Sanmati Library, Jaipur

Puran-tatv-prakash Volume-ii

Bansheedhar Ji · 2009/09

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ओरेमा
पुराण-तत्व-प्रकाश
ब्ध * य * शो #य शोध * ना * न् ? ? truvia
द्वितीय भाग
जिसमें
श्री महानवता देवीभागवन्त झा, विष्ण. शिव
लिल, अग्नि, पूजन, बाराह,चिप्य, कला
वैचर्च, वामनादि पुराणों सेशन'ATTI
पूर्वक दर्शाया है किसठारह पुराण
महापव्यास प्रणीत नहीं है
घोपु * स्त"
जिसको
श्रीमान् ५० वंशीधर जी पाठक आगरा
निवासी की सहायता से
चिम्मनलाल वश्य कासगञ्ज
निवालीने
निर्मित कर
पं० चौरसाद शुरद्वारा देशबन्धु प्रेस
धारामही में मुद्रित कराया।
(জন।
रजिष्टर टासन् १८६९ अमुसारकराई है
द्वितीया तिसन् १६६४ (मूत्यातिपुस्तक
१२००
L-110आद आना
2***URELIGERY

समर्पण । प्रिय पाठवन्द ! मेरे परम उस स्वामी पिता श्रीलालाटीकारामजी सत्य-प्रिय भाषण करने की बड़ी रुचि थी. इल कारण उनका प्रेमं मी पल महापुरुषों के साथ रहता था। मैं अपने पिता का एकलौता पुत्र है (पाल पसा धन का भण्डार-नहीं, जिससे पाठशाला.. धर्मशाला, अनाथालय स्यादि बनवाकर संसार में उनके नाम स्मरणार्थ छोड़ सक। हां मैंने बड़े परिश्रम के साथ इस अव्य को तय्यार किया है. जिस में सत्य-निय-कथन है जिससे देश के उपकार होने की भः संमभावना है उसी को आज मैं- - th अपने माननीय पिता के नाम पर समर्पण करता हूं। हे शक्तिमान् प्रमो. जिएं आप दयाभण्डार हो। आप की कृपा से यह पुस्तक लोक से मेरे पिता का नाग चिरस्थायी रहे ॥ ॐ शम् ॥ भावश्यक सूचना । इस पुस्तक का उर्दू, अनुवाद उर्दु जानने वालों के हितार्थ शीघ्र छप कर नयार हो जायगा अतएव कोई महाशय इस पुस्तक और इसके किसी परिज को उर्दू अनुवाद करने का कष्ट नावें। आपका शुभचिंतक चिम्मनलाल, 'स्थान आय॑मदिर निलहर यू० पी० जला शाहजहांपुर- M पुराण-तत्व-प्रकाशा द्वितीय-भाग। पन्द्रह दिन व्यतीत होने के पश्चात् नियत समय पर श्रीमान् पण्डित जी और अन्य महाशयों का प्रवेश। शायंसेठ-श्रीमान् पण्डित जी को आते देख उठ कर दोनों हाथ जोड़ कर बड़े प्रेम से श्रीमान् को नमस्ते कर कहा कि आइये, पधारिये, विराज- मान हुजिये। सुयोग्य पण्डितजी-नें हर्ष के साथ आयुष्मान कहा और विराज- मान हुए। सेठजी-से कुशल प्रश्न और गृह के समाचार पूंछे जिस का उन्हीं ने यथावत् उत्तर दिया इतने में अन्य महाशयगण भी आगये सब ने श्रीमान् को यथायोग्य' कह कर आनन्दं समाचार सुने । इसे के उपरान्त श्रीमान् ने खेठ जी से कहा अब आप कथा का आरम्भ कीजिये परन्तु प्रथम आप देव और त्रिदेव लीला यो संक्षेप से सुना कर अन्य विषय कों सुनाना आरम्भ करें। शायंसेठ-बहुत अच्छा जो आप की आशा, प्रथम निम्न लिखित मन्त्र से ईश्वर की प्रार्थना की-- ओ३म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धी- महि धियो यो नः प्रचोदयात् । जो ईश्वर प्राणों से प्यारा, दु:खभञ्जन, सुखस्वरूप, जंगपिता, अत्यन्त भजने के योग्य, विज्ञानस्वरूप, दिन्यगुणयुक्त, सव के आत्माओं का प्रकाशक, रूप जलों का दाना परमश्वर है उलको प्रमभक्ति से निश्चयकर अपनी आत्माओं में धारण करें यह हमारी मुद्धियों को उसम धर्म संयुत कामों में लगा ॥ पुनः पण्डित जी से कहा कि अब मैं आप को इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, बाशष्ठ, विश्वामित्र, वृहस्पति, शुक्र, अगस्त्य, भृगुजी, प? २ देव और मुनियों की लीला सुनाता हूं फिर त्रिदेव लीला को सुनाऊंगा नवम परिच्छेदः देव और मुनि लीला। इन्द्र लीला। आर्यसेठ- श्रीमान् महाराज देवतों में देवराज कहलाते हैं, परन्तु पुराणों के पाठ करने से उनके कार्य 'बड़े घृणित प्रतीत होते हैं। देखो अप कोई पुरुष तप करने का प्रवन्ध करता और ज्यो र तप निर्विप्न होता साता त्यो २ देबराज के हृदय में घबराहट उत्पन्न हो जाती फिर वह उसके तए भग फरने के अनेकान उपाय सोच उनको काम में लाते. कहां तक कहें वह बड़ी २ अपसराओं को भेज कास के वशीभून कर उनको तप से भ्रष्ट. करा देते और स्वयं भी, बहुत-सी अप्सराओं को रखते. और इसपर भी देवताओं में श्रेष्ठ देवराजके पद पर सुशोभित हैं देवी भागवत्-स्कंद ४ अध्याय १२ में लिखा है कि शुक महाराज दैत्यों की विजय के लिये महादेव जी के समीप बृहस्पति के समान मन्त्र लेने गये तव महादेव जी ने उन से कहा कि १०० वर्ष धूम्रपान करे फिर मन्न यंतलायेंगे। उन्होंने ऐसा ही किया जब यह वृत्तान्त इन्द्र महाराज को ज्ञात हुआ तो अपनी पुत्री जयती से कहा कि हम हमको पुत्र - ': . 2 - महराज को दिये देते हैं तुम उनको प्रसन्न कर उनका तप भंग करो या वह हभ पर वैले दयां करने लगे । यह सुन केन्या वहां गई और उनकी अच्छे प्रकार से सेवा की जब १०० वर्ष व्यतीत हो गये और शिम जी ने प्रसन्न होकर उनको वर दिया तब शुक जी ने जयन्ती से कहा कि तुम कौन हो और क्या चाहती हो. सत्य कही हम तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हैं जो तुम मांगोगी वही तुमको देंगे। तब जयन्ती ने कहा कि आप अपने तपोबल से जान लीजिये । इस पर उन्होंने कहा कि मैंने जान लिया । परन्तु तुम भी तो कहो । तब उसने अपने आने का वृतान्त कह सुनाया जिसके लिये इन्द्र ने भेजा था। जिसको उन मुनि ने जहा कि अच्छा हम तुम्हारे साथ.सौ वर्ष तक अलक्ष में निहार करेंगे और घसा ही :किया। मया सहत्वं सुश्रोणि-दशवर्षाणि भामिनी । लक्षू तैरहश्या चरम स्नेह यहच्छया। एवमुक्ता गृहं गत्का जयंत्याः पाणिमुद्छन् । - तया सहावस व्या दशवर्षाणि भार्गवः ।। ११. पद्मपुरंग्ण-स्वर्ग तत्तीय खंड अध्याय २४ में भी यह कथा लिखी है - ब्रह्मवैवर्तपुराण के कृष्णजन्म खण्डअध्याय ६१.में लिखा है कि एक बार इन्द्र मन्दाकिनी नदी के तट गौतमऋषि की खी अहिल्या को देख काम के वशीभूत हो गयें। दैवयोग से किसी दिन गौतम शङ्कर के यहां गये हुए थे इधर केन्द्र ने अपना मनोरथ सिद्ध्यर्थ महात्मा गौतम का रूप बना. अहल्या के यहाँ जाकर विहार किया एकदा गौतमः शीघ्र जगाम शङ्करालयम् । शको गौतमरूपेण तां सम्भोग चकारतः ॥ १४ ॥ इतने में गौतम घर आये उन्होंने दोनों के अनुचित व्यवहार को देख कर इन्द्र से कहा कि जा तेरे शरीर में भग ही.भग हो जायंगी । और अहल्या से कहा कितू शिला हो जा। नग्नामहल्यां रहंति पीनश्रेष्ठि पयोधरा । : मुनिः शशाप शकः च भगाङ्गश्च भवेति छ ।।

. कोपाच्छशाप पत्लीश्च सदन्ती भयविहलाम् । त्वञ्च पाषाणरूपा च महारण्ये भवेति.च.॥ यही कथा गणेशपुराण और मार्कण्डेय पुराण अध्याय ५ में लिखी है। नृसिंह उपपुराण अध्याथ६३मे लिखाहै कि एक दिन इन्द्र विमान पर 'बैंठकर मानसरोवर पर गये जहां कुबेर की श्री को देख मोहित होंगये और उसके गृहको गरे। उधर इन्द्र की आज्ञा से कामने स्त्री को प्रेरेत किया तब वह काम के. वशीभूत हो पूजाछोड़ कर इन्द्र के पास गई। फिर अपने २ वृत्तान्तको एक दूसरे में सुनाया । तिसपर इन्द्र ने कहा कि इसको मजो तुम्हारे चिना हमको आनन्द नहीं। इन्द्र उसको मन्दराचल पर्वत को कन्दरा में लेगये वहां अच्छे प्रकार विहार किया। जय कुवेर को यह समाचार मिले कि उनकी स्त्री चित्रसेना की कोई चुराकर ले गया तब वह आत्मघात करने पर उतारू होगये उस पर.मन्त्री ने नाडीजङ्घा नाम राक्षसी उसके खोज के लिये भेजा जो अत्यन्त सुन्दरप धारण कर इन्द्र के स्थान को गई जिसको देख इन्द्र वशीभूत हो गये और उसकी विमान में घिटला गुप्त स्त्री को दिखलाने के लिये चले । मार्ग में नारद महाराज मिले उस समय इन्द्र से कुशल क्षेम पूछने के पीछे नाडीजवा से पूछा कि राक्षसों के यहां आनन्द है। तेरे भाई विभीषण प्रसन्न हैं । उस समय इन्द्र ने बहुत विस्मित हो कहा कि इस दुष्टा ने हमको खूब छला अन्त को उसके मारने का विचार कर महात्मा: तृणविन्दु के आश्रम पर उसके केश पकड़कर खेचा वह रोदन कर पुकारने लगी इतने में महात्मा भी आगये जिन्होंने कहा कि रोदन करती हुई स्त्री को छोड़ दे परन्तु इन्द्र ने कोप के कारण कुछ न सुना और उसको मारडाला । उस समय मुनि ने कोप कर इन्द्र से कहा कि हे दुष्ट! तूने हमारे. तपोवन से ऐसा कार्य किया इस कारण तुम मेरे शाप से स्त्री होजाओ। तुरन्त इन्द्र स्त्री होगये इन्दु महाराज की और लीलाओंषो सुनिये जब अदितिके इन्द्र उत्पन्न हो गरे उसके बहुत काल व्यतीन होने पीछे दितिने कश्यप ले कहा कि इद्रके समान हमारे भी न हो तब मुनि में कहा कि पयोबूतं करो तो वैसाही पुत्रं होगा दिति ने स्वीकार कर गर्भ धारणा के पीछे पयोबूत में स्थित हो गई। गर्भ बंद चला थोड़े ही दिन प्रति के रहं गो तब अदिती जीत अपने पुत्र इन्द्र से कहा कि जिस प्रकार से हो सो दिति का गर्भ गिरा दो नहीं तो तुम से भी अधिक प्रतापी पुन उत्पर होगा और राज छीन लेगा । यह सुन इन्द्र-दितिजी के निकट .

() जा उनकी सेवा में लग गया एक दिन वह दिन में सों गई इन्द्र पैर दाब रहे थे अन्त को वह सूक्ष्मरूप को धारण कर दिति के गुप्त स्थान में प्रवेश कर गये और. गर्भ के बजू से सात खण्ड कर दिये ज़ब वह रोने लगे तो फिर एक २ के सात ३ दिये जो ४८ पचन हो गये इसी भांति वृत्रासुर से मित्रता कर विश्वासघात किया। पद्मपुराण सृष्टिखडअध्याय १२ में लिखा है कि पुरूरवा और इन्द्र में बड़ा प्रेम था एक दिन इन्द्र के आगे उर्वशी नाच रही थीं राजा पुरुरवा भी यहां बैठे थे जिन के रूप को देखःवह सब भूल गई इन्द्र ने उसको शाप दिया कि आज से ५५ दिन तक तू लता हो कर रहेगी और राजा त होकर तेरे साथ भोग करेंगे। पञ्चपञ्चाशदव्दानि लताभूता भविष्यसि । अध्याय १७ में लिखा है कि जब ब्रह्माजी ने यश करने का आरम्भ किया और सावित्री जी के आने में देर हुई.तच. इन्द्र ने एक गोप कन्या को लाकर खड़ा कर दिया जिसके साथ विष्णु की सम्मति से गान्धर्च विवाह कर यज्ञ करने में लग गये इतने में सावित्री देवी आई और वृतान्त को जान इन्द्र से कहा कि तुमने यह अनुचित कार्यवाही की है-इस से इन्द्र तुम कभी संग्राम में न जीतोगे पुत्र भी तुम्हारा नष्ट हो जायंगा। यस्मात्ते क्षुद्रंक कर्म तस्मात्त्वं लप्स्यते फलम् यंदा संग्रामसंध्ये त्वं स्थाताशक्तोभविष्यसि ॥ तदा त्वं शत्रुभिर्वद्धो नीतः परमिकां दशाम् ॥ पराभव महत्प्राप्य न चिरांदेव मोक्ष्यसे । १५० ॥ 'मार्कण्डेयपुराणजित्दः नग्थर. १. अध्याय.३ में लिखा है कि इन्द्र चूड़े पक्षी का रूप धारण कर एक मुनि के पास गये और कहा कि मुझको भोजन दो मुनि ने कहा कि जो भोजन की इच्छा हो सो लो। तय इन्द्र ने, मनुध्य मांस की इच्छा की। मुनि ने अपने पुत्रों से कहा जिन्होंने अपना मांस देने से इन्कार किया तब पिता ने पुत्रों को शाप दिया कि तुम सब पक्षी होजाओ और इन्द से कहा कि अब तुम मेरे शरीर का मांस भक्षण करोत:: ::::

M . r भक्ष्यस्वसुविश्रब्धो मामत्र द्विजसत्तम !। आहारीकृतमेतत्ते मया देहमिहात्मनः ॥ ४६ ॥ तब इन्द्र ने कहा कि मैं योगाभ्यास करके अपने शरीर को छोड़ दूंगा और इस समय किसी जीव के मांस को भक्षण न करंगा । यह सुन लुनि ने ध्यान से देखा और इन्द्र पक्षी का रूप छोड़ अपने रूप में हो गये तय इन्द्र ने कहा कि आप पाप रहित हैं आप की परीक्षा के लिये मैं भो भो विप्रेन्द्र बुध्यस्व बुध्याबोध्यं बुधात्मक । जिज्ञासार्थ मयोऽयंते अपराधः कृतोऽनघ ॥ ५२ ॥ आया था। " ..चन्द्र खीला f.. देवीभागवत स्कंद १ अध्याय में लिखा है.बृहस्पतिकी स्त्री, तारा बनी सुन्दर थी। एक दिन अपने यजमान के गृह गई। उसको देख चन्द्रमा, और तारा, चन्द्रमा की देख' कामतिर दुई। फिर को दिन तक दोनों में विहार किया। दिमानि कतिचित्तत्र जातानि रममाणयोः १ ११ ६ ॥ फिर वृहस्पति ने अपने शिष्य को भेज बुलाया पर यह न गई तब बृहस्पति जी आप गये और कहा कि हम ' देवताओं के गुरु हैं तुम हमारे यजमान हो जो 'मूर्ख गुरु की स्त्री से भोग करता है वह महापातकी होता है। चंद्रमा ने कहा कि हमने नहीं बुलाया वह आप अपनी इच्छा ले आई है। वह अपने घर को चले गये फिर थोड़े दिनों के पीछे कहा कि तुम मेरे शिष्य हो गुरु पत्नी माता के समान होती है इस पर चन्द्रमा ने कुछ न सुना तव वह इन्द्र के पास गये और सब घृतान्त कहा तब इन्द्र, ने चन्द्रमा के पास दूत भेजा जिसने जाकर सब वृतान्त कहा और यह भी निवेदन किया आप के यहाँ २८ :नियां हैं और इसके उपरान्त रम्भा आदि भी विहार के लिये मौजूद हैं, तब पन्द्रमा ने कहा कि इन्द्र और बृहस्पति दोनों बड़े शानी है जो अपनी मुधि नहीं लेने देखो वृहस्पति ने अपने बड़े भाई की स्त्री ममता को ग्रहण कर लिया उसी दिन से तारा सरसन्न हो गई । -- इस से तुम कह दो हम नहीं देंगे उसने वैसा ही कह दिया। फिर क्यों युद्ध को तय्यारी होने लगी उधर शुक ने चन्द्रमा से कहा कि तुम कदापि न देना हम तुम्हारी संहायता करेंगे । अन्त को बहुत दिनों तक युद्ध हुआ तब ब्रह्मा जी ने समझा कर ताराको चन्द्रमा से दिला दिया परन्तु चन्द्रमा ने उस को गर्भिणी कर दिया जब पुत्र हुओं तप चन्द्रमार्ने कहा कि हमारे सादृश्य पुत्र हुआ है हम को देवी, इस पर फिर संग्राम की ठहरी । तब ब्रह्मा ने एकान्त में तारा से पूछा कि किस का पुत्र है उस ने धीरे से कहा कि चन्द्रमा का। तय उन्होंने चन्द्रमा को दिला दिया जिस का नाम बुध रक्खा ! तारापप्रच्छ धर्मात्मा कस्यायं तनयः, शुभे । . · · सत्यं वद वरारोहा यथाक्लशः प्रशाम्पति ॥ २ ॥:.. तमुवायाऽसितापांगी लज्जमानाप्पंधोंमुखी। : चन्द्रस्येतिः शनैरंतर्जगाम घरवर्णिनी ॥ २३ ॥ जग्रोह तं सुतं सोमः प्रदृष्टेनौतरत्मिना। नामिचक्रे बुंध इति जगामः स्वगृहं पुनः ॥४॥ यही कथा प्रसंवर्त पुराण प्रकृतिखंड अध्याय ५८ में भी लिखी है । . * . 1 HITE: सूर्य लीला। देवी भागवत.स्कंद २ अध्याय ६ में लिखा है कि शूरसेन राजा की कन्या कुन्ती जिसको कुन्तिभोज नान रोजा कन्यापन 'मैं माँग ले गये थे एक दिन 'राजा'ने कुन्ती को अग्निहोत्र की अग्नि की रक्षा के लिये नियत किया । तय किसी समयं दुर्वासा ऋषि आये और राजा ने उनको चातुर्मास्य के निमित्त टिकाया जिन की कुन्ती ने बड़ी सेवा की जिस से प्रसन्न हो उन्होंने उन को एक मन्त्र बताया कि इस से तुम जिस देवता का ध्यान करोगी वह आकर तुम्हारी मनोकामना - सिंद्ध करेगा। इतना कह मुनि तो चले गये उसने मंत्र की परीक्षा लेने के लिये मन्त्र पढ़ के सूर्य का आह्वान किया। वह मनुष्य का रूप धर वहाँ आये जिस के भय से वह रजोवती हो गई और कहा कि मैं आपके दर्शन से प्रसन्न हुई अब आप अपने मण्डल को जाइये । तव धुओं ने कहा कि मतुने हमको क्यों बुलाया था जवकि हमको वैसेही वापिस करनाथा हतो तुम को देख कर कामातुर हुए हैं इस से हमको भजो] तब उन्होंने कहा कि हम तो अभी कन्या हैं आप सर्व साक्षी और धर्मज्ञ है हम कुलीन की कन्या हैं से आप को ऐसे वचन न कहने चाहिएँ । देवी भागवत स्कंद २० अ० ६१ इलोक २४ में कहा है। - कुन्त्युवाच-कन्याऽस्माहं तु धर्मज्ञ सर्वसाचित्रमाम्यहम् । तवाप्यहं न दुर्वाच्या कुजकन्याऽस्मि सुत । तब सूर्यनारायण ने कहा कि ऐसे जाने से तो हमको बड़ी लजा आवेनी क्योंकि सव देवता हमारी निंदा करेंगे कि ज्यों के त्यों ही लौट आये इस से हमको रति दो नहीं तो जिसने तुमको मन्त्र बताया है उसको और तुम्हें दोनों को हम शाप देंगे। तुम्हारी कन्याव्रत भंगन होगा. यह कह कुन्ती में धारण कर अपने मण्डल को चले गये। इत्युक्तो तरणिः कुन्ती तन्मस्को सुलजिताम् । भुक्त्वा जगामदेवेशो वाग्दत्वाऽतिवाञ्छितम् ॥ २८ ॥ गर्भ दुधार सुश्रोणी सुगुप्ते मंदिरे स्थिताः॥ २६ ॥ यह गुप्त स्थान में रहने लगी जिस-के भेद को एक दासी के उपरांत किसी ने न जाना जव सूर्य के समान पुत्र हुआ तव दासी के हाथ एक मंजूषा में बन्द कर गंगा में छुड़वा दिया जिस को श्री अधिरथ से लेकर अपनी स्त्री को दिया जिस का राधा नाम था इस लिये वह राधा पुत्र कहलाया। पद्मपुराण-सृष्टिखंड अध्याय आठ में लिखा है कि विश्वकर्मा की कन्या संज्ञा जो सूर्य को व्याही गई थी जब वह अपने पति का तेज न सह सकी तब उसने अपने शरीर से अपने समान एक स्त्री. उत्पन्न की जिस का नाम छाया था उसको वह अपनी संतान सौंपकर चली गई। छाया रह गई जो सूर्यनारायण की सेवा करने लगी । जिससे सन्तान हुई-फ़िर वह अपनो सन्तान पर अधिक प्रेम करने लगी। जिस का वृतान्त जव सूर्य को मालूम हुआ.तच सूर्य भगवान् संज्ञा के पिता के.समीप गये और उनकी पुत्री का सव वृतान्तःकहा! उस समय विश्वकर्मा ने कहा कि आप का तेज न सह कर वह संज्ञा घोड़ी का रूप धारण कर हमारे निकट चली आई-जब हमने उससे कहा-कितने अपनें प्रतिके प्रतिकूल काम किया है-तुम हमारे यहाँ न आओ इस पर वह उसी रूप में मरदेश में ..

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चली गई और यहाँ ही है इस लिए आप हम-से प्रसन्न हों और आप कहें तो
हम आप को यन्त्र, पर चढ़ा कर कुछ छील डालें जिसमें तेज कम होजाय । तब
संज्ञा भी आप का तेज सह सकेगी। तब सूर्य ने कहा कि अच्छा इस पर वि-
श्वकर्मा ने सूर्य को यन्त्र पर चढ़ा कर उन का तेज छील डाला उस्ली तेज से
विष्णु भगवान्का सुदर्शनचक, महादेवका त्रिशूल और इंन्द्रका वजू बनाया गया।
तस्मात्प्रसादं कुरु मे यधनुग्रह भागहम् ।
अपनेष्यामि ते तेजः कृत्वा यंत्र दिवाकरम् ।
रूपं तव करिष्यामि लोकानंदकर प्रभो।
तथेत्युक्तः सरविणाभूमे कृत्वा दिवाकरम् ॥
पृथक चकार तेजश्चं चक विष्णोः प्रकल्पयतु ।
त्रिशूलं चापि रुद्रस्य बनर्मिदस्य चापरे ।
इस प्रकार जय सूर्य का अद्भत रूप विश्वकरमाने. बना दिया उसमें भी
चरण बहुत उत्तम बनाए पर उन सूर्य के चरणों को के मारे तेजन देख सके
तब उन्होंने बहुत कम तेजके पाद उनके कर डाले ।
नाशशाक च तद्दष्टुं पादं रूपं रवेः पुनः ।
अद्यापि च ततः पादौन कश्चित्कारयेक्वचित् ॥
-इस के पीछे सूर्यनारायण भूलोक पर आए वा घोड़े का रूप धारण कर
उस घोड़ी के रूप को प्राप्त संशा के संग विहार करने लगे।
पर तो नी तेज विशेष था 'संज्ञा ने जाना कि और कोई है इस कारण
उसको और भी विह्वलता हुई और बहुत ही व्याकुल हुई वा दूसरा पति जान
कर नाक से संघ उसने सूर्य का वीर्य अलग कर दिया. इसी से अश्विनीकुमार
नाम यताओं के वैद्य उत्पल हुए ।
ततः सभगवान् गत्वा भूलोकममराधियः ।
कामयामास कामा? मुखदिवाकरः ॥
अश्वरूपेण महता तेजसा च समन्वितः।
संज्ञा च मनसा क्षोभमगमद्भय विला.॥
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नासापुटाभ्यामुत्स्सृष्टं परोयमिति शंकया। तस्याथ रेतलो जातावश्विना वितिना श्रुतम् ॥ फिर जब संज्ञा ने जाना कि हमारे स्वामी सूर्य ही अश्व का रूप धारण कर आये हैं तब बहुत प्रसन्न हुई और अपना पूर्ण रूप धारण कर अपने पति के साथ विमान पर चढ़ कर देवलोक को चली गई। ज्ञात्वा चिराञ्चतं देवं लन्तोषमगमत्परं । विसाने नागमत्स्वर्गे पत्न्यासह मुदान्वितः ।। पशिष्ठ और विश्वामित्र लीला । मार्कण्डेयपुरीण अध्याय ७ ले प्रकट होता है कि प्रेतायुगमें राजा हरिश्चंद्र धर्मारमा राजा हुये जब धशिष्ठजी ते विश्वामित्र का सब घृतान्त और राजा हरिश्चन्द्र की दशा को सुना तो क्रोध से आकर उन को शाप दिया कि तुम वाला हो जाओ। तस्माद्दुरात्मा ब्रह्म द्विट यज्वनामवसे पित्ताः। मञ्छापोपहतो मूढः सवकत्वमवाप्स्यति जब इस शाप को विश्वामित्रने सुना तव वशिष्ठ की तरफ क्रोध करके विश्वामित्र ने शाप दिया कि तू भी मेरे शाप से सूती अर्थात् लारस पक्षी का शरीर धारण कर श्रुत्वा शाप महातेजा वशिष्ठे प्रति कौशिकः । खमप्याडिर्भवत्सूती प्रतिशापमयच्छत ॥ जब दोनों पक्षी होगये तव क्रोध से दोनों आपस में लड़ने लगे और उस से बड़ा हाहाकार मच गया तब देवताओं को साथ लेकर ब्रह्माजी वहाँ गये और कहा अव न लड़ो पंस्तु इस पर भी उन्होंने न माना तब ब्रह्माजी संसार का नाश होने हुये देख कर और उन दोनों महात्माओं की भलाई चित्त से विचार पर विर्यग्भाव उन का हर लिया जब वह तामसी भाव को छोड़ कर अपने शरीर अर्थात् वशिष्ठ और विश्वामित्र होगये तव ब्रह्मा ने कहा कि तुम दोनों ने अपनी २ घड़ाई को छोड़ कर तामसी भाव को प्राप्त होकर ऐसा युद्ध किया देखो काम, क्रोध यह दोनों तपस्या में विन डालने वाले हैं जिन पश होकर तुमने अपनी तपस्या में हानि की अब इस पाप को छोड़ दो तबही कल्याण होगा ब्राह्मण के वास्ते तपस्या ही बड़ा बल है। तपोविघ्नस्य कर्तारी कामकोधवशं गतौ। परित्यज़ भटू वो ब्रह्म हि प्रचुरं बलम् ॥ यह सुन कर दोनों महात्मा उजित हो अपना २. क्रोध छोड़कर आपट में मिलगये । प्रह्मा जी अपने लोक.फो, चले गये। वृहस्पतिजी। यह महाविद्वान् देवताओं के गुरु थे इनके विषय में लिखा है कि इन्होंने अपने बड़े भाई उतथ्य की सी को अपनी नी बनाया था देवताओं की जीत के लिये शुक्र. का रूप धारण कर. १०० घर्ष तक दैत्यों के गुरु बन उन को धर्मच्युत कर दिया था जिस से देवतों ने उन. को. फिर परास्त कर दिया परन्तु फिर शुक्र के प्रताप.से विजय.पाई. शुक्रजी। यह दैत्यों के गुरु थे और सदा धर्म से उनको विजय घाइते थे एक बार अब दैत्य बहुत निर्वल होगये तो आप ने महादेव जी की तपस्या कर घर पालिया फिर दैत्यों की रक्षा में लगे रहे-इसी बीच इन्द्रजी ने अपनी पुत्री जयन्ती को शुक्र के प्रसन्न करने के लिये या कहिये तप भ्रष्ट करने को उनके पास भेजा था उन्हों ने १०० वर्ष तक अदृश्य हो जयन्ती. से. भोग किया और अपनी पुत्री देवयानी के कहने से मृतक कचको. कई बार आवित. कर दिया था। अगस्त्यमुनि केविषय में प्रसिद्ध चला आता है कि आप ने समुद्र के सब जल को पान कर लिया था पिंध्याचल पर्वत जब सूर्य के.मार्ग को रोकना चाहता था तब आपने उससे कहा कि अभी न बढ़ो अब हम दक्षिण से लौट आतव बढ़ना उसने ऐसाही फिया और आज तक पृथ्वी पर पड़ा हुआ है। अगस्य आज तक आते हैं अर्थात् उस से मिथ्या बोले। एक बार अगस्त्यमुनि .

(१२) को स्त्री की इच्छा पूर्ण करने के लिये धन की चाहना हुई तवजह इल्वल,नाम राक्षस के पास गये जिसने अपने भाई वातापी को काट अगस्त्यमुनि को भोजन कराये बह उस को धुरी आसन पर बैठ कर सव मांस खागये जव, इल्वल ने वातापी को पुकारा. तब अगस्त्यजी ने कहा कि वह पचगया अब नहीं निकल सकता देखो धनपर्व अध्याय ९९ । तं प्रहत्याचवीदा जन्नागस्त्यो मुनिसत्तमः । कुतो निष्क्वमितुं शक्तो मया जीर्णस्तु सोसुरः । कश्यप मुनि । देवीभागवत. स्कंद ४ अध्याय ३ में लिखा है कि- एक समय- की बात है..कि कश्यप मुनि यज्ञ करने के निमित्त वरण की गायें चुरा लाये और मांगने पर भी नहीं दी तब वरुण जी ने ब्रह्माजी के पास.. जा प्रणाम कर कहा कि कश्यप हमारी धेनु चुरा ले गये और भंगाने पर भी नहीं देते इल से हमने उन्हें शाप दिया है कि मनुष्य लोक में गोपाल और तुम्हारी दोनों स्त्रियां भी गोपी होकर जिस प्रकार हमारी गायें बिना बच्चों के रोती हैं उसी भांति तुम बन्दी गृह में पड़ कर रुदन करोगे । इतना कह कर ब्रह्माजी ने कश्यप जी को बुलाया और कहा कि आप ज्ञाता हो अन्याय से इन की गाय षयों ली और मांगने पर भी नहीं दी इस लिये -तुम्हारे पुत्र होते ही मरले जायेंगे। मृतवत्सादितिस्तस्मानविष्यति धरातले । “सृगुजी-महाराज ने महादेवजी को शापं दिया कि स्त्री के संग मत्त होकर मेरा निरादर किया इस लिये योनि लिंग का स्वरूप तुम्हारा हो जाय । जैलांकि पद्मपुराण षष्ठ उसर अ० १५५ में लिखा है। नारीसंगमसत्तोसो यस्मान्मामेवमन्यते । योनिलिङ्गस्वरूपं वै तस्मात्तस्य भविष्यति । और विष्णु महराज को भी शाप दिया कि आपने विना अपराध के मेरी माता का शिर काट डाला इस लिये पृथ्वी पर सात जन्म तक मनुष्यों के बीच में रत्पन्न होगे।

- . यत्वया जानता धर्ममबध्यास्त्रीनिषूदिता । - तस्मात्वां सप्तकृत्वो हि मानुषेषूपयास्यति ॥ • इस के उपरान्त उन्होंने मरी हुई अपनी माता को तपोयल के प्रताप से जीवित कर लिया था। देखिये कैसा अनोखा तपोवल है। देवी भागवत अध्याय ।। १३ में राजा जन्मेजय ने कहा है कि देवताओं के गुरु अंगिरा के पुत्र धर्मशास्त्र, पुराण, वेद के वक्ता होकर मिथ्या चौलें तो फिर अन्य मनुष्य क्या निथ्या भाषण न करेंगे- हरि, ब्रह्मा, इन्द्र, और अन्य देवता छल करने में बड़े दक्षहैं तो अन्य मनुष्यों को क्या कथा । वशिष्ठ, वामदेव, विश्वामित्र, वृहस्पति जय यही लोग पाप करने लगे तो धर्म की कहां गति और इन्द्र, अग्नि. चन्द्रमा और ब्रह्मा यही लोग परदारा'गमन . करते है तो श्रेष्ठत्व त्रिलोकी में किन में स्थित होगा किनके वचन उपदेश के विषय में माने जायंगे । क्योंकि बृहस्पति आदि की तो यह दशा ठहरी कि देवताओं के कहने से शुक्र का रूप दैत्यों से छल करने के निमित्त धारण कर लिया फिर संसार में छल कौन न करेगा।।. अमराणा गुरुः साक्षांन्मिथ्यावादीस्वयंयदि ॥ तदोकःसत्यवक्तास्याद्राजसस्तामसः पुनः ॥ ८॥ क्वस्थितिस्तस्य धर्मस्य संदेहो ये ममात्मनः। का गतिः सर्वजन्तूनां मिथ्याभूतेजगत्रये ॥ ६॥ हरि-ब्रह्माशचीकांतस्तथान्ये सुरसत्तमा । सर्वेकलबिधौदक्षा मनुष्याणां च का कथा ॥१०॥ छलेदक्षाः सुराः मुनयश्च तपोधनाः ॥ ११ ॥ वसिष्ठो वामदेवश्च विश्वामित्रा गुरुस्तथा । एते प्रापरतः कात्र गतिधर्मस्य मानदा ॥ १२ ॥ इन्द्रोग्निश्चन्द्रमावेधाः परदाराभिलंपटो। आर्यत्वं भुवनेष्वेषुस्थितं कुत्र मुने वद ॥ १३ ॥ सर्वे .

( १४ वचनं कस्य मन्तव्यमुपंदेशधियाऽनघ । सर्वे लोभाऽभिभूतास्ते देवाश्च मुनयस्तदा ॥१४॥ तब व्यासजी ने कहा कि ब्रह्मा क्या अन्य सय देव रागी हैं क्योंकि जो देह को धारण करेगा उसमें विकार अवश्य होंगे हां यह चतुर हैं इससे इनका रागी होना सर्वथा विदित नहीं होता समय समय पर यह भी मरते और जन्म लेते हैं। फिर इनके मिथ्या योलने छल करने में शंका क्या हुई। यह संसार इसी प्रकार का है भला देह धारण करके कौन पाप नहीं करता देखो वृहस्पति की भाऱ्या चन्द्रमाने बेली थी वृहस्पति ने अपने भाईकी स्त्री को प्रहण कर लिया था। जैसा कि- किं विष्णुः किं शिवो बूंह्मामधवा किं बृहस्पतिः । देहवान् प्रभवत्येव विकारैः संयुतस्तदा ॥ १५ ॥ रागीविष्णुः शिवो रागी बृह्माऽपि रागसंयुतः । रागवान्किमकृत्यं वै न करोति नराधिपा " रांगवानपि चातुर्याद्विदेह इव लक्ष्यते ॥ १६ ॥ म्रियते नात्र संदेहो नृपकिंचित्कदाऽपिच । स्वायुषाऽते पद्मजाद्याः क्षयमृच्छंति पार्थिव ॥ २६ ॥ प्रभवन्ति पुनर्विष्णुहर कादयः सुराः । तस्मात्कामादिकान्भावान्देहवान्प्रतिपद्यते ॥ ३०॥ नाऽत्र से विस्मयः कार्यः कदाचिदपि पार्थिव तस्माद्ब्रहस्पतिभार्या शशिनालंभिता पुनः ॥ ३१ ॥ गुरुणा लंभिता भार्या नथाभ्रातुर्यवीयसः । एवं संसारचकऽस्मिन्रागलोभादिभिर्वृतः ॥ ३२ ॥ इन्द्रका ४२ पवनों को और सूर्य महाराजको घोड़ा वन संशा घोड़ी के साथ समागम कर अश्विनीकुमार का उत्पन्न करना । शुक्र महाराज का मृतक कचका जीवित करना आश्चर्य जनक और सृष्टिक्रम के विपरीत है। तदन्तर वृहस्पति जी.का मिथ्या घोलना । वसिष्ठ और विश्वामित्रजी का क्रोधी होना । कश्यपका + ( १५ ) चोरी और अगस्त्यजी का मनुष्यमांस भक्षण करना। पढ़कर रोना आता है क्यों कि हम सब ऋषियोंको सन्तान होते हुए अपने प्राचीन पुरुषाओं की निन्दा को पढ़ने सुनते चले जाते हैं और कुछ विचार नहीं करते क्या पण्डितजी ऋषियोंका रक्त शरीर में शेष नहीं रहा । जव ही तो इन निन्दायुक्त पुराणों के न मानने वाले आयों को आप निन्दक कहते हैं। अव मेरी आप सबसे यही प्रार्थना है कि आप विचार कर सत्यका ग्रहण करें। सेठजी-पण्डितजी अघ मैं इस विषयको समाप्त करता हूं। श्रीमान कहिये जहां उपरोक्त कार्य देवता के हो वहां की मनुष्यलीला का क्या ठीक । फिर भी आप यह कहते ही चले जाते हैं कि सत्युग, द्वापर, त्रेतायुगों में पाप कम था, कलियुग पापका मूल है। मेरी समझ में तो भारत की अधोगति का कारण पुराण ही हैं ओ३म् शम् ।। श्रीमान् पण्डितजी-सेठ जी यह बात सुनकर वो हमारी समझ में नहीं आता कि यह पुराण व्यास महाराज ने लिखे हो। पण्डितजी व अन्य सजन पुरुष चलने की तय्यारीकर चहदिये। आर्य सेठ ने पण्डितजी को नमस्ते और सज्जनों की यथा योग्य कहा। .पंडितजी-ने आशीर्वाद और अन्य महाशयों ने यथा योग्य की सब चल दिये। सेठजी-अपने आवश्यक कार्य के लिये घरको गये। ॥ नषम परिच्छेद समास ॥ . दशम परिच्छेद। L श्रीमान् पण्डितजी-नियत समय पर आकर सुशोभित हुए और फई एक मान्यगण भी आगये परन्तु सेठजी अदालत में जाने के कारण उपस्थित

अन्य महाशयगणों ने यथा योग्य की पश्चात् श्रीमहाराज से
मार्ग के आनन्द समाचार सुने इतने में सेंटजी आगये।
सेठजी हाध. जोड़कर श्रीमान् पण्डितजी को नमस्ते और अन्य.
महाशयगणों को यथा योग्य कहा।
पण्डितजीने आशीर्वाद और अन्यों ने यथायोग्य कहा ।
इसी बीच लाला हरदेवप्रसादजी वा धाबू पन्नालाल
जीवा लाला गणेशीलालजी वा लाला भगवानदास अत्तार
वा बाबू छीतरमल वा बाबू तोताराम वा लाला डूंगरमलजी
जो कासगंज आदि नगरों से सेठजीके यहाँ पधारे थे आकर
विराजमान हुए और सब सज्जनों को नमस्ते की।
पण्डितजी-लेठजी अब आप निदेवलीलाको संक्षपसे
वर्णन कीजिये!...
आर्यसेठ-बहुत अच्छा आज मैं आपको संक्षेपके साथ त्रिदेवलीला
को सुनाता हूं पंडितजी ध्यान पूर्वक सुन घिचार कीजिये।
TE
त्रिदेवलीला, ब्रह्मलीला ।
श्रीमद्भागवतस्कन्द ३ अध्याय १२ में लिखा है कि ब्रह्माने
अपनी पुत्री की (जो मनको हरती थी जिसकी कुछ इच्छा न थी हे विदुर !)
इच्छा की।
बाचं दुहितर तन्वी स्वयंभूहरती मनः ।
अकामां चकमेक्षतः सकाम इतिनः श्रुतम् ।।
अधर्म में पिताकी वुद्धिको देखकर उनके पुत्र मरीचादिने उपदेश कर कहा ।
तमधर्म कतमतिं विलोक्य पितरं सुताः ।
मरीचि मुख्या मुनयो विरंभात् प्रत्यबोधयन् ॥

कि हे पिता यह काम पहिले किसीने नहीं किया और न अन्य करेंगे आप
कामके वश येटीके साथ प्रसंग करना चाहते हो।
नैतत् पूर्वैः कृतं त्वच न करिष्यति चापरे ।
यत् त्वं दुहितरं गच्छेरनिह्यांगजं प्रभुः।.
मत्स्यपुराण अध्याय २ में लिखा है कि ब्रह्माजी ने अपनी पुत्री पर मोहित
होकर उसको अपनी स्त्री बना देवताओं के सहस्त्र वर्ष प्रसङ्ग किया जिसके कारण
उनके ऊपर की और पांचवां शिर उत्पन्न होगया जिसको उन्होने जटाओं से ढक
वृष्टि रचने को कहा जैसा कि-
तत्सर्वनाशमगमत् स्वसुतोपगमेच्छया ।
तेनोवक्रमभवत्पञ्चमं तस्य धीमतः ॥
आविर्भवज्जटाभिश्च तद्वत्कंञ्चावृणोत्प्रभुः ।
वामनपुराण अध्याय ४६ में लिखा है कि यश से उत्पन्न कन्या को
बहुत सुन्दरी देख ब्रह्माजी उसको मैथुनके लिये बुलाते हुए। और जिस महा
पापसे ही उनका शिर कटगया।
तां दृष्ट्वाभिमता ब्रह्मा मैथुनाया जुहायताम् ।
सेन पापेन महता शिरोशीर्षत वेधसः ॥
शिवपुराण-शान संहिता अध्याय ४६ में लिंग्ला है ।
पुरा ब्रह्माविमोहेन सरस्वत्या रूपमद्भुतम् ।
ठाजगामतांपश्चात्तिष्ठति विदलः स्वयम् ॥
तद्वचनं तदा पुत्री श्रुत्वा
कोपसमन्विता।
उवाच किं ब्रवीषित्वं मुखेनाऽशुभाषिणा ।।
नत्रीश्चेिविरुद्धं बै विभाषी भव सर्वदा ।
तदिनां हि समारभ्य पंचमेन मुखेन च ॥
ब्रह्मवैवर्त पुराण कृष्णखण्ड अध्याय ३५ में लिखा है जब ब्रह्मां ने
ऐसा पाप विचारा तब ऋषि ने ग्रहा से कहा कि ऐसे पापी नरक को जाते हैं
३

. जिस फो सुन उन्होंने योग द्वारा प्राण छोड़ दिये जिस को सुन पुत्रीने भी प्राणों को त्याग दिया इल पर मारायण आये और दोनों को जीवित कर दिया। पच्यन्ते नरकेते च यावद्वै ब्रह्मणो क्यः । ब्रह्माशरीरं सत्यक्तुं नीड़या च समुद्यतः ॥ योगेन भित्वा षट्चक सर्वान्प्राणानिरुध्य च । बभूव हृदि कृत्वैकं ब्रह्मालीनञ्च ब्रह्मणि ॥ कन्या तातं मृतं दृष्ट्वा विलप्य च भृशं मुहुः । योगेन देहन्तत्याज सा प्रलीना च ब्रह्माणि ॥ नारायणो मदंशश्च कृपयागत्य सल्वरम् ॥ ब्रह्माणं जीवयामाल ब्रह्मज्ञानात्सुताञ्चताम् ॥ विष्णुपुराण धर्मसंहिता-अध्याय १० में लिखा है कि ब्रह्मा पार्वती के विवाह में उनके चरणों को देख कर स्खलित होगये जिससे वालखिल्य ब्रह्मचारी उत्पन्न हुये। गौयविवाहतेत्यादौ दृष्ट्वा प्रस्खलितोऽभवत् । यत्र ते बालखिल्यास्तु जाताः सद्ब्रह्मचारिणः ॥ ऐसाही गणेशपुराण अध्याय ३३ में लिखा है। श्रीमद्भागवत में लिखा है कि जब श्रीकृष्ण महाराज धन मैं गाय चराने जाने थे तो एक दिन ब्रह्मा गायों को चुरा लेगये। पद्मपुराण पाताल खप्ड अध्याय २० में लिजा है कि ब्रह्माजी ने प्रज्ञाओं को नाश शुक्त देखा इस से उनके तारने के लिये अपने गण्डस्थलसे अनेक जल उत्पन्न करके पापनाशिनी गण्डकी नदी को बनाया ॥१४॥ पुरादृष्ट्वा प्रजानाथा प्रजाः सर्वाणि पावनीः । स्वगंडविनुषोनेक पापघ्नीं सृष्टवानिमाम् ॥

( १६ ) और सृष्टिखण्ड-अ० १७ से प्रकट होता है कि ब्रह्माजी ने पुष्कर में यज्ञ किया उस समय लावित्री के आने में देर हुई तय इन्द्र ने एक गोप कन्या को ला गान्धर्व विवाह कर यज्ञ में पिठला कर.कार्य किया। तिसके पश्चात् सावित्री देवी देवताओं की देवियों के साथ यज्ञ स्थल में आई और उपरोक्त कार्य को देख कर उन्होंने कहा कि तुमने काम के वशीभूत होकर गोप कन्या को विठला कर हम को लजित किया भला अब मैं किस भांति सखियों को मुंह दिखलाऊंगी। तब ब्रह्माजी ने कहा कि काल बीता जाता था और तुम्हारे आने में देर हुई तब इन्द्र ने यह स्त्री लादी । विष्णु भगवान ने अनुमोदन किया जिस के कारण हमने इस को ग्रहण किया। अब हमारे अपराध को क्षमा करो। अब हम तुम्हारा कोई अपराध न करेंगे तुम्हारे चरणों पढ़ते हैं तब उन्होंने ब्राह्माजी को श्राप दिया कि जाओ आज से तुम्हारी पूजा कार्तिककी पूर्णमासी के अतिरिक्त न होगी। नैवते ब्राह्मणः पूजां करिष्यंति कदाचन । ऋत तु कार्तिकीमका पूजा सांवत्सरी तव !! करिष्यति द्विजाः सर्वे मानान्यत्र भूतल ॥ शिवपुराण विद्येश्वरी संहिता अध्याय ६ में लिखा है एक बार विष्णु में अपने २ महत्व पर झगड़ा हुआ अर्थात् ब्रह्मा कहते थे हम सब से प्रधान हैं इस पर इन दोनों में घोर युद्ध हुआ तब देवता महादेव जी के पास गये, तब शिवजी आफर दोनों के चीच में एक स्तंभ को इतना बढ़ाया जो आकाश और पाताल में पूर्ण होगया। इसके अनन्तर शिव ने कहा कि तुम दोनों में से जो इस का अन्त देख आपेगा वही जगत् में सब देवों में बड़ा अर्थात् पूज्य समझा जावेगा । यह सुन ब्रह्मा ऊपर को विष्णु नीचे को गये जब सैकड़ों वर्ष जाते २ भी उनको पता न मिला तब विष्णु ने आकर सत्य कह दिया कि मुझ को इसका पता नहीं मिला और ब्रह्माजी ने आकर इंठ बोला कि मैं अन्त तक पहुँच गया। देखो यह केतकी का फूल उसके ऊपर रक्खा था तव महादेवजी ने विष्णु से कहा कि मैं तुमसे प्रसन्न हूं क्योंकि ईश्वरत्व की इच्छा होने पर भी तुमने झंठ नहीं बोला इस लिये आज से तुम्हारी मूर्तिकी पूजा जगत में होगी। इतः परं ते पृथगात्मनश्च क्षत्रप्रतिष्ठोत्सवपूजनं च ।

(२०)
और ब्रह्माजी से कहा कि तुमने मिथ्या बोला इस कारण तुम्हारी
पूजा नहीं होगी।
नातस्ते सत्कृतिलोंके भूयात्स्थानोत्सवादिकम्
ब्रह्मवैवर्त पुराण कृष्ण जन्म खण्ड अध्याय ३२ में लिखा है कि
मोहमी कामातुर- हो नहा के समीप गई ब्रह्मा ने इस कारण निषेध किया कि
नू विष्णु की प्रिया है।
तब मोहिनी ने ब्रह्माजी को शाप दिया कि जागो तुम्हारी पूजा न होगी
तय ब्रह्माजी ने वैकुण्ठ में नारायण के पास जाकर सब वृतान्त कह सुनाया
तय नारायणजी ने ब्रह्मा से कहा कि तुम गङ्गा स्नान करो शाप दूर हो
जायगा तुम्हारी आगे पृथक् पूजा न होगी किन्नु अन्य देवताओं की पूजा
के साथ तुम्हारी पूजा होगी।
यदन्यदेवपूजायां तवपूजा भविष्यति ।
वाराहपुराण अध्याय ११३ में लिखा है एक समय ब्रह्माजी
जंभाई लेने थे उस समय हयग्रीव नानक दैत्य ब्रह्मा के मुख से वेदों को निकाल
कर रसातल को लेगया।
वेदेषु चैव नेष्टेषु मत्स्यो भूत्वा रसातलम् ।
प्रविश्यतान थोत्कृष्य ब्रह्मणे दत्तवानसि ॥
विष्णु लीला।
पद्मपुराण षष्ठ उत्तर खण्ड अध्याय १५ में लिखा है विष्णु
महाराज जालंधर की स्त्री के समीप उस का रूप बनाकर गये और उस से प्रसंग
कर लक्ष्मी के प्रेम से अधिक तुम्न माना और वृन्दा ने वियोग का सब दुम्स
माधव से दूर किया।
प्रियंगाद समालिंग्य चुचुम्वरति लोलुपा।
मोक्षादप्यधिक-सौख्यं वृंदामोहनसंभवम् ॥
: चेननारायणो देवो क्षक्ष्मीप्रेमरताधिकम् ।

( २१) बुंदावियोगजं दुःखं विनोदयति माधवे॥ जव वृन्दा को उनका कपट मालूम हुआ तब उसने शाप दिया कि जिस भांति माया के रूप से मैं मोहित हुई है उसी प्रकार आप की स्त्री को कोई माया से तपस्वी रूप होकर हरेगा। अहं मोहं यथा नीता त्वया 'माया तपस्त्रिमा। तथा तव ब● माया तपस्वी कोपिनेष्यति अध्याय १०३ । जय वृन्दा अग्नि में जल गई तो भगवान् पारंबार स्मरण कर चिता की भस्म की रजके निकट ही स्थित होगये मुनि और सिद्धों के समूह के समझाने पर भी शांति को प्राप्त न हुये। ततो हरिस्तामनुसंस्मरन्मुहुन्दाचिताभस्मरजोव- गुंठितः । तत्रैवतस्थौमुनिसिद्धसंद्यैः प्रबोध्यमानोपि ययौ न शान्तिम् ॥ सृष्टिखंड ; अध्याय, ४ में लिखा है कि जब भगवान् ने समुद्र मथन किया और अमृत निकाला और उस. को जब दैत्यों ने ले लिया तब भगवान् ने एक स्वरूपा स्त्री का रूप धारण कर दैत्यों को लुभाया जब वह मोहित हो गये तो उस स्त्री ने कहा कि कमण्डलु हम को देदो मैं सदा तुम्हारे घर में ही रहा करंगी तंब दैत्यों ने 'उस रूपवती पर मोहित होकर उस अमृत के पात्र को दे दिया तथ वह स्त्री अमृत का पात्र देवताओं को देकर अंतर्धान होगई ।, माययालोभपित्वा तु विष्णुः स्त्रीरूपसंश्रयः। अगत्य दानवान्प्राह दीयतां मे कमंडलुः ।। गुष्माकं वशगाभूत्वा स्थास्यामिभवतागृहे । तां दृष्ट्वा रूपसम्पन्नों नारीत्रैलोक्यसुन्दरीम् ॥ प्रार्थयामास्सुवपुष लोभोपहतचेतसः । दत्वा मतं तदा तस्यै ततोपश्यन्त तेप्रतः॥ पातालखंड "अध्याय १. में लिखा है कि एक समय ग्रह्मा नारद ( २२ ) मुनि के साथ विष्णु के समीप गये और उनसे नारद के प्रश्न को कहा तव विष्णु महाराज ने ब्राह्मण से कहा कि तुम इन को अमृतसर में स्नान कराओ ब्रह्मा ने ऐसाही किया वह स्नान करते ही अपूर्व खीरप होगए ।। तत्क्षणात्तत्सरःपारे योषितासविधेऽभवम् । सर्वलक्षणसम्पन्ना योषिद् पातिविस्मिता ॥ जिन को देख कर बहुधा स्त्रियां वहां आकर पूंछने लगी कि तुम कौन हो ? कहां से आई हो? यह सुन वह विस्मित होगये । इतने में ललिता सखी आई और उसने चौदह अक्षर का मंत्र दिया। जिसको ग्रहण करते ही हम वहाँ पहुँचे जहाँ सनातन कृष्णचन्द्र थे। जिन्होंने मुझ को देख कर कहा कि हे प्रिये ! यहां आओ व भक्ति से हमारे साथ साथ आलिंगन करी । ऐसा कई एक वर्ष तक रात दिन क्रीड़ा करते रहे । उसके पीछे उन्होंने राधिका से कहा यह तुम्हारी प्रकृति है जो जारद रूपिणी स्त्री होकर आई है सो इस को अमृतसर में स्नान कराओ स्नान करते ही हम फिर नारद होगये और स्त्री का एप जाता रहा और कृष्ण के गुण गाने लगे। ततो निमज्जनादेव नारदोहमुपागतः। वीणाहस्तो गानपरस्तद्रहस्यंमुहुमुदा ॥ और अध्याय ७४ में विष्णु भगवान् के अवतार श्रीकृष्ण महाराज ने अर्जुनको स्त्री बना उनके साथ विहार कर फिर उनको अपने रूप में कर दिया। -: राजा अम्बरीष की पुत्री को स्वयंवर में से नारद और पर्वत सुनि को धोका देकर विष्णु का लेजाना। लिङ्गपुराण अध्याय ५ में लिखा है कि राजा त्रिशंकुको संती बड़ी पतिव्रता थी जिसको दशहजार वर्ष तक विष्णु की सेवा करते व्यतीत होगये एक दिन एकादशीका व्रत और नारायण द्वादशी के दिन भगवान के मन्दिर में दोनों ने शयन किया। उससे नारायण ने स्वन्नमें कहा कि तू क्या चाहती है उसने कहा कि मैं ऐला पुत्र चाहती हूं कि जो आपका परमभक हो यह सुन एक फल उसको दिया रानी ने प्रातःकाल उठ सब वृत्तान्त राजा से फिर पतिकी आज्ञा पा फलको भक्षण करलिया और समय पूरा होनेपर पुत्र उत्पन्न हुआ। जिस का संस्कार प्रसन्नता के साथ कर उसका नाम अम्बरीप रक्खा जो बड़ा विष्णुका भक्त हुआ पिता त्रिशंकु अम्बरीषको राज्य दे परलोक सिधारा। अग्धरीष राज्य काज मन्त्रियों को दे तप करने गया एकर हजार वर्ष तक ब्रह्मा, विष्णु, शिव स्व- रूप से तप करता रहा। इस बीच'नारायणने इन्द्रका रूप धर ऐरावतपर चढ़े अम्बरीप निकट आ कहा कि मैं इन्द्र हूं। वर मांग। राजाने कहा कि मैंने तेरी प्रसन्नताके लिये तप नहीं किया न तुझसे वर चाहता है मेरे स्वामी नारायण हैं जव उनकी कृपा होगी तब वर मांगंगा तो हँसकर भगवान ने अपना रूप प्रकट किया तव तो अम्बरीष भकिसे प्रणाम कर स्तुति करने लगा । जिसको सुन भगवान् ने कहा कि तेरी इच्छा हो सो वर मांग । तव राजाने कहा कि जैसे आप शिवभक्त है वैसा मैं आपका रहूं । सय जगत्को वैष्णव वनाऊं। राज्य और यज्ञ कर। तब भगवान ने कहा कि ऐसा ही होगा । यह सुदर्शनचक्र तेरे राज्य की प्रत्येक प्रकार से रक्षा करेगा यह कह भगवान् अन्तर्धान होगये । राजा अम्बरीष भी प्रसन्न हो भगवानको प्रणामकर अपनी राजधानी अयोध्या में आ धर्मज करने लगा। घर २ भगवानकी पूजा व ध्वनि से होने लगी यज्ञोंकी धूम मच गई । आनन्द से राज्य करते हुए कुछ काल व्यतीत होगया तब राजाके शुभल- क्षणों से युक्त एक कन्या उत्पन्न हुई जिसके जन्मके समय राजाने बड़ा उत्सव मनाया और उसका नाम श्रीमती रक्खा । जब वह वरने योग्य हुई तो राजा को उसके विवाहकी चिन्ता हुई इतने में नारद और पर्वतमुनि आये जिनका राजा ने बड़ा आदर और सत्कारकर आसनपर बिठाया। उन्होंने भी श्रीमती को देखा तो मोहित हो राजासे पूछा कि यह किसकी कन्या है राजाने सब हाल कहा तब नारद और पर्वत मुनिने अपने २ मनमें मिलनेकी इच्छाकी फिर नारदजीने राजा को पृथक् लेजाकर कहा कि हमारे साथ इसका विवाह कर दो इसी भांति पर्वत मुनिने अपना अभिप्राय प्रकट किया तब राजाने दोनों मुनियोंसे कहा कि श्रीमती तो एक है आप दोनों इसकी इच्छा प्रकट करते हैं फिर भला मैं किसके साथ विवाह कर इसलिये अब मेरी यह इच्छा है कि पुत्री तुम दोनों में से जिसके साथ वाहे विवाह करले जिसको दोनोंने स्वीकार किया और कहा कि कल जब हम आगे तव ऐसाही करना । इतना कह दोनों चलेगये। परन्तु थोड़ी दूर जाकर नारदने पर्वत मुनिका साथ छोड़दिया और विष्णु लोकको गये जहां विष्णुवो प्रणाम कर कहा कि आपसे एकान्तमें मुझको कुछ कहना है, वह उठकर अलग होगमे तब उन्होंने कहा कि अम्बरीषके श्रीमती नामी एक रूपवती कन्या है जिस (२४) को मैंने और पर्वतमुनि दोनों ने मांगा राजाने कहा कि.पुत्री जिसको स्वीकार करे उसेही मैं देदूगा कल स्वयंवर होगा इसलिये पर्वतका स्वरूप बन्दरकासा कर दीजिये । हम आपके भक्त हैं भगवान ने कहा कि ऐसा ही होगा । आप जाइये। नारदमुनि भगवान् को प्रणाम कर अयोध्या गये। इसी अवसर में, पर्वतमुनि भी यहां पहुंचे और भगवान से एकान्तमें प्रार्थनाकी कि नारदका मुख लंगूरकासा दीख पड़े क्योंकि हम आपके भक्त हैं भगवान्ने पर्वतमुनि की प्रार्थना सुनकर कहा कि ऐसा ही होगा तुम भी अयोध्याको जाओ परन्तु यह समाचार नारदजी से न कहना। पर्वतमुनि अयोध्या में आये जहां उत्तम प्रकार से सभामण्डप बनाया था कन्या भी सब प्रकारसे गार कि शुतियोंके संग स्वयंवर सभा में आई जहां दोनों मुनि भी आये । उनको आसन दिया। फिर श्रीमती से कहा कि इन दोनों में से जिसकी इच्छा हो उसके गले में जयमाला डाल दे । राजा की आशा पाय दोनों मुनियों के समीप जाकर देखा तो एकका मुख बन्दर और दूसरे का लंगूरसा दीख पड़ा। तब उसने जाना कि यह दोनों के मुनि नहीं है । हां तीसरा आदमी १६ वर्षकी अवस्था का जो श्यामवर्ण सब भूषण धारण किये, दीर्घ भुजा, ऊंची छाती, कमलके से नेत्र अति सुन्दर दीख पड़ा । तव उन दोनोंले पूंछने पर जान पड़ा कोई मायाची पुरुष है हमारी जानमें वह बड़ा तस्कर विष्णु इस उत्तम कन्याको हरने तो नहीं आया । जो उसके मनमें कपट न होता तो हम दोनों के मुख धन्दर और लंगूरके क्यों बनाता । इतने में राजाने कहा कि महाराज आपके मुख देव कन्या भयभीत होती है तब दोनोंने कहा कि तेरा ही सब प्रपंच है इस लिये तू कहदे कि एकके गलेने माला डाल दे । राजा ने कहा, श्रीमती फिर उठी उसको फिर वही तीसरी भूस्तैि सुन्दर दीख पड़ी और यह दोनों वैसे ही दीखे । तव श्रीमतीने निर्भय हो उस तीसरे के कंठमें माला डालदी और यह दिन्य पुरुष कन्याको अपने संग ले अंतर्धान होगया। तब तो सभाके लोग कहने लगे कि श्रीमतीने भगवान्का आराधन बहुत किया इसलिये विष्णु भगवान् उसके पति हुरे। फिर दोनों मुनि अपना तिरस्कार देश, विष्णुलोकको गये। मुनियोंको आता जान श्रीमती से कहा कि तुम गुप्त होजाओ। तब वह छिपगई दोनों मुनि यहां पहुंचे प्रणाम किया । भगवान् ने आदरपूर्वक आसन दिया। फिर नारदनी ने कहा कि आपने हमारे साथ कपष्ट किया और उस कन्या को आपने हरलिया भगवान् ने कानों पर हाथ धरे और कहा कि हे मुनीश्वरो! मुझको इस वृत्तान्तकी खबर भी नहीं कि आप दोनों क्या करते फिरते हैं। यह सुन नारदजी ( २५. ) ने भगवान् के कानमें कहा कि हमारे करने से आपने पर्वतका मुख तो वन्दका सा वनादिया परन्तु हमारा मुख लंगूरकासा क्यों बनादिया । तब उन्होंने नारद के कान में कहा कि तुम्हारे पीछे पर्वतमुनि आये और तुम्हारे समान उन्होंने हमसे प्रार्थनाकी तप हमने पिका लंगुरकासा बना दिया इतना कह भगवान् 'बोलेकि हे मुनिश्वरो हमको आप दोनों तुल्य ही हैं इसलिये दोनोंका वचन मॉनना पड़ा इसमें हमारा कौन अपराध है। यह सुन नारद ने कहा कि जो आप ऐसा कहते हैं तो वह दोनों भुजाओं में अनुप वाण धारे पुरुप कौन था जो दोनों के बीच में श्रीमती को दीख पड़ा और उसको उड़ालाया। तब भगवान ने कहा कि महाराज अनेक मायावी पुरुष जगत् में फिरते हैं क्या जाने श्रीमती वो कौन हर लाया हम तो शपथ खाकर कहने है कि आप दोनों की आज्ञा से दोनों के मुख धनाये और हमारी चार भुजा है शङ्ख, चक्र, गदा, पल धारले हैं, यह भी आप जानते हैं कि हमारी कुछ इच्छा उस कन्या के लिए नहीं थी । इस भांति भगवान् के वचन सुन दोनों मुनि वोले कि ठीक है इसमें आप का कुछ दोप नहीं यह सब उस दुष्ट राजा की माया है । इतना कह दोनों भगवान् को प्रणाम कर वहां से चल दिये। फिर राजाके समीप आये और क्रोधसे कहने लगे त बड़ा है तै ने हम दोनों को बुलाया और कन्या किसी तीसरे को देदी इस लिये तमोगुण तेरी बुद्धि को ढाक लेगा जिस से तू अपनी आत्मा को न जानेगा। इतना कहते ही एक अंधकार का पुल वहां उत्पन्न हुआ और राजा की और चला तव सुदर्शन चक्र ने प्रकट हो उस अन्धकार को हटाया और वह अन्धकार नारद और पर्वत की ओर चला और सुदर्शन चक्र भी दोनों मुनियों के पीछे लगा मुनि भयभीत हो वहां से भागे लोकालोक पर्वत पर्यन्त भागने फिरे परन्तु सुदर्शन चक्र और उस अन्धकार ने उनका पीछा न छोड़ा तब तो अनि व्याकुल हो भगवान् की शरण में गये और कहा कि हे प्रभो ! हमारी रक्षा करो। राजकन्या के निमित्त हमारी यह दुर्दशा हुई । तब भगवान ने विचारा कि यह दोनों हमारे भक्त हैं और अम्वरीप भो हमारा ही भक्त है इसलिये हमको तीनोंकी रक्षा उचित है यह विचार सुदर्शनचक्र और अम्बकारको निवारण किया और अन्धकारसे कहा कि सुदर्शनचक्र हमारी आज्ञाले राजाकी रक्षा करता है ललिये यह निष्फल नहीं होसक्ता और ऋषि शाप भी दृथा न होना चाहिये इस कारण अम्बरीष के वंशमें बड़ा धर्मात्मा राजा दशरथ होगा उसके पुन हम होंगे और हमारा नाम राम होगा और हमारी दक्षिण भुजा भरत, घाम भुजा शत्रुघ्न, ४ और शेषका अवतार लक्ष्मण, ये तीन हमारे माता होंगे तब हमारी भार्या सीता को रावण हरेगा उस समय तु हमारे समीप आजाना हम तुझको ग्रहण करेंगे। अव मुनियों का पीछा छोड्दे इतना भगवान्का वचन सुन अन्कार नाश को प्राप्त भया और सुदर्शनचक्र अपने स्थानको गया दोनों मुनि भी बड़े भयसे छूटे भग- वानको प्रणामकर वहांसे चले और परस्पर कहने लगे कि अब हम जन्मपर्यन्त किली कन्याले विवाहकी इच्छा न करेंगे। कुछ कालके पीछे नारद पर्व पर विष्णु भगवान् की सब माया जान भगवान्से विमुख हो शिवभक्त होयये । नारदः पर्वतश्चैव चिरं ज्ञात्वा विचेष्टितम् । मायां विष्णोविनिन्द्यैव रुद्रभक्तो बभूवतुः ॥ १५६ ॥ ब्रह्मवैवर्तपुराण-प्रकृतिखप्डमें लिखा है फि वि णु महाराज की लक्ष्मी, गङ्गा और सरस्वती यह तीन स्त्रियां थीं। एकवार गङ्गा क्षणमात्र विष्णु को देखकर हँसी और कटाक्ष किये जिसको देख सरस्वतीने गंगाको शाप दिया कि तू नदीप होजा । इसी प्रकार गंगाने सरस्वतीको शरप दिया कि कलियुगमें तू नदीरूप होजा । इतने में विष्णुजी जो प्रथम वहाँले उठकर एलेगये थे। आये और सबसे कहा यहुनसी स्त्रियोंसे संसारमें निन्दा होती है और वह नरकको जाता है । इसलिये अब एक सुशीला लक्ष्मी ही को अपने पास रहने दंगा । गंगा तू महादेव और सरस्वती तुम ब्रह्मा पास जाओ। तब गंगाने विष्णुसे कहा कि आपने विना अपराध के ही मुझको त्यायन किया इसलिये मैं अपने शरीर को त्याग दंगी और तुम निर्दीपीके मा वाले कहलाओगे और जो मनुष्य निर्दोपी स्त्री को त्यागता है वह कल्पभर नरकमें रहता है । ० अ०६॥ निर्दोषकामिनी त्यागं करोति यो जनाभवे । सयाति नरकं कल्पं कि ते सर्वेश्वरस्य वा ॥ ७३ ।। देवीभागवत-स्कन्द ६ अध्याय २३ में लिखा है कि महादेव जी का शङ्खचूड़ दैत्यसे संग्राम खैरहा था और दोनों सौ वर्ष तक रुग्राम करते रहे परतु एक भी न हारा उस समय विष्णु वृद्ध ब्राह्मण का रूप धरकर शड्डचूड़के पास गये और कहा कि आप सब समदायों के दाता हैं। मुझयो एक वस्तुकी इछा है तुम प्रथम देने की प्रतिज्ञा करलो । देवने करली । तव वृद्ध ब्राह्मणते कहा हम -- कवच चाहते हैं उसने देदिया। फिर विन्न महाराज ने शङ्खचूलका स्वरूप बना उसकी स्त्री तुलसीके निकट जा प्रसङ्ग किया।. शंखचूडस्थ रूपेण जगाम तुलसीप्रति । गत्वा तस्यां मायया च वीर्याधानं चकारसः॥ श्रीमान् और भी सुनिये मुर नाम दैत्यसे जब आप संशाम हार पहासकी एक गुफा में छिपकर सो रहे तिसपर दैत्य पहुँचा जो इनकी खोज में धा इतने में विष्णु महाराजके शरीरसे एक कन्या उत्पन्न होगई और उसने मुरको मारडाला। इतने में इनकी नींद गई जागे । मुरको मरा देख पूछने लगे इसकी पि.सने मारा कन्याने कहा मैंने तब उसको प्रसन्न हो वरदान दिये। कहिये यही सर्वशक्ति. मानता के कर्लन्य हे तिसपर इनके कानके मैलले मधुकैटम नाम दो दैत्य भी उत्पन्न हुये थे क्या यह हसी नहीं है। श्रीमान् पण्डित जी पुराणों में लिखा है कि समुद्र मथने के समय असुरों से अमृत देने की प्रतिज्ञा की और असुर को अमृत पीते देखा तो चक्र से उस का शिर काट डाला । वामनरूप धारण कर गजा बलि से यज्ञ करने के लिए अग्नि की रक्षा के अर्थ तीन पैर कुटिया बनाने की मांग सब पृथ्वी लेली। श्रीमद्भागवत स्कंद १० उत्तरार्द्ध अध्याय ८८ में लिखा है कि एक बकासुर दैत्य ने शिवजी का आराधन कर शिव को प्रसन्न कर यह वर पालिया कि मैं जिसके.शिर पर हाथ धर वह तुरंत भस्म होजाय । दैत्य ने पार्वती के लेने की इच्छा कर. शिवजी के शिर पर हाथ धरना विचारा यह जान वह सब और भागे पर कहीं किसी ने रक्षा न की तब प.कुन्ठनाथ के पास गये तब वह उठ दैत्य के पास गये और कहा कि यदि शिव, ऐसा वर देने वाला सच्चा है तो वक्ष से शापित क्यों हुये हम तो यह बात धूठी समझते हैं यदि सच्ची है तो प्रथम अपने शिर पर हाथ रख कर देखो. यह. सुन ज्याही उसने अपने शिर पर हाथ धरा त्यों-ही वह भस्म हो गया कहिये यह काम साक्षात् परमेश्वर को करना चाहिये जो. शिव के लिये झूठ बोला और उस से विश्वास- घात किया। लिङ्गापुराण अध्याय ६६ में लिखा है कि प्रह्लाद की रक्षा के लिये जब विष्णु भगवान ने सिंहावतार धारण कर हिरण्यकश्यप को मारा उस (. २८ ) समय उन को बड़ा ही क्रोध था इस की शान्ति के लिये देवतों ने स्तुति की पर शान्ति न हुई तब वीरभद्र ने जाकर बहुत कुछ स्तुति की तब भी शान्ति न हुई वरन् चीरभद्र को मारने के लिये उठे उसी समय शिव महाराज ने शरभ पक्षी का रूप धारण कर अपने पक्ष और चौच और पहाँ से सिंह को आकाश में उठा कर ले गया और खूब पटक २ मारा तब देवता ने बहुत स्तुति कर कहा कि आज छोड़ दो जैसा किः- उत्क्षिप्योत्क्षिप्य संगृह्य निपात्य च निपात्य च । उड्डीयोड्डीय भगवान् पक्षाघातविमोहतम् ॥ हरिहरन्तवृष्टभं विश्वेसानंतमश्विरम् । अनुयान्ति सुरः सर्वे नमो वाक्येन तुष्टुवुः ॥ महादेव लीला। श्री महाराज महादेव की लीली का वर्णन करना भी करिन है देखिये पद्मपुराण सृष्टिखण्ड अ०.१७ में लिखा है कि ब्रह्मा जी का यक्ष होरहा था तो महादेवजी यशशाका में भिक्षा मांगने के लिये मञ्चसूत्र धारण किये वा एक चंड़ी भारी खोपड़ी हाथ में लिये ऋत्विज् के समीप आकर बैठ गये। तब घेद- वादी ब्राह्मणों ने उन से कहा कि तुम ऐसा निन्दित भेष बनाये यहां यज्ञशाला में कैसे चले आये तब उनको बहुत धुधुकारावानिश की, और खेदा भी पर 4 वहाँ से न उठे। तब हँस कर महादेवजी उन ब्राह्मणों से बोले कि हे ब्राह्मणो! संच को संतुष्ट करने ब्रह्माजी के यक्ष में हम को छोड़ और कोई नहीं निकाला जाता हम कैसे निकाले जाते हैं तव ब्राह्मणों ने कहा कि अच्छा भोजन कर लो तब चले जाना उन्होंने कहा अच्छा तव लाकर अन्न दिया। उन्होंने फमल में घर कर भोजन कर ब्राह्मणों से कहा कि हम अब स्नान के लिये पुष्कर को जाते हैं यह चले गए । तत्र ब्राह्मणों ने कहा कि कपाल यहाँ हो धरा है। हम लोग फ्याकर कार्य करें क्योंकि इस के रहने से अपवित्रता होती है। तब उन ब्राह्मणों में लें एक ने उठाकर बाहर फेंक दिया तव उस को दूसरा और दिखलाई दिया, फिर तीसरा दिखलाई दिया उलको फेंका . इसी प्रकार हजार तक फेके।

जब अन्त न मिला तब सब पुष्कर मै स्तुति करने के लिए गये देखा कि महादेव जी स्नान कर कुछ मन्त्र जप रहे थे । सबने महादेव की स्तुति की तय प्रसन्न होकर कहा कि जाओ, यज्ञ करो हमने कपाल उठा लिया और ब्रह्मा से कहा कि तुमभी कुछ वर मांगो। तब ब्रह्मा ने कहा कि हम यश दीक्षित हैं हमी सबको देने हैं चाहे तो आपही मांग लीजे। तव महादेवजी ने कहा कि अच्छा किसी समय हमी आप से मांग लेंगे। इतना कह सब चले गये। जय मन्वन्तर यीत गया और महादेवजी घूमते २ दूसरे मन्वन्तर में वहाँ पहुँचे तो ब्रह्मा यक्ष कर रहे थे तब फिर उसी भेष में नग्न अपने गुप्त स्थान को वायें हाथ से थामे ब्रह्माजी की सभा में आये तब सब उनको देख कर हँसने लगे कोई उन्मत्त समझ मिट्टी धूल फेंकने लगे । किसी ने पकड़ा किसी ने जदा पकड़ कर घसीटा। किसी ने कहा कि यह प्रत तुमको किसने लिखलाया है । देखो यहाँ सुन्दर स्त्रियां बैठी हैं तिस पर तुम इस भांति चले आये हो । तब महादेवजी ने कहा कि हमारा शिश्न तो ब्रह्मा का रूप है, और स्त्रियों के गुप्त स्थान सब जनार्दन के रूप है । तुम लोग हमारा वीर्य्य हो, फिर हमको वृथा फ्यों क्लेश देते हो हमीने पुत्र उत्पन्न किया है व उस पुत्र में हमी उत्पन्न हैं। ६३ । ६४. इसी से हमारी की हुई सृष्टि है व हमी ने भार्या हिमालयके यहाँ उत्पन्न की उसमें उमा रुद्रों को दी। बताओ वह किसकी कन्या है। तुम सब इस बात को भी जान लो कि हमारी स्त्री को ब्रह्मा ने नहीं उत्पन्न किया न विष्णुभगवान् ने यह भी जान को कि हमीने ब्रह्मा का शिर काट डाला था फिर तुम लोग ब्रह्माकी उपासना कैसे करते हो और हमको मारते हो । इतना कहने पर भी ब्राह्मणों ने शिव का मारना चन्द नहीं किया। तवरशङ्कर ने फिर कहा तिसपर और भी तक किया जिस पर शिवजी ने उनको शाप दिया कि कलियुग में वदार्जित हो जाओगे बडी २ अटा रखाओगे यज्ञ कर्म से भ्रष्ट होजाओगे व पर नियों के संग भोग करोगे जब माता पिता से रहित हो जाओगे तो वक्ष्याओं की दूतता करोगे। किसी पुत्र को अपने पिता का धन न मिलेगा और न किसी का पुत्र पण्डित होगा रुद्र के शिवालय की भिक्षा लोगे शूद्रो के श्राद्ध में भोजन करोगे। परस्पर विरोध रहेगा वहुधा धर्म रहित हो जाएंगे और जिन ब्राह्मणों ने हमको दुःखी नहीं किया उनके घरों में धन, धान्य पूर्ण रहेगा। घर की लियां सुशीलादि गुणों से युक्त होगी ऐसा कह वह अन्तर्धान होगये।

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दण्डैश्चापि च कलैश्च उन्मत्तवेषधारिणम् ।
पीड्यमानस्ततस्तैस्तु द्विजैः कोपमथागमत् ।।
ततो देवेनते शप्ता यूयं वेदविवर्जितः ।
ऊर्ध्वजटाः क्रतुष्टाः परदारोपसेविनः ॥
वेश्यायां तु रता द्यूते पितृमातृविवर्जितः ।
न पुत्रः पैतकं वित्तं विद्यावापि गमिष्यति ।
सर्वे च मोहिताः सन्तु सर्वेन्द्रिय विवर्जितः
रौद्रींभिक्षा समनंतु परपिंडोपजीविनः ॥
आत्मानं वर्तयंतश्च निर्ममा धर्मवर्जितः ।
कृपार्यितातुर्विप्रेरुन्मत्ते मयि सांप्रतम् ॥
तेषां धनं च पुत्राश्च दासीदासमजाविकम् ।
कुलोत्पन्नाश्च वै नार्यों मयि तुष्टे भवन्विह ।।
एवंशापं ववरं चैव दत्वां त नमीश्वरः ।
पद्मपुराण सृष्टिावण्ड अ०५ में दक्ष ने पार्वती से कहा है कि जिस कारण
तुम्हारे पति का निमन्त्र हमने नहीं किया।
सुनो एक तो वे मनुष्य की खोपड़ी ही को पात्र बनाये लिये रहते हैं, गज
धर्म ओढते, चिता की भस्म लगाते, त्रिशूल धारण करते, दंड लिए रहते,
नङ्ग सदा रहो, श्मशानभूमि में निवास करते, अंगों में विभूति लंगाते
कि कोई भी अङ्ग बानी न रखते, व्याघ्र का चर्म ओढ़ते हैं, हाथी का भी चर्म
ओड़ते हैं, जिस से रक्त के बिन्दु टपकते रहते हैं, मरे हुए मनुष्यों की कपालों की
माला तो गले में धारण किये ही रहते हैं।
हाथ में एक मनुष्य की मांजर चिना मांस की रहती है, एक कन्या
ऊपर से और ओड़े रहते हैं, सर्प का लँगोट यनाय अपना अच्छादित करते,
सपी के राजा वासुकी जी को ही यज्ञोपवीत बनाये रहते । फिर ऐसा रूप अमङ्गल
बनाये पृथ्वी पर घूमा करते यह भी नहीं कि कहीं छिप कर बैठे आप तो आप !
अपने संग हजारों भूत, प्रेत, पिशांच, डाकिनी, ब्रह्मराक्षसादि भी सब नङ्ग
धसङ्ग व निशूल धारण किये तीन नेत्रधारी सदा गाने बजाते और नाचते रहते

हैं। उनको देखकर हमको लज्जा होती है। कि लोग कहेंगे कि इनके ऐसेही दामाद है ..यहां सर्व देवताओं के निकट कैसे बैठ सकते हैं इस प्रकार भेष बनाये वे किसी ऐसे स्थान पर बैठने के योग्य कब हैं। वत्ले ! इन्हीं दोषों के कारण व सब लोगों की लज्जा से तुम्हारे पति को निमंत्रण नहीं दिया.। येनाद्यकारणेनेह पतिस्तेन निमंत्रिता।. कपालपात्र धक्वर्मी भस्मावृततनुस्तथा । शूलीमुण्डी च नग्नश्च श्मश्ने रमते सदा । विभूत्यांगानि सर्वाणि परिमार्टि च नित्यशः । व्याघवर्मपराधीनो हस्तिचर्मपरिच्छदः । कंपालमाला शिरसि खष्ट्वांगं च करेस्थिते ॥ कट्यांवेगोनसंवधा लिंगेऽस्लांवलयं तथा,। पन्नगाना:तु. राजानमुपवीतं.च. वासुकिम् ॥ :-:.: दक्ष के यज्ञ को शिका विध्वंस करना । दक्ष के यश मैं जो देवता और मुनि थे सबको शिवजी ने दग्ध किया सती के वियोग से खिन्न हो दक्षका यश नाश करने की आज्ञा शिवजी ने वीरभद्र को दी वह शिवजी की आज्ञा पाय अपने रोमों से करोड़ों गण उत्पन्न कर संबको साथ ले, - रथ पर बैठ ब्रह्मा जीको सारथी बनाय पक्षक यक्षको जाते भये, कनखल में दक्ष का यश होरहा था वहां जाकर कहा देवता मुनियों स- हित तेरे नाश को मुझे शिवजी ने भेजा है। इतना कह यज्ञशाला में आग लगवादी सब गण क्रोध कर यज्ञ स्तंभों को उखाड़ने लगे । इन्द्रकी भुजाका स्तंभ चन्द्रमा को मार गिराया फिर वीरभद्र ने इन्द्र का शिर काट लिया अनि के दोनों हाथ छेदन कर जिह्वा भी खेचली बमको दण्ड छीन माथे में लात मारी विष्णु और वीरभद्र के साथ युद्ध हुआ तब उन्होंने हजारों नारायण उत्पन्न किये वे सब वीरभद्र के साथ युद्ध करने लगे । वीरभद्र ने भी उन सब नारायणों को सबों से हटाय एक गदाका प्रहार विष्णु भगवान् की छाती में ऐसा किया कि मूर्छित हो भूमि पर गिर पड़े और थोड़ेही काल में सम्मल कर उठे और अति क्रोध कर वीरभद्र के मारने के अर्थ सुदर्शनचक्र उठाया परन्तु वीरभद्र ने चक ( ३२ ) सहित उनको स्तंभन कर दिया और अति तीक्ष्ण वाण से विष्णु भगवान् का मस्तक छेदन कर दिया और उस मस्तक को अपने पवन से उठा फर आहनीय नाम अनि के कुंड में गिरा दिया। इस भांति क्षण मात्र में यज्ञशाला दग्ध कर दी। कलश फोड़ दिये स्तूप उखाड़ डाले और यक्ष के सभासद् मार दिये तब यक्ष भी भयभीत हो मृगका रूप धारण कर आकाशकी ओर भागा परन्तु वीरभद्र ने एक वाण से उसका भी शिर उड़ा दिया । धर्म, प्रजापति, कदयप बहुत पुत्रों करके युक्त अरिष्टनेमि और अंगिरा मुनि रशादव और जो २ इधर उधर भागमे हुये देख पड़े सब के.मस्तकों को पाद से ताइन कर गिराया । सर- स्वती और. देवमाता की नासिका अपने तीक्ष्ण नखों से उखाड़ ली दक्ष प्रजापतिका शिर काटकर अग्निमें दग्ध करदिया। इस प्रकार क्षण भरमें उसक्षके यज्ञ वाट को श्मशान के तुल्य कर दिया और अति क्रोध से गरजने लगे। तव हाथ जोड़ ब्रह्मा जी प्रार्थना करने लगे । कि है वीरभद्र जी आप ने अपने यज्ञ का नाश किया। देवता और मुनि मार दिये । अयं आप क्रोर को शांति करें अपने गणों को भी रोकें। यह ब्रह्मा जी का वचन सुन वीरभद्र शांति भये और अपने सब गणों को भी चारों ओर से बुला लिया इस अवसर नन्दी आदि गणों को साथ ले श्री महाराज शिवजी भी वहां आये । उनको देख ब्रह्माजी ने बहुत सी स्तुति की और शिव जी को प्रसन्न भये जान यज्ञ में मारे देवता और सुनियों को जीवदान मिलने के लिये प्रार्थना की। श्री महादेवी ने जो २ यज्ञ में मारे गये और जिन के अङ्ग भङ्ग होगये थे सव को पहले की भांति कर दिया और जीवदान दिया। सरस्वती और देवमाता की नासिका ठीक कर दी इन्द्र. वरण, विष्णु और दक्ष का शिर लगा दिया परन्तु दक्ष का पूर्व शिर अग्नि में दग्ध होगया था। इस कारण यश के पशु का मस्तक काट दक्ष के लगाया दक्ष भी फिर जीवदान पाय हाथ जोड़ शिवजी की स्तुति करने लगे स्तुति ले प्रसन्न हो शिव जी ने दक्ष को अपना गण बनाया और आँति २ के चर दिये । नारायण, ब्रह्मा, इन्द्र आदि सब देवता मुनि परमेश्वर की स्तुति करने लगे शिवजी भी प्रसन्न हो उनको अभीष्ट वरदे अन्तर्दान होगये और देवता भी चलेगए। शिव पुराण ज्ञानसंहिता अध्याय ११ में लिखा है कि जब पार्वतो हिमा- लय पर महादेवजी की सेवा करती थी उसी समय तरकासुर ब्रह्माजी से वर पाकर राजा हुआ जिलसे सम्पूर्ण देवताओं को क्लेश हुआ तब वह ब्रह्माजी के समीप नये और वृत्तांत कह सुनाया उन्होंने कहा कि इसने मेरी तपस्या की है इसलिये मैंने इसको घर दिया है कि तप तक तू महीं तरेगा जब तक महादेवजी के वीर्य से पुभ उगलन होगा। इस लिये तुम सब इसी उपाय को करो तब इन्द्र ने कामदेव को बुलाकर सेन वृत्तांत पहा जिसने हिमालय पर जाकर सवको पुकार कार्य निया । जय पार्वती इनकी पूजा के लिये गई तो काम से पीड़ित महादेवजी ने अपने हाथ को उसके वलांदल धारण करने को बताया तब तक वह हर चली गई। इत्येवं वर्णयित्वातु तपसो विरसमह । हस्तं वत्नांबले यावत्तावच्छ दूरतो गता ॥ लियों के स्वाय से वह सुन्दरी लजित होकर अपने अगो को देखती और प्रकाश करती ली । इस प्रकार पार्वती की चेष्टा देशकर शिवजी मोह को प्राप्त होगरे और कहने लगे जो मैं इसका आलिंगन करूं तो कैसा सुख होगा । एवं चेष्टांसददृष्ट्वा शंभुर्मोहमुपागमत् । अद्यालिंगनमेतस्याः करोमि किं पुनः सुखम् ॥ किरक्षणमान विचार कर कहा कि मैं किस प्रकार मोह को प्राप्त होगया जो में ईश्चर होकर पराये अक्ष का स्पर्श करना चाहता हूं फिर दुसरा क्षद्रपुरुप पया करेगा ऐसे शान को प्राप्त हो रद कटिबन्धन को शियनी रचते हुए कि कहीं ईश्वर भ्रष्ट होते हैं क्या? ॥ ७४ ७५ ॥ क्षणमात्रं विचा किमहंमोहमागता । ईश्वरोऽहं यदीच्छेयं परांगस्पर्शसुदा ॥ तर्हि कोऽन्यतमः च दः किं किं करिष्यति । एवं विवेकमासाद्य पर्यंकंबंधनं दृढम् ॥ रवयामास सर्वात्मा ईश्वरः पितेदिह । और अध्याय १४ में लिखा है कि शिवजी महारज पार्वती के अन्तर्भाध की परीक्षा लेने के लिए वहां गए जहां पार्वतीजी तपस्या कर रही थीं शिवजी ने एक वृद्ध स्वामी का स्वरूप कर लिया था । जव वह वहां पहुंचे तो पानी में अतिथि का बड़ा सत्कार किया तब इन्होंने पूछो कि ऐसी घोर तप किस लिये (३४) करती हो तव पार्वतीजी ने सखी द्वारा कहा कि शिवको पति बनाने के लिये, तय अतिथि ने शिवको सब प्रकार से बुराई की। जिसको सुन पार्वती ने उसको चबुत बुरा भला कहकर अमेक प्रकार से शिवकी प्रशंसा की । जिस को सुन अतिथि ने शिव रूप में होकर कहा कि मैं तुमसे प्रसन्न हूं जो चाहो तो मैं. करने को उपस्थित है. चलो घर चलो । पार्वती ने कहा कि मैं पिता के घर जाती है और वहां से विवाह कर आप. की सेवा करूंगी तय शङ्कर ने कहा जैसी तुम्हारी इच्छा हो । वैसा ही होगा। इतना कह अन्तर्धान हो काशी में जाकर पिचार करने लगे और पार्वती के विरह में उत्करिठत हो सप्तऋपियों का स्मरण किया ॥१०॥ इत्येवं वचनं श्रुत्वा शिवोऽपि च शिवां तदा । उवाच वचनं त्वं च यदिच्छसि तथेति तत् ॥ इत्युक्त्वा तदर्वेशं भुर्गत्वा काशी विचारयन् । सस्मर च भाषीं संप्त विरहाविष्ट मानसः ।। लिङ्गपुराण अध्याय २०. मैं शिव का अतिथि बन सुदर्शन नाम महात्मा की स्त्री के साथ एक घृणित व्यवहार से उस की परीक्षा करना लिखा है। महामारत लौतिक पर्व में लिया है कि कुरुक्षेत्र की लड़ाई के पश्चात् जब युधिष्ठिर और उसके संगी जो रण में से बच निकले थे अपने डेरे पर आये जहां रात भर रखवारी करने की प्रतिक्षा कर रक्षा के वासो रहे पर जब अश्वत्थामा जो उनका शत्रु था रात को गया और महादेवजी की विनती की तो उन्होंने उसको अपना खड्ग दिया जिस से उसने द्रौपदी के पुओं को मारडाला। देवी भागवत प्रथम स्कन्द अध्याय १८ में लिखा है। एक बार सनकादि ऋषि महादेव के दर्शनों के लिये वहां गये जहां शिवजो सदा रहते थे । पहुँच कर देवा तो महादेव ओर पार्थती.जी ऋड़ा करने में आसक्त हैं। उन्हें देख पार्वती जी ने लजित हो चट-पट अपने पद धारण किये। ऋपि लोग यह दशा देखकर प्रदरिकाश्रम में श्रीनारायण के दर्शन को चले गयेः तब अति कतिः पार्वती को देव महादेवजी ने शाप दिया कि-तू क्यों लजित होती है आगे से हमकों होड़ मो कोई आवंगा वह तुरन्त स्त्री होजायेगा।

( ३५ ) अब प्रभृति यो मोहात्पुमान्कोपि वरानने । वनं च प्रविशेदेतत्सवैयोषिद्भष्यति ॥ २२ ॥ इसके अनुकूल वैवस्वत मनु का पुत्र सुद्युम्न नाम राजा पिना जाने, एक दिन शिकार खेटने को गया वहां जाने राजा सी और घोड़ा घोड़ी होगया। सुद्युम्नस्तु तदज्ञानात्प्रविष्टः सचिकैः सह । तथैवस्त्रीत्वमापन्नस्तैः सहेति न संशयः॥ २४ ॥ फिर वह लजा के कारण अपने राज्य को वापिस नहीं गया और स्त्री हो जाने पर उसका नाम इला हुआ। एक दिन चन्द्रमा और बुद्ध वहां पहुँथे । तथ बुद्ध ने उस रूपवती स्त्री को देख उसकी इच्छा की इसी प्रकार इला ने भी चाहा कि यह हमारे पति हो निदान दोनोंका समागम हुआ जिससे पुरूाया नाम पुन उत्पन्न हुआ ॥ संयोगस्तव संजातस्तयोः प्रेम्णा परस्परम् । सतस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम् ॥ जब पुत्र हुओ तो बड़े सोध में हो वशिष्ठजी का स्ममरण किया जिन्होंने आकर महादेवजी की बड़ी प्रार्थना करने पर प्रसन्न किया और वर मांगा कि यह राजा फिर पुरुष होजाय जिस पर महादेवजी ने कहा कि हमारा वाफ्य कमी मिथ्या नहीं हो सकता हां हम तुमसे प्रसन्न हुए इस ले राजा एक माल स्त्री रहेगा। मास पुमास्तु भविता मासं स्त्री भूपतिः किल ॥ ३३॥ श्रीमद्भोगत्रत अष्टम स्कंद अध्याय १२ में लिखा है कि देव और दानवों में घोरसंगाम हुआ तव विष्णुजी ने मोहिनी सी का रूप बना दानों को मदिरा और देवताओं को अमृत पान कराया। जब यह वृतांत महादेवजी ने सुना तब उमा सहित बैल पर चढ़ गणों सहित वहां पहुंचे जहां विष्णु भगवान थे। उस समय उन्होंने विष्णु महाराज की स्तुति कर कहा। अवतारा मया दृष्टा रममाणस्य ते गुणैः । सोहन्तदृष्टुमिच्छामि यत्ते योषिद्वपुर्घतम् ॥ तुम्हारे अनेक अवतार में देखें अब मैं उस नारी रूप को देखना चाहता हूं जिस से तुमने दैत्यों को मोहित किया है और देवता को अमृत पिलाया है। सौतूहलाय दैत्यानां योनिको नया मृतः। पश्यतां देवकारयाणि भाते पीपभाजने.॥ तनहं दर्शयिष्यालि दिनुहोः सुरसग। इस प्रकार से महादेव को छाके भगवान् विष्ण बोले कि जब अमृत जापानदेवले दैत्यों के पास चला गया तब दैत्यों को मोहित करने के निमित्त जोली का रूप धारण किया था वह तुम को दिखलाऊंगा वह सेरा रूप कामियों को अत्यन्त प्यारा है परन्तु यह क्षेवल कल्पमान ही है । ऐसा कहके भगवान वि. वहाँ अन्तर्धान हो गये। जहां उमा के सहित मात्र विराजमान थे, और हारों और को देख रहे थे। इसके अनन्तर समीपलती बार में जिस में लाल २ और कोमल पते तथा पुष्पमिदे हुए थे । सैदको उछालती हुई एक कन्या अत्यंत सुन्दरी को देखा और सन्द मुसकान वाली ली को गें। उछालने पेश कर महादेच ऐसे काम ले व्याकुल हुए उनके पास बैठी पार्वती और गणों की भी लजा जाती रही। जर स्त्री के साथ ले नेद बहुत हर चली गई और घह उसको पकड़ने के लिये झार्दा और वायुसे उसके बारीक वस्त्र को उड़ाया. महादेव उल लो पर ऐले मोहित हरेजि पार्वती के सामने ही जल के पीछे भागे। रह एल दीना नहादेव को अपने पीछे भाता देश कर बहुत लजित हुई और वृक्षों में छिप गई महादेव भी वृक्षों में उसके साथ चले गये और उस का जूड़ा पकडू २ (गोद भरसे) आलिङ्गन किया। वह स्त्री. इधर को तड़प कर महादेव की भुजाओं से छूटी और भागी इस आलिहून से जहां जहां महादेव फा" "पतन हुआ पहीं वहीं सोने की खाने हो गई। पश्नपुराण षष्ठ उमरखंड अध्याय १४४ में लिखा है । कि एक बार गाय और बैल आपत में क्रीड़ा कर रहे.थे वैश ने विष्टा और सून को छोड़ा तो बह नटादेव के माथे.घर गिर पड़ा। पुरा वृषेण गोलोके क्रीडतो तहमातृभिः । मुक्तं तथोशन्सूत्रं पतितं हरमूर्द्धनि । -- - तब उन्होंने गौचों को श्राप दिया। गौवों ने उन से प्रार्थना. की तय आपने उन से कहा कि जब तुम साम्रमती तीर्थ में ब्रह्मवत्ली के समीप खण्ड संशक हद लान फरो तब तुम स्वर्ग को जाओगी फिर गौवों ने ऐसा ही किया। गायः शप्ताभगवता संप्रसाद्मपुनर्हरम् । प्राप्स्यामहे पुनर्लोकं इतिदेवं यमाभिरे ॥ यदा सानमतीनीर्थे ब्रह्मवल्ली समीपतः । खडंसंज्ञहूदे स्नात्वा स्वर्गवैप्राप्स्यथध्रुवम् ॥ पसराण पष्ठ उत्तर खण्ड अध्याय १५४ में लिखा है कि एक बार महातेजस्वी विश्वामित्रजी खड्गधार तीर्थ पर गये और साम्भवती में स्नान कर महादेवजी के स्नान किये और प्रति दिन पूजा करने लगे, उस स्थान पर कोई दुध चौलिक ने आकर महादेवजी के ऊपर मांस चढ़ाया ॥१॥ तत्र कोपि महादुष्टः कौलिकः पापरूपधृक् । मांसं दत्त तदातेन.शिवस्योपरि भामिनि ॥ जब विश्वामित्र ने देखा तो कहा कि इस पापी को दण्ड नहीं दिया इस लिये में उनको शाप गा॥ ६३ ।। न दत्तस्तस्य दण्डोहि शर्वेण परमात्मनः । तस्मादहं हि निश्चित्य, शापं दायेन संशयः ॥ यह विचार उसी समय महादेवजी को शाप दिया कि इस धोर कलियुग में तुम सर्वथा गुश रहो इस प्रकार शाप देकर छ मुनि चले गये॥६५॥ अस्मिन्कलियुगे घोरे गुप्तस्त्वं भव · सर्वथा । इति दत्ताथवे शापं गतवान्मुनिसत्तमः ।। एक.बार-शिवजी ने विष्णु भगवान से भिक्षा..मांगी । विष्णु ने अपना दाहिना झा समर्पण किया. शिव ने त्रिसूल मारा और रुधिर की धारा कपाल में गिरने लगी शिन ने उसको मया उस में से एक पुरुष उत्पन्न हुआ। और भी सुनिये कि जब दक्ष महाराज ने अपने यज्ञ में पार्वती के पति महादेव को नहीं बुलाया तो पार्वती जी वहां ही भस्म हो गई। जिनके शोक .

(३८) में महादेव जी हरद्वार में आये और शोक में डूब गये । उस समय नारद मुनि ने आकर सब वृत्तान्त कहा जिस को ध्यान से उन्होंने जान शोक दूर किया । सृष्टि खण्ड अध्याय ५ में। शिवजी ने अंजनी के साथ छल किया और उसे अपने पास बुला के भन्न देने के धोखे से अपना बर्थ उसके कान में डाल दिया जिससे हनुमान उत्पन्न हुये। ब्रह्मवैवर्तपुराण गणेशम्शण्ड अध्याय ३ में लिखा है कि एक समय शिवजी ने क्रोध कर शस्त्र से सूर्य को मारा जब वह मृतक हो गये तो कश्यप जी महाराज विलाप करने लगे और सब तरफ अन्धकार हो गया कश्यपजी ने शाप दिया जैले मेरे पुत्र को तूने मारा है. ऐसे ही तेरे.पुत्र गणेश का शिर फट जायगा। : मत्पुत्रस्य यथा वक्षच्छिन्न शूलेन तेऽद्यवै ! स्वत्पुत्रस्य शिरच्छिन्न भविष्यति न संशयः ॥. पद्मपुराण षष्ठ उत्तरखण्ड अध्याय १२२ में लिखा है पार्वती जी ने दीपमालिका के दिन जुआ में महादेवजी को जीत कर नग्न छोड़ दिया था इसते महादेवजी दुःखी और पार्वती सुखी रहती हैं। गोर्या जित्वा पुरा शंभुर्नग्नो घूतेविसर्जितः । अतोयं शंकरो दुःखी गौरी नित्यं सुखेस्थितः ॥ २६ ॥ कहिये, श्रीमान् हुआ खेलना भी धर्म कार्य हो गया पयोंकि महादेव और पार्वती ने खेला, इतना ही नहीं वरन् साल भर की हार जीत मालूम होती है यानी उसं रात्रि में जो जीते उसकी. साल भर तक जीत,और जो हारे उसकी साल भर तक हारं होती रही है। श्रीमान् इस हार जीत को जानने के बहाने से भारतवर्ष में प्रति वर्ष जुआ का सर्वन प्रचार हो गया। धर्म शान जिस को कुरा बताते हैं पुराण उसे वर्ष भर की हार जीत सुख दुख की कल कहते हैं तिस पर तुर्रा यह कि पार्वती. सी पतिमताखी ने महादेव को इतना हरायां किधोती तक जीत ली और नन्न उन को छोड़ दिया। जिस से वह दु:खी रहते हैं। कहिये जो आप दुखी रहते हैं फिर औरों को क्यों कर सुखी करते हैं क्या पतिव्रताओं का यहीं धम्म है? .

एमपुराण चतुर्थ पातालखंड अध्याय ३११ से कि जब सय देवता के ले तब तुम्वरू नाम गान्धर्य आकर गाने लगा उसी समय हमारे भी गाते लगे जिस को सुन सब प्रसन्न हुये और सबने अपना २ गाना पल्द कर हनूमान जी का गाना सुनना पसंद किया यह गाने लगे अगभोजनों का समय हुआ सच भोजनों को चले महादेव अपने बैल पर चढ़ कर चले तय हनूमान जी से कहा कि तुम भी चढ़लो और गाना सुनको चलो तब हनूमान जी ने कहा कि आप.के सिवाय और कोई नहीं चढ़ सक्ता हां आप हमारे ऊपर सवार हो लें हम आप के मुख की ओर मुख किये गाना सुनाते हुए चलेंगे तब महादेवजी ने उनकी पीठ पर सवार हो लिये महादेव के सवार होते ही हनुमान ने अपना शिर काट डाला व घुमा कर कांग्रेपर जोड़ महादेवजी की ओर मुख करके गाने हुये चले इस प्रकार शिवजी को गीत सुनाते हुए गौतमजी के घर गये और भोजन के पश्चात् हनूमानजी ने फिर गान किया जिसको सुन जितने काष्ठ गौतम के गृह में लगे थे व जितने आसन पादिक काष्ठ थे, वे सब गीले होगये और सबों में नवीन पल्लव निकल आये १७६, १७७, १७८, १७६ । और उस गान मै सयका चित्त लग गया उस समय हनूमाननी महादेव के चरणों पर हाथ धरे हुए शिर पर शियजी को लपार करारे प्रसन्न चित्त स्तुति कर रहे थे तब महादेवजी ने हनुमानजी का शिर दोनों हाथों से पकड़ कर जैसा प्रथम था वैसाही कर दिया। १८२ ॥ शिव, ब्रह्मा और विष्णु की दशा । पद्मपुराण षष्ठ उत्तर खण्ड अध्याय १११ में लिखा है एक बार सब देव. गण समूह के साथ हरी महादेव आदि सह्य पर्वत की चोटी पर यह करते के लिये एकत्र हुये। जब महर्त का समय आया तब तक स्वरा नहीं आई तब विष्य ने कहा कि यदि स्चरा नहीं आई तो गायत्री से कार्य लो जिलको महादेव जी ने भी पसंद किया तब भृगु ने ब्रह्मा के दक्षिण भाग में गायत्री को मिटा घर दीक्षाधिधि आरम्भ की इतने में स्वरा भी आ गई और कहा कि पूजने योग्य की पूजा नहीं होती और अपूण्य की पूजा होती है वहीं दुर्भिक्ष मरण और भय यह तीन होते हैं हमारे स्थान पर आप ने इस छोटी को बिउलाया है इस लिये सब जड़ और नाना प्रकार के रूप वाले होवो ॥१५॥ .. ..

(४०) ममासनेकनिष्ठेयं भवद्भिः लत्रिवेशिता । तस्यात्सर्वे जड़ीसूता नानारूपाभविष्यथ ॥ स्वरा के शाप को सुन नापी उठी और देवताओं के रोकने पर भी स्था को शाप दिया ॥ १७ ॥ ततस्तंच्छ पमा कयं गायत्री कंपिता तदा। समुत्थायारापदं वैयमाणयितां स्वरा ॥ कि तुम्हारे स्वामी हमारे भी स्वामी हैं इस लिये तुमने कृथा शाप दिया इससे तुम भी नदी हो ॥ १८ ॥ तवमा यथा ब्रह्मा ममाप्येय तथा खलु । वृथाशपस्त्वंयस्मान्मांभव क्सपिनिगा ॥ तब शिव वि णु इत्यादि देवता हाहाकार करते पृथ्वी पर गिर दण्डवत प्रणाम कर स्वरा से कहने लगे ॥१॥ ततो हाहाकृतःः सर्वेशिवविष्णु मुखाः सुगः । प्रणम्य दण्डवद्भूमौ स्वरां तत्र व्यजिज्ञयन् ॥ कि हे देवि तुमते इस समय सब ब्रह्मादि देवताओं को शाप दिया है जो घे सब जड़ हो कर नही हो जायेंगे तो तीन लोक नाश हो जायेंगे। तुमने यह अज्ञान से किया इस से इस शाप को निवृत करी ॥ २१ ॥ तदा लोकत्रयं ह्येतद्विनाशं यास्यति ध्रुवम् । अविवेकः कृतस्तस्माच्छायोयं विनिवर्त्यताम् ॥ तय स्वराते कहा कि यज्ञको आदिमें तुमने गणेशको नहीं पूजा जिससे विश्न उत्पन्न हुआ हमारे वचन झूठे न होंगे जिससे अपने २ अंशझे नदी होकर, यही हा दोनों भी अपने २ अंशले नदी हो कर पशिछम मुध हो कर बहेंगी ॥ २४॥ आवामपि सपल्यौ च स्वांशाभ्यामापनिम्नगे। भविष्ययोऽबै देवाः पश्चिमाभिमुखावहे । इसप्रकार स्वराके वचन सुन ब्रह्मा, विष्णु और महादेव तिसी समयमै अपनेर अंशीले जड़ हो कर नदी होने हुए ॥ २५ ॥ • (४) ------ । इति तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा विष्णु महेश्वराः । जड़ीभूना भवन्नद्यः स्वांशैरेव तदा नृप । :: विणुजी कणा, महादेवजी घेण्या और ब्रह्माजी ककुमिनी गदा ये अलग २ इसी समय होगये ॥ २६ ॥ तत्र विष्णुरभूत्कृष्णा वेण्या देवो महेश्वरः । ब्रह्मा ककुमिनीगङ्गा पृथगेवाभवत्तदा ॥ और चतुर्थ देवता भी सह्य पर्वत पर अपने २ अंशको जड़ करके नदियां होते हुंए ॥२७॥ देवास्वानपितानंशान् जड़ी कृत्वा विचक्षणः । सह्याद्रि शिखरेभ्यस्ताः पृथगासन सुनिन्नगाः ।। गायत्री और स्वरा भी तिसी समयमें पश्चिम बहने वाली नदियां हुई ॥२८॥ गायत्री च स्वरा चैषपश्चिमाभिमुखे तदा ॥ पापुराण षष्ठी उत्तर खंण्ड अध्यायं ११५ मैं लिखा है कि पीपल भगवान् विष्णुका रूप है, बरगद महादेव और ढांक ब्रह्माजीको रूप है ॥ २९ ॥ अश्वत्थरूपी भगवान विष्णुरेव न संशयः । रुद्ररूपी वटस्तद्वत् पालाशो ब्रह्मरूपं धृक् ॥ इन सबका दर्शन पूजन और सेवा पाप नाश करनेवाली है ॥ २३ ॥ दर्शनं पूजन सेवा तयाँ पापहरामृता । दुःखापद्वयाधिदुष्टानां विनाशकरषी ध्रुवौ ॥ इसके वृक्ष होने का कारण यह है कि एक बारं महादेवजी की पार्वतीजी से भोग करते समय देवताओं ने अग्नि को भेज कर विघ्न किया थी उस समय उस सुख के भ्रश होने से क्रोध में आकर शाप दियो था ॥ २६ ॥ ततः सा. पर्वती क्रुद्धा शशाप-- त्रिदिवौकसः । रतोत्सवसुखभ्र शाकंपमाना रुखा तदा ॥ .. कि. कृमि और कोट आदि भी रति के सुखको जानते हैं उस के पिन्न करने से देवता वृक्ष होजाऔ॥ २७॥ : ६ ( ४२ ) कृमिकीटादयोध्येते जानन्ति सुरतं: सुखम् । तद्विघ्नकरणावा झुद्भिज्जत्वमवाप्स्यथ ॥ इस प्रकार कोषयुक्त पार्वतीजी ने देवताओं को शाप दिया तो सब देवता समूह निश्चय कर वृक्ष होगये ॥ २ ॥ तिसी शापसे विष्णुजी पीपल और महादेवजी घरगद हुये ॥२९॥ तस्मादिमी विष्णुमहेश्वरावुभो । बभूवतुर्बोधिवटौ सुनीश्वराः ॥ पद्मपुराण षष्ठ उत्तरखण्ड अध्याय १५८ में लिखा है कि पूर्व समय में कोलाहल के युद्ध में दानवों ने देवताओं को जीत लिया तो देवता प्राण बचाने की इच्छा से सूक्ष्म होकर वृक्षों में प्रवेश कर जाते भये ॥२॥ पुरा कोलाहले युद्धे दाननिर्जिताः सुराः । वृक्षेषु विविशुस्तत्र सूक्ष्माः प्राणपरीप्सया ॥ २ ॥ तहां वेल के पेड़ में महादेवजी, पीपल में नाश रहित हरिजी, सिरसा में इन्द्र और नीच में सूर्यनारायण स्थित.हो गये ॥३॥ तत्र बिल्वेस्थितः शंभुरश्वत्थे हरिरव्ययः। शीरीषे भूत्सहस्राक्षो निवे देवः प्रचाकरः ॥- पण्डितजी-सेठजी अब इस विषय को समाप्त कीजिये.! सेठजी-मेरी तो यह इच्छा थी भाप को दो; ती दिन त्रि- देवलीला ही सुनाता क्योंकि इन तीनों देवों के वृत्त से पुराण भरे. पड़े हैं। पंडितजी-हम देव और मुनिलीला ही को सुन कर पुराणों का तत्व जान चुके थे परन्तु त्रिदेवलीला ने रहे सहेः भ्रमकी मेट दिया क्या कहूं सेठजी आज आप की प्रशंशा, नहीं होती। यदि "स्वामी दयादन्द जीवित होते तो मैं उनके चरणों को पकड़ कर कृतार्थ होता, जिन्होंने भारत के रहे सहे महत्व को बचा लिया। इस विषय में आपके नोटो.की आवश्यकता नहीं क्योकि ब्रह्मा, विष्ण और शिवजी के नाम से जो कार्य्य पुराणों में लिखे हैं जिनको आपने सुनाया है।

:( .४३ . यह स्वयं ही उनके महत्व को प्रकाश कर रहे हैं न मालूम सनातनधर्म सभा के लीडर पण्डित आदि क्यों प्राण देते हैं और इन निन्दित कम्मों को स्तुति कहते हैं सच तो यह है कि यह पुराण व्यास महाराज के कदापि लिखित नहीं हैं कहां ब्रह्मा, विष्णु, शिव, भगवान् के रूप कहां उनके यह अनोखे कर्तव्य अब तो मुझको भी रोना आता है। सत्य कहा है कि जब नाश होने वाला होता है तब बुद्धि प्रथम विग जाती है यही दशा भारतवासियों की हो रही है। कि हम सब अपने मुंह अपनी निंदा को स्तुति कह कर अन्यों से कहलाना चाइते हैं। धन्य है स्वामीजी को जिन्होंने लाखों आदमी एक ओर होते हुये सत्य के पल को संसार में प्रकाश कर दिया इस कारण सेठजी मैं तो इस विषय में आपका आज से सहमत हूं. पुराण स्वार्थियों ने हमारी अवनति के लिये घना कर प्रकाश और प्रचार कर दिये । वस और मुझसे कुछ कहा नहीं जाता। अन्य महाशयों में से कितने एक महाशयों ने कहा कि महा- राज पुराणों की लीला सुन कर तो हमारे छक्के छूट गये यह कैले धर्म. पुस्तक हैं इनमें यह क्या लिखा है। सेठजी श्रीमहाराज और अन्य महाशयों को धन्यवाद देता हूपयोंकि आपने सत्य को प्रकट कर दिया आपले प्रार्थना यही है आप भले प्रकार अपने मित्रों के साथ विचार करें और संसार में सत्य का प्रकाश करें जिससे भारत के धर्म सम्वन्धी विचारों की जगत् में बड़ाई हो और हम सब देव पितर, ऋषि गण से उद्धार हो परमात्मा की आज्ञा पालन करते हुये सुखों को भोगें ॥ ओम् शम् ।.लव चल दिये। सेठी ने पण्डितजी को नमस्ते अन्यों को:यथा योग्य.कहा है पण्डितजी ने आशीर्वाद दिया अन्य सभ्यगणों ने यथाः योग्य कहा। सेठजी अपने.गृह में पधारे. ॥ इति दशम परिच्छेदः ।

(४४) एकादश परिच्छेदः। . .. आर्यसेठ-श्रीमान् पंडित जी नमस्ते । पण्डितजी-आयुष्मान । अन्य सजन महाशय आने लगे और यथा योग्य कर विराजमान हो गये। सेठजी-कहिये श्रीमान् अब आप क्या सुनना चाहते हैं। पण्डितजी-सेठ जी व्रत और तीर्थमाहात्म्य के विषय में जो आप की सम्मति हो उसको वर्णन कीजिये। सेठजी-बहुत अच्छा। श्रीमान् पण्डितजी पुराणों में अनेकान व्रत लिखे हैं जिनके बड़े २ महात्म्य सुन २ कर संसारी जन उनका पालन करना अपना परम धर्म समझते हैं यदि मैं उन सब का वृत्तान्त सुनाऊं तो बहुत काल चाहिये इस लिये संक्षप के साथ. उन के नाम और माहात्म्य सुनाता हूं। आप दया.पूर्वक सुन विचार कर सारको प्रहण कर कार्य कीजिये जिसका प्रभाव पवलिक पर उत्तम हो : भविष्यपुराण पूर्वार्द्ध में कृष्णाटमी, अनद्याष्टमी, सोमाष्टमी, ध्वज नवमी, उल्का नर्थमी, दशावतार व्रत रोहिणीव्रत, अवियोगव्रत, गोविन्दशयनन्नप्त, भीमपञ्चक, मल्लाद्वादशी, अखण्ड द्वादशो बत, मनोर्थद्वादशी, धरणीद्वादशी व्रत,. अकंपादनत, दुर्गन्धिनाशनव्रत, यमादर्शनव्रत, अनत्रयोदशीव्रत, पाली व्रत, रंभावत, शिवचतुर्दशी, श्रावणि का व्रत, नथवत, सर्वकलस्यागवत, युद्धिविजयपूर्णिमावत सावित्रीवत, कृत्तिकावत, अनन्तवत, नक्षत्रत, बैष्णव नक्षत्र पुरुष व्रत, शैवनक्षत्र पुरुषव्रत, सम्पूर्णवत, बेश्याओं को कल्याण देने हारे काम व्रत, शनैश्चरव्रत संक्रान्ति व्रत, पञ्चाशीति बत इत्यादि। उत्तरार्द्धमें शकटयत, तिलकवत, अशौकत्रत, करवीर, कोकिल, वृहद्धत, भद्रबत, अशूभ्यशयनवत, गोत्रिरात्रत्रत, हरतालवत, ललितातृतीयावत, .

. . अधियोगवत, उमामहेश्वरबत, सौभाग्य शयनयत, अनन्त फलदा तृतीया, रस कल्याणीतृतीया,आनन्दकरी तृतीया,चैत्रमाद्गु और माघशुक्ल तृतीया,अनन्तादि तृतीया, अक्षय तृतीया, अङ्गारक चतुर्थी, विघ्न विनाशंकचतुर्थी, शान्ति मत. सरस्वतीवत, नागपंचनी का व्रत, भीपंचमीवत, विशोक षष्टीव्रत, कमलषष्ठी, मन्दारपष्ठी, ललिताष्ठी, विजय सप्तमी, कुकटीव्रत, अचलासप्तमी, बुधाष्टमी, श्री- कृष्ण जन्माष्टमी व्रत, दुर्गाष्टमीवत प्रतिमास, पुप्यद्वितीयवत, गौरीतृतीयावत, विधान चतुर्थीवत, सप्तमीवत, रध सप्तमीपत, फलसप्तमीपत, जयासप्तमीव्रत, जयन्ती, महाजयन्ती, नन्दासप्तमी, फाल्गुन शुक्ल सप्तमी, पदयात, दोला, दमलक, शयन आदि। मत्स्यपुराणमें-कृष्णाष्टमी, कुलवृद्धमत, सौभाग्यशयनव्रत, पुरुष स्त्री का वियोग न होने वाला, अन्नत्रत, संसार के उद्धारहोने का व्रत, विशोकसप्तमी, पापमोचन सप्तमी, शर्करासप्तमी, कमलसप्तमी,मदारासप्तमी, शुभसप्तमी, प्रियजन का वियोग न होनेवाला.व्रत, अनन्तफलदाईव्रत, विष्णु भगवान के उत्तम प्रत, इत्यादि व्रतों का वर्णन है। वाराहपुराण में लिखा है कि पीप, माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाप, ज्येष्ठ, श्रावण, भाद्र, आश्विन, कार्तिक, एकादशी व द्वादशी व्रत, विधान, अभीष्ट पति लाम व्रत, मुक्ति प्राप्ति व्रत, धन्यवत,. कांतिवत्त, सौभाग्यप्राप्तिवत, अधिप्नव्रत, शांतिव्रत, पुत्र प्राप्ति व्रत, शौर्यव्रत, सार्वभौमवत, पृथ्वीतत्रत, अगस्त शरीर व्रत, कापालिंकवत । पद्मपुराण-प्रथम सृष्टिखंड में लिखा है, भीमनिर्जला घेक्ष्या नरक व्रत, रोहिणी चन्द्रशयनवत, अशून्य शयनवत, सौभाग्यवत, सावित्री व्रत | और षष्ठ उत्तरखण्ड में लिखा है। तुलसी जी का त्रिरात्रवत जन्माष्टमीव्रत, त्रिस्पृशाव्रत उन्मालिनीव्रत, पक्षवर्द्धिनी एकादशी चारहमास की एकादशी के व्रत, श्रवण द्वादशीवत, कार्तिक माहात्म्य की अनेकान प्रकार से उत्तमता दिखलाई है फिर उसके महीने भर के व्रत का वर्णन, भीमपञ्चक व्रत, दीपवत, चातुर्मास्यवत, धैतरणीव्रत, ऋषिपञ्चमीपूत, यमद्वितीया, गोवर्द्धनपूजा, राधाअष्टमी, वृहस्पति आदि बूतों का वर्णन है । अग्निपुराणमें लिखा है कि प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया पतुर्थी, । पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, श्रावण द्वादशी व्रत, अखण्ड-द्वादशीव्रत, प्रयोदशीव्रत चतुर्थदशी शिवरात्रिनत. अशोक पूर्णिमा प्रत, वाखत, नक्षत्रवत, दिवसक्त, मासवत, नानावत दीपदाननत, मालोपचास व्रत भीष्मपंचकवत कौमुद व्रत हैं। शिवपुराण में लिखा है शिवरात्रि व्रतविधि उसका माहात्म्य लक्षणाष्टमीवत. नामाएमीवत, पाशुपतव्रत। ब्रह्मवैवर्तपुराण-हरिव्रत, व्रतमाहात्स्य, निमासिनत, द्वादशी जय- दुर्गावत, जन्माष्टमीवत, आदि- इसके अतिरिक्त आदित्य पुराणके अनुसार रविवार, शिवपुराणमें से सोमवार और तेरस चन्द्रखण्डके कथानानुसार मंगल, बुद्ध, वृहस्पति, शुक्र और शनैश्चर को व्रत रखने की आवश्यकता है यही सप्ताह के सात दिन होते हैं। और भी सुनिये विष्णु भगवान् को एकादशी, वामनको द्वादशी, नृसिंह भगवान् की अनन्त चौदश, चन्द्रमा की पौर्णमासी, दिक्पाल की दशमी, दुर्गा की नवमी, वसुओंको अष्टमी, मुनियों की सप्तमी, कार्तिक स्वामी की उट, नागोंकी पञ्चमी, गणेशकी चौथ, गौरीको तीज, अश्विनी कुमारकी दुइज, आद्यादेवी की प्रतिपदा, मैरवकी अमावस । और २४ एकादशियोंकेतोंके रहने की आशा है जिनमें व्रतके दिनों में यम.और नियम धारण करनेका भी आदेश है और बहुधा व्रतों में अन्न खानेका.निषेध ही नहीं वरन् महापाप बतलाया है इन: उपरोक तोकी महिमा. को सुन २ कर स्त्री, पुरुष लह होजाते हैं क्योंकि लिखा है कि इनके करने से. मानधातादि राजा स्वर्गको गये, महादेव बावा कपालसे छूटे । श्रीरामचन्द्रजी दुःखों से बचे, भीमसेनजीका कल्याण होगया, सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्रके पाप क्षणमें कट गये योगीजन इन व्रताको कर मोक्ष पागये इसके उपरान्त यज्ञदान, तीर्थ भी व्रतोंकी समानतां नहीं कर सकते तदनन्तर काशी ग्रहण स्नान, मया पिण्ड, गोमती स्लान, कुम्भमें केदारदर्शन, पदरीनारायण यात्रा, कुरुक्षेत्रमें सूर्य ग्रहण स्लान इत्यादि भी व्रतोंके फलके समान फल नहीं देते और न हज़ार अश्व- मेथ न सोराजसूयमज्ञ उनी बरावरी कर सकते हैं इसके उपरान्त व्रत करने वालोंकी सौ सौ पीढ़ी तरजाती हैं.१८ प्रकारके कोड़की यही दवा है प्रथम के हज़ार जन्मके पाप दूर हो जाते हैं । ८८ हज़ार विपके भोजनका फल मिलता है। काशी प्रयाग, द्वारिका, बद्रीनाथ आदि तीधी की कौन कहें त्रिलोकी के तीधों (४७) का फल इन व्रतोंके करने से मिलता है। मन, वाणी के पाप जागरण से जाते रहते हैं वर्षा कराने की यही औषधि है, इससे ब्राहाणका मारनेवाला, सोना पुरानेघाला, मदिरापानेवाल, गुरुपत्नी से गमन करने वाला, वेश्यागामी, प्यारी, गोत्रनाशक झूठ बोलने वाला, गुरुनिन्दक, युद्ध से भागने आदि के पाप ही नहीं वरन् मेरु के समान हत्या सय दूर हो जाती है और पुत्र सन्तान, धन ऐश्वर्य, सम्पदा, बुद्धि राजसुख, मोक्ष मिलती है विधवापन जाता रहता है, कुल का विरोध मिट जाता है इत्यादि फल प्राप्त होते है जिसके कारण भारतवासी श्री पुरुष बिना विचार किए इधर को झुकते चले जाते हैं जिससे भारत का स्वरूप ही पलट गया । अब प्रथम मैं एकादशी तिथि की महिमा पश्चात् वि-णु महाराज का एका दशी होना और उनके शरीर से एक कन्या का उत्पन्न होना और तत्पश्चात् २४ एकादर्शियों की कथा इसके अनन्तर अन्य व्रतों की महिमा वर्णन करूंगा आप कृपा पूर्वक श्रवण कीजिए देखिए- पद्पुराण सप्तमक्रिया योगसार अध्याय २२में लिखाहै कि जिस प्रकार सय देवताओं में विष्णु श्रेष्ठ हैं। आदित्यों में सूर्य, नक्षत्रों में चन्द्रमा, वृक्षों में पीपल, वेदों में सामवेद, कषियों में शुक्र, वर्गों में ब्राह्मण, मुनियों में व्यास, देवर्षियों में नारद, दानों में अन्नदान, इन्द्रियों में मन, महीनों में कार्तिक, पाण्डवों में अर्जुन, शास्त्रों में वेद श्रेष्ठ है। उसी भांति सव व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ट है क्योंकि विष्णु भगवान स्वयं एकादशी होगए । और इसी अध्याय के श्लोक ७ से प्रकट है कि प्रथम भगवान् ने स्थावर जंगम संसार को रच सयके दमन के लिये पाप पुरुष को रचा। सृष्ट्रा वै पुरुषश्रेष्ठः संसारसचराचरम् । सवेषां दमनार्थाय सृष्टवान् पापपूरुषम् ॥ ७ ॥ जिसका ब्राह्मणों की हत्या मस्तक, मदिरा का पीना नेन, सोने का चुराना सुख, गुरु की शय्यो में जाना कान, स्त्री हत्या नाक, गऊ की हत्या का दोप भुजा, न्यास का चुराना गर्दन, गर्भ हत्या गला, पराई स्त्री से भोग मित्र, मनुष्यों का मारना पेट, शरणागत की हत्यादिक नाभि के छिद्र की अवधि, करिहर गुरु की निंदा, सक्थभाग कन्या का बेचना, विस्वास वाक्य का कहना, गुदा इन्द्रिय, प्रीति का मारना चरण, उपयो रोयें थे इस प्रकार बड़ी देह .

( ४८ ) वाले भयंकर कालेधर्ण, पौले नेत्र अपने आश्रयों के अत्यंत दुख देने वाले अत्यंत उगू पुरुषों में उत्तम पाप पुरुष को देख कर या समेत प्रजाओं के हेश नाश करने वाले प्रभुजी चिन्तना करते हुये । तं दृष्ट्वा पाप पुरुषमत्युग्रं पुरुषोत्तमः । सदयश्चिन्तयामास प्रजाक्लेशहरः प्रभुः ॥ १३ ॥ कि यह दुर्जन, क्रूर अपने काश्रयों के फ्लेश देने वाले को प्रजाओं के दमन के लिये तो मैंने रचा अब इसके कारण को रचता हूं ॥१४॥ सृष्टोऽयंदुर्जनः क्रूरः स्वाश्रयक्लेशदायकः । प्रजानां दमनार्थाय सृजाम्येतस्य कारणम्॥ १४ ॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुजी आप ही यमराज होगये और पापियों के दुःख देने वाले रौरवनरकों को रचते हुये। अथा सौभगवान्विष्णु बभूव स्वयमन्तकः । ससर्जरौरवादींश्च निरयान्यापि दुःखदान् ॥ १५ ॥ जो मूर्ख पाप का सेवन करता है वह परमपद दो नहीं जाता और यमराज की आना से रौरवनरक में जाता है ॥ १६ ॥ . पापं यः सेवतो मूढो न याति परमं पदम् ॥ यमाज्ञयां व्रजेत्तत्र नरकं गैरवादिकम् ॥ १६ ॥ एक समय विष्णु महाराज गरुड़ पर चंद कर यमराज के मन्दिर को गये जहां यमराज ने उन की अनेकान प्रकार से पूजा की फिर. उन्होंने दक्षिण दिशा में रोनेका शब्द सुन विस्मययुक्त हो यमराज से बोले कि यह रोने का शब्द कहां से आता है। २०॥ २१ ॥ तब यमराज ने कहा कि पापी मनुष्य नरलों में अपने हाथ के किये हुये दोषों से कष्ट पाते हैं ! उसी से दुःखित होकर पह. चिल्ला रहे हैं तब भगवान वहां गये और उन रौरवनरक्रादिकों में पापी पुरुषों को देख कर दयावान् हो प्रभु चिन्तना करते हुये २४॥ २५ ॥ 'फि मैंने प्रजाओं को रचा है मेरे स्थित होने में अपने कामों के दोषों से वे एकान्त दुःख देने वाले नरक में ब्लेश पाजे हैं । हे ब्राह्मण इस प्रकार तथा और 4

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भी करुणानिधान भगवान् चिन्तना कर सहसा से तहां ह आरहीएकादशी
लिथि हो जाने भये॥ २६ ॥ २७ ॥
एतच्चान्यच विप्रेन्द्र ! विचिन्त्य करुणामयः ।
बभूव सहसा तत्र स्वयमेकादशी तिथिः ॥ २७ ॥
तदनन्तर तिन सब पापियों को सुनाते हुये तब ये सब पापरहित होकर
परमधाम को जाने हुरे। तिससे एकादशी को परमात्मा विष्णु की मूर्ति
जानिये । यह सब दुकृतियों में श्रेष्ठ और बतों में उत्तम व्रत है ॥ २६ ॥
तस्मादेकादशीं विष्णो मूर्तिविद्धि परमात्मनः ।
समस्तदुप्कृति श्रेष्ठं व्रतमुत्तमम् ॥ २६ ॥
तीनों लोको पवित्र करनेवाली पयोदशी तिथिको कर, शङ्कायुक्त पापपुरुष
होकर वि•णु की स्तुति करने को प्राप्त होता हुआ ॥३०॥
एकादशी तिथिं कृत्वापावयन्ती जगत्रयम् ।
शक्षितः पापपुरुषो विष्णुस्तोतु मुपाययौ ॥ ३० ॥
तदनन्तर पाप पुरुष भकि से हाथ जोड़ कर लक्ष्मीपति भगवान् की
स्तुति करता हुआ ॥ ३१ ॥ उसकी स्तुति को सुनकर परमेश्वर प्रसन्न होकर
उस से बोले मैं तुमसे प्रसन्न हूं. क्या तुम्हारा अभिमत है उसको कहिये ॥ ३२ ॥
तब पाप पुरुष बोला हे विणजी भगवान् ने मुझे रचा है अपनी अनुग्रह में दुःख
देने वाला मैं हूं. सो एकादशी के प्रभाव से इस समय में नाश को प्रात होरार
हूँ॥ ३३ ॥
इस संसार में मेरे मरने से सब देहधारी संसार के बन्धनों से
जावेंगे ॥ ३४॥
मृते मयि जगत्यम्मिन्सर्वे ते च शरीरिणः ।
भविष्यंति विनिर्मुक्ता भव बन्धेः शरीरिणः ॥ ३४ ॥
हे प्रभु ! सब देहयारियों में श्रेष्ठी के मुक्ति होगाने में भाप संसाररूपी
कौतुक के मन्दिर में किनके साथ क्रीया करेंगे ॥ ३५ ॥
सर्वेषु च विमुक्तषु देहि श्रेष्ठेषु पूरुषम् ।
संसार कौतुकागारे कैस्त्वं क्रीडिष्यसे प्रभो ! ॥३५॥

( ५० - हे शिवजी! यदि संसार रूपी कौतुक के मन्दिर में कीड़ा करने की आप की वांछा हो तो एकादशी तिथि के डरसे मेरी रक्षा फौजिये ॥३६॥ क्रीडितुं यदि ते वांछा जगत्कौतुकमन्दिरे। एकादशीतिथिमयात्तदा मां त्राहि केशव ॥ ३६ ॥ हजारों पुण्य मेरे मरने में समर्थ नहीं हैं. पुण्यकारी एकादशी मेरे मरने में समर्थ है इससे वर देने वाले जिये ॥ ३७॥ अन्यः पुण्यसहस्तु मां हंतुं नहि शक्यते ॥ शक्नोत्येकादशीपुण्या मां हंतुं वरदो भव ॥ ३ ॥ मनुष्य-पशु-कीड़े तथा और जंतुभा में पर्वत वृक्ष और जल के स्थानों में नदी समुद्र और धन के प्रान्तों में स्वर्ग, मनुध्यलोक, पाताललोक, देवता, गन्धर्व और पक्षियों में एकादशी तिथि के डर से भागता फिरता हूं मुझको कहीं निर्भय स्थान नहीं मिलता ! मैं करोड़ों ब्रह्माण्ड के बीच एकादशी तिथि में स्थित होने को स्थान नहीं पाता फिर वह पृथ्वी पर गिर रोने लगा उस समय भगवान ने कहा उठो, शोक मत करो एकादशी तिथि में तुम्हारे स्थान को कहताई ॥ ३ ॥ २६ ॥ ४० ॥४१॥ ४२ ॥ ४३ ॥४४॥ ४.५-॥ तीनों लोकों को पवित्र करनेवाली एकादशी के आने में अन्न में स्थित होना ! अन में आश्रित होकर स्थित हुए तुमको मेरी मूर्ति यह एकादशी तिथि नहीं मारेगी. 1. ४६: । ४७ .. इतना कह भगवान् अन्तर्धान होगये । और पाप पुरुष कृतार्थ हो फर जैसे आया था वैसा ही चलागयी। श्रीमान् विष्णु महाराज का एकादशी तिथि होना देखिये । पया अच्छी गढन्त है-प्रथम पापों को रचना फिर पापियो को देखकर दुःखी होना- तिस पर स्वयं पकादशी हो जाना-परन्तु पण्डितजी जब हम पद्मपुराणषष्ठ उत्तरचण्ड अध्याय ३८ को देखते हैं तो वहां यह लिखा मिलता है एक समय युधिष्ठिर महाराज ने कण महारोज़ से पूछा कि पुष्यकारी एकादशी तिथि किस प्रकार से उत्पन्न हुई और वह क्योंकर देवताओं की प्यारी हुई यह सुन कर श्रीकृष्ण महाराज ने कहा कि सत्युग में सुर कामी दैत्य ने इन्द्रं आदि सब देवताओं को जीत स्वर्ग से निकाल दिया उन्हों ने घूमते हुए महादेव के पास जाय सब वृत्तान्त कहा उन के कहने से सब क्षीरसागर में गरे और प्रार्थना की ! " . ता विष्णु जो बोले कि हे पद वह देर कैज्ञा है कैसा रूप बल है और उसका स्थान कहाँ है! वीर्य और पराक्रम क्या है। कुछ उसको घर भी मिला है यह सद हम से कहो। तंव इन्द्र.ने सब वृतान्त कंहा जिल को सुनकर चन्द्रावती नगरी का उस राक्षस को मारने के लिये गये उस ने पहिले देवताओं को जीता वह सय दिशाओं को भाग गये। - फिर भगवान् ने वाणों को छोड़ा और चक से लाखों शिर काट लिये फिर बह राक्षस भगवान् ले वाहु युद्ध देवताओं के हजार वर्ष तक करता रहा तब भंगवान् को बड़ी चिन्ता हुई देवता सब नष्ट हो गरे आप हार कर घफ्रिकाश्रम को चलेगये ॥२०॥ विष्णु श्चिंता प्रयन्तञ्च नष्टाः सर्वाश्य देवताः । विणुश्च-निर्जितस्तेन गतो बदरिकाश्रमम् ॥ ८० ॥ वहां सिंहवती नाम बारह योजन की गुफा में जाकर सोरे पीछे दानव भी घुस कहने लगा कि मैं निस्संदेह मारूंगा तव तो विष्णु की देह से पक रूप- वती कन्या अस्त्र शस्त्र सहित उत्पन्न हुई ॥ . निर्गता कन्यका तत्र विष्णु देहायु धिष्ठिर : . .. :: रूपवती सुसौभाग्य दिव्यप्रहरणायुधा ॥ ५ ॥ और उसको मुरनाम दैत्य ने देखा और युद्ध होने लगा और उस की हुँकार से कह भस्म हो गया जब वह दैत्य. मर गया.. तवः विष्ण भी. जग उठे 1.4-1... हुंकारैर्भस्मसाज्जातो मुरनामा महासुरः । निहते दानवे तस्मिंस्तत्रदेवस्त्वबुध्यतः ॥ ८८ ॥ और कहने लगे इसको किसने मारा सब कन्या ने कहा कि इसने देवता गन्धर्व इत्यादि को स्वर्ग से.निकाल दिया था और आप सोते थे मैंने सोचा कि यह तीनो लोकों को नाश कर देगा। यह सुन विष्णुजी बोले कि जिस ने हम को जीत लिया उस को तुमने कैसे. जीत लिया तथा कल्या.रूपी एकादशी बोली कि मैंने तुम्हारे प्रसाद से इसको मारडाला ॥ ९३ ॥ .

~ त्वत्प्रसादाच्च भोस्वामिन्महादैत्यो गया हतः ॥१३॥ तब भगवान ने कहा कि तुमने तीनों लोकों में मुनि देवताओं को . आनन्द दिया इस लिये जो कुछ मांगो मैं निस्सन्देह दूंगा जो देवताओं को दुलंभ हो । सब एकादशी बोली कि मुझको तीन वरदान दीजिये । वि.शु ने कहा यहुत अच्छा । तथ एकादशी ने कहा कि तीनों लोकों और चारों युगों में सब तीर्थों से प्रधान सब विप्लों के नाश करने वाली सिद्ध देनेवाली देवी हो जाऊं ॥६६॥ जो मनुष्य आप की भक्ति से हमारा व्रत करे वह आप की कृपा से सय सिद्धि को प्राप्त हो और जो व्रत करने वाले रात्रि में एक बार भोजन करें उनको हे माधवजी ! द्रव्य, धर्म, मोक्ष कीजिये तय विष्णु ने कहा कि तुम जो कहती हो वह सब होगा। हे भन्द्रे तुम सब मनोरथों को देने वाली होगी। यत्वं वदसि कल्याणि तत्सर्वच भविष्यति । सन्मिनोरथान्भेदे दास्यसित्वं च नान्यथा ॥ १०२॥ तुमको मैं शक्ति मानता है निस्संदेह तुम्हारे प्रत में स्थित जो हमारी पूजा करेंगे वे मोक्ष को प्राप्त होंगे। तीज, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी इन सब में विशेष कर एकादशी अत्यंत प्रिया है इस से सय तीर्थों से पुण्य सत्य होगा यह तीन वाणी से वर दिया तब तो एकादशी पड़ी इ-पुष्ट हो गई ॥ १६० ॥ फिर भगवान ने कहा कि तुम शत्रु को मारोगी सय विघ्नों को नाश करोगी सिद्धि और धरको देवोगी जो एकादशी में उपवास करते हैं उनको निस्संदेह वैष्णव भगवान् के स्थान की प्राप्ति होती है। पंडितजी-इन दोनों यातों में कौन सी बात सथी है परन्तु सनातन. धर्म के मन्तव्य के अनुसार पुराणों को ज्यास महाराज ने बनाया है। पदा व्यासजी की ऐसी ही बुद्धि थी। नहीं! नहीं!! नहीं नहीं !!! वह यड़े शामी महात्मा थे इसी लिरे तो हम कहते हैं कि यह पुराण महर्षिकृति नहीं हैं अब हम आर को २४ एकादशियों के माहात्म्य संक्षेप के साथ पमपुराण से सुनाते हैं। मोचदा एकादशी। अध्याय ३६ में इन मोस नाम एकादशी के विषय में लिखा है वह संव पापों को हरनी है और जिसके पुरुषे नरक में हों वह मोक्ष को पाते हैं जैसा कि- अधिक सत्य J - . : अधोयोनि मतांश्च व पितरो यस्यपापतः। अस्पाश्च पुण्यदानेन मोच पांतिन संशयः ॥. चम्पक नगा में वैखानस नाम राजा था जो पुत्रों के समान प्रजा का पालन करता था एक दिन रात्रि में राजा ने स्वप्न देखा कि उसके पितर नर्फ में. पड़े हैं जैसा कि- स्वकीय पितरो दृष्ट्वा अधोयोनि गतानृपः ॥ राजा देख कर बड़े विस्मय हुरे और स्वन का सब वृतांत ब्राह्मणों से कहा उन्होंने कहा यहां से थोड़ी दूर पर्वत मुनि रहते हैं उनके पास जाकर पूछिये, राजा गया उस ने. उपरोक्त हाल कहा और उनके मोक्ष का हाल पूंछा। मुनि ने कहा कि तुम अगहन की मोक्षानाम की एकादशी के व्रत को कर उस का फल उनको दीजिये जिससे . उनका मोक्ष हो जायगा । राजा ने अपने राज्य में आकर व्रत किया. उस का फल पितरों को. दे. दिया जिससे पितर नरक से छूट मोक्ष को प्राप्त हुये और उन्होंने. आकाश से कहा कि पुत्र तुम्हारा कल्याण हो। राजानं चान्तरिक्षेसगिरं पुण्यामुवाचह । रचस्ति स्वस्तीतिते पुत्र प्रोच्य चैवं दिवंगतः ॥ इस से बढ़ कर मोक्ष देने वाली कोई एकादशी नहीं है इसके पुण्य की गिन्ती नहीं चिंतामणि के.समान मोक्ष देने वाली है। नातः परतराकोचिस्मोक्षदैकादशी भवेत् । पुण्यसंख्यां न जानामि राजन्मे प्रियकृद्वतम् ॥ ४६॥ नोट-अब यहां यह विचारना चाहिये कि यदि यह पनं पुराण महात्मा कृष्ण के समय में होता कृष्ण भगवद्गीता में यह ने लिब किं अवश्यमेव भो. तव्यं कृतं कर्म शुभाऽशुभम् परन्तु पद्मपुराणी यह लिखते हैं कि इस एकादशी के करने से न केवल अपने ही पाप दूर होते हैं किन्तु पितृगणों तक को भी नरक से स्वर्ग में पहुँचा देती है। कहि रे पण्डितजी अब क्या और चाहिये लीजिये एकादशी का व्रत पितृ- •गणों को नरक से स्वर्ग में भी पहुँचा देता है अर्थात् पुत्रादि के कर्म जन्मों को ।

-- भी लाभ पहुँचाते हैं । इसके उपरांत जब उपरोक्त एकादशी वृत से पितृ स्वर्ग को चले जाते हैं फिर गया श्राद्धादि की क्या आवश्यकता रही । सब मिक पितरों के स्वर्गवास के लिये इसी व्रत की ओर सनातनी भाइयों को ध्यान करना चोहिमें इसमें धन भी न्यून व्यय होगा समय कम खर्च तिस पर गया आदि के आने जाने की हैंगनी, मार्ग की थकाघट की बचत, फिर पर्यो' उधर ध्यान दिया जाता है-पण्डित पुराणों की अपार लीला है। ........... सफला। जिस प्रकार सपो में शेष जी, पक्षियों में ग्ररुड, देवताओं में विणु, दो पांव वालों में ब्राह्मणं, ऐसेही प्रती में यह एकादशी शेष्ठ हैं। यह पौष कृष्ण पक्ष में सफा नाम से होती है। - इससे लोक मैं धनवान होते हैं मरने पर मोक्ष होती है । महिष्पति नाम राजाकी चपावती नगरीसे पांच पुत्र थे उनमें से बड़ा पुत्र सदैव बड़े २ पापों को करता था दूसरों की स्त्रियों को भोगता और मदिरा पीता था। पिता के द्रव्य को पाप कर्मों में खर्च करता था ब्राह्मणों की निंदा में लगा रहता था राजा ने उसके भाइयों से सम्मतिं कर उस पापी को अपना राज्य से निकाल दिया । वह धन में जीवों को मार कर अपना निर्वाह करता और पुराने पीपल के वृक्ष के नीचे रहने लगा। पौष को कृष्णपक्षको वशर्मा में वृक्षों के फल खाकर वन विहीन वहीं सो गया जाड़े के मारे प्राणहीन सा हो गया और संफला एकादशी के दोपहर दिन चढ़े चेता और पांवों में पीड़ा के कारण चल भी न सकी भूज से अत्यंतपीड़ित हुआ जीवों के मारने की शक्ति भी न रही फल तोड़कर आश्रम को लौट गया इतने में सूर्य अस्त होगये फलों को वृक्ष की जड़ में धर कर हे तात क्या होगा ऐसा कहकर रोने लगा और यह कहाकि इन फलों से लक्ष्मी के पति भगवान प्रसन्न हो ऐसा कह नींद आगई । भगवान ने उस दुरात्मा का रात्री में जागरण और फलों से उसका सफला एकादशी का पूजन माना। ऐसा करने के फल में उसको अंकंटक राज्य मिला। अकस्मात्तमेवैतत्कृतवान्वै सलुपकः । तेन पुण्यप्रभावेन प्राप्तं राज्य निरन्तरम् ॥ "फिर आकाश वाणी हुई कि तुम राज्य को भोगी फिर सुन्दर रूप हो गया उसको बुद्धि अंछ वैष्णवी हो गई और १० वर्ष तया रात्य किया फिर शण के प्रताप से पुत्र आदि हुरे उनके सुख को भोग मर फर कृष्ण के समीप पहुँचा अर्थात् जो साला एकादशी का पूजन करता है यह इस लोक सुख यो भोग पर मर गार नोक्ष को पाता है ॥ एयः कुरुते राजन् सफला व्रतमुत्तमम् । इह लोके सुरवं प्राप्पय मृता मोक्षमवाप्नुयात् ॥ नोट-वर्तमान समय में जो बड़ी श्रद्धा से सफला मा करले हैं वह दरिद्र रहते हैं और अक्षा से प्रत करने वाले राज्य पाते हैं । यह भी घि. महाराज के न्याय पर नमूना है। पुत्रदा। पौष शुशा एकादशी का नाम पुत्रदा है जो तीनों लोक में सबसे अंध है। भद्रावतीपुरी में मुत नाम राजा जिनकी रानी का नाम चंपका था, पुत्र न होने से दोनो होश में रहते थे, एक दिन राजा घोड़े पर सवार होकर सघन धन यो गया जहां तालाब के किनारे मुनि लोग वेद जपकर रहे थे वहां पहुँचा और. १४. बत कर उनने का नि: आप लोग यहां किस लिये एकत्रित ई मुनियों ने यहा क्षिसाज से पांचवें दिन माय का स्नान होगा इसके स्नान के लिए या एकत्रित हुरे हैं। राजन् ! आज पुत्रदा नाम एकादा है इस में प्रत करने वालों को भगवान पुन देश है। पा. अश्याय ॥४॥ अद्य चैकादशी राजन् पुत्रदानामनागतः । पुत्रं ददात्यलो विष्णुः पुत्रदा कारिणं नृणाम् ॥ ४५ ॥ इस प्रकार के वचन सुन एकादशी षदा का मत विधान से किया और द्वादशी परायण कर मुनियों के बारश्चार नमस्कार. घर घर आये रानी ने. गर्भ धारण किया नवे मास तेजस्वी पुन हुआ जो कुछ साल के पीछे राजा हो प्रजा की रक्षा करने लगा है राजा एकान्तचित्त होकर जो घस करते है लोक में पुत्रवान् होो है और परलोक में मुख प्राप्त पाये है इसके सुनने से पढ़ने से अनिष्टोम का फल होता है॥१३॥ एकचितास्तु ये मर्माः कुर्वन्ति पुत्रदातम् पुत्रान्प्राप्येह लोकेतु मृतासो स्वर्गगामिनः ॥ *

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( ५६ )
पठनाच्छूषणाद्राजन्नग्निष्टोमफलं लभेद
दोर-श्रीमान् पण्डितजी राजा दशरथजी ने भी प्रीि
सम्मति से यज्ञ कर पुत्र लाभ किया था। यहां एकादती दान देने कुन
की प्राप्ति होगई । कहिए यया राजा दशरथजी के समर नजिरूसे
उनको अन्य उपाय करना पड़ा। वर्तमान समय में एकादशा व्रत के रखने वाले
फ्या पुत्र विहीन नहीं हैं यदि हैं तो षया कारण है ?
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षतिला।
एक समय दालभ्य ऋषि पुलस्त्य मुनि के पास गये और कहा महाराज
मनुप्य ब्रह्महत्यादि अनेक पापों से युक्त हैं। पराया त्र्य चुराते हैं । व्यसन में
मोहित होते हैं। वह नरक से क्यों कर बिना परिश्रम किए थोड़े दान से किस
प्रकार से व सो आए कहिये । पुलस्त्य ने कहा कि माघ के कृष्ण पक्ष में
पतिला नाम एकादशी का व्रत करे । भगवान् का पूजन कृष्ण का नाम कीर्तन,
जागरण, परमात्मा से प्रार्थना, जितेन्द्रिय रह, काम, क्रोध, ईर्षा को छोड़ अर्य
दे । ब्राह्मण को छतुरी दे । जूता, कपड़े, श्यामा गाय, काले तिल के पात्र का
दान करें क्योंकि जितनी संख्या तिल है वह उतने हजार वर्ष वर्ग में बसता है
तिलले स्नान, उयटना, होम, मल, तिल, भोजन यह छः तिल भोजन पाप के
नाशने वाले हैं ॥ २०, २१, २२॥ पद्म अध्याय ४२ ॥
तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ।
तिलस्नाभी तिलोही तिलहोमी तिलोदकी ।
तिलदाता न भोका च षट्तिला पापनाशना ॥ २२ ॥
पहिले मनुष्य लोकमें एक ब्राह्मणी हुई जो व्रतचा और देव पूजा में रत
रह कर सदा हमारी पूजा कर व्रतों से शरीर को केशित करती रहती थी परन्तु
मिक्षुक को भिक्षा और ब्राह्मणों को तृप्त नहीं करती या तब मैं कपाल रूप धारण
कर मिक्षा का पात्र ले मनुष्य लोक में जा उससे भिक्षा मांगी तब उसने बड़
क्रोध कर मिट्टी का पिण्ड तांये के वर्तन में जोर दिया तब भगवान् उसको लेकर
स्वर्ग को गये ॥३२॥
तया कोपेन महता मृत्पिण्डस्तानभाजने ।
चिसोयावदहं ब्रह्मन् ! पुनः स्वर्गगतोद्विजा ॥ ३२ ॥

५७ ) कुछ कालके पीछे वह स्त्री देहको त्याग स्वर्गको गई जहां मिट्टी के पिण्ड देने के कारण सुन्दर घर मिला परन्तु उसमें अन्नादि कुछ भी न था तव वह भगवान के पास गई और कहा मैंने बहुत व्रत उपवास किया, है परन्तु मेरे घर में कुछ दिखलाई नहीं देता, उन्होंने कहा तुम विस्मय मतकरो देवों के खियां तुम्हारे देखने को आवेगी उन्हीं के उपदेश से उसने पतिला का व्रत किया कि जिससे उसके घर में धन, धान्य सोना चांदी भी भरगया। क्षणमात्र में रूप और कांति को प्राप्त हुई इसलिये जो मनुष्य जन्म २ आरोग्य रहना चाहे और दरिद्र का नाश करना चाहे वह षट्तिला की विधि पूर्वक कर सुपात्र को दान देता रहे तो सब पाप नाश होजाते हैं। लभते चैवमाराग्यं नरो जन्मनि जन्मनि । न दारिद्रयं न कष्टत्वं न च दौर्भाग्यमेव च ॥ ५० ॥ सम्भवेद्व द्विजश्रेष्ठ षट्तिला समुपोषणात् । अनेन विधिना भूप तिलदाता न संशयः ॥ ५१ ॥ मुच्यते पातकैः सर्वैरनायासेन मानवः । दानं च विधिवत्याने सर्वपातकनाशनम् ॥ ५ ॥ नोट-तिलोंके दानसे एक हजार वर्ष स्वर्ग मिलता है क्या इससे भी सहज कोई और उपाय स्वर्गकी प्राप्तिका होसकता है फिर मैं पूछता है कि प्रतादिले शरीर सुखाना अथवा कष्ट उठाना और विष्णुकी पूजा करनेसे क्या प्रयोजन है हां इस कथासे सुपात्रको दान देनेकी आशा मिलती है अफ़सोस है कि हमारे सनातनी भाई इस पर दृष्टि डालकर दान नहीं करते । जया। एक समयमें स्वर्ग इन्द्र राज करते थे-जहां कल्पवृक्षयुक्त नन्दनवनमें देवता लोग सुखपूर्वक रहते थे एकवार इन्द्र इच्छापूर्वक आनन्द से पचास करोड़ स्त्रियों समेत नाचने लगे और गन्धवों की लियां गाने लगी चित्रसेन की मालिनी स्त्री की कन्या पुष्पदन्ती और पुष्पदन्त का पुत्र माल्यवान (जो पुष्पदन्ती के रूप से अत्यन्त मोहित था)भी वहां उपस्थित था इस से. वह शुद्ध गान न कर सकी तव इन्द्र अपना अपमान समझ क्रोधित हो दोनों को शाप दे बोले कि हे पतित मूर्ख तुम दोनों को धिकार है हमारी आशा को तुमने भङ्ग को इससे दम्पती भाव धारण कर पिशाच हो:मनुप्य लोक में कर्मके फल भोग करो । पद्म अ०४। युवां पिशाचौ भवतां दस्पती भावधारिणौ । सर्त्यलोकमनुप्राप्ती भुञ्जनौ कर्मणः फलम् ॥ २६ ॥. इन्द्र के शाप से वह दोनों पिशाच हो हिमपान् पर्वत पर प्राप्त हुये और मारे जाड़े के व्याकुल पिशाच ने पिशाचनी से कहा कि क्या रोम हर्पन हमने अधिक पाप किया जिसले अपने ही दुष्कर्म से पिशाचता प्राप्त हुई जो घोर नरक से भी अधिक दुःख देने वाली है इस लिये सब प्रकार से पाप न करने चाहिये । इसी चिंता में दोनों दुखित हो रहे थे इतने में माध की जया एकादशी प्राप्त हुई तो उस दिन आहार, जल पान न किया. न किसी जीव को मारा, न फल खाये, केवल पीपल के वृक्ष के समीप दुःखयुक्त स्थिर रहे । सूर्यनारायण अस्त हो गये इसी दुःख में रांत व्यतीत हुई। द्वादशी के सूर्य उदय हुये । इसी व्रत के प्रभाव से दोनों पूर्व के समान रूपयुक्त हो विमान पर चढ़ स्वर्ग को जा इन्द्र के आगे प्रणाम किया!, तव इन्द्र विस्मय हो बोले कि मेरे शाप,को किसने छुड़ाया तव माल्यवान् ने कहा कि भगवान के प्रसाद.जया एकादशी व्रत और 'हे स्वामिन ! आप की भफि ले पिशाचपन गया ॥४८॥ इन्द्र यह सुन कर बोले कि तुम दोनों भगवान की भक्ति एकादशी के करने वाले हो-इस लिये हमको भी पूण्य हो तुम निस्संदेह पुप्पदन्ती के संग विहार कणे । तब कृष्ण ने कहा कि जिसने जया का प्रत किया उसने सब दान, यज्ञ किये ॥५३॥ सर्वदानानि तेनैव सर्वयज्ञा अशेषतः । दत्तानिकारताश्च व जयायास्तु व्रतंकृतम् ॥ : यह मनुष्य करोड़ कल्प तक वैकुण्टमें निश्चय आनन्द करता है । है राजन् ! पढ्ने, सुनने से अग्निष्टोम का फल पाता है ॥ ५४॥ कल्पकोटिर्भवेत्तावद्वैकुण्ठे मोदते ध्रुवम् ॥ ५४ ॥ नोट-पण्डित सी इस कथा में वहिन पर भाई का आसक्त होना लिख है । तिस पर भी भगवान् ने विमान पर चढ़ा स्वर्ग में पहुँचा दिया और इन्द्र -महाराज ने स्वयं -आज्ञा दे दी कि तुम अपनी वहिन के साथ विहार करो क्यों .. :

न हो जच इन्द्र महाराज स्वयं ही ५० करोड नियों के साथ नात्र पर धे प्यारे पण्डित जी आप एवयं तो विचार करें। क्या हमारे प्राचीन पुरुष और देवता ऐसे ही थे जो उपरोक्त कर्म करने वालों को स्वर्ग में रहने की स्पष्ट आज्ञा देदी। फिर भला पापों की वृद्धि भयो न हो। .. विजया। पूर्व समय में जब रामचन्द्र १४ वर्ष के लिये वन में गये और पञ्चवटीपर सीता ने लक्ष्मण समेत निवास किया जहां से यशस्विनी सीता को रावण हर लेगया। जिस के दुःख से रामचन्द्रजी मोह को प्राप्त हो सीता को ढूंढ़ते हुये मरे जटायू के पास आये और कयन्ध को मार सुग्रीव के साथ मित्रता कर हनू- मान द्वारा सीता की खबर पा लङ्का पर चढ़ाई की तब रामजी ने लक्ष्मण से कहा कि है लक्ष्मण किस पुण्य से इस समुद्रसे पार हो क्योंकि यह सदैव अगाध और जल के जन्तुओं से भरा है कोई उपाय नहीं दीखता जिसले इसको पार हो जावें। अ०४४ ॥ उपायं नैव पश्यामि येनासौ सुतरो भवेत् ॥ १२ ॥ तब लक्ष्मणने कहा कि आप आदिदेव हैं यहां से दो कोस पर बकदालभ्य मुनि और बहुत से ब्राह्मण रहते हैं उनसे चल कर कोई उपाय पूछिये यह सुन रामजी वहां पहुँच मुनि को मस्तक से प्रणाम कर बोले कि हे मुनिजी आपकी कृपासे जिस प्रकार हम समुद्र उतर जाचे उस उपाय को प्रसन्न होकर इसी. समय कहिये। यह सुन मनि ने कहा कि आप व्रती में उत्तम व्रत विजया एकादशी का व्रत करो जो फागुण कुष्ण पक्ष में होती है जिस से तुम्हारी जीत होगी और समुद्र पार हो जाओगे। तस्या व्रतेन हेराम ! विजयस्ते भविष्यति । निःसंशयं समुद्रं त्वं तरिष्यतिसवानराः ॥ २५ ॥ दशमी के दिन एक घड़ा सोने, चांदी, तांबे या मिट्टी का स्थापन करे और उसमें जल पत्ते छोड़ देवे । सप्तधान्य नीचे यवों को ऊपर रक्खे तिसके ऊपर सोने के प्रभु नारायण को स्थापन करे एकादशी के दिन सवेरे स्नान करे फिर !

( ६० ) कलश को रख कण्ठ में माला पहिराये सुपारी, नारियल, चन्दन, धूप, दीप अनेक प्रकार की नैवेद्य लगाने । फलश के आगे अच्छी २ फयाओं से दिन रात्रि व्यतीत करे दीपक जला के द्वादशी के दिन सोने की भगवान की मूर्ति को वेद के पारगामी ब्राह्मण को दे देवे । हे राम इस व्रत को अत्न पूर्वक करो तुम्हारी जय होगी श्रीराम ने नुन र वैसा ही किया जिससे उनकी जीत हुई अर्थात् लका को जीता. पण को ना, सीता को पाया। इस प्रकार है पुत्र जो व्रत करते हैं उन की रम लोक में जीत होती है मरने पर स्वर्ग मिलता है इस लिये इस विजया का प्रत करना चाहिये जिस से सर पाप नाश होते हैं और पढ़ने सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल होता है। विजयायाश्चमाहात्म्यं सर्वकिल्विषनाशनम् । पठनांच्छ्रवणांच्चैव वाजपेयफलं लभेत् ॥ ३७॥ नोट-प्यारे भाइयो क्या अब भी इसमें कुछ संदेह रहा कि श्रीरामचंद्रजी ईश्वर थे? १-दुःख मोह का होना, सीता का दूँदना पया यही सर्वज्ञता के लक्षण हैं ? २-जिनको यह भी ज्ञात नहीं कि किस पुष्य से समुद्र पार हो, और क्या उपाय करें। ३-भला जो अपने आप तरने के लिये तो साधारण मुनि से उपाय पूंछे तव दूसरों को क्या तार सकते हैं, दशरथी राम के जपने वाले अब भी इस श्लोक पर दृष्टि डाल अपने आप को सम्हाली और वैदिक शरण में आओ। ४-~-रामचन्द्र उपास्य थे, वा उपासक यदि उपास्य थे, तव तो यह कथा झूठी और यदि ये उपासक थे, तो उनकी उपासना करना वृथा है। आमला। पूर्व समय में जब कि सच जीव नष्ट हो गये और एक जल ही जल हो गया और परमात्मा सनातन पुरुष अपने नाश रहित. श्रेष्ठ ब्रह्मपदं को प्राप्त हो जगे । ब्रह्म के मुख ले चन्द्रमा के समान दीप्त चाला थूकने से विन्दु उत्पन्न हुआ वह पृथ्वी पर गिर पड़ा । तो उस विन्दु से भारी आंवले का वृक्ष उत्पन्न हुआ, उसकी शाखा प्रशास्त्रा बहुत फैली और वह फल के भार से नव गया। अध्याय ४९॥ तस्मादिदोः समुत्पन्नः स्वयं धात्री नगोमहान् । .

शाखाप्रशाखाबहुलः फलभारेण नामितः ॥ ११ ॥ उसके पीछे और देवताओं को रचा जिन्होंने आंवले के वृक्ष को नहीं जाना तय आकाश वाणी हुई कि यह आंवले का पेड़ है इसके स्मरण से गौदान, छूने से दूना, खाने से तिगुना फल होता है यही वैष्णधी पाप नाशने वाली है जड़ में विष्णु, ऊपर ब्रह्मा, स्कंद में परमेश्वर, महादेव शाखाओं में, लब मुनि, प्रशाखाओं में देवता, पुष्पों में पवन, फूलों में प्रजापति, स्थित हैं मैंने सर्व देव- मयी इस आमले को कहा है इस लिये विष्णु की भक्ति में परायणों को यह पूजने योग्य है। सर्वपापहरा प्रोता वैष्णवीपापनाशिनी । तस्या मूलेस्थितो विष्णुस्तदूर्वे च पितामहः ॥ १८ ॥ स्कंधे च भगवान रुद्रः संस्थितःपरमेश्वरः । शाखा सुमुनयः सर्वे प्रशाखासु च देवताः ॥ १९ ॥ एएँघुपासते देवाः पुष्पेषु मरुतस्तथा । प्रजानां पतयः सर्वे फलेष्वेष व्यवस्थिताः ॥ सर्वदेवमयी ह्योषा धात्री च कथिता मया । तस्मात्पूज्यतमाह्यषा विष्णुभक्तिपरायणैः ॥ २१ ॥ तब देवता वोले आप कौन हैं तव वाणी ने कहा जो सब प्राणियों के भुवनों का कर्ता है वही मैं विस्मित विद्वानों को देख सनातन विष्णु को प्राप्त हुआ हूं ॥ २३॥ यः कर्त्ता सर्वभताना भुवनानां च सर्वशः । विस्मतान् विदुषः प्रेक्ष्यसोहंविष्णुःसनातनः ॥ २३ ॥ तब सब उनकी स्तुति करने लगे। तव भगवान ने कहा कि क्या चाहिये तब देवताओं ने कहा कि थोड़े परिश्रम से बहुत फल देने वाले व्रतों में उत्तम व्रत कहिये । जिस ले विष्णुलोक भी प्राप्त हो । तब भगवान् ने फागुन की शुक्ल पक्ष आमला एकादशी का व्रत बतलाया और कहा कि एकादशी के दिन प्रथम उठ दातौन कर पतित लोगों के दर्शन न करें। फिर तीसरे पहर को नदी तालाब में स्नान करें। फिर,माशे या आधेमाशे की परशुराम की सोने की . ( ६२ ) मूर्ति बनावे फिर घर आकर पूजो करे । फिर सामग्री समेत आमले के वृक्ष के नीचे जाने फिर वहां जाकर चारों ओर मन्त्र पूर्वक शुद्ध कलंश को स्थापन करे । पंचरत्न छोड़े। छतुरी, खड़ाऊं रख सफेद चन्दन से पूजा करे । फिर कलश में माला डाल धूप दीप देवे और उसके ऊपर राख लाई से भर परशुराम की मूर्ति को स्थापन करे फिर भक्ति से रात्रि में जागरण कर धर्म के आख्यान स्रोत नाच गीत में बितावे फिर आंवले की विष्णु के १०८ या २८ नामों से प्रदक्षिणा करे फिर ब्राह्मण की पूजा कर परशुराम की छतुरी, खड़ाऊं सब प्रामणों को दे देवे फिर भगवान से प्रार्थना करें कि आप हमारे ऊपर प्रसन्न हों और आंवले की प्रदक्षिणा कर विधि.से स्नान कर. ब्राह्मणों को भोजन करा कुटुम्ब.सहित आप भी खावे इस प्रकार करने से जो पुण्य होता हैं वह. सर्व मैं तुमसे कहता ९ संघ तीर्थसंव दानों में जो फल है सब यशों से अधिक फल होता है यह प्रतों में उत्तम व्रत. तुम से कहीं इतना कह भगवान अन्तर्धान,हो गये और ऋषियों ने सम्पूर्ण व्रत किया। सर्वयज्ञाधिकं चैव लभते नात्र संशयः । एतद्वः सर्वमाख्यातं ब्रतानामुत्तमं वृतम् ॥ ६१ ॥ एतावदुकत्वादेवेशस्तत्रैवांतरधीयत । तेचापि ऋषियः सर्वे चक्रुः सर्वमशेषतः ॥ -६२ ॥ तथात्वमपि राजेन्द्र कर्तुं मर्हसि सत्तम । व्रतमेतद्दुराधर्ष. सर्वपापप्रमोचनम् ॥.६३ . ॥ १२१ अ० में आमले का माहात्म्य है जो कोई आमले से भूषित मस्तक हाथ मुंह देह में आमलों को धारण करता और उन्हीं को जाता है वह नारायण होता है।" धात्रीफलताहारी-नरो नारायणो भवेत् ॥ १२ ॥१२॥ जो.वैष्णव आंचलों को धारण करता है वह देवताओं का प्रिय होता है तुलंसी आंवले को विशेष करन. त्यागे- जब तक कण्ट में माला स्थित रहेगी तब तक भगवान् उसके पास रहते हैं आमला, द्वारिका की मिट्टी, तुलसी जिस के घर में रहनी है उसका जीवन सफल है जिंतने दिन मनुष्य कलियुग में आंधले की माला धारण करता है उतने ही हजार वर्ष वैकुण्ठ में निवास होता है जो - आंवले, तुलसी की दो मालाओं को धारण करता है वह करोड़ कल्प स्वर्ग में- वास करता है। नोट-भूगर्भ पदार्थ विद्या के शातो इस कहानी पर विशेष ध्यान दें कि विष्णु के थूक से आमले का वृक्ष उत्पन्न हुआ शोक कि ऐसी गढ़ना और व्यास जी निर्माता ? ज्ञात होता है कि पुस्तक निर्माता ने दर्शन शास्त्री का स्वप्न में भी दर्शन नहीं किया था यदि विष्णु के थूक से आमले का वृक्षं उत्पन्न हुआ तो उस वृक्ष में भी विष्णु केसे ही गुण होने चाहियं पयोकि "कारणगुण- पूर्वकः कार्यगुणोदयः' अर्थात् जो कारण में गुण होते हैं वही कार्य में भी आते हैं। कविता भी हो तो ऐसी कि आंवले के वृक्ष को साक्षात् . विष्णु ही बना दिया (इस जगह पर उन उपमा देने वालों को भी शिर झुकाना पड़ा कि जिन्होंने कमर को वाल से भी पतली लिखा है)। प्रायः देखते हैं कि प्रीष्मऋतु में प्रत्येक जातिके प्रत्येक जन आंवलेका येनकेन प्रकारेण लेवन करते हैं तय तो न मालूम कितने नारायण बनगये होंगे और यदि यह नारायण वनगये तो हमारे रानातनधर्मी भाइयों के सब ही पूज्य होंगे आंवले का फल क्या है मानों नारायण बनानेकी गोली है। सनातनधर्मी भाइयो ! फिर ऐसे अवसर को क्यों खोते हो एक २ फल खाकर साक्षात् नारायण बनजाओ। २-क्या सनातनधर्मी भगवान् एकदेशी हैं तब तो यदि सौ दो सौ आदमी माला ही माला धारण करलें सव भगवान् किस २ के पास रहेंगे । यदि-तुलसी और आंचलेकी मालासे करोड़ कल्प तक स्वर्ग मिलता तो पूर्व ऋपि, मुनि और महात्मा तपस्याकर नाना प्रकार के कष्ट क्यो उठाने ? सच तो यह है कि इन्हीं असम्भव और आसान नुस्कोने सनातनधर्मी द्विजातियों को सन्ध्या, अग्निहोत्रा- दिसे छुड़ा शद्रत्वको प्राप्त करा दिया शोक फिर भी विचार नहीं करते । . पापमोचनी। लोमशने मानधातासे कहा कि चैतके कृष्ण पक्ष में पिशाच नाशने वाली पाप मोचनी एकादशी कहलाती है ॥ पद्म अ०४६- ४॥ सुनो, पूर्व समय में चैत्ररथ बनमें वसन्त समय में गान्धर्वोकी कन्या किन्नरों के साथ रमण कर थी इन्द्रादि देवता भी कीड़ामें लग रहे थे वहीं मेघानाम ब्रह्मचारी ऋषि थे उनके मोहने के लिये युक्तियां कर रही थी उनमें से मंजुघोषा. नाम उनके स्थान के पास मीठे स्वरों से गाती और काम के वाणों को चलाने लगी और मेधावी मुनिको देख काम के वशीभूत होगई और एनि मा उसपर मोहित होगये तव:मंजुघोपी चीणाको नीचे धर मुनिको लिपट गई । मुनीश्वरने वृक्ष ललता की नाई लिपटा जान कर रति-फिया उसके उत्तम रूप को देखकर शिवताव चला गयो कामतत्व के वश में प्राप्त हो गये। उन कामीने रगण भरने हुए रात्रि दिन भी नहीं जाना इस प्रकार मुनिका आचार तो लो हो गया और बहुत समय व्यतीत होगया। न निशा न दिन सोपि रमन् जानाति कानुकः । बहुवर्षगतः कालो मुनेराचारलोपतः ॥ २३ ॥ मंजुघोपामुनि से चोली कि मैं देवलोकको जाना Eाहती हूं मुनिने कहा कि इस समय प्रदोष समय में जाना चाहती 'हो प्रातःकालकी संध्या तक हमारे समीप रहो मारे डरके ५५ वर्ष ६ महीने ३ दिन मुनिके साथ रमण कर कहने लगी कि मैं अपने घरको जाऊंगी ! मेधाची बोले इस समय प्रभाती है जब तक हम संध्या करें तव तक यहीं स्थित रहो तब वह मुस्कराकर कहने लगी कि आप बीते हुये समय को तो विचार कीजिये तवतो मुनि ५७ वर्ष उसके साथ रमण करते हुये विचार क्रोध कर तपस्याकी नाश होते हुये देख उससे बोले कि तू पिशाची हो इस प्रकार उस को शाप दिया कि हे पापे हे दुराचारे तुझको धिक्कार है.॥३३॥ समाश्च सप्तपंचाशदंगतास्य तया सह । कालरूपां तु तां दृष्ट्वा तापसः क्षयकारिणीम् ॥३४॥ स कंपोष्ठों मुनिस्तत्र प्रत्युवाचाकुलेन्द्रियः ॥ ३५ ॥ तां शशापथ मेधावी त्वं पिशाची भवेति च । धिक् त्वां पापे दुराचारे कुलटे पातकप्रिये ॥ २६ ॥ मुनि के शाप से जलती हुई नम्रता से उनकी प्रसन्नता के लिये शाप के अनुग्रह के लिये कहने लगी कि 'सजनों का संग वचनों से होता है आपके साथ मुझे बहुत वर्ष बीत गये इस कारण आप मुझ से प्रसन्न हूजिये तब मुनि बोले कि,हे भद्रे शाप के अनुग्रह 'करने वाला वचन सुनिये मैं क्या करूं हे पापे तूने मेरा तप नाश कर दिया । ३८ ॥

-- शृणु मे वचनं भद्रे शापानुग्रहकारकम् । किं करोमि त्वया पापे क्षयं नीतं महत्तपः ।। ३६ ॥ चैत्रस्य कृष्णापक्षे तु भवेदेकादशी शुभा। पापमोचनिकानाम सर्वपापक्षयंकरी ॥४०॥ चैत के कृष्ण पक्ष में पापमोचन नाम एकादशी होती है वह सय पापों को नाशती है। उसके व्रत करने से पिशाचत्व जाता रहता है। ऐसा कह मेधावी पिता के आश्रम को चले गये। पिता च्यवन पुत्र को देख कर बोले पुत्र तूने पुण्य तो सब नाश कर डाला,मेधावी ने कहा कि मैंने अप्सरा के साथ रमण कर पाप किया अब हे तात ! प्रायश्चित्त कहिये जिससे पाप नाश हो जाये। तव च्यवन बोले कि चैत कृष्ण पक्ष में पापमोचनी एकादशी होती है जिस के व्रत करने से पाप की राशि भी नाश होती है। पिता के वचन सुन उन्होंने बत किया जिस से पाप नाश हो गया और तपस्या युक्त होगये । इधर अप्सरा भी व्रत के प्रपाप से पिशाचत्व से छूट सुन्दर रूप धारण कर स्वर्ग को चली गई मानधाता ने कहा जो मनुष्य पापमोचन व्रत को करते हैं तिनके सब पाप माश हो जाते हैं। :: .. .इति श्रुत्वा पितुर्वाक्यं कृतं तेन व्रतोत्तमम् ।। गतं पापं क्षयं तस्य तपोयुक्तो बभूवसः ॥४५॥ साप्येवं मंजुघोषा च कृत्वैतद्वतमुत्तमम् पिशाचत्वाद्विनिर्मुक्तां पापामोचनिकावतात् ॥ दिव्यरूपधरा सा वै :गतान्तकेवराप्सराः॥४६॥ पापमोचानिका राजन् ये कुर्वन्ति नरोत्तमाः । तेषां पापं का यत्किञ्चित्तत्सर्वं च क्षयं ब्रजेत् ॥ ४७॥ हे राजन् ! पढ्ने सुनने से हजार गौओं का फ़ल होता है और ब्राह्मण के मारने सें, सोने को चुराने, मदिरा पीने, गुरु पत्नी सं गमन करने आदि पाप- युक्त मनुष्य निर्दोष हो जाते हैं। पठनाच्छ्रेवणाद्राजन् ! गौसहस्रफलं लभेत् ॥ १ ब्रह्महाहेमहारी च सुरायो गुरु तल्पंगः ॥४८॥ : नोट-कहिये. सनातनधर्मी भाइयो अब भी आपको कुछ शङ्का शेष रह गई कि प्राचीन समय में आपके पौराणिकी मनुष्य प्रायश्चित्त के द्वारा शुद्ध, होते थे । पौराणिक माइयो यदि यह कथा सत्य है तो कृपा कर अपने पतित साइयों को क्यों नहीं बत कराकर शुद्ध करते? धर्म शास्त्र में परस्त्रीगमन का महापाप लिखा है जो कि ऐसे साधारण: व्रतो से शुद्ध नहीं हो सकता किन्तु कर्मानुकूल अवश्य फल भोगने पड़ेंगे। इसी प्रकार ब्रह्महत्या, गुरुपत्नी गमन जो कि महापातकों में गिनाये गये हैं एकादशी.के व्रत से छूटने लिखे हैं। ऐसी शिक्षा घोर पाप में प्रवृत कराने वाली और मनुष्यों को दुष्कर्म से निर्भय करने वाली नहीं तो क्या? . कामदा। पूर्व समय में नागपुर नाम नगरी में पुण्डरीक इत्यादि नाग रहने थे वहां का पुण्डरीक राजा था जिस की गन्धर्व, किन्नर, अप्सरा सेवा करती थीं जिन में से ललिता, ललितं एक दूसरे से प्रसन्न धन, धान्य से युक्त रहते थे एक दिन ललित ने गीत गाने हुए ललिता का स्मरण किया जिसके कारण गान में आनन्द न आता था जिंस को कर्कट ने जान कर पुण्डरीकं से कहा। सपा के राजा पुण्डरीक ने शोध में आं श्राप दिया कि रे दुर्बुद्धत, पुरुषो का खाने वाला राक्षस हो जी। तब वह राक्षस हो गया ! ललिता ने उसकी बुरी सूरत को देख दुःखिव हो पति के साथ वन में घूमने लगी और वह उनमें पुरुषों फो खाने लगा, ललिता एक सुन्दर स्थान को देख जहां शांति देह मुनि रहते थे नमस्कार कर उनके आंगे खड़ी हो गई। मुनि ने उसको दुःखित देखें वृत्तान्त पूंछा तब उसने सब वृत्तान्त कहते हुये कहा कि मेरा स्वामी राक्षस हो गया है जिस से मुझ को बड़ा क्लेश रहता है मुझको कोई ऐसा व्रत बतलाइये कि जिससे वह राक्षसपन से छूट जाय 1 तब ऋषि ने कहा कि तुम.चैत्र मास शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी का व्रत विधि पूर्वक करो वह पुण्य स्वामी को दो उसने वैसा ही किया द्वादशी के दिन ब्राह्मण के समीप भगवान के आगे अपने पति के तारने के लिये कहा कि मैंने कामदा एकादशी का व्रत किया है उसके पुण्य के प्रभाव से मेरे पति की पिशाचता दूर हो जाय । .

. दत्ते पुण्ये क्षणात्तस्य शापदोषः प्रयास्यति । इति श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं ललिता हर्षिताभवत् ॥३१॥ उपोष्यकादशीं राजन् द्वादशी दिवसे तथा । विप्रस्यैव समीपेतहासुदेवस्य चोयतः ॥३२॥ वाक्यमुवाच ललिता स्वपत्युस्तारणाय वै । मया तु तव्रतं चीर्ण कामदाया उपोषणम् ॥३३॥ तस्य पुण्यप्रभावेन गच्छत्वस्य पिशाचता। ललितावचनादेव वर्तमानोपि.तत्क्षणे ॥३४॥ उसका सोने और रत्नों के समान उज्वल रूप होगया वह ललिता के साथ रमण करने लगा । ऐसा जान फर नृप श्रेष्ठ यह व्रत नियम से करना चाहिये। लोक हित के लिये तुम्हारे सन्मुख कहा यह ब्रह्महत्यादि पापों और पिशा- चता का नष्ट करने वाला है। तीनों लोकों में इस से श्रेष्ठ कोई नहीं -तथा पढ़ने सुनने से बाजपेय यश का फल मिलता है। लोकानां तु हितार्थाय तवाग्रे कथिता मया। ब्रह्महत्यादि पापघ्नी पिशाचत्व विनाशनी ॥ ३८ ॥ नोतः परतराकाचित्रैलोक्ये सचराचरे । पठनाच्छ्वणाद्राजन् वाजपेय फलं लभेत् ॥ ३६॥ नोटं-यद्यपि लोक में भी यही देखा जाता है कि कर्मका फल करने वालोको ही मिलता है और यह वेदकी भी भाशा है परन्तु इस कहानी में भी औरों की भांति एकका किया पुण्य दूसरे को देना लिखा है जो कि वेद विरुद्ध है। वरूथिनी। वैशाख कृष्ण पक्ष में वरूथिनी एकादशी होती है सर्वदा इसके व्रत करने से पापकी हानि, सौभाग्यकी प्राप्ति, गर्भ के बालकी छुड़ाने वाली मानधाता आदि इसीके प्रतापसे स्वर्गको गये । भगवान् महादेव भी ब्रह्मकपाल से छूट गये जो मनुप्यं दश हज़ार वर्ष तक तप और जो ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में एक मार . - सोने के पुण्यका फल होता है। सप दानों में विद्यादान का श्रेष्ठ फल है। वर- थिनी एकादशीका करने वाला उन सबके समान फलको पाता है। जो कन्यायो गहनों से युक्तकर पुण्य मिलता है उसी फलको इस व्रतका करने वाला पाता है। व्रत रखने वाला कांसा, मांस, मसूर, चना, कोदो, लाग, मधु, पराया अन्न, दूसरीबार भोजन, मैयुन दशमीको छोड़ दे । जुआ, पान, दातोन, पराया अपवाद चुगली, चोरी, जीव मारना, रति, क्रोध इंठ यह एकादशी में छोड़ दे ! कांस, मांस, मदिरा, शहद, तेल, पतितले बोलना, कसरत, प्रवास, दूसरी बार भोजन और पराया अन्न यह द्वादशी में छोड़ देवे। इस विधिसे जो नरूधिनी का व्रत फरता है उसके सब पापोंका नाश कर अन्त में भगवान् नाश रहित गति देते हैं जो रात्रि में जागरणकर भगवान् को पूजने हैं उनके सर पाप छूट जाते हैं तिलसे पापोंसे डरे हुये को सब प्रकार से यह व्रत करना चाहिये और पढ़ने सुनने से हज़ार गौदान का पुण्य होता है और सय पापा ले छूटकर विष्णुलोक को जात है। । . सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते यांति परमां गतिम् । अध्याय०४८ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्तव्या पापभीरुभिः ॥ २४ ॥ क्षपारि तनयाद्भीरो नरः कुर्याद्वरूथिनीम् । पठनाच्छ्षणाद्राजन् गौसहस्रफलं लभेत् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते ॥ २५ ॥ नोट-इस. कथा के पढ़ने से ज्ञात होता है कि मांस, मदिरा एकादशी के दिन एवं द्वाशी के दिन को छोड़ देवे तो क्या शेष दिनों में सेवन रहे ? यदि एक महीने में दो दिन मांस मदिरा छोड़ भी दें तो क्या केवल दो ही दिनके छोड़ने और इस व्रत के करने से ऐसे कर्मों से जिनसे कि विजत्व से शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है निवृत्त हो विष्णु लोक को प्राप्त हो सकता है । सत्य तो यह है कि ऐसी लालची शिक्षाओंने ही मनुष्योंको इन दुष्ट कम्मौकी ओर प्रवृत्त कर दिया। हमने प्रायः पौराणिक भाइयों को यह कहते सुना है.कि "समरथं को नहिं दोष गुसाई। रवि पावक सुरसरि की नाई।" परन्तु इस कथा में विचित्रता और इसके विपरीत यह कि महादेवजी भी ब्रह्मकपाली के शाप से शापित हो इल उपरोक्त एकादशी के नत से मुक्त हुये। विचार शील पुरुषो । विचारो तो .

सही कि जिनको आप साक्षान् भगवान मानते हैं वह भी इस से शुद्ध हुये तव वे अपने उपासकों को कैसे शुद्ध वा मुक्त कर सकते हैं। क्या यह महादेव की महिमा के परस्पर विरुद्ध नहीं है इसी से तो हम कहते हैं कि पुराणं एक दूसरे, के विरुद्ध होने एवं आपके देवताओं को लांच्छन लगाने से किसी विरोधी के बनाये जान पड़ते हैं न कि व्यासकृत। . - 11 w मोहिनी। रामचंद्र के पूंछने पर. वशिष्ठ ने कहा कि वैशाख के शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी सय पापों के नाश करने वाली है । अध्याय ४६ ॥ हे राम ! सरस्वती के किनारे भद्रावती नाम नगर में द्युतिमान् राजा हुआ वहां धनपाल म एक बुनिया रहता था, जो विष्णु का भक्त मन्दिर ता- लाव का बनवाने वाला पुण्यात्मा था जिसके पांच पुत्रे थे, जिनमें पांचवा धृष्ट- बुद्धि था, जो पराई स्त्रियों से रति की लालसा करने वालो, जुआ खेलने वाला, अन्याय में पिता के द्रव्य का नाश करने वाला, मदिरा पीने वाला वेश्या से प्रीति करने वाला इत्यादि दुष्ट स्वभावी था, जिसको पिता और बांधवों ने निकाल दिया तब वह नगर में चोरी करने लगा पकड़े जाने पर कई बार राजा ने छोड़ भी दिया तिस पर भी चोरी न छोड़ा फिर पकड़े जाने पर राजा ने उस को देश से निकाल दिया । यह. भूख प्यास से व्याकुल हो जंगली जानवरों को मार र कर अपना निर्वाह करने लगा! किसी पुण्य के प्रभाव से कौडिन्यजी के आश्रम पर पहुँच गया महात्मा वैशाख में गंगा स्नान कर आये थे, उनके कपड़े की बंद उसके ऊपर गिरी उसी से उसके अशुभ पाप नष्ट हो गये तब तो हाथ जोड़कर कौडिन्य से बोला ॥ ३२॥.. माधवे मासि जाहव्याः कृतस्नानं तपोधनम् । आससाद धृष्टबुद्धिः शोकभारेण पीडितः ॥ ३० ॥ तद्वस्त्रविंदुस्पर्श. नगत पापोहता शुभः । कौडिन्य स्यागूतः स्थित्वा प्रत्युवाच कृतांजलि ॥ ३१ ॥ कि हे ब्राह्मण हमारे ऊपर दया करके कहो कि जिस पुण्य के प्रभाव से युक्त होचे। महात्मा ने कहो तुम सुनी वैशाख के शक्ल पक्ष में मोहिनी एकादशी ( ७०), होती है तुम उस का व्रत करो। इस व्रत के करने से देहधारियों के बहुत जन्सों के इकठे पाप मेरु के समान भी नष्ट हो जाते है । इस प्रकारके वचन सुन प्रसन्न चित्त विधि पूर्वक व्रत कर पाप रहित हो-सुन्दर देह धारण कर गरुड़ पर चढ़ सब उपद्रवों से रहित विष्णुलोक को चला गया ३४, ३५, ३६, ३७, । एकादशी व्रतं तस्याः कुरु मद्वाक्यनोदितः । मेरुतुल्यानि पापानि क्षयं गच्छंति देहिनाम् ॥ ३४ ॥ बहुजन्मानितान्येषा मोहनी समुपोषिता । इति वाक्यं मुनेः श्रुत्वा धृष्टबुद्धिःप्रसन्नधीः ॥ ३५ ॥ वृतं चकार विधिवत्कौडिन्यस्योपदेशतः । कृते ते नृपश्रेष्ठ गतपापो वभूषसः B३६ ॥ दिव्यदेहस्ततो भूत्वा गरुडोपरिसंस्थितः। जगाम वैष्णवं लोकं सर्वोपद्रव वर्जितम् ॥ ३७ ।। हे रामचन्द्र.! इस प्रकार उत्तम मोहिनी व्रत है चराचर त्रिलोकी में इससे बढ़ कर कोई नहीं। यज्ञादिक तीर्थदान इस की सोलहवीं कला को भी नहीं प्राप्त. होते पढ़ने सुनने से हपार गौओं का.फल होता है । .. इति दृशं रामचन्द्र! उत्तम मोहिनी व्रतम् ॥ नातः परतरं किंचित्रैलोक्ये सचराचरे ॥३८॥ यज्ञादितीर्थदानानि कलांनहति षोडशीम् । पठनाच्छ वणाद्राजन् गोसहसूफलं लभेत् ॥ ३९ ॥ नोट- इस कथा के पढ़ने से स्पष्ट प्रकट होता है कि गुरु वशिष्ठ की आशानुसार श्रीरामचन्द्रजी ने भी सीता के वियोग से भयभीत हो कर यही व्रत किया है। सब विचारशील सुजान जन विचार सकते हैं । इस पहिली कथा में तो महादेव शाप से छूटे और इस में रामचंद्र दुख से छूटे तव भी कोई संशयं शेष रहा कि यह, ईश्वर थे। प्यारे भायो कुछ'धुद्धिसे काम लीजिये और फिर देखिये वेद आपको क्या बता रहा है । । .

( ७१ ) ज्येष्ठ कृष्णपक्षकी एकादशी का नाम अपरा है जो अपार फलों को देती है। ब्रह्माहत्या, गोत्र का नाश करने वाला, गर्भ गिराने, पराई स्त्री से प्रीति, झूठी गवाही देने, झूठ बोलने, झूठ चेद शास्त्र का पढ़ने हारा, झंठा ज्योतिषी और वैद्य यह सब नरक को जाते हैं परन्तु अपरा के सेवन से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। अध्याय ५० ॥ मकरके सूर्य, माघस्नान प्रयागसे, काशी ग्रहणसे, गया में पिण्ड देनेसे, गोमती स्तान से, सिंह कन्या की वृहस्पति कृष्णावेणी के स्नान करने से, कुम्भ में केदारके दर्शन से, बदरीनारायण की यात्रा और सेवन से, कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण से, हाथी, घोड़ा, सोने के दान से, दक्षिणा समेत यज्ञ करने से जो फल मिळते हैं वैसाही फल अपराके व्रत से प्राप्त होता है। आधी व्याई हुई गौके देने, सोना और पृथिवोफे देनेसे जो फल मिलता है वही अपरास होता है। यह अपरा पापरूपी वृक्ष काटने के लिये कुल्हाड़ी है। पापरूपी धन जलाने में अग्निरूप है। पापरूप अंधेरा दूर करने के लिये सूर्य्यरूपी है ॥ ११, १२, १३, १४, १५, १६, १७११८॥ एकादशी के व्रत के विना फिर जन्म, मरण होता रहता है अपराका व्रत कर भगयानकी पूजा करने से सब पापों से छूट विष्णु लोक को जाता है । जायन्ते मरणं यैव एकादश्या व्रतं विना। अपरां समुपौष्यैव पूजयित्वा त्रिविक्रमम् ॥ १६ ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते ॥ २०॥ नोट-प्य भाइयो यदि इस व्रत का इतना प्रभाव था तो महाभारत के समय श्रीकृष्णचन्द्र महाराजने फ्यों अर्जुन को यह उपदेश दिया कि रण से भागने वाले क्षत्री की मुक्ति नहीं होती अब इसॅफी सत्यता आप सजन लोग स्वयं ही विचारलें एवं महापातकों की भी जिसके लिये कि महात्मा तुलसीदास तक लिख रहे हैं कि "जो जस कीन्ह सो तस फल चाखा" परन्तु इसमें सबके विपरीत लिखा है। .. u ( ७२) निर्जला। व्यासजी युधिष्ठिर से कहते हैं, मानवधर्म, वैदिकधर्म तुमने सुगा, कलियुगमें इनके करने की सामर्थ्य नहीं. इस लिये मुखपूर्वकथोड़ा पाच, थोड़े धन, थोड़े क्लेश में महाफल देने वाला सब पुराणों का सारभूत.यह है कि पक्षों की एका- दशी में भोजन न करे । द्वादशीम पवित्र फर्लोले भगवान् को पूजे, ब्राह्मणों को भोजन करा पीछे आप भी भोजन करे । सूनक और अशौच में भोजन करना न चाहिये, जिनको स्वर्ग की इच्छा हो वह अब तक जियें इसको करें, चाहे पापी, दुराचारी, धर्म से हीन हो.परन्तु एकादशी में भोजन न करे तो वह यमराज के पास नहीं जाता ॥8॥ अध्याय ५१॥. "अपि पापा दुराचाराः पापिष्ठा धर्मवर्जिताः । एकादश्या न भुजानान ते यान्ति यमान्तिकम् ॥६॥ यह सुन भीमसेनने कहा कि हमले सब भाई कहते हैं। परन्तु हमसे भूज नहीं सधती और स्वर्गजाने की इच्छा भी है इस लिये आप निश्चय करके ऐसा कोई कार्य बतलाइये जिससे मेरा भी कल्याण हो । तव व्यासने कहा कि वृप मिथुन के सूर्य ये जव ज्येष्ट मास में एकादशी हो तो विना जल के व्रत.तरे और आचमन भी न ले। नहीं तो व्रत नष्ट होजाता है, उदय पर्यंत जो मनुष्य जलको छोड़ देता है वह बारह हादशियों के फल को पाता है.॥ २६ ॥ उदयादुदयं यावर्जयित्वोदकं नरः । : श्रूयतां समवाप्नोति द्वादशवादक्षी फलम् ॥२१॥ जो मनुष्य विना जल के एकादशी व्रत करता है वह सब पापों से छूट जाता । जो उस दिन स्नान दान करता है वह नाश रहित है, जो एकादशी को अन्न भोजन करता है वह पाप भोगता है। ४३ ॥ एकादश्यां दिने योऽत्र भुक्तं पापं भुनक्ति सः ॥४३॥ इहलोके सचाण्डालो मृतः प्राप्नोति दुर्गतिम इस लोकमें चांडाल मर कर दुर्गतिको प्राप्त होता है जो ज्येष्ठ मास के शुलं- पक्ष द्वादशी में व्रत कर दान देते हैं वह परम पद पाते हैं। ब्राह्मणका मारते घाला, मदिरा पीने वाला, चौर, गुरुसे वैर करने आदि लब पापों से निर्जला ७३ ) व्रत करने वाले छूट जाते हैं। जिन्होंने इसका व्रत नहीं किया उन्होंने आत्मा से पैर किया बेही पापी बोर हैं ॥५०॥ ब्रह्महा मद्यपः स्तेनो गुरुद्वेषी सदानृती ॥ ४५ मुच्यते पातकैः सर्वै निर्जलायेरुपोषिता। विशेष शृणु कतियनिर्जलैकादशी दिने ॥ ४६ ॥ जो शांत दात, दान में परायण, रात्रि में जागरण कर भगवान को पूजते हैं। घह सौ आने वाली बीती हुई पीढ़ियों को और अपने को घासुदेव के मन्दिर में मात करता ऐसा ही वाराह पुराण पूर्वाद्ध अध्याय ३५ में लिखा है। नोट-कलियुगमें यदि वैदिक धर्म करने की सामर्थ्य नहीं तो शंखासुरले चेदों के बचाने के प्रयल के लिये आपके पौराणिकी ईश्वर को वागहका अवतार क्यों लेना पड़ा ? मिनवयं क्या इससे यह स्पष्ट प्रकट नहीं होता है कि वेदों की महिमा गिराने और नवीन मतं चलाने को यह विरोधियों एवं आलेंसियों ने बातें प्रकट फरदीं वरन् सनातन वेद क्या किसी जाति व कालविशेषके लिये हो सकते हैं कदापि नहीं। २-इससे स्पष्ट प्रकट है कि यह किसी ऐसे पुरुष की रचनी है कि जो पुर्म- जन्म को नहीं मानता परन् सौ पीढ़ी आगे व पीछेकी न लिखता वाहरी बुद्धि । . योगिनीं। आषाढ़ के कृष्ण पक्ष में योगिनी गाम एकादशी पापों को नाश ने पाली होती हैं। यह संसाररूपी समुद्र में डूबे हुओं को नौका, सनातनी व्रत करने वालो को त्रिलोकी में सारभूत है। अलंका में कुबेर जी महाराज महादेव को पूंजते थे । हेममाली फूलों को लाया करता था। एक दिन वह पर्वती विशा- लाक्षी स्त्री के प्रेम में डूब कर मध्याह लमय तक फूल नहीं ले गया तब कुवेर ने यक्षको भेजा कि हेममाली कहां है यक्ष ने घर आकर जाना कि वह नी पर मोहित होने के कारण घर ही में पड़ा है। कुवेर ने यह सुन कर फिर यक्ष से उसको वुलाया। वह उड़ता हुआ उनके सामने गया । कुवेर ने क्रोधित होकर कहा कि हे दुष्ट ! तू ने देवों की निंदा की । इस लिये खी वियोग हो कर तेरे अठारह कोढ़ हो जावे तू इस स्थान से चला जा । कुधेर के ऐसे वचन कहते ही वह उस ( ७४ ) स्थान से गिर गया और भारी दुःखों अर्थात् कोढ़ से पीड़ित हो दुःखी होने लगा ॥ १५, १६॥ अध्याय ५२ ॥ अष्टादशकुष्टवृत्तौ वियुक्तः कोतया तया । अस्मात्स्थानादपध्वंस्तौ गच्छस्वप्रमथाधम ॥ १५ ॥ इत्युक्तर्वचनैस्तस्य तस्मात्स्थानात्पपातप्तः । महादुःखाभिभूतश्च कुष्ठैः पीडितविग्रह ॥ १६ ॥ वह इस दुःख से दुश्खी घूमता हुआ हिमालय पर गया और वहां मार्कण्डेय महर्षि को देखा । उन्होंने पूछा कि क्या दशा है ? तप उस ने सय वृत्तान्त कहा । मार्कण्डेय बोले कि तू ने सत्य ही कह दिया इस लिये कल्याण देने वाली योगिनी एकादशी का व्रत कर मार्कण्डेयजी के उपदेश से उसने यथोचित प्रत किया तो १८ कोढ़ जाते रहे ॥ ३१॥ मार्कण्डेयोपदेशेन व तं तेन कृतं यथा । अंष्टादशैव कुष्ठानि गतानि तस्य सर्वशः ॥ ३१ ॥ यह जन ८८ हजार विनों को भोजन कराता है जो योगिनी व्रत करता है उनका फल समान होता है॥ ३३ ॥ अष्टाशीति सहस्राणि द्विजान्भोजयते तु यः । तत्समं फलमाप्नोति योगिनीव तकृन्नरः ॥ ३३ ॥ नोट-सनातनधर्मी भाइयों को चाहिए कि इस कोढ़ की दवा को पेटेण्ट कराकर सनातनधर्म गजट से विज्ञापन निकाल दें क्योंकि सम्भव है कि सिविलसरजन और वैद्य लोगों ने इस दवा को न जाना हो हरिद्वार और एपी- केश के मध्य में बहुत से कुष्टी हैं क्या कोई पद्म पुराणी एकादशी का व्रत करने वाला वहां नहीं रहना वा जाता है ? कृपा करके कोढ़ियों को यह दवा बतार्दै। बहुधा सनातनी ब्राह्मण देवता यह कहते हैं कि आर्यसमाजियों ने न्यौते चन्द कर दिये हमारी समझ में न्यौते यन्द कराने वाली यह एकादशी है जिसके व्रत रहने से ८८ हजार विप्र भोज का फल मिलता है ।

(७५) देवशयनी । . आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम देवशयनी है यह पापों के नाशने के लिये ब्रह्मा ने इस को सबसे उत्तम रचा है इस से श्रेष्ठ मोक्षदायक कोई नहीं है॥४॥ अध्याय ५३ ॥ पापिनां पापनाशाय सृष्टाधात्रा महोत्तमा । अतःपरा न राजेन्द्र ! वर्तते मोक्षदायिनी ॥४॥ इस लिये वैष्णव को चाहिये कि आपाढ़ के शुक्ल पक्ष में एकादशी का अच्छे प्रकार व्रत करें क्योंकि इस के पुण्य की गणना में ब्रह्मा भी असमर्थ हैं। नास्पाः पुण्यस्य संख्यानं कुर्तुशक्तश्चतुर्मुखः । एवं यः कुरुते राजन कादश्यां व्रतोत्तमम् ॥३०॥ सर्वपापहरं चैव भुक्तिमुक्ति प्रदायकम् ॥ ३१ ॥ नोटस से श्रेष्ठ मोक्षदायक कोई नहीं तो क्या और सब उपरोक्त झूठी हैं ब्रह्मा जिन्होंने कि जगत् रचा वह भी उसके गुण गिनने में असमर्थ । महिमा हो तो यहां तक! :: कामिका। श्रावण कृष्ण पक्षकी एकादशीका नाम कामिका है उस दिन गङ्गा, काशी, नैमिसारण्य, पुष्कर इत्यादि में जो फल होता है वह कृष्ण के पूजन से होता है जो मनुष्य पापरूपी कीचड़से व्याकुल संसाररूपी समुद्र में ड्वे हुयेहैं तिनके उद्धार के लिये कामिका व्रत उत्तम है इस से बढ़कर कोई पवित्र और पापनाशिनी नहीं है जो आध्यात्मिक विद्या में प्रवीण हैं उन को जो फल मिलता है वह कामिका व्रत करने वालों को मिलता है । जागरण करने वाले यमराज को नहीं देखते। जो फल एक भार सोना और चौगुनी चांदी देने से मिलता है वह तुलसीदल के पूजन से मिलता है, जो रात्री में दीपक जलाता है उस का फल अनगणित है और जो आज के दिन कृष्ण के आगे दीपक जलाता है उस के पितर स्वर्ग में अमृत से तृप्त होते हैं। जो. घी या तेल के दीपक को जलाता है वह सौ करोड़ दीपों से पूजित सूर्य लोक को प्राप्त होते हैं। इस व्रत के करने से नोट-यदि कामिका का ऐसा माहात्म्य था तो श्रीकृष्ण महाराजने इस का अर्जुन को उपदेशन कर योगाभ्यास की शिक्षा क्यों दी? - ( ७६ ) धुरी चोनियों में नहीं जाता । योगी लोग इस के व्रत को करके मोक्ष को पाते है | अध्याय ५४ ॥ न पश्यति कुचोनिं च कामिकादूतसेविनाम् । कामिकाया प्रतीणें कैवल्यं योगिनौ गतः ॥१८॥ . . पुत्रदा। श्रावण के शुक्ल पक्ष में पवित्रपिणी पुत्रदा एकादशी होती है । जिस के सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल होता है पूर्व समय में द्वापर युग के आदि में महिष्मती पुरमै महीर्जित नाम राजा था। पुत्र हीन होने से चिंता युक्त रहता था । एक दिन प्रजा पुरुषों से उसने कहा कि इस जन्म में अन्याय ले धन नहीं लिमा ! प्रज्ञा को पुत्रों के वरावर पालन किया, धर्म से पृथ्वी को जीता, सजनों ती सेवा, शत्रुओं को दण्ड दिया, परन्तु हमको, किल कारण से पुत्र नहीं मिला सोतो कहिये, यह सुन प्रजा और पुरोहितों ने सम्मति कर गहन यन को गये यहां ऋपियों के आश्रम को देख रहे थे, इतने में धर्मतत्व के जानने वाले महात्मा लोमश जिनसी सवने यन्दना की तब उन्होंने कहा कि अपना कारण कहिये तो उन्होंने उपरोक सय वृत्तान्त कह कर प्रार्थना की कि अब जिस प्रकार से राजा के पुत्र हो उसको आप कहिये । महात्मा लोमश मुहर्तमात्र ध्यान कर राजा के पूर्व जन्म का हाल जान चोले कि यह पूर्व जन्म में क्रूर धनहीन धनिया था वाणिज्य के अर्थ एक गांव से दूसरे गांव को जाते थे । ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को दोपहर के समय प्यास से व्याकुल था जज पीने को तालाब एर गया, उसी समय एक बछड़ा सहित एक गाय पानी पीने को आई जो प्यास, बाम से व्याकुल थी उस जल पीती हुई को खेद कर आप जल पीने लगा, उसी कर्म से यह पुत्र हीन राजा है । तृष्णातुरानिदाघार्ता तस्यमम्वु पपोतुसा । पिवंती वारयित्वातामसौ तोयं पपो स्वयम् ॥२६॥ कर्मणा तेन पापेन पुत्रहीनो नृपोऽभवत् । कस्यापिजन्मनः पुण्यात्प्राप्त राज्यमकंटकम् ॥ तब सबने कहा पुण्य से पाप नाश हो जाते हैं इसी लिये आप के शुक्ल . (७) उपदेश के प्रसाद से राजा के पुत्र हो । तब लोमेश बोले कि श्रावण के पक्ष में पुत्रदा एकादशी वांछित फल को देने वाली है उस का व्रत सब लोग कीजिये ॥ ३२ ॥ पाचणे शुक्लपक्षे तु पुत्रदानामविश्रुता। एकादशी वांच्छित्तदा कुरुध्वं तद्वतं जनाः ॥ यह सुन सब मनुष्य दण्डवत फर नगर में आयें। विधि पूर्वक सबने बत फिया और उस की पुण्य राजा को दे दी जिस के प्रताप से रानी के गर्भ रहा और तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। तस्य पुण्यं सुविमलं दत्तं नृपतये जनैः। दत्त पुण्येऽथसाराजी गर्भमाधत्त शोभनम् ॥२४॥ प्राप्त प्रसवकाले सा सुषुवे पुत्रमूर्जितम् ॥४५॥ इस लिये जो इस व्रत को करता है वह इस लोक में पुत्र सुख पाफर परलोक में स्वर्ग पाता है । अध्याय ५५॥ श्रु त्वामाहात्म्यमेतस्यानरः पापात्प्रमुच्यते। इहपुत्रसुखं प्राप्यपरत्र स्वर्गतिंभवेत् ॥४४॥ नोट-न जाने महर्षि वशिष्ठ और की ऋषि ने क्यों महाराज दशरथ को वृथा कष्ट दे पुत्रेष्टि यश कराया । क्या उस समय में व्यास कृत पुराण उपस्थित न थे परन्तु जो कुछ हो अब तो उपस्थित हैं सनातन धर्मी भाइयों के लिये यह एकादशी पुत्रों के देने वाली है इस लिये जिन समातनधर्मी भाइयों को पुत्र की इच्छा हो इसी से पुत्र प्राप्त करलें। फिर न जाते ग्रहों की दुकान क्यों खोलते हैं कवरों और मदार इत्यादि को क्यों पूजने जाते हैं। अजा। भादोको कृष्णपक्षकी एकादशीको अजा कहतेहैं। पूर्व समयमै सब पृथिवीका राजा हरिश्चन्द्र हुआ जो सत्य प्रतिक्षा करने वाला था किसी कर्मसे राज्यसे भ्रष्ट होगया तो उसने अपनेको.एवं स्त्री और पुत्रको-चांडालके हाथ घेच डाला। जहां वह मुदौके कपड़े लेता था परन्तु सत्यको वहां भी नहीं छोड़ा। इस कामको (७८) करते हुये वर्ष व्यतीत होगये। एक दिन दुःखी हो कहने लगा कि क्या करूं? इतनेमें गौतम ऋपि वहां आगये और हाल सुनकर महात्माने कहा कि भादौके कृष्ण पक्ष अजा एकादशी आने वाली है हेराजन् ! इसके व्रतको करजागरण करो पापों का नाश हो जावेगा इतना फह मुनि अंतर्धान हो गये राजा ने मुनि की आशानुसार व्रत किया जिससे सवपापों का नाश हो गया। मुनिर्वाक्यं नृपः श्रुत्वा चकार व्रतमुत्तमम् । कृते तस्मिन्बूतेराज्ञाः पापस्यांतोभवत्क्षणात् ॥ १८ ॥ राजाका दुःख जाता रहा । स्त्री मिलगई, पुत्र जी गया । आकाशमै नगाड़े बजे । फलौकी वर्षा हुई और अकंटक राज्य राजाने पाया और पुर परिवार समेत स्वर्ग भी मिला । जो मनुष्य इसका व्रत करते है वे स्वर्गको जाते हैं। इसके पढ़ने सुनने से अश्वमेध का फल होता है। अध्याय.५६ ।। सर्वपापविनिर्मुक्ता स्त्रिदिवं यांति ते नृप.। . पठनाच्छवणाद्वापि अश्वमेधफलं लभेत् ॥ २३ ॥ । पना। भाद्रपद शुक्लपक्षकी एकादशीको पन्ना कहते हैं ब्रह्माने नारवसे कहा कि सूर्य बंशमैं मानधाता नाम राजा हुये जो धर्मसे प्रजाका पालन करते थे। यहुत काल चीतने पर ३ वर्ष तक उसके राज्यमें वर्षा नहीं हुई जिससे प्रजा अति दुःखित हो राजाले प्रार्थना करने लगी कि महाराज आपसे धर्मात्मा राजा होने पर न मालूम वर्षा क्यों नहीं होती आप उपाय सोचिये तब राजा गहन वनको गया मुनियों के आश्रमों में घूमता हुआ अंगिराऋषिके समीप पहुँचा नमस्कारादि कर अपना सब वृतान्त कहो तव ऋषि बोले कि यह युगोंमें उत्तम अत्युग है इससे ननुष्य धर्ममें परायण हैं धर्म चारपावों का है। अभ्याय ५७॥ इसलिये ब्राह्मणही तप करें तुम्हारे राज्य में शूद्र तप कर रहा है इस हेतु वर्षा नहीं होती इसके मारने का यत्ल कीजिये तो दोष जातारहै । नोट-क्या रजा हरिश्चन्द्रने पापोंके फलसे दुःख पाया अथवा विश्वामित्र को दान दे वचन न लौटनेसे ? प्रकट होता है कि एकादशीका माहात्म्य बढ़ानेको यह कथा लिख दी है वास्तविक कम्मौका फल तो अवश्य भोगनाही पड़ता वरन् एकादशी व्रती सब सुखीही देखे जाते।

.. अस्मिन युगे तपोयुक्ता ब्राह्मणानेतरेजनाः । विषये तब राजेन्द्र वृषलोयं तपस्यति ॥ ३० ॥ एतस्मात्कारणाश्च व न. वर्षति बलाहकः। : कुरु तस्य वधे यत्नं येन दोषः प्रशाम्यति ॥ ३१॥ यह सुन राजाने कहा कि निरपराधीको मारना उचित नहीं और कोई उपाप बताइये तव मुनिने कहा अच्छा आप भादों के शुक्ल पक्ष की एकादशी पद्मा का व्रत करो जिस के प्रभाव से वर्षा होगी और सर्व प्रकार की सिद्धियां मिलेंगी राजाने अपने राज्यमें पहुँच कर सब प्रजा समेत व्रत किया। भाद्रमासे सिते पक्षे पद्मावतमथा करोत् । प्रजाभिः सहसर्वाभिश्चातुर्वर्ण्यसमन्विनः ॥ ३६ ॥ जिससे मेघ वर्षे अन्न अच्छा उत्पन हुआ ॥ ३७॥ एवं बूते कृते राजन् प्रववर्ष बलाहकः । जलेन प्राविता भूमिरभवत्तस्यशालिनी ॥ ३७ ॥ इसलिये इस उत्तम व्रत को करना चाहिये । दही, भात, जलसे भरा कलश, छाता, जूते, ब्राह्मणको दे प्रार्थना करे कि हे गोविन्द आप सुख दीजिये। इन्द्रा। कारकृष्णपक्षमें इन्द्रा नाम एकादशी होती है जिससे भारी पाप नाश होजाते हैं । जो पितृ नरकम हैं उनको गति देती है ॥ अध्याय ५८ ॥ नोट-वाहरे फिलासफी शूद्र तो तप करके परमात्माका स्मरण करे और पौराणिको अंगिरा ऋषि उसके मारनेका राजाको उपदेश दें विचारशीलो आप विचार सकते हैं कि शद्रकी तपस्यासे मेघबन्द हो सदुपदेष्टा ऋषि तपस्वीको भारनेकी आशा दें। यदि ऐसा ही था तो बाल्मीकादि कौन थे ? हमारे ब्राह्मण भाइयोंको उचित है कि जहां २ पानीकी वर्षा न हो वहीं इस व्रत के प्रभावसे पानी.चर्चा देवें क्योंकि भारतवर्ष मनुष्य अकालोंमें स्वयं पीड़ित रहते हैं जब कि उनके पास पानी वर्षालेकी एकादशीरूपी कल मौजूद है तो फिर समस्त देशमें दुर्भिक्ष क्यों पड़ते हैं ! . :

सतयुग में महिप्मतीपुरमें चन्द्रसेन राजा हुआ जो धर्मात्मा था एक दिन नारद आये और कुशल पूछने के पीछे राजाने आनेका कारण पंडा उन्होंने कहा कि मैं ब्रह्म लोकसे यमलोकको गया तो वहाँ मैंने तुम्हारे पिताको देखा उन्होंने कहा कि उसको किसी पूर्व जन्म के विश्न से यमराज के पास आना पड़ा है इस लिये पुत्र से कह देना कि तुम इन्द्रा एकादशी का व्रत कर स्वर्ग पहुँचाओ इस लिये.आपके पास आये हैं नारद ने सब विधि वताई उसने वैसा ही किया। जिससे हे युधिष्ठर ! आकाश से फूलों की वर्षा हुई और राजा के पिता गढ़ पर सवार हो कर स्वर्ग को चले गये। और राजा अकण्टक राज्य करके स्वर्ग को गया ॥ कृते वते तु कौन्तेय ! पुष्पवृष्टिरभूदिवः । तत्पिता गरुडारूढ़ों जगाम हरिमन्दिरम् ॥ ३३ ॥ इन्द्रसेनोपि राजर्षिः कृत्वा राज्यमकण्टकम् । राज्ये निवेश्य तनयं जगामत्रिदिवं स्वयम् ॥३४॥ पापकुशा। कार की शुक्ल पक्ष की एकादशी का पापकुशा कहते हैं यह पापनाशिनी है । इस में पद्मनाम नाम अभीष्ठ फल को प्राप्ति के लिये हमको पूजे जो स्वर्ग मोक्ष को देने वाली है फिर बहुत काल तीन तपस्या कर जो फल मिलता है वह भगवान् के नमस्कार करने से मिलता है मोहयुक्त मनुष्य बहुत पाप करके भी सब पाप नाश करने वाले भगवान् को नमस्कार कर नरक को नहीं जाता। पृथ्वी, तीर्थ, पवित्र स्थान जितने हैं वे विष्णु के नाम से प्राप्त होने हैं उन को यमलोक की यातना भी नहीं होती । मनुष्य घोर पाप करने पर भी एक एका- दशी व्रत करने से यम यातना को नहीं प्राप्त होने जैले पाप नाशने वाला पन्न- नाभ व्रत है वैसा तीनों लोकों को पवित्र नहीं है जब ही तक पाप रहते हैं जब नौठ-यह स्पष्ट प्रकट है कि प्राणान्त होने पर यह शरीर मृतवत् ज्ञा रहता है और कर्मानुकूल जीवामा दूसरा शरीर धारण करता है यथा महात्मा कृष्ण कहने हैं कि (वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ),परन्तु इस कथा में यह विचित्रता है कि स्वर्ग में उसके पिता को देखा फिर दूसरे यह पिता पुत्र का शारीरिक सम्बन्ध न कि आत्मिक ?

. . . तिक पद्मनाभ का अंत नहीं करता हजार अश्वमेधयह, सौरांजसूपयश एक एका- दशी के सोलहवों कलाको नहीं प्राप्त होते इस के बराबर कोई प्रत संसार में नहीं। जो लोग यहाने से भी करते हैं ये यमलोक को नहीं जाते। अश्वमेध सहस्त्राणि राजसूयशतानि च । एकादश्युपवासस्य कलां नाहन्तिषोडशीम् ॥१३॥ एकादशीसम किश्चिद् ब्रत लोके न विद्यते । व्याजेनापि कृतायैश्च न ते यान्ति हि भास्करिम्॥१४॥ यह पकादशी स्वर्गः; मोक्ष, आरोग्यता, स्त्री, पुत्र, धन, मित्रको देने वाली । गंगा, गया, काशी, पुष्कर, कुरुक्षेत्र भी एकादशी व्रतके पुण्य को नहीं होते ।। १५ । १६ ॥ अध्याय ५६॥ स्वर्गमोक्षप्रदोषा शरीरारोग्यदायिनी। कलत्रसुतदा धेषा धन मनप्रदाथिनी ॥१५॥ न गंगान गया राजन च काशी च-पुष्करम् । ने चापि कौरवं क्षेत्रं पुण्यं भूपहरेर्दिनात् ॥१६॥ हे राजन् ! जो पुरुषं रात्रि में जागरण कर एकादशी के दिन व्रत करता है यह मनुष्य वैश्णन पदको पा दश माता वंशं पिता दशस्त्री की पीढ़ियों को उद्धार कर दुर्गति को नहीं पाता ।। दशैवमातृके पक्ष राजेंद्र दशपैतृके । प्रियाया दशपक्ष तु पुरुषानुद्धरेन्नरः ॥१८ ॥ : उपोष्यैकादशी नूनं नैव प्राप्तांतिदुर्गतिम् ॥ ५० ॥ नीर-क्या यह यजमानों के नुशं करने और चैदिक धर्मसे विमुख करने वाली शिक्षा नहीं है कि जो बहाने से भी करते हैं वे यमराज के यहां नहीं जाते शोक ऐसी शिक्षा पर ! हमको बड़ा आश्चर्य ऐसी कथाओं पर होता है कि एक औरती रह महात्मा कृष्णजी का वचन "अवश्यमेव मोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्" एक ओर इसमें लिखा है कि माता की . दश' प्रौढ़ी एवं पिता की दश पीढ़ी चल एक एकादशी व्रतसे तर जाती है । पाठक गण क्या न्याय इसीका नाम है ? | -- - ( ८२ ) रसा। कार्तिक कृष्ण पक्षकी एकादशी को रमा कहते हैं पूर्व समय में मचकुन्द नाम राजा विष्णु का भक्त और सत्यवादी था जिस की इन्द्र, कुवेर, यमसे मित्रता थी उसने अपनी लड़की चन्द्रभागा को राजा चन्द्रसेन के पुत्र शोभन के साथ विवाह कर दिया इसी समय में शोभन श्वसुर के घर आया वह दिन एकादशी के व्रत का था राजा के राज्य में उसका बड़ा नियम था नगारा यजते ही इसने चन्द्रभागा से कहा कि भव मैं क्या करू तब उसने कहा यदि भोजन करो तो घर से निकल जाओ उसने कहा मैं भी व्रत करूंगा जब भूख लगी और रात्रिआई शोभन की सूर्योदय में मृत्यु हो गई तब तो राजा ने राजाओं के योग्य काष्ठ से जलवा दिया। चन्द्रभागा ने अपने देह को अपने पति के साथ नहीं जलाया॥२०॥ दाहयामास राजातं राजयोग्यैश्च दारुभिः । चंद्रभागानात्मदेहं ददाह पतिना सह ॥ २० ॥ शोभन रमा एकादशी के प्रभाव से मन्दाचल के कंगूरे पर देवलोक में प्राप्त हुआ जहां वह -सुन्दर महलों में सिंहासन पर बैठा हुआ अप्सराओं से सेवित था। यहां कोई मुचकुन्द के पुर में बसने वाला सोम शर्मा ब्राह्मण तीर्थ यात्रा करता हुआ राजा के दामाद के पास गया शोभन ने सोम शर्मा को उठ कर प्रणाम किया और श्वस्नुर आदि की कुशल पूंछी उसने कह कर कहा कि आप इस नगर में कैसे आये शोभन ने कहा कार्तिक के कृष्ण पक्ष में रमा एका- दशी के व्रत के प्रभाव से मैंने अनिश्चय पुर तो प्राप्त किये अब आप यह कीजिये जिस से निश्चय हो जावे ॥३१॥ कार्तिकस्य सिते पचे.. यानामै कादशी रमा.॥ ३१ ॥ तामुपोष्यमयाप्राप्त द्विजेंद्रपुरमधु वम् । . धःवं भवति येनैव तत्कुरुष्व द्विजोत्तमः ॥ ३२ ॥ तव ब्राह्मण ने कहा हमने यह निश्चय कैसे हो उसने कहा मुचकुन्द -की कन्या चन्द्रभागा से कहना वहां निश्चय हो जावेगा यह मुचकुन्द पुर में आया और सब वृत्तान्त चन्द्रभागा से कहा कि हे सुमगे मैंने तुम्हारे पति को नोट-भगवद्गीता के पाठी इस कथा पर सम्यकीत्या विचार करें।

( ८३)
प्रत्यक्ष देखा जो इन्द्र के समान हैं जिनको वह पुर अनिश्चित प्राप्त हुआ है इस
लिये तुम मुझको भी ले चलो आपको बहुत पुण्य होगा यह सुन कर वह दोनों
वहाँ गये चन्द्रभागा पति को देख कर बहुत प्रसन्न हुई इसी प्रकार पति स्त्री को
देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और आनन्द मंडलसे आयु व्यतीत करने लगे यह रमा
एकादशी का माहात्म्य है।
प्रबोधनी।
कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी योवनी होती है तभी तक तीर्थ समुद्र,
तालाब, भागीरथी की गङ्गा पृथ्वी पर गरजती हैं जब तक कार्तिक फी शुक्लपक्ष
की विष्णु की प्रबोधनी एकादशी नहीं आती ॥ ५, ६ ॥
तोवद्गर्जति तीर्थानि आसमुद्रसरासि च, यावत्प्रबोधिनी
विष्णोस्तिथि याति कार्तिके ॥ ५ ॥ तावद्गर्जति विपेंद्र
गंगा भागीरथी क्षितौ । योवन्नायाति पापनी कार्तिके
हरिबोधिनी ॥६॥
भक्ति पूर्वक इस एकादशी के व्रत करने से हजार अश्यमेध सौं राजसूययज्ञ,
तीनों लोकों के दुर्लभ पदार्थ, ऐश्वर्य, बुद्धि, राज्य सुख, त्रिलोकी के सब तीर्थों का
पुण्य-पुत्र-पौत्र-शान-सोना चांदी के दान के फल के समान फल प्राप्त होते हैं
पहिले हज़ार जन्मों के पाप कई के समान जल जाते हैं और गर्भ में कमी वासः
नहीं करना पड़ता ॥ अध्याय:६१ ॥
यः करोति नरो भक्कयो भुक्तिभाक्सभवेन्नरः ।
प्रबोधिनीमुपोषित्वा गर्भनविशते नरः ॥ २५ ।।
हे नारख इस व्रत को करो कर्म, मन, वाणी से जो पाप है ॥ २६ ।।
सर्वधर्मान्परित्यज्य तस्मात्कुर्वीत नारद ।..
कर्मणा मनसो वाचा पापं यत्समुपार्जितम् ।। २६ ।।
'उनको प्रयोधनी के जागरण नाश करते हैं स्नान, दान, तप, पूजा को भग
चान् का उद्देश्यकर जो प्रवोधनी में करता है वह अक्ष्य होता है जो भक्तिसे पूजा
और धत करते हैं सैकड़ों जन्म के पापों से छूट जाते हैं हे पुत्र नारद'यह महाव्रत
बड़े पापों को नाशने वाला है ॥ २९॥

समुपोष्य प्रमुच्यन्ते पापेस्तैः शतजन्मजैः । महाव्रतमिदं पुत्र महापापौघनाशनम् ॥ २७ ॥ वात्य, युघा, इद्धावस्थामें जो सौ जन्मतक पाप किये हो उनको भगवान नाशने हैं क्योंकि यह पकादशी धन धान्य देने वाली और पुण्य करनेवाली और सय पापों की नाशने वाली है। बाल्ये यत्संचितं पापं यौवने वाद्धिके तथा । शतजन्मकृतं पापं स्वल्पं वा यदि वो बहु ॥ ३२ ॥ सत्क्षालयति गोविन्दश्चास्यामभ्यर्वितो नृणाम् । धनधान्यवहा पुण्या सर्वपापहरा परा ॥ ३३ ॥ जो भक्ति से व्रत करता है उसको कुछ भी कटिन नहीं है चन्द्र, सूर्य, ग्रहण में जो पुण्य है उसका हजार गुणा गुण प्रयोधनों के जागरण में है स्नान, जप, तप, भोजन, दाम, होम, पदमा इस प्रबोधनी में करने से करोड़ गुणा देते हैं और जन्न भर में जो पुण्य इकट्ठा किया हो परन्तु कार्तिक में।बत न किया हो तो सब पुण्य नाश होजाते हैं ॥ ३ ॥ वृथाः भवति तवमकृत्वा कार्तिके व्रतम् ॥ ३७ ॥ पश, दान जपादिको सवै सो भगवान प्रसन्न नहीं होते जैसा कार्तिक में शाल की कथाओं से होते हैं जो मनुष्य विष्णुकी कथा का आधा या चौधाई श्लोक कहते या सुनते हैं उनको सौ गौका फल होता है इससे सव"धर्मों को छोड़कर विष्णु के आगे शान कहे या सुने जो मनुष्य' कल्याण की इच्छा या लोभसे करता है वह सौ पक्षियों को तार देता है.जो नियम से सुनता है. उसको साती द्वीप युक्त वृथ्वी के दान करने का फल मिलता है जो वांचने वाले को दान देता है उसको नाश रहित लोक मिलता है और जो शंखमें जल लेकर अर्य देता है तो सब तीर्थों में सब ानों के करने से जो फल मिलता है तिसका करोड़ गुणा फल, प्रबोधनी को अर्घ्य देने से मिलता है। गुरुको भोजन कपड़ा दे फेतकी के एक पत्र से भगवान सहस्र वर्ष तक अगस्त्य के फूलों से पूजन करने वालों को नरक की अग्नि नाश होजाती है मुनिके फूलों से भनीवाडा, तुलसीदल से.दश.. इज़.र.वर्ष के पाप नाश होजाते हैं और ओमनुप्य देखे.छुचे ध्यान लगावे नाम, स्तृति करे साँचे और पूजन करे तो करोड़ हज़ार युग उसको सुक्षति बढ़ती है -- . .

( ८५ ) शिल प्रकार तुलसी के डाले पीज़ तुलसी पृथवीपर बढ़ती है वे लगाने वाले के वंश में जो उत्पन्न हुये होंगे, होने वाले हैं वे लय हजार वर्ष भगवान के घर में वास करते हैं। नोट-श्या राजा दिलीप पयं श्रीरामचन्द्रादिके समय में ऐसे सुगम व्रत न थे जो केवल एक दिनके प्रत और जागरणं करने से मुक्ति प्राप्त करलेले । इस के उपरांत इस व्रत के न करने से भगवान् जन्मभर के पुण्योंका नाश करदेते हैं। कहिये यह न्याय है या पक्षपात । यथार्थ में अन्यकत्र्ता ने वां किसी मिलाने वाले पुरुषने प्रबोधिनी की महिमा बढ़ाने के लिये इतना फल दिया और तुलसी और अगस्त्यादिक घृक्षों के स्पर्श और सींचने से करोड़ हजार वर्ष से भी अधिक सुकति बढ़ती है तो हम सबसे माली अधिक महिमा के योग्य है और वही स्वर्ग अधिकारी होंगे। सजन जनों कुछ तो विचार कीजिये। कमला। मळमासको कृष्णपक्ष की एकादशी को कमलो कहते हैं अन्ति:पुरी में शिय शर्मा नाम एक ब्राह्मण हुये हैं जिनके ५० पुत्र थे, जिसमै छोटा फुकर्मी था इस लिये सबने छोड़ दिया यह चलता हुआ प्रयोग पहुँचा त्रिवेणी में स्नान किया भूत्रसे व्याकुल हुआ हरिमित्र' मुनिके स्थान पर पहुँचा.वहाँ मलमास की एका- दशी कमलाको कथा होरही यो जहाँ बहुत मनुष्य सुन रहे थे उसने सुना सबके साथ शून्य स्थान में व्रत भी किया उसके प्रतापसे. आधीरात, को, लक्ष्मी आई और बोली कि मैं तुझको वर दंगी तब जयशम्मा ने कहा कि हे रम्भ ! आप इन्द्र को इन्द्राणी महादेवको पार्वती या गंधर्वी या फिन्नरी या चन्द्रमा सूर्य की स्त्री आदिौन हो मैंने आपके समान किसी को नहीं देखा तवं लक्ष्मी बोली कि मैं वैकुंठसे आई ई. और कमला के प्रभाव से भगवान् ने भेजा है मैं बहुत प्रसन्न है तुमने एकादशीका मुनियों के साथ प्रयोग में वत किया है इसलिये तुम्हार वंश मैं सब मनुष्य लक्ष्मी से युक्त होंगे यह महीनों में श्रेष्ठ महीना है जैसे पक्षियों में गरुड़, नदियों में गंगा इत्यादि हैं इसमें निराहार रहकर दूसरे दिन प्रातः उठ स्नानकर इन्द्रियों को वशकर विष्णुका पूजन कर भगवान से प्रार्थना करे फिर आप भोजन करे लक्ष्मी जी यह वर देकर अंतर्धान होगई सयं ब्राह्मण धनान्य होकर पिता के घर गया। अध्याय ६२ ॥

इत्युक्त्वा कमला तस्मै वरं दत्वा तिरोदधे ॥ सोपि विप्रोधनी भूत्वा पितुर्गेहें समागतः ॥ ४२ ॥ -- कामदा। मलमास के शुहा पक्ष की एकादशी को कामदा कहते हैं कलियुग में एकादशी संसार के बंधन को छुड़ाने वाली है ॥ ४॥ अध्याय ६३ ।। इतवार, मङ्गल. संक्रान्ति में सदा एकादशी व्रत करने योग्य है क्योंकि पुत्र, पौत्र की चढ़ाने वाली है ॥ ५॥ स का व्रत विष्णु के प्यारे भक्त को कभी त्यागने योग्य नहीं है धयोंकि यह नित्य ही आयु, यश, पुत्र, आरोग्य, द्रव्य, मोक्षं राज्य को देती है । हे राजन् ! जो नित्य श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त एकादशी प्रत को करते हैं वे मनुष्य जीवन मुक्त और विष्णु रूप, निस्संदेह दिखलाई देते हैं ॥६॥७॥ एकादशी व्रतं क्वापि न त्याज्यविष्णु वल्लभैः । आयुः कीर्तिप्रदं नित्यं संतानारोग्य वित्तदम् ॥ ६ ॥ मोक्षदं रूंपदं राज्यं नित्यमेंकादशी व्रतम् । ये कुर्वति महीपाल श्रद्धया परमायुतः॥ ७ ॥ यथोक्त विधिना लोके ते नराः विष्णुरूपिणः । जीवन्मुक्तास्तु भूपाल दृश्यते नात्र संशयः ॥ ८ ॥ संबं मनुष्यों को सब कामनामों की देने वाली है क्योंकि एकादशी पवित्र पावन है व्रत रखने वाला दसवीं के दिन कांस, मांस, मसूर, चना, कौदौं साग, मधु, पराया अन्न दूसरी बार भोजन, मैथुन यह वस्तुवे छोड़ देवै, जुआ खेलना, क्रीडा, नींद, पान, दतून, पराया कलंक, चुगुली, चोरी, जीपमारना, मैथुन, क्रोध, झूठ वचन यह सव एकादशी में त्याग देवे । कांसा, मांस, मसूर, नोट-कहिये पापियों को अब कौन भय रहा जो वह पापसे उरें चाहे जितनी. चोरी, रिश्वत जारी इत्यादि नीच से नीच कर्म कर.केवल एक दिन जाकर स्वयं .या वेवशी से व्रत करले सारे पाप छूटकर लक्ष्मीजी सक प्राप्त होगी परन्तु न जाने आज कल लक्ष्मी जी सोगई हैं या विष्णु की आज्ञाकारिणी नहीं रही जो माज कल प्रायः एकादशी के व्रती बहुत कम धनवान दिखाई देते हैं । .

( ८७ )
तेल, झूठ बोलना, कसरत, परदेश जाना, दूसरी बार भोजन, मैथुन, बैल की
पीठ, पराया अन्न, लोग यह द्वादशी को छोड़ देवे ! हे राजन् ! इस विधि से
जो कामदा के व्रत को करते हैं वे परम गति को प्राप्त होते हैं।
एकादशी जागरण माहात्म्य ।
जो मनुष्य आनन्द समेत निद्रा रहित जागरण करता है उसके सय पाप
छूट जाते हैं जो जागरण में भगवान के आगे नाचता नहीं वह सात जन्म
लंगड़ा होता है।
यो न नृत्यति मूढ़ात्मा पुरतो जागरेहरेः।
पंगुत्वं तस्य जानीयात् सप्तजन्मानि बाडव.॥ ४०॥
जो नाच गा कर जागरण करता है वह ब्रह्मा और विष्णु के पद
को पाता है जिन मनुष्यों ने करोड़ जन्म पाप किये वे जागरण के कारण रात्रि
में नाश हो जाते हैं । काम, अर्थ, संम्पदा, पुत्र, यश आदि द्वादशी के जागरण के
विना दश हजार यज्ञों से भी नहीं मिलते । चलते हुए मनुष्य के पैरों से जो धूलि
के कण गिरते हैं उतने ही,हजार वर्ष. जागरण करने वाला स्वर्ग में बसता है।
ब्रह्महत्या के बराबर पाप जागरण से नाश हो जाते हैं । अध्याय ३७ ॥
यत्किंचित्किं यतेपापं कोटिजन्मनि मानवैः ।
श्रीकृष्ण जागरें सर्व रात्रौ नश्यति बाडवं ।।
कामार्थोसंपदः पुत्राः कीर्तिलोकाश्वशाश्वता!
यज्ञायुतैर्नलभ्यन्ते द्वादशी जगरं विना ॥ ४७ ॥
यावत्पदानि चलति केशवा यतनं प्रति ।
अश्वमेधसमानि स्युः जांगरार्थं प्रगच्छतः ॥ ४६ ॥
पादयोः पतितं यावंद्धरण्यां पांशुगच्छताम् ।
तावद्वर्षसहस्राणि जागरो. वंसते दिवि ॥ ५०॥
यानिकानि च पापानि ब्रह्महत्या समानि च ।
कृष्णाह जागरात्तानि विलयं यांति खंडशः ॥ ७१॥

एक ओर श्रेष्ठ दक्षिणाओं से समाप्त हुये सब यज्ञ और एक ओर भगवान् का प्यारा उन्हींका जागरण, काशी, पुष्कर, प्रयाग, नैमिषारण्य, गया, शालिग्राम का महाक्षेत्र, अर्वदारण्य पुष्कर, मथुरा सय तीर्थ, यक्ष, चारों भेद, यह सब भग- वान् के जागरण में प्राप्त होते हैं। गंगा, सरस्वती, ताप्ती, यमुना, शतदुकी, चन्द्रभागा, घिशसता-यह सब नदियां भी जागरण में पहुँचती हैं । तालाब कुंड सब समुद्र मी एकादशी में कृष्ण के जागरण में नाचते गीत गाते वीणा बजाते हुये. प्रसन्न करते हैं उनकी देवता लोग वांछा करते हैं। विष्णु के बराबर कोई देवता नहीं द्वादशीके वरावर कोई तिथि नहीं इसके व्रत करने से अक्षय फल होता है। अंब कुछ अन्य व्रत माहात्म्य भी सुन लीजिये। त्रिस्पृशावत। नारदजी ने महादेवजी ले कहा कि आप निस्पृशा नाम व्रतको कहिये । जिस के.सुनने से मनुष्य कर्म बंधन से क्षणमान में छूट जाता है, यह सुन महादेवजी ने कहा कि सब पापों के सम्ह महादुःखों के नाश करने वाला निस्पृशा नाम व्रत सुनो । शास्त्र. पुराणादिक, यज्ञ कोटियों तीर्थ, अनेकवतों के समय और देवताओं के पूजन से मोक्ष नहीं होती। इस लिये देव देवने यह चैष्णवी तिथी मोक्ष ही के लिये दिखलाई है। पद्म अध्याय ३४ ॥ मोक्षार्थे देवदेवन दृष्टो वै वैष्माचीतिथिः ॥ ७ ॥ कलियुग में ब्राह्मण साव्य को कठिनता से जानते और, इन्द्रियों का वश में करना ओर मनको जीतना महाकठिन है। इसलिये कामी ध्यानको धारणा ले धर्जित मनुष्य निस्पृशा के व्रत करने से ही मोक्षको पाते हैं । कामभोगप्रसक्तानां त्रिस्प्पशा मोक्षदायिनी ॥ १२ ॥ नोट-इससे प्रथम तो यह कहा था कि एकादशी के समान कोई व्रत नहीं। अब यह कहा कि द्वादशी के समान कोई तिथि नहीं इसमें भगवान् के पूजन की विधि में नाचने से साक्षात् ब्रह्मा, विष्णु का पद प्राप्त होता है और यदि न नाचे तो सात जन्म लंगड़ा होता है या इससे पढ़कर और भी. कोई अचम्भे की बात है?

+ कार्तिक के शुक्ल पक्ष में लोगधार या धुभयार के दिन निस्पृशा हो तो कारोह पापों को नाश करने वाली होती है। इस प्रत के करने से हत्यायुक्त महादेष के हाथ से. कपाल गिर गया, कलियुग के करोड़ों पाप समूहों से गङ्गा देवी छूट गई पाहूवीर्य की आठ हत्या शतायुध को क्षण मारे की हत्या, इन्द्र की नसुधि ले उत्पन्न हरया इस त ले जाती रही। हनादबारकालं तु तरक्षणापतितं मुशि ॥ १४ ॥ कलिकल्सर कोट्यौधेर्मुक्कादेवी त्रिपागा ॥ १५ ॥ हत्याष्टो पाहुवीर्यस्या पूर्वजाला महामुने । मताभृगूपदेशेन निस्पृशासमुपोषणात् ॥ १६ ॥ जो जन इस व्रत को नहीं करने पह प्रयाग, काशी, गोमती, सणामी के समीप में मरने से भी मोक्ष को नहीं पाने क्योकिल में स्नान करने से शा. श्वती मुकि होनी है और निष्पृशाबत के करने से कामभोग से युक्त भी मनुष्य घर ही में मुलि पाता है। न प्रयागे न काश्यां तु गोमस्या कृष्णसन्निधौ । मोक्षो भवति विप्रेन्द्र त्रिस्पृशा यदिनो कृता ॥ २० ॥ रहेपि जायते मुक्तिस्त्रिस्पृशां मोक्षदायिनीम् ॥ २१ ॥ यह सुन नारदजी के फिर पूछने पर महादेवजी ने कहा कि प्राची सर- स्वती के तर गङ्गा ने श्रीकृष्ण महाराज से कहा कि कलियुग में करोड़ों प्रम- हत्यादिक पापों से युक्त मनुष्य हमारे जल में स्नान करते हैं उनके सैकड़ो पाप दोषों से हमारी देह कलुफ्त है वह पाप किस प्रकार से जायें। तंग श्रीकृष्णजी ने कहा कि तुम रोदन न करो हमारे सम्मुख माची देवी है और सरस्वतीजी यह रही है । इसमें नित्य स्नान करने से पवित्र हो जाओगी, क्योंकि मैं यहां निस्सन्देह सैकडो तीथौँ और देवताओं से युक्त बसता, यह स्थान मेरे प्रिय पवित्र और करोड़ हत्या का नाश करने वाला है इसको मैं तुम को देता है क्योंकि तुम मेरे प्राणों से अधिक प्यारी हो। 1. ब्राह्मण को मारना, मदिरा पीना, गौ और शुद्र की प्री का बध करना, प्राण का द्रव्य छीन लेना, माता पिता का सत्कार न करना, कुम्हार के चाक को छूना । गुरुजी से .वैर करना । जमक्ष भोजन करना इन सब पापी

करने से प्राची सरस्वती में हमारे साग एक बार नुम लान करो पाप से
होन हो जाओगे।
चक्रियानादगुरुद्रोहादभक्ष्यस्य च भक्षणात् ।
सर्वपापस्य करणात् प्राचीब्रह्म सुतासुतो ॥ ३४ ॥
व्यपोहयति पापानि सकृत्स्नानेने मेग्रतः ।
कुरुस्नानं सरिच्छे ष्टे विपायात्वं भविष्यसि ॥ ३५ ॥
यह मुन गहा ने कहा कि मैं नित्य आने में असमर्थ अब मेरे पाप
कैसे नाश होंगे इसको आप कहिरे । अच्छा तो मैं और उपाप कहना।
क्योंकि तुम मेरे चरण से उत्पन्न हो सरस्वती से अधिक सौ करोड़ तीर्थों से
अधिक फगे यह, व्रत, दान, जप. होन से अधिक धर्म. अर्थ काम. मोक्ष
फल की देने वाली सारश्योगसे भी अधिक कल्याणयुक्न निस्पृशाको को ३८
सरस्वत्यधिकाया व तीर्थकोटिशताधिका ।
मखकोट्यधिकारापि तदानाधिकाचया ॥ ३८ ॥
जपहोमाधिकायोर चतुर्वर्गफलप्रदा ।
सांख्ययोगाधिकायाच विस्पृशा क्रियतां शुभा ॥ ३६
तब कृष्ण महाराज ने कहा कि एकादशी द्वादशी बंधी हो और कुछ
रात्रि रहे जो प्रयोदशी भी हो जाये वह त्रिस्पृशा जानने योग्य है और दशमी
युक्त एकादशी को करने से करोड़ अन्न का किया हुआ पुप्य और पुत्र नाश
हो जाते हैं और अपने पुरुषों को स्वर्ग से नरक रोख आदि में डाल देता है।
ऐसे अपराध को में नहीं मना करताईनर गाजी बोली कि हे अगन्नाथ !
भाप के वचन से निस्पृशा को मैं रूसंगी और आप ही की आज्ञा से सब पापों
से छूट जाऊंगी। पयाँकि कराड़ा तीर्थ करने से जो फल मिलता है वह एक
त्रिस्पृशा के मत से मिलता है।
करिष्येहं जगन्नाथ ! निस्पृशां वरनातव ।
सर्वपापविनिर्मुक्ता भविष्यामि तवाज्ञया ॥ ५५ ॥
तीर्थकोटिषु यत्पुण्यं क्षेत्रकोटिपुयत्फलम् ।
तत्फलं समवाप्नोति निस्पृशा समुपोषणात् ॥ ८ ॥

जो मनुष्य भक्ति से इसको करता है उसको हजार मन्यन्तर काशी जी में गंगा के स्नान करने से जो फल होता है वह इस निस्पृशा के करने वाले को होता है । करोड़ वर्ष प्राची सरस्थती और यमुना के स्लान से जो फल मिलता है वह इस प्रा के करने वाले को मिलता है कुरुक्षेत्र में करोड़ सूर्य- ग्रहण में स्नान सोने के सौ भार दान करने से जो फल है यह निस्शा के करने सं भी है। करोड़ हजार पाप, करोड़ सैकड़ा हत्या एक ही व्रत से नष्ट हो जाती हैं यह निस्पृशा का पता नहीं गति होपालों को गति देने वाला है। जिन्होंने सैकड़ों भारी पाप किये हैं यह भी गति की इच्छा नहीं करते हैं । कलियुग में पिस्पृशा को प्राप्त होकर जो अयम मनुष्य नहीं करते हैं उनके जन्म का फल और जीना निकला है ।। ८६, ८७, ८६.९०,६४ पापकोटिसहस्राणि हत्याकोटिशतानि च ॥ एके नैवोपवासेन क्रियते भस्मताद्रुतम् । निस्पृशाया व्रतं यत्तु अगतीनां गतिप्रदम् ।। गतिमिच्छति विप्रर्षे महत्पापशतानि च । स्वयंकृष्णेन कथितं पाराशरयस्य चाप्रतः ।। कलौ ये निस्पृशां लब्ध्वा न कुर्वति नराधमाः । तेषां जन्मफलं चैत्र जीवितं विफलं भवेत् ।। उन्मीलिनी व्रत । महादेव ने नारद से कहा कि जब दिन रात एकादशी हो और सबेरे एक घड़ी हो (द्वादशी भेदी)यह उम्मीलिनी बत जागना चाहिये यह विशेष कर नोट-पण्डित जन.ही हमारे इस विचार से सहमत हो सकेंगे कि दुराग्रहियों से तो कुछ आशा नहीं। १-आपका यह अटल सिद्धान्त है कि "नहिपङ्कन पामः" अयात कीचड़ से कीचड़ नहीं घुलती तब यह किस प्रकार हो सकता है कि जो गङ्गा स्वयं अपने पार छुहाने का यल दृती फिरे पर दूसरों को निप्पार करे। -यह कि जल जाहै न कि चैतन्य और प्रवाशालिनी होली से इसका नाम गंगा है तय किस प्रकार अल ने ऐसी बाते की जो किया ससम्मर हैं ...... ( २ ) भगवान् को प्रिय है। तीनों लोकों में जो तीर्थ पवित्र स्थान, यश, धेयः तपस्या वे उन्मालिनी के करोड़वे मार्ग से रावर नहीं। अध्याय ३५॥ त्रैलोक्ययानि तीर्थानि पुण्यान्यायत्नानि च कोट्यशे नैव तुल्यानि सखा वेदास्तपांसि च ॥३४॥ सके समान कोई न हुआ है न होगा प्रयाग, कुरक्षेत्र, काशी, पुष्कर हिमांचल पर्वत भेरु, गंधमादन, नील, निषध, विन्ध्याचल पर्वत, नैमिशारण्य, गोदावरी, कावेरी,.चाद्रभागा, वेदिका, तापी, पपौणी, क्षिप्रा, धदना, चर्मण्वती, सरयू, गण्डक, गोमती, धिपापा..महानदी, शोण यह सब उन्मीकिनी के यरायर नहीं हैं मैं कहाँ तक फहूँ इसके समान कोई नहीं जैसे भगवान के समान कोई देवता नहीं। उन्मीलनीलम किंचित् नः भूतं न भविष्यति। प्रयागेन कुरुक्षेत्र काशी न च पुष्करः ॥ ३५ ॥ घोदावरीन कादरी चन्द्रमागान वेदिका । न तापनि पयोष्णीच न क्षिप्रा नव चंदना ॥३७॥ चर्मरावती व लत्युश्चन्द्रभागा न गंडिका। ३-पाप पुण्य अच्छे और बुरे कामों का फलं हैं और इनकी निवृत्ति भोग से ही हो सकी है परन्तु पुस्तकनिर्माता ने अपने विचार में पाप पुण्य को द्रभ्य मान दर्शन शास्त्रों के विक्षच न जाने किस प्रकार यह असम्भव लेख लिख दिया कि गङ्गा कहती है जो.पापी मुझ में आकर स्नान करते हैं उन से मैं भी दूपित हूं यदि यह बात सत्य है तब.तो इस प्रकार आप के सब उपाल्य देव दूषित हो गये ।। ४-जब गङ्गा को पापनिदाणार्थ निस्पृशा नत बताया तो हमारे सनातनी भाइयों को चाहिये कि आजस गङ्गा स्नान छोड़ निस्पृशा को ही प्रत करें योफि विवारी गली को पापिनी बना उसको दुःख देते हैं परन्तु जब त्रिस्मशा में बहुरों से पाप इकट्ठे हो गये तो न जाने वह विचारों किसका प्रत. इती और करती फिरेगी इससे भी बढ़कर पिःणु महाग्रत का गहा के लिये असम्भव और बालधु- दिली यह उपाय कि हे अतू सरस्वती में स्नान कर जिस से तू अवश्य पवित्र हो जावेगी दुद्धिमान सजन जन ध्यान पूर्व विचार F::

गोमती च विपाशा ज शोणल्यश्च महानदः ॥ ३८॥ किमत्र बहुनोक्न भूयो.२:नराधिप । उन्मीलनी लमं किंचिन्न देवः केशवात्परः ॥ इस व्रत के करने से पाप समूह का क्षणमात्र में नाश हो जाता है जिस मास में उन्मीलिनी यंत तिथि हो उसी महीने के नाम से गोविन्य जी की यल पूर्वक पूजा करे और मास के नाम से भगवान् की सोने की मूर्ति बनावे और पवित्र जल, पंवरल, वंदन फूल अक्षत और मालाओं से युति कलश को स्थापन करें और बन्धन, जल, गेहूँ, वर्तन अनेक रलो से संयुक मल्लिका और मेली के फूलो से पूजन करे । दो कपड़े, अनेक दुपट्टा जूता इत्यादि सय, निवेदन करे और सोने से खींग-मदी चांदी के खुर, तांबे से: पीठ फासे की- दोहनी एल की पूंछ वाला अछड़ा और गहनों से युक्त गऊ गुरुजी को देवे धूप दीप नैवेद्य फल इत्यादि को मन्त्री सहित इथे । फिर विष्णु भगवान के घरण गुह्यपति, गुहाइन्द्रिय इत्यादि सर्व मूर्ति को अहं पूजन करे और फिर विधि पूर्वक अर्घ देखे और कई कि हे सुखमण्य | तुम्हारे अंर्थ नमस्कार है मुझको शोक है मोह महापाप सागर से सार कीजिये और हमारे पुरुष कुयोनि में प्राप्त था पाप से मृत्यु के पशः में मास हैं उन को प्रेत लोक से. उद्धार कीजिये मैं आपके आधीनई मेरी भक्ति अचल हो और फिर आती करे कपड़े गोदान:गुरु जी, को.. दे. और दिन हर्म करके ब्राह्मणों के साथ मोअन करे इस विधि से जो इस मत को करता है वह करोड़ हमार कल्प श्री विष्णु जी के समीपं बसता है। अनेन, विधिनायस्तु कुर्यादुन्मीलनी बतम् । कल्पकोटिसहस्राणि बसते विष्णु सन्निधौ ॥ ५८ ॥ जयन्ती बतः।। पद्मपुराण चतुर्थ-ब्रह्मखण्ड-अध्याय ४ में लिखा है कि जयन्ती प्रत से जो धिमुख रहता है यह सब धर्मों से छूट फर निश्चय नरकको जाता ..३८,u., on जयंत्यामंपवासेनः योनरापराङ्मुखः । ... सर्वधर्मविनिर्मुको यात्यसो नरक ध्रुवम् ॥ ३८ ॥ -- और जीवत करता है उसके घरमें भाग्यहीनता, विधवापन, लड़ाई और सम्तान का विरोध और धनका नाश नहीं होता ४१॥ नदीर्भाग्यं न वैध्यव्यं न भवेत्कन्नहोरहे। सततेन विरोधं च न पश्यति धनचयम् ॥ ४१ ।। जितने तीर्थ प्रत और नियम है वे जयन्ती केतकी सोलहवा कलाको भी नही पाते ४४॥ यानि कानि च तीर्थानि बूतानि नियमानि च । जयन्ती पासरस्येवः कलां नाइति पोडशीम् ॥ १४ ॥ भगवानकी प्यारी जयन्ती आधारहीनता कुल भ्रष्टता यश हीनता और पुरी योनिमें उत्पन्न हुए पापको शोध हो नाश कर देती है ॥ ७ ॥ भाचारहीनं कुलभ्रष्टं कीर्तिहीनं कुपोनिजम ॥ नाशयत्पाशु पापंच.जयंती हरिवल्लभा॥ ४६॥ जयन्ती में प्रत करने वाला मेरुपर्वत के बराबर माइत्यादिक सब पापीको जला देता है॥४॥ : मेरुतुल्यानि:पापानि ब्रह्माहत्यादिकानि च । सनि हति.सर्वाणि जयन्त्यां समुपोषकः ॥ ४८ ॥ जयन्ती में प्रत करने रारा, पुत्रको छायाला, पुषको धनको कामना पाला, धन और मोक्षवाला मोसको पाला॥१९॥ पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् ।. मोक्षार्थी लभते मोष जयस्वां समुपोषकः ॥ ४६ ॥ जयन्ती के स्मरण और कीर्तन करने से सात अन्मठे किये पापों को जला देती है किर व्रत करने वालोंके पुण्यका क्या कहना है ।। ५.॥ नोट-प्यारे भाईयो विचारो और सोचो तोही.कि अब भी आपको कुछ इसमें संदेह रहा कि पुराणों में एकको दूसरा छोटा बना रहा है या तीनों लोको जो तीर्थ, पवित्र स्थान यह, वेद हैं.बह उम्मीलिनी के करोड़वं भाग के बराबर नहीं कि जिसके करनेसे करोग लार करप श्रीविष्णुजी के समीप बस सारे पापों से छूट जाता है।

(६५)
स्मरणास्कीर्तनात्पापं सप्तजन्मार्जितं मुने।
जयन्ती दहते तच किं पुनः सोपवासकृत ॥ ५० ॥
भादोंमें जन्माएमी, चैत्र कृपक्षमै शुमकारिणी नवमी, फाल्गुणमें कृष्णपक्ष
की चतुर्दशी, शाल शुरूपक्ष चतुर्दशी कुवार में दुर्गाष्टमी और शुक्लपक्ष की
थषणयुक्त द्वादशी यह ६ महापुण्यकारिणी शुभ देनेवाली जयन्ती कहाती हैं।
जगन्ती बरकरनेवाका दिन २ में हमार मौके देने के फलको प्रास होता
है सो कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण में बजार भार सोना देने, हजार करोड़ कन्याओं के
दान, समुद्र पर्यन्त इस पृथ्वी के देने से और जो माता, पिता और गुरुओं की
भक्ति और तीर्थसंवा और सत्यवत-पालों को और गङ्गा, यमुमा और सरस्वती
के जलस्नान करने से जो पुण्य है। जिसको सहस्रनाइ, कर्ण, बुद्धिमान कुमार,
सगर. दिलीप. रामचन्द्र, गौतम, गार्य, पराशर वाल्मीकि और साधु द्रौपदी के
पुत्रने पूर्व समय में किया था।
क गवां सहलं तु यो ददाति दिने दिने ।
ततलं समवानोति जपन्त्यां समुपोषणे ॥ ६ ॥
हेमभारसहस्र तु कुरु रवियो ।
तकलं संमत्रानोति जयन्त्यां समुपोषणे ॥ १० ॥
कन्धाकोटि सहलाणां दाने भवति परफलम् ।
तरूलं समवाप्नोति जयन्त्यां समुपोषणे ॥ ११ ॥
ससागरमिमा पृथ्वी दत्वा यल्लभते फलम् ॥
तत्फलं समवानोति जयन्त्यां समुपोषणे ॥ १२ ॥
मातापित्रोर्गुरुणां च भक्तिं युक्तः करोति यः।
तत्फलं समवाप्नोति जयन्त्यां समुपोषणे ॥ १३ ॥ .
भपदाहरणार्थाय तीर्थसेवा कृतात्मनाम् ।
सत्यत्रतानां यत्पुण्यं सारस्वते जले ॥
स्नात्वा पुण्यमवामोति जयन्त्यां समुपोषणे ॥ १४ ॥

7 तुल्साष्टमी। एसपुराण पतुर्थ ग्रहाखण्ड अध्याय १३ में लिखा है जो मनुष्य भक्ति से कृष्णा जन्माष्टमी के प्रतको करता है यह करोड़ कुलसे युक्त होकर सात में विष्णु जी के पुर को प्राप्त होता है। बुधवार या सोमबार में रोहिणी नक्षत्र युक्त अष्टमी करोय कुलों को मुक्त कर देती है । महापापी भी पाप से घटकर हरिके स्थानको जाता है। जो अधम इस व्रत को नहीं करता षह इस लोक में दुम्ली रह भर कर नरक में जाता है और जो मूर्खा श्री प्रति वर्ष इस व्रत को नहीं करती थ, भयं- कर नरक में जाती हैं यह रात सत्य मामनी चाहिये कि जो ना पुरुष इस मत के बिन भोजन करता है वह महा नरकों में जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी. ब्रह्मभक्तया करोति या नरः। अंते विष्णु पुरं याति कुलकोटियुतो द्विज ॥ २ ॥ अष्टमी बुधवारे च सोमे. वैव हिंजोत्तम । रोहिणी संयुक्ता कुलकोटिविमुक्तिदा ॥ ३ ॥ महापातकसंयुक्ता. करोति व्रतम् त्तमम् । सर्वपापविनिर्मु कश्चोते याति हरेयहम् ॥ ४ ॥ कृष्ण जन्माष्टमी ब्रह्मन्नकरोति नराधमः । इहदुःखमवाप्नोति स प्रेत्य नरकं ब्रजेत् ॥ ५ ॥ न करोति च या नारी कृष्णाजन्माष्टमी व्रतम् । वर्षे वर्षे तु ला म दा नरके याति दारुणम् ॥ ६ ॥ जन्माष्टमी दिने यावे नरोऽाति विम ढधीः । महानरकमश्नाति सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ७॥ पूर्व समय में दिलीप राजा ने श्रीमान पासिष्ठजी से सर्व पाप नाशक प्रत को पूंछा था। तब उन्होंने कहा कि एक समय में पृथ्वी कसादिक राजाओं से पीड़ित होकर महादेवजी के पास रोती हुई गई - जिल को देख. महादेव देवता के साथ ब्रह्मा के समीप गये और वहां जाकर कंस के मारने के कारण को कहते हुएं ! तंब ब्रह्मा समेत सब विष्णुजी के पास गये और संपने स्तुति की । तय विष्णुजी ने कारण पूछा तव बालाजी ने कहा कि महादेवजी के घर से कंस से पृथ्वी पीड़ित होकर दुःखी हो रही है और महादेवजी से कंसने यह पर माँग लिया है किभानजे के बिना मेरी मृत्यु न हो इस लिये आप गोकुल जाकर कंसके मारने के लिये देवजी के पेट में जन्म लीजिये तब विष्णु ने महादेवजी से कहा कि पार्वती को दीजिये यह एक साल रह कर चली आवेगी तब महादेवजी और पार्वतीजी ने मधुरा की यात्रा की और भगवान् ने देवकी, पार्वतीजी ने यशोदा के पेट में नव मास नव दिन रह कर भादों की कृष्ण पक्ष की अटमी तिथि रोहिणी नक्षत्र युक्त बाडदेवजी के.आप पुन और गन्दी की मी वैराठी यशोदा जी कन्या को उत्पन्न करती हुई उस समय बजुदेव को आनन्द हुआ तब देवी ने कहा कि आप यशोदाजी के समीप जाकर पुत्र को देकर कन्या ले आओ उन्होंने ऐसाही किया फिर कंस को खबर मिली कि देवक्रीजी के कुछ उत्पन्न हुआ है दूत आरे और छल से कन्या को कंस को देते हुए तब उसने राक्षसों से कहा कि इसको शिला पर पटक दो उन्होंने ऐसा ही किया नब वह गौरी रूप पन्या ने महादेव के समान चल कर कहा कि कंस का मारने वाला नन्द के यहां छिपा हुआ है तब कंस ने पूतना से कहा कि तुम नन्द के यहां जाओ और कपट से पुधको मार कर चली आओ वह गई दूध पर विप लगा कर पिला आपही यमपुर को चली गई । श्रीकृष्णाजी शकटासुर, तृणावर्त आदि को मार काली को दमन कर मथुगा को चले गये वहां जाकर कंसादि को मारा । यह कृष्ण के जन्म के दिन का व्रत फहा इसके सुनने से पाप नाश हो जाते हैं । जो रो पुरुष इस व्रत को करता है वह यथेष्ट अतुल फल को पाता है। प्रथम महाराजा चिन तेन नामह जो महापाप परायण महान् अगम्या गमन फर ब्राह्मण के सोने को चुराने वाला मदिरा से सदैव तृप्त और वृथा मांस में रत इस प्रकार पाप में युक्त होकर नित्य ही प्राणियों के मारने में रत होकर चांडाल और पतितों के साथ सदैव वार्तालाप करने थे। वह शिकार को गये और व्याघ्र, को देख कर फौज से कहा कि मैं ही इसको मारूंगा राजा पीछे पड़ा वह भागा राजा भंज न्यास से व्याकुल यमुना के किनारे जाता हुआ उस दिन कृष्ण की जन्माप्रमी रोहिणीयुक्त थी। पिपासाकुल क्लेशः संध्या यमुनातटे ॥... अष्टमीरोहणीयुक्ता तदिनं जन्मवासरम् ॥

प्रातः युमनों जी में कन्यायें व्रतं करती भई अनेक प्रकारको भेंट द्रव्य आदि
पूजन करती हुई बहुत गुण वाले अन्तको देखकर राजा का मन भोजन करने
को हुआ और स्त्रियों से कहा अन्नके चिना मेरे प्राण निवले जाते हैं तब त्रियां
बोली कि हे पाप रहित राजा जन्माष्टमी में आपको भोजन न करने चाहिये जो
कृष्णजी के जन्म में अन्नका भोजन करता है वह गीध, गधा, कौवा और गऊ के
माल को निस्संदेह भोजन करता है ॥ ६ ॥
जन्माष्टम्यां हरेराजन्नभोक्तव्यं त्वया न च ॥
गृधमांसं खरं काकं गोमांसमन्नमेव च ॥७६ ॥
सेलार में उत्पन्न होनेवालों के अनेक छिद्र होते हैं जिन्हों ने जयन्ती का व्रत
न किया उनको यमराज के यहां इप्ड मिलता है और उसके दिये हुपको पितर
प्रश नहीं करसे जयन्ती में भोजन करने से सव पितर गिरा दिये जाते हैं यह
सुन राजा ने व्रत किया झुछ फल चन्दन कपड़ा लेकर प्रसन्न होकर इस व्रत में
युक्त होता भया और तिथि और नक्षत्र के आदमें पारायण करता तो चित्रसेन
राजा इस व्रतके प्रभाव से पितरों समेत सुन्दर विमानपर चढ़कर भगवान् के
स्थान को जाता भया जो फल मथुराती में जाकर कृष्ण जी के सुखरूपी कमल
के दर्शन करने से मिलता है वह फल कृष्णजी की जन्माष्टमी के व्रत से पुरुषको
प्राप्त होता है और द्वारका साकर संसार के ईश्वर भगवान्के दर्शन करने से.जो
'फल मिलता है वह फल दोनों को कृष्ण जन्माष्टमी व्रत करने से मिलता है।
यत्फलं द्वारकां गत्वा दृष्टेः विश्वेश्वरे हरौ।
वकलं प्राप्यते दीनैः कृत्वा जन्माष्टमी व्रतम् ॥८५.।।
।
शिवरात्रि व्रत ।
( शिवपुराण ज्ञानसंहिता अध्याय ७.)
विष्णुजी महाराजने शिवजी से पूछा कि आप कौनसे व्रतसे संतुष्ट होते हैं
'तब शिवजीने कहा कि लवले श्रेष्ट शिवरात्रि व्रत है जिस. का फल दशसहन
वर्षमें भी पूर्ण नहीं कह सकते हो जो अनादर से भी करता है उनकोभी निस्संदेह
मुक्ति प्राप्त होती है।
फलं क्तु न शक्येत वर्षाणामयुतैरपि ॥ १०८ ॥

अनादरतया घे? कृतं व्रतमनुत्तम् । तस्यैव मुक्तिबीजं च.जातं नान विचारषा ॥ १०६ ॥ .. इतिहास अध्याय ७५ में लिखा है कि उजैन नगरी में वेदका जानने वाला एक ब्राह्मण जिसकी पतिव्रता स्त्री थी। जिसके दो पुत्र थे । एक धर्मात्मा और दूसरा पुष्टन्य- सन में लगा हुआ था। पिताको एक अंगूढी राजाके यहां से मिली जिसको उस ने स्त्री को देदी उसने घरमें रखदी दुष्टात्मा पुत्र उसको चुराकर लेगया जो वेश्या को जाकर दे आया जिस को धारणकर वह राजसभा में नाचने को गई राजा ने अपनी अंगूठी देखकर सब वृत्तान्त जान पण्डितजी से कहा उन्होंने घर जाकर कहा लाचार होकर वेदनिधिको घरसे निकाल दिया, उसने इधर उधर बहुत दिन व्यतीत किये एक दिन उसको शामतक भोजन नहीं मिला उस दिन लोकपालनी शिवरात्रि थी कोई अनेक प्रकार की सामग्री लिये शीघ्रता के साथ शिव मन्दिर में जा रहा था वेदनिधि उसको देख भोजनों की इच्छा से उसके पीछे २ गया तहां मन्दिर में और लोग भी पूजा कर रहे थे वह भोजनों की इच्छा से रात्रि में जागरण करता रहा । इधर उन सबने पूजा कर नृय आदि से निवृत्त हो सो रहे । वेदनिधि उनको सोता देख भोजनों की इन्छा से धीरे २ शिवजी के निकट आया जहां दीपकों का प्रकाश मन्द २ हो रहा था जिससे वह अन्नादि अच्छे प्रकार दृष्टि नहीं आता था इस लिये उसने अपनी पगड़ी फाई कर बत्ती. बना अन्न के लिये बत्ती को प्रज्वलित किया इस से अन्धकार दूर हो गया तब अन्न को ग्रहण कर वह होले २ वहां से चला तो सोते हुये पुरुषों के पैरों पर पैर पड़ गया जिस से वह जाग गये और कहने लगे यह कौन चोर है तच मारे डर के यह भागा राजा के सेवक चौकीदार उसके पीछे दौड़े यह दौड़ा तब उन्होंने बाण छोड़े जिससे वह गिर पड़ा और मृतक हो गया परन्तु अशान से उसको व्रत और रात्रि में जामरण भी होगया ॥ ३७॥ पतितश्च कृतः सो अयतापृषिसत्तम ? | अज्ञानतो व्रतं जातं रात्रौ जागरणं तथा ॥ ३७॥ शिवशङ्कर की कृपा से यमराज के दूत आ गये और शिव के गण भी आये दोनों में झगड़ा हुआ शिवगणों ने कहा कि तुम किस प्रकार से आये इस

(१००)
यो दण्ड क्योकर हो सकता है। उन गणों ने कहा शिव भगवान् के भक्त तुन
यहां कैसे आये यम के गंण बोले जन्म प्रभृति इसने पाप ही किया है पूजन तो
बहुत थोड़ा है॥४॥
जन्मप्रभृति पापं च पुण्यं तु ह्मणुमात्रकम् ॥ ११ ॥
शिवगण बोले इसमें पाप तो बहुत था परन्तु वह क्षण मात्र में शिव
बत और रात्रि के जागरण ले नत्म हो गया ऐसा विवाद करते हुये दोनों दूत
रामराजले पास गये।।
पापं बहुतरं चाऽऽसीद्भस्मसाद भवत्क्षणोत् ।
शिवस्पचन्नतेनैव रात्री जागरणेन च ॥ ४२ ॥.
इस्पेवं विवर्दतश्च धर्मराजं गतास्तदा ।। ४३.॥
यमराज ने उन दोनों के बचन सुन कर कहा कि अवश्य ही उसके पाप
शस्म हो गएसा कह कर यमराज ने उन शिव गणों को नमस्कार करनालण
को कालिंग देश का राजा फिया ॥४४॥
यमे नोक्तं च सत्यैव पापं च भस्मतां गतम् ।
नमस्कारं च तात्कृत्वा कलिंगाधिपतिं तदा ॥ १४ ॥
पिर उसने अपने राज्य में शिव पूजा और शिवरात्री व्रत और शिव
स्थानों में दीपक जलाने की आज्ञा देदी इस प्रकार करने से वह मुक्त होगया
इस प्रत का माहात्म्य तो देखो अनायाल ही करने से क्या उपरोक्त फल मिला
जो परम भक्ति से इस व्रत को करते हैं वह निस्संदेह परम भक्ति को प्राप्त
ये पुनः परमाभन्या कुर्वन्ति व्रत मुत्तमम् ।
ते लभन्ते पर मुक्तिं किं तत्र विस्मितः पुनः ॥ ४८ ॥
उसने कुंछ दीपक श्रेष्ठ बुद्धि ले नहीं किन्तु चोरी करने को जलाया था
तो पेसा हुआ जो जान कर दीपक वालो है वे सुन्दर परम पदको पाते हैं l
चौार्थे न सुधुद्धया भ दीपं तु कृतवान्नहि ।
ज्ञात्वा दीपं च ये कुर्युर्लभन्ते तंशुभं पदम् ॥ ४६ ॥

(१०१) इस कारण इस प्रत के समान दूसरा वत. पवित्र करने वाला कोई नहीं ॥ ५० ॥ आप के समान दयाल सेठी नगर चतुर्थी व्रत । भविश्य पुराण ० २१ में लिखा है कि जो चतुर्थी के दिन व्रत कर गणेश का पूजन करता है और ब्राह्मण को तिलों का दान कर आप भी तिलों का भोजन करे जो दो वर्ष तक धारण करे उस से गणेश जी प्रसन्न हो जाते हैं फिर किसी प्रकार का लंश नहीं होता मनो वांछित फल मिलता है असाध्य कार्य सिद्ध होते हैं सात जन्म वह राजा होता है । स्वामिकार्तिक स्त्री पुरुषों का लक्षण बना रहे थे उस में गणेशजी ने विघ्न किया उन्होंने शोध में आकर गणेशजी का एक दांत उखाड़ कर फेंक दिया और मारने को उद्यत हुये तब महादेव जी ने उनके कोप को शांत कर पूंछा कि तुमको क्योंकर कोप आया तब उन्होंने कहा कि मैं सी पुरुषों के लक्षण लिख रहा था उस में इन्होंने चिन्न किया तब महादेव जी ने कहा कि पंया तुम जानते हो कहो इस में पथा लक्षण ? तब कार्तिकेय ने कहा कि आप में ऐसा लक्षण है जिससे आप थोड़े ही दिनों में कपाल धारण करेंगे और संसार में आप फपाली प्रसिद्ध होंगे महादेवजी यह सुन कोवमें हो उसको पुस्तक को समुद्र में फैक अन्तान होगये फिर कुंछ काल के पीछे महादेव और ब्रह्माका विवाद हुआ तब महादेवजीने कहा कि हम बड़े हैं हमारी उत्पत्ति कोई नहीं जानता और तुम्हारा जन्म हम जानते हैं तब ब्रह्माका पांचवां मुख हँसकर बोला कि तुम्हारी उत्पति हम जानते है शिवको क्रोध आया अपने नावले उनका शिर काट अपने हाथमें ले जहां विगु भगवान् तय करते थे वहां चले गरे, इधर ब्रह्माने क्रोध किया तो उनके उसके उस कटे हुये. शिरसे एक अति क्रूरः पुरुष निकाला जो श्वेत कुण्डल धार विच पहिने धनुषवाण हाथ में लिये ब्रह्माजी ले बोला.कि क्या आज्ञा, उन्होंने कहा कि जिस ने मेरा शिर काटा है उसको मारदे उसको देव शिवजीने विष्णु से कहा कि प्रिशूलसे हमारी भुजाको भेदन करो उन्होंने ऐसा ही किया फिर तो उसमें से रुधिरको एक धारा निकली और छलकर कपाल में गिरी जब वह मर गया उसको शिवजीने तर्जनी अंगुली से. मथा तचं उसमें से रक्तवर्ण कवच पहिने अति भयङ्कर पुरुष निकला.और शिवजी से कहा कि क्या आज्ञा तब उन्होंने कहा कि ब्रह्माके भेजे हुये मनुष्यको मार दो निदान . ..

दोनोंका युद्ध होने लगा ओर बहुन कालतक हुआ परन्तु हारजीत किसी की नहीं हुई तब आकाशवाणी हुई कि युद्ध मत करी विष्णु महाराजने दोनों को समझाकर युद्ध समाप्त करा दिया और कहा कि भूमिका भार उतारने के लिये तुम दोनों सहित अवतार होगा भगवान् ने श्वेतकुण्डली सूर्यनारायण को और रक्तकुण्डली इन्द्रको सौपदिया और विष्णुके कहने से क्पाल महादेव जीने धारण किया और कहा कि जो फोई उस कपाल नत को धारण करेगा उसको कोई पदार्थ दुर्लम न होगा फिर शिवजीकी आज्ञानुसार कीर्तिकेयने वह गणेशका दांत देदिया जिसको धारण करते हैं और जो स्त्री पुरुप के लक्षण बनाये थे वह समुद्र में देदिये इसीकारण महादेवके कहने से उनका नाम सामुद्रिक हुआ। पण्डितजी-सेठजी अब हम मत माहात्म्य अधिक नहीं सुनना चाहते । सेठजी-मैं तो अभी आपने अनेकान व्रतों के माहात्म्य सुनाना चा- हता हूं अभी आपने इस विषय में बहुत ही कम सुना है तो भी मैं आपकी संज्ञा नुसार किसी नतके माहात्म्यको वर्णन करूंगा,देखिये श्रीमान् पण्डितजी यजुर्वेद अध्याय १४ म०३० में कहा है। (व्रतेन दी०) जब मनुष्य धर्मको जानने की इच्छा करता है तब सत्य को जानता है उसी सत्य में मनुप्यों को श्रद्धा करनी चाहिये असत्य में कभी नहीं। (व्रतेन. ) जो मनुष्य सत्यके आचरणरूपी व्रतको दृढ़तासे करता है तब वह दीक्षा अर्थात् उत्तम अधिकारके फलको प्राप्त होता है ( दीक्षयानोति०) जव मनुष्य उत्तम गुणों से युक्त होता है तब सब लोग सब प्रकार से उसका सत्कार करते हैं क्योंकि धर्म आदि शुभ गुणांसे ही दक्षिणाको मनुष्य प्राप्त होता है अन्य- था नहीं (दक्षिणा थ०) जब ब्रह्मचर्य आदि बताते अपना और दूसरे मनुस्यों का अत्यन्त सरकार होता है तब उसी में दृढ़ विश्वास होता है क्योंकि सत्य धर्मका आचरण ही मनुष्योंका सत्कार करानेवाला है (श्रद्धया०)फिर सत्य के आचरण में जितनी २ श्रद्धा चढ़ती जाती है उतना २ ही मनुष्य लोग व्यवहार नोट-पण्डितजी स्वयं विचार कीजिये यहां महादेवका त्रिकालदर्शी होना नष्ट होता है अधिक क्या कहें ब्रह्माने अपने कटे शिरले विष्णुजीने अपनी भुजाम महादेवले त्रिशुल लगवाकर एक २ मनुष्य उत्पन्न किया फिर दोनों में लड़ाई हुई पहिये श्रीमान् मनुष्य उत्पन्न करने के क्या २ दङ्ग हैं इसके उपरान्त सामुद्रिक माहात्म्य फैलाने के लिये यह कथा वनाईगई।

(१०३)
और परमार्थ के सुखको प्राप्त होते जाते हैं अधर्माचरणसे कभी नहीं। इसी के
अनुकूल पुराण कह रहे हैं।
श्रीमद्भागवत स्कन्द ११ अध्याय १७ में लिखा है कि जब
तक ब्रह्मचारी गुरुकुलमें रहे तब तक विषय भोग से बच अखण्ड व्रतको धारण
करे ॥३०॥
एवंवृत्तो गुरुकुले क्सेद् भोगविवर्जितः ।
विद्यासमाप्यते यावद् विभ्रद् व्रतमखण्डितम् ॥३०॥
मार्कण्डेयपुराण अध्याय ४१ में लिखा है कि ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य में
स्थित रहकर चोरी, लोभ और हिन्सा आदि का त्याग करे यह ब्रह्मचारी का
बत है।
अस्तेयं ब्रह्मचर्यश्च त्यागोऽलोभस्तथैव च ।
वूतानियञ्च भिचूसामहिंसा परमाणिवै ॥ १६ ॥
ऐसा ही लिलापुराण अध्याय २६ लोक २४ में लिखा है ।
अस्तेयं ब्रह्मचर्यञ्च अलोभस्त्याग एव च ।
बूतानियंचभिक्षणां अहिंसापरमात्विह ॥ २४ ॥
महाभारत उद्योगपर्व अध्याय ४४ में लिखा है कि जो मनुष्य ब्रह्म-
चर्य जन को पूर्ण रूप से पालन करता है वह इस लोक में शास्त्रकार होता है
अन्त को मोक्ष पाता है।
माभारत उद्योगपर्व अध्या ४४ में सन्तसुजान मुनि का बंधन है
कि अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार कर्म करना, सत्य बोलना, इन्द्रियों को वा
में रखना, किसी की उन्नति देख कर न जलना, निन्दा न करना, यज्ञ, दान, अर्थ
समेत वेदों का पढ़ना, क्रोध न करना, तप करना, आपत्ति के समय में भी सत्य
फोन त्यागना यही व्रत है जो इन व्रतों को धारण करता है वह सम्पूर्ण पृथ्वी को
अपने आधीन कर सका है। भाषा अ०४३ में है।
धर्मश्च सत्यंच तपोदमश्च अमात्मयं हीस्तितिक्षानसूया ।
दानश्रुतश्चैवधृतिः क्षमा च महाबता द्वादश बाह्मणस्य ॥५॥

(१०४) वाल्मीक रामायण आरण्य काण्ड सर्ग में लिखा है कि जब रावण संन्यासी का रूप धारण कर सीता के निकट गया और उनसे वृत्तान्त पूंला तब सौता जी ने कहा कि हमारे स्वामी पिता की आज्ञा में दृढ़न्नत १४ वर्ष वन में रहने के लिये उद्यत होगरे क्योंकि उन्होंने दो बातों की प्रतिज्ञा की धी एक यह कि दान दें पर ल न किसी से । द्वितीय सदा सत्य योले झूठ कभी नहीं । है प्राझण? श्री रामजी ने यहं उत्तम व्रत धारण किये हैं। एन्नपुराण सृष्टि खण्ड अध्याय १८ में कहा है जो मनुष्य एकान्त में बैठने का स्वभाव रखते हैं वह दृढ़ व्रत होो है वा. सब इन्द्रियों की प्रीति को उनले विपयों से निवृत्त करते हैं तथा योग में मन लगाते हैं किलो जीव को हिन्सा नहीं करते उनकी मुक्ति होती है सब व्रतों में परायण दमही है इससे इन्द्रियों का दमन अवश्य करना चाहिये क्योंकि पडंग सहित चारों वेद पढ़ने से बिना दम के पवित्र नहीं होता ऐसे पुरुष के जाम कुल जन्म तीर्थ में स्नान सव ही निर्यक है। बाराह पुराण के अध्याय ३७ में वाराहजी ने धरणी से कहा है कि अहिन्ता, सत्या सोय, और ब्रह्मचर्य से रहकर विना आज्ञा के किसी दूसरे का पदार्थ नहीं लेते उन्हीं का मत सफल होता है वह बत रहने वालों के साधारण धर्म हैं। अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यमशीतितम् । एतानि मानसान्याहुतानि तुधराधरे । वेदस्याध्ययनं विष्णोः कीर्तनं हत्यंभाषणम् ॥ अपैशुन्यं हितं.धर्मवाचिक-बूतमत्तमम् ॥ ५ ॥ ..पण्डित जी यदि कोई पुरुप.एक दिन जैसा कि पुराणों की आज्ञाहै नियम करे और शेष:१४ दिन धर्मानुकूल न चले तो.एक दिन के फल ले १४ गुणा पाय न होगा फिर भला क्योंकर सब प्रकार के आनन्द मिल सकते हैं। महाभारत शांतिपर्व अंध्याच २२१ में युधिष्ठिर महाराज ने भीष्मपितामह से प्रश्न किया है कि साधारण लोग जो देह पीड़ा कर उपवास को तयश वहा करते हैं क्या यह तपस्या है ? इस पर भी माजी ने उत्तर दिया .

. व , (:१०५.) है कि साधारण लोग जो ऐला, समझते हैं कि एक महीना वा एक पक्ष उपवास करने से तपस्या होती है सो. यह आत्मा विद्या की विज स्वरूप तपस्या है। इस लिये यह तपस्या अच्छे पुरुपों की सम्मति के विपरीति है। मासपक्षोपवासेन मन्यन्ते यत्तपो जनाः। भात्मतन्त्रो पद्यातस्तु न तपस्तत्सतांमतम् ॥ ४ ॥ गरुडपुराण अध्याय १६ में लिखा है कि एक बार भोजन करने आदि उपवास करके शरीर सुखाने वाले नियमों को कर मेरी माया से मोहित मूढ़ परोक्ष जो- मोक्ष है उस की इच्छा करते हैं सो देवी के दण्ड देने मान से अविवेकियों ..फी कभी मुक्ति नहीं होती जैसी यांची की ताड़ना करने से फहीं का सांप मरता है ! पारावत फंकर आहार करता है, पापिया भूमि में गिरे. 'जल को कभी नहीं पीता तो क्या वे प्रती होजाते हैं। कदापि नहीं । एक भुक्तोपवासाद्यनियमः कायशोषणैः। मुडाः परोक्षमिच्छन्तिमममाया विमोहिताः ॥ ६१ ॥ देहदण्डनमात्रेणं कामुक्ति रविवेकिनाम् ।...::: .. वल्मीक ताडनादेवमृतः कुनमहोरंगः ॥ ६२ ॥ पारावताः शिलहरा कदाचिदपि चातकोः ।। 'न पिवन्ति महीतोयं प्रतिनस्ते भवन्तिकम् ॥ ६ ॥ 'तिसपर भी पुराणों में लिखा है कि एकादशी के दिन जो अन्न भोजन करते हैं वह अपवित्र वस्तु को खाते हैं देखो पदमपुराण ब्रह्म खण्ड अध्याय १५ में लिखा है। येऽन्नमश्नति पापिष्ठा श्च कादश्यांहि विड्भुजः । १२ रोगी, लँगडे, खांसीयुक्त पेट से कोढी उत्पन्न होते हैं अर्थात् संसार में जितने पाप हैं वह सब मोजनों में बसते हैं और एकादशी के दिन जितने अन्न के दाने मनुष्य खाते हैं उनको एक एक दाने में करोड़ ब्रह्महत्या का पाप होता है। नरा योवन्तिचान्नानि भुंजते चहरेदिने ॥ १८ ॥ प्रत्यन्नं च ब्रह्महत्याकोटिजं वृजिनं भवेत् ॥ १६ ॥ . -- (१०६.) परन्तु श्रीमान् अई मनणे घान से अन्न शब्द बनता है अर्थात् जो भक्षण किया जाय वह अन्न, चाहे फल हो चाहें दूध चायल ऐसा ही लनातन धर्म सभा में मार स्वांनी श्रीधरजी ने श्री मद्भागवत की व्याख्या करते हुए दशम स्कंद पूनार्द्ध सध्याय ३३ १९ लोक की वारया में चतुर्विध बहुगुणं मन्नमादाय भाजनैः ॥ १६ ॥:: अर्यात् भए जो संभया जाये जैसे चिंगा चयनो रोटी पूरी भोज्य दालें मांत-लेम जो वाया जायं मन्दी खीर चोस्यों चूसा जाय जैसे गन्ना और आम जादि फिर श्रीमान् पुराण कहते हैं एकादशी को अन्त मत पाओ फिर मला जो जन एकादशी को दुध, पेश, रबड़ी, आम, अंगुर इत्यादि खाते हैं। यह भी अन्न खाने वाले हुये इसके उपचं पद्मपुराणषष्ठ उतरखंड अध्याय ४२ में माघ कृष्ण पक्षकी पटतिला एकादशी के दिन ब्राह्मणों को तिल देना तिला ले लात करना, उबटन कराना, तिलों समेत जल-देना, तिलों का भोजन करना और हवन करना यह छ तिल पाप के नाशने वाले हैं जैसा कि- तिलस्नायां तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी ॥ २१ ॥ तिलदाता च भोकां च षट्तिलाः पापनाशनः ॥ २२ ॥ चाराहपुराण अध्यायः३० में लिखा है कि एकादशी के दिन अग्नि का एका हुसा जन्त जो नहीं खाना चह लित्य पवित्र है उसको कुदेर देता प्रसन्न होकर सब कुछ देते हैं जैसा-कि- तस्यब्रह्मा ददौतुष्टस्तिथिमेकादशींप्रभुः । .: तस्यासनग्नि पक्वाशी योभवेन्नियंतं शुचिः । तत्यापिधनदो देवस्तुष्टः सर्व प्रयच्छति ॥ ६ ॥ इससे तो यह भौ. प्रकट होता हैं कि जो अन्न अनि से पका हुसान हो उसको एकादशी के दिन वाले यदि अग्नि-से सुय्ये का अर्थ लें तो फिर फलादि वस्तु नखानी चाहिये और यदि मौतक अग्नि से प्रयोजन है तो फिर बाक्ल आदि पानी से मिगोकर एकादशी को चबा कर निर्वाह कर सकते हैं फिर से रहने की कोई आवश्यकता नहीं इसके अतिरिक्त जब एकादशी के दिन ब्राह्मणों . को तिल भोजन कराने की भाशा.पुराण दे रहे हैं तो फिर अन का निये कहां: रहा क्या यह लेख आप की समझ में व्यासजी से योग्य. महारमा के हो सक हैं फयापि नहीं। इस के उपरांत भूले मनुष्य की बुद्धि ठीक नहीं रहती। फिर यह अपने कार्यों को ठीक नहीं कर सकता.इस लिये वैद्यक शास्त्र में भूखे रहने जोर.अधिक भोजन. फरने का निषेध किया पुराणों में भी.लिखा है कि शति, खड्ग, गदा, चक्र, तोमर,. घाणादिकों से पीड़ित पुरुषों की. पीड़ा से भखाकी पीड़ा अधिक होती है. श्वास, फोढ़, क्षयी, ज्वर, मुगी, शूल आदि रोगों से पी- हित पुरुष की पौड़ा से भूव की पीड़ा अधिक होती है सुवर्ण: कुण्डलादि से भूपित पुरुष जवा क्षुधित होते हैं तब शोभित नहीं होते जिस प्रकार पृथ्वी पर सय पानी सूर्यनारायण शोष लेते हैं. उसी भांति क्षुधा से पीड़ित मनुष्य के शरीर, की सब नसे. सूब जाती हैं और जब मूढ़ क्षुधा से क्षुधित होते हैं तो तब उनको कुछ नहीं सूझता वह मर्यादा से बाहर हो जाते हैं यह लोग माता पिता, पुत्र, नी, कन्या, माता स्वजन वान्धव को छोड़ देते हैं और वह देवताओं और पितरों गुरु ऋपियों धेनुओं की पूजा नहीं कर सकते हैं और विपरीत इसके जो क्षधित नहीं होता.यह इन सब कामों को अच्छे प्रकार कर सकता है इस लिये कहा है फिजगत् में अन्न से श्रोष्ठ, कोई पदार्थ नहीं: यथार्थ में अन्न ही जगत् का मूल है इस हेतु-अन्न दान का बड़ा माहात्म्य फहा है:सत्व पूछो तो तप, सस्य, जप, होम, ध्यान, भोग, सद्गति वास्वर्ग यह सब अन्न ही में निवास करते हैं इस हेतु जो कोई श्रद्धा से भूत्रों को.. अन्त देता है वह. मानो सय तीर्थों में स्नान और व्रतों को करता है देखो पद्मपुराण सृष्टि खण्ड अध्यायः १९ । ; इस लिये हमारी समझ में तो प्रत्येक मनुष्य को सदा पथ्यापथ्य का विचार कर मिलाहारी हो पञ्चकर्म इ. न्द्रिय और ग्यारहवें मन अर्थात् इन एकादश को जिन की एकादश संख्या है सदा नियम में उतने का नाम एकादशी व्रत है न कि अन्न न खाने का है प्रिय पाठक गण यहः उपरोक प्रत सनातन व्रत है इनके पालन करने से बेड़ा पार हो जातादेजिना की सम्पूर्ण ऋषि, मुनि और महात्मा आमा दे रहे हैं देखिये। - .(१०८) महाभारत शान्तिपर्व अध्याय २६८ में लिखा है कि जो मनुष्य बाटु. वाक्य, उदर और उपस्थ इन चारों द्वारों की रक्षा करते हैं । यह सर्व. प्रकार से सुख भोगते हैं इस लिये जुआ न खेले, मांगने का स्वभाव न बनाये, क्रुद्ध होकर किसी पर प्रहार न करें, वृथा वचन न कहे, जो जन सत्यवती और 'मितभापी रहते हैं उने का वचन रूपी द्वार अच्छे प्रकार रक्षित रहता है । अनशन (उपवास) अवलम्बन न करे, और अधिक भोजन भी न करें, लोलुपता को छोड़ साधुओं का सत्संग करे । इस लोक में देह यात्रा के लिये थोड़ा सा आहार करे जो ऐसा करने हैं सनकी जठर अग्नि की उत्तम प्रकार रक्षा होती है। भार्यावत को धारण करे ऐसा करने से उपस्थ की रक्षा होती है। · · वनपर्व अध्याय २५ में कहा है कि सत्य, कोमलता, क्रोध, न करना दान, दम, शम, किसी के सुख को देख कर दुःखी न होना, हिन्सा न करना: पवित्रता और इन्द्रियों को अपने वश में रखमा यही धर्म के दश लक्षण हैं उन्हीं से महात्मां लोग पवित्र होते हैं अधर्मी पापी और मूर्ख लोग इन देश का मादर नहीं करते इसी से वे लोग नीच योनियों में जन्म लेते हैं और सुख को प्राप्त नहीं होो जो जितेन्द्रिय और शांति हैं उनको ग्लश कभी नहीं होता जिसने अपने मन को वश में कर लिया है वह कभी दूसरे की लक्ष्मी को देख कर दुखी नहीं होता हिन्सा न करने वाले को 'कभी रोग नहीं होता जो माननीयं पुरुषों का मान करता है वह उत्तम कुल में जन्म धारण करता है। इस लिये पंडितजी व्रतों के मुख्य अभिप्राय फो जान यथावत् व्रतों का प्रचार कीजिये जिल से भारत का कल्याण हो । ओ३म् शम् । श्रीमान् पण्डितजी और अन्य सभ्य गणों ने चलने की तय्यारी की। सेठजी ने दोनों हाथ जोड़ सब सजनों से,नमस्ते की-श्रीमान् पण्डित जी और अन्य महाशयों ने यथायोग्य कहा और चल दिये सेठजी अपने मित्रोंसे वार्तालाप करने में लग गये।। इति एकादश परिच्छेदः । . .:.

(१०२) द्वादश परिच्छेदः। आर्य सेठ-श्रीमान् पण्डितजी को अन्य सभ्य गणों के सहित आते देख दोनों हाथ जोड़ नमस्ते कई कहा कि आइये पधारिये । श्रीमान् पण्डितंजी और अन्य जन यथायोग्य कंह विराजमान हुए। इतने में लाला छंगेलाल व ठाकुर नेकरामसिंह व लाला मन्नीलाल वाचू तोताराम, लाला मूलचन्द, लाला नारायणलाल, लाला पीतमराम साहि- यान जो बाहर से आये हुये थे पधारे सबं सज्जनों को यथायोग्य कह उचित स्थानों पर सुंशोभित हुये। श्रीमान् पंडितजी ने आशीर्वाद दिया। सेठजीने और अन्य महाशयों ने यथा योग्य कह कुशल क्षेम पूछने के पश्चात् जी ने कहा कि आज मैं तीर्थ चिपय सुनाता है। पंडितजी-बहुत अच्छा! सेठजी-श्रीमान् पण्डितजी महाराज तीर्थों की संख्या शिवपुराण सनत्कुमार संहिता अध्याय १४ में छः करोष छ हजार लिखी है जैसा कि- षष्टिकोटि सहस्त्राणि षष्टिकोटि शतानिच । षष्टितीर्थ सहस्राणि परिसंख्या प्रकीर्तिता ॥ ६ ॥ जिनमें से अनेकान तीर्थों के बड़े बड़े माहात्म्य पुराणों में लिखे हैं जिनको सुन और परम कल्याण का कारण जाने सहस्रों स्त्री पुरुष उनके दर्शन स्नानादि में लगे रहते हैं और तन मन धन के उपरांतं अपने प्राणों को भी दे देते हैं परन्तु शोक इतना ही है कि पुराणों के वचनों पर विचार नहीं करते और न घेद की आशा को श्रवण करते हैं पण्डित जी तीर्थ शब्द "तृप्लवन सन्तरणयो" इस धातु से औणादिक थक् प्रत्यय करने पर सिद्ध होता है "तरन्तियेन यस्मिन् वा तत्तीर्थम्" अर्थात् जिससे जन तरते हैं उसको तीर्थ कहते हैं देखिये यजुर्वेद - ध्याय १६ मंत्र ६७ में लिखा है। ये तीर्थानि प्रचरन्ति सकाहस्ता निषाड्गणः तेषां छ सहस्त्रयोजने ऽ.वधन्वानि तन्मसि ॥ - ३ Evedion- (10) अर्थात् तीर्थ दो प्रकार के है पहिले तो वह हैं जोनहार्य शुरुको सेवा, वेदादि शास्त्रों का पंदना, पढ़ाना, सतसंग, ईश्वर की उपासना, सत्य सम्भाषण आदि.दुख. सागरले मनुष्यों को पार करते हैं और दूसरे हैं जिन से समुद्रादि जलाशयों के पार आने जाने में समर्थ होते हैं । इस मंत्रकी व्याख्या से सारछे प्रकार विदित हो रहा है जिस प्रकार मल्लाह नाप के द्वारा समुद्रादिक जलाशयों से पार कर देता है ठीक. अविद्या रूपी भवसागर से.योगी जन योग.रूपी नौका परं संचार कराकर पार कर देते हैं ऐसे महान पुरुषों को महात्मा, साधु, संत, धेरागी संन्यासी आप्त इत्यादि नामों से सूचित करते हैं और उन्हीं सजन पुरुषों के चरणों को तीर्थ स्वरूप कहां है देखिये। श्रीमद्भागवत स्कन्द ३ अध्याय १ श्लोक में विदुरजी के चरणों को तीर्थ रूप कहा है "गजाह्वयात्तीर्थपदःपदानि" स्कन्द्र , अध्याय १२ में ध्रुव जी के चरणों में तीर्थ तलाया है"तीर्थपादपदाश्रय:। पद्म पुराण चतुर्थ ब्रह्मखंड अध्याय १४. में लिखा है कि जिसने तीर्थ ब्रह्माण्ड में हैं और जितने तीर्थ समुद्र में स्थित हैं वे सब ब्राह्मणों के चरणों में स्थित है। ब्रह्माण्डेयोनितीर्थानि तानितीर्थानि सागरे। उदंधौयानितीर्थानि तिष्ठन्ति द्विजपादयोः ॥ १७ ॥ ब्रह्मवैवर्त पुराण कृष्ण जन्म खण्ड अध्याय ३१ में लिखा है कि ब्राह्मणों के पैर के धोये हुए जल में सर्वतीर्थ निवास करते हैं। इस कारण उनके पैरों के स्पर्श से सम्पूर्ण तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है। :: “पादोदके च विप्राणां तीर्थतोयानि सन्तिःच तत्स्पर्शात् सर्वतीर्थेषु स्नानजन्मफललभेत् ॥ ६४ ३॥ श्रीमान इस कथन का तात्पर्य यह है कि शानियों, महात्मालो, पण्डितों, साधुओं के सतसंग से ज्ञान की प्राप्त होती है इस लिये. प्राचीन काल में जहाँ कहीं ऐसे महात्मा और पि निवास करते थे वही स्थान तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हो जाते थे चाहे वह गंगा, यमुनी, नर्वदा, कावेरी, व्यास आदि नदियों के , ---

समीप हो अथवा यन जाल और पहाड़ों की चोटियों पर क्यों न हो।
जैसा कि,::
::::
महाभारत बनपर्व भध्याय १६ में कहा है कि जानने का,
व्रत करने वाले, ज्ञानी, तपस्यो, प्राह्मण जहां रहते हैं उसी का नाम: नगर है।
है. राजन् । गांव में अथवा जन्मल में जहां प्राठाण रहते हैं उसी. को नगर कहते
घही तीर्थ माना जाता है।
वेदाव्या वृत्तसम्पन्नाज्ञानवन्तस्त प्रस्विनः
यत्र तिष्ठन्ति वैविप्रास्तन्नाम संगर नपं ..
जे वायथचारण्ये चत्र सन्ति बहुश्रुताः।
तत्तन्नगरमित्याहुः पार्थतीर्थञ्चतद्भवेत् ।।
. शिवपुराण धर्म संहिता अध्याय १० श्लोक ६४ में कहा है कि जिस
स्थान पर एक दिन व आधे दिन जहां शिष योगी रहते हैं वही मङ्गल स्थान
पवित्र तीर्थ हैं
दिवस दिवसाध; वायत्रतिष्ठन्ति योगिनः ।
तनमांगल्यं पविचत्ततीर्थ तत्तपोवनम् ६४ ॥ :-
... और ऐसे महान पुरुषों के सत्संग करने की आज्ञा घेदादि सत्य ग्रन्थों में
हैं और पुराणों में भी लिखा है देखिये।
! " शिवपुराण धर्मसंहिता अध्याय २७ में कहा है कि साधु, महा.
त्मा निश्चय तीध रूप है तीर्थों का फल कालान्तर में होता है,और साधु,
महात्माओं की सहति का फल तुरन्त मिलता है और अनन्त फल देता है
इंसमें साधुओं की सङ्गति करनी आवश्यक है।
..... साधूनां दर्शनंपुण्यं तीर्थभूताहि साधवाः ।
: कालेन फलते तीर्थ संथा साधूसमागमः ॥
क्योंकि साधुओं के संग से शाखों का सुमना होता है जिस से भगवान
की भक्ति उससे शान और ज्ञान की गति होती है। जैसा कि पंचापुराण चतुर्थ
ब्रह्मखण्ड अध्याय १ एलोक में लिखा है।
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"

साधु संगाद्भवेद्विप्र शास्त्राणां.श्रवणं अंभो । हरिभक्तिर्भवेत्तस्मात्ततोज्ञानं ततोगतिः ॥६॥ पञ्चम पातालखण्ड अध्याय १६ में लिखा है कि परमेश्वर पापर्वजित साधुओं के सत्सङ्ग से जाने जाते हैं उनकी कृपासे मनुष्य दुःख रहित हो जाते हैं ॥ १४ ॥ वह साधु काम, लोभ रोगादि से रहित जो कुछ वह कहते हैं वह संसार में निवृत करने वाला है॥ १५ ॥ इस लिये संसार से डरते हुये मनुष्यों को तीर्थों में अवश्य जाना चाहिये क्योंकि उन तीर्थों में उच्चम जल और यहां साधुओं की श्रेणा विराजती है। तस्मात्तीर्थेषु गंतव्यनरैः संसारभीरुभिः । पुण्योदकेषुः सततं सधुश्रेणि विराजिषु । षष्ठ उत्तरखण्ड अध्याय..१३२. में लिखा है कि जिस प्रकार सूर्यनारायण के संयोग से सूर्यकान्तमणि, में अग्नि उत्पन्न हो जाती है उसी भांति साधुओं के संयोग से भगवान् में भक्ति उत्पन्न होती है ॥ १३ ॥ इसी हेतु जब युधिष्ठिर महाराज ने तीर्थयात्रा का विचार प्रकट किया उस समय नारद मुनि ने पाण्डवों से कहा कि तीर्थी में जाने से वामीक, कश्यप, आत्रेय, विश्वामित्र, गौतम, देवल,.मार्कण्डेय, तपस्वियों में श्रेष्ठ शुकदेव, दुर्वासा, जावाली इत्यादि, ऋषियों के दर्शन होंगे और महात्मा धौम्यजी ने कहा है कि तीर्थों में वस्तु, साध्य, सूर्य, ,वायु और अशिषनीकुमार देवों के समान ऋषि लोग निवास करते हैं देखो महाभारत वनपर्व अध्याय ८५ व ६०1 'मत्स्य पुराण अध्याय १६८ में लिखा है कि मुनि अत्रि, कश्यप, याज्ञवल्क्य संवत, कात्यायन, वृहस्पति, नारद और गौतमादिक धर्म की इच्छा करने वाले ऋषि, गंगा, कनखल, प्रयाग, पुष्कर, और गया इत्यादि तीर्थों में निवास करते हैं ॥११॥ श्रीमान् पण्डितजी प्राचीन काल में जो गृहस्थ तीर्थ यात्रा जाने का विचार करने थे यह विशेष कर नियम और यम के पालन का ध्यान बनाये रहने थे क्योंकि- महाभारत वनपर्व अध्याय २९ में कहा है दीन दण्ड का धारण करना, जटा सदाना, शिर मुड़वाना, मौनी होना, छाल पहरना, मृगचर्म धारण - करना, व्रतः अर्थात् भूखे रहना, स्नान करना, अग्निहोत्र करना, धन में रहना, शरीर को सुवाना 'यदि भाव शुद्ध नहीं तो सब ही' मिथ्या है। त्रिदण्डधारणं मौनं जटाभ.रोऽथ मुण्डनम् । वल्कल जिन सवैष्टं वतचर्याभिषेचनम् ॥ ६३ ॥ अग्निहोत्रं वनेवासः शरीरपरिशोपणाम् । सर्वाएयेतानि मिथ्यास्युयदिभावोन निर्नलः ।। ६४ ॥ हे राजन् ! अन्न न खाना सहज है परन्तु अन्न हर इन नेत्र आदि छ: इन्द्रियों का रोना कठिन है उस में रुप को विकार देने वाला मन को रोकना बहुत ही कठिन है जो मन बुद्धि और वाणी से पाप नहीं करते वही सपस्वी हैं । शरीर का सुब देना अन्न न खाना तप नहीं कहलाता जा घर में रह कर पवित्र रहता है वही मुने है। ने दुष्करमनाशित्वं सुकरं ह्यशनं विना । विशुद्विश्चक्षुरादीनां षणामिन्द्रिय गोमिनाम् ॥ ६६ ॥ विकारितेषां राजेन्द्र सुदुष्करतरंमनः । ये पापानि न कुर्वन्ति मनोवाक् कर्मबुद्धिभिः ॥ ६७ ॥ तेतपन्ति महात्मानो न शरीरस्य शोषणम् ॥ १८ ॥ पद्मपुराण षष्ठ उत्तर खण्ड अध्याय ८० में लिखा है कि चीर वस्तु, धारण करना, जटा रखाना, दण्ड का रखना व मूड़ मुड़वाना इत्यादि चिह्न धर्म के कारण नहीं हैं ॥ १०४॥ चीरवासा जटीविप्र दण्डी मुण्डित एक्वा । विभूषितोवा विप्रेन्द्र न लिङ्गं धर्म कारणम् ।। शिवपुराण धर्म संहिता अध्याय २६ श्लोक ७ में लिखा है कि रागी पुरुरों को वन में दोष होो हैं घर में पंरेन्द्रिय निग्रह करना तप है अकुत्सित कर्म में प्रवृत्त होने से राग रहित पुरुष को घर ही में तपोवन है । वनेपिदोषाः प्रभवन्ति रागिणां । गृहेपि पंचेन्द्रिय निग्रहरतपः ॥

अकुत्सिते कर्मणियः प्रवर्तते ।
निवृत्तरागस्य गृहे तपो वनम् ॥ ७॥
पण्डितजी जिस प्रकार विना पथ्य के उत्तम ले उत्तम औषधौ कुछ
लाम नहीं करती उसी प्रकार वेद ब शास्त्रादिक के पठन से मुक्ति नहीं होती
वान् मुक्ति का कारण ज्ञान युक्त कर्म करना ही है इसी हेतु पुराणों में भी लिखा
है कि जो कर्म ज्ञान पूर्वक किये जाते हैं वह कल्याण के दाता होते हैं अन्यथा
नहीं-इसी भांति ऋपि उपदेश भी यथार्थ में मुक्ति देने वाला है परन्तु जब तक
उनकी आज्ञानुसार कार्य न किया जाचे तव तक लाभदायक नहीं होता इस
लिये प्राचीन जन जब नीथों में जाने थे तब वह गंगा, यमुना, नर्वदा इत्यादि
नदियों वा अन्य तालाब आदि पवित्र जलों में स्नान कर शरीर शुद्धि के पश्चात्
आत्म शुद्धि के अर्थ महात्मा जनों का सत्संग कर आचरण सुधार आनन्द
प्रात करने थे क्योंकि मनकी शुद्धि के विना अन्य किसी प्रकार से भी यथार्थ शुद्धि
नहीं होती जैसा कि-
पद्मपुराण द्वितीय भूमिखण्ड अध्याय ६६ में कहा है कि कोई
पर्वत के समान मिट्टी मले और गंगा जल के सारे जल से मृत्यु पर्यन्त स्नान
करता रहे तो भी दुष्ट रघमाघ और दुष्ट विचार वाला मनुष्य शुद्ध नहीं
होना ।। ८३, ८४॥
गंगातोयेन सर्वेणमृद्भारैत्रिलेपनैः ॥ ८३ ॥
मयों दुगंधदेहोसौभावदुष्टोन शुध्यति ।
तीर्थ स्नानस्तपोभिश्च दुष्टात्मानच शुध्यति ॥ ८४ ॥
शिवपुराण-वायु संहिता उत्तरार्द्ध अध्याय ११ में लिखा है कि जिस
के अंत:करण में अशुद्धि है वह पवित्र भी अपवित्र है ॥ ५७ ॥
शिवपुराण-धर्म संहिता अध्याय ४२ में लिखा है कि जीवन
पर्यन्त
मुद्धता करने पर भी दुष्ट स्वभाव वाला मनुष्य तीर्थ स्नान और तप
करने से शुद्ध नहीं होता २॥
श्रामृत्योराचरेच्छौचं भावदुष्टो न शुद्धयति ।
तीर्थस्नानैस्तपोभिर्वा दुष्टात्मा नैव शुद्धयति ॥ ८२ ॥

विशतोपि हुताशनम् क्या कुत्ता तीर्थ में स्नान करने से शुद्ध हो सकता है । ( कभी नहीं) जो अन्तर्भाध से दुष्ट हो वह चाहे अग्नि में प्रवेश कर जाय तो उसकी देह दग्ध करने से स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती॥३॥ ४॥ श्वदतिः क्षालिला तीर्थो किं शुद्धिमधिगच्छति । अंतर्भाव प्रदुष्टस्य हुताशनम् ॥ ८३ ॥ न स्वर्ग नापवर्गश्च देहनिर्दहनं परम् ॥ ८४ ॥ दुष्ट स्वभाव वाला मनुष्य चाहे सब प्रकार गंगा जल से स्नान करे चाहे मिट्टी के पर्वतों से हाथ मांज डाले जन्म पर्यन्त जो स्नान करे । तथापि वह शुद्ध नहीं हो सकता ॥ ८५ ॥ सर्वेण गांगेम जलेन सम्यङ् मृत्पर्वते नाप्यथ भावदुष्टः । भांजन्मनःस्नान परो मनुष्यो न शुद्धयतीत्येव वयं वदाम ८५ गंगादि तीर्थों में नित्य मत्स्यादि निवास करते हैं देवालयों में पक्षी रहते है भाव हीन होने से यह फल तीर्थ में अवगाहन करने और दान देने से नहीं मिलता ॥ ८७॥ गंगादि तीर्थेषु वसंति मत्स्या देवालये पक्षिगणाश्चनित्यम् । भावोज्झितास्ते नफलं लभते तीर्थावगाहाच्च तथैवदानात् ८७ लिये शुद्ध भाव होना ही सब कम्मों में प्रमाण है। भाव शुद्धं परं शौचं प्रमाणं सर्व कर्मसु ॥ ८८ ॥ भाव के शुद्ध होने से प्राणी स्वर्ग और मोक्ष को पाता है ॥ १२ ॥ भावतः शुचिः शुद्धामा स्वर्ग मोक्षं च विंदति ॥ ६२ इस हेतु ज्ञानरूपी जल और वैराग्यरूपी मृत्तिका से शरीर के अविद्यारूपी रागद्वप आदि मलों को धोचे वही शुद्ध होता है। ज्ञानामलाभतापुंसां सद्वैराग्यमृदा पुनः। अविद्यारागविण्मूत्रं खेपगन्धविशोधनम् ॥ ६ ॥ वृहन्नारदीय उपपुराण अध्याय ३१ में लिखा है कि शद्धि दो प्रकार की होती है.एक वाहा और दूसरे आभ्यन्तर जिसमें मृतिका, जलले बाहर की और भाव की शुद्धि से भीतर की पवित्रता होती है ऋपियों ने कहा है कि अंतःकरण की शुद्धि के विना जो यज्ञ आरम्भ किये जाते हैं वे फलित नहीं होने जिस प्रकार मास में होम फिया निष्फल है इस लिये दुष्ट जन हजार भार मृ- त्तिका और य.रोड़ौ. कलशों के जलो से शौच करे पर वह चांडाल ही कहाता है। जो मनुष्य अंतःकरण की शुद्धि के बिना बाहर की शुद्धि करता है वह स- जाये हुये मदिरा के घड़े के समान है इस लिये जो कोई विना चित्त शुद्ध किये तीर्थ यात्रा करते हैं तो उनको तीर्थ पवित्र नहीं करने जैसे मदिरा पात्र पोन- दियां शुद्ध नहीं कर सकती। लिंगपुराण पूर्वार्द्ध अध्याय ८ में लिखा है कि बाहर से शौप कितना ही करे और मृतिका से देह को लीप लीप कर स्नान करे जो अंतः करण शुद्ध न होय तो सदा ही मलीन हैं ॥ ३३ ॥ क्योंकि मत्स्य मण्डूक आदि सदा जल में डूबे रहते हैं वे घया शुद्ध हो जा हैं इस खे अन्तर शौच ही मुख्य है ॥ ३४ ॥ इस लिये वैराग्यरूपी मृत्तिका ले शरीर को लिप्त करके आत्मज्ञान- रूपी जल में स्नान करे यही शौच मुख्य है पयोंकि शुद्ध पुरुष की ही सिद्धि होती है । अगुद्ध की नहीं। आत्मज्ञानाम्मसि स्नात्वा सकृदालिप्यभावतः। सुवैराग्य मृदा शुद्धः शौचमेवं प्रकीर्तितम् ॥ ३६ ॥ शुद्धस्य सिद्धयो दृष्टा नैवाशुद्धस्य सिद्धयः ॥ ३७॥ अध्याय २५ में लिखा है कि जिसका अन्तःकरण शुद्ध नहीं चाहे वो कितने जल से स्नान करे पन्तु शुद्ध नहीं होता अर्थात् दुष्ट भाव पुरुपका किसी नदी व सरोवर में स्नान करने से शुद्ध होना कठिन है। मनुप्योंका चित्त कमल अज्ञान रूपीरात्रिसे संकुचित हो रहा है इसको ज्ञानरूपी सूर्य की किरणों से विकसित करना उचित है। गरुडपुराणअध्याय १६ श्लोक ६८ में लिखा है जन्मसे लेकर अन्ततक गंगो आदि नदियों में जो मेंडक, मछली इत्यादि रहते हैं तो पया चे योगी होजाते है अर्थात् नहीं ॥ ६॥ भाजन्म मरणान्ते च गङ्गादितटिनीस्थिताः ।

( १९७) मण्डूक मत्स्यप्रमुखा योगिनस्ते भवंति किम् ॥ इसी हेतु पद्मपुराण पातालखण्ड अध्याय ६८ के श्लोक ७८ में लिखा है कि जो मनुष्य गंगादि पुण्यतीर्थों में स्नान करते हैं और वह पुरुष जो महात्माओं का सत्संग करते हैं इन दोनों से सत्संग करने वाला ही श्रेष्ठ है। गंगादिपुण्यतीर्थेषु यो नरः स्नाति सर्वदा । यः करोति सतां संगं तयोः सत्संग मोवरः ॥ ७८॥ मार्कण्डेय पुराण अध्याय १८ में दत्तात्रेय ती महाराज ने कहा है कि जो मनुष्य सत्संग रूपी पत्थर पर सान रूपी कुल्हाड़ी को नेज करके इस ममता रूपी वृक्षको काट डालने हैं वहीं शानी मनुष्य मुक्तिके मार्ग तथा विना कांटे और धूल के ब्रह्मज्ञानरूपी शीतल वन में परम निवृत्ति को प्राप्त हो संसार के आवागमन से रहित होजाने हैं। गरुडपुराण अध्याय १ में स्पस्ट रूपसे कहा है । कि जो मनुष्य पाप रत दया तथा धर्म रहित दुष्टोंकी संगत में मस्त उत्तम शास्त्र के जानने वाले सुजनों के सतसंग ले दूर। ये हि पापरतास्ताय॑ दयाधर्मविवर्जिताः। दुष्टसंगाश्व लच्छास्त्रसत्संगतिपराङ्मुखाः ॥ १४ ॥ जो अपने वो प्रतिछित जानते हैं और नम्रता रहित धन और मानके धमण्ड में चूर असुरभावयुक्त और दैवी सम्पत्तिसे दूर हैं। आत्मसम्भाविता: स्तब्धावृताः। आसुरं भावमापन्ना वीसम्पद्विवर्जिताः ॥ १५ ॥ जिन मनुष्योंका मन पराई स्त्री और धनमें मोहसे मोहित होकर भ्रम रहा है ऐले मनुष्य नरक में जाते हैं अनेकवित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। इसी कारण जय श्रीमान युधिष्ठिर इत्यादि पाण्डवों ने तीर्थयात्राकी इच्छा की उस समय ऋषियोंने उनसे कहा है जैजा फि महाभारत वनपर्व अध्याय ८१ में लिखा है। कि तीर्थयात्राका फल उन्हीं मनुप्योंको मिलता है जिनके हाथ, पांच, मन, विद्या और कीर्ति वशमें होती है।

. (:१९८) यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम् ।। विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥ ६ ॥ जो सब घरों से लोट एक किसी स्थान पर सन्तुष्ट होकर रहता है जिसको आहंकार नहीं वही तीर्थ के फलको भोगता है॥१०॥ प्रतियहा दयावृत्ताः संतुष्ठो येन केनचित् । अहंकारनिवृत्तश्च स तीर्य फलमश्नुते ॥ १० ॥ जो छल और कार्योंके आरम्भ से दीन, थोड़ा खानेवाला, इन्द्रियजित, सव पापों से रहित होता है वह तीर्थों के फलों को भोगता है ॥ ११ ॥ अकल्कको निरारम्भो लघ्वाहारी जितेन्द्रियः । विमुक्तः सर्वपापेभ्यः च तीर्थफलमश्नुते ॥ ११ ॥ जो क्रोधसे रहित सत्य, शील से भरा हुआ पक्का व्रतधारी अपने समानः सब प्राणियों को देखनेवाला हो.वहीं तीर्थी के फलको भोगता है॥ १२ ॥ अक्रोधनश्च राजेन्द्र सत्यशीली. दृढव्रतः। आत्मोयमचं भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते ॥ १२ ॥ और ऐसा ही पद्मपुराण सृष्टिलण्ड अध्याय १६ में लिखा है। मत्स्यपुराणा अध्याय १११ में कहा है कि जो ब्राह्मण प्रतिग्रहादिक दोनों से निवृत्त, सन्तोषवृत्ती, नियमी, पवित्र अहंकार और क्रोध रहित, सत्य- पता, सब जीवोंको अपने समान. देखने वाला होता है. वह तीर्थके फलको पाता है। अकोपनश्च सत्यश्च सत्यवादी दृढ़वतः । आत्मोश्च भूतेषु सतीर्थफलमश्नुते ॥ ११ ॥ शिवपुराण विघेश्वरी संहिता अध्याय १२ में लिखा है कि गंगा आदि तीर्थों में जानेका फल बही जन पाते हैं जो सदाचार सद्भाव और श्रेष्ठ भावना से बुद्धिमान् दयायुक्त रहते हैं अन्यया फलकी प्रति नहीं होती ॥ ३५ ॥ सदाचारेण सद्वत्या. सदा भावेन. यापि च । वसेदयालुः प्राज्ञो वै नान्यथा तत्फलं लभेत् ॥ ३५ ॥ - . ( ११६) इस लिये पवित्र हदय और सुद्ध मनसे जो स्नान करते हैं वही श्रेष्ठ स्नान कहाता है जैसा पद्मपुराण पष्ठउत्तरखंड अध्याय २७ में कहा है। अगाधे विपले सिद्धे सत्तीर्थे च शुचौ हृदि । स्नातव्यं मनसा युक्तः स्नानं तत्परमं स्मृतम् ॥ महाभारत वनपर्व अध्याय १६ में कहा है कि जजनों के संग और मीठी चाणी से जिन्होंने अपनी आत्माको पवित्र किया है उन्हीं को पवित्र कहते हैं महात्मा व्यास, पर्वत और नारद मुनि जब पांडवोंले मिलने गये तव उन्होंने कहा है कि हे युधिष्ठिर आप लोग अपने मनको शान्त कीजिये मनको पवित्र करके शुद्ध होकर तीर्थीको जाइये मुनियों ने कहा है कि शरीर शुद्ध होने ही से व्रत होसकता है ब्राह्मणोंने कहा है कि मन पवित्र होते से बुद्धि शुद्ध होती है मन ही पवित्रताका कारण है आप लोग अपनी बुद्धिको पवित्र और सबको मित्र वना कर तीधारी जाइये जब आप लोग शरीर के नियम और व्रतों से शुश होंगे और पूर्वोल देवव्रत धारण करेंगे तव तीर्थीका यथायोग्य फल पावेंगे॥ युधिष्ठिरयमौमीम मनसा कुरुतार्जवम् मनसा कृतशौचो वै शुद्धास्तीर्थानि यास्यथ । २० । शरीर नियम प्राहुर्ब्राह्मण मानुष व्रतम् । मनो विशुद्धां बुद्धञ्च देवमाहुतं द्विजाः । २१ । मनो ह्य दुष्टं शौचाप पर्याप्तं वै नराधिप । मैत्री बुद्धिं समास्थाम यशुद्धास्तीर्थेषुबैनराः ।। ते यूयं मानसैः शुद्धाः शरीरनियमब्रतैः। देवं ब्रतं समास्थाय यथोक्तं फलमाप्स्यथ ॥ २३ ॥ देवीभागवत स्कन्द ४ अध्याय १८ में प्रसादजी ने च्यवन ऋषि से कहा है कि जिनके मन धाणी देह शुद्ध हैं उन्हें तीर्थ पद पद पर हैं । मलिन चित्तों को गङ्गा भी अपावन की कटादि देशों से अधिक है जो प्रथम मन शुद्ध है तो जीवात्मा पापरहित होता है उसे सब तीर्थ भी पवित्र करते हैं नहीं तो गंगा . (१२०) के तीर सच कहीं नगर, बज अहीरों के ग्राम बसते हैं नियादों के गृह औरहण, वंग, खस, मलेच्छादिकों के स्थान होी हैं और सर्वदा गंगा जल ही पान करते हैं स्वछता पूर्वक त्रिकाल स्नान करने पर एक भी विशद्धारमा नहीं होता जिनका चित विषय वासना से हत हो गया है उन्हें तीर्थ क्या करें सब का कारण मन ही है इस लिये प्रथम उसको शुद्ध करना चाहिरे तीर्थ में वास करके औरों को छला तो क्या शुद्ध हो सकता है इस लिये प्रथम मन गद्ध फिर द्रव्य शुद्ध तदन्तर शौ वादि शुद्ध करके तीर्थ यात्रा अवश्य करनी चाहिरे धरन् जाना व्यर्थ है। प्रथम मनसः शुद्धिः कर्तव्या शुभमिच्छना ! शुद्धे मनसि द्रव्यस्य शुद्धिर्भवति नान्यथा :: ३७ ॥ क्योंकि यदि किसी के कहने अयवा देखने से तीर्थ यात्रा को गो और राग, द्वेष, काम, क्रोध युक्त ही गृह को लौट आये तो बतलाइये पथा फल मिला इस लिये तीर्थ यात्रा करने पर देह से काम, क्रोध, लोभ, मोह. तृणा, द्वेष, राग, मद, निन्दा, ईर्षा, अक्षमा और अशान्ति ये न गई तो देवल काम ही काम हुआ फिर फल कहां ! जैसाकि देवीभागवत स्कन्द ३ अध्याय ८ में कहा है। इसी हेतु नरसिंह उपपुगण अध्याय ६७ में मनु महा राज ने भारद्वाज ऋषि को उपदेश किया है कि मन का निर्मल रखना रागादि- कों में व्याकुल न होना, सत्य बोलना, सब के ऊपर दया करना. इन्द्रियों को जीतना, गुरु माता पिताकी सेवा करना यह मानुषी तीर्थ विशेष लाभदायक है। वामन पुराण अध्याय ४३ में लिखा है जिन का अनन्तभाव घाला चित्त आत्मा में लगा हुआ है उनको सव तीथों और आश्रमों से क्या प्रयोजन । किं तेषां सकलैस्तीराश्रमा प्रयोजनम् । येषां चानंतकं चित्तमात्मन्येव व्यवस्थितम् ॥ २४ ॥ अर्गत् विना मन के शुद्धि किये किली नदी आदि में स्नान कियेसे पापों की निवृत नहीं होती इसी हेतु गरुड़ पुराण अध्याय १७ श्लोक ५८ में लिखा है कि जिसके सत्संग और विवेक यह क्षे निर्मल नेत्र नहीं हैं वह अन्धा और कुमार्ग में जाने वाला है जैसा कि-.

(१२१)
सत्सङ्गाश्च विवेकश्च निर्मलनयनद्वयंम् ।
श्रीमहाराज इसी प्रकार पुराणों में अनेकान वचन मिलते हैं
इस पर भी इसके विपरीत उन्हीं पुराणों में तीर्थों के दर्शन और स्नानादि की
महान् महिमा लिख दी है जिन को सुन २ कर संसारी जन भैडिया धसान
की भांति चिनो इन बातों को विचारे यम, नियम से रहित टीड़ी दल के समान
एक विशेष तिथि पर काशी, मथुरा, प्रयाग, बदरीनाथ, केदारनाथ, द्वारिका,
जगन्नाथ, रामेश्वर, पंचवटी, चित्रकूट, गोकुल, अपोध्या, नैमिषारण्य, हरिद्वार,
गंगोत्री, यमुनोत्री, नगरकोट, कुरुक्षेत्र, पुष्कर इत्यादि स्थानों के दर्शन कर गंगा,
यमुना गंडकी और नर्वदा इत्यादि में दुबकी लगा कर अपने मनोरथ की सिद्धि
समझते हैं जैसा फि लिखा है आप भी संक्षेप से सुन लोलिये।
श्रीमान् पण्डितजी ने कहा कि आज यहां ही विश्राम, दीजिये।
सेठजी-बहुत अच्छा जो आशा मैं यहां ही समाप्त करता है
ओ३म् शम्।
सर्व सजनों ने चलने की तय्यारी की।
सेठजी ने सर्व महाशयों को नमस्ते की ।
पण्डितजी ने आयुष्यमान कहा और चल दिये।
अन्य महाशयों ने यथा योग्य की।
सेठजी. अपने गृह में गये।।
प्रति द्वादश परिच्छेदः ।
त्रयोदश परिच्छेदः
1.
सेठजी ने समय पर अनेक. सजनों सहित श्रीमान् पण्डितजी को
आने देख उठ कर दोनों हाथ जोड़ नमस्ते कह कर कहा कि आइये पधारिये
विराजमान हुजिये।
पंडितजी व अन्य संभ्य गंणों ने .या योग्य कहा और
सब अपने २ स्थानों पर जा बैठे।

(१२२) सेठजी ने कहा देखिये श्रीमान् । मत्स्यपुराण अध्याय १०७ में लिखा है कि जो पुरुष अज्ञान से तीर्थ यात्रा करता है वह सब कामनाओं से संम्पन्न हो स्वर्ग लोकं में प्राप्त होता है और क्षीण पुन्य होके धन धान्य से युक्त हुए स्थान को प्राप्त होता है। अज्ञानेन. तुयस्येह तीर्थयात्रादिकं भवेत् सर्वकाम समृद्धेतुं स्वर्ग लोके... महीयतें. स्थानञ्जलभते. नित्यंधनधान्यसमाकुलम् ॥ १६ ॥ धामनपुराण अध्याय ३४ में लिखा है कि तीर्थों का स्मर्ण मनुष्यों को पवित्र कर देता है और तीर्थों का दर्शन पापों का नाश करता है तीर्थ के स्नान से पापी को भी मुक्ति होती है जैसा कि-' ! तीर्थानां स्मरणं पुण्यं दर्शनं पापनाशनम् । स्नानं पुण्यं करं प्रोक्तमपि दुष्कृतकर्मणः ॥ . -- 1. : . हरिद्वार। ::::::: पद्मपुराण पष्ठ उत्तरखण्ड अध्याय २१ में महादेवजी ने कहा है कि एक समय मैं भगवान के स्थान हरिद्वार को गया तो उस तीर्थ के प्रभाव से मैं विष्णु के रूप के तुल्य हो गया ॥ २१॥ ... एकदा केशवस्थाने हरिद्वारे ह्यहंगतः। तस्मातीर्थप्रभावाच्च जातोहं विष्णुरूपवान् ॥ ११॥ और भी मनुष्यों में श्रेष्ठ जो जाते हैं वे निरोग रहते हैं वे नर नारी सब चार भुजा वाले भगवान के दर्शन ही से संबं वैकुण्ठ को जाते हैं हम को भी याई सुन्दर हरिद्वार तीर्थं सबसे अधिक है ॥ २२,२३॥ येगच्छन्ति नरश्रेष्ठास्तेवयांतिनामयम् । चतुर्भुजास्तुते लोकाः नरानार्यश्च सर्वशः ॥ २२.॥ - .. .. (१२३) बैकुंठं यांतिते सर्वे, हरेर्दर्शनमात्रतः । ममाप्यधिक तीर्थतु हरिद्वार सुशोभनम् ॥ २३ ॥ जो धर्म अर्थः काम भोक्ष का देने वाला है गऊ, ब्राह्मण और पिता के मारने भादिके बहुत से. पापः भगवान के दर्शन ही. मात्र से नाश को प्राप्ताही जाते हैं।२६, २७, २८॥ गोहंताब्रह्महाचैव येान्ये पितघातकाः । एवं विधानि पापानि वहून्यापि च वैद्विज विलयं यान्ति सर्वाणि हरेर्दर्शनमात्रतः ॥ 4. ...:::::. :: ..., प्रयागमाहात्म्य सप्तम क्रियायोगसार अध्याय में कहा है कि कोटि ब्रह्माण्ड के मध्य में जितने तीर्थ हैं वे सब प्रयाग के घरोवर नहीं। कोटि ब्रह्माण्डमध्येषु यानि तीर्थानि . वैसुने । प्रयान्ति तानि सर्वाणि प्रयाग प्रतिमान्तुकिम् ॥ जो जन मकर के सूर्य माघ मास में यहाँ स्नान करते हैं तिनका आगमन फिर विष्णु लोक से नहीं होता.॥६॥-::-:-::::: हजार करोड़ गौवों का दान, अश्वमेव : इत्यादि--यश, सुमेरु पर्वत के समान सोने का दान तथा और भी दान कुरुक्षेत्र: पुष्कर प्रभास और गयाजी मैं हवन कर ब्राह्मणों को देने से जो फल, पण्डितों को मिलता है तिससे करोड़ गुणा फल मांध में प्रयाग में स्नान करने से मिलता है तिस से सतीथों में प्रयाग है। गवांकोटि सहस्राणि वाजिमेध मुखावरा मेरुतुल्य सवर्णानिदानान्यन्यानिवद्विज ॥ ७ ॥ पद्मपुराण षष्ठ उत्तर खण्ड अध्याय २४ में लिखा है कि इस प्रकार का तीर्थ तीनों लोकों में न हुआ है न होगा 'प्रही में जैसें सूर्य और नक्षत्रों में जैसे चन्द्रमा श्रेष्ठ है। उसी-भांति तीर्थों में उत्तम प्रयागजी हैं प्रातःकाल में जो :

से. - . ( .१२४) यागजी में स्नान करता है वह महापाप, छूट परमपद को प्राप्त होता है दारिद्र के अभाव की इच्छा करने वाले को वहां यथा शक्ति कुछ देना भी चाहिये ३, ४, ५, ॥ अध्याय ६१ में लिखा है कि अन्य स्थानों में जो दश वर्ष में तपस्या का फल मिलता है वह यहां एक दिन में प्राप्त होता है और अध्याय १२९ में लोमश मुनि ने कहा है कि इस प्रयाग में विना सान के सथ प्राणी मुक्ति को प्राप्त हो गये हैं यहां ही प्रजापति ने महायज्ञ को कर प्रजा रखने की शक्ति को प्राप्त कर सृष्टि को रचा था और स्त्री की कामना करने वाले नारायणजी ने स्नान के प्रभाव से अमृत मधन कर लक्ष्मीजी को प्राप्त किया था और इसी स्थान पर छः माह स्नान कर महादेवजी ने तीन वाण से त्रिपुरासुर को मार डाला था। मत्स्यपुराण अध्याय १०६ में लिखा है कि विश्वास घात करके मार डालने वाला पुरुष तीन काल स्नान और भिक्षा कर भोजन करने से तीन माह में निस्संदेह पापों से छूट जादा है। विश्रम्भ घातकातान्तु-प्रयागे श्रृणुमत् फलम्। ::: त्रिकालसेव स्नायीत माहारं भक्ष्य माचरेत् ॥ : विभिर्मासैः समुच्येत् :प्रयांगेतु म.संशयः॥.. ..": वाराहपुराण उतरार्द्ध. अध्याय १२८ में लिखा है कि त्रिवेणी क्षेत्र पृथिवी मण्डल में सव तीर्थों से उत्तम हैं जिस में पृथिवी मण्डल के सब देवता और तीर्थों का समाज होता है यहाँ स्नान करने से मरके मुक्ति होती हैं इसको तीर्थराज नाम है :: : " ::: यत्राप्लुतादिवयान्ति मृतामुक्ति प्रयान्तिच । तीर्थराज इतिख्यातं तत्तीर्थंकेशवप्रियम् ॥ ८ ॥ इतिहास प्राचीन समय में प्रणधिनाम एक वैश्य धनवान और देवताओं अतिथियों की सेवा करने वाले थे उनकी पद्मावती नाम पतिव्रता स्त्री जो शीलादि गुणों युक्त थी । वहः कालान्तर में व्यापार को गये इधर स्त्री-सखियों सहित स्नान (१२५) को गई वहां धनुर्ध्वज नाम एक पापीने उस स्नीको देख उससे कहा कि तुमको हमारे साथ आनन्द करना चाहिए तव सखियों ने कहा कि यह पत्तिवता है इस की इच्छा करना मूर्खता है परन्तुं उसने न माना फिर सखियोले कहा कि जिस प्रकार यह मिल सके वह उपाय बतलाओ मैं तुम्हारी शरण हूं तब सखियोंने उत्तर दिया कि यदि तू इस नीकी इच्छा करता है तो शीघ्र गङ्गाजमुना के संगम पर देहका त्याग कर इतना कह वह सत्र घरकी गई, इधर हजार हत्या करने वाला चाण्डाल मोहके कारण गङ्गाजमुना के जल में उसका पूजन कर प्राण छोड़ता हुआ जिससे वह उसी दिन उस स्त्री के पंतिके समान हो गया और वह चांडाल ब्राह्मण उस स्त्री के घरको आयाधर वह मणधिनाम वैश्य व्यापार से वापिस आकर गृहको गया पतिवंताने दोनों को एक समान देखें चिन्ताकी कि मैं किस की स्त्री हूँ और मेरा कौन स्वामी है इसके लिये भगवान की प्रार्थनाकी तब भग- वानने कहा कि हे सुन्दर स्त्री जिसप्रकार अनन्त रूप वाली लक्ष्मी मेरे साथ फ्रीड़ा फरती है उसीभांति तुम भी दोनों के संग सदैव सुख भोगी। पासप्तम क्रियायोग अध्याय ४॥ . अनन्तरूपिणी लक्ष्मीर्यथाक्रीडे मयासहो। संथात्वमपिसुश्रोणि भुत्वताभ्यां सुखंसदा ॥ यह सुन पद्मावतीने कहा कि मनुष्य समाजमें जिस खी के दो प्रति. होते हैं उसकी प्रशंसा नहीं होती इसलिये लज्जारूपी रूपी समुद्र के कल्लोलमें डूबती हुई का ऑप उद्धार कीजिये। तब भगवानने कहा कि यदि तुम अपयश से डरती हो तो इन दोनों समेत मेरे पुरको प्राप्त हो। हे पवित्र अंगवाली स्त्री. तुम भ्रमको छोड़ दो यह दोनों तुम्हारे पति है। इसलियें सदैव एकभावसे सेवा करो। भ्रमंजहीहिः चार्वगिदावेतौहिपतीतका एकभावेनसुश्रोणि कुरूसेवा तयोः सदा तुम्हारा स्वामी प्रणिधि मेरा भक्त था वही अपने सुखके लिये दो प्रकार का हुआ है। तदन्तर भगवान् की माशा से विमान आया जिस पर पद्मावती दोनों पतियों को साथ लेकर बैकुण्ठको गई। मार्ग में उधर विष्णु दूत एक मनुष्यको स्त्री समेत विमान में बिठलाकर लिये जाते थे'तंब पद्मावती ने पूछा कि आप कौन हैं किस पुण्यके फलसे इसकी आप लिये जाते ही उसके व्रतको सुनाइये तब (१२६) दूतोंने कहा कि यह वृहद्ध्वज नाम राक्षस बनका रहने वाला था पराक्रमी पराई स्त्री, पराई द्रव्यका हरनेवाला गायोंके मांसकालानेवाला निष्ठुर वचन कहने घाला, देवोंकी निन्दा मैं मस्त अर्थात् शुभकर्म इसने स्वप्न में भी नहीं किये पराई स्त्रियोंके हरण के लिये आकाशमैं घूमा करता था एक समय भीमकेश राजाकी कोशिनी नामी स्त्री को देख उससे कहा कि मैं तेरे आलिङ्गन को आया हूं इतना सुन स्त्रीने उससे आलिंगन किया फिर प्रसन्न चित्त पति पत्नी भावको प्राप्त हो बड़े वेगवाले रथमें बैठ आकाश मार्ग में : ले थोड़ी देरके पश्चात् राक्षसने कहा तुम्हारे स्वामी के राज्य से गंगासागर में आगये। जिसको देख स्त्री के प्राण निकल गये फिर राक्षस ने रो २. कर.प्राणों को छोड़ दिया। अब भगवान की आभासे दोनोंके पाप- नाश होगये इसलिये दोनों को बैकुण्ठ लिये जाते हैं क्योंकि जल, स्थल, आकाशमै गासागर के संगम में देह छोड़कर पापी भी परमगति को पाते हैं इतना कह वह दूत उन दोनों को विष्णुलोक ले गये। इधर पद्मावती दोनों पतियों समेत विष्णुजी की सारूप्यताको प्राप्त हुई ! . मत्स्यपुराणा अध्याय १८० में पार्वती जी के पूछने पर शिवजी ने कहा है कि हे प्रिये जिन तीथों में मेरी स्थिति सुनी जाती है वह सवतीर्थ इस अविमुक्त तीर्थके चरणों में नित्यही स्थिति रहते हैं यह परम प्रसिद्ध परम गति का देने वाला है इसमें सब दान अक्षय कारी होते हैं हजारों जन्मों का संचय किया पाप सब नष्ट होजाती हैं जैसे अग्नि में रुई भष्म हो जाती है ब्राह्मण आदि वर्णशङ्कर पातकी जीव कीट पतंग मृग पक्षी भी इस तीर्थ में मरै चह शिव लोक में जाता है। ब्राह्मणकी हत्या करने वाला भी पुरुष इस तीर्थ पर जाता है तो उस की ब्रह्महत्या दूर होजाती है ॥ १६॥ २७॥ अध्याय ३ में लिखा है कि जो गति दान, तप, यश और ब्रह्म विद्या आदि से भी नहीं मिलती वह इस तीर्थ से प्राप्त होती है अनेक जाति पा चांडाल पापी तथा महा-हत्या-वाले इन सब पुरुषों की परम औषधी यही है कि अवि- मुक्ति तीर्थ को प्राप्त होजावे और जो वहां शिषकी भक्तिकरके भरते हैं फिर यह जन्म नहीं लेते। ५५१५७.1 हे पारवती जैसे न मेरे समान कोई पुरुष है न तेरे समान कोई-खी है इसी प्रकार अविमुक्ति तीर्थ के समान कोई तीर्थ भी न है न-होगा ।३५अध्याय १८१॥ अधिमुक्त-तीर्थ पर परमयोग परम गति और परम मोक्ष है. इसी से इसके

घाला
( १२७ )
समान कोई क्षेत्र नहीं है । ३६ । यही स्थान मेरी ब्रह्म हत्या का दूर करने .
है। पापी पुरुष को यहां की धूल परम पवित्र करदेती है कहां तक इसकी महिमा
वर्णन करूं व्यभिचारिणी स्त्री भी यहां पर शरीर त्यागने से परम गति को प्राप्त
होजाती है ॥२५॥ जो जनं इस वीर्थ का सेवन नहीं करते वह तपोगुणसे युक्त हैं।
शिवपुराण ज्ञानसंहता अध्याय ५० में कहा है कि मेरे बहुत कहने से क्या
है इस तीर्थ के दर्शन की विष्णु और ब्रह्मा भी अपने पवित्र होने की कामना करते
हैं। १५॥ .
तदर्शनमहं विष्णुब्रह्माचापि तथापुनः ।
कामयन्ति च तीर्थानि. पावना यात्मनस्तदा १५ ॥
पण्डित, श्रोत्रिय, चाण्डाल, पतित, संन्यासी कोईभी को यहां शरीर त्यागने
से मुक्ति हो जाती है।
पण्डितः श्रोत्रियोवापि चण्डालः पतितोऽथवा ।
संन्यासी वमृतः स्याद्वै सर्वे मोक्षमवाप्नुयुः ॥: .
.. पुरुषोत्तम तीर्थ।
पद्मपुराणं सप्तम क्रिया योग अध्याय १८ में लिखा है कि यहां चाण्डाल का
छुवा अन्न ब्राह्मणों के ग्रहण योग्य होता है तिससे वहां पर साक्षात् विष्णुही है।
विहां स्वयं लक्ष्मी भोजन बनाती हैं वहां का भात देवताओं को भी दुर्लभ
है भगवान् के भोजन से बचा हुआ अन्न जो भोजन करता है उसकी मुक्ति दुर्लभ
... हरिभुक्त्यवशिष्टं यत्पवित्रं भुविदुल्लभम् ।
अन्न येभुञ्जते लोकास्तेषां मुक्तिर्न दुर्लभा ।
जो चैत्रके महीने में वारुणी पर्व में जगन्नाथ के दर्शन करता है वह मरकर
उनकी देहमें प्रवेश करता हैं ॥ ४ ॥
चैत्रके माति वारुण्यां यो जगन्नाथमीक्षते ।
समृतः प्रविशेद हे जगन्नाथस्य जैमिने ॥ ३४ ॥

( १५८) इसीभांति जो दुर्भागा, सुभद्राजी के दर्शन करती है वह सुभागा होती है काक बन्ध्या निश्चय पुत्रको पाती है ॥ ४३ । दुर्भगा काकवन्ध्यावा सुभद्रायां प्रपश्यति ।। सा स्वामि सुभगा नारी वदपत्या भवेत्खलु ॥ ४३ कहां तक कहें रोगी रोगसे, पुत्र हीन पुत्र, विद्यार्थी विद्या धनकी इच्छा वाला धन स्त्री की इच्छा वोला स्त्रियों और मोक्षची इच्छा वाला मोक्षको पाता है 18si इसीभांति राज्य अर्थात् सब कुछ मिलता है यह पुरुषोत्तम तीर्थ सब, तीर्थों में श्रेष्ठ है। ............ मथुरा। । वाराहपुराण उत्सराई अध्याय १४६ में थाराह भगवानने कहा है कि हम उस तीर्थका महात्म वर्णन करते हैं जिसके तुल्य स्वर्ग मृत्यु और पाताल तीनों लोकों में दूसरा तीर्थ नहीं जिसको मथुरा पुरी कहते हैं जहां हमारा निवास स्थान है और क्षेत्र तो हमारे निवास करने से पवित्र हुए और मथुरा जन्म लेनेसे अति पवित्र है जो २ जीव मथुरा में बात करते हैं वे सघ शरीर त्याग करने पर मुक्ति पाते हैं मांघकी अमावास्याका जो फल श्री त्रिवेणी के स्नान से होता है वह फलं मथुरा में नित्य २ होता है. एक हजार वर्ष काशीवास से जो फले मिलता है वह मथुरा स्नानमात्र से ही होजाता है कार्तिक पूर्णमासी को पुष्कर स्नानले जो फल मिलता हैं वह मथुरांजीके स्नान से मिलता है हम कहां तक कहें यह संसार हमारी माया से मोहित भया भ्रमता है और मथुरा भण्डल मैं नहीं जाता जिसमें सब पापोसे मुक्ति हो उत्तम गतिको पीता है स्नान करना तो वहां उत्तम ही है जो कहीं किसी भूमि में कोई मथुराँ इस तीन अक्षरके शब्द को उच्चारण करते हैं वह पापों से मुक्ति होजाते हैं । और अध्याय १५४ में लिखा कि मथुरा मण्डलकी परिक्रमा करने से ब्राह्मणका वध करने वाला मद्यपान करने वाला, चोर, व्रतका खण्डन करने वाला, अगम्य स्त्री के साथ संगम करने वाला क्षेत्र नो हरने वाला सब पापों से मुक्ति हो उत्तम गतिको पाता है। :

शूकर चत्र। '. 'याराह पुराण उत्सरार्द्ध अध्याय १३९ में शूकर क्षेमं के विषयसै लिखा है नेता के अन्तं और द्वापरक आदिमें कपिल भगर में प्राह्मदत्त नोन राजाके लीमद नाम सुशील और धर्मारमा पुत्र था जो पिताकी आज्ञा पाकर पितृकर्म अर्थ आखेटके लिये वनको गया जहां अनेक जन्तुः होनेपर कोई हाथ आया सवं यह इधर उधर धूमने लगा इतने में एक गाली आई उसे देख टसने पाण चलाया जिस के लंग हा यह दुःखी हो भागी महाजी में जाकर जल पिया औरण छूट गया और सोमदत्त क्षुत्रा, तृषा करके पीड़ित उसो इनमें एक वृक्ष के निकट पहुँचा क्या क्षेत्रता कि एक चटकी शाखापर एक वृद्ध सुख पूर्वक निवास कर रहा है उसको देव वाण मारा हमरंगया यह क्षेत्र के प्रभावसे फालिञ्जर के राओंका पुत्र और शृगाली अतिरूपवान कान्तिसेन भाम राजा की कन्या हुई-दोनों का विवाह होगया और बड़े प्रेम से रहने लगे। राजा वृद्ध अवस्था देन राज्य पुत्रको दे बन वजा गया वह प्रज्ञा पालन करने लगा जिसके पांच पुत्र हुए। एक दिन रानी ने राजा से कहा कि आप हमको यह पर दीजिये कि मैं मध्याह के समय एकान्त में जाकर सोया करूं और वहां कोई न आने पावे राजा ने स्वीकार कर लिया। रानी एकान्त में मध्याह्न के समय शयन करने लगी इस प्रकार : वर्ष व्यतीत हो गरे वर्ष में राजा ने एक दिन विवालिये यह मध्यान के समय क्या किया करती है, क्योंकि शाओं और आचार्यों का यह मत नहीं है कि मध्याह्न के समम स्त्री एकान्त में शयन करे इस लिये छिप कर देखना चा. हिरे राजा मध्याह के सारय उस पग के नीचे छिप रहा तब रानी पलंग पर कह रही थी कि हे परमेश्वर मैंने पूर्व जन्म में कौनता पार किया जिसका फल मैं भोग रहो देवो मेरा पति भो मेरी.दशा नहीं जानता, मेराशि फरा जाता है इस से तो मरलो ही अच्छा अब मैं किस उपाय से शूकर क्षेत्र को जाऊं तो यह क्लेश निवृत्त हो । राजा ने सुन पलंग के नीचे से निकल कर कहा कि तुमने हम से नहीं कहा अब सब जाता रहेगा तब रानी ने कहा कि राज्य को को देकर शूकर क्षेत्र को चलो राजा ने ऐसा ही किया रानी समेत सूरक्षेत्र में पहुँचे और कहा कि अब तो लब वृत्तान्त कह दो रानी ने कहा कि तीन दिन बत कर लो जंबवत हो गया तो रानी ने कहा कि मैं पूर्वजन्म की गाली थी यहां ब्रह्मदत्त का पुत्र सोमदत्त आया जिसने एक तीर मस्तक में मारा जिसका - (१३०) घान इस समय आप देख लें महाराज इस तीर्थ के प्रभाव से मैं राजकुमारी हो आपकी पली हुई इसी क्षेत्र में प्राण त्यागने के कारण हमको पूर्व स्मरण भी नहीं मला यह सुन राजाको भी स्मरण होगया और कहने लगा कि मैं गृद्ध था-इसी पेड़ पर रहताथा उसी लोमदत्तने वाण मारा प्राण निकालगया जिसले इसी तीर्थ प्र- भोर से राज छुत्र और तुरहारा पति हुआ। अब मैं तुम्हारे साथ प्राण त्याग करता हमारे इत विमान लंकार पहुँच गये दोनों हमारा नाम स्मरण; करने २ प्राण त्याधिलान में बैठ श्वेत होप . पहुँचे राजा के साथ जो और जन आरे धे इस आश्चर्यको देख प्रेम श्रद्धायुक्त दान पुण्यकर अपने शरीरको त्याग विमानों द्वारा श्वेत-प में पहुँचे। - पापुराण पष्ट उत्सरखण्ड अध्याय १११ में लिखा है पांच योजन-के विस्तार युक्त भगवान मन्दिर शुकर क्षेत्र में जो गदहा भी जीव पसता है यह चार भुसा वाले भगवान के समान है !! ६ ॥ पंचयोजन विस्ताणे शूकर हरि मन्दिरे । यस्मितसति यो जीयो गर्दभोऽपिचतुर्भुजः ॥ ६ ॥ जो मनुष्य और जगह. साठ हजार वर्ष तपस्या कर फल पाता है वह फल शूकर क्षेत्रमें आधे पहर में मिलता है।॥ ८॥ पषिश्वर्ष सहस्त्राणियोऽन्यत्र कुरुते तपः । तरुललभतेदेवि प्रहराद्धे न शूकरे ॥ ८॥ काशी में दश गुण, घेणी में सौगुणा, गङ्गा सागर के सङ्गम में हजार गुणा और हर मन्दिर श फर लेनमें अनन्त गुणा फल होता है ॥ १० ॥ -काश्यां दशगुर्ण प्रोक्तं बैण्यां शतगुणं भवेत् । सहलं गुणितं प्रोक्त गंगासागरसंगमे ॥ १० ॥ श्रीमान् इसके उपरांत अनेकान तीथों के महात्म पुराणों में लिखे है जिनका वर्णन करने के लिये बहुत समय चाहिये परन्तु पण्डिनी महाभारत वनपर्व अध्याय -५ में पुलस्त ऋषि का वचन है कि सतयुग. में, सब तीथों में स्नान करने से जो पुण्य होना.या जेता में पुष्कर, द्वापर में कुरुक्षेत्र और कलि- गुग में तो गङ्गा ही प्रसिन है जैसा कि

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सर्व कृतयुगे पुण्यं त्रेताया पुष्करं स्मृतम् ॥
द्वापरेऽपि कुरुक्षेनं गङ्गा कलियुगे स्मृता ॥
इस लिये अब मैं अन्य तीर्थों के महात्म को छोड़ गङ्गा महात्म और
। उत्पत्ति को कल वर्णन करूंगा क्योंकि आज मुझको एक आवश्यफ पार्य के लिये
अपने बड़े साहिब के यहां जाना है आशा है आप आमा,देंगे।
श्रीमान् पंडितजी और अन्य महाशयों ने प्रसन्नता पूर्वक स्थी.
कार कर कहा कि बहुत अन्छा आज यहां ही समाप्त कर दीजिये।
सेठजी बहुत अच्छा ओम् शम् ।
सर्व सज्जन महाशयों ने चलने की तैय्यारी की।
सेठजी ने सब सज्जनों को हाथ जोड़ यथा योग्य कहा।
पण्डितजी ने आशीर्वाद दिया और अन्य महाशय यथा योग्य कह
कर चल दिये।
सेठजी भोजन कर साहय के यहां गये ।
इति त्रयोदश परिच्छेदः ।
.
अथ चतुर्दशः परिच्छेदः।
१
आर्यसेठ श्रीमान् पण्डितजी नमस्ते आइये विराजमान हुजिये।
श्रीपण्डितजी आयुष्मान् कह विराजमान हुये इतने में अन्य महा.
शय गण आने गये और यथा योग्य कह कर विराजते गये।
सेठजी अब मैं प्रथम गंगा माहात्म्य सुनाता है सुनिये।
गंगा माहात्म्य।
ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृतिखण्ड अध्याय १० में कहा है जो
मनुष्य गंगा २ सैकड़ों योजन से भी कहते हैं वह सब पापों से छूट कर विष्णु
लोक को जाते हैं।

गंगागंगेति यो माद्योजनानां शतैरपि । मुध्यते सवपापेभ्यो विष्णुलोक संगच्छति ॥ ७० ॥ एडापुराण पछ उत्तरखण्ड अध्याय ८१ में लिखा है। तपस्या, ब्राह्मचर्य, यश और दान से इस गति को नहीं प्राप्त होता जिसको गंगा का खेवन र प्राप्त होता है।३५॥ तपस्या ब्रह्मचर्येण यरित्यागेन वांपुनः । गतितानं लज्जतुगंगासेल्यया. .जभेत् ॥ २५ ॥ जैसे उदय के समय में सूर्यनारायण तीन अंधकार को दूर कर शोभित होते हैं. वैसे ही गहांजी के जल में स्नान करने वाला पापों को दूर कर शोभित होता है ॥ २७ ॥ ब्रांडण और गुरुका मारने वाला 'मदिरा पाने हारा, चालको का मारने वाला सब पापों से शीघ्र स्वर्ग को जाता है ॥ ३७॥ ब्रह्महाचैव गोनोवा सुरापीकालघातकः । मुव्यते सर्वपापेभ्यो दिवंयाति चसत्वरम् ॥ ३७॥ मत्स्य पुराण अध्याय १०३ -में लिखा. है . कि हजार योजन से जीग जी के रमरण चारने से पाप क्षय हो जाते हैं और, उनके नामोच्चारण से दुष्कृत कई करो याले भी परमगति को प्राप्त होते हैं:॥ १३ ॥ योजनानां सहलेषुः गङ्गायाः स्मरणान्नरः । अपिदुष्कृत कर्मातु लभते परमाङ्गतिम् ।। पी नि से पाप नष्ट होते है.दर्शन करने से शुभ मंगलों को देखता है कान और जल, पान-से अपने समेत सात पीढ़ियों को पवित्र कर देता है ॥१४॥ कीर्तनान्मुच्यते पापाद् दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति । अवगाह्य चपीत्वातु पुनात्या सप्तमं कुलम् ॥ श्रांगहीजी एस पृथ्वी पर मनुष्यों का, पाताल लोक में नागों का और स्वर्ग में देवताओं का उद्धार करती है यह त्रिपथगामिनी गङ्गाजी कशाती हैं । । ५१॥ अध्याय १०४॥

(३३) क्षितौतारयते मान्नागास्तारयतेऽप्यधः । दिवितारयतेंदेवांस्तेन त्रिपथगास्मृता ।.५१. ॥ .. प्राणियों की जितनी हडियां गङ्गाजी में पहुँच जाती हैं उतने हजार वर्षों तक प्राणी स्वर्ग में वास करते हैं ॥ ५३ ॥ यावदस्थीनि गंगायो तिष्ठन्तिः शरीरिणाः । .. तवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते यइ गङ्गा सप तीथों में उत्तम तीर्थ है मदियों में उत्तम नदी और महा पातकवाले संम्पूर्ण प्राणियों को मोक्ष देने वाली हैं ॥५३॥ तीर्थानान्तुं परंतीर्थ नदीनांतु महानदी। मोक्षदा सर्व भूतानां महापातकिनामपि ॥ ५३ ॥ विष्णु पुराण अं० ४ अध्याय ४ में लिखा है कि गङ्गा जलमें ही शक्ति है जो केवल स्नान, पान और मार्जन करने वाले ही पुरुषों को तारे किन्तु सैकड़ों हजारों वर्षों के सहे. गले, वार, नोह, हार, राख इत्यादि पर जल परने से उस प्राणी को भी तार दें ॥ १५ ॥ पदापुराण सप्तम क्रिश योगसार अध्याय - में लिखा है कि देवधारियों के जितने समय तक गङ्गाजी में हाद स्थित रहते हैं उतने ही हजार. कल्प वह बिष्णुलोक में प्राप्त होता है ॥ २५ ॥ तिष्ठत्यस्थीनि. गङ्गायां यावत्कालं शरीरिणः । तावत्कल्पसहस्राणि विष्णुलोके महीयते ॥ २५ ॥ जिसकी रान, हाड़, नौ और बोल गहा में डरते हैं वह बुद्धिमान् पिंणुजी के लोक में वास करता है.।। २६:". ६. यस्यमज्जन्ति गंगायाँ भस्मास्थीनि नखानि । शिरोरुहारयपि प्राज्ञः सविष्णो वने वसेत् ॥ २६ ॥ गरुडपुराण अध्याय : १० लोक ८ में लिखा है जो मनुष्य प्रथम अवस्था में पाप करके मर गये हैं और उनकी हड्डियां गङ्गामें पड़ी है वह स्वर्गको जाते हैं। यावदस्थि मनुष्यस्य... गंगातोयेषु तिष्ठति । .. ताचवर्ष सहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ।। ८० ॥ - ( १३४) -- कि यह ५ आप -- ॥ इतिहास ॥ इस पृथ्वी पर सोमवंश में मनोभद्र नाम सब धर्मों का जानने वाला एक राजा हुआ जिस की प्रिंया. हेमप्रभा नाम पतिव्रता स्त्री थी। एक दिन राजा ने मंत्रियों को सभा में बुला कर कहा कि मैं पृथिवी की रक्षा करता है पुत्र आदि भी हैं शत्रुओं को भी नाश किया है अपने गोत्र और दान से ब्राह्मणों की रक्षा भी की है । सजन और पुत्र वलयाहन समेत सब देवता भी प्रसन्न किये हैं परन्तु तो भी. वृद्धावस्था में मेरा बल हर लिया गया है इस..कारण मैं कर्म नहीं करता सामर्थ्य हीन पुरुष को लक्ष्मी शोभित नहीं होती और न अभिः षण सहित स्त्री अच्छी लगती है इस कारण अब मैं इस राज्य को पुत्रों को देना चाहता हूं इस में आप सब की: सम्मति क्या है इस पर सबने कहा. को विचार ठीक है राजा ने वीरभद्र यशोभद्र को बुलाकर अपना राज्य दे दिया इसी समय एक गूनं स्त्री सहित सभा में आकर बैठा तब राजा ने पूंछा आप का आगमन किस हेतु हुआ है तब गृध्र बोला कि इन दोनों के वैभवं को देखने आया हूं पूर्व जन्म में इन दोनों को देखा था। तब राजा ने कहा कि आपने इनके पूर्व जन्म का वृत्तान्त कैसे जाना गृध्र ने कहा कि द्वापर युग में यह सत्यघोप नाम शुद्र के गद और सगर यह दो पुत्र थे यह दोनों एक साथ मर गये। यमदूतं बांधकर धर्मराज के सन्मुख ले गये धर्मराज ने चित्रगुप्त से पूछा कि इनके सव कमी का वर्णन, कीजिये चित्रगुप्त ने कहा कि यह दोनों सत्य पुण्य कार व्रतमें बड़े अंतःकरण वाले हैं कुछ बुरे कर्म किये हैं जो सब कर्म के नाश करने वाले हो गये हैं उसी के कारण यह दोनों नरक जायेंगे अर्थात् इन्होंने ब्राह्मणों को दान नहीं दिया.धर्मराज की आज्ञानुसार वह नरक को गये उली दिम स्त्री समेत मुझ को भी यमदुत ले गये । अब मेरे कर्मों का वृत्तान्तःसुनिये मैं पूर्व समय में सौराष्ट देश का महा. कुलीन वेदादि का जानने वाला सर्वग नाम ब्राह्मण हूं और यह शस्विनी नाम पतिवता स्त्री है विद्या धन और अवस्था के मद से 'मतवाला हो युवावस्था में माता पिता की मन से सेवा नहीं की और निरादर किया । हे राजन् । इसी अपराध से स्त्री समेत उपरोक्त पापियों में छाड़ दिया गया और उन के साथ हजार करोड़ युग और सौ करोड़ युग नरक में महान् दुःखों को सहा फिर अन्त को स्त्री समेत मैं मरे हुओं के मांस खाने वाला गृध्र पक्षी; के कुल में उत्पन्न हुआ और यह दीड़ियों में । एक समय बड़ी आंधी . .

. (१३५ ) आई जिससे यह दोनों उड़ कर निर्मल गङ्गा जल में गिर पड़े और गिरते ही मर गये और सब पाप जाते रहे तदन्तर उन के लेने को विमान लेकर दूत आये जिस में बैंठ वह वि|पुर को गो यह सुन राजा पुत्र और स्त्री समेत गङ्गाजी की सेवा में तत्पर हो गये ! अध्यायः 9 में लिखा है कि जिसने गङ्गा में स्नान नहीं किया उसका मुख देख कर शीघ्र सूर्य के दर्शन करने चाहिये और ऐसे मनुष्यों का अन्न भी न ग्रहण करना चाहिए गङ्गाजी में स्नान करने वालों को पाप उनकी देही को छोड़ कर गङ्गा न स्नान करने वालों की देह में चले जाते हैं और जो कुएं के जल में भी गङ्गा यह नाम कह स्नान करता है वह गङ्गा स्नान के फल को.. पाता है जो गंगाजी. की सरसौ. वरावर .बाल.को मृत्यु समय में पाता है वह परम पद पाता है । पद्म सप्तम किया योगसार अध्याय ३, ७ से ॥ श्रेतायुग में धर्मस्व नाम' ब्राह्मण जो धर्मात्मा शांति शील आदि गुणों से परिपूर्ण थे गङ्गा स्नान कर घर चलने की तय्यारी की । उस समय रत्नकर बनियां सेकड़ों लेदकों सहित आया जिस में कालकरम नाम ब्राह्मण भी था। उसने एक थैल को जो मार्ग के परिश्रम से थक गया था अति निर्दई हो कर मारा उसने कोच में आकर कॉलंकल्प को सींगों से मार डाला इस को देग्न धर्मस्वजी वहां गये ओर उसको गङ्गा जलकी बंदों से, सींचा परन्तु वह प्राणरहित हो गया था इस कारण, चैतन्य नहीं हुआ इतने में यमदूत वहां आये दोनों में वार्तालाप होने लगा। यदूत ने कहा कि यह दुराचारी पापी, हजार हत्या करने वाला कृतघ्नी, गऊ और मित्रों का मारने वाला तथा बुरे शय चाला है इसने सुमेर पर्वत के समान सोना चुराया है हजारों वरन् करोड़ो हत्या और स्त्री हत्या की हैं.इसने माता से गमन.. किया है..और प्रति दिन गऊ मांस खाया है. और अन्यों के घरों को जलाया है सभा में पराई निन्दा की है विधवाओं के गों को. गिरोया है, अतिथियों को तलवारों से.. मारा है इस लिये इस महापापी का यमराज के पास जाने दो। अयं पापी दुराचारी ब्रह्महत्यासहतत् । " : कृतधना व गोध्नश्च मित्रघ्नश्च दुगशयः ॥ ५७ ॥ मेरुप्रमाणहेमानि हृतानि सुवहूनि म । ० परदाराह ता नित्य मनेनातिदुरात्मना ॥ ५.८ ॥ ..

कोटिकोटि सहस्राणि जंतूनां विष्णुकिंकराः । कृताश्च बहुधा हत्याः स्त्रीहत्या च सथैव च ॥ ५६ ॥ अयं न्यासापहरणं स्वमातृगमनं तथा । गोमांसभक्षणं चैव चकार प्रतिवासरम् ॥ ६० ॥ गृङ्मांयांतमतिथिं धनलोभेन सत्तम । अहन निशितैः खंगैर्निशाया यवनोपमः ॥ ६२॥ - विष्णुदूत यह तो आप ने सत्य कहा परन्तु गंगाजल के सींचन से यह पापों से छूट गया क्योंकि देह धारियों के पाप जय तक ही रहते हैं जय तक गङ्गाजल की बालू सर्श नहीं होती । अन्त को विष्णुदुत विष्णलोक को ले गरे अर्थात् गंगाजी के जल के सींचने के प्रभाव से अत्यन्त पापी कालकस्य भी हरिके मन्दिर में सालोक्य प्रात होता हुआ ॥ ६६, ६८, ९४ । यह देव धर्मस्व ब्राह्मण गंगा तट पर गया और स्तुति की जिसको गहा ने कर दिया बटुन काल के पीछे मरने पर उत्तम पद को पाया। ओमान गहा की महिमा कहाँ तक आप को सुनाऊं जव चि णु. शिव और ब्रह्माजी भी उनका सेवन करते हैं। तो फिर कौन ऐसा है जो उन का सेवन न करे जैसा कि-शिवपुराण शानसंहिता अध्याय ४३ में लिखा है। गंगां च सेवते विष्णुगंगां च सेवते हरः । गंगा च सेवते ब्रह्मा को वा गंगां न सेवते ॥ इसके अतिरिक गङ्गाके समान कुछ कम यमुना जीके गुण गाये हैं वेत्रमती के विपय में पापुराण यष्ठ उत्तर खण्ड अध्याय २३४ में लिखा है कि कलियुग में दूसरी मंगा जिसके समान पृथ्वी में कोई तीर्थ नहीं है क्योंकि विष्णु आदि सब देवता उस में स्थित रहरे है जो एक या दो वा तीन बार स्नान करता है उसके सब पाप छूट जाते हैं। धाराहपुराण उत्तरार्द्ध अधार १३% में लिन्ना है कि नर्वदा शिवजी की साक्षात् मूर्ति है इसके तप करने पर शिवजी ने कहा है कि हम लिंगरूप हो कर सर्वदा तुम्हारे गर्भ गणेश सहित निवास करेंगे । और इसी अध्याय में गण्डकी के विषय में लिखा है कि अब गण्डकी ने अत्यन्त घोर तप लिया तय चि णु (१३७ ) भगवान ने कहा कि हम तुम्हारे तप से प्रसन्न हैं तुम घर मांगो तय गण्डकी ने भगवान की स्तुति की और कहा कि आप मेरे गर्भ में निवास कर पुन हाँ तब विष्णु महाराज ने विचार कर देखा तो जाना कि यह नदी हमारे संग के लोम से बरकी याचना करती है तब भगवान् ने कहा कि हम निज भको के अनुग्रह के कारण शालिग्राम शिलारूप हो पुत्र तुल्य सर्वदा तुम्हारे उदर में निवास करेंगे इस लिये तुम सब नदियों में श्रेष्ट होगी और जो जीव तुरहार जल स्लान वा दर्शन पान आदि करतो वे निपाप हो उत्तम लोक बोप्राप्त होंगे। पण्डितजी ने कहा कि सेठजी अब आप अन्य नदियों के माहात्म्य को छोड़ फर गङ्गा उत्पत्ति को वर्णन कीजिए। सेठनी-जो आहा। विष्णुपुराण अंश २ अ० ८ ने लिखा है कि विष्णु के परमपद से देव- ताओं की स्त्रियों के अनुलोप चन्दनादि चहाने बाली श्रीगंगाजी उत्पन्न हुई गो कि श्रीविष्णुजी के यायें चरण के अँगूठा से निकली और ध्रुवजी ने अपने मस्तक पर धारण किया तिसके पीछे सन्तर्षियों के लोक में आई उन लोगों ने प्राणा- याम कर अपनी जटा धोई तिसके पीछे चन्द्रमण्डल को सींचती हुई सुमेह पर्वत पर आई वहां से जगत् के पवित्र करने के लिये ४ दिशाओं को सीता, अलकनन्दा, चक्ष व भद्रा नामों से प्रसिद्ध हो चली उनमें अलकनन्दा में भी सात भेद हैं उनमें से जो गङ्गा नाम से प्रसिद्ध है उसे शिवजी ने अपनी जटा में धारण कर लिया वा १०० वर्ष तक न होड़ा शिवजी की जटा से भागीरथ राजा की तपस्या से आई पा सगर के पुत्रों की राख पर यह फर उनको तारती हुई। श्रीगदागयत स्कंद - अध्याय २१ श्लोक में लिखा है कि- धातुः कमण्डलुं जलतदुरुकमस्थ, पादावने जनपवित्रतया नरेन्द्र । स्वरध्वन्यभून्नभसि सा पतीनिमाष्टि, लोकत्रयं भगवतो विशदेवकीर्तिः ॥ हे राजन् ! बामन के चरण धोने से ब्रह्माजी के कमण्डलु का जल

(१३)
लोगों को पवित्र करने के लिये गंगाजी बना और विष्णु भगवान् की उपचल
कीर्ति आकांश में गिरती हुई यह धारा तीनों लोकों को पवित्र करती है।
शिवपुराण धर्मसंहिता अध्याय ३३ में लिखा है कि गंगा
विष्णु के चरणों से प्रादूर्भूत हो स्वर्ग से गिरती है।
विष्णुपादविनिष्क्रांता गंगा पतति वै दिवाः ॥ २८ ॥
बृहन्नमारतीय पुराण अ० १५ श्लोक ६६ से १०६ तक महादेवजी भागी-
रथ की तपस्या से प्रसन्न होकर बोले कि हे राजन् वर मांगो। तब भागीरथ
ने हाथ जोड़ कर कहा कि हे महेश्वरजी जो आप मुझको वर दिया चाहते हैं तो
गङ्गाजी देकर मेरे बड़ों का उद्धार कीजिये तब शिवजी बोले कि हे राजन् हमने
गङ्गा दी और तिनकी परम गति अरु मोक्ष भी दी ऐले कह शिवजी अन्तर्धान
भये और शिवजी के मुकुट से निकली लोकपाधमी गंगाजी सब जगत् को पवित्र
करती भागीरथ के पीछे चलीं। तभी से यह निर्मल सब के मल हरने वाली
गंगाजी सघ लोकों में (भार्ग:रथी) ऐसे विख्यात भई ॥ १०६ ॥
पद्मपुराण पष्ठ उत्तरखण्ड अ०२१ में लिखा है।
पूर्वजानां हितार्थाय गतौ सौ हेमके गिगे
तत्र गत्वा तपस्तप्तं वर्षाणामयुतं तदा ॥ १० ॥
आदिदेवः प्रसन्नो भू यो सौ देवनिरंजनः ।..
तेन दत्ता इयं गङ्गा आकाशात्समुपस्थिता ॥ ११ ॥
तत्र विश्वेश्वरो देवो यत्र तिष्ठति नित्यशः ।
गंगा दृष्ट्वाऽऽ गतो तेन गृहीता जाददी तदा ॥ १३ ॥
जटाजूटं च संध्यार्य वर्षाणामयुतं स्थितम् ।
ननिःसृतांतदा गंगा ईशस्यैव प्रभावतः ॥ १३ ॥
विचारितं तदा तेन क्वगता मम मातृकां ।
स ध्यानेन विचार्यैवं गृहीता चेश्वरेण तु ॥ १४ ॥
ततः के जासमगमत्सतु. भगीरथो नृपः।
तत्र गत्वा मुनिःश्रेष्ठ ह्यकरोदुल्वणं तपः ॥१५॥

(१३६) महादेवजी बोले कि भागीरथ ने अपने पुरुषाओं के हित के लिये हिमांचल पर जाकर दस हजार वर्ष तपस्या की तय आदि देव प्रसन्न हुये। उन्होंने आ- फाश ले इन गंगाजी को दिया वहीं पर विश्वेश्वर देय सदा स्थित रहते जय भागीरथ ने गंगा को आते न देखा जो महादेव की जटाओं में दस हजार वर्ष स्थित रहीं और उन्हीं के प्रभाव से न निकली तब भागीरथ ने विचार किया. कि हमारी माता कर गई और ध्यान से जाना कि महादेवजी ने गृहण कर ली। तव भागीरथ महाराज कैलास पर. 'गये और वहां जाकर घोर तपस्या की जिससे महादेव प्रसन्न होकर घोले कि मैं गङ्गाजी को दूंगा उसी समय एक पाल गाजी को दिया ॥ १६ ॥ भागीरथ गंगा को लेकर पाताल में जहां उनके पुरुखे भस्म हुये ले गये गहाजी का पहिला नाम अलकनन्दा था पाराधितस्तदा तेन दत्तशेनहमापगाम् । एक केश परित्यज्य दत्ता त्रिपथगा तदा ॥ १६ स गृहीत्वा गतो गंगा पाताले यत्र पूर्वजा। शलकनंदा तदा नाम गंगायाः प्रथमं स्मृतम् ॥ १७ शिवपुराण सनत्कुमार संहिता अ० १२ में लिखा है कि शिव के दक्षिण नेत्र से श्वेत कांति वाला जल निकला चही भूर्भुवादि सय लोको में व्याप्त हो गया और वही यहां स्थित होकर पृथ्वीमें आनेसे गंगा कहाती है हे ब्राह्मणो! यह गंगा प्रथम नेत्रों से उत्पन्न हुई है॥६॥ दक्षिणान्नयनान्मुक्को जलविन्दुः सितप्रभा । सो सर्वेषु लोकेषु गता वै भूर्भुवादिकम् ॥ उपस्थाये मांगां प्राप्ता तस्मादङ्गेति चोच्यते। । नेत्राभ्यां प्रथमाजात गङ्गेति द्विजल सम ॥ याल्मीकि रामायण सर्ग ३६ श्लोक १२ से १५ तक॥ चोदितो रामवाक्येन विश्वामित्रो महामुनिः। वृद्धिं जन्म च गङ्गाया वक्तुमेवोपचको । शैलेन्द्रो हि भवान् राम धातूनामाकरो महान् ।

तस्य कन्या इयं राम रूपेण प्रतिम भुवि । या मेरुदुहिता राम तयोर्माता सुमध्यमा ! नास्ता भेना मनोज्ञा वै पत्नी हिमवतः -प्रिया 1, तस्या गङ्गेयमसबज्येष्ठा हिमवतः प्रिया । तस्यों नाम द्वितीयाभूत्कन्या तस्यैव राघव ॥ रामचन्द्र ने विश्वामित्र ऋपिसे गल्तका वृत्तान्त पूंछा तो उन्होंने उत्तर में कहा कि पर्वलाका राजा हिमवान् जो धातुओं की खानि तथा बड़ा है उसके यहां दो कन्या ऐसी उत्पन्न हुई जिनके समान रूपमें पृथ्वीपर कोई नहीं था, हे राम ! सुन्दर कमर वाली मेनकी बेटी मैनारम्य हिमवान् की प्यारी सी इन दोनों की माता धी। अय राघव : ख मैना ले हिमवान् की बड़ी बेटी गला और छोटी उना उपन्त हुई । देखिये देवी भागवत स्कन्द६ अध्याय ६ । लक्ष्नीसरस्वतीगंगा तिस्त्राभार्या हरेरपि । प्रेरणा समास्ता तिष्ठन्ति सततं हरिसनिधौ ॥१७॥ सर्थात् तमो, सरस्वनी और गहा तीनों पिजी की हियां हैं, वे तीनों समान प्रीति के साथ विडोके पास सदा रही है । 'मजा' ने एक बार विष्णु का मुह कामातुर हुए कटाक्ष साध गुलकरार वारंवार देखना जारभ बिया, विष्णुजी उस समय गहा के मुखको देन कर हंत दिरे, इस बात को देखकर लकी ने तो लमा की परन्तु सरस्वती ने ऐसा न दिया और मोधित होकर असे योली कि धर्मात्मा और श्रेष्ठ भर्ती कोअपनी स्त्रियों को समष्टि से देना चाहिये दुष्ट पतिका स्वभाव इस विरुद्ध होता है, गंगाधर ! मैंने जान लिया कि तेरा सौभाग्य गंगापर अधिक है और लक्ष्मी पर उसके घराघर । जय प्रभु ! सुपपर कुछ नहीं अब मुझ अभागिन का यहां जमो व्यर्थ है तुयको सय मनुध नस्यरूप कहते हैं दे सर मूर्ख हैं वेदको नहीं जानते हैं, इस यातको सुन सरस्वती को मोमें यूर देव दिर्जा सभापे बाहर इलदिये। इसके पश्चात् लोक ८ ४२ राक पद लिखा है कि लैजाने एर सरस्पती मंगादी माा मार पी गालियां बनी और चौरा को दौड़ी परन्तु लाजी ने बीचविचाय कर दिया इस पर सरस्वती नेलकी को शाप दिया दिलीतमा देखकर चरी तो नदी और वृक्ष समान वैती रही लो चत जा .

अर्यात् नयो सौर वृक्ष होला। गंगाने सरस्वती की यह दशा देखफर. लक्ष्मी से कहा कि इस दुशीला अपवासनी मरी फो टोह, देखें यह युरे मुंह घाली, सदा कलह बने पालो मेरा क्या फरल्यगी लोग मेरे भाययो देखलें में भी शाप देती है कि यह भी कलियुग में लोगों के पाप ग्रहण करेगी सरस्वती ने इस पर गा को उलट फर कहा कि नमी नदी चनफर लोगों के पापको प्राप्त होगी। इसके पश्चात् सी अध्याय ४३ लोक ले १७ तक लिखा है कि चतुर्भज पिणजी चारभुज याले चार. पारपदाको साथ लेकर आये और सरस्वती को पर लिया और लपी से बोले कि तृपक प.लास धर्मध्वज के घर जन्म लेकर कसद की सी पनंगी फिर भाग्य यश वृक्ष बन जायेगी पीछे से फिर मेरी पत्नी बनेगी और एक फलाले शीघ्र पद्मावती गाम नदी बन जा और अय गंगा तू मी एक अंशसे गदों यग और भागीरथके तपसे महातल में जाकर समुद्रकी सी हो जा पर फलाले राजा शान्तनुकी सी चन और अय सरस्वती तू भी सौतों के साथ लदाई करनेका फल मांग पक पलासे नदी बन ब्रह्माके मपन में जाकर ब्रह्माशी खी बनजा गंगा शिवजी के घर जाये मेरे यहां केवल लक्ष्मी ही रहे । पयोकि यह मेरी मुशीला, मोधरहित खी है मेरी भक्त तथा सतीरूप है बहुत नियोको रखने वाला सदा दुःखी रहता है और एक स्त्री वाला सदा सुखी । यह बात सुनकर तीनों देवी परस्पर लपटकर रोने लगी और भी भयभीत होकर शापमोचनकी प्रार्थना करने लगा। परन्तु गंगा वोली हे जगत्पति किस अपराध से तुमने मुझे छोड़ दिया में शरीर त्याग करगी और तुझको निर्दोषका दोप लगेगा। जो पुरुप पृथ्वी में निदॉप श्री का त्याग करता है यह चाहे सर्येश्वर मी फ्यान दो नरक को प्रात होता है। फिर पीछे लक्ष्मी ने अन कुछ सरस्वती के पारे में यहा विष्णु जी बोले कि अच्छा सरस्वती एक फल्प से नदी बने और आत्री ब्रह्मा के घर जाय और आप मेरे घर में रहे कलियुग के पांच हजार वर्ष गुजरने पर तुम्हारी तीनों को मोक्ष दोगी और मेरे घर आओगी। श्रीमार पण्डित जी अब हमारी आप से यह प्रार्थना है जो गंगा जी इस समय भारतलण्ड में यह रही है वह श्रीमद्भागवत के. लेखानुसार वामन महाराज के चरणों का धोबन या शिवपुराण धर्मसंहिता और विष्णुपुराण के कथानुसार गङ्गा विणु महाराज के चरण से उत्पन्न हुई है धा शिवपुराण सनत्कुमार संहिता लिखित शिवजी के (१४२) दक्षिण नेत्र का श्वेत जल है वा वाल्मीकि रामायण के कहने के अनुसार गंगा हिमवान् की बेटी है अथवा वृहन्नारदीय उपपुराण के अनुसार शिवजी के मुकुटसे निकली हुई हैं याति देवीभागवत स्कन्द ९ के अनु- सार विष्णु महाराज की तीनों त्रियों के लड़ने झगड़ने और कोसने पीटने के का- रण नदियां हो गई हैं ? अंग्रेज बहादुर ने तो तहकीकात कर यह प्रत्यक्ष प्रकार ले प्रकट ही कर दिया है कि गंगा हिमालय पहाड़ की गंगोत्री नाम चोटी से निकल दंगाले की खाड़ी में जाकर हिन्द समुद्र से मिलती है अब आप किसको ठीक मानेंगे। इसके उपरांत पद्मपुराण पष्ठ उत्तरखण्ड अध्याय ३४ को पढ़िये तो मालूम हो जायगा कि श्रीगंगाजी ने श्रीकृष्ण महाराज से कहा है कि कलियुगके करोड़ों ब्रह्महत्यादिक पापों से युक्त पुरुष मेरे जल में स्नान करते हैं जिसके कारण मेरा शरीर पापमय है बतलाइये मैं क्योंकर उस पाप से वचूं तव श्रीकृष्ण महाराज ने कहा कि तुम प्राची सरस्वती में स्नान करो इस पर गंगे में कहा कि प्रति दिन मैं आ नहीं सकती तब श्रीमहाराज ने कहा कि तुम निस्पृशा व्रतको करो सब पापों से जाओगी तब गला ने उसकी विधि पूंछी और व्रत किया । ब्रह्मवैवर्त्त- पुराण के प्रकृत खण्ड अध्याय १० में लिखा है कि हे गंगे सहनों पापियों के स्नान से जो पाप तुम को होगा वह मेरे भक्ति के दर्शन मात्र से नाश हो जायगा। सहस्रपापिना स्नानाद्यत्पापं वै भविष्यति । मद्भकैकदर्शनेन तदेव हि विनश्यति ॥ ७१ ॥ श्रीमान् पण्डितजी यदि आपका विश्वास वर्तमान धर्म सभा के मान- नीय पुराणों पर है तो आप गला को क्यों पापी बनाते हैं जिसके लिये उस को निस्पृशा व्रत अथवा विष्णु भक्त के दर्शन करने की आवश्यकता होती है इन से तो गला स्नान करनेवाले स्वयं त्रिस्पृशा व्रत अथवा विष्णुमत के दर्शन कर पापों को दूर कर लिया करें तो बहुत अच्छा हो क्योंकि गङ्गा को क्लेश पहुँचाना अच्छा नहीं। पण्डितजी-श्रीमान् सेठजी भव इस विषय में आपको कुछ कहने की आवश्यकता नहीं क्योंकि मेरी समझ में तो आ गया कि उत्तम पुरुषों का - (१४३) नाम तीर्थ है और उनके सत्संग से अपने आचरणों को सुधारना ही सच्चा स्नान है। क्योंकि जल ले शरीर शुद्धि होती है आत्मा की नहीं जैसा कि प्रथम आप ने हमको सुनाया अब रहने दीजिये। सेठजी-बहुत अच्छा मैं इस विषय को शीघ्र समाप्त करता हूं देखिये श्रीमहाराज उपरोक्त बातों के उपरांत श्रीमद्भागवत स्कन्द १२ अध्याय २ में कैसा स्पष्ट कहा है कि कलियुग में लोग दूर अलको ही तीर्थ मानेंगे जैसा कि-"दूरे वार्यपनं तीर्थ इस लेन से ही तो स्पष्ट प्रकट हो रहा है कि सतयुग, द्वापर और भेता में जल को तीर्थ नहीं मानते थे फिर आप कलियुग में दूर जल को क्यों तीर्थ मानते हैं। इसके अतिरिक्त श्रीमद्भागवत माहात्म्य अध्याय १ में नारद मुनि ने कहा है कि घड़े भयंकर, कुत्सित कर्म करने वाले नास्तिक पापी मनुष्य तीर्थों में वास करने लगे हैं इस लिये तीर्थों का सार अर्थात् फल जाता रहा जैसाकि- भत्युग्रभूरिकर्माणो नास्तिका गैरवा जनाः। तेऽपि तिष्ठन्ति तीर्थषु तीर्थसारस्ततो गतः ॥ ७१ ॥ श्रीमान् पण्डितजी वा नारदजी महाराज के कथन से स्पष्ट, दुरा चारी, वेदविरोधी, स्वार्थी आदि अपगुणयुक्त मनुष्य निवास करते हैं वहां जाने से कुछ लाभ नहीं होता इस लिये जो मनुष्य उत्तम पुरुपों के सत्संग से ज्ञान रूपी कुण्डके सत्यरूपी जलमें स्नानकर राग हेप रूपी मलको दूर करने के अर्थ मानसतीर्थ में स्नान करते हैं वही मोक्षको प्राप्त होते हैं जैसा गरुडपुराण श्लोक १११ में ज्ञानहरे सत्यजले रागद्वेषमलापहे । यः स्नाति मानसे तीर्थे स वै मोक्षमवाप्नुयात् ॥ अध्याय १ में कहा है कि जो मनुष्य शानी हैं वे परमगति अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करते हैं और पापीपुरुष दुःख सहित यमकी यातना को प्राप्त होते हैं। येन राज्ञानं शीलश्च ते यान्ति परमां गतिम् ।

(४४) पापशीला नरा यांति दुःखेनयमयातनाम् ।। और अध्याय १६ में कहा है कि तत्व जानने वाले मोक्षको और धर्म करने वाले स्वर्ग पाते हैं और पापी दुर्गति को प्राप्त हो पक्षी आदि के यहां उत्पन्न होकर मरते हैं। मोक्षं गच्छन्ति तत्वज्ञा धार्मिकाः स्वर्गति नराः । पापिनो दुर्गतिं यान्ति संसरन्ति खगादयः ॥ १६ ॥ श्रीमान् पंडितजी ने कहा कि सेटर्जा अब इस विषय को समाप्त कीजिये क्योंकि हमने पुराणोंके लेखसे ही तीर्थ विषय के तावषो जान लिया सच तो यह है कि पुराणलीला अपार है। सेठजी ने कहा कि जो आक्षा श्रीमान् की है मैं उसका पालन करूंगा परन्तु मुझको अभी इस विषयमें यह दिखलाना शेष रह गया है कि वेदानु- कूल पुराणों में स्त्रियों के लिये पतिसेवा पनि पूजा पतिकी आशा पालन फरनाही सर्वोपरि तीर्थ घतलाया है और उनको स्वतंत्रता पूर्वक किसी कार्य के करने की आशा नहीं दी परन्तु फिर उन्हीं पुराणों में उपरोक लेख के विरद्ध स्नान और दर्शन करने से नाना फलों की प्राप्ति उनको बतलाई है। श्रीमान् पंडित जी-तेजी इस विषय में हमारी भी यही सम्मति है जो आपकी है अर्थात् क्षियों को पतिसेवा के अतिरिक्त विना उनकी आज्ञा के स्वतन्ना पूर्वक कोई काम न करना चाहिये इस लिये हम इस विषय को सुनना नहीं चाहते। अन्य सज्जनोंने कहा कि हमशोटी इस विषय में कुछ सुनना नहीं है क्योंकि हमने अन्य-पुस्तकों में पढ़ा और सुना है। सेठजी-बहुत अच्छा जो आप सय र हाशयोकी आशा है वही मेरा कतं है इस लोअर मैं इस विषय को समाप्त करता हूं ओ३म् शम् । इसी समय लाला रामसहायजी ने बनारसखे आकर श्रमान् पंडितजी क्षी पालागनकर उनके बड़े भाई साहिवका पत्र दिया जिसको पढ़ श्रीमान् ने कहा कि सेठजी मुझको रे बड़े भाई साहिबने बहुत शीघ्र एक मुकदमे की पैरवी के लिये बुलाया है। इस कारण मैं कल जाने का प्रपन्ध फलंगा और न जाने मुंझको कितना समय इस कार्य के करने में लगे इस लिये अब आप पुराण के कथन को समाप्त कर दीजिये। सेठजीने यह सुन विवेदन किया कि अभी तो मुझंको बहुत कुछ पुराणों के विषय में सुनाता है और विशेरकर दो तीन विषय तो जरूर ही कहना है और यह कार्य भी परमावश्यक है इस कारण जब आप अपने भाई साहित के कार्य से आनन्दपूर्वक लोटकर आजायेंगे न मैं फिर निवेदन करूंगा। श्रीमान् पण्डितजी-बहुत अच्छा अन्य संब महाशयों ने कहाकि हमारी भी यही संम्मति है। पण्डित जी-सेठजो आपने इस समय तक जो २. विपश्य सुनाये उनसे हमको अनेकान बातों का पता लगा और अच्छे प्रकार यह प्रकट हो गया कि कि जिस सूरत में यह पुराण इस समय उपस्थित हैं वह कदापि महर्षि व्यास प्रणीत नहीं है । क्योंकि इन में हमारे पड़ों को निन्दा भरी पड़ी है जिसको सुन सुनकर मेरा हृदय फटा जाता है हां इनमें जो बातें उत्तम२ हैं वह व्यास महार ज को कहीं हुई हो । सच तो यह है कि महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने वेदोक्त धर्म को सर्वोपरि सिद्ध कर ऋषियों और मुनियों के महाध को चिरायुकर भारत के सिर का मुकुष्ट रख लिया और सत्य सनातन धर्म के ओ३म् रूपी झण्डे को भूमण्डल पर फहरा दिया। हम तो आज मन से उन महात्मा के चरणों को सिर नयाने है तदन्तर आप को आशीर्वाद देने हैं कि परमेश्वर आप को सर्व प्रकार के आनन्द दे फिर अपने कटुवांचयों के कहने की क्षमा चाहते हैं सेठजी आपकी सहन शीलता ने आज मुझको पुराणों के लेखों पर अविश्वास कर दिया ईश्वर आप को इस से भी अधिक सहन शक्ति प्रदान करें जिससे आप नाना प्रकार के कटु वाषयों को सहन करते हुये देश के उपकार में मन, मन, धन से लगे हैं। अंबं अन्त को आप से हमारी यही आशा है कि आप इस विषय को शीघ्र मुद्रित करा दीजिरे जैसा कि हमसे आए प्रथम कह च के हैं जिससे समस्त भारत वासियों को पुराणों के लेजों पर विचार करने का मौका मिले।

(१४६ ) शन्य महाशय गणों की शोर से लाला केदारनाथजी ने कहा। फि हम आज श्रीमान पण्डितजी और सेठी को धन्यवाद देते हैं जिनकी परम कृपा से हम सबको अवसर मिला कि जिसके कारण पुराणों की मपूर्व और अद्भुत वावे कर्ण गोचर हुई आगे और सुनने की आशा है इसके उपयंत श्रीस्वामी दयानन्द सरस्वतीजी और उनके गुरु स्वामी विरजानन्दी का कोटा- निकोट धन्यवाद देते हैं जिन्होंने भारत के धर्मफ्री ड्वती हुई तय्या को अपनी विधा के बल से बचा लिया। सेठजी ने कहा कि प्रथम मैं उस परसेघर जगदीश्वर मशक्ति मानको कोटिशः धन्यवाद देता हूं जिनकी परम कृशा और दया अनुग्रहसे मेरी इच्छा पूर्ण हुई और आगेको मनोकामना सिद्ध होने की आशा है ! इसके पश्चात् श्रीमान पंडित गपप्रसादजी और आ- साहिधानको धन्यवाद देताहूं जिन्होंने अपना अमूल्य समय देकर मेरी मतोकासना सफल को । श्रीमान् पडितजी व अन्य महाशयशेने जो कुछ मेरे लिये कहा है मैं उसके लिये कृतक्ष हूं और आशा है सदा मुझ सेवक पर ऐसी ही ना बनाये रहेंगे और धर्मके विषय में निष्पक्षता की कसौटी को अपने हाथ से न जाने देंगे इस के उपरांत वृष्टिश गवर्नमेष्ट क धन्यवाद देताहूं जिनके राज्य में आनन्द पूर्वक सभ्यतागुक्त प्रत्येक पुरुप अपने विचारोको प्रकट कर सकता है परमेश्वर हसारे शिरपर ऐती न्यायशीला गवर्मेण्ट को लदा वनाएरखे जिनके राज्यमें शेर, वकरी निर्वैर होकरएक घाट पानी पीते हैं। -- इसके पश्चात् महाशय छदम्मीलाल ने कवि नाधूरामशङ्कर शर्माका फहा हुआ निम्न लिजित भजन उत्तम प्रकारसे गायन किया। दोहा-जिसकी माता ने प्रजा, पाली प्रेम पसार । उस प्रभुकी प्रभुता बनी, लोक जीवनाधार ।

( १४७ ) भजन । टेक-सप्तम एडवर्ड महाराज, रक्षा हम सबकी करते हैं । श्री, बज, बोध भखण्ड प्रताप, साहस धर्म सुकर्म कलाप । ऐसे सद्गुणधारी आप, मनमें नहीं भरते हैं ॥ स. ए. म. र ह० करते हैं ॥ १ ॥ अपनी माताके अनुसार, पूरा करें प्रजापर प्यार । किसके ऊपर परमउदार, हितका हाथ नहीं धरते हैं । सए० म० र ६० करते हैं ॥ २ ॥ भिक्षुक भीरू वीर भूपाल, पण्डित मूढ़ धनी कङ्गाल । हिल मिल काटें सुखसे काल, पापी मारखाय मरते हैं । स० ए० म० ए० करते हैं ॥ ३ ॥ चारों राजनीतिके अङ्ग, चलते हैं न्यायके सङ्ग। " शंकर" शासनके रस रङ्ग, डाकू देख २ डरते हैं ॥ सक ए० म० र० ह० करते हैं ॥४॥ जिसको सुनकर सब महाशयोंने करतलध्वनिसे प्रस- नता प्रकट सप्तमएडवर्ड महाराजको धन्यवाद दिया इस के पश्चात् सेठजीने निम्नलिखित मन्त्रको पढ़ शान्ति की। द्यौः शान्तिरन्तरिक्षधशान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्ति- रोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिब्रह्म शान्तिः सर्वछशान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि ॥

( १४८ )
श्रो पण्डितजीने चलने की तैयारी की।
सेठजीने खड़े होकर हाथ जोड़ बड़ी नन्त्रतासे श्रीमान्को नमस्ते व
अन्य महाशयाँको यथायोग्य कहा।
श्री पण्डितजीने प्रसन्नतापूर्वक आयुष्मान् कहा और चल दिये।
अन्य सज्जनोंने यथायोग्य कहा।
सेठजी नपने कार्य में लग गये
इति चतुर्दश परिच्छेदः
पुराणतत्वकाशका द्वितीय भाग
समाप्त।

* ओ३म् विज्ञापन । गृह-नगर-दैर्श और राष्ट्र को सुखमय बनाने के लिये हमें आवश्यक है कि हम कुम्ब सहित उन पुस्तकों का पाठ करें जिन में आनन्द-शान्ति और स्वाधीनता के सरल उपाय बताए गए हैं क्योंकि इन्हीं उपायों से धन आदि पदार्थ भी मिल सकते हैं और इन्हीं के पाठ से हम अपने जीवन को आदर्श-धार्मिक और वीर जीवन यनाते हुरे.यथार्थ सुखी हो सकते हैं। -- हमारी पुस्तके अपनी गुणग्राहकना-भापा की सालना-छाई की सुन्दरता और मूल्यकी अल्पना के कारण जैसी लोकपिय हैं उनके कहने की आवश्यकता नही क्योंकि इन में से बहुत पुस्तकों के कई २ एडीशन निकल चुके हैं एक बार हाथ में ले लेने से पब तक थाप पुस्तक को समाप्त न कर लेंगे मंत्र नक आपका भी उसको छोड़ने को न चाहेगा । शरीर विज्ञान इस पुस्तकामें शरीर किन किन पदोधों से बनी। पंचमहाभूत किमया कहते हैं वायु और इस के भेद, श्वास-तेज-जल-पसीना-शरीर की गतिया-शरीर के भाग । मस्तिक-ओख-नाक-कान-मुंह-दान्त-मसूढ़े-ताल-गाल-कमपर्टी होठ-छोडी-गर्दन-धंड-हंसली-ठठेरी-हड्डी-चरवी-मांस--रुधिर--खाले- बाल आदि की बैनावैट-शिरा धमनी-स्नायु पेशी-काडरा-फुफ्फुस-हृदय-फेफड़ा अन्तड़ियां-सिवनी-मर्मस्थान-तिल्ली और जिगर क्या है ? भोजन कैसे कहां पचता है भूत्र प्यास कैसे लगती है नर्स प्रकारकी लैंगरोग १०० बातों का वर्णन सेंग्लभाषा में किया गया है साथ ही उने नियमों को भी बतलाया गया हैं जिन पर चलने से शरीर आरोग्य रह सकता है। विना शरीर की पनावट के भान से उसको निरोग रखना कठिन है। पूर्ण सुख-धन और ऐश्वर्य शरीर को स्वस्थ रखने से ही मिलने हैं इस लिये- +

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डिप्लोमाप्राप्तकर. अनुभव एवं प्रयोगों द्वारा लिस्मर
वैद्यक शास्त्रानुसार
पुरुषों एवं स्त्रियोंके रोगोंझा ठेका।
प्यारे राठक एवं पाठकानो!
भारतवर्ष में जिन जिन दिन मां पीड़ित होकर हमारे नपर्वक
एवं नवयुवनियाँ समय में लसावश अपने प्रगृल्य पारणों को परित्यार
करते हैं उन के दम्ब दूर करने के लिये हमने गा औपयालय खोला है।
किमी प्रकार का धोका न देकर चिकन्ला कई ध्यान से की जाती है।
प्रत्येक प्रकार के पत्र गुप्त रखे जाते है अत: यदि आप
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।
स्मिनलाल भद्रगुप्त,.
निलहर
शिला शाहजहां रय.

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Puran-tatv-prakash Volume-ii

Author
Bansheedhar Ji
Title
Puran-tatv-prakash Volume-ii
File name
Puran-tatv-prakash Volume-ii
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OCR done
Citation
1924
Published
2009/09
Publisher
Deshbandhu Press Barabadankee
Language
Sanskrit
Pages
158
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
322454
Barcode
99999990252926.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
U8ARwt74GJr
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Puran-tatv-prakash Volume-ii