस्ताखी के लिए मुझे माफ करना मुस्कराने का समय नहीं पा नहीं तो मैं इस देता। उत्तर की कोई आवश्यकता नहीं थी। तुम और तुम्हारी सड़की दोनों पली गयीं। और मैं तुम्हारे पति को पापस लाने के लिए मजबूर पा क्योंकि मोटर जो में अपनी से गया था। राह पर यह बातें करता जाता। मुमसे गम सहन नहीं हो पा रहा था। और यह हवा में उग रहा था। यह आदमी तुम्हारे योग्य नहीं या एक बार भी.उसने न कहा कि वह तुम्हारे बिना उदाम हो जायेगा या फितुम अन्ठी हो, प्यारी (3) हो, इत्यादि। में उसे मोटर में मारकर पर माया। ।
विकेन्द्रित 119 अपने कमरे में पर रखा तो ऐसे बालीपन और अकेलेपन का अहसास हुआ कि मैं बौरा-सा गया। पलंग पर सोने से पहले ही खत्म हो चुका था। और आज तख्तपोश भी आंखों को चुभ रहा था । अगर आंखों को चुभता था तो शरीर को कैसे नहीं चुभेगा। आज अगर सोते हुए दीवार के साथ मेरे शरीर का कोई अंग जा लगा तो वह अंग क्या जल नही जायेगा? क्या करता ? ऐसे अवसरों के अनुकूल मैं अभी तक अपने आप को ढाल नहीं सका। कभी भावनाओं ने इस प्रकार चित नहीं किया था। किसी की विदा ने इस प्रकार चारों तरफ फैली मौत का अहसास नहीं कराया था। ऐसे लगा जैसे यह मेरा न हो बेगाना हो । सुनहरी जिल्दों में जड़ी और अपने हाथों से लिखी पुस्तकें आज मुझे अपनी लिखी नही लग रही यो । न ही घर की कोई और चीज मुझे भा रही थी। जिसके साथ मेरा वर्षों से संबंध रहा था। यह नौकर किसका था और इसे क्या हक या मेरी बदहवाशी के कारणों को जानने का ? बदतमीज ! बेशर्म !! यह मेरा घरं था कि लाश रखने की जगह ? तख्तपोश, कुसियां, मेज, तस्वीरें, गुलदान, फानूस, गलीचे, सभी लाशें लग रही थी.. मैं उल्टे पर घर से बेघर होकर लौट आया। वह रात मैंने अपने छोटे भाई के यहां काटी। - वीस प्रेम का सवसे मलिन न पक्ष प्रेमिका के कुत्ते को पुचकारना है।' प्यारे कुते, या विल्ली, या चूहे (बच्चे या बच्चियां) गधै (पुरुष) और अन्य बिल्लिया और कीड़े-मकोड़े (रिश्तेदारं, मित्रं कपड़े, भोजन, आदि) की जी-जी, श्लाघा, खातिर तवजह प्रेम की संवेदना को निम्न स्तर की सवेदना मैं ला खड़ा करती है। दुनियावी इश्क का यह जुज हकीकी इश्क पर लागू नहीं होता । जहां मुहब्बत में सिवाय मुहब्बत के अनदेखे पात्र के अन्य लोगों के सामने एक तरह का बढ़ियापन उपजाते हैं। उसकी लडकी को भी इसलिए चूमता-धाटता था कि वह उसकी लड़की थी। वैसे उसकी लड़की के साथ प्यार (2) किये जाने के निजीगुण भी मौजूद थे परन्तु उसका पति और उसका पुत्र तो मनुष्य की कोटि आते ही नहीं थे । वह तो अपने वालों को संवारते रहते या कपड़ों को संभालते रहते। भला जब तुम यहां थी तो मैं उनके साथ सरोकार रखू परन्तु अब जब तुम यहां नहीं तो यह मुझे मजबूरी क्यों ? उफ ! मजबूरी यह थी कि मैं तुम्हारा प्रेमी या और तुमको एक दिन वापस लौटना था। और उनकी मुझे फिर जरूरत पड़नी थी। परन्तु तुम्हे कब वापस लौटना था? दो दिन, पांच दिन, सात दिन और आज पन्द्रह दिन हो गये थे। तुमने सिर्फ दो चिट्ठियां लिखी थी अपने पति को, उसने सिर्फ एक । असभ्य ! बस तेरे पनों का पता पाने और यह जानने के लिए कि तुम कब आ रही हो, मैं तुम्हारे पति को समय असमय १ विकेन्द्रित+21. बुला लेता। परन्तु उमे तुम्हारे आने या न आन में कोई फर्क नहीं पडदा था। अगर फर्क नहीं पड़ता था तो तुम्हे छोड़ क्यो नही देता?" मैं उदास, निराश, बदहवाश और मौत मेरे ओंठोसियो मुझे लगता, कि मेरा तो जीवन ही तुम थों और तुम्हें देखे बिना मैं मर जाऊंगा। और मरने के लिए मेरा जी न करता। मैंने क्या किया फिर ? जो कुछ मैंने अपनी अंधी जवानी के दिनों में भी नहीं किया था, और जो कि सिर्फ एक खास अल्हड़ उम्न में किया जा सकता है या किया जाना चाहिए। मैंने टिकट लेकर और बिना किसी को बताये मद्रास जा पहुंचा। प्रेम किस प्रकार आदमी को अपना-आप भुला देता है । प्रेम किस प्रकार आयु, ज्ञान, सूझ को पछाड़ कर.स्वाभाविक भावनाओं को सर्वोत्तम बनाता है। प्यार करता हुआ मनुष्य सदा जवान और अल्हड है"मूर्ख ! माइलापुर तुम लोग रहते थे परन्तु तुम्हारे घर के आस-पास कोई होटल नहीं था लिहाजा मैं पहले की तरह जिमखाना क्लब ही जाकर ठहरा। सुबह-शाम मैं तुम्हारे घर के सामने से निकलता परन्तु न कभी तुम बाहर और न ही तुम्हारी लड़की और न ही, कभी कोई खिड़की- किवाड पर दिखाई देता। डॉक्टर भी आता-जाता मैंने कोई न देखा । दो दिन तक घूम-फिरकर मैंने क्लब के नौकर को भेजकर मालूम करवाया तो पता चला कि बीमार मां के साथ तुम मैसूर गयी थीं। कुछ दिनों के लिए। मद्रास से मैं मैसूर पहुंचा। अब इन्ताह हो चुकी थी। या तो मैं कान को हाथ लगाऊंगा या जान दे दूंगा। बेसब्री के कारण मैं सीधा तुम्हारे भाई के यहां चला गया। तुम्हारा भाई मुझे अच्छा लगा था और गुरुओं की तरह उसमें मेरी श्रद्धा थी। जब टैक्सी लिए मैं वहां पहुंचा तो वह अपने घर के बाहर वाले दरवाजे का ताला खोल रहा था (और तुम लोग वहां नहीं थे)। वह मुझे देखते ही ताला पकड़े हुए मेरी तरफ लपका और बडे आदर व सम्मान के साथ उसने माया झुकाया। दोनो हाथ जोड़े। ताला और चाबियां हथेलियों के बीच लिये हुए।
122 विकेन्द्रित 'आप?' 'हां, जनाब ! मैं मैसूर आया था, आप को मिले बगर लौटने को जी न किया।' चोटी के घर नारायण पधारे थे। उसने मुझे टैक्सी से उतरवा लिया। टैक्सी का किराया दिया । वाह री श्रद्धा ! फिर मुझे भीतर ले गया । मैंने जाना ही था तुम्हारे बारे में जो पूछना था। मुझे पता चला कि तुम लोग सभी मैमूर सिर्फ माथा टेकने ही आये थे । तुम्हारी मां की इच्छा थी कि मरने से पहले वह श्रीरंगापट्टनम् के मंदिर मे स्थापित सुब्रह्मण्यम के आगे अपना माया नवा सके और अब वह मरने के नजदीक ही थी। वाह ! कितनी काव्यमयी इच्छा थी ! मैं मरने से पहले क्या करना चाहूंगी? सोच सोप। क्या क्या ? न मेरे लिए मंदिर और न ही गुरुद्वारा ना ही सुब्रह्मण्यम न ही बुद्ध को मूर्ति । पेरिस या लासएंजलिस जो दो जगहे मुझे बहुत प्यारी लगी थीं। परन्तु ब्लडप्रेशर के मरीज को विमान से उड़ने की मनाही है और पानी के जहाज से जाते-जाते ही. मौत हो जायेगी। अपनी सास के दर्शन? तोबा नही, जहन्नुम जाने से पहले जन्हनुम क्यों भोगा जाए किसी प्यारी या प्यार को. छूना चाहिए परन्तु प्यार तो अभी देखा जा रहा है और मैं इस जज्बे से मुक्त हो रहा हूं। फिर "फिर "क्या? हाँ ! चांद पर मैर! पगला ! इच्छा उस चीज की होती है जो पहले भोगी हो, देपी हो या पता हो । मकान पड़ा नहीं कि चोर पहले आ पहुंचे। अभी चांद देय तो.आओ। परन्तु हर हालत में ब्लडप्रेशर के मरीज को जैसे कि तुम्हें अभी बताया गया है उड़ना मना है। क्यों मना है जी? हमें कोई मनप्रेशर है मंया? हम तो स्वस्य मर रहे हैं । हमारा तो सिर्फ भरने के लिए ही मरना है (अगर कोई अच्छी परनी या प्रियतमा पास होती तो कहनी ऐसे शब्द मुंह से न निकालें। मरने के बारे में भी कोई इस तरह कहना है भला?) परन्तु मरने के बारे सोचना जरूर पाहिए। मौत का अन्त हो तो फिलासफी परमायं और आध्यात्मिकता का बारम्भ है। तुम अपनी मां के गाय श्रीरंगापट्टनम में गुब्रह्मण्यम के सामने माया मुफाने लिए मापी और चली गयी । मापा टेक्ने यात तुमने क्या - विकेन्द्रित 123 प्रार्थना की थी? मुझे याद किया था? मेरा भी मन हुआ कि मैं भी श्रीरगापट्टनम के सुब्रह्मण्यम् के सामने माथा जा झुकाऊं और मैं गया भी। लेकिन अपने घर से बाहर निकलने से पहले तुम्हारे भाई ने मुझसे एक दिन और रहने को वचन जरूर ले लिया। उसकी मंशा थी कि मैं उसके विश्वविद्यालय में एक भाषण दूं । ना-ना करने पर भी उसने मुझे मना ही लिया। मैं श्रीरंगापट्टनम् गया और फिर टीपू सुल्तान तथा हैदरअली की विद्या को भूलकर याभुलाकर सीधा श्रीरंगापट्टनम् के मन्दिर में पहुंचा । इतनी ही देर तक सुब्रह्मण्यम की लेटी हुई महान देह के सामने खड़ा रहा। कभी सिर झुकता तो कभी एंकटक देखता। पत्थर का देव सांस ले रहा था। पत्थर के नेत्र मेरी तरफ देख रहे थे। प्रणाम सुब्रह्मण्यम ! प्रणाम प्रभु, खुदा, भगवान, वाहे गुरु या जो भी तुम अदृश्य शक्ति हो। काला था सुब्रह्मण्यम और काला ही था उसका आस-पास । सिर्फ उसके नेत्र लाल और सफेद चमकते हुए थे। सारेपवित्र स्थान भीतर से काले ही होने चाहिए । कालिख मे मे अन्तरात्मा का गहरा अहसास होता है । कालिप ही अरूप अनूप अभेद है और कोई नही । सफेद दूध या सफेद बर्फ भी नहीं। कालिख ही अनादि, अछेद, अगाध, उदार, अपार, अभूत, निर्दोष, अरंग, अमंग, अजात, अपात, दयालु, अनन्त सब कुछ है। हा, सभी धर्म स्थानो को भीतर से काना होना चाहिए बाहर से बैशक वह सोने या हीरो से जगमगाते रहे । वैसे भी बाहर प्रकाश और भीतर से कालिख धर्म-स्थानो की सही रूपायत होगी । जी हां, बाहर से गोरे अदर से काले । मुब्रह्मण्यम के पैरो पर हाथ लगाने के बाद मेरा मन पहले से अधिक ठिकाने पर आ गया। शायद जहा मैंने खड़े होकर उसकी पूजा की थी वहां ही खड़ी होकर तुमने भी की थी। शायद जिस स्थान पर मैंने उनके घरणों को छुआया तुमने भी बिल्कुल उसी स्थान पर अपने हाथ रखे होंगे। अब मेरे हाथों मे शान्ति थी, परों में भी, अन्दर भी, बाहर भी । शांति थी, कालिग की कि अन्तान की? अन्तर्ज्ञान की कि अज्ञानता और अधेपन की? अगले दिन मैंने विश्वविद्यालय में भाषण दिया। हॉत भरा हुआ था 124 विकेन्द्रित विषय था साहित्य में प्रेम का मूल्याकन । वाह-वाह कसा भाषण था वह । मैं नहीं बोल रहा था मेरे, भीतर से कोई अदृश्य शक्ति बोले जा रही थी। सुब्रह्मण्यम ? परन्तु यह सुब्रह्मण्यम बड़ा गहरा मुग्रह्मण्यम था। एक हाथ शेक्सपीयर और कालिदास का स्वरूप और एक पर मोग, दाते और टामसमान, दूसरे पैर गुरुओं और पीरों-पैगम्बरों (नाम गिनना पाप है) की सुगमता, और दूसरे हाय साहित्य में प्रेम का अध्यात्मवाद और अलौकिकवाद । हायों और पैरो बीच मे साहित्य मे फूट रहे विलासवाद और भोगवाद को भी छेड़ा। फेंक हेरस, कोकशास्त्र और हैनरी मिलर के टापिक । श्रोतागण प्यार में रंग गये। उनके मुह पर और भीतर, बाहर प्रेम की बाढ आ गयी। वह प्रेम के सागर मे डुबकिया लगा रहे थे सर्वशक्तिमान उनका सहायक हो, यह मेरी प्रार्थना है, यही मेरे प्रेम का स्वरूप । अपने ही भाषण को सुनते हुए मैं खुद भी अपनी प्रतिभा और सद्बुद्धि पर हैरान था-जमे सद्बुद्धि विद्यार्थी की हो । मैंने अपने को कुछ खोया हुआ-मा पाया । एक पतली-सी बौद्धिक मूझ कही मे जागी । बौद्धिक सूझ को पतली-सी लकीर के प्रकाश के सहारे में प्रेम के सागर में डुबकिया खाता ही वहां से सीधा बम्बई जा पहुचा । और बम्बई में सीधा रामराज के दफ्तर । मेरे मित्र सम्पादक का मानो दिल ही फेल हो गया। जब उसने मुना: निकालो भित्र टिकट और पेशगी, यार चलो पेरिस ।
इक्कीस h प्रेम ताप है । इसे ताप का नाप लेने का न कोई थर्मामीटर है न कोई और पैमाना है । यदि होता तो सिद्ध हो जाता कि इसका पारा सौ; दो सो, तीन सौ डिग्री तक चढ़ सकता है। जहां तक मेरा संबंध है मुझे लगभग दो सौ डिग्री का प्रेमताप था। मैंने इस प्रकार अन्दाजा लगाया है : बम्बई से उड़ान करने के बाद औसतन एक डिग्री पारा रोज कम होता रहा और मैं लगभग छह महीनों में पूरी तरह स्वस्थ हो गया। भारत से पेरिस मैं उल्टे-सीधे रास्ते से आया था । काबुल, तेहरान, वेस्त, एथेंस और पेरिस ।, काबुल मेरा एक जिगरी दोस्त है और उसके लिए मन सदा ही उदास रहता है। ईरान की पी० ई० एन० सभा के अध्यक्ष की तरफ से मुझे कुछ दिन तेहरान विताने का भी बहुत दिनों से एक निमन्त्रण-पत्र आया था जो मैंने स्वीकार नहीं किया था। बेरुत गये भी वैसे काफी साल हो गये थे और इतने लम्बे अरसे में वहां आयी तब्दीलियों को देखने का मैं इच्छुक भी था । और एथेंस में यूनान का विदेश मन्त्री मेरा मेजबान था। यह पद संभालने से पूर्व वह दिल्ली में यूनान का राजदूत था और हमारी गहरी मित्रता थी । वह भाई कविता लिखने का बहाना किया करता था। कार्यक्रम मैंने इस प्रकार का बना लिया लेकिन वह पूरी तरह से कार्यान्वित न हो सका। वह"वह सदा मेरे साथ और मेरे आस-पास होतो, न उसे छोड़ा जाता और न ही उसे गले ही लगाया जाता। जहां भी पहुंचा, सबसे पहले उसी का ख्याल कि काश, वह साथ मे होती। मजा ही 126 विकेन्द्रित मजा होता। और पहला अवसर मिलते ही मैं उसे पत्र लिखने बैठ जाता। (यह सभी पत्र अभी भी मेरे पास हैं डालने किस पते पर थे? इन्हे एक दिन छापूगा)। प्रसिद्ध लेखक समझकर काबुल, तेहरान और एथेस के मेरे मित्र मुझे पागल न कहते । पेरिस आकर भी मैंने उसे काफी पत्र लिखे। उसके लिए पेरिस के बारह पोटरेट भी कलम-बद्ध और चित्रित किये जो- अब पुस्तक के आकार में छप चुके हैं। हों, बुखार की डिग्री वैसे अब कम हो रही थी और इन दिनों मेरे संपादक मित्र की ओर से मुझे एक मोटी और भारी-सी रजिस्ट्री पहुंची। क्या था यह ? हवाई डाक द्वारा भेजने में उमे काफी खर्चा करना पड़ा होगा । कोई जरूरी वस्तु ही रही होगी फिर सोचा उसने कौन से अपने पैसे खर्च किये होंगे। रामराज अमीर दैनिक पत्र है। रजिस्ट्री खोली तो एक पुस्तक की पांसिपि थी। संपादक मित्र की रचना यो-यूरोप का आधुनिक दौर और उसका भारत पर प्रभाव। साथ मे एक पत्र भी था, मुस्कराता हुआ पत्र । शायद कह रहा हो-देखो कैसा तुम्हे उल्लू बनाया है । पांडुलिपि प्रेस में जाने के लिए तैयार थी और मेरे मित्र का निवेदन था कि मैं उसे आधुनिक हालातों के अनुकूल संशोधित करके शीघ्र से शीघ्र वापस भेजदूं। अच्छातो यह बात है। इसीलिए डाइरेक्टरों के बोर्ड के सामने तुमने मेरी सिफारिश की थी । मैं भी कहूं कि कोई न कोई घुडी तो जरूर है। बदमाश ! हसमखोर !! चार सौ वीस !!! चलो कोई बात नहीं, आपका चार है, माफ किया । आधुनिक दौर में कौन चार सौ वीस, वैसा ही आठ मौ चालीस। यह पाडुलिपि भगवान ने मुझे एक उपहार के रूप में भेजी । उपहार के तौर पर भी और खिलौने के तौर पर भी । क्योकि सबमे बढ़िया निश्चित तौर पर खिलौने ही होते हैं या होने चाहिए। मैं उसे पढ़ने और फिर संशोधन करने में व्यस्त हो गया। अभी तक मैं नहीं समा सका था कि मेरे इस मंपादक मित्र में कुछ साहिरियक अंश भी है और कुछ राजनीतिक गूम भी । विना यूरोप भ्रमण के उमने यूरोप के आधुनिक काल और विशेष तौर पर यहां के राजनीतिक वातावरण में उठ रहे इस उतार-पढ़ाव और आरमविरोधी शक्तियों के प्रभाव का चित्रण किया है। वह पामा अया।
विकेन्द्रित 127 अलावा इसके साहित्यिक भाषा में उसका वर्णन भी बुरा नहीं था । परन्तु फिर भी संशोधन की जरूरत थी । सब कुछ होते हुए बिना यूरोप-भ्रमण के यूरोप के बारे में लिखने में गलतियां रह जाना जरूरी ही है । और मेरा मित्र'यह कमी जानता था। परन्तु योग्य संशोधन के लिए परिश्रम की जरूरत थी। एक तो मैं भी चार साल बाद यूरोप आया था और दूसरा जैसा मैं कह चुका हूं मुझे लगभग दो सौ डिग्री तक का प्रेमताप था। इस बीमारी ने मुझे मानसिक तौर पर कमजोर कर दिया था (इसीलिए प्रेम बुखार शारीरिक बुखार से अधिक खतरनाक है। यह मनुष्य की मानसिक और आत्मिक, एकाग्रता को कमजोर कर देता है)। पिछले डेढ-दो साल से मैंने अच्छी तरह समाचार पत्र भी नहीं पढ़े और बुद्धिजीवी तथा साहित्यिक स्तर के बारे में बेखबर था। पुस्तक का दयानतदारी से संशोधन करने के लिए मैं जो कुछ भी होऊ मरीजे-इश्क, मरीजे-वफा, मुनकर, काफिर या पक्का आस्तिक, आत्महितपी या मगरूर में हर हालत में दयानतदार जरूर हूं। मेरे लिए खास-खास मसले समझने और जानने के लिए यूरोप-भ्रमण आवश्यक था । सी में घूमने के लिए तैयार हो गया-कहीं गाड़ी द्वारा, कहीं विमान द्वारा और कही मोटर द्वारा। रगड़-रगड़ मेरी मोटर चले, दगड़-दगड़ दौड़े मेरी गाड़ी, फुर-फुर मेरा विमान उड़े और सर-संर घले मेरा मन और मेरी कलम । यह सारी रंगड़, दंगड़, फरर, और सरर में सर्वशक्तिमान का धन्यवाद कि मेरी प्यारी मदरासन चकरा गई और वह गिरने लगी। अपने मित्र की पुस्तक संशोधित करते हुए इच्छा हुई कि क्यों न खुद एक पुस्तक घसीट डालू । एक अच्छे लेखक के लिए किसी की पुस्तक का संशोधन करना कड़ी साधना है। एक अच्छे लेखक के लिए किसी भी पुस्तक का संशोधन, पूजा या इबादत के समान है। पूजा और इबादत की तरह ही इसमे एकाग्रचित होना पड़ता है और उतने ही त्याग को जरूरत होती है। इस त्याग और एकाग्रचित्त का लाम यह हुआ कि लेखक अपने आप पर नियंत्रण करना सीखता है और बौद्धिक दूरदर्शिता उसके भी भीतर प्रवेश करती है।
128 विकेन्द्रित परन्तु बौद्धिक दूरदर्शिता की राम-कथा छेड़ने वाला मैं कौन पापी हूं। क्या वौद्धिक दूरदर्शिता थी मेरी? रामराज के लिए लिखता था जिस रामराज मे मेरा बिल्कुल विश्वास नहीं था। लेकिन ऐसे शब्दों को बैठाता कि रामराज के श्रद्धालु रामराज से अधिक मेरे श्रंद्धालु बन गए। याद आती है कुछ घटनाएं। एक बार एक अमरीकी डीगोल और फास के विरुद्ध लाल-पीला हुए फिर रहा था परन्तु मैंने उसे दलीलबाजी से सिद्ध कर दिया कि डीगोल और फ्रांस की उस समय की नीति दरअसल अमेरिका के पक्ष में जाती थी और इस बात को आम अमेरिकी समझते नहीं । वह अमेरिकी समझ गया। एक बार एक आस्तिक को तर्क-विज्ञान द्वारा नास्तिक बना दिया । यद्यपि स्वयं में तब आस्तिक था। मतलब यह कि यही तो बौद्धिक दूरदशिता है । तर्क और दलील द्वारा सच को झूठ और झूठ को संच कर बताना । मारा-मूरा किसी को नहीं और ऐसे ही अरथी निकालकर राम-नाम सत्य है अलाप दिया । जन्मा कोई नहीं और लड्डू बांट आय. हम ? निष्कपट प्यार, दूरदर्शिता और विश्वास में ऐसी चिंतनशील और बौद्धिक उड़ान कहा ? देखिये न, मेरे ही इस जगह-जगह से टूटने वाले उपन्यास की तरफ ? कैमे थी मेरे गद्य की बनावट प्रथम अध्यायों (?) मे। और जब प्यार हुआ उस गोरी के साथ तो तब जा भटके उसकी याद मे या मेरी मूर्खता है या मेरा खालीपन । उसके प्यार के बाद रचना में कितनी निर्बलता है क्या यही वह मुखोटा है जिस मुखौटे की चर्चा करने वाला यह रचनाकार है और वही पत्रकार के साथ डबलबेड पर बारीकियो का उल्लेख करने वाला लेखक ? नही भई, नही । यह लेखक नही, आशिक है, रचनाकार नही जानवर है । यह मोहब्बत मे गहरा है। इसको मनुष्य और फिर बन्दर बनने की आरजू है। मोहब्बत और प्यार मे सराबोर होकर लिखी सभ्य रचना निम्न और मध्य स्तर की होती है। वह पढ़ी, प्यारी, सतकारी वेशक जाये परन्तु सम्पूर्ण मानव विकास में वह किसी विशेष हकदार नहीं। धत तेरे प्यार की। और अब देखो जब बुखार कम हुआ है तो किस प्रकार के गद्य के पद रहे हैं । ब्रह्माण्डनीय रग मेरे शब्दों में किस प्रकार आते जा रहे हैं- - स्थान की वाईस मुझे वह दिन-दिन या रात ? दिन भी और रात भी याद है। आखिर दिन और रात के चौबीस घण्टे मिल कर ही दिन कहलाता है जब मैं अच्छी तरह से स्वस्थ हो गया तो वैसा सेहतयाफ्ता दिन भी याद- गार मे वैसे ही जुड़ गया जैसे बीते हुए दिन । एक जून भोगी,थी मैंने (प्यार एक जून ही तो है) और आज फिर मनुष्य बना था । सर्दियो की ऋतु वेशक यौवन पर थी लेकिन पेरिस मे वह बहार जैसा ही दिन था । सूरज चमक रहा था और ऐसा लगता था कि ठण्ड अपने लिए एक दिन के लिए ठण्ड ढ ढ़ने के लिए कही चली गई है । पेरिस की क्या बात है। चंचल स्त्री की, तरह उसकी प्यारी-प्यारी ऋतुए न इसके प्यार (2) पर विश्वास किया जा सकता है-हर सुबह इसकी नयी और हर रात इसकी अलग ही खूबसूरती और मिजाज होते हैं। मैं और मेरी एक फ्रांसीसी मित्र किसी विदेशी राष्ट्रपति के सम्मान मे दी गई पार्टी में शामिल होने के लिए होटल दा वील मे में निकले। अभी बहुत रौनक यो लिहाजा हम पहले एक कहवाघर फिर दूसरे, फिर लग्जम वर्गबाग, फिर एक शराबघर और फिर, मोमरान जा पहुचे । मोमरात्र मे ही एक छोटे से आशियाने लू कुआं में रहता था। जब देर काफी हो गई तो उसने जाने की ख्वाहिश जाहिर की और सीधे से ही मेरे मुंह से निकल गया : 'चलिये आज की रात मेरे पास ही रह जाओ।' वह हैरान ! मैं भी ! वह हैरान कि आज कैसे मेरे दिल में उसके लिए प्रेम उमड़ा है। जरूर ही उमड़ा होगा, नहीं तो पहले क्यो नहीं कभी ।
130 विकेन्द्रित .. 11 . T मैंने उसे न्योता दिया। मैं इसलिए हैरान कि आज मैं एकाएक भला-चंगा कैसे हो गया। शरीर, मन और बुद्धि में बीमारी का बटन जैसे 'ऑफ' स्थिति की तरफ चला गया हो । मेरी महेली मुस्करायी, मैं भी। भोली-भाली सुन्दर-सी-मैं कैसे अपनी बीमारी मे उसकी सुन्दरता से विरक्त रहा। कभी उसे विदाई चुम्बन भी नहीं दिया था। हैरानी पर हैरानी यह कि वह मुझे अच्छी लगती थी और मैं उसे। हम दोनों के देखने के ढंग से प्रत्यक्ष रूप से परस्पर प्रशंसा की कहानी पढ़ी जा सकती थी। वह मुस्करायी और उसने एक अलौकिक नखरे के साथ कहा : 'अच्छा जी!' मैंने भी अनोखे अंदाज से उत्तर दिया : 'जी हां। परन्तु एक शर्त पर।' 'क्या शर्त? शत पूरी करने में मैं घबराती नहीं।' 'लेकिन यह बड़ी आसान शर्त है । 'बताओ!' 'अभी नहीं, फिर । बड़ी आसान है कह जो दिया तुम्हे'।' 'और अगर में पूरी न कर सकी तो आधी रात को कमरे से बाहर निकाल दोगे?' 'मैं इतना निर्दयी नहीं और फिर इस सुन्दर शरीर (मैंने उसे आलिंगन में ले लिया) और फिर इस सुन्दर दिमाग (मैंने उसके माथे को चूमा । यह पेरिस में मेरा पहला चुम्बनं यां।) को कौन आलिंगन में लेकर घूम-घूमकर सम्भाल-सम्भाल और छुपा-छुपा कर नहीं रखेगा। कोई बात नहीं अगर तुम शर्त पूरी भी न कर सको तो भी चलेगा।' जब हम कपडे उतार कर विस्तर मे घुसे तो उसने पूछा: 'शर्त तो आपने वतायी नहीं और बिस्तर तक हम पहुंच गये है। ऐसे ही रौब झाड़ते थे।' 'तुम मियानी हो शायद तुम उरा शतं की अवस्था सक पहुंचो ही ना । 'हूं तो फिर तो में पहुंच कर दिपलाऊंगी।' लगता है उम वेचारी ने उल्टा ही समझा । उम अवस्या तक पहुंचने . 1 . +5 विकेन्द्रित 131 के बिना रह सकती हैं तो सिर्फ, फासीसी स्त्रिया ही। परन्तु आज यह फांसीसी युवती भी फेल हो गई। (क्योकि अभी युवती थी?) जब आधी रात बीतने लगी और हमारे चुम्बन, हमारी काव्यमयी और विलासमयी सीमा तक पहुंच गए तो वह मेरे शरीर के साथ सिमटती हुई बोली: "ओह ओह मैं तुम्हें प्यार करती हूं। हां'ओह मैं तुम्हे प्यार करती हूं।' परन्तु मैंने उसे उस समय गले से पकड़ कर कहा : 'वस यही शर्त थी। मैं यह शब्द नही सुनना चाहता।' उसने विस्फारित नेत्रों से मेरी तरफ देखा पल ही पल के लिए जैसे यह पत्थर बन गई, मैं भी दुःखी हुआ और अपनी भूल का अहसास किया, कम-से-कम उस पल मुझे उसका सपना नहीं तोड़ना चाहिए था। मरी क्षमा मांगती हुई नजरें पहचानकर वह मुस्करा पड़ी-कितनी सुन्दर और प्यारी मुस्कान थी वह--और उसने पूछा : 'क्यो? पहले तो सोचा कि मुंह मे आई बात कह दूं, उसे भी आनन्द लेने दूं और खुद भी आनन्द लू । परन्तु फिर सोचा कि मौका भी यही है और सारी रात अपने पास है । अगर नाराज भी हो गई तो भी मना लूगा और अलावा इसके अभी तो और भी बहुत-सी रातें आनी थी (परन्तु यह बात तो दोनों तरफ से अच्छी लगती है) खर मैंने बडी ही हलीमी से, बडे ही प्यार से कहा (अगर नफरत का पुट या तो आवाज मे प्यार, क्योकि किमी का दिल तो रखना ही होता है ): 'क्योंकि मुझे प्यार से नफरत है ।' वह हंस पड़ी। हंसती ही गई। लोट-पोट हो गई। मैं भी मुस्कराता रहा और उसने कहा: 'तुम बड़े प्यारे हो मेरे 'प्यारा हूं या नही परन्तु मेरे शब्द ध्यान से सुन लो। मुझे न तो प्रेम में ही इतवार है और न ही में प्यार करना चाहता हूं।' 'लेकिन तुम प्यार के बिना रह नही सकते । मैं तुम्हें बताती हूं।' और फिर मेरी इस पेरिसी पत्रकार सहेली ने मेरी : दिल्ली वाली 132 विकेन्द्रित पत्रकार सहेली की तरह मेरी छाती के मिले-जुले वालों को स्पर्श किया। यह बाल सचमुच ही स्त्रियों को आकर्षित करते होंगे, लेकिन क्यों ? प्यार--प्यार के शाब्दिक रूप मे दो भावुक बिना शक एक दिमागी स्वांग है और नवीन पश्चिमी सभ्यता ने इस शब्द को हर प्रकार के लिंग- भोग क्रिया का अभिव्यजन बनाकर इसका शील बिल्कुल ही भंग कर दिया है। - और हम इस समय एक-दूसरे की बांहों में पड़े, एक-दूसरे के लिए कैसी सवेदना रखते हैं ? प्यार का आम शब्द ही इसकी आम व्याख्या करेगा । परन्तु यही तो गलत है। यही तो मेरी तकरार है। एक तरफ हम प्यार के लिंग-भोग की क्रिया जोड़ते है तो दूसरी तरफ उसे भगवान के साथ साक्षात्कार का साधन भी हैं तो तुम्ही बताओ कि इस शब्द के स्वरूप के बदलने का समय है कि नहीं? लिंग-भोग और प्रभु-मेल में शायद समानता हो, एक जैसा ही आनंद हो। मैं हंसा परन्तु कहा। यह हंसने का समय नहीं। तुम्हारी सभ्यता मे तो फिर इस शब्द की स्थिति ऊची होनी चाहिए। नही, यह दो अलग पहलू है । अच्छा यहा तो तुम भला एक-दूसरे को खुले तौर पर मिलते हो, अपना साथी स्वय चुनते हो और कह सकते हो कि मेल-मिलाप, भोग या विवाह का आधार प्यार है । परन्तु हमारे यहा तो लड़के लड़की ने पहली रात से पहले एक-दूसरे की शक्ल भी नहीं देखी होती। परन्तु फिर भी वह हीर-रांझा (मैंने उसे हीर-रांझे का प्रकरण समझाया) और रोमिया-ज्यूलियट बन कर रहते हैं । यह प्यार हुआ कि परिहाम । क्या प्यार अगर साल भर बाद तुम लोग यहां तलाक ले लेते हो तो हमारे पुरुप का स्त्री से मन चुक गया। वात एक जैसी ही है। एक ही मन्द क्षण-भंगुर जजवात और शाश्वत संवेदना को किस प्रकार सही रूप मे रूपायित या चित्रित कर सकता है । मायद प्यार साथ है। 1 Mann.. विकेन्द्रित 133 तो फिर इसे प्यार की जगह सायं ही क्यों ने कहा जाए जितनी देर इकट्ठे रहो, रहो और फिर विसर गए तो विसर गए । परन्तु भायंद जितनी देर विसरने में लगती है वह प्यार है और वही प्यार का पैमाना। परन्तु अगर वह प्यार है तो उसके लिए कोई और शब्द हटना पडेगा- फिर किसी को भूलना और याद रखना भी एक-दिमागी फेनरहे। मनोवैज्ञानिक खेल । कभी-कभी पल और कभी दिन और कर्मों साल लग जाते हैं। यह सब जीवित रहने के बहाने है अगर कोई और अच्छा बहाना मिल जाए तो पिछला भुला दिया जाता है और अगर नहीं मिलता तो उसकी याद बनी रहती है, महकती रहती है । यार की तस्वीर बहाना है, यार की कब्र पर पूजा एक बहाना । और क्या फिर प्यार भी एक वेहाना तो नही ?-प्यार अधूरी जिन्दगी का ठहराव है और प्यार की याद... वह युनती भी गई और मुस्कराती भी। एकाएक उसने मेरे ओंठों पर ओंठ रखकर चूमने शुरू कर दिये- मुझसे भी न रहा गया। हम इस प्रकार दोनों को चूमते, चूसते रहे परन्तु मन मे फिर एक उबाल उठा और ओंठ अलग करते हुए मैंने कहा : 'पहले 'मेरी व्याख्या सुनो और..." वह मेरी छाती के बालो को फैलाती हुई बोली : ''नहीं पहले 'प्यार' करेंगे-नही, प्यार नहीं, इस शब्द से आपको नफरत है-~पहले भोग करेंगे । अब ठीक है..." मुझसे रहा नही जा रहा था परन्तु फिर भी मैंने अपना दिल पक्का हुए कहा : 'नहीं, पहले मेरी कहानी। फिर मैं इस जजबात और इस शब्द से मुक्त होकर तुम्हें नही, तुम्हारे साथ भोग करूंगा।' और मैंने उसे अपनी बीमारी की कहानी सुनाई। उसने ध्यान से सुनी और कहने लगी: 'शायद मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्यार की बीमारी आवश्यक है।' 'चल-चल, आई हो बड़ा ज्ञान शाइने ।' 'ज्ञान में झाड़ रही हूं कि तुम । तुम पर मेहरबानी कर के मैं सुनती . . r" 134 विकेन्द्रित रही हूं क्योकि मैं तुम्हे प्या"क्योंकि तुम मुझे अच्छे लगते हो। तुम समझते हो कि तुम आज जानवर से इसान बने हो और मैं समझती हू सच्चाई इसके विपरीत है । हू' मैं मुस्कराया। 'देखो सुन्दरी, मैं अब पेरिस मे बस चार-पाच महीने और रहूंगा। पत्नी एक मैंने अपनी छोड़ी हुई है और एक यह जंजाल अब गले से उतारा है मुझ पर कोई उम्मीद न रखना..." 'बस एक उम्मीद रखती हूं कि तुम नामदं न हो...' हम एक-दूसरे को मिले हैं क्योकि हमें एक-दूसरे की संगत और सोहवत अच्छी लगी। तुम्हारी मित्रता, तुम्हारे साथ बिताये क्षण, तुम्हारे साथ राजतिनीक और आर्थिक मसलों पर हुई बहस और आज तुम्हारे साथ यह चुम्बन और आलिंगन"... 'बस'..?' 'और भी, और भी, और भी मुझे हमेशा याद रहेगा। दिल्ली की जलती हुई गर्मियों में जब तुम्हारी याद आयेगी." 'बस ! बस!! मेरे प्रियतम कही मुझे 'प्या' और क्या कहूं"जब तक इसकी जगह पर कोई और शब्द नही बताओगे तो इसी का इस्तेमाल करूगी कही मुझे प्यार ही न करने लग पड़ना।' 'सुन्दर, गुणवती, बुद्धिमती और प्यारी लड़की,को तो मैं सदा ही प्या · अच्छा जब तक कोई और, शब्द नहीं मिलता''यही इस्तेमाल करूंगा' 'मैंने सदा ही प्यार किया है और करता रहूंगा। मैं...' उसने फिर मेरे ओठों पर हाथ रखा और फिर अपने ओंठ । और यह कहते वह मुझेसे लिपट गयी :: .' 'तुम सचमुच ही बड़े प्यारे हो, मेरे प्यारे । तुम नहीं जानते, मैं तुम्हें कितना प्यार करती हूं"प्यार करती हूं." (क्या तुम समझती यों कि तुम्हें प्यार करने के लिए हूं। मैंने प्यार से फरत करने का स्वाग रचा था?) .
तेईस ग स्वस्थ तो मै हो गया था लेकिन फिर भी कभी मन के किसी कोने में किसी समय भय का पुट दिखाई देता। मानसिक संतुलन भी मैं कभी- कभी खो बैठता, सोचता यहां तो 'ठीक हूं, अच्छी तरह महसूस करता हूं परन्तु उसे देखते ही कही पुनः जी मिचलाने न लग जाये। कही फिर वह बला न चिपट जाये और मैं निर्वल हो जाऊं। जब पेरिस से मैं स्वदेश लौटने को हुआ तो रोम के हवाई अड्डे पर इस भय ने पल ही पल के लिए मुझे भयभीत कर दिया। लिहाजा उसी समय मैंने अपना कार्यक्रम बदल लिया और सीधा वापस आने की जगह एक हफ्ता काहिरा रुक गया । (कसी विचित्र स्थिति है कि संसार में जहाँ भी रकना चाहो वहां ही कोई न कोई परिचित या मित्रं मिल जाता है ।) सोचा प्यार की अरथी सिर पर उठाये लिये जा रहा हूं। यह पक्का करलू कि कही मंजिल पर पहुंचते-पहुंचते मुर्दा कफन फाड़कर बोलने न लग जाये। काहिरा में भारतीय राजदूत के यहां एक मिसी प्रकाशक मिल गया और बातचीत के दौरान उसने मेरा एक उपन्यास अरवी में अनुवाद करने के लिए मांगा (ऐसी घटनाएं भी मुझे होनीवाद और भावीवाद बनने के लिए मजबूर करती हैं और फिर होनीयांदी से आदर्शवादी और आदर्श वादी से ईश्वरवादी । सहजाद, अस्तित्ववाद और बुद्धिवाद की मंजिल पर पहुंचना और भी कठिन और वहां पहुपकर टिक सकना उससे भी कठिन है । काहिरा मे उतरा था अपना मन रवां करने के लिए और वहां 1 136 विकेन्द्रित उतरने से पहले मेरा रवा हो भी गया"ऐसे भय का अंदाज-सा हुआ जो हवा के एक झोखे के साथ उड़ गया । अरवी मे अभी तक मेरे किसी भी उपन्यास का अनुवाद नहीं हुआ था और इच्छा मेरी जरूर थी कि इस भाषा में भी मेरा कोई उपन्यास छपे । ज्यादा इसलिए कि मेरी एक अति मुन्दर सहेली को उरजोश अरबी संगीत अति रोचक लगता था। (वाह । चाह का कारण और फिर कारण तथा कार्य का रिश्ता ।) एक हफ्ता काहिर रहने के बाद मैं दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरा और डिफेंस कालोनी अपने घर पहुंचा और जानते हैं, सबसे पहले किसके दर्शन हुए उसी काले मुखड़े के । वाह ! कैसा मुखड़ा है, कैसा मुखौटा है । ऐसे वेसिर मुंह को मुह नही मुखौटा ही कहना चाहिए। मुस्करा कर मैंने फिर उस समय प्यार को अरथी एक जगह टिका दो और आज इस रचना के द्वा इम की अंत्येष्टि करने को चला हूं। सो आज इस भंजन उपन्यास द्वारा मैंने प्यार की अरयी निकाली है। इस अरथी को मैं मोहब्बत की विश्व अरथी का चिह्न बनाना चाहता हूं। इसलिए आओ, सजनो मित्रो, राम नाम सत्य का उच्चारण करते हुए इसके पीछे-पीछे आओ। आपका किसी प्रकार का विरोध लाभदायक नहीं होगा । वह समय लद गया जब मेरे जैसे बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक चुतशिकन की आप रचनाएं जला सकते थे या उसे सूली पर चढ़ा सकते थे या उसे जहर पीने या आत्महत्या करने पर मजबूर कर सकते थे । आज हमारा पा और हमारी पीठ शक्तिशाली है और हमें अनेक गौरव और बलवान ताकतों का सहयोग प्राप्त है। इस अरथी के जलूस में सम्मिलित होना एक दिन आदर और सम्मान का प्रतीक माना जायेगा। इससे बढ़कर आपको और कैसे गन्दों और -सपनो से आकर्षित और मोहित करूं । हर हालत मे आपका इससे किनारा करना आपकी अज्ञानता का प्रमाण होगा और हम वुद्धिजीवियों का सिवाय उन्हे सुधारने और समझाने के अजानियों के साथ क्या सरोकार ! 10
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