Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Omnkar Ek Anuchintan

Muni Pushkar · 2011/01

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ओकार : एक अनुचिन्तन
लेखक
मन्त्री पण्डित प्रवर श्रद्धय श्री पुष्करमुनिजी
म०
सम्पादक
देवेन्द्रमुनि शास्त्री, साहित्यरत्न
पं० शोभाचन्द्रजी भारिल्ल

प्रकाशक सार्वभौम साहित्य संस्थान । १०/१७ शक्तिनगर, देहली ६ प्राप्ति स्थान भण्डारी सरदारचन्द जैन । जैन बुकसेलर त्रिपोलिया, जोधपुर। अर्थ सहयोगी | १. ऋषभराजजी पारसमलजी भूताजी, सिवाना ! २. हस्तीमलजी भूताजो, सिवाना। ३. कानुगाधिंगड़मलजी मुलतान- मलजी, सिवाना (राज.) ४. नरसिंहमलजी शातिलालजी भारण्डा (मारवाड़) ~ प्रकाशन-तिथि २३ फरवरी सन् १९६४ मुद्रक | आर्य सहकारी प्रेस लिमिटेड, अजमेर । मूल्य | एक रुपया।

पूर्वाङ्कन
मानव ने अपनी समस्याग्रो का समाधान करने के लिये
अनेक सस्थाओ, परम्परामो और विद्याओ को जन्म दिया, कितु
वे स्वयं समस्याये वनकर, मानव को दबाने लगी। उद्धार के
स्थान पर हनन का कारण बन गई।
आत्मोन्नति के लिए कई संस्था अस्तित्व में आई उसका
लक्ष्य था बाह्य तत्त्वो आवरण मे छिपे हुए प्रांतरमानव का
प्रकटीकरण, किन्तु उसका नाम लेकर नये-नये तत्त्व अस्तित्व
में आ गये और वे मानवता को दवाने लगे। धर्म ने पंथ का
रूप ले लिया। अहिंसा और प्रेम के स्थान पर वह परस्पर
द्वष एवं घृणा का पोषण करने लगा। धर्म के नाम से होने
वाले युद्धो का इतिहास राजनीतिक युद्धो से कम रक्तरजित
नहीं है।
परस्पर सहयोग द्वारा सर्वतोमुखी विकास के लिए समाज
सस्था अस्तित्व मे आई किन्तु उसी वर्ण विद्वष जाति-विद्वेष
तथ्य लिङ्घ वैषम्य को जन्म दिया। एक मानव अपने आपको
देवता मानने लगा और दूसरे को पशु से भी नीचे समझने
लगा।
बाह्य आक्रमण को रोकने एवं चोर, डाकू आदि के उपद्रवों
से सर्व साधारण की रक्षा के लिए राज्य संस्था अस्तित्व में
में आई किन्तु अधिकार प्राप्त करके राजा अपने आपको अति-
मानव मानने लगा और प्रजा को अपनी भोग्य सामग्री। दूसरी
मोर राष्ट्रीयता के नाम पर सर्व साधारण को ऐसी मदिरा
पिलाई जाने लगी, जिससे एक मानव दूसरे मानव को अपना

ख शत्रु समझे। उसी ने अणु तथा उद्जन सरीखे भयङ्कर अस्त्रों को जन्म दिया जिनकी संहारक शक्ति से सारा विश्व कांप उठा है। वस्तुओं के विनिमय द्वारा दिनोंदिन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यापार या वाणिज्य विकास हुआ, किन्तु वहां भी एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण करने लगा। वाणिज्य-शास्त्रियों का उर्वर मस्तिष्क ऐसे उपायों की खोज में लगा है जिससे बाजार पर एकाधिपत्य हो जाय और उपभोक्ता को विवश होकर अधिक मुल्य देना पड़े । मध्ययुग में व्यापार के नाम पर मनुष्यों का क्रय-विक्रय भी चलता रहा। भौतिक स्वार्थों की संकुचित परिधि से बाहर निकाल कर मानव और मानव मे भावनात्मक एकता स्थापित करने के लिए कला एवं साहित्य अस्तित्व में आये। उनका लक्ष्य था मानव को हृदय की उस भूमिका पर पहुँचाना जहाँ वह एक संवेदन- शील प्राणी है । न वह हिन्दू है न मुसलमान, न अंग्रेज न यहूदी, न स्त्री न पुरुष, न ब्राह्मण ,न शुद्र । कितु वे हृदय-शुद्धि के स्थान पर विलाशीता को प्रोत्साहन देने लगे। मनुष्य भावुक के स्थान पर कामुक बन गया है। इस प्रकार हम देख रहे है कि समाधान स्वयं समस्यायें बनते चले गये। उपनिषदो मे मकडी का उदाहरण आया है, वह उसकी भूख की समस्या सुलझाने के लिए पेड़ से लारें निकाल कर जाला बुनती है, सोचतो है उसमे कीड़े मकोड़े फंस जायेगे और वह अपना पेट भर लेगो; किंतु स्वयं उसमे फँस जाती है और प्राण गवा देती है। वर्तमान मानव की भी यही दशा है। वह नये-नये उपाय खोज रहा है और प्रत्येक के लिये यही ग सोचता है कि वह उसे सुखी बना देगा; किन्तु वही नयी-नयी उलझनें पैदा करके उनका गला घोटने लगता है जिसे वह देवता मानता है, वह राक्षस बन जाता है, जिसे रक्षक के रूप में अपनाता है वही भक्षक हो जाता है, जिसे वरदान समझता है वही अभिशाप बन जाता है । इस स्थिति का मुख्य कारण है अहंकार की उपासना । प्रत्येक मनुष्य अपने जन्म के साथ ही दो घेरे बना लेता है। पहला घेरा 'स्व' का है और दूसरा 'पर' का। स्व के घेरे मे वह प्रेम एवं सहयोग से काम लेता है और पर के घेरे में हिंसा एवं द्वेष से। पर के घेरे मे आने पर प्रत्येक समाधान समस्या बन जाता है और स्व के घेरे मे कठिन से कठिन समस्या का भी अपने आप समाधान हो जाता है। अहंकार की उपासना पर के घेरे को उत्तरोत्तर हृदयहीन बनाती जाती है। दो अहंकार परस्पर टकराते हैं और समस्त वातावरण को अशांत बना देते है उसे हिंसा एवं क रता से भर देते है। मानवता के उद्धार का एक ही मार्ग है कि वह विषयता के स्थान पर समता की उपासना करे; भौतिक स्वार्थों के स्थल पर आध्यात्मिक उन्नति को महत्त्व देना सीखे। इसी को दूसरे शब्दों मे हम कह सकते हैं कि वह अहंकार के स्थान पर अोकार का पुजारी बने । भारतीय साधना में ॐकार की उपासना को सभी परंपरायो ने अपनाया है। वहिरात्मा से अन्तरात्मा अथवा जीवात्मा से परमात्मा पर पहुँचने का इसे अमोघ उपाय माना है। उपनिषदो ने इसे ब्रह्म का वाचक माना है। पतंजलि ने इसकी व्याख्या ईश्वर के रूप में की है। जैनदर्शन में यही पंचपरमेष्ठी का वोधक है। पुराणों में इसका अर्थ त्रिदेव अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु और महेश किया गया है।

छ बुझाई, उसके निर्मल जल में स्नान करके शान्ति और शुद्धि प्राप्त की। वर्तमान मानव धर्म की ओर उपेक्षा भरी दृष्टि से देख रहा है। उसे ढोंग तथा लडाई-झगड़ों का कारण मान रहा है। ऐसे युग में इस बात की बड़ी आवश्यकता है कि धर्म के उस उदात्त रूप को उपस्थित किया जाय जो वाह्य भेदों से ऊपर उठा हुआ हो। मन्त्री मुनिजी का यह प्रयास प्रशंसनीय है। हम आशा करते हैं कि वे इस ओर आगे बढ़ेगें और भारतीय साधना के उज्ज्वलतम रूप को उपस्थित करने में प्रयत्नशील होंगे। प्रस्तुत पुस्तक सार्वभौम साहित्य संस्थान के प्रथम पुष्प के रूप में प्रकाशित हो रही है। मानव को राष्ट्र, जाति तथा पंथ की परिधियों से निकालकर महामानवता की ओर ले जाना संस्थान का मुख्य लक्ष्य है। ओम् सबसे बड़ा मङ्गल है । संस्थान को अनायास ही मङ्गल के रूप मे इस पुस्तक के प्रकाशन का सौभाग्य प्राप्त हुआ इसके लिये हम मन्त्री मुनिश्री के आभारी हैं, और साथ ही देवेन्द्र मुनिजी का भी। आशा करते है कि उनका आशीर्वाद तथा सहयोग हमें सदा प्राप्त होता रहेगा। - डॉ० इन्द्रचन्द शास्त्री अध्यक्ष 1 सार्वभौम साहित्य संस्थान १०/१७, शक्तिनगर, देहली ६ - . । ।

प्रकाशकीय प्रकाश प्रबुद्ध पाठकों के पारिण-पद्मों में “ओंकार : एक अनुचिंतन" समर्पित करते हुए हम परम आह्लाद की अनुभूति कर रहे है। ॐ के सम्बन्ध मे जिज्ञासा रखने वाले साधको को प्रस्तुत ग्रन्थ में बहुत कुछ समझने को, चिंतन करने को प्राप्त होगा। -- प्रकृत ग्रन्थ के लेखक पण्डित प्रवर श्रद्धय श्री पुष्कर मुनिजी महाराज है और सम्पादक है, तेजस्वी लेखक देवेन्द्र मुनि तथा जैन जगत् के यशस्वी, कलम कलाधर पंडित शोभाचन्द्रजी भारिल्ल । तथा पुस्तक के प्रकाशन में आर्थिक सहयोग दिया है धर्म- प्रेमी सुश्रावक मिश्रीमलजी, हस्तीमलजी भूताजी कानुगा धिगडमलजी सिवाना व दानवीर सेठ नरसिंहमलजी सालचा, भारण्डा निवासी ने। श्री मिश्रीलालजी-जिनका कुछ समय पूर्व देहान्त हो गया, गुरुभक्त तथा भद्र प्रकृति के श्रावक थे। उनके ऋषभराजजी, पारसमलजी ये दो पुत्र है। जो अपने पूज्य पिता की तरह ही धर्मनिष्ठ है। आपने स्वर्गीय पिता श्री की पुण्य स्मृति ५०० रुपये पुस्तक प्रकाशन के लिये प्रदान किये है। श्री हस्तीमलजी-आप परम श्रद्धालु, गुरुभक्त, जैनागमों के प्रेमी व अनेक थोकड़ो के ज्ञाता श्रावक है। आप सिवाना वर्ध- मान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष है। आपने ३०० रुपया ग्रन्थ के प्रकाशन मे दिये है। कानुगा धिंगडमलजी, आप भी सिवाना के है। आप भी गुरुभक्त हैं आपने ३१ रुपये देकर अग्रिम ग्राहक बने हैं।

मे
श्री नरसिंहमलजी-आप वयोवृद्ध, उत्साही व उदारमना
श्रावक हैं। गुप्तदानी तथा गुरुभक्त हैं। आपने पुस्तक ३००
रुपये की सहायता दी है। भविष्य में भी आप साहित्य प्रेमियों
की सहायता प्राप्त होगी तो हम अधिक से अधिक उत्कृष्ट
साहित्य प्रकाशित कर सकेगे, उसी प्राशा और विश्वास के साथ।
-मन्त्री
-
"
.
-
-

ओंकार : एक अनुचिन्तन विषयानुक्रम १ (१) प्रोकार की महिमा (२) ओ की महिमा का रहस्य (३) ओंकार की सर्वमान्यता (४) निष्पति (५) का उद्गम १३ १८ २३ २६ (६) ओकार का जाप (७) जप साधना (८) द्विविध साधना (8) साधना की समग्रता (१०) साधना सर्वस्व ३४ ३८ ४४ ४८ ४८ ४६ (११) ध्यान-योग (क) घ्यान का स्वरूप (ख) ध्याता (ग) ध्येय (घ) चार भावनाएँ (ङ) ध्यान-विधि ५५ ५६ .

- . ६४ -- ६७ L- . ६८ . 17 (१२) भक्ति साधना (१३) मोकार का विराट रूप (क) ऊर्ध्व भाग (१) अहसा महानत (२) सत्य महावत (३) अस्तेय महावत (४) ब्रह्मचर्य महाव्रत (५) अपरिग्रह महाव्रत (६) देवलोक (७) बौद्ध पंचशील (८) वैदिक पंचमय (ख) मध्य भाग ६६ . . - ७१ - ७२ ७३ ७४ ७४ (१) नवपद -दर्शन ७७ -तप -चारित्र ७६ -साधु ८२ -उपाध्याय -प्राचार्य -अरिहंत -सिद्ध

(२) भारतीय संस्कृति में मुक्ति
(३) राजनीतिक पंचशील
६७
(ग) अधोलोक
१००
१०१
१०२
(२) मिथ्यातत्व
(२) अविरति
(३) प्रमाद
(४) कषाय
(५) योग
१०२
१०३
१.७

२ -- [१] ओंकार की महिमा की छाप आर्य जाति के साहित्य में 'ॐ' एक असाधारण मंत्र है । अनादिकाल से असंख्य-असंख्य साधक, मुनि और योगी इस परम पावन मंत्र का ध्यान करते आ रहे हैं । इस मंत्रराज मे अनन्त गरिमा सन्निहित है। शरीर की स्थिति और पुष्टि के लिए जैसे आहार की अनिवार्य आवश्यकता होती है, उसी प्रकार प्रात्मा मे निहित शक्तियो के आविर्भाव और विकास के लिए 'ॐ' का ध्यान अनिवार्य माना गया है । यह मंत्रराज 'ॐ' समस्त प्राध्यामिक विद्या का स्त्रोत और योग-विद्या का पुनीत केन्द्र है । न जाने कितने साधको ने 'ॐ' के गम्भीरतर रहस्य को अधिगत करके कृत-कृत्यता प्राम की है। 'ॐ' इस लघुतम पद मे विश्व संस्कृति की मौलिक एकता है और वह स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि संस्कृति का मूल स्त्रोत एक ही है, भले ही विभिन्न देशो और कालो मे उसने कितने ही अनोखे अनोखे रूप धारण किए हो। हम आगे चल कर देखेंगे कि इस लघुकाय पद में किस प्रकार समग्न विश्व और समस्त मतो एवं पंयो के महनीय देवों का समावेश होता है । 'ॐ' को प्रणाम करते हुए कहा गया है- प्रोमित्येकाक्षरं ब्रह्म, वाचकं परमेष्ठितः । सिद्धचक्रस्य सद्वीजं, सर्वदा प्रणमाम्यहम् ।। 'ॐ' एक अक्षरवाला ब्रह्म है या एक मात्र अक्षर-अविनश्वर ब्रह्म है। वह परमेष्ठी का वाचक और सिद्धचक्र का बीज है। मैं उसे सर्वदा प्रणाम करता हूँ। आर्यावर्त्त के प्रत्येक प्रात्मसाधक ने मंत्रराज के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा अर्पित की है । वास्तव में आत्मिक शक्तियो को उद्बुद्ध करने के लिए 'ॐ' का ध्यान, चिन्तन और मनन अतीव उपयोगी है।

२] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन साधक जब समाहित चित्त से 'ॐ' का ध्यान करता है और तन्मयता की एकनिष्ठ अनुभूति मे लीन वन जाता है, तब उसमें उसकी समग्र विराटता प्रतिविम्बित और समाहित हो उठती है। उसका आत्मिक सामर्थ्य अदम्य, उसकी क्षमता अप्रतिहत और उसका वीर्योल्लास अपूर्व हो जाता है। जैसे कल्पवृक्ष, चिन्तामणि-रत्न और कामधेनु आदि दिव्य-भीतिक पदार्थों से मनोवांछित भोग्य वस्तुओं की प्राप्ति होती है वैसे ही इस क्षीरसागरवत् निर्मल शब्दराज 'ॐ' पद से आत्मा मे निर्मल तथा सात्विक गुणों का आविर्भाव होता है । जब 'ॐ' के जप और ध्यान से आत्मा सात्विक गुणों से परिपूर्ण बन जाती है तो यह स्वाभाविक ही है कि उसका भविष्य मंगलमय बने । इस दृष्टि से गीता का यह कथन समीचीन ही है कि जो साधक एकाक्षर ब्रह्म-स्वरूप ॐ का उच्चारण करता हुआ देहोत्सर्ग करता है, वह परमा गति प्राप्त करता है । * वेदान्तदर्शन के समर्थ विद्वान् आचार्य गौड़पाद ने ओंकार के संबंध में जो कुछ कहा है, वह भी यहां उल्लेखनीय है । वे कहते है- 'साधक को चाहिए कि वह प्रोकार में अपने चित्त को समाहित करे, क्योकि ओंकार ही निर्भय ब्रह्म है। जिसका चित्त नित्य प्रोकार मे समाहित रहता है, भय उसके निकट भी नही फटकता।' 'ओंकार ही परब्रह्म है और प्रोकार ही अपरब्रह्म है । उसका कोई कारण नहीं, अतः वह अपूर्व है । जगत् मे कोई वस्तु ऐसी नही जो -- * प्रोमित्येकाक्षरं ब्रह्म, व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजद्दे हैं, स यातति परमां गतिम् ।। -भगवद्गीता, 4-५ - ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [३ उससे भिन्न जातीय हो या ब्राह्य हो। वह अकार्य और अव्यय है।' 'समझना चाहिए कि ओकार सबके हृदय मे स्थित ईश्वर है। जो ईश्वरस्वरूप सर्वव्यापी ओकार को जान लेता है, वह ज्ञानी पुरुष शोक से मुक्ति पा लेता है । अन्त मे कहते हैं-जिसने ओंकार को जाना है वही मुनि है। जो प्रोकार के विराट-विश्वव्यापी स्वरूप को नही जानता, उसके मर्म तक- अन्तस्तत्त्व तक नहीं पहुंचा, वह मुनि-पद का अधिकारी नहीं।' युजीत प्रणवे चेतः प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् । प्रणवे नित्ययुक्तस्य, न भयं विद्यते क्वचित । प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म, प्रणवश्च परः स्मृतः। अपूर्वोऽनन्तरोऽवाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः ।। प्रणवं ईश्वरं विद्यात्सर्वस्य हृदि संस्थितम् । सर्वव्यापिनमोड कारं, मत्वा धीरो न शोचति ।। -माण्डूक्योपनिषद, प्रोकारो विदितो येन स मुनिनेंतरो जनः । -वही पूर्वोक्त, Pre-i í . . [२] . - ॐ की महिमा का रहस्य J ॐ की महिमा के संबंध में जो कहा गया है, उसे पढ़ कर जिज्ञासु जन के मानस में स्वभावतः यह प्रश्न उद्भूत हो सकता है कि आखिर उसके अद्भुत एवं अचिन्त्य प्रभाव एवं माहात्म्य का रहस्य क्या है ? वास्तव में इस प्रश्न का विशद उत्तर वही साधक दे सकता है, जिसने दीर्घकाल पर्यन्त अनन्य निष्ठापूर्वक ॐ का ध्यान और उसके विषय में चन्तन किया हो । तथापि गंभीर विचार करके हम भी उसके महत्त्व रहस्य का आभास अवश्य पा सकते है । 'अणोरणीयान् महतो महीयान्' यह उक्ति प्रोकार के विषय में पूर्ण रूपेण चरितार्थ होती है । . .- प्रत्येक अन्य पदार्थ के समान ओंकार के भी दो रूप हैं-बाह्य और आन्तरिक । उसका बाह्य रूप अक्षरात्मक है जो भाषा-जातीय' पुद्गल- स्कंधो से निर्मित है और अन्यान्य मंत्रो की अपेक्षा अत्यन्त सूक्ष्म, बल्कि सूक्ष्मतम है। किन्तु उसका आन्तरिक रूप महान् से महान् है, अति- विशाल है, विराट है । उसे किसी सीमा में आबद्ध नही किया 'सकता । उसका विस्तृत विवेचन अगले प्रकरणो में किया जाएगा। विभिन्न इकाइयो मे समाहित शक्ति यदि किसी एक इकाई में केन्द्रित कर ली जाती है तो उसमें अनेकगुरिणत वृद्धि हो जाती है । इस तथ्य को समझने के लिए हम अग्निकरणो को ले ले । बिखरे हुए अग्निकरणो में भी दाहकसामर्थ्य है किन्तु उन्हें यदि केन्द्रित कर दिया जाय तो उनका दाहकसामर्थ्य कई गुणा बढ जाता है । यह वृद्धि तो उस समय हुई जब अग्निकणो को सिर्फ एकत्र किया गया है और उनकी पृथक् इकाइयाँ बनी हुई है । अगर हम किसी प्रयोग द्वारा उन समस्त पृथक्-पृथक अग्नि- ओंकार : एक अनुचिन्तन] [५ करणो के सामर्थ्य को किसी एक कण में संक्रांत कर सके तब तो वह सामर्थ्य इतना अधिक बढ जाएगा, कि उसकी कल्पना करना ही कठिन होगा। शर्करा के प्रत्येक करण मे माधुर्य विद्यमान है । यदि उन कणों को केवल एकत्र कर लिया जाय और उनका पृथक्-पृथक अस्तित्व कायम रहने दिया जाय तब भी उनके माधुर्य मे वृद्धि हो जाती हैं । किन्तु जब शर्कराकरणो की पृथक् सत्ता विलीन करके उन्हे 'सेक्रीन' के रूप मे परिणत कर दिया जाता है तो माधुर्य में विस्मयजनक वृद्धि हो जाती है। शर्कराकरणो की अपेक्षा सेक्रीन का वाह्य रूप-परिमारण बहुत सूक्ष्म होता है, तथापि उसका माधुर्य अत्यधिक होता है । जो लोग साधारण वमो को अपेक्षा सूक्ष्म परमाणु बम की, और परमाणु वमो की अपेक्षा भी सूक्ष्मतर उद्जनवम की शक्ति की अधिकता को वैज्ञानिक पद्धति से समझ सकते हैं, उन्हे अन्यान्य' मंत्रो की अपेक्षा सूक्ष्म ॐ मंत्र की शक्ति की प्रचण्डता को समझना कठिन नहीं होना चाहिए। 'सेक्रोन' का माधुर्य भले ही अपूर्व-सा प्रतीत हो तथापि वह शर्करा- करणो में से ही आता है, क्योकि 'सेक्रीन' वस्तुतः शर्कराकरणो का ही सार-सत्व है। इसी प्रकार ॐ में परिव्याप्त विराट् शक्ति भी अन्य मंत्र से ही आई है और वह मंत्र है पंचनमस्कार मंत्र । जैसा कि आगे कहा जायगा, पंचनमस्कार मंत्र 'पूर्व' नामक विशाल श्रुतो का सार है। और प्रोकार उसका भी सार है। इस प्रकार सार का सार होने के कारण ही संभवतः प्रोकार मे अद्भुत, असाधारण और अतयं सामर्थ्य प्रादुर्भूत हो गया है । : 7 --- .:::

[३]
प्रोंकार की सर्वमान्यता
-
न
विश्व-साहित्य में ॐ का समकक्ष कोई दूसरा पद उपलब्ध नही
है जिसे इतनी श्रद्धा और प्रतिष्ठा प्राप्त हो । उसमें जो गूढ़ और विराट
तत्त्व समाहित है, वह किसी भी एक पद में दृष्टिगोचर नही होता । यही
कारण है कि भारतवर्ष की विभिन्न धर्म-परम्पराओ ने एक स्वर से
इस मंत्रराज के महिमागान में अपनी श्रद्धा के स्वर संजोए है।
जैन, बौद्ध और विभिन्न वैदिक परम्पराएं प्रोकार के असाधारण महत्त्व
की स्वीकृति में एकमत हो जाती है । इतना ही नहीं, भारतीयेतर ईसाई,
मुस्लिम, पारसी आदि मतों के साहित्य में भी उसने सम्मानपूर्ण स्थान
प्राप्त किया है । नीचे दिये जाने वाले कतिपय उद्धरणों से यह तथ्य
स्पष्ट हो जाएगा।
ओ३म् खम्ब्रह्म।
यजुर्वेद अ. ४०, मंत्र १७ ॥
ओ३म् इति ऐतदन्तर उद्गीतमुपासीत ।
-छान्दोग्य उपनिषद् ।
ओ३म् इति ऐतत् असर इद १९ सर्वं तस्योपायाख्यानम् ।
-माण्डूक्योपनिषद् ।
भोमित्येतत् ।
, -कठोपनिषद्, १-२-१५
प्रोमित्यात्मानं युञ्जीत ।
-मैञ्युपनिषद्, ६-३
प्रोमिति ब्रह्म ।
-तैत्तिरीय उपनिषद्,.१-८-१
I

ओंकार : एक अनुचिन्तन]
[७
Show
मोकार एवेद सर्वम् । *
-छान्दोग्य उपनिषद्, २-२३
प्रणवात्प्रभवो ब्रह्मा, प्रणवात्प्रभ वो हरिः ।
प्ररणवात्प्रभवो रुद्रः, प्रणवो हि परो भवेत् ।। 1
-~-उपनिषद्
प्रणव से ब्रह्मा है प्रणव से हरि है, प्रणव से रुद्र है और प्रणव
हो पर तत्त्व है।
वौद्धो का प्रधान मंत्र है-'प्रो३म् मणिपद्म हुम् ।'
सिक्ख भाई 'एक ओंकार सद्गुरु प्रसाद' कह कर प्रोकार के
महत्त्व को शिरोधार्य करते हैं।
भाषातत्त्व विदों के अनुसार फारसी भाषा में 'अलिम्' का रूप
धारण करके ॐ ने स्थान प्राप्त किया है तो अंग्रेजी भाषा मे OMEN
के रूप में वह
आसीन है।
जैनपरम्परा के साहित्य में तो उसे उच्चत्तर स्थान प्राप्त है ही। एक
जैनाचार्य ओंकार को नमस्कार करते हुए और उसे 'कामप्रद' तथा
'मोक्षप्रद' बतलाते हुए कहते हैं -
ओकारं विन्दुसंयुक्तं, नित्यं ध्यायन्ति योगिनः ।
कामदं मोक्षदं चैव, ओकाराय नमो नमः॥
ओकार के इस स्तव में वैदिक एवं जैन परम्परा का स्वर एक हो
गया है । यह श्लोक दोनो परम्पराओं में प्रतिदिन पढा जाता है।
"प्रोमित्येकाक्षरं ब्रह्म वाचकं परमेष्ठिनः' इत्यादि जैन परम्परा-
-
इन सव उपनिषदो के उद्धरणों का करीव-करीब एक ही तात्पर्य है
कि ॐ ब्रह्म है, आत्मा है और वह सब कुछ है ।
1 'कल्याण' गोरखपुर के साधना अङ्क से उद्धृत ।

- . 1 5] [ ओंकार : एक. अनुचिन्तन प्रसिद्ध श्लोक पहले उद्धृत किया जा चुका है। इस श्लोक में ओंकार को सिद्धचक्र का बीज प्रतिपादित किया गया है। कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्र ओंकार को समस्त मंत्रों में प्राद्य (प्रथम और उत्तम ) बतलाते हुए कहते है- ओंकारमिव मन्त्राणा- माद्य संगीत कर्मणाम् । सुस्वरं पूरयामासु- वेणु वैरणविकोत्तमाः । -त्रिषष्ठि शलाका पुरुषचरित, १-६-७०७ श्री रत्नमन्दिर गणी ने ओकार का महिमागान इस प्रकार किया है- अोकारः कल्पकारस्करतिकरतिरस्कारिदातातिरेकः, शब्द ब्रह्म करत्नाकरहिमकिरणः कारणं मंगलानाम् । देयाद्वः शुद्धबुद्धि निरवधिमहिमाम्योनिधिः सार्वसिद्धा. चार्योपाध्याय साधूनभिदधदधिकं धीमदाराधनीयः ॥ - भोजप्रवन्ध-मंगलस्मरण अर्थात् प्रोकार कल्पतरु से भी अधिक अभीष्ट प्रदान करने वाला है, शब्द ब्रह्म रूपी अद्वितीय रत्नाकर का विकास करने के लिए चन्द्रमा के समान है, मंगलों का कारण है, असीम महिमा का महार्णव है, सभी परमेष्ठिो का वाचक है और बुद्धिमानो के लिये अराधनीय है, ऐसा प्रोकार तुम सभी को शुद्ध बुद्धि प्रदान करे। 'पंचवस्तुकं' में भी इसी प्रकार का आशय प्रदर्शित किया गया है- 'पोमिति परमेष्ठिपंचकमाहः कथमिति चेदुच्यते-'अ' इति अर्हत- प्राद्याक्षरम्, 'अ' इत्यशरीरस्य सिद्ध वाचकस्याद्याक्षरम्, 'आ' इत्या- चार्यस्याद्याक्षरम्, 'उ' इत्युपाध्यायस्याद्याक्षरम्, 'म्' इति मुनीत्यस्या- द्याक्षरम्-अ-+-+आ+उ+म् इति, ततः सन्धिवशात् ओमिति पदैकदेशे पदसमुदायोपचारात् एवमुक्तिः ।............प्रोमिति सर्वविद्या- -- - . .

ओंकारः एक अनुचिन्तन ] [8 नामाद्य वोजं सकलागमोपनिषद्भूतं सर्वविनविद्यातनितमसिल-इप्टा- दृष्टफलसंकल्पकल्पद् मोपमम्, इत्यस्य प्रणिधानस्यादावुपन्यस्तं परम- मङ्गलम्, न चैतद्व्यतिरिक्तमन्यत्तवमस्ति इत्यादि । यहां बतलाया गया है कि 'यो' पद पांचों परमेष्ठियों का वाचक है; क्योकि वह परमेष्ठिवाचक अरिहन्त, अगरीर (सिद्ध), प्राचार्य उपाध्याय और मुनि शब्दो के प्राद्य अक्षरो से बना है। पद के एक देश मे पदसमुदाय का आरोप होता है, इस न्याय के अनुसार यों को यह निप्पन्ति उचित हो है ।........... 'नो' सर्व विद्याओं का श्राद्य बीज है. सकल आगम-उपनिषद् रूप है, समस्त विघ्नों का विघातक और मनोरथो की पूर्ति करनेवाला कल्पपादप के समान है । आचार्य शुभचन्द्र ने बड़े प्रभावशाली शब्दोमे ॐ के स्मरण को पवित्र प्रेरणा की है:- स्मर दु.खानलज्वाला-प्रशान्तेर्नवनोरदम् । प्रणवं वाड मयज्ञानप्रदीपं पुण्यशासनम् ।। यस्माच्छन्दात्यकं ज्योतिः प्रसृतमतिनिर्मलम् । वाच्यवाचकसम्बन्धस्तेनैव परमेष्ठितः ।। ---ज्ञानार्णव, २८, ३१-३२ यह प्रणव (प्रोकार) दुःखाग्नि की ज्वालाप्रो की उपशान्ति के लिए नूतन मेघ है अर्थात् समस्त दुःखो का विनाशक है पागम ज्ञान के लिए प्रदीप के समान है और पुण्यशासन है। प्रोकार से ही अत्यन्त निर्मल शब्दात्मक ज्योति प्रकट हुई है और उसी के द्वारा परमेष्ठी का वाच्य-वाचकभाव है, अर्थात् पाच परमेष्ठी वाच्य हैं और प्रोकार उनका वाचक है। जैनदर्शन मे वाच्य और वाचक का कयंचित् भेदाभेद संबंध स्वीकार किया गया है। कहा है-- १० ] [ओंकार : एक अनुचिन्तन अभिहाणं अभिहेयाउ होइ भिण्णं अभिण्णं च । * इस सिद्धान्त के अनुसार ओंकार की आराधना पंचपरमेष्ठी की आराधना है। इस प्रकार उल्लिखित कतिपय अवतरणों से भलीभांति विदित हो जाता है कि महामंत्र प्रणव किसी एक सम्प्रदाय या पंथ की पूजी नही है। वह सम्पूर्ण भारतीय दर्शनो की ही नही; अन्य मतो की भी अमूल्य निधि है। यह अनुमान करना निराधार नहीं कि प्रणव की उपासना और आराधना उस अति पुरातन काल से आर्य जाति मे होती आ रही है जब विभिन्न दर्शनों एवं पंथों का जन्म ही नहीं हुआ था। समय २ पर दर्शनों और पंथों की स्थापना हुई किन्तु परम्परागत प्रणवोपासना का परित्याग उन्होने नहीं किया। आर्य जाति जहां २ गई, अपने साथ ही महामहिम प्रणव को भी लेती गई। कालान्तर में जब अनेक देवो की कल्पना का जन्म हुआ और ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवतानो को सिंहासन पर आसीन किया गया तो 'ॐ' पद के साथ उनका भी सामंजस्य विठलाया गया। एक नया शब्दकोष हमारे सामने आया- ब्रह्माऽकारोऽत्र विज्ञयः, उकारो विष्णुरुच्यते । महेश्वरी मकारस्तु, त्रयमेकत्र- तत्त्वत्तः । 'अ' ब्रह्मा, 'उ' विष्णु और 'म्' महेश्वर हैं। तीनो देव मिल- कर 'ओं' रूप धारण करते है। इस विषय का विशेष विचार अगले “ोकार की निष्पत्ति' प्रकरण मे किया गया है। यहा केवल यही दिखलाना अभीष्ट है कि ों की महिमा सर्वमान्य है। । * वृहत्कल्पभाष्य ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [११ उत्तराध्ययनसूत्र (अध्ययन २५ गाथा ३१) मे एक उल्लेख है- न ओंकारेण बंभयो प्रर्थात्-ओंकार के जाप या उच्चारण से कोई ब्राह्मण नहीं हो जाता। इस उल्लेख के आधार से कुछ महानुभावो की ऐसी धारणा है कि जैन परम्परा मे ओंकार को स्थान नहीं है, किन्तु ऊपर दिये प्रमाणो से तथा जैन मंत्रशास्त्रो मे प्रदर्शित सैकड़ो मंत्रो के अवलोकन से यह धारणा निमूल प्रमाणित हो जाती है । प्रायः प्रत्येक जैन मंत्र के प्रारम्भ मे 'ओ' पद का प्रयोग हुआ है जो इस वात को सिद्ध करता है कि मंत्र मे जो सामर्थ्य है, वह अओं के बिना प्रकट नहीं होता। जैसा कि अन्यत्र प्रकट किया गया है, प्रोकार नमस्कारमंत्र का सार-सर्वस्व है। ऐसी स्थिति में यदि नमस्कारमंत्र का जैन-परम्परा मे आदरणीय स्थान स्वीकार किया जाता है तो कोई कारण नहीं कि प्रोकार का भी वही स्थान न हो। तो फिर उत्तराध्ययन के उल्लेख का अभिप्राय क्या है ? इस प्रश्न पर थोड़ा विचार कर लें। यदि इस उल्लेख को पृष्ठभूमि पर गम्भीरता और बारीकी से विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि वहां वाह्य आचार या वेष का एकान्ततः महत्त्व स्वीकार करने वाले दृष्टिकोण का निरसन करके आन्तरिक प्राचार की प्रधानता प्रतिपादित की गई है। उत्तराध्ययन की पूरी गाथाएँ इस प्रकार है:- न वि मुडिएरण समणो, न प्रोकारेण वंभयो । न मुरणी रग्णवासेरणं, कुसचीरेण न तावसो। समयाए समरणो होई, वंभचेरेण बंभयो । नाणेरण य मुणी होई, तवेण होइ तावसो ॥ उत्तरा २५, ३१-३२ १२ ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन मुंडित होने मात्र से कोई श्रमण नहीं होता, ओंकार का रटन करने मात्र से कोई ब्राह्मण नही हो जाता, अरण्य में निवास करने मात्र से मुनिपन प्राप्त नहीं होता और कुश-चीर का परिधान कर लेने से ही तापस का पद प्राप्त नही किया जा सकता। समता से श्रमण, ब्रह्मचर्य से ब्राह्मण, ज्ञान से मुनि और तप से तापस होता है। ध्यानपूर्वक देखने से यह बात असंदिग्ध हो जाएगी कि यहां बाह्य क्रिया मात्र को ही श्रमणत्व, मुनित्व और तापसत्व की कसौटी मानने के अतिरिक्त दृष्टिकोण का निषध है, मगर इन क्रियाओं का निषेध नही है। इस उल्लेख से जो ओकार के जय या ध्यान का निषेध समझते है, उन्हे मुडित होने का तथा अरण्यवास का भी निषेध मानना पड़ेगा। मगर ऐसा मानना जैनाचार की अनभिज्ञता का सूचक होगा। शास्त्राकार का आशय स्पस्ष्ट है कि सिर मुंडा लेने पर भी जब तक समताभाव जागृत नही होता तब तक श्रमणत्व नही आता। ओंकार-ओकार रटने पर भी ब्रह्मचर्य के बिना कोई ब्राह्मण नही कहला सकता। बनवास करने पर भी जब तक सम्यगज्ञान प्राप्त नही होता तब तक मुनित्व की प्राप्ति नहीं हो सकती और कुशवस्त्र धारण कर लेने पर भी बिना तपश्चरण किये किये कोई तापस नहीं हो सकता। बाह्य और आन्तर-आचार का यहां सुन्दर समन्वय किया गया है। एकान्त वाह्याचार को प्रश्रय देने वाले जैसे सन्मार्ग वेत्ता नहीं कहे जा सकते, उसी प्रकार बाह्याचार का निषेद करके एकान्त आन्तरिक-प्राचार का समर्थन करनेवाले भी गलत राह पर चलते हैं। इस प्रकार अनेकान्त दृष्टि को सामने रखकर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रस्तुत गाथा में प्रोकार-जाप का विधान है, निषेध नही । निषेध सिर्फ उसके एकान्त का है ।

[४]
,
ओंकार की निष्पत्ति
1
+
प्रोकार की महिमा, सर्वमान्यता और व्यापकता का दिग्दर्शन
कराया जा चुका है। अगर प्रोकार सम्बन्धी साहित्य का समग्र
संकलन किया जाय तो निश्चय ही एक विशाल ग्रन्थ तैयार हो
सकता है।
इस प्रकरण मे देखना है कि 'ॐ' शब्द किस प्रकार निष्पन्न
हुया है ? इस छोटो-सी गागर मे कौन-सा सागर भरा है ? किस
कारण मनीषी महर्षि उसके महिमागान के लिए प्रेरित हुए है ?
असंख्य मंत्रो मे 'ॐ' को मूर्धन्य स्थान प्रदान करनेवाला तत्त्व क्या है ?
जैसा कि पहले प्रतिपादन किया जा चुका है, ओंकार विभिन्न
साधना-पंथो मे लगभग सर्वमान्य है। इसी कारण उसको निष्पत्ति भी
अनेक प्रकार से की गई है। प्रत्येक निष्पत्ति. उस-उस परम्परा के
दृष्टिकोण को द्योतक है ।
सर्वप्रथम हम जैन मान्यता को लेते है। जैन परम्परा मे परमेष्ठी-
परम-पद में स्थित-देवो और गुरुओ के पांच विभाग किये गये है,
जो इस प्रकार है:-
(१) अरिहन्त
(२) अशरीर (सिद्ध)
(३) आचार्य
(४) उपाध्याय
(५) मुनि (साधु)
इन पांचो परमेष्ठियो के आद्य अक्षर इस प्रकार हैं-अ-अ-मा-उ
-उ-म् । व्याकरण-शास्त्र के अनुसार इन अक्षरो की सन्धि करने
.

१४ ]
[ ओंकारः एक अनुचिन्तन
पर 'ओं' शब्द निष्पन्न होता है । इस प्रकार इस 'ॐ' पद में पांचो
परमेष्ठियों का अन्तर्भाव होता है।
वैदिक परम्परा ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश, यह तीन प्रधान
देवः स्वीकार किये हैं. जो क्रमशः सृष्टि के जनक पालक और प्रलय
कर्ता है । अतएव वे ओकार मे इन्ही तोनो का समावेश करते हैं,
जो इस प्रकार है, -प्रा', शब्द ब्रह्मा का अविष्णु का और 'उ'3 महादेव
का वाचक है। व्याकरण के अनुसार पाXIXउ मिलकर 'ओ'
रूप बनता है। उसको नान्यतर जाति का सूचक 'भू' प्रत्यय लगाने से
'ओ' पद निष्पन्न होता है।
किन्ही-किन्ही ने वासुदेव (विष्णु) वाचक 'अ' महेश्वरवाचक 'उ'
और प्रजापति (ब्रह्मा) के वाचक 'म' के संयोग से 'ॐ' शब्द की
निप्पत्ति बतलाई है।
इन दोनो ही कल्पनाओं का अभिप्राय समान है। दोनों के अनुसार
** क (१) महानिशीथ-पत्र (२) आगमोदय समिति
ख अरिहता असरीरा आयरिया तह उवज्झया म रिगणो।
पढमक्खररिणफण्णो, अोकारो पंचपरमेष्ठी ॥
-रत्नाकर ग्रन्थ
वृहदद्रव्यसंग्रह टीका पृ० १८२
१-२ 'अः' श्रीकण्ठेऽव्ययं तुल्याभावयोः 'आः' पितामहे ।
--विश्वलोचनकोश
३-.'उ' शिवे नाव्ययं तु स्यात्सम्बुद्धी रोषभाषणे ।
-पूर्वोक्त
४-अकारो वासुदेवः स्यात्, उकारस्तु महेश्वरः ।
मकारः प्रजापतिः स्यात्, त्रिदेवोॐ प्रयुज्यते॥

मोंकार : एक अनुचिन्तन ] [ १५ वैदिक-सम्प्रदाय के तीनों मूर्धन्य देव 'ॐ' मे समाविष्ट हो जाते है। कुछ विद्वानों ने 'सो ऽहं' पद से 'ॐ' को निष्पत्ति की कल्पना की. है। 'सो ऽहं', भारतीय शब्द साहित्य में तो महत्त्वपूर्ण स्थान रखता ही है, जन-जीवन मे भी घुल-मिल-सा गया है । वैदिक-परम्परा में इस शब्द का बहुलता से प्रयोग होता है। जैनपरम्परा मे भी इसका प्रयोग देखा जाता है । जैन शास्त्र आचरांग सूत्र के प्रयम अध्ययन के प्रथम उद्दशक में 'सो ऽहं प्रयुक्त हुआ है और अन्यत्र भी। इसी 'सो ऽहं' शब्द से 'ॐ शब्द की निष्पत्ति इस प्रकार की जाती है- सकारंजच हकारञ्च लोपयित्वा प्रयुञ्जते । तात्पर्य यह है कि 'सो ऽहं' शब्द मे से 'स्' का और 'ह' का लोप करके प्रयोग किया जाता है और जब यह दोनो व्यंजन लुप्त हो जाते है तो 'ओ' ही शेष रहता है। स्वामी रामतीर्थ ने 'ॐ' को निष्पत्ति के सम्बन्ध में एक कमनीय कल्पना इस प्रकार की है- 'वच्चा जन्म ग्रहण करता है, उस समय उसकी प्रथम ध्वनि, 'पा-या-आ' निकलती है। वह जव कुछ बड़ा होता है तो 'उ-उ-उ' की ध्वनि निकलने लगती है । और जब वह कुछ और वृद्धिगत होता 'है और उसको बुद्धि संकेत को समझने के योग्य विकास प्राप्त * पुरथिमानो वा दिसानो आगो अहमंसि, जा व अण्णयरीमो दिसायो अणुदिसाप्रो वा आगओ अहमंसि एवमेगेसि जं रणायं भवइ अस्थि मे पाया उववाइए जो इमायो, दिसायो अणुदिसानो वा अणुसंचरइ सोहं, सव्वानो दिसानो-अणुदिसाप्रो वा जो आगओ अणुसंचरइ सोहं । आचारांग १-३ : १६ ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन कर लेती है तो अपनी माता के लिये 'म-म-म' उच्चारण करने लगता है। इस प्रकार 'अ-+उ+म्' के संयोग से ‘ोकार' पद निष्- पन्न होता है। इस कल्पना मे किसी उपास्य देव को स्थान नही है। इसका अभि- प्राय यही प्रतीत होता है कि अोकार मानव-आत्मा की सहज स्फुरणा है, निसर्ग-जात प्रेरणा है या अन्तर मे विद्यमान शक्ति का स्वाभाविक आविष्करण है। 'ॐ' के सम्बन्ध मे ध्यान आकर्षित करने वाली एक कल्पना और है। इस कल्पना मे उसके विराट् स्वरूप का आभास मिलता है। वह इस प्रकार है- अ--अधोलोक ऊ-ऊर्ध्वलोक म्-मध्यलोक इस प्रकार तीनो लोको के वाचक शब्दो के प्रथमाक्षरो से निप्पन्न विराटस्वरूप ओंकार का अभिप्राय यह है कि इसके चिन्तन, मनन और जाप से तीनों लोक हस्तामलकवत् हो जाते हैं, चिन्तनकर्ता त्रिलोकी का अधिपति बन जाता है और वह तीनो लोको के शीर्षभाग---मुक्तालय -को प्राप्त कर लेता है। लोक यद्यपि क्षेत्र-स्वरूप है, मगर क्षेत्र और क्षेत्री के अभेद की विवक्ष से अखिल विश्व का उसमें समावेश हो जाता है। इसका फलितार्थ यह हुआ कि 'ॐ' इस छोटे-से शब्द मे सभी कुछ सन्निहित है। इस कल्पना का विस्तृत विवेचन आगे किया जाएगा। स्वामी भूमानन्द कहते हैं—'उपनिषद् के कथनानुसार ओकार का उच्चारण नहीं हो सकता, क्योकि वह स्वर या व्यंजन नही है और वह कंठ, होठ, नासिका, जीभ, दांत, तालु और मूर्धा आदि के योग से या उनके घात-प्रतिघात के कारण उच्चारित नहीं होता।

ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ १७ नासिका के अन्दर से जो आकर्षण क्रिया शब्दायमान होकर धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठती है, उस शब्द की ओर जरा मन लगाने पर अच्छी तरह समझ में आ सकता है कि वह शब्द अस्पष्ट रूप से ओकार जैसा है। यह शब्द कण्ठ, तालु नादि के घात-प्रतिघात को अपेक्षा नहीं करता। यहां तक कि नासिकागत जो वायु उस आकर्षणात्मक क्रिया का अनुसरण करता है, उसकी भी अपेक्षा नही करता। ओंकार का विश्लेषण करने पर जाना जाता है कि यह 'उ' और 'म' इन दोनो वर्गों की समष्टि मात्र है। यह प्रोकार ऊपर उठने के समय क्रम से 'उ' का परित्याग करके 'म' कार में पर्यवसित या लीन होता है। यह अस्वर 'म' ही साधन है। इसी से उपनिषद् मे कहा है-'अस्वरेण मकारेण यदं गच्छन्त्यनामयम्'। इस अस्वर 'म' कार का शेष अंश ही प्रणव या ओंकार है और उसका निःशब्द मे लय होना ही ब्रह्मानुभूति, आत्मानुभूति, या स्वरूप प्राप्ति है। १ -

ॐ का उद्गम
[पंचनमस्कार मंत्र]
अपवित्रः पवित्रो वा, सुस्थितो दुःस्थितोऽपि वा।
ध्यायेत्पञ्चनमस्कार, सर्वयापैः प्रभुच्यते ॥
-मोकारमंत्रमाहात्म्य
जो मन्त्र संसार के समस्त मन्त्रों में मुकुट-मरिण है, जो समस्त
कामनाओं को कल्पतरु के समान फलीभूत करनेवाला है, लोक मे अनुपम
है, जिसके जाप और ध्यान से मलिन से मलिन आत्मा भी निर्मल,
निर्विकार, निरामय और निरंजन बनकर अनिवर्चनीय एवं अलौकिक
ऐश्वर्य का भागी बन जाता है, त्रिलोकाधिपतित्त्व प्राप्त कर लेता है,
जिसे समन श्रुत-सागर का अमूल्य मुक्ता माना गया है और जिसकी
साधना से कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता, वह महामहिम मन्त्रराज,
नमस्कार मंत्र इस प्रकार है-
णमो अरिहंतारणं
णमो सिद्धारणं
रगमो पायरियारणं
रगमो उवज्झायारणं
एमो लोए सव्वसाहूरणं।
अर्थात् अरिहन्तो को नमस्कार हो, सिद्धो को नमस्कार हो, आचार्यों
को नमस्कार हो, उपाध्यायो को नमस्कार हो, लोक में विद्यमान
सर्व साधुओ को नमस्कार हो।
इस महामंत्र मे पांच पदो को नमस्कार किया गया है अतएव यह
'पंचनमस्कारमंत्र' कहलाता है।

से मार है ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ १६ कोई मनुष्य पवित्र हो या अपवित्र, सुस्थित हो यो दुःस्थित हो अर्थात् आत्मनिप्ठ हो या अनात्मनिष्ठ हो अथवा सोता-बैठा हो या चलता-फिरता हो, यदि वह पंचनमस्कार मंत्र का ध्यान करता है तो सब पापो से सर्वथा मुक्त हो जाता है । सामान्य मनुष्य को तो बात ही क्या, जो सिंह, व्याघ्र प्रांदि तिर्यच जन्मतः मासभक्षी है और जो सर्प आदि जन्तु स्वभाव और जिन्होने सैकड़ों प्राणियो का हनन किया है, सहस्त्रो पापो का आचरण किया है, वे भी अन्तिम समय इस मंत्र की आराधना करके देवगति को प्राप्त करने में समर्थ हुए । नमस्कारमंत्र आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक-सभी विघ्न-बाधाओं को दूर करने वाला है। अन्तःकरण में उत्पन्न होनेवाले राग, द्वेष, चितों, शोक प्रादि, जड पदार्थों के निमित्त से उत्पन्न होने- वाले कष्टो तथा भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, डाकिनो शाकिनी, चुल आदि के द्वारा उत्पन्न होनेवाली वाघानो को शीघ्र और समूल निवारण करने मे इस मंत्र के समान अमोघ साधन अन्य नहीं है। लौकिक और लोकोत्तर-दोनो प्रकार के मनोवाछित सुख इस मंत्रराज के जाप मे निवास करते हैं । आप यदि बुद्धि प्राप्त करना चाहते है, लक्ष्मी को दासी बनाना चाहते है, कोत्ति-कामिनी का वरण करना चाहते है, सिद्धि-वधु से सम्बन्ध स्थापित करने के अभिलाषी हैं, तो आपको इस मंत्रराज की शरण ग्रहण करनी चाहिए। ऐसी कोई लौकिक और लोकोत्तर कामना नही, जिसकी पूर्ति मे यह समर्थ न हो। त्रैलोक्य मे ऐसी कोई महान् और स्पृहणीय वस्तु नही है, जो इस * कृत्वा पापसहस्त्राणि, हत्वा जन्तु शतानि च । अमुमन्त्रं समाराध्य, तिर्यञ्चोऽपि दिवं गताः ।। -ज्ञानार्णव २० ] [ ओंकार :एक अनुचिंतन महामंत्र के द्वारा प्राप्य न हो। अज्ञान, मोह एवं विभ्रम का जो अंधकार सहस्त्रो सूर्य नष्ट नहीं कर सकते, वह भी इस महामंत्र के प्रवल प्रभाव से विनष्ट हो जाता है। यह पंच-नमस्कार जन्म-जन्मान्तर मे किए गए समस्त पापो को विनष्ट करनेवाला है और जगत् के सर्व मङ्गलो मे प्रथम मङ्गल है । इसकी महिमा प्रकट करते हुए कहा गया है- ; जिरणसासणस्य सारो, 'चउदस पुवारण जो समुद्धारो। जस्स मरणे नवकारो, संसारो तस्स किं कुणइ ? ।। जो जिनशासन का सार है और चतुर्दश पूर्वो से जिसका उद्धार किया गया है, ऐसा नमस्कारमंत्र जिसके मन मे स्फुरित रहता है, संसार उसका क्या विगाड़ सकता है। एसो मङ्गलनिलो, भवविलयो सयलसंघसुहजरणो। नवकारपरममंतो, चितिअमित्तं सुहं दे। यह मंत्र मङ्गल का आवास है, भवभ्रमण का अन्त करने वाला है। परम मंत्र है और इसके चिन्तन मात्र से सुख की प्राप्ति होती है । अघुब्बो कल्पतरु, चिंतामरिण-कामकुंभ-कामगवी, जो धायई सकलकालं, सो पावइ सिवमुहं विउलं । नमस्कारमंत्र अपूर्व कल्पतरु, चिन्तामणि, कामकुंभ और कामधेनु के समान है। जो भद्र मनुष्य सदा इसका ध्यान करता है, वह विपुल सिद्धिमुख को प्राप्त करता है। नवकार इक अक्सर, पावं फेडेइ सत्त अयराइं। : पन्नासं च पएणं, सागर पण-सय समग्गेणं । -- . .- . ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [२१ नमस्कारमंत्र के एक अक्षर का ध्यान करने से भी सात सागरोपम काल मे किये गए पाप नष्ट हो जाते है । सम्पूर्ण महामंत्र का ध्यान करने से पांच सौ सागरोपमो मे संचित पापो का विनाश होता है। जो गुणइ लक्खमेगं, पूएइ विहीए जिरणरणभुक्कारं । तित्ययरनामगो, तो पावई सासयं ठाणं । जो पचनमस्कार मंत्र का विधिपूर्वक एक लाख बार जाप करता है, और उसका पूजन करता है, वह तीर्थकर नाम कर्म को उपार्जन करता है और तत्पश्चात् शाश्वत धाम को प्राप्त करता है । अट्ठव अट्ठसया, अट्ठसहस्सं च अट्ठकोडोयो । जो गुणइ नमुक्कार, सो तइयभवे लहइ मोक्खं । जो भक्त आठ करोड, आठ हजार, पाठ सौ आठ वार, नमस्कारमंत्र का जाप करता है, उसे तीसरे भव मे मोक्ष प्राप्त होता है । हरई दुहं कुणइ सुहं, जणइ जसं सोसए भवसमुद्द। इह लोए पर लोए, सुहाण मूलं नमोक्कारो। नमस्कारमंत्र दु.ख को हरण करनेवाला और सुख उत्पन्न करनेवाला है। वह भव-सागर को शोषण करनेवाला और इहलोक मे तथा परलोक मे समस्त सुखो का मूल है । भोयणसमए सयणे, विवोहणे पवेसणे भए वसणे । पंचरणमुक्कारं खलु, समरिज्जा सव्वकालंपि। 1 भोजन करते समय, सोते समय, जागते समय, कही प्रवेश करते समय या वैठते समय, किसी भी प्रकार का भय अथवा संकट उपस्थित होने पर सदाकाल पंचनमस्कार मंत्र का स्मरण करना चाहिए । जैन शास्त्रो मे, प्रचुर मात्रा मे ऐसी 'कथाएँ विद्यमान है जिनमे नमस्कारमंत्र के अद्भुत प्रभाव और सामर्थ को प्रकाशित किया गया है । शूली को सिंहासन के रूप में परिणत करके सुदर्शन श्रेष्ठी के सुयश का विस्तार करना इसी -महान् मंत्र का प्रभाव था। नाग जैसे . 1 ३२] [ ओंकारः एक अनुचिन्तन कर जन्तु को धरणेन्द्र को पदवी पर पहुंचा देने वाला यही मंत्र था। कच्चे धागों बँधो छलनी से, कुएं से पानी निकालना इसी का चमत्कार था। वास्तव में इस मंत्र के प्रभाव से सर्प भी सुमनमाला बन जाता है। विष, पीयूष के रूप में परिणत हो सकता है और भंयकर प्रारणहारी शत्रु भी मित्र बन जाते है। नमस्कार-मंत्र अनादि कालीन मूल-मन्त्र माना गया है। भूतकाल में अंनत तीर्थकर हुए हैं, भविष्यत् में अनेक तीर्थकर होंगे, परन्तु इस महामंत्र की आदि कोई नही जानता ।* क्योकि वह है ही नहीं। जिसकी सत्ता ही नही उसे कैसे जाना जा सकता है ? जैन धर्म मे साधना का केन्द्र विंदु कोई व्यक्ति विशेष नहीं। वह गुणपूंजक धर्म है। उसकी यह विशिष्टता प्रकृत मंत्र में भी पूर्णरूपेण प्रस्फुटित हुई है। यहाँ किसी भी देव विशेष को या व्यक्ति विशेष को नही किन्तु आत्मिक गुणों को विकसित करने वाले~-पाध्यात्मिक विभूति को प्राविभूत कर लेने वाले जो भी महनीय पुरुष हैं, उनको नमस्कार किया गया है। अतएव यह मन्त्र मानव-मात्र की अनमोल निधि है, किसी पन्थ, सम्प्रदाय या परम्परा मे ही उसकी परिधि परि- समाप्त नहीं होती। इसी महामंत्र मे प्रतिपादित पांच वन्दनीय पदो के आद्य अक्षरों से 'ॐ' को निष्पत्ति हुई है, जैसा कि निष्पत्ति प्रकरण में बतलाया जा चुका है। * मागे चौबीसी हुई अनन्ती, होशे वार अनन्त । नवकारतणी कोई याद न जाणे, एम भाये अरिहन्त॥

प्रोंकार का जाप प्रत्येक संसारी आत्मा अपने मूल स्वरूप में मिद्ध है, बुद्ध है, गुन हैं ।* किन्तु अनादि-कालीन कर्म-ग्रावरणो के कारण या यो पाहिए कि वासनामो के संसर्ग से उसकी शक्तिया विकृत, मलीन, या अविकसित अवस्था मे है। यही प्रात्मा और परमात्मा के भेद का कारण है। उचित उपायो द्वारा जव आवरणो का पूर्णरूप से उन्मूलन हो जाता है, वासनाओ का आत्यन्तिक क्षय हो जाता है तो सधन धनघटा के विघटित हो जाने पर जैसे सुधाकर अपने निर्मल-स्वच्छ स्वरूप में प्रकट हो जाता है, उसी प्रकार प्रात्मा भी अपने शुद्ध चिन्मय स्वरूप का लाभ कर लेता है। यात्मिक शक्तियो को मौलिक एवं स्वाभाविक स्वरूप में प्रकट करने मे ओकार मंत्र अत्यन्त उपयोगी होता है। योगियो का अनुभव है कि प्रोकार मे आत्मशोधन की अद्भुत क्षमता है। यही कारण है कि इस महामन्त्र के प्रति इतनी व्यापक श्रद्धा-भावना अज्ञात काल से साधकवर्ग मे चली आ रही है। इस मन्त्र की रचना मे अक्षरो का कुछ ऐसा विन्यास हुआ है, इस प्रकार का सामंजस्य है कि इसका विधिवत्, लालबद्धता के साथ, जाप करने से फेफडो मे श्वास वायु का आवागमन इस रूप में होता है जिससे शरीर के आन्तरिक अङ्गोंपागों को जोवनी शक्ति मे वृद्धि होती * जारिसो सिद्ध सहावो, तारिसो सहावो सव्व जीवाणं -सिद्ध प्राभूत २४ ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन है। स्वास्थ्य स्थिर होता है, बल्कि गया हुआ स्वास्थ्य भी पुनः प्राप्त हो जाता है। अनेक मन्त्र केवल लौकिक सिद्धियां प्रदान करते है तो कुछ ऐसे भी है जो लोकोत्तर सिद्धि के कारण होते हैं, परन्तु ओंकार मे. दोनो प्रकार की , सिद्धियां प्रदान करने की क्षमता है। आचार्य हेमचन्द्र ने बतलाया है कि-स्तम्भन कार्य मे पीत वर्ण के, वशीकरण से लाल वरणं के, शोभरण कार्य में मूगे के वर्ण वाले, विद्वपरण-कार्य मे काले वर्ण के और कर्मों का प्रक्षय करने के लिए चन्द्रमा के समान उज्जवल श्वेत वर्ण ओंकार का ध्यान करना चाहिए। इस विधान से स्पष्ट है कि ओंकार का ध्यान न केवल कर्मक्षय के लिए ही उपयुक्त है वरन् विस्मय जनक लौकिक उद्देश्यो की भी पूत्ति करता है ।* यो तो पुरुषार्थ चार माने गये हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, किंतु इनमे साध्यभूत दो ही हैं-काम और मोक्ष । धर्म, मोक्ष का और अर्थ काम का साधन है। काम का अभिप्राय लौकिक सिद्धि और मोक्ष का मतलब लोकोत्तर आध्यात्मिक सिद्धि समझना चाहिए । ओकार को विद्वज्जन 'काम' भी मानते हैं और 'मोक्षदम्' भी। इसका भी अभिप्राय यही निकलता है कि ओंकार के ध्यान से लौकिक और लोको- त्तर--दोनो प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। ओंकार के ध्यान की विधि पर प्रकाश डालते हुए यही मुनि कहते है-हृदय-कमल के मध्य में स्थित, शब्द ब्रह्म-वचन विलास की उत्पत्ति के अद्वितीय कारण, स्वर तथा व्यंजन से युक्त, पंचपरमेष्ठी के वाचक पीतं स्तम्भेऽरुणं वश्ये, क्षोभणे विद्रुमप्रभम् । कृष्णं विद्व'पणे घ्यायेत, कर्मघाते शशिप्रभम् ।। -योगशास्त्र, ६-३१

ओंकार : एक अनुचिन्तन ]
एवं मूर्धा मे स्थित चन्द्रकला से झरने वाले अमृत के रस से
महामन्त्र प्रणव अोकार का कुम्भक प्राणायाम करके ध्या
चाहिये ।
। तथा हृत्पद्ममध्यस्यं, शब्द ब्रह्मक कारणम् ।
स्वर व्यञ्जनसंवीतं, वाचक परमेप्ठिनः ।
मूर्धसस्थित शीताशु-कलामृतरस प्लुतं ।
कुम्भकेन महामन्त्रं, प्रणवं परिचिन्तयेत् ।।
-योग शास्त्र, ८-२६-३०

[७] जप साधना अपने अभीष्ट मन्त्र अथवा इष्टदेव के नाम का पुनः-पुनः रटन करना जाप कहलाता है । ध्यान में मानसिक एकाग्रतापूर्वक मनन-क्रिया की प्रधानता होती है, जवकि जप मे शब्दोच्चार रटन की मुख्यता है । किन्तु शब्दोच्चार की प्रधानता का प्राशय यह नही समझना चाहिये कि उसमे मानसिक-अवधान की आवश्यकता नही अथवा एकाग्रता के लिए कोई स्थान नहीं। मानसिक अवधानहीन शब्दोच्चार मात्र फलप्रद नहीं होता। अतएव ध्यान की भांति जप मे भी मन की स्थिरता अपेक्षित है। जप और ध्यान मे जो भिन्नता है, वह मन की स्थिरता के तार-तम्य को लेकर ही है। अतएव जिस साधक का मन जितना अधिक एकान होगा, उसका जप उतना ही अधिक फलप्रद होगा। "तो क्या मानसिक एकाग्रता की सिद्धि के बिना जप करना ही नही चाहिये ?" ऐसी बात नहीं है । जप वस्तुतः मानसिक एकाग्रता के अभ्यास का साधन है। जिस साधक का मन पर अंकुश स्थापित हो चुका है और जो उसे किसी भी एक वस्तु पर टिका सकता है, उसके लिये ध्यान की साधना अधिक उपयोगी है। किन्तु जिनकी भूमिका अभी निम्न श्रेणी की है, और जो साधना पथ पर नये ही नये अवतीर्ण हुए है, जो मन को निगृहीत करने मे अपने को असमर्थ पाते है, उन्हे जप साधना करना हितावह है। पवित्र शब्दो के सहारे मन को स्थिर करते करते अन्ततः ध्यानयोग की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। कुछ लोग कहते हैं कि शब्द कितने ही पवित्र क्यों न हो, वारंवार .

ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ २७ उनकी पुनरावृत्ति करने से क्या लाभ है ? मगर ऐसा कहनेवाले जप के अर्थ को सही तौर पर समझे नहीं हैं। जैसा कि अभी कहा जा चुका है, जाप मे केवल शब्दोच्चार नही होता, उसमे मानसिक विचारो का भी योग होता है। जप के शब्द जिह्वा ही उगलती जाती हो, ऐसी बात नही है । आदर्श जप वही है, जिसमे रसना और अन्तःकरण दोनो एका- कार हो जाते हैं । अतएव जिह्वा द्वारा पुनः २ उच्चारित शब्द और अन्तःकरण द्वारा ग्रहण किया हुआ उनका प्रतिविम्ब अन्तरतर मे एक अद्भुत संस्कार उत्पन्न कर देता है। वह संस्कार वार-बार के अभ्यास से पुष्ट, वलिप्ठ, और गम्भीर होता जाता है। करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान । रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निशान ।। विद्यार्थी एक ही बार किसी पाठ को पढकर पाण्डित्य प्राप्त नहीं कर सकता। पाषाण-शिला पर एक बार रस्सी रगड़ देने मात्र से निगान नही बनता। इसी प्रकार एक बार किसी शब्द का उच्चारण कर लेने से ही न चित्त समाहित हो सकता है और न निमित्त संस्कार बद्धमूल हो सकता है। अतएव पावन विचारो की अजस्त्र धारा प्रवाहित करने के लिए, उन विचारो को संस्कार का स्वरूप प्रदान करने के लिये और उन संस्कारो से अनुप्राणित होकर जीवन मे दिव्यता, भव्यता और. विशुद्धता लाने के लिये प्रभु का नाम बारम्बार उच्चारण करना अनिवार्य. है। सामान्य साधक के लिये इससे अधिक उत्तम अन्य कोई साधन नहीं है। जप साधना मे अग्रसर होता हुआ साधक ध्यानयोग मे शनैः शनैः पराकाष्ठा प्राप्त कर लेता है और जन्म-मृत्यु के अनादिकालीन विषम चक्र से मुक्ति प्राप्त कर लेता है । 'ज-प' शब्द मे जो दो अक्षर है- 'ज' और 'प' । विद्वान् 'ज' को जन्म का विनाशक और 'प' को पाप विनाशक मानते हैं. जन्म । * जकारो जन्मविच्छेदः, पकारः पापनाशकः । तस्माज्जप इति प्रोक्तः, जन्म पाप विनाशकः ॥ -आग्नेय पुराण २८ ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन मरण और पाप का अन्त तब ही सम्भव है जब उल्लिखित प्रकार से जप की साधना की जाए। जैसे रसायन के सेवन से शारीरिक शक्ति मे वृद्धि होती है, उसी प्रकार जप साधना से सत्संस्कारो का निर्माण और संवर्धन होता है । जैसे, विषहरण जड़ी से सर्प का विष निश्शेप हो जाता है, उसी प्रकार जप-साधना से मिथ्या दृष्टि और पापवृत्ति का विप उतर जाता है। जैसे १०५ डिग्री ताप से तप्त व्यक्ति के मस्तक पर बर्फ की पट्टी बांधने से ताप मन्द हो जाता है, उसी प्रकार जप साधना से अन्तःकरण का संताप मिट जाता है और आत्मा मे अपूर्व उपशमभाव का प्रादुर्भाव होता है। जैन धर्म में तपश्चरण के बारह प्रकार बतलाए गए हैं। जिनमे अनशनादि ६ बाह्य तप है और विनय आदि ६ अन्तरंग है, जप वस्तुतः तप के अन्तर्गत है और उसमे भी स्वाध्याय तथा ध्यान नामक अन्तरंग तपो में। जप का शाब्दिक रूप स्वाध्याय के अन्तर्गत है तो मानसिक एकाग्रता-रूप अंश ध्यान की कोटि में समाविष्ट किया जा सकता है। इस प्रकार जप दो प्रकार के जपों का सम्मिश्रण है । तप का प्रभाव और महात्म्य अचिन्त्य है। उससे पूर्व संचित कर्मजाल छिन्न-भिन्न हो जाता है और नवीन कर्मों का आगमन रुक जाता है। जैन साहित्य के पारिभाषिक शब्दों मे यही निर्जरा और संवर है जो मुक्ति का साक्षात् कारण है। स्पष्ट है कि जप मुमुक्षु जनो के लिए अतीव श्रेयस्कर है। गीता में 'यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि' कहकर जप की श्रेष्ठता का प्रति- पादन किया गया है। टीकाकार मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि हिंसादि दोषो से शून्य होने के कारण जपयज्ञ अत्यन्त विशोधक है ।

ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [२६ श्रीपादलिप्त सूरि ने जप यो तीन प्रकार यातनाए --(२) मा (२) उपांशु और (३) मानस *। यास्तिलक वायू प में भी न तोन प्रकार प्रतिपादित किए गए हैं, मगर उन्हनि 'भा' - 'वाचक' शब्द का प्रयोग किया है। शब्दभेद होने पर भी बनी एक ही है। भाष्य अथवा वाचक जप में पदोच्चारण को प्रम होती है। जिस जप के शब्दो को समीपवर्ती दूसरे लोग गुन माग भाष्य जप है। जिस जप में स्पष्ट शब्दोच्चार न होकर निर्ण, न होता है, जिसे दूसरा सुन नहीं सकता, उपांशु जाप मालाना 1 जाप वहिर्जल्प और अन्तर्जल्प दोनो से रहित होता है और कि चिन्तन का स्पष्ट रूप प्रकट होने लगता है, वह मानम जप पहना जप के इन तीन प्रकारों पर विचार करने में स्पष्ट हो जाना यह भेद वास्तव मे जप की तीन धोरिगया ही है, जो माध को गोपना के आधार पर वरिंगत की गई हैं। प्रारम्भिका प्रवन्या में सापर मा जप वाचिक होता है, उसमे मानस-प्रवधान को गहरा नहीं जा पाती। मगर लगातार के अभ्यास से वह कुछ आगे बढ़ना है-नगरे नोन पर आरूढ होता है। तब शब्दो मे और मानसिक अवधान में जगे मागम स्थापित हो जाता है। इसके अनन्तर साधक तीसरे सोपान पर आ होकर मानस जप करने में सक्षम बन जाता है। . जप के ये प्रकार उत्तरोत्तर प्रकृष्ठ और अधिकाधिपः पनवाया होते हैं । भाष्य से उपांशु और उपांशु को अपेक्षा मानस जाप ग्राम शतगुणित और सहस्त्रगुणित फलप्रद होते हैं ।। वस्तुतः मानन * प्रतिष्ठा कल्पपद्धति । वचसा वा मनसा वा, कार्यो जाप्यः समाहित स्वान्ते । शतगुणमाद्य पुण्ये, सहस्त्रसंख्यं द्वितीये तु॥

३० ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन से ही ध्यान की साधना का प्रारम्भ होता है। जप का सरल एवं प्राथमिक साधन माला है। माला मे पंचपरमेष्ठी के १०८ गुणो के योग रूप १०८ मरिणयाँ होती हैं। एक बार अभीष्ट मन्त्र का उच्चारण करके एक बार मरिणया सरका दिया जाता है और इस विधि से जप की संख्या निश्चित हो जाती है । जिस साधक के चित्त मे विक्षेप की बहुलता होती है या जिसकी स्मरण शक्ति कमजोर होती है, उसके लिये माला के सहारे जप करना ही अधिक उपयोगी है। परन्तु चित्त की एकाग्रता की दृष्टि से अपनी अंगुलियो के पर्वो पर जप करना अधिक अच्छा है। किस अंगुली के क्सि पर्व से जाप पारम्भ किया जाय और किस अनुक्रम से आगे बढ़ा जाय ? इस संबंध मे. कोई एक निश्चित नियम नही है। विभिन्न प्रयोजनो की सिद्धि के लिए विभिन्न अंगुलियों से जप आरम्भ करने का विधान मिलता है। मारण-उच्चाटन आदि निकृष्ट प्रयोजन वाले अंगृष्ठ से और शत्रु-संहार की दुष्ट भावनावाले तर्जनी से जप प्रारंभ करते हैं। किंतु मुमुक्ष साधक को इस प्रकार की मलीमस भावना को हृदय मे स्थान नहीं देना चाहिए। उसका जप तो पार- मात्मिक गुणो की अभिव्यक्ति के एकमात्र विशुद्ध उद्देश्य से ही होना चाहिये । इस उद्देश्य के लिए अनामिका अंगुली से जाप प्रारम्भ करना प्रशस्त माना गया है। अंगुली के पर्वो से जप करना आवृत्त जप कहलाता है। साधारण- तया आवृत्त पांच प्रकार के है- १ आवृत्त २ शंखावृत्त ३ नन्दावृत्त ४ अोवृत्त ५ होवृत्त - ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ३१ आवृत्तः-अपने दाहिने हाथ की कनिष्ठिका अंगुलो के नीचे के पर्व से प्रारम्भ करके तीनो पर्व गिनें, फिर अनामिका, मध्यमा और तर्जनी के ऊपरी तीन पर्वो की गणना करे तत्पश्चात् तर्जनी का मध्य और, नीचे का पर्व, मध्यमा का नीचे का पर्व, अनामिका का मध्य पर्व और फिर मध्यमा का मध्यम गिने । नौ वार इस प्रकार जप करने से १२x६=१०८ संख्या होता है। यह आवृत्त शीघ्र ही शान्ति तुप्टि और पुष्टि करनेवाला माना जाता है । शंखावृत्तः-मध्यमा अंगुली के मध्यम पर्व से प्रारम्भ करें, फिर अनुक्रम से अनामिका का मध्य पर्व, अनामिका का नीचे का पर्व, कनिष्ठिका का मूल, मध्यम और ऊपरी पर्व फिर अनामिका का ऊपरी पर्व, मध्यमा का ऊपरी पर्व, तर्जनो का ऊपरी, मध्यम और निचला पर्व गिने। इस प्रकार गणना करने से शंखावृत्त होता है। इस आवृत्त से जाप करनेवाला दैवी उपद्रवो से पीडित नही होता। उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। सुख, शांति और धर्य प्राप्त करने के लिए यह प्रावृत्त उपयोगी माना जाता है । नन्दावृत्तः-इसकी गणना का उपक्रम इस प्रकार है:-तर्जनी के ऊपर का, मध्य का और नीचे का पर्व, मध्यमा के नीचे का, अनामिका के नोचे का, मध्य का, और ऊपर का, और फिर मध्यमा के ऊपर का तथा मध्यमा के मध्य का पर्व। इस आवृत्त मे कनिष्ठिका अंगुली त्याज्य है, अतएव बारह बार उक्त क्रम से आवृत्ति करने पर एक माला पूर्ण होती है । यह आवृत्त विशेप रूप से मागलिक माना गया है। इसके जप से शांति, तुष्टि, पुष्टि और आरोग्य की प्राप्ति होती है । प्रावृत्तः-इसका जाप मध्यमा अंगुली के मध्यम पर्व से प्रारंभ -- ३२] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन होता है। तदन्तर अनामिका का मध्यम पर्व, अनामिका का ऊपरी पर्व, मध्यमा का ऊपरी, तर्जनी का ऊपरी, मध्यम और नीचे का पर्व, मध्यमा के नीचे का, अनामिका के नीचे का, कनिष्ठा के नीचे का, मध्य का और ऊपर का पर्व गिनना चाहिए। इस प्रावृत्त का दूसरा अनुक्रम भी है, जो इस प्रकार है: अनामिका के मध्यम पर्व से प्रारम्भ करके, मध्यमा का मध्यम पर्व, मध्यमा का नीचे का पर्व, अनामिका का नीचे का पर्व, कनिष्ठा के नीचे का, मध्य का, और ऊपर का पर्व, अनामिका का ऊपरी, मध्यमा का ऊपरी, तर्जनी का ऊपरी, तर्जनी का मध्य का, और नीचे का पर्व गिनना चाहिए। ॐ श्रावृत्त का तीसरा गणना प्रकार भी है। वह द्वादश अजों के बदले नव अड्को मे भी गिना जाता है । लेकिन उसका महत्त्व अधिक नहीं माना जाता। वह इस प्रकार है:-मध्यमा का मध्यम पर्व, अना- मिका का मध्य पर्व, अनामिका के नीचे का, मध्यमा के नीचे का, तर्जनी के नीचे का- मध्य का और ऊपर का, मध्यमा के ऊपर का, अनामिका के ऊपर का और कनिष्ठा के ऊपर का, मध्य का और नीचे का। जब यही आवृत्त नव अड्डों में गिना जाता है तो अनुक्रम इस प्रकार होता है:-मध्यमा का मध्यम, मध्यमा का ऊपरी, तर्जनी के मध्य का, मध्यमा के नीचे का, अनामिका के मध्य का, तर्जनी के ऊपर का, तर्जनी के नीचे का, अनामिका के नीचे का और अनामिका के ऊपर का। ही आवृत्तः-सर्व प्रथम तर्जनी का ऊपरी पर्व, फिर मध्यमा का ऊपरी, अनामिका का ऊपरी, कनिष्ठिका का ऊपरी, कनिष्ठिका का मध्यम, अनामिका का मध्यम, मध्यमा का मध्यम, तर्जनी का मध्यम, तर्जनी का निचला, मध्यमा का निचला, अनामिका का निचला और कनिष्ठिका का निचला पर्व गिनना चाहिए।

है ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ३३ ॐकार महामन्त्र का जाप करने के लिए ॐ श्रावृत्त सर्वोत्कृष्ट माला के द्वारा या ॐ श्रावृत्त के द्वारा ही इसका जाप करना चाहिए। माला और आवृत्त के अतिरिक्त तीसरी जप विधि भी है जो कमल विधि कहलाती है। इसमे हृदय प्रदेश में एक श्वेत वर्ण कमल का चिंतन किया जाता है । कमल मे आठ पाखंडियो और प्रत्येक पाखुड़ी पर बारह- बारह पीत-वर्ण विन्दुओ को कल्पना करके उनका चिन्तन किया जाता है। किन्तु यह विधि पहुचे हुए साधको के लिये ही उपयुक्त है, साधारण श्रेणी के साधकों के लिए नहीं। अतएव इसका उल्लेख मात्र ही यहा कर दिया गया है।

[८] द्विविध साधना सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर अखिल विश्व एक साधना-सदन-सा प्रतीत होता है। कौन ऐसा प्राणी है जो कामनामय न हो? छोटा हो या बड़ा, सशक्त हो या अशक्त, विकसित हो या अविकसित, महाप्राण हो या अल्पप्रारण, यहां तक कि योगी हो या भोगो, सभी मे किसी न किसी प्रकार की कामना विद्यमान है। प्रत्येक जीव की प्रत्येक प्रवृत्ति किसी न किसी कामना से प्रेरित ही होती है और कामना की पूर्ति के लिये किया जानेवाला उपाय या पुरुषार्थ ही साधना है। जहाँ कामना है वहां साधना है। जब तक कामना है तब तक साधना है। कामना से मुक्ति मिले विना साधना की समाप्ति नहीं होती। अतएव जगत के समस्त प्राणी साधना में निरत है। किन्तु पूर्वकाल मे अजित, संचित एवं सिंचित संस्कारो की और वर्तमानकालीन वातावरण तथा तज्जनित विचारों की विभिन्नता आदि के कारण सवकी कामनाएँ एक-सी नहीं होती। जब काम्य भिन्न प्रकार के होते है, तो उनकी उपलब्धि के उपायो एवं साधनो मे भी भिन्नता होना स्वाभाविक है। मूल रूप मे कामनाएँ दो प्रकार की है-लोकिक और लोकोत्तर । संसार के अधिकाश प्राणी लौकिक कामनायो से ग्रस्त है । कोई धन- सम्पत्ति के लिये समय-असमय का विचार न करके दिन-रात पच रहा है तो कोई सत्ता और प्रभुता की प्राप्ति के लिए जमीन-पासमान एक कार रहा है। कोई गगन-चुम्बी प्रासाद का स्वप्न देखता है तो कोई पत्नी- पुत्र-परिवार आदि की प्राप्ति के लिये प्रयत्नगील है। तात्पर्य यह है कि लोग भौतिक पदार्थों को जुटाने मे ही संलग्न दृष्टिगोचर होते है। ऐसे लोगो का काम्य लौकिक-भौतिक होने से उसके लिए किया जाने वाला पुरुषार्थ भी लौकिक साधना के अन्तर्गत है।

ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ३५ मगर इस प्रकार को साधना वास्तविक साधना नही कही जा सकती। प्रथम तो प्रचण्ड से प्रचण्ड पुरुषार्थ करने वालो मे से भी बहुतो को अभीष्ट सिद्धि-सफलता प्राप्त ही नहीं होती, कदाचित् प्राप्त हो जाय तो उनका अभीष्ट बदल कर दूसरा ही रूप धारण कर लेता है। मानव को कामना मे स्थिरता नहीं होती। एक कामना की पूर्ति होते न होते दूसरी अनेक कामनाएं उत्पन्न होती जाती है। जैसे अपनी प्रतिच्छाया को पकड़ लेना और क्षितिज को छू लेना सम्भव नही, उसी पकार अनि- यंत्रित कामनाओं की पूर्ति होना असंभव है। इस प्रकार एक कामना की पूर्ति होने पर सुख-सन्तोष के बदले नवीन उत्पन्न अनेक अपूर्ण कामनाएँ, चिन्ताएं, उद्विग्नताएँ ही पैदा करती हैं। मान लीजिये-किसी की कामना ने एक सीमा का निर्माण कर लिया और वह पूर्ण भी हो गई है। वह अब सुखी है, सन्तुष्ट है । परन्तु क्या उसका सुख और सन्तोप शाश्वत है ? जिन भौतिक पदार्थो के संयोग पर उसके सुख-सन्तोष का भव्य-भवन खड़ा हुआ है, उनके विनष्ट होते कितने क्षण लगते है ? परिस्थिति का एक ही झंझावात क्या उसे क्षण भर-मे विलग नही कर देता ? तव मनुप्य का वह मधुर-स्वप्न पल-भर मे समाप्त हो जाता है और वह एक करुण दारुण वेदना से अभिभूत होकर कराहता रह जाता है। चलिए, यह भी मान लें कि उसकी सुख-सामग्री स्थायी है और पुण्य के दृढ वन्धन से आवद्ध होने के कारण उससे विलग नही होती, परन्तु उसका जीवन तो ध्रुव नहीं है। एक दिन प्राता है कि वह स्वयं उसे छोडकर किसी अज्ञात रहस्यमय पथ का पथिक बन जाता है और जहा जाता है वहां नये सिरे से अपनी सृष्टि रचता है। पहले का किया- कराया सव धूल मे मिल जाता है । अव लोकोत्तर साधना के सम्बन्ध मे विचार करें। आध्यात्मिक उत्कर्ष की उपलिब्ध के लिए किये जाने वाले उपाय एवं प्रयास लोकोत्तर [ ओंकार : एक अनुचिन्तन साधना है। आध्यात्मिक उत्कर्ष प्राप्त करने का अभिप्राय किसी वाद्य- पर-पदार्थ या उसके आधार पर वैशिष्ट्य प्राप्त करना नहीं है। क्योंकि दे आध्यात्मिक उत्कर्ष की प्राप्ति मे बन्धक हो सकते हैं, साधक नहीं। आध्यात्मिक उत्कर्ष का अर्थ आत्मा को सहज स्वाभाविक शक्तियों का आविर्भाव करना है। वस्तुतः आत्मा और परमात्मा के स्वरूप में कोई मौलिक अन्तर नही है। जो प्रात्मा प्रकृष्ट साधना के बल से कर्मा- वरणों को छिन्न-भिन्न करके अपने असली स्वरूप की प्राप्ति कर लेता है-परिपूर्ण वीतरागतत्त्व प्राप्त करके अनन्त ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य का लाभ कर लेता है, वही परमात्पद का भागी हो जाता है। लोकोत्तर साधना की सिद्धि के लिए भौतिक पदार्थों के आकर्षण से मुक्त होना और अतमुख वनना आवश्यक है। साधक भलीभाति जानता है कि पर-पदार्थों के संयोग मे सुख समझने की अनादिकालोन भ्रान्ति ही दुःखों का वीज है। उनके प्रति जितना अधिक आकर्पण या अनुराग होगा, उतनी ही आकुलता और इतना ही अधिक क्षोभ उत्पन्न होगा। 'पर' के अवलम्बन मे दैन्य है, दुःख है । प्रानन्द तो आत्मा का ही स्वभाव है और इनको प्राप्ति यात्मोन्मुख होने में ही है। इस परम सत्य को हृदयङ्गम कर लेने के कारण साधक वाद्य सुस- साधनों से विरत और आत्म-मरण में निरत हो जाता है । वह जब अपने अन्तरतर की गहराई में डुबको लगाता है तो उसे अपने ही अन्दर अनंत आनन्द का लहराता हुआ सागर दिखाई देता है। इस प्रकार भोतिक वस्तुओ के प्रति उसका अनुराग एवं प्राकरण क्षीण होता जाता है और सहज स्वरूप के प्रति आकर्षण बढता चला जाता है। शनैः २ उसे पूर्ण आत्मनिष्ठा प्राप्त होती है। यह सिद्ध, युद्ध, मुक्त और परमज्योति- स्वरूप वन जाता है। यही मिद्धि है, यही मुक्ति है। यह सिद्धि परम और चरम है, क्योकि परपदार्थ की अपेक्षा न होने से वह शाश्वत है, अनन्त है और उनमे किचित् भी अगरता नहीं होती।

नोंकार : एक अनुचिन्तन ] [३७ तात्पर्य यह है कि लौकिक सिद्धि क्षणिक होती है, लोकोत्तर सिद्धि शाश्वत । लौकिक सिद्धि अनेक आकुलतानी को जननो है, लोकोत्तर सिद्धि अनन्त निराकुलता को उत्पन्न करती है। लोकित सिद्धि से प्रात्मा का भव-भ्रमण बढता है, लोकोत्तर सिद्धि जन्म-मरण के चक्रव्यूह से बाहर निकाल देती है। एक बार उसे प्राप्त कर लेने के पश्चात् कुछ भी प्राप्य नहीं रह जाता | ध्रुव कृतकृत्यता और निप्काम प्रदान करती है। इसी कारण विश्व के मनोषी लोकोत्तर साधना में ही परम निधे यस् मानते है।

[] साधना की समग्रता 'साधना' शब्द से यहां लोकोत्तर साधना ही अभिप्रेत है, क्योकि वही साधक को कृतार्थता प्रदान करती है। प्रश्न यह है कि जिस साधना से आत्मा को पारमात्मिक गुणों की प्राप्ति होती है, आत्मा के समस्त दुःखो को प्रात्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है और वह अपनी असीम समृद्धि के अक्षय कोष का अधिकारी बन जाता है, उसका स्वरूप क्या है ? इस प्रश्न पर विचार करते है तो अनेक दृष्टिकोण हमारे समक्ष उपस्थित होते है। उनमे से एक बहुप्रचलित दृष्टिकोण साधना के तीन रूप स्वीकार करता है जान, कर्म और भक्ति । शास्त्रों का श्रवण, मनन, निदिध्यासन, ध्यान, समाधि आदि का अवलम्बन ज्ञानमार्ग है। निष्काम भाव से अपने-अपने वर्ण और आश्रम के अनुरूप अनुप्ठान करना कर्ममार्ग है। इसमे दान, यज्ञ-याग, जप, तप, वत, नियम आदि कर्तव्यो का समावेश होता है। चित्तवृत्ति का निरन्तर अविच्छिन्न रूप से भगवान् मे लगा रहना अथवा भगवान् मे अनुराग या अनन्य प्रेम होना भक्ति है। प्रभु का स्तवन, संकीर्तन, गुणगान आदि भक्ति मे ही अन्तर्गत है । वौद्धधर्म भावना-प्रचय को मुक्ति का साधन मानता है। अखिल विश्च क्षरण विनश्वर है, दुःखमय है, अगुचि है, पुनः-पुन: इस प्रकार का चिन्तन करने से भावनाप्रचय होता है। इसमे चित्त को समलता का - * योगास्तयो मया प्रोक्ता, नृणा श्रेयोविधिन्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिरच, नोपायोऽन्योऽस्ति कुमचित् ।। --भागवत्, ११-२०-६ . A भोंकार : एक अनुचिन्तन ] [ १६ विनाश और निर्मलता का विकास होता है और निर्यात को प्राप्ति होती है। साल्य नैयायिक प्रादि कतिपय कान तत्वज्ञान से हो मुक्ति-लान का प्रतिपादन करते है। इस प्रकार साधना के सम्बन्ध में मनेस मत प्रचलित है। किंतु उक्त तीन मार्गों में ही किसी न किसी रूप में सब का समावेश हो जाता है। मगर देखना यह है कि क्या उक्त तीन मार्ग परस्पर निरपेक्ष होकर साधक को उसके लक्ष्य तक पहुँचा सकते है ? क्या ज्ञान, फर्म नीर भक्ति तीन मार्ग है अथवा तीनो का समन्वित रूप एक साधनामार्ग है ? कतिपय लोगो की धारणा है कि उपयुक्त तीन साधनो से से किसी भी एक साधन के द्वारा मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। मगर यह धारणा न तो तर्क से और न अनुभव से ही समीचीन प्रतीत होती है । फर्म यदि सुविहित-सुआख्यात हो तो भी वह ज्ञान-निरपेक्ष होफर कार्य- कारी नहीं हो सकता। इसी प्रकार क्रियाशून्य ज्ञान भी सिद्धिप्रद नहीं हो सकता। यह सत्य है कि सभी मुमुक्षु साधको की रुचि, योग्यता या पात्रता एक-सी नहीं होती। एक ही साधक का स्तर भी सदैव समान नही रहता और शास्त्रकारो ने सभी को साधन सुलभ करने का प्रयत्न किया है । तथापि इससे साधना के स्तर में ही भेद हो सकता है, मार्ग में नही। प्रत्येक कार्य को निष्पत्ति किसी एक कारण से कदापि नही होती, उसके लिये कारणो की समग्रता अनिवार्य है। इस नियम के अनुसार मुक्ति प्राप्त करने के लिये जिन कारणो की अनिवार्य आवश्यकता है, उनकी समग्रता ही साधना का राजमार्ग हो सकता जैन धर्म प्रत्येक क्षेत्र में अनेकान्तवाद को प्रश्रय देता है, क्या तत्त्व- दर्शन के क्षेत्र में और क्या साधना-क्षेत्र में, उसका दृष्टिकोण सदा-सर्वदा अनेकान्तात्मक ही रहता है। इस दृष्टिकोण के अनुरूप उसने सभ्यग्ज्ञान ४० ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन और सम्यक्-क्रिया को सम्मिलित को साधना का स्वरुप स्वीकार किया है। वस्तु-स्वरूप को जान लेने मात्र से अथवा अनजाने प्रिया करने मात्र से सामान्य लौकिक सिद्धियां भी प्राप्त नहीं की जा सकतो तो अनादिकालीन विकार-संस्कारो की गहरी जडो का उन्मूलन कैसे किया जा सकता है ? आत्मिक विकास की उच्चतम भूमिका किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है ? जो रोगी निरोग होना चाहता है, उसे रोग के स्वरूप को समझना पड़ेगा, रोग के कारणों को जानना पड़ेगा और उसके निवारण के लिए उपयुक्त औषध को भी समझना होगा। किंतु यह सब जान लेने से हो नीरोगता प्राप्त नहीं की जा सकती। उसके लिए ग्रीषध का सेवन भी करना पड़ता है। स्पष्ट है कि न तो प्रीषध के ज्ञान मात्र से प्रारोग्य लाभ किया जा सकता है और न अनजाने किसी भी प्रीपघ के सेवन से ही। प्रारोग्य लाभ के लिए प्रौपघ का ज्ञान और सेवन दोनो जैसे अनिवार्य है, उसी प्रकार यात्म शुद्धि के लिये ज्ञान और क्रिया की आवश्यकता होती है। प्राचार्य शय्यंभव ने दशवकालिक सूत्र मे साधना का अनुक्रम प्रदगित करते हुए कहा है- साधक के लिए आवश्यक है कि वह प्रथम सम्यग्ज्ञान प्राप्त करें, फिर तदनुकूल अनुष्ठान को अपनाएँ क्योकि अज्ञानो प्राणी अपने यस अश्रेयस को नहीं समझ सकता। जो साधक जड़-चेतन के भेद को नही जानता यह संयम को भी नहीं जान सफता। संयम के वास्तविक स्वरूप को समझने के तिये जड़ और चेतन के स्वरूप का भान होना अनिवार्य है। * नारकिरियाहि मोक्सो। 1 देखिये दशवकालिक मूत्र अध्ययन ४ गाया १०-२५ ।

ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ४१ जड़-चेतन का स्वरूप परिज्ञान हो जाने पर ही जीवो की नाना गतियो एवं योनियो का परिज्ञान होता है और तब पुण्य और पाप की कसौटी हाथ लगती है। जव पुण्य-पाप और वन्ध-मोक्ष की कसौटी हाथ आती है तो साधक के चित्त को दैवी और मानवी भोगो के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है। जव भोग के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है तब साधक बाह्य- संयोग-धन-धान्य, पुत्र कलत्र आदि और आभ्यान्तर संयोग-क्रोध, मान, माया, लोभ आदि का त्याग कर देता है। वाह्याभ्यन्तर संयोग का त्याग कर देने पर प्रव्रज्या अङ्गीकार करता है, तदन्तर उत्कृष्ट संवर एवं अनुत्तर धर्म की आराधना करके कर्म-रज को हटा देता है और सर्वज्ञ-सर्वदर्शी होकर परमात्मपद प्राप्त करता है । परमात्मपद प्राप्त होने पर आत्मा जीवन्-मुक्त दशा का अनुभव करने लगता है और फिर अनुक्रम से विदेह मुक्ति प्राप्त करता है । इस प्रकार ज्ञानार्जन से प्रारम्भ हुई साधना क्रियात्मक बनकर विदेह-मुक्ति में पर्यवसित होती है। अनेकान्तवाद का यह समन्वयवादी स्वर जैन परम्परा की परिधि में हो नही घिरा रह सका। बाहर भी उसकी गूज सुनाई देती है । महर्षि हारीत ने भी उसी स्वर को दोहराते हुए कहा है जैसे पंछी आकाश मे दोनो पंखो के सहारे ही गति कर सकता है, एक पंख से नही, उसी प्रकार शाश्वत ब्रह्म की उपलब्धि ज्ञान और क्रिया के समुचित समन्वय से ही सम्भव है। कुछ लोग समझते हैं कि अकेले ज्ञान से या कर्म से या अकेली भक्ति से साधना सफल हो सकती है, वे भ्रम मे है। उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणा गतिः । तथैव ज्ञानकर्मभ्यां, प्राप्यते ब्रह्म शाश्वतम् ।। --हारीतसंहिता ४२ ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन वह वटोही कैसे अपनी मंजिल तक पहुँचेगा जिले यही मालूम नहीं कि मंजिल क्या है, कहाँ है ? मंजिल तक पहुंचने की राह कौन-सी है? जो नेत्र वन्द करके चला जा रहा है और चलता ही जा रहा है, वह जीवन पर्यन्त चलने के पश्चात् भो अन्त में असफलता का ही भागी होता है। इसी प्रकार जो साध्य के स्वरूप को समझता है, साधनो से भली- भांति अभिज्ञ है और पथ से परिचित है, अपने प्रसर पाण्डित्य से साधना के सम्बन्ध मे प्रभावशाली प्रवचन करके दूमरो का पथ-प्रदर्शन कर सकवा है, वह यदि साधना के पथ पर एक डग भी नही रसता तो किस प्रकार सम्भव है कि यह अपनी मंजिल तक पहुंच सकेगा ? जैनागमो मे कही २ ज्ञान और क्रिया (चारिन) के साथ सम्यग- दर्शन को भी साधना का अङ्ग स्वीकार किया गया है। और यही सम्यक्तप को सम्मिलित करके साधना का चतुर्मुखी स्वरूप माना गया है। किंतु इसमे विरोध जैसी कोई वस्तु नहीं है। यह विभिन्न योग्यता के पात्रो को समझाने की शैली है। सम्यग्दर्शन का ज्ञान मे और तप का क्रिया मे समावेश होता है। कही संक्षेप मे और कही विस्तार मे प्रति- पादन करना सहृदय शास्त्रकारो की पद्धति रही है। उल्लिखित ज्ञानमार्ग, कर्ममार्ग और भक्तिमार्ग भी सम्यगनान, सम्यग्दर्शन, सम्यक् चारित्र और सम्यक्तप मे समाविष्ट हो जाते हैं। ज्ञानमार्ग सम्यज्ञान मे, कर्ममार्ग सम्यकचारित्र में और भक्तिमार्ग सम्यक तप मे समाविष्ट है। । सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः । नत्वा मूम । - नाणं च दंसणं चेव चरित्त च तवो तहा। एयमग्गमगुप्पत्ता जीवा गच्छति सोग्गः॥ -उत्तग०३२-३ ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ४३ हाँ, यह नही भूल जाना चाहिए कि जैनधर्म का अपना एक विशिष्ट मौलिक और उदार दृष्टिकोण है। अपने दृष्टिकोण के वैशिष्टय के कारण उसकी कर्म आदि को व्याख्याएँ भी विशिष्ट है। जैनधर्म आश्रम व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता और वर्ण व्यवस्था को सिर्फ सामाजिक व्यवस्था मानता है। वह मानव-मानव के बीच कोई जन्मजात उच्चता-नीचता स्वीकार नहीं करता। सबको समान अवसर और अधिकार के सिद्धान्त की हिमायत करता है। अतएव लोकोत्तर धर्म-साधना मे पाश्रम या वर्ण के भेद से कर्म (चारित्र) का भेद वह अनुचित मानता है। यह सम्भव नही कि ब्राह्मण होने के कारण एक व्यक्ति शास्त्र का पठन-पाठन करके मोक्ष प्राप्त करे और दूसरा शूद्र होने के कारण सेवा द्वारा वही मोक्ष प्राप्त कर ले; वास्तव में साधक मात्र के लिये, चाहे वह किसी भी वर्ण या आश्रम मे हो, कर्म या सम्यक्चारित्र का एक ही रूप है। अलवत्ता परिस्थिति और योग्यता सवकी समान नहीं होती, अतएव उनके विकास एवं विकास के वेग मे अन्तर हो सकता है, किंतु चरम विकास करने का अधिकार सबको समान है। उनके विकास का मार्ग भी एक ही है। भक्तिमार्ग के विषय मे अलग परिच्छेद मे विचार करेंगे। . Pr । ।

[१०]
शक्ति है। परन्तु
साधना का सर्वस्व : मनोविजय
आत्मा के अस्तित्व की अभिव्यक्ति का प्रधान साधन, आत्म-गापारी
का सर्वाधिक प्रभावशाली और समर्थ वाहन तथा इस विराट् जगन् के
साथ आत्मा का अनुसन्धान करने वाला मन ही है । मन आत्मा का
वह अद्भुत द्वार है जिससे चिन्तन-मनन सामने आते हैं। मन नेतन-देव
का महामात्य है, जिसके विना उसका घडी भर भी काम नहीं चलता।
सचमुच मन में असाधारण क्षमता है, वेग है। हम जो भी सोचते,
समझते, चिन्तन करते और तर्करणा करते हैं, सब मन की शक्ति के
द्वारा ही करते हैं।
मन स्वयं आत्मा की
मूल्यवान्
शक्ति का उपयोग
सदैव दोहरा होता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि शक्ति
दुधारी तलवार है। शक्ति के सदुपयोग से जहां शक्तिमान् को बल और
सफलता मिलती है, वही दुरुपयोग से उसका विधात, हास
और पतन होता है। मन के विषय मे भी यह सत्य पूरी तरह
लागू होता है।
हमारे भावी श्रेयस्-अश्रेयस् का मन के साथ कितना गधन्य है,
यह तथ्य अनुभवियो की इसी उक्ति से प्रकट है:
मन एव मनुष्याणां कारणं वन्धमोटायोः ।
आत्मा का वधन और मोक्ष मनोव्यापारो पर निर्भर है। मन उसे
प्रगाढ़ बन्धनों मे प्रावद्ध करके नरक और निगोद की स्थिति में भी से
जा सकता है और मुक्तिधाम में भी पहुंचा सकता है ।
मन के इसी महत्व के कारण उनकी साधना का विशेष महतो।
मन की साधना के विषय में प्रात्मवेता महगियों ने बहुत सोचा और

। ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ४५ लिखा है । यहा तक कि शास्त्र की एक पृथक् शाखा का निर्माण किया और उसके निग्रह की विधि प्रदर्शित की है। मन अत्यन्त चंचल है, साहसिक है और हठोला है। जैसे गेद को नीचे पटका जाय तो वह और अधिक ऊपर उछलती है, उसी प्रकार ज्यो-ज्यो मन को स्थिर करने का प्रयत्न किया जाता है, त्यो त्यो वह अधिक गतिशील होने लगता है। ऐसी स्थिति मे उस पर नियंत्रण स्थापित करना आसान नही, तथापि असम्भव भी नही है । मन कितना ही जवर्दस्त क्यो न हो, आखिर तो आत्मा का ही एक उपकरण है । आत्मा उसको अपेक्षा अधिक शक्तिसम्पन्न है। अतएव उसका निग्रह सम्भव है। गीता मे कहा गया है-निसन्देह मन चपल है और उसे नियंत्रित करना कठिन है, तथापि लगातार अभ्यास करने से और वैराग्य का आश्रय लेने से वह वशीभूत हो सकता है ।* 'योग-सूत्र' ने भी गीता का समर्थन किया है । महाप्राण केशी श्रमण ने गौतम स्वामी के समक्ष रहस्यपूर्ण शब्दों मे एक समस्या रक्खी-गौतम ! यह दुष्ट अश्व वडा साहसी-सहसा प्रवृत्ति करनेवाला और भयानक है। तुम इस पर आरूढ हो किंतु यह तुम्हारा अपहरण नहीं कर पाता। इसफा क्या कारण है ? गौतम, केशी के इंगित को तत्काल समझ गए। बोले-जव यह हठीला घोड़ा भागने लगता है तो मैं इसे 'श्रुत' की लगाम लगाकर थाम * असंशयं महाबाहोः मनो दुर्विग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय, वैराग्येण च गृहयते ।। गीता अ०६० श्लोक ३५ * अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः। -योगसूत्र ४६ ] [ ओंकार : एक अनुचिंतन लेता हूं। लगाम से घाम लेने के बाद यह उन्मार्ग में जाने से एक जाना है और समीचीन मार्ग पर ही चलता है। प्रश्न और उत्तर हो गया किन्तु गांठ अनखुली रह गई। तब फेगी स्वामी ने पूछा---गौतम ! आखिर यह अश्व है कौन ? गौतम ने कहा-महाराज ! यह मन ही दुष्ट अश्व है, जिसे मैं 'धर्मशिक्षा' से वशीभूत करता हूं। गीता और योग सूत्र के शब्दो में अभ्यास और वैराग्य कह लोजिए, चाहे उत्तराध्ययन सूत्र के शब्दो मे 'धर्मशिक्षा' कहिए, कोई वास्तविक अन्तर नही है। इन सब उल्लेखों से यह स्पष्ट है कि मन का निग्रह किया जा सकता है। वह दुर्जेय भले हो, अजेय नहीं है। उस पर पूरी तरह नियन्त्रण स्थापित करने के लिये धर्म शिक्षाप्रो पर अमल करना आवश्यक है। आचार्य हेमचन्द्र ने मनोविजय के सम्बन्ध मे बहुत सुन्दर कहा है- निरंकुश मन राक्षस है जो निःशंक होकर दौड़धूप करता रहता है और तीनो जगत् के जीवो को मंसार रूपी गड्ढे में गिराता है। + अयं साहसिओ भीमो, छुस्सो परिधावइ । जंसि गोयमः पारढो, कहं तेण न हीरसि ।। पधावन्तं निगिण्हामि, सुयरम्सी समाहियं । न मे गच्छई उम्माग्गं, मग्गं च पटिवजय। आसे य इह के वृत्ते ? केसी गोयममव्ययी। केसोमेवं बुवंतं तु, गोयमो गमव्यवी। मरणो साहसियो भीमो, दुट्टस्सो परिधावइ । तं मम्मं तु निगिण्हामि, धम्मसिमपार कंधगं । --उत्तराध्ययन, २३-५५-५.८ योगमात्र, चतुर्थ प्रकाश मोंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ४७ से रुक आंधी की तरह चंचल मन मुक्ति प्राप्त करने के इच्छुक और तीव्र तपश्चर्या करने वाले मनुष्य को भी कही का कही ले जाकर पटक देता है। अतः मन का निरोध किये बिना जो योगी होने का निश्चय करता है, वह उसी प्रकार हँसी का पात्र बनता है जैसे कोई पंगु पुरुष एक गाव से दूसरे गांव जाने की इच्छा करके हास्यास्पद बनता है। मन का विरोध होने पर कर्म भी पूरी तरह जाते है क्योकि कर्म का प्रास्त्रव मन के अधीन है। जो पुरुष मन का विरोध नहीं कर पाता, उसके कार्यो की अभिवृद्धि होती रहती है। अतएव जो कर्मो से मुक्ति चाहते है, उन्हे समग्न विश्व मे भटकने वाले लंपट मन को रोकने का प्रयत्न करना चाहिए । यदि मन की शुद्धि हो गई है तो समझ लीजिये कि अविद्यमान क्षमा आदि गुरण भी विद्यमान ही है, क्योकि मनः शुद्धि वाले उन गुणो का फल सहज ही प्राप्त हो जाता है। यदि मनः शुद्धि नही हुई है तो क्षमा आदि गुणों का होना भी न होने के समान है। जो मन को शुद्ध किये विना मुक्ति के लिए तपस्या करते है, वे नौका को त्याग कर भुजाओ से महासागर को पार करना चाहते है । जैसे अंवे के लिये दर्पण व्यर्थ है; उसी प्रकार मन की शुद्धि किये बिना तपस्वी का ध्यान करना निर्रथक है। मन की शुद्धि के अभाव मे तपश्चरण, श्रु ताभ्यास एव महाव्रतो का पालन करके काया को क्लेश पहुँचाने से क्या लाभ मन को शुद्धि करके ही राग-द्वीप पर विजय प्राप्त की जाती है, जिसके प्रभाव से मात्मा मलीनता को त्याग कर अपने शुद्ध स्वरूप मे स्थित होता है।

[११] - ध्यान-योग ध्यान का स्वरूप जैसा कि बतलाया जा चुका है. मनुष्य का मन प्रचण्ड पचन के आघात से क्षुब्ध सरोवर के समान है। वह कभी इस यन्तु का तो कभी उस वस्तु का चिन्तन करता रहता है। उसमे स्थिरता नहीं होती यह निरंतर चंचल दना रहता है । इस चंचलता को रोक कर उसे एक निष्ठ बनाना ही ध्यान है ।* प्राचार्य नेमिचन्द्र ने परम ध्यान का स्वरूप इस प्रकार बताया है- शरीर से कोई चेष्टा मत करो, वाचनिक व्यापार को बंद कर दो और मन से चिन्तन मत करो। इस प्रकार करने से मन वचन और काम के व्यापार का निरोध हो जाएगा। यह आत्मनिर्भरता गा तल्लीनता ही परम ध्यान है। उल्लिखित दोनो लक्षणों मे किंचित् पार्थक्य दृष्टिगोचर होता है। प्रथम लक्षण मे मनोव्यापार को किसी भी एक ध्येय वस्तु में स्थापित करना ध्यान बतलाया गया है जबकि दूसरे लक्षण मे मनोव्यापार का निरोध करके श्रात्मा का प्रात्म मे लोन होना ध्यान कहा गया है । गिन्तु यह पार्थक्य ध्याता की भूमिका के भेद के कारण हैं। इसमे तात्विा भेद नही । ध्यान की प्रारंभिक स्थिति में राग-द्वप आदि का निवारण करने के लिए सविकल्प ध्यान ही संभव है। उसमे परद्रव्य पा चिन्तन होता है। किन्तु जब अम्यास परिपक्य हो जाता है तो शुल-युन स्वभावान * उत्तममंहननस्यैकाग्र चिन्ता विरोधो ध्यानम् | अ. ६.२८ गत्वार्थमूत्र, मुहूत्तन्तिमंनः स्थर्य ध्यानं छपन्धयोगिनाम् । -प्राचार्य हमनन्द्र

ओंकार : एक अनुचिन्तन ]
[ ४६
निजात्मा ही ध्येय रह जाता है। उस समय पंचपरमेष्ठी आदि पर द्रव्य
नहीं रहते। उस स्थिति मे ध्यान, ध्याता और ध्येय का विकल्प हट
जाता है। आत्मा ही ध्यान बन जाता है। यह उच्चकोटि का ध्यान
निर्विकल्प या परम ध्यान कहलाता है।
ध्यान करने से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है, आत्मज्ञान से कर्म
का क्षय होता और कर्म क्षय से मोक्ष प्राप्त होता है। अतएव ध्यान
आत्मा के कल्याण का कारण है ।*
ध्यान के माध्यम से ही मुनिजनो को निश्चय और व्यवहार मोक्ष
मार्ग को प्राप्ति होती है, अतएव चित्त की एकाग्रता साध कर ध्यान का
अभ्यास करना चाहिये।
ध्याता
मगर ध्यान की सिद्धि के लिये अनिवार्य योग्यता पहले प्राप्त कर
लेना आवश्यक है । कपाय विजय के बिना आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता।
कषाय विजय के लिए इन्द्रिय विजय अपेक्षित है, इन्द्रिय विजय के लिए
मनः शुद्धि आवश्यक है, मनः शुद्धि के लिए रागद्वष को जीतना
आवश्यक है, राग-द्वेष को जीतने के लिए समभाव का अभ्यास
चाहिये और उसके लिए निर्ममत्व भाव अनिवार्य है, इस प्रकार
कार्य कारणभाव की प्रक्रिया पूर्ण होने पर ध्यान की योग्यता
प्रकट होती है। इतनी योग्यता प्रकट होने पर ध्यान करने मे
-
* मोक्ष : कर्मक्षयादेव स चात्मज्ञाननो भवेत् ।
ध्यानसाध्यं मतं तच्च तद् ध्यानं हितमात्मनः ।
-योगशास्त्र, ४, ११३.
+ दुवहिं पि मुक्खहेउं झाणे पाउणदि जं मुणी णियमा ।
तम्हा
पयत्तचित्ता जूयं
झारणं समन्भसह ॥
-बृहद्रव्य संग्रह, ४७

५० ]
[ ओंकारः एक मनुचिन्तन
सफलता प्राप्त होती है। प्राचार्य नेमिचन्द्र ने बतलाया है कि जो साता
अपने चित्त को स्थिर करना चाहता है अर्थात् ध्यानसाधना में सफल
होना चाहता है, उसे इष्ट और अनिष्ट पदाथों में राग-द्वप और मोह को
वृत्तियों से दूर हो जाया चाहिये। इसके अतिरिक्त जो साधक तप,
श्रुत और व्रत का धारक होता है, वही ध्यान रुपी रथ की धुरा को
धारण कर सकता है, अतएव ध्यान की प्राप्ति के लिए तप, श्रुत और
व्रतों की आराधना करना अनिवार्य है।
आचार्य हेमचन्द्र ने घ्यान करने वाले साधक मे निम्न लिगिन गुणों
की संख्या प्रतिपादित की है-
(१) संयम के प्रति इतनी गहरी निष्ठा हो कि प्राण-सलट मे याने
पर भी उसका परित्याग न करें।
(२) समस्त प्राणियों को प्रात्मवत् समझे।
(३) ध्येय-लक्ष्य से च्युत न हो।
(४) सर्दी, गमी या वायु से खिन्न न हो।
(५) योग रूपी अमृत-रसायन का पान करने का एच्छुक न हो।
(६) राग-द्वेप से अामान्न न हो।
(७) क्रोधादि कपायो का विजेता हो ।
(८) मन को आत्माराम मे रमण करानेवाला हो।
(5) सब कर्मों मे अलित रहे ।
(१०) कामभोगो से विरक्त हो ।
| मा मुग्झह मा रजह मा दुराह दुनिट्ट प्रमु ।
थिरमिच्छहि जइ नित्तं विचित्त भागाप्य लिहाए ।
तवमुदवदव नेदा मागरह धुग्धगे हो जना।
तन्हा
तत्तियनिग्या तलदीए
युवक मगर, ४८, .:.
गर॥

ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [५१ (११) शरीराशक्ति से परे हो । (१२) संवेग के सरोवर मे निमग्न रहता हो । (१३) शत्रु-मित्र, स्वर्ण-पापारण, निदा-स्तुति, मान-अपमान मे सम- भाव रखने वाला हो। (१४) सबके कल्याण का अभिलाषो हो । (१५) करुणावान् हो। (१६) सासारिक सुखो से विमुख न हो। (१७) परीपह-उपसर्ग पाने पर भी सुमेरु की तरह अचल रहे । (१८) चन्द्रमा के समान सौम्य और वायु के समान निःसंग हो। (१६) प्रशस्त बुद्धि वाला हो। ध्येय - ध्यान के स्वरूप और ध्याता की योग्यता को समझ लेने के साथ ही 'ध्येय' को जान लेना भी आवश्यक है। ध्यान-अवस्था मे मन जिस वस्तु पर केन्द्रित किया जाता है या जिसका चिन्तन किया जाता है, वह ध्येय कहलाता है। ध्येय चार प्रकार के होते हैं-(१) पिण्डस्थ (२) पदस्थ (३) रूपस्थ और (४) रूपातीत । इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है- (१) पिण्डस्थः-पिण्ड अर्थात् शरीर मे स्थित आत्मा। उसका चिन्तन जिस ध्यान में किया जाता है वह पिण्डस्थ कहलाता है । शरीरस्थ आत्मा का ध्यान करने के लिये पाँच प्रकार की धारणाग्रो का अवलम्बन करना पड़ता है-(१) पार्थिवी (२) आग्नेयी (३) मारुती (४) वारुणी और (५) तत्त्वभू । (१) जिस पृथ्वी पर हमारा निवास है, उसका नाम मध्यलोक है। इस मध्यलोक के बराबर विशाल क्षीर- सागर का चिन्तन करना चाहिए। क्षीरसागर मे जम्बूदीप के बरावर एक लाख योजन विस्तार वाले, स्वर्ण के समान आभा वाले और हजार पंखुड़ियो वाले कमल का ५२ ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन चिन्तन करना चाहिए। उस कमल के मध्य में केसराएँ हैं मोर पो. वर्ण को प्रभा से युक्त और मेरु पर्वत के बराबर एक लाय योजन ऊँगी कणिका है। उस करिएका के ऊपर एक अतीव उज्ज्वल सिंहासन है. जिस पर मैं आसीन हूं और कर्मो का क्षय करने में उद्यत है। ऐसा चिन्तन करना पार्थिवी धारणा है। (२) आग्नेयी धारणा में नाभि के भीतर सोलह पातुड़ियों के कमल का चिन्तन करना चाहिए। उस कमल की करिणका पर 'मह स्थापित करना चाहिए और प्रत्येक पत्ते पर अनुमाम से प, या, इ, ई, उ, ऊ, ऋ. ऋ, लु, लु, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, यह सोलह स्वर स्थापित करना चाहिए। - - तत्पश्चात् हृदय मे आठ पंसुडियों के कमल का निन्तन करना चाहिए। उसकी पंखुडी पर अनुशाम से ज्ञानावरण आदि आठ कर्म स्थापित करना चाहिए। यह कमल अधोमुग हो । तत्पश्चात् रेफ, कला कौर विन्दु से युक्त, 'ह' इस अक्षर के रेफ मे मे धीमी-धीमी निकलने वाली धूमसिसा का चिन्तन करना चाहिए। फिर उगमे में अग्नि की चिनगारियो के निकलने का, फिर ज्वातामों का चिंतन करना चाहिए। इन ज्वालानो से हृदय स्थित पूर्वोक्त आठ दलों वाले कान को दग्ध करना चाहिए और सोचना चाहिए कि महामंग 'आई' थे. यान से उत्पन्न हुई प्रवल अग्नि अवश्य ही कर्मयुगत पमल को भाग पर देती है। युक्ता पर तत्पश्चात शरीर से बाहर निकोण रान्तिक में अग्नि-वीज 'रेफ' से युक्त जलते हुए बहीर का मिला मना चाहिये । तदन्तर गरीर के अन्दर महामंत्र के ध्यान में उपन: शरीर को ज्वाला से बाहर को बलिपुर पो ज्याना देर में प्रोन पगा को तत्काल भम्म करके अग्नि शान्त हो गई है, ऐगा चिन्तन परना नाहिए। यह ग्राग्नेयी धारणा है।

मोंकार : एक अनुचिन्तन ] [५३ (३) माग्नेयो धारणा के पश्चात् प्रचण्ड पवन का चिन्तन करना चाहिये मोर सोचना चाहिए कि देह और पाठ कर्मों के जलने से जो राख बनो थी; वह उड़ रही है। ऐसा दृढ चिन्तन करके पवन को शान्त कर देना चाहिये । यह वायवी धारणा है। (४) वारुणी धारणा मे अमृत सी वर्षा करने वाले और मेघ मालामो से व्यस्त आकाश का चिन्तन किया जाता है। तत्पश्चात् अर्ध- चन्द्राकार कला विन्दु से युक्त वरुण वीज 'व' का चिन्तन करना चाहिये । फिर यह चिन्तन करना चाहिये कि 'व' से उत्पन्न अमृत के समान जल से आकाशतल भर गया है और पहले उड़ी हुई भस्म इस जल से धुल कर साफ हो रही है। (५) पूर्वोक्त चार धारणाये करने के पश्चात् रस रक्त आदि सात धातुओ से रहित, पूर्ण चन्द्र के समान निर्मल एवं उज्ज्वल क्रान्ति वाले तथा सर्वज के समान शुद्ध प्रात्मस्वरूप का चिन्तन करना चाहिए। तत्पश्चात् सिंहासन पर आरूढ़, सर्व अतिशयो से सुशोभित, समस्त कर्मों का विध्वंस करने वाले, उत्तम महिमा से सम्पन्न अपने शरीर में स्थित निराकार आत्मा का चिन्तन करना चाहिए। इस प्रकार का चिन्तन पिण्डस्थ ध्यान कहलाता है । इस ध्यान के प्रभाव से मोक्ष-मुख की प्राप्ति होती है। इसका निरन्तर अभ्यास करने से मारण उच्चाटन आदि विद्याएँ, तथा सिंह सर्प आदि हिंसक प्राणी दूर रहते है। वे इस योगी के तेज को सहन नही कर सकते ।* (२) पदस्थ पवित्र मंत्राक्षर रूप पदों का पालम्बन करके जो घ्यान किया जाता है, वह पदस्थध्येय के कारण पदस्थ ध्यान कहलाता | इस ध्यान मे चिन्तनीय पद अनेक प्रकार के हैं । साधक अपनी रुचि * देखिये योग शास्त्र का सप्तम प्रकाश ।

५४ ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन या इच्छा के अनुसार उनने ने किसी का भी ध्यान करता है। संतोन अक्षर वाले नमस्कार मंत्र का 'अरिहंत-सिद्ध-प्रायरिय उवाय गार' पोडगाक्षरी विद्या का, अरिहतसिद्द' इस षडक्षरी मंग का, 'ग-सि-पा- उ-सा' इस पंचाक्षरी का, 'ॐ अह' का अथवा एकाक्षरी मंग 'ॐ' का ध्यान किया जाता है। (३) रूपस्थ समवसरणमे स्थित अरिहन्त परमात्मा स्पस्य 'येग है। उनका चिन्तन करना रूपस्थ ध्यान है। इस ध्यान में शान में व्याता को ऐसा चिन्तन करना चाहिए-समस्त कर्मों को विध्वस्त कर देने वाले, देशना के समय देव रचित तीन प्रतिविम्बो के कारण चतुर्मुग दिखाई देने वाले, तो न उज्ज्वल छत्रो से सुशोभित, सूर्यप्रभा का भी तिरम्- कार करने वाला या मंडल जिनके पीछे जगमगा रहा है, दिग दभि का निर्घोष जिनकी आध्यात्मिक सम्पदा का गान कर रहा है, गणार करते हुए भ्रमरो की झंकार से गन्दायमान अगोक वृक्ष से सुशोभित, सिंहासन पर आसीन, चामर जिन पर दोरे जा रहे हैं, मुरेन्द्र-मनुरेन्द्रो द्वारा जो वन्दित है, जिनके प्रभाव से जन्मजात वैर वाले मिह-हरिण अादि प्राणी निवेर हो गए है, जो केवल ज्ञान को लोकोत्तर प्रभाग से जगमगा रहे है, ऐसे अरिहन्त भगवान् गमवसरण में विराजमान हैं। इस ध्यान में तन्मयता प्राप्त हो जाने पर माघर अपने आपको रूप सर्वज्ञ के रूप में देखने लगता है। जब तक उसका मन गीतराग- भाव मे रमण करता है, तब तक वह बीतगगभाव भी हो भनित करता है। (४) रूपातीत निरंजन, निराकार, नेतन्यम्वरूप मित्र परमात्मा रूपातीत ध्येय है। जिस ध्यान में उगका चिन्तन लिया जाता है, यह मपातीत ध्यान कहलाता है । जो साधक प्रमगः पिण्डम्म, पदस्थ पीर यान में परिणत प्रान कर लेता है, वही पानीन प्रयान मी योग्पना प्राग मर सकता है। ।

ओंकार : एक अनुचिन्तन ]] [ ५५ इस ध्यान के प्रभाव से ध्येय और ध्याता का विकल्प समाप्त हो जाता है और ध्यान, ध्याता, ध्येय तीनो एकाकार हो जाते है। ध्याता की ध्येय के साथ एक रूपता हो जाती है। भेद-प्रभेद-प्राणी की चिन्तन धाराएँ यो तो असंख्य प्रकार को है, किन्तु उन्हे चार भागों में विभक्त किया है। वही ध्यान के चार भाग कहलाते है । यथा-(१) आर्तध्यान (२) रौद्रध्यान (३) धर्म- ध्यान और (४) शुक्लध्यान । इष्टवियोग अनिष्टसंयोग, रोग और भोग कामना से प्रेरित चितन धारा आर्त्तध्यान कहलाती है। हिंसा, असत्य आदि पापो का आचरण करने के उद्देश्य से होनेवाले विचार रौद्रध्यान में सम्मिलित है। जिनाज्ञा आदि का विचार धर्मध्यान है और उच्चश्रेणी का अतिशय उज्ज्वल ध्यान शुक्लध्यान है। यह चारों ध्यान भी चार-चार प्रकार के है । चार घ्यानो मे आदि के दो-यात और रौद्रध्यान अप्रशस्त है । उन्हे अपध्यान या पापध्यान कहा जा सकता है। शुक्लध्यान इस देश- काल मे संभव नही है। इस काल मे साधक के लिए धर्मध्यान ही एक- मात्र आलम्बन है । अतएव अन्यान्य ध्यानो के विस्तार मे न जाकर यहां धर्मध्यान का ही परिचय दिया गया है। धर्मध्यान के अन्य प्रकार से भी चार भेदो का वर्णन किया गया है-(१) प्राज्ञाविचय (२) अपाय- विचय (३) विपाकविचय और (४) संस्थानविचय । सर्वज्ञ भगवान् की आज्ञा को दृष्टि मे रखकर तात्त्विक अर्थ चिन्तन करना आज्ञाविचय, राग-द्वेष प्रमाद आदि विकारो से उत्पन्न होनेवाले कष्टो का चिन्तन करना अपायविचय, कर्म के विपाक का चिन्तन करना विपाकविचय और पुरुषाकार लोक का चिन्तन संस्थानविचय धर्मध्यान कहलाता है । चार भावनाएं मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ्य । यह चार भावनाएँ धर्म- ध्यान का उपस्कार करने के लिए रसायन के समान है। अतएव सा । ५६ ] । योंकार : एक अनुनिन्तन को चाहिए कि वह अपने अन्तर में अधिक से अधिक इन भावनामो को जागृत और प्रदीप्त करें। इनका अभिप्राय यह है १ मंत्री-भावना-जगत् का कोई भी प्राणी पाप न गरे, को, भी प्राणी दुःख का भाजन न बने, समस्त प्राणो दुःसने मुल हो जाएं, इस प्रकार का चिन्तन पुन:-पुनः करना मैत्रोभावना है। २ प्रमोद-भावना-जिनके समस्त दोष दूर हो गए हैं और जो यथार्थ वस्तुस्वरूप के दृष्टा है, उन गुण गरिष्ठ महापुरुषो के गुणों के प्रति आदर होना, उनको प्रशंसा करना, उनकी मेवा करना सौर देखकर प्रसन्न होना प्रमोद भावना है। ३ करुणा-भावना-जो प्रारणी दोन हैं, दुःती हैं, भवभोर पोर प्राणों की भिक्षा चाहते हैं, उनके दुःरा को दूर करने की भावना होना करुणा भावना है। ४ माध्यस्थ्य-भावना~जो कुपथगामी हैं, गन्मागं । अष्ट: अभक्ष्य-भक्षण, अपेय-पान और अगम्य-गमन से परहेज नही करने का कर्म करके प्रसन्न होते हैं, जो दूसरो को निन्दा और अपनी प्रगंगा किया करते हैं और जिन्हें सन्मार्ग पर लाना शक्य नहीं हैं, जो उपदेश भी पात्र नहीं हैं, उनके प्रति भो घृणा या हग का भाव न रगत उपेक्षाभाव धारण करना माध्यस्थ्य-भावना है। एक वार प्रारम्भ किया हुप्रा ध्यान एक गुटरी में प्रति मन ना स्थिर नहीं रहता; किन्तु जो माधक एन चार भागनासो मे भागिर होता है, वह भङ्ग हुए प्यान ती परम्परा को पुनः जोर बने मे समर्थ होता है। ध्यान-विधि विधिपूर्वक पी गई लिया हो सका है, पनाव नो गमन ध्यान करना नाहता है, उगे पान की विधि पाले ममम सनी पारि और निम्नलिरित वाली का प्यार ना माहिए...--

[५७
४
ओकार : एक अनुचिन्तन ]
१ ध्यान के लिए प्रासन का कोई ऐकान्तिक नियम नहीं है। जिस
आसन का उपयोग करने मे सुविधा हो और जिससे मन की अधिक से
अधिक स्थिरता रह सकतो हो, उसी आसन का प्रयोग करना
उचित है।
२ ध्यान करते समय दोनो होठ मिले रहना चाहिए।
३ नेत्र खुले न रहे, न पूरी तरह बन्द रहे। उन्हे नासिका के
अग्नभाग पर स्थापित कर लेना चाहिये ।
दात इस प्रकार रहे कि ऊपर दाँतो के साथ नीचे के दातो का
स्पर्श न हो।
५ मुख प्रसन्न रहना चाहिये ।
६ पूर्व और उत्तर दिशा समस्त प्रशस्त कार्यो के लिए योग्य मानी
गई है। अतएव इन्ही मे से किसी की ओर मुख करके ध्यान करना
चाहिये।
ध्यान के समय मेरूदंड सीधा और सुव्यवस्थित रहना चाहिए ।
प्रमाद को दूर रखना चाहिये ।
8 ध्यान की सिद्धी के लिए किसी पवित्र और एकान्त शान्त स्थान
को चुनना चाहिए, जहां कोलाहल न हो और चित्तक्षोभ का कारण न हो।
१० ध्यान का अभ्यास करने वाले को आहार की सात्विकता और
शुद्धता का ख्याल रखना रखना चाहिये। परिमित भोजन करना चाहिये।
११ ब्राह्ममुहूर्त ध्यान के लिए सबसे अनुकूल समय है ।
७
.

[१२] भक्ति साधना सुन्दर और भारतवर्ष की विभिन्न धर्म परम्परागो मे भक्ति को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है । ईसाई; मुस्लिम तथा अन्यान्य सम्प्रदायो में भी भारत की मधुर व्याख्या की गई है। भक्ति के अनेक साधन है, अनेक स्तर है और अनेक प्रकार में भेद हैं। शैव, शाक्त और वैष्णव सम्प्रदाय तो भक्तिमार्ग को ही उन्कार मार्ग मान कर चलते है। इसमे सन्देह नहीं कि भक्ति का साधन अन्य साधनो यो प्रक्षा सरल है। अतएव प्राथमिक भूमिका के साधको के लिये यह सर्यो साधन है। यही कारण है कि प्रन्यान्य साधनों की अपेक्षा मन्ति मापन अपनाने वालो की ही संख्या विपुल है । उनी का प्रचार गरि. गोचर होता है । वैदिक परम्परा मे भक्ति की विवेचना और गौमांगा में प्रगुर मनी का निर्माण हुआ है। उन ग्रन्थों में भक्ति के इतने अधिक पार- प्रदर्शित किये गए हैं कि उनका यहां सामान्य उलोग करना भी गंगा नहीं है। सगुण भक्ति और निगण भक्ति गोप्रमिरही है. मिमी पर. मात्मा के साकार और निराकार ग्वा को आगना को जागो के भी नाना भेद-प्रभेद है। भागवन में नवधा भगिन farmer प्रकार मिलता है। प्रवर्ग पोर्त्तनं विष्णो: म पागवार । यन्नं चन्दनं बार, मायामामति ननम् । (१) भगवान के अलौकिा चरिण को 7 परना गीर्तन करना (6) मग पारना (१) मी हा l प्रोकार: एक अनुचिन्तन ] [ ५६ करना (५) बाह्य सामग्री या मन द्वारा कल्पित सामग्री से भगवत्पूजन करना (६) वन्दन-प्रणमन करना (७) अपने को दास मानकर सेवा करना (८) मित्र भाव से सेवा करना (६) अहंकार को त्याग कर अपने सर्वस्व को तथा अपने आपको भगवान के समर्पण कर देना । वहा पांच रसो के आधार पर पांच प्रकार की भक्ति का वर्णन भी मिलता है। पाँच रस इस प्रकार है-शान्त रस, श्रीतिरस, प्रेयोरस (सख्यग्स),वात्सल्यरस और मधुर रस (शृंगार रस)। एक विद्वान् कहते है '(भक्ति) रस की सर्वोच्च परिणति मधुर रस मे होती है । यह अंलकार- शास्त्र के शृङ्गाररस का अतीन्द्रिय दिव्य स्वरूप है। यह सभी के, अनुभव की वात है कि लौकिक इन्द्रिय सुख की प्रगाढता और विस्त की परमाविधि दाम्पत्य प्रेम मे ही हुआ करती है। इसी प्रकार शृङ्गार अथवा मधुर रस विकास की चरमावस्था है। चरमावस्था इसे इसलिए कहा जाता है कि इसमे सब प्रकार की मर्यादा और सङ्कोच दूर हो जाते है और निरन्तर भगवान् की सेवा अवाध रूप से होती है और इस प्रकार इस सुख का समास्वादन अत्यन्त प्रगाढ होता है। * इसका आशय यह है कि परमात्मा को पति मानकर और अपने आपको पत्नी समझ कर भक्त जो भक्ति करता है, वही सर्वोत्कृष्ट भक्ति है। इक प्रकार को 'कृष्ण भक्ति' राधा ने की थी और जो सर्वोत्तम भक्ति करना चाहता है उसे अपने की राधा-भगवान् की पत्नी-मानकर ही भक्ति करना चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रकार की विवेचनाएं वास्तव मे भक्ति को विकृतियाँ है और भूतकाल मे इन कल्पनामो की बदौलत घोर से घोर अनर्थ, दुराचार और व्यभिचार तक हुए है। धर्म भी हो * देखिये कल्याण का साधना-अङ्क ५१७-२२ [१२] भक्ति साधना H भारतवर्ष की विभिन्न धर्म परम्पराओ मे भक्ति को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है । ईसाई; मुस्लिम तथा अन्यान्य सम्प्रदायो मे भी भक्ति को सुन्दर और मधुर व्याख्या की गई है। भक्ति के अनेक साधन है, अनेक.स्तर है और अनेक प्रकार के भेद है। शैव, शाक्त और वैष्णव सम्प्रदाय तो भक्तिमार्ग को ही उत्कृष्ट मार्ग मान कर चलते है। इसमे सन्देह नही कि भक्ति का साधन अन्य साधनों को अपेक्षा सरल है। अतएव प्राथमिक भूमिका के साधकों के लिये यह सर्वोत्कृष्ट साधन है। यही कारण है कि अन्यान्य साधनो की अपेक्षा भक्ति साधन अपनाने वालों की ही संख्या विपुल है। उसी का प्रचार सर्वत्र दृष्टि- गोचर होता है। वैदिक परम्परा मे भक्ति की विवेचना और मीमांसा में प्रचुर ग्रन्थों का निर्माण हुआ है। उन ग्रन्थो मे भक्ति के इतने अधिक रूप-प्रकार- प्रदर्शित किये गए है कि उनका यहाँ सामान्य उल्लेख करना भी संभव नहीं है। सगुण भक्ति और निर्गुण भक्ति तो प्रसिद्ध ही है, जिसमें पर- मात्मा के साकार और निराकार स्वरूप की उपासना की जाती है, उन के भी नाना भेद-प्रभेद है। भागवत में नवधा भक्ति का निरूपण इस प्रकार मिलता है। श्रवणं कोर्त्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्य, सत्यमात्मनि वेदनम् । (१) भगवान् के अलौकिक चरित्र को श्रवण करना (२) नाम कीर्तन करना (३) स्मरण करना (४) चरण कमलो का सेवन Ma - ओंकार : एक अनुचिन्तन ] 1 ५६ करना (५) वाह्य सामग्री या मन द्वारा कल्पित सामग्री से भगवत्पूजन करना (६) वन्दन-प्रणमन करना (७) अपने को दास मानकर सेवा करना (८) मित्र भाव से सेवा करना (8) अहंकार को त्याग कर अपने सर्वस्व को तथा अपने आपको भगवान् के समर्पण कर देना। वहा पांच रसो के आधार पर पांच प्रकार की भक्ति का वर्णन भी मिलता है। पांच रस इस प्रकार है-शान्त रस, प्रीतिरस, प्रेयोरस (सख्यरस),वात्सल्यरस और मधुररस (शृंगार रस)। एक विद्वान् कहते हैं '(भक्ति) रस की सर्वोच्च परिणति मधुर रस मे होती है । यह अंलकार- शास्त्र के शृङ्गाररस का अतीन्द्रिय दिव्य स्वरूप है। यह सभी के, अनुभव की बात है कि लौकिक इन्द्रिय सुख की प्रगाढता और विस्तार की परमाविधि दाम्पत्य प्रेम मे ही हुआ करती है। इसी प्रकार शृङ्गार अथवा मधुर रस विकास की चरमावस्था है। चरमावस्था इसे इसलिए कहा जाता है कि इसमे सब प्रकार की मर्यादा और सङ्कोच दूर हो जाते है और निरन्तर भगवान् की सेवा अवाध रूप से होती है और इस प्रकार इस सुख का समास्वादन अत्यन्त प्रगाढ़ होता है । * इसका आशय यह है कि परमात्मा को पति मानकर और अपने आपको पत्नी समझ कर भक्त जो भक्ति करता है, वही सर्वोत्कृष्ट भक्ति है। इक प्रकार को 'कृष्ण भक्ति' राधा ने की थी और जो सर्वोत्तम भक्ति करना चाहता है उसे अपने की राधा-भगवान् की पत्नी-मानकर ही भक्ति करना चाहिए। कहने की आवश्यकता नही कि इस प्रकार की विवेचनाएं वास्तव मे भक्ति की विकृतियाँ हैं और भूतकाल मे इन कल्पनाओ की बदौलत घोर से घोर अनर्थ, दुराचार और व्यभिचार तक हुए है। धर्म भी हो * देखिये कल्याण का साधना-अङ्क ५१७-२२ ६० ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन और हृदय की उच्छृखल वासना का पोषण भी हो जाय तो कौन ऐसा न करना चाहेगा? परमात्मा की भक्ति का उद्देश्य काम क्रोध आदि दुर्वासनानो का उन्मूलन करके वीतरागभाव प्राप्त करना है, मगर दाम्पत्य भाव से की जानेवाली भक्ति इस उद्देश्य को पूर्ण नही कर सकती। यही नहीं, वह प्रकारान्तर से कामुकता की वृद्धि मे सहायता करती है । भक्ति विषयक यह कल्पनाएँ साहित्यिक रूप मे कितनी ही सात्त्विक क्यो न हो, व्यवहार मे सात्त्विक नहीं रह सकती । इतिहास साक्षी है कि वे सात्त्विक रही भी नही है। इस प्रकार की विकृत भक्ति ने सहस्त्रो जनों को धर्म-विरोधो बनाया है । जैन परम्परा मे भी भक्तिमार्ग को समुचित स्थान उपलब्ध है । और इस विषय पर प्रचुर साहित्य का निर्माण भी हुआ है। मगर जैनधर्म का मूल और मुख्य उद्देश्य परिपूर्ण वीतरागभाव की प्राप्ति है, अतएव उसके अनुरूप ही वहा भक्ति का विधान किया गया है। जिन्होने राग-द्वेष, काम क्रोध, आदि समस्त आत्मिक विकारों पर विजय प्राप्त कर ली है, जो सर्वज्ञता और सर्वदर्शिता प्राप्त करके अव्यावाध अनन्त सुख के भागो बन चुके है, ऐसे अरिहन्त भगवान् के के प्रति, चतुविधि तीर्थ के नायक एवं प्राचार का पालन करने-कराने वाले धर्माचार्यों के प्रति, बहुश्रु तो पागम के विशिष्ट वत्तानी के प्रति और तीर्थकरो द्वारा उपदिष्ट प्र विशु होना भक्ति है। 'विशुद्ध भावपूर्ण अनुराग न के प्रति हृदय मे ऐसी गहरी, .. - अनुराग M गवान् ॐ . श्रुतेषु प्रवच ६-२१ ६१] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन चाहिए कि वह अनन्यनिष्ठा वन जाए-जगत् के पदार्थों और सुखो पर अनुराग न रह जाए। कहावत प्रसिद्ध है एक म्यान मे दो तलवारें नही रह सकती। मानव का मन म्यान है और उसमे परमात्मप्रीति जव प्रगाढ़ रूप मे जागृत होती है तो अन्य पदार्थों के अनुराग को कोई अवकाश नहीं रहता। भक्त उस स्थिति में अपने आपको भगवत्समर्पित अनुभव करने लगता है और शनैः शनैः उसकी अनुभूति तन्मयता का रूप धारण कर लेती है। उसमे भागवत् गुण प्रकट होने लगते हैं और अन्ततः भक्त ही भगवान् बन जाता है। जैन परम्परा मे अनादिसिद्ध एक ईश्वर की सत्ता स्वीकार नही की जाती। ईश्वरतत्व पर एक व्यक्ति का शाश्वत एकाधिपत्य (monopoly) नही है। प्रत्येक साधक औपाधिक भावो से मुक्ति प्राप्त कर और शुद्ध आत्मा स्वरूप को प्रकट करके ईश्वरत्व की विभूति का अधिकार वन सकता है। अतएव भक्ति का उद्देश्य अन्ततः स्वयं ईश्वर बनना है । ईश्वर का दास या सखा बन के रहने मे भक्ति की चरम कृतार्थता नही है। इस प्रकार भक्ति ईश्वरत्व प्राप्ति का साधन है, साध्य नही । भक्ति को साध्य और साधन उभय रूप मानना भ्रान्ति है । भक्ति के विषय मे एक प्रश्न पर विचार करके हम इस प्रकरण को समाप्त करेंगे। प्रश्न यह है कि ईश्वर मे यदि रोष और तोष की वृत्तिया विद्यमान हो और उनसे प्रेरित होकर वह अनुग्रह निग्रह करता हो-आशीर्वाद और अभिशाप देता हो, तब तो उसकी भक्ति करने से कुछ लाभ हो सकता है। यदि उसमे वह वृत्तियां नहीं है, वह वीतराग है तो उसकी भक्ति निरर्थक क्यों नहीं है ? वहुत लोगो के चित्त मे यह प्रश्न उठता है किन्तु उसका मूल भक्ति विषयक शुद्ध ज्ञान का अभाव है। भक्ति का मूल्य समर्पण मे है, ग्रहण ६० ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन और हृदय की उच्छृखल वासना का पोषण भी हो जाय तो कौन ऐसा न करना चाहेगा? परमात्मा की भक्ति का उद्देश्य काम क्रोध आदि दुर्वासनाओ का उन्मूलन करके वीतरागभाव प्राप्त करना है, मगर दाम्पत्य भाव से की जानेवाली भक्ति इस उद्देश्य को पूर्ण नही कर सकती। यही नहीं, वह प्रकारान्तर से कामुकता की वृद्धि मे सहायता करती है । भक्ति विषयक यह कल्पनाएँ साहित्यिक रूप मे कितनी ही सात्त्विक क्यो न हो, व्यवहार मे सात्त्विक नही रह सकती । इतिहास साक्षी हे कि वे सात्त्विक रही भी नहीं हैं। इस प्रकार की विकृत भक्ति ने सहस्त्रो जनों को धर्म-विरोधो बनाया है । जैन परम्परा मे भी भक्तिमार्ग को समुचित स्थान उपलब्ध है । और इस विषय पर प्रचुर साहित्य का निर्माण भी हुया है। मगर जैनधर्म का मूल और मुख्य उद्देश्य परिपूर्ण वीतरागभाव की प्राप्ति है, अतएव उसके अनुरूप ही वहा भक्ति का विधान किया गया है । जिन्होने राग-द्वेष, काम क्रोध, आदि समस्त आत्मिक विकारो पर विजय प्राप्त कर ली है, जो सर्वज्ञता और सर्वदर्शिता प्राप्त करके अव्यावाध अनन्त सुख के भागो बन चुके हैं, ऐसे अरिहन्त भगवान् के के प्रति, चतुविधि तीर्थ के नायक एवं प्राचार का पालन करने-कराने वाले धर्माचार्यों के प्रति, बहुश्रु तो आगम के विशिष्ट वक्ताओं के प्रति और तीर्थकरो द्वारा उपदिष्ट प्रवचन के प्रति विशुद्ध भावपूर्ण अनुराग होना भक्ति है। 'विशुद्ध भावपूर्ण अनुराग' का तात्पर्य यह है कि वीतराग भगवान् के प्रति हृदय में ऐसी गहरी, व्यापक एवं जागृत प्रीति उत्पन्न होना अहंदाचार्यवहुश्रुतेपु प्रवचनेपु वा भाव विशुद्धि युक्तोऽनुरागो भक्तिः । सर्वार्थसिद्धि, अ. ६-२४, तत्त्वार्थभाप्य अ. ६-२३ ६१] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन चाहिए कि वह अनन्यनिष्ठा वन जाए-जगत् के पदार्थों और सुखो पर अनुराग न रह जाए। कहावत प्रसिद्ध है एक म्यान मे दो तलवारें नही रह सकती। मानव का मन म्यान है और उसमे परमात्मप्रीति जब प्रगाढ़ रूप मे जागृत होती है तो अन्य पदार्थों के अनुराग को कोई अवकाश नही रहता। भक्त उस स्थिति में अपने आपको भगवत्समर्पित अनुभव करने लगता है और शनैः शनैः उसकी अनुभूति तन्मयता का रूप धारण कर लेती है। उसमे भागवत् गुण प्रकट होने लगते हैं और अन्तत. भक्त ही भगवान् बन जाता है। जैन परम्परा मे अनादिसिद्ध एक ईश्वर की सत्ता स्वीकार नही की जाती। ईश्वरतत्व पर एक व्यक्ति का शाश्वत एकाधिपत्य (monopoly) नही है। प्रत्येक साधक औपाधिक भावो से मुक्ति प्राप्त कर और शुद्ध आत्मा स्वरूप को प्रकट करके ईश्वरत्व की विभूति का अधिकार वन सकता है। अतएव भक्ति का उद्देश्य अन्ततः स्वयं ईश्वर बनना है। ईश्वर का दास या सखा बन के रहने मे भक्ति की चरम कृतार्थता नही है। इस प्रकार भक्ति ईश्वरत्व प्राप्ति का साधन है, साध्य नहीं । भक्ति को साध्य और साधन उभय रूप मानना भ्रान्ति है। भक्ति के विषय मे एक प्रश्न पर विचार करके हम इस प्रकरण को समाप्त करेंगे। प्रश्न यह है कि ईश्वर मे यदि रोष और तोष की वृत्तिया विद्यमान हो और उनसे प्रेरित होकर वह अनुग्रह निग्रह करता हो-आशीर्वाद और अभिशाप देता हो, तब तो उसकी भक्ति करने से कुछ लाभ हो सकता है। यदि उसमे वह वृत्तियां नहीं है, वह वीतराग तो उसकी भक्ति निरर्थक क्यो नहीं हैं ? बहुत लोगो के चित्त मे यह प्रश्न उठता है किन्तु उसका मूल भक्ति विषयक शुद्ध ज्ञान का अभाव है। भक्ति का मूल्य समर्पण मे है, ग्रहण ६२ ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन में नहीं। ऐहिक या पारलौकिक सुख साधन प्राप्त करने के उद्देश्य से की जाने वाली भक्ति वस्तुतः भक्ति ही नहीं है। भक्ति का उद्देश्य विषयतृप्रणा एवं कामना को नष्ट करके वीतरागता प्राप्त करना है, न कि कामनाओ की पूर्ति करना। जो लौकिक कामना की पूर्ति के लिए परमात्मा की भक्ति, स्तुति या प्रार्थना करता है, वह कृषक से भी अधिक भाग्यहीन है जो भूसे के उद्देश्य से कृषि करता है। परमात्मा के गुणों मे अनन्य अनुराग उत्पन्न होने पर विपय जनित सुख और सुख के साधनभूत पदार्थों की निगुनिता अन्तःकरण मे बद्धमूल हो जाती है। अनासक्ति की वृद्धि होती है और पापाचार का परित्याग हो जाता है। ऐसी अवस्था मे अपूर्व समभाव जागृत होता है और निराकुलता के निरुपम आनन्द की उपलब्धि होने लगती है । यह मानन्द इतना तीव्र और वास्तविक होता है कि विषयजन्य वैकारिक सुस इसकी तुलना मे नगण्य होता है। शनैः शनैः भक्त प्रात्मशुद्धि के महामार्ग पर अग्रसर होता जाता है और परिपूर्ण आत्मानन्द का भाजन बनता है। यही भक्ति का सबसे बड़ा और महामूल्य पुरस्कार है। इस प्रकार वीतराग देव हमे जो देते नही, उसे हम वीतराग की भक्ति करके स्वयं प्राप्त कर लेते है। ऐहिक लाभ की प्राप्ति के लिए परमात्मा मे सरागित्व की कल्पना करना अनात्मज्ञता का परिचायक है। पिछले समय की जैन स्तुतियो या प्रार्थनायो मे यदि ऐहिक याचना की प्रवृत्ति कही-कही दृष्टिगोचर होती है तो उसे पडोसियो का ही प्रभाव समझना चाहिए। भक्ति, स्तुति, स्तवन, प्रार्थना, भजन आदि एक ही अभिप्राय के सूचक है। उत्तराध्ययन सूत्र में चतुर्विगतिस्तव-चोवीस तीर्थहरों की स्तुति का फल सम्यग्दर्शन की विशुद्धि बतलाया गया है, इहलोक या

ओकार : एक अनुचिन्तन ]
[६३
परलोक सम्बन्धी वैभव नही ।* अतएव सच्चा मुमुक्षु पुरुष वीतरागता
की प्राप्ति के लिए ही वीतराग की स्तुति या भक्ति करता है।
यही भक्ति का महान् फल है । लौकिक वैभव उसके लिए महत्त्वपूर्ण
नही
होता, फिर
भी
शुभभावना-जनित
पुण्य
अनायास ही प्राप्त हो जाता है।
के परिपाक से वह
चवीसत्त्यएणं भंते, जीवे किं जरण्यइ ?
चउवीसत्थएणं दसराविसोहिं जरणयइ ।
-उत्त०
अध्ययन २६

[ १३ ] ॐ का विराट रूप 'ॐ' यह अक्षर ही सब कुछ है । जो कुछ भी भूत है, वर्तमान है और भविष्यत् है, सब उसी की व्याख्या है, इस कारण सव प्रोकार ही है। इसके अतिरिक्त जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है, वह भी ओकार ही है। उपनिषद्कार प्रकार को ब्रह्म का वाचक शब्द स्वीकार करते है और वाचक तथा वाच्य को एकान्त अभेद मानकर उसे सर्वात्मक प्रति- पादित करते है। उनका कथन है कि इस चराचर विश्व के कालिक पदार्थ और त्रिकालातीत जो तत्त्व है वह सब सोमात्मक ही है। उनका यह प्रतिपादन अद्वैतवाद की पृष्टभूमि पर अवलम्बित है। किन्तु किसी भी वस्तु के पारमार्थिक एवं परिपूर्ण स्वरूप को हृदयंगम करने के लिए कोई भी ऐकान्तिक दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है। जब तक विविध दृष्टिकोणों से वस्तुस्वरूप का पर्यालोचन न किया जा, सत्य को उपलब्धि नही होती। किसी भवन का एक दिशा से लिया गया चिन परिपूर्ण नही कहा जा सकता। उस चित्र में भवन का अधिकांश भाग अदृश्य ही रहेगा। वस्तुस्वरूप पर तटस्थ भाव से विचार किया जाय ती एक ही वस्तु में आपाततः परस्पर विरोधी जैसे प्रतीत होने वाले अनेक स्वभावो की - "ओमित्रेतदक्षरमिदं सर्व तस्पोपादानं भूतं भवद् भविष्यनिति सर्वगोड्कार एव । यथान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ कार एव ।' - माण्डूक्योपनिपद जैन महावत- आहसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अर्पा वैदिकयम-आहता त्य, जस्तय,ब्रह्मचर्य, अकिंचन सत्य, रतयइसपर्य, दर्शन,ज्ञान,तप, चारित्र. सर्वसाधु, उप मिथ्यात्व, अविरति, सिद्ध अरिहन्त ऊर्वलोक - मपान त्याग वौद्ध पपशील- मध्यलोक •आहसा, राजनैतिक पंचशील ० १.सार्वभौमिकता का समादर २.अनाक्रमण ३. अहस्तक्षेप ४.पारस्परिक सहयोग और समानता ५.शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व ALL ARE अधोलोक hine का ;

- ओंकार : एक अनुचिन्तन ] 1 प्रतीति होती है । जगत् में भी पदार्थ है, ये एक दमो मे in भिन्न भी नही और अभिन्न भी नहीं है। भेद को नीति पम: है। जल से तृषा शान्त हो सकती है, अग्नि से की। भोजन का परिपाक हो सकता हो, जल से नहीं । मनुम १ आदि मे चेतना की जो विशेषता दृष्टिगोचर होती है, वह पाया नही है। इस प्रकार भांति-भांति से प्रतीत होने वाले का नाप करना एक प्रकार से अपने अस्तित्व का अपलाप करना ।। लिनु म विभिन्नता मे भी क्ग कुछ सामंजस्य नहीं है ? एफपता नी' कम से कम सत्ता नामक धर्म तो ऐसा है ही, जिसके माधार पर हम विश्ववर्ती समस्त पदार्थो मे रही हुई एकरूपता को मरलना में रामम सकते हैं। तो जगत् के समस्त पदार्थ भेदाभेदात्मक हैं। उनका प्रतिपादन प्रयोजन के अनुसार कभी भेद दृष्टि की तो कभी प्रभेददृष्टि को प्रधानता के अनुसार होता है। माण्डूक्योपनिपद् मे जो कथन किया गया है, यह अभेद की प्रधानता से ही सङ्गत होता है। इस दृष्टि के अनुसार चराचर विश्व ओकार रूप ही है। प्रोकार ब्रह्म है और ब्रह्म सत्ता का वाचक है। अतः सत्ता रूप से जगत् एक है । सत्ता से जो विलक्षण है, वह असत् के अतिरिक्त क्या हो सकता है ? मगर यहाँ प्रोकार के विराट रूप की कल्पना अन्य प्रकार से को गई है। चित्र देखने से प्रतीत होगा कि उसके विभिन्न विभागो मे विविध भावात्मक द्रव्य-भाव रूप अङ्गो का मंविधान भी एक नूतन कल्पना द्वारा संजोया गया है। प्रोकार के चित्रण मे तीनो लोको की स्थिति का स्वरूप प्रदर्शित किया गया है। सर्वप्रथम ऊँचाई पर अवलोक मे देवपद और मोक्षपद की प्राप्ति के साधन विभिन्न धर्मों के दृष्टिकोणो से बतलाए गए है। देवलोको का भी उल्लेख किया गया है। मध्य भाग मे भारत के प्रधान- ६६ ] [ोकार : एक अनुचिन्तन मन्त्री पं० नेहरु द्वारा विश्व-शांति के स्वप्न को साकार करने के उद्देश्य से प्रचारित पंचशीलों को स्थान दिया गया है। अधोभाग में, अधोलोक में स्थित नरक भूमियो का और उनमे जाने के कारणों का उल्लेख किया गया है। ॐ के विकसित मार्ग मे अर्थात् पश्चाद्वर्ती भाग मे उन नौ पदो को अङ्कित किया गया है, जिनकी विधिवत साधना से मुक्ति प्रास होतो है। शीर्षस्त 'सिद्वारणं' इस पद से यह भाव व्यक्त किया गया है । इस कल्पना का किचित् विवरण आगे दिया जाएगा। ऊर्ध्व भाग ओकार महामन्त्र के स्मरण का मुख्य लक्ष्य प्रात्म-शुद्धि प्रान करने सिद्धि प्राप्त करना है। किंतु प्रोकार का स्मरण और जप तब ही शुद्ध होता है जब अन्तःकरण पाप-वासनामो से रहित हो । पापमय वासनायो को, जिनका मूल अत्यन्त सुदृढ और गहरा है, उन्मूलन करना हँसी- खेल नहीं है। पापाचरण न करने का संकल्प कर लेने पर भी और पापाचरण से निवृत्त हो जाने पर भी सुपुप्त रूप में वासनाएँ विद्यमान रह सकती है। उनके उन्मूलन के लिए पाप परित्याग के साथ-साथ शुभ और शुद्ध अध्यवसायो मे रमण करने की आवश्यकता होती है । निरन्तर सतर्क और सावधान रहना पड़ता है, चित्त की पूरी तरह चौकसी करनी पड़ती है । जिन पाप-व्यापारो से विरत हुए बिना प्रकार का विशुद्ध स्मरण चिन्तन और मनन सम्भव नहीं है, उनमे पांच प्रमुख हैं-हिमा, असत्य, अदत्तादान, अब्रह्म और परिग्रह। इन पाच व्यापारी से मलिनता उत्पन्न होती है, राग और द्वेष की परिणति प्रबल होती है और आत्मा प्रात्मरमण से विमुख होकर बहिर्मुस बनता है। इन पापों का त्याग करने से ही पांच महायतों को निप्पत्ति होती है। पान महायतों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:

ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ६७ अहिंसा महावत प्रमादवश होकर मन, वचन या काय से किसी भी स्थूल, या सूक्ष्म प्राणी को दुःख न पहुँचाना, उसका वध न करना, दूसरों के द्वारा वध न करवाना और वध करनेवाले का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अनुमोदन न करना अहिसा महाव्रत है। अहिंसा परम धर्म है, इस विषय मे समस्त धर्मशास्त्र एकमत है । जिन्होने हिसापरक कर्मकाण्ड का विधान किया है, वे भी हिंसा को धर्म कहने का साहस न कर सके। उन्होने इस हिंसा को अहिंसा कहकर ही जनता के गले उतारने का प्रयत्न किया है। इससे सहज ही अहिंसा के महत्त्व और प्रभाव का अनुमान लगाया जा सकता है। वास्तव मे अहिंसा के प्रति जनमानस मे सदैव गहरी आस्था रही है. आज भी है और भविष्यत् मे भी रहेगी। अहिसा स्वानुभवसिद्ध धर्म है । थोडा-सा कष्ट भी हमे पहुँचे, यह बात हमे रुचिकर नही है तो दूसरो को किस प्रकार रुचिकर हो सकती है ? जिस प्रकार हमे जीवित रहना प्रिय है, वध अप्रिय है, उसी प्रकार अन्य प्राणी भी जीवित रहना चाहते है और वध उन्हे प्रिय नही है। जो इस सीधी-सादी बात को समझ सकता है, वह अहिंसा को भी समझ सकता है। साधना के क्षेत्र मे अवत्तीर्ण होने वाले साधक के लिए अहिंसाधर्म का पाराधन करना सर्वप्रथम आवश्यक है। अहिंसा की भावना जागृत हुए विना साधना संभव नहीं है। साधना का अभिप्राय ही अहिंसा है। यम, नियम, जप, तप आदि समस्त साधन अहिंसा की आराधना के लिये है। सत्य आदि व्रत अहिंसा व्रत को हो शाखाये है। इसी कारण हिंसाकारो सत्य भी वस्तुतः असत्य की कोटि मे गिना गया है । न यत्प्रमादयोगेन जीवितव्यपरोपणम् । असा स्थावराणाञ्च, तदहिंसावतं मतम् ।। * वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति । -योगशास्त्र, १-२० ६८। [ ओंकार : एक अनुचिन्तन हिंसा का अर्थ बहुत श्यापक है। जैसे दूसरे प्राणियो को व्यथा पहुचाना परहिसा है, उसी अन्तःकरण मे राग, द्वेष, मद, मोह आदि विकारो का उत्पन्न होना स्व-हिंसा है। दूसरे को कष्ट देने का संकल्प या प्रयत्न होने पर पर-हिंसा कदाचित् हो या न भी हो, किन्तु स्व-हिंसा या आत्मवध तो हो ही जाता है। चित्त से उत्पन्न होने वाले प्रत्येक दुर्भाव से आत्महिंसा होती है, क्योकि वह आत्मिक शान्ति का विघातक होता है। अतएव अहिंसा महाव्रत का आराधक साधक अन्तःकरण में उत्पन्न होने वाले दुर्भावों का निरोध करके स्वहिंसा और अन्य प्राणी को कष्ट न पहुँचा कर पर हिंसा से विरत होता है । यही अहिंसा-ब्रह्म की सच्ची साधना है। सत्य महावत प्रिय, पथ्य और तथ्य वचन का ही प्रयोग करना और असत्य पा सर्वथा त्याग करना सत्य महाव्रत है। सत्य महाव्रत के इस लक्षण मे 'तथ्य' के साथ प्रयुक्त 'प्रिय' और 'पथ्य' विशेपणो पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। जो वचन तथ्य अर्थात् यर्थाथ तो हैं किन्तु अप्रिय है, अथवा अहितकर- अनर्थकर है, वह सत्य मे परिगणित नहीं है। सत्य अहिंसा का पोपक व्रत है। अतएव जिस वाणी से हिंसा को पोषण या प्रोत्साहन मिलता है, जिससे दूसरे के नित्त को व्यथा पहुँचती है अथवा जिससे अपनी आत्मा मे मलीनता उत्पन्न होती है, ऐसी तथ्य वाणी भी अमत्य ही हैं। अतएव वास्तव मे सत्यवादी पुरुप वही है जो नथ्य के साथ हितकर और प्रियंकर वचनों का ही प्रयोग करता है। अहिंसा भूताना जगति विदितं ब्रह्म परमम् । -ग्रानायं गमन्तभद्र प्रोंकार : एक अनुचिन्तन] 1६६ सत्य का सेवक ही भगवान् का सेवक है, क्योकि सत्य साक्षात् भगवान् का रूप है। वह क्रोध, लोभ, भय और उपहास से प्रेरित होकर भी कभी असत्य का प्रयोग नहीं करता । सत्यवादी पुरुष पृथ्वी का आभूषण है और उसकी चरणरज से पृथ्वी पावन बनती है। अस्तेयमहाव्रत अस्तेय का अर्थ है अदत्तादान या चोरी का सर्वथा त्याग करना। साधक जन किसी भी सजीव या निर्जीव, अल्पमूल्य या महामूल्य, सूक्ष्म या स्थूल वस्तु को, मन वचन और काय से, उसके स्वामी के द्वारा दिये बिना ग्रहण नहीं करते। उनकी आवश्यकताएँ अत्यन्त स्वल्प होती है। वे उन आवश्यकताओं को इस विधि से पूर्ण करते है कि उन्हे प्रदत्त को ग्रहण करने की आवश्यकता ही नही पड़ती। जिस वस्तु का जो न्यायतः स्वामी है, उससे याचना करके ही वे अावश्यक वस्तु को ग्रहण करते है। किसी भी वस्तु अदत्तादान एक भीषण पाप है, क्योकि उससे वस्तु के स्वामी को मार्मिक आघात पहुंचता है। अतएव धामिक पुरुप को दिये विना ग्रहण न करे। किसी को कोई वस्तु राह चलते गिर गई हो, कोई कही रखकर भूल गया हो, गुम हो गई हो, और कितनी भी अनिवार्य आवश्यकता क्यो न आ पड़ी हो, तथापि उसे ग्रहण करना उचित नहीं है। इस प्रकार त्रिकरण त्रियोग से अदत्तादान का त्याग करना अस्तेय महावत है। ब्रह्मचर्य महाव्रत भारतवर्ष के सभी ऋषि-मुनियो ने मुक्त कंठ से ब्रह्मचर्य का महिमा- तं सच्चंखु भगवं ।-प्रश्नव्याकरणसूत्र, सं. २ ।

७० ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन गान करके अपनी वाणी को पावन किया है । तप सभी उत्तम है, किन्तु ब्रह्मचर्य सब तपो में उत्तम है । ब्रह्मचर्य का पालन करने से शरीरबल, मनोबल और आत्मवल की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारो के मुखमण्डल पर एक अनूठी दिव्य आभा चमकती है। जो दुर्जय कामविकार को जीत लेता है, उसके लिए अन्यान्य विकारो को जीत लेने में कोई कठिनाई नहीं होती। ब्रह्मचर्य का अर्थ मैथुन-निवृत्ति तो है ही, किन्तु उसका व्यापक अर्थ है-समस्त इन्द्रियों का और मन का निग्रह करके ब्रह्म अर्थात् प्रात्मा मे रमण करना। ब्रह्मचर्य महाव्रत की सिद्धि के लिए पूर्ण रूप से काम भोग से विरत होना आवश्यक है और उसके लिए कतिपय नियमों का पालन करना अनिवार्य है । वे नियम इस प्रकार हैं- १. ब्रह्मचारी पुरुष ऐसे स्थान मे शयन या अवस्थान न करे जहां सी, नपुंसक (हीजड़ा) या पशु हों। २. स्त्रियों के सम्बन्ध में ऐसी चर्चा-वार्ता न करें जिससे कामवासना के जागृत होने की संभावना हो-विकार को प्रोत्साहन मिलता हो । ३. स्त्रियो के साथ सम्पर्क न रखखें । ४. रमणियों के मनोरम अंगोपांगो का अवलोकन न करें। सहसा दृष्टिपात हो जाय तो उसी प्रकार हटा लें जैसे सूर्य को प्रोर मे हटा ली जाती है । ५. दीवार, यवनिका श्रादि की प्रोट मे स्त्रियों का पूजन, गायन, हाम्य आदि सुनने का प्रयत्न न करें। जहा इस प्रकार का व्याघात हो, वहाँ न ठहरे। * तवेमु वा उत्तम वंभरं ।-सूयगडांगमूत्र ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ७१ ६ पूर्वकृत कामकीडा का स्मरण न किया जाय । ७ जिह्वा-इन्द्रिय पर अंकुश रक्खे । विकारवर्द्धक पाहार-पान का सेवन न करे। ८ अतिभोजन से बचे। ६ साज-शृङ्गार न करे। ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए पुरुषो को उल्लिखित बातो पर जैसे ध्यान रखना आवश्यक है, उसी प्रकार ब्रह्मचारिणी महिला को भी। उसे पुरुषो के संसर्ग से उसी तरह बचना चाहिए जिस तरह पुरुष को स्त्री-संपर्क से बचने का विधान किया गया है। उपर्युक्त नियमो पर दृढ रहते हुए तीन करण और तीन योग से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना ब्रह्मचर्य महावत कहलाता है । अपरिग्रह महाव्रत समस्त पदार्थो मे मूर्छा का अभाव होना अपरिग्रह महाव्रत है। कोई पदार्थ प्राप्त नहीं है, किंतु तद्विषयक आसक्ति यदि अन्तःकरण मे है तो वह भी परिग्रह मे परिगणित है । अतः सच्चा अपरिग्रही वही है जो जगत् के पदार्थों के साथ-साथ उनसे सम्बन्धित प्रासक्ति के प्रवल- पाश से अपने को मुक्त रखता है । समस्त दुःखो का मूल स्त्रोत कामनाएँ हैं । भगवान् महावीर ने सांसारिक दुःखो से छुटकारा पाने का एक अमोघ उपाय बतलाया है- कामे कमाही, कमियं खु दुक्खं । दशवै० अ० २ कामनामो से ऊँचे उठ जाओ। फिर समझ लो कि दुःख ऊपर उठ गए। से ७२ ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन जब तक अन्तःकरण कामना से कलुषित है, दुःख से मुक्ति पाना सम्भव नही है। कामनाओं की पूर्ति में सुख को गवेषणा करने वाले मृग-मरीचिका में शीतल जल को गवेषणा करते है। उनका मुन्व-प्राप्ति का स्वप्न अनन्तकाल मे भी साकार होने वाला नहीं है, क्योकि कामना तो वह क्षितिज है। जिसका कही ओर-छोर नहीं है । एक कामना की पूर्ति ही जहाँ सैकड़ो नूतन कामनाओं को जन्म देती है, वहां सुरा को कल्पना ही कैसे की जा सकती है ? देवलोक के प्रभाव पूर्वोक्त पांच महाव्रतों का मनसा वाचा कर्मणा माराधना करने वाले सभी साधक निर्वाण नही प्राप्त कर पाते । चिरपुरातन और समय समय पर होने वाले नूतन कर्म किसी किसी आत्मा मे इतनी गहरी जड़ जमाये होते हैं कि उनका उन्मूलन करने के लिये जन्म जन्मान्तर में साधना करनी पड़ती है, संस्कारों का संचय करना पडता है। इन चिरसाधना के अन्तराल मे ऐसा भी समय आता है जब माधक को शुभ परिणतिजनित पुण्य से अभ्युदय की प्राति होती है अर्थात् उसे दिव्य लोक (स्वर्ग) में जन्म धारण करता है। दिव्य लोक सर्वोत्कृष्ट सांसारिक सुख का स्थल है, तथापि मुमुक्षु के लिये वह स्पृहणीय नसी होता, क्योकि मानवीय मुख के सदृश ही वह भी स्थायी, परिपूर्ण एवं श्रात्यन्तिक आतक प्राप्त करने में बाधक है। सच्चे मुमुक्षु के लिए वह मंजिल नही, मंजिल तक पहुचने के लिए एक पडाव मात्र है। देवलोक मे सर्वोच्च स्थान पर पांच अनुनर विमान है, जिनके नाम विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और मर्या प्रसिद्ध है, इन विमानो में जन्म लेने वाले एक-दो बार जन्म धारण करने हो निद्धि प्रान पर लेते है। उनसे नीचे गधेयक विमान हैं। पुरपाटति तोक के श्रीवास्थान में प्रोकार : एक अनुचिन्तन ] [ ७३ होने के कारण उन्हे 'ग्रेवेयक' संज्ञा प्रदान की गई है, इनकी संख्या नी है। | वेयक विमानो के नीचे वारह देवलोक और है जो सोधर्य, ऐगान आदि के नाम से विख्यात हैं। देवलोको के विषय मे एक बात उल्लेखनीय है । वह यह कि नोचे बारह देवलोको तक मर्त्यलोक के समान शास्य-शासकभाव है। वहां देवगण साधारण प्रजा के समान है, इन्द्र राजा के स्थान पर। इन्द्र के अधीन सेनायें होती है, लोकपाल होता है। मनुष्यो के समान देवो मे भी कभी कभी पारस्परिक संघर्ष हो जाता है। अनुराग. विराग जैसी साधारण मनोवृत्तियाँ वहाँ भी अपना काम करती है । आध्यात्मिक दृष्टि से स्वर्ग या देवलोक कोई स्पृहणीय वस्तु नही है। देवगण अंशतः भी संयम अंगीकार नहीं कर सकते। सांसारिक सुख एवं विलास के मादक वातावरण मे उनकी आध्यात्मिक चेतना जागृत ही नही हो पाती। वारह देवलोको में पांचवा ब्रह्मदेवलोक है। वहा नौ लौकान्तिक देव निवास करते हैं। ये देवर्षि कहलाते है और उनका भवभ्रमण लगभग निकट होता है। बौद्ध पंचशील द्वादश देवलोको के नीचे वौद्धमत-सम्मत पाच शीलो को स्थान दिया गया है । शील का अर्थ प्राचार एवं अनुशासन है। उनके नाम इस प्रकार हैं- १-अहिंसा २-अस्तेय ३--ब्रह्मचर्य ४-सत्य ५-मद्यपान त्याग । * पाणी न हन्तव्वो, अदिन्नं नादातव्वं, कामेसु मुच्छा न चरित मुसा न भासितव्वा, मज्जं न पातन्वं । -बौद्धकालीन प्रस्त ७४ ] [ ओंकारः एक गनुचिन्तन यह पंचशील जैनो के महाव्रतों जैसे ही है और उनको व्याख्या में ही इनको व्याख्या आ जाती है। अन्तर केवल पांचवें शील में है। महाव्रतो मे पांचवां अपरिग्रह है जब कि शीलों में मद्यपान त्याग जैन परम्परा के अनुसार मद्यत्याग महाव्रतो की पूर्वभूमिका में ही कर दिया जाता है। वैदिक पंचयम वैदिक संस्कृति ने भी जीवनोत्यान की मंगलमय प्रेरणा प्रदान करने हेतु पंच महाव्रत और पंचशील की भांति पंच यमो का उल्लेख किया है। यम का अर्थ संयम, सदाचार और अनुशासन है । वे पंचयम इस प्रकार हैं-१. अहिंसा २. सत्य ३. अस्तेय ४. ब्रह्मचर्य ५. अपरिग्रह-अकिंचन पंच यमों को भी पंचगील की तरह हृदय स्थल पर अंकित किया गया है। मध्य भाग नव पद ओंकार के मध्य भाग मे अर्थात् पश्चाद्वर्ती अंश मे जैन-दर्शन सम्मत नव पदों की स्थापना की गई है। यह नव पद श्रद्धय है, पाराध्य हैं और ॐ पद के ही विभिन्न अङ्ग हैं। इनको श्रद्धा-पाराधना का गुम्य लक्ष्य मुक्ति प्राप्त करना ही है। अतएव ॐ के विरुमित भाग पर इन आदर्श नव पदो को स्थान दिया जाना उपयुक्त और युक्तिमारा ही है। 'ओं' के सर्वोच्च भाग पर 'मिद्वाणं' पद का अडान किया गया है। वह भी ध्येय के अनुरूप और सिद्धों की मर्योटना के अनुगुल है। वस्तुतः चरम याच्यात्मिक सिद्धि ही साधक के लिए अमोरिंगत होती है और वह सिद्धि जो महान् प्रात्मा प्राम कर हैं, ये उगो परम आराध्य हैं। इसने 'ॐ' पद को "सिद्ध' पद के साथ एक पता भी ध्वनित होती है। अहिमा- सत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहायमाः - योगगन M -- ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ७५ उल्लिखित नव पदो का सामान्य परिचय इस प्रकार है:- गमो दंसरगस्स १ णमो दंसरणस्स:---दर्शन शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में होता है, किंतु यहाँ वह 'श्रद्धा' अर्थ में समझना चाहिए । साधना चाहे लौकिक हो या लोकोत्तर, सर्वत्र श्रद्धा की अनिवार्य आवश्यकता है। श्रद्धा के बिना साधारण लौकिक कार्यों में भी पूरी सफलता नही मिल पाती, तो आध्यात्मिक जगत् के परम तत्व की उपलब्धि तो हो ही कैसे सकती है ? एक बार महात्मा गांधी ने अहिंसा को चर्चा करते हुए कहा था-'मैं अहिंसा को शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहता हूं। जैसे हिंसा का फल प्रत्यक्ष है-अंगुली पर छुरी चलते ही अंगुली कट जाती है, वैसा ही प्रत्यक्ष फल अहिंसा का भी दिखना चाहिए। मुझे इसमे श्रद्धा है, पर इसके लिए अटूट धैर्य चाहिए। घास के एक तिनके पर जलविदु लेकर समुद्र खाली करने मे जितनी श्रद्धा चाहिए उससे भी हजार गुणी अधिक श्रद्धा अहिंसा का साक्षात्कार करने मे चाहिए !* गांधीजी ने अहिंसा की शक्ति के साक्षात्कार के लिए जिस अचल एव अपार श्रद्धा की बात कही है, वही प्रत्येक प्राध्यात्मिक शक्ति का साक्षात्कार करने मे लागू होती है । किसी भी विषय मे मनोयोग का समग्र रूप में समर्पित हो जाना, दोलायमान प्रतीति का हट जाना और अचल संकल्प की दृढ़ता उत्पन्न हो जाना श्रद्धा है। इस प्रकार को श्रद्धा अन्तर मे जव प्रादुभाव हो जाती है तो समझना चाहिये कि साधक ने कम से कम आधी मंजिल पार कर ली है। अधूरे मन से किसी भी महान् कार्य को सिद्धि नही होती। साधक एकदम आगे बढ़ना चाहता है परन्तु उसकी मानसिक * गाधी-उज्ज्वल वार्ता पृ० ३ ७६ ] [ ओंकार : एक अनुचिंतन दुर्बलता उसे चार कदम पीछे धमोट ले जाती है। इसके विपरीत, जद कि ध्येय के प्रति सम्पूर्ण श्रद्धा हृदय मे जागृत होती है तो विना विशेष कठिनाई के साधक अनायास ही असर होता चला जाता है। 'यो यच्छदः स एव सः' श्रद्धा मनुष्य को तद्रप बना देती है। क्या जैन धर्म में और क्या इतर धर्मों मे, श्रद्धा को समान रूप से महत्त्व किया गया है। सम्यक् श्रद्धा के अभाव में गंभीर से गंभीर जान भी सम्यग्ज्ञान नहीं हो पाता। वह मिथ्याज्ञान ही रहता है। सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्र, सम्यकथद्धा के विना असंभव है। सन्यग दर्शन मुक्ति-महल का प्रथम सोपान है। जिस प्रात्मा में एक बार, अल्प काल के लिए भी, सम्यग्दर्शन उत्पन्न हो जाता है, उसका भवभ्रमण सीमित हो जाता है और उसे उस अवधि के पश्चात् निश्चय हो निर्वाण की प्राप्ति हो जाती है । इसी से सम्यग्दर्शन के अपार प्रभाव और महत्त्व की कल्पना की जा सकती है। आध्यात्मिक साधना के पथ में श्रद्धा ही साधक का सबसे बड़ा सम्बल है। श्रद्धा से उस माहस और धैर्य की प्राप्ति होती है जिससे असाध्य प्रतीत होने वाला कार्य भी मुसाध्य बन चाता है। अतएव जिस के अन्तः करण में तत्त्व के प्रति हिमालय के समान अविचल श्रद्धा वह साधक भाग्यशाली है और उसका भाग्य ईर्ष्या करने योग्य है। जो लोग श्रद्धा की अवगणना करते हैं, उसे जटता का प्रतीक मानते हैं और तर्क को ही तत्त्वनिर्णय को एक मात्र अभ्रान्त कसोटी सामने है, वे दयनीय हैं। उन्होने गहराई में उतरने का प्रयास ही नहीं किया है। स्थूल जगत् मे अोमल जा रहस्यमय गुक्ष्म किन्तु विगट तत्त्व हैं, उसकी झांको श्रद्धा के बिना कदापि देखी नहीं जा पाती। गोहेन नव पदो में दर्शन को प्रथम स्थान देकर नमस्कार किया गया। ४. विशेष विवेचन देखें लेखपापा 'साधना का राजमागं-मे गम्या- मानविनन विभाग ओकार : एक अनुचिन्तन ] [ रामो नारगस्सः गमो नारपस्सः- हमारे शरीर में नेत्रों का जोधानii कही अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्रात्मा में ज्ञान का है। पापिनी मे ज्ञान सर्वप्रधान शक्ति है। बल्कि यह कहना उपयुनोगा ::: आत्मा को 'आत्मा' है। ज्ञान के कारण ही प्रात्मा का काम वैशिष्ट्य है। नेत्रों के अभाव मे भी मनुष्य कानों में गा गमला :. नाक से सूघ सकता है, जोभ से रसास्वादन पोर पन्धि में भूति कर सकता है, किन्तु जान न होता तो ग्राम में पूजा । ही साम्राज्य होता और उसका पृथक अस्तित्व न होता। प्रत्येक प्रात्मा में अनन्त ज्ञानक्ति बम्पत: विधमान। और काल सम्बन्धो उसकी कोई परिधि नहीं है। तीनां पानी तीनो लोको को हस्तामलकवत् जानना उसका स्वभाव | fry मेघमाला से आवृत्त चन्द्रमा को नैसर्गिक ज्योल्ना मन्द और गन्ना हो जाती है, उसी प्रकार कर्मों से प्रावृत्त प्रात्मा को शान बनि. मी मन्द और मन्दतर हो रही है। जैसे मेघपटल के अपगमन से पनुपाल चन्द्रमा का प्रकाश वृद्धिंगत होता जाता है, उसी प्रकार - कर्मावरण क्षीण होता जाता है, त्यो त्यो पात्मिक मान पी मागानी बढती जाती है। जैसे सम्पूर्ण मेघ हट जाने पर चन्द्रमा प्रपो न्यानापिर रूप में प्रकाशित हो उठता है, उसी प्रकार यावरणों का पूर्ण rim क्षय हो जाने पर प्रात्मा को मौलिक ज्ञानशक्ति परिपूर्ण रूप में आविर्भूत हो उठती है। भारतवर्ष के कतिपय दार्शनिको को मान्यता के अनुसार मुक्ता दमा आत्मा ज्ञानहीन हो जाती है, किंतु वास्तव में ऐसा होना असम्भव है। ज्ञान और आत्मा का तादात्म्य सम्बन्ध है, ज्ञान के न रहने पर प्रात्मा के अस्तित्व की कल्पना ही नहीं की जा सकती। मुक्तात्मा जय समस्त उपाधियो और विकारो से रहित हो जाता है तो उसका प्रधान और अभिन्न गुण भी निरुपाधिक और निर्विकार रूप में जागृत हो उठता है।

७८ ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन साधना के क्षेत्र में ज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वह साधन होने से साथ साध्य भी है। सम्यक् धद्धा होने पर ज्ञान में सम्मात्य प्राता है और सम्यग्ज्ञान के प्रकाश मे की जाने वाली साधना ही फलवती होती है ।* इसी कारण यहां जान को नमस्कार किया गया है । रगमो तवस्स ३ मो तवस्स-तीसरा पद 'तप' है । तपश्चरण के विषय में अगणित भ्रान्तियां फैली हुई हैं। उन भ्रातियों की परम्परा नूतन नही, अति पुरातन है । भगवान् महावीर के समय में भी बहुत सी भान्तियाँ थी । भगवान् महावीर ने उनके निरसन के लिए प्रचण्ड पुरुषार्थ किया और साधको को एक अभिनव दृष्टि प्रदान की। भगवान् के समय मे नाना विधियों का अवलम्बन करने वाले तापस सम्प्रदाय विद्यमान थे। वे देहदमन को ही तपस्या का स्वरूप समझते थे। पंचाग्नि तपना, कंटकशय्या पर शयन करना, आकण्ठ जलमग्न होकर शोत को सहन करना आदि देहदमन रूप तप के प्रकार थे। महावीर स्वामी ने इस प्रकार की एकान्त बहिर्मुखी तपस्या की बालतप-प्रज्ञानपूर्ण तपश्चरण कह कर भत्संना को और बतलाया कि इससे अभ्युदय के अतिरिक्त निःश्रेयस् नहीं प्राप्त किया जा सकता। भगवान् महावीर ने तपश्चरण विषयक प्रचलित दृष्टिकोण मे आमूल संशोधन किया। उसके जट कलेवर में प्रारणो की प्रतिष्ठा की। उसे व्यापक स्वरूप प्रदान किया। वास्तविक तप इच्छाओं का निरोध करना है। तप के दो हम हैं- बाह्य और अन्तरंग। अनगन आदि या बाह्य तप और स्वाध्याय, ध्यान, विनय, वयावृत्य-सेवा, ब्रह्मचर्य, त्याग आदि का अन्तरंग तप मे समावेश होता है। । राममार्ग' मे-'सम्यग्नान एक विशेष विवेचन 'साधना का परिशीलना' देखें।

ओंकारः एक अनुचिन्तन ] [७६ आत्मा को निरावरण एवं निर्विकार बनाने के लिये मूमुक्षु को दो प्रकार के उपायो का अवलम्बन करना पड़ता है। प्रथम अभिनव कर्मों के आस्रवण का निरोध और दूसरे पूर्वसंचित कर्मों का प्रक्षय, इनमे से अभिनव कर्मास्त्रव के निरोध के तो गुप्ति, समिति, दशविध धर्म, अनुप्रेक्षा, परी पह-जप, चारित्र आदि अनेक साधन है किन्तु पूर्वसंचित कर्मों के क्षय का अद्वितीय उपाय तपश्चरण ही है ।" तप की तीव्र अग्नि में कोटि २ भवो मे संचित कर्मो को भस्म किया जा सकता है । इसके द्वारा अभि- नव कर्मों का निरोध भी होता है । यह अद्भुत दोहरा सामर्थ्य तप के सिवाय अन्य किसी साधन मे नही है । समीचीन श्रद्धा और ज्ञान की विद्यमानताप्रो मे ही तप सम्यक् हो सकता है और तभी वह मुक्ति का निमित्त बनता है। इस तथ्य को सूचित करने के लिए दर्शन और ज्ञान के पश्चात् तपश्चरण को स्थान दिया गया है। णमो चरित्तस्स ४ गमो चरित्तस्सः-चारित्र की परिधि बहुत विस्तृत है। आत्मशोधन के लक्ष्य से जो भी शुभ या शुद्ध अनुष्ठान किया जाता है, सव चारित्र के अन्तर्गत है । सिद्धान्त चक्रवर्ती प्राचार्य नेमिचन्द्र ने चारित्र की व्यापक परिभाषा बतलाते हुए यही कहा है- असुहायो विरिणवत्ती, सुहे पवित्ती य जारण चरित्त । अशुभ व्यापारो से सर्वथा निवृत्त होकर कुशल अनुष्ठान मे परायण होना चारित्र कहलाता है। प्रास्त्रव निरोधः संवरः । स गुप्ति समिति धर्मानुप्रेक्षापरीषहजय- चारित्रः । तपसा निर्जरा च-तत्त्वार्थसूत्र, ६, १-३ * भवकोडिसंचियं कम्मं तवसा निजरिजइ-उत्तराध्ययन सूत्र, ३०, ६ ८०] [ ओंकार : एक अनुत्रितन : मगर यह परिभाषा पर्याप्त व्यापक होने पर भी चारिन के समग्र चित्र को उपस्थित नहीं करती। यह व्यात्या मुत्य रूप से व्यावहारिक चारित्र पर लागू होती है। निश्चय चारित्र की प्राति समस्त प्रवृत्तियो का परित्याग कर देने पर स्वरूपरमरण को दशा में ही होती है। चारित्र के बिना मुक्ति-साधना की कल्पना तक नहीं की जा सकती। यही कारण है कि व्यौरे मे कही कम और कही अधिक भेद होने पर भी जगत् के समस्त धर्मशास्त्री ने चारित्र को महित्ता को एक स्वर से स्वीकार किया है। वास्तव मे दर्शन और ज्ञान का सुफल नारिम हो है। जब साधक हेय और उपादेय का विवेक प्राप्त कर लेता है तब हेय के उपादान में सहज ही उसकी प्रवृत्ति होती है। जिस ज्ञान को प्रास कर लेने पर तदनुरूप प्रवृत्ति न हो, जो ज्ञान प्राचार में परिणत न हो, वह वास्तव मे ज्ञान ही नहीं है। साधक गृहस्थ भी होते है और गृहत्यागी-अनगार भी होते है। स्पष्ट है कि दोनो की परिस्थितियां इतनी विभिन्न है कि उनका मिया- कलाप समान नहीं हो सकता। इसी कारण चारित की दो श्रोगिया की गई हैं-देश चारिय और सकलचारित्र, जिन्हे सामपा: देशविरती और सर्वविरति भी कहते हैं। सर्वविरति में पांच महावत और उनके पोषक दरारे भनेकविध प्राचार सम्मिलित हैं। महायतो का संक्षित परिचय पहले या गुफा। उन्ही का प्रांशिक रूप में आचरण करना देशविरति है। देशविरति में पांच पूर्वोक्त अहिंगा आदि अणुननो के अतिरिक्त गात सीतो का भी समावेश है। जैन श्रुत का बहुत बड़ा भाग पानार निम्पग में रोका है। बरा विस्तार के साथ वारीफ से बानीक वातो का निरूपण एवं राष्टीयारा किया गया है। विस्तारमय में यहां उसका उग माग किया जा [८१ ओंकार : एक अनुचिन्तन ] सम्यक चारित्र गीता की भाषा मे 'कर्मयोग' कहा जा सकता है। कर्म के लिये गीता की एक आवश्यक शर्त यह है कि वह निष्काम होना चाहिये। जैन शास्त्र भी इस शर्त का अनेकान्त दृष्टि से समर्थन करता है। वहां कहा गया है-'ऐहिक लाभ के उद्देश्य से प्राचार का अनुष्ठान नही करना चाहिये, पारलौकिक लाभ के उद्देश्य से प्राचार पा अनुष्ठान नहीं करना चाहिए । कोति वर्ण शब्द और प्रशंसा के लिये आचार का अनुष्ठान नही करना चाहिये, केवल विशुद्ध प्रात्मदामा प्रात करने के उद्देश्य से ही आचार का अनुप्ठान करना चाहिये । कहा जा सकता है कि यदि विशुद्ध प्रात्मदशा को प्रामि के उद्देश्य से साधक प्राचार का अनुष्ठान करता है तो उसमे निष्कर्मता कहां रही ? किन्तु गीता की निष्कर्मता का अभिप्राय भी लोकपणा से ही समझना चाहिए। साधना को प्राथमिक अवस्था में प्रात्मशुदि को पावन और प्रेरक अभिलाषा विद्यमान रहती ही है। उसके प्रभाव में कोई साधनाक्षेत्र मे अवत्तीर्ण नही हो सकता। प्राथमिक अवस्था से पप्चात् माध्यमिक अवस्था मे भी वह अभिलापा बनी रहती है, परन्तु पहले जैसी व्यक्त रूप मे नही, अव्यक्त स्थिति में रहती है, साधक जव उच्च भूमिका पर चरण न्यास करता है और वीतरागता प्राप्त कर लेता है तभी पूर्ण निष्काम दशा प्राप्त होती है। इसीलिये कहा जाता हैं कि मुक्ति प्राप्त वही करता है जिसमे मुक्ति को भी कामना नहीं रह जाती। * नो इहलोगट्ठयाए आयारमहिटिज्जा, नो परलोगट्ठयाए पायारमहिडिजा, नो किन्ति-वष्ण-सद्ध-सिलोगट्टयाये आधारमट्टटिला, नन्नत्य प्रारहतिहिं हेउहिं आयारहिडिजा। -दसवेयालियसुतं, ६, ४ + यस्य मोक्षेऽप्यनाकारक्षा स मोक्षमधिगच्छति । -- २] [ ओंकार : एक अनुचिटन इस प्रकार आत्मशोधक अनुष्ठान में प्रवृत्ति करना और आत्मारक में रमण करना चारित्र नामक चोया पद है।' ५ रगमो लोए सव्वसाहूणं मनुष्यलोक मे विद्यमान सर्व सागुमी को नमस्कार हो। जैसे मंत्रसाधक अपने लक्ष्य में एकनिष्ठ होकर, आने वाले समस्त उपसगों को पूर्ण दृढ़ता के साथ सहन करता है, उसी प्रकार मुमुक्षु साधक शुद्ध आत्मोपलब्धि के उद्देश्य से निरन्तर जागृत अप्रमत्त रह कर और जागतिक प्रपंचों से दूर रह कर साधना करता है, वह साधु कहलाता है। साधु पांच महाव्रतों का पालक, पांचो इन्द्रियो का विजेता, कोय मान माया लोभ से निवृत्त, मन वचन काय, को पाप व्यापार से निवृत्त करने वाला, समिति गुप्ति का माराधक, क्षमा मादव आजब सत्य शोन आकिंचन्य ब्रह्मचर्य आदि का पाराधक, संवेगवान्, समभाव मे शीतल सरोवर मे अवगाहन करने वाला, जगत् मे स्थित रहकर भी फगलपन- वत् जगत् से अलिप्त, स्वाध्याय एवं ध्यान मे निमग्न और वैराग्यभाव को साक्षात् प्रतिमा होती है। साधु जीवन अंगीकार करने का प्रधान हेतु अात्म कल्याण करना है, किन्तु प्रात्म कल्याण का प्रथम प्राधार 'स भूतात्मभूतता' अर्थात प्रारिण मात्र को प्रात्मवत् समझना है। यह उदार भावना निगम हदय मे मूतिमती हो उठती है, वही सच्चे मंयम की पाराधना गार पाता है। वह परफल्यारण को प्रारम कल्याण का अनिवार्य अंग मागता है और जगत् के उद्घार में मात्मा का उजार मानकर स्व-गर में समान भार धारण करके प्रवृत्ति करना है । अतएव उमा नीयन दून में दो लिए भी महान् वरदान होता है। साधना का राजमार्ग में 'मम्मका नागिन : एर परिमय गंगा' देणे ' ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ८३ परकल्याण करने को बुद्धि से किया जाना वाला कर्त्तव्य अहंकार उत्पन्न करता है। उससे अपने प्रति उच्चता और उपकरणीय व्यक्ति के प्रति हीनता की भावना भी उत्पन्न हो सकती है। किन्तु जो परोप- कार स्वोपकारखुद्धि से किया जाता है, उसमे इस प्रकार को अवाछनीय वृत्तियो के पैदा होने का खतरा नहीं रहता। आत्म कल्याण के लिये परकल्याण करने वाला दूसरो पर ऐहसान नही लादता, अंहकार से बच जाता है और प्रत्युपकार की अपेक्षा न रखने के कारण, प्रत्युपकार न होने की स्थिति में भी निराशा का अनुभव नही करता। वह निरीह भाव से सतत परोपकार मे लोन रह सकता है। इस प्रकार लोक का असाधारण कल्याण करता हुआ भी साधक आत्म-कल्याण करनेवाला ही कहलाता है। लोक कल्याण का यह उच्चतम आदर्श है, अनूठी कला है । कई लोग कहा करते हैं कि साधुत्व को प्रङ्गीकार करना एक प्रकार 'को पलायन वृत्ति है, अपने सामूहिक कर्त्तव्यो के परित्याग की स्वीकृति है या अपने व्यक्तित्व की परिधि को अधिक से अधिक सिकोड़ कर अपने तक ही सीमित कर लेना है। ऐसा कहने वाले सज्जनो ने साधुता की महान् मर्यादा को सहृदयता के साथ समझने का कभी प्रयत्न ही नही किया है। सत्य इससे एकदम विपरीत है। साधुता पलायनवृत्ति नही, आत्मा के शाश्वत शत्रुओ पर प्रात्यन्तिक विजय प्राप्ति का तुमुल संघर्ष है। न उसमे सामूहिक कर्तव्यो का संन्यास है, न व्यक्तित्व का सङ्कोचीकरण है, बल्कि एक परिवार, समाज अथवा राष्ट्र तक मर्यादित 'अहम्' या आत्मीयता को विश्वव्यापी विराट् स्वरूप प्रदान करना है। साधु किसी एक जाति, समाज या राष्ट्र का नहीं होता, वह सबका बन जाता है । सङ्कीर्ण हृदय के लाग ही ऐसा कहते है कि जो सबका है वह किसी का नहीं है ! जब एक व्यक्ति साधु जीवन स्वीकार करता है तव वह किसी ८४ ] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन . सत्कर्म का परित्याग नहीं करता, बल्कि अपने जीवन की रिक्तता को पूत्ति करता है । अर्थात् गृहस्थावन्या मे जिन सत्कर्मों को कर नही पाता था या करता हुआ भी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाता था, उनमी परिपूर्णता के लिए प्रयास करता है। ऐसी स्थिति में साधु जीवन पर किये जाने वाले प्राक्षेपो के लिए कही कोई अवकाश हो नहीं है। मानवजाति में जो प्रशस्त और स्पृहणीय वृत्तियां विद्यमान है, उनका अधिकाश श्रेय समय-समय पर वसुधा को पावन करने वाले संरा- जनों को ही है। वहीं चिरकाल मे मानव-यात्मा को देवत्व की महिमा से मंडित करने का उद्योग फरते आ रहे हैं। अतएव नव पदों में उसे स्थान प्रदान किया गया है। रगमो उवज्झायाणं णमो उवज्झायाः-उपाध्याय परमेष्ठी को नमस्कार हो। उपाध्याय वह मुनीन्द्र कहलाते है जिन्होंने गुरु के चरण-गरण में रह कर नागमो का गम्भीर अध्ययन किया है, जो गव्दार्थ में पारङ्गत होती है, संघ में अध्ययन-अध्यापन का उत्तरदायित्व वहन गारते है और विना को परम्परा को चालू मते है । उपाध्याय परमेष्ठी ग्गार - शास्त्रो और चौदह पूर्वगत शुनो । ज्ञाता होते है. अगवा जिस गारस मे जितना श्रुत भाग उपलभ हो उसके गलगी वेत्तागो प्राचार, गूप्रत आदि महागात पर लाते हैं। दृष्टिवाद नामक बाहय धन पान निमागी मे में न निमार पूर्वगत धन है। उसके. गौदा ३५ विभाग जोगं नाम में प्रसिद्ध हैं।

- ओंकार : एक अनुचिन्तन] [८५ उपाध्याय भी सामान्यतः साधु ही होते है, तथापि उनका पृथक निर्देश करने का कारण उनके उत्तरदायित्व एवं कर्तव्य की विशिष्टता है। पूर्वकाल मे श्रुत लिपिवद्ध नहीं किया गया था ।' श्रुति परम्परा से ही वह चलता था। गुरु अपने शिष्य को और शिष्य अपने शिष्य को मौखिक रूप से हो आगम पढ़ाता था । इस प्रकार मागम अविच्छिन्न प्रवाह को प्रचलित रखना कोई साधारण कार्य था। इसी उद्देश्य से साधुसंघ में उपाध्याय पद को पृथक् व्यवस्था को गई थी। शास्त्र जव लिपिवद्ध होने लगे तब भी उपाध्याय पद का वैशिष्ठ्य अक्षुण रहा। आधुनिक काल मे यद्यपि शास्त्र मुद्रित और अनूदित होने लगे है तथापि उनके विशेषज्ञ के रूप में उपाध्यायो की उपयोगिता कम नहीं है। शास्त्र मे उपाध्याय के पच्चीस गुणो का उल्लेख मिलता है । उसे द्वादश अङ्गो का वेत्ता, चरण-करण निष्णात, आठ प्रकार से प्रभावना करके धर्म-शासन की महिमा वृद्धि करनेवाला और मन, वचन एवं काय के अप्रशस्त व्यापारो का निग्राहक होना चाहिए । इस प्रकार परमागम एवं तत्त्व विद्या की शिक्षा देने वाले, ज्ञान की चिरागत ज्योति को जाज्वल्यमान रखने वाले उपाध्याय परमेष्ठी को यहाँ छठा स्थान दिया गया है। . गमो आयरियाणं णमो आयरियारणं प्राचार्यों को नमस्कार हो । श्रमणसंघ मे प्राचार्य का वही स्थान है जो सेना मे सेनापति का होता है । वह संघ के नेता होते है। ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप और वीर्याचार नामक पाच प्राचारो का वे स्वयं पालन करते और दूसरो से पालन करवाते हैं। साधु और उपाध्याय के योग्य पूर्वोक्त गुण तो प्राचार्य मे होते ही ८६ ] [ ओंकार : एक यनुनिन्तन हैं, उनके अतिरिक्त भी अनेक विशेषतायें होती हैं। प्राचार्य को प्राक्ष सम्पदायें और छत्तीस गुण प्रसिद्ध हैं। पाठ सम्पदायें इन भांति १. आचार सम्पदा-महाव्रत, समिति, गुप्ति, रूप मानार मे ना होना, पांच प्राचारों का दृढ़ता के माय पालन करना, कठिन मे पाठिन प्रसंगो में भी उत्कृष्ट प्राचार से न डिगना प्रादि । २. श्रुत सम्पदा-अपने समय में उपलब्ध नमस्त श्रत का परिजन होना, स्वममय के माथ परसमय में भी पारंगत होना, अपने युग विद्वानों में मूर्धन्य होना, उत्सर्ग मार्ग का परिस्फुट विषेक होना प्रादि । ३. शरीर सम्पदा-प्रभावशालो एवं तेजस्वी गरीर का पारक होना, अंधत्व बधिरत्व आदि गुटियो का न होना । ४. वचन सम्पदा-वाणी मे माधुर्य हो, हितकारिता हो, जिनसे गुन कर प्रतिपक्षी भी प्रभावित, चकित और प्रानन्दित हो उठे। गुग में वचन निकलें जैसे चन्द्रमा से अमृत झरता हो। यागी साफ, परिमित और प्रिय हो। ५. चाचना सम्पदा-भात्री से पठन-पाठन के विषय में अमाधारण कौगल होना, गिप्य को पानता और योग्यता को समझ कर तदनुरुप ही उसे ज्ञानामृत का पान पाराना । ६. मति नम्पदा-बाल दिशा दर्गक होते है। उनमे प्रत्येक जियागु या प्रतिवादी के प्रत्येक प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं लिया गया। उसे पाने के लिए बुद्धि-प्रतिभा नाहिये । ऐमी पिगिष्ट प्रतिमा हो गति मम्पदा है। प्राचार्य में अगाधारण युद्धिमय चाहिये । ७. प्रयोग मम्पदा-विजिगीया मे प्राय भानसिंग यादिगो में दुर्ग फोगान्त कर देने की विनिट क्षमना प्रयोग मापदा। । mm-RMA दगा तम्मना, दमा ४, म्यानान टाणा ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ८७ ६. संग्रह सम्पदा-पहले कहा जा चुका है कि प्राचार्य संघ के नायक होते हैं। नायक गासक होता है और शासक के नाते उन पर सम्पूर्ण संघ के योग-शेम का उत्तरदायित्व रहता है। मंघ के मुनियों को कोई अनावश्यक एवं अनुचित कष्ट न हो और उनको संयमागधना मे विघ्न उत्पन्न न हो, ऐसी दूरदर्शिता प्राचार्य में होनी चाहिए। मुमुक्ष एवं वैराग्यवान् शिप्यों का संग्रह करना, उनके लिए प्रावश्यक उपकरणों को व्यवस्था करना, समुचित सुख-सुविधा उत्पन्न कर देना मंग्रह- सम्पदा मे परिगणित है। कोई-कोई इन पाठ सम्प्रदाय के चार-चार भेद करणे और उनमें चार प्रकार के विनयो की गणना करके ३६ गुणो की पूत्ति करते है। किसी के मत से १२ तप, १० यतिधर्म, ५ प्राचार, ३ गुति और आवश्यक मिलकर ३६ गुण होते हैं। कही-काही इन गुणो मे ५ महावतों ५ प्राचारो, ५ समितियो, ३ गुलियो, ५ इन्द्रियों के दमन, ६ ब्रह्मचर्य गुतियो तथा ४ कपायों के परित्याग को गरगना की गई है। काही जाति- आदि गुरण इनमे परिगणित किए गए हैं। गुणो के नामनिर्देश मे शाब्दिक अन्तर होने पर भी कोई वास्तविक अन्तर नहीं हैं। पूर्वोक्त गुणो का स्वरूप इतना विस्तृत है कि उनमें एक दूसरे का अनायास ही समावेश किया जा सकता है। तात्पर्य यह है कि संघ के नेता आचार्य का वाह्य और आन्तरिक व्यक्तित्व प्रभावशाली होना चाहिए। उनको प्रत्येक किया प्रादर्श हो, उनका ज्ञान भण्डार अक्षय हो, प्रतिभा अनुपम हो, मंघ का उत्कर्ष बहुत अंशो मे प्राचार्य की सूझ-बूझ पर निर्भर रहता है । सम्पन्नता नमो अरिहातणं गमो अरिहंताएं-अरिहन्त भगवान् को नमस्कार हो । अरिहन्त का सीधा-सादा अर्थ है-शत्रुओ का हनन करने वाला।

८८] [ ओंकार : एक चनिन्दन किन्तु अध्यात्म मास्त्र में 'अरि' का अर्थ भिन्न है। यहां किनी - समूह या राष्ट्र आदि को अरि नहीं माना जाता। अत्यात्मवेत्ता बहिनि से किसी तथ्य पर विचार नहीं करते । उनको दृष्टि अन्तर्मुसो पोर तत्त्वस्पगिनी होती है। उनका लक्ष्य अमोघ होता है। वास्तव में शत्रु वही है जो आत्मिक हित पा विधात करता है, जिसके कारण प्रात्मा अपने सच्चिदानन्दमय स्वरुप से च्युत हो रहा जिसने आत्मा को उसके अनन्त-असीम नैसगिक वैभव से पंगा पार रक्खा है। इस दृष्टिकोण से विचार करने पर प्रात्मा के साथ कर कर्म प्रवाह ही उसका असली शत्रु है। स्वभाव से प्रात्मा गांधा निवि. कार, निष्कलंक, चिन्मय, आनन्दमय, परमज्योतिम्बरुप तथा साना वीर्यमय है। किन्तु कर्मावरों ने उसके इस स्वरूप को प्राथा पर दिया है। महापुरुषों के महामार्ग का अबलम्बन करके उन धारणा को क्षीण एवं विनष्ट करने का जो पुरुषार्थ किया जाता है, नही माधना साधना का स्मरण ज्यों-ज्यो ऊंचा उठता पाता है, माचरण शिविरागीना है और उसी अनुपात मे प्रात्मा का सहज शुद्ध स्वाप प्रकागित गा) । जन शास्त्रो में पारमा के विकास यम का प्रतीय इदयग्राली, या एवं तर्कसंगत सांगोपाग वर्णन उपलब्ध होता है। श्रात्मा के ज्ञान, मुग और बीगं गुगों का विधान करने पार फर्म समूत नष्ट हो जाते हैं, जब पारमा गर्गरम्य प्रामा मेहनिर्मा प्रात करके सर्वजाता, नवंबर्गी, पूर्ण गीत गग योर मनन गंप परमात्मा बन जाता है । उगे जोपन्मुकदमा पानी है। यामागेर परमात्मा 'अरिटा' करनारी है। पयपि मा यो नि gी नहीं प्रान होनी तवापि यह नियटनर हो जाती है। यही अरिहना परमात्मा मुक्ति के मार्ग पो प्रम। से प्रशानावृत जगा के जीवो का शान पनि प्राम। प्राएव दे हमारे मागप्प है। दर्शन, | ६ ओंकार : एक अनुचिन्तन ] णमोसिद्धाणं नमो सिद्धारगं:-निद्ध भगवन्तो को नमधारो। साधना का चरम लक्ष्य सिद्ध पद को प्रानि। मप: होम होने पर आध्यात्मिक विकास परिपूर्ण हो जाना है। नमन पापिका भावो को निवृत्ति हो जाने से प्रात्मा का विपुल माल म्यमा प्रकट हो जाता है। अरिहन्त अवस्था मे घाति कमों के क्षय हो जाने में ना जाना गुण प्रकट हो जाते हैं, फिर भी भवोपनाही, चार प्रधान माग रहते हैं, जिनमे आयु कर्म भी सम्मिलित हैं। प्रागु फन पी गगामिय सन्निकट होती है तो अरिहन्त भगवान् उच्चकोटि के ध्यान सा प्रपनंबर करके शीघ्र ही शेष कर्मों को क्षीण कर देते हैं और विदेह पगा प्रान करके सिद्धत्व प्राप्त कर लेते हैं। मुक्त दशा मे मूक्ष्म या स्यूल कोई पारीर नहीं रह जाता, प्रतएप आत्मा का अगुरु लघुत्व गुण व्यक्त हो जाता है। उनका अप्नंगमन स्वभाव भी, जो कर्मों के प्रावरणो से विकृत हो रहा था, प्रताप में आ जाता है। अतएव मुक्त होते ही आत्मा कवंगति गारफे लोक के ऊर्ध्व भाग तक, एक ही समय मे, जा पहुंचता है । जैसे जल मत्स्य को, और लोहे की पात रेलगाड़ी की गति में सहायक होता है, उसी प्रकार धर्मास्तिकाय नामक एक अमूर्त द्रव्य जीव पोर पुद्गल की गति मे सहायक होता है। जहां तक धर्मास्तिकाय विद्यमान है, वहाँ तक का आकाश-भाग लोकाकाश कहलाता है। उसके आगे का आकाश अलोकाकाश के नाम से प्रसिद्ध है। ऊर्ध्वगामी सिन्हात्मा, जहाँ तक धर्मास्तिकाय का सद्भाव है, वरावर गति करता है। धर्मास्तिकाय की अविद्यमानता में उसकी गति प्रतिहत हो जाती है ।। * अलोए पडिहया सिद्धा, लोगग्गे य पइट्टिया । इहं वोदि चइत्तारणं, तत्त्थ गंतूण सिज्झइ ।। ग्रीपपातिक सूत्र

१०]
[ प्रोकार : एका प्रनितिन
सिद्धिपद के विषय में कहा गया है कि यह पद मिव माद मन
प्रकार के उपद्रवों से रहित, अचल, अन्ज-गमन्न जागियों में दिन
अनन्त, अक्षय, अव्यावाघ और पुनरागमन से रहित है। गित भगवान
सदाकाल के लिए इस प्रकार के परमोतम पद को प्राप्त कर ली है।
सिद्ध भगवान् मे निम्नाकित आठ प्रधान गुण होते:
१-अनन्त ज्ञान
२-अनन्त दर्शन
३-अव्यावाघता
-अगुरुलगुत्त्व
५-- अमूर्तत्त्व
६-अनन्त वीर्य
-अक्षय स्थिति
-अनन्त चारित्र
सिद्ध का स्वरूप वस्तुतः शुद्ध प्रात्मा का स्वाप । उग रया
का वर्णन करने में गन्द, चिन्तन करने में मति, और विकास करने में
तकं समर्थ नहीं है । बड़े २ ज्ञानी भी उम अनिर्वचनीय, अनित्य
और अतक्र्य स्वरूप को कहने में अपना अगाम घोपित पारने में ही
अपना गौरव मानते हैं।
भारतीय संस्कृति में : मुक्ति
प्रत्येक प्रात्मवादी प्रान्तिमा नगन में समा एक दिन मनाया
उपस्थित रही है। वह यह है कि ग्रागिर मामा को परम परिमा
गया है ? जन्म मरण के विषय में पंगा लागेर अगाडि
• गवेगरा निपनि, तपन विधः, मग गा
-धानागंभ. २१. १. 7. ६.

ओंकार : एक अनुचिन्तन ] - काल से लेकर अनन्त काल तक प-Jघर मलाही निसर्ग का विधान है ? सभी दागनिक जगम का और दुःख प्रात्मा का स्वरूप नहीं है तो गवानी भी सकती है कि प्रात्मा को इन दु. मे मान मि . . या मूढता यदि आत्मा की शाश्वत नहावी नहीं हो : का अभिन्न स्वरूप है तो वह गुट चेतना, जिनमें मशान 1m हो, कभी उसे नसोय होती है ? भारतीय दर्शनों ने इस पर विचार नियोmt: स्वर से स्वीकार करते है कि लात्मा को एक प्रतिम Hिiii मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण कहते है। मुक्त होने पर पना. भ्रमण के दु.ख से छुटकारा हो जाता है। किन्तु मा र किस स्थिति मे रहता है और वह दशा मावति प्राम विषय में विभिन्न दर्शनशास्त्री एफमत नहीं है । वौद्धदर्शन प्रात्मा को स्वतन्त्र सत्ता को स्वीकार की गरमाया चार्वाक की भाति पुनर्जन्म, वन्ध और मोक्ष पा निध नीमा उसकी मान्यता के अनुसार विश्व के अन्यान्य पटापाकीनानिनिसm भी स्वभावतः विनाशगील है, उनका प्रवाह-गन्तान निम्न चाकमा है। पूर्ववर्ती चित्तक्षण से उत्तरवर्ती चित्तक्षरण को उत्पत्ति होती नमी है। मरणकाल मे जो चरमसमयवर्ती चित्तक्षण होता है, उसमे पर जन्म का प्रथम चित्तक्षण उत्पन्न होता है और इस प्रकार जन्म-जनगानगर को धारा प्रवाहित होती रहती। इस धारा का अन्त या जाना प्रार चित्तसन्तति का निरोध हो जाना ही मुक्ति है थोडे से विचार से ही यह तथ्य सामने आ जाता है कि योद्धसम्मत इस मुक्ति मे खोना ही खोना है, पाना कुछ नहीं है। अपने प्रापको अनन्त शून्य मे विलीन कर देना है । यह किसी को स्पृहणीय प्रतीत नही हो सकता । वास्तव मे ऐसी मुक्ति लाभ का नही, घाटे का ही सौदा है ।

१२] [प्रकार : एक अनुदिन वैदिक परम्परा के मुक्ति के सम्बन्ध में एसमय नही। मि. दर्शन के प्रणेता दणाद को मुक्ति का स्वर प भी होगा। और यानन्द हो ऐसे गुण हैं जो प्रात्मा पो जर पायों से पृनम की हैं । यही आत्मा का अनाधारण और नर्वोत्तम गय है। बलिया छिन हो गया, लुट गया तो समझना चाहिये कि यात्मा का नया गया। उसके पास अपना कुष्ट भी शेप नहीं रहा । पिर से आत्मा में वैशिष्ट्य नहीं रह जाता। किन्तु परणाद ऐनीको मुत । प्रतिपादन करते हैं। वे मुक्ति में मारमा पा अस्तित्व को स्वीकार ) मगर ज्ञान और प्रानन्द में उसका सर्वथा वंचित हो जाना मानते हैं। उनके कथनानुसार मुक्त दगा में 'शुद्ध' ग्रामा रह जाता है और 're' का अर्थ है बुद्धि मुरा प्रादि ममम्त विमिष्ट गुणो का प्रभाव हो जाना। जिस ज्ञान मे विनम या विप्रयास या अपुगंता है, पर गोपामिल। जो प्रानन्द इन्द्रियो के माध्यम से अनुभूति में पाता है और गमा जो पराधित है, वह यात्मा का स्वभाव नही। निमा और निकापधिक अवस्था मे इन विभावो का अल तो जाना तो सामागि फिन्तु शुद्ध संचित और प्रान्मानन्द का भी अन्न भागमा गो प्रार से प्रात्मा का ही विनाश मानना है। ऐसी मुक्ति का प्रण प्रामामा पापारागंट के महा जा कमाना । कतिपय वैदिक गति मुत्तात्मा गांनी गंभाला कोणार नहीं करते। उनका निमी, मोना मान Im पौर में भी मम्बत पदाकी माने पाय MET और प्रतीत पाय, देहत्या दरवीं पाय और TET परमाणु आदि मन्त्रिगीगर नही हो। riगि प्रा योगा वी, ग्वीकारनी।

+ .. १ 7 ओंकार : एक यनुचिन्तन ] सर्वज्ञ को सत्ता स्वीकारन : प्रकार टिक सकता है नम:' नित्य और प्रपोल्य माना गया है। प्रस्तुत प्रश्न का सम्बन्ध गा... '.:. इस विषय को मोमांना नहीं नहीं - - : : विषय मे ही विचार करना है जो देश !, '' : ' ; मे क्या स्थिति हातो है ? " सर्वनता के पक्ष मीर विषा: ४. भी अधिक चिन्तन किया गणि.. सर्वसम्मत निर्णय पर नहीं पहन करे। इन संबंध में एफ तक, जो नमन :"::. मे उद्भूत होता है। पारमा न्यमापन : विज्ञानघन और चिदानन्दमय बीमार : अज्ञान और मियाद है, या मालि मुक्त अवस्था मे यदि समन्त पोपनि.... । जाती है तो अमान को भी निवृति का संक्षय हो जाने पर पूर्ण जानमध मिति : ''. ऐसा ज्ञान हो जो विशुद्ध हे प्रयान् किम नाम: सर्वज्ञता कहलाता है। मुक्नमा में मा . + -- 1 . ★ .. re प्रकार अनिवार्य जो जाता है । मुक्तदना समस्त प्रावरणो का बारपन्निास होतो है, अतएव वह गाश्वत ही होनी चाहिम 1 raf :- ११४५ जनक है और जब पूर्ण निविकार स्थिति एक बार 10 तो विकार का अहेतुक उद्भव संभव नहीं है। हम निति , पर्याय या पागवजीवन के समान मुक्तपर्याय भी अल्पकालीन मुक्ति का कोई महत्त्व नहीं रह जाता जिसके लिंग मापना काम आयोजन किया जाय । अतएव अवतारवाद फो प्रमल्लारपना न पानाही

-
६४]
[ोकार : एप अनुनितान
नो प्रालंकारिक कथन ही समझना चाहिये । वस्तुतः मुस्तामा यो नः
अवतरित होकर जन्म जरा-मरगा की पीड़ा की परिधि में नही माना ।
प्रोपपातिक मूत्र में मुक्तात्माग्रो पा वर्णन गगन गुन्दरता
साथ किया गया है। उसका सार यहाँ अदित कर देना -
ही होगा।
भव से मुक्त होते समय चरम गरीर का परिल्लाग करने ममा
शरीर की जो प्राकृति होती है, मुक्तात्मा उनी पारुति मे मा मस्मिा
रहते हैं । अन्तर केवल इतना ही पड़ता है कि मुक्त होने पर गरीरमो
अवगाहना का तीसरा भाग कम हो जाता है।
सिद्ध जीवों को पृथक-पृथक स्थान को प्रावटयाला नही होती।
अमूर्त होने के कारण जहाँ एक सिद्ध हैं वहां अनन्त गित रहते है।
सिद्ध जीव अगरीर होते है, अतएव सारीर अवस्था में आगेर में
कारण आत्म-प्रदेगो मे जो पोलापन रहता है, पर उस अवम्मा मे नही
रहता। वे फेवल ज्ञान-दर्शन मे सदा उपयुक्त रहते हैं। मगलात
वर्ती भावो को केवल ज्ञान से जानते है और केवलन से देगा।
पूर्ण रूप में अव्यायाध को प्राप्त मुहात्मालो को मो अनुपम
मात्मानन्द प्राप्त रहता है, वह न नो मनुष्यों को प्राम है, नो-
momhematiPries
२
१ दीहं वा हम्बा नमिभयेा गटात
तत्तो विभागो, मिठालोमारा गया।
जन्म व एगो मिलोगन ना नारि।
अगोयाममवगाहा, पु गो गि गोली।
३ अपना मोरधना की
मामामामा म र ।

ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ ६५ में स्वर्ग का सुख वासी देवो को ही। सिद्धिसुख की तुलना किसी गिनती में नहीं है। देवो को जितना सुख है उसे यदि भूत भविष्यत् और वर्तमान काल के समयो से गुणित कर दिया जाय और उसके अनन्त वर्ग किए जाएं तो भी वह मुक्तिसुख की समानता नही कर सकता ।४ भाषाविषयक कौशल से अछूता कोई म्लेच्छ मनुष्य किसी अत्यन्त सुन्दर नगर के अद्भुत सौन्दर्य का अनुभव करके भी उसका यथा तथ्य वर्णन नही कर सकता, उसी प्रकार मुक्तिसुख का वर्णन शब्दो द्वारा नहीं किया जा सकता। उसके वर्णन के लिए कोई सत् उपमा नहीं है। हाँ, असत् उपमा का आश्रय लेकर कहा जा सकता है-जैसे कोई बहुत दिनो का भूखा-प्यासा 'सर्व कामगुरिणत' आहार करके भूख-प्यास छुटकारा पाकर अमृत से तृप्त हुअा सा अनुभव करता है, उसी प्रकार अतुल अव्यावाध और शाश्वत् सुखमय अवस्था मे मुक्तात्मा विराजमान रहते हैं।५ मुक्तात्मा समस्त दु.खो से पार हो चुके है, जन्म जरा मरण और वन्धन से विमुक्त हैं तथा शाश्वत सुख का अनुभव करते है ।६ . से ४ गवि अत्थि माणुसाणं, तं सोक्खं णवि य सव्वदेवाण । जं सिद्धाणं सोक्खं, अव्वाबाहं उवगयारणं । जं देवाणं सोक्खं, सव्वद्धापिंडियं अणंतगुणं । रण य पावइ मुत्तसुहं, राताहिं वग्ग वग्गूहिं । जइ रणाम कोई मिच्छो नगरगुणे बहुविहे वियागंतो । न चएइ परिकहे उं, उवमाएँ तहिं असंतीए । जह सव्वकामगुरिणयं, पुरिसो भोत्त रण भायणं कोइ । तण्हा छुहाविमुक्को, अच्छेज्ज जहा अमियतित्तो। ६ तित्यिण्ण सव्वदुक्खा, जाइजरामरण बन्धरणविमुक्का । अव्वाबाहं सुक्खं, अरगुहोति सासय सिद्धा। -प्रौपपातिक सूत्र, सिद्धप्रकरण।

६६ ] [मोंकार : एक अनुचिन्तन मुक्ति के स्वरूप में जिस प्रकार मतविभिमता देखी जाती है, तो प्रकार उसके कारणो के संबंध में भी। उसका उल्लेख मारमान लिा जा चुका है। हम बनला आये है कि मुक्ति जो परम प्रोर माम मेग को प्राप्ति सम्यक श्रद्धान, सम्यक ज्ञान, और सम्गक नारिम ३ दिना संभव नहीं है। जो लोग अक्लेले ज्ञान से मुक्ति की कल्पना करते हैं. उन उपर देते हुए और चारित्र का महत्त्व प्रदगित करते हुए महान् आचार्य श्रीमान वाहु ने कहा है-समन शुतज्ञान का फल चारित है और चारित्रका फल निर्वाण है। निर्यामक (मल्लाह) कितना ही कुगल पयो न हो, अनुल परन के विना वरिणक को उसके प्रभोष्ट लदर पर नहीं पहुंचा रास्ता---गाणा के किनारे नहीं ले जा सकता, इसी प्रकार कोरा मान, चारिम अनुकूल पवन के अभाव के प्रात्म-पोत को संगार-सागर में पार उतार सकता। ज्ञानविष्ठ यह सोचते है कि हम ज्ञान के ही महारे पार लग जायेंगे, वे अम में हैं और किनारे को निकट पग कर मारिन अभाव मे पुनः संसार-सागर मे ब जाते हैं। जिसने अगस्त्य की भाति श्रुत-वारिधि का पान कर लिया है, प्रमा पाण्डिन्य प्रान कर लिया है, किन्तु उसे सागरणगत नही किया, उमरे लिये यह अगाध शान भी उभी प्रकार निरक है में श्री पामे जमा गये लाखो करोडो दोप * मामाइयमाय मुयनार्ग जाय विमानो। तस्सविसापरणं, सारी पराग निगा ॥११२॥ जह यननित्राममोवि वाणिनियंगगि । पाएए विणा पोमोन गएर मत गरि ११ १.५॥ तह नागदनिजाममोति गितिवमा पाहाः। निउरणोऽपि जीयपोमो, गंजमा ११४६॥ गुपियमा चरमपि। समम ननिता राशि:११५ मार, ifi ओंकार : एक अनुचिन्तन ] । ६७ इस प्रकार पहुंचे हुए साधक ज्ञान और शिया से समुचित समन्वय पर भार देते हैं। उनका कथन है कि ज्ञान हीन मिया जैमे निरर्थक है, क्रियाहीन ज्ञान भी उसी प्रकार व्यर्थ है। इस भाव को व्यक्त करने के लिये जैनागमो मे एक वडा सुन्दर स्पक आया है । एक विशाल वन मे दावानल सुलग उठा। दुर्भाग्य से दो व्यक्ति एक अंधा और एक पंगु उसमे फंस गये। अंधा मनुष्य दावानल की चपेट में आने से बचने के लिये भागा। फिन्तु उसे ज्ञात नही था कि किस ओर भागने से प्राणरक्षा होगी ? विना जाने ही वह भाग खड़ा हुआ । परिणाम यह हुआ कि उसकी दौड़ दावानल की ओर ही हुई और वह उसमे भस्म हो गया। यही दशा ज्ञानहीन क्रियावान् की और क्रियाहीन ज्ञानवान् की होती है। एक दूसरे अंधे और पंगु के समक्ष भी यही परिस्थिति उत्पन्न हुई । उन्होने परस्पर समझौता किया। दोनो मे समन्वय स्थापित हुआ। अंधे ने पंगु को अपने कंधे पर विठलाया। पंगु पथ प्रदर्शित करने लगा और अंधा चलने लगा। पारस्परिक सहयोग से दोनो की त्रुटि को पूत्ति हो गई और वे सकुशल नगर मे जा पहुंचे। इसी प्रकार समन्वित ज्ञान और क्रिया से सिद्धि प्राप्त की जा सकती है ।* राजनैतिक पंचशील आज के युग में असाधारण और अभूतपूर्व वैज्ञानिक क्रान्ति हुई और * संजोगसिद्धी य फलं वयंति, न हु एगचक्करण रहो पयाइ । अंधो य पंगू य वरणे समेच्चा, ते संपउत्ता नगरं पविट्ठा ।। -आव० नियुक्ति, ११६५.

१८] [ ओंकार : एक अनुचिन्तन हो रही है। विज्ञानवेत्ताओं ने जो अन्वेषण किए हैं, उनमें एमएम अभिनव समस्याएं मानवजाति के समक्ष या उपस्थित है। गार के ऐसे विकराल मावन निर्मित हो चुके हैं कि भुमंडल के सांगाग के विरस स्वर गूंजने लगे है। राष्ट्रो के पारस्परिक भौगोलित अन्तर समान-से हो गए हैं। ऐसे युग मे प्रावग्या है कि विभिन्न राष्ट्रो रे नायको का हादं अन्तर भी समाप्त हो जाय और एा गद दुसरे रायरे साथ बन्धु-भावना, महानुभूति एवं मंत्री का व्यवहार करे। इस प्रकार के मधुर सम्बन्धो के बिना विश्व का पारा नहीं है । इस दृष्टिकोण से प्रेरित होकर भारत के महामान्य प्रमानमत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने राजनीतिक 'पंनगील पो योजना प्रस्तुत को और विश्व के प्राण एवं कल्याण के लिए नूतन मार्ग प्रदमित मिपा है। इन पंचगील सिद्धान्तो को ॐ के माय भाग में स्थान प्रदान frया गया है। प्रश्न किया जा सकता है कि प्रयात्म साधना मे केन्द्र में राजनीति घुमेटने को पचा प्रावस्यकता भो ? मगर भूल नही जाना चाहिये कि जीवन एक प्रापः तत्व है जिसे समाज, धर्म, अर्थ, गजनीति प्रादि के विभिन्न धामों में विभक्त नही किया जा गया। इन गभी नीजो का वैयक्तिक और सामाजिक जीवन पर प्रभान मा पनि वार्य है। इतिहाग रस तथा का मासी है। ग्रामीका हो शान्ति और स्वस्थता के लिए गानोनित गति और TET अनिवार्य है। श्री नेहर द्वारा प्रतिपादित पंचशीन ये है:- १. गावभौमिकता का नमार २. अनाममा १. प्रहप्तक्षेप ४. पारम्पनिमा मामी और मामा ५. बानि मर-निर।

ओकार : एक अनुचिन्तन ] [ ६ प्रथम शील 'सार्वभौमिकता का समादर' का अर्थ है--प्रत्येक देश अपनी भूमि और सार्वभौमिकता के साथ दूसरो कोभूमि पर सार्व. भौमिकता का उचित सम्मान करे। इससे आपसी विद्वेष और कलह का निवारण होगा और मानवता शांति लाभ करेगी। दूसरे शील पारस्परीक अनाक्रमण' की भावना से ओतप्रोत होकर जब कोई देश दूसरे देश पर प्राकमण नही करेगा, प्रस्तुत समझौता, शाति और वार्तालाप के द्वारा ही विवादो को सुलझाने का प्रयत्न करेगा तो किसी भी प्रकार को अशांति की सिर उठाने का अवसर ही नही मिलेगा। 'अहस्तक्षेप' का अभिप्राय हैं -एक दूसरे देश के आन्तरिक मामलो मे टांग न अडाए । सव को अपनी अपनी शासनपद्धति और निर्धारित नोति मे किसी दूसरे देश की ओर से वाधा न डाली जाय । चौथा शील पारस्परिक सहयोग और समानता' अत्यन्त महत्त्वपूर्ण | उसमे मानवता की सेवा और मानव शांति की भावना तरंगित हो रही है। इस शील मे यह बात निहित है कि प्रत्येक देश, दूसरे देश को अपने ही समान समझे, उसके प्रति आत्मीयता की भावना से बर्ताव करे, और जो देश जिस क्षेत्र मे पिछड़ा हुआ हो, उसके उस क्षेत्र मे विकाश करने मे सहयोग दिया जाय । इस शील का प्रामाणिकता के साथ पालन किया जाय तो देश को उन्नति के शिखर पर आरूढ़ हो सकता है। इससे मानवता को एक नया जीवन मिलेगा और प्रत्येक देश का निवासी अनुभव कर सकेगा कि मानव जाति एक और अखंड है, चाहे वह एशिया मे हो, यूरोप मे हो या अमरीका मे हो। सव का भाग्य एक ही सूत्र मे बँधा है। 'शान्ति सह-अस्तित्व' पांचवा शील है। इसका संक्षिप्त अर्थ है- जीमो और जीने दो। सभी देशो का अपना अपना अस्तित्व है और रहेगा। यदि हम समझ ले कि प्रत्येक राष्ट्र को रहने का अधिकार है १००] ओंकारः एा जमिनमा और एक राष्ट्र दूसरे का विरोधी नहीं पन्दुराष्ट्र है, तो गुर रोगियो. पका तथा विध्वंस की पाली घटानो का मीन ही गन्ता Mar; और इसी मानव लोक लो स्वर्ग तोर बनते विलम्ब नहीं लगेगा: वर्ष विनाश के साधनो पर व्यय होने वाला घरयो-मबों को fm धनराशि विकास के सायनो में प्रयुक्त होने लगेगी। इस प्रकार विश्वशांति के लिए पंचनील पा सिमान्य बूटी है। अधोलोक सात नरको का स्थान प्रधोलोक में ही है, समय-ram 'यो' पद के अधोभाग में नरफ-भूमिगों का उल्लेग पनागरिमा गती। जो भद्र प्राणी '' इस महामन्त्र को धारापना करता है, उसे मरक की दाग यानना नहीं भोगनो पानी, प्रस्तुत गया में लिए नारकीय यातनायो मे मुक्ति मिल जाती है । चन शास्त्रो में नरक भूमियां सात मागी ग, निगयो गानों पा 'ॐ के निचले भाग में उल्लेग दिया गया है। नरफ पापी जीवों में पाए पो भोगने गानो, यो पोर कार- माति-पाति पोगपों से युक्त और प्रतीय मातम मान बचने का उपाय है--पंचपरमेटोगमयिा मारना जो प्रोमारी प्रागनासपने तगादीपति और न को सायिक बना नद, जननामा दिन इगो विपरीत जो मम मियाय, , प्रमा, और पोग के नीमुन कर नगार ममीनी होगी , जन्म दाल गया ? घोािस विभागार समिती न मि आदि में प्रारमिया गया है। नद्रा irrar RIT ... मय, मे ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ १०१ मिथ्यात्व अयथार्थ रुचि, श्रद्धा या प्रतीति ही वास्तव मे मिथ्यात्व या मिथ्या दृष्टि है। मिथ्यात्वमस्त जीव मनुष्य हो तो भी वह विवेकहीन होने के कारण पशु के समान माना गया है ।* मिथ्या-दृष्टि जीव तत्त्व- अतत्त्व का भेद नही कर सकता। उसकी अन्तदृष्टि जागृत नहीं होती, अतएव वह तरह-तरह की भ्रान्तियों से घिरा रहता है। वह अदेव को देव, कुगुरु को सुगुरु और अधर्म को धर्म मानकर प्रात्मा के अकल्याण प्रवृत्त रहता है। उसको आत्मा अत्यन्त कलुपित और मलिन होती है। वह अपने दृष्टि विपर्यास के कारण अहित को हित और हित को अहित समझता है। जैसे कटुक वे के सम्पर्क से मधुर दुग्ध भी कटुक रूप मे परिणित हो जाता है, उसी प्रकार मिथ्यात्व के योग से मिथ्या- दृष्टि मे जो भी ज्ञानमात्रा होती है, वह सब मिथ्याज्ञान ही बन जाती है। मिथ्यात्वी प्राणी प्रथम तो आत्मतत्व, पुनर्जन्म, पुण्य-पाप और वन्व और मोक्ष को स्वीकार ही करता, कदाचित् स्वीकार कर ले तो आत्मकल्याण के लिए प्रवृति नहीं करता। कोई-कोई ऐसे भी होते है जो अपनी भ्रांत धारणा के अनुसार त्यागमय जीवन पथ पर चलते हैं, मगर उनका प्राचार मिथ्यात्व के विप से दूषित होने के कारण मिथ्या- चार ही होता है। उसका फल भवभ्रमण के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं होता। मिथ्यादृष्टि प्राणी के लिये वह कड़ी बेडी है जो उसे आध्यात्मिक विकास की प्रथम भूमिका पर भी प्रारूढ़ नही होने देती। आत्मशोधन के समीचीन मार्ग का ही पता नहीं होता । अतएव मुमुक्षुजीव का सर्वप्रथम मिथ्यात्व से पिण्ड छूटना नितान्त आवश्यक है। जब तक मिथ्यात्व नही जाता, कोई भी क्रिया प्रात्मस्पर्शी और आत्मलक्षी नही हो सकती। मिथ्यात्व के नष्ट होने ही दृष्टि शुद्ध होती है, लक्ष्य स्थिर होता है और प्रवृत्ति आत्महितकारिणी बन सकती है । * नरत्वेऽपि पशूयन्ते, मिथ्यात्वग्रस्तचेतसः । -पं० माशाधर।

१०२ ]
[ोकार : ए यनुचिन्तन
अविरति
हिंसा, मठ, नोगे, प्रबहाचवं गोर परिग्रह, यह पांग गुला" m
हैं। उनका पूर्ण रूप से या प्राधिक म्प मे भी त्याग न होना fer,
है। मिथ्यादृष्टि जीव मे तो ऐनी जाति या पति ही न
वह इन पापो का त्याग कर सको, अनेक मम्मष्टि भी इनका परिवार
नहीं कर पाते । वे अहिंसादि यतो को उपादेय एवं पापान
हेय समझते हुए भी तदनुकूल प्रवृत्ति करने में ग्राम हो।
जीवन में अनेक बार यह घटित होता देगा पा जमाना
विवेक जागृत होता है, उसकी कलि युति भी गोई न हो, शिर
भी अन्तरतर की दुर्बलता उन विवेक और मुक्ति को मना की।
और मनुप्य ऐसे काम कर बैठना है जिन्हें यह म्यगं करना मंडी
करता। बाद में उगो हदय में पाशाताप को माग पनि हो।
और वह अपने आपको मिलारना है। किन्तु प्रनगर पाने पर कि
उसी दुनिता का मिकार हो जाना है। इस प्राार अन्ना भी मामला
भावना ही बनी रहती है, यह निया में परिगन नहोगी।...
दुर्वलता ही अविनति कहलानी।।
प्रमाद
पुगल समों के प्रति जनादर गतिमा या लापमा
को 'स्व' के प्रनि गाण जागा मा प|ी:
जीवनयापन नियमभीशियाना, मी
भी गालीगला . मी पिता की ...:..
ली है। कर अपने frr; ..
देना। पानीमा nिir, wintract
गुमा अनु, int

ओकार : एक अनुचिन्तन ] [ १०३ आदि किसी कारण से उसकी दृष्टि जव बहिर्मुख बनती और लक्ष्य अोझल हो जाता है, तव प्रमाद की स्थिति है। भगवान् महावीर से अपने ज्येष्ठ अन्तेवासी इन्द्रभूति गौतम को पुनः पुनः सतर्क करते हुए कहा है- 'गौतम ! एक समय भी प्रमाद न कर। पनिहारी अपनी सखियो-सहेलियो से बाते करती चलती है, हंसती हैं, बोलती है, तथापि उसका अन्तस् मस्तक पर स्थित घट मे ही अटका रहता है, इसी प्रकार संयमनिष्ठ साधक का मन प्रत्येक क्रिया के समय अपने 'स्व' के साथ ही समन्वित रहना चाहिये। यह स्थिति तभी उत्पन्न हो सकती है जव अप्रमत्तभाव विकसित हो जाता है । प्रमाद एक प्रकार को व्यभिचार वृत्ति है, सुषुप्ति है, पतन है। वह साधक को पथ भ्रष्ट कर देता है, भुलावे मे डाल देता है। प्रमाद के कारण पापकृत्यो मे प्रवृत्ति होती है । अप्रमत्त अवस्था में की गई क्रिया जो पापजनक नही होती, वही किया जब प्रमत्त दशा में की जाती है तो पापजनक हो जाती है। इसी से कल्पना की जा सकती है कि प्रमाद कितना भयंकर है। - कषाय आत्मा का प्रवल से प्रवल प्रत्यनीक कषाय ही है। कषाय से बढ- कर आत्मिक शक्तियो का विघात करने वाला अन्य कोई भी विकार नहीं है। 'कषाय शब्द 'कष+पाय' के योग से निष्पन्न हुआ है। 'कष' का अर्थ है-कर्म अथवा भव । जिनसे कर्म की और भवपरम्परा की अर्थात् जन्म-मरण की 'आय' अर्थात् प्राप्ति होती है, उसे कपाय कहते । समय गोयम ? मा पमायए -उत्तराध्ययन, अ. १

१०४ ]
[ ओंकार :एक अनुनिन
हैं। तारायं यह है कि जिन विकार के कारण पा.मा मार
आवद्ध होती है और जिनकी बदौलत भव-भ्रमण मसा, या
विकार फपाय है।
आत्मा के उत्थान और पतन का जो दो कालोन नान या
है। उसका मूगर कपायभाव है। ज्यों-ज्यों काम की तर
वृद्धि होती है, पात्मा मलीन होता जाता है, स्वभाव मे विगुण तर
विभाव परिणति में ग्रस्त होता जाता है। पोर मायास्मिन यो
ओर अग्रसर होता जाता है। इसके विपरीत जैसे-जैसे गापामों मा
उपक्षम होता है, प्रात्मा की स्व-स्वभाव में सिरतातो जातो
उसके संपलेप का अन्त माता जाता है, अनिर्वचनीय शान्ति पा
होता है और प्रात्मा अपने उत्थान के उच्च-उगतार सोपानी पर
आरोहण मारता चला जाता है।
शास्त्र में चौदह गुणस्थानो का विगार वर्णन किया गया है। गा.
स्थान यात्मिक विकास को भूमिकायें। अगर तनिक गराईक Im
गुणस्थानों के स्वाप पर विनार किया गाय को मारा होमा कि
उन भूमिगानों का प्रमान प्राधार कसाय । किन र काम
तीव-नीकर उद्रका में प्रात्मा पर मार में कि
है पोर गिग प्रहार भयानों पर विजय प्रारको गा मा र
गुस म्याप को प्रपट करवाहमा नाम ऐप मेनुका
जाता है, इस नीर की मही करमा गुणरमानों के मन में
प्राती है। गुणस्थानों का प्रायन एकर में ARE नार
मा हो अध्ययन है।
मपाय विनम पी छदार पारगति Try : मा
गगन नती है।
यो तो पाप-प्रामामानी नानीsm, मो, :,
माता गन्दामा मादिभार पर
।
14

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१०४ ] [ योकार : निम्न हैं। तात्पर्य यह है कि जिन विकार के कारण प्रामा समान में आवद्ध होती है और जिगवी बदौलत भव-भगण मारता. विकार कपाय है। प्रात्मा के उत्थान और पतन का जो दोकानना है। उसका गुनगर कपायभाव है। ज्योज्यो काम को गोल वृद्धि होती है, आत्मा मलीन होता जाता है, गभाग मे विगुर शेर विभाव परिणति मे गम्न होता जाता है। और पागारिमा पानी और अगसर होता जाता है। इसके विपरीत जैसे-जैसे फापापों का TET उपक्षम होता है, आत्मा की स्व-स्वभाव में स्थिरता होलो ना। उसके संपलेप का मन्त आता जाता है. अनिर्वचनीय शान्ति गा र होता है और आत्मा अपने उत्थान के उच्च-गातर मौलानों पर आरोहण करता चला जाता है । शास्त्र में चौदह गुणस्थानों का विराद वन निगा गया है। म. स्थान यात्मिक विकास को भूमिकायें है। अगर ननिक गहरा में गुरणस्थानो के स्वरुप पर विचार किया जाय तो स्पष्ट नीट होगा उन भूमिकामों का प्रधान प्राधार पाय है। किम प्रकार का तीन-तीनकर उद्ग में प्रात्मा मन:पतन गरेरी में गिना !! है और जिस प्रकार मापायो पर विजय प्रान करने वाला मानाने गुड म्याप को प्राद करता हुआ पारमाहिम ऐम में मु!ि जाता है, इस चीज की सही कल्पना गुणगानो के अध्यापन हो प्राती है। गुणस्थानों का अध्ययन पर प्रकार में मापार : का हो प्रत्ययन है। फपाय विजय को छोड़कर भामशुद्धि का मग यो RS सम्भव नही है। पोको पाय-मनमादी गोदामोडमा, मारता, मामा आदि आधार पर मापददश ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ १०५ हो जाते हैं कि उनकी गणना नही हो सकती, तथापि उसके पार्थक्य का आभास देने की दृष्टि से चार स्थूल विभाग किये गए है, जो इस प्रकार हैं:- १. अनन्तानुवन्धी २. अप्रत्याख्यानावरण ३. प्रत्याख्यानावरण ४. संज्वलन यह चारो कषाय क्रोध, मान, माया और लोभ के भेद से चार-चार प्रकार के है। चाहे अनन्तानु बन्धी मादि के क्रोधादि चार भेद किए जाएँ, चाहे क्रोधादि के अनन्तानुबन्धी आदि के चार-चार भेद कर लिए जाएँ, अभिप्राय मे कोई अन्तर नहीं पड़ता। कोई अन्तर नहीं पड़ता। ये सब मिलकर सोलह प्रकार के कषाय है। पूर्वोक्त चारो कषायो मे अनन्तानुबंधी कपाय सबसे तीव्र है। इस कषाय की विद्यमानता से सम्यग्दर्शन की प्राप्ति नहीं की जा सकती। इसके वशीभूत होकर मरने वाले प्राणि को नरक गति का अतिथि बनना पड़ता है। यह कषाय संस्कार के रूप मे प्रायः यावज्जीवन बना रहता है। अप्रत्याख्यानावरण कषाय जव तक बना रहता है, तब तक देश- विरति उत्पन्न नहीं होती। इसके उदय मे देहोत्सर्ग करने वाले को तिर्यंचगति मे-पशु-पक्षी आदि की योनि मे, जन्म लेना पड़ता है। इसका संस्कार चार मास तक बना रहता है। प्रत्याख्यानावरण कषाय सम्यक्त्व और देशविरति मे तो रुकावट नही डालता, मगर सर्वविरति-सम्पूर्ण संयम का बाधक है। इसका संस्कार एक पखवाड़े तक रहता है । चारो में सबसे हल्का कषाय संज्वलन है। यह चरित्र मे रुकावट तो नहीं डालता, मगर उसमे पूर्ण निर्मलता नहीं आने देता। स्वात्म- . । १०६ ] [ोतार : पर मनु रमण रूप बचावात नारिण, जोतम माना गया . की उल्यावस्था में नहीं उत्पन्न हो पाता। किन्तु हल्ला मा प्रतीत होने वाला यह कपार भी है। आध्यात्मिक विकास को ग्यारहवी भूमिका परमनने या इसे पूरी तरह अपमान्त कर देते है। उगमात मार देनमा ri कि उसका ममूग अय नहीं करते वरन् व्या देते है। म महामुनि कपायोदय से नया मुक्न वीतराग तो गाना है पोर . स्यात चारित्र को प्रात कर देता है। मगर यात्री हो या .. शान्त किया हुआ न.पाय पुनः उभर आता है और उम म,fore ! पतनोन्मुस बना देता है । वह सीन न संभागो जो ; निम्न भूमिका पर पायर दीपवर कार पर सवार मा है। इसी कारण महामनीषी याना भरनारामो ना : भारण, व्रण, अग्निपण और पपाय को घोटासमा र .:. पारना चाहिये। इनको अपना देश पर निगा ?m चाहिये। अत्यम्प मात्रा में शेष रह कर भीगर में राशन जाते है। इनका मत विनामा काममा मंगहाय रिकोग, मादि नागे मापा गान समावेग हो जाना। दोन मोर माया, मम सम्मिलिन। मारगर के अभियानमाया + कामा उमणीय गामा पा form fir! कि दो pur ~~uri , amiti बयान से मार मेंदीगांगमन -- प्रार...

ओंकार : एक अनुचिन्तन ] [ १०७ है। ऋजुसूत्रनय की दृष्टि मे क्रोध ही द्वष रूप है तथा शेष तीन कभी राग और कभी द्वष रूप होते है। शब्दनय का अभिप्राय इसीसे मिलता जुलता है। प्राशय यह कि आत्मा की मलीनता का प्रधान कारण कषाय या राग-द्वेष है । अतएव समग्न साधना का प्रत्यक्ष या परोक्ष उद्देश्य कषाय से मुक्ति प्राप्त करना है । कषाय से मुक्त होना ही वास्तव मे सर्वोत्कृष्ट सिद्धि है। योग 'योग' शब्द अनेक अर्थों में प्रचलित है। योगशास्त्र के अनुसार चित्त की वृत्तिमात्र का या अप्रशस्त वृत्ति का निरोधयोग कहलाता है, किन्तु यहाँ यह अर्थ अभिप्रेत नहीं है। धर्मशास्त्र मे मन, वचन और काय के व्यापार को या इनके व्यापार से आत्म-प्रदेशो मे होने वाले परिस्पन्दन को 'योग' कहा गया है ।* मन मनोवर्गणा के पुद्गलो से बनता है। वचन भाषा से निर्मित होता है और काय औदारिक आदि वर्गणा के पुद्गलो से जनित है। जव प्रात्मा मे वीर्यान्तराय कर्म का क्षयोपशम या क्षय होता है तब उक्त पुद्गलो के आलम्बन से प्रात्मा के प्रदेशो मे एक विशेष प्रकार का कम्पन-हलन-चलन होता है जब मनोवर्गणा के पुद्गलो के आलम्बन से होता है तब वह मनोयोग कहलाता है, भाषाजनीय पुद्गलो के आधार से होता है तो वचन योग कहा जाता है और शरीर के सहारे होता है तो उसे काययोग की संज्ञा दी जाती है। इस प्रकार प्रात्मप्रदेशपरिस्प- म्दन रूप योग मूलतः एक होते हुए भी पालम्बनो की भिन्नना के कारण तीन प्रकार का माना गया है । * विशेषावश्यकभाष्य, उत्तरार्ध । * कायवाड्मनःकर्म योग. । -तत्त्वार्थ सूत्र, ६-१ * देखिये विशेषावश्यक भाष्य और टीका. गाथा ३५५-६४ १०८ ] [ प्रकार : ए7 अनुगि mere PAN Pre- . जय प्रारमनदेनों में परिम्पन्न होता है तो वण होता है और फिर वा फर्म ग्रात्मा से माय, इमा एकमेक हो जाते हैं । पात्मा ने मार गिनने पनामावली में किस प्रकार के स्वभाव का निर्माण हो, या दोन गो: 'योग' की विशेषता पर अपलम्बित है। एप गार प्रमा में दो-स्थिति बन्ध और सबन्ध-पाय से निमित प्रो. दो-प्रकृतिवन्ध तथा प्रदेशगंध-योग से निमित्र में गए हैं । अर्थात् बंधने वाले कर्म में किस प्रकार, ममा मानिirs हो पोर वे कितनी तादाद में हो, यह दो बात योग र पर नियमित रहती हैं। योग दो प्रकार का है-मुभ और मृम । हिंगा प्रालि प्राशय से होनेवाला पाविक व्यापार सम मामयोग, समीर या मिय्यामापरण करना अशुभ मनोयोग है। पिरोन प्र होना शुभ योग है। फपाय को विधमानना में योग मलको मोग में । पर फपाय होता है और नही भी होगा। तक रहता है जबकि योग गर्ने गुणस्यान म । म सयोग होते हैं, पिन्नु पब उनमा प्रागुष्य मा वे परमोत्तम गुप्लापान गामा ममागिरे मन में योग giri निरोध करने, प्रयोग प्रवन्या प्राम पी पीर पिर fair at भरने में उनसे विलम्ब नही जाना। mer-atmavanek-AMAR- जोगा मइ-गमा, cि.ger मोटा E & P

प्रस्तुत ग्रन्य में प्रयुक्त ग्रन्थों के नाम
(१) बीज कोग
(२) भगवद् गीता
(३) माष्ट्रकोपनिषद्
(४) यजुर्वेद
(५) छान्दोग्योप निपद
(६) पाठोपनिषद्
(७) मैन्युपनिषद
(6) तैत्तिरीय उपनिषद्
(8) कल्याण का साधना अर,
(१०) विपप्ठि शालाका पुरुष
(११) भोज प्रबन्ध
(१२) पलवस्तुका
(१३) सानागंव
(१४) उत्तराध्ययन
(१५) महानिनीय
(१६) : वृहद प्रव्य मंगर टीका
(१७) लाकर
(१०) विन नोनन गोग
(१६) प्राणागत
(२०) गमगर मरमा
(२१) मिल पाया
(२२) यो सान
(2) मा पुग;

(२४) प्रतिष्ठा कल्प पद्धति
(२५) यशस्तिलक
चम्पू
द्वि भाग
(२६) भागवत
(२७) दशवकालिक
(२८) हारीत संहिता
(२६) तत्त्वार्थ सूत्र
(३०) योग सूत्र
(३१) सर्वार्थ सिद्धि
(३२) तत्त्वार्थ भाष्य
(३३) प्रश्न व्याकरण
(३४) सूत्र कृताङ्ग
(३५) वृहद् स्वयंभू स्तोत्र
(३६) बौद्धकालीन प्रस्तर लेख
(३७) औपपातिक
(३८) स्थानाङ्ग
(३६) दशाश्रु त स्कंध
(४०) आवश्यक नियुक्ति
(४१) गाधो उज्ज्वल वार्ता
(४२) साधना का राजमार्ग
(४३) विशेपावश्यक भाष्य
(४४) गोम्मट सार

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Omnkar Ek Anuchintan

Author
Muni Pushkar
Title
Omnkar Ek Anuchintan
File name
Omnkar Ek Anuchintan
Text
OCR done
Citation
1964
Published
2011/01
Publisher
Sarvabhoam Sahitya Sansthan Shakti Nagar Dehli
Language
Sanskrit
Pages
134
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548884
Barcode
4990010028968.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
UDfp0KgPu9m
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