Adarsh Library, Jaipur
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शान्ताकुमार
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दो शटद
माल बैग में हमारी पहली दोगानो पो। प्रारमें ही सर गुमगुम
मे। रमजाद में कुछ दिनों में यह माना गरमी गोपीकि
पायर दोगामी पर गयी रिा पर दिपाशा । प्रतिनिोि
म्यान गुना जाता पा। पर दोगमा गई घोर नरपा
नपरे ।
हममे गे मुधार मन्ती में रहोगे । सामान मायारा। मादन रेम
से उग गूनी बोटीवो दोनों में जगममा दिया। नर की परे प्रगत
पएक आजीयन मंदीने हागिने माट गार वारयासोपा
पीर देशा है ।पहिया भोजन बनाया। माया पूना भी की।
पाहर गय मन्तीगामा भी पे, परमन ही मन पर पीपा
गयो सिमे मोरडार को भी जर में पटांगे पलाने बीमा नहीं
दीगई। नाहन नगर में पटागों को मार रारा दीदी। उग
मागगरी याताजी गरमा हिमानी मनोवार
सी और हमारी भागों के मामन प्रग्ना पर य परिवार माना।
गर गोग। पुटरपटे पारने रहे। मु मारमहरी मा रही थी।
पारप परम-वासरर भी पर गया।मायों के पानी में गिरने वा
पर।
मरे के पाने में पराममा परमारणे थे। ओरा
सोपाना पाई. यह यही पना गातापा। परसामगिर पारियों
कोनी में नाम पर पारे बहाने में होगा तर
पटी थे। परामा पाने का दा. पर मधिर परको सार में मायू
महातपं।
साधारह भी पर गा. पर नीममा समोर उगोपा
पश्चिमी मारा। मगर पानीमागरमीभी
मरेनोगमा रही थी।
सभी रिपोरोहहरपार मनगटन र पम-t
दुनियना पाहि तभी मिराहो मंगा।'
मैं उछल-सा पड़ा। धीरे से अपने विस्तर के पास आया, कापी-पेन लिया और परदे के पीछे की कुर्सी पर बैठ गया। पेन की नोक कापी के कागज़ पर पड़ी और यह उपन्यास यों शुरू हो गया, जैसे परीक्षा में छान्न रटे-रटाए उत्तर लिख रहा हो। उसी रात कई पृष्ठ लिख गया। उपन्यास वहीं से शुरू हुआ, जहां मैं था, अर्थात दीवाली की रात को एक कैदी जेल में बन्द है 'कैदी' नाहन जेल में लिखी मेरी प्रथम रचना है। यह मेरा प्रथम उपन्यास है। पता नहीं पाठकों को कैदी कैसा लगेगा.. कुछ भी हो, यह एक कैदी द्वारा लिखी एक कैदी की कहानी है । जेल अधिकारियों की नजरों से बचाने के लिए इसे भी कैद रहना पड़ा किसी प्रकार पाण्डुलिपि वाहर भेज दी गई थी। मेरे प्रथम प्रकाशित उपन्यास 'मन के भीत' पर कितने ही पाठकों की प्रतिक्रिया व सम्मति मुझे मिली है । उन्हें पढ़कर मुझे आनन्द भी माया, सन्तोप भी और भविष्य के लिए दिशा भी मिली। 'कैदी' पर भी मेरे पाठक मुझे कुछ लिख भेजें तो स्वागत करूंगा। -~-शान्ताकुमार मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश शिमला-१७१००२
पारदीगलोमोसा पो। पारी भोरगे दोनों, मोमगिलो पनि
पं.यायों सामान गिानीको प्रगति करता मा रानी की
गर भी अपनी पीमी गिविगी आपापटानों की सीमाव
सातारो दरलागी पी । म गुनगान गोमेरी नीरा भी मार जगममा
में प्रगति पपटानों सागर में मुगति होने कान पत्री.
गा रही पो। रागीर जर दूर गृपने
अमेष्टिपमा
दंगना मियारिगाजिया परली गे मायने र पी.दूरभागम
में वासर एक परिगंगा और फिर और पारी माप
भाती। सीपम पहर दिन पो गर, जगममा गाया।
सीमानी यसको मोहे की नागों पर गिर दिन
राीर पर मे पा. गारा द्वापदेन गापा। मार प्रा. मे ही मार
पा। पर मना करना पापा,पर पानही आई पी । मर
पहर भी गरगहा पा.गोर दावार पर गिराए मानो पात
हमा पा रहा था । उगे न रागी पी. न भागों में मारपी।
पायो । उटी,
माया गोषको
रिलती हरी दीवारियाली मीगयों में भादा पट-पटार से हिमानी।
मगरह पदो गोपो ने गे पागल हो जाओगे । उसो, मो जामो।"m
दी मोरल में मरे पर हाप रहा । गरमानी पर
रमेश्यनारेगी पर ए मानो रिमी नेपाली परर
एर रामभी
दिया। तभी एक तरफ से ज़ोर से सब ठीक है' की कर्ण-कटु आवाज़ गूंजी। "मोहन, मुझे यहीं रहने दो," सिर घुमाकर राजीव वोला । "नहीं । यों सोचते रहने से न कभी कुछ हुआ है और न ही कुछ होगा राजीव ! तुम तो बहुत समझदार हो।" "तभी तो यहां खड़ा हूं।" "क्या मतलब ?" "दिल में घुट रहा गुब्बार कुछ निकल जाए, इसीलिए तो यहां खड़ा था।" "पर इस तरह गुब्बार निकलता नहीं । अकेले सोचते रहने से तो चिन्ता का धुआं घुटता है और अन्तर् को जला देता है। उठो । चलो सो जाओ।" ".."टक "टक..." बूटों की एक कर्कश आवाज़ ने दोनों का ध्यान खींच लिया। "अरे ! रात के दस बज गए। तुम दरवाजे पर क्या कर रहे हो ? पाजी कहीं के ! औरों को भी सोने नहीं दोगे? जाओ, सो जाओ। वरना..." पहरे पर तैनात वार्डर की क्रोध-भरी आवाज़ गूंजी। "वरना''वरना क्या ?" मोहन बोल उठा। "अबे पाजी "उल्लू जवान खोलता है ?" "कंद मुझे हुई है मेरी जवान को नहीं । मैं कैदी हूं, मीसा का नज़रवन्द नहीं।" मोहन तुनककर बोला। "वार्डर साहब ! जरा दीवाली की जगमगाहट में घर की याद सता रही थी। यहां बैठ गया । हम कुछ भी तो नहीं कर रहे। आप व्यर्थ में गाली देकर हमारा दिल भी दुखा रहे हैं और अपनी जवान भी गन्दी कर रहे हैं।" राजीव की गम्भीरता से कही यह बात सुन वार्डर दूसरी तरफ चला गया। मोहन राजीव को उठाकर अपने विस्तर पर ले आया। फिर उसीके पास बैठकर बोला, "राजीव ! आखिर वात क्या है ? तुम आज प्रातः से ही इतने अधिक उदास क्यों हो ? तुम्हारे चेहरे पर इतनी अधिक उदासी पहले कभी नहीं देसी । याद रखो तुम्हें पूरे सात साल यहीं, इसी कोठरी में विताने हैं । एक नहीं पूरी सात दीवालियां।" "मोहन ! जवसे में जेल आया हूं, आज पहली बार मेरी पत्नी रेखा अपने वायदे के अनुसार मुझे मिलने नहीं आई। उसने पत्र में लिखा था कि वह - । ८/कंदी
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छत की ओर एकटक लगाए पागल की तरह देख रहा था। उसकी नज़रें छत से हटकर साथी कैदियों के चेहरों पर तैरने लगीं। "बाबूजी ! क्या बात है ? यदि आपको कोई रोग या तकलीफ है तो वताएं । हम आपकी कोई सेवा करें।" सूरत ने उसके पास आकर अपनी भोली आंखें मलते हुए कहा। "रोग-तकलीफ कुछ भी नहीं। मैं सपना देख रहा था। अभी-अभी अपने घर में अपनी पत्नी व बच्ची के साथ मैं दीवाली मना रहा था। एक फुलझड़ी से मेरी सुन्नो का हाथ जल गया। वह पीड़ा से तड़प उठी। मैं उसकी तड़प देख छटपटा उठा।" कहते-कहते राजीव का गला आंसुओं से जकड़-सा गया। उसने साथी कैदियों से इस असुविधा के लिए क्षमा मांगी। सवने उसे फिर सान्त्वना व सहानुभूति के शब्द कहे और सो गए। दीवाली की खुशियां समेट रात घोर अन्धकार में समा गई थी। वाता- वरण शांत था । लगता था सारा व्यक्त ब्रह्म इसी प्रकार अव्यक्त ब्रह्म में लीन होता होगा। अगले दिन का दूसरा प्रहर शुरू होने को था। जेल का बड़ा दरवाजा हिला । उस बड़े दरवाजे के दाईं ओर का एक छोटा-सा दरवाजा कुछ खुला । जेल का यह बड़ा गेट तभी खुलता है, जब जेल अधीक्षक या कोई बड़ा अधिकारी भीतर आ रहे हों । वाकी सबके लिए तो बड़े दरवाजे के एक ओर वना छोटा-सा खिड़की की तरह का दरवाजा ही खुलता है। प्रातः के तीन बज रहे थे । वार्डरों की ड्यूटी बदल रही थी। अन्दर के वार्डर वाहर गए व वाहर से अन्दर आए । वे अपने-अपने स्थान पर तैनात हो गए। बड़े गेट से सीटी की आवाज़ गूंजी और उसीके साथ 'ठीक है', 'ठीक है' की तीखी आवाजें उभरी। राजीव फिर चौंक पड़ा। 'ठीक है ! क्या ठीक है ? कुछ भी तो नहीं। दीवाली बीत गई, रेखा नहीं आई। उसके हाथ की मिठाई तक भी न मिली। सपना आया पर उसमें भी सुन्नो का हाथ जल गया । इधर यह मेरी लुटी-पिटी दुनिया और उधर 'ठीक है' का यह उद्घोप ! क्या विडम्बना है !' राजीव मन ही मन बड़बड़ाया। उसने करवट बदली और सो गया। फिर से स्वप्न-लोक में जा पहुंचा। -- १० / कैदी राजीव चुपचाप दवे पाव एक कमरे से दूमरे कमरे की ओर गया। सुलो को उसने कुछ मिठाई दे दी । वह उसे पाने में लग गई । दूसरे कमरे में टंगी लदमी की तमवीर के पास सड़ी होकर रेखा आंखें बन्द किए धूप जलाए बन्दना में मग्न थी। दवे पांव राजीव उसके ठीक पीछे खड़ा हो गया। पीछे से अपनी भुजाएं यागे वढ़ा उसने रेसा को समेट लिया। "रेगा ! क्या माग रही हो लक्ष्मी देवी से ? पहले इस धरती के अपने देवता को तो सन्तुष्ट कर लो। देखो यह आज का दिन और ये प्यारे से होंठ।" रेगा का मुंह अपनी और घुमाकर वह उसको आवों की गहराइयों में डूब गया । रेषा के हाथ मे मुलग रही धूप का उठता लहराता व वलसाता धुओं दोनों के बीच धुएं को एक बारीक जाली बुन रहा था । धुएं की उस बारीक धुंधली यदली में दोनो एक-दूसरे में खोए एक गहरी सोच में डूब रहे थे। गरेया! मैं जानता हूं तुम लक्ष्मी से क्या माग रही हो ! यही न कि यूब धन-धान्य, कोठी, कार, साड़ियां, ऐश्वयं को सव सुविधाएं तुम्हारे पास ही !" राजीव ने मौन तोड़ते हुए कहा । पर तभी रेखा ने उसके मुंह के शब्दों पर अपनी कोमल हथेली रख पूर्ण विराम लगा दिया। राजीव ने पास पड़े मिठाई के डव्ये से एक गुलाब जामुन निकाला और उसे रेसा के मुंह में डालने का यत्न करते हुए बोला, "रेया मैंने हार मान ली है । अव जीयन दाव पर लगाकर भी तुम्हारे लिए एक विशाल ऐश्वयं का साम्राज्य खड़ा करूगा, पर मेरे दिल की रानी, मेरी रेखा, अभी तो यह गुलाब जामुन ही लो।" ज्यो ही गुलाब जामुन पकडे राजीव की अगुलियां आगे वढी रेखा के होंठ गुलाब जामुन के लिए नहीं, अपितु एक तेज़ चीख मारते हुए खुल गए। एक ज़ोर की चीस मारती हुई रेखा राजीव के हाथों से निकल भागी। रेखा""रेखा...!" चिल्लाता हुआ राजीव रेखा के पीछे भागने लगा। रेखा ओझल होती गई। । 'बाबुजी ! बाबुजी ! क्या देखा? आप देखा-देखा क्या कह रहे हैं ?" पास के बिस्तर से जगकर सूरत बोला । राजीव आंखें मलता हुआ उठ बैठा। उसकी आखों में रेवा की मूर्ति :
- छत की ओर एकटक लगाए पागल की तरह देख रहा था। उसकी नज़रें छत से हटकर साथी कैदियों के चेहरों पर तैरने लगीं। "बाबूजी ! क्या बात है ? यदि आपको कोई रोग या तकलीफ है तो वताएं । हम आपकी कोई सेवा करें।" सूरत ने उसके पास आकर अपनी भोली आंखें मलते हुए कहा। "रोग-तकलीफ कुछ भी नहीं। मैं सपना देख रहा था। अभी-अभी अपने घर में अपनी पत्नी व बच्ची के साथ मैं दीवाली मना रहा था। एक फुलझड़ी से मेरी सुन्नो का हाथ जल गया। वह पीड़ा से तड़प उठी । मैं उसकी तड़प देख छटपटा उठा।" कहते-कहते राजीव का गला आंसुओं से जकड़-सा गया। उसने साथी कैदियों से इस असुविधा के लिए क्षमा मांगी। सवने उसे फिर सान्त्वना व सहानुभूति के शब्द कहे और सो गए। दीवाली की खुशियां समेट रात घोर अन्धकार में समा गई थी। वाता-. वरण शांत था । लगता था सारा व्यक्त ब्रह्म इसी प्रकार अव्यक्त ब्रह्म में लीन होता होगा। अगले दिन का दूसरा प्रहर शुरू होने को था। जेल का बड़ा दरवाजा हिला । उस बड़े दरवाजे के दाई ओर का एक छोटा-सा दरवाजा कुछ खुला । जेल का यह बड़ा गेट तभी खुलता है, जब जेल अधीक्षक या कोई बड़ा अधिकारी भीतर आ रहे हों। बाकी सबके लिए तो बड़े दरवाजे के एक ओर बना छोटा-सा खिड़की की तरह का दरवाजा ही खुलता है। प्रातः के तीन बज रहे थे। वार्डरों की ड्यूटी बदल रही थी। अन्दर के वार्डर वाहर गए व वाहर से अन्दर आए । वे अपने-अपने स्थान पर तैनात हो गए। बड़े गेट से सीटी की आवाज गूंजी और उसीके साथ 'ठीक है', 'ठीक है' की तीखी आवाजें उभरीं । राजीव फिर चौंक पड़ा। 'ठीक है ! क्या ठीक है ? कुछ भी तो नहीं । दीवाली बीत गई, रेखा नहीं पाई। उसके हाथ की मिठाई तक भी न मिली। सपना आया पर उसमें भी सुन्नो का हाथ जल गया । इधर यह मेरी लुटी-पिटी दुनिया और उधर 'ठीक है' का यह उद्घोप ! क्या विडम्बना है !' राजीव मन ही मन बड़बड़ाया। उसने करवट बदली और सो गया। फिर से स्वप्न-लोक में जा पहुंचा। १० / कैदी राजीव चुपचाप दवे पांव एक कमरे से दूसरे कमरे की ओर गया। मुन्नो को उसने कुछ मिठाई दे दी । वह उसे खाने में लग गई। दूसरे कमरे मे टंगी लक्ष्मी की तसवीर के पास खडी होकर रेखा आखें बन्द किए घूप जलाए वन्दना मे मग्न थी। दबे पांव राजीव उसके ठीक पीछे खड़ा हो गया। पीछे से अपनी भुजाएं आगे वढा उसने रेखा को समेट लिया। "रेखा ! क्या मांग रही हो लक्ष्मी देवी से ? पहले इस धरती के अपने देवता को तो सन्तुष्ट कर लो। देखो यह आज का दिन और ये प्यारे-से होंठ।" रेखा का मुंह अपनी और घुमाकर वह उसको आखों की गहराइयो में डूब गया। रेखा के हाथ मे सुलग रही घूप का उठता लहराता व वलखाता धुआं दोनों के बीच धुएं की एक बारीक जाली बुन रहा था । धुएं को उस बारीक धुंधली बदली में दोनों एक-दूसरे में खोए एक गहरी सोच में डूब रहे थे। "रेखा ! मैं जानता हूं तुम लक्ष्मी से क्या मांग रही हो ! यही न कि खूब धन-धान्य, कोठी, कार, साडिया, ऐश्वर्य की सव सुविधाएं तुम्हारे पास हों!" राजीव ने मौन तोड़ते हुए कहा। पर तभी रेखा ने उसके मुंह के शब्दों पर अपनी कोमल हथेली रख पूर्ण विराम लगा दिया। राजीव ने पास पड़े मिठाई के डब्बे से एक गुलाब जामुन निकाला और उसे रेखा के मुंह मे डालने का यत्न करते हुए वोला, "रेखा मैंने हार मान ली है । अव जीवन दाव पर लगाकर भी तुम्हारे लिए एक विशाल ऐश्वर्य का साम्राज्य खड़ा करूंगा, पर मेरे दिल की रानी, मेरी रेखा, अभी तो यह गुलाब जामुन ही लो।" ज्यों ही गुलाब जामुन पकडे राजीव की अंगुलिया आगे बढी रेखा के होंठ गुलाब जामुन के लिए नही, अपितु एक तेज चीख मारते हुए खुल गए। एक ज़ोर की चीख मारती हुई रेखा राजीव के हाथो से निकल भागी। रेषा'"रेखा...!" चिल्लाता हुआ राजीव रेखा पीछे भागने लगा। रेखा ओझल होती गई। 7" "वायुजी ! बाबुजी ! क्या देखा? आप देखा-देखा क्या कह रहे हैं पास के विस्तर से जगकर सूरत बोला। राजीव आंखें मलता हुआ उठ बैठा। उसकी आखों में रेखा की मूर्ति. ।..
। 'झलक रही थी। जेल की वैरक व बिस्तर देखकर एकबार तो वह चौंक ही पड़ा। "क्या सपने में आपने कुछ देखा? आप तो आज बस सपने ही लेते रहे । सोएंगे नहीं क्या ?" सूरत ने अपना कम्बल नीचे से खींचते हुए कहा। राजीव ने इधर-उधर देखा। वह कुछ शरमा गया । अबकी बार केवल सूरत की आंख ही खुली थी। वाकी कैदी सोए रहे "सूरत ! किसीसे कुछ मत कहना । मुझे सपना आ रहा था। मेरी पत्नी रेखा..." धीरे से राजीव ने कहा । फिर वह कम्बल सिर पर लेकर लेट गया। तभी बाहर घण्टे की चार वार बजने की आवाज़ आई। फिर सीटी की वारीक आवाज़ ने अन्धकार के सीने को चीर डाला और उसके वाद 'ठीक है' की कर्णभेदी गूंज से जेल का नीरव वातावरण भी कांप-सा गया। नींद नहीं आ रही थी। कम्वल मुंह तक लेकर राजीव ने अपने अतीत की ओर झांकना शुरू किया । सिनेमा रील की तरह एक-एक परत उघड़ने लगी। इस सारे नाटक का आदि व अन्त उसके कम्बल के ताने-वाने पर 'पड़ रहे झीने प्रकाश की किरणों में चित्रित हो उठा। २ पांच वर्ष पूर्व राजीव का रेखा से विवाह हुआ था। राजीव एक साधारण गरीब परिवार में एक छोटे से गांव में पैदा हुआ था। बड़ी कठिनाई से मैट्रिक किया। पिता लोगों की जमीन काश्त करके अपना गुजर चलाते थे। मां भी खेतों में काम करती। पर सनातनी विचारों की थी। व्रत-पूजा का क्रम भी सदा चलता रहता था । खेत में हल चलाते वैलों को घास डालते ‘व भूमि के रोड़े तोड़ते-तोड़ते राजीव ने जब अच्छी श्रेणी से मैट्रिक पास कर 'लिया तो आगे पढ़ने की उसकी इच्छा हुई। पर पिता न आगे पढ़ने की बात सोच सकते थे न ही निभा सकते थे । कभी निभा सकते थे । कभी ट्यूशन, कभी किसी दूकान की छोटी-सी नौकरी करके राजीव ने जैसे-तैसे प्राइवेट वी० ए० पास कर लिया । उसके इस परिश्रम को गांव व परिवार में खूब सराहा गया था। १२/ कंदी फिर दिल्ली के एक बड़े सरकारी कार्यालय मे एकाउंट विभाग में उसकी नियुक्ति हो गई। अपनी योग्यता व परिश्रम के कारण वह शीघ्र ही एक मुख्य पद पर पहुंच गया था। विवाह हुआ तो राजीव व रेखा ने प्यार के नशे में प्यार की दुनिया मे पर रखा था। सुहागरात का अधिक समय एक-दूसरे के प्यार की कसमे खाने में बीता था। जीवन की ऊपा लहलहाते प्यार को उल्लासमयी लाली से रक्ताम हो उठी थी। छोटा-सा घर प्यार से लबालव हो गया था। जो कुछ भी मिल गया था, वह राजीव के लिए बहुत कुछ ही नहीं, बल्कि सब कुछ या पास-पड़ोस के लोग उनके एक-दूसरे के प्रति प्यार की चर्चा करते व सराहते। प्रातः कार्यालय जाते समय राजीव कितनी ही देर दरवाजे पर खड़ा रहता । रेखा उसे विदा देने के लिए दरवाजे के अन्दर सामने खड़ी रहती शाम को जल्दी आने का रेखा वायदा लेती। राजीव चलने लगता तो रेखा फिर आवाज़ दे देती। पास बुला लेती, और कोई चीज लाने की याद दिला देती । ज्यों ही राजीव के पर आगे बढ़ते रेखा फिर किसी बहाने उसे आवाज़ देती। उसे अन्दर बुला लेती, रुआंसी हो जाती, उसके कन्धे पर अपना सिर रखकर बोलती, "अब इस मकान में मैं अकेली कैसे रहूंगी ?" तब उसे अपनी बाहों में समेटकर राजीव कहता, "बस शाम को ही तो मैं आ जाऊंगा।" इस पर रेखा मुह ऊपर उठा उसकी आंखों में आंखें डाल वोलती, "जानते हो शाम कब होगी ? अभी पूरे सात से भी कुछ अधिक घण्टे हैं ! एक घण्टे के साठ मिनट, एक मिनट के साठ संकिण्ड और एक सकिण्ड में कितनी ही धडकनें-मुझसे इतना समय नही काटा जाता।" तब राजीव उसे अपनी बाहो में और कस लेता और उसके श्वासो की गर्मी को अनुभव करते हुए कहता, "रेखा ! मैं तुम्हारे पास लौट आने के लिए माफिस जा रहा हूं। फिर मैं तो जा नहीं रहा, वस मेरा यह शरीर ही जा रहा है । मैं, मेरा मन, मेरा दिल सब तुम्हारे पास है। गीता पढी है तुमने ! में कोई मांस-हड्डी का शरीर ही तो नहीं हूं। मैं तुम्हारे पास तुम्हारे दिल में, तुम्हारे दिल का कैदी। और यह तुच्छ शरीर आजीविका कमाने आफिस जाएगा । ठीक है न मेरी अच्छी रेखा?" यह कहते हुए वह रेखा के गाल पर कैदी/१३ - हलकी चपत लगाकर बाहर निकल पड़ता। "जरा सुनो तो !" रेखा फिर आवाज़ लगा देती, "कुछ पढ़ने के लिए लेते आना । अकेली सारा दिन वोर होती रहती हूं।" रेखावात पूरी करती। "तो तुम्हें. दिल लगाने के लिए खिलौना चाहिए । ठीक है, आज शाम बिरला मन्दिर चलेंगे। वहां भगवान से एक सुन्दर-सा, तुम्हारी तरह का एक गोल कोमल नन्हा मुन्ना..." राजीव चुटकी लेकर बाहर चला जाता । लगभग हर रोज इसी प्रकार से विदाई के ये क्षण रंगीन हो झूम उठते । आफिस में राजीव को दिल लगाना मुश्किल हो जाता। पांच बजते और उसके कदम घर की ओर भागते। रेखा तो चार बजे ही दरवाजे पर आना- जाना शुरू कर देती । वह प्रति सायं उसका उसी प्रकार स्वागत करती, जैसे वर्षों के बाद कोई सैनिक युद्ध जीतकर घर लौट रहा हो । दोनों के प्यार का बीज स्नेहशील धरती पर बड़े दुलार से अंकुरित हो रहा था। परस्पर समर्पित जीवन की गाड़ी ठीक पटरी पर स्वाभाविक गति से चल रही थी। उन्हें लगता था अब इस प्यार के आगे दुनिया में और कुछ भी नहीं है, जिसे उन्हें पाना है । सब मिल गया उन्हें, सर्वस्व पा लिया उन्होंने। रेखा की धुंधराली अलकों में अपनी अंगुलियां नचाते कभी-कभी राजीव कहता, "रेखा ! संसार का सारा ऐश्वर्य, वैभव व सौन्दर्य मुझे तुम में मिल गया है । यदि तुम्हारे लिए मुझे सर्वस्व भी देना पड़े तो मैं परम सन्तोप का अनुभव करूंगा । इस दुनिया में मेरी तरह शायद ही कोई सुखी हो।" और रेखा उसके होंठों पर अपनी अंगुली रखकर बोलती, "तुम्हें पाने से बढ़कर भी इस दुनिया में और कुछ हो सकता है, मैं इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती। पता नहीं कितने जन्मों की प्यास बुझी है इस मिलन ~~ दोनों प्यार के आदर्शों के आकाश पर ऊंची उड़ाने भर रहे थे। उन्हें यह जानने का समय ही न था कि आदर्श के आकाश से यथार्थ की धरती वहुत नीचे होती है। उघर विवाह के दो वर्ष पूरे हुए और इधर रेखा की गोद एक नन्हीं वेटी से लहलहा उठी । यद्यपि मनौतियां लड़के के लिए मनाई गई थीं तो भी लड़की का भरपूर स्वागत हुआ। अपने प्यार का साकार रूप पाकर दोनों १४ / कैदी 1 की प्रसन्नता का पारावार न रहा। इसके साथ ही परिवार की आवश्यकताएं भी वढने लगी। राजीव ने अपने साधनों के अनुसार उन सव आवश्यकताओं को पूरा किया। पड़ौस मे एक पुरी दम्पति रहता था। उनके घर भी कुछ दिन पूर्व एक लहका पैदा हुआ था । उनको अपनी कोठी व कार तो थी ही, पर नवागत बच्चे की देखभाल करने के लिए एक आया थी व घर का बाको काम करने कालिए एक अलग नौकर था। बाहर का काम करने के लिए पुरी के आफिस से मिला हुआ यरदली था। रेसा को सव काम स्वयं करना पड़ता था। स्वयं काम करने में उसे कुछ कठिनाई नहीं होती थी, क्योंकि उसके पिता का घर भी साधारण दर्जे का था। घर का सारा काम करने की उसे यादत थी। पिता के घर तो गाय व भैमें भी थी। वह बचपन से ही प्रात: उठकर सब प्रकार का घर का काम करने की अभ्यस्त थी। पर यहां जब भी वह अपने मकान से बाहर निकलती और श्रीमती पुरी को अपने आगन में धूप में कुर्सी पर आराम करते या अखबार पढते देखती तो उसे अन्दर ही अन्दर कुछ चुभन-सी होती। श्रीमती पुरी को आया बच्चे को उठाए घूमती रहती । जव दिल करता श्रीमती पुरी कुछ देर के लिए बच्चे को गोद में लेती, उसे प्यार करती, पर जब वह टट्टी-पेशाब करता या रोने लगता या श्रीमती को पुरी को 'विविध भारती' से गाने सुनने होते तो वह तुरन्त बच्चे को माया के पास देकर चली जाती । जब श्री पुरी आफिस से आते तो नौकर बाहर चाय का सारा सामान सजाता। वे दोनों चाय पीते और फिर कार में बैठ- कर सिनेमा या कही और घूमने चले जाते । इधर रेखा अब जकडी-सी गई । बेटी ने घर का काम दुगना कर दिया। प्यार का उफान कुछ उतरने लगा। अब बाजार घूमना व सिनेमा जाना तो बिलकुल वन्द हो गया। म नन्ही सुन्नो को किसीके पास छोड़ सकते थे, न ही साथ लेकर जा सकते थे। वह प्रमूति की दुर्वलता से उभर भी न पाई थी कि घर का सारा काम उसे ही करना पड़ता था। अब वह राजीव से कभी- कभी मोठी शिकायत भी करने लगी। भला राजीव अपनी रेखा की शिकायत अनसुनी कैसे कर सकता था ! मेज रखता । - कैदी/१५ । हलकी चपत लगाकर बाहर निकल पड़ता। "ज़रा सुनो तो !" रेखा फिर आवाज़ लगा देती, "कुछ पढ़ने के लिए लेते आना । अकेली सारा दिन वोर होती रहती हूं।" रेखा बात पूरी करती। "तो तुम्हें दिल लगाने के लिए खिलौना चाहिए। ठीक है, आज शाम विरला मन्दिर चलेंगे। वहां भगवान से एक सुन्दर-सा, तुम्हारी तरह का एक गोल कोमल नन्हा मुन्ना..." राजीव चुटकी लेकर वाहर चला जाता । लगभग हर रोज़ इसी प्रकार से विदाई के ये क्षण रंगीन हो झूम उठते । आफिस में राजीव को दिल लगाना मुश्किल हो जाता। पांच बजते और उसके कदम घर की ओर भागते । रेखा तो चार बजे ही दरवाजे पर आना- जाना शुरू कर देती । वह प्रति सायं उसका उसी प्रकार स्वागत करती, जैसे वर्षों के बाद कोई सैनिक युद्ध जीतकर घर लौट रहा हो । दोनों के प्यार का वीज स्नेहशील धरती पर बड़े दुलार से अंकुरित हो रहा था । परस्पर समर्पित जीवन की गाड़ी ठीक पटरी पर स्वाभाविक गति से चल रही थी। उन्हें लगता था अब इस प्यार के आगे दुनिया में और कुछ भी नहीं है, जिसे उन्हें पाना है । सब मिल गया उन्हें, सर्वस्व पा लिया उन्होंने। रेखा की धुंघराली अलकों में अपनी अंगुलियां नचाते कभी-कभी राजीव कहता, "रेखा ! संसार का सारा ऐश्वर्य, वैभव व सौन्दर्य मुझे तुम में मिल गया है । यदि तुम्हारे लिए मुझे सर्वस्व भी देना पड़े तो मैं परम सन्तोष का अनुभव करूंगा । इस दुनिया में मेरी तरह शायद ही कोई सुखी हो।" और रेखा उसके होंठों पर अपनी अंगुली रखकर बोलती, "तुम्हें पाने से बढ़कर भी इस दुनिया में और कुछ हो सकता है, मैं इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती। पता नहीं कितने जन्मों की प्यास बुझी है इस मिलन से।" दोनों प्यार के आदर्शो के आकाश पर ऊंची उड़ाने भर रहे थे। उन्हें -यह जानने का समय ही न था कि आदर्श के आकाश से यथार्थ की धरती बहुत नीचे होती है। उघर विवाह के दो वर्ष पूरे हुए और इघर रेखा की गोद एक नन्हीं बेटी से लहलहा उठी । यद्यपि मनौतियां लड़के के लिए मनाई गई थीं तो भी लड़की का भरपूर स्वागत हुआ। अपने प्यार का साकार रूप पाकर दोनों १४ / कंदी को प्रसन्नता का पारावार न रहा। इसके साथ ही परिवार को मावश्यकताएं भी बढ़ने लगीं । राजीव ने अपने साधनो के अनुसार उन सव आवश्यकताओं को पूरा किया। पड़ौम मे एक पुरी दम्पति रहता था। उनके घर भी कुछ दिन पूर्व एक लड़का पैदा हुआ था । उनको अपनी कोठी व कार तो थी ही, पर नवागत 'बच्चे की देखभाल करने के लिए एक आया थी व घर का वाकी काम करने के लिए एक अलग नौकर था। बाहर का काम करने के लिए पुरी के आफिस से मिला हुआ अरदली था। रेखा को मब काम स्वयं करना पड़ता था। स्वयं काम करने में उसे कुछ कठिनाई नहीं होती थी, क्योंकि उसके पिता का घर भी साधारण दर्जे का था। घर का सारा काम करने की उसे आदत थी। पिता के घर तो गाय व भैमें भी थी । वह बचपन से ही प्रातः उठकर सब प्रकार का घर का काम करने की अभ्यस्त थी। पर यहां जब भी वह अपने मकान से बाहर निकलती और श्रीमती पुरी को अपने आंगन में धूप में कुर्सी पर माराम करते या अखबार पढ़ते देखती तो उसे अन्दर ही अन्दर कुछ चुभन-सी होती। श्रीमती पुरी की याया बच्चे को उठाए घूमती रहती। जब दिल करता श्रीमती पुरी कुछ देर के लिए बच्चे को गोद में लेती, उसे प्यार करती, पर जब वह टट्टी-पेशाव करता या रोने लगता या श्रीमती को पुरी को विविध 'भारती' से गाने सुनने होते तो वह तुरन्त बच्चे को आया के पास देकर चली जाती । जव श्री पुरी आफिस से आते तो नौकर वाहर मेज़ रखता। चाय का सारा सामान सजाता। वे दोनो चाय पीते और फिर कार में बैठ- कर सिनेमा या कही और धूमने चले जाते । इधर रेखा अब जकड़ी-सी गई । बेटी ने घर का काम दुगना कर दिया। प्यार का उफान कुछ उतरने लगा। अब वाजार घूमना व सिनेमा जाना तो विलकुल बन्द हो गया। न नन्हीं सुन्नी को किसी के पास छोड़ सकते थे, न ही साथ लेकर जा सकते थे। वह प्रसूति की दुर्वलता से उभर भी न पाई थी कि घर का सारा काम उसे ही करना पड़ता था। अब वह राजीव से कभी- कभी मीठी शिकायत भी करने लगी। भला राजीव अपनी रेखा की शिकायत अनसुनी कसे कर सकता था !
उसने एक आया का प्रवन्ध कर दिया। बाहर का काम राजीव के आफिस का चपरासी करने लगा । रेखा ने कुछ राहत का अनुभव किया । पर यह अनुभूति बहुत क्षणिक सिद्ध हुई। रेखा पुरी के घर जो कुछ भी देखती उसे अपने घर भी चाहने लगती। वे अपने मुन्ने के लिए जो कुछ लाते, रेखा वही सब अपनी सुन्नो के लिए भी लाना चाहती । राजीव रेखा की बात को 'न' कहना सीखा नहीं था। वह उसे दिल की पूरी गहराई से प्यार करता था । रेखा की जवान से निकली हर बात को उसी दिन पूरा करने के लिए राजीव के मन व शरीर की सारी शक्तियां मचल उठती थीं। परन्तु पुरी व राजीव में ज़मीन-आसमान का अन्तर था। पुरी एक लखपति बाप का बेटा था। सर्विस भी एक विदेशी फर्म में करता था। तीन हज़ार रुपया मासिक वेतन के अलावा एक या दो हजार प्रति मास वह घर से मंगवाता था। उसके घर रोज़ नये-नये मेहमान आते । श्रीमती पुरी प्रायः हर सप्ताह नई साड़ी खरीदती। दिल्ली के किसी भी कोने में लगने वाली नई पिक्चर को सबसे पहले देखने वे जाते थे। पुरी हर वर्ष नये मॉडल की नई कार लेता और पुरानी वेच देता था। राजीव एक निर्धन परिवार से था। सर्विस भी साधारण थी। अपने सात- आठ सौ रुपये के वेतन में से गांव में अपने वृद्ध माता-पिता के लिए भी वह कुछ भेजता था । शेप में गृहस्थी का गुजर चलाना पड़ता था। ज्यों-ज्यों दिन बीतते गए, रेखा का पुरी के घर माना-जाना बढ़ता मया और रेखा में एक हीन भावना का जहर घुलता गया। वह अन्दर ही अन्दर अपने घर को अभाव के एक मनहूस साए तले देखने लगी । उसे अब यह अनुभूति कचोटने लगी कि उसका घर हर दृष्टि से अभावों से भरा है । उसके पास आधुनिक जीवन की सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं है । जीवन की न्यूनतम सुविधाओं से भी वह वंचित है । अभावों की इस तड़प में उसकी गृहस्थी के सब भाव उसकी आंखों से ओझल हो गए। राजीव ने उसकी सभी इच्छाओं को पूरा करने की भरसक कोशिश की। वह रेखा के चेहरे पर जरा-सा मलाल देखकर परेशान हो उठता । पर रेखा जितना प्राप्त करती, उसकी भूख उतनी ही बढ़ जाती । परिणाम यह हुआ कि - १६ / कैदी कुछ ही समय के बाद राजीव एक भारी ऋण के नीचे दब गया ! आय कम थी, परन्तु व्यय अधिक होने लगा था । श्रीमती पुरी के संसग से रेया का मिलना- जुलना उमो स्तर के परिवारों से वढने लगा। अभावो की अनुभूति और तेज होने लगी। अब उसे अपने ही नहीं राजीव के कपड़े भी घटिया लगने लगे। घर के रहन-सहन से उसे स्वयं ही घृणा होने लगी। राजीव चुपचाप चलता रहा। पर जब उधार अधिक बढ़ गए तो वह परेशान हुआ । एक दिन वह कुछ हिम्मत करके रेखा से बोला, "रेसा । मैं समझता हूं तुम्हारी आवश्यकताएं मैं पूरी नहीं कर पा रहा हूं। पर देखो हमारी अपनी आर्थिक मीमाए है । क्या यह ठीक नहीं है कि हम अपनी आय के अनुसार अपना जीवन स्तर बनाएं ? आने वाली पहली तारीख को केवल आठ सौ रुपये मिलने हैं. परन्तु इम रामय ही दूध वाले का तथा किराने वाले का कुल मिलाकर एक हजार उधार हो गया है । बैठक के कमरे के लिए जो नई दरी ली थी व तुम्हारी दो साड़िया ली थी, उनका भी पांच सौ अभी देना है । यह आखिर किस प्रकार निर्भगा ?" "तो क्या आप यह समाते है कि मैं फिजूल-पर्ची करती है ? ये जीवन को माधारण-सी जरूरतें भी पूरी न की जाए ? आज हो दुपहर को पुरी के घर गई थी। उनके कुछ मेहमान आए थे। उनके सामने इस फूहड वेश-भूपा में मैं तो शर्म से गड गई। मैं ही थी जो वर्षों पुराने फैगन की साडी पहने थी।" "रेसा । फैशन की गति मेरी आय वढने की गति में बहुत तेज है । उस दौड में तो तुम्हे शामिल ही नहीं होना चाहिए।" "पर समाज मे तो मुझे रहना है।" "तुम्हारी साडी उघार खरीदता हू, पर उसके दाम चुका नहीं पाता और तब तक फंगन बदल जाता है । फैशन तो प्रति-क्षण बदल रहा है।" "मैं कुछ भी नहीं करतो । विलकुल सादा रहती हूं। तब भी आप मुझे मुनाते ते है । आसिर समाज में कोई स्तर तो रखना है ?" रेखा अब अपनी आमें पोंछने लगी थी। "रेमा ! मनुष्य का स्तर केवल नये फैशन के नये कपड़ो से ही नहीं बनता। मनुष्य अपने मन को पवित्रता व महानता से ऊंचे स्तर तक पहुचता है । और फिर कपड़ों, कोठियों व कारों की दौड मे हम क्तिना आगे जा सकते । हैं ? आज हमारे सामने यह पुरी परिवार है। यदि इनकी तरह का हमारा स्तर हो जाए तो इनसे बड़े धनवान को देखकर हमारा वही हाल होगा जो आज इन्हें देखकर होता है । सन्तोप किसी भी वस्तु में नहीं है । सन्तोप वस्तुगत नहीं अपितु भावगत है। हम जितना प्राप्त करते हैं, उतनी ही और इच्छा करने लग जाते हैं । इच्छाएं कभी भी समाप्त नहीं होती, मनुष्य समाप्त हो जाता है।" "आप मेरी कोई भी इच्छा पूरी न करें, पर यह भापण भी न पिलाएं।" रेखा ने राजीव की गम्भीर वातों को यों ही उड़ा दिया। "रेखा ! तुम्हारी इच्छा मेरे लिए एक मिशन है । यही सोच सब कुछ पूरा किए जा रहा हूं। पर तुम इतना तो सोचो कि ये प्रतिदिन बढ़ते उधार हमें कहां ले जाएंगे। मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं, पर इस आर्थिक परेशानी का कुछ तो हल हो।" रेखा सारी स्थिति को मन की भावनाओं से तोलती थी, बुद्धि से नहीं । नारी थी वह । नारी दिल से अधिक वोलती व सोचती है बुद्धि से कम । इसीलिए राजीव के तर्को का उसपर कोई भी प्रभाव नहीं हुआ। अव तक . सुन्नो उसकी गोद में आ गई थी। उसे प्यार करती हुई रेखा बोली, “इस वेचारी की भी क्या किस्मत है ! पुरी के लड़के के खिलौने देखो। प्रतिदिन आने वाले बढ़िया कपड़े देखो.. उनका घर सजावट फर्निचर.. सव कुछ.. और यहां तो'''यह तो घर लगता ही नहीं। किसीको अपने घर भी कैसे बुलाया जाए ! ये काठ की दसवीं सदी की पुरानी टूटी कुर्सियां ।" "रेखा ! तुम्हारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण एकदम वदल कैसे गया ?" "इसमें दृष्टिकोण की बात ही क्या है ! समाज में रहना है तो सवकी नज़रों में गिरकर तो रहा नहीं जा सकता।" "क्या वह तुम ही नहीं थी, जो कहती थी कि मुझे प्राप्त करके तुम्हें विश्व का सारा ऐश्वर्य मिल गया है।" आपके बारे में कुछ नहीं कहा मैंने।" "पर इन कुसियों के बारे...!" "हां, यह सब कुछ तो मुझे खलता रहता है।" "रेखा ! जिसे हमसे स्नेह है, वह यहां आकर इन कुर्सियों पर भी बैठ १८ / कैदी लेगा। और जिसे केवल बढ़िया सोफे पर बैठने के लिए ही आना है, यह किसी वढिया रेस्टोरेंट या फर्निचर की दुकान पर जा सकता है । रेखा, क्या जीवन का परम लक्ष्य यह बाहरी सजावट या दिखावा-ये सोफे, कुसिया, कपडे ही "यह लम्बा व्याख्यान रहने दें। आप मुझसे काफी तंग आ चुके है। मुझे कुछ दिन मायके भेज दें।" रेखा ने आखिरी तीर चला दिया । "हा वहा तो तुम्हारे लिए झूला लगा रखा है।" राजीव का सयम भी जवाब दे गया। रेखा गुस्मे मे उठकर चली गई। यह मंघर्ष दिन-प्रतिदिन वढने लगा। विचारों का टकराव नोक-झोंक में और फिर कलह में बदल गया । मनमुटाव रहने लगा । प्यार की बातें बीते युग को भूली-बिमरी कहानियां बन गई। रेखा को लगने लगा कि उसका जीवन ही व्यर्थ चला गया । वह सदा चिन्तित रहने लगी। उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ने लगा । जो छोटा-मा घर पहले प्यार की बहार से खिला रहता था, अव वहां एक घुटन का धुआं सुलगने लगा। जीवन भार वनकर खलने लगा। परन्तु इसका अधिक प्रभाव राजीव पर था। वह सदा उदास व चिन्तित रहने लगा। रेखा के प्रति उसका इतना अधिक प्यार था कि उसे दुःखी देख उसका दुख चौगुना हो जाता । उसके मन को दो बातें कचोटती थी। एक तो यह कि वह रेखा की मनचाही आवश्यकताए पूरी नहीं कर पाता और दूसरे यह कि रेखा दिन-प्रतिदिन शारीरिक व मानमिक रूप से अस्वस्थ होती जा रही थी। रेखा को प्रसन्न करने के लिए उसने एक प्रयत्न किया। उसने आफिस से एडवांस लिया । रेखा के कई दिनो के आग्रह पर उसके लिए नये फैशन के गहने बनवा दिए । पर इस सबने मानो तपे तवे पर पानी को बूद-सा काम किया । राजीव अपनी हैसियत से बढकर व अपनी आय से भी अधिक रेखा के लिए हर संभव साधन जुटाता, पर वह सब आग में घी की आहुति की तरह उसकी इच्छाओं को और भी बढा देता। राजीव भोजन के बाद वाहर टहलने लगा था । रेखा भी पास आ गई। बोली, "आप कुछ ऊपर की आय का प्रबन्ध क्यों नही कर लेते ? बाहर घमने को दिल करता है। कार न सही, स्कूटर तो होना ही चाहिए।" - । पाहता तो मैं भी हूं कि हमारे पास सब कुछ हो, परन्तु यह ला सिद्धांत मुझे कभी भी समझ नहीं आया। ईमानदारी व परिश्रम ये धन में जो आनन्द है, वह उस ऊपर की कमाई में नहीं।" "आप न जाने किस लोक से उतर आए हैं। इस दुनिया में सव इसी र ऐश किए जा रहे हैं। किसीका कुछ भी तो विगड़ता नहीं। आप थोड़ा ओर सोचें तो हमारे पास भी सब कुछ हो सकता है।" "रेखा ! इस सब कुछ' की आज तक कोई भी ठीक परिभापा नहीं की । सकी है । एक इच्छा पूरी हुई तो दूसरी जागती है और यह क्रम कभी भी माप्त नहीं होता। पैदल व्यक्ति साइकल वाले को, साइकल वाला स्कूटर वाले को, स्कूटर वाला कार वाले को देखकर सदा असन्तोप की आग में जलता रहता है । कार वाला भी सन्तुष्ट नहीं, क्योंकि उसे दो कारों वाला, वढ़िया कार वाला व हर वर्ष नये मॉडल की कार खरीदने वाला दिखाई देता है। यह दूपित क्रम कभी भी समाप्त नहीं होता । सन्तोप वहां होता है, जहां मनुष्य सन्तोप कर लेता है।" राजीव ने समझाने की कोशिश की। "आपकी बातें सुनकर मुझे लगता है, जैसे आकाश का कोई देवता मुझे उपदेश दे रहा है । मैं तो इसी धरती की हूं और इसी पर रहना भी चाहती । भला 'कुछ भी नहीं' से सन्तोप कैसे हो सकता है ?" रेखा ने उवासी लेते हुए कहा। "एक साइकिल से भी सन्तोप हो सकता है और दस कारों वाला भी असन्तोप में बिलख सकता है । एक झोंपड़ी में रहनेवाला भी सन्तोप व सुख की नींद सो सकता है और एक महल में रहनेवाला भी असन्तुष्ट हो आत्म- हत्या कर सकता है । यही कारण है कि आज विश्व के सबसे अधिक समृ. देशों में सबसे अधिक आत्महत्याएं होती हैं । कुछ सम्पन्न देशों के अति धनवा परिवारों के युवक व युवतियां मानसिक शान्ति व सन्तोप के लिए भारत तीर्थों में नंगे घूमते व गांजा-सुलफा पीते, दर-दर भटकते दिखाई दे रहे हैं राजीव चलते-चलते रुक गया था। रेखा के कन्धे पर हाथ रखकर गम्भीरता से उसने कहा । "यह तो हुआ रजनीग भगवान जी का प्रवचन । पर मुझे तो एक गू । हूं २० / कैदी चलानी है व मंवारनी है। आप अपने लिए न नहीं, मेरे व मुन्नों के लिए ही कुछ करें।" “कुछ क्यों ? मैं तुम्हारे लिए प्राण तक भी दे सकता हूं"पर" कई दिनों के बाद राजीव को मुजाए रेखा को समेटने के लिए मचल उठीं। ममय बीतता गया, पर पुरी परिवार के समर्ग में रेया की इच्छाए सुरमा के मुह की तरह बढ़ती गई। राजीव का मारा विचार-दगंन व्यथं रहा । तर्क में, प्यार मे, मनोवैज्ञानिक तरीको मे उसने रेखा को अपनी गृहस्यो को अपनी मौमाओं में मन्तुष्ट रहकर जीवन जीने की प्रेरणा दी, पर वह हार गया । अब कई बार रेखा के प्यार के पागलपन में वह यह भी सोचने लगा कि कही रेया ठीक ही तो नहीं कहती ? उसे भी अपने मे अधिक मुनी लोग दिखने लगें । अपने अभावों पर उमकी दृष्टि भी धूमने लगी। उमे रेखा के ये शब्द बार-बार याद आते, 'आज कौन मूर्ख है, जो केवल अपने वेतन पर ही बैठा है।' राजीव के चिन्तन मे भी धीरे-धीरे कुछ बदलाव आने लगा । समाज को देखने की उमकी नजरें रेसा की नजरों के रंग में रंगने-सी लगी। वह सोचता, कितने ही लोग बैईमानी से जीवन की पूरी भोज उडा रहे है । दुनिया कितनी आगे बढ़ रही है । उसका मन उसीसे प्रश्न कर उठता.""क्या दुनिया भर की ईमानदारी का सारा ठेका मैंने ले रखा है ? वडे अफमर, नेता, मव रातो-रात अमीर हो रहे हैं। मैं व रेवा घुल-घुलकर जीवन को व्ययं आत्महत्या के मार्ग पर धकेले जा रहे हैं।" आज मास की पहली तारीख थी। राजीव इम दिन बहुत अधिक व्यस्त रहता था। उसे कुछ कर्मचारी साय लेकर बैंक जाना होता था। वहां से लगभग एक लाख रपया निकलवाकर सारे आफिस के कर्मचारियो को वेतन वाटना होता था। सदा की भांति वह उस दिन भी वैक गया व घन निकलवाया। उन नये चमकीले चमकते नोटों की गड्डियां देस उसके मन में एक अजीब-सी मिहरन अनुभव हुई। उसे लगा, जैसे उसके मन में कुछ स्फुरण-सा हो रहा है । जव धन लेकर गाडी में बैठा तो अपने हाथ पर माथा टेक वह सोच मे डूब-सा गया। "क्यों राजीव जी। बडे परेशान नजर आ रहे हैं।" एक साथी ने पूछ लिया।
"नहीं। कुछ भी तो नहीं।" "कुछ तो है। अधिक खोये से नजर आ रहे हैं।" "वैसे ही सिर कुछ भारी-सा है।" राजीव ने टाल दिया। फिर राजीव ने ठीक होने का प्रयत्न किया, पर उसे लगा जैसे उसे कुछ हो रहा है। उसके अन्तर में कुछ घुल रहा है। आफिस आकर उसने वेतनवांटा, पर सायंकाल घर पहुंचते तक वह सोचता ही रहा। "रेखा! इधर आओ।" अन्दर के कमरे में कपड़े बदलते हुए राजीव ने पुकारा। "देखो। मैं कपड़े नहीं बदलूंगा यदि तुम मेरे पास नहीं आई।" रेखा से कोई उत्तर न मिलने पर राजीव फिर वोला। "कपड़े नहीं बदलेंगे ! पर आज तो स्वयं भी बदले-बदले से लग रहे हैं। कितने दिनों के बाद इतने प्यार से बुलाया है ! लो आ गई !” रेखा सामने आकर चहक उठी। "रेखा, हमारा प्यार कितनी जल्दी मुरझाए जा रहा है ! यदि यही गति रही तो हम दोनों सारा प्यार ही नहीं, स्वास्थ्य भी लुटाकर शीघ्र ही हस्पताल पहुंच जाएंगे।' “यही तो मैं कितने दिनों से सोच रही हूं। पर इसका इलाज निकालिए।" "मेरा व तुम्हारे आदर्शों का मतभेद रहा है। पर अब सवाल यह नहीं कि कौन-सा आदर्श ठीक है, पर यह है कि इस प्रति-क्षण की घुटन से बाहर कैसे निकला जा सकता है ! रेखा, मैं इस निश्चय पर पहुंचा हूं कि तुम धन ऐश्वर्य के विना खुश नहीं रह सकती और तुम्हें खुश किए विना मैं जीवित नहीं रह सकता।" रेखा आज हैरान थी। उसे लगा कि भूला-बिसरा प्यार आज फिर से ताज़ा हो गया है। वह थोड़ा सरककर राजीव के पास आ गई। उसके साथ सटकर बैठ गई। उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर सहलाती हुई वोली, "आज तुम कितने अच्छे लग रहे हो ! कितने दिनों के बाद तुमने प्यार से मुझे पास 'बैठाया है और मेरे मन की बात कह रहे हो।" "मेरे वेतन में से तो मुश्किल से दो समय की रोटी ही पूरी हो सकती है। " - २२ / कैदी यदि तुम्हारे वादों के अनुमार जीवन चलाना है तो मुझे बाज एक नवीन मूली है।" "मच ! क्या ऐमा हो सकता है ?" रेखा उछल पड़ी। "हो मक्ता ही नहीं, रानीव तुम्हारे लिए करके भी दिखाएगा।" रेवा के कन्धे पर हाथ रखकर उभे कमने हुए वह बोला। "वताओ जल्दी बताओ!" रेखा को अब प्रतिक्षा करना कठिन हो रहा था। "हर माम को पहली तारीख को में लगभग एक लान रुपया बैंक ने निकलवाकर अपने आफिम लाता हूं। किमी योजना मे वह धन उड़ाया जाए, फिर नौकरी छूट जाए या छोड़ दी जाए और उस धन ने अपना उद्योग चलाया जाए।" राजीव का हाय कुछ ढीला पड़ गया । वह मामने शून्य में देखने लग पड़ा। • फिर ? चुप क्यों हो गए ?" "फिर कार, कोटी, ऐश्वर्य..." "मच्च "यहुन वटिया "यूब मजा आएगा."जीवन जीने का।" रेखा गुणी मे उछल पड़ी। उसने अपना मिर राजीव की गोद में रप दिया। उमकी बांवों में एक सपना तरने लग पडा । उसने देखा उसकी गरोवी व अभाव के दिन परं मे उड़े जा रहे हैं । "पर कितनी भी मावधानी रखी जाए, यह भी संभावना है कि पकड़ा जाऊं और जेल भेज दिरा जाऊ।" "नहीं.."नहीं"तुम्हें जेल भिजवाकर मुझे कुछ नहीं चाहिए।" रेखा मानो याममान में जमीन पर आ गिरी। "देगी रेसा, बने तो योजना ऐनो बनाऊंगा कि साफ बचकर निकल याऊ, पर यदि परडा भी गया तो क्या है, दो-नीन वर्ष की कैद ही तो होगी। धन तुम तक पहुंच जाएगा। अपने मारे जीवन को सुपी वनाने के लिए यदि दो-तीन वर्ष की कैद भी मुगन लो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं है । इसके मियाय और कोई चारा भी तो नहीं ।" "क्या योजना ऐने तरीके से नहीं बन सकती कि तुम पर किसीको मन्देह तक न हो मरे ?"
. "विलकुल वैसे ही सारा काम करूंगा। अब इस मार्ग पर कदम रखने T निश्चय कर लिया है तो सब प्रकार से पूर्ण योजना बनाऊंगा।" राजीव चेहरे पर आत्मविश्वास की दमक लाने की कोशिश करते हुए कहा। रेखा को योजना जंच गई। थोड़ी विपत्ति व कष्ट सहने को भी वह तैयार हो गई । पिछले कुछ वर्षों से ऐश्वर्य मय जीवन की उसकी लालसा तीव्र होते-होते एक ऐसे पागलपन में बदल गई थी कि उसे इस योजना में कुछ भी बुरा न लगा व कोई संकट न दिखाई दिया। राजीव अव इसी योजना में लग गया। उसके आफिस का एक और कर्मचारी उसका साथी बन गया। रेखा को दूर की एक वस्ती में एक नया मकान ले दिया गया। उस नये मकान का पता राजीव व उसके साथी सुनील सेन के अतिरिक्त किसी और को न बताया गया। सुनील सेन बंगाल का रहनेवाला था। कई वर्षों से दिल्ली में था। यहीं रहता था। वह अपने घर कभी नहीं जाता था और न ही उसके घर का किसीको कुछ पता ही था। आफिस में उसने अपना दिल्ली का पता ही बताया हुआ था। राजीव व सुनील में काफी गाढ़ी मित्रता थी। जव राजीव ने उसे विश्वास में लेकर सारी योजना बताई तो सुनील ने उसे बड़े उत्साह के साथ स्वीकार किया। इस अप्रत्याशित उत्साह से राजीव को प्रसन्नता भी हुई और हैरानी भी । उसने सोचा था कि सुनील को इस काम के लिए तैयार करने में उसे प्रयत्न करना पड़ेगा। पर उसे लगा जैसे सुनील पहले से ही इसके लिए तैयार बैठा था। "सुनील, मुझे डर था शायद तुम इस योजना में मेरा साथ देने के लिए तैयार न होगे।" राजीव ने उसे सब कुछ बताकर कहा । "राजीव ! तुमने यह योजना बनाकर मेरे अतीत की कुछ परतों क उघाड़ दिया है । तुम्हारी इस योजना से मेरे जीवन की कहानी की ए अधूरी कड़ी पूरी होने को लालायित हो उठी है।" "वाह सुनील ! यह भी खूब रही। कैसी कड़ी ?" "आज तक दिल का एक बहुत बड़ा राज दिल में ही रखा था। तुम्हें बताऊंगा। क्योंकि आज से हम दोनों हमराज़ हो गए हैं। राज कलकत्ता नगर से कोई सौ मील दूर एक गांव में मेरा घर है। यहां पर २४ | कैदी असली घर का पता किसीको भी मालूम नहीं। मैंने बताया नहीं, क्योंकि मैं अपने घर से भागकर दिल्ली आया था। मेरे गाव के साथ के एक गाव की एक लड़की से मेरा प्यार हो गया था। हम दोनों विवाह करना चाहते थे। मेरे माता-पिता तो मान गए, पर लड़की वाले गजी न हए । कई मास मंघर्ष चलता रहा। हमारा प्यार दिन- प्रतिदिन वढता गया और बढते-बढ़ते दीवानापन हो गया। हम लुक-छिपकर मिलने लगे। लड़की का पिता गांव का प्रभावशाली मुखिया था और क्रूर म्वभाव का था । यदि हम दोनों को उसका डर न होता तो हम कैसे भी विवाह कर लेते।" दोनों टहलते-टहलते अव कनाट प्लेस के वीच के फव्वारे के पास आ गए थे। कुछ देर फब्बारे को ऊंची उठती धारो को देख वे एक तरफ हरी पास पर बैठ गए। "शुरू करो मुनील "यह कडी नहीं पूरी कहानी है।" "एक दाम गांव के एक पुराने टूटे मकान के खण्डहर की दीवार के साथ मैं अपनी प्रेमिका से बातें कर रहा था । हम दोनों प्यार की कसमें खा रहे थे। वह रो रही थी। मैं उसके आसू पोछ रहा था। मैंने उसे कही दूर भाग चलने को कहा तो वह अपने पिता की क्रूरता की याद करके सहम गई । उसने कहा कि यदि वह मेरे साथ भाग भी गई तो उसका पिता उसका पता लगवाकर दोनों की हत्या करवा देगा। ये प्यार की मनुहारें हो ही रही थी कि पास की झाडी से किसीके आने की आवाज आई। हाथ में एक मोटा डडा घुमाता हुआ उमका पिता आ धमका । मैं उसे देख भी न पाया था कि एक भरपूर डंडे की चोट मेरे सिर पर आ पड़ी। वह कोष से लाल हुआ गालियां दिए जा रहा था। मेरे सामने और कोई चारा न था । अपने पांव सिर पर रख प्यार की बगिया की उस कालिका को वही छोड़ मैं भाग गया। मारे गाव में शोर मच गया होगा और लडकी का वह क्रूर पिता मेरे प्राणों का प्यासा वन मुझे तलाश करेगा यह सोचकर में घर भी नहीं गया । सारी गत भागता रहा । फिर किसी प्रकार कलकत्ता पहुंच गया ।
वहां कुछ दिन एक चाय की दुकान पर नौकर हो गया। एक मित्र से पता करवाया तो उसने बताया कि उस लड़की के पिता ने मुझे सूब तलाश किया है और वह कहता है कि मेरे प्राण लेकर ही उसे चैन आएगा। मैं दिल्ली चला आया। घरवार, परिवार, प्रेमिका सब कुछ छुड़वाकर भाग्य का चक मुझे यहां ले आया।" सुनील की आंखें सजल हो गई थी और उसकी गीली आंखों के चमकते किनारों में उसके अतीत के वे सारे चित्र तैर रहे थे । उसका हृदय आज छलक रहा था। वर्षों का रुका बांध आज टूट रहा था। जो राज कब का दिल में छिपाकर रखा था, उसे वह आज कह देना चाहता "यार ! तुम भी छिपे रुस्तम निकले । प्यार की बलिवेदी पर सब कुछ चढ़ाकर भी प्यार से हाथ धोने पड़े तुम्हें । और इतना बड़ा राज अपने ही दिल में लिए तुम जीवन चलाए जा रहे हो।" सुनील के कन्धे पर प्यार से हाथ रखकर राजीव बोला। एक गहरी सांस लेकर सुनील ने अपनी बात आगे बढ़ाई, "इस घटना को पूरे सात वर्ष हो गए। पिछले वर्ष एक मित्र के द्वारा मैंने अपने घर व प्रेमिका का कुशल समाचार पता किया था। पता लगा कि उसे उसके पिता ने महीनों यातनाएं दी। उसका विवाह करना चाहा। पर वह मेरा ही नाम लेती थी। उसे खूब मारा-पिटा गया, भूखा रखा गया व कई प्रकार से प्रताड़ित भी किया गया। गांव के कुछ समझदार लोग व मेरे पिता मेरी तलाश भी करते रहे। उनकी इच्छा थी कि उस लड़की का मेरे साथ विवाह करने का यत्ल किया जाए। कलकत्ता तक मेरी खोज की गई। जब मेरा कुछ भी पता न चला तो वह लड़की भी हार मान गई। दो वर्ष के बाद उसका विवाह कर दिया गया। "परन्तु भाग्य का चक देखो कि दूसरे ही वर्ष वह विधवा हो गई। समुराल में रह न सकी, इसलिए पिता के घर आ गई। पिछले वर्ष उसके पिता को मृत्यु हो गई । मेरा मित उसके पास गया था। वह अब भी मेरी याद करती है। उसे अब भी मेरे वापिस आने की आगा है। राजीव, मैं उस योजना में तुम्हारा साथ दूंगा। यहां से पन लेकर घर जाऊंगा और सात वर्ष से बिछुड़ी अपनी प्रेयसी के साथ विवाह करूंगा।" गुनील की आंखें अव एक नये व उज्ज्वल २६/पदी भविष्य की कान्ति से दमक उठी थी। आफिस के कर्मचारियों को अगले मास के वेतन के साथ बढे महंगाई भत्ते का बकाया मिलने वाला था । कुत डेढ़ लाख रपया निकलवाया जाना था। राजीव वह सुनील ने पूरा एक माम उस योजना के लिए लगाया। वे कई बार बैंक गए। मारा मार्ग देया। राजीव ने रेया मे मुनील का परिचय करवाकर मव बता दिया। अगले माम की पहली तारीख को बेताबी से प्रतीक्षा की जाने । लगी। उसके माथ उस दिन ठीक समय पर योजना शुरू कर दी गई। बंक मे घन लेने के याद राजीव अपने दूसरे साथी के माथ बात करने खडा हो गया। कैश का थेला मुनील को थमा दिया। मुनील कुछ देर पास खड़ा रहा, फिर यह कह- कर चला गया कि वह मंरक्षक के साथ बाहर गाड़ी पर चलता है। राजीव ने सिर हिलाकर उसे जाने की अनुमति दे दी । सुनील कुछ आगे गया, फिर वाई तरफ के दरवाजे की और मुड़कर बैंक के भीतर से किसी दूसरे रास्ते मे बाहर निकल गया। राजीव कुछ देर वही सडा वातें करता रहा । फिर एकदम कुछ याद करके बैंक के भीतर चला गया। अपने आफिस के हिमाव के सम्बन्ध में बातें करता रहा । उसके साथ के आफिस के अन्य लोगों में मे थे व कुछ बाहर गाटी के पाम थे। राजीव जान-बूझकर समय बिता रहा था। कुछ ही समय बाद उसने घडी देखी और वाहर निकला। ट्राइवर व अन्य लोग पडे थे। "अरे! मुनील नही आया?" उमने चेहरे पर पूरी हैरानी की दिखावट बनाकर कहा। "नही सर!" ड्राइवर बोला। "प्रमोद ! देयो तो वह बंक मे ही तो नहीं है ?" "वह तो कब का बाहर आ गया था।" कहकर प्रमोद भीतर चला गया। वापिस आकर उसने बताया कि अन्दर नहीं है। "वह किसी और गाड़ी में ही तो नही चला गया ?" राजीव ने कुछ सिमयाने होकर पूछा। "इस प्रकार जाने का कोई मतलव ही नहीं हो सकता।"
- "हो तो नहीं सकता, पर अब क्या किया जाए ! चलो आफिस चलते हैं। 'फिर अगली बात सोचेंगे । वह ऐरो जा भी कहां सकता है ! इतना कैश...!" राजीव गाड़ी की तरफ लपका। ड्राइवर ने चाबी धुमाई। "चूं.''..."की आवाज़ के साथ ही सभी के दिमाग आशंकाओं के धुंए रो धुंधले हो गए। आफिस पहुंचे। इधर-उधर पूछा। फिर बड़े अधिकारियों को कहा गया। और उसके बाद पुलिस में रपट दर्ज करवाई गई। पुलिस के पारा जव रपट दर्ज की जा रही थी तब तक सुनील कलकत्ता जाने वाली गाड़ी के एक टव्ये के कोने में चुपचाप बैठा था। वह इसी बीच एक लाख रुपया राजीव के नये मकान में रेखा को दे आया था। शेष पचास हजार उसके पास था । अपना मकान तो उसने कुछ दिन पूर्व ही छोड़ दिया या। सामान पहले से ही स्टेशन के सामान घर में रखा था। दो दिन तक पुलिस सुनील की खोज करती रही और राजीव से पूछताछ करती रही। ड्राइवर तथा अन्य कर्मचारियों ने सारी घटना का सच्चा व्योरा अपने बयानों में दे दिया। उससे राजीव पर सन्देह हुआ। तीसरे दिन उसे गिरफ्तार कर लिया गया। इन बीच योजना के अनुसार रेखा ने नया मकान ले लिया था। कुछ सामान व एक लाख रुपया नये मकान में रख दिया। रात वहीं रहती, पर दिन में वह पुराने मकान में चली आती ! जब पुलिस राजीव के मकान की तलाशी लेने आई तो रेखा ने सब सामान खोलकर दिखा दिया। वहां पर कुछ भी न मिल सका । कुछ दिन के बाद रेखा सारा सामान व धन लेकर अम्बाला चली आई। वहां पहले से ही एक मकान लेकर रखा हुआ था। राजीव पर मुकदमा चला । अपराधपूर्ण लापरवाही तो सिद्ध हो ही गई। परिस्थितियों व सबकी गवाहियों के आधार पर राजीव को तीन अपराधों का दोषी ठहराया गया। उसे सात वर्ष के कठोर कारावास का दण्ड दिया गया। गुछ दिन उसे दिल्ली फी तिहाड़ जेल में रखा गया, परन्तु उसने अपने राज्य में भेजे जाने की प्रार्थना की। उसको घर सोलन के पास के एक गांव में था । कुछ ही दिन बाद उसे नाहन जेल भेज दिया गया। पिछले कुछ महीनों से वह नाहन की इस जेल में था। २८ कैदी प्रातःकाल का पन्या दरवाया। मनी कंदी अपने-अपने काम पर जाने जानकारी कर रहे थे। बैंक में ममिंट के लम्बे-ऊंचे पड़े दन थे। इन्हीं पर इदियों को मोना होता या चारपाई के बरादर नम्ब,पर चौडाई में कम थे। नत्र की अपने-अपने दिनर पर वो बार पी रहें। कुछ ही दिनों में रेल पात: की चाय भी मिलने लग पड़ी थी। दादुनी! यि चाय पीरिए।" मृग्न गतीद मिलान में चार लेकर उमर पान वाया। गीच उठवटा और मांगने बना। पाम के बिस्तर पर में मोहन ने गन को दान की चर्चा कराने इस कहा, गडीव ! नुम गत दड़े परेशान रहे। यह ठीक है तुम्हारी चट्ट परी दीवाली थी। हर पहला बहारदमी प्रकार बीटदा है। मुझे यहां का दन वर्ष हो गए हैं। पदवी दीवारी में भी गट-नर बन्द ही ददरता रहा था। पर धीरे-वारे अन्यन्न हो गया। उन्हीं दीदारों में दिल या का।नी न्ट्रिी में मन मिल गया। अद्र यादवानी ना है.पर उठना लानी नहीं है। बुटिकी नौद्रता व तीवारन, ममय कुन्द कर देता है। तृन रात नरमाने ही नेटे है।" "बाबुरी एक बार नो दट्टी र ने दिला पटे"देन्द्रा इन्दा.. जी यापने का देवा या?" मोली मृग्न दारा मृत दोट गामद गब की बार ध्यान में देखने नगे। देहलानने के लिए नारापिट दिगतीद ने मपन में वा देवा या! "कुछ नहीं । वम सपने में मैंने अपनी पली की आग मा.दा.. रेखा.. पर मृरत ने देख लिया देना "टेला'...।" गोव के ग्रह सहन कर मब और मे दिनविना पड़े। गनीद ने भी नदी ईनी में गादिर होने की वोनिग की। वरक के कोने में में बमर की मोटी नारी आवाइ गजी नी गट पर. के मपन ही बता रहा। मैंने देखा कि घर पर दिदा रमाद। माय की चारपाई परमपल्ली मांई। में ज्यों ही पानी अादट पन्दीदी तरफ ददलता हूं कि मंग नींद आती है।"
"तुम्हारी नींद खुल गई थी या तुम्हारी पत्नी ही दूर हट गई थी ?" मोहन ने चुटकी ली। "आप घर खाली हाथ गए होंगे। इसीलिए आपकी पत्नी आपसे नाराज होगी।" सूरत भी विनोद में शामिल हो गया। "खाली हाथ क्यों ? हाथ तो खूब भरे हुए थे।" "क्या लेकर गए थे घर? "दोनों हाथों में दो भारी-भारी हथकड़ियां जो थीं।" अमर की इस बात से जेल की वह क्रूर वैरक भी खिलखिला पड़ी। तभी एक बार्डर ने आकर बैरक का दरवाजा पूरा खोल दिया। बड़े गेट पर से एक आवाज़ गूंजी, "चलो पंजा नम्बर एक नम्बर दो।" कुछ कैदी उठकर नीचे गेट की ओर चले गए। कुछ फैक्टरी जाने की तैयारी करने लगे। पांच-पांच कैदियों की एक टुकड़ी जेल के बाग में व खेतों में काम करने के लिए ले जाई जाती थी, इसे ही पंजा कहा जाता था। हर एक पंजे के साथ एक वार्डर रहता था। उन्हें जेल के बड़े गेट से बाहर के खेतों में काम करना होता था। "टन...!" घण्टे की एक आवाज़ गूंजी। यह फैक्टरी का काम शुरू होने की गूचना थी। बाकी कैदी अपनी बैरकों से निकले और फैक्टरी के वाहर के मैदान में इकट्ठे हो गए। लाइनें लग गई और गिनती शुरू हो गई। जेल में गिनती एक बहुत महत्त्वपूर्ण काम है । वैरक से निकलते समय, फैक्टरी में प्रवेश करते समय, फैक्टरी से निकलते समय हर वार कैदी उसी तरह पूरे गिने जाते हैं, जैसे एक गड़ेरिया अपनी भेड़ें गिनता रहता है । राजीव को जेल के आफिस में ही काम करना होता था। आज वह रोज की तरह काम तो करता रहा, पर रह-रहकर उसे घर को याद सताती रही। रातो सपने याद आते और उसकी यादों की परतों को एक-एक कर उधेड़ते। उसके घाव हरे हो जाते। उसे समझ नहीं आ रहा था कि रेखा उसे मिलने क्यों नहीं आई ! पिछले लगभग एक वर्ष से वह प्रतिमास उसे मिलने आती थी। कभी-कभी मास में दो बार भी आ जाती थी। जिस दिन आने को वह कह जाती, उस दिन की राजीव बेसब्री से प्रतीक्षा करता और ठीक उस दिन रेखा अवश्य आती। पहली बार उसका वायदा अधूरा रहा था। ३० / कैदी । अभी दुपहर की खाने की छुट्टी का घण्टा बजा न था कि बड़े गेट के अन्दर मे किमी के रोने व चिल्लाने की आवाज थाई। राजीव का ध्यान काम में तो था ही नहीं, वह उधर चला आया। देखा तो कुछ बार्डर अमर को बुरी तरह मे पीट रहे थे । वह उछल-उछलकर चिल्लाता, रोना व कराहता । दम प्रकार जेल के कैदियों की पिटाई जेल की दिनचर्या का आवश्यक भाग था। जरा-जरा-सी बात पर इतनी निर्दयता मे मार पिटाई की जाती थी कि स्वयं नियता भी गर्म से मुह छिपा लेती थी। यद्यपि यह जैल सरकार द्वारा बाद कारागार के नाम से घोपित की गई थी, परन्तु वह 'आदर्श' बड़े गेट के बाहर लगे जेल के नामपट पर लिखे 'आदर्श' गन्द के अतिरिक्त और कहीं भी न था। उम नामपट के आगे दीवारों के अन्दर का वातावरण सदियों पुरानी जेली में कुछ बिगेप भिन्न न था। अपनी बैरक के माथी कंदो की इस प्रकार बेरहमी से होती पिटाई को देव राजीव महम गया। पर करता क्या वह भी तो एक कैदी ही था। अमर यव सिमक रहा था और वाईर उमे पीटते चले जा रहे थे। पूटने पर पता चला कि आज प्रात अमर पजे में काम करने के लिए बाहर गया था। जेल अधीक्षक के घर के साथ के बाग में वह काम कर रहा था। वहीं पर दाव लगा. कर वह घर के एक कमरे में चुपके से घुमा और अधीक्षक को पैट में रपे वटा में में दो पये निकाल लिए। तभी वार्टर ने उसे देख लिया। उगने हैडबार्डर के पास शिकायत की। और उमीकी आना में अब यह दण्ड दिया जा रहा था। अमर को वारी-बारी तीन वार्डरों ने पीटा। एक थक जाता था नो दूमग पीटना शुरू करता या। बाजुओं की पूरी शक्ति अमर के शरीर पर आजमाई गई। उसके चेहरे पर थप्पड़ों को मार मेमून जर बाया या शरीर का मांस धनों की मार से कहीं फट गया था, वहीं उभर आया था। कई जगह मगे या गई व खून निकल पड़ा था। राजीव को देखते ही अमर गिडगिड़ा पड़ा, "मैंने चोरी नहीं की। वार्डर ने झूठ बोल दिया। मैं भगवान की दमा वाताई। माने दन्त्रों को कम नाता हूं। मुझे छुट्टा दो राजीव...!" "मन"नाला "बदमाम झूट बोपना है।" पर वार ने उनके कान । ।
"तुम्हारी नींद खुल गई थी या तुम्हारी पत्नी ही दूर हट गई थी?" मोहन ने चुटकी ली। "आप घर खाली हाथ गए होंगे। इसीलिए आपकी पत्नी आपसे नाराज़ होगी।” सूरत भी विनोद में शामिल हो गया। खाली हाथ क्यों ? हाथ तो खूब भरे हुए थे।" "क्या लेकर गए थे घर? "दोनों हाथों में दो भारी-भारी हथकड़ियां जो थीं।" अमर को इस बात से जेल की वह क्रूर बैरक भी खिलखिला पड़ी। तभी एक वार्डर ने आकर बैरक का दरवाज़ा पूरा खोल दिया। बड़े गेट पर से एक आवाज़ गूंजी, " चलो पंजा नम्बर एक "नम्बर दो।" कुछ कैदी उठकर नीचे गेट की ओर चले गए। कुछ फैक्टरी जाने की तैयारी करने लगे। पांच-पांच कैदियों की एक टुकड़ी जेल के बाग में व खेतों में काम करने के लिए ले जाई जाती थी, इसे ही पंजा कहा जाता था। हर एक पंजे के साथ एक वार्डर रहता था। उन्हें जेल के बड़े गेट से बाहर के खेतों में काम करना होता था । "टन..!" घण्टे की एक आवाज़ गूंजी। यह फैक्टरी का काम शुरू होने की सूचना थी। बाकी कैदी अपनी बैरकों से निकले और फैक्टरी के वाहर के मैदान में इकट्ठे हो गए । लाइनें लग गई और गिनती शुरू हो गई। जेल में गिनती एक बहुत महत्त्वपूर्ण काम है । वैरक से निकलते समय, फैक्टरी में प्रवेश करते समय, फैक्टरी से निकलते समय"हर बार कैदी उसी तरह गिने जाते हैं, जैसे एक गड़ेरिया अपनी भेड़ें गिनता रहता है। राजीव को जेल के आफिस में ही काम करना होता था। आज वह रोज की तरह काम तो करता रहा, पर रह-रहकर उसे घर की याद सताती रही। रात के सपने याद आते और उसकी यादों की परतों को एक-एक कर उधेड़ते। उसके घाव हरे हो जाते। उसे समझ नहीं आ रहा था कि रेखा उसे मिलने क्यों नहीं आई ! पिछले लगभग एक वर्ष से वह प्रतिमास उसे मिलने आती थी। कभी-कभी मास में दो बार भी आ जाती थी। जिस दिन आने को वह कह जाती, उस दिन की राजीव बेसब्री से प्रतीक्षा करता और ठीक उस दिन रेखा अवश्य आती। पहली बार उसका वायदा अधूरा रहा था। ३० कैदी अभी दुपहर को खाने की छुट्टी का घण्टा वजा न था कि बडे गेट के अन्दर मे किसी के रोने व चिल्लाने की आवाज आई। राजीव का ध्यान काम में तो था ही नहीं, वह उधर चला आया। देखा तो कुछ वार्डर अमर को बुरी तरह से पीट रहे थे। वह उछल-उछलकर चिल्लाता, रोता व कराहता। इस प्रकार जेल के कैदियों की पिटाई जेल की दिनचर्या का आवश्यक भाग था। जरा-जरा-सी बात पर इतनी निर्दयता से मार पिटाई की जाती थी कि स्वयं निर्दयता भी गर्म से मुह छिपा लेती थी। यद्यपि यह जेल सरकार द्वारा आदर्श कारागार के नाम से धोपित की गई थी, परन्तु वह 'आदर्श' बड़े गेट के बाहर लगे जेल के नामपट पर लिखे 'आदर्श' शब्द के अतिरिक्त और कहीं भी न था। उस नामपट के आगे दीवारों के अन्दर का वातावरण सदियों पुरानी जेलो मे कुछ विशेष भिन्न न था। अपनी वैरक के साथी कैदी की इस प्रकार बेरहमी से होती पिटाई को देव राजीव महम गया । पर करता क्या । वह भी तो एक कैदी ही था । अमर अव सिमक रहा था और वार्डर उसे पीटते चले जा रहे थे। पूछने पर पता चला कि आज प्रात. अमर पंजे में काम करने के लिए बाहर गया था। जेल अधीक्षक के घर के साथ के वाग में वह काम कर रहा था । वही पर दाव लगा- कर वह घर के एक कमरे में चुपके से घुसा और अधीक्षक को पंट मे रखे वटुए में से दो रुपये निकाल लिए। तभी वार्डर ने उसे देख लिया। उसने हैडवार्डर के पास शिकायत की। और उसीकी आज्ञा से अब यह दण्ड दिया जा रहा था। अमर को वारी-बारी तीन वार्डरों ने पीटा । एक थक जाता था तो दूसरा पीटना शुरू करता था। बाजुओं की पूरी शक्ति अमर के शरीर पर आजमाई गई। उसके चेहरे पर थप्पड़ों की मार से खून उतर आया था। शरीर का मास घूमो की मार से कहीं फट गया था, कही उभर आया था। कई जगह खरोचें आ गई व खून निकल पड़ा था। राजीव को देखते ही अमर गिड़गिड़ा पड़ा, "मैंने चोरी नहीं की। वार्डर ने झूट बोल दिया। मैं भगवान की कसम खाता हूं। अपने वच्चो की कसम खाता हूं। मुझे छुड़ा दो राजीव...!" "चल "साला "वदमाग झूठ बोलता है।" एक वार्डर ने उसके कान - - । अमर को पकड़कर मुंह पर ज़ोर का थप्पड़ लगाकर कहा। "आप सबकी कसम खाता हूं।" अमर फिर चिल्लाया। "हरामजादा भैण मर जाएगा, लेकिन सच नहीं बोलेगा। चलो इसे धूप में खड़ा कर दो और अगली सज़ा पूरी करो।" हैडवार्डर ने आदेश दिया। धूप में खड़ा कर दिया गया और कहा गया कि वह सामने सूर्य की ओर आंखें खोलकर देखे। जब वह देख न पाये और चुन्धयाहट में आंखें झपक दे तो पीछे से उसके चूतड़ों पर ज़ोर का प्रहार किया जाए. । यह क्रम काफी देर चलता रहा। फिर श्रीकंठी को बुलाया गया। श्रीकंठी का असली नाम कुछ और था। वह तिव्बत का रहने वाला था और अपनी पत्नी की हत्या के अपराध में आजीवन कारावास का दण्ड भुगत रहा था। उसका परिवार १६५० में तिब्बत से भागकर भारत आया था। वह व उसकी पत्नी एक छोटी-सी चाय की दुकान चलाकर अपना गुज़र करने लगे। एक पड़ोसी के साथ उसकी पत्नी के अनुचित सम्बन्ध हो गए। उसने खूब समझाया व डराया भी, पर उसकी पत्नी उसकी ओर अधिक आसक्त होती गई। एक सायंकाल बादल गरज रहे थे, बूंदाबांदी भी हो रही थी। वह बाहर गया था। ज्यों ही लौटा उसने अपनी पत्नी व उस पड़ोसी को घर के अन्दर आपत्तिजनक स्थिति में देखा। कमरे के बाहर लकड़ी काटनेवाली कुल्हाड़ी पड़ी थी। उसने वही उठाई और क्रोध में पागल होकर दरवाजा खटखटाया। एक झटका-सा हुआ। दरवाजा खुला और उसका पड़ोसी विजली की चमक की तेजी से दिखाई दिया और भाग गया। उसकी कुल्हाड़ी अब एक-दो-तीन करके अपनी ही पत्नी पर पड़ी और वह प्रेमलीला करती करती इहलीला से भी हाथ धो बैठी। उसकी लाश वहीं छोड़ वह सीधा पुलिस स्टेशन गया और सारी बात बता दी। उसने अपराध स्वीकार किया था। आजीवन कारावास हुआ। जेल में वह लोहार था। उसने लकड़ी का आरा चलाने का काम भी सीखा। वह लकड़ी का हर प्रकार का काम कर लेता था। उसके जिम्मे कैदियों के पैरों में लोहे की वेड़ियां चढ़ाने का काम था। यदि कोई वी श्रेणी का या मीसा का बन्दी आ जाए तो उन्हें सोने के लिए जो चारपाई दी जाती थी, उस चारपाई को भी लोहे की एक मोटी जंजीर से बांधा जाता था। यह काम श्रीकंठी के ३२ / कैदी जिम्मे या । चारपाइयों को भी जंजीरों से बांधने का नियम वटा हास्यास्पद था। पर जेल नियम के अनुमार यह इस लिए आवश्यक यताया जाता था ताकि कदी चारपाई को दीवार के माय टिकाकर भाग न जाए। ज्यो ही थीकंठी वहा पहुंचा हैडवाडर ने उसे आमा दी, "अमर की टांगों में मोटी वेडिया डाल दी जाएं।" लोहे का एक बड़ा-सा टुकड़ा वही गा गया। हथोड़े को चोटें पड़ने लगी। और कुछ ही देर मे श्रीकठी के गिद हाथों मे अमर की टागों में बेड़िया डाल दी। "नहीं, इस मां को डहा बेडी पहनाओ! बडे साहब के घर में चोरी...!" हैडवाडर को आवाज गूजी और अमर के दिल पर एक आन्धी की तरह घूम गई। बेडिया दो प्रकार की पहनाई जाती थी। माघारण धेडी में लोहे पा एयः मोटा इंडा परसे लोहे का एक कडा लगाकर वाघ दिया जाता था। उगके ऊपर के सिरे को कंदी किसी रम्सी से बांधकर अपने पाजामे के नाड़ा वायने की जगह से बाध लेते थे । इम वेडी मे जैसे-तैसे चलना-फिरना हो गकता था। पर डंडा बेड़ी इससे भिन्न होती थी। दोनों परो मे मोटे लोहे के कड़े पहना दिए जाते। फिर एक मोटा लोहे का हडा दोनो पैरो के पड़ों के साथ फगा दिया जाता था। उसकी लम्बाई डेढ फुट से कम नहीं होती। जब भी कंदी चलने लगता, उमे अपने पर डेढ फुट चौटा रखना पड़ता था। गरी बहन अधिक कष्ट होता। न ठीक सोया जाता न चला जाता। टट्टी पेशाय तक करना कठिन हो जाता था। प्रायः सजा देने के लिये एक पैर में माधारण वेट्टी डाली जाती थी। पर अमर ने तो दो रपये की चोरी की थी और वह भी वटै गाहय की जेब में। इमलिए उसके दोनों परो मे वेडिया दालकर फिर दंदा यही भी लगा दी गई। फिर उसे कहा गया कि उग मंदान के एक किनारे में गिर नीचा कर, मुर्गे की तरह उछलता हुआ दूगरे किनारे तक जाए। वह चलना, बेटिया छनछनाती, उगको टागो व पुटनो को छोलती, गून निकलना। वह हारका क जाता तो मयमे र हरगोविन्दवार उमे पीछेगे जोर मे मान मार देना। ग्यारह बजे वा घटा बन गया था। गय कदी दुपहर का गाना गाने में लिग अपनी-अपनी वरको मे जा रहे थे । गय उपर में ही निरसने नहा पर आदर्श जेल के वार्डर दो रुपये की चोरी के अपराध में पिछले दो घण्टे से अमर को एक आदर्श दण्ड दे रहे थे। राजीव भी उधर खड़ा था। अमर की हालत देख उसका दिल दहल गया । अमर को अव उकड़ विठाकर एक कोने से दूसरे कोने तक उछलकर जाने को कहा जा रहा था। जेल के कैदी उधर से जाते हुए कुछ देर के लिए वहां पर रुकते, उसे देखते, फिर आगे बढ़ जाते । उनके लिए यह कोई नई बात नहीं थी। प्रायः ऐसा दूसरे- तीसरे दिन होता ही रहता था। यहां पर यह सब जेल की व्यवस्था व अनु- शासन पर्व के नाम पर ही होता था। पर आज राजीव इस प्रकार की नृशंस पिटाई देखकर छटपटा-सा उठा। अमर की सारी शक्ति जवाब दे गई। वह रुककर बैठ गया। हरगोविन्द के चूंसे स्वचालित मशीनगन की गोलियों की तरह रुकते ही नहीं थे। राजीव एक और खड़ा देख रहा था। उसे देख कुछ और कैदी भी रुक गए। राजीव अमर की हालत देख स्वयं को भूल गया। एक क्षण के लिए उसके भीतर का कैदी लुप्त हो गया और उसके अन्तर् का इन्सान प्रकट हो गया । वह क्रोध के आवेश में आगे लपका और उसने झटककर हरगोविन्द को एक तरफ धकेल दिया । अमर को जमीन पर से उठाया और एकतरफ ले गया । क्रोध से आंखों में लाल अंगारे भरकर वह गरज उठा, "वस. वस''अब हद हो गई। यह जानवरों की तरह का व्यवहार अब मुझसे सहन नहीं हो सकता। तुम मुझे भी जो चाहो सज़ा दे सकते हो, पर मैं अव अमर पर किसीका हाथ उठने नहीं दूंगा।" जो जहां था, वहीं ठहर गया। जेल में एक कैदी की यह हिम्मत कि हरगोविन्द जैसे प्रभावशाली व क्रूर वार्डर के उठते हाथ पकड़ ले। उससे तो जेल की हवा व चिड़ियां मी थर-थर कांपती थीं। सब कैदी आंखें मलने लगे। किसीको यह विश्वास न होता था कि एक कैदी ने इतनी हिम्मत कर दिखाई है। एक क्षण के लिए जेल के अन्दर की हवा भी ठिठक गई। राजीव के व्यक्तित्व का कुछ इस प्रकार का प्रभाव था कि उसे सभी वार्डर साधारण कैदी नहीं समझते थे। जेल अधीक्षक भी उसका कुछ आदर करते थे। इसी- लिए जब राजीव खुलकर सामने आ गया और तनकर खड़ा हो गया तो किसी भी वार्डर को कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं हुई। हरगोविन्द सबके सामने ३४ / कैदी अपनी झेंप मिटाने के लिए बोल पड़ा, "पर जानते हो, इमने साहब की कोठी मै आज दो रुपये चुराये हैं।" "पर क्या एमा कानून है कि एक मंतरा चुराने पर किमीको फांसी दे दी जाए ? या माह्व के दो रपये मोने के ये कि उनकी चोरी के बदले में इस गरीव की हटियां भी तोड देनी है ! दो रपये चुराने पर आखिर कितना दण्ड देने का विधान है ?" राजीव त्रोध में बोल उठा । अमर के घर में कुछ मून बहकर घरती पर गिर गया था। उसकी ओर इशारा करके राजीव वाला, "यह देखो कितना खून बहा जा रहा है। जेल मैनुअल मे व आदर्श कारागार के आदर्श नियमों में दो रपये चोरी के बदले में कितना खून निकालना जरूरी होता राजीव को कुछ भी पता नहीं लग रहा था कि वह क्या कुछ बोल रहा या। उसके दिल का कई दिन मे का दाज मुखर हो उठा था। कंदो चारों और जमा हो गए थे। राजीव की प्रत्येक थान पर स्वीकृति व समर्थन में मवर्क मिर हिलते थे व राजीव के प्रति श्रद्धा मे मवकी मांग मजल थीं। हरगोविन्द ने वहां मे विमपना ही ठीक ममता । वह बड़े गेट की और बढ़ा ही था कि राजीव उसके आगे आकर गहा हो गया । अपनी लाल आयें उसकी आंखों में गडाकर बोला, “वार्डर माहब । इमने दो रपये चुराये हैं, ठीक है इसने अपराध किया है । पर मुझे वह चेहरा दिखाओ, जो चोरी नहीं करता, जो ईमानदार है ! इमो जेल में क्या कैदियों के रागन में, कपड़ों, लकड़ी व दवाइयों में जेल के अधिकारी चोरी नही करते ' क्या जेल की देरी के दूध को कुछ लोग मुफ्त नहीं पीते ? इम समाज मे आज कौन बडा अफसर व नेता है, जो दिन दहाड़े बेईमानी व चोरी नहीं करता ! फकं इतना ही है, हम पकडे गए और चोर कहलाए और बाकी पकडे नहीं गए, इसलिए नेता व अफसर कहलाते हैं !" अब तक इस घटना की सूचना जेल के आफिम में पहुंच गई थी । अधीक्षक का चपरामी आया और हरगोविन्द व राजीव को बुलाकर ले गया। राजीव श्रोध में बहुत कुछ कह गया था। उसने जेल के आन्तरिक प्रशासन- सम्बन्धी रोग को आजाद दे दिए थे, जो हर कंदी के दिल में मदा मे भुलता रहा था, पर उमे जयान पर लाने की हिम्मत किमीवी नहीं होती थी 1 उसने जो कुछ भी कहा वह सव सच था। जेल के भरे आंगन में सव कैदियों के सामने जेल के सम्बन्ध इस प्रकार के खुले आरोपों से सब सहमे हुए थे। अधीक्षक के पूछने पर हरगोविन्द ने सारी बात बता दी। फिर राजीव की शिकायत करते हुए बोला, "साहब, यदि इस प्रकार राजीव जैसे कैदी खुले- आम बोलने लगे और हस्तक्षेप करने लगेंगे तो जेल का प्रशासन कैसे चल सकता है ? एक कैदी को कैदी की तरह रहना चाहिए। राजीव ने आज मेरे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया है। सारे कैदियों के सामने मेरा अपमान किया है।" राजीव अधीक्षक के कुछ कहने की प्रतीक्षा नहीं कर सका। बोला, "मैं खूब जानता हूं वार्डर साहब कि मैं एक कैदी हूं। पर कैदी से पहले मैं एक इन्सान भी हूं। और कोई भी इन्सान वह सब देख नहीं सकता, जो आप वाहर कर रहे थे।" "आप जेल में अभी आए हैं, मुझे बीस साल हो गए। ये जेलें इसी प्रकार चलती हैं और चलती रहेंगी। इन चोरों-डाकुओं को डर न हो तो ये न जाने क्या कुछ कर दें।" हरगोविन्द ने अपनी सफाई दी। "यह सदियों पुराना विचार है। इस गले-सड़े पुराने वोसीदा सिद्धान्त को कव की तिलांजली दी जा चुकी है। जेल नियमों के अनुसार आप और दण्ड दे सकते हैं, पर किसीको भी मार नहीं सकते।" राजीव भी चुप न रह सका। "मिस्टर राजीव ! तुम्हारी भावनाओं की मैं सराहना करता हूं, पर तुम्हें हमारी कठिनाई भी समझनी चाहिए।" अधीक्षक ने बात का सूत्र यहीं से गुल किया। वह राजीव की आज की स्पष्टवादिता से सहम गया था। यदि राजीव की जगह कोई और होता और उसने इतनी बड़ी गुस्ताखी की होती तो इस समय तक उसे मार-मार कर अधमरा करके वेड़ियों में जकड़ किसी अन्धेरी कोठरी में डाल दिया गया होता। "अधीक्षक महोदय ! बीसवीं सदी में अपराध-विज्ञान बहुत बदल गया है। जेल को अव सुधार-गृह कहा जाता है। एक अपराधी भी रोगी की तरह है। शरीर का रोगी हस्पताल में रखा जाता है और मन का रोगी जेल में । जो व्यवहार हस्पताल में एक रोगी को दिया जाता है, वही व्यवहार जेल में कैदी । - ३६ / कंदी को मिलना चाहिए। जैसे हस्पताल का उद्देश्य रोगी के शारीरिक रोग की चिकिल्मा करता है, उसी प्रकार जेल का उद्देश्य कैदी के दिल व मन के विकार को दूर करना है । गालियों, घूसों-मुक्कों व जानवरों की तरह के व्यवहार से यह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।" राजीव बोलता ही जा रहा था। क्षमा कीजिए, अपराधी कोन नहीं है ? चोरी कौन नहीं करता ?यह कहानी जितनी न कही जाए, उतनी ही ठीक है । कौन जानता है, कितने आदर्शवादी नवयुवकों को परिस्थितियों के क्रूर थपेड़ी ने अपराध के भंवर में झोक दिया। भगवान का कोई भी पुत्र अपराधी या पापो के रूप में जन्म नहीं लेता । ममाज ही उमे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपराध करने पर विवश करता है। हम पकडे गए, पर हमसे अधिक यूंमार अपराधी, ममाज का रक्त चूमकर गगनचुम्बी महल गडे करने वाले ममाज के नेता बने फिरते हैं।" आज राजीव आपे से बाहर था, पर अधीक्षक अपार भयम दिया रहा था। वह चुपचाप मुनता रहा, फिर हरगोविन्द को बाहर जाने का इशारा करके राजीव को अपने पास की कुर्सी पर बिठा लिया। "राजीव ! तुमने ठीक कहा है । मेरा भी यही विचार है । पिछले वर्ष भारत सरकार की ओर से जेल अधीक्षकों का प्रशिक्षण हुआ था। उसमें भी यही कुछ सिखाया गया था , परन्तु क्या करें, मेरी भी विवशताए हैं । स्टाफ मारा अनपढ़ है, फिर ये पेशावर अपराधी हैं । र, तुम सब भूल जाओ !" अधीक्षक ने उने शान्त करने की कोशिश की। "आपकी बात ठीक हो मकती है। पर जिम प्रकार बदले की भावना मे कैदियों को मारा-पीटा जाता है, उससे अपराधी और घडा अपराधी बनता है। उनके अन्दर का चोर और अधिक प्रबल होता है। बाप जरा अमर को बुलाइए तो सही।" अमर को बुलाया गया। यह अभी भी मिसक रहा था। जब उनै अधीक्षक के कमरे में बुलाए जाने की सूचना मिली तो वह और घबराया। ये अधीक्षक महोदय भी दियो को पीटने में बहुत माहिर गमझे जाते थे। किन्तु कुछ समय से किन्ही कारणों से उनका हृदय बुध कोमल हो गया या। इस पर भी उनका पुराना रूप ही कैदियों को याद था । बमर थरयर कांप रहा था। वह कमरे के भीतर जाने से वैसे ही हिचर रहा था, जमे. - - बकरा कसाई के पास जाने से हिचकिचाता है। एक वार्डर उसे धकेलता हुआ अन्दर ले आया। वह वाहर लगी चिक के पास खड़ा हो गया। उसके कदमों ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया । उसे पुरानी कहानियां याद आ रही थी, जव इसी प्रकार इसी कमरे के अन्दर बुलाकर उसे व अन्य कई कैदियों को बुरी तरह पीटा गया था। वार्डर ने चिक उठाई और अमर को अन्दर धकेल दिया। अन्दर जाते ही उसकी नजर अधीक्षक पर पड़ी, पर तभी उसे एक कुर्सी पर राजीव दिखाई दिया। उसकी जान में जान आ गई। वह हैरान भी हुआ। कैदी को कुर्सी पर बिठाया जाना एक बहुत बड़ी अनहोनी बात थी। एक तरफ दूर खड़े होकर अमर ने हाथ जोड़ दिए। उसके शरीर का हर अंग कराह रहा था और दोनों गालों पर खून उभर आया था। 'अव उसे कौन कितना मारेगा'..' इस उधेड़बुन में उसका दिल धड़क रहा था। "इधर, नज़दीक आओ !” अधीक्षक श्री भाटिया की आवाज़ ने मौन तोड़ा। अमर सटपटा उठा । नज़दीक बुलाने का मतलब वह कई बार समझ व देख चुका था। "पर साहब ! उस कसूर के लिए तो मेरी हड्डियां तक भी तोड़ डाली गई हैं पहले ही मुझे ..." जोड़े हुए हाथ कांप उठे। अमर के होंठ ठीक वोल भी नहीं पा रहे थे। "बेटा ! घबराओ मत । तुम्हें अब कोई मारेगा नहीं। यहां मेरे पास आकर बैठ जाओ।" भाटिया के ये शब्द सुनकर अमर को लगा, आज स्वयं भगवान ही धरती पर उतर आए हैं । उसने भाटिया के मुंह से न कभी 'बेटा' शब्द मुना था और न इस प्रकार का व्यवहार देखा था। उसकी तो दोनों पुष्ट लम्बी भुजायें व टांगे ही कैदियों से बातें करती थीं। पर आज यह हो क्या गया-उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। 'बेटा' शब्द ने अमर के सिर से पैर तक बिजली की झुरझरी-सी पैदा कर दी । जब ने उसने आंघ खोली और अपराध के मार्ग पर अग्रसर हुआ था, उसे न तो किसीने कभी वेटा कहा और न ही इतने स्नेह से पुकारा था। मां- बाप तो उसने देखे ही नहीं थे। वेटा उसे कहता ही कौन ? पुलिस व जेल वालों से तो मां-बहन की गालियां ही सुनता आ रहा था। उसकी कंपकंपी कुछ । ३८ / कैदी शात हुई । पारीर का तनाव भी कम हो गया । वह आगे बढ़ा और भारिया की कुर्मी के पास बैठ गया। "अमर, सच बताओ वह चोरी तुमने को या नहीं ?" आज पहली बार अमर धर्मसंकट में पड गया। आज तक कभी भी उसने अपना अपगध स्वी- कार नहीं किया था। कई बार पुलिस ने उसकी हड्डिया तक भी तोड़ दी थीं, रात-रात भर उसे बर्फ पर रखा गया था, उसके हाथों पर पलंग के पाए रख- कर मिपाही पलंग पर यूदे थे, पर उसने अपना अपराध कभी भी स्वीकार नहीं किया था। उसके गुरू की यही सबमे वडी शिक्षा थी कि न तो मच योलना, न अपराधस्वीकार करना और न ही अपने साथियों का भेद गोलना। परन्तु आज वह परेशान हो गया । वह मच कहे तो कमे और झूठ कहे तो कमे ? एक ओर उसके गुरू की शिक्षा व पेशे का धर्म था और दूसरी तरफ जीवन में पहली बार मिला एक मानव का स्नेह-मिक्त व्यवहार था। यो? से समय में ही उसके दिल में लम्बा संघपं हुआ। आखिर उसके दिल का जूट हार गया और मच जीत गया। दोनों हाय जोडकर वह बोला, “साहब । मैंने दो रूपये चुराए थे।" "अमर । यह चोरी तुमने क्यो की ? घबराओ मत अमर की पीठ पर भाटिया का भारी भरकम हाथ फिग तो उमका शगेर म्नेह मे भर उठा। "पिछले पन्द्रह दिन मे मुझे बीडी पीने को नहीं मिली थी। मैं बहुत परेशान था। दो-तीन दिन मागकर पीता रहा। फिर वोडो की तलय मुझे तडपाने लगी। में वीड़ी के बिना रह नही सकता। मेरे पाम एक पैन थो । उसके बदले में मुझे पाच वीडिया मिली। उनसे पाच दिन निकाले। फिर एक गावुन की टिक्की धी। उसके बदले में चार वीडिया ली और चार दिन निकाल लिए। उसरे याद मेरे पास कुछ भी नहीं था। बहुत तग था। इसलिए आपके घर में दो रुपये निकाल लिए।" "क्या बटुए मे दो रपये ही थे अमर'" राजीव ने पूछा। "नहीं, बटुए मे तो पूरे चार मो म्प थे। पर मेरी उररत तो भवन रुपये की ही घो।" अमर के इन शब्दों मे भाटिया की आंगों में एक चमक आ गई। और फिर आमें गीली हो गई। " ।
मर, तुम्हें और तो कोई तकलीफ नहीं है ?" भर्राये गले स से पूछा। इन भारी वेड़ियों से व कूदकर चलने पर विवश करने से पैरों के टखनों व हो गया है। मैं यहां कपड़े की पट्टी बांधना चाहता हूं ताकि लोहे के कड़े घावों पर और घाव न करें। पर मुझे ये पट्टी भी बांधने नहीं दे " अमर को लगा आज दुनिया एकदम वदल गई है। उसकी तकलीफ से ज तक किसीको कोई भी वास्ता न रहा था। भाटिया ने हैडवार्डर को बुलाया और अपनी जेब से दस रुपये का नोट कालकर वोला, "इन रुपयों की वीड़ियां मंगवाकर मेरे आफिस में रखवा दो और प्रतिदिन अमर को चार वीड़ियां दे दिया करो। उसकी सव वेड़ियां खुलवा दो और इसके घावों पर मरहम पट्टी करवाओ।" अमर की आंखें पानी से चमक उठीं। उसके हाथ जुड़ गए। उसने झुककर भाटिया के पैर छुए, फिर कृतज्ञता व श्रद्धा की नजरें राजीव पर डाली और हैडवार्डर के साथ कमरे से बाहर हो गया। राजीव ! मैं तुम्हारा धन्यवादी । तुमने आज मेरे अन्तर् के एक बहुत नाजुक तार को छेड़ दिया। मुझे आज लगा है कि हम कितने गलत तरीके से इन कैदियों के साथ व्यवहार करते हैं। इस व्यवहार के कारण अमर के पैर में तो केवल घाव ही आया था, पर मेरा तो कलेजे का एकमात्र टुकड़ा मुझसे अलग हो गया था।" भाटिया के आंसू छलकने लग पड़े। उसने दोनों कुहनियां मेज़ पर टिका दी। हाथों पर माथा थाम लिया। कुछ देर मौन रहा । तभी उस मौन को भंग करने मेज़ पर रखे सफेद साफ शीशे की चमकीली परत पर भाटिया की आंखों के आंसू छलक पड़े। "क्यों भाटिया साहव ! ऐसी क्या बात हो गई थो?" राजीव ने उत्सुक . दिखाई। । "मुझे कैदियों को मारने-पीटने की बहुत आदत हो गई थी। मुझे अफसरों ने सदा यही सिवाया कि जितना इन्हें मारा-पीटा जाएगा, उतन जेल प्रगासन ठीक रहेगा। मेरा ही एक पुत्र था। मैं उसे बहुत योग्य वन धुन में सूब मारता-पिटता था। यदि मैं कुछ दिन जेल में या घर में पि करता तो मेरे हाथों में जैसे खारिश-सी होती रहती थी। जरा-जरा- ४० | कैदी 1 पर मैं अपने इकलौते पुत्र को मारने-पीटने लगा। एक दिन वह रात के समय भाग गया । आज सात साल हो गए, उसका कही कुछ पता नहीं लगा। सारी दुनिया छान मारी। पुलिस ने सब संभव स्थान सोज लिए, अपवारों में विज्ञापन दिए, रेडियो पर घोषणा करवाई, पर मेरा बेटा नहीं मिला। मुझे नीद नहीं आती। बीमार रहने लगा हूं। मैंने अपने हाथों अपना बेटा गंवा दिया !" आज भाटिया एक बच्चे की तरह रो रहा था। "भाटिया साहब प्रभु करे आपका पुत्र जहा भी हो ठीक हो और वह शीघ्र आपके पास आ जाए । पर मैं आपने एक बात पूटने की गुस्तापी कर सकता हूं?" "ज़रूर पूछो राजीव " "उस घटना के बाद भी जेल में मारने-पीटने का यह रिवाज बदला क्यों नहीं गया?" "शायद मनुष्य अपने स्वभाव का दास होता है।" भटिया ने परोक्ष से अपनी भूल स्वीकार की। "एक विचारक ने कहा है कि मनुष्य इतिहास से केवल यही सीखता है कि वह इतिहास से कुछ नहीं सीयता।" "बहुत ठीक-यही बात है-" "अच्छा, भाटिया माहब | वार्डरो की मार ने अमर के मन के गंतान को जगाया था, पर आपके सहानुभूति व स्नेह के गन्दो ने उसके दिल के भगवान को जगाया है । आपने मेरी वात भी रग ली। मैं आपका धन्यवादी हूं।" राजीव उठकर चला आया। अब मारी जेल में इमी घटना की चर्चा थी। राजीव सब कैदियों का हीरो बन गया था। राजीव के बैरफ के बाहर आते ही फैदियों ने उसे पर लिया । उसमे पूर्व वे अमर मे मय कुछ मुन चुके थे। राजीव की हिम्मत का नतीजा है, जिमने भरे आंगन में वार्डर के हाय पकड़ लिए। गरेआम गवकी पोल खोल दी।" प्रमोद ने बहा। "यह दया व महानुभूति नहीं थी, बल्कि अपनी कमजोरियों को छुपाने की एक कोशिग है । आज तक किमीने भी इनके मुह पर इनकी कमजोरियों का भाडा नहीं फोडा था।" मोह्न ने अपनी व्यापण दी। - "यह "भाटिया साहव जीवन भर कैदियों की हड्डी-पसली तोड़ते रहे तब उनके दिल में कभी दया नहीं आई। उनका अपना पुत्र भी इस व्यवहार से भाग खड़ा हुआ तब भी कैदियों की पिटाई में कोई फर्क नहीं आया। शायद अब लड़के के मिलने की आशा नहीं रही, इसी कारण..." रेशम ने पास आकर वातचीत में हिस्सा लिया। "सौ चूहे खाकर विल्ली हरिद्वार चली।" सूरत भी चुप नहीं रह सका। "ऐसी बात नहीं है। मनुष्य के दिल में शैतान भी है, इन्सान भी और भगवान भी। कभी भी एक शैतान इन्सान बन सकता है । कारण कुछ भी हो पर इन्सानियत के व्यवहार का हमें स्वागत करना चाहिए। आखिर हमारे जीवन में भी तो एक ऐसा शैतानियत का दौर आया था, जब हमने अपराध किया और यहां पहुंच गए।" राजीव ने सवसे यह बात कही और आगे चला गया। रात को जब अपनी बैरक में सब इकट्ठे हुए तो अमर ने राजीव को बहुत धन्यवाद किया। राजीव बोला. "धन्यवाद किस बात का ? मैंने तो एक इन्सान के नाते अपना कर्तव्य पूरा किया है। पर तुमने पैन व साबुन के बदले में पांच सात बीड़ियां कहां से लीं? क्या यह भी लेन-देन की दर है ?" "राजीव वाबु ! इस वस्ती के अपने ही नियम हैं और अपने ही भाव हैं। हम तो चोर है ही, पर यह खाकी वर्दी पहने जो हमारे पहरेदार वार्डर हैं, ये तो डाकू व लुटेरे हैं। ये हम मजबूर गरीबों का खून तक चूस लेते हैं । यह जो क्रूर हरगोविन्द है, उसीने मेरे पैन के वदले मुझे सात बीड़ियां दीं। वह पन तीन साल पहले मैंने तीन रुपये में खरीदा था। तीन रुपये की सात वीड़ियां यहां का रेट यही है।" अमर की बात ने राजीव को हैरान कर दिया । तभी सोहन बोल पड़ा, "अरे, दो रुपये की अफीम मुझे दस रुपये की पड़ी।" "तो क्या जेल के अन्दर अफीम भी आ जाती है ?" राजीव ने और हैरान होकर पूछा। ४२ / कैदी "परमों मक्कड मिह एक वार्डर के साथ मिलकर लगर के अन्दर हुए- कर शराब पी रहे थे। वे बाहर में मंगवाते हैं।" मूरत ने अपनी भोली मूरत दिमाकर कहा। "राजीव ! यहां क्या नहीं होता! ये जेल के अधिकारी व कर्मचारी लुटेरे ही तो हैं। जेल नियमों के अनुमार प्रति कंदी जितना राशन व मामान दिया जाना चाहिए उनना नो दिया नहीं जाता और याटा तो उतना पाया भी नहीं जा सकता। पर रजिस्टगे में उतना ही गचं दिपाया जाता है। उसीमे से भराव भी उड़ती है। हजारो रपये की जेल को मरौद में न जाने किम-किसको तिनी कमियन होती है ।" मोहन बोला "सोहन । वह लड़की वाली बात बताओ बाबुजी को।" मूरत ने युछ शमति हुए कहा। लहकी कमी नाइकी ? क्या वात ?" राजीव ने कुछ चौंरकर पूछा। "अजी पूछो मत। कुछ साल पुरानी बात है। मैंने मृनी है, देवी नहीं। एक अमीर व्यक्ति कैदी बनकर आया। उसे नीचे के छोटे कमरे में रमा। उस बी क्लाम मिली थी। वह मय वार्डरों को रिश्वत देता और गराब पिलाता था। उन दिनों जेल प्रशासन बडा ढीला था। अधीक्षक भी कोई अयोग्य-मा व्यक्ति था। कहते हैं, उस अमीर कैदी के लिए एक गत कुछ वार्डर एक लहकी उसके कमरे में ले आए थे।" मोहन की इस बात पर कुछ चेहरे शर्मा गए, कुछ ने भद्दे मज़ाक शुरू कर दिए, पर राजीव गम्भोर हो गया। अमर आज बिलकुल चुपचाप एक तरफ बैठा किसी गहरी मोव में मग्न था । राजीव ने उसे अपने पास बुताया । उमे पूछा, "क्यों अमर, आज तुम इतने चुपचाप क्यो हो?" "राजीव ! आज की घटनाओ रो भेरी एक बहुत बडी पोजना अन्त- व्यम्न हो गई। मोच रहा है. उसका क्या कह।" अमर ने धोरे में कहा। वाकी कंदी अब साग खेलने या गणेमारने लग पड़े थे। अमर को राजीव ने कुछ पाम बुला लिय । पूछा, "कंगी योजना?" "यह मारयाज पहली बार नही पडी। मुझे कितनी ही बार इन प्रकार - पोटा जा चुका है। मैं अगले ही मास रिहा हो रहा हूं। मेरी योजना यह थी कि इस वार बाहर जाकर भाटिया और हरगोविन्द की हत्या कर दूंगा। जीवन के चालीस वर्ष पूरे कर चुका हूं । सात वार जेल आ चुका हूं। अव तो यहीं दिल भी लग गया है। इन दो की हत्या से यदि फांसी मिल गई तो जिन्दगी का व्यर्थ का यह भार समाप्त हो जाएगा। यदि उमरकंद मिली तो आप सबके साथ खूब बढ़िया कटेगी।" अमर ने दिल खोलकर रख दिया। "अमर! इतना बड़ा बदला आखिर किस बात का?" राजीव ने विस्मय प्रकट किया। "राजीव ! इन सालों ने कई बार विना कारण बुरी तरह पीटा, मारा व गालियां दी हैं। मुझे ही नहीं सब कैदियों को इन्होंने वेजान चमड़ा समझ- कर धोवी के कपड़े की तरह पीटा है। कितनों की हड्डियां-पसलियां तोड़ी, कईयों के अंग बेकार कर दिए, एक पागल हो गया था, तीन रुपये के पैन के बदले सात बीड़ियों की तरह कितने ही कैदियों का इन्होंने खून तक चूस लिया है ; परन्तु मेरी योजना अब कुछ..." "क्यों, अव क्या सोच रहे हो?" "जब से तुम इस वैरक में आए हो, तुम्हारे सम्पर्क व तुम्हारी बातों ने मेरे सोचने का ढंग ही बदल दिया है। आज भाटिया ने जिस प्रकार का व्यव- हार किया, मुझे पता नहीं उससे कुछ अन्दर ही अन्दर अनुभव हो रहा है। भाटिया के लिए संभाली जहर की पोटली जैसे पिघल-सी रही है। पर इन दोनों ने इतने जुल्म किए हैं कि कुछ भी हो, मैं इन्हें छोडूंगा नहीं।" अमर की आंखों में क्रोध की लाली उतर आई। "सातवीं बार जेल में ! तुमने जेल को अपना घर क्यों बना लिया अमर?" राजीव ने हैरान होकर पूछा। अब तक बाकी सभी कैदी लगभग सो चुके थे। "राजीव ! जब मैंने होश संभाली थी, तो एक नगर की पटरी पर कुछ बच्चों के साथ रहता था। मेरे मां-बाप कौन थे, मुझे कुछ मालूम नहीं। किसी- को कहते सुना था कि वे भी अपराध करते और पटरियों पर ही जीवन विताते थे। वे एक बार किसी बड़े गिरोह के साथ गए, फिर उनका कुछ भी पता नहीं चला। मैं पटरी पर सोता । बाकी बच्चों के साथ इधर-उधर से मांग- । 1 - ४४ / कैदी प कर अपना पेट भर लेता। जब कुछ वडा हुआ तो एक उस्ताद के पल्ले पत्र गया । उसने गुर बताए योर जैव काटने का काम में लग गया। गुजर अन्य। होने लग पड़ा। मेरे साथियों की एक अलग टोली बना दी गई व हमें एक क्षेत्र दे दिया गया। नगर के सब बड़े उस्तादों ने सारे नगर को कुछ हिस्मों में बाट लिया था। कोई भी टोली अपने इलाके में बाहर काम नहीं कर सकती थी। मैं केवल बारह वर्ष का था जब पहली बार मुझे मजा हुई। जेल गया। वहां पर मारपीट, घृणा, गाली-गलीच गाते हुए सजा पूरी की। बाहर निकला तो न मेरा कोई पर था और न सम्बधी, न मिन्न। फिर से अपने उन्हीं मित्रों में जा मिला । वही धन्धा शुरु कर दिया । कुछ दिन मजे में गुजरे, फिर पकडा गया। जेल गया। कुछ मास के बाद वापिस आया। वापसी पर इच्छा हुई कि कोई काम करके मम्मान का जीवन व्यतीत करूं । यही सोचकर में अपनी टोली में नामिल नहीं हुआ। किसी और वस्ती में जाकर मजदूरी करता रहा और किसी काम को मौज करता रहा । ' उन्ही दिनों एक बड़े नेता की किसीने जेब काट ली। पूरे तीन हजार रपये निकल गए थे। पुलिम पर बडा दबाव पड़ा कि किसी भी प्रकार अपराधी को पकड़ा जाना चाहिए। अखबारों में नेता की जेब कटने का ममाचार छप गया। नेता की पार्टी ने प्रस्ताव पास कर दिया कि कानून य व्यवस्था पुलिस की पकड़ में बाहर हो गई है। विधानसभा में भी सवाल उठा दिया गया । नास सिर पटकने के बाद भी पुलिस को अपराधी नहीं मिला। . "थाने में एक योजना बनाई गई। पुनिस ने मुझे तलाश करवाया और पकड़ लिया। मुझे कहा गया कि में ही वह अपराध स्वीकार कर लू। यह भी धमकी दी गई कि यदि मैं उम अपराध को स्वीपर न कसंगा तो मेरी इतनी पिटाई की जाएगी कि विवश होकर मुझे स्वीकार करना पड़ेगा। मैंने इनार किया तो थानेदार ने कहा कि उनकी इपरत का मवाल बन गया है। एक बर्ड नेता की जैव कट जाए और अपराधी पकडा न जाए तो उनको नौकरी गरे में है। मुझे यह भी आइवामन दिया गया कि मुझे छुड़ा लेंगे। मैं कुछ घबराया। अपराध स्वीकार कर लिया। मेरी जेब में से कुछ नोट बरामद हुए बता दिए गए। मुकदमा चला। किमीने मेरी कोई मदरन की, करनी भी नही ! । - व्यर्थ में फंस गया था। इस वार एक अच्छा नागरिक बनने की योजना मी तो पुलिस की इज्जत बचाने व एक बड़े नेता की चोरी पकड़ने की दी पर मुझे बलि चढ़ा दिया गया।" अमर ने गहरी सांस ली। "वाह अमर ! तुम आप बीती सुना रहे हो या किसी लेखक की कहानी ? री कहानी सुनूंगा, तू कहता चल ।" राजीव बड़े ध्यान से सुन रहा था। ने अव पूरा कम्बल अपने ऊपर ले लिया था। अमर भी अपना कम्बल कर उसे लपेट कर बैठ गया। अमर ने एक बीड़ी सुलगाई। उसके धुंए से कमरे के प्रकाश में वल से पड़ते दिखने लगे। वह फिर बोला, "इस बार विल्कुल वेगुनाह पकड़ा गया था . पुलिस पर मुझे बड़ा भारी गुस्सा था। एक दिन मुकदमें की पेशी थी। न्याया- लय के लिए मुझे बस में ले जाया जा रहा था। एक बस स्टैंड पर बड़ी भारी भीड़ थी। सिपाही मुझे हथकड़ी डाले सीट पर बैठा था। मैं नीचे बस के फर्श पर ही बैठ गया था। भीड़ इतनी थी कि आदमी पर आदमी चढ़ रहा था। तव मेरी आयु सत्रह अठारह वर्ष की रही होगी। मैं बिल्कुल पतला था। उस दिन मेरे वायें हाथ में चोट थी, इसलिए केवल दायें हाथ में ही हथकड़ी लगी थी। मैंने धीरे से अपना हाथ मरोड़ा, टेढ़ा किया और हथकड़ी से निकाल लिया। नीचे ही नीचे कुछ आगे सरका। एक चौक पर बस धीमी हुई तो मैं कूदकर वाहर हो गया। भीड़ इतनी थी कि सिपाही को तलाल कुछ भी पता न चला। चौक से सीधा सामने जाकर आगे मुड़ा और फिर अगली सड़क पर चला गया पीछे मुड़कर देखा तो वही सिपाही दूर सड़क पर भागता हुआ दिखाई दिय मैं घवराया। तभी मेरे सामने से एक कार निकली। मैंने हाथ देकर उसे कर लिया। एक नौजवान महिला कार चला रही थी और कार में को था। मैंने रोते हुए कहा, 'मेम साहव ! मुझे अगले चौक तक कार में छो मेरी मां घर पर मर रही है, मेरा बाप वहां काम करता है। अपने व तुरन्त बुलाना है।' वह महिला रहमदिल थी, दरवाजा खोला और मुह लिया। मैंने किसी एक सड़क की ओर इशारा कर दिया और वह क और घुमा दी, वह मुझसे अधिक सवाल न पूछे, इसलिए मैंने रोना में दिया। ४६ / कैदी । मेम माहब ! कार जल्दी चलाइए । यही मेरे याप ये पहुंगने से पहले हो मा दम न तोड दे।' मैंने कहा और उसने पैर एक्सलेटर पर दया दिया। कार हवा से बात करने लग पड़ी। " सामने एक सिपाही दिया। उसने कार रोक ली। रोजगार पाने के लिए वह कार का चालान करने लगा। वह महिला रानी भाषीपी गि 'सिपाही से बोली, 'इस लडके को मा मर रही है। मुझे से भी माना है। आप जल्दी से चालान लियो, मुझे फारिग यगे।' सिपाही ने पातान की किताब निकाली। सब कुछ लिग लिया । मैं भी बाहर निकाल उग गिपाती के पास पडा हो गया। जल्दी में पुलिग याले में हाथ से पिसाय मागेगी। वह उम महिला से कुछ बान कर रहा था। मैंने किताय उठाई, फिर अपनी कभीज़ से उमै झारने-पीटने लगा, फिर यापिग पर दी। महिमा गे गुजरी फिर कार में बिठाया और कार दौडा दी। जब मुझे लगा कि अय गुरक्षित साग आ गया है तो मैंने कार रकवा दो। पार में उतरकर मी दोनों। काप जोह और बोला, 'मैम माहब ! आपने मुश गरीय मी यही भारी मदर की। आपका ऐहगान तो चुका नही गयता, पर ये कागज अप पागमा कागनों को देश यह चौंक गई। उगगे पहले कि यह मारीयान गमामी और कुछ कहती, मैं मामने की गली में गायय हो गया।" "तो उन कागजों में पया पा" गीत्र या उपगुकता जागी। "उस मिपाही की चालान भी पापी में ये पागन गिना मगरला का चालान लिया गया था। मैंने वेपार लिए।" अमर पाली की लाली दौड़ गई। राजीव हगी ग मोटपोट हो गया। अमापी पीट पीला, "कमाल के यादमी हो यम तुम भी! तभी पानी ! 71 गिपासी योगा भी पता नहीं बना !" "गीव! वाटना भी एक कलापही कायमसी। एर बद्दल बरं ना? मैंने या, हुमा गीपा र गभी वही माग्ना विरग्या सनी परती है। वनमनी गागागडा हूँ कि यदि उगानमा बहा रामारावास गरम "ing । । इस मुकदमे में तो कभी पकड़ा ही नहीं गया। उसके बाद मैंने वह नगर दया। अन्य नगरों में घूम-फिरकर अपना धन्धा करता रहा। दिन गुज़रते गए। कई बार विचार आया कि कोई नौकरी करूं और अच्छा रक बन जाऊं। फिर सोचा, पुलिस में मेरा नाम व हुलिया है। ज्यों ही स को पता लगेगा, किसी भी अपराध में मुझे घेर लिया जाएगा। इसलिए ही निर्णय किया कि अच्छा बनने की कोशिश करना व्यर्थ है। मुझे लगा कि श संभालने पर प्रभु ने मुझे जिस धन्धे में डाला था, वही मेरे जीवन क पन्या है। कुछ वर्ष ठाटबाट से निकले। फिर पकड़ा गया तो हिसार जेल वन्द कर दिया गया। "हिसार में हरगोविन्द की तरह का एक जालिम डिप्टी था। उसने इतना पीटा कि पिटाई का सारा डर समाप्त हो गया। रही सही शर्म भी जाती रही। मन के किसी कोने में कभी अच्छा इन्सान बनने की इच्छा झलकती भी तो वह उस व्यवहार से सदा के लिए भस्म हो जाती। जितना मुझे मारा पीटा गया, गाली-गलौच की गई, उतना ही मैं पक्का जेबकतरा वनता गया। " एक दिन वह डिप्टी हमारी बैरक का निरीक्षण करने आया। उस दिन वेतन मिला था व उसका बटुआ भरा हुआ था। मुझे कुछ गन्ध-सी आ गई। उससे बदला लेने का अच्छा मौका लगा। जब वह सबसे पूछताछ कर रहा था व मेरी ओर आकर मुड़ा तो मैंने उसका बटुआ निकाल लिया। उसे पता तब लगा, जब वह शाम को घर गया और पत्नी को पैसे देने के लि उसने जेब में हाथ डाला। " वह सीवा जेल आया। मैं ही सबसे बड़ा जेबकतरा था। हैडव' के कमरे में मुझे बुलाया गया। आव देखा न ताव, मुझे दो जवान व ने पीटना शुरू कर दिया। वह डिप्टी भी पास खड़ा था। मुझे कुछ नहीं, बस पीटते रहे । पर तव तक मुझे जेल में इतना अधिक पीटा ज था कि मेरा शरीर अभ्यस्त हो गया था । और मुझे पीड़ा उतनी मह नहीं होती थी। " ओ साले "हराजादे.. भैण "बटुआ निकाल...।" एक घर रहने के बाद जब मेरा शरीर सूज गया, कई जगह खून निकल अ अभ्यस्त अंग भी दर्द करने लगे तो डिप्टी ने मेरे पास आकर कहा ४८ । कैदी " मा वटुआ? किमका वटुआ..?' रोते हुए मैंने कहा। " 'वह बटुआ जो तूने निकाल लिया। इतनी सफाई से और कोई भी जेब माफ नहीं कर मकता। जल्दी बोल!' डिप्टी का एक घूमा मेरी पीठ पर पड़ा और मैं दीवार में जा चिपका। सिर मे मून यह गया। । 'ओए मादर "हम बटुआ तेरे पेट से भी निकला लेंगे. बोल निकालता है या नही ?' साथ के वार्डर ने गालिया व पिटाई एकमाथ शुरू कर दी। पर में विल्कुल ही मुकर गया। तब तक बटुआ ऐमी जगह छिपाया जा चुका था, जहां से मिल नहीं मकता या। राजीव बाबु ! उसके बाद पूरे मान दिन तक मुझे पहाड़ी मेले में लगाए ढोल की तरह वेरहमी से पीटा गया। बीच में दो-नीन बार में बेहोश भी हो गया। पर मेरा यह दृढ निश्चय था कि मच नहीं बोलूंगा। " मुझे जेल में धन को कोई आवश्यकता नहीं थी। परन्तु उम जालिम डिप्टी मे बदला लेने का और तरीका भी नहीं था। कई दिन तक बेरहमी गे पिटाई तो मेरी हुई, पर वे हार गए और मैं जीत गया। कुछ दिन के बाद मैं अपनी बैरक में आ गया।" अमर ने कहा। "अमर । तुम इतनी मार पाकर भी सत्य नही बोल, पर कल भाटिया के कमरे में केवल दो रुपये की चोरी नुमने एकदम ही मान ली!" राजीव ने हैरानी में पूछा। "राजीव ' उस दिन भी जब मुझे बाहर पीरा गया तो मैंने अपराध स्वीकार नहीं किया था। मैं कभी मानता भी नहीं। वह तो माधारण-मी मार थो । उममे बड़ी भयंकर यातनाएं मैंने मही है। यदि मार-मारकर अप- मरा भी कर देते तो भी मैं स्वीकार न करता।" "फिर तुम माने कसे?" "जब उस दिन भाटिया ने अपने कमरे में बुलाया तो उसके चेहरे में एक पुलिस या जेल अधिकारी को करता नहीं, बल्कि एक इन्मान को इन्मानियत शलफा रही थी। फिर तुम भी पाम ही बैठे थे। भाटिया ने मुझे बेटा' वहार पुकारा । आह ! उन शब्दों में क्या जादू पा राजीय ! मुझे ही क्या, इस प्रकार के प्यार व सहानुभूति के पद परथर को भी पिपला देने । मुझे अपने मां- चार का पता नहीं। आज तक मुझे ममाज, पुलिस व जेल वालों ने चोर, पार, संदी] ४४ दमाश' ही कहा था। सव प्रकार की गालियां मेरे लिए प्रयोग की जा है। उस दिन जव भाटिया ने मुझे 'बेटा' कहकर पास बुलाया तो मुझे मुझमें शैतान के अलावा कुछ और भी है। जिसे स्वर्ग कहते हैं, वह धरती पर है, यहीं पर है।' “अमर ! तुम सात वार जेल आए। पिछले पच्चीस वर्षों में तुमने कितने अपराध किए। पर तुम्हारे दिल में भी प्यार के वे दो शब्द इतनी बड़ी चल पैदा कर सके। सच ही कहा है, भगवान हर जगह मौजूद है, महात्मा भी और चोर में भी। आवश्यकता उसे जगाने और पहचानने की है। अच्छा फिर क्या हुआ?" राजीव ने करवट बदलकर पूछा। अमर को पहली बार इस प्रकार का स्नेही श्रोता मिला था। उसने कहना शुरू किया, “मैंने वह वटुआ अपनी वैरक की लैटरीन के ऊपर की छोटी पानी की टंकी में इस प्रकार रख दिया था कि वह पानी से कुछ ऊपर रहे। मैं जव हस्पताल से लौटा तव तक वह सुरक्षित था। सारी जेल के चप्पे-चप्पे में उसे तलाश किया गया था। मेरी बैरक का फर्श भी दो जगह से खोदा गया था। वटुए में पूरे सात सौ रुपये थे। फिर तो खूब मौज की। रोज वढ़िया सिगरेट 'फीम व शराब उड़ने लगी। वाकी की कैद मैंने शाही तरीके से काटी।" "पर जेल में ये सब चीजें कैसे आती थीं?" "राजीव ! इस हिन्दुस्तान में हर आदमी के माथे पर उसकी कीमत लिखी रहती है। वह कीमत चुकाओ और उसे खरीद लो। यहां बाजार सरेआम इन्सान नीलाम पर चढ़ते हैं और मन्दिर में भगवान भी बेचे जा हैं। बड़ा अनुभव है मुझे जिन्दगी का ! जेल में वार्डर पैसे लेकर क्या नहीं आते ? बस, इतनी बात है कि दुगना-तिगना मूल्य चुकाना पड़ता है। उन्हें पता चल गया कि मेरे पास धन है तब मेरी इज्जत होने लगी। "मैंने कंद पूरी की। छूटकर बाहर आया पर जाता कहां? फिर धन्धा पुलिस और जेल । इसी प्रकार अब सातवीं बार यहां आया कंद नमाप्त हो रही है तो फिर मेरे सामने सवाल खड़ा हो गया है कि जाकर कहां जाऊंगा व क्या करूंगा। जानता हूं कि कुछ भी और सकता। यह ज़िन्दगी अब जेल की ही हो गई है।" अमर ने कहा की और एक ठण्डी गहरी सांस छोड़ी 1. - ५० / कैदी "अमर ! जीवन के लम्बे बालीम वर्ष तुमने जिम अपराध की दुनिया में बिताए हैं, उससे आगे भी बहुत कुछ है। मूल स्वभाव में कोई भी मनुष्य अपराधी नहीं होता। ममाज और उमकी परिस्थितिया मनुष्य को अपराध के रास्ते पर धकेलती है । कुछ लोग उन परिस्थितियों मे लड़कर भी अपना ठीक मार्ग बना लेते हैं परन्तु अधिकतर अपराधी बन जाते है । अपराध का मार्ग अन्धेरा है, भयकर है । उसका कोई भी भविप्प नहीं। जीवन के अन्तिम क्षण तक माथे पर अपराध का कलंक व मिर पर पुलिस की तलवार लटकाए जीना कोई जीना नहीं। अमर! सोचो, निश्चय करो कि यह रास्ता अव हमेशा के लिए छोड दोगे।" राजीव ने अमर के कुछ पास आकर कहा। "परन्तु राजीव ! मेरे तोपून के हर कण में अपराध बरा गया है। मैंने जीवन में कभी कुछ और सोचा नहीं, कुछ किया भी नहीं। अब इम पक्की उमर में माफ आदमी बनूगा !" "तुम गलत मोचते हो। आदमी तो तुम हो हो। तुम उस परम शुद्ध पवित्र गचिदानन्द परम पिता की मन्तान हो । तुम्हारी आरमा की उग चिनगारी पर घोडी राय जम गई है । तुम अपने विवेक को फूक से उस राग को उड़ाओ तो देखोगे कि तुम कितने पवित्र हो ! कितने अच्छे हो ! कितने भले इन्मान हो ।" "लग रहा है नुम मुझे किगी फिल्म का पात्र समझ बैठे हो।" अमर ने युछ विस्मय से कहा। "हा, हाँ !यह जिन्दगी एक नाटक है। हमें अपना पाटं अदा करना है। पर तुमने आज तक वह पार्ट अदा नहीं किया जो प्रभु ने तुम्हें दिया था। जीवन में कभी भी इतनी देर नहीं होती कि विगड़ी वात वनाई न जा सके।" राजीव की बातों मे अमर एक गहरी सोच में पड़ गया। "अच्छा अमर ! एक बात बताओ।" अमर गम्भीर हो उगको ओर देखने लग पड़ा। "तुम जब भी अपराप फरते हो, किमीकी जेब काटते हो, रिसीको छुरा घोंपते हो तो तुम्हारे अन्दर कोई ऐसी काममगाहट होती है, कोई ऐमी अनुभूति होती है, जो तुम्हे रहती है कि तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो?" "राजीव ! ऐगा नहीं, यस्मि दमके उलटा होता है। उस समय गैर - के अन्दर जैसे कुछ वोलता है कि यह मत करो। हर अपराध करने से पहले मन में यह विचार भी आता है कि यह नहीं करना चाहिए। करने वन करने की दो इच्छाएं, जैसे अन्दर ही अन्दर टकराती-सी रहती हैं । और यह संघर्ष अन्त तक चलता है। अपराध करने के बाद भी मन में एक लीक-सी महसूस होती है कि यह अच्छा नहीं किया।" "वस अमर ! वही आत्मा की आवाज़ होती है। यदि उसे सुन लो तो इन्सान बन सकते हो और न सुनो तो शैतान ।" पर अब इस उमर में.."ज़िन्दगी का कांटा वदलकर करूंगा भी क्या?" अमर गहरी सोच में पड़ गया। "अमर ! एक दिन यह जीवन समाप्त हो जाएगा। यह मिट्टी का शरीर मिट्टी में मिल जाएगा। तुम्हारी आत्मा भगवान के पास जाएगी। जेल अधीक्षक भाटिया के चेहरे पर जो दया व सहानुभूति की चमक तुमने देखी थी, उससे कई लाख गुणा अधिक प्रेम दया व सहानुभूति का सूर्य है भगवान ! वह हम सबका पिता है। बोलो, तुम उस पिता के पास क्या जवाब दोगे ? यही कि कितनी जेबें काटी, कितनों के गले काट दिए, छुरे घोंपे।" राजीव ने अमर को कई बार समझाया था। पर उस पर कभी कोई प्रभाव न हुआ। आज कुछ वात ही अलग थी। अमर की पिटाई, भाटिया की दया व उसके जीवन की कहानी को सुनकर राजीव का स्नेह ये सबकुछ अमर पर अजीव-सा प्रभाव कर रहे थे। अमर सामने की दीवार की ओर देख रहा था। उसकी आंखों में आंसू थे। "अमर ! आज वायदा करो, अपनी इस बार की रिहाई के बाद तुम एक नई ज़िन्दगी शुरू करोगे। अपने पसीने की कमाई से अपना पेट भरोगे। मैं जब भी वाहर आया, तुम्हारी ज़िन्दगी की हर कठिनाई में तुम्हारे साथ रहूंगा।" "राजीव ! मैं हार गया, तुम जीत गए। वायदा दे सकता हूं, पर एक शर्त पर। एक बात की तुम्हें भी मुझे आज्ञा देनी होगी। तुम्हारी कसम, उस एक बात को छोड़ यह अपराधी रास्ता छोड़ दिया. विलकुल छोड़ दिया." भूखा मर जाऊंगा, पर कभी अपराध नहीं कदंगा।" अमर के चेहरे पर एक चमक दौड़ गई। - "कान-मो गतं?" राजीव ने पूछा। "म आलिम हरगोबिन्द को एक बार जरूर मजा बनाना है। इसने मुझे मत रोक्ना, वरना मारा वायदा वापस ले लगा।" अमर का चेहरा फिर तमतमा पठा। वर, फिर देखेंगे।" राजीव ने उने और कुछ कहना ठीक न ममता । वड़े गेट में लम्बी-तीनी मोटी की आवाज़ आई और फिर टीर है, टीक है' यो तेज आवा रात के एकान्त को चीरती हुई एक किनारे में दूसरे किनारे तक गूज गई। फिर रात के बारह बजे तो घण्टे के बारह बार बजने की ऊंची कर्णकटोर ध्वनि गूज पड़ी। बड़े गेट के हिलने की बटगट हुई। 'छोटा दरवाजा गला। कुछ वार्डर अन्दर आए. कुछ बाहर गए । रात को हर तीन घण्टे के बाद ड्यूटी बदलती थी। उग आने-जाने की आवाज के याद फिर में उस मन्नाटे में जेल मोन की चादर ओडे सो गई। मुबह होती थी और गाम होती थी और इसी प्रकार जिन्दगी तमाम होती जा रही थी। वही दीवार, वही गेट, वही कंदी, वही भोटो की आवाज और वही ठीक है' की गूज। जेल की दीवारो में दिसनेवाला उतना ही आकाश, वही तारे। मानो आकाम भी बन्दी होकर अपनी अगोमता यो बैठा हो । मब कुछ एकः पन्त्र की तरह यन्धा-मा। इस वातावरण में राजीव कभी- कभी बहुन अधिक परेशान हो उठता या। 'कुछ भी बदलता नहीं यहा । पुछ भी नया नहीं दिखता । एक नया पत्पर भी यहा नहीं आता। आज कई माम में न तो पंमे को शाल देगी और जव मे रेगा नही आई तव मे किमी महिला या वच्चे की पर भी नहीं देगी।' राजीव स्वर में बोल पडा। जेल के नियम के अनुसार कोई कंदी अपने पाम धन नही रम गवता। जब नया मंदी आता है तो बड़े गेट के गाय के कार्यालय में जमे सारा धन जमा करवाना होना है। जब वह गेट में भीतर वाया जाता है तो गेटमा पहरेदार उमकी पूरी तलाशी लेता है । यदि उम तलाशी में कंदी के पास धन मिल जाए तो वह मारा धन जब्त हो जाता है। उसमें में आधा उम तलाशी सेने पाले पहरेदार को मिल जाता है और भाषा मरकारी राजाने में जमा करवा दिया जाता है। कंदी/ ५३ - जेल का जीवन भी एक यन्त्र की तरह घूमता है । एक निश्चित समय पर सवको उठना होता है । फिर काम पर लगाया जाता है। निश्चित समय पर, निश्चित मात्रा में दाल व गिनकर हाथी के कान जितने बड़े-बड़े फुलके दिए जाते हैं। दो वार खाना देना व काम लेना। जरा-सी भी गलती हो जाए तो कैदी को मारने का अपना नशा पूरा करना। घुटा-घुटा-सा वातावरण, आतंक, डर व भय की दुर्गन्ध सन्देह की सड़ांध, मन को कलुपित कर देने वाली विचार तरंगे, दिल की कोमल तारों को छेदने वाला व्यवहार इसीका नाम है जेल । इस सवसे राजीव का मन खीज उठता, घर की स्मृति उचाल लेने लगती, रेखा के प्यार की याद दिल के दर्द को भी तोड़ डालतीं। उसकी बच्ची सुन्नो की तुतलाहट उसके अन्तर् की गहराइयों में गहरी चोट मारती। वह उस क्षण को कोसता, जब रेखा के प्यार के ज्वार में पागल होकर उसने अपने हाथों अपने आदर्शों की होली जला डाली थी और गलत रास्ते पर गलत कदमों को बढ़ाया था। पर अब तो तीर रकस से निकल चुका था। वह सोचता और सोचता ही रहता । सोचते- सोचते जब उसके सोचने की शक्ति जवाव देने लगती, सिर दर्द से टूटने लग पड़ता, तो वह कराह उठता। दीवाली के दीप बुझे आज पूरे पन्द्रह दिन हो चुके थे। रेखा का कुछ भी पता न आया था। न वह स्वयं आई न उसका कोई पत्र । उसने रेखा को दो पत्र लिखे, पर उनका भी कोई उत्तर न आया। राजीव की उद्विग्नता सीमाएं तोड़ रही थी। 'यह क्या ?.. कीन ?.."ओह.. कितना प्यारा "कितना मासूम चेहरा'..! !' गेट पर से होकर जब राजीव अपने प्रतिदिन के काम पर कार्यालय की ओर चला तो गेट के उस तरफ एक छोटे-से बच्चे को देख वह ठिठक गया। वह एकटक उस बच्चे की ओर देखता रहा । जेल के वाहर बाईरों के रहने के मकान थे। वहीं से किसीका बच्चा इधर आ गया था। देखते- देखते राजीव देखता ही रहा । वह पत्थर की मूर्ति की तरह स्थिर हो गया। राजीव जानता था वह बच्चा उसका कुछ नहीं लगता। उसका दूर का भी उससे कोई सम्बन्ध नहीं । पर उस बच्चे की मासूम नज़रों में, उसकी भोली-भाली सूरत में राजीव अपनी सुन्नो को देख रहा था। ५४ / कैदी "राजीव ! कय मे गडे हो कुछ पता है ?" एक माथी मंदी ने पीछे में झझोटा तो उमवा गपना टूट गया । तब नए मुन्नी की पाद राजीव गी नांवों में पानी बनकर टप-टप धरती पर गिर रही थी। विवा विहन राजीय अपनी वदो की हैमीयत को याद कर आगे बढ़ा। आग पॉटी, दिर पर स्थिर रमा, भावनाओं को दवाया, अरमानों को दफनाया, यादों को आग पर पानी डाला और अपने काम पर लग गया। प्रतिदिन जब डाक आती तो राजीव को तरमती आयें चिट्टियों के तुलन्दे को घूरती रहती। जेल मे में ही पत्र का अपना महत्व है। फिगी अपने सम्बन्धी व मिव का पन कितनी प्रसन्नता देता है, हृदय मी किन गहराइयो लेता है, किस प्रकार जुदाई के पावो पर मरहम यन लग जाता है । कतना गम गलन कर देता है.."जेन में पन की इस अपरम्पार महिमा यो नही जान सकता है, जो कभी जेल में रहा हो। जेल के बाहर के लोग पत्र नही, केवल कागज पर म्याही में लिखें गन्द मात्र पढ़ते हैं। एक कैदी के लिए पत्र दो दुनिया को जोदने वाला एक कुल है। जेल की दीवारों के बाहर भी कैदी के अस्तित्व के गाय किमीमी गाय है, इसका पत्र ही एकमात्र प्रमाण है। अपराध करने से पहले पानी का भी कोई परिवार था. उसका भी एक मसार था, यह भी एक नागरिक पी तरह समाज में रहता था, उसे भी कोई चाहने वाला है....इन मय वाती को पहा फेवल पन ही तो गित करता है। इस विश्व में पन की वाम्नयिक महिमा स्वयं भगवान भी तब तक नहीं जान सकते, जय तक वे कुछ समय जेलन हो आए। जव किमी कंदो का पत्र आता, उगमी उम दिन दीवाली हो जागी। चह बार-बार उमे पता। रात को मोती बार फिर उन पड़ना। फिर पर को मिरहाने रयकर सपनों के मंमार में गो जाना। पुराने पत्रो को दी उतनी ही गभाल के माय जोडकर रखना है, जितनी गभाल ने गाय कम अपने को रगता है। आज ज्यो ही डाक का पुषन्दा गुला, राजीव की नजरें पर लग गई। उप-अधीक्षक ने सारी डाक को ध्यान में देमा । सरकारी पर एक और कर दिए ।
राजीव !" पा"क्या कहा ? मेरा..." हां हां तुम्हारा पत्र है। तुम कव से इन्तज़ार कर रहे थे। यह लो।" पर.. पर"यह तो.."" राजीव झिझका । "अरे ले लो। तुम्हारी पत्नी का ही तो पत्र है। मैं इसे सेंसर नह गा।" पत्र लेकर राजीव ने देखा । रेखा का ही था। पत्र जेब में डाल लिय जीव रेखा के पत्र सबके सामने नहीं पढ़ता था। एक तो पत्र खूब लम्ब। ता था, प्यार के नशे में मदहोश रेखा क्या कुछ लिख देती थी और फिर उसकी भावुक आंखें पन्न पढते ही वरस पड़ती थीं। इसलिए वह रेखा का पव रात को अपनी बैरक में ही पढ़ता था। जेव में पत्न रखकर राजीव की बेचैनी और भी बढ़ गई। दिन बहुत लम्बा हो गया। घण्टे बहुत देर से बज रहे थे। शाम होती ही नहीं थी। उसे लगा समय की गति भी धीमी पड़ गई है। रात तो बहुत देर से हुई। बिस्तर पर बैठकर उसने पत्र पड़ा। सुन्नो की बीमारी के कारण ही रेखा उस दिन उससे मिलने न आ सकी थी । सुन्नो अव भी बीमार थी। पन छोटा- सा जल्दी में लिखा गया लगता था। राजीव ने दूसरी प्रात: ही बहुत लम्बा पत्र लिखा । रेखा को साहस व घयं की प्रेरणा दी। किसी अच्छे डाक्टर से उसका इलाज करवाने के लिए वा। यह भी आग्रह किया कि उसे हर सप्ताह घर की कुशलता क साचार भेजे । इस बार भी राजीव के पत्र का उत्तर बड़ी देर से आया र पन आते-जाते रहे। सुन्नो भी ठीक होती गई। पर अव रेखा के में राजीव को कुछ अभाव-सा खटकने लगा था। पहले की तरह विह्वलता, जुदाई की तड़प, प्यार की सुलगती-सी चिंगारियां अब रेर पत्रों में नहीं मिलती। अब उसका पन एक रस्म की तरह होता अब वह मिलने आने की तीव्रता भी न दिखाती थी। पहले रेखा ती पृष्ठों का लम्बा पन लिया करती थी। फिर पत्न एक-दो पृष्ठों का अ अब कई बार अन्तर्देशीय पत्र ही आ जाता था। इस व्यवहार पर र कई वार विस्मय भी होता। पर यह सोच कि परिवार की व्यस्त ५६ / कैदी कारण ही ऐगा हुआ होगा, वह मन को गन्तोष देता। ४ उधर दीवाली के दिन राजीव रेखा के न आने के कारण उद्विग्न या, 'घर रेवा नन्ही मुन्नो को लेकर हम्पताल जनरल वार्ड में रात भर जागती रही। दिवाली में पहले गाम को मुन्नी गलती-गनती गिर गई पी। 'मिर से गून बहने लगा, रेमा दौड़ी उमरे मिर से यहते पून को दंगकर उसके होग उड़ गए। मकान बदलकर रेषा कुछ दिन पहले यहा आई पी। पाग- पड़ोम में उसका कोई भी परिचय न था। किमरी यहे ? कहा पर जाए? डाक्टर कहा पर है ? उमे कुछ भी मालूम नही पा। मुन्नो को गोद में लिए अपने मकान के बाहर वह सिगर रही थी, उसके कपड़े पून मे साल हो गए थे । मुन्नो पहले चिल्लाती रही, पर अब वेहोश हो चुरी थी। मामते के मकान से एक युडिया की आवाज आई, "नोरज! गामने के मकान को नई किरायेदारिन बरामदे में बंटकर रो रही है। देगो तो क्या बात है कुछ ही देर में नीरज मामने आ गया । उमने ज्यो ही मुग्लो के भाव से देवा, वह दौडकर बाहर चला गया। एक रिकमा लाया, रेमा व मुन्नी को विशा पर बैठाकर हम्पताल ले गया। मुनो को हम्पताल में दागिन पर दिया गया। दिवाती के दूसरे दिन उगे होग आई। नीरज ने मुन्नी की बहन मेवा की। जो दवाई हम्पताल में न मिलनी. यह याजार में खरीदकर ले जाता। उसका डाक्टरों में भी परिचय पा, मनिए देवमाल भी अच्छी होने लगी। कभी-कभी रेया अपने मशान की देखभाल करने जाती तो नीरज मन्नों के पास बैठा रहना। गन्नो उमे पार करने लगी थी। मुमीवत के समय नीरज ने रेगा को जो मेवा-गहायता की, उमगे परिचय गहरा होने लगा। रेग मुन्नो को लेकर घर आ गई। मुन्नी पटोर हो गई दी। रेया नीरज के घर आने-जाने लगी। उमको बूढी मा में अलाग पर में और कोई - नहीं था। एक नौकर तथा एक नौकरानी और थे। नीरज ने नौकर को आदेश दिया था कि वह रेखा के लिए बाजार से सामान लाने का सारा काम कर दिया करे। नीरज की नौकरानी ही रेखा के घर में आकर कामकाज कर जाती थी। "क्यों रेखा जी! इतनी सुहानी शाम को इतनी उदास क्यों बैठी हैं ?" नीरज ने पास आकर कहा। "यूं ही, कोई खास बात नहीं है ।" रेखा ने अपने हाथ में पकड़े हुए राजीव के पत्र को समेटते हुए कहा, "आइए, अन्दर वैठिए।" रेखा ने शिप्टा- चार निभाने के लिए नीरज को कहा। नीरज अन्दर आकर कुर्सी पर बैठ गया। । "रेखा जी ! यूं ही कोई बात नहीं है कहकर आपने फिर मुझे टाल दिया। आप शायद मुझे इस योग्य भी नहीं समझतीं कि मैं आपके बारे में कुछ जानः सकू और आपका दुग्ख पूछ सकू । कितने दिन हो गए आप अपने बारे में कुछ भी नहीं बतातीं । खैर छोड़ें, मैंने तो निश्चय किया था, इस बारे में आपसे कुछ पुडुंगा ही नहीं। ऐसे प्रश्नों से आपको कुछ असुविधा होती है, मैं आपको किसी असुविधा में डालना नहीं चाहता। आप हमसे कोई वात न करें, परः हमारी सुन्नो तो हमसे खूब बातें करती है।" यह कहते ही नीरज ने सुन्नो को गोद में उठा लिया और अपने घर की तरफ चल पड़ा। "ठहरिए, आपको दिवाली की मिठाई तो खिलाई ही नहीं। मिठाई का उव्वा उठाकर रेखा ले आई। इब्बा खोलकर नीरज के आगे रख दिया। नीरज ने मिठाई की एक टुकड़ी हाथ से उठाई और एक नज़र रेखा के चेहरे पर धुमा दी। एक मिठाई का टुकड़ा गोदी में बैठी सुन्नो को भी दे दिया। जब रेखा कुछ और समीप आई तो नीरज ने एक बार फिर गहरी नजर से. रेखा को देखा । नीरज सुन्नो को लेकर अपने घर चला गया। पड़ोसी का साधारण-सा परिचय अब थोड़ी आत्मीयता में बदलने लगा था। रेखा व नीरज का मिलना-जुलना वढ़ने लगा। कभी सुन्नो को अपने घर ले जाने के बहाने कभी उसे छोड़ने आने के बहाने, कभी कोई पत्रिका आदि देने के बहाने मेल-मिलाप लगातार बढ़ता गया। रेन्वा भी नीरज के घर आने-जाने लगी। बूढ़ी मां रसोई में काम करती रहती, नौकरानी मुन्नो को ५८ कैदी
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. - 'फिर भी कुछ प्रकाश तो हो ही गया है। अन्धकार कितना भी क्यों न हो और प्रकाश की कितनी भी छोटी किरण क्यों न हो, कुछ अन्धेरा तो दूर किया ही जा सकता है। प्रकृति का यह अन्धेरा, छोटी-सी मोमवत्ती से कुछ समय तक दूर हो सकता है, पर आपके जीवन में न जाने कौन-सी अमावस्या कब से छाई पड़ी है ! खैर, मुझे क्षमा करें। मैं जव आपके पास बैठा नहीं होता तो निश्चय करता हूं कि इस सम्बन्ध में आपसे कुछ भी नहीं पूछंगा, परन्तु आपके सामने आकर पता नहीं कौन मेरे अन्दर में बड़ी तीव्रता से यह जानना चाहता है कि आप कौन हैं और क्यों इस प्रकार""घर छोड़ आई... अच्छा मुझे आज्ञा दीजिए।" कहते हुए नीरज उठ खड़ा हुआ। "अभी ठहरिए, बाहर वर्षा हो रही है, कुछ देर के बाद चले जाएं।" रेखा ने नीरज को रोकते हुए कहा। कुर्सी पर करवट बदलते हुए नीरज ने कहा, "आप मेरे सामने बैठी रहेंगी तो फिर मैं कुछ पूछने की गुस्ताखी कर बैलूंगा, इसलिए आप रसोई में चली जाएं।" "क्या मतलब आपका ?" रेखा ने विस्मय से पूछा। "मतलब कुछ नहीं, वर्षा है, कुछ ठंड भी है। इस स्थिति में यदि आप रसोई में चली गई तो निस्संदेह ही आप चाय बनाकर ले आएंगी।" नीरज के यह कहने पर दोनों खिलखिला पड़े। रेखा रसोई में चली गई। सुन्नो नीरज की गोद में कहानी सुनने लगी। वर्षा ज़ोर से होने लगी थी। नीरज का नौकर बुलाने आया तो उसने मां को कहला भेजा कि वह देर से आएगा, मां प्रतीक्षा न करे।" सुन्नो कहानी सुनते-सुनते नीरज की गोद में सो गई। स्टोव जलाकर रेखा ने चाय का पानी रख दिया। वह विचारों में उलझ गई, 'वह कौन है.."क्यों इस प्रकार रह रही है... यह रहस्य कब तक दुनिया से छिपा रखेगी। फिर बार-बार मकान भी कैसे बदलती रहेगी। इतना अच्छा पड़ोस छोड़कर कहीं और जाना भी नहीं चाहिए।' तभी उसे दिवाली के दिन याद आ गए। वह सोचने लगी, यदि नीरज समय पर सहायता के लिए न आता तो बेहोश पड़ी सुन्नो का पता नहीं क्या होता! सुन्नो की सुरक्षा के के लिए नीरज की कृतज्ञता से उसकी मांखें भर उठीं। तभी एक प्रश्न-चिन्ह उसकी आंखों में उभर आया, वह नीरज और उसकी मां से कब तक अपना . - ६० / कैदी रहस्य छिपाती रहेगी, ये इतने मले हैं कि सच्ची बात उन्हें बता दे तो...' यह मोचते ही उसका चेहरा सजा मे सान हो गया। अब तक चाय का पानी ऊचल चुका था। स्टोव को गू-गं को आवार में पतौली के पानी की उठनेवाली भाप रेगा के चेहरे के पाम में ऐसे ही गुजर रही थी, जैसे हिमालय की गुरम्य, धवल चोटी को छूकर याद गुजर जाते हैं। उगे राजीव की याद आ गई। जेल जाने मे पहले राजीव ने रेगा के कान में कहा था, 'रेगा, यह रहस्य फभी किसीको मत बताना, नया मकान बदल लेना। इग सम्बन्ध में कभी फिसीको कुछ पता नहीं चलना चाहिए, यदि रहस्य गुल गया तो मारा धन भी जब्त हो जाएगा और मेरे गाय तुम्हारे विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह मेरा तुम्हारा राज हम दोनों से थाहर न निकले।' रेसा यह गय याद करते करते विचारो में गो गई, उगे याद आया कि एक यार फिर वह राजीव से मिलने जैल गई पोतो राजीव ने उसे कहा था, 'रेसा, जो भी हो गया वह हो है, मैंने यह सब तुम्हारे लिए किया, तुम्हारे गुप के लिए मैंने इतनी आपत्तियां शेली। पहले तो मैं मुसी पा, मंतुष्ट था, अभाव नाम के किसी भाव मे मैं परिचित ही न था, मुझे तो अभावाद का अपं भी तुमने ही समझाया था। मेर, तुम्हारे लिए मैं मय कुछ कर सकता हूं, इगलिए मैंने यह भी कर दिया, पर रेया तुम मेरे प्यार यी अमानत सम्भालकर रपना।' रेपा को याद आया कि ये गन्द कहते-कहते राजीव विलपकर रो उठा था। तय सिपाही ने उगी हयकड़ियों की जजीर पीचते हुए उसे अन्दर चलने को कह दिया था। रेगा पायल नजरों में एकटक तब तक देखती रही थी, जब तक कि वह उसकी आगों से ओझल नहीं हो गयापा। रेगा की आंगों से बहता हुआ पानी उसे बहुत दूर ले गया था। राजीव का प्यार और प्यार के लिए उसका बलिदान उनके दिल में एक हक पंदा कर रहा था और नीरज ये माय उमका बढ़ता हुआ परिचय एक टीम की तरह उसके दिल में तूफान पैदा कर रहा था। "रेगा जी, आप चाय यना रही हैं या मैं कुछ पूछ न लू इम डर में स्टोव जलाए जा रही हैं ?" नीरज ने पीछे से आकर कहा । रेमा चर्चीक पड़ी। उसन 1 सम्भलने की कोशिश की। "अच्छा छोड़ें चाय, यह सुन्नो तो मेरी गोद में ही सो गई, इसे तो विस्तर सुला दीजिए।" रेखा ने नीरज की गोद से सुन्नो को लिया। नीरज ने बा रेखा की आंखें लाल थी, खोई-खोई-सी थी किसी दूर के सपने में। गरज अन्दर स्टोव की ओर गया। वह चिल्ला-सा उठा, "अरे, यह पतीली ग्या खाली ही रखी है ? देखो जलकर आग की तरह लाल हो गई है।" रेखा मुन्नो को सुलाने अन्दर चली गई। नीरज ने स्टोव बुझा दिया। जब रेखा बाहर आई, तो नीरज ने हाथ जोड़ते हुए नमस्ते की और चलने की आज्ञा मांगी। रेखा ने अनमने मन से रुकने को कहा, लेकिन वह रुका नहीं। नीरज भी विचारों में डूवा बाहर चला गया। रेखा सारी रात सो न सकी, करवटें बदलती रही। पूरे सात साल का लम्बा रास्ता, सुनसान अकेला जीवन उसकी आंखों के सामने घूमता रहा। उसके पास अपना कहने को कोई भी तो नहीं है, जिससे वह दिल की दो बातें कर ले । राजीव के माता-पिता वृद्धावस्था में मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। रेखा का एकमात्र भाई सेना में सर्विस करता था, वह वर्ष में एक वार ही घर आता और तभी अपनी वहन के हाल पूछने कुछ दिन के लिए उसके पास आ जाता। अपने घर में रेखा की मां और उसकी भाभी हैं। भाभी से उसकी बनती नहीं है, a दो-चार दिन से अधिक वहां ठहर नहीं सकती। वह एकांत में दिल में दव राज का यह भार ढोती हुई व्याकुल-सी हो उठती। कई वार मकान दीवारों को देखते-देखते उन्हींसे वोलने लग पड़ती, रसोई में खाना समय बोलती रहती। कुर्सी पर बैठी गोद में सुन्नो को लेकर उससे ही करने की कोशिश करती रहती। 'इतने लम्बे वीरान रास्ते की यह खामोशी आखिर कैसे कटेगी कुछ तो सोचना पड़ेगा'-अपने वरामदे में टहलती-टहलती रेखा स्व वोल पड़ी। 'नीरज जैसे सुहृदय व्यक्ति को यदि अपने बारे कुछ जाए तो हर्ज भी क्या है ! मुन्नो के घायल होने पर उसने कितनी की !' उसे कल रात की घटना याद आई तो बहुत पश्चाताप नीरज को कितनी देर विठाए रखा, चाय के लिए रसोई में आई, विचारों में ही खोई रही। ६२ / कैदी ।
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दूगर दिन सायंकात विदा ले रही थी। राती दरी वादर धीरे-
पार विछ रही थी। नीरज का नौकर बाजार का नामान लेटररेखा
पर आया। रेखा ने उसे नीरज के बारे में पूछने दकला की दह
अभी बाजार से ही नहीं आए हैं। रेवा ने नौकर रहा किदह घर
आएं तो उन्हें बता दें कि मैं पूछ रही यो । नौरमार हैरान पारिनेही
दिन बीत गए पर रेषा ने नीरज के बारे कभी कुहन धामा, नाही की
उमे अपने पर बुलाया था। जब नौरज पर बापा, नोनांकर ने रद्रा
को बता दिया। आज यह पहला मौका था कि मानव नीर मन्दन्न
में कुष्ट उत्सुकता दिवाई थी।
"अंतल जी, आपको मेली मम्मी बुला नही है ।" कुलो ने सासरनौर
कोरेगा का संदेश दिया । वह विस्मय व उल्लास में रोमांचित हो ।
मुन्नों के माप रेगा के घर पहुंचा। आन रेवाने एक मवर दुकानदा
स्वागत किया।
"बैठिए," वह मिठाई की, प्लेट लते हुए दोनो, “न अटक
नहीं क्या हो गया था। मैंने आपके माय टॉक याहार नहीं किया।
लिए विठाया भी और आपकी चाय मिलाए दिनार दिया। म
लिए मुझे क्षमा कर दें।"
"एक शतं पर क्षमा कर सकता हूं।"
"हां, हां, अवन्य बताइए।"
"यदि आज भी चाय का एक अनिल र दी।"
रेगा भी शामिल हो गई। रेला चाप बनाया।
लगाते हुए नीरज दोला,"रेगा जी, प्राविरमा
भी मुझे क्यों नहीं देती! वा यासाभरे मायhिers
नहीं है कि मैं आपके बारे में इतना पर Ext
"नीरज जी, अव आपको यह कह नगर
निश्चय कर लिया है कि आरोगा ?
और चाय नीरज के वर में
दागारेर
सहायता की "यह तो मेरा सौभाग्य होगा।" कहकर नीरज कुछ सम्भलकर कुर्सी पर बैठ गया। रात अंधेरी हो चुकी थी। सूरज की किरणों के पदचिह्न भी वुझ चुके थे। विजली की टिमटिमाती वत्तियां यह बताने का प्रयत्न कर रही थीं कि अंधकार प्रकाश को जीत नहीं सकता। रेखा ने अपना परिचय दिया, पर पूरा नहीं। उसने कहा कि उसका पति राजीव गवन के झूठे केस में पकड़ा गया है। सारा धन सुनीलसेन उड़ाकर चला गया। यह सारी कहानी सुनकर नीरज को विस्मय हुआ और उसने कहा कि इसमें छिपाने की क्या बात थी। नीरज बोला, "इतनी-सी बात को आप इतने दिन रहस्य क्यों बनाए रहीं ? यदि ऐसा ही है, तो आपका या राजीव का कोई दोप नहीं!" "दोप हो या नहीं, परन्तु कानून की नज़रों में तो वह दोषी सिद्ध हुए और उन्हें दंड मिल गया। मैं एक कैदी की पत्नी हूं। आपने मेरी जो और सुन्नो के जीवन की रक्षा की, मैं उसका बदला कभी नहीं चुका सकूँगी, आप सचमुच मेरे लिए भगवान की तरह हैं। यहां मेरा और है ही कोन! आपसे इतनी प्रार्थना है कि यह रहस्य आपसे बाहर किसी और तक न खुले । मैं आपका यह एहसान जीवन भर नहीं भूल सकूगी।" रेखा के नेत्र सजल हो गए। "आप निश्चित रहें। किसीको इस बात का पता नहीं लगेगा। आज से आप यह समझें कि इस विपत्ति में आप अकेली नहीं हैं। मैं हर कदम पर आपके साथ रहूंगा।" नीरज ने सांत्वना दी। "आप कल्पना नहीं कर सकते। इन शब्दों से मेरा हृदय उल्लास से कितना विल उठा है। आज के विज्ञान ने चांद को छू लिया, आसमान की ऊंचाई को नाप,लिया और समुद्र की गहराईयों की थाह भी ले ली है, पर वह ऐसे किसी यन्त्र का आविष्कार नहीं कर सका, जो विपत्ति के समय सहानुभूति की तरह की राहत दे सके। मैं सचमुच बहुत कृतन " आंखें पोंछती रेखा रसोई की ओर चली गई और कुछ देर बाद चाय की केतली मेज पर रपते हुए बोली, "चाय दुवारा पिला रही हूं, जानते हैं किसलिए?" "नहीं। आप बताएं।" . ६४ "कल की गलतो के मुधार के लिए।" कुछ देर के बाद नीरज ने उठना चाहा पर रेपा ने उसे रोक लिया। इपर-उधर की बातें चलते काफी समय हो गया था, चाय के कप के साथ- माय बातों का ऐमा तांता चला कि कब रात ये ग्यारह बज गए, कुछ पता ही नहीं चला । अब दोनो ने विदा ली। इसके बाद कभी-कभी रेखा नीरज के माथ सामान लेने वाजार भी जाने नगी। कभी-कभी दोनों कहीं घूमने भी चले जाते। कई बार नीरज रेखा के घर पर गाना गा लेता और कभी रेपा को अपने घर बुला लेता। धीरे- घोरे यह परिचय सहानुभूति की सीमाओं को पारकर निकटता व घनिष्ठता में बदलने लगा। नीरज के विश्वास और व्यवहार ने रेखा को बिलकुल जीत लिया था। दोनों काफी निकट आ गए थे। पास-पड़ोग की नजरे भी उठने लगी थी। कुछ चर्चा भी होने लग पड़ी थी। नीरज को मा भी उन दोनों के इम निकटता से मारांकित हो रही थी। रेगा इस सबमे वखवर भावनाओं के मार्ग पर बढ़ी जा रही थी। अब एक ही राज या जो उमने नीरज को नहीं बताया था। वह कभी-कभी उसके गले तक आ जाता, तभी उसे राजीव की सीख याद आती । एक दिन नगर के एक पार्क में दोनों घूम रहे थे। नीरज ने रेखा का हाथ पकड़कर कहा, "रेखा, पता नहीं क्यों में तुम पर मासक्त हुआ जा रहा हूं।" "मेरे अकेले जीवन के मूनेपन को पूरा करके सचमुच तुमने मुझ पर बड़ा एहमान किया है।" “इसमें एहमान की कोई बात नहीं, यह तो केवल हृदय को भावनाओं का गवाल है।" "नीरज, कितने ही दिनों से तुम्हें एक बात बतानी चाह रही थी।" "वाह ! रेखा, अब ऐसी भी क्या दूरी है कि तुम अपने दिल की बात मुझे न कह सको।" नीरज ने रेखा के हाथ को कसकर पकड़ते हुए कहा। "उस दिन मैंने तुम्हें सारी कहानी बताई थी, परन्तु कुछ कडियां छूट गई पी, आमओ उस तरफ बैठें।" रेखा ने पास के हरे घास पर नीरज को बिठाया और उसे सब कुछ बता दिया। नीरज इस बात को पहले ही भांप गया था - कि राजीव द्वारा गबन किया धन रेखा के पास है, उसका संशय अब सत्य में वदल गया। नीरज ने रेखा के पास इतना अधिक धन होने की बात को प्रत्यक्ष रूप से कोई महत्त्व नहीं दिया। कुछ देर इधर-उधर की बातें कर वह बोला, "रेखा, तुमने ऐश्वर्य भरा जीवन व्यतीत करने के लिए अपने पति को गवन करने के लिए विवश किया, क्या आज तुम्हें यह महसूस होता है कि तुमने गलती की ?" "महसूस ही नहीं होता, मैं तो पश्चाताप में कई बार डूब-सी जाती हूं। पर नीरज, उस स्थिति में और करते भी क्या? गरीवी एक ऐसी बला होती है, जो मनुप्य से कुछ भी करवा देती है। मैंने उन दिनों वहुत सोचा कि घर की आय बढ़ाने के लिए कोई और सावन तलाश किया जाए, परन्तु कुछ भी समझ नहीं आया, इसलिए मैंने व राजीव ने यह योजना बनाई थी।" "रेखा, तुमने बहुत बड़ी गलती की। तुम्हारे पास उससे कहीं अधिक ऐश्वर्य का खजाना छिपा हुआ है । काश, उस समय तुम्हें कोई पारखी मिल जाता।" "क्या मतलव तुम्हारा ?" चौंककर रेखा ने पूछा। "रेखा, तुम्हारी जैसी सुन्दर, आकर्षक, नवयौवना यदि कला के क्षेत्र में निकल जाती तो लाखों रुपये तुम्हारे चरण चूमते, ऐश्वर्य से तुम्हारा घर- वार भर जाता और तुम प्रसिद्धि के चरम शिंखर पर पहुंची होती।" कहकर . नीरज दूर आकाश की तरफ देखने लग पड़ा। रेखा के लिए यह एक विलकुल नई बात थी। उसे कभी इस प्रकार किसीने नहीं कहा था। अपनी सुन्दरता व यौवन की प्रशंसा सुन रेखा उल्लास से भर गई। उसे लगा कि उसके पैर धरती से ऊपर उठ गए हैं। "नीरज, तुम वैसे ही मुझसे आत्मीयता के कारण ऐसा कह रहे हो। ऐसा मुझमें है ही क्या, जो कला के क्षेत्र में कदम रख सकू !" रेखा ने सकुचाते हुए कहा। कुछ गम्भीर होकर नीरज वोला, "ऐसी बात नहीं है रेखा! कल मैंने पिक्चर में जब हेमामालिनी को देखा तो मैंने सोचा कि ऐसी कौन-सी वात है, जिसमें तुम उससे कम हो ! रेखा, मैं सच कहता हूं कि तुम्हारे शरीर की - - . ६६/ कैदी बनायट, पतली कमर, बनगाती-गो देह और उस पर यह यौवन में गिने फूर और चेहरे को यह मागूम मुन्दग्नामा करना, बाज मुहाने गच पहा जा रहा है। अलर येवन तना है कि हेमामालिनी को ये परिस्थितियोमिन गई और यह मिनेमा जगत में छा गई। तुम्हें ये परिम्पिनिया नहीं मिनी, इगलिए अपने पति को गबन करने पर विचार न भिजवा दिया और म्वयं चुपनाप नगर के दम कोने में जीवन का भार ढो रही हो।" एर मांग में हो गय कर रहकर नीरज रेगा के चेहरे पर अपनी बातों को प्रतित्रिया देखने लगा। . रेगा यो लगा जो उसमे गचमुच आज कोई आधिप्पार हो रहा है। नीरज पर उमरा पूग भरोगा पा, उम पर उमगी असा भी थी और स्नेह भी उमट रहा था। इतनी प्रांमा गुनगर रेगा उल्लाग गे इतनी भर गई कि मुछ बोल न गयी। दोनों उठे और पर की ओर चल पड़े। रंगा ने नीरज के पर में मुन्नी को लिया और अपने घर आ गई। गुन्नी को बिम्नर पर मुलाकर दरवाजा बन्द करके रेगा मीधी शोने के पाम गई और बार-बार स्वयं को देखने लगी। उसने सोचा, यह भी कितनी भूयं है कि अपने अपार मोदयं व यौवन को आज तक पहचान ही नहीं पाई ! राजीव ने भी इस प्रकार कभी नहीं कहा था। नीरज पारणी लगता है । उसो. ने एक गन्ची बात को पहचाना है। दीवार पर एक तरफ एक कैलेंडर में हेमामालिनी का फोटो टंगा था, रेसा उसे उठाकर लाई। कभी वह उस फोटो को देयती और फिर वोरी में अपने आपको देगती, उसके चेहरे का अपने चेहरे मे मिलान करती, उसकी कमर के पतलेपन से, उसके अपरो को साली से और उसके यौवन के उभार से अपने शरीर का मुकाबला करती। कितनी ही देर यह गोरी के सामने बैठकर रंगा को हेमामालिनी से अधिक गुन्दर होने के उस तय की थाह लेती रही, जिसकी घोषणा आज नीरज ने पी थी। उमे मगा, सचमुच ही उसका सौदयं हेमामालिनी से कई गुना अधिक है। अब रेला कभी उदाम नहीं होती थी। नीरज उसके जीवन में काफी .मागे आ गया पा। जब कभी राजीव का जेल से पत्र आता, तो वह एक अप के लिए महम-मी जाती । राजीव की याद आने ही नीरज उसके सामने - एक प्रश्न-चिन्ह बन जाता, तब वह बुद्धि के तर्कजाल से अपने दिल की भावनाओं को वकालत करती। वह सोचती कि जीवन के लम्बे छ: वर्ष उसे व्यतीत करने हैं, वह असहाय अकेली आखिर किसीका सहारा तो लेगी ही। नीरज सरीखा इतना हितैपी मिला है, यदि उससे थोड़ा स्नेह कर ले तो हर्ज भी क्या है ! इस प्रकार के तर्क से वह अपने मन को संतोप देने लगी। धीरे- धीरे वह थोड़ी अखरन भी समाप्त होने लगी। ५ आज बहुत दिनों के बाद राजीव की 'मुलाकात' आई है। जेल में इस शब्द का विशेप अर्थ था । ज्यों ही राजीव को पता लगा वह खुशी से झूम उठां । उसे बड़े गेट के पास बुला लिया गया। लोहे की सींखचों के इस पार राजीव और उस पार रेखा खड़ी थी। राजीव एकटक रेखा को देखने लगा। वह कुछ वोल न सका। उसे आज रेखा काफी स्वस्थ नज़र आ रही थी, उसके चेहरे पर पहले वाली उदासी भी न थी। जंगले की ओर देखते हुए राजीव बोला, "रेखा, तुम्हें देखकर मैं आज बहुत प्रसन्न हूं। मैंने तुम्हें कितनी बार कहा और लिखा भी कि उदास मत रहा करो। मैं देख रहा हूं कि तुमने मेरी बात मान ली है। इस बार तुम्हारा स्वास्थ्य भी अच्छा है।" "आपका कहना क्यों न मानती! याद है न, आपने कहा था कि मैं आपकी धरोहर सम्भाल करके रखू !" धीरे से रेखा ने कहा । "यदि आज मेरी इस बात को याद रखोगी तो मुझे विश्वास है बाद का जीवन तुम आनन्द से व्यतीत कर सकोगी।" इधर-उधर की कुछ बातें करने के बाद दोनों फिर चुप हो गए। रेखा ने बात शुरू करने की कोशिश की, परन्तु राजीव चुप रहा। मौन तोड़ते हुए राजीव फिर बोला, "रेखा यह भी कितना अन्याय है कि महीनों के बाद भी पति-पत्नी कुछ क्षण के लिए ही आपस में मिले तो वह मुलाकात भी अकेले में नहीं हो सकती। हमें देखने पास एक जेल कर्मचारी खड़ा है। दो शरीरों की वात-मुलाकात के समय लोहे के यह सींखचें एक दीवार बन जाते हैं और दो दिनोंसे निकलने वाले शब्दों को नोट करने वाले जेल कर्मचारी की उपस्थिति- - ६८ / कैदी स्तिना यहा आपात पहं पाती है ! यह गीमा रेगा है, उस तरफ है मुर पर गंगार और इस तरफ है कंदियों की कंद यग्नी । गर, पर तुम यह बताओ कि तुम गुलो को माय मारयों नहीं आई?" 'मुन्नी को पड़ोग यो एक बुढ़िया के पाम छोड़ आई, यह यग के गर मे बड़ी अमुविधा अनुभव करती है। मैंने अब अपने मन को ममालिया। यह आपत्ति ती पाटनी ही पड़ेगी। चिन्ता में नित जनानी रहूंगी तो उमगे बनेगा तो छ नहीं, उल्टा तुम्हारे आने तक में ही मिट जाऊंगी।" "रेगा, मुमने मेरे दिल की बात नहीं है । मैं तो मदा इस आदर्श पी मानना रहा हूं। यह जीवन जीने के लिए है, भार ढोने के लिए नहीं । जो भी परि- स्थिति बाई हो उगका माहम मे मुराबला करना पाहिए। दुग यो स्वीपर पर मेना ही दुग में कार उटने का रास्ता है । जय मनुष्य छिमी आपत्ति को गाहम से स्वीकार कर लेता है सो वह आपत्ति के लिए ही आपत्ति बन जाता है। दुग तभी सक दुगरे जय सर हम उगे दुग गमाकर दुगी होते रहा है। इमीलिए कई बार पड़ी का मजदूर पूरी नीद मो सेता है और महलों में रहने याला समपनि नीद की गोलियां गाते-गाते मर जाता है।"रात्रीव ने दूर गून्य मी और दंग एक ठंडी मांग सी और फिर रहने लगा, "रेगा मैं सो उगी जीवन से पूरी तरह गंतुष्ट पा, यह मय कुछ तो वग तुम्हारे ही लिए." "राजीय, मैं मम ममानी हूँ और यह गोचर में कई बार प्रायश्चित की माग में लग-गी जाती है। पर जो हो चुका है. उमे अब वापस नहीं दिया गा सकता। आने वाले कल में इतजार में हमें आर की यह पड़िया जैसनरी पतीन करनी होगी।" मुलारात या निश्चित गमय समान हो रहा था। जेल के मर्मचारी ने यातचीत गमाण करने का गंरेत दिया। रैगा राजीय में लिए गामान साई पी, उमे उसने राजीव हाप में दिया। मामान ते गमप राजीव पाहाय रंगा के हाथ मे भगा तो उगके गरीर में एरपुरारी-गी दौर गई। बीते जीवन कास्तिनापुछ एकान में ही उगरी आगोरे गामने पुम गरा। यह गंमाना। रेगा नीट पहा । गंगा उगमी योर देगते-देगने याहर मार्ग पर पड़ राजीव कितनी ही देर उमरी पीठ और गो परो धारा पर जोहा राम्ने मो अपनी अपनर नहरों में निहारणा रहा। ।
. राजीव रेखा की याद में उस दिन कोई काम न कर सका। इधर-उधर जैसे-तैसे समय काटता रहा। सायंकाल हुआ, बन्दी का घंटा वजा, राजीव अपनी बैरक में आ गया। उसकी बैरक के सभी कैदियों को पता लग गया था कि आज राजीव की पत्नी उसे मिलने आई थी। राजीव की पत्नी जब भी उसे मिलने आती थी, तो उस रात उसके साथियों को कुछ न कुछ खाने को मिल जाता था। राजीव ने मिठाई का डब्बा निकाला और सवको मिठाई बांटी। जेल में दो समय की रूखी रोटी, भुने हुए चने और गुड़, बस यही खाने के लिए मिलता था । इनके अलावा और कुछ कभी देखने को भी नहीं मिलता। मिठाई का एक टुकड़ा किसी कैदी को मुलाकात के कारण यदि मिल जाए तो कैदी को स्वर्ग के किसी पकवान का मजा आ जाता है । प्रतिदिन घर में सब कुछ खाने वाला व्यक्ति यह अनुभव नहीं कर सकता कि एक कैदी के लिए मिठाई के टुकड़े का कितना महत्त्व है । राजीव ने जो मिठाई कैदियों को दी, सबने उसे तभी नहीं खाया, थोड़ी-थोड़ी बचाकर रख ली। वे जानते थे कि उसके बाद न जाने फव उन्हें मिठाई के दर्शन हों। "राजीव तुमने मिठाई नहीं खाई ?" सोहन ने राजीव को पूछा। "मेरा दिल मिठाई खाने को नहीं कर रहा। मैं आज खुश भी बहुत हूं और उदास भी बहुत हूं।" "ऐसी भी क्या बात है ?" सोहन ने पूछा। "सोहन, आज मेरी पत्नी मुझे मिलने आई थी, आज उसकी याद तड़पा रही है। मैं अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता हूं। मैं तो उसके लिए मर भी सकता हूं, यह कैद तो कुछ भी बात नहीं है।" राजीव अनजाने में कह गया । "तो क्या तुम अपनी पत्नी के कारण ही जेल आए हो?" सोहन ने उससे पूछा। "नहीं भी और हां भी। उसकी इच्छाएं पूरी करने के लिए ही मुझे इस अपराध के रास्ते पर बढ़ना पड़ा। उसकी महत्त्वाकांक्षा पूरी करने के लिए ही मैंने अपने आदशों की हत्या कर दी। पर सोहन, इन सब बातों का भी मुझे कोई गिला नहीं, कोई शिकवा नहीं है। प्यार के लिए कुछ भी लुटाया जा सकता है। मैं रेखा को प्यार करता इसलिए मैंने वह सब कुछ कर डाला, जिसकी मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था। बहुत-बहुत प्यारी है मेरी ७०/ कैदी रेगा। यह भी मुझे नी जान मे प्यार करती है। मोट ! भगवान पास या पार योगे?" राजीव भायरता में यह गया था, पर मोरन यो उगी मामला मे शरा भी रग न आया। उसकी हंगी निकल गई। राजीव ने उसे गरार हंगते देगा तो विम्मय और त्रीप मे बोला, "पया मैं गट बोल रहा है ? तुम बहे गुगताग हो, जो मेरी ईमानदार भावनाओं को हमी उटा रहे हो।" "नही रागीय, मैं तुम्हारी हंगी नही उरा रहा। मी एर याद ने कपोट टाला। इसी प्रकार एक नारी के मोदय और प्यार में एक बार मेरी भीमी उढाई थी। हंगी उड़ाने यी उग पुरानी बात को पाद पार मात्र मेरी भीगी निगल गई।" मोहन ने गहरी माग होते हुए पहा । "क्या मतलब सुम्हारा' में गम नहीं।" "राजीप, तुम पपा गमलोगे, तुम्हें तो अभी हरे-भरे प्यार की मदमाती मम्ती पा आग्यादन करना है । पर, छोडो, अब मो जाओ।" 'नहीं, मोहन याज नीद नहीं पा रही। मुम यतानी, गया कह रहे थे ?" राजीय अपने विनर पर कंबल मपेटकर चट गया। "तुम्हारी गुनने की इच्छा हो । सो मुझे भी जान माने मन का भार हल्का करने की इच्छा हो रही है।" मोहन उठार बिस्तर पर बंट गया। कम्पल गपेटा और मुनाने ममा, गजीय' में एक छोटे से गार म एक गाधारण परिवार में वह गुग का जीवन व्यतीन करना पा। एक गुन्दर मनी में मेरा विवाह हुथा। यह जितनी गुन्दर पी. उतनी ही मुगीर, गुनवान प यफादार भी थी। यह मुग और में उगे जी जान में पाले थे। हमारा परियार एक मैनिक परिवार पा। मेरे दास और तिा मेना में रहे । परनु मेरे पिता मुझे मेना में भेजना नहीं चाहते थे। कोई और नोपरी सामने पीकोगिकी, पर मैं यमपल रहा। पिवाह बाद एक गाना नौर के लिए भटकता रहा पा। गेना में नामो मेरे पिता भेजना पाते और न ही मेरी पत्नी गाविधी मने इतनी दूर भेजना वर्शन पर गपनी पी। "जय यही नौकरी न मिली, तो विवाहोपर में गंगा में भरनी हो गया। में जय पर में पला. तो गाविस बिलग-विलासर गे पी। इसलिए पानी बार जब में पट्टी पर पर आया, तो यह रान हमने पेग सिाई पी, निा प्यार उमः भाया था, हम एप-मरे में जीवन सामगदीपनाया। श्री 1 - का समय व्यतीत कर में सेना में चला गया। इस प्रकार एक वर्ष बीत गया। सावित्री मुझे काफी लम्बा पन लिखती थी। राजीव, यह प्यार बहुत देर नहीं रहा। अभी दो ही वर्ष थे कि उसने मेरे प्यार के साथ धोखा कर दिया। गांव में एक पुरुप के साथ उसके सम्बन्ध हो गए। मैं जब छुट्टी पर आया, तो मां ने मुझे सारी बात बताई। मैंने जव सावित्री से पूछा तो वह रोने लगी और उसने करामें खाई। उसके गाहने पर एक बार मैंने विश्वारा कर लिया। छुट्टी खतम हुई तो मैं फिर सेना में चला गया। अब उसके पन में वह पहले जैसी तड़प न होती थी, पन आते भी कम थे। पिछली बात याद करके मुझे कभी-कभी संदेह भी होता था। जब में दोबारा छुट्टी पर गया, तो वह बात गुशे मां ने फिर बताई। अब तक गांव में भी उसकी चर्चा हो चुकी थी। मैंने एक रात सावित्री को अपने पास विठाया और कहा, 'सावित्री ! मैं तुम सबके लिए घर से हजारों मील दूर कठिन, ऊंची पहाड़ियों पर नौकरी करता । कड़कती सर्दी में १०-१२ हजार फुट की ऊंचाई पर शत्रुओं की गोलियों के आगे छाती ताने राड़ा रहता हूं। वहां जब मैं तुम्हारे प्यार की गर्मी अनुभव करता हूं तो वह खून जमा देने वाली ठंड भी मेरा कुछ विगाड़ नहीं सकती। परन्तु सावित्री, में यहां गया सुन रहा हूं ? गया यह सच है कि हरनाम के साथ तुम मिलती-जुलती हो ?' " सावित्री फूट-फूटकर रोने लग पड़ी। उसने पाहा कि वह आरोप शूठे हैं। मैं असमंजरा में पड़ गया। मुझे समझ न आया कि अपनी मां और लोगों की बात पर विश्वास करूं या अपनी पत्नी पर। परन्तु कुछ ही दिनों के बाद भने सब कुछ अपनी आंगों से देख लिया। एक शाम में घर आ रहा था तो लम्बे रारते की बजाये मैं एक पगडंडी से निकलने लगा। यहां मैंने सावित्री को हरनाम के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देगा। मेरे शरीर में आग लग गई। एकदम बिजली की तरह शरीर में क्रोध की लोक-सी दौड़ गई। सोचा, अभी दौड़कर जाऊं और दोनों को यमलोक पहुंचा दूं, फिर गुछ सोचकर ठहर गया, उलटे पैरों वापस आ गया । ने एका योजना बनाई। दो दिन बाद शाम के समय सावित्री को लेकर में बाजार गया, उसे इधर-उधर घुमाता रहा। जब रात का अंधेरा बढ़ा तो पर की तरफ लौटा। हमारे पर के रास्ते में एक मुनसान जगह और उसके - - ७२ / कंदी माय ही गांव पा पमनानपाट पा। उसके पास पहुंचते ही मैंने सावित्री को घरका दिया, वह नीचे गिर गई। मैंने उमकी छाती पर चढ़कर पूरे जोर में उसका गला दवा दिया। उगोके दुपट्टे यो उसके मुंह में डालकर उसके गर्ने को तय तक दयाया जब तक वह मर नहीं गई।" कहते-रहते सोहन पी आगे माल हो गई। "अरे, मोहन ! यह इसना क्रूर फर्म तुम पंगे कर गए ? ओह ! मुझे तो मुनकर ही हर-गा लग रहा है। क्या एक ममपिता परनी भी ऐगा कर मानी है और तुम्हारी तरह एक मरीफ मूरत व मीरन वाला मनुप्प भी इतना गूगार यन मरता है ! हे प्रभू ! यह कमे लोगों को बम्नी है ?" माये पर हाप रमकर राजीव उद्विग्न हो उठा। उगका गिर घूमने लग पहा, उमगे आंगों के मामने रेगा पूम गई। दोनों हाथों में गिर रगपर यह युप हो गया। मोहन ने मुम्पराते हुए कहा, "राजीव ! यह विदगी पी कटोर गच्चाई है । तुम्हे गायर मालूम नहीं कि इस जेल में हत्या के अपराधो जितने लोग कंदी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उनमें से ८० प्रतिशत मेरी तरह रे है। उन्होंने प्यार में घोगा गाने के कारण या काम वागना के मारप हरयाएं की है। इस देश में जमीन य घन के लिए बहुत कम हत्याएं होती हैं। राजीव, प्यार और हाया एक होमियो के दो पहलू है । मैंने साविग्री की हत्या इमलिए पो कि मैं उसे हर मे पपादा प्यार करता था।" "पर सोहन, तुम अपनी ही परनी को इस प्रकार कैसे मार पाए, मैं तो यह सोच भी नहीं गकता।" राजीव ने हैरानी मे पूछा। • गजीर, मैं उग ममप मोहन तो रहा ही नहीं पा, गुम्से मे पागम हो गया पा । बुद्धि को तो मानो ताला लग गया पा । तुम्हारी तरह मैं भी आग यही मोचता हूं कि सोहन ने यह मय फुट ऊंगे किया होगा, पर यह सच्चाई है. मैंने यह मय पुप किया था। मैंने जीवन में कभी पाई हत्या नहीं की पी, पालु उग गमय, उग विशेप स्थिति के कारण जो उन्माद मुगमें उमड़ा, उगी. पारण में,यह गव पुए कर गया।" "अच्छा, फिर आगे मुनाओ क्या हुआ?" राजीव ने अपनी अनमाई आगों मे मोहन को और देगफर महा। मोहन फिर बोला, "राजीव, उसके बाद जो हुआ यह एक जामूमो . नायल से अधिक रोमांचकारी है। उस समय मैं गुस्से में पागले था, सावित्री दम तोड़े धरती पर पड़ी थी। सोचने की शक्ति तो मुसमें थी ही नहीं, इस- लिए जो सामने देखा कर डाला। शमशानघाट पर खूब लकड़ियां पड़ी थीं, मैंने उन्हींको इकट्ठा किया, उन पर सावित्री का शव रखा और लकड़ियों में आग लगा दी। ये दिन सदियों के थे, आसमान बादलों से घिरा था। आग बड़ी कठिनाई से सुलगी । जव लकड़ियों में भाग जलने लग गई तो मैं आश्वस्त होकर सामने खड़ा हो गया। मुझे विश्वास हो गया कि सुबह होते ही मेरे प्यार का पाखंड राय का ढेर हो जाएगा। मैंने हाथ साफ किए और घर चला गया। मैंने मां को बताया कि सावित्री अपनी मौसी के घर चली गई है, गयोंकि कल उग़की मौसी के लड़के का जन्म दिन है । यह कहकर मैं चुप- चाप सो गया। दूसरे दिन प्रात: मुझे निश्चित कार्यक्रम के अनुसार वापरा जाना था। मैं प्रातः उठा, सामान रामेटा और चल दिया। उस समय तक गांव में कोई पोर न था, वातावरण में सावित्री की कोई बात न थी। मैं बिल्कुल आश्वरत था राजीव । पर सावित्री मरी नहीं थी, मुझे जेल भेजने के लिए वह जिन्दा बन गई थी।" "क्या कह रहे हो सोहन ! जलती हुई चिता में से भी कोई जिन्दा जीवित हो सकता है ? तुम अपने जीवन की कहानी सुना रहे हो या जासूसी नावल की कहानी कह रहे हो ?" राजीव ने हैरान होकर पूछा। सोहन ने फिर अपनी बात शुरू की, "जब मैंने उसका गला घोंटा तो वह एकदम बेहोश हो गई, सर्दी के कारण उसका शरीर ठंडा पड़ गया। उसकी बेहोशी को मैंने उसकी मौत समश लिया। मेरे अनपेक्षित व्यवहार से उसमे दिल को भी बहुत बड़ा धाका लगा होगा, और मेरे कठोर प्रहार से भी उसका शरीर अचेत हो गया। मैंने चिता के नीचे पूर्व लकड़ियां जला दी घी और आग भी अच्छी तरह सुलगा दी थी। मैं जब चला गया तो आग धीरे- धीरे सुलगती रही और उसकी आंच से सावित्री का शरीर गर्म होने लगा। इस गर्मी से उसकी बेहोशी उड़ गई, परन्तु तब तक उसके कपड़ों में आग लग गुगी थी, वह शटगयर हिली, जिससे उसके ऊपर की लकड़ियां गिर गई और यह एक तरफ गिरी, फिर उठ गई और आधी रात के समय मुलगते . ७४ /दी पपट्टी के माय घर-उधर पमने नगी, तभी उसने अपने सामान दिए योर मो न गने ये फाइटाने। उमरा गरीर मीनही गएनम गया। पर गंगी होकर आधी रात के समय दिछुरती गर्दा मे उग गमगानघाट पर प्यार में बेवफाई की गजा मगनने लगी। चिता जल रही थी और मुद्रा चिना फे बाहर था। अपनी ही चितारे पाग बैठकर वह अपने नगे गरीरको मेक्ने लगी। राम के पर पर पहर बीनने सगे।" यहोयले मोहन पप हो गया। फरवट बदलकर राजीव ने कहा, "मोहन ! मैंने कभी गोचा भी नहीं था कि तुम्हारी जिन्दगी की पहानी दग प्रार पो हो सकती है। अब सुनने लगा है, तो यहानी अधूरी मत छोड़ो, आगे बनाओ।" "रात का अन्धरा गावित्री ने उस चिता की गर्मी ३ महारे पाट लिया, पग्नु अव अन्धेरा जा रहा था और प्रकाश आ रहा था। यह पयगई किप्रात: होते ही वह नगे मगर को लेकर हो जाएगी। ज्यों ही प्रशाम होने लगा. वह घटपटा कर पर-उधर देगने लगी। पाम में उगे कुछ साड़ियां दिखाई दी, उगम जाफर छिपकर बंट गई। तभी पाग में गाव का नम्बरदार दामोदर भाने गती यो जाते हुए यहा में गुजरा। मावित्री ने उगे पायान लिया। जोर मे नाराज मगाई । गमनानपाट यो नादियों में इतनी प्रानः एक महिला की आवाज गनते ही दामोदर पीक पटा। उगने अपने बैल व हल यही घोडे और 'भूत-भूत' रहते हुए दौड़ पड़ा। उमे तो पर पहुंचने के बाद ही होग आई होगी। "पोटी देर बाद उग राम्ने से कुछ और लोग गुजरे। मावित्री ने आवाज सगाई। परने ये भी हरे, पर फिर माविवी ने उन्हें मारी बात कह दी। वे उसी पाव रहने वाले थे। ये पान वे किमी घर में गए और पपई ले आए। पपरों की गाट रापकर राहियों में फेंपो तथा कपड़े पहनकर सावित्री बाहर था गई। उसने रात को मारी पहानी यह दी। उस समय तक में काफी दूर निरन गया था। गाड़ी में बैठ पुरा था। पुलिस ने मेरा पीछा किया और मंना भी अपनी ड्यूटी पर उपस्थित होने से पहले ही मुझे पकड़ लिया गया। गत यो गावित्रीरा गला दवोचते ममय मेरी घडी वही रह गई थी। उग पटी के पीछे की तरफ मैरा नाम गुदा हुआ था। वह घड़ी भी मेरे विरुद्ध एक यी गयाही मिस हुई। मुरादमा चला और मुन्ने फागी को सजा हुई। हाई- - कोर्ट में अपील की। फांसी पर लटकने से तो बच गया, पर उमर कैद मिल गई। लम्बे ६ वर्ष पूरे कर चुका हूं, पर अभी भी ८-६ वर्प यहीं काटने होंगे।" राजीव पत्थर की तरह सुन्न हो गया था। वह कभी सोच भी नहीं सकता था कि उसके सामने बैठा सोहन अपने जीवन में कभी इतना नृशंस भी बन गया होगा। तेज़ नज़रों से सोहन की ओर देखकर उसने कहा, "सोहन, तुम सावित्री को समझा सकते थे, यदि वह न समझती तो उसे तलाक दे सकते थे, अपना दूसरा विवाह कर सकते थे, पर इस प्रकार इतने बड़े घिनौने अपराध करने का तुमने निश्चय कैसे किया ?" बड़े धैर्य से सोहन बोला, "सोचने का तो यह सवाल ही नहीं था, यदि मैं एक क्षण के लिए भी ठहर जाता और सोचने की कोशिश करता तो मैं यह अपराध कभी न करता। क्रोध के बादलों के अन्धकार ने सोचने- समझने की मेरी सारी शक्ति कुंठित कर दी थी। मानों वहां मैं तो रहा ही नहीं था। 'मैं' लुप्त हो गया था। रह गया था वह भयंकर क्रोध, जो केवल बदले की आग में मुझे जला रहा था। राजीव, अधिकतर हत्याएं इसी क्रोध के पागलपन के उस क्षणिक आवेश के कारण होती हैं। यदि व्यक्ति एक भी क्षण ठहरकर सोच ले, तो वह आवेश उड़ जाता है।" "सोहन, तुमने इतना बड़ा अपराध किया, फिर भी तुम फांसी से बच । गए।" "फांसी के फंदे से तो बच गया, पर सोचता हूं मैं किसलिए बचा । घुट-घुट- कर ज़िन्दगी का जहर पीने के लिए! यह शरीर बचा तो क्या वचा! मर तो मैं तभी गया था, जब क्रोध ने मुझ पर और मेरे विवेक पर अपना अधिकार चलाया था। मेरी बूढ़ी मां मेरी फांसी की खबर सुनकर मर गई थी, वह हाईकोर्ट के उस निर्णय का इंतज़ार भी न कर सकी, जिसमें मेरी फांसी की सजा रद्द कर दी गई थी। सावित्री अपने माता-पिता के घर चली गई, मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। घर में कुछ पशु थे, उनमें से कुछ मर गए, वाकियों को लोग उड़ा- कर ले गए। मैं जेल में आ गया, गांव का मेरा मकान दो बरसातें भी वरदाश्त न कर सका, मकान गिर गया। राजीव, उस घर में जहां कभी बूढ़ी मां को ममता के साए तले मेरा वनावित्री का प्यार मूले झूलता था, वहां अव गिरे हुए मकान का ८ वर्ष पुराना खंडर है। सोचता हूं. यह खंडर किसकी दास्तान ७६ / कैदी मना रहा है ? मेरे प्यार की, गोप या पागलपन की अपा गायिकी येयपाई वी?"अब रानी मोहन पी आंगों मे या दाना गरम पानी उगी यमोसमी भिगोतामा समीज के बटनों पर गे यंग हो गिर रहा पा. जग मिली पहाटी ना काय गेपिपतराया गपानी ? पने प्येत पायरी पर मे तैरताहमा आग यदना । । गोहन अगर मेरा पा, उमफे भीतर का पुरुष हार गया या. उमरी तमन्नाभी मी वगिया पता गई थी, दिल के अरमानी पी चिता जनकर गल हो गई थी। जीवन पा दीया-वनी य तेल जला अब मानी म्यमं मोहोजना महापा। यह गिनी ही देर रोता रहा। उगे सारवना देने ए राजीय बोला, "गोहन, यह गर तुम्हारे पूर्वजन्मोरे पामों का फल है । माज नुम जंगे हो, यह गर पिछले जन्म में ममों में पान है। हम पदि चाहें तो अब भी अपना जीयन टोर. दिगा में प्रपात अपना आने वाला जीयन मुषार मकते हैं । मानता हूं. हमारा गय मुल मर पुका है, पर अभी भी बहुत कुछ यानी है। जीवन के जो दिन यानी उन्हें गुग से जीने की योजना बनाई जा सकती है। हिम्मत और गाहग परो, भगवान मेराग्य में कोई भी पापी नहीं है । गलती भी है, पर उगे मुपागना गरता है। जब सर जेल में ही प्रभू का नाम लो और अपने जीवन को गुपारने की कोशिश करो। जेल से बाहर जाकर तुम एक नई जिन्दगी गुरू कर सकते हो । तुम्हारी सजा कितनी बची है?" "सजा तो ८ या १० वर्ष औरराटनी पड़ेगी। परनु यर में अपने मारो गुपारकर करूंगा भी गया ! क्रा अपने घर के उग ग्रार की मिट्टी को देप पुट-घुटकर मरने के लिए ? अब मेरो भोई यानी, कोई अरमान भाकी नहीं। जिन्दा रहने का कोई बहाना नहीं, कोई गारा नहीं, अब सो इगी जगह, इन्ही दीवारों के भीतर, इन्हीं घोरों-दायारों की पम्नी में माना सारा जीवन व्यतीत महंगा'" सोहन ने मांगू बहाने एगर दुधहा "पर मोहन, जब तुम्हारी मा ममाप्त हो जाएगी, सब तो गुहें बार जाना ही पड़ेगा!" राजीव ने उसे पूटा। "जाऊंगा, पर फिर से यहीं भाने के लिए। मैं उग मागियी और हरनाम को हत्या करूगा--उतरा यून पीऊंगा."हाँ उनम, जिनसे अनुतिगारों दी - ने मेरी बसी हुई छोटी-सी गृहस्थी की अधखिली कली को मसल डाला था। अब मेरी ज़िन्दगी का एक ही मिशन है और मैंने पूरा प्रबन्ध कर लिया है। इसी जेल में एक बड़ा उस्ताद डाकू है, उसका नाम है मकड़ सिंह, वह और मैं लगभग एक ही समय रिहा होंगे। उससे मेरी बात तय हो चुकी है । हम दोनों हरनाम के घर डाका डालेंगे। जो धन-सम्पत्ति मिलेगी, वह मकड़ सिंह लेगा और उसके बदले में वह हरनाम व सावित्नी की हत्या करेगा। मैंने यह भी तय कर लिया है कि उन दोनों की हत्या के बाद वहां ही मैं भी आत्महत्या कर लूंगा । यह वकाया कैद मैं उसी एक कार्य को पूरा करने के लिए काटूंगा" ऐसा लगा सावित्री का गला दवोचते समय का क्रोध फिर से सोहन की आंखों में उभर आया था। उसकी लाल आंखें चिंगारियां छोड़ रही थीं। पूरे ८ वर्ष बीत जाने के बाद भी यह सारी घटना उसे ज्यों की त्यों याद थी। बदले की भावना पलकर और भी दृढ़ हो गई थी। राजीव ने उसे समझाते हुए कहा, "सोहन, तुम्हींने कहा है कि क्रोध के पागलपन के कारण ही तुमने सावित्री का गला दबाया था। जिस क्रोध के कारण तुम्हें यहां आना पड़ा, क्या फिर उसीके रास्ते पर जाओगे ? उस समय भी तुम्हारे सर पर क्रोध का भूत सवार था। यदि सावित्री दुश्चरित्न हो गई थी तो तुम उसे छोड़ देते, नया विवाह कर देते, तुम्हारी सेना की नौकरी भी बनी रहती और तुम्हारी गृहस्थी भी चलती रहती । परन्तु तव तुमने कुछ सोचा ही नहीं। एक क्षण के उस पागलपन ने ऐसा बारूद का काम किया कि तुम्हारा सब कुछ उड़ा दिया और तुम्हें जीवन के लम्बे २० वर्ष जेल में बिताने पर विवश किया। इतना सब कुछ होने के बाद भी तुम वही पागल- पन दोहराने की बात सोच रहे हो ! सोहन, सावित्री और हरनाम को भूल जाओ। समझ लो तुम्हारे लिए सावित्री मर गई, समझ लो तुम भी मर गए, जेल से निकलने पर नई ज़िन्दगी शुरू करना।" आज वर्षों बाद आत्मीयता व सहानुभूति के साथ सोहन को यह नई सलाह मिली थी। इतने दिनों वह जेल के चोर-डाकुओं के साथ हरनाम व सावित्री की हत्या करके बदला लेने की योजना ही बनाता रहा था। राजीव की बात उसे मजीव-सी लगी। कई बार उसे वे बातें बिलकुल वेकार-सी . ! ७८ / कैदी नगी। परन्तु बाद में उसे लगा कि गदीर के उस व्यवहार बोर ग गलाह में उसके अन्नर या मोया हुआ दम्मान जाग रहा है। बड़े गेट मे जल पी मोटी पी आवाज आई, 'नन नाई.."मय अच्छा- भी वही हमेगा मानों को रोदने वाली गूज गूजी। रात के समय ग प्रारी आवान जेल में गूजती ही रहती थी। जैन के चारो और पहरेदार वार गई रहने । बडे गेट में मीटीपी आवाज आती और उसके चार एक बार एक म गे गभी पहरेदार 'चर भाई, मब अच्छा' या 'गय टीक है, पो आवार देने है। रात के बारह बन चुके थे, राजीव और मोहन भी गो गए। आज अमर की रिहाई थी। पिछले दिन फिननी ही देर राजीव समर को गमझाता रहा । यमर ने उसके माय वापदा किया था, पर माप ही एरमां भी लगाई थी। उसने कहा था कि यह एक यार हरगोबिन्द को मना जर चगाएगा। राजीय ममताता था कि अमर याहर जार र एक बार उगरीय पाटना चाहता है । परन्तु कम उगने बताया कि यह बाहर जाकर हरगोरिद सी हत्या कर देगा। राजीव के बार-बार ममगाने के बाद भी जमर ने पहा पा, "यग, यही एक अपराप जीवन में अव करना है, उसके बाद नहीं । उग जानिम हरगोविन्द ने रितने ही कैदियों की हड्यिा तोरी है, और मनगारा गून भूमा है । यह कंदियों गेरित पेना है। जो कंटी उगे मागुन, चोरी या अन्य पीजों कम्प में रिपतनहीं देता, उगे वह किसी भी बहाने जेन से आगन में जानवरों की तरह पिटवावा है । गजीव, मैं तुम्हें मित्र, भाई व पुर मानता है. यदि मुमने इतनी भी आना मुझे नहीं दी तो मैं मुम्हें दिया मा यह सायदा बापम मे नगा।" यह कहार अमर फूट-स्टार रो पराया। अमर को पजे के माप बाहर नहीं भेजा गया, वह रिहाई भी तयारी कर रहा था । पानी परक में अपना मामान मम्मानने मगा । पुछ बीदिया, पुछ गाउन, गुण फटे-पुराने पप, एक राम की फोटो, एर पूप पी वगी, बग यही उमा गामान था। मामान ममेटने में बार बरम से बाहर पर बोने में अमर बंट गया । उमा हाय में रात की रोटी के मुछ रहे थे। रोटी छोटे-छोटे टर करणे यह नागे फेर रहा पा, नीचे एक छाटी-गी गिलहरी दुम हिला-हिसार उन्हें गा रही पी। रोटी के दा के गाय ही अमर मो योगों में आमुओं पीडी-गो मग गई पी। न जाने का उगरी - - - आंखों से वहा जा रहा था। उसके आंखों के पानी की कुछ बूंदें गिलहरी के शरीर पर भी पड़ी थी। "क्यों अमर, यह क्या कर रहे हो, यह गिलहरी, यह रोटी और यह आंसू..." सामने से आकर राजीव ने अमर से पूछा। अमर ने चौंककर राजीव की ओर देखा । रात के वचे टुकड़े नीचे फेंक खड़ा होते हुए वह बोला, "राजीव, यह गिलहरी प्रतिदिन मुझे यहीं मिलती है । मैं रात की अपनी रोटी में से कुछ बचाकर रखता हूं। यह निश्चित समय पर मेरी प्रतीक्षा करती है, इसी जगह आती है और रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े खाती है । आज इसे भी छोड़कर मुझे जाना होगा । मैंने तुम्हें बताया था कि इस दुनिया में मेरा अपना कोई भी नहीं है । तुमने जब तक दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाया था, तब तक यह गिलहरी ही इस इतनी बड़ी दुनिया में मेरी अपनी कहने को थी। इस जेल में मैंने कितने वर्ष विताए हैं और प्रतिदिन यह गिलहरी मुझे मिलने आती थी !" अमर की आंखों में आंसू थे। "अमर, मैं बहुत हैरान हूं। दिल्ली की सड़क की पटरी पर पैदा होने वाला अमर"""जिसे अपने मां-बाप का भी पता नहीं, जो अपराध के गर्भ से पैदा हुआ, जुर्म के पालने में, चोरी की लोरियों में, जिसने होश सम्भाला, जीवन में सात बार जेल की हवा खाई, कितने ही निर्दोप मासूम लोगों की खून-पसीने की कमाई को जिसने अपने करतब से साफ कर दिया, वही अमर आज एक गिलहरी से बिछुड़ने पर आंसू बहा रहा है । अमर, तुम्हारी यह मनःस्थिति देख मेरे मन का विश्वास पक्का हो गया है कि हर अपराधी के अन्दर एक छुपा हुआ अच्छा इन्सान रहता है। चोरों में भी भगवान है। फरक इतना है कि उसका भगवान अव्यक्त है, इन्सान सोया है और शैतान खुल खेल रहा है ।" अमर चुपचाप राजीव की बात सुन रहा था। गिलहरी अभी भी रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े खाती हुई इधर-उधर उछल रही थी। राजीव ने अमर के कन्धे पर हाथ रखकर कहा, "अमर, चिन्ता मत करो। तुम्हारे जाने के बाद इस गिलहरी को रोज़ रोटी खिलाने का काम मेरा रहा, पर उसे कह दो कि कल से तुम्हारे स्थान पर मेरी नियुक्ति हो रही है।" दोनों हंस पड़े। ६०/कैदी
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. राजीव को भी यह वचन दिया है । साहव, राजीव भी एक भला इन्सान है, मुझे तो समझ नहीं आता कि उस जैसा व्यक्ति कैसे अपराध कर सकता है ! वह तो फरिश्ता है, जैसा व्यवहार वह वैरक में कैदियों के साथ करता है, यदि सभी कर्मचारी वैसे ही व्यवहार करें तो इन जेलों से निकलने वाला हर अपराधी इन्सान वन जाए।" “मुझे बहुत खुशी है कि तुम इतना अच्छा निर्णय कर जेल से निकल रहे हो । तुम्हारे साथ यहां कभी कोई बुरा व्यवहार भी हुआ हो तो उसे भूल जाना।" "अवश्य भूल जाऊंगा। पर यह नगर छोड़ने के बाद ही।" "क्या मतलब ?” विस्मय से भाटिया ने पूछा। "जनाव, यह जेल और यह नगर, इसकी इतनी कड़वी और कठोर यादें है कि एकदम भुलाई नहीं जा सकती। इस नगर की सीमा से बाहर निकलकर मैं वह अमर ही नहीं रहूंगा।" अमर ने मन का भाव छिपाने की कोशिश करते हुए कहा । "पर अमर, तुम आज कहां रहोगे ? अव तो शायद तुम्हें कोई बस मिलेंगी !" भाटिया ने अपनी घड़ी देखते हुए कहा । "यहीं कहीं शहर में रह लूंगा।" "नहीं-नहीं, ऐसी क्या बात है ! यहां वार्डरों की बैरक में ही मैं तुम्हारे रहने का प्रबन्ध कर देता हूं।" भाटिया से विदाई लेकर अमर बाहर आया। जेल के उस काले बड़े गेट को उसने कई बार ऊपर से नीचे और दायें से बायें देखा, नजरें घुमाई और बाहर चला गया । पास ही वार्डरों की बैरक थी। वहीं रात को उसका सोने का प्रबन्ध किया गया था। हरगोविन्द जेल में ही क्रूर नहीं था, उसका व्यवहार घर में भी उसी प्रकार का था। उसकी एक पत्नी मर चुकी थी। उसके बाद उसने दूसरा विवाह किया । वह जरा-सी बात पर अपनी पत्नी को मारता-पीटता था। दूसरे ही वर्ष तंग आकर वह भाग गई। उसने सम्पत्ति काफी बना ली थी। जेल से मिलने वाला वेतन तो सभी बैंक में जमा करवाता था, उसका गुजारा तो कैदियों के सिर पर ही चलता था। बहुत से कैदी अपने घर से कुछ घन मंगवाते थे। वह । ८२/कंदी - - पन जेर में हिमाय मरणा रहता। उसमे गे प्रतिमाम रंगिट, गाउन आदिमुरचो मगवा मेने थे। नियमों में अनुमार एक मंदीर माग में २० गये तरपागामान ही मंगयागताई। र यह मामान मगाया जाता या तो हरगोबिन्द की अच्छी गागी ममाई होती थी। गरिसारा मार काली माधारण था। दो महीने में बीटीया एक मारकरी उगे गग कर देने गे । मोरियो गे होने वाली प्राय के अतिरिक्त भी उगरी कार पी कई प्रसार यी माप थी। जैन म रिए गरीमा जाने या हमारी यों में गामान में भी उगरा हिम्मा पा। उगने गाय में जमीन में मोपी, गम अन्या मगान भी बना लिया था। पर यह मय पुछ होने पर भी उमरा माना पर पाभी यग न गा। पुछ महीने पहले उगने एक विधया गे मारपीपी. परन्तु यह भी उगरे र म्यवहार मे पापी तग प्रामुरी पो। घरफ जिग बमरे में अमर को टहाया गया था. उगर पारी हरगोवित का वाटर भी था। वह उग गमय जेल इयूटी पर पा और उमरी परनी पर में पी। अमर उगनरफ.गया और उसकी पत्नी गे यानपाने मगा। अमर यानवी मे यहा होशियार पा। बातों-बातों मेहरगोलि रम्परहार यो पर्चा भी हुई। उगकी पानी एक गरीय परपी अनरसीपी समर में उसे पगलाया और गानयाग गिलाए । उगर्ने उमे अग्नी अपार गति मागागा दिया। रात के समय हरगोबिल पर रोटी गाने पापा, उगो बार उगरी गल मोटी थी। पीये मे अमर ने उगको पानी, पर मे रहर पुश रेगर और दो हजार रूपया पिया और चमत हो गया। दूसरे दिन प्रात सरहरगोविन्द जग इयूटी मे पर वारग मापा सो उसने देगारि दरवारा गुरापा और एण अपहेपर-उपर विगरेपर।गि ट्रक में उमने गल्ने रण में यह एप कार, टूटा पड़ा पा । पोहागा गोपने के बाद ही वह गमागमा रियर मारा र अमरपाही है। अमर भर परना रहा था। गुरहान-होने वा पाग के एक नगर में पप गया। दोनों ने काई यदले और गाड़ी में मंदारम्लिी पहच गए। का भी दो दिन यहाकार मारे लिए पुरिग रो मागो मे यरने के लिए दोनों चले गए। अमर ने मजदूरी करनी शुरू की और छोटी-सी गृहस्थी रख दी। छ ही दिनों बाद जेल अधीक्षक श्री भाटिया को एक पत्र आया : आदरणीय श्री भाटिया जी, आपको दुख होगा कि मैं उस दिन हरगोविन्द की पत्नी तथा उसके गहने व धन उड़ाकर भाग गया था। आज मैं जीवन में पहली बार इस अपराध पर पश्चाताप कर रहा हूं। वह भी इसलिए कि आपने मुझे एक बार प्यार से बुलाया था और राजीव ने मुझे ज़िन्दगी का एक नय रास्ता दिखाया था। हरगोविन्द की क्रूरता के कारण मेरा यह पूर्ण निश्चय था कि जेल से छूटने के बाद मैं उसकी हत्या कर दूंगा । वह इन्सानी वेश में दरिंदा है । गरीव और लाचार कैदियों का रक्त चूसकर उसने हजारों की जायदाद बनाई है । सब कैदी उसकी क्रूरता से बहुत दुखी हैं । आने से पहले मेरे इस निश्चय को राजीव ने बदला। उसने मुझे कहा था कि मैं उसकी हत्या न करूं । परन्तु मैं उसे कुछ न कुछ सजा अवश्य देना चाहता था, इसलिए मैंने उस रात उसकी हत्या नहीं की, अपितु उसकी पत्नी व सम्पत्ति को उड़ाकर ले आया। मैं अब भारत के बहुत बड़े नगर में एक भले नागरिक की ज़िन्दगी व्यतीत कर रहा हूं। हम दोनों मजदूरी करते हैं, पसीना बहाते हैं, उससे हम दोनों अपना पेट भरते हैं। चोरी की कमाई के बदले मेहनत की कमाई में कितना आनन्द है, यह पहली बार मुझे अनुभव हुआ है। मैं एक पटरी पर पैदा हुआ था, मां-बाप को मैंने कभी देखा नही होश की आंखें जब खुली थीं तो मैंने अपने-आपको अपराध की दु में पाया था। अब मेरे जीवन का कांटा ही बदल गया है। मैं छोटी-सी गृहस्थी बनाकर यहां रह रहा हूं। मैं आपसे हजारों मील दूर एक नगर की औद्योगिक वस्ती रहा हूं। पुलिस के हाथों की पहुंच के विलकुल बाहर हूं। मुझे कि मैं कभी भी आपको व राजीव को नहीं मिल सकूँगा। हरगोविन्द की चोरी का अपराध मेरे सिर पर रादा रहेगा। ८४ | कैदी
दग्गोविन्द पो पहमि यति रागीर ने मान रामो
मैं उगी हापा भवन पर दंगा। मै भीगार बनने पीमित
फरती पाहिए. नहीं तो कोई नेग मापामारी की गमाला
भाटियानो, मेरोवरा यार र दायें कांग में हार गुरपाटी.
मी गिलहरी आती थी और में उगे रोटी डा सिमामा पापा।
परबार मैंने रान योग्य भूगा रहार पोती रोटी यमाई गारि
उग गितहरी को गिमाई गागरे । आनी बार गोय में गोलियाग
बिताया पाकि यह उग गितारी को हर गुवह गेटी गितारमा ।
गाय को मेरी नमस्ते बंद और गे गिलहरी सामान राने की
पाद भी दिया।
प्रार1.
अमर
पा पार भारिया जी महा। उन्होंने रात्रीय पो भरने कमरे में
शाया और यह पर उसे पाने दिया। पापार राय पी माग गर
हो गई। यह योला, "माटिया जी, मोशी #म गेमम अमर को
हरमा के अपराध में रोक मगा। यह तिनी गनी बीमारियर प्रय
एक अच्छा नागरिक यन गया । पाप हरगोबिनको अपाय गमक
याल गेमंदी उगसे कल दुग्गी है।"
दो दिन यादवीय को भी अमर का एक पर मितानिगापा
मेरे जीवन के प्रयास,
मैं तुम्हारा पन्यवाद भी परमो कंगे। यह मेरे मार तिनी
विम्बनाजिम महान आरमा ने सिमीप
यार मुरी रोगनी दिगाई, नौने दामना गिगापा, मपराध वारी
अपरी गमी मे निसरार मार पिया. उमरा में सभी पायवार भी मही
कर गरगा।
गंगा रिमो गुमग पाया हरगोविनमय गरीबों को
आहोरा यागेर म गाहा मी निगा तो
हरराये परामभाए । उगी पर पानी भी कोनोनिग्मी।
हम दोनों ने विधिवत् विवाह कर लिया है और एक गृहस्थी बनाकर सुब से रह रहे हैं। में कहां हूं यह भी बता नहीं सकता, क्योंकि हरगोविन्द के घर किया गया अपराध मेरे सिर पर खड़ा है । वैसे मैं सोचता हूं तुम्हारी पूरी बात मान लेता और यह आखिरी चोरी भी न करता तो अधिक अच्छा रहता। परन्तु राजीव, जैसे तुम सदा कहा करते थे कि वही होता है, जो प्रभु को स्वीकार होता है, शायद यह भी उसीको स्वीकार था। क्योंकि उस आग्विरी चोरी से मुझे अपनी ज़िन्दगी बसाने व चलाने में बड़ी सहायता मिली 1 में अब तुम्हारी इच्छाओं के अनुसार एक भला आदमी बन गया हूं। काश ! तुम मेरी इस गृहस्थी को देख पाते। तुम जब रिहा हो जाओगे तो मैं किसी न किसी तरीके से तुम्हें अवश्य मिलूंगा। मैं हर रोज़ प्रभू से यही प्रार्थना करता हूं कि तुम्हारी अपील स्वीकार हो जाए और तुम अतिशीघ्र अपनी रेखा व सुन्नी के पास पहुंच जाओ। राजीव, मैं तुम्हारे ऋण को कभी भी चुका नहीं सकंगा । वह भी कोई ज़िन्दगी थी, जिसमें प्रति क्षण किसीकी जेब काटनी और किसी- को छुरा घोपना होता था ! ना कोई घर था, न गृहस्थी ! जीवन में सुख-दुख और धूप-छांव का कोई साथी न था। गन्दी वस्तियों में अनैतिक व्यभिचारी, चोरों-डाकुओं के साथ बिताए जीवन के ४० वर्ष अब याद आते हैं तो सोचता हूं, वह पूर्व जन्मों के किन्हीं पापों के . कारण था। । अब लगता है मैं एक स्वर्ग में रहता हूं। मेरी छोटी-सी गृहस्थी है, मुझे हर शाम अपनी पत्नी की प्रतीक्षा भरी नजरों का प्यार मिलता है । मैं एक मिल में मजदूरी करता हूं, प्रतिदिन पसीना बहाता हूं। श्रम का एक नया अर्थ मुझे समझ आया है । पसीना तो पहले भी बहता था, किसीकी जेब काटकर दौड़ने में, लड़ाई मुक्केबाजी में, छुरेवाजी-~- इस सव में पसीना तो गिरता ही था, पर अब जो पसीने के कण बहाता हूं, वह कितने पवित्र हैं, सार्थक हैं, यह अनुभूति अभी ही हुई है। - ८६/कंदी
गुमने पर कर पशु को दम्मान बना दिया। मैं कम-जमारों
सर तुम्हारा यह परमान भूम नहीं गाना। प्रभ तु. गुपद की
विनती मा करता रहता है।
पर पाम तुम्हारे जिम्मे नगा प्रापा । उग मंग मिली।
ध्यान रगना। उगरी भी मुझे यन याभाती है। नम योगन,
गुनगान जीयन में रितनी ही एकात पहिली में यह गिरीही मंग
एकमात्र मित्र पी। शाप सि जन्म में उगगे भी कोई मम्मरगा
होगा।जैन मे गभी को मंगनमम्ने पहना।
मुम्हारा गदा एकनानमः,
अमर
राजीय पी हाईकोर्ट में अपीर पर पी पी। उगरे यसोरा
आया था। जन्मी हो याम होने यात्री पी। राजीर यो निर्णयरी प्रतीक्षा
पीयद्यपि यह जानता था कि उसने अपगप किया है और गगरियो धागार
पर उग एटने की कोई विशेष गम्भावना नहीं है तो भी हर साभा
निगोमा भी महारा तनाम करना । उसे राम नीदन मागी मोर का गाने
मेता गला। यह गोयना परिवह एट जाए तो एकदम अपने परिवार में जाकर
न रागरे गे नई जिन्दगी गुरु करेगा
रात मो मोने से पहले बैंक में गभी दी गीर पे पाग पाबंदी, गग
गणे गगनीं। भाज गूरत की मुनाकार आईपी। उसके पागे दुष्प गामान भी
उगे दिया गया पा। यह गाग मामान राजोपाग गरे सम
"यायू जी ! यह तो आप ही गरमे याट हममे आप ही मांगे परेवार।।"
गूसरा भोसा पेहरा और उग भोली याग पर रावीप हम परा।
"अरे, यह रम्य तो पहले ही पाफी गाती है।"ग गोकार दिया
एरानी से राजीव मे पता।
"पार जो, यह पोपी पगो।"गरण ने उगरसि।पर पहपा गोर
पोगमा न माई। उगरे पूमने पर गूगल ने सिरहा, "यर नर पर गीती
।" राजीगरे पन्ने प्रय भी पुन । उगने गोल को भोर देग पूरी
पार गममा पोपहा । मोहन योरा, रानीप' यान की भात और
गंगरे नियम निमदीपी मुनागा माई गरे मामान गे पापा
- - - गेट वाला वार्डर रख लता है। यदि उसका हिस्सा न दिया जाए तो कोई बहाना लगाकर वह सामान अन्दर नहीं आने देता। उस सामान द में हरगोविन्द व कुछ अन्य वार्डर आपस में बांट लेते हैं। वैसे कैदी पास घन नहीं रख सकता, परन्तु यहां बहुत से कैदियों के पास काफी पैसे यदि चाहो तो मुलाकात के समय अपने सम्बन्धी से धन भी लिया जा ता है, पर गर्त यह है कि उसका चौथा हिस्सा वहीं देना पड़ता है, इसे ही ल की भाषा में चौथी पत्ती कहते हैं।" राजीव यह सुनकर हैरान हो गया । बोला, "यह तो बड़ा भारी अन्याय है। जेल के नियमों के अनुसार हमारे सम्बधी यहां अपनी चीजें हमें दे सकते हैं, फिर उनमें से चौथा हिस्सा क्यों लिया जाए ?" "अरे राजीव, इस बस्ती में क्यों' का कोई सवाल नहीं है। तुम शिकायत नहीं कर सकते, कहीं आवाज़ नहीं उठा सकते, इसलिए जो भी तुम्हारे साथ होता है तुम्हें वरदाश्त ही तो करना है।" कोने से एक कैदी की आवाज़ आई। "कुछ भी हो यह बहुत बड़ा अन्याय है।" राजीव के साथ दो-तीन आवाजें और गूंजी। "तो हम ही कौन-से बड़े न्याय करके यहां आए हैं !" एक कोने से एक बूढ़े कैदी की आवाज़ सुनकर सभी खिलखिला पड़े। "तो फिर हमारे और उनमें फरक ही क्या हुआ! यदि तुम्हारी तर वह पहरेदार वार्डर भी चोर और लुटेरे हैं तो या तो उन्हें जेल में रखा जान चाहिए या हम सबको जेल से बाहर निकालकर उनकी तरह अपने घरों रहने की इजाजत होनी चाहिए।" सोहन ने कहा। बहस में हिस्सा लेते हुए सूरत बोला, "बाबू जी ! सभी वार्डर ऐसे हैं। रोशन, प्यारेलाल जैसे कुछ बहुत अच्छे लोग भी हैं। जब कभी ड्यूटी होती है तो वे चौथी पत्ती नहीं लेते। इतना ही नहीं, पिछले मा कोई मुलाकात नहीं आई। मेरे पास धूप नहीं था। हर दिन भग फोटो के सामने धूप दिए विना खाना नहीं खाता । मुझे बड़ी मुश्किल जव रोशन को पता लगा तो वह अपने घर से मेरे लिए धूप ले आय कल में जो धूप जलाता हूं, वह रोशन का दिया हुआ ही है। आज में ८८ / कैदी गामार थापा तो मैंने गंगन पा पा वाम पाना पारा, परमने नी निया।" उगरे बाद घर में गंगन और प्यारेगारीमायमानागरी महानिमा गुम हो गई। गबने अपने-माने अनुमा गुनाए । मीन पभी गाती देने और न मारने कई बार रिमी बीमार पटीपी वागार मे दवाईमानीमों या भीगार। यागिर में गोहन योगा, "की पारन निगोविन्द परमान गममता। उनी राापी स्टी नावाई जारी गरिया पर ये पास अपना पाम पर मार मोति दे भी मुगी, उनमें परिवार में भी भगवान ने गय गुहिया।" दान परते-करते सारी ममय हो गया था । म्हारो गोनो गय यनि-अपने विग्तर पर मेटने मगे। जयगे:गरा मे रात्रीच मायापा, गा पो ट बटर या पग्ने पाया मदिन परता था। प्रबग यंग में न तो सहागर होने पे पोरनी गानोग। गय गोगा पर मान गगनकी भागों में नौतनहीं पी। उसी मार मुशागत दुई पी। जिगदिन कंदो गो परिवार रे मोगों में मुगामा होती थी, उग गेग यह गी नहीं गया था। उगली जैन-बीरन में पिरति उमरगी जाती पी। महीनों का सम्ममा माति भटरने पापा। और पर परिवार के बीच की अपनी स्मृतियां किस धमर मी पो।। मेवाती मम्बी अमार गर्ग और में बिनाने पोयाची पामरामपंग गमर उगमी आगोंगामने पानी विनीपोतदोपरापा।दोगमागे बीप पापामा जीना दूमर पर देता था। मार गूगी भी मोही हात पी। सारी त में गून मी कम उमर पाटी पा। उगी मार १६माप धी। गोरा पेशा छोटा पद, भीनी-भारी और गपीहर पान मे टपाने वाली गरलता पर गri पीr मगर भने जीवनेमि प्रसार पन्दूर को गोरे साप मानेही भाई भाभी पी हत्या कर दी होगी। गूगत करवटे यदा हा पा और पर रात्रीय गोभी नीनाई पी। गगीय ने उमे पहा, 'गृस्त. तुम्हें मायनोरनी माशी, माया?" मृग्न, मागूममोर्ग "नहीं कोई बात नहीं।" सूरत ने कम्बल की लपेट सम्भालते हुए कहा। "बात तो मुझे समझ आ रही है सूरत !" "वताओ तो सही।" "आज तुम्हारी मुलाकात जो हुई थी।" राजीव के यह शब्द सुनते ही मूरत की आंखें बरस पड़ीं, विस्तर पर विछाई चादर के एक कोने को पकड़कर उसने आंखें पोंछने की कोशिश की। "मूरत ! उठो, इधर आओ, आन तुमसे बातचीत करने की इच्छा हो रही है।" राजीव के यह कहने पर सूरत कम्बल लपेटकर उसके पास आ बैठा। राजीव वोला, "सूरत ! तुम्हें देखकर कोई यह सोच भी नहीं सकता कि १४- १५ वर्ष की आयु में तुमने दो हत्याएं की हों। आखिर तुमने ऐसा क्यों किया।" जेल का हर कैदी अपनी कहानी सुनाने का आतुर रहता है। सबकी अपनी-अपनी कहानियां होती हैं। अपने दिल की बात कहकर दिल हल्का करने की सबकी इच्छा होती है, पर जेल की कठोर. दिनचर्या में कठोर हृदय कैदियों में सहृदय श्रोता कभी-कभी ही मिल पाता है। जिन लोगों ने चोरी की हो या जेब काटी हो वे प्राय: अपनी सारी बात नहीं बताते। हत्या करने वाले अधिकतर लोग, पेशेवर हत्यारे नहीं होते, जीवन की किसी विशेष परि- स्थितियों में वे हत्या कर डालते हैं। जेल की दुनिया के तौर-तरीके में हत्या करने वाले को ऊंचा समझा जाता है, कैदियों में उसे अधिक सम्मान मिलता है। बाकी के अपराध करने वालों को नीची श्रेणी का समझा जाता है। मूरत बोला, "बाबू जी, मैं स्वयं यह सोचकर हैरान होता हूं कि मैंने इतना बड़ा कर काम कैसे कर दिया था ! मुझे तो पता ही नहीं था कि वन्दूक की गोली चलाने से इतना कुछ हो जाएगा। पता नहीं मेरे भाग्य में यह सब कुछ क्यों लिखा था !" कहते-कहते मूरत फिर अपनी आंखें पोंछने लगा। राजीव ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, "सूरत, जो कल चला गया है वह वापस नहीं आएगा। जो कुछ होना था वह तो हो चुका है, अब तो तुम केवल आगे को सुधार सकते हो। आज तो मुझे अपनी पूरी कहानी सुनाओ।" मूरत ने वोलना शुरू किया, "मैं, मेरे दो छोटे भाई, दो बहनें तथा मेरी विधवा मां अपने गांव में बड़े आराम से रहते थे। थोड़ी-सी धरती थी, . ।
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भाई दौड़ता हुआ आया और मेरी मां को घसीटते हुए मकान के सामने के खेत तक ले गया। गालियां देते हुए बुरी तरह से पीटने लगा। । उसके बाद मुझे क्या हुआ और मैंने क्या किया यह सब मुझे एक सपने की तरह याद है। मुझे लगता है मैं तव पूरी होश में नहीं था। मैं तुरन्त अन्दर गया और पिता की वन्दुक निकाली। मैं कभी-कभी बन्दूक चलाया करता था । वन्दुक उठाकर बाहर आया, निशाना वांधा और वन्दूक चला दी। उस समय तक मुझे यह विलकुल ध्यान नहीं था कि यदि वन्दूक चला दी और निशाना ठीक बैठ गया तो उसका परिणाम क्या होगा! निशाना ठीक वैठा और चचेरा भाई वहीं धरती पर ढेर हो गया। में स्वयं चौंक पड़ा और रोने लग गया। पास ही खड़ी मेरे भाई की पत्नी चौंककर इधर-उधर देखने लगी। उसे यह समझ नहीं आया कि यह बन्दूक की गोली कहां से आई और किसने चलाई है। पर ज्यों ही उसकी नज़र बरामदे की ओर पड़ी, मैं बन्दूक पकड़े खड़ा था। उसने एक पत्थर उठाया और ज़ोर से मुझे मारा। दूसरा पत्थर उठाकर मारने ही लगी थी कि मेरी उंगलियां फिर हिली। तवं तक मेरे सिर पर खून सवार हो गया था। एक गोली और चली और मेरी भाभी की लाश भी वहीं धरती पर पड़ गई। वन्दूक नीचे फेंक मैं मां के पास जाकर बैठ गया और रोने लग पड़ा। मेरे चचेरे भाई का वह शन्नु जिसने मुझे सिखाया था, तुरन्त पहुंच गया। यह गांव का प्रभावशाली व्यक्ति था। हमारा गांव ऊंचे पहाड़ पर छोटे-से कस्बे से ५० मील दूर था। गांव के प्रमुख लोग बैठे और यह तय किया कि जो हो गया है उस पर पर्दा डाला जाए। तब तक शाम हो गई थी। वहीं खेत के पास लकड़ियां इकट्ठी की गई और दोनों लाशों को ‘जला डाला गया। उस इलाके में बड़े-बड़े अपराव भी इसी तरह छुपा दिए जाते थे।" राजीव तन्मय होकर उसकी कहानी सुन रहा था। वह कभी सूरत की बात सुनता तो कभी उसके मासूम चेहरे को देखता। फिर वह कल्पना करने की कोशिश करता कि क्या इस सूरत ने अपने भाई और भाभी को मारा है ? उसे विश्वास न होता । उसने हैरानी से पूछा, "फिर तुम पकड़े कैसे गए ?" १२ / कैदी
मूरत ने दावोस पोज
हो गई। परन्तु मांद मारू करने का
* स्वयं हो पाने गाकर मोगर देना देन
नहीं किया और पुनिम को हार काले ।
फांसी का नाम सुनार विमोना का
लम्बी याना पर पीपा पनेरका
वही पकड लिया था, उनमें
मचे न बोलूं मैं नुकसानकारनामा
गवाहियों के बयान पर मुझे राई
वर्ष बाकी है। बाब उन दिनोंद कसारेर
मुझसे कैसे हो गया! पर
काम
में ही कर दिया। अब तो हिन्दी
"क्या तुम्हारी अपील नहीं हुई?" में
"अपील तो की है, मेरे नानारत नजर
छोडेगा! मैंने दो हत्याएं की हैं। नंग वाटरमा
होनी थी, उसने बड़ी कोगिग करके उनकार
सांस लेते हुए कहा।
राजीव ने उसे समझाया, और दिनाना दिदि
को है तो भी उमकी कन मर रे मोरा
कर दे। मूरत को रादीव के उना for..
राजीव लेट दो नना परमीट हैं।
जीवन की परिस्थितिमान कानन्य trer
भर देती है कि वह दोहार 21 mins
आवेश पंदा कर देनी, छोहार rex rry
नपराप मनुष्य नहींटा,चिनिrirni.
ने नन्न दिवस्टा ही मन्त्राrmi
है। सय की सीट सामान :
अधिकतर समय दिनxyri
आवेग में होते है। न्तुष्ट grammer ..."
है। आवेश के उन क्षणों में यदि एक क्षण ठहरकर सोच लया जाता, यदि भावनाओं के पागलपन में कुछ करने से पहले बुद्धि के द्वारा करने की सद्बुद्धि आ जाती तो ८० प्रतिशत अपराध न होते। आज जेलों में जिन्हें अपराधी या हत्यारे कहा जाता है, उनमें से ८० प्रतिशत लोग समाज के उतने ही भले नागरिक होंगे जितने अन्य हैं। राजीव सूरत से बड़ा स्नेह करने लगा था। यद्यपि सूरत अपने भाई व भाभी का हत्यारा था तो भी उसका रहन-सहन व जीवन सरलता, सावुता व ईमानदारी का प्रतीक था । वह बहुत प्रात: उठ जाता था, ठंडे पानी से नहाता, धूप जलाकर दीवार के साथ लगाए कैलेंडर में भगवान की मूर्ति के सामने खड़ा होकर कितनी ही देर पूजा करता। सभी के साथ बड़े आदर से बात करता था। सारी जेल में वह सरलता व सज्जनता के लिए प्रसिद्ध था। उसे जो भी काम दिया जाता, वह ईमानदारी से करता था। लालच उसे बिलकुल न था। राजीव ने उसे कहा था कि यदि वे दोनों छूट गए तो वह सूरत किसी नौकरी पर लगवा देगा। सूरत उसे यह कहता था कि राजीव ही उसे अपने घर में नौकर रख ले। प्रात: का समय था। वैरकों के दरवाजे अभी खुले ही थे। राजीव अपने विस्तर के पास रखी हुई रात की एक रोटी लेकर वैरक से बाहर आया । एक तरफ किनारे बैठ गया और रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े दरवाजे पर फेंकने लगा। तभी पास से एक गिलहरी आई और उन टुकड़ों को खाने लग पड़ी। वह वही गिलहरी थी, जिसे अमर रोज रोटी खिलाया करता था। अमर जाती बार यह काम राजीव को सौंप गया था। राजीव छोटे-छोटे रोटी के टुकड़ों पर झपटती हुई गिलहरी को देख रहा था और न जाने क्या सोच रहा था। "राजीव यह तुम बहुत अच्छा कर रहे हो। मुझे डर था कि अमर के बाद यह बेचारी गिलहरी कहीं भूखी न मर जाए।" सामने से शिवमंगल सिंह ने आकर कहा। "यह कैसे हो सकता है ! अमर जाती बार मुझे यह काम सौंप गया था।" "मेरी चिड़ियां तो अभी तक आई नहीं।" ६४/ कैदी "हां। तुम भी प्रतिदिन उन चिड़ियों से अपना दिल लगाते हो। माओ, यही बैठ जाओ।" राजीव के कहने पर शिवमंगल वही माफर बैठ गया। "मगल, तुम यहां किम गुशी में आए थे। मुना है, तुम इन यस्ती के सबमे पुराने मदस्य हो।" राजीव ने शिवमंगल के कन्धे पर हाय रखकर पूछा। 1 "राजीव, म्बुशी किसी बात की नहीं, अपना भाग्य ही यहां से वाया और अब यहा मे बाहर जाने का कोई साधन ही नहीं बनता।" एक ठंडी सास भरकर शिवमंगल ने कहा। "जेस आए कमें?" राजीव ने पूछा। "मैं वन विभाग में कर्मचारी था। मैं व मेरे कुछ साथी कुछ बड़े ठेकेदारों मे मिलकर अवैध रूप से सरकारी जगलो को कटवाते थे। उमसे हमे बहुत अधिक धन रिश्वत के रूप में मिलता था। ठेकेदारों में जो भी पैमा आता या, उमे हम मव कर्मचारी आपस में बाट लेते थे। एक बार साथियों में पैसा बाटने पर मतभेद हो गया। हम एक कमरे में शराब पी रहे थे और हिसाव- विताय कर रहे थे कि किसका हिस्सा कितना हो। इमी पर झगड़ा हो गया। भराव कुछ ज्यादा पी ली थी और उसके नशे ने उम झगडे में आग में घी का काम किया। मारपीट शुरू हो गई। मैं काफी शक्तिशाली पा, उन नशे में आकर मैंने एक मापी को मार डाला। हम बाकी मामी पकड़े गए. वह धन सरकार ने जब्त कर लिया, नौकरी चली गई और मुझे उमर कैद की सजा हुई।" अपने दोनों हायो में सिर रखकर शिवमगल उस गिलहरी को देख रहा था, अब उसकी आंखों में पानी भर आया था। "यह भी अजीव बस्ती है। जिससे बात करो उसकी अलग कहानी है, अजीब दास्तान है। शिवमंगल, तुम्हें देखकर मैं कभी सोच भी नहीं सकता कि तुम कभी रिश्वत लेते थे, गराय पीते थे और तुमने कोई हत्या की होगी ! अब तो तुमसे अच्छी तरह चला भी नहीं जाता।" राजीव ने शिवमगल की और देखते हुए कहा। "यह जिन्दगी का बदलता हुआ पड़ाव है, राजीव ! अब मैंने १४ साल पूरे कर लिए हैं। मरकार मुझे छोड सक्ती है, पर मेरे घर के और गाव के ।
लोग मेरे बारे में किसी प्रकार का आश्वासन नहीं देते। यदि वे आश्वासन न दें, तो मुझे मृत्यु तक यहीं रहना होगा।" "तुम्हारे घर वाले क्या तुम्हें नहीं चाहते ?" "हां। वे नहीं चाहते कि मैं घर आऊं।" "यह क्यों ?" "घर पर मेरे भाई हैं। उन्हें पता लग गया है कि मैं अब कोई काम नहीं कर सकता, मेरे नाम कोई वन सम्पत्ति भी नहीं है। पिछले दिनों एक भाई यहां आया था, उसने मुझे कहा कि मैं अब घर के किसी काम के योग्य नहीं हूं, मुफ्त की रोटी घर वाले मुझे नहीं खिला सकते। मेरे भाई ने मुझे कहा कि मैं जेल में ही रहूं और सरकार की रोटी खाता रहूं!" शिवमंगल की आंखों का पानी अब धरती पर टपक-टपककर गिर रहा था। "तो अव तो तुम्हें यहीं अपना दिल लगाना होगा।" "हां। यही तो मैं करता हूं। अन्य कैदियों से भी मेरा कोई विशेप वोलचाल, मिलना-जुलना नहीं है । न ही मैं कोई काम कर सकता हूं। मुझसे कोई काम के लिए कहता भी नहीं है।" "तो फिर सारा दिन क्या करते रहते हो ?" "मुझे इतनी बड़ी जेल में मेरा अपना कोई नहीं लगता, बस कुछ चिड़ियां हैं, जो प्रातः और सायं इस मेरी कोठरी के बाहर इकट्ठी हो जाती हैं, मैं उनके लिए कुछ दाने डाल देता हूं और वे उछलती-खेलती उन्हें खाती हैं। राजीव, वो हो गए, ये चिड़ियां निश्चित समय पर दाने खाने के लिए यहां आ जाती है। मैं कितनी ही देर तक इनके पास बैठा रहता हूं। इनसे बातें करता रहता हूं। मुझे लगता है कि वे भी मुझसे बातें करती रहती हैं । वे मुझसे डरती नहीं, मेरे बहुत पास आ जाती है। मैं कई बार उनसे अपने सुख- दुख की बातें कहकर अपना दिल हल्का कर लेता हूं।" "मंगल तुम्हें कितने साल हो गए, इन चिड़ियों को दाना खिलाते ?" "ठीक याद नहीं। लेकिन जेल में आने के लगभग दो वर्ष बाद ही इन पक्षियों से मेरी मित्रता हो गई थी, तो समझ लो १२ वर्ष हो गए। इस बीच में केवल एक बार में इतना बीमार हो गया था कि विस्तर से उठ नहीं सका। चिड़ियों को दाना तो किसी और से डलवा दिया था, लेकिन मैं स्वयं रोटी नहीं ६६ / कैदी यो । सा सका था। इनको दाना डालकर मुझे एक अजीब संतोए होता है। मुशे लगता है जैसे यह मेरा परिवार है । इनमे इतना अपनापन हो गया है कि अब मुझे यह जैल अपने घर की तरह ही लगने लग पड़ी है। केमा भी मौसम कयों न हो, कितनी भी या पो न पह रही हो, ठीक समय पर ये चिटियां फर-करं करती हुई आ जाती है। कई बार रिहा होने को दिल करता है। पर जब १२ साल की साथी इन चिड़ियों का स्याल आता है तो जेल में बाहर जाने को भी दिल नहीं करता।" राजीव और शिवमगल आपम में बात कर रहे थे, इतने में ही गामने मे कुछ वार्डर आए. साथ में हरगोविन्द भी था । वे सब चरक के अन्दर चले गए। रामलाल को पकड़ा और उमको पिटाई शुरू कर दी। कुछ देर तो रामलाल चुपचाप मार सहता रहा, परन्तु बाद में जोर-जोर से चिल्लाने लग पड़ा। रामलाल कुछ जिद्दी स्वभाव का था। प्रात. उम बैरक के नम्बरदार ने उसे झाइ लगाने को कहा। रामलाल ने कहा कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है। नम्बरदार उससे पहले ही नाराज पा। बाहर जो बार्डर पड़ा या वह भी रामलाल से चिढा हुआ था। इस बार रामलाल की मुलाकात के समय उसकी पत्नी उसके लिए कुछ सामान ले आई थी। रामलाल ने उममे गे उम बार को चौथी पत्ती नही दी थी। जेल में कैदियो में से ही कुछ को नम्बरदार बना दिया जाता है । नम्बरदार याकी कैदियो पर निपन्त्रण रसता है, और उनमे काम लेता है। उसका भी काफी रोष होता है। इनमें से कुछ नम्बरदार वार्डरों की तरह ही कैदियों का शोषण शुरू कर देते हैं । ये कैदियों से थोड़ी सावुन आदि के का में रिश्वत लेने लग पड़ते है । जब तक कोई कैदी रिश्वत देता रहता है, उनके काम की कोई चिन्ता नहीं होती, परन्तु जब वह नम्बरदार को अपना हिम्मा नहीं देता तो उसे तग करना शुरू कर दिया जाता है । रामलाल अक्सड और जिद्दी स्वभाव का तो था ही, परलु यहत स्वाभिमानी भी पार उभे मबसे अधिक मान अपनी पत्नी बाबा उगरी पत्नी प्रतिमास उसे मिलने आती थी । उमका घर एक गांव में था। पर ये साथ की जमीन की सीमा के बारे में पड़ोसियों से अगडा था। एक दिन । , झगड़ा हुआ, वात बढ़ गई, एक-दूसरे को मुक्के मारने शुरू किए। रामलाल से अचानक एक ऐसा मुक्का लगा कि पड़ौसी वेहोश हो गया और उसके सुनने की शक्ति जाती रही । उसी अपराध में रामलाल कैद काट रहा था। जव रामलाल की पत्नी पहली बार उससे मिलने आई तो उसने देखा कि रामलाल को मोटे-सफेद खद्दर के कपड़े पहनने पड़ते हैं, तो वह घर गई और अपने लिए भी उसी प्रकार के कपड़े सिलवा लिए। उसने अपने रंगदार कपड़े पहनने बन्द कर दिए थे। उसके बाद जब वह दूसरी बार जेल में मिलने आई थी तो सफेद खद्दर में उसे देखकर रामलाल चक्कर में पड़ गया। उसके पूछने पर उसने उत्तर दिया था, 'जब आप अच्छे कपड़े नहीं पहन सकते तो मैं भी नहीं पहनूंगी। जब तक आप जेल में हैं, मैं उसी प्रकार का जीवन व्यतीत करूंगी, जिस प्रकार कि आप यहां व्यतीत करते हैं । उसने जेल के खाने का भी पता कर लिया था। जो कुछ रामलाल को जेल में खाने को मिलता था, वही कुछ वह भी घर में खाती थी। उसने चार- पाई पर सोना बन्द कर दिया था, चाय पीनी छोड़ दी थी। रामलाल की तरह दो बार बड़ी-बड़ी सूखी रोटियां, दोपहर को चने और गुड़-बस यही अब उसका भोजन था । जब रामलाल ने एक मुलाकात के समय यह विश्वास दिला दिया कि अब जेल में एक बार चाय भी मिलनी शुरू हो गई है तो उसने भी घर में एक बार चाय पीनी शुरू कर दी थी। वह अपने घर की चारदीवारी में ही प्रायः बन्दी रहती थी। जब उसे उसके पड़ीसी बुलाते तो वह कहती कि जब तक उसका पति जेल में वन्दी है तब तक वह अपने घर की दीवारों में ही वन्द रहेगी। जव अपने पति को मिलने जेल जाना होता तभी वह घर के आंगन को पार करती थी। दूर-दूर तक उसकी इस तपस्या की चर्चा हो गई थी। रामलाल ने अपनी सजा के विरुद्ध अपील की थी। उसके विरोधी नेर्भ उसकी सजा बढ़ाने की अपील की थी। एक बार जब जेल के बड़े गेट की लो के सीवचों के आर-पार रामलाल अपनी पत्नी से मुलाकात कर रहा था। उसकी पत्नी ने उसे धैर्य देते हुए कहा था कि अब तो उसकी कैद केवल ए साल बाकी रह गई है। उस पर रामलाल ने कहा कि उसकी सज़ा बढ़ : सकती है। तब उसकी पत्नी साहस से बोल उठी, 'आप इसकी चिन्ता ६८/ कैदी
करते है ! मैंगो कमामा मामी आTTER
में है, पर मैं घर में आग हा Hिerity ift
अलग नहीं कर सकस । यदि गर, म मा uT
हो प्राप्त करूंगी।' शम्मों में भी भाजी
तर उठा पास
राजीय उटगर मानी और लाम
पा। मार सो उराने गई धारमानी, मारatntntity
गहरी पोट भाग भी। मी tet hurt hit fire they
पानी नहीं जिरानी किमयागा infrashifality
और पदी में यह बात निकली 43 114 1 4{{ttt milk tits
होता सोलान भी patthat tim Hititin | "
पौर मई-गौर, टायरम4g ART 1 1 11
कारण है कि यदी म titant fanninaimarin
में आया कि गोगा fimiliththi anmrit
फिया गिए 11 MItainment
सीmart, ETARE THEIR 11 MITHILI
जापर गली उगी Antarman
a faithiasim MIL11m
अकर गरीniliyin 4441414141
बेहोशी Aranti 2014
युनाया गया familitantrtainmATHA
यही गया औr.mmitteHI HAMAnmol
घरकारमान धारा MALHinut
होगा ! 11141411 Hymn 11
गई पागममा ALTRAMMAMI 11.
पुरा 17.11 MMMMAR
रापमान ALIHEMAMAN
ममा eh REE Htteroin
गोगागरा
झगड़ा हुआ, वात बढ़ गई, एक-दूसरे को मुक्के मारने शुरू किए। रामलाल से अचानक एक ऐसा मुक्का लगा कि पड़ोसी बेहोश हो गया और उसके सुनने की शक्ति जाती रही। उसी अपराध में रामलाल कैद काट रहा था। जव रामलाल की पत्नी पहली वार उससे मिलने आई तो उसने देखा कि रामलाल को मोटे-सफेद खद्दर के कपड़े पहनने पड़ते हैं, तो वह घर गई और अपने लिए भी उसी प्रकार के कपड़े सिलवा लिए । उसने अपने रंगदार कपड़े पहनने बन्द कर दिए थे। उसके बाद जब वह दूसरी बार जेल में मिलने आई थी तो सफेद खद्दर में उसे देखकर रामलाल चक्कर में पड़ गया। उसके पूछने पर उसने उत्तर दिया था, 'जव आप अच्छे कपड़े नहीं पहन सकते तो मैं भी नहीं पहनूंगी । जब तक आप जेल में हैं, मैं उसी प्रकार का जीवन व्यतीत करूंगी, जिस प्रकार कि आप यहां व्यतीत करते हैं । उसने जेल के खाने का भी पता कर लिया था। जो कुछ रामलाल को जेल में खाने को मिलता था, वही कुछ वह भी घर में खाती थी। उसने चार- पाई पर सोना बन्द कर दिया था, चाय पीनी छोड़ दी थी। रामलाल की तरह दो बार बड़ी-बड़ी सूखी रोटियां, दोपहर को चने और गुड़-बस यही अब उसका भोजन था । जब रामलाल ने एक मुलाकात के समय यह विश्वास दिला दिया कि अव जेल में एक बार चाय भी मिलनी शुरू हो गई है तो उसने भी घर में एक बार चाय पीनी शुरू कर दी थी। वह अपने घर की चारदीवारी में ही प्रायः बन्दी रहती थी। जब उसे उसके पड़ोसी बुलाते तो वह कहती कि जब तक उसका पति जेल में वन्दी है तब तक वह अपने घर की दीवारों में ही बन्द रहेगी। जव अपने पति को मिलने जेल जाना होता तभी वह घर के आंगन को पार करती थी। दूर-दूर तक उसकी इस तपस्या की चर्चा हो गई थी। रामलाल ने अपनी सजा के विरुद्ध अपील की थी। उसके विरोधी ने भी उसकी सजा बढ़ाने की अपील की थी। एक बार जब जेल के बड़े गेट की लोहे के सीजनों के आर-पार रामलाल अपनी पत्नी से मुलाकात कर रहा था तो उसकी पत्नी ने उसे वैयं देते हुए कहा था कि अब तो उसकी कैद केवल एक साल बाकी रह गई है। उस पर रामलाल ने कहा कि उसकी सज़ा बढ़ भी सकती है। तब उसकी पत्नी साहस से वोल उठी, 'आप इसकी चिन्ता क्यों ६८ / कंदी ।
करते हैं ! मैं तो कयामत तक भी आपका इन्तज़ार करूंगी । आप भने ही जेल में हैं, पर में घर में आपके ही साय प्रतिक्षण रहती हूँ। ये दीवारें मुझे आपसे असग नहीं कर सकती। यदि मर भी गई, तो अगले जन्म में फिर आपको ही प्राप्त कहंगी।' इन शब्दों के साथ उसकी आंखों में विश्वास का पानी तर उठा था। राजीव उठकर बैरक की ओर गया। रामलाल एक तरफ येहोश पड़ा पा। मार तो उमने कई वार ग्वाई थी, पर इस बार एक इंडे में उसके सिर पर गहरी चोट आ गई थी। उमकी बेहोशी में जेल में कुछ घबराहट-मी हुई, पर इतनी नहीं जितनी कि एक माधारण मादमी के लिए होती है। क्योकि आदमी और कंदी में बहुत अन्तर है । यदि कंदी को भी समाज में मादमी समझा गया होता तो जेलखाने अपराधी पंदा करने वाले कारखाने न बनते, जेल में में चोर बड़े-चौर, ठग बड़े-टग, हत्यारे वडे हत्यारे वनकर न निकलते हैं । यही कारण है कि कंदी वहां यह नहीं सोचता कि अपराध करने के कारण वह जेल में याया है, बल्कि यह सोचता है कि उसने ठीक सावधानी से अपराध नहीं किया, इसलिए उसे जेल आना पड़ा। कंदी जेल में अपराध के नये-नये तरीके सीवता है, नई योजनाएं बनाता है, नई मिन्न-मंडली बनाता है और बाहर जाकर कंदी उमी अपराध की अन्धेरी दुनिया में वापस चला जाता है। रामलाल कितनी ही देर वहांगी मे पड़ा रहा। मीं से उमा परीर सरड़ गया । राजीव व अन्य माथियों ने उन पर कम्बन डाल सहलाकर उसकी देहोंगी दूर करने की कोशिश की। जेल में डाक्टर तो या नहीं, कम्पाउंडर को दुलाया गया। कितनी ही देर तक कम्पाउंडर वाला नहीं । जव राजीव दौड़कर दहा गया और उमने गुम्से से कम्पाउंडर को चनने लिए कहा तो कमाऊडर चरक के अन्दर माते ही बोल पड़ा कि रामनार दहानेदार है, वैसे ही पड़ा होगा। परनु जब उसने देखा तो वह चौंक उठा। बापान में गई तया रामलाल को उठाकर बड़े हस्पताल ले जाया गया। उमरा इनार गुरु हुआ। एक सप्ताह के वाद उभे होग तो बापा पर वह किमीको टीक वह पहचानना न था। कुछ दिन के बाद वह मनिफका संतुलन माने नगा। डाक्टरों ने उसे पागल करार दे दिया। जन अधिकारियों ने रामलाल मोपलवाने भेज दिया। सूचना उसकी पत्नी अव भी उसे मिलने पागलखाने जाती थी। पर रामलाल अब पहले की तरह उसका मुस्कराकर स्वागत नहीं करता। ठीक ढंग से उससे वात भी नहीं करता। इतना अवश्य था कि पत्नी को देखते ही वह चुप हो जाता था। उसकी पत्नी उसके सामने आंसू बहाती रहती। रामलाल अब उन मांसूओं की भापा भी समझ नहीं पाता था। उसकी पत्नी सोचती कि अब उसका पति रिहा भी हो गया तो वह क्या करेगी ! राजीव इस घटना से बहुत उद्विग्न हुआ। उसे एक बड़ा आघात लगा, परन्तु उसे जेल के कैदियों ने बताया कि जेल के लिए यह कोई नई बात नहीं है। कुछ वर्ष पहले इसी प्रकार एक कैदी की हड्डी टूट गई थी। इसी प्रकार की मार से एक और कैदी जीवन-भर के लिए वेकार हो गया था। इस प्रकार की बातें सुनकर राजीव और भी परेशान रहने लगा। उसने कैदियों को समझाने की कोशिश की कि उन्हें इकट्ठे होकर इस पाशविक अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए। परन्तु कैदी घबराते थे, वे जानते थे कि जो ज़रा-सी भी आवाज़ उठाएगा, उसकी हालत रामलाल की तरह कर दी जाएगी। राजीव ने देखा कि इस अन्याय का प्रतिकार जेल के भीतर सम्भव नहीं। एक कैदी तिरलोचन रिहा हो रहा था। उससे राजीव की अच्छी दोस्ती थी। राजीव ने उसे कहा कि वह रामलाल के घर जाकर उसके पागल होने की घटना की सच्चाई बताए। तिरलोचन ने कहा कि वह एक पत्र में सब कुछ लिख दे। राजीव ने रामलाल की पत्नी के नाम सारी घटना एक कागज़ पर लिख दी। जेल के अन्दर से कागज़ का एक टुकड़ा भी बाहर नहीं जा सकता। राजीव ने यह पत्र तिरलोचन को देते हुए कहा कि जब गेट पर उसकी तलाशी होगी, तो वह इसे कैसे छिपाएगा। इस पर तिरलोचन हंस पड़ा, बोला, "वाह राजीव, यह साले मेरी क्या तलाशी लेंगे। जब जेल आता हूं तो गेट पर मेरी तलाशी होती है, परन्तु में सैकड़ों रुपये और अफीम जेल के अन्दर ले आता हूं।" "पर तिरलोचन, गेट पर तो बड़ी सस्ती से तलाशी होती है। तुम यह सब लेकर कैसे आ जाते हो?" राजीव ने हैरान होकर पूछा। इस पर तिरलोचन ने अपना मुंह खोल दिया और दायें हाथ की बड़ी उंगली अन्दर । १०० / कैदी । डालो और एक डब्बी मुंह ने निराली। राजीव मानों रिती जादूगर का रोग देख रहा था। विरलोचन ने इन्दी चोली तो उसमें सौ-सौ के नोट तपा कफीम की एक गोलो यो।राजीव को दोहुई चिट्ठी उत्तने मरोड़ारसी की और उनी डच्ची में डालो और इच्ची को फिर उसी प्रकार अपने मुंह के अन्दर डाल दिया। राजीव यह मव देवकर चक्ति रह गया। पूछने लगा, "तिरलोचन यह सन्यो तुम्हारे गले में कैसे रहती है ?" "राजीव, यह देखो मेरे गले के नीचे यह एक गडा-सा है। मुझे मेरे उस्ताद ने यह अभ्यास कराया था। लोहे का एक टुकड़ा में निरन्तर पहा रखता रहा। वह भारी धातु लगातार रसने के कारण यहां एक साती जगह बन गई । इसी जगह में यह छोटी डबी रसता हूं।" तिरलोचन रिहा हो गया। उसने वह पन रामलाल की पत्नी को दे दिया। साथ ही उसने सारी घटना भी उसको सुना दी। रामलाल की परनी यह गुन. कर सुन्न हो गई। उसे तो यह बताया गया था कि यह जेल मे धीमार हो गया और फिर अपने आप पागल हो गया। सारी कहानी गुनकर फिरानी ही देर वह तड़पती और रोती रही। जव उसके सम्बधियो को पता लगा सो उन्होने सारी घटना की शिकायत जिलाधीश को लिरा भेजी। यह समाचार प्रदेश के सभी समाचार पत्रों में छप गया। विधान सभा में भी कुछ सदस्यों ने यह प्रश्न उठाया। चारो तरफ इराकी पूब पर्चा हुई। सरकार ने इसकी जाच के लिए एक समिति नियुक्त कर दी। अव जेल अधिकारियों में चिन्ता व्याप्त हो गई। फैदियों को पसगापा जाने लगा। यह प्रयत्न होने लगे कि कोई भी उस पटना के गम्बन्ध में गवाही न है। उस घटना के समय जो कैदी उपस्थित थे, उन्हें बार-बार बुलाया जाने लगा। विशेष सुविधाएं देने के आश्वासन दिए गए। डाक्टर को महफर पुछ फैदियों को दूध लगवा दिया गया। भोजन का स्तर भी अच्छा पर दिया गया। कैदियों को हर तरीके से पुश करने की कोशिशें होने लगी। अब कोई भी वार्डर किसी कैदी को कुछ नही कहता था। मारना-पीटना तो दूर रहा अब उन्हें शिड़कना भी बन्द हो गया। मभी कदी यह अनुभव करने लगे कि जेल सचमुच ही मुधार-गृह बन गया है। वंदी| १०१ राजीव ने सव कैदियों को समझा दिया था। सबने जेल अधीक्षक के कमरे में आश्वासन दे दिया कि वे वही गवाही देंगे जैसे अधिकारी कहेंगे। उससे जेल अधिकारी काफी आश्वस्त हो गए थे। तभी एक दिन जेल अधीक्षक श्री भाटिया ने राजीव को बुलाया और कहा, "राजीव उस दिन की रामलाल की घटना की जांच होने वाली है।, जो होना था वह तो हो चुका है, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम भी जेल अधिकारियों का साथ दो। कोई भी कैदी रामलाल की पत्नी के पक्ष में गवाही नहीं देगा। जब तक गवाही नहीं होगी, आरोप सिद्ध नहीं हो सकता। क्या मैं आशा करूं कि तुम भी हमारा साथ दोगे?" राजीव सुनकर भड़क पड़ा, "भाटिया जी! क्या जेल में वन्द एक इन्सान इतना सस्ता होता है कि टंडे मार-मारकर उसकी खोपड़ी फाड़ डाली जाए, यह पागल बना दिया जाए और फिर उसकी बदकिस्मत पत्नी जव शिकायत करे और सरकार जांच विठाए तो इस प्रकार झूठ से लीपा-पोती करके उस घटना को ही झूठा साबित कर दिया जाए ! वाह ! क्या खूब तमाशा है ! क्या यही आपकी इस आदर्श जेल का आदर्श है ? भाटिया जी, क्या आपको पता है कि यह शिकायत विलकुल सच्ची है ! यह घटना हम सबकी आंखों के सामने घटी है !" "देखो राजीच, तुम ठीक कह रहे हो। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि भविष्य में अव ऐसा कभी नहीं होगा।" भाटिया ने गिड़गिड़ाते हुए कहा । "मैं खूब जानता हूं इन आश्वासनों का मूल्य । मैं जव से यहां आया हूं, आप कई बार इस प्रकार कह चुके हैं, परन्तु जेल के अन्दर वही पुराने तौर- तरीके चलते रहते हैं।" राजीव ने श्रोध से कहा। "देखो राजीव, यदि जांच समिति के सामने सारी घटना आ गई तो कितने ही लोगों की रोजी समाप्त हो सकती है। हो सकता है कुछ को नौकरी से हाथ घोना पड़े। मैं तुमसे प्रार्थना करता हूं कि तुम भी हमारा साथ दो।" "नहीं, नहीं भाटिया जी! किसी नवयुवती का प्रिय नौजवान पति, छोटे- छोटे बच्चों का वात्सल्पदाता पिता, एक बूढ़ी मां के जीवन का सहारा प्यारा पुत्र, मार-मारकर पागल बना दिया गया। क्या ऐसा अपराध करने वाले के अपराध को छिपाकर आप उन्हें पुरस्कार देना चाहते हैं ? यह सब आप १०२ / कैदी करते रहे हैं और अब भी कर मरते हैं। पर मुझमे यह नहीं हो सकता। मैंने जीवन की किन्ही परिस्थितियों में एक बार एक अपराध किया था, उसका फल यहां भोग रहा हूं। अब झूठ बोलकर एक और अपराध हरगिज नहीं करूंगा । आप मुझे भी डडे लगवाकर पागल बना मकते हैं और पागलखाने भी भेज सकते हैं, पर याद रखें मैं मच बोलूंगा और सच के सिवा कुछ नहीं योलूंगा।" भाटिया को राजीव मे ऐमी ही आशा थी। परन्तु उसे विशेष चिन्ता भी नहीं थी। क्योंकि कोई भी कैदी राजीव की बात का समर्थन करने वाला नहीं था। यब भाटिया यह तो मानने लग पड़ा था कि कैदियों को मारना-पीटना ठीक नहीं है। वह यह भी समझता था कि इस प्रकार के दुव्यवहार से कोई भी अपराधी मुघर नहीं सकता। उसके विपरीत अपराधी और अधिक अपराधी बनता है। परन्तु जेल का पुराना चला आ रहा ढाचा बदलने की न उममें शक्ति थी और न चि थी। जेल के अन्य अधिकारी व कर्मचारी उन्ही पुराने तरीकों पर विश्वाम करते थे, उन्हीके अभ्यस्त थे और उन्हीं के अनुमार काम करते थे। भाटिया का इस मामले मे मीधा सम्बन्ध तो नहीं पा, मार-पीट तो अन्य लोगो ने की थी, परन्तु मयमे बडी कठिनाई यह पी किजेल रिपोर्ट में यह लिया गया था कि पर फिमल जाने से रामलाल के गिर पर चोट आ गई और उमौके कारण उमके दिमाग में गराबी आ गई। मरकार को भेजी गई एक रिपोर्ट में जेल की ओर से यह बात लिमी जा चुकी थी। राजीव ने कुछ ही दिन बाद सभी बैरकों के कुछ प्रमुप कैदियों को किसी बहाने एक जगह इकट्ठा किया और उन्हें ममझाने लगा, "कैदी भाईयो, जांच गमिति बहुत जल्दी जेल में आने वाली है। जब तुम्हारा बयान लिया जाने लगे, तो मवमे पहले यह कहे कि हम अपने बयान बिलकुल एकात में केवल जांच ममिति के मामने देंगे। उनमे यह भी कहें कि हमें इस बात को गारंटी होने चाहिए कि मच कहने के कारण याद में हम पर कोई अत्याचार न हो । याद रगो, यह मुनहरी मौका है, यदि मच बोलकर अपगधी अघि. कारियों को दंड दिला दिया गया तो भविष्य में जेल में होने वाले इन सी.
अत्याचारों से छुटकारा मिल सकता है। पर एक बात याद रखना, जब तक वह नमिति नहीं आती किसीको यह पता न चले कि आप सच-सच कहने वाले हैं।" "राजीव भाई, ऐसी गलती हम कैसे करेंगे ! आजकल तो जेल में ससुराल की तरह हमारी ग्वातिर हो रही है।" "क्या एक बात नहीं हो सकती ?" "क्या बात ?" राजीव ने एक कंदी के प्रश्न पर उत्सुकता प्रकट की। उस कंदी ने फिर पूछा, "यदि यह समिति कुछ महीने के बाद आए। तो बहुत अच्छा है। आजकल कितनी अच्छी ग्वातिर हो रही है। भोजन भी अच्छा मिल रहा है। न कोई गाली देता है, न मार पड़ती है। मूलियों और शलजम के पत्तों की बजाए अब तो सब्जी में शलजम और मूली मिलनी गुरून हो गई है। कल तो भाटिया जी ने अपनी तरफ से सबको हलवा भी खिलाय था। यह मौज-मेला जांच समिति के आने तक ही है।" उसकी बात सुनक सभी मुस्करा पड़े। जांच समिति निश्चित दिन नगर में आ गई। सरकारी रेस्ट हाऊस उनकी सूब यातिर की गई। जेल अधिकारी उन्हें मिले और अपना समझाने की कोशिश की। समिति के दो सदस्य जेल अधिकारियों की बात सहमत हो गए, पर समिति का प्रधान वस्तुस्थिति स्वयं जानने के बाद कोई धारणा बनाना चाहता था। दूसरे दिन जांच गुरू हुई। श्री भाटिर पगरे में ही रामलाल की बैरक के कुछ कैदी बुलाए गए। अपने सामने अधिकारियों को देखकर कैदियों का सारा हौसला ठंडा पड़ गया। भाटिया और हरगोविन्द बैठे थे। उन्हें देखकर उनके पसीने से निकल पड़े। जब उन्हें पूछा गया तो उन्होंने यह कहा कि रामलाल को किर नहीं मारा, यह पैर फिसलने की चोट से ही पागल हुआ है। ए घबराहट में यह भी कह गया कि रामलाल बिलकुल ठीक है । न सिर पर कोई चोट लगी और न ही उनका दिमाग खराव है। यह सुनते ही समिति के अध्यक्ष चौंक पड़े। पूछा, "पया मचमुच ठीक है ? यदि ऐसा है तो सारे प्रदेश में गोर किसलिए मचाया यह प्रश्न मुनते ही सारे कमरे में मौन छा गया। राव एक Hom. १०४ | दी ओर देखने लगे। अध्यक्ष के दो-तीन बार पूछने के बाद भी किसीने को उत्तर नहीं दिया। अध्यक्ष सारी बात भांप गया। उसने आदेश दिया कि समिति अला कमरे में एक-एक कैदी को बुलाकर वयान लेगी। यह सुनते ही जेल अघि कारियों के चेहरों पर परेशानी की छाया पड़ गई। अलग कमरे में जांच शुरू हुई। जय एक-एक कैदी को बुलाकर पूछा गय तो सबने सच्ची घटना कह सुनाई । समिति के सदस्यों की आय खुल गई। सोहन ने अपनी गवाही में कहा, "रामलाल को डंडे से मारा गया, वह बेहोश हो गया, उसके मिर से खून निकलने लगा था। एक घटे से में अधिक देर तक वह बेहोशी की हालत में एक लावारिस की तरह पड़ा रहा उमका इलाज भी बहुत देर के बाद हो सका। उसके बाद जब वह होश में याया तो वह पागल हो चुका था। उसके पागलपन की सारी जिम्मेदारी जेल अधिकारियो पर है साहब ! रामलाल तो केवल पागल हुआ है, आज से दे वर्ष पहले रामसिंह नाम का एक कंदी इनके दुव्र्यवहार के कारण जीवन से ही हाथ धो बैठा था।" मोहन अपनी बात कहकर वापस जाने लगा, तभी समिति के अध्यक्ष ने उसे राममिह की बात विस्तार से बताने को कहा। मोहन कहने लगा, “साहब, राममिह गरीव घर का था। उससे मुलाकात करने कभी कोई नहीं आता था। वार्डरो को रिश्वत देने के लिए उसके पार कुछ भी नहीं था। इसलिए उसके माथ बहुत अधिक दुव्र्यवहार किया जाता था। एक बार वह बीमार हुमा तो कितने ही दिन उसे न किसी डाक्टर ने देगा और न ही दवाई दी। यह कहा गया कि वह वहाने करता है। उसे काम से छुट्टी भी नहीं दी गई। बीमारी का हालत में भी उसे खेतों में कठोर काम करने पर विवश किया गया। लगभग तीन सप्ताह इमी तरह बीत गए, उरो हल्का बुसार रहता था। वह रात भर कराहता रहता। धीरे-धीरे उसका दारीर टूट गया। एक दिन जब जेल के खेतो में उमसे काम करवाया जा रहा था तो वह बेहोश होकर गिर गया। तब कम्पाउंडर को बुलाकर उसे दवाई दी गई। फिर कुछ दिन वह अपनी बैरक में ही पड़ा रहा। एक सप्ताह बाद डाक्टर ने उसे देखा, परन्तु दूसरे ही दिन वह मर गया।"
- जांच समिति के सदस्यों के रोंगटे खड़े हो गए। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जेल की दीवारों के अन्दर किस प्रकार की अलग दुनिया बसती है। समिति एक दिन के लिए आई थी, परन्तु तीन दिन तक गवाहियां लेती रही। जेल अधिकारी राजीव की गवाही नहीं दिलाना चाहते थे, परन्तु, बहुत से कैदियों के बयानों में बार-बार राजीव का नाम आया, इसलिए समिति के अध्यक्ष ने स्वयं ही राजीव को बुलाया। रामलाल की घटना के सम्बन्ध में गवाही देने के बाद राजीव बोला, "इस जेल के बड़े गेट के बाहर आदर्श जेल का जो बोर्ड लगा है, यदि उसे आप ले जाकर सरकार को दे दें, तो आपको बहुत कृपा होगी। यदि सरकार और कुछ नहीं कर सकती तो कम से कम आदर्श शब्द का अपमान तो नहीं होना चाहिए। मैं जब बाहर था तो बड़े-बड़े नेताओं के भापणों में कई बार यह सुना करता था कि अब जेलों को मुधार-गृह में बदल दिया गया है । और यह जेल इस प्रदेश की सबसे बड़ी और सबसे बढ़िया जेल कही जाती थी। इस जेल के बाहर एक बड़े बोर्ड पर बड़े-बड़े शब्दों में लिखा है 'आदर्श केन्द्रीय कारागार' । परन्तु आदर्श शब्द केवल उस बोर्ड पर ही है, जेल के अन्दर घृणा, पाप, क्रूरता और पशुता की एक ऐसी घिनौनी दुनिया बसती है, जिसमें समाज पर अधिक अत्याचार करनेवाले अपराधी बनाए जाते हैं। सुधार इसी वात में होता है कि यहां से हर अपराधी पहले से बड़ा अपराधी बनकर निकलता है। "जेल के हर छोटे-बड़े विभाग में हर चीज़ की खरीददारी में यहां तक कि कैदियों के खाने-पीने की चीजों में भी रिश्वत का बोलवाला है। गरीब कैदियों से बीड़ियां व सावुन की टिकियों तक की रिश्वत ली जाती है। जो नहीं देते उन्हें किसी न किसी बहाने से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया जाता है। "किसीकी नैतिक शिक्षा तो मिलती ही नहीं। यह इतनी बड़ी जेल है, संकड़ों कैदी हैं। हममें से कितने ही पढ़े-लिखे हैं, परन्तु पढ़ने के लिए कोई पुस्तक नहीं है। हम कैदियों के सामने न तो किसी जेल अधिकारी का आदर्श जीवन है, न नैतिकता का कोई उपदेश है और न कोई पुस्तक है । क्या इस प्रकार भी कभी अपराधियों का मुधार किया जा सकता है ?" । . १०६ / कैदी "परन्नु राजीव, जेल तो आविर रेल है। यदि यहां सब प्रकार को- मुविधाएं दे दी गई तो दंड देने की भावना ही ममाप्त जाएगी। फिर तो: लोग जानवृक्षार अपराध करेंगे और जेल में लाकर आनन्द का जीवन व्यतीत करेंगे।" एक सदस्य ने कहा। राजीव बोला, "नहीं महोदय, ऐमा नहीं है । बार इस जेल के अन्दर के कमरों को मत देखिए, यहां की मुविधा और भोजन की वान नो मत मोपिए। उन क्या होती है, यह आप अनुभव ही नहीं कर मरने! मुविधाएं तो एक तरफ, याप यदि वेतन देकर मांगों को जेल में रमना चाहेंगे तो भी कोई नहीं वाएगा। मनुप्य स्वनात्र में एक स्वतन्त्र प्राणी है। जीवन की कुष्ट चीजों के लिए मनुष्य वेईमानी कर सकता है, परन्तु अपनी बाडादी वैचकर जेल में बन्दी होने के लिए कोई नमार नहीं होगा।" राजीव को वातों में रचि लेते हुए बध्यक्ष ने कहा, "राजीव, जो चोरी करना है, किमौकी हत्या करता है, ऐसे लोगों के माय अच्छा व्यवहार किया भी क्यों जाए ? और यदि जेलों में चोरों बोर टाकुओं को मुविधाएं दे दी गई तो समाज में अपराध की संख्या वह नहीं जाएगी?" "नहीं, ऐसा नहीं होगा, क्योंकि मूल स्वभाव में कोईवपरापी नहीं होता। मनुष्य उस परम पिता प्रन का एक म्प है, जो प्रन परम पवित्र और मच्चिन.. आनन्द है । बाज तक किसी भी मा ने अपनी कोग से बोर व हार को जन्म नहीं दिया। जिम प्रकार गरीर अम्बन्य हो जाता है उमी प्रसार मन भी बस्वस्य होता है। गरीर के बम्वन्य हन्यतान में रखे जाने हैं और मन के अस्वस्य जेल में रणे जाते हैं। परन्तु हम्पताल में मिलती है दवाई, कोमल हृदय नर्मो कामदुल व्यवहार, डाक्टरों का उपचार और इन जेनों में मिलती है पंजाची में दिल तोड़ नम्बी गालियां, हडिया तोड़ डालने वाली मार, पता, भ्रष्टाचार में भरा वातावरण और पशुत्रो जमा दुव्यवहार । "कोई भी अपराधी जानवर अपराध नहीं करता। बहुत कम ऐसे अपराधी होने हैं, जिन्होंने अपगप की नीपन में बागप किया हो। कोन जानना है जीवन की पिन टेडी-मही, पेचीदा परिस्थितियों की विकट गहोंने एक भले आदमी को सपराध करने पर विवा दिया। महोदय, में एक मच्ची बान रह रहा है, यदि उन्हीं प्रगर की परिस्थितियों में कमी यार भी कम टी.
. गए होते तो नम्भव है आप भी इसी जेल के कैदी होते। यदि भाग्य हमें उन परिस्थितियों में न ले जाता तो हम भी आपकी तरह एक भले नागरिक होते । अपराध की अधिक जिम्मेदारी उस समाज पर है, जो उन परिस्थितियों को पंदा करता है, जिनमें मजबूर भला इन्सान, अपराध की डगर पर अपने . कदम बढ़ाने पर विवश हो जाता है। "एक गवाल और भी है। क्या जेल में बन्दी हम लोग ही अपराधी हैं ? इन दीवारों और नींबचों के बाहर क्या सभी लोग दूध से घुले हैं ? यह आताग-चुम्बी महल, यह आलीशान स्वर्ग के ऐश्वर्य को भी ले जाने वाली हवेलियां, रात के गहरे अन्धेरे में मदमाती व्हिस्की की चुस्कियां, नैतिकता को लजाने वाली रंगीनियां.. क्या यह सब कुछ ईमानदारी के पैसों से प्राप्त होता है ? ओ नेता आज बड़े-बड़े मंचों पर बड़े-बड़े भाषण देते हैं, क्या वह सब ईमानदार है ? क्या यह सच नहीं कि काल तक के काग्यपति एकदम से लखपति हो गए ? आज इस समाज में कौन बड़ा नेता, अधिकारी व धनवान है, जो किनी न किसी रूप में चोरी नहीं करता! "महोदय फळ यही है कि जेल की इन दीवारों के अन्दर वे अपराधी हैं, जो गरीब हैं, पकड़े गए, अपराधी कहलाए और कैदी बनकर जिन्दगी का बोझ हो रहे हैं और इन दीवारों के बाहर वे बड़े लोग हैं, जो हमसे भी भयंकर अपराध करने पर भी नेता कहलाए जाते हैं, बड़े लोग कहे जाते हैं और समाज में आदर प्राप्त करते हैं। मैं आपसे इतना ही कहूंगा कि यदि आप समाज को बदलना चाहते है तो इन जेलों को बदल डालिए। जब तक ये जेलें अपराधी पैदा करती रहेंगी तब तक समाज में शान्ति नहीं आ सकती।" राजीव दिल की गहराइयों से बोल रहा था। उसकी बातों में एक टीस थी, 'एक मनाई थी। समिति के सभी सदस्य बड़े व्यान से उसे सुनते रहे। अपनी गुन अयने हुए अध्यक्ष ने कहा, "राजीव, हम तुम्हारा और तुम्हारे साथियों या पन्यवाद करना चाहते है, जिन्होंने हमें वस्तु-स्थिति को समझने में मदद की है। जेलमा कंदी भी एक अच्छा इन्सान हो सकता है, एक सच्ची और अरटी बात कह सकता है"यह मुझे भी आज ही पता चला। तुम्हारी बातों ने गामुग हमारी आंखोल दी हैं। तुमने जैसे शुरू में कहा था, हम उसके अनुमार जेल के गेट के बाहर लगे 'आदर्श जेल' के नामपट को अपने साथ । १०८/कंदी नहीं ले जाएंगे, परन्तु यह विश्वाम दिलाते है कि तुम्हारा और अन्य सभी कंदियों का यह मंदेश हम सरकार तक अवश्य पहुंचाएंगे। रामलाल की पत्नी को न्याय दिलाने का प्रयत्न करेंगे। मैं व्यक्तिगत रूप से यह विश्वाम दिलाता हूं कि जेल में सुधार लाने के लिए सरकार को सलाह ही नहीं दूंगा, अपितु निरंतर मंघर्ष भी करूंगा।" कुछ दिनों बाद ममिति ने सरकार को अपनी रिपोर्ट दे दी। प्रदेश की विधानसभा में विरोधी दल ने यह मांग की कि रिपोर्ट सभा के पटल पर रखी जाए। सरकार ने दम मांग को रद्द कर दिया। मरकार की ओर से कहा गया कि इसका प्रकाशन जनहित में नहीं होगा.। इस पर विधानसभा में भावनाएं उत्तेजित हो उठी। विरोधी दल ने विधानसभा में ही इस प्रश्न पर धरना देने की चेतावनी दे दी। कुछ दिनों के बाद सरकार को झुकना पड़ा और रिपोर्ट सदन के पटल पर रपी गई और फिर सभी समाचार पत्रों में रोंगटे खड़े कर देने वाली जेल को कहानियां छपी। सरकार को तुरन्त कार्यवाही करनी पड़ी। कुछ अघि- कारियों को निलम्बित किया गया, कुछ को उस जेल से बदल दिया गया। रामलाल की पत्नी को उचित मुआवजा दिया गया और गमलाल को इलाज के लिए एक बड़े हस्पताल में भेजा गया। जेल में सुधार लाने के लिए सरकार समिति की स्थापना भी की। जितने दिन जेल में जांच समिति के आने की प्रतीक्षा और गवाहियों का क्रम चलता रहा, राजीव का मन उमी तरफ लगा रहा। उसे रेसा व मुन्नो की याद तो आती पर उसके मन व मस्तिष्क को दूमरा विपय घेरे हुए पा। अब वह काम ममाप्त हुआ तो उसका मारा ध्यान घर की और चला गया। वैसे भी अब जेल में काफी मुस-चन पा। कैदियो के साथ व्यवहार में भी बहुत अन्तर आ गया था। राजीव तो मारे कैदियो में हीरों बन गया था । अय जेल में जेल अधीक्षक का नहीं, अपितु राजीव का शासन चलता था, परन्तु यह पामन डडे का न था, प्यार और अच्छे व्यवहार का था। रेगा के पन अब लगभग रस्मी हो गए थे। उसमें प्यार की तड़प तो पहले ही गायब हो चुकी थी। राजीव पत्र पढ़ता तो सोचने लग पड़ता। उसका दिल पन पढ़कर कुछ परेशान होता, तभी उसको बुद्धि उसे समझाने की कोशिश । केटी १० करती। वह सोचता कि कभी-कभी पत्र लिखा जाए, तो प्यार को बातें लिखी मा सकती है, पर अब जब सारा जीवन ही पत्रों में सिमटकर रह गया है तो रोज-रोज रेखा लिखती भी क्या रहे ! इस तक से वह अपने मन को शांत कर लेता। अब रेखा हर मास आती भी नहीं थी। राजीव भी उसे यही लिखता था कि वह इतनी दूर आने का कष्ट न करे, आराम से घर पर सुन्नो की देखभाल करती रहे। राजीव के बूढ़े माता-पिता को इस घटना का कुछ भी पता न था। राजीव ने उन्हें कुछ भी न बताया था। उसने सोचा था कि इससे उन्हें गहरा दुख होगा और मापद यह उनके दिल तोड़ने का कारण बन जाए। पर जब राजीव को जेल गए काफी समय हो गया तो बात गांव तक पहुंच गई। उन्हें सारी बात पता चल गई। उन्होंने एक सम्बन्धी को राजीव को मिलने भेजा और यह महनवाया कि जो हो गया है उसे वापस नहीं किया जा सकता। राजीव को पैयं व दादा रखने को कहा। उन्होंने यह आग्रह किया था कि ऐसी स्थिति में रेखा और सुन्नो गांव चली आए। इस संदेश से राजीव ज सहारा मिला। रेवा का गांव जाफर मांबाप के पास रहना रा यह पहले भी ऐसा ही प्रबन्ध करना चाहता था, पर मां-बाप को बताने का साहस न बटोर सका था। । 'पा ६ रेमा और नीरज अब पूर्व आनन्द का जीवन व्यतीत कर रहे थे। वे प्रायः इकठे रहते । रेपा अपने घर में बहुत कम माना बनाती थी। नीरज उसकी सब सुस-मुविधा का ध्यान रखता। यदि कभी रेपा को अपने घर रोटी बनानी भी पडती, तो नीरज के घर का नौकर वहां आ जाता था। जय से नीरज ने रेखा के सौंदर्य की प्रशंसा को थी और उसका मुकाबला हेमामालिनी से किया था, तब से रेवा बिलकुल बदल गई थी। वह अपने में एक नई ताजगी और एक नई खोज का प्रकाश अनुभव करने लगी थी। नीरज कभी-यभी यह बात फिर दोहरा देता । वह कभी उसकी पतली कमर पर कोई शेर कह देता तो कभी उसके काले बालो की काली घटाओ मे तुलना करता। रेसा पहले कुछ शर्माती थी, पर अब उसे यह बहुत अच्छा लगता था। वह ज्यों ही उसे मिलती तो उसकी इच्छा होती कि नीरज उसकी प्रगंमा करे। प्रव नीरज के बिना अधिक देर रहना भी उसके लिए कठिन हो गया था। कई पार तो नीरज प्रात: उठकर उसके पास आता, उसे जगाता और नौकर से वह-टी वही पर मंगवा लेता। यदि नीरज अधिक देर उससे दूर रहता तो मिलने पर रेगा गिला करती । कई बार नाराज भी हो जाती। नीरज उमे मनाने लगता। सिनेमा तो प्राय गप्ताह में दो बार वे अवश्य जाते थे। कभी-कभी घूमने भी निकल जाते । कही भी पास बैठने का मौका मिलता तो नीरज रेखा के साप सटकर बैठने की कोशिश करता । किसी चीज को लेते-देते वक्त यह रेसा का हाथ छू देता। रेपा भी छूट दिए जा रही थी और नीरज भी एक-एक कदम आगे बढ़ाता जा रहा था। जब मुन्नो रेगा की गोद में होती तो नीरज मुन्नों को लेने को अवश्य कोगिरा करता। तब वह काफी आगे बढ़ जाता। रेगा की सासों की परिधि तक उगकी पहुंच हो जाती। रेगा जब हाय वढा मुन्नो को उसे धमाती तो नीरज की आंग रेया को नोचे-आर, जहां-तहां पूरती रहती। आज दोनों का पिनमा जाने का कार्यक्रम था। नीरज टीक समय पर संपार होकर आ गया। उसका तौकर आया और मुन्नो को अपने घर से गया। .
. - . रेखा भी तैयारहो रही थी। नीरज ने आवाज़ लगाई, "तो क्या हम वाहर बड़े- खड़े वोर होते रहेंगे?" तभी अन्दर से दोड़ती हुई रेखा बाहर आई, बोली, "क्षमा करना मुझे कुछ देर लगी, पर हां, वाहर क्यों खड़े हैं, अन्दर आओ ना।" उसीके साथ नीरज उसके पीछे-पीछे अन्दर चला गया। रेखा अपने दोनों हाथ उठाए बाल संवारते बातें करने लगी। नीरज पास खड़े होकर सिगरेट का धुआं उड़ाने लगा। रेखा ने विन्दी लगाई। लिपस्टिक लगाने के लिए कुछ शर्माती-सी नीरज की ओर पीठ करके खड़ी हो गई । शीगे के सामने वह लिपस्टिक से होंठ रंगने लगी। तभी उसके पीछे आकर नीरज खड़ा हो गया और सामने शीशे में देखना शुरू कर दिया। रेखा ने पहले उसे नहीं देखा, ज्यों ही उसकी नजरें उठी सामने बड़े शीशे में अपने पीछे नीरज को देखकर वह एकदम चौंकी, शरमाई और फिर बलखाते अन्दाज़ में कह उठी, "याप भी बड़े 'वो' हैं। मैं आपकी तरफ पीठ करके खड़ी हुई और आप हैं कि एकदम शीशे के सामने आ गए।" "रेखा, क्या करूं? तुम आज बहुत ही सुन्दर लग रही हो। इतनी सुन्दर तुम मुझे पहले कभी नहीं लगी थी।" कहते-कहते नीरज ने उसके कन्धे पर हाथ रखा । रेखा कुछ सम्भली, पर फिर सम्भल न सकी। वह नीरज की और मुड़ी, तभी नीरज ने उसकी कमर पर हाथ रखे और फिर क्या हुआ, किसीको कुछ पता नहीं लगा। कितनी ही देर दोनों एक मेज़ के पास खड़े आलिंगनवद्ध रहे। ज्यों ही वह मेज़ हिली, उस मेज़ पर रखी हुई शीशे में फ्रेम की हुई एक बड़ी फोटो घड़ाम से नीचे गिरी। नीचे गिरते ही फोटो चकनाचूर हो गई। उसकी आवाज से दोनों चौंक पड़े। रेखा अलग हो किनारे खड़ी हो गई। रेखा के कपड़े अस्त-व्यस्त हो गए थे, होंठों की लाली फीकी पड़ गई थी, माथे की बिन्दी मिट-सी गई थी। अब तक सिनेमा का समय बीत चुका था। रेखा मीन थी, उस पर किसी अज्ञात भाव ने काठ-सा मार दिया था। नीरज कुछ देर खड़ा रहा फिर दोनों बैठ गए, कोई कुछ बोला नहीं। मौन तोड़ते हुए नीरज बोला, "रेखा, तुमने आज मुझे जो कुछ दिया है, उसकी मादकता में जीवन भर नहीं भूल सकता। मुझे लग रहा है कि मैं अब तुम्हारा ही होकर रह गया हैं।" ११२ । यदी रेगा बुरा बोली नहीं, मुस्कराने की कोगिन उगने अवश्य की । नीरज यह कहते हुए बाहर चला गया, "सिनेमा तो अब कल देगेंगे। मैं मुन्नो यो भेजता हूं, गाना गाने तुम उपर आ जाना।" रेगा की स्थिति बहुत अजीब थी। नीरज के जाने पर उसने दरवाजा बन्द किया और मेज़ की तरफ चली। मेज़ के माथ टूटी हुई फेम, गोगे के टुप और उन्ही के बीच एक फोटो पड़ा था। रेगा के कदम उगमगा रहे थे, उसके चेहरे पर कई रग आकर जा रहे थे । वह मेज के पास जाकर फर्म पर बैठ गई। सोने के बारीक टुकड़ों को एक कागज में इकट्ठा किया फिर यह फोटो उठाई। यह रेगा और राजीव की विवाह के बाद को इकट्ठी फोटो धी। रेगा क्तिनी ही देर उसे देखती रही। उसके दिल से एक हूक-गी निकली, 'या नीरज थे. माय इतनी निकटता राजीव गै घोपा नहीं है ?' वह चौंरकर पड़ी हो गई। उसने दोनों हाथो मे अपने वक्ष को कम लिया, कमरे के चारो ओर देया, फिर दोनों हाथों में सिर पकड़ लिया। उगके दिल में मानी पुष टूटने लगा। राजीव की याद में यह गीले तोनिये की तरह निचुटने नगी । उगमी अन्तरात्मा से फभी कोई पुकार उठती थी और कभी कोई धिकार उसे कचोटनी। उमे लगा जैसे दीवारें कुछ बोल रही हैं । उगके कानों में एक आवाज गूजी, 'किंग रास्ते पर यती जा रही है ? राजीव ने मेरे लिए अपने ऊचे आदों की होली जलाई. नेगे महत्वकाक्षाओ को पूरा करने के लिए वह एक न उन अधिकारी 'कंदी' कहलाया और आज घर मे दूर एक जेल मे यातनाए भगत रहा है। और तू क्या कर रही है ? नीरजपी बाहों में मिमटी जा रही है।' सोचते-गोचने रेगा विहल हो उठी। नीरज के नगीन गर्ग गे भीगी आग अब राजीव के लिए यह उठी। उमकी आगो के पानी ने फर्श पर गिरेपी के टुकटो को भिगो दिया । श्रीने के टुकड़े उसके आंगुनो मे नमक उठे। राजीव और रेया का फोटो अगुओं के पानी में भीगने लगा। वही येटी-बेटी यह अकड़-मी गई। तभी बाहर मे मुन्नों की आवाज ने उगको चौका दिया । नीरजका नौकर को छोडकर यह कहते हुए चला गया कि नीरज गाने पर उगकी प्रतीक्षा कर रहा है। रेगा हिम्मत करके उठी, बाहर गई और नौकर को आवाज उन्हें कह देना मेरी तबीयत ठीक नहीं है, मैं आज खाना नहीं । ।" . । खा ने दरवाजा बन्द किया। सुन्नो को गोद में लिया और विस्तर में, र फूट-फूटकर रोने लगी। वेचारी नन्हीं सुन्नो अपनी मां के इस विचित्र हार को देखकर चिल्ला पड़ी। रेखा सम्भली, सुन्नो को सम्भाला, थोड़ी देर में सुन्नो सो गई और रेखा विचारों की गहरी, अन्धेरी वादियों में खं । गत भर नींद नहीं आई। उसे लगा नीरज उसे राजीव से अलग करके एक भयानक घाटी में लिए जा रहा है। राजीव की याद उसके मन को तोड़ने- सी लगी। राजीव की कही बातें उसकी हत्तन्त्री को गुंजित करने लगी। उसे याद आया कि जेल जाते समय राजीव ने भरे दिल से कहा था-'रेखा, मैं जेल जा रहा हूं, मैं तुम्हारे पास अपनी रेखा को अमानत के रूप में रख रहा हूं। रेग्या के लिए ही मैंने सब कुछ किया है । रेखा, तुम मेरी रेखा को सम्भाल कर रखना, देखना अमानत में श्यानत न हो'-और याद आते ही रेखा चीख उठी। चौंककर उठ बैठी, बत्ती जला दी। सामने मेज़ पर राजीव की फोटो और टूटी हुई फ्रेम दिखाई दी। उसीके पास एक कागज़ की पुड़िया में फेम के शीशे के टूटे हुए टुकड़े देखकर वह सिहर-सी उठी। इसी प्रकार सोते, जागते व स्वप्न देखते रात का अंधेरा विदा हो गया। रेखा दो दिन तक नीरज के घर नहीं गई । वह अपने मकान से बाहर है नहीं निकली। एक-दो वार नीरज आया भी पर उसने कोई रुचि नहीं दिखाई उसके व्यवहार में कुछ रूमापन आ गया था। नीरज समझ गया। वह भी कुछ समय छोड़ देना चाहता था ताकि रेखा फिर से अपनी पूर्व स्थिति में जाए। नीरज एक धनवान पिता का बिगड़ा हुआ, ऐय्याश पुत्र था। पर आ सबसे बड़ी विगेपता यह थी कि उमको वास्तविक प्रकृति प्रायः छिपी थी। बाहर के व्यवहार में वह सौम्य, निष्कपट व मरल व्यक्ति लगत प्रारम्भिक परिचय के दिनों में उसकी अमली प्रकृति की झलक भी प्र होती थी। उसका असन्नी चेहरा बहुत अन्दर था। वह कभी भी वे-न ११४ | कैदी होता था। यातचीत करने व व्यक्तिव में वह मरलता व मराफत की तमवीर लगता था। । उसका व्यक्तित्व भी बड़ा आकर्षक पा। पहली ही मुलाकात में वह अपने प्रभाव को अमिट छाप डाल देता था। जिससे भी उमसी मित्रता होती, वह गुरू में तो उग पर न्योछावर ही हो जाता। रंगा ने उसके नौकर में उमर गम्बन्ध में इतना तो जान लिया था कि उगको दो-चार मादी हुई थी। एक पत्नी की मरयु हो गई और दूगरी किमी कारण उसे छोड़कर चली गई। यह जानकारी नौकर मेवाता-यातों में मिल गई थी। उसके मन्यन्य में नौकर यात करते भी हरते थे। नीरज का पिता मर चुका था । लामो सये उनके बैंक में जमा थे । टगी और योगा नीरज का धन्धा पा । पर उमकी टगी भी बड़े ऊंचे स्तर की होती थी। वह धनवान मामूम मोगों के हजारों रुपये मार जाना, पर किमीको पता तमन लगता । उगको जमा पूजी बढ़ती जाती थी। च्याज के हजारोपय बैंक से उमे याते थे। पहली पत्नी के मरने के बाद उगने दूसरी शादी की। वह एक धर्म-परायण पतिग्रता स्त्री पी । वह नीरज के अन्य लड़कियों के माय सम्बन्ध बरदाश्त न कर सकी। उसने नीरज को यूव ममझाया, परन्तु वह न सममा । लाचार होकर उगने नीरज को छोड़ दिया और अपने माता-पिता के घर चली गई। तब से नीरज और भी उन्छगल हो गया था। नगर की कितनी ही लड़कियों से उसके गम्बन्ध थे। उमके पास लुटाने को धन था और दिगाने को मुन्दर आरुर्पक व्यक्तिरव । वह नई-नई बलियों को फुगलाता, मसतता और कभी- कभी कुचल भी देता था। उसकी एक मित्र लडकी की बड़ी संदिग्ध परि- स्थितियों में मुरयु हुई थी। नगर में चर्चा थी कि वह लडको पहले गर्भवती हुई और उमने नीरज को विवाह करने को कहा। नीरज हर लड़की को में मादी का विश्वागदेकर ही अपनी बाहों में जकड़ता था। वह उमे भी कुछ दिन टालता रहा था। दिन बीतते गए तो लडरी चिन्तित हुई। उसने नीरज को धमकी दी कि या तो वह उसके माय विवाह करे, नही तो वह युलेआम कह देगी। कुछ ही दिनों के बाद यह महकी कही मरी पाई गई। नगर मे पर्चा रही, नीरज पर गंदेह व्यक्त किया जाता रहा पर पुलिम नीरज पर हाय न 1 । की। कोई स्पष्ट सबूत भी न था और नीरज ने पुलिस को सिक्के का र और बोतलों की धार से मोहित भी कर लिया था। माज के प्रतिष्ठित वर्ग से उसका कोई सम्बन्ध न था, पर नगर के लम्पट उसके पक्के साथी थे । सभी उससे डरते थे। उसकी पीठ के पीछे कुछ भी पर सामने सभी उसका आदर करते थे। रेखा के सामने का नीरज कुछ और ही था। उसका असली चेहरा कभी उसे दिखाई ही नहीं दिया । उस दिन सिनेमा जाते समय की घटना को अव एक सप्ताह हो चुका था। रेखा ने कुछ समझौता कर लिया था। उसका मन हल्का हो गया था। उसने सोचा कि यदि दोप है तो उसीका है। नीरज ने जबरदस्ती तो कुछ भी नहीं किया। फिर उसने एक इन्सान की तरह प्यार ही तो किया है । वह जिन परिस्थितियों में है, जिस लाचारी में है, उसमें यदि वह थोड़े प्यार का सहारा तलाश कर ले, तो हर्ज भी क्या है ! उन दिनों अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ग के उपलक्ष में नारी जाति की स्वतंत्रता की सब तरफ गूंज थी। रेखा ने कुछ प्रगतिशील महिलाओं के लेख पढ़े थे और भापण भी मुने थे 1 उसने अपने मन को समझा लिया था कि आखिर नारी पर किसी एक ही व्यक्ति का एकाधिकार भी क्यों हो! उसने अपने मन से सवाल किया था कि क्या नारी किसी दुकान की विक्रय करने योग्य वस्तु है कि जिसने एक वार खरीद लिया उसीकी क्रीतदास हो गई ! वह इसी प्रकार के विचार में खोई थी कि उसके अन्तर में कोई बोल उठा, 'राजीव तेरा पति है, ठीक इससे इनकार कौन करता है ! पर क्या तू नीरज जैसे एक सुशिक्षित पू को अपना मित्र बनाकर नहीं रख सकती? यदि द्रोपदी के पांच पति हो स हैं तो तेरा एक पति और एक मित्र क्यों नहीं हो सकता ? पुराने रूढ़ी विचारों में रखा ही क्या है !' इसी प्रकार के तर्कजाल से रेखा ने भावनाओं की वकालत कर उनके हक में मन ही मन निर्णय ले लिया य मात दिन की चुप्पी से निरज काफी तड़पा था। रेखा की उपेक्ष असह्य हो रही थी। उसने सोचा कि उसने असहाय रेखा की कितनी म उसको कितना सहारा दिया और एक छोटी-सी घटना से वह यूं मुंह बैठ गई ! उसे उस पर काफी क्रोध आ रहा था और वह अपने असन आना चाह रहा था। ११६ / कंदी आज जय मात दिन के बाद नीरज याया तोरेगा ने एक मुनान के गाय उगका स्वागत किया, पर उतनी गुवकर यात न की। वह एक प्रभान अपनी महाम कर रही थी। उगने अपने व नीरज के बीच के एकान्त को भंग करने के लिए दूसरे कमरे मे मुन्नी को बुला लिया। वह उसीके यहाने अपनी ग उतारना चाहती थी। नीरज समा गया कि रेपा उमके गाय एकांत में घटना नहीं पाती। यह कुछ गोप से बोला, "रेगा, तुम जानती हो मैंने तुम्हें कितना चाहा है, तुम्हारी कितनी गहायता की है ! यहां पाग-पड़ोम में लोग तुम्हारा अता-पता जानना चाहते हैं, पर मेरे कारण कोई तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहता। मेरी छत्रछाया न हो, तो तुम सबके लिए एक प्रश्न चिह्न बन जाओ। परन्तु इन दिनो तुम इतनी रूगी हो गई हो कि मेरी निरंतर उपेक्षा करती जा रही हो। रेगा, याद ग्यो मैं तुम्हारा पितना बड़ा राज...!" एक हटके के माय रेगा अपनी कुर्मी मे उठी और अपनी उंगलियां नीरज के मुंह पर रगकर उमे चुप कराने लग पड़ी । अन्तिम वाक्यों में तो यह मुन्न ही रह गई। उगकै पाग बग्ने हुए रेगा योली, "नीरज, तुमने इतना क्यों मोच लिया? क्या चुप रहने या मतलब तुम्हारा अपमान करना है ? मैं तो वैसे ही इन दिनों उदाम रही। तुमने मंगै उदागी का पारण तो पूटा नहीं, उल्टे नाराज हो गए। मैं तुम्हारा गहगान कभी नहीं भूल सरती। और अब तो तुमने मेरे दिल को भी जीत लिया है । नीरज, मैं तुम्हें...!" दम बीच मुन्नो अपने पिलौने को लेकर दूगरे कमरे में पल में व्यस्त हो गई थी। "पर नीरज, क्या तुम उग राज यो मुझे धमकी दे रही हो?" कुछ गंभीर होकर देगा नै पूछा। नीर, गम्भल गया। उसने मोचा इतनी तीगी दवाई को अभी कोई जरूरत नहीं है। रेया के हाय को अपने हाथों मे दवाने हुए उसे पाम विठाया और बोला, "चम, इतनी-गो बात पर गच मान लिया। जानमन, हम तो आपके गुलाम हैं । देपो रेगा, कोई भ्रम अपने मन में मन ग्यो। तुम राजीव की परनी हो, टीक है । जब राजीव जेल में आएगा तब में म्वयं तुम्हें उनके पाग मार दूगा । तुम्हें उसके माय रहते देखना चाहूगा, पर तब तक हम दोनों के नाते रहें तो क्या हर्ज है ?" र फिर कितनी ही देर रेखा नीरज में सिमटती-सी वहीं बैठी रही। वात से बड़ा संतोप हुआ। उसे नीरज के साथ सम्बन्धों में औचित्य लगा। एक सप्ताह से उलझन भरा मन आज हल्का हो गया। नीरज मेज़ पर रखी विना शीशे व फ्रेम के राजीव के फोटो को उठाकर T, मैं इसे बाजार से फेम करवाकर लाऊंगा। इसे ठीक से सम्भालकर ना। आगे से इस मेज़ के किनारे अधिक हलचल भी न करना। राजीव री परम मित्र रेखा का पति है, उससे मेरा भी सम्बन्ध है।" "फेम करवाने का काम कल होगा नीरज ! आज उस दिन का बकाया' यानी सिनेमा...।" नीरज का हाथ पकड़ते हुए रेखा ने फरमाइश की। नीरज तैयार ही था । सुन्नो को नौकर के पास छोड़ दोनों सिनेमा चले गए। रास्ते में नीरज ने दो दिन पहले की वात शुरू कर दी। नीरज ने उसे अपने घर बुलाया था और वह कोई बहाना बनाकर नहीं आई थी। उसने कहा, "वम्बई से मेरे एक निकट के मित्र श्री मेहरा जी आए थे, वह एक अच्छे फिल्म निर्माता हैं। मैंने उनसे तुम्हारे सौंदर्य व तुम्हारी कला की चर्चा की थी। वे तुमसे मिलना चाहते थे, इसलिए तुम्हें बुलाया था। रेखा, मुझे विश्वास है कि फिल्म की दुनिया में तुम अपना उज्जवल भविष्य बना सकती हो। खैर..." "अरे नीरज, तुम मुझे स्वयं आकर बता देते तो मैं अवश्य आ जाती मुझे क्या मालूम था! क्या वही मेहरा जी थे, जिनकी तुम प्रायः बातें कर थे? क्या वे चले गए ?" चौंककर रेखा ने पूछा। "हां, वे चले गए। यहां पर कुछ दिन के लिए आए थे। मैंने उन्हें ब आग्रह किया तो वे बोले कि यदि तुम्हारी तबीयत खराब न होती तो वे वातचीत कर लेते । जाती वार कह गए थे कि पत्र लिखना और फिल्म काम करने की इच्छा हो तो फोटो भेजना।" नीरज कह ही रहा : सिनेमा हाल आ गया। टिकट लेकर वे अन्दर चले गए। आज रेखा का प्यार मानों उमड़ पड़ा था। वह नीरज के पास बैठी थी। अभी न्यूज रील चल रही थी। नीरज के कानों के पास न ले जाकर रेखा बोली,"नीरज, तुम आज ही मेहरा जी को पत्र लिस . । । - ११८ / कैदी "मयपE नहीं क्यों अब मेरे दिल में फिल्मों में काम करने को लालगा हो रही है। मः धेय नुम्हें ही है कि तुमने मुझमे यह प्रतिभा देखी है ।" नीरज ने उगराहार दवाया और हां भर दी। चित्रपट पर ज्यों ही हीरोइन किमी प्रभावशाली मुद्रा में आती रेगा का मन कल्पना के पंग लगाकर मही दूर उड जाता। वह सोचती उगके मोहर में क्या कमी है ! नीरज ठीक ही तो पता है। यदि नीरज के कहने में एर चार मेहरा जी उसे काम करने का मौका दे दें तो एक ही फिल्म मे यह गमा जाएगी। राजीव के जेल मे छूटने से पहले-पहले यह एक हीरोइन बन जाएगी अपार धन सम्पत्ति उसके कदमों पर होगी। इसी प्रकार की बात मानते. सोचते वह गपनो में गो चुकी थी। दोनो थापग पर पहुंचे। रेपा अपने घर पली गई। यह अभी दरवाजा सोलकर अन्दर गई ही थी कि नीरज मुन्नी को उठाए यहां आ पहुंचा । मुन्नो मी चुकी थी, उगे बिस्तर पर लिटा दिया। नीरज जाने लगा तो रेगाने उगका हाय पकड़कर उगे विटा दिया। उठने नोरजने पहा. बदल कर आता हूं, तब तक तुम भी कपड़े बदर लो।" नीरज बाहर गया ही था कि पीछे से रेगा ने आवाज लगाई. "नौकर को बहकर भोजन भी यही मंगया लेना।" दोनो ने वहीं भोजन किया। फिर रेया बातों में गो गई। नीरण रेगा ये फिल्मी भविष्य की बड़ी ही आकर्षक तम्वीर उसके ग्यानी की दुनिया में बना दी थी। जय से नीरज ने यह नया विचार दिया था तभी में रंगा यह पहले वाली रेया न रही थी। अब वह सूय यन-टनकर रहनी, हर बार नई माडी बदलती, उसकी ब्लाक के आधे याजू गुम हो गए थे तथा फमर से कार की यात्रा भी म्लाऊज ने काफी पूरी कर ली थी। बातें करते-करते काफी रात हो गई। आगमान में बादल उमहनाए थे। अय वुछ यूदा यादी भी हो रही थी। नीरज जय पर पलने लगता तो रंगा उगे पोड़ा रकने को कह देती। मीरज वैट जाता और यातों में गो जाता वह फिर जाने लगता तो रेगा उगे फिर रोक सेतो। गत के बारह यत्र पुणे- पे। अलमाई भागों मे देखने हा नीरज ने अगाईनी और पहा, "रेगा. रोपना ही है तो पूरी रात के लिए यो नही रोगी ।"
किए न आज ! बाहर वर्षा भी हो रही है।"नीरज वहीं सो गया। छ दिन के बाद रेखा ने नीरज को फिर याद दिलाई कि वह बम्बई जी को पत्र लिखे । मेहरा जी को भेजने के लिए रेखा का फोटो चाहिए नीरज रेखा को लेकर एक स्टूडियो में गया। रेखा के कई प्रकार के पोज़ व गए। उसके बाद नीरज ने कहा, "हमारे साथ भी एक-दो पोज़ हो जाए। ल्मी कैरियर के बाद हमारी क्या याद रहेगी!" रेखा मान गई। नीरज के य सटकर बैठी हुई, हाथ पकड़े हुए, बातें करते हुए कुछ पोज़ खींचे गए। नमें से कुछ बढ़िया फोटो चुनकर नीरज ने बम्बई में मेहरा जी को भेज दिए। । अब रेखा पूरी तरह से नीरज के वश में थी। नीरज को उसके पास रखे धन का भी पता लग गया था। उसने रेखा को फुसलाया कि घर में धन रखना अच्छा नहीं है। यदि वह एक कम्पनी के हिस्से खरीद ले तो उसे हर मास कमिशन के रूप में कुछ आय हो जाएगी और उसी आय से रेखा के घर का सचं चलता रहेगा। रेखा को यह योजना जंच गई। उसने पांच हजार रुपये नीरज को दे दिये। कुछ ही दिन के बाद नीरज ने उसे पांच सौ रुपये ला दिए और कहा कि उस पांच हजार रुपये की कमिशन आई है। रेखा और ललचाई, उसने बीस हजार रुपये नीरज के पास दे दिए। हर मास नीरज कुछ सौन्पये उने लाकर दे देता था। रेखा समझती थी कि इस प्रकार वह धन का उचित उपयोग कर रही है। जेल में राजीव के दिन अव बच्छे निकल रहे थे। जेल अधिकारी विगेप सम्मान करते थे। उनसे डरते भी थे। हरगोविन्द तथा दो वार्डर नौकरी ने निकाले जा चुके थे। जेल के हिसाब-किताब की विगे हो रही थी। कैदियों के प्रति व्यवहार बहुत वदल गया था । हाईकोर्ट में सूरत की अपील मंजूर हो गई, उसे बरी कर दिए ज्यों ही यह समाचार आया वह बुगी से नाच उा। अब उसे जेल १२० / कैदी किया जाना था। राजीव ने गूरत को अपने घर वा पता दिया, एक विशेष पत्र रेगा के लिए लिया। जवानी भी रैमा के लिए उसने बहुत कुछ पहा । मूरल से राजीव को विशेप ग्नह हो गया था, इसलिए उसने यह आग्रह रिया कि मूरत उसके घर जाकर सारी कुशल गमाचार उमे बताए । गूग्न ने उगे विश्याग दिलाया कि वह उनके पर जाकर जिरा भी प्रकार सहायता यो आवश्यकता होगी, यह पूरी करेगा। मूरत रिहा हो अपने घर पहुंच गया । कुछ ही दिन के बाद यह गजीय के पर गया। यह ज्यो हो बरामद के अन्दर आया उसने देगा कि रेणा हाथ में पमं पकड़े कही जाने की तैयारी कर रही है। मूरत भोलाभाला शर्मालो आदत वाला था। यह कितनी ही देर चुपचाप यहा रहा । सामने गे नीरज का नौकर आया तो उसने उसमे बात की। उसने बताया कि वहीं गया है। मूरत आगे बढकर रेया गे यात करना ही चाहता था कि दूगरी तरफ मे नीरज आया, रेपा नीरज को देखते ही तेज कदमों से उसके साथ बाहर चली गई । गूरत पीछे दौड़ा उसने बात करनी पाही, पर नीरज ने कहा कि यह सिनेमा जा रहे हैं अभी बात करने का समय नहीं है। गूरत हरभ-सा वही पहा रहा । वह उन दोनों को जाने हुए निहारता रहा। उगे समाा नही आया कि गंगा के गाय वह पुरप कौन है ! उसने गोचा कि राजीव तो इगी बात पर आगू बहाता रहता था कि रेगा अफेसी मूनेपन में तडपती होगी, पर यहा तो यह एक तितली की तरह उहती जा रही है। उसे अपनी आगो पर विश्वाग नही हुआ । उसने पर-उधर देगा, सोचा कि कहीं यह गलत पने पर तो नही आ गया। मवान के बरामदे में नीरज का नौकर मुन्नो को पिलीनों मे गिला रहा था । गृरत उसके पाग जाकर बातें करने सगा। नौकर ने एकात देग. कर मूरत से सब कुछ यह दिया । मूरत रितनी ही देर बैठ उग नौर मे रंगा की बातें मुनता रहा। मुन्नो कमरे के अन्दर जाकर सेल रही पी। सभी मुन्नो अन्दर के कमरे मे पेलते-गेलते एक किताव लेकर बाहर आई। उग नौकर ने मुन्नो मे हाय से किताब लेनी चाही । मुन्नो रोपी, तिाय परती पर गिर गई। गिरने ही उममे मे पुए फोटो फर्ग पर गिर गए। चे फोटो वही थे, जो उम दिन स्टूडियो में रंगा ने नीरज के माप गिपपाए फोटो देखकर सहम गया। उसने आंख बचाकर कुछ फोन ल लिए कुछ देर इधर-उधर की बातें करके वह वहां से चला ८ । नीरज ने रेखा को इस बार पिछले धन के हिस्सों का बहुत अधिक कमिशन नवाया। उसे यह भी बताया कि एक नई कम्पनी बन रही है। उसके हिस्से रीदने के लिए बड़ा रश है। नीरज ने कहा कि वह स्वयं ५० हजार रुपये के हस्से गरीदने के लिए दिल्ली जा रहा है। नीरज ने रेसा को बातों ही बातों में विश्वास दिलाया कि उस कम्पनी में लगे धन की बहुत अधिक कमिशन मिलने याली है, इसलिए उसके हिस्सों की होड़ लगी है। नीरज दिल्ली जाने की तयारी करने लगा। दूसरे दिन नीरज को बुलाकर रेगा ने कहा, "तुम नई कम्पनी के हिस्से सरीदने दिल्ली जा रहे हो। मैं सोचती हूं, क्यों न मेरे लिए भी तुम हिस्सों का प्रबन्ध कर दो।" "बिलगुल ठीक है । यदि तुम लेना चाहो तो मैं तुम्हारे लिए भी पूरी कोशिण महंगा। पर मुझे दिल्ली जल्दी जाना पड़ेगा। अभी टेलीफोन आया है कि बहुत लोग उस कम्पनी ने हिस्से मरीदना चाह रहे हैं, कहीं ऐसा न हो मेरे जाने से पहले ही सारे हिस्से बिक जाएं। पर हां, तुम कितने हिस्से लेना चाहोगी।" "जैसा तुग ठीक समझो।" "रेगा, पैरो तो यहां पर राब सुरक्षित है तो भी आजकल घर में अधि धन राना बुद्धिमता की बात नहीं क्योंकि वह घन तो जीवन के लिए रातरा बन सकता है। तुम गुछ धन यहीं बैंक में अपने खर्च के लिए रस वागी के हिस्से मरीद लो। दिल्ली में मेरे एक प्रभावशाली मित्र हैं, सिफारिश से मैं तुम्हारे लिए अधिक से अधिक हिस्से खरीदने की 4 पलंगा।" १२३ / कैदी रोगा को वास गम में था गई। वह स्वयं भी अधिक पन पर में रगने में चिन्तित रहती थी। नीरज के माय रेला वंक में गई। वहां रेगा में नाम में. हजार रुपये जमा करा दिए। यापम आकर रेगा ने वापी ६.६गरपये नीरज को दे दिए और उसका हाथ पकड़कर पाहा, "नीरज, जानने हो मुम पर मेरा फिनना भरोगा है ! मैंने अपना गब धुछ तुम्हे ममपित कर दिया है। यह धन मेरे पाम उनकी अमानत है। मम्भलकर जाना और इस धन के पूरे हिम्मे गरीदकर पाना । मुमै अपने में भी अधिक तुम पर भरोगा नीरज !" रेखा का हाय दवाते हुए नीरज ने उमे विश्वास दिलाया। यह ग्पया ग्रोफरेग में डालकर नीरज पला गया। लगभग एक सप्ताह ये बाद यह याग भाया। रेगा के नाम में शेयर मटीफिोदग तपा ६० हजार साये की रगीर भी नीरज ले आया था। रेगा आश्वस्त हो गई। मायंकाल का समय था । नीरज दौड़ता हुमा रेगा के कमरे में आया, गरेगा वधाई हो।" कमी वधाई ?" हैरानी में रेगा ने पूछा। "यह लो स्वयं ही पर लो।" नीरज में एक पन रेगा के सामने रग दिया। यह पन बम्बई में मेहरा जी का पा। उन्होंने लिया था कि यदि रेगा फिल्मी ম কাম ফনা খারীঃ স য গ্রামি লুক লিং যনই । यह भी लिपा था कि रेया के फोटो देगकर वे ब प्रभावित हुए है। उसके फोटो से उन्हें विश्वाम हो गया है कि उसमे एक मफल कलाकार यो महान मम्भावनाए निहित है। विशेषकर उगको काली आगों की मालाहट लिए गहराई में तो वे बडे ही प्रभावित हुए हैं। पत्र में और भी बहन मुनिमा पार एक फिल्म निर्माता के पत्र में अपनी प्रगंगा पड़कर रेगा पर जमीन पर न रहे, वह आसमान में उडने सगी। उगी बामों के गामने अपना उगमन फिल्मी भविष्य नाचने लगा । उगने पत्रपा, दोनो हापों में यदरिया दोनों हपेलियो की बीच पत्र को लेकर नोरज के पाग जाकर गही हो गई और बहने सगी, "नीरज मैं किन शो में तुम्हारा धन्यवाद कर । मदि तुम्हारे जमा पारपीन मिलता तो मेरी प्रतिभा इमी प्रसार गन-गट जाती। अब नुमारे कारण मुझे अपना एक नया भविष्य दियाई दे रहा है।"नीरज ने एरप रेगा मे कन्पी पर रगा और दूसरे हाय में उमर पार पपपपालिए।
। सप्ताह बीतते गए। रेखा और नीरज वहुत आगे निकल गए थे। दिखावे की थोड़ी बहुत मर्यादाएं भी मिट चुकी थी। रेखा और नीरज भग एक पति-पत्नी की तरह का जीवन व्यतीत करते थे । रेखा के लिए वीते युग की एक घुघली स्मृति की बारीक लकीर मान रह गया था। याद आती थी, पर जैसे आती थी वैसे ही चली जाती थी। वह याद न से तड़पाती थी और न ही रुलाती थी। उसके जीवन की रिक्तता अव तरह नीरज ने भर दी थी। इतना ही नहीं उसके व्यक्तित्व में अंतनिहित न कला व प्रतिभा का पारखी नीरज अब पूरी तरह उसके तन-मन को पने में जकड़े हुए था। रेखा एक कोमल लता की तरह अपने निकट के नीरज पी वृक्ष से पूरी तरह लिपट चुकी थी। वह यह भूल चुकी थी कि उस लता को अंकुरित करने के लिए राजीव अपने सर्वस्व की बाजी लगाकर जेल में दिन काट रहा है। . मूरत कुछ दिन घर के काम में उलझ गया। परन्तु जब उसे राजीव की याद आती तो वह रेखा के बदले जीवन की बात सोचकर चौंक जाता। पहले सूरत ने सोचा कि राजीव को कुछ न बताया जाए। वह जानता था कि सच्चाई का पता लगने पर राजीव पागल हो उठेगा। परन्तु बहुत सोचने के बाद उसने निर्णय किया कि एक सच्चे मित्र के नाते उसका यह कर्तव्य है कि राजीव को सारी बात बता दे। शायद अपने किसी सम्बन्धी को बीच में डालकर राजीव अब भी अपनी लुटती दुनिया को सम्भाल सके । मूरत ने राजीव को पत्र लिखा कि वह उसके घर पर गया था । स कुशल है पर पूरा समाचार वह स्वयं आकर कहेगा। राजीव ने पत्र पढ़ा उसे कुछ संदेह हुआ कि ऐसी क्या बात है, जिसे सूरत पत्र में नहीं लिख सक राजीव चिन्तित रहने लगा औरघर की याद उसे पहले से ज्यादा सताने ल राजीव सोचता कि रेखा अब उसे उस उत्सुकता से मिलने नहीं आ अपने हाथ से पकाकर उस तरह मीठे पकवान नहीं लाती, उसके पन पहले की तरह प्यार की गर्मी नहीं है। कितनी ही आशंकाएं उसके मस्तिष्क को घेरने लग पड़ती। जैसे-तैसे वह अपने मन को समः • कोगिरा करता। उसने एक दिन मूरत को पत्र लिखा कि वह मा १२४ / कैदी मम्बन्य में वहा चिन्तित है। उसने गूरत में बाग्रह पिया कि ये रेन में आरर उगमे मिले और यानी बार उगने पर होरर आए। गूरत फिर राजीव के पर गया, पर उस समय भी पर में उगने यात करने के लिए रिमीक पाम ममय न पा। रेगा नीरज के माय वर जाने को नयारी में लगी हुई थी। गामान वाया जा रहा पा । रेगा अपने पर या बावश्यक मामान बंधवायर नीरज के पर भेज रही थी। मुन्नी मी नीरज मैं घर पर ही छोडना था। गाड़ी छूटने का ममय हो रहा था। रंगा अपने कपड़े बदलने अन्दर चली गई। मूरत को मामने वही नौकर दिगाई दिया। नौकर ने पूछाफियह गंगा में मिलना चाहता है, तो मूरत ने इनकार कर दिया। उगे गन्देह था कि यदि वह बात करने या पल भी करेगा तो रेगा इतनी प्यम्नता में उसमे बात नहीं करेगी। गूगन यहा मे पना गया। कुछ देर इधर-उपर पूमने के बाद वह फिर वापस आया । तव तक रेगा य नीरज जानने थे। रंगा के मन में ताला लगा पा । सामने नीरज के मकान के बरामदे में मुन्नी नौकर के माय गग रही थी। पाग में ही नीरज को यूटी मा चंठी युछ पा रही थी। यूरत उग तरफ चला गया। पहले कुछ सिका, फिर उम युनिया में उमने अपना परिचय दिया। गजीव यो वान फर मुनाई । युरिया उत्गुरू हो गई। मूरत को पाग बिठाया पाय पिलाई और गीद के सम्बन्ध में उममें जानरारी लेने लगी। गय मुनने के बाद युढ़िया टी आह भरार बोनी, · वटा, बरा बनाऊं, नीरज है नो मेरा पुत्र, पर है कुनपानी । उमने परिवार की मार्ग परमगारो मिट्टी में मिला दिया । फिननी हो गहरियों के जीवन उगने नष्ट लिए। मुझे रंगा ये बारे में कुछ मन्देह था। पर-दो बार गंगा में मैंने पूछा नो उगने पुप नहीं बताया । नीरज को तो मैं कुछ पूछ ही नहीं गरनी थी। मेरे द्वारा उममें कोई बात पूछने पर वह मुझे मारने तर को नयार हो जाता है। मैं या करती, मेरी मोन मुनता पा' अन्द्र भने परिवार में दो बार उमरा विवाह किया था। पर नायर हमारे परिवार का नीरज गे ही अनहोना पा। नीरत्र के पिता एर हरे भरे सम्मानित परिगर वो घर गए थे । एक ही र पा। पहले पनीरज मेरा माल है। पार पांदनगामा मेर परिवार की परता, - ।
- ए, पर मुझे छोड़ गए इस कलंकी की करतूतें देख घुट-घुट दम तोड़ने हाय भगवान ! बेचारा राजीव जेल से छूटकर क्या देखेगा!" कहते- बुढ़िया की आंखों में आंसू आ गए। सूरत बोला, "मां जी, राजीव तो देवता है । अपनी पत्नी की इच्छा पूरी ने के लिए ही उसने गवन किया । अव वह जेल में और पत्नी वम्बई की सर र। बड़ा अन्याय हो गया। मैं राजीव को जाकर यह सब कुछ कैसे ताऊंगा!" बुढ़िया ने सूरत को समझाया कि राजीव अन्धेरे में न रहे, इसलिए सारी बात उसे बता देनी चाहिए। बुढ़िया ने रेखा के सम्बन्ध में सारी बातें उसे वता दीं। यह भी बता दिया कि रेखा का सारा धन किसी न किसी बहाने से नीरज ने उड़ा लिया है और बम्बई भी उसे धोखे से ले गया है। ९ . जेल की ओर बढ़ते हुए सूरत के कदम डगमगा रहे थे। राजीव कितनी आशाएं लगाकर उसकी प्रतीक्षा कर रहा होगा। परन्तु उसे क्या कुछ बतान पड़ेगा ! वह सोचता कि राजीव को यह सब कुछ न बताए तो भी अच्छा शायद राजीव इस आघात को न सह सके। सूरत चलता-चलता रुक जा 'और पीछे मुड़ने लग पड़ता। तभी उसे यह विचार आता कि अपने मित्र अन्धेरे में रखकर वह उसके साथ द्रोह तो नहीं कर रहा । उसका मन क 'कि वह और कुछ तो नहीं कर सकता, पर राजीव को समय रहते सारी तो बता सकता है। बड़े गेट के आर-पार राजीव और सूरत खड़े थे। राजीव का हृदय पत्नी रेखा व सुन्नो के सम्बन्ध में सूरत के मुंह से कुछ सुनने के लिए ल था। वह सूरत के हाथ की ओर देख रहा था। उसने मूरत के हाथ पत्र दिया था और उस पत्र के उत्तर में वह रेखा के पत्र की प्रतीक्ष जेल से लिखे पत्र पढ़कर भेजे जाते हैं, इसलिए किसी भी पति पत्नी के लिए पत्र लिखना कठिन होता है। पत्र पढ़ा जाएगा, इसी १२६ / कैदी पत्र लिगने का मारा उन्माद, उमड़ा हुआ प्यार, गुदगुदाने हपका मन पानी के बुलबुले की तरह यंठ जाते हैं। जिन्हें वर्षों जेल में रहना होता है, उनमा 'प्यार भी कंद होकर रह जाता है । इस बात से राजीव को यही गौर होनी भी। पति-पत्नी या सम्बन्ध ऐमा है, जो लोगों की नजरों को गहन नहीं कर सयता। पिछले दिनों को याद करने राजीय कितना मुछ रेगा मो लिगना चाहना था पर जेल में उमरी भी इजाजत नहीं थी। राजीव गोचता कि अपराध तो उसने किया है, पर दंड उगका प्यार भी भोग रहा है। राजीव जय से जेल में आया था पहली यार उमने दिन गोलकर रेगापो पर निगा और मूरत ये हाथ उमे भेजा था। यह पत्र किमीकी नजरो गे नहीं गुजरना था, इसलिए उसने उग पत्र में सब कुछ लिगाया। पूरे गार दिन लगाए थे पर लिगने में कठिनाई मै कागज लिए धे, वागर-बारोक लिया पा। अपने हृदय के प्यार यो सारी गहराईयो को गली में उतार दिया था। प्रेम के विद्याल आकार को सब्दों की सीमा में बांध दिया था। पितने ही बीते मादक क्षणों की याद दिलाई पी। जेल में आने के वार तीन यषों में पहली बार उसे अपनी रेगा से उग कागज के माध्यम से मिलने का यह मौका मिला 'या। उसने मोचा, फिर पायद कभी पन से जाने के लिए कोई गूरत न मिले, दानिए उमने अपना पूरा हृदय कागज पर अषित कर दिया था। राजीव मूरत की ओर देग रहा था । गृरत का चेहरा मायूम था। राजीव उमकी मायूसी को देखकर एकदम चौक गया । गूगल ने मौन तोडा। पर पर. उपर की बातों में उला गया। उससे सच बात कही नहीं गा रही थी। जब राजीय ने आग्रह किया कि उसके पत्र के उत्तर में रंगा ने पत्र दिया है या नहीं ती मूरत ऑर्ग झुकाए चुप पड़ा रहा। "भाई राजीव, मुझे क्षमा करना, मुामे कुछ नहीं कहा जा रहा ।" यह यहते हुए मूरत ने एक पन रात्रीव के हाय में पमा दिया । राजीय पहने गुग शुभा, परन्तु ज्यों ही उसको दृष्टि पर पर पडओ, उसने परिफर पूछा, "अरे यह तो मेरा ही पत्र है ! तो क्या रेमा यहा पर नहीं पी ?" थी तो यही. पर मुझमे बात न हो मकी।" "रया सुभने पनाया नहीं कि तुम मेरा गन्देश मेकर माए हो?" मूरन पुप पा।
रत, तुम बोलते क्यों नहीं ?" रत दोनों हाथों से सलाखों को पकड़कर घरती की तरफ देख रहा "सूरत, मुझे यह पहेली समझ नहीं आ रही । तुम मेरे घर गए, रेखा वहीं पी, फिर मेरा यह पत्र दिए विना तुम क्यों चले आए ?" राजीव की आंखे ओं में डूबने लगी थीं। सूरत ने अपने को सम्भाला, साहस बटोरा और सारी त राजीव को कह सुनाई। सूरत सारी बात सुनाए चला जा रहा था और जीव दोनों हाथों में सिर थामकर रो रहा था। पर जब उसने यह सुना कि खा नीरज के साथ फिल्मी करियर के लिए वम्बई चली गई है और उसका सारा धन नीरज ने उड़ा लिया है तो उसके आंसू पथरा-से गए और आंखों से पानी भी बन्द हो गया। सूरत ने अपनी जेब से एक फोटो निकाला और राजीव के हाथ में दिया। राजीव ने ज्यों ही उसको देखा उसकी रही सही चेतना भी पत्थर हो गई। राजीव पत्थर की मूर्ति की तरह गेट के साथ सटकर बैठ गया । सूरत कुछ कहता, तो राजीव न उसे सुनता था और न उत्तर देता था। सूरत ने अपने हाथ से उसे एक-दो बार हिलाकर बात करनी चाही पर राजीव जैसे वहां था ही नहीं। "राजीव, मैं समझता हूं तुम्हारे लिए यह बहुत बड़ा आघात है । पर देखो, अभी भी बहुत कुछ सम्भल सकता है । मैं पूरी कोशिश करूंगा, तुम दिल मत तोड़ो।" सूरत ने बड़ी दिलासा दिया। बड़ी कठिनाई से राजीव ने अपने आपको सम्भाला, आंखें नीचे की ओ वोला, "सूरत, मैं तुम्हाग यह एहसान जीवन भर नहीं भूल सकता। मैं विलकुल अन्धेरे में था। हे भगवान, यह क्या से क्या हो गया ! मुझे भिजवाकर रेग्वा यह सब कुछ क्या कर रही है ! अच्छा सूरत, भगवान सुखी रखे। मैंने तो जीवन जी लिया, अव तो एक क्षण भी जीवित रहने मेरी इच्छा नहीं।" इन शब्दों के साथ वह उठा और डगमगाते कदमों से कोठरी की ओर चल दिया। राजीव की दुनिया मानों भाप वनकर उड़ी जा रही थी। उसकी तर की बगिया को किसीने क्रूर हाथों से रौंद डाला था। मूरत ने उसे १२८ / कैदी दिया था। समझाने की रोगिग यो पो। पर वह भी बयाना!मुष्काने मी भी बात न थी। महानुभूति यो रम्म पूरी कर दी उगने । राजीव घे घरे. या माहम करे तो पिस बात पर ! उगका तो गय गाय सुट पापा। गजीय अपनी बैरक में पड़ा रहा। उगने किगीसे वात नवी।एर. दो यार उगने रंगा को अपना लिगा यह पत्र पढ़ा। वह पत्र रेगा तक पहुंच ही नहीं पाया था। मूरख वा दिया यह फोटो भी देने की मोगिम को। वडा माह्म बटोरना पटा उमे। जिग अन्दार में रेगा नीरज ये हाय परई गटी थी, वह अन्दाज एक यिने गार की तरह उगे काटने नगा। यह बार-बार अपनी आग मलने लगा। उमे विध्याग ही नहीं होता पा। वह गोगना, मूरत की बात गलन भी हो मपनी है, पर यह फोटो "यह गलत कंगे हो गगता है ! फैदियों ने बार-बार पूछा तो मिर दर्द रहकर यम्बन मिर पर लिए राजीर लेटा रहा। रात के पहर पर पहर बीतते गए। घडियाल पीआवाज होती तो उसे नगना कोई उगवी छाती पर चोट कर रहा है । 'चन भाई...मय अच्छा की गूज गंजती तो यह मोचता उगमो लूटी दुनिया का उपहाग उहाया जा रहा है। गंटमोरने की घर-चर' की ध्वनि आती तो उगे लगता उगरे अरमानों यो का मोदी जा रही है । परक के बाहर जल रही ट्यूब के प्रमान पर दृष्टि जाती तो उगे लगता कि उसके मंजोए गुनहरे सपनो को चिना जन रही है। यह रात भर गो न मका । करवटें बदलता रहा । करवटें तो यह पहले भी कई बार बदलता रहता था, नीद तो पहले भी उगे नहीं आती थी, पर तब यह रेगा के रंगीन गानों में व उसके प्यार के नगे मे गोया रहता था। यह स्मृतियों को दुनिया में कल्पना पग मगाकर उपना था, अपनी रंगा मोमिलता था, उममे प्यार को मनुहारे करता, वीने दिनों की पार्टी को दोहराता और अपने भविष्य का मुनहा ताना-बाना युनता था ! पर आर नीद न आने की बात ही कुछ और थी। गमय रिगोकी प्रतीक्षा नहीं करता। गजीव की प्रतीक्षा भी नहीं की उसने । प्रात. हुई, शाम हुई और दिन बौनते गा । पर अब गौर यर रामऔर ने रहा था। वह अन्दर मे टूट रहा था। डीज रहा था। उगा जीवन नेट, से पिघलते बर्फ की तरह वहा जा रहा था । वह घण्टों चुपचाप बैठा । उसकी स्मरणशक्ति खोने लगी, उसे अब कुछ याद नहीं रहता था। उसे जेल के साथ, जेल प्रशासन के साथ, कैदियों के जीवन सुधारने के कोई मचि न रही थी। खोया-खोया, लुटा-लुटा-सा राजीव. अब लुटे- जीवन के भार को घसीटे जा रहा था। वह बीमार रहने लगा । डाक्टर देवा, दवाई भी दी, पर उसका असली रोग न कोई जानता था और न कसीके पास उसकी दवाई थी। १० नीरज रेखा को लेकर बम्बई पहुंच गया। नीरज भांप गया था कि रेखा काफी धन लेकर आई है। दोनों एक बढ़िया होटल में ठहर गए। नीरज ने फोन किया तो पता लगा कि मेहरा जी किसी काम से बाहर गए है व एक सप्ताह के बाद आने वाले हैं। एक सप्ताह तक रेखा के सम्बन्ध में कोई बात नहीं हो सकती थी। रेखा व नीरज बम्बई की सैर करने लगे। नीरज को धन व सौंदर्य दोनों मिल गए थे, जिन्हें वह दोनों हाथों से लुटा रहा था और रेखा अपने उज्ज्वल फिल्मी भविष्य के सपनों में खोई आंखें मूंद कर उसके साथ थी। इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया। नीरज ने पता किया। मेहरा जी लौट आए थे। उसने टेलीफोन बात की और समय निश्चित किया। दूसरे दिन प्रातः नीरज और रे मेहरा जी के पास मिलने गए । उनका घर कहीं और था, कार्यालय भी और था, पर वह मुलाकात एक बड़े होटल में रखी गई थी। मेहरा जी की उमर ढलती-सी थी, पर शरीर स्वस्थ और मुडौल, रंग और व्यक्तित्व बहुत प्रभावी था। नीरज की उनसे गहरी मित्रता थी तपाक मे मिले, बिठाया, कुशल समाचार, चाय आदि हुई। इधर-3 बातों के बाद मेहराजी ने अपनी फिल्मों की बात शुरू की, "नीरज, तु हो आजकल फिल्मों में एक्टिंग के लिए कितना रग है। बड़ा नंघ पड़ता है इसके लिए। स्वयं अपनी प्रतिभा व परिश्रम से अपनी जर . १३० / कैदी पहती है। जिम नई फिल्म के लिए मैंने रंगा पारे में मांगा है, मारिए दो-तीन नाम और भी है। निगम को अपने मत मा पनाना होगा।" "देगिम मेहरा जी, मैं कुछ नहीं जानता, जंगे भी हो रंगा जी की प्रतिमा को भी आपको ही उचित स्थान दिलाना है । मैं तो और पिगीको जानता नहीं और आप पर मेरा पूरा भरोगा है। आप है फिल्म निर्माता और रेगा जी हैं एक यालाफार । दोनों को मुलारात करया दी है, भय मेग कोई विशेष काम नहीं।" "या मननय?" "मुझे वैसे भी एक मित्र के यहां जाना है, आप दोनों यान गरें, में हो आता हूं।" नीरज ने रेपा गे आमा ली। रेगा ने गहर्ष स्वीकार कर लिया। नीरज पना गया। मेहरा काफी देर रेगा गे घर-उधर की यात करता रहा । उगने गा को गडे होने के लिए कहा । उसके शरीर को बनावट, समर का पतलापन सया कद आदि का निरीक्षण करता रहा । रेगा ने बढी नम्रता मे पहा, "मेहरा माहब, फिल्मों में काम करने की मेरी ती सिमने ही दिनों में यह अरमान मैंने अपने मन में गजोया है। मेरी मो भागे फिल्म निर्माना तक यया पहन होगी, यह तो नीरज जी ने मुजराको है कि मैं आप तक पहल गई। अब यदि आप भी मुापर गृणा गरेंगे ता में अपनी मनोकामना पूरी पर गागी। महग जी, देगिए मुझे निगान करना।" रेगा जी, आपने प्रथम मिलन में ही अपने व्यक्तिस्य की मुबार र बाल दी है । मोनता हूं इतनी बडी प्रतिभा आज तक क्यों छिपी रही ! नीरज सचमुच पारती है। मैं इतना प्रभावित हुआ है कि आप गरमुग पाहने मग पटा हूं।" पोरे मे निस्ट गरपने हा मेहग ने पहा। रेगा अव आममान पर पी। नीरजमो तो उगने जीता ही था, पर मेग पर भी उसका जादू चल गया । यह मन ही मन प्रसन्न हो गी भी। उसने गोना, यदि मेहग मवमुच उमे चाहने मग पांतर नो उपरान्मी भरित्र हिमालय की तरह अटन है । रेगा किन्नी जीवन के लिए मार-मोही यसरी पी। उमे उमीफे स्वप्न आते थे। 1 । .......
. - . मेहरा उसके और निकट आ गया। वह पहले ही कह चुका था कि वह चाहने लगा है। रेखा ने पहले कुछ झिझक-सी प्रकट की, फिर उसी प्रकार झौता कर लिया, जैसे नीरज के साथ किया था। रात के नौ बज चुके थे, अब फिर मेहरा ने फिल्मों की वात शुरू की। तने में नीरज आ गया। मेहरा ने कहा, उसने रेखा को देख लिया है, वह उसके बारे में फिल्म निर्देशक से बात करेगा। रेखा व नीरज चले गए। रात अपने होटल में पहुंचकर रेखा ने नीरज से शाम को मेहरा के साथ हुई घटना की चर्चा की तो नीरज वोला, "रेखा, क्या विना मूल्य दिए भी संसार में कोई बड़ी चीज प्राप्त होती है ? फिर जितनी महान प्राप्ति, उतनी ही अधिक मूल्य भी चुकाना पड़ता है। देखो रेखा, विना बलिदान के कोई भी महान कार्य सम्पन्न नहीं होता। त्याग और बलिदान तो जीवन की महान सफलता की कुंजी है। कल्पना करो, जब तुम फिल्म हीरोइन बन जाओगी, अखबारों में तुम्हारे फोटो छपेंगे, तुम्हारा इंटरव्यू लेने के लिए बड़े-बड़े पत्र- कार तड़पा करेंगे, सब ओर तुम्हारी चर्चा होगी, तुम लाखों दिलों की धड़कन वन जाओगी, तुम्हारे कदमों की थिरकन पर लाखों आंखें विछ जाएंगी। रेखा, सोचो तो सही वह कितनी बड़ी उपलब्धी होगी। अच्छा, एक बात बताओ, उस समय तुम्हें क्या इस बात की याद रहेगी कि ज़िन्दगी के सफर में कर्भ नीरज भी तुम्हें मिला था ? तव मैं तुम्हें मिलने के लिए तुम्हारे सेक्रेटरी समय लेने बाहर खड़ा रहा करूंगा।" और दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े। नीरज ने रेखा को धरती पर टि नहीं दिया। उसने प्रशंसा भरे शब्दों से उसे एकदम सातवें आसमान पहुंचा दिया, जहां से रेखा को सारी दुनिया बिलकुल छोटी-सी दिख रही बम्बई में लगभग एक मास तक रेखा को कई जगह इंटरव्यू देने मेहरा के अतिरिक्त दो और फिल्म निर्माता नीरज के परिचित थे। भी रेखा से मिलाया गया। उस मिलन का भी उसे वही मूल्य चुकाना कभी-कभी उसे शक भी होने लगता, पर नीरज पर उसका विश्वास: और नीरज अपनी कुशल बुद्धि से उसे समझा भी देता था। उस एक उसका विश्वास कई वार हिला, पर नीरज ने उसे सम्भाल लिया। जेल में वन्दी राजीव की याद आंधी की तरह आई, पर रेखा ने १३२ / कैदी उह उसे वारम कर दिया। रेगा अब पूर्ण आधुनिका बन गई थी। नीरज ने उगे गमा दिया पा कि बम्बई तो ऐचर्य की नगरी है ही, पर फिल्मी दुनिया तो गौदर्य का एक अलग मंमार है। रेया को अपना व्यक्तिरव निगारफर रगना होगा ताकि निर्माता और निगम उगमे प्रभावित हों । उगने उगे बताया था कि तीन पर उमी मड़की यो साया जा गरता है, जो मेहरे को एक ही सनक में, कमर की एक ही गया में नामों दिलों को तड़पा है। धन तो रेगा के पास पा हो, उमने नये-नये कपड़े बनवाए, म्यूटी गलनों में गई, गौंदर्य प्रमापन गरीदे, हर प्रातः घन्टौं वह शृंगार बरती। यह नीरज को दियाती । नीरज उसकी प्रांमा करता। नीरज के मित्र के निर्माता उन्हें पार्टियों में युनाते। यहां पराव के दौर भी चलने छ । नीरज ने उगे ममाया पाकि एक आधुनिका के लिए यह भी विश्यक है कि वह मराय के नाम पिए भी और पिलाए भी। जर पार्टी में नहीं जाना होता तो नीरज कमरे में ही पराव ले पाता और दोनों गुलकर पीने। रेगा जितना पन नाई पो यह धीरे-घोरे गमाप्त होने लगा । अव उसके पाग वापस पहुंचने तक का फिगया हो यचा पा। वह चिन्तित हुई। एक माम उमने कुछ गुम्मे में नीरज को पहा, "नीरज, मैंने तुम पर कितना भरोमा पिया है, तुम्हें अपना गय कुछ दे दिया । अपना पर भी बताया, पर देगो, एक माग बीत गया, वीस हजार रपये यचं हो गए. पर कोई निर्माता फिल्म या काम देने का नाम ता नहीं पता। पितने इंटरव्यू दे चुकी है। बेचारी मुन्नो भी अकेली मा मोचती होगी।" मुन्नो की याद ने रेणा में दिल की ममता को ऐड दिया, वह रो पड़ी । नोरन धुर्मी पर आराम से बैठा गिगरेट का धुआं छोड़ रहा था। "नीरज, यही तुम मुद्दाम घोगा तो नहीं कर रहे, पर बतासो ? में तुम्हें मित्र समाकर रितना विश्याग करनी हूं !" बहते-पहले रेगा फूट-फूट- कर पिलग पड़ी। "वाह रेगा, मुनुममे यह आगा नहीं थी। हर यई काम में अमरूपता ने धान भी आते हैं । याद रयो, हर टोकर आदमी को भागे यानं मा गदेग - । सफलता की मंज़िल असफलताओं के कितने ही पड़ाव पार करने के जाती है । घवराओ मत रेखा, मुझ पर विश्वास रखो, तुम्हारा उज्ज्वल ज्य मुझे नज़र आ रहा है । हर वात में समय लगता है । तुम रसोई आय वनाने जाती हो। चाय के एक कप को बनाकर अपने होंठों तक चाने में भी समय लगता है, फिर इतने महान भविष्य को क्या कुछ क्षणों बनाया जा सकता है ! देखो रेखा, तुमने वीज बो दिया है, वह अंकुरित । हो रहा है । मेहरा जी अपनी दो फिल्मों के निर्देशकों से तुम्हारे नाम की सफारिश कर चुके हैं । तुम्हारा नाम एक फिल्म में हीरोइन के लिए और दूसरी में सह-हीरोइन के लिए विचाराधीन है। उस छोटे से मकान से निकल- कर आज रेखा का नाम एक हीरोइन के लिए विचारधीन है, क्या यह कम उपलब्धी है ? इतने थोड़े से समय में जो कुछ हमने प्राप्त कर लिया वह वो लगाकर अन्य लोग प्राप्त नहीं कर पाते। और फिर मेहरा जी तुमसे इतने प्रसन्न हैं व तुमसे इतना प्यार करते हैं कि मुझे भी कभी-कभी इर्ष्या होने लगती है।" कहते-कहते नीरज ने उसे अपनी बाहों में भर लिया और खिलखिला कर हंस पड़ा। अब तक रेखा का संदेह हवा हो गया था। नीरज पर उसके विश्वास के उखड़ते पत्थर उसकी बातों के सीमेंट से फिर से जुड़ गए थे। रेखा फिर उसी मस्ती में शराब के जाम पीने व पिलाने लगी। सोते समय नीरज ने कहा कि दूसरे दिन वह प्रातःकाल ही मेहरा जी से मिलकर दो टूर बात करेगा। दूसरे दिन नीरज मेहरा से मिलने गया। रेखा प्रतीक्षा में रही। नी ने आकर बताया कि मेहरा ने पूरा विश्वास दिलाया है। उसने कहा है दोनों फिल्मों में से किसी एक में रेखा को अवश्य ही काम मिलेगा। पर नि कारणों से उन फिल्मों का निर्माण कुछ विलम्ब से होगा। मेहरा ने उसक लिख लिया है। वह एक मास के भीतर उन्हें सूचना देंगे। रेखा के अन्तर् में एक बार फिर संदेह के धुएं की रेखा उभरी, पर के विश्वास दिलाने पर वह फिर आश्वस्त हो गई। दोनों बम्बई से चले आए। नीरज दिल्ली में उतर गया। उसने कहा कि वह एक से मिलकर दो दिन वाद आएगा। रेखा अम्बाला आ गई। । १३४ । कैदी रेखा जब घर पहुंची, तो जेल के अधीक्षक का तार चमकी प्रतीक्षा कर रहा था। तार में लिखा था कि राजीव कई दिन विमार रहा, फिर मानमिक रोग में पीड़ित रहा और अब पागल हो गया है। उसे पागलयाने भेज दिया गया है। रेमा की रगों का लहू एक यार क गया । आममान पर उहती चिड़िया मानों एक ही झटके में धरती पर गिर पडी। बम्बई की मारी रंगीनियां मासूमियों में बदल गई। वह इतने दिनों मे छोड़ी मुन्नी को अभी मा का प्यार भी न दे पाई थी...कि यह वय-मा ममाचार उमे मुनने को मिला। इतने में उमका भाई विनीद आ पहुंचा। विनोद रेणा को मिलने इम चीच दो बार आ चुका था। राजीव के पागल होने का ममाचार जैल के अधिकारियों ने राजीव के माता-पिता व उसके ममुराल के घर भी भेज दिया था। विनोद युट्टी पर आया तो वह रेखा के पास भी आया। उमे नीरज की मागे रेखा के वम्बई जाने का ममाचार मिला, तव वह राजीव को भी मिल आया था। अचानक अपने भाई को देय रेखा को सहारा-गा अनुभव हुआ। विनोद को रेषा के बारे मव मालूम हो गया था। "विनोद, यह देयो जेल से तार आया है। यह तो मुझ पर वय ही गिर 'पड़ा है।" रेखा ने विनोद को तार दिखाते हुए कहा । "रेसा, मुझे क्या दिखाती हो । में तो राजीव को दो-चार मिल आया हूं। मुझे तुम्हारे बारे में भी सब पता चल गया है । तुम्हें पता है तुम्हारे बारे में सब पता लगने के कारण ही राजीव पागल हुआ। उसका एक माथी कंदी मूरत रिहा होकर आया था। राजीव नै मूरत के पाम तुम्हारे लिए एक लम्बा 'पत्र दिया था। मूरत यहा आया, तुम नीरज के माय मिनेमा जाने में व्यस्त थी। वह तुम्हें न मिल गका । वह पत्र देने के लिए दोबारा आया तो तुम सामान वायकर वम्बई जा रही थी। तुम्हारा व नीरज का फोटो उसके हाथ लग गया। मूरत ने सब कुछ राजीव को बता दिया, वह फोटो भी दे दिया और तभी में राजीव वह राजीव न रहा। रेगा, क्या कर डाला नूने यह मव ?" विनोद वहाँ-कहते निलमिला उठा। रेमा पत्यर की तरह गड़ी थी। अब वह । सफलता की मंज़िल असफलताओं के कितने ही पड़ाव पार करने के ती है । घबराओ मत रेखा, मुझ पर विश्वास रखो, तुम्हारा उज्ज्वल य मुझे नज़र आ रहा है । हर वात में समय लगता है । तुम रसोई य बनाने जाती हो। चाय के एक कप को बनाकर अपने होंठों तक ने में भी समय लगता है, फिर इतने महान भविष्य को क्या कुछ क्षणों बनाया जा सकता है ! देखो रेखा, तुमने बीज बो दिया है, वह अंकुरित हो रहा है । मेहरा जी अपनी दो फिल्मों के निर्देशकों से तुम्हारे नाम की फारिश कर चुके हैं । तुम्हारा नाम एक फिल्म में हीरोइन के लिए और सरी में सह-हीरोइन के लिए विचाराधीन है । उस छोटे से मकान से निकल- कर आज रेखा का नाम एक हीरोइन के लिए विचारधीन है, क्या यह कम उपलब्धी है ? इतने थोड़े से समय में जो कुछ हमने प्राप्त कर लिया वह वर्षो लगाकर अन्य लोग प्राप्त नहीं कर पाते। और फिर मेहरा जी तुमसे इतने प्रसन्न हैं व तुमसे इतना प्यार करते हैं कि मुझे भी कभी-कभी इया होने लगती है।" कहते-कहते नीरज ने उसे अपनी बाहों में भर लिया और खिलखिला कर हंस पड़ा । अब तक रेखा का संदेह हवा हो गया था। नीरज पर उसके विश्वास के उखड़ते पत्थर उसकी बातों के सीमेंट से फिर से जुड़ गए थे। रेखा फिर उसी मस्ती में शराव के जाम पीने व. पिलाने लगी। सोते समय नीरज ने कहा कि दूसरे दिन वह प्रातःकाल ही मेहरा जी से मिलकर दो टूक वात करेगा। दूसरे दिन नीरज मेहरा से मिलने गया। रेखा प्रतीक्षा में रही। नीर ने आकर बताया कि मेहरा ने पूरा विश्वास दिलाया है। उसने कहा है दोनों फिल्मों में से किसी एक में रेखा को अवश्य ही काम मिलेगा। पर कि कारणों से उन फिल्मों का निर्माण कुछ विलम्ब से होगा। मेहरा ने उसका लिख लिया है। वह एक मास के भीतर उन्हें सूचना देंगे। रेखा के अन्तर में एक बार फिर संदेह के धुएं की रेखा उभरी, पर के विश्वास दिलाने पर वह फिर आश्वस्त हो गई। दोनों वम्बई से चले आए। नीरज दिल्ली में उतर गया। उसने कहा कि वह एक र से मिलकर दो दिन बाद आएगा। रेखा अम्बाला आ गई। १३४ | कैदी रेगा जव घर पहुंची, तो जेल के अधीक्षक का तार उमकी प्रतीक्षा कर रहा था। तार में लिखा था कि राजीव कई दिन बिमार रहा, फिर मानसिक रोग से पीड़ित रहा और अव पागल हो गया है। उमे पागलखाने भेज दिया गया है। रेगा की रगों का लहू एक बार रक गया । आममान पर उड़ती चिड़िया मानो एक ही झटके से धरती पर गिर पड़ी। बम्बई की सारी रंगीनियां 'मायूमियों में बदल गई। वह इतने दिनो मे छोड़ी मुन्नो को अभी मा का प्यार भी न दे पाई थी कि यह बच-मा समाचार उसे मुनने को मिला। इतने में उसका भाई विनोद आ पहुंचा। विनोद रेखा को मिलने इम चीच दो बार आ चुका था। राजीव के पागल होने का समाचार जेल के अधिकारियों ने राजीव के माता-पिता व उमके ससुराल के घर भी भेज दिया था। विनोद छट्टी पर आया तो वह रेखा के पाम भी आया। उगे नीरज की मां ने रेखा के बम्बई जाने का ममाचार मिला, तब वह राजीव को भी मिल आया था। अचानक अपने भाई को देग रेखा को सहारा-गा अनुभव हुवा । विनोद को रेषा के वारे मव मालूम हो गया था। "बिनोद, यह देखो जेल मे तार माया है। यह तो मुझ पर बन ही गिर 'पड़ा है।" रेया ने विनोद को तार दिखाते हुए कहा । "रेखा, मुझे क्या दिखाती हो ! मैं तो राजीव को दो-वार मिल आया हूं। मुझे तुम्हारे बारे में भी सब पता चल गया है । नुम्हें पता है तुम्हारे बारे मे सब पता लगने के कारण ही राजीव पागल हुआ। उसका एक मापी कंदी मूरत रिहा होकर आया था। राजीव ने गृरत के पास तुम्हारे लिए एक यम्या "पत्र दिया था। मरत यहां थापा, नुम नोरत्र के गाय मिनमा जाने में व्यग्न थी। वह तुम्हें न मिल मका । वह पत्र देने के लिए दोबारा आया तो नुम गामान बांधकर बम्बई जा रही थी। तुम्हारा व नीरत्र का फोटी उमर हाय मग गया । मूरत ने मब कुछ राजीव को बना दिया, वह कोटी भी दे दिया और. तभी से राजीव वह राजीव न रहा। रंगा, क्या कर टाला ने यह गय?" विनोद रहते-पहने नियमिला उठा। रेमा पत्थर की दाढ़मट्टी थी। अब यर पकड़कर रोने लगी। उसका दिल मानो पिघलकर आंखों के रास्ते वहने "रेखा, जबसे राजीव ने वह फोटो देखा और उसे तुम्हारे व नीरज के सम्बन्धों का पता लगा, तभी से उसकी स्मृति खोने लगी थी। कई बार वह रात को रेखा-रेखा पुकारता और चिल्लाने लग पड़ता। कभी-कभी सुन्नो की याद भी करता। रात को उठकर चलने लग पड़ता। दिन में ही भाग पड़ता। सामने शून्य में देख रेखा-रेखा' पुकारता और उसे पकड़ने दौड़ पड़ता। वे दिन उसके बहुत बुरे बीते। जेल में सभी कैदी उससे सहानुभूति रखते थे। सभी उसे समझाते, पर वह राजीव ही कहां रहा था। उसके विश्वास की चट्टान के टूटे टुकड़ों के नीचे उसकी चेतना की कली मसली गई थी। और अब वह पागलखाने में एक पागल है।" विनोद फिर बोला, "रेखा, तुम मेरी बहन हो अन्यथा दिल करता है राजीव सरीखे देवता को गवन करने के लिए मजबूर करके जेल भेजने तथ स्वयं बाहर उसके प्यार के साथ धोखा करने वाली रेखा का गला घोंट दूं क्या तुम्हें उसे जेल भेजकर भी चैन न आया, जो पागलखाने भेजने तक तुम पीछे मुड़कर ही न देखा!" रेखा अब विनोद के कदमों पर पड़ी फूट-फूटकर रो रही थी। फि दुनिया का सारा नशा उसकी आंखों से गायब हो चुका था, वह बोली, मुझे बचा लो। यदि तुम मेरा गला घोंट सको तो सचमुच तुम्हारी बड़ी होगी। मैं अब जीना नहीं चाहती। किसके लिए जीऊंगी ? ओह ! निकल गई थी!" रात को विनोद ने रेखा को समझाया। यह तय हुआ कि कम्पनी में लगाया धन तुरन्त निकलवाया जाए। हिस्से बेचे जाएं और र दिल्ली ले जाकर बढ़िया इलाज करवाया जाए। दूरारे दिन नीरज का पता किया, पर वह अभी आया नहीं था बताया कि २० हजार रुपये तो वैसे ही उसने कहीं दिए थे और हिस्से खरीदे थे। रेखा ने शेयर सर्टीफिकेट्स विनोद को दिखाए लेकर दूसरे दिन दिल्ली चला गया। सारी दिल्ली उसने खोल नाम की कम्पनी उसे कहीं न मिली। विनोद समझ गया कि कितनी दूर १३६ / कैदी हड़प गया है। उसने पुलिस से बात की, पता लगा को उसी नाम से बहुत से लोगों को ठगा गया है। दिल्ली पुलिम के पास पहले ही मामला दर्ज था। खोज शुरू हो गई। रेगा प्रतीक्षा में थी कि विनोद दिल्ली से घन लेकर आएगा और वे राजीव के पास जाएंगे। वह पिछले तीन दिन से सोई न थी। उसकी आंखें साल हो मूज गई थीं। शरीर थककर चूर था। थोड़ा-थोड़ा ज्वर भी था। उमने भोजन भी नहीं किया था। विनोद चार अन्य आदमियों के साथ घर आया । विनोद ने कहा कि वे उसके मित्र हैं और नीरज से मिलना चाहते हैं। रेखा मभी बता ही रही थी कि नीरज अभी आया नहीं है कि सामने से नीरज का नौकर आया और कहने लगा, "मालिक रात बड़ी देर मे आए हैं। आपको बुला रहे हैं । कह रहे हैं, जब तक आप नहीं पाओगो वह चाय नही पिएंगे।" विनोद ने उस नौकर को कहा कि नीरज के कुछ मिन्न उन्हें मिलना चाहते हैं। रेखा को वही रुकने को कहकर विनोद उन मित्रों के साथ नीरज के घर चला गया। नीरज उनमें मे विनोद के सिवा यौर किसीको नहीं जानता था। नीरज ने उन्हें बिठाया। विनोद ने एक सैनिक की तरह सीधी वात कर दी, कहा, "नीरज, वे ६० हजार रुपये के जो सर्टीफिकेट तुमने रेखा को खरीद- कर दिए हैं वे तो जानी हैं । मैं दिल्ली हो पाया हूं, उस नाम की वहां कोई कम्पनी नहीं है। अब यह बताओ कि जो २० हजार रुपये तुमने रेखा से लिए थे वे कहां है ?" नीरज सव मुनकर स्तब्ध रह गया। थोड़ा सोचकर उठा और दूसरे कमरे में जाते हुए सबको प्रतीक्षा करने को कहा । तभी विनोद के एक साथी ने उठ- कर नीरज को हाथ से पकड़ा और कुसी पर बिठाते हुए बोला, "नोरज, अब तुम इयर-उधर नहीं जा सकते।" "तो क्या आप दिन-दहाड़े डाका डालने आए हैं ?" नीरज ने श्रोध से कहा। "डाका डालने नहीं एक घोखेबाज डाकू को देखने आए हैं।" विनोद ने . नीरज बोला, "विनोद, मैंने यदि धन लिया है तो तुमसे नहीं । तुम मुझसे का हिसाव नहीं पूछ सकते।" विनोद अपने साथियों को वहीं विठाकर रेखा को लेकर आ गया। उसने स्ते में रेखा को सारी बात बता दी थी। रेखा तिलमिलाकर बोली, "नीरज, तुमने कितना बड़ा घोखा किया। सचमुच वह ६० हजार के सर्टीफिकेट झूठे हैं । और वे २० हजार रुपये तुमने किसको दिए ? तुमने मेरे विश्वास को इस प्रकार तिरस्कृत किया! तुमने मुझे बड़ा धोखा दिया। नीरज, मेरा पति पागलखाने पहुंच गया है, भगवान के लिए लिए अव तो मुझ पर रहम करो ! मेरा धन मुझे लौटाओ ताकि मैं अपने पति का इलाज करा सकू।" रेखा विलख रही थी। नीरज की बूढ़ी मां कमरे के बाहर आकर सुन रही थी। नौकर भी चौकन्ना हो गया था। नीरज समझ गया कि अब वह गुप्त रहस्य सवको पता चल गया है। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे ! वह कुछ देर चुप रहा, जव विनोद ने उसे बार-बार पूछा तो बोला, "मुझे कुछ मालूम नहीं।" "अच्छा उठो, चलो तुम हमारी हिरासत में हो।" एक व्यक्ति ने कहा। "और यह रहा तुम्हारी गिरफ्तारी का वारंट !" दूसरे ने एक कागज़ उसके मुंह के आगे रख दिया। अब नीरज समझा कि सादी वरदी में वे पुलिस के आदमी थे। कुछ ही देर में नीरज को हथकड़ियां पहनाई गई । विनोद के साथ आप पुलिस के लोग नीरज को लेकर चले गए। विनोद रेखा के साथ उसके घ चला आया। रेखा खिड़की के पास चुपचाप खड़ी थी। उसकी आंखों में आंसू थे। सुन्नो पास खड़ी कुछ कहती रही, पर रेखा ने कुछ सुना ही नहीं विन चुपचाप कुर्सी पर बैठा था। कितनी ही देर बीत गई। विनोद उठा रेखा को अन्दर ले आया । रेखा कुछ लड़खड़ाई, फिर गिर पड़ी। विनो उसे उठाकर विस्तर पर लिटा दिया। उसे समझाते हुए विनोद बोला, "रेखा, मैं तो सोच भी नहीं सकत कि तुम इस प्रकार कर सकती हो। इतना धन भी गंवाया और राजी भी कहां भिजवा दिया ! राजीव के इलाज के लिए यहुत धन चाहिए । र, अय सोचने से कुछ नहीं होगा।" रेसा कुछ बोली नही, चुपचाप पड़ी रही । उसकी आँखों से एक पर्दा बिलकुल हट गया था और पश्चाताप की आग उमे जलाए जा रही थी। उराका अन्तर टूट रहा था। उसके जीवन, सौदर्य व धन की लुटी दुनिया के संबर उसका उपहास उड़ा रहे थे। बिस्तर पर लेटी हुई आयें बन्द किए यह कभी-कभी सोचने की कोशिश करती-'राजीव यया सोचता होगा? उग माता-पिता और सब क्या पहेंगे?' तभी रेसा को राजीव के वे शब्द याद आ गए जो उसने जेल जाते समय पहे थे, 'रेगा, मैं अपनी रेखा तुम्हारे पास अमानत के रूप मे रस रहा हूं, इमे गम्भाल कर रखना, देपना अमानत में म्यानत न हो...' इन शब्दों को याद करते ही वह जोर की चीख मारकर विस्तर से उठ बैठी। विनोद दौड़कर उसके पास आया और उसे जाकर विस्तर पर लिटा दिया। "रेसा, जो सुट गया उसे तुम वापस नहीं ला सकती, जो बचा है उसे सम्भालो। तुम्हें गुन्नो फे लिए जिन्दा रहना है । चिन्ता मत करो, मुझसे जो भी बन पड़ेगा मैं तुम्हारी सहायता करूंगा।" गायद ये विनोद के ये शब्द रेखा के कानों तक नहीं पहुंचे । यह सामने यो दीवार पर पथराई आयो रो देश रही थी। विनोद रेया य मुन्नो को लेकर अपने घर चला आया। रेषा सम्भली नहीं । उसकी हालत दिन प्रतिदिन सराय होती गई । गुन्नो अब अपने नाना पेः साप ही रहती थी। और एका दिन यिनोद रेगा को लेकर उसी पागलपाने में आया । जिस कमरे में राजीव बन्द था; उसके साथ के दूगरे कमरे में रेया को भी बन्द कर दिया गया; क्योकि रेगा भी अब पागल हो चुकी थी।
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