Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Tatvanusasanadi Sanghar
Front matter
Printed by Chialaman dakbarom Doole, at 1. Boulay
Viimhar l'or, Battants of ladle Boolety Ilome,
Bandhant Roul, Olegan, Rombny
tablished by Yathuram l'rnini, llogorary Bvorotary
Anlloh ate Dogamhor Jala grunth. fala,
Ihrabagh, flomday.
ग्रन्ध-सूची।
१
५८
...
...
तत्वानुशासन
२ श्योपदेश वृत्तिमहितः
नीतिमारः
४ मोक्षपाशिका
५५तावतारः
(अध्यात्मतरगिणी टिप्पणीममेता,
७ पात्रपरिम्नात्र गटीक
८अध्यात्मारकम्
द्वाविंशतिका
१. बेराग्यमणिमाला
11 तस्वमारः (भारत)
११ तम्कन्या (प्राकृत)
१३दादगी-गापा संशतण्डायोऐना
१४ ज्ञानामार. संमृतमायामदिनः...
११
...
10
१४५
...
।
माणिकचन्द्र-ग्रन्थमाला।
इस प्रन्थमालामे अबतक नीचे लिरो हुए अन्य छप चुके हैं:-
१ लघीयस्वयादिसंग्रह । भट्टाकलंकृत लघीयत्रय राटीक, और अनन्तर
सिंकृत बृहत्सर्वज्ञसिद्धि तथा लघु सर्वशसिद्धि । ००)
९ सागारधर्मामृत । ५० आमाधाकृत मूल और स्योपश भव्यकुमुदचान्द्र
टीकासहित । मू.१२)
३ विकान्तकीरचीय नाटक । हस्तिमहात । मू.16)
४ पार्श्वनाथचरित । वादिराजसूरिकत । .॥)
५ मैथिलीकल्याण नाटक। हस्तिमाकृत । .)
६ आराधनासार । देवमेनकृत मूल प्राकृत और रलकातिदेवहत संस्कृत
टीकासहित । पू.)
७ जिनदत्तचरित । भाचार्य गुणभद्रत । मू.)
पानचरित्र । कविवर महागेनत । म.)
९ चारित्रसार । मत्रितर चामुण्डराय-त । पू.)
१० प्रमाणनिर्णय । वादिराजमूरिकृत । म.)
११ आचारसार । वारनन्दि सिद्धान्तकंवतःकृत)
११मिलाकसार । भाचार्य नेमिचन्द्रकृत मूल प्राकृत और भाचार्य माधर
चन्दकृत संस्कृतीका । मू. १m)
१३ तत्त्यानुशासनादिसपाह। • )
१४ अनगारधर्मामृत । 4. भाशापरहन मूल और संस्कृतटीकामादल।
छा रहा है।
मोट- प्रथमालाके तमाम अन्ध लागतो मूल्यपर
थे जात है। गांग
दानवीर गेट माणिकरदजी के स्मारक यह प्रत्यपाला निकाली जाती है।
धारमाका हम महायना करनी चाहिए । प्रायः सभी अन-युगलरी महाग
ये मन्य मिन्टगे।
।
1 संग्रहके ग्रन्थों और ग्रन्थकर्ताओंका संक्षिप्त परिचय । तत्यानुमासन । इस प्रन्यो कर्ता आचार्य न यमेन है। प्रत्यक अन्त में वे असागुका नाम विजयदेव और विद्या- गुफा न म धीरचन्द्रदेव, शुभचन्द्रदय नया महेन्द्रदेय बतलाते हैं। अपने मंघ या गणगछादिके विषयमन । अपने समयका भाव उग नहीं करते है । परन्तु ऐगा मादम होता है कि किसी १३ की पनादिमे पहले हुए है । क्योंकि पण्डितकर अगर सोपवटीया मे-जोरी मप्र में प्रकाशित की गई है-दम प्रन्यो भनेक गाउ'हमें उन्न करत । उदाहरण के लिए दस सग्रह के पृ २७ मे 'गुपदेशमगाध आदि हो कोको देखिए । ये तत्वानुगागन के १९६और १९७ नम्बर प्रकार. आशाधरजीने-जैगा किभागे जादया गया है-विषम सन १९८५ के पहले सारा लिया है। भन तस्वनुशासनके पा इससे भी पहले हुए है। नागगेनो अन्य किमी मन्यसे एम परत नहीं। सत्वानुमासन उचकोटिका और महत्वका अन्ध है। मान्दम नही, इंगका वषेर प्रचार क्यों नहीं हुआ। बम्बई विगारजनमन्दिाक पुग्नकालयमे एक बहुत ही जण प्राचीन गुटका है। इसी पारो इग अन्य प्रेमकापी पराई गई है। इमरी प्रतिषाही प्राप्त न हो सकी, मतपय उक एक ही प्रतिके आधारसे इसरा मंशोधन कराया गया है। २ अष्टोपदेश । इस छोटे पर महावपूर्ण अन्य कर्ता भाचार्य देवनन्दि या पृज्यशाद है ।युक्त.प. बागीनाथ पाजी पाटकधी ए. ने एक कनदी प्रन्धर, आभार प्रकट किया है। गगनीय दुर्तिमान नाम रामाज्यपा-- दका शिष्य था और हम राजाने वि०.५३५ से ५७. तक राज्य किया है। इमो. रिवाय ददमनमूरिने अपने दर्शनार' नामक प्राकृतिग्रन्थमे जो वि. मा ९९. में रचा गया है--लिखा है कि प्रश्यपादके शिष्य बनन्दिने वि० मं. ५२६ में दाविडमंघकी स्थापना की थी । इन दोनों प्रमाणोंसे मादम होता है वि. देवनन्दि भाचार्य विकमकी ही तारिदमे हो गये है। उनके बनाये हुए मयिमितिरीका, जनेन्द्रव्याकरण और समाधिनत्र ये तीन अन्य प्रसिद्ध है। - - - इटोपदेशकी टीकाकै कर्ना पण्डितवर आशाघर है। उन्होंने अनगार धर्माती भव्यकुमुदचन्द्रिका टीका वि० में १३५० में समाप्त की थी, और यही शायद उनका अन्तिम मन्य था। अत: वे विक्रमकी तेरहवी शतान्दिके विद्वान है। उनके बनाये हुए वौसौ अन्य हैं और उनमेमे बहुत से उपलब्ध भी हैं । वे अपने जिनयज्ञकल्प' नामक प्रत्यमें जो वि० सं० १२८५ में बनकर समाप्त हुआ है-अपने उस समय तरुके बनाये हुए जिन जिन मन्योंका उन्दरा करते है, उनमें इटोपदेश टीकाका भी नाम है। इसमे मालम होता है कि यह टीका १२८५ से पहले बनी है । यह टीका उन्होंने सागरचन्द्र मुनिके शिष्य विनयचन्द्रको प्रेरणासे बनाई थी, ऐसा टीकाके अन्तिम श्लोकोंसे मान्दम होता है।* श्रीयुत प. पनालालश्री बाकलीवालने जयपुरके किमी पुस्तकालयकी प्राचीन प्रतिसे इस प्रथको प्रेमकापी की थी। उसी परमे यह ग्रन्थ छपाया गया है। ३ नीतिसार और ४ श्रुतायतार । दिगम्बरजैनसम्प्रदायमें इन्दनन्दि नामके अनेक आचार्य और भट्टारक हो गये हैं। उनमेस एक इन्दनन्दि भुताय. तारके और एक नौतिसारके कर्ता है। दोनों के कर्ना एक नहीं मालम होते। हमारी समझमें भ्रतावतारके कर्ता तो वे इन्दनन्दि हैं, जिनका उम आचार्य नेमिचन्द्रने गोम्मटसार कर्मकाण्डकी ३९६ वी गाया गुणरूप से किया है - घरइंदनंदिगुरुणो पास सोऊण सयलसिद्धत। सिरिकणयनंदिगुरुणा सत्तहाणं समुदिई । ३९॥ लेखान्तरोंमे यह सिद्ध किया जा चुका है कि नेमिचन्दका समय विक्रमी ११ वी शताब्दि है । क्षत धनावतारके कर्ता लगभग इसी समयके लावार्य है। नीलि. मारके कर्ता दसरन्द्रनन्दि जान पाते हैं, जो मेमिचन्दमे पीछे म क्योकि थे नीतिगारके . गरमें आचार्य नेमिचन्दका उम करते हैं। नीतिमारको स्वनामे और मुनिधर्मगम्बन्धी उपदेशोंगे मी मालूम होता है कि यह ग्यारहवी ही नही बलि १३ वीं शताब्दि भी बादका बना हुआ अन्य होगा। नोनिमारका सशोधन अयपुरकी एक प्रतिमे और एक पनी पी हुई पुग्नकारगे कराया गया है । तावतार शोलापुरकी जैन-युवडियो द्वारा प्रकाशि मगरायुक्त पुस्तकपरगे छपाया गया है। *पडत भाशार विनय विल ने लिए मी लिपाई "fr. इनमाया'तीय लमो पदिए । - ५ मोक्षपचाशिका । इसके का नाम मादम नहीं हुआ। धीयुत गाय अगलांसारजी मुर पग गरी प्रति घी, उसी परगे यह छपाई गई है। ६ अध्यात्मतरांगणी । ममेहर नामकेई भाचार्य हो गये हैं। मालम मही उनमे या बिग मामाकी बनाई हुई। यदि यशस्तिलाके का ही हो, तो उनका समय विरामी वातादि । उन्होंने अपना यस्ता मा ८८१ में बनायर गमाम किया है।गी एप्रनि हमें ६.दलाली गाहित्यमाथीदारा जयपुरक किमी प्राचीन पुस्तकालयगे प्राप्त हुई थी। उसी परम इसका मुनादन हुआ है। ७ पाकमरि-स्तीत्र । इमा पानविर नाम वृदयमनमस्कार स्तोत्र मादम हाना। इसके पर्ना भानाय पाशगरी, कारण हग 'पात्र. मरिस्तोत्र' भी रहते है। विधानद और पात्रोगरी एक है, यह हम अग्ने स्यादिविसापान frनन्दि' मामा सेसमें (जहिलेपी पर भै) अटी तरह मिद पर चुके हैं। रिचानन्दि किमी.वीं शतादिमें हुए हैं, यह भी उन लेगमें प्रमाणित किया जा चुका है। इस अन्य गाय एक टीका भी प्रकाशित की जानी है, परन्तु याकनी भग्ना नाम प्राट नही परती। मर्गीय दामनार मट माणिकचन्दजीके पुम्नक-भाण्डारम इसकी एक बहुत आर्ग भौर प्राचीन प्रति थी, उगी परमे यह स्लोष पाया गया है। यह स्नोत्र येवल स्नोत्र ही नहीं, किन्तु एक अर्व दार्शनिक प्रन्य है। इसमें जनमती भनेक बालों पर एक विलक्षण ही प्रकाश डाला गया है। ८ अध्यात्माएकागो गर्ना वे ही वादिराजगरि जान पाते है जिन्होंने बार सवत् ९४७ में पार्थनाथचरित नामक अन्य बनाया है और जो इमी अन्य गलामें प्रकाशित हो पुका है। वात्रिंशतिका । इसके कर्ता भमितगतिमूरि है और वे शायद मुभाषित. सन्दाह, धर्मपरीक्षा, भमितिगनित्रावाचार भादि अन्यों के कर्ता प्रसिद्ध अमि. अनिमें पृथक नहीं है । मुभापित-रमगन्दोर वि.सं....में समाप्त 7 है, भतएव उनका समय विक्रमी ग्यारहवीं शताब्दि निधिन है । (विशेष के लिए देसो विज्ञानमालाका तीसरा सेंस।)
२
सत्त्वानुशासनम् ।
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बंधस्य कार्यः संसारः सर्वदुःसमदागिना ।
द्रव्यक्षेत्रादिभेदेन स चानेकविधः स्मृतः ॥ ७॥
स्युमिथ्यादर्शनशानचारित्राणि समासतः।
बंधस्य हेतवोन्यस्तु प्रयाणामेय विस्तरः ॥ ८॥
अन्यथास्थितेवयंप्यन्यथैव चिढणां।
दृष्टिमोहोदयान्मोही मिध्यादर्शनमुच्यते ॥ ९॥
ज्ञानावृत्युदयादर्थप्वन्यथाधिगमो भ्रम.।
अज्ञानं संशयश्चेति मिथ्याज्ञानमिह विधा ॥१०॥
वृत्तिमोहोदयाजन्तोः कपायवर्तिनः।
योगप्रवृत्तिरशुभा मिथ्याचारित्रमूचिरे ॥११॥
बंधहेतुषु सर्वेषु मोहश्च प्राक् प्रकीर्तितः।
मिथ्याज्ञानं तु तस्यैव सचिवत्यमशिश्रियन् ॥ १२ ॥
ममाहंकारनामानी सेनान्यौ तौ च तत्सुतौ।
यदायत्तः सुदुर्भेदी मोहव्यूहः प्रवर्त्तते ॥ १३॥
शश्वदनात्मीयेपु स्वतनुप्रमुखेषुकर्मजनितेषु ।
आत्मीयाभिनिवेशो ममकारो मम यथा देहः ॥ १४ ॥
ये कर्मकृता भावाः परमार्थनयेन चात्मनो भिन्नाः।
तत्रात्माभिनिवेशोऽहंकारोऽहं यथा नृपतिः ॥ १५ ॥
मिध्याज्ञानान्वितान्मोहान्ममाहंकारसंभवः ।
इमकाभ्यां तु जीवस्य रागो द्वेपस्तु जायते ॥ १६ ॥
ताभ्यां पुनः कपायाः स्युनों कपायाश्च तन्मयाः।
तेभ्यो योगा: प्रवर्तन्ते ततः प्राणिवधादयः ॥ १७ ॥
तेभ्यः कर्माणि वध्यन्ते ततः सुगतिदुर्गती।
तम कायाप्रजायन्ते सहजानीन्द्रियाणि च ॥१८॥
भीमागमेनमुनिविरषित-
तानिन्दियग्रंदन गुहाति देष्टि ज्यते।
ती या प्रमत्ययं महायूहगतः पुमान् ॥ १९॥
तरमाइतस्य मोदस्य मिथ्याज्ञानस्य च द्विपः ।
ममाइंकारयोगात्मन्यिनाशाय पुरुप २०॥
धांवर मुग्येषु मायन्स फ्रमशस्तय ।
पोऽपिरागडेपादिधातिथिनन्यति ॥ २१॥
ततम्यं देवना समानानां विनाशतः।
संघमणादान्मुम सज धमिप्यपि मैसूती ॥२२॥
पंचदयिनास्तु मांसाहतुपरिमहाव ।
पपरविष्यवाहीतीप्णस्पर्शयनयोः ॥ १३॥
स्यात्सम्यग्दर्शमशानवारित्रितयात्मकः ।
मुक्तिदाजिनोप निरामयरकियाः । २४ ॥
आयादयो माया ये यथा मिनभाषिताः ।
ते तवति या भद्धा सा सम्यापर्शनं स्मृतं ॥ २५ ॥
प्रमाणमयनिक्षेपों याथात्म्येन निशयः ।
जीयादिषु पदार्थषु सम्यगज्ञान तदिप्यते ॥ २६ ॥
घेतला एचमा तन्या कृतानुमतकारितः ।
पापकिया यस्पागः सचारित्रगुपंक्ति तत् ॥ २७ ॥
मोक्षहतः पुनर्देधा निश्चयय्यवहारतः ।
सापः साध्यपः स्थाहितीयस्तस्य साधनं ॥ २८
अमिसकर्तृकर्मादिपियो निभयो मयः।
प्यपहारनयो भित्रकर्टकर्मादिगोधरः ॥ २९ ॥
धर्मादिधदान सम्यक्त्यं ज्ञानमधिगमस्तेषां ।
घरणं व तपसि चेष्टा व्यवहाराव मुकिदवरयं ॥ ३॥
नभ्यानुशासनम । -- नियनयन गम्भिर्गभयं ममाहितो भिभुः। नापादन किनिन्न न मुर्भात माशानुग्गी ॥ ३१ ॥ या मग पायनि जानाम्यान्मानमान्मनात्मन्यात्मा। गमनगम नागान्गकिरगिति जिनोकिः३२ मार दान यम्मायाप्यन द्विविधाऽपि । 11 सहयपाम्यालस्यं ॥३३॥ राम'..' - । है . T मागममणाम Nitra'-74 । ."भमा ॥३५॥ ITI ममान । - 1 ॥14 . , -- HH INDIA + 14 नाता - १ 1 . .
srxy भीमनामसनमुनिपिरपित- पम्पमातीपावियागुम्यपापितः। आमपरित्यागाविसमत्तिक १३ ॥ हमालयापेक्षा पापपपदः । अनुप्रितक्रियायोगी पानयोगमतीपमा ४ ॥ मदासाप परित्याहुलेयाशुभभावनः । Emक्षणी पाता धर्मध्यानाय मम्मतः॥४५ अधमन ममता मराष्टियतः । जमध्यामाय यस्यारतापाण्यामिन अमृताः ४६. मुज्यापधारभेदेन धर्मध्यानमिद लिया। अप्रमतं तन्गुष्यमितरप्योपचारिक मायक्षपादिमामी भ्यानोपना पस्त्रिया। पासारियिधारतरमासपी ध्यानान्यपि त्रिपा ४८॥ मामत: मायायाध्यातरि ध्यानमुत्तर्म। स्याजपन्य जयन्याया मायमायान्तु मध्यम ४९. भूतन यिनापि ध्याता प्यान्मनमा स्थिर मपुरधार पयोधर्मध्यानस्य सभुतः । ५०॥ मराटिलानमामि धर्म धर्मवर पिः । तरमापदमत दिप रमानमभ्यपुः । ५१ भारमनः परिणामी पो मारतोषियजितः। मध धर्मानपतं यत्तस्मातमित्यपि ॥ ५२ ॥ धामदिर विश्व स्यरूपेण कृतं यतः। तस्मादरस्यस्पं विप्रानुर्धर्म महर्षयः ॥ ५३॥ संतानपत यमातंतवर्य ध्यानमिप्यते । धमा हिवस्तु पाधात्म्यमित्यापंतप्यभिधानतः ॥ ५५.
नन्चानायनम । अननक्षमट म्यादमा तानया पर। नतानपन गहान नद्रा धामनग्न पकार्याचनालयाय परम्पंदन जिनः । बदमान निट मागम्य च कारण पकमियाग्रमालयन मुग्न । निता मुना' 7 नन्गाम्नवर बननं ॥५॥ हत्यामागवामयान्यन यापन । अवचन"नाच सम्मान मजिनाः ॥ ८ ॥ काग्रता 7 व्यायनिवनय व्यग्रहामन सत्र न्यानमकाप्रमुच्यन ॥ ९ ॥ मचायदा भिनाजानवनातिनी *T Tी đa: 33: 33 तकनन मम्यान ममा म्य' 'न म्बयफलपद ॥११ अथवात्रि जानानीन्यग्रममा निकिन । नन्दप मानायनारमाय ग्रामनि मन .. व्याधिन बागनाटिन भन करवा निम्न मित्रागा नियत्रणा ॥३॥ नसावा वा निार म्याम न निनानाव्यय । नाम यहा मामांवाचनामिन ॥२४॥ ग्रामन्यमहार यापनाया म्याग्निसाधन । तयान मानावा म्ममावनिमय म ॥५॥ भनमानमहामान ययायमांत्रनिकट म्वगापगफमा यानमामाभन ॥ ६॥ '"73 - भीमसागसेगमुनिपिरषित- . ध्यापत पेन तयानं याच्यापतिस पय या। पर या यायते पहा ध्यातिर्या ध्यानमिप्यते ॥ १७ ॥ भूतकानेन मनमा यतो पापन्ति पोगिनः । सत स्थिर मनो ध्यान तानं पतात्विक ॥६८॥ तामादतरापास्मा तस्मामाने म चान्यतः । एक पूर्यापरीभृतं शाममात्मेति कीर्तितं ॥ ६९॥ ध्येयासंचन ध्यान ध्यावयरमा भियते। द्रष्याधिकनयानरमादपालय प्यानमुख्यते ॥ ७० ॥ ध्यातरियायत ध्येयं यस्मापिययमाभितः । तस्मादिदमपि ध्यान कर्माधिकरण ॥ १॥ ध्येये स्थिरा पुद्धियां स्यात्मतानलिनी । शानांतरापरामृष्टा सा ध्यातियानारिता ॥७२॥ एक चकता करणं फाधिकरणं फलं । ध्यानमेवमति निरुतं निथयानयात् ॥७३॥ स्थात्मानं स्यात्मनि स्येन ध्यायेत्स्वस्मै स्यतो यतः। पटारकमयस्तस्मायानमारमैय निधयात् ॥ ७४ ॥ संगत्याग कपायाणां निपदो घतधारपां । मनोक्षाणां जयोति सामग्री ध्यानजन्मने ॥५॥ इन्द्रियाणां प्रवृत्ती घ निवृत्ती च ममः प्रभुः । मन पप जयेतस्मानित तस्मिन जितेन्द्रिय. ॥७६ ॥ ज्ञानपैराग्यरज्यूभ्यो नित्यमुत्पतिनः । जितचित्तेन शक्यन्ते धर्तुमिन्द्रिययाजिनः ।। ७७॥ यनोपायेन शक्येत मषियन्तुं धलं मन । स पोसासनीयोऽत्र म धेय पिरमेत्ततः॥७८।।
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भीमनागमनमुनियिरषित-
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चायत पेन तयानं पो ध्यायति स पय था।
या पाप्यायने पता ध्यातियां ग्यानमिप्यते ॥ ६७ ॥
भुगतानन मनाला यतो ध्यायन्ति योगिनः।
हत. स्थिर मनी ध्यानं भुतकानं च तायिक ॥६८॥
शानादातरादात्मा तस्मासान म पान्यतः ।
एक पूर्यापरीभृतं शाममात्मति कीर्तितं ॥ ६९॥
ध्येयार्यालंपन प्यानं ध्यातर्यरमान मियते ।
द्रव्याथिकनयातम्माद्धपातेय ध्यानमुप्यते ॥ ७० ॥
ध्यातरि ध्यायत ध्ययं परमानिययमाभितः ।
तस्मादिधमपि ध्यान कर्माधिकरणदयं ॥५॥
राष्टं ध्येये स्थिरा पुद्धिर्या स्यात्मतानलिनी ।
ज्ञानांतरापरामष्टा सा ध्यातिध्यानारिता ॥२॥
पकंच का करणं कर्माधिकरण फल ।
ध्यानमेयरमन्दिर निरनं निधयायात् ।। ७३ ॥
स्यात्मानं स्यात्मनि म्येन भ्यायस्यस्मै म्यतो यतः ।
पदारफमयस्तम्मायानमात्मय निथयात् ॥ ७४ ॥
संगत्यागः कपायाणां निग्रो प्रतधारण ।
मनाक्षाणां जयोति सामग्री ध्यानमन्मने ।।७५॥
इन्द्रियाणां प्रवृत्ती च निवृत्ती घ मनः प्रभुः।
मन पय जयेत्तरमाजित तम्मिन जितेन्द्रियः ॥७६n
ज्ञानवैराग्यरज्जूभ्यो नित्यमुत्पतिनः ।
जितवितेन शक्यन्त धनुमिन्द्रियवाजिनः ॥ ७७ ।।
यनोपायेन शयेत मनियन्तुं पलं मनः ।
स एयोपासनीयोलमय पिरमत्ततः॥८॥
६ च्यानुगामनम। । यम्तृत्तमक्षमादि म्यादा दहशतया पर । ततोऽनपतं यदयान नद्रा प्रामाग्नि ।', एकाग्रचितागंधा य परिम्पदन जिन । तद्वगन निजगह मवरम्य न कारणा ।.६ ॥ एकं प्रधानमित्याहा ग्रमालवन मुग्य । चिंतां स्मृति निरोप तु तम्याम्तव वनन ॥"; दव्यपर्याययामध्ये प्राधान्यन यापन । तत्र चितानिगंधा यम्नद्वगन वभाजना ॥ ८ ॥ एकाग्रग्रहण चात्र व व्यग्रविनिवनय व्यग्रं ह्यज्ञानमेव म्याद्वयान में काग्रमन्यन । १ ।। प्रत्याइन्य यदा चिता नानालबननन। पकालंबन पवना निम्यादा तदाभ्य योगिना यागधिनमायानापन प्रसंख्यानं ममाधि म्या दान म्बाला : अथवांगति जाना त्यग्रमात्मा निकित तत्त्वेषु चाग्रगण्यत्वादमावग्रमिति म्मत ॥ ६ ॥ द्रव्यार्थिकनयादक कंवलो वा तयादित । अंतःकरणवृत्तिस्तु चितारोधा नियत्रणा ॥ ३ ॥ अभावों या निरोधः स्यात्स च चितानन्यय एकचितात्मको यद्वा म्वविचिताग्नित तमात्मन्यमहाये धिताया म्याचिराधन । तमान साभायो वा स्वनिमयश्च म ॥६५॥ भूतज्ञानमुद्रामीनं यथार्थमतिनिश्चल । स्वर्गापवर्गफलम् ध्यानमांतर्मुहनत ॥ ६६ ।। ।। -
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भीममागसेनमुनिविरषित-
ध्यायत पेन सयानं पो ध्यायति स एयया ।
या या प्यायसे यदा यातियां ध्यानमिष्यते ॥ १७ ॥
भुतानन मममा यतो ध्यायन्ति योगिनः ।
सत. स्थिर मनी ध्यानं श्रुतज्ञानं च तात्यिक ॥६८॥
सामादत्तरादात्मा तस्मा ज्यान म धान्यतः।
एक पूर्यापरीभूत ज्ञानमात्मंसि कीर्तितं ॥ ६९॥
ध्येयालपन ध्यानं ध्यातर्यस्मान भियते ।
द्रप्याथिकनयात्तस्मादमातेय ध्यानमुच्यते ॥ ७ ॥
ध्यातरि ध्यायते ध्ययं यस्मानिधयमाभितः ।
तस्मादिदमपि ध्यानं कर्माधिकरणद्वय ७१ ॥
इष्टे ध्येये स्थिरा पुद्धिर्या स्यात्संतानवर्तिनी ।
शानांतरापराममा सा ध्यातियानसरिता ॥७२॥
एकं च फत्ती करणं कर्माधिकरणं फलं ।
पानमेवेदमन्दिर निरुत निधयालयान् ॥ ७३ ॥
स्थात्मानं स्वात्मनि स्वेन ध्यायेत्स्वस्मै स्वतो यतः।
पटारफमयस्तस्माद्यानमात्मैव निश्चयात् ॥ ७ ॥
संगत्याग. कपायाण निमो व्रतधारणं ।
मनोक्षाणां जयोति सामग्री ध्यानजन्मने ॥ ७५ ।।
इन्द्रियाणां प्रवृनी च निवृत्ती च मनः प्रभुः ।
मन पय जयन्तस्मानित तस्मिन् जितेन्द्रियः ।।७६ ॥
ज्ञानवैराग्यरज्जुभ्यां नित्यमुत्पथवर्तिनः ।
जितचित्तेन शक्यन्ते धर्तुमिन्द्रिययाजिनः ॥ ७ ॥
यनापायेन शक्यत समियन्तुं चलं मनः ।
स पयोमामनीयोऽत्रमय पिरमेत्ततः॥८॥
६
तत्यानुसामनम् ।
यम्तृत्तमक्षमादिः म्याद्वमा दातया पर।
ततानपतं यदयानं तद्वा धमितीरितं ॥ ५५॥
एकाग्रचितागंधा य पग्दिन वर्जितः ।
तत्यानं निजगहतुः मंबरम्य च कारणं ॥ ५६ ॥
एक प्रधान मन्याहुग्ग्रमालंबनं मुग्छ ।
चिंता म्मृनि निगंध तु नम्याम्नत्रय बननं ॥ ५७ ॥
द्रव्यपर्यायांमध्ये प्राधान्यन यदर्पितं।
तत्र चितानिगंधी यम्नद्धयानं बमणुजिनाः ॥ ५८ ॥
एकाग्रग्रहणं चात्र यै व्यग्रविनिवृनये ।
व्यग्रं ह्यज्ञानमेव म्यायानमेकाप्रमुच्यते ॥ ५९ ॥
पत्याहत्य यदा चिनां नानालवनवतिनी।
पकालंबन बना निमणहि विशुद्धधी ॥६॥
तदाम्य यांगिना याचिकाग्रनिरोधनं ।
प्रसंन्यानं ममाधिः म्यादयान म्बेष्टफलम ६१ ॥
अथवांगति जाना त्यग्रमात्मा निफक्तित |
तत्त्वेषु चाग्रगण्यन्वादमावग्रमिति स्मृतः ॥ १२॥
दव्यार्थिकन यादक कंवलो वा तथोदितः।
अंत करणत्तिम्तु चिंतारोधी नियंत्रणा ॥ ६३ ॥
अभाया वा निराधः भ्यात्स च चिंतांतरव्ययः ।
पकार्चितात्मको यद्रा म्वविचिंतयोग्झित. ॥ ६४॥
तमात्मन्यमहायं यचिताया स्यामिरोधनं ।
तयान तामायो या भ्यमंवित्तिमयध सः ॥६५॥
अतज्ञानमुकामीनं यथार्थमतिनिथलं ।
स्वगांपवर्गफल ध्यानमांतर्मुहूर्ततः ॥ ६६ ॥
भीमप्रागसनमुनिषिराषित- Hin अन्यत्र या शषिो प्रशस्त मारकसमे। चतनाचेतनाशेपध्यानपिमाविषजिते । ९१ । भूगल पा शिलापट्टे सवासान:स्थितोऽयया। सममृज्यायतं गाणं नि:कंपायय पद ॥ ९२॥ मासामन्यस्तनिप्पंदलोचनो मामुष्कासन । नाशिदोपनिनुसकायोत्सर्गध्ययस्थितः ॥ १३ ॥ प्रत्याहत्याक्षरंटाफोस्तभ्यः प्रयत्नतः । चिता संयम्यो निरुध्य ध्येययस्लनि ॥ १४ ॥ निरस्तनिदो निमीतिनिरालस्यो निरंतरं। स्वरूप पररूप या ध्यायेदंतर्यिमुदये ॥ ९५ ॥ निधपाद व्यवहाराच ध्यान द्विविधमागमे । स्वरुपारनं पूर्व परालंपनमुत्तरं ॥ ९६ ॥ अभिधमाधमन्यत्तु भि तत्तापदुध्यते। मिले दिविहिताभ्यासोऽभित्रं ध्यायत्यनाकुलः॥९७ ॥ आतापायो विपाच संस्थानं भुयनस्य च । यथागममधिक्षित चतसा चितयन्मुनिः ॥ ९८ ॥ माम घ स्थापन दध्य भायधेति चतुर्विध । समस्तं घ्यस्तमप्यतरयमध्यात्मदिभिः ॥ ९९ ॥ याच्यस्य मायकं नाम रतिमा स्थापना मता। गुणपर्ययपद्रव्य भावः स्यागुणपर्ययौ ॥ १०॥ आदौ मध्येवसाने यहाहमयं प्याप्य तिष्धति । ददि ज्योतिष्मदरसामध्ययं तदस्तो । १०१ एत्पंकजे चतुःपत्रे ज्योतिमंति प्रदक्षिणं । असिभाउसाक्षराणि ध्येयानि परमेष्टिना ५१०२।
तत्त्वानुशासनम्। Ana anna- संचितयन्ननुप्रेक्षाः स्वाध्याये नित्यमुद्यतः। जयत्येव मनः साधुरिन्द्रियार्थपराङ्मुखः ॥ ७९ ॥ स्वाध्यायःपरमस्तावज्जयः पंचनमस्कृतेः। पठनं वा जिनेन्द्रीतशास्त्रस्यैकायचेतसा ॥ ८ ॥ स्वाध्यायाचानमध्यास्तां ध्यानात्स्वाध्यायमामनेत् । ध्यानस्वाध्यायसंपत्या परमात्मा प्रकाशते ।। ८१॥ येऽत्राहुन हि कालोऽयं ध्यानस्य ध्यायतामिति । तेऽहन्मतानभिज्ञत्वं ख्यापयंत्यात्मनः स्वयं ॥ २ ॥ अदानी निषेधंति शुक्लध्यानं जिनोत्तमा । धर्मध्यानं पुनः माहुः श्रेणीम्यां प्राग्विवर्तिनां । ८३॥ यत्पुनर्वबकायस्य ध्यानमित्यागमे वचः । श्रेण्या ध्यान प्रतीत्यानं तन्नाधम्नानिषेधकं ॥ ८४॥ ध्यातारयल स्न्यपश्रुतसागरपारगा। तत्किमल्पभुतेरन्यन ध्यातव्यं स्वशाक्तित ॥ ४ ॥ चरितारी चेत्सन्ति यथाख्यातस्य संमति । तत्किमन्ये यथाशक्तिमाचरन्तु सपस्विनः॥८६॥ सम्यग्गुरूपरेशन समभ्यस्यसनारतं । धारणामापयास्पानं प्रत्ययानार्प पश्यति ॥ ८ ॥ पयाभ्यासन शाम्बा स्थिराणि महानयाप । नया ध्यानमपि स्वयं समंतभ्यासलिनी ॥८॥ ययोक्तलक्षणी ध्याता यातगुत्महने यथा । तदेव परिकम्मादी कन्या ध्यायतु धीरधीः । ८९॥ भून्यागार गुदायां या रिया या पाया निशा चारशकारीयानां पुदाणामध्यगाधर ९..
भीमनागसेन मुनि विरचित- अन्यत्र या कमिददो प्रहारते मासके ममे। चेतनाचेतनारोपध्यानविमविवक्षिते ॥ ९१ । भूतले पा शिलापट्टे सुखासीनः स्थितोऽथवा । समस्यायतं गा निःकंपायययं दधद ॥ १२ ॥ नासामन्यस्तनिप्परलोचनो मंत्रमुच्छवसन । दानिशदोपनिर्मुसकायोत्सर्गव्यवस्थितः ॥ ९३ ॥ प्रत्यारत्याक्षींटाकास्तदर्थभ्यः प्रयत्नतः । चिंता धाकृष्य सर्वम्यो मिरुध्य ध्येययस्तुनि ॥ १४॥ निरस्सनिदो निभीतिनिरालस्यों निरंतर। स्वरूपं पररूप या ध्यादतपिशुद्धये ॥ १५॥ निधया व्यवहाराप ध्यान द्विविधमागमे । स्वरूपालन पूर्व परालंघनमुनरं । ९६ ॥ अभिसमाधमन्यत्तु भिसंतत्तायष्यते। भिरे दिविदिताभ्यासोभिवं ध्यायत्यनापुलः॥ ९७. भातापायो पिपाष संस्थान भुषमस्य च । पयागममधिक्षितसा चिंतयेन्मुनिः ॥ ९८॥ माम प स्थापनं दाय भावति पदाधि। समासं एयरतमप्येतस्पेयमभ्यामतिभिः ॥१९॥ याच्यरय पापमाम प्रतिमा स्थापना मना। गुणपपयट्रय भाषा स्थानणपर्ययो - १.. आदी मायेयाने पाम स्याप्य निति पनि ज्योतिष्मद्रासामध्ये तारतो ११ एक पल मोतिमति दाक्षिण । अमिभारताशराणिपिशादि परमेष्टिको १०९ + १० तत्त्वानुशासनम् । ध्यायेउपओ व सद्वन्मंत्रानुदपिः। मत्याविज्ञामनामानि मत्यादिज्ञानसिद्धये ॥१०३ ।। सताक्षरं महामंत्र मुसरंधेपु सप्तम् । गुरूपदेशतो ध्यायेदिच्छन् दूरश्रवादिक । १०४॥ दृदयेशदलं पद्मं धर्गः पूरितमभिः। दलेषु कर्णिकायां च नानाधिमितमहतो ॥१०५॥ गणभृद्लयोपेतं धि:परीतं च मायया । क्षीणीमंडलमध्यस्थं ध्यायेदम्यर्षयेद्य तत् ॥ १०६ ॥ अकारादिहकारान्ताः मंशा परमरातयः। स्थमंदलगता ध्येया लोकद्वयफलमाः॥१०॥ इत्यादीन्ममिणो मंत्रानहन्मंत्रपुरस्सरान । ध्यायन्ति यविद स्पष्ट नामध्येयमयहिता १०८॥ जिनेन्नप्रतिपिंपानि प्रिमाण्यरुतानि च । पोकान्यागमे तानि तथा यायेगांकित ॥१०९॥ पकमेका दप्यमुत्पित्स स्थास्नु मवरं। तधेय मयंदा समिति तत्व यिपितये ॥११॥ अंतनोपंतनो पाया या पथैव व्यवस्थित । तर तस्य यो भायो याथाम्यं तमगुस्यते ॥ १११॥ अनादिनिधने ये स्वपयांया प्रतिक्षणे । उन्मजन्ति निमन्नि जलकलोस यमाले । ११२॥ यदि प्यार पारिलि। विपने पाप मियत ११. . untinfram श्रीमनागसेनमुनि विरचितं- - सहवृत्ता गुणास्तत्र पर्यायाःकमयत्तिनः। स्थादेतदात्मक द्रव्यमेते च स्युस्तदात्मकाः ॥११४॥ एवंविधमिदं वस्तु स्थित्युत्पत्तिव्ययात्मकं । प्रतिक्षणमनाय॑तं सर्व ध्येयं यथास्थितं ॥ ११५॥ अर्थव्यंजनपर्याया मुर्तीमूर्त्ता गुणाश्च ये पत्र द्रव्ये यथावस्थास्तांच तत्र तथा स्मरेत् ॥ ११६ ॥ पुरुषः पुद्गलः कालो धर्माधमा तथांवरं। पविधं द्रव्यमानातं तत्र ध्येयतमः पुमान् ॥ ११७ ॥ सति हि ज्ञातरि शेयं ध्येयतां प्रतिपद्यते। ततो ज्ञानस्वरूपोऽयमात्मा ध्येयतमः स्मृतः ॥ ११८ ॥ तत्रापि तत्त्वतः पंच ध्यातव्याः परमधिनः । पत्यारः सकलास्तेपु सिद्धः स्यामीति निष्कल ॥ ११९॥ अनंतदर्शनज्ञानसम्यक्त्यादिगुणात्मकं । स्वोपात्तानंतरत्यक्तशरीराकारधारिणः ॥ १२० ॥ साकारं च निराकारममूतमजरामरं। जिनविचमिय स्वच्छस्फटिकप्रतिबिंधितं ॥ १२१ ॥ लोकामशिखरारदमुंदृढसुखसंपदं । सिद्धात्मानं निरावाधं ध्यायनिर्दूतकल्मषं ॥ १२२॥ तथाधमाप्तमामानां देवानामधिदैवतं । प्रक्षीणपातिकमाणं मातानंतचतुष्टयं ॥ १२३ ॥ दूरमुत्सृज्य भूभागं नमस्तलमधिष्ठितं । परमौदारिकस्वांगमभाभत्सितभास्करं । १२४॥ पूती मंत्रनपर्यायो पागम्योऽनश्वरस्थिर रामाप्रतिक्षण सी पर्यायवार्थ- २ उद्धृत।
१
तत्यानुशासनम्।
चतुस्त्रिंशन्महाश्चर्यः प्रातिहार्यच भूपितं ।
मुनितिर्यइनरस्वर्गिसमाभिः सनिपेवितं ॥ १२५ ॥
जन्माभिषेकप्रमुखमातपूजातिशायिनं ।
केवलज्ञाननिर्णीतविश्वतत्त्वोपदेशिनं ॥१२६ ॥
प्रभास्वल्लक्षणाकीर्णसंपूर्णादग्रविग्रहं ।
आकाशस्फटिकांतस्थञ्चलज्ञ्चालानलोज्वलं ॥ १२७॥
तेजसामुत्तमं तेजो ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमं ।
परमात्मानमर्हतं ध्यायेनिःश्रेयसातये ॥ १२८ ।।
वीतरागोऽप्ययं देयो ध्यायमानो मुमुक्षुभिः।
स्वर्गापवर्गफलदः शक्तिस्तस्य हि तादृशी ॥ १२९ ।।
सम्यग्ज्ञानादिसंपलाः प्राप्तसतमहर्धयः ।
तथाक्तलक्षणाः ध्येया सूर्युपाध्यायसाधवः ॥१३॥
एवं नामादिभेदेन ध्येयमुक्तं चतुर्विध ।
अथवा द्रव्यभावाभ्यां द्विधैव तदवस्थितं ॥१३१॥
द्रव्यध्येयं बहिर्वस्तु चेतनाचेतनात्मकं ।
भायध्येयं पुनर्धेयससिमध्यानपर्ययः ॥ १३२ ॥
ध्याने हि विभ्रते स्थैर्य ध्येयरूपं परिस्फुटं।
आलेखितमियामाति ध्येयस्यासषिधावपि । १३३॥
धार्पिद स्थितेथैवं ध्येयोऽर्थो ध्यायते यतः ।
ध्येयपिदस्थमित्याहुरत एव च केयलं ॥ १३४॥
पदा ध्यानबलाक्ष्यता शून्यीकृत्य स्वपिपई।
ध्येयस्यरूपाविष्टस्यात्ताह संपचते स्ययं ॥ १३५ ॥
तदा तथाविधध्यानर्सयित्तिध्यस्तकल्पनः ।
स एय परमात्मा स्यादैनतेयध मन्मयः ॥ १३६ ॥
भीमसामनियिषित-
रमणीभापरिकीकरण मत
पारमाशियालोकायफलपदः in
मिमीन त्या प्रदाय नायत ।
मालमतन्मायाप्त पिता ॥ १३८॥
माया समापदा देराय माम्पमस्पर ।
वैव परम निरिकोज्याभिधीयते ॥ १९ ॥
संसपेण पदमोनः पितरावरमागमे ।
सामर्द ध्यानमेय ग्यारपते परमेष्टिपु . १४०॥
प्पयामयाद प्यानगुनः पराभयं ।
निययादपना स्वारमाहं पनं तमिप्यते ॥ ११॥
मुक्ता ध्यानमा पददम्यमयादिगम्।
तथापि स्पष्टमाल्यात पुनरप्यभिधीयते । १४२॥
विधासम्बं पर तात्या श्रद्धाय च यथास्थिति।
विदायान्यदमार्थस्यात् स्पर्मयायत पश्यतु। १४२ ॥
पूर्व श्रीन संस्कार ग्यात्मन्यारोपयेततः।
तरका समापाच मकिषिदपि चितयेत् ॥ १४॥
यस्तु मालंयत भाता भावनां कल्पनामयाव ।
सोध्ययं मुराति स्यस्मिन्यहिथितो विमति च ॥ १४५ ॥
तस्मान्माएपहाणाय यहिधिनानिसये।
स्थात्मानं भावयत्पर्य मकामस्य व सिद्धये ॥ १४६ ॥
तथा हिपेतनोऽमस्यप्रदेशो मृतियाजितः ।
शुद्धामा सिद्धरूपाश्मि शानदर्शनलक्षणः ॥ १४ ॥
मान्योऽस्मि नादमस्स्यन्यो नान्यस्याई म में परः ।
अन्यस्त्वन्यात्मेवाइमन्योन्यस्यारमेव मे ॥ १४८॥
तत्वानुशासनम्। अन्यच्छरीरमन्योऽहं चिदहं तदवेतनं । अनेकमेतदेकोऽहं क्षयीदमहमक्षयः॥ १४९॥ अचेतन भवे नाहं नाहमप्यस्त्यचेतनं । ज्ञानात्माहं न मे कश्चिनाहमन्यस्य कस्यचित् ॥१५० योन स्वस्यामिसंबंधो ममाभूद्वपुषा सह । यश्चैकत्वभ्रमस्सोऽपि परस्माल स्वरूपतः। १५१ ॥ जीवादिद्रव्ययाथात्म्यज्ञातात्मकमिहात्मना । पश्यमात्मन्यथात्मानमुद्रासीनोऽस्मि वस्तुए ॥१५२॥ सद्रव्यमस्मि चिदहं ज्ञाता द्रष्टा सदाप्युदासीनः । स्वोपात्तदेहमात्रस्ततः पृथग्गगनवदमूर्तः॥ १५३ ॥ सवाहं सदाप्यस्मि स्वरूपादिचतुष्टयाद ।। असलेयास्मि चात्यंतं पररूपाद्यपेक्षया ॥ १५४॥ यन्त्र चेतयते किंचिताचेतयत किंचन । यतयिष्यते नैय तच्छरीरादि नास्म्यहं । १५५ ॥ यदचेतत्तथा पूर्व तिष्यति यान्यथा । घेतनीयं यदनाथ तषिद्धयं समस्म्पदं ॥ १५६ ॥ स्ययमिष्ट न च विष्टं किन्तूपेक्ष्यमिदं जगत् । नोऽहमेष्टा न च द्रष्टा किन्तु स्वयमुपेक्षिता ॥ १५७ ॥ मत्तः कायादयो मिसास्तभ्योऽहमापि तस्यतः। नाहमेषा किमप्यस्मि ममाप्येते म किंघन ॥ १५८॥ पर्व सम्यग्यिनिधित्य स्यामानं भिलमन्यतः। विधाय तन्मयं मार्य म किंपिपि चिंतये। १५९. चिंतामायोग अनाना उप्छो मिप्याससामिय । दावोधमाम्यहपस्य पत्त्यर्मयानं हिसः १६०॥
भीमागममिपिरपित- Non- पंप परकर पायरय न पागिनः । मत्स्यगंदम मारात्मनोनुभयं ॥ १६१॥ स्पपरातमिळपत्याप तम्य कारणान्त । भिता परित्यग्य स्पसंदिस्यय पंचता ॥ १२ ॥ ग्यांपाम्परूपायाजानम् पश्यपदामिता । विमामान्यविज्ञपारमा म्यान्मनयानुभूयतां ॥ १६३॥ कर्मभ्यः समसिम्यो भायेभ्यो भिधमन्यद। शम्चभायमुदासीन पायेदारमानमामिना ॥ १६४॥ पन्मियाभिनियमान मिप्याशामन पोनिक्षतं । तन्मभ्यस्थ मिर्गकप स्वग्मिन्संयंपता स्यये । १६५॥ महान्दियधिया हाय पानिरहितत्वतः। पितकालय पतितेपयिस्पष्टतकंणाः ॥ १६॥ उभयस्मिपिरत स्यानिस्पष्टमतीदिये। म्यमयचं हित स्वपित्त्यप हश्यतो ॥ १६७ ॥ पपुपोप्रतिमासऽपि स्यातंटयण चकासते। तना शानपश्यं स्वयं हरयत एवं दि॥ १६८॥ समाधिरधन पचारमा बोधात्मा नानुभूयते । तमा न तस्य तस्यानं मछायान्मोह पय सः ॥ १६९ ॥ संदेवानुमयंधायमेकामा परमृयाति। तधामाधीनमा रमति याचामगोपरं ॥ १७॥ यथा निर्यातदेशस्थः प्रदीपीन प्रकंपते । तया स्वरूपनियोऽयं योगी नेकाक्यमुज्झति ॥ ११ ॥ तमा ध परमेकाम्यानदिपु सरस्थपि। अन्यत्र किंधनाभाति स्थमेवात्मनि पश्यतः ॥ १७२।
तत्यानुशासनमा vivariouran अत एवान्यशून्योऽपि नात्मा शुन्या स्वरूपतः । शून्यान्यस्वमायोऽयमात्मनेयोपलम्यते ॥ १३ ॥ ततध यजगुस्त्यै मेराम्यादतर्शनं । सोतरेय यत्सम्यगन्यापोटात्मानं ॥ १४ ॥ परस्परपरावृत्ताः सर्ये भायाः कथंगन । मेराम्य जगतो यन्नैर्मगत्ये तथात्मनः ॥ १७५॥ भन्मामाभायो मेराय यात्मसात्मकः म्यामार्शनमेवातः सम्यगारात्म्यार्शने ॥ १॥ भान्मानमन्ययनपश्यन देन पश्यति । पश्यन विभाहमन्यभ्यः पश्यत्यामानमायं १७७॥ যামানামাযাশাহানাল্লাহ। नितमीभाग मेणागष्यनागताना १७८॥ Pा या mint or unf frhi गमायादित नपा पा॥ या 4m पापापा । विनामा याममा बधायना ॥ १८ ॥ Em मानापमान। बाबमानमा समानयमापन १८१ ॥ 44 4 TRITYमनपा । 4 48भियान ना RH बागमनमक- समानामा गम...
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भामयागसेनमुमिविरचितं---
तप्राविसिप निर्मलीकरणाय च ।
मारती तेगसीमायो पिदम्यादारणो कमात् १८५॥
ततःचनमस्कारः पंचपिटासरान्वितैः ।
चस्यापु यिन्यस्वैविधाय सकला कियाम् ॥ १८ ॥
पक्षादात्माममति ध्यायप्रिर्दिशलक्षण ।
सिद था प्यरतकर्माणममूर्त शानमास्थर । १०७॥
मन्चनईतमात्मानमतं ध्यायतो सतो।
अतरिमस्तहदी भान्तिर्भपता मयतीति चेत् ॥ १८८ ॥
तन घोघं यहोरमामिमायादवयमपितः।
सपाईस्थानानिधारमा ततरतमेव सर १८९॥
परिणमते बनाममा मायेन स तेन तन्मयो मयति ।
अर्हदयामाविष्टो भाषाई स्यात्स्वयं तस्माद । १९०॥
येन मायेन यह ध्यायत्यात्मानमात्मविद ।
तन तन्मयतां याति लोपाधिः स्फटिको पथा। १९१॥
अयया मायिनी मताः स्वपर्यावारतदात्मकाः ।
वामत व्यस्पेण सदस्येषु सर्वदा । १९९॥
ततोऽयमदत्पर्यायो भावी मायारमना राश।
मायंप्यार रातगास्य चाने को नाम यिभ्रमः॥१९॥
किंचनांत पाई स्यात्तदा पात: फलोपयः।
महि मियामहाजात विधिात्तिर्मायने नृपः ॥ १९४॥
पादुमयति चामुमारपालानि ध्यानतिन ।
भारणापशतः शान्तकररूपाण्यनेकपा । १९५
गुरूपांतमामाय प्यायमामः समाहितः।
अतानिरात्माय मुक्ति भुक्ति च यच्छति ॥ १९ ॥
तत्यानुशासनम्। ध्यातोऽसिद्धरूपेण घरमाङ्गस्य मुक्तये। सद्धपानोपासपुण्यस्य स पयान्यस्य भुक्तये ॥ १९७॥ शान भीरायुरारोग्य सुष्टिपुटियपुतिः। यत्पशस्तमिहान्यप तत्तद्धधातुः प्रजायते ॥ १९८॥ सध्यानायिधमालोक्य प्रकंपन्ते महामहाः । नश्यान्न मतशाकिन्य' करा. शाम्यसि च क्षणात १९९ यो परकर्म मभूयस्तनपानायितमात्मनः । भ्याता तात्मको भूत्या साधयत्यारमयोछित ॥२०॥ पार्थनापो मयन्मंत्री राफीकतर्यिपदः । महागुतो महामंत्र महामंडलमाभितः ॥२१॥ ধারাবন্তি থাকার। निमहीनुरामाणी पाणी करते तं ॥ २०२॥ स्थयमालाला भावा मादामडलमध्यग' । किरीटायली पी पीताम्मतिः ॥२.३॥ मनीराममायाराम प्रधागान । मकार्याणि माणि कायनापमानस ॥२०॥ सागरामय आपणा। ..... * मला जगप्रयातायना लपेशामाणे यालाSAITल । front and pre rretarmo MT NIममा मा भन11 AA4ममाMMEN. आगामिया मिलिगा। पारिवानिपाnिनाम-१.८॥ - भीमप्रायसेनमुनिपिरषित- किमय बनोनोन पपत्कर्म विकीपति । तदेयतामयो भूत्या तत्तनियतयत्ययम् । २०९।। पातिकमणि तात्मा पूरे करो भयमय । तिराणि फर्माणि साधयन्येय साधकः॥ २१० आकर्षन पीकार भिनं मोहनं दुतिः । मिविपाकरण शांतियिद्धेपोच्याटनिग्रहाः ॥ २११ पयमादीनि कार्याणि यन्ते ध्यानयतिना। ततः समरसमायसफलत्याप विभ्रम. ॥ २१२॥ यत्पुनः पूरण मुभी रचनं दहनं तयः । सकलीकरण मुदामंघमंदसधारणा. ॥ २१३ ॥ कम्माधिष्ठारदेवानां संस्थान लिंगमासनं । प्रमाणे याहनं र्यि जाति मतिर्दिना ॥ २१४ ॥ भुजपत्र नेप्रसंस्या भायः कररतयेतरः । पर्णस्पास्यराश्यस्था यस्त्र भुषणमायुधं ॥ २१५ ॥ पयमादि पान्यप शांतकराय कमंगे। मंत्रयावादिषु भारतमानस्य परिष्टमः ॥२६॥ सदाधिक पलं किंधित्फलमामुत्रिकं च यत् । पतस्य द्वितयस्यापि ध्यानमयाप्रकारणं ॥ २१७॥ ध्यानस्य च पुनर्मुग्न्यो हेतरतयतुपयम् । गुरुपदेशः श्रद्धानं सदाभ्यामः स्थिरं मनः ॥ २१८॥ अयमाम कार्यद्धमानफलमहि । हि ध्यानमाहात्म्यग्न्यापनाय प्रदर्शितं ॥ २१९॥ यद्धमान संद्रमात या यंदैहिकफलार्थिनां । तस्मादेतत्परित्यज्य धय शुक्लमुपास्यता ॥ २२० ।
२० तस्यानुशासनम् । ----- तत्त्वज्ञानमुदासीनमपूर्वकरणादिषु । शुमागुममलापायाद्विशुद्ध शुक्लमभ्ययुः । २२१ ॥ शुचिगुणयोमाच्छुकलं कपायरमसः क्षयादुपदामाद्वा। माणिक्यशिसायदि सुनिर्मल निःप्रकंपं च ॥ २२२ ।। रत्नत्रयमुपादाय त्यक्त्या घनिधन। ध्यानमभ्यस्यता नित्यं यदि योगिन्मुमुक्षसे । २२३ ॥ ध्यानाभ्यासमकपेण तुघन्मोहस्य योगिनः । चरमांगस्य मुक्तिः स्यात्तदा अन्यस्य च कमात् ॥ २२४ ।। तथा ह्मचरमांगस्य ध्यानमभ्यस्यतः सदा । निर्जरासंवरच स्यात्सकलाशुभकर्मणां । २२५॥ आस्रवन्ति च पुण्यानि मधुराणि प्रतिक्षणं । यैर्महर्मियत्येष त्रिदशः फल्पवासिषु । २२६ ॥ तत्र सर्वेन्द्रियामोदि मनसः प्रीणने पर। मुखामृतं पियक्षास्ते सुचिरं सुरसेविसः । २२७ ततोऽवतीर्य मत्यपि चक्रवादिसंपदः । चिरं भुक्त्वा दीक्षा देगंदरीं श्रितः २२८।। चनकायः स हि ध्यात्वा शुक्लध्यानं चता । विध्याष्टापि कर्माणि अयते मोक्षमझये । २२९॥ आत्यंतिकः स्वहेतोर्यो विश्लेपो जीवकर्मणाः। स मोक्षः फलमेतस्य शानायाः क्षायिका गुणाः ॥ २३० ।। कर्मबंधनविध्वंसाप प्रज्यास्वमायतः । क्षणेनकेन मुक्तात्मा जगध्धूडाप्रमृच्छति ॥ २३१ ॥ पुंसः संहारविस्तारौ संसारे कर्मनिर्मिती। मुक्ती तु तस्य तो गस्तः क्षयात्तद्धेतकर्मणा. २३२ ।। स्वयं मुश्त्वा -n. भीमसागसेनानिविषित- ततः सोनंतरस्यास्यशरीरममाणत: मिचिमतदाकारलपास्ते स्यगुणात्मकः ॥२३॥ स्वरूपायरिथति: सस्ता क्षीणकर्मणः। সামাখা শাখার ৭ ঘশয়া ২৪ स्पं सर्वशीयानां स्वपरस्य प्रकाशन । भानुमंटडयत्तेपी परस्मादमकामनं २३५ ॥ तिमत्येव स्वरूण क्षणे कमणि पौरुषः। पया मजिस्वदेवम्यः क्षीणे मांसगिक मले। २१६॥ म मुमति म संगते म स्वायांनष्ययस्यति। मज्यते न बदष्टि किंतु स्यस्य प्रतिक्षर्ण ॥ १७ ॥ विकासपिपोयमारमानं च यथास्थित। जानन पश्यं निदोषमुशल स तदा प्रमुः।२३८॥ सर्व चानुमवन्यप समातीनियरयुक्तः ॥२३९ ॥ সৰু ঘাবধানানুষ ই মা। अतीन्द्रियेषु मुनभोक्षे तत्कीट सुसं ॥ २४.५ इति चिन्मन्पसे माहात्तन यो मतं यतः। यापि यत्स त्वं रिस स्वरूप समानयोः ॥ २१ ॥ मात्मायन निरायाधमतीदियमनावरं । गतिकर्मक्षयोभूतं यचन्मोदासर वितुः १२४२ संसारिकीस्य रामामकमशाश्वत । वरप्रयसभूत तृष्णासंतापकार २४ मोहद्रोहमाकधमायालोमानियाई । सकारणधस्य हेतुत्वादु समेव तव १४४ ॥
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E = = মানববনবিধি-মিম। : নরোধ মুধি; জানাননিঘাষি ৭ বল বাঘিৰে যুষা, मासाप सिद्धिसमसंपरपायभूतं । বালুখানননি সাহা কােষ সাবলমিঃ অধি ॥ ২২৬ ॥ নিহা: নবনবযাবিলয়; এৱাি যিয়ায় ময়ম: শিৱিপিত্তথ্য: বাঘাষ ধ: গােয়ায়। নয় যান সিবিকা ঘি ময়: ২৭ ॥ বয়ষা গলার সমাহার নানিব বিনী মুবায়। হাবিব যত কথা যে ব্যাথায়গা এ ব্যময়খিরা সিনসিয়াবিন্তের : ২৯ ই মিয়ানমুনিঃ ন্যায়বিৱৰ নাম।
२४ श्रीमत्पूज्यपादस्यामिविरचितः ! श्रीमत्पूज्यपादस्वामिविरचितः इंष्टोपदेशः। श्रीपण्डित-आशाधर-कृतसंस्कृतटीकासमेतः । , . टीकाकारस्य मंगलाचरणम् । परमात्मानमानम्य मुमुक्षः स्वास्मसविदे। इष्टोपदेशमाचष्टे स्वशकल्याशापर स्फुटम् ।। तत्रादौ यो यद्गुणार्थी स तद्गुणोपेतं पुरुषविशेष नमस्करोतीति पर- मात्मगुणार्थी ग्रंथकर्ता परमात्मानं नमस्करोति, तयया;- यस्य स्वयं स्वभावातिरभावे कृत्स्नकर्मणः। तस्मै संज्ञानरूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥१॥ अस्तु भवतु । किं तनमः नमस्कारः कस्मै, तस्मै परमात्मने । परम अनाध्येयापहेयातिशयत्वात्सकलसंसारिजीवम्य उत्कृष्ट आत्मा चेतनः पर- मात्मा तस्मै । किविशिष्टाय, संज्ञानरूपाय सम्यक्सकलार्थसाक्षात्का- रित्वादितदत्यन्तसूक्ष्मत्वादीनामपि लामाकर्महत्वादेरपि विकारस्य त्यागाच संपूर्णशानं स्वपरावबोधस्तदेव रूपं यस्य तस्मै । एवमाराप्यस्वरूपमुक्त्वा तस्प्राप्युपायमाह । यस्याभूत्कासो स्वभावाप्तिः स्वभावस्म निर्मल- निश्चलचिर्पस्य आतिलन्धिः कचित्तादात्म्यपरिणतिः । कृतकृत्यतया स्वरूपेऽवस्थितिरित्यर्थः । केन, स्वयं संपूर्णरणत्रयात्मनात्मना । क सति, अमावे शक्तिरूपतया विनाशे । कस्य, फत्यकर्मणः। कृत्यस्प सकलस्य द्रध्यमावरूपस्य कर्मण आत्मपारतंत्र्यनिमित्स्य ॥ १॥ भनारोपिभप्रतिहत-सानापरणाविशयकर्माणि, रागदेवायो मावकमाणि । . .
टोपशाः। अपशिष्य. माद स्वाय स्वयं स्वरूपोपलब्धिः कपमिति म्यात्मनः पवयमात्मना स्वरूपस्य सापवारिगुणाटकाभिव्यनिकपप उपलब्धिः बयरेनोपायेन होताभावादिति । मत्राचार्यः समायते,-- पोग्योपादानयोगन पदः स्वर्णता मता। मप्यादिम्यादिमरत्तापात्मनोऽप्यात्मता मता ॥२॥ मता अभिप्रेता लोटासासी, पर्णता सुवर्णमास्य, पदः व. नाविभागयोग्यपापाणम्य । केन, योग्यानो सुमणारिणामकरणोषिताना उपादानानी कारणाना योगेने मेटापन संपाया था । एवमात्मनोऽपि पुषस्यपि न येवलं हपदात्यपिशवार्पः।मतारपिता।कासो, आत्मता। मात्मनो जीवस्य मावा निर्मटनिश्चचतन्यं । करयां सत्या, द्रव्यादि- स्वादिसंपनी दम्पमन्यायिभावः आदिको क्षेत्रपालमावाना से पते विादय शम्दः पशब्दोवा माथिको ते स्वादयो द्रग्पादयच स्वाद. तो विशेषणविशेष्यमारः इति समासः । सदर्य क्षेत्र सबाट समाव इत्यर्थः । मुशनः प्रशसार्थः । माशय पात्र मतकार्योप. योगित्व द्रव्यादिश्वादीनां संपतिः सपूर्णता सस्या सत्यां । अपशिष्यः माह-सहि बतादीनामानर्थक्यामिति मगवन परिसध्यादि. सामन्यो सत्यामेवायमारमा पारमानमुपलपयते सहि व्रतानि दिसाविरत्पा- दीनि आदयो येषा समित्यादीनां तेषामानय विफलतं स्यादभिप्रे- मायाः स्वारमोपटन्धे मुद्रध्यादिसंपत्त्यपेक्षत्वादित्यर्थः । प्राचार्यों निषेध- माह-तमेति । बस! पापया दाक्तिं बतादीनामानर्थक्यं सम माति । तेवामपूर्वमधर्मनिरोधेनोपामिताभकमेकशक्षपणेन च सफललादि- पपराग्ठक्षणशुभोपयोगजनितपुण्यस्य च स्वर्गादिपदप्राप्तिनिमित्तत्वादेव व प्यार पति- मेलापरेन सामथ्या नियमाना। प्रारपसाप । पारितामा श्रीमत्पूज्यपादस्वामिविरचितः घरं व्रतैः पदं वैध नाव्रतैर्बत नारकं । छायातपस्थयोभदः प्रतिपालयतोर्महान् ॥३॥ वरं भवतु । किं तत्पदं स्थानं । किविशिष्ट, देवं देवानामिदं देवं स्वर्ग: कैतुभिर्वतर्नतादिविषयरागजानितपुण्यैः तेषां स्वर्गादिपदाभ्युदयनिर्भधत्वेन सकलजनसुप्रसिद्धत्वात् तीव्रतान्यपि तथाविधानि मविध्यतीत्याशंक्याह । नेत्यादि । न वरं भवति । कि तत्पद । किंविशिष्टं, नारक नरकसंबंधिा है, अवतेः हिंसादिपरिणामजनिनपातकः बतेति खेदे कष्टे वा । तर्हि बतावत- निमित्तयोरपि देवनारकपक्षयोः साम्य भविष्यतीत्याशंकायां तयोर्महदंतर- मिति दृष्टातेन प्रकटयन्नाह । छायेत्यादि।भवति। कोऽसौ, भेदः अंतरं। कि- विशिष्टो, महान् बृहत् । कयोः, पथिकयोः।कि कुर्वतोः, स्वकार्यवशानगरीत-- त तृतीयं स्वसार्थिकमागच्छंत पथि प्रतिपालयतोः प्रतीक्षमाणयोः । विशिष्टयो. सतो.. छायातपस्थयो छाया च आतपश्च छायातपो तयोः स्थितयोः। अयमों यथैव छायास्थितम्तनायागमन काल यावत्सुसेन तिष्ठति आतपस्थितश्च दुःखेन तिष्ठति तथा व्रतादिकृतानि स आत्मा नीव. सुत्र्या- दयो मुक्तिहतवो यावत्संपद्यते तावत्वर्गादिपदेषु सुखेन तिति अन्यध नरकादिपदेषु दुःसेनेति । अय विनयः पुनराशते । एवमात्मनि भक्ति- रयुक्ता स्यादिति भगवनै चिरमाविमो क्षसुसस्य मतसाम्ये संसारसुसे सिद्ध सत्यात्मनि चिद्रूपे भक्तिभावविशुद्ध आंतरोऽनुरागो अयुक्ता अनुप- पना स्याद्भवेत् तत्साध्यस्य मोक्षमुसस्य सुव्यादिसंपत्यपेक्षया दूरवर्ति वार्गतरमाप्यस्य च स्वर्गादिसुखस्य व्रतैकसाध्यत्वात् । अवाप्याचार्यः समाधत्ते । तदपि. नेति न केवलं व्रतादिनामानक्यं न भवेत् तिर्ह तदप्यात्मभनयनुपपत्निप्रकाशनमपि त्वया क्यिमाण न साधु स्यादित्यर्थः । । यतः- मप्यस्य । अयुक्ति ।
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होपरेश। एमः। दंगति देगानित म पुरस्यनिसे, ते रामनरलेन माता भोगा: रमणीयरमणीयमुरग दिपाक, रोगा मरादिष्पापयो पधारा त्यामागी उनिगररिप्रमानिसंपादित- दमिनदायो विपतितपाधोतर- "मुंचाग लपवायल क्षिप तोश्यक्षाय विरमात्यही रेदिय एप किममूरन्या न पैत्मि क्षणम् । स्वरि मिद्धि गामिति तोपोंगे दिपाखी क्षिप- स्यामामुकोगरागलहितालापरिधित रतिम् ॥ " अवि- " रम्यं यं चदने दादा श्वाना पोयनरपा गुयत्यः । त रम्या सुत्पिपासाहिताना सवारंमारतालापरयमला.." तया । आत भूतिमता सह पध्या यामिनीविरहिणा विहगेन सहिरन किरणा रिमरक्ष्मे :सिते मनसि सर्वमसमित्यादि । अतो शायते ऐंद्रिय पुरा पासनामात्रमेव नात्मन. स्वाभाविकानाकुटत्वस्वभाव । कपमन्यथा लोके सुसमनकलेन प्रतीतानामपि मावाना दुसहेतुत्वं । एवं दुःस्तमपि । अराह पुनः शिष्यः एते उससे खलु वासनामात्रे कर्थ न हत्येते इति । खल्दिति पापयाकारे निधये वारक केन प्रकारेण न तस्येने न संवेयेते होरिति शेषः । शेष सष्टम् । अमाचार्यः प्रबोधयति;- मोदन संदृतं ज्ञानं स्वभावं लभते नहि। मनः पुमान्यदार्थानो यथा मदनकोदवैः ॥ ७ ॥ भारदिन।
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ARTIme + Romarathi AmATARACTET nirituat: TAITrrrrrrrrrrr I, Him Aritrim ITTTTTTTwit wri: Timgruare PHOn 14 मे 1 TETTE मा. मी Armfri मगरमपनिपंगा मेहता মন্তিমাখা শান্তাকে।” gir SHAHो गुप मम या सगो, THER ATMer I, पापांनो mal.THI .: 1. नितमनोः। दुनापार प. IIT आभारपनाम: रिम- COM SAfte ml मरममान पुरादीनि अन्यथाभानि नियन पर्ष । मम्मे फुटपति- मपुरटं धन पारा. पुषा मित्राणि समयः । भयंपान्यस्यभायानि मुदः स्यानि प्रपद्यते ॥८॥ प्रापते । कोमो, साविज्ञानहीनः पुमान् । कानि, धपुरहादीनि वस्तूनि । किरिशियानि, सानिधारमा स्थानि चात्मीयानि स्वानि । ए- रोपपगादेशप शहाय लोपः । अयार्थी हरतममोगरियो देहादिक- मात्मान प्रायते । आत्मनाभ्युपगति । हस्तरमोडाविश्य आत्मीय- खेन । निविशिधानि सति स्वाने मरयत इत्याह । सर्वपान्यस्वभावानि सर्वेग दम्यक्षेत्रकालभावसागेन पारेण सवभावादन्यो भिन्नः स्वमात्रो पिजातीये पाडपराज। । ।
शेपदा षो तानि निमत्याह । वपुः शरीर तावदचेतनत्वादिस्वभावं प्रसिद्ध- मस्ति । एवं गई धने दारा भार्याः पुत्राः आत्मनाः मित्राणि सुदः शत्रयो मित्राः । मत्र हितवर्गमुदिश्य दृष्टान्तः । अतेषु वपुरादिषु मध्ये हितानामुपकारकाण बारादीनां वर्गो गणरतमुद्दिश्य विषयीत्य हशन्त उदाहरणं प्रपर्यते । अस्माभिरिति शेषः। सपा-- दिग्देवीभ्य. खगा पन्य संघसंति नग नगे। स्वस्यकार्यवसायाति देशे विशु प्रगे धगे ॥९॥ संघसंति मिलिस्वा रात्रि यादभिवासं कुर्वन्ति । के ते, सगा पक्षिणः । हा,नगे नो दृशे वृक्षार्षिकृत्वा, पत्य आगत्या केभ्यो, दिग्देशेम्य दिशः 'पूर्वादयो दिश देशस्तरस्थैकदेशो अंगर्यगादयस्तेभ्योऽवधिकृतेभ्यः तथा योति गच्छन्ति। ते सगा:। काम, रिक्ष दिग्देशेविति प्राप्तेविपर्ययनिर्देशो गमन- नियमनिवृत्त्यर्थस्तेन यो यस्यामेव दिशि गच्छति यच यस्माद्देशादायातः स तस्मिन्नन देशे गच्छतीति नास्ति नियमः। वितर्हि, यत्र कापि यथेच्छ गच्छंतीत्यर्थः । करमात, स्वम्वकार्यवशात् निजनिजकरणीयपारतंत्र्यात् । कदा कदा, प्रगे भगे प्रातः प्रातः । एई संसारिणी जीवा अपि नरकादि- गतिस्थानेभ्य आगत्य कुले स्वायुकालं यावत् संभूय तिष्ठति तथा निजनिज- पारतंत्र्यात् देवगत्यादिस्यानेष्यनियमेन स्वायुःकालान्ते गहन्तीति प्रतीहि । कथं भद्र तर दारादिषु हितबुद्धया गृहीतेषु सर्वयान्यस्वभावेषु आत्मा- स्मीयमावः । यदि सत्वेतदात्मकाः स्युः तदा त्वयि तदवस्थ एव कथमव. स्थान्तरं गच्छेयुः यदि च एते तारकाः स्युस्ताह कय । क प्रयोगमंतरेणेव यत्र वापि प्रयोतीति मोहमहादेशमपसार्य यथावत्पश्येति दाटीते दर्शनीय । अहितवर्गेऽपि दृष्टान्तः प्रदश्यते आमाभिरिति योज्यम्,- विराधकः कथं हने जनाय परिकुप्यति । व्यंगुलं पातयन्पमा स्ययं इंटेन पात्यते॥१०॥ अपराधानकया। १४॥
ALAA- ..AA । " श्रीमापूग्यपावग्यामिविरपिता कथमित्याची न प्रधे क परिष्यति समता पनि । कोमो, कि. रामअपकारको जनः । करम, हने जनाय प्रपाकारकाप सोडाय। सुख या यदि या दुर्ग येन या कृतं भुवि । अयामोति स तत्तरमावेष मार्गः सनिधितः॥ इत्यभिधानादन्याय्यमेतवित मारः। अहान्तमाचटे। अंगुदमित्यादि पात्यते भूमो क्षिप्यते । कोऽयो, यः कश्चिदसमीक्ष्यकारी जनः । केन, दंडन हस्तधार्यकाष्ठेन कथं स्वयं पात्य प्रेरणमंतरणे।। कुर्वन, पातपन भूमि प्रति नामयन् । किं तत, व्यंगलं अंगुलियाकार कचारावाकर्षणावर । काभ्यो, पद्यां पादाभ्यां ततोऽहित प्रीतिरहित चानीतिः स्वहितविया प्रेक्षावता न करणीया। अत्र मिलेपः पृच्छति । हिताहितफ सन्देष कुईन् कि कुते इति दारादिषु रागं शष १ देपं कुर्वाणः पुरुषः किमात्मनेहितं कार्य करोति येन तावत कार्यतयोपदिश्यते इत्यर्थः । अत्राचार्यः समापते- रागद्वेपदीदीर्घनत्राकर्षणकर्मणा। अज्ञानासचिरं जीवः संसाराब्धी नमत्यती ११॥ भ्रमति संसरति । कोऽसौ, असौ जीवश्चेतनः । क, संसाराधों संसारः द्रव्यपरिवर्तनादिरूपो मोब्धिः समुद्राव दुःसहेतुत्वाददुस्तरत्वान तास्मन् । कस्मात, अज्ञानात् देहादिष्वात्मविभ्रमात् । कियाकालं, सुचिर अतिदीर्घकालं । केन, गंगेत्यादि । राग इष्टे वस्तुनि प्रीतिः पश्चानिष्टेड } प्रीतिस्तयोयो । रागद्वेषयोः शक्तिव्यक्तिरूपतया युगपत् प्रवृत्तिज्ञापनार्थ ट्याग्रहणं, शेषदोषाणां च तदयप्रतिबद्धत्वबोधनार्थ । तथा चोक्तम्-- यत्र रागः पदं धत्ते द्वेपस्तति निश्चयः। उभावती समालंब्य विक्रमत्याधिक मनः ॥" १ अयुक्तं । ३ भविचायकार्यकर्ता । ३ पंडितन । - रोप म । मनि पनि मापी अनयोः तिरसा ने दपाय मापते । माबीपनमायतमधागपाश । अमनलागतम्यापणार्मीय विस्तया परिणम भयानमानियनं मन मोपमानभूमो मंद आयातेन पानापागण्यापार समुदे रि प्रोता सोसिन क्या MEANI । पाभनेन गगादिपरिणामेन कारण- मायाराजनितन संसारया जो अनादिकाल संसारे shi sri श्रमिपनि पानि पक्षिा नित्याने राविधानाना "जो सट हामी मोहोहोरि परिणामो। परिणामाकाम कामा हादिगदि सुगदी। गदिमधिगदाम दो दादावियाणि जायते । सरिसियातना गमो वसोवा॥२॥ गायदि जावरमे मावो ससानामि । दि निणगर मणिभं अगाइमिह मणिपणे दा!" ॥३॥ अथ प्रतिपादः पतयने । तम्मिरि यदि मुसी स्थान को दोपहति गगन समापि न केवर मोक्ष पयपि हाम्दार्थ । पेनी: मुसयुक्तो हिं को न कधित दोषी दुष्टर संगारस्य सपा सुवस्येव आनु- वात् पेन समारनाय संतो यतेभित्यत्राह । वत्स ! विपदयपदायत पदिक पातिवाद्यते । पापत्तायड्यंत्यन्या: प्रगुरा विपक्षः पुर. ॥१२॥ बदतियागने मतिकम्यते । प्रेर्पते । कासो, विपत सहमशारीरमानसा- माना रियः पृष्ठति। ।
श्रीमत्पूज्यपादस्वामिविरचितः । गंतुकानामापदां मध्ये या काप्येका विवक्षिता आपत् । जीवेनेति शेषः ।, भवपदावर्त भवः संसारः पदावर्त इव पादचाल्यघटीयंत्रमिव भूयोभूयो परि- वर्तमानत्वात् । केव, पदिकेवै पादाक्रांतदंडिका यया तावद्वन्ति । का, अन्या अपूर्वा प्रचुरा बह्यो विपदः आपदः पुगे अग्रेजीवस्य यदि । का इत्र, का. छिकस्येति सामर्थ्यदुा । अतो जानीहि दुःखैकनिबंधनविपत्तिनिरंतरत्वात संसार अवश्यविनाश्यत्वम् । पुनः शिष्य एवाह । न सर्वे विषदन्त ससंपदोपि दृश्यत इति भगवन समस्ता अपि संसारिणो न विपत्तियुक्ताः सन्ति सश्रीकाणामपि केषी चित् दृश्यमानत्वादित्यवाह,- दुरज्यनासुरक्षेण नश्वरेण धनादिना । स्वस्थंमन्यो जनः कोऽपि परवानिय सर्पिया ॥ १३॥ भवति । कोसौ, जनो लोकः । किविशिष्ट', कोपि निर्विवको न सर्वः । किविशिष्टा भवति, म्वन्धमन्य स्वस्थमात्मान मन्यमानो अह सुखीति मन्यत इत्यर्थ । केन कृत्वा, धनादिना द्रव्यकामिन्यादीष्टवस्तुजातेन । कि- विशिष्टेन, दुर्बण अपायब हलवाद दुानावेशाच दुसेन महता कटेना. र्जित इनि दुण तथा अमरशेण दुसाणेन यनतो रक्षमाणस्याप्यपाय- स्थावश्यभाकिवान । तथा नश्वरेण रममाणम्यापि विनाशसंभवादशाश्व- तन । अत्र दृष्टातमाह। बो- पाव यथार्थ यथा कोऽपि मुग्धो जरान अतिशयेन मतेविनाशात सामान मापा पतन पानायुप- युनेन स्वस्थमन्यो भवति । निरामयममा मन्यत नतो पदपत्र दुरुपायंरक्षणभंगुरदम्यादिना दु:समेव स्यात् । उन च- " अर्थग्योपानने इ.सममितम्य च रक्षणे। आये दु:ख व्यये मुविमर्थ मास्मिरागन। १ ... " दुःसभाजनम्॥
पटोपदेशः। - 'गोपि दिनेयः पूछति ।" एवंविधा संपदार्थ न त्यजतीति दुरर्जवादिप्रकारेण लोकदयेऽपि दुलदा धनादिसंपत्ति कर्य मुंशति जन' । कयामिति विशमयगर्भ प्रभे । अत्र गुरुरुनरमाह- विपनिमात्मनो मूर परेपामिय नेक्षते । पधमानमूगाकीर्णयनांतरतमस्थयन् ॥१४॥ नेक्षते न पश्यति । कोऽमो, मट्टो धनायामात्या टुप्तविवेको लोक । को, विपनि नारादिना नियमाणो धनापहारापापा । म्य, आत्मन स्वस्य। पामिन, परेशामिव पपा हमे विपदा आफम्पन्ते तथाहमप्याकतव्य इति न विवेचपतीयः । स मदसमान दावानलबालादिभिर्भरमीक्रिय- माणमृगेरिणादिभिराकीर्णस्य संकुलाप पनस्यांतरे मध्ये वर्तमान । तर वृक्षमारूदो मनो यथा आत्मनो मृगाणामिव विपत्ति न पश्यति । पुनराह शिष्य कुत एतदिति, भगवन कस्माद्धेतोखि सनिहिताया अपि विपदो अदर्शन जनाए । गुरुराह । लोभाक्षिति, वत्स धनादिगाा- रोवतिनीमप्यापदं धनिनो न पश्यति । यतः-- आयुर्वृद्धिक्षयोत्कर्षहत कालस्य निर्गमे । वांछता धनिनामिष्टं जीवितासुतरा धनं ॥१५॥ बने । कि तदनं । विशिष्टं, एमभिमत । कथं, सुतरा अतिशयेन करमानीविनात्यागेभ्यः । केपो, धनिना। दुर्वतो, वांछता, निर्गम अतिशयेन गमनं । पस्य, कालस्य ।विशिष्ट, आयुरित्यादि । आयुः क्षयस्य शुकर्षस्य च कालांतरवर्द्धनस्य कारणम्, भयमा, धनिना तथा जीवितव्यं नष्टं यथा धनं । कपमन्यथा जीवितभयारणमपि धनदिहेतु कालनिर्गमें धाउनि । अनो धिग्धनम् ' एतविधव्यामोहहेतुत्वात् । अत्राह शिष्यः । कथ धनं नि येन पुण्यमुपायते इति पायदानदे- भःस्थिनामपि। -
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इप्टोपदेशः। आरंभे तापकान्यातायप्तिमतिपादकान् । अंते सुदुस्त्यजान कामान कार्म का मेयते सुधीः ॥ १७ ॥ को, न कश्चित् एधीविद्वान मेवते दियप्रणालिदयानुभवति । कान्, भौगोपभोगान् । उन्नच- तदान्मुखसंशेषु भावेषज्ञोऽनुरज्यते । हितमेवानुरुध्यते परीक्ष्य परीक्षका । क्यंभूतान, तापकान् देहेद्रियान देशहेतून् ।, आरंभे उत्पन्युप- नमे । अनादिभोग्यद्रव्य-संपादनस्य ऋष्यादिवशवालया सर्वजन- सुप्रसिदत्वात् । तर्हि भुग्यमानाः फामाः सुरसहेलका समुतिरोग्यास्ते त्याह, प्राप्तापित्यादि । सो दियेण संबंधे सति अत: सतप्णाया प्रति. पादकानदायकान् । उप- "अपि संस्थिताः कामा संभवति यथा यथा । तथा तथा मनुष्याणा कृष्णा विधं विसति ॥" है ययेष्ट भुवया तृप्तेषु सेषु तुष्णासंताप साम्यतीति न्यास्ते इस्याह । ओ एदुस्यमान मुनिप्रति स्यनुमायका । मुभुने पवितेषु मनोग्यतिवमय दुर्निवारत्वात् । उ प-- "दहनावणा संसपेरपि तप्यधिदक्षतः । ननु राममुरः पुमानरो पलपता रामपि कर्मणः । अपि प-हिमपीई विषयमय विषमनिधिम पुमानय येन । प्रसभमनुभूय मनो मरे भवे ने चेतयते।" मन नापविशति भोगानभुनतो न भूपर पिकामा सेणे RANIY साम .
- श्रीमत्पूज्यपादस्यामिविरचितः सुधीरित्युपदेशः कथं श्रद्वीयत इत्याह । काममिति। अत्यर्थ । इदमत्र तात्पर्य चारित्रमोहोदयात् भोगान् त्यतुमशक्नुवन्नपि तत्त्वज्ञा हेयरूपतया कामान्य श्यमेव सेवतं मंदीमवन्मोहोदयस्तु ज्ञानवैराग्यमावनया करणग्राम संयम्य सहसा स्वकार्यायोत्सहत एव । तथाचोक्तम्- बदं फलमियं कियाकरणमेतदेष मो व्ययोयमनुषंगनं फलमिदं दशेयं मम । अयं सुन्दयं द्विषन् प्रयतिदेशकालाविमाविति प्रतिवितर्कपन अप तते बुधो नेतरः। किंच यदर्यमेतदेवविधमिति । भद्र यासायलक्षणं वस्तुसंतापायुपेत कर्तु कामस्त्वया प्राग्रत तदश्यमाणलक्षणमित्यर्धन एवंविधाति पाठः । तपथा- भयंति माध्य यत्संगमधीनि शुचीन्यपि । म कायः संततापायस्तार्थ प्रार्थना पृथा ॥ १८ ॥ वर्तन । कामी, स काय शरी। पिशिष्ट, मनापाय नित्यशुधापु- पतापः । सक, स्याह । यत्मा यन कायन महमबध पाप्य ला शुन्यपि पविधरम्याण्यपि भाजनमादियानन्य शुभानि भवति यतभेष सतस्तदर्थ । सतनालाय काग तिमभिपतु प्रार्थना आ. सेनामय था म्यया कनन निति पिकमिभपापक्षणे क्षणे परापरापापी- पनिममवाल। शिष्य । न बनानाप्यारमा मापश्यतिमगन संतनागयतया कायम्य धनादिना साकारोन या नागिन रमनानादितासनत्य मार्ग । मा यो ms दुबलो मनियर्थः । गुरुगा नभेनि । am नाना आrist. मान समायनि। पर- यधीवस्योपकाराय नंदहस्यापकारक। पदम्योपकागयतमायाकार.१॥ । पुनायाह शिश्य N १९.
टोपदेश ३९ 11 यनशनादि तपोऽनुष्धानं जीवश्य पूर्वापापक्षपणनिवारणाभ्यामु पकाराय स्यातदेहत्याएकार हान्यादिनिमित्तवात् । यत्पुनर्धनादिक दहस्य भोजनापुरमोगेन क्षुधाश्तापक्षणवायुपकाराय स्याननीवायो- पार्जनादौ पापजनहतेन दुनि. दुसनिमित्तन्वाइपकार स्यादतो जानीहि ঐ খানা নীলাখাল খনৰ নৱশ্য। अशा शिष्यः ता कायम्योपकारचित्यते इति भगवन यये तहि “शरीरमाएं सलु धर्ममाधनम् " इत्यभिधानातत्यापायनिरासाय यन: भियते न च कापस्यायनिरासो दु.का इति पाया । पानेन तस्यापि मुरत्वा । तपाचोक्तम्- दर पर किंचित्कटमामुद्रिक च यत् । নেয় যিয়াব শামামা। झाणस्य सह किपीति - गुरु प्रतिमाह तनोति ।ध्यानेन वायम्पकारोन वित्य स्परः। इसचिन्तामणिदिव्य त पिण्याकसंडकं । ध्यानन घनमे हम्ये कनियंती विधेकिनः २० ॥ अस्लिमोऽसो, चिन्तामणि चितितार्थपदोरलविशेषः । विशिरो, दियों देनाधिष्ठित । स्त अस्मितभिन्न पक्षे तिचायस्मिन, पिण्यासण्ड के कृत्सितमतं वा सहसंमस्ति एते च उभे अपि यदि ध्यानेन सम्येते अवश्य लभ्येते ताह य क योर्मध्ये कतर- मिनेशस्मिन्द विकिनो रोपदविचारच आदियंता आदर कुर्वन्तु । तदेहिकफलानिढाएं स्पस्ता आमुविफलसिद्धार्थमेवात्मा प्यातयः । उक्तंच-- रोगपबिनाये।
গলুশামিংনিস । भवानोपाम्लिग्नानं मान बानिममाय । पाति यत्तु यस्यास्ति सुममिमि यमः ॥२३॥ दानि । मो, अशानाप शावमानित मंदिग्धगुर्गविणे आनिः से अमान, मोहममस देहलक्षणे सपा पदाति । कासो, शानिनः समा- यस्यात्मनो शानसपमदिर्ग ममाप्रयः । अनन्यारया सेग्नं । कि, शानं स्वामियोध। उनं न,-- शानमेव फलं शान ननु श्याध्यमनश्वरम् । अ महाय माहात्म्यमन्यदस्यत्र मुग्यो । को अब पति इत्याह यदित्यादि ददातीत्यत्रापि योग्यं 'तुरवधारणे तेनायमर्थः संपयने । यद्येव यस्य स्वाधीन विद्यते स सेव्यमान तदेव ददातीत्येतदाक्यं लोके सुप्रतीतमतो मद शानिनमुशस्य समुहंभितस्वपर- विवेकज्योतिरजनमात्मानमत्मानामात्मनि सेभ्यश्च । अत्राप्याह शिष्यः। शानिनोध्यात्मस्वस्थम्य किं भवतीति निष्पन्नयोग्यपेक्षया स्वारमध्यान- फलप्रश्नीयम् । गुरुराह,-- परीपहाविज्ञानादास्रवस्य निरोधिनी । जायतेऽध्यात्मयोगेन कर्मणामाशु निर्जरा ॥ २४ ॥ जायते भवति । कामा, निर्जग एकदेशेन सक्षयो विश्लेप इत्यर्थः । केषां, कर्मणां सिद्धयोग्यपेक्षयाऽशभाना च शुभाना साध्ययोग्यपेक्षया त्वसवेद्या- दीनां । कथमाशु सद्य । केन, अन्यात्मयोगेन आत्मन्यात्मनः प्रणिधानेन, किं केवला, नेत्याह निरोधिनी प्रतिषधयुक्ता कस्यास्रवस्यागमनस्य कर्मणामि-- त्यत्रापि योज्यं । कुत इत्याह, परीपहाणां क्षुधादिदुःखभेदानामादिशब्दा देवाविकृतोपसर्गचाधाना चाविज्ञानादसवेदनात् । तथा चोक्तम्--- यस्य पुण्यं च पापं च निःफलं गलति स्वयम् । स योगी तस्य निर्वाणं न तस्य पुनराम्रवः"॥१॥ "
मापदंशः।
४३
पा.
सपा ममय ध्यानमभ्यम्या. सदा।
निरामाधाम्प सासाशुभकाभणी ॥२॥
.
आमदातरज्ञान भनि मानहानित ।
बरसा दुपार भुजानोऽपि म सियने " ॥३॥
एस स्यबहानयारयते । दुनपासकायो पुनराचार्य एवाह का
सट्टा दम्मा भवति तय धम्मदा पमिति । वस आकर्णय
सतु पागास। एकदेशेन विषटगा निजग कर्मणः चित्मामान्यान-
विधायिपुदलपरिणामरूपम्य ध्य. संबधिनी संभानि दृध्ययोरेव
संयोगविभागसमा तस्य चम्यामिंगस्तदा योगिन' स्वरूप
मात्रावग्यानबारे सवध प्रत्यासतिरात्मना स । कयं न संयोगादिपकी.
रेण संभवति समेक्षिकया समीक्ष्याव न कथमवि सभषमीत्यर्थः । यस
सल्वाम प्यान स्पेयं च म्यानद। सदात्मनाप्यात्मन. परद्रव्याद व्यावृत्य
स्वरूपमात्रावस्थितत्वावध द्रध्यांतरेण संबंधः स्यात्तस्य दिछत्वात् । म
मसारिणो न संभवतीति वाच्यं । संसारतीरमाप्तस्पायोगिनो मुकात्मवत्प-
व हवरोझारणकालं यावनथावस्थानसंभवात् कर्मक्षपणाभिमुसम्प
लक्षणोत्तपशुलेश्वासकारावेशवशात्तावन्मात्रकर्मपारतंत्रव्यवहरणात् ।
तथा धोनः परमागमे-
"बालेसि संपनी जिन्दणिम्सेस भासती जीवो।
कम्मरयविप्पमुसो गयनोगो केवली होदि।"
भूयतो चारपैदास्य संमहश्कः ।
कटस्य फहमिति संबंधः स्याद दायो।
ध्यानं ध्येयं यदात्मैव संबंधः कीदृशस्तदा ॥ २५ ॥
४ श्रीमत्पुग्यपादम्यामिविरचित म्याद मवेत् । कोमो, मंबंध व्यादिना प्रन्यामनिः। कयोदयोः कनिद. मिन्नयोः पदार्ययोः इति अनेन लोकप्रनिद्रन प्रकोण कयमिति ययाह- मरिमा कोहगः, कती निर्माता 1 कम्य, कटम्य वंशदलानां जलादिप्रनिर्व- धायर्थम्य परिणामस्य । एवं संबंधम्य दिनां प्रदर्य प्रतिव्यतिरेकमाइ । ध्यानमित्यादि ध्यायते येन ध्यायति वा यनयानं व्यातिकियां प्रति करण का वा । उक्तंच,- "ध्यायंते यन तयानं योध्यायति स एव ना।" ध्यायन इति ध्येयं चाच्याति क्रिययाध्याप्यं । यदा यस्मिनात्मनः परमात्मना सहेकीकरणकाले आत्मैव चिन्मात्रमेव स्थानदा कीमः संयोगादिप्रकार संयो द्रव्यमणा सहात्मनः स्यात् येन जायतेव्यात्म- योगेन कर्मणामाशु निग्रेति परमार्थतः दृश्यते । अत्राह शिष्यः- तर्हि कथं वंधस्तत्प्रतिपक्षश्च मोक्ष इति भगवन् यद्यात्मकर्मदव्ययोरध्यात्मयोगेन विश्लेपः क्रियते तर्हि कथं कनापायप्रकारेण तयोः परस्परप्रदेशानुप्रवेश- लक्षणः संश्लेषः स्यात् । तत्पूर्ववत्वाद्विश्लेषस्य क च तत्प्रतिपक्षो बंध- विरोधी मोक्षः सकलकमीवलपलक्षो जीवस्य स्यात्तस्यैवानंतरमुस- हेतुत्वेन योगिमिः प्रार्थनीयत्वात् । गुमराह- वध्यते मुच्यंत जीयः सममो निर्ममः क्रमाव । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन निममत्वं विचितयेत् ॥ २६ ॥ मत्यव्ययं ममेदमित्यभिनिवेशार्थमव्ययानामनेकार्थत्वात् तेन सममो ममेदमित्यभिनिवेशाविष्टो अहमस्येत्यभिनिवेशाविष्टश्योपलक्षणत्वात् जीवः -कर्ममिर्वध्यते । तथा चोकम्- "न कर्मबहुलं जगन्न चलनात्मक कर्म वा । न चापि करणानि वा नचिदचिद्धो बंधकृत " यदेक्यमुपयोगभूसमुपरो अतिरागादिभिः स एव किल केवलं भवति - इष्टापदेशः। - " - बन्धहेतुर्नृणां । तथा स एवं जीवो निर्ममस्तविपरीतस्तर्मुन्यत इति यथा. संख्येन योजना प्रमादित्युपात । उनं च- " अकिंचनाहमित्यास्व लेण्याधिपतिर्भवे । योनिगम्य तव प्रोक्तं रहस्य परमात्मन'। अथवा "रागी बाति कर्माणि शीतगगी विमुंचति । जीवो जिनोपदेशोऽयं संपादन्धमाशयो ।" यस्मादेवं तस्मात्सर्वप्रयलन बतायवेधानेन मनोवाधायप्रणिधानेन वा निर्ममत्वं विचिन्तयेत् मनः कायादयोऽभिन्नास्तेभ्योहमपि तस्वत. नाहमेयां किमप्यस्मि ममाप्यते न किचन इत्यादि श्रुतज्ञानभावनया मुमुक्षुविशेषेण भावयेत् । उन च-- "निवृत्ति भावयेवावन्निनि तदभावतः । न वृत्ति निवृत्तिश्च तदेव पदमव्यय ॥" अयाह शिष्य' । कथं नु तरिति निर्ममत्वविचितनोपायमोऽयं अप गुरुस्तकियो मम विज्ञस्य का स्पृटेति यावद्धपदिशति- एकोऽहं निर्ममः शुद्धोक्षानी योगीन्द्रगोपरः। वायाः संयोगजा भावा मत्तः सर्वेऽपि सर्वथा ॥२७॥ द्रव्याथिकनयादेकः पूर्वापरपर्यायानुस्यूती निर्ममो ममेदमहमाल्या भिनिवेशशून्यः पदः शुद्धनगदेशाध्यभावधर्मनिर्मुनी शानी स्वपर- प्रकाशनस्वभावो योगदगोचगेनितपर्यायविशिष्टतया देवलिना गुदोप- योगमात्रमयत्वेन श्रुतके वरिनां च संयोहमात्मास्मि पेतु संयगाम्य- कर्मसंबधापाता मया सह संबध प्रामा भाषा देहाइपोरने समिती मत्सकाशासर्वथा सर्वेण प्यादिप्रकारेण यादा भिमा सति पुनरिक १ साप नेन । १ पायामापुटप । निर्माणमा सोनम- देहकारी মালামাগণ . - मिति संगोगारिकमिनि देहादिभिः संगारिनल स्यादि त्यर्थः । तत्र ममने- गर्ममागिय मेयोगारिहहिनाम् । त्यनाम्येन ततः सर मनोयाणायकममिः ॥२८॥ दुमान मंदो महानद्रागिरी देहिनामिह संमार मयोगादेवादि- संपादोत् । पासत पन योग सनि.शेष त्यजामि ।केश्यि- माणं, मनोगमायाभिमनोपणापालावरात्मप्रदेशपगिदम्तरेव स्य- जामि । जगमभिप्रायो मनोयाकायापतिसदिमानानात्मप्रशान् मा वतो निदामि । नदाभेदाभ्यासमूलत्यारमुग मेकफरनिर्वनिमं मृत्यो- स्तथा घोक्त- स्वयुदया यनु गृझीयालायवाचनसा त्रयं । संसारनावदेतेषां तदाम्यासेन नितिः ॥ पुनः स एव विमृशति पुनलेन किल सयोगस्तदपेक्षामरणादयस्तद्- व्ययाः कथं परिदियत इति । पुरलेन देहात्मना मूर्तद्रव्येण सह दिल आगमे श्रयमाणो जीवम्य सबन्धोऽस्ति तदपेक्षाश्च पुसलसंयोग निमित्त जीवस्य मरणादयो मृत्युरोगाइयः सभवति । तद्यथा मरणादयः संभांति मरणादिसंबंधिन्यो बाधा । कथ, केन भावनाप्रकारेण मया परि- हियते । तदभिभवेः कथं निवार्यत इत्यर्थः । स्वयमेव समाधत्ते,- न में मृत्युः कुती भीतिनं मे व्याधिः कुतो व्यथा । नाहं धालो न वृदोहं न युवैतानि पुद्गले ॥ २९॥ न में एकोऽहमित्यादिना निश्चितात्मस्वरूपस्य मृत्युः प्राणत्यागो नास्ति । चिच्छक्तिलक्षणभावप्राणानां कदाचिदपि त्यागाभावात् यतश्च मे मरणं नास्ति ततः कुत' कस्मात्मरणकारणाकृष्णसाद तिर्भयं मम विचारयति । १ सेवितं । ३ देहात्मनः । ४ सयोगापेक्षा। ५ पराभवः ।
रोपांसाः। - -- -- स्थान हताश्चिदपि विभमीत्यर्थः । तथा स्याधिर्वातादिशेषवैषम्यं मम मास्ति मसधित्वादातादीन । यतश्चैव ततः कस्मात ज्वरादि विका. रात मम व्यथा स्यात्तथा पालायवस्थो नाहमस्मि ततः कृथं बालाघ- वस्थाप्रभवः दुसरभिभूयेये अहमिति सरामध्यदित्र द्रष्टव्यं । तहिं क मृत्युप्रभृतीनि स्युरित्याह-एतानि मृत्युन्याधिवालादीनि पुगले मूर्चे देहादावर संभवन्ति । मर्निधर्मत्वादमूर्चे मयि तेषां नितरामसंभ- वात । भूयोऽपि भाव एव स्वयमाशरते ताबेतान्यासाय मुक्तानि पश्चानापकारीणि भाविष्यतीति ययुक्तनीत्या भयादयो मे न भवेयुस्तहि एतानि देहादिवग्नून्यासाद्य जन्मप्रमृत्पात्मात्मीयभावेन प्रतिपय मुनानीदानी भेद. भावनावष्टंभान्मया त्यक्तानि । चिराभ्यस्ताभेदसंस्कारवशात्पश्चात्ताप- कराणि किमितीमानि मयास्मीयानि त्यकानीत्यनुशयणि मम मविष्यति । अत्र स्वयमेव प्रतिषेधमनुष्यायति तनेति यत:- भुक्तोमिता मुहमाहान्मया सर्वेऽपि पुदलाः । उच्छिष्टेष्विव तेष्वद्य मम विज्ञस्य का स्पृहा ॥ ३० ॥ मोहादविद्यावेशवशादनादिकालं कर्मादिमायेनोपादाय सर्वे पुला:मया संसारिणा जीवन वारं वारं पूर्वमनुभूताः पश्चाच्च नीरसीकृत्य त्यक्ता यतश्चैवं तत उच्छिष्टविद भोजनगंधमाल्यादिषु स्वयं ममत्वा त्यक्तेषु यथा लोकस्य तथा मे संप्रति विशम्य तत्त्वज्ञानपरिणतरय तेषु फेला कल्पेषु पुद्गलेषु का पहा! न कदाचिदपि । दस ! त्वया मोक्षाधिना निर्ममत्वं विचिंतयिव्यं । अत्राह शिष्यः । अथ कथं ते निवघ्यंत इति । अथेति प्रश्ने केन प्रकारेण पुदला जीवन नियंतमुपादयिते इत्यर्थः । गुरुराह- कर्म कर्महिताबन्धि जीवो जीवहितस्पृहः । म्यस्यममावभूयस्त्वे स्वार्थ को या न घांछति ॥३१॥ - . १दुन्धिो भवामि । २ करोति । ३ वरिट निबिन । ५बहुतस्खे।
श्रीमत्पूज्यपादस्वामिविरचितः wamanane - -- कत्थवि बलिओ जीयो कथयि कम्माद हुँति पलिया जीवरस य कम्मस्स य पुष्यविरुद्धाइ बहराइ ॥ " इत्यभिधानात्पूर्व पार्जितं वलवकर्म कर्मणः स्वस्यैव हितमानधाति जीवस्यौदयिकादिमा मुद्भाव्ये नवनवकर्माधायकत्वेन बसंतान पृष्णातीत्यर्थः । तथाचोक्तं-- जीवकृतं परिणाम निमिनमात्रं प्रपद्य पुनान्ये । स्वयमेव परिणमंतेऽत्र पद्गाला कर्मभारेन ॥१॥ परिणममानस्य चिदश्चिदात्मक. वयमपि सोभावे । भवति हिनिमित्तमात्र पाइलिक कम तम्यापि ॥ २॥ तया जीः कालादिलाया बलवानात्मा जीवम्य म्यम्येव हितमनन मुसहेतु वेनोपकारक मोक्षमाशति । अत्र दृष्टांतमाह-सम्येत्यादि निजान नमाम्यवहताये सति स्वार्थ पायोपकार वस्तु को न बोउति साध्यमिलातीत्यर्थः । तनो सिद्ध कवियो जीवः कर्म मचिनोतीति यत तत:-- परोपकृतिमुत्सृज्य स्योपकारपरो भव । उपपूर्वपरस्याशी हस्यमानस्य होकयन् ॥ ३२॥ परस्य कर्भगो देहावी अप्रियायशान कियमाणमुपधारे वियाभ्यासेने स्यात्तात्मानुग्रहप्रधानो मा संमिन, उपनि । म्य, परम्प मर्वया स्वम्मादाय समानरयेदियानुभवमानस्य देह वशिष्टो यस अचान मिशः मोर | यथा तलाक पर पानामान सम्योपनिति तन माया तामर स्याहारो मन येव लामियः । अपा शि: लोप नापायन स्वारी- दोनशानुभnt- मुख्शायाममरिन स्यातt। मानातियार पानाति मोक्षामय निरम ३. Nal -- टोपदेशः। . " यो मानाति । तत्परतरं आत्मपरयोदं यः शात्मानं परस्माद्भि पश्यतीत्यर्थः कुतः सपिने क्षगतः स्वलक्षानुभवाता एपोपि कुतः, अभ्यासात अभ्यासमावनातः । योऽपि गुरुपदेशात् धर्माचार्यस्यात्मनश RE- स्वपर विशेषज्ञानोत्पादकवाक्यात से तयान्यांपोस्वारमानुमविता मोक्षसाख्यं निरंतरमविनिमनुभवनि । कर्मविविवानुमान्यविनाभावित्वात्तस्य । तथा घोक्तं तत्वानुशासने,- 'तमेवानुभवंचायमेशगयं परमृच्छति । तपामाधीनमानंदमतिधाचामगोचरम् । इत्यादि। अय शिष्यः पच्छति-करतत्र गुरुरिति तत्र मोक्षमुखानुमत्राविषये। गुरुरा,- स्वस्मिन्सदभिलापित्यादभीष्टज्ञापकत्वतः । स्वयं हितपयोफ्नृत्यादात्मैव गुरुरात्मन ॥ ३४ ॥ यः स शिष्यः सदा अभीक्षणं कल्याणमभिलपति तेन जिज्ञाश्य तदुपायं तं शापयति तत्र चाप्रवर्तमान तं प्रवर्तयति स हिल गुरुः प्रसिद्धः । एवं च सत्या.मनः आत्मैव गुरुः स्यात् । कुत स्याह-स्वयमात्मना स्वस्मिन्मोक्षमुस्वाभिटापिण्यात्मान सत् प्रशस्त माशमुसमभीक्ष्णमभिलपति । मोक्षसं में संपयतामित्याकांक्षतीत्येवं ममात् । तपाभीष्टस्यात्मना जिज्ञा- स्यमानस्य मोक्षसुसोपायस्यात्मविषये सापालादेपे मोक्षमुसोपायो मया सेव्य इति बोधकत्वात् । तथाहि ते मोक्षमुसोपाये स्वयं स्वस्य प्रयोक्त- स्वात् । अस्मिन्मदुर्लभे मोक्षसुसोपाये दुरात्मनात्मन्वयमचापि न प्रवृत्तः इति । तत्रावर्तमानस्यात्मनः प्रवर्तकत्वात् । अथ शिष्यः साक्षेपमाह। एवं नान्योपास्तिः प्रामोतीनि भगवन्नुमनीत्या परस्परगुरुत्वे निश्चित सति पुर.। २ परम दिए । म ४ अनुमरि बाउिदस्य ५आमा श्रीमत्पूज्यपादस्वामिविरचितः - धर्माचार्यादिसेवनं प्राप्नोति मुमुहूं। मुमुक्षणा धर्माचार्यादिः सेव्यो न भवतीति भावः । न चबमेतदिति वाच्यमपसिद्धांतप्रसंगादिति बदत प्रत्याहा-- नाक्षो विज्ञत्यमायाति विज्ञो नासत्यमृच्छति । निमित्तमात्रमन्यस्तु गतेधर्मास्तिकायवत् ॥ ३५ ॥ भद्र ! अज्ञस्तत्वज्ञानोत्पत्ययोग्योऽमन्यादिस्तित्त्वं तस्वशा धर्माचा- यायुपदेशसहस्रेणापि न गच्छति । तथाचोक्त- " स्वाभाविक हिनिष्पनी कियागुणमपेपयते । में व्यापारशतेनापि शुक्रवत्याम्यते पकः ॥" सथा विशस्तवसानपरिणतो अशलं तरानात्परिशमायग्रहो. गापिन गति । तपाचोक्त- "बने पतस्यपि भयतविश्वलोके मुक्काम्यान प्रशमिना न चलति योगात् । बाधवदीपहतमाहमहाकार: सम्पादश. किमुत शेषरीपहेषु ।। नने बानिमिनः प्रामोतीत्यवाह । अन्य पुनर्गविशमा प्रांतासमुत्पादशयोर्निमिनमात्र स्यानय योपापा TT HARसा- कलातायाः को यथेत्या तिरियादि। अयमयी गया युगपमा गितिपरिणामोन्मुसानो भावान या विशक्तिरेर गते: मामाज नियन्ये तम्याः केनादिकमशायरवात । धातायात मागु. पाहाय्यपिस्तम्या: BRTरिकरणमा या मातो व्यवहारादेश गुरः शुश्रूषा प्रतिनध्या । अपात्र शियः । अम्पाय: कपमिति । अभ्यामांगोपाध्यायामः पनी कमि FromसाRT
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- श्रीमत्पूज्यपादस्वामिविरचितः अतो विषयारुचिरेव योगिनः स्वात्मसंवित्तेमिको तदभाव तदभावात प्रकृष्यमाणार्या च विषयारुची स्वात्मसंवित्तिः प्रकृष्यते । तद्यथा-- यथा यथा न रोचंते विषयाः सुलमा अपि । तथा तथा समायाति संचित्ती तत्त्वमुत्तमम् ॥ ३८॥ अत्रापि पूर्वनव्याख्यानं । तया चोक्तम्- "विग्न किमपरेणाकार्यकोलाहलेन स्वयमपि निभत सन्पश्य षण्मासमेक। उदयससि पुस' पदलाद्भिग्नधाम्नो ननु किमनुपलब्धि ति किचोपलब्धिः।" प्रकृष्यमाणायां च स्वात्मसवित्तो यानि चिन्द्रानि म्युस्तान्यार्णयापया-- निशांमयति निशेषर्मिदजालोपर्म जगत् । स्पृहयत्यात्मलाभाय गत्वान्यमानुतप्यते ।। ३९ में योगीत्यतदीपरत्वात्मवत्र याज्य । पारसमवित्तिरमिको ध्याता घर- घर पहिस्तुगातमाश्या गाणीयतया हानोपादान निविषयत्वाविभा. कोपर्शितसर्पहारादिपदार्थसार्थसही पायति । पामलामाप स्पृह यति चिदानंदस्वरुपमामान संवेदयितुमिरजनि तथा अन्यत्र स्वारमयति- रिने यन हावि वानुनि पूसिंहकारादिशात्मनोगकागला साप अनुतप्यते स्वयमेर गाः र मयेदमना मीनमपितमिति पभालाई करोति । तया- इच्छत्येकातायाम निनंग अनितारा বিনাঘাকিথিলা মিপি * * * पनि सभा निर्जन मिनायो मा print Irr. 14ITIATIME: 1 प्रतिपय मा.अम. - सोपोगा। . मभिटपति । किविशिष्टः सन्, जनितादो जनमनोरंजनचमत्कारि मंत्रादि प्रयोगवानिवृत्ती कृतमयत्नः । कामे निर्जन जनाभावाय स्वार्थशा- साभालाभादि प्राय लोपमुसर्यतं निषेधमित्यर्थः । यानादि लोक- चमत्कारिणः प्रत्ययाः स्युः । तया पोक- गुरुपदेशमासार समभ्यम्यननारत । धारणा सौष्टाध्यानत्ययानपि पश्यति ।" तथा सदस्थावान्दरणीयभोजनादिपारतभ्याकिचिदल्लमसमयं श्राद कादिकं प्रति अहो इति अहो दमिति अहो हद दुर्वन्नित्यादि भापित्वा तत्क्षण र विस्माति । भगवन् किमादिश्यत इति श्रावकादी पृच्छति सति न किमप्युत्तरं ददाति । तथा,- दुवमापिहिन ते गच्छपि न गच्छति । स्थिरीकृतात्मतत्त्वस्तु पश्यपि न पश्यति ॥ ४ ॥ स्थिरीकृतात्मतत्वोहदप्रतीतिगोचरीतस्वस्वरूपो योगी संस्कारवशात्प- गेपरोधेन इवन्नपि धर्मादिक भाषमाणोऽपि न केवलं योगेन तिष्ठति भपि- शब्दार्थः । न ते हि न मारत एव । तत्राभिमुग्यामावात् । उकं च-- आत्मज्ञानात्परं कार्य न बुद्धी धारयश्चिरं । कुर्यादमिचिदाकायाभ्यासतत्परः ॥" तथा मोजनार्थ बजनपिन प्रजत्यपि । तथा सिद्धपतिमादिकमवलोक्य- अपि नावलोकयत्येव । सुरेवार्थः । तथा--- किमिदं कीदृशं कस्य करमाक्वेत्यविशेषयन् । स्वदहमपि नायति योगी योगपरायणः॥ ४२ ॥ मध्यात्ममनुभूयमाने तत्वं किं रूपं कीदर्श केन सहश काय "मिदं स्मारकस्य सकासात्यः कस्मिन्नरतीत्यविशेषयन् अविकल्पयन्सन् मागच्यारष्टलद । ३ आत्मायो । ४ पराधीनतमा । " মধুখামাখি -- " योगग: समरसीमTTARो योगी रवि ने पायी का तातिरेहातीनिातनायाः सपा पोले- "ताप परमेर सार। अन्यत्र नामानिरामनि पयः ॥ WIT- भयो में हमारे संभार | RR मानेको पोनिमा प्रहरी पाप II गरछन ।॥४३॥ 4. AIIMamtariuTो HIM On Airty. INifarm In U TA 1ि को 100 योगिनो AAI. गया - . . मामामा मामला wanlaMTITRAM AMRAT HIM In Primaithun Raha Hindi TH IMA"" 111111AIAIR minat . Hinमागारमा मन . . H न . + . . . 1 - टोपदेशः। तथा आत्मा आत्मैव स्यात् । ताप दानिदवि देहादिरूपत्वानुपादान यावं ततस्तम्मामु स्यानिमित्तानो तस्याविषयत्वात् । यतश्रवं एव महात्मानस्तीर्घकगदयम्तस्मिानिमित्तमारमार्य कृतोपमा शिविहितता नशानाभियोगो: सनाताः । अथ परदच्यानुरागो दोष दर्शयति,- अपिता-पुलद्रव्यं योऽभिनंदति तस्य तत् । म जात तो सामीप्यं धतुर्गतिपु मुंधति ॥ ४६॥ प.पुनरविद्वान् हेयोपादेयतत्वानभिशः पुनलदम्यं देहादिकमभिनंदति प्रदत्ते आत्मात्मीयभावेन प्रतिपयते तस्य अंतोनीवस्य तत्युदलदल्य पतमा नारकादिगतिः सामीप्यं प्रत्यासत्तिं संयोगसंबंध जातु कदाचिदपि न त्यति । अथाह शिष्यः-स्वरुपपरस्य कि भवतीति सुगमं । गुरुराह- आत्मानुधाननिष्टस्य व्यवहारवाहिस्थितः । जायते परमानंद: कथिद्योगेन योगिनः॥४७॥ आत्मनोऽनुशान देहादेव्यावर्त्य स्वात्मन्येवावस्थापनं तत्परस्य व्यवहारा- प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणादहि:स्थितः बाह्यस्य योगिनो ध्यातुगिन स्वात्मध्या- नेन हेतुना कधि वाचागोचाः परमोऽनन्यसमधी आनंद उत्पयते । सत्कार्यमुच्यते-- आनंदो निर्ददन्युद्धं कमधनमनारतं । न चासो सियते योगी यहि ववचंतनः । ४८॥ स पुनरानंद उद्धं प्रमूतं धर्मसंतति निर्दहति । पहिरिधने यथा। किंध असावानंदाविष्टो योगी पहिसेषु परीयहोपसर्गहरो अचेतनोसंवेदनः स्यातत एव न सियने न संक्श याति । यामादेवं तस्मात्- अविद्याभिदुरं ज्योतिः परं ज्ञानमयं महत् । स्पष्टव्यंतदष्टयं तद्रष्टव्यं मुमुक्षुभिः॥४९॥ मान्मन' । आपरा भांदनंदिमणीतः मायालेसितान दीनाम् भोजनादिभिरावराद । अनुरानन्यति. संधपूजनीयो भवेत्सा॥४१॥ परं स्वहस्तेन कृतः पाको नान्यत्र शाम । मन्दिरे भोजने यस्मात्सर्यमायपसेगमः ॥ ४२ पिच्छेन भुतुमा लिम्य यपुर्धर्मादिशेन्मुनिः। छायो तर धर्म च भूमिभपि गान्बाहम् ॥४३॥ पुनरो पनी म भनासपशोषण । मायकमायाम्मन पर्गमान गमगिरे॥४४॥ न विमानन कर्म यिस्य पतसंगणे । मानं पायदान माराम गंमत ॥ ४५ ॥ यया योगने पीपमापकतामन । in काम TISHALIMyan तापताना मन नाARAM शामभारि मध्याTTINA I" हमेशात पगमार्ग प्रान। पारियोपान पाना मिपासपE४८॥ जानिpt fit gri मम । Trयापन म्यगुस् UP traममला किम । finमान RT . ... - - " . "
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मीतिसारः। ६५ पच्छा रचितं नूनं तदेयादेयमन्यकैः। विसंध्यै रचितं नैव प्रमाण माध्यपि स्फुटम् ॥७१ ॥ पूर्याचार्यपधः श्रीमत्मयंशवचनोपमम् । जानसनगारोऽत्र पूज्यः स्यादस्सिीजनः । ७२ ॥ विसंध्यः सममध्यात्ममायश्चित्तविधिक्रियाः । सिद्धान्ताचारमावाथ नालोच्या यतिना सदा ॥७३॥ द्रयलिंग समास्थाय भावलिंगी भवेद्यतिः। विना तेन म पूज्यः स्यामानाव्रतधरोऽपि सन् ॥ ७४ ॥ अचेलत्यं शिर फूर्चलोचोऽधः केराधारणम् । निराभरणताउछिनंदहता पिधारणम् ॥ ७५॥ यलिगमदो यं भावलिंगस्य कारणम् । सदध्यात्मकृतं स्पष्टं न नेत्रविषयं यतः ॥ ६ ॥ मुद्रा सर्वत्र मान्या स्याग्निदो नैव मन्यते । राजमुद्राधरात्यंतहीनवच्छाखनिर्णयः ॥ ७७॥ स्थावरं देहभेदेन ब्रमदेन लिंगिनम् । उभयोभिन्नलिंगत्वासार्चयेषाभिवन्दयेत् ॥ ७८॥ येन येन हि कृत्येन धर्मवृद्धिः प्रजायते । सत्तत्पुर्वन्मुनिर्मान्यो भवेशन न संशयः ॥ ७९ ॥ आगते स्थागतं कुर्यानचन्तं न निवारयेद । तिष्ठन्तं कारयेद्भिक्षामेप धर्मः सनातनः ॥ ८ ॥ पिच्छपुस्तकपट्टादन याचयित्वा परस्परम् । ग्रहणं न पिना याशामेप धर्मः सनातनः ॥ ८॥ १ "प्रतमगेनेति" "क" पुस्तके पाठ.। २ मामयेदिति "क" पुस्तके पाठ ।
श्रीइंद्रनंदिप्रणीतः AAAHAmrummon .AAM AN गुरुन्धिलोक्य सहसा समुत्यानं तथा नतिः अनुकूलप्रवृत्तिश सर्वधर्मशिरोमणिः ॥ ८२॥ गुरुणा दीयमानानि वस्तूनि वहुमावतः। पाणिद्वयेन संगृह्य पुनरप्यभिवन्दयेत् ॥ ८३॥ दीक्षादाताऽध्यापयिता कृताचार्यादियाचनः । दोपच्छेदी कृतांतार्थो गुरुरित्यभिधीयते ॥ ८४॥ यो यो गुणाधिको मूलगणगच्छाद्यलंकृतः। म सर्वोप्युच्यते जैनैर्गुरुरित्युज्सितस्मयैः । ८५ ॥ कंचित्कालानुसारेण सूरिदव्यमुपाहरेत् । संघपुस्तकवृद्धयर्थमयाचितमथालाकम् ।। ८६ ॥ पावस्थवृत्तितां नैवालंबेताऽऽलंबनोज्झितः । न दैन्यं दर्शयलोके प्राणत्यागेऽपि धात्मनः ॥ ८ ॥ क्षुत्कार्य मलिनाद्गत्व यतेभूषणमंजसा । न तेन लज्जने योगी पवित्रतरमानसः ॥८८॥ मनः शुद्ध भयेयस्य सः शुद्ध इति भाप्यते । यिना सेन कृतस्नानोऽप्यंगी नैव विशुद्धति ॥ ८॥ कार्याकार्यविचारमाः सर्वभापाविशारदः। सर्वशास्त्रार्थयित्सापुर्धर्मस्य प्रतिपारकः ॥९॥ सगुणो निर्गुणा याऽपि धायको मान्यते सदा। नाध्यक्षा कियते सस्य तन्मूला धर्मपत्तना ॥ ९५ ॥ विसंघमका मतपण घेदानं यच्छन्ति योगिने । माण्डमाजनमुदिधन निषधोऽस्ति कधन ॥ ९२॥ समुत्थाय नमानि "नि म" पुन: । नपत नगन्यामयिनः। अर. स" पुम्सी नालि । ५पानाही पठानम्। . १ नीतिसारस। ६७ am- मामालन शुद्धोऽपि पाटी यो विनिन्दकः। यतेस्तत्र न भोक्तव्यं तदनं पापमुच्यते ॥१३॥ नयोपित स्रोद्योगी फाचित्रकृता अपि । कि पुनः स्पर्शन तासां यासा स्मरणमापदे ॥ ९४ ॥ पंचचेसविनिर्मुक्ता प्रेन्यमुक्ता मताः सताम् । न ते सुवर्णरूप्यादि स्पृशन्ति गुरुसंयमाः ॥ ९५॥ मुखशुद्धिं न कुन्ति नापविश्य च भोजनम् । संधन सह कुर्यन्ति नापंक्षन्ते च किंचन ॥ ९६ ।। घिनस्थामपि संस्पृश्य यांपितं नव भुंजते । सस्मिनहनि भुकं घेत पष्ठे स्यात्पापनाशनम् ॥ ९७ ॥ पासंदा यत्र संजाता जिहोपस्थादिदंडिताः। 'ते सर्व पापिनस्तस्मादनचर्य धरेवतिः ॥ ९८॥ संधापकारिणं मूद संघबाह्यं प्रकल्पयेत् । अहिल्यांगुलियोस. सर्वनाशाय जायते ॥९९ ॥ सम्यग्दर्शनशुद्धानां तपसापेन जायते । कर्मक्षयस्तता नूनं तदेव प्रतिपालयेत् ।। १०. । सम्यक्त्यमूलं सर्व स्याज्ञानचारित्रमेव था । विना तेनाऽपर नैव कुर्यातां मोक्षसाधनम् ॥११॥ प्रतिक्रमादिवेलायां यदि प्राप्येत तत्वतः । चतुर्दस्यष्टमी था ये सदा सैव प्रशस्यते ॥ १०२ ॥ "पुम्न के भौमुत्ता इनि पाट. २"क" पुस्तके गहनानि पाठः पुस्तकयोः " पर " इति पाटः परन्ला "पंट सुज्यने ।"ते गर्वेऽप्यन नस्मात् " इति "क" पुस्तके पाट. । ५"ख" तुम्नके " "नि म्धाने पुम इति पाट -अत्र " वा " पदो स्वार्थे । " १ । " " 1 पाप भी मिनीत यद्यदुतरं तत्तत्सर्यप बलयपथा। या धतुर्दशीमुग्यतिथीनामपि सद्रमः ॥ १३ ॥ अधिका शिविरारिता धर्मकार्येषु सत्तमा । आरिमध्यान्तमेोन शक्तिरामापि हीयते ॥१०४॥ जिनजन्मारिकाः सर्याः किया मासतिथिप्रमाः। माप्रयोगकरण म प्रधान यतालम ॥१.५॥ घटीपतपये राः कुर्यारपूर्यादयननाम् । मध्याममापि नियमो नाडीश्यमुहासा ॥१०॥ अपरानाडीना तुमयसमादितः । नामानान्पासामायिकपरिमहा ॥१.७॥ যা দিয়া কিন্তু বয় সিখী র সয় না। अनाग तीन मिनाहीय मत ॥१.८॥ गितास वारयमान भ्यापति यस्य गजमा । frji न पापिमापने मन ..॥ मानोकापतो माडीयापायगापा । नि पान यह निया ॥११॥ নাসা না নিশানালাগা या EिARTiमागमनागत १५ भीमभावान बनाना हमामा पानिमाला - - 1 . " 4माना नीतिसार। स्रग्धरावृत्तम् माचन्मयर्थियादिद्विरदपदुघटाटोपकोपापनोदा पाणी यस्याऽभिरामा मृगपतिपदयीं गाते देयमान्या। सः श्रीमानिन्दनन्दी जगति विजयतां भूरि मायानुभावी देवश कुन्दकुन्दमभुपदाधिनयः स्यागमाचारचंयुः ॥११॥ इति श्रीमहारक इन्द्रनन्दिमानः श्रीनीतिमा समाति पाण। इति मातिमारः।
मोक्ष-पंचाशिका ।
मोक्ष-पंचाशिका।
ज्ञानदर्शनचारित्रतपसां संहतिश्च या।
सम्यकपदोपसंहमा मोक्षमार्गः प्रकीर्तितः ॥१॥
गुणपर्ययतादात्म्यविशिष्टस्यैव धर्मिणः ।
वैशिष्ट्ययुक्तं ग्रहणं ज्ञानं साकारमुच्यते ॥२॥
मुख्यत्वे धर्ममात्रस्य गौणत्वे धर्मिणस्तथा।
अनाकारं दर्शनं तत्कीतितं मुनिपुङ्गवः ॥ ३ ॥
संशयश्च विपर्यासोऽनध्यासश्च भवेगिधा ।
दोषस्तेन विनिर्मुक्तं ज्ञानं सम्यक्प्रचक्षते ॥४॥
अनवस्थितकोटीनामेकन परिकल्पनाम् ।
शुक्ति पा रजतं किं वेत्येवं सशीतिलक्षणम् ॥ ५॥
विरुद्धकोदिसंस्पर्शा व्यवसायो विपर्ययः।
शुक्ती रजतबुद्धिः सा विपर्यासो भ्रमोऽपि च ॥६॥
विशिष्टस्य विशेषाणामस्य च स्वेन घेदनम् ।
गच्छतस्तृणसंस्पर्श इवानध्यास इप्यते ॥७॥
गुणपर्ययतादात्म्यविशिष्टं द्रव्यमुच्यते।
उपत्तिव्ययनेयत्वं पर्यायास्तस्य शाश्वताः॥८॥
भूतं चापि भविष्यं च भवतीति विनिश्चितम् ।
यदतीतं विनष्टं तवागाभ्युत्पादलक्षणम् ॥९॥
वर्तमानं भुयं प्रोक्तमेवं द्रव्येषु पर्ययाः ।
उत्पते विलीयते तरंगा इय पाथसि ॥१०॥
उत्पाइप्ययनेयत्य मैतत्कालस्य कल्पना ।
यतस यन्नारूपोवस्यान्तामिवंधनम् ॥ ११ ॥
पूर्वक्षणानुसार भिगाया करोतिमः।
तेनारूपिणदेपु म हस्य गतिरिष्यति ॥ १२॥
मोक्ष-पंचाशिका। NA स्वयं सिद्ध मतं दयं गुणास्तत्मत्यतिनः । तनाव्यावर्तकाः कंचित्कंधिगवृत्तिहेतये ॥१३॥ अतिव्याप्तिस्तथाज्यातिरसंभय इति त्रिधा। दोपस्तेन विनिमुक्ती गुणो ध्यावर्तकः स्मृतः ॥ १४ ॥ अलक्ष्ये पर्तनां प्रारतिव्याति घुधा यथा । गुण आत्मन्परूपित्यमाकाशादिपु हश्यते ॥ १५॥ लयकदेशयतित्वमच्यातिः कीर्तिता युधे । यथा जीयस्य दहत्वममिद्धं परमात्मनि ॥ १६ ॥ लक्ष्ये त्यनुपपनत्वमसंभय इतीरितः । यथा यादियुक्तात्यमसिद्ध मर्वयात्मनि ॥ १७ ॥ एतदोपत्रयातीतं हि व्यावृत्त्य कलक्षणम् । मदुपयोगी जीवरय मूर्तत्वं पुनलस्य था ॥१८॥ कमवृत्तास्तु पर्याया अवस्थाभेद एव ते। केचिद्रव्याश्रयाः केचिद्गुणनिष्ठा इति द्विधा ॥ १९ ॥ नरामराइयो जन्ता स्कंधदेशादयो पर। उभयोनियांधा द्विधैव पर्यया मता: ॥२०॥ शुद्धामुद्धा इमे प्रोता: मिद्धाः संसारिणरतथा। केयलं याथ मत्यादि कीर्तितं मुनिपुंगये ॥२१॥ स्थान्यभेदाद द्विधा या निजाधरणकर्मणां । क्षयोपशमसंभूता क्षयाद्वा पुतिरात्मनः ॥ २२ ॥ फेवलिमाया तस्या जवन्याशास्तु पर्ययः । तदानंत्येन निष्पना सा तिर्निजपर्य्ययाः॥२३॥ पदस्थानपतितावाद्याः केवलं तक्षयोद्भवम् । तेन तत्पययास्तुल्याः सदावस्थितरूपिणः॥ २४ ॥ क्षयांपामचिन्यं शेयवेचिश्यमेय था। जीयस्य परपर्यायाः पदस्थानपतिता अमी ॥ २५ ।
माशिका यम्या गुमाय जघन्यायपि कल्पिते । ए गार जल पर्यया ॥ २६ ॥ गर। न TT पागम -यम्धता । यामा नराम्नम्यायामनात ॥ २७ ॥ ग: F अन्य म्यादा गवतुलम । र पयगा राम ।। २८॥ ITI 1 नागपभया । मासयन ॥२९॥ T T . JTE * - . 7 । - , . + 1 ३. 11. 101 11 1 मनन्तम । , F . +नना । भन + + . - . । । . . . . Jnी . - + 4 + 4. - 4" 7 माश-पाता। पर परामदारमनायानि एषपेत् । तणाधारण धर्मरम्यान प्रीतिः ॥ १९ ॥ मयंपामय भापामा मारमाय माय एय दिन पिना पवादमा पदापरपापिनियात् .. रपयायो पयाभाग्य पर्थ यामांगपिना । एर पनि पर्याण गुपा तनमन्तरा साय प्पामाहीतिविपर्यासपियनिता। मेय प्रतीति भलारा कासिता दु.॥ ४२ ॥ ९ भसापती मन्तो भकार पन्नीक्षणे । आम्मानुभयविस्फर्तादानन्दो पनि मतम ॥ ४३. तामयरताप्यामधारित निसपास्मयाम् । कामपिनयना निमाही ध्यपहारत' ४४॥ निरालय मारय रवयमापतिष्ठ पदात्मनेय मंच धारिणं निथयारमफम ४५ गानां सामक्षसांस्पातिरंकभाश। नभयं महा पापारिक निधामकम् ॥ ४६॥ आमनी नियिंकारस्य कृतवायरपाय या। उत्साहो पायमिति तत्कालिन मुनिपुंगः ॥ १७ ॥ सम्मायामगुदेकादिष्याधिस्तपी पिः। पायाकायभूतमान्सरं मानगं स्मृत ॥१८॥ पनपतष्पर्य मार्गः समुदाये थिनिधितः। समाराध्य गतारसूर्ण निति मुनिसत्तमाः । ४९ ॥ मायग्यिचिन्तयवस्तु मोक्षपंचाशिकामिमाम् । अभ्यस्यमात्मनों रूपं विकारम्या निवर्तते ॥५०॥ सिमाक्ष पंपाशिका श्रुतावतारः। H - . श्रुतावतारः। . सर्वनाकीन्द्रवन्दितकल्यापपरंपरं देवं । प्रणिपत्य वर्धमानं श्रुतस्य यस्येऽहमवतारम् ॥ १॥ यमप्यनाधनिधनं श्रुतं तथाप्यत्र सनिभेन मया। कालाश्रयेण तस्योत्पत्तिविनाशी प्रवक्ष्यते ॥२॥ भरतेऽस्मियतपिण्युत्सपिण्यायो भयत्तेते । काली सहाऽपि जीवात्सेधायुसवृद्धिकरी॥३॥ पकैकस्य पूयादशकोटीकोटमा प्रमाणमुदिष्टम् । पायुपमानायती समाश्रितो मयति कल्म इति ॥४॥ तयायसपिणीय प्रवर्तमाना भवेत्समास्याथ। कालविभागा मोक्ताः पदेय कालमभेदसः ॥ ५॥ सुषमसुषमायाचा सुषमाया ममत्यपरा। समगुणमान्या दुष्पमाऽतिपूर्या परास्यै ॥६॥ तर ममायतस्तिनी सागरोपमायामाम। কান্ধায়শিগামায়ালা মবি থামাগাধ ও कोटकाटीयागदरतामाभिरना। त्रिगुणरामाधीनो परिमाण मर्यात यांप.n८॥ एकोनविंशग्या वर्णमहमिना गमापारया। गानीय कलिना मायः ममा प॥॥ पना पदनभ्यारिन मोजानानि पर। हम्माः मतानः पदादिमाग:-१.n पल्यानि प्राविकास च। गि विनिगानोमनामा " श्रुतायतारा तापपर्यायनीत समये सम्पूर्ण यास्मृतीयायाः। पस्योपमाटमासन्यूनापा पुलधरा ये स्युः ॥ १२ ॥ तपामाधी माम्ना प्रतिभूतिः मन्मतितिायः स्यात् । क्षमतृतीय क्षेमन्धरमसितस्तुर्यः ॥ १३॥ मामातथान्य सीमन्धरमादयो विमलयाः। मधुमास यसरयानभिचन्द्रधन्दामनामा ध ॥ १४ ॥ मरणयनामधयः प्रगमित्राभिराजनामान्य । हामाधिकाराननुशाति निजतंजमः स्खलितान ॥१५॥ (राकार पवती हमाकारं च पर पचान्ये । रामाधिकागकथयन्ति तनावण्टन भरतः ॥ १६ ॥ रपितारालोकभ्यायो वृणामपनयन्ति भयमाझ्याः । दीपविमोवनमर्यादतियाहादिरोहमतः ॥ १७ ।। कथयन्ति त प्रत्यार सुनेक्षणागीतिमपहरत्यन्य। मामकृति पासपरममि शिकलिं प्रकुरतेऽन्यः ॥१८॥ आयति सुनः महान्यो जलतरणं गर्भमलविशुद्धिं । नासनिकर्तनमपिच प्रयोऽपि परे ध्यपदिशान्ति मृणाम् १९ अथ नाभिराजपतेमगदेव्यां ध्यजनि नन्दनो कृपभः । तीर्थकृतामापीनी प्रयत्यं भरते भृशं तीर्थम् ॥ २ ॥ निर्याणमवाप सतः पचामलक्षकोटिमितवादिः। यावदपिच्चिस्मतया समागतं तत् श्रुतं सकलम् ॥२१॥ जातस्तताजितजिनः शिष्येभ्यः सोऽपि सम्यगुपदिश्य । तत् श्रुतमखिलं मापपिर्याणमनुत्तरं तद्वत् ॥ २२ ॥ पवमजितादिचन्द्रप्रमान्ततीर्थशिनामातकान्ता। सागरकोटीनां त्रिंशक्रमाददाभिरथ नयमिः॥२३॥ ।
श्रुतावतार। तेऽपि ततस्तष्टितमीहशमावेदयन् स्वकीयगुरोः । सोऽपि ततः द्विजमुख्यस्तमपूर्व छात्रमित्यवदत् ॥ १८ ॥ शास्त्राणि करतलामलकायन्तेऽस्माकमिह समस्तानि । अपर पि वादिनोऽस्माजायन्त नष्टदुष्टमदाः ॥ ४९ ॥ सत्केन हेतुना तयारयान नैव रोचते तुभ्यम् । कथयति सतस्तस्मै प्रतिवचनमुवाच सोऽपीत्यम् ॥ ५॥ यदि सर्यशास्त्रतत्त्वं जानन्ति भवन्त पय तहमुध्याः । आर्यायाः कथयन्त्यमिति पठति तत्काव्यम् ॥ ५१ ।। पदय्यनयपदार्थनिकालपान्तिकायपदफायान । पिनुपी परः स एव हि यो जानाति प्रमाणनयः ॥ ५२५ भुन्या सेनेत्युदितामभूतपूयांमतीय विषमार्थाम। आर्यामिमा गतास्याः मोऽर्थमजानमिति तमधे ॥ ५३॥ कस्य छायातायाय कन्या माऽपि भाई।। श्रीवर्धमानमारकम्य जगतीगुरोपमात्रः ॥ ५४॥ गद्धार्थनननम्य छायस्त्वं पेन्महन्यगालयितः । यागर्म मनस्य प्रतियतो वियन्मार्ग ॥ ५५ ॥ निय थियाई माध मकाम किया कायम । सभी जयापयाममेय विद्वत्सु लघुना म्यात् ॥ ५६॥ हिमाय भिधाय पुराभाय गौतम राम । সমাৰি শামাযাহম্বিনিন্ম। हमा मानम्माम वितिमानोयो विमम्मामान। मातम्या मह मितिमांकय परीय मारया Men সবা মুলা শ্বাঃলামেশায় । पाधिमममममा ममि:५॥
अथ भगवान किंजीयोस्ति नास्ति या किंगुणः कियान्कीदृक इत्यादिपदयुतप्रमित सद्गणेटमनपर्यन्ते ॥ ६ ॥ जीयोऽस्त्यनादिनिधनः शुभाशुभविभेदकर्मणां कर्ता । सदसत्कर्मफलानो भोक्ता स्वोपात्ततनुमारः। ६१ ॥ उपसंहरणधिर्मपणधर्मशानादिभिर्गुणयुनः । धोव्योत्पत्तिव्ययलक्षणः स्वसंबदनयाह्यः ।। ६२ । नोकर्मकर्मपुद्गलमनादिरूपात्तकर्ममम्बन्धात् । गृहन मुश्चन् भ्राम्यन् भवे भवे तत्क्षयान्मुकः ॥६॥ इत्याचनकदस्तथा म जीवादियस्तुसद्भावम् । विध्यध्यनिना स्फुटमिन्द्रभूतये सन्मतिरबांधत् ॥६४ ॥ भायणपालप्रतिपातिक रोदनामनि मुरतं । अभिजिगते शशांके तीर्थात्पत्तिर्वभूय गुरोः॥६५॥ तेनेन्द्रभूतिगणिना सदिव्ययचोऽयबुध्य तत्त्वेन । अन्योद्भपूर्वनाम्ना प्रतिरपितों युगपदपरादे ।। ६६ ॥ प्रतिपादितं सतस्तत् श्रुतं समस्तं महात्मना तेन । मधितात्मीयसधर्मणे सुधर्माभिधानाय ॥ १७ ॥ सोऽपि प्रतिपादितयान जम्यूनाम्ने सधर्मणे स्वस्य । तभ्यस्ततो गणिभ्योन्यपि तदर्धातं मुनिवृपः ॥ ६८ ॥ सन्मतिमिनरलतोऽमावासमायमुनिभव्यसस्यानाम् । परमाननं जनयन धर्मामतष्ठिसकन ॥ ६९ ॥ तिमिह वर्षाणां विदत्य पहुगनपान जगत्पृश्यः । सरसिजयनपरिकलित पायापुरपहिरुघाने ॥७॥ यत्सरपतयेत्रिमासहीने चतुर्धकालस्य । शंप कार्तिककृष्णपस्या नितिमाए .
८०
श्रुतावतारा
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भगवत्परिनिर्वाणक्षण एवायाप केवलं गणमव ।
गौतमनामा सोऽपि द्वादशमित्सरमुक्तः ॥७२॥
निर्याणक्षण एवासायापत्केवलं सुधर्ममुनिः।
द्वादशवाणि विद्धत्य सोऽपि मुक्ति परामाप ॥७३॥
जम्बूनामाऽपि ततस्तनिवृतिसमय एवं कैवल्यम्।
प्राप्पाटत्रिंशतामिह समा विहत्याप निर्वाणम् ॥ ७४॥
एते त्रयोऽपि मुनयोनुबद्धकेवलविमूतयोऽमीयाम् ।
केवलदिवाकरोऽस्मिनस्तमवाप व्यतिक्रान्ते ॥५॥
जम्यूनामा मुक्ति प्राप यदासी तथैव विष्णुमुनिः ।
पूर्वाङ्गभेदभिन्नाशेषश्रुतपारगो जातः ॥ ७६ ॥
एवमनुबद्धसकलश्रुतसागरपारगामिनोवासन् ।
नन्यपराजितगोवर्धनाद्वया भद्रबाहुश्च ॥७७ ॥
एषां पञ्चानामपि काले वर्षशतसम्मितेऽतीते।
दशपूर्वविदोऽभूस्तत एकादश महात्मानः ॥ ७८ ॥
तेपामाद्यो नाम्ना विशाखदत्तस्ततः कमेणासन् ।
प्रोग्लिनामा क्षत्रियसंज्ञो जयनागसेनसिद्धार्थाः ।। ७९॥
धृतिपेणविजयसेनौ च बुद्धिमान्गङ्गधर्मनामानी।
एतेषां वर्षशतं त्र्यशीतियुतमजनि युगसंख्या ॥८॥
नक्षत्री जयपालः पाण्डुर्दुमसेनकंसनामानौ।
एते पचापि ततो प्रभूखुरेकादशाङ्गधराः ॥ ८ ॥
विशत्यधिक वर्षशतद्वयमेषां बभूव युगसंख्या।
आचारानघराश्चत्वारस्तत उदभवन् कमशः।। ८२॥
प्रथमस्तेषु समद्रोऽभयभद्रोन्यापरोऽपि जयबाहुः ।
लोहार्योन्यतेप्टारशवर्षयुगसंख्या ॥ ८३ ॥
श्रुतावतार। ८१ विनयधरः श्रीदत्तः शिवदत्तोऽन्योऽदसनामते । आरातीया यतयस्ततोऽभवतद्नपूर्वदेशधराः ॥ ८४॥ मागपूर्वदेशकदेशवित्पूर्वदेसमध्यगते । श्रीपुण्ड्रपर्धनपुरे मुनिरजनि ततोऽदिल्यास्यः ॥ ८५ ॥ स च सत्यसारणाधारणाविशुद्धातिसकियोधुक्तः । अष्टांगनिमित्तशः संधानुमहानिमहसमर्थः ।। ८६ ॥ आस्त संवत्सरपञ्चकावसाने युगमतिकमणम् । कुर्वन्योजनातमात्रवर्तिमुनिजनसमाजस्य ॥ ८ ॥ अथ सोन्या युगान्ते कुर्वन भगवान्युगप्रतिकमणम् । मुनिजनवृन्दमपृच्छकि सर्वेऽप्यागता यतयः ॥ ८८ ॥ सेऽप्यूघुमंगवन्ययमात्मात्मीयन सकलसंघेन । सममागतास्ततस्तद्वचः समाकर्ण्य सोऽपि गणी ॥ ८९ ॥ काले फलायमुम्मिलितः प्रभूत्यत्र जैनधर्मोऽयम् । गणपक्षपातभेदैः स्थास्यति नोदासभायेन ॥ ९॥ इति सथिन्त्य गुहायाः समागता ये यतीश्वरास्तेषु । कॉघिभिधानान काँधिदीरालयानकरोत् ॥ ९१ प्रथिताशोकपाटात्समागता ये मुनीश्वरास्तेषु । काँधिदपराजिता'स्यान्काँधिदिया हयानकरोद ॥ ९२ ॥ पशस्तूप्यनिवासानुपागता येनगारिणस्तेषु । काँधिसेना'भिख्यान्कौधिमाभिधानकरीत् ॥ १३॥ ये शाल्मलीमहाममूलापतयोऽभ्युपागतास्ते। कॉथित 'गुणधर'संज्ञान्कॉथि गुप्ता'दयानकरोत् ॥९४॥ ये खण्टकेसराममूलान्मुनयः समागतास्तेषु । काँधिसिहाभिस्यान्कौशिपन्दाहयानकरोत् ॥ ९५.
श्रुतायमारः +1 उक्तं च- 'भायाती नन्दिरी प्रकीरिगुहायासतानाकयादा. देवाशान्योरादिजित इति यतिका मनमवादी पचम्प्याग्मगुती गुणधरपमा माल्मीमामूला ম্বিয়ানাভি থিনায়াশায় अन्ये जगुगुहाया यिनिगंता 'नन्दिनी मदारमानः। 'देवा'शाशोकयनान्यद्यानुप्यागत मन'. विपुलतरमात्मीदममाटगतावापयामिनी नीरा 'भदाय मटकमातरमनियागिना जाता.१४ गुदायां यामिती स्टी हिनायकवादिकान। नियांना 'नन्दिदामिधानायायायनुकमा... पाण्यामन गिनानां धीरान ममः । मारकमानामा न ' ममयमामा..." एवं हमाष्टमुनिजनमा । दिनमा मुन्दा लागायrat हावादामनमापायी मारननिनामा मायाRARE erated कहा nिiriririte बारादितानी मरम.in" rington.. rrerxxe.४. frrafarmfarert:Home gawaranfirmeriestra वतायतार शिन्दशनामानि येणाकतीपुरे महामहिमा । ममुदितगुर्नान प्रति प्रधारिणा प्रापयरुखम् ॥ १०६॥ आदाय हसपतिप्यथ तदधारिणी हरणात् । अविमुध्य पन्धन याचयाम्पभपुस्तदा महात्मान. १०७॥ रयस्ति भीमत इत्पूजयन्तगटनिकटचन्द्रगुहा. पासादरमेनगी घेणाकतटसमुदिनयतीन् ॥ १०८॥ अभियन्ध कार्यमयं निगदत्यस्माकमायुरपशिष्टम् । म्यल्पं तस्मादस्मातस्य शास्त्रस्य प्युष्ठिति ॥१०९॥ न क्यापथा तथा नौ यतीश्वरी प्रहणधारणसमयीं। निशितपती यूर्य प्रस्थापयति खार्थम् ॥ ११०॥ सम्यगवधार्य सैरपि तथाविधी दोगुनी समन्विष्य । पहिली तायपि गत्या चापतुररमूनयन्तगिरिम् ॥ १११॥ आगमनदिने च तयोः पुरय धरमेनरिरपि रात्री। निगपादयो पतन्ती धवलवृपावक्षत स्थमे ॥ ११२ ॥ सत्यमेक्षणमात्राजयतु दियतति ममुपलपन् । उदतिपदत. मातः समागतायत मुनी दी ॥ ११३॥ मापर्णिकाचितविधि तयाबिंधायादरात्ततस्ताभ्याम् । विभ्राम्य श्रीन्दिवसान नियदितागमनहतुभ्याम् ॥ ११४॥ मुपरीक्षा नियतिकरीति सन्चिन्त्य दत्तवान् सूरि। साधयितुं पिच हीनाधिकवर्णसंयुक्त ।। ११५६ श्रीमसेमिजिनंवरसिद्धिशिलायां विधानता विद्या- मंमाधनं विदधतास्तयांय पुरतः स्थिते दया ॥११६ ॥ हीनाक्षरविद्यासाधकस्य देयकलोचमापेऽस्थात् । अधिकाक्षरविद्यासाधकस्य सा इन्तुरा तस्थी ११७॥
धनायनार: हदा साविति देव्यो न देवनानो यमाय एप इति । प्रविनिय ततो विद्यामंत्रश्याकरणविधिनय ॥ ११०० मस्तार्य न्यूनाधिकवर्णक्षेपापचयविधानेन । पुनरपि पुरतश तयोदव्या से दिव्यरूपेण ॥ ११९, केयूरहारनुपुरकटकटीसुबमासुरारी। अमे स्थित्या यवतो कि करणीयं प्रयदतेति १२०० तायप्यूचनुरेतनास्माकं कार्यमस्ति किमपि । ऐहिकपारधिकयोर्भवतीम्या मिध्यति यत्र परम् ॥ १२१ । किन्तु गुरुनियोगादावाम्यां विहितमेतदिति वचनम् । श्रुत्या तयार भी ते जग्मतुः स्थास्पद देन्यो । १२२॥ विद्यासाधनमेवं विधाय तोपानतो गुरोः पाश्चम । गत्या ती निजवृत्तान्तमयदतों तद्यथावृत्तम् ॥ १२३ ॥ सोऽप्यतियोग्याविति सचिन्त्य ततः सुपास्ततिथिवेला- नक्षत्रपु तयोारख्यातुं प्रारब्धवान् ग्रन्यम् ॥ १२४ ॥ ताभ्यामप्यध्ययनं कुर्वाणाभ्यामपास्ततन्द्राभ्याम् । परममविलयभ्यां गुरुविनयं ज्ञानविनयं च ॥ १२५ ॥ दिवसेषु कियत्स्वाप गतष्ययापाढमासि सितपक्षे। एकादश्यां च तिथौ मन्यसमाप्तिः कृता विधिना ॥१२६॥ तदिन एवैकस्य द्विजपंक्ति विपमितामपास्य सुरैः। कृत्या कुन्दापमितां नाम कृतं पुष्पदन्त इति ॥ १२७॥ अपरोऽपि तुर्यनादैर्जयघोपर्गन्धमाल्यधूपायैः। भूतपतिरेय इत्यादूतो भूतमहं कृत्वा ।। १२८ ॥ स्वासनमति ज्ञात्वा मा भुत्संक्लेसमेतयोरस्मिन् । इति गुरुणा सश्चिन्त्य द्वितीयदिवसे ततस्तेन ॥ १२९ ।। .
शुतायतार
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योग प्रव
पियदितपयनरगुप्य तायुमादेय पुरावर प्रक्षिती ।
मायापे मयभिनियमगत्या तत्पसममयाप्य ॥ १३० ।
तापट मारयसितपक्षपाम्याम् ।
पांकालं या बिहरन्ती दक्षिणाभिमु ॥ ११ ॥
जामवएप करहाटे तयोः यः पुप्पान्तनाममुनिः।
जिमपालिताभिधानं मामी भागिनेयं स्यम् ॥ १२
दत्या दीक्षा तरम तन समझामन्य बनयासम् ।
तस्था भूतपलिरपि मधुरायां दयिशेऽरथात् ॥ १३ ॥
अथ पुष्पान्तमुमिरप्यध्यापयितुं स्वभागिमयं तम् ।
कर्ममारुतिशाभूतमुपमहायव पदभिरिह तण्दैः ॥ १३४ ॥
पांन गुणीयादिकविंशतिविधस्मसाधरूपणया ।
पुता जीयस्थानाधिकार प्यरपयत्सम्यका १३५॥
समाणितानि साममध्याप्य ततो भतलिगुरी पाश्वम् ।
ताभिमायं ज्ञातुं प्रस्थापयदगमंदपोपि ॥ १६ ॥
संन तत परिपाटितां भूतलि' सत्यम्पर्णा भुत्या ।
पटवण्डागमरचनाभिमाय पुष्पदन्तगुरोः ॥ १७ ॥
विज्ञायाल्पायुप्यानल्पमन्मिानवान् प्रतीत्य ततः ।
दध्यमरूपणापधिकारः पदण्टपथकस्यान्या ॥१३८ ।
सूत्राणि पटमहस्रपन्थान्यथ पूर्यसूयसाहितानि ।
अविरध्य महापन्धादयं ततः पकं वण्डम् ॥१३९॥
शिसहस्रधमन्यं ध्यरचयदसी महामा।
सो पचानामपि वण्डानां शणुत नामानि ॥ १४ ॥
आपंजीयस्थानं भुलकबन्धादयं द्वितीयमतः।
बन्धस्वामित्व भायर्यदनाधणाग्मण्डे ॥ १४१ ॥
श्रुतायतार - एवं पदसण्डागमरचना प्रविधाय भूतरल्यार्यः। आरोग्यासमावस्थापनया पुस्तकेषु ततः ॥ १४२॥ ज्यमसितपक्षपञ्चम्यां चातुर्वर्ण्यसंघसमयतः। सत्पुस्तकोपकरणयधात् कियापूर्वक पूनाम् ॥ १४३ ॥ श्रुतपथमीति सेन प्रत्याति तिथिरिय परामाप । अद्यापि येन तस्यां श्रुतपूजो कुर्यते जैनाः ॥ १४४॥ जिनपालितं ततस्तं भूतलिः पुष्पदन्त गुरुवार्धम् । पटसण्डान्यप्यध्यगमयत्तत्पुस्तकसमेतम् ॥ १४५ ॥ अथ पुष्पदन्तगुगरपि जिगपालिसहस्तमंस्थितमुदीश्य । पदण्डागमपुस्तकमही मया चिंतितं कायम ॥१५॥ सम्पसमिति समस्तांगोत्पन्नमहाभूतानुरागभरा। चातुर्वण्यसुमधान्विनो मिहिनयान कियाकर्म ॥ १७॥ गन्धाक्षतमाल्याम्बरवितानपण्टाध्यजादिभिःभाग्यम् । भूतपसम्यामकरोतिराद्वान्तसपुस्तकमहेश्याम ॥ १५८ १ पय पदमागमापति प्राप्य पुनरघुना। कथयामि कपायाभूतस्य गरसूत्रमाभूतिम् ॥ १४९ ॥ সঙ্গণমংথামায়। पायाभत कक्षामा गुणधानीमा १५ गुणधारमनान्ययगुः पर्यापरकमा:स्माभिः। यतात्ययकथाममनिमनामाचार प्रय गुणधरमुभिनाया मायाभूनान्यतापायी। सामनहास माnिfrimen १५१ . यधिमाया गुलमप्राधानाम । विमाधान पिErfirm भूतावतार एवं गाथासूत्राणि पश्चदशमहाधिकाराणि । प्रयिरध्य प्यायल्यौ स नागहस्त्यार्यमंधुभ्याम् ॥ १५४॥ पावं तयोयोरप्यधीत्य सूत्राणि तानि यतिवृषभः । यतिवृषभनामधेयो बभूव शारत्रार्थनिपुणमतिः ॥ १५५ ॥ तेन ततो यतिपतिना सद्गाथावृत्तिसपरूपेण । रचितानि पटमहतग्रन्थान्यथ पूर्णिसूत्राणि ॥ १५६ ॥ सस्यान्ते पुनस्यारणादिकाचार्यसंसकन सतः । सूत्राणि तानि सम्यगधीत्य प्रन्यार्थरूपेण ॥ १५७ ॥ द्वादशगुणितसहस्रपन्यान्युशारणाख्यसूमाणि । रचितानि पृतिरूपेण तेन तपूर्णिसूत्राणाम् ॥ १५८॥ गाथाघूर्युपारणसभैरुपसंदतं कपायास्य । मामतमेवं गुणधरयतिवृषमांधारणाचार्यः ॥ १५९ ॥ पवं द्विविधो ध्यभावपुस्तकगतः समागच्छन् । गुरुपरिपाटा ज्ञातः सिद्धान्तः पुण्ढकुन्नपुरे ॥ १६ ॥ श्रीपद्मनन्दिमुनिना सीपि द्वादशसहस्रपरिणामः । प्रन्यपरिकर्मकर्ण पटपण्डापत्रिपष्टस्य ॥ १६१।। काले ततः कियस्यापि गते पुनः शामपुण्डमोन । आचार्येण सात्या विभेदमप्यागमः काात् ॥ १६९ ॥ द्वादशगुणितसहसं मन्य सिद्धान्तयोरुभयो । पोन यिना पण्डेन पृधुमहाबन्धसंशेन । १६३ ॥ মাসকুরগাহশাধ্য বামঃ বা বিনা। तस्मादारात्पुनरपि काले गतयानि किपत्यापि च । १६४॥ अप तम्बुदरनामामायभूमुम्बुटरममामे । पोन पिना दर्दन सोप सिद्धान्तोषभयो। १६५॥
-- - अनामनार नरय पाप माल मिदान्तमधीय पारगेनगुमः। उपरितमनियाधमाधिकारानष्ट पसिन। १७८॥ आगत्य चिदानमः म भगवानरोरनुमानात् । पारमा नामानन्दतमिमगृहे चिन्या ॥ १७९ ५ मारपामिमयाप्य पटसपटतरततस्तरिमन । उपरिममाधनाधिकारशासपिकलः ॥ १८ ॥ मत्कमनामधे पार्ट हण्ट विधाय संक्षिप्य । इति पण मण्टन पन्धमदधिमतत्या ॥१८॥ पालनमापामिाटीको तिलिम्य भयलायाम् । जयपषला न कपायमामृतक मारणा विमतीनाम् १८२ विशतिसहसमन्यापनया संयुतां शिरच्य दियम् । पातस्ततः पुनस्तरिमप्यो अयमेनगुरुनामा ॥ १८३॥ समं धयातिता मह समापितवान । मलयलयं पष्ट्रिसहस्रग्रन्या भट्टाश ॥१४॥ एवं भूतायता निर्पिता भीन्द्रन नियतिपतिना। भुतपथम्यामूपिभिव्यायी भयलोकेभ्यः॥१८५॥ यत्किनिदा लिग्नितं समयविरुदं मयाम्पोधेन । अपनीय सदागमतस्यदिनः धियन्तः ।। १८६ ।। टोकपन वृत्त कनाशीतितमिताभिः । मतांतरवितात्या प्रन्यनाय परिममाः॥१८७॥ न'नंदि' आचार्यतः श्रुनाश्तारः।
श्रीसोमदेवमणीता. श्रीसोमदेवप्रणीता अध्यात्मतरंगिणी। मा स्माः स्ताद्धरित्री दिशतु म परमाः संपदोऽस्यामयिभ्रं. त्योदाम्ते' यः पतास्म कम इति च कुता निर्भर सर्यता यः। मागुगप्रतिनिधी क्षितिमिति ममतः प्रक्षिपन शुश्मर्याक्षान मा भूयाग्न्यप नार पवनपथमहा या यतो नर्समानुः ॥ १ ॥ पातालांता बभूयुः गलजननिता यापथा कर्णपुरा' कुध्यत्यय य साक्षात्याय मतिविशिनीभानुभामोहर्षितांग। भानायामा, यमान पनियरा पाभि तिलाल- मुगाया गरमना मानना पाण| धारणायां चतुरयययन मपयाग धिया य पन्याहाराक्षवृत्त. म्यविषयिशामत् गुरुराक पित। ध्यान रोयटीन यमनियमपयाम्यसनाधे माध्यम्या | ममा । ममा गणा यागनिदापति। '17|नमा . 4 * भि . . . P4 . H . । . "भा 'ग । . . . 4. ory in, Art ferent प्रापारमतरंगिणी यापान माग्नि मध्याः प्राममुपगता परपनामा पिसाची मस् पम्य नितमपदनशिवाजतिभामो न यस्य । पानामगार करणपतिः परयं पश्या कथं नी स्यभ्यान भी ! विधिर्भवति स मदता मोपदागाय देदी ४ पर्चा दसान दिपति भजति या कदमै पुमयां मोरोदः मम्मी या पिपनपटकादिप्यधीनांशुा । पापाज्यमी हमति नमति पा निक्तिः सन्तुमर्श संबंध ते पुताना पतु विवधीमा धृति योऽपि भूयः ॥ ५॥ भ्यामि त्वं महासि क्षिपनपने ' पर प्यासानमासि' ज्यायोपियोनि क्षर मिहरे 'सर भ्यर्थीमनासि। मोजानिय रजामि मृग पयन 'हिम भूरि मुत्तरार्सि' भयांमि ग्य यामि त्यमति म धृतधीरेप नूनं रहामि ॥६॥ पुषप्रात्याहिपाल कलयति नयली सिंहमार्य को यांहापत्यं ललायी" प्रमुदितरपया प्यापतिं पुरंगी। दुरामद्विभगादाहिगायिकमध्यांतजालायाया- पियं ध्यानावधानावनिपत मिथी अतधामी पनेपि ॥७॥ आनंदम्यदिधिहमनजटाटत राचन निःप्रकंप यभ्याने नायगंय. कथमपि ममता गंधयाहांतराल । शामन । • मागाय वर्ष न भव यषि तु भायेन। ३ श । । ५भये । : । . मानावी । शमित्रयो । .र्माण। १.नेजामि। "ग्य । ११ । १ दिगाकामापकानि । १४ प्रगति । १५. जलानि । १६ । मप। १८ भूनिगगिता भकानि । १९ ममानिस... जगभकानि २२ हम्बिनी । माली। हरिन । १ मा. - स्त्रीसोमदेवप्रणीता- . तावन्मानेऽपि काले हुतभुगिव भवेद ध्यानमुचैरधानां' ध्वंसायोपींधराणां ज्वलनचलतयां व संपातजन्मां ॥१७॥ विष्वक्संस्थानदेहे' गतिपु चतसृषु माणिनि स्तः सद्वत्के सर्वस्मिनातरौद्रे विकलकरणके तत्र योगोपयोगः। उत्कृष्टं धर्ममुक्तं यतिषु सुरपशुश्चनिपंढायलानां मयंप्यन्येषु तद्वै हर्ति निखिलविदचाप्यनुत्कृष्टमातुः ॥१८॥ आयं शुक्लं विसंहत्युचिततनुविधावाधसंहत्युपेते. विज्ञयं तार्य स्यादितरदापि नरे काऽपि कालाद्यपेक्ष । कोऽधीशो मातुमेतां परणतिमितरां कनुमानंत्यकृते. स्तत्तद्वाह्यांतरंगाश्रयविषययशावेशभूयोवताराम् ॥ १९ ॥ नाशास्ते मातमिष्टं सदापि न मनुते नेय शोषत्यतीत नपाउनिप्रसंगे न घ कलुपमतिर्वाण्यभावाभिलापी। मायाऽसुयोगशोभामदमानकथालोकयात्रातिगध ग्रीन्मुंघवातमततत्पशुगतिफल यः रतयायास्त यः सः॥२०॥ बेषां हिंसा न सत्य कामिपि ययसा येषु नाऽमत्पमायो येषां चित न यित परयति निजके येषु रक्षा न योगे। ध्यानाये रोदसंज्ञानुपरतमतयः वनरेशायिरी. द्रोपद्वेषप्रमोपायहविधियिधुराप्रीतये संतु ते ॥१॥ . , धर्मशानभाय । २ पापानां । पानी । भिातरी भाव । लिमीत पिरिम । telah मान । ८ मारकः । , नम: ।। " गी। भानावनाग. Pाये म ममम विगतो. सवसाजिनपराया मागः ॥ ५यरमायबोली अध्यात्मतरंगिणी। याथात्म्यं धर्ममास्तदिह पधियो यस्तुनातेश सध हमपांभिपंगमयिकलमनसा स्यात्सदालंभेषाम् । सध्यानाधीनधीनाः प्रतिगमथिगर्मान्मोहमुलं सुनंति तस्मिन्पंचाययोधीपरिकलितकले काऽपि तस्ये कृताऽऽस्था २२ आज्ञा सर्यायाणी निजवृजिमजयोपायधिता व्यपायः फौद्रिको विपाकस्त्रिभुयनरचनायि संस्थानमुक्तम् । सनाऽयं स्याद्वियको विचय इह तती योगिनः स्युः कदाचित नाफरस्त्रीनवनीलोत्पल यनसददः कर्मपाशच्छिवो पा ॥ २३ ॥ धर्मध्यानमधाभ्यसनममधिकास्थर्यलधावतारे माणायामाम्यवाधाऽसनमयदरयस्थानविज्ञानमारे। द्विः श्रोतोयाहिसायशमनगमासमर्मसारपार मिद्धशित्तमचारैर्भयति कृतमति. शुयोगोपचार ॥२४॥ नानाभायः पृथक प्रयननविषयाप्टोकनाको वितर्कः मंक्रांतिरसेन कुर्यन कमयिधियसतो यावि पाध्ये प्रियोग्याम् । यीचारो द्रव्य आप स्थितमणुममल्ल. पर्यये या निमार्गः फारीणामरीणां स्थितिमनुतनुते म्यर्गगो मोक्षगध ॥२५॥ गुप्ताः कर्मण्डोभिपतनुपमितं कर्म पिये- खेकत्येदायिधाराजिनपिनयिनी पीथिको गाहमानः। भनवगनाची पार । धर्ममानारनमानमा ।लरवमय बनाशान घराभवालियर्ष । नो बानी ममहारथी तथा परपालिका कालापला पाले म मम । - सम्पयथा । | En हा विदिनपदार्थाचाय मत प्रतिको विशेष तसमनाय नमानमांजनारमनिममन्याहार मना. बादशादिषस: मुभा । मालपानाम:
श्रीसोमदेवमीता- VA- एकं वाश्रित्य योगं कमणुमनुसरन द्रव्यर्ग भावगं वा शुक्ल याऽपि द्वितीये भवति जिनपतिर्यात्यघध्वंसनेन ॥ २६ ॥ मा सा लब्धिस्ततोऽस्मिन यपुरतिशययचातुरास्यामिराम श्रीर्वाहाऽभ्यंतरी चागुतविभवमया सर्वसत्त्वरमोदः । आनंदाऽन्यानपेक्षा दुरपबिघटनाद्वेधमस्ति स्थकायें नो ते सार्यस्य तम्याः प्रभुनचनियमोऽधविवाऽन्येपु यस्माता यत्रान्येऽप्यंगभाजो न हि मदमि बुभुक्षादिवाधास्तवामी तबाधा तत्र किं ते न च तदुदयवद्वेद्यमन्नादनाय । सामान्याऽऽहारहेतावपि मदमिमतं स्थापितांगन्यथाऽस्ति देव स्यादन्यथाऽता रतिरखिलमुख नास्ति भुक्ती हि मुक्तिः २८ देवार्धात सुधार्नाप्यनुपहतमतिको वलास्त्वत्पदस्य यांग्या आचारलामे परममरपदं तेषु त्वद्रूपवर्स। 1 । सन शानदानदानलामभागोपभोगार्यसम्यक्षचारित्र- दानाग वम्यामपत क्षयादननप्राणिगणानुग्रहकरं क्षायिकमभयदान लाभानग्यम्यगर्यमापनियतवलाहारत्रयाणां क्वलिना यतः शरीरबलाधा- नहनवोन्यमनुन उमपणा पाममा मूक्ष्मानना प्रतिममयं पुदला. संबंध- मुपयान 4 1 या लभ , कृमनभागातगयन्योन्मुलनादाविर्भूतोऽतिशयानता भाग 1 +समय म्यादया 'बाया प्रादुर्भवनि, निरवोयम्योपभोगतरायम्य 'अल्ट्यान्यान' अन-पभाग क्षायिका यन मिहामनादिभूतय., सप्तानो प्रकृतीना संयामायिक मम्यन्च, चाम्य द्वधा मोहापोहात क्षायिक चारित्रं, 'ननु वेदनीय- कर्मगद्भावान्यामममानुपपनानि वदन प्रत्याह, वेदनीय आमीय युभुक्षादिकार्य- करणसमर्थन यन महायानगया मकाद्यागमयों भवति, उदयप्राप्तं वेदनी- यमनादान न मन न भवनि शुभगमदेहरियानवधनपग्मायुगंबनिमित्त, कि मन ममाऽभिप्रेत नम्मादननमममाहनभ्य कलिनः कवलापारम्पनं न युक्तमिति । ४ ना जन संधीवपर्यागानध्यवमायहिनमनि । ५ माक्षरय । ६ अहपयुष ।
अध्यात्मतरंगिणी। । स्थान नैयोत्तरेप प्रतिनिधिनिधिषु क्लीषयोपिज्जनानां । दौधित्यस्याविशेषे यदपि न नरयच्चभ्रमुचे जते' ॥ २९ ॥ पोप्पी वृष्टिः प्रभाणां थलयमसहा इंदुमीनों निनाद- स्त्रीणि छत्राण्यशोको पुतहरुभयतथामराणां प्रचारः। उक्तिचित्राभिधेये हरिभिरमिधृतं पीठमत्यद्धतार्था' लक्ष्मीरन्याऽपि शक्रः परिचरति मुदा देवमायास्यमेतत् ॥३०॥ ध्येयं स्मार्य न किंचिद्भगवति निखिलाध्यक्षपक्षायसेये ततधानमीहाउसमकलपतयां तत्समत्वार्य याऽपि । तत्साम्य तयपायोवहसमयसमावेक्षणा या मनीपा नो घेदात्मप्रदेशाव्यसनसमसनारंमणो" चा प्रयत्नः ॥ ३१ ॥ आयुप्यंतर्मुहूर्ते सति समयचतुष्कावधावेव काले कृत्या दंडे कपाट प्रतरमय जगत्पूरणं चाप्यसौ स्वम् । संक्षिप्याशातिक हितमाः पूर्वदेहममामा सूक्ष्मैकांगोऽन्ययोगविगीकरणात्स्यात्सयोगी तृतीये ॥३२॥ - १ पापचिनस्य विशेषाभावेऽपि सप्तम नरक न यानीनि भावः। माद्वादशको- टिदाद्यानां । ३ अत्र एदस्यैवमात्रान्यूनचे " मर्यानो प्रयेण त्रिमुनियनियुका सग्धरा कीसिनेयम्" इत्युसनग्धरालक्षणत्वात् स्त्राणि श्रीभ्यशोको' इनि पाटान वृत्तदोपः । ४ वाणी । ५ महिरा । तथ्ये। . विषमस्थितिकर्मतया। विषा- तिकर्मणां समस्थिति कर्नु। विश्लेषः । १. मामा जीवस्तम्य प्रदेशा जीवन स्वभावनामगोत्रोदनीयपरिणामास्तेरा म्यगने दादिरूपतया क्षेपणे समान हो प्रतररूपेणारीगण सयोरारंभणं यल ,न हि पुननिधयनयापेक्षया कानानदापनेक. सभावस्य परमात्मनो ध्यानरूपनाउलि पर प्रामाणि प्रत्यक्षादिप्रमाण. परम- स्मनि तथा तथा स्वाभाविकी परिणति परिण्ठेश स्पानोपच रोशः बनी तात्पर्यम् । विनाश श्रीसोमदेयप्रणीता --- VIVA सत्यात्मन्यात्मरूपे विरमति मरुतौ त्यक्तसंगेऽययोगे क्षीणोल्लाघे कियोघे समधियति यथाख्यातचारित्रमत्र । प्रोन्मुक्ताशेपदोघे भवति कनकवत्पांतशुक्लोपपने मोक्षीयोगिन्यवश्यं यदविकलविधी कारणे को विलंबः ॥३॥ सर्वासां हि क्रियाणामुपरतिमेसमा प्राहुरेतचरित्रं पात्रं तन्मुख्यवृत्त्या भयति खलु यती योगिनो यः परोन। अस्याहत्यभ्युपतो स्थितिरिह न भवेन्मुक्तहेतुमपंच उत्कृष्टायाः परोऽस्याः अपि जगति यतोनास्ति रत्नत्रयाते:३४ ऊच बज्यात्मकरवादयमनिलशिसावत्ततः मोचमीत' नी याने चाऽयमास्ते जगति दि गगने या धर्माऽस्तिकायः। प्रत्यावृत्तिर्न मोक्षायमविगमनाव जीविहीनः संसारोऽनंतभावान च जननविधिस्तेष्वपूर्वेष्य हेतोः॥ ३५॥ ओलोकांतात्ममीरात्ममतति समये नायमैकेन मुक्ता. वस्योत्कर्षाद्विशुद्धनिविवरसया किंचिदनाकृतिः स्तः। एनः संवृद्धिबंधयुपरमकरणार ध्यानमेतध मुक्त- माये दे तत्र पूर्वश्रुतिनि जिनपतायुत्तरे च शुढे ॥ २६ ॥ स्य गंता नो यियासा तव न च मैतिमान्स्यंदमानदेशः सेवार्थव्याप्यवृत्तिर्न प सकलगतः कार्यरूपापि नित्यः । १ सम्यगधि गछति आत्मस्वभावावस्थोपेशालक्षण पायातमारिन। २ नियमेन । ३ व्याक्ति।४ भयोगिनिनात् । ५ ऊगमनस्लमावभाववादी- पासमाधित शामन यानितिन भाजनिरिप्प...संग. छेन। यति हावामितान तातिनधारित मागि कलम सारमुके। ११ गमनशीलः, परन पानुनिया मुजारमा तमायादेव गमनहामियुगदिति न मितिरोधः । याशिल गतिमान् भाति ग परमपरमानदेगः, गतिमायेति मुहम्य प्रदेशबायोगागियो । 4 आध्यात्मतरंगिणी। संसारातीतमूतिर्न यससि पदये कस्य लोकत्रयेऽस्मिन् मो केपी चित्रमेतदिभवपदपरोऽप्यय॑से यन्मुनींदैः ॥ ३७॥ सौख्यं मोदक्षयेणावृतियुगगमनाद दृष्टियोधायपि स्तो वीर्य विनव्ययेनोद्गमविगमहतियायुरुच्छेदनेन । नामोच्चित्रमूर्ती स्थितिसमयफुलाइसंगमो गोप्रनाशा- द्वोच्छेदादोपेंद्रियनितसुखातंकसंपर्कदानिः ॥ ३८॥ हटिनिं गुणी दायिह विनिगदितापात्मनि प्राप्ततत्त्यै- स्ताव प्रासयंती विविधयिधिसयोत्कर्षमावाद त्वम् । यगाँतभायमन प्रकृतगुणयुगे याति कथित धर्गः सौम्यश्रद्धायगाहागुरुलघुगुणताऽवाध्यताधाविरोधः ॥३९॥ मुक्तौ नापूर्यमाप्यं किमपि कृतिभिधेतितामात्मरूप- माति प्राः प्रणीताखिलनिगमनया केवलक्षानभाजः। सूक्ष्मास्लेषो "जिनेंद्रोदितमतमहितज्ञानमाम्राज्यसंप संपधाः सर्यसत्योत्पलविपिनमुरे सोमदेयाश साक्षात् ॥४॥ इति श्रीसोमदेवाचार्यप्रणीताऽध्यात्मनांगिणी समाप्ता । . - १यो हि पालाभ्यापनशीला नैव सर्वगत एयनुमानविरोधचेतवेदमनुमा मिरः सर्वगतः सकस्लार्थम्याधिवृतिवायमकलापारिनिवार्य तस्मात्पर्य गत इति म न मानणैव जैनेः मालार्थम्यापिनाविज्ञानामारमदेवारनपुर्ण 'मामा कानप्रमाणो ने देयप्रमाणमुरिटाय लोकाया तम्मान हि सर्व- गर्ने ।" हानात्मकन्वेन निसिलाध्यापिनोऽपि म मुक्तात्मनः सर्वगतत्वमिनि विरोधा- भावार्थः । सार्यमुत्याय नदेन का स्वमा यस्य स नियोनवर मे पहाणा हानिधिमाकार्य शुसार याविनयापेक्षया यि त म विरोध । २ उती । नानाकार्यपतया : ५ पचास प्राप्य, अ मधमान- संबाद परमपितमित्य । ७ जिननामनिरलसारसाराश्यामधि- -सार्वभौमपरा. जी एसपि पारस्वाय मुरपाय ।। -
श्रीविद्यानंदिकृतं
नमः श्रीवीतरागाय जिनाय ।
पात्रकेसरिस्तोत्रम् ।
सटीक
जिनेन्द्र ! गुणसंस्तुतिस्तव मनागपि प्रस्तुता
भवत्यखिलकर्मणां प्रहतये परं कारणम् ।
इति व्यवसिता मतिर्मम ततोऽहमत्यादराव
स्फुटार्थनयपेशलां सुगत ! संविधास्ये स्तुतिम् ॥ १॥
टीका--श्रीवर्द्धमानमानम्य संसारार्णवतारणम् ।
बृहत्पंचनमस्कारपदं विनियतेऽधुना ॥
जिनानां देशतः कर्मोन्मूलकानां गणधरदेवादीनामिन्द्र स्वामिन् ! तब
गुणसंस्तुतिर्गुणानां केवलज्ञानादीनां समीचीना मनोवाकायविशुद्धिपूर्विका
स्तुतिर्मनागपि स्तोकाऽपि प्रारब्धा कृना भवति संपयते।कि, कारणं । कथंभूतं,
परमुत्कृष्टं । किमर्थ, प्रहतये विनाशाय ! केपामखिलकर्मणामिति हेतोळव-
सितोयोगं कृतवती। काऽसो, मतिः। कस्य, मम स्तोतुस्ततस्तस्मान्मतेव्र्यवसा-
यात अहमत्यादरात् भक्तिपकसिंविधास्ये करिष्ये। का, स्तुति । कथंभूता,
स्फुटार्थनयपेशलो स्फुटो व्यक्तः संशयादिरहितोऽयों येषां ते च ते नयाश्च
: पेशला मनोशां । कथंभूत जिनेन्द्र, सुगत शोभनं गतं ज्ञानं यस्य ।
पृथ्वीन्छन्दोलक्षणं वृत्तरत्नाकरे यथा “ जसो जसयलावसुग्रहयतिश्च
पृथ्वी गुरुः " इति ॥ १॥
पात्रकेसरिस्तोत्रम् । १०१ 1 तामेव स्तुति विधानो मतिरित्याद्याह- मतिः श्वतमथावधिथ सहज प्रमाणं हि ते ततः स्वयमबोधि मोक्षपदवीं स्वयंभूर्भधान । न चैतदिह दिव्यवधुरधुनेश्यतेऽस्माना यथा सकृतकर्मणां सकटराज्यलक्ष्म्यादयः ॥२॥ मतिरित्यादि । मतिश्च श्रुतं च मतिश्रुतमय तथाऽनन्तरं धाऽवविधतरप- माणत्रयं ते तव सहनं सहोत्पन हि फुटं ततः प्रमाणत्रयात स्वयं परोप- देशमन्तरेण अबोधि बुद्धवान् । कां, मोक्षपदयीं मोक्षस्य पदवी मार्गः सम्यग्दर्शनायामकस्ता, मतः स्वयंभूभवान् स्वयं परोपदेश- मन्तरेण मोक्षमार्ग शास्था अनुष्ठाय चानन्तचतुष्टयरूपतया भवतीति स्वयमः । नन्विदं ज्ञानत्रयमिदानीमस्मदादीनामतीह भविष्यतीति ततः कथं भगवतो विशिष्टो गुणः स्तुतः स्यादित्यत्रात, मधेत्यादि । न च नवमेतदनंतरोक्त विशिष्टज्ञानत्रयमिष्यते दृश्यते । कथंभूतं, दिव्यचक्षुः चहरिव चक्षु. पदार्थस्वरूपरकाशने निमित्तत्वात् दिव्यं सामान्यप्राणिनाम- भविस्यात् तच्च तचक्षुश्शेह क्षेत्रेऽधुनेदानीमरमाश उमस्थानां । अत्र दृष्टान्तमाह- यथेत्यादि, अयमर्थः-- सुकृतकर्मणो विशिष्टपुण्यपता था. स्याहीना सम्बन्धिन्यः सकलाज्यलक्ष्म्यादयो यथाशनीमस्माशो नेप्यन्ते सपा तदपि ॥२॥ भगवतः पचिद्रागषसद्भावे परमेष्टिता न विरुपयत स्याह,- व्रतेषु परिज्यसे निरुपमे व सोग्ग्ये स्पृक्ष विभप्यपि ष संएतरसमतो य देक्ष्यपि । कदाधिदयोदयो विगतपित्तकोऽप्यासा तथाऽपि गुरुरिप्यसे प्रिभुपमैकपन्धुगिनः॥३ मतेवित्यादि । मपरिमादिषु परिसमन्तादग्यसेनुराग गोषि; निरुपमे घोपमातिकान्ते प सौख्ये मोक्षारसे स्पाभिलाषा विभेष्यप श्रीविद्यानदिकृतं च भयमुपगच्छस्यपि च संसृतेः संसारात असमतों माणिनो वधं हिंसों देश्यपि प्रतिषेधस्यपि, कदाचित्कषायेन्द्रियकालेऽदयोदयः न दयाइया हिंसा तस्या उदय उत्पादो यत्र । किंविशिष्टोऽव, विगतचित्तकोऽपि विगत विनष्टं चित्तं भावरूपं यस्य ततो अमनस्का: केवलिन इति वचनात; अजसा परमार्थेन तथाऽपि रागलोभदेषदुष्टप्रकारेणापि गुरुः परमात्मा इष्यसे स: । किंविशिष्टस्तु जिनोऽशेषकर्मोन्मूलकापुनरपिडिविशिष्टत्रिभुवनैकअन्धुः। कथंभूतस्य भवतः केवलमभूदित्याह;-- तपः परमुपाश्रितस्य मयतोऽभयत्केवल समस्तविषयं निरक्षमपुनस्च्युति स्वात्मजम् । निरावरणमक्रमं व्यतिफरादपेतात्मक तदेव पुरुषार्थसारममिसम्मतं योगिनाम् ॥ ४ ॥ तप इत्यादि:--मरतो जिनस्यामवसंजाता तत्केवल केवलज्ञान, कभूतस्योपाश्रितस्य सेवितवत. किं तत्तपः। किंभूत, परमुत्कृष्टमेकत्ववि- शुक्रष्यानलक्षणं । शिविशिष्टं, केवल समस्तविषयं समस्ता अखिला विषया यस्मिन्तत, निरक्षमझेभ्य इन्द्रियेभ्यो निशान्त निरक्षमतीन्द्रियमित्यर्थः, अपुनश्यति न विद्यते पुन. पश्चात प्युतिर्विनाश यस्य, स्वरम स्पस्य जीवस्यामा प्रमाणावरणम्वभावातरमानातमत १२ निराकरण, अकर्म युगपत्सीयाहि निरक्षवान, व्यतिकरायेतात्मकं शमा पीतादितथा पहणं व्यनिकरातस्मादपेत आत्मस्वभावो यम्य । कम्तेन पुरुषार्थ याह तदेवन्यादि- तदेव बलशानमेव पुरुषार्थानां धर्मादीना मध्ये सारे प्रधान भू अभिसम्मतं मियाम् ॥ ४॥ ननु यदि समुत्पनशानो भगवाकय तरेगास्तिथ नाती- स्यादि तदीयवघोविरोध या निराकुमार- परस्परविरोभनिविधमहापाउल प्रधामनगम तर निरामना।
पात्रकेसरिस्तोत्रम् । --- तयापि जिन ! सम्मत सुविदुषो न घात्यद्भुत 'भवन्ति हि महात्मना दुरुदितान्यपि ख्यातये॥५॥ परस्परविरोधेत्यादि:-हे जिन ! तद शासन वचनं, कथंभूतं, निरक सदेवासदेव चेत्यायेकान्तरूपाइर्याभिधेयानिष्क्रान्त परसाविरोधवादिविध- मंगशालाकुलं परसरमन्योन्यं विरोधः परस्परपरिहारस्थितिलक्षणः स येतो वियते तेच ते विविधभंगाश्चास्तित्वनास्तित्वादिविकल्पास्त एव शाखास्ताभि- राकुलमाकीर्ण, पृथग्जनसुदुर्गमं पृथाजना हेयोपादेयविवेकशून्यहदयास्त: सुदूर्गम समु दुरवबोध तपाप्येवंविधनिरर्थकत्वप्रकारेण स्थितमविता शासन सम्मतमभिप्रेत । केषां, मुबेनुपा शोमनपण्डिताना न च नैवास्य. तमाश्चर्थभूतमेतत्कुत इत्याह, भवन्ति होत्यादिना-हि परमादयन्ति संपपन्ते महात्मनो सातिशयज्ञानवता दुरदितान्पति परस्परविरुवा- स्यपि ख्यातये प्रसिद्धये प्रमाणोपरमत्त्वात्अनार्थान्तरन्यासालबारः महक्षणंह यथा-उतिरोतापास. स्यात्सामान्यविशेषपोरिति ॥५॥ सानी सपरिग्रहत्त्वनि:परिमहारयोर्भगवरयविरोध दर्शयमाह, - सुरन्द्रपरिकल्पित वृदयनार्यसिंहासन तथापनिवारणश्यमयोलसथामरम् । पांच भुवनय निरुपमा प नि:संगता म संगतमि यंत्ययि तथापि संगष्यते॥६॥ सुरेन्द्ररयादि-सुरेन्द्र परिकाल्पविता यदना महान এন্মনোমং বই বর্ণিধন খা নয় মাসােমনিয়াম छपर, अपानन्तरमन सरसामर पशुपटिस्, पच भवन, "माशाधीन जगाय" निरूपमा माला विसंगता मिहिमा म संगम पुन विरुदमिदमनारोत सिंहासनादिभिहिमायनि- १०४ श्रीविद्यानंदिकृत " गतवं च तथाऽपि विरुद्धप्रकारेणापि त्वयि भगवति सङ्गच्छते घटते त्वन्मा- हात्म्यस्य ताहशत्वात् ॥ ६॥ तधेदं विरुद्धमपि भगवति संगच्छत इत्याह;- त्वमिन्द्रियविनिग्रहप्रवणनिष्टुरं मापसे तपस्यपि यातयस्यनयदुष्करे संश्रितान् । अनन्यपरिदृष्टया पडसुकायसंरक्षया स्वनुग्रहपरोऽभ्यहो ! त्रिभुवनात्मनां नापरः ॥ ७॥ त्वमित्यादि, -वं भगवन् ! भाषसे निारमिन्द्रियविषयप्रवृत्तिनिरोधक। कथंभूतं, इन्द्रियविनिग्रहप्रवणं इद्रियाणां विशेषेण निमहः स्वविपये प्रवृत्ति- निरोधस्तत्र प्रवणं दक्ष न केवल मापसे किन्तु ' यातयसि क्लेशयसि यन- वतो करोषि " यती प्रयत्ने " धातोर्यन्ते रूप" क, तपसि, विविशिष्टे, दुष्करे इश्चरे । किविशिष्टोऽनघः। कान, संश्रिताराकया, पडसुकायसंरक्षया पदायप्राणियया। कथंभूतयाऽनन्यपरिदृष्टयाऽन्येरीश्वरादिभिरमतीतया । कथंभूतापि, स्वनुमहपरोऽपि । केपी, त्रिभुवनात्मनो अहो भगवन ! यत एवं त्वं तेषामनुमहपरोत एव तद्भापसे, ईश्वरादिरपि कधितेषामनुग्रहपरो भविष्यतीत्याह-नापरो न द्वितीयस्त्वमेवेत्यर्थः ॥७॥ यथेश्वरस्तुष्ट स्तुतिपाय गुग सपादयति तद्विपरीत च दुःौ न म भगवान्ताय तोपोषियोरभावेऽपि तत्सपावनसामयसमारिति दर्शयमाह- वास्यनुपम सुगं स्तुतिपरेप्यतुष्यपि क्षिपम्यकुपिताऽपि च भूयमसूयकान्तुगती । न धेश ! परमपिता तब विगसपी यमयान न कुप्यनि नयति प्रतिमाभितो मध्यगाम् ॥ ८॥ दवामीत्यादि-शासित, मुकभूतमनुरमा कपु, स्तुतिपरेषु स्तनतत्पीयु । कमतोम्याप्रमाणहममिः स्तुत पनि दिन ससिम- पात्रकारिताम्। १०५ अदि, पापितोऽपि कोषरहितोऽह क्षिसि पेरपति भुवमवश्य- भावन । र, दुर्गा समापमान सणासहिष्णून, काहनिमहानुपही गतव पर महिलाविरोधो न भविष्यातीयवाह न वेत्यादिन पेश! परमेष्टिता विरुष्यते । इतो, यपरमादयान कुप्पत्ति न तुम्पति प्राति विमाषमाश्रिता, विविशिष्टी, मायम मध्यस्थरूपामिनि ॥ ८॥ अधुना सपोनि वल्पस्थायी भगवतोऽनन्दमाशरणान् धर्माम् थपमाह- परिक्षपितकर्मणस्तय म जातु रागादयों मन्द्रियपिवृत्तयो म प मनस्कृता प्यावृत्तिः । तथापि सकट जगधुगपदेशसा रिस प प्रपश्यगिन कंपलाम्युवित्तविण्यसभुपा ॥९॥ परिक्षपितेन्यादि-परि समन्तात् निशेषतः शापितकर्मणो दिनाशित. पातिकर्मचतुष्टयस्प तब जिनेन्द्रस्य न जातु कदाचिदपि रागादयो नाइजीनियश्कृिस्य इन्द्रियाणां पर्शनादीनां विशिष्ट वृत्तयो यथा स्वसमर्थ- प्रणव्यापारा निमपोन्मेषादयो वा न च मनाता मनःपूर्षिता घ्यावृति अष्टा, मान्द्रियमनोव्यापागभावप्रकारेणापि शानावरणादिप्रक्षयप्रमय. ज्ञानेन समस्त जगपुगपदेकहेलया वेसि च जानास्पे। न केवल वेत्स्येव किन्तु प्रपश्यसि । केन इवा, केवटेरयादि--केवलशम्भन केवलज्ञान बबलदर्शनं च गृपने तदेवाभ्युदित अभि आभिमुख्येन सक्लार्पसाक्षा- स्वारिलक्षणेनोदिते मादुर्भूते दिव्यमन्पजनासमवि सत्समीचीनं चक्षु- स्तनेति॥९॥ सया कर्मप्रक्षयापद्भगवतः सम्पनं तदर्शयमाह,- क्षयाच रतिरागमाभयकारिणी कर्मणां कपायरिपुनिर्जयः सकलतत्त्वयिधोदयः। - r
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पात्रकेसरितांनम् । १०७ मादनुपलमाद्भगवति, अतोऽपेविषाचनादवि तोर्न केपलमनन्तरोक- गुणोपेतलान भगवन् । इन्द्राभिपूज्यविशिष्टज्ञानेन वा संपभपरमेष्टितायाः परमात्मतायाः पदं स्पान स्वमेव नान्य इति ॥ ११॥ मनु वितपकारणं मे नास्तीति भवततत्कुतो निश्चितमिति भगवत्पर्यनु. योगे सति चाचार्यः आह;- म रुग्ध इति गम्यसे सकलसंगसंन्यामती न चाऽपि तव मूढता विगतदोपयाग्यवान् । अनेकविधरक्षणासभूतो न च द्वेषिता निराशुपतयाऽपि च व्यपगत तथा से भयम् ॥ १२ ॥ न लुब्ध एयादि,-तुम्क्षा परिमोपासक्त इन्येव न गम्यसे न प्रती- यसे । कुतस्तर कारणमाह-सकलसदसन्यासतः समस्तपरिग्रहपरित्या- गात न चाऽपि तब मूढ़तायज्ञानताऽपि । कुतो, विगतदोषाक यदवान विगता विनष्टा दोषाः पूर्वापरविरोधादयो यस्यास्तादृशी पाक यस्यास विगतदोषवा पयस्मात्कारणात् भवान् भगवान्, न प नैव देपिता कोधिताऽनेकविधाक्षणात अनेकप्रकारेण प्रतसमितिगुप्तधादिलक्षणेन पालनात् । केषामसुभृतां प्राणिना, तथा भयमपि साध्यसमविध्यपगतं नई। कया, निरायुपतया निरस्तसमस्तपहरणतया घेति ॥ १२ ॥ अत्र विगतदोषवाक्त्वं मे कर्य सिद्धमिति भगवदाशङ्को स्तोतुः प्रजाति- शयपरीक्षार्थ प्रवृत्तामिव निराकुनाह-- पदि स्थमपि भापसे घितथमेघमाताजप सन् परेषु गिन का कथा प्रकृतिलुब्धमुग्धादिषु । न चाप्यकृतकात्मिका यधनसंहतिश्यते पुनर्जननमप्यहो ! म हि विरुध्यते युक्तिभिः ॥ १३॥ यदीत्यादि-पदि लमपि न केवलमीहशो जन इत्यपिशमार्यः, लियमेवासत्यमेव माषसे पदसि । कथंभूतोऽध्याप्तोऽपिसन् तिरागसश- - श्रीविद्यानविपस । वारिगुणोपेतोऽपि सम्मेवं प्रागुफप्रकारेण तदा परेपमा हेनिन कथा सत्याभिधानेन का बार्ता ! किविशिशु, प्रकतिलुब्धमुग्धारिश समान लुभा मुग्धाभाविशन भीतदिष्टादिपारमहः । अा. सका, आगमलक्षणाया वयनसहतेपारुपेयतया नचिकरणासार. गवतो विगतदोषपाक्यं ततः कथं सिमिति, तायुक्तभिरयाह-म घेरमारिना। नश हश्यते प्रमाणतः प्रतीयते । कासो, पचनसहतिः। भूतापता मिका अपौरुषेयाऽपि लोरिकवपनसंहासदियया अपि तस्यामाना- विण्यापारयतया तया कतारमयोपपतेः। एतांचा पुनरियाविना- परमात्र विरुदया। पुनर्गमनमपि न केवलमनियतिन्नुि मुनिमि माविरुदत इति ॥ १३॥ एलोप दर्शवाहा- गजम्ममरणनिंगीशरणारिनामभुरी. নানিনিনিয়ানমালা। পাথুমাবিলিখিশালা नंग मनुपश्यापककय भूति ॥ १५ ॥ मम्मेदारियापारिक मानना मंज्ञा तापमान 17 नाग माम भूपा प्रगति का HARITRINASHEतिनियमन star बम्ननिमाArint krfartal ETA: करना नामाRT forg ratr Apaanifi Rat Samiti Manा माम: RAMERIE पात्रकेसरिस्तोत्रम् । नयात्मनि सिद्धे सस्प सर्वशत्वादिगुणोपेतत्वमागमप्रणेतृत्व र सिधेत, न चासो सिद्धस्तत्प्रमाणाभावादिति पार्याय,तमेव निरायुध माह;- स्मृतिथ परजन्मनः एटमिहेश्यले कस्यधि- तयातयघनान्तरामएतलोकपादादपि । म चाप्पमत उड्यो न च सतो निमूहाक्षयः कर्य दिपरलोकिनामसमतामसपोयते ॥ १५॥ स्मृतिश्चेत्यादि--परजन्मनः पूर्वभवाय स्मृतिः स्मरण व स्पुटमसंशय कायचित्पाणिन बह लोक दियते मतः । कथं, शुटमसत्ता मास्तिर चादरूपात उत्पादने तथा प्रसतोकवादावि प्रस्तः प्रसिद्ध' प्रयुत्तो था पूर्वमेवविधतः पुरतं कृतं येन रासेन लिन्ति एतेश नं घेन इन हियनित्यादिरूपरतयारि परजन्म नेप्यते कई तेषामसत्तोसते रतिपापले कापामसुमना परलोफिनामतीतमशागताना भावि भव गमिप्यता सपा सेनेव प्रकारेणाधनान्तराजशिअणा- निको हत्यायागमादपि तेषां परजन्मेध्यतः पमनोगते । पर. प्युज्यते पाक कापामारपरिणतेभ्यः पृषिष्याम्पिधेतन्यमास पुष्यने तय विरालालमबस्थाय निर्मूलं प्रतीयत इति तस्युन मियाह-मयादिना- मप सर्वयाऽसन उदरः वरविषाणामच सो निभान भय धि- प्यास्तित्वात, मध्यरूपतया सर: पयरूपतया स्पशनापोत्पाद बनायुपगमे नमासिरिति ॥ १५ ॥ बैतन्य चतुर्गा भूताना कार्य पर ARRE निराकार,- मचायगीयनसदेप या यम्यते एराष्ट्र मापनपा शिपिकापरिन् । कपिमानापिटाकियो का सिनिमहादियागुण से बनमा । १६.
११० श्रीविधानंदिकृतं न चेत्यादिन चाऽसदप्युदीयत उत्पाद्यते चैतन्यं, किंवत, सुराग मदवत सुरा मयं तदङ्गानि कारणानि पिष्टोदकगुइयातक्यादीनि तेभ्यो यथाऽत्यन्तमसन्नेव मदो मदशक्तिरुत्पयते तथाभूतेभ्यश्चैतन्यमिति तर्हि सदेवाऽभिव्यज्यते तदित्यत्राह न चेत्यादिना-न च तथा सर्वथा सदेव वा व्यज्यते किंवत् शिखिकलापवैचित्र्यवा, नहि शिसिनो मयूरस्य कलाए- वैचित्र्य सर्वथा सदभिव्यन्यते किन्तु कथंचित्तया चैतन्यमपि कथंचि- रसदाभिव्यज्यतां । तथा च जैनमतसिद्धिरेतेन देहगुणश्चेतन इति मतं प्रत्याख्यातं यस्मात्कचिन्मृतकरंधनार्थपिडसादेके नेक्ष्यते सातः कर्म क्षितिजलादिसंधगुण इष्यते चेतनेति ॥ १६॥ इदानी भगवतो वीतरागं वपुः स्तुवन्नाहा प्रशान्तफरणं पुपिंगतभूषणं चाऽपि ते समस्तजनचित्तनेत्रपरमोत्सवत्वं गतम् । विनायुधपरिमहाजिन ! जितारवया दुर्जयाः कपायरिपयो परेने त सीतारपि ॥ १७ ॥ प्रशान्तकरणमिति-वपुःशरीरं कथंभूत,प्रशान्तकरणं प्रशान्तानि शान्ति प्रामानिकरणानीन्द्रियाणि यस्मिन्तत् । पुनः कथंभूतं, विगतभूषणे विगतानि प्रयातानि मूषणान्यामरणानि यस्मिन्तत । एवं चततहिं कस्यापि बाम न स्यानियाशहायो रामस्तेत्यादिनासा-समस्तमनचित्तनेनाणा निसिल. प्राणिमानसलोचनाना परम उतष्ठ उप प्रमोदो यामात्तस्य भावान तत प्राममेवाम्वधशरीरसंयुक्तन स्वपादितं हे नि ! खपा मिनेन निता, पायरिपकोधमानमायालोमा एस रिपः शरः भूता, पुर्नयः उरीन नेतन्याः कथं निनाः, विनाशुधरमिहान शम्रारिपाणे विनय । अपर निता भविदन्तीत्याशहापामानापश्यादिमा गई. रिहादिभिन्नु न मिताने। विशिषि, पारिशुशादिशमाणि धारिम- विति..
पात्रकसरिस्तोत्रम्। AA एवं पायजयलक्षणमातातिशय प्रतिपाप केवलशानलक्षण मास्य- तिशयं प्रतिपादयमाह- धियान्तरतमार्यवद्गतिसमन्ययान्वीक्षणा- मवेत्तपरिमाणयत्कचिदिए प्रतिष्ठा परा। माणमपि दृश्यते क्षयवतो निमूलाकचि- तथाऽयमपि युज्यते ज्यटनवाकपायक्षयः॥१८॥ धियान्तरतमेति; - जगति कचित्पुरुषविशेषे दिया बुद्धीनां प्रति- धारवाया परा मवेत् । कुतः, सरतमार्थबद्दतिसमन्वयान्वीक्षणात् सरतमार्थोऽ- तिशायनं स विद्यते परयाः सा चासो गतिध प्रवृत्तिस्तस्याः समन्वयोऽनु- गमस्तस्याक्षिणात् सन्दर्शनात् । किवत, सपरिमाणवत् । अपमर्थ:-यथा आपग्माणोः परिमाण प्रवर्दमानं नमसि परी प्रतिष्ठा प्रतिपयते तथा आस्थावरेभ्यो पुदिः प्रकृप्यमाणा पक्षीणशेषावरणपुरुषे पर प्रतिष्ठा प्रति- पयन इति । ननु धियां परमातिशयो ज्ञानावरणादिप्रक्षये मविष्यति ।स कृतः सिद्ध इत्याह प्रहाणमित्यादिना-हाणमपि दृश्यते । पस्य, क्षयवतः किट्टालिकादेनियात्सर्वया चित्सुवर्णादो या तथाऽयमपि युज्यते ज्वटनवत्वपापक्षपः । इदमत्र सात्पर्य, यथा ज्यटनस्याग्नेरुदाप्रवाहादिना अक्षयस्तथा सम्यग्दर्शनादिना पायागामिति ॥१८॥ ननु सर्वशतालक्षणातिशयस्यात्यन्तासंमान्यत्वात् कयं भगवति तत्क- रूपना स्यादित्याशंका निराकुर्वाह;- अशेपविदिदश्यते सदसदात्मसामान्याय- जिन प्रकृतिमानुषोऽपि किमुताखिलज्ञानयान् । कदाचिदिह कस्यचिवचिदपेतरागादिता फुटं समुपलभ्यते किमुत ते एरपेतैनसः ॥१९॥ अशेषविदिति,हे जिन ! इह जगात अशेषविदिष्यते । कोऽसौ, प्रकृतिमानुषोऽपि सामान्यजनोऽपि । कथंभूतः सन्, सदसदामसामान्यक्ति -
श्रीविद्यानं विकृत
सदसस्वभावाम्यामसिलजगन्निश्वायकः किमुत पुनरखिलज्ञानवान
भगवान सर्वज्ञो नेष्यते । अधुना सर्वे पुरुषाः सर्वदा रागादिमन्त एवेत्ये-
कान्तं निराकुनाह, कदाचिदित्यादिना-कदाचिदिह जगति कस्यचिन्म
न्दरुपायस्य कचित्कस्मिंश्चित्मसत्तिहेतो पदेशेऽपेतरागादिता स्फुट गया
भवति तथा समुपलभ्यते किमुत ले निनस्य । किं लक्षणस्य,
व्यपतनसः
ध्वस्तक्लेशस्यति ॥ १९॥
साम्प्रतं युक्तिशास्त्राविरोधिवक्तृत्वं भगवतः सर्वशतायो चिलमित्याह -
अमेषपुरुषादितत्त्वगतदेशनाकौशलं
त्यदन्यपुरुपान्तरानुचितमाततालाञ्छन ।
कणादकपिलाक्षपादमुनिशाक्यपुत्रोक्तयः
বহুনিক ৰি মুখমুয়হিমনিৰ্মিনাম্বার্থ । ২৪
अशेषेत्यादि, अशेष च तत्पुम्पादितत्त्वं तस्मिन्गतं मद्देशनाया.
प्रतिपादनस्य कौशलं चातुर्य । कथम्भूतं, त्वदन्यपुरुषान्तरानुचितं त्वदन्यानि
पुरुषातराणीश्वरादीनि तेष्वनुचितमयोग्य । तकि ' आमतालाञ्छन । ननु
कणादादेः कामान्न तस्निगमित्याह कणाक्षेत्यादिना कणादकपिलाशपा-
दादीनामुक्तयः शाखाणि सक्लन्ति प्रमाणेन प्रतिहन्यन्ते हि स्फुटं । केषु,
सुचक्षुरादिपरिनिश्चितार्थेष्वपि सुष्ट चक्षुरादिभिरिन्द्रियः पीर समन्तानिश्च-
तार्थेष्वपि निश्चयं प्राप्तेष्वप्यर्थेषु न केवल सूक्ष्मान्तरितदूरार्थेष्वेवेति निर्गलि-
तोऽर्थ इति ॥ २० ॥
तदेव तदुतीनां सलन दर्शयन्ना-
परैरपरिणामका पुरुप इप्यते सर्वथा
प्रमाणविषयादितत्त्परिलोपमं स्यात्ततः।
कपायविरहान चाऽस्य विनिवन्धर्म कर्मभिः
पुतश परिनिवृतिः क्षणिकरूपतायो तथा ॥ २१॥
पात्रकेसरिस्तोत्रम् । । - परोरिस्यादि-परवशेषिकादिभिः पुरुषो जीव ध्यते । कथंभूतोऽपरिणामकः परिणामरहितः । कय, सर्वथा नित्य ।ततः प्रिमाणविषयावतवपरितोपन पारणामित्वे सत्येव बामनोऽप्रमातावादिरूपपरित्यागेन प्रमावृत्यादिरूप- संमवात् । तथा कर्मबन्धोऽप्येवविधस्यात्मनो न संभवनीति दर्शयन कपा- येत्यादिनाहास चाऽस्य सधारणामिनो जीवस्य विशेषेण निबन्धन सम्बन्धः । , कर्मभिः । कुत., पायविरहात कपायरहितत्वात, सक पायो हि जीवः कर्मभिः सम्बध्यते । यन्धाभावात् कि, कुतश्विरसिभ'ति- मुनिन्धपूर्वक त्यान्मोक्षस्य, तथा तेनैव प्रकारेण क्षणिकरूपतायो तरि- लोपन तदभावभ स्यात् इति ॥ २१ ॥ इदानीं सोख्यमतमाशय दूपयमाह- भनी विपरिणामक यदि संसृति चास्नुते तदेय च पिगुच्यते पुरुषकल्पना रयाद वृधा। म घास्य मनसो विकार उपपचते सर्वथा भु तदिति हीप्यते द्वितययादिता कोपिनी ।। २२ ।। मन इत्यादि--"मनश्चिन विपरिणाम विविधपरिणामोपेतं यदि घ संतति व ममा पतुतिलक्षणमश्नुते ध्यानोति सदेव ए मनो बिमुध्यते मुकं भवतीति सौरभ्युपगम्यते सदा पुरषकल्पना स्पाडो वृक्षा प्रयोगमाभावात् । पये परिणामिल मनस: सिसिदा समारमझौ स्यात नपतसिमिति दर्शवाह न घेत्यादिना-ने चाय संसारमोक्षा- घरयाधारतयाऽभ्युपगतस्य मनको वि.परिणामः सवधापपपते परते। कुतः, भुवे नित्य तम्मन इत्येमियो, हि यस्मातहि सथानि परि- जामिनोऽस्त्रिय-निपादिता रोपिनी सिंगाधनीति । २२. पानी योद्धानो स्याम्पुरगमाविस विशेष एमा,- प्रधानममनोनुकलमपारम एलेन रावमाप्यने मतपस्यापतिः। " मनोऽनुकूल मौसम प्राविधानविकत प्रतिक्षणविमंगुरं सकलसंस्कृत ग्रेज्यते मनु स्वमतलोकलिंगपरिनियोहितम् ॥ २३ ॥ प्रमग्जनेति-यजना रागादिमन्तस्तेषा सोगतः तं शासन दर्शनं । कोश तदित्याह मुसेनेत्यादिना-हुसेन . देश पिनास पारलौकिकमाररूपमापते प्रायन AIIfl. जिडेही तमाश्यन्वियम्तये पोलिस हलमस्तीमा, लिभगुर statति विगु निमम । अप नन्निपानामा Amm दर्शयति-मत लोच लिग परिनिधपायात विसरिनिश्चयेन AIRY FARE गुसरासी कार: शिरोमगानमा गदियभारणेनानायसवाल, सपा पप गितम | साम HAL ARTणी. कम पति होमी (ध:, पाप मिरची नितिन पानिज्ञापमानवापिदिपिभिनयापानः मनाने प्र-मिशाना मन ना मागमत, मनातिनी महिनमधीमा भिा घमागगाय पयायो । খানিবুনিসপৰিস্তি। শিশি মালয়াধা' * Ranfrarना-HIRafruit HARIHITH writARARTA HARI मा An IHRel: OrdnTY, Romanti RARY Tirtun में।
पात्रकेसरिस्तोत्रम् । - विहाय न किंचिद्धनं नगर पा धास्तवं सोगतेरिटं । तथा क्षणिकक्षणा- विहाय न सन्ततिरपि भवतु तदमावः को दोष इत्याह बुधवेत्यादिना- स्थैव निष्फलेन । फेत्याह कृषीत्यादिना-कृषिश्च दानव शीलं च मुनि- धन्दना च ता आदयो थासां ताश्च ता क्रियाश्च । अथैतदोषमयात्कर्ष- चिदविनश्वरी सन्ततिरिष्यते तथा सर्व क्षणिकमिति भदेत्यतिशाक्षति ॥२४॥ अधुना मुंने केवली चिरीविमनुष्यत्वावोगभूमिजददित्यत्र हेतोरसि- दनामुदावयाह- अनन्यपुरुषोत्तमो मनुजतामतीतोऽपि स- मनुष्य इति शस्यसे त्यमधुना नरालिरी। क ते मनुजगर्भिता क च विरागसर्वक्षता न जन्ममरणात्मता हि तव विद्यते तत्त्वतः ॥ २५ ॥ अनन्येति-हे जिन! त्वमनन्यपुरुषोत्तमः न विद्यन्तेऽन्ये पुरुषोत्तमा यस्मात् । पुनरपि क्यम्भूतः, मनुजतामतीतोऽपि मनुष्यप्रकृतिरूपतामती- सोऽपि सन्नित्यंमूतोऽवि भगवन् । मनुष्य इति शस्यस उच्यसेऽधुना नरैः। किविशिष्टबालिशेः । यदि च मनुष्यमानतुल्यता भगक्त इप्यते तदा वीत. रागताविरोध इत्याह केत्यादिना-कते मनुजगमिता क च विरागसर्वरता न खलु मनुजाना मनुष्यमात्राणां गर्भ व गर्भो येषां तेषो धीतरागता सर्वज्ञता च दृष्टा, यदि मनुष्यमात्रतया तुल्यता भगवतः स्याचदा जन्मा- दिप्रसंगो, न च सोडस्तीत्याह न जन्मेत्यादिना- जन्ममरणात्मता ह यस्माचय न विद्यते तत्वतः, जन्म हि कर्मशेषाद्भवति तस्य च जन्मन्येर तत्क्षयात्कथं तस्यात् तदभावान्मरणाभाव इति ॥ २५॥ ननु मगवतो जन्माभावे कथं स्वमातृग दुत्पाद इत्याशयाह;- स्थमातुरिह यद्यपि प्रभव इप्यते गर्भतो मलैरनुपसंगतो घरसरोजपत्रेम्वुवत् ।
श्रीविद्यानदिकृतं 144 प्रतिक्षणचिभंगुरं सकलसंस्कृतं चेप्यते ननु स्वमतलोकलिंगपरिनिश्चयेन्याहितम् ॥ २३ ॥ पृथग्जनेति-पृथग्जना रागादिमन्तस्तेषां मनोऽनुकूलं मनोशमारे सोगतेः कृतं शासनं दर्शनं । कीरशे तरित्याह सुसेनेत्यादिना- सुसेन काय- क्लेश विना सुरस पारलौकिकमाहादरूपमाप्यते प्राप्यते न तपसा fदि. शिष्टस्तैः कृतमवश्येन्द्रियम्तयेष्यते। नित्सकलसंस्कृतं । कथंभूतं, प्रतिक्षण- विभंगुर क्षण क्षणं प्रति विभंगुरं विनश्वरं । अब नन्वित्यादिना स्वमतादि- विरोध दर्शयति-स्वमतञ्च लोकश्च लिट् च तेषां परिनिश्चयास्ताहत विरुद्ध तत्र स्वमतपरिनिश्चयेन विरोधस्तावत् न तपसा सुसं प्राप्यत इति यदतः शिरोमुण्डनमाचर्यादिवतधारणेनानायसलात, तथा यारायं यच्च दूरे ध्यवस्थितम् । तत्सर्व तपसा साध्यं तपो हिरति । मम् " इति लोकपतीत्या च विरोध:, प्रत्यक्षे विभंगुरमित्यस्य च सर्व कपगिनित्यं प्रत्यभिज्ञायमानत्यादित्यादिलिनपरिनिश्चयेन च्यापात: ॥२२॥ सन्ताने प्रत्यभिज्ञानादे प्रवृतेर्न तयापात इत्याशा निराकुमार, न सन्ततिरनश्वरी न हिच नभ्वरी नो द्विधा यनादियाभाय पय यत इष्यते तस्यतः । पृथेय कृषिदानशीलमुनियननादिक्रिया कथभिविनश्वरी यति भयेप्रतिमाक्षति ॥ २४॥ नसन्ततिनियादिना-सा हि सन्ततिक्षणिक क्षणिक उमयमा का स्यादिनि पक्षवयमध्ययनमिति नेत्यादिना इशंपनि ने मलनि राम्ता- नोऽनश्ची निया न घिनश्वनी द्विगन ॥ मा न समाति पनादिनमात्र यन यतेतपत । परि 10 + गाना नित्यानित्या मामयया पायात, न मा. पतालः परमाता मात्र मनजिन 11 नादिया पर नियन नमिलादिया, RARTHA पागा 11 th Rोमियते पाघ्रकेसरिस्तोत्रम् । ११५ विहाय न किंचिदनं नगर पा वास्तवं सोगतेरिष्टं । तथा क्षणिकक्षणा- विहाय न सन्ततिरपि भवतु तदमावः को दोष इत्याह वेत्यादिना- पृथैव निष्फ्लेव । केत्याह कृषीत्यादिना-कृषिश्च दानव शीलं च मुनि चन्दना च ता आदयो यास ताश्च ता क्रियाश्च । अयेतदोषमयात्कर्ष. चिदविनश्वरी सन्ततिरिष्यते तथा सर्व क्षणिकमिति भवेत्यतिशाक्षतिः॥२४॥ अधुना अँने केपली चिरजीविमनुष्यत्वान्दोगभूमिजवादिस्यत्र हेतोरसि- दतामुद्भावयन्नाह अनन्यपुरुपोत्तमो मनुजतामतीतोऽपि स- मनुष्य इति शस्यसे त्यमधुना नरैलिसः। कते मनुजगर्भिता क्व च विरागसर्यक्षता न जन्ममरणात्मता हि तव विद्यते तत्त्वतः ॥ २५ ॥ अनन्येति-हे जिन! त्वमनन्यपुरुषोत्तमः न विद्यन्तेऽन्ये पुरुषोचमा यस्मात् । पुनरपि कथम्भूतः, मनुजतामतीतोऽपि मनुष्यप्रतिरूपतामती. सोऽपि सन्नित्यंभूनोऽपि भगवन् ! मनुष्य इति शस्यस उप्पसेऽधुना नरः । किविशिष्ट टिशः । याद च मनुष्यमात्रतुल्यता भगक्षत इष्यते तदा धीत- रागताविरोध इत्याह फेत्यादिना-कते मनुजगमिता क च विरागसर्वशता न खलु मनुजाना मनुष्यमात्राणां गर्भ व गर्भो येषां तेषां धीतरागता सर्वज्ञता च दृष्टा, यदि मनुष्यमात्रतया तुल्यता भगवतः स्याताजन्मा- विमसंगो, न च सोऽस्तीत्याह न जन्मेत्यादिना-जन्ममरणात्मता हि यस्माचवन वियते तत्वतः, जन्म हि कर्मशेषाद्भवति तस्य च जन्मन्येच तत्क्षयात्कथं तस्यात् तदभावान्मरणाभाव इति। २५ ॥ ननु भगवतो जम्मामावे कथं स्वमातूगर्भादुत्पाद प्रत्याशयाह;- स्यमातुरिह यधपि प्रभव इप्यते गर्भतो मलैरनुपसंमुतो परसरोजपत्रेभ्युपत् ।
श्रीविद्यानं दिकृतं -Mamw-- " । " प्रतिक्षणधिभंगुरं सकलसंस्कृतं चेष्यते ननु स्वमतलोकलिंगपरिनिश्चययाहितम् ॥२३॥ प्रयाजनेति-प्याजना रागादिमन्तस्तेषां मनोऽनुकूलं मनोशमारेर सौगतैः कृतं शासन दर्शनं । कीदृशं तदित्याह सुखेनेत्यादिना- सुसेन पार क्लेश विना मुस पारलौकिकमाहादरूपमाप्यते प्राप्यते न तपसा ft शिटेरतेः कृतमवश्येन्द्रियैस्तथेष्यते। किं तत्सकलसंस्कृतं । कथंभूत, प्रतिक्षण- निर्मगुर क्षणं क्षणं प्रति विभंगुरं विनश्वरं । अब नन्वित्यादिना समतार- विरोध दर्शयति- स्वमतश लोकश्च लिव तेषां परिनियालेन्योल विरुदत स्वमतपरिनिभयेन रोिधस्तावत न सपसा सुखं प्राप्यतत বনঃ হিনমন্যথাইনঘাযতীনালখাযp, বগ यसराय यधरे यास्थितम । तत्सर्व तपसा सायं तपो हिरति. काम् पति लोहरतीत्या स विरोध:, पन्यो भिंगुरमित्यस्य १ सई कमगिभित्यं पन्यभिज्ञायमान वादियादिलिट्रपगिनिधयेन ध्यापातः॥२॥ सन्ताने प्रत्यभिज्ञानाद नर्न नयापान यानि म सन्ततिरनन्धरी न हिमनपरी नो विधा যাপন্যায় যে এর যে খস: । বুখৰ ফুৰিামাপনিষপনাকিয়া कधिविमरी यति भयप्रतिदक्षनym न तिमियादिना सा नमनिमणि III 11 मारिन पायमययनवियादिना शयान भी नियानी 1111 कलादिमाmama141 निमाविला HA..." यमन मा भRam in ) पर Teri aan, Ram Prefini +मनमना- 44 4 पात्रकेसरिस्तोत्रम्। । - विहाय न किंचिदनं नगर पा पास्तव तोगतेरिष्ट । तथा दणिकक्षगा- विहाय न सन्ततिरवि भवतु तदमाषः को दोष त्याह वृधवेत्यादिना-- पथेव निष्फलेव । केन्याह पपीत्यादिना-वृषिक्ष दानश शीट च मुनि- पन्दना यता आइयो पास ताश्च ताः पिया । मतदोषमयात. चिदविनश्वरी सन्ततिरिष्यते सपा सर्व क्षणिनिति भवत्पतिशासति ॥१४॥ अधुना भुने कपी धिरजीविमनुप्यत्वानोगभूमिजबदिस्य नोरलि. खतामुनादयनाए- अनन्यपुरुषोत्तमो मनुजतामतीतोऽपिल- मनुष्य इति तस्यरो स्यमधुना मरालिदी। कते मनुजगर्भिता कच विरागसाता म जन्ममरणारमता दिप घिद्यते तस्यतः ॥ १५॥ अनन्येति-2 मिन! लमनन्यपुरषोत्तमः म विचन्तन्ये पुरषोतमा यामात् । पुनरपि याभूगः, मनु मतामतीतो वि मनुष्यतिरूपतामती- तोऽपि सनियंभूतोऽपि भगवन ! मनुष्य इतिहास उच्य ना मरे । विशिष्टबालिसः । यहि च मनुष्पमामतुल्यता भगवा फोदा - लागताविरोध याहत्यादिमा- मनुमगनता विरागसरता नसटु मनुजाना मनुष्यमाण गर्भ १५ गर्भो पोतेपदीलगता सर्वज्ञता का परि मनुष्यमावता पता भगवा स्पासास- दिगो, म च सोडतीत्याह ने अम्रपापिना- जन्ममरणाममा ह घरमा नविते तयन., जन्महिषासन्मिन्या सक्षम हस्यात् तदभावान्मरणाभा९ि५। अनुभगवनो नामाभारे TE TREATMENTr;- रबमारिद पपविभव गर्भमो मरीनुरली परसरोजपपर।
श्रीविद्याने विकृत -- प्रतिक्षणविमंगुर सकलसंस्कृतं चेप्यते ननु स्वमतलोकलिंगपरिनिश्चयाहितम् ॥ २३ ॥ पृथग्जनेति-~-प्रथाजना रागादिमन्तस्तेषां मनोऽनुलं मनोज्ञमरे सौगतेः कृतं शासनं दर्शन। कीदृशं तदित्याह सुसेनेत्यादिना- सुखेन काय क्लेशं विना मुलं पारलौकिकमाहादरूपमाप्यते प्राप्यते न तपसा कि- शिस्तिः कृतमवस्येन्द्रियैस्तथेष्यते। नित्सकलसंस्कृतं कथंभूतं, प्रतिक्षण- विभंगुरं क्षणं क्षणं प्रति विभंगुरं विनश्वरं । अब नन्वित्यादिना स्वमतादि- विरोध दर्शयति-- स्वमतश्च लोकश्च लिव तेषां परिनिश्चयास्ताहत विरुद्ध तत्र स्वमतपरिनिश्चयेन विरोधस्तावत न तपसा मुस्तै प्राप्यत इति वदतः शिरोमुण्डनब्रह्मचर्यादिवतधारणेनानायप्रसङ्गात्, तथा " " यरं यदुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम् । तत्सर्व तपसा साध्यं तपो हि दुरति- झमम्" इति लोकप्रतीत्या च विरोधः, प्रत्यक्षे विभगुरमित्यस्य च सर्व कमचिन्नित्यं प्रत्यभिज्ञायमानत्वादित्यादिलिङ्गपरिनिश्चयेन व्याघातः ॥२३॥ सन्ताने प्रत्यभिज्ञानावे प्रवृत्तेर्न तव्याघात इत्यागड़ा निराकुर्वनाहर म सन्ततिरनश्वरी न हि च नश्वरी नो द्विधा बनादियदभाव एव यत इष्यते तत्त्वतः। वृथैव कृपिदानशीलमुनिवन्दनादिकिया कश्चिदविनश्वरी यदि भवेत्मतिज्ञाक्षतिः ॥ २४ ॥ न सन्ततिरित्यादिना-सा हि सन्ततिरक्षणिका क्षणिका उभयरूपा वा स्यादिति पक्षवयमध्ययुक्तमिति नेत्यादिना दर्शयति-~न सन्तति सन्ता- नोऽनश्वरी नित्या न हि व नश्वरी नो दिया कुत इ.4 सा न सम्भवति वनादिवदमाव एवं यत प्यते तत्वत । यदि हि मन्तनियमनुभना मतदा नित्यानित्या चोमयरूपा वा स्यात्, न चासो सम्ममता सोगतरिष्यते यतस्तत्वतः परमार्थतो मात्र एन सन्ततेरिध्यते विवत् वतादिवत, यथे हिवनं नगरमित्यादिस्परहार , न हि वृक्ष विशेषान गृहप्रासादविशेषोश - पात्रकेसरिस्तोत्रम् । - । विहाय न किंचिदनं नगर पा वास्तवं सोगतेरिटं । तथा क्षणिकक्षणा- विहाय न सन्ततिरपि भवतु तदमावः को दोष इत्याह वृधवेत्यादिना- दृथैव निष्फलेव । केत्याह कृषीत्यादिना- कृषिश्च दानश शीलं च मुनि- चन्दना च ता आदयो यासां ताश्च ता. क्रियाश्च । अधैतदोषमयात्कर्ष- चिदविनश्वरी सन्ततिरिष्यते तथा सर्व क्षणिकमिति भवेत्सतिशाक्षति.॥२४॥ अधुना भुक्ने केपली चिरीविमनुष्यत्वान्दोगभूमिजपदित्यत्र हेतोरसि- दतामुद्भावयन्नाह;- अनन्यपुरुपोत्तमो मनुजतामतीतोऽपि स- मनुष्य इति शस्यसे त्वमधुना नालिशः। कते मनुजगर्भिता क च विरागसर्वज्ञता न जन्ममरणात्मता हि तय विद्यते तत्त्वतः २५ ॥ अनन्येति-हे जिन । वमनन्यपुरुषोत्तमः न विद्यन्ते ये पुरुषोचमा यस्मात् । पुनरपि कथम्मतः, मनुजतामतीतोऽपि मनुष्यप्रतिरूपतामती- तोऽपि सनित्थंभूतोऽपि भगवन् | मनुष्य इति शस्यस उज्यसेऽधुना नरैः। किविशिष्टोलिशैः । यदि च मनुष्यमानतुल्यता भगवत प्यते तदा पीत- रागताविरोध इत्याह केत्यादिना-कते मनुनाभिताक पविरामसरता न खलु मनुजाना मनुष्यमात्राणां गर्भ व गर्भो येषां तेषी वीतरागता सर्वशता व हटा, पदि मनुष्यमात्रतया तुल्यता भगवतः स्यात्ताजन्मा- दिप्रसंगो, म च सोऽस्तीत्याह न जन्मेत्यादिना- जन्ममरणात्मता हि यस्माचव न वियते सत्त्वतः, जन्म हिमशेषाद्धपति तस्य च जन्मन्येर तत्क्षयात्कथं तस्यात् तदभावान्मरणाभाष इति ॥२५॥ ननु भागवतो जम्मामावे कथं स्वमातृग दुत्पाद हरयाशया;- स्थमातुरिद यति प्रभव हप्यते गर्भतो मलेरनुपसंमुतो परसरोजपत्रेश्वद ।
श्रीविद्या विकृत -- - प्रतिक्षणविर्मगुरं सकलसंस्कृतं चेप्यते मनु स्वमतलोकलिंगपरिनिश्चयव्याहितम् ॥ २३ ॥ पृयग्जनेति-पृधाजना रागादिमन्तस्तेयां मनोऽनुकूलं मनोज्ञमपरैः सोगतैः कृतं शासन दर्शनं । कोहश तदित्याह सुखेनेत्यादिना सुसेन हाय- क्लेश विना सुखं पारलौकिकमाझादरूपमायते माध्यते न तपसा। विदि. शिष्टस्तेः कृतमवस्येन्द्रियैस्तथेष्यते । कि तत्मकलसंस्कृतं । कयंमूत, प्रतिक्षण- विमंगुरं क्षण क्षणं प्रति विभंगुरं विनश्वरं । अब नन्वित्यादिना स्वमतादि विरोध दर्शयति-- स्वमतञ्च लोकश्च लिई च तेषां परिनिश्चयास्ताहत विरुद्ध तत्र स्वमतपरिनिश्चयेन विरोधस्तावत् न तपसा सुसं प्राप्यत इति वदतः शिरोमुण्डनब्रह्मचर्यादिवतधारणेनानस्यप्रसङ्गात, तथा यडूर यदुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम् । ताम तपसा माध्यं तपो हि दुरति क्रमम् " इति लोकपतीत्या च विरोधः, प्रत्यक्षे विभंगुरमित्यस्य च सर्व कपश्चिमित्यं प्रत्यभिज्ञायमानत्वादित्यादिलिङ्गापरिनिश्चयेन व्याधातः ॥२३॥ सन्ताने प्रत्यभिज्ञानाद पनेर्न तव्याधाल इत्याशङ्का निराकुमाहा न सन्ततिरमश्वरी न हि च नश्वरी नो द्विधा वनादिवदभाव पर यत इप्यते तत्त्वतः । वृयव कृपिदानशीलमुनिवन्दनादिकिया कश्चिदविनश्वरी यदि भवेत्यतिज्ञाक्षतिः ॥ २४ ॥ न सन्ततिरित्यादिना- सा हि सन्ततिरक्षणिका क्षणिका उभयरूपा या स्यादिति पक्षत्रयमप्यतामिति नेत्यादिना दर्शयति-- न मन्तति सन्ता- नोऽनश्वरी नित्या न हि च नश्वरी नो दिशा कुत इन्य सा न सम्भवति पनादिक्दमाव एव यत इप्यते तत्वत । यदि हिमत 17 18 यातका नित्यानित्या चोभया या यात, न चामो । सौगतरिष्यते यतस्तावतः परमार्थतो:माव ए सन्ततेरिध्यते किवन पनाविधता ឧប៊ុ हिवनं नगरमित्याविश्यवहार, न शिविशेषान एमासाशा पात्रकेसरिस्तोत्रम् । - विहाय न किंचिदनं नगरं वा वास्तवं सोगतेरिष्टं । तया क्षणिकक्षणा- विहाय न सन्ततिरपि भवतु तदमावः को दोष इत्याह थेवेत्यादिना-- वृथैव निष्फलेव । केत्याह कृषीत्यादिना-कृषिश्च दानव शीलं च मुनि- बन्दना च ता आदयो यास ताश्च ताः क्रियाश्च । अथेतदोषमयात्कर्ष- चिदविनश्वरी सन्ततिरिभ्यते तथा सर्व क्षणिकमिति भवेत्भतिज्ञाक्षतिः॥२४॥ अधुना मुक्त केपली चिरजीविमनुष्यत्वान्दोगभूमिजवदित्यत्र हेतोरसि- इतामुद्भावयन्नाह- अनन्यपुरुषोत्तमो मनुजतामतीतोऽपि स- मनुष्य इति दास्यसे त्यमधुना नरैलिशः। व ते मनुजगर्भिता क घ विरागसर्वज्ञप्ता न जन्ममरणात्मता हि तय विद्यते तत्त्वतः ॥ २५ ॥ अनन्येति-हे जिन ! बमनन्यपुरुषोत्तमः न विद्यन्तेऽन्ये पुरुषोत्तमा यस्मात् । पुनरपि कथम्मूतः, मनुजतामतीतोऽपि मनुष्यमकृतिरूपतामती. तोऽपि सन्नित्यंभूतोऽपि भगवन् । मनुष्य इति शस्यस उच्यतेऽधुना नरः । किंविशिष्टेलिशैः । यदि च मनुष्यमात्रतुल्यता भगवत इप्यते तदा धीत- गताविरोध इत्याह केत्यादिना-कते मनुजगभिता क च विरागसशता न सलु मनुजाना मनुष्पमात्राणां गर्भ व गर्भो येषां तेषां वीतरागता सर्वशता च दृष्टा, यदि मनुष्यमात्रतया तुल्यता भगवतः स्याचा जन्मा- विप्रसंगो, न च सोऽस्तीत्याह न जन्मेत्यादिना-जन्ममरणात्मता हि यस्मातव न विद्यते तत्त्वतः, जन्म हि कर्मशेषाद्भवति तस्य च जन्मन्येव तत्क्षयात्कथं तत्स्यात् तदमावान्मरणाभाष इति: २५ ॥ ननु भगवतो जम्मामावे कथं स्वमातृग दुत्पाद इत्याशश्याह;- स्वमातुरिह यद्यपि प्रभव इप्यते गर्भतो मलेरनुपसंगुतो परसरोजपत्रेयद ।
११४ श्रीविद्यानदिकृतं noun प्रतिक्षणधिमंगुरं सकलसंस्कृतं चेप्यते ननु स्यमतलीकलिंगपरिनिशययाहितम् ॥ २३ ॥ पृयजनेति-पृथाजना रागादिमन्तस्तेषां मनोऽनुकूलं मनोसमपरैः सोगतैः कृतं शासन दर्शनं । कीदृशं तदित्याह सुखेनेत्यादिना- सुखेन काय क्लेशं विना सर्व पारलौकिकमाहादरूपमाप्यते प्राप्यते न तपसाIf. शिस्तैः कृतमत्स्येन्द्रियस्तथेष्यते । किं तत्सकलसंस्कृतं कथंभूतं, प्रतिक्षण- विमंगुर क्षण क्षणं प्रति विभंगुरं विनश्वरं । अब नन्वित्यादिना स्वमतादि- विरोध दर्शयति- स्वमतञ्च लोकश्च लिव तेषां परिनिश्चयास्ताहत विरुद्ध तत्र स्वमतपरिनिश्चयेन विरोधस्तावत न तपसा सुखं प्राप्यत इति घदतः शिरोमुण्डनब्रह्मचर्यादिवनधारणेनानायमसङ्गात, तथा " यहूर यदुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम् । तत्सर्व तपसा साध्यं तपो हिरति- भमा " इति लोकपतीत्या च विरोधः, प्रत्यक्षे विभंगुरमित्यस्य च सई कविनित्यं प्रत्यभिज्ञायमानत्याशियादिलिपरिनिश्चयेन व्यापातः ॥२२॥ सन्ताने प्रत्यभिज्ञानादे प्रवृत्तेर्न तयाघात इत्याशङ्की निराकुर्वमहा- न सन्ततिरनश्वरी न हि घ नभ्वरी मी द्विधा यनादियदमाय एय यत इप्यते तत्त्वतः । पृथय कृपिहानशीलमुनियननादिकिया कधिविनम्वरी यदि भवत्प्रतिमा क्षति ॥२४॥ नसन्ततिरित्यादिना-सा हि सन्ततिक्षणिका मणिका उभयरूपा का स्यादिति पक्षत्रयमप्ययतामिति नेत्यादिना दशंपति - मन्तनि सन्ता- बोनी ने निश्ची नो दिया न ५ मा न सम्मति पनादिवशमा त यत पयले तायन । यदिम 4 101 पाना नित्यानित्या बाRAKAT या स्यात, म 11 महिपते यतस्तावतः परमार्थन:मात्र सम्ननि 11 नाति पा दिन नसमित्यादिश्यवहार, सोनागाविशेष पात्रकेसरिस्तोत्रम् । - -- विहाय न किंचिदनं नगर पा पास्तवं सौगतेरिष्टं । तथा क्षणिकक्षणा- विहाय न सन्ततिरपि भवतु तदमावः को दोष इत्याह प्रथेवेत्यादिना- स्थैव निष्फलेव । केत्याह कृषीत्यादिना-कृषिश्व दानव शीलं च मुनि. पन्दना घ ता आदयो यासां ताश्च ताः कियाश्च । अयेतदोषमयात्कर्ष चिदविनश्वरी सन्ततिरिष्यते तथा सर्व क्षणिकमिति भवेत्पतिज्ञाक्षतिः॥२४॥ अधुना मुंते केवली चिरजीविमनुष्यत्वाद्रोगभूमिजवादित्यत्र हेतोरसि- खतामुद्भावयन्नाहा- अनन्यपुरुपोत्तमो मनुजतामतीतोऽपि स- मनुष्य इति शस्यसे त्वमधुना नरैलिशः। कते मनुजगर्भिता क च विरागसर्वाता न जन्ममरणात्मता हि तव विद्यते तत्त्वतः ॥ २५॥ अनन्येति-हे जिन! वमनन्यपुरुषोत्तमः न विद्यन्तेऽन्ये पुरुषोचमा यस्मात् । पुनरपि कथम्भूतः, मनुजतामतीतोऽपि मनुष्यप्रकृतिरूपतामती- सोऽपि सनित्यंभूतोऽपि भगवन ! मनुष्य इति शस्यस उच्यतेऽधुना नरैः । किविशिष्टे टिशः । यदि च मनुष्यमानतुल्यता भगवत इष्यते तदा धीत. रागताविरोध इत्याह केत्यादिना-कते मनुजगर्भिता क च विरागसर्वशता न सलु मनुजाना मनुष्यमात्राणो गर्भ व गर्भो येषां तेषां धीतरागता सर्वशता चहा, यदि मनुष्यमात्रतया तुल्यता भगवतः स्याचदा जन्मा- दिप्रसंगो, न प सोऽस्तीत्याह न जन्मेत्यादिना-जन्ममरणात्मता हि यस्मातव न विद्यते तत्त्वतः , जन्म हिकर्मशेषाद्भवति तस्य च जन्मन्येव तरक्षयात्कथं तत्स्यात् तदभावान्मरणाभाव इति ॥ २५ ॥ ननु भगवतो जन्मामावे कथं स्वमातूगर्भादुत्पाद हरपारान्याह;- स्थमातरिह यद्यपि अभय इप्यते गर्भतो मलेरनुपसंतो घरसरोजपत्रेबुवत् ।
११४ श्रीविद्यानं दिकृतं प्रतिक्षणविभंगुरं सकलसंस्कृतं चेष्यते मनु स्वमतलोकलिंगपरिनिश्चयेाहितम् ॥ २३ ॥ पृयग्जनेति-पृथानना रागादिनन्तस्तेषां मनोऽनुकूलं मनोजमरः सोगतैः कृतं शासनं दर्शनं । कीदृश तदित्याह मुखेनेत्यादिना- सुखेन कोय- केशं विना सुखं पारलौकिकमाहादरूपमाप्यते प्राप्यते न तपसार विवि. शिष्टस्तैः कृतमवश्येन्द्रियैस्तथेष्यते । किं तत्सकलसंस्कृतं । कयंभूत, प्रतिक्षण- विर्मगुरं क्षण क्षणं प्रति विभंगुरं विनश्वरं । अब नन्वित्यादिना स्वमतादि विरोध दर्शयति- स्वमतञ्च लोकश्च लिहूं च तेषां परिनिश्चयास्ताहत विरुद्ध तब स्वमतपरिनिश्चयेन शिरोधस्तावत न तपसा सुख प्राप्यत इति बदतः शिरोमुण्डनब्रह्मचर्यादिवतधारयोनानायप्रसङ्गात्, तथा । यदूर यदुराराध्यं यच दूरे व्यवस्थितम् । तत्म तपसा माध्यं तपो हिदुरति. जमम् ॥ इति लोकप्रतीत्या च विरोधः, प्रत्यक्षे विभगुरमित्यस्य च सर्व पश्चिन्नित्यं प्रत्यभिज्ञायमानत्वादित्यादिलिङ्गपरिनिश्चयेन व्याधातः॥२३॥ सन्ताने प्रत्यभिज्ञानादे प्रवृत्तेर्न तव्याघात इत्याशहां निराकुर्वनाहर म सन्ततिरनश्वरी न हि च नश्वरी नी द्विधा बनादिवसाय एवं यत इप्यते तत्वतः । पृथैव कृपिहानशीलमुनिवन्दनादिकिया कश्चिदविनम्वरी यदि भवत्प्रतिज्ञाक्षतिः ॥ २४ ॥ न सन्ततिरित्यादिना- सा हि सन्ततिरक्षणिक क्षणिका उभयरूपा का स्मादिति पक्षश्यमध्ययुक्तमिति नेत्यादिना दर्शयति-~न मन्तनि सन्ता. नोऽनश्वरी नित्या न हि च नश्वरी नी दिय कुन इन्य सान सम्भवति पनादिवभाव एष मत इप्यते तत्वत । यदि तदा नित्यानित्या चीमयाप वा स्यात, न शाम 4 सोगतरिष्यते मततावत: परमार्थतो मात्र मानतेरिष्यतेविन नादिया यधेर हिवन नगरमित्यादिम्यवहार, न हि भविशेषार गुहागर .
पात्रकेसरिस्तोत्रम् । । विहाय न किंचिदनं नगर या वास्तवं सोगतेरिदै । तथा क्षणिकक्षणा- विहाय न सन्ततिरपि भवतु सदभावः को दोष इत्याह थैवेत्यादिना- वृथव निष्फ्लेव । केत्याइ कृषीत्यादिना-दृषिश्च दानव शीलं च मुनि- वन्दना च ता आइयो यासा ताश्च ताः क्रियाश्च । अथैतदोषमयात्क- चिदविनश्वरी सन्ततिरिभ्यते तथा सर्व क्षणिकमिति भवेत्रतिज्ञाक्षतिः॥२४॥ अधुना मुंक्ते केपली चिरजीविमनुष्यत्वाद्गोगभूमिजवदित्यत्र हेतोरसि- दतामुदायमाइ:- अनन्यपुरुपोत्तमो मनुजतामतीतोऽपि स- मनुष्य इति शस्यसे त्वमधुना नलिस। क हे मनुजगर्मिता क च विरागसर्वज्ञता न जन्ममरणात्मता हितव विद्यते तत्त्वतः ॥ २५ ॥ अनन्येति-हे जिन! त्वमनन्यपुरुषोत्तमः न वियन्तेऽन्ये पुरुषोत्तमा यस्मात् । पुनरपि कयम्भूतः, मनुनतामतीतोऽपि मनुष्यप्रतिरूपतामती- तोऽपि सनित्थंभूतोऽवि भगवन् | मनुष्य इति शस्यस उच्यसेऽधुना नरैः । विशिष्टेलिशैः । यदि च मनुष्यमात्रतुल्यता भगवत प्यते तदा पीत. रागताविरोध इत्याह केत्यादिना-कते मनु नगर्भिता क च विरागसर्वगता न खलु मनुजाना मनुष्यमात्राणां गर्भ व गर्भो येषां तेषां वीतरागता सर्वशता च एा, यदि मनुध्यमानतया तुल्यता भगवतः स्याचदा जन्मा- दिप्रसंगो, म च सोरतीत्याह न जन्मेत्यादिना-जन्ममरणात्मता ह यस्माचय न विद्यते तत्त्वतः, जन्म हिकर्मशेषाद्भवति तस्य च जन्मन्येर तत्क्षयात्कथं तत्स्यात् तदभावान्मरणाभाव इति ॥२५॥ भगवतो जन्माभावे कथं स्वमातृग दुत्पाद इत्याशश्चा- स्वमातुरिद यद्यपि प्रभय इप्यते गर्मतो मलैरनुपसंगतो घरसरोजपश्यद ।
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