Sanmati Library, Jaipur
Upnayan Paddhati
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भूमिका। .द्विजोका यथालमय और यथाविधि उपनयन होना अति आव- श्यक है। इसीके होनेसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य द्विजन्मा कहलाते हैं। दूसरे संस्कार यदि कुसमय हों तो इतनी हानि नहीं हो सकती जितनी यज्ञोपवीतके न होनेसे हो सकती है, कारण यह है कि यज्ञो- पवीत होनेले ही वालक वेदाध्ययन इत्यादिका अधिकारी होता है। यदि यह अत्युपयोगी संस्कार यथावत् कराया जाय तो पठन, पाठन और यज्ञ इत्यादि सबमें सुलभता होती है। अब तक जितने ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं बे या तो बहुत बड़े हैं जिनमें अनेक अनुपयोगी विषय लिखे हैं या अति लघु हैं जो पर्याप्त नहीं हैं। इस पुस्तकमे सरल भाषामें सब विषय पूर्ण रीतिले लिखे हैं जितना उपयोग कर्मकाण्डी लोग सरल रीतिसे कर सकते हैं। उप- क्रमणिकाओके लगानेसे यह पुस्तक और भी अमूल्य कर दी गई है। इन उपक्रमणिकाओंमें उपनयनके मुहूर्त, यज्ञोपवीत धारण, वेदारम्भ समावर्तन, वेदोका अनध्याय इत्यादि पूर्ण रूपसे लिखा गया है। यदि इस पुस्तकमे कोई अशुद्धि रह गई हो तो पाठकगण कृपा कर प्रकाशकके पास लिख भेजें तो वे अति भनुगृहीत होंगे और पुनरावृत्तिमें पुस्तक और भी शुद्ध और लाभकारी हो जायगी। . सम्पादक।
श्रीगणेशायनमः भाषाटीकासहित यजुर्वेदीय उपनयनपद्धतिः MuSAGAR श्रीगणेशाय नमः । अयोपनयनम् । तत्र शुद्धसपये रविगुरुचन्द्र तारादिशुद्धौ जन्मतो गर्भाष्टमेऽन्दे वानूकूल्ये पोड़पसंवत्सराभ्य- न्तरे ब्रह्मवर्चसकामस्य पञ्चमेप्युदगयन आपूर्यमाण पक्षेऽनध्याय षष्ठीरिक्तायतिरिक्ततिथौ रविगुरुशुक्रान्यतमवारे मध्यावादाक् कुमारपित्राभ्युदयिके कृते तदभावे आचार्येणैव कृते ब्रालणान्मा- एवकंच भोजयिखा सशिखकृततौर स्नानान्तरं यथाशक्यलंकना बहिशालायां तुषकेशशर्करादिशून्यपरिष्कृवभूमौ आचार्योंग्नि- स्थापनं कुर्यात् । श्रीगणेशायनमः । शुद्ध समयमें अर्थात् शुभ मुहूर्त निश्चित करके रवि, गुरु, चन्द्र, तारा, इत्यादिके शुद्धताका पूर्ण विचार करके जन्मसे अथवा गर्भ से श्राठवें भवरसमें ('गर्भाष्टमे का अर्थ यह है कि जबसे चालक गर्भने आया तवसे आठवे घरलमें-इस विचारमें बालक की आधुनिक अवस्थामै नौ महीना जोड़ना चाहिये) अनुकूल समयमें सोलह बरसके भीतर कर; अथवा यदि पुत्रके ब्रह्म तेजकी अभिलाषा हो तो पांचवें वरसमें सूर्य जव उत्तरायण हो तब शुक्ल पक्ष में अना- "ध्याय पष्ठी, चतुर्दशी और नवमीके अतिरिक्त अन्य शुभ तिथियों में रवि, गुरु तथा शुक्रवारके दिन मध्याह्नसे पहिले वालकका पिता नान्दी * पाठवां वर्ष बामणके वास्ते लिखा है, ग्यारहवां वर्ष त्रियके लिये और बारहवीं वैश्यके लिये समझना चाहिये ।
[ २ ] श्राद्ध करे, और पिताके न होने पर प्राचार्य ही नान्दी मुख श्राद्ध करे। इसके अनन्तर ब्राह्मण और वालकोंको भोजन करा, शिखा सहित क्षौर करा स्नान कराके 'यथाशक्ति आभूषण पहना कर शालाके वाहर ऐसे स्थानमें आचार्य अग्नि स्थापन करे जहां घास, रेह अथवा चाल न हो। (अर्थात् शुद्ध स्थान देखकर अग्निस्थापन होना चाहिये). तत्र हस्तमात्रपरिमितचतुरस्त्रभूमि कुशकरण- कसमूहनानन्तरं गोमयोदकेनोपलिप्य सुवमूलेन प्रा- गयप्रादेशमात्रमुत्तरोत्तरक्रमेण त्रिरुल्लिख्य उल्लेखन क्रमेणाऽनामिकांगुष्ठाभ्यां मृदमुद्धृत्य जलेनाऽभ्युक्ष नवीनकांस्यपात्रेणाग्निमानीय खाऽभिमुखंनिदध्यात् । वहां (अर्थात् अग्निस्थापन करते समय) एकवेदी चौकोर एक हाथ लंबी और उतनी ही चौड़ी (चौरस भूमिपर) वनावे और उसको कुशो- से झाड़कर गायके. गोबरसे लीपकर नुवाके मूल भाग (अर्थात् डंडीके किनारेसे) अपने प्रागेके भागसे प्रारम्भ करे और हाथ फैला- कर दूर ले जाकर एक रेखा खींचे, उत्तरसे प्रारम्भ करके तीन ऐसी रेखा खींचे और इसी खिंची हुई रेखाके क्रमसे कानी उंगली और अंगूठेसे मिट्टी उसी वेदीमेसे निकालकर आगेकी ओर फेके उसके अनन्तर जलसे सिंचनकर (अर्थात् जल छिड़ककर)नई काँसेकी थालीमें अग्निदेवताको मंगवा अपने सामने पूरवकी ओर रक्खे। . ततः कुमारमाचार्यः शिष्यद्वाराग्नेः पश्चादक्षि- सपार्श्वेऽवस्थापयति । ततः कुमारं बद्धाञ्जलिं संबो- धयति.। ॐब्रह्मचर्यमागामिति बहीति प्रैषानन्त- रम् । ॐ ब्रह्मचर्यमामामितिकुमार आह। ततःॐ * शिला सहित सौर कराना वैदिक श्रेष्ठमार्ग है और केवल चौर लौकिक हैं। +शालाके बाहरका अर्थ है मैदान अपवाघरके आँगनमें, कोठरी के भीतर नहीं।
[ ३ ] ब्रह्मचार्यसानीति बहीत्याचार्येणोक्ते । ॐब्रह्मचर्य- सानीति कुमार आह । अथ माणवकुमाचार्योवासः परिधापयति । ततः आचार्यपठनीयो मन्त्रः । इसके अनन्तर शिष्य द्वारा बालकको आचार्य अग्निके दूसरे पार अपने सामने दक्खिनकी ओर बैठाता है। तव कुमारसे हाथ जोड़वा- कर नाम लेकर पुकारता है और कहता है "ॐ ब्रह्मचर्य मागामिति, ऐसा कहो (मैं इस आचार्यकी श्राशासे ब्रह्मचर्य प्राप्त करूं) तव बालक "ॐ ब्रह्मचर्य सानि" ऐसा कहता है। तब श्राचार्य कुमारको वस्त्र पहनाता है। निम्नलिखित मन्त्र श्राचार्यके पढ़ने योग्य हैं। ॐ येनेन्द्राय वृहस्पतिर्वासः पर्यदधादमृतं तेन त्वापरिदधाम्यायुषे दीर्घायुत्वाय चलाय वर्चसे । ततो माणवकस्य द्विराचमनम् । अथ माणवकस्य वेष्टनत्रयेण तत्प्रवरग्रथितां मेखलामाचार्यों बनाति । तत्र माणवकपठनीयो मंत्रः। मन्त्रोंका अर्थ-वृहस्पति (देवताओके गुरु) ने जिस विधिसे यह अमृत (अर्थात् अपूर्व, सर्व दोपरहित) वस्त्र इन्द्रको पहनाया, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारा आयुष्य, वल और तेज बढ़ानेके निमित्त पहनाता हूँ। वस्त्र धारण करनेके बाद प्राचार्य कुमारको दो चार आचमन करावे। तव श्राचार्य कुमारके जितने प्रवर हो उतनी गाँठ देकर तीन बार जकी करधनी उसके कमरमें लपेटे । तब निम्न- लिखित मन्त्र बालकको पढ़ना चाहिये। ॐ इयंदुरुक्तं परिवाधमाना वर्णं पवित्रं पुनती- १ स्नात्वा पोत्वा शुते सुप्ते भुक्का रथ्योपसपणे । श्राचान्तः पुनराचामेद्वासो परिविधाय च ॥ १ ॥ इति याज्ञवल्क्यः । अर्थात स्नान, पान, छींकके वाद, तथा सोकर उठने पर, मोनन करने पर बनारसे श्राकर और वन पहनकर दो वार चमन करना चाहिये । ३ [ ४ ] म आंगात् । प्राणापानाभ्यां बलमादधाना खसा देवी सुभगा मेखलेयम् ॥ १ ॥ ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान्भवति जायमानः ।। ते धीरासः कवय उन्नयन्ति खाध्यो मनसा देवयन्त इति वा ॥२॥ तत आचाराद्यज्ञोपवीतसहितभां- डाष्टतयं ब्राह्मणेभ्यो दत्वा तत्सदद्यामुकगोत्रः ख- कीयोपनयनकर्मविषयकसत्संस्कारप्रात्यर्थे इदं भा- ण्डाष्टतयं सयज्ञोपवीतं सदक्षिणं यथायथानामेति । मन्त्रका अर्थ-यह पूँजकी करधनी मेरे दुष्ट वचनोंको खण्डन करती हुई और वर्णको पवित्र करती हुई आई; यह मेखला प्राण और अपानसे वलकी वृद्धि करती हुई भगिनीके सदृश यह देवी (स्तुति योग्य ) है । अथवा “ॐ युवा सुबा सुवासाः इत्यादि मन्त्र पढ़ कर मेखला वांधे। इसके अनन्तर आचारसे यज्ञोपवीतके सहित श्राठ पात्र (मिट्टीके कलश) ब्राह्मणोंको देता हुश्रा सङ्कल्प :-"ॐ तत्सत् इत्यादि देशकाल स्मरण करके अमुकगोत्र वाला मैं अपने उपनयन संस्कारकी श्रेष्ठताके निमित्त ( यज्ञोपवीत दक्षिणा- सहित) ये आठ पात्र अमुक अमुक (यहां पर जिन जिन गोत्रवाले ब्राह्मणोको ये दिये जाँय उनके गोत्रका नाम लेना चाहिये ) गोत्रके ब्राह्मणोंको देता हूँ। ततो यज्ञोपवीतं परिदधाति माणवकः । ॐ यज्ञोपवीत. मिति मन्त्रस्य परमेष्ठी ऋषि लिङ्गोक्ता देवता त्रिष्टुप्छन्दो यज्ञो- पवीतपरिधाने विनियोगः। ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजा- पतेर्यत्सहज पुरस्तात् । आयुष्यमयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं वलमस्तु तेजः ॥ इति मन्त्र- इसके बाद कुमार निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर यज्ञोपवीत धारण करे । मन्त्रार्थ:-ॐ यज्ञोपवीतं इत्यादि मन्त्रका परमेष्ठी ऋषि है, [ ५ ] लिलोक्ता देवता है और इसका विनियोग यज्ञोपवीत पहननेमें है। हे कुमार! इस पवित्र यज्ञोपवीतको धारण कर जो ब्रह्मके साथ उत्पन्न हुआ और आयुष्यकी वृद्धि करनेवाला है यह यज्ञोपवीत तेरा बल और तेज हो (अर्थात् इसके धारण करनेसे तेरा बल और तेज बढ़े)। तत ऐणेयमजिनं तूष्णीं परिधत्ते । ततो मा- णवकः केशपरिमितपालाशदण्डमाचार्यः तूष्णी तस्मै प्रयच्छति । तं च यो मे दंड इति प्रजाप- तिषिर्दण्डो देवता यजुर्दण्ड ग्रहणे विनियोगः । ॐ यो मे दण्डः परापत द्वैहायसोधिभूम्याम् । तमहं पुनरादद आयुषे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय । इति मंत्रेण माणवको दण्डं गृह्णाति । तव कुमार चुपचाप (अर्थात् बिना मन्त्रका उच्चारण किये) काले मृगके चर्सको धारण करता है। तब श्राचार्य बालकको विना मन्त्र पढ़े केश इतना ऊँचा (अर्थात् पैरसे लेकर जहां तक शिखा पहुँचे उतना ऊंचा) पलासका दण्ड देता है और कुमार उसको "योमे दण्डः" इत्यादि मन्त्र पढ़कर धारण करता है। मन्त्रका अर्थ-"यो मे दण्डः इत्यादि" इस मन्त्रका प्रजापति ऋषि है, दण्ड देवता है, यजुस् छन्द है और दण्ड धारण करनेमें इसका विनियोग (उपयोग) है। श्राकाशसे उत्पन जो दण्ड पृथ्वीपर पड़ा उसको फिर मैं आयुष्यकी वृद्धिके लिये, वेद प्राप्त करने लिये तथा ब्रह्मचर्यके तेजके लिये धारण करता हूँ" ऊपर लिखे मन्त्रको पढ़ कर बालक दण्डको लेता है। तत आचार्यों वारिणा स्वमञ्जलिं पूरयित्वा कुमारस्याञ्जलिं तेनैवाञ्जलिजलेन पूरयति । ॐ आपोहिष्ठा मयोभुवस्तीन अर्जे दधातन । महे- । १ यजुर्वेद अध्याय ११ मन्त्र ५० [ ६ ] रणायचनसे॥१॥ ॐ योव शिवतमोरसस्तस्य भाजयतेहन उशतीरिवमातरः ॥२॥ ॐ तस्मा ऽभरङ्गमामवोयस्यक्षयायजिन्वथ । पापोजन यथा च नः ॥३॥ इति ऋग्भिः। इसके अनन्तर प्राचार्य अपनी अखलीको पानीसे भर कर कुमारकी अञ्जलीको उसी (अर्धात् अपने प्रबलीके) जलसे भर दे और निम्नलिखित मन्त्रीका उच्चारण करे। मन्त्रोंका अर्थ- आपोहिष्ठा इत्यादि तीनों मन्त्रोंका सिन्धु द्वीप ऋपि है, गायत्री छन्द है, जल देवता है और सार्जन करना इनका विनियोग है। हे जलक्षेत्र आप मुझको यश और सुख देनेवाले हो, मुझको चलके लिये तथा अन्न इत्यादिके उपभोग करनेके लिये धारण करो और अत्यन्त सुन्दर देखने योग्य वल और पुष्टि करनेवाले हो अर्थात् जैसे हम अन्न खाने में समर्थ हो, उसी प्रकारसे विधिपूर्वक स्नान इत्यादि करनेम तथा ब्रह्म साक्षात्कार में भीसमर्थ हो ॥३॥ हे जलदेव! तुम्हारे अति कल्याणकारक रसके हम भागी हो, जिस प्रकार माता पुत्रको स्तनपान इत्यादिसे पालन करती है, उसी प्रकार तुम भी मुझको पालन करो॥२॥ हे जलदेव ! जित पापके नाशके लिये उत्पन्न हुए हो उस तुम्हारे रससे हम सर्वदा तृप्त हों, हमको तुम प्रजाके उत्पन्न करनेके निमित्त समर्थ करो॥३॥ ततः सूर्यमुदीक्षस्वेति आचार्य प्रैषानन्तरम् । तञ्चक्षुर्देवहितंपुरस्ताच्छुकमुञ्चरत् ॥ पश्येमशरदः शतंजीवेमशरद शत शृणुयामशरद शतम्प्रन्न- वामशरद शतमदीना स्यामशरद-शतभूयश्चशर- द+शतात् ॥१॥ इत्यनेनादित्यपश्यति। १ यजुवेंद् अध्याय ३६ मन्त्र २४ [७] तव "सूर्यको देखो ऐसा गुरुके कहने पर निग्निलिखित मन्त्रकों पढ़ता हुाबालक सूर्यको देखता है । मन्त्रकाअर्थ:-तिचतुः इत्यादि मन्त्रका दध्यनाथर्षण ऋषि है; अक्षयतीत पुर उष्णिग छन्द है, सूर्य देवता है और सूर्यका उपस्थान विनियोग है। जो देवताओंको प्रिय, खच्छ और संसारके नेत्ररूप सूर्य भगवान् पूर्व दिशामें उदय होते हैं उनके श्राशीर्षादसे हम सौ वर्ष देखें (अर्थात् सौ वर्ष भारोग्य रहकर जीवित रहें ) सौ वर्ष तक जीते रहे, सौ वर्ष तक सुनते रहे अर्थात् सौ बरस तक हमारे कानोसे सुनाता रहे। सौ बरस तक बोलते रहे अर्थात् वाणी हमारी पुष्ट रहे। सौ घरस तक श्रदीन रहे अर्थात् किसीके सम्मुख याचक न हो। केवल सौ वरसों तक ही नहीं परन्तु सौ घरससे अधिक भी हमारी इन्द्रियां पुष्ट रहकर अपना अपना कार्य करें। अथ कुमारस्य दक्षिणांसं सहृदयं दक्षिण- हस्तेन स्पृशत्याचार्यः। ॐ मम व्रतेते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु ॥ मम वाचमेकमना जुषस्व बृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् ॥ इति मंत्रेण । अव सूर्यका दर्शन करनेके अनन्तर कुमारके हृदय सहित दाहिने कंधेको श्राचार्य अपने हाथसे छूकर निन्निलिखित मन्त्रको पढ़ता है। मन्त्रका अर्थ:-(हे चालक !) तेरे हृदयको मैं अपना निश्चय करता हूं कि तेरा चित्त मेरे चित्तके अनुकूल होवे, इसी प्रकार मेरी वाणी एक मनसे सेवन करो अर्थात् जो मैं कहूँ उसे सावधान चित्त होकर सुनो और वृहस्पति तेरे हृदयको मेरे हृदयसे मिलावे (अर्थात् . तेरा और मेरा हृदय एकसा हो जाय) ततः कुमारस्य दक्षिणहस्तं गृहीला तंपृच्छति को नामासि श्रीअमुकशर्माऽहं भोः इति कुमार आह । कस्य ब्रह्मचार्य सीत्या- चार्यः । भवत इति कुमार आइ । पुनराचार्यो भाषते । ॐ इन्द्रस्य 'ब्रह्मचार्यस्यामिराचार्य स्तवाहमाचार्यः श्रीअमुक शर्मन् । तब कुमारका दाहिना हाथ पकड़कर श्राचार्य पूंछे कि "तुम्हारा नाम क्या है, तव कुमार कहे "मैं अमुक शर्मा हूँ"अर्थात् नाम...... ।
[2] शर्मा है; फिर आचार्य पूछे कि तुम किसके ब्रह्मचारी हो-तव कुमार उत्तर दे कि मैं श्रापका (ब्रह्मचारी) हूँ। फिर प्राचार्य इस मन्त्रको पढ़ें-ॐ इन्द्रस्य इत्यादि मन्त्रका अर्थ:-हे अमुक शर्मन् ! तुम. इन्द्र के ब्रह्मचारी हो, तुम्हारा प्राचार्य अग्नि है और मैं हूँ। (श्रुति वाक्य है "गुरुरग्निईिजातीनाम्ग अर्थात् द्विजातियोंका गुरु अग्नि है) अथ माणवकं वद्धाञ्जलिं पूर्वादिदिक्षु प्रदक्षिणमुपस्थान कारयति । अथाचार्यो माणवकं भूतेभ्यः परिददाति । तत्र आचा. यस्य मन्त्रपाठः। इस प्रश्नोत्तरके अनन्तर प्राचार्य वालकको हाथ जोड़वाकर उसको पूर्व इत्यादि चारों दिशाओं में क्रमसे घुमाकर उपस्थान अर्थात् नमस्कार करावे। तव प्राचार्य बालकको निन्नलिखित मन्त्र पढ़कर भूतोंके प्रति अर्पण करे। ॐ प्रजापतये बा परिददामीति प्राच्यम् । ॐ देवायला सवित्रे परिददामीति दक्षिणस्याम् । ॐ अद्यस्वीपरीभ्यः परि- ददामीति प्रतीच्याम् । ॐ द्याापृथिवीभ्यां खा परिददामीति उदीच्याम् । ॐ विश्वेभ्यस्वा देवेभ्यः परिददामीत्ययः । ॐ सर्वे- भ्यस्वा भूतेभ्यः परिददाम्यरिष्य इत्यूर्ध्वम् । अर्थ-आचार्य बालकसे कहे कि तुम्हारे कष्ट निवारणके निमित्त मैं तुम्हे प्रजापति अर्थात् ब्रह्माको अर्पण करता हूँ, ऐसा कहता हुआ पूर्व दिशाको अर्पण करे। फिर सूर्य देवताको अर्पण करता हूँ, ऐसा कहकर दक्षिण दिशाको अर्पण करें। जल और औषधियोको अर्पण करता हूँ, ऐसा कहकर पच्छिम दिशाको दे। आकाश और पृथ्वीको तुम्हें अर्पण करता हूँ, ऐसा कहकर उत्तर दिशाको अर्पण करे । सव इन्द्र इत्यादि देवताओंको तुम्हें अर्पण करता हूँ, ऐसा कहकर पृथ्वी- को अर्पण करे, सब भूतोंके प्रति तुमको अर्पण करता हूँ ऐसा कहकर श्राकाशको अर्पण करे। ततोऽग्निं प्रदक्षिणीकृत्य आचार्य दक्षिणदिशि उपविशति माणवकः । ततः पुष्पचन्दनताम्बूलवासांस्यादाय ततः कर्तव्योपनयनहोयकर्मणि कृताऽकृत्तावेक्षण रूप ब्रह्मकर्मकर्तुममुक- . [8] गोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचन्दनताम्बूल वासोभिब्रह्म त्वेन बामहं वृणे इति ब्राह्मणं वृणुयात् । ॐ वृतोमीति वचनम् । तव अग्निकी परिक्रमा करके बालक श्राचार्यके दक्षिणकी ओर बैठे। तव हाथमें पुष्प, चन्दन, ताम्बूल और वस्त्र लेकर “ॐ अद्य कर्तव्यो० इत्यादि "संकल्प करके यज्ञोपवीतमें करने योग्य होमके ब्रह्म कर्म करानेके लिये अमुक गोनवाले अमुक नामके ब्राह्मणको इन पुष्प, चन्दन, ताम्बूल और वस्त्रले ब्रह्माके भावसे तुमको वर्णी देता हूँ ऐसा कहकर ब्राह्मणको वर्णी दे । तव ब्राह्मण "ॐ वृतोस्मि" ऐसा कहे। ततः पुष्पचंदनताम्बूलवस्त्राण्यादाय अद्य कर्त- व्योपनयनकर्मणि होतकर्म कर्तुममुकगोत्रममुक- शर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचन्दनताम्बूलवासोभि) तृत्वेन त्वामहं वृणे इति होतारं वृणुयात् । ॐ स्व- स्तीति प्रतिवचनम् । ॐ यथाविहितं कर्म कुर्वीत्या- चार्येणोक्त । करवाणीत ब्राह्मणो वदेत् । तव इसी प्रकार फूल, चन्दन, ताम्बूल और वस्त्र लेकर “अद्या इत्यादि सङ्कल्प करके यज्ञोपचीत करने योग्य होताका कर्म करनेके लिये छामुकगोत्र और अमुक नामवाले तुम ब्राह्मणको इन पुष्प चन्दन ताम्बूल तथा वस्त्रोंसे होताके भावसे वरता हूँ (अर्थात् होताके पदपद नियुक्त करता हूँ) ऐसा कहकर होताको वर्णीदे। औरहोता "ॐखस्ति। ऐसा कहे । "फिर ॐ यथाविहितं कर्म कुरु" अर्थात् शास्त्रोक्त विधान करो ऐसा कहने पर प्राचार्य “ॐ करवाणि मैं करूँगा ऐसा कहे । ततोऽदक्षिणतः शुद्धमासनं दत्वा तदुपरि प्रागग्रान्कुशानास्तीर्य ब्राह्मणमनिं प्रदक्षिणं कार- यित्वाऽस्मिन्कर्मणित्वं मे ब्रह्माभवेत्यभिधाय भवा- नीति तेनोक्ते तदुपरि ब्राह्मणमुदङ्मुखमुपवेश्य ततः
।
[१०]
प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य कुशैरा-
च्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्याग्नेरुत्तरतः कुशोपरि
निदध्यात् ।
तव अग्निसे दक्षिणकी ओर शुद्ध श्रासन विछा कर उसके ऊपर
कुशा इस प्रकार रक्खे कि जिसमें उसकी नोक पूरवकी ओर रहे।
श्रव ब्राह्मणको अग्निकी प्रदक्षिणा कराके "इस कर्ममें तुम ब्रह्मा हो"
ऐसा कहकर और ब्राह्मणके 'भवानि' (= होता हूँ) ऐसाकहने पर उस
आसनपर ब्राह्मणको उत्तर मुँह बैठाकर प्रणीतापानको आगे रख
कर जलसे भरकर कुशोसे आच्छादित करके ब्रह्माके मुखको देखकर
अग्निके उत्तर कुशाके ऊपर स्थापन करे ।
ततः परिस्तरणम् । वर्हिपश्चतुर्थभागमादायाग्नेयादीशा-
नान्तम् । ब्रह्मणोनिपर्यन्तम् नैर्ऋत्याद्वायव्यान्तम् अग्नितः
प्रणीतापर्यन्तम् ।
तव कुशा बिछावे-चौसठ
कुशका चौथा भाग अर्थात् सोलह
ले और इनमेसे चार कुशा तो अग्नि कोणसे ईशान कोण तक विछावे
और चार कुशा ब्रह्मासे अग्निकोण तक, चार कुशा नितिकोणसे
वायव्यकोण पर्यन्त तथा चार कुश अग्निसे प्रणीता पात्र पर्यन्त
बिछावे। पूर्वोत्तर कोणसे प्रारम्भ करता हुआ वरावर विछाता
चला जाय।
ततोऽरुत्तरतः पश्चिमदिशि पवित्रच्छेदनार्थ
कुशत्रयम् । पवित्रार्थ सायमनन्तर्गर्भकुशपत्रद्वयम्
प्रोक्षणीपात्रम् । आज्यस्थाली समाजनाथ कुशाः।
उपयमनकुशाः। समिधस्तिस्रः। नुवः प्राज्यं षट्पं-
चाशदुत्तराचार्यमुष्टिशतद्वयावच्छिन्नाऽऽमतण्डुलपू.
र्णपात्रं पवित्रच्छेदनकुशानां पूर्वपूर्वदिशि क्रमेणा-
सादनीयम् ॥
- [ ११ ] तब अग्निसे उत्तर पश्चिम दिशामें पवित्र छेदनके निमित्त तीन कुशा रक्खे और पवित्राके लिये अगले भाग सहित परन्तु भीतरी गर्भ निकाल कर दो कुशा स्थापन करे। इसी तरह प्रोक्षणी पात्र भी स्थापन करे। धूतपात्र स्थापन कर, मार्जन करनेके लिये कुशा, उपयमन कुशा। तीन पलासकेसमिधा। सुवा, धृततथा आचार्यके दोसौछप्पन (२५६) मुट्ठी चावलोंसे भरकर पूर्णपात्र'-ये सब वस्तु पवित्र छेदन कुशाके पूरवकी ओर क्रमसे रक्खे । ततः पवित्रच्छेदनकुशैः पवित्रे छित्त्वा सपवित्र करेण प्रणीतोदकं त्रिः प्रोक्षणीपात्रे निधाय अना- मिकांगुष्ठाभ्यां गृहीतपवित्राभ्यां तज्जलं किञ्चि. विक्षिप्य प्रणीतोदकेनं प्रोक्षणी निरभिषिच्य । प्रोक्षणीजलेनासादितवस्तुसेचन कृत्वाऽग्निप्रणीत- यामध्ये प्रोक्षणीपात्रं निदध्यात् । इसके अनन्तर पवित्र छेदन कुशाओंसे दो (२) पवित्रा छेदन करके ( पहन कर ) पवित्रा सहित दाहिने हाथले प्रणीता पात्रके जलको तीनवार प्रोक्षणी पात्र में डालकर पवित्रायुक अनामिका (कानी अंगुलीके बगलवाली अङ्गुली) और अंगूठेसे उस जलको ऊपरकी ओर उछाल कर, प्रणीता पात्रके जलसे प्रोक्षणी पात्रको तीन वार सिंचन कर प्रोक्षणी जलसे सब वस्तु सिंचन करे अर्थात् इस जलसे सव वस्तुके ऊपर मार्जन करे और प्रणीता पात्रके वीचमें प्रोक्षणी पात्रको खापन करे। ततः आज्यास्थाल्यामाज्यनिर्वापः। अधिश्रयः णम् ततः कुशं प्रज्वल्याज्योपरि प्रदक्षिणं भ्रामयि- त्वा वहौ तत् प्रक्षिप्य स्नुवंत्रिःप्रतप्य संमार्जनकुशा- नामौरंतरतो मूलैर्बाह्यतः सुवं संमृज्य प्रणीतोदके. नाभ्युक्ष्य पुनास्त्रिः प्रतप्य दक्षिणतो निदध्यात् । १२ ] तव.घृत पात्रमें घृत डाले और इसे अग्निके ऊपर धरे। तव कुश- को जलाकर घृतके ऊपरसे दक्षिण ओरसे घुमाकर और उसको (कुशको ) अग्निमें फेंककर और नुवा तीन वार (अग्निमें ) तपाकर संमार्जन अर्थात् मार्जन करनेवाले कुशके अग्रभागके अन्तरसे (भीतरी भागले) और मूल अर्थात् जड़से वाहारके भागने युवाको मार्जन करे और प्रणीता पात्रके जलसे सींचकर फिर तीन बार तपाकर दक्षिणकी ओर स्थापन करे। ततः आज्यमग्नेरवतार्य त्रिमोक्षणीवदुत्पूयावेक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरसं कृला पूनः प्रोक्षण्युत्पवनम् । तव घृतको (घृतके पात्रको) अपने आगे उतारकर तीन बार प्रोक्षणीके समान उछालकर और देखकर और इसमें यदि कोई बुरी चीज पड़ी हो तो उसे निकालकर फिर ग्रोक्षणी पात्रके जलकी तह उछाले। ततःउत्थायोपयमनकुशान्बामहस्ते कृत्वाप्रजा- पर्ति मनसा ध्यात्वा तूष्णीं घृतातास्तिस्त्रः समिधः प्रक्षिपेत् उपविश्य सपवित्रप्रोक्षण्युदकेन प्रदक्षिण- . क्रमेणाग्निं पर्युक्ष्य प्रणीतापाने पवित्रे लिधाय पा- तितदक्षिणजानुः ब्रह्मणावारब्धः समिद्धतमेग्नौश्रुबे- शाज्याहुतीर्जुहोति । तव उठकर उपयमन कुशाओंको चायें हाथ में लेकर मनमें प्रजा- पति (ब्रह्मा) का ध्यान करके चुपचाप (विना कुछ कहे) तीन समिधा में घी लगाकर अनिमें फेंके। फिर बैठकर पवित्र सहित प्रोक्षणी पात्र- के जलसे प्रदक्षिणा क्रमले अग्निमें छिड़ककर और प्रणीता पात्र में पवि- त्रियोंको रखकर दहिना घुटना मोड़कर अपनेसेलेिकर ब्रह्मा तक कुश द्वारा युक्त होकर नुरासेप्रदीप्त अग्निमें निन्नलिखित घृतको प्राडूती दे। तत्रतत्तदाहुत्यनन्तरं सुनावस्थित घृतशेषस्व प्रोक्षणी पात्रे प्रक्षेपः। आहुतिके अनन्तर नुवामें बचे हुए घीको प्रोक्षणी पात्रमें रक्खे ।
[ १३ ] ॐ प्रजापतये खाहा इदं प्रजापतये० इति मनसा । ॐ इन्द्राय स्वाहा इदमिन्द्राय० इत्या- घारौ। ॐ अग्नये स्वाहा । इदमग्नये । ॐ सो- माय स्वाहा इदं सोमाय० इत्याज्यभागौ । ॐ भूः स्वाहा इदमग्नये।ॐभुवः स्वाहा इदं वायवे०। ॐख- स्वाहा इदं सूर्याय० । एता महाव्याहृतयः । प्रजापतये खाहा इत्यादि सात व्याहतियां हैं। प्रथम मन्त्र मनमें कहना चाहिये। फिर निम्नलिखित मन्त्रोंसे आहुति दे। ॐ वन्नो अग्ने वरुणस्यविद्वान्देवस्य हेडो- अवयालिलीष्ठा ५ । यजिष्ठोवहितमः ५ शोशुचानो- ऽविश्वाद्वेषा ५ सिप्रमु मुग्ध्यस्मत्खाहा इदमनी- वरुणाभ्याम् । त्वनो और सत्वनो० इन मन्त्रोंके वामदेव ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द है, अग्नि और वरुण देवता हैं, सव प्रायश्चित्तके निवृत्त करने में इनका विनियोग है ॥ मन्त्रका अर्थ हे अग्नि! तुम वरुण भगवानके क्रोध शान्त करनेके योग्य हो अतएव इनका क्रोध दूर करो। तुम संव कार्यों में साक्षी हो, चतुर और सर्वश्रेष्ठ हो, सब देवता लोग यशोंका अंश तुमको देते हैं और तुम प्रकाशमान हो, अतएव मेरे मन्दबुद्धि पुरुषसे किये हुए अनादर और मूर्खताको क्षमा करो सव कल्याण और सुख दो। ॐ संखन्नो अग्नेऽवमोभवेतीनेदिष्ठोऽअस्याऽउपसो व्युष्टौ । अब यक्ष्यतो वरुण ५ रराणोयीहिमृडीक ५ सुहवोन एधि- • स्वाहा । इदमनीवरुणाभ्याम् ।। अर्थ हे अग्नि ! श्राप सबको पालन करनेवाले हो अतएव आज प्रातःकालले लेकर ( अर्थात् दिन भर तक) मेरी रक्षा करो। मैंने (१) यजुर्वेद भ० २१ मन्त्र ३. (२) यजु० २१-१ । २
.
[ १४ ]
तुमको बुलाया है अतएव केवल मेरी रक्षा ही न करो परन्तु सुखसे
श्राकर मेरे दिये हुए पुरोडाश (चर)को भक्षण करो और यक्षके
खामी वरुण देवताको देकर पूजन करो जिससे वरुण देवता भी मुझ
पर प्रसन्न होकर मेरा कल्याण करें।
ॐ श्रेयाश्चामेस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्वमयाऽअसि ॥
अयानो यज्ञ वहास्ययानो धेहि भेषज ५ स्वाहा । इदमनये० ॥
अर्थ हे अग्नि ! आप सबके अन्तर्यामी हो और प्रायश्चित्त द्वारा
सब पुरुपोंको शुद्ध करनेवाले हो, कल्याणको देनेवाले हो, क्योंकि
हमारे किये हुए यज्ञोंको इन्द्र इत्यादि देवताओंको देते हो, अतएव
हमारा भी दुःख हटाकर अपूर्व आनन्दको दो।
ॐ येते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा
वित्तता महान्तः॥ तेभिन्नोऽअद्य सवितोत-विष्णु-
विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा॥ इदं वरुणायक।
सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुभ्यः खर्केभ्यः।।
अर्थ हे वरुण ! यक्षके विघ्नसे उत्पन्न हुए बड़े बड़े कठिन जो
सैकड़ों हजारों तुम्हारे पाश ( फन्दे ) हैं उन पाप रूपी फन्दोको सूर्य,
विष्णु भगवान, मरुत् और सब देवता हटावें । इस भन्नसेवरुण सूर्य
इत्यादि देवताओंको आहुति देवे ।
ॐ उंदुत्तमंरुणपाशमस्मदवाधर्मविमध्यम ५
श्लथाय । अथाव्वयमादित्यव्रतेतवानागसोऽअदि-
तयस्याम स्वाहा ॥ इदं वरुणाय० ॥ एताः सर्वाः
प्रायश्चित्तसंज्ञकाः इति (ततोऽन्वारब्धं विना) ॐ
प्रजापतये खाहा इदं प्रजापतये। मनसा प्राजा-.
पत्यम् । ॐ आग्नये खिष्टकृते स्वाहा इदमग्नयेस्वि-
(१) यजु० २१-४। (२) यजुर्वेद अध्याय १२ मन्त्र १२ ।
[ १५ ] ष्टकृते। इति स्विष्टकृद्धोमः। ततः संस्रवप्राशनम् आचमनं च । ततो ब्रम्हणे दक्षिणा दानम् । हे वरुण ! आपके जो उत्तम, मध्यम और नीच ये तीन प्रकारके पाश (फन्दे) हैं, उनमेले उत्तम पाशसे हमारी रक्षा करो। मध्यम पाशको ढीला करके हमारी रक्षा करो और नीच पाशको हटा दो। हे अदितिपुत्र ! ऐसा करनेसे निरपराधी हम अदीन हो जायेंगे। उपरोक्त मन्त्रसे वरुण देवताको श्राहुति दे। ये सब आहुतियां प्राय- श्चित्त नामकी हैं, इसके बाद अन्दारब्धके विना होम करे और 'प्रजा- पतये वाहा' इत्यादि मन्त्रीका उपयोग करे । इसके अनन्तर प्रोक्षणी पात्रके श्रवशिष्ट घृतका पान करे और आचमन करे इसके अनन्तर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। ॐ अद्य एतस्मिन्नुपनयनहोमकर्मणि कृताच- तावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजा- पतिदेवतम् अमुकगोत्रायामुकर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्म- णे दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे। इति दक्षिणादानम् ॐस्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततो ब्रह्मग्रंथिविमोकः ! अव अद्यत्यादि० सङ्कल्प पढ़कर एतस्मिन्......सम्प्रददे' कहकर ब्राह्मणका नाम और गोत्र उधारण करके पूर्णपान दे और दक्षिणा दे और आचार्य "ॐवस्ति ऐसा कहे । तव ब्रह्म प्रन्थि अर्थात् ब्रह्माकी गांठको खोले॥ : . ततः ॐ सुमित्रियानऽआप ओषधयः सन्तु इति पवित्राभ्या जलमानीय तेन शिर. संमृज्य ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तुयोस्माऽन्द्वेष्टि यञ्चवयंद्विष्मः ॥ इत्यैशान्यां प्रणीतान्युञ्जीकरणम् । ततः स्तरणक- मेण बहिरुत्थाप्य घृतेनाभिधार्य हस्तेनैव जुहुयात्॥ (१) यजुर्वेद अध्याय मन्त्र २१ ।
[ १६ ] इसके अनन्तर 'ॐ सुमिनियान०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर पवित्रियों से जल लेकर सिरपर मार्जन करे। मन्त्रका अर्थ-जल और श्रीपधि हमको अत्यन्त मुख दें। ॐदुर्मित्रिया०इत्यादिमन्त्रसे प्रणीतापात्रको ईशान कोण उलटदे। मन्त्रका अर्थ-जो लोग हमारे साथ द्वेष करते हैं और जिनके साथ हमारा द्वेष है उनको ये जल और औषधि अत्यन्त दुःख दें। इसके बाद पूर्वोक्त आस्तरण क्रमसे अर्थात् जिस क्रमले ये स्खे. गये थे उसी क्रमसे कुशोको उठा घी लगा कर "देवगासु०॥ इत्यादि मन्त्र पढ़कर हाथले हवन करे। ॐ देवागातुविदो गातुं विता गातुमिन ! मनसस्पतऽइम देवयज्ञ ५ स्वाहा न्वाते धा स्वाहा । इति वहिहोमः । उपरोक्त मन्त्रसे बर्हिका होम करे। अर्थ-हे देवता लोग ! तुम यज्ञको जानने वाले हो अतएव यज्ञको विष्णुका रूप जानकर सुख- पूर्वक चले जाओ। हे अन्तर्यामिः ब्रह्म स्वरूप इसका फल मैं तुमको अर्पण करता हूँ और तुम इसको वायुको अर्पण कर दो। ततः प्राचार्यः कुमारस्यानुशासनं करोति । ॐत्रम्हचार्यसीत्याचार्यः ॐ असानीति ब्रह्मचारी। ॐ अपोशान इत्याचार्यः ॐ अशानीति कुमार आह । ॐ कर्म कुर्वित्याचार्यः ॐ करवाणीति माणवकः । ॐ मा दिवा सुषुप्स्व इत्याचार्यः ॐ न स्वापानीति कुमार । ॐ वाचं यच्छेत्याचार्यः ॐ यच्छानीति कुमारः । ॐ समिधमाधहीत्या- चार्यः ॐ आदधानीति माणवकः । इसके अनन्तर प्राचार्य इस प्रकार चालकको शिक्षा देता है। गुरु वाक्य-हे वालक! तुमने ब्रह्मचर्य धारण किया? उत्तर-हांगुरु- जी ! धारण किया। गुरु वाक्य-आपोशनपूर्वक अन्न भोजन करना। बालक-गुरुजी ! करूँगा। [आपोशन क्रिया यह है कि जब भोजन करनेको वैठना तो "अमृतोपत्तरणमिति मन्त्रसे क्रमसे दक्षिणको . .
[ १७.] ओर वाले अन्नपात्रको जलसे रक्षित करना अर्थात् हाथमें जल लेकर इस पात्रके चारो ओर कना; तब "ॐ भूपतये स्वाहा" इस मन्त्रसे प्रथम ग्रास, "ॐ भुवनपतये खाहा" इस मन्त्रको कहकर द्वितीय ग्रास, “ॐ भूतानांपतये स्वाहा" मंत्र पढ़कर तीसरा ग्रास भूमिपर रखना और इसपर जल छोड़ना, तदनन्तर “ॐ प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐसमानाय स्वाहा इन पांचो मंत्रोसे एक एक क्रमसे कहना और एक एक ग्रास भोजन करना। इसके अनन्तर पूरा भोजन करके हाथमें जल लेकर "ॐ अमृतापिधानमसि" यह मन्त्र कह कर पृथ्वी पर फेंक देना यह क्रिया यज्ञोपवीत हो जाने पर बालकको प्रतिदिन भोजन करती समय करनी चाहिये ] प्रश्न-हे बालक ब्रह्मचारीके कर्म करोगे? उत्तर-गुरुजी करूंगा|प्रश्न-हे कुमारदिनमें नहीं सोना उत्तर- गुरुजी ! न सोऊँगा । प्रश्न हे कुमार! वाणीकोरोकना (अर्थात् व्यर्थ का वार्तालापन करना) उत्तर-गुरुजी, रोदूंगा। प्रश्न-हे वालक हमारे अग्निहोत्रके लिये समिधा लाना । उत्तर-गुरुजी! लाऊंगा। ब्रह्मचारीके प्रतिदिनके करने योग्य कर्तव्य याज्ञवल्क्य स्मृतिमें स्नानमब्दैवतैर्यन्त्रैर्माजनं प्राणसंयमः। सूर्यस्य चाप्युपस्थानं गायत्र्याः प्रत्यंह जपः ॥ गायत्री शिरसा साधं जपेत् व्याहृतिपूर्विकां। प्रतिप्रणवसंयुक्तां त्रिरयं प्राणसंयमः ॥ प्राणानायम्य संप्रोक्ष्य ऋचेनाव्दैवतेनतु । जपन्नासीत सावित्री प्रत्यगातारकोदयात् ॥ सन्ध्याप्राकमातरेवेहतिछेदासूर्यदर्शनात् । अग्निकार्य ततः कुर्यात्सन्ध्ययोरुभयोरपि ॥ ततोऽभिवादयेदृद्धानसावहमितिब्रुवन् । गुरुं चैवाप्युपासीत लब्धं चास्मै निवेदयेत् ॥ हितं चास्य चरेन्नित्यं मनोवाकायकर्मभिः। सारांश-ब्रह्मचारीको चाहिये कि प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके सन्ध्या करे तथा गायत्रीका जप करे। सायंकाल तथा मध्याह्नके समय भी इसी प्रकार सन्ध्या और जप करे और सूर्यका उपस्थान * अध्याय १नीक २२ २७ तक। लिखे हैं।
[ २ ] करे। प्रातःकाल और सन्ध्याके समय होम करे; अपना नाम लेता हुश्रा (मैं अमुक शर्माहूँ कहकर) बड़ोंको नमस्कार करे और वेद पढ़ने-. के लियेगुरुजीकी आशाले। उनके समीपाजावे मन, वाणी तथा शरीरसे गुरुका सदा हित चाहे । *मधुमांसाजनोच्छिशुक्तस्त्री प्रारिणहिंसनम् । भास्करालोकनाश्लील परिवादादिवर्जयेत् ॥ अर्थ-ब्रह्मचारी निम्नलिखित वस्तुका त्याग करे:-मधु (शहद) मांस, अञ्जन, जूठी कोई वस्तु वासी भक्ष्य,स्त्री,प्राणियोंकी हत्या, सूर्य उद्य तथा सूर्यास्तके समय सूर्यका दर्शन, गाली देना, दूसरोंकी निन्दा, विवाद, हठ इत्यादि । अयानरुत्तरनः मत्यमुखायोपविष्टायाचार्यचरणोपसंग्रहण पूर्वकमुपसन्नायाचार्य समीक्षमाणायाचार्यः स्वयमपि समीक्षिता- यास्मै निवारितशतूर्यादिशब्ददृष्टांशके सावित्रीमन्वाह । अव शिक्षा देनेके उपरान्त अग्निसे उत्तरकी अोर सामने मुँह करके प्राचार्यके चरणोंको हाथोंसे छूकर ननभावले गुरुकी शोर देखे और शंखतूर्यादि शब्दोको रोककर यथोचित लग्नमुहर्त इष्ट नवांश प्राचार्य शिष्यको परीक्षा करके गायत्री मन्त्रोपदेश करे। गायत्रीका उपदेश किस प्रकार करना चाहिये सो पद्धतियों में लिखा नहीं है परन्तु पारस्कर गृह्यसूत्र में लिखा है:-"पच्छोर्द्धशः सवाच तृतीये नानुवर्तयत्ति-अर्थात् आदिमें सप्तव्याहृतिके सहित एक पान गायंत्रीका उपदेश करे: तदनन्तर अधोसन्त्रका उपदेश करे और तीसरी वारमें मन्त्रको पूर्ण करके उपदेश करे। प्रथमचार"ॐभूः ॐ भुवः ॐ खः ॐ तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ द्वितीयवार "ॐ भूः ॐ भुवः ॐखः ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यधीमहि । तृतीय वार “ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं ॥ भर्गो देवस्यधीमहि । धियो. योनः प्रचोदयात्। श्रापोज्योति रसोमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम् ॥ अध गायत्रीखरूपमाह। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्यधीमहि धियो योनः प्रचोदयात् ॐ। *याइ० स्मृति प्र० १ ०३३ ।
[१६] पदच्छेद-ॐ भूः भुवः स्वः तत् सवितुः परेण्यं भर्गः देवस्य धीमहि धियः यः नः प्रचोदयात् । अन्वय-यः (सविता) नः (अस्माक) धियः (धर्माधर्मविवेक बुद्धयः) (प्रेरयित) तत् (तस्य) सवितुः (सूर्यस्य ब्रह्मणः दैदीप्यमानस्य) वरेण्यं (उत्कृष्टं) भजनीयम् भूरादिसप्तलोकप्रकाशकं आपः खरूपम् ज्योतिः स्वरूपं तथा आनन्दवरूपं अमृतं (मोक्षरूप) भूर्भुवः स्वरूपं ॐकार (प्रणव) वरूपं च भर्गः तेजः धीमहि (वयं) ध्यायामः । अर्थ-सारे संसार और जन्मादिका कर्ता सूर्यनारायण जो हमारे धर्माधर्म विवेककी बुद्धिको शुभ कार्यों में प्रेरणा करता है उस दैदीप्य- मान प्रकाशमान ब्रह्मखरूप सूर्य भगवानके परब्रह्म ज्योति स्वरूपका हमलोग ध्यान करते हैं। गायत्रीके अर्थ इत्यादिके विपयमें जो विशेष द्रष्टव्य है सो थोड़ेमें यहाँ लिखा है जिसे पढ़कर पाठकगण अति सन्तुष्ट होंगे। स्थानाभावले सबका भाषान्तर नहीं किया गया है। भारद्धाज स्मृतिमें गायत्रीका अर्थ इस प्रकार संस्कृतके श्लोक तथा गद्यमें लिखा है:- अथाहमर्थ गायत्र्याः प्रवक्ष्यामि यथातथं । द्विजोत्तमानां सद्भत्तया जपादीनि प्रकुर्वताम् ॥ विश्वासभक्तिजननं मन्त्रैर्यज्ज्ञानमुत्तमम् । तस्माद, विजानीयाद्यत्नेन जपकृद्विजः॥ द्वाभ्यां विश्वासभक्तिभ्यां जपादीनां महत्तरम् । फलं भवेजपकृतमिति वेदेषु भाषितम् ॥ पदानि दशमन्त्रस्य तदादीनि यथाक्रमात् । पदंप्रत्यर्थनिष्पत्तिः स्पष्टंतुक्रियतेऽधुना ॥ तत् = अनेक जगदुत्पत्ति स्थितिलयकारणीभूतमुपकथ्यमानं निरु- * पमं तेजः सूर्यमण्डलाभिधेयं परं ब्रह्माभिधीयते। सवितुः= सर्वस्यभूत- जातस्य प्रसवितुरित्यर्थः। वेरण्यं वरणीयं, प्रार्थनीयं नियमादि- भिरयगतकल्मषैः सततं ध्यायेत् । भर्गः = भजतां पापभजनहेतुभूतम्: तेजः देवस्य-वृष्टिदानादिगुणयुक्तस्य निरतिशयस्येत्यर्थः दीप्यते प्रकाशार्थत्वात् । धीमहि मध्येचिन्तयामि, निगमनिरुक्त विद्यारूपेण चक्षुषायोसावादित्यो हिरण्मयः पुरुषः सोहमिति चिन्तयामि। धियः = बुद्धयः । यः = यत्तेजः सवितुर्देवस्य घरेण्यमस्माभिरभिध्यातम् [ २० ] भर्गो जपतां पापभजनहेतुभूतं धीमापास्महे । नः =अस्माकं (धिमः). बुद्धिः श्रेयस्करेषु । प्रचोदयात् =प्रेरयेत् । एषा व्याख्या तु गायत्र्याः सर्वपापप्रणाशिनी । विज्ञातव्या प्रयत्नेन द्विजैःसर्वशुभेच्छुभिः ।। जपस्याभ्यन्तरे व्याख्या सर्तव्या मनसा द्विजैः। स्मरणात्सर्वपापानि प्रणश्यन्ति न संशयः ॥ अथ प्रत्यक्षरं देवताभेदं कथ्यते । प्रान्नयं प्रथमं शेयं वायव्यं तु द्वितीयक। तृतीयं सूर्यदैवत्यं चतुर्थं वैद्युतं तथा ॥ पञ्चमं यमदैवत्यं वारुणं षष्ठमुच्यते। बार्हस्पत्यं सत्तमंतु पार्जन्यमष्टमं विदुः ।। ऐन्द्रं तु नवमं ज्ञेयं गान्धवं दशमं तथा । पौष्णमेकादशंप्रोक्तं मैत्रावरुण द्वादशम् । त्वाष्ट्रं त्रयोदशं शेयं वासवंतु चतुर्दशम् । मारुतं पञ्चदशकं सौम्यं षोडशकं स्मृतम् ।। सप्तदशं त्वाङ्गिरसं वैश्वदेवमतःपरम् । आश्विनंचैकोनविंशं प्राजापत्यं तु विंशकम् ॥ सर्व देवमयं प्रोक्तमेकविंशमतः परम् । रौद्रं द्वाविंशकं प्रोक्तंत्रयोविंशंतु ब्राह्मकम् ॥ वैष्णवं तु चतुर्विंशमेता वक्षरदेवताः । जपकालेतुसंस्कृत्य तासां सायुज्यतां व्रजेत् ॥ छन्द शास्त्रमे ६ अक्षरके पादवाले वृत्तको गायत्री छन्द कहा है। इस मन्त्रमे २४ अक्षर हैं और इनका चारपाद हुआ और प्रत्येक पादमें ६अक्षर हैं। ऐसे छन्द अनेक हैं, पर यही गायत्रीके नामसे प्रसिद्ध हैं। इसका कारण यह है कि “गायन्ते त्रायते यस्मात् गायत्रीयं ततः स्मृता "यह गाई जाती है और हम लोगोंकी रक्षा करती है अतएव इसका नाम गायत्री है। याशवल्क्य ऋषिने गायत्रीकी प्रशंसा निम्नलिखित श्लोकों में लिखी है- गायत्री चैव वेदांश्च तुलया समतोलयत् । वेदा एकत्र सङ्गास्तु गायत्री चैकतः स्थिता ।
- [ २१ ] सारभूतास्तु देवानां गुह्योपनिषदोस्मृताः। ताभ्यःसारस्तुगायत्री तिस्रोव्याहृतयस्तथा। ॐ कारपूर्विकास्तिस्रो गायत्री यश्च विन्दति । चरित्रं ब्रह्मवर्चस्य सवै श्रोत्रिय उच्यते ॥ एतयाज्ञातयासर्व वाइयं विदितं भवेत्। उपासितं भवेत्तेन विश्वं भुवनसप्तकम् ॥ एवं यस्तु विजानाति गायत्रीं ब्राह्मणस्तु सः। अन्यथा शूद्रधर्मास्यावदानामपि पारगः॥ ऋष्यशृङ्ग ऋषि इस प्रकार कहते हैं- सर्वात्मना हि या देवी सर्वभूतेषु संस्थिता। गायत्री मोक्षहेतुर्वै मोक्षस्थानमलक्षणम् ॥ कूर्म पुराणमें गायत्रीकी योप्रशंसा की गई है- गायत्री देवजननी गायत्री पापनाशिनी ॥ न गायत्र्याः परं जप्यमेतद्विज्ञानमुच्यते। गायत्री देवजननी गायत्री पापनाशिनी। गायत्र्यास्तु परं नास्ति देवि चेहच पावनम् ॥ हस्तप्राणप्रदा देवी पततां नरकार्णवे। तस्मात्तामभ्यसेन्नित्यं ब्राह्मणो हृदये शुचिः॥ वृहदारण्य उपनिषद्में इस प्रकार गायत्रीकी प्रशंसा लिखी है- भूमिरन्तरिक्ष द्यौरित्यष्टावक्षराणि अष्टाक्षरं हवा एकं गायत्र्यै पदमे- तदुहेवास्या एतत् स यावदेषु लोकेषु तावद्धजयतियोऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥१॥ ऋचोयजूंषि सामानि इति अष्टावक्षराणि अष्टाक्षरं वा . एक गायन्यै पदमेतदुहैवास्या एतत् सयावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति थोऽस्था पतदेवं पदं घेद ॥२॥ प्राणोऽपानो व्यान इत्यष्टावक्ष- राणि अष्टाक्षरं हवाएक गायत्र्यै पदमेतदुहैवास्या एतत् सयावदिद प्रणितितद्वैजयतियोऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ३॥ अथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजाय एष तपति यद्वै चतुर्थ मत्तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृशे इव एष परोरजा इति सर्व ह्येष रज उपर्युपरि तपति एवं हैषश्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ४॥ सैषा गायत्री एतस्मिस्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठितेत्यादि ।।५।। एत- द्वैतत्सत्यं चले प्रतिष्ठितं प्राणोवै बलं तत् प्राणे प्रतिष्ठितमित्यादि । सा- हेषा गयास्तत्रे प्राणवै गयास्तान् प्राणांस्तत्रे यस्माद्गयां स्तो तस्मात् -- , [ २२ ] गायत्री नाम ॥ ६॥ सयामे वाभुमन्वाह वैषसोस यस्मा अन्वाह तस्य प्राणांस्त्रायते । छान्दोग्य उपनिषदें इस प्रकार लिखा है गायत्री वा इदं सर्व भूतं यदिदं किञ्च । वाग्वै गायत्री वाग्वाइदं: सर्व भूतं गायतिच त्रायतेच ॥१॥ या वैसा गायत्रीयं वा वसायये पृथिवी अस्यां हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितं एतामेव नातिशीयनो ॥२॥ या वै सा पृथिवीयं वा वसा यदिदमस्मिन् पुरुषे शरीरं अस्मिन् ही मेप्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशयन्ते ॥३॥ यद्वैतत् पुरुषे शरीरमिदं वावतत् यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयम् अस्मिन् ही में प्राणाः प्रति- ष्ठिताः एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥ सैषा चतुष्पदा पनिधा गायत्री तदेतहचाभ्यनूक्तम् ॥ ॥ ५॥ भाष्यकारोंने गायत्रीके अर्थ इत्यादिके विषयमें यों लिखा है। शाङ्करभाज्यमें (श्रीशङ्कराचार्यने) इस प्रकार लिखा है- एतावानस्य गायत्र्याख्यस्य ब्रह्मणः समस्तस्य महिमा विभूति- विस्तारः यावान् चतुष्पाद् षड्विधश्च ब्रह्मणो विकारः पादः गायत्रीति व्याख्यातः। अतस्तस्माद्विकारलक्षणात् गायत्र्याख्यात् ततो ज्यायान् महत्तरश्च परमार्थ सत्यरूपोऽधिकारः पुरुषःसर्वपूरणात् पूरिशयनाञ्च। तस्यास्य पादाः सर्वाः सर्वाणि भूतानि तेजो वन्नादीनिसस्था- वरजङ्गमानि। त्रिपाद् त्रयः पादा अस्य सोऽयं त्रिपाद् अमृतं पुरुषाख्यं समस्तस्य गायत्र्यात्मकस्य दिविद्योतनवति खात्मन्यवस्थित- मित्यर्थः। महीधर भाष्यकारने गायत्रीका अर्थ इस प्रकार लिखा है- तदितिषष्ट्यर्थे । तस्य द्योतनात्मकस्य सवितुः प्रेरकस्यान्त- यामिणो विज्ञानानन्दस्वभावस्य हिरण्यगर्भोपाध्यवच्छिन्नस्य वा आदित्यान्तरपुरुषस्य वा ब्रह्मणो वरेण्यं वरणीयं सर्वेः प्रार्थनीयं भर्गः सर्वपापानां सर्वसंसारस्यच भजनसमर्थं च तेजः सत्यज्ञानादि वेदान्तप्रतिपाद्यं वयं धीमहि ध्यायामः इति। सायनभाष्यमें गायत्रीका अर्थ इस प्रकार किया गया है- यः सविता देवः नः अस्माकं धियः धर्मादिविषया बुद्धीः प्रचो. दयात् प्रेरयेत् तत् तस्य सर्वासु श्रुतिषु प्रसिद्धस्य देवस्य धोतमानस्य सवितुः सर्वान्तर्यामितया प्रेरकस्य जगत्स्रष्टुः परमेश्वरस्य आत्मभूतं - [ २३ ] वरेण्यं सर्वरुपास्य तया शेय तया च सम्भजनीयं भर्गः अविद्या तत् कार्ययोर्भर्जनाद्भगः स्वयं ज्योतिः परब्रह्मात्मकं तेजः धीमहि । माधवाचार्य ने गायत्रीका अर्थ इस प्रकार किया है:- यः सविता सूर्यो धियः कर्मणि प्रचोदयात् प्रेरयेत् तस्य सवितुः सर्वस्य प्रसवितुर्देवस्य धोतमानस्य सदृश्यतया प्रसिद्धं वरेण्यं सर्वेः संभजनीयं भर्गः पापानां तापकं तेजः धीमहि ध्येयतमा मनसा धारयेम इति । याज्ञवल्क्यजीने इस प्रकार कहा है:- तत् शब्देन तु यच्छब्दोबोद्धव्यःसततं बुधैः । उदाहते तुतच्छन्दे तच्छब्दः स्यादुदाहृतः ॥ सविता सर्वभूतानां सर्वभावान्प्रसूयते । सवनात्पावनाञ्चैव सविता तेन चोच्यते ॥ दीव्यते क्रीडते यस्मादुच्यते शोभते दिवि । तस्माद्देव इति प्रोक्तः स्तूयते सर्वदेवतैः॥ योनःचिन्त- यामो वयं भर्ग धियो यो नः प्रचोदयात् । धर्मार्थकाममोक्षेषु बुद्धि- वृत्तिः पुनः पुनः । भृसजपाके भवेद्धातुर्यस्मात्पाचयते ह्यसौ॥ भ्राजते दीप्यते यस्माजगञ्चान्ते हरत्यपि । कालाग्निरूपमास्थाय सप्तार्चिः सप्तरश्मिभिः ॥ भ्राजते तत्स्वरूपेण तस्माद्भर्गःसउच्यते । भेति भाजयते लोकात्रेति रंजयते प्रजाः॥ गइत्यागच्छतेऽजस्रं भरगो भर्ग उच्यते । वरेण्यं वरणीयं च जन्मसंसारभीरुभिः। श्रादित्यान्तर्गतं यच्च भर्गा- ख्यं वै मुमुक्षुभिः । जन्ममृत्युविनाशाय दुःखस्य त्रिविधस्य च । ध्यानेन पुरुषो यस्तु द्रष्टव्यः सूर्यमण्डले-इति ॥ अव सप्तव्याहृतिका शर्थ इस प्रकार किया गया है- भूराद्याश्चैव सत्यान्तः सप्त व्याहृतयस्तथा। लोकास्त एव सप्तैते उपर्युपरि संस्थिताः ॥ सप्त व्याहृतयः प्रोक्ताः पुरा कल्पे खयंभुवा । तएव सप्त छंदांसि लोकाः सप्त प्रकीर्तिताः । भवन्तिचास्मिन्भूतानि स्थावराणि चराणि च तस्माद्भरिति विशेया प्रथमा व्याहृतिः स्मृता। भूः का अर्थ । भवन्ति भूयोलोकानि उपयोगक्षये पुनः। कल्पान्ते उपभोगाय भुवस्तस्मात्प्रकीर्तिता ॥ भुवः का अर्थ । शीतोष्णवृष्टितेजांसि जायन्ते तानि वै सदा। आलयः सुक्रतानां च स्वर्लोकः स उदाहृतः । स्वः का अर्थ । अधरोत्तरलोकेभ्यो महांश्च परिमाणतः। • हृदयं सप्तलोकानां महस्तेन निगद्यते । महाका अर्थ । ।
ॐ एवं [ २४ ] कल्पदाहो प्रलोनास्तु प्राणिनस्तु पुनः पुनः । जायन्ते च पुनः स्वर्ग जनस्तेन प्रकीर्तितः। जनः का अर्थ । सनकाद्यास्तपः सिद्धा ये चान्यं ब्राह्मणः सुताः। अधिकारनिवृ. त्तास्तु तिष्ठन्त्यस्सिन्स्तपत्ततः। तपाका अर्थ । सत्यं तु सप्तलोकांवैब्रह्मणः सदतंततः। सर्वेषां चैव लोकानां मूर्ति सन्तिष्ठते लदा । ज्ञानकर्मप्रतिष्ठानां तथा सत्यस्य भाषणात् । प्राच्यते चोपभोगार्थ प्राप्यं न च्यवते पुनः। तत्सत्यं सप्तमो लोकत्तस्मादूर्ष न विद्यते-सत्यका अर्थ- गायत्रीका विनियोग ऊपर नहीं लिखा गया जो लिखते हैं:- गायत्री महामन्त्रका विश्वामित्र ऋपि है। सविता देवता है, अग्नि मुख है और इसका विनियोग उपनयनमें है। ततः माणवकः आचार्य दक्षिणदिशि अग्निपश्चिमोपविष्टो घृतातशुष्कनिषिद्धेन्वरेन्धनेन जुहुयात् ततः ॐ अग्नेसुश्रवः सुश्रवसं मां कुरु ॐ ययालमग्नेसुश्रयः मुश्रवा असि । मा सुश्रयः सोश्रवसं कुरु ॐ ययावमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिः पोऽसि । ॐ एवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम् । अव गायत्रीका उपदेश होनेके बाद आचार्यसे दक्षिणकी ओर और अग्निसे पश्चिम दिशामें बैठकर कुमार धृतयुक्त सूखे और शुद्ध गोवर इन्धन अर्थात् एरनेसे इन मन्त्रोंको पढ़ता हुवा हवन करे। मन्त्रका अर्थ हे अति जिस प्रकार तुम नुश्रव हो (तुम्हारा नाम शुभ है ) उसी प्रकार मुझे भी सुश्रव अर्थात् श्रेष्ठ कर्णवाले करो (=मैं वेद पहूँ और मेरे कान भी वेदध्वनि सुनकर शुद्ध हाँ) जिस प्रकारसे तुमको वेदके मन्त्र पढ़कर आहुति दी जाती है उसी प्रकार मुझको भी वेद पढ़नेका अधिकार दो, मैं भी वेदाध्ययन करूं । लिस प्रकारसे तुम देवोंके और यज्ञोंके अधिप (सामी) हो उसी प्रकार मैं मनुष्योंका तथा देवोंका रक्षक होऊँ। ततः प्रदक्षिणमग्निं वारिणा पर्युक्ष्य उत्थाय स्वप्रादेशमितां घृताक्तपलाशसमिधमादायॐ अग्न- ये समिधमाहार्ष बृहते जातवेदसे यथा त्वमग्ने [ २५ ] समिधा समिध्यसएव महमायुषां मेधया वर्चसा प्रजया पशुभिब्रह्मवर्चसेन समिन्धे जीवपुत्रो ममा- चार्यों मेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वी तेजखी ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भूयासस्वाहा। इति मंत्रेण जुहु- यात्। एवं समिदन्तरद्वयं जुहुयात्। ॐ अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मां कुरु ॐ यथा त्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवा असि । एवं मां सुश्रवः सौभवसं कुरु । ॐ यथा- त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपोऽसि । ॐ एवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम् । ततः प्रद- क्षिणमग्निं पर्युक्ष्य तूष्णी पाणी प्रताप्य मुखं प्रति मंत्रांतेवशति । इसके अनन्तर अग्निको जलसे प्रदक्षिणा करके हाथ में जल लेकर अनिके चारो ओर फेंके और उठकर अपने प्रदेशमात्र (अंगूठे और तर्जनीके फैलनेके अन्तरको प्रदेश कहते हैं) पत्नास की समिधामें श्री लगाकर "ॐ अग्नये स०" इस मन्त्रले अग्निमें हवन करे। मन्त्रका अर्थ-वेदोक्त फलको देनेवाले दैदीप्यमान हे अग्नि देवता! मैं आपके लिये समिधका होम करता है, जिस प्रकार आप मेरे होम किये हुए समिधले प्रज्वलित होते हैं उसी प्रकारसे मेरी 'आयुष्य, बुद्धि, सन्तति, तेज, गौ इत्यादि पशु ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान हो। मेरे प्राचार्य भी बहुपुत्रवान् तथा बुद्धिमान होवें । मैं नित्य यज्ञ करनेवाला होऊँ, मैं आयुष्माम् यशयुक्त तथा तेजस्वी होऊ, वेदाध्य- यनशील तथा अन्न देनेवाला होऊ और अन्नका अभाव मेरे पास कभी न होवे। इस कामनासे अग्निमें होम करे। इसी प्रकारके दो संमिधाका होम करे । ॐ अग्नये मन्त्रका अर्थ पूर्व लिखा जा चुका है। अव आचार्य प्रदक्षिण क्रमसे अनिका पर्युक्षण करके बिना मन्त्र ३ - । [ २६ ] पढ़े दोनों हाथोंको अग्निपर तपाकर "ॐ तनूपा० इत्यादि मन्त्र पढ़- कर कुमारके मुखको छूवे । मन्त्र नीचे लिखे हैं:- ॐ तनूपा अग्नेसि तन्वं मे पाहि । ॐआयुर्दा अनेस्यायुमें देहि। ॐवोंदा अग्नेसि वर्गों मे देहि। ॐ अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तत्म आपण। ॐ सेधां देवः सविता आदधातु । ॐ मेधां मे देवी सरख- ती आदधातु । ॐ मेधां मेऽश्विनौ देवावाधत्तां पु. करस्त्रजौ। ततः सर्वगात्रादिषु दक्षिणपाणिना स्पर्शः । अत्र प्रत्येक मंत्रः । ॐ अंगानि च म आ. प्यायताम् । इति सर्वगात्रालभनम् । ॐ वाक् च म आप्नाइतामिति मुखे । ॐ प्राणश्च म आप्या- यतामिति नासिकयोः। ॐ चक्षुश्च म आप्यायता- मिति चक्षुषोः ॐ श्रोनं च म आप्यायतामिति श्रोत्रयोः। ॐ यशोवलं च म आच्यायतामिति मंत्रपाठमात्रम् । अर्थ हे अग्नि! आप शरीरके रक्षक हो अतएव मेरे शरीरकी रक्षा करो। आप आयुके देनेवाले हो अतएव मुझे दीर्घायु करें। आप तेजको देनेवाले हो अतएव मुझे तेज दो। मेरे शरीर में जो न्यूनता है उसको पूर्ण करो। सूर्य मुझको धारणाशक्ति दें, सरस्वती देवी मुझे बुद्धि दें। कमलकी मालावाले अश्विनीकुमार मुझे बुद्धि देवें । इसके अनन्तर क्रमसे निन्नलिखित मन्त्रीको पड़ता हुआ अङ्गो- का स्पर्श करे। यथा-शरीरके अङ्गवारणीका कारक इन्द्रिय,प्राण, वायु, चक्षु, नेत्र, कर्ण, श्रोत्र, यश और पलकी वृद्धि हो-क्रमसे सब शरीर, -मुख, नासिका, चक्षु, श्रोत्र कर्ण आदि स्पर्श करे।
[ २७ ] ततो दक्षिणकरानामिकाग्रहीतभस्मना ललाटे ग्रीवायां दक्षिणबाहुमूले हदि च त्र्यायुषं कुर्यात् । तत्र यथासंख्येन मंत्रचतुष्टयम् । ॐ त्र्यायुषं जमदग्नेः इति ललाटे । ॐ कश्यपस्य व्यायुषमिति ग्रीवा- याम्। ॐ यदेवेषुत्र्यायुषम् इति दक्षिण वायुमूले। ॐ तन्नोऽअस्तु व्यायुषम् इति हृद्रये इसके अनन्तर दहिने हाथको अनामिका (कानी अंगुलीके पास वाली अंगुली) ले हवन भस्म लेकर कमसे ललाट, गर्दन, दहिने भुजेकी जड़ तथा हृदयमै मन्त्र पढ़कर लगावे । यथा 'ॐ ज्यायुषं जमदग्नेः' पढ़कर ललाटमें, 'ॐ कश्यपस्य व्यायुपम्' कहकर प्रीधाम, ॐन्यदेवेषु व्यायुपम् कहकर दहिने बाहुकेजड़में तथा'ॐ तन्नोऽस्तु ध्यायुषम्' कहकर हृदयमें भस्म लगावे । अर्थ-जमदग्नि, कश्यप और अन्य देवताओंकी वाल्य, यौवन और वृद्धावस्था हैं सो हमारी हो। ततो व्यस्तपाणिभ्यां पृथिवीं स्पृशन्नभिवादनं कुर्यात् ॥ तत्र प्रकारः॥ ॐ अमुकगोत्रोहममुकश- महिं भो वैश्वानर त्वामभिवादये॥ ततस्तेनैव क्रमेण सबोध्य वरुणमाभिवाद्याचार्य तथैवाभिवादयेत् । ततः भायुष्मान् भव सौमेत्याचार्यों ब्रूयात् ॥ इसके अनन्तर बालक उलटे हाथोंसे पृथ्वीको स्पर्श करता हुवा नमस्कार करेकि मैं अमुकगोत्र, अमुकशर्मा हे भनि,आपको नमस्कार करता हूँ। इसके अनन्तर इसी प्रकारसे कहते हुए वरुणदेवता तथा आचार्यको नमस्कार करे, तब आचार्य श्राशीर्वाद दे कि तुम दीर्घायु हो। ततो.भिचापात्रमादाय प्रथमं मातुः सकाशात् - [ २८ ॐ भवति भिक्षा मे देहि इति प्रार्थनानंतरं तदत्ता- चादायाचार्याय निवेदयेत् । तथैव भिक्षांतरं याचे- त्। तत आचार्येण भुंक्ष्वेत्यनुज्ञातो भिक्षां स्वी.. कुर्यात् ततः फलपुष्पचंदनतपूर्णस्वेण ब्रह्मचारि- दक्षिणकरस्पृष्टेनाचार्यः पूर्णाहुतिं दद्यात् । तत्र संत्रः । ॐ भूद्धनंदिवोऽभरति पृथिव्यावैश्वानर- ताजातमानि । कवि सम्राजमतिथि जना- नामासन्नापानं जनयन्त देवाः खाहा : इदमग्नये । ततः स्वेण भस्मानीय दक्षिणानासिकायगृहीतभ- स्मना ॐ त्र्यायुषं जमदग्नेः इति ललाटे। ॐ कश्यपस्य न्यायुषमिति ग्रीवायाम् । ॐ यदेवेषु त्र्यायुषम् । इति दक्षिणबाहुमूले । ॐ तन्नो अस्तु त्र्यायुपम् इति हृदि । कुमारपक्षे तो इत्यस्य स्थाने तत्ते इति विशेषः। इसके अनन्तर ब्रह्मचारी सिक्षापात्र लेकर पहले साताले भिक्षा मांगे, तव अन्य स्त्रियोसे मांगे और यह वाक्य कहे "भवति भिक्षा में देहि" अर्थात् आप मुझे भिक्षा दीजिये। इनकी दी हुई शिक्षा लेकर आचार्यको दे। इसी प्रकार और लोगोले भी भिक्षा मांगे। इसके अनन्तर जब आचार्य कहे कि तुम भिक्षाको अंगीकार करो तव ब्रह्मचारी भोजन करे, इसके वाद ब्रह्मचारी अपने दाहिने हाथमें खुवा (१) भवत्पूर्व बामणे मिशेद भवान्मध्यां राजन्यो भवदन्त्यां वैश्य इति पारस्कर गृश्यसूत्रे। (२) यजुर्वेद अध्याय ७ मन्त्र २४.
[ २ ] लेकर फल, पुष्प चन्दन और घी लेकर आचार्य तष पूर्णाहुति कराये। निम्निलिखित मन्त्र पढ़े। अथ क्षारलवणमधुमासादिनिवृत्तिःउद्धृतजल स्नानदंडकृष्णाजिनधारणवृक्षारोहण विषमभूमिलं- घननग्नस्त्रीनिरीक्षणस्त्रीसंभोगव्यसनव्यावृत्तिरूपा ब्र- ह्मचारिणो नियमाः। तदिने वाग्यतो ब्रह्मचारी अहः शेषं स्थित एव गमयेत् । ततः सायंसंध्यां कृत्वा तस्मिन्नेवाग्नी पूर्ववत्पर्युक्षणपरिसमूहने कृत्वा वाचं विसृजेत् परिसमूहनांते शुष्कनिषिद्धेतरेन्धन- स्याग्नौ प्रक्षेपः । ततः संध्यामुपास्य प्रतिदिनं सायं प्रातरपि ब्रह्मचारिणा कर्तव्या इति ॥ इसके ननन्तर खारी वस्तु (क्षार) नोन, मधु, मांस इत्यादिका प्रयोग न करना, और (किसी तडाग, कूप इत्यादिसे) जल निकाल कर-नान करना। दण्ड और काले मृगका चर्म धारण करना । वृक्ष पर चढ़ना, ऊंची नीची भूमि पर कूदना, नंगी स्त्री देखना, स्त्री संग करना, जुवा इत्यादि व्यसन ब्रह्माघारीको न करना चाहिये ये ब्रह्म- चारीके नियम है। उसदिन ब्रह्माचारी मौन व्रत धारण किये रहे बाकी दिन खड़े खड़े वितावे तव सायंकालकी सन्ध्या करे और उसी अग्नि में पूर्ववत् पर्युक्षण और परिसमूहन करके भौनव्रत तोड़े अर्थात् तव बोलने लगे। इसके अनन्तर परिसमूहनके अन्तमें अग्निमें सूखा और अच्छा ईंधन लगावे। फिर सन्ध्योपासन करके प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल ब्रह्मचारीको नियमसे सन्ध्या करनी चाहिये। - (१) मधुमांसां जनोच्छिष्ट भुक्त स्त्री प्राणिहिंसनम् । भास्करा लोकनानील परिवादादि वर्जयेत् । या० स्मृति । (१) नानुतिष्ठति यः पूर्वा नोपास्तेगा पश्चिमाम् । सशूदवहिष्कार्यः सर्व- स्माद्विन कर्मणः। . .
[३] अध वेदारम्भः तत्र कृतनित्यक्रियः आचार्यः कृशैईस्तमात्र: परिमितां भूमि परिसमुश तान् कुशानेशान्यां परित्यज्य गोमयोदकेनोपलिप्य युवमूलेनस्फ्येन वा उत्तरोत्तरतः प्रागयप्रादेशमात्रं त्रिरुल्लिख्य उल्ले- खनक्रमेणानामिकांगुष्ठाभ्यांमृदभुद्धृत्यजलेनाभ्युक्ष्य कांस्येनानिमानीयाभिमुखमुपसमाधाय पुष्पचंदन- तांबूलवस्त्राण्यादाय *अद्य कर्तव्यवेदारंभहोमकर्म- णि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मकर्तुममुकगोत्रसमु- कशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचंदनतांबूलवासोभिब्रह्म-- खेन त्वामहं वृणे इति ब्रह्माणं वृणुयात्। ॐ वृतोस्मी- ति प्रतिवचनम् ॐ यथाविहितं कर्म कुर्वित्याचार्यः । इसके अनन्तर वेदारम्भ कृत्य प्रारंभ किया जाता है। प्राचार्य नित्यक्रिया ( सन्ध्योपासन इत्यादि ) करके हाथ २ भर लम्बे कुशोसें पृथ्वी साफ करके और इन कुशाओंको ईशान कोणमें फेंककर गोवर और जलसे लीप करके स्रुवाके जइसे अथवा (स्फ्य) यशपानसे सामने उत्तरकी ओर प्रदेशमें तीन रेखा करके और जिस क्रमसे. रेखा खींची हैं उसी क्रमसे अनामिका और अङ्गुष्ठसे मिट्टी निकालकर जल छिड़कर कांसेके पात्र में रखकर अग्नि लाकर अपने सामने स्थापन करे। इसके अनन्तर पुष्प, चन्दन ताम्बूल और वस्त्र लेकर “ॐअधकon इत्यादि सङ्कल्प करे। तव ब्राह्मण "वृतोस्मि" कहे, "यथाविहितं कर्म कुरु" आचार्य कहे "तुम शास्त्रोक्त कार्य करो।" - १ कुशरिका प्रयोग पूर्व लिखा जा चुका है। यहांते " इत्याव्यभागौ तक कुशकंडिक विधान कहलाता है।
- [३१] ओं करवाणीति सेनोके अनेदपिवतःशुधमां- सनं दत्वा तदुपरि प्रागवान् कुशानास्तीर्य प्रज्ञा- समभिप्रदक्षिक्रमेण भ्रामयित्वा भस्मिन कर्मति त्वम्मे ब्रह्मा भवेत्यभिधाय । ओं भवामीति सेनोले ब्रह्माणमुदङ्मुखं तत्रोपवेश्य। प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा । वारिणा परिपूर्य । कुशैराच्छाय । ब्रह्मणो मुखमवलोक्यानरुत्तरताकुशोपरि निदध्यात् । ततः परिस्तरणम् बहिषश्चतुर्थभागमादाय आग्नेयादी- शानांन्तंब्रह्मणोग्निपर्यंतं न त्याद्वायव्यांतम् अग्नि- तः प्रणीतापर्यंतम् । ततोग्नेरुत्तरतः पश्चिमदिशि पवित्रच्छेदनार्थ कुशत्रयं पवित्रकरणाथ सायमनं- तर्गर्भकुशपत्रद्वयम प्रोक्षणीपात्रमाज्यस्थाली सं. मार्जनकुशाः उपयमनकुशाः समिधस्तिस्त्रः स्वः भाज्यम् पूर्णपात्रम् पवित्रच्छेदनकुशानां पूर्वपूर्व- दिशि क्रमेणासादनीयम् । ततः पवित्रच्छेदनकुशैः पवित्रे छित्त्वा सपवित्रकरण प्रणीतोदकं त्रिः प्रोक्ष- णीपात्रे निधाय द्वाभ्यामनामिकांगुष्ठाभ्यामुत्तराये पवित्रे गृहीत्वा त्रिरुत्पवनम् । ततः प्रोक्षणीपात्रं वामहस्ते गृहीत्वा दक्षिणहस्तानामिकांगुष्ठाभ्यां निरुद्दिगनम् । ततः प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीपात्रम- भ्युक्ष्य प्रोक्षणीजलेन यथासाधितवस्तून्यभिषिच्या- [ ३२ ] ऽग्निप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रं निदध्यात् । तत आज्यस्थाल्यामाज्यं निरूप्याधिभ्रमणम् । ततः कुशं प्रज्वाल्याज्यस्याग्नेश्वोपरि प्रदक्षिणं भ्रामयि- स्वा अग्नौ तत्प्रक्षेपः ततस्त्रिः नुवप्रतपनं संमार्जन- कुशानामौरंतरतो मूलैर्बाह्यतःनुवं संमृज्य प्रणी- तोदकेनाभ्युच्य पुनस्त्रिः प्रतप्य दक्षिणतो निद- ध्यात् । तत आज्यमाग्निप्रदक्षिणं भ्रामयित्वाऽवता- ोये निदध्यात् ततः आज्यस्य प्रोक्षणीवदुत्पवनं अ- वेक्ष्य सत्यपद्रव्य तन्निरसनं ततःप्रोक्षण्युत्पवनम् । तत उत्थायोपयमनकुशानादाय प्रजापति मनसा ध्यात्वा तूष्णीमग्नौघृताकाः समिधस्तिस्त्रः क्षिपेत् । तत उपविश्य सपवित्रप्रोक्षण्युदकेन प्रदक्षिणक्रमे णाग्निं पर्युक्ष्य प्रणीतापात्रे पवित्रे निधाय ब्रम्ह- णान्वारब्धः पातितदक्षिणजानुः समिद्धतमेग्नौ जु- हुयात् । तत्र प्रथमाहुतिचतुष्टयेन त्रुवावस्थितहुतशे- षघृतस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये० इति मनसा ॐ इन्द्राय स्वाहा इदमिंद्राय इत्याघारौ ॐ अग्नये वाहाइदमग्नये. ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय० इत्याज्यंभागौ । १ आधार आइति वेदोके वायव्य कोण से अग्निकोण सक सुवाके धारसे २ भाज्य भाग भाइति वेदीसे नैतिकोणसे ईशानकोण तक जुवाके वृतको धारसे होती है। होती है।
[ ३३ ] ततः प्राकृतोऽनन्वारब्धकर्तृको होमः। ॐ अंत- रिक्षाय स्वाहा इदमंतरिचाय०ॐ वायवे खाहा इदं वायवे० ॐ ब्रह्मणे खाहा इदं ब्रह्मणे० ॐ छंदोभ्यः खाहा इदं छंदोभ्यः। एताः सामान्याहुतयः। ॐप्रजा- पतये स्वाहा इदं प्रजापतये० इति मनसा ॐ देवेभ्यः खाहा इदं देवेश्यॐऋषिभ्यः स्वाहा इदं ऋषिभ्यः० ॐ श्रद्धायै स्वाहा इदं श्रद्धायै० ॐ मेधायै स्वाहा इदं मेधायै० सदसस्पतये स्वाहा इदं सदस्पतये० ॐ अनुमतये खाहा इदमनुमतयेततोन्वारब्धकर्तृ- को होमः तत्तदाहुत्यनंतरंस्तुवावस्थितहुतशेषघृतस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः। ॐ भूः खाहा इदमग्नये ॐ भुवः खाहा इदं वायवे० ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय। एता महाव्याहृतयः।ॐ त्वन्नोअग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अब यासिसीष्ठा ५ यजिष्ठो वाहितम शोशुचानो विश्वाद्वेषार सिप्रमुमुग्यस्मत् खाहा इदमग्निवरुणाभ्याम् सत्वन्नोअग्नेवमोभवोतीनेदि- ष्ठो अस्या उषसोव्युष्टौ अवयक्ष्वनो वरुण ररा- णो व्वीहि सृडीकर सुहवो नएधि स्वाहा इदन- मीवरुणाभ्याम् ॐ अयाश्चाग्नेस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्यमयाअसि ॥ अयानोयज्ञवहारस्ययानोधे हिमेषजर खाहां। इदमनये ॐये ते शतं वरुण [३४] ये सहस्रं यशियाः पाशा वितता महान्तः तेमिनों अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चतु मरुतः स्वर्काः स्वाहा । इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुभ्यःस्वभ्यश्च। ॐ उंदुत्तमं वरुण पाश मस्मदवाधमं विमध्यम ५श्रथाय । अथा व्वयमा- दिस्यनते तवानागसोऽअदितये स्यामस्वाहा । इदं वरुणाय० । इति सर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः । ॐ प्रजा- पतये स्वाहा। इदं प्रजापतये० इति मनसा । इति प्राजापत्यम् । ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा । इद- मग्नये स्विष्टकृतेः इति स्विष्टकृद्धोमः । इसके अनन्तर विना अन्वारब्धके हवन करना चाहिये। ॐ अन्तरिक्षाये' इत्यादि मन्त्रीको पढ़ कर ये पाहुतियां अन्तरिक्ष, वायु, ब्रह्म और छन्द अर्थात् वेदोके निमित्त हैं। सामान्य आहुतियां ॐ प्रजापतये मनमें कहना चाहिये। इसके अनन्तर देव, ऋषि, श्रद्धा, मेधा, सदसस्पति और अनुमति ये आहुतियां विना अन्या- रब्ध के हवन करना चाहिये। इसके अनन्तर अन्वारब्ध सहित हवन करना चाहिये । 'त्वन्नो अने इस मन्त्रका अर्थ पूर्व लिखा जा चुका है। भूः इसका अधिष्ठाता देवता अग्नि है: भुवः का वायु और खः का सूर्य है। ततःसंस्रवप्राशनम् । तताचम्य ॐ अद्य कृ- तैदद्वेदारंभहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्र-- तिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतममुकगोत्रायामु- १गनुर्वेद भध्याय २ मन्त्र २.
[ ३५ ] कशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणांतुभ्यमहं संप्रददे इति दक्षिणां दद्यात्।ॐस्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततो ब्रम्हग्रंथिंविमोकः । ॐ सुमिनियान आप ओषध- यः संतु इति पवित्राभ्यां प्रणीताजलमानीय तेन शिरः संमृज्य। ॐदुर्मित्रियास्तस्मै संतु योस्मिन्टेष्टि यं च वयं द्विष्मः इति मंत्रेण ऐशान्यां प्रणीतां न्युजी कुर्यात् । ततः स्तरणकमेण वहिरानीय घृते- नाभिघार्य हस्तेनैव जुहुयात् । ॐ देवागातुविदो- गातुवित्वागातुमितमनस्मत। इमं देवयज्ञ ५ स्वाहा व्यातेधाः स्वाहा । इति वहिहोमः । तब संभव प्राशन करना अर्थात् वामेसे प्रोक्षणी पात्रसे युवे हुए घीको चाटना । तब श्राचमन करके यह संकल्प करे और नाम- राको दक्षिणा दे। तव ब्राहमण कई "स्वस्ति"। तव ब्राम* प्रन्थिको खोले । ' सुमिमिया. इस मन्त्रको पढ़कर पचित्राओंमें प्रणीताका जल लकार सिरपर मार्जन करें। फिर “ॐ दुर्मिप्रिया०" इस मन्त्रको पढ़कर ईशान दिशाम प्रणीताको उलट दे। तव स्तरण क्रमसे चर्हिको लाफर वृत लगाकर हाधसे हवन करे और "ॐ देवगातु०॥ इत्यादि मन्त्र पढ़े। ततः काश्मीरगमनम्। तत इष्टांशके वेदारंभ गुरुः कारयेत्। तत्र क्रमः। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितु- वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचो- * जहां वेफर्म प्रवीण श्रीनिय प्रामए न हों सदा शिक्षा नया बना कर श्रावादन करे पार इस स्थानपर उस कुशको पन्धि सोगे। यह महा ५० पुगेका बनाना चाहिये।
[ ३६ ] दयात् ॐ इति प्रणवांतं पठित्वा। पंक्ति नमस्कार च कारयित्वा। ॐसमिधाग्निंदुवस्यतधृतर्बोधयताति- थिअस्मिन्हव्याजुहोतन। ॐ सुसमिद्धायशोचिषे,। इति कंडिकांतरं वा फकिका वा पाठयेत् । तब काश्मीरकागमन करना। इसके अनन्तर शुभ नवांशमेश्राचार्य बालकको वेद पढ़ावे। इसका यह क्रम है कि गायत्रीके आदि और शन्त प्रणव अर्थात् ॐ कार लगा कर पढ़ावे और वालकसे वेदकी पंक्तिको नमस्कार करवाकर इसके अनन्तर ॐ समिधानिं-इपेत्वो- जैत्वा-"छाग्निमीळे पुरोहितं० शन्नो देवी०" इत्यादि काण्डिका पर्यन्त अथवा फक्किका पर्यन्त पढ़ावे । ततः सप्रणवं स्वस्ति वाचयित्वा उत्थाय फलपु- पसमन्वितब्रम्हचारिदक्षिणकरस्पृष्टन घृतपूर्णेन पूर्णाहुतिं दद्यात्। ॐ मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृताजातमग्निं कविसमाजमतिथिं जना- नामासनापात्रं जनयंत देवाः स्वाहा इतिपूर्णाहुतिः। इसके अनन्तर प्रणव सहित खस्ति (अर्थात् ॐ स्वस्ति) कहला कर और खड़े होकर फल और पुष्प लेकर ब्रह्मचारीके दाहिने हाथसे छुवा हुआ घृतसे पूर्ण सुवासे “ॐ मूर्धानं०" इत्यादि मन्त्र पढ़कर पूर्णाहुति दे। मन्त्रका अर्थ-ॐ मूर्धानं० इस मन्त्रके भारद्वाज ऋषि हैं, वैश्वानर देवता और त्रिष्टुप् छन्द है और पूर्णाहुतिमें इसका विनियोग है। हम उस परमेश्वरको यह पूर्णाहुति देते हैं जो स्वर्ग इत्यादि लोकोसे ऊपर है, जो पृथ्वी इत्यादि पञ्चतत्व (पृथ्वी, आप, तेज, वायु,आकाश) से परे है, जो सब ब्रह्माण्डको देदीप्यमान करता है, सत्य रूप और जन्म इत्यादिसे रहित है। निर्विकार सर्वप्रकाश, सर्वश और प्रानन्द रूप है तीनों कालसे रहित और जो उत्पत्ति तथा प्रलयमें प्रालि मात्रका पात्ररूप है और जो सब देवताओको उत्पन्न करता है।
[३७ ] ततः उपविश्य सुवेण भस्मानीय दक्षिणानामि- कापगृहीतभस्मना ॐत्र्यायुषंजमदग्नेरिति ललाटे। ॐ कश्यपस्य व्यायुषमिति ग्रीवायाम् । ॐ यद्दे- वेषु व्यायुषमिति दक्षिणबाहुमूले । ॐ तन्नोऽन- स्तु व्यायुषमिति हृदि। अनेनैव क्रमेण ब्रह्मचारि- ललाटादावपि तत्र तत्ते इति विशेषः। इति वेदारंभः। इसके अनन्तर बैठकर नुवाकी पेंदीमेंसे भस्म दहिने हाथकी 'अंनामिकामें लगा कर 'ॐन्यायुषं' कह कर ललाटमें, 'कश्यपस्या कह कर प्रीवामे, 'ॐयदेवेषु' कह कर दक्षिण बाहुके मूल में, तन्नो' कह कर हृदयने लगावे । इसी क्रमसे ब्रह्मचारीके भी ललाट इत्यादि- में लगाये। यहां वेदारम्भ क्रिया समाप्त हुई। अथ समावर्तनम् । तत्र शुभे दिने प्रतीभूय आचार्य स्नास्यामीति कुमार आचार्य भाषते तत्र नाहीत्याचार्यः । ततो ब्रह्मचारिण आचार्थसान्नि- हितदक्षिणदिशि उपविष्टकृतस्नानादिराचार्यः कुशै- हस्तमात्रां भूमि परिसमुह्य तानैशान्यां परित्यज्य गोमयोदकेनोपलिप्य त्रुवमूलेनोत्तरोत्तरक्रमेण त्रि- रुल्लिख्य उल्लेखनकसेणोद्धृत्य जलेनाभ्युक्ष्य कांस्ये- नाग्निमानीय प्रत्यङ्मुखं निदध्यात् । ततः पुष्प- चंदनतांबूलवासांस्यादाय ॐ अद्यामुकस्य कर्त- व्यसमावर्तनहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मक- मकर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचं- ४ [ ३८] दनतांबूलवासोभिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे। वृतोस्मीति प्रतिवचनम् । यथाविहितं कर्म कुर्वित्यभिधाय ॐ करवाणीति तेनोक्त।अग्नेदक्षिणतःशुद्धमासनं दत्वा तदुपरि प्रागवान् कुशानास्ती-ऽस्मिन्कर्मणि त्वं मे ब्रह्मा भवेत्यभिधाय। ॐ भवानीति तेनोक्त। ब्रह्माणमुदङ्मुखं तत्रोपवेश्य । ततः प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य कुशैराच्छाद्य ब्रह्मणो सुखमवलोक्यानेरुत्तरतःकुशोपरि निदध्यात् । ततः परिस्तरणम् । वर्हिषश्चतुर्थभागमादायानेयादीशा- नांतं ब्रह्मणोग्निपर्यंत त्याद्वायव्यांतं अग्नितः प्रणीतापर्यंतम् । ततोग्नरुत्तरतः पश्चिमदिशि पवित्र- च्छेदनार्थ कुशत्रयम् । पवित्रकरणाथसाग्रमनंतर्ग- भकुशपत्रद्वयं प्रोक्षणीपात्रम् । आज्यस्थाली सं- मार्जनार्थं कुशाः उपयमनकुशाः । समिधास्तिस्त्रः सुवः आज्यम्पूर्वपूर्वदिशि क्रमेणासादनीयम् । ततः पवित्रच्छेदनकुशैः पवित्रे छित्त्वा सपवित्रकरण प्रणीतोदकं त्रिः प्रोक्षणीपात्रे निधायानामिकांगु- ठाभ्यां पवित्रे गृहीत्वा त्रिरुत्यूय प्रोक्षणीपात्रं वाम- करेणादायानामिकांगुष्ठगृहीतपवित्राभ्यां तज्जलं किंचित्रिःप्रक्षिप्य । प्रणीतोदकेन प्रोचणीमभ्युक्ष्य प्रोक्षणीजलेन यथाऽऽसादितवस्तून्यभिषिच्याग्निः [ ३६ ] प्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रं निदध्यात् । तत आज्य- स्थाल्यामाज्यनिर्वापः। अधिश्रयणम् । ततस्तुणं प्रज्वाल्याज्यस्याग्नेश्चोपरि प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा वहौ तत् प्रक्षिप्य सवं त्रिप्रतप्य संमार्जनकुशा- नामौरन्तरतो मूलैबर्बाह्यतः नुवं समृज्य प्रणीतोदके- नाभ्युक्ष्य पुनः प्रतप्य खस्य दक्षिणे निदध्यात् । तत आज्यमग्निं प्रदक्षिणं भ्रामयित्वाऽवतार्य त्रिः प्रोक्षणीवदुत्यूयावेक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरसनं कृत्वा पुनः पूर्ववत्प्रोक्षण्युत्पवनम् । तत उत्थायोपयमन- कुशान्वामहस्ते कृत्वा प्रजापतिं मनसा ध्यावा. तूष्णीमनौ घृताकाः समिधस्तिस्त्रः क्षिपेत् । तत उपविश्य सपवित्रप्रोक्षण्युदकेन प्रदक्षिणक्रमें- णानिं पर्युक्ष्य प्रणीतापाने पवित्रे निधाय पातित- दक्षिणजानुः समिद्धतमेऽग्नौ ब्रह्मणान्वारब्धः सुवे- णाज्याहुतीर्जुहुयात् । तत्र प्रथमाहुतिचतुष्टये प्रत्याहुत्यनन्तरंखुवावस्थितहुतशेषघृतस्य प्रोक्षणी- पात्रे प्रक्षेपः . ॐप्रजापतये खाहा इदं प्रजापतये। इति मनसा। ॐ इन्द्राय स्वाहा इदमिंद्राय। इत्याघारौ।ॐ अग्नये खाहा इदमग्नये।ॐ सोमाय खाहाइदं सोमायाइत्याज्यभागौ। ततोऽन्वन्वार- ब्धकर्तृकहोमः । ॐ अंतरिक्षाय स्वाहा । इदमंत- [४०] रिक्षाय। ॐ वायवे स्वाहा। इदं वायवेॐ ब्रह्मणे स्वाहा इदंब्रह्मणेॐछंदोभ्यः स्वाहा इदंछंदोभ्यः। ॐ प्रजापतये वाहा । इदं प्रजापतये० इति मन- सा । ॐदेवेभ्यः स्वाहा इदं देवेभ्यः। ॐ ऋषिभ्यः खाहा इदं ऋषिभ्यः। ॐ श्रद्धायै खाहा । इदं श्रद्धायै। ॐ मेधायै खाहा । इदं मेधायै०। ॐ सदसस्पतये खाहा । इदं सदसस्पतये॥ॐ अनु- मतये खाहा इदमनुसतये। सतो ब्राह्मणान्वारन्धो जुहुयात् अनाहुतिदशतये तत्तदाहुत्यनंतरं सुवाव- स्थिताज्यस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः। ॐ भूः स्वाहा इदमग्नयेः। ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे। ॐ स्वः खाहा इदं सूर्याय० । एता महाव्याहृतयः। ॐ त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्यहेडोअवयासिसी ष्ठाम्यजिष्ठोवहितम-शोशुचानो विश्वाद्वेषा ५ सिप्र मुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमनीवरुणाभ्याम् । ॐ सत्व- नोअग्नेवमोभवोतीनेदिष्ठोअस्याउषसोव्युष्टौ। अव- यक्ष्वनोवरुण ५ रराणोव्वाहिमृडीक सुहबोनएधि- खाहा इदमग्नीवरुणाभ्याम् । ॐ अयाश्चाग्नेस्य- नभिशस्तिपाश्चसत्यमित्वमयाभास अयानो यज्ञं वहास्ययानो धेहि भेषज ५ स्वाहा इदमग्नये। ॐ ये ते शतं वरुण य सहस्रं यज्ञियाः पाशा - [ ४१ ] वितता महांतः तेभिर्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतः स्वर्काः स्वाहा इदं वरुणायक सविने विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भयः स्वर्केभ्यश्च। ॐ उदुत्तमं वरुणपाशमस्मदवाधर्म विमध्यम ५श्रथाय- अथाव्वयमादित्यव्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा । इदं वरुणाय। इति सर्वप्रायश्चित्तम्। ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये० इति मनसा । इति प्राजापत्यम् । ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा इद- मग्नये स्विष्टकृते इति स्विष्टकृत ततः संत्रवनाश- नम् । तत आचम्य ॐ अद्य कृतैतत्समावर्तनहो- मकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे। इति दक्षिणां दद्यात् । ॐ स्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततो ब्रह्मग्रंथिविमोकः। ततः पवित्राभ्यां प्रणीता जलेन ॐ सुमित्रिया न श्राप ओषधयस्संतु इति मंत्रेण शिरः संमृज्य । ॐ दुर्मियास्तस्मै संतु यो- स्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः इति मंत्रेणैशान्यां प्रणीतान्युझीकरणम् । ततः स्तरणक्रमेण बहिस- नीय घृतेनाभिघार्य हस्तेनैव जुहुयात् । ॐ देवा गातुविदो यातुं वित्त्वा गातुमितमनस्मत इमं देव- हैं [ ४२ ] यज्ञ ५ स्वाहा व्वातेधाः : स्वाहा इति बहिहोमः । अव वेदारम्भके वाद समावर्तन संस्कार लिखा जाता है । समा- वर्तन संस्कार उसको कहते हैं कि जब वेद पढ़ लेने के बाद ब्रह्मचारी गुरुकी आज्ञा पाकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहता है, तब जो स्नान इत्यादि कर्म करना है वह इसी कृत्यका भाग है। इसी कारण- से ब्रह्मचर्य आश्रमसे गृहस्थाश्रममें आनेवालेको स्नातक भी कहते । पारस्कर गृह्यसूत्रके अनुसार पूर्ण ब्रह्मचर्य धारण करनेकी अवधी ४८ वर्ष है यथा “अष्टचत्वारिंशद्वर्षाणि वेद ब्रह्मचर्य चरेत् द्वादश द्वादश वा प्रतिवेदं यावद्ग्रहणं वेति अर्थात् ४८ वर्षतक चेद पढ़े और ब्रह्मचर्य धारण करे। अर्थ-एक वेद १२वारह वर्ष पढ़ कर अथवा तव तक ब्रह्मचर्य धारण करे जब तक वेदाध्ययन न हो जाय। मनुजीका वाश्य है "षट्त्रिंशदाब्दिकं चयं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम्। नंदाधकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा । स्नातक तीन प्रकारके होते हैं:-(१) विद्यानातक. अर्थात् वे ब्रह्मचारी जो तीवबुद्धिके कारण शीघ्र ही वेदाध्ययन समाप्त करके ब्रह्मचर्याश्रममें प्रवेश करते हैं। (२)व्रतस्नातक अर्थात् वे जो केवल ब्रह्मचर्यका व्रत समाप्त करके ही और विना वेदाध्ययन पूर्ण किये ब्रह्मचर्य त्याग कर गृहस्थ बने । (३) विद्यावत स्नातक अर्थात् वे ब्रह्मचारी जो वेदको भी समाप्त करें और ब्रह्मचर्यकी अवधि भी समाप्त करके गृहस्थाश्रममें प्रवेश करें। अव यदि चार वेद न पढ़ सके तो अपनी शाखाका ही वेद पढ़े। यदि वह भी पूरा न हो सके तो संहिता ही पढ़े। यदि. यह भी असम्भव हो तो नित्यकर्म सन्ध्या इत्यादि अंपने वर्णकी अवश्य करना चाहिये। समावर्तनमें विधि यह है कि किसी शुभ दिनमें ब्रह्मचारी बालक नम्र होकर अपने गुरुके पास जावे और विज्ञापना करे कि मैं स्नान करूंगा । तव प्राचार्य कुमारसे कहे " जा तू स्नान कर । इसके अन- न्तर आचार्यके पास दक्षिण दिशामें ब्रह्मचारी वैठे और प्राचार्य भी स्नान इत्यादि करके हाथ हाथ भर के कुशा से भूमि झाड़े, पूर्व- की तरह कुशकुण्डिका इत्यादि करे जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है पुनः यहां नहीं किया जाता। 44 [ ४३ ] ततो ब्रह्मणान्वारब्धकर्तृ कर्म ततोमिपश्चिमो- पविष्टो ब्रह्मचारी परिसमूहनं कुर्यात् । तत्र घृतात- शुष्कनिषिद्धतरेंधनेन पंचाहुतीर्हस्तेनैव जुहुयात् । ॐ अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मां कुरु। ॐ यथा त्वममे सुश्रवः सुश्रवा असि । ॐ एवं मांसुश्रवः सौश्रवसं कुरु। ॐ यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपा असि। ॐ एवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम् । ततःप्रदक्षिणमनिवारिणा पर्युक्ष्य उत्थाय धृतातां प्रादेशमितसमिधमादाय जुहुयात् । तत्र मंत्रः । अग्नये समिधमाहार्ष बृहते जातवेदसे यथा त्वमग्ने समिधा समिध्य स एवमहमायूषा मेधया वर्चसा प्रजया पशुभिब्रह्मवर्चसेन समिधे जीवपुत्रो ममाचार्यो मेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वी तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भूयास ५ खाहा । ततः समिदंतरद्वयमनेनैव क्रमेण प्रत्येकं हुत्वा उपविश्य तेनैव क्रमेण पंचाहुतीर्घताक्तशुष्कनिषिद्धतरेंधनेन जुहुयात् । ॐ अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मां कुरु । ॐ यथा त्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवा असि। ॐ एवं मां सुश्रवः सौश्रवसं कुरु। ॐ यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्यनिधिपा असि। ॐ एवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम्। ततःप्रदक्षिणमग्निं वारिणा पर्यु- [४४ ] क्ष्य तूष्णीं पाणीप्रताप्य मुखं प्रतिऽमंत्रांतेवमृशति । ॐ तनूपा अग्नेसि तन्वं मे पाहि। ॐ आयुर्दा अग्नेस्यायुमें देहि। ॐ वर्बोदा अग्नेसि वर्षों मे देहि । ॐ अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आपण । ॐ मेधां मे देवः सविता आदधातु। ॐ मेधां मे देवी सरखती आदधातु। ॐ मेधां मे अश्विनी देवावाधत्तां पुष्करस्त्रजौ। तत्र सर्वगात्रादिषु दक्षि- णपाणिना स्पर्शः । तत्र प्रत्येकं मंत्रः। ॐ अंगा- नि च म आप्यायताम् । इति सर्वगात्राले भने । ॐ चक्षुश्च म आप्यायतामिति चक्षुद्वयस्पर्शः। ॐ श्रोत्रं च म आप्यायतामिति श्रोत्रद्वयस्पर्शः । ॐ यशोबलं च म आप्यायतामिति मंत्रपाठमा- श्रम् । ततो दक्षिणानामिकामगृहीतभस्मना ललाटे ग्रीवायां दक्षिणाबाहुमूले हृदि च व्यायुषं कुर्यात् यथासंख्येन मंत्रचतुष्टयम् । ॐ व्यायुषं जमद्- ग्नेरिति ललाटे। ॐ कश्यपस्य त्र्यायुषम् इति ग्रीवायाम् । ॐ यद्देवेषु व्यायुषम् इति दक्षिण- बाहुमूले । ॐ तन्नो अस्तु न्यायुषम् इति हृदि । बहि हवनके अनन्तर अन्वारब्ध कर्म करना चाहिये । इसके बाद अग्निसे पश्चिम दिशामें बैठकर ब्रह्मचारी परिसमूहन कर्म करे। अर्थात् सुन्दर सूखे समिधाको घीमें घोरकर अपने हाथले ॐ अग्ने' इत्यादि मन्त्रीको पढ़ पढ़ कर पांच श्राहुतियाँ दे । इन मन्त्रों- की व्याख्या पहले हो चुकी है।
[ ४५ ] ततो व्यस्तपाणिभ्यां पृथिवीं स्पृशन् प्रथम वैश्वानरं संबोध्याभिवादयेत् । तत्रामुकगोत्रोहममु. कप्रवरोहमसुकशाहं भो वैश्वानर स्वामभिवादये इति प्रकारः। इसके अनन्तर अलग अलग दोनों हाथोंसे पृथ्वीको छूकर कुमार अग्निको संबोधन करके प्रणाम करे। यथा वह कहे कि हे अग्नि! अमुक गोत्र, अमुक प्रवर और अमुक शर्मा मैं आपको नमस्कार करता हूँ। ततस्तथैव वरुणं संबोध्याभिवादयेत् । तथैवा- चार्य चाभिवादयेत् । ततः आयुष्मान भव सौम्य इत्याचार्यो ब्रूयात् । ततोग्नेरुत्तरतः प्रागयान् कुशा- नास्तीर्य तदुपरि दक्षिणोत्तरक्रमेणासादितवारिपूर्ण- कलशाष्टतये कलशानां पुरतः प्रागग्रेषु कुशेषु स्थि- त्वा एकस्मादाम्रपल्लवेनोदकं गृहीत्वा । ॐ येप्स्वं- तरग्नयः प्रविष्टागोटउपगोटोमयूषोमनोहास्खलो- विरुजस्तनूदपुरिंद्रियहान्विजहामियोरोचनस्तमिहन- हामि इति मत्रेण । ततस्तेन मामाभषिचामिश्रिय यशसे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय इत्यात्मानमभिषिंचति । ततो द्वितीयघटस्थमुदकं गृह्णामि। ॐ येप्स्वंतरग्नयः इति मन्त्रेण गृहीत्वाम्रपल्लवेनाभिषिञ्चति । तय इसी प्रकारसे वरुणको सम्बोधन करके नमस्कार करे और आचार्यको भी नमस्कार करे । तब आचार्य कहे "सौम्य आयुष्मान्। भव" अर्थात् हे सौम्य ! तुम चिर आयुर्दावाले हो। तब अग्निके उत्तरकी ओर सामने कुशा फैला कर उसके ऊपर दक्षिण और 7 [ ४६ ] उत्तरके क्रमसे स्यापन किये, जलसे पूर्ण किये हुए आठ कलश पूर्व इत्यादि दिशाओं वाली कुशाके ऊपर एक कलशमेसे श्रामके पत्तेसे जल लेकर “ॐ येप्वन्तर०० इत्यादि मन्त्र पढ़कर श्री (लक्ष्मी) यश और ब्रह्मतेज प्राप्त करनेके निमित्त अपनेको मार्जन करे। मन्त्रीका अर्थ 'ॐ ये प्वन्तर जलमें स्थित गोहा, उपगोहा, मयूख, मनोहर, खल, विरुज और तनू, दुषु ये जो आठ अग्नि हैं इनको त्याग कर मैं रोचन और कल्याण नामकी अग्नियों सहित जलको स्नान करनेके लिये ग्रहण करता हूँ। 'ततस्तेन-इस जलसे लक्ष्मीलाभ, यशलाभ, ब्रह्मज्ञानलाभ और ब्रह्मतेजलाम हो इसी निमित्त आत्म- सिंचन करता हूँ। इस पूर्वोक्त मन्त्रसे श्रामके पत्तेसे अपने ऊपर मार्जन करे। ॐ येन श्रियमकृणुतां येनावमृष्यता ५ सुरां येनाल्यावभ्यषिंचतां यद्वा तदश्विना यशः इति मंत्रेण । ततस्तेनैवक्रमेण 'पुनः येप्स्वंतर' इत्यनेन सुतीयकलशस्थजलमादाय ॐ आपोहिष्ठामयो- सुवस्तानऊर्जेदधातन।महेरणायचचुषे । इति मंत्र- याभिषिच्यतेनैव क्रमेण येप्स्वंतरग्नय इति मंत्रेण । चतुर्थकलशस्थजलमादाय ॐ योवः शिवतमोरस- स्तस्यभाजयतेहनः । उशतीरिवमातरः । इति मंत्र- णाभिषिच्य पुनः पंचमकलशस्थं जलं येप्स्वंतर- उनय इति मंत्रेण तथैवादाय ॐतस्मा अरंगमामवो- यस्यक्षयाय जिन्वथ । आपोजनयथाचनः । इति मंत्रणाभिषिच्य ततोऽवशिष्टकलशत्रितयजलं तथै- वयेप्स्वंतरग्नय इति मंत्रण प्रत्येकं गृहीत्वा तूष्णी प्रत्येकमभिषिचति।
[४७ ] अर्थ-जिस जलसे अश्विनीकुमार लक्ष्मीयुक्त हुए, सुरा (मदिरा) से उत्पन्न दोष दूर किये और जिस जलसे उन्होंने नेत्र सींचे उस जलसे मैं अपनी आत्माको सिंचन करता हूँ। इसके अनन्तर उसी क्रमसे "ॐ येप्स्वन्तर०" इत्यादि मंत्र पढ़कर तीसरे कलशसे जल ले और "आपोहिष्ठा०० इत्यादि मन्त्रोंसे सिंचन फरे। और फिर “ॐ येप्स्वन्तर०" इस मन्त्रको पढ़कर चौथे कलश- का जल ले और “ॐ योवः शिव०॥ इस मन्त्रसे मार्जन करे। फिर पांचवें कलशका जल ले और "ॐ तस्मा इस मन्त्रसे अभिषेक करे। अब बाकी तीन कलशोमेसे भी इसी प्रकारसे जल ले और आगे लिखे मन्त्र पढ़कर मार्जन करे। ततो खलामोचनं शिरोभागेनॐउर्दुत्तमव्वरु- णपाशस्मदवाधर्मविमध्यम ५ श्रथाय । अथाव्वय मादित्यव्रतेतवानागसोआदितयेस्याम इति मंत्रण। दंडकृष्णाजिने तूष्णीं भूमौ निधाय अन्यबस्त्र परिधायोत्तरीयं च कृत्वाऽऽचम्य बद्धांजलिरादि- त्यमुपतिष्ठत ब्रह्मचारी । ॐ उद्यन्श्राजभृष्णुरि- द्रोमरुद्धिरस्थात् । प्रातविभिरस्थातदशसनिर- सिदशमनिमाकुळविदन्मागमयोधम्राजभूष्णुरि- द्रोमरुद्भिरस्थादहियायावभिरस्थाच्छतस निरसि- शतसनिमाकुळविदन्मागमयोबभ्राजभूष्णुरिंद्रो- मरुद्भिरस्थात्सायंयावभिरस्थात् । सहस्रसनिरसि- सहस्रमनिमाकुळविदन्मागमय इति मंत्रेण । तव मेखला (मूंजकी करधनी)को शिरको ओरसे उतारे और १ इस मन्त्रकी व्याख्या पहिले हो चुकी है। १ [ ४८ ] "ॐ उदुत्तमं मंत्र पढ़े। इसके अनन्तर ब्रह्मचारी दण्ड और काले मृगचर्मको बिना किसी मन्त्रको कहे चुपचाप पृथ्वीपर उतार कर धरे औ दूसरे वस्त्र धारण । बाद डुपट्टा ओढ़कर आचमन करके हाथ जोड़ कर “ॐ उद्यन्o" इत्यादि मन्त्र पढ़कर सूर्यनारायणका उपस्थान करे। मन्त्रका अर्थ-प्रातःकाल सूर्य भगवान् सम्पूर्ण मरुत् देवताओंके साथ किरणोको धारण करते हुए उदय हुए। हे आदित्य ! तुम सबको जाननेवाले हो। तुम बहुत धन देनेवाले हो अतएव मुझे भी बहुत धन दो और मुझे ब्रह्मचर्यसे उत्तीर्ण जानो। दूसरी श्रावृत्तिम "दिवा या वभिः सायं या वभिः पढ़े । सायंकालके उपस्थानमें “या- वद्भिः शतसनि सहस्रसनि" इतना विशेष है। इस मन्त्री दिवा दिन- का और सायं सायंकालका वाचक है। शत और सहस्त्र ये दोनों शब्द अनेक संख्यावाचक हैं। इस प्रकार सूर्य भगवानकी स्तुति करके बहुत धन होनेकी प्रार्थना करे। ततो दधितिलान्वा प्राश्याचम्य जटालोमन- खादीश्छेदयित्वा स्नात्वाचम्य प्रादेशमितोदुंबरका- ष्ठेन दंतधावनम् । ओमन्नाद्याव्ययूहन्ध ५ सोमो- राजायमागमत्ममंसुखंप्रमायतेयशसा च भगेन- च इति मंत्रेण । ततो दंतकाष्ठं परित्यज्याच- म्य सुगंधिद्रव्येणोद्वर्तनानंतरं स्नाला द्विराचम्य चंदनकुंकुमादिना नासिकाया मुखस्यालंभने प्रा- णापानौ मे तर्पय। ॐ चक्ष तर्पय । ॐ श्रोत्रं मे तर्पय । इति मंत्रेणानुलिपति । ततः पाणी प्र- क्षाल्य दक्षिणाभिमुख पातितवामजानुः कृतापस- व्योदिगुणभुग्नकुशत्रयतिलजलान्यादाय आस्तृ- [.४६ ] तकुशत्रयोपरि पितॄस्तर्पयेत् । ॐ पितरः शुधव- मिति मंत्रेण । ततः सव्यं कृत्वा आचम्यानुलिप्य जपेत् । ॐ सुचक्षा अहमक्षीभ्यां भूयास सुवर्चा मुखेन सुश्रुत कर्णाभ्यां भूयासम् । इति ततोऽह- तवासापरिधानम् । ॐ परिधास्यै यशोधास्यै दी- युत्वाय जरदष्टिरस्मि शतं च जीवामि शरदः पुरुचीरायस्पोषमाभिसंव्यपिष्ये । इति मंत्रेण । इसके अनन्तर दधि (दही) अथवा तिल खाफर और श्राचमन करके जटा, लोम, नख इत्यादि कटाकर स्नान करके फिर पाचमन करके प्रादेशमात्र (अर्थात् तर्जनी और अंगूठेके फैलानेके नाप) की गूलरकी दतवन करे और “ॐ मन्नाद्या०" इत्यादि मन्त्र पढ़े। मन्त्र का अर्थ हे वनस्पति ! जिस तुमसे वनस्पतिका स्वामी चन्द्र श्राया सो तुम अव जाओ और कीर्ति और सौभाग्यसे मेरे मुखको अन खानेके लिये साफ करो। तव दतवनको फेंककर आचमन करे। सुगन्धयुक्त उबटन लगाकर स्नान करे, दो बार आचमन करे और चन्दन और केसर रगडकर नासिका, मुख, नेत्र और कानों में लगावे और अलग अलग "ॐप्राणापानौ०" इत्यादि पड़े। इन मन्त्रोंका अर्थ पहले लिखा जा चुका है। इसके अनन्तर हाथोको धोवे और दक्षिण मुख होकर बांया जंघा तोड़कर अपसव्य होकर (अर्थात् यज्ञोपवीत दाहिने कन्धे पर रखकर) मोस्क तिल और जल हाथमे लेकर तीन कुशा विछाकर उनपर बैठे और ॐ पितरः०० इत्यादि मन्त्रोंको पढ़कर पितरोंको तर्पण करे । मन्त्र- का अर्थ है पितर लोगो, मुझे शुद्ध करो। तव सव्य होकर (वाये कन्धे पर यज्ञोपवीत रखकर) कुमार श्राचमन करे चन्दन लगावे और "ॐ सुचक्षा०॥ इत्यादि मन्त्र पढ़े। मन्त्र का अर्थ-मेरे नेत्र सुन्दर, मुख कान्तिवान् और कान सुन्दर होवें। इसके अनन्तर ॐ परिधाo, इत्यादि मन्त्र पढ़कर नवीन वस्त्र धारण करे। मन्त्र. ५ [ ५० ] का अर्थ-मैं वस्त्र पहिसँगा और कीर्ति प्राप्त करूँगा अर्थात् इस मेरे वन पहिरनेसे मुझे कीर्ति होगी और इस वस्त्र पहिरनेसे मैं सौ वर्ष जीवित रहूँगा और अति तेजस्वी और धनवान हो जाऊँगा। ततो यज्ञोपवीतपरिधानम् । ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्य- मयं प्रतिमुंर्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः। इति मंत्रेण द्वितीयग्रहणम् । यज्ञोपवीतमिति प्र- जापतिषिर्यजुरुपवीतदेवता यज्ञोपवीतपरिधाने- विनियोगः । ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञो- पवीतेनोपनह्यामि आचमनम् । अथोत्तरीयम् । ॐ यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेंद्राबृहस्पती यशो भगश्च माविदयशो मा प्रतिपद्यताम् इति मंत्रेण । इसके अनन्तर "ॐयज्ञोपवीतं०" इत्यादि मन्त्र पढ़कर यज्ञोपवीत धारण करें। इस मन्त्रका अर्थ पहले लिखा जा चुका है। यहाँपर दूसरा यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये। “ॐ यज्ञोपवीतं, इस मन्त्रका प्रजापति ऋषि है, यजुरुपवीत देवता है और इसको विनि- योग यज्ञोपवीत धारण करने में है। अर्थ यह यज्ञोपवीत आयुष्यका बढ़ानेवाला, श्रेष्ठ, शुन और अति पवित्र है, यह प्रथम ब्रह्माके साथ उत्पन्न हुआ है। इसके धारण करनेसे वल और तेज उत्पन्न होता है। इस मन्त्रसे यज्ञोपवीत धारण करनेके उपरान्त आचमन करे। इसके अनन्तर “ॐ यशसा०" इत्यादि मन्त्र पढ़कर वस्त्र धारण करे। मन्त्रका) अर्थ-आकाश और पृथ्वी मुझे यशसे परिपूर्ण करें, इन्द्र और वृहस्पति मुझे यश दे, यश और सौभाग्य मुझे प्राप्त हो । वारंबार मुझे यश मिले। ततः पुष्पमालाग्रहणे मंत्रः । ॐ यामाहरजम- दनिः श्रद्धायै कामयेंद्रियाय तामहं प्रतिगृह्णामि -- । [ ५१ ] यशसाच भगेन च । इति मंत्रेण पुष्पमालाग्रहणम् । ततः पुष्पमालापरिधानम् । ॐ यद्यशोप्सरसामि- न्द्रश्चकार विपुलं पृथु। तेन संग्रथिताः सुमनस आवघ्नामि यशो मयि । इति मंत्रेण पुष्पमालाप- रिधानम् । इसके अनन्तर पुष्पकी माला पहिरनेके मन्त्र कहे हैं । “ॐ यात्रा- हर०॥ इत्यादि मन्त्र पढ़कर पुष्पमालाको धारण करे । मन्त्रीका अर्थ- जिस पुष्पकी मालाको जमदग्नि ऋपिने अपने अभीष्ट फलके प्राप्त करनेके निमित्त धारण किया था उन्हीं पुष्प मालाओंको में यश और सौभाग्य प्राप्त करनेके निमित्त चतु इन्द्रियोंके पर्यन्त धारण करता हूँ। उपरोक्त मन्त्र पढ़कर पुष्पमालाको हाथमे लेना और “ॐ यशो" इत्यादि मन्त्र पढ़कर धारण करना। मंत्रका अर्थ-जो उर्वशी इत्यादि अप्सराओंके धारण करने पर उनके असीम यशका काणा हुश्रा उसीसे आये हुए पुष्पोंकी मालाको में यश प्राप्त करनेके निमित्त धारण करता हूँ। अर्थात् इस मालाके धारण करनेसे मुझे वही यश मिले जो देवता, अप्सरानी इत्यादिको मिला। अथ वसुप्रतिष्ठा । अथोष्णीषण शिरोवेष्टनम्। ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः तं धीरा सः कवय उन्नयंति स्वा- मनसा देवयंतः । इति मंत्रेण । है, इसके अनन्तर वस्तुकी प्रतिष्ठा करे । तब “ ॐ युवा सुवासाः०" इत्यादि मन्त्र पढ़कर सिरपर पगड़ी बाँधे । मन्त्रका अर्थ-जो युवा पुरुष वस्त्र धारण करके आया वही भेष्ठ होता है। अच्छा वस्त्र पहिरने वाला सुन्दर पुरुष पण्डितोसे प्रशंसा किया जाता है और हृदयसे लोग उसकी स्तुति करते हैं। ततः कुंडले परिदधाति । ॐ अलंकरणमसि [ ५२ ] भूयोलंकरणं भूयात् । ततोजनम् । ॐ वृत्रस्यासि कनीनकश्चक्षुर्दा असि चक्षुर्मे देहि । तत आदर्श आत्मदर्शनम् । ॐ रोचिष्णुरसि इति मंत्रेण । ततश्छत्रग्रहणम् । ॐ बृहस्पते छदिरास पाप्मनो मामन्तधेहि । इति मन्त्रेण । इसके अनन्तर "ॐ अलंक०" इत्यादि मन्त्र पढ़कर बालक दोनों कानमें कुण्डल पहने। मन्त्रका अर्थ-हे कर्ण कुण्डल ! तू शोभाको देने वाला है अतएव मेरी शोभा बढ़ा। इसके अनन्तर आंखों में ॐ वृत्रस्यासि०५ पढ़कर अंजन लगाये । मन्त्रका अर्थ-हे अजन! तू वृत्रासुरके नेत्रका तारा है और नेत्र देनेवाला है अतएव तू मुझे नेत्र दे। तब "ॐ रोचि० इत्यादि मन्त्र पढ़कर कुमार दर्पणमें अपना मुख देखे । मन्त्रका अर्थ-हे दर्पण ! तू प्रकाश खभाववाला है अतएव मुझे प्रकाश दे। इसके अनन्तर ॐ वृहस्पते" यह मंत्र पढ़कर छत्र धारण करे। मन्त्रका अर्थ हे छत्र ! तू वृहस्पतिका ाितप (घाम) हटाने वाला है अतएव तू मेरे पाप रूपी आतपसे मुझे बचा। अर्थात् तू सूर्यके आतपसे मुझे निवारण कर तथा मुममें जो पाप हैं उन्हें भी हटा दे। ततः पद्यामुपानहौ प्रतिगृह्णाति । ॐ प्रतिष्टे स्थो विश्वतोमा पातम् । इति मंत्रेण। ततो वैणव. दंडधारणम् । ॐ विश्वाभ्यो मा नाष्ट्राभ्यस्परिपा हि सर्वतः । इति मंत्रेणं । इसके अनन्तर "ॐ प्रतिष्ठ" इत्यादि मन्त्र पढ़कर कुमार जूता पहिरे । मन्त्रका अर्थ-हे उपानह ! तुम चलने में उपकाव हो अर्थात् नहीं थकते, गतिवान् होनेके कारण प्रतिष्ठावाले हो अतएव गतिके' विरोधोंसे अर्थात् कंटक इत्यादिसे मेरी रक्षा करो। इसके अनन्तर यांसका दण्ड "ॐ विश्वेभ्यो०" मन्त्र पढ़कर धारण करे। मन्त्रका - [ ५३ ] अर्थ-हे वेसुदण्ड ! काटने और फाड़ने वाले जो पशु हैं अर्थात् सर्प, तथा सींध वाले जानवर इत्यादि उनले मेरी रक्षा करो। ततः स्नातकस्य नियमाः। गानवादित्रनृत्य- त्यागः। न तत्र गमनम् । क्षमे सति न रात्रौ ग्रा- मान्तरगमनम् । न धावेत् न कूपेऽवेक्षणम् । न बृक्षारोहणम् । न फलत्रोटनम् । अमार्गेण न गच्छेत् । नमो न मायात् न संधिशयनम् । न विषमभूमिलंघनम्। अश्लील नोपवदेत्। उदितास्त- समये सूर्य नो पश्येत् । जलमध्ये सूर्य आकाश- स्थं न पश्येत् । देवे वर्षति न गच्छेत् । उदके आत्मानं न पश्येत् अजातलोम्नी प्रमत्तां पुरुषा- कृर्ति षंढां च न गच्छेदित्यादि । तत आचार्याय वरां दक्षिणां दद्यात् । इसके अनन्तर नातकके नियम लिखे जाते हैं। वे इस प्रकार हैं- स्मातक, गाना बजाना इत्यादिका त्याग करे और इनमें जाना भी स्थाग दे अर्थात् न तो वह स्थयं नाचे गावे और न ऐसी मण्डलाने जाकर उनका तमाशा देखे । क्षेम (अच्छा) होकर रात्रिमें दूसरे गांव- में न जाय। ब्रह्मचारी दौड़े नहीं, कुंवा न झांके, पेड़पर न चढ़े, वृक्षसे फल न तोड़े, वेरस्ते न जाय, नंगा होकर स्नान न करे, सन्धि' अर्थात् सायंकाल और प्रातःकालके समयन सोवे, ऊँची नीची वी पर न कूदे । अश्लील वाक्य (गाली गुप्पड ) न बोले, असत्य भाषण न करे और अरसिक न बोले, सूर्यका उदय और अस्त होता हुआ न देखे, जलमें सूर्यकी परछांही न देखे, पानी बरसनेमें न चले फिरे, जलमें अपनी परछांहीं भी नदेखे, और रोमरहित उन्मत तथा पुरुष- की श्राकृति वाले नपुंसक स्त्रियोंके साथ विपय न करे। ये सब कार्य [ ५४ ] हो जानेके पश्चात् श्राचार्यको यथोचित्त (जहाँतक अपनेसे हो सके) दक्षिणा दे। ततः मूर्धानं दिवोअरतिं पृथिव्यावैश्वानरमृत आजातमग्निं कवि ५ सम्राजमतिथिं जनानामास- नापात्रं जनयंत देवाः खाहा । इति मंत्रेण फलपु. प्पसमन्वितघृतपूर्णत्रवेण माणवकदक्षिणकरस्पृष्टेन उत्थाय पूर्णाहुतिमाचार्यः कुर्यादिति। तत उपवि- श्य स्वेण भस्मानीय दक्षिणानामिकामगृहीतभस्म- ना। ॐ व्यायुषं जमदग्नेरिति ललाटे। ॐ क. श्यपश्य घ्यायुषमिति ग्रीवायाम् । ॐ यद्देवेषु त्र्यायुषमिति दक्षिणवाहुमूले। ॐ तन्नो अस्तु व्यायुषमिति हृदि इति न्यायुषं कुर्यात् । अनेनैव क्रमेण कुमारललाटादावपि तत्र तन्नो इत्यस्य स्थाने तत्ते इति विशेषः । ततो मूर्धान्तादिग्रहणम् । इसके अनन्तर “ॐ भूर्भानं०" इत्यादि मन्त्रोंसे घृतंयुक्त पूर्णा- हुति करे। ज्यायुषं० इस मन्त्रसे ललाट, ग्रीवा दक्षिण बाहु और हृदय में खुवासे हवन भस्म उठाकर अनामिकासे अपने ललाट इत्यादिमें तथा शिप्यके भी ललाट इत्यादिमें लगावे। इसके अनन्तर आचार्य कुमारके मस्तकपर अक्षत पुष्प इत्यादि छिड़के। .
[ ५५ ] अनुक्रमणिका [१] उपयुक्त यज्ञ पात्रोंकी आकृति और उनके लक्षण । (१) प्रोक्षणी पात्र--प्रणीता नम्रते भागे तबदायव्यगोचरे। पारणं संविजानीयात्सर्व कर्मसु कारयेत् ॥ सर्यसंशोधनार्थीदपात्रं. वारणमिप्यते । द्वादशाङ्गुल दीघंच करतलोन्मितखातकम् ॥ पमपत्रसमाकारं मुकुलाकारमे पवा ।। अर्थ-यह पात्र धारह अंगुल लया और हथेली इतना गहरा होना चाहिये । एसका आकार या तो फमलके पत्ते अथवा कमलके फूलके ऐसा होना चाहिये। (२) श्राज्यस्थाली-तेजसी मृण्मयी वापि हाज्यस्थाली प्रकीर्तिता। द्वादशांगुल विस्तीर्ण प्रादेशोचप्रमाणतः ॥ अर्थ-यह स्साली-तेजसधातुकी (अर्थात् सोने, चांदी, कांसे इत्यादिकी) होनी चाहिये अथवा मिट्टीकी बनी हो चारह अंगुल लंची और प्रादेश मात्र गहरी होनी चाहिये। (३) चरुरथाली-चरुस्थाली तथैवापि दीर्घोचातुप्रमाणतः । नानयोरन्तरं यस्माद्रव्य संस्करणार्थका ॥ अर्थ-यह स्पाली (थाली) भी श्राज्यवालीकी नाई होती है परन्तु उससे घड़ी और ऊँची होती है। जिस उपयोगमें यह श्राती है उसीके अनुसार इसका प्रमाण होना चाहिये। (४) संमार्जन कुशा-सुव संमार्जनाथंतु कुशत्रयमुदीरितम् । अर्थ-वासे मार्जन करनेके निमित्त तीन फुशाका प्रयोग करना चाहिये। (५) कुशाप्रमाण-उपयमनार्थमाख्यातासिपएनवमिताः कुशाः। वेणीरूपा निरोधार्था निरोधे बहुभिः सुखम् । अर्थ-उपयमनके निमित्त तीन, छ, अथवा नौ कुशा घेणीकप निरोधके निमित्त बताए गए हैं। (६) समिस्तिस्त्रः-पलाशजं तु प्रादेशमात्रं देयेण स्थूलता । कनिष्ठिका समध्यात्वा विधिमसौ क्षिपेष तत् ॥ अर्थ-पलाशकी समिधा प्रादेशमात्र लंबी और कानी भंगुली इतनी मोटी अग्निमें हवन करते समय प्रयोग करना चाहिये।
[ ५६ ] अनुक्रमणिका [२] आठों दिशाके जाननेके निमित्त निन्नलिखित चक्र दिया जाता है। hd ईशान पश्चिम पूर्व श्राग्नेय दक्षिण an उपक्रमणिका [३] उपनयनका समयनिर्णय इत्यादि । गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायकम् । गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः ।। मनु० अ० २, श्रो० ३६ । ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्य विप्रस्य पञ्चमे । राज्ञो वलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे ॥३७॥ आषोडशाब्राह्मणस्य सावित्री नाति वर्तते । आद्वाविंशात् क्षत्रबन्धोराचतुर्विशतेर्विशः ॥३८॥ उत ऊर्दू प्रयोऽप्येते यथा कालमसंस्कृताः। सावित्री पतितावात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः॥३क्षा अर्थ---गर्भसे अष्टम वर्षमें ब्राह्मणका यज्ञोपवीत होना चाहिये, गर्भसे ग्यारहवें वर्षमें क्षत्रीका और गर्भसे वारहवें वर्ष वैश्यका। + - [ ५७ ] यदि वेदाध्ययन पूर्णरूपसे कराने तथा उत्तम ज्ञान करानेकी इच्छा हो तो ब्राह्मणका यज्ञोपवीत पाँच वर्षमें करना चाहिये । और क्षत्रिय यदि अधिक बलवान होनेकी इच्छा करे तो उसका यज्ञोपवीत छठे वर्ष करना और वैश्य यदि अधिक धनकी लालसा करे तो उसका यशोपवीत पाठवें वर्ष करना चाहिये। ब्राह्मणको सोल हवर्षके उप- रान्त, क्षत्रियको वाईस तथा वैश्यको चौवीस वर्षके बाद (अर्थात् यदि इनका इस अवस्था तक यज्ञोपवीत न हो तो) गायत्रीका उपदेश नहीं किया जा सकता। इस अवस्थाके उपरान्त यदि उचित समय पर यज्ञोपवीत न किया जाय तो ये तीनों (ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य) गायत्री पतित हो जाते हैं, निन्ध होते हैं और ऐसोको वात्य कहते हैं । वेदाध्ययनकी अवधिक विषयमें मनुजी इस प्रकार लिखते हैं- पत्रिंशदाब्दिकं चयं गुरौ त्रैवेदकं बतम् । तदर्धक पादिकं वा प्रहणान्तिकमेव पो ॥ मनु० १० ३, ओ०१ वेदानधीत्य वेदौवा वेदं वापि यथाक्रमम् । अविमुत ब्रह्मचर्यों गृहस्थाश्रममावसेत् ॥२॥ अर्थ-छत्तीस वर्ष तक गुरुके पास रहकर ब्रह्मचारीको वेदाध्ययन करना चाहिये। इसके आधे (अर्थात् अट्ठारह) वर्ष तक अथवा इसके भी आधे (नौ) वर्ष तक वेदाध्ययन करे (यहाँ छत्तीस वर्ष तीन वेदोंके पढ़नेके वास्ते कहे गए हैं-प्रत्येक वेदाध्ययनमें वारह बारह वर्ष लगते हैं) ब्रह्मचर्यका व्रत न तोड़कर तीनों वेद पढ़े यदि यह सम्भव न हो तो दो वेद पढ़े और यह भी न हो सके तो एक वेद अवश्य ही पढ़े (विना इसके ब्रह्मचर्य आश्रम त्यागकर गृह- स्थाश्रम में प्रवेश न करना चाहिये)। यशानां तपसां चैव शुभानाञ्चैव कर्मणाम् । वेद एव द्विजातीनां निः श्रेयसकरः परः ।। याज्ञवल्क्य स्मृ० अ० १ नो० ४०। अर्थ-यशोके, तपोंके और शुभकर्म करनेके लिये विजोंके लिये घेदाध्ययन अति आवश्यक है। अब मुहूर्तचिन्तामणिके अनुसार यज्ञोपवीतके काल और शुभ मुहर्त लिखे जाते हैं।
[ ५८ अविभाणां व्रतवन्धन निगदितं गर्भाजनेष्टमे वर्षेवाप्यथ पञ्चमे क्षितिभुजांषष्ठतथैकादशे । वैश्यानां पुनरष्टमेऽप्यय पुनः स्याद्वादशे वत्सरे कालोऽथ द्विगुणे गते विगहिते गौणंतदाहुर्बुधाः ॥१॥ अर्थ-ब्राह्मणोंका गर्भसे अथवा जन्मसे पांचवें अथवा आठ) वरस में व्रत तेजके निमित्त यज्ञोपवीत करावे, क्षत्रियका वलकी इच्छा- से छठे अथवा ग्यारहवें वरस, और वैश्यका धनकी इच्छासे प्राउ अथवा वारहवें बरस यज्ञोपवीत कराना चाहिये और गौण काल विद्वानों ने प्रत्येकमें इससे दुगुना कहा है। तिम ध्रुवा हि चरमूल मृदु त्रिपूर्वा रौद्रऽर्क विद्गुरुसितेन्दुदिने व्रतं सत् । वित्रीषुरुद्र रविद्विममिते तिथौच कृष्णादि मत्रिलवकेऽपि न चापराहे ॥२॥ अर्थ-हस्त, अश्विनी, पुष्य, रोहिणी, तीनों उत्तरा, आश्लेषा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पुनर्वच्छ, खाती, मूल, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों पूर्वा और आर्द्रा ये नक्षत्र यज्ञोपवीतके लिये श्रेष्ठ कहे गये हैं। और वुध, गुरु, शुक्र, सोम ये वार और द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, एकादशी, द्वादशी, दशमी ये तिथियाँ पक्षकी पञ्चमी पर्यन्त तिथियों में और इनमें अपराह अर्थात् तीसरे पहरको छोड़ ऐसे समयमें यज्ञोपवीत श्रेष्ठ है। कवीज्यचन्द्र लग्नपा रिपो मृतौ व्रतऽधमा । व्ययेऽन्जभार्गवौ तथा तनो मृतौ सुते खलाः ॥ ३ ॥ अर्थ-छठे अथवा अष्टम स्थानमें शुक्र, गुरु, चन्द्र लग्न खामी हो तो यज्ञोपवीत मृत्युकारक होता है और चन्द्र और शुक्र वारहवे खानमें अशुभ हैं, और पापग्रह लग्नमें, अष्टम स्थानमें अथवा पञ्चम स्थानमें भी अशुभ कहे हैं। AmpA * मुहतचिन्तामणि संस्कार प्रकरण नोल ३६ से ६० तक ।
[ 8 ]
व्रतवन्धेऽष्ट पड्रिः फलर्जिताः शोभनाः शुभाः ।
त्रिपडाये खलाः पूर्णो गोकर्कस्थो विधुस्तनौ ॥ ४ ॥
अर्थ--शुभग्रह आठवें, छठे, पारहवें स्थानमें हो तो यज्ञोपवीत
शुभ नहीं समझना, परन्तु अन्य स्थानोंमें हो तो शुभ जानना और
पापग्रह तीसरे, छठे, ग्यारहवें स्थानमें शुभ नहीं होते परन्तु अन्य
स्थानोंमें शुभ होते हैं और पापग्रह तीसरे, छठे, ग्यारहवें स्थानमें शुभ
होते हैं। पूर्णचन्द्र, वृप, कर्क तथा लग्नमें हो तो व्रतबन्ध शुभ
जानना चाहिये।
विमाधीशौ भार्गवेज्यौ कुजाकौं
राज्यन्यानामौपधीशो विशांच ।
शूद्राणां ज्ञश्वांत्यजानां शनिस्या-
च्छाखेशः स्युर्जीवशुक्रारसौम्याः॥५॥
अर्थ-शुक्र और बृहस्पति ब्राह्मणों के खामी हैं; मंगल और सूर्य
क्षत्रियोंक; चन्द्रमा वेश्यका स्वामी तथा बुध शुद्रोंका खामी है गुरु
ऋग्वेदका स्वामी, शुक्र यजुर्वेदका, भौम सामवेदका तथा बुध अथर्व
का स्वामी है।
शाखेश वाग्तनुवीर्यमतीव शस्त
शाखेश सूर्य शशि जीव वले व्रतं सत् ।
जीवे भृगौ रिपुगृहे विजितेच नीचे
स्याद्वंदशास्त्रविधिना रहितो व्रतेन ॥६॥
अर्थ-जो अपना शाखाधिप हो और उसका वार, लग्न गोचर
हो और बलवान हो तो' यज्ञोपवीत श्रेष्ठ है । यथा-ऋग्वेदियोको
गुरुवारमें धन, मीन लग्नमें गुरु बलवान होतो यज्ञोपवीत अतिश्रेष्ठ है
और वेदका स्वामी सूर्य, चन्द्र, वृहस्पति इनके चलमें भी यज्ञोपवीत
श्रेष्ठ है और गुरु, भृगु शाखेश वर्गेश रिपुस्थानमें हो तो वयं है और
यदि ये नीच राशिमें हो तो यज्ञोपवीत करनेसे बालक शास्त्रसे
विमुख रहेगा।
जन्मर्तमासलमादौ व्रत विद्याधिको व्रती।
आद्यगर्भपि विप्राणां शत्रादीना मनादिमे ॥ ७॥
[ ६०]
अर्थ-जन्म नक्षत्रमें, जन्ममासमें, जन्म लग्नमें, ब्राह्मण के ज्येष्ठ
पुत्रका और द्वितीयका यदि यज्ञोपवीत होतो यह विद्यामें निपुण होवे,
क्षत्रिय वैश्यके दूधरे गर्भका बालक जन्म नक्षत्र इत्यादिमें यदि यज्ञो-
पवीत हो तो व्रती और विद्वान होवेगा ।
बटुकन्या जन्मराशेस्त्रिकोणाय द्विशप्तकः ।
श्रेष्ठो गुरुः खषट्च्याचे पूजयान्यत्र निन्दितः ॥८॥
अर्थ-वालक और कन्याकी जन्म राशिसे नवम, पञ्चमं और
एकादश तथा सप्तम स्थानोंमें गुरु श्रेष्ठ है और दशवा, छठां तीसरा
और प्रथम इन स्थानोंमें पूजा करनेसे श्रेष्ठ है अन्य स्थानोंमें
निन्दित है।
खोचे स्वमें खमैचेवा खांशी वर्गोचम् गुरु ।
रिःफाष्टतुर्यगोपीष्टो नीचारिस्था शुभोऽप्यसन् ॥ ६ ॥
अर्थ-चतुर्थ इत्यादि नीच स्थानों में रहता हुआ भी गुरु यदि
कर्कका हो अथवा धन, मीन पर हो वा मेष, सिंह, वृश्चिक पर हो
वा धन मीनके नवांशपर हो अथवा वर्गोत्तरमें हो तो शुभफलका
देने वाला होता है और मकर राशि तथा शत्रु राशिका गुरु
अशुभ होता है।
कृष्णेप्रदोषेऽनध्याये शनौ निश्यपरालके ।
माक्सन्ध्या गर्जिते नेष्टो व्रतवन्धो गलग्रहे ॥१०॥
अर्थ-प्रथम विभाग रहित कृष्ण पक्षम, प्रदोषमें, अनध्यायमें,
शनिवारके दिन, रात्रिमें तीसरे पहर में, प्रातःकाल तथा गर्जनामें और
गलग्रहमें व्रतवन्ध उत्तम नहीं होता।
क्रूरो जडो भवेत्पापः पट्टापट्कर्मकद्रदुः ।
यज्ञार्थभाक् तथा मूल् व्यावंशे तनौ क्रमात् ॥१२॥
अर्थ यदि लग्नमें रवि इत्यादिका अंश हो तो क्रूर, जड़, पापी,
चतुर षटकर्मी यज्ञार्थ भजनेवाला ये फल क्रमसे जानना ।
विद्या निरतः शुभराशिलवे पापांशगते हि दरिद्रतरः।
चन्द्रे खलवेवहु दुःखयुतः कर्णादिभेधन वान्स्ववले ॥१२॥
[ ६१ ] अर्थ-यदि शुभराशिके नवांशमें चन्द्रमा हो ती बालक विद्या पढ़े, करग्रहके नवांशमें यदि चन्द्र होतो दरिद्री होवे, कर्कका नवांश हो तो अत्यन्त दुखी हो, श्रवण और पुनर्वसू नक्षत्र हो और चन्द्रमा अपने नवांशमै हो तो यज्ञोपवीत अति शुभ है। राजसेवी वैश्यवृत्तिः शास्त्रत्तिश्च पाठकः । मोज्ञोऽर्थवान् म्लेच्छसेवी केन्द्र सूर्यादि खेचरैः ।।१३।। शुक्र जीवे तथा चन्द्र सूर्ये भौमार्किसंयुते । निर्गुणः क्रूरचेष्टः स्यानिघृणः सधुदे पटुः ॥१४॥ अर्थ-सूर्य आदि ग्रह केन्द्र में हो तो क्रमसे निम्नलिखित फल कहना-राज सेवा कर, वैश्यका कार्य करे, शास्त्र वृत्तिवाला हो, पढावे, पण्डित हो, धनी हो, म्लेच्छकी सेवा करे। शुक्र, गुरु और चन्द्रमा ये ग्रह यदि सूर्य मंगल और शनिश्चरसे युक्त हों तो गुण- शुन्य, क्रूर चेष्टावाला, और दयारहितं हो और यदि शुभ लग्नोसे युक्त हो तो चतुर हो। विधौ सितांशगे सिते त्रिकोणगे तनौ गुरौ । समस्तवेद विव्रती यमांशगेऽति निपुणः ॥१५॥ अर्थ-चन्द्रमा शुक्रके नवांशमै यदि हो, शुक्र त्रिकोणमें हो और बृहस्पति लग्नमें हो तो सम्पूर्ण वेदोंका जाननेवाला हो और इनके नवांशमै चन्द्रमा हो लग्नमें गुरु तथा त्रिकोणमें शुक्र हो तो बालक कृतघ्न होवे। शुचिशुक्र पौपतपसांदिगविरुद्रार्क संख्यसित तिथयः । भूतादित्रितयाष्टमि संक्रमणं च व्रतेष्वनध्यायाः ॥१६॥ अर्थ-आषाढ शुक्ल दशमी, ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया, पौप शुक्ल एका- दशी, माघ शुक्ल द्वादशी और चतुर्दशी, पूर्णिमा, प्रतिपदा, अष्टमी, संक्रांति दिन ये यज्ञोपवीतके अनध्याय हैं। अर्क तर्क त्रितिथिषु मदोषः स्यात्तदग्रिमैः । राज्यर्घ सार्थ महर याममध्य स्थितैः क्रमात् ॥१७॥ अर्थ-द्वादशीके दिन आधी रातके पहिले त्रयोदशी आवे तो A [ ६२ ] प्रदोष जानना, छठमें डेढ पहर पहिले सप्तमी आवे तो प्रदोष कहना तृतीयामें पहिले प्रहरमें चतुर्थी आवे तो प्रदोष जानना चाहिये। माग्नमौदनपाकाव्रतवन्धानन्तारं यदि चेत् । उत्पातानध्ययनोपचावपि शान्ति पूर्वकं तत्स्यात् ॥१८॥ अर्थ-ब्रह्मौदन पाकसे पहिले और यज्ञोपवीतके अनन्तर यदि उत्पात्त अनध्याय हो तो भी शान्तिपूर्वक यज्ञोपवीत करना चाहिये। वेदक्रमाच्छशिशिवाहि करत्रिमूल पूर्वामु पौष्पाकर मैत्रमुगादि तीज्ये । ध्रौवेषु चाश्विवसुपुष्य करोत्तरेश- कणे मृगांत्यलघुमैत्रघनादितौ सत् ॥१६॥ अर्थ-मृगशिरा, अश्लपा, आर्द्रा, हस्त, चित्रा, खाती, मूल तीनों पूर्वा इन नक्षत्रोंमें ऋग्वेदवालोंका यज्ञोपवीत शुभ है। रेवती, हस्त, अनुराधा, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, रोहिणी तीनों उत्तरा इनमें यजुर्वे- दियोंका, अश्विनी, धनिष्ठा, पुष्य, हस्त, तीनों उत्तरा, आर्द्रा, श्रवण इनमें सामवेदियोंका तथा मृगशिरा, रेवती, पुष्य, अश्विनी हस्त, अनुराधा ,धनिष्ठा, पुनर्वसु इनमें अथर्व वेदियोंका यज्ञोपवीत शुभ है। नान्दीश्राद्धोत्तरं मातुः पुष्ये लग्नान्तरेनहि । शान्त्या चौलं व्रतं पाणिग्रहः कार्योऽन्यथा न सत् ॥२०॥ अर्थ-नान्दी श्राद्धके अनन्तर यदि वालककी माता ऋतुमती होवे और अन्य शुभ लग्न न मिलता हो तो शान्ति करके मुण्डन, यज्ञोपवीत और विवाद ये श्रेष्ट हैं और समय नहीं। विचैत्र व्रतमासादौ विभौमास्ते विभूजिते । छुरिकाबन्धनं शस्तं नृपाणां माग्विवाहितः ॥२१॥ अर्थ-चैत्रको छोड़ यज्ञोपवीतमें कहे महीनों में अर्थात् माध, फाल्गुन, वैशास्त्र और ज्येष्ठ इन महीनों में और यज्ञोपवीतमें कहे नत्र जन्म लग्न आदिकोंमें और भौम, गुरु, शुक्र इनके अतिरिक्त दिनोंमें भौम छौड़ अन्य वारों में विवाहसे पहले क्षत्रियोंका छुरिका- बन्धन शुभ है। :
[ ६३ ] केशान्तं षोडशे वर्षे चौलोक्त दिवसे शुभम् । व्रतोक्तदिवसादौ हि समावर्तनमिष्यते ॥२२॥ अर्थ-चूड़ा कर्मके लिये कहे दिनों में, सोलहवें वर्ष में केशान्तकर्म करना उत्तम है और यज्ञोपवीतके लिये कहे दिनों में समावर्तनसंस्कार शुभ कहा है। उपक्रमणिका [४] वेदका अनध्याय । याशवल्क्य स्मृतिके प्रथम अध्यायसे उद्धृतः- त्र्यहं प्रेतेष्वनध्यायः शिष्यविंग्गुरुवन्धुषु । उपकर्मणि चोत्सर्गे स्वशाखा श्रोत्रिये तथा ॥१॥ सन्ध्यावर्जित निर्धात भूकम्पोल्का निपातने । समाप्य वेदं ह्यनिश मारण्यकमधीत्य च ॥२॥ पञ्चदश्यां चतुर्दामष्टम्यां राहु सूतके। ऋतु सन्धिषु भुस्यावा श्राद्धिकं प्रतिगृह्यच ॥३॥ पशुमण्डूक नकुल मार्जाराश्वोऽहि मूषकैः । कृतेन्तरे त्वहो रात्रं शक्रपाते तथोच्छये ॥४॥ श्वक्रोष्ट्र गर्दभोलूक साम वाणर्त निःखने । अमेध्यशव शूद्रान्त श्मशानपतितांन्तिके ॥५॥ देशेऽषु चावात्मनि च विद्युत्स्तनित संसवे । भुक्ताई पाणि रम्भोन्तरर्द्धराति मारुते ॥६॥ पांसुवर्षे दिशोदाहे सन्ध्यानीहार भीतिषु । धावतः पूति गन्धेच शिष्टेच गृहमागते ॥७॥ खरोष्ट्रयान हस्त्यश्च नौवृक्षे रिणरोहिणे । सप्तत्रिंशदनध्याया नेतांस्तात्कालिका विदुः ॥ ८ ॥ अर्थ-शिष्य, ऋत्विक् और बन्धु इनके मरनेपर तथा उपाकर्म (अर्थात् वेदोंके प्रारम्भ करनेके समयमें, भाद्रपद मासमें) और उत्सर्ग (घेदोंके उत्सर्गके समय अर्थात् पौष मास) में और यदि अपनी शाखाका दूसरा पढ़नेवाला भी मर जाय तो दिनका अन. ध्याय होता है ॥१॥ सन्ध्याके समय यदि मेघ गरजता हो, अकाशमें , , [ ६४ ] उत्पाद हो, भूकम्प अथवा उल्कापात (तारेका टूटना) हो और वेद समाप्त होने पर और श्रारण्यक पढ़ चुकने पर एक दिन रातका अनध्याय होता है ॥२॥ अमावास्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अष्टमी, सूर्य वा चन्द्रग्रहण, ऋतुओकी सन्धिमें, श्राद्ध में भोजन करनेपर अथवा दान लेनेपर एक दिन रातका अनाध्याय होता है ॥३॥ यदि पढ़ने और पढ़ानेवालोंके मध्यसे कोई पशु, मेढक, नेवला, कुत्ता, सर्प विडाल अथवा मूसा निकल जावे और इन्द्र ध्वजा जो वर्षके फल जाननेके लिये खड़ी की जाय अथवा उतारी जाय तो एक दिन रातका अनाध्याय होता है॥४॥ कुत्ते, सियार, गदहे, उल्लू पक्षी, साम, वाण तथा आतुर पुरुषका यदि शब्द सुन पड़े अथवा अपवित्र वस्तु, मृतक, शूद्र, चाण्डाल, श्मशान और पतित यदि समीप हो तो इनके समीप अनध्याय करना चाहिये ॥ ५॥ अपवित्र देश तथा भूमिपर, वारंवार विजली चमकनेपर, मेघ गरजने पर, भोजनके बाद गीले हाथ होनेपर, जलमें खड़ा होकर श्राधीरातमें और बहुत वायु वहती हो तो वेदका अनध्याय करे (अर्थात् न पढ़े)॥६॥धूर वरसती हो, दिग्दाह हो, सध्या अथवा प्रातःकाल कोई भय हो, दौड़ता हुआ अथवा दुर्गन्धके स्थानमें तथा यदि कोई शिष्ट अपने घर आ जाय तो अनध्याय करना ॥७॥ गदहा, ऊंट, रथ, हाथी, घोड़ा, नाव, वृक्ष और ऊसर पृथ्वी पर पद स्थित हो तो तत्काल वेद न पढ़े। ये तेतीस अन- ध्याय तभी तक माने जाते हैं जब तक इन घटनाओंकी सम्भावना है (इसके अनन्तर वेदाध्ययन करना योग्य है)॥ ॥ उपक्रमणिका [५] यज्ञोपवीत कब और किस प्रकारसे धारण करना चाहिये। सूतके मृतकेचैत्र गते मास चतुष्टये । नव यज्ञोपवीतानि धृत्वाजीर्णानि संत्यजेत् ॥ अर्थ-सूतकमें (सन्तति उत्पन्न होनेपर) तथा मृतके अशौचमें और चार महीनेके उपरान्त नवीन यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये और जीर्ण यज्ञोपवीत उतार देना चाहिये।
है [ ६५ ] कठाः कारवाश्व चरका विप्रा वाजसनेयकाः । ववृचाः सामगाश्चैव ये चान्ये यजु शाखिनः ॥ अर्थ-कठ, करव, चरक और वाजसेन शाखाके बच (ऋग्वेदी) सामवेदी और जो यजुर्वेदी शाखावाले ब्राह्मण 'चे कण्ठसे यशोपवीत उतारकर फिर संस्कारके योग्य हो जाते हैं। छान्दोग्य परिशिष्टमें पारस्कर गृह्यसूनके हरिहर भाष्यमें यज्ञो- 'पवीत वनाने तथा इनकी संख्याक विषयमें इस प्रकार लिखा है। त्रिविदूर्ववृतं कार्यतत्तुत्रयमधो वृतम् । त्रिवृत्तं चोपवीतंस्यात्तस्यै को ग्रन्थिरिप्यते ॥ आवेष्ट्यपावत्यात त्रिगुणी वृत्य यत्नतः। अलिङ्गकै स्त्रिभिर्सम्यक् प्रक्षाल्यो वृतंच तत् ॥ अप्रदक्षिणमावृत्तं सावित्र्या त्रिगुणी कृतम् । अधः प्रदक्षिणावृत्तं समस्यान्नव सूत्रकम् ॥ त्रिरावेष्टय दृढ़ बध्वा हरि ब्रह्मेश्वरानमन् । सूत्रसलोमकं चेत्स्या त्ततः कृत्वात्व लोमकम् ॥ सावित्र्या दश कृत्योद्भिमंन्त्रिताभि स्तदुक्षयेत् । विच्छिन्नंवाग्यधोयातं भुक्कानिर्मितमुत्सृजेत् । स्तनादूर्ध्वमधोनाभेर्न धार्यतत्कथेचन ॥ ब्रह्मचारिणमेकंस्यात्स्नातस्यद्वे बहूनिवा। तृतीयमुत्तरीयं वा वस्त्राभावे तदिष्यते ॥ ब्रह्मसूत्रेऽपसव्येसे स्थिते यज्ञोपवीतिता। प्रचीनावीतितासव्ये कण्ठस्थेतु निवीतिता ॥ कृतैपनमयं सूत्रं त्रेतायां कनकोद्भवम् । द्वापरे राजतं प्रोक्तं कलौ कर्पाससम्भवम् ॥ विना यज्ञोपवीतेन तोयं यः पिवते द्विजः। उपवासेन चैकैन पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ विनायज्ञोपवीतेनं विरामूनोत्सर्ग कृयदि । उपवास द्वयं कृत्वा दानोमैस्तु शुध्यति ॥ उपाकर्मणि चोत्सर्ग गतेमासचतुएयं । नवयज्ञोपवीतानि धृत्वापूर्वाणि संत्यजेत् । - पूर्व यज्ञोपवीतानि शिरोमार्गेण संत्यजेत् ॥ . ३ [ ६६ ] अर्थ-यज्ञोपवीत बनानेकी विधि यह है किपहिले महीन सूतको तिलरावे और नीचेको (जांघ पर ) बहे, फिर तेहरा चटके एक गांठ दे। छानवे (४६) वार इसको लपेट कर (हाथपर चैवा करके) फिर तेहरावे और गांठ साफ करे, फिर धोकर ऊपरको वटकर यशो- पवीत बना ले। गायनी पढ़कर तीन बार लपेट फिर नीचे बटकर नव सूत्र वना तीनवार लपेटे और कसकर गांठी बांधे। सूत्रको इतनी 'अच्छी तरह वटना चाहिये कि इसमेंले रोम नाश हो जोवे और गांठ इत्यादि न रहे । फिर दस चार गायत्री जप कर धारण करे, स्तनके ऊपर और नाभी के नीचे कदापि यज्ञोपवीत न धारण करे। ब्रह्मचारीको एक और स्नातकको दो अथवा इससे अधिक यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये और उपवस्त्र अथवा वस्त्रके अभावमें तीन यज्ञोपवीत पहरे। अपसव्य यज्ञोपवीतको उपवीतिता और . सन्य यज्ञोपवीतको नवीतिता कहते हैं। सतयुगमें पद्म (कमलके वृक्ष) के तन्तुका यज्ञोपवीत, त्रेतामें सुवर्ण, द्वापरमें चांदी और कलियुगमें कपासका यज्ञोपवीत बनाना चाहिये। विना यज्ञोपवीतके द्विजको जल न पीना चाहिये। यदि ऐसा हो जाय तोएक उपवाल करने तथा पञ्चगव्य खाकर शुद्धि होती है; विना यज्ञोपवीतके यदि मल अथवा मूत्र त्याग दे तो दो उपवास करे और दान तथा होम करे तब शुद्ध होवे। उपाकर्ममें, उत्सर्गमे तथा चार मास तकएक यज्ञोपवीत पहिरे रह जाय तो इसको इस जीर्ण यज्ञोपवीतको त्याग कर नवीन यज्ञोपवीत धारण करे और पुराना यज्ञोपवीत शिरके द्वारा उतार डाले। अथ यज्ञोपवीत धारण प्रयोगः । आचम्य प्राणानायम्य । अथ सङ्कल्पः । अयेत्यादिमम श्रौतस्मात कर्मानुष्ठानसिध्यर्थं यज्ञोपवीत धारणमहं करिष्ये । श्रथ सूत्र त्रिगुणी- करणम्-इदं विष्णु रिति मेधातिथिऋषिः विष्णुर्देवता गायत्रीछन्दः सूत्र त्रिगुणी करणे विनियोगः। ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधानिदधे पदम् । समूढ मस्य पा ५ सुरेखाहा । अथ प्रक्षालनम् । आपो. हिष्ठेतिन्यचस्य सिन्धुद्वीपऋषिः श्रापो देवता गायत्री छन्दः यहो- 'पवीत प्रक्षालने विनियोगः। ॐ आपोहिष्ठा मयोभुवस्तान. ऊन द्धातन । महे रणायचक्षसे। ॐ योव शिवत मोरसस्तस्य भाजयते १ [ ६७ ] . हन । उशतीरिव मातर। तस्माऽभरङ्ग मामवो यस्यक्षयाय जिन्वथ आपो जनयधाचन | ततः यज्ञोपवीतानि प्रक्षाल्यांनन्तरं दश गायत्री मन्त्रैरभिमन्ज्य तन्तु देवतानामावहनं कुर्यात् । प्रणवस्य पर ब्रह्मऋषिः परमात्मा देवता गायत्री छन्दः प्रथमतन्तौ ॐकारा- वाहने विनियोगः । ॐ प्रथम तन्तौ ॐ काराय नमः ॐकारसावा- हयामि । अग्निंदूत मिति मेधा तिर्थिषिः अग्निर्देवता गायत्री छन्दः द्वितीय तन्तौ अग्न्यावाहने विनियोगः। ॐ अग्निन्दूतम्पुरो देहो : हव्यवाह मुपत्रुवे । देवाँ ऽश्रासादयादिह । द्वतीय तन्तौ अग्नये नमः अग्निमावाहयामि । नमोस्तु सर्पेभ्य इत्यस्य प्रजापतिऋषिः सर्पा देवताः अनुष्टुप्छन्दः तृतीयतन्तौ सवाहने विनियोगः। ॐ नमोऽस्तु सर्पेभ्यो येकेच पृथिवीमनु । येऽअन्तरिक्ष ये दिवि तेभ्य: सर्पेभ्यो नमः। तृतीय तन्तौ सर्पेभ्यो नमः सर्पानावाहयामि । वय ५सोमे त्यस्य वन्धुर्ऋषिः सोमो देवता गायत्री छन्दः चतुर्थतन्तौ सोमा- चाहने विनियोगः ॥ ॐ ब्वय ५ सोमबेतवमनस्तनूषु विन्ध्रत : प्रजावन्त '६ सचे माह । चतुर्थ तन्तौ सोमायनमः सोममावा । उदीस्तापित्वस्य शत ऋषिः पितरो देवता त्रिष्टुप् छन्दः पञ्चमतन्तौ पित्रावाहने विनियोगः। ॐ उदीरता मवरउत्परासऽउन्मद्धवमाः पितरे सोम्यस । असुंष्यऽईयुरख का ऋतु शास्तेनावन्तु पितरो हवेषु । पञ्चम तन्तौ पितृभ्योनमःपितॄना० । प्रजापतये इत्यस्य हिरण्य- गर्भ ऋपिः प्रजापतिर्देवता त्रिष्टुप् छन्दः षष्ठतन्तौ प्रजापत्यावाहने विनियोगः ॐ प्रजापते नत्वदेतात्यन्यो विश्वा रूपाणि परिताः बभूव । '. यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नोऽप्रस्तुन्वय २ स्यामपतयोरयीणाम् । षष्ठ- तन्तौ प्रजापतये नमः प्रजापति मावा० । अनोनियुद्भिरित्यस्य वसिष्ठ ऋपिः अनिलो देवता त्रिष्टुप् छन्दः सप्तमतन्तौ अनिलावाहने. विनियोगः । ॐ आना नियुद्भिशतिनीभिरध्वर. '५ सहस्त्रिणी भिरुपयाहि यशम् । व्वायोऽअस्मित्सवने मादयस्व यूयम्पातखस्तिभि सदा नः । सप्तमतन्तौ अनिलाय नमः अनिलंमावा। सुगाव इत्यस्यात्रिर्ऋषिः गृहपतयो देवताः पार्षी त्रिष्टुप् छन्दः अष्टमतन्तौ यमावाहने विनियोगः ॐ सुगांवो है सदनाऽअकर्मय अजग्मेद सवन एजुषाणा : भरमाणावहमानाहवी ५ ष्यस्मेधत्तव- सवोव्वसूनिस्वाहा । अष्टम तन्तौ यमाय नमः यममावा विश्वेदेवा- सऽागत इत्यस्य मधुच्छन्द्रा ऋषिः विश्वेदेवा देवताः त्रिष्टुप .
। । छन्दः नवमतन्तौ विश्वेषां देवानामावहने विनियोगः। ॐ विश्वे- देवासऽनागत ऋणु तामऽइम' हवम् । एदबहिनिपीदत । नव मतन्तौ विश्वभ्यो देवेभ्यो नमः विश्वान् देवाना० । यज्ञोपवीत ग्रन्थि देवताऽऽवाहनम्। ब्रह्मजज्ञानमित्यस्य प्रजापति!यिः ब्रह्मा देवता त्रिष्टुप् छन्दः प्रन्थिमध्ये ब्रह्मावाहने विनियोगः। ॐ ब्रह्म जज्ञानम्प्रथ- सम्पुरस्ता द्विसीमत: सुरचो वेनऽयावर । सवुल्याऽउपमाऽअस्य विष्ठा सतश्चपोनि मलतश्च विवः । इदं विष्णुरित्वस्थ मेधातिथि- पिः विष्णुदेवता गायत्री छन्दः प्रन्थिमध्ये विरवावाहनेविनियोगः ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधानिदधे पदम्। समूढ भस्यपा ५सुरे स्वाहा । त्र्यम्बकमित्यस्व वसिष्ठ पिः रन्द्रो देवता विराट् ब्राह्मी अनुष्टुप् छन्दः ग्रन्थिमध्ये रुद्रावाहने विनियोगः। ॐ त्र्यम्बकं यजा- महे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमानृतात्। यज्ञोपवीत अन्यिदेवताभ्यो नमः ग्रन्थिदेवता आवाहयामि। प्रा- वाद्या वाहित देवताभ्यो नमः यथास्थानमहं न्यसामि । मानसोपचारः संम्पूज्य । अथ ध्यानम् । प्रजापतेर्यत्सहजं पवित्रं कार्पास सूत्रोद्भव ब्रह्मसूत्रम् । ब्रह्मत्व सिध्येच यश प्रकाशं जपस्य सिद्धि कुरु ब्रह्मसू- त्रम्। युवासुवासाः परिवीत श्रागात् स उश्रेयान्भवति जायसानः। तन्धीरासः कषय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवचन्तः। यज्ञोपवीत धारणम् । यज्ञोपवीतमिति मन्त्रस्य परमेष्ठी ऋपि, लिज्ञोक्का देवताः त्रिष्टुप् छन्दः यज्ञोपवीत धारणे विनियोगाः। ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यलहजं पुरस्तात्। श्रायुष्य मगलं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञो- ‘वीतं बलमस्तु तेजः। यझोपवीतमसि यज्ञस्यत्वा यज्ञोपवीतेनो- पिनह्यामि । अनेन मन्त्रेण यज्ञोपवीतानां पृथक् २धारणम् । प्रति यज्ञो- पवीत धारणस्याद्यन्तचोराचमनम् । धारणान्ते जीर्ण सूत्र त्याग मन्त्र- पठेत् । तद्यथा-एतावाइनपर्यन्तं ब्रह्मत्वं धारितं मया। जीर्णत्वा त्वं परित्यक्तं गच्छसूत्र यथा सुखम् । इति मन्त्रेण जीर्ण यज्ञोपवीतं शिरोमार्गण निःसार्य भूमौ त्यजेत् । पश्चाद्यथाशक्ति गायत्रीमन्त्र जपं कुर्यात् । अर्पणम् । अनेन नव यज्ञोपवीत धारणाथै कृतेन यथाशक्ति गायत्री जपकर्मण श्री सविता देवता प्रीयतांनमम् । ॐ तत्स ब्रह्मा- पणमस्तु । यस्य० इति.यज्ञोपवीत धारण प्रयोगः। अर्थ-आचमन और प्राणायाम करके "श्रोत्यादि० सङ्कल्प करे। विनियोग कके "ॐइदं विष्णु०॥ इत्यादि मन्त्र पढ़ कर सूत्रोंको ।
[ ६६ ] तिगुना करे। विनियोग इस मन्त्रका करके "ॐ आपोहिष्ठा इत्यादि मन्त्र पढ़ कर धोवे, धोनेके अनन्तर दशवार गायत्री पढ़कर अभिमन्त्रित करे और तन्तु देवताओंका आवाहन करे। प्रथम तन्तुका विनियोग करके" ॐकाराय नमः इस मन्त्रसे आवाहन दूसरे तन्तुमें अग्निदेवताका अावाहन करे, विनियोग करे। ॐ अग्नि न्दूत" इत्यादि मन्त्र पढ़े। तृतीय तन्तुमे विनियोग करके "ॐ नमो- स्तु० इत्यादि मन्त्रसे आवाहन करे । चतुर्थ तन्तुमै विनियोग करके "व्वय ५० इत्यादि मन्त्रसे सोमदेवताका आवाहन करे। पञ्चम तन्तुमें इसी प्रकार “ॐ उदीरता०० इत्यादि मन्त्रसे पितरोंका विा- हन करे। छठे तन्तुमें “ॐ प्रजापते० इत्यादि मन्त्रसे प्रजापतिका आवाहन करे, सातचे तन्तुमें “ॐ पानानियु० इत्यादि मन्त्रसें अनिल देवताका आवाहन करे, आठवें तन्तुमें ॐ सुगावो०॥ इत्यादि भन्नसे यमदेवताका आवाहन करे, न तन्तुम "ॐ विश्वे- देवा० इत्यादि मन्त्रले सर्वविश्वके देवताओका आवाहन करे। अब यज्ञोपवीतकी ग्रन्थिमें “ॐ ब्रह्मजज्ञान०, इत्यादि मन्त्रसे ब्रह्माका आवाहन कर; "ॐ इदं विष्णु०" इत्यादि मन्त्रले विष्णुका आवाहन : करे और ॐ त्र्यंबक इस मंत्रसे महादेवका आवाहन करे । इसके अनंतर 'प्रजापते' इस मंत्र से यज्ञोपवीत का ध्यान करे । अर्थ- "ब्रह्माके साथ उत्पन्न हुए पवित्र और श्रेष्ठ कापससे रचित है। ब्रह्मसूत्र ! तुम जयकी सिद्धि जो यश देने वाली है उसका प्रकाश करो। ॐ युवा सुवासा' इस मन्त्रका अर्थ समापवर्तन प्रकरण में दिया जा चुका है। इसको कहकर इसके पश्चात् “ॐ यज्ञोपवीतं०॥ इस मन्त्रको पढ़ कर पहिले दाहिने हाथमें यज्ञोपवीत डाल कर तव गलेमें पहने। किसको कितने यज्ञोपवीत पहनना चाहिये यह पूर्वमें लिखा जा चुका है। उसके अनुसार पृथक् पृथक् यज्ञोपवीत' धारण करे । प्रत्येक यज्ञोपवीत धारण करनेपर पृथक् पृथक् आचमन उतनी ही बार करे। नवीन यज्ञोपवीत धारण करने पर पुराने यज्ञोपवीतको "ऐताव० मंत्र कहकर सिरसे निकाल दे और प्राच- मन करे। इसके अनन्तर अपनी शक्तिके अनुसार गायत्री जप करे और उसको सूर्य-भगवानको अर्पण करे। - - मृत्युजय स्तोत्र पद्धति । मू०. " मूल शान्ति भा०टी० 10 भार्गव बुक डिपो, चौक, बनारस से मिलनेवाली नित्यकर्म की पुस्तकें । Jim | गरुडपुराण भाषा टीका ३) रामरक्षा स्तोत्र jin | एकादशी महात्म्य १॥ शिवमहिम्न भा० टी० प्रयाग महात्म्य सन्तान गोपाल u | कर्मकाण्ड नित्य कर्म शिवस्तुति चालीसा महालक्ष्मी स्तोत्र Su) एकोदिष्ट श्राद्ध मूल सरस्वती सटीक शिवमहिम्न मूल गणपति पूजा महाविद्या स्तोत्र जनेऊ पद्धति चरपट पंजरिका मूल D वाशिष्ठी हवन पद्धति रामस्तव राज समंत्रक ग्रहशांति प्रयोग वाल्मीकी श्रादित्यहृदय चौविस गायत्री ।' अनन्तनत कथा पार्थिव पूजा भा० टी० भा० टीका au तिथि निर्णय मूल मात्र का मूल्य दशकर्म पद्धति अक्षयनवमी। मूल्य JI प्रेतमञ्जरी मूल 12) गणेश पुराण । मूल्य भा०टी० 10 काशी माहात्म्य । मूल्य पारवण मूल JI चित्रगुप्त कथा भा० टी० सत्यनारायण व्रत०मूल अशौच निर्णय भाषाटीका 1) शनिश्चर कथा संकटचतुर्थी व्रत कथा सिद्धान्त पटल सूर्य पुराण । मूल्य :- पिण्ड दर्पण सूर्य पुराण बड़ा साइज विवाह पद्धति मूल m) पाकेट साइज पुस्तके मिलने का पता- भार्गव बुक डिपो, चौक, बनारस सिटी। mpps5555555 का FANParammar भा०टी० ה ה ה भा०टी०
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