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Shri Bhakrmaal

Nabhaji · 2012/11

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*श्री. द्वितीयावृत्ति "श्रीभक्तमाल सटीक सतिलक" का सूचीपत्र॥ श्री प्रे ह नि ते ध ये -- . PNAR न न विपय पृष्ठ विपथ पृष्ठ ४१ २ ... श्रीहनुमत् चित्र भूमिका समर्पण मंगलाचरण (परमहंस श्रीशुक)... टीका का नाम स्वरूप श्रीभक्तिस्वरूप वर्णन भक्ति पंचरस निरूपण(सतसङ्ग) पंचरस स्वरूप विस्तार यंत्र ... ... .. ... शान्तरस ... ५७ ... दास्य रस ... १ | मूल मङ्गलाचरण दोहा ... श्राशासमय की टीका ३. श्रीगोस्वामी नामाजी को श्रादि अवस्था ६ चौबीस अवतारों के नाम १४ | श्रीरामचन्द्र पदपद्मचिह्न १६ | श्रीचरण चित्र २६ | श्रीचरणसरोज की रेखाएं २६ | उनके नाम, स्थान, इत्यादि ३० | उनकी महिमा... ३० | भक्तों की माला का प्रारंभ ३१ | श्रीब्रह्माजी ३४ | श्रीनारदजी ३५ श्रीशिवजी ३६ श्रीसनकादि ३७ | श्रीकपिलदेवजी ३५ श्रीमनु श्रीदशरथजी ... RESSES सख्य रस ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ६७ घात्सल्य रस ङ्गार रस भक्तिपंचरस व्याप्या पूर्ति सत्सङ्ग प्रभाव गोस्वामी श्रीनाभाजी का वर्णन श्रीरूपकला चित्र श्रीमतमाल स्वरूप REACHER ... .. ... ७० * श्रीभक्तमाल सटीक का सूचीपत्र । घिपय चिपय पृष्ठ १४४ ७० ... ... ... ... ... ... ... ... १४६ १४७ ... ... ... ... १४७ १४६ १४६ १५० ... ... ... ... ... ... ... श्रीप्रलादजी श्रीजनकजी राजर्पि श्रीभीष्मजी श्रीयलिजी श्रीशुकजी परमहंस अजामिल, श्रीधर्मराज श्रीविष्यफ्सन श्रादि पार्षद श्रीलक्ष्मीजी श्रीपार्षद श्रीगरड़जी श्रीहनुमानजी रामदूत... श्रीजाम्यवान जी श्रीसुग्रीवजी सखा श्रीविभीपणजी लसा .... प्रीतिमती श्रीशयरी जी देवी पगपति श्रीजटायुजी .. श्रीयम्बरीपजी और महारानी श्रीवितुरानी और श्रीविदुरजी ... श्रीसुदामाजी... श्रीचन्द्रहासजी श्रीमैत्रेय ऋपिजी कोपारव श्रीचित्रकेतुजी श्रीवृद्धवजी (पूर्वी) ... श्रीध्रुवजी, स्तुति श्रीअर्जुनजी ... धीयुधिष्ठिरमादि ५ पाण्डव श्रीगजेन्द्र, ग्राह श्रीकुन्तीजी श्रीद्रौपदीजी. धीश्रुतिदेवजी बहुलास्व नव योगीश्वर... राजा श्री श्रद्धजी रामानुचुकुन्दजी महाराज श्रीप्रियवतजी राजा श्रीपृथुजी' ... राजा श्रीपरीक्षितजी ७२ श्रीशेप जी ७३ | श्रीसूत व शौनकजी ७३ / श्रीमचेताजी ७४/ श्रीशतरूपा व श्रीकौशल्याजी ७५ | श्रीप्रसूतीजी ७६ | श्रीश्राकृतीजी ८० श्रीदेवहूतीजी ८० | श्रीसुनीतीजी... २१ श्रीमन्दालसाजी ८१ श्रीसतीजी श्रीउमाजी. ८४ | थीमथुरानी चौयाइन ४ | श्रीगोपिकावृन्द ८५ | महर्षि वाल्मीकिजी ८७ | दूसरे याल्मीकिजी ६४ प्राचीन वहीं जी १६ | श्रीसत्यवतजी १०७ श्रीमिथिलेशजी महाराज विदेह १०६ / राजा श्रीनीलजी ११४ | श्रीरहमणजी १२४ | श्रीसगरजी १२५ ] श्रीभगीरथजी १२६ / धीरुक्मांगदजी १२८ राजारुपमाङ्गद की सुता १३० | श्रीहरिश्चन्द्रजी १३२ | श्रीसुरथ व सुधन्वाजी १३२ / राजा श्रीशिविजी १३३] श्रीभरतजी भरतखंड १३५ श्रीदधीचिजी १४१ श्रीविनयावलीजी १४१ | श्रीमयूरप्याज व श्रीताम्रध्यनजी १४२ श्रीनलजी १४२ श्रीरन्तिदेवजी श्रीगुहनियादजी प्रेमी श्रीऋभुजी श्रीइक्ष्वाकुजी. १४३ ! श्रीपेल (पुरूरवाजी) १६४ १६४ .. ... ... ... ... ... ... ... १७० ... ... ... ... ... १७४ ... ... ... ... ... ... ... १८७ ... ... १६२ १६२ CSC+ ॐ श्रीभकमाल सटीक का सूचीपत्र। विषय विषय पृष्ठ ... .. ... ... ... ... ... .. २२५ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... श्रीगाधिजी १६३ | श्रीवशिष्ठजी गुरुवर्य २२० महाराज श्रीरघुजी १६३ श्रीसौभारजी ૨૨૨ श्रीरयजी १६४ | श्रीकर्दमजी २२३ श्रीगयजी १६४ | श्रीप्रत्रिजीव श्रीअनसूयाजी... ૨૨૪ श्रीशतधन्वाजी १६५ श्रीगर्गजी श्रीउतजी १६४ धीगौतमजी श्रीदेवलजी व श्रीश्रमूर्तजी १६५/ परमहंस श्रीशुकदेवजी श्रीनहुपजी १६५ श्रीलोमशजी श्रीययातिजी... १६५ ] श्रीऋचीकजी २२७ श्रीदिलीपजी ... १६६ श्रीभृगुजी श्रीयदुजी १६६ | धीदालभ्यजी श्रीमान्धाताजी १६७ श्रीश्रङ्गिगजी ... ... २२६ श्रीनिमिजी श्रीऋष्यशृङ्गज श्रीभरद्वाजजी १६८ | श्रीमाण्डव्यागी २३० श्रीदक्षजी १६८ | श्रीविश्वामित्रजी पुरुभूरिसेन १६६ श्रीदुर्वासाजी २३३ श्रीववस्वत मनुजी १६६ श्रीजायालिजी, याज्ञवल्क्य २३३ मनु और मन्वन्तर १६६ | श्रीजमदग्निजी २३४ श्रीशरभङ्गजी २०० श्रीकश्यपजी श्रीसंजयजी २०१ श्रीाकण्डेयजी मायादर्श श्रीउत्तानपादजी २०२ श्रीपतिजी श्रीयाशवल्स्यजी २०२ श्रीपराशरजी २३५ श्रीसमीकजी, श्रीपिप्पलादजी २०२ अट्टासी सहस्र ऋपिथटारह पद्मयूथराल, देवी श्रीजयन्तीजी २०३ अष्टादश पुराणों की संख्या २३५ श्रीपरीक्षितजी २०५ अष्टादश स्मृतियों का निरूपण... २३७ परमहंस श्रीशुकदेवजी २०६ | स्मृत्याचार्यों का वर्णन श्रीप्रहादजी २०८ | श्रीराम सचिव (मंत्रीवर) महावीरश्रीहनुमानजी... २२० | सुमन्त्रजी २३६ श्रीअर्जुनजी श्रीपृथुजी २९१ | श्रीरामसहचरवर्ग २३६ স্বাক্সী २११ महावीर श्रीहनुमानजी श्रीवलिजी २१३ / श्रीअगदजी प्रसादनिष्ठ भक्त २१४ ! श्रीजाम्बवन्तजी श्रीअगस्त्यजी सुतीक्षा २१६ श्रीनल व नीलजी श्रीपुलस्त्यजी... २१% नवोनन्दजी धीपुलद्दजी २१८ गोपवृन्द श्रीच्ययनजी २१६ श्रीयशोदाजी FOR CHECE ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... २४८ २५० .. ... ...

RASTRA श्रीभक्तमाल सटीक का सूचीपत्र । विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ ... ... ... ... ... .. ... ... ... ... .. ... ... ... ... ... ... ... ... ... श्रीकीर्ति व श्रीवृपभानुजी २५० | श्रीगयेशजी ३१२ ३१२ २५१ श्रीकर्मचन्दजी श्रीसहचरियां थीयजचन्द्रजी के पोडश सखा श्रीअल्हजी ३१२ सेवक २५१ श्रीसारी रामदासजी ३१२ सप्तद्वीप के भक्त २५२ श्रीनरहरिदासजी ३१३ जम्बूद्वीप के भक्त २५३ | श्रीरंगादासजी कुम्हार दिल्ली के श्वेतद्वीप के भक्त २५६ बच्चोयाले .. ३१४ अष्टकुलनाग २५६ | श्रीकील्हदेवजी इति पूर्वार्द्ध २६२ श्रीसुमेरदेवजी ३१८ कलियुगमतायली २६३ स्वामी श्रीअग्रदेवजी ३१८ चारोंसंप्रदायधैष्णव २६४ | श्रीशंकराचार्यजी ૩૨ श्रीनिम्बादित्यजी २६५ | श्रीनामदेवजी, उनकी माता ३२८ श्रीसम्प्रदायगुरुपरम्परा २६६ | श्रीजयदेवजी ३४६ श्रीनिम्बार्क संप्रदाय २६६ श्रीपद्मावतीजी ३७० स्वामी अनन्त श्रीरामानुजजी २६७ श्रीधरस्वामीजी ३७० श्रीविष्णुस्वामीजी २७५ | श्रीपरमानन्द ૩૭૨ মাখা २७६ श्रीविल्यमंगलजी चतुरमहन्त २७६ श्रीविष्णुपुरीजी श्राचारज जामात लालाचारजजी २७७ श्रीज्ञानदेवजी ३८७ वर्वर मुनिजी २७७ श्रीधिलोचनजी श्रीथतिप्रशाजी २८२ श्रीवल्लभाचार्यजी ३१४ श्रीधतिदेवजी २८३ | श्रीभक्कदास कुलशेखरजी ३६८ धोतिधामजी २८४ श्रीलीलाअनुकरणभक्तजी श्रीश्रुति उदधिजी २८४ श्रीरतियन्तीजी ४०१ गुरु और शिष्य (पादपद्मजी) २८५ प्रसादनिष्टपुरुषोत्तमपुरनृपत्ति ४०३ श्रीरामानन्दस्वामी २८७ | श्रीकर्मायाईजी ४०६ भवसिंधु सेतु के भेरूपी उनके सिलपिल्लभक्तउभययाई २६२ भक्तों के हित जिनने सुतों को श्रीरामानन्दीयसम्प्रदाय २८६ | विष दिया ये दो याई ४१५ महामुनि श्रीदेवाधिपाचार्य स्वामी ३०२ | मामा भानजा श्रीहरियानन्द प्राचार्य स्वामी ... ३०३ | हंसभक्तों का प्रसङ्ग प्राचार्य स्वामी राघवानन्दजी ३०३ सदायती महाजन साहूकार श्रीधनन्तानन्दजी ३०४ श्रीभुवनजी चौहान ४३७ धीरगजी ३०६ । राना के कुलदेव श्रीचतुर्भुज जी के पयहारी श्रीकृष्णदासजी ३०८ पण्डा श्रीदेवाजी थीयोगानन्दजी ३१२ श्रीकामध्वजजी ४४३ ... ... ... ... ... ... . ... ... ... ... ४०८ शिष्यों के नाम ... .. ४२८ ... ... .. ...

RAN श्रीभक्तमाल सटीक का सूचीपत्र । ५ ~ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ ... ... ... ... .. ... ... .. ... 1 ... ... ... ... ... ... ... .. ... ... ... ... .. श्रीजयमलजी ४४४ | श्रीदिवाकर भोलारामजी एकग्बालभक्तजी ४४६ श्रीबिट्टननाथगुसाई श्रीश्रीधरस्वामीजी ४४८ | त्रिपुरदासजी ५७६ निकिचन नाम हरिपाल ब्राह्मण... ४५० | श्रीकृष्णदासजी बिट्टलेशसुत ५७६ श्रीसाक्षीगोपालजी के भक्त ४५३ / श्रीवर्धमान, श्रीगंगल ५८५ श्रीरामदासजी ४५६ गोकुलनाथगुसाई ५८६ श्रीजसूधरस्वामीजी ४६१ श्रीखेमगुसाईजी श्रीनन्ददासजी वैष्णवसेवी ४६३ श्रीविठ्ठलदासजी माथुर 'श्रीप्रल्हजी (अर्चा रसाल) ४६४ | श्रीहरिरामहठीले वारमुखी ४६५ | श्रीकमलाकरभट्टजी भक्तविप्रसपत्नीक ४६८ | श्रीनारायण भट्टजी एकमेपनिष्टराजा ४७० | श्रीवल्लमजी ५६६ एक अन्तनिष्ठ राजर्पि और रानी ४७२ / श्रीरूप व श्रीसनातनजी ५६७ श्रीगुरुशिष्य ४७५ | श्रीहितहरिवंशजी ६०३ श्रीरदास जी महाराज ४७७ श्रीहरिदासजी ६०७ श्रीकधीरजी ४८५ | श्रीव्यासजी ६०१ श्रीपीपाजी ४६४ | श्रीजीव गुसाई श्रीधनाजी ५२८ | श्रीगोपालभट्टजी गुसाई ६२० श्रीसेनजी ५३१ | अलि भगवान् श्रीसुखानन्दजी ५२३ | श्राविट्ठल विपुलजी श्रीसुरसुरानन्दजी ५३५ श्रीजगन्नाथ थानेश्वरीजी ६२२ श्रीसुरसुरीदेवीजी ५३६ | श्रीलोकनाथ गुसांईजी ६२३ श्रीनरहरियानन्दजी ५३७ / श्रीमधु गुसाईजी श्रीलड्डूभक्तजी स्वामी ५३८ | श्रीकृष्णदास ब्रह्मचारीजी ६२५ जड़भरत ५३८ | श्रीकृष्णदास पण्डितजी ६२५ श्रीपद्मनाभजी ५३- श्रीभूगर्भ गुसाईजी श्रीतचाजी, धीजीवाजी ५४२ | धीरसिकमुरारिजी ६२७ श्रीमाधवदासजीजगन्नाथी ५४६ श्रीसदना (सधना) जी ६३७ श्रीरघुनाथगुसाई गरुड़ ५५७ थीगुसाई काशश्वरजी ६४० श्रीनित्यानन्दमहाप्रभुजी ५५६ श्रीलोजीजी श्रीकृष्ण चैतन्यमहामभुजी ५५६ श्रीगंका व यांकाजी ६४४ श्रीसूरदासजी ५६३ | श्रीलङ्कमक्तजी ६४७ श्रीपरमानन्दजीसारी ५६५ | धीसन्तभक्तजी ६४- श्रीकेशवभट्टजी काश्मर ... - ५६५ | श्रीतिलोक सुनारजी ६४६ श्रीभट्टजी ५७० श्रीघाटमजी ६५२ श्रीहरिव्यासजा देवीपूज्य ५७१ श्रीरुद्रप्रताप गजपतिजी AKACHECHAKOREA ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ६४२ .. .. ... ... .. ... ...

+6 श्रीभक्तमाल सटीक का सूचीपत्र । विषय पृष्ठ विषय ... ... ... ... ... ... ... - ... ... ७६१ ७६३ ८०१ ८०१ ८०५ ८०६ ८०८ १० E२३ ... ... ... ... ... ... ७२० ... ८३२ ... ... ... ... श्रीगोविन्दस्वामीजी ६५% | श्रीचावनजी गुंजामाली, वह ६६२ श्रीपरशुरामजी श्रीगनेशदे रानी ६६५ श्रीगदाधर भट्टजी श्रीनरवाहनजी ६६६ धीकरमानन्दजी श्रीगोपालभक्तजी (जोगनेर) ६७१ | श्रीकोल्हजी, श्रीयजी श्रीलाखाजी ६७३ श्रीनारायणदासजी अल्हवंशी श्रीनरसी मेहताजी ६. श्रीपृथ्वीराजजी श्रीजसोघरजी दिवाकरपुत्र ७०१ | चालीवांजी नन्ददास ७०२ श्रीमतीरत्नावतीजी श्रीजनगोपालजी जकरी ७०३ | थ्रीजगन्नाथपारीप श्रीमाधवदासजी गढ़ ७०४ श्रीमथुरादासजी श्रीअङ्गदसिंहनी ७.६ | श्रीनारायणदासनूनक श्रीचतुर्भुजजी ७१३ | श्रीजयतारण घिदुरजी धीमीराबाईजी ७१८ | स्वामी श्रीचतुरोनगन ( नागा धीपृथ्वीराजजी चतुरदासजी) श्रीजयमलजी... ७३५ श्रीकान्हरजी (धीविठ्ठलसुत)... धीमधुकरसाहजी ७३७ । श्रीनीवाजी राठौर धोखमालरत्नजी ७३८ श्रीभगवान् तूयरी राजा श्रीरामरयनजी ७३८ श्रीजसवन्तजी श्रीरामरयनजीकी धर्मपत्नी ७.० श्रीहरीदासजी यनिक राजकुमार श्रीकिशोरसिंहजी ७०५ | थीगोपालभक्त (वायोली के) धीचतुर्भुजजी (कीर्तन) ७४५ | श्रीनाथमहनी श्रीकृष्णदासजी चालक ७४६ श्रीकरमैतीजी श्रीसन्तदासजी ७५० धीखइगसेनजी श्रीसूरदास मदनमोहन ७५१ | श्रीगङ्गाग्वालजी श्रीकात्यायनीजी ७५६ श्रीसोतीजी थीमुगरिदासजी ७.७ | श्रीलाल दासजी 'गोस्वामी तुलसीदासजी भक्तमाल श्रीमाधवग्याल के सुमेर ७६२ श्रीप्रयागदासजी दो चित्र ७८०, ७८१ | श्रीप्रेमनिधिजी श्रीमानदासजी ७८२ धीराघवदास दूधलेजी श्रीगिरिधरजी विट्टलेशनंदन ७.३ | श्रीकान्हरदासजी थीगुसाई गोकुलनाथजी ७३ | श्रीकेशवलटेरा थीपरशुरामजी श्रीयनवारीदासजी ७८७ श्रीवलरामजी धीनारायण मिश्रजी ७-८ | श्रीप्रासकरनजी धाराघवदासजी ७८ | श्रीहरिवंशजी... ... ... ह ८५१ ८५६ ८५७ ... ... ... ... ... ... ... ... ८६५ ८६३ २६७ २६८ ८६६ ७१ ... ... ... ... ... .. ८० ... ... ... ८८१ ८८२ ८८३ ... ...

+ Cast CheckCKAGECT श्रीभक्तमाल सटीक का सूचीपत्र । विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... १०० ... ... .. ... ... श्रीकल्यानजी... ८८ ! श्रीलालमतीजी ६३० श्रीवीठलदासजी सम इति मूलभक्तमाल भीहरीदासजी ८६०(१) टीका कर्ना श्रीप्रियादास का श्रीकृष्णदासजी ८६७ वर्णन १५० प्रयोघानन्द सरस्वती २६६ (२)चौबीस निष्ठानों में विभक्त श्रीद्वारकादासजी २६६ भक्तों की नामावली ... ६४३ श्रीपूर्णाजी ६०१ (३) संक्षिप्त यन्त्र (१) (२) ६५ श्रीलक्ष्मणभट्टजी ६०२ ६५१ स्वामी श्रीकृष्णदास पयहारीजी... ६०२ (४) नम्र निवेदन श्रीगदाधरदासजी १०४ (५) सन्तभगवन्त श्रीनामा स्वामी १५५ श्रीनारायणदासजी ६०% | (६) तिलकार की संक्षिप्त जीवनी २६२ श्रीभगवानदासजी ६११ (७) भक्तिसुधास्वाद के प्रकाशक की श्रीकल्याणसिंहजी ६१२ संक्षिप्त जीवनी, सचित्र श्रीसन्तदास श्रीमाधवदास ६६४ श्रीकन्हरवासजी ६१५ (८) भक्तगुण और लक्षण (बाबूखेदन- "भक्तमाली" श्रीगोविन्ददासजी... ६६ लाल लिसित) श्रीनृपमणि जगत्सिहजी ६१७ | (६) श्रीभनमाल माहात्म्य (एक श्रीगिरिधर ग्वालजी १२० सजन कृत) ६६६ श्रीगोपालीजी... ६२२ / (१०) समालोचनाएं ६७४ श्रीरामदासजी ६२२] (११) श्रीअवतार वृक्ष सर डॉक्टर স্বামহর্ষ। १२५ जार्जनियर्सन लिखित ६७६ श्रीभगवन्तजी (माधवदास के पुत्र) ६२६ (११) भक्तनामावली वर्णमाला श्रीमाधयभगवन्त के पिता क्रमानुसार ६50 ... --- ... ... ... ... J. . ... ... ... SCORECE

***
श्रीभक्तमाल “भक्तिसुधास्वाद”
श्रीहनुमते नमः ॥ .
श्रीभयोध्या
श्रीसीताराम
राम
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श्रीसीताराम शरण भगवान.प्रसाद रूपकला
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8. B.S. B. P. R. K.
irector

श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमतमाल
संशोधित संस्करण वा द्वितीयारत्ति
श्रीसीताराम-कृपा से
संवत् १९८२ ( सन् १६२५ ) में एक जिल्द में " मुंशी.
नवलकिशोर" प्रेस ने इस दीन की सम्मति और बाबू बलदेवनारायण
सिंहजी की अनुमति से छाप कर प्रकाशित किया।
श्रीनयोध्याजी
तिलफकार विनीत दीन
श्रीसीतारामशरण भगवान प्रसाद
रूपकला
रूपकला कुंज
H
os

श्रीहंसकलायै नमः भूमिका। -10- श्रीसीताराम-कृपा से इस दीन को बचपन ही से श्रीभक्तमालजी के पढ़ने में, और श्रीहरिभक्तों की कथाओं के श्रवण करने में, असा- धारण अानन्दानुभूति होती पाई है । इस कारण श्रीप्रेरित होकर स्वभावतः इस दीन ने श्रीभक्तमालजी को अत्यन्त मनोयोग के साथ बड़ी श्रद्धा से, प्रथम तो अपने पूज्य पिता श्रीमहात्मा तपस्वी- रामजी सीतारामीय से जो अपने समय में उस प्रान्त में "श्रीभक्त- मालीजी " नाम से प्रसिद्ध थे अध्ययन किया था, और तत्पश्चात् यहां श्रीजानकीघाट के महात्मा स्वामी पंडितवर श्री १०८ रामवल्लभाशरण महाराजजी से और पंडित श्रीगंगादासजी से भी पंढा था। श्रीभक्तमालजी के इस भक्तिसुधास्वाद " नाम तिलकनिर्माण में तीनों महोदयों की शिक्षा से जो अनमोल सहायता ली गई है सो अकथनीय है, और यह दीन एतदर्थ सदा उपयुक्त तीनों महोदयों का एकान्त ऋणी बना रहेगा। इसका प्रथम संस्करण, श्रीकाशीजी में, बाबू बलदेवनारायण सिंहजी वकील ने छः जिल्दों में छपवाकर प्रकाशित किया, इस लिये वे सज्जन भी इस दीन के अमित अमित धन्यवाद के पात्र हैं। " श्री अयोध्याजी स०१९०६ तिलककार विनीत दीन श्रीसीतारामशरण भगवान् प्रसाद रूपकला (S.S.R.S. B. P. R. K.) +-

* श्री: *
* समर्पण
.
सुमुख, सुलोचन, सरल, सत, चिदानन्द, छविधाम ।
प्राण-प्राण, जिय जीवके, सुखके सुख, सियराम ॥ १
पवनतनय,
विज्ञानघर, कपि, बल पवन समान ।
रामदूत, करुणायतन, बुद्धि विवेक निधान ॥ २
सन्तशिरोमणि सन्तप्रिय, प्रेमी, सहज उदार ।
जानकिघाटश्री"प्रेमनिधि", रामप्रेम आगार ॥३
"रामवल्लभाशरण" शुचि, पण्डित सन्तप्रवीन ।
तेजपुंज, सद्गुण-भवन, शोभा नित्य नवीन ॥४
रामचरितमानस प्रभृति, भक्तमाल निगमाद।
वाल्मीकि भागौत की, कथा प्रेम रस स्वाद ॥५
शान्ति, विरति, रति, ज्ञान, हरि-भक्ति, सुतत्त्व विभाग।
सन्त समाज बखानहीं, वचन अमिय अनुराग ॥६
श्रीहरि गुरु करकंज यहि, अर्पति मन वच काय ।
रुपिया सोई तुच्छ अति, कृपया लें अपनाय ॥ ७
तुम्हारी
रुपिया (रूपकला)
श्रीअयोध्याजी.
.R.S.B.P,R.K.

*श्री:*
थीअयोध्यासरयूभ्यां नमः ।
Tutatrket.itizntral
-3 श्रीसीताराम
ओम् नमो भगवते हनुमते श्रीरामदूताय ।
श्रीमते रामानन्दाय नमः।
अथ श्रीभक्तमाल सटीक
(तथा सतिलक)
दो० "भक्क, भक्ति, भगवन्त, गुरु, चतुर नाम वपु एक ।
इनके पद बंदन किये, नाशहिं विघ्न अनेक ॥"
अथ टीकाकर्ता श्रीप्रियादासजी का मंगलाचरण,
तथा आज्ञानिरूपण।
(१) कवित्त (८४२)
महाप्रभु "कृष्णचैतन्य", मनहरनजू के चरण को ध्यान मेरे,
नाम मुख गाइयै । ताही 'समय "नाभाजू” ने आज्ञा दई, लई
धारि, टीका विस्तारि भक्तमाल की सुनाइयै ॥ कीजिये कवित्त वंद
छंद अति प्यारो लगै, जगै जगमाहि, कहि, वाणी विरमाइयै ।जानों
निजमति, ऐपै सुन्यों भागवत शुक द्रुमनि प्रवेश कियौ, ऐसेई
कहाइयै ॥ १ ॥ (६२८)
अथ "भक्तिसुधास्वाद” वार्तिक तिलक।
ॐ नमो भगवते हनुमते श्रीरामदूताय । श्रीचारुशीलादेव्यै नमः।
श्रीचन्द्रकलादेव्यै नमः । श्रीअयअलीदेव्यै नमः ॥श्रीश्यामना-
RECTRESSNESSNESSESERX

65 श्रीभक्रमाल सटीक। यिकायै नमः। श्रीहंसकलाये नमः॥ (श्लोक) "यं प्रजंतमनुपेत. मपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव । पुत्रेति तन्मयतया तर- वोऽभिनेदुस्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोस्मि" ॥१॥ दो० भनमाल आचार्य वर, श्रीनाभा पदकंज। प्रियादास पदकमलपुनि, यंदों मङ्गल पुंज ॥ "सन्त सरलचित जगत हित, जानि सुभाव सनेहु । वाल विनय सुनि करि कृपा, रामचरण रति देहु ॥" गोस्वामी "श्रीनाभाजी" करुणासिंधुकृत "श्रीभकमाल" जी की प्रसिद्ध टीका "श्रीभक्तिरसवोधिनी" के कर्ता, श्रीप्रियादासजी कृपानिधि, यों कहते हैं कि “महाप्रभु श्रीकृष्ण चैतन्य मनहरण" पदकंज का, तथा तद्रूप मनहरण [ निज स्वामी] "श्रीमनोहर- दास" जी का, ध्यान एक समय अपने मनमें में कर रहा था, और साथ ही साथ श्रीनामकीन भी। उसी समय गोस्वामी श्री. नाभाजी ने मुझे आज्ञा दी कि "भक्तमाल की विस्तृत टीका करो, और ऐसी कि कवित्त छंद से बंध बहुत ही मधुर तथा प्रिय लगे, और जगत् में प्रसिद्ध होवे" ॥ ऐसी आज्ञा दे जब आप की वाणी शान्त हो गई, तब मुझे अपनी मति अति मंद जानकर पहिले अपने को संकोच तो निःसन्देह बड़ा भारी हुआ ही, परन्तु यह विचार करके आज्ञा को सीस पर धर लिया कि "श्रीमद्भागवत" में सुन चुका हूं कि “परमहंस श्रीशुकदेव जी" वृक्षों में प्रवेश करके * * श्रीमद्भागवत के प्रारम्भ में ही कहा है कि जय श्रीशुकदेश भगवान् : जन्मते ही परम घिरतिमान् सब त्याग कर, घर से निकल वन को चल दिये, और उनके पिता श्रीव्यास भगवान् पुत्र के ( उनके ) विरह में कातर होकर उनके पीछे पीछे "हे पुत्र ! हे पुत्र !" ऐसा पुकारते हुये साथ हो लियः तर योगीश्वर सहृदय- मरेशक श्रीशुकदेव जी ने तो पीछे की योर पुँह तक भी न फेरा और न साक्षात् उचर ही (महर्षि पिताजी को) दिया, किन्तु उस प्रदेश के समस्त दृक्षगरण श्राप आप को बोलने लगे कि "हां, मैं शुक हूँ, मैं शुक हूं, क्या प्राज्ञा होती है ?" ॥

भक्तिसुधास्वाद तिलक। स्वयं बोल उठे थे और "शुकोऽहं, शुकोऽहं" कहने लगे थे; ऐसे ही मुझ जड़मति में भी स्वयं श्रीनाभा जी ही प्रवेश करके अपनी कृपासे ही मुझ से भी तिलक बनवालेंगे। इसमें आश्चर्य वा संदेह ही क्या है। दो० "सरल वरण,भाषा सरल, सरल अर्थ मय मान । तुलसी सरलै सन्त जन, जाइ करिय पहिचान ॥" (२) टीका का नाम स्वरूप वर्णन कवित्त (८४१) रची कविताई सुखदाई लागै निपट सुहाई औ सचाई पुनरुक्ति लै मिटाई है । अक्षर मधुरताई अनुप्रास जमकाई, अति छवि छाई मोद झरीसी लगाई है ॥ काव्य की बड़ाई निज मुख न भलाई होति नाभा ज कहाई, याते ( ताते ) प्रौनिकै सुनाई है । हृदै सरसाई जोपै सुनियै सदाई, यह "भनिरसबोधिनी" सुनाम टीका गाई है ॥२॥ (६२७) तिलक। कविताई ऐसी रची है, कि अति सुहाई (सुहानेवाली) और सुखदाई लगती है; पुनरुक्ति के दोप को भी मिटा डाला है; सचाई, और कोमल अक्षरों की मधुरता, (रसों के स्वरूपादि और टीका के विचित्र चमत्कार,) तथा अनुप्रासों और यमकों की छवि ने मोद (आनन्द ) की वृष्टि सी वरसाई है।अस्तु।अपने काव्य की प्रशंसा "आप मुँहमिठू " ) अपने ही मुख से कहनी, कुछ अच्छी बात तो नहीं ही है, परन्तु श्रीनाभाजी ने कहलाई है, (जैसी कि ऊपर निवेदन कर चुकाहूं, अतएव पुष्टता से कहने में आ- गई; सज्जन विचारवान् इसको क्षमा करेंगे ॥ यदि इसको नित्यशः कोई पढ़े सुनेगा तो अवश्यमेव उसका अंतःकरण श्रीहरि- भक्ति महारानीजी की कृपा से निःसन्देह सरस हो आवेगा ॥ ऐसी टीका (गाई है) की है और इसका नाम "भनिरसवोधिनी" है ॥ SHARES * श्रीभक्तमाल सटीक । . - (३) श्रीभक्ति स्वरूपा कवित्त (८४०) 'श्रद्धा'ई(ही)फुलेल ओ उवटनौ 'श्रयण कथा', मैल अभिमान, अंगअंगनि छुड़ाइये । 'मनन' सुनीर, अन्हवाइ अंगुराइ 'दया', 'नवनि' वसन, 'पन' सोधो, ले लगाइये ॥ आभरन 'नाम हरि', 'साधुसेवा' कर्णफूल, 'मानसी' सुनथ, 'संग' अंजन, चनाइये। "भक्ति महारानी" को सिंगार चारु, घीरी 'चाह', रहे जो निहारि लहै लाल पारी, गाइये ॥ ३ ॥ (६२६) तिलक। निम्न लिखित सुशृङ्गार श्रीभक्ति महारानीजी के जानिये । जो इन्हें निरखता रहता है उसको श्रीप्रिया प्रियतम (श्रीराम प्रिया सीताजी तथा श्रीमज्जनकनन्दिनी प्राणवल्लभ रामचन्द्रजी) कृपा करके आ मिलते हैं । ऐसा सब वेद पुराण शास्त्रादि में गाया हुआ है- १. उबटन कथा का लुनना । भगवत्लीला तथा भनों के यश का श्रवण । चौपाई। "रामचरित जे सुनत अघाहीं । रस विशेष जाना तिन नाहीं॥ जिनके श्रवण समुद्र समाना । कथा तुम्हारि सुभग सरिनाना ॥ भरहिं निरंतर होहिं न पूरे । तिनके हृदय सदन शुभ रूरे"॥ ३. मैल-अमिमान । संव प्रकार के अर्थात् भीतर के बाहर के अहंकार। चौपाई। " उर अंकुरेउ गर्व तरु भारी । वेगि सो में डारिहौं उपारी ॥ अहंकार अति दुखद डमरुआ" इत्यादि। दो० "विद्या रूप सुजाति, धन, इत्यादिक अभिमान । जव लगि उर, तब लगि कभू, मिलें न श्रीभगवान ॥" ३. फुलेल श्रद्धा । शास्त्र और आचार्य के वचनों इत्यादिक में प्रीति प्रतीति सहित स्पृहा । । .

भक्तिसुधास्वाद तिलक। श्लो० "भवानीशङ्करी वन्दे 'श्रद्धाविश्वास रूपिणौ । याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम् ॥" "सात्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा, कर्मश्रद्धा तु राजसी । तागस्यधम्में या श्रद्धा, मत्सेवायान्तु निर्गुण ॥" (भावगते) चौपाई। रघुपति भनि सजीवनमूरी । अनूपान 'श्रद्धा' शुचि पूरी॥" ४. सुनीर-मनन । मन में उसको चितवन करना कि जो कुछ श्रवण किया है वा जो कुछ पढ़ा है, श्रीहरिकृपासे ऐसे सविवेक चिन्तवन मननरूपी निर्मल सुगन्धित पवित्र अनुकूल सुन्दर जल से स्नान, [मानहारी दीनसुखद अभिमानभंजन गर्वप्रहारी प्रणत- हितकारी भगवत्चरित्रों के श्रवणरूपी उपटन के अनन्तर ] योग्य ही है; तथा दयारूपी अङ्गप्रक्षालन और नवनि (नम्रता) रूपी वसन (वस्त्र) की आवश्यकता भी, भक्रिके और और अनेक सुसाधनोंसे पूर्व ही समझना चाहिये । क्योंकि यह तो प्रसिद्ध ही है कि उपटन, स्नान, तथा वसन, सव शृङ्गारों और भूषणों से पहिले ही अत्यावश्यकीय हैं। सो० "विद्या, वोध, विवेक, सुमति, ज्ञान, सद्गुणअमित । श्रीहरिरहस अनेक, प्राप्ति 'श्रवण' ते; रामहित ॥. चौराई। मनन विना है विद्या भार । “मननशील" सद्गुण आगार ॥ विधुवदनी सबभांति सँवारी । सोह न वसन विना वरनारी"॥ ५. अँगुलाइव (अङ्गप्रक्षालन )="दया"। करुणा से द्रवना, क्षमा करनी, छोहसे पघिलना, कृपासे पसीजना, अहिंसा, अनु- कम्पा; भलेबुरे जीवमात्र के क्लेश को देख सुनके दुखी होना। दो० " दया धर्मको मूल है, यह प्रसिद्ध जगमाहि । शास्त्रनिपुण कैसोउ कोउ, भक्ति "दया" विनु नाहि"॥ .

ISRO श्रीभकमाल सटीक , चौपाई। "परहित वस जिनके मन माहीं । तिनकहँ जग दुर्लभ कळु नाहीं"। ६. वसन (विशुद्ध सुन्दर अनुकूल वस्त्र )=" नवनि" मान अहङ्कार अभिमान मदादि का अभाव; नम्रता, प्रणता, दीनता, कार्पण्य, झुकना; पूर्व ही वन्दना दण्डवत् करना, दूसरे के प्रणाम नमस्कार की कदापि प्रतीक्षा न करनी; अपनी निचाई समझना, अपने दोषोंको कदापि न भलना; श्रीगौरी गणपति विधाता गुरु त्रिपुरारि तमारि तो ईश ही हैं, ऋपि मुनि सुर महिसुर गो पितर माता पिता तो पूज्य हैं ही, किन्तु नरनारी गन्धर्व दनुज प्रेत और भूतमात्र को प्रणाम करके उनसे अविरल अमल "श्रीहरिभक्ति" की भीख मांगनी, भगवत्के अनन्य भक्कोंकी शोभा है ॥ चौपाई। " तब रामहि विलोकि वैदेही। सभय हृदय विनवतिजेहिं तेही॥ प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला वचन विगत अभिमाना ॥ शाखामृग के बड़ि मनुसाई । शाखाते शाखा पर जाई "॥ "मांगों भीख त्यागि निज धरमू" ।। चौपाई। "की तुम राम दीनअनुरागी। श्राएड मोहिं करन वड़भागी" ॥ “वरपहिं जलद भूमि नियराये । यथा नवहिं बुध विद्या पाये” । दो० "फलभर 'नम्न' विटप सब, रहे 'भूमि नियराइ'। पर उपकारी पुरुष जिमि, 'नवहिं सुसम्पति पाइ ॥. सत्य वचन, अरु 'दीनता' पर त्रिय मात समान । एहु पर हरि जो ना मिले, तुलसीदास जमान" ॥ (स.) हों तो सदा खर कौ असदार तिहारोइ नाम गयन्द चढ़ायो"। (पद) “यह दरवार दीन को आदर, रीति सदा चलि आई"। चौपाई। "सकल शोकदायक 'अभिमाना' । संस्कृत मूल शूलप्रद नाना ॥ - .8 भकिसुधास्वाद तिलक। 'दम कपट मद मान' नहरुमा। 'अहंकार अति दुखद डमरुआ॥" दो० "दीन रहा नहिं दीन भा, नाहिं दीन पद भास। दीनबन्धु केहि विधि मिलें, विन दीनता निवास ॥" ७. सोंधो (अरगजा, चन्दन, सुगन्ध)="पन" । श्रीगिरिराज- किशोरीकृपासे नियम, नेम, व्रत, दृढ़ता, अनन्यत्ता ।। चौपाई। "रामभक्ति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीश प्रवीना ॥ तजौं न नारद कर उपदेशू । आयु कहैं शतवार महेशू ॥" दो० "चातकि को, अरु मीनकौ, भक्तनको 'पन' एक । सुयश 'नेम' विख्यात जग, धनि धनि धन्य सो टेक ॥" तथा एकादशी व्रत, ऊर्ध्वपुण्ड्र, और वैष्णवों के चरणरज को सीसपर रखने का नेम और पन ॥ ८. आभरण (अनेक भूषण) = "हरिनाम।” श्रीशारदाकृपा और श्रीनारददया से "श्रीसीताराम" "श्रीराधाकृष्ण" नाम का कीर्तन, अखण्ड तैलधारावत् रटना जपना उसमें रमना; रागस्वर से उसका मधुर कीर्तन सप्रेम; "चारु हरिनाम लेत अश्रुअन झरी है" चौपाई। "पुलक गात, हिय सियरघुवीरू । जीह नाम जप, लोचन नीरू ॥" तथा, श्रीहरिसहस्त्रनाम,युगलनाममंजरी, और भगवन्नामकीर्तन का पाठ करना नेमप्रेमपूर्वक 8 केश सुधारने और वेणी सँवारने तथा सेन्दुर से भूपित करने के उपरान्त, वेन्दी; अरगजा चन्दन सुगन्ध; और तिलक; तिल, कस्तूरिविन्दु, दन्तशृङ्गार, सुरमा, [ का- जल, अंजन] मुखराग [बीरी ]; इत्यादि; पुनि तिनके अनन्तर नाना मणि जटित स्वर्णाभरण पुष्पों के भूषण ॥ भूषण विविध प्रकारके हैं और अनेकजैसे, चन्द्रिका, सीसफूल, मँगटीका, वदनी, चूड़ामणि, बेसर, नथिया, कर्णफूल, बुलाक, कंठिका, चम्पाकली, झूमक, मुक्काहार, पँचलरी, कंकना चूड़ी, मुद्रिका, पहुँची, इत्यादि । "१कवित्तरामायण" "२विनयपत्रिका" तथा "३ श्रीमानसराम. RRRRR १० श्रीभनमाल सटीक। चरित" और "४ नामतखभास्कर", "५ श्रीसीतारामनामप्रताप- प्रकाश में 'श्रीनाम प्रभाव देखना चाहिये । यहां केवल एक श्लोक. लिखे देते हैं। श्लो० "कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं पावनं पावनानां पाथेयं यन्मुमुक्षोः सपदि परपदप्राप्तये प्रस्थितस्य । विधामस्थानमेकं कविवरवचसा जीवनं सजनानां वीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम" ॥ चौपाई। "कहाँ कहां लगि नाम पड़ाई । राम न सकहिं नाम गुण गाई ॥" दो०"राम नाम नर केसरी, कनक कशिपु कलिकाल । जापकजनप्रहलादजिमि, पालहिं दलि सुरसाल ॥ वरपातु रघुपति भगति, तुलसी सालि सुदास । राम नाम वर वरण युग, श्रावण भादों मास ॥ राम नाम जो चित धरै, सुमिरे निशिदिन सोई। योग यज्ञ तप, व्रत, सकल, तेहि पटतर नहिं कोइ ॥" ६. कर्णफूल मन, तन, अन्न, धन, वचन से "हरिसेवा, तथा साधु सेवा।" पाएं कान का भूपण भगवत् कैंकर्य को.जानिये और दाहिने कान का अलङ्कार भागवतसेवा को समझिये क्योंकि एक 'कुर्छ गुप्त होता है और दूसरा कुछ प्रत्यक्ष सा ।। चौपाई। "उमा रामस्वभाव जिन जाना । तिनहि भजन तजिभाव न आना। सेवहिं लपण सीयरघुबीरहि । जिमि अविवेकी पुरुष शरीरहि ॥" "सुमिरन, सेवा, प्रीति, प्रतीती। गुरु शरणागति भक्ति कि रीती॥ सीतापतिसेवक सेवकाई । कामधेनु शत सरिस सुहाई ॥" १०. सुनथ ( नाक की नथिया)="मानसी" अष्टयामरीति, मानस पूजा; भावना; निरन्तर सुरति से स्मरण; सुरति से सप्रेम SHARE N भक्तिसुधास्वाद तिलक। परिचU; भनियोग; ध्यान; गुप्तस्मरण; मनही बन्धन तथा मोक्ष "का कारण है। चौपाई। "रहति न प्रभुचित चूक किये की। करत सुरति सौ वार हिये की॥" "मन परिहरे चरण जनि भोरे।" पुनः, "मन तहँ जहँ रघुपति वैदेही ।" यह वार्ता किसको विदित नहीं है कि सब अंगों के शृङ्गारों तथा भूषणों आभरणों में नाक कान और आंखों के ही शृङ्गार मुख्य है; पुनः तिन में भी नाक की नथिया तो सर्वोत्तम है वरञ्च सुहाग ही कही और जानी जाती है । ११. अंजन [काजल, सुरमा]= "सुसंग"। सत्संग, सन्तसंग, साधु संगति, सम्प्रदायी सजाती भक्तों का संग; सद्ग्रन्थ विचार; श्रीगुरुहरिहरिजन चर्चा आदि; तथा, भक्ति शास्त्रावलोकन, सज्जन संसर्ग, महात्मा का दरस परस, भागवत धर्म वेत्ता महानुभावों से जिज्ञासा, हरिभक्त समागम, निजसम्प्रदाय के रहस्य का ज्ञान, सन्तासन्तलक्षण विवेक, श्रीसीतारामगुण स्वभाव का कथन परस्पर॥ सया। "सोजननी, सो पिता,सोइभ्रात,सोभामिनि,सोसुत,सोहित, मेरो। सोइ सगो, सो सखा, सोइ सेवक, सोगुरु, सो सुर, साहिब, चेरो ॥ सो तुलसी प्रिय प्राण समान, कहां लो बनाइ कहौं वहुतेरो। जो तजि देह को गेह को नेह, सनेह सो राम को होइ सवेरो॥" चौपाई। "मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहि यतन जहां जे पाई ॥ सो जानब सतसंग प्रभाऊ । लोकहु वेद न आन उपाऊ ॥ सत्संगति मुद-मंगल मूला। सोइफल सिधिसवसाधन फूला॥" 'दो० "तात ! स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला एक अंग। तुलै न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सतसंग ॥" SARESCRESCLECRECORRECRUGREECRECACCRICS .

15 श्रीभक्तमाल सटीक। भक्ति। १२. वीरी [पान, अधरराग]="चाह (नेह, भाति)" चौपाई। . , . स्वारथ सांच जीव कह एहा । मन क्रम वचन राम पद नेहा ॥ सो० "लोभिहि प्रिय जिमि दाम, कामिहि नारि पियारिजिमि। हरि पद "रति" निःकाम, "भक्ति" सुसंज्ञा ताहि की॥" "भक्ति" प्रेम, अनुरक्ति, चाह, इश्क, लव, लो, लगन, भाव, भजन, आसक्ति, राग, प्रीति, अनुराग, रति ॥ [ सूत्र ] “सा पराऽनुरक्रिसेश्वरे"[श्रीशाण्डिल्य] [सूत्र ] “सा कस्मै परमप्रेमरूपा" [श्रीनारद ] "भक्ति" भजना, भजनकरना, प्रणय, प्रिय लगना, सेवा करनी,चाहना,प्यारकरना,प्रीति,प्रेम,स्नेह,अनुरक्ति,अनुराग,परम प्रेम, पराप्रीति, रति, प्रियतम विन दुखी रहना, प्यारे बिन न जीना, सकल प्यारी वस्तुओं को प्रियतम पर न्योछावर करना, कैंकर्य प्रिय लगना, सदैव चिन्तवन, प्रियतम की प्रसन्नता में ही सुख मानना, पी पी रटना ॥ "मनुज देह सुर साधु सराहत सो सनेहसियपीके", "स्वाति सलिल रघुवंशमाण,चातक तुलसी दास" "प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना। "प्रेम" ते प्रगट होहिं मैं जाना। रामहि केवल प्रेम पियारा । जानि लेहु जे जाननिहारा ।। देवि ! परन्तु भरत रघुवर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी ॥" श्लो० "मन्मना भव मद्भक्को मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे [१८-६५] मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्तमो मताः [१२-२] मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव प्रत ऊर्ध्व न संशयः[१२-८] . अभ्यासेप्यसमर्थोसि मकर्मपरमो भव । S . , चौपाई।

भक्तिसुधास्वाद तिलक।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि" [१२--१०]
चौपाई।
"थोरे महँ सब कहाँ बुझाई । सुनहु तात! मति मन चितलाई ।
प्रथम हि विप्रचरण अति प्रीती । निज निजधर्मनिरतश्रुति रीती ॥
यहि कर फल पुनिविषयविरागा। तब मम चरण उपज अनुरागा ॥
श्रवणादिक नवभक्ति दृढ़ाहीं " । मम लीला रति अति मन माहीं।
* श्लोक-"श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥१॥"
सन्त चरण पंकन अति प्रेमा। मन क्रम वचन भजन दृढ़ नेमा ॥
गुरु पितु मातु वन्धु पति देवा । सव मोहिकहँ जानै दृढ़ सेवा ॥
मम गुण गावत पुलक शरीरा। गद्गद गिरा नयन वह नीरा ॥
काम आदि मद दम्भ न जाके । तात निरन्तर वस में ताके ॥"
दो० "मन कम वचन कपट तजि, भजन करै निष्काम।
तिनके हृदय कमल महँ, करौं सदा विश्राम ॥
चौपाई।
प्रथम भक्ति सन्तन कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।
दो० गुरु पद पंकज · सेवा, तीसरि भक्ति अमान ।
चौथि भक्ति मम गुणगण, करै कपट ताज गान"॥
चौपाई।
"मन्त्र जाप मम दृढ़ विश्वासा । पंचम भजन सो वेद प्रकासा॥
छठ दम शील विरति बहु कर्मा । निरत निरन्तर सजन धर्मा।
सातवसम'मोहि मय जग देखा। मोते सन्त अधिक करि लेखा ॥
आउँव यथा लाभ सन्तोपा । सपनेहु नहिं देखै पर दोषा ।
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हिय हरषन दीना॥
सन्मुख होय जीव मोहि जवहीं । जन्मकोटिअघनाशोतव हीं।
जननी जनक वन्धु सुतदारा । तन धन भवनसुहृद परिवारा ॥
सब के ममता ताग बटोरी। ममपद मनहि बांधवटि डोरी॥
समदर्शी इच्छा कछु नाहीं । हर्ष शोक भय नहिंमन माहीं॥
SS RISASSARŠKAS

१४ श्रीभक्तमाल सटीक। अस सज्जन मम हिय घस कैसे । लोभी हृदय वसै धन जैसे ॥ भनि स्वतन्त्र सफल सुखखानी । विनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥ पुण्यपुंज बिनु मिलहि न सन्ता । सतसंगति संस्मृति कर अन्ता ॥ पुण्य एक जगमहें नहिं दूजा। मन क्रम वचन विप्र पद पूजा ॥ सानुकूल तेहि पर मुनि देवा । जो तजि कपट करै द्विज सेवा ॥ दो० औरौ एक गुप्त मत, सवहि कहाँ कर जोरि । शंकर भजन विना नर, भकिन पावई मोरि॥ चौपाई। कहहु भगति पथ कौन प्रयासा । योग न मख जप तप उपवासा ॥ सरल सुभाव न मन कुटिलाई । यथा लाभ सन्तोप सदाई॥ मोर दास कहाइ नर आसा। करै तो कहहु कहां विश्वासा॥ बहुत कहाँ का कथा बढ़ाई । यहि आचरण वश्य में भाई ॥ वैरन विग्रह आस न त्रासा। सुख मय ताहि सदा सव आसा ॥ सनारम्भ अनिकेत अमानी। अनघ अरोप दक्ष विज्ञानी॥ प्रीति सदा सजन संसर्गा । तृण सम विपय स्वर्ग अपवर्गा॥ भगति पक्ष हठ नहिं शठताई । दुष्ट तर्क सव दूरि पहाई ॥ दो. • मम गुण ग्राम नाम रत, गत ममता मद मोह। ताके सुख सोइ जाने, चिदानन्द सन्दोह ॥" । श्रीभक्रमाल सम्पूर्ण ही श्रीः भनि" शब्द का अर्थ ही अर्थ तो है तो फिर अव भक्ति का अर्थ अलग क्या लिखा जावे ॥ इति "भक्ति के स्वरूप" का संक्षिप्त वर्णन । (४) भक्तिपंचरस वर्णन कवित्त (८३६) शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य, औ शृगार चारु, पांचौ रस सार विस्तार नीके गाये हैं *टीका को चमत्कार जानौगे विचारि मन, इन के स्वरूप में अनूप ले दिखाये हैं। जिनके न 'अश्रु- पात पुलकित गात कर्भू', तिनहू को "भाव" सिन्धु वोरि सो HORSCRESCRECRSSCkc SE भक्तिसुधास्वाद तिलक। छकाये हैं । जोलौं रहें दूर रहें विमुखता पूर, हियो होय चूर चूर नेकु श्रवण लगाये हैं ॥ ४ ॥ (६२५) (* सत्रहवीं शताब्दी में अर्थात् संवत् साढ़ेसोलहसौ तथा सत्रहसौ के बीच में, श्री "भनमाल" जी का अवतार जाना गया है। और, संवत् १७६६ में श्री प्रियादास जी ने "भक्ति- रसबोधिनी टीका" लिखी है, अनुमान तथा अनुसंधान से ऐसाही निश्चय किया गया है।) प्रोफ़ेसर लाला भगवान्दीन की "भक्ति भवानी" तथा वखशी हंसराजकृत "सनेहसागर" देखिये ॥ तिलक। भक्ति के जो पांच रस हैं, अर्थात् (१) शान्तरस (२) दास्य- रस (३) सख्यरस (४) वात्सल्यरस तथा (५)दिव्य शृङ्गार- रस ("रसराज" वा " उज्ज्वल" रस), तिन पांचो रससार की भली भांति विस्तार व्याख्या आप इस "भनिरसबोधिनी" में पाइयेगा ।। (विचारवान् महाशय !) श्राप स्वतः अपने मन में विचार करके टीका के चमत्कार को जान लीजियेगा, कि इन पांचो रसों के स्वरूप कैसे अनूप दिखलाए गए हैं। जिन पाषाणहृदय प्राणियों की मांखों से कभी अश्रुविन्दु नहीं निकलता, और जिनका अंग कभी पुलकित नहीं होता, ऐसे २ कठोर हिय जनों को भी श्रीसीतारामकृपा से प्रेमभाव के समुद्र में कहांतक चोर के छकाया है, सो स्वयं आप समझ लीजियेगा । यदि तनकभी कान लगाके भक्तों के भाव तथा भगवत् भागवतयश को वैसे लोग भी सुनें, तो उनके भी, प्रेम से चूरचूर चित्त, गद्गद कण्ठ तथा पुलकतनूरुह, होजाएंगे और नेत्रों से प्रेमाश्रुप्रवाह वह आवेंगे। पूरे विमुख तो वे भी केवल उसी कालतक रहेंगे कि जब तक “भनमाल" तथा "भनिरसवोधिनी" से न्यारे रहेंगे। भक्ति के पांच रसों " शृङ्गार, सख्य, वात्सल्य, दास्य और शान्त रस,"की व्याख्या का संक्षेप कुछ,अब आगे यन्त्रों में लिखा जाता है। RAGRICA ******** , म विभाव व्यभिचारी अनुभाव सायिक भाव स्थाइ भाप विषयाराम्बम आश्रयालम्बन उद्दीपन "सस्य रस मिनमुराद मित्र साथ साथ १ रोमांच ३३ माघ . २स्तम्भ भूपए घनुप.. शर, मधुर भाव निरन्तर ३ प्रतय भोजन, ग्वल, मृगया किचिन परिहासा लाललाडले द्विभुजसुयेप लगनजी,शिय, चतुर- थीसुग्रीन, হিসাব थीविभीपण, सत्यसंकरप श्रीवारमाणि सुपसिन्धु राजकुमार श्रीरामभद्र इत्यादि रघुनाथ श्रवधविहारी थीरामचन्द्र (पृष्ठ । दखिये) ५ विपर्ण &c. (S.S. R.S, B. P RK ) श्रीभकमाल सटीक। &c - परभंग विभाव रस अनुभाव साविकमाव व्यभिचारी माय स्थाई भाय विषयालम्चन आभयालम्वन उद्दीपन ३३ भाव जी का "शृङ्गार" माधुर्य-प्रेम- श्रीजनककि- सिन्धु, शोरी जी रूपमाधुर्य व कमनीय कि- "उज्ज्वल" रस, प्राणवसभा शोर मूर्ति (S. S. R. S. P. P.R.K.) नियतम पदरति मनोहर छाघ की शचला सुरतिः भावना प्रीति, (पृष्ठ १८ में देखिये) कमनीयता थीकिशारी.] १ रोमांच वसन्त २ स्तम्भ तुः संकल्पा ३ प्रलय फोकिल कूक, प्रियतमका ४ स्वेद निविध मंदस्मित ५ विवर्ण पवन, भूविक्षेप ६ कम्प पावसा स्पर्श, फटाक्ष, कटाक्षा ८ स्वरभंग मुस्त्यान कर में कर घचन, | नयन में नयन, शील, &c. परम शोभा, "दम्पति | श्रीजानकी. ও স্ব भनिसुधास्वाद तिलक। रस, जीयन "रसराज" रामचन्द्र वा शोभाधाम, रसपुज विसिन्धु &c. &c. न श्रीभक्रमाल सटीक । *अथ ३३ व्यभिचारी भाव । १ निवेद १० चिन्ता १६ निद्रा २७ वितर्क २ ग्लानि. ११ पास २० सुषुप्ति २८ अवहित्था ३ शंका १२ ईपी २१ संज्ञा २६ व्याधि ४धम १३ श्राम . पा अवबोध ५धुति १४ गर्व २२ वीड़ा ३० उन्माद ६ जड़ता १५ स्मृति २३ मोह ३१ विपाद ७ हर्ष १६ अपस्मृति २४ मति ३२ चपलता ८धीनता १७ मरण २५ यालस्य ३३ औत्सुक्य ६उग्रता १८मद २६ आयेश (श्लो०) “पञ्चधा भेदमस्तीह तच्छुणवमहामुने। शान्तो दास्यस्तथा सख्यः वात्सल्यश्च शृङ्गारकः॥१॥ मधुरं मनोहरं रामं पतिसम्बन्धपूर्वकम् । ज्ञात्वा सदैव भजते साशृङ्गाररसाश्रया ॥२॥" (श्रीहनुमत् सीहता) (श्लो०) " मन्मना भव मद्भको मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवेष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ (भ० मी०६ श्लोक ३४) "ये यथा मां प्रपद्यते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थसर्वशः॥" (भ० गी०६) (8. S. R.S. B. P. R. N.) LISTE USA भाव SHES अनुभाव सात्त्विक भाच ध्यभिचारी भाव स्थायी भाव विपयालस्वन याथयालम्बन उद्दीपन श्रीराम लाल " वारसा ल्य रस १ रोमांच, २स्तम्भ ३प्रलय ४ स्वेद ५विवर्ण (S. S. R. S. B. P. R. K.) दाशरथी, अम्बा मीठे खिलाना: श्रीकौशल्या. श्रीकौशल्या तोतरे २ लाड़ा नन्दवर्द्धक, महारानीजी, वचन: दुलार खेलौने म० श्रीदशरथजी, गुलाक, यालक रामललाजी अम्बाश्रीसुनयना| घुघुरू, देना सियावर, || जीमहारानी कालापिन्दुः जन्मोत्सव सीतापति वाललीला &0. महाराज सुमित्रा जी भोलापन, कुमार; सरलता। सुकुमार लालजी, रामजी। भंगताप कृशता, जागरण बालंबन. शून्यता, याधृति, उन्मादा मूछा, प्रहर्प, मृत्यु जी में अत्तोल मन।। "सुतविषयक हरि पद रति होऊ"॥ अम्बा श्री ७ अश्रु भनिसुधास्वाद तिलक। ८ स्वरभंग ३४ RESS FORSkestastestIRECASSAKASE विभाव २० अनुभाव व्यभिचारी सात्त्विकभाव भाव स्थाई भाव विषयालम्वन श्राश्रयालम्बन उद्दीपन श्राझा 'दास्य रस ब्रह्म, सेव्य, (S.S. R.S. B, P. R. K.) १ रोमांच पालना तुलसीकंठी । ३ प्रलय तुलसीमाला, ४ स्वेद ऊर्द्धपुण्डा ५ विवर्ण ५संस्कार भाक्त, भजन, स्वरमंग . सर्वेश्वर, थीहनुमत भरुवत्सल, श्रीग्रहलाद दीनदयालु, ब्रह्माजी, सेवकसुखद, शिवजी भक्त सचिदानन्द, मात्र, जगदेकनाता, सन्त व्यापका नारदादि श्रीसीतापति, इन्द्र श्रीराम मद्रा पतितपावन, अशरराशर अधमोद्धारण, करणायतन शरण सुखदता, सेवक प्रियत्व, अनन्यवत्सलता चितधड़क, विरल दुर्वलता, भक्तिः रंगविकार, | तैलधारावत् चिराग, स्मरण मूच्र्छा, प्रेमा व्याधि, भजन उन्माद सेवा, पूजा, प्रहर्प, अर्चा, मृत्यु, ७ अश्रु श्रीभक्तमाल सटीक। सेवा SARKASkka CMS SSC ॐॐॐॐ * ARSHA विभाव अनुभाव सात्त्विकभाव व्यभिचारी भाच स्थाई भाव विपयालम्वन श्राश्नयालम्बन उद्दीपन प्रशान्त, चन्द्र हरि २ रोमांच ३ स्वेद उपनिपद् नासाप्रपर विचार दृष्टि तीन वैराग्य | अवधूत चेष्टा परमचैराग; निर निर्ममता मग्न, निर्द्वन्द्र समदरशी, विरक्लपर, ४ विवर्ण स्मृति, निर्वद, श्रावेग, धृति, उत्सुकता, विपाद, वितर्क, इत्यादि ५ कम्प तन्मय (S. S. R. S. B. P. R. K.) शान्तरस एकान ७ स्वरमग 'शान्ति" इष्ट श्रीराम- ब्रह्मा, शिव सनकादि, परब्रह श्रीनारद सचिदानन्द | श्रीवशिष्ठ, जगदेकका | श्री अगस्ति, भगवान् इत्यादि विश्यम्मर व्यापक सर्वज्ञ वाले भक्त शाईधर श्रीसीतापति परमात्मा अद्वैत, परमानन्दात्मा, सचराचर- भक्तिसुधास्वाद तिलक। निस्पृह K 95NERARI SRORES*******RIRAKAR श्रीभगवन्जीव सम्बन्ध यन्त्र श्री परमात्मा और जीवात्मा में अनेक सम्बन्ध हैं । इनमें से कई लिने जाते हैं- I. पंचरस श्रीमगवत God विपयालम्पन परमात्मा जीय Soul माश्रयालम्वन, जीवात्मा गिन्ती १ १ स्थामी, सेव्य, पूज्य, साहिय, Master | सेवक, दास, अर्चक, किंकर,पूजक, aisa- सार प्रभु, Lord sipisa worshipper, shiva दासी, टहलनी assis: servant किंकरी, चेरी, ou le maid servant, a पहला | दास्य रस रस (SS. R. S. B. PR.K.) SAML. श्रीभक्तमाल सटीक। सचिदानन्द, व्यापक, अन्तर्यामी, शेपी, शेप, अंश, जीवात्मा, Spirit अंशी परमात्मा, ब्रह्मपरात्पर soul Creator, God; / creature २ مهارتی दूसरा शान्त रस خالق، باري تعالي حق د مالق परम स्वतन्ना अन्तर्यामी, व्यापक, पर वश governed. पराधीन, प्रजा, re subject, ON परतन्न, حاكم الا नृप, भूष, Emperor समर्थ प्रेरक सूत्रधार SECTRESSURESHARISA ******KSHAR****** नाथ, CHURU gia, Owner, Proprietor, स्ववस्तु, properly, owned SFA मिल्क ४ d आधार Supporter, भगवान् Dependent. श्राधेय, supported, O रक्षक, शरण्य, शरणागतवत्सल, Saviour, Protector, supkista (B.S. R.S. B. P. R. K.) शान्त रस वेदविद्य , शय, गेय, Admired, जगदीश Almighty, गुरु, शिक्षक, पतितपावन, दया-क्षमा-मन्दिर, image. तारण रक्ष्य, रक्षित, अनन्य, saved, sourkes शरणागत, dependent, भगवद्भक, प्रपन्न शाता, यशश्रोता, स्तुतिकर्ता, मार्मिक रसिक, विशेषज्ञ रसिक, शानी,Ute praise singer, शिष्य, पापात्मा पतित, as aurato sinner. दोपभाजन, उपासक, ufi समाश्रित त्यागी, विरक, वैरागी, संन्यासी, ध्यानी योगी श्रात्म निवेदक, निन्द्र, समदर्शी व्रत निष्ठ, शान्त दीन, भिक्षुक, पानेवाला, पालित, आरी, अनाथ favoured, urleras And दुखिया, mar beggar, receiver, wegelen selles भक्तिसुधास्वाद तिलक। مرشد سالی کدوم هادي n परमार्थ, सर्वस्व, धेय, उपेय i दयालु, दाता, नाता, ints Merciful, astiseams १० عمار مس رحيم كريم منعم . &c. &c. &c. &c. FREE PRASAIRSSHRSS २४ دست بسته حادر तवास्मि, मैं तुम्हारा या तुम्हारी हूँ I am Thine, सम्मुख-bkan मुसातिव तुम, तू Thou nosts तुम्ही मेरे हो, मुसातिय (Second Person) (Lord addressed ) Thee, cas y A.. B. ( 3rd Person ) वह He, His. I मैं उसीकी वा उसका हूँ I am his. (S• S. R.S.B. P. R. K.) श्रीभक्तमाल सटीका पिता, वाप पुन Bon सौहार्द तीसरा (वात्सल्य) रस Father, Mother मांजगजननी बेटा (यदि लड़का) बेटी (यदि लट्टकी) १२ पुन 'The only son भाववश्य, पितामाता (यदि नारी हो) The only son-inlaw ani داماد ससुर, सास (यदि नारी हो) . १३ RAND يون d RAGHAGRARIES भ्राता, भाई, धर्मधुरंधर, Brother, cousin वात्सल्य यजमान, पुरुषोत्तम, ब्रह्मन्नदेव, भाई, प्रेमनिधि, बहिन ( यदि नारी हो) hrother, cousin पुरोहित (यदि ब्राह्मण हो) . &c. dec &c. Ac. सखा, Friend EME, सखा, मित्र, friend, प्रेमी, प्रीते, AAmongs ४ सख्य (S.S.P.S. B. P. R.K.) चौथा सखा دوست دار رليتي सहपाठी सखा, appelass friend भक्तिसुधास्वाद तिलक। १७ a सखा همدم انهم مونس بار नर्मसखा, यालसखा مشهر متماحب d همتوار همدم دوق دوست یار اوس مونس मन्त्री, मुसाहिवादिक प्रौढ़ ससा 6 सखा, भाई, Cousin Brother सखा, भाई, Cousin six brother २० sote यहनोई, बहिन का पति, ससा सया, साला, स्त्री का भाई, साद PESHISASSACResskson THIS SISALSIASHA4554 ASE ५ माधुर्य कान्त, पति, माणनाथ, भा, रसिकेश्वर, | पती स्वकीया व्याही सी. प्रियतम, प्राणवल्लभ, शोभाधाम, ममप्राण | मिया Wife लतिका पतिनना बालमा सुखसिन्धु. | satte hot लता अनन्या Husband * पांचवा २२ उज्ज्वल हरि, रस दम्पति रस शुल रस, रस राज श्रृंगार रस साली, नायका, चातिकी, रसीली कुसुम स्त्री की वहिन सखी अयला, छवीली यहनोई, यहिना पति, नायक, सौन्दर्यनिधि, छयल Sister's husband . छीला, श्यामसुन्दर, किशोर تاریں رباته عاثته ازحودر قم دل २३ (SS. R. S. B. P. R. K.) to सहेली, सहचरी, ahilar nifo's sister, कला, फली, मुन्दरी, कमल- नयनी, loving अमियवयनी, प्रियभारिणी, मंजरी, गजगामिनी, फोफिला, श्रीभक्तमाल सटीक। دلر حاماں دی دلارام محارب عمره دا بريس वा रसीला, Beloved प्रेममूर्ति, छविधाम, प्रियतम, • श्रीसीतापति रामचन्द्र जी SP श्रीजानकी जीको दासी रसपुंज दो० जेहि के हियसर सिय कमल, पावन विकसे प्राय। प्रियाशरण ! रघुवर भ्रमर, रहे तहां मड़राय ?" ॥ "तुलसी जनकसुता पिनु, जो सुमिरे रघुवीर । शरद रैनि यिनु चन्द्रमा, बचै न अमृत नीर २" ॥ ६ ***** R556+3 **** *** असण्डैकरसनित्यकिशोर 0 नन्दोई, पति की वहिन का पति नायकोत्तम, रसिया, . मनमोहन, सौन्दर्यखान, प्रियतम Beloved or अनूप सरहज, सखी, साले की पत्ती, रसीली crit, loving sääle of प्रौदा सखी रसश &c. ac &c. &c. 1 (S.S. R.S. B. P. R. K.) भक्तिसुधास्वाद तिलक। • चक्रवर्ति किशोर श्रीसीतापति रामचन्द्र + श्रीमिथिलेश्वरजनकनन्दनी जीकी दासी EM जीवको श्रीरामजी से अनेक अनगिनती नाते (सम्बन्ध ) हैं। " मोहि तोहि नाती अनेक " इत्यादि " सर्व भाव भजु कपट सजि" ॥ सभी उचित नाते इसे मानने योग्य हैं ॥ soul जीव तो न स्त्री है, न पुरुष ही है ॥ अपने तई चाहे स्त्री माने चाहे. पुरुष जिस उचित नाते (भाव ) से जी चाहे, उसी नाते (भाव) से ही श्रीराम को भग सस्ते हो । प्रेम और सेवा मुख्य हैं अवश्य है नाता उचित हो कोई हो। २७ PRESENGkGkGkist *WANI RASHARASI ** fi (कोई कैद नहीं) II. अपर (किसी रस पर मिर्भर नहीं) واحد دمول دودی و حاں جاں ق حقیقی प्रियतम Beloved in रस वाहिद् "जहँ तहँ दीख धरे धनुवाना रस भेद से बेखवर ॥ वेद-और लोक सव से घेखवर ॥ न कोई थपना न कोई भी पर रत, प्रेमपागल प्रेममग्न, अनन्य Lover निज सुधि हीन, असली परमहंस, UP عشق مادق کامل पराअनुरक्ति Love रति, दशा- امراه حامی) همیں عشقت دهد از دود وحائی ، گیتی گرچه مدا آرمائی در سرایا مدقدمنا مستعري سرد داداده سرد جاب پر سو حدب ددا بهم معنوي درداں Gcd The Lore सुखराम चराचररूप ध्यापक पकाएकरस व्यापक in-TOR सच्चिदानन्द, श्रानंदकंद अखण्ड श्रीभक्तमाल सटीका सया पका प्रेम। "सीयराममय सब जग जानी" इत्यादि 4 رام الرحرد مقصود حار رحل سرم با عشق ست و चराचररूप مساحت بے سروساماں عاشق مادی کا مل "जाहि न जानत वेद هستی و شور سراو وبا حاب عالم مهره ای "यह गुण साधनते नहिं होई। در دشت که دل ودرد "रामकृपा पावै कोइ कोई *** CRICE २६ भक्तिसुधास्वाद तिलक। (१) अथ भक्ति के "शान्त" रस में कुछ वचनः- 'श्लो. “यो मां पश्यति सर्वत्र मयि सर्वं च पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ (गी०६।३०) "श्रेयोहि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद् ध्यानं विशिष्यते । ध्यानात् कर्मफलत्यागं त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥१२॥" दो० "तुलसी ! यह तनु है तवा, सदातपतत्रयताप। शान्त होय जब “शान्ति" पद, पावै रामप्रताप ॥१॥ नासिकाग्र करि दृष्टि पुनि, धरै भेष अवधूत । निर्ममता, निर्वाक्यता, यथा शास्त्र अनुसूत ॥२॥ दारुमाहिं पावक लगै, तीन रूप दरसाय। जरे, बरे, हो भस्म जब, तब सो"शान्त"कहाय ॥३॥ अतिशीतल, अतिही अमल, सकल कामनाहीन । तुलसी ताहि "अतीत" गनि, “शान्ति"वृत्तिलयलीन॥४॥ अहङ्कार की अग्नि में, जरत सकल संसार। तुलसी ! वांचे सन्त जनं, केवल"शान्ति” अधार॥५॥ ज्ञानाभूपण ध्यान धृति, ध्यानाभूषण त्याग । त्यागाभूपण “शान्ति" पद, तुलसी अमल अदाग ॥६॥" (२) भक्ति के “दास्य" रस में कुछ वचनः- श्लो० "दासोऽहं कौशलेन्द्रस्य रामस्य क्लिष्टकर्मणः। हनुमाञ्छत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः॥" दो० "सेवक सेव्य भाव" विनु, भव न तरिय उरगारि । भजहु राम पद पंकज, अस सिद्धान्त विचारि॥ चौपाई। सिर भर चली धर्म अस मोरा । सव ते "सेवक" धर्म कठोरा ॥ अस अभिमान जाय जनि भोरे । मैं"सेवक"रघुपति पति"मोरे॥ "सेवक"हम"स्वामी” सियनाहू । होउ नाथ ! यहि ओर निवाहू ॥ मैं मारुत सुत हनुमत बन्दर । दीनबन्धु रघुपति कर किंकर । ALSCREER RSS PROIN श्रीभक्तमाल सटीक । सेवक प्रिय यह सब की रीती । मोरे अधिक दास पर प्रीती ॥ सुनु कपि जिय जविमानसिऊना। तें मम प्रिय लक्ष्मण ते दूना कोउमोहिप्रियनहिंतुमहिसमाना। मृपा न कहीं मोर यह वाना ॥ "समदरशी"मोहि कह सब कोऊ । "सेवकप्रिय,"अनन्यगतिसोऊ॥ "तेतिस कोटि भर्जे संसार । खोटा वन्दा खोटी नार॥ खाविन्दों का खाविन्द एक । तिसको जपै यह कविराटेक॥" "सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु शत सरिस सुहाई॥" दो०"भजवे को दोई सुघर-( १ ) की हरि (२) की हरिदास ॥" (३) अथ भक्ति के “वात्सल्य" रस में कुछ वचन:- चौपाई। "सुत 'विषयक' हरि पद रति होऊ । मोहि वरु मूढ़ कहै किन कोऊ।। देखि "मातु" आतुर उठि धाई । कहि मृदुवचन लिये उर लाई॥ गोद राखि कराव पय पाना रघुपतिचरितललितकरिगाना"। दो पिता विवेकनिधान वर, मातु दया युत नेह । तासु"सुक्न"किमि पाइ हैं, अनत अटन तजि गेह ।। चौपाई। सो “सुत" "पितु"प्रियप्राण समाना । यद्यपि सो सब भांति अजाना॥ गीत। बूढ़ो बड़ो प्रमाणिक ब्राह्मण शङ्कर नाम सुहायो । मेले चरण चारु चारिउ सुत माथे हाथ दिवायो॥ चौपाई। "सेवक, सुत "पितु मातु" भरोसे । रहै अशोच, वनै “प्रभु" पोसे॥" "मोहि वरु मूढ़ कहै किन कोऊ । सुतविषयक तव पद रति होऊ॥" (४) अथ भक्ति के “सख्य" रस में कुछ वचन:- श्लोन तथा मे प्रियतम आत्मयोनिन शंकरः। न च संकर्षणो न श्री वात्मा च यथा भवान् ॥" (श्रीपरमहंससंहिताया एकादशे, २४ । श्री उद्धवप्रति) ko - -

ॐॐॐ
भक्तिसुधास्वाद तिलका
चौपाई।
'ये सब, मुनिवर ! "सखा" हमारे । भरतहु ते माहि अधिक पियारे॥
तुम सब प्रिय मोहि प्राण समाना । मृषा न कहीं मोर यह बाना ॥"
"सेवक स्वामि सखा सियपी के हित निरुपधिसब विधि तुलसीके"
"मातु पिता आज्ञा अनुसरहीं । अनुज "सखा" सँगभोजनकरहीं"
बन्धु “सखा" संग लेहि वुलाई । वन मृगया नित खेलहिं जाई॥"
दो० “चपल तुरंगन फेरनी, मृग तकि मारब वान ।
करि पन लक्षण वेधनी, सब उद्दीपन जान ॥
धरिभुजगंलवतलावनी, इक सँग भोजन सैन ।
अनूभाव ये "सखन"के, सब विधि सुख के ऐन ॥"
(५)अथ भक्ति के “शृङ्गार" रस में कुछ वचनः-
श्लो. " यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।
तेनाटवीमटसि तव्यथते न किं स्वित्
कूर्पादिभिर्भमति धीभवदायुषां नः ॥
(श्रीभागवते)
"हरिरिति हरिरिति जपति सकामम्" इत्यादि ।
(श्रीजयदेव गीतगोविन्द)
दो० गंगा यमुन सरस्वती, सात सिंधु भरपूर ।
तुलसी चातकि के मते, विनु स्वाती सब धूर ॥
चौपाई।
प्राणनाथ ! तुम पिनु जग माहीं । मो कहँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं॥
जिय विनु देह नदी विनु वारी । तैसेइ नाथ ! पुरुष विनु नारी ॥
नाथ ! सकल सुख साथ तुम्हारे । शरद विमल विधु वदन निहारे ॥
दो० प्राणनाथ करुणायतन, सुन्दर सुखद सुजान।
तुम बिनु रविकुल कुमुद विधु, ! सुरपुर नरक समान ॥
.

TA ३२ श्रीभकमाल सटीक । चौपाई। छिनु चिनु पिय पदकमल विलोकी। रहिहाँ मुदितदिवस जिमि कोकी।. "को न विकी विनु मोल सखी ! लखि जानकीनाथ की सुन्दरताई ॥" दो० "जेहि के हिय सर" इत्यादि "तुलसी जनकसुता बिनु"&C. गीत। “सखि,रघुनाथ रूपनिहारु।" "सखि रघुवीर 'मुखछवि' देखु"इत्यादि आली री राधाजी के रुचिर हिंडोलना झूलन जैए। इत्यादि ।। कोशलपुरी सुहावनि श्रीसरयू के तीर" इत्यादि सया। “सोहहिं स्वामिनिसीय सुसंग, “सहेली सवै अलवेली नवेली; गोरी, गिरा कहिये जिन आगे गवेली लगें रति मानहुँ चेली। सारी सबै जरतारी किनारिन की पहिरे तन रंग रंगेली; पीरी, हरी,रसरंग सखी,कुसुमी, सित, ऊदी औनीली रमेली। ऐसी “सखीं" चहुँओर लसे, सिय मध्य कृपारससागर वोरी; दै सव को मुदपुंज विलोकहिं मंजुल कंज विलोचन कोरी। को.वरनै छवि सुन्दर राजकिशोरी की, जो तिहुँ लोक अँजोरी; जासुकटाक्ष विलास पिया चित को,रसरंग सखी, लियचोरी॥ १ श्री कथा श्रवण २ अभिमान ३ श्रद्धा फुलेल = उपटन ४मनन ५दया सुनीर ६ नवनि ८भगवन्नाम ६ हरि साधुसेवा १०मानसी ११ सुसंग १२ चाह अंगुकाइब -वसन सोंधो -आभरण कर्णफूल %3Dसुनथ - अंजन =बीरी 2

भक्तिसुधास्वाद तिलक।
३३
दो० "जेहि के हियसर सियकमल, पावन विकसे आय ।
प्रियाशरण ! रघुवर भ्रमर, रहे तहां मँडराय ॥
नहिं जप तप व्रत ज्ञान ते, नहिं विराग ते कोय।
"उज्ज्वलरस" अधिकार वर, लली कृपा ते होय ॥
सिद्ध योगि देखे नहीं, जो थल सुर समुदाय ।
सीय कृपा अलिवेष धरि, सहजहिं देखहुआय॥"
निज निज सेवा द्रव्य युत, युवति वृन्दसिय पात।
रूपकला तिन महँ लिये, बहु सुगन्ध सहुलास ॥
चौपाई।
“सो मन रहत सदा तोहि पाहीं । जानु प्रीति रस इतनेहि माहीं ॥"
"द्विभुज श्याम दशरथ कुँवर, रामऽरु जनक कुमारि।
कारण कारज ते परे, इनहि कहत श्रुति चारि॥
सदा अवध में ध्यावहीं, रासादिक बहु रंग ।
वीच वीच मिथिला गवन, चहुँ कुँअरिन मिलि संग ॥
रीति भाव स्थाइ पुनि, प्रणय प्रेम अरु नेह ।
अनूराग अस
जानिये, मनो एक दुइ देह ॥
मन्द हँसनि दृग फेरनी, सो अनुभाव बखानु ।
कोकिल शब्द वसन्त ऋतु, सो उद्दीपन जानु ।
स्थाई प्रियतम रती, नवनि प्रणय अति नेह ।
कर पंकज स्परस पर, वारत तन मन गेह" ॥
चौपाई।
"नाथ सकल सुख शरण तुम्हारे । शरद विमल विधु, वदन निहारे"
इत्यादि।
दो० "प्राणनाथ करुणायतन, सुन्दर सुखद सुजान ।
तुम विनु रवि कुलकुमुदविधु ! सुरपुर नरक समान ॥
"सी" कहते सुख ऊपजै, "ता" कहते तम नास।
तुलसी “सीता" जो कहै, राम न छाडै पास ॥"

श्रीभक्तमाल सटीक। प्रियपाठक ! श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी कृत "श्रीगीतावली," श्रीदेव स्वामी (काष्ठजिह्वाजी)प्रणीत "शृङ्गारप्रदीप," श्रीजयदेव- स्वामीकृत "गीतगोविन्द"; प्रधानकृत "रामहोली, रामकलेवा, श्रीयुगलप्रिया श्रीरूप सखीजी की होली; श्रीनाभाजी, श्रीरसिक- अली, श्रीतपस्वी रामजी, तथा श्रीरामचरणदासजी दीनरूपकला* कृत "अष्टयाम मानसपूजा"; "श्रीअगस्त्यसहिता" इत्यादि और श्रीमद्भागवत (दशम), एवं श्रीकृपानिवासजीकी पोथियां भी देखिये॥ (५) कविता (८३८) पंचरस सोई पंच रंग फूल्न थाके नीके, पीके पहिराइवे को रचिकै वनाई है। वैजयंती दाम,भाववती अलि "नाभा" नाम लाई अभिराम श्याम मति ललचाई है ॥ धारी उर प्यारी, किहूं करत न न्यारी, अहो ! देखो गति न्यारी ढरि पायन को आई है। भनि छवि भार, ताते नमित "शृंगार" होत, होते वश लखे जोई याते जानि पाई है ॥ ५ ॥ (६२४) भक्तिसुधास्वादतिलक । "शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार," ये जो भनि के पांचो रस, सोही पँचरँगे फूलों के विचित्र थाके हैं; इन्हीं की वैज- यन्ती माला सप्रेम नीके रच रच के, प्रियतम को पहिराने के हेतु, श्रीनाभा नाम की प्रतिभाववती अलीजी सुन्दर मनोहर वनायलाई हैं; जिस को देख के, भक्तवत्सल भावग्राहक प्रेमप्रिय श्रीशाईधर श्यामसुन्दरजी की भी मति ललचगई है; आपने इस मालाको उर में धारण किया, यह विलक्षण अनूप रीति गति देखनेही योग्य है कि आप इस परमप्रिय माला को किसी क्षण गले से अलग नहीं करते हैं। भक्ति रस पुष्प थाकों की यह वैजयन्ती वनमाला है, इस कारण से यह श्रीचरणकमल पर झुक के आ लगी है; अहा ! भक्ति की गति क्या न्यारी होती है, "उज्ज्वलरस" ("रसरांज" अर्थात् "शृङ्गार"रस,) भक्रिकी अपार छविके भारसे नमित, क्याही सुन्दर *पटना खविलास प्रेस से मिलती है। FREE भनिसुधास्वाद तिलक । ३५ होता है; यह बात इससे जानने में आती है कि श्रीभक्ति महारानी का जो दर्शन पाता हैसो अवश्य प्रभु के प्रेमके वश होही जाता है। (१) "सोह न वसन विना वर नारी"। (२) "नवनि वसन, (पन सोधौ लै लगाइये)" (३) “यद्यपि गृहसेवक सेवकिनी । विपुल सकल सेवा विधि गुनी ॥ निज कर श्री परिचर्या करई। रामचन्द्र आयसु अनुसरई ॥ इत्यादि ॥" (४)"पद सेवा श्रीलक्ष्मी, (आसन वर श्रीशेप)" इत्यादि, इत्यादि । (६) सत्संग प्रभाव वर्णन । कवित्त ( ८३७) भनितरु पौधा ताहि विघ्न डर छेरी हू को, वारिदै विचार, वारि सींच्यो सतसंग सों । लाग्योई बढ़न, गोंदा चहुँ दिशि कढ़न, सो च- इन अकाश, यश फैल्यो वहुरंग सों ॥ संत उर आलवाल शोभित विशालछाया, जिये जीव जाल, ताप गये यो प्रसंग सों। देखौ चढ़- वारि, जाहि अजाहू की शंका. हुती, ताहि पेड़ बांधे झूलें हाथी जीते जंग सों॥६॥ (६२३) तिलक । श्रीहरिभनिरूप तरुवर की आदि अवस्था एक नवीन वृक्ष की सी समझिये कि जिसको एक बकरी के बच्चे से भी विघ्न का भय रहा करता है, और संत वा भक्त के हृदय को थाला सरिस जानिये। इस पौधे की रक्षा चारों ओर विचाररूप घेरे * से जव की गई तथा सत्सङ्ग के जलसे यह सींचागया तव यह बढ़ने लगा; चारोंओर गोंदे. (शाखा प्रशाखा) निकले फैले और वृक्ष आकाश की ओर बढ़ने बढ़ने लिंगा भगवद्भक्ति का सुयश अनेक प्रकार से लोक में विख्यात हो गया । इस तरुवर की विस्तृत छाया कैसी सुशोभित हुई कि जिसके तले पहुँचने ही से महातापं गये; और नारिनरवृन्द वरन् जीवमात्र * मिट्टी, ईटों वा काँटों के घेरे को "चारी" वा "यार" जानियें।

न श्रीभक्तमाल सटीक। जी उठे अत्यन्त सुखी हुए। इस वृक्ष की उन्नति पर तनक चित्त की दृष्टि तो दीजिये कि जिसको प्रथमतः मेरी बकरी की भी महाशंका रहा करती थी वही अब आज (रामकृपा से) ऐसा सुदृढ़ हो गया कि ज्ञान वैराग्य यश महत्वादिक बड़े बड़े प्रवल हाथी भी इसमें बंधे हुए मला करते हैं; सत्सा के प्रभाव को विचारियेगा. चौपाई। 'सतसङ्गति मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि, सब साधन फूला॥" दो० "तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला एक अंग । तुलै नताहि सफल मिलि, जो सुख लव सत्संग॥" - (७) श्रीनाभाजूका वर्णन । कवित्त । (८३६) जाको जो स्वरूप सो अनूप ले दिखाय दियो, कियो चों कवित्त पट मिहीं मध्य लाल है । गुणपै अपार साधु कहें आंक चारिही में, अर्थ विस्तार कविराज टकसाल है ॥ सुनि संत सभा झूमि रही, अलि श्रेणी मानौं, धूमि रही, कहें यह कहा धौं रसाल है। सुने हे अगर अब जाने में अगर सही, चोवा भये नाभा, सो सुगंध भक्क- माल है ॥७॥ (६२२) तिलक। जिस सन्त का जैसा स्वरूप है, श्रीनाभाजी स्वामी ने उसको अपने अनूठे काव्य में वैसाही अनूप दिखा दिया है और कविताई ऐसी की है कि जिसका अर्थ ऐसा झलकता है कि जैसे बहुत झीने वस्त्र के बाहर से उसके भीतर का लालमणि (रत्न) झलकता है। सन्तों के अपार गुणों को श्रीनाभाजीने थोड़ेही अक्षरोंमें यों कहाहै, कि उनमें अर्थअनोखे विस्तृतभरे हैं, जैसेवड़ेबड़े कविवरोंकी चमत्कृत रीति होती ही है । सन्तों की सभाएँ इस भक्तमाल काव्य को सुन के भ्रमर वृन्दों की भाँति मँडराती तथा झूमती रहती हैं, और यह क- हती हैं कि "यह कैसा आश्चर्यरसमय रसाल है"। मैंने "अगर" जी का नाम सुना तो था परन्तु अव ठीक ठीक जान भी लिया कि

भक्तिसुधास्वाद तृतीयावृत्ति
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.
...
श्रीसीताराम ON
श्रीम्पकला
श्रीअयोध्याजी (अध)
MUNITOTO BUMM
श्रीभक्तमाल तिलककार
श्रीसीतारामशरण भगवान्प्रसाद रूपकला
कलिसम्बत् ५०२६ तुलसीदासान्द३० सन् १६२६ई सम्बत् १९८०
नवलकिशोर यन्त्रालय लखनऊ

SHWARA . भकिसुधास्वाद तिलक। माप वस्तुतः 'अगर' हैं, जिनसे "नाभा" * रूप 'चोआ' कि जिन नाभा ("नाफ़ा") का "भक्तमाल" ऐसा 'सुगन्ध' फैल रहा है। भागवतधर्माचरण के प्रसिद्ध तथा प्रधान आधार "भक्त- माल" की क्या बात है । इस आदरणीय ग्रन्थ का अनुवाद केवल महाराष्ट्री, बङ्गला, फारसी, उर्दू, इगरेजी आदि अनेक प्राकृत भा- पामोमात्र में ही नहीं, वरंच देववाणी (संस्कृत) में भी हो गया है। यह तो ठीक ही है कि इस ग्रन्थ (भनमाल) में प्रायः सातसौ भक्कों के नाम हैं, अर्थात् सतयुग त्रेता द्वापर के अतिरिक्त कलियुगके,- हिन्दू महाराजाओं के ४२६६ वर्ष के, तथा मुसल्मान् वादशाहों के ४४४ वर्ष के, कलियुग के ४७४०वें वर्ष पर्यन्त के महात्माओं के, (सम्बत् १६६६, सन् १६३६ ईसवी,) तथा (विक्रमी सत्रहवीं शताब्दि तक के); कि जिस समय को आज (19082+, २६४ वर्ष हुए। . - * गोस्वामी श्री ६ नाभाजी के "भकमाल" के अनुवाद और टि- प्पणी तथा टीकाएँ भी, अपनी अपनी चाल पर, अनेक हो चुकी हैं- , "थाके" का अर्थ। एक एक रंग के पांच सात फूलों का समूह एकत्रित, ऐसे समूहों को "या" कहते हैं । जसे गुलाबी वा लाल पुष्पों का एक थाका, ऐसेही पीले, हरे, स्वेता श्याम तुलसीदलों फूलों के विचित्र थाके ॥ ऐसे पंचरंगे धाकाओं से मालाएँ रची जाती है। यह प्रसिद्ध ही है । नामाजी "नमोभूज" का अपभ्रंश है ।। जनाफा (कस्तूरीवाला) किलियुगीय संवत्सर ५००४-विक्रमीय संयत् १६६०% सन् १६०३ ईसची ॥

श्रीभक्तमाल सटीक । उनके पात्रों के नाम गिनती संवत् भक्तनामावलियों के नाम धीप्रियादासजी १. १७६६] भक्तिरसवोधिनी टीका 4 , 7 8 २/१८०० भताउरयशी (अनुवाद) लालचन्द्रदास ३ | १८०० म०म० टिप्पनी (श्रीकाशी निम्बार्फसम्प्रदायी श्री १६२३ लखनऊ १६५२, घृन्दावनवासी वैप्पयदास यम्बई १९५७ में छपी है) १८९८ (फारसी) मुंशी गुमानीलाल सादिय ५ गुरुमुखी भक्तमाल फीतिसिहजी ६१६११ भक्तिपदीप (२५ मिष्ठा) उर्दू थीतुलसीरामजी साहिय १६५८ | मक्तकल्पद्रुम (२४ निष्ठा) प्रतापसिंहजी ८ | १९२१ रामरसिकावली(चौपाई दोहे) | राजा रघुराजसिंह, रीवा ६ १९२५ | रसिकभक्तमाला श्रीयुगलप्रियाजी (चिरांद) 10 १० | १९३० भक्तमाल छप्पय धीहरिश्चन्द्रजी,मारतेन्दु प्रेमी 11 ११ १६३४ | " श्रीतपस्नीरामजी सीतारामीय 12] १२ १९५५ हरिभक्तिमकाशिका पं० ज्वालाप्रसाद मिश्रजी भक्तनामावली श्रीध्रुवदास १४ | १६५८ | भक्तनामावली श्रीराधाकृष्णदास,"श्रीकाशी नागरीप्रयारिणी सभा 15 १५ १६६५ भक्तमाल का ग्रेज़ी सरी श्रीभानुप्रताप तिवारी, धनार, 16| १६ | १६६६ | Gleanings Sir George Grierson, I. O S., C.I E, AM.R.A.S,&0. 9 ! इन में, भक्तों के निवासस्थान देश तो प्रायः वर्णित हैं, परन्तु उनके जन्मादि के काल की चरचा पाई नहीं जाती। हां, इस बात के HISTORISHISTORIE SAR RA FRESHA भक्तिसुधास्वाद तिलक। ३६ अनुमान तथा अनुसन्धान की ओर महाशयों की दृष्टि तो अवश्य ही गई है (१) प्रेमीवर भारतेन्दु श्रीहरिश्चन्द्र जी (२) "प्रेम- गंगतरंग" "रुमूजे मिहो वफ़ा” और “वनाए देहली" इत्यादिक के कर्ता श्रीतपस्वीराम जी सीतारामीय (३) श्रीराधाकृष्णदासजी बनारस, (४) "दिमाडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर अब हिन्दुस्तान" के कर्ता सरजार्ज ग्रियर्सन् साहिब वहादुर ॥ तथापि, किसीको उनकी तारीखें मिली नहीं ॥तो जिन वार्त्ताओं की टोह ऐसे २ ऐतिहासिक तत्त्वरसिक अनुसन्धानकर्ताओं को न मिली, उन बातों में इस दीन का हस्तक्षेप भला कव फलदायक होना सम्भव ? चौपाई। "जेहि मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं॥" अतः उसको छोड़कर, इस दीन ने स्वमति अनुसार इस तिलक में केवल मूल तथा कवित्त के अर्थमात्रही लिखने पर चित्त दिया। सब सज्जनों से पुनः पुनः कृपा आसीस की इस दीन की प्रार्थना है । । यह वात विदित ही है कि "भक्तमाल" की शुद्ध प्रति आज कल ढूंढ़ निकालनी भी कोई सहज ही सी वार्ता नहीं है ॥ (c ) भक्तमालस्वरूप वर्णन । कवित्त (८३५) घड़े भक्तिमान, निशिदिन गुण गान करें, हर जग पाप, जाप हियो परिपूर है । जानि सुखमानि हरि सन्त सनमान सचे, वचेऊ जगत रीति, प्रीति जानी सूर है ॥ तऊ दुराराध्य, कोऊ कैसे के अ- राधि सके, समझो न जात, मन कंप भयो चूर है । शोभित ति- लकभाल, माल उर राजै, ऐपै विना भक्त माल भक्तिरूप अति दूर है ॥ ८ ॥ (६२१) वार्तिक । चाहे कोई कैसेही बड़े भकिमान हों, रात दिन हरिगुण गाया + श्रीसीतारामशरण भगवान् प्रमाद रूपकला।

- श्रीभक्तमाल सटीक। करते हों, संसार के पापों को हरते भी हों, भगवन्नाम जपा करते भी हों, उनका हृदय सद्गुणों तथा भगवद्ध्यान से भरा भी हो, ज्ञानमान, भी हों, (तनु कम्प और हिय चूर्ण भी हों,) श्रीहरि तथा सन्तों के सन्मान में भी साँचे हों, और उसीमें सुख मानते भी हों, रीति से नाम जपते भी हो; सांसारिक प्रपंच से बचे भी हों, प्रेम कोही जड़ वा सार जानते हों, ललाट में तिलक ओर उर में माला भी सुशोभित हों; यह सब ठीक है सब कुछ हो, तथापि भनि की आराधना कठिन ही है; ओह ! कोई किस प्रकार से आराधना कर सकता है ? भक्ति की विलक्षण सूक्ष्मगति समझ में नहीं आती, मन कांप उठता है, हृदय चूर चूर हो जाता है । सारांश यह कि "श्रीभक्तमालजी" को पढ़े समझे और मनन किये विना, श्रीभक्तिमहारानी की आराधना और उनके स्वरूप का जानना अतीव दूर तथा असम्भव है ॥ इस कवित्त में यह शंका है कि "को जो श्रीभाकि के अंग इसमें कहे हैं। तिनसे पृथक भी क्या और भी कोई भक्ति का रूपहै?" समाधान:-नहीं, परन्तु इन्हीं अंगों की निष्टा, पराकाष्ठारूप, भक्तमाल में भक्तों ने पाचरण कारकै दिखाए हैं, कि जिन्ह के श्रवणमात्र से ही, इन अंगों-संपन्न जन भी, निज भक्ति का अभिमान त्याग के निराभिमान परा- काष्ठा भक्ति पद की श्राशा करते हैं ।। ( उदाहरण ) यथा, बड़े मक्तिमान श्रीपीपाजी ने श्रीधरभक्त की भक्ति को देखि निज भाक्ति को लघु माना " 'गुन गान'; जैसे. नृतक- नारायणदास कि शरीरही त्याग दिया ।। नाम जाप अंतर्निष्ठ राजा का कि, तनहीं त्यास दिया । 'श्रीहरिसन्मान सेवा' जैसे मामा भानने की कि सरावगी के शिष्य होके कहा कि पाई प्रभु सुख हम नरक हूं गए तो कहा" । । सन्तसन्मान' जैसे सदावती वणिकजी की कि वेषधारी ने घेटा वध किया तब बेटी विवाहदे प्रसन्न किया। इत्यादिक उदाहरण श्रीभक्तमाल में देख लीजिये । विस्तार के भय से बहुत नहीं लिखे ॥ "श्रीभक्तमाल" क्या है ? उन महानुभावों का जीवनचरित्र कि जिनको हमारे करुणाकर प्रभु की दयालुता विशेष अपने छवि समुद्र में मग्न कर चुकी है । उसके श्रवण मनन निदिध्यासन विन, उस रस में किसी का प्रवेश कैसे सम्भव है ? क्रिया का यथार्थ स्वरूप कर्ताओं ही के आचरण जानने से पूर्णतः तथा शीघ्रतर - भक्त, भक्ति, , भक्तिसुधास्वाद तिलक। 'अन्तःकरण में श्रवणादि द्वारा पहुँच कर गुणकारक और सुखप्रद होता है । श्री- भक्तमाल के अपूर्व अधिकार को विनक्षणता चित्त पर कैसी होती है, इसका अनु- भव श्रीभक्तमाल के पढने सुननेवालों ही को होता है ।। (६) अथ मूल मंगलाचरण ॥ दोहा ॥ (८३४) भक्ति, भगवंत, गुरु, चतुर नाम वपु एक। इनके पद वंदन किये, नाशें विघ्न अनेक ॥ १ (२१३) * १ विनरों तिलका "श्रीभगवद्भक्क" "श्रीभगवद्भक्ति" "श्रीभगवत्" और "श्रीगुरु", इनके नाम ही मात्र तो चार हैं, परन्तु वास्तविक स्वरूप एक ही जानिये; इनमें भेद कुछ भी नहीं। विश्वासपूर्वक ऐसा समझ रखिये कि इनके पदसरोज की व- न्दना समस्त विघ्नों को निःशेष नाश करती है, चाहे विघ्न हृदय के भीतर के हों; वा बाहर के ही हों। आठवें कवित्त तक तो श्रीप्रियादासजी की ही निज भूमिका, मंगलाचरण, और उपक्रमणिका हुई। हां अब आगे, नवें कवित्त से, उनकी "टीका" प्रारम्भ होती है । (१०) टीका ॥ कवित्त ॥ (३३) हरि गुरु दासनि सो सांचो सोई भक्त सही, गही एक टेक, फेरि उरते न टरी है । भक्ति रस रूप को स्वरूप यह छवि सार चारु हरि नाम लेत असुवन भरी है । वही भगवंत संत प्रीति को विचार करै, धेरै दूरि ईशता हू, पांडुन सो करी है। गुरु गुरुताई की सचाई ले दिखाई जहां गाई श्री पैहारी जू की रीति रंग भरी है ॥६॥(६२०) तिलक। (१)"भक्त" उन को समझिये सही कि जिन को "हरि" (भगवत् ) चरणारविन्द में तथा श्री "गुरु" पदकंज और "हरि- दासों" (भागवतों) के पदपंकज में 'सच्चा प्रेम हो; तथा "श्रीहरि, श्रीगुरु और श्रीहरिगुरुदासों' के प्रति जिन का सत्य (निश्छल SAREERRORESRECRUIRLS A श्रीभक्तमाल सटीक। निष्कपट) वर्ताव होवे; और जो श्रीकृपा से अपनी निज गृहीत. निष्ठा के टेक में सदेव अचल रहे ॥ भक्तिमान जन भक्त कहे जाते हैं अर्थात् जिन भाग्यभाजनों के हृदयकमल में श्री भक्ति महारानी विराजती हैं तिन्ह सज्जनों को भक्त कहते हैं। ( श्लोक ) वैष्णवो मम देहस्तु तस्मात्पूज्यो महामुने । अन्ययत्नं परित्यज्य वैष्णवान् भज सुव्रत ॥ (२) "भक्ति" जो रसरूपा है उसका सुन्दर छवि सार स्वरूप संक्षेपतः यह पहिचान लीजे कि श्रीसीताराम नाम उच्चारण करने के साथ ही आँखों में से प्रेमाश्रु के बिन्दु टपकने लगें वरंच आँसू की झड़ी बरसने लगे। "भक्ति" की कुछ व्याख्या पृष्ठ ६ से ३६ पर्यन्त लिख आए हैं। “भक्त" के भाव का नाम "भक्ति" है अर्थात् जिल अनूप स- म्पत्ति के भाजन को "भक्त" कहते हैं उस अविरल अमल पवित्र सर्वोत्तमोत्तम फलों के रस का नाम "भक्ति"जानिये ॥ (३)"भगवत्" तो सन्तों और भक्तों की प्रीति ही को विचार करता है। प्रेम के आगे अपनी ईशता (ईश्वरत्व) को न्यारे ही छोड़ देता है जैसे कि गृद्ध, निषाद, शबरी, पाण्डवों इत्यादिकन के साथ । ऐसा भगवत्, सो उसकी इस भक्तवत्सलता की जय ॥ .. (४)ऐसे व्यापक, सच्चिदानन्द, परब्रह्म, सुखराशि, शाइधर, शोसाधाम, परमसमर्थ, "भगवंत" श्रीजानकी वल्लभजी के पद- पंकज की भक्ति जिसके उपदेश तथा कृपाद्वारा भक्तों को प्राप्त होती है, उसको श्री "गुरु" कहते हैं। गुरुताई की रीति तथा सचाई को श्रीकृष्णदास पैहारी (पयोहारी)जी महाराज के रङ्ग भरे चरित्र में सुन्ना समझना चाहिये ॥ कुछ न लेना और पूरा २ कृतार्थ कर देना ॥ (१)प्रीति जिसको होती है (भक्त);(२)तथा प्रीति (भक्ति); (३) और जिसकी प्रीति होती है (भगवन्त); (४) एवं जिसके द्वारा प्रीति होती है, और प्रियतम मिलता है, जो कि भगवत् प्रेम के ही निमित्त पूजा जाता है, (गुरु);ये चारोंके चारों ही केवल कहने मान *** भक्तिसुधास्वाद तिलक। को ही चार हैं, नहीं तो ध्रुव करके इन्हें वस्तुतः एक ही जानिये ॥ जैसे यदि किसी को अपनी आंखें दर्पण में देखनी हों, तो उस समय विचारिये कि कर्ता वा देखनेवाली तो आंखे ही हैं तथा देखना आंखों ही की क्रिया है और जिसको (कर्म) आंखें देखती हैं सो भी अपनी आंखें ही हैं; एवं जो आपके देखने के करण स्वरूप हैं नाम जिन से आप देखते हैं वे भी आंखें ही हैं, और फिर दर्पण वना भी है केवल आंखों ही के लिये; अर्थात् कर्ता कर्म करण सम्प्रदान ये सब कारक आंखें ही हैं। वा सव एक ही तत्त्र हैं। उनमें भेद वा भिन्नता कहां है ? ऐसे ही भक्त, भक्ति, भगवन्त, गुरु, ये चारों अभेद हैं । भगवत् की ही विचित्रता हैं। चारों नामोंसे भगवत् ही वन्दनीय है वही एक नामी है।। चारों की एकता का तात्पर्य यह है कि श्रीभगवत ही जीवों के कल्याण के निमित्त अपनी कृपा से चार रूप हुए हैं, क्योंकि भकों के अन्तयांमी तथा उरप्रेरक आप ही हैं; उपाय रूपा भक्ति भी प्रापही की साक्षात् कृपाशक्ति है; हितोपदेशक इष्टमन्त्र गर्भित श्रीगुरु तो भगवद्रूप प्रसिद्ध ही हैं। इस प्रकार से तत्वतः चारों एक हैं। "श्री- भक्ति भवानी" नाम की छोटी सी पुस्तिका (छंदवद्ध) प्रोफेसर लाला भगवान्दीनजी दीन की रची देखने योग्य अवश्य है। (११)॥दोहा॥ (८३२) मंगलादिविचारिरह, वस्तुन और अनूपा हरिजन को यश गावते, हरिजन संगलरूप ॥२॥ (२१२) (१२) सव सन्तन निर्णय कियो,*श्रुति पुराण इतिहास।भजिवे को दोई सुघर, कै हरि, कै हरि- दास॥३॥ (२११) तिलक। मंगलाचरणों तथा मंगल वस्तुओं में विचारने से भगवत् भक्कों *मकट हो कि "अशुद्ध प्रतियों में ऐसा पाठ है कि सब सन्तनमिलि निर्णय कियो मथि श्रुति पुराण इतिहास ॥ इत्यादि । मिलि और मयि अधिक है !!!

४४ श्रीभक्रमाल सटीक। का गुण वर्णन ही अनूप अँचता है, इसके सरीखा मंगल मूल और कुछ भी नहीं ठहरता। भगवत् तथा महात्माओं के सुयश को गाते गातेही, भगवत् के जन मंगलमय हो जाया करते हैं। सब वेदों पुराणों इतिहासों ने तथा सब सन्तोंने यह बात पक्की ठहरा रक्खी है कि भजे जाने के योग्य दो ही हैं ( १) भगवान् तथा (२) भगवान् के साधुतथा भन्न सो इन दोनों ही की सेवा वा भजन, उत्तम ठीक और सुन्दर है ॥ (१३)॥ दोहा॥ (८३०) अग्रदेव आज्ञा दई, भक्तन को यश गाउ। भवसागर के तरनको,नाहिन और उपाउ॥४॥ (२१०) तिलक। स्वामी श्री ६ अग्रदेव महाराजजी ने आज्ञा दी कि भाग- वतों के सुयश वर्णन कर; भवसिंधु से पार होने के अर्थ अमोघ महानौका दूसरा कोई नहीं है । (१४) आज्ञा समय की टीका ॥ कवित्त ॥ (८२६) मानसी स्वरूप” में लगे हैं अग्रदास जू वै, करत वयार नाभा मधुर सँभार सौ । चढ्यो हो जहाज पै जु शिष्य एक, आपदा में कस्यो ध्यान, खिच्यो मन, लुब्यो रूपसार सों ॥ कहत समर्थ "गयोबोहित वहुत दूरि प्राओ छवि पूरि, फिर ढरौ ताही ढार सों"। लोचन उघारिक निहारि, कह्यो "बोल्यौ कौन?" "वही जौन पाल्यौ सीथ दे दै सुकुँवार सों" ॥ १०॥ (६१६) तिलक। एक समय स्वामी श्री ६ अग्रदास महाराज जी मानसी भावना में मग्न थे, और श्रीनाभाजी महाराज आप को प्रेम से धीरे धीरे पंखा झल रहे थे। उसी समय आप के शिष्य ने, कि जो सागर (समुद्र में एक जहाज़ पर चढ़ा था, जहाज़ के रुक जाने से आर्तवश स्वामी श्री ६ अग्रदेव महाराजजी का ध्यान किया। एक तो स्मरण, दूसरे दीनता से, फिर क्या था, उक्त स्वामीजी कृपालु PakSAGAR N भक्तिसुधास्वाद तिलक । ४५ के मन को सार स्वरूप की सेवा से छुड़ा के अपनी ओर आकर्षण कर ही तो लिया। समर्थ श्री नाभाजी अपने स्वामी के अनुपम रहस्य सेवा का यों विघ्न सह न सके, कृपापूर्वक उसी पंखेके वायुवल से जहाज को उस आपदा से छुड़ा कर, विनय किया कि "प्रभो! वह बोहित (जहाज) तो आप की कृपा ही से आपदा से बच कर बहुत दूर निकल गया; अव आप अपने चित्त को उधर से लौटाय के शान्तिपूर्वक स्वकार्य में तत्पर करके पुनः उसी अनुपम छवि में लगाइये"। इस वार्ता के सुनतेही नेत्र उघार उनकी ओर निहार आपने पूंछा कि “कौन बोला?" श्रीनाभाजी ने हाथ जोड़ के प्रार्थना की कि "नाथ ! वही शरणागत वालक, कि जिसको सीथ प्रसाद देदे के आपने कृपापूर्वक पाला है ।" (१५) टीका | कवित्त । (८२८) अचरज दयो नयो यहां लौं प्रवेश भयो, मन सुख छयो, जान्यो संतन प्रभाव को। आज्ञा तब दई, “यह भई तोपै साधु कृपा, उनहीं को रूप गुण कहो हिय भाव को" ॥बोल्यो करजोरि, "याको पावत न ओर छोर, गाऊं राम कृष्ण नहीं पाऊं भक्ति दाव को"। कही समुझाइ, “वोई हृदय आइ कहैं सव, जिन लै दिखाइ दई सागर में नाव को" ॥११ ।। (६१८) तिलक। इतना सुनतेही आप नवीन आश्चर्य में आकर विचारने लगे कि इसकी यहां तक पहुंच हुई ! तथा मन में अत्यन्त आनन्द छा गया, और जाना कि यह सन्तों के प्रसादी और चरणामृत का प्रभाव है। तब आपने इन्हें प्राज्ञा दी "वत्स ! यह तुझ पर साधुओं की अलभ्य कृपा हुई; अतः अव तू सन्तोही के गुण स्वरूप तथा हृदय के भाव को वर्णन कर । (भवसागर के तरने का यही उपाय है।) इनने हाथ जोड़ के निवेदन किया कि "स्वामी! श्रीराम कृष्ण चरित्र गा सकू, परन्तु भक्तों के अपार रहस्य चरित्रों का आदि अन्त पाना तो मुझ को असम्भव ही है" ! आपने समझाया कि "पुत्र ! SURESHER EKACROS ॐ श्रीभक्तमाल सटीक। जिनने तुम्हें समुद्र में जहाज़ को दिखा दिया, वेही तुम्हारे हृदय में प्रवेश करके अपने अलौकिक रहस्यों को कहेंगे । सो, तुम अव भक्क यश कह ही चलो।" ऐसे वरदानात्मक वचनवर सुनके श्रीकृपा से श्रीनाभा जी महाराज आनन्दपूर्वक उद्यत होही तो गए, और "श्रीभक्तमाल" रचही तो दिया। श्रीभनमालजी में १६५ छप्पय (पट्पदी) हैं; आदि में चार दोहे हैं; एक कुण्डलिया तथा एक दोहा मध्य में; अन्त में तेरह दोहे हैं; सब मिलके २१४ (दो सौ चौदह) छन्द हैं ॥ यही "भूल भक्क- माल" है, जो इस ग्रन्थ में 'बड़े अक्षरों में छपा है ॥ और श्री- प्रियादासजी की "भक्तिरसबोधिनी" नाम उसीकी टीका ६२६ कवित्तों में है। इन्हीं आठ सौतेंतालीस ( २१४ + ६२ = ८४३) छन्दों का भावार्थ, यथामति, सन्तों की कृपा से लिखना, इस दीन का उद्देश्य है। OD- । (१६) श्रीनाभाजी की आदि अवस्था वर्णन । कवित्त (८२७) हनूमान् वंश ही में जनम प्रशंस जाको भयो हंगहीन सो नवीन चात धारिये । उमरि वरप पांच, मानि के अकाल आंच, माता वन छोड़ि गई विपति विचारिये । कील्ह नौ अगर ताहि डगर दरश- "दियो लियो यो अनाथ जानि, पूछी, सो उचारिये ।बड़े सिद्ध जल लै कमण्डलु सों सींचे नैन, चैन भयो खुले चख, जोरी को निहारिये॥ १२॥ (६१७) तिलक। स्वामी श्रीनाभाजी महाराज के जन्म, और प्रथम अवस्था की दशा इस प्रकार है कि परम प्रशंसनीय श्रीहनुमान् वंश में अवतार लिया ॥ सो हनुमान् वंश का निर्णय मुन्शी श्रीतुलसीराम जी और "रुमूज़े मिइ व वफ़ा" के कर्ती श्रीतपस्वीरामजी ने, इसप्रकार Recheck 6 भक्तिसुधास्वाद तिलक। किया है कि दक्षिण में तैलङ्ग देश गोदावरी के समीप श्रीरामभद्रा- चल के पास "श्रीरामदास" जी समर्थ नाम के एक महाराष्ट्र ब्राह्मण श्रीहनुमान जी के अंशावतार हुए, (उनके छोटी सी पूंछ भी थी) वे बड़े प्रसिद्ध श्रीरामोपासक परम भक्त सानुराग सिद्ध थे बहुतों को श्रीसीताराम भक्त भव विरक्त श्रीचरणानुरक्त करके श्रीसीताराम धाम को प्राप्त हुए । इस प्रकार श्रीहनुमान् अवतार होने से वह हनुमान् वंश करके विख्यात है, अबतक उस वंश के लोग गानविद्या के अधिकारी होते हैं, राजा लोगों के यहां नौकरी गाने पर करते हैं ऐसा उन्होंने लिखा है। और इसी भक्तमाल को, दोहा चौपाई में रचनेवाले राजा श्री- रघुराजसिंहजीने ऐसा लिखा है कि "सोशिशु लाङ्गुली द्विजकेरो" अर्थात् उन्होंने हनुमान् वंश का "लाङ्गुली"ब्राह्मण अर्थ किया है। और, कोई २ तो स्वामी श्रीनाभाजी का जन्म डोमवंश में भी कहते हैं, परन्तु पश्चिम देश में "डोम" किस को कहते हैं यह न जाननेशले लोग इस देश में डोम भंगी का नामान्तर समझ के "भंगी" भी कह बैठते हैं सो भंगी कहना महा अनुचित अविचार वो पाप है क्योंकि पश्चिम माड़वार आदिक देशों में डोम, कलावत, ढाढ़ी, भाट, कथक, इन गानविद्या के उपजीवियों की तुल्य जाति (ज्ञाति) और प्रतिष्ठा है । इसका प्रमाण ( १११ वें छप्पय) में श्रीमूलकारने "लाखा" भन को वानर अर्थात् वानरवंशी लिखा और (४२६ वें कवित्त में) भक्कमाल के टीका कारने "लाखा नाम भक्त ताको वानरो चखान कियो कहें जग डोम जासो मेरो शिरमोर है" ऐसा लिखके आगे इनके गृह में सन्तों का जाना और रोटी प्रसाद का पाना भी लिखा है सो देख लीजे ॥ लाखा भक्त के यहाँ सन्तों का प्रसाद रोटी पाना अन्यथा असंभव था ॥ अस्तु, यहां तो दोनों प्रकार से उत्तमता हे श्रीनाभा स्वामी तो श्री सीता- रामजी के अनन्य विशुद्ध जगत्पूज्य दास हैं न ब्राह्मण हैं न डोम इन अच्युतगोत्र की देह तो जात्याभिमान से रहित है ! इत्यलम् ॥ RE श्रीभकमाल सटीका ४८ और श्रीनाभाजी के अवतार की कथा इस प्रकार भी सन्तों से सुनी है कि जब ब्रह्माजी ने वत्स चालकों को हरण किया तव श्री- कृष्ण कृपालुजी ने कहा "ब्रह्माजी आपने विमोह दृष्टि से हमारे प्रिय वत्स वालकों का हरण किया तिस हेतु से कलिकाल में लोच. नहीन जन्म लोगे" तब श्रीब्रह्माजी ने स्तुति की और श्रीभगवान् ने प्रसन्न होके वर दिया कि “पांच वर्ष तक अंधे रहोगे तदुपरि बाहर भीतर दोनों प्रकार के दिव्य नेत्र खुलेंगे और परम यश को प्राप्त होगे" । सोई श्रीब्रह्माजी के अंश से श्रीनाभाजी का अवतार जानिये॥ प्रशंसनीय "हनुमान् वंश" में, हरि इच्छा से आपने अन्धे ही जन्म लिया, और "नवीन वात," सो यही कि नेत्रों के चिह्न तक न थे, तिन को भी महात्माओं की कृपा से दिव्य लोचन मिले । आप पांचवर्ष के हुए तव देश में अति दुकाल पड़ा। पिता का भी शरीर छूट गया। माता आपको लेके और देश को चली; परन्तु भूखों मरने लगी, लेके न चल सकी इसी विपत्ति के वश वनही में छोड़कर चली गई।वह दीनता, औरभगवत् की यह दीनदयालुता विचारनेही योग्य है कि स्वामी श्रीकील्हदेवजी तथा स्वामी श्रीअग्रदेवजी श्रीहरिकृपा से उसी ओर जा निकले; अनाथ बालक को देख आपने "बालक! तू कौन है ? और अकेला क्यों है ? कोई औरभी तेरा संगी सहायक है ? तेरे माता पिता कौन हैं ? सो उसी अवस्था में, (होनेहार विरवे के चिकने विकने पात) आपने उत्तर कुछ विलक्षण सा दिया, कि "महाराज! अवतक तो यह दीन अपने को असहाय ही समझे था परन्तु आप का कृपापूर्वक पूछना ही मुझे सुधि दिलाता है कि मेरा और तो माता पिता संगी सहायक कोई नहीं है, पर जो सव जगत् का माता पिता साथी और सहायक है, सोई अनाथ नाथ मेरा भी संगी सहायक और माता पिता है।" दोनों महात्मा सिद्ध तो थे ही, बड़े भाई श्रीकील्हदेवजी ने अपने पूछा कि . R-55 भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४६ कमण्डल से कृपा रूपी जल के छींटे ज्यों ही उनकी आंखों पर दिये, उसी क्षण उनकी आंखें खुलही तो गई। दोनों महानुभावों की जोड़ी का दर्शन पाकर उनके नेत्रों में प्रेमाश्रु भर आए ॥ अव इस विषय में (अर्थात् श्रीनाभाजी के जन्म जाति तथा नाम की वार्ता ) कुछ और भी निवेदन किया जाता है। स्वामी श्रीनाभाजी का नाम "नभभूज" है; आप अयोनिज पुरुष हैं; आप की जाति तो कोई नहीं; आप श्री हनुमत स्वेद से हैं, अत- एव हनुमान्वंशी प्रसिद्ध हैं। "श्रीसूर्य भगवान् से विद्या पढ़ने के अनन्तर जिस समय श्रीअंजनीनन्दन पवनतनय श्रीहनुमानजी श्रीशिवजी के समीप योग सीख रहे थे, उस समय विचार के परिश्रम से जो स्वेद पसीना) श्रीमारुति भगवान् के अङ्ग से निकला, उसको भनिरत्न के कोपा- ध्यक्ष त्रिकालज्ञ जगद्गुरु श्रीशिवजी ने एक पात्र में रखलिया। कालान्तर में श्रीभगवद्भक्रि के विवर्द्धन के निमित्त उसी को नभ से भू में निक्षेप किया; इसीसे इनका नाम “नभभूज" हुआ कि जो "नाभाजी" के नाम से प्रसिद्ध है । हनुमान्वंशी इसीसे कह- लाए।" अयोनिज पुरुपकी जाति कोई नहीं वह पसीना (स्वेद) उस समय का था कि जब आप नेत्रों को वन्द किये हुए योग की परा- काष्ठा दशा (समाधि) में थे; अतएव श्रीनाभाजी भी वाह्य नयनों से हीन (परन्तु अन्तःकरण की दिव्य दृष्टि से अनुपम रहस्य के देखने वाले ही) हुए ॥ (१७) टीका । कवित्त ( ८२६) पायँ परि आंसू.आये, कृपा करि संग लाये, कील्ह आज्ञा पाह, मंत्र अगर सुनायो है । “गलते" प्रगट साधुसेवा सो विराजमान जानि अनुमान, ताही टहल लगायो है ॥ चरण प्रछालि संत सीथ सों अनंत प्रीति, जानी रस गति, ताते हृदय रंग छायो है। मई घढ़वारि ताको पावै कौन पारवार, जैसो भक्तिरूप सो अनूप गिर। गायो है ॥ १३॥ (६१६) R REESARMILMCASSESAMACRECORMALISA श्रीभक्तमाल सटीक। तिलक। चड़ी श्रद्धा से उनने अपना सीस दोनों महात्माओं के पदकंज पर रख दिया । कृपापूर्वक वे “गलता" स्थान में ( गालव मुनि के आश्रम में कि जो जयपुर के पास है,) लाए गए ॥ स्वामी श्रीकोल्हदेवजी की आज्ञा से, स्वामी श्रीअग्रदेवजी ने नारायणदास नाम रख कर इनको श्रीराममन्त्र उपदेश किया। उक्त गादी की साधुसेवा तो प्रसिद्ध है ही, श्रीनाभाजी (नाराय- णदासजी) को यह टहल सौंपा गया कि “सन्तों के चरण धोया करें, तथा उच्छिष्ट पत्तल उठाया करें" "वही सन्त प्रसादी पाया करें और सन्तचरणामृत पिया करें।" महात्माओं के आज्ञानुसार कुछ काल पर्यन्त ऐसाही करने से श्रीरामकृपा से इनको सन्तों के चरणामृत तथा सीथ प्रसाद में अत्यन्त प्रीति हो गई और उसका स्वाद विशेष भी इनने जाना। एवं इनका अन्तःकरण भागवतों तथा भगवत् के विलक्षण प्रेमरङ्ग से रँगगया, और ऐसे अनुपम विद्युत् के चमत्कृत प्रकाश से सुशो- भित हुआ कि जिसकी अलौकिक किंचित् झलक की अपूर्व अवस्थासे (कवित्त १०पृ.४८)ज्ञान वैरागरूपी नेत्रों को चकाचौंधसी हो जातीहै। जैसी 'अपार बढ़वारी (बड़ाई ) इनकी हुई, उसका वारपार कौन पा सकता है ? देखिये, श्रीभक्तिजी का जैसा विलक्षण 'स्वरूप है उसको अपनी अनूप वाणी से श्रीभनमाल में आपने (श्रीनाभास्वामीजी ने ) कैसा गाया है ॥ श्रीगोस्वामी नाभाजी का यश थोड़ा सा इस दसवें ग्यारहवें चारहवें तेरहवें कवित्त के तिलक में कहे। श्रीभक्तमालकार स्वामी श्रीनाभाजी प्रथमतः "दोहाओं" में ही मङ्गलाचरण करके, अव "पट्पदी (छप्पय ) छन्द" के प्रारम्भ में पहले, चौबीसों अवतारों का जयकारात्मक मङ्गलाचरण करते हैं। (१८) (मूल) छप्पय । (८२५) जय जय मीने, वराह,कमठ.नरहरि बलि-बावन । SHREEKREERUGREEKR SACRORSES भक्तिसुधास्वाद तिलक । परशुराम', रघुवीर, कृष्ण कीरतिजगपावन ॥ बुद्ध कलक्की", व्यास', पृथू, हरि", हंस, मन्वन्तर यज्ञ,ऋषभ , हयग्रीव, ध्रुववरदैन',धन्वन्तरं ॥बद्री- पति', दत्त, कपिलदेव, सनकादिक करूणा करौं । चौबीस , रूप लीला सचिर, श्रीअग्रदास उर पद धरौ॥ ५ (२०६) तिलक। जय जय जय, हे श्रीमच्छरूप भगवान् ! आप की जय; हे श्रीशूकररूप भगवान् ! आप की जय; हे . श्रीकच्छपरूप भगवान् ! आपकी जय; हे श्रीप्रह्लादपति नरसिंहजी ! आप की जय; हे बलियुत श्रीवामनजी ! आपकी जय; हे श्रीपरशु राम ! आपकी जय; हे प्रभो श्रीरामचन्द्र रघुवंशमणि ! आपकी जय; हे यदुपति श्रीकृष्णचन्द्र ! आपकी जय; हे वुद्धावतार ! आपकी जय; हे श्रीकल्कि भगवान् ! आप की जय; हे श्री वेदव्यासजी ! आपकी जय; हे श्रीपृथुजी ! आपकी जय; हे गजेन्द्र- रक्षक श्रीहरि ! आपकी जय; हे श्रीहंसरूप भगवान् ! आपकी जय; हे चतुर्दश मनु अवतार ! आपकी जय; हे श्रीस्वयंभू मनु के रक्षक श्रीयज्ञ भगवान्! आपकी जय; हे श्रीऋषभ भगवान् ! आपकी जय; हे श्रीहयग्रीवरूप भगवान् ! आपकी जय; हे श्रीध्रुवजी के बर:, दाताजी ! आपकी जय; हे श्रीधन्वन्तरजी! आपकी जय; हे. बद्रीपति श्रीनरनारायणजी ! आपकी जय; हे श्रीदत्तात्रेयजी ! आपकी जय; हे श्रीकपिलदेवजी ! आपकी जय; हे श्रीसनक श्री- सन दन श्रीसनातनश्रीसनत्कुमारज! आपकीजय जय; हे भगवन्! आपके चौवीस रूपों की रुचिर लीलाओं की कीर्ति जगत् को पावन करनेहारी है; आप मेरे ऊपर कृपा कीजै, अर्थात् अपने निज वन सहित साचेर लीला मेरे हृदय में प्रकाश कीजिये । और हे गुरुदेव श्रीअग्रदासजी ! इन चौवीस अवतारों के साथ आप भी अपना २ पदसरोज मेरे हृदय में रखिये॥ RECEIGHCRACTERRACire per R श्रीभक्रमाल सटीका ५२ R" स्वामी श्रीअग्रदासजी कृत यह छप्पय मंगल हेतु श्रीनामाजी ने यहां रक्खा अथवा पापही ने गुरुका नाम छाप दिया हो। . अवतारों युग जिस देश में श्रयता मास पक्ष तिाथ- समय नाम उसका नाम or मत्स्य कृत प्रात अ० शु०११ पुष्पभद्रा २ कच्छप कृत भा० प्रात समुद्र शुफर फत भा० शु० ५ मध्याह्न हरिद्वार नृसिंह कृत वै० । शु० १४ मध्याह पंजाय मुलतान प्रयागजी चामन प्रेता भा० शु०१ १२ मध्याह ६. परशुराम वेता वै ०० ३ मध्याह्न यमुनिया प्राम ७ श्रीरघुपति नेता चै० शु० मध्याह श्रीधपापाजी fil श्रीकृष्ण द्वापरभा०० স্বপ্ন मथुरागी द्वापर पू० शु० प्रात गया (कीकट) कलिक फालि भा० शु०१३ सम्पलग्राम मुरादाबाद ये प्रसिद्ध "दश" अवतार हैं। दो० दुइ वनचर, दुइ वारिचर, चार विप्र, दो राउ। तुलसी! दश यश गाइके, भवसागर-तरि जाउ॥ *कल्पभेद से तिथियों में भी कहीं कहीं कभी कभी भेद पाया जाता है।

भकिसुधास्वाद तिलक। ५३ गिन्ती अवतारों के नाम युग देश च्यास द्वापर १ १७ १३ कृत श्री अयोध्या कृत निकूटाचल हंस सात ब्रह्मलोक मन्वन्तर* १५ . कृत बिठूर चौदह यज्ञ (उरुकुम्म) कृत घद्री धुबवरदेन कृत बिठूर १७ १८ 88 SHARE हयग्रीव कामरूप ऋपभोव कृत धीअयोध्या धन्यन्तर कृत समुद्र २१ नरनारायण कृत यद्रिकाश्रम दत्तात्रेय कृत चित्रकूट फपिलदेव विन्दसर के समीप २५ सनकादि। ब्रह्मलोक चार (१३) टीका करित्त (२४) जिते अवतार, सुखसागर न पारावार, करै विस्तार लीला जीवन उधार कौं । जाही रूप मांझ मन लागै जाको, पागैताही; जागे हिय भाव वही, पावै कौन पार को ॥ सब ही हैं नित्त, ध्यान करत प्रकाश RECRece SCREECRUCHAKREGRANAGAR RASI श्रीभक्तमाल सटीक । चित्त, जैसे रंक पावें वित्त, जोपै जानै सार कौं । केशनि कुटिलताई ऐसे मीनसुखदाई,अगर सुरीतिभाई,बसौउर हारकों ॥१४॥(६१५) तिलक। भगवत् के जितने अवतार हैं, वे सवही सुखके समुद्र हैं, जिनका वारपार (ओरछोर).कौन पासकता है। प्रत्येक की लीला का वि- स्तारपसार, जीवों केही उद्धार के निमित्त है । जिस भक्त का, जिस अवतार के रूप नाम लीला धाम में मन लगै, और उसमें वह रँगै पगै, उसके हृदय में वही भाव ऐसा जाग उठता है (प्रकाशमान होता है) कि कहां तक उसकी प्रशंसा कीजाय, उसका अन्त नहीं। सबही अवतार नित्य हैं, सवही ध्यान करने से चित्त को प्रकाश- कारक; और सबही ऐसे सुखद हैं कि जैसे दरिद्री को धन का मिलना सुख देता है । हां, इतनी बात तो अवश्य है कि यदि सारांश तत्व का ज्ञान होवे, तब सुख की प्राप्ति होती है । जिस प्रकार से 'टेढ़ापन' रूपी दोष भी वालों (केशों) के सम्बन्ध में सुखद गुणही होता है, वैसेही मीन वाराह आदि तिर्यक् शरीर भी भगवत् की प्रभुता के सम्बन्ध से अति सुखदायी ही हैं। "सवही अवतारों को भावपूर्वक पूर्ण मानना" श्रीअग्रदेव स्वामीजी की ऐसी जो मनभावती रीति सो मेरे हृदय में मनोहर हार के सरिस बसे॥ , प्रेम एक ऐसा अनुपम और अनोखा पदार्थ है कि वह जाति पांति का कदापि विचार न करके तड़ित्वत् जिसपर पड़ता है लोक परलोक के झगड़ों से उसको छुड़ा ही के छोड़ता है। जोकि इस ग्रन्थ में जगदुद्धारक निषाद श्वपचादि महानुभावों के विमल पवित्र चरित, कि जिनको देख सुनकर कर्म काण्ड के बड़े अभिमानी नाक सको- इते और दाँतों तल उङ्गाली दवाते चले आए हैं, वर्णन किए हैं; इसीसे ग्रन्थकर्ता ने भूभार उतारनेवाले और भक्तों के सुख देने- हारे भगवत् के भी शूकरादि विलक्षण स्वरूपों की वन्दनारूपी मंगलाचरण पहले किया है। Ateliebte ५५ , . 5 भक्तिसुधास्वाद तिलक । जी में आया था कि चौबीसों अवतारों की संक्षेप लीलाएं भी यहां लिखदूं; परन्तु विस्तार के भय से छोड़ दिया, न बढ़ाया ॥ (२०) छप्पय ( ८२३) चरण चिह्न रघुधीर के, संतन सदा सहायका ॥ अंकुश, अंबर, कुलिश, कमले, जवे, धुर्जा, धेनुपर्दै। शंख, चक्र, स्वस्तीके, जंबुफले,कलस,सुधाहदै।।अर्द्ध- चन्द्रे ,षटकोने,मीन', बिंदु,ऊरधरेखीं । अष्टकोन, त्रैकोन, इन्द्रधनु', पुरुषविशेखा। सीतापति पद नित बसत, एते मंगल दायका । चरण चिह्न रघुवीर के, संतन सदा सहायका॥६॥ (२०८) तिलक। चौवीसों अवतारों का मङ्गलाचरण करके, स्वामी श्रीनाभाजी महाराज अब, साकेतपति श्रीअवधविहारी निज प्रभु श्रीसीता- पति रघुवीरजी के चरणपङ्कजों में के सुखदायक सहायक पापहारी जन उद्धारकारी बाईस चिह्नों का मङ्गलाचरण करते हैं। श्रीजानकीजीवन रघुवीरजी के पदकंज में "अंकुश” प्रमुख (अड़तालीस) चिह्न सदैव विराजते हैं। परम मङ्गल के देनेवाले तथा संतों की विशेष सहायता करनेवाले हैं। "महारामायण,” " तपस्वीभाष्य, " प्रमुख की मति से श्रीच- रणचिह्न तो वस्तुतः ४८ (अड़तालीस) हैं, २४ (चौवीस) दक्षिण पदपंकज में, और २४ (चौवीस) वामचरणसरोज में। श्रीअगस्त्यमुनीश्वरकृत "श्रीरघुनाथचरणचिह्न स्तोत्र" में ४८ में से केवल १८ (अठारह ) ही रेखाओं का वर्णन है अर्थात् (१) अम्बुज (२) अंकुश (३) यव (४) ध्वज (५) चक्र (६) अर्द्धरेवा (७) स्वस्तिक (८) अष्टकोण (६) पवि (१०) बिन्दु(११)त्रिकोण (१२)धनु (१३)अंशुक वा अम्बर अर्थात् वस्त्र (१४) मत्स्य (१५) शङ्ख(१६)चन्द्राई (१७)गोप्पद मौर(१८)घट॥

श्रीभक्तमाल सटीक। ऐसेही, श्रीकिशोरीजी की एक कृपाभिता ने केवल ६ (नव) ही रेखाओं की वन्दना की है (सोरठा) " वन्दों सियपद (१ रेख, (२) श्रीलक्ष्मी, अरु (३) श्रीसरयू । (४) शनि (५)सुपुरुप विशेष, (६) स्वस्तिक (७) शर (८) धनु (६) चन्द्रिका ॥ एवं, श्रीयामुनाचार्य महाराजजी ने "मालवन्दार स्तोत्र" में इन अड़तालास में से केवल सातही चिह्न चुन के लिखे (१) दर २) चक्र (३) कल्पवृक्ष (४) ध्वजा (५) कमल (६)अंकुश और (७) वन ॥ गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी ने तो अति कल्याणदायक केवल 'चारही चिह्न लिखे, अर्थात् (१) ध्वज (२) कुलिश (३) अंकुश (४)कमल ॥ (कवित्त ) "ध्यावहीं मुनीन्द्र राम पदकंज चिह्न राज, सन्तन सहा- यक सुमङ्गल सन्दोहहीं। ऊर्द्धरेखा स्वस्तिक, रु अष्टकोण, लक्ष्मी, हल, मूसल, प्रो शेष, शर, जन जिय जोहहीं ॥ अम्बर, कमल, रथ, वज्र, जव, कल्पतरु, अंकुश, धजा, मुकुट, मुनि मन मोहहीं। चक्र जू सिंहासनह यमदण्ड, चामर नौ छत्र, नर, जयमाल दहिने पद 'सोहहीं ॥१॥" (अथ चिह्नों के स्थान) भक्रवत्सल श्रीजानकीवर के दक्षिण पद की रेखाएँ। C १३ जय (अँगूठे में) n २३जयमाप्त २३ नर १२"वज २२ छत्र १० कमल अम्पर २१. चामर २० यमदण्ड १६ सिंहासन १८ चक्र १ उई रेखा ८ शर ६ मूसल १६ ध्वजा ४ लक्ष्मी ३ अष्टकोण १४ कल्पतर २स्तक ५७ भक्निसुधास्वाद तिलक। (कवित्त) “बाम पद, सरयू, गोपद, मही, कलश, पताका, 'जम्बूफल, अर्द्धचन्द्र, शंख, राजहीं। षटकोण, तीनकोण, गदा, जीव, बिन्दु, शक्ति, सुधाकुण्ड, त्रिवली,प्रताप सुर गाजहीं। मीन, पूर्णचन्द्र अरु वीणा अपि, बंशी पुनि धनुष, तुणीर, हंस, चन्द्रिका, विराजहीं। एते चिह्न श्रीसियपिय पदपंकज के, “तपसी" मंगलमूल, सब सुख साजहीं ॥२॥ , श्रीचरणयिह चित्र देखिये । (अथ चिह्नों के स्थान) दीनवन्धु श्रीजानकीवर के वामपद की रेखाएं। ३७ बिन्दु (अँगूठे में) ३६ जीच ४८ चन्द्रिका ४७ इंस ३५ गदा ४६ तूणीर ४५ धनुष ४४ घंशी २५ सरय् CHERS ३४ तीन कोण ३३ पट्रकोण ३२ शंख ३१ अर्द्धचन्द्र ३० जम्यूफल २६ पताका २८ कलश २७ भूमि ४३ योणा ४२ पूर्णचाण ४१ मीन ४० त्रिपली ३६ सुधाएट ३८ शक्ति २६ गोपद RBASHIROFESS S ५८ श्रीभकमाल सटीका रेखामों के उस चिट से गिनती उनके ध्यान में लाभ विशेष उनके रंग कार्यायतार लाल और . ७ / शेष - १ परेवा लाल(गुलायो) महायोग भवसिन्धु सनकादिक. चार सेतु २ स्वस्तिक पीत मंगल, कल्याण श्रीनारदजी अष्टसिद्धिदायक ३ अएकोण फपिलदेव सफेद यन्त्र मदासुन्दर ४ महालक्ष्मी सर्व सम्पत्ति थीलक्ष्मीजी गुलावी श्वेत विजय यसरामजी का हल ६ मूसल धूम शत्रु का नाश बलरामजी का मूसल श्रीरामानुजस्थामी, श्वेत शान्तिप्रद शेप शर श्वेत, पीत सद्गुण प्रसिद्ध २ याण सय अम्पर नीला, भयातिहरण घराह भगवान् (ख) मिजलीसा १० कमल गुलायी हरिभक्ति विष्णु का कमल चार घोड़ो घोड़े सफेद विशेष पराक्रम स्वयंभूमनुः पुष्पक कारथ रथ विचित्र पिमान बलदायक; १२ बज्र (पवि)| बिजलीसा इन्द्र का वज्र पापसंहारक १३ यच (जय)| श्वेत, रक्त मोक्षःशृंगार फुकेर, यज्ञायतार कल्पतरु इच्छित फल सुरत, पारिजात १५ अंकुश श्याम मन निग्रह ध्वजा विचित्र विजय, यश सोनहरा भूपण पृथु, दिव्यभूपण १८ तप्तकांचन शत्रु का विनाश सुदर्शन; कल्कि १६ । सिंहासन | तप्तकांचन विजय २० यमदण्ड कांस निर्भयता यमराज, धर्मराज चामर धवल हिय में प्रकाश दयनीय छत्र शुक्ल दया, बुद्धि, ध्यान कल्कि नर गौर भक्ति शान्ति सत्त्वगुण दत्तात्रय जयमाल ताहित, विचित्र उत्सव २३ ५६ भकिसुधास्वाद तिलक। अथ वाम चरणसरोज के चिह्न। गिनती यन्न, योग उस चिह्न से रेखाओं के उनके रंग ध्यान से लाभ विशेष कार्यायतार नाम १ सरयू श्वेत भक्ति चिरजा गंगा इत्यादि २ गोपद श्वेत, लाल भवसिंधु लंघन कामधेनु,पृथु,धन्यन्तरि ३ भूमि पीत, लाल क्षमा कमठावतार कलश सुनहरा,श्वेत भक्ति, जीवनमुक्ति अमृत पताका विवित्र विमलता ६ जम्युफल श्याम चारो पदार्थ गरुड़जी, व्यासजी ७. अर्द्धचन्द्र धवल भक्ति,शान्ति प्रकाश वामन भगवान् शंख श्वेत,गुलाची जय, बुद्धि वेद, हंस, दत्त, शंस ६ पटकोण लाल, सफेद यन्त्र पट्किाराभाव कार्तिकेय १०/तीन कोण लाल हयग्रीव, परशुराम गदा श्याम जय महाफाली, गदा ૨૨ जीव दीप सा जीव १३ विन्दु पीत सर्व पुरुषार्थ 'सूर्य; माया पीलीगुलावी १४ मूलमति, शारदा, शक्ति श्री सुन्दर महामाया १५ / सुधाकुंड ! श्वेत, लाल अमृत रत पभ हरालाल, निपली शोभा वामन धवल १७ मीन रूपासा मङ्गलार्य, शुभशकुन १८ | पूर्णचन्द्र धरल सरलता,शान्ति,प्रकाश पीत, रक्षा धीणा यशगान श्रीनारदजी श्वेत वंशी विचित्र श्रीकृष्णजी की वंशी घनुप यमयशगान्हंतुं शा, पिनाक, श्राद लाल तूर विचित्र सप्त भूमि शान परशुराम इस श्वेन,गुलाबी विवेक,शान इंसावतार सर्वरंगमय २४ चन्द्रिका श्रकथमभाव तड़ितवत् ६ हरारीला श्रीभक्तमाल सटीक। ३ मूसल ४ अम्पर ६ केज अठतालिसों चिह्नों में से २४ चौवीस चिह्न दोनों चरणकमलों में विराजमान हैं। और, जो २४ रेखाएँ श्रीजनककिशोरी महारानी' जी के वाम पदकंज में हैं, सोई २४ चिह्न श्रीप्राणवल्लभजी के दक्षिण चरणसरोज में हैं। तथा जो २४ रेखा स्वामिनी श्रीजनकलली महारानीजी के वाऍ चरणारविंद में हैं, सोई २४ चिह श्रीप्राण- प्रियतम के दाहिने पदपद्म में हैं। यह मनस्थ रखना चाहिए। दुःखहारी रेखाएं सुखकारी रेखाएं १ अष्टकोण १ उम्बरेखा १६ पृथ्वी २ इल २ स्वस्तिक १७ घर ३ महालक्ष्मी ५८ जम्युफल ४ शेष १६ जीय ५ कुलिश २० पिन्तु ६ यय- २१ शक्ति ७ अंकुश ७ स्यन्दन २२ सुधाहद ८ कल्पवृक्ष '२३ त्रियली १चका मुपुट २४ मत्स्य १० यमाए १० सिंहासन २५ पूर्णशशि १९ गोपई ११ चामर २६ चारण १२ पताका १२ छत्र २७ निपंग १३ अर्धचन्द्र १३ पुरुष २८ हंस २१ चन्द्रिका १४ जयमाल .यव .१५ पट्कोण १६ त्रिकोण * अटकोण • अर्सचन्द्र ४८ में १६ दु खहारी है और २६ सुखकारी। १८ वंशी आएकोण, यप, और श्रद्धचन्द्रय तीन दु खदारी १६ धनुष भी है और सुखफारी भी। करुणासिन्धु श्रीनाभाजी महाराज ने १८ में से विशेष सहायक २२ (वाईस) चिह्नों का ही मंगलाचरण किया है, जिनमें से ११ (ग्यारह) प्रत्येक पद के हैं ॥ अर्थात् (१) अंकुश (२) अम्बर (३) कुलिश (४) कमल (५) जव (६) ध्वजा (७) चक्र (८) स्वस्तिक (६) कवरेखा (१०) अष्टकोण (११) पुरुष। ये ग्यारह दाहिने पद के, और ( १) गोपद (२)शंख (३) जम्बु, १५ सरयू १७ गदा . भक्तिसुधास्वाद तिलक। फल (४) कलश (५) सुधाकुण्ड (६) अर्द्धचन्द्र (७) षट्कोण (८) मीन (8) बिन्दु (१०) त्रिकोण (११) इन्द्रधनुष ग्यारह बाएं चरणकंज के। (२१) टीका । कषित (०२२) सन्तनि सहाय काज, धारे राम नृपराज चरणसरोजन में चिह्न सुखदाइये । मनही मतंग मतवारो हाथ आवै नाहि, ताके लिये "अकुश" ले धास्यो, हिये ध्याइये ॥ सठता सतावै शीत, ताही तें "अम्बर" धस्यो हस्खो जन शोक ध्यान कीन्हे सुखपाइये । ऐसेही "कुलिश" पाप पर्वत के फोरिवे को, भक्ति निधि जोरिवे को "कंज", मनल्याइये ॥ १५॥ (६१४) विलक। सन्तों की सहायता के अर्थ नृपराज महाराज श्रीरामचन्द्र कृपा- सिन्धुजी ने अपने पदकमलों में भक्तों के सुखदाई चिह्नवृन्द धारण किये हैं ॥ मनरूपी मतवाला गजेन्द्र अपने वशमें नहीं होता है; इसीलिये प्रभु ने "अंकुश" चिह्न निज चरणपंकज में धारण किया, है कि भक्तजन निज मनरूपी मत्त हस्ती को वश करने के निमित्त, उक्त चिह्न का ध्यान अपने हृदय में करके, इसकी सहायता से वश करलें । इससे "अंकुश” चिह्न का ध्यान करना चाहिये ॥ शठता (जड़ता ) रूपी शीत हरिजनों को दुःख देता है, इसीलिये "अम्बर" (वस्त्र) विह्न को धरा, कि जिसमें इस चिह का ध्यान भक्तजनों के शोक को हरे, तथा प्रतिष्ठादि सुख प्राप्त हों। इसी प्रकार, पापरूपी पर्वत के फोड़ने के हेतु "वन" रेखा,और प्रेममय नवधा भक्तिरूपी नवों निधियोंके जोड़ने के हेतु,सर्व निधीश्वरी श्रीलक्ष्मीजी का वासस्थान कमल तिसका चिह्न धारण किया है। उक सहाय के हेतु दोनों चिह्न मन में लाके ध्यान करना चाहिये। * इन पांच (१५ से १६चे तक) कवितों को कोई कोई "क्षेपक" बताते हैं अस्तु । है चौ०॥ जड़ता जाड़ विषम उर लागा। गयहु न मज्जन पाव प्रभागा" (मानसरामचरित) SONG , ॥

PRETARIA श्रीभक्तमाल सटीक . (२२) टीका । कवित्त (८२१) "जव" हेतु सुनो सदा दाता सिद्धि विद्याही को, सुमति सुगति सुख सम्पति निवास है । छिनमें सभीत होत कलि की कुचाल देखि, "ध्वजा"सो विशेष जानो अभे को विश्वास है ॥ गोपद सो हैहैं भवसागर नागर नर जो नैन हिय के लगावै, मिटै त्रास है। कपट कुचाल मायावल सधैं जीतवे को, “दर" को दरस कर, जीत्यो अनायास है ॥ १६॥(६१३) तिलक। "जब (यव)" चिह्न के धारण का अभिप्राय सुनो कि ध्यान करनेवाले को यह चिह्न सर्वविद्या सर्वसिद्धियां देता है; और सुमति सुगति सुखसम्पत्ति का निवासस्थान है; इससे, ध्याता को भी इन गुणों का घरही कर देता है। कलिकी कुचालों को देख देख के भक्तजन क्षणमात्र में भय- ग्रसित हो जाते हैं, उनको विशेष करके अभयत्व का विश्वास दिलाने के लिये प्रभु ने ध्वजाचिह्न को धारण किया है। और "गोपद" चिह्न धारण करने का हेतु यह है कि जो प्रवीण (नागर )जन इस का ध्यान करेगा तिसको अपार भवसागर गोपद के सरीखा सुलभ हो जायगा, सो जो कोई जन अपने हृदय के नेत्रों को इस "गोपद" के ध्यान में लगावै, तो उसको भवसागर में डूबने आदि का डर रामट 'जावै दंभ कपट कुचाल इत्यादिक माया के जालों को बिना प्रयास जीतने के हेतु "शंख" चिह्न को श्रीप्रभुने धारण किया तिसको दर्शन करके भक्तजनों ने उन मायाजाल को बिना प्रयास ही जीत लिया, क्योंकि शंख विजयकारी शब्द संयुत है । इस सहायतारूप कृपा की जय ॥ (२३) टीका | कवित्त (०२०) कामहु निशाचर के मारिने को " चक्र" धास्यो, मङ्गाल कल्याण हेतु स्वस्तिक हुँ मानिये । मंगलीक " जम्बूफल", फल चारिहूं को फल,. कामना अनेक विधि पूर्ण, नित ध्यानिये ॥ कलश SONG *** भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६३ " सुधाको सर" भस्यो हरि भक्ति रस, नैनपुट पान कीजे, जीजे मन आनिये । भक्ति को बढ़ावै श्री घटावै तीन तापहूं को, "अर्ध- चन्द्र" धारण ये कारण हैं जानिये ॥ १७॥ (६१२) तिलक। कामरूपी निशाचर के वध के लिये “चक" चिह्न को धारण किया, महल और कल्याण के निमित्त " स्वस्तिक" रेखा का धारण मानिये ॥ “ जम्बूफल" को महालों का करनेवाला, तथा चारोंही फलों का फलरूप और सब मनकामनाओं को नाना प्रकार से पूरा करनेवाला, जानके नित्य ध्यान कीजे ॥"अमृत का घड़ा" और "अमृत का इद" ( तालाव) इसलिये धारण किये, कि इन्हें ध्यान करनेवाले के हृदय में भनिरस भरें; और मानसिक नयनपुट से पीकर परम अमरत्व प्राप्त हो । “अर्धचन्द्र" चिह्न के धारण के कारण ये जानिये कि, इसके ध्यान से तीनों ताप घटते हैं, और प्रेमाभक्ति बढ़ती है ॥ (२४) टीका ! कवित्त (८१९) विषया भुजङ्ग बलमीक तनमाहिं बसै, दास को न डसै, ताते यत्न अनुसस्यो है। अष्टकोन" " पटकोन" औ “त्रिकोन जंत्र किये, जिये जोई जानि जाके ध्यान उर भरयो है। “मीन " “विन्दु" रामचन्द्र कीन्यों वशीकर्ण पायँ ताहिते निकाय जन मन जात हस्यो, है । संसारसागर को पारावार पार्वे, नाहि " ऊर्धरेखा" दासन को सेतुबन्ध कस्यो है ॥ १८ ॥ (६११) तिलक। शरीररूपी वल्मीक (वामी वा चमोट) में कामादिक विषय- र.पी सांप जो वास करता है, सो जिसमें भक्तों को न काटखाय, इसलिये प्रभुने ये यत्न किये, कि " अष्टकोण", " पटकोण", और “ त्रिकोण " यंत्रों को धारण किया। जिसने इस बात को जानके इन रेखाओं का ध्यान हृदय में किया, सोई जन विषय भुजंग से बच के अखण्ड जिया। Techuct-SCREEGACEBCARBOREGAON " *** श्रीभकमाल सटीका " , और श्रीरामचन्द्रजी ने अपने पाय (पदपङ्कज) में “मीन और "विन्दु" चिह्नों को वशीकरण यन्त्र बनाके धारण किया, क्योंकि मीन जगत वशीकारक " कामदेव" का ध्वजा है तथा बिन्दु" (वेदी) भी वशीकरण तिलकरूप है । इसीसे, श्रीप्रभु- चरण चिन्तवन करनेहारे समस्त जनों के मन हरे जाते हैं अर्थात् प्रभुके विवश होते हैं । अपार संसाररूपी समुद्र को पार कोई नहीं पा सकता; अतएव ऊर्ध्व रेखारूप सेतु (पुल) वांधा है, कि जिसमें ध्यानारूढ़ होके, मेरे भक्क, सुगमही, संसारसागर उतर जावें ॥ (२५) टीका कवित्त । (८१८) धनु" पद माहिं धस्यो, हरयो शोक ध्यानिन को, मानिन को मारयो मान, रावणादि साखिये । पुरुष विशेष" पदकमल सायो राम हेतु सुनो अभिराम, श्याम अभिलाखिये ॥ सूधो मन सूधी बन सूधो करतति सब ऐसो जन होय मेरो, याही के ज्यों राखिये । जोपे बुधिवन्त रसवन्तरूप सम्पति में, करि हिये ध्यान हरिनाम मुख भाखिये ॥ १६ * ( ६१०) तिलक। श्रीधनुधारीजी ने पदकंज में “ इन्द्रधनुष" का चिह्न धारण करके ध्यानधारी जनों का शोक नाशु किया, क्योंकि महामानी रावणादिकों के मान और प्राण का क्षय, धनुषही से किया; सो वे मरके साक्षी दे रहे हैं कि हम लोग भक्त द्रोही थे तिन्हों को श्रीराम- धनुष ने नाश किया; तैसेही, “ इन्द्रधनुष" चिह्न ध्यानियों के समस्त शत्रुओं का नाश करके विशोक करेगा ॥ " पुरुष " नाम चिह्न को अपने पदकमल में बसाया, तिसका अति सुन्दर कारण सुनके श्यामसुन्दर सियावर श्रीराम की अभिलाषा कीजे; श्रीप्रभु इसचिह्न से यह जनाते हैं कि जो हमारा जनसरल (सूधा)मनवाला, सरल वचनवाला, सरल कर्मवाला और इस चिह्न का ध्यान करने वाला हो, तिमको इसी चिह के समान में अपने पद में अर्थात् पद * १५ च से १६वें तक, इन पांच कवित्तों को किसी किसीने "क्षेपक" बताया है ।

रस 55555 भक्तिसुधास्वाद तिलक । प्रेमरूपी स्थान में,तथा (अन्तमें)परमपद श्रीसाकेतधाम में रखूगा।। जो जन कदाचित् ऐसे बुद्धिमान हों, तथा श्रीरामरूप सम्पत्ति में रस (स्नेह) वन्त हो, सो समस्त श्रीचरणचिह्नों का ध्यान करके श्रीसीताराम नामही मुख से निरन्तर कहें ॥ 1 (२६) छप्पय (८१७) विधि, नारद, शङ्कर, सनकादिक, कपिलदेवं, मनुभूप नरहरिदास,जनक,भीषर्म, बलि ,शुकै सुनि, धर्म स्वरूप ॥ अंत रंग अनुचर हरि जू के, जो इन कौ यश गावै। आदिअन्त लौ मङ्गल तिनको स्रोता वक्ता पावें ॥ अजामेल परसंग यह निर्णय परम धर्म' के जान। इनकी कृपा और पुनि समझै “ द्वादश भक्त" प्रधान ।। ७ (२०७) तिलक। स्वामी श्रीनाभाजी अब १२ (द्वादश) महामनराजों के नामो- च्चारणपूर्वक भक्कों की "माला" का प्रारम्भ करते हैं। (१) श्रीब्रह्माजी (२) श्रीनारदजी (३) श्रीउमापति शिवजी (४) [१] श्रीसनक [२] श्रीसनन्दन [३] श्रीसनातन [४] श्रीसनत्कुमार (५)श्रीकपिलदेवजी (६),महाराज श्रीमनुजी (७) श्रीप्रसादजी [नृसिंहदास] (८) पिता श्रीजनकजी महाराज (६) श्रीभीष्मा- चार्यजी (१०) श्रीवलिजी (११) परमहंस श्रीशुकदेवजी महामुनि, भागवत, (१२) धर्मस्वरूप, (धर्मराजजी, श्रीअजामिलप्रसंग)॥ जो जन श्रीसीतारामचन्द्रजी के इन ऐकान्तिक प्रिय समीपी प्रधान द्वादश भक्तराजों के यश गावे, तिन महाभक्तों के यशों के श्रोता वक्ता आदि अन्त तक (सदैव ) मंगल पावें। परम धर्म के निर्णय में श्रीअजामिलजी का प्रसंग जानने योग्य है; अर्थात् श्रीनामोच्चारणादि भागवत धर्म सप्रेम करने की तो वातही क्या है, ARNॐॐ श्रीभक्तमाल सटीक । , नामाभासमात्र ने भी सब महापातकों का विनाश कर ही दिया। ये द्वादश, (ऊपर लिखे हुए श्रीविरंचि महेश नारदादि बारहो), तो महाप्रसिद्ध भक्तराज है ही, पुनि और समस्त भकमात्र इन्हींकी कृपा उपदेश तथा सत्संग से समझना चाहिये; अर्थात् श्रीलक्ष्मीनारायण की शिक्षित वैष्णवसंप्रदायों के भागवत धर्म (धर्मविशेष) के आ- चार्यवर और प्रचारक शिरोमाणि ये ही वारहो तो हुए ॥ दो० "विधि, शिव, नारद, शुक, जनक; सनकादिक, प्रहलाद । ज्यों हरि आपुन नित्य हैं; त्यों ये भक्त अनाद ॥" (१) श्रीब्रह्माजी। सो . "चन्दौं विधिपद रेणु, भवसागर जिन कीन्ह यह । सन्त सुधा ससि धेनु, प्रगटे खल विष वारुणी" सृष्टि और सुख दुःखादि प्रारब्धरेखाओं के कर्ता जगत्पिता सुगम अगमवर दाता श्रीब्रह्माजी की (श्रीभगवतनाभीकमल से जन्म आदि) कथाएं, पुराणों में अगणित हैं। "हानि लाभ जीवन मरन यश अपयश विधि हाथ ॥" श्रीविधाताजी यद्यपि सब निष्टाओं में श्रेष्ठ तथा प्रधान हैं, तथापि इनकी गणना "धर्मप्रचारक निष्ठा" में प्रत्यक्ष है। जिन देव मुनि गो महि इत्यादिक की प्रार्थना से भगवत् के विविध अवतार होते हैं उन मण्डलों के अगुआ और मुखिया श्रीअज ही तो होते हैं, सो व्यवस्था किसको विदित नहीं है ? ॥ (२)श्रीनारदजी। चौपाई। चन्दौं श्रीनारद मुनिनायक । करतल वीण राम गुणगायक ॥ अप्रतिहतगति देवर्षि श्रीनारद भगवान् तो परमात्मा के मनही हैं, भगवत् के अवतार हैं, और जगत् के परम उपकारक प्रसिद्ध है। सेवा, पूजा,कीर्तन, प्रसाद, भक्ति प्रचारक इत्यादिक सवही निष्ठायों में प्रधान हैं। पुराणमात्र में आपकी शुभ कथा भरी है। सर्वलोकों में आपका पर्यटन केवल परोपकारके निमित्त,यही आपका व्रत साहै। FesteRECRORECARRC . . .

HORS भक्तिसुधास्वाद तिलक। (३) श्रीशिवजी। (२७) टीका ! कवित्त । (८१६) द्वादश प्रसिद्ध भक्तराज कथा "भागवत" अति सुखदाई, नाना विधि करि गाए हैं । शिवजी की बात एक बहुधा न जाने कोऊ, सुनि रस सानै, हियो भाव उरझाए हैं। "सीता"के वियोग "राम विकल विपिन देखि “शंकर" निपुण"सती"वचन सुनाए हैं। "कैसे ये प्रवीन ईश ? कौतुक नवीन देखौं"; मनेहूँ करत, अंग वैसे ही बनाए हैं ॥ २०॥(६०६) बार्तिक तिलक। बारहो प्रधान भक्तराजों की कथाएं "श्रीमद्भागवत" प्रभृति में व्यास शुकादिने नाना प्रकार से कही हैं । परन्तु त्रिभुवन गुरु श्रीमहादेवजी की एक वात प्रायः सबलोग नहीं जानते; सो उस अपूर्व वार्ता को सुनके, अपने हृदय को श्रीसीताराम भक्तिरस में सान देना चाहिये, देखिये श्रीमहेश्वरजी श्रीसीताराम भक्ति के भाव में अपने मनको कैसा उलभाए (अटकाए ) हुए हैं । श्रीशंरजी तो परम प्रवीण ही हैं परन्तु “सती" जी ने मोहवश श्रीमहादेवजी से कहा कि "हे प्रभो ! इन (श्रीराम) को आप प्रवीण परमेश्वर परमात्मा कहते हैं सो कैसे ? क्योंकि इनका यह कौतुक नवीन तो देखही रही हूं कि स्त्री श्रीसीता के वियोग से वन में ये विकल हैं!" तव श्रीशिवजी ने बहुत समझाया पर न समझी, और परीक्षा लेने को चली ही । तब, जगद्गुरु श्रीशिवजी ने वरज दिया कि "सावधान ! कोई अविवेक की क्रिया मत करना।" तथापि, सतीजीने जगज्जननी स्वामिनी श्रीरामप्रिया श्रीजानकीजी महा- रानी का सा अपना रूप बनाया !!! (२८) टीका । कवित्त । (८१५) सीता ही सो रूप वेष, लेश हून फेर फार, रामजी निहारि नेकु मन में न आई है । तब फिरि आइ कै सुनाइ दई शंकर को; अतिदुख पाइ, बहुविधि समुझाई है । इष्टको स्वरूप धस्सो, ताते तनु परिहस्यो, पस्यो बड़ो शोच मति अति भरमाई है। ऐले प्रभु भाव पगे, पोथिन Look श्रीभक्तमाल सटीक। में जगमगे, लगे मोको प्यारे, यह बात रीमि गाई है ॥२१॥(६०८) वार्तिक तिलक।. अपने जानते तो सतीजीने कुछ भी श्रीजनकललीजी के रूप और वेष से अन्तर न रक्खा; पर, सर्वज्ञ श्रीप्रभु उसको देख के मन में कुछ भी न लाए। तब फिर आके सतीजीने श्रीशिवजीको सव सुना दिया; श्रीशिवजीने मन में बड़ाही दुख पाया और अनेक प्रकार से सतीजी को समझाया कि तुमने मेरी परम इष्ट देवता स्वामिनी श्रीजानकी सीताजी महारानीका रूप धारण किया, अतः मैंने तुम्हारे इस शरीर में से पत्नीभाव को त्याग किया। श्रीसतीजी मति के भ्रमवश यों बड़े ही शोच में पड़ी।सो कथा प्रसिद्ध ही है कि सतीजीने वह तन त्याग ही तो विया और श्रीशिवजी से तब मिल सकीं कि जब श्रीगिरिवर- राजकिशोरी हुई। अहो ! धन्य श्रीगिरिजापति हैं कि अपने प्रभु के भाव में ऐसे पगे हुए हैं कि पुराणों में आप की भावभक्ति की कथाएं जगमगा रही हैं। यह बात अतिशय प्रिय मुझे लगी; इससे रीझ २ के गान किया है। (8) दीका कवित्त । (८१४) चले जात मग उभै खरे शिव दीठि परे, करे परनाम, हिय भक्ति लागी प्यारी है। पार्वती पूचे “किये कौन को ? जू ! कहो मोसों, दीखत न जन कोऊ” तव सो उचारी है ॥"वरप हजार दश वीते 'तहां भक्क भयो; नयो और हैहै दूजी ठौर चीते धारी है।" सुनिकै प्रभाव, हरिदालनि सों भाव बढ्यो, रयो कैसे जात चढ्यो रंग अति भारी है ।। २२ (६०७) वाकि तिलक। एक समय श्रीचन्द्रभूपण अपनी प्राणप्रिया श्रीपार्वतीजी के सहित फैलासशिखर को छोड़कर भूमण्डल में विचरने के हेतु निकले, भार्ग में दो उजड़े २ छोटे ग्रामों के टीले (खरे) देखके नन्दी से उतर के दोनों को प्रणाम किया। क्योंकि भक्कों की भक्ति श्राप को अति ही प्यारी लगती है। तब श्रीपार्वतीजी ने पूछा कि "प्रभो। आपने प्रणाम किसको किया ? प्रत्यक्ष में तो कोई जन दिखाई देता भक्तिसुधास्वाद तिलक। ही नहीं।" श्रीमहादेवजी ने उत्तर दिया कि "हे प्रिये! यह जो एक 'टीला दीखता है तहां दस हजारवर्ष बीते कि एक श्रीसीता-रामानुरागी परमभक्त निवास करते थे; और वह जो दूसरा खेरा दिखाई दे रहा है उसमें दस सहस्र वर्ष व्यतीत होने पर एक दूसरे भक्तराज निवास करनेवाले हैं। इसीसे ये दोनों स्थल मेरे वन्दनीय हैं" ऐसा आश्चर्य- जनक प्रेम देख और भागवत प्रभाव सुनके, श्रीपार्वतीजीने इस बात को अपने मन में धारण किया, उनका प्रेमभाव भगवद्भत्रों में अत्यन्त ही वढ़ा, कि जो क्योंकर कहा जा सकता है (रयो कैसे जात),क्योंकि उनके अन्तःकरणरूपी स्वच्छ वस्त्र पर अनुराग का रंग गहरा चढ़ आया। श्लो। भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ । याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम् ॥ श्रीशिवजी इसीसे भागवतों में शिरोमाण गिने जाते हैं और इनके अनेक चरित्र ऐसे पर उपकार भरे हैं कि जैसे “विषभक्षक, त्रिपुरारि," इत्यादिक नामों से ही सूचित होते हैं । आपकी कथा- समूह पुराणों में प्रसिद्ध हैं; आप जगद्गुरु परमोपदेशक हैं, श्रीराम नाम माहात्म्य के प्रकाशक हैं, और श्रीकाशीजी में मरनेवाले जीव- मात्र को श्रीरामतारक मन्त्र सुनाके मुक्ति देते हैं ।। (४) श्रीसनकादि। सनकादिक चारो भाई (१) श्रीसनक (२)श्रीसनन्दन (३) श्रीसनातन (४) श्रीसनत्कुमार, श्रीभगवत् के अवतार और श्रीब्रह्माजी के पुत्र हैं। चौपाई। जानि समय सनकादिक श्राए । तेज पुंज गुण शील सुहाए । ब्रह्मानन्द सदा लय लीना । देखत बालक बहु कालीना ॥ रूप धरे जनु चारित वेदा । समदरसी मुनि विगत विभेदा॥ आसा बसन व्यसन यह तिनहीं । रघुपति चरित होय तहँ सुनहीं। मुनि रघुपति छवि अतुल विलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥ SSA WATER श्रीभकमाल सटीक। दो० बार वार अस्तुति करि, प्रेम सहित सिरु नाइ। ब्रह्म भवन सनकादि गे, अति अभीष्ट वर पाइ॥ (५) श्रीकपिलदेव। श्रीकपिलदेवजी श्रीभगवत् के अवतार पुरुष प्रकृति विवेकमय तत्त्वज्ञान खानि साङ्ख्य शास्त्र के विषेश आचार्य हैं। चौपाई। श्रादि देव प्रभु दीनदयाला । जठर धरेउ जेहि "कपिल" कृपाला॥ "सांख्य शास्त्र" जिन्ह प्रगट बख'ना। तत्व विचार निपुन भगवाना॥ (६) श्रीमनुजी श्रीदशरथजी। यह वात तो सभी जानते हैं कि "मनु" ही से मनुज, मनुष्य (नर) वा मानव सृष्टि हुई है । "श्रीस्वायंभू मनुजी" की कथित "मनुस्मृति" सर्व धर्मशास्त्रों में अग्रगण्य है ॥आपकी कठिन तपस्या, अलौकिक भजन, विलक्षण प्रीति, तथा अनन्य भनि तो श्रीतुलसीकृत रामायण "मानसरामचरित" बालकाण्ड में प्रसिद्ध ही है कि जिन्होंने सर्वावतारी परब्रह्म को पुत्र करके प्रत्यक्ष सबको सुलभ कर दिया ॥. चौपाई। स्वायंभू मनु अरु शतरूपा । जिनते भइ नरसृष्टि अनूपा ॥ दो० जासु सनेह सँकोच वश, राम प्रगट भए आइ । जे हरहिय नयनन कबहुँ, निरखे नहीं अधाइ ॥ छप्पय । " भक्ति भूमि भूपाल श्रीदशरथ दश दिारी विदित यस । मनुवपु में बहु भनि सुतपकरि ब्रह्म विलोके । परमातम प्रिय पुत्र पाये सिय भू विशोके ।। फणि मणि इबु जल मीन सरिस प्रभु प्रीति सुपागे । सत्य प्रेम के सींव राम विदुरत तन त्यागे । कौशल्यापति पूज जग धर्मध्वज वात्सल्य रस । भक्ति भूमि भूपाल श्रीदशरथ दशदिशि विदित यस ॥" (७) श्रीप्रह्लादजी। श्रीनरहरिदास अर्थात् “प्रह्लादनी"द्वादश भक्तराजमें हैं; ये महा. भागवत "दास्यनिष्ठा" में अग्रगण्य हैं । श्रीनरसिंहावतार आपही SCREES - ।

भनिसुधास्वाद तिलक। के हेतु होना प्रसिद्ध है ही। श्रीनरसिंहजी तथा श्रीप्रह्लादजी का यश अनेक पुराणों में गाया हुआ है । भगवत् की इच्छा से एक समय श्रीसनकादिक ने “श्रीजय, श्रीविजय " को तीन जन्म निशाचर होने का शाप दिया; पुनः भगवत् तथा श्रीसनकादिक ने शापानुग्रह किया कि भगवत् अवतार लेले के तीन जन्म में उद्धार करेंगे। सो पहिले जन्म में "हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु " हुए; दूसरे जन्म में वही रावण और कुम्भकर्ण"; एवं तीसरे जन्म में “शिशुपाल और दन्तवक्र"॥ जव हिरण्याक्ष को भगवत् ने वाराह अवतार लेके मारा, तब हिरण्यकशिपु ने तप करके श्रीब्रह्माजी से वर मांगा कि किसी देश- काल में किसी अस्त्र-शस्त्र से किसी जीव से मैं मारा न जाऊं। श्री ब्रह्माजी ने ऐसाही वर दिया। उसकी स्त्री के गर्भ में श्रीप्रह्लादजी थे इसलिये श्रीनारदजी ने राजा इन्द्र से उसे बचाकर ज्ञानोपदेश किया। हिरण्यकशिपु अलोकिक वर पाके राजगद्दी पर बैठ देवतो. को कष्ट देने लगा। परन्तु श्रीप्रह्लादजी जिसके वेटे हुए उसके भाग्य की क्या' वात है। जव गुरुजी पढ़ाने लगे आपने "श्रीसीताराम सीताराम" की मधुरध्वनि करना प्रारम्भ किया । वरंच पाठशाला भर के लड़कों को इसी में लगा दिया । और इसके विरुद्ध यद्यपि उनके पिता माता गुरु ने लाख समझाया पर आपने भगवत् विमुख वाप की एक न मानी। दुष्टपिता की आज्ञा से ये पहाड़पर से गिराए गए, जल में डुवाये गए, आग में जलाये गए, हाथी तथा हत्यारों से प्राण लेने का उ- योग किया गया, विष दिया गया, यह सब किया, परन्तु जिस श्री प्रह्लादजी के मुखारविन्द पर अष्टप्रहर "श्रीसीताराम" नाम बसता था उनका एक वाल भी बांका न हुआ । तव हिरण्यकशिपु खड्ग निकाल क्रोध से लाल हो आपसे पूछने लगा “वता तेरा रक्षक कहाँ है ?" आपने उत्तर दिया कि "वह समर्थ सर्वव्यापी है" उसने पूछा कि "क्या वह इस खम्भे में भी है जिसमें तू बँधा है ?"श्रीभक्त- राज महाराज बोले कि हां निस्सन्देह ऐसाही है " उस मूर्ख तामसी INGREGA RRENSRCESS PRESCRISHARE श्रीभकमाल सटीक। ने ज्योंही उस खम्भे में मुष्टिका मारी, उस खम्भे में से महाभयकर प्रचण्ड शब्द के साथ साथ अति तेजमय महाभयानकरूप ऐसी एक तेजोमयी मूर्ति उसको देखपड़ी कि जिसको वह न तो मनुष्य ही कह सकता था और न सिंह ही समझ सकता था। यह अद्भुत अवतार सायङ्काल समय वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को भक्तवत्सल भगवत् ने श्री प्रह्लादजी के निमित्त लिया, “मुलतान" में कि जो उक्त कनककशिपु की राजधानी थी। बहुत काल तक लड़ाई होती रही । अन्त को सन्ध्याकाल में घरके द्वार की देहली पर अपनी जांघ पर रख के अपने नखों से उसका शरीर विदार डाला। ब्रह्मा शिव इन्द्र तथा सब देवतों की और विशेष करके श्रीप्रह्लादजी की स्तुति से प्रसन्न हो भक्ति वर दिया। और राजतिलक देके अन्तर्धान हो गए॥ सौया। "आरतपाल कृपाल जो राम जहां सुमिरे तेहिको तहँ ठाढ़े। नाम प्रताप महामहिमा अकरे किय छोटेउ खोटेउ बाढ़े ॥ सेवक एक ते एक अनेक भए तुलसी तिहुँ ताप न डाढ़े। प्रेम वदी प्रहलादहिं को जिन पाहन ते परमेश्वर काढ़े ॥" श्रीप्रह्लादजी के राज में भगवद्भकि कैसी फैली इसका कहना ही क्या है ॥ श्रीभगवत की भरवत्सलता की जाय ॥ ८) राजर्षि श्रीजनकजी महाराज। पिता श्रीजनकजी महाराज योगिराज की महिमा वर्णन कर सके ऐसा त्रिभुवन में कौन है ? भगवद्गीता में भगवत् ने प्रसंगतः आपही का नाम कहा है ("जनकादयः" अ. ३ श्लो. २०)जिनके ज्ञान वैराग्यरूपी प्रचण्ड प्रभाकर को देख श्रीशुकादि ऋषीश्वरों के भी हृदयकमल विकशित होते थे। चौपाई। प्रणवों परिजन सहित विदेहू । जिनहिं रामपद गूढ़ सनेहू ॥ योगभोग मह राखेउ गोई । राम विलोकत प्रगटेउ सोई॥ जासु ज्ञान रवि भवनिशि नाशा। बचन किरण मुनि कमल विकाशा॥ पृष्ठ ६५ मे, यारया "धम स्वरूप " जानिये ("अजामिल" नहीं) SALA और प्रभु 1-1-14 भनिसुधास्वाद तिलक। ७३ आपकी "सौहार्द निष्ठा" की बात ही क्या है कि जगज्जननी महारानी श्रीजानकीजीने ही जिनको स्वयं अपना पिता मान लिया, ने भी “पितु कौशिक वशिष्ठ सम जाने" ॥ ६) श्रीभीष्मजी। श्रीभीष्माचार्यजी को बहुतेरे महाशयों ने “धर्म कर्म' निष्ठा में लिखा है। श्रीभीष्माचार्यजी आठ वसुओंमें से एक "वसु" के अवतार हैं। इनकी माता साक्षात् "श्रीगंगाजी" और पिता महाराज "शन्तनु" जी हैं। इनकी प्रशंसनीय कीर्ति "महाभारत" इत्यादि में देखनेही सुनने योग्य है। ज्ञान वैराग्य भक्ति और धर्मशास्त्र के बड़े ही विज्ञ आचार्य हुए हैं, बड़े ही परउपकारी थे यहां तक कि महाभा- रत की कठिन लड़ाई में श्रीयुधिष्ठिर महाराज के लिये, अपने मरने का उपाय आपही बता दिया, आपने बाणशय्या पर शयन किया, और पर्व का पर्व नीतिव्याख्या की ॥ महाभारत में भगवान् अपनी प्रतिज्ञा छोड़ के महाभागवत् भीष्मजी के प्रणको पूरा करने के निमित्त अपने भक अर्जुनजी के हितार्थ रथ का चक्र लेकर भीष्मजी पर दौड़े, यहां तक भक्तवत्सलता भगवत् की देखिये ॥ बावन दिनपर्यन्त शरशय्या पर रहके सन्त और भगवन्त के समागम में प्राण परित्याग किया। श्रीकृष्ण भगवान के सामने ही परमधाम को गए। १०) श्रीवलिजी। राजा बलिजी श्रीप्रह्लादजी के पौत्र (विरोचन के पुत्र) "धर्म- कर्म" निष्ठा में वर्सित हैं । इनने १०० (एकसौ) यज्ञ का संकल्प करके यज्ञ करना प्रारम्भ किया । सुरेशमाता श्रीअदितिजी ने भग. वत से विनय किया कि बलि मेरे बेटे (इन्द्र) का राज लेके इन्द्रपद की अचलता के निमित्त यज्ञ कर रहा है । भगवत् ने "श्रीवामन- रूप" धारण कर राजा बलि से तीन डेग पृथ्वी भीख मांगी। यद्यपि देत्यकुलगुरु शुक्रजी ने वलि को रोका, पर इनने उनकी एक न SEARS श्रीभक्तमाल सटीक। ७४ सुनी और दान देही दिया । पृथ्वी नापने के समय वामन से विराट्, होकर हरि ने दोनों लोक (स्वर्ग, पाताल ) नाप लिये; और शेष तीसरे डेग की जगह बलिजी ने अति हर्षित मन से अपना शरीर निवेदन कर दिया। प्रभु ने प्रसन्न हो अगले जन्म में सुरपुर का राज्य और तत्काल इस जन्म में पाताल का राज्य बलिजी को अनु. ग्रह किया। केवल इतना नहीं वरन् भक्त से छल करने के कारण स्वयं आपने (उनके द्वारपाल होकर)उस (वामन)रूप से नित्यशः उनको दर्शन देना स्वीकार करलिया ॥ (११) श्रीशुकजी। श्लो० निगमकल्पतरोगलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् । पिवत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥ परमहंस श्रीशुकदेवजी की प्रादि अवस्था की कथा कुछ चौथे पृष्ट में लिख भी आए हैं। आप महर्षि श्रीव्यास भगवान् के पुत्र हैं। आपही ने श्रीमद्भागवत सुनाके श्रीपरीक्षित महाराज को एकही स. साहमान में परमधाम को पहुंचा दिया । किसी समय श्रीपार्वतीजी ने श्रीशिवजी से श्रीरामनाममाहा- म्य के तत्त्वज्ञान का गुप्त रहस्य सुनना चाहा; तब श्रीशङ्करजी ने अ- पनी प्राए प्रिया की यह अनोखी अभिलाषा देखकर (जैसे प्रभु की कृपा ने उनके अन्तःकरण से अन्य साधनों की महिमा का अभाव कर दिया था) प्रमथ उस शुभस्थान को अपर जीवों से शून्य करके उलके अनन्तर अपना उपदेश प्रारम्भ किया। श्रीगिरिजाजी तो नींदवश हो गई, परन्तु हरिइच्छा से शुक पक्षी का एक, वच्चा वहां रहगया था, सो श्रीरामनाममाहात्म्य श्रवण के प्रभाव से वही वच्चा परमतत्त्ववेत्ता तथा अमर होकर " हूं हूं" कार भरता रहा; महेश्वर ने यह जानकर शीव उसको मारने की इच्छा की। भागकर उसने श्रीव्यासजी की धर्मपत्नी के पेट में जा शरण लिया । AMISHAGREE SECRECENS FORECAUSERECORRECRACT , SHRSTAR भक्तिसुधास्वाद तिलक। ७५ (१२) श्रीधर्मराजजी। और (१३)श्रीअजामेलजी। (३०) "प्रजापिल" जी की टीका कवित्त (८१३) धरयो पितु मात नाम "अजामेल", सांचो भयो, भयो अजा- मेल, तिया छूटी शुभ जात की । कियो मद पान, सो सयान गहि दूरि डारयो, गास्यो तनु वाही सों, जो कीन्हो लैकै पातकी ॥ करि परिहास काहू दुष्ट ने पठाए साधु, आए घर, देखि वुद्धि आइ गई सातकी । सेवा करि सावधान, सन्तन रिझाइ लियो, “नारायण" नाम धस्यो गर्भ चाल पातकी ॥ २३॥ (६०६) यार्षिक तिलक। ये ब्राह्मण के पुत्र थे; इनका नाम माता पिता ने अजामेल रक्खा था। सो वह अजामेल सच्चा ही हो गया, अर्थात् अजा (माया, अविद्या) की अन्त सीमा शूद्री वेश्यामय वह होगया; और ब्राह्मण ज्ञाति शुभ धर्मपत्नी को छोड़ दिया। इस कार्य का कारण अब टीकाकार बताते हैं कि “कियो मद पान" अर्थात् मदपान करतेही सात्विकी बुद्धिने अन्तःकरण को परित्याग किया उसके पयान करते ही तामसी दशा प्रकट हुई, तमोगुण के करतब होने लगे, पिताके रक्खे हुए नामने अपनी सचाई दिखाई ॥ सत्यसंकल्प प्रभुके अनुरागियों के साथ लौकिक परिहास का भी कैसा अनोखा फल होता है सो देखिये। किसी खलने हँसी से सन्तों को भेज दिया (कि अजामिल बड़ा साधु सेत्री हरिभक्त है उसके घर जावो) सन्त चले चले अजामिल के घर आए; उनके दर्शन से उसकी बुद्धि श्रीसीतारामकृपासे सात्विकी हो आई अर्थात् सन्तन में श्रद्धा आगई । और सावधानता से सेवा करके साधुओं को रिझाय लिया। जब सन्त चलने लगे तब उस गर्भवती अपनी दासी को सन्तन के चरण पर गिराय के बोला कि इस गर्भवती को असीस दिया जाय । सन्त ने प्रसन्न होके कहा कि श्रीरामकृपासे "इसके पुत्रही होगा, सो उसका तू 'नारायण' नाम रखना" । साधु तो ऐसा कहके चले गए; कालान्तर में उसके पुत्र जन्मा और कुछ काल का हुआ । RELIERE GRA RAGHSCIST SECRUSTAN श्रीभकमाल सटीक। . (३१) टीका कवित्त । (८१२) आइ गयो काल, मोहजाल में लपटि रह्यो, महाविकराल यमदत सों दिखाइये। वोही सुत "नारायण” नाम जो कृपाकै दियो, लियो सो पुकारि सुर आरत सुनाइये॥ सुनत ही पारपद पाए वोही ठौर दौर, तोरि डारे पास क्ह्यो धर्म समुझाइये । हरि लै बिडारे जाइ पति पै -पुकारे कहि "सुनो वज़मारे! मत जावो हरि गाइये ॥२४॥(६०५) स्त्री पुत्र के स्नेहरूप महामोहजाल में लपेटा पड़ा था, इतने में उसका मरणकाल आगया। महाभयानक यमदूत मुगदर (मुद्गर) फांसी लिये हुए देख पड़े । तब अतिशय मोह तथा महाभय से उस सुत का कि जिसको सन्तों ने कृपा करके दिया था और नाम भी रख दिया था बड़े आर्त और उच्चस्वर से “नारायण !!!" ऐसा पुकारा। भक्तरक्षार्थ जो भगवत्पापदं जगत् में विचरते रहते हैं वे नारा- यण शब्द आर्तनाद से सुनतेही उसी ठिकाने दौड़ के आही तो पहुँचे। और उस बेचारे की फांसी को तोड़ के उसको छुड़ा ही लिया । यमदूतों ने पापी की सहायता का कारण पूछा तव पार्षदों ने विवशहु भगवन्नामोच्चारण का माहात्म्य कहिके उनको हराया ही नहीं बरंच भगा भी दिया उनने जाके अपने पति यमराज से पुकार किया। यमराजने सब व्यवस्था सुनके उन दूतों को डाट वतायी कि "अरे ! तुम सबों पर वन पड़े, मेरी बात समझ के चित्त में दृढ़ गहि रकखो कि कोई कहीं कैसाहू पापी क्यों न हो परंतु वह यदि किसीप्रकार से भगवन्नामोच्चारण करे तहां तुम भूलके भी कदापि मत जाव वहां तो तुम्हारा वा मेरा भी कोई प्रयोजन ही नहीं । उनको तो भगवद्भकाही जानना" प्रियपाठक ! नाम का माहात्म्य तन कचित्तलगादेखिये।। चौपाई। विवशहु जासु नाम नर कहहीं । जन्म अनेक सँचित अघ दहहीं ॥ सादर सुमिरन जे नर करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं। (३२) बप्पा (११) मोचित इति नित तहँ रहौ जहँ नारायण (पद)* * (पद) शब्द पीछे से मिलाया हुशा है । मूल "नारायण पारषद" ही मात्र है ॥ KA - , KA भक्तिसुधास्वाद तिलक। पारषद ॥ विषवकसेन,जय, विजय, प्रबल बल, मङ्गल- कारी। नन्द, सुनन्द, सुभद्र, भद्र, जग आमयहारी॥ चण्ड, प्रचण्ड, विनीत, कुमुद, कुमुदाक्ष, करुणालय। शील, सुशील, सुषेन, भावभक्तन प्रतिपालयालक्ष्मी- पति प्रीणन प्रवीन भजनानन्द भक्तन सुहृद । मोचित वृति नित 'तहँ रहौ जहँ' "नारायण ( पद ) पारषद" ॥८॥ (२०६) बार्तिक तिलक। मेरे चित्त की वृत्ति सर्वदा तहां रहै कि जहां श्रीनारायणजी के (पदपंकजसेवी) पारषद हों, कि जो मंगल के करनेवाले; संसाररूपी महारोग के हरनेवाले; करुणा के स्थान; विनीत; और भावयुक्त भक्कों के प्रति-पालक हैं; जोश्रीलक्ष्मीपतिजी की सेवा करके उनको प्रसन्न करने में परम प्रवीण हैं; तथा जो भजनानन्द भक्तोंकी हद्द हैं; अर्थात सव में श्रेष्ठ सीमारूप हैं। (१)श्रीविष्वकसेनजी, (६) श्रीभद्रजी, (२) श्रीसुपेनजी, (१०) श्रीसुभद्रजी, (३)श्रीजयजी, (११)श्रीचण्डजी, (४)श्रीविजयजी, (१२) श्रीप्रचण्डजी, (५)श्रीवलजी, (१३) श्रीकुमुदजी, (६) श्रीप्रवलजी, (१४) श्रीकुमुदाक्षजी, (७) श्रीनन्दजी, (१५) श्रीशीलजी, (८) श्रीसुनन्दजी, (१६) श्रीसुशीलजी ॥ (३३) टीका | कवित्त । (१०) पारषद मुख्य कहे सोरह सुभाष सिद्धि सेवाही की ऋद्धि हिये राखी जोरि के । श्रीपति नारायण के प्रीणन प्रवीण महा, ध्यान श्री यमराज (श्रीधर्मराज ) महा भागवत की, श्रीरामनाममाहात्म्य वर्णन द्व र श्रीभगवद्भक्ति, अजामिल के प्रसंग में वर्णन हो हो चुकी है।

* श्रीभक्रमाल सटीक। कर जन पालें भाव हग कोरि के ॥ सनकादि दियो शाप, प्रेरि कैदि- वायो आप, प्रगट है कह्यो पियो सुधा जिमि घोरि कै । गही प्रतिकूलताई जो पै यही मन भाई, याते रीति हद गाई धरी रङ्ग चोरि के ॥ २५॥(६०४) पातिक तिलक । श्रीनाभाजी ने जो सोलह मुख्य पारपद कहे सो उनको स्वाभाविक सिद्ध अर्थात् नित्यमुक्त जानिये, सो प्रभु की सेवा रूपा सम्पत्ति को एकट्टी करके अपने अपने हृदय में रख ली है; श्रीलक्ष्मीपतिनारायण जी की प्रसन्नकारिणी सेवा में महा प्रवीण हैं; और सर्वदा उन्हीं के ध्यान में मग्न रहते हैं। समस्त भगवद्भक्त जनों का पालन यों करते हैं कि जैसे पलक नेत्रगोलकों की रक्षा करते हैं। और तत्सुखी आज्ञाकारी यहां तक हैं कि उनमें श्रीजयजी शौर श्रीविजयजी को जब श्रीप्रभुकी प्रेरणा से सनकादिकों ने तीन जन्म तक असुर होने का शाप दे दिया (पृष्ठ ६६) और उसी समय शीलसिन्धु श्रीनारायणजी प्रगट हो के बोले कि "इस शाप को मेरी ही इच्छा समझ के सुधापान सरिस ग्रहण करो," तब इतना सुन कहा कि "जो यह आप की इच्छा है तो हम को सहल सुधा समान है ॥” इससे सेवकधर्म की रीति "हद" (सीमा) है, क्योंकि नित्य सेवा का सुख छोड़ के आपकी आज्ञा से, प्रसन्नतापूर्वक, प्रतिकूलता को,अर्थात् असुरभाव को अङ्गीकार किया। ऐसे रँगीले सेवक हैं। (३४) दप्पै । (८०६) हरि वल्लभ सब प्रार्थों, जिन चरणरेणु आसाधरी॥ कमलो, गरुड़, सुनन्द आदि षोड़श प्रभु पद रति । हनुमन्ते,जामवन्त सुग्रीव, विभीषण,शर्वरी,खगपति॥ ध्रुव, उद्धव, अम्बरीष, विदुर, अक्रूर, सुदामौ । चन्द्र हासे, चित्रकेतु,ग्राह, गज, पाण्डव, नामा ॥कोषार, कुन्ती, वधू, पट ऐचत लज्जा हरी । हरि बल्लभ सब प्रार्थों, जिन चरणरेणु आसा धरी॥६॥(२०५) RESTURE RUGk ७६ भनिसुधास्वाद तिलक। दार्तिक तिलक। श्रीहरि के समस्त परमप्रिय श्रीप्रभुपदप्रीतिपरायण भक्तों की प्रार्थना करता हूं कि जिन्ह के चरणरजकण का आसरा संसार सा- गर के तरने के हेतु अपने हृदय में रक्खे हुआ हूं- (१)श्रीलक्ष्मीजी (२) श्रीगरुड़जी (३) श्रीसुनन्द आदि (पृष्ट ७७) सोलहो पारपद (४) श्रीरामदासाधिपति कपीन्द्र श्रीह- नुमन्तजी (५) श्रीजांमवन्तजी (६) श्रीरामसखा श्रीसुग्रीवजी (७) श्रीविभीषणजी (८) श्रीशवरीजी (६) खगपति श्रीजटायूजी (१०) श्रीध्रुवजी (११) श्रीउद्धवजी (१२) श्रीअम्बरीपजी (१३) श्रीविदुरजी (१४) श्रीअक्रूरजी (१५) श्रीसुदामाजी (१६) श्रीचन्द्रहासजी ( १७) श्रीचित्रकेतुजी (१८) गजराज (१६)ग्राह (२०) पाण्डव [१श्रीयुधिष्ठिरजी २ श्रीअर्जुनजी ३ भीमसेनजी ४ नकुलजी ५ सहदेवजी] (२१) श्रीमैत्रेय मुनिजी (२२) श्रीकुन्तीजी (२३) श्रीकुन्तीवधूजी जिनकी लज्जा दुःशासन के पट छीनते समय श्रीप्रभु ने रक्खी है सो अर्थात् श्रीद्रौपदीजी॥ (३५) टीका कवित्त । (८०८) हरि के जे वल्लभ हैं दुर्लभ भुवन मांझ तिनही की पदरेणु आसा जिय करी है । योगी, यती, तपी, तासों मेरो कछु काज नाहि प्रीति परतीति रीति मेरी मति हरी है ॥ कमला, गरुड़, जाम्बवान्, सुग्रीव, आदि, सवै स्वादरूप कथा पोथिन में धरी है। प्रभु सों सचाई जग कीरति चलाई अति मेरे मन भाई सुखदाई रस भरी है ॥ २६ ॥ (६०३) वार्तिक तिलक। श्रीहरि के वल्लभ जगत् में परम दुर्लभ हैं, सो मैंने उन्हीं के पदरजरेणु की आशा की है। और कोरे योगी यती तपस्वी लोगों से मुझे कुछ कार्य नहीं है; मेरी मति को तोश्रीभगवत् के प्यारों की "प्रीति" "प्रतीति" और "रीति" ने ही हर ली है। पूर्व कथित भक्तों में,श्रीलक्ष्मीजी, श्रीगरुड़जी, श्रीजामवन्तजी, श्रीसुग्रीवजी आदिकों की भक्तिरसास्वादरूपा कथाएं तो पुराणों में प्रसिद्ध ही हैं, जिन्होंने HSGGRICUSGESSO , . ANSI श्रीभक्तमाल सटीका प्रभु से सच्ची प्रीति करके जगत् में अपनी कीर्तियां फैलाई है, और मुझे अत्यन्त ही भली लगी हैं क्योंकि रसीली तथा सुखदाई हैं । चौपाई। वन्दनीय पद पंकज तिन्हके। सियपियप्रिय, प्रिय सियपिय जिन्हके। (१४) श्रीलक्ष्मीजी। जग जननी श्रीलक्ष्मीजी महारानी तथा श्रीमन्नारायणजी, गिरा अर्थ जलवीचि सम वास्तव में एकही हैं । भक्कों के हेतु युगल मूर्ति से प्रकट हैं । वस्तुतः जो यह हैं सो वह और जो वह हैं सो यह ॥ भगवत् आपही, श्रीलक्ष्मीरूप से, जगत को उत्पन्न करके, संरक्षण पालन करि भुक्ति, मुक्ति, भक्नि, प्रभु मंत्र नेम प्रेम दे के जीवों को श्रीप्रभु समीप निवासी करते हैं । इसीसे श्रीलक्ष्मीजी भक्तिमार्ग "श्रीसंप्रदाय" की परमाचार्य आदि भक्तरूपा श्रीहरिवल्लभा हैं। जितने वेद पुराण भागवत इतिहास और सद्ग्रन्थ हैं, सव के सब युगल सरकार की ही लीला यशचरित्र को तो वर्णन करते "नेति नेति" पुकारते हैं। श्रीकृपा की जय जय जय ॥ श्लो० या देवी सर्वभूतेषु भक्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः॥ (१५) श्रीपार्षद। भगवत के प्रमुख पार्षद जो सोलह [१६] हैं श्रीसुनन्द प्रमुख, तिनका वर्णन पृष्ठ ७७ में कुछ हो ही चुका है; और इनकी कृपा अजा- मिल के प्रसङ्ग में भी विदित ही है। भक्तों के रक्षक है, इनकी कृपा कौन वर्णन कर सकताहै । यहां श्रीनाभाजी स्वामी ने इनकी प्रार्थना हरिवल्लभों" में भी पुनः की है ॥ रामउपासक शम्भुसम, काक भुशुंडी भक्त भल । पंचवर्ष वय वाल नित्य रघुनन्दन ध्यावत । मानसि सेवा मंत्र जपत रामारण गावत ॥ आय जन्म मुनि अवध विपुलब्रह्मानंद है। कलवत्सल रतरसिक ललित लीला सुखलूटे। भजनकरतनितपेमते जिवनमुक्त प्रभुमेमवल । रामउपासक शम्भुसम काकभुशुंडीभक्त भना। सोलहो पारपद् तथा पांचो पाएडय समेत ४२ ( बयालीस ) हरि यल्लमों के नाम इस {पांचवें) छप्पय में है ।। HAKAARites REACHAR .

- RSS भक्तिसुधास्वाद तिलक। (१६)श्रीगरुड़जी। श्रीहरिवल्लभ (श्रीगरुड़) जी भी भगवत् पार्षद हैं, प्रभुके बाहन हैं "श्रीहनुमान् गरुड़ देव की जय" यह तो सबको प्रसिद्धहै ही। चौपाई। गरुड़ महाज्ञानी गुण राती । हरि सेवक अति निकट निवासी॥ आप अनेक भावरूप,अर्थात् दास,सखा,बाहन,आसन,ध्वजा,बि- तान,व्यजन होके श्रीप्रभुकी सेवा करतेहैं और सदा संमुखखड़ेरहते हैं। "श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी" ने तो श्रीगरुड़जी को वेदत्रयी रूपही कहा है, जिन्ह के पक्षों से “सामवेद" उच्चारण होता है, सो प्रभु चढ़े हुए सप्रेम सुनते हैं। श्रीकाक "भुशुण्डि" जी से आपने "श्रीरामचरितमानस" जिस प्रेम से श्रवण किया उसका कहना ही क्या । चौपाई। सुनि शुभ रामकथा खगनाहा । विगत मोह मन परम उछाहा । सुनि भुशुण्डि के वचन सुहाए । हरषित खगपति पंख फुलाए ॥ नयन नीर मन अति हरपाना । श्रीरघुपति प्रताप उर आना ॥ पुनि पुनि काग चरण सिरु नावा (जानि राम सम प्रेम बढ़ावा। दो० काग चरण सिर नाइ करि, प्रेम सहित मति धीर। गरुड़ गयउ वैकुण्ठ तब, हृदय राखि रघुवीर ॥. और इनका बल पराक्रम भकि चरित्र के वर्णन तो महाभारत एक "सौपर्ण" पर्व का पर्व ही प्रसिद्ध है। श्रीवाल्मीकि युद्धकाण्ड में श्रीवैनतेयजी ने निज वल्लभता श्रीसीताकान्तजी से स्वयं कही है कि “हे श्रीककुत्स्थकुलभूषण जी ! मैं आप का सखा हूं परमप्रिय बाहर का विचरनेवाला आप के प्राण हूं यह नरनाक्ष्य नागपास बंधनलीला सुनके निज सख्य सेवा निवेदन करने को आया हूं। (१७) श्रीरामदूत हनुमानजी। चौपाई । पवन तनय बल पवन समाना । वुधि विवेक विज्ञाननिधाना ॥१॥ Reasure ८२ REASE ANSAR श्रीभक्तमाल सटीक । महावीर विनवौं हनुमाना । राम जासु यश आपु वखाना ॥२॥ (३६) टीका । कवित । (८०७) रतन अपार सारसागर उधार कियेलिये हित चायकैवनाइमालाकरी है । सब सुख साज रघुनाथ महाराज जू को, भक्ति सों, विभीपणजू आनि भेद धरी है ॥ सभाही की चाह अवगाह हनुमान गरे डारिदई सुधि भई, मति अरवरी है। राम विन काम कौन,फोरि माण दीन्हें डारि, खोलि त्वचा नामही दिखायो; धुद्धि हरी है ॥२७॥(६०२) वार्तिक तिलक । सागर से निकाले हुए जिन रत्नों में अपार सार अर्थात् अति प्रकाशयुत अमूल्यता थी, वे रत्न तीनों लोकों के देव भूप नागों के मस्तकों के महामुख्य भूपण थे; तिनको जीत के रावण ने पड़े चाव से अपने कोश में रक्खा था। उन्हीं रत्तों को बड़े हित चाह से श्रीविभीषणजी ने माला बना के, सब सुखसाजयुक्त महाराज श्रीरघुनाथ जी को भक्तिपूर्वक भेंट दी॥ उस महामनोहर माला को देख के सभा भर के लोगों को उसकी अथाह (अवगाह) चाह उत्पन्न हुई । श्रीजानकीजीवन जी ने देखा कि इस माला ने तो हमारे सव निष्काम भक्कों के मन को चाहयुक्त कर दिया। इससे सबको चाहरहित करने के निमित्त श्रीहनुमानजी के गले में वह माला पहरा दी ॥ श्रीमास्तीजी तो प्रभु के रूप असूप के अवलोकन से छके अपनपो विसारे हुए थे ही माला कराठ में पड़तेही मणियों के सौन्दर्य को देखकर और उसमें कहीं श्रीराम नाम न देखकर आपकी मति अकुला उठी और विचार किया "कदाचित् इसके भीतर श्री नाम हो" इस हेतुसे उस माला की एक मणि को फोर के आपने देखा तो भीतर भी श्रीनाम न पाया। तव यह विचार किया कि "यह तोश्रीरहित होचुकी है" उस मणिको डाल दिया; इसीप्रकार से एक एक मणिको फोर फोर देख देख फेंकने लगे। यह कौतुक देख के सव सभा चकित हुई और श्रीविभीषणजी बोल ही उठे “कपिवरजी! आप इन अमूल्य मणियों को फोर फोर फेंकते क्यों हैं ? कपि जाति स्वभावसेही, वा इसमें कोई हेतुभी है ?"

भक्तिसुधास्वाद तिलक। तव श्रीसीताराम सम्पत्ति के धनिक श्रीअंजनीनन्दनजी ने उत्तर दिया कि "श्रीरामनाम से हीन ये मणि मेरे काम के नहीं" यह सुन श्रीविभीषणजीने पुनः पूछा कि आपके शरीरमें भी तो श्रीराम नाम दीखता नहीं, फिर उसे क्यों रक्खे हुए हैं ? इतना सुनतेही आपने नखोंसे अपने दिव्य विग्रह की त्वचा खोल के दिखाया तो तेजोमय सूक्ष्म शब्दयुत सर्वाङ्ग में श्रीरामनाम सबको देख पड़े। और सबकी, मति आश्चर्य मग्न में हो गई। देखिए, इस कौतुक से श्रीकपिकुलकेतुजी ने सवों को परम वैराग्ययुत निष्काम श्रीरामानुराग का उपदेश किस प्रकार दृढ़ाया। भला इन्ह के ज्ञान वैराग्यादि दिव्य रत्नों से पूर्ण विमल भक्ति जल से भरे हुए परम प्रेमरूपी सिंधुकी थाह किसको मिल सक्ती है ? और श्रीसीतारामसेवा में ऐसा अनूठा अनुराग किस का होगा, कि अनेक रूप से सेवा सुख लेते हैं (१) "श्रीनिमिकुलकुमारी चारुशीलाजी" हो के सखीसेवा सुख अनुभव करते हैं; (२) एवं "श्रीअंजनीनन्दन" रूप से दिव्यदम्पतीजी के दास्य सेवा का सुख लेते हैं । इस कपिरूप की प्रीति भक्ति सेवा तो लोक प्रसिद्ध है कि जिसके वश अखिल ब्रह्माण्ड के स्वामी श्रीजानकीजीवनजी आप तो ऋणी कहाए और सेवा धर्मधुरंधर श्रीहनुमन्तजी को धनी बनाया ॥ चौपाई। "सुनु सुत तोहिं उरिन मैं नाहीं । देखेउँ करि विचार मन माहीं ॥ प्रति उपकार करौं का तोरा । सम्मुख होइ न सकत मन मोरा ।। हनूमान सम नहिं वड़ भागी। नहिं कोउ रामचरण अनुरागी॥ गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार बार प्रभु निज मुख गाई ॥" श्रीहनुमानजी के यश को वारवार सुनते भी हैं । दो० किमि बरनों हनुमन्त की, कायकान्ति कमनीय । रोम रोम जाके सदा, राम नाम रमनीय ॥१॥ (विनय) जाके गति है हनुमान की। ताकी पयज पूजि आई यह रेखा कुलिश पखानकी ।। RESCORRECRURRESENSEX ८४ श्रीभक्तमाल सटीक। अघटित घटन सुघट विघटन ऐसी विरुदावलीनहीं आनकी। मुमिरत संकट सोच विमोचन मूरति मोद निधान की। तापर सानुकूल- गिरिजा हर लखन राम श्रीजानकी । तुलसी कपिकी कृपा विलोकनि खानि सकल कल्यान की। दो० जय जय कपि श्रीराम प्रिय, धन्य धन्य हनुमन्त । नमो नमो श्रीमारुती, बलिहारी बलवन्त ॥ १ ॥ सिया दुलारे, पवनसुत । मम गुरु, अंजनिपूत । सतसंगति, निज चरण रति, देहु, सीयपियदूत ॥२॥ श्रीसियसियपिय पदकमल, अविरल अमल सनेहु। युगल चरण कैंकर्य पुनि, मोहि कृपा करि देहु ॥३॥ "वीरकला श्रीमारुती", तुमहि निहोरि निहोरि । रूप कला सियचेरि लघु, विनय करति कर जोरि॥४॥ चौपाई। महावीर विनवौं हनुमाना । राम जासु जस आपु वखाना ॥ सीताराम चरन रति मोरे । अनु दिन चढ़ों अनुग्रह तोरे ॥ (१८) श्रीजाम्बवानजी। श्रीजाम्बवानजी, श्रीब्रह्माजी के अवतार हैं । श्रीप्रभु तथा सुग्रीवजी के मन्त्रीवर हैं। लंका के युद्ध में बुढ़ापे में भी बड़ा पराक्रम पक्षपतिजीका प्रसिद्ध है । और युवावस्था में तो- दो० "बलि चाँधत प्रभु वाड़ेउ, सो तनु बरनि न जाइ । उभय घड़ी महँ दीन्ह मैं, सात प्रदक्षिण धाइ ॥" श्रीमद्भागवत में वर्णित है कि इनने वहुत बूढ़ेपन में भी, श्रीकृष्ण भगवान के साथ बड़ा पराक्रम दिखाया, जवतक कि इनने आपको पहिचाना न था ॥ फिर तो अपनी कन्यारत्न "जाम्बवती" को भगवत को प्रदान कर दिया । (१६) श्रीसुग्रीवजी। श्रीसुग्रीवजी, श्रीसूर्य भगवान् के पुत्र हैं। श्रीसुकण्ठजीसे प्रभुने श्रीअग्निदेव को साक्षी करके मित्रता की। आपने जैसी सख्यता I भकिसुधास्वाद तिलक । सम्पत्ति आपको प्रदान किया और निवाहा, सो श्रीवाल्मीकीय रामायण ही के देखनेवालों को विदित है। कपीश्वरजी सब ऋक्षों और कपियों के राजा थे। और श्रीजानकी- जीवनजी के तो प्राण से भी प्रिय "पंचम भ्राता" ही थे। (२०) श्रीविभीषणजी। श्रीसीतारामभक्त लंकेश श्रीविभीषणजी की भक्ति तथा शरणागति को वर्णन कर सके ऐसा कौन जन है ? तथापि कुछ थोड़ा सा कहाही जाता है, सो चित्त लगाके सुनिये। देखिये कि प्रात समय इनका नाम लेना वड़ाही मंगलदायक है। और श्रीरामायणजी में जो इनकी कथा है, सो तो प्रसिद्ध है ही, एक नवीन इतिहास यों है- (३७) टीका | कवित्त । (८०६) भक्ति जो विभीषण की कहै ऐसो कौन जन, ऐ पै कछु कही जाति सुनो चित लाइ कै । चलत जहाज परी अटकि; विचार कियो, कोऊ अंगहीन कथा लै बहाइ कै ॥ जाइ लग्यो टापू ताहि राक्षसनि गोद लियो:मोद भरि, राजा पास गए किलकाइकै । देखत सिंहासन ते कूदि परे, नैन भरे, “याहीके आकार राम देखे भाग पाइकै"॥२८॥(६०१) वार्तिक तिलक। एक वणिक की जहाज चली जाती थी। किसी कारण से अटक गई; उसने बहुत यत्न किये पर नहीं चली । तव वणिक ने ऐसा विचार करके कि समुद्र के देवता ने रोका है, उसके लिये किसी मनुष्य को वलि की भांति समुद्र में गिरा दिया। वह मनुष्य श्रीरामकृपा से मरा नहीं, वरंच "लंका टापू" के तीर पर जा लगा। उसे राक्षसों ने देखा; और वे बड़े आनन्द से उसको अपने गोद में उठा के, वहुत खिल खिलाते हुए, राक्षसेन्द्र “श्रीविभीषणजी" के समीप लेगये। उस समय श्रीविभीषणजी श्रीरामविरह अनुराग में छके प्रभु का ध्यान करते हुए बैठे थे; आप इस मनुष्य को देखतेही सिंहासन से कूद पड़े क्योंकि मनुष्यरूप का दर्शन आपको एक उद्दीपनही होगया। ऐसा विचारने लगे कि “इसीकी नाई मेरे स्वामी नराकार अ श्रीभक्तमाल सटीक । विग्रह श्रीरामजी हैं, इनके दर्शन इस समय बड़े भाग्य से पाये" इस भाव से नयनों से प्रेमाश्रु वह चले ॥ (८) टीका । कवित्त । (८०५) रचि सो सिंहासन पै लै वैठाए ताही छन, राक्षसन रीमि देत मानि शुभघरी है । चाहत मुखारविन्द, अतिही अनन्द भरि, ढरकत नैननीर, टेकि ठाढ़ो छरी है ॥ तऊ न प्रसन्न होत,छन छन छीन ज्योति, हूजिये कृपाल, मति मेरी अति हरी है । "करो सिन्धु पार, मेरे यही सुखसार;" दियो रतन अपार, लाये वाही ठौर फेरी है ॥२६॥(६००) वार्तिक तिलक। दिव्य वस्त्र, चन्दन, मणि और सुवर्ण के भूपणों से, उनके शरीर की रचना शृङ्गार करके सिंहासन पर बैठाय धूप,दीप, नैवेद्य,आरती के अनन्तर भूपण वस्त्रादि न्योछावर करके, राक्षसों को रीझ पारितो- पिक दिये ॥ उस घड़ी को अति शुभदायक माना । और श्रीप्रभु का भाव करके सुवर्ण की छड़ी ले के प्रतीहार की भांति वखाप खड़े हो, उनके मुखारविन्द का सप्रेम दर्शन करने लगे और आपके नेत्रों से आनन्द का जल चलने लगा; तथापि उस मनुष्यके मुख में प्रसन्नता का लेश भी न दीख पड़ा, वरंच क्षण क्षण प्रति उसकी चेतना (चेष्टा) क्षीण ही होती जाती थी उसकी आंखों से आंसू बहते थे, और उसके मन में यह भय बढ़ता जाता था कि इन सब सत्कारपूर्वक मुझे ये सब बलि दे देंगे। श्रीविभीषणजीने.प्रानथा की कि "इस दास पर कृपा करके कुछ आज्ञा दीजे, क्योंकि आपको उदास देख के मेंरीमति सभीत हो रही है"। तब वे बोले कि “मुझे समुद्र पार उतार दीजे, मुझको तो इसी में परमसुख होगा"॥ तव, श्रीविभीषणजी बहुत रत्न देके फिर उसी ठौर सिन्धुतीर उनको ले आये- (8) टीका | कवित्त । (८०४) "राम" नाम लिख,सीस मध्य धरि दियो; “याको यही जल पार करै," भाव सांचो पायो है। ताही ठौर वैव्यो, मानो नयो और रूप s৩ Fols भक्निसुधास्वाद तिलक। भयो, गयो जो जहाज सोई फिरि करि पाया है। लियो पहिचान, पूच्यो सब, सो बखान कियो, हियो हुलसायो, सुनि, विनै कै चढ़ायो है । पस्यो नीर कूदि, नेकु पाय न परस कस्यो, हस्यो मन देखि, रघुनाथ नाम' भायो है ॥ ३०॥(५६६) वार्षिक तिलक। श्रीविभीषणजी ने "श्रीराम नाम " लिख के उनके मस्तक पर श्रीकरकमल से भावपूर्वक रख के वस्त्र से बांध दिया; और कहा कि "इस श्रीराम' नामके प्रतापसे लोग संसारसागर से पार होजाते हैं, सो इस समुद्रके जलको तो आप विना प्रयासही पार होजाइयेगा॥" उनके सच्चे भाव और विश्वास से वह मनुष्य जल में स्थल की नाई चल के उसी ठौर पहुंच गया कि जहां संयोगवश वही जहाज लौट के आ लगा था ॥ उन लोगों ने इसको देख के पहिचाना और उसके शरीर के तेज तथा अवस्था को दिव्य पाया। पूछने पर उसने अपनी व कथा और श्रीविभीपणजी की भक्ति कह सुनाई । सुनके सवको अति आनन्द हुआ बड़े विनय से उसको जहाज पर चढ़ा के क्षमा मांगी। प्रसन्न होके श्रीराम नाम का प्रभाव उन सबोंसे कहा वरंच समुद्र में कूद के दिखा दिया कि जल में उसका पांव तक भी भीगा नहीं। अथवा (ऐसा भी कहते हैं कि), उसके पास अनमोल रत्नों की गठरी देख कर नौकापति को लोभ प्रबल हुआ; उसके ये ढंग देख के उसकी माया से बचने के निमित्त यह मनुष्य.पुनि जल में कूद पड़ा और यो चलदिया जैसे कोई सूखी धरती पर सहजही में चले ॥ इस प्रभाव को देखके, "श्रीसीताराम" नाम में सबों को श्रद्धा और प्रतीत उपजी, और अति प्रीतिपूर्वक जप के सब के सब संसार के पार हो गए। (२१) देवी श्रीसवरीजी। समस्त प्रेमी भन्नों में शिरोमणि रूपाश्री "सवरी" जी, किसी हेतु से सवर (भिल्ल ) जाति में उत्पन्न हुई परन्तु वालपन से ही इनकी RECERENESCORRECRORS KRIS613 FRELI- श्रीभकमाल सटीक। . - - दशा तथा मति लोक से विलक्षण ही थी। जब विवाह योग्य अवस्था इनकी हुई, तब माता पिता उसके प्रवन्ध में उद्यत हुए और सं. म्बन्धी लोगों के भक्षण के लिये, बहुत से जीव, इकहे किये। इन्हों ने विचारा कि 'मोह ! मेरे निमित्त इतने जीवों का वध होगा! धिक् इस लोक के प्रपंच को है" । रात्रि में आपने उन सब जीवों को छोड़ दिया और उसी रात आप भी वहां से चलके पंपासर के पास जा छुपी, और वहीं वन के फल मूल से निर्वाह करती हुई दिन बिताने लगी (४०) टीका । काविच । (८० ८०३) वन में रहति, नाम "सवरी" कहत सब, चाहत टहल साधु, तनु न्यूनताई है । रजनी के शेप, पि आश्रम प्रवेश करि, लकरीन घोझ धरि आवै, मन भाई है। न्हाइवेको मग झारि, कांकरनि चीनिडारि, चेगि उठि जाइ, नेकु देति न लखाई है । उठत सवारे, कहैं “कौनधी वहारिगयो,"भयो हिये शोच, “कोउ वड़ोसुखदाईहै"॥३१॥(५९८) वार्षिक तिलक। उसी वन में रहती थीं; इनको सब "सवरी" ही कहते थे॥ इन्हे संतों की सेवा की चाह विशेष थी, परंतु अपनी नीच जाति जान के साधुवों के समीप नहीं जाती थीं । तथापि विना सेवा किये नहीं ही रहा गया, तब कुछ रात रहते श्रीमतंगादि ऋपि जनों के आश्रम में लकड़ियों के बोझ रख आया करती थीं; मनमें इसमे सुख मानती थीं; और स्नान के मार्गकी कंकड़ियां भी रात्रिही में बहार के चली आया करती थीं, जिसमें कोई देख न लेवे । श्रीरामभक्त ऋपिजन प्रभात उठके इस टहल को देख विचारते कि "मार्ग को भाड़ वहार के लकड़ियां रख जानेवाला सुखदायक कौन है ? " ॥ (४१) टीका । कवित्त । (८०२) वड़ेई असंग वे "मतंग" रस रंग भरे, धरे देखि वोझ, कहो "कौन चोर आयो है ? करै नित चोरी; अहो ! गहो वाहि एक दिन; विना पाए, प्रीति वाकी मन भरमायो है"।बैठे निशि चौकी देत शिष्य सब सावधान; आइ गई: 'गहि लई; कांपै, तनु नायो है। SCREER-IGHUGREACHAR . RA भक्तिसुधास्वाद तिलक । देखत ही ऋषो जल धारा बही नैनन ते, बैनन सों को जात, कहा कंड पायो है ॥ ३२ ॥ (५६७) वार्षिक तिलक। सब ऋषियों म बड़े ही असंग श्रीराम-रंग से भरे श्रीमतङ्गाजी लकड़ियों का वोझ धरा देख के बोले कि "हमारे सुकृत का चोर यह कौन आता है ? जो नित्य ही चोरी से सेवा करके चला जाता है। उस प्रीतिवान् को विना देखे उसकी प्रीति ने मेरे मन को चपल कर रक्खा है । रात्रि में जाग के उसको पकड़ो।" रातको शिष्य लोगों ने सावधान रहके चौकी देके उसको पकड़ा। उसले शिष्यों ने पूछा कि तू ने यहां लकड़ियां पहुंचाने के लिये किसी से कुछ पाया है ? ॥ अतिभय से वह कांपती हुई पांवपर गिरपड़ी। देखतेही श्रीमतङ्ग जी के नेत्रों से प्रेमानन्दजल की धारा चलने लगी। और ऐसे अकथ आनन्द में मग्न हो गए मानो कोई महा अलभ्य वस्तु पाया है । (४२) टीका । कवित्त । (८०१) डीठी ह न सोही होत,मानि तन गोत छोत, परी जाय सोच-सोत, कैंसेकै निकारियै । भक्ति को प्रताप ऋपि जानत निपट नीके "कैऊ कोटि विप्रताई यापै वारिडारियै ॥” दियो वास आश्रम में, श्रवण में नाम दियो कियो सुनि रोप सबै, कीनी पांति न्यारियै । सबरी सों कह्यो “तुम रामदरशन करो, मैं तो परलोक जात, आज्ञा प्रभु पारियै॥" ३३॥ (५६६) वार्तिक तिलक। श्रीसवरीजी की तो दृष्टि भी मुनिवरजी के सामने नहीं होतीथी, अपनी जातिको अतिनीच मान के सोचरूपी प्रवाह में पड़ गई। इधर श्रीमतङ्गमुनिजी सोच विचार के प्रवाह में पड़े कि इसको सोच के सोत (धारा) से कैसे निकालूं ? क्योंकि ऋषीश्वरजी "श्रीरामभक्लिजी" का प्रताप भलेप्रकार जानते थे। शिष्योंसे कहनेलगे कि "यह जातिकी तो नीच है सही, परन्तु इसकी भक्ति पर तो कई कोटि ब्राह्मणांभिमान को न्योछावर करना योग्यहै ॥" निदान, सबरीजीको अपने आश्रमही में निवास दें करके महामंत्र श्रीसीतारामनाम श्रवण में सुना दिया। .

HERE WHER श्रीभक्तमाल सटीक । इस वार्ताको सुनके और सब मुनिजनोंने अति रोष करके आपको अपनी ज्ञाति पंक्ति से न्यारा कर दिया । इस बात का कुछ हर्ष विपाद श्रीरामभक्त "मतङ्ग" मुनिजी को लेश भी न हुआ। श्रीसवरीजी सेवा में तत्पर होके रहने लगीं। कुछ काल में श्रीमतङ्गजी के देह त्याग का समय आ पहुँचा; श्रीसवरीजी से आपने कहा कि "मुझे तो अब इसलोक में रहनेकी प्रभुकी आज्ञा नहीं है,श्रीरामधाम को जाताहूं,परन्तु तुम यहांही वनी रहो।" इतना सुन श्रीसवरी जी अत्यन्त व्याकुल हुई। आपने समझा के कहा कि "मेरे इस आश्रम में 'परब्रह्म परमात्मा श्रीरामचन्द्रजी' अपने अनुज 'श्रीलक्ष्मणजी' के सहित आवेंगे, तू उनका दर्शन पूजन सप्रेमकरना। तब श्रीरामधाम को पाना॥" ऐसा समझाके श्रीमतगजी परमधाम को पधारे ॥ (४३ ) टीका ! कविच । (६००) गुरू के वियोग हिये दारुण लै शोक दियो, जियो नहीं जात; तऊ राम आसा लागी है । न्हाइवे को चाट निशि जात ही वहारि सब, भई यो अधार पि देखि व्यथा पागी है ॥ छुयो गयो नेकु कहूं, खीजत अनेक भांति; करिकै विवेक गयो न्हान; यह भागी है। जल सो रुधिर भयो, नाना कृमि भरि गयो, नयो पायो शोच, तौह जानै न अभागी है ॥ ३४ ॥ (५६५) चार्तिक तिलक। श्रीसवरीजी को श्रीगुरु वियोग से घड़ाही दुःसह दुःख हुआ कि जिसमें वह प्राण को नहीं रक्खा चाहती थीं; पर श्रीरामरूप अनूप के दरशन की लालसाने प्राणों को निकलने न दिया । श्राप मुनियों के स्नान के पथ को रात ही को भार आया करती थीं। एक दिन कुछ विलम्ब होगया; प्रतिपक्षी ऐक मुनि ने श्रीसवरी जी को देख लिया, इससे श्रीसवरीजी भय से व्यथित हुई। वन का मार्ग पतला तो होता ही है, मुनि, किंचित् छू जाने से, क्रोध करके अनेक दुर्वचन बोले STRESSANGA . ॥

भकिसुधास्वाद तिलक। ६१ अपने मन में विचार के उस मुनि ने फिर जाके स्नान किया। और श्रीसवरीजी भागके अपनी कुटीमें चलीआईं। मुनि जव स्नान करने लगे, तो श्रीरामभक्त सवरीजी के प्रति अपराध से, जल रुधिर होगया, और देखते ही देखते उस सर में कीड़े भी पड़ गए। मुनि को यह एक नया शोच हुआ तथापि इस बात को तो न समझे कि 'श्रीसबरीजी को नीच मान के दुर्वचन जो कहे, और उनके स्पर्श के अनन्तर पुनः स्नान किया, तिसी से इस सर काजल रुधिर होगया'; किन्तु भक्ति भाग्यहीन मुनि ने उलटे ऐसा समझा कि “सवरी ही के स्पर्श के दोप से यह जल विगड़ गया है ॥" (४४) टीका । कवित्त । (७६९) लावे वन बेर, लागी राम को अवसर भल, चाखै परिराखै फिर, मीठे उन जोग हैं । मारग में जाइ, रहै लोचन बिछाई, कर्भू आवै रघुराई, दृग पावै निज भोग हैं ॥ ऐसे ही बहुत दिन बीते मग जोहत ही, आइ गए औचक सो; मिटे सब सोग हैं। ऐपै तनु नूनताई आई सुधि, छिपि जाई; पूछे आप "सवरी कहां ?" ठाड़े सब लोग हैं ॥ ३५ ॥ (५.६४) वार्तिक तिलक। श्रीसबरी जी के मन में श्रीरामजी की अति अवसेर थी अर्थात प्रभु के आने के सोच सन्देह में मग्न हो रही थीं, सो वन के वेर आदिक फल लाकर चखती थीं और मीठे प्रभु के योग्य जान कर रख छोड़ती थीं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा में अपनी आंखें बिछाए रहती थीं और अति उत्कण्ठा से ऐसा विचारा करती थीं कि “कब वह दिन आएगा ? कि जिस दिन श्रीरघुनन्दनलालजी आयेंगे और उनके दर्शनरूपी सुधा को मेरे नेत्र चखेंगे ॥" प्रिय पाठक! श्रीसबरीजीका प्रेम अकथ अगाध है। "गीतावली" में गोस्वामी श्री ६ तुलसीदासजी ने भी कुछ गाया है ॥ * इसका अर्थ कोई एक महात्मा ऐसा बताते हैं कि चसने पर जिस वृक्ष के फल मीठे पाती थी उसी क्ष के फल प्रभु के योग्य जान तोड़ के रख छोड़ती थी ।।

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N ASSISTANTRVEY *** श्रीभक्रमाल सटीक "छन भवन, छन वाहर विलोकति पंथ," इत्यादि । इसी प्रकार मार्ग जोहते२ वहुत दिन व्यतीत हुए । अवचक ही, एक दिन लालजी (प्रभु) आयही तो पहुंचे सुन के सव शोक सन्देह जाते रहे; पर अपने शरीर की नीचता की सुधि आगई, और प्रेमकी विचित्र विकलता से, आगे लेने को तो न बढ़ीं, वरंच छप गई। प्रभु आके, वनवासी लोगों से पूछने लगे कि "वह सरस भक्तिवती सवरी कहां रहती है ? ॥" (४५) टीका । कवित्त । (७९८) पूछि पूछि आए तहां,स्योगको अस्थान जहां, कहां वह भागवती? देखों ग प्यासे हैं। आइ गई आश्रम में जानिकै पधारे आप, दूरही ते साष्टाङ्ग करी चप भासे हैं ॥ वकि उठाइ लई, विथा तनु दूरि गई, नई नीर भरी नैन, परे प्रेम पासे हैं। बैठे, सुख पाइ फल खाइ कै स- राहे, वेइ कह्यौ “कहा कहीं मेरे मग दुख नासे हैं ॥"३६॥ (५६३) वार्तिक तिलक। • इस प्रकार पूछते २ जहाँ श्रीसवरीजी की कुटी थी तहां ही आके यह वात पूछी कि "हमारी वह परम भागवती सबरी कहां है ? हम उसको नयन भर देखा चाहते हैं, हमारे नेत्र उसके दर्शनरूपी जलके प्यासे हो रहे हैं। प्रीतिपगे श्रीमुख वचनोंको सुनके उनको अपनी नीचताका शोच मिटगया और यह देखा कि आश्रममें ही दोनों भाई कृपा करके आ खड़े हैं; तव सन्मुख आके जहां से आपके दर्शन पाए वहीं से प्रेम पूरित साष्टाङ्ग प्रणाम किया। प्रभु ललक के आए और श्रीकरकमलों से आपने श्रीसबरीजी को उठा लिया। श्रीकरकंज के स्पर्श ही से वियोगकी सब व्यथा जातीरही और नेत्रोंसे नवल प्रेम. मय जलकी झड़ी लगगई। क्योंकि इस समय इनके पौ बारह सरीखे प्रेम के पासे अनुकूल पड़गए अथवा श्रीसवरीजी के नयन श्रीराम प्रेमपाश में बँध गए। चरण धोके दोनों भाइयों को अनुराग रंजित भासन पर बैठाय फूलमाला पहिराय फलों को नवीन२ दोनाओं में करके आगे रक्खा। प्रभु उन फलों को खाते हुए बारम्बार उनके स्वाद की प्रशंसा, और ISRNSARSHABH भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६३ शिवजी आदि उसके भाग्यकी तथा प्रभु की भक्तवत्सलता की सरा- हना, करने लगे। और बोले कि क्या कहूं आज तुमने मेरे मार्ग भर के परिश्रम दुःखों को मिटाके परम सुख दिया ।। (४६) टीका | कपित्त । (७६७) करत हैं सोच सब ऋषि बैठे आश्रम में, जल को विगार ! सो सुधार कैसे कीजिये ? । यावत सुने हैं वन पथ रघुनाथ कहूं; आवे जव, कहें "याको भेद कहि दीजिये ॥” इतने ही मांझ सुनी "सबरी के विराजे आन" गयो अभिमान! चलो पग गहि लीजिये। आय, खुनसाय, कही "नीर को उपाय कही" "गही पग भीलिनी के छुए स्वच्छ भीजिये" ॥ ३७॥ (५६२) वात्तिक तिलक। उधर ऋषि लोग अपने आश्रमों में बैठे सोच रहे थे कि यह जल जो बिगड़ गयाहै सो इसकी शुद्धता किसप्रकार से की जावे। इतने में कोई वोलउठे कि सुनते हैं कि इस वन मार्ग से कहीं श्रीरघुनाथजी चले आते हैं; सो जब आवें तव इसका हेतु तथा शुद्धि का उपाय आपही से लिया जायगा। ये वातें हो ही रही थीं कि उसी क्षण मुनियोंने सुना कि आप आ ही गए, सवरीकी कुटी में विराजरहे हैं। यह सुनते ही सभों के अभिमान जाते रहे और वे लोग बोले कि चलो उनके चरणों में दण्डवत् प्रणाम करें। खुनसाए हुए आए और प्रभु से कहा कि हमारे स्नान पान का जल बिगड़गया है इसके सुधरने का यत्न वता दीजिये ॥ इसके उत्तर में प्रभु ने कहा कि आप लोगों ने परम भागवती सबरी का अनादर किया इसी भक्तापराध से जल की यह दुर्दशा हो रही है । अतएव इसी के चरणों को गहिये और "सादर इन्हें ले जाके इनका चरण स्पर्श कराइये तो जल निःसन्देह निर्मल हो जावेगा।" आप लोग सुख से स्नान पान कीजियेगा। क्या करें उनने ऐसा ही किया; और जल परमनिर्मल और स्वाद सुगन्धितयुक हो गया। प्रभु ने जब वहां से चलना चाहा, श्रीसवरीजी ने अपना प्राण GREEKRICALCRECE लाल। ISASTERSE 133ॐ श्रीभक्तमाल सटीक। न्यवछावर कर दिया और परमधाम को चली गई। धन्य, धन्य! अहो ! प्रीति परमेश्वरी परमआश्चर्य ! श्रीसवरीजीक प्रेमकी प्रशंसा करें ? कि श्रीप्रभुकी प्रेमपालकता की? दोनोंही की बलिहारी। देखिये तो श्रीसवरीजी ने केवल धन के फल ही खिलाने में प्रभु में अनुराग, उससे शतसहस्रगुण अधिक किया कि जो प्रेम माता सुतको खिलाने में करती है; और वैसेही प्रभुने श्रीमातु कौशल्याजी महारानीके पवाए भोजनों से भी अधिकतर मोठे स्वादिष्ट मानके उन फलोको पाया। इस प्रेम की जय हो और इस प्रेम-भाव-ग्राहकता की जय ।। "घर गुरु गृह ससुरारि प्रिय, सदन पाय पहुनाय । सवरी फल रुचि माधुरी, कहुँ न लही रघुराय॥ १॥ प्रेम पगे चाखि चार फल, कौशल्या के भक्तन की कवरी मणी, सबरी करी कृपाल |॥२॥ अधिक बढ़ावत, आप ते, जन महिमा, रघुवीर । तुलसी, सवरपिदरज से, शुद्ध भयो सरनीर ॥ ३॥" (२२) खगपति श्रीजटायुजी। (४७) टीका । कवित्त । (७६६) "जानकी" हरणकियो "रावण" मरण काज; सुनि“सीता"वाणी "खगराज" दौड़ोआयो है। बड़ी ये लड़ाईलीन्ही,देह वारिफेरि दीन्ही, राख प्राण, राम मुख देखियो सुहायो है ॥आए आपु, गोद शीशधारि हग धार सींच्यो, दई सुधि लई गति तनहू जरायो है। "दशरथ"वत मानकियो जल दान, यह अतिसनमान, निजरूप धाम पायो है॥३८॥ है, वार्तिक तिलक । (५६१) पक्षियों के राजा महाभन श्रीजटायुजीने अपना तन भी भगवत् के निमित्त अर्पण कर दिया। जब रावण अपना मरना प्रभु के शर से संकल्प करके उसके निमित्त श्रीमाया सीताजी को हरके ले चला, तो आपकी आर्तवाणी और विलाप सुन के सहायता करने को उक्त श्रीभक्तराज महाराज अतिशीघ्र पहुँचे।आप जगतविख्यात् निशाचर- पति रावण से बहुत लड़े, रावणने भी जाना कि किसीसे काम पड़ा। ॐॐॐ SHRA भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६५ जब उस दुष्टने आपके दोनों पक्ष काटडाले तब आपने अपना शरीर प्रभुके निमित्त न्यवछावर करदिया; परन्तुश्रीचक्रवर्तिकुमार महाराज के प्रिय दरशन के हेतु प्राण रक्खे हुए प्रभु का स्मरण कर रहे थे। श्रीप्रियाजी को ढूंढ़ते ढूंढ़ते श्रीजानकीजीवनजी श्रीलक्ष्मणजी के साथ साथ वहां आए। "(क) जाति के निसिद्ध, मांसभक्षक अशुद्ध "अवधेश" धर्म वृद्ध, सखा किये निज शुद्ध है । पातक पिनद्ध वली रावण श्रवुद्ध मूढ़ काल पास बद्ध कियो करम विरुद्ध हैं || सुनत सनद्ध जुरे रसरङ्ग जुद्ध, सिया छीनि लिये कुद्ध परे पंख चिनु बिद्ध हैं । रामकृपा रुद्ध दिये गेम ते प्रबुद्ध धाम मुख को समृद्ध धन्य श्री जटायूद्ध हैं।" "दो० कर सरोज सिर परसेउ, कृपासिन्धु रघुबीर । निरखि राम छविधाम मुख,बिगत भई सव पीर ॥" प्रभु ने श्रीजटायुजी का सीस अपने श्रीगोद में लेके, स्नेह के आंसुओं से सींचा। (सवैया) "दीन मलीन अधीन है अंग. विहंग परेउ तिति खिन्न दुखारी। राघव" दीनदयातु कृपाल को देखि दुखी करणा भइ भारी ॥ गीध को गोद में राखि कृपानिधि नैन सरोजन में भरि वारी । चारहिं पार सुधारत पंख "जगयु" की धूरि जटान सों भारी॥" चौपाई। "राम कहा तनु राखहु ताता" । मन मुसुकाइ कही तिन्ह बाता ॥ "जाकर नाम मरत मुख आवा । अधमी मुक होय श्रुतिगावा॥ सो मम लोचन गोचर आगे। राखौं नाथ ! देह केहिखांगे?॥" "गीध अधम खग आमिष भोगी। गतितेहिदीन्हजोजांचतजोगी।" प्रभुने पिता श्रीदशरथजी महराज के सदृश जान के, क्रिया की; इस सनमान की बलिहारी ॥ चौपाई। "गीध देह तजि धरि हरि रूपा.। भूपण बहु पट पीत अनूपा ॥ दो० अविरल भगति मागि वर, गीध गएउ हरि धाम । तेहि की क्रिया यथोचित, निजकर कीन्हीराम ॥" A ।

, , पितुसखा, जानि कृपा के धाम। श्रीभक्तमाल सटीक । गीत*"फिरत न बारहिवार प्रचात्यो। चपरिचोंच चंगुलहति हय रथ खंड खंड करिडास्यो॥ विरथ विकल कियो, इत्यादि, इत्यादि ॥" तुलसीदास सुर सिद्ध सराहत धन्य विहंग बड़भागी॥ दो० "दशरथ से दशगुन भगति, सहित तासु कृत काज। तुलसी सोचत बन्धु युत, राम गरीवनिवाज ॥१॥ मुए, मरत, मरिहैं, सकल, घरी पहर के बीच । लही न काहू आजु लौं, गीधराज की मीच ॥२॥ गोदसीस धरि, भारी धूरि जटायु की, निज जटान सों राम॥३॥" छप्पय । "भक्ति भूगि भूपाल श्रीदशरथ दश दिशि विदित जस ॥ मनुवपुमै बहु भक्ति सुतपकरि ब्रह्म विलोके । परमातम प्रिय पुन पाय सिय वधू विशोके ॥ फणि मणि इव जल मीन सरिस प्रभु मीति सुपागे । सत्य प्रेप के सीम राम विठुरत नन त्यागे । कौशल्यापति पूज्य जगधर्मघजवात्सल्य रस । भक्ति भूमि भूपाल श्रीदशरथ दशदिशि विदितजस ॥१॥ वारिधि रस वात्सल्य की कौशल्या वेला मनहु ॥ कृपा प्रीति प्रभु भक्ति सुकीरति सकल सकेली। विरचेउ चतुर विगं राम जननी पुदवेली ॥ सीना सरिस स्वभावधर्मधुर परनि उदास । भरतादिक को करनि रामते अधिक दुलारा । मातु मुमित्रा आदि सब रसरङ्ग बदै तेहि सम गनहु । वारिधि रस वात्सल्य की कौशल्या वेला मनहु ॥ २ ॥ (२३) श्रीअम्बरीषजी, महाराज महारानी। (४% ) टीका । कवित्त । (७६५) "अम्बरीप" भक्तकी जो रीस कोऊ करे और, वडोमतिवौर, किहूं जान नहीं भाखिये । “दुरवासा" रीसि खीसि सुनी नहीं कहूं साधु मानि अपराध, सिर जटा बैंचि नाखिये ॥ लई उपजाइ काल कृत्या विकरालरूप भूप महाधीर रह्यो ठाढ़ो अभिलाखिये । चक्र दुखमानिले कृशानुतेज राखकरी,परीभीर ब्राह्मणको भागवतसाखिये॥३६॥(५६०) वार्षिक निलक। श्रीअम्बरीप भक्त राजपिजी की समानता जो और कोई किया चाहे सोचड़ाही मतिमन्द विक्षिप्तहै,क्योंकि उनकी भक्ति किसीप्रकार कथन में भी नहीं आसकती । देखिये, दुर्वासापिने किसी साधुकी .

६७ भनिसुधास्वाद तिलक। सिखावनि नहीं सुनी, श्रीअम्बरीषजी के विना अपराध ही अपराध 'माना, अर्थात् एक समय द्वादशीके दिन महाराज के यहां दुर्वासाजी आए महाराज ने नमस्कार विनय के अनन्तर भोजन के लिये प्रार्थना की। ऋषिजी ने कहा कि स्नान कर आवे तो भोजन करें। इतना कह स्नान को गए । परन्तु उस दिनद्वादशी दोही दण्ड थी। राजाने विचार किया कि त्रयोदशी में पारण करने से शास्त्राज्ञा उल्लंधित होगी। तव ब्राह्मणों ने कहा कि चरणामृत पी लीजिये। ऐसाही किया। दुर्वासाजी आए और अनुमान से जाना कि इन्हों ने जल पिया है। फिर तो अत्यन्त क्रोध करके अपने जटा को भूमि में पटक के महाविकराल “ कालकृत्या" उत्पन्न करके उससे कहा कि इस राजाको भस्म करदे"इतने पर भी श्रीअम्बरीपजी हाथ जोड़े, दुर्वासा की प्रसन्नता के अभिलाष में खड़ेही रहे। "श्रीसुद- शनचक्रजी" जो श्रीप्रभु की आज्ञानुसार राजा की रक्षार्थ सदाई समीप ही रहते थे, उनने दुर्वासा के दुखदाई क्रोध से दुखित होके, उस कालाग्नि कृत्या को अपने तेज से जलाके राख कर दी। और ब्राह्मण की ओर भी चले,यह देख दुर्वासाजी भागे और चक्रतेज से अत्यन्त विकल हुए, कि जैसा श्रीमद्भागवत में लिखा ही है। (४६) टीका । कवित्त । (७६४) भाज्यो दिशा दिशा सव लोक लोकपाल पास गये, नयो तेजचक्र चन किये डारे हैं । ब्रह्मा शिव कही यह गही तुम टेव धुरी, दासन को भेद नहीं जान्यो, वेद धारे हैं ॥ पहुंचे वैकुंठ जाय, कह्यो दुःख अकुलाय, हाय हाय ! राखौ प्रभु ! खरो तन जारे हैं। "मैं तो हो अधीन; तीनगुण को न मान मेरे 'भक्तवात्सल्य गुण' सवही को टारे हैं" ॥४०॥ (५८६) वार्तिक तिलक । ऋषिजी श्रीचक्र के भय से भागे हुए चारों दिशाओं, तथा चारों विदिशाओं, को, और सब लोकों में गए; और लोकपालों के पास अर्थात् इन्द्र, वरुण, कुवेर, यम, के पास जाके, उनने शरण शरण पुकारा; परन्तु चक्रका प्रतिक्षण वढ़ता हुआ तेज दुर्वासाजी को यों V ६८ , - श्रीभक्तमाल सटीक। जलाके चनासा किये डालता था जैसे अग्नि कंकड़ पत्थर को । जव श्रीब्रह्माजी एवं श्रीशिवजी के लोक में वह पहुंचे, तव आप दोनों ने कहा कि “दुर्वासाजी ! तुम ने यह बड़ी निकम्मी टेव पकड़ी है कि भगवद्भलों का भेव (भेद, मर्म) न समझके उनसे उलझते हो, कि जिनका प्रभाव घेद गान करते हैं। तुम्हारी रक्षा हम नहीं करसकते।" हां, श्रीनारदजी ने हित उपदेश दिया। तव अन्त में, श्रीवैकुण्ठ जा पहुंचे और हाय हाय ! करके अकुत्लाके प्रभु से अपना दुःख कहा कि "हे प्रभो ! रक्षा कीजिये । त्राहि त्राहि दयालु रघुराई ! रघुवीर करुणा सिन्धु आरतवन्धु जनरक्षक हरे !! इस चक्र का अति तीक्ष्ण तेज मुझे जलाए डालता है । (१) आप शरणागतपाल हैं, मैं शरणागत हूं, (२) आप आर्तिनाशक हैं, मैं आर्त हूँ; और ( ३) आप ब्रह्मण्यदेव हैं, मैं ब्राह्मण हूं ॥" यह सुन श्रीभगवान् बोले कि "आपने बात तो ठीक कही, परन्तु मैं भक्तों के आधीन अस्वतन्त्र हूं; जो मेरे उक्न तीन गुण आपने कहे, उनका मान मुझको नहीं है, क्योंकि भनवात्सल्यगुण' ने इस देश काल में उन तीनों गुणों का तिरस्कार कर दिया है ॥" (५०) टीका । कवित्त । (७६३) "मोको अतिप्यारे साधु, उनकी अगाधमति; कस्यो अपराध तुम, सो कैसे जातहै । धाम, धन, वाम, सुत, प्राण, तनु, त्याग करें, ढरे मेरीओर, निशि भोर मोसो वातहै | मेरेऊन सन्त बिनु और कछु, सांची कहाँ, जानो वाहीठौर,जाते मिटै उतपातहै। बड़ेई दयाल,सदा दीनप्रतिपालकरैं न्यूनतान धेरै कहूं; भक्ति गातगातहै"॥४१॥(५८८) वार्तिक तिलक । "मुझे साधु अत्यन्त प्यारे हैं, काहे कि उनका अगाधमत है । सो जब तुमने उन्हींका अपराध किया तो मुझसे कैसे सहा जासकताहै ? बे मेरे लिये, गृह,धन, तन, अन्न, जन, वरंच स्त्री, पुत्र तथा प्राणतक,, परित्याग करके मेरी ओर, लगते हैं। और रात्रि दिवस मेरा भजन छोड़ उनके दूसरी बात ही नहीं । Eter ।

s भक्तिसुधास्वाद तिलक। 88 एवं, मेरे भी सन्तों के लालन पालन सार सँभार विना और कोई कार्य कुछ भी नहीं है, मैं सच्ची २ कहे देता हूं। चौपाई। "अस सज्जन मम उर वस कैसे।लोभी हृदय वसत धन जैसे॥" आप उन्हीं के पास जाइये, जिससे यह चक्र कृतदुःख उत्पात मिट जावे । यह शंका न कीजिये कि वे मुझे कैसे क्षमा करेंगे, क्योंकि मेरे सन्त भक्त बड़ेही क्षमाशील, अकारण पर-उपकारी एवं दयालु होते हैं तथा दीनों का सदा प्रतिपाल करते हैं। दूसरे का चूक अपने हिय में नहीं रखते; क्योंकि उनके तो सम्पूर्ण अङ्गों में मेरी भक्ति ही भरी है, किसी की न्यूनता रखने के लिये कुछ भी जगह ही उनके चित्त में बची नहीं है ॥" चौपाई। "सुनु, मुनि ! सन्तन के गुण जेते । कहि न सकहिं श्रुति शारद तेते॥" (५१) टीका । कवित्त । (७६२) बैंकरि निरास, ऋषि आयो नृप पास, चल्यो गर्व सों उदास, पग गहे, दीन भाष्यो है । राजा लाज मानि, मृदु कहि, सनमान कयो ढस्यो, चक ओर, कर जोर, अभिलाष्यो है ॥ भक्त निसकाम, कभू कामना न चाहत हैं, चाहत है विप्र, दूरि करो दुख, चाख्यो है। देखिकै विकलताई, सदा सन्त सुखदाई, आई मन मांझ, सब तेज ढांकि राख्यो है ॥ ४२ ॥ (५८७) वार्तिक तिलक । प्रभु के ऐसे वचन सुन के, ऋपिजी निरास, तथा अपने गर्व (अभिमान) से उदासीन होके चले, और राजा अम्बरीपजी के पास आके चरणों को पकड़कर ऋपिने दीन वचनों से क्षमा मांगी। महाराज लज्जित हो, सादर पग छुड़ा, कोमल वचनों से मुनिजी का सनमान करके, श्रीचक्रजीकी ओर जा हाथ जोड़, यों प्रार्थना करने लगे, कि "हे क्षमामन्दिर श्रीसुदर्शनजी ! यद्यपि हरिभक्तों को कोई कामना नहीं होती, वे सदा निष्काम रहते हैं,तथापि मेरी यह कामना , श्रीभक्तमाल सटीक । . , है कि, इन विधजीने वहुत दुःख पाया सो अब, आप मुझ पर कृपा करके इनकी रक्षा कीजिये" सन्तों के सुखदाता श्रीसुदर्शन चक्रजी. ने द्विजके दुःखसे श्रीभगवतभलको विकल देख, प्रसन्न हो, प्रार्थना मान,अपने तेजको छिपालिया, और भाग्यभाजन राजाने दुर्वासाजी को अभयदान दे भोजन करा, विदा किया ॥ चौराई। "श्रापत ताड़त परुप कहन्ता । पूजिय विप्र कहहिं अस सन्ता॥ दो० मन क्रम वचन, कपट तजि, जो कर भूसुर-सेव । विष्णु समेत विरंच शिव, वश ताके सव देव ॥" (५२) टीका । कपित्त । (१७६१) एक नृपसुता सुनि अम्बरीष भक्तिभाव, भयो हिय भाव ऐसो वर कर लीजिये । पितासों निशंक ढके कही “पति कियो मैं ही, विनय मानि मेरी, वेगि चीठी लिखिदीजियै ॥” पाती लेके चल्यो विप्र, छिप वही पुरी गयो, नयो चाव जान्यो ऐपै कैसे तिया धीजिये । कहो तुम जाय, "रानी बैठी सत आय, मोको बोल्यो न सुहाय, प्रभुसेवा मांझ भीजिये" ॥४३॥ (५८६) वार्तिक तिलक। श्रीअम्बरीषजी की एफ आख्यायिका कहकर अव राजसुता सम्बन्धीभक्ति उनकी वर्णन करते हैं। एक राजकन्याको श्रीअम्बरीपजी की भक्ति और प्रेम भाव सुनके बड़ा आनन्द हुआ, उसके हृदय में यह भाव उत्पन्न हुआ कि "ऐसा पति कर लेना चाहिये; जो भाग्यशालिनी ऐसे भक्तराज की दासी हो वह धन्य है" यों विचार कर, निशंक हो, उसने अपने पितासे कहा कि मैंने श्री६अम्बरीपजी को पति मान लिया, "वरौंताहि न तु रहौं कुमारी"; "आप मेरा विनय मान के राजा को एक पत्रिका लिख दीजिए।" कन्या के पिताने पत्र लिखके एक ब्राह्मण के हाथ दिया । ब्राह्मण ने, वह पत्र ले, बड़ी शीघ्रता से उस पुरी में जा, महाराज (श्रीअम्बरीषजी) को दिया । महाराज ने पत्र पढ़ के कहा कि "उसका नवीन अभिलाप BRECAMAREL RSS- . .

५५123 भक्तिसुधास्वाद तिलक १०१ मैंने भली भांति जाना, परन्तु मैं स्त्री को कैसे ग्रहण करूं? क्योंकि मेरे तो सैकड़ों रानियां घर में बैठी हैं और मुझको उनसे बात तक करनी नहीं भाती॥ चौपाई। "उमा!रामसुभाव जिनजाना । तिनहिं भजन तजि,भाव न आना" "मेरा मन तो केवल भगवत सेवा ही में रंग गया है। यह बात आप जाके राजकन्या से कह दीजिये।" (५३)ीका | कवित्त । ( 380) कहो नृपसुतासो जु कीजिये यतन कौन? पौन जिमि गयो आयो काम नाहीं विया को । फेरिकै पठायो, सुख पायो मैं तो जान्यों वह बड़े धर्मज्ञ, वाके लोभ नाही तिया को ॥ वोली अकुलाइ मन भक्ति है ही रिझाइ लियो, कियो पत्ति, मुख नहीं देखों और पिया कौ । जाइ के निशंक यह वात तुम मेरी कही, “चेरी जो न करौ तौ पैलेवो पाप जिया को" ॥४४॥ (५८५) वार्तिक तिलक। ब्राह्मण ने आके राजकन्या से सब वार्ता सुना के कहा कि "क्या यत्न किया जाय ? मैं पवन के समान वेग से गया और आया पर कार्य कुछ भी (गुंजा के बीया भर भी ) न हुआ ! राजकन्या ने कहा कि “उनके तीव्रतर वैराग्य की अनुपम व्याख्या सुनके मुझको बड़ाही आनन्द हुआ; मैं जानती हूं कि वे बड़े ही धर्मज्ञ हैं तथा उनके शुद्ध अन्तः करण में भक्ति लता ऐसी सघन फैली हेकि स्त्री आदिक की चाह के अड्कुर की जगह रही नहीं है।" इतना कहने के साथही साथ भक्तराज के स्नेह से व्याकुल होके वह सुशीला फिर वोलउठी कि "उनकी भगवद्भक्ति ही ने मेरे अंतःकरणको आकर्षण करके मुझे ऐसा रिझा लिया है कि मैं उनको अपना पति मान चुकी हूं। और अब दूसरे पुरुपका मुँह में देखनेवाली नहीं। आप फिर जाके निःशंक कहिये कि 'जो आप अपने चरण की चेरी न कीजियेगा तो मेरे देह त्याग का पाप लीजिये' में उनके विन अपने प्राण नहीं रखने की RRIGANGACEBCAMSCR:

Reck C CLICK CASCRIGANA श्रीभकमाल सटीका को ओपती अर्थात् चमाचम प्रेमप्रभामय कर देती है; वह प्रेमानन्द कुछ कहे विना किसी प्रकार से रहा नहीं जाता। राजा के वचन सुनते ही रानी ने वीणा लेके फिर सरस स्वर अलाप करके गान तान को सँभाला; कि जिसके साथहा मन में श्यामसुन्दररूप अनूप का ध्यान आ गया और उसीमें मग्न हो गई। इस भौति, रानी राजा दोनों को ऐसी भक्तिरसरूपा प्रीति वढी कि जिसमें सारी रात पल सरीखी व्यतीत हो गई। आश्चर्यमय प्रोतिकी अलौकिक रीति की अनूठी घटनाएं ऐसीही विलक्षण हैं, कि जिसमें नींद आलस भूख इत्यादि चाधावों का तो कहनाही क्याहै,जागरित स्वप्न सुपुप्त अवस्था पर्यन्त भी अपनार विरादर देखकर अन्तःकरण और वाह्य इन्द्रियों से अपना शासन आपही उठा लेती हैं। (५६) टीका । वित्त । (७-४) बात सुनो रानी और, राजा गए नई ठौर, भई सिर मोरे, अब कोने बाकी सर है । हमहूं लै सेवा करें, पति मति वश करें, धरेंनित्य ध्यान, विषय बुद्धि राखी धर है ।। सुनिकै प्रसन्न भए अति अम्बरीप ईसलागी चोफ़, फेल गई भक्ति घरघरहै । वनै दिन दिन चाव,ऐसोई प्रभाव कोई, पलटे सुभाव होत आनँद को भर है ॥ ५० ॥ (५७६) वार्षिक तितक। यह वृत्तान्त और सब रानियों ने सुना, कि नई रानी के समीप में जाके प्रभु का नाम गुण गान सुनते २ राजाने आज रात्रिभर, बिता दिया; अतएव वह तो अव सवकी शिरोमणि हो गई, अब उसकी समानता हम सब कैसे कर सकती हैं। तब सबों ने यह विचारा कि महाराज यदि श्रीभगवनसेना भकिही से प्रसन्न होते हैं तो हम सव भी क्यों न भगवतसेवा करके प्राणपति को अपने वश करलें। सब गनियों ने ऐसा ही किया विषयात्मक वुद्धिको अलग रखके केवल भगवतसेवा पूजा गुणगान और रूप अनूपके ध्यानमें ही दिन रात विताने लगीं। उन सबों की भक्ति को भी उनके स्वामी श्रीअम्ब- रीपजी सुनके बड़े ही प्रसन्न हुए । और उन सब रानियों के हरि- मन्दिरों वैसा ही आनन्द देने लगे। CANCHORE . न , 10 भक्तिसुधास्वाद तिलक। पहुंचे तब देखते क्या है कि सानुरागा सुन्दरी अपने शरीर की सुधि भूल के प्रेमरसरंग में मग्न है, और उसके नेत्रों से प्रेमानन्द जल की अविच्छिन्न वर्षा हो रही है; वीणा बजा के झीने स्वर से प्रभु का नाम यश गाके प्राणप्रिय को रिझा रही है। यह दशा ज्यों ज्यों देखते हैं त्यों त्यों श्रीश्रम्बरीषजी के मन में यह दशा तथा प्रीतिदशावतीरानी अत्यन्तही प्रियलगती। महाराज मनमें कहते हैं कि यह घडीधन्य है। रा० क० "कोउ लै वीन नवीन सुरनते, मनहु वशीकर जाएँ। कोउ मृगनयनी कोकिलवयनी, पंचम राग अला।" श्लोक. "नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च । मद्भका यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि, नारद !॥ प्रेम सुख के लालच से द्वार पर ठहरा नहीं गया, तव रानी के पासही जा खड़े हुए। “हरि ते अधिक गुरुहि जिय जानी" के श्राशय ने, प्रेम निमग्न रानी की सुरति को श्रीसेवा से खींच के, भक्तराज के सन्मुख कर दिया; रानी ने देखा कि मेरे हरि (पति) हितोपदे- शक गुरु, राजा, पासही खड़े हैं। इससे उनके आदर के निमित्त उठ खड़ी हुई। (५% ) टीका । कवित्त । (७८५) वैसेही बजाओ वीन ताननि नबीन लैकै, झीन सुर कान परे,जाति मति खोइये। जैसे रंग भीजि रही, कही सो न जाति मोपे, ऐपै मन नैन चैन कैसे करि गोइये॥करिकै अलाप चारो फेरिकै सँभारि तार, आइगयो ध्यान रूप ताहि मांग भोइये। प्रीति रसरूप भई, राति सब बीति गई,नई कछुरीति अहो ! जामें नहिं सोइये ॥४६॥(५८०) वार्तिक तिलक । तव राजा ने कहा कि “इस सन्मान को इस घड़ी जाने दो; जैसे चीन बजाती रही हो, वैसेही वजा के नए तान लेके मधुर स्वर से स्वामी के यश गान करो; क्योंकि उस श्रवणामृत के सुने विनामेरी मति विकल हुआ चाहती है ॥" रानी जैसे अनुरागरंग में मग्न हो रही है, सो दशा मुझसे कही नहीं जासकती, परन्तु ध्यान से देखते ही मन तथा मानसिक नेत्रों SELECtactactuaCHECCCCCESC CRICAGGROCCARRECENERACIAL श्रीभक्तमाल सटीक। १०२ दो० कै अपनावहिं मोहि वे, के में त्यागौं देह । भवशिरोमणि नृपति ते, कहेहुविप्रवर ! नेह॥" (५२) टीका । कवित्त । (७८६) कही विप्र जाय, सुनि चाय भहराय गयो, दयोले खड़ग "यासों फैरी फेरि लीजिये ।" भयो जू विवाह उत्साह कहूं मात नाहिं; आई पुर अम्बरीष देखि छवि भीजिये ॥ कह्यो “नव मन्दिर में झारिक बसेरो देवो, देवो सब भोग विभौ, नाना सुख कीजिये। पूरब जनम कोऊ मेरे भक्ति गन्ध हुती, याते सनवन्ध पायो यहै मानि धीजिय" ॥४५॥ (५८४) बार्तिक तिलका ब्राह्मण ने फिर जाके श्रीअम्बरीषजी से राजकन्या की प्रीति प्रतीति प्रणय पातिव्रत्य का पन और प्राण त्याग का संकल्प पर्यन्त कहा । राजा ने, ऐसा सप्रेम चाव सुन, धर्म संकष्ट से अधीर हो, अपना खग दिया, कि “इसी से भावरी फिरा लीजियेगा॥" [राजा ने खड्ग इस कारण से दिया कि क्षत्रियों का शस्त्रशास्त्र में उनका अंग ही माना गया है ॥ इस प्रकार से विवाह होजाने पर राजकन्या का आनन्द तन मन में अँटता नहीं था। बड़ेही उत्साह से मन्त्री वगों के साथ पुर में आईं। राजसुता तथा श्रीसम्बरीपजी दोनों श्री युगल सरकार के भक्तिरस माधुरी से छके हुए अन्योन्य छवि देख के श्रीप्रभु प्रेम में मग्न हो गए । महाराज ने आज्ञा दी कि "नए मन्दिर को झाड़ वहार, स्वच्छ कर, रानी को निवास देके, सब भोग सामग्री दियाजावे, कि वे नाना प्रकारके सुख भोगें । जाना जाताहै कि पूर्वजन्म की मेरी इनकी कोई भक्ति सम्बन्धी विमल वासना थी; इसी हेतु से मेरा इनका सम्बन्ध हुआ; और ऐसाही अनुमान कर के इनका स्वीकार किया गया ।" (५५) टीका | कवित्त । (७:- रजनी के सेस पति भौन में प्रवेस कियो, मन्दिर के भाइये । वाहिरी टहल पान चौका Rad , भकिसुधास्वाद तिलक। १०३ कौन जाय, जामें होत ना लखाइये ॥ श्रावतही राजा देखि लगे न निमेप क्यों हूं कौन चोर आयो मेरी सेवा लै चुराइये । देखी दिन तीनि, फेरि चीन्हि के प्रवीन कही, “ऐसो मन जोपै प्रभु माथे पधराइये" ॥ ४६॥ (५८३) वार्तिक तिलक। 'भकिवती रानी अपने निवास में रहने लगी। एक दिन कुछ रात रहते हुए अकेली केवल अपने प्रिय प्रेम ही को संग लेके पति के पूजामहल में प्रवेश करके भगवलमन्दिर के समीप आके वाहर की सेवा टहल किये अर्थात् पूजा के पार्षद मांज के चौका लगाके, उस सेवा सुख के अनुभवसे अति प्रसन्नतापूर्वक चली आई, जिसमें किसी को लखाई न पड़े। तो अब इसमें सेवा करनेवाली कौन रानी कही जावे ? तदनन्तर श्रीभक्तराजाजी ने, आ के देखा कि वाह्य कैंकर्य (पार्षद चौका) कोई कर गयाहै। इससे उनको ऐसी चंचलता हुई कि उनके मनरूपी नेत्र में स्थिरताका निमेषभीनहीं लगता था। विचारने लगे कि यह कौन चतुरचोर माके.मेरी सेवा सम्पत्ति चुरा ले गया?॥ इस प्रकार तीन दिन पर्यन्त देखा; चौथे दिन उसी समय परम प्रवीण राजा छिप के बैठे, और देख के भनिवती रानी को पहिचान के कहा कि "जो तुम्हारे मन में ऐसीही सेवा की उत्कंठा और भक्ति है तो अपने मनभावन को अपने निज भवन में ही क्यों नहीं पधरा लेती हौ ? जिसमें तुम्हारेही सीस पर सेवा सुख भार रहे ॥" लोक० "पुस्तक, माला, असनो, वसनो। ठाकुर वटुआ, अपनो अपनो ॥ (५६) टीका | कवित्त । (७८७) लई वात मानि, मानो मन्त्र ले सुनायो कान; होत ही विहान, सेवा नीकी पधराई है। करति सिंगार, फिर पुही निहारि रहे, लहै नहीं पार, हग झरी सी लगाई है ॥ भई चढ़वार, रागभोगसों अपार भाव, भक्ति विस्तार रीति पुरी सब छाई है । नृपह सुनत अव लागि चोप देखिये की; पाएततकाल मति अतिअकुलाई है॥४७॥(५८२) CROSAGARLAHURESS A EURUSHARE SAKSIR-CAS श्रभिक्रमाल सटीका - दो. "के अपनावहिं मोहि वे, के मैं त्यागौं देह । भवशिरोमणि नृपति ते, कहेहुविप्रवर! नेह॥" (५४ ) टीका | कवित्त । (७८६) कही विप्र जाय, सुनि चाय भहराय गयो, दयोले खड़ग "यासों फैरी फेरि लीजिये।" भयो जू विवाह उत्साह कहूं मात नाहिं आई पुर अम्बरीष देखि छवि भीजिये ॥ कह्यो "नव मन्दिर में झारिकै बसेरो देवो, देवो सब भोग विभौ, नाना सुख कीजिये । पूरब जनम कोऊ मेरे भक्ति गन्ध हुती, याते सनवन्ध पायो यहै मानि धीजिय" ॥४५॥ (५८४) दानिक तिलक। ब्राह्मण ने फिर जाके श्रीअम्बरीषजी से राजकन्या की प्रीति प्रतीति प्रणय पातिव्रत्य का पन और प्राण त्याग का संकल्प पर्यन्त कहा । राजा ने, ऐसा सप्रेम चाव सुन, धर्म संकष्ट से अधीर हो, अपना खड्ग दिया, कि "इसी से भांवरी फिरा लीजियेगा॥" [.राजा ने खड्ग इस कारण से दिया कि क्षत्रियों का शस्त्रशास्त्र में उनका अंग ही माना गया है ] ॥ इस प्रकार से विवाह होजाने पर राजकन्या का आनन्द तन मन में अँटता नहीं था। बड़ेही उत्साह से मन्त्री वर्गों के साथ पुर में आईं। राजसुता तथा श्रीअम्बरीपजी दोनों श्री युगल सरकार के भक्तिरस माधुरी से छके हुए अन्योन्य छवि देख के श्रीप्रभु प्रेम में मग्न हो गए । महाराज ने आज्ञा दी कि "नए मन्दिर को झाड़ वहार, स्वच्छ कर, रानी को निवास देके, सब भोग सामग्री दियाजावे, कि वे नाना प्रकारके सुख भोगें। जाना जाताहै कि पूर्वजन्म की मेरी इनकी कोई भक्ति सम्बन्धी विमल वासना थी; इसी हेतु से मेरा इनका सम्बन्ध हुआ; और ऐसाही अनुमान कर के इनका स्वीकार किया गया ॥" (५५) टीका । कवित्त । (७) रजनी के सेस पति मौन में प्रवेस कियो, लियो प्रेम साथ, ढिग मन्दिर के शाइये । वाहिरी टहल पान चौका करि रीमि रही, गही RISHRA भक्तिसुधास्वाद तिलक। कौन जाय, जामें होत ना लखाइये ॥ श्रावतही राजा देखि लगे न निमेष क्यों हूं कौन चोर आयो मेरी सेवा लै चुराइये। देखी दिन तीनि, फेरि चीन्हि के प्रवीन कही, "ऐसो मन जो प्रभु माथे पधराइये" ॥ ४६॥ (५८३) वार्निक तिलक। भक्तिवती रानी अपने निवास में रहने लगी । एक दिन कुछ रात रहते हुए अकेली केवल अपने प्रिय प्रेम ही को संग लेके पति के पूजामहल में प्रवेश करके भगवतमन्दिर के समीप आके बाहर की सेवा टहल किये अर्थात् पूजा के पार्षद मांज के चौका लगाके, उस सेवा सुख के अनुभवसे अति प्रसन्नतापूर्वक चली आई, जिसमें किसी को लखाई न पड़े। तो अब इसमें सेवा करनेवाली कौन रानी कही जावे ? तदनन्तर श्रीभक्तराजाजी ने, आ के देखा कि वाह्य कैंकर्य (पार्षद चौका) कोई कर गया है। इससे उनको ऐसी चंचलता हुई कि उनके मनरूपी नेत्र में स्थिरताका निमेषभीनहीं लगता था। विचारने लगे कि यह कौन चतुरचोर पाके.मेरी सेवा सम्पत्ति चुरा ले गया?॥ इस प्रकार तीन दिन पर्यन्त देखा; चौथे दिन उसी समय परम प्रवीण राजा छिप के बैठे, और देख के भनिवती रानीको पहिचान के कहा कि “जो तुम्हारे मन में ऐसीही सेवा की उत्कंठा और भक्ति है तो अपने मनभावन को अपने निज भवन में ही क्यों नहीं पधरा लेती हो ? जिसमें तुम्हारेही सीस पर सेवा सुख भार रहे ॥" लोक० “पुस्तक, माला, असनो, वसनो । ठाकुर बटुआ, अपनो अपनो ॥ (५६ ) टीका । कवित्त । (७७) लई वात मानि, मानो मन्त्र लै सुनायो कान; होत ही विहान, सेवा नीकी पधराई है। करति सिंगार, फिर आपुही निहारि रहे, लहै नहीं पार, दृग झरी सी लगाई है ॥ भई बढ़वार, राग भोग सो अपार भाव, भनि विस्तार रीति पुरी सब छाई है। नृपहू सुनत अब लागि चोप देखिवे की; पाए ततकाल मति अतिअकुलाई है॥४७॥(५८२) HAR 1-1-56NS श्रीभक्तमाल सटीक। जाकर जापर वात्तिक तिलक। श्रीभक्तराज के स्वच्छ अंतःकरण से प्रीतियुक्त निकले हुए ऐसे अनुपम वचन सुनते ही प्रेममूर्ति रानी ने महामुदित मन में इस प्रकार मान लिया कि मानो गुरु मन्त्र ही कानमें सुना दिया गयाहै । प्रातःकाल होते ही उनने भगवत के दिव्य अर्वा विग्रह नीके प्रकार से उत्सव पूर्वक विराजमान किया । चौपाई। सत्य सनेहू । सो तेहि मिलै न कछु सन्देहू ॥ फिर अब क्या कहनाहै, अपने हाथों से सप्रेम शृङ्गार करके पुनि उस छवि को आपही अवलोकन करती हुई चन्द्रचकोरक्त एक टक रहजाती, शोभासिन्धु श्रीप्रभु की शोभा का पार नहीं पातीथी; उसके नेत्रों से प्रेमानन्द जल की झड़ी सी लग जाती थी। सेवा राग भोग से अपार भाव हुआ। इस भकिरसिका रानी की प्रीति प्रतीति रीति भक्ति की ऐसी अभिवृद्धि हुई कि संपूर्ण नगर में सुकीर्ति छा गई। यहां तक कि राजा ने भी सुना तव उनको भी प्रेमवती के प्रेम- वर्द्धकप्रभु के दर्शन की अतिशय चाह उत्पन्न हुई; वरंच दर्शन विना व्याकुल होके ततकाल चलही तो दिया । (५७ ) टीका । कविच । (७-६ ) हरे हरे पांव धरै, पौरियानि मने कर, खरे अरवरै, कब देखौं भागभरी को । गए चलि मन्दिर लौं, सुन्दरी न सुधि अङ्ग, रङ्ग भीजि रही, हग लाइ रहे झरी को ॥ वीन ले वजावे, गावै, लालन रिझाव, त्यों त्यो अति मन भावे, कहैं धन्य यह घरी को। द्वार पै रह्यो न जाय, गए ढिग लल वाय, भई उठि ठादि, देखि राजा गुरु हरी को॥४८॥ (५८१) पार्तिक तिलक । जब निकट पहुंचे तब धीरे धीरे पांव रखते और पौडियों को अर्थात् वृद्ध द्वाररक्षकों तथा द्वार रक्षिणीयों को रसे रसे निवारण करते, कि रानी को जाके जताओ मत । और अत्यन्त अकुला रहे हैं कि उस भनि भाग्यपूर्ण को मैं कब देखू । यों ही जव मन्दिर के समीप जा .

** REAL भक्तिसुधास्वाद तिलक । पहुँचे तब देखते क्या है कि सानुरागा सुन्दरी अपने शरीर की सुधि भूल के प्रेमरसरंग में मग्न है, और उसके नेत्रों से प्रेमानन्द जल की अविच्छिन्न बर्षा हो रही है। वीणा बजा के झीने स्वर से प्रभु का नाम यश गाके प्राणप्रिय को रिझा रही है । यह दशा ज्यों ज्यों देखते हैं त्यो त्यों श्रीअम्बरीषजी के मन में यह दशा तथा प्रीतिदशावतीरानी अत्यन्तही प्रियलगतीहैं। महाराज मनमें कहते हैं कि यहघडीधन्यहै। रा० क० "कोउ लै चीन नवीन सुरनते, मनहु वशीकर जाएँ कोउ मृगनयनी कोकिलवयनी, पंचम राग अला।" श्लोक० " नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च । मद्भका यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि, नारद !॥ प्रेम सुख के लालच से द्वार पर ठहरा नहीं गया, तब रानी के पासही जा खड़े हुए। “हरि ते अधिक गुरुहि जिय जानी" के भाशय ने, प्रेम निमग्न रानी की सुरति को श्रीसेवा से खींच के, भक्तराज के सन्मुख कर दिया; रानी ने देखा कि मेरे हरि (पति) हितोपदे- शक गुरु, राजा, पासही खड़े हैं। इससे उनके आदर के निमित्त उठ खड़ी हुई॥ (५८) टीका । कवित्त । (७८५) वैसेही वजाओबीन ताननि नवीन लैकै, झीन सुर कान परै,जाति मति खोइये । जैसे रंग भीजि रही, कही सो न जाति मोपै, ऐपै मन नैन चैन कैसे करि गोइये ॥ करिकै अलाप चारो फेरिके सँभारि तान, आइगयो ध्यान रूप ताहि मांग भोइये। प्रीति रसरूप भई, राति सब वीति गई,नई कछुरीति अहो ! जामें नहिं सोइये ॥४६॥(५८०) वार्तिक तिलक। तब राजा ने कहा कि “इस सन्मान को इस घड़ी जाने दो; जैसे चीन वजाती रही हो, वैसेही वजा के नए तान लेके मधुर स्वर से स्वामी के यश गान करो; क्योंकि उस श्रवणामृत के सुने विनामेरी मति विकल हुआ चाहती है । रानी जैसे अनुराग रंग में मग्न हो रही है, सो दशा मुझसे कही नहीं जासकती, परन्तु ध्यान से देखते ही मन तथा मानसिक नेत्रों Recisc+sotect Scotos " " GUST श्रीभकमाल सटीक। , को ओपती अर्थात् चमाचम प्रेमप्रभामय कर देती है; वह प्रेमानन्द कुछ कहे बिना किसी प्रकार से रहा नहीं जाता। राजा के वचन सुनते ही रानी ने वीणा लेके फिर सरस स्वर अलाप करके गान तान को सँभाला; कि जिसके साथहा मन में श्यामसुन्दररूप अनूप का ध्यान आ गया और उसीमें मग्न होगई। इस भांति, रानी राजा दोनों को ऐसी भनिरसरूपा प्रीति बढ़ी कि जिसमें सारी रात पल सरीखी व्यतीत हो गई। आश्चर्यमय प्रीतिकी अलौकिक रीति की अनूठी घटनाएं ऐसीही विलक्षण हैं, कि जिसमें नींद आलस भूख इत्यादि वाधावों का तो कहनाही क्याहै,जागरित स्वप्न सुपुप्त अवस्था पर्यन्त भी अपनारविरादर देखकर अन्तःकरण और बाह्य इन्द्रियों से अपना शासन आपही उठा लेती हैं। (५६) टीका | कवित्त । (७-४) वात सुनी रानी और, राजा गए नई ठौर, भई सिर मोरे, अब कॉन वाकी सर है । हमहूं लै सेवा करें, पति मति वश करें, धरैंनित्य ध्यान, विषय वुद्धि राखी धर है ॥ सुनिकै प्रसन्न भए अति अम्बरीप ईसलागी चोफ़, फैल गई भनि घरधरहै । बढ़े दिन दिन चाव,ऐसोई प्रभाव कोई, पलटै सुभाव होत आनंद को भर है ॥ ५० ॥ (५७६) वातिक तिलक। यह वृत्तान्त और सब रानियों ने सुना, कि नई रानी के समीप में जाके प्रभु का नाम गुण गान सुनते २ राजाने आज रात्रिभर, विता दिया; अतएव वह तो अव सवकी शिरोमणि हो गई, अब उसकी समानता हम सब कैसे कर सकती हैं। तब सबों ने यह विचारा कि महाराज यदि श्रीभगवतसेना भकिही से प्रसन्न होते हैं तो हम सब भी क्यों न भगवतसेवा करके प्राणपति को अपने वश करलें सब रानियों ने ऐसा ही किया विषयात्मक बुद्धिको अलग रखके केवल भगवतसेवा पूजा गुणगान और रूप अनूपके ध्यान में ही दिन रात विताने लगीं। उन सबों की भक्रि को भी उनके स्वामी श्रीअम्ब- रीपजी सुनके बड़े ही प्रसन्न हुए। और उन सब रानियों के हरि- मन्दिरों में भी जा जा के उनको वैसाही आनन्द देने लगे। " , , ॐॐ +UAR भक्तिसुधास्वाद तिलक। महाराज की यह रीति समस्त पुरवासियों ने सुनी; तव तो नगर भर के लोगों को भगवद्भक्ति में अतिशय भाव चाव उत्पन्न हुआ और घर घर में भक्ति कल्पलता फैल फूल के फलयुक्त हुई । इस प्रकार महाराज श्रीअम्बरीपजी के घर नगर तथा देश में दिन दिन प्रति प्रेमभाव भक्तिकी वृद्धि और उन्नति हुई। देखिये, परमप्रेमवती एक रानी की भक्ति के प्रभाव से ही, सव रानियों वरंच सम्पूर्ण नगर- वासियों का स्वभाव संसार से पलट के प्रभु में लग गया । और सर्वत्र भगवत प्रेमानन्द छा गया। सत्संग ऐसा पदार्थ है ॥ (२४) श्रीविदुरानीजी और ( २५) श्रीविदुरजी। (६०) टीका । कवित्त । (७८३) न्हात ही विदुर नारि, अंगन पखारि करि; आइ गए द्वार कृष्ण वोलि के सुनायो है । सुनतही स्वर, सुधि डारी ले निदरि, मानो राख्यो मद भरि, दौरि आनिकै चितायो है ॥ डारि दियो पीन पट, कटि लपटाइ लियो, हियो सकुचायो, बेप वेगिही बनायो है । बैठी. ढिग आइ, केरा छीलि छिलका खवाइ; आयो पति, खीभयो, दुःख कोटि गुनो पायो है ॥ ५१ ॥ (५७८) वार्तिक तिलको महाभारत होने के पूर्व श्रीकृष्ण भगवान् पाण्डवों की ओर से मिलाप की वार्ता करने को दुर्योधन के पास गए; पर उसने नहीं माना; इससे उसके घर भोजन भी नहीं किया। श्रीविदुरजीके गृह आए, उस समय श्रीविदुरजी की स्त्री, दूसरे वस्त्र के अभाव से विवस्त्र हो अंगोको धो२ स्नान कररही थीं। द्वारपर आके श्रीकृष्ण भगवान् ने महामधुर स्वरसे पुकारा;श्रीविदुरानीजी आपका वह मधुर स्वर सुनतेही सुध बुधभूलगई, क्योंकि वह स्वर मानो प्रेम से भरा हुआ था; दौड़ती हुई आके किवाड़ोंको खोलके दर्शन किया। श्रीयादवेन्द्रजीभी उनको प्रेमोन्मत्त वस्त्रहीन देखके अपना पीताम्बर शीघही आपको उढ़ा दिया; जिसको आपने अपनी कटि में लपेट लिया और संकोचयुक्त हो, शीघ्रता से अपने वेपको सँभाल लिया। -5 .

WARNI श्रीभक्तमाल सटीक। श्रीकृष्ण भगवान् ने कुछ भोजन मांगा । आप केले ला, पास बैठ, केले को छीलने लगी, पर प्रेम तथा हर्प से विह्वल होके, छिलकों ही को तो खिलाती जाती थीं और सार को फेंकर देती थीं। भक्तवत्सल भगवान् प्रेम के स्वाद में छके छिलकों ही को बड़े चाव से खाते जाते थे; इतने में श्रीविदुरजी के इस कौतुक को देख अपनी धर्मपत्नी पर बहुत झिझलाए; तब सचेत हो अपने व्यतिक्रम को समझ के श्रीविदुरानीजी ने अत्यन्त दुःख पाया ॥ दो० अहह ! भइउँ मैं वावरी ! रही न तनु सुधिनेकु। ऐसी सुधि भूली, कि नहि छिलका सार विवेकु ॥ (६१) टीका । कवित्त (७८२) प्रेम को विचार आपु लागे फल सार देन, चेन पायो हियो, नारि बड़ी दुखदाई है । वोले रीमि श्याम, तुम कीनो-बड़ो काम, ऐपै स्वाद अभिराम वैसी वस्तुमें न पाई है ॥ तिया सकुचाय, कर काटि डारों हाय प्राणप्यारे को खवाई छीलि छीलिका न भाई है। हित ही की बातें दोऊ, पार पावै नाहि, कोउ, नीके के लड़ावे, सोई जाने, यह गाई है ॥५२॥ (५७७) वार्तिक तिलक। प्रिय पाठक ! प्रेम के प्रवल प्रभाव को विचार कीजे । अथवा, विदुरजी अपनी धर्मपत्नी के प्रेम प्रमादको विचार के, प्रभु को फल का सारांश खिलाने लगे, तव उनके हृदय में आनंद आया; और मन में वे यह कहने लगे कि इसने प्रेमसे विक्षिप्त होके यह दुःखप्रद कार्य किया। श्यामसुन्दरजी ने प्रसन्न होके कहा कि "आपने काम तो बहुत अच्छा किया कि केलों का सारांश खिलाया; परंतु न जानें क्या कारण है कि जैसा उन छिलकाओं में अत्यन्त सुन्दर स्वाद मुझे मिलता था वैसा इस सारांश में नहीं प्राप्त हुआ। श्लो० पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भनय प्रयच्छत्ति तदहं भन्न ग्रुपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ।। , न ****** भक्तिसुधास्वाद तिलक। १०४ अभी, अभी, दुर्योधन के घर अनेक पटरस व्यंजनादि का त्याग किये हुए चला आता हूं। उधर श्रीविदुरानीजी अतिशय संकोचको पाके पश्चात्ताप करनेलगी कि, "हाय ! मैं तो इन हाथों को काट डालं, जिन हाथों से प्राणप्रियं को छिलके खिलाए । लालन को छिलके कैसे प्रिय लगे होंगे? । देखिये ! श्रीविदुरानीजी तथा श्रीविदुरजी का छिलका और सार खिलाना, ये दोनों ही बातें प्रेम की ही हैं; तथापि प्रेमरूपी सागर ऐसा अपार है कि कोई उसका पार नहीं पासकता; हां, जो इस प्रेम में परायण होके प्रेमग्राहक प्रभुको लाड़ लड़ावे, प्रेम करे, सोई इस अनुराग सिन्धु की गम्भीरता तथा अपारता को कुछ जाने; अपने तो, आप सवकी कृपा से, केवल गानमात्र कर दिया हे ।। (२६) श्रीसुदामाजी (दामनजी) (६२) टीका | कवित्त । (७८१) बड़ो निसकाम, सेर चूना हू ने धाम, ढिग आई निज भाम; प्रीति हरि सो जनाई है। सुनि सोच पस्यो हियो खरो अरवस्यो, मन गाढ़ो लेकै कस्यो, बोल्यो "हांजू सरसाई है"। "जाबो एक वार, वह बदन निहार आवो, जोपै कछु पावो, ल्यावो, मोको सुखदाई है"। "कही भली बात, सात लोक में कलंक है है, जानियत याही लिये कीन्ही मित्रताई" ॥ ५३॥ (५७६) वार्तिक तिलक। श्रीकृष्ण भगवान् के मित्र श्रीसुदामाजी वड़े निष्काम भक्त थे; यहांतक कि घर में सेरभर आटा भी न रहता था। एक दिन उनकी धर्मपत्नी श्री सुशीला देवी, समीप में आके, कहने लगी कि "सुना है कि श्रीलक्ष्मीपति द्वारकाधीश श्रीकृष्णचन्द्रजी से और आपसे मित्रता है।" यह सुन, श्रीसुदामाजी उसका प्राशय विचार के, हृदय में अत्यन्त घवड़ाकर सोच में पड़ गए; परन्तु फिर मनको हृढ़ करके वोले कि "हां, उनकी मेरी तो बड़ी सरस प्रीति है। इसपर ब्राह्मणी (उनकी स्त्री) ने कहा कि “एक वेर जाके अपने " REKER श्रीभक्तमाल सटीक। . , मित्रवर का मुखचन्द्र अवलोकन कर आइये; और यदि कुछ मिले तो लाइये कि वह मुझे बड़ा सुखदाई होगा।" भक्तजी ने उत्तर दिया कि "तुमने वात तो भली कही, परन्तु मुझको तमस्त लोकों में कलंक होगा कि इस अर्थार्थी भिक्षुक ब्राह्मण ने केवल द्रव्य ही के लालच से प्रभु से मित्रता की है ॥ दो० भजन विगाड़ी कामिनी, सभा बिगाड़ी कूर । भानि विगाड़ी 'लालची', केसर मिलगइ धूर ॥ १॥ एवमादि, इनने बहुत "नहीं, नहीं" किया; परन्तु-.. (६३) टोका । कपित्त । (७०) तिया सुनि कहै "कृष्णरूप क्यों न चहै ? जाय, दहै दुख प्रापही सो,” वचन सुनाए हैं। आई सुधि प्यारे की, विचारे, मति टारे सब, धारेपग,मगभूमि "द्वारावती" आएहैं॥देखिकै विभूति, सुख उपज्यो अभूत कोऊ, चल्यो मुखमाधुरी के लोचन तिसाए हैं। डरपत हियो, ड्योढ़ी लांघि, मन गाढ़ो कियो, लियो कर गहि चाह तहां पहुँचाए हैं॥५४॥(५७५) वार्तिक तिलका इनका उत्तर सुन, इनकी स्त्री ने कहा कि "जाके केवल अपने प्रिय मित्र के रूप अनूप का दर्शनमात्र क्यों नहीं करते?" और ऐसा प्रयाण वचन भी सुनाया कि "भगवत् के दर्शनही से दारिद्रयादि सब दुःख आपही आप भस्म हो जाते हैं।" श्रीसुदामाजी को प्राणप्यारे मित्र के रूप का ध्यान नागया; तब विचार करके लोसादिकों के उपहास की शङ्का को चित्त से हटाके, श्रीकृष्ण भगवान के दर्शन को सानुराग चले; प्रेममद में छके भूम झूम पग धरते, मिलन सुख का मंजुमनोरथ करते हुए श्रीहरिकृपा से अति शीघ्र श्रीद्वारकाजी में आ पहुँचे । परम प्रिय प्रभु का ऐश्वर्या विभूति देखके मनमें कोई आश्चर्य सुख उत्पन्न हुआ, और आगे बढ़े ॥ 2. मित्र मुखचन्द्र सुधा पान के हेतु नेत्र चकोर अतिशय प्यासे हैं; इससे आप अत्यन्त आतुर होरहे हैं; हृदय में किसी के रोक देने का occaste भकिसुधास्वाद तिलक। भय भी हो रहाहै; परन्तु मनको दृढ़ करके, राजसदन पर आ विप्रजी ने डेवढ़ियों को उल्लंघन किया,मानो मिलनकी चाहरूपा प्रतिहारी ने इनका हाथ गहके (थाभ के) इनको श्रीकृष्ण महाराज के पास पहुँचा दिया। "जाकी सुरति लगी है जहां । कहै कबीर सो पहुँचै तहां ॥ (६४) टीका | कवित्त । (७७६) देख्यो श्याम आयो मित्र, चित्रवत रहे नेकु; हितको चरित्र, दौर रोइ गरे लागे हैं। मानो एकतन भयो, लयो ऐसे लाइ छाती, नयो यह प्रेम, छूटें नाहिं अंग पागे हैं ॥ आई दुवराई सुधि, मिलन छुटाई ताने; आने जल रानी, पग धोए भाग जागे हैं । सेज पधराइ, गुरु चरचा चलाइ,सुखसागरबुड़ाइ, आपु अति अनुरागेहैं ॥५५॥(५७४) चात्तिक तिलक। श्रीश्यामसुन्दरजी ने देखा कि मेरे मित्र आए, तव प्रेमानन्द की विचित्रता से कुछ काल तो अपनपो भूलके चित्रवत जहां के तहां रह गए; फिर दौड़के अति विह्वल होके मित्र के, चरित्र में पगे, नेत्रों में आंसू भर, सखा (सुदामाजी) को अपने कण्ठ में लपटा, और इस प्रकार से अपने हृदय में लगा लिया, कि मानो श्याम-सुदामा एकही मूर्ति हो गए; एवं, इस लोकोत्तर प्रेम के वश हो के परस्पर अंग ऐसे पग गए कि छुड़ाए से दोनों छूटते नहीं। फिर श्रीश्यामसुन्दरजी को यह सुधि अगई कि “मेरे मित्र अति दुर्बल हैं,सो कही इनको क्लेश न हो"; तव आपने छोडदिया । हाथ में हाथ मिलाए हुए रंगमहल में लाए; श्रीसक्मिणीजी जल और थार लाई, आपने अपने करकमलों से उनके चरणकमल धोए; और कहा कि आज मेरे धन्य भाग्य हैं। सवैपा। "ऐसे बेहाल चेवाइन सों भर कंटक जाल गुंधे पग जोए । हाय सखा! दुख पाए महा, तुम आए इतै न कितै दिन खोए । देखि सुदामा की दीन दशा करुणा करिकै करुणामय रोए। , . . PR** ११२ श्रीभक्तमाल सटीक । पानीपरातको हाथ/एनहि,नैननकेजलसों पगधोए॥"(श्रीनरोत्तमकवि) ले जाके निज दिव्य सेज पर विराजमान करके, कुशल पूछ,' श्रीगुरुगृह में जो इकट्टे पढ़ते थे सो उन दिनों के चरित्रों की चरचा चलाके, आनन्द के सागर में इनको मग्न करदिया; और आप भी इनके अनुराग में मग्न होगए ॥ (६५) टीका । कवित्त । (७७% ) चिउड़ा छिपाए कांख, पूछे कहा ल्याए मोको ? अति सकुचाए, भूमि तकें, दृग भीजे हैं। खैचि लई गांटि, मूठि एक मुख माझ दई, दूसरी हूं लेत स्वाद पाइ आपु रीझे हैं ॥ गयो कर रानी, "सुखसानी प्यारी बस्तु यह, पायो वांटि" मानों श्रीसुदामा प्रेम धीजे हैं । श्याम जू बिचारि दीनी सम्पति अपार, विदा भए, पैन जानीसार विठुरनि छीजे हैं ॥ ५६ ॥ (५७३) वार्तिक तिलक। आपने पूछा कि “सखे ! मेरे लिये क्या लाए हो ?" यह सुन श्रीसुदामाजी सकोच के वश होके पृथ्वी की ओर देखने लगे और इनकी आंखो में आंसू भर आए ॥ श्रीश्यामसुन्दरजीने देखा कि फटे कपड़े में एक छोटी सी गठरी वांगेहुए ये कांख में दबाए छुपाए हुए हैं; देखतेही उसको खींच के खोल देखा कि उसमें चिउड़े हैं। आप उसमेसे एक मुट्टी लेके शीघ्रता से श्रीमुख में डाल के चबाने, पुनः दूसरी मुट्ठी भी भर के पाने लगे, और मित्र की लाई वस्तु जान के उसमें अपूर्वस्वाद पा अत्यन्त रीझ के आपने तीसरी मुट्ठी भी भर ली; मानों उस चिउड़े को श्रीसुदामाजी के प्रेम का रूपही मानके ग्रहण करते हैं। श्रीरुक्मिणीजी महारानीने आपका करकंज पकड़के कहा कि "यहवस्तु प्रेमसुखसे सनीहुई आप अकेलेही सब न पा लीजिये,किंतु हम सर्वोका भागभीबांट दीजिये।" तव आपने मुट्ठी छोड़दी और उसको श्रीमती रुक्मिणीजीको देदिया। सत्यसंकल्प श्रीकृष्ण भगवान् ने उस चिउड़े को ग्रहण करके, विचार के, अपने मन ही से इनको अपार सम्पत्ति देदी, प्रत्यक्ष में कुछ न दिया; परन्तु इनने इस भेद को न जाना ॥ SIC X ३ भक्रिमुधास्वाद तिलक। श्रीसुदामाजी प्रिय मित्रका परम सत्कार पाते हुए (बहुन आग्रह करने से) सात दिन रहकर, बिदा हुए । श्रीमित्रवर के वियोगसे अतिशय दुःख पाते अपने ग्रह को लौट चले ॥ चौपाई। मिलत एक दारुण दुख देहीं । विठुरत एक प्राण हरिलेहीं॥ (६६) दीका । कपित्त । (७७७) आए निज ग्राम वह, अति अभिराम भयो, नयो पुर द्वारका सो, देखि मति गई है। तिया रंग भीनी संग सतनि सहेली लीनी, कीनी मनुहारि यो प्रतीति उर भई है ॥ वह हरि ध्यानरूप माधुरीको पान, तासों राखें निज प्रान, जाके प्रीतिरीति नई है । भोगकी नचाह ऐसे तनु निरवाह करें, ढरें सोई चाल सुखजाल रसमयी हे ॥५७॥ (५७२) पातिक तिलक। जब अपने गांव (सुदामापुर ) में आ पहुँचे तो देखते क्या है कि वह ग्राम अतिशय रमणीय होगया है यहांतक कि सब नवीन रचना. युक्त मानों साक्षात् द्वारका ही है । ऐसा देखते ही श्रीसुदामाजी की मति तो भ्रम में डूब गई॥ परन्तु इनकी धर्मपत्नीजी अपनी अटारीपर से इनको देखके परम अनुराग में भरी हुई भारती कलश चैवर आदिक सामग्रियों सहित प्रभुकी दीहुई सैकड़ों सहचरियों के साथ-साथ, सामने आके, भारती कर, प्रभु की कृपा से इन सब विभवों की प्राप्ति परम प्रिय वचनों से समझा के विश्वास कराके अपने कंचन भवन में लेगई। यद्यपि श्रीसुदामाजी ने सब प्रकार के विभव भोग पाए तथापि उसमें आशन न हुए। श्यामसु दर सखावरजी के उसी रूप अनूप का ध्यान और सुधामाधुरी का पान मन से करते, नवीन प्रोति रीति मैं पगेहुए, अपने प्राणों को रखते थे; इसी प्रकारसे अपने शरीर का निर्वाह करते, विषय भोगों से विरत रह के भक्ति प्रेमानन्दमयी रसभरी चाल से जीवनावधि पर्यन्त चलते रहे। चौराई। अमित बोध अनीह, मितभोगी। सत्यसार, कवि, कोविद, योगी॥ REAKIRCLEARCISCRENA , ARREAREKPsorcer 5ऊन , *SAKES श्रीभक्तमाल सटीक। दो० "गुणागार संसार दुख, रहित विगत सन्देह । तजि प्रभु चरण सरोज प्रिय, तिनके देह न गेह॥ श्लो० "युक्ताहारविहारस्य युक्नचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। वैराग्य की जय ! अनुराग की जय !! प्रिय पाठक ! कहां श्रीसुदामाजी का विमल चरित्र, और कहां इस दीन की असमर्थ लेखनी॥ २७) श्रीचन्द्रहासजी। (६७) टीका । कवित्त। (७७६) हुतो नृप एक, ताके सुत "चन्द्रहास" भयो; परी यो विपति,धाई ल्याई और पुरहै । राजा को दीवान, ताके रही घर आन,वाल आपने समान संग खेलै रसढुरहै॥भयो बहाभोज,कोई ऐसोई संयोग बन्यो, 'आए वै कुमार,जहां विप्रन को सुरहै । बोलि उठे सवै “तेरी सुताको जुपति यहै, हुवो चाहै जानी;" सुनि गयो लाजघुरहै ॥ ५८ ॥ (५७१) वात्तिक तिलक। केरलदेश का एक मेधावी नाम राजा था, उसके पुत्र "चन्द्रहास" हुए । उनके पिताको दूसरे राजा ने युद्धमें मार डाला, तव माता भी सती होगई; इस विपत्ति से एक दासी उनको लेके, कुन्तलपुर के राजा के प्रधानमन्त्री "धृष्टवुद्धि" के घर में रहने, और निज पुत्र करके इनको पालने लगी। जब चन्द्रहासजी पांच वर्ष के हुए, वह धाई भी मरगई । क्या बात है ! जय हरि ॥ एकदिन इनके भाग्यवश दयासिन्धु श्रीनारदजी कृपाकर आके एकान्त में मिले, और एक श्रीशालग्रामजी की छोटीसी मूर्ति देके समझागए कि "इनको धोकें पीलिया करो, और दिखाके खायाकरो;" फिर उस मूर्ति को मुख में ही रखने की युक्ति भी बता के श्रीभगवन्नाम का उपदेश करगए। ये वेसाही करते और समान वयसवाले वालकों के साथ २ भगवतसम्बन्धी (रसढुर) खेल खेला करते थे। एकदिन धृष्टवुद्धि के घर ब्राह्मणों का भोजन था। विधिसंयोगवश BREGERGRUKRICALGUSARAM.

. N भनिसुधास्वाद तिलक।. ११५ लड़कों के साथ २ उन ब्राह्मणों के मुखिया पण्डित के सामने आ के उनको श्वीचन्द्रहासजी ने प्रणाम किया। उसीसमय धृष्टवुद्धि ने विप्र वरसे पूछा था कि “मेरी इस कन्या को पति कैसा मिलेगा?" तव वे श्रीचन्द्रहासजी की ओर अंगुल्यानिर्देश करके कहउठे कि यही बालक तेरी इस कन्या का पति होगा । हम यह भावी निश्चय जानते हैं।" सुनतेही, वह प्रधान लज्जा ग्लानि में डूवगया ॥ (६८) टीका । कवित्त । ( ७७५) पस्यौ सोच भारी “ कहा करौं ?" यौँ विचारी; "अहो ! सुता जो हमारी, ताको पति ऐसो चाहिये ? । डारों याहि मार, याको यहै है विचार;" तव बोलि नीचजन, कह्यौ "मारी, हिय दाहियै" ॥ लेके गए दूर, देखि बाल छबिपूर, "हम योनि परै धूर, दुःख ऐसो अवगा- हिथै " । बोले अकुलाय, “तोहि मारेंगे; सहाय कौन ?” "मांगों एक पात 'जब कहाँ तब वाहिय" ॥ ५६ ॥ (५७०) वार्षिक तिलक। • उसके मनमें बड़ाभारी सोच हुआ कि "अब क्या करना चाहिये?" तव धृष्टयुद्धि ने निज भ्रष्ट बुद्धिसे ऐसा विचार किया कि “इसबालक (चन्द्रहाल) को मारडालना चाहिये। बड़े आश्चर्यकी बात है ! क्या मेरी बेटीको ऐसा दासीपुत्र दीन पति होना चाहिये?" ऐसा अविचार ठीक करके घातक नीचजनों को बुलवा के आज्ञा दी कि "इस बालक को देख मेरा हृदय जलाभुना जाताहै,इसको लेजावशीघ्रमारडालो।" वे घातक लोग इनको बाहर वनमें लेगए; परन्तु मारने के काल में इनकी अतिशय सुन्दरता देख श्रीप्रभुप्रेरित दया उनके हृदय में आगई; वे अपने मनमें कहने लगे कि "धिक ! धिक!! हमारी जाति कर्म को है, इस पर क्षारपड़े, कि ऐसे दुःख झेलने पड़ते है;" फिर, अकुलाके,श्रीचन्द्रहासजीसे वे धोले कि “अव हम तुम्हारा वध करेंगे, बताओ तुम्हारा सहायक रक्षक कोई है ?" ॥ इनन उत्तर दिया कि "मैं केवल एकही वात चाहता हूं कि 'जब मैं कहूं तब मुझपर खड्ग का हाथ छोड़ना'" । RECECREEN , . RSS 15.35 FASTER ११६ श्रीभक्तमाल सटीक । (६६) टीका | कवित्त । (७७४) मानिलीन्हो वोल वे, कपोल मध्य गोल एक "गंडकी को सुत, कादि सेवा नीकी कीनी है । भयो तदाकार, यो निहार सुख भार भरि, नैननि की कोर ही सो आज्ञा वध दीनी है ॥ गिरे मुरझाइ, दया आइ, कल्लु भाय भरे, ढरे प्रभु ओर, मति आनँद सों भीनी है। हुती छठी आंगुरी, सो काटि लई, दूपन हो, भूपनहीभयो, जाइ कही सांच चीनी (चीन्ही) है ॥ ६०॥ (५६६) बार्तिक तिलक। दुष्टों ने इनकी वार्ता मान ली। तदनन्तर श्रीवन्द्रहासजी अपने गालमें से श्रीनारदजी की दी हुई श्रीशालग्रामजी की मूर्ति को निकाल के तड़ाग के जल एवं वनके पुष्पों से उनकी सप्रेम पूजन भलेप्रकार से कर, अपने करकमल पर विराजमान करके, एकाग्रचित्त हो देखने लगे; तब प्रभुने उसी मूर्ति में ऐसा सच्चिदानन्द सूक्ष्म रूप का दर्शन दिया, कि जिसके भारी प्रेमानन्द में ये मग्न होके देहाभिमान भूल के तन्मय होगए। जय, जय ॥ उसी क्षण अपनी आंखों की कोर से अपने वध की आज्ञा दे दी। ज्योंही घविकों ने मारडालने का विचार किया त्योंही प्रभुप्रेरित ऐसी दया वधिकोंके हृदयमें आई कि मूर्छित होके वे सब भूमिपर गिरपड़े। फिर सावधान होके उठे तो उनके मन में भगवत की भक्ति का भाव भी कुछ आगया। अपने पापों से ग्लानि कर, प्रभु के सन्मुख हो; प्रेमानन्दको प्राप्त हुए । प्रभुकी जय ।। श्रीचन्द्रहासजी के एक पगमें छः अंगुलियां थीं, कि जिसका होना सामद्रिक में दूषण बताया है। उत्ती छठी अंगुनी को काट, उन्होंने इनको छोड़ीदया; मानों वह अधिक अंगुलीरूप दूपण (अपलक्षण) निकजगया और अव आप भवभूषणरूप सुलक्षण रहगए। जाके, दुष्ट धृष्टवुद्धि को वही अंगुली सहदानी (चिन्हासी) दिखा, कहाँदया कि "हमने उसको मारडाला।" उसने अंगुली पहिचानी, और वह बात सच मानी। "कोनकी त्रास करे? तुलसी,जोपै राखिहै राम,तो मारिहै को रे?॥" २७ भक्तिसुधास्वाद तिलक। चौपाई। "गरल सुधा, रिपु करै मिताई । गोपद सिन्धु, अनल शितलाई ॥ गरुअसुमेरु रेणुसम ताही । राम कृपाकरि चितवहिं जाही॥" (७०) टीका । कात्ति । (७७३) वहै देश भूमि में रहत लघु भूप और, और सुख सब, एक सुत चाह भारी है। निकस्यौ विपिन, आनि, देखि याहि, मोद मानि, कीन्ही खग छांह, घिरी मृगी पांति सारी है। दौरिकै, निशंक लियो, पाइ निधि रंक जियो, कियो मनभायो, सो वधायो, श्री हु वारी है। कोऊ दिन चीते, नृप भए चित चीते, दियो राज को तिलक, भाव भक्ति विसतारी है ॥ ६१॥(५६८) वार्तिक तिलक। उसी कुन्तलपुर के राजाके राज्यही में एक छोटासा राजा रहता था वहस्त्रीधनादि सबप्रकारके सुखों से तो सुखीथा, परन्तु उसके पुत्र न था, सो उसके पुत्र की अतिशय अभिलाषा थी । भावीवश वह राजा उसी वनके मार्गसेजानिकला,देखता क्याहै कि श्रीचन्द्रहासजी बैठेहुए हैं, और श्रीसर्वान्तर्यामी प्रभुका प्रिय जानके, इनके सुन्दर रूप को देखती हुई, हरनियों के समूह इनको घेरे हैं, और एक बड़ा पक्षी सीस पर छाया किये हुए है कि जिसकी छाया माथे पर होना महाराज्य प्राप्ति का सूचक है "उसे कृपाकरते नहीं लगती बार।" यह देख, अत्यन्त आनन्दयुक्त हो, इसप्रकार से दौड़के राजाने अपने गोदमें लेलिया, कि जैसे दरिद्री महाधन को पाके प्राणसमान ग्रहण करता है; घर में लाके, जैसा निजपुत्र होने से मनमाना मंगल लोग करते हैं वैसाही आनन्दधावा नाच गान कर करा के बहुत सा द्रव्य लुटाया, और लालनपालन करने लगा। कुछदिन बीतनेपर श्रीचन्द्रहासजीकी योग्यता देख अपने चित्तमें विचार करके उस राजाने इनको राज्यतिलक कर दिया। दो० "मसकहि करहि विरंचि प्रभु, अजहि मसक ते हीन । अस विचारि तजि संशय, रामहिं भजहिं प्रवीन ॥" BOARRESCRENAKACCESS , 9555 श्रीभक्तमाल सटीक। राजाहो के श्रीचन्द्रहासजी ने अपने राज्य में भगवद्भक्ति और प्रेमभाव का बड़ाही प्रचार किया। (७१) टीका | कवित्त । (७७२) रहै जाकेदेश सो नरेश कछु पावै नाही, बांह वल जोरि दियो सचिव पठाइकै । आयो घर जानि, कियो अति सनमान, सो पिछान लियो वहै वाल मारो छल छाइ कै ॥ दई लिखि चिट्ठी, जाओ मेरे सुत हाथ दीजे, कीजे वही बात जाको आयो लै लिखाइकै। गए पुर पास बाग, सेवा मति पागकरि,भरी दृग नींद नेकु सोयो सुखपाइकै॥२॥(५६७) वार्तिक तिलक। चन्दनावती का राजा कलिन्द जिस महाराज (कुन्तलपुर वाले) के राज्य में था, उस महाराज को अव श्रीचन्द्रहासजी के यहां से कर नहीं पहुंचने लगा, क्योंकि साधुसेवा ही में इनका पैसा लग जाताथा, कौड़ी बचती न थी। इसीसे उसने कुछ सेना समेत अपने मन्त्री धृष्टवुद्धि को कर लेने के लिये चन्दनावती में भेजा । राजा कलिन्द तथा श्रीचन्द्रहासजी ने (अपने घर में आया हुआ जान करके) उसका बड़ा आदर सत्कार किया। धृष्टवुद्धि ने पहिचान लिया कि यह तो वही लड़का है जिसके वधका प्रवन्ध किया था; वह क्रोध से जलभुनकर सोचने लगा कि अव "छल से इसका वध करो।" कुछ बातें बनाकर चन्द्रहासजी को 'एक पत्र दे धृष्टवुद्धि ने अपने घर भेजा कि यह पाती मेरे पुत्र मदन के हाथ में दीजिये और कहिये कि जो कुछ इसमें लिखा है सो कृपा करके शीघ्र करवादीजिये। पत्रले, उस ग्राम में पहुँच, एक सुन्दर वाटिका में, जो .उसी मन्त्री धृष्टबुद्धि का था, ठहरके इनने श्रीशालमामजी की सेवा बड़े प्रेम से की; और प्रसाद पाके श्रीराम भरोसे निर्द्वन्द्र विश्राम किया। हरि इच्छा से उनको नींद आगई, सुखसे सो गए। (७२) टीका । कवित्त । (७७१) खेलति सहेलिनिमों, आइ वाहि वाग मांझ करि अनुराग, भई S NEWS भक्रिसुधास्वाद तिलक। . , न्यारी, देखि रीझी है। पाग मधि पाती छविमाती झुकि बैंचिलई, वांची खोलि, लिख्यो विष दैन, पिता खीझी है ॥ "विषया" सुनाम अभिराम, दृगअंजनसों विषया वनाइ, मनभाइ,रसभीजी है। आइ मिली आलिन में, लालन को ध्यान हिये, पिये मद मानो, गृह आइ तत्र धीजी हे ॥ ६३ ॥ (५६६) वार्तिक तिलक। श्रीहरि इच्छा से उसी मन्त्री की लड़की "विषया" नामा अपने उस वाटिका में अपनी सखियों सहित आई; अचानक उसकी दृष्टि चन्द्रहासजी पर पड़ी, और साथ ही अति अनुरक्त और आशन हो गई। दूसरी ओर जा, वहां से अपनी सहचरियों से अलग हो, वह चक्कर लगाके फिर वहीं पहुंची जहां श्रीचन्द्रहासजी सोए थे; "जिनसे अटकत हैं ये नैना । खटकत है उर सो दिन रैना ॥” इनको देखही रही थी कि इतने में एक पत्रिका दिखाईदी जिसको उस सुन्दरी ने निकाल के पढ़ा; उस पत्रको अपने भाई मदन के नाम अपने पिता धृष्टवुद्धि का लिखा, पाया; और उसका आशय यह था कि “इस पत्रिका लेजानेवाले को शीघही विष दे देना, विलम्ब करने से मैं तुम पर क्रोध करूंगा॥" यह पढ़ उस बालिका को अपने पिता पर क्रोध, तथा प्रीतिवश इस प्रिय मूर्तिपर दया आई; श्रीहरिकृपा से उसीक्षण उसको ऐसी सूझी, कि उसने बड़ी ही फुरती के साथ अपनी आंख के काजल से विष शब्द के अन्त में 'या' अक्षर बना दिया, जिससे “विष" अव "विषया" होगया। श्रीभगवतकृपा का मनन करती हुई, प्रेमरस में पगी, वहां से चटपट चली और अपनी सहचरियों में आ मिली। जैसे मदसे माती हो इसभांति वह प्रेमाशक्त हो अपने मनोरथकी सफलताके लिये घर आई। और संतुष्ट हो प्यारेके ध्यान में मग्न,पर- मात्मासे प्रार्थना करनेलगी॥"जगदम्बे ! मोर मनोरथ जानसिनीके" (७३ ) टीका । कचित्त । (७७०) उध्यो चन्द्रहास; जिहि पास लिख्योलायो जायो देखि मन भायो BE 4768 ၁၁ श्रीभक्रमाल सटीक। गाढ़े गरे सो लगायो है। देई कर पाती, वात लिखो मौं सुहाती; बोलि. विप्र, घरी एक माझ व्याह उभरायो है ॥ करी ऐसी रीति, डारे बड़े नृप जोति, श्री देत गई वीति, चाव पार पै न पायो है । आयोपिता नीच; सुनि घूमि आई मीच मानो; वानो लखि दूलह को, शूल सरसायो है ॥६॥ (५६५) वार्तिक तिलक। श्रीचन्द्रहासजी उठे और ठिकाने पर पहुँचकेचिट्ठी दी; मदनसेन बहुत ही प्रसन्न हुमा उसने इनको अपने गलेसे लगालिया और अपना हर्ष प्रकट किया; बड़ी त्वरासे, ब्राह्मणों को बुला, लग्न सोधके भगवत कृरा से एकही घड़ी के भीतर अपनी बहिन विषयाका विवाह चन्द्रहास से करदिया। सारी रात आनन्द और दान पुण्य में व्यतीत हुई; ऐमा उत्सव किया, कि अपने से बड़े राजासे भी बढ़के, और तबभी महोत्सब से अघाता न था। प्रिय पाठक ! देखिये- "विष देते विषया भयो; राम गरीव निवाज ॥" उसका बाप, नीच धृष्टवुद्धि, आने पर यहां यहरंग, और चन्द्रहास जी को दूलह वेप में देख, अतिशय शूल पा, अत्यन्त मूर्छित हो गया । " पर दुख लागि असन्त अभागी!" (७४) टीका | कविता (७६६) घेट्यो लै इकान्त, “ सुत ! करी कहा भ्रान्त यह ?" कह्यो सो नितान्त, कर पाती लै दिखाई है । वांचि आंच लागी; मैं तो वड़ोई अभागी ! ऐ पै मारो मति पागी वेटी रोड़ हू सुहाई है ॥ बोलि नीच जाती, चात कही "तुम जावो मठ,आवै तहाँ कोऊ, मारि डारो मोहि भाई है" । चन्द्रहास जू सो भाष्यो “देवी पूजि आवो आप मेरी कुलपूज, सदा रीति चलि आई है " ॥ ६५ ॥ (५६४) वाकि तिलक। परहितवृतमाखी दुर्मति कधी धृष्टबुद्धि ने अपने पुत्र से एकान्त में पूछा कि “रे ! तूने यह क्या गड़बड़ किया ?" मदनसेन ने पाती दिखा दी। पढ़के कुबुद्धि के तन में भागसी लग गई; यहां तक कि वेटी का विधवा रहना तक, वह अभागा अच्छा समझा।

. *** भक्रिसुधास्वाद तिलक। १२१ वध करनेवालों को बुलाया और चुप चाप आज्ञा दी कि "कल भोरे जिसको देवीमन्दिर में पाना, विना विचार कियेही उसका वध करदेना; और इधर निरपराधी चन्द्रहासजी से कहा कि “ देवी मेरी कुलपूज्य है, तुम प्रात ही उठके जाके उसकी पूजा कर पाओ, विवाह के अनन्तर उसकी पूजा हमारे कुल की रीति चली आती है।" सठने अपनासा उपाय, गढ़ा रचा तो परन्तु उसने यह नजाना कि- दो० "जो भावी सो होइ है, झूठीमन की दौर । मेरे मन कछु और है, करता के कछु और ॥१॥ पर अनहित को सोचियो, परम अमंगल मूल । कांट जो वोवे और को, ताही को तिरसूल ॥२॥ (७५) टीका | कवित्त । (७६८) चलाइ करन पूजा; देशपति राजा कही " मेरे सुत नाहीं, राज- वाही को लै दीजिये"। सचिव सुवन सों जु कह्यो " तुम लावो जावो, पावो नहीं फेरि समय, अव काम कीजिये" ॥ दौस्यो सुख- पाइ चाइ, मग ही में लियो जाइ, दियो सो पठाइ, नृप रंग माहि भीजिये । देवी अपमान ते न डरो, सनमान करौं;जात मारि डायो, यासों भाष्यो भूप “ लीजिये " ॥ ६६ ॥ (५६३) वार्तिक तिलक। प्रभातहोते स्नान और श्रीशालग्रामजी की पूजा से अवकाश पा श्रीचन्द्रहासजी, श्रीदेवीजी महारानी को पूजने चले । उसी समय श्रीसीतारामकृपा से देशाधिपति (कुन्तलपुर के महाराज ) के मनमें आया कि “ मेरे पुत्र है ही नहीं, तो अब यही उत्तम है कि सुयोग्य चन्द्रहास को ही मैं राज्यतिलक करदूं; हरिभजूं ऐसा विचारकर मन्त्री के पुत्र मदन को बुलाकर हरिकृपा ले यों कहा कि “ मेरे मन में यह बात आई है, सो तुम अभी अभी दौड़े जाव; अपने बहनोई चन्द्रहास को लाओ; इसी समय काम कर लो; नहीं तो विलम्ब करने से फिर न होगा; हरिइच्छा ऐसी ही है; पीछे पछताओगे॥" ("मन ! पछते है अवसर बीते") .

SAROO श्रीभक्तमाल सटीक। मदनसेन प्रहर्ष में भरा बड़े चावसे दौड़ा, पंथही में दोनों (साला बहनोई) मिले । चन्द्रहासको महाराज के पास भेजा कि ऐसी ऐसी वार्ता है, इस घड़ी महाराज वैराग और अनुराग में पगे हैं, इस संकल्प में दृढ़ हैं, सीधे उनके पास पहुँचो, राज्य को प्राप्त हो; श्रीदेवी महारानीजी के अपमान का भय मत करो मानसी प्रार्थना कर लो; मैं मठ में जा उनका पूरा सनमान पूजन करता हूं।" उधर जाते ही मदनसेन को घातकों ने मारडाला; और इधर चन्द्रहास से महाराज ने कहा कि “यह लीजिये;' और राज्याभिषेक करही लिया। आप भगवद्भजन में लगा॥* चौपाई। उमा ! कहों मैं अनुभव अपना । सत हरिभजन जगत सब सपना" (७६) टीका । कवित्त । (७६७) काहू आनि कही " सुत तेरो मारो नीचनिने," सींचन शरीर हग नीर झरी लागी है । चल्यो ततकाल, देखि गिस्यो है बिहाल, सीस पाथरसों फोरि मस्यो ऐसोही अंभागी है ॥ सुनि चन्द्रहास, चलि बेगि मठपास आये, ध्याये पग देवताके, काटे अंग, रागी है। कह्यो "तेरो द्वेषी, याहि क्रोध करि मास्यों मैं ही," "उ दोऊ दीजे दान " जिये बड़भागी है ॥ ६७॥ (५६२) चार्तिक तिलक । कुबुद्धि से आकर किसीने कहा कि "तेरे बेटे को घातकों ने बध करडाला ?" यह सुन, डाढ़ें मार मारकर, वह रोने पीटने लगा। दौड़ता हुआ मन्दिरमें जा वैसाही देखा । वह अभागा भी पत्थरपर सांस पटककर कालवश होगया! "कर्म प्रधान विश्वकरि राखा"। श्रीचन्द्रहासजी सब वृत्तान्त सुनकर शीघही देवीभवन में आ स्तुति करने लगे; वरंच अपना सीस वलिदेने पर उद्यत हुए। श्रीदेवी महारानीजी प्रगट हो, इनका हाथ पकड़, यह बोली कि "धृष्टवुद्धि तेरा द्वेषी है इसलिये वत्स! मैं ही ने उसको पुत्रसमेत मारडाला है।" * ( मनुस्मृति ) " प्रवृत्त कर्म ससेव्यं देवानामेतिसाम्यताम् । निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येतिपञ्च (१२-१०)" karti Check RSH भकिसुधास्वाद तिलक। १२३ श्रीचन्द्रहासजी ने, उनको प्राणदान सुमतिदान के लिये देवीजी से विनय किया और पुनः स्तुतिकी ॥ "जय महेश भामिनी! अनेक रूप नामिनी, समस्तलोक स्वा- मिनी, हिमशैल बालिका। सिय पिय पद पद्म, प्रेम तुलसी चह अचल नेम, देहु है प्रसन्न, पाहि प्रणत पालिका ॥" श्रीदेवीमहारानीजी ने साधुता देख, हरिभक्तजान इनकी प्रार्थना स्वीकार की और प्रसन्न हो, दोनों को जिला के उन्हें सुमति भी दी कृपा की जय जय ॥ "सन्त सहहिं दुख परहित लागी॥" * (७७) टीका ! कस्ति । (७६६) कस्यो ऐसो राज,सव देश भक्तराज कस्यो, ढिग को समाज ताकी वात कहा भाखिये। "हरि हरि" नाम अभिराम धाम धाम सुन, और काम कामनान, सेवा अभिलाखिये। काम, क्रोध, लोभ, मद आदि लैके दूरि किए, जिये नृप पाइ, ऐसो नैननि में राखिये । कही जिती वात आदि अन्तलों सुहाति हिये, पढ़े उठि प्रात फल "जैमिनि" में साखिये ॥ ६८॥ (५६१) वार्तिक तिलक। कहते हैं कि श्रीचन्द्रहासजी ने तीनसौ वर्ष राज्य किया और राज्य भी इस प्रकार से कि देश में हरिभक्ति फैलादी, अपने समीपियों की तो वार्ताहीं क्या है, घर घर "श्रीसीताराम सीताराम" प्रीति से और मधुर स्वरसे सुनलीजिये; किसी को किसी कामकी कामना न थी; सब भगवत् सेवा भजन में रत रहतेथे; इसके कहने की आवश्य- कता ही क्या कि ऐसा राजा पाकर सब प्रजा चैन से जीवनविताती थी; और कहती थी कि ऐसे नृपति को आंखों में रखना चाहिये । - चौपाई। "अससिख तुमविनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथरत ओऊ ॥. हेतु रहित जग युग उपकारी । हरिलेवक, अरु श्रीअसुरारी ॥ * वाञ्छित फरपतरुभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एवच । पतिताना पावनेभ्यश्च, वैष्णवेभ्यो नमा नम ॥

१२४ श्रीभक्तमाल सटीक। अस सुराज वसि दूनौ लाहू । लोक लाभ परलोक निवाहू ॥ श्रीचन्द्रहास कथा सुनने का तथा श्रीचन्द्रहासजी के प्रातसमय नाम लेने के माहात्म्य को "जैमिनी" जी ने वर्णन कियाही है। (२८) श्रीमैत्रेयऋषिजी। (७८ ) टीका | कवित्त । (७६५) "कौपारव" नाम सो बखान कियो नाभाजूने मैत्रे अभिरामशपि जानि लीजै वात में । आज्ञा प्रभुदई जाहु 'विदुर' है भन मेरौ, करौ उपदेशरूप गुण गात गात में ॥ 'चित्रकेतु प्रेमकेतु 'भागवत' ख्यात, जाते पलट्यो जनम प्रतिकूल, फल घात में । 'अक्रूर' आदि 'ध्रुव' भए सब भक्तभूप 'उद्धव' से प्यारेन की ख्यात पात पात में ॥६६॥(५६०) वार्तिक तिलक । आपकी माताजी का नाम श्रीमित्राजी और पिताजी का श्री कुषारुजी था; इसीसे, आप "श्रीमैत्रेय" ऋपि, तथा श्री "कोपारव" भी कहेजाते हैं; कि जो नाम श्रीनभोभून (श्रीनाभाजी) स्वामी ने वर्णन किया है । श्राप श्रीपराशर मुनि के शिष्य हैं। जिसघड़ी श्रीकृष्णभगवान् विदुरजी के लिये, अपने सखा श्रीउद्धवजी को, ज्ञान और भक्ति का उपदेश कर रहे थे, उस समय वहीं श्रीमैत्रेय ऋपिजी भी थे तथा उन्होंने भी उपदेश लाभ किया, था और प्रभुने इनसे आज्ञा की थी कि "मैत्रेयजी आप मेरे परम प्रिय भक्त विदुरजी को यह उपदेश इस प्रकार सुनादीजियेगा कि जिसमें मेरा नाम मेरे गुण और मेरारूप उनके रोम रोम में, नाड़ी नाड़ी में, प्रविष्ट व्याप्त और विराजमान हो जावें ॥ जब श्रीकृष्ण भगवान् गोलोक को गए, और श्री“ उद्धवजी प्रभु के विरह में बदरिकाश्रम को चलेजारहे थे, तो श्रीविदुरजी से श्रीउद्धवजी मिले, परन्तु श्रीविरह में अत्यन्त विकल होरहेथे इससे कुछ उपदेश न करके श्रीउद्धवजी ने.श्रीविदुरजी से इतनाही मात्र कहदिया कि प्रभु ने श्रीमैत्रेयजी के सामने मुझसे आपके लिये बहुत कुछ उपदेश किया है, सो मैं तो विरहाकुल हूं, आप उनसे सत्संग RESH MORLSCRECRLGCA , भक्तिसुधास्वाद तिलक। करके उसको प्राप्त कर लीजियेगा। श्रीविदुरजी ने ऐसाही किया; यह प्रसंग (श्रीमैत्रेय विदुर संवाद) श्रीमद्भागवत के तीसरे स्कन्ध में विस्तार पूर्वक है। धन्य वे, कि जिनने स्वयं भगवतही से उपदेश पाया ॥ प्रेम के भवन वा प्रेम के ध्वजा “श्री चित्रकेतु" जी की कथा श्रीमद्भागवत में ख्यात है, कि कई शरीर पलटके प्रतिकूल जन्म अर्थात् असुर ( "वृत्रासुर") होके, श्रीइन्द्रजी के त्रिशूल को फूल सरीखा समझ, घात से प्रसन्न हो, अपनी भक्ति और ज्ञानके चमत्कार से सबको प्रफुल्लित कर दिया । "श्रीअक्रूरजी", श्रीभक्तराज "व" जी, तथा अतिशय प्रिय श्री "उद्धव" जी, इत्यादिक (समुदाय) की कथाएं श्रीमद्भागवत के पत्र पत्र में प्रख्यात और प्रसिद्ध हैं ही ॥ ६६ ॥ श्रीअक्रूरजी। श्री ग्रन्थकर्ता, श्रीअक्रूरजी का वर्णन, आगे चलके करेंगे, अर्थात् 'नवधाभक्ति' के भक्तों के प्रसंग में॥ (२६) श्रीचित्रकेतुजी। राजा "चित्रकेतु" के लाखोंस्त्रियां थीं। "कृतदूती" नामा एक स्त्री के, (श्रीनारदजीके एवं श्रीअंगिराजीके यज्ञकराने से) एक पुत्र हुआ था, जिसको और सब रानियों ने मिलकर विष देदिया; वह मरगया। स्नेह वश राजा उसका दाहकर्म नहीं करता था; यद्यपि श्रीनारद जी ने उपदेश किया समझाया, तथापि उसका मोह नहीं गया बोध नहीं हुआ। तव श्रीनारदजी के प्रभाव से वह पुत्र जीवित होके स्वयं कहने लगा कि "हे राजा ! सेकड़ों वार मैं तुम्हारा और तुम मेरे पुत्र हो चुके हो; मोह कहां तक और कैसा? ॥" "अस्तु, पूर्वजन्म में मैं साधु था और श्रीशालग्रामजी की पूजा करताथा । एक दिन इस माई ने, जो अब मेरी माता कृतती है. मुझे भोजन कराना चाहा तो अमनिया सीधा के साथ रसोई करने के EHESAREECHESER* KE १२६ श्रीभकमाल सटीक। लिये जो जलावन दी, उसमें लाखों चींटियां भरीथीं !!! मैंने प्रभुको भोग लगाकर प्रसाद पालिया। "उन चींटियों के कारण एक एक वेर प्रत्येक के हाथों से मुझे मरने के लिये ( ओह !) लाखों जन्म लेने पड़ते (हरे ! हरे !!) परन्तु अपने लिये तो रसोई नहीं की थी वरंच प्रभु के निमित्त करके, और प्रभुही को भोग लगाया था, इसी से श्रीसीताराम कृपा से, इस एकही जन्म में वह बात सधगई, अर्थात् वेही लाखों चींटियां सवकी सव रानियां हुईं, वही माई मेरी यह माता हुई, मैं पुत्र हुआ, जिन हम दोनों से उन्हों ने अपना पलटा इस प्रकारसे लेलिया ।" "प्रभु राखेउ श्रुति नीति अरु, मैं नहिं पाव कलेश ॥" इतना कह लड़केने पुनः उस शरीरको छोड़ दिया।उसकादाह क्रिया कर श्रीचित्रकेतुजी मोहरहित होगए। "यह सब माया कर परिवारा॥" श्रीनारदजी ने चित्रकेतुजी को संकर्षण भगवान् का मन्त्र उपदेश किया; जिससे सातही दिन में श्रीनारदकृपासे चित्रकेतु श्रीसंकर्षण भगवान् के समीप जा पहुँचे । स्तुति कर, श्रीवासुदेव मन्त्र पा, उसके अप से अव्याहत (अप्रतिहत ) गति पाई अर्थात् जहां चाहें नावें, रोके न जावें॥ एकदिन विमान पर चढ़ श्रीशिवजी के पास पहुंचे वहां सभा में देखाकिसमर्थमहाप्रभुश्रीशिवजी अपनीप्राणप्रिया श्रीपार्वती जगत्- माता को अपने जंघापर विठाये हैं । यह देख मूर्खतावश ("छोटा मुँह बड़ी बात") वह देव देव महादेव को उपदेश करने लगा। श्रीगिरिजाजी ने शाप दिया; शापवश"वृत्रासुर" होने पर भी उसको ज्ञान बना रहा । दधीचि राजा की हड्डी के वज्र द्वारा इन्द्र के हाथों से मारा गया । संग्राम में जो विलक्षण वार्ता उसने सुरेन्द्र जी से कही है, सो श्री मद्भागवत के छठे स्कन्ध में पढ़ने सुननेही योग्य है। शरीर त्याग करके उसने परांगति पाई ।। .(३०) श्रीउद्धवजी। महात्मा श्रीउद्धवजी को श्रीकृष्ण भगवान् अपना अतिसमीपी RAISASRAGHAGRECIM 5315 भक्तिसुधास्वाद तिलक । नातावाले सुहृद जानते थे, आप परमज्ञानी महाभागवत थे और श्रीयदुवंशमणि महाराज की सेवा प्रेमपूर्वक अतिशय उत्तम प्रकार से किया करतेथे ॥ जब श्रीवजराजजी की आज्ञा से आप श्रीगोपियों के पास ब्रज में पहुंचे, तो उनकी अद्भुत प्रीति देखी- (पूर्वी) सुधि न लीन्हि पिय विरहिनि हियकी । सखि ! मोहिं कत दिन तरसत चीते, सुधि न लीन्हि पिय विरहिनि हिय की॥आह धुआं मुख, हिय विरहागी, ठादि जरों जैसी वाती दिय की। अधिक दाह चित चातक कोकिल, विरह अनल जिमि आहुति घिय की । सव उर व्यापक, अन्तरयामी, जानत हैं पिय रुचि तिय जिय की। सांचहु स्वपनेहु कव लगि देखिहाँ मधुर मनोहर छवि सियपिय की । क्षमा निधान विलोकिह निज दिशि, करिहहिं खोजन मोरे किय की। कृपानिधान दया सुख सागर, मनिह सखि ! बिनती लघुतिय की। रूपकला विनवति हनुमत ही, चन्द्रकला अरु गिरिवरधिय की। एको उपाय न सूझत आली ! मोहिं आसा केवल श्री सिय की ॥ १॥ (रूपकला) "अब तो सुरतिया दिखादे पियरवा ! धीर धरोनहिं जात रामा। तलफत वीति गई ऋतु सारी, शीत गरम बरसात रामा ॥ हाय तिहारो सदसवोन पायऱ्या रहि रहि जिय अकुलात रामा ॥अब तो०॥ नीको न लागत भोजन भषण तान मात अरु भ्रात रामा। संग की सहेली अली अवली सब जहँ लों कुटुम अरु नात रामा॥अब तो०॥ घर ना सुहात घने वन बाहर भीतर दिन अरु रात रामा। सांझ सुहात न धूप छांह कछु अरु ना सुहात प्रभात रामा ॥ अब तो०॥ जानत हों नहिं ज्ञान ध्यान जप जोग जुगुत की वात रामा। श्रवण मनन निदिध्यासन आसन कीर्तन सुमिरन प्रात रामा। अब तो०॥ सहि नहिं जात व्यथा विठुरन की नाहि कलुक कहि जात रामा। काह करौं जिय निकसत नाही नातो धनत विष खात रामा॥ अव तो सु०॥ हारी जतन करि राह न सूझत कित जाऊं नहिं ज्ञात रामा । दीन- दयाल दया दरसाओ, “जीत" जगत विख्यात रामा ॥अब तो सुर- . .

CACRORCEKACHARScise श्रीभक्रमाल सटीक। १२८ तिया दिखादेपियरवा धीर धरो नहिं जात रामा " (सर्वजीतलाल) प्रिय पाठक ! "सूरसागर", कृष्णगीतावली, ललितगीत, गीतगो- विन्द इत्यादिक देखनेही योग्य हैं। निदान,श्रीसखावर उद्धवजी महाराज उनके चरणरजमें लोटने- लगे, और अपने को धन्य और कृतकृत्य, तथा अपना सव सुकृत सफल समझा । धन्य धन्य श्रीउद्धवजीं, जिनने श्रीवजसुन्दरियों की महिमा अपने हृदय में बसाई । "तव महिमा जेहि उर वसे, तासु परम वड़भाग ॥" आप जब ब्रजसे लौटके व्रजवल्लभ महाराजके पासमाए, तो प्रभु से श्रीवजसुन्दरियों की ऐसी स्तुति की कि जिसके लिये श्रीउद्धवजी की प्रशंसा जहां तक की जावे सब थोड़ीही है ॥ आप मथुराले श्रीगोपिकाप्राणवल्लभजी के साथ साथ श्रीद्वारकाजी को गए। वहां से देशकालानुसार उपदेश तथा ज्ञान और भक्ति प्रभु से प्राप्त करके, आज्ञा पाके, प्रभु के वियोगाग्नि से बदरिकाश्रम को गए। (३१) श्रीध्रुवजी। जैसे करुणाकर प्रभु श्रीप्रह्लादजी का कष्ट नसहके उनके रक्षार्थ आप प्रगटहोहीगये,पैसेही आपने "श्रीध्रुववरदेन"अवतारभी धारण किया। श्रीधुवजी की कथा प्रसिद्ध ही है ॥ ध्रुव सगलानि जपेउ हरिनामू । पाएउ अचल अनूपम ठाम् ॥ राजा उत्तानपादकी रानी सुनीति के गर्भ से आपका जन्म हुआ; और श्रीसुनीतिजी की सपत्नी सुरुचि के गर्भ से जो पुत्र था, उसका नाम "उत्तम"था। एक समय, राजा उत्तम को गोदमें लियेहुए थे, श्रीधुवजीने भी (जो चारवर्ष के थे) राजा के गोद में बैठना चाहा; परन्तु उनकी वह सौतेलीमाता वोलउठी कि "भगवतका तप करके तू पहिले मेरे उदरसे जन्म तो ले, तव तुझको राजाके अंकमें बैठनेकी योग्यता और अधिकार होवे" यह सुन आप रोतेहुए निज माता के पास गए, और उनकी आज्ञा पाकर तप करने को निकले। NECRACTENCEKACHAR भक्तिसुधास्वाद तिलक। १२६ मार्ग में दयासिन्धु देवर्षि श्रीनारदजी मिले। "लागिदया कोमल चित सन्ता"श्रीदेवर्षिजी ने अतिशय कृपासे "द्वादशाक्षर मन्त्र" का उपदेश किया; श्रीध्रुवजी मथुराजी में श्रीयमुनाजी के तटपर आकर- " द्वादश अक्षरमंत्रवर जपेउ सहितअनुराग।" हरिने साक्षात् प्रगट होकर भक्निवर दिया और कृपा करके, अपना शंख श्रीध्रुवजीके कपोलमें स्पर्श करदिया कि जिससे उसीही अवस्था में आपने भगवत की स्तुति की- "जे अशरनशरन,राम! दशरथकिशोर। जनकनंदिनी मुख विधूवर चकोर ।। अवधनाथ, श्रीनाथ, मम प्राणनाथ । लखन मारुती नाथ, शरचाप हाथ ॥ प्रभो ! जानकीप्राणवल्लभ हरी । कृपासिंधु, भगवंत, रावण अरी ॥ मुनीजनअगम कृत् सखाभालु कीश।निजेच्छाविहारी, रमास्वामिनीश ॥ विवुध वृन्द सुखदाइ, दूषण दमन । महीदेव गो देव महि दुख शमन॥ अलख, सच्चिदानन्द, छवि मूर्तिमान। पतितपावन अव्यक्त, करुणानिधान ॥ न गुन में, न निर्गुण, न तू रत्न में। न है ज्ञान में तू न है यत्न में॥ पै सब रंग में, और परतीत में। चमकता है तू प्रेम में प्रीत में ॥ तुझी में मही, स्वर्ग, सातो पताल । नहीं शून्य तुझसे कोई देशकाल ॥ तुही सबमें है, औ तुझी में हैं सब । तुही एकही था, न था कुछ भी जब ॥ सकलही पदारथ भरे हैं यहीं। पै तुझ बिन तो कुछ भी है अपना नहीं॥भटकते बहुत दूर दूंअजान। तुम्हें आप में ही हैं पाते सुजान ॥ मैं दिनरात देखू हूं लीला तेरी । है चक्कर में, हे प्यारे ! वुद्धी मेरी ॥ अगम औ अकथनीय महिमा तेरी। है अतिक्षुद्र वुधि,मन्दतर मति मेरी॥ न देखी किसू ने "गिरा" थाह लेति । कहा “शेष" औ "वेदों" ने "नेति नेति" ॥ बड़े से बड़े भी सके कर न जो । प्रभु स्तुति तेरी जुझ से किस भांति हो ॥ तेरे पद्म पद छुट नहीं और ठौर। न तव प्रेम तजि, जगमें,कुछ सार और ॥ मैं कलिमलग्रसित, अतिविकल पाहि पाहि । तेरी माया गाढ़ी प्रवल, त्राहि त्राहि ॥ अधिक इससे क्या कह सके 'रामहित'। अमित है, अमित है, अमित है, अमित ॥ कृपा करके दो प्रेम अपना, विभो ! "सियाराम सियराम" जपना,प्रभो!" ("पण्डित श्रीरामहितोपाध्यायजी) . .

, ASTROR * १३० श्रीभक्तमाल सटीका प्रभुने कहा कि "छत्तीस सहस्र वर्ष इस पृथ्वीका राज्य करके, तब अचल अनुपम लोक का राज्य करोगे; अब तुम घर जावां" आप घर को चले ॥ श्रीनरदजी की आज्ञा से महाराज उत्तानपादजी ने आगे आके इनका आदरसत्कार कर, घर ला, इनको राज्य दे दिया, स्वयं और स्त्री भगवद्भजन करने के लिये वनको गए ॥ भूमण्डल के राज्य के अनन्तर, श्रीध्रुवजी अपनी दोनों माताओं और पिता के समेत "ध्रुव लोक" में जा विराजमान हैं; महाप्रलय के पीछे परमपद को जायेंगे। (३२) श्रीअर्जुन जी। श्रीअर्जुनजी श्रीयादवेन्द्रजी प्रभु के फुफेरे भाई थे; भगवत में सखाभावसे प्रेमरखते थे। सुहृद होनेके उपरान्त मित्रता भी आपसमें ऐली थी कि करुणाकर प्रभु आपके सारथीका कामभी कियाकरतेथेn मित्रता की अधिकता से श्रीअर्जुनजी निष्कपट भी ऐसे होगए थे कि जब आपश्रीयदुपति महाराज की वहिन सुभद्राजी की सुन्द- रता पर आशक्त होगए- दो० व्याकुलता अरु व्यग्रता, व्याप्यो रगरग आय। चंचल चित अतिछटपटी, घर आंगन नसुहाय॥२॥ गदगद स्वर रोमांच अरु, नैनन नीर वहंत । प्रेम मग्न उन्मत्त ज्यों, अन्तः पीर सहंत ॥२॥ तो अपनी पूरी विकलता श्रीकृष्ण भगवान् से निःशंक होके कह सुनाई। दो० "परदा कौन सुमित्र सन, हित सन कौन दुराव । हियकी सव परगट करै, तुरतहि भाव कुभाव ॥: चौपाई। "जिन्ह के असमति सहजनआई। ते सठ कत हठि करत मिताई॥" राम सदा सेवक सचि राखी । घेद पुराण सन्त सव साखी ।। जेहि जन पर ममता अरु छोहूं । तेहि करुणाकर कीन्ह न कोहू ॥"

ॐॐ5 भक्तिसुधास्वाद तिलक। १३१ श्रीकृष्णचन्द्रजीने, लौकिक निन्दा उपहास के भयशंका को धरखे परेधर भक्त रहस्यानुकूल ऐसा गुप्त मन्त्र बताया कि उसके अनुसार श्रीअर्जुनजी अपने मनोरथको प्राप्तही होगए।मित्रवत्सलताकी जय। चौपाई। "जाकर जापर सत्य सनेहू । सो तेहि मिले न कछु सन्देहू ॥" एक र प्रभु अपने सखा अर्जुनजी के पास, वेखटके वहाँ चले गए कि जहां आपश्रीसुभद्राजी के साथ विराजते थे॥ "हो सख्य जो तो ऐसा, हो प्रीति जो तो ऐसी।विश्वास हो तो ऐसा, परतीति हो तो ऐसी ॥" भक्त की प्रशंसा की जावे ? कि भक्तवत्सलजी की ? कि प्रेमाभक्ति महारानीकी? एक समय मंगलमूर्ति श्रीमारुतिजी गन्धमादन निजस्थल से श्रीसीतारामजी के दर्शनार्थ दिव्यसाकेतलोक आए, जहाँपर श्रीसन. कादि पिवृन्द और श्रुतियां स्तुति कर रही हैं। किञ्चित् काल प्रभु सेवाकर श्रीरामदूतजी ने गन्धमादन जाना चाहा; तो भक्तवत्सल श्रीसीतानाथजी ने कहा कि "जाव, परन्तु हमारे अवतारान्तर के भक्त 'पाण्डवों की रक्षा कौरवों से अवश्यही करना ॥ इस प्रभुवचनामृतको अङ्गीकार और दण्डवत् कर श्रीपवनात्मज- जी आकाशमार्ग होकर चले जब "द्वैतवन" के समीप पहुँचे, तब अर्जुनादिपाण्डव और श्रीकृष्णचन्द्र की वार्ता सुनी । सो वह वार्ता यह हैः-अर्जुनादि ने कहा कि “कौरवरूपी दुःख से केसै बचेंगे?" यह सुन, श्रीकृष्णचंद्रजी ने कहा कि “देखो, ये पवनपुत्र हनुमान श्रीसाकेतविहारी के दूत,आकाशमार्ग होके जारहे हैं; सो ये ही तुम्हारी रक्षा करेंगे।" इतना सुनतेही, वृत्त जानने की वाञ्छा से श्रीमारुतिजी श्रीकृष्ण- चंद्रजी के समीप पहुँचे; तब आपने अपने को 'श्रीसाकेतविहारीजी का अवतार' ज्ञापन करने के लिये, श्रीरामरूप हो दर्शन दिया और पाण्डवों को श्रीहनुमत् शरण में लगा दिया । श्रीअंजनीनन्दनजी ने पाण्डवों को निज अनूप भक्त और दास HORS १३२ श्रीभक्तमाल सटीक। जान, कोरवों से उनकी रक्षा की। इसीसे,श्रीमारुतिजी का "अर्जुन सहायकारी" ऐला ख्यात हुआ। पाण्डवों की भक्ति की प्रशंसा किससे हो सकती है। "तुलसी, सकल सुकृत सुख लागे राम भक्ति के पाछे।" (३३।३६) श्रीयुधिष्ठिरादि- [पाण्डव] श्रीपाण्डव पांचो भाइयों में से,श्रीअर्जुनजी की कथा तोअभीअभी निवेदन की जा चुकी है। श्रीयुधिष्ठिरजी महाराज, श्रीभीमसेनजी, श्रीनकुलजी, और श्रीसहदेवजी, ये चारो श्रीयादवेन्द्रजीके ममेरेभाई थे। वे आपको पूर्णब्रह्म तथा अपना स्वामी मानते थे। श्रीयुधिष्ठिरजी और श्रीभीमसेन को (जो बड़े थे) आप प्रणाम; तथा, श्रीनकुलजी और श्रीसहदेवजी (जो छोटे थे) आप को दण्डवत् किया करते थे। श्रीयुधिष्ठिरजी की महिमा कौन कह सके कि जो साक्षात् "धर्म" के ही अवतार थे। महाभारत में भगवत् की भक्तवत्सलता और वार- म्बार सहायता के साथ पाण्डवों का सुयश भी प्रसिद्ध है ही। "कहां न प्रभुता करी ? हे प्रभु ! तुम कहाँ न प्रभुता करी" (३७।३८) गजेन्द्रजी; ग्राहजी। ( कल्पान्तमेदसे एक कथा) स्वेतद्वीप में एक सर में श्रीदेवलमुनि स्नान कर रहे थे,हाहा नाम गन्धर्व ने, खेलले पानी के भीतर, ग्राह की नाई उनका पांव पकड़ लिया; इसलिये मुनि के शाप से वही वहीं ग्राह हुआ। बड़ों से हँसी खेल का फल ऐसाही है। इन्द्रदवन राजा अपने मन्त्री को राज्य देकर पहाड़ पर जा मौनी हो भजन करता था; भक्तराज ऋषीश्वर श्रीअगस्त्यजी महाराज कृपा कर वहां गए, पर उसने अभिमान से आपका सत्कार श्रादर नहीं किया। फलतः मुनिजी के शाप से गजेन्द्र हुआ। ओह ! अभिमान से किसका सर्वनाश न हुआ ? ॥ * श्रीयुधिष्ठिर , श्रीभीम २, श्रीथर्जुन ३, श्रीनकुल'४, श्रीसहदेव ५॥ RANSORAKASON भक्तिसुधास्वाद तिलक। १३३ ( कल्पान्तभेद से दूसरी कथा ) मरु देश के राजा के यज्ञ में भगवद्भक्त दो भाई ब्राह्मणों में, एक ब्रह्मा दूसरे होता हुए; होता ने बहुत परन्तु ब्रह्मा ने उनकी अपेक्षा थोड़ी दक्षिणा पायी; अतएव ब्रह्मा ने दोनों दक्षिणा इकट्ठा मिला के आधा-आधा वांट लेना चाहा। होता ने नमाना । ब्रह्माने शाप दिया "तुम गंडकी में ग्राह हो; एवं होता ने भी शाप दिया तुम गज हो।" आपस की लड़ाई और लोभ के लाभ हैं तो ये हैं। सारांश यह कि ये दोनों वैष्णव वा ब्राह्मण थे और शाप से एक ग्राहं दूसरे गजेन्द्र हुए थे। एकदिन संयोगवश गजेन्द्र उसी ठौर अपनी हथिनियों और पट्ठों के समेत जल पीने गया कि जहां वही ग्राह रहता था;ग्राह ने गज का पांव पकड़ लिया; ग्राह अपनी ओर जल में, गजजी अपनी ओर थल में खींचते थे; कुछ कालपर्यन्त और हाथियों ने गजेन्द्रजी की सहायता की, परन्तु अंत को हारमान के उनको अकेले असहाय छोड़ छोड़ के चले गए॥ "कौन काको मीत कुसमय कौन काको मीत" दो० "हरे चरै, तापहिं बरे, फरे पसारहिं हाथ । तुलसी स्वारथ मीत जग, परमारथ रघुनाथ ॥" सहस्र वर्षपर्यन्त लड़ाई होती रही अंत को ग्राह प्रवल हो गज को नदी में ले चला, केवल सूडमात्र वाहर रह गयी। अव गज का ध्यान दीनरक्षक आरतहरन की ओर आया। "सुख समय तो दुइ नशान सबके द्वार वाजे । दुख समय दशरथ के लाल त गरीब निवाजे॥" श्रीगजेन्द्रजी ने भगवान् की शरण ली और एक कमल का फूल तोड़ कर श्रीवैकुण्ठनाथ को अर्पण करके पुकाराः- "यः कश्चनेशो बलिनोंऽतकोरगात् प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशं, भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्यान्मृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहि ॥ नायं वेदस्वमात्मानं यच्छक्त्याऽहं धियाहतम् । तंदुरत्ययमाहात्म्यं भगवंतं नतोस्म्यहम् ॥"

% 45 १३४ श्रीभनमाल सटीक। आर्त की टेर को सुनतेही आर्तिहरण चक्रधर हरि गरुड़ को छोड़ के वैकुण्ठ से दौड़ उसी निमिष श्रीगजेन्द्रजी के पास पहुँच, ग्राह को चक्र से मार श्रीगजेन्द्रजी को छुड़ा लिया। शीघ्रता देखिये कि "पानी में प्रगट्यो किधी वानी गयंद के ॥" भगवत् ने श्रीगजेन्द्रजीको तो परमपद दियाही, किन्तु ग्राहने भी मुक्ति पाई॥ श्रीमद्भागवत आदिक में श्रीगजेन्द्रकृत स्तुति पढ़नेही योग्य है। किसने प्रभुको पुकारा और अपने कप्टसे छुटकारा न पाया ? ॥ (३६) श्रीकुन्तीजी। (७६) टीका । कवित। (७६४) कुन्तीकरतूति ऐसी करै कोन भूत प्राणी; मांगति विपति, जासों भासवजन हैं। देख्यो मुख चाहाँ लाल !देखे विनु हिये शाल, हूजिये कृपाल, नहीं दीजै घास वन हैं।देखि विकलाई प्रभु प्रांखि भरिआई, फेरि घरही कोलाई,कृष्ण प्राण तन धन हैं। श्रवण वियोग सुनि तनक न रह्योगयो, भयो व पुन्यारोअहो! यही सांचो पन हैं ॥७०॥(५५६) वार्षिक तिलक। श्रीयादवेन्द्र महाराज श्रीकुन्तीजी के भतीजा थे; परन्तु आप प्रभु में ब्रह्मसच्चिदानन्दही का भाव रखती थीं, उनकी अन्तःकरणदृष्टि के सामने मोह माया का धुंधलापन नहीं था, सदा भगवत् की मूर्ति सन्मुख विराजमानही रहती थी॥ श्रीकुंतीजी की प्रशंसा करसके ऐसा कौन है ? जिस विपत्ति से सवलोग भागते हैं, सोई विपत्ति आपने प्रभुसे माँगी, कि "हेलालजी! सुखसे वह दुःखही मुझे भलाहै कि जिस दुःखमें तुम सदैव दर्शन दिया करते हो; मैं सदा तुम्हारा मुखारविंद देखती रहाचाहती हूं; जिसके अवलोकन विना मेरे हृदय में बड़ा शूल होता है; मुझपर कृपा करके सदा मेरे पास रहाकरो और नहीं तो वनवास दो, क्योंकि वनवास में सदा तुम साधरहतेथे,राज्यहोने पर तुम्हारा वियोग हुआ चाहताहे॥" जबकिश्रीयुधिष्ठिरजी को राज्य प्राप्त होनेके अनंतरभगवत्द्वारका * भक्तिसुधास्वाद तिलक। १३५ जाने का विचार करते थे, तब इसप्रकारकी प्रार्थना आपकियाकरतीं। आपकी यह व्याकुलता और विकलता देखके प्रभु की आंखों में प्रेमअनुभरआया, और श्रीद्वारकाकी यात्राको छोड़ दिया; आप इस प्रकार से आनंदकंद को रथपर से उतार के अपने पास लोटा लाई। सारांश यह कि श्रीकृष्ण भगवान् ही आपके धन,जन,तन,प्राण, सब कुछ थे। जब हरि इस जगत् को छोड़ गोलोक को गए, तो यह समाचार सुनने के साथही, श्रीकुंतीजी भी शरीर परित्याग करके, हरिके पास जा पहुँची। देखिये 'प्रेम का पन निवाहाना' इसको कहते हैं, ऐसे पन का नाम सच्चापन है॥ दो० "मीन आदि के प्रेम को, कविगण कियौ वखान । प्रीति सो सांचि सराहिये, विठुरत निसरै प्रान ॥१॥" "आली! मैंने यह सुनी, पह फाटत पिय गौन। 'पह' में, "हिय' में हरही, “पहिले फाटै कौन? ॥२॥" नारायण अति कठिन है, प्रेम नगर कौ वाट। या मारग सो पग धरै, प्रथम सीस दे काट ॥३॥ (४०)श्रीद्रौपदीजी। (८०) टीका । कवित्त । (७६३) द्रौपदी सती की बात कहै ऐसो कौन पटु ? बँचतही पट, पट कोटि गुने भए हैं। "द्वारका के नाथ !” जव बोली तब साथ हुते द्वारका सो फेरि आए, भनवाणी नए हैं ॥ गए दुर्वासा ऋषि वनमें पठाए नीच धर्म-पुत्र बोले विनय आवै पन लए हैं । भोजन निवारि त्रिया आइ कही शोच पस्यो, चाहै तनु त्यागो, कह्यो “कृष्ण कहूं गए हैं?"॥७१॥(५५८) वार्तिक तिनक। परमसती श्रीद्रौपदीजी की महिमा वर्णन करने की सामर्थ्य किस प्रवीण (पटु) को है ? आप श्रीयादवेन्द्र भगवान्को ब्रह्मसच्चिदानन्द ROGRESCA-MASSI - ****** ' श्रीभक्रमाल सटीक। जानके देवरभाव से उनमें अमल विशुद्ध भक्ति रखती थीं; और श्री. हरि भी आपको अपनी भावज जानते थे ।। चौपाई। "तिन सम पुण्य पुंज जग थोरे । जिनहिं राम जानत करि "मोरे"॥ को रघुवीर सरिस संसारा । शील सनेह निवाहनिहारा ॥" श्रीद्रौपदीजी की कथा महाभारत में विस्तार के साथ वर्णित है। जव श्रीयुधिष्ठिरजी बरबस जुआ खेलके छली दुर्योधन के हाथ श्रीद्रो- पदी सतीजी को हारगए, और कलिरूप दुर्योधन की आज्ञा से. दुष्ट दुःशासन भरीसभा में आपको नग्न करने के निमित्त वन खींचने लगा, ( केवल एक सारीमात्र आप उस समय पहिरे हुए थीं),तव उस कठिन काल में, आपने अपने देवर श्रीकृष्ण भगवान् भनवत्सल प्रणतहित को "द्वारकानाथ !" नाम लेके स्मरण किया। करुणासिन्धु महाराज यद्यपि साथही में विद्यमान थे, तथापि भक्तवचन चरितार्थ करने के लिये उसी क्षण द्वारका से हो आये ।। भनरक्षक भगवान् उस चीर (सारी)को अपनी कृपा से चढ़ाने- लगे, वह वस्त्र इतना बढ़ताजाता था कि दुःशासन, जिसको दशसहस्र हाथियों का बल था, खींचते खींचतेहारगया, परन्तु आपके एक नखके कोरका भी वस्त्र मर्यादासे नहीं सरकाबरंच आप सारी से हरिकृपासे ज्योंकी त्यों सम्पूर्णतः ढंकी हुई खड़ी रहीं। दुष्टों के मुख कालेहोगये। और सज्जनों के मुख से “भनि भक्त भगवन्त की जय" ध्वनि गूंज उठी, आपके चारो ओर वस्त्र का ढेर होगया। (क०) दुर्जन दुशासन दुकूल गयो “दीनबंधु !” दीन हैके द्रुपद- दुलारी यो पुकारी है।आपनो सवल छांडि ठाढ़े पतिपारथसे भीममहा- भीम ग्रीवा नीचे करि डारी है ॥अम्बर लौ अम्बर पहाड़ कीन्हों, शेप कवि,भीषम,करण,द्रोण,सभी यों विचारीहै । नारी मध्य सारीहै, कि सारी मध्य नारी है, कि सारीही की नारी है, कि नारीही की सारी है?" दो० "कहा करे वैरी प्रवल, जो सहाय रघुबीर । दशहजार गजबल घट्यो, घट्यो न दशगज चीर॥" BookStocheck न भकिसुधास्वाद तिलक। "हण गीतावली। अपनेनिको अपनो क्लिोकिवता, सकलालविश्वासविसारी। हाथउठाइ अनाथनाथलों " पाहि पाहि प्रभु पाहि !" पुकारी॥ तुलसी परखि प्रतीति प्रीति गति भारतपाल कृपालु मुरारी । "वसन वेप" राखी विशेष लखि विरदावलि मूरति नरनारी ॥१॥ प्रीति प्रतीति द्रुपदतनया की भली भूरि भयभभरि न भाजी। कहि .पारथ सारथिहि सराहत गई वहोरि गरीवनिवानी ॥ शिथिल सनेह मुदित मनही मन, वसनबीचविच वधू विराजी ।। सभा सिन्धु यदुपति जयमय जनु रमाप्रगटि त्रिभुवन भरि भ्राजी॥ युग युग जग लाके केशव के शमन कलेश कुलाज सुसाजी। तुलसी को न होइ सुनि कीरति कृष्णकृपालु अगति पथ राजी ॥२॥ एकदिनजव नीच दुर्योधन ने जगत्प्रसिद्ध श्रीदुर्वासापिजी को श्रीयुधिष्ठिरजी के पास वनमें (किसीप्रकार से) भेजा तो वह महात्मा ऐसे समय पहुंचे कि जब श्रीद्रौपदीजी लवको भोजन कराके श्रीसूर्य भगवान् की दी हुई टोकनी को धोधा चुकी थीं * । अतः श्री युधिष्ठिर आदि बड़े शोच में पड़े कि दससहस्त्र चेलों समेत दुर्वासाजी को अब कहां से भोजन करावें ? दुर्वासाजी ने कहा कि "जवतक तुम भोजनका टीकठाक करो, इतने में हमसब स्नानादिक नित्यक्रिया करके आतेही हैं।" धमरिमा श्री युधिष्ठिरजी ने विचार किया कि "अब तो शरीर परित्याग करना ही भला जान पड़ता है।" परन्तु श्री द्रोपदीजी ने कहा कि "आप.किसीप्रकार की चिन्ता मत कीजिये; क्या हमारे शोकविमोचन प्रभु कहीं गए हैं ?" (८१) टीका । कवित्त । (७६२) सुन्यो भागवती को बचन भनिभाव सस्यो, कस्यो मन, पाए श्याम, पूजे हिये काम है । आवतही कही "मोहि भूख लागी देवो 'श्री सूर्य नारायराजी ने प्रसन्न होकर वोह टोकनी दी धी । उसका यह चम कार या फिजयतक भाद्रौपदी जी भोगन करके उसको नहीं घोडालती थी, नय- तक निरिधभाँति को भोजनलायत्री उसमें मे निकासा करती थी" 625 , .

. M १३८ श्रीभक्तमाल सटीक । : कछु,” महा सकुचाये मांगें प्यारो "नहीं धाम है" ॥ "विश्व के भरण हार धरे हैं अहार, अजू, हमसों दुराके” कही वाणी अभि- राम है। लग्यो शाक पत्र पात्र, जल संग पाइ गए पूरण त्रिलोकी विप्र गिनै कौन नाम है ।। ७२ ॥ (५५७) वार्निक तिलक। प्रेमी के शुद्धान्तःकरण की भक्तिभावभरी वाणी (“क्या श्री. कृष्णचन्द्र कहीं गए हैं ?") सर्वव्यापी करुणाकर ने ज्योंही सुनी, फिर क्याथा? दयालुताने सुहृद के अन्तःकरण का चित्र सामने धरही तो दिया। भक्तवत्सलता कैसे स्थिर रहने देती ? निजधाम छोड़ने और भक्त के सम्मुख पहुंचने में शीघ्रता ने विद्युत् को लजित कर दिया। भगवत् तथा भक्त के एकत्र होने से प्रमोद पाकर अन्तःकरण की जो दशा होती है, वह अन्तःकरण ही के समझने की वार्ता है; लेखनी की सामर्थ से बाहरहै कि उसका किंचित् अंश भी प्रकाश करसके । चौपाई। "बार बार प्रभु चहत उठावा । प्रेम मग्न तेइ उठव न भावा ।" आनन्दकन्द विश्वभरण प्रभु ने बड़ी आतुरता से आप से मांगा कि " भौजी.! शीघ्र कुछ खिलावो, मैं बड़ा भूखा हूँ।" यह सुन, अति सकुचाय, आपने उत्तर दिया कि "प्यारे! खाने पीने की तो कोई वस्तु घर में नहीं है।" 'हरि मुसक्या के बड़ेही मधुरस्वरसे बोले कि "भौजी! मुझसे तुम दुराव क्यों करती हो ? तुमने तो वह वटुई (टोकनी) घर में धर रक्खी है, कि जिससे चाहो तो हरिकृपासे तुम संसारभर को खिला सकती हो।" आपने कहा कि "प्यारे ! मैं पाकर उस बटुई को धोधा चुकी हूं ॥" प्रभुने टोकनी मांगी, कि " लाओ, देखू" आप उठा लाई, और प्रभु के सामने उसको रखदिया ।। भगवत् ने उसमें से एकपत्ता साग का (सटाहुआ) ढूंढ़निकाला, जिसको, श्रीद्रौपदीजी को दिखला के, आप पागए और उसके ऊपर से थोड़ासा जल भी पीलिया। उसीक्षण, दुर्वासाजी और उनके चेलों की कौन कहे, वरंच सारेत्रैलोक्य के प्राणी भोजन से पूर्ण होगये ॥ CAM , भक्तिसुंधास्वाद तिलक। दुर्वासाजी, श्री अम्बरीपजी की वार्ता स्मरण करके, डरे; और वाहरही से वाहर नदी तट से अपने चेलों समेत भागे ॥ "जन को पन, राम ! न राखो कहां?", चौपाई। शील सकोच सिन्धु रघुराऊ । सुमुख, सुलोचन, सरल सुभाऊ॥ वह अपनी, नाथ ! कृपालुता तुम्हें याद हो कि न याद हो; वह जो कौल भक्नों से था किया, तुम्हें याद हो कि न याद हो । सुनी गज की ज्योंही वह आपदा, न विलम्ब छिन का सहा गया; वहीं दोड़े उठके पयादा पा, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥१॥ वह जो चाहा लोगों ने द्रौपदी को कि लाज उसकी सभामें लें; वह बढ़ाया वस्त्र को तुमने श्रा, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥२॥ वह अजामिल एक जो पापी था, लियानाम मरने में बेटे का; उसे तुमने ऊंचों का पद दिया, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥३॥ जिन धानरों में न रूप था, न तो जाति थी, न तो गुन ही था। रहे उलटे उनके ऋणी सदा, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥४॥ वह जो गोपी गोप थे ब्रज के सव, उन्हें इतना चाहा कि क्या कहूं; उन्हें भाइयों कासा मानना, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥५॥ वह जो गीध था, गनिका जो थी, वह जो व्याध था, वह मलाह था; उन्हें तुमने भनों का पद दिया, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥६॥ खाना भिल्लनी के वह जूठे फल, कहीं भौजि छिलके विदुर के चल; योंही लाखों किस्से कहूं मैं क्या, तुम्हें याद हो किन याद हो ॥७॥ वह गोपियों से कहा था क्या करो याद गीता की भी जरा; यानी विरद शरण निवाह का, तुम्हें याद हो कि न याद हो॥८॥ यह तुम्हारा ही "हरिचन्द" है, गो फसाद में जग के बन्द है; वह है दास जन्मों का आपका, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥६॥" (२) छप्पय (७६१) पदपङ्कज बांछौं सदा, जिनके हरि नित उर बसें ॥ योगेश्वर, श्रुतिदेवे, अङ्ग, सुचुकुन्दै, प्रियनत जेता। REACREGRESCORECRUST २२ Cokes श्रीमहमाल सटीक। पृथं, परीक्षित,शेष, वृत, शौनक, परंचेती, ॥ सतरूपा, यता, सुनीति, सती संवही, मन्दालेस। यज्ञपनि, ब्रजनारि, किये केशव अपने वस॥ऐसे नरनारी जिते तिनही के गाऊं जसे * । पदपङ्कज बांछौं । सदा, जिनके हरिनित उर बसें ॥१०॥(२०४) वार्तिक तिलक। जिन जिन भक्तजनों के हृदय में श्रीहरि भगवान् नित्य ही निवास करते हैं, तिन भन्नों के कमलरूपी चरणों की ( मैं मधुपसम) सदा इच्छा करता हूं- दो० "जाहि न चाहिय कबहुँ कलु, हरि सन सहज सनेह । वसहि निरन्तर तासु उर, सो हरि को निज गेह ।। (१) ६ (नव ) योगीश्वर, (१०) श्रीशौनकादिक, इत्यादिक योगीश्वर (११) श्रीप्रचेतागण, वृन्द। (१२) श्रीसतरूपाजी; उनकी (२) श्रीश्रुतिदेवजी, तीनों कन्या अर्थात् (३) राजा श्रीअङ्गनी, (१३) श्रीप्रसूतीजी, (४)श्रीमुचुकुन्दजी, (१४)श्रीआतीजी, (५) जगत् विजयी श्री (१५) श्रीदेवहूतीजी, नियनतजी महाराज, (१६) श्रीसुनीतीजी, (६) श्रीपृथुजी, (१७) श्रीमन्दालसाजी, (७) श्रीपरीक्षितजी, (१८) श्रीसती (शिवा) जी, (८) सहलानन श्रीशेप (१६) सम्पूर्णसनी (पतिवता) भगवान्, स्त्री वर्ग, (६)श्रीसूतजी, (२०) श्रीमथुरावासिनी यज्ञ- " पली समूह जसे यशै; चांडा याची । ACCU भक्तिसुधास्वाद तिलक। १४१ (२१) श्री ब्रजगोपिका वृन्द, जिन्होंने भगवान् को अपने वश कर लिया ॥ जय जय जय ॥ (२२) भगवत् को इस प्रकार अपने हृदय में वसानेवाले पुरुप वा स्त्री वर्ग जितने हैं, तिन्हीं के सुयश को मैं नित्य गान करता हूं और करूंगा। (८३) टीका | कवित्त । (७६०) जिनही के हरि नित उर बसैं तिनही की पदरेनु चैनु दैनु आभ- रण कीजिये । योगेश्वर आदि रस स्वादमें प्रवीन महा, विप्रश्रुति- देव ताकी बात कह दीजिये। आए हरि घर देखि गयो प्रेम भरि हियो ऊंचो कर करि, पट फेरि, मति भीजिये । जिते साधु संग, तिन्हें विनय न प्रसंग कियो, कियो उपदेश “मोसों बाद, पांव ली. जियै" ॥७३॥ (५५६) वार्तिक तिलक। जिन महानुभावों के हृदय में सर्वदुःख हरनहारे तथा मनहरनेवाले भगवान् सर्वदा वसते हैं,तिन्ही के पदपंकज की सर्व सुख देनेहारी धूरि को अपने मस्तक में सदा धारण करना चाहिये । तिन भन्नों में योगी- श्वर आदिक प्रेमापराभक्तिरस के छकेहुए परम प्रवीण प्रसिद्ध ही हैं । उनमेंसे, "श्रुतिदेव" नाम ब्राह्मण परमप्रेमी की वार्ता कहेदेता हूं- (४१) श्रीश्रुतिदेवजी। एक समय श्रीकृष्णचन्द्रजी द्वारकाजी से श्रीविदेहपुर (जनकपुर) में निमिवंशी राजा श्रीवहुलास्वजी से जाके मिले; और साथही, उसी समय सब साथियों समेत दूसरेरूपसे विप्र श्रीश्रुतिदेवजीके घरमें भी कृपा करके गए। ये दर्शन करतेही परम प्रेम में भरे, भाकिरस में मति को भिगाए, ऊंचे हाथों से, अपने वटा को फिरा २ के, नाचने लगे। परन्तु श्रीकृष्ण भगवान् के साथ में और जो सन्त थे, तिन को विनय प्रणाम आदर सत्कार इनने कुछ नहीं किया ! तब, प्रभु ने इनके प्रेम विचित्रता को देखके स्वयं यो उपदेश किया कि "तुमने सन्तों का तो सत्कार नहीं किया ! इनको मुझसे अधिक जानके SKAR RE STRY १४२ श्रीभक्तमाल सटीक। दण्डवत् प्रणाम तथा पूजन करो।" ऐसा सुन, सुख मान, इनने वैसाही किया। चतुर्मासा भर दोनों के घर कृपा कर रहे; तब भी एक को दूसरे का समाचार नहीं मिला ॥ (४२) योगीश्वर । (8) नवो योगीश्वरों के नाम श्रीग्रन्धक जी आगे चलके, (१३) तेरहवें मूल में कहेंगे। (४३) राजा श्रीअङ्गाजी। राजा "अङ्ग" सोमवंशी विठूर निवासी बड़े धर्मात्मा थे; इनके पुत्र न था। ब्राह्मणों से यज्ञ कराया परन्तु देवतों ने (पूर्व पाप के कारण) यज्ञ स्वीकार न किया। बहुत विनयवश ब्राह्मणों ने वसु का यज्ञ किया; वसु महाराज ने प्रगट होकर हविष (क्षीरान) दिया; जिससे राजावेणु उत्पन्न हुआ परन्तु वह अपने धर्मात्मा पिता श्री अङ्गजी की आज्ञानुसार नहीं चलता था। अतः श्रीअङ्गजी चुपचाप अरण्य में जाकर भगवत् के भजन में भलीभांति लगे। भजन-प्रभाव से परमधाम को गए। अङ्ग नाम के दूसरे राजा "अङ्ग प्रदेश" (पटना बिहार प्रान्त) के थे। इनके पुत्र श्री रोमपादजी बड़े भक्त हुए। (४४) राजा सुचुकुन्दजी। श्री मुचुकुन्दजी श्रीअयोध्याजी के राजा थे; देवतों की लड़ाई में बड़ी सहायता की; थकके एक पर्वत के कन्दरे में विश्राम कर रहे थे। श्री कृष्णचन्द्र "कालयवन" के पीछा करने से, भागते भागते उसी खोह में पहुंचे और अपना पीताम्बर श्री मुचुकुन्दजी के शरीर पर उढ़ाकर आप कहीं छुपगए । कालयवन इन्हीं को श्रीकृष्णजी समझ कर उलटी पुलटी सुनाने लगा। इनने आंखें खोली तो इनकी दृष्टि पड़तेही कालयवन मृत्यु को प्राप्त होगया।क्योंकि भक्कापराध का दण्ड शीघ्रतर मिलता है। और भगवान् ने स्वयं इस लिये उसको न मारा कि गर्गाचार्य का वचन था कि कालयवन किसी यदुवंशी के हाथ से न मरे॥ SCred See .

भक्तिसुधास्वाद तिलक। (ऐसा सुना गयाहै कि यही श्रीमुचुकुन्दजी श्रीजयदेव कविशिरो- -मणि हुए कि जिनका “गीतगोविन्द" प्रसिद्ध है)। (४५) महाराज श्रीप्रियव्रतजी । भगवान् श्रीस्वयंभूमनुजी तथा महारानी श्री सतरूपाजी के पुत्र, श्री प्रियव्रतजी, पाँच वर्ष के ही जव थे श्रीनारद भगवान् के उपदेश से, विरक्त हो वनमें हरि भजन करनेलगे। चौपाई। "जेतो श्रम संस्कृति हित कीजै। कस नहिं तेतो हरि मन दीजै ॥" महाराज श्रीमनुजी ने श्रीब्रह्माजी से कहा। तब दोनों प्रियव्रत जी को समझाने चले । इसलिये श्रीनारदजी ने आज्ञा देदी कि "वत्स ! श्रीब्रह्माजी तथा श्रीमनु महाराज तेरे पास आते हैं, उनके वचन मानलेना" श्रीब्रह्माजी के उपदेश से श्रीप्रियव्रतजी विवाह कर गृहस्थ हुए। उनके दस वेटे, तीन ऊर्द्धरेता (विरक्त) और सात गृहस्थ कि जो सातों द्वीप के राजा हुए। ये महाराज ऐसे प्रतापी भक्त और तेजस्वी थे कि इनका प्रकाश सूर्य के तेज के तुल्य था; जब सूर्यनारायण अस्ताचल को जाते तव भी इनके रथ के प्रकाश और तेज से दिन वनाही रहता था। श्री- ब्रह्माजी के उपदेश से इनने अपने तेज को ढांप लिया। तव सव को रात्रि का वोध होने लगा। चौपाई। "लघुसुत नाम “प्रियनत" ताही । वेद पुराण प्रशंसत जाही॥" "गुरुशाप्तन गुनि पुनि घर आयो। कियो राज्य रघुपतिपद ध्यायो॥" श्रीप्रियव्रतजी ग्यारह अर्बुद वर्ष राज्य कर भगवद्भजन करते शरीर का परित्याग करके परमधाम को गए । (४६) राजा श्रीष्टथुजी। राजा श्रीपृथुजी का नाम पहिले चौबीस अवतारों (मूल ५ छप्पे १ पृष्ठ ५१) में आचुका है। Sta ।

। 15 R-5 १४४ श्रीभकमाल सटीक। आप भगवद्यश के ऐले बड़े प्रेमी थे कि उसके श्रवण के निमित्त अपने कानों में दस लहस्त्र कर्णों की सामर्थ्य मांगी और पायी ॥ (४७) महाराज श्रीपरीक्षितजी। हस्तिनापुर के राजा श्रीपरीक्षितजी ही के प्रति, परमहंस श्रीशु- कदेवजी ने श्रीमद्भागवत सुनाया, कि जो सब पुराणों में श्रेष्ठ तथा पारमहंसीसंहिता है; सबका सार और संसार समुद्र के तरनेकी दीर्घ नौका (जहाज) है। आप श्रीअर्जुनजी के पोता थे । भगवान् ने गर्भ में ही इनकी विशेष रक्षा की थी। आपने "कलियुग" को दण्ड किया था, और इसको घातके लिये पाँच ही स्थान दिये थे अर्थात् ( १ ) हिंसा जहां हो; (२) मद्यपान जहां हो; (३) यन (जूबा) जहां हो; (४) वेश्या जहां रहें; और (५) सुवर्ण पर॥आपको ५००४ वर्ष हुए। (४८) श्रीशेपजी। "शेष सहस्र सीस जग कारण । जो अयतरेउ भूमि भय टारणं ॥" "चौदह भुवन सहित ब्रह्मण्डा । एक सीस सरसव सम मंडा ॥" श्रीशेष भगवान् । श्रीक्षीरशायी प्रभु के शय्या तथा छत्र रूप से अखण्ड सेवा करते हैं और सहस्त्र मुख से शेपी (भगवत् ) का यशगान करते हैं। 'अनन्त' के चरित्र का अन्त कौन पा सकता है ? किससे वर्णन हो? "श्रीसम्प्रदाय" के प्रगट करनेवाले आवार्य आप ही हैं। इसी- लिये श्रीसम्प्रदायको शेप सम्प्रदायके नाम से भी पुकारते हैं। भापकी ही सम्प्रदाय "श्रीरामानुज सम्प्रदाय" कही जाती है जिसकी परम्परा यों है (१) नारायण (२) श्रीलक्ष्मीजी (३) श्रीविष्वक्सेन (४)श्री शठकोप (५) श्रीश्रीनाथ (६) श्रीपुण्डरीकाक्ष (७) श्रीराममिश्र (८) श्रीयामुनाचार्यजी जिनके "मालवन्दारस्तोत्र" इत्यादि हैं (e) श्रीपूर्णाचार्य (१०) स्वामी अनन्त श्रीरामानुज भगवान् ॥ BRESISTEREST SURBAHEGAOSEX SHARE भनिधास्वाद तिलक। (४६-५०) श्रीसूतजी: श्रीशौनकजी। यह बात प्रसिद्ध है ही कि सब पुराणादिक के कीर्तन करनेवाले श्रीसूतजी हैं; एवं, उनके अठासी सहस्र श्रोताओं में श्रीशौनकजी प्रसिद्ध ही हैं। (५१) श्रीप्रचेता। ये दस भाई थे और दसों का नाम “प्रचेता" ही है; ये प्राचीन- वहीं के पुत्र थे। पिता की आज्ञानुसार तप करने के लिये सिद्धिसर वा "नारायण 'सर" को जाते थे। पन्थ में श्रीनारदजी मिले और कृपा करके भक्ति के लिये तप का उपदेश कर दिया। दस सहस्र वर्ष तप करने के अनन्तर, गरुड़ पर चढ़े पाकर भगवत् ने दर्शन तथा भक्ति का वरदान दिया, पुनः एकही लड़की से दसो भाइयों को विवाह करने की आज्ञा भी दी। उससे "एक" प्रजापति का दूसरा जन्म हुआ, जिनको राज्य देकरके दसो भाई पुनः भगवत् भजन करनेके लिये वन में गए। देवर्षि श्रीनारदजी कृपसिन्धु के उपदेशसे ऐसी भक्ति की कि देह त्याग कर दिव्य शरीर धर भगवत् के धाम को चले गएं ।। (५२) श्रीसतरूपाजी (श्री १०८कौशल्याजी) महाराज श्रीस्वायंभूमनु की धर्मपत्नी, श्रीसतरूपा और महाराज, श्रीदशरथजी की महारानी श्रीकौशल्याजी थीं। चौपाई। सतरूपहिं विलोकि करजोरे । “देवि ! मांगु वरु जो रुचि तोरे॥" "जो बरु नाथ ! चतुरनृप माँगा । सोइ कृपालमोहिअतिप्रियलागा॥ प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई । जदपि भगतहित तुम्हहिं सहाई॥ तुम्ह ब्रह्म दि जनक जग स्वामी । ब्रह्म सकल उर अंतरजामी॥ अस समुझत मन संशय होई । कहा जो प्रभु प्रमान पुन साई॥ जे निज भगत नाथ! तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं। दो० सोइ सुख, सोइ गति, सोइ भगति, सोइ निज चरन सनहु । GESGRESSASSETTES HER-SCRECESCHESTEGORY RAKAR १४६ श्रीभकमाल सटीक। सोइ विवेक, सोइ रहनि प्रभु ! हमहिं कृपाकरि देहु ॥ चौपाई। सुनि मृदु गड़ रुचिर वचरचना । कृपासिन्धु वोले मृदु बचना ॥ "जो कुछ रुचि तुम्हरे मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संशय नाहीं॥ मातु ! विवेक अलौकिक तोरे । कबहुँ नमिटिहि अनुग्रह मोरे,॥" श्रीसतरूपाजी श्रीसुरपुर में बसने के अनन्तर श्री १०८ अयोध्या जी में, मातु श्री १०८ कोशल्याजी महारानी हुई, जिनकी भक्तिवश अखण्डेक परात्पर ब्रह्म प्रियतम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी, श्रीअवध में आप्रगट हुए ॥अम्बा श्री १०८ कौशल्या महारानीजी की जय ॥ , चौपाई। मङ्गल मूल राम सुत जासू । जो कछु कहिय थोर सब तासू॥ तेहिते मैं कल्लु कहे वखानी । करन पुनीत हेतु निज वानी ॥ दो० "कौन तासु महिमा कहाँ, जासु सुक्न श्रीराम । विना काम सब कामप्रद, सहित काम नहिं काम ॥" बारिधि रस वात्सल्य की कौशल्या बेला मनहु ॥कृपाप्रीति प्रभु- भक्ति सुकीरति सकल सकेली । विरच्यौ चतुर बिरंचि राम जननी मुद बेली॥ सीतासरिस स्वभाव धर्मधुरधरणि उदारा।.भरतादिक को करति रामते अधिक दुलारा ॥मातु सुमित्रा आदि सब अति अनन्यतेहि समगनहु।वारिधिरसवात्सल्य की कौशल्या बेलामनहु॥ (५३) श्रीप्रसूतीजी। श्रीसतरूपा मनुजी की कन्या, श्रीदक्षजी की धर्मपत्नी, श्रीप्रसूती जी, अतिशय पतिव्रता तथा भगवद्भक्तिपरायणा हुई.। आपकी स्तुति किससे हो सकती है। तीनों बहिनें एक से एक बढ़के प्रशंसनीय हुईं ॥ (५४) श्रीमाकूतीजी। महाराज श्रीस्वायंभूमनु और महारानी श्रीसतरूपाजीकी नन्दिनी श्रीआकृतीजीका विवाह, श्रीसबिपिजीसे हुआ। इनकी भगवद्भकि तथा पातिव्रत की प्रशंसा कौन कवि कर सकता है । आप तीनों श्री. उत्तानपादजी और श्रीप्रियव्रतजी की भगिनी (वहिन) थीं। BEERUSALEGASCRICS १४७ ************* भनिसुधास्वाद तिलक । (५५)श्रीदेवहूतीजी। चौपाई। "स्वायंभूमनु अरु सतरूपा। जिन्हते भइ नरसृष्टि अनूपा ॥ दम्पति धरम आचरन नीका । अजहुँ गाव श्रुति जिन्हकै लीका ।। देवहूति पुनि तासु कुमारी । जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी ॥ आदि देव प्रभु दीनदयाला । जठरधरेउजेहि कपिल कृपाला॥" "देवहूति, तहँ करि हह नेमा । करि सियपिय पद पूरण प्रेमा । रही जगत महँ सो कछु काला । लग्यो न तेहि संसृत जंजाला ॥" जो स्वयं हरि (कपिलजी) की माता हुई, और जिन्ह देवी ने साक्षात् भगवत् से उपदेश पाया, उनकी स्तुति जहां तक की जा. सके सो थोड़ी ही है तीनों बहिनों की कथा उक्त प्रकार से है । (५६) श्रीसुनीतीजी। "ध्रुव हरिभक्त भएउ सुत जासू।” चे महारानी, महाराज उत्तान- पाद की धर्मपत्नी, भक्तराज श्रीधवजी की माता हैं, जिनने अपने प्रियपुत्र (श्रीवजी) को पांच वर्ष की अवस्था में हरिभजनपरा- यण कर दिया। "छोड़ि भवन धन गवन कीजिये । रघुपति पद रति रंग भीजिये। श्रीहरि संकट काटनहारे । दूज न रक्षक और तिहारे ॥" "हरिभरोस करि कियो न मोह। पंच वर्ष वालक तजि छोहूं। चढ़ि विमान सुन्दर सुखलाई । गइ वैकुंठ निसान वाई॥ ध्रुवहु लख्यो निज नैन उठाई । गवन करत भागू निज माई ॥" "पुत्रवती जुवती जग सोई । रघुपतिभक्त जासु सुत होई ॥" (५७) देवी श्रीमन्दालसाजी। श्रीसीतारामकृपा से श्रीमन्दालसाजी ने ऐसा पन किया कि "जीनं जीव मम गर्भहिं आवे । सो पुनि जन्म मरण नहिं पावै ॥ भग- वत होके आवागवन से छूट जाय आपने अपने पितासे यह विनय किया कि यदि मेरा विवाह कीजिये तो ऐसें पुरुष से कीजिये कि MER श्रीभक्तमाल सटीक । जो "दूसरी स्त्री के पास नहीं जाने की प्रतिज्ञा करले ॥” इसीके अनु: सार आपका विवाह राजा रतिध्वज (प्रतर्दन) से हुआ श्रीमन्दालसा कथा श्रीप्रियादासजी आगे चलके कहंगे। माता होतो ऐसी॥ इनके जो पुत्र होता था, श्रीमन्दालसाजी उसको बचपन ही से ऐसा उपदेश किया करतीं कि वह ग्यारहवें ही वर्ष में तीक्ष्ण विरक्त हो, हरिभक्त परम अनुरक्त हो जाता था। इसी प्रकार से जब पांच छःपुत्र विराग और अनुरागपूर्वक हरिभजनपरायण हो ही गए, तब राजाने बड़ी युक्ति से रानी श्रीमन्दालसाजी से यह वर मांग लिया कि “यह सातवां वेटा अलर्क (सुबाहु) मेरे लिये रहने दो कि राजकाजप्रवृत्ति नीति सीख सके।" वचनवश रानी ने यह बात स्वीकार की । और एक श्लोक लिख के एक यन्त्र में अपने इस लघुतम युन सुबाहु के दक्षिणहस्तमें बांध के यह सिखा दिया कि "वत्स! जब तुझपर कोई कष्ट पड़े तो तू इस यन्त्रको खोलके पढ़ना।" पुत्रको राज दिलवा रानी श्रीमन्दालसाजी पति को सुन्दर उपदेश कर, हरिभजन के निमित्त पतिके साथ साथ बनको गईं; और सुबाहु (अलकी राज्य करनेलगा। वन में अपने पुत्रों को- वासनाविगत श्रीहरि पदरत देख अति प्रसन्नहो यह वोली कि "हे पुत्र | सबसे छोटे सुत की मुझे चिन्ता है उसको भी किसी प्रकार से निवृत्ति मार्ग में लायो॥ सबसे बड़े पुत्रजी ने मातुबचन तीस धर, घर आ सबसे छोटे भाई (राजा)से उचित वार्ता करके देखा कि 'वह रजोगुण में बहुत ही डूबा है और उस प्रमाद में उपदेश कुछ काम नहीं करता। तब उनने अपने मानू काशीराज को उभारा, आधा राज देने का वचन दिया, और यों उसने इनके छोटे भाई पर चढ़ाई की। इस संकट के समय, सुवाहु (अलर्क) ने अपनी माता के दिये यन्त्र को खोल के पढ़ा॥ चौपाई। "करै न संग कबहुँ केहु केरो। करे तो सन्तहि संग घनेरो॥" श्लोक । “संगः सर्वात्मना त्याज्यः सचेदातुं न शक्यते । ससद्भिः सह कर्तव्यः संगः संगारिभेषजम् ॥१॥ " RE भक्तिसुधास्वाद तिलक ।' १४६ शुद्धोऽसि वुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि,संसारमाया परिवर्जितोऽसि। संसारनिद्रां त्यज स्वप्नरूपां” मन्दालसा वाक्यमुवाच पुत्रम् ॥ २॥ यह पढ़ते ही श्रीसीतारामकृपा से श्रीमाता के पासीस से इस वचन का ऐसा अधिकार इनके चित्त पर हुआ कि उसी क्षण वहीं से बन की ओर चल निकले । श्रीरामकृपा से श्रीदत्तात्रेयजी मिले । "वालि परम हित जासु प्रसादा । मिलेउ राम तुम शमन विपादा॥" उनके सत्संग के उपरान्त, प्रसन्नतापूर्वक अपने बड़े भाईजी से जामिले तथा माता के चरण पर गिरे और-पिता एवं सब भाइयों के सत्संग का आनन्द पाया । सब मिल भगवद्भजन करने लगे। दो० "ऐसी श्री मन्दालसा, राम भक्त सिरताज । पति सुत तारण भव उदधि, आपुर्ति भई जहाज ॥" यह घटना सुन वह राजा भी, कि जिसने अलर्क (सुबाहु) पर चढ़ाई कर सुबाहु के जाने पर राज कर रहा था, अपने पुत्र को राज्य दे उन्हीं के पास जा भगवद्भजनपरायण हो गया । श्रीमन्दालसाजी की जय ॥ (५८)श्रीसतीजी (श्रीउमाजी) दक्षसुता श्रीसतीजी महारानी की कथा, श्रीशिवजी की कथा के अन्तर्गत, (पृष्ठ ६७।६८) हो चुकी है ।। "सिय वेष सती जो कीन्ह तेहि अपराध शंकर परिहरी। हर विरह जाइ बहोरि पितु के यज्ञ योगानल जरी ॥". (५६) यज्ञपत्नी (श्रीमथुरानी चौवाइन) संसार का प्राण "प्रेम" ही है । भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी ने गऊ चराते समय एकदिन चतुर्वेदीविनों (चौबे लोगों) को, यज्ञ करते देखा; अपने सखाओं को उनसे भोजन मांगने के लिये भेजा; चौवे लोगों ने नहीं दिया; सखा सव लौटाए। पुनः, प्रभु ने उनको भेजा कि "चौवाइनों (उनकी स्त्रियों) से मांगना" । ब्रजवन्द महाराज का नाम सुनतेही वे सब अतिशय प्रेम से (अपने पतियों की आज्ञा के विरुद्ध ) थालियों में भोजन ARRERFARRE RECREEPROST.

.. KAR " . Lite १५० . श्रीभक्रमाल सटीक। व्यञ्जन ले ले वन में पहुँच, श्रीनन्दनन्दन महाराज को सखाओं समेत भोजन करा, मनमानी भक्ति का वरदान पा, घर घर आ मंगलकारिणी हुई॥ सर्वथा। "रूप गुन्यौ प्रथमै सुनिकै हरि देखन की अति लालसा जागी। आय प्रत्यक्ष लखी तिनको अपने को गुनी जग में बड़भागी। श्रीरघुराज अनूप स्वरूप हिये धरि मंदि दृगें अनुरागी। मोहन को मिलिके मनमें द्विजनारि वुझाई दई विरहागी॥ (६०)श्रीगोपिका वृन्द। "प्रेम"--हा! इस शब्द (प्रेम) के तो सुनते ही हृदय की कुछ और ही दशा होजाती है; नेत्रों के सामने एक व्यवधान सा आजाता है। प्रिय पाठक ! संसार में ऐसा कोन सा अन्तःकरण है कि जिसपर इस तीक्ष्णशस्त्र ने अपना कठिन घाव न किया हो? चाहे थोड़ा चाहे वहुत । परन्तु कहीं कहीं तो इसने ऐसी अपूर्व तथा विलक्षण दशा प्रकट की है कि जिसके सुनने समझने से बड़े बड़े कठोर चित्तवालों के नयनों से.भी मघां की सी झड़ी लग जाती है । श्रीब्रजगोपियां ज्ञान और भक्ति की खानि वरञ्च साक्षात् परा.प्रीति ही तो थीं ॥ "श्री नारद भक्ति सूत्र" देखिये। वेद, ब्रह्मा, शिव, शेष, सनकादि, गणेश, नारद, शारदा, सूत, श्रीनाभास्वामी, श्रीतुलसीदासजी, श्रीसूरदासजी इत्यादिक बड़े-बड़े कुशल, कोई भी तो श्रीवजगो- पिकाओं की पूरी प्रशंसा न करसका पर, अपनी अपनी वाणी को कृतार्थ करने के हेतु कोई कुछ न कुछ कहे चिन रहा भी तोनहीं । आज तक साधारण लोक भी इनके प्रेम को गाते ही हैं। श्रीब्रज के कुंज-कुंज घर-घर हाट घाट बाट से सुन्दरियों की ऐसी पुकार सुनाई देती है कि-'हाय श्याम मिलिहौ कवै तुम बिन छिनु युग जात॥१॥" ऊधो! जाग कहत हैं काको?। की दधि माखन के चाखन को, लाखन खन-ताको । की जमुनातट पनघट ऊपर घट पटकन लीला को। SAIRSCRECACANCERRAR NSAR - *555555HRES-15 भकिसुधास्वाद तिलक। १५१ की मधुवन सँग श्याम विहरिबो, हरिवो चीर अवला को॥ 'की मुरली की तान मनोहर प्रान हरो नहिं थाको। की रस रास बास में वसियो, हसियो हेरि हहा को॥ हों तो गई गुजरी उनहीं पै वांकी चितोनि जाको । इनते कळू और नहिं चाहों पावों “जीत" पिया को ॥२॥ कबसे पियारे तिहारे दरस को, तरसत हैं मोरे नैन-राम । जोहत वाट कपाट सो लागी आठो पहर दिन रैन-राम ॥ ऐसी सुरतिया हा री वसी है, पलको न लागन दैन-राम । जानों न ठांच कहां तुम छाये, आये नहीं सुधि लैन-राम ॥ पतियां की बेतियां को कौन चलावे, नेकहु संदसवो सरै न-राम । कासों कहूं कोऊ सुनत न मोरी, विठुरन की तोरी वैन-राम ॥ जो कोउ सुनत करेजवा है थामत, बिसरावत सुख चैन-राम । आवो पै आवो देखावो छटा छवि, नैना नोकीलेव पैन-राम ॥ जो नहिं आवो पठावो खवरिया, ऐसी निठुरता पैन-राम । अन्तर की गति जाननहारो, तुम चिन कोऊ तो है न-राम ।। जो मन भावे करो सोई प्रीतम, जीत कबहुँ विसरैन-राम ॥३॥ माधो ! कहि न जाति गति ब्रज की। c &c. ॥४॥ कहि न जात ब्रज की कछु वतियां । देखत ही मोको उठिधाई ग्वाल गोपिका जतियां ॥ दिन की और दसा गोसाई ह्वां की और रतियां । नहिं प्रतीति कोऊ उर मानत रहत वैसिये पतियां ॥ काह कहूं कहि जात न मोपै भरि आवत हैं छतियां । जीत आपही जाय तो देखो निवहत है केहि मतियां ॥५॥ (सर्वगीत लाल) सर्वपा। सुत दारा ओ गेह की नेह सबै ताजे जाहि विरागी निरन्तर ध्यावें। यम नेम औ धारना आसन आदि करें नित योगी समाधि लगावें॥ जहि ज्ञान औध्यानते जाने कोजओ अनादि अनन्त अखण्ड बताने। ताहि अहीर की छोहरियाँ, बछिया भर छांछ पै, नाच नचावें ॥६॥ BRECECRELESECRECHAR 14 ** १५२ श्रीभक्तमाल सटीका श्लोक। “यत्ते सुजातचरणाम्बुरहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।। 'ते नाटवीमटसि तव्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभि+मति धीर्भवदायुपं नः॥" (जो दशमस्कन्ध का प्राण कहा जाता है, ) सो कैसै अनूठे चित्त से निकला है। गोपियों के प्रेम सा प्रेम, न तो होनेवाला, न है, और न हुभा; हां श्रीजनकनगर की युवतियों की प्रीति और श्रीरघुवीरचरणा- नुरक्ति का क्या कहना ॥ , चौपाई। कहि न सकहिं सत शारद शेसू । वेद विरंच महेश गनेसू ।। सो मैं कहउँ कवनि विधि घरनी । भूमि नाग सिर धरइ कि धरनी ॥ (८४) दप्पय (७५६) अंघीअम्बुज पांशु को जनम जनम हौं जाचिहौं । प्राचीनहि , सत्यव्रत, रहुगणं, सगरे, भगीरथ, । वाँ- ल्मीकि,मिथिलेश,गए जेजे गोविंद पथ॥ रुकमाङ्द, हरिचन्दै, भरत, दधीचिं', उदारा । सुरथै, सुधन्वी, शिविर, सुमति अति वलि-की-दारी,॥नील, मोरध्वजें, ताम्रध्वज, अलरके की कीरति राचिहौं । अंघी अम्बु- ज पांशु को, जनम जनम हौं जाचिहौं ॥ ११(२०३) वार्तिक तिलक। इंन भक्तों के चरण कमल की धरि (पांशु) को, मैं जन्मजन्म याचूंगा इन्ही भक्तों की रगीली कीर्शियों से मैं रँग जाऊंगा। (१)श्रीप्राचीनवहींजी (४) श्रीसगरजी (२) श्रीसत्यवतजी (५) श्रीभगीरथजी (३) श्रीरहूगणजी (६) महर्षि श्रीवाल्मीकिजी .

< 5*555 भक्तिसुधास्वाद तिलको (७) श्रीवाल्मीकिजी, दूसरे (१४) श्रीसुरथजी ८) श्रीमिथिलेशजी महाराज (१५) श्रीसुधन्वाजी (६) जो जो श्रीविदेहवंशी (१६) राजा श्रीशिविजी श्रीभगवद्भक्ति के पथ में (१७) अतिसुमति श्रीवलिपली चले, ते सव रानी श्रीविन्ध्यावलीजी (१०) श्रीरुक्माङ्गदजी (१८) श्रीनीलजी (११) श्रीहरिश्चन्द्रजी (१६) श्रीमयूरध्वजजी (१२) श्रीभरतजी (२०)श्रीताम्रध्वजजी (१३) परमोदार श्रीदधीचिजी (२१) श्रीअलर्कजी (८५) टीका | कवित्त । (७५८) जन्म पनि जन्म को न मेरे कछु सोच, अहो ! सन्तपद कंज रेनु सीसपर धारिये। प्राचीनवर्हि आदि कथा परसिद्ध जग,उभै वालमीकि वात चित्त ते न टारियभिए भील संग भील,ऋषि संग षिभए,भए रामदरशन,लीला विसतारिये। जिन्हें जग गाय किहूं सकै ना अघाय- चाय भाथ भरि, हियो भरि, नैन भरि ढारिये ॥७४ ॥(५५५) वार्तिक विलक। अहो ! मुझको इस बात का तो कुछ भी शोच नहीं है कि मोक्ष न पाके जगत् में वारम्बार जन्म लूं,क्योंकि जन्म लेके यदि सन्तों के चरणकमल की रज सीस पर धारण करूं तो मुक्ति से भी अधिकतर सुख मानूंगा। प्राचीनवहीं आदिक भक्तों की कथा श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों से जगत् में प्रसिद्ध ही है। परन्तु महर्षि श्रीवाल्मीकि जी, तथा दूसरे बाल्मीकिजी, इन दोनों भक्कों की कथा चित्त से न टालना चाहिये क्योंकि दोनों की वार्ता अनोखी हैं। (६१) महर्षि श्रीवाल्मीकिजी। आदि कवि श्रीवाल्मीकिजी भिल्लों का संग पाके भिल्ल ही होगए; पुनः श्रीसप्तर्षि के सत्संग से महर्पि होगए, कि साक्षात् श्रीसीतारामलक्ष्मणजी ने आपके आश्रम में जाके दर्शन दिया । आपने विस्तारपूर्वक श्रीरामायणलीला को गान किया, कि SSORSERUGRESSAGE SHREERS AS श्रीभक्तमाल सटीक। जिसके श्रवण अनुकथन से संसार के सज्जनों को किसी प्रकार से तृप्ति होती ही नहीं । "रामचरित जे सुनत अघाहीं। रस विशेष जाना तिन नाहीं ॥" वरंच श्रवण और गान करने पर अत्यन्त चाव भाव हृदय में भर आता है । और नेत्रों से प्रेमाश्रु का प्रवाह ढलने लगता है। सो “चन्दौ मुनि पद कंज, रामायण जिन निर्मएउ। सखर सकोमल मंजु, दोपरहित दूपण सहित ॥" श्रीवाल्मीकिजी थे तो ब्राह्मण परन्तु भीलद्वारा पाले गए तथा भीलिनी ही से विवाह भी हुआ। पथिकों को मारना लूटना यही उनका उद्यम था। "को न कुसंगति पाइ नशाई।" करुणाकर हरि की इच्छा से एक दिन श्रीसप्तर्षि ( १ कश्यप २ अत्रि ३ भरद्वाज ४ बसिष्ठ ५ गौतम ६ विश्वामित्र और ७ जमदग्नि) उसी ओर से जा निकले । इन्हें भी जव आपने लूटना मारना चाहा तो महा- 'रमाओं ने यो उपदेश किया कि “रे द्विजाधम ! दो० जो तेरे यमदण्ड में, भागी होइ न कोइ ! तौ कत कीजत पाप हठि, घोर दण्ड जिहि होइ ?" चौपाई। सुत तिय उत्तर दियो प्रचण्डा । "हम नाहीं भागी यमदण्डा॥" श्रीसीताराम कृपा से महाभागवत सप्तर्षि के दर्शन सम्भापण से उनकी किरातबुद्धि जाती रही; विरक्ति तथा सुबुद्धि उत्पन्न हुई। "पाहि पाहि" कह, चरण पर गिर, अपने कल्याण का उपदेश पूछा। दिव्यदर्शन करुणापूर्ण सन्तों ने कृपा करके देशकाल पात्रानुसार आज्ञा यह दी कि "मरा मरा रट।"वे वहीं बैठ अमित काल पर्यन्त "मरामरामरामरा" रटते जपते रहे ॥ चौपाई। "सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परसि कुधातु सुहाई ॥" सहस्र युग बीतने पर पुनः श्रीसप्तर्षि कृपा करके उधरही से आए,और वल्मीकि (वामी) में से अन्वेषण करके उन्हें ढूंढनिकाला, Sosteories of Scies * भक्तिसुधास्वाद तिलक। वाल्मीकि" नाम रक्खा । व्याध को राम कृपा तथा नाम प्रताप से शुद्ध सिद्ध मुनीन्द्र पाया। सत्सङ्ग की जय ।। "जहां वालमीकि भए व्याध तें मुनीन्द्र साधु 'मरा मरा' 'जपि' सुनि सिष ऋषि सात की ॥" चौपाई। "उलटा नाम जपत जग जाना । बालमीकि भए ब्रह्म समाना॥" श्रीसीताराम मन्त्रराज का उपदेश करके, श्रीसप्तर्षि चले गए। श्रीरामनाम का माहात्म्य कौन किस प्रकार से कहे ?॥ श्रीनारद भगवान् तथा जगत्पिता श्रीब्रह्माजी ने कृपा करके महर्षि आदिकवि महाराज को श्रीरामगुण तथा रामचरितसे परिचित किया। महर्षि ने शतकोटि रामायण कीर्तन किया।"चरितं रघुना- थस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥ कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् । आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्" (कवित्त) विधिजू सुजस बीज वोये विश्ववाग़ वीच, बारिबर दै बढ़ाए मोक्षफल काम हैं। सगुणावतार ब्रह्मयशं 'रसराम' थंभ, काण्ड सप्तकाण्ड, सर्ग पत्र अभिराम है ॥ त्रेता धातुराज, रामअयन रसाल तरु, कविता सुसाखा पै बिराजै वसु जाम हैं । कूजत मधुर मधुराखर श्रीराम राम वन्दौं वालमीकि कवि कोकिल ललाम हैं। चौपाई। "राम लेपन सिय प्रीति सुहाई । वचन अगोचर किमि कहि जाई॥ देखत बन सर सैल सुहाए । बालमीकि आश्रम प्रभु आए । दो० सुचि सुन्दर आश्रम निरखि, हरपे राजिव नैन । सुनि रघुवर आगमन मुनि, आगे आयउ लैन ॥" चौपाई। "मुनि कहँ राम दण्डवत कीन्हा । आसिरवाद विप्रवर दीन्हा ॥ देखि राम. छवि नैन जुड़ाने । करि सनमान आश्रमहिं आने । मुनिवर अतिथि प्रान प्रिय पाए । कंदमूलफल मधुर मँगाए । सिय सौमित्रि रामफल खाए । तव मुनि आसन दिये सुहाए ।

। श्रीभक्तमाल सटीक । वालमीकि 'मन आनंद भारी । मंगल मूरति नैन निहारी॥" सो०' "राम स्वरूप तुम्हार, वचन अगोचर वुद्धि पर । अविगत अकथ अपार, 'नेति नेति नितनिगम कह ॥" "श्रीवाल्मीकीय रामायण" बड़ा प्रामाणिक ग्रन्थ है। (१) श्रीवाल्मीकीय (२) श्रीभागवत (३)पराशरीय-श्रीविष्णुपु- राण (४) मनुस्मृति,और (५) महाभारत,ये पांचों बड़ेही प्रामाणिक माने जाते हैं । इझरेजी, फारसी, आदि में भी इनके अनुवाद हैं । (६२) दूसरे श्रीवाल्मीकिजी। (८६) टीका । कवित्त । (७५७) हुतो बालमीक एक सुपच सुनाम, ताको श्याम ले प्रगट कियो, भारथ में गाइये । पांडवन मध्य मुख्य धर्मपुत्र राजा, आप कीनो यज्ञ भारी, भूपि आए, भूमि छाइये ॥ ताको अनुभाव शुभ शंख सो प्रभाव कहै, जो पै नहीं बाजे तो अपूरनता आइये । सोई बात भई बहु बाज्यो नाहिं, शोच पस्यो, पूछे प्रभु पास “याकी न्यूनता वताइये" ॥७५॥ (५५४) वार्तिक तिलक। अब दूसरे वाल्मीकिजी की कथा कहते हैं । एक सुपच गुप्त भगवद्भक्त "वाल्मीकि" नाम के थे। उनको श्रीश्यामसुन्दरजी ने प्रगट किया; सो कथा "महाभारत" ग्रन्थ में गाई हुई है। 'पांचो पाण्डवों के मध्य में ज्येष्ठ धर्मपुत्र श्रीयुधिष्ठिरजी राजा थे। आपने इन्द्रप्रस्थ में एक बड़ा भारी यज्ञ किया। जिसमें सम्पूर्ण ऋषिवर्ग आए, जिनसे समस्त यज्ञभूमि भर गई। उस यज्ञ के पूर्ण होने का अनुभाव प्रभाव यह था कि एक शंख रक्खा गया, कि जब वह आपसेआप बज उठे तव यज्ञ को सम्पूर्ण जानें । और यदि शंख स्वतः न बजे, तो जानिये कि यज्ञ पूर्ण न हुआ; सो वैसा ही हुआ अर्थात् शंख नहीं वजा ॥ तव युधिष्ठिरादिक को बड़ाही शोच हुआ; और श्रीकृष्णचन्द्रजी * श्रीभगवद्गीता तो महाभारत के अन्तर्गत है ॥ १"सुपर" (श्वपच )लो श्वान का मांस भी रांध के सा जाये, भंगी। , अर *HAR भक्तिसुधास्वाद तिलक। से पूछने लगे कि "किस घटती (न्यूनता) से शंख नहीं बजा ? सो कारण आप कृपा करके बता दीजिये ॥" (८७) टीका | कवित्त । (७५६) वोले कृष्णदेव, “याको सुनौ सब भेव, ऐपै नीके मानिलेव बात- दुरी समुझाइये । भागवत संत रसवंत कोऊजयो नाहि, ऋपिनसमूह भूमि चहूदिशि छाइये ॥ जोपै कहौ "भक्त नाही" नाहीं कैसे कहीं, गहोंगांस एक और कुलजाति सोबहाइये।दासनिको दास,आभमान कोन वाँस कहूं, पूरण को आस, तोपे ऐसो लै जिंवाइये॥७६॥(५५३) वार्तिक तिलक। श्रीकृष्ण भगवान् ने उत्तर दिया कि इसका सव भेद सुनो। परन्तु सुनके उसको भलेप्रकार से मानना । क्योंकि मैं तुम्हें गोप्य रहस्य बताए देता हूं। यद्यपि प्रषियों के वृन्द तो आके यज्ञभूमि में चारों ओर छाए हुए हैं, परंच किसी भक्तिरसरसिक भागवत मेरे प्यारे सन्त ने तुम्हारे इस यज्ञ में भोजन नहीं किया, इसीसे शंख नहीं वजा।यह यदि कहिये कि "क्या ये सब मुनिगणआपके भक्त नहीं हैं ?" तो यह कैसे कहूं कि "ये मेरे भक्त नहीं हैं" परन्तु एक औरही गांस ग्रहण करने योग्य है कि ये सब ऋषिमुनि आचार, ब्रह्मज्ञान, जाति तथा कुल के अमिमान से भरेहुए हैं;पर मेराभक्त तो जाति और कुल आदिक के अभिमान को भक्तिरूपी निर्मल नदी में बहा के मेरे दासों का भी दासहोकर समस्त अभिमानों के लेशसे रहित रहता है। चौपाई। "भक्ति बिरति विज्ञान निधाना । वास विहीन गलित आभिमाना॥ रहहिं अपनपी सदा दुराए । सब विधि कुशल कुवेष बनाए । तेहिते कहहिं सन्त श्रुति टेरे । परम किंचन प्रिय हरि केरे॥ प्रभु जानत सव विनहिं जनाए । कहहु लाभ का लोक रिझाए ॥" दो० "तिनहिं न जानहिं प्रगट सब, ते न जनावहिं काहु। लोकमान्यता अनल सम, कर साधन वन दाहु ॥" १ "दूरी" छुपी, गुप्त । २ "गांस"=गुप्त सूक्ष्मयात । ३ "वास"-गन्ध; तनक कुछ। E- , . म १५८ श्रीभकमाल सटीका "यदि तुम्हें यज्ञ की पूर्णता की इच्छा हो, तो ऐसे मेरे प्यारे भक्त को भोजन कराओ।" (८) टीका । कवित्त । (७५५) ऐसो हरिदास पुरांसपास दीसे नाहि, वासविनु कोऊ लोक लोकनि में पाइये । "तेरेई नगर मांझ निशि दिन भोर सांझ पावै जाय, ऐपै काहू वात न जनाइये" ॥सुनि सव चौकिपरे, भाव अचरज भरे,हरे मन नैन "अजूवेगिहीवताइये।कहां नांव ? कहां ठांव?जहाँ हम जाय देखें, लेखें करि भाग, धाय पाय लपटाइये ॥७७॥ (५५२) चार्तिक तिलक । ऐसे श्रीमुखवचन सुनके श्रीयुधिष्ठिरजी बोले कि "ऐसे भगवत्दास तो हमारे नगर के आसपास कहीं दिखाई नहीं देते; वरंच ऐसे विरक्त सर्ववासनाविगत सन्त कदाचित् कहीं किसी लोकलोकान्तर में मिलें तो मिलें।" तंव आपने कहा कि "तुम्हारे ही पुर में तो दिनरात रहते हैं, और नित्यही सांझ सवेरे तुम्हारे यहां आते जाते हैं; परन्तु न कोई उनके प्रभाव को जानता है, और न वे किसी को जताते हैं ॥" यह सुनतेही सब चकित होके आश्चर्यभाव में मग्न हो गए; सब के मन तथा नेत्र दर्शन के अभिलाप से अकुला उठे; और सव कहने लगे कि अब कृपाकरके शीघ्र ही वता दीजिये कि उनका क्या नाम है और वे कहां विराजते हैं, जहां हम जाके दर्शन करके अपना धन्यभाग्य माने और उनके चरणकमल में लपट जायें ।" (८६ ) टीका । कवित्त । (७५४) जिते मेरे दास कभू चाहे न प्रकास भयो, करों जो प्रकास,मानै महा- दुखदाइये । मोको पस्यो सोच यज्ञ पूरन की लोच हिये वाको नाम; जिनि ग्रामतजिजाइये॥ऐसौतुम कहो, जामें रहो न्यारेप्यारे सदा, हमहीं लिवाइ ल्याइ, नीकेकै जिॉइये । जावो 'बालमीक' घर, वड़ो अलीक साधु;कियो अपराध हम दियो जो वताइये" ॥७॥ (५५.१) १"बासबिनु"-गृहहीन, विरक; वासना विगत, इच्छा रहित । २"लोच"= देखने की इच्छा। ३ "जिनि" मत, नहीं ४ "जिमाइये" जिंबाइये,भोजन कराइये । ५ "श्रयलीक "निय लीक, सच्चा । GrkestakeSCk SHARE - , + 5.5-15 भकिसुधास्वाद तिलक। चार्तिक तिलक । तब प्रभु ने कहा कि "जितने मेरे सच्चे दास हैं, वे कभी लोकमें प्रकाशित नहीं हुआ चाहते; और यदि मैं उनके गुणों का प्रकाश करूं, तो वे उस प्रकाश को अपने मनमें बड़ादुखदाई मानते हैं। परन्तु अब मुझे बड़ा ही सोच पड़ा क्योंकि तुम्हारे यज्ञ को पूर्ण देखने की बड़ी भारी इच्छा है । और यदि मैं तुमसे उनका नाम बताऊं तो कहीं ऐसा न हो कि वे इस ग्राम ही को छोड़के चलेजावें।" श्रीयुधिष्ठिरजी बोले कि "हे प्यारे ! आप इस प्रकार से बतादी- जिये कि जिसमें आप तो सदा अलग के अलग हीरहिये, पर हम ही जाके लिवायलावै, और भलीभांति से भोजन करावें"। श्रीकृष्ण- भगवान् ने आज्ञा दी कि "वाल्मीकि के घर जाओ; वे सच्चे बड़ेही साधु हैं। क्या कहूं ! मैंने उनका बड़ा अपराध किया कि तुमसे प्रगट कर बता दिया ॥" (६०) टीका । कवित्त । (७५३ ) अर्जुन औ भीमसेन चलेई निमन्त्रन को, अन्तर उघारि कही भनिभाव दूर है । पहुँचे भवन जाइ, चहुँ दिशि फिरि, आइ, परे भूमि, भूमि, घर देख्यो छवि पूर है ।। आए नृपराजनि को देखि, तजे काजनि को, लाजनि सों कांपिकांपि भयो मन चूरहै । पायनि को धारिये जू, जूठन को डारिये जू, पापग्रह टारिये जू, कीजे भाग भर हे ॥ ७ ॥ (५५०) वार्तिक तिलक। प्रभुधाज्ञानुसार श्रीअर्जुनजी तथा भीमसेनजी उनको नेवता देके लाने के लिये चले प्रभ ने हृदय खोलके कह दिया कि "जाते तो हो परन्तु मनमें कोई न्यूनता नहीं लाना, क्योंकि भक्ति का भाव बहुत ही अगम होता है।" वे दोनों इनके घर जापहुँचे; चारो ओर फिरके इनके घर की परिकर्मा कर, सन्मुख आ, प्रेम से झूम झूम, भूमि में पड़ उन दोनों १ "दूर"-'दुरी, समीप नहीं, छुपी, अप्रगट । २ "पापग्रह"-शनि, राहु, केतु जो जो प्रतिकूल हो। BSCRECRETRESCREEGHACK .

. ॐ १६० श्रीभक्तमाल सटीक। ने दण्डवत् किये, और देखा कि इनका भवन, भीतर श्रीभगवन्नाम शंख चक्र चिह्न श्रीतुलसीवृन्द इत्यादिक भकिसामग्री की छवि से भरा है । जव इनने देखा कि राजाओं के राजा मुझ दीन के घर आए, तो भजन के कार्यों को छोड़ दिया, और अत्यन्त लज्जा से मन में चूर चूर होके कांपने लगे। श्रीअर्जुनजी ने प्रार्थना की कि "महात्माजी! आप कृपाकरके मेरे घर चरण धरिये, भोजन करके अपना जूठन गिराइये और हमारे घर को सम्पूर्ण पापों से रहित तथा शुद्ध करके हमको पापग्रहों से छुड़ाके हम सबको वड़ भागी कीजिये । (६१) टीका | कवित्त । (७५२) "जूठनि ले डारौं, सदा द्वार को वुहारों, नहीं और को निहारौं, अजू ! यही सांचोपन है"। "कहों कहा?" जेंवो कळू पाछे लै जिं: वावो हमे जानीगई रीति भक्ति भाव तुमतन है । तब तो लजानौ, हिये कृष्ण पैरिसानौ, नृप चाही सोई ठानौ, मेरे संग कोऊ जन है। भोर ही पधारौ अव यही उर धारौ और भूलि न विचारौ कही भली जो पै मन है ॥२०॥ (५४६) वार्तिक तिलक । 'यह सुन, श्रीबाल्मीकिजी अपने प्रभाव को छिपाते और निज जाति की न्यूनता को प्रगट करते हुए बोले कि, "अजी महाराज | मेरी तो यही प्रतिज्ञा है ही कि सदा आपके जूठे पत्तल आदि वाहर फेंक आया करता हूं, और आपही के द्वार को माइता बहारता हूं; दूसरे किसी की ओर तो मैं देखता तक नहीं ।" श्रीअर्जुनजी ने सादर कहा कि "आप यह क्या कहते हैं ? कृपा करके चलिये, हमारे यहां कुछ भोजन कीजिये और पीछे हम लोगों को खिलाइये; आपको भोजन कराए विन हमलोग खा नहीं सकते, क्योंकि हम आपके स्वरूप तथा प्रभाव को भले प्रकार से जान चुके हैं कि प्रभु की प्रीति रीति भक्ति भाव से आपका तन मन पूर्ण है ॥" तब तो श्रीवाल्मीकिजी लजाए और हृदय में श्रीकृष्णचन्द्र पर ROMA भक्तिसुधास्वाद तिलक। रिसियाने कि "प्रभो ! मुझे प्रगट करना यह तुम्हारा ही काम है ! तुमने यह क्या किया ?" फिर प्रत्यक्ष में श्रीअर्जुनजी से कहा कि "आप राजा हैं, जो चाहिये सो कीजिये; में क्या कर सकता हूँ, क्या कोई सहाय करनेवाले मनुष्य मेरे साथ हैं ? ॥" श्रीअर्जुनजी ने कहा कि "इन सब बातों को छोड़ के हम पर कृपा कीजिये, और हमारे घर आप कल सवेरे ही पधारिये; अव दूसरा कुछ भूलकेभीन विचारिये; केवल हमारीप्रार्थनाही कोअङ्गीकारकीजिय।।" जब महात्माजी ने उनका यह प्राग्रह तथा ऐसी श्रद्धा और प्रीति देखी, तो सरलवाणी से बोले कि "बहुत अच्छा, जो आपकी वही रुचि है तो वैसा ही करूँगा।" (६२) टीका । कपित । (७५१) कही सब रीति, सुनि धर्मपुत्र प्रीति भई, करी लै रसोई, कृष्ण द्रोपदी सिखाई है। "जेतिक प्रकार सब व्यञ्जन सुधारि करो, आजु तेरे हाथनि को होति सफलाई है" ॥ ल्याए जा लिवाई, कहे "बाहिर जिमाई देवो," कही प्रभु "आपु ल्यावो अंक भरि भाई है"। आनि के बैठायो पाकशाल में, रसाल ग्रासलेत वाज्यो शंख, हरि दण्डकी लंगाई है ॥ ८१॥ (५४८) वार्तिक तिलक। आयके, श्रीअर्जुनजी और भीमसेनजी ने श्रीयुधिष्ठिरजी से श्रीवाल्मीकिजी की रीति प्रीति भक्ति का वर्णन किया। सुनके श्रीधर्म- पुत्र महाराज को अत्यन्त प्रेम हुआ और मन में कहा कि- "हरि को भजै सो हरि को होई । जाति पांति पूछ नहिं कोई॥" तदनन्तर श्रीद्रौपदीजी रसोई करने लगीं; श्रीकृष्ण भगवान् ने उनको सिखाया कि "जितने प्रकार के व्यञ्जन तुम जानती हो सो सवअच्छेप्रकारसे सुधारके करो; आज तुम्हारे हाथों की सफलता है।" फिर भोजन के समय युधिष्ठिरादि स्वयं जाके उनको सादर लेआए। श्रीवाल्मीकिजीने कहा कि "मुझे बाहर यहीं बैठा के प्रसाद पवादी- जिये" परन्तु प्रभुने श्रीअर्जुनजीसे आज्ञा की कि ऐसा नहीं,वरंच मेरी RECECREKASCRECRACHAR ROGRESSAGE .

१६२ श्रीभक्तमाल सटीक। तो यह रुचिहै किइनको सादर भीतरले चलके बैठाओ" ऐसाही किया अर्थात् पाकशाला में ही विठलाके उनके आगेव्यंजनोंके थारलारक्खे॥ श्रीवाल्मीकिजी ने मनही में श्रीकृष्ण भगवान् को अर्पण किया। चौपाई। "प्रभुहि निवेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषण धरहीं। फिर जोही परम रसाल ग्रास मुख में डाला, उसी क्षण शंख बजा। बजा तो सही, परन्तु भली भाँति से नहीं । तव श्रीकृष्णचन्द्रजी ने उस शंख को एक छड़ी लगाई.॥ (६३) टीका । कवित्त । (७५०) "सीत सीत प्रति क्यों न वाज्यो ? कछु लाज्यो कहा ? भक्ति को प्रभाव तें न जानत यो जानिये" । वोल्यो अकुलाय, "जाय पूछिये जू द्रौपदी कों, मेरो दोष नाहि, यह आपु मन आनिये" ॥ मानि सोच वात “जाति बुद्धि आई देखि याहि, सवही मिलाई मेरी चातुरी विहानिये"। पूछते, कही है वालमीकि "मैं मिलायों यातें आदि प्रभु पायो पाउं स्वाद उन मानिये ॥८२॥ (५४७) वार्तिक तिलक। और, प्रभु ने पूछा कि “क्यारे शंख ! तू प्रत्येक सीथ पर नीके प्रकार से क्यों नहीं बजता ? कुछ लजित सा होके क्यों बजा है ? मुझे ऐसा जान पड़ता है कि तू इनकी भक्ति के प्रभाव को नहीं जानता।" तब वह अभिमन्त्रित दिव्य शंख अकुलाके स्पष्ट बोला कि "इसका कारण आप जाके नीद्रौपदीजी से पूछिये; इसमें मेरा दोप नहीं है आप इसे अपने मन में निश्चय मानिये ॥" श्रीप्रभु के पूछने पर श्रीद्रौपदीजी ने शंख की वार्ता को सत्य- मानके कहा कि "हां प्रभो ! मुझे इनमें जातिवुद्धि आगई क्योंकि इन्होंने पदार्थों को एक में मिला करके मेरी चातुरी की हानि कर डाली । मैं इनसे, शंख से, तथा श्राप से तीनों से क्षमा माँगती हूं।" इस पर प्रभुने श्रीवालमीकिजी से पूछा कि "तुम, इन विविध प्रकार के व्यंजनों को एक में मिलाके क्यों पाते हो ?॥" BHAKTI ANGRECE १६३ - भकिसुधास्वाद तिलक। आपने उत्तर दिया कि "इन सब पदार्थों को प्रथमतःआपने तो पाया ही है, इससे ये सब आपके प्रसाद हुए। अव में इन्हें पृथक् पृथक् पाके, प्रत्येक के स्वाद को अनुमान नहीं किया चाहता हूं, स्वाद लेने से प्रसाद का भाव जाता रहेगा।" ऐसा सुनते ही, श्रीद्रौपदी युधिष्ठिरादि का अधिक भाव इनमें हुआ; तव शंख की ध्वनि भली भाँति हुई और यज्ञ पूर्ण हुआ। देवता फूलों की वर्षा करने लगे। सब बोले कि श्रीभक्ति महारानीजी की जय।। (६३) श्रीप्राचीनवर्हिजी। राजा प्राचीनवर्हि पूर्व मीमांसा के अनुसार यज्ञादिक कर्म विधि- वत् किया करते थे। इनके कई सहस्र पुत्र हुए; परन्तु देवर्षि श्रीना- रदजी कृपासिन्धु ने दया करके भक्तियोग के अनुपस रहस्य का उपदेश कर, उन सबको विरक्त वना, हरिभजन में तत्पर कर ही तो दिया । कृपा करके राजा से कहा कि "आँखें मूंद के देख तो" उसने और यज्ञ करानेवालों ने देखा कि बहुत पशु कि जिनको उन्होंने यज्ञ में बलि दिया था कोप करके खड़े हैं और इनसे अपना अपना पलटा लेने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। "पर पीड़ा सम नहिं अध- माई" ॥, "परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा" । वह देख राजा के रोमांच खड़े हो गए और वह समझ गया कि हिंसा वास्तव में महापाप है। श्रीनारदजी का उपदेश पाकर श्रीराम- कृपा से राजा तथा यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण सव भगवद्भक्तिरूपी बो- हित के सहारे संसार सागर तर के परमधाम को चले गए। दो० "उमा! दान, मप, यज्ञ, तप, नानावत, अरु नेम। राम कृपा नहिं करहिं तस, जस निकेवल प्रेम (६४)श्रीसत्यव्रतजी। श्रीभगवत् के “मीन" अवतार इन्ही की अंजली में प्रगट हुए थे। राजा सत्यत्रतजी सिन्धुतीर सन्ध्या कर रहे थे सूर्य भगवान् को अर्घ देने के समय एक विचित्र मत्स्य इनकी अञ्जली में आ गिर । राजा ने कमण्डल में छोड़ दिया।वह बढ़ने लगा और ऐसी SCSCRETURESSANSARKARISRUSREEN श्रीभक्तमाल सटीका । विलक्षण रीतिसे कि जब क्रमशः घट, इद,और सर में भी नहीं अँटा तब उसे समुद्र में पहुंचा दिया। वहाँ आप दशलाख योजन लंबे हो गये और उसके सातवें दिन प्रलयहुआ । मीन भगवानकी आज्ञा और उपदेशसे, एक अलौकिक नौका पर सप्तर्षि इत्यादि और ओषधियों समेत,राजा चढ़े।मत्स्यभगवान् ने अपने शृङ्गमें उस नौकाको वासुकी नाग से बँधवालिया और उस महा जलार्णवमें राजा को उनके ला- थियों सहित बचा लिया। यही राजा सत्यव्रत की संक्षिप्त कथा है ॥ "केशव ! धृत मीनशरीर; जय जगदीश हरे !" (२) एक दूसरे "श्रीसत्यवतजी" रघुवंशी "श्रीबीरमणिजी" थे जिनके नाम "अन्नदाता" आदि भी थे। (६५)श्रीमिथिलेशजी। श्रीमिथिलेश "निमि" जी महाराज की चर्चा श्रीग्रन्थकार स्वामी जी आगे चलके, नवें छप्पय (तेरहवें मूल ) में करेंगे; और श्रीमिथि- 'लेश जनकजी महाराज की कथा, हो चुकी है ॥ (६६) राजाश्रीनीलध्वजजी। • राजा श्रीनीलजी श्रीनर्मदा तट माहिष्मती में रहते थे। उनके पुत्र प्रवीर ने श्रीअर्जुनजी के यज्ञ के घोड़े को बांध रक्खा; पर लड़ाई में वह हार के अपने पिता नील राजा के पास भाग गया। श्रीनीलजीने अपने जामाता पाचक देव को स्मरण किया जिनने उनके साथ समर में जाकर श्रीअर्जुनजी की बहुत सैना जला डाली; श्रीअर्जुनजी ने वारुणास्त्रसे अग्नि को शान्त किया चाहा, पर न होसका।तव श्रीकृष्ण भगवान् के उपदेश से वैष्णवास्त्र चलाया, जिससे पावक देव भाग चले और जाकर उनने नीलजी से कहा कि "जीतना कदापि सम्भव नहीं; अव यज्ञाश्व को छोड़दो, देदो॥" श्रीनीलजी ने घोड़ा देकर अश्वमेध के अनन्तर, प्रभु के प्रिय सखा श्रीअर्जुनजी से विनय कर, उनके तथा प्रद्युम्नजी के द्वारा, श्रीहरिभक्ति पाके, श्रीधैकुण्ठ में अचल वास पाया ॥ SCRECERESC , भक्तिसुधास्वाद तिलक। १६५ (६७) श्रीरहूगणजी। राजा श्रीरहूगणजी बड़े प्रतापी तथा बुद्धिमान थे। एक दिन आप, ज्ञान प्राप्ति के लिये श्रीकपिल भगवान के दर्शन को शिविका (पालकी) पर, जा रहे थे। पंथ में एक कहार की आवश्यकता आ पड़ी तो लोग एक हृष्ट पुष्ठ मनुष्य को पकड़ लाए और पालकी में दुरादिया ( लगादिया)। आप "श्रीजड़भरतजी थे”। आप मार्ग को देख भाल के जीव जन्तु बचाके पग धरते और कभी २ कूद भी जाते थे। इससे पालकी बहुत हिलती तथा राजाको कष्ट होताथा॥ राजा के रजोगुणी हृदय से तमोगुणमय वार्ता श्रवण करके जव महात्म ने सतोगुणी प्रसंग प्रारंभ किया तव राजा जी समझ गए कि ये कोई महान् पुरुष ( परमहंस) हैं । तव शिविका से उतर, पांव पड़, आपसे सादर विनय किया, क्षमा मांगी, और इष्ट वार्ता- लाप करने लगे। आपके उपदेशसे राजा कृतार्थ हो अपनी राजधानी को लौट आए॥ श्री “जड़भरत" जी ओर राजा रहूगण का सम्बाद श्रीमद्भाग- वत के पांचवें स्कन्ध में अवश्य देखना सुनना चाहिये ॥ (६८) श्रीसगरजी। राजा सगर को उनकी सौतेली माता ने गर्भ ही में विष देदिया था; परन्तु राम कृपा से बचे। राजा सगर के, एक स्त्री से, असमंजस नाम एक पुत्र, और दूसरी स्त्री से ६०००० (पष्टिसहस्र ) वेटे हुएं। असमंजस ने प्रजा के साथ कठिन उपद्रव किया इससे राजा ने उस को देश से निकाल दिया । तव असमंजसजी, अपने योग वल से प्रजा का कल्यान करके, आप वन में रहके हरिभजन करने लगे। राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ से इन्द्र घोड़ा चुरा लेजाकर श्रीक- पिलदेवजी के आश्रम में वांध आए। सगर के साठसहस्र पुत्रों ने घोड़ा ढूंढ़ने में पृथ्वी खोदी कि जिससे सागर हुआ। वेजव श्रीकपिलदेवजी केपास यज्ञपशु (अश्व) को देख कपिल भगवान्को दुर्वचन कहनेलगे, तव आपने आंखें खोली। दृष्टि पड़ते ही साठो सहस्र भस्म होगए। GREGRESORRECRUIRECRECR ******** श्रीभक्तमाल सटीक । असमंजस के पुत्र अंशुमान ने श्रीकपिल महाराज की स्तुति की। शापने प्रसन्न हो घोड़ा देदिया; तथा श्रीगंगाजी को लाने की आज्ञा दी। घोड़ा लाकर अंशुमान ने अपने दादा (पितामह) राजा सगर को दिया ॥ श्रीसगरजी ने यज्ञ पूर्ण कर, अशुमान को राज्य दे आप वन को जा भगवद् भजन कर परांगति पाई॥ (६६) महाराज श्रीभगीरथजी। राजा अंशुमान ने बहुत दिन राज्य कर, अपने पुत्र दिलीप को राज्य दे, तप किया तथा दिलीप राजाने भी श्रीगंगाजी ही के लिये तपकिया। राजा भगीरथ ने विवाह करने के पूर्व ही तप करना आरम्भ किया, उनके तप से श्रीराम कृपा से श्रीगंगाजी आई, इसीलिये श्री. गंगाजी भागीरथीके नाम से भी पुकारी जाती हैं।श्रीभगीरथजी की भक्ति को धन्यवाद जिनके द्वारा श्रीगंगाजी प्रगट हुई हैं । "जय जय जय सुरसरि ! तवरेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू ॥जय भगीरथन न्दिनी, मुनिचय चकोर चन्दिनी, नर नाग विबुध बन्दिनी, जय जह्व वालिका । विष्णु पद सरोजजासि, ईश सीसपर विभासि,त्रिपथगासिं, पुण्यराशि, पाप बालिका ॥ विमल विपुल वहसि वारि, शीतल त्रय ताप हारि, भवरवर विभंगतर तरंग मालिका । पुरजन पूजोपहार शोभित शशिधवल धार, भंजनि भवभार भन कल्पचालिका ॥ निज तटवासी विहंग जलथलचर पशु पतंग कीट जटिल तापस,सव सरिस पालिका । “अवधपुरीसरयुतीर सुमिरत रघुवंशवीर विचरत मति" दोहि मोहमहिप कालिका ॥" (७०) श्रीरुक्माङ्गदजी। (६४) टीका | कविच 1 (७४६ ) रुक्मांगद घाग शुभ गन्ध फूल पागि रह्यो, करि अनुराग देववधू लेन भावहीं । रहि गई एक, कांटा चुभ्यो पग चंगन के माली पास थाए सुख पावहीं ॥ क पठाइ दीजे" "करे 'एकादशी जलधं Ct , उपाय स्व -- भक्तिसुधास्वाद तिलक। नाम यहि ग्राम कोऊ जानै नाहिं" "कीनो हो अजान काल्हि, लावो गुन गावहीं" ॥ २३॥ (८४६) चार्तिक तिलक। भगवद्भक्न राजा श्रीस्क्माङ्गदजी की पुष्पवाटिका फूलकर सुन्दर सुगन्धित फूलों से भरी पगी सुशोभित हो रही थी, यहाँतक कि स्वर्ग के वाटिकाओं से भी अधिक उत्तम थी, और इससे स्वर्गस्त्रियां (अप्सराएं) भी रात्रि में प्रेम से फूल लेजाया करती थीं ॥ एक बार उनमें से एक अप्सरा के पांव में भांटे का कांटा चुभ गया, अतः उसका पुण्य क्षीण होने से उसकी आकाश में उड़ने की दिव्यगति नष्ट होगई अत एव वाटिका ही में रहगई । यह वार्ता मालियों से सुनके श्रीरुक्माङ्गदजी ने, स्वयं वहां पहुंचके उस अप्सरा को (श्रीराम कृपा से अकाम दृष्टि से ही) देखा, और प्रसन्न होके उससे पूछा कि "तुम्हारे स्वर्ग जाने का कोई उपाय हो तो बताओ कि जिससे हम तुमको स्वर्ग को भेज दें।" उस अप्सरा ने उत्तर दिया कि "जिसने 'एकादशी' काजत किया' हो, वह यदि अपने एक एकादशी के व्रत का फल संकल्प करके जल मेरे हाथ में देदेवे तो मैं स्वर्ग को चली जाऊ” राजा ने उत्तर दिया कि “इस व्रत का तो नाम भी कोई इस नगर में नहीं जानता ॥" तिसपर अप्सरा बोली कि "कल एकादशी थी; कदाचित कोई अज्ञात हू से भूखा रहगया हो, तो उसको लाके उसका ही फल मुझ को दिलवा दीजिये, तोमैं स्वर्ग को चली जाऊंगी और आपके इस उपकार को सदा मानती गाती रहूंगी ॥" (६५) टीका । कवित्त । (७४८) फेरी नृप डौंडी; सुनि, बनिक की लौड़ी भूखी रही ही कनौड़ी, निशि जागी, उन मारियै । राजा ढिग आनि करिदियो नतदान; गई तिया यों उड़ानि निज लोक को पधारियै ॥ महिमा अपार देखि, भूप ने विचारी याको “कोउ अन्नखाय ताको वांधि मार डारियै"। याही के प्रभाव भाव भक्ति विसतार भयो, नयो चोज सुनो सब पुरी लै उधारियै ॥८४॥ (५४५) SHAILS श्रीभनमाल सटीक। पातिक तिलक। यहसुन, राजा ने अपने नगर में डौंडी फिरवा दी कि "कल जो कोई दिनरात भूखा रहगया हो सो राजा के समीप चले !!! उसपर महाराज अति प्रसन्न होंगे”। ऐसा ढिंढोरा सुनके एक बनिये की कनौड़ी टहलनी सामने आई, जिसको किसी अपराध से बनिये ने वहुत पीटा और भोजन भी नहीं दिया था; इसी हेतु से वह भूखी और रातभर रोती जागी हुई थी। राजा ने उसी लौंडी (टहलनी)से संकल्प कराके उस अज्ञात बन का फल अप्सरा को दिलादिया; इतनेही मात्र के प्रभाव से उप्स अप्सरा को दिव्य गति प्राप्त हो गई, तथा उडके वह निज लोक को चली भी गई ॥ इस प्रकार एकादशी व्रत का आश्चर्यजनक अमोघ माहात्म्य देखके, राजा ने अपने पुर और देश भर में आज्ञा दे दी कि "एका- दशी को यदि कोई अन्न खायगा, तो उसको बांध के प्राणान्त दंड दिया जायगा।" यो सब लोग राजा की आज्ञा से व्रत और जागरन तथा भगव- नाम कीर्तन में तत्पर होगए । इसीव्रत के प्रभाव से राजा के हर भर में भावभक्ति का अति प्रचार हुआ; और नवीन अनोखी बात यह हुई कि अन्त में सबके सब मुक्तरूप होकर श्रीभगवद्धाम को प्राप्त होगए ॥ (७१) राजा रुक्माङ्गद की सुता। (६६) टीका । कवित्त । (७४७) एकादशी व्रत की सचाई ले दिखाई राजा; सुता की निकाई सुनौ नीके चित लाइके। पिताघर आयो पति, भूख ने सतायो अति, मांग तिया पास, नही दियो यह भाइक ॥ "आजु 'हरिवासर' सो ता सर न पूजै कोऊ; डर कहा मीच को" यो मानी सुख पाइकै । तजे उन प्रान, पाए बेगि भगवान्, वधू हिये सरसान भई; कहाँ पन गाइकै॥८५॥ (५४४) - 156 भनिसुधास्वाद तिलक। १६६ वार्तिक तिलक। भीएकादशी व्रत का प्रभाव और सचाई तो राजा ने प्रगट की, अब राजा की लड़की की महिमा वा प्रशंसा लिखते हैं सो भली- भांति से चित्त देके सुनिये॥ उसका पति रुक्माङ्गदजीके घर (अपनी ससुराल) में भाया; उसी दिन एकादशी थी। राजपुत्र अतिसुकुमार तो था ही उसको क्षुधा ने अत्यन्त बाधा किया; जव उसको किसी ने भोजन न दिया तव उसने अपनी स्त्री से यह कहा कि खाने विना मेरे प्राण छूट जाएँगे; परन्तु तब भी उसने एकादशी के भावसे भोजन नहीं दिया, और बोली कि “आज हरिबासर है कि जिसकी समानता को कोई और व्रत नहीं पहुँच सकता । आज के मृत्यु का क्या भय है ? कि जिसमें अभय परमपद की प्राप्ति है" । सुखपूर्वक ऐसी दृढ़ता को वह गहे रही । उसने भूख से प्राण छोड़ ही तो दिये। उसी समय वैकुण्ठ से विमान आया और सबके देखते दिव्यरूप हो वह उसपर चढ़ भग- वद्धाम को चला गया । यह देखके उनकी स्त्री का हृदय भक्ति से अत्यन्त सरस हुआ। प्रभुने प्रसन्न हो पार्षदों को विमान समेत भेजकर आपको (उनकी प्रिया) को भी कृपा करके अपने धाम में बुला लिया। इसभांति उनके एकादशी व्रत का पन हमने गान किया । टीका (समुदाय)। (६७) कवित्त । (७४६) सुनौ "हरिचंद" कथा, व्यथा विन द्रव्य दियो, तथा नहीं राखी सुत तिया तन है। "सुरथ" "सुधन्वा” जू सों दोष के करत मरे, "शंख" औं "लिखित" विप्र भयो मैलो मन है ॥ इन्द्र औ भगिन गये शिवि पै परीक्षा लेन, काटि दियो मांस रीमि सांचो जान्यो पन है। "भरत" "दधीच", आदि भागवत बीच गाए, सबनि सुहाए जिन दियो तन धन है॥८६॥ (५४३) वार्तिक विलक। महाराज श्रीहरिचश्चन्द्रजी की कथा सुनिये । दुःखरहित मनसे ज वंचि *GREGASE 1 1434857 GRA श्रीभनमाल सटीक। (श्रीविश्वामित्रजी को)सम्पूर्ण द्रव्य दिया, तथा अपना पुत्र अपनी रानी और अपना शरीर तक भी नहीं रक्खा तीनों को वेच डाला॥ श्रीसुरथजी तथा श्रीसुधन्वाजी इन भक्त राजपुत्रों से शंख और लिखित मलीन मनवाले ब्राह्मण, द्वेप एवं भवद्रोह करते ही मर गए । इन्द्र, सेन पक्षी का रूप धर के एवं अग्नि कपोत का रूप बनाके राजा शिविजी की परीक्षा लेने के निमित्त गए । उनके धर्म की सचाई पर रीझके प्रगट होके इन्द्र और अग्नि ने वरदान दिया। श्रीभरतजी श्रीदधीविजी आदिक भनों की कथा श्रीमद्भागवत ग्रन्थ में गान की हुई हैं । इन सबने अपने तन और धन परमार्थ में दे दिये इससे ये धर्म और भगवद्भक्ति की शोभा को प्राप्त हुए । (७२) महाराज श्रीहरिश्चन्द्रजी। राजा श्रीहरिश्चचन्द्रजी सूर्यवंशी श्रीअयोध्याजी के राजा धर्म कर्म निष्टा में बड़े पक्के तथा प्रतापी थे। एक समय इनके कुलपूज्य पुरोहित श्रीवशिष्ठजी महाराज कहीं गए थे इसी से श्रीविश्वामित्र 'जी से इन्होंने यज्ञ कराया जिनने दक्षिणा में राज्यादि तथा तीनभार (इक्कीस मन) सोना भी संकल्प करालिया और उक्त तीनभार सुवर्ण राजा से बड़ी कड़ाई से मांगा ॥ श्रीवशिष्ठजी आकर राजासे वोले कि " श्रीकाशीजी श्रीविश्वना- थपुरी है किसी प्राकृत राज्य के मध्य नहीं गिनाजाता सो तुम वहीं कुमार रोहिताश्व तथा रानी समेत अपने आपको बेचकर दक्षिणा का सोना मुनि को दे सकते हो, उसमें विश्वामित्रजी कोई बखेड़ा नहीं लगा सकते" । तब, श्रीकाशीजी में जाकर राजा के पुत्र और धर्मपत्नी एक ब्राह्मण के हाथ बिके और स्वयं राजा एक चाण्डाल के यहां विका । यो पूर्ण दक्षिणा देडाली । कालिया चाण्डाल ने इनको मृतक का कर लेने को श्मशानघाट पर रखदिया। . १ इन सवझी कथा नीचे लिखी जाती है देखिये ॥ BreaREIGNESGRRIGHUSAGEURUGALASS , . 15615 भक्तिसुधास्वाद तिलक। १७१ श्रीकौशिक (विश्वामित्र) जी ने सांप होकर रोहिताश्व को काटा, कुमार मरगया; रानी पुत्र के मृतशरीर को ले रोती पीटती हुई घाट पर गई। उससे भी धर्मात्मा दुःखी राजा ने चाण्डाल (डोम) के लिये कर मांगा ही। और कुछ तो था ही नही इस लिये इन्होंने रानी के वस्त्र में से ही आधा फड़वा के ले लिया, अपना धर्म न छोड़ा। इन्द्र तथा विश्वामित्रजी ने जब राजा को यो दृढ़ पाया, तो वे पुनः दूसरी चाल चले अर्थात् काशीनरेश के पुत्र को मार कर, और हरिश्चन्द्रजी की निर्दोप रानी को डाकिनी बताकर राजपुत्र के मृत्यु का कलंक उसपर लगाया, यहां तक कि काशीनरेशने राजा हरिश्चन्द्र ही को उस रानी के मारडालने की आज्ञा दी। इस अन्तिम परीक्षा में भी हरि कृपासे उत्तीर्ण धमात्मा श्रीहरिश्चन्द्रजी' ने ज्यों ही रानी के वध के अर्थ शस्त्र उठाया, त्यों ही श्रीसूर्य भगवान् ने, निज कुलभूषण पर प्रसन्न हो,आकाशवाणी की कि “धर्मात्माहरिश्चन्द्र की जय; एवंइन्द्रादिने पुष्पवृष्टि भी की; विष्णु विधाता महेश्वर ने साक्षात् प्रगट होकर दर्शन- दे राजा का हाथ रोक लिया; राजकुमार को भी जिला दिया; विष्णुभ- गवान् ने भक्ति वरदान दिया; विश्वामित्र ने भी रनेश को अपनी सव करतूत कहके प्रशंसायुक्त श्रीअयोध्याजी के राज्य करने की आज्ञा दी। श्रीसीतारामकृपा से राजा ने भक्ति प्रचार और राज्य कर अपने उसी पुत्र को राज्य दिया; परम धाम को सिधार, जगमें अपना और धर्म का यश फैलाया ॥ (७३-७४) श्रीसुरथः श्रीसुधन्वाजी। ये दोनों परम भागवत तथा सगे भाई थे; किसी ग्रन्थकार ने लिखा है कि ये दोनों चम्पकपुरी के राजा "हंसध्वज" के पुत्र थे; औरों ने राजा नीलध्वजजी के पुत्र इन्हें लिखा है; अस्तु । इनके पिता ने एक समय अर्जुनजी से युद्ध करने के हेतु यह आज्ञा दी कि “सव सेना तुलसी माला तथा उर्द्धपुण्डू तिलक धारण करके रण भूमि में आवे और जो कदराई करेगा सो तप्ततेल के कड़ाह में छोड़ा जावेगा॥" SURESSASSICALSSESSAREER 85 ॐ १७२ श्रीभक्रमाल सटीक। परमभक्त राजकुमार श्रीसुधन्वाजी चलते समय श्रीमातुचरण कमल को दण्डवत् करके निजधर्मपत्नी से विदा होने गये। स्त्री ने कर जोड़के प्रार्थाना की कि "प्राण नाथ! मैं ने स्त्री धर्म से छुट्टी पा आज ही स्नान किया है, तुमसे विशेष प्रेमालिङ्गन चाहती हूं, मेरे परितोप के अनन्तर स्नान करके, तिलक माला शस्त्रादि सजके, तब हरिस्मरण करते हुए सानन्द समरभूमि में जाओ" श्रीसुधन्याजी ने, जो "एक स्त्री व्रत धारी" थे, ऐसा ही किया। इसीलिये वह धर्म कर्म निष्ठा में प्रसिद्ध हुए। रण में विलम्ब के साथ पहुँचने से निज आज्ञा भंग समझ राजा (इनका पिता) बड़ा अप्रसन्न हुआ और “शंख” तथा “लिलित" नाम के मनमलीन दो ब्राह्मण मन्त्रियों ने, द्वेष से, राजा के उस क्रोध को और भड़का दिया। निदान निर्दोष राजकुमार श्रीसुधन्वाजी खो- लते तेल के कड़ाह में डाल दिये गए । परन्तु वह तो परम भागवत थे, भक्तरक्षक हरि की कृपा ले तप्त तेल उनको श्रीसरयू जल (शीतल सुखद) होगया जैसे श्रीप्रसादजी को। दो "पिता विवेक निधान घर, मातु दयायुत नेह । तासुसुधन किमि पाइ है, अनत अटन तजि गेह॥" •शंख और लिखित ने तेल के ताप की परीक्षा के लिये कड़ाह में एक सजल नारियल फल छुड़वाया जो पड़ते ही फूटा; और दो टुकड़े होकर हरि इच्छा से शंख तथा लिखित की खोपड़ियों पर ऐसे जा लगे कि उनदोनों भक्नद्रोहियों के प्राण ही ले लिये ॥ चौपाई। "कर्म प्रधान विश्व करि राखा । जो जस करै सो तस फल चाखा ॥ जो अपराध भक कर करई। राम रोष पावक सो जरई॥ भन द्रोह करि कोउ न वांचा । भक्कसुरक्षक हरि पन सांचा ॥" दोनों भाइयों श्रीसुरथ तथा सुधन्वाजीने श्रीअर्जुनजी से (जिनके सारथी स्वयं श्रीकृष्ण भागवान् थे,) भलीभांति लड़के रणक्षेत्र में शरीर त्यागा। उनकेशीसों को श्रीशिवजी ने अपने मालामें रखलिया।

ASTROTAS भक्तिसुधास्वाद तिलक। १७३ छप्पय , "भस्म अंग, मर्दन अनंग, संतत असंग, हर । सीस गंग, गिरिजा अर्द्धग, भूखन भुजंग, वर ॥ गल मुण्डमाल, विधुवाल भाल, डमरू कपाल, कर। विबुध वृंद, नवकुमुद चंद, सुखकंद, शूलधर ।। त्रिपुरारित्रिलोचनदिगवसन विषभोजनभवभयहरन। कहतुलसिदाससेवतसुलभ,शिवशिवशिवशंकरशरन॥" यो भगवत् के सन्मुख तन तजके, परम भागवत दोनों भाई श्रीभगवत् के धाम को गए । श्रीभक्ति महारानीजी की जय ॥ (७५) राजा श्रीशिविजी। दानशील धर्म धुरन्धर महाराजश्री"शिवि" जी दयासिन्धु "धर्म कर्म निष्ठा" में प्रसिद्ध हैं, यहां तक कि इसमें देवतों के राजा इन्द्र जी ने इनकी परीक्षा लेनी चाही। इन्द्र ने आप तो सेन ( बाजू) पक्षी का रूप धारण किया और अग्निदेव कपोत बने । सेन कपोत पर झपटा, तव कपोत भागकर श्रीशिविजी के गोद में जा छुपा और बोला कि "महाराज ! मैं आप के शरण हूं मुझे सेन के चंगुल से अभय देकर रक्षा कीजिये"; सा- थही सेन भी पहुंचा और कहा कि "यह पक्षी मेरा भक्ष्य है, मैं भूखा हूं; आप मेरे अहार में बाधा न डालिये इसको मुझे दीजिये"। राजा ने कहा "मैं न दूंगा"॥ धर्माधर्म पर वाद विवाद के अनन्तर दोनों में प्रसन्नतापूर्वक यह बात ठहरी कि महाराज कपोत के तुल्य मांस अपने शरीर से सेन को दें। राजा कपोत को तुला के एक पल्ले पर बैठाके, दूसरे पल्ले पर अपने शरीरकामांसकाट २ तुलवाने लगे।परन्तु समस्त शरीर का मांस भी उस कपोत के तुल्य न हुआ, कबूतर भारी होता ही गया। अन्त को राजाजी ज्यों ही अपना शीसदेने पर उद्यत हुए, त्यों ही उसी क्षण अतिप्रसन्न हो, सेन और कपोत का रूप छोड़ छोढ़,प्रगट होके, ।

१७४ श्रीभकमाल सटीक। श्रीसुरेश इन्द्रजी तथा पावकदेव ने दरशन दे, राजा को शीस काटने से रोका, और उनका तन जैसा था पुनः वैसाही हृष्ट पुष्ट कर दिया फिर उनकी शरणागतवत्सलता, दानशीलत, दयादृढ़ता आदिक धम्मों की प्रशंसा कर, वे यह वरदान दे, चले गए, कि॥ दो० "जीवत भोगो अति विभव, तनु तजि हरिपुर जाइ। पान करो हरिभक्ति रस, पुनरागमन विहाइ ॥" (७६) श्रीभरतजी। श्रीभरतजी के पिता का नाम श्रीभाषभदेवजी था । श्राप नो नव योगीश्वरों के बड़े भाई थे, बहुत दिन राज करने के अनन्तर अपने बड़े लड़के को राज देकर बहुत काल पर्यन्त मुक्तिनाथ क्षेत्र में गंडकीजी के तीर तप करते रहे ।। एक दिन नदी तट बैठे थे; उसी समय एक गर्भवती हरिणी जल पीने आई; सो सिंह का गर्जना अकस्मात् सुनके ऐसी घबड़ाहट में कूदी कि उसका गर्भपात होगया, और वह मरगई; उसका बच्चा श्रीभरतजी के सामने नदी में वहवला; यह देख दयावश इन्होंने. उसको शीघ्र निकाला, तथा असहाय जान, कृपाकर, ये उसको निज आश्रम में ला पालने लगे। उसमें इनका मन इतना लगा, उसको इतना चाहने लगे कि उस मृगशावक की प्रीति में ये बहुत ही आसक्त होगए; यहांतक कि जव वह सयाना हो, मृगाओं के झुण्ड में मिल किसीओर चलागया, तो उसके लिये ये अत्यन्त विकल हुए । यह आख्यायिका श्रीमद्भा- गवत में पढ़ने सुनने योग्य है । हरे! हरे मोह, माया,आसक्ति, इनकी वात विलक्षण और अपार हैं। जब इनका शरीर छूटा तो उस राग (स्नेह) तथा मनगति के कारन इनको पुनर्जन्म लेकर मृगा ही होना पड़ा। जो भरत एक समय सारे भरतखंड के महाराज थे अब वह मृगा होकर कलिंजर के बन में रहने लगे; परन्तु पूर्वभजन और प्रभु की कृपा से हरिण तन में भी आपको पूर्वजन्म की सुधि तथा शुद्ध बुद्धि , . - भकिसुधास्वाद तिलक। १७५ वनी की बनी ही रही; इसी लिये आप अकेले ही रहा करते थे। कारण रहित कृपालु प्रभु ने उस मृग शरीर से छुड़ाकर आपको ब्राह्मण के घर में जन्म दिया। यहां भी 'भरत' नाम पड़ा। श्रीहरिकृपा से ज्ञान तथा दोनों जन्मों की सुधि इनको बनी रही। चौपाई। "निशिदिन लगे रहत हरि ध्याना। का जानत का होत जहाना॥ जिनकी हृदय ग्रन्थि सब छूटीं । सव इन्द्रिय हरिपद महँ जूटीं॥" आपकी मति पचपन से ही विरक्त और श्रीहरिभक्ति में अनुरक्त हुई। पूर्वघटना स्मरण कर आप किसी से न मिलते न कोई संसारी काम यथार्थ कर देते किसी से घोलते भी न थे वरन किसी के प्रश्न का उत्तर तक नहीं देते थे। दो० "धन्य रहनि “जड़भरत" की, धन्य तासु वैराग्य । जग से जड़ बनि राम पद, पगे धन्यतर भाग्य ॥१॥" एक दिन भिल्लों का राजा इनको पकड़वा, अपनी इष्टदेवी काली के सामने लेजाकर खड्ग ले इन्हें वलि देने को उद्यत हुआ। श्रीदुर्गा जी महारानी ने वही खड्ग छीनके उन सब दुष्टों को वध किया और श्रीभगवद्भक आपको जानकर आपसे अपना अपराध क्षमा कराया। भक्तभयहारिणी श्रीभगवती महामाया की जय ।। चौपाई। "श्रीसियराम कृपा जाही पर । सुर नर मुनि प्रसन्न ताही पर॥" राजा रहूगण की कथा में लिख आए हैं कि एक बेर उसने आप को पालकी में लगाया, आप चींटियां बचा कर पग धरते थे जिससे पालकी उचकी तो आपसे उसने कड़ाई के साथ वात की; आपने ऐसे उत्तर दिये कि शीध्र वह श्रीचरणों पर गिरा, तथा आपके स- त्सङ्ग से ज्ञान विराग प्राप्त किया; सो यह संवाद श्रीभागवत में पढ़ने सुनने ही योग्य है । अस्तु ॥ समय पा, योगाभ्यास से तनुत्याग, श्रीजड़भरतजी परम धाम को गए। SCREEKRESS PROSESSIES न । १७६ श्रीभकमाल सटीक। (७७) श्रीदधीचिजी। परमोदार दधीचि पि का सुयश प्रसिद्ध ही है । वृत्रासुर के उत्पात से अकुलाके देवता भगवत् के शरण में गए, तब प्रभु ने श्राज्ञा दी कि "पीश्वर दधीचि महाराज की हड्डी का यज्र बनायो सो इस उपाय से असुर का नाश होगा; मुनि महादानी धर्मात्मा हैं, अस्थि मांगने पर 'नहीं' नहीं कहेंगे" ऐसा ही किया। पिने अपनी पीठ की अस्थि देडाली उसी का बन इन्द्र ने बनवाकर उसी से वृत्रासुर का वध किया ॥ चौपाई। "ते नर पर थोड़े जग माहीं । मंगन लहहिं न जिनके नाहीं॥ शिवि दधीचि हरिचन्द कहानी । सुनी न चित दे ते नहिं दानी ॥" (७८) श्रीविन्ध्यावलीजी। (६%) टीका | कवित्त । (७४५) विन्ध्यावली तिया सी न देखी कहूं तिया नैन, वांध्यो प्रभु पिया, देखि किया मन चौगुनौ । “करि अभिमान, दाने देन चैव्यो तुमहीं को, कियो अपमान में तो मान्यों सुख सौगुनो" ॥ त्रिभुवन छीनि लिये, दिये वैरी देवतान प्रान मात्र रहे, हरि आन्यों नहीं औगुनो। ऐसी भक्ति होइ जो पै जागो रहो सोइ, अहो ! रहो ! भव मांझ ऐपै लागे नहीं भौ गुनौ ॥८७॥ (५४२) वार्तिक तिलक। जैसी राजा बलि (पृष्ठ ७३) की स्त्री श्रीविन्ध्यावलीजी थीं, वैसी स्त्री तो कहीं देखने सुनने में नहीं आती; कि श्रीवामन भगवान् ने इनके प्रियपति को वाँध डाला और इन्होंने उनको बँधे हुए अपने नेत्रों से देखा तिसपर भी इनका मन मलीन न हुआ, वरंच प्रभुकी कृपा समझ चित्त में चौगुना हर्ष बढ़ाया । प्रभु से ये प्रार्थना करने लगी कि "प्रभो ! आपने बहुत अच्छा किया; ये अभिमान करके, त्रिभुवन के नाथ स्वयं आपको दान देने , PIN भक्तिसुधास्वाद तिलक । बैठे, आपकी ही तो पृथ्वी, तिलको अपनी समझ के, अपने को दानी मान, इन्होंने जो आपको भिक्षुक माना, तो यही बड़ा अप- मान किया। आपने इनका अभिमान छुड़ाया, इससे मैंने शतगुण सुख माना॥" देखिये ! त्रिभुवन को इनले चीनि के इनके शत्रु देवतों को दे. डाला और केवल प्राणमात्र इनके रहगए, तब भी श्रीविन्ध्यावलोजी ने प्रभु में अवगुण नहीं आरोपण किया वरंच गुण ही समझा ॥ अहा ! जो कदाचित् ऐसी प्रवल भक्ति जिसके हो, सो जन चाहे भजन करता हुआ जागता रहे, चाहे प्रभु पर विश्वास कर निश्चिन्त सोता हुआ संसार ही में रहे, तथापि उसको संसार के कोई गुण स्पर्श नहीं कर सकते। वह भक्त जीवनमुक ही है । अति सुमति रानी श्रीविन्ध्यावली की प्रेमाभक्तिनिष्ठा की प्रशंसा कौन कर सकता है ? ॥ (७६-८०) श्रीमोरध्वजजी श्रीताम्रध्वजजी। (86) टीका । कवित्त । (७४४) अर्जुन के गर्व भयो, कृष्ण प्रभु जानि लयो, दयो रस भारी, याहि रोग ज्यों मिटाइयै । "मेरो एक भक्त आहि, तोको लै दिखाऊं ताहि, भए विप्र वृद्ध, संग वाल, चलि जाइये ॥ पहुँचत भाप्यो जाइ "मोरध्वज राजा कहाँ ? बेगि सुधि देवो" काहू वात जा जनाइयै । "सेवा" प्रभु करौं, नेकु रहो, पाँउ धरौं, जाइ कहो तुम बैठो; कही, आग सी लगाइये" ॥८८॥ (५४१) वार्तिक तिलक। एक समय श्रीशर्जुनजी को अपनी भक्ति का अभिमान हुआ। इप्सवातको भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजीने जाकर मनमें विचार किया कि "इनको हमने अपना भारी संख्यरस दिया तिसका अभिमान इनको रोग सरीखा होगया, सो उसको यलरूपी औपधि से मिटा डालूं ॥" ऐसा विचार कर शर्जुनजी से बोले कि "हे सखे ! मेरा एक भक्त है चलो मैं उसको तुम्हें दिखा लाऊं । तुम ब्राह्मण का चालक बन ReckoregALSGANG AHASANSAR १७८ श्रीभक्तमाल सटीक। जावो और में वृद्ध ब्राह्मण होके दोनों चलें"। ऐसाही किया। राजा मोरध्वज के द्वार पर पहुँच के प्रतिहार से कहा कि "राजा कहाँ हैं ? शीघ्र जाके जनावो कि दो विप्र आए हैं" किसी ने जाके राजा से जनाया। मोरध्वजजी ने उन्तर दिया कि "प्रभु की पूजा कर रहा; जाके कहो कि थोड़ा ठहरिये कृपाकर बैठ जाइये, अभी में आके आपके चरणों पर पड़ता हूं।" आकर प्रतिहार ने ऐसा ही कहा; सो सुनते ही, ब्राह्मण देवता के आग सी लग गई। (१००) टीका । कपित्त । (७४३) बले अनखार पाँय गहि अटकाय जाय नृप को सुनाय ततकाल दौरे आए हैं। "चड़ी कृपा करी बाजफरी चाहवेलि मेरी,निपट नवेल फल पाँर्य गाते पाये हैं। दीजै आज्ञा मोहिं सोई कीजै, सुख लीजै यही, पीजे वाणी रस, मेरे नैन लै सिराए हैं । सुनि क्रोध गयो, मोद भयो, सो परिक्षा हिये लिये चित चाव ऐसे बचन सुनाए हैं ।।८६(५४०) वात्तिक तिलक। ब्राह्मण देवता रिसाय के चल दिये। तव राजा के सेवकों ने उनके चरणों को पकड़ के बहुत विनय कर उन्हें रोक रक्खा, और सब वृत्तान्त महाराज ले जा सुनाया। 'सुनतेही उसी क्षण राजा दौड़े आए और प्रणाम करके हाथ जोड़ प्रार्थना करनेलगे कि "प्रभो! आपने बड़ी कृपा की; आज मेरी चाहरूपी वेलि फल युक्त हुई जिससे अत्यन्त नवीन फलरूपी आपके पाँय (चरण) मैंने पाए। अब जिस हेतु अापने कृपा की हो लो मुझे भाशा दीजिये कि मैं वही करके सुख लूटूं और आपके अमृतरसमय वचन श्रवणपुट ले पान कर; अापके दर्शनों से मेरी आंखें भलीभांति शीतल हुई ॥" भक्तराजजी के ऐसे वचन सुन विप्रदेव ने क्रोध को त्याग कर १ "अनसाय"-रिसाय; मनपसें । २ किलीप्रति में पाँय नहीं है, 'पायो' पाठ है। ३,सिराप"= ठंढे 'शीतल, जुलाने, तृप्त ॥ EPSC . , , ! भक्तिसुधास्वाद तिलक १७६ आनन्द पाया; फिर परीक्षा लेने का विचार जो आपके हृदय में है तिससे चित्त में प्रसन्न होके राजा से यों वोले ॥ (१०१) टीका । कपित्त । (७४२) "देवे की प्रतिज्ञा करो", "करी जू प्रतिज्ञा हम, जाहिभांति सुख तुम्हें, सोई मोको भाई है" । “मिल्यो मग सिंह यहि वालक को खाए जात, कहो खावो मोहिं नहीं यही सुखदाई है" । "काहूभांति छोड़ो" ? "नृप आधो जो शरीर आवै तौही चाहि तजौं",कहि वात मो जनाई है। वोलि उठी तिया "अरधंगी मोहिं जाइ देवो", पुत्र कहै "मोको लेवो", "और लुधि आई है" ॥६० ॥ (५३६) बार्तिक तिलक। सालण-हे राजा ! तुम देने की प्रतिज्ञा करो तो मैं कहूं ॥ राजा-मने प्रतिज्ञा की; जिस प्रकार से आपको सुख हो, सोई मुझे परम प्रिय है; मैं वही करूंगा। नाहाण-हमको मार्ग में एक अद्भुत सिंह मिला लो इस बालक को खाए जाता था। मैंने उससे कहा कि "हे सिंह ! तुम इसको तो छोड़ दे और मुझे खा लो"। परन्तु सिंह बोला कि "मुझको इसीके मांस खाने ले सुख होगा"। तब मैंने पूछा कि “भला किसी प्रकार से तुम इस चालक को छोड़ सकते हो?" उसने उत्तर दिया कि "हां, यदि राजा मोरध्वज का आधा शरीर पाऊं, तव ही तो इसको न खाऊंगा" इस भांति वार्त्ता उसने कही है। श्रीमोरध्वजजी कीरानी-(विले) में राजा की अगिही मुझे ही लेचलिये, उलको दे दीजिये, खा जाये। श्रीमोरध्वजजी का पुन ताम्रध्वज-में राजा का आत्मज अतः दूसरा शरीर ही हूं, मुझोही उस सिंहको दे दीजिये कि खा ले क्योंकि उसको वालक का मांस बहुत प्रिय है ।। ब्राह्मण-हां, उसकी कही हुई एक बात ने गल गया था सो अव सुधि आई है, सुनो। "भाई" तुदाई, नीक या मती तनी, सुखदाई हुई। AECRE .

१८० श्रीभक्तमाल सटीक। (१०२) टीका | कवित्त । (७४१) सुनो एक बात “सुत तिया लै करौंते गात चीर धीरे भीर नाहि, पीछे उन भाखिये । कीन्यो वाहीभांति, अहो नासा लगिआयो जव, ढत्यो दृग नीर, भीर वाकर न चाखिये ॥ चले भनखाय गहि पाँय सो सुनाये वैन "नैन जेल वायों, अंग काम किहिं नॉखिये" । सुनि भरि आयो हियो, निज तनु श्याम कियो, दियो सुखरूप, व्यथा गई, अभिलाषिये ॥ ६१ ॥ (५३८) वार्तिक तिलक। उस सिंह ने पीछेसे यह एकवात कही सो भी सुनो कि "आधा अंग योंही न लाना, वरन् इसभांति से चीर के दाहिना अंग लाना कि आरा का एक छोरं राजा का पुत्र, तथा दूसरा छोर उनकी रानी पकड़े और दोनों धीरे धीरे चीरें, पर तीनों मनको दृढ़ रक्खें कोई कदराय नहीं॥" श्रीरामकृपा से तीनों ने ऐसाही किया । अहाहा! ये भगवत् कृपापात्र धन्य हैं। जब चीरते चीरते आरा नासिकापर्यन्त आया, तब राजा की वाई आंख से आंसू निकलने लगा। यह देख ब्राह्मणदेव बोल उठे कि "राजा तुम कदरा गए, रोनेलगे, तिसले वह तुम्हारा मांस नहीं खाएगा और इतना कह रिसियाके चल भी दिये। 'ब्रह्मण्यशिरोमणि राजा ने विप्रदेव के चरण, पकड़के प्रार्थना की कि "हे द्विजदेवजी! देखिये मेरे दाहिने नेत्रमें अश्रुविन्दु का लेश भी नहीं है कि जो ब्राह्मणके अर्थलगा। हां बाई आंख से आंसू इस कारण से चलता है कि वास अंग आपके कार्य में न आया, व्यर्थ ही फेंक दिया जायगा। यह भावयुक्त वचन सुनते ही अपार करुणा से आपका हृदयभर आया, और अपने सुन्दर श्याम शरीर को प्रगट करके सपरिवार मनराज को दर्शन दिये तथा सिरपर कर स्पर्श कर घाव और व्यथा १ "करात"यारा, श्ररकस । २ "भौरे' डरे, कादर हो। ३"चाकर उसकरके, निससे ४ "नासिगे"-पटकना ॥ NAGACAST .

भक्रिसुधास्वाद तिलक। दोनों का नाश करके अभूत सुख दिया। राजा अतिअभिलाषपूर्वक दर्शनानन्द में मग्न हो गए। श्रीकृष्ण भगवान् को यह अभिलाषा उत्पन्न हुई कि राजा कुछ वरदान मांगे॥ (१०३) टीका । कचित्त । (७४०) "मो पै तो दियो न जाइ निपट रिझाइ लियो, तऊ रीझि दिये बिना मेरे हिये साल है। मांगो पर कोटि, चोट वदलो न चूकत है, सूकत है मुख, सुधि आए वही हाल है"। वोल्यो भक्तराज "तुम बड़े महाराज, कोऊ थोरोऊ करत काज, मानो कृत जोल है। एक मोको दीजै दान” “दीयो जू बखानो वेगि", "साधु पै परीक्षा जनि करो कलिकाल है" ॥६२॥ (५३७)॥ वानिक तिलक। श्रीप्रभु ने भक्तराज से कहा कि “जैसा तुमने अपना शरीर चीरके दिया वैसा मुझसे तो नहीं दिया जाता, और अव जो इसका पलटा मैं तुमको दिया चाहता हूं तौभी इसके योग्य की तो कोई वस्तु है ही नहीं; इससे सो भी मुझसे नहीं दिया जाता, क्योंकि तुमने मुझको अत्यन्त ही रिझा लिया। तथापि कुछ रीझ कर (पारितोपिक) दिये बिना मेरे हिये का साल मिटता नहीं; अतः यदि करोड़ों वरदान मांगो तो भी जो चोट मैने तुम्हें दी है उसका पलटा चुक नहीं सकता; इस लिये कुछ अवश्य मांगो। हे प्रिय भन तुम्हारी उस दशा की सुधि आने से मेरा मुख सूख जाता है, और क्या कहूं ॥ श्रीभक्तराजजी प्रेम से विह्वल हो हाथ जोड़ के वोले कि "नाथ ! आप बड़े महाराज हैं जो कोई थोड़ा भी भला कार्य करे उसको आप अपनी कृतज्ञता से सुकृतों का पुंज मान लेते हैं । चौपाई। "जेहि समान अतिशय नहिं कोई । ताकर शील कसन अस होई ॥" १"तक" तथापि, तिसपरभी। २"सूकत" सूखता है। ३"जाल" =समूह ॥ CEBGASCHIC* FREER १८२ श्रीभकमाल सटीक। श्लो० * कथञ्चिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति । नस्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥१॥ बहुत अच्छा, आप एक वरदान मुझे दीजिये" प्रभु ने कहा कि "दिया, शीघ्र कहो क्या मांगते हो? तव परोपकारी श्रीमोरध्वज जी ने यह वर मांग लिया कि "कलिकाल में भक्त सन्तों की परीक्षा मत लिया कीजियेगा।" श्रीमोरध्वजजी की जय ॥ (८१) श्रीअलर्कजी। (१०४) टीका । कवित्त । (७३१) अलरक की कीरति में गचौं नित, सांचौं हिचे, किये उपदेशहू न विप वासना । माता मन्दालसा की बड़ी यह प्रतिज्ञा सुनो "नावे जो उदर मांझ, फिरी गर्भ आस ना" ॥ पति को निहारो ताते रह्यो छोटो कोरो; ताको लैगए निकासि; मिलि काशी नृप शा- सना । मुद्रिका उघारि, औ निहारि दत्तात्रेयजू को, भए भवपार करी प्रभु की उपासना ।। ६३॥ ( ५३६) चार्तिक तितक। श्रीशलजीकीमाताश्रीमन्दालसाजी की कथापीछेलिख पाएहैं। श्रीअलर्कजी की कीर्ति में मैं सच्चे हृदय से नित्य ही रँगता हूं। लोगों की विपय भोगवासना, उपदेश किये से भी नहीं छूटती परन्तु श्रीरामकृपा से अलर्कजी की सर्वथा छूट गई। सुनिये,श्रीअलजी की माता श्रीमन्दालसाजी की यह बड़ीभारी दृढ़ प्रतिज्ञा थी कि "जो जीव मेरे धर्म में आवे, उसको फिर गर्भ में नहीं जाना पड़े अर्थात् आसा तृष्णा आदिसे छूटके वह मोक्षपद को प्राप्त हो जावे"। "बद्धो हि को ? “यो विषयानुरागः” "का वा * यदि किसी प्रकार से कोई किंचित् भी उपकार करे, तो उत्तीसे प्रभु अतिशय सन्तुष्ट हो जाते हैं । फिर जो सैकड़ों अपफार भी फरे, तो उस जन में शपगपी मान के उसके दोपों का स्मरण ही नहीं करते, पेसा प्रभुका स्वभाव है (श्रीवाल्मीशिः) १ रांचों रैगजाता हूं। २"निहोरो"प्रार्थना, विनय, ३ "कोरो" गोद का लड़का, काँछे का चालक । REAKNESS -- . भक्विसुधास्वाद तिलक। १८३ विमुनिर ?" "विषये विरक्तिः" । सो अपनी प्रतिज्ञा उनने पूर्ण की ही तो सही॥ कई पुत्रों को उपदेश करके आपने बिरन जीवनमुक्त कर दिया। जन सबसे छोटा पुत्र श्रीसन्दालसाजी के हुआ, तो उनके पति ने आपसे बहुत विनय निहोरा किया कि “इस पुत्र को भी उपदेश देकर विरागी मत वनादो, इसको राज्य तथा वंश के निमित्त गृहस्थ रहने दो॥" यों, पति के विनय वश उसको वन में न भेजा। परन्तु पति समेत आप वनको चलीं और उसी समय एक श्लोक लिख मुद्रिका में रखके अलर्कजी को दे दिया कि तुम्हें जब कोई कष्ट पड़े तो इसको खोलके देखना ॥ श्लो० संगः सर्वात्मना त्याज्यः; यदि त्यक्वं न शक्यते । सद्भिरेव प्रकर्तव्यः सत्सङ्गो भवभञ्जनः ॥ १ ॥ वन में जा आपने अपने ज्येष्ठ पुत्रों से कहा कि "जिसमें मेरी प्रतिज्ञा भंग न हो इसलिये जाके किसीभांनि अपने भाई अलर्क को भी विरन करके प्रभु के चरणों में लगादो"। आज्ञा मान, आके, उन्होंने प्रथम अलर्क को बहुत उपदेश किया परन्तु उपदेश से विषय- वासना नहीं छूटी। तब अपने मायूँ काशीराज को सेनासहित लाके पुर को घेर लिया। इस आपदा के समय अलर्कजी ने मुद्रिका को खोल के देखा तो लिखामाया कि "संसार के संगको सर्वथा त्याग करना चाहिये और जो त्याग न सके तो समीचीन महात्माओं का संग करे क्योंकि सत्सङ्ग भवरोगनाशक है" यह विचार श्रीअलर्कजी राज्य को परित्याग कर रात्रि में निकल के श्रीदत्तात्रेयजी से मिले ॥ एवं उनके उपदेश से भगवत् की उपासना करके मोक्षपद को प्राप्त हुए। श्रीअलर्कजी ने अपनी आंखें निकाल के एक वेदपाठी ब्राह्मण को उनके मांगने पर देदी थीं। अलर्कजी एक समय कालंजर के समीप वन में विचरने लगे; तो एक दिव्य सर देखा, जिसके तट में एक मृतक मनुष्य पड़ा था; R * १८४ श्रीभक्रमाल सटीक। इतने में दो पिशाचों में झगड़ा होने लगा, एक कहता था कि मैं खाऊंगा, दूसरा कहता था कि मैं ॥ अलर्कजी ने पूछा क्यों विवाद करते हो ? तब दोनों पिशाच बोले कि वस्तु एक ही है और हम दोनों भूखे हैं; उदर कैसे भरे ? श्रीम लर्कजी ने कहा कि "एक शव को खावे, ओर दूसरा मेरी देह को"। यह सुन प्रसन्न हो दोनों ने “वरं ब्रूहि" कहा ॥ श्रीअलर्कजी ने पूछा कि तुम दोनों कौन हो ? तब उसी क्षण, एक श्रीविष्णु, दूसरे शिवजी होके बोले कि "हम विष्णु, शिव हैं" अतः पर, स्तुति कर उनसे यह वर मांगा कि “सकल विश्व सुखी रहे, किसी वस्तु का कोई दुःखी न रहे," यही वर दीजिये। इस पर दोनों ने आज्ञा की कि यह नहीं होसकता कर्म सबके पृथक् २ हैं; परन्तु हमारी कृपा से अब यह सामर्थ्य तुझ में रहेगा कि जिस वाञ्छा से तेरे पास कोई आवेगा तू पूरी कर सकेगा; अन्स में तुझे मोक्ष प्राप्त होगा।" इस प्रकार श्रीविष्णुजी और शिवजी, अलर्कजी की परीक्षा ले वरदे, निज निज स्थल को चले गए। (१०५ छप्यय । (७३८) तिन चरण धूरि मो सूरि सिर, जेजे हरिमायातरे ॥ रिभु,इक्ष्वाक रु, * ऐल, गाँधि, रघु, रे, गैं, शुचि शत- धन्वा । अमरति, अरु रन्ति, उतंग, भूरि, देवले, वैवस्वत मन्वा ॥ नहुँप, जाति, दिलीप, पू. यदु, गुह,मान्धातापिप्पलें,निर्मि', भरद्वाज, दक्ष, समग, सँघाता॥ संजय, समाके, उत्तानपार्दै, याज्ञवल्क्य, जस जग भरे। तिन चरण धूरि मो भूरिसिर,जेजे हरि माया तरे। (२०२) * "ऐल"-इलो के पुत्र पुरुरवा ।। 'सर्भग सँघाता"-श्रीसमग प्रभृति दण्डकपन के मुनिवृन्द। RESSESSINESCALCRILM OESGAR भक्तिसुधास्वाद तिलक। वार्तिक तिलक। उन श्रीभगवद्भकों के चरणों की धूर बहुतसी बहुमान्यपूर्वक मेरे शीस पर है, कि जो जो भगवान् की माया के पार होगए हैं,और उन पवित्रात्माओं के सुयश सम्पूर्ण जगत् में भररहे हैं । १ श्रीषटभुजी १६ श्रीययातिजी २ श्रीइक्ष्वाकुजी १७ श्रीदिलीपजी ३ श्रीऐल (पुरूरवा) जी १८ श्रीपुरुजी ४ श्रीगाधिजी १६ श्रीयदुजी ५ श्रीरघुजी महाराज २० श्रीगुह (निषाद )जी ६ श्रीरयजी २१ श्रीमान्धाताजी इक्ष्वाकुवंशी ७ श्रीगयजी २२ श्रीपिप्पलायनजी ८ श्रीशतधन्वाजी २३ श्रीनिमिजी । श्रीअमूरतिजी २४ श्रीभरद्वाजजी .१० श्रीरन्तिदेवजी २५ श्रीदक्षजी ११ श्रीउत्कजी २६ श्रीशरभंगजी १२ श्रीभूरि पेसा २७ श्रीसंजयजी १३ श्रीदेवलजी २८ श्रीसमीकजी १४ श्रीवैवस्वत मनुजी २६ श्रीउत्तानपादजी १५ श्रीनहुपजी ३० श्रीयाज्ञवल्क्यजी (८२) श्रीरन्तिदेवजी। (१०६ ) टीका । कवित्त । (७३७ ) अहो ! रंतिदेव नृप सन्त दुसर्फत बंस अतिही प्रशंस सो १ (श्लोक ) " इक्ष्वाकुरैलमुचुकुन्दविदेहगाधिरवम्बरोपसगरा गयनाहुपाघाः । मान्धात्रमशतधन्मनुरन्तिदेवा देयग्रतो चलिरमूर्तरयो दिलीपः ॥ १॥ सौभर्युतकशिवि देयलपिप्पलाद सारस्वतोद्धयपराशरभूरिपेणाः । येऽन्ये विभीपणहनुमडुपेन्द्रदत्तपार्थी हिंपेणविदुरथुतिदेववर्याः ॥ २॥ ते वै विदन्त्याततरन्ति च देवमायां खीशूद्रहणशबरा अपि पापजीया । यद्यद्भुनक्रमपरायणशालशिक्षास्तिर्यग्जना अपिकिमु श्रुतिधारणा ये॥३॥ (श्रीमद्भागवते) २ "दसर्फत" नाम दुप्यन्त जिनकी स्त्री शकुन्नला संज्ञक, प्रसिद्ध है। ANCE .

* १८६ श्रीभक्तमाल सटीक। अकाशवृत्ति लई है । भूखे को न देखिसके, आवे सो उठाइ देत, नेति नहिं करें भूखे देह छीन भईहै। चालिस-ओ-आठ दिन पाछे जल अन्न आयो, दियो विप्र शूद्र नीच श्वान, यह नई है । हरि ही निहारै उन मांझ, तब आए 'प्रभु, भाए, जग दुख जिते भोगौं, भक्ति छई है ॥ १४॥ (५३५) वातक तिलक । राजा दुप्यन्त के वंश में महाराज श्रीरन्तिदेवजी अतिआश्चर्य प्रशंसनीय सन्त हुए, कि जिन्होंने आकाशवृत्ति जीविका ग्रहण की। तिसपर भी उस शाकाशवृत्ति में भी जो कुछ भोजन आ जाता था सो भी भूखों को दे दिया करते थे क्योंकि किसी को भूखा नहीं देख सकते थे। अपने लिये यत्न वा संचय नहीं करते थे अतएव भूख से शरी अति दुर्बल हो गया। एक वेर अड़तालीस उपवास हो चुकने पर अन्न जल हरिकृपा से आया सो, प्रथम एक भूखे ब्राह्मण को खिलाया; फिर उसके पीछे एक भूखे शूद्रको दिया; पुनः एक नीचको, और फिर शेष भूखे श्वान को खिला पिला दिया । यह इनकी कृपालुता तथा समदृष्टि की नवीन रीति है, क्योंकि सवों में वे सर्वात्मा हरिही को देखते थे। जब जलपर्यन्त भी दे दिया और आप भूखे वरंच प्यासे रह गए, तब इनकी दया और समदृष्टि देखके प्रभुने आके दर्शन दिया परम कृतार्थ किया। प्रभु को प्रसन्न पा यह वर मांगा कि सब जीवमात्रका दुःख में ही भोगूं और वे सबके सब दुःखरहित हो जायें ॥ प्रभु अति प्रसन्न हो उनको स्त्री पुत्र तथा पुत्रवधू तीनों सहित विमानपर बैठा के निज लोक को ले गये। ऐसे विलक्षण सन्त थे तब तो उनकी भक्ति की महिमा जग में छा रही है। १ "श्राकाश वृत्ति" ऐसी वृत्ति कि जीविका के अर्थ कमचेपाशून्य, ऐसी वृत्ति कि जो कुछ शनाधित अकस्मात् (बिन प्रयन्ध जैसे आकाश से जल) श्राजाचे, उसीको लेना २"छान"-क्षीण, खिन्न, दुर्बल !

Pape १८७ , भक्तिसुधास्वाद तिलक। (८३)श्रीगुह निषाद जी। जिस समय श्रीभरतजी महाराज प्रभु के दर्शन को चित्रकूट जा रहे थे उस समय कुछ और संदेह होने के कारण, श्रीनिपादजी ने पहिले यह चाहा था कि यद्यपि श्रीभरतजी की सेना अपार है तथापि अपनी प्रतिभल्प सेनासहित अपने को श्रीसीता राम हेतु न्योछावर कर देना चाहिये सो यह संकल्प कर लड़ने के लिये इच्छा की थी। किंतु जब प्यारे भरतजी को मन कर्म वचन से श्रीसीताराम- भक्त पाया, तब श्रीभरतजी की सेवा की। पुनः जिस समय श्रीसर्कार रघुवंशमणि आनंदकंद, लंकापत्तन का विजय हस्तगत कर, श्रीभरद्वाजजी के आश्रम पहुंचे, उस क्षण निज दूत श्रीपवनसुतजी को अवध श्रीभरतजी की चेष्ठा देखने को भेजा और निषादजी से भी श्रीमान् अनंत ऐश्वर्यने अपना सुखा- गमन निवेदन करने की श्रीहनुमानजी को आज्ञा दी। उसी समय "दुमिल राक्षस” कोजो श्रीअयोध्यानिवासी जनों को दुःख देने को प्राप्त था, निषादराज ने शृंगवेर पुरही में यह विचार रोक डाला, कि “यह दुष्ट स्वामिपुर को न जाने पावै, वरन बीचही में इसको यमद्वार दिखालऊँ" । तीन सहस्र धनुर्धरों को साथ ले, “द्रुमिल"से श्रीनिषादराजजी तीन दिनसे युद्धकर रहेथे; उससमयतक निषादराज द्रुमिल की सात सहस्र सेना मार चुके थे, शेष तीन सहस्र सेना थी; परन्तु निषादराज बड़े थके तथा कुछ हत पराक्रम प्रतीयमान होतेथे। वहीं उसी क्षण पहुँचते ही श्रीरामदूतजी ने हांक दिया, कि जिसमें निषादराज का बल संवर्द्धनहो "मैं श्रीरामदूत पहुँचगया।" यह हांक सुनाकर तीन सहस्त्र राक्षसों को लाग़ल में लपेट वायुमण्डल को पहुँचा दिया; और निषादराजजी ने द्रुमिल के साथ मल्लयुद्ध करके उसको पृथ्वी में पटक, उसके हृदय में शस्त्र चुभा दिया, जिससे द्रु- मिलका प्राणान्त होगया।इसके अनन्तर दोनों श्रीरामप्रेमी परस्पर मिले; और निषादराज से स्वामि आगमन जना करके श्रीमारुति TA ।

AR कर श्रीभक्तमाल सटीका जी भरतजी के समीप चले गये। श्रीनिषादराजजी श्रीभरद्वाजजी के पाश्रम को प्राणनाथ से मिलने चले॥ . छन्द ।। - "पदकमलधोइ चढाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। मोहि राम! राउरि पान दसरथ सपथ सब सांची. कहाँ॥ वरु तीर मारहिं लपन पै जब लगि न पांव पखारिहीं। तवलगि न तुलसीदास नाथ कृपालु पार उतारिहौं ॥१॥" (कवित्त) "प्रभुरुख पाइके वुलाइ बाल घरनी को, बन्दि के चरण चहुँदिशि बैठे घेरि घेरि । छोटोसो कठोतो भरि आनि पानी गंगाजी को, धोइ पाय पियत पुनीत वारि फेरि फेरि ॥ तुलसी सराहें ताको भाग सानुराग, सुर वरपि सुमन जय जय कहें टेरि टेरि ॥ विविध सनेह सानी बानी असयानी सुनि, हँसे राघौ जानकी लषनतन हेरि हेरि"॥१॥ दो० "पदपखारि, जलपान करि, आपु सहित परिवार । पितर पारु करि प्रभुहि पुनि, मुदित गयउ लेइ पार ॥१॥" (१०७) टीका | कवित्त । (७३६) भीलन को राजा "गुह" राम अभिराम प्रीति भयो बनबास, मिल्यो मारग में प्राइकै । करौ यह राज जू विराजि सुख दीजै मोको, बोले चैनसाज तज्यों आज्ञा पितु पाइकै ॥ दारुण वियोग अकुलात हग अश्रुपात पाछे लोहु जात, वह सकै कोन गाइकै । रहे नैन मंदि "रघुनाथ दिन देखों कहा?" अहा ! प्रेम रीति, मेरे हिये रही बाइक ॥६५॥(५३४) वार्षिक तिलक। सम्पूर्ण वनवासी भिल्लों के राजा शृङ्गवेरपुरवासी श्रीगुहनिपाद- राजजी की, प्राणनाथ शोभाधाम श्रीरामचन्द्र कृपालुजी से अतिशय अमिराम प्रीति थी, कि जिनको प्राणनाथ आत्मसमान सखा मा- नते कहते थे । सो जब श्रीप्रभु वनविहार मिसु सुर मुनिजनों का १ "चनसाज"राज्य । २ "जात"-पहता था, भरता था, निकलवाया।

- भकिसुधास्वाद तिलक। १८६ दुःख छुड़ाने के लिये चलके, श्रीगंगाकूल में शृङ्गवेरपुर के समीप आए; तव निपादजी श्रीप्रभु का वनगमन सुन, पगों से चलके, समाजसहित प्राणनाथ से मिले । प्रभु ने हृदय से लगा के अपने परम समीप बैठा लिया। तब निषादराज हाथ जोड़ घोले कि "हे सुखराशि, रघुवीरजी ! चलिये, यह राज्य आपका ही है, यहीं विराज, राज्य करते हुए, मुझे सुख दीजिये; मैं आपका सेवक हूं, आप मेरे स्वामी हैं, मैं सब प्रकार से सेवा करूंगा।" यह सुन, प्राणेश्वर श्रीरधुनन्दनजी ने उत्तर दिया कि "हे सखे ! इस बात को क्या कहना है, आपका राज्य तथा आप मेरे हैं ही, परन्तु में तो श्रीपिताजी की आज्ञा से राज्यभोग सुख सामग्री त्याग के चला हूं चौदह वर्षपर्यन्त वन ही में बसूंगा”। इतना सुनते ही श्रीनिषादराज विह्वल होगए । तष श्रीप्राणपति प्रभु बहुत प्रकार से इनको समझा के श्रीचित्रकूट में जा वसे ॥" दो० "गमन समय अंचल गह्यो, छाड़न कह्यो सुजान। 'प्राण पियारे ! प्रथम ही, अंचल तजौं कि प्रान ?" यहां श्रीनिषादराजजी अपने प्राणप्रिय मित्र के दारुण वियोगसे अत्यन्त व्याकुल हुए; आंखों से अश्रुपात की धारा निरन्तर वहने लगी; यहां तक कि कुछ दिन पीछे नेत्रों से रक टपकने लगा। हा! वह दशा कौन कह सकता है ! प्रेमनिधि निपादजी अपनी आंखें मूंदेही रहा करते थे, इस विचार से कि "मित्रवर प्राणप्रिय श्रीरयु- नाथजी के विना और क्या देखू ?" अहा ! यह इनके परम प्रेम की रीति मेरे हृदय में छा रही है मुख से कहते नहीं बनती॥ दो० "जासु संग सुख लहि रह्यों, सारे दुख बिसराइ । ता प्रियतम के विरह में, लुटत नं यह तनु हाइ !" सवैया ।। "प्रीति की रीति कळू नहिं राखत जाति न पांति नहीं कुल गारो। प्रेम के नेम कहूं नहिं दीसत लाज न कानि, लग्यो सब खारो॥ .

१६० 16405454756405** श्रीभकमाल सटीक । लीन भयो हरि सों अभ्यन्तर, आठहु याम रहे मतवारो । "सुन्दर" कोउ न जानि सके यह प्रेम के गांव को पैड़ोहि न्यारो॥" पद। पद "सदन मोरे, आवो हो बांके यार ! दशरथ राजकुमार ! ॥ कित गयो ? हाय ! विहाय सेज को करद करजे मार ।। हाय निहारत डगर तिहारो, होइ गई भिनुसार ॥ कित जाऊं ? पाऊं कहँ तुमको ?, जग मो को अँधियार ।। तुम्हरे कारन, हम सव त्यागा, लाज काज घर वार ॥ विरह चारि विच, चूड़त तुम विनु, कोनलगै है पार ? ॥ सुधि लीजे; दीजे देखाय छवि, प्रीतम प्राण अधार ! ॥ जो नहिं अइहौ, मैं मरि जइहौं, "जीत" पुकार पुकार ॥" (१०८) टीका । कपित्त । (७३५) चौदह वरस पाछे आए रघुनाथ नाथ; साथ के जे भील कहें "आए प्रभु देखिये" । बोल्यो "अब पाऊँ कहां होति न प्रतीति क्यों हूं" प्रीति करि मिले राम, कहि "मोको पेखि ये" ॥ परसि पिछौने लपटाने सुख सागर समाने प्राण पाये, मानो भाल भाग लेखिये प्रेम की जू यात क्योंहूँ वानी में समात नाहिं अति अकुलात कहो कैसे के विशेखिये ॥६६॥ (५३३) वार्तिक तिलक । इस प्रकार चौदह वर्ष व्यतीत हुए पर निषादराज के नाथ श्री- रघुनाथजी श्रा, पुष्पक विमान से उत्तर, श्रीनिपादराज से मिलने को पधारे; सो देख, इनके साथ के भिल्लों ने दौड़ के श्रीनिपादजी से कहा कि "आप के प्रभु आए, आंखें खोल के दर्शन कीजिये।" तब आप बोले कि "में प्राणनाथ प्रभु को अब कहां पासकता हूं, मुझे किसी प्रकार से भी प्रतीति नहीं होती।" इतने में स्वयं प्राणप्रिय मित्रवरजी आ, हाथों से उनको उठा, सप्रेम हृदय में लगा, कहने लगे कि "सखे ! नयन उघार मुझको १"निषे" देखिये । २"पिछाने" पहिचाने । ३"क्योंई"-किसी भांति से भी। SKASKESERTREASUR maa भक्तिसुधास्वाद तिलक। देखो ॥ श्रीप्रभु के वचनामृत सुन, तथा दिव्य मान-विग्रह का सुखद स्पर्श पहिचान, ये भलीभाँति से लपट गए । श्रीनिषादराज से मिलने का सुख श्रीभक्तवत्सल कृपालुजी को श्रीभरतजी के ही मिलनसुख के समान हुआ; और श्रीनिषादराज जिस असीम आनन्दसिन्धु में मग्न हुए, सो सर्वथा अगाध और अपारही है । "मृतक शरीर प्राण जनु भेटे" और ये अपने भाल में लिखे सुन्दर भाग्य का पूर्ण उदय जान के धन्यतर कृतार्थ हुए ॥ प्रेम की बातें वाणी में किसी प्रकार समाती ही नहीं, प्रीतिकी वार्ता:वर्णन करने के लिये बुद्धि वानी अतिशय अकुलाती है परन्तु किस विशेषण से उसकी व्याख्या की जासके । दो० "प्रेम न चारी अपजै, प्रेम न हाट विकाय । माथो बदले मिलत है, भावे सो लैजाय ॥१॥ आंखड़ियन भाई पड़ी, पन्थ निहारि निहारि । 'जीभड़िया छाले पड़े, नाम पुकारि पुकारि ॥२॥ छनक चढ़े, छन उतरै, सो तो प्रेम न होइ । आठ पहर भीना रहै, प्रेम कहावै सोइ ॥ ३॥" (८४) श्रीऋभुजी। श्रीभुजी ब्राह्मण के बालक थे एक दिन श्रीउमामहेश्वरजी के मन्दिर हो के चले जा रहे थे, शिवलिङ्ग को वहुत चिकना सुन्दर देख चित्त में पूजन की श्रद्धा हुई; सो एक फूल (जो उस समय इनके हाथ में था) उसको उस विग्रह पर रख के बोले कि "नमः शिवायै च नमः शिवाय" । आशुतोष औढरढरन महादानी श्रीगि- रिजावरजी के मन्दिर से वाणी हुई कि "वर मांग” । इन्होंने कर जोड़ के प्रार्थना की कि "महाप्रभो! आपसे भी बड़ा जो कोई परम पुरुष हो, आप कृपा करके उनका दर्शन इस अयोध बालक को अपनी कृपा से करा दीजिये ॥" , सवैया ॥ "देवन के शिर देव विराजत ईश्वर के शिर ईश्वर कहिये ।

ॐ अ श्रीभक्रमाल सटीक। सर्वया ॥ लालन के शिर लाल निरंतर खूपन के शिर खूबन लहिये । पाकन के शिर पाकशिरोमणि देख विचार वहीं दृढ़ गहिये। सुन्दर एक सदा शिर ऊपर और कळू हमको नहिं चहिये ॥" इस भारी वर की याचाना से श्रीगिरजापति कुछ विचारने लगे। इतने ही में, अपने भक्तराज महाभागवत परमप्रिय देव-देव महादेव के वचन के पूरा करने के हेतु, श्रीहरि स्वयं वहां प्रगट होगये। करुणा- सागर भक्तवत्सल त्रिभुवनपति जगदाधार शोभाधाम को देखतेही, श्रीशिवजी भी प्रत्यक्ष हो, प्रेम और हर्प में चकित होते हुये द्विज- वालक (श्रीभुजी) से वोजे कि "वत्स ! ले जिन दीनबन्धु ब्रह्मण्य- देव जगत्त्राता प्राणेश्वर को तू ढूंढ़ता था, सो तेरे सुकृतियों के फल कारणरहित कृपालु यही हैं; तेरे भाग्य धन्य, तू धन्य, तेरी माता और तेरे गुरु धन्य ॥" "होत बिनोद जितौ अभियंतर तो सुख आपमें श्रापही पैये। वाहिर क्यों उमग्यो पुनि आवत कंठ ते सुन्दर फेर पठेये ॥ स्वाद निवेर निवेस्यो न जात मनो गुड़ मूंगहि ज्यों नित खैये । क्या कहिये कहते न धनै कछु जो कहिये कहतेही लजैये ॥" श्रीभुजी को भक्ति वरदान देके दोनों अन्तर्धान होगये ॥ (८५) महाराज श्रीइक्ष्वाकुजी। श्रीसूर्यवंश में महाराज श्रीइक्ष्वाकुजी बड़े ही प्रतापी हुये आप की राजधानी यही साकेतपुरी अर्थात् श्रीअयोध्याजी थी आप तप- बल से शरीर त्यागकर परमधाम को चलेगये ॥ आपने तप करके जब वरदान मांगा था तो, "मुसकाइ कह्यो हरि तेरह वंशमें खेलिहों औध के अंगन में ॥" पुराणों में आपकी विचित्र कथा है। उसके लिखने की यहां कोई आवश्यकता नहीं देखी। (८६) श्रीऐल (पुरूरवा)जी। राजा पुरूरवाही का नाम ऐल है क्योंकि उनकी माता इला जी PANCE SAR PICHAASANSARAS भक्तिसुधास्वाद तिलक। १६३ थी, और पिता श्रीवुधजी श्रीइलाजी की कथा पुराणों में विचित्र लिखी है जिसकी संक्षिप्त वार्ता यह है कि एक महीना यह स्त्री रहती थी और दूसरे महीने में पुरुष अर्थात् राजा सुद्युम्न, अस्तु !! सोई इलाजी के पुत्र श्रीपुरूरवाजी उर्वशी अप्सरां के संग और प्रेम में बहुत दिन तक मृत्युलोक और गन्धर्वलोक में रहे। पुनः जब पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आये तो पिछली बातें स्मरण होने से इनको बड़ा विराग हुआ जिस विराग का फल श्रीहरिपद अनुराग पाकर आप हरिकृपा से बैकुण्ठ को गये। (८७) श्रीगाधिजी। राजा श्रीमाधिजी के ही पुत्र श्रीविश्वामित्रजी हैं जिनने साक्षात् प्रभु को अपनी वात्सल्य भक्ति से प्रसन्न किया कि जिनको प्रभुने श्रीवशिष्ठजी के समान आदर दिया, यह कथा श्रीमानसरामायणजी में सब प्रेमियों ने देखीही है ॥ गाधिजी की बेटी के पुत्र श्रीयमदग्निजी हैं । राजा गाधि बड़े भक्तिमान् हुये ॥ (८८) महाराज श्रीरघुजी। श्रीअयोध्याजी के महाराज श्रीरघुजी का प्रताप चौदहो भुवन में छाया हुआ था। एक समय उनकी महारानी को देख एक ब्राह्मण वैतीही स्त्री पाने के लिये श्रीशिवजी को अपना मस्तक अर्पण कर देना चाहा । यह वार्ता सुन के महाराज ने अपनी स्त्री राज समेत उस ब्राह्मण देवता को दे दी और उसी विप्र के मनोरथ हेतु इन्द्र ब्रह्मा तथा स्वयं श्रीवैकुण्ठनाथ से बहुत बिनय प्रार्थना की कि जिससे प्रसन्न होके उस ब्राह्मण ने वैकुण्ठ में निवास पाया ॥ आप ऐसे प्रतापी हुये कि आपही के नाम पर वह वंश आज

*
HARMA
श्रीभकमाल सटीक।
तक (रघुवंश के नाम से ) प्रसिद्ध है और भाग्य की वड़ाई इससे
अधिक और क्या कि श्रीसाकेतविहारी आपही के वंश में आके
प्रकट हुये ॥
(८६) श्रीरयजी।
श्रीरयजी राजा पुरूग्वा के पुत्र थे (उर्वशी अप्सरा जिनकी
माता थी) ( १ ) जय (२) विजय (३) रय (४) आयु
(५) श्रुतायु (६) सत्यायु ये छः सहोदर भ्राता थे। "रय" इनमें
बड़े प्रतापी थे॥
(६०)श्रीगयजी।
महाराज श्रीप्रियव्रतजी के कुल में राजा "नक" के पुत्र श्रीद्रुति
जी से हुये। एक बार यज्ञ में आपने ऐसा मनोरथ किया कि जिस
प्रकार से देवता लोगों ने कृपा करके प्रत्यक्ष होके अपना २ भाग
लिया, वैसे प्रभु भी अनुग्रह करके प्रगट हों, पर जव ऐसा न हुआ तो
राजा ने अन्न जल त्याग दिया और प्रभु की प्रतीक्षा करते रहे ॥
सच्चे व्रत और प्रेमवाले पर हमारे प्रभु ने कब कृपा नहीं की है ?
करुणाकर भक्तवत्सल हरि मख में आही तो पहुँचे ।
यज्ञ पूर्ण करके राजा बदरिकाश्रम जाय योगसे शरीर तज
प्रभु के लोक में जा पहुँचे और उनकी धर्मपत्नी भी सती होकर पति
से जा मिलीं ॥
(६१) श्रीसतधन्वाजी।
शतधन्वा की कथा ( स्यमन्तक माण के सम्बन्ध में) श्रीमद्भा-
गवत में विस्तार से वर्णित है । इनको श्रीकृष्ण भगवान् ने मारा
और मुक्ति दी।
(६२) श्रीउतंकजी।
श्रीउतंग (उतङ्क)जी दण्डकवनवासी थे। उनके गुरु, स्वामी
श्रीमतंगऋषिजी, जव श्रीरामधाम जाने लगे तो उनको आज्ञा दी
USEURUGREES

ॐॐॐॐॐ भक्तिसुधास्वाद तिलक। १६५ कि तुम इसी वन में भजन करो। यहीं श्रीसीतानाथ साकेतपति शाधर आवेंगे और कृपाकरके तुमको दर्शन देंगे सो वैसाही हुआ ॥ (६३)(६४) श्रीदेवलजी: श्रीअमूर्तजी। श्रीदेवलजी, जो ब्राह्मण और मौनी थे, और श्रीहरिदास (अमूर्त ) जी, ये दोनों बचपन ही से त्यागी बड़भागी और रामा- नुरागी हुये ॥ (६५) श्रीनहुषजी। एकनहुप श्रीसूर्यवंश में हुये हैं और दूलरे नहुप श्रीचन्द्रवंश में। श्रीसूर्यवंशी नहुपजी श्रीअयोध्याजी के राजा थे । जव गौतमजी के शाप से वा ब्रह्महत्या के भय से इन्द्र मशक सरिस लघु होके मानसरोवर के कंजनाल में जा छिपे तव नहुपजी देवतों के राजा इन्द्र के स्थान पर बिठाये गये । वह उस समय अपने यान को मु- नियों के कन्धे पर उठवा के इन्द्राणी के पास चला । उन ब्राह्मणों के शाप से सर्प होकर मृत्युलोक में गिरा और एक गिरिकन्दरा में काल वितानेलगा। भाग्यवश श्रीयुधिष्टिरजी उधर से जा निकले उनके पुण्यप्रभाव से शाप से उद्धार होके परमधाम को पाया। (६६) श्रीययातिजी। श्रीनाहुपजी अर्थात् श्रीनहुपजी के पुत्र श्रीययातिजी, आखेट को वनमें गये वहां श्रीशुक्राचार्य की बेटी देवजानी से बहुत वात- चीत हुई; संक्षेप यह कि शुक्राचार्यजी ने देवजानी का विवाह राजा ययाति ले करदिया। उनसे दो लड़के हुये ॥ श्रीशुक्राचार्यजी के शाप से वृद्ध हो गये, फिर अपने पुत्र की सहायता से आपने युवावस्था पाई, अन्त को घर छोड़ वन में गये। निदान भगवद्भजन के प्रभाव से परम धाम पाया। SAKASEASE -SGASAN श्रीभक्तमाल सटीक। . (६७) श्रीदिलीपजी। श्रीदिलीपजी सातो द्वीप के राजा थे; आपकी राजधानी श्रीअ- योध्याजी थी॥ एक दिन रावण विप्रवेप बनाके आपके पास पहुँचा, उस समय महाराज पूजा कर रहे थे। एक कुश और किंचित् जल दक्षिण दिशा की ओर फेंका; यह देख रावण को संदेह हुआ और उसने पूछा कि आपने यह क्या किया ? महाराज ने उत्तर दिया कि वन में गायें चररही थीं, उनको सिंह ने पकड़ना चाहा था। इसीलिये मैंने मंत्रित करके वह तृण फेंका है, सो उस वाण ने बाघ को मार के गायों की रक्षा की प्रार लंका में जाके रावण का घर जलाने लगा इसलिये उसके पीछे जल छोड़ दिया कि जिसने वह आग बुझा दी है ।। यह सुनकर रावण झटपट चलदिया और जाकर देखा तो आप की सब बातें ठीक पाईं और आश्चर्य तथा शंका में डूबके फिर कभी यहां (श्रीअयोध्याजी) आने का नाम न लिया वरन् महाराज दि- लीप के नाम से डरा करता था। यशस्वी महाराज दिलीपजी ने अपने पुत्र श्रीभगीरथजी को राज देफर बन जाय श्रीगंगाजी के हेतु तप करते करते तन तज दिया। आपका मनोरथ श्रीभगीरथजीने पूरन किया कि जिनकी कथा लिखी जा चुकी है ॥ (६८) श्रीयदुजी। श्रीयदुजी, राजा श्रीययाति के पुत्र थे देवजानी के गर्भ से॥ श्रीदत्तात्रेयजी महाराज ने कृपा करके राजा यदु के यहां आकर दर्शन दिया और इनके सत्सङ्ग से राजा यदु को विवेक उत्पन्न हुआ और राज तज बन में जा भगवत् भजन कर परम धाम को गये।

१६७ भक्तिसुधास्वाद तिलक। आपही के वंश में भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र प्रगट हुये थे। (१) श्रीपुरुषोत्तमभगवान् ; उनके श्री (२)श्रीब्रह्माजी; उनके यदु (३) श्रीअत्रिजी; जिनके ययाति (४)श्रीचन्द्रजी; जिनके नहप (५)श्रीवुधजी; जिनके आयु (६) श्रीपुरूरवाजी; जिनके पुरूरवा (७) आय; जिनके (८) श्रीनहुपजी; जिनके चन्द्र (६) श्रीययातिजी; उनके अत्रि "श्रीयदुजी" और श्री “पुरु" जो थे॥ पुरुषोत्तम वध (१०) पुत्र ब्रह्मा (६६) श्रीमान्धाताजी। श्रीमान्धाताजी श्रीअयोध्याजी के राजा बड़े प्रतापी और धर्मात्मा थे। श्री “सौभरि” ऋषि ने आप से मांगा कि “मुझे अपनी एक कन्या दीजिये,” राजा ने उत्तर दिया कि “बहुत अच्छा, मेरी पचासो कन्याओं में से जो आप को वरे, आप उसको ले.जाइये ॥" REGERMANCREASE है RA भक्तिसुधास्वाद तिलक। १६६ श्रीतीर्थराज प्रयागमें आपका पावन आश्रम आजभीप्रसिद्ध है। (१०२)श्रीदक्षजी। श्रीदक्षजी ने एक पहाड़ पर भजन किया, भगवत् ने प्रसन्न हो कर दर्शन दे यह आज्ञा की कि “पहिले गृह में रह के भोगविलास और प्रजाउत्पत्ति करलो तब मेरे धाम में आना॥" श्रीदक्षजी के, कई वेर, दश दश सहस्र बेटे हुये और इनने सब को सृष्टि हेतु तप करने के लिये "नारायणसर' पर भेजा; परन्तु, "श्रीनारद उपदेशेउ आई, ते पुनि भवन न देखेउ जाई॥" तव, श्रीब्रह्माजी के उपदेश से श्रीदक्षजी ने साठ कन्यायें उत्पन्न की; जिनकी कथा श्रीमद्भागवत में विस्तारपूर्वक है, अस्तु । अन्ततः, श्रीहरिहरकृपा से श्रीदक्षजी ने परमगति पाई। (१०३। १०४) श्रीपुरुजी। श्रीमृरिषेनजी। श्री "पुरु" जी श्रीयदुजी के भाई थे। दोनों बड़े भगवद्भक्त थे। (१०५) श्रीवैवस्वतमनुजी। चौदह मनुओं में एक मनु प्रथम श्रीस्वायम्भुवमनुजी हैं कि जिन की धर्मपत्नी श्रीसतरूपाजी हैं कि जिनकी कथा लिखी जा चुकी है। शेष तेरह मनु और हैं । (१०६) मनु और मन्वन्तर। अथ चौदहो मनु के नाम- (१) श्रीस्वायम्भुवमनुजी (८)सावर्णि मनु . (२) स्वारोचिष मनु (६) दक्षसावर्णि मनु (३) उत्तम मनु (१०) ब्रह्मसावर्णि मनु (४) तामस मनु (११) धर्मसावर्णि मनु (५) रैवत मनु (१२) रुद्रसावर्णि मनु (६) चाक्षुष मनु (१३) देवसावार्ण मनु (७)श्रीवेवस्वत मनु १४) इन्द्रसावर्णि मनु kkaru.armaCASGRACESSARGESSESSACREAST .

१६८ श्रीभक्तमाल सटीक। जय मुनिको देखके सवहीने उनको वरा; तव राजाने पचासो कन्याएँ मुनि को दान कर दी। (१००)श्रीविदेहनिमिजी। महाराज श्री "निमि" जी विदेह ने जिनकी थिलापुरी थी, यज्ञ करना चाहा; उसी समय उनके वशिष्ठजी महाराज को श्रीइन्द्रजी ने बुलालिया। श्वर श्रीवशिष्टजी इन्द्रलोक से लौट आये, तब देखा गौतमजी से यज्ञ करारहे हैं; क्रोध में आके राजा को तू विदेह हो जा; राजा ने भी बशिष्ठजी को शाप दि विदेह हो जाइये । यह देख श्रीब्रह्माजी ने वशिष्ठजी दिया; और राजा को यह आशीप कि "तुम्हारा वास की पलकों पर रहे ॥" तयसे, वहां के राजा "विदेह" कहलाने 'श्रीनिमिजी के पास एक दिन नवो योगेश्वर कृपाकर आदर सत्कार पूजा के उपरान्त, आपसे कई प्रश्न योगेश्वरों से एक एक करके सवका उत्तर पाया; पूर्वक श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में है। ... पढ़ना सुनना चाहिये। .श्रीनिमिजी महाराज एक अंश से तो सबकी हैं, और एकरूप से श्रीसाकेत में विराजते हैं । (१०१) श्रीभरद्वाजजी। महामुनि श्री "भरद्वाज" जी का यश श्री " में प्रसिद्ध है, कि जिनके ही मनोरम प्रश्न पर श्री "यासन ने परम हितकारिणी कथा प्रगट की आपकी महिमा वर्णन की जावे कि जिनके अतिथि श्रीरामप्राणप्रिय " हुये, पुनः स्वयं प्रभु श्रीजनकनन्दिनीजी और पणजी समेत बड़े प्रेम से इनके आश्रम में श्राए॥ RECEREMONGk ने .

. , , स भनिसुधास्वाद तिलक। १६६ श्रीतीर्थराज प्रयागमें आपका पावन आश्रम आज भी प्रसिद्ध है। (१०२) श्रीदक्षजी। श्रीदक्षजी ने एक पहाड़ पर भजन किया, भगवत् ने प्रसन्न हो कर दर्शन दे यह आज्ञा की कि “पहिले गृह में रह के भोगविलास और प्रजाउत्पत्ति करलो तब मेरे धाम में आना ॥" श्रीदक्षजी के, कई बेर, दश दश सहस्र घेटे हुये और इनने सब को सृष्टि हेतु तप करने के लिये "नारायणसर" पर भेजा; परन्तु, "श्रीनारद उपदेशेउ आई, ते पुनि भवन न देखेउ जाई॥" तव, श्रीब्रह्माजी के उपदेश से श्रीदक्षजी ने साठ कन्यायें उत्पन्न की; जिनकी कथा श्रीमद्भागवत में विस्तारपूर्वक है, अस्तु ॥ अन्ततः, श्रीहरिहरकृपा से श्रीदक्षजी ने परमगति पाई। (१०३। १०४) श्रीपुरुजी। श्रीमरिषेनजी। श्री "पुरु" जी श्रीयदुजी के भाई थे। दोनों वड़े भगवद्भक्त थे। (१०५) श्रीवैवस्वतमनुजी। चौदह मनुओं में एक मनु प्रथम श्रीस्वायम्भुवमनुजी हैं कि जिन की धर्मपत्नी श्रीसतरूपाजी हैं कि जिनकी कथा लिखी जा चुकी है। शेष तेरह मनु और हैं। (१०६) मनु और मन्वन्तर। अथ चौदहो मनु के नाम- (१) श्रीस्वायम्भुवमनुजी (८) सावर्णि मनु . (२) स्वारोचिप मनु (६) दक्षसावर्णि मनु . (३)उत्तम मनु (१०) ब्रह्मसावर्णि मनु (४)तामस मनु (११) धर्मसावर्णि मनु (५)रैवत मनु (१२) रुद्रसावर्णि मनु (६) चाक्षुष मनु (१३) देवसावर्णि मनु ६(७) श्रीवैवस्वत मनु (१४)इन्द्रसावर्णि मनु GHORHSSCRk .

RSS श्रीभक्तमाल सटीक। * १६८ मुनिको देखके सबहीने उनको वरा; तव राजाने पचासो कन्याएँ मुनि को दान कर दी। (१००) श्रीविदेहनिमिजी। महाराज श्री "निमि" जी विदेह ने जिनकी राजधानी श्रीमि- थिलापुरी थी, यज्ञ करना चाहा; उसी समय उनके पुरोहित श्री१०८ वशिष्ठजी महाराज को श्रीइन्द्रजी ने चुलालिया। जव महामुनी- श्वर श्रीवशिष्ठजी इन्द्रलोक से लौट आये, तव देखा कि राजा तो गौतमजी से यज्ञ करारहे हैं। क्रोध में आके राजा को शाप दिया कि तू विदेह हो जा; राजा ने भी वशिष्ठजी को शाप दिया कि आप भी विदेह हो जाइये । यह देख श्रीब्रह्माजी ने वशिष्टजी को देह (शरीर) दिया; और राजा को यह आशीप कि "तुम्हारा वास सबकी आंखो की पलकों पर रहे ॥" तबसे, वहां के राजा "विदेह" कहलाने लगे। महाराज 'श्रीनिमिजी के पास एक दिन नवो योगेश्वर कृपाकर पहुँचे महाराज ने आदर सत्कार पूजा के उपरान्त, आपसे कई प्रश्न पूछे और नव योगेश्वरों से एक एक करके सबका उत्तर पाया; कि जो, विस्तार- पूर्वक श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में है । उसको अवश्य ही पढ़ना सुनना चाहिये। श्रीनिमिजी महाराज एक अंश से तो सवकी पलकों पर बसते हैं, और एकरूप से श्रीसाकेत में विराजते हैं। (१०१)श्रीभरद्वाजजी। महामुनि श्री “भरद्वाज" जी का यश श्री "मानसरामचरित्र" में प्रसिद्ध है, कि जिनके ही मनोरम प्रश्न पर श्री “याज्ञवल्क्य" जी ने परम हितकारिणी कथा प्रगट की आपकी महिमा कहांतक वर्णन की जावे कि जिनके अतिथि श्रीरामप्राणप्रिय "भरत" जी हुये, पुनः स्वयं प्रभु श्रीजनकनन्दिनीजी और लाललाडिले श्रील- पणजी समेत बड़े प्रेम से इनके आश्रम में आए। SCIRE अस्तु॥ ' RSHIP भक्तिसुधास्वाद तिलक। १६६ श्रीतीर्थराज प्रयागमें आपका पावन आश्रम आज भी प्रसिद्ध है ।।. (१०२) श्रीदक्षजी। श्रीदक्षजी ने एक पहाड़ पर भजन किया, भगवत् ने प्रसन्न हो. कर दर्शन दे यह आज्ञा की कि “पहिले गृह में रह के भोगविलास और प्रजाउत्पत्ति करलो तब मेरे धाम में आना " श्रीदक्षजी के, कई वेर, दश दश सहस्र वेटे हुये और इनने सब को सृष्टि हेतु तप करने के लिये “नारायणसर" पर भेजा; परन्तु, "श्रीनारद उपदेशेउ आई, ते पुनि भवन न देखेउ जाई॥" तव, श्रीब्रह्माजी के उपदेश से श्रीदक्षजी ने साठ कन्यायें उत्पन्न की; जिनकी कथा श्रीमद्भागवत में विस्तारपूर्वक है, अन्ततः, श्रीहरिहरकृपा से श्रीदक्षजी ने परमगति पाई। (१०३। १०४) श्रीपुरुजी। श्रीलरिषेनजी। श्री “पुरु" जी श्रीयदुजी के भाई थे। दोनों बड़े भगवद्भक्त थे। (१०५) श्रीवैवस्वतमनुजी। चौदह मनुओं में एक मनु प्रथम श्रीस्वायम्भुवमनुजी हैं कि जिन की धर्मपत्नी श्रीसतरूपाजी हैं कि जिनकी कथा लिखी जा चुकी है। शेष तेरह मनु और हैं । (१०६) मनु और मन्वन्तर। अथ चौदहो मनु के नाम- (१) श्रीस्वायम्भुवमनुजी (८) सावर्णि मनु . (२)स्वारोचिष मनु (६) दक्षसावर्णि मनु (३) उत्तम मनु (१०) ब्रह्मसावर्णि मनु (४)तामस मनु (११) धर्मसावर्णि मनु (५) रैवत मनु (१२) रुद्रसावर्णि मनु (६)चाक्षुष मनु (१३) देवसावार्ण मनु (७)श्रीवैवस्वत मनु (१४) इन्द्रसावर्णि मनु R ** ॐॐॐ २०० श्रीभक्रमाल सटीक । जैसे सातो दिनों का एक "सप्ताह", तथा वारहो महीनों का एक "वर्ष” हुआ करता है, वैसे ही सत्ययुग त्रेता द्वापर कलियुग इन चारों की एक "चौकड़ी" ("चतुर्युग" ) जानिये । तथा ऐसे ऐसे सहस्र चतुर्युगों वा १००० चौकड़ियों का, केवल "एक दिन श्रीब्रह्मा जी का" होता है; सो, ब्रह्माजी के प्रत्येक दिन में चौदह मनु होजाया करते हैं । अर्थात् एक एक मनु, (१०००-१४) कुछ ऊपर-एक- हत्तर चतुर्युगों पर्यन्त रहा करते हैं । जव एक मनु की अवधि पूरी होती है तो उनके साथही साथ उस समय के इन्द्र, सप्तर्पि, मनुपुत्र, भगवदवतार, और देवता, ये छयो पहिले की जगह नए नए होते हैं । प्रत्येक समूह (इन छों का), एक एक "मन्वन्तर" कहलाता है; जव चौदह मन्वन्तर हो चुकते हैं, अर्थात् चौदहो (१) मनु (२) इन्द्र (३) सप्तर्षि ( ४ ) मनपुत्र (५) भगवदवतार (६) देवता की एक एक आवृत्ति हो चुकती है, तब एक सहस्र चौक- ड़ियां व्यतीत होती हैं वा श्रीब्रह्माजी का एक दिन पूरा होता है। उतने ही काल की ब्रह्माजी की रात्रि होती है । ऐसे ऐसे रात्रि दिनों से जब एक सौ वर्ष पूरे होते हैं, तव श्रीराम-इच्छा से पूर्व ब्रह्मा के. स्थान में नए ब्रह्माजी होते हैं। प्रभु की रचना की महिमा अपार तथा अकथनीय है *॥ सौया ।। , "वंद थके कहि, तन्त्र थके कहि, ग्रन्थ थके निशि वासर गाते । शेष थके, शिव, इन्द्र थके पुनि खोज कियो बहु भांति विधाते ॥ पीर थके, औ फ़कीर थके, पुनि धीर थके, बहु वोलि गिराते । ""सुन्दर" मौन गही सिध, साधक, कौन कहै उसकी मुख बाते॥" (१०७) श्रीशरभंगजी। महामुनि श्रीशरभंगजी की स्तुति जितनी की जाय थोड़ी है। नोट-एक चिउटा चिउंटी को देख कर एक समय श्रीकृष्ण भगवान् के हँसने पर धीरुक्मिणीजी के पूछने के उत्तर में भगवत् ने कहा कि जो पिउँटा स्त्री के पीछे दौड़ा जाता है उसको मैं इकहत्तर बार इन्द्र बना चुका हूं तब भी उसकी तृप्ति भोग से नहीं हुई, काम वश दौड़ा जाता है उसी पर हँसी आई है ॥ * श LIBRAR . २RISHNA भकिसुधास्वाद तिलक। २०१ आप कृतयुग से ही श्रीसीतारामदर्शन के लिये तप कर रहे थे। इन्द्रने बहुत विघ्न किये पर श्रीरामकृपा से मुनिजी का मनोरथ सुफल हुआ ही॥ चौपाई। "पुनि आये जहँ मुनि सरभंगा । सुन्दर अनुज जानकी संगा॥" दो० " देखि राम मुख पंकज, मुनिवर लोचन भंग । सादर पान करत अति, धन्य जनम सरभंग ॥" चौपाई। "कह मुनि सुनु रघुवीर कृपाला । शंकर मानस राजमराला॥ जात रहेउँ विरंचि के धामा । सुनेउँ श्रवन बन अइहहिं रामा ॥ चितवत पंथ रहेउँ दिन राती । अव प्रभु देखि जुड़ानी छाती ॥ नाथ ! सकल साधन मैं हीना । कीन्ही कृपा जानि जन दीना ॥ सो.कळु देव ! न मोहि निहोरा । निजपन राखेहु जनमन चोरा ॥ तव लगि रहहु दीन हित लागी । जवलगिमिलउँतुम्हहिंतनुत्यागी।। जोग जग्य जप तप व्रत कीन्हा । प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा । एहि विधि सररचि मुनि सरभंगा । वैठे हृदय छांडि सब संगा॥" दो० "सीता अनुज समेत प्रभु, नीलजलद तनु श्याम । मम हिय बसहु निरंतर, सगुनरूप श्रीराम॥ चौपाई। "अस कहिजोगअगिनि तनुजारा । राम कृपा बैकुंठ सिधारी ॥ तातें मुनि हरि लीन न भयऊ । प्रथमहिं भेद भगति मन दयऊ ॥ ऋपि निकाय मुनिवर गति देखी । सुखी भये निज हृदयविशेखी ॥ अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा । जयति प्रनतहित करुनाकंदा ॥" (१०८) श्रीसंजयजी। सत्यवादी हरिभक्त श्रीसंजयजी, महर्षि श्री "व्यास"जी के शिष्य और राजा 'धृतराष्ट्र के मन्त्री तथा पुरोहित थे। श्रीप्रभुकृपा और व्यासजी के आशिप से इनको दिव्य दृष्टि मिली "श्रीभगवद्गीता" को पहिले श्रीसंजयजी ही ने धृतराष्ट्र से कहा था । महाभारत में KALSCRECRUIRECE . , २०२ श्रीभक्तमाल सटीका इनकी कथा बहुत विस्तारसे है । जव धृतराष्ट्र ने अपनी स्त्री गान्धारी समेत श्रीविदुरजी के उपदेश से सप्तधारा गंगा के तट जाके प्राण त्याग किया, तब श्रीसंजयजी भी विरक हो मुन्न होगये ।। (१०६) श्रीउत्तानपादजी। श्रीमहाराज उत्तानपादजी सब विधि प्रशंसनीय हैं, कि जिन्होंने भक्तराज श्री "ध्रुव" जी सा पुन पाया। श्रीध्रुवजी को राज दे, घन जा, हरि का भजन कर आपने परांगति पाई॥ (११०) ऋषीश्वर श्रीयाज्ञवल्क्यजी। श्रीसूर्य भगवान् ने कि जिनसे श्रीयाज्ञवल्क्य महर्पिजी ने विद्या प्रथमतः पढ़ी थी, अतिशय प्रसन्न होके यह आशिप दिया कि "जो तुमसे विवाद करेगा उसका शीस स्वतः फट जावेगा।" आप महर्षियों में हैं। आपने श्रीभरद्वाजजी के प्रश्न के उत्तर में कृपा करके श्रीपार्वती शिव संवाद "मानसरामचरित" गाया है। आपकी स्मृति भी प्रसिद्ध है ही। आप अत्यन्त प्रेमी महाभागवत परम विवेकी महानुभाव हैं ॥ आपकृत उपदेश विख्यात हैं । (१११) (११३) श्रीसमीकजी, श्रीपिप्पलादजी, श्रीपिप्पलाइनजी। श्रीसमीकजी तथा महाभागवत श्रीपिप्पलादजी, और श्रीपि- प्पलाइनजी तीनों बड़े ज्ञानी ध्यानी प्रेमी थे। (१०६) छप्पय । (७३४) निमि अरु नौ योगेश्वरा पादत्राण*की हौ शरण। कवि, हरि, करभाजन भक्ति रत्नाकर भारी। अन्त- रिक्षे, अरु चमस, अनन्यता पधति उधारी ॥ प्रबुध, प्रेम की राशि भूरिदा आविर होता। पिप्पल छमिल, प्रसिद्ध भवाब्धि पारं के पोता ॥ जयन्ती नन्दन * "पादत्राण' हाऊ, पनाही, जोदा, पगरखी। । "भूरिदा"-यदुत देनेवाला ॥ REAL फरमान भक्तिसुधास्वाद तिलक। २०३ जगत के त्रिविधि ताप आमय हरण। निमि' अरु नव योगेश्वरा पादत्राण की हौं शरण ॥ १३॥(२०१) चाचिक तिलक। महाराज श्रीनिमिजी और नव (6) योगेश्वरों के पादत्राणों के मैं शरणागतहूं और उनके पादत्राण मेरे रक्षक हैं। उन नवो योगेश्वरों के नाम और गुण कहते हैं। श्रीकविजी, श्रीहरिजी, और श्रीकर- भाजनजी, जो नवधा प्रेमा परादि भक्तियों के महारत्नाकर [समुद्र] हैं। श्रीअन्तरिक्षजी और श्रीचमसजी, जो भागवतधर्म अनन्य मार्ग के उद्धार करनेवाले हैं। श्रीप्रवुधजी जो भगवत्प्रेम की राशि ही हैं। श्रीयाविहोताजी जो भक्ति ज्ञान वैराग्य के महादानी हैं। श्रीपिप्पलायनजी और श्रीगुमिलजी, जो संसारसागरसे पारजाने के अर्थ प्रसिद्ध महानौका हैं । १ श्रीकविजी, ७ श्रीआवि)ताजी, २ श्रीहरिजी, श्रीपिप्पलायनजी, ३ श्रीकरभाजनजी, ६ श्रीदुमिलजी, ४ श्रीअन्तरिक्षजी, १० श्रीनिमिजी महाराज ५ श्रीचमसजी, ११ श्रीजयन्तीजी देवी। ६ श्रीप्रवुधजी, (११४) देवी श्रीजयन्तीजी। श्रीपभदेवजी की धर्मपत्नी परम भागवती देवी श्रीजयन्तीजी धन्य हैं, कि जिनके एकसौ पुत्रों में, परम आनन्ददायक ये नवो पुत्र संपूर्ण जगत् के जनों के तीनों ताप तथा काम क्रोधादिक मान- सिक महारोगों के हरनेहारे, और श्रीभरतजी भगवत् के प्यारे,हुए। धन्य धन्य, जय जय ।। दम्पति के उन एकसौ पुत्रों में से ८१ महिसुर (ब्राह्मण) और शेष महीश (अवनीश) हुए॥ (११०) छप्पय (७३३) पदपराग करुण करौ, (जे) नेता "नवधा भगति" KRECReir #RUIREASACHARLES 1 .

614 श्रीभक्तमाल सटीक । २०६ . अहो! श्रीपरीक्षितजी की क्या प्रशंसा की जावे कि सातवें दिन ज्योंही श्रीशुकदेवजी की वाणी समाप्त हुई, उसी क्षण शरीर को त्याग दिया परमधाम को चले गए। श्रीपरीक्षितजी की कथा लिखी जाचुकी है कि ("जिनके हरि नित उर वस")॥ (११६) परमहंस श्रीशुकदेवजी। (११२) टीका | कवित्त । (७३१) गर्भ ते निकसि चले वनही में कीयो वास, व्यास से पिता को नहि उत्तरहु दियो है । दशम श्लोक सुनि गुनि मति हरि गई, लई नई रीति, पढ़ि भागवत लियो है। रूप गुन भरि सह्योजात कैसे करि; आए सभानृप ढेरि भीज्यो प्रेम रस हियो है । पूछे भक्त भूप ठौरठौर परे भौर, जाई, गाई उठे जवै मानो रंगझर कियो है ॥८॥(५३१) वार्तिक तिलक। परमहंस श्रीशुकदेवजी की कथा यहां तक तो लिखी जाचुकी है कि शुक का बच्चा श्रीव्यासजी की स्त्री के मुखद्वारा उदर में प्रवेश कर गया। बारह वर्ष उनके उदर में ही आपरहे । पुनः देवतों मुनीश्वरों की प्रार्थना से आप गर्भ से निकल के उसी क्षण चल दिये और जाके वनही में वसे । महर्षि श्रीव्यासजी सरीखे पिता के “पुत्र ! पुत्र !!" पुकारने पर स्वयं उत्तर तक न दिया, किन्तु वृक्षों से ही "शुकोऽहं शुकोऽहम्" कहला के प्रबोध कर दिया । तब श्रीव्यासजीने एक अनुरागका जाल फेंका अर्थात् भगवद्यश के श्लोक सिखाकर लड़कों को (श्रीअगस्त्यजी के शिष्योंको) वन में आपकी ओर भेजा। किसी दिन एक लड़के को अपूर्व भगवद्यश का एफ*श्लोक भागवतके दशमस्कन्धका गाते सुनके आपकी मति हर गई। भगवत्प्रेम में आप ऐसे पगे कि उस लड़के से पता पूछकर श्री- व्यासजी के पासभाकर नवीनरीति ग्रहणकर (अर्थात् जिन्होंने उत्तर १ "ढरि"चलिके, ढरफ के, कृपा करके । *प्रदो यकीयं स्तनकालकूट जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । लेभे गति धान्युचितां ततोऽन्य कं वा दयालुं शरणं मजेम ॥ SANI - । ॐ PRE भक्तिसुधास्वाद तिलक। २०७ भी न दिया था सो) अव पास में रह के श्रीमद्भागवत को पढ़ा। तव संपूर्ण.श्रीभागवत में जो श्रीभगवत्रूप और गुणों का वर्णन था,सो सब इनके मनमें भरके उसके आनन्द का भार इतना हो गया कि जो किसी प्रकार से सहा नहीं जाता था। एवं, जव ऋषिपुत्र के शापसे राजा परीक्षितजी राज तज के श्रीगंगाकूल में मुनियों के वृन्द समेत सभा में बैठे, और भक्त राजा जी ठौर ठौर के मुनीश्वरों से अपनी सुगति का उपाय पूछरहे थे; मुनीश्वरलोग इस विचार के चक्कर (भँवर) में पड़े थे कि राजा को क्या उपदेश देना चाहिये। उसीक्षण उससभाग, श्रीपरीक्षितजी के भाग्यवश,श्रीशुकदेवजी, कि जिनका हृदय श्रीभगवत्प्रेमरस से भीगा हुआ है, सो परोपकारता की ढरनसे ढर के, आ पहुंचे और राजा से कहा कि "तुम भगवद्यश सुनो"। यह कह श्री "भागवत" कथा गा चले मानो प्रेमरंगकी झड़ी सी लगा दी । श्रीभागवत, श्रीपरीक्षित महाराज को श्रीशुकजी ने ऐसा सुनाया कि सातही दिन में महाराज ने परमपद ही तो पा लिया। श्रीव्यासजी तथा सुरुगुरु श्रीबृहस्पतिजी की आज्ञा से श्रीशुकजी ने, विज्ञानसिन्धु श्रीजनकजी महाराज से उपदेश लिया । एक समय किसी तीर्थ पर देवाङ्गनाएँ वस्त्ररहित स्नान कर रही थीं परमहंस श्रीशुकदेवजी अकस्मात् उधरही से जा निकले, उन देवियों ने आपसे तो लज्जा न की, परन्तु व्यासजी को देखते ही शीघ्रता एवं लज्जापूर्वक वस्त्र धारण करने लगीं। और व्यासजी की शंका का उत्तर उन बड़भागियों ने यह दिया कि "प्रभो आपले अथवा सबसे लज्जा तो सामान्यतः अवश्य है ही, रही वार्ता यह कि परमहंस श्रीशुकदेवजी से लज्जित क्यों न हुई ? सो उनको तो स्त्री पुरुष का भेद ही नहीं, वे तो सवको भगवतमय ही देखते हैं; उनको इतनी भी सुधि नहीं कि हमको लज्जा आई वा नहीं, सवस्त्र हैं वा नग्न, वे तो भगवद्रूप में छके केवल उसीमें मग्न हैं ॥" RHICROREGARLS . , FRESHAकम ॐ श्रीभक्तमाल सटीक। २०८ (११७) श्रीप्रह्लादजी। (११३ ) टीका | कवित्त । (७३०). सुमिरन सांचो कियो, लियो देखि सवहीं में एक भगवान कैसे काटै तरवार है । काटियो खड़ग जलबोरियो संकति जाकी, ताहि को निहारै चहुँओर सो अपार है ॥ पूछेते वतायो खंभ, तहाँही दिखायो रूप, प्रगट अनूप भक्त बाणीही सों प्यार है । दुष्ट डायो मारि, गरे अति लई डारितऊ क्रोध को न पार, कहाकियो यो विचार है MEn वार्तिक तिलक। महाभागवताग्रगण्य श्रीप्रहादजी की कथा "द्वादश भक्त राजों" के साथ लिखी जा चुकी है। इन्होंने श्रीराम नाम का सच्चा स्मरण किया; जिस स्मरण से इनको पूर्ण परब्रह्म दृष्टि प्राप्त हुई। कि जिस दृष्टि से चरावर में एक भगवान ही को देखा । यह भजन और स्म- रण देखके भन दोही हिरण्यकशिपु ने इनके वध के अनेक प्रयत्न किये; अग्नि में जलाया, जल में डुवाया; तथा खड्ग का प्रहार भी कराया; परन्तु इनको खड्ग कैसे काट सकता था। क्योंकि खड्ग में काटने की शक्ति अग्नि में जलाने की एवं जल में डुबाने की शक्ति जिस परमात्माश्रीरामजी की है, उन्हीं को आप चारो ओर अग्नि जल खड्गादिकों में अपार प्रीति प्रतीति से देखते थे। अन्त में हिरण्यकशिपु ने पूछा कि "तेरा राम कहां है ?" तो आपने उत्तर दिया कि "प्रभु सर्वत्र हैं।" दो० "तोमें मोमें खड्ग में, खम्भहु में हैं राम । मोहि दीखे,तोहि नाहिं, पितु , विना जपे हरि नाम॥" ऐसा सुन दुष्ट ने पुनः पूछा कि “क्या इस खंभे में भी है ?" आपने उत्तर दिया कि "हां, निस्सन्देह हैं" तिसपर, उसने महा- क्रोध करके उस खंभे में एक घूसा (मुष्टिक) मारा ।। तवं अपने भक्त की प्रियवाणी को सत्य करनेवाले प्रभु, उसके १"सकति"-शक्ति । "श्रागेहु रामहि, पीछेहु रामहि, व्यापक रामहि हैं बन मामै । सुन्दर राम दशादिशि पूरण स्वर्गहु राम पतालहु रामै ॥"

भकिसुधास्वाद तिलक। २०६ मुष्टि मारतेही, उस खंभे में से महा अट्टहास शब्द करके अद्भुत रूप से (अर्थात् आधा "नर" का और आधा "सिंह" का शरीर धारण कर)प्रगट हो उस दुष्ट को मार डाला। फिर उसकी आँतें निकाल के अपने गले में डाल ली; पर इतने पर भी आपका अपार क्रोध बनाहीरहा, शान्त नहींहुवा,न जाने मनमें क्या विचार आगया। (११४) टीका | कविच । (७२६) डरे शिव अज आदि, देख्यो नहीं क्रोध ऐसो, आवत न ढिग कोऊ लछिमीहूं त्रास है। तब तो पठायो प्रहलाद अहलाद महा,'अहो भक्ति. भाव पग्यो आयो प्रभु पास है ॥ गोद में उठाइलियो, शीसपर हाथ दियो, हियो हुलसायो, कही वाणी विनयरास है । आई जगदया लगिपस्यो श्रीनृसिंहजू को, अत्यो यो छुटावो कस्यो माया ज्ञान नास है ॥ १००॥ (५२६) वार्तिक तिलक । श्रीनरहरि भगवान् का वह क्रोध देख के, औरों की तो बात ही क्या है श्रीब्रह्माशिवादिक भी डर गए क्योंकि इन्होंने प्रभु का ऐसा क्रोध कदापि देखा ही न था। कोई समीप नहीं जा सकते थे, वरंच श्री लक्ष्मीजी भी भय से प्रभु के पास नहीं जा सकीं ॥ तब तो श्रीब्रह्मादिक ने श्रीप्रह्लादजी से कहा कि "वत्स ! तुम प्रभु के पास जाके क्रोध की शान्ति करावो" यह सुन आश्चर्य भक्ति भाव के महान अह्लाद में पगे हुए श्रीप्रह्लादजी श्रीप्रभु के पास ने खटके गये। श्रीभक्तवत्सलजी ने प्रसन्न हो दोनों हाथों से उठके मापको गोद में विठला लिया, और मस्तक आघ्राण कर शीस पर अखण्ड अभ- यप्रद हस्त फेरा॥ तदनन्तर, श्रीप्रहादजी का हृदय अकथनीय आनंद से हुलास को प्राप्त हुआ; और प्रेमराशिसानी वाणी से स्तुति प्रार्थना करने लगे। प्रभु ने आज्ञा की कि "वत्स ! कुछ वर मांग ॥" १ "ढिग"-समीप, पास, लगे, । २ "लगिपखो"-मुंहलगू हुए, लहुए, अरुझि पखो, उलझ पड़े। ३ "श्रयो"हठ पहे, अड़ गए। , २१० श्रीभक्रमाल सटीका , आप वोले कि प्रभो ! मैं वरदान नहीं चाहता हूं ॥ परन्तु पुनः आज्ञा पाय आपको जगत् के जीवों पर दया आ गई; इससे चरणों में लग के और हठ करके यही वर मांगा कि नाथ ! इस आपकी माया ने सब जीवों का ज्ञान हर लिया है इसलिये अपनी माया से जीवों को छुड़ाइये, जिसमें आपका भजन करें। "काढ़ि कृपान कृपा न कहूं पितु कालकराल विलोकि न भागे। "राम कहां?""सवठाउहें "खंभमें?" "हां"सुनिहांक नृकेहरि जागे। वैरी विदारि भए विकराल, कहे प्रहलादहि के अनुरागे। प्रीति प्रतीति बढ़ी, तुलसी, तवते सव पाहन पूजन लागे ॥२॥" (११८) महावीर श्रीहनुमानजी। (ॐ नमो भगवते हनुमते श्रीरामदूताय) "श्रीहरिवल्लभों" में भी, परम प्रिय श्रीवीरमारुतिजी की कथा कही जाचुकी है। फिर यहां "नवधाभक्ति" की निष्ठा में आपका यश श्रीग्रन्थकर्त्ताने गायाहै; और पुनःआगे,१६वे छप्पय (मूल २०)में भी, "श्रीरघुवीर सहचर"महावीर पवनात्मजजीका सुयश दोखिये। उसी प्रसंग में आपके जन्मकी कथा भी पढ़के परमानन्द लाभ कीजिये ।। चौपाई। "सुमिरि" पवनमुत पावन नामू। अपने वश करि राखे रामू ॥" और, आपकी "श्रवण" निष्ठभक्ति इस वार्तासे प्रसिद्ध ही है कि जब श्रीअवधेश राघवेन्द्रजी महाराज निज साकेत धाम को जाने लगे, आपको आज्ञा दी कि "तात ! तुम यहीं (श्रीअयोध्याजी में) रहो"; तिसपर आपने कहा कि प्रभो ! जो आज्ञा, परन्तु यह घर- दान मिले कि कदापि किसी काल में श्रीरामायण मुझे सुनानेवालों का अभाव नहीं हो।" प्रभु बोले कि "अच्छा, एसाही होगा, सदैव मेरी कथा तुम्हारे श्रवण गोचर होती रहेगी; नर नाग गन्धर्व सुर, मेरे यश तुमप्रति गायाही करेंगे, तथा भाग्यशालिनी अप्सराएं निरन्तर मेरे चरित्र तुम्हें सुनातीही रहेंगी॥" निदान, आप किस रस के आचार्य नहीं हैं ? सवही के हैं। Sekeko .. FRONTHS भक्तिसुधास्वाद तिलक। २११ चौपाई। "दुर्गम काज जगत में. जेते । सुगम अनुग्रह कपि के तेते ॥ कवनसो काजकठिनजगमाहीं। जोनहिं तात होय तुम पाहीं॥ सीयदुलारे रामपियारे । सन्त भन के कपि रखवारे ।। नहिं कोउ हनुमतसमवड़भागी। सीताराम चरण अरानुगी । मंगल मूरति मारुतनन्दन । सकल अमंगलमूलनिकन्दन॥" सो० "सेइय श्रीहनुमान, भुक्ति-मुक्ति-हरिभक्ति-प्रद । जनरक्षक, भगवान, बीर, धीर, करुणायतन ॥" (११९)(१२०) श्रीअर्जुनजी; श्रीप्टथुजी। "श्रीहरिवल्लभों" में भी, श्रीअर्जुनजी की कथा होचुकी है और यहां (इस छप्पय में) आपको श्रीग्रन्थकारस्वामीने "नवधाभक्ति" (सख्यरस) के प्रसंग में लिखा है । श्लो० " सर्व गुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इप्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ &c. &c. प्रियोसि मे ॥" (२) भगवत् के अवतारों में तथा "जिनके हरिनित उर बसें" तिन भाग्यभाजनों में भी महाराज श्रीष्टथुजी की चर्चा हो चुकी है। किसी२ महात्मा ने आपको "श्रवण” निष्ठा में लिखा है; और यहां आपको श्रीनाभास्वामीजी प्रमुख ने “पूजन"निष्ठामें वर्णन किया है । (१२१) श्रीअक्रूरजी। (११५) टीका | कवित्त । (७२८) चले अकरूर मधुपुरीतें, विसर, नैन चली जल धारा, कब देखौं छवि पूर को । सगुन मनावै, एक देखिबोई भावे, देहसुधि विसरावै, लोट, लखि पगधूर को ॥ बंदन प्रवीन, चाह निपट नवीन भई, दई शुकदेव कहि जीवन की मूर को । मिले राम कृष्ण, झिले पाइ के मनोरथ को हिले दृगरूप कियो हियो चूर चूर को ॥१०१५(५२८) १"विसूरना" रूप चिन्तवन करना । २ "मिले" धागे यढ़े, लपके ।३"हिले"- प्रवेश किया, हिल गए, हिताए, परके, सस्नेह मिले ॥ SkGSGARGREGORIESGARLS २१२ श्रीभक्रमाल सटीक। - वार्तिक तिलक। श्रीअक्रूरजी कंसके भेजे हुए मथुराजी से (श्रीवज की ओर) अति विरह उतकण्ठा से चले, यों विचारते हुये कि- पद-" जे पदपदुमसदा शिवके रह, सिन्धुसुता उरते नहिं टारे । सूरदास तेई पदपंकज, त्रिविध ताप दुख हरन हमारे ॥ दो ब्रजवाला जे पदकमल, रहीं सदा उर लाइ । तेइ पद पंकज देखिहाँ, हौं इन्ह नैनन्ह जाइ ॥ श्रीकृष्ण वलदेवजी का रूप चिन्तवन करते ही आंखों से प्रेम जल की धारा वहने लगी; और श्याम गौर छविपूर्ण दोनों भाइयों के दर्शनका मनोरथ भी हृदय में भराया। सगुन मनाते जाते थे; केवल दर्शनही सुहाताथा, इससे अपने शरीरका भान भूल जाया करतेथे ॥ इसी दशा से जन श्रीव्रज के समीप पहुंचे, तो मार्ग की धरि में "कमल वन ध्वज अंकुशादि चिन्ह" युक्त भगवत के चरण उवटेहुए देखके उनको दण्डवत् कर आप उन्हीं चरणचिह्नों में लोटनेलगे और इन्हें प्रीति चाह अतिशय नवीन उत्पन्न हुई उसी से इनकी "जीवन की जड़ी वन्दन भक्ति प्रवीणता" श्रीशुकदेवजी ने श्रीभाग- वत में भलीभांति कही है। श्रीवृन्दावन में आप आ पहुंचे; श्रीवलरामजी तथा श्रीकृष्णजी का दर्शन कर, अपना मनोरथ पूर्ण देखा आगे बढ़, जा मिले; छवि सागर में इनके नेत्र मग्न हो गए और हृदय प्रेम से चूर चूर होगया॥ प्रेमपूरित अन्तःकरणसे शुभमार्गमें जिनका चिन्तवन करतेचले आते थे, यहां आकर, उनके और विचित्र चरित्रों के अतिरिक, यह भी देखा कि- "सुतदारा औ गेहकी नेह सवै तजि जाहि विरागी निरन्तर ध्यावें यम नेम औ धारणा प्रासन आदि करें नित योगी समाधि लगावें ॥ जेहि ज्ञान औध्यान तेजाने कोऊ सोअनादि अनन्त अखण्ड बताईं। ताहि अहीर की छोहरियां छिया भर छाँछ पै नाच नचावें ॥" जिससे आप असीम सुख HAR सौया ।। को प्राप्त हुए॥

२१३ भनिसुधास्वाद तिलक। श्रीअकूरजी की चरचा "श्रीहरिवल्लभों" में भी हो आई है और यहां "नवधा भक्ति" के प्रसंग में ॥ (१२२) श्रीवलिजी। (११६) टीका । कवित्त । (७२७) दियो सरवसु, करि अतिअनुराग बलि, पागिगयो हियो प्रहलाद सुधि आई है। गुरु भैरमावै, नीति कहि समुझावै, वोल उर में न श्रावै केती भीति उपजाई है ।। कह्यो जोई कियो सांचो भाव पनलियो, महो दियो डर हरिहूने, मति न चलाई है। रीझेप्रभु, रहेद्वार, भये वस हरि मानी, श्रीशुक बखानी,प्रीति रीति सोई गई है॥ १०२ ॥ (५२७) चार्तिक तिलक। श्रीवलिजी ने अति अनुराग पूर्वक श्रीवामन भगवान् को अपना सर्वस्व दे डाला; यद्यपि इनके गुरु शुक्राचार्य ने इनको बहुत भरमाया; और यह भी जता दिया कि ये देवतों के पक्षपाती विष्णु हैं; तथापि इन्होंने न माना, वरंच इनको अपने पितामह श्रीप्रहादजी की प्रेमाभक्ति की सुधि आ गई । इससे श्रीवलिजी का हृदय प्रभु के अनुराग में पग गया ॥ पद "जाके प्रिय न राम वदेही । तजिये ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही।तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषण बन्धु, भरत महतारी। बलि गुरु तजेउ, कन्त ब्रजवनितनि, भयो मुदमंगलकारी ॥ नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहालौं । अंजन कहा ? आँखि जो फूटें, बहुतक कहाँ कहाँलौं ॥ तुलसी, सो सब भांति परमहित पूज्य प्राणते प्यारो । जाते होय सनेह रामपद, एतो मतो हमारो॥"(वि०प०) पुनः शुक्रचार्य ने बहुत प्रकार से राजनीति समझाई तथा अनेक भय भी दिखाए परन्तु शुक्र का वचन आपके मन में एक भी न जमा; किन्तु जो कुछ प्रभु से प्रतिज्ञा की थी, सोई वात की। सच्चे भाव से अपना दृढ़ प्रण (पन) गहे ही रहे । भरमावै घुमाये फिरावे, इधर उधर करे, बहकाये, टाल मटाल करे, हेर फेर करे। २"चलाई"-चली, टसकी, हटी, डोली ॥ SCREACROREGALISTENCESS .

FISH ॐ श्रीभक्तमाल सटीका श्रीहरिने भी बहुत डराया,पर इन्होंने अपनीमति हरिकृपासे स्थिर ही रक्खी; अर्थात् अपना देह आत्मा सब प्रभुको समर्पण कर दिया। सवैया ॥ "कै यह देह सदा सुख सम्पति कै यह देह विपत्ति परोजू । कै यह देह निरोगरहो नित के यह देहहि रोग चरोजू के यह देह हुताशन पैठहु के यह देह हिमालै गरोजू। सुन्दर रामहि सॉपिदियो जब,तब यह देह जियो कि मरोज़ा।" प्रभु इनकी सत्यसन्धता तथा आत्म निवेदन भक्ति देख,अत्यन्त ही रीझ, इनके द्वारपाल वन के सदा द्वारपर ही रहने लगे और अपने मन में हार मान, आपके वश ही हो गए। सो परमहंस श्रीशुकजी ने श्रीभागवत में अच्छे प्रकार से बखान किया है । सोई श्रीवलि की प्रीति रीति हमने भी गान की है।श्रीवलिजी की कथा "द्वादश भक्तों" में भी लिखी जा चुकी है और यहां"आत्मसमर्पण में । (१२३) प्रसादनिष्ठ भक्त। (११७) छप्पय । (७२६) हरिप्रसाद रस स्वाद के भक्त इते परमान॥शङ्कर, शुक, सनकादि, कपिल, नारद, हनुमान विष्वकसेन, प्रहलाद,वलि,भीषम,जग जाना॥अर्जुन, ध्रुवं,अस्व- रीष, विभीषणे, महिमा भारी। अनुरागी अक्रूर, सदा उद्धव, अधिकारी॥भगवन्त मुक्त अवशिष्ठ की कीरति कहन सुजान । हरिप्रसाद रस स्वाद के भक्त इते पर- मान १५॥ (१६६) वार्तिक तिलक । श्रीहरि के प्रसाद के रसस्वाद लेनेवाले, और श्रीभगवत् के भो- जन किये हुए शेष अमृतान्न की कीर्ति महिमा कहने में परम सुजान, इतने भक्त प्रमाण हैं-श्रीशङ्करजी श्रीशुकजी सनकादिक चारो भाई . , , CARE भक्रिसुधास्वाद तिलक। २१५ श्रीकपिलजीश्रीनारदजी श्रीरामानन्य हनुमानजी श्रीविष्वकसेनजी, श्रीप्रहलादजी, श्रीवलिजी, और प्रसिद्ध देवव्रत श्रीभीप्मजी,श्रीअर्जु- नजी श्रीध्रुवजी श्रीअम्बरीपजी, महा महिमायुक्त श्रीविभीषणजी, अनुरागी श्रीअक्रूरजी, सदा प्रेमाधिकारी श्रीउद्धवजी ॥ तात्पर्य यह है कि भगवत् का उच्छिष्ट प्रसाद इन भक्कों को अवश्य अर्पण करना चाहिये, उसमें प्रमाण पद्मपुराण का- श्लो० "वलिविभीपणो भीष्मः कपिलो नारदोऽर्जुनः । प्रह्लादो जनको व्यासो अम्बरीपः पृथुस्तथा ॥ १॥ विष्वक्सेनो ध्रुवोऽक्रूरो सनकाद्याः शुकादयः । वासुदेवप्रसादानं सर्वे गृहन्तु वैष्णवाः॥२॥ १ श्रीशिवजी, ६ श्रीवलिजी, २ श्रीशुकदेवजी, १० श्रीभीष्मजी, ३ श्रीसनकादिजी, ११ श्रीअर्जुनजी, ४ श्रीकपिलदेवजी, १२ श्रीध्रुवजी, ५ श्रीनारदजी, १३ श्रीअम्बरीपजी, ६श्रीहनुमान्जी, १४श्रीविभीपणजी, ७ श्रीविष्वक्सेनजी, १५ श्रीअक्रूरजी, ८ श्रीप्रह्लादजी, १६ श्रीउद्धवजी, (११८) छप्पय ! (७२५) ध्यान चतुर्भुज चितधयो, तिन्हें शरण हौं अनु- सरौं ॥ अगस्त्यं पुलस्त्य पुलह च्यवर्ने वशिष्ठ सौभरि ऋषि । कईम अत्रि रिचीर्क गर्ग गौतम सु- व्यासशिपि ॥ लोमश भृगुँ दालभ्य अङ्गिराङ्गि प्रकासी। मांडव्य विश्वामित्र दुर्वासौं सहस अठासी॥ जीवालि यमैदग्नि मायादेर्श कश्यपँ परवंत पराशर पद रजधरौं । ध्यान चतुर्भुज चित धस्यो, तिन्हैं शरण हौं अनुसरौं॥ १६ ॥ (१९८) SAREERelease .

२१६ श्रीभक्तमाल सटीका वार्षिक तिलक। श्री भगवान् के चतुर्भुज रूप का ध्यान जिन भक्न ऋषियों ने अपने चित्त में धारण किया, मैं उनके शरण में प्राप्त हूं और उन्हीं के चरणों की धूरि अपने शीस में धरता हूं १श्रीअगस्त्यजी १५ श्रीदालभ्यजी २ श्रीपुलस्त्यजी १६ श्रीअनिाराजी ३ श्रीपुलहजी १७ श्रीप्यशृङ्गाजी ४ श्रीच्यवनजी १८ श्रीमांडव्यजी ५ श्रीवशिष्टजी १६ श्रीविश्वामित्रजी ६ श्रीसौभरिजी २० श्रीदुर्वासाजी ७ श्रीकदमजी २१ श्रीजावालिजी ८ श्रीअनिजी २२ श्रीयमदग्निजी ६ श्रीऋचीकजी २३ श्रीमायादर्श (मारक- १० श्रीगर्गजी एडेय)जी ११ श्रीगौतमजी २४ श्रीकश्यपजी १२ श्री( संजयजी)व्यासशिष्य | २५ श्रीपर्वतजी १३ श्रीलोमशजी २६ श्रीपराशरजी १४ श्रीभृगुजी (२७) अठासीसहस्र (८८०००) (१२४) महर्षि श्रीअगस्त्यजी।। श्रीसीतारामकृपापात्र शिरोमणि ऋपीश्वर श्री१०८ अगस्त्य भगवान्को, कि जिनका दूसरा नाम "श्रीघटयोनि वा कुम्भजजी" भी है, अन्य महर्षियों के ही सरिस नहीं, वरंच इनको श्रीप्रभु का दूसरा व्यकि ही समझना चाहिये; किमधिकम् ? एवं, आपकी स्त्री "श्रीलोपामुद्राजी",श्रीजनकनन्दिनीजी की अतिशय कृपापान सखी हैं। आप दोनों की जय ॥ श्रीअगस्त्य भगवान् की उत्पत्ति घड़े से हुई; वरुण देवता तथा मित्रजी दोनों के तेज एक कलश में रक्खे हुए थे, श्रीब्रह्माजी की इच्छा से उसी घट से आप निकले। और ऐसा भी कहा है कि एक राजा ने पुत्रकामयज्ञ कराया; उससे जो क्षीरान्नमिला, उसको उसने चौपाई। 55 RE भनिसुधास्वादं तिलक। २१७ एक कलश में रख दिया (वह अपनी रानी को न खिला सका); उसी घड़े से आप प्रगट हुए। आप की वनाई "श्रीअगस्त्य संहिता" प्रसिद्ध ही है। साकेतपति शाइधर दिव्य अखण्डैक नित्यकिशोर मूर्ति व्यापक परात्पर भगवत् सच्चिदानन्दघन शोभाधाम श्रीजानकीवल्लभ राम- चन्द्रजी की उपासनापूजा इत्यादि के बड़े भारीआचार्य श्रीअगस्त्य भंगवान् हैं। आपने सर्व जगत् पर कैसी कृपा की वर्षा की है, वर्णन नहीं हो सकता। पांच छः कारणों से एक समय श्राप सम्पूर्ण विशाल समुद्र ही को पान कर गए थे; सो कथा विख्यात है ही। कहँ कुम्भज, कहँ सिन्धु अपारा । सोखेउ विदित सकल संसारा ॥ आज भी आपका नाम ही लेते महा अजीर्ण कोसों भागता है। श्रीपार्वतीजी और महादेवजी के विवाह उत्सव में जव गिरिराज हिमाद्रि के यहां देवतों दानवों आदिकके इकट्ठे होने पर उनके बोझ से धरती उत्तरकी ओर नीची होगई, तोसवकी प्रार्थनासे परम समर्थ श्रीअगस्त्यजी दक्षिण को चले गए; तब आप ही के प्रभाव से पृथ्वी दक्षिण की ओर नीची हो गई। • अन्नदान न करके केवल मणि सुवर्ण वसन भूषणादि दान करने पर भी एक व्यक्ति वड़ी दुर्गति को प्राप्त हुआ था; सो उसका उद्धार महामुनि श्रीअगस्त्यजी ही महाराज ने कराया । और उसके दिये भूपों से आपने श्रीप्रभु की पूजा की । श्रीसीतारामनाम का महात्म्य, श्रीअगस्त्यजी ने कहा भी है और श्रीशेषजी की सभा में देवतों तथा मुनियों को आपने नामप्रभाव दिखा भी दिया है। देवतों की प्रार्थना पर श्रीअगस्त्य भगवान् ने ही मन्दराचल (विन्ध्यगिरि) को आज्ञा दी जिसके अनुसार वह अचल आज तक वैसा ही पड़ा का पड़ाही है जैसा आपको साष्टाङ्ग दण्डवत् करने के समय गिरा था ॥ श्रीहनुमानजी, श्रीशिवजी, और श्रीब्रह्माजी, जिस प्रकार से मगर श्रीभक्तमाल सटीक । २१८ श्रीअगस्त्यजी महाराज की महिमा जानते हैं, वैसी और कोई क्या जानेगा ? आपके शिष्य श्रीसुतीक्ष्णादि * की ही भक्ति प्रीति की व्याख्या तो अपार है फिर स्वयं आपकी तो वार्ता ही क्या ? लंका में सकार पर कृपा करके राक्षस प्रेरित अस्त्र-शस्त्रों से रक्षा की है; और श्रीआदित्यहृदय पढ़ाया है कि जिसकी महिमा प्रसिद्ध ही है। चौपाई। । "दीन दयाल दिवाकर देवा । कर मुनिमनुज सुरासुर सेवा ॥ हिम तम करि केहरि करमाली । दहन दोष दुख दुरित रुजाली ॥ कोक कोकनद लोक प्रकाशी। तेजप्रताप रूप रस राशी॥ सारथि पंगु दिव्य रथ गामी । विधिशंकर हरि मूरति स्वामी ।। वेदपुराण प्रगट यश जागै । तुलसी राम भक्ति वर मांगे ॥ अरण्यमें,प्रभुने स्वयं आपके आश्रम में जाके आपको दर्शन दिया है। श्रीअयोध्याजी में राज्याभिषेक के अनन्तर श्रीअगस्त्यजी से प्रभु ने अनेक कथा, तथा श्रीमहावीर हनुमानजी के सुयश सुने हैं। श्रीअगस्त्यगुणं ग्राम,वेद तथा पुराणों में विदित है ।श्रीसीतारामजी की भक्रि के प्राचार्य महामुनि अगस्त्य भगवान् की जय जय ॥ पूजा सवैया । 'पूरण ब्रह्म बताय दियो जिन एक अखंड है व्यापक सारे । रागरु देप करै अव कौन सों जोई है मूल सोई सब डारे ॥ संशय शोक, मिट्यो मनको सब तत्व विचारि कंह्यो.निरधारे। "सुन्दर" शुद्ध किये मलधोयकै है गुरु को उर ध्यान हमारे ॥" (१२५)श्रीपुलस्त्यजी। श्रीपुलस्त्यजी, श्रीब्रह्माजी के पुत्र हैं। गृहस्थाश्रममें रह,पुत्र उत्पा- दन कर, बेटों को विद्या पढ़ा, आपने मोक्षपद का साधन किया। ( १२६) श्रीपुलहजी। श्रीपुलहजी श्रीपुलस्त्यजी के भाई हैं। इन्हों ने भी अपने भ्राता ही के सरिस आचरण किये ॥ धासुनाराजीकीपीनि श्रीरामचरितमानस में पाठक देयही धुके हैं। ECOGRESoneed भक्तिसुधास्वाद तिलक। ( १२७) श्रीच्यवनजी। श्रीच्यवनजी वनमें रह, भगवान् के ध्यान समाधि में ऐसे निमग्न होगए कि उनके शरीर भर में दीमकों ने मिट्टी का ढेर (बलमीक) लगा दिया। उसी वन में राजा शांति आखेट को गया। उसकी कन्या तथा कुछ सेना भी साथ थी। उस कन्या ने उसी मिट्टी के ढेर (बलमीक) में कुछ चमकती सी वस्तु देख के कौतुकवंश उसमें लकड़ी खोद दी। उसमें से रुधिर निकल आया। लड़की बहुत डरी और चुपचाप अपनी सेना में भाग आई॥ मुनि के उद्वेग पाने से, राजा तथा उसके सब साथियों का अ- पान वायु रुक गया। इस प्रकार से सबको अतिकष्ट होने के कारण को, बुद्धिमान् राजा ने यह ठीक ठीक अनुमान कर लिया कि “किसी ने यहां के किसी तपस्वी का कोई अपराध अवश्य कियाहै" तब राजा इसकी पूछ जांच करने लगा ॥ राजकन्या ने विनय किया कि "पिताजी ! मुझ बालिका की अज्ञता से एक तपस्वी के नेत्रों में लकड़ी चुभ गई है। मुझे उसका बड़ा ही पश्चात्ताप तथा भय है।" श्रीमुनिजी की सेवा [उस कन्या को साथ लिये] जाके,नृपति ने, स्तुति प्रार्थना की । मुनि प्रसन्न हुए । श्रीराम कृपा से सबका कष्ट जाता रहा। राजा, मुनि महाराज को वह कन्यादान कर, अपनी राजधानी श्रीअयोध्याजी में लौट आए । स्वपत्नी के तोषार्थ,श्रीच्यवन ऋषीजी हरिकृपा से अश्विनीकुमार की सहायता से युवा अवस्था को प्राप्त हो, विषय भोग करने लगे। यद्यपि मुनिजी शरीर से तो इतने बड़े भोगी थे, तथापि वास्तव में मनके निदोष और परम यिरत ही थे, क्योंकि भोगाभोग सुख दुःख से निर्द्वन्द्व थे॥ श्लो० "सुखदुःखे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयो । Rece-CAMERASANCCARRHECHNICAadharnamics निॐॐॐॐ २२० श्रीभक्तमाल सटीक। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥१॥" दो० "तुलसी" सीताराम-पद, लगा रहै जो नेह । तो घर घट बन बाट में, कहूं रहै किन देह ॥ सवैया । "श्रीणरु पुष्ट शरीर को धर्म जो शीतड्ड उपण जरामृत ठाने । भूख तृषा गुण प्राण को व्यापत शोकरु मोहहु भय मन आने ॥ बुद्धि विचार करै निशि वासर चित्त चितेसे अहं अभिमान । सर्वकोप्रेरक सर्वको साक्षिजु "सुन्दर"आपकोन्यारोहिजाने॥१॥" "एकही कूप ते नीरहि सींचत ईख अफीमहि अम्ब अनारा । होत वही जलस्वाद अनेकनि मिष्ट कटूकनि खट्टक खारा ॥ त्याहिं उपाधि सँयोगते आतम दीसत आय मिल्यो सविकारा। कादिलिय सुबिबेक बिचार सौ“सुन्दर" शुद्धस्वरूप है न्यारा॥२॥" भगवत्कृपा से दम्पति भगवद्भजनसे न चूके वरंच भजन प्रभाव से भगवद्धाम को गये। चौपाई। रघुपति चरण प्रीति अति जिनहीं । विषयभोग वश करै कि तिनहीं॥ ( १२८) गुरुवर्य श्रीवशिष्ठजी। "बड़ वशिष्ठ सम को जग माहीं ॥" मुनीश्वर अनन्त श्रीवशिष्ठजी महाराज श्रीब्रह्माजी के पुत्र, श्री- रघुकुल के गुरु हैं। आप प्रायः सब शास्त्रों के आचर्य हैं। स्वर्ग और भूमि के बीच आकाश में बहुत दिन स्थित रहके आपने युगुल सरकार का भजन किया है। "सो गुलाई विधिगति जिन वेंकी।" अपने भजनप्रभाव से एक दूसरे ब्रह्माण्ड में जाके वहां के ब्रह्माजी से मिले हैं। उपदेश आदि के लिये आप कई शरीर धारण किये हुए कई स्थान पर रहते हैं; जैसे, (१) ब्रह्मलोक में; (२) धर्मराज की सभा और (३)श्रीअवधमें। (१) "सप्तऋषियोंमें भी आप हैं। इत्यादि। CHECAREER R-नॐॐ भक्तिसुधास्वाद तिलक। श्रीविश्वामित्रजी अपार तप करनेपर भी "ब्रह्मर्षि"तो तब हुए,कि जब आप (भगवान् श्री१०८ वशिष्ठजी) ने उनको "ब्रह्मर्षि कहा। परमाचार्य जगद्गुरु महर्षि श्री १०८ वशिष्ठजी महाराजकी,तथा अ. पनेर श्रीगुरु महाराज की,महिमाको जो विचार सो परम बड़भागीहै।। कवित्त । "जग में न कोऊ हितकारी गुरुदेव सों। वूड़त भवसागर में आय के वधावैधीर पारहू लगाय देत नाव को ज्यों खेव सोंगपरउपकारी सब जीवनके सारे काज कवहूँ न आवै जाके गुणन को छेव सों ॥ वचन सुनायकर भ्रम सब दूरि करें "सुन्दर' दिखाय देत अलख अभेव सों । औरहू सुनेहि हम नीके करि देखे शोधि जगमें न कोऊ हितकारी गुरुदेव सों ॥१॥" गुरुकी तो महिमा है अधिक गोविंदते ॥ गोविंदके किये जीव जात हैं रसातल को गुरु उपदेशै सोतो छूटै यमफंदते । गोविंद के किये जीव वशपरे कर्मनके गुरु के निवाज सूं तो फिरत सुछंदते ॥ गोविंद के किये जीव चूड़त भवसागर में “सुन्दर" कहत गुरु काढ़े दुखवंदते । कहांलो बनाय कछु मुखते कहूं जू और, गुरु की तो महिमा है अधिक गोविंदते॥२॥" दो० "श्रीवशिष्ठ मुनिनाथ यश, कहाँ कवन मुँह लाय । जिन्हें स्वयं श्रीराम ही, लीन्हों गुरू बनाय ॥१॥" चौपाई। "राम!सुनहु" मुनि कहकरजोरी। "कृपासिंधु ! विनती कछु मोरी॥ महिमा अमित वेद नहिं जाना । मैं केहि भांति कहउँ भगवाना! ॥ उपरोहिती कर्म अति मन्दा । वेद पुराण स्मृति कर निन्दा ॥ जब न लेउँ मैं तव विधि मोही। कहा “लाभ आगे सुत ! तोही ॥ परमातमा ब्रह्म नर रूपा । होइहि रघुकुलभूषन भूपा" ॥" दो० "तब मैं हृदय विचारा, जोग जज्ञ व्रत दान । जाकह करिय सो पदहउँ, धर्म न यहि सम भान ॥" चौगाई। "तवपद पंकज प्रीति निरन्तर । सव साधन कर यह फल सुन्दर ॥ SSESAR RE C । વિરુછવડ ६२२२ श्रीभक्तमाल सटीक। दक्ष सकल लच्छनजुत सोई । जाके पदसरोज - रति होई ॥ दो० नाथ ! एक घर मांगउँ, राम ! कृपा करि देहु। 'जनम जनमप्रभुपदकमल, कबहुँघटइ जनि नेहु' ।" चौपाई। अस कहि मुनि वशिष्ठ गृह आये । कृपासिंधु के मन अति भाये ।। (१२६) श्रीसौभरिजी। श्रीसोभरिजी की कुछ कथा,श्रीमान्धाताजी की कथा के अन्तर्गत पाचुकी है। श्रीसोभरिजी को जल में मछलियों का विलास देख के विषय- वासना हुई । श्रीमान्धाताजी की कन्याओं को तपवल से अपना युवा स्वरूप दिखा के प्रसन्न कर उनके पितासे मांग लिया और अपने तप प्रभाव से बड़ा विभव रचके उन पचासों सहित वास किया । बहुत दिन भोग-विलास करने पर मोहनिशा से नींद टूटी और श्रीरामकृपा से तव मुनिजी महाराज पश्चात्ताप करने तथा सोचने विचारने लगे कि- चौपाई.। "जप तप नेम जलाशय भारी । है ग्रीपम सोखै सब नारी।" दो० " दीपशिखा सम युवतिजन, मन जनि होसि पतंग ॥ भजास राम तजि काम मद, करसि सदा सतसंग ॥". सौथा। "हे तृष्णा ! अब तो करि तोषा ॥ बाद वृथाभटकै निशि बासर दूरि कियो कवहूं नहिं धोषा । तू हतियारिनि पापिनि कोदिनि सांच कहूं मतिमानहिं रोपा॥ तोहिं मिले तबते भयो बंधन तू मरि है तवहीं होय मोपा। "सुन्दर"और कहा कहिये त्वहिं हेतृष्णा! अबतौ करितोषin१॥" "हे तृष्णा ! त्वहिं नेक न लाजा ॥ तूही भ्रमाय प्रदेश पठावत वूड़तजाय समुद्र जहाजा। तूही भ्रमाय पहाड़ चढ़ावत वाद वृथा मरिजाय अकाजा ॥..

२२३ A मन REAST भक्रिसुधास्वाद तिलक। तैं सब लोक नवाय भली विधि भांड़ किये सब रंकहु राजा। "सुन्दर"एतो दुखाय कहाँ अव हेतृष्णा त्वहिं नेक न लाजा॥२॥" "भौंह कमान सयान सुठान जो नारि बिलोकनि वाण ते चांचे। कोप कृसानु गुमान अवा घट जे जिनके सन आंच न आँचै ॥ लोभ सबै नट के वश है, कपि ज्यों जग में बहु नाच न नांचै। नीके हैं साधु सबै, "तुलसी,"पैतेई रघुवीर के सेवक सांचे ॥३॥" . पद। अबलो नसानी सो अव न नसे हो ॥ इत्यादि । इनकी उन स्त्रियों को भी विराग उत्पन्न हुआ; श्रीसीतरामजी का भजन करके आपने और उन सबकी सपने परमधाम पाया। (१३०) श्रीकईमजी। श्रीकर्दमजी श्रीब्रह्माजी की छाया से प्रगट हुए । श्रीब्रह्माजी ने सृष्टि की आज्ञा दी, पर इनको इनके तीव्र वैराग्य ने गृहस्थाश्रम अंगीकार करने न दिया । और वे वन में जाकर तप करने लगे। प्रभु ने दर्शन दिये ॥ चौपाई। "रामचरण पंकज जव देखे । तब निज जन्म सफल करि लेखे" प्रभुने आज्ञा की कि "परसों स्वायम्भूमनु तुम्हारे पास आकर अपनी लड़की देवहूती तुम्हें देंगे; स्वीकार कर लेना ॥ चौपाई। "ताके में लेहौं अवतारा । करिही योग ज्ञान परचारा ॥" श्रीदेवहूतीजी की सेवा से प्रसन्न होकर, आप (श्रीकदमजीने) विश्वकर्मा से एक विमान बनवाया तथा श्रीदेवहूतिजी की सेवा के अर्थ सहस्र सुन्दरियां भी प्रगट की। सब समेत विमान में उसके भोग विलास करते लोकों में विचरने लगे। श्रीदेवहूतीजी को अति सुख दिया। दो० "धर्मशील हरिजनन के, दिन सुख संयुत जाहि। सदासुखीअति मीनगण, जिमि अगाध जल माहि ॥" CHECRUCIASCAMGARGOLICRORSCRS . २२४ श्रीभक्तमाल सटीक । दम्पति से श्रीकपिन भगवान् ने अवतार लिया; और ६ (नब) लड़कियां भी हुई । जिनका विवाह श्रीब्रह्माजी के ६ (नव ) बेटों से हुआ--- १ श्रीअरुन्धतीजी से श्रीवशिष्ठ | ५ श्रीहवी, पुलस्त्यजी; जी महाराज का; ६ श्रीगति, पुलहजी; २ श्रीकला, मारीचिजी; ७ श्रीक्रिया, ऋतुजी; ३ श्रीअनुसूया, अत्रिजी; ८श्रीख्याति, भृगुजी; ४ श्रीश्रद्धा, अङ्गिराजी; श्रीशान्ति, अर्थवनजी॥ श्रीकईमजी, अपनी धर्मपत्नी देवहूतीजी को यह आशिष देकर कि "भगवान् श्रीकपिलदेव (तुम्हारे पुत्र) अपनी माता का (तुम्हारा) भवबन्धन छुड़ावेंगे", आप परम विरक्त हो, वन में जा, भगवत्वरण कमल के परम अनुरक्त हुए। (१३१)( १३२) श्रीअत्रिजीः श्रीअनुसूयाजी। श्रीअत्रिजी श्रीब्रह्माजी के 'पुत्र हैं । आपने अपनी धर्मपत्नी श्रीअनुसयाजी सहित महेन्द्राचलपर (श्रीचित्रकूट ) में तप किया। आप निज तपबलसे श्रीसुरसरिधार मन्दाकिनीजी, पयसरनीजी को लाई। श्रीअत्रिजी ने चाहा कि जगदीश मेरे पुत्र हों । हरिने विधि हर युत कृपा करके दर्शन तथा वरदान दिया कि “बहुत अच्छा, श्री- नुसूयाजी के गर्भ से हमतीनों के अंशावतार होंगे" । सो वैसाही हुआ, अर्थात्- १ श्रीविष्णु भगवान् के अंश से "दत्तात्रेयजी;" २ श्रीब्रह्माजी के अंश से "चन्द्रमा" मुनिजी; ३ और रुद्रांश से श्रीदुर्वासाजी ॥ श्रीअनुसूयाजी और श्रीअत्रिजी को अभिलाषा हुई कि श्री- सीतारामजी के दर्शन पाऊं। लाल लाडले श्रीलखनजी सहित भक्तवत्सल श्रीसीतारामजी ने or CRICALCOHDCA ॐRSHA भक्तिसुधास्वाद तिलक। २२५ आपके आश्रम पर जा दर्शन दिये । और पातिव्रतधर्म श्री "राम चरितमानस" से सब प्रेमियों को विदित ही है। (१३३) श्रीगर्गजी। श्रीगर्गाचार्यजी ने बड़ा तप किया । बहुतों को विद्या पढ़ाई । यदुवंश के पुरोहित और श्रीकृष्ण भगवान् के गुरु हैं । श्रीगर्गसंहिता में श्रीकृष्ण भगवान् के अति मनोहर चरित लिखे हैं। "गर्गसंहिता" विख्यात ग्रन्थ है। (१३४) श्रीगौतमजी। श्रीसरयू के तट पर जहां, (गोदना सेमरिया), कार्तिक पूनो को बहुत सन्त और लोग एकटे होते हैं और अहल्याजी की सुन्दर मूर्ति है, वही श्रीगौतमजी का आश्रम है। आप "न्यायशास्त्र" के आचार्य हैं। गुणवती आदरणीया सुशीला परमसुन्दरी श्रीअहल्याजी "पंच. कन्याओं" ( १ अहल्या; २ द्रौपदी; ३ तारा; ४ कुन्ती; ५ मन्दोदरी) में से, प्रसिद्ध हैं ही; बहुतों ने आपकी चाह की तब श्रीब्रह्माजी ने आज्ञा दी कि “जो एक दण्ड (२४ मिनिट) भर में त्रिभुवन की परिक्रमा कर आवे उसीको यह कन्या दी जावै ॥" श्रीगौतमजी की सालिग्रामजी में अलौकिक निष्ठा थी; उनके सालग्रामजी ने आज्ञा की कि तू मेरी प्रदक्षिणा कर ले; इन्होंने ऐसा ही किया। इन्द्रादि जो अपने अपने वाहन ऐरावतादि पर सहर्ष चले थे, सबने अपने अपने आगेही श्रीगौतमजी को जाते हुए देखा और सबने उनका अग्रगम्य होना स्वीकार किया। इन्द्रादि हाथ मलते रह गए, और श्रीगौतमजी का विवाह श्रीअहल्याजी से हो गया।श्रीगौतमजी की कृपा से श्रीअहल्याजी को प्रभुने दर्शन दिया। एक समय बड़े दुःकाल में पंचवटी से भाग के मुनिवृन्द श्रीगो- तमजी के आश्रम में श्राए । तपबल से आप सबका आतिथ्य और बहुत सत्कार करते रहे। .

SAGRONE श्रीभक्तमाल सटीका २२६ आपके ही पुत्र महामुनि श्रीशतानन्दजी महाराज हैं, कि जो परमपुनीत श्रीनिमिवंश के गुरु हैं। (१३५) परमहंस श्रीशुकदेवजी। श्रीव्यासपुत्र अर्थात् परमहंस श्रीशुकदेवजी की कथा देखिये । गऊ के दूध दुहने में प्रायः जितना काल लगता है, आप उससे अधिक काल पर्यन्त एक समय कहीं नहीं विलम्बते (रुकते) हैं। आप अमर हैं। आपने श्रीमद्भागवत सुनाके एक ही सप्ताह में भाग्यवान् राजा परीक्षित को परमपद को पहुंचा दिया। नंगी स्नान करनेवाली स्त्रियों ने आपको 'परमहंस' कहा और समझा और श्रीव्यासजीसे लज्जा का वर्ताव किया।आपने पत्ते पत्ते से 'शुकोह' 'शुकोह' कहला दियाथा॥ (१३६) श्रीलोमशजी। श्रीलोमशजी के आयु की दीर्घता प्रख्यात ही है । श्रीलोमशजी यमुनाजी के तट पर तप कर रहेथे, श्रीकृष्ण भगवान् का बालचरित देख के भ्रमवश हुए कि "ये परमेश्वर कैसे कहे जाते हैं?" अतःहरि ने उनको अपने श्वास से खींच कर अपने में अनेक ब्रह्माण्ड तथा अनेक लोमश और बहुत से अद्भुत चरित्र दिखाए, जिसे कल्पान्त पर्यन्त देखते देखते ये अति घवरांए, व्याकुल हुए; तब कृपासिन्धु ने इनको श्वास ही द्वारा वाहर कर दिया। इनको वे कई कल्पान्त केवल एक क्षण मात्र सरीखे जान पड़े ॥ भ्रम से छूट प्रभु की स्तुति की; भनि वरदान लिया। इन्होंने भगवत् की माया देखनी चाही, और श्रीमन्नारायण से अपना मनोरथ निवेदन किया।भगवत् की इच्छा से प्रलयादि देखा; जब वहुत विकलहुए,हरिने माया अलग की। तब इन्होंने ज्यों का त्यों अपने को पाया और सब अद्भुत चरित्र को एक क्षणमात्र का खेल जाना।बड़ी स्तुति की। “चिरंजीवी मुनि" यह नाम और वर पाया। एक समय अपने चिरंजीवित्व वा दीर्घायुता से अकुला कर इन्हों ने अपनी मृत्यु भगवान् से मांगा। प्रभु ने उत्तर दिया कि "यदि जल ब्रह्म की वा ब्राह्मण की निन्दा करो तो उस महापातक से मर- CHECORRECEIGNSCIOGRESEcokes ।

२२७ मन भक्तिसुधास्वाद तिलक। सकते हो।" इन्होंने कहा कि श्राश्रम में जाता हूं वहां पहुँच कर ऐसा ही करूंगा। मार्ग में भगवत् इच्छा से इन्होंने थोड़ा सा जल देखा जिसमें शकर के लोटने से अतिशय मलीनता आ गई थी, और एक स्त्री भी देखी जिसके गोद में दो वालक थे। इनके देखते ही देखते उसने पहिले एक बालक को दूध पिलाया फिर अपना स्तन धोकर तब दूसरे बच्चे को । लोमशजी ने इसका कारण पूछा; उसने कहा कि "यह एक पुत्र तो ब्राह्मण के तेज से है, और वह दूसरा दुसाध [नीच जाति ] से अर्थात् मेरे पति से जन्मा है; अतएव ब्राह्मणोद्भव को धोए स्तन का दूध पिलाया है।" श्रीलोमश मुनिजी का नियम था कि ब्राह्मण का चरणोदक नित्य अवश्य लेतेथे। दूसरा जल वा दूसरा ब्राह्मण वहां मिला नहीं; मुनि महाराज ने उसी जल से उसी ब्रह्मवीर्य-से-उत्पन्न वालक का चरणामृत ले लिया। उसी देशकाल में, प्रभु प्रगट हो वोले कि "तुमने जब ऐसे जल को भी आदर दिया और ऐसे ब्राह्मण के चरणसरोज की भी भक्ति की, तो तुम जल वा विप्र के निन्दक कव हो सकते हो ? मैं तुमसे अति प्रसन्न हूं और आशीस देता हूं कि विप्रप्रसाद से तुम 'चिरंजीव' ही बने रहोगे ।" चौपाई। "जे नर विप्ररेणु शिर धरहीं। ते जनु सकल विभव वश करहीं।" रे मन ! आजकल के एक प्रकार के बुद्धिमानों की बातें न सुन, नहीं तो ब्राह्मणों के चरणरज की यह महिमा तुझे भूल ही जावेगी "हरितोषक व्रत द्विज सेवकाई"। चौपाई। "पुण्य एक जग महँ, नहिं दूजा। मन क्रम बचन विष पदपूजा m (१३७) श्रीऋचीकजी। भृगुवंशी श्रीऋचीकजी" नेश्रीगाधिजीसे उनकीसुता(श्रीविश्वा- मित्रजी की बहिनि)श्री "सत्यवती"जी को माँगा। उन्होंने विचारा कि 'कन्या तो छोटी है और मुनि बूढ़े हैं परन्तु सीधे २ "नहीं" ASS ALGERSALARSCIRCRY २२८ श्रीभकमाल सटीक। कहने में मुनि के क्रोध का भय है; अतः उन्होंने इनसे कहा कि “यदि आप १००० [एक सहल] श्यामकर्ण घोड़े लाइये तो मैं आपको अपनी कन्या दूं"। वह इस बात को असम्भव जानते थे । पर, मुनि ने "श्रीवरुणजी" से मांग के सहस्र श्यामकर्ण घोड़े विना प्रयास उनके सामने प्रस्तुत करदिये; तब तो उन्हें लड़की देनी ही पड़ी।मुनिजी श्रीसत्यवती सी धर्मपत्नी पा अतीव प्रसन्न हुए । अपनी सास (श्रीगाधिजी की स्त्री) की, तथा अपनी धर्मपत्नी की प्रार्थना से, आपने दोनों को क्षीरान मन्त्रित करके दिया, कि जिसमें उनकी प्रिया को ब्राह्मण और उनकी सास को क्षत्री प्रसव हो । परन्तु ईश्वर की इच्छा से मां बेटी ने अपना अपना भाग क्षीरान पलट दिया।आपने यह बात जानली और अपनी स्त्री से कहा कि तुमने अयोग्य कार्य किया, अब तुम्हारे सतोगुणी पुत्र नहीं होगा किन्तु राजस-तामस-प्रकृति का होगा। पुनः श्रीसत्यवतीजी की प्रार्थना के अनुरूप आपने यह वर दिया कि "अच्छा, पुत्र तो राम कृपा से समदर्शी परन्तु पौत्र बड़ा क्रोधी होगा।" इसी आशीर्वादसे पुत्र तो श्रीसीताराम कृपा से श्रीयमदग्नि जी तरिस किन्तु पौत्र परशुरामजी सरीखे हुए; तथा गाधिजी के पुत्र श्रीविश्वामित्रजी इव । अस्तु ॥ श्रीऋचीक मुनिजी बड़े प्रभावशाली और भगवद्भक्त थेां आपके समागम से गाधिजी भी हरिभक्त हो गए। सबैया। "संतनको जु प्रभाव है ऐसो॥ जो कोउ श्रावत है उनके ढिग ताहि सुनावत शब्द संदेसो । ताहिको तेसही औषध लावत जाहि को रोगहि जानत जैसो॥ कर्मकलं कहि काटत हैं सब शुद्ध करें पुनि कंचन पैसो। सुन्दर तत्व विचारत हैं नित संतन को प्रभाव है ऐसो॥" (१३८) श्रीभृगुजी। श्रीभृगुपिजी श्रीनारदजी के उपदेश से बड़े भगवद्भन हुए। ये GACASCARECRUCI SARASHRESONSINE भक्निसुधास्वाद तिलक। २२६ बहुत सी विद्याओं के आचार्य हैं । इन्होंने परीक्षा के अर्थ भगवान् की छाती में लात मारकर ब्राह्मणों की महिमा और भगवत् का अपार सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मण्यदेवत्व यश प्रगट किया है । प्रभु ने इनको त्रिकालदर्शी ऐसा आशीस दिया है । श्रीभृगुजी का माहात्म्य प्रगट ही है कि-. श्लो० "महर्षीणां भृगुरहं, गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोस्मि स्थावराणां हिमालयः॥१॥" श्रीगीताजी में भगवत् ने श्रीमुख से कहा है कि 'मैं महर्षियों में "भृगु" हूँ; शब्दों में एकाक्षरी मंत्र ॐ और रां हूं; यज्ञों में जपयज्ञ हूं; और पहाड़ों में गिरिराजहिमालय हूं।' आपका भृगुसंहिता प्रसिद्ध है परंतु पंडितों ने अगणित क्षेप बढ़ाकर बहुत बड़ा और कुछ अ- नादर का कारण बना दिया है। (१३६) श्रीदालभ्यजी। विप्रवर श्रीदालभ्यजी ने भगवान् श्रीदत्तात्रेयजी के उपदेश से श्रीसीतारामजी का भजन किया। प्रभुने दर्शन दिया। हरि आशिष से दालभ्य संहिता दैहिक दैविक भौतिक तीनों तापों को छुड़ाने- वाली और सर्वकार्य सिद्ध करनेवाली है। (१४०) श्रीअङ्गिराजी। श्रीअङ्गिराजी ने श्रीनारदजी के उपदेश से वासुदेव भगवान् की पूजा की । इनके बृहस्पतिजी पुत्र हुए, जिनको अपनी जगह पर समझ के, भगवत् का ध्यान करते हुए आपने भगवद्धाम पाया ॥ (१४१) श्रीऋषिशृङ्गजी। श्रीऋषिशृङ्गजी श्रीविभाण्डकमुनि के पुत्र हैं। इन्होंने अपने पिता से विद्या पढ़ी। ये नित्य विपिन ही में रहा करते थे, ग्राम पुरी नगर को स्वप्न में भी नहीं देखा था। बड़ेही वैराग्यवान् थे। चंग देश से पश्चिम जो देश (जिसमें विहार)है उसकोही "अङ्ग" देश कहते हैं; उसकी राजधानी अभी तक पटना नगर है । वहां के ACANCECRECICRORESCARBAR २३० श्रीभक्रमाल सटीक। राजा "श्रीरोमपाद" जी थे, उनमें और चक्रवर्ती महाराजाधिराज अवधेश श्रीदशरथजी में परस्पर बड़ी मित्रता थी। श्रीरोमपादजी की कन्या श्रीशान्ताजी थी, जो प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की भगिनी (वहिन) प्रसिद्ध है। अस्तु । अङ्गन्देश में दुःकाल पड़ा; ज्योतिषियों ने बताया कि यदि श्रीचङ्गी- ऋषिजी आवै तो यह महा अवर्षण मिटे, जल चरसे ॥ निदान वेश्याओं ने बड़ी युक्ति की और वन से आपको पटने लाई। दुर्भिक्ष मिटगया। और विभाण्डक मुनिके भय से श्रीरोमपाद जी ने अपनी कन्या का विवाह श्रीभागीऋषिजी से कर दिया। और इस प्रकार इनके पिता को प्रसन्न किया। जब श्रीचक्रवर्ती महाराज को वंश न होने से खेद हुमा, तो- चौपाई। श्रृंगी ऋपिहिं बशिष्ठ बुलावा । पुत्र काम सुभ यज्ञ करावा ॥ तब, दो० विप्र धेनु सुर सन्त हित, लीन्ह मनुज अवतार । निज इच्छा निर्मित तनु, मायागुनगो पार ॥" (१४२) श्रीमाण्डव्यजी। श्रीमाण्डव्य मुनि श्रीभगवत् के अनुराग में रंगे प्रेम में मग्न ध्यान समधि में थे, उनकी कुटी के पासही चोर सब चोरी के द्रव्य को बांट रहे थे। राजा सुकेतु के भट वहां पहुंचे, एक चोरने फुर्ती से एक मणिमाला मुनिके गले में छोड़ दी। भटों ने मुनि समेत कई चोरों को पकड़, न्याय कर्ता तथा राजा की आज्ञा से सबके सबको शूली पर चढ़ा दिया। मुनि हरिस्मरण में मग्न थे इसकी कुछ सुधि न हुई। सब चोर मर गए,पर मुनि की फांसी तीन वेर टूट २ गई। राजाने, "एक चोर का मुनि के वेष में होना तथा शूली पर चढ़ के भी उसका जीते ही बचना" सुनके, उसको अपने सामने लाने की आज्ञा दी चोर के भ्रम में, वा कर्मचारियों के अत्याचार में, अथवा पूर्वकर्म के फन्दे में पड़े हुए श्रीमाण्डव्यजी, राजा के सामने लाये गए ॥ * श्लो० श्रीमान् दशरथो राजा शान्ता नाम व्यजीजनत् । अपत्यहातिका राक्षे लोम- Sstickerscootkick , पदाय यां ददौ . 5436 भनिसुधास्वाद तिलक । २३१ मुनिजी को पहिचान, थर थर कांपता हुआ राजा सिंहासन से उठ शीघ्र आपके पदपंकज पर शीस धर हाथ जोड़ सजल नयन हो अपराध की क्षमा मांगने लगा। महामुनि ने धीरे से कहा कि “राजा! तेरा कुछ दोष नहीं; यह यमराज की चूक है; मैं अभी जाके इसका उत्तर उससे ही पूछता हूं।" मुनि के क्रोध से डर यमराज ने हाथ जोड़ कहा कि "मुनिनाथ ! यह आपके पूर्वजन्म की वाल अवस्था के दोष का फल था, कारण जो आपने एक पतंगे (फरपुंदे) के शरीर में नीचे से ऊपर तक एक कांटा छेद दिया था।" आप वोले "रे मुर्ख ! अज्ञान वालक को भी तूने न छोड़ा, जिसका दोष धर्मशास्त्र भी ग्रहण नहीं करता।जा, शूद्र की योनि में जन्म ले, दासी पुत्र हो।" वही श्रीयमराजजी श्रीविदुरजी बड़े भगवद्भभक्न हुए “मुनि शाप जो दीन्हा अति भल कीन्हा ।" श्रीमाण्डव्य मुनि भगवद्भजन कर,शरीर तज, परमधामको गए॥, (१४३) श्रीविश्वामित्रजी। श्रीविश्वामित्रजी राजा थे, राजा गाधि के पुत्र । एक बेर राजा विश्वामित्र नगर ग्राम देखते वन में गए। मुनीश्वर श्रीवशिष्ठजी का आश्रम देखा । वहां इनकी सेना सहित सारा सत्कार और पहुनई । यह नन्दिनी वा सवला नाम गऊ का प्रताप जानकर राजा ने गऊमागी, पर ब्रह्मर्षि शिरोमणि ने नहीं कर दी। राजाने युद्ध कियां। परन्तु, यद्यपि उसकी बड़ी भारी सेनाथी तथापि राजा जीत न सका, पराजय पाया। तब ब्रह्मर्षिकी महिमा*समझ उसने चाहा कि ब्राह्मण *गी ऋपि का यश देखिये- कानपुर के जिले में बल्हौर स्टेशन से मकनपुर को जाना होता है, उसी मएडन में "श्रीरामपुर" ग्राम ऐसी प्ररयाति है कि मकनपुर "विभाएडक मृपि" का स्थान है उसमें लोग यह प्रमा. णित करते हैं कि जब राजा के कर्मचारियों से प्रेरित वेश्यायें बड़ी नौका पर श्रारूद हो मधुर गाग नृत्य करती हुई बाजे के साथ यहाँ ना पहुँची, उस समय श्रीविभाएडक जी कहीं दूर जाने के लिये अपने पुत्र के सर्वोपद्रव से रक्षार्थ एक मेहरा० खींचकर- चले गये थे। धीरे २ गङ्गा तट पर नाय श्रान पहुँची। शृङ्गीऋषि जी मधुर अपूर्व गान -- ******** २३२ श्रीभक्तमाल सटीक। बनूं; इसलिये अपार तप किया; और अन्त को,श्रीवशिष्ठजी महाराज की कृपा ले, श्रीविधिजी से विश्वामित्रजी "ब्रह्मर्पि" पद पाके बहुत प्रसन्न हुए। श्रीविश्वामित्रजी को अव यह लालसा वाढी कि- "सियपियपद सरोज जब देखो। सुकृत समूह सफल तव लेखौं॥" इस मनोरथ से यज्ञ करने लगे, पर ताड़का राक्षसी और उसके पुत्र सुबाहु आदि ने उपद्रव और उत्पात करना प्रारंभ किया। चौपाई। "तब मुनिवर मन कीन्ह विचारा । प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा ॥ यहि मिस देखहुँ प्रभुपद जाई । करिविनती आनउंदोउभाई ॥" सो० "पुरुप सिंह दोउ वीर, हरपि चले मुनिभय हरन । कृपासिन्धु मतिधीर, अखिल विश्वकारन करन ॥" प्रभु ने आपसे अस्त्रादि विद्या पढ़ी, और आपको अनन्त श्रीगुरु वशिष्ठजी सम आदर दिया । जय, जय ॥ श्रीविश्वामित्रजी की स्तुति और क्या की जावे ? इससे इति है कि सुनकर मेरे को उल्लंघन करके देखने चलाधीशृङ्गीऋपिजी तो स्त्री जाति पुंजाति का भेद ही नहीं जानते थे, तट पर जाफर पड़े २ गान सुनते रहे । रस भांति नीम दिन जाने श्राते रहे । नौका पर लगे गमलों के वृक्षों के फल की जगह लड्डू लटकाये गये थे एक घेश्या ने उसमें से कुछ फल लेकर ऋषि को भेंट किया और कहा कि हमारे देश के ये फल हैं, ऋषि ने खाकर अपने स्थान के भी फल उन्हें उपहार किये । चौथे दिन एक वेश्या ने कहा कि हमारे देश की यह रीति है कि अपने प्रेमियों से प्रेमी लोग भेटते शृङ्गो जी तो कुछ जानतेही न थे, आलिङ्गन के साथही कुछ ऋपि का चित्त उस ओर खिंच गया, तद्नन्तर वे नौका पर भी गान सुनने जाने लगे एक दिन ऋषि को राग सुनने में मग्न देख शो नौका छोड़ दी गई परंच ऋषिको नौका के भीतर न जान पड़ा कि हम कहीं जाते हैं क्योंकि कभी उन्होंने नौका देसी न थी । स्वस्थान में जय नाय कई दिनों के पीछे था गई, तर ऋपि लोग शृङ्गीजी को, लेन गये, फिर अवर्पण मिटा-धागे की कथा तो विख्यातही है- उसी विभाएडक के मेडरा ० के स्थान में स्त्री जाने से भस्म होजाती थी इस चम. कार को देख मुसल्मानों ने स्वराज्य के समय उस पर अधिकार कर लिया। भयभी स्त्री जाति मान को भीतर जाने की आशा नहीं है, अद्यापि वहां यहा मेला लगता है परन्तु मेला दूसरेही अभिप्राय से होता है, वाणिज्य विशेष होता है। SOCIRECORRECR-SCRECRescri .

भक्तिसुधास्वाद तिलक। २३३ चौपाई। . "जिन्हके चरन सरोरुहु लागी। करत विविध जप जोग विरागी॥ तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते । गुरुपद कमल पलोटत प्रीते ॥" (१४४) श्रीदुर्वासाजी। श्रीअत्रिजी की कथा लिखी जा चुकी है कि श्रीदुर्वासाजी उनके पुत्र और रुद्र के अवतार हैं । श्रीब्रह्माजी प्रायः इन्हीं के द्वारा, लोगों को शाप दिलाया करते थे। इनकी कथा पुराणों में बहुत है । समर्थ की ईर्षा कौन कर सकता है ? भगवत् के जितने काम हैं वे गूढ़ हैं उनका भेद जानना कठिन है। श्रीअम्बरीषजी के तथा श्रीद्रौपदीजी के सुयश के प्रसङ्ग में कुछ इनकी चरचा इस ग्रंथ में भी होचुकी है । साठ सहस्त्र वर्ष तप किया, पूरे होने पर श्रीनन्दजी के घर आए; माता श्रीयशोमतिजी ने प्रेमसे अति उत्तम दधि; जिसमें से भगवत् को पवाया था, आपको भी पवाया । श्रीदुर्वासाजी ने, अति प्रसन्न होकर, उनको "गोपालकवच" पढ़ा दिया और वरदान दिया कि इस कवच को जो पढ़ेगा वा इससे जिसको झार देगा सो तीनों तापों से बचेगा॥ (१४५) श्रीयाज्ञवल्क्यजी। आप बड़े प्रतापी मुनि हैं । आपने पहिले श्रीसूर्यनारायण से विद्या पढ़ी। किसी कारण से सूर्य भगवान् अप्रसन्न हुए तो इन्हों ने सब विद्या उगल दी (वमन कर दिया)।यह पराक्रम देख प्रसन्न होश्रीरविदेव ने वर दिया कि जो तुमसे वाद विवाद करेगा उसका शीस फट जायगा। कह चुके हैं कि आपने श्रीरामचरितमानस (तथा अद्भुतरामायण) श्रीभरद्वाजजी को सुनाया है। (१४६) श्रीजावालिजी। आप श्रीअवधेशजी के मंत्रियों मे से थे। RECASTORE x , २३४ श्रीभक्तमाल सटीक। (१४७) श्रीयमदग्निजी। श्रीयमदग्नि ऋषि, भक्तिसहित अग्निहोत्र यज्ञ किया करते थे और इनकी स्त्री श्रीरेणुकाजी आपकी सेवा करती थीं। एक दिन, अति अप्रसन्न होके, आपने अपने पुत्र श्रीपरशुरामजी से आज्ञा की कि तू अपनी माता (रेणुका) का, तथा अपने दोनों बड़े भाइयों के, शीस अपने परशु से उतार ले ॥ श्रीपरशुरामजी ने पिता की आज्ञा मान ली॥ दो० "अनुचित उचित विचार तजि, जे पाहिं पितुवैन । ते भाजन सुख सुयश के, वसहिं अमरपति ऐन ॥" आपने बहुत प्रसन्न हो पुत्र से कहा वर माँग । परशुरामजी ने मांगा कि “एक तो इन तीनों को जिला दीजिये, दूसरा यह वरदान दीजिये कि ये तीनों मुझसे सदैव अति प्रसन्न रहा करें । श्रीसीताराम कृपा से ऐसाही हुआ ॥ (१४८) श्रीकश्यपजी। श्रीकश्यपजी श्रीमरीचि मुनि के पुत्र हैं। भगवत् ने आपको दर्शन दे आज्ञा की कि सृष्टि उत्पन्न करो ॥ कश्यपजी से बहुत कुल प्रगट हुए हैं कि जो "कश्यप गोत्र" प्रसिद्ध है। • एक काश्यपी कल्प हुआ था जिसमें सब सृष्टि कश्यपजी से ही हुई थी॥ (१४६ ) श्रीमार्कण्डेयजी। श्रीमार्कण्डेयजी ने प्रभुसे विनय की कि मुझे अपनी माया दिखा- इये । देखा कि जल चाढ़ आया और प्रलय हो गया, सर्वत्र जल- मय, और कहीं कुछ नहीं। अपने को उस जल में इधर उधर वहते डूबते उतराते पाया। अनेक वर्ष पर्यन्त ऐसाही बीतने पर, एक वट-वृक्ष के एक पत्ते पर वालक स्वरूप प्रभु का दर्शन पा, श्वास द्वारा उनके उदर में जा, वहां अनेक अद्भुत देख, पुनि वाहर श्रा, घड़ी स्तुति कर, हरिकृपा से, हरि की उस माया से निकले। + पुत्र हूंगा।" भक्तिसुधास्वाद तिलक । २३५ ( १५०) श्रीमायादर्शजी। कोई कहते हैं कि मायादर्श एक भक्तविशेष का ही नाम है । पर उनका पता तो कहीं चलता मिलता नहीं। बहुतेरे बताते हैं कि मायादर्श श्रीलोमशजी, वा श्रीमार्कण्डेयजी हैं; क्योंकि दोनों ने माया देखी है। इन महात्मा की कथा देखिये ॥ (१५१)श्रीपर्वतजी। "अद्भुत रामायण" में लिखा है कि एक कल्पमें इन्हीं के शाप से श्रीलक्ष्मीनारायणजी ने अवतार लेकर रावण कुम्भकण का वध किया। १५२)श्रीपराशरजी। श्रीब्रह्माजी के पुत्र श्रीवशिष्ठजी उनके पुत्र श्रीशक्तिजी उनके पुत्र श्रीपराशरजी हैं । प्रभु ने दर्शन दे के आज्ञा की कि "मैं तुम्हारा श्रीपराशरजी ही के पुत्र श्रीव्यास भगवान् (पृष्ट ५१) है, जिन्हों नेपुराण वनाए हैं। (१५३)(१८ महापुराण) (११६) छप्पय । (७२४) साधन साध्य सत्रह पुरान, फल रूपी श्रीभागवत ॥ ब्रह्म, विष्णु, शिव, लिङ्ग, पर्दो स्कन्द, विस्तारा । वा- मन, मीन, बराह, अग्नि, कूरमै, ऊदारा ॥ गरुड़, ना- रैदी भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, श्रवण शुचि। मार्कण्डे, ब्रह्मा- एटें, कथा नाना उपजै सचि॥ परम धर्म श्रीमुख क- थित चतुःश्लोकी निगम सत । साधन साध्य सत्रह पुरान, फलरूपी श्रीभागवत ॥ १७॥ ( १९७) वार्तिक तिलक। सत्रही पुराण, साधनरूपं हैं; और अठारहवां पुराण श्रीमद्भाग- SSC " " " " " ॐ* २३६ श्रीभक्तमाल सटीक । वत साध्यफलरूपी है तदन्तर्गत स्वयं श्रीभगवत्मुख कथित परधर्म (भागवत्धर्म) रूप "चतुःश्लोकी भागवत" तो वेदों का सारांशही है। और चे १८ पुराण कैसे हैं कि कोई कोई अति विस्तार हैं, और सब उदार, परम पवित्र, और श्रवण करने से धर्मरुचिउत्पादक वि. चित्र हैं। "श्रीभागवत" सबका सागर, फल, रस और प्राण है जैसा कि श्रीनारदजी ने व्यासजी से कहा ।। (साविक) (तामस) १ विष्णु पु० श्लोक २३००० १३ मत्स्य पु० ,, २नारद पु० २५००० १४ कूर्म पु० ,, १७००० ३ श्रीभागवत १८००० १५ लिङ्ग पु० ४ गरुड़ पु० १६००० १६ शिव पु०* ५ पद्म पु० ५५००० १७ स्कन्द पु० " ८१००० ६ वाराह पु० २४००० १८ अग्नि पु० १५००० १६४००० १६२००० (राजस) सा० १६४००० श्लोक ७ ब्रह्माण्ड पु० " १२००० ८ ब्रह्मवैवर्त पु०, रा० ७४००० श्लोक १८००० ता० १६२००० श्लोक मार्कण्डेय पु०॥ ६५०० १० भविष्य पु०॥ जोड़ ४,००,००० श्लोक १४५०० चार लाख श्लोक ११ वामन पु० " १०००० १२ ब्रह्म पु० १०००० ७४००० *(श्लोक) "वैष्णवं नारदीयश्च,तथा भागवतं शुभम् । गारुड़ञ्च तथा पानं वाराहं शुभदर्शने ॥ १॥ पडेतानि पुराणानि सात्तिकानि मतानि मे । ब्रह्माण्डं ब्रह्मवैवर्त मार्कण्डेयं तथैव च । भविष्य वामनं नामं राजसानि निबोध मे ॥२॥ मात्रा कौम्म तथा लैङ्गं शैवंस्कान्दं तथैव च । आग्ने- यश्च पडेतानि तामसानि निबोध मे ॥३॥ * कोई तो "माहेश्वर" नाम का एक उपपुराण कहते है, "शिव पुराण" नहीं बताते, वरंच २४००० श्लोक का "वायुपुराण" लिपते है । अठारही पुराणों के श्लोफों की गिन्ती चार लास (४००००१) प्रसिद्ध ही है ॥

भक्तिसुधास्वाद तिलक। २३७ (१५४) (अठारह स्मृतियां और उनके १८ कर्ता) (१२०) छप्पय । (७२३) दश आठ स्मृति जिन उच्चरी, तिन पदसरसिज भाल मो॥ मनुस्मृति, अत्रेय,वैष्णवी, हारितक, यामी। याज्ञवल्क्य, अंगिराँ, शनैश्चर, सामर्तक नामीका- त्यायनि, सांखल्य, गौतमी वासिष्ठी दाखी । सुरगुरु, आतातापि (शातातप); पराशर, कर्तुं मुनि भाखी॥ आशा पास उदारधी, परलोक लोक साधन सो।दश आठ स्मृति जिन उच्चरी, तिन पदसरसिज भाल मो॥१८॥ (१६६) वार्तिक तिलक । अठारह स्मृतियां जिन महानुभावों ने कही हैं, उनके चरणकमल मेरे भाल (ललाट) के भूपण हैं; सो वे स्मृतियां कैसी हैं कि आशा रूपी कठिन पाश ( फाँस) के छुड़ाने के लिये उदार बुद्धि देनेवाली और लोक परलोक की साधन रूपा हैं- १ मनुस्मृति, १० कात्यायनस्मृति, २ आत्रेयस्मृति, ११ सांखल्यस्मृति, ३ वैष्णवस्मृति, १२ गौतमस्मृति, ४ हारितस्मृति, १३ वाशिष्ठस्मृति, ५ चाम्यस्मृति, १४ दाक्ष्यस्मृति, ६ याज्ञवल्क्यस्मृति, १५ वाहस्पत्यंस्मृति, ७ आङ्गिरसस्मृति, १६ आतातपस्मृति, ८ शनैश्चरस्मृति, १७ पाराशरस्मृति, ६ सावर्तकस्मृति, १८ ऋतुस्मृति*॥ *नं अठारह के अतिरिक्त और कई प्रसिद्ध स्मृतिया (धमश स्रो) फे नाम- व्यास, श्रापस्तम्ब, श्रोशनश वा उसना (शुक्र), सांडिल्य, भरद्वाज, फाश्यप, शंख, , लिखित, इत्यादि।

, RECASTASHRSITESHEKHARAKHAND २३८ श्रीभकमाल सटीक। वशिष्ठ, हारित, पाराशर, भारद्वाज और काश्यप इत्यादिक कई एक स्मृतियां "सात्त्विकी' कही जाती हैं; आत्रेय, याज्ञवल्क्य, दाक्ष्य, कात्यायनि इत्यादिक "राजस"; एवं गौतम, वार्हस्पत्य, सांवत, याम्य इत्यादिक "तामस" कहलाती हैं। "दस आठ स्मृति जिन उच्चरी” तिन के नाम- १ श्रीमनुजी. १० श्रीकात्यायनजी २ श्रीअत्रिजी ११ श्रीशंखजी ३ श्रीविष्णुजी १२ श्रीगौतमजी ४ श्रीहारीतजी १३ श्रीवशिष्टजी ५ श्रीयमराजजी १४.श्रीदक्षजी ६ श्रीयाज्ञवल्क्यजी १५ श्रीवृहस्पतिजी ७ श्रीअङ्गिराजी १६ श्रीशतातपनी ८ श्रीशनैश्चरजी १७ श्रीपराशरजी श्रीसंवर्तजी १८ श्रीकृतुमुनिजी॥ (१५५) श्रीरामसचिव (मन्त्रिवर्ग)। (१२१) छप्पय । (७२२) पावै भक्ति अनपायिनी,जे रामसचिव सुमिरन करें। धृष्टी, विजय नीतिपर शुचिरं विनीता । राष्टर वर्धन निपुण, सुराष्टर परम पुनीता । अशोक, सदा आनन्द धर्मपालक, तत्ववेत्ता । मंत्रीवर्जसुमंत्र, चतुर्जुग मंत्री जेता* ॥ अनायास रघुपति प्रसन्न, भवसागरदुस्तर त। पावै भक्ति अनपायिनी, जे रामसचिव मुमिरन करें॥ १६॥ (१६५) वार्तिक तिलक। अनन्त श्रीमहाराजाधिराज श्रीरामचन्द्रजी के मन्त्रिवर्गों को, * "चतुर्जुगमन्त्री जेता' चारोंयुगों के भूत वर्तमान भविष्य मंत्रियों को जीनने वाले ॥

WAR****SHREPEAKS भक्तिसुधास्वादं तिलक। २३६ जो भक्तजन प्रभातादिकालों में नित्य स्मरण करते हैं, सो अचल श्रीरामभक्ति पाते हैं और अपने परमभक्त सचिवों के स्मरण करने से श्रीरघुपति अनायास (विन परिश्रम) ही प्रसन्न होते हैं; अतः श्रीप्रभु की प्रसन्नता से दुस्तर संसारसमुद्र को भी तर जाते हैं- श्रीधृष्टिजी, श्रीजयन्तजी, श्रीविजयजी, ये तीनों अतिशय नीतियुक्त परम पवित्र, तथा शिक्षित और नम्र; श्रीराष्ट्रवर्द्धनजी उभय लोक कृत्यों में परम प्रवीण; श्रीसुराष्ट्रजी अतिशय पुनीत; श्रीअशोकजी सदा प्रेमानन्द युक्त श्रीधर्मपालकजी भगवत् तत्वज्ञानी; इन सचिवों में वर्य (परमश्रेष्ठ), अपनी बुद्धिविज्ञता सुनीतियुक्तता से चारों युगों के मन्त्रियों को जीतनेवाले श्रीसुमन्त्रंजी ॥ १ श्रीधृष्टिजी ५ श्रीसुराष्ट्रजी २ श्रीजयन्तजी ६ श्रीअशोकजी ३ श्रीविजयजी ७ श्रीधर्मपालकजी ४ श्रीराष्ट्रवर्द्धनजी ८ श्रीसुमन्त्रजी श्लो० धृष्टिर्जयन्तो विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्द्धनः । * अकोपो धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चाष्टमो महान् ॥ १॥ (श्रीवाल्मीकीय) (१५६) श्रीसुमन्त्रजी। श्री ६ सुमन्त्रजी के विवेक, महा विरह, प्रेम, धैर्य आदिक गुण, श्रीमानसरामचरित से सबको विदित ही हैं। चौाई। "तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी।" मन्त्रि हि राम उठाइ प्रवोधा । “तात ! धरममत सब तुम्ह सोधा ॥" इत्यादि। (१५७) श्रीरामसहचरवर्ग। (१२२) छप्पय । (७२१) शुभदृष्टि दृष्टि मोपर करौ, जे सहचर रघुवीर * पाठभेद्-"अशोको" + कहा जाता है कि मंत्रीवर श्रीसुमंत्री श्रीचित्रगुप्त वंशी थे। SCRE , २४० . श्रीभकमाल सटीक। के ॥ दिनकरसुत, हरिराज, वालिबछ, केशरिऔरतैं। दधिमुखें, दुविद,मयंद, ऋच्छपैति सम, को पौरस ॥ उल्का सुभट, सुपेन, दरीमुखं, कुमुदै, नीले, नले । सर, रु, गैवै , गवाच्छ, पनसँ, गंधमादन, अतिवल ॥ पद्मअठारह यूथपाल,राम काजभट भीरके *।शुभदृष्टि वृष्टि मोपर करौ, जे सहचर रघुबीर के ॥२०॥ (१९४) वार्तिक तिलक। जगद्विजयी श्रीरघुवीर के संग चलनेवाले जो जो सखावर्ग हो, सो आप सब मुझपर कृपा प्रसन्नता युक्न शुभदृष्टि की वर्षा कीजिये। श्रीदिनेशपुर कपिराज श्रीसुग्रीवजी,बालिपुत्र श्रीअंगदजी,श्रीकेशरी- नन्दन हनुमानजी, श्रीदधिमुखजी, श्रीद्विविदजी, श्रीमयन्दजी और जिनके समान दूसरेका पुरुषार्थ नहीं ऐसे ऋक्षराज श्रीजाम्बवान्जी, परम सुभट श्रीउल्कामुखजी, श्रीसुषेणजी, श्रीदरीमुखजी, श्रीकु. मुदजी, श्रीनीलजी, श्रीनलजी, श्रीशरभजी, श्रीगवयजी, श्रीगवाक्ष जी, श्रीपनसजी, अतिशय वली श्रीगन्धमादनजी, इत्यादिक अठा- रहपद्म यूथपति; और भी सेनासमूह के सम्पूर्ण भट श्रीरामकार्य करनेवाले भी, मुझपर कृपादृष्टि की वर्षा कीजिये ॥ श्रीसुग्रीवजी १० श्रीदरीमुखजी २ श्रीहनुमान्जी ११ श्रीकुमुदजी ३ श्रीअङ्गादजी १२ श्रीनीलजी ४ श्रीजाम्बवान्जी १३ श्रीनलजी ५ श्रीदधिमुखजी १४ श्रीशरभजी ६ श्रीद्विविदजी १५ श्रीगवयजी ७श्रीमयन्दजी १६ श्रीगवाक्षजी ८ श्रीउल्कासुभटजी १७ श्रीपनसजी ६ श्रीसुपेणजी १८ श्रीगन्धमादनजी BiSotecteGLEGRESS *"भीर" भीड़, समूह समीप। reORN HE , , .

- 5 भकिसुधास्वाद तिलक। २४१ ( १५८) महावीर श्रीहनुमानजी। जव श्रीसीतारामजी राजसिंहासनपर विराजे,और चारो दिशाओं से सब मुनि लोग दर्शन के लिये श्रीअयोध्याजी में इकटे हुए, तब प्रभुने श्रीअगस्त्यजी महाराज से पूछा कि- चौपाई। "सौरज, वीरज, धीरज, नीती । वरविक्रम, दक्षता, प्रतीती। तिमि प्रभाव, प्रज्ञता, प्रमाना । हनुमतहियकियअयन निदान॥ हनुमत चारु चरित बिस्तारा । सुखद सुनाइय मोहिउदारा॥" तथा नैमिष क्षेत्र में ऋषियों ने श्रीसूतजी से पूछा कि- दो “एकादश रुद्रहि कहत, महाशंभु अवतार । ताकी जग जीवन कथा, कही सूत बिस्तार ॥" इसके उत्तर में- सो० "कह अगस्त्य भगवान, सत्य कहहु रघुवीर तुम । नहिं हनुमान समान, गतिमति बलहू में कोऊ" ॥१॥ कहेउ सूत, "सुख मूल, कहाँ चरित्र पवित्र अव । हरण सकल अघशूल, चितलगाय ऋषिगण सुनौ"॥२॥ श्रीकेशरीप्रिया शुभवतरता परमविनीताश्रीअञ्जनाजी एक समय धीरे धीरे विचरती हुई वन और पर्वत की शोभा देख रही थीं उसी समय श्रीपवन देव के उद्वेग से आपका वस्त्र उड़ने लगा था; इससे आपने वायु देव पर क्रोध करना चाहा । परन्तु श्रीमरुत् देवजी ने को- मलवाणी से आपको श्रीरामकथा से श्रीब्रह्माजी का विचार सुनाकर, बहुत कुछ समझाया- "तूं भयंमानहि मति मन माहीं । हम तव तन व्रत हिंसव नाहीं ॥" और-छन्द । "होइहिं महाबलवान बुद्धि-निधान सुत मेरे दिये। अति तेजमान महान सत्व पराक्रमी ममसम तिये ॥" "धीरज बिलंघन वेगवान सु मोहुतें अधिकाइकै । अस तनय लहि तिहुँलोक तेरो सुयश रहिहै छाइक।" .

२४२ श्रीभकमाल सटीक। पुनि और देवता भी आके उसी देशकाल में आप से बोले- "भय छांडि संशय तजौ, चिन्ता त्यागि मन धीरज धरौ । पिय त्रास, लोक-विवाद को सन्देह चितसे परिहरौ॥" "आए महाशिव गर्भ तव ये देव मुनि चिन्ता हरै। करिवेगि निशिचर कुल निधन, विधि धेनु की रक्षा करै॥१॥ मन पवन खग से गति अधिक, पदकंज जे चितलावहीं। धरि चरण निज सुर सील पै, साकेत पद नर पावहीं ॥ सिपनाह सेवा करन हित जग माँहिं यह अवतार है। सेवै सिया रघुनाथ के पदकंज गुण से पार है ॥२॥" दो० "धर्मशील विद्या निपुण, सकल कला परवीन । आचारज ये होयँगे, रहे विश्व आधीन ॥" सो० "सुर सब भेव जनाय, गए सकल निज निज भवन । सुनो सजन चितलाय, अग्र कथा भव भयहरन ॥" "महामरुत की मूल, तेज गर्भ उर धारिकै। सुख संपति अनुकूल, अंजनि निवसी गिरिगुहा ॥" निदान, शरऋतु, कार्तिक मास, कृष्णपक्ष चतुर्दशी, भौम वार, स्वाति नक्षत्र, मेप लग्न, उच्च उच्च स्थानों में सब ग्रह, एवं सर्व योगों तथा समय के सव विधि अनुकूल होने पर- 'दो० "निशा दिवस के सन्धि में, मुद मंगल दातार । महाशम्भु परगट भए, हरन हेत भवभार ॥ १॥" खल अरविन्द विनाशकर, सुजन कुमुद आनन्द । अंजनि उर अंभोधि ते, उदित भए कपिचन्द ।।२॥ धन्य धाम अरु धन्य थल, धन्य तात अरु मात । धन्य चंश जेहि वंश में, जन्मे तिहुपुर त्रात ॥३॥ "करहिं वेदधुनि विप्रगण, जै जै शब्द विशेप । सुख समाज तेहिकाल को, कहि न सके शत शेष ॥ ४॥" कवित्त । "मङ्गल सु मास, कल कातिक सरद चास, मंगल प्रथम पक्ष, SteGISTER- GORIES , - ..

RAN . ॐ भक्तिसुधास्वाद तिलक। .२४३ चौदसि सोहाई है । मंगल सु वार, महामंगल नखत स्वाती, संध्या समय, मंगल लगन मेष आई है ॥ मंगल सुथल, जल, अनल, सु मंगल भे, अनिल, अकासझरी फूल की लगाई है । मंगल स्वरूप हनुमन्त जन्म मंगल की, बाजैरस राम जग मंगल बधाई है॥१॥ भोरे, सूर्य को देख, श्रीअंजनीनन्दन, बालभाव से लाल फल अनुमान करके उछले कि रवि को मुखमें रखलें । यह प्रभाव देख, देव दानव सब विस्मयवन्त हुए । रवि के तेज को विचार के श्रीपवन देव भी पुत्र के पीछे पीछे शीतलता करते हुए जा रहे थे। एवं, श्री- दिवाकर भगवान् ने भी इन्हें श्रीरामकृपापात्र जानकर अपने ताप का लेश भी इनको नहीं लगने दिया । उसी दिन सूर्य ग्रहण का योग था, इसलिये राहु श्रीभानु भग- वान् के समीप गया। वहां श्रीपवनसुत को देख, भयमान राहु वहां से लौट सुरेश से जा कहने लगा कि आप ही ने सूर्य तथा चन्द्र को मेरा ग्राह्य निर्मित किया। फिर आज आपने मेरा भाग दूसरे को क्यों दे दिया है ? यह सुन सुरपति अपने ऐरावत नाम (श्वेत) हस्ती पर चढ़ के शीघ्रही वहां पहुंचे कि जहां सूर्यदेव और मारुती थे। श्रीअंजननन्दनजी राहु को नील फल मान सूर्य को छोड़ पहिले तो उसी की ओर लपके, परन्तु ऐरावत को देख श्वेत फल अनुमान करके, राहुको भी छोड़ ऐरावत ही की ओर लपके । यह देख इन्द्र ने विना विचारे ही वन चलाही तो दिया। राहु के कुसंग का यह फैल देखिये।निदान वह वज्रश्रीप्रभंजनसुत के अंग में आ लगा । उस पत्रि प्रहारसे व्यथित हो श्रीपवनजजी पर्वत पर आ गिरे, जिससे आपके बाएं हनु में में कुछ चोट पहुँचा । श्रीमरुत् देव ने पुत्र को गोद में उठा लिया। कोप करके,सारेजगत् से प्रभंजन देवने अपनी गति खींचली। तब तो प्राण के राजा श्रीपवनजी के रुकने से, समस्त जीवों को अत्यन्त क्लेश हुआ । सुर मुनि नर नाग गन्धर्व असुर संवके सब, श्वास प्रश्वास प्राण अपान के निरोध से विकल होगए; शरीर की सन्धियां अति पीड़ित हो गई। कोई कुछ कर्म धर्म करने योग्य न REASURESHREEGRESSESCREESREGREERS २४४ श्रीभक्रमाल सटीक। रहा। देखिये ! एक इन्द्र के अपराध से त्रिलोक दुखी हो गया। कुमन्त्र तथा कुसंग से कहां कष्ट नहीं पहुँचता है ? ॥ सब प्रजाओं ने इन्द्र के साथ २ श्रीब्रह्माजी के पास जा पुकारा। श्रीविधाताजी सबको साथ लिये वहां आए जहां श्रीपवन देव श्रीम- हावीरजी को गोद में लिये आपका मुख अवलोकन कर रहे थे। जगत् पिता श्रीविधिजी को अपने निकट देखतेही, श्रीमरुतदेवने उठके अपने शीस और प्रियपुत्र दोनों को श्रीविरंचिजी के चरणार- विन्द पर रक्खा । प्रभु ने कृपा करके वालक के शीस पर ज्याही निज हस्तकमल फेरा, त्योंही आप सुखी हो गए; तथा आपकी प्रसन्नता के साथ साथही त्रैलोक्य के प्राणी भी सब सुखी हुए। श्रीइन्द्रजी ने एक अपूर्व माला श्रीमारुतीजी के गले में पहिरा के, और "हनुमान्" आपका नाम रख.के, आशीस दिया कि अव से मेरे वज्र से इनको कभी कुछ भय नहीं । श्रीगिरिजापतिजी ने भनि वर दे अपने शूल से आपको निर्भय किया; तथा, ने निज ब्रह्मास्त्र से, श्रीकुवेरजी ने अपने गदा से, श्रीयमजी ने यम- दण्ड से; एवं श्रीदुर्गाजी ने अपने खड्ग से, वरुणजी ने निज पास से; और विश्वकर्माजी ने अपने सर्व प्रायुधों से अभयत्व दिया। श्रीसूर्य भगवान् ने अपने तेजका (शतांश), अनुग्रह किया; और कहा कि "मैं इन्हें शास्त्र पढ़ा दूंगा।" पुनः सवने भनेक विचित्र अद्भुत वरदान आपको दिये, जिनका विस्तृत वर्णन कहां तक किया जावे॥ दो० देखि सुरन के वरन ते, भूपित हनुमत काहि । वोले विधि पवन प्रति,अति प्रसन्न मन माहिं।" चौपाई। "यहिके सेवा बस रघुनाथा। यहिके घेगि विकहें हाथा ॥ मारुत ! तव, यह सुतको पाई । रहिहै सुयश तिहूं पुर छाई । दो० अस कहि विधि अमरन सहित, दैदै बर वरदान । गवने पवनहि पूछि सब, अपने अपने थान ॥१॥ कारण रुद्र अनेक के, “ महाशंभु” परधाम । HOCKERAKASH , .

भकिसुधास्वाद तिलक। २४५ समय समान स्वरूप करि, सेवहिं सीताराम ॥२॥ तेऊ प्रभु रुचि पाइके, प्रबिसे पवन स्वरूप। "अंजनिमारुत-सुत" भए, कपि वपु बिरचि अनूप ॥ ३ ॥ गिरि सुमेरु के मुनि सकल, सादर सदन वुलाय । पूजि पगन मेले ललन, भोजन विविध कराय ॥ ४॥ तव आनन्दि अंजना, केसरि बसि निज गेह । दम्पतिसुतहिं दुलारहीं, दिनप्रति सहित सनेह ॥५॥ आपके जन्म के चरित्र को, प्रसिद्ध महानुभाव सन्तमण्डलभूषण श्री ६ "श्रीमतीशरण गोमतीदास" महाराजजी ने छपवाकर अपने श्रीहनुमत् निवास से प्रकाशित किया है, उसकीतथा श्रीरामनामा- नुरागी मुन्शी श्रीरामअम्बेसहायजी कृत श्रीकाशीजी की छपी श्रीहनुमत् जन्म-विलास को देखिये ॥ श्रीमारुतिजी के सुयश श्रीवाल्मीकीय में एवं श्रीगोस्वामीतुलसी- दासजीकृत जगत् विख्यात ग्रन्थों में प्रेमीजन पढ़ते सुनते हैं ही। और एक चुटकुला यहां भी देखही आए हैं । (वि०) "जयति अंजनीगर्भ अम्बोधिसम्भूत" दो० "नमो नमो श्रीमारुती, जाके वस श्रीराम। करहुकृपानिशिदिन जपों,श्रीसियासिय-पिय नाम॥" (१५६) श्रीअङ्गन्दजी। श्रीसीतारामपदकंज में प्रेम करने ही से लोक परलोक की कोई वार्ता ऐसी नहीं रह जाती जिसमें मतिमान् प्रेमी कुशल न हो। श्रीअङ्गन्दजी, किष्किन्धाधिप बालि के योग्य पुत्र, अपने पिता सम बली ने, लंका की रणभूमि में किस कुशलता से प्रशंसित पराक्रम किये कि जिसकी सराहना स्वयं प्रभुही श्रीमुख से करते हैं । सवैया । * पावत ओप भयङ्क लुभावत भाव भरी निपुनाई। है जलजात लजात बिलोकत कोमल पायन की अरुनाई। मोहति है मन त्यो ब्रजवल्लभ अङ्गन की छवि केर निकाई । फोन बिकी बिनमोल सखी लास जानकिनाथ की सुन्दरताई ॥ C 15 २४८ श्रीभक्तमाल सटीक। . सिंहासनासीन करके तव श्रीनल-नीलजी, श्रीरामपार्श्व में प्राप्त हुये। श्रीराघव दया सागरजी उन वीरों से अंक भरि भेटे; और अन्त में निज पद का लाभ दे, कृतार्थ किया । ( १६३) नवो नन्दजी।. (१२) छप्पय । (७०) व्रज बड़े गोप “पर्जन्य" के सुत नीके नव नन्द ॥ धरानन्द, ध्रुवनन्द, तृतिय उपनन्द, सु नागर । चतुर्थ तहां अभिनन्दः नन्दै सुखसिन्धु उजागर ॥ सुठि एन- न्द पशुपाल, निर्मल निश्चय अभिनन्दन । कर्मा धर्मानन्दः अनुज वल्लभं जगवन्दन ॥ आस पास वा बगर * के, जहँ विहरत पशुप सुछन्द । व्रज बड़े गोप "पर्जन्य" के, मुत नीके नव नन्द ॥ २१॥ (१९३) "जसुमति नन्द जगत् में जिनकी कीरति सरद जुन्हाई । तिनके आनि परम पुन्यनते प्रगटे कुँवर कन्हाई ॥" वार्तिक तिलक। गोकुल (ब्रज) में ( १).सुजन्यजी (२)श्रीपर्जन्यजी (३ अर्जन्य और (४) राजन्य, ये चारों गोप सहोदर भ्राता थे; तिनमें तीन भाइयों के वंश का तो वर्णन नहीं; श्री“पर्जन्य"जी नवो नन्दों के बड़े (नाम वृद्ध पिता) थे; इन्हीं के सुन्दर सुत नवो नन्दजी थे; अर्थात् श्रीधरानन्दजी, श्रीध्रुवानन्दजी, तीसरे परम प्रवीण (सुना. गर) श्रीउपनन्दजी; तिनमें चौथे श्रीअभिनन्दजी; और सुख के समुद्र परम प्रसिद्ध महर श्रीनन्दजी । गौओं के विशेष पालक, निर्मल, * "बगर" टोला, पुरवा, फैलाच ॥ भिन्न भिन्न अन्यों में, कई नाम मिन्न पाये जाते हैं जैसे “वल्लभान" के स्थान में "मन" वा "अभिनन्दन," एयमादि ॥ बहुत सी हाथ की लिखी पुरानी प्रतियों को मिला के जो पाठ अधिक पोथियों में मिला सोही लिपा है। Reck **** भकिसुधास्वाद तिलक। २४६ निश्चय करके प्रभु को आनन्द देनेहारे श्रीसुनन्दजी; श्रीकानन्दजी;, तथा श्रीधर्मानन्दजी; और इन आठों के छोटे भाई जगत् में वन्दनीय श्रीवल्लभजी । जहां गोपाललोग स्वच्छन्दता से विहरते थे, तिस वगर के आस पास में नवो नन्द विराजते थे । मैं उनके चरण की धूरि चाहता हूं ॥ १ श्रीधरानन्दजी, ६ श्रीसुनन्दजी, २ श्रीध्रुवनन्दजी, ७ श्रीकानन्दजी, ३श्रीउपनन्दजी, ८ श्रीधर्मानन्दजी, ४ श्रीअभिनन्दजी, ६ श्रीवल्लभनन्दजी, ५ श्रीनन्दजी, सुखसिन्धु पाठ भेद कई हैं। जो श्रीकृष्ण भगवान् के ही पिता वा चचा हैं, भला उनकी बड़ाई कहां तक की जा सकती है। (१२४) छप्पय ।, (७१६) बाल वृद्ध नर नारि गोप, हौं अर्थी उन पाद रज ॥ नन्द गोप, उपनंद, ध्रुव धरानँद, महरि जसोदा। कीर- तिदा “ वृषभानु" कुँअरि सहचरि (बिहरति) मन मोदा ॥ मधु, मंगल, सुबल, सुबाहु, भोज, अर्जुन, श्रीदामा। मंडल ग्वाल अनेक श्याम संगीवहु नामा॥ घोषं निवासिनि की कृपा, सुर नर बांछत आदि अंज। बाल वृद्ध नर नारि गोप, हौं अर्थी उन पाद रज ॥२२॥(१६२) १"महरि" घड़ी, महर की स्त्री। २प्रेमकी मुख्य आदर्श श्रीकीर्ति सुता वृषभानु कुँचरि श्रीराधिकाजी की जय, प्रेम जितना हो ऊंचा पवित्र और निःस्वार्थ होना, है उसका चिन उतना ही टिकाऊ चमकीला और मनोहर होगा । ३ "घोष"-अहिरों का टोला, घोसियों का पुरवा, अहीर, घोसी, ग्वाल, गोप। ४"आदि अन"-अजादि, विरंचिप्रमुख, विधेि प्रभृति, ब्रह्मा आदि ।

२५० - K श्रीभक्तमाल सटीक । (१६४) गोपन्द। "वृद्ध तरुन वालक अति सुन्दर गोप अथाइन बैठे। कोई पाग लटपटी बांधे कोऊ भेंटा ऐंठे॥ कोई वांधे मोरपखौवा कोऊ वांधे जंगे। लटपट आवत गैयन पाछे गावत तान तरंग ॥" वात्तिक तिलक। जिन घोपनिवासियों ( गोप, गोपियों) की कृपा को ब्रह्मादिक और नर लोग चाहते हैं, तिन वालक वृद्ध और स्त्री पुरुप गोपों के पाद रज का मैं अर्थी हूं, अर्थाद जांचता हूं। उनमें मुख्यों के नाम-(१)महर श्रीनन्दगोपजी, (२)श्रीउपनन्दजी, (३)श्री- ध्रुवनन्दजी, (४) श्रीधरानन्दजी,(५) महरि श्रीयशोदाजी, (६) स्मरणमात्र से कीर्ति देनेवाली श्रीपभानुजी की स्त्री श्री कीर्ति" जी, (७) श्रीवृषभानुजी, (८) सदा प्रसन्न आनन्दयुक्न मनवाली सखियों के सहित श्रीवृपभानुनन्दिनी श्रीराधिकाजी, (६) श्रीम- धुजी, (१०) श्रीमंगलजी, (११) श्रीसुवलजी, (१२) श्रीसुवाहुजी, (१३) श्रीभोजजी, (१४) श्रीअर्जुनगोपजी, (१५) श्री श्रीदामा" जी, तथा (१६)श्रीश्यामसुन्दरजीके साथी, अनेक नामवाले, अनेक ग्वालमण्डलों के पद रज को मैं चाहता हूं ॥ . धन्य गोकुल बज; धन्य धन्य वहां के वासी; और धन्य धन्य उन सबकी चरणरज ॥ (१६५) श्रीयशोदाजी। 'महरि श्रीयशोदाजी की कथा श्रीमद्भागवत, सुखसागर, ब्रज- विलास तथा प्रेमसागर प्रभृति ग्रन्थों में अति प्रसिद्ध है । विशेष कुछ लिखने की आवश्यकता क्या है । हरिमाता की स्तुति क्या कोई साधारण वार्ता है। (१६६ । १६७) रानी श्रीकीर्तिजी श्रीषभानुजी। "श्री 'वृषभानुपुरा' के ठाकुर ‘करिति' अरु वृषभानू । कंधों आनि विसद भुवमण्डल उदित भये वृषभानू ॥ ।

। - भक्तिसुधास्वाद तिलक। २५१ "तिनके आनि अवतरी 'राधा' अमित रूप की ढेरी। कीजे काहि बराबर दूजो तीन लोक छविहेरी ।" श्रीकृष्णप्रिया जगत् जननि सुरमुनिवन्दिता भवजन इष्टदेवता "श्रीराधाजी" केही माता पिता, यही तो सव स्तुतियों की अवधि है; वात्सल्य रस के सुखों की खानि के भाग्य की प्रशंसा और वड़ाई कौन कर सकता है और क्योंकर सम्भव है। (१६८ । १६६) श्रीसहचरियां; ग्वालमंडल। "जकत चकित चितवति तुम इत उत केहि ठग ठीक ठगी हो। डगति डगनि डगमग गति पगनि तुम काके रंग रँगी हो । कै काहू तो को भरमायो के चेटक कछु कीन्हो । कै काहू तेरो चित चोरो के लै फेरि न दीन्हो ।" (प्रेमभरी गोपियों की दशा) प्रियाजी (श्रीराधाजी)की सहचरियोंकी स्तुतिप्रार्थना कियेविन,जो कोईश्रीप्रिया प्रियतम के चरणों की भक्ति चाहे, उसकी बुद्धि अल्प है ।। जिन ग्वालिन तथा ग्वाल मण्डल को भगवान ने अपना करके जाना माना, और श्रीब्रह्मा ऐसे बड़ों के बड़े ने जिनकी कृपा चाही, उनके चरणसरोज की रज अपने मस्तक पर धरने की बांछा करनी अतिशय बड़भागी का चिह्न है। "दमकत दिपति देह दामिनसी चमकत चंचल नैना। धूंघट विच खेलत खंजन से उड़ि उड़ि दीठि लगेना ॥ लटकति ललित पीठ पर चोटी विच २ सुमन सँवारी। देखे ताहि मैरु सो आवत मनहु भुजंगिनि कारी॥ कहाँ कहा तो सों हो गधा दिल की नाहिं दुराऊं। चलि बैठो एकंत कहूं तौ श्रवनन सुधा पियाऊं ॥" १७० ) श्रीव्रजचन्द्रजी के (१६) षोडश सखा। (१२५) छप्पय । (७१%) व्रजराजसुवनसँग सदन वन,अनुगसदा तत्पर रहैं। BREAK RERAKA २५२ . , * श्रीभक्तमाल सटीका रक्तक, पत्रक, और पैत्रि, सवही मन भावें।मधुकण्ठौ, मधुवत, रसाल, विशाल, सुहावै । प्रेमकन्द, मकरन्द, सदा आनन्दै, चन्द्रहासौ । पयद, वकुले, रसदानें, साः रदै, बुद्धिप्रकासा ।। सेवासमय विचारिकै, चारु चतुर चितकी* लहैं। ब्रजराजसुवन सँग सदन वन, अनुग सदा तत्पर रहैं ॥ २३ ॥ (१६१) वार्तिक तिलक। ब्रजराजश्रीनन्दजी के पुत्र श्रीकृष्णचन्द्रजी के साथ साथ घर में और सब वन में ये सब पोडश सेवक सदा सेवा में तत्पर रहते हैं। (१) रनकजी (२) पत्रकजी, तथा (३) पत्रीजी, ये तीनों प्रभु के मन में भाते हैं; ( ४ ) मधुकण्ठजी (५) मधुवर्तजी (६) रसालजी (७) विशालजी, प्रभु को बहुत सुहाते हैं; (८) प्रेमकन्दजी (६) मकरन्दजी (१०) सदा श्रानन्दजी (११) चन्द्रहासजी; (१२)पयदजी (१३) बकुलजी (१४) रसदानजी (१५) शारदजी और (१६) वुद्धिप्रकाशजी। ये सोलहो चारु चतुर अनुग अपनी अपनी सेवा का समय विचार के श्रीनन्दनन्दनजी के चित्त की सचि को जान लेते हैं, सोई सोई सेवा किया करते हैं। इन के भाग्य की बड़ाई किससे हो सकती है ? ॥ (१७१) सप्तद्वीप के भक्त। (१२६) छप्पय । (७१७) सप्तदीप में दास जे,ते मेरे सिरताज ॥ जम्बू, और पलच्छे, सालमलि, बहुत राजऋषि । कुश, पवित्र, पुनि क्रौंच, कौन महिमा जानै लिपि ॥ सार्क विपुल विस्तार, प्रसिध नामीअतिपुहकर।पर्वत "लोकालोक ओक "टापूकंचनधर" ॥ हरिभृत वसत जे जे जहां, * "चित्त की लहै मन की रुचि को समझ जाते हैं। + "श्रोक" स्थान, श्राश्रम ॥ , निध भक्रिसुधास्वाद तिलक। २५३ तिन सों नित प्रति काज । “सप्तदीप” में दास जे, ते मेरे सिरताज* ॥२४॥ (१६०) वार्तिक तिलक। सातो द्वीपों में, जितने श्रीभगवदास जहां २ हैं सो सब, मेरे मस्तकके मुकुट हैं ( १) जम्बूद्वीप (२) लक्षद्वीप (३) शाल्मलि- द्वीप इनमें बहुत से राजर्षि भगवद्भक्त हैं; (४) परमपवित्र कुशद्वीप, तथा (५) क्राँचद्वीप में जो भक्तसमूह हैं तिनकी महिमा जो अनेक पुराणों में लिखीहुई है सो कौन जान सकता है (६) बहुत विस्तारवाला शाकद्वीप और (७) उससे भी अतिप्रसिद्ध नामी बड़ा पुष्करद्वीप; तथा लोकालोक पर्वत एवं कांचनधर टापू के स्थानों और आश्रमों में जहां जहां जो जो, श्रीभगवत् के सेवक वसते हैं उन्हीं से नित्य ही मेरा प्रयोजन है; वे ही मेरे शीस के मुकुटमणि हैं। चौपाई। "मोरे मन प्रभु अस विश्वासा। राम ते अधिक राम के दासा ॥" १ जम्बूद्वीप ५ क्रौंचद्वीप २ प्लक्षद्वीप ६ शाकद्वीप ३ शाल्मलीद्वीप ७ पुष्करद्वीप ४ कुशद्वीप (इति "सप्तद्वीप") (१७२) जम्बूद्वीप के भक्त। (१२७) छप्पय । (७१६) मध्यदीप नवखंड में, भक्त जिते, मम भूप ॥ * "ताज" =टोपी, मुकुट । + "कांवनधर" टापू तथा "लोकालोक पर्वत," इन सातों द्वीपों से बाहर * अपना यह "भारतवर्ष देश, (भरतखंड ) जम्बूद्वीप ही में है। प्रथम (जम्बू) द्वीप से, दूसरा दूना है। उससे उत्तर उत्तर दूना । अर्थात् द्वितीय से तृतीय दूना, नाम प्रथम से चौगुना है; एवं चौथा प्रथम से पाठ गुना यड़ा है। पांचयां सोलहगुना छठा बत्तीसगुना; और सातवां (पुष्कर ) द्वीप प्रथम (जम्बू) द्वीप से चौसठ गुना बड़ा है। प्रत्येक द्वीप में शतावधि योजन का एक एक वृक्ष है, सो उसीके नाम से यह द्वीपभी पुकारा जाता है जैसे ( १ ) जामुन, (२) पाकड़ि, (३) सेमर, (४) कुश, इत्यादि का। Check ॥

. HIN श्रीभक्तमाल सटीक। इलावत, अधीस संकर्षन, अनुगसदाशिव । रमनंक, मछ, * मनु दास; हिरन्य, कूरम, अर्जम इव ॥ कुरुं, बराह भूभृत्य; वर्ष हैरि, सिंह, प्रह्लादा। किंपुरुष,राम, कपि, भरत, नरायन, वीना नादा। भद्रामुग्रीवहय, भद्रस्रवः केतु, काम, कमला अनूप । मध्यदीप नवखंड में, भक्तजिते, मम भूप ॥२५॥ ( १८६) वातिक तिलक। मध्यद्वीप अर्थात् “जम्बूद्वीप" के नवो खण्डों में जितने श्रीभग- वत् के भक्त हैं, वे सब मेरे राजा हैं, (मैं उन सवका सुयश कहने- वाला वन्दी हूं)॥ नवोखण्डों के अधीश्वर भगवद्रूपों के, तथा उनके मुख्य भक्क सेवकों के नाम कहते हैं। (१) इलावर्तखण्ड के अधिपति, भग- वान् श्रीसंकर्पणजी हैं, और उनके सेवक श्रीसदाशिवजी हैं; (२) रमणकखण्ड के स्वामी श्रीमत्स्य भगवान् और उनके भृत्य श्रीमनु जी (सत्यव्रत); एवं (३) हिरण्य खण्ड के अधीश्वर श्रीकूर्म भग- वान्, और उनके दास श्रीअर्यमाजी (४) कुरुखएट के पति श्री. वाराह भगवान् और उनकी सेवा करनेवाली श्रीभूमि देवीजी; (५) हरिवर्षखण्ड के स्वामी, भगवान् श्रीनृसिंहजी, और उनके भक्त- राजे श्रीप्रह्लादजी; (६)किम्पुरुषखण्ड के महाराज, स्वयं श्रीसी- तापति रामचन्द्रजी; और आपके प्रियदास,कपिनायक-श्रीहनुमान्- जी हैं; (७) भरतखण्ड के पालक बदरिकाश्रमवासी श्रीनारायणजी और उनके पुजारी वीणा-नाद-कारी श्रीनारदजी; (८) भद्राश्वखण्ड के ईश्वर श्रीहयग्रीव भगवान्, और उनके सेवक श्रीभद्रशवाजी; (8) केतुमालखण्ड के स्वामी श्रीकामदेव भगवान् और उनकी पूजा करनेवाली उपमारहित श्रीकमलाजी हैं। *"मछ"-मत्स्य, मच्छामान । "चीनानादा"-श्रीनारदजी। "मध्यदीप" जम्वृद्धी ।

S भकिसुधास्वाद तिलक। २५५ जम्बूद्वीप के नवो अधीशभगवान् पुजारी खएड १ इलावर्तखंड संकर्षणभगवान् सदाशिव २ रमणकखंड मत्स्य भगवान् श्रीमनुजी ३ हिरण्यखंड कूर्म भगवान् श्रीअर्यमाजी (उत्तर) कुरुखंड वाराह भगवान् श्रीभूदेवीजी ५ हरिवर्षखंड नृसिंह भगवान् श्रीप्रसादजी ६ किम्पुरुषखंड श्रीसीतारामजी श्रीहनुमानजी ७ भरतखंड* श्रीलक्ष्मीनारायणजी श्रीनारदजी ८ भद्रास्वखंड हयग्रीव भगवान् श्रीभद्रश्रवजी ६ केतुमालखंड कामदेव भगवान् श्रीलक्ष्मीजी इसी (किम्पुरुष)खण्ड ही में महारानी श्रीमिथिलेशललीजी की, तथा श्रीजानकी-जीवनजी की सेवा, श्रीसीताअंजनीदुलारेजी कई ("कपिमहावीर, "श्रीरामदूत," "श्रीमारुतिवीर कला," "श्रीचारु- शीला," इत्यादिक, ) रूप से सदैव करते हैं । एवं, वहीं मुमुक्षु जनों को श्रीकेशरीनन्दन कपीशजी,श्रीरामायणीय कथा और श्रीसीतारा- माराधन सिखला के मुक्त कराते हैं ।। (१२८) छप्पय । (७१५) स्वेत दीप में दास जे, श्रवण सुनो तिनकी कथा॥ " (अथ देशकाल ) यह तो विदित है ही कि हम सब इसी खण्ड (जंबूद्वीप भरत खंड) के आर्यावर्त देश में हैं । भरतखंड को "भारतवर्ष" भी पुकारते हैं तथा इसी को विदेशी "हिन्दोस्तान" kase पवं "इण्डिया" Indin भी कहते हैं । और यह मन्वन्तर जिसमें हम सब वर्तमान है. "वैवस्वत मन्वन्तर" है। इस मन्वन्तर के अट्ठाईसवें चतुर्युग का यह "कलियुग" है। जिसके ४३२००० वर्षों में से केवल प्रथम ही चरण का ५००५ [ पांच सहन पांचयां] संवत्सर, अर्थात् विक्रमी संवत् १९६१ यह है । अस्तु ॥ (जिस समय यह लिखा जाता है)। इन्हीं श्रीवैवस्वत मनुजीके वंश में. "श्रीदशरथ चक्रवतीजी" जिनके स्वयं साकेतविहारी शार्ङ्गधर श्रीसीतापति रामचन्द्र महाराजजी प्रगट हुए हैं। ५० पृष्ट प्रथम छप्पय (पाँच मूल) में, ग्रन्थका स्वामी मन्वन्तरों की वन्दना कर आए हैं, जिनमें से श्रीवैवस्वत मनुजी [वर्त्तमान ] की बन्दना, आप आठवीं षट्पदी नाम बारहवें मूल [पृष्ठ १८४] में करते हैं । S पुत्र हो २५६ श्रीभक्तमाल सटीक। श्रीनारायण (को) * बदन निरन्तरताही देखें। पलक परै जो वीच कोटि जमजातन लेखें ॥ तिनके दरशन काज गए तहँ वीणाधारी। श्याम दई कर सैन उलटि अब नहिं अधिकारी ॥ नारायण आख्यान दृढ़, तहँ प्रसंग नाहिन तथा। स्वेत दीप में दासजे, श्रवण सुनो तिनकी कथा॥२६॥ (१८८) चार्तिक तिलक। "श्वेतद्वीप" में जो श्रीभगवान् के दास वसते हैं, तिनकी कथा कान लगा के सुनिये । वे दास, श्वेतद्धीपवासी श्रीमन्नारायण के मुखचन्द्र को सदा देखाही करते हैं, और नेत्रों में जो पलक पड़ते हैं उस अन्तर को कोटिन यमयातना के सरीखा दुःख मानते हैं । उनभगवत् दर्शनानन्द-निष्ठोंके दर्शन तथा ज्ञानोपदेश करने के हेतु वीणाधारी श्रीनारदजीगए; तव श्रीमन्नारायणजीने श्रीनारदजी के मन की रुचि जान के, हाथ के सैन से निवारण किया कि "आप उलटे पांव फिर जाइये, ये हमारे रूप-माधुरी के निष्ठ लोग आपके ज्ञानोपदेश के अधिकारी नहीं हैं।" नारायण के रूपाशक्ति प्रेमाभक्ति का आख्यान जैसा वर्णित है सीही वहां के भक्कों को भली भांति दृढ़ है । जैसी अन्यत्र के भाग- वतों की ज्ञानमिश्रा भक्ति में प्रवृत्ति है, वैसा प्रसंग श्वेतद्वीप में नहीं है, वहांवाले तो केवल शुद्ध माधुर्य रूप के ही प्रेमी उपासक हैं। (१७३) श्वेतहीप के भक्त। (१२६) टीका ! कवित्त । (७१४) श्वेतदीपवासी, सदा रूप के उपासी; गए नारद विलासी,उपदेश आसा लागी है। दई प्रभु सैन जिनि आवो इहि ऐन,हग देखें सदा चैन,मति गति अनुरागी है।फिरेदुख पाइ, जाइ कही श्रीवैकुण्ठनाथ, * 'को' किसी ने बढ़ाया मूल में नहीं। . ** , भक्तिसुधास्वाद तिलक। २५७ साथ लिये चले लखोभक्ति अंगपागी है।देख्योएकसर, खगरह्योध्यान धरि, ऋषि पू0 कहो हरि, कह्यो “वड़ो बड़भागी है"॥१०३॥(५२६) वार्तिक तिलक। श्वेतद्वीप के वासी भक्तजन सदा श्रीभगवत रूपही के उपासक हैं; वहां एक समय ज्ञानोपदेश करने की आशा करके सत्संगविलासी श्रीनारदजी गए; उनके मन की गति जान के प्रभु ने सैन से आज्ञा की कि “इस स्थान में मत आओ, क्योंकि ये भक्त हमारे रूप अनूप ही को देख कर परम आनन्द मानते हैं, औररूपही के अत्यन्त अनु- रागी हैं, इनको अब ज्ञान उपदेश का प्रयोजन नहीं है।" यह सुन, उदास हो के, श्रीनारदजी फिरे, और श्रीवैकुण्ठनाथ भगवान् के यहां जाके सब वार्ता निवेदन की। भगवान् बोले कि "ठीक तो है; और, उनको अपने साथ ले चल के कहा कि "चलो,. हम दिखादें कि, यथार्थ में उन भक्तों के अंग अंग रोम रोम सब प्रेम भक्ति से पगे हैं।" दोनों श्वेतद्वीप में पहुंचे। वहां एक सरोवर में एक भक्त पक्षी प्रभु का ध्यान धरे हुए बैठा था; देख के श्रीनारदजी ने श्रीवैकुण्ठनाथजी से प्रश्न किया कि "प्रभो। यह खग ऐसा शान्त क्यों बैठा है ?,' श्रीहरि ने उत्तर दिया कि 'यह भक्त खग अति वड़भागी है।" (१३०) टीका । कविच । (७१३) बरषहजार वीते,भए नहीं चितचीते,प्यासोई रहत,एप पानी नहीं पीजिये । पावै जो प्रसाद जबजीभ सो सवादलेत,लेतनहीं और,याकी मति रस भीजिये। लीजै बात मानि,जल पान करिडारिदियो, लियो चोंच भरि, हगभरि बुधि धीजिये। अचरज देखि. लगेन निमैप किहूं, चहूं दिशि फिस्यो; अव सेवा याकी कीजिये । १०४॥ (५२५) वार्तिक विलक। "नारद ! देखो, इसको एक सहस्र (१०००) वर्ष बीत गए, इस "नहीं चिते चीते"=चित चिन्ता नहीं पालन दिना"तन निमेयर ३ "चहें दिशि फियो"-परिक्रमा करके, प्रतिचं! , .

२५८ श्रीभक्तमाल सटीक ।। चित्त में चिन्ता नहीं, यह इतने दिनों से प्यासा ही रहता है परन्तु जल नहीं पीता, केवल मेरे ध्यानामृत ही से जीता है; क्योंकि जब यह मेरा प्रसाद पाता है तवही जीभ से खानपान का स्वाद लेता है; इसकी मति भक्तिरस में ऐसी भीग गई है कि प्रसाद विना और वस्तु का ग्रहण ही नहीं करता। मेरी इस वात को सत्य मानो; देखो, में प्रसाद करके जल इसको देता हूं, उसको पियेगा।" प्रभु ने श्राप जल पीके प्रसाद उसके आगे रख दिया, तब तुरन्त ही उसने भर चोंच पान कर लिया प्रेमानन्द का जल भी उसकी आंखों में भर आया तथा अधरामृत के स्वाद से मति प्रसन्नता से पूर्ण हो गई। श्लो० "यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः । ते त्वधं भुञ्जते पापान् ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥" (भ० गी: ३ ॥१३) "वैष्णवे भगवद्भक्तो प्रसादे हरिनाम्नि च । अल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते ॥" इस आश्चर्य भक्ति को देख के श्रीनारदजी के नेत्रों में किसी प्रकार से निमेप नहीं पड़े उसकी ओर देखते ही गए; फिर चारो ओर फिर करके उसकी प्रदक्षिणा की। और प्रभु से बोले कि "मेरा तो जी चाहता है कि मैं इसकी सेवा किया करूं।" (१३१) टीका ( कविता (७१२) चलो आगे देखौ, कोऊ रहै न परेखौ; भाव भक्ति करि लेखौ; गए द्वीप; हरि गाइये । आयो एक जन धाई,आरती समय विहाई,खेंचि लिये प्राण, फिरि वधू याकी आइये । वही इन कही, पति देख्यो नहीं मही पस्यो; हस्यो याको जीव, तन गिस्यो, मन भाइये । ऐसे, पुत्र आदि आए, सांचे हित में दिखाए, फेरिके जिवाए, अपि गाए चित लाइये ।। १०५ ॥ (५२४) वार्तिक तिलक । यह सुन श्रीभगवान् बोले कि "चलो, अभी आगे और देखो कोई परीक्षा रह न जाय, जिसमें उन भक्तों की सब दशा देख के १ "परेखो"-जांच, परचो,परीक्षा। २ "लेखौ" लेखा करो, मानो, गिन्ती में लायो ।

भकिसुधास्वाद तिलक।
२५६
तुम भावपूर्वक उनकी भक्ति को लेखा में लाओ” यों बातें करते हुए
उस (श्वेत) द्वीप के मध्य मन्दिर में दोनों गए, कि जहां सब भन्न
लोग हरि के गुण और नाम ही प्रेम से गा रहे हैं ।
देखते क्या हैं कि एक आर्ती दर्शन का नेमी दौड़ता हुथा आया
परन्तु आर्ती का समय बीत गया था। आर्ती का दर्शन न पाने के
विरहसे उसने प्राण को खींच के छोड़ ही दिया ।
उसके पीछे ही उसकी धर्मपत्नी भी आई और पूछने लगी कि
"क्या आती हो गई?" आपने कहा कि "हां,होगई बरन् तेरे पतिको
भी दर्शन नहीं हुआ ! देख, प्राणत्याग के धरती पर गिरा पड़ा है।
आर्ती विरह ने इसके भी प्राण हर लिये, उसका भी मृतक शरीर
पृथ्वी पर गिर पड़ा।"
इन दोनों का नेम प्रेम देख प्रभु के और नारदजी के मन में यह
अत्यन्त भाया।
इसी प्रकार से, उनके पुत्रादि सब आए और आर्ती के दर्शन
विना प्राण त्याग त्याग गिर गिर पड़े।
इस भांति, प्रभु ने इन सच्चे भक्तों का प्रेम नेम नारदजी को
दिखाया; जिससे श्रीनारदजी का प्रवोध हुआ।
पुनः जब आर्ती होने लगी तो उस समय प्रभु ने उन संवको
सजीव कर पार्ती दर्शन का आनन्द दिया।
यह आख्यान, "श्वेतद्वीप-माहात्म्य" में ऋषियों ने गाया है। इन
के प्रेम भक्ति में सवको चित लगाना चाहिये।
(१७४) ? अष्टकुल नाग।
(१३२) छप्पय । (७११)
उरग अष्टकुल द्वारपाल सावधान हरिधाम थिति ॥
इला पत्रं, मुख अनन्त, अनन्तकीरति विसतारत। पद्म,
संकुँ, पन प्रगट ध्यान उरते नहिं टारत ॥ अशुकम्वल,
"श्वेतद्वीप" को भूमंडल पर एक वैकुण्ठ ही जानिये ॥
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KARAN २६० S श्रीभक्रमाल सटीक। बासुकी, अजितआज्ञा अनुवरती। करकोटक तक्षक सुभट सेवा सिर धरती ॥ आगमोक्त शिव संहिता "अगर” * एक रस भजन रति । उरग अष्टकुल द्वारपाल सावधान हरिधाम थिति ॥२७॥(१८७) वार्तिक तिलक। इन अष्टकुली महासों की श्रीभगवत् के धाम में स्थिति है,श्री. हरिमन्दिर के द्वारपालक हैं, और निज निज सेवा में सदा सावधान रहते हैं- (१) एलापत्रजी, और (२) अनन्त (शेष ) जी, अपने मुखों से श्रीअनन्त (श्रीभगवान् ) की कमनीय कीर्जिविस्तार पूर्वक सदा वर्णन करते हैं। (३) पद्मजी तथा (४) शंकुजी की प्रतिज्ञा (पन )प्रगट है कि श्रीप्रभु के स्वरूप का ध्यान निज हृदय से क्षण- मात्र नहीं टारते हैं (५) अशुकम्बलजी और (६) वासुकीजी श्रीमजित् महाराज की आज्ञा के सर्वदा अनुवर्ती रहते हैं। (७) कर्कोटक जी तथा (८) तक्षकजी ये दोनों सुभट श्रीप्रभु की सेवा रूपी भूमि अपने शीसपर निरन्तर धारण किए रहते हैं। स्वामी श्रीअग्रदेवजी कहते हैं कि यह"शिवसंहिता तंत्र (आगम)" में कहा गया है ये अष्टकुली महानागों की श्रीभगवत् के भजन में सदा एक रस प्रीति (रति) रहता है । श्लो० "तेपां, प्रधानभूतास्ते, शेपे,वासुकि,तीका १ ॥ १ ॥ शंखेंः, श्वेतो, महापद्मः कम्बलाश्वतरौ तथा। * श्रीश्रमस्वामी का यह छप्पय मंगल जान श्रीनामाजी ने यहां रक्खा है अथवा भक्तमाल के सतयुग त्रेता द्वापर नाम पवाद्ध के अन्त में स्वयं श्रीनाभाजी ने ही अपने गुरु श्रीमग्रस्वामी का छाप रक्खा है, SUSECRECENotect SEXAKER श्रस्तु।

--- Rec-CA सम भकिसुधास्वाद तिलक। एलापत्रस्तथा नागः, कर्कोटके, धनंजयौ ॥ २॥" [विष्णुपुराण, अंश १, अध्याय २१ ] इनकी चर्चा "श्रीरामतापिनीयोपनिषद" में भी है ।। १. एलापत्र ७. कर्कोटक २. अनन्त [शेष] ६. तक्षक ३. महापद्म है. धनंजय ४.अश्वतर १०. नाग ५. कंबल ११. श्वेत ६. वासुकि १२. शंख प्रिय पाठक ! आप सब धर्मशीलों के गृह गृह सब यज्ञादिकों में पुरोहित लोग अवश्य ही "अष्टकुली नाग" की (और और देवतो के समूह में) पूजा करते कराते हैं; वे नाग ये ही हैं जिनकी वन्दना प्रार्थना श्रीअन्धकार स्वामी श्रीभनमाल के इस पूर्व खण्ड के अंत में कर रहे हैं। । अंत में इसलिये कि ये “द्वारपाल" हैं; इनकी कृपा विन भीतर प्रवेश नहीं हो सकता; भीतर जानेवाले को प्रथम आपही की कृपा की आवश्यकता होती है। चित्र मय तथा मन्त्रमय " श्रीयन्त्रराज" का दर्शन अवश्य कीजिये; देखिये कि यन्त्र कोट के बाहर येद्वादश उरग कैसे शोभते विराजते हैं। श्रीअयोध्याजी में “यन्त्रराजजी" कई ठिकाने नित्य पूजेजाते हैं- श्रीजानकीघाटके स्वामी श्री १०८पंडितरामवल्लभाशरणमहाराजजी, श्रीहनुमन्निवास के महात्मा श्रीगोमतीदासजी महाराज, श्रीकनक- - अनुमान से ऐसा निश्चय होता है कि इस पटपदी (छप्पय १८७) "अगर एक रस भजन रति । उरग पृष्ठ" अपने गुरु स्वामी श्री १०८ अग्रदेव कृत को, श्रीनामास्वामीजी ने अति गंगल जानकर अंत में यहाँ स्थापन किया है जैसे आदि में प्रथम पटपदी पांचवें मूल छप्पय को भी है। "'पायो जिन राम तिन प्रेमही ते पायो है”। BROE KORESCRECRALEKAR

२६२
श्रीभकमाल सटीक।
भवन, के श्रीसीताशरणजी महाराज, तथा छपरे जानकीनगर के
-वकील अयोध्यावासी श्रीदुर्गाप्रसादजी (जिनके पुत्र धावू हरनारा-
यणप्रसाद वकील हाई कोर्ट), और अपहर याम के वकील श्रीवाबू
सूर्यप्रसादजी वकील (जिनके आत्मज वावू मदनमोहन सिंह
मोदमणि कवि), गोदना श्रीअहल्यास्थान, इन सब जगहों में
दर्शनीय "श्रीयन्त्रराजजी" विराजते हैं।
, “धन्य ते नर यहि ध्यान जे रहत सदा लवलीन ॥"
प्रार्थना--पाठक महोदय! "श्रीभक्ति रस वोधिनी" टीका कवित्तों
की भाषा समझना इस दीन को अति कठिन है तिस पर तिलक
लिखना तो और भी कठिनतर है-
"बाल मराल कि मन्दर लेही
श्रीगुरुदेवों की ही कृपा से जैसा तैसा लिखा है, भूल चूक सज्जन
सुधार
लेंगे।
इति पूर्वाद्ध, सतयुग, त्रेता, द्वापर, पर्यन्त,
.
-
दोहे ४, छप्पय २३, मूल २७, टीका करित्त १०५, जोड़ १३२)॥
S. R... BP.R. K.
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*

ॐ 13 - श्रीसीताराम श्रीहनुमते नमः। श्रीमते रामानन्दाय नमः । श्रीप्रेम- निधये नमः । श्रीचन्द्रकलायै नमः । श्रीश्यामनाय. कायै नमः । श्रीहंसकलायै नमः ।। अथ श्रीभक्तमाल सटीक (तथा सतिलक) अथ उत्तराई ( कलियुग भंकावली, विक्रमीय सत्रहवीं शताब्दी तक) (१३३ ) छप्पय । (७१०) चौबीस प्रथम हरि वपु धरे*, त्यों चतुर्ग्रह कलियुग प्रगट ॥:"श्रीरामानुज" उदार, सुधानिधि, अवनि कल्पतरु । “विष्णु स्वामि" बोहित्थ सिन्धुसंसार पार करु॥ "मध्वाचारज" मेघ भक्ति सर ऊसर भरिया। निम्बादित्य' आदित्य कुहर अज्ञान जु हरिया ॥ जनम करम भागवत धरम सम्प्रदाय थापी अघट। * "यपुधरे"-अवतार लिये, अवतीर्ण हुए, प्रगटे। । "थापी" स्थापित किया ।

RAHA २६४ श्रीभक्तमाल सटीक। चौवीस प्रथम हरि वपु धरे, त्यों चतुयूह कलियुग प्रगट ॥ २८ ॥ (१८६) वैष्णव चारो सम्प्रदाय। (१३४) दोहा । (७०६) "रमा" पद्धति रामानुजःविष्णु स्वामि त्रिपुरारि"। निम्बादित्य, सनकादिका;" मधुकर, गुरु "मुख चारि॥ २६ ॥ *(१८५) १ श्री "श्री" सम्प्रदाय श्रीरामानुज रामानन्द स्वामी सम्प्रदाय २ श्रीशिव सम्प्रदाय =श्रीविष्णुस्वामी सम्प्रदाय ३ श्रीसनकादिकसम्प्रदाय -श्रीनिम्बार्कस्वामी सम्प्रदाय ४ श्रीब्रह्म सम्प्रदाय -श्रीमध्वाचार्य सम्प्रदाय चार्तिक तिलक। (१) यतीन्द्र स्वामी श्री रामानुज महाराजजी भाष्यकार, बड़े ही उदार, श्रीसीतारामभक्तिरूपी अमृत के सागर, कल्पवृक्ष के सार्मन जगत् में सर्वकामप्रद (१) श्रीविष्णु स्वामीजी महाराज, संसारसमुद्र से पार करने वाले दीर्घ नाव (जहाज); (३)श्रीमध्वाचार्यजी महाराज, ऊसर के सूखेसर समान जीवों के हृदय में श्रीभक्तिरूपी जल वर्षाकरके भरनेवाले धन और- * पांचवां दोहा (वा उन्तीसवां मूल ) यही दोहा है । नोट-नास्तिक' संसार को श्रीभगवत् ने शंकराचार्यजी के द्वारा आस्तिक और सनातन धर्मनिष्ठ स्मार्त बनाया और फिर कृपा करके श्रीविष्णुस्वामी, श्रीनिम्बार्क स्वामी, श्रीमध्वस्वामी, श्रीरामानुजस्वामी और श्रीरामानन्दस्वामी इन पांचों प्राचार्यों के द्वारा स्मानों और अद्वितवादियों में से भी बहुतों को भागवत बनाने की कृपा की, जिनकी कथा सत्रहवी शताब्दी तक की इस भक्तमाल में हैं । टिप्पणी कलियुगमें अनेक सम्प्रदाय और पंथ होते जान कर,गोस्वामी श्रीनामा. जीने केवल वैष्णव भक्तों की ही "नाममाला" लिखी इसलिये नानकपंथी उदासी, - इत्यादिक, महात्मा, अपने मन में कुछ और न समझे ।'

' भक्तिसुधास्वाद तिलक। २६५ (४) श्रीनिम्बार्कजी महाराज, जनों के अज्ञानरूपी कुहेसे को नाश करके उनके हृदय में ज्ञान तथा भक्ति प्रकाश करनेवाले सूर्य भागवत जन्म, भागवत कर्म, भागवत धर्म, तथा भगवत् धम्मों के चारो सम्प्रदाय, आपही चारों के स्थापित कियेहुए अचल हैं। जैसे भगवान् पहिले चौबीस रूपसे अवतरे, वैसेही भगवत् ही कलियुग में इन चारों आचार्यरूप प्रगट हो चारो भागवत सम्प्र- दाय स्थापन किये हैं। स्वामी श्रीरामानुज की पद्धति, श्रीलक्ष्मीजी की और श्रीविष्ण स्वामीजी की पद्धति श्रीशिवजी की है। श्रीनिम्बार्क पद्धति के आचार्य श्रीसनकादिक हैं; और श्रीमध्वाचार्यजी का मार्ग, श्रीगुरु ब्रह्माजी की पद्धति है ॥ (१) श्रीनिम्बादित्यजी। (१३५) टीका कवित्त । (७०८) निम्बादित्य नाम जाते भयो अभिरामकथा,आयो एक दंडीग्राम, न्योतो करी, आए हैं। पाक को अवार भई, संध्या मानिलई जती, "रतीहूं न पाऊँ" वेद वचन सुनाए हैं ॥ आंगन में नींव, तापै आदित दिखायो वाहि, भोजन करायो, पाछे निशि चिन्ह पाए हैं। प्रगट प्रभाव देखि, जान्यो भक्ति भाव जग, दांव पाइ, नांव पस्यो, हस्यो मन, गाए हैं ॥ १०६॥ (५२३) वार्जिक तिलक। भागवतधर्म प्रचारक स्वामी श्रीनिम्बादित्य (निम्बार्क) जी के ग्राम में एक समय एक दंडी स्वामी आए; आपने उनका न्योता किया, संन्यासीजी इनके स्थान में आए । शिष्टाचार तथा रसोई में संध्या (वरंच अधिक विलम्ब) होगई; यतीजी ने वेदवचन का प्रमाण देकर कहा कि “रात्रि में रतीमात्र भी मैं पाता नहीं हूं।" यह मुन, आपको दया आई कि 'मेरेरामजी के यहां अतिथि उप- वास करे, (और मेरी ही असावधानता से!) यह विचारकर आपने १"रत्ती"माशा ॥ , २"दान"-पेच, अवसर, अवकाश, सन्धि, सुगमता ! AM RESS - स २६६ श्रीभक्तमाल सटीका कहा कि इस आंगन में जो "निम्ब" का वृक्ष है, उसपर देखिये कि अभी ("अर्क" वा "आदित्य") अर्थात् सूर्य देव विराजते हैं, और ऐसा ही दिखाके दंडीजी को सन्तुष्टतापूर्वक प्रसाद पवादिया। पीछे, (दो तीनघड़ी) रात्रि के चिह्न पाकर, दंडीजी ने आपका प्रभाव प्रकट देखा तथा जगत्में सर्वत्र इनकीभविभावकी दाव एवं महिमाप्राख्यात होगई, और इसीसे आपका यह नाम (निम्बार्क) विख्यात हुआ। इसी से मेरामन हर गया, और मैंने श्रद्धापूर्वक आपका यश गान किया। आप, दक्षिण में "श्रीगोदावरी गंगा" के तट "मुंगेर" नाम के ग्राम के वासी महाराष्ट्र ब्राह्मण "मरुण" जी और माता "जयन्ती- जी".के, पुत्र हैं। भगवान् ने "श्रीहंस" अवतार लेके श्रीसनकादिक को उपदेश किया और श्रीसनकादिक से श्रीनारदजी ने पाया, जिससे यह सम्प्र- दाय "सनकादिक सम्प्रदाय' कहलाता है। उसी को स्वामीजी ने श्रीनारदजी से पाके, प्रचलित किया; जिससे वही, श्रीनिम्बार्क (निम्बादित्य) सम्प्रदाय के नाम से विख्यात हुआ। गोलोकवासी श्रीकृष्ण भगवान् की माधुर्य उपासना, इस संप्रदाय की मुख्य बात है। आपकी गादी (१) अरुण और (२) सलेमावाद इत्यादिक नगरों में हैं। निम्बार्क सम्प्रदाय तथा श्री श्रीसम्प्रदायकी “श्रीगुरुपरम्परा" आगे देखिये-- १ श्रीनारायण ६ श्रीयामुनाचार्यजी २ श्रीलक्ष्मीजी १० श्रीपूर्णाचार्य ३ श्रीविष्वक्सेनजी ११ श्रीभाष्यकार स्वामी ४ श्रीशठकोपजी रामानुज ५ चोपदेवजी १२ श्रीहंसभगवान् ६ श्रीनाथमुनिजी १३ श्रीसनकादिक ७ श्रीपुण्डरीकाक्ष १४ श्रीनारदजी ८ राममिश्रपरांकुश १५ श्रीनिम्यादित्य KAMALEARSANGALOREM SEASSAKUs 5545525 मक्तिसुधास्वाद तिलक । (२) स्वामी अनन्त श्रीरामानुजजी। (१३६) छप्पय । (७०७) सम्प्रदायशिरोमणि "सिन्धुजा"रच्योभक्तिवित्तान। "विष्वकसेन” मुनिवर्य, सुपुनि “सठको" प्रनीता ॥ 'वोपदेव" भागवत लुप्त उधयो नवनीता ॥ मङ्गल मुनि श्रीनार्थ” “पुण्डरीकाक्ष" परमजस। “राममिथ" रस रासिः प्रगट परताप “परांकुस” ॥ “यामुन,” भुनि "रामानुज” तिमिर हरन उदय भान सम्प्रदाय शिरो मणि सिन्धुजा रच्यो भक्ति वित्तान ॥३०॥(१८४) (१३७ ) छप्पय । (७०६) सहस्त्रास्य उपदेश करि, जगत* उधारन जतन कियो॥ गोपुर लै आरूढ़, ऊंच स्वर, मन्त्र उचास्यो। सूते नर परे जागि, बहत्तरि श्रवणनिधाखो ॥ तितनेई गुरुदेव पधति भई न्यारी न्यारी । कुरुतारक शिष्य प्रथम भक्ति वपु मंगलकारी ॥ कृपणपाल करुणा स- मुद्र,"रामानुज सम नहिं वियो।सहस्रास्य उपदेशं करि, जगत उधारन जतन कियो॥३१॥ (१८३) वार्तिक तिलक। श्रीसिन्धुजा नाम (श्रीलक्ष्मी) महारानीजी का सम्प्रदाय, सब सम्प्रदायों का शिरोमणि, और संसारताप से बचाने के निमित्त भक्ति के मण्डप का चदोभा रचा हुआ है । श्रीश्रीजीमहारानी से, श्रीवि- प्वकसनजी भगवत्पार्पद; फिर उनसे पुण्यपुंज मुनिवर्य्यनम्रता-नीति- शील "श्रीशठकोप" जी; श्री"वोपदेव" जी कि जिनने श्रीमद्भागवत * पाठान्तर- उद्धरन । SANSALMANCHESTROLSPACK है HERUAR ॐ श्रीभक्तमाल सटीक। रूपीलुप्त मक्खन का उद्धार किया; मंगल स्वरूप "श्रीनाथमुनि जी; तथा परम यशस्वी श्री "पुण्डरीकाक्ष" जी; भनिरस के राशि श्री राममिश्र" जी; श्रीपरांकुशजी, कि जिनका प्रताप प्रगट है; स्वामी श्री ६ “यामुनाचार्य" जी; तथा भष्यकार स्वामी अनन्तश्री 'रामानुजजी, किजोसंसार के मोहान्धकार हरनेवाले सूर्य उदय हुए। ऊंचे गोपुर (बृहद्वारकोइल) पर चढ़के, अतिउच्चस्वरसे, श्रीम- न्त्रजी का उच्चारण किया, सोये हुये लोग जाग पड़े; बहत्तर ने अपने अपने श्रवण में रामकृपा से धारण किया; इसीसे उतनी ही अर्थात् वहत्तर न्यारी न्यारी पद्धतियां गुरुदेव की हुई; जिनमें प्रथम शिष्य श्रीकुरुतारक (श्रीकुरेशजी) को, मंगलकारा श्रीभक्ति प्रेम रूप ही जानिये । दीनपालक और करुणा के सागर, स्वामी श्री १०८ "रामानुज" जी के सरिस दूसरा कोई नहीं । आपने सहस्र मुखसे उपदेश करके जगत के उद्धारार्थ उपाय (प्रयत्न) किया। (१३८) टीका | कवित्त । (७०५) आस्य सो बदन नाम, सहस हजार मुख, शेप अवतार जानो, वही सुधि आई है। गुरु उपदेशि मन्त्र, कह्यो "नीके राख्यो" अन्त्र, जपतहि श्याम जू ने मूरति दिखाई है ॥ करुणानिधान कही “सव भगवत पा' चदि दरवाजे सो पुकास्यो धुनि छाई है । सुनि शिष्य लियो.यों चहत्तर हि सिद्ध भए नए भनि चोज, यह रीति लेकै गाई है ॥ १८७॥ (५२२) वार्तिक तिलक। आस्य नमा वदन (मुँह), सहस नाम सहस्त्र (१०००) यह जान लेना चाहिये कि आप सहस्र मुख श्रीशेष के अवतार हैं। श्री. गुरु “गोष्ठी पूर्णाचार्य" जी ने आपको मन्त्र देकर आज्ञा की कि "बड़े यत्न से अन्तःकरण में गुप्त तथा नीके रक्खो।" जपते ही श्रीभगवान् श्याम सुन्दर श्रीरामचन्द्र ने दर्शन दिये। मन्त्र का यह प्रभाव देख, आपकी करुणा की लहर उठी, जीवों पर दया आई, जी में कहा कि सब लोग प्रभु को.जिससे पावें सो १"आभ्य"-मुंह, बदन । २ "सहस"3२०००। . (0 RSS भकिसुधास्वाद तिलक। २६६ मन्त्र सबको सुना देना चाहिये । यो विचारकर, रात के समय गोपुर (फाटक) पर चढ़गए और वहां ही से चिल्ला के मन्त्रोच्चारण किया, अपूर्व ध्वनि छागई। ., यह शिक्षा पा, ७२ बहत्तर सिद्ध होगए। "जिसे चाहे पिया सोती जगावे" ॥ प्रत्येक की पद्धति न्यारी न्यारी हुई। यह चोज, यह नई रीति गाने योग्य है कि उधर परहित के लिये आपने श्रीगुरु आज्ञा उल्लंघन पापभार अपने शील पर धर लिया, और इधर भाव.. ग्राही गुरुतथा भगवान् ने इससे अपनी अतिशय प्रसन्नता प्रगट की। चौपाई। "रहति न प्रभुचित चूक किये की। करत सुरति सौ बार हिये की ॥ (१३६) टीका । कवित्त । (७०४) गए "नीलांचल" जगन्नाथ जू के देखिये कों, देख्यो अनाचार, सव पंडा दूरि किये हैं। संग ले हजार शिष्य रंगे भरि सेवा करें, धरै हिये भाव गूढ़ दरसाई दिये हैं ॥ बोले प्रभु “वेई आवें, फेरे अंगीकार मैं तो; प्यार ही को लेत, कभू औगुन न लिये हैं"। तऊ दृढ़ कीनी; फिरि कही, नहीं कॉन दीनी; लीनी वेद वाणी विधि कैसे जात दिये हैं ॥ १०८ ॥ (५२१) वार्तिक तिलक। श्रीजगन्नाथजी के दर्शन के लिये (उड़ीसा, पुरुषोत्तमपुरी में) एक बेर आप सहस्र शिष्यों सहित गए वहां धोनेमाँजने तथा वर- तन चौका आदिक विचार प्राचार का बड़ा अभाव पण्डों में देखकर, अनाचार को छुड़ाना चाहा; पण्डों को सेवा से अलग करके बड़े प्रेमसे पूजा सेवा करने लगे; महानुभावों के भाव बड़े गूढ़ होते हैं, उनका कहना ही क्या है ।। परन्तु सीधे पंडे दुखी हुए। "मालाचल-नीलगिरि, उड़ीसा प्रदेश में, जिस पर थीजगन्नाथजी का मन्दिर है। २"रंगभरि" प्रेम में पूर्ण होके, पूरी प्रीति से, स्नेह में भरके |३ "करे' किये, धारचुके । ४"नहीं कान दीनी," ज्यान नहीं दिया, उसके अनुसार चले नहीं । ५ "जात छिये है" क्षय वा नष्ट किये जाते हैं।

56*5SHA २६८ श्रीभक्तमाल सटीक। रूपीलुप्त मक्खन का उद्धार किया; मंगल स्वरूप "श्रीनाथमुनि" जी; तथा परम यशस्वी श्री "पुण्डरीकाक्ष" जी; भाकिरस के राशि श्री "राममिश्र" जी; श्रीपरांकुशजी, कि जिनका प्रताप प्रगट है; स्वामी श्री ६ “यामुनाचार्य" जी; तथा भष्यकार स्वामी अनन्तश्री 'रामानुजजी, किजोसंसार के मोहान्धकार हरनेवाले सूर्य उदय हुए। ऊंचे गोपुर (बृहद्वारकोइल ) पर चढ़के, अतिउच्चस्वरसे, ओम- न्चजी का उच्चारण किया, सोये हुये लोग जाग पड़े बहत्तर ने अपने अपने श्रवण में रामकृपा से धारण किया; इसीसे उतनी ही अर्थात् वहत्तर न्यारी न्यारी पद्धतियां गुरुदेव की हुई जिनमें प्रथम शिष्य श्रीकुरुतारक (श्रीकुरेशजी) को, मंगलकारा श्रीभनि प्रेम रूप ही जानिये । दीनपालक और करुणा के सागर, स्वामी श्री १०८ ''रामानुज" जी के सरिस दूसरा कोई नहीं । आपने सहस्र मुखसे उपदेश करके जगत के उद्धारार्थ उपाय (प्रयत्न) किया ।

" REKHE क भकिसुधास्वाद तिलक । २७१ ।, स्वामी अनन्तश्रीरामानुजजी का समय कलि । विक्रमी ईसवी शक गतं.वर्ष जन्म ४११८ १०७४ १०१७ ६३६ ७६७ परधाम ४२३८ ११६४११३७७ १०५६ ८८७ वर्तमान ५००५/१६६१, १६०४ १८२६ वय १२०वर्ष "कल्यऽव्देषु प्रयातेष्वहहसुनिशी नाथ चन्द्राब्धिसत्ये प्वायाते पिंगलादे सवितरि च गते मेषराशिं मृगांके । आस्थे कान्तिमत्यां हरितकुलमणेः केशवाख्यद्विजाग्याच्छीमत्यां भूतपुर्या- मथ, धरणितलेऽभूत्स रामानुजार्यः* ॥ १॥" ("विष्णुचिन्ह" ग्रन्थे) पिंगल नाम संवत्सर में मेष शंक्रान्ति के पीछे आर्द्रा नक्षत्र में कान्तिमती माता के गर्भसे हारितगोत्री केशव नाम याज्ञिक ब्राह्मण से श्रीभूतपुरी में श्रीरामानुजजी प्रगट हुये ।। भाष्यकार सम्प्रदाय शिरोमणि (श्रीलक्ष्मीपद्धति) के प्रसिद्धकर्ता, संसारसागर के लिये दीर्घनाव,भकजनोंके कल्पतरु,श्रीभनिरूपीभूमि को स्थिर रखने के लिये दिग्गज,भागवतधर्म के प्रचार तथा प्रकाश के हेतु सूर्य के समान, स्वामी अनंतश्रीयतीन्द्र रामानुज महाराज- जी के रूप से श्रीशेषजी, भगवान् की आज्ञा से, पृथ्वी पर द्राविड़ देश में कांचीपुरी के पास श्रीकावेरीगंगा के तट "भूतनगरी"ग्राममें, " * आपके जन्म को "आठसौ वर्ष से अधिक (७); हुए । । ऐतिहासिक तत्ववेत्ता "हरप्रसाद शास्त्री एम० ए०" ने भी ११३७ ही ( ईसवी) आपके परधाम का समय लिखा है ; Dr. 1w. W. Hunter f A. तथा " A.C. Mukerji, M. A.; मुंशी श्रीतपस्वी रामजी, और R. C. Datti; इन सब ही ने "12bt. cene tury (ईस्वी यारहवीं शताब्दी)" लिखी है ॥ Dr. V. V. Hunter; ने ११३७ फी जगह सीधे-सीधे ११५० लिख दिया है। केवल १३ वर्ष मात्र का भेद ( इतने में ) भेद है फ्या' अपने अन्यों से ११३७ ही ठीक है । धीयतीन्द्रजी के यश थी "प्रपन्नामृत" में देखिये ।

२७० 9%455 श्रीभक्तमाले सटीक नेम से अधिक प्रेम के चाहनेवाले प्रभुने स्वप्नमें दर्शन देकर,कहा कि "मैं मंडों को अंगीकार कर चुकाहूं मैं कदापि दोपों पर दृष्टि नहीं देता,प्रेम ही को ग्रहण किया करता हूं; वेही लोग आकर सेवा करें"। तवं भी, आप अपने आचार की रीति में दृढ़ ही रहे। श्रीजगन्ना- थजी ने पुनः पुनः आज्ञा की, पर आपने एक न सुनी; वरन प्रार्थना की कि प्रभो ! देखिये आपकी सेवा-विधि वेद में कैसी वर्णित हैं, भला मैं उन्हें क्यों कर छोड़सकताहूं ॥ (१४०) टीका । कवित्त । (७०३) जोरावर भक्न सो बसाइ नहीं, कही किती, रती हूं न लावें मन चोज दरसायो है । गरुड़ को आज्ञा दई, सोई मानि लई उन, शिष्यनि समेत निज देश छोडि आयो है । जागि कै निहारे, ठौर और ही, मगन भए, दए यों प्रगट करि गढ़ भाव पायो है । वेई सब सेवा करें, श्याम मन सदा हरें, धरै सांचो प्रेम, हिय प्रभु जू दिखायो है ॥ १०६ ॥ (५२०) वार्षिक तिलक । प्रेमयुक्तनेम का वल भी कैसा भारी है, कि जिससे स्वयं प्रभु भी हार मान जाते हैं। प्रभुने कितनी ही कही, परन्तु अापके प्रेमभरे हृदय में एक भी न लगी। अन्ततः, श्रीजगन्नाथजी ने श्रीगरुड़जी को आज्ञा दी कि "इन कों सब सेवकों सहित रात्रि ही में श्रीरंगपुरी पहुँचा आओ।" श्री- खगेशजी ने वैसा ही किया। नींद टूटी तो आपने सवको श्रीजगन्ना- थपुरी में न पाकर श्रीरङ्गधाम में देख के, शीलसंकोचसिन्धु प्रभु के स्वभाव तथा गूढ़ भाव को देख कर, आप प्रेम में डूब गए॥ वहां, वेही पंडालोग फिर सेवापूजा करनेलगे। सेवा के विरह- वियोग के अनन्तर जो पुनः मेवाकी प्राप्ति हुई, इससे उनकी प्रीति दूंनी होगई। प्रभु को सदैव अपनी पूजा से अति ही प्रसन्न रखने लगे। .१ "जोरावर" बलवन्त, बेली, प्रबल । २"किती कितनीही।.३ "रती रत्ती, एक माशेका ३ (नाठयां) भाग, अति अल्प, कुछ भी नहीं। More ह भक्तिसुधास्वाद तिलक। २७१ 3, स्वामी अनन्तश्रीरामानुजजी का समय कलि । विक्रमी ईसवी | शक 'गत वर्ष ४११८ १०७४ १०१७ ६३६ ७६७ परधाम ४२३८ ११६४,११३७७ १०५६ ८८७ वर्तमान । ५००५ १६६१ १६०४ १८२६ वय १२०वर्ष "कल्यऽब्देषु प्रयातेष्वहहसुनिशा नाथ चन्द्राब्धिसङ्ख्ये वायाते पिंगलादे सवितरि च गते मेषराशिं मृगांके ॥ आस्थे कान्तिमत्यां हरितकुलमणेः केशवाख्यद्विजाग्याच्छीमत्यां भूतपुर्या- मथ, धरणितलेऽभूत्स रामानुजार्यः* ॥ १॥" ("विष्णुचिन्ह" ग्रन्थे) पिंगल नाम संवत्सर में मेष शंक्रान्ति के पीछे आर्द्रा नक्षत्र में कान्तिमती माता के गर्भ से हारितगोत्री केशव नाम याज्ञिक ब्राह्मण से श्रीभूतपुरी में श्रीरामानुजजी प्रगट हुये ।। भाष्यकार सम्प्रदाय शिरोमाणि (श्रीलक्ष्मीपद्धति) के प्रसिद्धकर्ता संसारसागर के लिये दीर्घनाव,भक्तजनोंके क्ल्पतरु,श्रीभक्तिरूपीभूमि को स्थिर रखने के लिये दिग्गज, भागवतधर्म के प्रचार तथा प्रकाश, के हेतु सूर्य के समान, स्वामी अनंतश्रीयतीन्द्र रामानुज महाराज- जी के रूप से श्रीशेषजी, भगवान् की आज्ञा से, पृथ्वी पर द्राविड़ देश में कांचीपुरी के पास श्रीकावेरीगंगा के तट "भूतनगरी"ग्राममें, D * आपके जन्म को "आठसो वर्ष से अधिक (८७), हुप । । ऐतिहासिक तत्ववेत्ता "हरप्रसाद शास्त्री एम० ए०" ने भी ११३७ ही ( ईसबी) आपके परधाम का समय लिखा है , Dr. W. W. Hunter I A तथा " A. C. Mukerji, M. A., मुंशी श्रीतपस्वी रामजी, और R. C. Datta, इन सव ही ने "12bt. century (ईस्वी यारहवीं शताब्दी)" लिपी है ॥ Dr. W. V. Hunter, ने १९३७ की जगह सीधे सीधे ११५० लिख दिया है। केवल १३ वर्ष मात्र का भेद (इतने में ), भेद है क्या अपने प्रन्थों से ११३७ ही ठीक है। धीयतीन्द्रजी के यश श्री "प्रपन्नांमृत" में देखिये ।

श AKASH २७२ ।। श्रीभक्तमाल सटीक ।। अ श्रीहारीत ऋषीश्वर के वंश (गोत्र में,)"श्रीकेशवजज्वा" नामक याज्ञिक ब्राह्मण की धर्म पत्नी "श्रीकांतिमती" जी के गर्भ से पिंगल नाम संवत्सर में मेप संक्रान्ति के पीछे पार्द्रा नक्षत्र में चैत शुक्ल पंचमी गुरुवार को, अवतीर्ण हुए । श्रीकेशवजवाजी के गुरु श्री "शैलपूरण” जी ने आपके संस्कार किये कांचीपुरी में पंडित यादव गिरि से १६ सोलह वर्ष की अवस्थामे वेदांत पढ़तेथे। उसी अवस्था में उनके पिता का वैकुण्ठ बास हुआ। वहां के राजा की सुता एक ब्रह्मराक्षस से पीड़ित थी; राजा के वुलाने से यादव पंडित, अपने शिष्य श्री १०८ रामानुजजी समेत, वहां गया। ब्रह्मराक्षस ने कहा "तुझसे मैं नहीं जानेका, पर यदि तेरें यह शिप्य श्रीरामानुजजी अपना चरणामृत मुझे दें तो मैं अभी इसको छोड़दूं" | राजा के विनय से श्रीस्वामीजी ने अपना चरणतीर्थ ब्रह्मराक्षस को दिया वह कृतकृत्य हो गया । लड़की सुखी होगई। इस बात में, और "कप्यास" शब्द के अर्थ निरूपण, में तथा अद्वैतमत के खंडन में आपका महा प्रभाव देख, मत्सर से भर, 'उक्त पण्डित यादव आपका शत्रु बरन आपके प्राण का गाहक हो गया। वह अपने एक निज शिष्य से सम्मति करके, चुपचाप त्रिवेणी में डुबा देने के निमित्त, आपको तीर्थ यात्रामिसु श्रीप्रयांग- जी ले चला। आपके मौसेरे भाई "गोविन्दजी" भी उसी पण्डित से पढ़ते थे; श्रीरामकृपा से इनको उस दुष्ट पण्डित की गुप्त इच्छा जान्ने में 'आगई; इनने आपको सावधान कर दिया । आप मार्ग के एक वन में छुप रहे और श्री "असहायों-के-परम-रक्षक" जी का स्मरण करने लगे। करुणासिन्धु भक्तवत्सल श्रीलक्ष्मीनारायणजी ने, व्याधा मिल्ल और मिलिनी के वेप से आपके पास उस वन में रातभर रहके आपकी रक्षा की और प्रातःकाल आपके हाथों से एक कूप का जल SHES SAKASEAt भनिसुधास्वाद तिलक। २७३ पीके वे दोनों अन्तर्धान हो गए ; और आपने अपने को काञ्चीपुरी में पाया, श्रीजनरक्षक भगवान् का धन्यवाद कर घर जा, माता के चरणों के दर्शन कर इनसे सारा वृत्तान्त सुनाया। श्रीमातु कान्तिमतीजी ने उपदेश दिया कि "वत्स ! काञ्चीपुरी सत्यवत-क्षेत्र" में श्री "काञ्ची पूरण" नाम वैष्णव महात्मा (श्री. यामुनाचार्यजी के शिष्य ) श्रीलक्ष्मीनारायणजी के अनन्योपासक है। बेटा ! तू जाके उनसे मिल सब प्रसंग सुना और महात्माजी जो आज्ञा दें सो करना।" आपने वैसा ही किया। श्रीकाञ्चीपूरणजी ने बताया कि "वत्स! ..भिल्लिनी तथा व्याध के वेष में स्वयं श्रीलक्ष्मीनारायणजी थे, जिन्होंने कृपा करके तुझे उस कूप के जल का माहात्म्य लखाया है। इसका आशय यह है कि उस कूप के जल से तू प्रभु की (श्रीवरद- राजभगवान् की) सेवा कर, तेरे सकल मनोरथ पूरे होंगे, प्रभु तुझपर विशेष कृपा करेंगे।" यह सुन, आनन्द मग्न हो, धन्यवाद दे, आपने ऐसाही किया ॥ श्रीआलवन्दारस्तोत्र के कर्ता श्रीयामुनाचार्य महाराजजी जो श्रीरङ्ग भगवान् की सेवा में उस समय थे, आपको (श्रीरामानुज, स्वामी को) बड़े योग्य बालक समझकर अपने एक शिष्य को.आप के लाने के लिये भेजा। माज्ञानुसार आप श्रीरङ्ग नगर को चले.॥ परन्तु आठ दिन के भीतर ही श्रीरंग भगवान् की आज्ञापा श्री ६ यामुनाचार्य स्वामी शरीर त्याग कर परमधाम को चले गए। इस कारण यहां आने पर आपने श्रीस्वामीजी महाराज का दर्शन न पाया; केवल शरीरमात्र को श्रीकावेरी तट पर बड़ी भीड़ भाड़ के मध्य देखकर प्रणाम किया। बड़े शोक मग्न हुए ॥ 'श्रीस्वामीजी की तीन उङ्गलियां मुड़ी देखकर आपने कहा कि "इसका तात्पर्य यदि अमुक तीन, चाते हैं, तो अंगुलियां खुल जावें ।" इस वचन के उच्चारण के साथ ही तीनों अंगुलियां एक एक करके खुल ही तो गई और इसी आश्चर्य संघट के समय से सब लोग आपका अधिकतर आंदर करने लगे। वे तीनों वाले ये थी- SPESH २७४ श्रीभकमाल सटीक। . । (१)श्रीसंप्रदाय प्रचार । (२) ब्रह्मसूत्र पर भाष्य करना । (३) ईश्वर जीव माया की व्याख्या करनी। आपने श्री ६ यामुनाचार्यजी के पांच शिष्यों से उपदेश लिये, अर्थात्- (१) श्रीमहापूर्णजी से, पंच संस्कारयुत श्रीनारायण मन्त्र; (२) श्रीकाञ्चीपूर्णजी से, श्रीवरदराज की सेवा विधि (३) श्रीगोष्ठीपूर्णजी से, श्रीराम षडक्षर मन्त्रराज ; (४) श्रीशैलपूर्णजी से, श्रीरामायणजी के अर्थ (५)श्रीमालाधरजी से, सहस्रगीति के अर्थ ॥ इसके पश्चात् विरक्त हो आपने त्रिदंड धारण किया ॥ चौपाई। "धरे त्रिदण्ड उदण्ड पानि में । रति अछिन्नजानकीजानि में"। आप श्रीरंगनगर में पहुँच, श्रीरंगभगवान् की सेवा में रहने लगे। यह वार्ता तो पूर्व ही लिखी जा चुकी है कि रात को गोपुर पर चढ़के मन्त्र उच्चस्वर से उच्चारण करके आपने जीवों को कृतार्थ कर दिया। श्रीजगन्नाथपुरी का चरित भी ऊपर ही कहा गया है । ऊपर के लिखे तीनों कार्यों में लगे और पूरा किया। दिग्विजय में अनेक प्रदेशों को कृतार्थ और लाखों मनुष्यों को श्रीभगवान् के शरणागत कर दिया । आपके अतिप्रिय शिष्य "श्रीकू- रेशजी" ने तथा "पण्डित यादव की माताजी ने भी अपने पुत्र को (उक्त पण्डित को) बहुत कुछ उपदेश किया कि "यतीन्द्र महाराज का शिष्य होजा, नहीं तो तेरा कल्याण नहीं।" तब वह आपका शरणागत हुआ, आपने उसके पंचसंस्कार कर गोविन्दप्रपन्न उनका नाम रक्खा ॥ वारहसहस्र सेवक साथ रहा करते थे; चौहत्तर वा पचहत्तर तो मुख्य शिष्य थे, जिनसे जगत्में शरणागति उपदेश का प्रचार हुआ। दिल्लीपति यवन के यहां से एक भगवन्मूर्ति लाकर आपने । RE भक्तिसुधास्वाद तिलक २७५ विराजमान किया । उस बादशाह की लड़की भी भगवत् प्रेमिन होकर परम पद को गई। एक स्त्रीभक्त विषयी को जिस प्रकार से आपने हरि सम्मुख करके "धनुर्दास" नाम रक्खा, वह चरित्र; तथा विषयी बनिये को.सुमति प्राप्त होने के घृतान्त भी, सुनने ही योग्य हैं । आपके सुयश अपार हैं । "प्रपन्नामृत" नामक ग्रंथ में, आपके जन्म से भगवद्धाम यात्रा पर्यंत के मुख्य मुख्य चरित्र सब, संक्षेप से, वर्णित हैं । अपने सम्प्रदाय के प्रत्येक मूर्ति को अवश्य देखना सुनना चाहिये । कहते हैं कि आप १२० (एक सौ वीस) वर्ष पृथ्वी पर विराजते रहे। * श्राप कलि संवत्सर ४२३८, विक्रमी संवत् ११६४ (कलि- युग की पांचवीं सहस्राब्दी में) अर्थात् विक्रमी ११६४ तक इस भूमि पर वर्तमान थे ऐसा महानुभावों ने तथा ऐतिहासिक विज्ञों ने लिखा है। (३) श्रीविष्णुस्वामीजी। श्रीशिवजी ने यह सम्प्रदाय पहिले श्रीप्रेमानन्द (परमानन्द) मुनिजी को उपदेश किया; इसीसे यह “शिव (रुद्र) सम्प्रदाय" कहा जाता है । "श्रीपरमानन्द मुनिजी" "श्रीविष्णुकांची" पुरी में हुए। आप श्रीवरदराज महाराज के मन्दिर में पूजा सेवा किया करते थे । भगवान् श्रीवरदराज प्रसन्न होके श्रीशिवजी को आज्ञा दी, जिन्होंने मन्त्र उपदेश करके (सात वर्ष के) बालकरूप का ध्यान बताया। इस सम्प्रदाय का श्रीविष्णुस्वामीजी ने प्रचार किया, कि जो दक्षिण देश में ब्राह्मणवंश में हुए । इसलिये "विष्णुस्वामी सम्प्रदाय” प्रसिद्ध हुआ ॥ परम्परा में आप श्रीवरदराज भगवान् से पचासवें, श्रीप्रेमानन्द मुनि से ४८ वें हैं। आपके परहित तथा उदार चित्त को समझ श्रीजगन्नाथजी ने अपने मन्दिर में चार द्वार कर दिये। RE । N २७६ श्रीभकमाल सटीक। (४) श्रीमध्वाचार्यजी। पहिले भगवत् ने यह (माध्व) सम्प्रदाय श्रीब्रह्माजी को उपदेश किया। श्रीमध्वाचार्य फिर इसका प्रचार श्रीमध्या- चार्य स्वामीजी से हुआ । श्रीमध्वा. श्रीनरहर्याचार्य चार्यजी द्राविड़ देश में कांचीपुरी से पश्चिम दक्षिण (नेर्धत्य ) कोने पर सुबुद्धाचार्य "उरपी कृष्णा" ग्राम में ब्राह्मण श्रीवेदव्यास हुए। आपने पंजाब देश में राजा को परिचय दे, उसका अभिमान नष्ट श्रीनारदजी कर, उसको उसके दल समेत हरि श्रीब्रह्माजी सम्मुख कर दिया। श्रीहंसभगवान् (१४१ ) छप्पए । (७०२) चतुर मन्त चतुर महंत दिग्गज चतुर, भक्तिभूमि दावे रहैं । "श्रुतिप्रज्ञा "श्रुति देव" "ऋषभ""पुहकर"इभऐसे। "श्रुतिधामो श्रुतिउदधि" "पराजित "वामन"जैसे। श्रीरामानुज गुरुबंधु विदित जग मङ्गलकारी । "शिवसंहिता”-प्रणीत ज्ञान सनकादिक सारी ॥ इन्दिरा पद्धति उदारधी, सभा साखि सारंग + कहैं। चतुर महंत दिग्गज * चतुर, भक्ति मूमि दावे रहैं । (१) ऋषभ (२) पुहकर (३) पराजित (४) वामन । • "इम"-यारण, करि, मिन्धुर, गयन्द, गज, हस्ती, हाथी । । "सारी" श्व, स. रिस, नाई, सरीखा, समान। + "इन्दिरा पद्धनि"-श्री श्रीसम्प्रदाय, श्रीलक्ष्मीजी का मार्ग। "सारेंग" प्रत्त गजेन्द्र, पपीहा, भ्रमर, रामगुणगायक, भात | "दिग्गज चतुर" चारों दिशाओं के हाथी, नाम ॥ SHAGHIRASAASAASAS Check भाकिसुधास्वाद तिलक । २७७ १. श्रुतिप्रज्ञा २. श्रुतिदेव ३. श्रुतिधामा. ४. श्रुतिउदधि षभ पुष्कर पराजित वामन बार्तिक तितक। . चारों महन्त, चारों दिग्गजों की भांति, भक्तिरूपी धरती को दवाए रहते हैं । श्रीश्रुतिप्रज्ञाजी तथा श्रीश्रुतिदेवजी, "ऋषभ" और "पुष्कर" नाम के दिशागजों के सरिस हैं; एवं श्रीश्रुतिधामाजी तथा श्रीश्रुतिउदधिजी, "पराजित" और "वामन" सरीखे हैं। ये चारों महानुभाव, स्वामी अनन्त श्रीरामानुज महाराजजी के गुरुभाई जगत् के बड़े मंगलकारी और जगत् में प्रसिद्ध हैं । शिव- -संहिता में जैसा वर्णन है, उसी रीति.से सनकादिक चारों भाइयों के समान एकतुल्य ज्ञानी हैं । श्रीलक्ष्मीजी के सम्प्रदाय में अति उदार बुद्धिवाले हैं । सन्त सभा के (पक्षपातरहित )साक्षी सज्जन, इन चारों भनिरक्षकों को श्रीरामानुरागमें मत्त गजराज ही कहा करते थे; अतएव अपने भजन सदाचारों से भक्तिरूपी भूमि को ऐसा दवाए रखते हैं कि किंचित् डगने डोलने नहीं पाती। (१४२) छप्पय । (७०१) (श्री) आचारजजामांत की कथा सुनत हरि होइ रति॥कोउमालाधारी मृतक बह्यो सरिता में आयो। दाह कृत्य ज्यों वन्धु न्योति सब कुटुंव बुलायो। नाकसकोचहिं विप्र तबहिं हरिपुर जन आए । जेंवत देखे सवनि, जात काहू नहिं पाए ॥ “लालाचारज" १ "जामात" सुता का पति, शमाद, जमाई । २ "हरिपुर" वैकुण्ठ । Rel ४ श्रीभक्तमाल सटीक। २७८ लक्षधा प्रचुर भई महिमा जगति । (श्री) आचारज- जामात की कथा सुनत हरि होइरति॥३३॥ (१८१) (५) श्रीलालाचार्यजी। वात्रिंक तिलक। कोई मालाधारी मृतकशरीर नदी में बहता हुआ जा रहा था; श्रीलालाचार्यजीने गुरुभाई सरीखा उसकी दाहक्रिया इत्यादि करके, ब्राह्मणों तथा सब कुटुम्वों को न्योता देके बुनाया। भूसुर लोगों ने अनजाने मृतक के भण्डारे को जानकर नाकसिकोड़ भोजन नहीं स्वीकार किया; तव वैकुण्ठ से हरिजन लोग हरिकृपा से आके प्रसाद पाने लगे। उनको जेंवते तो सबों ने देखा परन्तु जाते हुए उनको किसी ने नहीं देखा । इससे श्रीलालाचार्यजी का माहात्म्य जगत् में लाखों गुना अधिक प्रसिद्ध हो गया। आचार्य स्वामी श्रीरामानुजजी महाराज के जामाता की यह कथा जो सुनेगा तिसकी श्रीभगवत् तथा वेषधारी भागवतों में अवश्य प्रीति होगी। (१४३) टीका | कवित्त । (७००) आचारज को जामात, बातताकी सुनो नौके, पायो उपदेश "सन्त बन्धु करि मानिये । कीजै कोटि गुनी प्रीति," ऐपै न बनति सीति तातें इति करो याते घटती न आनिये ॥ मालाधारी साधु तनु सरिता में बह्यो आयो, ल्यायो घर फेरिकै विमान सब जानिये। गावत बजावत लै नीर तीर दाह कियो, हियो दुख पायो सुख पायो समाधानिये ॥ ११०॥(५१६ चार्तिक तिलक। स्वामी श्री १०८ रामानुजजी के जामाता श्रीलालाचार्य की कथा भली भांति सुनिये । श्रीगुरुमहाराज ने उपदेश किया कि "सन्तों को अपने भाई मानना और भाई से कोटि गुनी प्रीति १"लक्षधा"-लक्षगुण, लास गुना । २ "जगति"-लोक में। ३"इति"-मर्यादा, सीमा। RECSCRECERESO भक्तिसुधास्वाद तिलक। २७६ उनसे करनी" तब श्रीलालाचार्यजी ने कहा कि "स्वामिन् आज्ञा तो हुई परन्तु कोटि गुनी प्रीति रीति वनती तो नहीं" तब श्री गुरुस्वामी ने कहा कि, " (ताते) भाई की प्रीति से, सन्तों में न्यून न होने पावै इति॥ एक बेर आपने एक मालाधारी मृतक शरीर नदी में बहते पाया। वेष से सन्त जानके उसमें भ्राता तनु का भाव मानके उसे घर ला, विमान पर विठा गाते वजाते फिर उस नदी के तीर ले जाके उसकी दाहक्रिया की। (१४४ ) टीका । कवित्त । (६६९) कियो सो महोच्छो, ज्ञाति विप्रन को न्योतो दियो, लियो आए नाहिं कियो शंका दुःखदाइयें । भए. एक ठौरे, माया कीनी सव चौरे कछु कहें वात और मरी देह वही आइयें ॥ याते नहीं खात, वाकी जानत न जाति पांति, बड़ौ उतपात घर ल्याइ जाइ दाहिये। मैंग अवलोकि उत पस्यो सुनि शोक हिये जिये आइ पूछे गुरु कैसेके निबाहियें ॥ १११॥ (५१८) वार्तिक तिलक । इनने अपने भाई सरीखा उसकी तेरहीं का महोत्सव किया; ब्राह्मणों और अपने जातिवर्ग को नेवता दिया; उन्होंने नेवता तो लेलिया, परन्तु आए नहीं; क्योंकि इन महात्माजी की दुखदेनेवाली शंका उन्होंने की; और जात्यभिमानरूपी मद से वावरे वे सव इकडे होके और की औरही कहने लगे कि “देखो उस मृतक का शरीर नदी में बहके आया था, उसको घर लाके,घाट पर लेजाके,उसको जलाया, कर्म किया; उसकी जाति पांति कुछ भी जानते नहीं, सो यह बात तो बड़ेही उत्पात की है।" ऐला गठ के कहा कि "हम सब भोजन नहीं करेंगे।" १ "लियो"-न्योतो लियो। २ "माया कीनी" बखेड़ा गठा, भंझट खड़ा किया, जाल फैलाया । ३ "कहै वात औरे" दूसरी ही वार्ता कहने लगे। ४ "मगअवलोकि" बाट हेरके, मार्ग देखक, प्रतीक्षा करके । ५ "पू गुरु" श्रीगुरुजी से पू© ।. ६"कैसकै ?"-किस प्रकार से? ॥

२८० श्रीभक्तमाल सटीक। श्रीलालाचार्यजी ने उनकी प्रतीक्षा की; पर जब वे न आए और उनकी दुष्ट सम्मति सुनने में आई, तब आपका हृदय शोका- कुल हुआ। जी में यह वात आई कि चलं, श्री १०८ गुरुदेव स्वामी से पूर्छ कि अब किस भांति मेरा निर्वाह होवे ?॥ (१४५) टीका | कवित्त । (६६%3D ) चले श्रीआचारज पै वारिज बदनदेखि, करि साष्टाङ्ग,वात कहि सो जनाइयो "जाओ निहशंक, वे प्रसाद को न जाने रंकजा. जे प्रभाव, भावें वेगि सुखदाइयै ॥” देखे नभ भूमि द्वार ऐहैं निरधार जन वैकुंठ- निवासी पांति ढिग द्वैकै आइयै । इन्हें अब जान देवो जनि कळू कहो अहो गहो करौ हांसी जब घर जाँइ खाइयै ॥ ११२॥(५१७) पातिक तिलक। ये श्रीआचार्यजी महाराज (भाष्यकारस्वामी ) से प्रार्थना क- रने को चले; जाके मुखकमल का दर्शन कर सप्रेम सादर साप्ताह दण्डवत् किये; और वे सव बातें निवेदन की । आपने आज्ञा की कि "उन अभागे कैंगलों को श्री-भगवत्-प्रसाद का माहात्म्य विदित नहीं॥ (श्लो०) "प्रतिमामन्त्रतीर्थेषु भेषजे वैष्णवे गुरो। यादृशी भावना यस्य, सिद्धिर्भवति ताशी ॥" तुम निःशंक जाओ निश्चिन्त रहो; क्योंकि जो दिव्य महानुभाव श्रीप्रसाद का अनुपम प्रभाव जानते हैं, वेही सुखदाई शीघ्र कृपा करके आवेंगे।"श्रीश्राचार्य स्वामी ने इतना कहके आकाश की भोर देख के फिर भूमि को देखा । तात्पर्य यह कि वैकुण्ठवासी पार्षदों का ध्यान स्मरण करके आकाश के ओर देख के मही में आवाहन किया । फिर कहा कि "जावो श्रीवैकुण्ठनिवासी भगव- जन नभमार्ग से निराधार उतरके तुम्हारे द्वार होके गृह में भावेंगे।" ऐसी आज्ञा सुन शिरपर धारण कर साष्टाङ्ग करके अपने गृह में आए। उसी समय श्रीवैकुण्ठनिवासी जनों की पंक्ति उन विमुखों के निकट होके श्रीलालाचार्यजी के गृह में आई। वे अभक्त लोग देखके १"रङ्क"-श्रीभगवद्भक्तिसंपत्ति से हीन, दरिद्धी । २ "श्रहो" हे भाइयो! ॥

BAR BIRURE भकिसुधास्वाद तिलक। २८१ परस्पर कहनेलगे कि "हे भाइयो ! अभी इन सवों को जाने दो, कुछ कहो मत, फिर जब भोजन करके अपने घर जाने लगें तब प- कड़ के अपने समीप विठा के अच्छे प्रकार हांसी निन्दा करो।" (१४६) टीका | कवित्त । (६६७) आए देखि पारषद, गयो गिरि भूमि सद, हदै करी कृपा यह जानि निज जन को। पायो लै प्रसाद स्वाद कहि अहलाद भयो, नयो लयो मोद जान्यो सांचो सन्त पन को॥ बिदा पधारे नभ, मग में सिधारे; विष देखत विचारे द्वार, व्यथा भई मन को । गयो अभिमान अनि मन्दिर मगन भए नए दृग लाज; बीनि बीनि लेत कनको ॥ ११३ ॥ (५१६) पातिक तिलक। श्रीलालाचार्यजी ने अपने गृह में श्रीभगवत्पार्षदों को आए देख भमि में गिरके, साष्टाङ्ग दण्डवत् किये, और हाथ जोड़ आप कहने लगे कि “आप सबोंने इस दीन को अपना जन जान के इसके ऊपर निःसीम कृपा की ।" पार्षदों ने प्रसाद ले के पाया ( भोजन किया), और उसके स्वाद का बखान कर कर श्रीलालाचार्यजी को बड़ाही आनन्द दिया; इनने ऐसा यह मोद प्रमोद पाया कि जो अपूर्व था और पहिले कभी भी प्रास न हुआ था। तब भली भांति जाना कि सन्तों का प्रण कैसा सच्चा होता है। सर्वज्ञ श्रीपार्षदवृन्द विदा होके आकाशमार्गसे चले ब्राह्मण लोग मग में द्वार पर खड़े खड़े देखतेही रहे । जब जाना कि वे तो प्रा. काशमार्ग से लोटे चले जा रहे हैं, वैकुण्ठसे आए थे, तब उन सबोंके मन में बड़ाही पश्चात्ताप हुआ; अब उनका जात्यभिमान गया। और आँखें नीची हुई, नम्र तथा लजिन हुए, और श्रीलाला- चार्यजी के गृह में आके प्रेमानन्द में मग्न भी अवशिष्ट प्रसाद के कण, जो भूमि में गिरे पड़े थे, उनको चुन- चुन के पाने लगे॥ ?"सद"पजन (श्रीलालाबार्यनी)।२ "हद" इति । RECENTRE , २८२ श्रीभनमाल सटीक। (१४७ ) टीका | कवित्त । (६६६) पाइ लपटाइ अंग धरि में लुटाए कहैं "करो मन भायो,” और दीन बहु भाष्यो है । कही भक्तराज "तुम कृपा में समाज पायो, गायो जो पुराणन में रूप नैन चाप्यो है" ॥छाड़ो उपहास अब करो निज दास हमें, पूजै हिए आस मन अति अभिलाप्यो है । किये पर- शंस मानो हंस ये परम कोऊ ऐसे जस लाख भांति घर घर राख्यो ॥ ११४ ॥ (५.१५) वात्तिक तिलक। वे ब्राह्मण श्रीलालाचार्यजी के चरणकमलों में लपट गए, वहां की धूरि में लोटने लगे, और यों वोले कि "आप महात्मा हैं जिस प्रकार से हम आपको प्रिय लगें सो वैसा कीजिये, अर्थात शिष्य करके भगवभक्त कीजिये।" इसी प्रकार से बहुत सी दीनतापूर्वक बातें कहीं। श्रीभक्तराज (लालाचार्य) जी ने कहा कि "आपही के न आने से तो इस दिव्य समाज की सेवा का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ; अतः आपकी कृपा का में धन्यवाद करता हूं कि जिससे मैंने उन भगवत्पार्षदों के रूप के दर्शन पाए कि जिनका पुराणों में व- खान सुना था।" तब उन विनों ने पुनः प्रार्थना की कि "अब आप हमारी हँसी तो कीजिये नहीं; वरन दया करके हमको अपना दास बना लीजिये। हम सबोंके मन की यह अति अभिलाषा पूर्ण कीजिये।" तब श्री लालाचार्यजी ने सबोंको श्रीमंत्र तिलक आदिक पंचसंस्कार करके लोकवेद में परमप्रशंसनीय हंसों के समान वेष तथा विवेकयुक्त कर दिया। इत्यादि । इसी प्रकार श्रीलालाचार्यजी के यश, लक्ष विधि के, देश में घर घर सब कोई मन में तथा मुख में भी, रक्खे अर्थात् गान किए। (६) श्रीश्रुतिप्रज्ञजी। आप ब्राह्मण थे; लड़कपनसेही बड़े नैरागी तथा नामानुरागी MARCHIRECTORS R ॐ R**** भक्रिमुधास्वाद तिलक। २८३ रहे, और अपने मन में वैष्णवों में जातिभेद नहीं रखते थे। आप देशों में विचरके भगवन्नाम का उपदेश किया करते तथा भक्ति ही को भारी आचार समझते थे। नीलाचल के मार्ग में एक अति प्रेमी श्वपच को साष्टाङ्ग करते पाके उठाकर उसको अपने हृदय में लगा लिया और अपने पट से उसके अंग की धूरि झाड़ डाली। उसके हाथों में महाप्रसाद था सो लेके सादर पागए। रात भर उस प्रेमी श्वपच को अपने साथ रखके सबेरे अतिशयआदर-पूर्वक बिदा किया। श्रीजगदीश दर्शन कर, सुयशभाजन रहे, और परधाम को गए। (७) श्रीश्रुतिदेवजी। आप बहुत से सन्तों का समाज साथ में लिये, श्रीरामनाम कीर्तनपूर्वक विचरते, और सब लोगों को कृतार्थ किया करते थे। एक समय एक अभक्त राजा के नगर में पहुँचे जहां कोई नदी ता- लाव नहीं, केवल वापी तथा कूएं ही राजवाटिकाओं में थे। जब साधु लोग उपवन के कूपों में स्नान करने गए, मालियों ने उनको रोक दिया। सन्त दुःखी हो स्वामीजी से कप्ट निवेदन करने लगे। आपने कहा कि विना स्नानही नामकीर्तन कर लो और तब इस नगर को छोड़ चलो। यह आज्ञा सुन इधर सन्त हरिभजनमें लगे; उधर कूपा तथा वापियों में जल ही नहीं । मालियों ने जाके राजा से सब वार्ता सुनाई; नरेशने मन्त्रियों से पूछा; सचिव लोगों ने पूछपाछ बूझ विचारकर निवेदन किया कि “महाराज ! यहां साधुसमाज आया है, सन्तों की ही कृपासे यह जलाभावका कष्ट जा सकेगा, इस समाज के मुखिया श्रीश्रुतिदेव नाम महात्मा हैं, उन्हीं से प्रार्थना करनी चाहिये।" ऐसाही किया गया। सब प्रजाओं सहित राजा श्रीस्वामीजी के शरणागत हो कृतार्थ हुए । स्वामीजी महाराज उस देश को हरिभक्त बनाकर दूसरी ओर चले। ऐसे ऐसे चरित्र आपके अनेक हैं। Sok GRAHASKAR RS २८४ श्रीभक्तमाल सटीक। (८) श्रीश्रुतिधामजी। आप परमोदार थे और भगवत् तथा भवगभन्नों में अभेद बुद्धि रखते थे; भेप (अर्द्धपुण्ड्र, कंठी, माला, छाप) की महिमा भली भांति जानते मानते थे । आपके गुणों की गिन्ती कौन कर सके ? एक समय साधुसमाज सहित श्रीप्रयागजी जा स्नान कर त्रिवेणी पर हरिकथा कहरहे थे; एक सन्त ने पूछा कि "महाराज इस संगम पर श्रीसरस्वतीजी का नामही मात्र तो सुना जाता है देखने में तो आती ही नहीं।" आप यह सुन ध्यान में मग्न हो गए; शीघ्रही सबों ने देखा कि श्रीश्वेत गंगाधार, श्रीश्याम यमुनाधार के. वीच तेजमय अरुणधार श्रीसरस्वतीजी का भी वहीं दर्शनीय है। मकर के वासी दौड़ के स्नान करने लगे । सन्तों ने स्वामीजी से निवेदन किया; आप भी उठ प्रणाम कर साधुओं सहित स्नान करने लगे। ऐसे अनेक सुयशों के साथ आप जगत् में प्रसिद्ध रहे ॥ (8) श्रीश्रुति उदधिजी। सब सद्गुणों के समुद्र एक दिन श्रीगंगाजी की ओर जाते थे मार्ग में एक राजा की वाटिका में रात्रि निवास किया। उस रात को राजा के भवन में चोरी हुई; चोरोंने भागके उसी उपवन में आपको ध्यान में पा, एक माला पहिरा दी। कोतवाल के भटों ने उन्हें देखा; वे आपको पकड़ ले गए; राजाने बन्दीघर में भेजदिया, तव शीघ्र ही नरेश सीसकी पीड़ा से व्याकुल हुआ, किसीप्रकार न छूटी, तब सचिव के कहने से राजा त्राहि त्राहि कर आपके चरणों पर गिरा। आपने तब आँखें खोली और सारा समाचार सुना । राजा को पीड़ा रहित कर श्रीराममन्त्र दे, कृतार्थ किया। कहां तक आपके यश गाए जासकें। श्रीश्रुतिपक्ष, श्रीश्रृंतिदेन, श्रीश्रुतिधाम नौर श्रीश्रुतिउदधिजी ये चारों महात्मा गुरुभाई हैं।

२८५ ॥ AR भक्रिसुधास्वाद तिलक। (१०-११) गुरु, और शिष्य (पादपद्मजी)। (१५८ ) छप्पय । (६६५) श्रीमारग उपदेश कृत श्रवण सुनौ आख्यान शुचि ॥ गुरु गमन कियो परदेश, शिष्य सुरधुनि दृढ़ाई। इक मंजन इक पान एक हृदय बन्दना कराई। गुरु गंगा में प्रविशि शिष्य को बेगि बुलायो। विष्णु- पदी भय जान, कमल पत्रन पर धायो॥ “पादपद्म" ता दिन प्रगट, सव प्रसन्न मन परम रुचि। श्रीमारग उपदेश कृत श्रवण सुनौ आख्यान शुचि॥३४॥(१८०) वार्तिक तिलक । एक और श्रीसम्प्रदायवाले भागवत का पवित्र वृत्तान्त सुनिये। इनके गुरु परदेश चले; इनको श्रीगंगाजी में गुरु का भाव दृढ़ रखने के लिये उपदेश दिया; इन्होंने श्रीगुरुआज्ञा को हृदय में दृढ़ धारण कर लिया। तब कोई शिष्य स्नान किया करें, कोई पान किया करें; परन्तु ये गुरुभक्तजी तो केवल हृदय से ही बन्दन प्रणाम मान करते थे । जव श्रीगुरुजी आए, शिष्यों से सब बातें सुनी, तब इनकी भक्किमहिमा प्रगट करने के हेतु श्रीगंगाजी में. जनके भीतर जाके वहीं शिष्य को (इनको) शीघ्र बुलाया; इन्होंने श्रीविष्णुपदी (गंगा)जी के जलपर अपना चरण रखने में संकोच किया; श्रीरामकृपासे जलमें कमल के पत्तों पर पांव धरते दौड़ते हुए जा पहुँचे । उसी दिन से आपका नाम “पादपद्म” जी हुआ; सय बड़े प्रसन्न हुए और श्रीगंगाजी में तथा इन महात्मा में सवकी भारी श्रद्धा हुई। (१४६ ) टीका । कवित्त । (६६४) देवधुनीतीर सो कुटीर, बहु साधु रहें, रहै गुरुभक्त एक, न्यारो नहिं है सके। चले प्रभु गांव "जिनि तजो वलि जांव" करौ कही RS PeeCrack , 15 N २५६ श्रीभक्तमाल सटीक। दास सेवा गंगा में ही कैसे दे सकै ॥ क्रिया सब कूप करे, विष्णुपदी ध्यान धरै; रोष भरे सन्त श्रेणी भाव नहीं भ्नै सके। आए ईश जानि दुखमानि सो वखान कियो आनि मन जानि बात अंग कैसे चै सकै॥११५॥ (५१४) वार्तिक तिलक। इनके गुरु की कुटी श्रीगंगाजी के तट पर थी; उसमें बहुत सन्त रहा करते थे साधुसेवा हुआ करती थी। ये बड़े गुरुभक्त थे, और श्रीगुरुचरणकमल से कभी अलग नहीं रह सकते थे। एक समय गुरु महाराज किसी ग्राम को चले; इन्होंने प्रार्थना की कि "कृपानिधे! इस दास को मत छोड़िये मैं आपकी बलिहारी जाऊं।" श्रीगुरुमहा- राज ने बड़ाई की और आज्ञा दी कि "तुम यहां ही रहो, भगव- हासों की सेवा करो, तथा श्रीगंगाजी को मेरा स्वरूप ही मानो, उनमें गुरुभाव रक्खो।" आप यह आज्ञा उल्लंघन नहीं करसके; और मन में विचार किया कि "श्रीसुरसरिजी में अपने चरणों का स्पर्श क्योंकर होने दूं" इसीसे श्रीगंगाजी में स्नान तक भी नहीं करते थे, शरीर की सब क्रिया स्नानादिक कूपजल से ही किया करते थे, और श्रीसुरसरिजी को श्रीगुरुरूप मानके प्रणाम और हृदय में ही ध्यान धरते थे। प्रायः सन्त इनपर रोष रखते क्योंकि इनके हृदय के भावको वे लोग पहुँच (जान ) नहीं सकते थे। जब श्रीगुरुजी आए, तब सब दुःखित हो उन सबने इनके गंगास्नान न करने की वार्ता कही। स्वामीजी वातके मर्मको समझ गए कि इसने सच्चा गुरुभाव रखकर यह संकोच किया होगा कि श्रीगंगाजी में अपना अपावन शरीर कैसे धोऊ पद स्पर्श कैसे करूं। (१५०) टीका । कवित्त । (६६) चले लैके न्हान संग, गंग में प्रवेश कियो, रंग भरि घोले सो "अंगोला बेगि ल्याइये" । करत विचार शोच सागर न वारापार, गंगा जू प्रगट कह्यो "कंजन पर आइये" ॥ चले ई अधर पग धरै सो मधुर जाइ प्रभु हाथ दियो, लियो, तीर भीर छाइये । निकसत ALSCR CRORENA , , SKAR २८७ भक्तिसुधास्वाद तिलक। धाइ चाइ पाइ लपटाइ गए, वड़ो परनाप यह निशि दिन गाइये ॥ ११६ ॥ (५१३) बार्तिक तिलक। श्रीगुरुजी इनको साथ लेके, (इनकी भकिमहिमा को प्रगट करने के निमित्त,) श्रीगंगास्नान को चले; श्रीगंगाजल के भीतर गए और अत्यन्त प्रेम में पगके शिष्य को (इनको) आज्ञा की कि "मेरा अंगोछा शीघ्र लाके दो।" ये बड़ेही अपार शोच विचार में पड़े कि इत तो श्रीगंगाजी उन श्रीगुरुजी और दोनों ही में इनकी भावभक्ति अपूर्व ठहरी; अपार असमंजस में पड़े। इतने में तुरन्त ही श्रीगंगाजी इनको प्रगट देखपड़ी और कृपा करके बोली कि "यह देखो तुम्हारे पाससे गुरुजी के समीप तक कमल के पत्ते प्रगट हो गए, तुम निस्सन्देह इन्हीं पत्तों ही पर पांव रखते हुए बेखटके चले आओ।" आज्ञानुसार ये अधर पर अर्थात् उन्हीं कमलपत्रों पर पांव रखते हुए दौड़े और वहां पहुँचके श्रीगुरुकरकंज में अंगोछा दी, और आपने आनन्दपूर्वक उसको लिया यह परिचय, यह आश्चर्य, यह गुरुभक्ति माहात्म्य, यह श्रीगंगाजी की कृपा ! देखने के लिये तट पर भारी भीड़ एकट्टी होगई । ज्यों ही ये तोर पर लौटे, लोग दौड़ दौड़के इनके चरणों में लपट लपट गए; और इस महत् प्रताप को उस दिनसे सब लोग दिनरात गान करते रहे। (१२) श्री १०८ रामानन्दस्वामी। श्रीसम्प्रदाय (१५१) इप्पय । (६६२) श्रीरामानुज पद्धति प्रताप अवनि अमृत कै अनु- सरयो । “देवाचारज” द्वितीय महामहिमा "हरिया- १"द्वितीय अर्थात् , प्रथम महामहिमायुक श्री६देवाचायं (देवाधिपाचार्य), और, द्वितीय महामहिमा से युक्त श्री १०८ हरियानन्द स्वामी । CAREERAL STAR २८८ श्रीभकमाल सटीक। नँद । तस्य "राघवानन्द” भए भक्तन को मानद ॥ पत्रावलम्ब पृथिवी करी व काशी स्थाई । चारि वरन आश्रम सवही को भक्ति दृढ़ाई। तिनके "रामानंद" प्रगट, विश्व मंगल जिन्ह वपुं धस्यो। श्रीरामानुज प- द्धति प्रताप अवनि अमृत लै अनुसयो (३५) (१७६) (१५२) छणय । (६६१) श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यों दुतिय सेतु जग तरन कियो ॥ अनन्तानन्द, कवीरें, सुखी, सुरमुरी, पद्मा- वति, नरहरि । पीपाँ, भावानन्द, रैदास, धनी, सेन, सुरसुर की घरहरि ॥ औरौ शिष्य प्रशिष्य एकते एक उजागर । विश्वमंगल आधार सर्वानंद दशधा के आगर ॥ बहुत काल बपुधारिकै, प्रणत जनन कौं पार दियो। श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यों दुतिय सेतु जग तरन कियो (३६) (१७८) वार्तिक तिलक। अनन्त श्रीरामानुज स्वामी के संप्रदायका अमृतरूपी प्रताप भू- मंडल में शिष्य प्रशिण्यादिद्वारा, जीवों के मरणादि दुःखों को नाश करता हुआ अतिशय फैल गया और फैलताही जाता है । कोई कोई लिखते हैं कि स्वामी श्रीरामानन्द जी महाराज इस संसारको त्याग संवत् १५०५ में श्रीसाकेन परधामगये १४८(149) वर्ष यहां विराजे थे । २ 'करीव'-करीव, समीप करके । "करी"=किया; "व"=और ।३ "वषुधयो"-देह धरी, अवतीर्ण हुए, प्रगर, नवनार लिया। CREGALSPEECRACRENCE-900 495 6:51 ॐर ॐॐ भक्तिसुधास्वाद तिलक। २८ “अथ श्रीराममन्त्रराज परम्परा" १. सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी १२. श्रीरामेश्वराचार्यजी २. श्रीजगज्जननी जानकीजी १३. श्रीद्वारानन्दजी ३. श्रीहनुमानजी १४. श्रीदेवानन्दजी ४. श्रीब्रह्माजी १५. श्रीश्यामानन्दजी ५. श्रीवशिष्ठजी १६. श्रीश्रुतानन्दजी ६. श्रीपराशरजी १७. श्रीचिदानन्दजी ७. श्रीव्यासजी १८. श्रीपूर्णानन्दजी ८. श्रीशुकदेवजी १६. श्रीश्रियानन्दजी ६. श्रीपुरुपोत्तमाचार्यजी २० श्रीहर्यानन्दजी १०. श्रीगंगाधराचार्यजी २१. श्रीराघवानन्दजी ११. श्रीसदाचार्यजी २२. स्वामी श्रीरामानन्दजी (श्लोक) नम आचार्यवाय रामानन्दाय धीमते । मोक्षमार्गप्रकाशाय चतुर्वर्गप्रदाय च ॥ १॥ महामहिमा से युक्त श्रीहर्यानन्दाचार्य स्वामी, उनके शिष्य समस्त भगवद्भकों के मान देनेवाले श्री १०८ राघवानन्दाचार्यजी; जो, पहिले, वैष्णवों के वृन्द साथ लेके, भरतखण्ड की संपूर्ण पृथ्वी में विचरके, भगवत् विमुखों को जीत, अपने विजयपत्र के अवलम्ब में भूमि को करके, काशीजी में स्थिर विराजमान हुए; और चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) तथा चारों आश्रमी (ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तपस्वी, संन्यासी) इन सवों को उत्तम उपदेश देकर श्रीरामभक्ति में दृढ़ स्थित कर दिया। इन्हीं श्रीराघवानन्द स्वामी जी के शिष्य, साक्षात् श्रीरामराघव जीआपही, श्रीरामानन्दै रूप से प्रगट हुए, कि जो विश्व (संसार) भर के मङ्गल की मूर्ति ही हैं, अर्थात् सब संसार के जीवों का जिनने . . मङ्गल किया।

व २६० श्रीभकमाल सटीक । खंभे इस प्रकार श्री १०८ रामानुज की “पद्धति” (शुभमार्ग) का प्र- ताप, भूमिमण्डल में अमृतरूप होके फैल रहा और फैलता जाता है। श्रीरामानन्द स्वामीजी ने श्रीरघुनाथजी की नाईं, संसाररूपी समुद्र में, जगत् के जीवों को उतर जाने के हे, दूसरा सेतु (पुल) बांध दिया। तात्पर्य यह है कि जैसा अद्भुत जगत् समुद्र था उसी प्रकार का अद्भुत सेतु भी बनाया । आपके मुख्य शिष्य सोई हद और पोत्र शिष्य, ("प्रशिष्य")प्रपौत्रादि शिष्यगण, सोई इस सेतु के सर्वाङ्ग हुए। "बहुतकाल" पर्यन्त शरीर को धारण करके, आपने "प्रणत" (शरणागत) जनसमूहों को मंत्रराज श्रीरामतारकरूपी सेतु पर चढ़ा के, संसारसागर के पार उतार, श्रीरामधाम में निवास दिया । भवसिन्धुसेतु के खंभेरूपी उन मुख्य शिष्यों के नाम- (ज्येष्ठ) श्रीमनन्तानन्दजी; श्रीकवीरजी, श्रीसुखानन्दजी, श्री- सुरसुरानन्दजी, श्रीपद्मावतीजी, श्रीनरहरियानन्दजी, श्रीपीपाजी, श्रीभावानन्दजी,श्रीरमादास (श्रोरैदासजी), श्रीधनाजी,श्रोसेनीजी, श्रीसुरसुरानन्दजी की स्त्री "सुरसरी"जी ॥ और भी शिष्य अर्थात् श्रीगालवानन्दजी; और प्रशिष्य श्री- योगानन्दजी, जिन सवों के नाम भी श्रीनाभास्वामीजी आपही आगे कहेंगे; जो श्रीरामप्रेम प्रकाशयुक्त एक से एक अधिक चढ़ चढ़ के हुए । विश्व के मङ्गल करनेवाले जो श्रीरामानन्दस्वामी, तिनकी कृपा का आधार पाके सब "आनन्द" युक्त नामवाले श्रीअनन्ता- नन्द,सुरसुरानन्दादि शिष्य, परमानन्दरूपा (दशधा)प्रेमा पराभक्ति के स्थान, श्रीरामभनाग्रगण्य परमप्रवीण हुए । (श्लो०) "राघवानन्द एतस्य रामानन्दस्ततोऽभवत् । सार्द्धद्वादशशिष्याः स्युः श्रीरामानन्दसद्गुरोः॥ १५॥ द्वादशादित्यसंकाशास्संसारतिमिरापहाः। श्रीमदनन्तानन्देस्तु सुरसुरानन्दस्तथा ॥ १६ ॥ नरहरियानन्दस्तु योगानन्देस्तथैव च ।- SCRE , ६ PRETATISTS भकिसुधास्वाद तिलक। २६१ सुखो भावा गालवं च सप्तैते नाम नन्दनाः ॥ १७ ॥ कबीरश्च रमादासः सेनी पीपा धनीस्तथा। पद्मावती१२३ तदर्द्ध च पडेते च जितेन्द्रियाः॥१८॥ येषां शिष्यप्रशिप्यैश्च व्याप्ता भारतभारती॥ श्री १०८ अग्रस्वामीकृत "रहस्य प्रय" की संस्कृन टीका, (श्रीकाशी १६३५ की छपी), का ये साढ़े चार श्लोक है ॥ [१] श्रीशानन्तानन्दजी। ["मिद्ध परमप्रेमी रघुनाथा । सियजू हाथ धरे जिन्ह माया ॥"] [२] श्री१०८ सुरसुरानन्दजी । ["सन्तप्रसाद प्रमाव विद. प्रथमहि पाए स्वाद । सोइ याह तन सत करी, महिमा महाप्रसाद।।"] [३] श्रीसुखानन्दजी ! ["प्राचारज गुरु भक्ति निधाना । निरत मन्त्र मन्त्रार्थ विधाना ॥"] [४] श्रीनरहरियानन्दी । [" रामभक्त कुल कैरव चन्दा ॥'' ] [५] श्री ६ पीपाजी । [" जगत रिदित सियरामपट, पीपा प्रेम प्रताप । लगी भागवत भुजन मह, जिन्ह की लाई छाप"] [६] श्रीकधीरजी । [" छाके राम नाम रस स्वादा ॥" ] [७] श्रीपद्मावतिजी। [८] श्रीभावानन्दजी । [" निरत रामसेना मतिमाना । गूढ प्रेम विज्ञान निधाना ॥"] [६] श्रोसनाजी । [" सदा सन्तसेवा मति पागी। भक्तियोग युत अनि बहभागी "] [१०] श्रीधनाजी। [" सुमति सन्तसेचा लयलीना। सदाचार गुरु-भक्त प्रवीना !"] [११] श्री रैदासजी। ["रमादास शासन मति दासी । सदा भागवत धर्म प्रकासी। नि:किंचन उदार गुरुसेवी । भाविक रामतत्व को भेधी ॥"] [१२] देवीशीसुरसरीजी श्रीसुरसुरानन्दजी की स्त्री। ["विषय विगत रघुवर रति सानी। गुरुपद मला तन मन बानी ।। परम पुरुष गुनि राम विहारी । और सबै जग जान्यो नारी ॥"] [१३] श्रीगालयानन्दजी [" उपदेशक घेदान्त पित, योगी रतरघुनन्द।"] यह नाम इस चप्पे में नहीं है॥• [२४] भीयोगानन्दजी । ["योग निधान निरत रघुराई। श्रीयोगानन्दजी श्री मनम्नानन्दजी के शिष्य हा RECReciescikshOCLIC REAK an २६२ जिसने जिस नाम से जन्म समय अवतार मृत्युलोक में लिया ख्यात हैं महीना पक्ष तिथि दिन लग्न नक्षत्र यांग गिनती विधाता ( 61... ". II.K) হিg श्रीनारद श्रीअनन्तानन्द कार्तिक शुक्ल १५ शनि धन कृत्तिका सुखानन्द वैशाख शुक्ल ९ शुक्र तुला शतभिषा श्रीसुरसुरानन्द वैशाख कृष्ण गुरु वृष नरहरियानन्द वैशाख कृष्ण ३ शुक्र मेष अनुराधा उत्तरा- पीपा चैत्र शुक्ल १५ बुध धन फाल्गुनी कवीर चैत्र कृष्ण ८ मंगल सिंह मृगशिरा श्रीभकमाल सटीक। ३ सनत्कुमार व्यतीपात मनु ६ प्रह्लाद शोभन E- अझ +963 न k श्रीजनक भांवानन्द. चन्द्र कर्क * भीष्म सेन माधव वलि धना। माधव १० वैशाख कृष्ण ६ मूल कृष्ण | १२ रवि तुला पूर्वा श्रीयोगा- शनि वृश्चिक पूर्वाषाढ़ नन्दजी चैत्र शुक्ल २ चित्रा श्री पौत्र शिष्य हैं चैत्र शुक्ल १३ गुरु कर्क उत्तराफा० अर्थात् श्रीअन- यमराज शुक्र मेष (S.S. R. S. B. P. H.K.) रमादास (दास) पदमावती भनिसुधास्वाद तिलक । श्रीपद्मा .१२ सुरसरी ... ... न्तानन्द जी के धनिष्ठा शिष्य हैं। गालवानन्द चैत्र कृष्ण ११ सोम धन (१३) शुकदेव (१४) कपिल योगानन्द * वैशाख कृष्ण बुध कर्क मूल २६३ RAMETRNAKARMARATHI Pareek HTRA २६६ श्रीभक्तमाल सटीका ऐसा हितोपदेश पाके, आपने श्रीस्वामी राघवानन्दजी को साष्टाङ्क प्रणामकर विनय किया कि "हे प्रभो | यह शरीर और आत्मा आपको अर्पण है इसकी दोनों लोक में रक्षा कीजिये" तव श्रीस्वामी- जी ने श्रीरामषडक्षर मंत्र प्रादि पंच संस्कार कर रामानन्द नाम दिया और प्राणायाम आदिक रीति वता, उतारने की युति भी सिखा के समाधि में स्थित कर दिया; काल आया देख के चला गया। थोड़ेही काल में आप समाधिस्थ हो गए यह कुछ बड़ी बड़ाई नहीं है आप तो स्वयं प्रभु के अवतार ही हैं; परन्तु यह सव लीला है, सो भी उचित ही है। कुछ काल में आप समाधि से उतर के श्रीमंत्र जाप और गुरु- सेवा में तत्पर हुए। श्रीराघवानन्द स्वामीजी महाराज तथा भग- वान् रामानन्दजी के परस्पर सत्सङ्ग की शोभा क्या कही जावें दो."दोउ महान मिलि सोहहीं, सम वसिष्ठ रघुनाथ । उपमा अपर समुद्र जस, सहित ब्रह्मदव पांथ ॥" स्वामी श्री १०८ रामानन्दजी ने बहुत तीर्थाटन किया। "श्रीकृष्ण-चैतन्य-चिरंजीवी" ("श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु" नहीं) की दया से अष्ट सिद्धि को प्राप्त हुए । चौपाई। जगत गुरू, आचारज भूपा । रामानन्द राम के रूपा॥ "श्रीरामानन्दीयसम्प्रदाय"। • आप जब पुनः श्रीगुरु दर्शन को गए तो आचारी गुरुभाइयों ने आचार विचार का आग्रह न देख इनको दंड करने के लिये गुरु महाराज से कहा। परन्तु श्रीगुरुजीने तो आपको यह आज्ञा दी कि "तुम अपना सम्प्रदाय ही अलग प्रचलित को।" ऐ "श्रीरामावत” वा “श्रीरामानन्दीय" सम्प्र- : *

HTAS
भक्तिसुधास्वाद तिलक।
२६५
"अवतरे परेशा मनहुँ दिनेशा सुत द्विजेश तनुधारी।
पूजित शिवशेषा शुभ उपदेशा तारकमन्त्र प्रचारी ॥
कलिकलुप विनाशी प्रेमप्रकाशी मुखराशी दुखहारी।
प्रभुइच्छाचारी स्त्रवश विहारी जगजीवन उपकारी ।।
रक्षक श्रुतिसेतू सनकुलकेतू वन्दित सदा अमानं ।
निगमादिसुगीतं चरित पुनीतं भवभयशमन निदानं ।।
सेवितवरचरणं चातुरवरणं शरणदकृपानिधानं ।
प्रदरसरामहि सियवर संगहि प्रेमभक्ति वरदानं ॥"
चौपाई।

5 श्रीभक्तमाल सटीक। २६४ कवित्त । "प्रगट प्रयाग भाग कश्यप ज्यों भूसुर के सातें माघकृष्ण मारतण्ड से अरामी हैं । काशी-से-अकाश में प्रकाश सुखरास किए, वारही सु शिष्य मानों को तेजधामी हैं । कलि की कुचाल- निशा खण्डे हैं पखंडतम, दुरिगे अभक्त चोर पंथ-घोर बामी हैं। फैल्यो चेप घाम, धाम धाम सन्त कंज खिले बदै "रसराम" रवि रामानन्द स्वामी हैं "॥१॥ स्वामी श्री १०८ रामानन्दजी दयालु श्रीप्रयागराज में कश्यप- जी के समान भगवद्धर्मयुक्त बड़भागी कान्यकुब्ज ब्राह्मण “पुण्य- सदन "के गृह में, विक्रमीय संवत् १३५६ के माघ कृष्ण सप्तमी तिथि में, सूर्य के समान सवों के सुखदाता, सात दण्ड दिन चढ़े चित्रा नक्षत्र सिद्ध योग कुम्भ लग्न में गुरुवार को, "श्रीसुशीला देवी" जी से प्रगट हुए। दो. चारि सहस शतचारि भी, गत कलिकाल मलीन । तेहि अवसर नरलोक हरि, निवसनहित चित दीन ॥ कलियुग के ४४०० वर्षगत हो चुकने के अनन्तर- विक्रमी शाके ईस्वी कलि ४१३५६ १२२२ १३००+ (श्लो०)-"रामानन्दमहामुनिस्समभवद्रागेपुरामावनी- (१३५६) युक्ने विक्रमवत्सरे घटतनौ माघासिते त्वाष्ट्रभे ॥ सप्तम्यां गुरुवासरे युजि तथासिद्धौ प्रयागाश्रमा. च्छ्रीमद्भसुरराजपुण्यसदनाद्रामावतारः कृती" ॥ चौपाई। "विमलसलिल, निर्मलनभ आसा। शुचि सन्तन मन मोद हुलासा ॥ प्रगटे रवि इव करुणाकन्दा । सन्तसरोजन प्रदानन्दा" ॥ + Dr. W. \'. Iuuler, M. A FİK A. 1.Mukerji M 1. B Lift यही लिखा है। x और शीतपस्वीरामजी सीतारामीय ने भी संवत् १३५६ ही लिखे है। , ३ भकिसुधास्वाद तिलक। २६५ "अवतरे परेशा मन हुँ दिनेशा सुत द्विजेश तनुधारी। पूजित शिवशेषा शुभ उपदेशा तारकमन्त्र प्रचारी ॥ कलि कलुष विनाशी प्रेमप्रकाशी सुखराशी दुखहारी । प्रभुइच्छाचारी स्ववश विहारी जगजीवन उपकारी ॥ रक्षक श्रुतिसेतू सतकुलकेतू वन्दित सदा अमानं । निगमादिसुगीतं चरित पुनीतं भवभयशमन निदानं ॥ सेविनवरचरणं चातुरवरणं शरणदकृपानिधानं । प्रदरसरामहि सियवर संगहि प्रेमभक्ति वरदानं ॥" चौपाई। वपु वुधि विमल बढ़े केहि भांती । जस शशि, पाइ पक्षसित-राती ॥ आठ वर्ष के भे मतिवाना। भयो यज्ञ उपवीत विधाना॥ आठ वर्ष की अवस्था में विद्या आरंभकर चार वर्ष में ही ऐसे पण्डित होगए कि प्रयागनिवासी पण्डित लोग भव आपको अधिक नहीं पढ़ा सकते थे। तब बारह वर्ष की अवस्था में प्रभु श्रीकाशीजी आए। चौपाई। तहां वेद वेदान्त विशेषा । सकल किये करतल अवशेषा। आप संन्यासी के शिष्य होके "स्मार्त" रीति से अपने धर्म कर्मः में प्रवृत्त हुए । प्रथम आपका नाम श्रीरामदत्त ऐसा था; किसी दण्डी विद्वान् के समीप रहके ब्रह्मचर्ययुक्त विद्या पढ़ते थे। एक दिवस स्वामी श्रीराघवानन्दजी के पास प्राप्त होके प्रणाम किया; आप कृपादृष्टि से देख भावी वार्ता को जान के कहने लगे कि "तुम्हारे शरीर का तो आयुप भी पूर्ण हो चुका पर अभी लों तुम हरि शरणागत न हुए !" । यह सुन, आके, उन दण्डीजी से सब वात आपने कही। दंडी विज्ञ तो थेही उस बात को सत्य विचार के बोले कि "वात तो सत्य है परन्तु उपाय मेरे किये न हो सकेगा तुम उन्हीं महानुभावजी के शरणागत होके शरीर की रक्षा करो"। R २६४ श्रीभकमाल सटीक। . “ कवित्त ।। प्रगट प्रयाग भाग कश्यप ज्यों भूसुर के सातै माघकृष्ण मारतण्ड से अरामी हैं । काशी-से-अकाश में प्रकाश सुखरास किए, वारही सु शिष्य मानों कली तेजधामी हैं । कलि की कुचाल- निशा खण्डे हैं पखंडतम, दुरिगे अभक चोर पंथ-घोर वामी हैं। फैल्यो वेष घाम, धाम धाम सन्त कंज खिले बदै "रसराम" रवि रामानन्द स्वामी हैं"॥१॥ स्वामी श्री १०८ रामानन्दजी दयालु श्रीप्रयागराज में कश्यप- जी के समान भगवद्धर्मयुक्त बड़भागी कान्यकुब्ज ब्राह्मण " पुण्य- सदन "के गृह में, विक्रमीय संवत् १३५६ के माघ कृष्ण सप्तमी तिथि में, सूर्य के समान सघों के सुखदाता, सात दण्ड दिन चढ़े चित्रा नक्षत्र सिद्ध योग कुम्भ लग्न में गुरुवार को, "श्रीसुशीला देवी" जी से प्रगट हुए। दो० चारि सहस शतचारि भी, गत कलिकाल मलीन । तेहि अवसर नरलोक हरि, निवसनहित चित दीन । कलियुग के ४४०० वर्षगत हो चुकने के अनन्तर- विक्रमी शाके ईस्वी कलि ४१३५६. १२२२ १३००१ (श्लो०)-"रामानन्दमहामुनिस्समभवद्रागेपुरामावनी- (१३५६) युक्त विक्रमवत्सरे घटतनी माघासिते त्वाष्ट्रभे ॥ सप्तम्यां गुरुवासरे युजि तथासिद्धी प्रयागाश्रमा. च्छ्रीमद्भसुरराजपुण्यसदनाद्रामावतारः कृती" ॥ चौपाई। "विमलसलिल, निर्मलनभ आसा। शुचि सन्तन मन मोद हुलासा ॥ प्रगटे रवि. . इव करुणाकन्दा । सन्तसरोजन प्रद-आनन्दा" ॥ | Dr. V.IN. Ilunter, I. A. और A..Mukerji I. A, B. L. ने भी यही लिखा है। और श्रीतपस्वी रामजी सीतारामीय ने भी संवत् १३५६ ही लिपे हैं।

IONARISAR भकिसुधास्वाद तिलक। २६५ छन्द। "अवतरे परेशा मनहुँ दिनेशा सुत द्विजेश तनुधारी। पजित शिवशेपा शुभ उपदेशा तारकमन्त्र प्रचारी ॥ कलिकलुष विनाशी प्रेमप्रकाशी सुखराशी दुखहारी। प्रभुइच्छाचारी स्त्रवश विहारी जगजीवन उपकारी ॥ रक्षक श्रुतिसेतू सतकुलकेतू वन्दित सदा अमानं । निगमादिसुगीतं चरित पुनीतं भवभयशमन निदानं ॥ सेवितवरचरणं चातुरवरणं शरणदकृपानिधानं । प्रदरसरामहि सियवर संगहि प्रेमभक्ति वरदानं ॥" चौपाई। वपु बुधि विमल घड़े केहि भांती । जस शशि, पाइ पक्षसित-राती॥ आठ वर्ष के भे भतिवाना । भयो यज्ञ उपवीत विधाना॥ आठ वर्ष की अवस्था में विद्या आरंभकर चार वर्ष में ही ऐसे परिडत होगए कि प्रयागनिवासी पण्डित लोग भव आपको अधिक नहीं पढ़ा सकते थे । तब बारह वर्ष की अवस्था में प्रभु श्रीकाशीजी आए। चौपाई । तहां वेद वेदान्त विशेषा । सकल किये करतल अवशेषा । आप संन्यासी के शिष्य होके "स्मार्त' रीति से अपने धर्म कर्मः में प्रवृत्त हुए। प्रथम आपका नाम श्रीरामदत्त ऐसा था; किसी दण्डी विद्वान् के समीप रहके ब्रह्मचर्ययुक्त विद्या पढ़ते थे। एक दिवस स्वामी श्रीराघवानन्दजी के पास प्राप्त होके प्रणाम किया; आप कृपादृष्टि से देख भावी वार्ता को जान के कहने लगे कि "तुम्हारे शरीर का तो आयुप भी पूर्ण हो चुका पर अभी लों तुम हरि शरणागत न हुए !"। यह सुन, आके, उन दण्डीजी से सब वात आपने कही। दंडी विज्ञ तो थेही उस बात को सत्य विचार के वोले कि “वात तो सत्य है परन्तु उपाय मेरे किये न हो सकेगा तुम उन्हीं महानुभावजी के शरणागत होके शरीर की रक्षा करो। Reacheste AS these so . 367957967 भक्तिसुधास्वाद तिलक। २६७ दो "स्वामिही सेवा वश किये, रामानन्द उदार। दै सरवेस गुरु रामपुर, गवने देशएँ द्वार ॥" आपकी गुरुसेवा, भजन, साधुगुण, तेज, प्रताप, देख और श्रीप्रभु के अवतार जान, अपनी सब भजन-संपत्ति सौंप के, अपनी इच्छा ही से दशम द्वार से गमन करके कृपालु श्रीराघवानन्दजी श्रीरामधाम में प्राप्त हुए। तब सूर्य्यरूपी श्रीरामानन्दजी काशीरूप आकाश में प्रकाश- मान, और पूर्व छप्पय विषे कथित श्रीअनन्तानन्दादि आपके शिष्य हुए। वेई तेज के स्थान कला शोभित हुई। इस प्रकार श्रीरामानन्द सूर्य ने प्रकट होके कलियुग की कुचालरात्रि को नाश किया तथा प्रबल पाखण्डरूपी उस रात्रि के अधकार को भी नाश किया; तव अभक्त भगवत्-विमुख छुप रहे ॥ और आप के शिष्य प्रशिष्य भागवत वेषधारी वैष्णव धूप (घाम)प्रकाश के सरीखा चारों धामों में स्थान स्थान में भर गए। एवं महात्मा सन्तसमूह कमलों के सम विकाशमान हुए । ऐसे सूर्यरूपी श्रीरामानन्दस्वामी रदित हुए । कवित्त । मन्द कलिकाल की कुचाल ते.अमन्दपाप फैले पंथ निंन्द वेद भनिहू निकन्द के। देखे रघुनन्द जब सधै जन्तु द्वन्द दले लीन्हें अवतार तब दायक अनन्द के . सेतु विसतारे मंत्र तारकमचारे किए जीव भवपारे देहधारक स्वच्छन्दके । सन्तसिंधु चन्द ऐसे करुणा के कंद रसरङ्ग मणि" बंद पद स्वामी रामानंद के ॥१॥ रामानंद स्वामी से भएन कोई और होने जिनको विदित तीनो लोक में प्रताप है। काम क्रोध लोभ मोह मत्सरादि मुण्डादएह मर्दन को केशरी ज्या राजे करिदाप हैं। विमुख पाखंडी धान धर्मी तमतोम रवि, अभिमान सागर को कुंभज से श्राप हैं। रामभक्ति शालिक्षेत्र पोपिये को वारिद से आश्रित प्रपन्ननके एक माई बाप हैं ॥शा" चौपाई। "बायो लोक प्रताप प्रकाशा । कलिकर तब पातक तम नाश ।। घोर पंथ चोर लिखाने । पुमुद कर्मकांडी सकुशने ।। रामभक्ति सरसीरुह पृन्दा । रवि लखिभे विकशितसानन्दा ||" ।

ॐॐॐ श्रीभकमाल सटीक । २६६ ऐसा हितोपदेश पाके, आपने श्रीस्वामी राघवानन्दजी को साष्टाङ्ग प्रणामकर विनय किया कि "हे प्रभो! यह शरीर और आत्मा आपको अर्पण है इसकी दोनों लोक में रक्षा कीजिये" तव श्रीस्वामी- जी ने श्रीरामपडक्षर मंत्र आदि पंच संस्कार कर रामानन्द नाम दिया और प्राणायाम आदिक रीति वता, उतारने की युक्रि भी सिखा के समाधि में स्थित कर दिया; काल आया देख के चला गया। थोड़ेही काल में आप समाधिस्थ हो गए यह कुछ बड़ी बड़ाई नहीं है आप तो स्वयं प्रभु के अवतार ही हैं; परन्तु यह सव लीला है, सो भी उचित ही है ॥ कुछ काल में आप समाधि से उतर के श्रीमंत्र जाप और सेवा में तत्पर हुए। श्रीराघवानन्द स्वामीजी महाराज तथा भग- वान् रामानन्दजी के परस्पर सत्सङ्ग की शोभा क्या कही जावे; दो "दोउ महान मिलि सोहहीं, सम वसिष्ठ रघुनाथ । उपमा अपर समुद्र जस, सहित ब्रह्मद्रव पाथ ॥" स्वामी श्री १०८ रामानन्दजी ने बहुत तीर्थाटन किया। "श्रीकृष्ण-चैतन्य-चिरंजीवी" ( "श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु" नहीं) की दया से अष्ट सिद्धि को प्राप्त हुए। चौपाई। जगत गुरू, आचारज भूपा । रामानन्द राम के रूपा ॥ "श्रीरामानन्दीयसम्प्रदाय"। आप जब पुनः श्रीगुरु दर्शन को गषु तो आचारी गुरुभाइयों ने आचार विचार का आग्रह न देख इनको दंड करने के लिये गुरु महाराजसे कहा । परन्तु श्रीगुरुजीने तो आपको यह आज्ञा दी कि "तुम अपना सम्प्रदाय ही अलग प्रचलित को।" ऐसाही किया; सो "श्रीरामावत" वा "श्रीरामानन्दीय" सम्प्र- दाय आपका प्रसिद्ध ही है ॥ PROTECRETREEGANGSTECE-SC R This is a *** भक्तिसुधास्वाद तिलक। २६७ दो० "स्वामिही सेवा वश किये, रामानन्द उदार । दै सरवस गुरु रामपुर, गवने दशएँ द्वार ॥" आपकी गुरुसेवा, भजन, साधुगुण, तेज, प्रताप, देख और श्रीप्रभु के अवतार जान, अपनी सब भजन-संपत्ति सौंप के, अपनी इच्छा ही से दशम द्वार से गमन करके कृपालु श्रीराघवानन्दजी श्रीरामधाम में प्राप्त हुए। तब सूर्यरूपी श्रीरामानन्दजी काशीरूप आकाश में प्रकाश- मान, और पूर्व छप्पय बिपे कथित श्रीअनन्तानन्दादि आपके शिष्य हुए । वेई तेज के स्थान कला शोभित हुई । इस प्रकार श्रीरामानन्द सूर्य ने प्रकट होके कलियुग की कुचालरात्रि को नाश किया तथा प्रबल पाखण्डरूपी उस रात्रि के अधकार को भी नाश किया तब अभक्त भगवत्-विमुख छुप रहे । और आप के शिष्य प्रशिष्य भागवत वेषधारी वैष्णव धूप (घाम)प्रकाश के सरीखा चारों धामों में स्थान स्थान में भर गए। एवं महात्मा सन्तसमूह कमलों के सम विकाशमान हुए । ऐसे सूर्यरूपी श्रीरामानन्दस्वामी उदित हुए कवित्त । "मन्द कलिकाल की कुचाल ते अमन्दपाप फैले पंथ निन्द बेद भक्तिहू निकन्द के। देखे रघुनन्द जब सधै जन्तु द्वन्द दले लीन्हें अवतार तब दायक अनन्द सेतु विसतारे मंत्र तारकप्रचारे किए जीव भवपारे देहधारक स्वच्छन्दके। सन्तसिंधु चन्द ऐसे करुणा के कंद रसरङ्ग मणि" चंद पद स्वामी रामानंद के ॥१॥ रामानंद स्वामी से भएन कोई और होने जिनको विदित तीनो लोक में प्रताप है। काम क्रोध लोभ मोह मत्सरादि सुण्डादण्ड मर्दन को केशरी ज्यों राजै करिदाप हैं। विमुख पाखंडी पान धर्मी तमतोम रवि. अभिमान सागर को कुंभज से आप हैं। रामभक्ति शालिक्षेत्र पोपिये को वारिद से आश्रित प्रपन्ननके एक मार्ड वाप हैं ॥४॥" चौपाई। "छायो ‘लोक प्रताप प्रकाश । कलिकर तब पातक तम नाश ।। घोरे "बुथ चोर लिखाने । कुमुद कर्मकांडी सकुचाने ॥ रामभक्ति सरसीरुह इन्दा । रवि लखिभे विकशितसानन्दा॥" !! A ॥ के.

************* २६८ श्रीभक्तमाल सटीक। + चौपाई। "सहित तेरहो शिष्य श्ररामी । राजत श्री रामानंद स्वामी ॥ शिष्य शिष्य उपशिष्य समेता । शोभित पूजित कृपा निकेता ।। नित प्रति राम कथा सतसंगा। कहत) बहन , जनु मरि गंगा ।। तारत जीवन मरत महेशू । सतनु तरत स्वामी उपदेश ।।" "यस प्रभु भगवत रामानन्दा । परम धरमतनु जनु मुखकन्दा हिय विचार किय कृपा निकेतू । महि दिग विजय करन के हेत् ॥ संग शिष्य परशिप्य अनन्ता | तिमि तिहुँ सम्पदाद बहु संता ।। नागे फहरत बना निशाना । तेहि पर बैठ वीर हनुमाना । "जै जै सियाराम" धुनि छाई । चले विजय · कर शंख बजाई ॥" दो० खंडन किये कुपन्ध ये, यथा योग दै दंड । सत मारग श्राने तिनहिं करि उपदेश अखंड ।। चौपाई। चारिप बरण. आश्रम माहीं । कीन्हें "समभक्त" सबकाहीं । राममन्त्र मन्त्रार्थ, विधाना,। यथायोग दीन्हें मतिवाना ।। यहि विधि करि दिगविजय उदंडा । थापे 'रघुपति भक्ति अखंडा' ।। प्रभु जेहि हेतु लिये अवतारा । सत्यसन्ध सोइ कि प्रचारा ॥ रामानन्द प्रताप अपारा । को कवि लहै कथन करि पारा॥" छ० भारी प्रभाव प्रताप रामानंद को, को कहि सकै ? जो परम प्रभु अवतार शारद वदत जस' जाको जकै ॥" "श्रीरामरूप अनूप रामानन्द स्वामी हैं सदा शुचि ज्ञान दायक ध्यान लायक हरन मल माया मदा ॥" सोरठा। "शारदशसी समान, कीरति समानन्द की । पावन पुण्य महान, नाशनि पातक द्वन्द की ॥" परमाचार्य स्वामी श्रीरामानन्दजी का यह चरित "श्रीअगस्त्यसंहिता भविष्योत्तर- खएड" में पांच अध्याय से वर्णित है सो श्रीकाशी कुंनगली के पास "हजारीलाल गणेशप्रसाद" के यहां मिलता है। सूर्यप्रभाकरशिलायंत्र सं० १६३५ में छपा । उसीसे भाषा में "श्रीरामानन्द यशावली" नामक ग्रन्थ वना है श्रीरामअनन्यसखा, परमहंस श्री ६सीताशरणजी महाराज ने श्रीपाँच रामरसरङ्गमणिजी महाराज से "श्रीरामानन्द यशावली" के नाम से भापा प्रबन्ध कराके छपवाया है, उससे, तथा मुंशी श्री ६ . i.

भक्तिसुधास्वाद तिलक। २.६६ तपस्वीरामजी कृत रमूजे मिहोवफा से लेके, संक्षेपता यह कथा लिखी गई है। श्लो० नम आचार्यवाय रामानन्दाय धीमते। मोक्षमार्गप्रकाशाय चतुर्वर्गप्रदाय च ॥१॥ पाखण्डेन विदूषितान्स्वविमुखाज्ञात्वा कलो वै जनान् तत्कल्याणपरः" कृपापरवशासाकेतवासी स्वयम् ॥ रामानन्दसुसंज्ञया प्रयजने श्रीपुण्यसद्मद्विजा- जातस्तं विनमामि नारदयुतं श्रीरामचन्द्रं हरिम् ॥ २ ॥ श्रीपुण्यसदनस्तातः सुशीला जननी तथा ॥ यस्यासीद्रामानन्दन्तं जगद्गुरुं नमाम्यहम् ॥३॥ सो० रामभक्ति दातार, ज्ञान विराग विधायनी। सुनतहि भली प्रकार, सुखद मोह तमहारिनी ॥ (कथा) चौपाई। बहुत काल वपुधारण कीन्हे । भूमहँ भक्ति भाव भर दीन्हे ॥ संवत् गतकलि ईसवी सन् विक्रमी परधाम गमन १४६७ ४५११ वैशाख शुक्ल तृतीया पृथ्वी पर आप १११ * वर्ष पर्यन्त विराजमान रहे। श्लो. वेदाझेन्दुधरासंख्ये (११६४) वर्षे वेक्रमराजके। श्रीमद्रामानुजाचार्यो ह्यन्तर्धानमगात्स्वयम् ॥१॥ श्रीमद्विक्रमवत्सरेऽश्वरसवारीशेन्दुसंख्ये (१४६७) धरां त्यक्त्वा माधवमासके सुदि तृतीयायां तिथावुज्ज्वलम् ।। धर्म भागवतं विमुनिफलकं विन्यस्य जीवेषु वै रामानन्दसुदेशिकस्समगमत्साकेतलोकं परम् ॥ २॥ "बहुत काल" | जिनका आयु १६ ही वर्ष की अवस्था में पूर्ण हो चुका था सो महामुनि यदि १११ वर्ष विराजमान रहे तो "बहुत काल" इसको कहने में शंका ही क्या ? प्रसिद्ध ही है कि श्रापका समयसिकंदर लोदी (१४१% ईस्वी) से पूर्व था ।। आपका ३००० श्रीभक्तमाल सटीक। "वर्ष सप्तशत" जो लिखा है (श्रीरघुगजसिंहनी ने) सो न जाने कैसे ? १३५६ से ७०० तो २०५६ में होंगे यह अभी भी संवत् १९६२ ही है। स्वामी- जी को अन्तर्धान हुए सैकड़ों वर्ष बीत चुके । न जानें उनने ७०० किस अभिप्राय से लिखा ? इस श्लोक से तो १११ ही ( १४६७-१३५६१११) वर्ष स्पष्ट है। इसके अतिरिक दो और ने भी १०० वर्ष से ऊपर" लिखा है ।। इति- हासों से (५१४०० ईसवी" ) संवत् १४५७ प्रगट है ॥ वह भी इसके समीप मिलता है ॥ (१) श्रीअगस्त्यसंहिता भविष्योत्तरखएड की कथा तो ममिद है ही। (२) ऐसा भी लिखा है कि "एक कल्प में कलि ४४४७ की भाद्रकृष्णा- पृमी को श्री १०८ रामानन्द स्वामी श्री कपिलदेव भगवान् के अवतार, गाल- वाश्रम के समीप गौड़ ब्राह्मण के पुत्र हो मगट हुए; १०८ वर्ष की अवस्था में कलि के ४५५५ वर्ष गत होने पर परधाम को सिधारे ॥" (३) और भनिष्यपुराण के "तृतीय प्रतिसर्गार्व" के चतुर्थरखएड में लिखा है कि आप श्रीमर्य भगवान् के अवतार, 'देवन' मुनि के पुत्र होंगे-- भविष्यपुराण में ये (छ.) श्लोक आप के यश में हैं- "इति श्रुत्वा वेर्गाथां वैशाख्यां देवराट् स्वयम् । प्रत्यक्ष भास्करं देवं ददर्श सहितं सुरैः॥१॥ भक्तिनम्रान्सुरान्दृष्ट्वा भगवांस्तिमिरापहः। उवाच वचन रम्यं देवकार्यपरं शुभम् ॥ २ ॥ ममांशात्तनयो भूमौ.भविष्यति सुरोत्तम । सूत उवाच ॥ इत्युक्त्तास्वस्य विम्बस्य तेजोराशिं समन्ततः॥३॥ समुत्पाद्य कृतं काश्यां रामानन्दस्ततो भवत् । देवलस्य च विप्रस्य कान्यकुब्जस्य वै सुतः ॥ ४॥ वाल्यात्प्रभृत्तिसज्ञानीरामनामपरायणः । पित्रा मात्रा यदा त्यको राघवं शरणं गतः ॥ ५॥ तदा तु भगवान्साक्षाच्चतुर्दशकलो हरिः । सीता पतिस्तद्धृदये निवासं कृतवान्मुदा ॥ ६ ॥ इति ते कथितं विप्र मित्रदेवांशतो यथा । रामानन्दस्तु बलवान् हरिभक्नेश्च संभवः॥७॥ इतिभविष्यपुराणे तृतीये प्रतिसर्गपर्वणि सप्तमाध्याये श्लोकाः॥

*KHERE भकिसुधास्वाद तिलक आप अभक्कों से कभी वार्तालाप (घरन् चार आंखें भी) नहीं करते थे, परन्तु इतने पर भी, यदि भक्ति भाव देखते वूझते थे चाहे किसी जाति में क्यों न हो तो उसका बड़ाही आदर करते थे। श्रीकाशीजी में आपकी खड़ाऊं श्रीपंचगंगाघाट पर अभीतक विराजमान हैं। मापने श्रीगंगासागर संगम कपिलदेवस्थान को प्रगट किया जो लुप्त हो गया था। दो रामानन्द उदार अति, कलिमल नाशनहारा सेवत भक्तिसमेतशुभ मुकि मुक्तिदातारा। आचारजवर दिगविजय, जेजनमुनहिं समेम। विजय विभूति विवेकते, लहदि भाक्नेयुत क्षेम।। चौपाई । अस प्रभु जगपावन वपुधारी । कृपासिन्धू दासन हितकारी । ताते तासु जन्म दिन माहीं । जन्म महोत्सव रचै उछाही ॥ श्रीअयोध्यावासी प्रायः श्रीरामानन्दीय हैं ही, और अनेक जगहों में आपका व्रत तथा उत्सव होताही है, तथापि श्रीसीताराम कृपासे (१)श्रीकनकभवन के परमहंस श्रीसीताशरणजी महाराज, (२) श्रीअवधभूषण पण्डित श्रीरामवल्लभाशरण महाराजजी, जानकीघाट (३) और श्रीरामकोट जन्मस्थान में, इन तीनों स्थानों में श्रीरामानन्दजन्मोत्सव विशेष करके होता है । श्रीरामानुजजी श्रीरामानन्दजी जन्म परधाम जन्म परधाम कलि(गत) ४११० ४२३८ ४५११ विक्रमीय १०७४ ११६४ संवत् ईसवी सन् १०१७ ११३७ १३०० । १४११ कितने वर्ष १२० विराजे १६६२ पर्यन्ता ७६८ ४६५ 'कितने वर्ष दोनों आचार्यों के बीच अन्तर १६२ वर्ष REAK VILY ३०२ श्रीभक्तमाल सटीक। १. श्रीसीताराम ११. श्रीविनोदानन्दजी २. श्रीहनुमंत १२. श्रीधरनीदासजी ३. श्रीराघवानन्दाचार्य १३. श्रीकरुणानिधानजी स्वामीजी १४. श्रीकेवलरामजी ४. भगवान् रामानन्द १५. श्रीरामप्रसादीदासजी ५. भगवान् रामानन्द १६. श्रीरामसेवकदासजी परसा ६. श्रीसुरसुरानन्दजी १७. स्वामी श्री १०८ रामचरण ७. श्रीवलियानन्दजी दास महाराज ८.श्रीसेउरियास्वामीजी १८. सीतारामशरण भगवान् ६. श्रीविहारीदासजी प्रसाद १०.श्रीरामदासजी (बना०सिं०) (२) मुन्शी श्रीतुलसीरामजी तथा श्रीप्रतापसिंहजी (और F H. Wilson आदिक अंग्रेजों) ने, श्री १०८ रामानन्द स्वामीजी को श्रीरामानुज स्वामीजीले "पांचवां" ही लिखा है, अर्थात् "(१) श्रीरामानुज स्वामी (२) थीदेवाचार्यजी (३ ) श्री. हरियानन्द (प्रधानानन्द ) जी (४) श्रीराघवानन्दजी, और (५) अनन्त श्रीरामानन्द स्थामीजी" और धीच के महानुभावों के नामों को उन्हों ने छोड़ दिया है। (३) अनन्त श्रीरामानन्द भगवान के जन्म का समय तो अनेक (आठ,नप) प्रन्या में पाया जाता है। परन्तु पाप कितने दिन संसार में विराजे ? अय परमधाम को गए? कठिनता यदि है तो इसींक ठहराने में ॥ (४) भापके पिता का नाम, श्रीरामानन्द यशावली में श्रीभूरिकमांजी" लिखा है। भूरिकर्मा, तथा "पुण्यसदन" (श्रीअगस्त्यसहिता) एक ही बात है ॥ (५) श्रीश्रगस्त्यमहिता और भविष्यपुराण की कथा की तो इस प्रकार से एकता हो जाती है कि सूर्यमण्डल के अन्तर श्रीरामजी विराजे दही, (श्लोक )"सूर्यमण्डलमध्यस्थं राम सीतासमन्वितम् । नमामि पुण्डरीकाक्षममेयं गुरु तत्परम्" ॥१॥ इससे, सूर्यमंडल ही से जन-हृदय तिमिर-नाशक श्रीरामाश अवतार हुमा | और काशी से जन्मस्थान की भिन्नता यों नहीं कि श्रीकाशीजी में श्रीगुरुशरणागत होने से अपर जन्म ही जानिये क्योंकि ऐसा कहा ही जाता है । अर्थ विचार से "देवल' तथा पुण्यसदन { भूरिकर्मा) की एकता भी मानिय । शंका न कीजिये । दोनों ग्रन्थों (धी अगस्त्यसंहिता तथा भविष्यपुराण) की कथा एक ही समझिये ॥ (१३) महामुनि श्रीदेवाधिपाचार्य स्वामी। महामहिमायुक्त श्रीदेवाचार्य महाराजजी एक समय श्रीकाशी यात्रा के मार्ग में किसी ग्राम में एक वृक्ष के समीप दशमस्कन्ध SEARCREKASIRCLECTREGA ?

R RANSAR भकिसुधास्वाद तिलक। (श्रीभागवत ) कह रहे थे; कथा में " यमलार्जुन" का प्रसंग था: ज्योंही अध्याय पूरा हुआ कि उसी क्षण पास का वृक्ष, किसी प्रत्यक्ष कारण के बिना ही, अकस्मात् गिर पड़ा अडररधाम ! और साथही आश्चर्यमय यह घटना भी हुई कि एक विमान और एक पुरुष सब सन्तों ने देखा; उस मनुष्य ने आपके चरणसरोज की वन्दना करके कहा कि मैं बड़ाही पापी, नरक से हो पाके, यही वृक्ष होके यहां था; इस समय श्रीहरिकथा के श्रवण से मैं निष्पाप हो, श्रीभगवत्कृपा से इस विमान पर चढ़ परधाम को जाता हूं, यह आप के ही दर्शनों का प्रभाव है। (१४) श्रीहरियानन्द आचार्य स्वामी। हरिआनन्द में सदा छके हुए श्री ६ हरियानन्दजी ने एक समय पुरुषोत्तमपुरी में जा आषाढ शुक्ल द्वितीया को रथारूढ़ श्रीजगन्नाथजी के दर्शन किये; चलते चलते रथ रुक गया था; खींचे ठेले से हिलता बढ़ता'न था। आपने पुकारके कहा कि सब कोई रथ को छोड़ दो, श्रीजगदीश कृपा से रथ आपही चलेगा" ऐसा ही हुआ, सौ पगतक रथ भापही दौड़ा गया । जयजयकार ध्वनि छा गई। ऐसे ऐसे इतिहास आप के यश के अनेक हैं। छप्पर । "चरणकमल वन्दों कृपालु हरियानंद स्वामी। सर्वसु सीताराम रहसि दशधा अनुगामी ॥ बालमीक' वर शुद्ध सत्त्व माधुर्य रसालय । दरसीरहसि अनादिपूर्व रसिकनकी चालय ॥ नित सदाचार मैं रसिकता अति अब्रुतगति जानिये। जानकिवल्लभकृपा लहि शिषप्रतिशिष्य वखानिये।" (श्रीयुगलप्रिया, रसिकभनमाल) (१५) आचार्य स्वामी श्री १०८ राघवानन्दजी। कुछ तो आप का प्रताप, स्वामी अनन्त श्रीरामानन्दजीके चरित OLSCRECORRUSALISTRUSSCRICKR ३०२ श्रीभक्तमाल सटीक। १. श्रीसीताराम ११. श्रीविनोदानन्दजी २. श्रीहनुमंत १२. श्रीधरनीदासजी ३. श्रीराघवानन्दाचार्य १३. श्रीकरुणानिधानजी स्वामीजी १४. श्रीकेवलरामजी ४. भगवान् रामानन्द १५. श्रीरामप्रसादीदासजी ५. भगवान् रामानन्द १६. श्रीरामसेवकदासजी परसा ६. श्रीसुरसुरानन्दजी १७. स्वामी श्री १०८ रामचरण ७. श्रीवलियानन्दजी दास महाराज ८.श्रीसेउरियास्वामीजी १८. सीतारामशरण भगवान् ६. श्रीविहारीदासजी प्रसाद १०.श्रीरामदासजी (चना०सि०) (२) मुन्शी श्रीतुलसीरामजी तथा श्रीप्रतापसिंहजी (और H. H. Wilson आदिक अंग्रेजों) ने, श्री १०८ रामानन्द स्वामीजी को श्रीरामानुज स्वामीजी से "पांचवां" ही लिखा है, अर्थात् "(१) श्रीरामानुज स्वामी (२) श्रीदेवाचार्यजी (३ ) श्री. हरियानन्द (प्रधानानन्द )जी (४) श्रीराघवानन्दजी, और (५) अनन्त श्रीरामानन्द स्वामीजी" और पीच के महानुभायों के नामों को उन्हों ने छोड़ दिया है। (३) अनन्त श्रीरामानन्द भगवान के जन्म का समय तो अनेक (आठ,नघ) प्रन्यों में पाया जाता है। परन्तु आप कितने दिन संसार में विराजे ' अब परमधाम को गए? कठिनता यदि है तो इसीक ठहराने में। (४) मापके पिता का नाम, श्रीरामानन्द यशावली में थीभूरिकमांजी" लिखा है। भूरिकर्मा, तथा "पुण्यसदन" (श्रीअगस्त्यसहिता) एक ही बात है। (५) श्रीअगस्त्यमंहिता और भविष्यपुराण की कथा की तो इस प्रकार से पकता हो जाती है कि सूर्यमण्डल के अन्तर श्रीरामजी धिराज है ही, (श्लोक )"सूर्यमण्डलमध्यस्थं रामं सीतासमन्वितम् । नमामि पुण्डरीकाक्षममेयं गुरु तत्परम्" ॥१॥ इससे, सूर्य मंडल ही से जन-हृदय तिमिर-नाशक श्रीरामांश अवतार हुआ ॥ और काशी से जन्मस्थान की भिन्नता यों नहीं कि श्रीकाशीजी में श्रीगुरुशरणागत होने से अपर जन्म ही जानिये क्योंकि ऐसा कहा ही जाता है। अर्थ विचार से "देवल' तथा पुण्यसदन (भूरिकर्मा) की एकता भी मानिय । शंका न कीजिये । टोनो ग्रन्थों (थी अगस्त्यसंहिता तथा भविष्यपुराण) की कथा एक ही समझिये ।। (१३) महामुनि श्रीदेवाधिपाचार्य स्वामी। महामहिमायुक्त श्रीदेवाचार्य महाराजजी एक समय श्रीकाशी यात्रा के मार्ग में किसी ग्राम में एक वृक्ष के समीप दशमस्कन्ध SCORRESS R . RASHTRA भकिसुधास्वाद तिलक। ३०३ (श्रीभागवत ) कह रहे थे; कथा में “ यमलार्जुन" का प्रसंग था; ज्योंही अध्याय पूरा हुआ कि उसी क्षण पास का वृक्ष, किसी प्रत्यक्ष कारण के विनाही, अकस्मात् गिर पड़ा अडररधाम | और साथही आश्चर्यमय यह घटना भी हुई कि एक विमान और एक पुरुष सब सन्तों ने देखा; उस मनुष्य ने आपके चरणसरोज की वन्दना करके कहा कि मैं बड़ाही पापी, नरक से हो आके, यही वृक्ष होके यहां था; इस समय श्रीहरिकथा के श्रवण से में निष्पाप हो, श्रीभगवत्कृपा से इस विमान पर चढ़ परधाम को जाता हूं, यह आप के ही दर्शनों का प्रभाव है। (१४) श्रीहरियानन्द आचार्य स्वामी। हरिआनन्द में सदा छके हुए श्री ६ हरियानन्दजी ने एक समय पुरुषोत्तमपुरी में जा आषाढ शुक्ल द्वितीया को रथारूढ़ श्रीजगन्नाथजी के दर्शन किये; चलते चलते रथ रुक गया था; खींचे ठेले से हिलता बढ़ता'न था। आपने पुकारके कहा कि सब कोई रथ को छोड़ दो, श्रीजगदीश कृपा से रथ आपही चलेगा" ऐसा ही हुआ, सौ पगतक रथ भापही दौड़ा गया । जयजयकार ध्वनि छा गई। ऐसे ऐसे इतिहास आप के यश के अनेक हैं। छप्पप । "चरणकमल बन्दों कृपालु हरियानंद स्वामी। सर्वसु सीताराम रहसि दशधा अनुगामी ।। वालमीक' वर शुद्ध सत्त्व माधुर्य रसालय । दरसीरहसि अनादिपूर्व रसिकनकी चालय ॥ नित सदाचार मैं रसिकता अति अद्भुतगति जानिये। जानकिवल्लभकृपा लहि शिषप्रतिशिष्य वखानिये।" (श्रीयुगलप्रिया, रसिकभक्तमाल) (१५) आचार्य स्वामी श्री १०८ राघवानन्दजी। कुछ तो आप का प्रताप, स्वामी अनन्त श्रीरामानन्दजीके चरित श्रीभक्रमाल सटीक। . A में लिखाही जा चुकी है एकसमय एक राजाने अपने लड़के को शिण्ये करने के लिये बहुत प्रार्थना कहना भेजी; उसी क्षण और दो जनों की भी प्रार्थनां विनय सुनके, कृपासिन्धुजी एकही समय तीनों ठाम तीन रूप से गए । उस दिन तो किसी ने यह भेद न पाया, पर दूसरे दिन सव वार्ता प्रसिद्ध हो ही तो गई । आपके चरित का पार भला कौन पासकता है, कि जिनके शिष्य स्वयं प्रभु (भगवान् रामानन्द ) ही हुए । छप्पय । "रसिक राघवानन्दबस काशी प्रस्थाना । गुरुरूप शिव लये दये रसिकाई ध्याना ।। काल करालहि हटकि शिप्य किय रामानन्दा। प्रगटी भनि अनादि अवध गोपुर स्वच्छन्दा ॥ आवारज को रूप धरि जगत-उधारन जतन किया महिमा महाप्रसाद की प्रगटि रसिक जन सुक्ख दिय॥ (श्रीयुगलप्रिया, रसिक भनमाल)" (१६) श्रीअनन्तानन्दजी। २५३ रपय । (६६०) अनन्तानन्दपदपरसिकेलोकपालसे तेभए॥योगा- नन्दे गयेश करमचन्दै अल्हे पैहारी।सारी रामदास श्रीरंग अवधि गुण महिमामारी॥तिनके नरहरि उदित मुदित मेहाँ मंगलतन-। रघुबर यदुबर गाइ बिमल कीरति संच्यो धन ॥ हरिभक्ति सिन्धु बेलो रचे पानि पद्मजासिर दए । अनन्तानन्द पद परसिकै लोकपाल से,ते भए ॥ ३७॥ (१७७) १"मेहा"-पाठान्तर'महा' भी है; "मेह" मेघ"घेला"-मर्यादा, मेरा नांववेरा इति।३ "पद्मजा"-श्रीलक्ष्मीजी । Sactice Kyri કર भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६२ ३०५ वार्तिक तिलक । प श्रीअनन्तानन्दजी महाराज के चरणसरोजके विमल रज को स्पर्श करके अर्थात् चरणशरण होके, लोकपालों के सदृश जीवों के लोक परलोक में रक्षक श्रीभक्त ये सब हुए-श्रीयोगानन्दजी;श्रीगयेशजी'; श्रीकर्मचन्दजी'; श्रीअल्हजी'; श्रीपयहारी कृष्णदासजी'; श्रीसारी- रामदासजी; श्री श्रीरंगजी'; ये सब सद्गुणों के तथा भारी महिमा के सीमा हुए। तिन्ह के शिष्य मङ्गलस्वरूप आनन्द के मेघ श्री नरहरिदासजी प्रकट हुए, जिन्होंने, श्रीरघुबर कृपालजी तथा श्री यदुवरजी, (दोनों) के सुयश गान करके, निर्मल कीर्तिरूपी धन का संचय किया ॥ श्रीअनन्तानन्दजी ने ये शिष्य ऐसे किये कि जो हरिभक्तिरूपी समुद्र के बेला (मर्यादा ) ही हुए; और पद्मजा अर्थात् श्रीजानकीजी महारानी ने, आपके भजन से प्रसन्नतापूर्वक प्रकट होके श्रीअभयकरकमल आपके मस्तक पर रक्खा ॥ कहते हैं कि आप एक वेर संभर प्रदेश में पहुंचे वहां के राज- माली ने आपके साथ के सन्तों को बिही के फल लेने से रोक दिया। दुःखित हो सन्तों ने आप से कहा; दूसरे दिन विही एक भी न पाया गया। राजा ने सब वृत्तान्त सुन के कारण जाना। श्रीस्वामीजी के शरणागत हुआ। इस प्रकार से वह सारा देश भगवगन हो गया। *तिन्ह के अर्थात् श्रीअनन्तानन्दजीमहाराज के शिष्य; और कोई २ महात्मा ऐसा भी लिखते हैं कि श्री श्रीरंगजी के शिष्य । (कवित्त)"रामानन्द स्वामी जू के शिष्य श्रीअनन्तानन्द, शीतल सुचन्दन से भक्तन अनन्द कर । सन्तन के मानद, परानंद मगन मन मानसी स्वरूप छवि सरसिमरालवर ॥ जनकलली की कृपापात्र चारुशीला अली, रूप में अभिन्न भुजे रंगभूमि लीला पर ऊपर समाधि; उर अमित अगाध जैन सुधा स्त्रयत, उमगत मानो सुधासर ॥" (रसिक भक्तमाल) अध्या, यह भी संभव है कि श्रीअनन्तानन्दजी ने "भक्तिसिन्धुबला" नामक कोई ग्रन्थ ही रवा हो । अथवा, श्रीसीतारामजी की भक्तिरूपी अगाधसिन्धु में बिहार करनेवाले घेला अर्थात् येरा (नावयेरा) रूपी ये शिष्य सब हुए । इन महात्माओं से भक्ति की इति है। RECHAR RECTOR Amerika श्रीभक्तमाल सटीक। (१७) श्रीश्रीरंगजी। (१५४) टीका। कवित्त । (६%38) घोसा एक गांव तहां श्रीरंग सुनाव हुतो, वनिक सरावगी की कथालै बखानिये । रहतो गुलाम गयो धर्मराज धाम, उहाँ भयो वड़ो दूत कही "सुनु अरे वानिये ॥आए बनिजारे लैन देख तूं दिखा चैन, वैल शृङ्ग मध्य पैठि मारे पहिचानिये । बिनु हरिभक्ति सब जगत की यहीगति, भयो हरिभक्त श्रीअनन्त पद ध्यानिये ॥११७॥(५.१२) वार्तिक तिलक। जयपुर में 'देवसा' नामक एक ग्राम है, वहां प्रथम सरावगी मत के बनिये के घर में जन्म श्रीरङ्गजी का था, इनके श्रीरामभक्त होने की कथा यों है, कि इनके गृह में एक टहलुआ था, वह मरके श्रीधर्मराजजी के लोक में एक बड़ा यमदूत हुना। वह एक दिन इसी देवसा गाँव में, यमराज का भेजा आया; और पूर्व परिचय से श्रीरङ्ग के सामने प्रत्यक्ष होके बोला कि “रे वनिया ! सुन, तुझे एक कौतुक दिखाता हूं; देख ये जो वनजारे यहां अन्नादिक लेने आए हैं, उनमें से एक का प्राण लेने में आया हूं; सो उसीके बैल की सींग पर बैठ के अभी अभी उसको मारे डालता हूं, तू देख के समझ लेना और जानना कि श्रीसीतारामजी की भक्ति विना सव जगत् के लोगों की इसी प्रकार की नीच मृत्यु होती है । इस घटना को प्रत्यक्ष देख चुकने पर यदि तुझे हरिकृपा से चेत हो आवे तो श्रीअनन्तानन्दस्वामी का शरण लेना ॥" श्रीरङ्गजी उस ठिकाने उस समय गये और देखा कि बनजारेको उसीके वैलने अपनी सींगों से, इनके देखते ही देखते, पेट चीर के मारडाला। यह घटना देख, इनको वस्तुतः भय तथा ज्ञानवैराग्य हुआ; और अपने कुल के सब अनाचारों को त्याग के, श्रीअनन्तानन्द स्वामी के चरणशरण में श्रा, श्रीराममन्त्रादिक पंच संस्कार ग्रहण BREASSACREAKILLER-SCARSEASE RSCREET , भनिधास्वाद तिलक। ३०७ कर, गृहस्थाश्रम ही में रहके, माप बड़े महात्मा और परम भक्त हो गए । (१५५) टीका । कवित्त । (६८८) सुतको दिखाई देत भूत, नित सूख्यो जात, पूछे, कही वात, जाइ वाके ठौर सोयो है । आयो निशि मारिवे को धायो यह रोष भस्यो, "देवो गति मोकों" उनि बोलिकै सुनायो है ॥ “जाति को सोनार पर नारि लगि प्रेत भयों, लयों तेरी शरण मैं ढूंढ़ि जग पायो है" दियो चरणामृत लै, कियो दिव्य रूप वाको अति ही अनूप, सुनो भक्ति भाव गायो है ॥ ११८ ॥ (५११) वार्तिक तिलक। कुछ कालान्तर की बात है कि श्रीरंगजी के पुत्र को एक प्रेत रात में दिखाई देता था; जिसके भय से वह लड़का सूखा जाता था; आपने उससे दुर्वलता का कारण पूछा । लड़के ने वात सब कही। जहां वह पुत्र सोता था वहीं स्वयं आप भी जा सोए; प्रेत जिस समय आया करता था अपने उसी समय पर ही तो पहुँचा । आप क्रोधयुक हो, कोई आयुध लेके, उसे मारने दौड़े। उस प्रेत ने कहा कि “ मुझे आप इस दुष्ट योनि से छुड़ा के शुभ गति दीजिये; मैं इसी ग्राम का अमुक सोनार था, परस्त्री में प्रीति करने से प्रेत हुआ हूं। मैं अपनी गति के लिये संसार में ढूंढ़ता ढूंढ़ता आपही को समर्थ जान के शरणागत हुआ हूं। यह सुनते ही, आपने दया करके श्रीचरणामृत देके, उसको उस अधम योनि से छुड़ाके दिव्य रूप कर दिया। आपके पास श्रीपीपाजी भी कृपा करके आए थे सो कथा श्रीपीपाचरित में आवेगी। सुनिये, श्री श्रीरङ्गजी की भनिभाव का अत्यन्त अनूप प्रभाव इस प्रकार से गान किया गया है । और आप के चरित्र बहुत हैं पर यहां इतने ही कहे गए। BRECER CSC । . R * श्रीभक्तमाल सटीक। (१८) पयहारीश्रीकृष्णदासजी। (१५६) छप्पय । (६८७) निर्वेद अवधि कलि कृष्णदास, अन परिहरि पय पानकियो।जाके सिर कर धयो, तासु कर तर नहिं अड्ड्यो । अर्यो पद निर्वान सोक निर्भय करि छ- ड्ड्यो । तेज पुंज बल भजन महामुनि ऊरधरेता । सेवत चरण सरोज राय राना भुविजेता ॥ दाहिमा वंश दिनकर उदय, सन्त कमल हिय सुख दियो। निर्वेद अवधि कलि कृष्णदास अन परिहरि पय पान कियो ॥ ३८ ॥ (१७६) वार्तिक तिलक। कलियुग में तीन वैराग्यकी सीमा श्रीकृष्णदासजी महाराज अन्न को त्याग के केवल दूध ही पिया करते थे । और योग ज्ञान भक्ति निधान सिद्ध कैसे हुए कि जिस जनके सीस पर करकमल रक्खा, उसके हाथों के नीचे आपने अपना हाथ नहीं मोड़ा (प. सारा) अर्थात् उससे कभी कुछ न लिया। और उस जन को संसार के सब शोकों से निर्भय ही कर छोड़ा, तथा अन्त में मोक्षपद दिया। तेज के पुंज, श्रीरामभजन के महाबल से युक्त, महामुनि और ऊर्द्धरेता थे। जिनके चरणसरोज की सेवा, पृथ्वी के जीतनेवाले अनेक राजा राना किया करते थे । “दांहिवां ब्राह्मणों" के वंशमें सूर्य सम उदित होकर कमलरूपी समस्त सन्तों के हृदय को आपने आनन्द दिया प्रफुल्लित किया। १ "निर्यद" वैराग्य, विराग । २ "निर्वान" मोक्ष मुक्ति। ३ "ऊरधरेता" जिसका चौर्य कभी न गिरे, ब्रह्माण्ड पर चला जाये । पाठान्तर 'सोव" (उसको)। ४ "भुविजेता"पृथ्वी को जीतनेवाले। Earks *** भकिसुधास्वाद तिलक। ३०६ जोकि आपने सर्वदा अन्न को त्याग के दुग्ध ही पान किया, अतएव आपकी पयहारी (पयोहारी) संज्ञा प्रसिद्ध हुई है। जोकि आपने किसी शिष्य से कदापि कुछ न लिया और अपने शिष्यों को जीवनमुक्न ही कर दिया, इसीसे टीकाकार श्रीप्रियादास जी ने आदि ही में यह पद लिखा है कि- "गुरू गुरताई की सचाई लै दिखाई जहाँ गाई श्री पैहारीजी की रीति रंग भरी है"। दो. तो ऐसा चाहिये, शिख सों कळू न शिष्यहुँ ऐसाचाहिये, तन मन धन सब देय ॥ १ ॥ (१५७ ) टीका । कवित्त । (६-६) जाके शिर कर धस्यो, तातर न ओड़यो हाथ दीनो बड़ो वर, राजा कुल्हू को जु साखिये । परबत कंदरा में दरशन दीयो आनि दियो भाव साधु हरि सेवा अभिलाखिये ॥ गिरी जो जलेबी थार मांझ ते उठाई वाल, भयो हिये शाल बिन अरपित चाखिये । लै करि खड़ग ताहि मारन उपाइ कियो, जियो संत भोट, फिरि मोल करि राखिये ॥ १६॥ (५१०) वातिक तिलक। श्रीपयहारीजी ने जिस शिष्यके माथे पर हाथ रक्खा उसके हाथों के नीचे अपना हाथ कभी न पसारा (न ओड़ा); और. बड़ा भारी वर 'भनि मुनि' सो दिया; उसमें कुल्हू देश का राजा साक्षी है, कि जिसको आपने भाके परबत के कन्दरे में दर्शन और राज्य दे, शिष्य कर, भावभक्ति से उसको पूर्ण कर दिया, कि जिससे श्री. सीतारामजी तथा भक्क सन्तों की सेवा सदा किया करता था; उससे तृप्त नहीं होता था। वरश्च सेवाभिलाप ही से भरा रहता था। एक समय सन्तों का भण्डारा था; उसीमें जलेवियों का थार श्रीसीतारामजी के मन्दिर में जा रहा था, उसी थार में से दो एक जलेवी गिर पड़ीं; सो भन राजा के छोटे से बालक ने उठाके मुखमें डाल ली राजा को देखते ही हृदय में अति सन्ताप BreCREASERARIAGE RAKAR R श्रीभक्रमाल सटीक। हुआ कि यह हमारा सुत होके, विन भगवदर्पण की हुई जले. वियां इसने खा लीं । इससे खड्ग लेके उसको मार डालना चाहा; तव सन्तों ने जाके उसको मांग के अपना करके, उसकी रक्षा की। फिर सन्तों ने कहा कि यह बालक अव हमारा होगया, इसका मल्य हमको देके इसको तुम अपने ही पास रक्खो॥ ( १५% ) टीका । कवित्त । (६८५) नृपसुत भक्त बड़ो अबलों विराजमान साधु सनमान में न दूसरो वखानिये । संत वधू गर्भ देखि उभे पनवारे दिये, कही अर्भ इष्ट मेरो ऐसी उरानिये ॥कोऊ भेषधारी सो व्योहारी पगदासिन को कही कृपा करो कहा जानें और प्रानिये । ऐपै तजिदेवो क्रिया देखि जग चुरो होत जोतिवहुँदई दाम राम मति सा- निये ॥१२०॥ (५०६) वार्तिक तिलक । कुल्हू के राजा का पुत्र बड़ा भन, साधुओं की सेवा सन्मान करने में अद्वितीय है। भंडारे में एक गृहस्थाश्रमी सन्त की वधू को गर्भवती देख, उसको दोहरा पारस (दो पनवारे') देकर, आपने यह कहा कि इस गर्भ में जो पालक है, वह मेरा इष्ट अर्थात् भगवद्भक्त है, उसके लिये में इस दूसरे पत्र के पदार्थ अर्पण करता हूं। कालान्तर में वस्तुतः उस गर्भ से हरिभक पुत्र ही हुआ। एक मनुष्य सन्तों का वेष बनाए, पगरखियां (पनहियां )वेचा करता और अति दरिद्र ही बना रहता था। भक्त राजा को उसपर दया आगई उससे वोले कि "आप तो कृपा करके कंटकादि से रक्षा करने के हेतु यह व्यापार करते हैं, परन्तु और जीव इस बात को कैसे जान सके ? सब जगत् के लोगों को यह व्यवहार देखके १"अवलो" अयतक अर्थात् थीरियादासजी के समय तक । २“ पनवा?" पत्र, पत्तल । ३" असं "अर्भक, बालक । ४ " पगदासिन "=पनही, पगाखी, जूतियां । ५ 'जातिब हु दई 'हृदय में बहुत प्रकाश दिया, बहुत ज्योति दी, यहुन ज्योतियुक्त दान सुवर्ण दिया, जोतने बोने को भूमि तथा खेत की सामग्रियां दी।- ESCOREAKINCRESCRI-NCRE যেমন .

* भक्तिसुधास्वाद तिलक । अति अनुचित लगता है, अतः इस कर्म को त्याग दीजिऐ"। ऐसा कहकर बहुत जोति, भूमि जोतने वोने खेती करने को, (अथवा) बहुत जोतियुक्त दाम सुवर्ण तथा और द्रव्य देकर फिर कहा कि "श्रीसीतारामजी के चरणों में मन लगा के भजन कीजिये"। वह वैष्णव-वेष-धारी उस कर्म को तज कर श्रीरामजी में लग गया और सन्तों की सेवा सन्मान करने लगा ॥ भक्तराज की दया की जय, श्रीपयहारीजी महाराज के प्रभाव की जय ॥ उस राजा के वंश का राजकुमार ( "नृपसुत" ) श्रीमियादासजी महाराज के समय ( संवत् १७६६ ) पयत विराजमान था ॥ पुनः श्रीपयहारीजी ने गलता तथा आमेरके कनफटे वैष्णवद्रोही. योगियों को अपनी सिद्धता से उस मठ से निकाला- रात भर रहने के लिये उस जगह आप गयेथे परन्तु उन विमुख योगियों ने कहा "यहां से उठ जाव" तव आप ने अपनी धूनी की आग कपड़े में बांध ली और दूसरी ठौर जा बैठे, वहीं आग कपड़े में से रख दी। कपड़े का न जलना देख के योगियों का महंत बाघ वन कर आप पर डपटा। आप ने कहा "तू कैसा गधा है" तुरन्त वह गधा होगया और अपने बल से मनुष्य न बन सका। और सव योगियों के कान के मुद्रे कानों से निकल २ आप के पास पहुँच के देर लग गये । आमेर का राजा पृथ्वीराज आपकी सेवा में जाकर बड़ी प्रार्थना करने लगा तब आपने गधे को फिर आदमी वना के आज्ञा दी कि इस जगह को तुम सब छोड़ के अलग रहो और लक. ड़ियां इस धूनी में पहुँचाया करो। उन सवोंने स्वीकार किया और राजा पृथ्वीराज भी श्रीपयहारीजी का चेला हो गया और तभी से गलता भापकी प्रसिद्ध गादी हुई ॥ वन में गऊ आप से आप दूध श्रीपयहारीजी को देती थीं। आप ने आमेर की एक गणिका को भी चेताया था जिसने परम गति पाई ॥ EMA SARAIGALE NAGAR *** *** श्रीभक्तमाल सटीक। (१६) श्रीयोगानन्दजी। आप श्रीअनन्तानन्दजी के शिष्य थे । और महात्माओं ने आपको सांख्यशास्त्र के कर्ता श्रीकपिल भगवान् का अवतार भी लिखा है इसीसे आप योगानन्द नाम से प्रख्यात हुए। (२०) श्रीगयेशजी। श्रीगयेशजी श्रीअनन्तानन्दजी के कृपापात्र अर्थात् श्रीरामानन्द स्वामीजी के पौत्र शिष्य थे। श्राप की भक्रि की प्रशंसा किस से हो सकी है ॥ (२१) श्रीकर्मचन्दजी। श्रीअनन्तानन्दजी महाराज के शिष्य श्रीकर्मचंदजी बड़े नामा- नुरागी साधुसेवी तथा गुरुनिष्ठ थे । (२२) श्रीअल्हजी। श्रीअल्हेजी श्रीअनन्तानन्दजी के शिष्य थे । आपकी कथा आने की, ५४ वें मूलः २४८ वें कवित्त, में आगे आवेगी॥ (२३) श्रीसारीरामदासजी । कोई "सारीरामदासजी"एक ही नाम लिखते हैं, और किसीने "सारीदास" और "रामदास" दो व्यक्ति कहे हैं, भस्तु, आप श्रीअनन्तानन्दजी महाराज के शिष्य थे। एक समय आप कृपा करके श्रीचित्रकूटजी के पास "स्वर्श" नाम के ग्राम में, वहां के लोगों को विशेष करके चेताने गए, क्योंकि उस गांववाले वैष्णवों के द्रोही थे। एक के द्वारपर आप पहुंचे, उस अभागे ने खड़े भी न रहने दिया; आप नदी तट पर जा ठहरे। उसी दिन वहां के राजा का पुत्र १ दूसरे श्रीमहजी, श्रीकोल्हजी के भाई का वर्णन, १३६ वे मूल में होगा ॥ तथा श्रीकर्मचन्दजी के पुत्र श्रीदिवाकरजी का ॥ आंबकी डाल झुक PRE भक्निसुधास्वाद तिलक। मर गया। जब उसको लोग नदीतट पर ले गये तो आपने उन लोगों से कहा कि “यदि तुम्हारा राजा और ग्रामवासी लोग आज से वैष्णवसेवा की प्रतिज्ञा करैं तो अनन्त शनिवाले करुणाकर श्री- सीतारामजीसे हम इस लड़केको पुनर्जीवित होने की प्रार्थना करें।" ग्रामवासियों सहित राजा ने सुबुद्धि मन्त्रियों के कहने से वही दृढ़ प्रतिज्ञा की; तब साधुचरणामृत (अपना पदतीर्थ) देकर आप ने उस लड़के को जिला दिया । इस प्रकारसे उस प्रदेश को आपने चेता कर हरिभक्त करदिया। चौपाई। "सन्तबिटप सरिता गिरि धरनी । परहित हेतु सबन्ह की करनी ॥ हेतु रहित जुग जुग उपकारी । तुम तुम्हार सेवक असुरारी ॥" सन्त कृपा की जय ॥ ३७ वे मूल में श्री अनन्तानन्दजी के शिष्यों के नाम कह पाए है। २. श्रीयोगानन्दजी ५. श्रीपयहारी कृष्णदासजी २. श्रीगपशजी ६. धीसारीरामदासजी ३. श्रीकमचन्दजी ७. श्री श्रीरंगजी ४. श्रीश्रल्हजी सो, इनकी चर्चा ऊपर हो चुकी, अब श्रीनरहरिदामजी की वार्ता सुनिये । और तर, श्रीपयहारीजी के शिष्यों के नाम ३६ व में (२४) श्रीनरहरिदासजी। किसी फिसी ने श्रीनरहरिदासजी को श्री श्रीरंगजी का शिष्य लिखा है; और कोई कोई आपको, श्रीअनन्तानन्दजी का पौत्र शिष्य नहीं, वरंच स्वयं श्रीअनन्तानन्दजी ही का शिप्य लिखते हैं । किसी का लेख है कि यही महाराज श्रीनरहरिदासजी श्री गोस्वामी तुलसीदासजी के गुरु थे; और किसी का मत है कि नहीं, श्रीगोस्वामीजी के गुरु श्रीनरहरिदासजी तो, और ही थे, वे श्री- गोपालदासजी वाराहक्षेत्रवासी के शिष्य थे। अस्तु, श्रीनरहरिदासजी एक समय श्रीजगन्नाथजी के दर्शन को गए, वहां आपने सोचा कि "श्रीठाकुरजी को यदि साष्टाङ्ग दण्ड- वत् करूं तो दर्शन से उतने समय तक असह्य विपेक्ष होगा," इससे ॥

FROR श्रीभक्तमाल सटीक। गोपाल, आप उलटे हो पड़ रहे; पण्डों ने यह अनाचार देख उनके पांव प. कड़ घसीट के मन्दिर के बाहर कर दिया। पर, श्रीजगन्नाथजी की कृपायुक आज्ञासे सबों ने आपका बड़ा आदर सम्मान किया । (१५६) बप्पय । (६८४) पैहारी परसाद तें शिष्य सवै भये पारकर ॥कील्ह अगर, केवल, चरण,व्रतहठी नारायनें, । सूरज, पुरुषाँ, पy तिपुर हरि भक्ति पारायन ॥ पद्मनाभ, टेक, टीलो, गदाधारी । देवा, हेम, कल्याँन, गंगा गंगासम नारी ॥ विष्णु दास, कन्हेर, रंगा, चांदन, संबीरी गोविंदपर । पैहारी परसाद तें, शिष्य सवै भये पारकर ॥३६॥ (१७५) वार्तिक तिलक। पयहारी श्रीकृष्णदासजी के ये सब शिप्य, श्रीगुरुप्रसाद से, जीवों को संसारसागरसे पार उतारनेवाले और श्रीसीतारामभक्ति में परम परायण हुए- १ स्वामी श्रीकालहदेवजी १५ धीदेवापण्डाजी २ स्वामीश्रा६ अग्रदेवजी १६ श्रीहेमदासजी ३ श्रीकेवलदासजी १७ श्रीकल्याणदासजी ४ श्रीचरणदासजी १८ स्त्रीशरीर श्रीगंगागाईजी, श्रीगङ्गाजी के ५ श्रीवतहठीनारायणजी समान, अथवा गङ्गादासजी तथा ६ श्रीसूर्यदासजी श्रीगंगादासकी स्त्री गंगाजी के सदृश ७ श्रापुरुषानी ( पुरुषोत्तमदास) २६ श्रीविष्णुदासजी श्रीपृथु दासजी २० श्रीकान्हरदासजी ६ श्रीत्रिपुरदासजी (त्रिपुरहरि) १ श्रीगंगागमजी १० श्रापद्मनाभजी २२ धीचांदनजी ११ श्रीगोपालदासजी २३ श्रीसवीरीजी १२ श्रीदेवरामजी २४ एक महात्मा ने लिया है कि (२४) १३ श्रीटीलाजी श्रीगोविन्ददास नाम के भी एक १४ श्रीगदाधारी (गदाधरदास) जी शिष्यश्री पयहारीजी के थे। "गोविंदपर"-श्रीगोन्दिपगगण, हरिभक्त ।

भकिसुधास्वाद तिलक। ३१५ (२५) श्रीकोल्हदेवजी। (१६० ) छप्पय । (६-३) गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं, त्यों कील्ह करन नहिं कालवश ॥रामचरण चिंतवनि, रहति निशि दिन लौ लागी।सर्व भूत शिर निमित, सूर,भजनानंद भागी॥ सांख्य योग मत सुदृढ़ कियो अनुभव हस्तामला ब्रह्म रंध्रकरि गौनभये हरितन करनी बल ॥ सुमेर-देव-सुत जग विदित, भू विस्तास्यो विमल यश। गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं, त्यों कील्ह करन नहिं कालवश ॥ ४०॥ (१७४) घातिक तिलक। जैसे श्रीगंगाजी के पुत्र श्रीभीष्मजी को मृत्यु ने अपनी इच्छा से विनाश नहीं किया, तैले ही स्वामी श्रीकोल्हदेवजी को काल अपने वश नहीं कर सका, क्योंकि आपकी यह दशा थी कि श्रीराम सच्चिदानन्दजी के चरणकमल के स्मरण चितवन में रात्रि दिन तैल- धारावत् एक रस लय लगी रहा करती थी। सम्पूर्ण प्राणीमात्र का सीस आपको देग्व के नमित हो जाता था; आप भी सर्व प्राणियों में श्रीसीतारामजी को अन्तर्यामी जानके सबको सीस नवाते थे और आप माया मोह के दल को नाश करने में सूरवीर सन्त, भजना- नन्द के भोना, भाग्यशाली थे। सांख्य शास्त्र तथा योगशास्त्र इन दोनों मतों के सिद्धान्तों का सुदृढ़ अनुभव आपको ऐसाथा कि जैसे अपने हाथ में वर्तमान आंवले के फल का यथार्थ ज्ञान होता है । १" गांगेर" श्रीमती ।२.नंग्यो नहीं"-नही नाश किया। ३ "सांख्य"शास्त्र, चौबीस तत्वमय प्रात को जान के उससे पृथक् पुरुष को जानना । ४ योग"-अप्रांग साधन कर मूढ़ विक्षिप्त घेोर शन्त और अनुरोध इन पाँचों चित्त की वृत्तियों को समट के केवल संप्रज्ञात योग में जाके गरमात्मा में प्राप्त हाके असंप्रज्ञात समाधि में स्थित हो जाना॥ - 5 + श्रीभक्रमाल सटीक। . अन्त में अपनी इच्छा ही से सुपुम्ना मार्ग होकर, ब्रह्मांध्र वेधके, हरिकृपा से अपनी करनी के बल से श्रीरामरूप हो गए; अर्थात् सारूप्यामुक्ति को प्राप्त हुए । श्रीसुमेरदेव जी के पुत्र ( श्रीकोल्हदेवजी ) ने सर्व जगत् में विख्यात, इस प्रकार का विमल यश भूमण्डल में फैलाया कि, जैसे श्रीभीप्मदेवजी ने दक्षिणायन में शरीर नहीं त्यागा बरंच हरिकृपा- श्रिता अपनी इच्छा ही से श्रीभगवद्धाम को गए; तसेही, यद्यपि कालसर्प ने आपको तीन वेर काटा, तथापि मृत्यु की तो बात ही क्या है, किंचित् विषमात्र तक न चढ़ा ॥ यद्यपि श्रीकोल्हदेय स्वामीजी विरक्त थे तथापि आपको "सुमेरदेव सुत" कहने का तात्पर्य यह है कि इनके सम्पन्ध से उनका नाम कहके, श्री १०८ नामास्वामीजी ने धीसुमेरदेवजी को भी भक्तमाल के भक्तों में गिनती किया, मो प्रागे टीकाकार भगवद्धाम जाना थीसुमेरदेवजी का वर्णन करहोगे ॥ (१६१)रीका । करिन । (६८२) श्रीसुमेरदेव पिता सूबे गुजरात हुतें भयो तनु पात सो विमान चढ़ि चले हैं । बैठे मधुपुरी कील्ह मानसिंह राजा ढिग, देखे नभ तात, उठि कही "भले, भले, ह" ॥ पूछे नृप"बोले कांसों ?" "कसे कै प्रकासों;" "कही;" कह्यो हठ परे, सुनि अचरज रले हैं । मानुस पठाये, सुधि ल्याए सांच, आँच लागी, करी साष्टाङ्ग बात मानी भाग फले हैं ॥ १२१॥ (५०८) वार्तिक तिलक । श्रीकोल्हदेवजी के पिता, श्रीसुमेरदेवजी, सूबै गुजरात के "सूवा" (सूवादार) थे; यद्यपि गृहस्थाश्रम ही में रहे, तथापि परम भगवद्भक्र थे; सो आप वहां ही (गुजरात में ही) शरीर त्याग कर विमान पर चढ़के श्री रामधाम को पधारे; उस समय श्रीकोल्हदेव जी मथुराजी में राजा मानसिंह के पास बैठे थे। अपने पिताजी को विमान पर आकाश में जाते देख, उठके, प्रणाम कर बोले कि बहुत अच्छा, भले, पधारिये" अचरज रले हे 'आश्चर्य में मिले. श्राश्चर्ययुक्त हुए आश्चर्य को प्रास SCka हुए।"श्राच" ताप ।

*** . ***** भनिसुधास्वाद तिलक। ३१७ यह सुन मानसिंह ने पूछा कि “आप किससे बोले ?" आपने उत्तर दिया कि "प्रगट कहने की बात नहीं है" परन्तु राजा ने धड़ी नम्रतापूर्वक बड़ा हठ किया कि "कृपा करके अवश्य सुनाइये।" तब आपने पिताजी के श्रीरामधाम पधारने की सब वार्ता कह सुनाई॥ बड़ा आश्चर्य मान, साँडिनी पर मनुष्यों को भेज के राजा ने सुधि मँगवाई॥ गुजरात से लौट के उन लोगों ने कहा कि "हां, सत्य है, उसी दिन उसी क्षण आप का तन छूटा है ।" यह सुन मानसिंह अपनी अप्रतीति का पश्चात्ताप कर, श्रीकोलह- देवजी के समीप गया और उसने साष्टाङ्ग दण्डवत् करके यह बि. चारा कि ऐसे त्रिकालज्ञ महानुभाव का संग तथा सेवा मुझे प्राप्त है; सो मेरा महोभाग्य और पूर्व सुकृतों का फल, तथा श्रीकरुणाकर प्रभु की विशेष कृपा है। (१६२) टीका । कवित्त । (६८१) ऐसे प्रभु लीन, नहीं काल के अधीन, बात सुनियें नबीन, चाहे रामसेवा कीजिये । धरी ही पिटारी फूल माला, हाथ डास्यो तहाँ व्याल कर काट्यो, कह्यो " फेरि काटि लीजिये "॥ऐसेही कटायो चार तीनि, हुलसायो हियो, कियो न प्रभाव नेकु सदा रस पीजिये। करि के समाज साधु मध्य यों बिराज, प्रान तजे दशैं द्वार"; योगी थके; सुनि कीजिये ॥ १२२॥ (५०७) वार्तिक तिलक। श्रीकोल्हदेवजी इस प्रकार परब्रह्म श्रीसीतापति प्रभु में लीन रहते थे कि काल आप को अपने आधीन करही नहीं सका था। एक समय की यह लोकोत्तर नवीन वार्ता सुनिये कि प्रभात में आप श्रीसीतारामजी की पूजा सेवा करने लगे; सो, सुगन्धित पुष्प मालाभों की पिटारी जो पहिले, से वहां रक्खी थी, उसमें * नव द्वार-१२ नेत्र, ३।४ कर्ण, ५। ६ नासिका, ७ मुख, मलद्वार, ६ मूत्र- द्वारा १० वा दशैं द्वार "ब्रह्माण्ड, ब्रह्मरंध महाक ॥ Recxicket - . SHRETREKAXXX ३१८ श्रीभक्तमाल सटीक। एक काला सर्प शीतनता तथा सुगन्धि के लिये आ बैठा था।मापने जव, श्रीप्रभु को स्नान चन्दनादिक अर्पण करके फून लेने के अर्थ, उस पिटारी में हाथ डाला, तब उस सांपने हाथ में काट लिया;फिर हाथ उसके मुँह के समीप लेजाके आप वोले कि "फिर काट ले, तेरा विष क्या मुझे चढ़ थोड़े ही सकता है, क्योंकि मेरे तन मन में श्री- सीतारामध्यानामृत व्याप्त है।" इस प्रकार केवल एक क्या वरन आनन्दपूर्वक तीन बेर कटवाया, परन्तु किंचिन्मात्र भी उस काले. सर्प के विष का प्रभाव आपको व्याप्त न हुआ, काहे कि आप तो सदा श्रीरामरूपामृतरस को पान कर मग्न रहते थे। पुनः कालान्तर में जब आपने अपनी इच्छा ही से श्रीरामधाम को गमन करना चाहा, तब समस्त सन्तमण्डली को बुना,श्रीसीता- राममन्दिर में समाज वैठा, सरकार पूजन कर, मध्य में विराज- मान हो, दशमद्वार से (ब्रह्माण्ड फोर के) प्राण को त्याग,श्रीराम- धाम को प्राप्त हुए । इस बात को देख सुनके योगी लोग आश्चर्य- मान, (इस गति से ) थक के रह गए ॥ ऐसे श्रीरामोपासक की कथा सुन सुनके जगत् में जीना योग्य है ॥ (२६) श्रीसुमेरदेवजी। श्रीसुमेरदेवजी श्रीकोल्हदेवजी स्वामी के पिता, बड़े भक्त थे । आपकी कथा १२१ वें कवित्त में लिखी है। कुल्हू राजा की कथा श्रीपयहारीजी की कथा के अन्तर्गत है। (२७) स्वामी श्रीअग्रदेवजी। १६. ) छप्पय । (६८०) (श्री) अग्रदास हरिभजन विन, काल वृथा नहि वित्तयो॥ सदाचार ज्यों सन्त प्राप्त जैमे करि आये। सेवा सुमिरण सावधान, चरण राघव चित लाये ॥प्र- सिध बाग सों प्रोति सुहथ का करत निरंतर । रसना , "सुहम्स, अपने हाथों से।

P BOSASCALA २ भकिमुधास्वाद तिलक। ३१६ निर्मल नाम मनहुँ वर्पत धाराधर ॥(श्री) कृष्णदास कृपाकरि भक्ति दत्त, मन वच क्रम करि अटल दयो। (श्री) अग्रदास हरिभजन बिन. काल वृथा नहिं बि- त्तयो॥४१॥ (१७३) श्री १०८ अग्रदास स्वामीजी ने श्रीसीतारामजी के भजन विनाकिंचित्मात्र भी काल व्यर्थ नहीं बिताया। आपका सदाचार किस प्रकार का था कि जैसा पूर्वाचार्य सन्तों का हुआ करता; और प्रातःकाल से वे पूर्व के महात्मा लोग जैसे सम्पूर्ण भगवत् कर्म कर आए हैं, वैसेही आप भी मानसी नथा प्रत्यक्ष सेवा पूजा और नाम रूप गुण स्मरण करते हुए अपने चित्त की वृत्ति साव- धानतापूर्वक श्रीयुगलसर्कार के चरणकमलों में एकरस लगाए रहा करते थे। और जो आपके स्थान के समीप पुष्प फलादि युक्त वाटिका थी उसको "श्रीसीताराम विहारस्थल अशोकवन और प्रमोदवन" ही भावना से मानकर उसमें प्रीति करते थे; सो प्रीति आपकी लोक- प्रसिद्ध हो गई, क्योंकि आप निज करकमलों से ही उसकी सब कृत्य, अर्थात् श्रीतुलसी आदि वृक्षों का कोड़ना सींचना सूखे पत्रा- दिकों का बहारना इत्यादि, निरन्तर किया करते थे और रसना. (जिह्वा) से "श्रीसीताराम" निर्मल नाम इस प्रकार से सप्रेम उच्चारण किया करते थे, कि जैसे कोई अलोकिक आनन्द का मेघ मधुर २ शब्द करके बरसता है। स्वामी श्री१०-अग्रदेवजी की इस प्रकार की चाह्यान्तर प्रेमा परा दशा कैसे न हो ? क्योंकि आपके श्रीगुम्देव पयोहारी श्रीकृष्ण- दासजी ने कृपा करके, मन वचन कर्म तीनों प्रकार की भक्तिभाव, अपना सर्वस्व, देके अटल (अचल ) कर दिया था। श्रीअग्रदेव स्वामीजी की अष्टयामीय भावना-रीति-भक्ति की जय। . "धाराधर"-मेर, जलद । २"दयो"-दिया। ३"पित्तयो"-विताया, व्यतीत किया।

३२० श्रीभक्रमाल सटीक । - (१६४ ) टीका | कवित्त । (६७६ ) दरशन काज महाराज मानसिंह आयो, छायो वाग मांझ, बैठे द्वार द्वारपाल हैं । झारिक पतौवा गये बाहिर ले डारिवे को, देखी भीरभार, रहे बैठि ये रसाल हैं ॥ आये देखि नाभाजू ने साष्टाङ्ग करी, ठाढ़े, भरी जल आँखें, चले अंशुवनि जाल हैं। राजा मग चाहि, हारि, आनिकै निहारि नैन, जानी आप, 'जानी भए दास. नि दयाल हैं ॥ १२३ ॥ (५०६) वार्तिक तिलक। एक समय श्रीअग्रदेव स्वामी के दर्शन करने के लिये (आमेर जयपुर के ) महाराज मानसिंह आए; उस समय आप वाटिका ही की सेवा में थे; इससे राजा अपने समाज सहित (वाटिका ही में) गया। अतः द्वारपाल लोग बाटिका के द्वार पर बैठा दिये गए, जिसमें इतर मनुष्यों की भीड़ भीतर न आने पावे । श्रीअग्रदेव स्वामीजी उस क्षण वाटिका के सूखे पत्ते आदि बहार के फेंकने के निमित्त बाहर निकल चुके थे; कूड़े को फेंक के जो देखा तो राज- सेवकों की भीड़ भाड़ हो रही है और द्वाररक्षक भी द्वारपर बैठे हैं। अतएव श्रीरामरसिक शिरोमणि स्वामीजी बाहरही एक आम्र. वृक्ष के नीचे बैठके श्रीप्रभु की मानसी सेवा ध्यान में मग्न होगये। विलम्ब देख श्री ६ नाभाजी आके साष्टांग दण्डवत् कर सन्मुख खड़े हो, आपकी निस्सीम निरभिमानता सरलता तथा प्रेम-मग्नता देख प्रेमसे विह्वल होगए, नेत्रों से प्रेमाश्रु की धारा चलने लगी। उधर राजा भापके आने का मार्ग देख देख हारके, आप ही आके दोनों महानुभावों की प्रीति की यह विलक्षण दशा अपने नेत्रों से देख, कृतकृत्य हो, उसने यह जाना कि साक्षात् जानशिरोमाणि श्री- रामजी ही अस्मदादिक दासों पर दयालु होके "श्रीगणदेव" रूप से प्रगट हुए हैं। आप "शृङ्गाररस के आचार्य "श्रीअंग्रअली" के नामसे प्रसिद्ध हैं १ "जानी-जगत् के प्राण श्रीजानशिरोमणि प्रभु। Relect-HI-RSSCRICS * SCSIL oper . भक्रिसुधास्वाद तिलक। ३२१ आप का अष्टयाम, आपकी "ध्यानमंजरी" आप के कुण्डलिया, पदावली इत्यादि प्रख्यात ही है। आपके विशेष प्रभाव आदि में मानसी का वर्णन, हो चुका है और यहां बाटिकाप्रीति प्रसंग कुछ लिखा गया । श्रीअग्रस्वामीजी के प्रेमकी प्रशंसा कहांतक हो सकती है जिनके कृपापात्र, श्रीभक्रमालजी के कर्ता श्री १०८ नाभास्वामीजी आपको श्रीजानकीजी महारानी ने कृपा करके दर्शन दिया। आप अपनी इच्छा से तन तज के श्रीसाकेत को पधारे॥ Kattttitutstat स्वामी श्री६ नाभाजी हुए॥ स्वामी श्रीअग्रदेवजी pehate arti पयहारी श्रीकृष्णदासजी श्रीअनन्तानन्दजी भगवान् रामानन्दजी श्रीगोस्वामी श्री१०८ नाभाजी महाराज का नाम श्रीनारायणदासजी भी ( पृष्ठ ५० में ) लिखा जा चुका है। आपकी चरचा पूर्व हो चुकी है और यह भी कि भक्त- माल विक्रमीय संवत् को १७ वीं शताब्दी में, अर्थात् १६४० और १६८ के बीच में लिखी गई है। BEORAKESHSAKAL PASSESC * FORSE + श्रीभक्रमाल सटीक। ३२२ भगवान् श्रीरामानन्द कासमय, 'पन्द्रहवीं शताब्दी' लिखचुके हैं। "श्रीराधाकृष्णदास सम्पादित मननामावली" में भी यही वर्णित है। स्पष्ट है कि स्वामी श्री १०८ अयदेवजी, विक्रमीय संवत् की सत्रहवीं शताब्दी में विराजते थे । श्री १०८ नाभास्वामीजी ने, पहिले चारों भागवत सम्प्रदायों के चारों प्राचार्यों का वर्णन किया; फिर अपने निज सम्प्रदाय (श्री "श्रीसम्प्रदाय" ) की वार्ता उठाई पुनः श्रीगुरुपरम्परा का वर्णन, स्वामी अनन्त श्रीरामानुजजी से लेके, श्रीअनन्तानन्द द्वारा, अपने गुरु भगवान् तक, अर्थात् श्री १०८ अग्रस्वामीजीपर्यन्त गान किया; जय जय जय । जब श्रीगुरुयश गा चुके, तब पुनः पीछे लौटकर, अब सबसे पुराने (कलियुग ३८८९) आचार्य, श्री शङ्कर स्वामीजी का वर्णन करते हैं- (२८) श्रीस्मार्त आचार्य श्रीशङ्कर स्वामी। (१६५ ) छप्पय । (६७८) कलियुग धर्मपालक प्रगट, आचारज शङ्कर सू- भट । उतशृङ्खल अज्ञान जिते अनईश्वरवादी। बुद्ध कुतर्की जैन और पाखण्डहि आदी ॥ विमुखनिको दियो दण्ड, ऐंचिं सन्मारग आने । सदाचार की सीव विश्व कीरतिहि बखाने ॥ईश्वरांश अवतार महि, मर- जादा माँड़ी अघट । कलियुग धर्मपालक प्रगट, प्रा. चारज शङ्कर सुभट ॥४२॥ (१७२) वार्तिक तिलक। कराल कलियुग में अधर्म और अधर्मियों से धर्म को अर्थात् वर्ण- १"उतहल"-गृहला को उत्मादन करनेवाले। २"अनईश्वरवाद।" पेनास्तिक लोग, कि जो संसार का कर्ता किसी का, ईश्वर नहीं मानते वरन कहते है कि स्वयं स्वभा. वनः संघ होता रहता है और विनराता है। ३ "वुद्ध" पौद्ध । ४ "पाच" सोंचकर ! ५"माँही'मए इन फिया ॥ ନ Sabah RRIA भकिसुधास्वाद तिलक। ३२३ धर्म, आश्रमधर्म, तथा भागवतधर्मको पालन रक्षण करनेवाले परम सुभट श्रीशङ्कराचार्यजी प्रगट हुए। किस प्रकार से आपने धर्म पालन किया सो सुभटना वणन करते हैं कि जितने उतशृंखल अर्थात् वेदविदित सनातन-धर्म-परम्परा के उठा देनेवाले अज्ञानी अनीश्वर- वादी थे, और वुद्धमतावलम्बी तथा कुनी जैनमतवादी एवं पाख- एडपरायण आदिक जितने विमुख थे, तिन सबको यथायोग्य दण्ड देके उन कुमार्गों से खींच सनातन सतमार्ग में लाके, (स्थापित करके) चलाया; इस प्रकार की धर्म सुभटता की। श्रुति स्मृति-विहित सज्जन-परिग्रहीत समीचीन आचरण की सीमा (मर्यादा ) ही हुए। "ईश्वर"के (शङ्करजीके)अंशावतारप्रगट होके, वेदधर्ममर्यादा को आपने मंडन किया कि जो फिर घटे नहीं एक रस बनी रहे। आ- पकी ऐसी सत्कीर्ति सम्पूर्ण विश्व बखान करता है । श्रीशङ्कराचार्यजी (श्रीशङ्करांशावतार) दक्षिण देशमें प्रगट हुए। स्मार्तपत रक्षक दण्डी संन्यासी थे। मण्डनमिश्र नामक एक ब्राह्मण जिन को किसीने श्रीब्रह्माजीका अंशावतार भी लिखा है, बड़े कर्म- काण्डी मीमांसामतवादी थे मानो कर्म ही को वह ईश्वर मानते थे; उनको आपने (श्रीशंकरस्वामी ने) शास्त्रार्थ में निरुत्तर कर शिष्य (भगवतशरणागत) किया ॥ दो० "बिनु सतसंग न हरि कथा, तेहि विनु मोह न भाग। मोह गए विनु राम पद, होय न दृढ़ अनुराग ॥" शिवजी की आप पर बड़ी कृपा थी। आपने प्रायः सब बड़े बड़े देवतों की स्तुतियां लिखीं और बहुत देवतों के मन्दिर भी बनवाए। स्मात आपको अपना आचार्य, और अद्वैतवादी अपना मानते हैं; निर्गुणमतावलम्बी अपना तथा शैव और शाक्त भी अपना अपना आचार्य आपको पुकारते हैं । "शिव विष्णुभक्ति"; "भज गोविन्दं"; " विश्वेशपादाम्बुजदीर्घनौका” इत्यादि उपदेश आपही के हैं; "ब्रह्मसूत्रभाष्य " तथा "नृसिंहतापनी भाष्य," आदि आप के प्रख्यात ही हैं। आपके मुख्य शिष्य चार प्रसिद्ध हैं- । ।

terestESE श्रीभक्तमाल सटीक। , भगवान् श्रीरामानन्द कासमय, 'पन्द्रहवीं शताब्दी' लिखचुके हैं "श्रीराधाकृष्णदास सम्पादित भकनामावली" में भी यही वर्णित है। स्पष्ट है कि स्वामी श्री १०८ अयदेवजी, विक्रमीय संवत् की सत्रहवीं शताब्दी में विराजते थे ॥ श्री १०८ नामास्वामीजी ने, पहिले चारों भागवत सम्प्रदायों के चारों आचार्यों का वर्णन किया; फिर अपने निज सम्प्रदाय (श्री "श्रीसम्प्रदाय") की वार्ता उठाई पुनः श्रीगुरुपरम्परा का वर्णन, स्वामी अनन्त श्रीरामानुजजी से लेके, श्रीअनन्तानन्द द्वारा, अपने गुरु भगवान् तक, अर्थात् श्री १०८ अग्रस्वामीजीपर्यन्त गान किया; जय जय जय । जब श्रीगुरुयश गा चुके, तब पुनः पीछे लौटकर, अब सबसे पुराने (कलियुग ३८८९) आचार्य, श्री शङ्कर स्वामीजी का वर्णन करते हैं- (२८) श्रीस्मार्त आचार्य श्रीशङ्कर स्वामी। (१६५ ) छप्पय । (६७८) कलियुग धर्मपालक प्रगट, प्राचारज शङ्कर सु- भट । उतशृङ्खल अज्ञान जिते अनईश्वरवादी । बुढे कुतर्की जैन और पाखण्डहि आदी ॥ विमुखनिको दियो दण्ड, ऐंचि सन्मारग आने । सदाचार की सींव विश्व कीरतिहि बखाने ॥ईश्वरांश अवतार महि, मर- जादा माँड़ी अघट । कलियुग धर्मपालक प्रगट, आ. चारज शङ्कर सुभट ॥४२॥ (१७२) वार्तिक तिलक। कराल कलियुग में अधर्म और अधर्मियों से धर्म को अर्थात् वर्ण- १ "उतगृहल"-शृङ्खला को उत्सादन करने वाले। "अनईश्वरवादी" वे नास्तिक लोग, कि जो संसार का कर्ता किसी का, ईश्वर नहीं मानते वरन कहते है कि स्वयं स्वभा. वतः सय होता रहता है और विनशता है । ३ "बुद्ध". प्रौद्ध । ४ "पाच"-खोंचार। ५"माँझ'-मर इन किया ॥ RECREECRECIRCLOREAKER RSS भकिसुधास्वाद तिलक। ३२३ धर्म, आश्रमधर्म, तथा भागवतधर्मको पालन रक्षण करनेवाले परम सुभट श्रीशङ्कराचार्यजी प्रगट हुए । किस प्रकार से आपने धर्म पालन किया सो सुभटता वणन करते हैं कि जितने उतशृंखल अर्थात् वेदविदित सनातन-धर्म-परम्परा के उठा देनेवाले अज्ञानी अनीश्वर- वादी थे, और बुद्धमतावलम्बी तथा कुतर्की जैनमतवादी एवं पाख- एडपरायण आदिक जितने विमुख थे, तिन सबको यथायोग्य दण्ड देके उन कुमार्गों से खींच सनातन सतमार्ग में लाके, (स्थापित करके) चलाया; इस प्रकार की धर्म सुभटता की ॥ श्रुति स्मृति-विहित सज्जन-परिगृहीत समीचीन आचरण की सीमा (मर्यादा) ही हुए। "ईश्वर के (शङ्करजीके) अंशावतारप्रगट होके, वेदधर्ममर्यादा को आपने मंडन किया कि जो फिर घटे नहीं एक रस बनीरहे । आ. पकी ऐसी सत्कीर्ति सम्पूर्ण विश्व वखान करता है । श्रीशङ्कराचार्यजी (श्रीशङ्करांशावतार) दक्षिण देशमें प्रगट हुए। स्मातमत रक्षक दण्डी संन्यासी थे। मण्डनमिश्र नामक एक ब्राह्मण जिन को किसीने श्रीब्रह्माजीका अंशावतार भी लिखा है, बड़े कर्म- काण्डी मीमांसामतवादी थे मानो कर्म ही को वह ईश्वर मानते थे; उनको आपने (श्रीशंकरस्वामी ने) शास्त्रार्थ में निरुत्तर कर शिष्य (भगवत्शरणागत)किया । दो. "चिनु सतसंग न हरि कथा, तेहि विनु मोह न भाग। मोह गए विन राम पद, होय न दृढ़ अनुराग ॥" शिवजी की आप पर बड़ी कृपा थी। आपने प्रायः सब बड़े बड़े देवतों की स्तुतियां लिखीं और बहुत देवतों के मन्दिर भी बनवाए। स्मात आपको अपना आचार्य, और अद्वैतवादी अपना मानते हैं; निर्गुणमतावलम्बी अपना तथा शैव और शाक्त भी अपना अपना आचार्य आपको पुकारते हैं। "शिव विष्णुभक्ति"; "भज गोविन्द"; "विश्वेशपादाम्बुजदीर्घनौका” इत्यादि उपदेश आपही के हैं। "ब्रह्मसूत्रभाष्य" तथा "नृसिंहतापनी भाष्य," आदि आप के प्रख्यात ही हैं। आपके मुख्य शिष्य चार प्रसिद्ध हैं- . । , SASTHAUFFANTASIAKAS ७८८ ३२४ श्रीभकमाल सटीक। १. पद्माचार्यजी ३. स्वरूपाचार्यजी २. पृथ्वीधराचार्यजी ४. तोटकाचार्यजी ऐसा कहते हैं कि आप इस मर्त्यलोक में केवल ३२ ही वर्ष रहे। कलि संवत्सर । विक्रमीय संवत् ईसवी सन् ३८८६ ८१५ JI_R.C. Dast.(श्रार० सी० दत्त), A. C. Makerji (ए० सी० मुकर्जी); M. A. B.L Dr. W. THunter ( डाक्टर हन्टर) तथा श्रीतपस्त्री रामजी सीतारामीय ने भी ऐसाही लिखा है। किसी ने फलि संवत् २५०० ही लिसा है ।। "श्रीशङ्करदिग्यि जय" नामक ग्रन्थ में आपका समस्त जीवनचरित्र है । यह भी कथा उलीकी है। उन्होंने चार धाम भी निश्चित किये- अब श्रीप्रियादासजी महाराज की टीका ( कचित्तों) पर ध्यान दीजिये-- (१६६) टीका । कपित्त । (६७७) विमुख समूह लैके किये सनमुख श्याम, अति अभिराम लीला जग विसतारी है । सेवरा प्रवल बास केवरा ज्यों फैलिरहे; गहे नहीं जाहि, बादी शुचि बात धारी है ॥ तजिकै शरीर काहू नृप में प्रवेश कियो, दियो करि ग्रन्थ, "मोहमुद्गर" सुभारी है। शिष्यनि सों कह्यो "कभू देह में आवेश जानो तब ही वखानो आय सुनि कीजै न्यारी है" ॥ १२४ ॥ (५०५) वार्तिक तिलक । श्रीशङ्कराचार्यजी ने भगवतविमुख (सेवड़ा, अवुध, अज्ञानी, बौद्ध, नास्तिक, अनीश्वरवादी, चार्वाक, जैन, इत्यादि समूहों को वाद में परास्त करके दंड देके, श्रीमन्नारायण श्यामसुन्दरजी के सन्मुख कर दिया, और श्रीबदरिकाश्रमादिक भगवद्धामों के माहा. म्य को प्रसिद्ध कर भगवत्स्तोत्रादि "श्रीविष्णुसहस्रनाम भाष्य" गीताभाप्यादि अति सुन्दर भगवत्यश लीला को जग में विस्तार किया। उस काल में सेवरा आदिक प्रयल नास्तिक समूह इस प्रकार से लोक में फैले थे कि जैसे बाटिका में फूले केवड़े की चास १'शुचि"=Zङ्गाररस । (अमरकोश शृङ्गार शुचिरज्जवलः") ॥ HEREKREKAS RSS RSSCRE HERE FARRIORS**esex भकिसुधास्वाद तिलक।. ३२५ फैल जाती है; और बड़े ही विवादी थे, कि वेदवाक्य के ग्रहण में किसी प्रकार से पा नहीं सकते थे। एक समय श्रीशङ्कराचार्यजी से शास्त्रार्थ में ओर २ विवादों से पराजय होके, आप को चालब्रह्मचारी जानके "शुचि” अर्थात् शृङ्गाररस (स्त्रीपुरुषप्रसङ्ग) की वार्ता का बाद करने लगे। तब आप उस बात के जानने के अर्थ कुछ अवकास लेके किसी राजा ("अमरुक") के मृतकशरीर में, परकायप्रवेश सिद्धि के बल से, घुस गए; और अपने शरीर की रक्षा करने को शिष्यों से कह गए। तथा, प्रवेश करने के पूर्व ही एक “मोहमुद्गर” नामक ग्रन्थ बनाके शिष्यों को पढ़ाके कह गए कि "कदाचित् विषयाशक्त होके नृपदेह विषे मेरा ममत्व आवेश देखो तो आके यही ग्रंथ मुझे सुनाना, सुनते ही में नृपशरीर से न्यारा होके (तज के ) निज देह में चला आऊंगा"॥ (१६७ ) टीका । कवित्त । (६७६ ) जानिकै आवेश तन शिष्यने, प्रवेश कियो राबले में देखि सो श्लोक ले उचास्यो है । सुनत हि तजो तन, निज तन आय लियो, कियो यो प्रनाम दास, पन पूरो पास्यो है ॥ सेवरा हराए बादी; आए नृप पास, ऊँचे छात पर वैठि एक माया फन्द डास्यो है। जल चदि आयो, नाव भाव लै दिखायो, कहे "चढ़ौ, नहीं चूड़ो;" आप. कौतुक सों धास्यो है ॥ १२५ ॥ ( ५०४) वार्तिक तिलक। श्रीशङ्कराचार्यजी जितने काल की अवधेि शिष्यों से कह गए थे सो काल व्यतीत हो गया; तब शिष्यों ने जानाकि "जो स्वामीजी ने श्राज्ञाकी थी सो काल तो बीत गया, अतएव अब जाना जाता है कि राजा के तन में ममत्व का आवेश आपको कुछ हो गया है;" तव राजा के गृह में जाके शिप्यों ने "मोहमुद्गर" के श्लोक उच्चारण करके तृपशरीरस्थ स्वामीजी को सुनाया। सुनते ही आपने नृपतन १ 'रायले" राजा का गृह ॥ CREACK SASSASSING **** श्रीभक्तमाल सटीक । त्याग के अपने शरीर को ग्रहण कर लिया। शिष्य साष्टांग प्रणाम कर कहने लगे कि 'हे स्वामी! जो पन किया था सो आपने किया;"आप चोले "तुमने भी मेरी आज्ञा भजे पाली ॥" श्रीशङ्कराचार्यजी ने उस कामकौतुक वाद को, इस ढंग से समझ के, कुवादी सेबड़ों को बाद में परास्त किया। जब सेवरों ने जाना कि "अव तो हम सब हार गए, राजा शङ्कराचार्यजी ही का मत ग्रहण करेगा, अतः राजाको शङ्कराचार्य सहित माया से मारडालें" तब, कुमत करके, निज शिष्यों सहित मायावी सेवड़ों का गुरु राजा तथा श्रीशङ्कराचार्यजी को लेके ऊँचे छत पर जा बैठा और अपने मायाफन्द का प्रयोग किया कि जिससे चारों ओर से प्रलयकालीन समुद्रसरीखा जल छत के समीपतक चढ़ आया और उसी जल में छतके समीपही माया की एक बहुत बड़ी नौका भी आ पहुँची; तब सेवड़ों के उस गुरु ने राजा से कहा "कि शीघ्र इस नाव पर चढ़ो, नहीं तो डूब जाओगे ।' राजा ने भय से चढ़ना चाहा; परन्तु श्रीशङ्कराचार्यजी ने इस माया- कौतुक को अपने मन में मिथ्या ही धारण किया (झूठ समझा) (१६८ ) टीका । कवित्त । (६७५) अचारज कही यो चढ़ाओ ईनि सेवरानि; राजा ने चढ़ाए; गिरे टूक उड़ि गए हैं। तब तो प्रसन्न नृप, पाँव पस्यो,भाव भस्यो, कह्यो जोई कस्यो धर्म भागवत लए हैं ॥ भक्ति ही प्रचार; पाछे मायावाद डारि दीनों, कीनों प्रभु कह्यो, किते विमुख हु भए हैं । ऐसे सो गंभीर सन्त धीर वह रीति जाने, प्रीति ही में साने हरिरूप गुन नए हैं ॥ १२६ ॥ (५०३) वार्तिक तिलक । उस मायाजाल के जल में वह मायारूपी मिथ्या नौका देखके राजा चढ़ा चाहता ही था तभी श्रीशंकराचार्यजी ने राजा को चढ़ने से रोक के कहा कि "पहिले इन सब सेवड़ों को चढ़ाओ" । राजा ने सेवराओं से कहा कि "हां आगे आप सब ही चढ़िये" यह सुन ALS ****** 0339739 भनिसुधास्वाद तिलक । ३२७ सेवड़ों ने विचारा कि "जो अब हम इस नौका.में नहीं चढ़ते तौभी तो राजा हम सबको मार ही डालेगा;" इससे वे सब सेबड़े राजा के भय से चढ़े । वह नाव तो देखने मात्र को थी ही, भूमि में गिर के सव सेवरे टुकड़े टुकड़े होके मर गए । फिर तो न वह नाव ही रही, न वह जल ही रह गया। तब तो यह सब कौतुक देख राजा अत्यन्त प्रसन्न हो, धन्यवाद- पूर्वक श्रीशंकरस्वामी के चरणों पर गिरा; तथा भकिभाव में भर गया। और, आपने जो उपदेश दिया राजाने सो ही किया, अर्थात उसने वेदविहित भागवत धर्म को अपनी प्रजा समेत ग्रहण किया। इस इस प्रकार से श्रीशंकराचार्यजी ने प्रथम तो श्रीभगव. द्भक्ति तथा भागवत धर्म ही का भलीभांति प्रचार किया था; परन्तु पीछे कालानुवर्ती कौतुकी प्रभु की प्रेरणा सें, अपने मत में स्वयं उन्होने कुछ मायावाद डाल दिया; कि केवल निर्विशेष अद्वि- तीय ब्रह्म ही सत्य है और सब माया है, अर्थात् ईश्वर को भी विद्या- मायायुक्त कहा और ज्ञान, भक्ति, वेद, मन्त्र इत्यादिक मोक्ष. साधनों को भी केवल विद्यामायामय बताया, तथा जीव और संसार को अविद्यामायामय, और दोनों मायाओं को तीनों काल में मिथ्या कहा । अतः कितने जीव भगवत् से और भागवतधर्म से विमुख हो गए और होते जाते भी हैं। (यथा, दोहा) 'ब्रह्मज्ञान दिनु नारि नर, कह न दूसरि बात । कौड़ी लागी लोभवश, करहि विन गुरु घात।" और जो धीर गम्भीर (श्री श्रीधर स्वामी आदि सरीखे) सन्त हैं सो तो श्रीशंकराचार्यजी की प्रथम भविमति रीति को यथार्थ जान के अपने मन को प्रीति ही में सान के नित्य नवीन भगवत्- रूप गुण लीला में लौलीन हुए हैं तथा होते हैं। इन कथाओं को किसी किसी ने प्रकारान्तर से भी लिखा है, परन्तु यहांतोश्रीप्रियादासजीके अक्षरों के अनुसारही लिखा गया । श्रीशंकराचार्यजी कृत "मोहमुद्गर” के .१६ (सोलह) श्लोकों में से, ये पांच श्लोक-- - ३२८ 900 13 श्रीभक्रमाल सुटीक। भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते॥ "का तव कान्ता कस्ते पुत्रः, संसारोयमतीच विचित्रः। कस्य त्वं वा कुत आयातः, तत्वं चिन्तय तदिदं भ्रातः॥३॥ तत्वं चिन्तय सततं चित्ते, परिहर चित्तं नश्वरक्तेि। क्षणमिह सज्जनसङ्कतिरेका,भवति भवार्णवतरणे नौका ॥६॥ सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः, शय्या भूतलमजिनं वासः । सर्वपरिग्रहभोगत्यागः, कस्य सुखं न करोति विरागः ॥१०॥ वालस्तावत् क्रीडासकः, तरुणस्तावत्तरुणी रक्तः । वृद्धस्तावत् चिन्तामग्नः, परमे ब्रह्मणि कोपिन लग्नः॥११॥ यावजननं तावन्मरणं, तावजननी जठरे शयनम् । इति संसारे स्फुटतर दोषः, कथमिह मानव तव सन्तोपः?"॥१३॥ भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते ॥ (२६-३०) श्रीनामदेवजी; उनकी माता। (१६६.) छप्पर । (६७४) "नामदेव” प्रतिज्ञा निर्वही, ज्यों त्रेता नरहरिदास की॥ बालदसा "बीठल पानि जाके, पै.पीयौ। मृतक गऊ जिवाय परचौ असुरन कौं दीयो॥ सेजसलिल तें काढि पहिल जैसीही होती।देवल उलट्योदेखि सकुचि रहे संबही सोती ॥ "पंडरनाथ” कृत अनुग ज्यों छानि सुकर छाई घासकी। नामदेवप्रतिज्ञा निर्वही, ज्यों त्रेता नरहरि दासकी॥४३॥ (१७१) वार्तिक तिलक। श्रीभगवद्भक नामदेवजी की प्रतिज्ञा श्रीहरिकृपासे इस प्रकारसे , २"पानि "-पाणि, कर, हाथ । २ "होती' =थी । ३ " मोनी 'धोत्री, वेदपाठी ब्राह्मण NEER सर भकिसुधास्वाद तिलक । ३२६ निवही कि जैसे त्रेता * में श्रीनृसिंहजी के दास श्रीप्रह्लादजी की (प्रतिज्ञा निवही थी)। देखिये, बाल अवस्था ही की प्रीतिदशा में जिनके हाथों से श्री- विट्ठल भगवान् ने दूध पिया। और मरीहुई गाय को जिला के असुरों (यमन म्लेच्छों) को परीक्षा परचौ दिया। तथा, उस यमनराज की दी हुई सेज ( पलंग) को जो आपने नदीके जल में डाल दिया था, सो उस जल में से वैसे ही अनेक पलंग निकाल के दिखा दिये। और जब आपने मन की दुचिनाई के भय से पनही कमर में बाँध ली थी, उसको देखके पुजारी पंडों ने आपका तिरस्कार किया, इससे आप मन्दिर के पीछे जाके भजन गान करने लगे; तब "श्री. पण्डरीनाथ " जी के देवालय का द्वार उलट के आप ही की ओर हो गया जिसको देखके अत्यन्त सकुचाके सब पूजक श्रोत्री लोगों ने श्रीनामदेवजी से विनय कर अपना अपराध क्षमा कराया। पुनः भक्तवत्सल श्रीपंडुरनाथजी को आपने अपनी प्रेमपुंज. भक्ति के बल से, अनुग (संवक) सरीखा कर लिया, यहाँ तक कि प्रभु ने स्वयं अपने करकमलों से आपका छप्पर छाया । दो."जिन जिन भकन प्रीति की, ताके वस भए पनि। -सेन होइ नृप टहल किय, नामा छाई छानि ॥" (श्रीध्रुवदासजी) श्रीशिवसम्प्रदाय (विष्णुस्वामीसंप्रदाय ) में श्रीलक्ष्मणभट्टजी से और श्रीवल्लभाचार्यजी से आप पहिले हुये; आपके गुरु श्रीज्ञान- देवजी; शिष्य त्रिलोचनदेव, और आपके नाना श्रीवामदेवजी थे। आप सुकवि थे; आपकी कविता उदासियों के “ग्रन्थसाहिब" में भी संग्रहीत है । यह बात तो प्रसिद्ध ही है कि आप श्रीकवीरजी के समकालीन थे। है * श्रीनृसिंहायतार सत्ययुग का कहा जाना है, और श्रीनामास्वामी ने त्रेता लिम्वा, इसका तात्पर्य यह है कि उक्त अवतार कृतयुग त्रेता के संध्या में हुआ अत. एव त्रेता ही कहा, हिरण्यकशिपु ने वर ही तो मांग लिया था कि 'न सत्ययुग में मरे न त्रेता में ॥

CREACHESECRECROCHEESED श्रीभक्तमाल सटीक। कलिसंवत्सर विक्रमीय संवत् ईसवी सन् ४५८६ १४४८ श्रीराधाकृष्णजी (काशीनागरीप्रचारिणी सभा), तथा श्रीतप. स्त्रीराम सीतारामीयजी ने भी ऐसा ही लिखा है और उस समय भारतवर्ष में "बादशाह सिकन्दर लोदी" था ॥ (१७०) दीका । कवित्त । (६७३) छीपा वामदेव हरिदेवजू को भक्त बड़ो, ताकी एक बेटी पति- हीन भई जानिये । द्वादश वरष मांझ भयो तन, कही पिता सेवा सावधान मन नीके करि आनिये ॥ तेरे जे मनोरथ हैं पूरन करन जो पै दत्तचित्त हक मेरी वात मानिये । करत टहल प्रभु वेगिही प्रसन्नभए, कीनी काम वासना सु पेखि जन मानिये ॥१२७॥ (५०२) वार्तिक तिलक। पण्डरपुर (दक्षिण) में, जाति के छीपा, श्रीवामदेवजी श्रीहरिजी के परम भक्त हुए; तिनकी एक कन्या थोड़ीही अवस्था में विधवा हो गई । जब उसकी अवस्था चारह वर्ष की हुई, तब उसके पिता श्री- वामदेवजी (श्रीनामदेवजी के नाना) ने कहा कि "श्रीपण्डुरनाथ (श्रीविठ्ठलदेवजी ), की जो मेरे गृह में विराजमान हैं, इनकी सेवा पूजा सावधान मन लगा के भली भांति से किया कर, तेरे जितने मनोरथ हैं उन सबके पूरे करनेहारे येही प्रभु हैं; परन्तु जो मेरी बात में विश्वास करके चित्त लगाके प्रेम सहित सेवा करेगी तो"। इस प्रकार पिताका उपदेश सुन, वह बड़भागिन सप्रेम सेवा- टहल दिन रात करने लगी। उस पर शीघ्र ही प्रसन्न हो प्रियतम प्रभु ने अति अनूप किशोररूप से साक्षात् दर्शन दिया, जिन्हें देख उसको कामवासना हुई । सर्वकामपूरक प्रभुने उसकी कामना पूर्ण की, यहां तक कि वह गर्भवती होगई । इस कलिकाल में भी ऐसी अनोखी प्रकट कृपा प्रभु की हुई, इसको विश्वासपूर्वक मानिये ॥ * किसी ने संवत् १५०० ही लिया है। 1 "छीपा"-छीट यन छापनेवाले (चोग दरजी नहीं)। A * भक्तिसुधास्वाद तिलक। दो० "कलियुग सम नहिं आनयुग, जो नर करि विश्वास। गाइ गाइ हरि भक्त यश, भवतरुविनहि प्रयास॥" (१७१ ) टीका । कवित्त । विधवा को गर्भ; ताकी वात वजी ठौर ठौर, दुष्ट शिरमौरनि की भई मन भाइयै । चलत चलत वामदेवजू के कान परी, करीनिर- धार प्रभु आप अपनाइयै ॥ भए जू प्रगट वाल, नाम “नामदेव" घस्यो, कस्यो मन भायो सब सम्पति लुटाइयै । दिन दिन बढ्यो, कछु और रंग चढ्यो; भक्तिभाव अंग मढ्यो, कट्यो, रूप सुख- दाइयै ॥ १२८ ॥ (५०१) वात्तिक तिलक। कुछ कालान्तरमें जब लक्षणोंसे उनकागर्भ प्रत्यक्ष जान पड़नेलगा, तब विधवा के गर्भ की वार्ता जहां तहां लोग मुहांमुहीं करने लगे, और दुष्टशिरोमणि निन्दकों की मन भाई बात हुई; क्योंकि वे निन्दा करने के लिये चिद्र ढूंढ़ते ही रहते हैं सो मिल गया। वार्ता चलते चलते श्रीभनवर वामदेवजी के कानों तक पहुँची; तब आपने एकान्त में पुत्रीसे पूछा कि “यह क्या बात है ?" इनने, वाञ्छा-पूरक, कृपा-युक्न प्रभु के दर्शन देनेका तथा अपने को अपना लेनेकी सत्य सत्य वात, पूरी पूरी कह सुनाई आप (श्रीवामदेवजी) सुनके अति हर्षित हुए। धन्य आपके भाग्य ॥ प्रसवकालकी पूर्णता पर अनूपम बालक प्रगट हुए; श्रीवामदेव जीने वालक का नाम "नामदेव" रक्खा और मनमाना जन्मोत्सव कर, घर की सम्पत्ति को लुटाया; जय जय । बालक दिन दिनप्रति बढ़ने लगा; इनमें लोक के रंगों से कुछ औरही रंग; (श्रीरामानुरागरंग ) चढ़ा; और प्रेम भक्तिभावसे लपेटा हुआ अति सुखदाई सुन्दररूप का प्रकाश निकलने लगा, क्या कहना।। १ "करीनिरचार-निश्चय निर्णय किया; पूछा । २"मढ़यो" मदा, छाया, लंपटा । ३ "कढ़यो"-निकला। BireoneCREMRAGALISALAMRAGARIKCAREERSC . HOOLSCRE KRITECARKer ३३२ श्रीभकमाल सटीक। (१७२)धीका । कवित्त । (६७१) खेलत खलौना प्रीतिरीति सब सेवाहीकी, पटपहिरावै, पुनि भोग को लगावहीं । घटा ले बजा*, नीके ध्यान मन लावें, त्यो त्यो अति सुख पावै, नैन नीर भरि आवहीं ॥ चार बार कह नामदेव बामदेव ज़ सौ "देवो मोहि सेवामांझ, अतिही सुहावहीं"। "जाऊं एक गाउँ, फिर आऊं दिन तीन मध्य, दूध को पिवावी, मत पीवी, मोहिं भावहीं ॥ १२६ ॥ (५००) जव श्रीवामदेवजी की पांच वर्ष के निकट बाल्यावस्था हुई; तब आप खेल खेलने लगे; सो और संसारी खेल नहीं; किन्तु जैसे अपने नानाजी को पूजा करते देखते थे, वैसे ही, प्रीति रीति से सब सेवा पूजाही का खेल खेलते थे । कोई पापाणादिक की मूर्ति कल्पित करके उनको स्नान कराके वस्त्र पहिराते, पुष्प चढ़ाते, भोगलगाते, घंटा बजाके धूप आरती करते और भनी भांति अखेिं मूंदके ध्यान लगाते थे; बरंच ध्यान करते समय आपको श्रीप्रभु कृपा संस्कारवश अपूर्व सुख उत्पन्न होता और नेत्रों में प्रेमानन्द का जल भर आता था। यथा- चौपाई। "खेलौं तहां बालकन मीला । करौं सकल रघुनायक लीला ।' कुछ कालान्तर में श्रीनामदेवजी श्रीवामदेवजी से बारम्बार कहने लगे कि “नानाजी! मुझे अपनी सेवा अर्थात् अपने ठाकुरजी, पूजा करने के लिये, दीजिये; मुझको उसमें बड़ा ही सुख प्राप्त होगा क्योंकि मुझको सेवा अत्यन्त प्रिय लगती है" इसप्रकार सचाई सहित अति अभिलाषा देख,श्रीवामदेवजी एक दिन वोले कि "मुझे तीन दिनों के लिये एक ग्राम को जाना है; सो जब जाऊंगा तब तुम पूजा करना, और दूध ठाकुरजी को पिलाना, परन्तु प्रभु को भोग लगाए बिना तुम आप न पीना" श्रीनामदेव जी ने सुन के कहा कि "हां बहुत अच्छा, यह तो मुझे बहुत ही भला लगता है। १ "सेवा"-प्रावतार भगवत् को परिचर्या, ठाकुरजी ।

भकिसुधास्वाद तिलक। ३३३ (१७३ ) टीका | कवित्त । (६७०) कौन वह धेरै ? जेहि बेर दिन फेर होय, फेर फेर कहें "वह बेर नहीं आइये?"। आई वह वेर, लै कराही मांझ हेरि दूध डास्यो युग सेर मन नीके के वनाइयें ॥ चौपनि के ढेर, लागि निपट औसेरे, दृग आयो नीर घेरि, जिनि गिरै घुटिजाइयें । माता कहै टेरि, "करी बड़ी तें अबेर, अव करो मति में ""अजूचित दैऔंटाइये। १३०॥ (४६६) वार्तिक तिलक। जव श्रीवामदेवजी आपको सेवा देके उस ग्राम को चले गए, तब श्रीनामदेवजी को रात्रि ही से छटपटी लगी और आप मन में यह विचारने लगे कि “वह बेला कौन है ? कि जिस वेला में फिर दिन आवे; और वारम्बार माता से पूछने लगे कि "मां ! अभी सेवा का समय नहीं आया ?" होते होते वह प्रभात बेला आगई; आप उठ के स्नानादिक और पूजा करके, दो सेर दूध देख भाल छान के कड़ाही में छोड़ औंटने लगे। मन में ऐसी अभिलाषा कर रहे हैं कि "भले प्रकार से दूध को वनाऊं"। चित्त में प्रभुप्रेम चाहचौप की अति अधि- कता है, और अत्यन्त प्रोसेर अर्थात् चिन्ता भी है कि "मुझ से दूध कैसे उत्तम बने जिसमें प्रभु पीले।" । ऐसी चिन्ता करते में नेत्रों में प्रेमजल भर आया; तब आपने उसको रोका कि कहीं कोई बूंद दूध में न टपक पड़े। माता पुकार के कहने लगी कि "बेटा!तूने वड़ा विलम्ब लगाया, अब अधिक झेल न कर, शीघ्र भोग लगा" । सुनके आप बोले कि "माता ! मैंने चित्त लगा के दूध औंटा है इसले कुछ विलम्ब हो गया" ॥ + . १ "येर' बेला, समय । २' हेरि"-देखभाल के । ३"चौपनि" प्रेम का चाय । ४ देर"-राशि, समूह । ५ 'निपट"=अत्यन्त । ६ "ौसेर" चिन्ता । ७."घूटि- जाइये" रोक लू, रे कलेना चाहिये । = "अबेर"-विलम्ब 1 E "झेर'झल, विलम्व । KRISRO , HARE stenen ३३२ श्रीभनमाल सटीक । (१७२) दीका | कवित्त । (६७१) खेजत खलौना प्रीतिरीति सब सेवाहीकी, पटपहिरावै, पुनि भोग को लगावहीं । घंटा ले वजा, नीके ध्यान मन लावे, त्यो त्यो अति सुख पावें, नैन नीर भरि आवहीं ॥ बार बार कह नामदेव वामदेव ज सौ "देवो मोहि सेवामांझ, अतिही सुहावहीं"। "जाऊं एक गाउँ, फिर आऊं दिन तीन मध्य, दूध को पिवावी, मत पीवौ, मोहि भावहीं ॥ १२६ ॥ (५००) जब श्रीवामदेवजी की पांच वर्ष के निकट बाल्यावस्था हुई; तव आप खेल खेलने लगेसो और संसारी खेल नहीं; किन्तु जैसे अपने नानाजी को पूजा करते देखते थे, वैसे ही, प्रीति रीति से सब सेवा पूजाही का खेल खेलते थे । कोई पाषाणादिक की मूर्ति कल्पित करके उनको स्नान कराके वस्त्र पहिराते, पुष्प चढ़ाते, भोगलगाते, घंटा बजाके धूप आरती करते और भनी भांति अांखें मूंद के ध्यान लगाते थे; बरंच ध्यान करते समय आपको श्रीप्रभु कृपा संस्कारवश अपूर्व सुख उत्पन्न होता और नेत्रों में प्रेमानन्द का जल भर आता था। यथा- - चौपाई। ' . "खेलौं तहां वालकन मीला । करौं सफल रघुनायक लीला " कुछ कालान्तर में श्रीनामदेवजी श्रीवामदेवजी से बारम्बार कहने लगे कि "नानाजी! मुझे अपनी सेवा अर्थात् अपने ठाकुरजी, पूजा करने के लिये, दीजिये; मुझको उसमें बड़ा ही सुख प्राप्त होगा क्योंकि मुझको सेवा अत्यन्त प्रिय लगती है" ।। इसप्रकारसचाई सहित अति अभिलाषा देख,श्रीवामदेवजी एक दिन बोले कि "मुझे तीन दिनों के लिये एक ग्राम को जाना है; सो जब जाऊंगा तब तुम पूजा करना, और दूध ठाकुरजी को पिलाना, परन्तु प्रभु को भोग लगाए विना तुम आप न पीना" श्रीनामदेव जी ने सुनके कहा कि "हां बहुत अच्छा, यह तो मुझे बहुत ही भला लगता है। १ "सेवा"-प्रावतार भावत् की परिचर्या, ठाकुरजी। , *** ॐ KAR भनिसुधास्वाद तिलक। ३३३ (१७) टीका । कविता (६७०) कोन वह धेरै ? जेहिं वेर दिन फेर होय, फेर फेर कह "वह वेर नहीं आइये?" आई वह बेर, लै कराही मांझ हेरि दूध डास्यो युग सेर मन नीके कै बनाइये ॥ चौपनि के ढेर, लागि निपट औसेर, दृग आयो नीर घेरि, जिनि गिरै घुटिजाइये । माता कहे टेरि, "करी बड़ी तें अबेर, अब करो मति में ""अजूचित दै औंटाइयें"। १३०॥ (४६) वार्निक तिलक। जय श्रीवामदेवजी आपको सेवा देके उस ग्राम को चले गए, तब श्रीनामदेवजी को रात्रि ही से छटपटी लगी और आप मन में यह विचारने लगे कि "वह वेला कौन है ? कि जिस बेला में फिर दिन आवे; और बारम्बार माता से पूछने लगे कि मां ! अभी सेवा का समय नहीं आया?" होते होते वह प्रभात वेला आगई; आप उठ के स्नानादिक और पूजा करके, दो सेर दूध देख भाल छान के कड़ाही में छोड़ औंटने लगे। मन में ऐसी अभिलाषा कर रहे हैं कि "भले प्रकार से दूध को बनाऊँ"। चित्त में प्रभुप्रेम चाहचौप की अति अधि- कता है, और अत्यन्त औसेर अर्थात् चिन्ता भी है कि "मुझ से दूध कैसे उत्तम बने जिसमें प्रभु पीजे।" । ऐसी चिन्ता करते में नेत्रों में प्रेमजल भर आया, तब आपने उसको रोका कि कहीं कोई बूंद दूध में न टपक पड़े। माता पुकार के कहने लगी कि "वेटा तूने बड़ा विलम्ब लगाया, अब अधिक झेल न कर, शीघ्र भोग लगा" । सुनके आप बोले कि "माता ! मैंने चित्त लगा के दूध औंटा है इससे कुछ विलम्ब हो गया" ॥ १ "येर' बेला, समय । २' हेरि" देखभाल के । ३ "चौपनि" प्रेम का चाव । ४ देर राशि, समूह । ५ "निपट" अत्यन्त । ६ “ोलेर"-चिन्ता । ७ "धूटि- जायें"tोक लू रेकलेना चाहिये। "अबेर"विलम्बE "झर'-झल. विलम्य । .

*** wri ३३४ श्रीभक्तमाल सटीक । . (१७४) टीका | कवित्त । (६६६) चल्यो प्रभु पास, लै कटोरा छविरास, तामें दूध सो सुवास-मध्य, मिसिरी मिलाइयै । हिये मैं हुलास, निज अज्ञता को त्रास, ऐपैं करें जो पै दास मोहि, महासुख दाइयै ॥ देख्यौ मृदु हांस,कोटि चांदनी की भास, कियौ भाव को प्रकास, मति अति सरसाइये । प्याइवे की आस, करि ओट कछु, भैस्योस्वास; देखिके निरास, कह्यो "पीवौ ज अघाइयै" ॥ १३१॥ (४६८) वात्तिक तिलक। जव दूध सिद्ध हो गया, तब एक बड़े सुन्दर कटोरे में सुगन्ध द्रव्य तथा मिश्री मिलाया हुआ वह दूध लेके श्रीनामदेवजी, भग- वान् श्रीविठ्ठलदेवजी के पास चले । हृदय में अतीव प्रेमानन्द का हुलास और साथ ही साथ अपनी अज्ञता का त्रासभी, अर्थात् यह कि "मुझसे दूध बनाते वना कि नहीं ? प्रभुके योग्य हुआ पियेंगे ? कि नहीं ? अहा ! यदि मुझे अपना दास बनाने और कृपा करके दूध पीलें । तो मैं सदा सेवा करके सुख पाऊं ॥" योंही विचार करते,. समीप जाके, आपने श्रीप्रभु का श्रीमुख अवलोकन किया। तो देखा कि श्रीविग्रहजी में कोटिन चांदनी के भास के समान मृदु मुसक्यान प्रगट हो रही है क्योंकि श्रीनामदेव जी के प्रेमभाव का प्रकाश प्रभु ने अपने विग्रह में प्रकट दिखाया तव तो नव अनुरागी श्रीनामदेवजी की मति अति ही सरस हो आई। और दूध पान कराने की आशा से कटोरा आगेरख, किसी वस्त्र का प्रोट कर, प्रेमसहित स्वांसभर, चित्त एकाग्र कर, अर्पण किया; दूध पीने की प्रार्थना की । पुनः आवर्ण वस्त्रं को कुछ अलग करके देखा कि सब दूध अभी- तक ज्यों का त्यों ही रक्खा है; तव कुछ निराश से होके प्रार्थना करने लगे कि"प्रभो ! आप अति अघाके दूध पीजिये जिसमें मैं भी प्रेमानन्द से अघा जाऊ॥" १ "भग्योस्वास"सप्रेम चित्त एकान किया। RECASERECRUGRORISEX भनिसुधास्वाद तिलक। ६३५ . (१७५) टीका । कवित्त । (६६%) ऐसें दिन बीते दोय, राखी हिये वात गोय, रह्यो निशिं सोय, ऐपै नींद नहीं आवहीं। भयो जू सबारे, फिरिवैसेही सुधार लियो हियो कियौ गाढ़ौ, जाय धरयौपियो भावहीं ॥ बार वार "पीवो" कहूँ; अब तुम पीवो नाहि, आवै भोर नाना;गरे छूरी दे दिखावहीं। गहि लीयो कर, "जिनिकर ऐसी पीवों में" तो पावेकौं लगेई, “नेकु राखौ, सदा पावहीं" ॥ १३२ ॥ ( ४६७) वार्तिक तिलक। श्रीनामदेवजी ने बहुत प्रार्थना की परन्तु प्रभु ने दूध नहीं पिया; तब आप भी उपवासही करके रह गए: दूसरे दिन फिर वैसेही दूध औट,आगेरख विनय किया तब भी प्रभु ने नहीं ही पिया ।दोनों दिन दूध न पीने की बात माता से न कही; भूखेही चुपचाप रात्रि में पड़ रहे; परन्तु नींद किंचित् भी नहीं आई; केवल प्रभु के दूध न पीने की चिन्ता ही में सारी रात व्यतीत हुई । तीसरे दिन का प्रातःकाल हुआ; फिर उसी प्रकार से पूजा आदि करके दूध को ओंट, सुधार, प्रभुके आगे ला रकावा; और जो, प्रभु के दूध न पीने के सोच से मन सिथिल हो रहा था, सो दृढ़ करके दीनतायुक्र कहने लगे कि "हे प्रभो ! दूध पीलीजिये; जिसमें मैं शोक से मुक्त हो आनन्द पाऊं"। इतने पर भी सकारने जब दूध नहीं ही पिया, तब तो श्रीनामदेवजी भति अधीर हो गए, क्योंकि बाल्यावस्था के मुग्ध मधुर प्रेम विश्वास वस आप ऐसा ही समझते थे कि "प्रभु नाना के हाथों से नित्य ही दूध पिया करते हैं"। अतः परम प्रेम की विलक्षण विह्वलता से, आप कहने लगे कि "मैं वारम्बार सविनय कहताहूं कि दूध पीजिये पीजिये, पराप अव नहीं ही पीते; और कल्ह सवेरे नाना आवेंगे मुझ से आप के दूध न १ "सवार"-सबेरा, प्रभात, भोर । २ "डियो"-मन । ३ "गादौ'द ॥ SGAR श्रीभक्तमाल सटीक। . पीने का समाचार सुन, मुझे आप की सेवा पूजा से अलग कर ही देंगे; इससे भला है कि मैं मरही जाऊं" इतना कह तीक्ष्ण दूरी ले, प्रभु को दिखा के, अपने गले पर लगाही तो दी। तब तो, वहीं, भक्तवत्सल कृपासिन्धु विश्वासवर्द्धक प्रभु ने अतीव आतुरता से नामदेवजी का छूरी-युक्त-हाथ पकड़ लिया और कहा कि "अरे प्रिय बालक ! ऐसा मत कर; देख मैं दूध पिये लेता । ऐसा समझा के प्रभु कटोरा हाथ में ले, दूध पीने लगे। जब थोड़ा सा दूध रह गया, तब श्रीनामदेवजी बोले कि "महाराज! मेरे लिये भी तो कुछ रहने दीजिये; क्योंकि आपका प्रसाद नाना का दिया मैं सदाही पाता था"। तव कृपा से बिहँस के अपने अधरामृत का अवशेष प्रभु ने अपने हाथों से ही नामदेवजी को पिला के भक्ति प्रेमानन्द से तृप्त. कर दिया। श्लोक "ध्याने पाठे जपे होमे, ज्ञाने योगे समाधिभिः । विनोपासनया मुकिर्नास्ति सत्यं ब्रवीमि ते" ॥ १॥ ( १७६ ) टीका | कवित । (६६७) आये वामदेव, पाखें पूछे नामदेवजू सों, दूध को प्रसंग, अति रङ्ग भरि भाखियें । "मोसौं न पिछानि, दीन दोय हानि भई तब मानि डर, प्रान तज्यो चाही, अभिज्ञापियें ॥ पीयों, सुख दीयो, जब नेकु, राखि लीयो, मैं तो जीयो,” सुनि बातें, कही "प्यायो कौन साखियें ?"। धस्यो, पेन पीयें, अस्यो, या मैं लै दिखायौ भन-बस-रस चाखिय ॥ १३३ ॥ (४६६) वार्तिक तिलक। जव श्रीवामदेवजी घर आए । और श्रीनामदेवजी से पूछने लगे कि "पूजा सेवा नीके करके दूध भोग लगाया करते थे ?"। तब श्रीनामदेवजी अति प्रेमानन्द रङ्ग में रंगे हुए दूध सारा प्रसंग कहने लगे; कि "नाना ! मुझसे ठाकुरजी से जान- १ 'पिछानि" पहिचान । २ "श्रयो -अहे, इठ किया ॥ , प्यायौ, सुख पायो नाना, . पिलाने का भकिसुधास्वाद तिलक। ३३७ पहिचान तो थी ही नहीं, इससे दो दिन तो बड़ी हानि हुई कि प्रभु ने दूध नहीं ही पिया; तब आपके भय से मैंने छूरी लेके अपनी गला काटना चाहा; सो देखते ही प्रभु ने अति अभिलाप से दूध पान कर मुझे बड़ा सुख दिया; थोड़ा सा मैंने प्रसाद भी मांग लियाः इस भांति प्रभु ने दूध पी पिला के मुझे जिलाया॥" यह वार्ता सुनके श्रीवामदेवजी बोले कि "दूध पिलाने का साखी कौन है ?" श्रीनामदेवजी ने कहा कि स्वयं ठाकुरजी ही साक्षी हैं कि जिन्होंने पिया है।" नाना ने कहा कि भला पिलाके मुझे भी तो दिखा दे।" तब श्रीनामदेवजी ने उसी प्रकार से दूध वनाके सामने रख पीने की प्रार्थना की, परन्तु प्रभु ने न पिया। तब आपने अत्यन्त हठ पूर्वक कहा कि “कल्ह तो तुमने पिया और आज न पीके मुझे झूठा बनाते हो ? वह छूरी अभी मेरे पास रक्खी ही है" यह सुन मन्द मुसक्यान सहित प्रभु ने फिर दूध पी लिया॥ यह देख श्रीवामदेवजी ने अत्यन्त सुख पाया। और प्रभु से कहा कि "नाथ ! इसको अपनी सेवा ही के लिये आपने प्रगट किया है। सो अब इसी से सेवा लिया कीजिये।" उसी क्षण से श्रीनामदेवजी को सब सेवा पूजा सौंप दी। देखिये | इस चरित्रमें प्रभुने यह दिखाया कि हम भक्नोंके प्रेमवस ही होके भोजनादिक रसोंको चखते हैं, तात्पर्य प्रेमहीको चखते हैं। (१७७) टीका । कवित्त । (६६६) नृप सो मलेछ, बोलि, कही "मिले साहिवं को, दीजिये मिलाय करामात दिखराइयै ।" "होय करामात तो पे काहे को कसब करें ? भरे दिन ऐपै बाटि सन्तन सौ खाइयै ।। ताही के प्रताप आप इहालौं बुलायो हमैं;" "दीजिये जिवाय गाय घर चलि जाइयै।" दई लै जिवाय गाय सहज सुभाय ही मैं, अति सुख पाय, पाय पस्यो, मन भाइये ॥ १३४ ॥ (४६५) १ 'साहिब • स्यामी, प्रभु । २' करामात - ka}"-प्रता, सिद्धाई, परचौ, प्रभाच, परीक्षा।३"कसव-"प्रान करना, कमाना ॥ NE . , - . ३३६. श्रीभक्तमाल सटीका वार्तिक तिलक। श्रीभगवत्कृपा से जव श्रीनामदेवजी की प्रीति-प्रतीति-भक्ति- महिमा अति फैली, और सव राजाओं का राजा-म्लेच्छ (सिकन्दर लोदी बादशाह) के यहां तक भी आप की सिद्धाई की वार्ता जा पहुँची; तव उसने आपको बुलाके कहा कि हम सुनते हैं कि आप साहिब को मिले ( पहुँचे ) हैं; सो हमको भी मिला दीजिये अथवा अपनी कुछ करामात दिखाइये।" आपने उत्तर दिया कि “यदि मुझ में कोई करामातही होती तो मैं अपनी जीविका के हेतु छीपा का काम क्यों करता ? दिन भरके परिश्रम से जो कुछ मिलता है सो, सन्तों के साथ बांट खाता हूं; इसी के प्रताप से अर्थात् जो साधु लोग मुझ पर कृपा करके मुझे दरशन देते हैं, इसी से लोगों में मेरी बड़ाई हो रही है, यहां तक कि आपने भी अपने यहां मुझे बुलाभेजा है।" यह सून भूप (वादशाह ) ने कहा कि “इस मरी हुई गऊ को जिला दीजिये; वस अपने घर चले जाइये ॥" नृप का हठ देखके, आपने सहज स्वभाव ही से, अर्थात् एक विष्णुपद सप्रेम गान करके, गऊ को जिला दिया। श्लो० "हरिस्मृति प्रमोदेन रोमाञ्चिततनुर्यदा । नयनानन्दसलिलं मुक्किदासी भवेत्तदा ॥१॥" यह प्रभाव (करामात ) देख, भूपति (वादशाह ) घड़ाही प्रसन्न हुश्रा और सुखपूर्वक सादर आपके चरणों पर गिरा ॥ ( १७% ) टीका। कपित्त (६६५) "लेवो देश गांव, जाते मेरो कछु नांव होय," "चाहिये न कछु दई सेज मनिमई है। धरि लई सीस, "देउँ संग दसवीस नर, , " * विनती सुनु जगदीश हमारी । तेरो दास. श्रास मोहि तेरी, इन करु कान मुरारी॥ दीनानाथ दीन द्वै टेरन गाहिं क्यों न जियाओ? आधे सबै अंग है या मेरे यहिं पढ़ायो । जो कहाँ याके करमादि में नदि जीवन लिरयो विधाता। तौ श्रम नामदेव श्रायुष त होहु तुमहिं प्रभु ! दाता ॥१॥१ "जाते" जिसले ॥

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भक्तिसुधास्वाद तिलक ।
३३६
नाहीं करि आये, जल माँझ डारि दई है ॥ भूप-सुनि चौकि पस्यो,
"ल्यावो फेरि;" आये "कही;" कही "नेकु आनिके दिखावो कीजै
नई है। जल निकासि बहु भांति गहि डारा तट "लीजिये
पिछानि" देखि सुधि बुधि गई है ॥ १३५ ॥ (४६४)
वार्तिक तिलक।
और कर जोड़ के कहा कि "आप मुझपर कृपा करके कोई गांव
वा देशराज्य लीजिये जिससे आप सरीखे सन्तों की सेवा से मेरा
नाम सुयश हो" आप ने उत्तर दिया कि "मुझको कुछ नहीं
चाहिये॥"
श्लो० "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मभक्तिं लभते पराम् ॥ १॥"
दिल्लीपति ने बड़ी प्रार्थना करके एक सुवर्णरचित मणिजटित
सेज (पलंग) दिया कि "इसपर अपने साहिब को शयन
कराइयेगा।" तब श्रीनामदेवजी ने अपनी साधुता सरलतासे उसको
अपने ही माथे पर रख लिया ॥
सीस पर रखते देख, यवनाधिप ने प्रार्थना की कि "मैं दस
बीस मनुष्य साथ दिये देता हूं पहुँचा देंगे, आप पर्यंक को अपने
मस्तक पर न रखिये" आपने इनकार कर दिया कि "मुझे मनुष्यों की
कुछ भी आवश्यकता नहीं है।" और आप अपने स्थान को चल
दिये । नृपने पीछे से कुछ लोग रक्षा के निमित्त भेजही तो दिये । आप
नदी (यमुना) तट आए जहां अति अगाध जल था; वहां उस
सेज को श्रीप्रभु को अर्पण करके जल में डाल दिया ।
चौपाई।
"सबसे सो दुर्लभ मुनि राया । रामभक्ति रत गत मद माया ॥"
इस कौतुक को देख के उन राजभृत्यों ने (जो पीछे २ आरहे थे)
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N श्रीभक्तमाल सटीक। . . शीघ्र लौट के म्लेच्छराज से समाचार कहा; जिसे सुनते ही भूप चौंक पड़ा; और आज्ञा दी कि "नामदेवजी को फिरालाओ॥" [श्रीनामदेवजी के 'गुरुभाई' श्रीत्रिलोचनदेवजी थे ॥ ऐसा लिखा है कि जब श्रीनामदेवजी की माता ने अपने पिता श्रीवामदेवजी से अपने गर्भ की वार्ता पूरी पूरी कह सुनाई, तव उसी दिन स्वप्न में श्रीप्रभु ने भी वामदेवजी से आज्ञा की कि "हां, इस निष्कलङ्क की सब बातें ठीक हैं, सत्य है, तुम कुछ शंका संशय मत करो, सुता तुम्हारि सकल गुन खानी ॥"] सोसुन, आप लौट आए और पूछा कि “किसलिए फिर बुलाया ? सो'कहो" उसने कहा कि “उस सेज को तनक लाके (सुनारों को) दिखा दीजिये, क्योंकि वैसाही नया पर्यंक बनवाना है ॥" आपने आके उस जल से वैसे और उससे भी चढ़ बढ़ के अनेक सेज निकाल निकाल तट पर डाल दिये और कहा "लो पहिचान के अपनी ले लो " यह प्रभाव देख नरेश की सुध बुध जाती रही चकित हो गया। (१७६ ) टीका । कवित्त । (६६४) श्रानि पस्यो पांय, "प्रभु पास ते पचाय लीजै;" "कीजै एक बात कभू साधु न दुखाइये।" लई यही मानि, 'फेरि कीजिये न सुधि मेरी;" "लीजिये गुननि गाय मन्दिर लो जाइयै” ॥ देखि द्वार भीर, पगदासी कटि वांधी धीर; कर सों उछीर करि, चाहे पद गाइयै । देखि लीनी बेई, काहू दीनी पांच सात चोट ! कीनी धका- धकी ! रिस मन में न आइयै ॥ १३६ ॥ (४६३) वार्तिक तिलक । यह दूसरा बढ़ाभारी चमत्कार देखके, भूप फिर चरणों पर पड़, हाथ जोड़, प्रार्थना करने लगा कि “आप ने गऊ भी जिला दी तब 4. एक पर्यक यवनाधिपको लौटा देकर शेष पलंगों को श्रीयमुनाजीम अापने छोड़दिया। १ पाठान्तर "लाज" । २ "उच्चार"मीद नहीं, सना नहीं, अलग अलग । "फर सा उछीर फरि" द्वार्थों से लोगों को कुछ इधर उधर सरका थोड़ा अवकाश करके । ३"रिम" रोष, क्रोध॥ रासस c*c*check भक्तिप्तुधास्वाद तिलक। ३४१ भी आपका प्रभाव न जानके मैंने पलंग को देखना चाहा, सो यह मेरा अपराध आप क्षमाकरके अपने प्रभुसे मुझे बचालीजिये जिसमें वे भी मेरा अपराध क्षमा करदें" श्रीनामदेवजी ने आज्ञा की कि "जो मेरे प्रभु की क्षमा चाहो तो एक बात करना कि कदापि साधु- मात्र को दुख मत देना ॥" दो० "साधु सताए तीन हानि अर्थ धर्म अरु वंस। "टीला" नीके देखिये कौरव, रावण, कंस ॥१॥" यह बात उसने मान ली । पुनः चलते समय आप ने यह भी कहा कि "अव फिर मुझको अपने यहां न बुलाना;" और वहां से अपने स्थान (पएडरपुर ) को चले आए। आपने विचारा कि "प्रथम श्रीपण्डरीनाथजी के मन्दिर में जा, आपके गुन गा, तब ग्रह को चलूं ॥" आके देखा तो विट्ठलदेवजी के द्वारपर लोगों की बड़ी भीड़ है; "यदि पगदासी (पनही )वाहर छोड़ जाऊंगा तो मन में उसका खटका, दर्शन तथा पदगाने में विक्षेप करेगा;" इससे धीरे से कपड़े में कर, कटि में वांध, भीतर जा, झांझ हाथों में ले, तब आपने पद गाना चाहा। इतनेही में किसी ने जूती का कोर देख लिया, सो उसने आप को पांच सात चोट लगा, धके दे, बाहर निकाल दिया। परन्तु, आपके क्षमा-साधुता युक्त मन में किंचित् भी क्रोध न आया । दो० "उमा जे रघुपति चरण रत, विगत काम मद क्रोध । निज प्रभु मय देखहिं जगत, कासन करहिं विरोध ॥" (१८०) टीका | कवित्त । (६६) बैठे पिछवारे जाइ “कीनी जू उचित यह, लीनी जो लगाइ चोट, मेरे मन भाइथे । कान दैक सुनो अब चाहत न और कछ; ठोर मोकों यहीनित नेम पद गाइये।" सुनत ही मानिकरि करना विकल भए फेखो द्वार इते गहि मन्दिर फिराइ । जेतिक वे सोती "ठौर"-ठांय, टिकाना, स्थान ॥ , ३४० श्रीभकमाल सटीक। चौंक शीघ्र लोट के म्लेच्छराज से समाचार कहा; जिसे सुनते ही भूप पड़ा; और आज्ञा दी कि नामदेवजी को फिरालाओ॥" [श्रीनामदेवजी के 'गुरुभाई श्रीत्रिलोचनदेवजी थे। ऐसा लिखा है कि जब श्रीनामदेवजी की माता ने अपने पिता श्रीवामदेवजी से अपने गर्भ की वार्ता पूरी पूरी कह सुनाई, तब उसी दिन स्वप्न में श्रीप्रभु ने भी वामदेवजी से आज्ञा की कि "हां, इस निष्कलङ्क की सव बातें टीक हैं, सत्य हैं, तुम कुछ शंका संशय मत करो, सुता तुम्हारि सकल गुन खानी ॥"] सो सुन, आप लौट आए और पूछा कि "किसलिए फिर बुलाया ? सो कहो" उसने कहा कि "उस सेज को तनक लाके (सुनारों को) दिखा दीजिये, क्योंकि वैसाही नया पर्यंक वनवाना है।" आपने आके उस जल से वैसे और उससे भी चढ़ बढ़ के अनेक सेज निकाल निकाल तट पर डाल दिये और कहा "लो पहिचान के अपनी ले लो " यह प्रभाव देख नरेश की सुध बुध जाती रही चकित हो गया। (१७६ ) टीका। कवित्त । (६६४) आनि पस्यो पांय, "प्रभु पास ते चचाय लीजै;" "कीजै एक वात कभू साधु न दुखाइयै ।" लई यही मानि, "फेरि कीजिये न सुधि मेरी;" "लीजिये गुननि गाय मन्दिर लो जाइये" ॥ देखि द्वार भीर, पगदासी कटि वांधी धीर; कर सों उछीर करि, चाहे पद गाइयै । देखि लीनी वेई, काहू दीनी पाच सात चोट ! कीनी धका- धकी ! रिस मन मैं न आइयै ॥ १३६ ॥ (४६३) वार्तिक तिलक । यह दूसरा बढ़ाभारी चमत्कार देखके, भूप फिर चरणों पर पड़, हाथ जोड़, प्रार्थना करने लगा कि “आप ने गऊ भी जिला दी तब एक पटक यवनाधिपको लौटा देकर, शेष पलंगों को श्रीयमुनाजीम आपने छोड़ दिया। १ पाठान्तर "लीज" । २ "उछीर"मीद नहीं, घना नहीं, अलग अलग । “कर सो उछीर करि 'हाथों से लोगों को कुछ इधर उधर सरका थोड़ा अवकाश करके । ३"रिस"रोप, मोध ॥ SCARACRECRACEBCAR . भक्तिसुधास्वाद तिलक। ३४३ रहिगेई सोऊ डारियै । कहै "अहो नाथ ! सब कीजिये जु अंगी. कार," हँसे सुकुमार हरि मोही को निहारियै ?" ॥ "तुम्हरो भवन और सकै कौन आइ इहां ?" भए यो प्रसन्न छानि छाई आप सा- रियै । पूर्छ आनि लोग “कौने छाई हो ? छवाइ लीजै, दीजे जोई भाव;" "तन मन प्राण वारियै” ॥ १३८ । (४६१) वार्तिक तिलक। एक दिन सांझ के समय अचानक ही आपके घर में आग लग गई, आप तो बड़ेही अनुरागी थे पंचतत्वादि सबको सानुगग भगवत् रूपही देखा करते थे, अतः जो २ वस्तु उस आग से पृथक् भी रहगई थी, सो भी सब उठा २ के आप अग्नि में डालके प्रार्थना करने लगे कि "हे नाथ ! ये पदार्थ भी अंगीकार कीजिये ॥" श्री नामदेवजी का ऐसा सर्वात्मकभाव देख, तथा सप्रेम वचन सुन, सुकुमार-शिरोमणि श्रीहरि प्रगट हो, बिहँसके पूछने लगे कि "हे नामदेव ! क्या अग्नि में भी मुझको ही देखते हो ? अर्थात् तुम अग्नि को भी मेरा ही रूप जानते हो?" आपने हाथ जोड़ निवेदन किया कि "प्रभो ! यह गृह आपका है इसमें आपको छोड़ दूसरा कौन आ सकता है ? ॥" इस पर अत्यन्त प्रसन्न होकर रात्रिही भर में सम्पूर्ण गृह का छप्पर आपने अपनेही हाथों से सुन्दर अति विचित्र छा दिया ॥ सवेरे, लोग छप्पर की सुन्दरता देख २, चकित हो हो, आपसे पूछने लगे कि “यह छप्पर अति सुन्दर किसने छाया है ? जिसने छाया हो उसको बताओ तो हम भी छवाले, जो माँगे सोई छवाई दें॥" आपने उत्तर दिया कि “भाइयो ! वह छान छानेवाला तो रुपए पैसे लेनेवाला नहीं है, किन्तु उसपर जब पहिलेही तन मन प्राण सर्वस्व न्योछावर कर दीजिये तव वह ऐसी छावनी छा. देता है। १" रहिगई "=बचरही । २ "मोही को निहारियै ?" =क्या तू सब में मुझे ही देखता है ? सबको मुझमय ही समझना है ? सबको मेगही रूप जानता है ? ॥ ACTRICK N SK ३४२ श्रीभक्तमाल सेटीक। , मोती आब सी उतरि गई, भई हिये प्रीति, गहे पांव सुखदा- इयें ॥ १३७॥(४६२) और जाके, मन्दिर के पीछे बैठ, प्रभु से विनय करने लगे"हे प्रभो ! यह आपने बहुतही उचित वात की कि जो मेरे दो चार धौलधके लगवा दिये, क्योंकि मैंने अपराध किया ही था; सो दण्ड देके आपने शुद्ध कर लिया; मुझे यह बहुतही अच्छा लगा। परन्तु अब मेरी प्रार्थना कान लगाके सुनिये; मैं और कुछ नहीं चाहता; केवल यही चाह मुझे है कि नित्य नेम से जो पद गाया करता हूँ सो गाके सुनाया करूँ; क्योंकि आप की शरण छोड़ मुझको दूसरा ठौर- ठिकाना ही नहीं।" यही प्रार्थना इस पद में भी है- 'हीन है जाति मेरी, यादवराय | कलिमें “ नामा" यहाँ काहे को पठाय ॥ पातुरि नाचे, तालपसमाज बाजे, हमारी भक्त योठल काहे का राजे ॥ पाउयप्रभु जू वचन सुनी जै । " नामदेव मामी' दरशन दीजै ॥ इस पद के सुनतेही भक्तवत्सल श्रीकरुणासिंधु प्रभु ने, कृपा से विकल हो सम्पूर्ण मन्दिर को नीचे से (जड़ से) फेर के उसका द्वार फिरा के, श्रीनामदेवजी के सन्मुख हो, दर्शन दिये। (उस मन्दिर का द्वार अब तक दक्षिण मुख है) इस प्रसंग से यह निश्चय होता हे कि जो मूर्ति श्रीर्य ठलदेव की, श्रीवामदेव जी ने सेवा के निमित्त अपनी पुत्री (श्रानामदेव जी की माता) को तथा श्रीनामदेवजी को दी थी, सो इन्हीं प्रधान मूर्ति का द्वितीय विप्रह, उनके गृह के भावान्तर में था। यह अतिविचित्र चरित्र देख, जितने श्रोत्रिय वेदपाठी पंडा पुजारियों ने धौल धक्के दिये दिलाए थे, तिन सबके मुख ऐसे सूख गये कि जैसे मोती का पानी उतर जाय । और सुखदाई श्रीनामदेव जी के विषे अति प्रीति भाव कर, चरणों में पड़, अपराध की क्षमा कराई । श्रीनामदेवजी की जय ॥ (१८१) टीका । कपित्त । (६६२) औचकही घरमांझ सांझही अगिनि लागी, वड़ो अनुरागी, १"प्राय वानी, युति फान्ति, चमक ॥ RSE-A-RECE MORECORRESSACRECORRESO Recent . FREGREECRECRUCREAK भकिसुधास्वाद तिलक। रहिर्गई सोऊ डारियै । कहै "अहो नाथ ! सव कीजिये जु अंगी. कार," हँसे सुकुमार हरि मोही कों निहारियै ?" ॥ "तुम्हरो भवन और सकै कौन आइ इहां ?" भए यो प्रसन्न छानि छाई आप सा- रिये । पू आनि लोग “कौने छाई हो ? छवाइ लीजे, दीजे जोई भावे;" "तन मन प्राण वारियै" ॥१३८॥ (४६१) बार्तिक तिलक। एक दिन सांझ के समय अचानक ही आपके घर में आग लग गई, आप तो बड़ेही अनुरागी थे पंचतत्वादि सवको सानुगग भगवत् रूपही देखा करते थे, अतः जो २ वस्तु उस आग से पृथक् भी रहगई थी, सो भी सब उठा २ के आप अग्नि में डालके प्रार्थना करने लगे कि "हे नाथ! ये पदार्थ भी अंगीकार कीजिये ॥" श्री नामदेवजी का ऐसा सर्वात्मकभाव देख, तथा सप्रेम वचन सुन, मुकुमार-शिरोमणि श्रीहरि प्रगट हो, बिहँसके पूछने लगे कि "हे नामदेव ! क्या अग्नि में भी मुझको ही देखते हो ? अर्थात् तुम अग्नि को भी मेरा ही रूप जानते हो ?'आपने हाथ जोड़ निवेदन किया कि "प्रभो ! यह गृह आपका है इसमें आपको छोड़ दूसरा कौन आ सकता है ? ॥" इस पर अत्यन्त प्रसन्न होकर रात्रिही भर में सम्पूर्ण गृह का छप्पर आपने अपनेही हाथों से सुन्दर अति विचित्र छा दिया ॥ सवेरे, लोग छप्पर की सुन्दरता देख २, चकित हो हो, आपसे पूछने लगे कि “यह छप्पर अति सुन्दर किसने छाया है ? जिसने छाया हो उसको वताओ तो हम भी छवालें, जो माँगे सोई छवाई दें॥" आपने उत्तर दिया कि "भाइयो ! वह छान छानेवाला तो रुपए पैसे लेनेवाला नहीं है, किन्तु उसपर जब पहिलेही तन मन प्राण सर्वस्व न्योछावर कर दीजिये तब वह ऐसी छावनी छा. देता है। १" रहिगई " यचरही । २ "मोही को निहारिये ?" =क्या त सब में मुझे ही देगता है ? सबको मुझगय ही समझना है ' सबको मेगही स्प जानता है ? ॥ ? , श्रीभकमाल सटीक। दो "प्रभुता को सब कोउ चहै, प्रभु को चहै न कोय । तुलसी जो प्रभु को चहै, आपहि प्रभुता होय ॥" (१८२) टीका । कवित्त । (६६१) सुनो और परचै जो आए न कवित्त मांझ, वांझ भई माता क्यों न ? जौ न मति पागी है । हुतो एक साह, तुला दान को उछाह भयो; दयो पुर सबै, रह्यो नामदेव रागी है ॥ "ल्यावो बुलाइ" एक दोई तो फिरोइ दिये; तीसरे सो आए "कहा कहो ? बड़ भागी है" । “कीजिये जु कछु अंगीकार मेरो भलो होय, "भयो भन्नो तेरो, दीजै जो पै आसा लागी है" ॥ १३६॥ (४६०) अब श्रीनामदेवजी के परचे प्रभाव, जो श्रीनामास्वामीजी के छप्पय में नहीं कहे गए हैं, सो सुनिये; देखिये ऐसे भनिभरे श्रीनाम- देवचरित्र सुनके श्रीसीतारामजी में तथा श्रीसीतारामनाम में जिसकी मति प्रेम से न पगी, उसकी माता बांझ क्यों न हुई ? इस निज-यौवन विटप-कुठार पुत्र को व्यर्थ ही क्यों उत्पन्न किया ? पण्डरपुर में एक बड़ा साहु ( सेठ) था, उत्साहपूर्वक सोने का तुलादान करके उसने सवको सुवर्ण दिया । परमानुरागी श्रीनाम- देवजी ही एक रह गए ॥ आपके पास भी सादर बुलाने को मनुष्य भेजे; परन्तु आपने एक दो वेर तो उनको कोरेही लौटा दिया कि "मुझे नहीं चाहिये।" तीसरी बार बड़ी प्रार्थनापूर्वक उसने वुलाया तो आप जाके बोले कि "हे बड़भागी सेठ! कहो क्या कहते हो?" उसने विनय किया कि "आप कृपाकरके इसमें से कुछ सुवर्ण अंगीकार कीजिये कि जिसमें मेरा भला हो॥" आपने उत्तर दिया कि "तेरा भला हुआ ही है, क्योंकि तूने सब को दिया। जिसकी आशा लगी हो उसको दे; और यदि मुझको भी देने के हेतु तेरी आशा लगीही है तो दे ॥" १ "रहो'-शंप रहे । २"फिराइदिय"-कोरेही लौटा दिये ।।

, भक्तिसुधास्वाद तिलक। (१८३) टीका कवित्त । (६६०) जाके तुलसी हैं ऐसे तुलसी के पत्र मांझ, लिख्यो आधो राम नाम; "यासों तोल दीजिये। कहा परिहास करो ? ढरो, है दयाल;" "देखि, होत कैसो ख्याल याकों, पूरो करो, रीझियै" ।। ल्यायो एक कांटो, लै चढ़ायो पात सोना संग भयो बड़ो रंग, सम- होत नाहि छीजिये । लई सो तराजू जा सौ तुलै मन पांच सात; जाति पांति ह को धन धस्यो, पै न धार्जियै ॥ १४० ॥(४८) वार्तिक तिलक । इतना कहके, श्रीतुलसीजी के पत्र में आधा श्रीराम नाम अर्थात् "रा" मात्र लिखके, आप बोले कि "यदि दिया ही चाहता है तो इसी भर तौल के दे।” सुन के सेठ ने कहा कि "आप हँसी क्या करते हैं, इस पत्रहीभर में क्या हूँ ? मुझपर दयालु होके कुछ अधिक अङ्गीकार कीजिये।" श्रीनामदेवजी ने उत्तर दिया कि "मैं हँसी नहीं करता, देख तो इसका कैसा कौतुक होता है; इस भर तौल के पूरा तो कर, तब मैं तुझ पर अतिशय प्रसन्न हूंगा ॥" एक तोलने का कांटा ला के उसके एक ओर वह तुलसीदल और दूसरी ओर सोना साह ने चढ़ाया, परन्तु बड़ा ही रंग मचा कि वह सोना श्रीपत्र के तुल्य न हुआ, वरन घट गया । तदनन्तर, साहु ने एक ऐसी तुला (तराजू ) मँगवाई जिसमें पाँचसात मन वस्तु तुल सके और उसपर वह श्रीनामपत्र रख के अपने घर भर का स्वर्णादिक सब धन चढ़ाया तब भी श्रीपत्रवाले पल्लेने भूमि न छोड़ी। फिर, अपने जातिभाइयों का धन भी मांग मांग के पल्लेपर चढ़ाता गया, तथापि पूर न पड़ा, धन का पल्ला अतीव हलका ही रहा । उन सब का प्रिय न हुआ। १"जाके तुलसी है ऐसे" इसका अर्थ कोई २ महात्मा यों करते हैं:-जिस श्रीनाम. देव जी के श्रीतुलसीजी ऐसे इस प्रकार से हैं, सर्वस्व है, (जैसा मागे के संघंट से प्रत्यक्ष है, सो श्रीनामदेवजी श्रीतुलसीपत्र पर "1" लिखा। (भीतुलसीजी पैष्णवामत्र के रुर्घस्थ है विशेषतः श्रीनामदेवजी के । २ "ख्याल"रंग, खेल, कौतुक । ३"रंग" स्याल, खेल, कौतुक, तमाशा ।-४. सनूर-तुला।-५"न धीजिये"- प्रिय न हुश्रा, पूर्ण न हुना, पूरा न पड़ा। vediomade ********** श्रीभकमाल सटीक । ३४६ - (१४) टीका | कवित्त । (६५) पखो सोच भारी, दुःख पावे नर नारी, नामदेव जू विचारी "एक और काम कीजिये । जिते व्रत दान और स्नान किये तीरथ में करियै संकल्प या 4 जल डारि दीजिये" ॥ करेऊ उपाय, पात पला भूमि गाड़े पाय, रहे वे खिसोय, कह्यो "इतनोई लीजिय” । "लेक कहा* करें ? सग्वाह न करें, भक्ति भाव सों लै भरै हिये, मति अति भीजिय" ॥ १४१॥ (१८८) वात्तिक तिलक । यह भर्द्ध रामनाम युक्त तुलसीपत्र के गौरव महत्व का कौतुक देखके, सेठ के घर के सत्र स्त्री-पुरुष-वर्गों को बड़ाही सोच और दुख हुआ कि कैसे पूरा हो। श्रीनामदेवजी ने विचार किया कि "श्रीगमनाम के सामने धनादिकों की तुच्छता तो दिखा ही दी, परन्तु अब यह भी दिखा कि श्रीनाम के आगे सब धर्म कर्म भी हलके (न्यून ) ही हैं; अतः आपने कहा कि "सुनो एक काम और करो कि ने जितने व्रत उपवास, तीर्थस्नान, दान इत्यादि सुकर्म धर्म किये हों, उन सबको भी संकल्प करके वह जल इसपर छोड़ दो अर्थात् सब पुण्य भी चढ़ादो।" यह उपाय भी किया गया; तथापि श्रीनामपत्र वाला पल्ला भूमि में पांव जमाए ही रहा; यथा- दो० "भूमि न छांइत कपि चरण, देखत रिपुमद भाग । कोटि विघ्न ते सन्त कर, मन जिमि नीति न त्याग"॥१॥ तवतोवे सब अति लजिनसंकुचित होके कहने लगे कि "महाराज! आप इतनाही ले लीजिये।" श्रीनामदेवजी ने उत्तर दिया कि "यह सब धन और पुण्य लेके मैं क्या करूंगा? क्योंकि तुम सब ने स्पष्ट देखा ही कि मेराधन जो श्रीरामनाम है, उसके आधे के भी तुल्य ये सब नहीं ठहरे; इससे श्रीरामनाम और श्रीभक्किही से मैं अपने हृदय १"बिसाय" लजाय । २"सरबर"-समता। * पाठान्नर "कहां धर?"॥ - - भक्तिसुधास्वाद तिलक। को संतुष्ट रखता हूं और रकबूंगा; किस लिये कि मेरी मति प्रेमभनि रस ही से भीगी है । इससे तुम लोग भी धनधर्माभिमान छोड़ श्रीरामनाम की भक्ति रस में अपनी बुद्धि को भिगाके भव पार हो।" दो० "राका रजनी हरि भगति, राम नाम सोइ सोम । अपर नाम उडुगण बिमल, बसैं भक्त उर व्योम ॥" ( १८५) टीका | कवित्त । (६५८) कियो रूप ब्राह्मन को दूवरो निपट अंग, भयो हिये रंग, बन परिच को लीजियें । भई एकादशी, अन्न मांगत "बहुत भूखो, आजु तो न देही भोर चाहो जितो दीजिये" ॥ करयो हठ भारी मिलि दोऊ, ताको शोरै पस्यो समझावै नामदेव याको कहा खी- जिये। चीते जाम चारि मरि रहे यों पसारि पांव, भाव पै न जाने दई हत्या नहीं छीजियें ॥ १४२॥ (४८७) वार्तिक तिलक। अब जिस प्रकार स्वयं प्रभु ने एकादशी व्रत का पन श्रीनाम- देवद्वारा दृढ़ाया, सो आख्यायिका कहते हैं- प्रभु के हृदय में यह रंग (कौतुक) आया कि “ एकादशी निष्ठा की परीक्षा लूं;" इस हेतु अत्यन्त दुर्बल ब्राह्मण का रूप बना, एकादशी को सबेरेही आ, श्रीनामदेवजी से बोले कि "मैं कई दिनों का बहुत ही भूखा हूं, मुझ को अन्न दो।" आप ने उत्तर दिया कि " आज एकादशी वन है, इससे अन्न भोजन न दूंगा; कल सवेरे जितना मांगोगे उतना दूंगा।" ब्राह्मणजी ने बड़ा भारी हठ किया कि "मैं अन्न अभी अभी लूंगा; आपने भी हठ किया कि "आज तो मैं अन्न नहीं ही दूंगा।" दोनों के हठयुक उत्तर प्रत्युत्तर का बड़ा हल्ला मचा, सुन के बहुत लोग इकट्ठे हो गए; और श्रीनामदेवजी से कहने लगे कि " हम २.गरिने'Tरीक्षा, जांच, परचे, प्रभाव, प्रभुता ।२ "शोर-हल्ला, कोलाहला , घने शाद ॥ RECAREER SCARICALCIENCREGIR . ** ३४८ श्रीभक्तमाल सटीक। इस मरणप्राय ब्राह्मण पर क्रोध करके क्या कहें ? पर तुम्हें समझाते हैं कि दे दो।" तथापि, एकादशी को अन्न देना निषेध जान के, आपने नहीं ही दिया ॥ जब चार पहर बीत गए, तब अन्नाभिलाषी भूखे ब्राह्मण देव, पांव फैलाके मर गए। लोग आपके भाव निष्ठा को न जान के, कहने लगे कि "नाम- देव को ब्राह्मण ने ब्रह्महत्या दी, इनको छूना न चाहिये, अब यह हत्या छूटनेवाली नहीं है।" (१८६) टीका | कवित्त । ( ६५७) रचिकै चिता को, विप्र गोद लेके, बैठे जाइ, दियो मुसुकाइ "मैं परीक्षा लीनी तेरी है । देखि सो सचाई, सुखदाई, मन भाई मेरे;" भए अन्तर्धान, परे पायँ प्रीति हेरी है ।। जागरन मांझ, हरि भवन को प्यास लगी, गए लैन जल; प्रेत पानि कीनी फेरी है। फेटे तें निकासि ताल, गायो पद ततकाल; बड़ेई कृपाल रूपधरयो छवि ढेरी है ॥ १४३॥ (४८६) वार्तिक तिलक। तदनन्तर, श्रीनामदेवजी चिता रच, मृतक विपके शरीर को गोद में लेकर चितापर जा बैठे, और किसी आज्ञाकारी जन से कहा कि "अग्नि-लगा दो॥" तब तो श्रीएकादशीपति प्रभु ने मुसुकाके कहा कि “ प्रिय भक्त ! जलो मत, तुम्हारे हृदय के शीतल करनेवाले मैं ने ही तुम्हारी परीक्षा ली है, तुम्हारे व्रत की तथा ब्रह्मण्यता की सचाई देखी, सो मुझको बड़ीही प्यारी सुखदाई लगी।" यह कहके श्रीप्रभु उस चिताही पर से अन्तर्धान हो गए। इस प्रकार, वैष्णवधर्म तथा ब्राह्मण, श्रीतुलसी, श्रीरामनाम, और श्रीप्रभु में नामदेवजी की परमप्रीति देख, एवं प्रभु के चरित्रों , - . १॥ फेट"कटिवन्धनवस्त्र ॥ SEKACEBCAT ********** भक्तिसुधास्वाद तिलक। ३४६ की विचित्रता विचार, सब लोग जय जयकार कथनपूर्वक श्रीनामदेव जी के चरणों में पड़के प्रसंशा करने लगे। अन्य एकादशी की रात्रि में आपके गृह विष जागरन उत्सव हो रहा था; उसमें हारभक्कों को प्यास लगी, आप स्वयं जलाशय में जल लेने गए; क्योंकि वहां एक बड़ा प्रेत रहता था इससे और किसी को न भेजा । सो जब आप वहां पहुंचे तो कई प्रेतों को साथ लिये वह प्रेत बड़ा भारी विकराल भयंकर रूप धारण कर आप के सन्मुख आ खड़ा हुआ। उसको देख, आपने उसमें भगवदभाव ही आरोपण किया, क्योंकि आपकी दृष्टि में तो और भाव रहही नहीं गया इससे अपने फेट से ताल अर्थात् काश्यताल (झांझ) वा करताल निकाल के तत्कालही यह पद बनाके सप्रेम गाने लगे। "ये श्राए मेरे लम्यानाश । धरती पांच स्वर्ग लो माधो जोजन भरि भरि हाथ ॥ शिव सनकादिक पार न पात्र, तेमा ससा विराजत साथ नामदेव के स्वामी अन्नयामा कान्ह्या मोहिं सनाथ ॥१॥" सुनतेही सर्वान्तयामी परम कृपालु ने प्रेतरूपों को विनाश करके, परम छविराशि रूप धारण कर दर्शन दिया। निज रूपामृत पिलाके कहा कि "जल लेजाव । जल लाके आपने भगवद्भक्तोंको पिलाया श्रीनामदेवजी की जय ॥ (३१)श्रीजयदेवजी। (१८७) छप्पय (६५६) जयदेव कवि नृप चक्कवै; खडमंडलेश्वर आन कवि॥ प्रचुर भयो तिहुँलोक “गीतगोविन्द” उजागर।कोक काव्यनवरससरससिंगारकोसागर॥ अष्टपदीअभ्यास करै तेहिं बुद्धि बढ़ावें। (श्री) राधारमन प्रसन्न सुनन १ "चक" वार्ता, सातोद्वीप का राजराजेश्वर । २ "खण्डेश्वर"-नच खण्डोंमें से एक खगडा का महाराज | "मण्डलेश्वर'-प्तौ दोसो कोस के मगडलका राजा ॥ BEEGREATEGGARACTERT CONCE । महाराज सरीखे ३५० श्रीभक्तमाल सटीक । निश्चय तहँ आवै। संत सरोरुहखंड को “पद्मा"पति सुखजनक रवि। जयदेव कवि नृप चक्कवै खडमंडलेश्वर आन कवि॥४४॥ ( १७०) वार्तिक तिलक। कलियुग में संस्कृत के कवियों में, श्रीजयदेव कविराज, चक्रवर्ती और, और सब कवि खण्डेश्वर वामण्डलेश्वर राजाओं के सरिस हैं। उक्त महा-कवि-कृत अति उजागर "श्री. गीतगोविंद" काव्य, देव मनुष्य नाग इन तीनों लोकों में प्रचुर विख्यात हुआ; कैसा " गीतगोविंद" है कि, कोकशास्त्र का, काव्य के सम्पूर्ण अंगों का, नवो रसों का, तथा सरसश्रृंगार का रत्नाकर समुद्र ही है ॥ और, श्रीगीतगोविंद की अष्टपदियां जो कोई अभ्यास करे (पढ़े ), उसकी बुद्धि को बढ़ाती है । तथा जो सप्रेम गान करता है तो श्रीराधावल्लभजी वहां उसके सुनने के लिये प्रसन्न होके प्रगट वा गुप्तरूप से अवश्यही आते हैं। सन्तरूपी कमलसमूहों को सुख उत्पन्न करनेवाले, श्रीपद्मावतीजी के पति (श्रीजयदेवजी) सूर्य समान हुए । (१८८) टीका । कवित्त । (६५५ ) किन्दुबिल्लु ग्राम, तामै भए कविराज भस्यो रसराज हिये मन मन चाखियें । दिन दिन प्रति रूख रूख तर जाइरहैं, गहें एक गूदरी, कमंडल कों, गखियें ॥ कही देवै विप्र सुता जगन्नाथदेवजू को, भयो जब ममै, चल्यो दैन प्रभु भाखिये । "रसिक जैदेव नाम मेरोई सरूप, नाहि देवौ ततकाल अहो, मेरी कहि साविय" ॥१४४॥ (४८५) वार्तिक तिलक। सब कविराजों के राजा श्री जयदेवजी पूर्वदेश में "किन्दुबिल्व" १ "पण्ड" कदम अर्थान् समूह । "सरोरुह-खगई" कमल के समूह । 'ग्मगज"रमों का राजा, शृङ्गार रस ॥ SANELESSONG राज, iane USALA * भक्तिसुधास्वाद तिलक। नामक ग्राम में "भोजदेव" पिता और "राधादेवी माता से ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न हुए; सो आपके हृदय में प्रभु संवन्धी रंसराज (शृ. हाररस) भरा था, परन्तु उसका स्वाद मनहीमन में लिया करते थे। और विरक (वैराग्यवान् ) कैसे थे कि गृह को त्याग के वनमें भी एक वृक्ष तले एकही दिवस रहते थे दो दिन भी एक के नीचे नहीं; और तनुक्रिया-निर्वाह के हेतु केवल एक गुदड़ी (कन्या) और एक कमण्डलु मात्र रखते थे। उसी काल की वार्ता है कि एक ब्राह्मण श्रीजगन्नाथजी को अपनी कन्या प्रतिज्ञापूर्वक देने को कह गया; जब वह लड़की अवस्था में उस योग्य हुई, तो उसको देने के लिये वह विप्र श्री- जगन्नाथजी के पास लाया ; प्रभुकी आज्ञा हुई कि "जयदेवजी नामक आश्चर्य रसिक भक्त मेरेही स्वरूप हैं, सो इसी क्षण लेजाके और मेरी आज्ञा उनसे सुनाके, यह अपनी सुता उन्हींको दे दो।" (१८६ ) टीका | कवित्त । (६५.) चल्यो द्विज तहां, जहां बैठे कविराजराज, "अहो महाराज ! मेरी सुता यह लीजिये। “कीजिये विचार, अधिकार, विस्तार जाके ताहि को निहारि, सुकुमारि यह दीजिय” । “जगन्नाथ देवत की आज्ञा प्रतिपाल करो, ढरो मति धरोहिये; ना तो दोष भीजिय”। "उनको हजार सोहैं, हमको पहार एक; ताते फिरि जावो, कहा कहि खीजिये" ॥ १४५॥ (४०४) वार्तिक निल। श्रीजगन्नाथजी की आज्ञा सुन, कन्या लिये हुए ब्राह्मण जहां कवि. राजराज श्री जयदेवजी श्रीप्रभु का स्मरण करते हुए बैठे थे, वहां जाके आपसे प्रार्थना की कि "हे महाराज ! यह अपनी कन्या मैं आपको अर्पण करता हूं इसका कर ग्रहण कीजिये ।" आपने उत्तर दिया कि "आप विचार कीजिये, जिसको कन्या लेने का अधिकार और गृहस्थाश्रम का विस्तार हो, उसीको यह सुन्दरि कुमारी दीजिये।" सस .

RASHTRA ३५२ श्रीभक्रमाल सटीक। . ब्राह्मण बोले कि "महाराज ! मैं जो अपनी इच्छा से कन्यादान करता तो विभव विचार अवश्य करता; परन्तु मैं तो श्रीजगन्नाथ देवजी की आज्ञा से आपको कन्या दे रहा हूं, इससे उनकी आज्ञा को अपि भी प्रतिपाल कीजिये और कन्या को ग्रहण करना हित मान, अपनीमति में धारण कर, प्रभु की आज्ञा अनुवर्तन कीजिये; नहीं तो "प्रभुआज्ञा-भंग का बड़ा भारी दोष आप को लगेगा॥" इसपर श्रीजयदेवजी बोले कि "मैं श्रीजगन्नाथजी की ऐसी आज्ञा पालन करने में समर्थनहीं हूँ। वे प्रभु समर्थ हैं उनको सहस्रों (हजारों) सुन्दर स्त्रियां शोभा देती हैं, पर मुझे तो एक ही स्त्री पहाड़ है, अर्थात् जैसे दुर्वल निर्वल मनुष्य को पहाड़ का चढ़ना उतरना लाँघना अगम होता है, अथवा पहाड़ का उठाना असक्य है, वैसेही मुझको एक ही स्त्री का सँभाल अतिशय अगम असह्य है, इससे आप यहाँ से चलेही जाइये; हम आपको और क्या बात कहके रिसायँ ।" (१६०) टीका | कवित्त । (६५३) सुतासों कहत"तुम बैठि रहो याही ठौर, आज्ञा सिरमौर मोपें * नाहीं जाति टारी है"।चल्यो अनखाइ समझाइ हारे वातनि सों; "मन ! तू समझ, कहा कीजै ? सोच.भारी है" ॥ बोले द्विज-बाल- कीसों 'आप ही विचार करो, धरोहिये ज्ञान, मो में जाति न सँभारी है" । बोलीकर जोरि “मेरो जोर न चलत कळू, चाही सोई होहु, यह वौरिफेरि डारी है" ॥ १४६ ॥ (४८३) वार्तिक तिलक। तव, भक्त ब्राह्मण ने अपनी कन्या से कहा कि "तू इसी ठौर इन्हीं के पास बैठ रह, क्योंकि त्रयलोक्य-शिरोमणि श्रीजगन्नाथजी की आज्ञा मुझसे टारी नहीं जाती;" ऐसा कह, कन्या को विठला (बैठाय), ब्राह्मण कुछ अनखाके चल दिया । आप बहुत प्रकार १"सिरमौर" शिरोमणि | २"प्रा.साइ"-अमर्ष करके, सोध । ३ "यालकी" पालिका, कन्या, लड़की। ४"और"-घल । ५ 'वारिफेरि दारी'न्योछावर हुई ॥ *पाठान्तर"मेरे"॥ .

. . ****** ৩১৬২ भकिसुधास्वाद तिलक ३५३ की वार्ता से ब्राह्मण को समझा के हार गए, परन्तु ब्राह्मण ने नहीं ही माना, श्रापकी एक न सुनी। आप अपने चित्त में कहने लगे कि "रे मन तू समझ, विचार कर, कि अब क्या करना योग्य है ? यह बड़े भारी सोच की वार्ता आ पड़ी॥" और, विप्रसुता से बोले कि "तुम अपने पति की योग्यता तथा योगक्षेम निर्वाह आदिक को विचार करो, जैसा करना उचित है वैसा ज्ञान हृदय में धारण करो; मेरे पास मत वेठी रहो; क्योंकि तुम्हारा सारसँभार मुझसे नहीं होने का ॥" श्रीपद्मावतीजी आपकी पूर्वजन्म-सम्बन्ध-सौभाग्यवती तो थी ही, यह सुन, हाथ जोड़, बोली कि "नाथ ! मेरा कुछ बल विचार नहीं चलता; अब जो चाहे सो हो, मैं तो पिता के देने से तथा प्रभु आज्ञा से, आप को श्रीजगन्नाथ ही जान, अपना नाथ मान, आप के ऊपर तन मन से न्योछावर हो, आपकी हो चुकी ॥" (१६) टीका | कवित्त । (६५२) जानी जब "भई तिया किया, प्रभु जोर मो पैं, तो पें एक झोपड़ी की छाया करि लीजिय" । भई तव लोया, श्याम सेवा पध- राइ लई,"नई एक पोथी में बनाऊ"मन कीजिये ॥ भयो जू प्रगट "गीत" सरस "गोविन्द" जू को, मान में प्रसंग"सीत मंडन सो. (को दीजिये" । एही एक पद मुख निकसत सोच पस्यो, धस्यो कैसे जात ? लाल लिख्यो, मति रीमियै ॥ १४७॥ (४८२) वार्तिक तिलक । इस प्रकार जब श्रीपद्मावतीजी से सुबुद्धि-विनय प्रीति-पतित्रत- भरा हुआ उत्तर श्रीजयदेवजी ने सुना, तव जाना कि "यह मेरी पत्नी हुई, क्योंकि श्रीजगन्नाथजी ने मुझ पर अपनी प्रभुता का वल किया, अव मेरी कुछ नहीं चलने की । इससे उचित है कि एक १"छाया" चांह, कुटीर, झोपड़ी, गृह । २ "धयो कैसे जात ?" -किस प्रकार से लिसा जासक ॥ CAlert , Presiexxx . * श्रीभक्तमाल सटीक। झोपड़ी की छाया कर लूं" ऐसा विचार सज्जनों से कहकर एक कुटी बनवा ली॥ जव छाया हो गई, तव श्रीश्यामसुन्दरजी की मूर्ति सेवा के हेतु पधरा ली; क्योंकि गृहं कुटी में रहके, जो भगवतमूर्ति की पूजा कर अन्नको भोग लगा के प्रसाद नहीं पाते, अपने ही लिये बना के खालेते हैं, वे पाप ही भोजन करते हैं (ऐसाश्रीगीताजी में लिखा है ।) श्लो. "यज्ञशिष्टाशिनः संतो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः । भुञ्जन्ते तेत्वघं पापाये पचन्त्यात्मकारणात्॥ (३।१३)॥ कुछ काल में श्रीप्रभुप्रेरणा से आपके हृदय में इच्छा हुई कि "मैं श्रीप्रभुचरित्रमय एक नवीन पुस्तकवनाऊं" तब "श्रीगोविन्द" जी का अतिसरस “गीत" अर्थात् "श्रीगीतगोविन्द" प्रगट हुआ । उसमें जय श्रीराधिकाजी के महामान का प्रसङ्ग आया, तो उस स्थान पर ध्यानभावना में आपको श्यामसुन्दरजी का विनय श्री. प्रियाजी प्रति यह पद स्फुरित हुन्ना कि "स्मर-गरल-खण्डनं मम- शिरसि मण्डनं देहि पदपल्लवमुदारम्” (हे प्रिये ! कन्दर्प का विष खंडन करनेवाला और मेरे मस्तक का मण्डन, भूषण, अपना उदार पदपल्लव मेरे शीस पर रख दीजिये) इसी एक पद के मुख से निक- लते ही, श्रीजयदेवजी को सोच संकोच हुआ, कि "इस प्रकार का ‘पद पोथी में कैसे लिखें?" तब सोच विचार करते स्नान को चले गए। इतने में श्रीराधा- रमणजी ने, जयदेवजी के स्वरूप से आके, जयदेवजी की मति में रीझ के, जो पद स्फुरित हुआ था वही पद पुस्तक में आपही लिख दिया। .. पुनः जब जयदेवजी स्नान करके आए और पुस्तक में वह पद लिखा देखा, तब पद्मावतीजी से पूछा कि "यह पद किसने लिख- दिया ?" उसने कहा "अभी अभी शापही तो आके लिख गये हैं" जयदेवजी ने कहा कि "मैंने तो नहीं लिखा" तब यह निश्चय हुआ कि प्रभु मापही लिख गए हैं LACKAGRUKHASRECRLS K***SAEXY RE*** भकिसुधास्वाद तिलक। ३५५ (१९२) टीका । कवित्त । (६५१) नीलाचल धाम तामै पंडित-नृपति एक, करी यही नाम धरि पोथी सुख दाइयै । द्विजनि बुलाइ कही "वही है, प्रसिद्ध करो, लिखि लिखि पढ़ौ देश देशनि चलाइयै” ॥ बोले मुसुकाइ विष क्षिप्र सो दिखाइ दई "नई यह कोऊ मति अति भरमाइये"धरी दोऊ मंदिर में जगन्नाथ देवजू के दीनी यह डारि, वह हार लप- टाइयै ॥ १४८ ॥ (४८१) पातिक तिलक। जब श्री "गीतगोविन्द" जी धन के पूर्ण हो गए और प्रभु अनु- ग्रहीत जान सब कोई पढ़ने गाने लगे, तब इसको देखके श्रीजग- नाथधाम का राजा जो पण्डित था, मो उसने भी यही (गीत- गोविन्द ) नाम रख के दूसरी एक सुखदाई पुस्तक बना, ब्राह्मण पण्डितों को बुला, पुस्तक देकर, कहा कि “यह वही गीतगोविन्द है.इसको लिख २ के पढ़ो, और देश देश में प्रसिद्ध करो चलाओ।" यह सुन, पण्डितों ने श्रीजयदेवजी कृत गीतगोविन्द राजा को दिखा के मुसक्याके उत्तर दिया कि "राजन् ! वह गीतगोविन्द तो देखिये यह है, और यह दूसरी किसी ने नई बनाई है, हमारी मति में अत्यना भ्रम होता है।" इसपर, दोनों पुस्तकें श्रीजगन्नाथजी के मन्दिर में रख दी गई। तब प्रभु ने इस राजावाली पुस्तक को अलग फेंक के, 'श्रीजयदेव. कृत गीतगोविन्द' को पदिक हार की नाई अपने हृदय में लपटा लिया और कोई कहते हैं कि जयदेवजी के गीतगोविन्द में हार लपेट दिया । (१६३ ) टीका । कवित्त । (६५०) पस्यो सोच भारी, नृप निपट खिसानो भयो, गयो उठि सागर मैं, "चूड़ों वही बात है । अति अपमान कियो; कियो मैं बखान सोई, गोई जात कैसे ?" आंच लागी गात गात है ॥ आज्ञा प्रभु दई “मत बूड़े तूं समुद्र मांझ, दूसरो न ग्रन्थ ऐसो, वृथा तनुपात ACCE .

३५६ श्रीभक्तमाल सटीक। , . है। द्वादश सुश्लोक लिखि, दीजे सर्ग द्वादश मैं, ताहि संग चले जाकी ख्याति पात पात है" ॥ १४६ ॥ (४८०) घातिक तिलक। जर श्रीजगदीशजी ने उस पुस्तक का आदर करके राजा की पोधी का निरादर कर दिया, तब राजा को बड़ा ही शोक हुआ, तथा अति संकुचित गलित मान होकर, उठके समुद्र की दिशि चल दिया; और मन में यह निश्चय किया कि "अव में समुद्र में डूब के मर जाऊं, सो भला है; क्योंकि जो जयदेवजी ने कहा सोई मेंने बखान किया और प्रभु ने मेरा इस प्रकार का अतिशय अपमान किया तिसको में कैसे छिपाऊँ।" इस प्रकार राजा सर्वाङ्ग संतप्त होकर डूबने ही तो लगा ॥ सो देख, भक्तवत्सल करुणाकर श्रीजगन्नाथजी ने प्रगट होकर, आज्ञा दी कि "तुम समुद्र में मत डुबो, मैं सत्य सत्य कहता हूँ जयदेवजी के ग्रन्थ सरीखा तुम्हारा तथा और कोई ग्रन्थ है ही नहीं; तुम वृथा ही शरीर त्याग करते हो । एक बात करो कि अपने ग्रन्थ के बारह श्लोक, जिस गीतगोविन्द की प्रसिद्धता, विराटरूपी वृक्ष के पत्रों पत्रों में है अर्थात् मनुष्यों मनुष्यों में है, उसी में लिख दो; उसीके साथ साथ तुम्हारेभी द्वादश श्लोक चलेंगे(प्रसिद्ध होंगे)॥" राजा ने हर्पपूर्वक प्रभु की आज्ञा मानकर ऐसा ही किया ॥ (१९४) टीका । कवित्त । (६४६) सुता एक माली की जु बैंगन की बारी मांझ तोरे, "वनमाली" गावै कथा सर्ग पांच की। डोलें जगन्नाथ पाछे, काछे अङ्ग मिहीं मँगा, "आछे" कहि घूमैं सुधि आवै बिरहांच की ॥ फट्यो पट देखि नृप पूछी "अहो भयो कहा?" "जानत न हम"; "अब कहो बात सच की" प्रभु ही जनाई "मन भाई मेरे वही गाथा" ल्याए वही पालकी की पालकी मैं नांव की ॥ १५० ॥(४७६) १ "पात पात"-सर्व माहि, सय में। २ 'बिरहांच"-विरह की प्रांच, विरहाग्नि, ताप। "नांच को"-नृत्य किया। FACE CLICR .

- की सुता . FRE भक्तिसुधास्वाद तिलक । ३५७ वार्मिक तिलक। एक दिन माली की कन्या बैंगन (भांटा ) की वारी में बैंगन तोड़ती हुई श्रीगीतगोविन्द के पंचम सर्ग की कथा का यह पद गाती थी"न कुरु नितम्बिनि गमनविलम्बनमनुसर ते हृदयेशम् ॥ धीर- समीरे यमुनातीरे वसतिवने वनमाली" (अर्थ-दूती श्रीराधिकाजीसे कहती है कि हे नितम्बिनि ! अब गमन में विलम्ब मत करो; उन प्राणप्रिय के समीप चलो । वे वनमाली वनविषे यमुना के कूल में धीर समीर कुंज में बसते हैं ।) इसी पद को सुनते हुए उस माली के पीछे पीछे श्रीजगन्नाथजी निज अंग में झीना मँगा (जामा) पहिने फिरते डोलते थे; और जब वह तान तोडती थी तब प्रेममादकता से झूम के "बहुत अच्छ।” कहते थे, क्योंकि पद सुनते ही उस समय के विरहाग्नि की सुधि आ जाती थी, अर्थात् विरहाग्नि से संतप्त हो के उस दूती को प्रियाजी के पास आपही ने जब वह कन्या अपने घर को चली गई तब बैंगन के कंटकों से मँगा फाड़ के आप मन्दिर में आए और उसी समय पुरुषोत्तमपुरी का राजा दर्शन करने आया; सो फटे हुए वस्त्रों को देख के पंडा से पूछा "क्योंजी! श्रीजगन्नाथजी के ये वस्त्र कैसे फटे हैं ? सत्य कहो, क्या हुआ है ?" पंडा ने कहा "हम नहीं जानते कि क्या हुआ है ।" तब, प्रभुही ने जनाया कि "वह माली की कन्या बैंगन की वारी में गाती थी, सो हम सुनते थे; इससे वस्त्र फट गए हमको वह कथा अति ही प्रिय लगी है" तात्पर्य "उसको बुला के गवाओ॥" ऐसी आज्ञा सुनके उसी क्षण पालकी पर चढ़ा के उस कन्या को लाए । आके गान और नृत्य करके उसने प्रभु को प्रसन्न किया। । १४५) टीका | कवित्त । (६४%) फेरी नृप डौंडी, यह औड़ी वात जानि महा; कही "राजा रंक पढ़ें नीकी ठौर जानि के। अक्षर मधुर और मधुर स्वरनि हि सों गावे १'ओड़ी"-गहिरी, गंभीर ।। भेजा था ॥ *COM । ३५८ श्रीभक्तमाल सटीक । जव लाल प्यारी ढिग हिले मानि?" " सुनि यह रीति एक मुरोल ने धारि लई, पढ़े चढ़े घोड़े आगे श्याम रूप ठानि: । पोथी को प्रताप स्वर्ग गावत हैं देववधू आपही जु रीझि लिख्यो निज कर' आनिकै ॥ १५१॥ (४७८) वार्तिक तिलक। श्रीगीतगोविन्द इस प्रकार प्रभु को प्रिय जानकर श्रीपुरुषोत्तम पुरी के राजा ने सर्वत्र डौंडी ( ढंढोरा ) फिरवा दिया, क्योंकि उक्त ग्रन्थ के गान की वार्ता बड़ी ही गहिरी जानी; और यह पुकार करा दिया कि "राजा हो अथवा रंक हो परन्तु श्रीगीतगोविन्द को अच्छे ठोर ठिकाने पर पढ़ और मधुरता से अक्षरों को उच्चारण कर मधुरही स्वर से गान करे, तथा गाते समय अपने मन में ऐसा निश्चय मान ले कि श्रीराधिका श्यामजी मेरे समीप ही में सुन राजा की पुकार कराई हुई इस वार्ता को एक मुगल जाति के यवन ने सुनकर अपने मन में निश्चय कर धर लिया और घोड़े पर चढ़ा चला जाता श्रीगीतगोविन्द का पद गान करता था। इसके विश्वास पर रीझ के श्रीश्यामसुन्दरजी ने अनूप रूप धारण कर आगे आके दर्शन दिया; तथा संसारसागर से उसको मुक भी कर दिया। श्रीगीतगोविन्द पुस्तक के प्रताप को स्वर्ग में देवबंधू गान करती हैं क्योंकि जिससे रीझ के स्वयं प्रभु ने आके निज करकमल से पूर्वकथित ( "स्मरगरलखण्डनं" इत्यादि ) पद लिख दिया। इससे इसकी महिमा जहां तक कही जाय सो सब युक्त ही है । (१६६) टीका। कवित्त । (६४७) पोथी की तो बात सव कही मैं सुहात हिये; सुनो और वात जामें अति अधिकाइयें । गाठि में मुहर मग चलत में ठग मिले, "कहो कहां जात ?” “जहां तुम चलि जाइये । जानि लई वात, खोलि द्रव्य पकड़ाइ दियो, लियो चाहो जोई जोई सोई मोकों ल्या- १ "मुराल Jश्वन जाति विशेष ॥ BSCREENSECRECRACCOR SAEGORRECRACREGARH , . . RRIA Big भकिसुधास्वाद तिलक। ३५६ इये। दुष्टनि समुझि कही "कीनी ईनी विद्या अहो आवै जो नगर इन्हें बेगि पकराइये" ॥ १५२॥ (४७७) वार्तिक तिलक। श्रीगीतगोविन्द पुस्तक की रचना और प्रभु प्रिय होने की, अपने तथा सज्जनों के हृदय की, सुहाती वार्ता तो मैंने सब कह ही दी; परन्तु श्रीजयदेवजी के चरित्र की और वार्ता सुनिए कि जिसमें उनकी शान्ति, सहनशीलता, साधुता की अति अधिकाई है। एक समय आप सन्तसेवा भंडारा के वास्ते अन्न घृतादि सामग्री लेने को द्रव्य मोहर गांठ में बांधे हुए ग्रामान्तर को चले जाते थे, दैवयोग मार्ग में कई ठग (चोर ) मिल गए; तब आपने पूछा कि “कहाँ जाते हो?" चोरों ने कहा "जहां तुम जाते हो।" तब श्री- जयदेवजी ने जान लिया कि "ठग हैं ऐसा न हो कि द्रव्य के हेतु मेरे भजन-सहायक शरीर का घात करें;" इससे गांठ से छोर (खोल) के सव द्रव्य चोरों को दे दिया। परन्तु दुष्ट इस साधुना को उलटा ही समझ आपस में कहने लगे कि देखो इसने यह अपनी बुद्धिमानी की है कि अभी द्रव्य दे दूं; जव नगर ग्राम आवै तब इन सबों को शीघ्र पकड़ा हूँ॥ (१९७) टीका | कवित्त । (६४६) एक कहै "डारी मार, भलो है विचार यही,” एक कहै "मारौ मत, धन हाथ आयो है"। "जो पै ले पिछान कहूं कीजिये निदान कहा," हाथ पांव काटि बड़ो गाड पधरायो है ॥आयो तहां राजा एक, देखि कै विवेक भयो, छयो उजियारो, ओ प्रसन्न दरसायो है। वाहिर निकासि मानो चन्द्रमा प्रकाश राशि; पूछयो इतिहास; क्ह्यो “ऐसो तनु पायो है" ॥ १५३ ॥ (४७६) वार्तिक तिलक । ऐसा सुन एक ठग बोला कि जब इसने ऐसी चातुरी की है, तो इसको मारडालना ही अच्छा विचार है " यह सुन और ठग कहने लगे कि "मारो मत क्योंकि धन तो हमारे हाथ ही गया अब Acks CARE Reckic F55 ३६० *****RRRE श्रीभक्तमाल सटीक। " मार डालने का क्या काम है ?" तब दूसरे दुष्ट बोले कि भला जो कहीं पहिचान के पकड़ा दे तब क्या करोगे ?" इत्यादि कुतर्क कुसं. मत करके श्रीजयदेवजी के हाथों तथा पगों को काट कर बड़ेभारी गड्डे में डाल दिया और चले गए। तदनन्तर उस वन में आके एक राजा ने श्रीजयदेवजी को देखा; उसी क्षण उसके हृदय में ज्ञान उदय हुआ और चमत्कार क्या देखता है कि हाथ पग तो कटे हैं परन्तु आप के तेज की उजि. याली हो रही है और मुखारविन्द प्रसन्न है । तब राजा ने आपको गड़हे से निकलवा कर बाहर बेठाल के दर्शन किया मानो अनेक चन्द्रमाओं के राशि का प्रकाश हो रहा है । फिर आपसे हाथ पग कटने का वृत्तान्त पूछा । श्रीजयदेवजी ने कहा कि "मुझे इसी प्रकार का शरीर मिला है। इस प्रसंग में कोई महानुभाव इस प्रकार का भाव कहते हैं कि श्रीजगन्नाथजी ने जो कहा था कि "रसिक जयदेव मेरोई स्व- रूप जानो" सो भी अपने वर्तमान विग्रह की सदृशता कराके लोक को दिखा के फिर अच्छा कर दिया। ( १९८) टीका । कवित्त । (६४५) बड़ेई प्रभाववान, सकै को वखान ? अहो मेरे कोहू भूरि भाग, दरशन कीजिये । पालकी विठाइलिये, किये सब ठूठ नीके, जीके भाए भए “कछु आज्ञा मोहिं दीजिय" ॥ “करौ हरि-साधु-सेवा, नाना पकवान मेवा; आवे जोई सन्त तिन्हें देखि देखि 'भीजिय" माए बेई ठग, “मालो तिलक चिलक किये, किलकि के कहि “घड़े, वन्धु लेखि लीजिये"॥ १५४ ॥(४७५) श्रीजयदेवजी के इस प्रकार गंभीर वचन सुनके राजा अपने मन में विचारने लगा कि "येतो कोई बड़े ही प्रभावयुक्त अकथनीय महानुभाव हैं; मेरे कोई बड़े भाग्य उदय हुए कि मैंने इनके दर्शन १"भीजिधै" - प्रेमानुयुक्त प्रमरस में भीगा। र कराठी माला तिलफ आदि स-त भेष बनाए ॥ GER-ACCESS । माला तिलक चिलक किये"- १exR HAIR भकिसुधास्वाद तिलक। ३६१ पाए।" ऐसा विचार कर आपको पालकी पर बिठा के अपने घर में लिवा लाया और कटे हुए हाथपगों के ठूठों को औषध से अच्छा कराया। फिर, आपके पास आ, प्रणाम कर, राजा बोला कि "हे स्वामी जी ! यह आपका आगमन और हाथ पग का अच्छा हो जाना अति उत्तम हुआ परन्तु अब मुझको कुछ हितोपदेश तथा आज्ञा दी जिए।" राजा की विनय सुन श्रीजयदेवजी ने आज्ञा दी कि “ दिव्य मन्दिर बनवाके श्रीभगवान्की मूर्ति पधराओ, और नित्य सेवा पूजा मेवा मिठाई भोग अर्पण करो, तथा प्रभुके आगे सन्तशाला.बनवाके उसमें प्रति प्रेम से साधुसेवा करो। और, जो सन्त आवें तिनका दर्शन करके प्रेमरस में भीजि जाया करो।" आपकी आज्ञा मस्तकपर धारणकर राजा इसीप्रकार करनेलगा। तन, मन, धन अर्पणपूर्वक राजाकृत सन्तसेवा सुनके, वे सब ठग भी चमाचम-तिलक तथा माला धारण कर साधुवेष बना के आए। श्रीजयदेवजी उन सबों को देखते ही अति प्रीतिहर्षाकुल होके बोले कि "आइये २" और समीप के लोगों से कहने लगे कि "ये सब मेरे बड़े गुरुभाई हैं। इनको दर्शन और प्रणाम करो।" (१९६ ) दीका | कवित्त । (६५४) नृपति वुलाइ कही हिये हरि भाय भरे, “ढरे तेरे भाग, अब सेवा- फल लीजियै "। गयो लै महल मांझ टहल लगाए लोग, लागे होन भोग; जिय शंका तन छीजियै ॥ मांग बार बार विदा; राजा नहीं जान देता अति अंकुलाये, कही स्वामी "धन दीजिये। देके बहु भांति सो, पठाए संग मानुस हूं, "आवौ पहुँचाय तव तुम पर रीमियै” ॥ १५५ ।। (४७४) वार्तिक तिलक। श्रीजयदेवजी ने राजा को बुलवा के कहा कि "हे राजा श्री- १"ढरे" प्राए हैं, पधार है। २ पाठान्तर "अकुताए"। अति त्वरा को, अति शीघ्रता चाही । ३ "मानुस हूँ"-मनुज हूं, मनुष्य भी। । وهو RSE ३६२ श्रीभक्तमाल सटीका भगवत् के प्रेमभाव से भरेहुए हृदयवाले ये सन्त तुम्हारे भाग्यवश आज पधारे हैं, आज तक तुमने जितनी सन्तसेवा की है तिसका फल अब इनकी सेवा करके लो॥" आपकी आज्ञा मान राजा ने अतिहर्ष से उनको लेजा कर अपने राजभवन में सवों का आसन निवास दिया; और बहुत मनुष्यों को सेवा टहल में लगा दिया। नित्य नवीन भोग पदार्थ अर्पण करने लगा। तथापि, वे दुष्ट तो अतिही अपराधी थे; इससे जी में यह शंका हो रही थी कि "जयदेवजी हम सबों को मरवाही डालेंगे।" अतएव सवों का शरीर सूखा जाताथा। वे ठग वारंवार विदा मांगते परंतु भक्त राजा नहीं जाने देता; जब ठग लोगअतिही अकुला गए, बड़ी शीघ्रता मचाई, तब श्रीजयदेवजी ने उनकी शंका जानकर राजा को आज्ञा दी कि “ये सन्त हैं, रजोगुणी के यहां इतना ही बहुत रहे, अव धन वस्त्रादिक देके विदा कर दो।" आपकी आज्ञा सुन राजा ने रत्न सुवर्ण मुद्रादि बहुत प्रकार का धन देके विदा किया, और वह धन ले जाने में रक्षा करने के लिये बहुत से मनुष्य साथकर उनसे कहा कि"अच्छे प्रकार सन्तों को पहुँचाकर श्रावोगे तब तुम लोगों पर मैं अतिही प्रसन्न होकर बहुत द्रव्य दूंगा ॥" (२००) टीका । कवित्त । ( ६४३) पूछे नृप-नर "कोऊ तुम्हरी न सरवर, जिते आए साधु ऐसी सेवा नहीं भई है। स्वामी जू सौं नातो कहा? कहाँ हम खांइ हहा;" "राखियो दुराइ, यह बात अति नई है ॥ हुते एक ठौर नृप चाकरी मैं, तहां इन कियोई बिगार "मारिडारौं” आज्ञा दई है। राखे हम हितू जानि, लै निदान हांथ पावँ, वाही के इसान अब हम भरिलई है"॥१५६ ॥ (४७३) वार्तिक तिलक ! इस प्रकार जव चल के मार्ग में आए तब राजा के सेवक लोग १ "सरयर"-तुल्यता । २' इसान इहसान, उपकार, भलाई ॥

5 भक्तिसुधास्वाद तिलक। उनसे पूछने लगेकि "महाराज! आप सबों के समान कोई महात्मा नहीं है; क्योंकि यहां जितने सन्त आए हैं उनमें किसी की भी ऐसी सेवा नहीं हुई; आप कृपा करके कहिए हम लोग अति विनय करके हाहा खाते हैं स्वामीजी से और आप सबों से क्या नाता सम्बन्ध है ?" यह सुन दुष्ट बोले कि "हम कहने तो हैं परन्तु यह बात बहुत नवीन ( आश्चर्यमय ) है, इससे छिपा रखना, कहीं कहना नहीं। प्रथम हम लोग और ये स्वामीजी एकही राजा के चाकर थे; वहां इन्होंने बहुत ही बुरा काम कियाथा; राजाने आज्ञा दी कि 'इसको मारडालो' तब हम लोगों ने अपना हितू जान के इनके प्राण की रक्षा की, केवल हाथ पग काट के राजा को दिखा दिये थे। उसी उपकार के पलटे में अब हमने यह सेवा सत्कार धन सब ले लिया है।" (२०१) टीका । कवित्त । (६४२) फाटि गई भूमि, सब ठग वै समाइ गए, भए ये चकित देरि स्वामीजू पे आए हैं। कही जिती बात सुनि गात गात कापि उठे, हाथ पांव मी भए ज्यों के त्यो सुहाए हैं ॥ अचिरज दोऊ नृप पास जा प्रकाश किये जिए एक सुनि आए वाहीठौर धाए हैं। पूछ चारचार सीस पयनि पे धारि रहे कहिए उघारि कैसे मेरे मन भाए हैं ॥ १५० ॥ (४७२) वार्तिक तिलक । श्रीजयदेवजी ने इस प्रकार की क्षमा साधुता की; परन्तु दुष्टों के चित्त में एक भी न चढ़ी, उलटे निन्दायुक्त ही वचन कहे; इस से यद्यपि श्रीभूमिजी का "सर्वसहा" नाम है तथापि इन सन्तद्रो- हियों की न सहि सकीं; जितने में ठग थे, उतनी भूमि फट गई ! दुष्ट रसातल को चले गए !!॥ राजा के मनुष्य देख के अतिचकित हुए और दौड़ के स्वामीजी के समीप आ संपूर्ण वृन्तात कह सुनाया । सुनके श्रीजयदेवजी १"उघारेगर कर, ग्वालके। CAKINGERSORRIERENC SAR HEAR . ३६४ श्रीभकमाल सटीक। सर्वाङ्ग कंपित होकर हाथ पग मीड़ने लगे। मोड़तेही आपके कर तथा चरण सुन्दर ज्यों के त्यों निकल आए। दुष्टों का भूमि में समाजाना तथा आपके हस्त पद ज्यों के त्यों हो जाना, ये दोनों आश्चर्य देख राजा के सेवकजनों ने राजा को आ सुनाया; आपके हाथ पगों का यथार्थ हो जाना सुनकर नृप ऐसा प्रसन्न हुआ कि जैसा मरणप्राय पुरुप अमृत पीके जी उठे, और दौड़कर श्रीजयदेवजी के पास आके चरणों में सीस धर वारंवार पूछने लगा कि "हे महाराज ! मेरे मन भावते आपके ये हस्त पद कैसे अच्छे हो गए ? और वे लोग भूमि में क्यों समा गए ? इस आश्चर्यचरित्र का मर्म खोल के कहिए कृपा करके ॥" (२०२) टीका | कवित्त । (६४१) राजा अति ओरि गही, कही सब वात खोलि, निपट अमोल यह सन्तन को बेस है । कैसौ अपकार करें तऊ उपकार करें ढरै रीति आपनी ही सरस सुदेसं है । साधुतान तजे कभूजैसे दुष्ट दुष्टता न, यही जानि लीजै मिले रसिक नरेसहै। जान्यो जब नांव ठांव "रहो इहां बलि- जांव भयो में सनाथ, प्रेम भनि भई देस है" ॥ १५८ ॥ (४७१) वार्तिक तिलक । जब राजा ने, श्रीजयदेवजी के चरणों में सिर धर के, अति ही हठ ग्रहण करके, पूछा नव आप, अपना नाम ग्राम, तथा ठगों की करनी सव वार्ता यथार्थ कहकर, हितोपदेश करने लगे कि "राजन् ! वे ठग अत्यन्त अयोग्य सन्तों का वेष बना के आए, इसीसे मैंने उनका अतिशय सत्कार कराया; भगवद्भक को. ऐसा ही उचित है, कि कोई कैसेहूँ अपकार करे तब भी उसका उपकार. ही करें, अपनी सरस सुदेश रीति ही से चलें, कभी साधुता को न त्याग करना चाहिए। जैसे दुष्ट अपनी दुष्टता कभी नहीं त्याग करता; यह निश्चय जान लो कि इसी प्रकार की साधुता से प्रभु-रसिक- नरेश मिलते हैं।" १"आरि" हठ । २ "ग्योलि" स्पष्ट करके. गुप्त न रख के, प्रगट ॥ LECT-C KEERESCREEKAKASKAR .

भरन भकिसुधास्वाद तिलक। जब श्रीजयदेवजी के कहने से राजा ने जाना कि किन्दुविल्व- वासी श्रीगीतगोविन्द काव्य के कर्ता आप ही हैं, तब तो अति ही प्रेम भाव में भर के प्रार्थना करने लगा कि "हे प्रभो ! मैं आप के ऊपर न्योछावर होता हूँ; अब आप श्रीपद्मावतीजी सहित यहां ही रहिए; मैं सनाथ होऊँ जबसे आप विराजे तब से इस नगर तथा देश में भगवद्भक्रि उत्पन्न हुई; अब उसको बढ़ाइये, और मुझ पर कृपा कीजिये।" (२०३) टीका। कवित्त । (६४०) गयो जा लिवाय ल्याय कविराज-राज-तिया; किया लै मिलाप आप रानी ढिग आइ है । मस्यो एक भाई वाको, भई यों भौजाई सती, कोऊ अङ्ग काटि, कोऊ कूदि परी धाइ है । सुनतही नृपवधू निपट अचंभौ भयो इन न भयो फिरि कही समुझाइ है । "प्रीति की न रीति यह बड़ी विपरीति अहो छुटै तन जबै प्रिया प्रान छूटि जाइ है" ॥ १५६ ॥ (४७०) वार्तिक तिलक । राजा ने अपनी प्रार्थना श्रीजयदेवजी को अङ्गीकार कराकर किन्दुबिल्व से सादर श्रीपद्मावतीजी को लाके दोनों मूर्ति का मिलाप करा दिया; और भक्रराजा की रानी भी श्रीपद्मावतीजी के दर्शन सतसङ्ग को आया करती थी। एक दिवस कविराजकान्ताजी के पास रानी बैठी थी। उसी समय किसी किंकरी ने सुनाया कि "आपके भाई का शरीर छूट गया; सो आपकी भौजाइयाँ कोई सती होगईं, कोई शस्त्र से अंग काट के मर गई, कोई दौड़कर चिंता में कूद पड़ी।" रानी यह सुन, उन सबों के प्रीति पातित्रत का परम आश्चर्य मान, विस्मित हुई; पर श्रीपद्मावतीजी ने इस बात का कुछ आश्चर्य न किया; किन्तु रानी को समझाकर कहने लगी कि "यह प्रीति की रीति नहीं है, शस्त्र से मर जाना, जर जाना, वडी विपरीति गति है; प्रीति की रीति तो यह है कि प्रिय पति का शरीर छूटते ही प्रिया के प्राण छूट जायें ॥" RECECRECREECRECAPACRELC AMREK , ३६६ श्रीभक्तमाल सटीक। गरे छुरी, (२०४ ) टीका | कवित्त । (६३९) "ऐसी एक आप” कहि, राजा सू यूँ बात कही "लैक जाओ बाग स्वामी नेकु, देखों प्रीति कों" । "निपट विचारी वुरी, देत मेरे " तिया-हठ मानि करी वैसेही प्रतीति को॥ आनि कहे "आप पाय" कही यही भांति आय, चेठी ढिग तिया देखि लोटि गई रीति को । बोली "भक्तबधू अजू ! वे तो हैं बहुत नीके, तुम कहा औचक ही पावतिही भीति कों" ॥ १६० ॥ (४६६) वार्तिक तिलक। श्रीपद्मावतीजी के वचन सुनके भक्तराजा की स्त्री बोल उठी कि "ऐसी प्रेममूर्ति तो जगत् में एक आप ही हो" ऐसा कहके, फिर उसने राजा से जाके सब वार्ता कही; और साथही यह बात भी, आग्रह-पूर्वक कही, कि "आप स्वामीजी को वाटिका में तनक लेके जाइये, तो मैं भला इनकी प्रीति देखू तो।" भक्न राजा ने उत्तर दिया कि “तूने ऐसा विचार बहुत ही बुरा किया है, तू मेरा गला ही काटा चाहती है ।" कुमंग से कहां हानि नहीं हुई ? दुष्टा रानी के हठ आग्रह वस उसके वचन में प्रतीति करके, राजा ने वैसाही किया। उस त्रिया ने एक टहलनी को सिखा रक्खा था: जब वह श्रीपद्मावतीजी के पास बैठी हुई थी, उसी क्षण वह लौंड़ी आकर सिखाई बनाई दुख की रीति से बोली कि "स्वामीजी तो वैकुण्ठ धाम पागए;" यह सुन राजा की स्त्री रो रो कर कुरीति से भूमि में लोट गई। पर, श्रीजयदेवप्रियाजी ने कहा कि “हे भक्तबधू ! तुम व्यर्थही धोखे में पड़ती और. भयभीत होती हो, श्रीस्वामीजू महाराज तो बहुत अच्छे विराज रहे हैं।" (२०५) टीका । कवित्त । (६३८) भई लाज भारी, पुनि फेरिकै सँवारी दिन बीति गए कोऊ, जब १V"=से 1 "यू". इस भांति । २ "ग्राप पाय"आपने श्रीहरिधाम पाया। ३ 'प्रौचक ही" नचाना, धोखे में । BLOCALGCRECROCOLARSA HAKRECECRECECAR , भनिसुधास्वाद तिलक। ३६७ तब वही कीनी है । जानि गई 'भक्तवधू चाहति परीछा लियो,' कही "अजू पाए;" सुनि तजी देह भीनी है ॥ भयौ मुख स्वेत रानी; राजा आए जानी यह रची चिता “जरौं, मति भई मेरी हीनी है"। भई सुधि आप कौं, सु आए बेगि दौरि इहाँ; देखि मृत्यु प्राय नृप, कह्यो "मेरी दीनी है" ॥१६१॥ (४६८) वार्तिक तिलक। जब श्रीपद्मावतीजी इस झुठाई को जान गई; तब तो रानी के मन में बड़ी भारी लज्जा हुई; परन्तु उस दुर्मति को छोड़ा नहीं, कुछ दिन बीते फिर पूर्ववत् कपट का ठाट रच कर वैसेही किया । तब श्रीपद्मावतीजी जान गई कि "यह मेरी परीक्षा लिया चाहती है।" इससे, जव उसके मुख से सुना कि "स्वामीजी श्रीहरिधाम को प्राप्त हुए,” उसी क्षण स्नेह से भीजी हुई निज देह त्याग दी। श्रीपद्मावतीजी की यह अलौकिक स्वछन्द-मृत्यु देख, रानी का मुख श्वेत हो गया; और राजा आके यह चरित्र सुन देख बोले कि "मैरी मति नष्ट हो गई इस स्त्री के संग से, इससे मैं जल जाऊंगा," और चिता रचाकर जला ही चाहता था ॥ यह वार्ता श्रीजयदेवजी सुनते ही दौड़े आए । राजा को देखा कि शोक से मृत्युप्राय हो रहा है । आपका दर्शन कर कहने लगा कि “स्वामीजी ! मेरीही दी हुई मृत्यु से माताजी मरी हैं !!!" (२०६ ) टीका । कवित्त । (६३७) घोल्यो नृप "अजू मोहि जरेई बनत अव, सव उपदेश लैकै धरि मैं मिलायो है" । कह्यो बहु भांति ऐपै आवति न शान्ति किहूं; गाई अष्टपदी, सुर दियो, तन ज्यायो है । लाजनि को मास्यो राजा चाहै अपघात कियो, जियो नहीं जात, ''भक्ति लेसहूं न आयो है”। करि समाधान, निज ग्राम आए "किन्दुविल्लु,” जैसो कछु सुन्यो यह परचै लै गायो है ॥ १६२ ॥ (४६७) वार्तिक तिलक। श्रीजयदेवजी ने राजा को निषेध किया कि "तुम जरो मरो KARANG , K SCARRORS ३६८ श्रीभक्तमाल सटीक। मत;" तब राजा बोला कि "अजी महाराज ! मुझे अब जले विना नहीं बनता क्योंकि आपका समस्त उपदेश लेके मैंने धूल में मिला दिया।" यह सुन श्रीजयदेवजीने बहुत प्रकार से समझाया तथापि राजा के हृदय में किसी प्रकार शान्ति नहीं ही आई तब आपने जाना कि 'विना इनके जिवाए राजा नहीं जीवेगा; इससे आपने संजीवन मंत्र सम गीतगोविंद की अष्टपदी गानकर, शरीर में स्वर भर दिया; सुनते ही श्रीपद्मावतीजी. उठके साथ में आप भी गान करने लगी। यह चरित्र देख के सब "जयजयकार" करने लगे। इस प्रकार आपने अपनी भक्तिभाग्यवती को जिला दिया; तथापि लज्जा के मारे राजा को अपना जीना भला न लगता था, ग्लानि से ऐसा विचारता कि "हाय; मेरे मन में भक्ति का लेश भी न आया;" इससे छात्मघात किया चाहता था, तब श्रीजयदेव जी ने बहुत प्रकार उपदेश देकर उसको सावधान किया; और आप अपने किन्दुबिल्व ग्राम को चले आए। श्रीनाभास्वामीजी के छप्पय से उपरान्त, श्रीजयदेवजी के ये परिचय चरित्र-चमत्कार जिस प्रकार वृद्ध लोगों से सुने थे, तिस भाँति गान किये॥ (२०७) टीका । कवित्त । (६३६) देवधुनी सोते हो अठारै कोस आश्रम से; सदाई अस्नान करें, धेरै जोग्यताई कौं । भयो तन वृद्ध,तऊं छोड़ें नहीं नित्य नेम, प्रेम देखि भारी निशि कही सुखदाई कॉ॥ "श्रावो जिनि ध्यान करो, करौ मत हठ ऐसो" मानी नहीं "श्राऊँ मैं हीं;" "जानों कैसे आई कौं" ? । “फूले देखौ कंज तब कीजियो प्रतीति मेरी;" भई वही भांति, से अबलौं सुहाई कौं ॥ १६३ ॥ (४६६) वार्तिक तिलक। श्रीजयदेवजी राजा के यहां से आएं। श्रीगंगाजी की धारा १ "देवधुनी" देवसरिता, श्रीगङ्गाजी । २ "सोत"-स्रोत, धारा । ३ "हो"=थी, रही। RES ।

i . SH RREN भक्तिसुधास्वाद तिलक। ३६६ आपके आश्रम से अठारह कोस थी, परन्तु आप श्रीप्रभुकृपा से योगसिद्धिवेग से गमन कर, नित्य ही गंगास्नान करते थे। जव श्रापका शरीर वृद्ध होगया तव भी नित्य स्नान का नेम नहीं छोड़ा। ऐसा भारी प्रेम नेम देख, श्रीगंगाजी को दया लगी; क्योंकि यद्यपि योगावेशसे जाते आते थे तौभी शरीरको परिश्रम होताहीथा; इससे श्रीगंगाजी ने निज सुखदाता श्रीजयदेवजी को रात्रि में आज्ञा दी कि "अव वृद्ध शरीर से नित्य स्नान को मत आवो, इस हठको छोड़कर ध्यान ही से मेरा स्नान कर लिया करो।" परंतु आपने बात मानी नहीं; आते ही थे; तव श्रीगंगाजी ने कृपाकर कहा कि "तुम्हारे आश्रम के निकट की नदी में ही मैं आऊंगी उसी में स्नान किया करो। आपने पूछा कि "मैं कैसे जानें कि आप आई हौ ?" श्रीगंगाजी ने कहा कि "देखो उसमें कमल नहीं हैं; अब जब सुन्दर कमल फूले देखना तव मेरे ना जाने की प्रतीति करना।" दूसरे दिवस देखें तो दिव्य कमल फूले हैं, जल भी दिव्य गंगाजल के तुल्य अमल मिष्ठ हो गया; तब श्रीजयदेवजी ने जीवनावधि उसी में स्नान और पान किया। अभी तक किन्दुबिल्व ग्राम में अति सुहाई "जयदेई-गंगा" नाम से प्रसिद्ध है । सज्जन लोग श्रीगंगा तुल्य मानकर सेवन स्नान पान करते हैं। मुंशी तपस्वीरामजी सीतारामीय ने श्रीजयदेवजी की माता का नाम "श्रीराधा देवी" जी लिखा है, और श्रीराधाकृष्णदासजी की 'भकनामावली' (काशी नागरीप्रचारिणी सभा) में "रामादेवी" है । इनका समय “सन् १०२५ ईसवी से १०५० ईसवीतक" निर्णय किया है, अर्थात् विक्रमी संवत् १०८२ तथा ११०७ के मध्य है। इनका ग्राम किन्दुविल्व, बंगाल देश में बीरभूमि से प्रायः दस कोस दक्षिण की ओर अजयनद के उत्तर था। दो० प्रगट भयो जयदेव मुख, अद्भुत गीतगुविन्द । कह्यो 'महाश्रृंगार रस,' सहित प्रेम मकरन्द ॥ (श्रीध्रुवदासजी) SAGE *** ***** श्रीभक्तमाल.सटीक। (३२) श्रीपद्मावतीजी। श्रीआज्ञा से जब पिता ने आपको श्रीजयदेवजी के पास छोड़ दिया, तब श्रीपद्मावतीजी ने अपने को आपकी दासी जानकर पातिव्रत उसी समय से धारण किया, और श्रीजयदेवजी के और और प्रकार से समझाने पर भी आपकी ही सेवा में दृढ़ रहीं। जब श्रीकविराजराजेश्वरजी स्नान को गए प्रभु ने आप उनके रूप में आकर श्रीपद्मावतीजी को दर्शन दिये, तथा इनके हाथ का भोजन सराह सराह के पाया; और वह पद पोथी में लिखकर चल दिये; धन्य धन्य श्रीपदमावतीजी । जव दुष्टा रानी (भनवधू)ने पुनः पुनः परीक्षा ली आपने शरीर छोड़ ही दिया था। आपकी प्रशंसा कहां- तक की जा सके ॥ “पद्मावति जयदेव प्रेम वस कीने मोहन" ॥ (श्रीध्रुवदासजी) (३३) श्रीश्रीधरस्वामी। (२०% ) छप्पय । ( ६३५) श्रीधर श्रीभागौत में, परम-धरम निरनै कियौ ॥ तीन-कांड एकत्व सानि, कोउ अज्ञ वखानत । कर्मठ ज्ञानी ऍचिअर्थको अनरथ बानत॥ परमहंस संहिता' विदित टीका बिसतारयो । षटशास्त्रनि अबिरुद्ध बेद- संमतहिं बिचाखो ॥ “परमानन्द" प्रसाद ने, माधौ सुकर सुधार-दियौ । श्रीधर श्रीभागात में, परम-घरम निरनै कियौ ॥४५॥ (१६६ ) वार्तिक तिलक । श्रीश्रीधरजीने श्रीभागवत ग्रंथ विषे परम:धर्म (श्रीभगवद्धर्म) १ बानत"aर्णत । जैसे, कनकाह यान चढ़े जिमि दाह । अर्थात् जसे दाहते कनक में वर्ण चढ़े । पुनः जैसे, गाजत अर्थात् गर्जत । *"ठानत"पाठ, नवीन कल्पित है ॥ sa FER भक्तिसुधास्वाद तिलक। ३७१ का यथार्थ, निर्णय किया अर्थात् श्रीव्यासजी और श्रीशुकजी ने जिस ठिकाने जो भागवद्धर्म जिस महत्त्व तथा जिस आशय से कथन किया था वहां वैसा ही स्पष्ट अर्थ करके दिखा दिया । और अन्य टीका (अर्थ) करनेवालों ने यथार्थ नहीं कहा। कोई लोग कर्मकण्ड, उपासनाकाण्ड, ज्ञानकाण्ड, इन तीनों काण्डों को एक ही में सान (मिला )के अर्थ बखानते हैं , "क्योंकि वे अज्ञानी है," तीनों का स्वरूप ही नहीं जानते । और पूर्व-मीमांसासन कर्मठ अर्थात् कर्मकाण्डी तथा उत्तर-मीमांसासक वेदान्ती ज्ञानी जन इस भक्ति ग्रंथ भागवत को, कर्मज्ञान की दिशि खींच के अर्थ को अनर्थ करके वर्णते हैं। और श्रीश्रीधरानन्दजी ने जैसा"पारमहंस- संहिता" यह विख्यात ग्रन्थ है, वैसाही परमहंसप्रीतिवद्धिनी टीका विस्तारकर वर्णन किया कि जिसमें मीमांसा, वेदान्त, योग, सांख्य, न्याय, वैशेषिक, इन छहूं शास्त्रों के अविरुद्ध वेद के संमत विचार पूर्वक बखान किया। उस "श्रीमद्भागवत भावार्थदीपिका" नामक टीका के प्रारंभ का मङ्गलाचरण यह है "नमःपरमहंसास्वादितचरण- कमलचिन्मकरन्दाय भवजनमानसनिवासाय श्रीरामचन्द्राय ।" सो इस प्रकार की टीका रचना आपको योग्य ही है, क्योंकि आपके ऊपर गुरु स्वामी "श्रीपरमानन्दजी"ने अति प्रसन्न होकर कृपा की। इसी हेतु से उस टीका को श्रीविन्दुमाधवजी ने स्वयं श्रीकरकमलों से सुधार दिया अर्थात् सर्वोपरि सर्व टीकाओं की शिरोमणि बनाकर स्वीकार किया ॥ दो०"श्रीधरस्वामी तो मनौ, श्रीधर प्रगटे भान । तिलकभागवत को कियौ, सब तिलकन परमान ॥१॥" (श्रीध्रुवदासजी) (२०६ ) टीका | कवित्त । (६३४) पंडित समाज बड़े बड़े भक्तराजजिते,भागवत टीका करि आपस मैं रीमियै । भयो जू विचार कोशीपुरी अविनाशी मांझ, सभा "मंगल का राशि परमारथी खानि काशी विरचि बनाई विधि केशव यमाई है।" प्रन यह काल रावी शूलपाणि शलपर" ( प्रमाण कवित्त श्रीगोस्वामी कृत। . ।

R R ३७२ श्रीभक्तमाल सटीक। अनुसार जोई सोई लिखि दीजिये ॥ ताको तो प्रमान भगवान "बिन्दुमाधौजी" हैं, साधौ यही बात धरि मन्दिर में लीजिये । धरे सब जाय, प्रभु सुकर वनाय दियो, कियो सर्व-ऊपर लै, चल्यो मैति धीजिये ॥ १६४ ॥(४६५) वातिक तिलक। जिस समय श्रीश्रीधरस्वामीजी ने "श्रीभागवत" पर टीका रची, उस समय और बड़े बड़े पंडित भक्तों ने भी इस ग्रन्थ की टीकाएं कीं; और सबके सब अपनी अपनी टीका अन्य टीकाओं से श्रेष्ठ कहकर निज निज मति पर रीझकर आपस में विवाद करते थे। फिर सबका संमत विचार होकर, प्रलय काल में भी अवि. नाशिनी ऐसी श्रीकाशीपुरी के मध्य इकट्ठे होकर, सब टीकाओं के टीकाकारों ने सभा की कि 'इस सभाके मतानुसार जो टीका उत्तम मध्यम जैसी हो तैसी लिख दीजै । निदान अन्तिम सिद्धान्त यह हुआ कि इसमें महा पंच-पंडित भगवान् श्रीविन्दुमाधवजी हैं, जो टीका आप अङ्गीकारकर सर्वोपरि करें सोई प्रमाण है । अव टीका की श्रेष्ठता जानने के हेतु यही बात साधे, प्रथम सब टीका मंदिर में रखकर फिर लेलेवें। ऐसाही किया; मध्याह्न भोग के पश्चात् प्रभु के आगे सब टीकाएं. धर मंदिर के किवाड़ दे, दो मुहूर्त में खोला; तो देखते क्या हैं कि- "स्वामी श्रीधरजी कृत टीका" श्रीविन्दुमाधवजी निज करकमलों से सब टीकाओं के ऊपर, धरकर, ब्रह्मा के भाल में भाग्य लिखनेवाले हस्तकंज से उस पर लिख दिया कि "श्रीभागवतपर श्रीधरी टीका सर्वोपरि है।" इस प्रकार मापने अङ्गीकार करके सुधार दिया। इसी से श्रीश्रीधरजी की टीका चली (फैली) और उस पर सब सजनों की मति प्रसन्न हुई। "मनिर्धाजिय"-मति प्रसन्न हुई । ७ -- - भनिसुधास्वाद तिलक। (३४)श्रीपरमानन्दजी। स्वामी श्रीपरमानन्दजीश्रीश्रीधरस्वामीके गुरु संन्यासी हैं "परमा- नन्द प्रसादतें ॥" "श्रीपरमानन्दजी " सुकवि, भजनप्रवीन, शान्त, श्रीवृन्दावन के संन्यासी सर्वस्वत्यागी थे । (३५) श्रीबिल्वमङ्गालजी। (२१०) छप्पय । (६३३ ) कृष्णकृपा को पर प्रगट, "विल्वमंगल" मङ्गल- स्वरूप ॥ "करुणामृत" सुकवित्त युक्ति अनुचिष्ट उचारी।रसिकजनन जीवन जु हृदय हारावलिधारी॥ हरि पकरायो हाथ वहुरि तहँ लियो छुटाई। “कहा भयो कर छुटैं वदौं जो हिय तें जाई" ॥ चिन्तामणि सँग पाय कै, ब्रजवधू केलि बरनी अनूप । कृष्णकृपा कोपर प्रगट, “बिल्वमङ्गल" मङ्गलस्वरूप॥ ४६॥ (१६८) वार्तिक तिलक। श्रीकृष्णजी के बड़े कृपापात्र तथा परम मङ्गाल के स्वरूप श्री "विल्वमंगल" जी ने श्री "श्रीकृष्णकरुणामृत” नामक ग्रन्थ ऐसा विरचा है कि जो श्रीकृपा को परत्व मंगलस्वरूप है; जिसमें न किसी कवि की छाया ही है न किसी काव्य का अनुवाद है; वह रसिकजनों का जीवन है; कि जो उसको हारों की नाई अन्तर + और भी कई परमानन्दजी हुए है । जिनमें से, डाक्टर ग्रियर्सन साहिय ( Dr.G. A.Gielson )ने अष्टापनाले की, ओर श्रीराधाकृष्णदासजी ने चार की चरचा की है ।। १ "श्रनुचिष्ट' = उच्छिष्ट नही, श्रमनिया,छाया किसी की नहीं, अनुवाद नहीं। २"कोपर" = पात्र विशेष, परात । ३"पर"-परत्व, सर्वोपरि ॥ RECRUA Keec , eKantice ३७४ श्रीभक्तमाल सटीक । . हृदय में धारण किये रहते हैं। श्रीहरि ने अपना हाथ पकड़ाके और, फिर (उस देशकाल में)छुड़ा भी लिया; तब आपने कहा कि "मेरा कर तो छटकाए जाते हो, परन्तु वदों तब कि जब मुझ दुर्वल के हृदय में से भी छटक जा सको" । "चिन्तामणि" नाम प्रमदा (वेश्या) के संग से, विषय से विरक हो कर आपने श्री ब्रजवधून की केलि का अनूप वर्णन किया है । (२११)रीका । कवित्त । (६३०) "कृष्णवेना" तीर एक द्विज मतिधीर रहे ह्वे गयो अधीर संग "चिन्तामणि" पाइ के । तजी लोकलाज, हिये वाही को जु राज, भयो निशि दिन काज, वह रहै घर जाइकैं। पिता को सराध, नेकु रह्यो मन साधि, दिन शेष में आवेश चल्यो अति अकुलाइ कैं। नदी चढ़ी रही भारी, पैये न अवारी नाव, भाव भस्यो हियो जियो जात न धिजाइक ॥ १६५ ॥ (४६४) वार्तिक लिक दक्षिण में "कृष्णवेणा" नदी के तट पर ब्राह्मणकुल में श्री बिल्वमंगलजी का जन्म था; प्रथम बड़े मति धीर थे पर चिन्तामणि नाम की एक वेश्या नारी के प्रेम में वह अतिशय आशक्त थे, यहां- तक कि लोक की लाज धैर्य इत्यादि खोके दिन रात उसीके घर, जो उस नदी के दूसरी ओर था, रहा करते; उनके हृदय में उसीका पूरा पूरा राज्य था । एक दिन पिता के श्राद्ध के कारण जैसे तैसे मन मार के दिनभर तो उसी कार्य में लगे रहे परन्तु दिन के अन्त में घड़े अधीर होके अकुलाके उसके घर की ओर चले ॥ सरिता तीर पहुँचे तो देखा कि नदी तो बड़ी चढ़ी हुई है और उस पार जाने की कोई सामा, नाव वेड़ा कुछ नहीं है । अत्यन्त प्रेमभाव में इनका हृदय डूबने लगा। "हस्तमुक्षिप्य निर्यामि बलात् कृष्ण ! किमद्भुतम् । हदयाद् यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते ॥" मे० 'वाह छुड़ाय जान हौ, निवल जानि कै मोहिं । तु छुडाइही, मई बढो तर तोहि ।' १ "प्रचारी"= अबेर | २' धिजारक'-प्रेम में भीग के । SECustories * हदय . * FREE भनिधास्वाद तिलक। ३७५ (२१२) टीका । कवित्त । (६१) करत विचार वारि धार मैं न रहें प्राण, तातें भली धारि मित्र सनमुख जाइयें । परे कूदि नीर, कछु सुधि न शरीर की है, वही एक पीर कत्र दरसन पाइये ॥ पैयत न पार, तन हारि भयो बड़िवे कों, मृतक निहारि, मानी नाव मनभाइयें । लगेई किनारे जाय, चले पग धाय चाय, आए, पट लागे, निशि आधी सो.विहा. इयें ॥ १६६ ॥ (४६३) वार्तिक तिलक। इन्होंने विचार किया किन प्रियाविरह धारही में प्राण वच सकते हैं और न जल धारही में, इससे यही भला है कि प्रेमी के सन्मुख ही प्राण दे दूं । इतना मन में लाके, नदी में कूदही तो पड़े शरीर की कुछ सुधि न रही, केवल प्रिया वियोग का दुःख तथा यह उत्कएठा रह गई कि कब अपने प्रेमी का दर्शन पाऊँ । पैरते पैरते थक के ज्योंही तन जलमग्न होने पर हुआ, त्यों ही अकस्मात एक मृतक (मुरदा) को देखके समझे कि प्रेमी ही ने मेरे अर्थ नाव भेज दी है। उसपर चढ़के देव इच्छा से पार होके तीर लगे । उतरके प्रेमातुर होके दौड़े; जब चिन्तामणि के द्वार पर पहुँचे, रात आधी से कुछ अधिक वीती थी; अतः पट लगे थे। (२१३) टीका । कवित्त । (६३०) अजगर धूमि भूमि भूमि को परस कियो, लियोई सहारौ, चढ्यो छात पर जाय के। ऊपर किवार लगे, पस्यो कूदि आंगन मैं, गियो, यो गरत राग जागी सोर पाय के ॥ दीपक बराइ, जो पे देखे, बिल्व. मंगल है, “वड़ोई अमंगल, तूं कियो कहा भाय?" । जल अन्ह- वाय, सूखे पट पहिराय, "हाय ! कैसैं करि आयो जलपार द्वार धाय के?" ॥ १६७ ॥ (४६२) वार्तिक तिलक। चिन्ता में थे ही, कि इतने में एक लटकी हुई वस्तु पर इनकी दृष्टि पड़ी; वह एक अजगर था जो पृथ्वी के पास तक पहुँचके झूल रहा था परन्तुये अति प्रेमान्धतो थेही, यह समझे कि प्रेमिन ने मेरेहीलिये RAkSCRI । , - INE श्रीभक्रमाल सटीक। रस्सा लटकाय रक्खा है, चटपट आप उसके सहारे से चढ़के छत पर पहुंच गए। ऊपर किवाड़ लगे देखके ये आंगन में धम से कूद पड़े; धमाके का शब्द सुन इनकी प्रेमिनी जाग उठी; लोग दीप जलाके उसके प्रकाश में जो देखें तो आप हैं श्रीविल्वमंगल महाशयजी। चिन्तामणि मिझला के चोली कि "हा ! तुम बड़े ही अमंगल हो । तुमने आके क्या किया ?" अस्तु, स्नान करा, सूखे वस्त्र पहिरा, उसने पूछा कि “बताइये तो आप नदी पार क्योंकर हुए और ऊपर चढ़े कैसे ?" (२१४) टीका । कवित्त । ( ६२६ ) "नीका पठाई, द्वार लाव लटकाई देखि मेरे मन भाई, मैं तो तवै लई जानिके" । "चलो देखौं अहो यह कहा धौ प्रलाप करें" देख्यौ विषधर महा, खीजी अपमानिकै ॥ "जैसो मन मेरे हाड़ चाम सौं लगायो, तैसो स्याम सौं लगाव तोपै जानियें सथानिक । मैं तो भये भोर भनौं युगलकिशोर अव, तेरी तुही जाने चाहो करौ मन मानिके" ॥ १६८॥ (४६१) वार्तिक तिलक । इन्होंने उत्तर दिया कि “मैंने जभी देखा कि तुमने मेरे लिये नाव भेज दी है और छत से डोरलटका रक्खी है, तो मैंने तभी तुम्हारी प्रीति और कृपा की विलक्षणता जान ली।" वह बोली कि "ये क्या बड़बड़ाते हैं चलो लोग देखें तो कि डोर कहां और कैसी है ?" जा के देखें कि वह बड़ा विषधर अजगर है ।। यह देख चिन्तामणि झुंझला उठी और अपमान तथा,क्रोध- पूर्वक कहने लगी कि- “मेरे हाड़ चाम में जैसा अनोखा.अनुराग. किया, यदि वैसा श्यामसुन्दर मुरलीधर, शोभासिन्धु, करुणाकर में लगाते तो तुम्हारा सयानापन था । अब तो तेरी बात तूही जाने, जो चाहे सो कर, पर मैं तो भोर होतेही श्रीयुगल सौर के भजन में चित्त लगाऊंगी।" SECSC ki भनिसुधास्वाद तिलक। (२१५ ) टीका । कवित्त । (६८) खुलि गई अांखें अभिलाखें रूप माधुरी को चाखें रस रंग औ उमंग अंग न्यारिये । बीन लै बजाई गाई विपिन निकुंज क्रीडा भयो सुत्रपुंज जापे कोटि विपै वारियै ।। वीति गई राति प्रात चले आप आप को जू हिये वही जाप हग नीर भरि डारिय। "सोमगिरि" नाम अभिराम गुरु कियो आनि सके को खानि लालं भुवन निहारिये ॥ १६॥(४६०) वार्तिक तिलक। श्रीभगवत्कृपा से चिन्तामणिजी के वचनों से श्रीविल्वमंगलजी के हृदय की आखें घुल गई; श्रीयुगलसरकार के रूप के माधुर्य की अभिलापा बहुत ही बढ़ी, प्रेमरंग में रंग गए; तन मन में अपूर्व विलक्षण उमंग छा गया; चिन्तमणि वीणा बजाके श्रीविहारीजी की वृन्दावन कुंज की लीला रूप धाम नाम कीर्तन करने लगी। सुनकर, विल्वमंगलजी ऐसे आनन्द में मग्न हुए कि जिसपर करोड़ों विषय के सुख न्यवछावर करना चाहिये । इसी प्रकार भगवत्कृपा के अनुभव में जब सारी रात्रि बीत गई, तो भोर दोनों ही ने अपना अपना रस्ता पकड़ा। श्रीरूप हृदय में धरे, और नाम रटते प्रेमाश्रु वहाते चले। आके, “सोमगिरि" जी को विल्वमंगलजी ने गुरु किया और उनसे उपदेश लिया॥ इनके प्रेम का वर्णन किससे हो सके? आप सर्वत्र श्रीनन्दलालजी ही को देखते थे- "जहँ तह देख लली अरु लालहिं॥" (२१६ ) टीत । कवित्त । (६०७) रहे सो वरप्त, रस सागर मगन भये, नये नये चौज के श्लोक पदि जीजिये । चले वृन्दावन, मनै कहै कब देखों जाइ, आइ मग १ 'चोज"अनोगामात्र RECE - READ 9.* ३७८ श्रीभक्रमाल सटीक। . ॥ मांझ एक ठौर मति भीजिये । परयो बड़ोसोर दृग कोर के न चाहै काहू, तहां सर तिया न्हाति, देखि आंखें रीझियें । लगे वाके पाचे कांछ कांछे की न सुधि कळू, गई घर आछे, रहे द्वार, तन लीजिये ॥ १७॥ (४५६) यार्निक तिलक। एक वर्ष श्रीगुरु की सेवा में रह के, प्रेमरस सिन्धु में मग्न हुए, कई रसीले रसीले काव्य पढ़े, तथा गुरु कृपा से आप भी अनेक भाव भरे श्लोक रचना किये; और जीवन का सुख लिया । फिर श्रीवृन्दावन को चले; दर्शन की उत्कण्ठा मन को जैसी विलक्षण है, कही नहीं जा सकती। ऐसी चटपटी हो रही है कि कब देखू । 'मार्ग में एक सरोवर पर आए। आपकी श्रीप्रभु-प्रेमोन्माद की दशा में मति मग्न हो गई। अश्रुपातादिक सात्विक प्रगट हुए । आपकी यह दशा देख के गांव में बड़ी धूम मची; आप किसी की ओर दृष्टि भी नहीं करते थे; केवल प्रभु के रूप की माधुरी में छके थे। परन्तु माया के कोतुक से, उसी सर में एक अति रूपवती स्त्री को स्नान करते देख उस मृगलोचनी के नयनवाण इनकी आंखों में चुभही तो गये, और ऐसा खटकने लगे कि वेप की भी लज्जा जाती रही; तन मन की सुधि खो, उसके पीछे पीछे लगे, और उसके द्वार पर जा जमे । “देखन को अति व्याकुल नयना ॥" विरह से तन क्षीण होने लगा। वह सुन्दरी अपने घर में चली गई। (२७) टीका । कवित्त । ( ६२६) आयो वाको . पति, द्वार देखै भागवत ठाढ़े, बड़ो भागवत; पूछी वधू सों, जनाइये। कही जू "पधारो पांव धारो गृह पावन कों; पावन पखारौं जल ढारौं सीस भाइये" ॥ चले भौन मांझ, मन आरति मिटायवे कौं, गोयवे की जोई रीति सोई के बताइयें । नारि सो कह्यो "हो तूं सिंगार करि सेवा कीजै, लीजै यौं सुहाग जाम बेगि प्रभु पाइये" ॥ १७१ ॥(४५८) १ "कांछ काछे की"-भागवत् वेप धारण किय की। २'गाइने को कहने को ।

************ भकिसुधास्वाद तिलक। ३७६ वातिक तिलक। उस स्त्रीका पति कहीं बाहर गया रहा। वह बड़ा हरिभक्त था, घर आके सन्तको द्वारपर खड़े देख,अपने धन्यभागसमझ, दण्डवत्कर, आसन दिया । स्त्री से पूछा तब उसने सारी वार्ता कह सुनाई ॥ उस भक्त ने. आपके पास आके कहा कि “आप भीतर पधारिये; मेरा गृह पवित्र होने के हेतु अपने चरण उसमें रखिये। मैं आपके चरण धोके जल सीस पर धारण करके कृतार्थ होऊ ।' यह सुन आप उसके साथ घर में जाके अपने मन की आरति मिटाने के लिये जो कहना था सब वात बता दी। उसने अपनी पतिव्रता स्त्री को आज्ञा दी कि "तुम शृङ्गार करके महात्माजी की सेवा करो, इसको परम सुहाग मानकर ऐसीप्रतीति रक्खो कि परम भागवत की निष्कपट सेवा करने से भगवत् शीघ रीझते मिलते हैं।" (२१८) टीका | कवित्त । (६५) चली यै सिंगार करि, थार में प्रसाद लैंके, ऊंची चित्रसारी, जहां बैठे अनुरागी हैं । झनक मनक जाइ, जोरि कर ठाढ़ी रही, गही मति देखि देखि नून वृत्ति भागी है ॥ कही युग सूई ल्यावो, ल्याई, दई, लई हाथ, फोरि डारी आंखें, "अहो बड़ी ये अभागी हैं"। गई पतिपास स्वास भरत न बोलि आवै, बोली, दुख पाय आयु पाय परे रागी हैं ॥ १७२ ॥ (४५७) वार्तिक तिलक । पति की आज्ञा ही को परम धर्म मान, वह सौभाग्यवती सज धज, बन ठन, श्रीभगवत्प्रसाद का थार हाथ में ले, उस ठिकाने चली जहां चित्रसारी युक्त ऊंची अटारी पर विल्वमंगलजी उसकी चाह में विराजते थे; गहना के शब्द तथा प्रमदाओं के स्वाभाविक हावभावयुक्त सुन्दरी आपके आगे पहुँचकर कर जोड़ के खड़ी होगई; अर्थात् विल्वमंगलजी की आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगी। विल्वमंगलजी की मति जो कामवश वही जाती थी, उसको श्रीभकमाल सटीक। विवेक से ये पकड़कर वारंवार उसका रूप देखने लगे, मुख्य प्रभु- कृपा और निष्पट भक्क तथा पतिव्रता स्त्री के दर्शन से, इनकी न्यून (विषय-वृत्ति ) भागी, निर्मल मति प्राप्त हुई; विचार किया कि इन अनर्थों की जड़ यही निगोड़ी आखें हैं। उस सुलोचना मुलक्षणा से कहा कि "दो सुई लादो" वह ले आई। इन्होंने शीघ्रही उन दोनों सुइओं से अपने दोनों नेत्र फोड़ डाले। वह भक्रिवती शोक से श्वास लेती कांपती डरती अपने पतिके पास गई; अतिशय दुःख के साथ टूटे फूटे स्वरसे सब वृत्तान्त निवेदन किया; सुनते ही वह अनुरागी बड़भागी भी घबराया हुआ दौड़कर आपके चरणों पर आ गिरा ॥ (२१६ ) टीका। कपित्त । (६२५) "कियो अपराध हम, साधु को दुग्वायों," "अहो बड़े तुम साधु हम नाम साधु धस्यो है" । "रही अजू सेवा करौं" "करी तुम सेवा ऐसी जैसी नहीं काहू मांझ, मेरो मन भस्यो है" ॥ चले सुख पाई, दृग भूतसे छुटाइ दिये, हिये ही की आंखिन सो अवे काम पस्यो है। बैठे बन मध्य जाइ, भूखे जानि आप आइ भोजन कराइ “ चलो छाया दिन ढस्यो है" ॥ १७३ ॥ (४५६) वार्षिक तिलक। व्याकुलता से बोला कि "हम दोनों से बड़ा अपराध हुआ; हम से सन्तने दुःख पाया; हम बड़े अभागी हैं !” आश्वासन-पूर्वक आपने उत्तर दिया "अहो, तुम वस्तुतः वड़े साधु हो; मैं तो साधु वेप को महा कलंक लगानेवाला वास्तव में बड़ा असाधु हूँ, साधु का तो केवल नाम मात्र मुझे है वास्तव में साधु तो तुम हो।” तब भक्तने विनय किया कि महाराज ! आप रहिये, मैं आपकी सेवा ओषधि करूँ।" आपने उत्तर दिया कि 'तुमने तो ऐसी सेवा करके मेरा मन हर लिया कि किसीसे ऐसी कहां होसकेगी; तुम हरिकृपा से बने रहो, भगवद्भजन तथा सन्तसेवा किया करो।" श्रीबिल्व- मंगलजी नेत्र रूपी प्रेतों को अपने शरीर से छुड़ाके, सुखपूर्वक श्रीवृन्दावन को चल खड़े हुए ॥ ANSAR RA भक्तिसुधास्वाद तिलक। अब बाहर की आंखों से तो स्थूल भौतिक वस्तुओं के देखने का काम रहगया ही नहीं, हृदय के नयन से सुखपूर्वक प्रयोजन साधते चलके एक वन के मध्य जा बैठे। श्रीबिल्वमंगलजी को भखे देख, श्रीवृन्दावनविहारीजी ने स्वयं आकर प्रसाद पवाय के कहा कि "दिन ढर चला, संध्या समीप है, छाया में चलो।" (२२०) टीका । कवित्त । (६३) चले लै गहाइ कर, छाया घन तरु तर; चाहत छुटायो हाथ, छोड़ें कैसे? नीको है। ज्यों ज्यों बल कर त्यों त्यों तजत न एऊ अरें, लियोई छुटाइ, गह्यो गाड़ो,रूप हीको है ॥ ऐसे ही करत वृन्दावन धनाइ लियो पियो चाहें रस, सब जग लाग्यो फीको है । भई उतकंठा, भारी, आये श्रीविहारीलाल, मुरली वजाइ कै सुकियो भयो जीको. है॥ १७॥ (४५५) वार्तिक तिलक । श्रीप्रभु करुणाकर भक्तवत्सल भी हाथ पकड़ा के आपको एक घने वृक्ष की सुखद छाया के तले बैठा के, अपना करसरोज आपके हाथ में से छुड़ाने लगे; आप भला कैसे छोड़ना चाहते; क्योंकि वह करकमल अति प्रिय ब्रह्मस्पर्श सुखद था परन्तु वल करके छुड़ाके प्रभु अलग होगए । आप बोले "हाथों में से तो निकले जाते हो, पर यदि मन में से सरकोगे तो देखूगा। इसी प्रकार प्रभु के सहारे से वृन्दावन में आकर श्रीवृन्दावन के कुंज में जमके रहे; संसार फीका- लगने लगा; सब ओर से चित्त की वृत्ति इकट्ठी कर के श्रीकृपासे भगवत् का प्रेमरस पीना चाहा।। . . चौपाई। "सब के ममता ताग वटोरी । ममपद मनहिं बांध वठ डोरी ॥" युगल सरकार के दर्शन की उत्कण्ठा प्रबल हुई ॥ N चौपाई। "राम चरण पंकज जब देखौं । तब यह जन्म सफल करि लेखौं।" RECORESCKAG KA ३८२ श्रीभकमाल सटीक। श्रीविहारीजी कृपा करके आए । वंशी की मीठी तान सुनाई इनके हृदय का भावता मनोरथ पूर्ण किया ॥ (२२१) टीका | कवित्त । (६२२ ) खुलि गए नैन ज्यौं कमल रवि उदै भए, देखि रूप रासि बाढ़ी कोटि गुनी प्यास है । मुरली मधुर सुर राख्यो मद भरि मानो ढरि आयो कानन मैं, आनन में भास है ॥ मानिके प्रतापचिंतामनि मन मांझ भई,"चिंतामनि जैति" आदि बोले रसरास है। "करुनामृत" ग्रंथ, हृदै ग्रंथि की विदारि डारे, बांधै रस ग्रंथ पन्थ युगल प्रकास है ॥ १७५ ॥ (४५४) वातिक तिलक । श्रीविहारीजी ने आके मुरली बजाई; उसकी तान सुन, आपने जाना कि यह तो बिहारीलाल के मुख की ही वंशी है; इससे स्वरूप माधुरी देखने की अभिलाषा हुई । तब जैसे सूर्योदय से कमल खिल जाते हैं, वैसेही आपके नयन खुल गए। सामने करुणासागर शोभाराशि भगवान के दर्शन प्राप्त हर्ष से फूले, आनन्द हृदय में अँटता नहीं था, दर्शन से भला कर तृप्ति होती है ? छविसमुद्र का मुखचन्द्र देखते रहने की प्यास कोटि- गुण अधिक बढ़ती चली ।। श्रीवंशी का वह मधुर स्वर सुनकर आनन्द मग्न हो गए, उस श्रवणामृत ने इनके कानों में पहुँचकर इनको मतवाला कर दिया; 'मुरली ध्वनि की गूंज सदा वनीही रही; और मुखारविन्द के प्रकाश का कहना ही क्या है। आपने चिन्तामणि के उपदेश का प्रताप जान, मन में गुरु तुल्य मान, "जयतिचिन्तामणि" आदि शब्द, उच्चारण किये; रसराशि श्रृंगार ग्रन्थ में, जिसका नाम "श्रीकृष्णकरुणामृत" है और जो जीव- मात्र की हृदयग्रन्थि के खोलने के लिये अतिअपूर्व है; ऐसी चमत्कृति दिखाई है, कि वह ग्रन्थ श्रीयुगलसरकार (प्रियाप्रियतम) के रूप- माधुरी प्रेमरसमें गांठ बांधदेता है, तथा प्रभु की प्राति के सुन्दर मार्ग का प्रकाशक ही है। , . भकिसुधास्वाद तिलक। ३८३ (२२२) टीका । कवित्त । (६२१) चिन्तामनि सुनी “बन मांझ, रूप देख्यो लाल," द्वै गई निहाल, आई नेह नातो जानिके । उठि बहु मान कियो, दियो दूध भात दोना, "दै पठावें मिन हरि हितू जन मानि के" ॥लियो कैसे जाइ, "तुम्हें भाय सो दियो जो प्रभु, लहों नाथ हाथ सौं जो दैहैं सनमानि" बैठे दोऊ जन, कोऊ पावै नहीं एक कन, रीझे श्यामधन, दीनो दूसरो हूं आनि के ॥ १७६ ॥ (४५३) वार्षिक तिलक। चिन्तामणिजी को यह विदित हुआ कि "श्रीबिल्वमंगल पर विशेष कृपा श्रीयुगल सरकार की हुई; और श्रीब्रजचन्द्र महाराज के दर्शन पाए हैं।" वह अति हर्ष को प्राप्त हुई, निहाल हो गई, पिछला नेह नाता सुरति कर अनेक मनोरथ करती वह भी श्री- वृन्दावन में आपके पास बड़े भाव से आई । देखते ही आप उठ खड़े हुए, बड़े आदर भाव से सत्कार किया; श्रीयुगल सरकार (ललीलाल) का प्रसाद दूध भात जो कि प्रभु नित्य ही अपना स्नेही जन मान के भेज दिया करते थे, सो दिया। इन्होंने पूछा कि 'यह प्रसाद का दोना कहां से कैसे आया किसने दिया?" आपने उत्तर दिया कि "स्वयं भगवत् कृपाकरके अपने कर कमलों से भेज दिया करते हैं।" यह सुनतेही बोल उठी कि "जव वे कृपा करके आप अपने हाथों से ही देंगे तो लूंगी।" अब न आप पावें न चिन्तामणि पावें, दोना रक्खा है और दोनों भजन कर रहे हैं। श्रीविल्वेमंगलजी की भक्तिभाव तथा श्रीचिन्तामणिजी का सच्चा पन जान के श्रीभाववश भगवान् ने दर्शन दे दूध भात का दूसरा दोना भी कृपा किया ही । कृतकृत्य हो दोनों ने धन्यवाद गुणानु. वाद पूर्वक मिलके प्रसाद पाया। आगे क्या कहूं ? प्रेम की जय ! प्रेम प्रिय प्रभु की जय !! परम प्रेमियों की जय !!! १ बहुत से लोग भूल मे इन्हीं को मूरदासजो समझने है । यह अन्यथा है ! सूरदासजी की कथा अन्यत्र है (छप्पय ७३ देखिये ) SAR * ॐ ३८४ श्रीभनमाल सटीक । " (३६) श्रीविष्णुपुरीजी (२२३ ) छप्पय । (६२०) कलि जीव जंजाली कारनै, "विष्णुपुरी” बड़ि निधि सँची॥ भगवत धर्म उतंग आन धर्म आनन न देखा। पीतर पटतर विगत, निपैक ज्यौं कुंदन रेखा ॥ कृष्णकृपा कहि वेलि फलित सतसंग दिखायो। कोटि ग्रंथ को अर्थ, तेरह विरचन में गायो॥ महा समुद्र भागौत ते, भक्तिरतन-राजी रची । कलि जीव जंजाली कारनै, विष्णुपुरी" बड़ि निधि सँची ।। ४७॥ (१६७) चात्तिक तिलक । श्रीविष्णुपुरीजी ने, कलियुग के जंजाल झंझट में उलझे हुए, भगवद्भनि सम्पत्तिहीन दरिद्री, जीवों के उपकारार्थ बहुत बड़ाधन (महानिधि ) संचय किया। श्रीभगवद्धर्म (नवधा, प्रेमा, परा भनियों) को सब धर्मों से ऊंचा जानके वैसा ही वर्णन किया; और अन्य धर्मों ( वर्ण तथा आश्रम के धर्मों ) का मुख भी (आनन ) शपथ करके नहीं देखा; किस प्रकार कि जैसे सोनार की कसौटी में पीतल घिसने से उसका रंग रेखा विगत हो जाता है अर्थात् कसौटी किति भी ग्रहण नहीं करती, और कुन्दन सुवर्ण के रंगरखा अतिचमकयुक्न उपट आने हैं; इसी प्रकार आपकी मति तथा भणित में भगवद्धर्म चमत्कारयुक्त चमकता है। १"श्रान धर्म प्रानन न देखा = अन्य धर्मों का मुंह भी नहीं देना । "श्रान धर्म आनन देखा" = श्रान (शपथ) करके पान [अन्य ] धमों को नहीं देखा । वा, अन्य धर्मों को अपनी मति में धान के [ला के ] देखा भी नहीं। २ 'श्रागन न देखा'=मुंह न देखा। ३ " पीतर "-पोतल । पटनर "परिम्न. उामा. निपक "कसौटी ( सुनार की)। ६ "विरचन' =लर, माला की लड़यां । ७ "राजी"पति, माला || ARTHACHERECORMALUSIRECRORECARE ALE , ********** - . भकिसुधास्वाद तिलक। ३८५ श्रीकृष्णचन्द्रजी की कृपारूपिणी वेलि (लता) का फल सत्संग को कह दिखाया। उनयन्थ "श्रीभनिरत्नावली" के तेरह ही बिरंचन ( माला की लड़ियों) में करोड़ों ग्रन्थों का तात्पर्य संग्रह किया गया है । श्री- मदभागवत रूपी महा समुद्र में से निकाल के "भक्तिरत्नावली" भक्ति की माला पांचसौ रत्नों (श्लोकों ) की अपूर्व रची है। (२२४) टीका । कवित्त । (६१६) जगन्नाथ छेत्र मांझ बैठे महाप्रभुजू वे,चहूँ ओर भक्त भूप भीर अति छाई है । बोले "विष्णुपुरी, पुरी काशी मध्य रहै, जाते जानि- यत मोक्ष चाह नीकी मन आई है" ॥ लिखी प्रभु चीठी “आपु मणिगण माला एक दीजिए पठाइ, मोहि लागता सुहाई है" जानि लई वात, निधि भागवत, रत्नदाम दई पठै आदि मुक्ति खेदिक वहाई है ॥ १७७॥ (४५२) वार्तिक तिलक। एक दिन श्रीविष्णुपुरीजी के सतगुरु महाराज श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभुजी श्रीजगन्नाथपुरी में भक्तराजों की भीड़ के मध्य सन्त. समाज में विराजमान थे, उन्हीं में से कोई कोई कहने लगे कि"विष्णु- पुरीजी ने काशी में वास किया है इससे जान पड़ता है कि मुनि.की इच्छा भलेप्रकार मनमें रखते हैं।" महाप्रभुजी ने सबको समझाया कि ऐसा नहीं है, वे उनमें से हैं कि जो, “मुक्ति निरादरि भक्ति लोभाने" इस प्रकार के अनुरागी हैं। और उन लोगों के समाधानार्थ यह काम किया कि इनको एक पत्र लिखा कि रत्नों की एक माला भेज दो; मुझे प्रिय लगती है।" • आपने श्रीमद्भागवतमें से रत्नरूपी ५०० श्लोक चुन और संग्रह करके, अपूर्व मालारूपी एक पोथी "भक्रिरत्नावली" नाम रख भेज दी, कि जिसमें रूखी मुकि सूखे मोक्ष को तो जड़से ही खोद के चहा दिया है और भागवद्धर्म हरिभकि भगवत् प्रेम की महिमा KI.COM ISTRIANTRAORS श्रीभक्तमाल सटीक। ३८६ तथा ऐसी विलक्षणता प्रकाशित की है कि जिसको पढ़ते ही सब "साधु साधु"कह उठे । उक्न ग्रन्थ भक्कों के देवन ही योग्य है ।। (००५) रपए । (६) "विष्णुस्वामिसंप्रदाइ'दृढ़ज्ञानदेवे" गंभीरमति॥ "नाम" "तिलोचन" शिष्य, सूर शशि सदृश उजा- गर। गिरा गंग उनहारि काव्य रचना प्रेमाकर ॥ आचारज, हरिदास, अतुल बल आनंददायन । तेहिं मारग"बल्लभ" विदित, पृथुपधति परायन ॥ नवधा प्रधान सेवा सुदृढ़, मन वच क्रम हरि चरन रति विष्णुस्वामिसंप्रदाइ" दृढ़ ज्ञानदेव " गंभीर- मति ॥४८॥ (१६६) वाकि तिलक । श्रीविष्णुस्वामीसम्प्रदाय में, गम्भीरमति "श्रीज्ञानदेवजी प्रसिद्ध हैं; जिन के शिष्य (१) श्रीनामदेवजी और (२)श्रोत्रिलोचनजी, सूर्य तथा चन्द्र के सरिस उजागर हुए और श्रीज्ञानदेवजी की गिरा (वाणी ) श्रीगंगाजी की नाईं निर्मल और संसार को पवित्र करनेवाली हुई, जिस वाणी से प्रेम की खानि काव्य की रचना कर हरियश गाया । आचार्य (गुरुवर्ग), तथा हरिभक्तों का, अतु- "लित बल विश्वास आपके हृदय में था; जिन सवों को अति आनन्ददाता हुए। १. श्रीज्ञानदेवजी; ३. श्रीत्रिलोचनजी; २. श्रीनामदेवजी; ४. श्रीवल्लभाचार्यजी॥ इसी मार्ग ( सम्प्रदाय ) में, जगविख्यात, पृथुपद्धति अर्थात् प्रभु पूजन अर्चन में परायण, "श्रीवल्लभाचार्यजी हुए; कि जिन्हों ने नवधा भक्ति ही को प्रधान मान, प्रभु की सेवा में अत्यन्त दृढ़ होकर मन वचन कर्म से श्रीहरिचरणों में प्रीति की॥ PRESERECENA - भक्तिसुधास्वाद तिलक। . . . (०२६) टीका । कवित्त । (६१७) विष्णुस्वामि सम्प्रदाई वड़ोई गंभीर मति, "ज्ञानदेव" नाम, ताकी वात सुनि लीजिये। पिता गृहत्यागि, भाइ ग्रहण संन्यास कियो, दियो बोलि झूठ "तिया नहीं," गुरु कीजियें ॥ आई सुनि वधू पायें, कह्यो जान्यो मिथ्यावाद, " भुजनि पकरि मेरे संग करि दीजियें " । ल्याई सो लिवाइ, जाति अति ही रिसाइ, दियो पंक्ति मते डारि, रहें दूरि, नहीं छीजियें ॥१७८॥ (४५१) (३७) श्रीज्ञानदेवजी। वार्तिक तिलक। विष्णुस्वामीसम्प्रदाय में बड़े गम्भीरमनि श्रीज्ञानदेवजी, उनकी कथा सुनिये । आपके पिता ने अपना घर छोड़ आके संन्यास ले लिया। पूछने पर गुरुजी से झूठ कहा था कि "मेरे पत्नी नहीं है, मुझे शिष्य कर लीजिये" ( क्योंकि स्त्री रहते संन्यासी वैरागी बनाने बाले को बड़ा दोष होता है )॥ परन्तु पीछे उनकी स्त्री पहुँची और बिगड़ के कहने लगी कि " महाराज ! बलले हाथ पकड़ के इनको मेरे साथ करही दीजिये," और आपको अपने साथ घर ले ही आई । जाति के ब्राह्मणों ने अत्यन्त कोध करके इन दोनोंको अपनी पंगति से निकाल दिया कि "अब मिलने योग्य नहीं हैं," इससे जाति पांति से पृथक् रहते थे । (२२७ ) टीका | कवित्त । (६१६ ) भए पुत्र तीन, तामें मुख्य बड़ो ज्ञानदेव जाको कृष्णदेवजू सों हिये की सचाई है। बंद न पढ़ावे कोऊ कह सब "जाति गई," करि सभा अहो कहा मन आई है ॥ "विनस्यो ब्रह्मत्व" कही "श्रुति अधिकार नाहि," वोल्यो यो निहारि "पढ़े भैंसा" लै दिखाई है। देखि भक्रिभाव, चाव भयो, अनि गहें पांव, कियोई सुभाव वहीं गही दीनताई है ।।१७६॥ (४५०) वातिक तिलका उनके तीन पुत्र हुए जिनमें सबसे बड़े "श्रीज्ञानदेवजी" हैं जिन- .

३८८. श्रीभक्तमाल सटीक । को श्रीभगवत्चरण में सत्य प्रेम था दूसरे " महानदेव;" तीसरे "सोपानदेव ॥" 'जब श्रीज्ञानदेवजी पढ़ने योग्य हुए, तब ब्राह्मणों के पास वेद पढ़ने गए; परन्तु किसीने पढ़ाया नहीं; कारण यह कहके कि "तुम्हारा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया है।" श्रीज्ञानदेवजी भगवद् धि- भूति साधु अवतार तो थे ही, अतः सभा करके इन्होंने सव ब्राह्मणों से कहा कि "आप लोगों के मन में हमारी क्या न्यूनता आई है, क्यों वेद नहीं पढ़ाते ?" ब्राह्मणों ने वही उत्तर दिया कि "तुम्हारे पिता संन्यास लेकर पुनः आय के गृहस्थ हुए इससे तुम्हारा ब्रह्मत्व नष्ट हो गया, वेद का अधिकार नहीं रहा ॥" आपने कहा कि "पूर्णब्रह्म श्रीभगवान् को मन कर्म वचन सप्रेम जाननेवाला वास्तविक ब्राह्मण है, न कि केवल वेद पाठी ही; वेद तो एक भैंसा भी पढ़ सकता है" इतना कह कर जिसके श्वास से वेद हुए हैं उन श्रीयुगलसर्कार (ललीलाल) का स्मरण कर, पास के एक मैसे को कि जो संयोग से वहां ही आ गया था, आज्ञा की कि "वेद पढ़, सुना।" वह पशु, शिक्षित ब्राह्मण से भी भली रीति तथा उत्तम मधुर स्वर से स्पष्ट और शुद्ध वेद पढ़ चला । सुन- के सवकी बुद्धि चक्कर में आ गई, लजित हुए, और भगवत् की भक्ति में प्रतीति की; श्रीभक्ति महारानी का प्रभाव और प्रतापजाना॥ श्रीज्ञानदेवजी के चरणों में पड़कर अपने देह जात्यभिमान को त्याग, आपके शिष्य, तथा अनुमत में स्थित हो, दीनतापूर्वक भगवद्भक्ति ग्रहण की। (३८)श्रीत्रिलोचनजी। (२२८) टीका | कवित्त । (६१५) भये उभे शिष्य नामदेव श्रीतिचोवनजू, सर शशिनाई कियो जग में प्रकास है । "नाम" की तो बात सुनि पाए; सुनो दूसरे की सुनेई बनत भक्नकथा रस राल है । उपजे वनिक कुल सेवें १"नाम"श्र नामदेवजी । ABCRECORRECRACRENCCCCE KRECRUCTIESCRI NRNARE भनिसुधास्वाद तिलक। -३८६ "कुल अच्युत" को ऐपै नहिं बने, एक तिया रहे पास है । टहलू न कोई "साधु ममही की जानि लेत" येही अभिलाष सदा दासनि को दास है ॥१८०॥ (१४६) वार्तिक तिलक। श्रीज्ञानदेवजी के दो शिष्य हुए (१) श्रीनामदेवजी और(२) श्रीत्रिलोचनजी । सूर्य और चन्द्र के समान दोनों ने संसार में प्रकाश किया । जिनमें से “ श्रीनामदेवजी" की वार्ता तो ऊपर कही ही जा चुकी है; दूसरे (श्रीत्रिलोचनजी) की भक्ति की कथा ऐसी अपूर्व रस की भरी है कि सुनते ही बनता है; सो सुनिये- आप वैश्य वर्ण में उत्पन्न थे; और "अच्युतकुल" अर्थात् वैष्णवों, की सेवा किया करते । दोही प्राणी थे, आप और इनकी धर्मपत्नी; घर में तीसरा कोई न था । आपको साधुसेवा में ऐसा प्रेम था कि सदा यही बड़ी लालसा रहती थी कि " हरिकृपा से कोई ऐसा नौकर हाथ लगता कि जो सन्तों के मन की बूझ बूझ उनकी रुचि के अनुसार टहल किया करता," ये हरिदासों के दास, इसी सोच विचार में रहा करते थे । (२२६) टीका | कवित्त । (६१४) आए प्रभु, टहलुवा रूप धरि द्वार पर, फटी एक कामरी पन्हैयां टूटी पाँय हैं । निकसत पूछे "अहो कहां ते पधारे आप ? बाप महतारी और देखिये न" गाय हैं ॥ "बाप महतारी मेरे कोऊनाहिं सांची कहाँ, गहौं मैं टहल जो पै मिलत सुभाय हैं" । 'अनमिल बात कौन ? दीजिये जनाय वहू," "पाऊं पांच सात सेर, उठत रिसाय हैं" ॥ १८१॥ (४४८) वार्तिक तिलक । भक्तकी अनोखी अभिलाषा जान, एक दिन स्वयं प्रभुही एक टहल के रूप से; कंधे पर फटी कमली धरे पावों में टूटी पनहीं पहिने, आपके द्वार पर आ ही तो पहुँचे । १ "कुल अच्युत" वैष्णव ॥ २"गाय हैं" कथन किया। ICCCCHAR RSA REk श्रीभकमाल सटीक । ३६०. श्रीत्रिलोचनजी ने घर से निकलते ही आपको देख मा बाप घर आदि का प्रश्न किया। आपने उत्तर दिया कि सच कहता हूँ मेरे बाप मां कोई नहीं हैं । जो मुझे रक्खे, और मेरा उसका स्वभाव मिल जाय, तो मैं सेवा टहल भले प्रकार करता हूँ।" श्रीत्रिलोचन- जी ने पूछा कि "आपके सुभाव में अनमिल वार्ता कौनसी है ? सो भी तो बता दीजिये।" टहलू जीने उत्तर दिया कि मैं पांच सातसेर खाता हूँ; इसीसे जिसके यहां रहत्ताहूँ सो रिप्लाय उठता है, ग्लानि मानने लगता है तब मैं चलही देता हूँ॥" (२३० ) दीका । कवित्त । (६५) चारिह वरन की वरन की जु रीति सब मेरे हाथ, साथ हू न चाहौँ, करौं नीके मन लाइकै । भक्कन की सेवा सोतो करत जनम गयो, नयो कछु नाहि, डारे बरस बिताइके ॥ "अंत्रजामी" नाम मेरो, चेरो भयो तेरो हो तो," बोल्यो भक्त 'भाव, ग्वावानिशंक अघाइकै"। कामरी पन्हैयां सब नई करि दई, और मीड़ि के न्हवायो, तन मैल कों छुटाइके ॥ १८२॥ (४४७) वार्तिक तिलक। "चारों वर्णों की रीति मैं सब जानता हूँ, मेरे हाथों में है, और अकेला ही सब टहल कर लेताहूँ, मन लगाके भली भाँति सेवा किया करता हूँ; विशेष करके हरिभक्तों संतों की सेवा तो करते बरसों क्या वरन् सारा जन्म बीता, कुछ नई बात नहीं, मेरा नाम "अन्तर्यामी है; मैं आपका चाकर हुआ ॥" दो०"चार वरन की चातुरी, सरै न मेरो काम । भन सेव जो जानई, तो रहु मेरे धाम ॥" तब श्रीत्रिलोचनजी ने हर्षित होकर कहा कि जितना चाहो उतना अघाके खाइयो, कुछ शंका मत करो ॥" इनको अच्छी प्रकार से अंग मांज मांज के स्नान कराकर, पगरखी (पनही) तथा काली आदि नई मँगवा दी ॥ तब सन्तों की टहल साँपो॥ EkteCRECASGASCIEO . , คนนี้********* भकिसुधास्वाद तिलक। ३६१ (१) टीका । कवित्त । (६१२) बोल्यो घरदासी सों,"तूं रहै याकी दासी होइ, देखियोउदासी देत ऐसो नहीं पावनौं । खाय सो खवावो, सुख पावो नित नित किये, जियें जग माहिं जौलौ मिलि गुन गावनौ" ॥ आवत अनेक साधु, भावत टहल हिये, लिये चाव दाबै पाँव, सवनि लड़ावनौ । ऐसे ही करत, मास तेरह वितीत भए, गए उठि आपु, नेकु वात को चलावनौ ॥१८३॥ (४४६) वार्तिक निलक। स्त्री से कहा कि "तू इसकी दासीसी रहियो, देखना, उदास हो- के खाने को देने से यह चला जावेगा और फिर ऐसा सेवक मिलने का नहीं, जितना खाय सो खिग्नाना, सुखपूर्वक नित्यही इसके लिये रोटी करना । जब तक हम तुम जियें, तब तक तीनों मिल जुलके साधुसेवा और भगवत् का भजन करें" अस्तु । इस भाँति इनके भोजन के विषय में विशेष करके उसे समझा बुझा दिया । अब अन्तर्यामी ने सन्तों की टहल आरम्भ की; साधु तो यहां पहिले हीसे अनेक आया करते थे, पर अब और भी अधिक आनेलगे; क्योंकि अन्तर्यामी उनकी बड़ी चाव भाव से दहल सेवा करते, चरण चापते; "अन्तर्यामी" अन्तर्यामी ही निकले। जिसकी जो रुचि होती वैसाही करते, जो जहां पुकारते उनके पास वहीं पहुँच जाते; इसी रीति से सब सन्तों को लाड़ लड़ाया करते थे । निदान चारों खंट में श्रीत्रिलोचनजी की साधुसेवा की धूम मच गई। इसी भाँति एक वर्ष से एक महिना अधिक बीततेही, तनक सी बात चलाते ही उसीक्षण "अन्तर्यामी” अन्तर्धान ही हो गए। (२३) टीका | कवित्त । (६११) एक दिन गईही परोसिन कैं, भक्त्रवधू, पूछि लई बात "अहो ! काहे को मलीन है ?,बोली मुसुकाय, "वे' टहलवा लिवाय ल्याये, क्योंहू न अघाय खोट, पीसि तन छीन है ॥ काहू सौं न कहाँ, यह गहौं मन माझ एरी, तेरी सौं सुनैगो जो पै जात रहै भीन है" १ 'वे-मेरे पति । २"मीन"=मिननारे, प्रभान, संयो। SAR RECRACK . HARSH भित्र ३६४ श्रीभकमाल सटीका "तुमकहँ, भरत ! कलंक यह, हमसबकहँ उपदेश ॥" भक्त भक्ति भगवन्त की, जय ! जय !! जय !!!. (३६) श्रीवल्लभाचार्यजी। (२३५) टीका । कपिल । (६०८) हिये में सरूप, सेवा करि अनुराग भरे, ढरे और जीवनि की, जीवनि कौं दीजियें । सोई लै प्रकास घर घर में बिलास कियो, अति ही हुलास, फल नैननि की लीजियें ॥ चातुरी अवधि, नेकु आतुरी न होति किहूं, चहूं दिसि नाना राग भोग सुख कीजिये। "बल्लभजू" नाम लियो "पृथु" अभिराम रीति, गोकुल में धाम जानि सुनि मन रीझिये ॥ १८७ ।। (४४२) वार्तिक तिलक । श्रीवल्लभाचार्यजी की वात्सल्यरस भरी भक्ति रीति अति अनूप थी। हृदय में प्रभु स्वरूप का ध्यान धरे हुए अन्तर तथा वाहर में अति अनुराग से सेवा पूजा करते थे। ध्यान सेवा सुख पाकर आप अनुग्रह कर और जीवों की ओर ढरे । यह विचार किया कि यह जगत्जीवनप्रभु की अमृत संजीवनी सक्रि अपने आश्रित जनों को भी देना चाहिये । सो ऐसा ही किया, कि वह प्रीति रीति शिष्य- वर्गों के घर घर में प्रकाशित कर प्रभु के विलास में हुलास पूर्ण कर दिया। आपके सदन में, तथा सेवकों के घरों में, प्रभु विग्रह की झांकी कर नेत्र सफल होते थे। सेवा प्रादिक कृत्यों में आप चातुरी की अवधि, और परम धीर थे; किसी प्रकार से किंचित् भी आतु. रता आप से नहीं होती थी। नानाप्रकार के भोगपदार्थ तथा राग- रागिनियों से यश लीला गान का आनन्द लिया करते थे। । .

भनिसुधास्वाद तिलक।
३६५
श्रीवल्लभा
चार्यजी
श्रीलक्ष्मण भट्टजी
श्रीविष्णुस्वामीजी
|श्रीनामदेवजी
तथा
श्रीत्रिलोचनजी
शिवजी से प्रसिद्ध ४६
वें श्रीज्ञानदेवजी
श्रीज्ञानदेवजी के छप्पय में जो श्री १०८ नाभा स्वामीजी ने
'पृथु ,पद्धति परायण अभिराम रीति वाले श्रीवल्लभजी" लिखा,
सो उनका श्रीगोकुल में स्थान है। इनको जानके और सुयश सुनके
मेरा मन इन में रीझ गया है।
(२३६ ) टीका | कवित्त । (६००)
गोकुल के देखिये कौं गयौ एक साधु सूधो, गोकुल मगन भयो
रीति कछु न्यारिये । छोंकर के वृक्ष पर बटुवा मुलाय दियो, कियो
जाय दरशन, सुख भयो भारियें। देखै आइ नाहीं प्रभु, फेरि आप
पास आयो चिंता सौमलीन देखि, कही जा निहारियें। वैसेई सरूप
केई; गई सुधि वोल्यो आनि, लीजिये पिछानि कह्यो सेवा नित
धारिये ॥ १८८॥ (४४१)
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"छोकर"क्षेमंकर, समी का वृक्ष ।

SHRESTHA AN HOST ३६८ श्रीभकमाल सटीक। (२) श्रीनृसिंह भगवान् का अनुकरण ( लीला ) में एक श्रावेशीभक नृसिंहजी के रूप बने । उन्होंने हिरण्यकशिपु वनने वाले को मार डाला; वेही फिर लीला में श्रीदशरथ महाराजजी का रूप बने और श्रीसीताराम विछोहतेही अपना शरीर त्याग दिया। (३) "श्रीकृष्णजी को श्रीयसोदाजी ने बांधा" ऐसी कथा सुनतेही एक भक्का “रतिवन्ती बाई" ने तन त्याग दिया । प्रगट है, सबको विदित है, साधु इसके साक्षी हैं, कि कलियुग में "प्रेम प्रधान है;" कलियुग के प्रेमियों में तीन प्रधान आवेशी हैं, इनका प्रेम प्रत्यक्ष सच होगया । (२३६ ) टीका | कवित्त । (६०४) सन्त साखि जानें कलिकालमैं प्रगट प्रेम धड़ोई असत जाके भक्ति में अभाव है। हुतो एक भूप राम रूप ततपर महा, राम ही की लीला गुन सुनै करि भाव है ॥ विप्र सों सुनावै सीताचोरी को न गावै हियो खरो भरि आवै, वह जानत सुभाव है । पस्यो द्विज दुखी निज सुवन पठाइ दियो जाने न सुनायो भरमायो कियो घाव है ॥१६॥(४३६) वातिक तिलक । इसके साक्षी साधु हैं कि कलिकाल में प्रेमही प्रगट है ध्योंकि इन तीनों का प्रेम प्रगट हो गयी । उसको बड़ा अभागा और गया ही हुआ जानो कि जिसको इन सन्तों की कथा सुन के भी, श्री. भतिजी में अभाव अर्थात् अनादर ही बना रहे। (४०) श्रीभक्लदास. कुलशेखरजी। दक्षिण में एक राजा श्रीरामोपासक श्रीरामरूप में बड़े अनन्य दास्यरसावेशी प्रेमी भक्त थे; श्रीजानकीजीवनजी का परत्व उन्हें जैसा चाहिये वैसा था; बड़े भाव से श्रीअवधविहारीजी की लीला श्रीवाल्मीकीय रामायण कथा सुना करते थे। इनका "कुलशेखर" नाम था; "भनदास" नाम से भी प्रसिद्ध थे। जो विप्र पण्डित T - NS भक्तिसुधास्वाद तिलक ३६६ उनको कथा श्रवण कराते थे वे इनके अलौकिक प्रेम को जानते थे, क्योंकि एक समय पारण्य काण्ड की खरदूषण की चढ़ाई की कथा सुनकर राजा आवेश में आ गया, श्राप घोड़े पर चढ़ हथियार बांध सेना साथ ले, शीघ्रतम पयान करने की आज्ञा दी। तो चतुर पण्डित ने देशकालानुसार युनि से इनको लौटाया-तस्मात् श्रीमहारानी- जी की चोरी की कथा उन्होंने इन्हें कभी नहीं सुनाई। एक दिन श्रीपण्डितजी दुखी हुए, इससे अपने पुत्र को कथा सुनाने के लिये भेजा । राजा का सुभाव नहीं जानने से उसने श्री. सीताहरण सुनाया; सुनते ही भक्क राजा को यह भ्रम आ गया कि यह इसी समय सत्य हो रहा है। इससे हृदय में घाव सरीखा दुःख हो गया। राजा ने लंका की ओर धावा किया । (०४०) टीका | कवित्त । (६०३) "मार मार" करि कर खडग निकासि लियौ, दियो घोरी सागरमैं, सो आवेस आयो है । "मारौं याहि काल दुष्ट रावन वि. हाल करौं, पाँवन को देखौं सीता" भाव दृग छायो है । जानकीरवन दोऊ दरशन दियो आनि, बोले "विनप्रान कियो, नीच फल पायो है"। सुनि सुख भयो, गयो शोक हृदै दारुन जो, रूप की निहारनि यो फेरि कै जिवायो है ॥ १६१॥(४३८) वार्तिक तिलक । खड्ग निकाल "मार मार" कहता, लङ्का की ओर घोड़ा दौड़ाया यहां तक आवेश आया कि समुद्र में भी घोड़ा डालही दिया; "दुष्ट रावण को व्यथित कर दूंगा, इसी क्षण मारडालूंगा; अपनीमाता श्रीजानकीजी महारानी के चरणकमल के दरशनकर अभी ले आऊं- गा।" इस प्रकार बीरवाक्य कहते हुए प्रेम में मग्न और नयनों में प्रेमाच भरे हुए सागर में चले ही जारहे थे-कि उसी क्षण, भक- प्रापालक प्रेम निर्वाहक जनरक्षक श्रीजानकी श्रीजानकीरमणजी श्रीलक्ष्मणजी और श्रीहनुमदादि कपि सेना समेत पुष्पक विमाना- रूढ़, भन के समीप आकाश में प्रगट हो, दर्शन दे, इन्हें कृतकृत्य BHERS CASE . .

श्रीभक्तमाल सटीक) कर, बोले कि "हे प्रिय पुत्र! उस दुष्ट को हमने सपरिवार मारडाला, उस नीच रावण ने अपनी करनी का फल पाया।तुम चिन्ता मत करो; देखो अपनी माता के दर्शन करो। हम अब अपनी राजधानी श्रीअयोध्याजी को जाते हैं, तुम भी घर जाओ।" श्रीवचनामृत सुनते ही इनके हृदय से दारुण शोक जाता.रहा; दर्शन पाके अति कृतार्थ हुए । "मृतक शरीर प्राण जनु पाये ॥", आप लौट के अपने घर आए । परमावेशी भक श्रीकुलशेखरजी की जय ।। "प्रेम कलियुग प्रधान ॥" "कलिकाल में प्रगट प्रेम ॥" दो० "कलियुगसम युग भान नहिं, जो नर करि विश्वास । गाइ राम गुण गण विमल, भव तर विनहि प्रयास ॥" चौपाई। "कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुण्य होय, नहिं पीप" "कलि केवल रघुपति गुण गाहा। गावत नर पावहिं भन थाह॥" दो० "सुनु व्यालारि, करालकलि, बिनुप्रयास निस्तार " "कृतयुग, त्रेता, द्रापर, पूजा, मख अरु जोग। जो गति होय सो कलिहरी, 'नाम' ते पावहिं लोग ॥" "रामनाम जपु जिय सदा सानुराग रे। कलिन विराग जोग जाग तप त्याग रे ॥" . चौपाई। "रामहिं केवल प्रेम पियारा । जानिलेहु जे जाननिहारा ।" "मिलहिं न रघुपति विनु अनुरागा। किये योग जप ज्ञान विरागा॥" "कालधर्म नहि व्यापहिं तेहीं। रघुपतिचरणप्रीति अति जेहीं॥" और युगों से कलियुग में, कमलनयन श्रीहरि ने जीवों पर विशेष करुणा की है। (२४१) टीका | कवित्त । (६०२) नीलाचल धाम तहां लीला अनुरुर्न भयो, नरसिंह रूर धरि, SCAL - H भक्तिसुधास्वाद तिलक। साँचै मारि डायो है । कोऊ कह देस, कोऊ कहत आवेस, "तोपै करौ दशरथ"; कियो; भाव पूरो पायो है ॥ हुती एक वाई, कृष्ण रूप सों लगाई मति, कथा में न आई, सुत सुनी, कह्यो धास्यो है । "बांधे जसुमति" मुनि और भई गति, करि दई सांची रति, तन तज्यो; मानो वारयो है ॥ १६२ ॥ (४३७) वाति तिलक । (३१) श्रीलीलानुकरण भक्तजी। एक समय श्रीनीलाचल धाम में लीला होती थी। इन सत्य प्रेमा. वेशी भनजी को लोगों ने लीला अनुकरण में "श्रीनृसिंह भगवान्" का स्वरूप बनाया; आपने आवेश में आके, जो हिरण्यकशिपु वना था उसको पेट फाड़ के मारही डाला । सज्जन तो इसका कारण श्रीनृसिंहजी का सच्चा आवेश बताते थे, और दुर्जन लोग मार- डालने का कारण देश (वैरभाव ) कहते थे । अन्ततः यह विचार हुआ कि "इनको श्रीगमलीला में श्री. दशरथ जी महाराज का अनुकरण स्वरूप बनाओ और देखो कि आवेश होता है या नहीं। ऐसाही किया गया; आपका भाव तो सच्चा था ही, पूरा पड़ा; अर्थात् आवेश में आकर श्रीप्राणनाथ रघुनाथ के वनयात्रा में विठुरते ही, आपने शरीर को तृण सरीखा त्याग ही तो दिया । सबों ने जाना कि भावावेश पूरा था । (४२) श्रीरतिवन्तीजी। श्रीरतिवन्तीजी नाम की एक बाईजी वात्सल्यनिष्ठा से श्री- कृष्णभगवान् में अत्यन्त प्रेम रखती थीं; भगवान् को अपना बेटा जानती और चाहती थीं; कथा सुनने का भी नित्य नियम था। एक दिवस आप कथा में नहीं गई, कि उस दिन उखलीवन्धन की कथा थी। बालक जो नित्य साय जाया करता था, लोहा उसने जब वही कथा आपको सुनाई. नो यह नुनते ही चि acREMECRECRection AR ४०२ श्रीभक्तमाल सटीक। सुकुमार श्रीकृष्णचन्द्रजी को माता यशोदाजी ने ऊखल में वांधा है" आप अति व्याकुल हुईं। तड़पने लगी, और ही गति हो गई, अर्थात् सच्ची प्रीति से, कोमल अन्तःकरण में प्यारे का इतना दुःख न सहकर प्राण ही श्रीभक्रवत्सलजी महाराज पर न्योछावर कर दिये ॥ भाव इसको कहते हैं। श्रीभक्ति महारानीजी की जय ! जय !! जय !!! (२४२ ) छप्पय । (६०१) प्रसाद अवज्ञा जानिक, पाणि तज्यौ एकै नृपति ॥ हौं कहा कहौं वनाइ बात, सवही जग जानै । करते "दौना" भयो स्याम सौरभ, मनमानै ॥ 'छपन भोग' तै पहिल खीच "करमा” कौ भावें । सिलपिल्ले के कहत कुँअरि पै हरि चलि आवे ॥ भक्तन हित सुत विष दियौ भूपनारि प्रभु राखि पति । प्रसाद अवज्ञा जानिक पाणि तज्यौ एकै नृपति ॥ ५० ॥ (१६४) वार्तिक तिलक। श्रीमहाप्रसाद की महिमा जाननेवाला श्रीपुरुषोत्तमपुरी का ऐसा राजा एकही ( अर्थात् अद्वितीय) हुआ, कि जिसने अपने दाहिने हाथ से श्रीप्रसाद की अवज्ञा जानके उसको कटवा ही डाला। मैं वातें बनाकर क्या कहूं, सारा संसार जानता है कि उसी कटे हुए हाथ से "दौना" उत्पन्न हुआ है कि जिसकी सुगन्ध श्रीपुरुषोत्तम प्रभु ही भाता है ॥ जगन्नाथजी को छप्पन प्रकार के भोग से भी पहिले श्रीकर्माजी की खिचड़ी ही निवेदन होती है, वही वहुत अच्छी लगती है । १ "अवक्षा"-अपमान, श्रादर का अभाव । २ "दौना"=दमना, दौना, दना। ३ "स्याम" भगवत् ४ "सौरभ"=सुगंध । ५"खीच" खिचड़ी ॥ स को बहुत । K RE भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४०३ "सिलपिल्ले ! सिलपिल्ले !!" कहके पुकारने से दो कन्याओं के पास भगवान् का चले आना प्रसिद्ध ही है। भक्तों के लिये, अर्थात् सन्त को रखने के हेतु, तथा सन्तों की कुछ काल पर्यन्त सेवा पूजा के अर्थ, रानियों ने अपने अपने पुत्र को विष ही देदिये; श्रीप्रभु ने कृपाकरके उनकी लज्जा (पति) रख ली, तथा उन दोनों के अभिलाप को पूर्णकर पति को और पुत्रों को भी बचालिया। (४३) प्रसादनिष्ठ पुरुषोत्तमपुर-नृपति। ( २४३ ) टीका । कवित्त । (६००) प्रसाद की अवज्ञा ते तज्यो नृप कर एक करिके विवेक; सुनौ जैसे वात भई है । खेले भूप चौपरि कौं, आयो प्रभु-भुक्त-शेप, दा- हिने मैं पासे, बाएँ छुयो, मति गई है ॥ ले गए रिसायकै फिराय, महा दुख पाय, उठ्यो नरदेव, गृह गयो, सुनी नई है । लियो अन- सन, "हाथ तजौं याही छन, तव सांचौ मेरौ पन,' वोलि विप्र पूछि लई है ॥ १६३॥ (४३६) वार्तिक तिलक। श्रीजगन्नाथपुरी के महाराज ने, श्रीभगवत्प्रसाद के अपमान के कारण अपना दाहिना हाथ ही कटवाडाला। यह वृत्तान्त जैसे हुआ सो सुनिये । राजा चौपड़ खेलने में निमग्न हो रहा था, उसीसमय पएंडाजी श्रीप्रसाद लाए । दक्षिणकर में पासे थे, सो उसने पाएं ही हाथ से श्रीप्रसाद का स्पशत्मिक ग्रहण किया, ऐसी उसकी मति खेलके वश चली गई। इस असह्य अपमान से क्रोध में आके, पण्डा श्रीप्रसाद फेरलेगए॥ राजा उठकर घर आया, वहां उसको यह नई बात सुनने में आई कि पण्डा आज प्रसाद पाकशाला में नहीं देगए ! नरपति ने बड़ा दुख पाया उसको अत्यन्त पश्चात्ताप और ग्लानि हुई; उसने अन- सन व्रत लिया; और यह संकल्प किया कि "इसी क्षण इस हाथ को तज दूं तब तो मेरा भक्रिपन सच्चा ॥" १ "प्रभुभुक्तशेष" भगवत् प्रसाद । २"श्रममन' उपवास ॥ KAKi , .

S بووه **** श्रीभक्तमाल सटीक RE ४०४ . विद्वान् ब्राह्मणों को बुलाकर महाराज ने इस वात की अनुमति भी ले ली कि "जिस अंग से भगवत् का अपराध हो जावे उसको त्याग करना भला है। (२४४) टीका 1 कपित्त । (५६) "काट हाथ कौन मेरो ? रह्यो गहिमौन योत; पूछतं सचिव कथा विथा, सो बिचारियै । "आवै एक प्रेत, मो दिखाई नित देत निशि, डारिक झरोखा कर, शोरै करै भारिय" ॥ "सोऊं ढिग आइ, रहीं आपुकौं छिपाई, जब डोरै पानि आनि, तब ही सुकाटि डारियै" । कहीं नृप "भलैं"; चौकी देत मैं घुमायो, भूप डास्यो उठि आइ छेद, न्यारो कियो, वारिये ॥ १६४॥ (४३५) वार्तिक तिलक। राजा इस सोचविचार में था कि "मेरा हाथ कौन और क्योंकर काटै ?" और इसीसे खिन्नचित्त चुप बैठा था। मन्त्री ने पूछा कि महाराज ! "वार्ता क्या है ? आप व्यथा को प्रगट कीजिये, तो उसका प्रयत्न किया जावे" राजा ने उत्तर दिया कि "नित्य ही एक प्रेत आता है, रात्रि के समय मुझे देखपड़ता है, झरोखे में हाथ डालकर वह बड़ीभारी चिल्लाहट मचाया करता है।" मन्त्री ने कहा कि "मैं आपके पर्यंक के पास आके सोऊं और अपने तई छिपाए रहूं। वह प्रेत ज्यों ही आके झरोखे में हाथ डाले त्योंही काटडालं ।" राजा बोला "बहुत अच्छा ॥" मन्त्री चौकी देरहा था, राजा अपने पर्यंक से उठ आया और छेद में हाथ डालकर उसने हाथ को घुमाया। वहीं, मन्त्री ने हाथ को धड़ से काट के अलग कर दिया। मानों राजा ने अपने कर को श्रीप्रभुपर यों न्यवछावर किया । (२४५) टीका । कविन । (५९% ) दखि लजानों, “कहा कियों में अजानों!" नृप कही "प्रेत १ "यात"इससे, इसहेतु । २ "छत कया, वियो"घार्ता तथा व्यथा का विवर्ण छ।। ३"शोर" कोलाहल, चिलाहट । ४ "टारै पानि प्रानि"प्राके हाथ डाले।"चारिय":यलाचर कर दिया । ACakace RE भक्तिप्तधास्वाद तिलक। ४०५ मानौं यही, हरि सों विगारिय"। कही जगन्नाथदेव, “लै प्रसाद जावौ उहां, ल्यावौ हाथ, चोवो वाग, सोई उर धारिय" ॥ चले तहां धाइ, भूप आगे मिल्यो आइ, हाथ निकस्यो, लगाइ हिये, भयो सुख भारिये । ल्याए कर फूल, ताके भए फूल "दौना' के, जु नि- तहीं चढ़त अंग, गन्ध हरिप्यारियै ॥ १६५ ॥ (४३४) वात्तिक तिलक । मन्त्री ने जब देखा कि यह मैंने राजाही का हाथ काटडाला, तव वह बड़ा ही लज्जित हुआ, और पछताने लगा कि "मुझ अनजान 'ने यह क्या किया?" तब महाराज ने कहा कि “इसी हाथ को प्रेत मानो क्योंकि इसने हरिका अपराध किया है । तुमने तो बहुत अच्छा किया ॥" श्लो० "प्रसादं जगदीशस्य अन्नपानादिकं च यत् । ब्रह्मवन्निर्विकारं हि यथा विष्णुस्तथैव तत् ॥ १ ॥" उसी क्षण श्रीजगन्नाथजी ने पण्डों को आज्ञा की कि "प्रसाद लेके वहां जाव, राजा को दो, और कटाहुआ हाथ लाके वाटिका में वो दो, (भूमि में गाड़ दो) उसी से जो दौना होगा मैं उसी दौना को हृदय में धारण किया करूंगा। पएडा लोग उधर दौड़े राजा उताउल हो आगे आ, उनकी अगवानी कर उनसे सादर सविनय मिला; प्रसाद के लिये प्रेमसे दोनों ही हाथ उठाए (हाथ बढ़ाये) तो दाहिना हाथ, भी निकल आया अंगुलियां इत्यादि सब पूरी पूरी; अव दक्षिण हस्त पहिले से भी अति सुन्दर हो आया ॥ चौपाई। "गहत प्रसाद हाथ जमि आयो । सकल पूरी 'जय जय' रव छायो।" प्रसादको हृदय में लगाया, परस्पर मिले, भारी सुख और आनन्द हुआ। हर्ष से फूलके फूलरूपी कर को लाए, वाटिका में गाड़ दिया; वही सुगंधित पत्र 'दौना" हुआ, १ "विगारिये -बिगाड़ किया है, अपराध किया है । २ "ल्याएकरफ़ल" कर मपी फूल को लाए: या, हर्ष से फुनकर कर को लाए । ARRECTRICROCE ALSO कि जो भगवान् के NRN 153 श्रीभक्रमाल सटीक। R अंगपर नित्य चढ़ाया जाता है, और उसकी सुगंध सार को अति प्रिय है; अवतक प्रभाव प्रसिद्ध है । प्रभुकी कृपालुता की जय ।। (४४) श्रीकर्मा बाईजी। (२४६) टीका । कवित्त । (५६७) हुती एक वाई, ताको “करमा” सुनाम जानि, विना रीति भांति भोग खिचरी लगावही । जगन्नाथदेव आपु भोजन करत नी, जिते लग भोग तामैं यह अति भावही ॥ गयो तहां साधु, मानि 'बड़ो अपराध करे,' भरै बहु स्वांस, सदाचार ले सिखावही। भई यो अवार, देखें खोलिक किवार, जोपै जूठनि लगी है मुख धोए बिनु आवहीं ॥ १६६ ॥ (४३३) चार्तिक तिलक। श्रीकर्माजी नामक एक वात्सल्यरस की बड़ी प्रेमिनी बाईजी श्रीपुरुषोत्तमपुरी ही में रहती थीं, सो बड़े भोर नित्य श्रीजगन्नाथ जी को खिचड़ी भोग लगाया करती थीं, परंतु किसी रीति भांति सदाचार पर ध्यान न देके विना स्नान चौका इत्यादि के ही खिचड़ी कर बड़ी ही प्रीति से अर्पण किया करती । इसका ध्यान तो अवश्य रखतीं कि अवेर न हो और कची वा अलोनी न रहै ॥ चौपाई। सांची प्रीति करे प्रभु माहीं । राति दिवस विसरै सुधि नाहीं॥ कर में रवि रचि खिचरि बनाऊं। कब लालहि मैं भोग लगाऊं ॥" श्रीजगदीश भगवान् सुन्दर बालकरूप से नित्य प्रातःकाल आपही जाके बड़ी प्रसन्नता से भोजन कर आते थे। जितने विविध पदार्थ भोग लगा करते थे तिन सबमें प्रभु को यह अतिही नीकी लगती थी, सवसे पहिले इसी को पाया करते थे । एक दिन वहां एक सन्त गए; उन्होंने सब देखा; अपने जी में माना (विचार किया) कि "यह बड़ाभारी अपराध करती है," आप श्वास भरके बोले, और आपने श्रीवाईजी को बहुत प्रकार से साम्प्रदायिक आचारविचार का उपदेश किया। peo , .

भनिसुधास्वाद तिलक। ४०७ चाईजी डरी; और बताई हुई रीति भांति से खिचड़ी की; तथा सदाचार-अनुकूल उसको अर्पण किया; इस कारण बड़ा विलम्ब और अतिकाल हुआ ही ॥ यहां पंडोंने जो श्रीजगन्नाथजी के मन्दिर के पट खोले तो श्री- मुख में खिचड़ी लगी हुई दरशन पाए । क्योंकि अवेर होने के कारण शीघ्रतासे प्रभु विना श्रीमुख धोलाए ही वाईजी के यहांसे चले आए। (२४७) टीका । कवित्त । (५६६) पूछी, "प्रभु ! भयो कहा ? कहिये प्रगट खोलि, बोलिहू न आवे हमैं, देखि नई रीति है" । “करमा सुनाम एक खिचरी खवावै मोहि, मैं हूं नित पाऊं जाइ, जानि सांची प्रीति है ॥ गयौ मेरो सन्त, रीति भांति सो सिखाइ आयो; मते मो अनन्त, विनु जाने यो अनीति है"। कही वही साधु सों "जु ! सोधि आवौ वही वात"; जाइकें सिखाई, हिय आई, बड़ी भीति है ॥१६७॥ (४३२) वार्तिक तिलक। पंडोंने स्तुति विनय करके पूछा कि "प्रभो ! हम सब के मुँह से भय के मारे बात नहीं कहते वनती है, आज यह नई रीति देखने में आरही है, वार्ता क्या है ? सो कृपाकर खोलके प्रगट बता दीजिये।" आज्ञा हुई कि “करमा” नामक एक बाई है, सो नित्य ही मुझको खिचड़ी खिलाती है, मैं भी उसकी सच्ची प्रीति लखके नित्य जाके पा आया करता हूं। उसके यहां कल एक मेरे सन्त गए सो वे उसको सदाचार रीति भांति सिखा पाए हैं, इसीसे विलम्ब हुमा सो त्वरा (जल्दी) से मैं विना मुख धुलाए हुए ही चला आया हूं; वह साधु यह नहीं जानते कि मेरी अर्चापूजा की रीति इदमित्थं नहीं वरंच नेमियों तथा प्रेमियों के पथ इतने विविध १"मत मो अनन्त" मेरे प्रेमियों तथा भक्तों के भजन सेवा के मत और मार्ग अनेक तथा अनन्त हैं. इसमित्य नहीं । २"साधि आयौ वही बात" उसी बात को ठीक- ठाक कर, प्रायो॥ CAEKECTECHERS . .

A श्रीभकमाल सटीक.। . . . प्रकार के हैं कि जिनका अन्त कोई नहीं पा सकता, और इस रहस्य को विना जाने ही अन्यथा कुछ कहना अनीति है । "जाननिहारे जानहीं, बड़ो नेमते प्रेम॥" पण्डों ने उस सन्त से वही बात समझाकर कही कि "महात्मा जी ! आप जाके श्रीकाबाईजी से फिर कह आइये 'कि मैंने जो झं- मट वताएथे उन्हें आप जाने दीजिये, और जैसे प्रथम आपप्रभात ही शीघ्रता से भोग अर्पण किया करती थीं उसी सरल भाव से नि:- शंक आप अपनीसी कीजिये, श्रीभक्तवत्सल भावग्राहक सर्कार इसी में प्रसन्न हैं।" वे साधुजी डर गए और वेगि जाके वैसा ही ठीकठाक कर पाए । प्रभु आज्ञा से अबतक सबसे पहिले ही श्रीकर्माजी की खिचड़ी भोग लगाई जाती है। भावभक्रि, सरलता, और सच्ची प्रीति की जय !! चौपाई। "नहिं विद्या, कुल, जाति अचारा । रामहिं केवल प्रेम पियारा॥" (४५) (४६) सिलपिल्लेभक्ता उभय वाई। (२४) टीका । कवित्त । ( ५६५) "सिलपिल्ले भक्ता उभै बाई", सोई कथा सुनो, एक 'नृपसुता' एक 'सुना जिमींदार की' । आए गुरु घर, देखि सेवा, ढिग बैठी' जाइ, कही ललचाइ “पूजा कीजै सुकुमार की" ॥ दियो 'सिलाटूक' लकै, नाम कहि दियो वही, कीजिये लगाइ मन मति भवपार की। करत करत अनुराग बढ़िगयो भारी, बड़ी ये विचित्र रीति यही सोभौसार की ॥ १६८ ॥ (४३१) वार्तिक तिलक। • एक राजकन्या और एक भूम्यधिकारीसुता सिलपिल्ले-भगवान् १ "पिले" पिल्ला लड़का, घंटा ( "भखरसरगुजा" पोर की बोली ) "सिल पिले" -"शिलाटूम"-पत्यलके टुकड़े । २"उभय" =२. दो। ३ "जिमींदार"= ! ; ज़िमीदार, भूम्यधिकारी । ५ "सुकुमार" भगवत् । ५ "शोभासारभगवत् KAKCEKACHAR ..

४०६ . ****-- भक्तिसुधास्वाद तिलक। की भका दोनों बाइयों की अपूर्व कथा सुनिये। ये दोनों एकसाथही रहती खेलती थीं॥ एक समय राजा के गुरु महाराज आए; उनको श्रीशालग्रामजी की सेवा करते देख, ये दोनों पास जा बैठी; वरंच हरिकृपा से पूर्व- जन्म के भनि-संस्कारवश सेवापूजा को ललचाई, और गुरुजी से इन दोनों ने मांगा कि "महाराज | श्रीठाकुरजी की मूर्ति हमको भी दीजिये; हम शोभासार सुकुमार प्रभु की पूजा सेवा करेंगी॥" उन्होंने वालिका जान दोनों को एक एक टुकड़ा पत्थर देके कह दिया कि इन ठाकुरजी का नाम “सिलपिल्ले" है, मति और मन लगाके प्रीति से इनकी पूजा कियाकरो तथा यह प्रतीति रक्खो कि "येही हमको भवसागर से पार उतारदेंगे।" वे बड़भागिनी सेवा पूजा करने लगी; करते करतें उनकी प्रीति प्रतीति भगवत्मार्त में अत्यन्त बढ़गई, उन सिलपिल्लों में ही श्री- सुकुमार शोभासारजी के रूप अनूप उन दोनों को झलक गए । युगलसर्कार की कृपा की यह बड़ीअनोखी रीति है कि "करते करते नकल के, सही असल है जाय ॥” “सांचा जगमें विरला- कोय । झुटझुठ खेल सांचा होय ॥" भगवत् के सच्चे प्रेमियों के व्यवहार तथा आचरण का सच्चे मन से नेम से अनुकरण करते करते भगवत्कृपासे लोग वास्तव में हरि- भक्त अवश्य होही जाते हैं; यह बात विशेष करके जानके मनस्थ रखने की है। (२४६ ) टीका | कवित्त । (५६४) पाछिले कवित्त मांझ दुहुँन की एक रीति, अब सुनौ न्यारी न्यारी नीके मन दीजिये। "जिमींदारसुता" ताके भएं उभै भाई, रहैं आपुसमैं बैर, गाँवे मास्यो, सब छीजिये ॥ तामैं गई सेवा, इन बड़ोई कलेस कियो, जियो नाहिं जात, खान पान कैसे कीजिये। १"भए उभयभाई"-दो भाई थे, दोनों भाई अलग हुए । २ "गाँव मात्रो" गाँव में (इसके घर पर ) डाका डारा वा छापामारा, न लिया । ३. "बीजियै"-क्षय हुना, जाता रहा, नाश हुश्रा १ ४ "सेवा"-पूजने की मूर्ति । ** *** ห%%%%%%% ४१० श्रीभक्तमाल सटीक। रहे समुझाय, याहि कछु न सुहाय, तव कही "जायल्यावौ तेरे दोऊ समें धीजिय" ॥ १६ ॥ (४३०) वार्तिक तिलक । यहांतक तो दोनों लड़कियों की एक ही रीति की वार्ता हुई; अब आगे मन लगाके उनके सुचरित्र अलग अलग सुनिये ॥ (१) भूम्यधिकारीसुता (जमींदार की लड़की)। इसके दोनों भाई दो गाँव में रहते और उनमें परस्पर अत्यन्त ही विरोध था; वह दूसरा भाई इसपर छापा मारके गांव और घर को लूट लेगया। सबकुछ गया उसमें उस कन्या की सेवा पिटारी भी लुटगई । इस लड़की को बड़ा ही क्लेश प्राप्त हुआ; प्राण ही भार हो गए जीवन ही कठिन अप्रिय था तो अन्न जल कैसे अच्छा लगता। दो० "धवल महल, शय्या धवल, धवल शरद ऋतु रैन । एक राम विन व्यर्थ सव, जिमि बिनु पुतरी नैन ॥" सब लोग समझातेरहारगए, पर इसको कुछ भी नहीं सुहाताथा। तब सबने कहा कि "तुझको तो दोनों भाई समान ही हैं, तू उस भाई के पास जाके स्वभावतः अपनी सेवा की मूर्ति मांग ला ॥" दो०"उमा, जे रघुपति चरणरत, विगत काम मद क्रोध । निज-प्रभु-मय देखहिं जगत, कासन करहिं विरोध ? ॥" ( २५०) टीका । कवित्त । ( ५६३) गई वाही गांव जहां दूसरोज भाई, रहै बैट्योहो अथाई मांझ, कही वही बात है। "लेवौ जू पिछानि तहँ बैठे एक ठौर प्रभु,"बोलि. उठ्यो कोऊ “वोलि लीजै प्रीति गात हे" । भई आंखि रौती, लागी फाटिबे की छाती, सो पुकारी सुंर आरत सौं, मानो तन पात है। हिये आइ लागे, सब दुख दूर भागे, कोऊ बड़े भाग जागे, घर आई, ने समात है ॥ २००॥ (४२६) "सम धीजिये'-तुल्य प्रिय समाझये । २"अथाई" बैठक । ३"राती' जाल, अरुण । ४"सुर भारत' =भारत के वचन का स्वर । ५"न समात"-प्रदर्प से फूली समाती नहीं। SH FORT भकिसुधास्वाद तिलक। वार्तिक तिलक। वह भक्तिवती, जिस गांव में दूसरा भाई रहता था वहां गई, कि जहां वह अपनी अथाई में बैठा हुआ था इसने वही बात कही, अर्थात् “मेरे तो जैसे वह भाई तैले ही तुम, भाई भाई में चाहे जैसी हो पर मुझपर तो आप दोनों ही की समान कृपा चाहिये, मैं अपने ठाकुर के विन मृतकप्राय हो रही हूँ । मेरी सेवाकी मूर्ति देके मुझ को प्राणदान दीजिये।" उसने कहा कि "जा वहां सब ठाकुर एकही ठोर विराजते हैं अपना पहिचान के ले ले।" यह कन्या बड़ी प्रसन्न हुई; परन्तु उसके भाई के पास बैठे हुए लोगों में से एक विमुख बोल उठा कि “यदि ऐतीही प्रीति तुम्हारे हृदय में है तो तुम यहीं से अपने भगवान् को बुलालो॥" उस दुष्ट की ऐसी बात सुन यह विरह से व्याकुल होगई, आंखें सजल तथा लाल होनाई, छाती फटने लगी, अति भारत दशा में वैसेही स्वर से इसने अपने "सिलपिल्ले" भगवान् को पुकारा, ऐसी विकलहोके मानो अभी शरीरपात हुआ ही चाहता है ॥ करुणानिधान प्रभु उसकी वह टेर सुनते ही पहुँचकर उस बड़- भागिनि अनुरागिनि की छाती में आ लपटे ॥ . चोपाई। "शुद्ध भाव कन्याकर जाना । भारत वचन सुनत भगवाना। प्रेमतेप्रगट भए जगजाना मारिव्यापक सर्वत्र समाना।" "जय जय" की ध्वनि छा गई। उसके सब दुःव भागे; आनन्द से अपने ग्राम में भाई यहाँ भी "जय जय" धनि होने लगी। इसके परमानन्द का कहना ही क्या। "मृतकशरीर प्राण जनु भेटे ॥" (२) नृपसुता। (२५१) टीका । कविच । (५६२) सुनौ "नृपसुना" वात, भक्ति गात गात पगी, भगी सब विपै- FREECRECRUNCALCREDMCNCRECA-CC ised - । . ४१२ श्रीभकमाल सटीक। वृत्ति, सेवा अनुरागी है । व्याही ही विमुख घर, आयो लैन वहै चर, खैरी अखरी कोऊ चित चिन्ता लागी है ॥ करि दई संग; भरी अपने ही रंग, रली अनीहूं न कोई एक वही जासौं रागी है। आयोढिग पति, बोलि कियो चाहै रति, वाकी और भई गति, "मति आवौ, विथा पागी है" ॥ २०१॥ (१२८) वार्तिक तिलक। अब उस दूसरी वाई राज-कन्या की वार्ता सुनिये । जिसके मन तथा अङ्ग अङ्ग में भक्ति का विचित्र रङ्ग छा गया था; सब विपयों से उसको तीन वैराग्य होगया और उसके मन की वृत्ति श्रीयुगल- सर्कार के अनुराग में भलीभांति लग गई । प्रभुकृपा की जय ॥ उसका विवाह एक हरिविमुख के घर हुआ, सो वह वर इस अपनी स्त्री को ले जाने के लिये आया। इससे यह अतिही चिन्तित हो भारी घबराहट में पड़गई। उसके साथ वह विदा करदीगई, कोई सखी भी संग नहीं, वह अकेली अपने ही रंग में रंगीहुई चली। एक संग थे तो श्रीप्रभुप्राणनाथ ही थे कि जिनके प्रेम में वह निमग्न थी; अपनी डोली ही में श्रीठाकुरजी की पिटारी भी सादर रख ली॥ मार्ग ही में, जब उसके पास जाकर पतिने उसके साथ वार्स- लाप तथा प्रीति व्यवहार चाहा, तो वह अत्यन्त घबड़ाके वोली कि "तुम मेरे पास न आओ, मैं बड़ी ही व्यथित हूं।" (२५२) टीका । कवित्त । (५६१) "कौन वह विथा ? ताको कीजिये जतन वेगि, वड़ो उदवेग, नेकु वोलि सुख दीजिये" । बोलिवो जो चाहो, नौ पै चाही हरि- भनि हिये, विन हरिभक्ति मेरो अंग जिन छीजिय" । आयो रोष भारी अव मन में विचारी, “वा पिटारी में जु कछु, सोई लैकै न्यारो कीजिये" । करी वही बात, मंसि जलमांझ डारिदई, नई भई ज्वाला, जियो जात नहीं; खीजियै ॥ २०२ ॥ (४२७) १ "खरीअरवरी =शोक से अत्यना घबड़ाई । २ "मूसि"चोरीकरक, चुराके । SKRUGRESCORRECIRCRECORRECESCESCORE .

18 भक्रिसुधास्वाद तिलक। वार्तिक तिलक । पति ने पूछा कि "तुमको व्यथा कौनसी है ? वताभो कि उसका प्रयत्न शीघही किया जावे; मुझे बड़ाही उद्वेग है, तनक अपने मधुर वचन से मुझको सुखी करो।" इन्होंने उत्तर दिया कि “यदि बोलना बुलाना चाहो तो श्रीभगवान् की भक्ति स्वीकार करो, नहीं तो मेरा अंग स्पर्श मत करो।" उसको क्रोध आगया। और यह विचार करके कि "इस पिटारी में जो कुछ है वही वाधक है, उसी को चोरीसे नदी में डाल देना चाहिये" उस दुष्ट ने वैसाही किया; अर्थात् पिटारी छिपाके नदी में डालही दी। अपनी सेवा-मूर्ति न देखकर इसके हृदय में नई दाह उत्पन्न हुई, क्रोध तथा अतिशय व्यथा से जलने लगी॥ (२५३) टीका | कवित्त । (५६०) तज्यो जल अन्न; अब चाहत प्रसन्न कियो, होत क्यों प्रसन्न जाको सरवस लियो है । पहुँचे भवन आइ, दई सो जताइ * वात, गात अति छीन देखि, "कहा हठ कियो है ?" ॥ सासु समुझावै, कछु हाथसों खवावे, याकौं वोलिहू न भावे, तब धरकत हियो है। "कहै लोई करें, अव पांय तेरे पर हम,"बोली "जब वेई आवे तोही जात जियो हैं" ॥२०३ ॥ (४२६) वार्तिक तिलक। प्रभु की विरहिनि ने अन्नजल खाना पीना तजदिया। अब उस विमुख राजकुमार ने इसको प्रसन्न करना चाहा, बहुत प्रयत्न किये, परन्तु जिसका सर्वस्व ही उसने हर लिया सो भज्ञा कैसे प्रसन्न होती ? जव वे सब घर आ पहुँचे तव पतिने सारी वार्ता कह सुनाई। सासु तथा और स्त्रियां अनेक प्रकार से समझा थकीं; और उसको झटकगईहुई देखकर पूछने लगी कि "अपने इस हठ का परिणाम तो बता" सासु अपने हाथसे उसको खिलाया चाहतीथी; पर इसको किसी की कोई बात भली नहीं लगतीथी, उसका जी धड़कता था। •पाठान्तर "जनाइ"॥ KEEPIKACHAKRANCY K ॐ श्रीभकमाल सटीक। . सासु कहने लगी कि “हम अब तेरे पांव पड़ती हैं जो कहे सोई करें।" इसने उत्तर दिया कि “जब वेही (प्राणनाथ श्रीठाकुरजीही) मिलें तभी जीसकती हूं।" (२५४) टीका । कवित्त । (५६९) आए वाही ठौर, भार आई, तनु भूमि गिस्यो, ढस्यो जल नैन, सुर आरति पुकारी है । भनिवस श्याम जैसो काम बस कामी नर, धाइ लागे छाती सो जु संग सो पिटारी है ॥ देखि पति सासु आदि, जगत विवाद मिट्यो "यादही जनम गयो, नेकु न सँभारी हैं"। किये सब भक्क, हरि साधु सेवा मांझ पगे, जगे कोऊ भाग घर वधू यो पधारी है ॥२०४॥ (४२५) वार्तिक तिलक। तब वे उसी नदी के तीर उसी ठिकाने आए कि जहां पतिने श्रीसेवा की पिटारी जलमें फेंक दी थी। उस स्थान को देख के जैसा इसका हृदय हो आया उसका अनुकथन विरह- रूपी अग्नि से संतत प्रेमी हो सो कर सकता है। यह चकर खाव धरती पर गिर पड़ी, आँखों से विरह के अश्रु की धारा बहने लगी; बड़े आरत स्वर से अपने प्राणपति भगवान् सिलपिल्ले को पुकार उठी- दो० "मिलहु मोहिं तुम आइ प्रभु, दयासिन्धु भगवान ! दर्शन बिनु तव दालि अब, तजन चहति है प्रान.॥" करुणाकर श्रीश्याम तो भनिप्रिय ऐसे हैं ही कि "कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभिहि प्रिय जिमि दाम," आप उसकी वह आरत टेर सुनते ही अपनी विरहिनि वियोगिनि की छाती में पिटारी (सम्पुट ) समेत आलिपटे॥ दो."सुनतहि अति भारत बचन, करुणानिधि अतुराई। निकास सरित ते गोद तिहि, आ लिपटे हरि धाइ ॥" अब कन्या के आनन्द की छाया ऐसी प्रतीति होती है कि- १ "भार"-धुमरी, चकर ॥ CKEReck Excist

,
HIN
भक्तिसुधास्वाद तिलक ।
चौपाई।
"परम रंक जनु पारस पावा । अन्धहि लोचन लाभ सुहावा ॥"
सासु
पति आदि सब यह भक्तिप्रभाव देखके दंग होगये । संसार
के व्यर्थ विवाद से सबका मन हटा, पछताने लगे कि "श्रीहरि-
भक्रि विन जन्म गये, कुछ सँभाला नहीं, हमारे भाग जागे कि
ऐसी वधू घर में आ विराजी॥"
निदान, इसने घरभर को भगवद्भक्त बना दिया । भगवन्त
तथा सन्तों की सेवा करके वे सव भव पार होगए।
"श्रीसिलपिल्ले” नाम भगवत् का किस वेद में किस नामावली
'वा “सहस्रनाम" में है ? उनका किस गंडकी नदी से प्रादुर्भाव
हुआ था ? और क्या चिह्नचक्र उनमें थे ? वे कब श्रीनारदपंचरात्र
रीति इत्यादि से संस्कृत हुए थे ? पर शुद्ध अन्तःकरण के सत्य
प्रेम ही ने यह चमत्कार दिखाया । तब, वस्तुतः श्रीशालग्रामजी
पर नेम प्रेम से जो श्रीतुलसीदल चढ़ाते हैं, अर्चामूर्ति की विधि-
वत् सप्रेम पूजा करते हैं, उनके भाग्य का कहना ही क्या है ? ॥
(४७।४८) भक्तों के हित जिन्होंने सुतों को
विष दिया वे दो बाई।
(२५५) टीका | कवित्त । (५८%)
भक्कन के हित सुत विष दियौ उभै बाई कथा सरसाई, बात
खोलिकै बताइयै । भयो एक भूप ताके भक्त हूं अनेक आवै, आयो
भक्त भूप, तासौं लगन लगाइयै ॥ तिनहीं चलत ऐपै चलन न देत
राजा, वितयो वरष मास कहै "भोर जाइय” । गई आस टूटि,
तन छूटिवे की रीति भई, लई वात पूछि रानी, सवे लै जना
इयै ।। २०५ ॥ (४२४)
१ 'यताइये" ताई जाती है । २ "भक्तभूप सन्तशिरोमणि, भक्तराज | ३ "लगन
लगाइये =प्रेम लगन लगाया था।

, ४१६ श्रीभक्तमाल सटीक। पातिक तिलक। दो वाइयों ने भक्तों (सन्तों) के लिये, अपने २ पुत्र को विप ही देदिया; उनकी कथा अति सरस है, सो स्पष्ट करके लिखी जाती है- (१) एक बाई जी। एक भक्क राजा था, उसके यहां सदैव अनेक साधु कृपाकर आया करते थे। एक समय एक बड़े महात्मा भकभूप कई मूर्ति संत साथ लिए आए; उनमें राजा का विशेष अनुराग होगया। महात्माजी नित्य वहां से अन्यत्र चला चाहते थे, परंतु राजा नहीं जाने देता और कहा करता कि "महाराज आज रह जाइये, कल भोर जाइयेगा।" योही एक वर्ष और एक महीना बीत गया । तब उन संत ने अवश्य प्रभात जाने का निश्चय ही कर दिया और अब उनके विराजने की आशा टूट ही गई, तब राजा ऐसा व्याकुल हुआ कि उस सन्त बिन उसके जीने की संभावना नहीं रही। रानी ने राजा से पूछकर सव मर्म जान लिया ॥ (१५६ ) टीका। कवित्त । (५८७) दियो सुत विष रानी, जानी "नृप जीवै नाहि, सन्त हैं स्वतन्त्र, सो इन्हैहि कैसैं राखिये"। भये विन भोर, वधू शोरकरि रोय उठी भोयगई रावले मैं, सुनी साधु भाषियै ॥ खोलिडारी कटिपट, भवन प्रवेश कियो, लियो देखि बालककों नीलतनु साषियै। पूछयो भूपै- तियासौं जू "सार्च कहि कियो कहा?" कही "तुम चल्योचाही नैन अभिलाषियै” ॥ २०६॥(४२३) वार्तिक तिलक । राजा का जीना असंभव जान, रानी सोच विचार करने लगी; तब अंतर्यामी प्रभुने एक अनूठा उपाय उसके मनमें फुराया कि "उसने अपने पुत्र को विष देदिया'; क्योंकि "साधु तो स्वतन्त्र हैं ही इनको और किस प्रकार से अटका रक्खू" कुछ रात्रि रहते ही १ "भोयगई' =ज्याप गई, छागई, व्याप्त हुई। २ 'रावले"-अन्त पुर, रनियांस । ३ "भूपतिया" कृपयधू, रानी । ४ "सांचकहि" यह कहके पूछा कि "सांच सांच कहो कि क्या किया"1 SOREA , ************ भक्तिसुधास्वाद तिलक। ..४१७ रानी रो उठी, अन्तःपुर में भीतर बड़ा कोलाहल तथा हाहाकार मच गया। महात्माजी ने भी शीघ्र ही कटिपट खोलडाला, रनि. वास में प्रवेशकर वात पूछी; लड़के का शरीर देखा तो प्रत्यक्ष काला हो गया था। महात्माजी ने रानी से पूछा कि “जी! सच सच कहो कि तुमने यह किया क्या है ?" रानी ने बता दिया कि आपने चलना ही निश्चय किया, परन्तु हम सबकी आंखों को तो दर्शन की भारी प्यास धनी ही है, तृप्ति हुई ही नहीं ॥" दो०"महाराज ! तव गवन सुनि, जानि भूप तनु नास । मैं दै दीन्ह्याँ सुत गरल, सन्त करें जैहि वास॥" (२५७ ) टीका | कवित्त । (५८६) छातीखोलि रोए किहूं वोलिहूं न आवै मुख, सुख भयो सारी, भक्ति रीति कछु न्यारी । जानी ऊं न जाति, जाति पांति को वि- चार कहा, अहो रस सागर सो सदा उरधारीय ॥ हरिगुण गाय, साखी सन्तनि बताय, दिये वालक जिवाय, लागी ठौर वह प्या. रीयै । संग के पठाय दिये, रहे वे जे भीजे हिये, बोले आप "जीऊं जौनमारि कै बिडारीय" ॥ २०७॥ (४२२) वार्तिक तिलक। सन्त महात्माजी छाती खोलके ऊंचे स्वर से रोने लगे; इस- प्रेमिन का आश्चर्य कर्म देख आपको प्रेम जनित आश्चर्य ही दुख हुआ, यहांतक कि मुंह से स्पष्ट बात भी नहीं निकलती थी; परन्तु साथ साथ इसकी लोकोत्तर अनूठी प्रेमाभक्ति की कुछ न्यारीही रीति विचार के हृदय में अति ही आनन्द हुआ। भक्तराजाजी जाति में क्षत्री से कोई न्यून ही थे यह बात सन्त ने जानी, पर विचार किया कि "मैं इनमें जातिपाति का विवेक १ रहे वेज पीजे हिये"-वेही संत यहां रह गए कि जिनके हृदय श्रीभगवान् के प्रेम रस से भीगे थे निरस सुकन थे । n , *** ४१८ श्रीभक्तमाल सटीक। क्या करूं; ये तो राजा रानी दोनों भगवत्प्रेमका समुद्र ही हृदय में धारण किए हुए हैं, इससे ये प्रेमरूपही हैं । अपने संग के संतों को बुलाके साक्षी करके, श्रीभगवान् के अमृतरूपी गुणगाए, गुणगाए, यहांतक कि श्रीभगवत्-कृपा से मृतक बालक को जिला ही दिया । तब श्रीसीताराम नाम तथा यश की "जय जय” कार हुई ॥ महात्माजी को उस भक्त का स्थान अति प्रिय लगा, जितने सन्त साथ में थे उन सबसे कहा कि "आप लोग जाइये, मैं यहांही रहूंगा" वे प्रायः सब चले गए । केवल ऐसे ऐसे कई भक्कसन्त कि जिनके अन्तःकरण रूपी वस्त्र प्रेमरङ्ग से रङ्गे थे, वे यह कहते हुए कि "जो आप मारके भगाइये तो भी भापको छोड़के यहां से हम जानेके नहीं," प्रेम में बँधके रहगए ॥ (२) दूसरी बाईजी। ( २५% ) टीका | कवित्त । ( ५८५) सुनौ चित्तलाई वात दूसरी सुहाई हिये, जिये जग माहिं जी लौं, संत संग कीजिये । भक्न नृप एक, सुता व्याही सो अभक्त महा जाके घर मांझ जैन नाम नहीं लीजियै ॥ पल्यो साधु सीथ सौं शरीर, हग रूप पले, जीभ चरणामृत के स्वादही सों भीजिये। रह्यो कैसे जाय अकुलाय न बसाय कछू "आवें पुर प्यारे तब विष सुत दीजिय"॥ २०८ ॥ (४२१) वार्तिक तिलक । अब उस. दूसरी भगवत्-भका बाई की वार्ता जोकि सुनने से अतिप्रिय लगेगी सो चित्तलगाके सुनिये; देखिए, इसने सन्तसेवा दर्शन के लिए कैसा विलक्षण यत्न किया। इससे सज्जनों को उचित है कि जबतक जगत् में जियें तबतक अवश्य सन्तों का संग करें । एक मन राजा साधुसेवी था; उसकी लड़की ऐसे हरिविमुख के जन प्यारे, सन्त, हरिजन। २"नहीं लीजियै" नहीं लेता था। ३"भीजिये"-भीगा हुना था, SkcBCCSIRECORRECRUIRECReso . भीजा रहा करता था।

" भनिसुधास्वाद तिलक। ४१६ साथ व्याहीगई कि जिसके घर में सन्त भगवजन का नाम भी कोई नहीं लेता वा जानता था। इस भका राजकन्या का शरीरतो साधुओं की सीथप्रसादी (जूठन ) से पलाहुआ था, और आंख सन्तों के रूपके दर्शनों की पली थी, तथा इसकी रसना भगवत् और सन्त- चरणामृत के रसकी ही रसज्ञ थी, सो इसके श्वसुरालय में यह सब अति ही दुर्लभ था, तब इससे रहा कैसे जाता, अत्यन्त व्याकुल रहाकरती यो"कोउ दुख दुसह दुखद न कठिन ऐसो, जैसो कहूँ छिनक विमुखसँग रहियो ।"कुछबस नहीं चलता था। एकदिन श्री. सीतारामजी के स्मरणपूर्वक विचार करने से इसको यह फुरा कि “जब हरिप्यारे संत इस ग्राम में आवै तव में अपने पुत्र को विष दे दूं।" यह निश्चयकर इसने अपनी लौड़ी से यह कह रक्खा कि 'जव इसग्राम में साधु आवें तब मुझसे कहियो॥" इसीसे कहा है कि "विना भनमाल भक्ति-रूप अति दूर है।" (२५६ ) टीका । कवित्त । (५८४) आए पुर सन्त आइ दासी ने जनाइ कही, सही कैसे जाइ, सुन विष लैकै दियो है। गए वाके प्रान, रोय उठी किलकानि, सब भमि गिरे आनि, ट्रक भयो जात हियो है ।। बोली अकुलाय “एक जीवे को उपाय, जोपै कियो जाय, पिता मेरे कैयौवार कियो है"। "कहै सोई करें" दृग भरें "ल्यावा सन्तनिकौं", "कैसे होतसन्त?" पूडयो; चेरी नाम लियो है ॥ २०६ ॥ (४२०) वार्षिक तिलक। रामकृपासे गांव में साधुओं का एक वृन्द आ उतरा; सो टहलना ने आके इस भक्तिवती को जनाया । तब जो पूर्वमें कह :आए कि यह वाल्य अवस्था ही से सन्तोंका दर्शन चरणामृत आदिक सप्रेम लेरही थी सो उसके वियोग की पीड़ा अब इससे कैसे सहीजाय । इसलिए इसने अपने बालक को विप देदिया; वह मरगया; तब सब १"नाम लियो है" बाह्य चिह्न प्रादि बतादिये ॥ , ॐ श्रीभक्तमाल सटीक। ४२० रो उठा; हाहाकार मचगया; राजा के सहित सब मूछिन हो भूभिपर गिरे सबके हृदय टूक दूक हुएजातेथे। तब भकावाई अकुलाके बोली कि"पुत्र के जी उठने का एक उपाय है जो आप सब कीजिये, क्यों- कि मेरे पिता ने कई वेर यही उपाय किया है सो सफल हुआ है मैंने प्रत्यक्ष देखा है।" राजा और सोने आंखों में आंसू भरे हुए, रोरोके, कहा कि "जो तू कहे सोई उपाय करें" इसने कहाकि “सन्तों को शीघ्र हूँढ़ के बुलालाइये।" उन्होंने पूछा कि सन्त कैसे होते हैं?॥" दासी ने सन्तों के बाह्य चिह्न कह सुनाये; और यह भी बताया कि "अमुक ठिकाने आज बहुत से साधु लोग आ उतरे हैं।" (२६०) टीका | कवित्त । (५८३ ) चली लै लिवाय चेरी, बोलिवो सिखाय दियो "देखिकै धरनि परि पाय गहि लीजिय" । कीनी वहीरीति, गधारा मानौ प्रीति सन्त करी यौँ प्रतीति "गृह पावन को कीजिये" ॥ चले, सुखपाय दासी आगे ही जनाई जाय, आय ठाढ़ी पौरि, पाय गहे, मैति भीजिये । कही हैरेवात "मेरे जानौं पितामात मैं तो अंगमें न माति आज, प्राण वारिदीजिये" ॥ २१०॥ (४१६) घात्तिक तिलक । जहां सन्त उतरे थे, टहलनी वहां राजा को लिवा लेचली; मार्ग में यह भी बतादिया कि सन्तों से बातें करने की रीति ऐसी होती है, तथा यह भी कि 'लम्बी दण्डवत् करके चरणारविन्दपकड़ लीजियेगा"; क्योंकि यह दासी इसके पिता ही के घर की थी जहां संतसेवा होती थी। उन्होंने वैसा ही किया । राजा के नेत्रों में जो पुत्रमरण के दुःख से आंसुओं की धारा बहती थी, सो सन्तों ने यही प्रतीति की कि "हमारेही प्रेमसे अनु बहते हैं।" राजा ने हाथ जोड़ के सन्तों से प्रार्थना की कि अपने पंदरज से दास के घर को पवित्र कीजिये" सन्त कृपाकर मुखपूर्वक १"पारि"निघास की डेउढ़ी। २ "मतिभौजिय"-युद्धि प्रेम में पग गई, मति प्रीति रङ्ग से भीजी हुई। ३ "हरे"-धीरे, धीमेसा में 1४ "न मति" नहीं समाती थी, अँटती नहीं थी, अमाती नहीं ।।

. RS भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४२१ चले तव चेरी ने हर्षित होके आगे ही जाके संतों के आने का समा- चार कहा; अगवानी के लिये भक्का वाई अपनी डेवढ़ी पर आके खड़ी हुई; साधुओं के पधारते ही चरणकमलोंपर गिरपड़ी; प्रेमाश्रु की धारा आंखों से बह चली, प्रेमरस से मति भीज गई। हाथजोड़ सन्तों से धीरे से कहने लगी कि मैंतो अपने पिता माता परमहित- कारी सन्तों ही को जानती हूँ; मैं तो आजहर्षसे फूली अपने शरीरमें नहीं अंटती हूँ; जी चाहता है कि आपसब पर प्राण न्योछावर करदूँ।" (२६१) टीका । कवित्त । (५८२) रीभिगए सन्त, प्रोति देखि के अनन्त, कह्यो "होइगीजु वही सो प्रतिज्ञा तें जो करी है"। वालक निहारि जानी विष निरंधार दियौ, दियो चरनामृत कौं, प्रानसंज्ञा धरीहै ॥ देखत, बिमुख जाय पाये ततकाल लिये, किये तब शिष्य, साधुसेवा मति हरी है। ऐसें भूप नारि पति राखी सब साखी, जन रहे अभिलाखी जो पै देखौ याही घरी है ॥ २११॥(४१८) वार्तिक तिलक । इस भक्का बाई (रानी) की अपार प्रीति देख, साधलोगों ने बहुत रीझ के कहा कि "तुमने अपने मनमें जो प्रतिज्ञा की है सोई ठीक होगा" (क्योंकि इसके श्रद्धा विश्वास वश श्रीरामकृपासे वैसे ही पूरे सन्त भी प्राप्त हुए थे;) फिर बालक की ओर देख यह नि- श्चय जाना कि इसको विप दियागया है, सन्तोंने कृपा करके भगवत् और संतों का (अपना) चरणामृत उसको पिलाया। अकालमृत्यु- हरण चरणामृत देते ही श्रीयुगलसर्कार की कृपा से बालक के प्राण पलट आए और चैतन्य होगया ॥ श्लो० "अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् । विष्णोः पादोदकं पीत्वा शिरसा धारयाम्यहम् ॥" दो० "धन्य सन्त जहँ जहँ फिरें, तहँ तह करत निहाल । चरणामृत मुख डारिकै, फेरिजियायो वाल ॥" "निरधार"-निश्चय | "पांयलिये"-चरणपड़े ॥

****** श्रीभक्तमाल सटीक। । रो उठा; हाहाकार मचगया; राजाके सहित सब मूछिन हो भूभिपर गिरे सबके हृदय टूक दूक हुएजातेथे। तब भक्कावाई अकुलाके बोली कि "पुत्र के जी उठने का एक उपाय है जो आप सब कीजिये, क्यों कि मेरे पिता ने कई वेर यही उपाय किया है सो सफल हुआ मैंने प्रत्यक्ष देखा है।" राजा और सवाने आंखों में आंसू भरे हुए, रोरोके, कहा कि "जो तू कहे सोई उपाय करें" इसने कहाकि "सन्तों को शीघ्र हूँद के वुलालाइये।" उन्होंने पूछा कि "सन्त कैसे होते हैं?॥" दासी ने सन्तों के बाह्य चिह्न कह सुनाये; और यह भी बताया कि "अमुक ठिकाने आज बहुत से साधु लोग आ उतरे हैं।" (२६०) टीका । कवित्त । (५३) चली लै लिवाय चेरी, वोलियो सिखाय दियो "देखिकै धरनि परि पांय गहि लीजियै” । कीनी वहीरीति, हगधारा मानो प्रीति सन्त करी यौं प्रतीति “गृह पावन को कीजिये” ॥ चले, सुखपाय दासी आगे ही जनाई जाय, आय ठाढ़ी पॉरि, पांये गहे, मंति भीजिये । कही हैरेवात "मेरे जानौं पितामात मैं तो अंगमें न माति आज, प्राण वारिदीजिये" ॥ २१० ।। (४१६) यात्र्तिक तिलक । जहां सन्त उतरे थे, टहलनी वहां राजा को लिवा लेचली; मार्ग में यहभी,चत्तादिया कि सन्तों से बातें करने की रीति ऐसी होती है, तथा यह भी कि "लम्बी दण्डवत् करकेचरणारविन्द पकड़ लीजियेगा"; क्योंकि यह दासी इसके पिता ही के घर की थी जहां संतसेवा होती थी। उन्होंने वैसा ही किया ॥ राजा के नेत्रों में जो पुत्रमरण के दुःख से आंसुओं की धारा बहती थी, सो सन्तों ने यही प्रतीति की कि "हमारही प्रेम से अनु बहते हैं।" राजा ने हाथ जोड़ के सन्तों से प्रार्थना की कि अपने पदरज से दास के घर को पवित्र कीजिये" सन्त कृपाकर सुखपूर्वक १"पौरि"रानेवास की डेउढ़ी । २ "मतिभीजिये -बुद्धि प्रेम में पग गई, मति प्रीति रङ्ग से भीजी हुई। ३ "हरे"-धीरे, धीमेपर में । ४"न मति" नहीं समाती थी, अँटती नहीं थी, अमाती नहीं !! RAKASORRCksc+sote - . भनिसुधास्वाद तिलक। ४२१ चले तब चेरी ने हर्षित होके आगे ही जाके संतों के आने का समा- चार कहा; अगवानी के लिये भक्का वाई अपनी डेवढ़ी पर आके खड़ी हुई; साधुओं के पधारते ही चरणकमलोपर गिरपड़ी; प्रेमाश्रु की धारा आंखों से वह चली,प्रेमरस से मति भीज गई। हाथजोड़ सन्तों से धीरे से कहने लगी कि "मैंतो अपने पिता माता परमहित- कारी सन्तों ही को जानती हूँ; मैं तो आजहर्षसे फूली अपने शरीरमें नहीं अंटती हूँ; जी चाहता है कि आपसब पर प्राण न्योछावर करदूँ।" (२६१) टीका । कवित्त । (५८२) रीझिगए सन्त, प्रीति देखि के अनन्त, कह्यो "होइगी जु वही सो प्रतिज्ञा तें जो करी है" । चालक निहारि जानी विष निरधार दियो, दियो चरनामृत कौं, प्रानसंज्ञा धरी है ॥ देखत, विमुख जाय पाये ततकाल लिये, किये तब शिष्य, साधुसेवा मति हरी है। ऐसें भूप नारि पति राखी सव साखी, जन रहैं अभिलाखी जो पै देखो याही घरी है ॥ २११॥ (४१८) वातिक तिलक। इस भक्का वाई (रानी) की अपार प्रीति देख, साधलोगों ने बहुत रीझ के कहा कि "तुमने अपने मन में जो प्रतिज्ञा की है सोई ठीक होगा" (क्योंकि इसके श्रद्धा विश्वास वश श्रीरामकृपासे से ही पूरे सन्त भी प्राप्त हुए थे;) फिर बालक की ओर देख यह नि- श्चय जाना कि इसको विप दियागया है, सन्तोंने कृपा करके भगवत् और संतों का (अपना) चरणामृत उसको पिलाया। अकालमृत्यु- हरण चरणामृत देते ही श्रीयुगलसर्कार की कृपा से बालक के प्राण पलट आए और चैतन्य होगया । श्लो. “अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् । विष्णोः पादोदकं पीत्वा शिरसा धारयाम्यहम् ॥" दो. "धन्य सन्त जहँ जहँ फिरें, तह तहँ करत निहाल। चरणामृत मुख डारिकै, फेरिजियायो बाल ॥" "निरधार"-निश्चय | "पांगलि"-चरणपड़े । ४

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BAHARHARAPAR
४२२
श्रीभकमाल सटीक ।
जयजयकार शब्द के साथ माता पिता आदिक सब अति हर्ष
को प्राप्त हुए; और राजा जो इस बालक का पिता था उसके सहित
सव भक्निविमुख लोग तुरत ही साधुओं के पांवोपर यह विनय करते
हुए गिरे कि 'हमको अब शरणदीजिये।" श्रद्धा देख संतों ने उन्हें
शिष्य किया ॥
तदनंतर राजा प्रत्यक्ष परचो देख सब सन्तों की इस प्रकार सेवा
किया करता कि जिसको देख सबकी मति हरजाती थी॥
जो श्रीनामास्वामीजी ने इस छप्पय में "भूपनारि प्रभु राखि-
पति" लिखा है, सो इस प्रकार प्रभु ने इस भका रानी की लज्जा
प्रतिज्ञा रखली; उसके सब सज्जन साक्षी हैं। सो जो कदापि और
किसी को ऐसी भक्ति की अभिलाषा हो, तो जैसे इसकी इसी घड़ी
अभिलापा पूरी हुई, वैसी ही पूर्ण होगी। लोक में रीति है कि जब
तत्काल देख लो तथा परचो से तोप को प्राप्त हो, तो सब जनों की
अभिलापा सन्तों में बढ़ती है ।
(०६०)प्पय । (५१)
आशै अगाध दुहुँ भक्त को, हरितोपन अतिशै
कियो । 'रङ्गनाथ" को सदन करन बहु बुद्धि विचारी।
कपट-धर्म रचि* जैन-द्रव्यहित देह विसारी ॥ हंस
पकरनैं काज बधिक वानौं धरि आए। तिलक'-दाम
की सकुच, जानि तिन, आप बँधाए ॥ सुतबध हरिजन
देखिकै, दै कन्या, आदर दियो । आशै अगाध दुहुँ
भक्त को, हरितोषन अतिशैकियो ॥५१॥ (१६३)
वार्तिक तिलक।
(१।२) इन मामा भानजे दोनों भगवद्भक्तों के भाव भक्ति का
* "रवि' =ोप बनाके । । "वानो" भगवन् चेपा । "तिलक दाम"-ऊन् पुगड़
और मागपती कराठी माला । + "आशै अगाध"-प्रथाह अभिप्राय ॥

* भकिसुधास्वाद तिलक। ४२३ अभिप्राय अति अथाह था कि जिस अपनी भक्तिभाव से अपने वर्णधर्म तथा प्राणपर्यन्त अर्पण करके श्रीभगवान् को इन्होंने अतिशय प्रसन्न किया; किस प्रकार से सो कहते हैं- श्रीरंगनाथजी के विराजने के लिये श्रीविग्रह के अनुरूप बड़ा- भारी मन्दिर बनवाने के लिये द्रव्य मिलने के हेतु बुद्धि में बहुत प्रकार के उपाय विचार किये निदान कपट से जैनधर्मियों के शिष्य हो उनका वेष धारण कर अपने शरीर प्राण पर्यन्त की ममता छोड़के पारस द्रव्य ले मन्दिर बनवाया ॥ (३।४) इसी भांति, हंसभक्त तथा वैश्यभक्त इन दोनों की भक्ति का भी आशय वैसाही अगाध था। उन्होंने भी हरि की अति प्रसन्नता प्राप्त की। हंसों के पकड़ने के लिये व्याधा सब सन्त का वेष धरके आए; तिलक कराठी माला के संकोच से वधिकों का कपट जानकर भी हंसों ने अपने प्राणों का लोभ तज अपने नई बँधवा लिया । और सदावती-वैश्यभक्त भागवत वेषधारी लोभी को जाना और देखा कि इसने मेरे पुत्र को मार ही डाला है परन्तु अब शोक- युक्त है, इससे उसको अपनी कन्या विवाह कर आदर दिया। इस प्रकार इन चारों भक्तों की भक्ति अथाह है कि जिसमें बड़े बड़े भक्कों का मन डुबजाता है । १. मामू। ३. हंस भक्तों का जोड़ा। २. भानजा। ४. सदाव्रती साहूकार ॥ (४६ । ५०) मामू भानजा। (२६३) टीका कवित्त । (५८० आशय अगाध दोऊ भक्त मामा-भानजे कौं, दियो प्रभु, तोष ताकी वात चितधारियै । घरतें निकसि चले वनकौं विवेक रूप3B मूरति अनूप बिन मन्दिर निहारियै ॥ दक्षिण मैं "रङ्गानाथ" नाम अभिराम जाकौ, ताको लै वनावै धाम, काम सब टारिय। धन के * पाठान्तर "पोप"।१ "धाम" मन्दिर । BECORRE CELORSCIM LOCK E ४२४ HERERRRRE श्रीभक्रमाल सटीक। जतन फिरे भूमि पे, न पायो कहूं, चहूं दिशि हेरि, देख्यो, भयो सुख भारियै ॥ २१२ ॥ (४१७) वार्तिक तिलक । जो नाते में मामू भानजा होते थे, उन दोनों महाभक्तों की भक्ति का अभिप्राय अथाह था; जिस तत्सुखात्मक प्रेमा भक्ति से श्रीभग- वत् को भी इन्होंने सन्तुष्ट किया; सो वार्ता सुनके चित्त में रखलीजिये। श्रीरामकृपा से विवेक उत्पन्न हुआ इससे असार संसार से वि. रन हो, घर त्याग के, भजन करने के लिये दोनों ही वन को प- धारे; दक्षिण में एक ठिकाने, जहाँ श्रीविभीषणजी श्रीअयोध्याजी से लेजाकर पधरा गए थे, वहां "श्रीरंगनाथजी" नामक ठाकुरजीकी अति अभिराम विशाल मूर्ति विना मन्दिर की देखकर जी में ऐसी अभिलापा हुई कि "अब और सब कार्य छोड़ के इनका मन्दिर बनवावें ।" इसलिये बहुतसे द्रव्य के हेतु पृथ्वीपर अनेक देशों में चारों ओर फिरे; पर कहीं न पाया। ढूंढ़ते ढूंढ़ते अन्त में एक अटूट द्रव्य देखकर इनके हृदय में बड़ाभारी आनन्द हुआ। (१६४) टीका । कवित्त । (४७६) मंदिर सरावगी कौं, प्रतिमा सो पारस की, औरसन-कियो बेद न्यून हूँ बतायो है । “पावें प्रभु सुख, हम नहूँ गये तो कहा ?" घरक न आई ! कानलै फुकायो है। ऐसी करी सेवा, जासी हरी मति केरा ज्यों, सेवेरा-समाज सबै नीके के रिझायो है। दियो- सौपि भार, तब लैबे को विचार करें “हरें कौन राह ?" भेद राज- नि पायो है ॥ २१३॥ (४१६) वार्तिक तिलक । वह अटूट धन क्या है सो कहते हैं, एक नगर में देखा कि १ "भूमि"अनेक स्थानों में, बहुत जगहों में । २ "नारसन" दरसपरस, दर्शन स्पर्श । ३ "धरक" शंका, धड़क । ४ "के घरा' केवड़े का फूल । ५ "सवरा" सरावगी, बौद्ध, जैनी. जैन । ६ "राह" मार्ग, मग पंथ ॥

४२५ , भकिसुधास्वाद तिलक। सरावगियों का बड़ाभारी मन्दिरहै; उसमें पारसनाथकी प्रतिमा पा- रस की ही है ("पारसनाथ-मूर्ति पारस की") जिसकी प्रतिमा का दर्शन स्पर्श करना भी वेद ने अति न्यून (बड़ापाप) बताया है ॥ "गजैरापीड्यमानोऽपि न गच्छेज्जैनमन्दिरे ॥" नितान्त, दोनों भक्त मन में विचारकर आपस में निश्चयकर कहनेलगे कि "सुन्दर मन्दिर बने, तथा उसमें विराज के प्रभु सुख पावें, सो भला है; और हम यह न्यून कर्म करनेसे नरक में जायेंगे तो क्या चिन्ता है।" यह मनमें दृढ़कर वेधड़क जा कानपुंकाके उनका मन्त्र ग्रहणकर उनके शिष्य हो, ऐसी सेवा की, कि उन सब की मति इस प्रकार से हर ली कि जैसे केवड़ा* के पुष्पको सूंघने से मन हर-जाता है। यहां तक कि सेकापूजा का सम्पूर्ण भार उन्होंने इन्हीं को सौंप दिया । तब पारस लेने का विचार करने लगे कि “इसको किस मार्ग से हर लें ?" क्योंकि उस मन्दिर में भीतर जाने का द्वार नहीं रक्खा गया था, केवल हाथडाल के सेवापूजा करनेने मात्र को, और दर्शन करलेने को, अवकाशमार्ग था। तब दोनों ने राजों ( थवइयों, मिस्त्रियों ) से युकिहीयुक्ति यह भेद लिया कि मन्दिर के ऊपर से मार्ग है ॥ - , । (२६५) टीका | कवित्त । (४७८) मामा रह्यो भीतर, औ ऊपर सो भानजो हो, कलस भँवरकली हाथों फिरायो है । जेवरी लै फांसि दियो मूरति, सो खैचिं लई, और बार वह आप नीके चढ़ि आयो है ॥ कियो हो जो द्वार तामैं फूलि तन फँसि बैव्यो, अतिसुख पाय, तब वोलिकै सुनायो है। काटिलेवो सीस, ईस भेषकी न निंदा करें," भैरै अंकवारि, मन कीजियो सवायो है ॥ २१४ ॥(४१५) * सेवरा वा सेवड़ा के अनुप्रास के लिये ही केवरा चा केवड़ा लाये हैं । १ "मेवरकली"-पेच, कल ॥

***** १२६ श्रीभक्रमालसटीक। . वार्तिक तिलक। मन्दिर के ऊपर जाके कलस में जो भँवरकली थी, उस भँवर. कली को दोनों भक्तों ने हाथों से घुमाकर अलग कर दिया; इससे उसमें इतना अवकाश (मार्ग) हो गया कि जिसमें होके सामान्य शरीरवाला मनुष्य आ जासके (पर मोटा नहीं)। तब उन्होंने उसी में एक मोटासा रस्सा छोड़कर ऊपर बांधदिया; उसी को पकड़ मामा भीतर चलागया, भानजा ऊपर रहा। मामूने पारसवाली मूर्ति को वस्त्र में गठियाके उसी रस्से में बांध दिया, और भानजे ने उसे खींच- लिया। गठरी को रस्सी में से खोल, फिर (और वार ) वह रस्सी भीतर छोड़दी गई, जिसे पकड़के वे (मामाजी) आप भली प्रकार से चढ़ आए । जब उस छोटे द्वार में आधा शरीर निकल चुका तव मामाभलजी को अतिशय हर्ष और सुख प्राप्त हुआ कि जिस हर्ष से उनका शरीर फूलकर उत्ती बिल में फँसबैठा (फंस गया), न इधर सरकै न उधर ॥ मामू ने भानजे से कहा कि "मेरा सीस काट लो, जिसमें सेवड़े लोग वैष्णव वेष की निन्दा न करें, क्योंकि हम दोनों (मैं और तुम) वैष्णववेष धारण किये ही इन सबके यहां आके शिष्य हुए थे।" तब भानजा अकवारभरके मामाजी को अपने घलभर खींचके निकालने लगा; परन्तु आपके मन में सवाया आनन्द बढ़ता ही जाता था इससे शरीर फूलके निकल नहीं सका ॥ (२६६) टीका | कवित्त । (४७७) काटि लियो सीस, ईस-इच्छाको बिचार कियो, जियो नहीं जात तऊ चाह मतिपागी है । "जीपै तन त्याग करौं, कैसे आस-सिन्धु तरौं ? ढरौं वाही ओर;" आयो; नींव खुलागी है ॥ भयो शोक भारी, "हमें बैंगई अवारी, काहू ओरने विचारी,” देखें वही बड़। भागी है । भरि अकवार मिले, मंदिर सँवारि, मिले, खिले सुखपाइ नैन, जानै जोई रागी है ॥ २१५॥ (४१४) १"भिले"-दौड़े, लपके ॥ SCHLEICHSHAUSBESCHOGA । - PARAN भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४२७ यार्तिक तिलक । जव भानजे के खींचने से मामाजी नहीं निकल सके, तब फिर आपने भानजे से कहा कि "मेरा सीस काटही लो॥" दो० "हरिमन्दिर के हेतु जो, लागे मोर शरीर । तो यामें कछु सोच नहि, कछु न मानिये पार ॥" ऐसे प्राण समर्पण-रूप सच्चे वचन सुन, ऐसी ही सर्कारी इच्छा विचार, भानजे ने मामू के कहने के अनुसार शस्त्र से सीस काटही लिया। और पारस तथा वह सीस लेके वहांसे चम्पत हुआ। इन्हों ने सीस को तो कहीं योग्यस्थल में डालदिया; परन्तु परमभक्त मामू के वियोग से इनको जिया नहीं जाता था, जीने की इच्छा नहीं होती थी, तथापि प्रभु के मन्दिर बनवाने की चाह में मति पगरही थी; इससे विचार किया कि “यदि मैं शरीर को त्याग दूं तो श्री- प्रभुमन्दिर के बनने की जो मेरी समुद्रवत् आशा है उसके पार कैसे पहुँचुंगा, अतः वहां ही चलूं ॥" ऐसा निश्चय कर श्रीकावेरी गंगा के निकट जहां श्रीरंगनाथजी की मूर्ति थी, वहां आके देखते क्या है कि बड़े विस्तार के मन्दिर की नीव खुदवाने में कोई तत्पर है । उसको देख इनके मन में बड़ाभारी शोक इसलिये हुआ कि "हमको बहुतदिन लगगए अतिविलम्ब होगया ! इसी कारण से किसी दूसरे ने मन्दिर बनवाना प्रारंभ कर दिया।" समीप जाके देखें तो वेही, बड़े भाग्यशाली मामाभक्तजी ही,*यह नींव खोदवा रहे हैं। दोनों को परस्पर के दर्शन से कोई अभूत ब्रह्मानन्द हुआ और दोनों के नेत्रकमल परम प्रफुल्लित हुए; मिलके (दौड़के) आपस में भुजा भरभरकर मिले । इन दोनों अनु- रागी भक्तों के मिलने का अपूर्व सुख वेही जानें; जिनको इस अनु- राग का अनुभव है। दोनों ने मिलके श्रीरंगनाथजी का सप्तावर्ण-युक्त "रङ्गविमान" *प्रापको प्रात्मनिवदन भक्ति से तथा भानजे के सर्वधर्मार्पण भक्ति से, संतुष्ट होके मर्य जगत्का ने मामूभक्त का वैसा ही दूसरा स्वरूप निर्माण करके और बहुत द्रव्य देके यहाँ उपस्थित कर दिया था । FRICA ४२८ , *** श्रीभक्तमाल सटीक। संक्षक महामन्दिर बनवाया कि जिसका दर्शन करके अद्यापि सब बड़भागियों को बड़ा आश्चर्य और अपूर्व आनन्द होता है । (५१) हंस भक्तों का प्रसंग। (२६७) टीका | कवित्त । (५७६) कोढ़ी भयो राजा, किये जतन अनेक, पेपै एकहूं न लागै, कह्यो "हंसनि मँगाइये" । बधिक बुलाय कही वेगही उपाय करौ, जहां- तहां ढूंढ़ि अहो इहां लगि ल्याइये" ॥ "कैसे करि ल्याव ? वैतो रहें मानसर मांझ," "ल्यावोगे, छुटौंगे तव, जनै चारि जाइये"। देखत ही उड़िजात, जाति को पिछानिलेत, 'साधुसों' न डरें, जानि भेष लै बनाइयै ॥ २१६ ॥ (४१३) वार्तिक तिलक। किसी देश का बड़ाभारी राजा कोढ़ी होगया था, वैद्यों ने उसके अनेकप्रकार के यत्न किये, परन्तु कोई सफल नहीं हुआ; तब वैद्योंने कहा कि "हंस मँगाइये उसकी औषध वनाईजायगी, उससे आप अ. वश्य अच्छे होजायँगे।"राजानेवधिकोंकोवुलाके आज्ञादी कि "जाके जहां मिलें वहांसे हंस लाओ, वेगिही उपाय करो" वधिक बोले "महाराज ! हंसों को किसप्रकार से लावें ? वेतो 'मानससरोवर' ही में रहते हैं।" सुनकर राजा ने कहा कि "चार जने जाके किसीभांति लाओ, विना लाए तुम्हारे प्राण नहीं वचनेके ॥" हिम (पाला) से वचने योग्य वस्त्र चर्मादिक पहिन प्रोदके वे व्याधा मानससर को गए । परन्तु हंस पक्षियों के जोड़े, इन सबको देखते ही, व्याधा जानकर, उड़जाया करतेथे । बुद्धिमानोंने बताया कि "हंस वैष्णव सन्तों से ही नहीं डरते" तब वधिकों ने वैष्णव सन्तों का वेष धारण करलिया । (२६%) टीका | कवित्त । (५७५) गए जहां हंस, संत-वानों सो प्रशंस देखि जानिके बँधाये; राजा पास लेकै भाये हैं। मानि मत सार, प्रभु वैद-को स्वरूप Becomes छ - . भकिसुधास्वाद तिलक। ४२६ धारि, पूछिकै बजार, लोग भूप ढिग ल्याये हैं ।। "काहे को मँगाये पच्छी ? अच्छी हम करें देह, छोड़ि दीजै इन्हें," कही "नीठकरि पाये हैं"। औषदी पिसाये, अंग अंगनि मलाये, किये नीके, सुख पाये, कहि उनको छुटाये हैं ॥ २१७ ॥ (४१२) वार्तिक तिलक। वधिक सन्तों का वेष बनाके मानससर में हंसों के निकट गए; हरिभक्त विवेकी हंसों ने जान लिया कि 'ये बधिक हैं' पर परम प्रशंसनीय वैष्णववेष बनाके पाए हैं; इस लिये इस वेष के सन्- मानार्थ अपने तई बधाही लेना चाहिये । दो० "हंस कहै सुनु हंसिनी ! सुनो पुरातन वात । साधु निकट नहिं जात तो, वाना की पति जात ॥" इससे वे उड़े नहीं । वधिक इनको पकड़कर राजा के पास ले आए। गुणग्राही हंसों ने कपटरूपी नीर छोड़के सन्तवेषरूपी क्षीर उनका ग्रहण किया। श्रीभकवत्सलप्रभु ने हंसों का मत भकिसारांशयुक्त जाना कि उन्हों ने मेरे दासों के वेष का यहांतक सन्मान किया कि नीच वधिकों के शरीर में भी केवल वनावट मात्र देख के अपने शरीर और प्राण अर्पण करदिये,' इसीसे उसीक्षण अापने वैद्य का स्वरूप धारणकर, उस नगर के हाट में आ, लोगोंसे अपना यह गुण प्रगट किया कि "मैं कुष्ठ रोग विशेष करके अच्छा कर देता हूं !" लोग आपको राजा के पास लाए। वैद्यजी ने राजा से कहा कि "आपने इन हंसों को किसलिये मँगाया है ? इनको छोड़दीजिये, मैं आपका शरीर अभी अभी अच्छा किये देता हूं।" राजा ने कहा कि "मैंने इन्हें बड़ी कठिनता से पाया है, योही कैसे छोड़दूं?" वैद्यजी ने योषधि पिसवा के राजा के सब अंगों में लेपकराकर १ "बजार", बाज़ार, हार । २ "नीठ करि'कठिनता से, बड़ी मुश्किल मे। *पाठान्तर "श्रौषधी"॥ CRIME SAHR ४३० श्रीभक्तमाल सटीक। , बात की बात में चंगा कुन्दन सा शरीर कर दिया। राजा ने अत्यन्त सुख पाया। आपने राजा से कहके हंसभक्तों को छुड़वा दिया। श्रीकृपा की और वैष्णव-वेष की जय ॥ (२६६ ) टीका | कवित्त । (५७४) "लेवो भूमि गाउँ, बलिजाउँ या दयालता की, भाल भाग ताके जाकों दरसन दीजिय" । "पायो हमसब, अब करो हरिसाधु-सेवा; मानुष-जनम, ताकी सफलता कीजिय" । करी लै निदेस, देस भक्ति विसतार भयो; हंस हित सार जानि, हिये धरिलीजिये। वधिकनि जानी जासों खगनि प्रतीति कीनी, ऐसो भेष छोड़ियै न, राख्यौ, मति भीजियै ॥ २१८॥(४११) चार्तिक तिलक। राजा अपना नवीन जन्म जान श्रीवैद्यनारायण के चरणों में पड़के प्रार्थना करनेलगा कि "आपकी दयालु ना की मैं बलिहारी जाऊं; आपने हंसों के प्राण और मुझको हिंसासे बचाके मुझे चंगा कर दिया, जिसको आप कृपाकर दर्शन दें उसके भाल में बड़े भाग्य लिखे जानना चाहिये, अब मुझपर कृपाकर जितनी इच्छा हो उतनी भूमि वा गांव लीजिये।" वेद्यरूपी प्रभु बोले कि "मैं सबकुछ पाचुका; अब में यही चाहता हूं कि तुम भगवान् की भकि पूजा तथा 'सन्तों की सेवा कर, अपने मनुष्य जन्म को सफल करो ॥" चौपाई। वैद्यरूप हरि अस कहि बयना । पुनि कह "तोहि यमकी अव भयना" यह कहिके प्रभु अन्तर्धान होगए। राजा ने आपका उपदेश मान, वैसा ही किया कि अपने देश भरमें भक्ति का विस्तार कर दिया ।। देखिये, हंसों ने श्रीभागवत्वेप का ऐसा आदर किया, तो उसी क्षण प्रभु ने प्रगट होकर हंसों के प्राण वचाए, यश दिया, और भकिमुनि दी । इस सारांश को अपना हित मानकर सबको अपने हृदय में धारण करना चाहिये कि गुण और सारग्राही हंसों ने RASACRACCIRCLICRAC ॐ ******** भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४३१ वधिक-कपटरूपी नीर छोड़कर सन्तवेषरूपी क्षीर को ग्रहण किया। प्रभुकृपा से वधिकों को भी यह ज्ञान हुआ कि "जिसवेष में खग जाति हंसों ने भी हमारी प्रतीति की, ऐसा वेष हम न छोडे।" ऐसा विचार, वधिक दुष्टव्यापार तज वेष धारण किये ही रहे, साधु संग में उनकी मति भी भक्ति रस में भीगगई और उनका परम कल्याण हुआ॥ (५२) सदाव्रती महाजन। (२७०) टीका | कवित्त । (५७३) महाजन सुनो सदावती ताको भक्तिपन, मन में विचार, सेवा कीजै चितलायकै । आवत अनेक साधु निपटअगाध मति, साधिलेत जैसी आवै सुबुधि मिलायकै ॥ संत सुखमानि, रहिगयो घरमाँझ, सदा सुत सों सनेह नित खेलै संग-जायकै । इच्छा भग- वान, मुख्य, गौन लोभ जानि, मारि डास्यो, धूरि गाड़ि, गृह आयो पछितायकै ॥ २१६ ॥(४१०) वार्तिक तिलक । हे महज्जनो ! सदावती महाजनकी भक्ति की कथा सुनिये । श्री. गुरुउपदेशसे इन्होंने मनमें विचार किया कि "मैं चित्तलगाके सन्तों- की सेवा किया करूँ" सो आप ऐसा ही करनेलगे; इससे इनके यहां अनेक प्रकारके साधु आया करते थे; ये भक्तजी ऐसे अतिशय अगाधमतिवाले थे, कि जिस प्रकारके सन्त होते वैसी ही सुवुद्धि से उनकी सेवा साधलिया करते थे। एक समय एक सामान्य साधु वेप- धारी आया, और खानपान का सुख पाके आपके घर में रह गया। भक्तजी के एक छोटा सा बालक था, जिसको इसके साथ स्नेह था, और इसके साथ जाके खेला करताथा ॥ एकदिन इस साधु की मति भ्रष्ट होगई उममें मुख्य तो भगवत् की इच्छा (भक्कसुयश तथा सन्तमहिमा प्रगट करने के हेतु)जानिये, १"सदाव्रती महाजन" चैश्य सेठ कि जिसका व्रत यह था कि सन्त ब्राह्मणों को सदा दिनरात भोजन देना । BHOSRACKS .

४३२ श्रीभक्तमाल सटीक। . और गौण कारण लोभ कि जिसके वश भूषण लेलेने के लिये उस बालक को उसने जी से मारकर धूल में गाड़ दिया। और फिर मन ही मन में पछताता हुआ घर में चला आया । (२७१) टीका | कवित्त । (५७) देखै महतारी मग, बेटा कहां पग रह्यौ ? बीते चारि जाम, तऊ धाम में न आयो है । फेरी पुर डौंडी, ताके संग संत, आप, लौड़ी, कहो यो पुकारि "सुत कौने विरमायो है ? ॥ वेगिदै वताय दीजै आभरन दिये लीजै;" कही सों संन्यासी एही मास्यो, मन लायो है । दई ले दिखाय देह; बोल्यो “याको गहि लेहु, याही ने हमारो पुत्र हत्यौ, नीके पायो है" ॥ २२० ॥ (४०६) चार्तिक तिलक। उस लड़के की माता उसके आने का पन्थ देख रही थी सोचती थी कि वेटा कहां अटक रहा?" चार पहर वीतगए पर अभीतकघर नहीं आया ! साँझ समय वह महाजन उस सन्त और लौंडी इत्यादि कोसाथलिये ग्राम भर में यह पुकरवाता हुआ डौंडी फिरवाने लगाकि "पुत्र को किसने अँटका रक्खा है ? बतादे, बतानेवाले को मैं उस लड़के के सव भूपण दे दूंगा।" चौपाई। "सदावती भूपति पहँ जाई । नृपसों कहि डौंडी पिटवाई ॥" पुकार सुनकर एक संन्यासी कि जिसने, उस लड़के को मारके धूल में छुपाते देखा था, सो आके बोला कि “मन में लोभ लाके इसी वैरागी ने तुम्हारे पुत्र को वध कियाहै" यह कहके जहां मृतक शरीर था वहां उनको लेजाके दिखादिया। तब वैश्य भनजीने अपने साथके लोगोंसे कहाकि "इस संन्यासी को पकड़ ले चलो, इसीने मेरे लड़के को मारडाला है, भला भया कि यह मिलगया" परन्तु मन में तो क्षमा दया धैर्य को सँभाला ॥ "कहां पग रह्यौ ?"-किसके प्रेम में अक्षम रहा ? ॥ RECENCESS CE หจ%4ห%*** KAR भक्तिसुधास्वाद तिलक। दो० सदानती निज चित्त में, कीन्ह्यो विमल विचार । मरयो सुवन जीहै नहीं, व्यर्थ उपाधि असार । (२७२) टीका | कवित्त । (५७२) बोल्यो अकुलाय "मैं तो दियो है बताय, मोंको देवौ जु लुटाय, नहीं झूठ कळु भाषिय" । "लेवौ मति नाम साधु, जो उपाधि मेट्यौ चाहौ, जावो उठि और कहूं;" मानी, छोरि नोषिये ॥ आयकै विचार कियो; जानी सकुचायो संत, वोलि उठी तिया "सुता देके नीके राखिय" । पस्यो वधू-पांय, तेरी लीजिये वलाय, पुत्रशोक को मि- टाय, और खरी अभिलापियै ॥ २२१॥ (१०८) वार्तिक तिलक । जव भक्तजी ने कहा कि “इसीको पकड़ लो" तव वह संन्यासी अति अकुला के कहने लगा कि "मैंने लड़के को मारा नहीं है आपको बतायमात्र दिया है, सो भी कुछ झूठ नहीं कहता हूं मुझको छोड़ दीजिये ।" भनजी ने कहा कि “यदि इस उपाधि से, तुम छूटना चाहो तो लड़के के वधमें सन्त का नाम न लो और यहां से टलके कहीं चलेजाव ॥" संन्यासी ने वात मान ली, तब भक्तजी ने छोड़ दिया; वह चम्पत होगया । भक्तजी मृतक शरीर को घर लाए; तदनन्तर उसकी दाहादिक क्रिया कर, विचार करके अपनी धर्मपत्नी से कहने लगे कि जान- पड़ता है "ये सन्त उदास होगये हैं।” तव परमभक्का आपकी स्त्री वोली कि "मेरा कहा मानिये तोसन्तको अपनी पुत्री विवाह दीजिये और सन्मानपूर्वक राखिये।” इसकी आश्चर्य-भक्ति-भरी वाणी सुनके सदाव्रतीजी अपनी धर्म-पत्नी के चरणों में पड़के कहने लगे कि "तेरी बलिहारी जाऊँ तूने पुत्रशोक को मिटाके अतिशय (खरी) उत्तम आभलाषा की" (२७३ ) टीका । कवित्त । (५७०) बोलिलियो सन्त, "सुता कीजियै जू अंगीकार, दुख १ " नापियै" - गेरिये, पटकिये, फैसिये, सारिये । SURRORRECT सो अपार . . acce Restricks ४३४ श्रीभक्तमाल सटीक। काहू विमुख कों दीजिये” । बोल्यो मुरझाय "मैं तो मायाँ सुत हाय ! मोपे जियोहू न जाय, मेरो नाम नहीं लीजिय", "देखौ सा. धुताई, धरी सीसपै वुराई, जहां राईह में दोस कियो, मेरु सम री. झिये । दई बेटी व्याहि, कहि "मेरो उर दाह मिटै, कीजियै निवाह जग माहि, जौलौ जीजिय" ।। २२२ ॥ (१०७) वार्चिक तिलक । भक्तजी ने अपनी धर्मपत्नी का वचन अतिप्रिय मान, उस सन्त को बुलाकर प्रार्थना की, कि “इस मेरी कुमारी कन्या को आप अंगीकार कीजिये, क्योंकि किसी भक्रिविमुखको दूंगा तो मुझको अपार दुःख होगा ।" आपका विनय सुन वह साधुवेषधारी अति ग्लानिसे मुरझा के बोला कि "हाय ! आपके प्रियपुत्र को मैंने मारडाला, मुझसे जिया नहीं जाता, आप मुझ पातकी का नाम नहीं लीजिये॥" सदाव्रतीजी उस सन्नवेषधारी को सुनाके अपनी स्त्री से बोले कि "देखो तो आपकी साधुता, कि आपने यह दोष अपने माथे पर वृथा ही धर लिया; जहां राईभर भी दोष नहीं वहां मेरु पर्वत के समान अपराध अंगीकार करते हैं । मैं इस साधुता पर रीझता हूँ।" फिर विनय किया कि 'मेरे हृदयकी ताप मिटाने के लिये आप अवश्य कन्या को अंगीकार कर, जवतक में जग में जीऊं तबतक यहाँ ही रहकर मुझे दर्शन देते रहिये, और अपनी कृपा से ही इन बातों का निर्वाह कीजिये॥" दो० "माया चाकी, कील हरि, जीव चराचर नाज । तुलसी जो उवरो चहसि, कील शरण को भाज ॥" निदान उसको अपनी सुता व्याह ही दी। दो० "अवगुण ऊपर गुण करे, ऐसो भन जो कोय । ताकी पनहीं सिरधरौं, जवभर जीवन होय ॥" (२७४) टीका | करित्त । (५६९) आये गुरुघर; सुनि, दीजै कोन सर, बड़े सिद्ध, सुखदाईसाधु- १ "सर"=सरबर, पटत्तर, उपमा । Recketectactactureractices . , - S भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४३५ सेवा ले बताई है । कयौ “सुत कहां ?" "अजू! पायौ;" कही "कैसीभांति?" "भांति का * बखानौं, जग मीच लपटाई है”। "प्रभुने परीक्षा लई, सोई हमें आज्ञा दई; चलिये, दिखावों जहां देह को जराई हैं"। गए वाही ठौर, सिरमौर हरि ध्यान कियो, जियो, चल्यो आयो; दास कीरति बढ़ाई है ॥ २२३ ॥ (४०६) चार्तिक तिलक। विवाह होजाने के अनन्तर, सदावतीजी के श्रीगुरुदेवजी जोकि बड़े ही भगवत्भक सिद्ध उपमारहित सन्तसुखदायी थे, और जि. न्होंने प्रभुकी प्रसन्नता का साधन साधुसेवा को बताया था सो आप के घर में आए; यह सब विचित्र चरित्र कुछ तो श्रीप्रभु के इङ्गित से जानतेही थे, तथा यहां और किसी ने कह दिया सो सुनकर भक्त जी से पूछा कि "तुम्हारा पुत्र कहां है ?" भनजी ने उत्तर दिया कि "अजी महाराज ! उसकी तो मृत्यु होगई" श्रीगुरुजी ने प्रश्न किया कि "किस भांति से?" उत्तर दिया कि "प्रभो ! भांति क्या बखानं, इस जगत् में तो मीच लपटी ही है" तब श्रीगुरुमहाराजजी बोले कि “यह तुम्हारी भक्ति की प्रभु ने परीक्षा लेकर तुम्हारा सुयश बढ़ाके, मुझे आज्ञा दी है कि "तुम वहां जाव।" यह कह आपने भाज्ञा की कि "चलो, जहाँ तुमने उसको दाह किया है वहां चलें।" वहाँ जाके सिद्धशिरोमणि श्रीगुरुजी ने ध्यान करके ज्योंही श्री. प्रभु से प्रार्थना की, त्योंही श्रीप्रभु का प्रगट किया हुआ वह पुत्र सजीव आ पहुँचा, और उसने श्रीगुरुचरणों को प्रणाम किया । जयजयकार हुआ। इस प्रकार श्रीभगवान् ने अपने दास की उज्ज्वल कीर्ति बढ़ाई। जिसको अद्यापि सज्जन लोग सुन और गाकर अपूर्व प्रेम में मग्न होजाते हैं। (२७५) छप्पय । (५६८) चारौयुग चतुर्भुज सदा, भक्त-गिरा सांची करन । "पायो"-मीच को प्राप्त होगया। "मांनि का बवानों पाउन्नर "मांनि से घखान ?" || CREALKARSALMAN , ***ॐॐॐॐॐॐॐ श्रीभक्तमाल सटीक। ४३६ दारुमई तरवार सारमय रची "भुवने" की। "देवा"हित शितकेश प्रतिज्ञा राखो जनकी ॥ "कमधुज" के कपि चारु चितापर काष्ठ जुल्याये। "जैमलें" के जुधिमांहि हूँ अश्वचढ़ि आपुन धाये ॥ घृत सहित भैंस चौगुनी; "श्रीधर" सँग सायक-धरन । चारौयुग चतुर्भुज सदा, भक्त-गिरा सांची करन ॥५२॥ (१६२) वार्तिक तिलक । श्रीचतुर्भुजभगवान् चारों युगों में अपने भक्कों की वाणी सदा ही सच्ची करते आते हैं। (१) "भक श्रीभुवनसिंहजी चौहान" का खड्ग था तो काट ही का, परन्तु भक़जी के मुख से “सार" उच्चारण होते ही प्रभुने उस- को उत्तम सार लोहे का बना दिया । (२) एवं श्रीदेवापगडाजी" के कहने से उनके हित करने के अर्थ भगवान् श्रीचतुर्भुजजी ने अपने विग्रह में श्वेत (धवल ) केश धा- रण कर उनकी प्रतिज्ञा रखली। (३) ऐसा ही, "श्रीकमधुज (कामध्वजजी)" ने कहा कि “मैं जिसका दास हूँ वहीं मेरे शरीर का दाह करेगा", इससे श्रीकपीश हनुमान्जी ने उनकी चिता के हेतु उत्तम काष्ठ लाके इनका मृतक शरीर जलाया ॥ (४) तथा,"राजा जयमलजी" के हेतु युद्ध में प्रभु स्वयं आप घोड़ेपर चढ़के दौड़े और लड़कर विजय किया । (५) इसी भांति, "ग्वालभन" जिन्होंने अठही कह दिया कि "मैंने भैंसें ब्राह्मण को दे दी हैं, वह घृनसहित देजावेगा" सोभी प्रभु ने सत्य किया कि चौगुनी भैसें घर में पहुंची। (६)इसीप्रकार "श्रीधरजी जिन्होंने चोरों से कहा कि "मेरे साथ रक्षक है" सो इनकी गिरा सत्य करने के लिये अपने चारों भुजा ओं में धनुष वाण लिये हुए श्रीरघुवीर लक्ष्मणजीने रक्षा की। Gook .

भकिसुधास्वाद तिलक। ४३७ १ श्रीभुवन चौहानजी ४ राजा श्रीजयमलजी २ श्रीदेवापंडाजी ५ श्रीग्वालभक्तजी ३ श्रीकामध्वजजी ६ श्रीश्रीधरजी श्रीप्रियादामजी ने श्राठवें कपित्त में जो यह लिखा है कि "ममभयो न जास मन कम्प भयो चूर है । पेपै यिना भक्तमान भक्तिरूप अति दूर हे ॥” इस कवित्त में सभी शंका करते है कि, इस ऋवित्त में कथित भक्ति के लक्षणों से पृथक भार क्या भक्ति रूप रह गया? से जानना चाहिये कि सदाबतीजी की भक्ति और अनूठी प्रतीति, तथा सन्ताको विष देनेवाली स्त्रियों की भक्ति' इत्यादिक ही वे भक्तियां है कि जो पूर्वोत लक्षणों से दूर हैं और, श्रीमतमाल में वर्णित भक्तों मैही देखी जाती हैं । (२७६ ) टीका | कवित्त । (५६७) सुनौ कलिकाल वात, और हैं पुराण ख्यात, "भुवन चौहान" जहां "राना" की दुहाई है । पट्टा युगलाख खात, सेवा अभिलाप साधु; चल्यो सो सिकौर नृप, संग भीर धाई है ॥ मृगी पाछे परे, करे टूक, हुती गाभिन, यौं आइ गई दया, कही "काहेको लगाई है ? । कहें मोकों 'भक' क्रिया करौं मैं अभक्तन की; दारु तरवार धरौं" यह मन भाई है ॥ २२४ ॥ (४०५) वात्तिक तिलक । "और पुराणों में ख्यात” तीन युगों के भक्तों के उदाहरण- (१) कृतयुग में श्रीध्रुवजी ने कहा कि मैं प्रभु का भजन कर सिंहासन और राजा के गोद में बैठेंगा (२) त्रेता के आदि में प्रह्लादजी ने कहा कि खंभे में प्रभु हैं (३) द्वापर में भीष्मजी ने कहा कि मैं प्रभु को अस्त्र गहाऊंगा, इनकी तथा अनेक की वाणी प्रभु ने सच की । (४) कलियुग में श्रीभुवन चौहानजी, इत्यादि। (५३) श्रीभुवनजी चौहान। और युगों की कथाएं तो पुराणों में विदित ही हैं, अव कलिकाल के भन की कथा सुनिये-जहां चित्तौरगढ़ उदयपुर के राना की दोहाई अर्थात् राज्य है, वहां एक भक्त श्रीभुवनसिंहजी चौहान थे। १ "चौहान" क्षत्रिय जाति विशेष । २ "युगलास"-दो लाख,२००००० । ३"सिकार" शिकार, मृगया, आखेट ॥ CROR .

ॐॐॐॐ श्रीभक्तमाल सटीक। ४३८ , . राना के यहां से दो लाख रुपये वार्षिक पाते थे, इसके लिये भमि का पट्टा था; और भनजी साधुसेवा बड़े अभिलाषा से करते थे। एक दिवस राना मृगया (शिकार ) खेलने को चला; संग में सब राजभृत्य तथा सामन्त भुवनसिंहजी भी चले; कालवश एक मृगी के पीछे आपने घोड़ा दौड़ाकर उसको खड्ग से दो टुकड़े कर दिये; वह गर्भवती थी; उसको देख के भनजी को अति दया और ग्लानि आई; और मन में पछताने लगे कि “हा! मैंने क्यों मारा ? मुझको सब लोग 'भगवद्भन' कहते हैं, परन्तु मैं कर्म अभक्कों का करता हूं। इससे मनमें संकल्प किया कि मैं आज से काष्ठ की कृपाण वनवाके धारण किये रहूंगा” । सो आपने वैसा ही किया । ( २७७) टीका । कवित्त । (५६६) और एक भाई, तानै देखी तरवार दारु, सक्यो न संभार, जाय राना कौं जनाई है । नृप न प्रतीति करै, करै यह सौंह नाना, 'वाना प्रभु देखि तेज, वात न चलाई है ॥ ऐसेही घरस एक कहत बितीत भयो, कह्यो "मोहि मारि डारी, जोपै मैं वनाई है। करी गोठे,कुंड जाय, पायकै प्रसाद, बैठे, प्रथम निकासि आप, सवनि दिखाई है ॥ २२५ ॥ (४०४) वार्तिक तिलक। इस वार्ता को चौहानजी के एक (कुलसंबंधी) भाई ने जाना और देखि लिया; और इस मर्म को अपने हृदय में रख न सका, वरंच जाके राना से कह दिया । परन्तु राना प्रतीति नहीं करता था। पिशुन ने नाना शपथ खाकर आग्रहपूर्वक कहा कि "महाराज ! उनका खड्ग वास्तव में काष्ठ का ही है ।" तथापि, भक्रजी का श्रीहरिभक्तवेप और तेज देखकर रानाने आपसे उसकी कुछ चर्चा नहीं की। इसी प्रकार एक वर्ष पर्यन्त उसने कहा ही किया; निदान उसने यह कहा कि “यदि मैं अन्यथा बनाके कहता होऊं तो मुझको मारडालियेगा। तव एकदिन राना ने, अपने एक १ "गोठ" गोष्ठी, सभा ॥ CHCECE , , S भकिसुधास्वाद तिलक। ४३६ उपवनके समीप सर (कुण्ड ) के तीर समाज सहित जाके, भोजन कर, सभा गोष्ठी (गोठ) की । वहां राना ने प्रथम अपना खड्ग कोश से खींचकर सबको दिखाया ॥ (२७८) टीका । कवित्त । ( ५६५) क्रमसौं निहारि, कही भुवन "विचार कहा ?" कहौ चाहै 'दार' मुख निकसत 'सार' है। कादिकै दिखाई, मानौं विजुरी चम- चमाई आई मन मांझ बोल्यौ "याको मारौ भार है" ॥ भक्त कर जोरिकै बचायौ "अजू ! मारिये क्यों ? कही बात झूठ नहीं; करी करतार है"। "पट्टा दूना-दून पावौ, आवौ मत मुजरा कौं, मैं ही घर आऊं, होय मोय मेरो निस्तार है" ॥ २२६ ॥ (४०३) वार्तिक तिलक । राजा ने पहिले अपना खड्ग दिखाके फिर क्रमसे सब वीर- सामन्तों के खड्ग, कोशों ( मियानों ) में से खिंचवाके, देखे और कहा कि "भुवन जी! क्या विचार करते हो ? तुम भी तो दि- खाओ।" तब भुवनजी खड्ग को करमें लेकर कहा ही चाहते थे कि "मैं क्या दिखाऊं, मेरी खड्ग तो दार की है," परन्तु सार का कर देनेवाले प्रभुने 'दार' शब्द के स्थानपर मुखसे 'सार' कहला दिया, और साथ ही ज्योंही चौहानजी ने कृपाण खींचकर दिखाया, वही (तलवार ) विजली सी चमचमाने लगी कि राना की आंखों में चकाचौंधसा हो पाया। देखकर, राना फड़क उठा और विचार के अपने वीरों से बोला कि "वह मिथ्यावादी पिशुन भूमि का भार है इसको मार डालो॥" श्रीभुवनजी श्रीसीतारामभन तो थे ही उस शत्रुता करनेवाले पर भी दया कर उसके प्राण बचाने के लिये हाथ जोड़कर राना से आपने कहा कि “महाराज ! इसको क्यों मारते हैं ? इसने मिथ्या नहीं कही क्योंकि मैंने एकदिन आप के संग एक गर्भिणी १ "दार" दारु, काष्ठ, लकड़ी। + ***KORERNERRIERREN श्रीभक्तमाल सटीक। , मृगी को मारा, उसका वच्चा भी कटगया उस दिन से दयावश मैं काष्ठ ही का कृपाण रखता था, इससे मेरा खड्ग तो था दारु ही का, परन्तु भक्तवत्सल करतार ने इसको सार का कर दिया।" ऐसा सुन, रानाजी श्रीभुवन भक्त की सब वार्ता यथार्थ मान, भक्ति- युक्न कहनेलगे कि “आजसे आपको पट्टा दूना ( चारलाख ) दिया जाय, और आप मेरी सभा में जुहार करने तथा सेवा में कभी मत आया कीजिये; मैं ही दर्शन के लिये आपके ही घर आया करूंगा कि जिससे भवसागर से निस्तार होजायगा ।" अरिल्ल "भई तलाया गोंठ जुरे जहँ चक्कवै । परचौ निज है, आजु खाय दै लक्खवै ॥ परमेश्वर पति राखि, बात नहि कहन की। विजुरी ज्यों तरवार चमंकी भुवन की।" (५४) “राना" के कुलदेव "श्रीचतुर्भुजजी" के पंडा श्रीदेवाजी। (२७६ ) टीका । कवित्त । (५६४) दरसन आयो "राना" रूप "चतुर्भुज जू" के, रहे प्रभु पोढ़ि, हार सांस लपटाये हैं। बेगि दै उतारि, कर लैक गरे डारिदियो, देखि धौरो' बार, कही “धोरे आये ?" "आये हैं"। कहत तो कही गई, सही नहीं जात अब, “महीपति डारै मारे" हरिपद ध्याये हैं। "अहो हृषीकेश ! करौ मेरेलिए सेतकेस, लेसहूं न भक्ति" कही "किये, देखो, छाये है" ॥ २२७ ॥ (४०२) वार्तिक तिलक। श्रीचतुर्भुज भगवान् के दर्शन के हेतु रात्रि में राना प्रायः आया करता था। एकबार राना को अबेर होगई और प्रभुके शयन का समय जानकर श्रीदेवाजी (पंडा)ने शयन करादिया, और प्रसाद १ "धारौ"-धवल, खेत। 'धौरे पाये हैं ?"-केश क्या उज्ज्वल होगये? क्या पाल पक गए ? ॥ • देवाजी श्रीपयहारी कृष्णदासजी के शिष्य (गृहस्थ थे। .

भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४४१ माला लेकर अपने माथे में लपेट लिया; उसी अवसर राना दर्शन को आया; सो तो हुआ नहीं । परन्तु श्रीदेवाजी ने शीघ्रता से अपने 'सीस से माला उतारकरराना के गले में डाल दिया; उसमें लपटाहुआ पंडा (पुजारी) जी का एक श्वेत केश चला गया; उसको देख, राना ने कुछ सकोप व्यंग वचन से पूछा कि"पंडाजी ! क्या श्रीचतुर्भुजजी के केशों में शुक्लता (सपेदी) आ गई ? " श्रीपंडाजी के मुख से निकल गई कि "हां आ गई।" राना यह कहकर चला गया कि "कलं दिन को आके दर्शन करूंगा।" पुजारीजी ने कहने को तो कह दिया परन्तु अब अति दुःसह चिन्ता हुई कि राजा अब मुझे मारही डालेगा;' परन्तुभक्त तो थेही, इससे प्रभु के चरणकमल का ध्यान करनेलगे- दो० "सीतापति रघुनाथजी ! तुम लगि मेरी दौर । जैसे काग जहाज को सूझत और न ठौर ॥" द्वारदेश में बैठ ध्यान करते हुए यह विनय करने लगे कि "हे हृषीकेश.! वाक्-इन्द्री के प्रेरक अब आप मुझदास की रक्षा के निमित्त वस्तुतः,श्वेत केशधारण कीजिये । यद्यपि मुझमें आपकी भक्ति का लेश भी नहीं है, तथापिहूँ तो मापही का" ऐसी अति प्रार्थना सुन भक्तवत्सल कृपालु की, मन्दिर के भीतर से स्पष्ट वाणी हुई ही तो सही, कि "मैंनेधारण करलिये; देखो मेरे मस्तक में धवल केश छाए हैं।" (२८०) टीका | कवित्त । ( ५६३ ) मानि राजात्रास, दुखरासि सिन्धु वूड्योहुतो, सुनि कै मिठास- वानी, मानौ फेरि जियो है। देखे सेतवार, जानी कृपा मो अपार करी, भरी आंखें नीर “सेवालेस में न कियो 'है ॥ बड़ेई दयाल, सदा भनप्रतिपाल करें; मैं तो हों अभक्त, ऐपै सकुचायो हियो है"। "झूठे सनबंधहूं तें नाम लाजै मेरोई जु,” तातें सुख साजै यह. दरसाय दियो है ॥ २२८ ॥ (४०१) ChectactoCAREKACAKACharmirm .

*** ४४२ श्रीभक्तमाल सटीक। वार्तिक तिलक। श्रीदेवापंडाजी जो राजा का बड़ा भारी डरमान दुःखराशिरूपी समुद्र में डूबेहुए थे, सो इन्होंने श्रीप्रभु की यह अतिमिष्ठ मृतक- जियावनि वाणी सुनकर ऐसा सुख पाया कि मानों मरणशील अमृत पीके जी उठे, और फिर जब प्रभुके सीस में धौले वाल देखे तव और भी आनन्दमग्न हो अपने ऊपर सौर की अपार कृपा जान नेत्रों में प्रेमाश्रु भरके, प्रभु को धन्यवाद करनेलगे कि मैंने प्रभु की लेशमात्र भी सेवा नहीं की परन्तु भक्रवत्सल प्रभु बड़े ही दयालु हैं, सदा अपने भक्तों का प्रतिपाल करते हैं; और मैं तो अभक्त ही हूँ तथापि मेरी प्रार्थना से आपका कोमल हृदय संकोच को प्राप्त हुआ पर हां मैं झूठा सच्चा आपही का तो कहलाता था, सो इस सम्बन्ध से आपने यह विचारकियाकि 'जो मैं इसकी अब रक्षा नहीं करूँ,तो मेरे ही नाम की लज्जा होगी अतएव सारने मेरे सुख का साजनेवाला यह वेष धारण करलिया, और अपनी कृपालुता सबको दिखा दी ।" (२-१) टीका | कवित्त । (५६२) आयो भोर राना, सेतबार सो निहारि रह्यो, कह्यो “केस काहूं के लै पंडाने लगाये हैं"। ऎचिलियो एक ताम, बँचिकै चढ़ाई नाक, रुधिर की धार नृप अंग छिरकाये हैं ॥ गिरयौ भूमि मुरछा है, तन की न सुधि कळू, जाग्यौ जामबीते, "अपराध कोटि" गायें हैं। “यही अव दंड राज बैठे सो न आवै इहाँ;" अवलौहूं आनि मानि कर जो सिखाये हैं ॥ २२६ ॥ (४००) वार्तिक तिलक। राजा के मन में यह अमर्प तो था ही कि "इस बुड़े (पुजारी) ने अपना पहिनाहुआ हार मुझे पहिराया है," इससे प्रभात ही आकर श्रीचतुर्भुजजी के दर्शनकर श्वेतबाल देख चकित हो रहा, क्योंकि क- रुणानिधि प्रभु की कृपालुता उसको निश्चय तो हुई ही नहीं, अतः विचार किया कि "पंडे ने किसी के धवले केश लेकर लगा दिये हैं। इस अप्रतीति से श्रीचतुर्भुजजी के समीप जाके परीक्षा के लिये उसने एक BREAGEECRECRec CIRLS - P4G । भकिसुधास्वाद तिलक। ४४३ बाल उखाड़ ही तो लिया। उखाड़ने के साथ ही प्रभुने अपनी नासिका सकोड़ी (नाक चढ़ाई ), और उससे लहू की धारा वेग से निकलकर राना के अंगों पर आ पड़ी; प्रभुके उस अपचार से रानामूञ्छित होके भूमि पर गिरपड़ा पहरभर उसको शरीर की तनक भी सुधि न रही। जब पहरभर पीछे वह मूर्छा से जगा, श्रीसर्कार से अपना "बहुत भारी अपराध" कहके क्षमा कराने लगा, तब श्रीरूपचतुर्भुजजी की आज्ञा हुई कि “यहाँ के राजाओं को अब यही दण्ड है कि जो राजगद्दीपर बैठा करे, आज से वह हमारे दर्शन को न आया करें।" इससे उदयपुर रानाके वंश में जो राजा होता है राजतिलक होनेपर वह प्रभु की आज्ञा की आनि मानकर अबतक श्रीचतुर्भुजजी के मन्दिर में नहीं आता। (५५) श्रीकामध्वजजी। (२८१) टीका | कवित्त । (५६१) भए चारिभाई, करै चाकरी वै रानाजू की; तामें एक भक्त, करै बन मैं वसेरो है। आय के प्रसाद पावै, फेरि उठि जाय तहीं; कहै "नेकु चली तो, महीना लीजै तेरो है" ॥ "जाके हम चाकर हैं, रहत हजर सदा," "मरै तो जरावे कौन?" "वही जाको चेरो है" छूट्यो तन बन, राम-आज्ञा हनुमान आए, कियो दाह, धुआँ लगे प्रेत पार नेरों है ॥ २३ ॥ (३६६) वार्तिक तिलक । चित्तौरगढ़-उदयपुर में ही राना के यहां इन चारों भाइयों की चाकरी लिखी थी, महीना पाते थे; परन्तु तीनभाई तो राना की सेवा में उपस्थित होते थे, पर एक चौथे कामवजजी श्रीसीतारामजी के अनन्यभक्त थे; ये वनही में भजन करतेहुएनिवास करते, केवल प्रसाद पानेमात्र को घर आ जाया करते; और प्रसाद पाके फिर वहीं वनही १ हजूर"- • हुजूा, सम्मुख, वर्नमान, उपस्थित । २ "मेरो" निकट समीप CLOCALCHAR , WARY 24 श्रीभक्रमाल सटीक। . में चले जाया करतेथे। तीनों कहा करते कि "भला तुम तनक एकवरे तो रानाजी को जोहार करआया करो, क्योंकि तुम्हारी चाकरी का महीना भी हम लोग वहांसे लाया करते हैं, न जाओगे तो कैसे मिलेगा?" यह सुन श्रीयुत कामध्वजजी ने उत्तर दियो कि "मैं जिस प्रभुका चाकरहूँ उसी की सेवामें सदा निकट रहता हूं" तव भाइयों ने सक्रोध होके कहा कि "तू जव मरैगा तो तुझे जलावेगा कोन ? (हमतो न जलावेंगे)।" आपने छूटते ही (शीघ्रही) उत्तर दिया कि "जिसका यह दास है सोही जलावैगा ॥" निदान, आपका शरीर वन में ही छूटा, और उसी क्षण कृपा- निधान श्रीसीतारामजी की आज्ञा से श्रीकपिनाथ हनुमानजी पाकर चन्दन की लकड़ी की चिता बनाके यथेष्ठ दाह-क्रिया कर उनको दिव्य रूपसे श्रीरामधाम को लेगए । वरंच चिता के समीप में वृक्षों पर जो बहुत से प्रेत रहते थे सो वे सब प्रेत, आपके शरीर का धुवा लगने से, प्रेतयोनिसे मुक्त होकर शुभगति को प्राप्त हुए । किन्तु एक प्रेत उस घड़ी वहां उपस्थित न था, आनेपर अपने सजातियों को न देखकर, किसी एक मूर्ति से उसने सवारी सुनी और उसी चिता की भस्म में लोटपोटकर प्रेतत्व से छूट शुद्ध हो सद्गति पाई॥ (५६) श्रीजयमलजी। (२:३) टीका । कवित्त । (५६०) "मेरते" प्रथम वास, "जैमल नृपति, ताक सेवा-अनुराग, नेकु खटको न भावहीं । कर घरी दस, तामें कोऊ जो खबैरि देत, लेत नहीं कान, और ठौर मरवावहीं ॥ हुतो एक भाई वैरी, भेद यह पाइलियो; कियो आनि घेरौ, माता जाइकै सुनावहीं । "करें हरि भली,” प्रभु घोरा असंवार भए, मारी फौज सब, कहें लोग सचु पावहीं ॥ २३१ ॥ (३८) १ "खबरि"खबर - समाचार, जताना, जाके सुनाना । २ अनवार", सवार अश्वारूढ़ । ३ "फौज"-" सेना ॥ * : . मा - भनिसुधास्वाद तिलक । ४४५ वार्तिक तिलक । हरिभक्तराज श्रिीजयमलसिंहजी का, प्रथम "मेरता" नगर में निवास था; भगवत् की सेवापूजा में इनका ऐसा एकाग्र अनुराग था कि उसमें किंचित् भी खटका होने से क्लेश मानते थे; और दस घड़ी पर्यन्तं नियम से पूजा करते थे; इस समय के बीच में जो कोई किसी प्रकार की वार्ता जनावै तो आप उसको श्रवण नहीं करते; वरंच उसी ठांव वहा मारा जायगा ऐसी आज्ञा दे रक्खी थी। आपके इस नियम का सव भेद आपके एक वैरी भाई ने जानकर उसी समय के प्रारंभ में बहुत सी सेना लेकर नगर को आ घेरा; और तो कोई आपके पास समाचार जताने को जा सका नहीं, परन्तु आपकी माताजी ने आके उस दुष्ट का घेरलेना आपको सुना दिया। सुनकर भक्तराज श्रीजयमल जी ने इतनी ही बात कही कि "श्रीहरि भली करेंगे और उसीप्रकार सेवापूजामें ही लगे बने रहे ॥ तव शत्रुसूदन भक्तवत्सल श्रीप्रभुजी जयमलसिंह के घोड़े पर चढ़ अस्त्रशस्त्र ले सब सेना को मार, उस शत्रु को भी घायल कर गिराके, घोड़े को अश्वशाले में बांध आप अन्तर्धान होगए। और प्रभु की इस कृपालुता कर्तव्यता को देख लोगों ने आके कहा कि "वरी की सब सेना मारी हुई पड़ी है।" यह सुन सब सचु (सुख) को प्राप्त हुए। (२८४) टीका । कपित्त । (५५६ ) देखै हाँफै घोरो; "अहो ! कौन असवार भयो?" गयो आगे जबै, देख्यो वही बैरी पस्यो है । बोल्यो सुखपाय "अजू ! सांवरो. सिपाही को है ? एंकलेही फौज मारी, मेरो मन हस्यो है ॥ "तोही को दिखाई दई, मेरे तरसत नैन !" बैनन सों जानी वही स्यामप्रभु ढरयोहै' । पूछिकै पठाय दियो, वा नै पन यहै लियो, कियो, इन दुःख, करै भली, वुरो कस्यो है ।। २३२ ॥ (३६७) वार्तिक तिलक। अपना नियम पूजा समाप्तकर उठके वस्त्र शस्त्रादिसे सुसज्जित हो, RESUCRECECECRekCRECRD । . .

ॐॐॐ श्रीभक्तमाल सटीक। निकल कर, श्रीजयमलजीने अपनाघोड़ा मैंगवाया, देखें तो वह घोड़ा अत्यन्त श्रमित होकर पसीने से भरा हांफरहा है। देखकर आपने पूछा कि "इस घोड़े पर चढ़ा कौन था ?" पर किसी ने कुछ उत्तर नहीं दिया क्योंकि कोई इसका मर्म जानता ही न था । फिर आप वैरी की सेना की ओर आगे जाके देखें तो वही शत्रु घायल पड़ाहुआ है । परन्तु प्रभु के दर्शन के सुख-युक्र उसने श्री. 'जयमलजी से पूछा कि "अजी महाराज ! आपके यहां वह सांवला सा सुभट वीर कौन है ? कि जिसने अकेला ही सब सेना (फोज) मारडाली और मुझे घायल कर अपनी सुन्दरता से मेरा मन हर लेगया। दो "सियपिय वदन अदोष ससि, अलकावलि युग नाग। नयन विशेष कटाक्ष शर, सखि ! मोरे हिय लाग ॥" उसके वचन सुन, आप बोले कि "उन श्यामसुन्दर सुभटने तुम्ही को दर्शन दिया, मेरी तो आंखें तरस ही रही हैं।" आपके वचनों से उस शत्रुने जाना कि 'अहो हो वे तो स्वयं प्रभु ही थे जिन्होंने कृशकर इनकी रक्षाहेतु भाके ऐसा पुरुषार्थ किया।" श्रीजयमलजी ने उससे पूछा कि तुम्हारी क्या इच्छा है ? उसने कहा कि मैं अपने घर जाया चाहता हूँ" आपने कृपाकर उसको पालकी में चढ़ाकर उसके घर पहुँचत्रा दिया। अपनी दुष्टता की ग्लानि से दुःखित हो उसने विचार कि "देखो प्रभु के भक ऐसे होते हैं कि मैंने तो उनसे ऐसी दुष्टना की, और उन्होंने मेरे साथ ऐसी भजाई की।" फिर वह भी श्रीजयमलजी की नाई पूजन का पन ले सपरिवार भक्त होगया। (५७) एक ग्बालभक्तजी। (२८५) टीका-। करिन । (५५% -) भयो एक बाल, साधुसेवा सो रसाल करै, परै जोई हाथ लैकै सन्तन खवावहीं । पायो पकवान बनमध्य, गयो खाइयेकौं प्राइवे Mechi , ४४७ *** भक्तिसुधास्वाद तिलक। की ढील, चोर भैंस सो चुरावहीं ॥ जानिकै छिपाई वात मातासौं बनाइ कही, "दई विप्र भूखौ, घृतसंग फेरि आवहीं"। दिन हो दि. वारी को सु उन्हि पहिरायौ हांस, आइ घर जाम लिये रांभकै सुना वहीं ॥ २३३ ॥ (३६६) वार्तिक तिलक। किसी उत्तम ग्राम में बाल जाति के मध्य एक भगवद्भन हुए; वे बड़ी रसीली साधुसेवा किया करते थे, कि जो कुछ भोजन का अच्छा पदार्थ हाथ लगता था सो सन्तों ही को खिला देते थे। एक दिवस वनमें भैंस चग रहे थे; किसी तिथि उत्सव संयोग से इन्हीं के घर से अच्छे २ पकवान उनके पास पहुँचे; सो आपने तो पाए नहीं, लेके समीपस्थ किसी साधु को पाने के लिये ले गए; और भैंसें वहां ही छोड़ गए; आने में जितना विलम्ब हुआ उसी अन्तर में चोर भैंसों को चुराके हांक ले गये। आपने आके देखा ढूंढ़ा तो भैंसें मिली नहीं; भक्तजी ने जान लिया कि भैंसों को चोर ले गए। परन्तु घरवालों के भय से उस वार्ता को छिपाकर माता से बात बनादी कि "माई ! मैंने भैंसें एक भिक्षुक भूखे ब्राह्मण को दे दी हैं। वह माठा खायेंगे और घी सहित भैंसें फिर दे जायंगे॥" कुछ दिनके अनन्तर जब दीपावली (दिवाली) का दिन आया, उसदिन चोरों ने भैंसों को उत्साह से चांदी की हंसुलियां पहिनाईतब अपने भक्त की वाणी सत्य करनेवाले तथा भैंसों के प्रेरक प्रभुकी प्रेरणा से भक्तजीकी भैंसें उसके घरकी भैंसों को भी साथ ले भगी; और श्रीग्वाल भनजी के घर पर सबकीसव आकर खड़ी हो भाने (शब्द करने) लगीं। श्रीभक्तजी ने देखकर कहा कि "माता। देखो, भैंसें आ गई और घी बेंचके रुपयों की हंसुलियां भी वन- वाके ब्राह्मण देवता देकर चले गये ।" श्रीसाधुसेवीभक की गिरा सत्यकारी भगवान् की जय ॥ "अरुण मृदुल येई पदपंकज त्रिविध ताप दुखहरण हमारे ॥" BBCKE FORES ********* ४५० श्रीभनमाल सटीक । भक्त के शरीर में लगने नहीं दिया, वरन् वलिवन्धन प्रभु ने उस हथियार का घाव पापही अपने ही भंगपर ले लिया। बछड़े के संग संग डोलनेवाली गऊ की भांति भगवत् नित्य अपने अनुगों के साथ साथ विचरा करते हैं (फिराकरते हैं ) । (१) श्रीनिस्किश्चन हरिपालजी; (२) श्रीगोपाल जी ने जिसभक्त के लिये साक्षी दी; (३) श्रीरामदास डाकोरवाले ॥ इस मय भक्तों की कथा आरो पाती है। (५६) निष्किञ्चन नाम "हरिपाल" ब्राह्मण । (२८८) टीका | कवित्त । (५५५) भवनि के संग भगवान ऐसे फिस्यो करें जैसे वच्छसंग फिरे नेहवती गाइ है। "हरिपाल" नाम विप्रधाम में जनम लियो, कियो अनुराग साधु, दई श्री लुटाइ है। केतिक हजार लै बजार के करजें ख्वाएं, ग़रजन सरै, कियो चोरिको उपाई है । विमुख को लेत, हरिदास कौं न दुख देत; आये संतद्वार; तियासंग बतराइ है ॥ २३५ ॥ (३६४) वार्षिक तिलक। जैसे नेहवती गऊ अपने बच्चे के पीछे फिराकरती है वैसे ही श्री: भगवान् अपने भक्तों के संग सग सदा फिराकरते हैं। श्रीहरिपालजी ने एक ब्राह्मण के धाम (घर) में जन्म लिया। संतों में वड़ा प्रेम रखते और भारी साधुसेवा किया करते थे। इसी यही प्रभुका "यनिवन्धन" नाम लिग्वने का भाव - (१) जैसे प्रभु ने राजा बलि को ऐसे छला कि नापने के समय शरीर बढाके तानद्वीपग में सब नाप लिया, वेसे ही यहा प्रति हलके होकर आप पगों को उग दिया कि अपने सारे विग्रह को केवल एक बाली के तुल्य कर दिया । (२) जैसे चलि के यहा प्रभु विराजे, वसे रामदासजी के . यदा भी। . १ 'श्री =धन।२"हज़ार = सहन १०००।३"वज़ार हाट,नगर। ४ करज's . कर्ज, ऋण, उधार "रवाए खवाए, खिलाए, खिला दिये । ६"गरज' गर्ज, प्रयोजन, कार्य ।। RECOREAK SARAN ABCCICE । - ॐॐॐॐ भनिसुधास्वाद तिलक। में आपने घर का सव धन उठा दिया, वरंच महाजनोंसे कई सहस्र रुपये ऋण भी लेकर साधु भनों को खिला दिये; यहां तक कि आप का नाम "निष्किञ्चन"प्रसिद्ध होगया । जब ऋणभी नहीं मिलने और काम नहीं चलने लगा, तो साधु- सेवा ही के निमित्त चोरीपर पड़े, इस प्रकार से कि हरिविमुखों ही का धन लेते और भगवद्भक्कों को कदापि कुछ कष्ट नहीं देते थे। एक वेरे कुछ साधु आपके द्वार पर आ निकले । उनके भोजन के निमित्त अपनी धर्मपत्नी से बातचीत करने लगे। (२८१ ) टीका । कवित्त । (५५५) बैठे कृष्ण रुक्मिनी महले, तहां सोच पस्यो, हस्यो मन साधु- सेवा, साहरूप कियो है । पूछी “चले कहां ?" कही "भक्त हमारौ एक" "मैंहूँ आऊँ ?” “आओ;" आये जहां पूछि लियो है ॥ "अजू मग चल्यो जात बड़ो उतपात मधि, कोऊ पहुँचावै, देवौं,' लै रुपैया दियो है । "करो समाधान संत; में लिवाइ जाऊं इन्हे;" जाइ बनमांझ, देखि वहु धन, जियो है ॥ २३६ ॥ (३६३) वार्तिक तिलक। जब घर में कुछ नहीं ठहरा तो आप बड़े विकल हुए । उसी समय श्रीकृष्णभगवान का मन भी, कि जो श्रीद्वारका के अन्तःपुर में श्रीरुक्मिणी महारानीजी के साथ विराज रहे थे, भवजी की ओर खिंचगया कि "हम विश्वम्भर कहलाते हैं और हमारे ही भक्त के पास इस क्षण साधुसेवा के अर्थ कुछ नहीं है।" कहां तो श्रीरु- क्मिणी महारानीजी की परम प्रीति में मोहित थे, कहां भक की साधुसेवा-निष्ठा ने भगवान् का मन हरनिया। उठने देख महारानी जी ने पूछा कि "चंले कहां?" हरि ने उत्तर दिया कि "अमुक स्थान में मेरा एक भक्त है, मैं उसीके यहां जाता हूं" श्रीजी ने पूछा कि "मैं भी श्राऊं ? ( चलूं)।" हरि ने कहा "आओ, चलो।" १"महल"= {• अन्न पुर, रानेगास । ३ 'जियो है" जोगए है, प्राण श्राप है, अनि हर्ष को प्राप्त हुए है। SACANCARNI ॥ . - - KR -- FFARAKHARKHAO भक्निधास्वाद तिलक। ४५३ इनको धनुषवाणादिक हथियार लिये देख, डरकेमारे सब कुछ उतार दिये, पर केवल एक छल्लामात्र साहूकारिनि वा साहूकार की भंगुली में रह गया । वह भी आपने अंगुली मरोड़कर छीन ली। सुकुमारी बोली कि "हा निगुड़ा ! तू बड़ा ही निठुर है !" आपने उत्तर दिया कि "मुझे इसका छोड़ना कैसे अच्छा लग सकता है ? क्योंकि इस छल्ले में कई संतों का भोजन हो सकता है।" धन ले, दोनों को वहीं वाट में छोड़, आप साधुओं के भोजन की चिन्ता में अपने घर की ओर लपके; थोड़ी ही दूर आये थे कि प्रगट हो भगवान् ने सुन्दर अनूप युगल मूर्ति से भनजी को दर्शन दिये। श्रीनिस्किञ्चनजी ने साष्टांग दण्डवत् कर वह सब भूपणादि श्री- दम्पति के कमलचरणों के सामने रख कर निवेदन किया कि "सर्कार ! इसमें जो २ अनूठे २ गहने हैं सो आप दोनों के ही योग्य हैं; कृपाकर पहिनिये । और शेष को यह दास घर ले जाकर संतों को खिला देगा, साधु लोग बाट जोहते होंगे।" प्रभु ने आपको "भक्तभूप !" कहके छाती से लगा लिया और वह सब धन भनभूपजी को ही दे, आप युगल अखण्डैक नित्य किशोरमूर्ति अन्तान होगये ॥ श्रीभनभूपजी की जय; । सांचेमन मीत सर्कार की जय ॥.. दो० "तीन टुक कोपीन के, अरु भाजी पिन नौन । तुलसी, रघुपति उर बसें, इन्द्र वापुरो कौन ?॥" (६०) श्रीसाक्षीगोपालजी के भक्त। (२६१ ) टीका । कवित्त । (५५२) "गौड़" देशवासी उभै विप्र, ताकी कथा सुनौ; एक वैश'वृद्ध, जाति वृद्ध, छोटो संग है । और और ठौर फिरि आए फिरि पाए "वन," तन भयो दुखी; कीनी टहल अभंग है ॥ रीझो बेड़ो द्विजे "निज सुता तोको दई;" "अहो रहो नहीं चाह मेरे;" लंई विनै रङ्ग है । साखी दै गोपाल; "अब बात प्रतिपाल करो",टरो कुल, ग्राम, भाम, पूछयो सो प्रसंग है ॥ २३८ ॥ (३६१) RECI-CONGRESCREEKREATES SALA ४५२ श्रीभक्तमाल.सटीक। सरावगी साहूकार और साहकारिनि के रूप में चलके दोनों,जहां श्रीनिष्किञ्चन भक्त अपनी धर्मपत्नी से बातें कररहे थे, आ पहुंचे। भक्कजी के पूछने पर साहकारजी बोले कि "मार्ग के बड़े २ उत्पात में चलना है, सो यदि कोई हम लोगों को पहुँचा देवै तो उसको रुपए दें।" श्रीनिष्किञ्चनजी ने यह बात स्वीकार कर ली%3B और साहूकारजी ने कुछ रुपए दिये । इस द्रव्य को भक्तजी ने अपनी धर्मपत्नी को देकर कहा कि "तवतक तुम इससे सन्तों का बाल- भोग इत्यादि से कुछ समाधान करो, इतने में मैं इन लोगों को पहुँचाने को लिवा जाऊँ।” साहूकार तथा साहूकारिनि के साथ आप चले वन में जा यह देख हर्षित हुए कि इन हरिविमुखों के पास धन गहने बहुत हैं । ( २६० ) टीका | कवित्त । (५५३ ) देखें जो निहार, माला तिलक न सदाचार, 'होयँगे भण्डार जो धन इतो लायो है । लीजियै छिनाइ' "यह वारि" कहै “डारि देवौ;" दियो सब डारि, छला छिगुनी में छायो है ॥ अगुरी मरोरि, कही "बड़ो तूं कठोर अहो" "तो को कैसे छोडौं सन्त जे मोको भायो है" । प्रगट दिखायो रूप सुन्दर अनूप वह, “मेरे भक-भूप" लेके छाती सौ लगायो है ॥ २३७॥ (३६२) वार्तिक तिलक। आपने देख भाल लिया कि 'साहूकार के कोई संस्कार वैष्णव सदाचारानुसार अर्थात् माला तिलक कराठी छाप इत्यादि कुछ नहीं है और न भगवत् नाम ही उच्चारण करता है, परन्तु साहूकार साहू कारिनि दोनों के अंगोंपर धन गहने लदे हुए हैं इसलिये विचारने लगे कि जो इनके भण्डार बहुत धन से भली भांति भरे हैं, तब तो ये इतनां धन साथ लाए हैं; और इतने धनके हाथ लगने से संतों का भारी भण्डारा होगा, सो इसको छीन लेना चाहिये ऐसा मन में ना उन दोनों से बोले कि "एकही बेर कहने पर सब धन गहने धर दो।" दोनों ने अपनेतई असहाय जान, . E THERE ARE THE भक्तिप्तधास्वाद तिलक। इनको धनुषवाणादिक हथियार लिये देख, डरकेमारे सब कुछ उतार दिये, पर केवल एक छल्लामात्र साहूकारिनि वा साहूकार की भंगुली में रह गया । वह भी आपने अंगुली मरोड़कर छीन ली। सुकुमारी बोली कि “हा निगुड़ा ! तू बड़ा ही निठुर है !" आपने उत्तर दिया कि "मुझे इसका छोड़ना कैसे अच्छा लग सकता है ? क्योंकि इस छल्ले में कई संतों का भोजन हो सकता है।" धन ले, दोनों को वहीं घाट में छोड़, आप साधुओं के भोजन की चिन्ता में अपने घर की ओर लपके; थोड़ी ही दूर आये थे कि प्रगट हो भगवान् ने सुन्दर अनूप युगल मूर्ति से भकजी को दर्शन दिये। श्रीनिष्किञ्चनजी ने साष्टांग दण्डवत् कर वह सब भूषणादि श्री- दम्पति के कमलचरणों के सामने रख कर निवेदन किया कि "सार । इसमें जो २ अनूठे २ गहने हैं सो आप दोनों के ही योग्य हैं; कृपाकर पहिनिये । और शेप को यह दास घर ले जाकर संतों को खिला देगा, साधु लोग बाट जोहते होंगे।" प्रभुने। आपको "भनभूप !" कहके छाती से लगा लिया और वह सब धन भनभूपजी को ही दें, आप युगल अखण्डैक नित्य किशोरमूर्ति अन्तान होगये॥ श्रीभकभूपजी की जय; । सांचेमन मीत सर्कार की जय ॥..., दो० "तीन ट्रक कोपीन के, अरु भाजी बिन नौन । तुलसी, रघुपति उर वसें, इन्द्र वापुरो कौन ?" (६०) श्रीसाक्षीगोपालजी के भक्त। (०६१ ) टीका । कपित्त । (५५२) "गौड़" देशवासी उभै विप्र, ताकी कथा सुनौ; एक वैश'वृद्ध, जाति वृद्ध, छोटो संग है । और और ठौर फिरि आए फिरि आए "वन," तन भयो दुखी; कीनी टहल अभंग है ॥ रीझो बड़ो द्विज "निज सुता तोको दई;" "अहो रहो नहीं चाह मेरे;" लई विनै रङ्ग है । साखी दै गोपाल; "अव वात प्रतिपाल करो".टरो कुल, प्राम, भाम, पूछयो सो प्रसंग है ॥ २३८ ॥ (३६१) ४५७ श्रीभक्रमाल सटीक। वार्तिक तिलक। , गौड़,देश (उड़ीसा) के वासी दो ब्राह्मण, तिनकी कथा सुनिये एक बूढ़ा, जाति का कुलीन, और दूसरा युवा सामान्य कुल वाला, दोनों साथ साथ तीर्थयात्रा को चले थे। और और ठौर फिर के, फ़िर श्रीवृन्दावन में जब आये तत्र कुलीन वृद्ध ब्राह्मण दुखी हुए। छोटे विप्रजी ने (जो साधु सुभाव तो थे ही) दुखी बूढ़े की अभंग सेवा की; अर्थात् दिनरात टहल में भली भांति तत्पर रहे । अरोग होने पर बूढ़े ब्राह्मण अति प्रसन्न हुए और श्रीयुवा ब्राह्मणजी से बोले कि "हे विप्र । मैंने तुमको अपनी लड़की दी ॥" इन्होंने उत्तर दिया कि "ओह ! मुझे तो आपसे कुछ चाह नहीं. थी।" वृद्धदेव के बड़े आग्रह से श्रीगोपालजी को साक्षी रख कर इन्होंने विवाह स्वीकार कर लिया। जव घर आये, तब इन्होंने कहा कि "देवताजी! अब आप अपना वचन प्रतिपाल कीजिये ॥". स्त्री तथा कुल और ग्राम के लोगों ने वचन से टर (टल ) जाने को कहा और ( साथही ) सारा प्रसंग पूछा (२६२) टीका । कवित्त । (५५१) बोल्यो छोटो विष चिप्र दीजियै कही जो बात, तिया सुन "अहो सुता याके जोग है ?"। द्विज कहै "नाहीं कैसे करों ? मैं तो दैन कही," कही कहो "भूलि भयो, विथा को प्रयोग है" ॥ भई सभा भारी, पूछयो “साखी नर नारी ?" "श्रीगोपाल वनवारी, और कौन तुच्छ लोग है"। "लेवौं जू लिखाइ जोपे साखी भरें आइतव्याहिबेटी दीने, लीजै, करौसुखभोग है "॥२३६॥(३६०) वार्निक तिलक। छोटे विप्र जी. बोले कि "आपने जो बात कही है सो शीघ्र (चित्र) दीजिये।" स्त्री और पुत्र ने (पूरा प्रसंग सुनकर) कहा कि "क्या लड़की इसके योग्य है ?" बूढ़े विप्रजी ने उत्तर दिया कि "मैं नहीं कैसे करूँ ? मैंने तो देने को अवश्य कहा है।" तंब सबने, 1.

४५५ RRRRRRRRRRRRRRRRRE भकिसुधास्वाद तिलक। सिखाया कि कह दो कि "दुख समय की बात है, चूक हुई, भूल से कह दी गई होगी॥" इसकी बड़ी भारी सभा हुई । सभा ने पूछा कि “कोई नर वा नारी साक्षी है ?" आपने कहा कि "और तुच्छ लोगों का क्या कहना; साक्षी तो स्वयं श्रीगोपाल बनमाली जी ही हैं।" की ओर से कहा गया कि “पत्र लिखाय लीजै कि यदि गोपालजी आके साखी भर देवें, तो बेटो आप के ही साथ व्याह दी जायगी, कन्या लेजाकर सुख भोग कीजियेगा ॥" (२६) टीका। कवित्त । (५५०) भायौ वृंदावन, वनवासी श्रीगोपाल जू सों बोल्यो "चलों साखी देवी, लई है सिखाइकै"। बीते कैयौ याम तब बोले श्यामसुन्दरजू "प्रतिमा न चलै" "तोपै बोले क्यों जू भाय कै"। "लागे जब संग, युग सेर भोग धरौ रंग, आधे आध पावै, चलौं नूपुर बजाय कै. धुनि तेरे कान पर; पाच जिनि दीठि करै करै रहौं वाहि ठौर कही, मैं सुनाय के" ॥ २४०॥ (३८६) वार्तिक तिलक। आप आके श्रीवृन्दावनवासी गोपाल जू से बोले कि "ठाकुरजी ! पंचायत में मैंने पत्र लिखवा लिया है, कृपा करके चलिये साखी दीजिये" कई पहर व्यतीत हुये, न कुछ उत्तर मिला न श्रीविप्रजी ने कुछ भोजन किया; तब प्रसन्न होकर श्रीश्यामसुंदर- जी ने कहा कि "प्रतिमा चलती नहीं है ।" तो आपने पूछा कि "यदि प्रतिमा चलती नहीं है नो कृपा करके बोलती क्यों कर है?" श्रीवनमालीजी ने प्रसन्न होकर कहा कि “जव संग चलूं तो दो सेर भोग अर्पण किया करना हम दोनों आधा आधा पाया करेंगे; चलते समय मेरे चरणों के नूपुर बजते चलेंगे और उनकी ध्वनि तुम्हारे कानों में पड़ा करेगी, जिससे तुम अपने साथ साथ मेरे चलने की प्रतीति करना । मैं सुना के कहे देता हूं-किं "पीछे दृष्टि न डालना, जहां फिरके देखोगे वहां से मैं आगे न वढूंगा ॥" UCCESS * F ***** श्रीभक्रमाल सटीक । - (२६४) टीका | कवित्त । (५४६ ) गए दिग गांव,कही 'नेकु तो वितांव' रहे चितएते ठाढ़े दियो मृदु मुसकाय के । “ल्यावौ जू बुलाय"; कह्योनाय "देखौ आए आप” सुनतहि चौंकि सव ग्राम आयो धायकै ॥ वोलिक सुनाई साप; पजि हिये अभिलाप, लाख लाख भाँति रंग भस्यो उर भाय 'के। आयो न सरूप फेरि, बिनै करि राख्यो घेरि, भूप सुख टेरि दियो अवलौं वजायकै ॥ २४१॥ (३८८) जव गांव के पास पहुंचे तो भक्तराजजी ने अपने मन में कहा कि "तनक देख तो लं" देखते ही श्रीवनमाली गोपालजी वहीं खड़े रह गये, और मधुर मुसक्याय कर कहा कि "उन लोगों को चुला लाभो॥" , गांव के भीतर आकर आपने कहा कि "देखो श्रीसाक्षीगोपालजी कृपा करके गांवके वाहर आविराजे है" सुनतेही चौंककर सब ग्राम- वासी दौड़कर आ टूटे । श्रीगोपालजी वोले, और सुन्दर साक्षी दी। युवा ब्राह्मणजी का अभिलाप पूरा हुआ हृदय में लाख लाख प्रकार से प्रेम छा गया। श्रीगोपालजी की वह प्रतिमा श्रीवृन्दावन को लौट नहीं गई, चरन वहां के राजा तथा और प्रेमियों ने श्रीसाक्षीगोपालजी को अपने विनय वल से घेर कर वहीं रक्खा ॥ सब सुखी हुए। और यह बात विदित है ही कि उड़ीसा देश में आज-तक श्रीसाक्षीगोपालजी विराजमान हैं। विनय काशलपाल कृपाल कल्पतरु, द्रवत सकृत सिर नाए ॥" (६१) श्रीरामदासजी। ( २६५) टीका | कवित्त । (५४%) द्वारिका के ढिग ही डाकोर एक गांव रहे, रहै रामदास भन भक्ति या को 'प्यारिये । जागरन एकादशी करे रनछोर ज के, भयो तन वृद्ध, आज्ञा दई नहिं धारियै ॥ चोले भरिभाय "तेरौ ASCRecole SHEREIGGC *** भक्तिसुधास्वाद तिलक। आयवौ सह्यौ न जाय चलौं घर धाय तेरे 'ल्यावौ गाड़ी भारियै । खिरकी नु मन्दिर के पाछे तहाँ ठाढ़ो करौ, भरौ अकवारी मोकों वेगही पधारियै ।। २४२ ॥ (३८७) वार्तिक तिलक । श्रीद्वारकाजी के निकट (सातकोस) डाकोर (हीराकोरक नाम के एक गांव में श्रीरामदासजी रहते थे। आपको श्रीभगवान् की भक्ति अति प्रिय थी। श्रीरणछोर भगवान् के यहां प्रति एका- दशी की रात को जागरन कीर्तन उत्सव हुआ करता था, उसमें आप भी बरावर पहुँचा करते थे, यह आपका नियम था । आप बूढ़े हुए, तो भगवान् ने कृपाकर आज्ञा दी कि “तुम इस अवस्था में अब सात कोस आने जाने का कष्ट न सहा करो।” परन्तु आपने जागरन के आनन्द में साथ देना नहीं छोड़ा ।। भगवान् ने प्रेम तथा कृपापूर्वक कहा कि “तुम्हारा आना मुझ से सहा नहीं जाता; सो तुम शीघ्र मुझे अपने घर ही ले चलो। इसके योग्य एक गाड़ी ले आओ। मन्दिर के पीछे जो खिड़की है उसीके सामने गाड़ी खड़ी रखना । अपने अकवार में लेके मुझे उस गाड़ी पर लेटा देना और बड़ी त्वरा से गाड़ी हांक ले जाना" (२६६) टीका । कवित्त । (५४७) करी वाही भांति, आयो जागरन गाडी चढ़ि जानी सव 'वृद्ध भयो, थकी पांव गति है।' द्वादशी की आधी रात लेकै चल्यो मोद गात, भूषण उतारि धरे, जाकी सांची रति है ॥ मन्दिर उघारि देखें, परो है उजारि तहां; दौरे पाछे जानि; देखि कही कोन मति है। बापी पधराय हांकि जाय सुखपाय रह्यो; गह्यो चल्यो.जात भानि मास्यो घाव अति है ॥ २४३ ॥ (३८६) वात्तिक तिलक। श्रीरामदासजी ने वेसाही किया।.गाड़ी पर चढ़के जगिरन की- र्तन के उत्सव में आएँ । लोगोंने अनुमान किया कि 'बूढ़े होने से पांवों की शक्ति थक जाने के कारण अबकी गाड़ी पर आए हैं।' , ।

se non श्रीभक्तमाल सटीक। द्वादशी की आधी रात के समय भगवत् उसी ढंग से आपके साथ गाड़ी पर चले; आपके आनन्द की वार्ता ही क्या है ? हां, श्रीभग. वान् को गाड़ी पर चढ़ा ले चलने के पहिले श्रीरामदासजी ने भूपण सब उतार कर मन्दिर ही में छोड़ दिए; क्योंकि आप द्रव्य धन के भूखे तो थे ही नहीं, आपको तो केवल श्रीभगवत् के चरणों की सच्ची चाह थी॥ बड़े भोर जव मन्दिर खोलागया तो सबों ने देखा कि उजाड़ पड़ा । जान गए कि रामदास ही ले गए। लोगों ने आपका पीछा किया, दौड़कर समीप पहुँचे कि जहां से गाड़ी दिखाई देने लगी, तथा आपने भी देखा कि पीछा करनेवाले आ पहुँचे। आपको भारी चिन्ता हुई कि "अव क्या बुद्धि चलाऊँ ?" भगवत् ने आज्ञा की कि "उस समीपस्थ वापी में मेरी प्रतिमा छुपा दो।" ऐसा ही करके आप गाड़ी पर पांच फैला चैन से लेट रहे। गाड़ी धीरे धीरे हांक दी ( चला दी, खड़ी नहीं रक्खी)। वे लोग आ पहुँचे; गाड़ी जो चली जा रही थी उसको पकड़कर श्रीरामदास- जी को बड़ी मार मारी वरन आपकी देह में बरछी चुभा दी। ( २६७) टीका । कवित्त । (५४६) देखे चहुँदिशि गाड़ी; कहुँपै न पाये हरि करि पछतावो, कहैं "भन के लगाई है"। वोलि उठ्यो एक "एहि ओर यह गयो हुतो;" जाय देखें बावरी को लोहू लपटाई है ॥ "दासकों जु डारी चोट; ओट लई अंग मैं ही नहीं मैं तो जाऊं" बिजैमूरति बताई है। "मेरी सम सोनो लेहु;" कही जन “तोलि देहु" "मेरे कहां ?" वोल्यो “वारी तिया कै;" जिताई है ॥ २४४ ॥ (३८५) वार्तिक तिलक। मारपीट के अनन्तर उन सबने उस गाड़ी में चारों ओर श्री- भगवान् को ढूँढ़ा, परन्तु कहीं नहीं पाया। तब वे सब पछताने लगे कि 'व्यर्थ ही हमने भबैको कलंक लगाया तथा चोट लगाई।' इतने "यजे' दूसरी । पाठान्तर गरी' (गडी ) ॥

॥ . भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४५६ में उनमें से एक बोल उठा कि मैंने रामदास को देखा था कि उस बावली की ओर गया था।" सबने पावली में जा देखा जल में रुधिर छाया हुआ था! तब वे सब चिन्तित तथा चकित श्रीभगवान् ने आज्ञा की कि "मेरा भक्त मुझे मेरी आज्ञा से ले चला है; तुमने जो मेरे भक्त को मारपीट की सो मैंने अपने शरीर पर ले ली है, देखो ! मेरे ही लहू से बावड़ी रुधिरमय हो रही है; तुम ने वुग किया; तुम सब फिर जाव; तुम्हारे साथ मैं नहीं जानेका; अमुक टिकाने मेरी दूसरी मूर्ति है तुम उसको ही ले जाकर पधरा लो। और मेरी इस प्रतिमा के तुल्य सोना लेके लौट जाव ॥" पुजारियों ने मांगा कि अच्छा आप सोना तौल दीजिये" प्रभु ने आपको ( रामदासजी को ) आज्ञा दी कि"तोल दो।" आप बोले कि भला मेरे पास सोना कहां है ?" प्रभु ने उत्तर दिया कि "रामदासजी ! अपनी स्त्री के कान की बाली को मेरी मूर्ति के तुल्य तौलके दे दो।" यह कह फिर आपको भगवत् ने जिता दिया । (२६८) टीका । कवित्त । (५४५) लगे जब तौलिये कों, वारी पाछे डारि दई, नई गति भई, पल उठे नहीं बारी कौ । तब तो खिलाने भए, सबै उठि घर गए, कैसे सुख पावें फिस्यो मतिही मुरारी को ॥ घर ही विराजे आप, कंह्यो भक्रि को प्रताप, जाप करे जोपै फुरै रूप लाल प्यारी कौ। बलिवंध नाम प्रभु बांध बलि भयो तब; आयुध को छन सुनि आए चोट मारी को ॥ २४५ ॥ (३८४) वार्तिक तिलक। जब वे श्रीभगवत्प्रतिमा के साथ सोने की उस बाली को तौलने लगे, तो यह नई गति हुई कि प्रभुप्रताप से बाली ऐसी भारी हो गई कि बालीवाला पलरा पृथिवी पर से उठा ही नहीं । भगवत् ने निज मूर्ति को हलका कर लिया; यह पल्ला ऊपर को उठ गया। तब.तो पुजारी सव क्रोधित लजित हो हारकर घर लौट गए, यह AAS श्रीभक्रमाल सटीक। ४६० . कहते हुए, कि "रामदास के घर भगवत् भला क्या सुख पावेंगे ? पर प्रभु की मति ही उलटी हो गई ॥" श्रीसर्कार अब आपके घर ही में आ विराजमान हुए । भक्ति का प्रताप कहा (दिखलाया)। श्रीरामदासजी भजन जाप ध्यान में मग्न रहने लगे। देखिये, जो भक्त भगवन्नाम जपते हैं तो युगलसर्कार के रूप अनूप उनके हृदय में फुरते हैं (प्रकाश होते हैं)। प्रभु ने जब "बलि" को बांधा तब से "वलिबन्ध" नाम हुआ और राजा बलि के यहां प्रभु विराजे; और जब श्रीरामदासजी हथियार की चोट से घायल हुए तब प्रभु आपके यहां विराजने लगे और तभी से प्रभु का "आयुधकत" ऐसा नाम भी सुना जाता है । अभीतक घाव पर पट्टी बांधी जाती है। अब तक मन्दिर को जव जब सुधारने की आवश्यकता होती है, तव तब मूर्ति को राम- दास भनजी के ही वंश का कोई जन उठाता है; किसी दूसरे से वह प्रतिमा उठती ही नहीं। इससे जाना जाता है कि अभी तक भगवत् वहां विराजते हैं। (२६६) छप्पय । (५४४) बच्छ हरन पाछै बिदित सुनौ संत अचरज भयो। जसूस्वामिके वृषभ चोरि ब्रजबासी ल्याये । तैसेई दिये श्याम वरष दिन खेत जुताये॥ नामा ज्यों नँद- दास मुई इक बच्छि जिवाई । अंब अल्हकौं नये प्रसिद्ध जग गाथा गाई ॥ बारमुखी के मुकुट कौं, श्रीरङ्गनाथ को शिर नयो। वच्छ हरन पाछै विदित सुनौ संत अचरज भयो॥५४॥ (१६०) वार्तिक तिलक। श्रीमद्भागवत् में ब्रह्माजी का वच्छहरण विस्तारपूर्वक गांया Stackact SAA CINE भक्तिसुधास्वाद तिलक। हुआ है । वैसा ही आश्चर्यजनक चरित्र उसके पीछे (कलियुग में) हुआ सो विदित है, सन्तों के सुनने योग्य है। (१) श्रीजसूस्वामी के बैल बजवासी चोर चुरालाए; सर्कार ने कृपा करके वैसे ही बैल स्वामीजी को दिये जिनसे वर्ष भर आपने खेत जुतवाए । फिर चोरों ने आपको बैल फेर दिये। (२) श्रीनामदेवजी की नाई नन्ददासजी ने भी रामकृपा से मरी बछिया को जिलादिया। (३) श्रीअल्हजी के लिये आंब के वृक्ष नीचे को झुक पाए, सो प्रसिद्ध ही है; जगत् में यह यश सब गाते हैं। (४) वारमुखी का मुकुट कृपाकर धारण करलेने के लिये श्री. रगनाथ कृपालुजी ने अपना सीस नवा दिया। १. श्रीजसूस्वामीजी, | ३. श्रीअल्हजी, २. श्रीनन्ददासजी, ४. एक वारमुखीजी॥ हे साधुवृन्द ! ये सब कथा सुनिये; द्वापर में बच्छहरण च- रित्र के पश्चात् कलियुग में भी यह आश्चर्यजनक वृत्तान्त हुआ सो प्रसिद्ध ही है ॥ (६२) श्रीजसूस्वामीजी। (३००) टीका । कवित्त । (५४३) "जसू” नाम स्वामी, गगा जमुना के मध्य रहैं गहें साधुसेवा; ताको खेती उपजावहीं । चोरी गए बैल ताकी इनकी न सुधि कळू तैसे दिये श्याम, हल जुटै मन भावहीं॥ आए ब्रजवासी पैठ वृषभ निहारि कही "इन्हें कौन ल्यायो?" घरजाय देखि आवहीं ऐसे वार दोय चारि फिरेउ, न ठीक होत, पूछी, पुनि ल्याए आए, उन्हें पे न पावहीं ॥२४६॥ (३८३) वार्तिक तिलक । अन्तर्वेद में अर्थात् श्रीगङ्गायमुनाजी के वीनवाले प्रदेश में "श्रीजसूजी" नाम एक स्वामी रहने थे; आपने साधुसेवावृत्ति धारण R ENI , RSE श्रीभनमाल सटीक। ४६२ - की थी, इस निमित्त आप खेती किया करते थे। एक समय आपके वैलों को व्रजवासी चोर चुरा ले गए। आपको बैलों के चोरी जाने की कुछ सुधि नहीं हुई, क्योंकि श्याम कृपालु ने आपको ठीक वैसे ही बैलों का जोड़ा अनुग्रह किया। वे भी भली भाँति खेत जोता करते थे। हां, इस जोड़े को स्वामीजी अधिक प्यार किया करते थे। इसी प्रकार से एक वर्ष के लगभग व्यतीत हुआ एक दिन हाट में वे ही चोर आए और श्रीस्वामीजी के यहाँ दोनों बैलों को देख चकित हो आपस में बोले कि "इनको हमारे यहां से यहां लाया कौन?" वे घर पहुँचे तो वहाँ भी बैलों को बंधे देखा, यहाँ फिर पाए तो यहाँ भी देखे । ऐसे ही दो चार (कई) बेर यहां वहां आए गए, दोनों जगह वैसाही जोड़ा देख अनि श्रमित और चकित हुए; चित्त में कोई एक बात ठीक नहीं होती थी। निदान स्वामीजी से पूछा; आपने उत्तर दिया कि "बैल तो मेरे रामजी के यहां सदा बने हैं खेत जोतते हैं।" तब घर जा बैलों को चोर लोग आपके पास ले आए । परन्तु यहां आते ही इन बैलों को न पाया (ये अदृश्य हो गए ) केवल वेही चल फिर रह गए। (३०१ टीका | कवित्त । (५४२) बडोई प्रभाव देख्यो, तैसे प्रभु वैल दिये; भयो हिये भाय, जाय पायनि में परे हैं। निपट अधीन दीन भाषि; अभिलाप जानि, दयाके निधान स्वामी शिष्य लेकै करे हैं ॥ चोरी त्यागि दई; अति शुद्ध बुद्धि भई; नई रीति गहि लई; साधु पन्थ अनुसरे हैं । अन्न पहुँचावें दूध दही दै लेड़ा, आवें, सन्त गुण गावें वै अनन्त सुख भरे ॥२४७॥ (३८२) वातिक तिलक। चोरों ने आपका यह बड़ाभारी प्रभाव देखा कि प्रभु ने कृपा करके आपको वैसे ही वेल दे दिये थे, इससे उनके हृदय में वड़ा १ "लहाय"प्रेम करते थे ।। ला -- , भक्तिसुधास्वाद तिलक। भाव उत्पन्न हुआ, और आके वे स्वामीजी के पांवों में लपट गये। उनके निपट आधीन दीन वचन सुन, उनका अभिलाष देख, दया. निधि स्वामीजी ने उनको अपने शरण में लेके भगवंत्मन्त्र का उपदेश किया। उन्होंने चोरीकर्म त्याग दिया, उनकी मति अति विशुद्ध हो गई; उन्होंने नवीन रीति धारण की; वे सन्तों के पन्थ पर चले; गुरुस्थान में भगवत् तथा साधुओं के लिये अन्न और दूध दही इत्यादि पहुँचाते; बड़ा अनुराग किया करते; साधुसंग में उप- स्थित होते; भनि भक्त भगवंत तथा गुरु के यश गाते; अनन्त सुख पाते; और परमानन्द में छके रहते थे। दो० "हरिगुणग्राम नाम रत, गत ममता मद मोह । ताकर सुख सोइ जाने, चिदानन्द सन्दोह ॥" (६३) श्रीनन्ददासजी वैष्णव-सेवी। (२०२) टीका । कवित्त । (५४१) निकट बरैली गांव, तामैं सो हवेली, रह नन्ददास विप्रभक्त साधु-सेवा-रागी है । करै द्विज द्वेष तासों, मुई एक बछिया लै, डारि दई खेत मांझ गारी जक लागी है । हत्याको प्रसंग करें, सन्त जन हूं सों लरें, हिन्दू सो न मारै, यह बड़ोई अभागी है । खेत पर जाय वाही लियो है जिवाय, देखि द्वेषी परे पाय, भक्ति भाय मति पागी ह॥२४८॥ (३८१) वार्तिक तिलक। वरैली के समीप एक ग्राम "हवेली" में श्रीनन्ददास नाम एक ब्राह्मण साधुसेवानैष्ठिक रहते थे। एक दुष्ट गोतिया आपसे देष रखता था, उसने एक मरीहुई वछिया आपके खेत में डालदी; झूठ मूठ आपको हत्या दोष लगाया । बहुत बड़धड़ाता रहा। सन्तों से भी वे सब विवाद बखेड़ा करते थे कि यह हत्यारा है हिन्दू नहीं है तुम लोग कैसे साधु हो जो इसके यहां हो, इत्यादि । श्रीनन्ददासजी खेत पर गए और आपने उस वछिया को BEAUCRESECREGAORAKASKAR 455344-5ห้ DES: श्रीभकमालसटीक। श्रीभगवद्यश सुनाके जिला लिया । तब तो द्वेषी लोग आपके चरणकमल पर गिरकर शुद्ध भावभक्ति से हरिशरणागत हुए। (६४) श्रीअल्हजी [अर्चावतारनैष्ठिक] (३०) टीका । कवित्त । (५४०) चले जात अल्ह, मग लाग वाग दीठि परयो, करि अनुराग हरि- सेवा विस्तारियै । पकि रहे आंच मांगे माली पास भोग लिये; कह्यो "लीजे"; कही; झुकि आई सवडारियै ॥ चल्यों दोरि राजा जहां, जायकै सुनाई चात, गात भई प्रीति आपुतट पाय धारियै । आवत ही लोटि गयो, “मैं तौ जू सनाथ भयो, देवो लै प्रसाद" भक्ति भाव ही सँभारियै ॥ २४६ ॥(३८०) वार्तिक तिलक । श्रीअल्हजी महाराज की भगवत्-प्रतिमा-निष्ठा की महिमा प्रशंसा किससे हो सकती है। एक दिन आप किसी तीर्थ को जाते थे, मार्ग में आपने पके रसालों की एक राजवाटिका देखी । “भयउ रमापति-पद-अनुरागा” वहीं बड़े प्रेम से श्रीसर्कार की पोडशोपचार पूजा करने लगे। भगवत्भोग के लिये माली से आंब मांगे उसने रूखेपन से कहा "तोड़ लो।" आपने वृक्ष पर दृष्टि डाली; वहीं पके आंबों से लदी डालियां श्रीसिंहासन के निकट झुक आई । आपने वड़ी सुगमता से रसालफल तोड़कर श्रीयुगलसर्कार को भोगलगाए। माली अपने राजा के पास दौड़ा गया, सब वार्ता जनाई। राजा आ आपके पदारविन्द पर लोटने लगा और प्रेम भाव में मग्न हो गया ॥ वह बोला "मैं सनाथ हुआ, मुझे प्रसाद दीजिये” भक्ति भाव का माहात्म्य समझना चाहिये कि जहां ब्रह्मादिक सीस नवाते.हैं वहां वृक्ष और महीपति का झुकना कौन सी बड़ी बात है ॥ • पाठान्तर "पुठत"-गिरते पड़ते ॥ RESCAMASKEKINGRECASS ROCESCREENESS . । भतिसुधास्वाद तिलक । (६५) वारमुखीजी। (३०४) टीका । कवित्त । ( ५६६) वेश्या को प्रसंग सुनौ, अति रस रंग भयो भस्यो घर धन अहो ऐप कौन काम को चले मग जात जन, ठौर स्वच्छ आई मन, छाई भमि आसन, सो लोभ नाही दाम को निकसी झमकि द्वार, हंस से निहारि सब, कोन भाग जागे भेद नहीं मेरे नाम को । मुहरनि पात्र भरि, लै महन्त आगे धस्यो, ढस्यो हग नीर, कही "भोग करौ श्याम को" ॥ २५० ॥ (३७६) वार्तिक तिलक। एक दक्षिणी वेश्याजी की कथा बड़ी ही रॅगीली तथा सुनने योग्य है । इसका घर धन से भरा था परन्तु किस काम का क्योंकि वेश्या ही तो थी । वेश्याओं के बाहरी चत्मकारों का कहना ही क्या, इसके घर द्वार सब बड़े ही स्वच्छ तथा सुन्दर थे। एक दिन सन्तों का एक वृन्द इधर से जा रहा था। इस जगह की विमलता वृक्ष की मनोहर छाया जल का सुभीता इत्यादि देख, साधुलोग यहीं टिक रहे, जहां तहां भूमि पर आसन जमादिये, ठाकुर के सिंहासन विराजमान किये । सन्त लोग कुछ धन वा पूजा प्राप्ति के लोभ से यहां नहीं ठहरे किन्तु भगवत्-सेवा की सुगमता समझ रम रहे.॥ वारमुखीजी झमझम करती जो द्वारपर आ निकली, तो सौ के दर्शन कर इन्होंने केवल मन की प्रसन्नता ही नहीं पाई, वरंच इनकी मति में भी निर्मलता आई । ये विचारने लगी कि "इन महा- स्माओं को मेरी जाति का भेद ज्ञात नहीं है । अस्तु, मेरे भाग्य का उदय तो निःसन्देह ही हुभा है।"स्वर्णमुद्रों से भरी एक थाली श्री- महन्तजी के भागे ला रक्खी और दीनता तथा प्रेम से ऑखों में आंसू भर हाथ जोड़ दण्डवत् कर विनय किया कि "इससे भगवत् को भोग लगाइये, इस अधम पतित को कृतार्थ कीजिये ॥" (३०५) टीका । कवित्त । (५३) पूची "तुम कौन ? काके भौन में जनम लियो ?" कियो सुनि HAR ताप Pre MARRIOR ४६६ श्रीभक्तमाल सटीक। मौन, महा चिन्ता चित्त धरी है । "खोलिकै निसंक कहो, संका जनि मानो मन, कहि "वारमुखी" ऐपै पांय आय परी है ॥ "भरो है भंडार धन करो अंगीकार अजू ! करिये विचार जोपै, यह मरी है"। "एक है उपाय हाथ रङ्गनाथ जू' को अहो कीजिये मुकुट जाम जाति मति हरी है" ॥ २५१ ॥ (३७८) वार्तिक तिलक। महन्तजी ने इनसे पूछा कि "तुम कौन हो ? और तुम्हारे मा बाप कौन?" यह प्रश्न सुन ये मौन हो रहीं और चित्त में बड़ी चिन्ता करने लगीं। श्रीमहन्तजी ने पुनः कहा कि मन में कुछ शंका न लाओ, निःशंक होकर खोलके कह दो।" इन्होंने, यह बतला कर कि"वारमुखी हूँ" श्रीमहन्तजी के पदसरोज पर गिरके, प्रार्थना की कि"श्रीसीतारामकृपा से भण्डार धन से भरा है कुछ घटी नहीं है; पतितपावन सन्त कृपा करके इस दलतृण को अंगीकार करें; और यदि कुछ बूझ विचार करने लगेंगे तोतो इस पापिन का मरण ही सम॥" साधु महात्माओं ने इनसे आज्ञा की कि हम रामकृपा से एक उपाय बताते हैं । इसकी सफलता श्रीरगन्नाथजी के हाथों में है, और वह यह है कि इस द्रव्य का अति उत्तम मुकुट बनवाकर श्रीरङ्गभगवान् को सप्रेम अर्पण करो ॥" (३०६ ) टीका । कवित्त । ( ५३७) "विप्रहू न छूए जाको, रंगनाथ कैसे लेत?" "देत हम हाथ तो को रहें इह कीजिय" । कियोई बनाय सब घर को लगाय धन; बनि ठनि चली थार मधि धरि लीजियै ॥अस आज्ञा पाइकै निसंक गई मन्दिर में फिरी यों ससक धिक तिया धर्म भीजिये। बोले आप "याको ल्याय आप पहिराय जाय" 'दियो पहिराय' नयो सीस मति रीमियै ॥ २५२ ॥ (३७७) वार्तिक तिलक। वारमुखीजी ने कहा कि "जिसको विप्र (मनुष्य) भी छूते तक NEER KICKASKEKSI PRERNATER भकिसुधास्वाद तिलक। ४६७ नहीं, उसको स्वयं श्रीरङ्गानाथ भगवान् किस प्रकार से स्वीकार करेंगे?" तेरे हाथों से चढ़वाने तक हम सब यहीं ठहरेंगे; तू मुकुट बनवाव ॥" इन्हों ने घर की सम्पूर्ण सम्पत्ति लगाकर (कहते हैं कि तीन लाख के लागत का) एक जड़ाऊ मुकुट बड़ी श्रद्धा से बनवाया। वस्त्र शृङ्गार से वनठन के थाल में मुकुट को लेकर गाती बजाती धूमधाम से चलीं । ये आज्ञा पाकर मन्दिर में निशंक चली आई परन्तु इस समय इनको मासिकधर्म हो गया; अति दुःखित लज्जित शंकित हो, ये पीछे हट अपने को धिक्कार दे, सजल नेत्र भूमि पर गिर पड़ी। दीनवत्सल अन्तर्यामी प्रेमरसिक भगवत् ने शीघही पुजारी को आज्ञा की कि "वारमुखी को सादर लिवालाओ, वह अपने हाथों से मुकुट मुझे पहिरा जावै ।" पुजारियों ने इनको प्रभु के निकट पहुँचा दिया । इनके हाथ न पहुँचने पर श्रीदीनबन्धु कृपासिन्धु ने स्वयं अपना सीस इतना भुका दिया कि बड़भागिनी ने हाथ उठाकर बड़ेही अनुराग से श्रीसर्कार को मुकुट पहिना दिया। रिझ- वार की जय । आपके प्रेम का क्या कहना ॥ १ बन्द । "मैं नारि अपावन, प्रभु जग पावन, करुणानिधि जनसुखदाई। राजीव विलोचन, भवभयमोचन, पाहि पाहि शरणहिं आई। विनती प्रभु मोरी, मैं मति भोरी, नाथ ! न मांगों वर आना। पदपद्मपरागा, रस अनुरागा, मम मन मधुप कर पाना ॥ दो० "बार बार बर मांगों, हरपि देहु श्रीरङ्ग। 'पद सरोज अनपाइनी, भक्रि, सदा सत्सङ्ग ॥" (३०७) छप्पय । (५२६) और युगन ते कमलनयन, कलियुग बहुत कृपा करी॥ वीच दिये रघुनाथ भक्त संग ठगिया लागे। SARKAkson act 1 ।

NRN ? * ४६८ श्रीभक्तमाल सटीक। निर्जन बन मैं जाय दुष्ट कर्म कियो अभागे ॥ बीच दियो सो कहां ? राम ! कहि नारि पुकारी। आए सा- रँगपानि शोक सागर ते तारी ॥ दुष्ट किये निर्जीव सब, दास प्राण संज्ञा धरी। और युगन तें कमलनैन कलियुग बहुत कृपा करी ॥ ५५ ॥ (१५६) १ एक भक्त ब्राह्मण । २ इनकी धर्मपत्नी रामभक्ता ॥ (६६।६७) दम्पति (भक्त विप्र सपत्नीक) वार्तिक तिलक। दीनहित श्रीराजीवलोचन भवभयमोचन श्रीरामचन्द्रजी और युगों की अपेक्षा कलियुग में जीवों पर अधिकतर कृण कर रहे हैं। दो भक्तों के साथ मार्ग में ठग लगे; "श्रीरघुनाथजी तुम्हारे हमारे बीच में है" ऐसा कहकर ठगों ने श्रीभक्तों का सन्देह निव- टाया, परन्तु निर्जन वन में पहुंचते ही उन अभागे हत्यारों ने प्रति दुष्टता की कि पुरुष को मार डाला । भक्का स्त्री ने कहा कि "जिन रामजी को दुष्टों ने बीच में बताया था वे अब कहां हैं ?" वहीं श्री- शाईधर जनरक्षक रघुवीर ने प्रगट हो दुष्टों को मार भक्त को जि- लाया अपने जनों को शोकसमुद्र के पार किया श्रीरामजी सब युगों से काल में अधिकतर कृपा करते आते हैं। (300) टीका। कवित्त । (५३५) विप्र हरिभक करि गौनो चल्यो तियासंग, जाके दूनौ रंग, ताके बात ले जनाइयै । मग ठग मिले द्विज पू "अहो ! कहां जात?" "जहां तुम्ह जात" या मैं मन न पत्याइयै ॥ पंथ को छुटाय, चाह वन में लिवाय जायँ, कहें "अतिसूधो पैंड़ो" डर मैं न आइयै । बोले "वीचं राम" तऊ हिये नेक धकधकी, कहै वह बाम "श्याम नाम कहां पाइये" ॥ २५३ ॥ (३७६) KUCCECASSED --- KRE , NEL भकिसुधास्वाद तिलक। १६६ वार्तिक तिलक। 'एक भक्क, जाति के ब्राह्मण, गौना कराके स्त्री को ले घर आते थे। पुरुष से स्त्री का अनुराग दूना चढ़ा चढ़ा था । इनकी कथा सु- निये। मार्ग में ठग मिले, साथ चले । भक्त विप्रजी ने पूछा कि "तुम सब कहां जाते हौ ?" ठगों ने उत्तर दिया कि “जहां तुम दोनों जाते हो।" इस उत्तर में ब्राह्मण भक्तजी को प्रतीति नहीं क्योंकि ठग चाहते थे कि यथार्थ मार्ग को छुड़ाकर इन्हें वन को लिवा जायँ; उन सबोंने वन मग को "वड़ा सीधा" बताया। ब्राह्मणजी के नहीं पतियाने पर दुष्टों ने श्रीरामजी को बीच में कहके इनका सन्देह घटाया; फिर भी आपके मन में कुछ कुछ धकधकी थी ही। परन्तु आपकी स्त्री आपसे भी अधिकतर प्रीति प्रतीति रखती थी, भाग्यवती ने कहा कि “शंका नहीं करनी चाहिये क्योंकि रामजी का नाम बीच में देते हैं, भला श्रीरामजी का नाम सहज में कहां मिलता है।" (३०६) टीका । कवित्त । (५.४) चले लागि संग, अब रंग कै कुरंग करौ तिया पर रीझे भक्ति साँची इन जानी है। गए वन मध्य ठग लोभ लगि मास्यो विप्र, छिप ले के चने वधू, अति बिलखानी है ॥ देखै फिरि फिरि पायें; कहें “कहा देखै ? मास्यो" तब तो उचास्यो देखौं वाही बीच प्रानी है। आए राम प्यारे, सब दुष्ट मारि डारे, साधु प्रान दै उचारे, हित रीति यों वखानी है ॥ २५४ ॥ (३७५) वार्तिक तिलक । ब्राह्मण देवता अपनी स्त्री की भक्ति प्रीति प्रतीति श्रीसीताराम- चरणों में देखकर उसपर बहुत रीझे और मन में विचारा कि "चाहे दुष्ट कुरंग करें चाहे रंग।" वनके ही मग से सब साथ साथ चले। वन के बीच में जाके अभागे लोभी दुष्टों ने कुरंग किया, विप्र को मारडाला । ब्राह्मणी को बड़ी त्वरासे लिवाल चले।ब्राह्मणी अतिशय विलाप करती और पुनः पुनः पीछे फिर फिर देग्वती जाती थी BIG GORIAGEC स RRH श्रीभक्तमाल सटीक। " दुष्ट बोले कि "तूने देखा ही है कि तेरे पति को हमने मार डाला; तो अब तू फिर फिर देखती किसको है ?" इस देवी ने उत्तर दिया कि "उन प्राणनाथ के आने की प्रतीक्षा कर रही हूं कि जिनका नाम तुम सोंने लिया था कि “हमारे तुम्हारे बीच में हैं" "राम" कह पुकारा॥ अभागों ने कहा "चल फूहरी ! ये सब कहने की ही बात भर थी।" इतने ही में प्राणनाथ श्रीरघुनाथ तथा लाडिले लाल लखन जी धनुष बाण कृपाण लगाए घोड़ों पर चढ़े देखने में पाए । प्रभु ने दुष्टों का वध कर मृतक साधु ब्राह्मण को जिला लिया; यों दर्शन दे भन दम्पत्ति को अत्यन्त सुखी किया; इनको इनके घर तक पहुँचा दिया । प्रभु की भक्तवत्सलता यों वखानी गई है ॥ (३१०) छप्पय । (५३३) एक भूप भागौत की कथा सुनत हरि होय रति। तिलक दाम धरि कोइ, ताहि गुरु गोविंद जाने। षट- दर्शनी* अभाव सर्वथा घट करि मानै । भांड भक्त को भेष हांसि-हित मँड़-कुट ल्याये । नरपति कै दृढ़ नेमताहि ये पांव धुवाये॥ भांड़ मेप गाढ़ो गह्यो दरस परस उपजीभगति । एक भूप भागौत की कथा सुनत हरि होय रति ॥ ५६ ॥ (१५८) (६८) एक भेषनिष्ठराजा। वार्तिक तिलक। एक भागवत (भगवत्भक) नृपति की कथा की ऐसी महिमा *वर्ण(१) जाह्मण (२)क्षी (३) शुद्र, श्राश्रम-१) ब्रह्मवारी। २) गृहस्थ (३) वानप्रस्थ (४) संन्यासी, पइदर्शमी (१) उपनिपर (२) न्याय (२) कर्मकाण्ड (४) तत्वविवेचा (५) योग श्रार (६) स्मृतिया, छ शु स्त्र-श्लो. चेदान्त १ तर्क, २ मीमाला, ३ माय, ४ पानाल ५ नया | धर्म शासन मित्येतत् प्राहुः शास्त्राणि पइवुधा ॥१॥ SCSCAGAR १ -- - *********** भकिसुधास्वाद तिलक। ४७१ । है कि इसके श्रवण से श्रीहरिपदपद्म में भक्ति होती है । श्रीऊर्द्ध- पुण्डू तथा श्रीतुलसीजी की कण्ठी माला जिनके देखते थे, उनको ये बड़भागी अनुरागी महीपजी सर्वथा श्रीगुरु और श्रीहरि के समान जानते थे; पट दर्शनी से भाव नहीं रखते थे भागवतों से सवको घट के मानते थे । भांडों ने देखा कि 'इस राजा के यहां हमारी तो पूछ पाछ कुछ नहीं; कण्ठी और खड़े तिलकवालों का ही यहां सेन्मान है; इससे भांड़ भागवत साधुओं का भेप हँसी हित धारण कर राजा के यहां पहुँचे, महाराज का यह प्रेम नेम दृढ़ था कि भेष के चरण अपने हाथों से धो लेते थे, अतः उन भांडों को भी कराना पड़ा। भांडों को हंसभेप के प्रभाव, और भागवतवर के दर्शन तथा स्पर्श से, श्रीसीतारामीय भेष में भक्ति दृढ़ हो आई। इन भनभूप की कथा सुनने से किस अधिकारी के चित्त में भक्ति न उपजेगी? ॥ (३११) टीका । कवित्त । ( ५३२) राजा भक्तराज डोम * भांड़ को न काज होय, भोय गइ, "या को धन हरी को न दीजिये" । आए भेष धारि लै पुजाय नाँचे दै कै तारि नृपति निहारि कही यों निहाल कीजियै ॥ भोजन कराये भरि मुहरनि थार ल्याय आगे धरि विनय करी "अजू यह लीजिये "। भई भनि रासि बोले "आवै वास, भावै नाहिं," वाहिं गहें, रहै "कैसें चले मति भीजिय” ॥ २५५॥ (३७४) वार्तिक तिलक । एक राजा भक्तराज था इसके यहां भगवत्भेषधारी को छोड़ डोम (गानेवालों) और भांड़ों को कुछ नहीं मिलता था; हरिभक्त राजा समझता था कि धन श्रीहरिका है, दूसरों को नहीं देना चाहिये। भांड़ लोग सन्तों का भेप करके आए। पांव पुजवाके, ताली बजा बजाके श्रीठाकुरजी के सामने नाचे । राजा ने देखकर कहा "आप सबने मुझे निहाल कर दिया।" भूप ने उनको प्रेमसे भोजन * किसी ने कहा है -दो० जोगी, १ जंगम, २ सेवड़ा, ३संन्यासी, ४ दाप, ५। छठपं दर्शन पिप्र६ को, जामे मीन न मेप ॥१॥ SHOKA , 15

Heart
श्रीभक्रमाल सटीक।
४७२
कराया, थाली में स्वर्णमुद्रा भर आगे ला रखकर विनय किया कि
"यह अंगीकार कीजिये।" श्रीहरिकृपासे उनको बड़ी भक्ति उत्पन्न
हुई, भेप सदा धारण किये ही रहे, धन की वासना जाती रही, वे
कहने लगे कि "इसमें से दुर्गन्ध आती है, हमको भला नहीं लगता
है; हम लोग जाते हैं।" राजा ने उनके हाथ पकड़के कहा कि "क्यों
चले ? कृपा करके रहिये।" वे यह कहते चले गए कि "अव सांची
प्रीति भेष और भजन में हुई, अब वैराग तथा अनुराग ही में मति
पग गई॥"
(३१२) छप्पय । (५३१)
अन्तरनिष्ठ नरपाल इक, परम धरम नाहिन धुजी॥
हरि सुमिरण हरि ध्यान आन काहून जनावै। अलग
न इहि विधि रहै; अंगना मरम न पावै ॥ निद्रावस सो
भूप वदन तें नाम उचायो । रानी पति पर रीमि,
बहुत वसु तापर वारयो ॥ ऋषिराज सोचि कह्यो
नारि सों, “आज भक्ति मेरी कजी।" * अन्तरनिष्ठ
नरपाल इक, परम धरम नाहिन धुजी ॥५७॥ (१५७)
(६९७०) एक अन्तनिष्ठराजर्षि तथा इनकी रानी।
एक राजा अन्तनिष्ठ (गुप्त) भक्त परम भागवत था। उसके
बाह्यमें फहरानेवाली ध्वजा नहीं थी; अपनी हरिभक्ति हरिस्मरण
हरिध्यान प्रगट होने नहीं देता था। वह इस प्रकार से रहता था कि
इसकी धर्मपत्नी भी इसकी भक्ति का मर्म नहीं पाती थी, अतएव
यह उदास सी रहा करती थी।
नृपति से निद्रा में श्रीविहारीजी का नाम उच्चारण हुआ। इससे
* "कजी"-जाती रही, वजा होगई, चूक गई ॥

. । ASTER भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४७३ इसकी भक्का रानी अपने पति पर अति रीझी और हर्ष से उसने प्रभात होते ही प्राणपति पर बहुत सा धन न्यवछावर किया। राजर्षि ने अपनी रानीजी से इस धूमधाम और प्रहर्ष का कारण पूछा । रानी ने अपने हर्ष का विषय विस्तारपूर्वक कह सुनाया। राजा को भारी सोच हुआ और इन्हों ने अपनी रानी से कहा कि "खंद की बात है कि आज मेरी अन्तरंग भक्ति जाती रही ।" (३१) टीका | कवित्त । (५३०) तिया हरिभक्त कहै "पति पै न भन पायों !” रहै मुरझायो, मन सोच बढ्यो भारी है । मरम न जान्यो निशि सोवत पिछान्यो, भाव विरह प्रभाव नाम निकस्यो विहारी है । सुनत ही रानी प्रेम- सागर समानी भोर सम्पति लुटाई, मानो नृपति जियारी है। देखि उत्साह भूप पूझ्यो, सो निवाह क्ह्यो; रह्यो तन ठौर, नाम जीव यौं विचारी है ॥ २५६ ॥ (३७३) वार्तिक तिलक। एक अन्तर्निष्ठ भक्त राजर्पिजी की स्त्री हरिभक्ता थी, परन्तु उसको इस बात का बड़ा सोच बना रहता था कि “मैंने पति हरिभक्त भगवन्नामानुरागी नहीं पाया !" इसी सोचसे उसका मन मुर्भाया रहा करता था। रानी राजर्षि के गुप्त भाव का मर्म नही जानती थी; एक रात स्वप्न में भाव तथा विरह के प्रभाव से राजा के मुख से श्रीविहारीजी के नाम का उच्चारण हुआ। तब रानी ने परम भागवत को पहिचाना और जाना कि 'महाराज स्मरण ध्यान मानो गुप्त रखते हैं ।' हरिनाम को श्रवण करते ही रानी प्रेमसिन्धु में मग्न हो अपने पति पर अत्यन्त रीझ गई। भोर होते बहुत अन्न वस्त्र और बहुत धन उसपर न्यवछावर कर लुटाने लगी, हर्ष से फूली न समाती थी; मानो राजा ने नया जन्म पाया है ॥ राजर्षि ने यह उत्साह धूमधाम देखकर इस सुख का कारण रानी ने स्पष्ट रीति से सब कुछ कह सुनाया। सुनते ही राजा सोच से ठठक गया, कि 'जैसे ही नाम मुंह से बाहर निकला, गुप्त RECRUKRCasteeuter ROCES ॐ श्रीभक्तमाल सटीक। ४७४ नेम चला गया, वैसे ही जीव भी शरीर से निकल जाव तो भला है।' ऐसा विचार करने लगा; ऐसा ही हुआ। (३१४) टीका । कवित्त । (५२६) देखि तन त्यांग पति, भेई और गति याकी; "ऐसे रतिवान में न भेद कळू पायो है । भयो दुःख भारी; सुधि बुधि सब टारी; तब नेकु न विचारी, भावराशि हियो छायो है ॥ निशिदिन ध्यान, तजे विरह प्रबल प्रान, भक्ति रस खान, रूप कापै जात गायो है। जाके यह होय, सोई जानै रस भोय, सब डारै मति खोय; यामैं प्रगट दिखायो है ॥ २५७ ॥ (३७२) बार्तिक तिलक। जब रानी ने देखा कि पति ने शरीर त्याग कर दिया तो इसकी औरही दशा हुई; अतिशय दुःखित हो सुधि बुधि खो, पछताने लगी कि "महाराज श्रीसीताराम कृपा से ऐसे भावराशि भक्कराज थे, पर कैसे खेद की बात है कि यह मर्म में तनक नहीं विचारती जानती थी" जैसे राजर्षि की मति गति रही, वैसी ही श्रीभगवत् कृपासे रानी भी दिनरात ध्यान में रहने लगी, * 'यहांतक कि प्रबल: विरह में प्राण छोड़ दिया। भनिरसखानि का स्वरूप, और मति, रति और गति को कोन घखान सकता है ?. श्रीभक्ति महारानीजी जिसपर कृपा करती हैं सोई रसिकजन इसको कुछ कुछ समझ सकते हैं, और केवल विद्याधुद्धिका यहां पता नहीं रहता ॥ : .. इन बातों को इस दम्पतिकथा में प्रगट देख लीजिये। (३१५) छप्पय । (५२८) गुरु गदित बचन शिष सत्य अति, दृढ़ः प्रतीति गाढ़ो गह्यौ । अनुचर आज्ञा मांगि कह्यो “कारज कों • सोरठा "कली गली दिन चारि, जश्च लगि मुख मूंदे रहै। देत डार से डारि, फुलियो सहे न फल को" स *ॐॐॐ भनिसुधास्वाद तिलक। ४७५ जैहों"। आचारज "इक बात तोहि आये ते कहिहों"। स्वामी रह्यो समाय दास दरसन को आयो। गुरु की गिरा विश्वास फेरि सब घर में ल्यायो ॥ शिषपन सांचो करन कों, विभु सबै सुनत सोई कह्यो । गुरु गदित वचन शिष सत्य अति, दृढ़ प्रतीति गाढ़ो गह्यो॥ ५८ ॥ ( १५६) (७१।७२) गुरु शिष्य। बार्तिक तिलक। एक शिष्य ने अपने गुरु भगवान् के वचन को अति सत्य मान कर उसमें परमपूर्ण प्रतीति की। श्रीगुरुजी की आज्ञा लेकर शिष्यजी एक काम को चले; इनके गुरु भगवान् ने आज्ञा की कि "अच्छा जाओ, जब तुम लौटकर आओगे तब तुमसे एक बात कहूंगा।" जब उस कार्य से निवृत्त होकर लौट के शिष्यजी श्रीगुरुदर्शन को पाए तो देखा कि आचार्य के मृतक शरीर को लोग लिये जाते हैं; तव शिष्यजी यह कहकर कि "महाराजजी ने मुझे कुछ कहने की प्रतिज्ञा की है, श्रीवचन कदापि अन्यथा नहीं" शव के साथ सबको घर फेर ही लाए ॥ प्रतीति सांची करने के लिये श्रीसर्कार की कृपा से गुरु भगवान् जी उठे और विश्वास श्रद्धा-पूर्ण शिष्य से अपने संकल्पानुसार वचन कहे ही। प्रतीति विश्वास इसको कहते हैं । इसीसे श्रीप्रिया- दासजी महाराज ने कहा है कि "प्रीति परतीति रीति, मेरी मति हरी है ॥" (१६) टीका | कवित्त । (२७) बड़ो गुरुनिष्ट कल घटी .माने कैसे समझाइये । नित्यहि विचारे पुनि टारे पै उचारे नाहि चल्यो जब रामती को कही फिरी आइये ॥ सपथ दिवाई न जराइवे, कों KC C साधु इट जाने स्वामी सन्त पूज्य. .COM

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४७६
श्रीभक्तमाल सटीक।
दियो तन, ल्यायों यों फिराई वहे वात जू जनाइयें ॥ सांचो भाव
जानि प्रान पाये सो बखान कियो "करो भक्त सेवा" करी वर्ष लों
दिखाइयें ॥ २५८ ॥ (३७१)
वार्तिक तिलक।
एक शिष्य बड़े ही गुरुनिष्ट थे यहां तक कि श्रीगुरु भगवान् को
सन्त और भगवन्त से भी बढ़के मानते जानते; पर श्रीगुरु महाराज
साधुओं को पूज्य इष्ट समझते थे, अतः श्रीगुरुजी के चित्त में यह
चिन्ता रहती थी कि शिष्य को कैसे समझाऊं जिसमें "माते अ.
धिक सन्त कहँ जाने।" नित्यही श्रीगुरुजी इसी सोच विचार में रहा
करते पर कुछ कहते न थे। एक दिन जब शिष्यजी रामत को जाने
लगे तो श्रीगुरु ने आज्ञा की कि “लौट कर मानो तो कुछ कहूंगा।"
। जब फिर आए तो देखा कि गुरु-मृत-शरीर को दग्ध करने को
लोग ले जा रहे हैं, तब सबको सपथ दे दिलाकर शव को फेर
लाकर श्रीगुरुशरीर के आगे कर जोड़कर खड़े हो विनय किया कि
"जो बात कहने की आज्ञा हुई थी सो कही जावे ॥"
सच्चा भाव जानकर श्रीसर्कार ने इनको पुनर्जीवित कर दिया,
आपने साधुसेवा' बताई, वरंच शिष्य की प्रार्थना से एक वर्ष पर्यन्त
कर दिखाई॥
(३१७) छप्पय । (५२६)
संदेह ग्रंथि खंडन निपुन,बानि विमल रैदास की।
सदाचार श्रुति शास्त्र बचन अविरुद्ध उचास्यो। नीर
खीर बिबरन परम हंसनि उर धारयो ॥ भगवत कृपा
प्रसाद परमगति इहि तन पाई । राजसिंहासन बैठि
ज्ञाति परतीति दिखाई ।। बर्णाश्रम अभिमानतजि, पद
रज वंदहि जासुकी। संदेह ग्रन्थि खंडन निपुन, बानि
विमल "रैदास" की ॥ ५६ ॥ (१५५)

४७७ - प्रार्थना कीथी परन्तुतिश्य से कभीयहनही * PRE भनिसुधास्वाद तिलक। (७३) श्री ६ रैदासजी महाराज। दो०"सब सुख पावे जासुते, सो हरि जू को दास । कोउ दुख पावै जासुते, सो न दास रैदास ॥" वार्तिक तिलक । स्वामी श्री १०८ रैदासजी की विमल वाणी, सन्देह की ग्रन्थियों (गिरही ) के खोलने में बड़ी ही निपुण, तथा सदाचार वेद और शास्त्र के अविरुद्ध (अनुकूल ) है । दूध और जल ( सारासार ) के विवेक में प्रवीण थे, तथा विवेकी हंसों ( महानुभावों ) ने अपने हृदय में आपके वचनों को धारण किया है । श्रीसीतारामकृपा प्रसाद से इसी शरीर में ही परमगति को पाया । राजसिंहासन पर बैठकर ज्ञाति की प्रतीति दिखाई॥ बड़े बड़े लोगोंने वर्णाश्रम (ब्राह्मण जातिवा संन्यास आश्रम) का घमंड छोड़ छोड़ आपके चरणसरोजकी धूरि अपने अपने सीस पर रक्खी है। (३१८ ) टीका । कवित्त । (५२५) रामानंदजू को शिष्य ब्रह्मचारी रहे एक गहेवृत्ति चुटकी की कहे तासों वानियों। करोअंगीकारसीघोकहि दशवीसबारबरपेप्रबल धार तामें वापि आनियों ।। भोग को लगावे प्रभु ध्यान नहिं भावे भरे कैसें करि ल्यावे जाइ पूछि नीच मानियों । दियो शाप भारी बात सुनी न हमारी घटि कुल में उतारी देह सोई या जानियों ।। २५६ ॥ (३७०) वार्तिक निलर। स्वामी अनन्त श्रीरामानन्दजी का एक शिन्य ब्रह्मचारी यावर उसकी यह वृत्ति थी कि मोरी फेरसर न मांग लाया करना उसीसे स्वामीजी महाराज के यहां नगबन्द और सन्त की सेवा हो थी आपकी कुटी के समीप एमनियारहनाया उसने श्रापलेले यहां की चुटकी (सीवा) मकर काने के लिये इस AK+KKRE MENT श्रीभक्तमाल सटीक। दो० "रामचन्द्र के भजन बिनु, 'बढ़ो' कहावै सोय । जैसो दीपक बुझन' कहें, बढ़ो कहें सब कोय ॥" एक दिन पानी बहुत बरसता था इसीसे श्रीगुरु आज्ञा को चित्त परन रखके आलस वश निकटस्थ उस बनिये का ही सीधाले आए। जब थाल सर्कार के आगे अर्पण हुआ तो भोजन करते हुए भगवत् को स्वामीजी महाराज ने ध्यान में नहीं देखा । अतः इस ब्रह्मचारी- जी से पूछा कि "चुटकी कहां कहां की लाया है ?” इन्होंने कहा कि 'अमुक बनिया का सीधा लाया हूँ॥" श्रीमहाराजजी ने पूछपाछ कर जाना कि वह बनिया चमार के साथ कारवार रखता है। आपने अपनी प्राज्ञा टालने और भगवत् के भोग न स्वीकार करने से भारी शाप दिया कि "तूने मेरी बात नहीं सुनी इस लिये जा चमार के यहां जन्म ले ॥" श्रीरैदासजी के पूर्वजन्म की वार्ता ऐसी है । इसीसे आपने चमार के घर में जन्म लिया। श्रीकृपा से सिंहासन पर विराजे और अपने ब्राह्मण होने की प्रतीति कराई अर्थात् यज्ञोपवीत का चिह्न शरीर में दिवाया ॥ (३१६) टीका । कवित्त । (५२४) माता दूध प्यावे याकों छुयोऊ न भावे सुधि श्रावे सब पाछिली सुसेवा को प्रताप है । भई नभवानी रामानंद मन जानी बड़ो दंड दियो मानी बेगि आये बल्यो आप है ॥ दुखी पिना माता देखि धाय लपटाय पाय कीजिये उपाय कियो शिष्य गयो पाप है । स्तन पान कियो जियो लियो उन्ह ईस जानि निपट अजानि फेरि भूले भयो ताप है ॥ २६० ।। (३६६) वार्तिक तिलक । माता का दूध पीना क्या आपको तो स्पर्श भी नही अच्छा लगता था क्योंकि श्रीगुरुसेवा के प्रताप से आपको पिछले जन्म की सारी वार्ता की सुधि बनी थी कि "चमार से व्यवहार रखनेवाले Cate ४७६ , ॐ * भकिसुधास्वाद तिलक। बनिये की सामग्री लाने से तो चमार के घर जन्म हुआ; और जो उसका दूध पीऊं तो न जाने कि क्या गति हो ॥" स्वामी श्रीरामानन्दजी महाराज को आकाशवाणी हुई कि "ब्रह्म- चारी तुम्हारे घोर शाप से अमुक चमार के घर जन्मा है उस पर तुमको अब दया उचित है ।" श्रीवचनामृत को सुनकर श्री १०८ रामानन्द स्वामीजी महाराज शीघ्र ही उस चमार के घर जा, आप के पास पहुँचे । माता पिता जो दुखी हो रहे थे, श्रीस्वामीजी को देखते ही दौड़कर पांव पड़, गिड़गिड़ाने लगे कि "महाराज ! लड़का दूध नहीं पीता ! आप कृपा कर कुछ उपाय कर दीजिये।" श्रीजी ने श्रीकृपा से श्रीराममन्त्रराज उपदेश किया; निष्पाप तथा सुखी हो आपने माता के स्तन से दुग्ध पान करने लगे; मानों पुनर्जीवित श्रीस्वामीजी को ईश्वर से अधिक मानने जानने लगे ॥ पूर्वजन्म का अपना चूक स्मरण कर अपने अज्ञान पर बड़ा पश्चात्ताप किया। (३२०) टीका । कवित्त । (५२३) बड़ेई रैदास हरिदासनि सो प्रीति करी पिता न सुहाई दई ठौर पिछवारहीं । हुतो धन माल कन दियो हु न हाल तिया पति सुख जाल अहो किये जव न्यारहीं ॥ गांठ पगदासी कहूं वात न-प्रकासी ल्यावे खाल करें जूती साधु संतकों संभारहीं । डारी एक छानि कियों सेवा को सुस्थान रहे चौडे आप जानि वाँटि पावे यहि धारहीं ॥ २६१ ॥ (३६८) नातिक तिलक। श्रीरैदासजी बड़े हरिभक हुए; और माता पिता आदि से आपको वैराग्य था, श्रीहरिभक्तों ही से प्रीति रखते थे आपका यह आचरण माता पिता को तनक नहीं सुहाता था। मां बाप ने कह दिया "जा, घर के पिछवाड़े रह तव आपने एक छोटी सी कुटिया बना ली कि जिसमें श्रीठाकुरजी की सेवा करते थे। CCCX A scri SCkcECH श्रीभक्तमाल सटीक। ४८० . मां बाप के पास बहुत अन्न धन था परन्तु उसमें से एक कनका एक कौड़ी भी उन लोगों ने आपको नहीं दी, आपकी नई धर्म- पत्नी और आप विना छाया के ही, ठाकुरजी की झोपड़ी के पास बड़े ही आनन्द से रहा करते । हत्या नहीं करके मोल चमड़ा ला के उसकी पनही बना बना के सन्तों के चरणों में देते थे और अपना भजन सेवा गुप्त रखते थे सरकारी कृपा से जो अन्न मिल जाता था वह अतिथि और भूखों को देकर भोग लगाते थे। (३२१ ) टीका । कविन । (५२०) सहे अति कष्ट अंगहिये सुख सील रंग आए हरिप्यारे लियो भक भेष धारिकै । कियो बहु मान खान पान सो प्रसन्न ढकै दीनों कह्यो पारस है राखियो संभारिकै ॥ "मेरे धन राम, कछु पाथर न सरे काम, दाम मैंन चाहों, चाहों डारों तन वारिक। रॉपी एक सोनों कियो दियो करि कृपा राखो राखो यहु छानि मांझ लै हो जु निकारिकै ॥ २६२ ॥ (३६७) बार्तिक विलक। दम्पति शीत इत्यादि से शारीरिक दुःख तो अवश्य सहा करते थे परन्तु उनके साधुशील अन्तःकरण प्रेम रंग से -अत्यन्त सुख मग्न रहते थे। , एक दिन एक साधु का वेष बनाय कृपा करके स्वयं श्रीजानकी. नाथ आपके पास आये । आपने यथाशनि वहुत आदर सत्कार किया सेवा पूजा की श्रीसाधुजीने अति प्रसन्न होकर पारस का एक टुकड़ा दिया और कहा कि इसको सम्भाल कर रखिये यह पारस है इसके स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है वरंच आपकी एक राँपी में वह पारस ठुला कर उसके लोहे को सोना बना के प्रत्यक्ष देखा भी दिया । परन्तु आप वोले "मेरा एक धन केवल श्रीरामजी मात्रहीं हैं, पत्थर को मैं किसी काम का नहीं समझता । हम दोनों व्यक्ति अपने शरीर और इस पत्थर को ॐॐ HOCHAKKALKAR . , PART भकिसुधास्वाद तिलक। ४८१ भगवत् पर न्यवछावर करते हैं यदि आपको यह पत्थर छोड़ ही जाना है तो ठाकुरजी के छप्पर में कहीं खोंस जाइये जब आइयेगा पहिचान के ले लीजियेगा।" (३२२)ीका । कवित्त । (५२१) आये फिरि श्याम, मास तेरह वितीत भये, प्रीति करि चोले "कहो पारस की रीति कौं" । "वाहि ठौर लीजै मेरो मन न पतीने अब चाहौ सोई कीजै मैं तो पावतहौं भीति कौं ॥" लेके उठि गये; नये कौतुक सो सुनो, पावें सेवत मुहर पांच नितही प्रतीति कौं। सेवहु करत डर लाग्यो; निसि कह्यो हरि “छोड़ो अर आपनी, औ राखौ मेरी जीति को" ॥२६३॥ (३६६) वार्तिक तिलक। भगवत् पारस को सामने छप्पर में खोंस के चले गये, और तेरह महीने व्यतीत होने पर फिर उसी भागवत वेष में आकर दरशन दे पूछा कि “पारस के व्यवहार का समाचार बताइये," आप दण्डवत् सत्कार करके बोले कि "वह उसी ठेकाने होगा जहाँ आपने रखा था, देख भाल के अपना ले लीजिय; मेरी परीक्षा न कीजिये; मेरे मन को तो उससे प्रतीति नहीं होती है, मैं उससे डरता हूं; आप उसको जो चाहिये सो कीजिये ॥" साधु देवता उस पत्थर को लेकर चले गये ।। अब नया कौतुक सुनिये कि ठाकुरजी का आसन झारने के समय आप नित्य पांच स्वर्ण-मुद्रा पाने लगे; तव सेवा पूजा से भी डरे तब रात को श्रीसरकारने स्वप्न में आज्ञा की कि "अपना हठ (अर) छोड़ो और मेरी बात रक्खो ॥" (30) टीका । कवित्त (५०० ) मानि लई बात, नई ठौर लै बनाय चाय संतनि बसाय, हरि मंदिर चिनायो है । बिबिधि बितान तान, गनो जो प्रमान होई, भोई गई, भक्ति पुरी जग जस गायो है । दरसन आवै लोग, नाना विधि राग भोग; रोग भयो विप्रनि की तन सब छायो है। बड़ेई ReckeracticketCCA.

krant %%%%%%%%% श्रीभक्तमाल सटीक । खिलारी वे, रहे हैं छान-डारि करी, घर पे अँटारी; फेरि द्विजन सिखायो है ॥ २६४ ॥ (३६५) चौपाई। 'के माया, कै हरिगुण गाई। दोनों से तो दोनों जाई॥" दो० "व्यास बड़ाई जगत की, कुकुर की पहिचान । प्रीति किये मुख चाटि है, बैर किहे तनु हान ॥" वार्तिक गिलक । अव श्रीसार की बात श्री १०८ रैदासजीने मानली । एक नए ठांव में कोठा अटारी हरि मन्दिर तथा सन्तनिवास स्थान बनाये; विविध वितान चंदोवा ध्वजा पताका बन्दनवार इत्यादि से साज सजाया; कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता, वह श्रीभक्तिमहारानी की पुरी जान पड़ती थी; संसार में श्री १०८ रैदासजी का यश पूरे रूप से फैलगया । श्रीकृपासे नाना प्रकार के भोग राग संगीत होते, और बहुत लोग दरशन को आया करते थे; वड़ी भीड़ लगी रहती थी। "पूजहिं तुमहिं सहित परिवारा ॥" ब्राह्मणों को मत्सर रोग हुआ, वे यह सब देख देख डाह से जलने लगे । रामजी तो बड़े खिलाड़ी हैं ही । कहां तो परम अविश्चन श्रीरदासजी एक झोपड़ी में गुप्त भजन में दिन वितारहे थे, कहां स्वयं प्रभु ने धन माया कोठा अटारी दे श्रीहरि महोत्सवादि ठाट और सन्तसेवा की धूमधाम बढ़ा दी । और फिर अति अधिक बढ़ते समझ भक्कहित विचार, आपही सकार विनों के हृदय में वैसे प्रेरक हुए॥ (३०४) टीका | कवित्त । (५१६ ) प्रीति रसरास सों रैदास हरि सेवत हे, घर में दुराय लोक रंज- नादि टारी है। प्रेरि दिये हृदै जाय द्विजनि पुकारि करी भरी सभा नृप आगे कह्यो मुखगारी है । जनकौं बुलाय समझाय न्याय प्रभु सौंपि कीनों जग जस साधु लीला मनु हारी है । जिते प्रतिकूल में तो माने अनुकूल, 'यातें संतनि प्रभाव मनि कोठरी की तारी है'। २६५॥ (३६४) CtKkKKRUCka *KKAR R भकिसुधास्वाद तिलक। ४८३ चार्तिक तिलक। श्री १०८ रैदासजी रसराशि प्रेम अनुराग से श्रीयुगल सर्कार (प्रिया प्रियतम ) की सेवा में छके गुप चुप घर में रहतेथे लोकको रिझाने से कुछ प्रयोजन नहीं रखतेथे;"लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाह ।” भक्नहितकारी कौतुकी खिलारी प्रभु ने ब्राह्मणों के हिय में प्रेरणा की, ब्राह्मण लोगों ने राजा की सभा में जाके पुकारा, श्रीरदासजी को गालियां देदे कर यों कहने कि "वह चर्मकार भग- वत की प्रतिमा तथा सालग्रामजी की पूजा सेवा करता है लोग उसका आदर करते हैं, इस सवका नीच को अधिकार नहीं; वरंच श्लो० "अपूज्याः यत्र पूज्यन्ते पूज्यपूजाव्यतिक्रमात् । यस्तत्र प्रवर्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम् ॥" राजा ने श्रीरदासजी को बुलाके समझाया, न्याय किया (जैसा भागे वर्णन होता है); इनका प्रताप प्रत्यक्ष देख कर इनको ठाकुर की सेवापूजा सौंपदी; विप्र लोग लज्जित हुए; श्रीरदासजी का यश संसार में छागया । साधु की लीला प्रभु का मन हरनेवाली है। श्रीहरि का वचनामृत है कि "जो लोग मेरे भक्नों के प्रतिकूल होते हैं मैं उनको अनकूल मानता हूँ, क्योंकि उनकी प्रतिकूलता साधु-महिमा रूपी मणि वाली कोठरी की ताली होती है । (जैसे हिरण्यकशिपु ने जब श्रीप्रह्लादजी को कष्ट दिये तो आपके प्रभाव प्रसिद्ध हुए); अर्थात् दुष्टों के द्वारा सन्तों के माहात्म्य में प्रकाश करता हूँ ॥". चौपाई। "जात पांत पूछ नहिं कोइ । हरि को भजे सो हरि को होइ ॥" (३२५ ) टीका | कवित्त । (५१%) वसत चितौर मांझरानी एकझाली नाम; नाम विन कान खोली; आनि शिष्य भई है । संगहुतें विप्रसुनि छिप तन आगि लागी; भागी मति नृप आगे भीर सब गई है | वैतेहि सिंहासनपै आयकै १ "ग्राली' शुन्य ।। CRICKEnteCHCRAK ४८१ श्रीभकमाल सटीका , बिराजे प्रभु: पढ़े वेद वानी, पै न आये, यह नई है । 'पतित पावन नाम कीजिये प्रगट आजु" गायो पद गोद आई बैठे भनि लई है। ॥२६६॥(३६३) कार्तिक तिलक। चित्तौरगढ़ में"झाली" नाम की एक रानी रहती थी। श्रीहरि- नामोपदेश से इसका कान पवित्र नहीं हुआ था ( मन्त्र नहीं पाया था)। वह श्रीकाशीजी आके श्रीरदासजी महाराज से शिष्य हुई। जो ब्राह्मण लोग रानी के साथ थे, यह सुनके उनके तन में आग सी लग गई;विचार उनके कुछ नहीं रहा राजा के आगे ब्राह्मणों की भीड़ पहुँची। राजा ने श्रीरैदासजी को आदर से दुलाया । सभा यद्यपि विवाद में ब्राह्मण नहीं जीने पर ब्राह्मणों ने माना नहीं तब यह ठहरी कि ऊंचे सिंहासन पर श्रीभगवत् की मूर्ति ( जिनकी ब्राह्मण लोग पूजा किया करते थे ) विराजमान कराई गई और यह वात ठहरी कि जिनके बुलाने से श्रीठाकुरजी पास चलेआड़े उन्हीं को पूजासेवा इत्यादि सब कुछ का अधिकार जानना चाहिये। ब्राह्मण लोग एक एक करके तथा वृन्द के वृन्द मिलकर पहरों वेद ऋचाओं से स्तुति करते मन्त्र जपते रहे, परन्तु मूर्ति मूर्ति ही वनी रही; और जब श्रीरदासजी ने कहा कि "विलम्ब छांडि आइयै, कि तो बुलाइ लीजिये । पतित पावन नाम आपनो शीघ्र सांच की. जिये ॥"तो सभा के सामने सबके देखते श्रीभक्तवत्सल ठाकुरजी श्रीरदासजी की छाती में आ लगे; जय ! जय !! शब्द की ध्वनि हो उठी। श्रीभक्ति महारानीजी की जय ॥ (०६) टीका । कपित्त । (५१७) गई घर झाली पुनि बोलि के पठाये, "अहो जैसे प्रतिपाली अब तैसे प्रतिपारिय" । आपुत् पधारे; उन बहु धन पट वारे; विप्र सुनि पांव धारे; सीधौदै निवारियै ॥ करिके रसोई द्विज भोजन करन बैठे है वै मधि एक यों रैदासकों निहारियै । देखि भई नांखें, दीन भा सिख लाखें भये स्वर्ण को जनेऊ काढ्यो त्वचा कीनी न्यारिये ॥ २६७॥(३६२) Kickscricksckcheckterest नस ४८५ बहुत धन नभर SH PRA भक्तिसुधास्वाद तिलक। वार्तिक तिलक। झाली रानी ने, अपनी राजधानी चित्तोर जाके वहां से श्रीरदास जी को विनय कर, सादर बुलाभेजा कि "जैसे आपने मेरा प्रति- पाल किया है वैसे ही तनक यहां आके भी प्रतिपाल कीजिये।" श्रीरदासजी कृपा करके वहां पधारे; आनन्द से गनी ने वस्त्र श्रीगुरु भगवान् पर न्यवछावर किये ॥ ब्राह्मण लोग भी जो गए उनको सीधा दे कर निबटाया क्योंकि उन्होंने श्रीरदासजी के भंडारे में पूड़ी मिठाई भी नहीं खाना चाहा। जब ब्राह्मण रसोई भोजन करने लगे, तो अपने प्रति दो दो विपके बीच श्रीरदासजी को बैठे पाया। यह प्रभाव देख उनकी आंखें खुली, दीन हो गिड़गिड़ाने लगे उनमें से बहुत विष आपके शिष्य भी हुए । सबकी प्रतीति दृढ़ाने के निमित्त श्रीरदासजी ने अपने पूर्वजन्म की कथा कही, तथा शरीर की त्वचा न्यारी कर स्वर्ण यज्ञो- पवीत सवों को दिखाया । कठौते में श्रीगंगाजी आपके घर आई और उसी में से जड़ाऊ कङ्कण मापने दिये ॥ लाखों को भगवत् सन्मुख करके आप परमधाम को गए। स्वामी अनन्त श्री रामानन्दजी की कृपा की और श्रीरदासजी की जय ॥ (७४) श्री ६ कबीरजी (३२७) दप्पय । (५१६) कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट दरसनी॥ भक्ति विमुख जो धर्म सो अधरम करि गायो। जोग जग्य व्रत दान, भजन बिनु तुच्छ दिखायो॥ हिन्दू तुरक प्रमान “रमैनी, शबदी, साखी”। पक्षपात नहिं वचन, सवही के हित की भाखी ॥ आरूढ़ दसा कै जगत पर, सुख देखी नाहिनभनी। कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षटदरसनी ॥ ६० ॥ (१५४) FROGRAMREKASIK श्रीभक्रमाल सटीक। वार्षिक तिलक। जगद्विख्यात श्री १०८ कवीरजी ने चार वर्ण, चार आश्रम, छः दर्शन, किसी की आनि कानि नहीं रक्खी । केवल श्रीभक्ति (भागवतधर्म) को ही दृढ़ किया। भक्ति के विमुख' जितने धर्म, उन सबको "अधर्म" ही कहा है । सच्चेजी से सप्रेम भजन (भकि, भाव, चन्दगी) के विना तप योग, यज्ञ, दान, व्रत, सचको तुच्छ बताया है। आर्य अनार्यादि हिन्दू, मुसलमान दोनों को प्रमाण सिद्धान्त बातें सुनाई हैं। चापाई। धर्म एक एकहि व्रत नेमा । काय वचन मन प्रभु पद प्रेमा।" अपनी वीजक अर्थात् “रमैनी, शब्दी, साखी" में किसी मत की सुहाती (खुशामद ) और मुँह देखी नहीं कही है किसी का पक्षपात आपके वचनों में नहीं है; “अन्तःकरण में कुछ और, और बघारना मुँह से कुछ और” इसको बहुत ही बुरा बताया है । हिन्दू, मुसलमान सबके हित की ही बात बखानी है । आप प्रेमा दशा में मारूद थे। (३२%) टीका | कवित्त । (५१५) अतिही गंभीर मति सरस कवीर हियो लियो भनि भाव, जाति पांति सव टारियै । भई नभ वानी "देहतिलक रमानी करौ, करौ गुरु रामानन्द गरें माल धारिये"। देखें नहिं मुख मेरो मानिक मलेछ मोको, "जात न्हान गंगा कही मग तन डारियै"। रजनी के + "वर्णाश्रम पट दर्शनी"। (छपय ५६ देखिये) * Turker टकी (SI) रूम के रहने वालों को "तुर्क 3" कहते हैं। तुर्क प्रायः मुसलमान होतेही हैं, अतः "तुर्क" मुसलमानों को कहते हैं । श्रीकवीरजी महाराज ने हिन्दुओं के लिये "राम" तथा मुसलमानों के लिये "-, रहीम" (दयालु ), नाम को, सच्चे दिलनधा निस्कपट प्रेमभनि से करने का उत्साह बढ़ाया है प्रेम भनि रहिन मिथ्या और केवल दिखाऊ प्राडम्बरों पर "मुलना" तथा "पांडे" अर्थात् मौलाना श्रोर पण्डितों को बहुत धिकारा है ॥ गंयां के महाराज विश्वनाथसिंहजी की टीका "रमैनी" पर है सो देखने योग्य है। SCRIMALSCRECRASHRScience *** re , ****** RKAR भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४८७ शेष में आवेश सों चलत आप, परै पग राम कहै मंत्र सो विचारियै ॥ २६८॥ (३६१) वार्तिक तिलक । श्रीकबीरजी की मति अति गंभीर तथा अन्तःकरण श्रीभक्तिरस से सरस था, भाव भजन में पूरे, जाति पांति-वर्णाश्रम इत्यादि साधारण धर्मों का आदर नहीं करते थे। लड़कपन ही में आकाशवाणी हुई कि "कबीर ! अपने शरीर में (रमानी वा रामावत अर्थात् रामानन्दी) तिलक रमाके गले में तुलसीजी की माला धारण करके, रामानन्दजी का शिष्य हो।" आपने प्रार्थना की कि "प्रभो ! स्वामी श्रीरामानन्दजी यदि मुझको तुर्क (मुसलमान ) मानकर मेरा मुँह भी नहीं देखें तो?" तो आज्ञा हुई कि "रामानन्दजी गंगा स्नान को जाया करते हैं, तुम मार्ग में जा पड़ो॥" रात्रि के पिछले पहर में स्वामी श्रीरामानन्दजी के मार्ग में जा, देख भालके, ये पड़ रहे। श्रीसीताराम नाम स्मरणावेश में श्रीस्वामी महाराज श्रीगंगातट पर चले जा रहे थे, अचानक प्रभु का दक्षिण चरण कमल इनकी छाती पर ज्योंही पड़ा त्योंही इधर श्रीस्वामीजी ने राम ! राम !! कहते हुए पांव सँभाल लिया, और उधर अति आनन्दमें भरे श्रीकवीरजीने श्री गुरुमुख से महा- मन्त्र ( "राम, राम") पा उसी को उपदेश मान सुख में मग्न राम राम रटते जपते, अपने घर पहुँचे । आकाशवाणी द्वारा आज्ञा के लिये श्रीयुगल सर्कार का अनेक धन्यवाद कर उस रंग में रंग गए। "सीतापति के भजन विन, राजा परजा सब अफल । तत्त्ववेत्ता तिहुंलोक में, राम रटै ते नर सुफल ॥" (३२६ ) टीका | कपित्त । (५१४) कीनी वही बात माला तिलक बनाय गात मानि उतपात मात सोर कियो भारियै । पहुँची पुकार रामानन्द जू के पास आनि कही AAR ANS - KARRANTARNARRORANI ४८८ श्रीभक्रमाल सटीक। कोऊ पूछे तुम नाम ले उचारियै ॥ "ल्यावौ जू पकरि वाको कब हम शिष्य कियो" ? ल्याये करि परदा में पूछी; कहि डारिय। राम नाम मंत्र यही लिख्यो सब तंत्रनि में खोलि पट मिले सांची मत उर धारिये ।। २६६ ॥ (३६०) वार्तिक तिलक। श्रीकवीरजी ने वही वात की; अर्थात् अपने शरीर में भागवत संस्कार नाम ऊर्ध्वपुण्ड्र तुलसी की कंठीमाला, इत्यादि धारण किये उसी महामन्त्रका जप करनेलगे यह सब देख, बड़ा उत्पात मान आपकी माता कहलानेवाली बहुत चिल्लाने लगी; श्रीस्वामीजी के पास भी वह चिल्लाहट पहुँची; किसी समीपी ने कहा कि वह कहती हे कि "कविरा से जो पूछती हूँ कि तूने यह सब कहां पाया, तुझे किसने बताया ? तो वह श्रीस्वामीजीही को अपना गुरू बताता है" यह सुन श्रीस्वामीजी ने आज्ञा की कि "कवीर को पकड़लावो, पूछा जाय कि मैंने उसको कव शिष्य किया है?" लोग कबीरजी को ले आये । कपड़े का ओट करके श्रीस्वामीजी ने पूछा, कबीरजी ने उत्तर में सारा प्रसंग कह डाला और विनय किया कि "सब तंत्रों और ग्रंथों में राम ही नाम को महामंत्र परमजाप्य लिखा है।" (अनेक प्रमाण हैं)॥ "उस ब्राह्ममुहूर्त में इस काशी धाममें श्रीगंगाजी की सीढ़ी पर आपने अपने चरणस्पर्शपूर्वक श्रीराम नाम कहा उस समय वहां कोई और नहीं था, केवल मेंने ही सुना; और फिर इस महामंत्र से परे उपदेश करने को और रह ही क्या गया ? इतनी बात सुन, अति प्रसन्न हो, श्रीस्वामीजी ने ओट हटाकर प्रत्यक्ष हो, कबीर जी को छाती से लगा लिया, यह कहते हुए कि "वत्स ! तेग मत सच्चा पक्का है, यही नाम अपने उर में धरो। भगवत् स्मरण और भागवत सेवा करो" . १ "परदा" पट, व्यवधान, व्यवहित, आड़, नोट । RECECRE . THE भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४८ (10) टीका । कवित्त.। (५१३) बीन*नानी बानौ; हिये राम मड़रानौ; कहि कैसे कै घखानों वह रीति कछु न्यारियें। उतनोई करें जामें तन निरबाह होय, भोय गई और वात भक्ति लागी प्यारिये ॥ ठाढ़े मंडी मांझपट बेचन लै, जन कोऊ आयो मोकों देहु देह मेरी है उघारिौँ । लग्यो देन आधी फारि आधेसों न काम होत, दियौ सब लियौ जो यहै उर धारिय।। २७०॥ (३५६) चार्तिक तिलक। श्रीकबीरजी कपड़ा बुनने का उद्यम करते थे, यद्यपि बाह्य में ताना वाना करते तथापि अन्तःकरण में निरन्तर श्रीसीताराम रूप तथा श्रीसीताराम नाम मंत्र जपा करते थे जैसे आकाश में पक्षी मँडराते हैं। प्रेमाभत्रि भाव, प्रीति प्रतीति रीति, न्यारी ही वस्तु है वह वर्णन क्योंकर किया जावे। श्रीश्रीभक्ति महारानी की कृपा व्याप गई, वही प्यारी लगती थी, उद्यम तो केवल उतना ही करते थे कि जितने में शरीर तथा माता आदि का निर्वाह हो। एक दिन हाट में कपड़ा बेचने को खड़े थे एक साधु ने मांगा कि "मैं वस्त्र रहित हूँ, मुझे दो।" आप थान में से आधा फाड़ने लगे, उन्होंने कहा कि "आधे से पूरा नहीं पड़ने का।" आप बोले कि "अच्छा सब लो ॥" (२२१) टीका । कवित्त । ( ५१२) तिया सुत मात मग देखें भूखे; आवें कब ? दबि रहे हाटनि में ल्यावें कहा धामकों । सांचो भनि भाव जानि, निपट सुजान वे तो कृपाके निधान, गृह शोच पस्यो श्यामकों ॥ वालद ले धाये दिन तीनि यों विताये जब आये घर डारी दई, दई हो अरामको । माता करै सोर कोऊ हाकिम मरोरि बाँधै डारो बिन जानै सुत लेत नहीं दामकों ।। २७१॥ (३५८) * "बीने"-चुन । "हाकिम"ts श्राज्ञादेनेवाला, राजकर्मचारी, राजकार्य निर्वाहक, शासनकर्ता, न्यायकर्ता । - ************** - श्रीभक्तमाल सटीक। ) पातिक तिलक । श्रीवीरजी की माता और स्त्री पुत्र आपकी बाट जोह रहे थे कि कपड़ा घेचकर हाट से कुछ लावै तौ भोजन होय । परिवार उधर इस प्रतीक्षा में थे और इधर आप यह सोचकर कि "छूछा हाथ घर क्या जाऊ" पैठ सेही वन में जा छिपे । श्रीसुजान शिरोमणि भक्तवत्सल महाराज कृपानिधान श्रीरामजी को इनके घर के लोगों का सोच पड़ा; जब तीन दिन बीत गये तो सार व्यापारी के भेष में वैलों पर आटा घी चीनी इत्यादि लदवाये हुए लाकर श्रीकवीरजी के घर दे गये माता चिल्लाने लगी कि यह सब सामग्री मुझ दरिद्र के घर न पटको कोई राज्याधिकारी वा कोतवाल पकड़े वांधेगा दंड करेगा। मेरा लड़का कबीर किसी अनजाने की एक कोडी नही छूता है पर व्यापारी ने कहा कि कुछ भय नहीं ॥ (३३) टीका | कवित्त । (५॥ गये जन दोय चार, ढूंढिक लिवाय ल्याये, प्राये घर सुनी बात, जानी प्रभु पीर कौं। रहै सुख पाय कृपाकरी रघुराय; दई छिनमें लुटाय सब, बोलि भक्ति भीर कौ ॥ दियो छोड़ि तानो वानी; सुख सरसानो हिये; किये रोस धाये सुनि विप्र तजि धीर कौं। क्योरे तूं जुलाहे ! धन पाये, न बुलाये हमै ? शूद्रनि को दियो जावो कहें यों कबीर कौं ॥ २७२ ॥ (३५७) वार्तिक तिलक। दो चार जन जाकर श्री कबीरजी को ढूंढ़ लाये; घर पहुंच आपने सब वार्ता सुनी और समझा कि श्रीसकरिने मेरे लिये यह कष्ट उठाया है । श्रीरघुनाथजी की कृपा को धन्यवाद कर श्रीसीतारामजी को भोग लगाकर संतों भक्तों को क्षणमात्र मे सबका सब पवाय दिया; ताना बाना कपड़ा बिनना छोड़कर श्रीसार के भजन मे लगे। यह नित्य का उत्सव देखि ब्राह्मणों को धैर्य न रहा, कोध कर आये और धकने लगे-"रे जोलाहा ! तूने धन पाया, वैरागियों को जो शूद्र है बोला बोला के खिलाया, और हम ब्राह्मणों को पूछा भी नहीं।" CATECRECE । GAR-SCHORS , भकिसुधास्वाद तिलक। ४६१ (३३१) टीका । कवित्त । (५१०) क्योंजू, उठि जाऊं ? कछु चोरी धन ल्याऊं, नित हरि गुनगाऊं, कोऊ राह मैं ने मारी है । "उनिकों ने मान कियो याहि मैं अमान भयौ, दयो जॉप जाय हमें तो ही तौजियारी है।" "घर में तौ नाहिं मंडी जाहिं तुमरही बैठे;" नीठिकै लुटायो पैडौ; छिपे व्याध टारी है। आये प्रभु आप द्रव्य ल्याये समाधान कियो लियो सुख, होय भन कीरति उजारी है ॥ २७३ ॥ (३५६) वार्निक तिलक। श्रीकधीरजी ने कहा कि "मैं कहीं डाका नहीं देता हूं, धन चोरा के नहीं लाता हूं, घर बैठे श्रीराम गुन गाता हूं; क्या यहाँ से उठकर चला जाऊं? आपको देने को धन अब कहां से लाऊं?" ब्राह्मणों ने कहा कि “तूने वैरागियों शूद्रों का मान किया इससे प्रत्यक्ष हम सवं ब्राह्मणों का अनादर और अपमान है; जो तुझ से दिया जाय तो हमको दे, तवही हमारा जीवन ठीक है।"श्री कवीरजीने यह कहके उनसे बड़ी कठिनाई से अपने प्राण वचाए और उस व्याधि को टाला कि “आप सब यहीं ठहरिये मैं जाता हूं पैंठ ( हाट) से कुछ लाता हूं, क्योंकि घर में तो कुछ है नहीं" और हाट की ओर चलके बोट में कहीं आप छिप रहे। प्रभु ने आप के रूप में स्वयं आके द्रव्य अन्न दे दे के ब्राह्मणों का सन्मान किया, सर्कार ने इस में सुख माना कि मेरे भक्त (कवीरजी) की कीर्ति उज्ज्वल रहै। श्रीकाशीजी भर में श्रीकवीर जी का सुयश छा गया। (३३१) टीका । कपित्त । (५०६) ब्राह्मन को रूपधरि आये छिपि बैठे जहां, "काहेकौं मरत भौन #जावौजू कवीरके । कोऊजाय द्वार ताहि देतहै अढ़ाई सेर, बेर जिन नावी, चले जाव। यो वहीर के॥" आये घर मांझ देखि निपट मगन भये; नये नये कौतुक ये कैसे रहै धीर के । वारमुखी लई संग मानौ वाही रंगरंगे, जानी यह बात करीडर अति भीरके ॥२७६॥ (३५५) * पाठान्तर 'भृग्व" । REACKGANGANAARCH KHAREKAR ४६२ श्रीभक्रमालसटीका , वात्तिक तिलक । उधर तो आपने श्रीकवीरजी हो प्रति व्यक्ति को ढाई ढाई सेर देने का प्रबन्ध किया, और इधर एक ब्राह्मण के रूप से वहाँ पहुँचे जहाँ कवीर जी छुपे और श्रीयुगलसर्कार के नाम स्मरण तथा रूप के ध्यान में संसार से अचेत बैठे थे; कहा कि "अरे तू कौन है ? यहां भूखों क्यों मरता है ? कबीरजी के घर जा; जो जाता है कबीर जी उसको ढाई सेर देते हैं । यह देख ! मैं भी लाया हूं; सीधा वहीं चला जा, विलम्ब मत कर ॥" आप घर आए सर्कार की कृपा देख प्रेमानन्द में अति मग्न हुए ।। जब आपके यहां बड़ी भीड़ होने लगी, मान वड़ाई बहुत बढ़ी, तो इसको विष सम जान, आप नए नए कौतुक करने लगे। एक वेश्या को साथ लेकर बाहर निकले । लोगों ने समझा कि अब यही रंग बदला लोक में सुयश घटा । भला सामान्य लोगों में इतना धैर्य कहां? जो श्रद्धा घट न जाय । आप ने तो केवल लोक रंजन के भय से ऐसा किया। (३३५) टीका | कवित्त । (५०%) सन्त देखि डरे, सुख भयो ई असन्तनि के, तब तो विचार मन सांझ और आयो है । वैठी नृप सभा जहां गये पै न मान कियो कियौ एक चोज उटि जल ढरकायो है ॥ राजा जिय शोच पस्यो, कस्यो कहा ? कह्यो तव "जगन्नाथ पण्डा पांच जरत बचायो है"। सुनि अचरज भरे नृप ने पठाये नर, ल्याये मुधि, कहीं "अज सांच ही सुनायो है" ॥ २७५ ॥ (३५४ ) वातिक तिलक। यह देख सन्त लोग तो हरिमाया से डरे, और अभागे निन्दक खलगण सुखी हुए। तव श्रीकवीरजी महाराज मन में कुछ और विचार ठान राजा की सभा में गए । राजा ने आपका कुछ भी आदर सम्मान नहीं किया। आए कहीं बैठ गए; थोड़े ही काल के अनन्तर उठके उस REAKEsteetectioCeleGEEGK- . भनिसुधास्वाद तिलक। ४६३ पात्र में से (जिसको लोग मदिरां से भरी अनुमान करते थे)सभा ही में जल ढाल दिया। राजा ने पूछा कि "यह.क्या किया?"आप ने उत्तर दिया कि "श्रीजगन्नाथजी में एक पंडे का पांव जला चाह- ता था, इसलिये आग बुझा दी है।" यह आश्चर्यजनक वचन सुन के राजा ने सांडिनीवाले को पुरुषोत्तम पुरी भेजा लौट आकर उस ने कहा कि "सब वाती सत्य है।" (३७६ ) टीका | कवित्त । (५०७) कही राजा रानी सो "जु वात वह सांची भई, अांच लागी हिये अव कहो कहा कीजिये ?" । "चले ही बनत" चले, सीसतृण बोझ भारी, गरे सो कुल्हारी बांधि, तिया संग भौजियै ॥ निकसे वजार है के, डारिदई लोक लाज, "कियो मैं अकाज छिन छिन तन छी- जिये।" दूरते कवीर देखि, द्वै गये अधीर महा, आये उठि आगे कह्यौ, डारि मति रीझियै ॥२७६ ॥ (३५३) वार्तिक तिलक। राजा ने रानी से कहा कि श्रीकबीरजी की वह बात (पंडेके पांव जलने से बचाने की) तो ठीक ही निकली; बताओ अब क्या करना चाहिये । मैंने महाराज का बड़ा अपमान किया है, इस भय आंच से मेरा जी तप्त है; और, मैंने नहीं करना सो किया इससे क्षण क्षण शरीर तेज वल हान हो रहा है ।" रानी ने कहा कि "चले ही धनत" । रीति अनुसार, लाज तज, गले में कुल्हारी बांध, माथे पर तृणभार रख, रानी को साथ ले, नंगे पाँध, नगर के मध्य हो, आपके पास चला। श्रीकवीरजी की दृष्टि ज्यों ही दम्पति पर पड़ी, आप महा अधीर हो, उठकर, आगे आ, कुल्हारी बोझा फिंकवा, रानी राजा का आदर सत्कार कर अ- मृत वचनों से दम्पति को अपनी प्रसन्नता जनाई और सुखीकिया। (३३७) टीका । कवित्त । (५०६) देखि के प्रभाव, फेरि उपज्यो अभाव द्विज आयौ पादसाह सो "सिकंदर" सुनाव है । विमुख समूह संग, माता हूं मिलाय लई, SARAKANTRA ४६४ श्रीभक्तमाल सटीक। जाय कै पुकारे "जू दुखायो सब गांव है" ॥ “ल्यावो रे | पकर,वाके देखों यै मकर कैसो, अकर मिटाऊंगाढ़े जकर तनाव है। आनि, ठाढ़े किये, “काजी" कहत "सलाम करो;" "जान न सलाम, जानें राम," गाढ़े पांव है ॥ २७७॥ (३५२) वार्तिक तिलक । यह प्रभाव देव करके ब्राह्मणों के हृदय में पुनः मत्सर उत्पन्न हुआ; वे सब काशीराज को भी श्रीकधीरजी के वश में जानकर, 'बादशाह सिकंदर लोदी' पास, जो आगरे से काशीजी आया था पहुंचे । श्रीकवीरजी की मा को भी मिलाके साथ में ले के मुसल. मानों सहित बादशाह की कचहरी में जाकर उन सवने पुकारा कि "कबीर नगर भर में उपद्रव मचारहा है।" बादशाह ने आज्ञा दी कि उसको पकड़ लावो मैं उसका मकर देखें, गाढ़े सिकडी में डाल के उसका अकड़ मिटाऊं । आप बादशाह के पास लाये गए; "काजा" ने कहा कि "सलाम करो।" मापने उत्तर दिया कि मैं श्रीरामजी को छोड़ और दूसरे किसी को तीस नवाना नहीं जानता हूँ। (कवित्त )"विमुखन मुख निंदा सुनिकै सिकंदर ने पकरि मगाये आप आये ताहि ठाम है । कही काजी पाजी सुनो ये महा मिजाजी करो सिर को झुकाय बादशाह को सलाम है ॥ बोले श्रीकवीर रस राम कहें धीर उर ध्याय रघुवीर जन पीर हारी नाम है । जानौं न स. लाम कहाँ सांची में कलाम वात दूसरी हराम जग जानौं एक राम है। (३३%) टीका | कवित्त । (५०५) बांधि के जंजीर गंगा नीर मांझ चोरि दिये, जिये तीर ठाढ़े; कहै "जंत्र मंत्र आवही" । लकरीन मांझ डारि अगिनि प्रजारि दई, नई मानो भई देह, कंचन लजावही ॥ विफल उपाय भये, तऊ नहीं आय नये, तव मतवारो हाथी आनि के मुकावही । आवत न ढिग, औ चिघारि हारि भाजि जाय; आप आगे सिंह रूप बैठे सो भगावही ।। २७८ ॥ (३५१) kect.cactectecturCECARRECILY " " . * %%%%%%%%%%%%%%%%% भक्तिसुधास्वाद तिलक। ४६५ यात्र्तिक तिलक। बादशाह ने आपको लोहे की सांकर में बांधकर श्रीगंगाजी में छोड़वा दिया, पर श्रीकृपा से सांकर टूट गई और आप तीर पर : खड़े देखने में आये, बादशाह ने कहा कि "इसको जंत्र मंत्र आता है," फिर लकड़ियों में आग लगवाकर आपको उसमें छोड़वा दिया; परन्तु इसमें से भी आप ऐसे (तेजस्वी) निकले जैसे आग में से सोना । "काजी" के सब उपाय निष्फल हुए परन्तु श्रीकबीरजी वादशाह के आगे नहीं ही झुके । तब मतवाला हाथी लाकर उनके सामने छोड़ दिया; हाथी आपके पास नहीं आया, वरन् चिघर चिघर करके भाग गया, क्योंकि हाथी के आगे आप सिंहरूप बैठे देख पड़े ॥ (सिंकदर लोदी का राज्य सं० १५४५ से १५७४ तक) (३३६ ) टीका । कवित्त । (५०४) देख्यो बादशाह भाव, कूदि परे गहे पांव, दखि करामात, मांत भये सब लोग हैं। "प्रभु पै वचाय लीजै, हमे न गजब कीजै, दीजे जोई चाहो गांव देस नाना भोग हैं" ॥ "चाहें एक राम, जमैं आठो जाम, और दाम सौ न काम, जामें भरे कोटि रोग हैं। आये घर जीति, साधु मिले करि प्रीति, जिन्हें हरि की प्रतीति वेई गायवे के जोग हैं ॥ २७६ ॥ (३५०) वार्तिक तिलक सब लोग हार गए । 'बादशाह' ने प्रभाव देख कर, आपके चरणों पर शिर नवाय, विनय किया कि "मुझे जगकर्ता की अप्र- सन्नता तथा क्रोधानल से बचा लीजिये, आप जो चाह नगर, प्रदेश सामग्री सो सव लें।" आपने उत्तर दिया कि "धन धान्य द्रव्य में किलि प्रध्द ४५८८ संवत् १५४५ में सिकन्दर लोदी बादशाह हुना और २६ वर्ष राज्यकर १५७४ विक्रमी में मरगया बोध होता है कि कबीरजी का परिचय इसी जमाने की बात है लगभग १५४८ या १५४६ ॥ "उठेला गङ्गा की लहरी टूटेला जंजीर । प्रेम भरे राम राम रटेले कवीर ॥ जाके मन न डिगे तन कैस के डिगे।" ROCHURCESC-CACA-604-01-CA PRA न 15 ४६६ श्रीभक्तमाल सटीक। करोड़ों अवगुन.और रोग भरे हैं, उससे मुझको कुछ प्रयोजन नहीं, मैं केवल 'श्रीराम' नाम चाहता हूँ, कि जिसको आठो याम जपा करता हूँ॥" , महा राजसभा से भी जीतकर आप स्थान में पहुंचे । सन्त भक्त जिन्हें हरि में प्रतीति थी, अति प्रीति और आनन्द से दर्शन और मिलन को आए। जिनको श्रीसीतारामजी में श्रद्धा विश्वास प्रीति प्रतीति है वेई महानुमाव गाए जाने के योग्य हैं। (४०) टीका | कवित्त । (५०३) होय के खिसाने द्विज, निज चारि विप्रन के मूडनि मुड़ायो भेष सुन्दर बनाये हैं। दूर दूर गांवनि मैं, नावनि को पूँछि पूँछि, नाम लै “कबीर जू" को झूठे न्योति आये हैं ॥ आये सब साधु सुनि एतो दूरि गये कहूँ चहूँ दिसि सन्तनि के फिरै हरि धाये हैं । इनहीं को रूप धरि न्यारी न्यारी ठौर बैठे एऊ मिलि गये नीके पोषि के रिझाये हैं।। २८०॥ (३४६) वार्तिक तिलक । ब्राह्मणों को मत्सर ने पुनः घेरा; कई कई जनों को माथ मुड़वा वैरागी के सुन्दर भेष धारण करवा, चारों ओर भेजा, जो अनेक गांवों में जा जाकर झूठमूठ श्रीकबीरजी की ओर से न्यवता दे दे आए कि "अमुक दिन भण्डारा है।" उसी दिन चारों ओर से वृन्द के वृन्द साधु पहुंचे । वार्ता जानकर श्रीकवीरजी कहीं जा छुपे । श्री सर्कार कबीरजी के वेष में अपार सामग्री सहित पहुंच, म. नेक रूप से सन्तों का आदर सत्कार कर आसन दिला, ऐसा भण्डारा दिया, कि जो केवल लक्ष्मीनाथ से ही बन सकता है । सब सन्तों को अत्यन्त रिझालिया । श्रीयुगल सर्कार की जय ॥ (३४१) टीका | कवित्त । (५०२) आई अपछरा, छरिवे के लिये, वेस किये, हिये देखि गाढ़े, फिरि गई, नहीं लागी हैं । चतुर्भुज रूप प्रभु आनि के प्रगट कियो, लियो फल नैननि कौं, बड़ौ वड़ भागी हैं | सीस धरै हाथ, "तन साथ Bes RECRUCTECI-CONGRESCRICE ४६७ भक्तिसुधास्वाद तिलक। मेरे धाम श्रावो, गात्रौ गुण, रही जोली तेरी मति पागी हैं।" "मगह" मैं जाय, भक्ति भाव को दिखाय, बहु फूलनि मँगाय, पोदि मिल्यो हरि रागी हैं ॥ २८१ ॥ (३४८) वार्निक निलक। स्वर्ग से एक अप्सरा भापकी परीक्षा के लिये आई, अपना सब करतब कर हार के लजित हो लोट गई । “जेहि राखे रघुवीर, बाल को बंका कर सकै ?।" आपने आंखों का फल पाया, श्रीलक्ष्मीनाथ ने चतुर्भुजरूप से दर्शन दिये और सीस पर करसरोज रख के भाज्ञा की कि "जब तुम्हारा जी चाहे तब सबके देखते शरीर सहित मेरे परमधाम में चले आइयो; और जबतक यहां रहो मेरे गुण गाओ।" धीकवीरजी का विक्रमी संवत् ईसपी सन् शाके कलि अब्द जन्म ४३१५ परमधाम २५५२ १५६५ १४२७ ४५६६ , . H. II. Wilson, Ex ने १९४८ ईमवी अर्थात् १५०५ विक्रमी लिखा है धीकधीरज १५४६ में मगहर गये । वहीं म संवत् १५५२ के अगहन सुदी एकादशी को परधाम पहुँचे। दोहा "पन्द्रह सौ उनचास में, मगहर कीन्ही गोन। अगहन सुदी एकादशी, मिले पौन सो पौन ॥" श्री १०८ कवीरजी मगहर जा, भावभक्ति प्रचार कर, बड़े ही प्रसिद्ध हुए । फूल मँगा, उन को विका, उस पर लेट, एक सादा वस्त्र ओढ़, १०१ (एकसौ एक) वर्ष की अवस्था में, श्रीपरमधाम को पहुँचे । जय ! जय !! हिन्दू मुसलमान दोनों ने देखा कि वस्त्र के तले कुछ नहीं था; केवल फूलही फूल थे। तो! मन मान जन रंगी || कोऊ पीचत प्याला प्रेम सुधारस मतवाला सत. संगी ॥ 'सुर नर मुनि जिने पीर प्रौलिया' जिन्ह रे पिया निन्द जाना । कह कबीर गंगे की शकर क्योकर सकी यवाना ?" श्रीकधीरली जुलाहे के घरनी पलेही थे. और जुलाहे उनके रिवार, इससे इनका संबंध मुसल्मानी से स्पष्ट है । और, मानसी भागवत संस्कारपूर्वक श्रीरामनाम- R ४६८ श्रीभक्रमाल संटीक । (७५) श्री ६ पीपाजी की कथा। (३४२) छप्पय । (५०१) पीपा प्रताप जग वासना नाहरकौं उपदेश दियौ। प्रथम भवानीभक्त मुक्ति मांगन कौं धायो।सत्यकह्यो तिहिं शक्ति, सुदृढ़ हरिशरण बतायो॥ श्रीरामानंद पद पाइ, भयौ अतिभक्ति की सीवां । गुण असंख्य निर्मोल सन्त धरि राखत ग्रीवां ॥ परासि प्रणाली सरस भई, सकल विश्व मंगल कियो। पीपाप्रताप जग बास- ना नाहर को उपदेश दियो॥६१॥ (१५३) वार्तिक तिलक। श्रीपीपाजी का प्रताप जगत् में विदित है, आप के सुयश की वासना संसार में फैल रही है; एक वासना-नाहर*ने आपका उप- देश ग्रहण किया। प्रथम श्रीपीपाजी श्रीदेवीभवानीजी के भक्त रहे, एक समय शीघ्रतायुक्त मन्दिर में जा पूजा ध्यान करके मुकि मांगी, -महामंत्र उपदेश के साथ, स्वामी अनंत श्रीरामानन्दजी महाराज का कृपापात्र होना प्रसिद्धही है। इसी भांति हिन्दू तुरुक दोनों ही से संबंध के कारण, श्रीकधीरजी के वचनों से दोनों के कल्याण की इच्छा और दोनों ही पर श्राप की बड़ीद्दी कृपा पाई जाती है। कहते हैं कि आपने "बीजक" को संयत् १४६७ विक्रमी में स्वामी श्री १०८ रामान- न्दजी महाराज के परधाम के अनन्तर, १६ वर्ष की अवस्था में प्रारम्भ किया था। "जो कबीर काशी मरे, रामहिं कौन निहोर?" दोहा) भजन भरोसे रामके, मगहर तजे शरीर । अविनाशी की गोद में, बिलसे दास कबीर ॥ Doctor Hunter, M. A. L L.D., K.C.I F., CS I.. जो श्राप का जन्म सन् १३८० ई० में लिसने हैं, उनके अनुसार भी, पाप सन् १३६५ और १४१६ ईसवी में इस मृत्युलोक में वर्तमान थे। *'पासना-नाहर' एक प्रकार का नाहर ( व्याघ्र ) कि जिसको बहुत दूर से मनुष्य आदि की वासना (गन्ध ) पहुँच जाती है। RECRIKA - ४६६ AHARASHTRA भक्तिसुधास्वाद तिलक। श्रीभवानीजी ने प्रत्यक्ष रूप धर के बताया कि "श्रीहरि की शरणा- गति को दृढ़ धरो श्रीरामानन्दजी को गुरु करो॥" श्रीस्वामीजी के चरण प्रताप से आप भनिभाव की सीमा तथा असंख्य अनूप गुणों के समूह हुए। सन्तों को बड़े ही विनय बल से अपने यहाँ अटका के पूजा सेवा किया करते थे। श्री १०८ पीपाजी की प्रणाली अति सरस निकली; सारे संसार के मंगल का कारण हुई। आपके प्रताप की वासना जगद्विख्यात हुई कि ऐसे भारी हिंसक पशु (नाहर) को भी चेताया और उसको उपदेश लगा। (३४३) टीका । कवितं । (५००) "गागरोन" गढ़ चढ़ पीपा नाम राजा भयो; लयोपन देवीसेवा, रंग चढ़यौ भारिये । आये पुर साधु, सीधो दियो, जोई सोई लियो, कियो मन माझ 'प्रभु | बुद्धि फेरि डारियै'। सोयो निशि; रोयो देखि सुपनो वेहाल अति, प्रेत विकराल देह धरिकै पछारियै । अव न सुहाय कळू; वहूं पायँ परि गई; नई रीति भई, वाहि भनि लागी प्यारिये ॥ २८२॥ (३४७) वार्मिक तिलक । गागरोन नाम नगर में एक बड़ा गढ़ और “पीपा" नाम वहां का राजा था; देवीजी की पूजा का उसका पन था ओर उनमें वह भारी प्रेम रखता था। कहते हैं कि चालीस मन भोग प्रति दिन चढ़ाता था। शुभ गुणों से राजा सम्पन्न था एक दिन अकस्मात् कई मूर्ति संत इस बड़भागी राजा की पुरी की ओर आ निकले । जब साधु आये तव राजा ने उनके निकट रसोई की सीधा सामग्री पहुँचवा दी। राजा का भाग धन्य और धन धान्य । साधु महात्मा तो (जिनके प्रभुही धन हैं ) नित्य पूरण काम सदा कृता- रथरूप होते ही हैं, राजा ने आटा दाल चावल जल दल फूल फल, जेन केन विधि, जो ही कुछ दिया सो ही बड़ी प्रशंसा और सन्तुष्ट- तापूर्वक संतों ने अंगीकार किया। * श्रीकाशांजी और श्रीद्वारावती (द्वारका पुरी) के बीच ।

KAR श्रीभक्तमाल सटीक। सन्तों ने प्रभु से विनय किया कि “राजा कीमति सुधारदीजिये॥" राजा ने रात को भयानक स्वप्न देखा: प्रेत ने उस की खाट उलट दी। श्रीदेवीजी ने उसको प्रत्यक्ष दर्शन दिये । राजा ने मुक्ति मांगी, श्रीदेवीजी ने इस प्रार्थना से प्रसन्न हो हरिभक्ति का मार्ग वताया; और देवीजी ने राजा का आदर किया, नई रीति हुई। राजा को हरिभत्रि अति प्रिय लगी। (३४४) टीका ! कवित्त । ( ४६६ ) पूछ्यौ हरि पायवेको मग जब, देवी कही, “सही रामानन्द गुरु करि, प्रभु पाइये।" लोग जाने बौगै भयो, गयौ यह काशीपुरी; फुरी मति अति, आये जहां-हरि-गाइयै ॥ द्वारमैं, न जाने देत, पाजा ईश लेत, कही राजसों न हेत, सुनि सवही लुटाइयै । कह्यो "कुवाँ गिरी" चले गिरन प्रसन्न हिए, जिये सुख पायौ, ल्याय दरस दिखाइयै ॥ २८३॥ (३४६) वार्तिक तिलक । श्रीपीपाजी ने श्रीदेवीजी से पूछा कि"माता ! श्रीसीतारामजी कैसे मिलें ?" श्रीदेवी मी ने उत्तर दिया कि "पुत्र ! काशीजी में जाके श्रीरामानन्दजी का शिष्य हो ।” श्रीपीपाजी बड़ी ही आतुरता से श्रीकाशीपुरी, भगवान् रामानन्दजी के स्थान में पहुँचे; आश्रम देख और हरिकीर्तन सुन विशेष आनन्द पाया । ड्योढ़ी पर के भृत्य ने पीपाजी को रोका; उनके आगमन का सव समाचार तथा हेतु श्रीस्वामीजीसे विस्तारपूर्वक निवेदन किया; और श्रीआज्ञा आ सुनाई मि"गृहाशक्ति और विरनि में बड़ा अंतर है।" राजसी लोगों से हमारा प्रेम नहीं। पीपाजीने सबका सब तृण की नाई उड़ादिया सब धन ठिकाने लगाया। इसके उपरांत इनको यह आज्ञा दी गई कि "कुएं में कूद पड़," आज्ञा सुनि, पीपाजी कुएं की ओर ज्याही लपके, कि इतने में भगवान् रामानन्दजी के सेवक लोग घड़ी फुर्ती और अति लाधव से इनको पकड़ के श्रीस्वामीजी महाराज के सन्मुख लेगये । श्रीदर्शन से पीपाजी कृतकृत्य हुए। Sc+KAucticacturesIcecon-CLICROR पत्र23 AARAKHANDRAKAR - भक्तिसुधास्वाद तिलक । (३४५) टीका । कवित्त । (४६८) किये शिष्य कृपा करी, धरी हरि भक्ति हृदै; कहीं "अब जावी गृह, सेवा साधु कीजिये । वितये वरस, जब सरस टहल जानि, संत सुख मानि, आवै घरमधि लीजिये ॥" आये आज्ञा पाय धाम, कीन्ही अभिराम रीति; प्रीति को न पारावार; चीठी लिखि दीजिये। "हूजियै कृपाल; वही बात प्रतिपाल करौ;" चले जुग वीस जन संग, मति रीझिये ॥ २८४ ॥ (३४५) पातिक तिलक। भगवान रामानन्दजी ने संस्कारपूर्वक पीपाजी को शिष्य करके आज्ञा दी कि "वत्स ! अब तुम गागरौनगढ़ जाओ, और वहीं रह के साधुलेवा करो; जब तुम्हारी साधुसेवा सरस निकलेगी, तब बरस दिन बीते हम स्वयं तुम्हारे घर आवैगे।" पीपाजी राजधानी में आके साधुसेवा करने लगे, यहां तक की कि उनकी कीर्ति कौमुदी का प्रकाश दसौदिशाओं में फैल गया; बारह महीने श्रीपीपाजी को सुख से एक पल सरिस जान पड़े; अब श्रीगुरु दर्शन की प्रतीक्षा कर, विरह से विकल हो, पीपाजीने काशीजी में पाती (पत्रिका)निवेदन की; जिसके सत्य कार्पण्य और यथार्थ प्रणय से द्रव कर, निज वचन को सँभाल, संतों से पीपाजी की साधुसेवा की प्रशंसा सुन, श्रीसीताराम कृपासे, तीक्षण विराग और तीब अनुरागवाले चालीस मूर्ति संतोंको साथ ले, अनन्त श्रीरामानन्दजीने श्रीकाशीजीसे गाग- रौनगढ़ को प्रस्थान किया। (३४६) दीका । कवित्त । (४६७) कवीर, रैदास आदि, दास सब संग लिये, आये पुर पास; पीपा पालकी ले पायौ है । करी साष्टांग न्यारी न्यारी बिनै साधुन को, धन को लुटाय सो समाज पधरायो है ॥ जैसी कीन्ही सेवा, बहु मेवा, नाना राग भोग, बानी के न जोग; भाग काँपै जातगाया है। जानी भक्ति रीति, “घर रहौ, के अतीत होहुः" करिके प्रतीति गुरु पग लगि धायो है ॥ २८५ ॥ (३४४) * युगशेस"-२०+२००४०,२०४२-४० . .

SAFERNANGANAGAR श्रीभक्तमाल सटीक। वार्त्तिक तिलक । श्रीपीपाजी ने सुना कि भगवान् रामानन्दजी महाराज चालीस कृपापात्रों के साथ नगर के निकट आ पहुँचे शीघ्र राजधानी के वाहर पालकी सहित आ, अगुआई की; और अलग २ साष्टांग दंडवत् कर, पालकी में चढ़ा, धन धान्य लुटाते, श्रीगुरुनारायण की पालकी में अपना कंधा भी लगाए हुए चले । प्रेम से अपने कंधे पर पालकी रक्खे, बड़े धूम धाम से गीत वाजा इत्यादि के साथ, घर में ला पधराया ॥ जिस भाव से श्रीगुरु और संत समाज की सेवा पूजा करने लगे कहते नहीं बनता; नित्यके राग भोगकी प्रशंसा किससे की जासकती है ? स्वामीजी महाराज ने इनकी रुचि देख, आज्ञा की कि "यदि तुम इसी रीति पर रामकृपा से चले चलो तो राज्य त्यागना और घर में बने रहना दोनों ही बातें तुम्हारे लिये तुल्य ही हैं ।" श्रीगुरु वचन को हृदय में समझ दौड़कर श्रीचरणारविन्द पर आ गिरे अ. र्थात् यह चाहा कि “सब छोड़ श्रीगुरुसेवा में बना रहूं ॥" (३४७) टीका | कवित्त (४६६) लागी संग रानी दस दोय, * कही मानी नहीं, कष्ट को बतावै, डरपावै, मन लावहीं । कामरीन फारि मधि, मेखला पहिरिलेवो, देवो डारि आभरन, जो पै नहीं भावहीं" ॥ काहू पै न होय, दियो रोय, भाय भक्ति आई, छोटी नाम सीता, गरें डारी न लजा. वहीं । “यह दूर डारौ, करौ तन को उघारौ;" कियौ; दया रामानन्द हियो; पापा न सुहावहीं ॥ २८६ ॥ (३४३) वार्तिक तिलक। जव पीपाजी की बारह (वा बीस) रानियों ने जाना कि हमारे महाराज, राज और घर सब कुछ छोड़, विरक हो, भगवान् श्री- रामानन्दजी के साथ जा रहे हैं, तो वे सवकी सब साथ हुईं; और, मार्ग के कष्ट बताने डराने डांटने फटकारने समझाने से भी किसी ने नहीं माना। श्रीपीपाजी ने कमली फाड़ फाड़ कर, सब रानियों * "दसतोय' -२०१२-१२ अथवा १०४२-२० ChocockSONGCRockste ASAN - . ॐॐ भक्तिसुधास्वाद तिलक। ५०३ को दी कि “यही गले में पहन पहन लो, और भूषण वसन उतार डालो, जो यहां रहना नहीं भाता है तो इसी वेषसे चलना पड़ेगा।" यह तो किसी से नहीं हो सका; सबों ने रोदिया; परन्तु “सीता सहचरी" नाम सब से छोटी रानी, जो भनिवती सुन्दरी सुकुमारी और बड़ी सुशीला थी, शीघ्र उठ खड़ी हुई और अपने सिंगार आभरन इत्यादि उतार, लाज तज, कंवल की मेखला (अलफी) गाती पहन, हाथ जोड़, समाज में आ मिली। पीपाजी ने कहा कि "यह भी उतार फेंको" सीता-सहचरी ने ऐसा ही किया। भगवान् रामानन्दजी को इस पर बड़ी ही दया आई पर पीपाजी को स्त्री का साथ लेना नहीं भला लगता था । (३४८ ) टीका । कवित्त (४६५) जौ पै यापै कृपा करी, दीजै काहू संग करि, मेरे नहीं रंग यामैं, कही वार वार है। सौंह को दिवाय दई लई तव कर धरि; चले ढारि; विप्र एक छोड़ें न बिचार है ॥ खायौ विष; ज्यायो; पुनि फेरि कै पठायो सब आयो यों समाज द्वारावती सुखसार है । रहे कोऊ दिन, आज्ञा माँगी इन रहिये की; कूदे सिंधु माँझ; चाह उपजी अपार है ।। २८७॥ (३४२) वार्तिक तिलक। श्रीगुरुभगवान् से पीपाजी ने पुनः पुनः प्रार्थना की कि "मुझ को इसका साथ ले चलना नहीं भाता है, यदि आपको इस पर इतनी करुणा है तो किसी और कृपापात्र के साथ कर दीजिये।" पर स्वामीजी महाराज ने शपथ दिया; तव पीपाजी ने सीतासह. चरीजी का हाथ थाँभ लिया । श्रीसीतारामकृपा से समाज ने प्रस्थान किया। रानियां दूसरा रंग लाई, एक ब्राह्मण को (जो पुरोहित से कुछ सम्बन्ध रखता था, कहते हैं कि उन्नीस सौ रुपए देने की प्रतिज्ञा कर) कहा कि "किसी भाँति राजा को रोको।" वह ब्राह्मण हलाहल * 'मेपला"- कटि भूपण, करधनी ॥ Hat ALSO NRO- श्रीभक्तमाल सटीक । ५०४ एक दिन कूद पड़े। विष खा गया जिसके भयानक परिणाम से पीपाजी अत्यन्त डरे । परन्तु भगवान् रामानन्द ने श्रीसीताराम कृपा से तत्क्षण ही उस दुर्बुद्धि को जिलादिया; और उन मूखों को फेरदिया, यह मंगल समाज सानन्द शीघ्र पयान कर सुखपूर्वक, विचरता, मार्ग वासियों को कृतार्थ करता, श्रीद्वारावती ( द्वारिका ) पहुंचा। कुछ दिन सुख से साथ रह कर पीपाजी ने श्रीगुरु-सतसंग का आनन्द प्राप्त किया। जब समाज वहां से काशीजी को चला, तो आज्ञा मांग कर श्री पीपाजी द्वारावती ही में रह गये भगवत् दर्शन की अत्यन्त आकांक्षा से श्रीपीपाजी सीता-सहचरी समेत समुद्र में दीर्घ-दर्शी स्वामी श्री १०८ रामानन्दजी महाराज, पीपाजी के जल में कूदने की परीक्षा तो लेही चुके थे। (३४६ ) टीका | कवित्त । (४६४) ' आये आगे लेन आप, दिये हैं पठाय जन, देखि द्वारावती कृष्ण मिले बहुभाय के । महल महल माझ चहल पहल लखी, रहे दिन सात, सुख सके कोन गाय के ॥ आज्ञा दई जाइये की; जाइबो न चाहैं; दिये पिये वह रूप “देखो मोहीको जु जाय कै"। "भक्त चूड़ि गये, यह बड़ोई कलंक भयो, मेटौ तम,अंक संक गही अकुलाय कै॥ २८८।। (३४१) वार्तिक तिलक। जैसे ही दम्पति समुद्र में कूदे, वैसे ही श्रीकृष्ण भगवान के भेजे हुए एक मूर्ति ने इन दोनों को रास्ता दिखाते हुए श्रीमहल तक पहुँचा दिया, जहां श्रीरुक्मिणीजी महारानी समेत श्रीकृष्ण भगवान् इनकी अगुआई के लिये स्वयं आगे आ खड़े थे। श्रीपीपाजी और सीतासहचरीजी ने श्रीद्वारावती का दर्शन करके अद्भुत आनन्द तो पाया ही था, किन्तु प्रभु जिस कृपा और भाव से इनसे मिले, और सात दिन तक इन्होंने मंदिर मंदिर में जैसा चहल पहल ( परमा- नन्द ) का अनुभव पाया, उस सुख का वर्णन किसी कवि से क्या घरन शेष शारदा से भी नहीं हो सकता ॥ , स *SH , H भक्तिसुधास्वाद तिलक । ५०५ प्रभु ने वाहरजाने की आज्ञा दी; यद्यपि साक्षात् दर्शन के सुरव को छोड़ कर जाना नहीं चाहते थे, तथापि श्रीहरि ने यह समझाया कि 'जहां रहोगे वहां इसी ध्यान में मग्न रहोगे, और यदि तुमको न भेजूं तो लोक में यह कलंक होगा कि भगवत् का भक्त डूब गया। सो तुम्हें इस कलंक रूप अंधकार को मेटना उचित है ।" आज्ञा सीस पर धर उस छाप को जो भगवत् ने अनुग्रह किया, पीपाजी ने हाथ में ले लिया और विरह से अत्यंत विकल हुए । श्रीरुक्मिणी दयामयी ने अपना प्रसाद, सारी, महाभाग्यवती सीतासहचरीको अनुग्रह किया; नदनंतर प्रभु समुद्रतटतक पहुंचाने के अर्थ उठ खड़े हुए। - (५०) टीका | कवित्त । (१६३ ) चले पहुँचायवे को प्रीति के अधीन आप, बिन जल मीन जैसे ऐसे फिरि आये हैं । देखि नई चान, गात सूके *पट, भीजे हिये, लिये पहिचानि, पानि, पग लपटाये हें ॥ दई लेकै छाप पाप जगल के दूर करौं, "ढरौ कहूं और" कहि सीता समुझाये हैं। छठेई मि. लान बन मैं पठान भेट भई, लई छोनि तिया, किया चैन, प्रभु धाये हैं॥ २६॥ (३४०) चार्तिक तिलक । भगवत तो प्रेम के अधीन हैं ही, पहुँचाने को चले और पहुँचा कर श्रीभक्रवत्सल महाराज ऐसे फिरे जैसे जल बिन सीन; श्रीपीण- जी तथा श्रीसीतासहचरीजी की दशा क्या कही जाय ? जैसे विना प्राण के शरीर की। समुद्र के तट पर लोगों ने श्रीपीपाजी और सीता सहचरीजी को बड़े आश्चर्य से देखा; इनके शरीर और वस्त्र का एक सृत वा एक रोम भी भीगा नहीं था। सबके सब सखे ही थे; इनके हृदय भंगा वत् प्रेम से भली भांति भीगे थे । सिंधु तट की भीड़ने, जिनमें से बहुतों ने इन दोनों को समुद्र में कूदते देखा था, पहिचान लिया; "सूके"-सूये, भीगे नही । " मिलान'मागे माप (Sth milk ) || न COMCN RACRECORG ४८ **99999****** NA श्रीभक्रमाल सटीक। महात्मा लोगों ने बड़े आदर से दोनों को लोके, दिव्य द्वारका और श्रीहरिकृपा का वृत्तान्त सुना; तथा छाप को देख कर चरणों में लपट गये; श्रीपीपाजी ने छाप को पुजारी के हाथों में सौंप श्री. मुख-वचन कह सुनाया कि "जिस के छाप लगेगी सो भवसागर से उत्तीर्ण हो जायगा ।" श्रीआयुध अंकित प्राणियों की महिमा श्रीपीपाजी ने भगवत् आज्ञा से समझा के कहा कि "लोगों का पाप छुड़ाया कीजिये।" दर्शन को आनेवाले लोगों की भीड़ देख कर श्रीपीपाजी श्री. सीतासहचरी की सम्मति से शीघ्र ही वन की ओर चल दिए। श्री- पीपाजी ने श्रीसहचरीजी को समझाया कि "तुम सरीखी युवासुन्दरी को मुझ अकेले के साथ चलना ठीक नहीं है;" पर श्रीकल्यानीजी ने एक न सुना ॥ वन में छः “मिलान" जाने पर एष्ट पठान लुटेरों की दृष्टि श्री सहचरीजी पर पड़ी और साथ ही सबके सब इन दोनों पर टूट पड़े। स्त्री को छीन चम्पत हुए। श्रीसीतासहचरी भगवत् से विनय करने लगी कि "प्रभो यदि तुमने तनक विलंब किया तो इसकी लाज और प्राण पर न जानूं कि क्या और कैसा हो?" "तुम को तो है यह खेल कौतुक, पर । जाते हैं लाज प्राण यां, प्रियवर। हूं में अवला न सिख दो यो वेढब । जुन ऐसी हँसी औ सिप है कव ? सब औसर में ही निकट प्यारे। तजि विलंब वेग हो प्रगट प्यारे॥" वहीं, श्रीहरिने निगुड़े दुष्टों को पूरा दंड और सहचरीजी को दर्शन दियां । श्रीपीपाजी भगवत् इच्छा समझ एकांत को मुखद मान भगवद्भजन में चैन करने लगे; तथापि श्रीहरि श्रीसहचरीजी को श्रीपीपाजी के पास पहुँचाकर आप अंतर्द्वान होगये ।। CREASECRESex *** REKHA भक्तिसुधास्वाद तिलक। ५०७ (३५१) टीका । कवित्त । ( ४६२) अभ लगि जाओ घर, कैसे कैसे भा₹ डर वोली "हरि !जानिये न भाव पैन आयो है"। लेतही परिच्छा, मैं तो जानौं तेरी सिच्छा ऐपै, सुनि दृढ़ वात कान अति सुख पायो है" ॥ चले मग दूसरे;सु, तामैं एक सिंह रहै, आयौ वासलेत शिप्य कियोसमझायो है। श्राए भौर गांव, सेपसाई प्रभु नांव रहै, करे वाँस हरे; ढरे “चीधर" सु. हायो है ॥ २६० ॥ (३३६) वार्तिक तिलक। श्रीपीपाजी ने सीतासहचरीजी से कहा कि "देखो ! कैसे कैसे उपद्रव खड़े होते हैं; तुम अब भी घर फिर जावो; आपने उत्तर दिया कि हे हरि! यह दासी तो कदापि पीछे पग देने की नहीं; आपने ठीक विचार नहीं किया है; मेरे निमित्त आपने कौन सा उद्योग किया है ? और श्रीयुगल सर्कार ने किस आपत्ति की शान्ति नहीं की है ? तब श्रीपीपाजी ने मुसका के कहा "मैं केवल तुम्हारी परीक्षा लेता था, तुम्हारी समझ बूझ को मैं जानता हूं, तुम्हारी दृढ़ता देख समझ सुन के मैंने अतिशय सुख पाया ॥ दो. "पीपाजी तब हँसि कह्यो, लई परीक्षा तोरि । ते तो श्रीरुक्मिणि सखी, तोहि तजे बड़ि खोरि ॥" उस मग को तज, दोनों मूर्तियों ने दूसरा पथ पकड़ा; कुछ भागे बढ़, एक सघन विपिन में एक बड़े सिंह के गरज की प्रतिध्वनि सुनी जो मनुष्यों की वास पाके टोह लेता हुआ इन दोनों की ओर आ निकला । परन्तु इन पर दृष्टि पड़ते ही वह मृगराज चकरी के सदृश अधीन हो श्वान की नाई पूंछ हिलाने लगा । चौपाई। "पीपा ताके निकट सिधारेउ। देह तेहि मंत्र, माल गर डारेउ॥" सिंह को उपदेश और शिक्षा दे, समझा बुझा, एक गांव में आये जहां शेषसाई नाम प्रभु के दर्शन किए। एक जगह कोई मनुष्य लाठी बेच रहा था उससे एक लाठी KARKIKc , KKR ***** श्रीभक्तमाल सटीक। . N माँगी, उसने कहा "वसवाड़ी में से जाकर काट क्यों नहीं लाते ?" आपने कहा "बहुत अच्छा, रामकृपा से ऐसा ही होगा।" सो उसकी वे सब सूखी लाठियाँ धरती में जड़ पकड़ कर, हरे हरे बाँस हो गई आपने उसमें से एक लाठी काटली ॥ फिर "श्रीचीधड़ भगत" का नाम सुनके उनसे मिलने को चले। श्रीपीपाजी और श्रीसीता-सहचरी का नाम, यश, देश देश, गांव गांव, गली गली, प्रसिद्ध होगया था। (३५२) टीका । कवित्त । (४६१) दोऊ तिया पति देखें आए भागवत; ऐपै घर की कुगति रति सांची ले दिखाई है । लहँगा उतारि, बेचि दियो, ताको सीधौ; लियो "करौ अजू पाक," वधू कोठी में दुराई है ॥ करी लै रसोई सोई भोग लगि बैठे, कह्यो “आवौ मिलि दोई" "कही पाछे सीथ भाई है।" "वाहू को बुलावौ ल्यावौ बानि के जिमाँवौ, तब सीता गई ठोर जाइ नगन लखाई है ॥ २६१ ॥ (३३८) बार्मिक तिलक। श्रीचीचड़ भगतजी और उनकी भगतिन ने भागवतों के दर्शन से अति आनंद पाया। चीधड़ भगाजी ने पूछा तो जान पड़ा कि घर में कुछ नहीं है । श्रीपीपाजी और सीतासहचरीजी का नाम सुन के दोनों हर्ष से फूले नहीं समाये ॥ चीधड़जी की धर्मपत्नीजी ने अपना लहँगा उतार के बड़े प्रेम से दिया और श्रीचीधड़जी ने उसको बेच, सीधा सामग्री मोल ले श्रीपीपाजी के आगे ला रक्खा ॥ जब रसोई होगई, और श्रीयुगल सरिको भोग लग चुका, तो आप दोनों ने कहा "भगतिनजी को बुलाइये, सब मिलकर प्रसाद पाव; इन्होंने उत्तर दिया "वह पीछे से सीथ प्रसादी लेगी आप दोनों पावें।" चार पत्ते परस के श्रीपीपाजी ने सहचरीजी को कहा कि "तुम भाप जाके भगतिनजीको लिवाय लाओ।" श्रीसहचरीजी बाके देखती हैं तो भगतिनजी को एक कोठी में नंगी बैठी पाया । RECRCH Kaleckchr SCHACRECRUICICIAL A , कुछ भी . ॐ भकिसुधास्वाद तिलक। ५.8 (३५३ ) टीका | कवित्त । (४६०) पूछे “कहो वात, ए उघारे क्यों हैं गात,” कही “ऐसेही विहात, साधुसेवा मन भाई है। आवे जव संत सुख होत है अनंत, तन ढक्यो, के उघारौ ? कहा चरचा चलाई है", जानिगई रीति,प्रीति, देखी एक इनहीं मैं, "हमहूँ कहावें, ऐपे, छटा हूँ न पाई है." दियौं पट आधौ फरि, गहि कै निकारि लई, भई सुखसैल, पाथै पीपा सों सुनाई है ॥ २६२ ॥ (३३७) वार्तिक तिलक। श्रीसहचरीजी ने पूछा कि "भगतिनजी नंगी क्यों हो ?" उत्तर दिया कि "दिन इसी भांति व्यतीत होते हैं; साधुसेवा में विलक्षण सुख की प्राप्ति हुआ करती है; उस सुख के सामने दुख ऐसा जान नहीं पड़ता; जव संत कृपा करिके पधारते हैं, तो असीम सुख मिलता है तब इस चरचा की क्या आवश्यकता रहती है कि "तन ढका है कि नंगा?" सहचरीजी ने बातों में सब कुछ समझ लिया और जाना कि "मोह ! श्रीसीतारामकृपा से इनकी रीति प्रीति वर्ताव इन्ही में है। हमलोग भी 'संत भक्त कहलाते हैं, पर इनकी छटा भी हममें कहीं पाई नहीं जाती।" अपने वस्त्र में से आधा फाड़कर उनको पहिनाया और हाथ पकड़ के वहां से लिवाय लाई जितना सुख समूह हुआ वह वर्णन नहीं हो सकता है ॥ प्रसाद पाने के अनंतर श्रीपीपाजी से श्रीसहचरीजी ने सब वार्ता विस्तारपूर्वक कह सुनाई ॥ (३५४) टीका | कवित्त । ( ४८६ ) "करैं वेस्या कर्म,अवधर्महे हमारो यही,"कही; जाय वैठी जहां नाजनि की ढेरी है। घिरि आये लोग जिन्हें नैननि को रोग; लखि भयो सोग, नेकु नीकेहूँनहेरीहै । कहैं "तुम कौन?" "वारमुखी, नहीं भौन संग भरुवा" सु गहै मौन, सुनि परी बेरी है। करी अन्न रासि आगे मुहर रुपैया पागे; पठै दई चीधर के; तब ही निवेरी, है ॥ २६३॥ (३३६) R Sahsik श्रीभकमाल सटीक । , . वात्तिक तिलक। श्रीसहचरीजी ने कहा कि "मेरा अब यही धर्म है कि अपनी सौन्दर्यता को वेचं, और इन दंपति को अन्नादि दूं ॥ सो० "हरि जन चरित विचित्र, जिमि हरि चरित विचित्र अति । जानिय सदा पवित्र, नहिं संशय, वे अलख गति ॥१॥ दो० "चरित समर्थन के अलख, गढ़, अतर्य, अदोस । जे सुनि ई करहिं ने, मूढ़ अविद्याकोस ॥१॥ बड़े कह सो कीजिये, करै सो लेब विचार । श्याम कीन्हि करतूति जे, नहिं कर्तव्य हमार ॥२॥" यह कह अन्न के गोले (चाजार ) में जा बैठी जिन लोगों को बेश्याओं के देखने का रोग था वे लोग वहाँ घिर आये; परन्तु श्री- सहचरीजी के दर्शन के माहात्म्य से उनके रोग सोग जाते रहे, उनके मन पवित्र हो गए और उन्होंने फिर आपकी ओर विषय. दृष्टि से नहीं देखा; पूछा कि "तुम कौन हो?" आपने कहा कि "वारमुखी, मेरे घर गृहस्ती नहीं है और साथ में * अँडुआ (मौन बैठा है ) भी नहीं है।" इतना कह आप मौन होगई। सब लोग वहाँ घिरे खड़े ही रहे; वरंच रामकृपा से सब लोगों को निश्चय निर्णय होगया कि ये श्रीसीता-सहचरीजी और श्रीपीपाजी हैं। ("तब ही निवेरी है") आपके आगे नाज सोना अन्न धन का ढेर लगा दिया। आप उस अन्न धन को श्रीचीधर भगतजी के घर भिजवा कर तव वहां से आप भी उठके श्रीपीपाजी और चीधर भगतजी के यहां चली आई। उस नाज सोना धन धान्य से श्रीचीधरजी भलीभांति साधुसेवा करने लगे। (३५५) दीका | कवित्त । (५८) आज्ञा माँगि "टोड़े" आये; कभू भूखे कभं घाये; औचकही दाम पाये, गयो हो स्नान को। मुहरनि भांडो, भूमि गाड़ो, देखि छाडि आयो; कही निसि, तिया बोली "जावौ सर आन को ॥ चोर वाह * कोई २ कहते है कि पीपाजी को भेडा बताया ॥ wee म भकिसुधास्वाद तिलक। चोरी करें; ढरे सुनि वाही ओर, देखें जो उघारि सांप, डारें हते प्रान को। ऐसे आय परी; गनी, 'सात सत बीस' भई, तोले पांच वाट करे एक के प्रमान को ॥ २६४ ॥ ( ३३५) चार्तिक तिलक। श्रीपीपाजी श्रीसीतासहचरी सहित श्रीचीधड़जी और उनकी भगतिन से आज्ञा लेके "टोड़े" नाम के एक गांव में आये। "कभी घी धना कभी मुट्ठी चना कभी वह भी मना" तो विरकों के भोजन की ऐसी वार्ता प्रसिद्धही है इसका कहना ही क्या है । एक दिन स्नान को गये थे, वहां अचानक बहुत धन देखा कि स्वर्णमुद्राओं से भरे हुए घड़े धरती में गड़े कुछ कुछ दिखाई दे रहे हैं। आप देख के छोड़ आये । रात को स्त्री से यह बात कही। ये बोली कि "अव से आप उस ठिकाने न जाइये, दूसरे पोखरे पर स्नान को जाया कीजिये॥" श्रीपीपाजी श्रीसीतासहचरीजी से उस धन के पता ठिकाने की जब बात जहां कर रहे थे उसी समय वहीं, पास ही चोर भी चोरी की ताक में छिपे दोनों की बातें सुनरहे थे सो वे चोर उसीपते पर पहुँचे, और उन पात्रों को देखा भी; परन्तु जो उनको खोलें तो उन में विषधर सांप देख पड़े क्रोध से भरके वे चारे उन बरतनों को उठालाये और श्रीपीपाजी के घर में गिरादिया; ऐसे घरवठे ही धन पहुँच गया; श्रीपीपाजीने गिने तो सोने के भारीभारी मुद्रे (७२ सात सो वीस) थे, जो एक एक स्वर्णमुद्रा तौल में पाँच पाँच तोले काथा॥ (३५६ ) टीका । कवित्त । ( ४८७) जोई आवै द्वार, ताहि देत हैं अहार; और बोलि के अनंत संत भोजन करायो है। बीते दिन तीन, धन खाय प्याय छीन कियौ लियौ सुनि नाम तृप, देखिबे को आयो है ॥ देखि के प्रसन्न भयौ; नयौ; "देवी दीक्षा मोहि;" "दीक्षा है अतीत, करें आप सो सुहायो है"। "चाही सोई करौं, हे कृपाल, मोकों ढरौ," "अंजू धरी भानि संपति औ रानी;" जाइ ल्यायो है ॥ २६५ ॥ (३३४) XECitak ACCRE . , श्रीभकमाल सटीका . वार्तिक तिलक। श्रीपीपाजी उस धनको पाके साधु भागवत अतिथि और भूखों को खिलाने लगे; जो आता था उसको पूरा भोजन देते थे, और प्रति दिन बहुत संतों को बुता के भंडारा देने थे; तीन दिन इसी धूमधाम से व्यतीत हुए; सब धन खिला पिला उड़ादिया । वहां का राजा "सूर्यसेनमल" आपका नाम सुन के दर्शन को आया, देख के बड़ा प्रसन्न हुआ और बड़ी नम्रता से बार बार दंडवत् कर प्रार्थना की कि "मुझको दीक्षा शिक्षा दीजिये।" आपने श्राज्ञा की कि "पहली शिक्षा अतीत (विरत ) होना है, जो होसके तो हो क्योंकि हम अपने सरीखा सुंदर कर लेते हैं" राजा ने कहा कि "जो कहियेगा सो करूँगा, आप मुझपर कृपा कीजिये।" श्री- पीपाजी ने आज्ञा की कि "अपनी सब संपत्ति भोर रानी लाके मुझको भेंट दे दे" राजा ने वैसा ही किया । (५७) टीका । करिन । (४३) करिके परीक्षा, दई दीक्षा; संग रानी दई; "भई ए हमारी, करौ परदा न सन्त सों। दीयौ धन घोरा कळू, राख्यो दै निहोरा; भूप मान तन छोरा; बड़ी मान्यौ जीव जन्त सों ॥ मुनि जरि बरि गये भाई "सेनसरज" के, ऊरज प्रताप कहा कहें सीताकत सों। आयो पनिजारो, मोल लियो चाह खैलनि को दियो बहकाय, कही पीपाज अनंत सो॥ २६६ ॥ (३३३) पातिक तिलक। इस भांति परीक्षा लेकर श्रीपीपाजी ने राजा सूर्यसेनमल को दीक्षा दी, और रानी तथा राज्य उसको फेर देके यह शिक्षा दी कि "रानी और राज्य सब कुछ मेरा है, तू अपना न समझ, भगवन्त और सन्तों की सेवा कियाकर और सन्तों से कुछ ओट न रखना, ए रानियां सामने दर्शन किया करें ।" वारंवार विनय करके एक घोड़ा और एक तोड़ामेंट करके राजा बिदा हुआ। राजा ने अपने नृपतित्व का अभिमान छोड़ा और KAREKACHCHACHCHECHAKRAM , +++++++++++++Э. भक्तिसुधास्वाद तिलक। स्वामीजी की भाज्ञानुसार सन्त तथा जीव जन्तु की सेवा करने लगा। राजा सूर्यसेनमल के भाई इत्यादि यह सब देख सुन दुष्टता से जल भुन गये, परन्तु श्रीसीतारामजी तथा श्रीसीतासहचरीजी के कान्त श्रीपीपाजी के ऊंचे (ऊरज)प्रताप से ची नहीं कर सकते थे। एक वनिजारा वैल भोल लेने आया दुष्टों ने उससे कह दिया कि पीपाजी के पास बहुत अच्छे अच्छे खैला (नाटा)वैल अनन्त हैं ।। (५% ) टीका। कवित्त । (४८५) वोल्यों वनिजारो दाम खोलि, "खेला दीजिये ज!" "लीजिये जू!, आय, गांव चरन पठाये हे" । गये उठि पाछे बोलि सन्तनि, महोच्छो कियो; आयो वाही समै; कही "लेहु मन भाये हैं"। दरसन करि, हिये भनिभाव भयो श्रानि, आनिकै चसन सब साधु पहिराये हैं। और दिन नहाने गये घोड़ा चढ़ि छोड़ि दियो, लियो, वाँध्यौ दुष्टननि; आयो, मानौ ल्याये हैं ॥ २६७ ॥ (३३२) वार्तिक तिलक । वह वनिजारा श्रीपीपाजी की कुटिया में आ बहुत से रुपये सामने रख, बोला कि "मुझे खैला (वैल ) चाहिये।" आपने कहा कि “बहुत अच्छा, जिनने चाहिये उतने लीजियो; वेल गांव में चरने के लिये गये हैं; कल दो पहर से पहले आना।" आज्ञानुसार उधर वनिजारा रुपये दे चला गया, और इधर आपने न्योता दे दे के सन्तों को वुलवाया, उसके सब रुपये भंडारे में लगादिये ॥ दूसरे दिन सहस्रशः सन्त इकट्ठे हुए थे उसी महोत्सव के समय बनिजारा भी श्रा पहुंचा और बैल मांगे आपने उत्तर दिया कि "इन संतो को देख, कि परलोक की खेप पहुँचा देनेवाले ये कितने बैल भोजन कर रहे हैं, मैं इन्हीं वेलों का वाणिज्य करता हूं सो ले।" संतों के दर्शन करके उसकी बुद्धि निर्मल हो गई और उसने बड़ा आनन्द पाया; शीघ्रही वस्त्र भी लाके सन्तों को उढ़ाया पहनाया; ओर रुपये भी संतों के वस्त्र के लिये दिये । इस प्रकार से उस बड़- FROFESCEIA RECECraced - , * + श्रीभक्रमाल सटीक। भागी के रुपये से श्रीपीपाजी ने भोजन और वस्त्रसे सेवा करके उस समय संतों के समाज को बड़ाही प्रसन्न किया । श्रीकृपा से वह बनिजारा तव से बड़े प्रेम से साधुसेवा करने लगा। एक दिन श्रीपीपाजी घोड़े पर चढ़ तड़ाग में स्नान को गए; घोड़े को जब योही छोड़ स्नान आदि में लगे, तब दुष्टों ने घोड़े को चुरा लेजाकर अपने यहां बांध रखा। परन्तु जब श्रीपीपाजी स्नान आदि करके चलने लगे तो घोड़े को वहां कसा कसाया श्रीरामकृपा से हिंहनाता ऐसा उपस्थित पाया कि मानों उसको कसके अभी कोई लाया है। श्री १०८ पीपाजी का समय, विक्रमी संवत् की पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में था। (३५६) टीका । कवित्त । (४८४) गये हे बुलाये*आप; पाछे घर संत आये; अन्न कछू नाहि; "कहूँ *सोलहवीं शताब्दी के अन्त ( संवत् १५१७ ) में श्रीनवध प्रदेश “जायस' के मध्य मलिक मुहम्मद जायसी ने "पद्मावत" (दोहे चौपाइयों में) प्रशंसनीय रची ॥ * जिस के न्याय में धीपीपाजी की सहायता यिन, राजा तथा उसके मन्त्री असमर्थ थे, यह झगड़ा यह था कि एक तालाब पर किसी पथिक को सुन्दर स्त्री के निकट होई अनबीन्हा पुरुष श्राकर कहने लगा कि यह स्त्री मेरी है । झगडा अन्त को राजा की कचहरी में पहुँचा, साक्षी के प्रभाव से राजा मंत्री सब चकराये थे, श्रीपीपाजी सर्वज्ञ जय ठीक यात समझ गये तो, लोहे के छोटे बड़े कई मंजूरी (सुंदूत ।। 1 ) और ताला मंगा के एक लोहे का बोतल सा वस्तु और उसका पेंच एक बली वीर के हाथ में धरा के, राजा से बोले कि "दोनों मनुष्यों में से जो इस बोतल में श्राधे घंटे तक रह सकै सोही इस स्त्री का स्वामी सममा आय।" इतना सुन एक तो चुप हो रहा पर दूसरा यह कहकर कि "मैं बोनल के भीतर जाता हूं" अदृश्य हो गया । श्रीपीपाजी ने वीर को पंच बढ़ाने की श्राज्ञा देकर, लोहे के बोतल को लोहे के सबसे छोटे मंजूप में और उसको उससे बड़े में तथा क्रमशः एक को दूसरे में धरते और ताला लगवाते हुए, अंत को कहा कि "यह मनुष्य नहीं है, दैत्य प्रेत है यदि उसमें से निकलेगा तो भारी उपद्रव मचाधेगा।" कोई कहते हैं कि धरती में गाड़ दिया गया और को कहते हैं किधीपीपाजी उसकी सुगति के कारण हुए, दोनों प्रकार से सुना जाता है ॥ जो मनुष्य चुप हो गया था वही उमस्त्री का पति था, स्त्री उसको दे दी गई। CAUGUSeacticeOGES -- --- -- सो SASARis भक्तिसुधास्वाद तिलक। ५१५ जाय करि ल्याइयै”। विपई बनिक एक दोख के बुलाइ लई दई सब सौंज कही "सही निसिआइये" ॥ भोजन करत मांझ पीपा जू पधारे; पूछी वारे तन प्रान जब कहिकै सुनाइयै । करिकै सिंगार सीता चली झुकि मेह आयौ, कांधे पे चढ़ायो बपु बनिया रिझाइ- यै ॥२६८॥ (३३१) पातिक तिलक। श्रीपीपाजी महाराज को राजा सूर्यसेन मल ने एक झगड़े के न्याय में सहायता लेने के लिये सादर सविनय बुलाया था, आप वहीं गए थे। पीछे में आपकी कुटी में सन्तोंका समाज आया। श्रीसीतासहचरीजी ने संतों को सादर सप्रेम आसन दिला, घर में देखा तो भन्न कुछ भी न था; विचार। कि "जाके कहीं से कुछ अन्नादि लाना चाहिये।” इस लिये चलीं। आपको देख एक विषयी बनिये ने सब सामग्री पूरा पूरा, यह वचन लेके, कुटी पर पहुँचवा दिया कि "रातको अवश्य आना।" जिस समय संत भगवत्प्रसाद पारहे थे, श्रीपीपाजी आ पहुँचे और देख के अति आनन्द को प्राप्त हुए। समय पाके पूछा और सुना कि यह ऋद्धी सिद्धी कहां से आई। सब मर्म जानकर, श्रीसहचरीजी पर अति प्रसन्न हो तन मन प्राण निछावर किया ॥ रातको जव श्रृंगार करके आप बनिये बापुरे के पास चली तो कुछ कुछ पानी बरसने लगा इसलिये श्रीपीपाजी ने आपको अपने कंधे पर बिठा लिया। (३६०) टीका । कवित्त । (४८३) "हाट पै उतारि दई द्वार आप बैठे रहे; चहे सूके पग, “माता! कैसे करि आई हो?" | "स्वामी जू लिवाय ल्याय;" "कहां हैं ?" "निहारौ जाय;" माय पांय परचो डस्यौ, राखौ सुखदाई हो ॥ "मानौ जिनि संक, काज कीजिये निसंक, धन दियौ बिन अंक, जाप लरै मरै भाई हौ" । मस्यौ लाज भार, चाहै धसौं भूमि फार, हग बहै नीर धार, देखि, दई दीक्षा पाई हो ॥ २६६ ॥ (३३०) MANENERARAN श्रीभक्तमाल सटीक। . चार्तिक तिलक। श्रीमहाराजजी आपको उस बापुरे की दुकान पर उतार के स्वयं वाहर ठहरे । ज्योंही आप उसकी दूकान में उतरी, उस बनिये के भाग खुले, पहले उसकी दृष्टि श्रीचरणों ही पर पड़ी, और उस प्र. भार से उसकी बुद्धि रामकृपा से निर्मल तथा पवित्र होगई चरण सूखे देखकर पूछा कि “माता ! आप कैसे आई हैं ?" उत्तर दिया कि "स्वामीजी अपने कांधे पर लाये हैं।" पुनि पूछा कि "महाराजजी कहां हैं?" वोली "जा देखो द्वार पर होंगे।" वनिया दौड़ा गया देख- कर चरणों पर गिरा । श्रीपीपाजी ने कहा कि "तुम जाव लज्जा और-भय मत करो, क्योंकि तुमने विना कागद लिखाये ही बहुतसा धन दिया है, कि जिसके लिये भाई भाई लड़ मरा करते हैं।" बनिया लाज से मरा जाता था कि धरती में धसमरूं और रोता था। आप दोनों मूर्ति को उस पर दया आई। श्रीपीपाजी ने उसको दीक्षा देकर, आवागमन के दुःख से छुड़ा दिया । ( ३६१) टीका | कवित्त । (४८२) चलत चलत बात नृपति श्रवन परी, भरी सभा विप्र कहें बड़ी विपरीति है । भूप मन आई यह निपट घटाई होत, भक्ति' सरसाई नहीं जाने घटी प्रीति ॥ चले पीपा वोध दैन, द्वार ही ते सुधि दई, लई सुनि कही आवो करौं सेवा रीति है । "बड़ी मूढ़ राजा मोजा गांठे बैट्या मोची पर,” सुनि दौरि आयो रहे ठाढ़े कौन नीति है ॥ ३००॥ (३२६) वार्तिक तिलक। यह बात चलते चलते, भरी सभा में, राजा के कानों तक पहुँच गई। ब्राह्मण चिल्लाने लगे कि "यह बड़ी बिपरीत बात है।" अभागे नृपति के मन में भी आई कि "यह बड़ी ही घटाई है ।" राजा भक्ति में सरस नहीं रहा, उसकी प्रीति श्रीपीपाजी के चरणारविन्द से हट घट गई। विनों के कहने से अभागे राजा ने ऐसे गुरु संबंध मानने में बड़ी लज्जा और अपना मान भंग जाना ॥ RecenterNAINAINIK مقعدوزخند , । भकिसुधास्वाद तिलक। ५१७ श्रीपीपाजी को राजा पर दया आई, उसको वोध देने के लिये चले. वाहरही से नौकरों के द्वारा सुधि जनाई, राजा ने नौकर को उत्तर दिया कि “जा के कह दो कि पूजा कर रहा हूँ।" पीपाजी ने कहला भेजाकि"राजा बड़ा मूढ़ है मोची के पास बैठा मोजा बनवा रहा है और पूजा का मिस ।” यह सुन भूपति के कान खड़े हुए, रोमांच हो पाये, डरा । यथार्थ को समझकर उसकी समझ ठिकाने आगई, क्योंकि उस क्षण उसका मन मोची जोड़ा के पासही था दौड़ता हुआ डरता, कांपता, हाथ जोड़े,आकर चरणों पर गिर पड़ा। श्रीपीपाजी महाराज ने पूछा कि "गुरु का अनादर और भगवत् पूजा के समय मन दूसरी जगह रखना, यह कौनसी नीति रीति है?" (३६२) टीका । कवित्त । (४८१) हुती घर मांझ, बाँझ रानी एक रूपवती, मांगी "वही ल्यावा बेगि;" चल्यौ, सोच भारी है । डगमग पांव धरै, पीपा सिंह रूप करे, ठाढ़ौ देखि डरें, इंत आवै आप ख्वोरी है ॥ जाय तो बिलाय गयो, तिया ढिग सुत नयो, नयो भूमि पर,"कला जानी न तिहारी है" प्रगट्यो सरूप निज, खीजि के प्रसंग कह्यौ "कहां वह रंग ? शिष्य भयो लाज टारी है" ॥ ३०१ ॥ (३२८) वार्तिक तिलक । टोड़े के राजा सूर्यसेनमल की एक रानी रूपवती और बांझ थी, श्रीपीपाजी ने आज्ञा की कि शीघ्र उसको मेरे पास लाओ।"इस अप्रिय आज्ञा को सुन, सोच संकोच से भरा, डगमग पांव रखता हुआ, राजा रनिवास की ओर चला । परन्तु आगे थोड़ी दूर पर एक सिंह बैठा देखा; डरके मारे न आगे जा सकता था, और न पीछे ही पांव रख सकता था। इतने ही में सिंहरूपी श्रीपीपाजी अंतरधान हो गये; राजा जो उस रानी के पास पहुँचा तो उसके निकट एक नवीन बालक देखा। यह अद्भुत लीलादेख, साष्टांग दंडवत्करसर्यसेनने प्रा- र्थना की कि "हेमहाराज!आपकी महिमा कलाजानी नहीं जाती है।" १ "मवारी "युराई ॥ AUCRORE RECHAKRACHECK SH * , आय *SHASTRATOR श्रीभक्रमाल सटीक। ज्ञानसूचक यह स्तुति सुनते ही चालकरूप दुरा के, श्रीपीपाजी ने निजरूप से राजा को दर्शन दे, डाट के कहा कि "तुझे वह दिन भूल गया कि जब शिष्य हुआ था, रानी राज इत्यादि की लाज छोड़के किस प्रेम रंग में पगा था सो रङ्ग तेरा कहां गया ?" (०६३ ) टीका | कवित्त । (४०) कियो उपदेश, नृप हृदै मैं प्रवेसकियो, लियो वही पन, आप आये निज धाम है । वोल्यो, एक नाम-साधु "एक निसि देहु तिया;" "लेहु कही भागौं;" संग भागी सीता बाम है ॥ प्रात भये चलें नाहि,"रैन ही की आज्ञा प्रभु;" चल्यो हारि, आगे घर घर देखो ग्राम है । आयौ वाही ठोर, "चलो माता ! पहुँचाय भावों," गहे पांव, भाव भयो, गयौ काम है ॥ ३०२ ॥ (३२७) वार्तिक तिलक। श्रीपीपाजी ने उपदेश दिया, और वह उपदेश राजा के हृदय में श्रीसीताराम कृपा से जा भी बैठा। सूर्यसेनमल ने पूर्ववत् वही अपना नियम भगवत्पूजा तथा साधुसेवा का धारण किया; और श्रीपीपाजी प्रसन्न हो के अपने स्थान में चले आये ॥ संत रूप बनाए एक नाम का साधु परंतु वास्तविक दुराचारी श्री. पीपाजी से बोला कि "सहचरी को एक राति के लिये मुझे दीजिये" आपने आज्ञा दी कि ले जाइए उसने कहा कि मेरे साथ दौड़ती चलो। आज्ञानुसार श्रीसहचरीजी उसके संग दौड़ी ( भागी) पर भोर होते ही आप यह कह ठहर गई कि "श्रीमहाराजजी ने मुझे केवल राति ही भर की आज्ञा दी थीं" हार के वह दुराचारी वहां से ले जाने के लिए पालकी लेने को चला गया। आगे के गांव में घर घर उसको श्रीसीता-सहचरी ही देख पड़ने लगीं। संत भगवंत की कृपा से उसकी मत सुधर गई कामवुद्धि जाती रही, भाव भक्ति उपजाई त्रसित और लज्जित हो वहीं पहुंचा जहां श्रीसहचरीजी रुकी बैठी थीं। आपके चरणों पर गिर के वह बोला कि "हे माता! आप मेरा अपराध क्षमा कीजिये, चलिये, आपको श्रीमहाराजजी के FOREGACHKKRECEICHEKASKAR । , -- NERA E भकिसुधास्वाद तिलक। ५१६ पास पहुँचाय भाऊं।" इनको श्रीपीपाजी के पास पहुँचाकर फिर निः- काम भक्त हुआ। (६४) टीका । कचित्त । (४७६ ) विपई कुटिल चारि, साधुभेप लियो धारि, कीनी मनोहारि कही "तिया निज दीजिये "। करिके सिंगार, सीता कोठे माँझ बैठी जाय, चाहे मग आतुर ढे, अजू ! जाहु लीजिये ॥ गये जब द्वार, उठी नाहरी सुफारिबेकौं, फारै नहीं, बानो जानि; पाय अति खी- जिये। अपनों विचारोहियो, कियो भोग भावना को, मानि सांच, भये शिष्य प्रभु, मति धीजिये ॥ ३०३ ॥ (३२६) वार्तिक तिलक। चार विषयी, अभागी, कुटिल, दुराचारियों ने सन्तों का भेष बना के श्रीपीपाजी महाराज से विनय किया कि "अपनी स्त्री हम को दीजिये। आज्ञानुसार श्रीसहचरीजी श्रृंगार कर ऊपर कोठे में जा बैठी और आपने इन सबोंको अत्यन्त आतुर उनकी बाट जोहते देख बतादिया कि "जाओ उस कोठे पर चले जाओ लेले ओ" जब ये चारों उस कोठे के द्वार पर गये, तो देखा कि एक बा- घिनि गुर्राती फुफकारती, इनको फाड़खाने के लिये चली आती है; परन्तु संतभेप देख के, इन विपयियों को फाड़ नहीं खाती है। ये सब डर के भागे और श्रीपीपाजी महाराज पर झुमलाने रिसियाने लगे कि "तुमने कपट करके, हम लोगों के प्राण लेने के लिये, कोठे पर बाघिनि रख छोड़ी है।" आपने उत्तर दिया कि "जैसा तुम लोगों का कुविचार था उसी भावना के अनुसारही तो भोगभी मिलाचाहै।" इतना श्रीमुख वचन सुन, उसमें प्रतीति कर श्रीसहचरीजी में माता का भाव ला, उसी कोठे पर ये चारों शीघ्रतापूर्वक पुनःगये, जाते ही माता सीतासहचरीजी ने निजरूप से इन लोगों को द- र्शन दे श्रीमहाराजजी के पास भेजा । आज्ञानुसार आके ये सब श्री- महाराजजी के चरणों पर पड़के शिष्य हो गये; और सन्त भगवन्त के रंग में इनकी मति परायण हो भीग गई। REACHECRECRECORGAAKRAckse 3A ५२० श्रीभक्रमाल सटीक। , , (३६५) टीका । कवित्त । (४७: ) गजरी को धन दियो; पियो दही सन्तनि नै (३) ब्राह्मन को भन कियो (४) देवी दी निकारि कै । (५) तेली कों जिवायो (६) भैसि चोरनि पे फेरि ल्यायो (७) गाड़ी भरि आयो (८) तन पाँच ठोर जारि के ।। () कागद ले कोरो कस्यौ (१०) वनियां को सोक हस्यो (११) भस्यो घरत्यागि (१२) डारी हत्याहूं उतारि के। (१३) राजा को औसेर भई (१४) सन्त को जु विभौ दई (१५) लई चीठी, मानि, गये श्रीरंग उदारिकै ॥३०४॥ (३२५) वार्तिक तिलक। १। २ एक दिन सन्तों ने श्रीपीपाजी से कहा कि श्रीराघवजी को दही पिलाइये । श्रीसीतारामकृपा से एक ग्वालिनि दही लिये हुए वहीं आ पहुँची ( यामैं लै दिखाई, यह बात सरसाई, 'आई जोई भक्न मन, सोई पूरी होत है सही।') ग्वालिनि ने दही दे के उसका दाम तीन रुपए बताया । आपने आज्ञा की कि "उधार ही छोड़ जा, आज जो पूजा आएगी, रामकृपा से तुही पाएगी।" ग्वालिाने यह कहके प्रसन्नतापूर्वक दधि पीने देग्वती धैठी रही कि "यदि अाज और कुछ पूजा नावै नो यही दही मुझ दासी की ओर से सन्तों को पूजा जानिये।" श्रीपीपाजी को श्रीसीताराम भरोसा तो था ही इसका कहना ही क्या है, ज्यों ही सन्त लोग दही प्रसाद पीपी उठा चाहते थे कि वहीं उसी समय श्रीपीपाजी का एक बड़- भागी शिप्य पहुँचा जिसने कुछ स्वर्ण-मुद्रा (अशरफ़ियां) और मोतियों की एक माला भेंट की; वह सबका सब श्रीमहाराजजी ने उस घड़भागिनी ग्वालिनि को दे डाला। दो० "तुलसी घिरवा वाग को, सींचत हूँ कुम्भिलाय । राम भरोसे जो रहे, पर्वत पै हरियाय ॥" • वह ग्वालिनि इतना धन लेते डरी, परन्तु श्रीस्वामीजी ने उसका भलीभांति परितोष कर दिया। वह गुजरी अपने घर आके केवल दो चार स्वर्णमुद्रा अपने प्रयोजन के लिये रख, शेष स्वर्णमुद्रा GoldenKIKHESABSECRECARENESCEIAH * Edit भक्तिसुधास्वाद तिलक। ५२१ और वह मोतीमाला पूजा चढ़ा श्रीमहाराजजी से शिष्य हो गई (३) एक दिन एक देवीउपासक ब्राह्मण ने श्रीपीपाजी का, और गांव भर का न्योता किया; पर भाप न गये; और विशेष प्रार्थना पर यह उत्तर दिया कि "जहां श्रीसीतारामसम्बन्ध नहीं वहां में नहीं जाता आता, परन्तु यदि ऐसा करो तो चलं कि देवी को भोग धरने के पूर्वही सब अमनियों में से श्रीसीतारामजी के पास पहुंचाओ।" इसीके अनुसार हुआ, और श्रीमहाराजजी ने सन्तों सहित भगवत् प्रसाद पाया। रात को देवी ने ब्राह्मण से कहा कि "मैं आज भूखी ही रही, भगवत् पार्षदों ने मुझे मन्दिर से बाहर निकाल दिया।" विष देवता की आंखें खुली, भोरही आ श्रीपीपाजी से शिष्य परिवार समेत हुए । (४) होते ही गांव भर देवी की पूजा छोड़ श्रीसीतारामभक्त हो गया । (५) एक दिन एक रूपवती तेलिनि "तेल लो ! तेल लो !!" पुकारती हुई आ निकली; आप बोल उठे कि "तुम सुन्दरी को "तेल तेल" नहीं भला लगता; तेरे मुंह से तो “सीताराम सीताराम" अनुरूप होता।" दो. "हे सुन्दरि ! तब चाहिये, शब्द रूप अनुकूल । तेल धार अवछिन्न रटु, सरस "राम" सुख मूल ॥" तेलिनि वोली "वह तो विधवा कहती हैं वा मुए पर कहा जाता है।" मापने कहा कि "भला, तू भी तभी कहना।" घर-आई कि उसका पति भीतर जाने लगा कि नासिका में चौ. खट लगी और गिरकर मर गया; तव उस तेली की देह लेकर सब चले और तेलिनि भी सत्य राम सत्य राम कहती सती होने चली श्रीपीपाजी ने आके कहा कि "अब तो राम राम कहती है ?" तव चरणों पर पड़ के कहने लगी "आपहीने मेरे पति को मार डाला है !" रोती पीटती हाय राम हाय राम चिल्लाती श्रीपीपाजी महाराज से. कह के सिर धुनने लगी। आपने आज्ञा की “यदि तेरा पति जी उठे तो तुम दोनों श्रीसीताराम श्रीसीताराम जपना, श्रीरामचरित सुना करना ।” उसने कहा “बहुत अच्छा।" तेलिनि ने घर पहुंच, REGALEKASCReckectokGAOORK Mos • श्रीभक्रमाल सटीक। ५२२ , पति को जीतापा,सब प्रसंग सुना, दोनों सीताराम सीताराम कहते आके चरणों पर गिरे और शिष्य हुए । दो० "सिला सुतिय भइ, गिरि तरे, मृतक जिये जग जान । राम अनुग्रह सगुन शुभ, सुलभ सकल कल्यान ॥" (६) एक राति चोर आकर भैंस को चुरा ले चले; श्रीपीपाजी भैंस के बच्चे को लिए हुए यह कहते साथ चले कि “पड़िया भी लेते जाइये, "मां ! मां !!" चिल्लाती है इसके विना भैस दूध क्यों कर देगी ?" वचन सुन चोर भैंस लिये लौटे भोर चरणों पर गिर के भैंसऔर पड़िया खूटों में बांध आपके शरणागत हो गये। (७) एक समय भीड़ भाड़ को त्याग, श्रीपीपाजीऔर श्रीसीता. सहचरीजी एक एकांत निर्जन ठांव में जा भजन करने लगे; उस ठौर भी एक भाग्यवान् महाजन जा पहुँचा और गाड़ी भर अन्न, घी, चीनी और द्रव्य आपके भेंट किये । उसी समय लुटेरे पहुंचे और उनको सहजही में श्रीपीपाजी ने गाड़ी सौंप दी । कई पल के अनंतर आपने लुटेरों से जाके यह कहा कि "मेरे पास इतने रुपये भी हैं, सो भी ले लो।" डाकुओं ने आपका नाम पूछा; पहि चाना; दंडवत् कर, रुपये फेर, गाड़ी भी उसी स्थान पर फिर पहुँचा दी और शिष्य होकर भवसागर पार हो गये। (८) एक वृत्तान्त सुनिये। किसी दिन एकही साथ,भापको पांच गांव से न्यौता आया; और इतने में कुछ संत लोग भी आ. गये; आप उनके सत्कार में तत्पर हो, पांचौ प्रेमियों का मन रखने के लिये, पांच शरीर धरि पांचौं ठौर जा, प्रत्येक के उत्सव समाज में विराजते रहे। उनमें से एक जगह पर प्रभात होते अपने शरीर को त्याग दिया; वहां पर आपकी शिष्या दो बाई भी उपस्थित थी, वे यह घटना अपने सामने देख, दुःखी हो, श्रीसीतासहचरीजी से निवे- दन करने को टोड़े नगर को चली। जब वे दूसरे ग्राम में आई, तो देखा कि वहां भी श्रीपीपाजी के मृतक शरीर को जला रहे हैं, तीसरे ग्राम में भी उन दोनों ने आप CCCHES N skia -- भकिसुधास्वाद तिलक । ५२३ के मृतक देह की जलती चिता देखी; इसी प्रकार पांचौ ग्राम में उन दोनों ने सुना कि रात उत्सव में श्रीपीपाजी विराजते थे भोर को तन त्याग किया और आज उनके शव की चिता जल रही है। यह आश्चर्य देख सुन ज्योंही वे दोनों बाइयां टोड़े नगर में पहुंचीं, तो देखा कि संतसमाज में श्रीसीतासहचरीजी समेत श्रीपीपाजी महाराज आनन्दयुत सीताराम जपते झूमते विराजमान हैं। तब दोनों आपके चरणों पर गिरी और समाज में सब वार्ता कही बहुतों ने सुन के आश्चर्य माना। उन दोनों ने श्रीगुरु में मनुष्यवुद्धि उठाली और गुरुप्रभावबिचारि अकथनीय आनन्द पाया। चौपाई। "यह न कछुक गुरु की प्रभुताई । विश्व रूप व्यापक सुखदाई ॥" दोनों ने अपने तई बड़ी भाग्यवती जाना । (६) श्रीपीपाजी के यहां साधुसेवा उठान के बहुन मे रुपये एक वनिये के होगये, उसने वारंवार मांगा पर आपके यहां उन दिनों कौड़ी न थी; बनिये ने पंचायत में वही रख के कहाकि महाराजजी के यहां बहुत रुपये हो गये हैं देते नहीं हैं। पंचों ने जो वही देखी तो धकुलापङ्ख कोरा कागद पाया, महाराजजी के नाम कुछ लिखा न था। पंचों ने बहुन झंझला के बनिये को दंड देना चाहा ॥ (१०) यह समाचार श्रीस्वामीजी ने जानकर कहला भेजा कि "वनिये के रुपये हैं ठीक सही, परंतु वह बहुत शीघही रुपया मांगता कड़ाई करताथा, उसी कट के कारण भगवत् इच्छा से उसकी वही कोरी हो गई।" बनियां चरण पर गिर के गिडगिड़ाने लगा। एक महाजन आ पहुँचा और श्रीसीतारामकृपा से बनिये के सब रुपये चुकाकर उस बापुर को शोकरहित कर दिया। (११) टोड़े नगर में जो श्रीमहाराजजी की कुटी थी, वह ऋद्धि सिद्धि से भरी थी; परंतु एक दिन श्रीपीपाजी और श्रीसीता- सहवरीजी सम्मत करके, मंझट समझ के, उस भरे घर को त्याग कर, किसी ओर चल दिये । Beect-eckeractactuRECRUARRACTRESCA । ५२४ WERXXXKANNARASWATIKA श्रीभकमाल सटीक। (१२) एक ब्राह्मण जिसको गोहत्या लगी थी और पंचों ने उसे जाति से निकाल दिया था श्रीपीपाजी का नाम सुन, आपके शरण में भा, सब वार्ता सुना रोने लगा ॥ चौपाई। "पीपा को जपो हरि नामा । मिटै ब्रह्महत्या दुखधामा । जपनसो राम नाम द्विज लाग्यो । तन ते तुरत पाप सब भाग्यो।" स्वामीजी ने श्रीभगवत् चरणामृत और प्रसाद पवाकर उसको विदा कर दिया; पर कट्टर ब्राह्मणों ने जाति में नहीं लिया। तब श्रीपीपाजी ने उसी ब्राह्मण के हाथों से नैवेद्य श्रीहनुमानजी के मंदिर में रखवाया जब थार उतारा गया, भोग लगने के चिह्न पाए गए। यह आश्चर्य देख सब ब्राह्मणों ने उसको अब हत्या रहित जान जाति में लेलिया ॥ (१३) बहुत काल वीतने से टोड़े के राजा सूर्यसेनमल को श्रीगुरुचरणारविन्द के दर्शन की बड़ी ही उत्कण्ठा उपजी। राजा ने घुड़चढ़ों को जिधर तिधर भेजा कि आपको ढूंढ लावै । उनमें से एक ने वीस दिन के रास्ते पर आपके दर्शन पाये । राजा की लालसा प्रार्थना सुनाई। आपने उत्तर दिया "हमें उनकी कामना की सुधि हो चुकी है; अभी अभी उसको दर्शन देने के लिये उपस्थित थे ही।" उस घुड़चढ़े को एक पत्र दे, विदा किया। आप और श्रीसीतासहचरीजी ने उसी क्षण राजा के पास टोड़े न: गर पहुँच कर उसको अपने दर्शनों से कृतार्थ किया। बहुत दिन पीछे वह घुड़चढ़ा भी आ पहुँचा और सब वार्ता कही । (१४) एक संत ने कुछ कारज के लिये श्रीपीपाजी से धन मांगा आपने राजा सूर्यसेन व दूसरे राजा से दिलवा दिया । (१५) श्रीरंगदास नाम एक भगवद्भक ने, जो श्री ६ अनं- तानन्द स्वामी के शिष्य, आपके भतीजे चेला लगते थे, विनयपत्र भेज श्रीपीपाजी को बुलाया आप और श्रीसीतासहचरीजी दोनों गए । अगुआनी और अति आदर किया । KAKAR ॐॐ भकिसुधास्वाद तिलक। ५२५ (६६६) टीका | कवित्त । (४७७) (१) श्रीरंग के चेत धस्यौ, (२)तिय हिय भाव भस्यो, (३) ब्राह्मण को शोक हस्यो, राजा पै पुजाय कै । (४) चंदवा बुझाय लियौ, (५) तेली को लै बैल दियौ, (६) दियो पुनि घर मांझ भयो सुख आयकै ॥ (७) बड़ोई अकाल परयो, जीव दुख दूरि करयो, परयो भूमि गर्भधन पायो दै लुटाय कै। (८)अति विसतार लियौ, कियो है बिचार; (६) यह सुनै एक वार फेरि भूले नहीं गाय कै॥ ३०५ ॥ (३२४) वार्तिक निलक। (१) एक समय श्रीरंगदासजी मानसी पूजा कर रहे थे और उनसे फूलों की माला का पहनाना सहज में नहीं बनता था। श्री- पीपाजीने वता दिया कि "मुकुट उतार के यो पहिनाय दीजिये।" श्रीरंगदासजी ने वैसा ही कर, श्रीजानकीनाथ को माला पहिनाय, सुख पा, वह ध्यान बिसर्जनकर, श्रीपीपाजी को दंडवत् किया। सुख पूर्वक आप दोनों श्रीरंगदासजी के स्थान में रहने लगे। (२)एक दिन दो सुन्दरी अति नीच जाति की युवतियां उस जगह के समीप गोबर चुन रही थीं कि जहां श्रीपीपाजी और श्री- रंगजी विराज रहे थे। चौपाई। "श्रीपीपा बोल्यो मुसकाई । राम भिन्न मोहिं कोउ न दिखाई ॥" ऐसा सुन्दर मनोहर तनु पाके ये गोवर चुनें, बड़ी दया की बात है; देखो इन दोनों को उपदेश देकर राम कृपा से कल्याण को पहुँचा दूंगा।" इतना कह उन दोनों को अपने पास बुला लिया।वे अति नम्र और सरल हाथ जोड़े सन्मुख आ खड़ी हुई । श्रीपीपाजी ने उनसे कहा कि "ऐसा सुन्दर तन पाने का लाभ यह है कि श्रीजानकीजीवन शोभाधाम अखंडैकनित्य किशोर का भजन करो।" यह उपदेश उन दोनों युवतियों के हृदय में ऐसा लगा कि उसी क्षण ऊर्द्धपुण्डू लगा कंठी पहन, श्रीसीताराम सीताराम मनो- SHOCKR *** ५२६ श्रीभक्तमाल सटीक। हर स्वर से गाती हुई, घर को गई और श्रीभगवद्भक्ति उनको भत्यंत प्रिय लगने लगी। दो. "देह गेह की सुधि नहीं, टूट गई जग प्रीति । नारायण गावत फिरें, प्रेम भरे हरि गीत ॥" घरवालों को महाविमुख पा, परित्याग कर, वे दोनों उलटे पांवों फिरी और श्रीपीपाजी के पास पहुंचीं ॥ दो० "जरौ सुसंपति सदन सुख, सुहृद मातु पितु भाइ । सन्मुख होत जो रामपद, करै न सहज सहाइ ॥" निदान वे दोनों आप ही के शरण में रहने लगी और श्रीभगवत् यश गाया करती थीं। (३) एक ब्राह्मण ने अपनी कन्या दान में सहायता के लिये श्रीपीपाजी से विनय किया। श्रीपीपाजी ने (ब्राह्मण को जगद्गुरु जान ) उस व्यक्रि को वहां के राजा के पास भेजा कि "ये मेरे गुरु हैं यदि आपकी श्रद्धा हो तो कन्यादान में इनकी सहायता की- जिये।" राजा ने उस ब्राह्मण को बहुत रुपये दिये। (४) कुछ दिन सत्संग का सुख दे; श्रीरंगदासजी से विदा हो, टोड़े नगर में अपने स्थान पर फिर आये । एक एकादशी की राति को राजा सूर्यसन के सामने जागरण कीर्तन हो रहा था, अकस्मात् उसी समाज के मध्य श्रीपीपाजी उठके हाथ मलने लगे। सव ने देखा कि हाथ में कारिख लग गयी। राजा ने इस आश्चर्य का हेतु पूछा; आपने उत्तर दिया कि श्रीद्वारकाजी में भगवत् के बँदोवा में आग लग गई थी उसको वुझा दिया है। राजा ने “सांडि नीसवार" भेज के पुलवाया तो यथार्थ जाना गया कि उस एका. दशी की गति को भगवत् चदोवा में आग लग गई थी सो श्रीपीपा जी ने वुझाई थी जो यहां उस राति को उपस्थित थे। (५) किसी दिन आप स्नान को गये थे, वहां एक तेली का लड़का पानी पिलाने के लिये बैल लाया, उसी समय एक ब्राह्मणने श्रीपीपाजीसे रो रो के कहाकि "एक बैल के विना मेरी खेती गृहस्थी BECRETA.kGESCORACK ५२७ NRNA भनिसुधास्वाद तिलक। डूबी जाती है;" श्रीपीपाजी ने उसी बैल की नाथ उस ब्रह्मण के हाथ में पकड़ा दी; ब्राह्मण देवता बैल ले के लम्बे हुए। उधर बह तेली का लड़का रोने चिल्लाने लगा; आपने उसको चुप कराके प्रतीति करायी कि तेरा बैल तेरे घर बँधा है । लड़के ने घर आके देखा तो वस्तुतः एक वैल खूटे पर बँधा है । लड़का बड़ा प्रसन्न हुआ और श्रीस्वामीमहाराजजी का शिष्य हो गया ॥ (६) आप भी बड़े प्रसन्न हुए और श्रीयुगलसर्कार की कृपा के धन्यवाद में बहुत अन्न धन निछावर किया । (७) एक साल उस प्रदेश में भारी अकाल पड़ा; राजा सूर्य- सेनमल के सँभाले न सँभला । प्रजा बहुत दुःख पाने लगी । राजा ने श्रीपीपाजी से प्रार्थना की; श्रीपीपाजी अपनी कुटी में से सबको अन्न जल कपड़े इत्यादि बांटने लगे और धरती में गड़ा धन उखाड़ उखाड़ अकालपर्यन्त बांटते रहे, कि टोंडा नगर, वरन सूर्यसेन- मल के राज्य भर के लोग, उस कराल काल में अति ही सुखी रहे ॥ (८) श्रीपीपाजी के चरित अनेक बड़े और विस्तृत हैं; जो कुछ संक्षेप से कहे गये उसीसे साधु और भक्त जन विचार लेंगे। (६)जो एक वेर श्रीपीपाजी के सुयश सुनता गाता है, उस को फिर कभी भूलता नहीं, उसका जी चाहता है कि "सदा आप के यश गाया ही करूं।" (३६७) छप्पय । (४७६) धन्य धना के भजन को, बिनहिं वीज अंकुर भयौ। घर आये हरिदास तिनहिं गोधूम खवाये । तात मात डर खेत थोथ लांगूल चलाये॥ आस पास कृषिकार खेत की करत बड़ाई। भक्त भजे की रीति प्रगट पर- तीति जु पाई॥अचरजमानत जगत में कहुँ निपुज्यौ, कहुँवै बयौ। धन्य धना के भजन को, विनहिं बीज अंकुर भयौ॥६२॥ (१५२) CSCRects . - . KEECHECCASINESS SHRESTISANDHARIES ५२८ श्रीभक्रमाल सटीको (७६.).श्री ६ धनाजी (और एक विप्र)। वार्तिक तिलक । श्री १०८ धनाजी महाराज के भजन को धन्य है, कि बीज बोए विना ही उनका खेत उगा (जमा) आपके घर सन्त लोग आये; उनको जो,गेहूं विया के लिये रक्खा था सो पवादिया। माता पिता के डर से छूछे ही खेत में लांगूल (हल.) चलवा दिया, जिस से जान पड़े कि इसमें भी बीज बोए हुए हैं। आस पास के गृहस्थ आपके खेत के (ठट्टा से) वड़ाई किया करते थे । साधुसेवा की रीति तथा परतीति प्रत्यक्ष देखी । जग में इस बात के सुननेवाले आश्चर्य मानते हैं कि बोया गया किसी और खत में और उपजा किसी औरही खेत में । विना वीज बोए ही जिनका खेत उपजा, ऐसे श्री १०८ धनाजी का भजन धन्य धन्य है। (३६८) टीका | कवित्त । (४७५) खेत की तो बात कही प्रगट कवित्त मांझ, और एक सुनो, भई प्रथम जु रीति है। आयौ साधु विप्रधाम,सेवा अभिराम करे, ढस्यौ ढिग आय, कही "मोहूँ दीजै प्रीति है" ॥ पाथर ले दियो, “मति सावधान कियो"छाती मह लाय जियो, सेवै जैसी नेहनीति है। रोटी धर आगे, आंखि मंदि लियौ, परदा कै; छियौ नहीं टूक, देखि भई बड़ी भीति है ॥ ३०६॥ (३२३) वार्तिक तिलक । श्रीधना भक्तजी के विना बीज ही खेत उपजने की बात तो श्री- नाभा स्वामीजी ही ने अपने कवित्त (छप्पय) में कह दिया, अब और एक बात सुनिये, कि जिस रीति से श्रीधना भवजी को प्रथम भक्ति उत्पन्न हुई । एक समय आपके गृह में एक श्रीभगवद्भक ब्राह्मण आये सो श्रीशालग्रामजी की भली प्रकार पूजा करने लगे; देख के धना भक्तजी समीप में जाके कहने लगे कि "स्वामीजी! मुझे भी ठाकुरजी दीजिये, मुझे बड़ी प्रीति है पूजा करूँगा।" सुन, के भक्त द्विजवर ने एक गोल मोल पत्थर देकर कहा कि ठाकुरजी + . .

* FAR भकिसुधास्वाद तिलक। ५.२६ लो, सावधान हो प्रेम से पूजा करना।" धना भक्तजी ने ठाकुर ले कर हृदय में लगा के मानों प्राण पाया, और जैसी प्रेम की रीति नौति है वैसी सेवा पूजा आप करने लगे। जैसे ब्राह्मणजी को भोग लगाते देखा था वैसे ही आगे रोटी धर ओट ( आड़ ) कर, आंखें मूंद के भोग लगाया फिर देखें तो एक ट्रक भी रोटी प्रभु ने नहीं खाई तब आपको बड़ा भय हुआ। (३६६ ) टीका । कविन । ( ४७४) चार बार पांव परै, अरै, भूख प्यास तजी, धेरै हिये सांचौ भाव पाई प्रभु प्यारिये। छाक नित आवे नी, भोग कौं लगावे, जोई छोड़े सोई पावै, प्रीति रीति कछु न्यारियै ॥ जाको कोऊ खाय ताकी टहल बनाय करै ल्याक्त चराय गाय हरि उर धारियै। आयौ फिरि विप्र नेह खोज हूँ न पायो कहूँ सरसायो वातै लै दिखायो स्याम ज्यारियै ॥ ३०७॥ (३२२) वातिक निलक। श्रीठाकुरजी को वारंवार प्रणाम करने लगे, हठपूर्वक अन्न जल छोड़ कर प्रार्थना की। हृदय में सच्चा भाव देख अति प्रियमान प्रभु ने रोटी खाई। अब तो जो खाने को छाक (कलेऊ) को रोटी आती थी सो नित्य ही प्रभु को भोग लगाने लगे। जो प्रभु छोड़ देतेथे, उतनाही प्रसाद आप पाते थे, क्योंकि प्रीति की गति तो जगत् से न्यारीही है। एक दिन ठाकुरजी आपसे कहने लगे कि "जिसका कोई खाता है उस की टहल भली प्रकार से करता है इससे हम तुम्हारी गऊ चराय लाया करेंगे ऐसा कहकर उसी दिन से श्रीहरि नित्य ही गऊ चराय लाया करते थे। कुछ काल बीते उन भन ब्राह्मण ने फिर श्रीधना- जी के घर में आके देखा तो पापाण पूजा के स्नेह का खोज भी नहीं पाया। तब धनाजी से पूछा कि "पूजा करते हो कि नहीं?" तव श्रीधनाजी सव वृतांत कह गये कि "स्वामीजी ! कई दिन तो प्रभु ने कुछ नहीं पाया इससे मैं ने भी नहीं खाया । अब तो आप RECT SCREGACCRICKETERMere , ॐॐॐॐ ५३० श्रीभक्तमाल सटीक । की मर्तिही में से प्रगट होकर रोटी भी खाते हैं और गैया भी चरा लाते हैं।" यह सुन ब्राह्मणजी अति चकित हुए और सप्रेम हृदय से कहने लगे कि "धना ! हम को भी तो दिखादे" धनाजी वहां ले गये जहां आप गऊ चराते थे, परन्तु ब्राह्मण को न दीख पड़े। निदान, धनाजी की प्रार्थना से श्यामसुन्दरजी ने दर्शन दे मानों ब्राह्मण को मरे से फिर जिया लिया। (३७०) टीका । कवित्त । (४७) द्विज लखि गायनि में, चायनि समात नाहि, भायनि की चोट हग लागी नीर भरी है । जाय के भवन, सीता-रवन प्रसन्न करें, बड़े भाग मानि प्रीति देखी जैसी करी है ॥ धनाको,दयाल है के, आज्ञा प्रभु दई “ढरौ, करौ गुरु रामानंद, भकि मति हरी है" । भएशिप्य जाय, आप छाती सों लगाय लिये, किये गृहकाम सबै; सुनि जैसी, धरी है ॥३०८ ॥ (३२१) वार्तिक तिलक। ब्राह्मणजी के हृदय में, गायों के बीच में श्रीप्रभु की छवि माधु- री देख के, आनन्द का उत्साह नहीं समाता; प्रेमभाव की चोट चित्त में लग गई, इससे आनन्दमय आँसुओं की झरी भी नेत्रों से लग गई । और यह निश्चय किया कि "अब गृह में जाके मैं भी सप्रेम भजन कर श्रीसीतारामजी को प्रसन्न करूं।"मेरा कोई बड़ा भाग्य था कि इस बड़भागी धना के संग से मुझे श्री- रामजी का दर्शन हुआ । श्रीद्विजभक्तजी ने जैसी धनाजी की प्रीति और उस प्रीति का प्रभाव देखा वैसा ही इन्हों ने आप भी किया । ब्राह्मणजी के चले जाने पर, गुरु शिष्य संप्रदाय के परिपालक प्रभु ने परम दयाकर धनाजी को आज्ञा दी कि "अब तुम श्रीकाशी जी में जाके श्रीरामानन्दजी को गुरु करके श्रीरामतारकमंत्र ग्रहण करो; तुह्मारी प्रीति भनिने हमारा मन हरलिया।" आज्ञा पा, श्री- रामानंदजी के शिष्य हो, फिर घर में प्राके प्रभु को प्रगट पा, चरणों ५३१ ARRIORRER ***** भक्निसुधास्वाद तिलक। में पड़े । प्रभु ने हृदय में लगा लिया इस प्रकार धनाजी गृह में रह के गृह के कारज भी किया करते और भगवद्भजन भी । हमने जैसी संतों से सुनी थी वैसी इनकी कथा लिखके रखदी है ।। (३७१ ) छप्पय । ( ४७०) विदित बात जगजानिय, हरि भये सहायक सेन" के॥ प्रभुदास के काज रूप नापित को कीनौ। छिप छुड़हरी गही पानि दर्पन तहँ लीनौ॥ ताहस कै तिहिं काल भूप के तेल लगायौ। उलटि राव भयौ शिष्य प्रगट परचौ जब पायौ॥ स्याम रहत सनमुख सदा, ज्यों वच्छा हित धेन के। विदित बात जग जानिय, हरि भये सहायक सेन" ॥६३ ॥ (१५१) (७७) श्री ६ सेनजी*। वार्तिक तिलक। यह वार्ता विदित है, सम्पूर्ण जगत् जानता है, कि श्रीहरि श्री- "सेन" भनजीके सहायक हुए; किस प्रकार हुए सो सुनिये, अपने सच्चे दास का कारज करने के लिये प्रभु ने नापित (नाऊ) का रूप धारण किया और बहुत शीघ्रही छुरारखनेवाली पेटी कंधे में टांग, हाथ में दर्पण लेकर, सेनभकका रूप धर, वॉधौगढ़ बघेला के राजा वीरसिंह के पास तेल लगाने के समय जाके तेल लगाया, तथा दर्पणादिक दिखाके सव सेवाकी । राजा ने जब यह प्रभुकृत परची प्रगट जाना तब फिर वह श्रीसेन भनजी का शिष्य हो गया। देखिये जैसे गऊ अपने बछड़े की प्रीति हितकार में सन्मुख तत्पर रहती है वैसा ही भक्त वत्सल श्यामसुन्दर श्रीरामजी अपने भक्तों के हितकार में सन्मुख तत्पर रहते है। प्रभु ने इस प्रकार श्रीसेनभक्त की सहायता की । * विक्रमी पन्द्रहवीं शता-दी में श्राप विराजमान थे। REGACASS K ***************RISHNAKHAPATRE ५३२ श्रीभक्तमाल सटीका (३७२) टीका | कवित्त । (४७१) - "बांधौगढ़" वास, हरि साधु सेवा आस लागी, पगी मति अति, प्रभु परचौ दिखायौहे । करि नित्त नेम, चल्योभूप कौं लगाऊँ तेल, भयौ मगमेल संत, फिरि घर पायौ है । टहल वनाय करी, नृप की न संकधरी, धरि उर श्याम, जाय भूपति रिझायौ है । पाछे सेन गयो, पंथ पूँछ,हिये रंग छायो, भयौ अचरज राजा वचन सुना यो है ॥ ३०६ ॥ (३२०) वार्तिक तिलक । 'श्रीसेन भनजी" का निवास “वघेलखण्ड वांधवगढ़" में था। आपकी आशा श्रीसीतारामजी तथा संतों की सेवा पूजा में लगी रहती थी, और उसी में अतिशय प्रीति रीति से मति पग गई थी॥ तब श्रीप्रभु ने परचौ दिखाया कि एक दिन श्रीसेन भक्तजी श्री- राम पूजा मंत्र जप आदिक नित्य नेम कर गृह से राजा वीरसिंह के तेल लगाने के लिये चले; मार्ग में बहुत से संत मिल गये, आप सवको दंडवत् प्रणाम कर प्रार्थनापूर्वक लौट के अपने घर में लि- वाय लाये । राजा की भय शंका छोड़, सन्तों की भले प्रकार सेवा पूजा कर रसोई बनवा के सन्तों को प्रसाद पवाने लगे । सेन भक्त की प्रीति देख प्रभु श्यामसुन्दर ने, जैसा छप्पय में कहि आये वैसा ही जाके, राजा की सेवा कर प्रसन्न किया । सन्तों की सेवा करने के पीछे सेन भक्त राजा के समीप चले, मार्ग में राजा के समीप से आनेवाले लोगों से आपने पूछा कि "राजा महाराज स्नान करचुके, तो तेल किसने लगाया था ?” लोगों ने कहा "आपही ने तो ल- गाया है।" सुन के भनजी के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ और जाना कि यह कुछ प्रभु की कृपा कौतुक है, इससे आपके हृदय में अति- शय प्रेम रँग का उमंग छा गया। जब सेन भक्क राजा के पास गये तब राजा पूछने लगा। Rececre SALEGALSCALARACTER , , r . भक्तिसुधास्वाद तिलक। ५३३ (७२) टीका । कवित्त । (४७०) "फेरि कैसे आये ?" सुनि अति ही लजाये; कही "सदन प. धारे सन्त, भई यो अवार है । श्रावन न पायौं वाही सेवा अरु- झायौं," राजा दौरि सिर नायौ, देखी महिमा अपार हे ॥ भीजि गयो हियो, दासभाव दृढ़ लियौ, पियौ भक्तिरस, शिष्य है के जान्यौ सोई सार है । अवलो हूं प्रीति, सुत नाती वही रीति चलें, हीय जौ प्रतीति प्रभु पावै निरधार है ॥ ३१०॥ (३१६) यार्तिक तिलक । राजा वोला कि "सेन ! तुम अब फिर किस लिये आये?" आप अति लजित हो हाथ जोड़ प्रार्थना करने लगे कि "हे महा- राज ! मेरे गृह में सन्त लोग कृपा कर आगये, सो उनकी सेवा सत्कार करने लगा आने न पाया, इससे विलम्ब हो गया " ऐसा सुन राजा को प्रभु के कर कमल स्पर्श का अलौकिक सुख तो हुआ ही था, इससे जान गया कि “सेन" का रूप धारण कर, भगवान् ही आये थे। राजा वीरसिंह दौड़ कर श्रीसेन भकजी के चरणों पर गिर पड़ा, यह विचार करने लगा कि 'ओह ! इन भक्तजी की अपार महिमा है; निदान राना का हृदय श्रीराम प्रेमरस में डूब गया और श्रीसीतारामजी का तथा श्रीसेन भनजी का दास्यभाव मनः में दृढ़ धारण कर, आपका शिष्य होकर श्रीभक्तिरस को पान कर उसी को सारांश जान, जगत् को असार माना । टीकाकार कहते हैं कि "अब तक भी सेन भक्तजी के पौत्रा- दिक उसी सन्त भगवन्त की सेवा भक्ति रीति में चलते हैं। यह बात निश्चय है कि जो हृदय में सच्ची प्रीति प्रतीति हो तो प्रभु अवश्य मिलते हैं। (३७४) छप्पय । (४०६) भक्तिदान, भै हरन भुज, “सुखानंद पारस परस॥ "सुख सागर" की छाप राग गौरी रुचि न्यारी । पद- Saleected COICE Reacher - ५३४ श्रीभक्तमाल सटीक। रचना गुरु मंत्र मनों आगम अनुहारी॥निसिदिन प्रेम प्रवाह, द्रवत भूधर ज्यौं निर्भर । हरिगुन कथा अगाध भाल राजत लीलामर ॥ संत कंज पोषन वि- मल, अति पियूष सरसी सरस । भक्तिदान भै हरन भुज "सुखानंद" पारस परस ॥६४॥ (१५०) (७८) श्री ६ सुखानन्दजी । याचिक तिलक । जनों को भनिदान देने में तथा संसार के भय हरने में श्री- सुखानन्दजी श्रीरामरघुवीरजी के भुजा के सरीखे रहे; और लोहा सरीखे खोटे जीवों को अपने संगरूपी स्पर्श से सुवर्ण सरीखा उत्तम संत कर देने के लिये मानों पारस मणि ही थे । चौपाई। 'सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परसि कुधातु सुहाई ॥" दो. “पारस में अरु संत में, बड़ी अंतरी जान । वह लोहा सोना करै, ये करें आपु समान ॥" आप अपने पदों की पूर्ति में "सुख सागर" की छाप दिया करते थे; जैसे; श्रीमीराबाई “गिरिधर नागर" की, और आपने गोरी राग में बहुत से पद बनाये हैं। उनमें लोक से न्यारी ही प्रियतारुचि प्राप्त होती है। ओर आपने ऐसे प्रभाव युक्त नियमानुकूल पदों की रचना की है कि मानों गुरुमंत्र ही है अथवा दिव्य संहितातंत्र है। दिन रात्रि श्रीरामप्रेमाश्रु का प्रवाह नेत्रों से पेसा चलता था कि जैसे श्रीचित्र- कूट पर्वत के झरना भरते हैं; श्रीसीताराम गुण गण बहुत गाया करते थे। कथा लीलारूपी विमल अमृत से अतिशय भरे हुए, जन कमलों के पोषक विकासक, मानों अति सरस तड़ाग (तालाब) ही थे । और जब भगवत् कथा कहने लगते थे तब श्रीसुखानन्दजी का ललाट ( लिलार) अति प्रकाशमान राजता था । SSESSAGE SAMACHAR संत

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भकिसुधास्वाद तिलक।
५३५
(३७५) छप्पय । (४६८),
महिमा महा प्रसाद की "सुरसुरानन्द" सांची
करी ॥ एक समै अध्वा चलत वरा बाक छल पाये।
देखा देखी शिष्य तिनहुँ पाछे ते खाये॥ तिन पर
स्वामी खिजे वमन करि विन विस्वासी।तिन तैसे
परतच्छ भूमि पर कीनी रासी ॥ “सुरसुरी-सुवर" पुनि
उदगले, पुहुप रेनु, तुलसी हरी। महिमा महाप्रसाद
की "सुरसुरानन्द” सांची करी॥६५॥ (१४६)
(७६) श्री ६ सुरसुरानन्दजी।
वार्तिक तिलक।
श्री १०८ सुरसुरानदजी ने भगक्त् मुकावेष में महा प्रसाद की
महिमा जैसीभनिग्रंथों में लिखी है वैसी सत्यकरके प्रत्यक्षदिखादिया।
एक समय शिष्यों को साथ लिये मार्ग में चले जाते थे, वहां
किसी वैष्णवद्रोही नीच ने उरदका बरा बहुतसा बनाया और उस
में मांस भी मिला दिया था फिर उसने तुलसी छोड़ वाक्यछल कर
आपले कहा कि यह भगवत् प्रसाद है *लीजिये, पाइये ।" आप
थोड़ा सा हस्त में ले प्रसाद ध्यान भाव पूर्वक पाकर आगे चल दिये
किंचित् ही अंतर में शिप्य लोग थे, उन्होंने देखा कि स्वामी-
जी ने यह प्रसाद पाया है। फिर उस दुष्ट ने उन लोगों को भी
"प्रसाद" कह वही बरा दिया सो सब के सब स्वाद बुद्धि से बहुत
बहुत खाकर स्वामीजी के समीप आये; तब आपने क्रोध करके
कहा कि "क्योरे मुखौं ! तुम लोगों ने भाव विस्वास विना ही वरा
क्यों खा लिया ? वमन करौं" उन्होंने जो वमन किया तो वैसेही
वरा भूमि में राशि लग गया; सब के सब ने जल लेकर कुल्लियां की;
१ "वैष्णवे भगवगतो प्रसाद हरिनानि च । अलापुगयवतां राजन विश्वासी नेव
जायते "
+LOG

A *** ५३६ श्रीभक्तमाल सटीका तदनंतर श्रीसुरसुरीजी के पति श्रीसुरसुरानन्दजी अपने मुँह में उँग- लियां दे वमन कर उस प्रसाद को देखें तो वह वरा साक्षात् हरित तुलसीदल, पुष्प तथा रेणु हो गया कि जिसकी सुगंधि चारों दिशिमें छा गई । इस प्रकार से आपने महाप्रसाद की महिमा दिखाई। श्रीमहाप्रसाद की जय ॥ श्रीसुरसुरानन्दजी ही के द्वारा के श्रीधरनीदासजी.थे श्रीसरयू- सट (मांझी सारन) श्रीप्रसादीदासजी (एकमास्टेसन परसासारन॥) (३७३) छप्पर । (४६७) महासती सतऊपमा, त्यों सत्त“सुरसुरी”को रह्यो। अति उदारदंपती त्यागि गृह,बनको गवने ॥ अचरज भयो तहं एक, संत सुन जिन हो विमने। बैठे हुतें एकांत आय असुरनि दुख दीयौ। सुमिरे सारंगपानि रूप नरहरि कौ कीयौ ॥ सुरसुरानन्द की घरनि को, सत राख्यौ नरसिंह जह्यो । महासती सत ऊपमा, त्यों सत्त “सुरसुरी” रह्यो ॥६६॥ (१४८) (८०) श्री ६ सुरसुरीजी देवी। वार्तिक तिलक। श्रीअरुन्धती, अनुसूया, लोपामुद्रा, सावित्री, आदिक जो महा- सती हैं,तिनके सत्त के समान श्रीराम कृपासे "श्रीसुरसुरीजी" का सत्य पातित्रत अखएड रह गया। एक समय अति उदार दम्पति श्री- "सुरसुरानन्द” जी और श्री “सुरसुरी" जी अपने गृह की सब सं. पत्ति दान कर, श्रीसीतारामजी के भजन करने के लिये, गृह त्याग, उत्तम वन में पाए । हे सन्तो ! वहां एक आश्चर्य हुआ सो सुन, प्रभु का विश्वास मान आप आनन्दित होवें। विमन मत हो । . २ "जयो"प्राणत्याग कगया। पाटातर 'जया" =जान लिया। Reckerosecsi भक्तिसुधास्वाद तिलक। ५३७ एक समय दोनों मूर्ति एकांत में बैठे थे; वहां बहुत से असुर (मुसल्मान ) आकर, श्रीसुरसुरीजी का अति सुन्दर रूप देख, इन को लेने को दौड़े। दम्पति ने श्रीसाईपाणि रघुवीरजी का स्मरण किया; प्रभु ने उसी क्षण नृसिंह रूप धारण कर, सब दुष्टों के प्राण लेके, श्रीसुरसुरानन्दजी की पत्नी का पातिव्रत रख लिया । तदन- न्तर श्रीराजमाधुरीरूप के दर्शन से भक्त दम्पति को कृतार्थ कर अन्तर्धान हुए। , (३७७) छप्पय | (४६६) निपट "नरहरियानन्द" कौ, करदाता दुर्गा भई ॥ घर भर लकरी नाहिं शक्ति को सदन उदार । शक्ति भक्त सों वोलि दिनहिं प्रति बरही डारें ॥ लगी परौसी हौंस भवानी बैंसो मारै । बदले की बेगारि मूंड वाके सिर डारै॥ "भरत” प्रसंग ज्यों कालिका, “लई" देखि तन मैं तई। निपट "नरहरियानन्द" कौ, कर- दाता दुर्गा भई ॥६७॥ (१४७) (८१) श्री ६ नरहरियानन्दजी। वार्तिक तिलक । जैसे राजा को प्रजा कर देते हैं, ऐसे ही श्रीनरहरियानन्दजी को कर भेली प्रकार देनेवाली श्रीदुर्गादेवीजी हुईं। एक समय मेघों ने जल की बड़ी झड़ी लगाई; औरश्रीनरहरियानन्दजी की कुटी में श्री- भगवन्त सन्त के भोग के लिये अन्नादिक सामग्री तो सब थी परन्तु सूखी लकड़ी न थीं। श्राप विचार करने लगे कि “अब किस प्रकार रसोई हो और श्रीसीतारामजी को भोग लगाके सन्तों को प्रसाद पवाऊं।" तव र यह महागनी पन्द्रहवीं शताब्दी विक्रमीय में विराजमान थीं। २ "मैं रह गइ पाली ! मोहाय करके, प्रभु देखे न पाहउँ नय ने भर के ॥" ३ श्रीलड्डू स्वामी। ४ श्रीनरहरियानन्द स्वामी । RECISCLAGAKARKACA-SANGAM * * X - ***WARA ५३८ श्रीभक्तमाल सटीक । चित्त में यह फुरा कि "देवी के मन्दिर में बहुत से काष्ठ लगे हैं सो ले आऊं।' ऐसा विचार कुल्हाड़ी लेकर शनि भगवती का गृह आप उजाड़ने लगे। श्रीदेवीजी प्रत्यक्ष होकर धोली कि "हे श्रीराम- भक्रजी ! भाप हमारा घर मत गिराइये; में आपको नित्य लकड़ी दिया करूंगी" आपने कहा “बहुत अच्छा" और चले आये । तब श्रीदेवीजी रात्रि में नित्य एक बरही (बड़े बोझ भर ) लकड़ी आ- पकी कुटी में डाल जाती थीं। इस वार्ता को एक पड़ोस का रहनेवाला मनुष्य जानकर वह भी आपके समान लकड़ी लेने की इच्छा कर, श्रीदेवीजी का गृह उजाड़ने लगा; श्रीभवानीजी उसके शरीर में प्रवेश कर ध्याप्त हो, भूमि में पछाड़, प्राण लिया चाहती थीं; बहुत विलंब देख उसके घर के लोग जा देखें तो वह मरणप्राय हो रहा है तब सबों ने श्रीदेवीजी की बड़ी प्रार्थना की। श्रीदेवीजी उसी के भीतर से घोली कि "यह यदि नरहरियानन्दजी को वैसी ही लकड़ियों का बोझ नित्य दिया करे, तब तो छोडूंगी नहीं तोमारडालूंगी।' उस दिन से देवी की बेगार उसी के सीसपड़ी, नित्य श्रीनरहरियानन्दजी को लकड़ी दिया करता था। (८२) श्रीलड्ड्भक्तजी। ऐलेही श्रीभागवत में ''श्रीजड़भरतजी" और श्रीभद्रकाली का प्रसंग लिखा है; और उसी प्रकार श्री "लड्डू" भन जी का॥ श्रीजड़भरतजी की कथा सिन्ध सौवीर देश के राजा रहू. गण के साथ लिखी जा चुकी है कि "श्रीजड़भरतजी" महाराज जंगल में बैठे भगवत्स्मरण कर रहे थे । भिल्लों के एक राजा ने भद्रकाली नाम अपनी इष्ट देवता को बलि देने के लिये एक लड़के को मोल लिया था, उस लड़के को किसी से ज्ञात हो गया कि मुझे चलि देने को मोल लिया है इसी से वह लड़का रानि के समय भाग, गया । राजा ने उसके ढूंढ़ने के लिये लोग भेजे। उस लड़के को तो राजा के जनो ने नहीं पाया, परन्तु श्रीजड़भरतजी" ही को ले BkestSCIRCELECORRECEBOOLCANOCRROCEScie Here LACK RAN भकिसुधास्वाद तिलक। ५३६ आये । आप तो परम हंस थे ही शांतभाव से दुष्टों के संग चले आए॥ : जब उनको विधिपूर्वक बलि देने के लिये राजा उपस्थित हुआ तो श्रीदेवीजी ने विचारा कि "यद्यपि रामभक तो कुछ बोलेंगे नहीं, परन्तु “जो अपराध भन कर करई। रामरोषपावक सो जरई ॥" उसी अपने विग्रह में से श्रीकालिकाजी प्रगट हो दुष्ट के हाथ से खड्ग छीन उसी से सब दुष्टों को मार अपने गणों के हाथ में उनका सिर दे दे, स्वयं देवी श्रीजड़भरतजी के आगे नाचने और उनको प्रसन्न करने लगीं । श्रीभक और भगवत् को श्रीदेवीजी ने इस भांति प्रसन्न किया। श्रीजड़भरतजी तो आनंद की मूर्तिथे ही श्रीसीताराम सीताराम कहते हुए पुनः जंगल में चले गए। "श्रीलड्डूस्वामीजी" एक समय वंगाले के मध्य एक कुदेश में गए; वहां लोग आपको दुर्गाजी को बलि देने को ले गए । कालीजी क्रोधाग्नि से तप्त हो खड्ग ले दुष्टों को मार श्रीलड्डूस्वामी की राम- भक्ति की प्रशंसा करने लगी। यह देख सुन, सवत्रामवासी भगवद्- भक्त हो गए। (३७८) दापय । (४६५) "कबीर" कृपा तें परम तत्त्व, “पद्मनाम" परचौ लह्यौ। नाम महा निधि मंत्र, नामही सेवा पूजा। जप तप तीरथ नाम, नाम विन और न दूजा॥ नाम प्रीति नाम बैर. नाम कहि नामी वोलै । नाम "अजामिल" साखि, नाम बंधन तें खोलै ॥ नाम अधिक रघुनाथ तें, "राम" निकट "हनुमत” कह्यौ । “कधीर" कृपा तें परम तत्त्व, “पद्मनाभ” परचौ लह्यौ॥६८॥ (१४६) PRESCR CHAKAM SAR ५४० श्रीभकमाल सटीक। (८३) श्रीपद्मनामजी*। चार्तिक तिलक। (अब तक स्वामी अनन्त श्रीरामानन्दजी के चेलों का यशव- र्णन था।) अपने गुरुदेव श्रीकबीरजी की कृपा से श्रीपद्मनाभजी ने परम तत्व, परब्रह्म स्वरूप भूत श्रीराम नाम से, परचौ पाया; क्योंकि भाप बड़े ही श्रीरामनामानन्य एक तत्त्वाभ्यासी आपने श्रीरामनाम महानिधि ही को परम मंत्र मान जप किया; और श्री. रामनाम ही की सेवा पूजा की । दो० "राम नाम आनादि ब्रह्म, सुमिरे शंकर सेस । राम चरण सांचा गुरू, यो देवै उपदेस ॥" और तंत्रशास्त्र की विधिपूर्वक जप तथा पंचाग्नि आदिक तप, पृथ्वी भरके तीर्थ, सब आप श्रीरामनाम ही को जानकर प्रेम करते थे। श्रीनाम को छोड़, और कोई दूसरा साधन मनही में न लाते ये॥ श्लो. "तेन नतं हुतं दत्तमेवाखिलं तेन सर्व कृतं कर्म जालम् । येनश्रीरामनामामृतं पानकृतमनिशमनवद्यमवलोक्यकालम्॥" दो० "राम नाम सुमिरन भजन, नामहि पूजा प्रेम । तप, तीरथ, दानादि सव, नाम योग, सुख, केम ॥" नाम ही से, तथा श्रीरामनामानुरागी ही से, प्रीति करते थे। और जो नाम से विमुख जीव थे उन्हीं से वैर विरोध करते थे अथवा, जब किसी से वैर विरोध हो जाता था, तब नाम ही स्मरण करते थे । नामी जो परब्रह्म परमात्मा श्रीरामचन्द्रजी हैं उनको भी नाम ही कह के बोलते थे। (क०) "मूल रेफ ब्रह्म, ताते कारन सुवम थूल, तीन हूँ अकार सतचित मुद ग्राम है । रेफ राम मिलित सिया सनेह नाद रूपा दीरघ अकार स्वर विद्या अभिराम है ॥ व्यंजन मकार थूल, माया बिन्दु, जीवानन्द, संजुत अकार जीव वदै रसराम है । सब नाम रामही के । मानि के करै प्रणाम, जपै राम” नाम जानि जीव ब्रह्मधाम है" ॥ * आप संवत् १५७४ के लगभग वर्तमान थे ॥ +Cuctioes.

. भकिसुधास्वाद तिलक ५४१ श्रीभगवत् नाम में अजामिल साक्षी है; अर्थात् अपने पुत्र के बहाने से नारायण" नाम लिया इसी से नाम ने भव-बंधन तथा यमपाश-बंधन से छुड़ा दिया। देखो श्रीधर्मराज अजामील प्रसंग ॥ साक्षात् श्रीरघुनाथ जी के प्रति हनुमान्जीने कहा है कि "हे प्रभु! आपका नाम आपसे भी बड़ा है, क्योंकि आप तो केवल अयोध्या- वासी प्रजाही मात्र को अपने परमधाम को लेगये, और आपके नाम तीनों लोक के जीवों को परमधाम ले जाते हैं ॥" श्लो. "राम स्वत्तोऽधिकं नाम इति मे निश्चिता मतिः । त्वयैका तारिताऽयोध्या नाम्ना तु भुवनत्रयम् ॥ १॥" इस प्रकार श्रीकबीरजी की कृपा ते पद्मनाभजी ने परम तंत्र का परचौ पाया। (३७६ ) टीका | कवित्त । (४६४) काशीवासी साहु भयौ कोढ़ी, सो निवाह कैसे, परिगये कृमि चल्यो चूड़िबे कों, भीर है । निकसे “पदम" आय, पूछी ढिग जाय, कही गही देह खोलौ गुन न्हाय गंगा नीर है ॥ "राम नाम कहै बेर तीन मैं,नबीन होत;" भयौई नवीन कियौ भक्ति मति धीर है । गयौ गुरु पास," तुम महिमा न जानी; अहो । नाम भास काम करें" कही यों कधीर है ॥ ३११॥ (३१८) वार्तिक तिलक। एक काशीवासी सेठ कोढ़ी हो गया और उसकी देह में कीड़े भी पड़ गये; उसने किसी प्रकार से जीने में अपना निर्वाह न देखा, तव उसने कहा कि "हम श्रीगंगाजी में डूब जायंगे;" उसके घरके और बहुत से लोग लेकर गंगातट गये। उसी समय उसके भाग्य- वश, श्रीपद्मनाभजी वहां आपड़े और पूछा कि क्या है ?" लोगों ने सब कह दिया कि यह कोढ़ी डूब मरता है ।" आपने आज्ञा दी कि "इसके बंधन, और पापान आदिक, छोड़ दो; यह गंगास्नान कर यह संकल्प मन में करे, कि मैं जन्म भर श्रीरामनाम जपूंगा' तीन वार श्रीराम नाम कहै, अभी अभी इसकी नवीन काया हो .

५४२ श्रीभकमाल सटीक जावेगी।” वैसाही किया; श्रीरामानुरागी की कृपा से उसका नवीन शरीर होगया, कुष्ठ छूट गया। तदनंतर उसने जन्म भर भत्रिपूर्वक श्रीराम नाम स्मरण किया। श्रीपद्मनाभजी अपने गुरु श्रीकबीरजी के पास आये, श्रीक- वीरजी यह बात सुन कहने लगे कि तुमने श्रीराम नाम की म. हिमा नहीं जानी, कुष्ठ तो श्रीराम नाम का आभास * मात्र नाश कर देता।" तब पद्मनाभजी ने अति आश्चर्य को प्राप्त हो श्रीनाम का प्रभाव जाना॥ (क) कोऊ एक जमन जरठ मग जात कहूं, सूकर के सावक ने मास्यो ताहि धाय के । जोर सो पुकान्यो “मोहि मास्यो है 'हराम' जाति, ऐसे कहि बेगि प्रानगए अकुलाय कै ॥ गोपद समान भव- सागर सों पार गयों; नाम के प्रताप ऐसो पद को गाय के । प्रेम सों कहैगो कोऊ नाम, कृपा राम, कोन अचरज रामधाम देतु है जो चाय कै॥" (चैता ) "सखी ! नैहर में, काहे फिरनि बौरानी, ए रामा, सखी नैहर में । खेलत खात रात दिन बीते रहियै सदा न जवानी, ए रामा ॥ इधर से आवै उधर चलि जावै करि रहु कोटि जतनवा, ए रामा। धन सम्पति कहिं ठहरै न आली, करि लेहु राम भजनवा, ए रामा।” (३८०) छप्पय । (८६३) "तत्वा” “जीवा” दक्षिण देस बंसोद्धर राजत बि- दित ॥ भक्ति सुधा जल समुद्र भये वेलावलि गाढ़ी। पूरब जा । ज्यों रीति प्रीति उत्तरोत्तर बाढ़ी ॥ रघु- कुल सदृश सुभाव, सिष्ट गुण, सदा धर्म रत । सूर, धीर, उदार, दया पर, दक्ष, अनन्य व्रत ।। पदमखंड * श्राभाप अर्थात् जमे जमन ने "राम" कहा ।। पूर्वजा दोपहर के पीछे की छाया अर्थान पश्चिम मर्यान से पूर्व में प्रगट होनेवाली यढनी हुई छाया॥ KICKASKASKOSECRECTOR स *** R भक्तिसुधास्वाद तिलक। ५४३ पदमा पद्धति" प्रफुलित कर सविता उदित। "तत्वा" "जीवा" दक्षिण देस बंसोडर राजत वि- दित ॥६६ ॥ ( १४५) वार्तिक तिलक। (८४) श्रीतत्वाजी। (८५) श्रीजीवाजी। श्रीरामभक्त "तत्वाजी" तथा "जीवाजी" दक्षिण देश विप्र कुल में, अपने वंश भर के उद्धार करनेवाले, जगत् विदित दोनों भ्राता विराजमान हुए। दोनों भाई भक्ति सुधा जल समुद्र के दोनों तट की दृढ़ वेलावली (मर्यादा) हुए; और सन्त भगवन्त में दोनों भाइयों की प्रीति शति उत्तरोत्तर कैसी बढ़ी कि जैसे दो पहर के पीछे की छाया उत्त- रोत्तर बढ़ती है । आप दोनों, रघकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी के खरे खरे पूरे दास थे, इससे रघुवंशियों के ऐसा शुद्ध सुभाव, श्रेष्ठ गुण, सदा धर्म में प्रीति, लोक परलोक के शत्रुओं के लिये शूर, तथा धीर, उदार, दयापरायण, अति प्रवीण, और अनन्य व्रत युक्त थे । "श्रीपद्मापद्धति" जो श्रीसम्प्रदाय, सोई कमल के वन सरीखा है, सो उसको प्रफुल्लित करने वाले दोनों भाई मानों दो सूर्य उदित हुए । इस प्रकार के निज वंशोद्धारकारक श्रीनत्वा जीवा भक्त हुए । श्लो० "प्रारंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लध्वी पुरावृद्धिमती च पश्चात् । दिनस्य पूर्वार्द्ध परार्द्धभिन्ना छायेवमैत्रीखलसज्जनानाम् ॥१॥" (८१) टीका । कवित्त । (४६२) तत्वा, जीवा, भाई उभै, विप्र साधु सेवा पन; मन धरीवात, तातें शिष्य नहीं भये हैं । गाड्यौ एक ढूंठदार, होय अहो हरी डार, संत चरणामृत को ले के डारि दये हैं । जब ही हरित देखें, ताको गुरु करि लेखे, आये श्रीकवीर, पूजि आस, पांव लये हैं । नीठ खलों और सजनी की मित्रता ऐसी घटती बढ़ती जाती है जेसी कि दिन के पूर्वार्द्ध तथा पराद्धं की छाया घटती बढ़ती है ।। LOG KORE ' . * Gi ५४४ SHARE श्रीभकमाल सटीक। नीठ नात दियौ दियो परिचाय, धाम, काम कोऊ होय जो पै आवौ कहि गये हैं ॥ ३१२ ॥ (३१७) वार्तिक तिलक। श्री "तत्वा" जी तथा "जीवा" जी दोनों भाई ब्राह्मण थे। संत वैष्णवों की सेवा का व्रत भले प्रकार धारण किये थे। परंतु मन में एक वार्ता निश्चय किये हुए थे; इससे किसी के शिष्य नहीं हुए थे। वह वार्ता यह है कि आपने अपने द्वार पर एक सूखे काष्ठ का ठूठ गाड़ दिया था। जो नित्य नवीन संत माते थे उनके चरण धोकर चरणा-टू मृत उसमें डालते थे मन में यह था कि "जिसके पदतीर्थ से इस टूठ में हरे २ पत्ते निकल आवे उसी को अपना गुरुदेव जान उसी से मंत्र लेंगे ॥" कुछ काल में उनके भाग्यवशश्रीकवीरजी आये और उनका चरण धोकर ज्योंही उसमें डाला, उसी क्षण उस ठंठ में हरित शाखा पल्लव हो गये। तब इन दोनों भक्तों की आशा पूर्ण हुई, चरण पकड़ पकड़ के प्रार्थना की कि "हम को मंत्र दीजिये।" कवीरजी मंत्र नहीं देते थे परंतु बड़ी कठिनता से दोनों भाइयों को.महा मंत्र श्रीरामनाम दिया; और आपका निवास श्रीकाशीजी में जिस टोले में था सो भले प्रकार से बता दिया कि "कोई कारज पड़े तो हमारे समीप आना;" क्योंकि श्रीकवीरजी तौ त्रिकालज्ञ थे ही होनेवाली बात जानते थे। (३५२) टीका । कवित्त । (४६१) काना कानी भई, द्विज जानी जाति गई, पांति न्यारी करि दई, कोऊ बेटी नहीं लेत है। चल्यो एक काशी, जहां वसत कबीर धीर, जाय कही पीर, जब पूडयौ कौन हेत है । दोऊ तुम भाई, करौआपुमैं सगाई, होय भक्ति सरसाई, न घटाई चित चेत है। आय वहै करी, परी ज्ञाति खरभरी, कहैं कहा उर धरी, कळू मति हूँ अचेत है ॥ ३१३॥ (३१६) , SAKSON s INDIA PAGES भविसुधास्वाद तिलक। ५४५ . वार्तिक तिलक। श्रीकबीरजी के जाने के अनंतर श्रीतवाजी जीवाजी के ग्राम देश के ब्राह्मण लोग आपस में कहने सुनने लगे कि "कबीरजी की जाति जानते हो न?" किसी ने कहा "हां, जानते हैं, ये 'जुलाहा' हैं" "तब तो तत्वा जीवा का ब्राह्मणत्व नष्ट हुभा !" दो० "जाति न पूछौ सन्त की, परखो उनका ज्ञान । मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥" इस प्रकार कुमंत्र कर, दोनों भक्तों को ब्राह्मणों ने अपनी पंक्ति से न्यारा कर दिया। और इनकी कन्या का भी किसी ने विवाह न किया। तब एक भाई ने परम धीर श्रीकबीरजी के समीप श्रीकाशी. जी जाके प्रणाम किया; आपने पूछा कि "किस हेतु से आये हो?" इन्होंने अपना दुःख निवेदन किया। श्रीकधीरजी ने आज्ञा दी कि "तुम्हारे दोनों भाइयों के एक एक कन्या, एक एक पुत्र है; सो आ. पस में विवाह करदो इसमें तुम्हारी कोई घटी नहीं होगी तुम्हारी भनि की अति सरसाई होगी।" आज्ञा पा, अनि प्रसन्न हो घर में आ, वैसा ही करने को उद्यत हो गये । विवाहादिक के गीत सुनकर सब लोगों ने आपका निश्चय जाना । तब तो जातिवाले ब्राह्मणों में घड़ी ही शंका हुई और आपस में कहने लगे कि इन दोनों की मति में भ्रम हो गया। यह क्या अनर्थ कर रहे हैं। (३३) टीका कत्ति । (४६०) "करें यही बात, हमें और न सुहात," आये सबै हा हा खान, यह छांडि हठ दीजिये । पूछये को फेरि गये, करौ व्याह जौ पै नये, दंड करि नाना भाति, भनि दृढ़ कीजिये ॥ तब दई सुता, लई पांति न प्रसन्न झै के, पांति हरि भनि सों सदा मति भीजिये । बिमुख समूह देखि समय बड़ाई करें, धरै हिय मांझ, कह पन पर रीझियै ।। ३१४॥ (३१५) वार्तिक तिलक । भगिनी भ्राता ( वहिन भाई ) का विवाह करने में सन्नद्ध देख, falseries अ.CHCRACRECEREAL .

RE श्रीभकमाल सटीक। ५४६ . सव ब्राह्मण लोग आकर, हा हा खाकर कहने लगे कि "आप दोनों, यह हठ छोड़ दीजिये, ऐसा मत कीजिये, हम आपके पुत्र कन्या दोनों का विवाह कर लेंगे।" आपने कहा कि "हम तो श्रीगुरु आज्ञा से ऐसाही करेंगे, हमको अब उस प्रकार विवाह करना भला ही नही लगता।"पुनः अति दीन होकर सब ब्राह्मणों ने वारंवार प्रा. र्थना की; तब, फिर एक भाई ने श्रीकधीरजी के पास आके सब वृत्तान्त कह, पूछा कि "जैसी आज्ञा हो ?॥" श्रीकवीरजी ने कहा कि "जो अब ब्राह्मण लोग नम्र हुए हैं तो उनको यह दंड करो कि भगवद्भनि करें, तव व्याह क्रौ।" श्री- गुरु आज्ञा सिर पर रख अपने गृह आ, सवको भक्ति दृढ़ कराके तव अपनी कन्याएं दीं। और उनके पंक्ति में ले लेने से कुछ प्रसन्न न 'हुए। क्योंकि आप तो श्रीराम भक्त के साथ ही अपनी जाति पांति मान प्रेम रस में सदा मग्न रहते थे। श्रीतत्वाजी जीवजी का श्रीगुरुवचन में ऐसा विश्वास देख विमुख लोग सन्मुख बड़ाई करते थे, कि "हम सब तो आपके गुरुवचन पालन के प्रण ही में रीझ गये॥" (४) छप्पय । ( ४५६ ) विनै ब्यास मनो प्रगट ह्व, जग को हित "माधौ”. कियौ ॥ पहिले वेद विभाग कथित, पुरान अष्टादस। भारत आदि भागात मथित उन्हाखौ हरि जस ॥ अव सोधे सब ग्रन्थ अर्थ भाषा विस्तायौ। लीला जै जै जैति गाय भवपार उताखौ ॥ जगन्नाथ इष्ट वैराग्य सीव करुणा रस भीज्यौ हियौ । विनै व्यास मनो प्रगट है जग को हित "माधौ” कियौ॥७०॥(१४४) (८६) श्रीमाधवदासजी जगन्नाथी। वार्तिक तिलक । मानों श्रीविनय युक्त व्यासजी प्रगट होकर श्रीमाधवदासजी ने BEEG . ALSCRE ५४७ . ห้จห้หัส 5 RA भकिप्तुधास्वाद तिलक। जगत् के जीवों का हितकार किया। जैसे प्रथम द्वापर में प्रगट हो- कर व्यासजीने वेदों का विभागकिया, तथा अठारह पुराण और महा- भारत बनाकर सबों को मथ कर, हरियशमय "श्रीभागवत" नि- काला, वैसेही अव माधवदासरूप होकर, सव ग्रन्थों को ढूँढ़ विचार, सारांश ले, भाषा ग्रंथ विस्तार किये। उनमें "जयजयकार" शब्दः युक्त भगवत्लीला गान की है, जिसको गाके, जीव भवसागर के पार उतर जाते हैं। श्रीजगन्नाथजी आपके इष्टदेव थे, और आप वैराग्य की तो सीवां थे, तथा करुणारस में आपका हृदय सदा भीगा रहता था। (८५) टीका | कवित्त । (४८) माधौदास द्विज, निज तिया तन त्याग कियो, लियो इन जानि जग ऐसोई व्योहार है । सुत की बढ़नि जोग लिये तित चाहत हो, भई यह और लै दिखाई करतार है ॥ ताते तजि दियौ गेह, वेई सब पालें देह, करै अभिमान सोई जानिये गँवार है। आये नीलगिरि- धाम, रहे गिरिसिंधु तीर, अति मतिधीर, भूख प्यास न विचार है ॥३१५॥ (३१४) वातिक तिलक। ."-श्रीमाधवदासजी ब्राह्मण थे। आपकी स्त्री ने प्राण त्याग दिया। देख कर आपको ज्ञान होगया कि "संसार में शरीरों का व्यवहार ऐसाही मिथ्या है । मैं चाहता था कि यह पुत्र बड़ा हो परिवार बहै, परन्तु कर्त्ता प्रभु ने मुझे और ही वार्ता दिखाई" इत्यादिक विचार- कर प्रबल वैराग्यपूर्वक गृह को त्याग दिया। मन में यह विचारते, कि "ये मेरे माता पुत्रादिक जितने देहधारी हैं उन सबका पालन परमेश्वर ही ने किया है और प्रभु ही करेंगे। मैं जो इनके पालन का अभिमान करूं, तो बड़ा गँवारपना है" इत्यादिक विचार करते नीला- चलधाम में श्रीजगन्नाथजी का दर्शन कर नीलगिरि के समुद्र नीर एकांत में पड़ रहे महामतिधीर भूखप्यास को त्याग केवल प्रभु के४ स्मरण ही में लगे रहे। RRCHESELECRE PRACLESEARCHCRACK . " R KHASHMAHARAkREKHA श्रीभक्तमाल सटीका ५४८ . (३८६) टीका | कवित्त । (४५७) भए दिन तीन, एतो भरत्र के अधीन नाहि, रहैं हरिलीन; प्रभु शोच पस्यो भारियै । दियौ सैन भोग, आप लक्ष्मीजू ले पधारी, हा- टक की थारी झनझन पाँव धारियै ॥ बैठे हैं कुटी में पीठ दिये, हिये रूप रंगे बीजुरी सों कौंधि गई नीके न निहारियै । देवी सो प्र- साद, बड़ौ मन अहलाद भयौ, लयो भाग मानि, पात्र धस्खोई बिचारियै ॥ ३१६ ॥ (३१३) वार्षिक तिलक। तीन दिवस बीत गये; आप क्षुधा के आधीन नहीं हुए; केवल हरिस्मरण में मन लीन रहा ।आपकी दशा देख श्रीजगन्नाथजी को शोच हुआ कि "मेरा भक्त तीन दिन से भूखा पड़ा है" तब जो सु- वर्ण की थाली में सयन भोग धरा था, सो प्रसाद (उच्छिष्ट) करके दिया; स्वयं श्रीलक्ष्मीजी नूपुरादिकों का शब्द झन झन करती ले आई । आप द्वार की दिशि पीठि दिये, श्रीश्यामसुन्दर के रूप में बैठे थे । श्रीलक्ष्मीजी आपके समीप प्रसाद रख के चली गईं। आपने देखा कि विजली सी चमकी, परंतु भले प्रकार दर्शन नहीं पाया ! श्रीमहाप्रसाद देख कर अति आनंदित हो, अपना वेडा भाग्य मान, प्रसाद पाकर थाल वहाँ ही रख दिया। (३८७) टीका । कवित्त । ( ४५६) खोले जो किवार, थार देखिये न सोच पस्यो, कस्यो लै जतन ढूंढ़ि, वाही ठौर पायौ है । ल्याये वांधि मारी वेत, धारी जगन्नाथ देव, भेव जब जान्यो, पीठ चिह्न दरसायौ है ॥ कही पुनि आप में ही दियो, जब लियो याने, माने अपराध पांव गहि के छिमायौं है । भई यों प्रसिद्ध बात कीरति न मात कहूँ, सुनि कै लजात साधु, सील यह गायौ है ॥ ३१७॥ (३१२) वार्तिक तिलक। प्रभात में पण्डा लोगों ने जब किवार खोले, तब थार नहीं देखा, सकको वड़ा सोच हुआ । यत्नपूर्वक सबके सव सर्वत्र ढूँढने लगे; BECtKkKACANCCCircractical रंगे हुए, . - R भकिसुधास्वाद तिलक। ५४६ ढूँढ़ते ढूँढ़ते श्रीमाधवदासजी के समीप थाल रक्खा पाया; अवि- वेकी लोगों ने इतना विचार न किया कि "ये जो चुरा लाते तो ऐसा ही क्यों रख छोड़ते।" थाल लिया, और आपको वांध कर वेंत मारे; उन वेंतों की चोट सब श्रीजगन्नाथ देवजी ही ने अपने तन पर धा- रण कर लिया। जव पण्डा लोग प्रभु को तैल लगाने लगे, तब देखें तो पीठ में वेत के चिह्न ज्यों के त्यों उबटे हैं ! सबके सत्र शंकित हुए । प्रभु ने आज्ञा दी कि “जब हमने उनको थाल प्रसाद दिया है तव उन्होंने लिया है ।" यह सुन सवने श्रीमाधवदासजी के चरणों को गह के अपराध क्षमा कराया; यह सब वार्ता पुरी भर में प्रसिद्ध होगई। तब आपकी कीर्ति अत्यन्त फैल गई। सब प्रशंसा करने लगे; आप सुन के अति लजित होते थे, क्योंकि साधु का सुभाव ग्रन्थों में ऐसा ही गाया गया है । ८) टीका | कवित्त । (४५५ ) देखत सरूप सुधि तन की बिसरि जात, रहि जात मन्दिर में जाने नहीं कोई है । लग्यौ सीत गात, सुनो वात, प्रभु कांपि उठे; सकलात आनि प्रीति हिये भोई है ॥ लागे जब वेग, वेग जाय, परे सिंधु तीर, चाहैं जब नीर, लिये ठाड़े, देहँ धोई है । करिकै वि. चोर औं निहारि, कही "जानों में तो, देत हो अपार दुःख, ईशता, लै खोई है" ॥ ३१८ ॥ (३११) वार्तिक तिलक। अब तो आप मन्दिर में, श्रीजगदीशजी का इस प्रकार सप्रेम इकटक दर्शन किया करते थे कि शरीर की सुधि बुधि संव भूल जाती थी। प्रभुइच्छा से पण्डा लोग आपको देखते न थे, मन्दिर ही में रहि जाते थे; एक बार जाड़े में आप मन्दिर में उघारे रह गये, शरीर में अति शीत लगा, तब शीत से प्रभु भी कांपने लगे। उसी क्षण पण्डाओं को स्वप्न देकर बुलाय, एक नवीन ओढ़ना मँगा के ओढ़ा, और अपनी प्रसादी श्रीमाधवदासजी को ओढ़ाई। आप ओदना प्रसादी पाकर अत्यन्त प्रीति में भर गये। SEARCH Rec ( - 6 *** श्रीभक्रमाल सटीक। एक समय माधवदासजी को संग्रहणी के रोग से मल पड़ने बगा; आप समुद तीर में जा पड़ रहे । जव शौच के लिये पानी चाहा, तो श्रीजगन्नाथजी ने स्वयं जल लाके, सब देह को धोया। श्रीमाधवदासजी ने देखकर जाना कि “ये प्रभु हैं," हाथ जोड़ क- हने लग कि "आप अपनी ईश्वरता छोड़ ऐसा लघु कर्म करके मुझ को अत्यन्त दुःख देते हैं।" (138) टीका । कवित्त । ( ४५४) "कहा करौं, अहो ! मोपे रहो नहीं जात नेकु,” "मेटी विथा गात" "मोकौं विथा वह भारी है"। रहै भोग शेश, और तन में प्रवेश करें, तातें नहीं दूर करौं, ईशता लै टारी है ॥ वह वात सांच, याकी गॉस एक और सुनौ, साधु को न हँसै कोऊ यह मैं विचारी है"। देखत हो देखत में, पीड़ा सो विलाय गई; नई नई कथा कहि भनि बिसतारी है ।। ३१६ ॥ (३१०) बार्मिक तिलक। श्रीजगन्नाथजी ने उत्तर दिया कि मैं क्या करूँ, भक्कों का दुःख देख मुझको किंचित् काल भी नहीं रहा जाता।" श्रीमाधवदासजी ने कहा कि "मेरी व्यथा ही मिटा क्यों नहीं देते ?" प्रभु वोले कि "मिटा देने में मुझे एक भारी व्यथा है, कि जो मिटा दूं तो कर्म 'के भोग का शेष रह जाय, फिर उसको दूसरा शरीर धरके भोगना पड़े । इसी से तुम्हारा दुख नहीं छुड़ाया अपनी ईशता को छोड़ . तुम्हारी सेवा की ॥" दो. "तुलसी रेखा कर्म की, मेंटत हैं नहिं राम । भेटें तो छाचरज नहीं, समुझि किया है काम ।।" सो यह वार्ता भी सत्य है, पुनः प्रभु ने कहा कि "इसकी एक दूसरी गांस सुनो, जिस लिये मैंने सेवा की है जिसमें कोई मनुष्य किसी भक्त की हँसी न करें कि देखो भगवद्भक्ति का कुछ फल नहीं है; 'यह सन्त कैसे दुःख में पड़े हैं। कोई एक लोटा जल तक देने वाला नहीं।' इस प्रकार विचार के मैंने सेवा की है ॥"

भक्तिसुधास्वाद तिलक। ५५१ प्रभु के दर्शन तथा स्पर्श से वात की बात में देखते देखते ही आपकी समस्त पीड़ा बिलागई। श्रीमाधवदासजी ने श्रीपुरी में विराजे हुए नई नई कथा काव्य रचना कर श्रीभगवद्भक्ति को अत्यंत विस्तार किया । (३६०) टीका । कवित्त । (४५३) कीरति अभंग देवि भिच्छा को अरंभ कियो, दियो काहू बाई पोता खीझत चलाय कै । देवो गुण लियो नीके जलसों प्रछाल करि, करी दिव्य बाती, दई दिये में वराय के ॥ मंदिर उँजारो भयो, हिये का अन्ध्यारो गयो, गयो फेरि देखन कौं, परी पांय आय कै। ऐसे हैं दयाल, दुख देत में निहाल करें; करें ले जे सेवा ताको सक कौन गाय के॥३२०॥ (३०६) वार्तिक तिलक । श्रीमाधवदासजी अपनी अभंग कीर्ति देख भिक्षा मांगने लगे। एक दिवस एक अति कृपण वृद्धा वाई के घर भिक्षा मांगने गये; वह गृह पोत रही थी। आपने दो बार मांगा, अत्यंत क्रोध कर उसने पोतनेवाला वस्त्र ही फेंक मारा । अापने कृपालुता से विचार किया कि इसने कुछ वस्त्र दिया तो सही" आपने उस वस्त्र को ले लिया। पद। "सन्तनि की यह रहनि सदा है । गुन में गुन देवें, अचरज क्या ? दोपों में गुन गहान महा है ॥" (श्रीकाप्टजिहा स्वामी आपने जल में धो, स्वच्छ कर, उस पोतने की बाती चना श्री. जगन्नाथजी के मन्दिर के दीपकों में लगा चार दिया। जव मन्दिर में उन वत्तियों का प्रकाश हुआ, उसी क्षण उस माई के हृदय का भी अज्ञानकृत अन्धकार जाता रहा । दूसरे दिन आप कृपाकर उसके घर फिर भिक्षा मॉगने गये । वह देखते ही चरणों पर गिर पड़ी। आपकी कृपा से उसको भनि उत्पन्न हुई। अपने धनादिकों से सन्तसेवा कर भवपार होगई ॥ ReacticRckchecketecteries ५ KARE SAX श्रीभकमाल सटीक। ५५२ आप ऐसे दयालु थे कि उसने तो मारा दुःख दिया, और आपने उसको कृतकृत्य निहाल कर दिया। दोप में गुण लेना सन्तों ही का काम है। भला ऐसे शुद्ध सन्तों की जो कोई सेवा करै तो उसका फल कौन कह सकता है। (१) टीका | कवित। (५०) पण्डित प्रबल दिग रिज करि आयौ; अाय वचन सुनायो "जू विचार मोसों कीजिये।” दई लिग्वि "हारि;" काशी जाय के नि- हारि पत्र, भयौ अति ख्वार, लिखी जीति वाकी, ग्वीजिये ॥ फेरि मिलि माधौ जू को वैसे ही हरायो, एक खर को मँगायौ कही "चढ़ो जब धीजिये।" बोल्यो "जूती बांधो कान,” गयो सुनि न्हान; पानं जगन्नाथ जीते; लै चढ़ायौ वाको, रीमियै ॥ ३२१॥ (३.८) वार्तिक तिलक। एक समय एक बड़ा प्रवल पण्डित, चारों दिशाओं में विजय कर, श्रीजगन्नाथपुरी में आया और यहां के सब पण्डिनों से कहा कि “मुझसे शास्त्रार्थ करो।" पण्डितों ने इसकी प्रबल पाण्डित्य देख कहा कि "तुम श्रीमाधवदासजी को जीत लो तो मानों हम सबको जीति लिया।" उसने श्रीमाधवदासजी से जा कहा कि "मुझसे शास्त्रार्थ की. जिये।" आपने उत्तर दिया कि "हम तुम से हारे हैं।" पण्डित घोला कि "लिख दो" आपने अपनी हार लिख दी । श्रीकाशी में आ वह पत्र पण्डितों को दिखा, स्वयं देखा सो प्रभु की कृपा से पत्र में लिखा था कि "माधवदासजी जीते, दिग्विजयी पण्डित हारा।" यह देख पण्डित अति क्रोध युक्त फिर माधवदासजी के पास आके कहने लगा कि "तुमने छल कर अपनी जीत लिख दी थी, अव मुझसे शास्त्रार्थ करो, मैं तुमको हरा के दोनों कानों में जूतियां बांध गदहे पर चढ़ा पुरी भर में फिराऊँगा।" श्रीमाधवदासजी इस के क्रूर वचन सुन बोले कि “मैं स्नान कर आऊं, तब शास्त्रार्थ करूं।" ऐसा कहके चले गये। तदनन्तर श्रीजगन्नाथजी माधवदासजी का abcREKKROACHECRECE .

- भकिसुधास्वाद तिलक। रूप धर, पण्डित को हरा, उसके कानों में जूतियां बंधा, गधे पर चढ़ा, पुरी भर में फिराने लगे। और आप बहुत से लोगों को संग ले पीछे से ताली थपोड़ी बना हँसते ठहाका लगाते थे । पश्चात् आके उस मूर्ख पण्डित को श्रीमाधवदासजी ने छोड़वा दिया । (३६२) टीका | कवित्त । (४५१) बज ही की लीला सब गावें, नीलाचल मांझ; मन भई चाह "जाय नैननि निहारिय" । चले वृन्दावन, मग लग एक गांव जहां बाई भक्क, भोजन को ल्याई चाव भारियै ॥ बैठे ये प्रसाद लेत; लेत हग भरि, "अहो ! कहीं कहा बात दुख हिये की उघारिये ?" "सांवरौ कुंवर यह कौन को भुराय ल्याये ? माय कैसे जीवै" सुनि मति ले बिसारिये ॥३२२ ।। (३०७) वार्तिक तिलक। श्रीमाधवदासजी वृन्दावन (वन) की ही सब लीला जगन्नाथ- धाम में गाया करते थे; मन में चाह उत्पन्न हुई कि "नेत्रों से श्री- वृन्दावनजी का दर्शन कर आऊं" आप वृन्दावन को चल दिये ॥ मार्ग के एक ग्राम में एक बाई भगवद्भका थी वह आपको दर्शन कर बड़े प्रेम से घर लाय प्रसाद पवाने लगी; उस बड़भागिनी को श्रीजगन्नाथजी ने, दश १० वर्ष का वालक वन आपके समीप ही में, दर्शन दिया। वह भनिवत्ती दर्शन पा नेत्रों से जल ढारने लगी। माधवदासजी ने कारण पूछा, माई बोली कि “यह साँवली साँव- ला सा सुन्दर बालक किस का भुला के (फुसला के ) आप अपने साथ लिवा लाये हैं ? इसके वियोग से इसकी मैया कैसे जीवेगी।" सुनकर श्रीमाधवदासजी जान गये कि इसको प्रभु ने दर्शन दिया। इसले आप भी प्रेम में मग्न हो गये ।। श्री कृपा की जय ।। (81) टीका । कवित्त। ( ४५०) चले और गाँव, जहां महाजन, भक्क रहै, गहै मन मांझ, आगे विनती हूं करी है । गये वाके घर; वह गयो काहू और घर; भाय भरी तिया आनि पायन मैं परी है ॥ ऊपर महन्त कही "अजू एक BAGECHOCALCRECORRECORK , , R ******** ५५४ श्रीभकमाल सटीक । सन्त आए;" "इहाँ तो समाई नाहि;" आई अरवरी है। कीजिये रसोई;""जोई सिद्ध सोई ल्यायो;" दूध नीके के पिवायो; नाम "माधों" आस भरी है ॥ ३२३॥ (३०६) वार्तिक तिलक। आप उस माई के ग्राम से आगे चले । एक दूसरे गांव में आये; वहां एक वैश्य महाजन भक्त था वह जब प्रथम जगन्नाथपुरी में गया था तो श्रीमाधवदासजी से अपना नाम ग्राम बता प्रार्थना की थी कि "जो श्रीवृन्दावन आइये तो मुझे दर्शन दीजियेगा" उसके घर में गये, वह कहीं गया था; उसकी स्त्री बड़ी भनिवती थी, उस ने आपके चरणों में प्रणाम किया उसकी अटारी पर एक वैष्णव महंत थे उसने उनसे कहा कि एक और संत आये हैं;' उन्होंने उत्तर दिया कि “यहां समाई नहीं है" तब वह भक्का घबड़ा के आप से रसोई करने की प्रार्थना करने लगी। आप बोले "जो सिद्ध पदार्थ हो सो ला" वह चीनी मिला के दूध लाई । आपने प्रभु को अर्पण कर पान किया अपना नाम "जगन्नाथी माधवदास" बताया कि "मेरा आगमन अपने पति से कह देना ॥" (६४) टीका । कवित्त । (४४६) गये उठि; पाछे भक्त आयो, सो सुनायौ नाम; सुनि अभिराम, दौरे संगही महत है। लिये जाय पाय आपटाय; सुख पाय मिले; मिले घर मांभ; "तिया धन्य तो सो कंत है" ॥ संतति बोले "मैं अनंत अपराध किये 1 जिये अब," कही सेवो सीत मानि ते है। आवत मिलाप होय, यही राखौ बात गोय;" आये वृन्दावन जहां सदाई वसंत है ॥ ३२४ ॥ (३०५) वार्तिक तिलक। श्रीमाधवदासजी उठ के चल दिये । पश्चात् कुछ ही काल में बड़. भागी आया, और आपका नाम सुन अति प्रेमसे दौड़ा; तथा आप का नाम सुन साथ ही वह महंत भी दौड़ा; श्रीमाधवदासजी के १"संतति"-महन्न ! २"जत'-पत, उपाय ।। HOKHARACETA - भक्रिसुधास्वाद तिलक । ५५५ चरणों में लिपट गये; आप सुखपूर्वक मिले, और लौट के भक्त के घर में आय बोले, कि "ऐसी भक्ति-युक्र नारी धन्य तथा उसका प्रिय. पति त धन्य है।" उस महंत ने हाथ जोड़ श्रीमाधवदासजी से विनय किया कि "मैं ने भापका अमित अपराध किया; सो कैसे छूटै ?" आपने आज्ञा दी कि “जब तक जियो तब तक वैष्णवों का सथिप्रसाद सेवन करो; अपराध छूटने का यही यत्न जानो, जब वैष्णव आवै तव उनसे मिलि दंडवत प्रणाम कर, सत्कार किया करो; यह मेरी कही वार्ता छुपा के प्रीति से हृदय में धर रक्खो ॥" फिर श्रीमाधवदासजी वहां से चल, जहांसदा वसंत ऋतु सरीवा आनन्द रहता है उस श्रीवृन्दावन में आये । (१५) टीका । कवित्त । (४४%) देखि देखि वृन्दाबन मन में मगन भये, गये श्रीबिहारी जू के चना तहां पाये हैं। कहि रह्यो. द्वारपाल "नेकु में प्रसाद," लाल यमुना रसाल तट भोग को लगाये हैं। नानाविधि पाक धरै, स्वामी आप ध्यान करें, वोले हरि "भावे नाहिं वेई लै खवाये हैं"। पूछयो, सो जनायो, दूँदि ल्यायो, आगे गायौ सघ, "तुम तो उदाप्त,” हां सरस समझाये हैं ॥ ३२५ ॥ (३०४) वार्तिक तिलक। श्रीवृन्दावन देख देख आपका मन प्रेमानन्द में मग्न हुआ; फिर "श्रीयांकेविहारीजी" के मन्दिर में दर्शन को गये; वहां बाहर ही किसी ने चने दिये । द्वारपाल ने कहा "कुछ ही विलंब में आपको प्रसाद भी मिलेगा, थान गया भोग लग रहा है"; आपने विचारा कि "क्षधा की निवृत्ति तो चनों ही से हो जावेगी।" श्रीयमुना तट रसान वन में आके श्रीगोपाल नाल को अर्पण कर चने पाके बैठे रहे । यहाँ विहारीजी के आगे नाना प्रकार के व्यं- जन घर मंदिर (स्थान) के महंत स्वामीजी ध्यान करने लगे भा- वना में विहारीजी बोले कि "हमको तो एक प्रिय भक्त ने चने भोग BachecksoctacksCHECRESCRECIENCRECRORSCLecter 656 ५५६ श्रीभकमाल सटीक। लगा दिये; इससे इन सव पदार्थों की क्षुधा ही नहीं है ।" स्वामी ने प्रार्थनाकर पूछा कि “उन भक्तजी का क्या नाम है कहां हैं ?" प्रभु ने बताया, तब लोग दौड़ के श्रीमाधवदासजी को ढूंढ़ लाये । आप आये चनों को पाने पवाने का वृत्तान्त कह! । विहारीजी के यहां के महंत हँस के कहने लगे कि "आप तौ उदासीन विरक्त हैं, चने ही ले के चल दिये । सो जगत से उदासीन होना तो भला है, परंतु रलिकराज विहारीलाल से और उनके प्रसाद से उदासीन होना उचित नहीं॥" (३६६) टीका | कवित्त । (४४७) गये ब्रज देखिये कों; "भांडीर" में "खेम" रहै निसि को दुराय खाय क्रिमि लै दिखाये हैं। लीला सुनिने को "हरियाने” गांव रहे जाय गोवरहूं पाथि पुनि नीलाचल धाये हैं ॥ घर हूं को आये सुत सुखी सुनि माता वानी, मारग में स्वप्न दै के घनिक मिलाये हैं। याही विधि नाना भांति चरित अपार जानो, जिते कछु जाने तिते गान के सुनाये हैं ॥ ३२६ ॥ (३०३) वार्तिक तिलक। किसी और दिन आप वहाँ से ब्रज के सव स्थलों को देखने गये; भांडीर वट में आग्रे, वहाँ एक "खेमदास” नामक वैरागी रहता था; वह प्रथम तो आपको अपनी कुटी में रहने ही न देता था, परंतु आप रहे सो आपको नो उसने छुछ रूखा सूखा सा प्रसाद पवा दिया, और आप रात्रि में छिप के, खीर खाने लगा। श्रीमाधव- जी ने उसका कपट जाना इससे दिखा दिया कि वह संपूर्ण खीर के चावल कीड़े होकर रेंगते थे। तब तो वह दीन तथा विकल होकर आपके चरणों में आ गिरा। आपने बहुत प्रकार से सदुपदेश देकर उसको संत-सेवा में प्रवृत्त किया। फिर श्रीवृन्दावन से चले "हरियामे" में "गोली' नामक ग्राम में भगवत् लीला भागवतकथा बहुत अच्छे प्रकार से होती थी वहां रहके कथा सुनने लगे।आप ऐसे निरभिमान थे कि वहाँ का गोवा SECRESCRITICICICIA -- -- भक्तिसुधास्वाद तिलक। ५५७ नित्य आपही पाथ दिया करते थे। पीछे लोग आपको जान चरणों में पड़े। पुनः वहीं से श्रीजगन्नाथधाम को चले, मार्ग में आपके गृहस्था- श्रम में निवास वाला ग्राम मिला आपने विचारा कि "माता को भी देखता चलूँ” गृह के समीप लोगों से माता और पुत्र का कुशल सुना; किसी ने दौड़ के माता से कहा कि तेरा पुत्र आया है । माताजी बोली कि "मेरा पुत्र विरक हो करके फिर घर आवै, ऐसा कपूत नहीं है ।" आप माता के शुभ वचन सुन संकुचित हो शीघ्रही लौट चले । फिर जिसके यहां प्रथम गए थे उस भन वैश्य के ग्राम के निकट आये तब उसको स्वप्न देकर बुलाके, मिलकर, श्री. जगन्नाथधाम में चले आये। इसी भांति, श्रीमाधवदासजी के अनेक अपार चरित हैं; मैं जितने चरित जानता था, उतने गाके सुना दिये ।। (२६७) छप्पय । (४४६) (श्री) रघुनाथ गुसाई गरुड़ ज्यौं, सिंहपौरि ठाढ़े रहैं ॥ सीत लगत सकलात बिदित पुरुषोत्तम दीनी। सौच गये हरि संग कृत्य सेवक की कीनी ॥ जगन्नाथ- पद प्रीति निरंतर करत खवासी । भगवत्धर्म प्रधान प्रप्तन्न नीलाचल वासी॥ उतकल देस उड़ीसा नगर "वैनतेय" सब कोउ कहैं। (श्री) रघुनाथ गुसाईं गरुड़ ज्यौं, सिंहपौरि ठाढ़े रहैं ।। ७१ ॥ ( १४३) (८७) श्रीरघुनाथ गुसाईं। वार्तिक तिलक। जिस प्रकार श्रीभगवत् के अग्रभाग में श्रीगरुड़जी खड़े रहते हैं, उसी प्रकार श्रीरघुनाथ गुसाईजी श्रीजगन्नाथजी के भागे"सिंहपोरि ड्योढ़ी" पर खड़े रहतेथे। एक समय आपको रात्रि में अत्यंत जाड़ा ko । pat SRISION-RINotes श्रीभकमाल सटीक। ५५८ । लगने पर स्वयं श्रीपुरुषोत्तमजी ने ओढ़ने को दुलाई दी; यह बात प्रसिद्ध है । और जब रोग से गुसाईंजी को मल गिरने लगा, तब प्रभु ने सेवक की नाई अंग प्रच्छालन आदि कृत्य किया। श्रीजग- नाथजी के पदकमल में आपकी अत्यंत प्रीति थी। निरंतर सेवा करते थे । भागवधर्म करने करानेवालों में प्रधान, प्रसन्नतापूर्वक नीलाचल में वास करते थे। वरन उड़ीसानगर के तथा उत्कल देश के निवासी सव श्रीरघु- नाथ गुसाईजी को "गरुड़जी" ही कहा करते थे। (३६८) टीका | कवित्त । (१४५) अति अनुराग घर संपति सो रह्यो पागि, ताहू करि त्याग कियो नीलाचल वास है । धन को पठावै पिता ऐ पै नहीं भाव कळू देखियो सुहावै महा प्रभूजी को पास है ॥ मन्दिर के द्वार, रूप सुन्दर नि- हास्यौ करें, लग्यो सीत गात सकलात दई दास है । सौच संग जा यबे की रीति को प्रमान वह वैसे सब जानौ माधोदास सुख- रास है ॥ ३२७ ॥ (३०२) वार्तिक तिलक । श्रीरघुनाथ गुसाईंजी का घर सर्व सम्पत्ति से भरा था; उसको भी त्याग कर अनुरागपूर्वक "नीलाचल" में आपने निवास किया। आपके पिताजी गृह से धन भेजते थे, परन्तु आपको प्रिय नहीं लगता; केवल महाप्रभुजी का दर्शन तथा समीप रहना प्रिय लगता था। श्रीजगन्नाथजी के द्वार पर खड़े सुन्दर रूप को देखा करते थे। एक रात जब शरीर में शीत लगा, तब प्रभु ने अपने दात को दु- लाई दी; और रोग से शौच जाने पर प्रभु की सेवा करने की रीति, प्रथम जैसी श्रीसुखराशि माधवदासजी की कथा में लिखी है, उसी प्रकार जानिये॥ (३६8 ) का | कवित्त । (४४४) महाप्रभु कृष्ण चैतन्य ज की आज्ञा पाइ, आये 'वृन्दावन," "राधाकुण्ड" वास किया है। रहनि, कहनि, रूप चहनि, न कहि Haractectesterotect Geect-SCH प्र ५५६ . **) भकिसुधास्वाद तिलक। सकै, थकै सुनि; तन भाव रूप करि लियो है ॥ मानसी में पायौ दूध भात, सरसात हिये, लिये रस नारी देखि वैद कहि दियो है। कहां लौ प्रताप कहौं; आपुही समझि लेहु, देहु वही रीझि जासों आगे पाय जियो है ॥ ३२८ ॥ (३०१) वार्तिक तिलक । श्रीजगन्नाथधाम से महा प्रभु कृष्ण चैतन्यजी की आज्ञा पाके, आपने श्रीवृन्दावन आ, श्रीराधाकुण्ड में निवास किया । आपकी रहन, सहन, प्रभु के रूप की चाह कही नहीं जाती; सुन सुन के मति थक जाती है; स्वस्वरूप तथा पर स्वरूप की भावना करते क- रते इस शरीर और भावना रूप दोनों ही को एक करलिया । एक समय आपका शरीर सहज हुआ तब आपने मानसी सेवा में प्रभु को दूध भात भोग लगाया। और श्रीनन्दलालजी का दिया हुआ वही प्रसाद अपने सरस हृदय से ग्रहण किया । उसका रस इस पंचभौतिक शरीर में व्याप्त हो गया । वैद्य ने नाड़ी देख कर सवों से कह दिया कि "इन्होंने तो आज दूध भात पाया है।" हे सज्जनो ! मैं इन महानुभाव का प्रताप कहां तक कहूं; आप सर्व स्वयं समझ लीजिये । जैसा आगे, श्रीरघुनाथ गुसाईजी भावना कर जिए थे कृपा करके वैसा ही वरदान मुझे भी दीजिये कि जिसको पाके आगे कृत कृत्य होऊ ॥ (४०० ) छप्पय । (४४३) । नित्यानंद कृष्ण चैतन्य की, भक्ति दसोंदिसि वि- स्तरी॥"गौड़देस” पाखंड मेटिकियाँभजन परायन। करुणासिंधु कृतज्ञ भये अगनित गति दायन ॥ दसंधा रस आक्रांति, महतजन चरण उपासेोनाम लेत निह- पाप दुरित तिहिं नरके नासे ॥ अवतार विदित पूरव "दसों दिसि"चारों कोन और नीच ऊपर सहित दश दिशा।२'दसधा" नयधा भक्ति तथा प्रेमाभक्ति। SECREG REAKING 5 Kranti २ HARSA भक्तिसुधास्वाद तिलक । ५६१ सम्पूर्ण प्रेममत्तता लेकर अपने हृदय में भर लिया; तथापि और प्रेमाभिलाषा बनी ही रही। आपको उस मादकता का ऐसा भारी बोझा हुआ कि किसी प्रकारसँभाला नहीं जाता, तब कृपा करके ठोर ठौर अपने शिष्य पार्षदों को थोड़ा थोड़ा दे दिया, जिस प्रेम- माधुरी के कहते कहते तथा सुनते सुनते कितने अनुरागी मतवारे हुए। उनके चरित्रों के, और प्रेम वाग्विलास के बहुत से ग्रंथ साक्षी हैं। (८६) श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभुजू । (४०२) टीका | कवित्त । (४४१) गोपिन के अनुराग आगै, आप हारे श्याम, जान्यो यह लाछ रंग कैसे आवै तन मैं । येतो सब गौर तनी नख सिख बनी ठनी, खुल्यो यों सुरंग अंग अंग रंगे वन मैं ॥ श्यामताई मांझ सो ल- लाई हूं समाई जोही, ताते मेरे जान फिरि आई यहै मन मैं। "जसु- मति सुत" सोई “शची सुन" गौर भये, नये नये नेह चोज नाचे निज गन मैं ॥३३०॥ (२६६) वार्तिक तिलक। - श्रीगोपीगणों के अपार प्रेम के आगे श्यामसुन्दर श्रीकृष्णजी हार गये, तब विचार किया कि "इस प्रेम का लालरंग मेरे तनु में किस प्रकार आवै, ये गोपिका वृन्द गौर तनु युक्त नख शिख श्रृंगार से लड़भर बनी ठनी हैं।" उनके तब शोभा युक्त सुरंग अंगों का संग वन में करने से आपकी झमाझल श्यामताई में, गोपिकाओं के अंग की ललाई समा गई; अपने को गौर देखा । इस लिये मुझे जान पड़ता है कि आपके मन में यह बात आई कि "अब मैं गौरांग शरीर धारण करूं।" सोई श्रीयशोदा नंदन कन्हैया अब गौरांग । शचीनंदन "श्रीकृष्णचैतन्य" जी हुए। और जैसे प्रथम गोपियों के संग रास में नाचते थे, वैसेही फिर अब अपने अनुरागियों के बीच में स्नेह के चुटीले पद गान कर नाचते थे, प्रेम की जय !! Start -. , KHARGER STATE ************* श्रीभक्तमाल सटीक। गति दी॥ मही, उभै महत देही धरी। नित्यानन्द कृष्ण चैतन्य की, भक्ति दसोंदिसि बिस्तरी ॥७२॥ (१४२) वार्तिक तिलक। "श्रीनित्यानंदजी" की, तथा "श्रीकृष्ण चैतन्य" महाप्रभुजी की भक्ति दशों दिशाओं में विस्तार हुई । गौड़ (बंगाल) देश का, पाखंड मिटा के, जीवों को आपने भगवद्भजन में परायण किया। दोनों महात्मा करुणासिंधु, अति कृतज्ञ ने अगिनित जीवों को आपका हृदय दशधा, नाम प्रेमाभक्ति से सदा पूर्ण रहा करता था। आपके चरणों की उपासना बड़े बड़े महात्मा लोगों ने की । जो कोई आपका नाम जपते हैं उनके दुरित पाप नाश हो जाते हैं, निप्पाप हो जाते हैं। पूर्व देश की भूमि में श्रीवल देवजी तथा श्री- कृष्णचन्द्रजी ने अपने अंशों से दोनों महंतों की देह धरकर अवतार लिया; यह बात विख्यात ही है । (१)श्रीकृष्णचैतन्यजी। (२) श्रीनित्यानन्द प्रभुजी। (४०१) टीका । कवित्त । (४४२) भाप बलदेव सदावारुणी सो मत्त रहैं, चहें मनमानी प्रेम मत्त- ताई चाखियै । सोई नित्यानन्द प्रभु महँत की देह धरी, भरी सब आनि तऊ पुनि अभिलाखियै ॥ भयो बोझ भारी, कि हूँ जात न संभारी, तब ठौर ठौर पारषद मांझ धरि राखियै । कहत कहत और सुनतसुनतजाके,भयेमतवारे; बहुग्रंथ ताकी साखियै॥३२६॥(३००) (८८) श्रीनित्यानंद प्रभुत। वार्तिक तिलक। प्रथम द्वापर अवतार में आप श्रीवलदेवजी श्रीकृष्ण भगवान् के बड़े भाई (दाऊजी) वारुणी पानकर मत्त रहते थे, फिर आपने मन में चाह किया कि अव में प्रेम की मत्तता भी चाखू" इसी हेतु से आपने "श्रीनित्यानन्द" महंतजी का शरीर धारण किया। और +Caste SACRIKRITERS , ॐॐNS भक्तिसुधास्वाद तिलक । ५६१ सम्पूर्ण प्रेममत्तता लेकर अपने हृदय में भर लिया; तथापि और प्रेमाभिलाषा बनी ही रही। आपको उस मादकता का ऐसा भारी बोझा हुआ कि किसी प्रकारसँभाला नहीं जाता, तब कृपा करके ठौर ठौर अपने शिष्य पार्षदों को थोड़ा थोड़ा दे दिया, जिस प्रेम- माधुरी के कहते कहते तथा सुनते सुनते कितने अनुरागी मतवारे हुए।उनके चरित्रोंके, और प्रेम वाग्विलास के बहुत से ग्रंथ साक्षी हैं। (८६) श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभुजू। (४०२) टीका । कवित्त । (४४१) गोपिन के अनुराग आगे, आप हारे श्याम, जान्यो यह लाछ रंग कैसे आवै तन मैं । येतो सब गौर तनी नख सिख वनी ठनी, खुल्यो यों सुरंग अंग अंग रंगे वन में ॥ श्यामताई मांझ सो ल- लाई हूं समाई जोही, ताते मेरे जान फिरि आई यह मन मैं। "जसु- मति सुत" सोई "शची सुन" गौर भये, नये नये नेह चोज नाचे निज गन मैं ॥ ३३० ॥ (२६६) वार्तिक तिलक। श्रीगोपीगणों के अपार प्रेम के आगे श्यामसुन्दर श्रीकृष्णजी हार गये, तब विचार किया कि “इस प्रेम का लालरंग मेरे तनु में किस प्रकार आवै, ये गोपिका वृन्द गौर ननु युक्त नख शिख श्रृंगार से लड़झर बनी ठनी हैं।" उनके तब शोभा युक्त सुरंग अंगों का संग वन में करने से आपकी भलाभल श्यामताई में, गोपिकाओं के अंग की ललाई समा गई; अपने को गौर देखा । इस लिये मुझे जान पड़ता है कि आपके मन में यह बात आई कि "अब मैं गौरांग शरीर धारण करूं।" सोई श्रीयशोदा नंदन कन्हैया अब गौरांग शचीनंदन "श्रीकृष्णचैतन्य" जी हुए । और जैसे प्रथम गोपियों के संग रास में नाचते थे, वैसेही फिर अब अपने अनुरागियों के बीच में स्नेह के चुटीले पद गान कर नाचते थे, प्रेम की जय !! RECTECECRACHAch KRT****FARRRRETE ५६२ श्रीभकमाल सटीक। (४०) टीका । कपित्त । (४४०) आवै कभू प्रेम हेमपिंडवत तन होत, कभू संधि संधि टि अंग बढ़ि जान है । और एफ न्यारी रीति आंसू पिचकारी मानों, उभे लाल प्यारी भावसागर समात है । ईशता बखान करो सो प्रमान याकों काह ? 'जगन्नाथ क्षेत्र नेत्र निरखि साक्षात है'। चतुर्भज पट- भुज रूप ले दिखाय दियो, दियो जो अनूप हित वात पात पात है ॥ ३३१॥ (२६८) वार्त्तिक तिलक । आपको जब कभी प्रेमावेश होताथा तब गौर शरीर तत सुवर्ण के पिड की नाई लाल होजाता था, और कभी प्रेम से संधि संधि छूट अंग अंग फूलि उटते थे । आपकी एक रीति और लोक से न्यारी थी, कि प्रेम के आंसू इस प्रकार चलते थे मानों श्रीलालजी की तथा प्यारीजी की युगल पिचकारी छूटती हैं । इस प्रकार प्रेमभाव के स. मुद्र में आप डूबे रहते थे। जो कहिये कि मूल, टीका के कवित्तों में आपकी ईशता का बखान किया है सो इसका प्रमाण करो तो जगन्नाथ क्षेत्र में सबने नेत्रों से साक्षात् देखा है कि एक समय प्रेम नृत्य करते करते चनु र्भुज होकर आपने दर्शन दिया । तब लोगों ने कहा कि चतुर्भुज हो जाना तो इस क्षेत्र का प्रभाव ही है तदनन्तर आपने पद्भुज होकर दर्शन दिया। आपने जो हितोपदेश जीवों को दिया सो वार्ता पत्र में लिखी है अद्यापि वहां भापके पद्भुज मूर्ति का दर्शन होता है । (४०४) टीका । कपित्त । (४३६) कृष्ण चैतन्य नाम जगत प्रगट भयौ, अति अभिराम लै महन्त देही करी है । जितौ गोड़ देश, भक्ति लेसहूँ न जाने कोऊ, प्रेमसागर में बोत्यौ कहि "हरी" है ॥ भए सिरमौर एक एक जग तरिवे को धारिबे कों कौन साखि पोथिन में धरी है। कोटि कोटि अजामील वारि डारे दुष्टता पै, ऐसे हूं मगन किये, भक्ति भूमि भरी है ॥३३२ ॥ (२६७) DESGAR KUR Reacher-CSCxsci सोक .

- ॐॐॐ भकिसुधास्वाद तिलक। ५६३ वार्तिक तिलक । भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी अति अंभिराम महन्त की देह धारण कर "श्रीकृष्ण चैतन्य" नाम से जगत् में प्रगट हुए। जितना गौड़ बंगाल देश था उसमें कोई लेश मात्र भक्ति न जानता था; वहां के लोगों को "हरि हरि" नाम जपना उपदेशकर प्रेमसागरमें डुबादिया। सो० "सकल तत्त्र को सार, अकथ अनूपम, रामहिन । * "प्रेम" अतर्क अपार, बरनि सकै सो कोन अस?" आपके शिष्य प्रशिष्यादि अनेक शिरमौर हुए, कि एक एक महानुभाव ने जगत् के अनेक लोगों को तार दिया । उनकी साक्षी पुस्तकों में लिखी धरी हैं । जिनकी दुष्टता पे कोटिन अजामील स. रीखे पापियों को न्योछावर कर दीजिये, वैसे दुष्टों को भी प्रेम में मग्न कर भक्ति भूमि भर में भर दिया । (४०१ ) छप्पय । (४३८ ) "सूर" कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं सिर चा- लन करै ॥ उक्ति, चोज, अनुप्रास, वरन अस्थिति, अति भारी। बचन प्रीति निर्वाह, अर्थ अद्भुत तुक धारी ॥ प्रतिबिंवित दिवि दिष्टि हृदय हरि लीला भासी। जनम करम गुन रूप सबै रसना परकासी। विमल बुद्धि गुन और की, जो यह गुन श्रवननि धरै। "सूर" कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं सिर चालन करै ।। ७३ ॥ (१४१) (६०) श्रीसूरजी। वार्तिक तिलक। ऐसा कौन कवि है, ? कि जो श्रीसूरदासजी का कवित्त सुनकर * भक्तमालो गरिडत उपाध्याय श्रीरामहित शर्मा, रामपूर, नगरा, सान छारा । + श्रीसूरदासजी यही हैं । यात में लोग भ्रम से विल्वमंगलजी (छापय ४६ ) को. श्रीसूरदास समझते हैं। Si K**KRANT श्रीभकमाल सटीक । , प्रशंसापूर्वक अपना सीस न हिलावै । उनकी कविता में बड़ी भारी नवीन युक्रियां, चोज, चातुर्य, बड़े अनूठे अनुप्रास, और वर्णों की यथार्थ बड़ी भारी स्थिति है । कवित्त के आदि में जिस प्रकार का व. चन तथा प्रेम उठाया उसका अंत तक निर्वाह किया। और कविता के तुकों में अद्भुत अर्थ धरा है । आपके हृदय में प्रभु ने दिव्य दृष्टि दी, जिसमें सम्पूर्ण श्रीहरिलीला का प्रतिविम्ब भासित हुआ। सो प्रभु का जन्म तथा कर्म और गुण, रूप सब दिव्य दृष्टि से देखकर अपनी रसना, (जीभ) वचन से प्रकाशित किया ॥ जो और कोई जन श्री ५ सूर कथित भगवद्गुण गण अपने श्रवण में धारण करें तो उसकी भी बुद्धि विमल गुण युक्न होजाय । कहते हैं कि आपने सवालाख भजन (पद) का अपने मन में संक- ल्प किया था, पर लाख ही बना के शरीर त्यागा; श्रीकृष्ण भगवान् ने स्वयं पच्चीस सहस्त्र कहके उस ग्रंथ को और अपने भक्त की वा- सना को पूरा कर दिया*॥ श्रीसूरदासजी की दिव्यदृष्टि की परीक्षा भी राजसभा में हुई थी। दो०"किधों सूर को शर लग्यो, किधों सूर की पीर । किधों सूर को पद सुन्यो, यों सिर धुनत अधीर ॥" "सूर सूरी तुलसी शशी, उड़गन केशवदास । अब के कवि खद्योत सम, जहँ तह करत प्रकास ॥" , है *जो-पच्चीस सहस्र भजन श्री भगवान ने कृपा करके रचा है उन भजनों में सूरश्याम की छाप दिया है । कृपा की जय । । सूर्य । श्रीसूरजी ने अकपर, जहांगीर, शाहजहां तीनों के समय देखे थे। आपका समय प्रायः संवत् १६१७ से १६६० तक के लगभग कहा जाता ("ललिता ! तोहिं बूझत शाहजहा। ऊध्य ! तजि श्याम, तुम श्राप कहां?") ("बाल्मीकि तुलसी भय, ऊधव सूर शरीर" ) (अकबर बादशाह संवत् १६६२ तक, जहांगीर १६८४ तक, ओर १६८४ से शाह- जहां था। ) जैसा कि गोस्वामी श्री १०८ तुलसीदासजी ने भी कई बादशाहों के समय देपे थे, यह यात प्रासद्ध ही है कि श्रागका समय १५८१ से १६८० तक रहा ॥ दो "पढ़यों गुरू सन चीच शर ५, सन्त बीच मन ४० जान । गौरी शिव हनुमत कृपा, तब मैं रची चिगन ॥१॥ श्रीरामचरित मानस ॥ श्रीतुलसीदासजी॥ Accok SCRECEM -- भकिसुधास्वाद तिलक । (४०६)छप्पय । (४३७) व्रज वधू रीति कलियुग विर्षे, “परमानंद" भयौ प्रेमकेत ॥ पौगंड, बाल, कैशोर, गोपलीला सवगाई। अचरज कहा यह वात हुतौ पहिलो जुसखाई ॥ नैननि नीर प्रवाह, रहत रोमांच रैन दिन। गद गद गिरा उ- दार श्याम शोभा भीज्यौ तन॥ “सारंग” छाप ताकी भई, श्रवण सुनत आबेस देत। ब्रजवधू रीति कलियुग वि- “परमानन्द" भयौ प्रेमकेत ॥७४ ॥ (१४०) (६१) श्रीपरमानन्दजी। वार्तिक तिलक। द्वापर में जिस प्रकार गोपी जनों की रीति थी, उसी प्रकार क- लियुग चिपे श्रीपरमानन्दजी प्रेम के स्थान हुए । श्रीकृष्णचन्द्र के जन्म से पांच वर्ष तक की बाल लीला, तथा १० वर्ष तक की पौ. गंड लीला, और दश से सोरह वर्ष के भीतर की कैशोर लीला, ये सब गोप्य चरित्र गान किये । सो इस वार्ता का क्या आश्चर्य है, क्योंकि ये श्रीनन्दनन्दन के प्रथम के सखा ही तो हैं। आपके नेत्रों से प्रेमवारि का प्रवाह, तथा शरीर में रोमांच, रात्रि दिन बना रहता था । और आपकी उदार वाणी सदा गद्गद रहती थी। श्री. श्यामसुन्दर की शोभा से तन मन भीगा रहता था। आपने अपनी कविता में “सारंग" छाप दिया है। आपकी कविता सुनते मात्र में प्रेमावेश देती है। (४०७) छरपय । (४३६) "केशोभट” नरमुकुटमणि, जिन की प्रभुता बि- स्तरी॥ "कास्मीरि" की छाप; पाप तापनि जग मं- डन । दृढ़ हरिभक्ति कुठार, आन धर्म विटप विहं- LEGIARSAIAS SCReck ॐॐॐ श्रीभकमाल सटीक। ५६६ डन॥मथुरा मध्य मलेच्छ, वाद करि, बबट * जीते। काजी अजित अनेक देखि परचै मै भीते ॥ विदित बात संसार सव सन्त साखि नाहिन दुरी । "केशौभट” नरमुकुटमणि, जिन की प्रभुता वि. स्तरी॥७५ ॥ (१३६) (६२) श्रीकेशव भट्टजी। पार्मिक तिलक। श्रीकेशव भट्टजी सब नरों के मुकुटमणि हुए, कि जिनकी प्रभुता जगत् में विस्तार हुई । आपकी "काश्मीरी" की छाप थी; आप पापों के ताप देनेवाले जगत् को शोभित करनेवाले हुए। भगवद्धर्म से विरुद्ध अन्य धर्म रूपी वृक्षों के काटने को आपने हरि- भनि रूपी दृढ़ कुठार धारण कर, उनको निर्मूल किया। मथुराजी के मध्य में म्लेच्छ यवनों से विवाद कर उन बरवटों को हरा कर विश्रान्त घाट के श्रेष्ठ मार्ग को जीत लिया। अनेक दुष्ट "काजी" चेटकी जिन्हें किसी ने न जीते थे, वे भाप का परचो प्रभाव देख अति भय युक्र हुए; यह सब वार्ता संसार में विदित है । छिपी नहीं है। सब संत साक्षी हैं कि विश्रान्त घाट के मार्ग का विघ्न "श्रीकेशवभट्ट काश्मीरी" जी ने नाश किया ॥ (१०८) टीका । कवित्त । (४३१) करि दिग बिजे, सब पंडित हराय दिये, लिये बड़े बड़े जीति, भीति उपजाई है। फिरत चौडोल चढ़े, गज वाजि लोग संग, प्रतिभा को रंग, आए"नदिया" प्रभाई है ॥ डरे द्विज भारी, महाप्रभ जू बिचारी तब, लीला बिस्तारी, गंगा तीर सुख दाई है । बैठे ढिग पाय, बोले, नम्रता जनाय, “रह्यो जग जसु छाय, नेकु सुनै मन भाई है" ॥३३३ ॥ (२६६) • * "घरबरपाखण्डी, मिथ्या मार्गचाले ॥ - نمونه - na भक्तिसुधास्वाद तिलक। ५६७ 'चार्तिक तिलक । प्रथम अवस्था में, श्रीकेशवभट्टजीने दिग्विजय कर, सब पंडितों कोहराय, बड़े बड़े विद्यावुद्धि युनों को जीत कर, भय उत्पन्न किया। चौडोल नामक पालकी पर चढ़े बहुत से घोड़े हाथी मनुष्यों को संग लिये, प्रतिभा बुद्धि के रंग में रँगे, फिरते फिरते नदिया (नवद्वीप) शांतीपुर आये; वहां के ब्राह्मण बड़े बड़े पंडित नैयायिक श्रीकेशव भट्टजी का प्रभाव देखकर डर गये। तब महाप्रभु श्रीकृष्णचेतन्य- जी ने विचार कर, सुखदाई लीला विस्तार कर, श्रीगंगानीर जहां केशव भट्ट बैठे थे वहां आ, पास में बैठ, प्रणाम कर नम्रतापूर्वक, बोले कि "आपका यश जगत् में छा रहा है, सो मेरे मन में इच्छा है कि आपकी कुछ शास्त्रसंबंधी वार्ता श्रवण करूँ॥" (४०६) दीका । कवित्त । (४३४ ) "लरिकान संग पढ़ो, बातें बड़ी बड़ी गढ़ौ,ऐ पै रदौ कहाँ सोई, सीलतापै रीमियै"। "गंगाको सरूप कहो;" "चाही ग आगेसोई," नये सौ श्लोक किये,सुनिमति भीजिय॥ तामें, एक कंठ करि, पढ़ि के सुनायौ "अहो बड़ो अभिलाप, याकी व्याख्या करि दीजियें"। अचरज भारीभयो, कैसे तुम सीखि लयो?""दयो लै प्रभाव तुम्है, ताने दयौ जीजिय" । ३३४ ॥ (२६५) वार्तिक तिलक । श्रीकृष्ण चैतन्यजी का वचन सुन, केशवभट्ट जी बोले कि "बाल- कों के संग तो पढ़ते हो, परन्तु वातें बड़ी बड़ी गढ़ते हो; अस्तु जो कहौ सो हम कहें, क्योंकि तुम्हारी शीलता पर हम प्रसन्न हैं।" आप बोले कि "श्रीगंगाजी का स्वरूप कहिये।" केशवभट्ट बोले कि "जो नेत्रों से देखते ही सोई गंगाजी का स्वरूप है।" महाप्रभु ने कहा “नये श्लोक वनाइये ॥" तव भट्टजी ने १००श्लोक बना के सुनाये । महाप्रभुजी ने सुन, 'प्रसन्न हो, उसमें का एक श्लोक सुनाकर कहा कि "इसका अर्थ कहिये, मुझे सुनने की बड़ी अभिलाषा है ।" भट्टजी ने आश्चर्ययुक्त SECREGA * +3 ५६८ श्रीभक्तमाल सटीका - . , हो पूछा कि तुमने कैसे सीख लिया ?" श्रीमहाप्रभुजीने उत्तर दिया कि जिसने आपको बनाने का प्रभाव दिया उसी ने हमको सिखा दिया।" (४१०) टीका । कपित्त । (४२३) "दूपन ओ भूपन हूँ कीजिये वखान याके, सुनि दुख मानि, कही "दोष कहाँ पाइय" । "कविता प्रबंध मध्य रहै खोटि गंध अहो! आज्ञा मो को देउ,” कह्यौ “कहि के सुनाइयै” ॥ च्याख्या करि दई नई, ओगुन सुगुन मई आये निज धाम "भोर मिले" समुझाइये। सरस्वती ध्यान कियो, आई ततकाल पाल, "वाल पै हरायो, सव जग जितवाइय" ॥ ३३५ ॥ (२६४) बार्तिक तिलक । श्रीमहाप्रभुजी ने कहा कि "इसके अर्थ, दूपण और भूपण सव कहिये।" दूपण शब्द सुन भट्टजी दुःख युक्त हो कहने लगे कि मेरी कविता में दूपण कहां ? श्रीमहाप्रभुजी ने कहा "कविताप्रबंध में दोषों की गधि अवश्य रहती है, मुझको आज्ञा दीजै तो कह मुनाऊ" भट्टजी घोले कि “कही।" तब श्रीमहाप्रभुजी ने नवीन चमत्कार युक्त अर्थ, और भूषण तथा दूपण भी सब सुना दिये । भट्टजी ने कहा कि "अच्छा प्रातःकाल हम तुमको समझावेंगे," ऐसा कह, आसन पर आ, एकांत में श्रीसरस्वतीजी का ध्यान किया। श्रीसर. स्वतीजी आई; भट्टजी बोले "हे देवि ! सम्पूर्ण जगत् से जितवा के, इस बालक से मुझे हरवा दिया ?" (४११) टीका । कवित्त । (४३०) बोली सरस्वती "मेरे ईश भगवान् वेतो मान मेरौ किती सन्मुख वतराइयै । भयो दरसन तुम्है" मन परसन होत, सुनि सुख सोत वानी आये प्रभु पाइये ॥ विनै बहु करी, करि कृपा आप बोले अजू। भक्ति फल लीजै, काहू भूलि न हराइये "। हिये धरि लई, भीर भार छोड़ि दई; पुनि नई यह भई, सुनि दुट मरवाइयै* ॥३३६॥ (२६३) * श्रीकेशव भट्ट के अनुयायियों ने कवित्त ३३ से १३६ तक के चार कवित्त निकाल दिये हैं। RECECAUSE SCkACHCECECCANUAR KARAN भकिसुधास्वाद तिलक। पातिक तिलक । श्रीसरस्वतीजी बोली कि "वे वालक नहीं हैं, ईश्वर भगवत् के अवतार हैं। मेरा प्रभाव ऐसा नहीं है कि उनके सन्मुख वार्ता करूं। जिस प्रभु को मन वाणी स्पर्श नहीं कर सकते उनका दर्शन तुमको हुआ।" भट्टजी ने सरस्वतीजी की ऐसी सुखमय वाणी सुन, महा- प्रभुजी के समीप आ, सप्रेम प्रार्थना की; श्रीमहाप्रभुजी कृपा कर कहने लगे "आप आज से भूल के भी किसी को न हराइये । श्री. कृष्णभक्रि मनुष्यतनका फल है, सो लीजिये।" यह वार्ता सुन. तेही भट्टजी हृदय में धारण कर सब भीड़भाड़ छोड़ केवल भक्ति में भारूढ़ हुए। पुनः कालांतर में दुष्टों ने मथुरा में नवीन दुष्टता उठाई तब आपने उन दुष्टों को नाश किया । (४१२) टीका । कवित्त । (४३१) आपु काश्मीर सुनी बसत विश्रांत तीरतुरक समूह द्वार जंत्र इक धारियै ।। सहज सुभाय कोऊ निकसत आय, ताको पकरत जाय ताकें 'सुन्नत' निहारिये ॥ संग लै हजार शिष्य भरे भक्तिरँगमहा अरे वही ठौर घोले नीव पद टरियै । कोधभर झारे आय, 'सूवा' पै पुकारे, वे तो देखि सबै हारे, मारे जज़ वोरि डारिये ॥ ३३७॥ (२६७) वार्तिक तिलक । श्रीकेशवभट्टजी भगवद्भक्ति में निरत "कश्मीर" * में विराजते थे। वहां ही सुना कि 'श्रीमथुरा विश्रान्तघाट के मुख्य मार्ग के बड़े द्वार पर बहुत से दुष्ट तुर्क लोगों और काजियों ने एक ऐसा यंत्र बांधा है कि जो कोई आर्य ( हिन्दू ) उसके नीचे से निकलता है उसकी 'सुन्नत्' हो जाती है (अर्थात् अधो इन्द्रीकी त्वचा कट जाती है), तब उसको बहुत से यमन पकड़ बस्त्र छोड़, दिखा के कहते हैं कि देखो तुम तो मुसल्मान्' हो; और उसको बलात्कार अपनी जाति में मिला लेते हैं।" तब एक सहस्र शिष्य संग में लिये, श्री. * किसी के मत से "कश्मीर" शब्द 'कश्यप पमेरू से है। SECREE

किया।
* FOREINS
श्रीभक्रमाल सटीक ।
भकि के रंग में भरे, अनुष्ठानादिक से श्रीसुदर्शन चक्रजी का प्रभाव
सिद्ध किये, आकर उसी "विश्रांतघाट" के मार्ग में घरवटों के उस
यंत्र का प्रभाव नष्ट कर, उसी के नीचे से निकले । देख कर बहुत से
यमन दौड़कर कहने लगे कि "देखिये ! अपना वस्त्र उघारकर आप
मुसल्मान हैं ।" श्रीभट्टजी ने शिष्यों को आज्ञा देकर सव दुष्टों को
ताड़ना कराया । भागके सव दुष्ट, जो उनका सहायक सूबा था,
उससे कहा; उसने बहुत सी सेना ( फोज ) दी । भट्टजी ने श्री-
सुदर्शन चक्रजी को स्मरण किया, उसी क्षण सबकी देह में आग
लग गई, और शिप्य लोगों ने भी दुष्टों को युद्ध कर मारा । बहुतों
को श्रीयमुनाजी में डुबा दिया। तत्र बचे हुए, 'नाजी और सूया'
चरणों पर पड़े, त्राहि त्राहि पुकार
आपने दुष्टता न करने की शपथ कराकर सबको छोड़ दिया।
उनका यन्त्र मन्त्र आदिक सब तोड़ फोड़ जल में डुवा कर तव
जिनको 'मुसल्मान' बना लिया था, उन सबों को अपने प्रभाव से
हिन्दू का चिन्ह लौटा के, भगवन्नाम स्मरण करने का उपदेश दिया।
इस भाँति मथुराजी में निष्कण्टक भगवभक्ति का प्रचार किया ॥
(४१३ ) छप्पय । (४३०)
श्रीभट सुभट प्रगट्यौ अघट रसरसिकन मन मोद
घन ॥ मधुर भाव संमिलित ललित लीला सुवलित
छवि । निरखत हरखत हृदै प्रेम बरसत सु कलित
कवि ॥ भंव निस्तारन हेतु देत दृढ़ भक्ति सवनि नित।
जासु सुजस ससि ऊदै हरत अतितम भ्रम श्रम चित॥
आनन्द कन्द श्रीनन्द सुत श्रीपभानुसुता भजन।
श्रीभट सुभट प्रगट्यौ अघट रस रसिकन मन मोद
घन ॥७६ ॥ (१३८)
RecKRICARRORMERecrachar
* "सूया" " एक सूर्य का शासक ।

भक्रिसुधास्वाद तिलक। ५७१ (६३) श्रीमट्टजी। वार्तिक तिलक। श्री " भट्ट” जी, (संसार शत्रु को पराजय करने में बड़े सुभट) ने, रसिकों के मन में आनन्द देने के लिये अपने ग्रंथ द्वारा मेघ के समान अघटित भक्तिरस को प्रगट कर वर्षा किया । ऐसी काव्यरचना की कि सुन्दर मधुर भाव से मिलित युगल छवि से सुवलित (सु वेष्टित ) ललित लीला उसमें वर्णित है। जिस जिसको बुद्धि के नेत्रों से देख सुकलित (सुयुक्त ) कविजन हर्षित हृदय से प्रेम वरसते हैं। आप अपने सदुपदेश तथा ग्रंथ से भव निस्तार के लिये सबों को नित्य दृढ़ भनि देते हैं; जिन श्रीभट्ट- जी के सुयश रूपी चन्द्रमा ने उदित होकर सुजनों के चित्त का अति अंधकार तथा श्रम, भ्रम हर लिया। आप आनन्द कन्द श्री- नन्दनन्दन और श्रीमती वृषभानुनन्दिनीजी के भजन में तत्पर थे, और वही उपदेश आपने सबको दिया। (४१४) छप्पय । (४०६) हरिव्यास तेज हरिभजन बल, देवी को दीक्षा दई । खेचर नर की शिष्य, निपट अचरज यह आवै । वि. दित वात संसार संतमुख कीरति गावें ॥ वैरागिन के वृन्द रहत सँग श्याम सनेही। ज्यों जोगेश्वर मध्य मनो सोभित वैदेही । श्रीमट्ट चरण रज परसते, सकल सृष्टि जाकों नई । हरिव्यास तेज हरिभजवल, देवी को. दीक्षा दई ॥७७॥ (१३७) (६४) श्रीहरि व्यासजी। 'वार्तिक तिलक। श्रीहरिव्यासजी ने अपने हरिभजन के तेज चल से देवी को ख 30** RAHAN ५७२ श्रीभनमाल सटीक। दीक्षा दिया । आकाश में चलने वाली देवीं मनुष्य की शिष्य हुई यह अति आश्चर्य की बात है, परन्तु यह बाते सब संसार में विदित है, और सत्यवत्रा सन्त जन श्रीहरिव्यासजी की कीर्ति गान करते हैं। आपकी चेली वैष्णवी देवी भी विद्यमान है । आपके साथ में वैराग्य-युक्त तथा श्यामसुन्दरजी के म्नेही संतों के वृन्द सदा रहते थे। वे संत नत्र योगेश्वरों के सरीखे होते थे। उनके मध्य में आप मानों "वैदेही' अर्थात् श्रीविदेहराज विराजमान होते थे। श्रीगुरु (श्रीभट्टजी) के चरण के रजस्पर्श करने से, श्रीहरिव्यासजी को सम्पूर्ण सृष्टि के लोगों ने नमस्कार किया ॥ (४११) टीका । कवित्त । (४०%) चटथावल गाँव बाग देखि, अनुराग भयौ, लयौ नित्त नेम करि चाहें पाक कीजिये । देवी को स्थान, काहू बकरा लै मास्यो पानि, देखन गलानि "इहां पानी नहिं पीजिय" ॥भूख निसि भई,भक्रि तेज मिड़ गई, नई, देह धरि लई प्राय, लखि मति भीजिये। "करी जू रसोई" "कौन करे, कछु और भोई" "सोई मोंकों दीन-दान शिष्य करि जीजिये” ॥ ३३८ । (२६१) वार्तिक तिलक । श्री "हरिव्यासजी" सन्तों को साथ लिये बिचरते "चटयावल" नाम ग्राम में प्राप; एक उत्तम वाटिका देख आपका चित्त प्रसन्न हुआ; वहां उतर के जप पूजन आदिक नित्य नेम कर, सामग्री सवाँर, आपने रसोई करने का विचार किया। इतने में उसी वा. टिका में देवी के स्थान पर किसी ने वकरा मार के देवी को चढ़ाया यह दुराचार देखकर दयालु सन्तों को अति ग्लानि हुई । निश्चय किया कि “यहां प्रसाद की तो बात क्या, जल तक भी नहीं पीना चाहिये ॥" सव संतों के साथ श्रीहरिव्यासजी भूखे ही रह गये। रात्रि हो गई श्रीहरिभक्तों के अनुताप तेज से देवी पित गई। तब नवीन देह ReceKGEECHECIAACHAR - भ . * भकिसुधास्वाद तिलक। ५७३ धारण कर, आय, संतो को देख देवी अति अनुरागयुक्त नम्र हो बोली कि "अजी संतो! आप लोग भग्वे क्यों पड़े हो ? रसोई की- जिये।" आपने उत्तर दिया कि "इस देवी और देवी के भक्कों की हिंसा देख मन में अति ग्लानि व्याप्त हो गई है। अब रसोई कौन करे।" उसने विनय किया कि "वह देवी मैं ही हूँ। मुझे यह दान दीजिये कि मुझे शिष्य कर, रसोई करके, भगवत् का भोग लगा प्रसाद पाइये पवाइये ॥" (४१५) टीका | कवित्त । (४२७) करी देवी शिष्य, सुनि, नगर को सटकी, यो पटकी लै खाट जाकी बड़ी सरदार है । चढ़ी मुख बोले "हौं तो भई हरिख्यास दासी, जौ न दास होहु तो पै अभी डारौं मार है" ॥ आये सब भृत्य भये मानौं नये तन लये, गये दुख पाप ताप, किये भव पार है। कोऊ दिन रहे, नाना भोग सुख लहे; एक श्रद्धा के स्वपच आयौ पायौ भक्ति सार है ॥ ३३६ ॥ (२६०) बार्तिक तिलक । आपने देवीजी की प्रार्थना सुन उनको शिष्य किया। देवी भग- वत्मंत्र सुन, नगर को दौड़ी, आके जो उस नगर का मुखिया था, उसको खाट समेत उठा, भूमि पर पटक, छाती पर चढ़के कहने. लगी कि "मैं तो श्रीहरिव्यासजी की शिष्य दासी हुई, तुमलोग भी जो उनके शिष्य दास न होगे तो अभी सवको मार डालूँगी।" देवी की आज्ञा सुनके सबके सब आके श्रीहरिव्यासजी के शिष्य हुए; मंत्र, माला, तिलक, मुद्रा ग्रहण कर मानों सबको नवीन शरीर प्राप्त हुए। सबों के दुःख, पाप, ताप छूट गये । भगवदभजन कर संसार से पार हुए। श्रीहरिव्यासजी वहां कुछ दिन रहे नाना प्रकार के सत्कार भोग सुख प्राप्त हुए। पश्चात् आपके समीप एक श्वपच (भंगी)बड़ी श्रद्धा से आय त्राहि त्राहि कर साष्टांग भूमि पर गिर पड़ा; आपने उसको भी सर भक्तियों का सार श्रीभगवन्नाम उपदेश दिया। वह सप्रेम रट कर भव पार हुआ ॥ ErectesterstockKKHAKTeace . net ५७४ ୫***+*** श्रीभक्तमाल सटीक । (४२७ ) छप्पय । (४०६) अज्ञान ध्वांत अंतहिं करने, दुतिय दिवाकर अव: तरयौ। उपदेशे नृपसिंह, रहत नित आज्ञाकारी। पक्क वृक्ष ज्यों नाय संत पोषक उपकारी॥वानी "भोला राम" सुहृद सबहिन पर छाया। भक्तचरणरज जांचि, विशद राघौ गुण गाया॥ “करमचन्द" "कस्यप" सदन बहुरि आय, मनो बपु धस्यौ। अज्ञान ध्वांत अंतहिं करन, दुतिय दिवाकर अवतरयौ ॥७८॥(१३६): (६५) श्रीदिवाकरजी। वार्तिक तिलक। अपने शिष्य वर्गों के हृदय के अज्ञानरूपी अंधकार को अंत (नाश ) करने के लिये श्री “दिवाकर" भक्रजी ने मानों दूसरे दिवा- कर (सूर्य ) अवतार लिया। आप श्री १०८ अग्रदेव स्वामीजी के ? शिष्य थे। सो बड़े बड़े राजसिंहों को उपदेश दिया, वे सब आपके आज्ञा- कारी रहते थे। जैसे आम्र आदिक वृक्ष सफल पक के नव जाते हैं, उसी प्रकार आप अपने फन सम्पत्ति युक्र नमित होकर संतों के । उपकारी पोषक हुए। आप "भोलाराम भोलाराम" इस वचन के सहारे से वाणी बोलते थे। (अथवा भोलाराम वणिक् आपके सु- हृद् 'मित्र' थे)। आप सब जीवों पर कृपारूपी छाया करते थे; और आपने जीवनपर्यन्त श्रीरामभक्कों के चरणों की रज ग्रहणकर, श्री- रघुनन्दनजी के चरणों का विशद गुण गण गान किया। आपके। पिता श्री "कर्मचन्द" जी, श्री "कश्यप" जी के समान थे, उनके गृह में फिर मानों शरीर धारण कर श्रीदिवाकर (सूर्यदेव ) जी ने अवतार लिया। Reccracked - sont w + भनिसुधास्वाद तिलक। ५७५ (४१८) छप्पय । (४२५) "विट्ठलनाथ" ब्रजराज ज्यों, लाल लड़ाय कै सुख लियौ ॥राग भोग नित विविधिरहत परिचर्या ततपर। सज्या भूषन बसन रचित रचना अपने कर ॥ वह गोकुल वह नंदसदन दीच्छित को सो है । प्रगट विभौ जहां घोस* देखि सुरपति मन मोहै ॥ "वल्लभ सुत वल भजन के, कलियुग मैं द्वापर कियौ । "विट्ठलनाथ" ब्रजराज ज्यों, लाल लड़ाय के सुख लियौ॥७६ ॥ (१३५) (६६) श्रीविठ्ठलनाथ गुसाईं। वार्तिक तिलक । श्रीवल्लभाचार्यजी के पुत्र श्रीविठ्ठलनाथजी ने, मानसी भावना तथा अर्चा विग्रह और अपने पुत्रों' ही में श्रीकृष्णभाव मान के, वनराज श्रीनन्दराय की नाई, मधुर प्यार लाड़ लड़ाय कर वात्सल्य- सुख को लिया। नित्यही विविध प्रकार के भोग राग, शय्या, भूषण, वस्त्र, आदिक सब अपने हाथों से रचना कर श्रीगोपाललाल को * घोष'आभीर पल्ली, अहीरों का पुरवा, गोपग्राम ॥ + सातो बेटों की सात गादिया गोकुल में बड़ी बड़ी ह सातों में भगवत् की विशाल मूर्षिया विराजमान थी उनमें से एक मूर्ति श्रीनाथजी की उदयपुर का राना और दूसरा मूर्ति चन्द्रमा की बालीय जयपुर लेगया दोना जगह विट ननाथजी की औलाद वहाँ अधिकारी या पुजारी है। उदयपुर और जयपुर में मूर्तिया अाल पगीर बादशाह के वक्त में गई अर्थात् संवत् १७१४ और १७६४ क मध्य में । एक समय श्रापके एक बेटे जो भगवत् कला थे एक बन्दर को देखकर डरकर मागकर श्रीविठ्ठलजी की गोद में श्राछिपे । "उस समय गोमाई विट्ठलनाथजी को भगवत् के ऐश्वर्य का ध्यान था इसलिये प्यार से पुनरूप से पूछा कि लंका में वैसे वैसे बन्दरों के साथ थे और यहा एक छोटे से यन्दरसे डरना पुत्र रूप भगवत् ने जमार दिया कि हम भक्त के उपासना अनुकूल चरिन कर सुप देते है यदि तुम को ऐश्वर्य चित्त में है तो चाल चरिन की उपासना क्यों यह सुन श्रीविठ्ठलजी लजित और परम अानन्द मग्न होकर आपको गोद में लिपटा लिया। SCREEKACK PRESS क्या बात है RAM श्रीभक्तमाल सटीक। ५७६ अर्पण करते; परिचर्या में तत्पर रहतेथे। जिस प्रकारद्वापर में गोकुल और नन्दजी का घर था, उसी प्रकार आप जो तैलंग ब्राह्मण दी. क्षित हैं उनका गृह शोभित होता रहा । जहां गोकुल में आपका गृह है वहां श्रीनन्दरायके घोप कहिये आभीरपल्लीका विभव प्रगट है जिसको देख चन्द्र, इन्द्र का भी मन मोहि जाता है । और क्या प्रशंसा की जाय, श्रीवल्लभाचार्यजीके पुत्र श्रीविठ्ठलनाथजीने अपने भजन के बल से कलियुग में द्वापर कर दिया । (४१६ ) दीका । कवित्त । ( ४२४ ) कायथ "त्रिपुरदास" भाकि सुख राशि भस्यौ, कस्यौ ऐसो पन सीत दगला पठाइयै । निपट अमोल पट हिये हित जटि आवै ताते अति भावै, नाथ अंग पहिराइये ॥ आयो कोऊ काल नरपति ने बिहाल कियो, भयो ईश ख्याल नेकु घर में न खाइयै । वही ऋतु आई, सुधि आई आंखि पानी भरि आई, एक द्वौति दीठि आई बेंचि ल्याइयै ॥ ३४०॥ (२८६) (६७) श्रीत्रिपुरदासजी। वार्तिक तिलक। "श्रीत्रिपुरदासजी” का नाम यद्यपि श्रीनाभाम्वामीजी के मूल में छूट गया, तथापि "श्रीविठ्ठलनाथजी" के प्रति प्रिय शिष्य कृपापात्रहोनेसे, श्रीटीकाकार प्रियादासजीने आपकी टीकालिखीहै। श्रीत्रिपुरदासजी कायस्थ शेरगढ़-निवासी का हृदय सुख राशि भक्ति से भरा था, उन्होंने ऐसा प्रेमप्रण किया कि शीतकाल में "श्रीवल्लभाचार्यजी" के ठाकुरजी को दगला ( सईदार भंगरखा) सदा भेजा करते थे । वह अति बहुमूल्य वस्त्र बड़े प्रेम से गोटा, पहा, लगवा के भेजते थे। श्रीगुसाईजी को अति प्रिय लगता था, इससे अपने ठाकुर श्रीगोकुलनाथजी के अंग में अवश्य पहिराया करते थे। परिवर्तनशीलता तो विदित ही है, कोई काल ऐसा आ प्राप्त हुआ कि राजा ने सब धन हर के आपको दुःखित कर दिया। १"द्वाति"जन्दयात, मसियानी, फजलपात्र ॥ • StickeSBREASTE tecter , vie ५७७ ****KOKANHREPORT भकिसुधास्वाद तिलक। कर्मप्रदाता ईश्वर का ऐसा खेल हुआ कि घर में नित्य भोजन भी नहीं होता था । जब वही शीतऋतु आई, तब आपको भी वस्त्र भेजने की सुधि आई; और अत्यन्त अनुताप से नेत्रों से जल बहने लगा। इतने में एक मसियानी घरमें धरी दृष्टि पड़ी; निश्चय किया कि "इसी को बेंच के कोई वन भेज दूं ॥" (४०० ) टीका | कवित्त । (४०) बेंचि कै बजार यों, रुपैया एक पायो ताकौ, ल्यायो मोटो थान मात्र रंग लाल गाइयै । भीज्यो अनुराग, पुनि नैन जल धार भीज्यो भीज्यो दीनताई, धरि राख्यो ओर आइयै ॥ कोऊ प्रभुजन आय सहज दिखाई दई, भई मन दियौ लै, "भंडारी पकराइयै काहू दास दासी के न कामको;पै, जाउ लैकै, बिनती हमारी जू गुसाई न सुनाइयै" ।। ३४१ ॥ (२८८) वार्तिक तिलक । उस कज्जलपात्रको बेचने से १) ( एक रुपया) पाया; उससे लाल रंग से भीगा (रँगा) हुआ मोटे वस्त्र का थान मोल लिया। वह वस्त्र त्रिपुरदासजी के अनुराग से भीगा, पुनः उन्हीं के नेत्र-जल- धार से भी भीगा, फिर आपकी दीनता से भी भीगा । उसको ले- कर आपने अपने घर रक्खा (आप का गृह "शेरगढ़" में था)॥". विचार करते थे कि "श्रीवृन्दावन की ओर से कोई आवेगा तो भेज दूंगा।" इतने ही में श्रीगोसाईजी का कोई जन सहज ही में दीख पड़ा। मन में भया कि “दे देना चाहिये।" उनको देकर बड़ी दीनता.से कहने लगे कि “यह श्रीगुसाईंजी के भण्डारी (कोठारी) के हाथ में दे दीजियेगा । यद्यपि यह वस्त्र किसी दासी दास के काम का भी नहीं है तथापि लेजाइये, मेरी ओर से कुछ विनय प्रार्थना वा, इस वस्त्र का ही समाचार, श्रीगुसाईजी को मत सुनाइयेगा।" SAGAR *** .

** ISKIN ५७८ श्रीभकमाल सटीक। तीर। . । . "राजिन्दर, जानकी-वर-चरण ध्यावो । सुयश श्रीप्राणपति के नित्य गावो।" (जानकी प्रपन्न राजेन्द्रशरण, छपरा) दो० "जीते भज्यो न रामही, मस्यो न सरयू वनादास तिन व्यर्थ ही, पायो मनुज शरीर ॥ १ ॥ दरस स्वाति सुन्दर जलद, प्यासे चातक नैन । कवौं दर्शन पाइ है, ! कब लहिहै सुग्व चैन ॥२॥ हम वासी वहि देश के, जहां जाति कुल नाहिं । देह मिलन हो तो नहीं, वहाँ सु शब्द मिलाहिं ॥ ३॥" (४१) टीका | कवित्त । (१००) दियो लै भंडारी कर राखे धरि पट, वापै निपट सनेही नाथ बोले अकुलाय के । "भये हैं जड़ाये, कोऊ वेग ही उपाय करौ;" विषिधि उढ़ाये अंग बसन सुहाय के ॥ भाज्ञा पुनि दई, यों अंगीठी वारि दई, फेर वही भई, सुनि रहे अतिही लजाय कै । सेवक बुलाय कही "कौन की कवाय आई ?' सबै सी सुनाई, एक वही ली व- चाय के ॥ ३४२ ॥ ( २८७) पार्तिक तिलक। उसने लाके गुसाईजी के कोठारी के हाथ में दे दिया। उसने उस वस्त्र को विछा के उसी पर अच्छे अच्छे वस्त्र रख दिये। परन्तु, श्रीअत्यन्त स्नेही नाथ अति अकुला के गुसाई श्रीविठ्ठलनाथजी से बोले कि "हमको जाड़ा बहुत लगा है, शीघही कुछ उपाय क- रिये" गुसाईजी ने रुई भरे बहुत से सुन्दर सुन्दर वस्त्र उढ़ाये, प्रभुने फिरि आज्ञादी कि “जाड़ा तो नहीं गया।" गुसाईंजी ने अंगीठी बार कर प्रभुके आगे रखदी। फिर प्रभुने कहा कि “जाडा तो नहीं गया।" सुनके श्रीगुसाईजी लजित होगये कि "अब क्या उपाय करूं।" तर विचार कर सेवक को बुला पूंछा कि किस किसकी कवाय (जड़ावर) आई है ? वह (कोठारी) एक त्रिपुरदासजी का नाम छोड़ और सब के नाम एक एक कर कह गया । BacKEKHAKKHESCIENCEREMIEKURA भकिसुधास्वाद तिलक। (४२२) टीका । कवित्त । (४२१) सुनी न "त्रिपुरदास" ! बोल्यो “धन नास भयो, मोटो एक थान आयौ राख्यौ है विछाय के"। "ल्यावौ बेगि याही छिन" मन की प्रवीन जानि, ल्यायो दुख मानि, व्योंति लई सो सिवाय के ॥ अंग पहिराई सुख दाई, का पै गाई जाति, कही तब बात “जाडो गयो भरि भाय के" । नेह सरसाई, ले दिखाई, उर आई सबै ऐसी रसिकाई हृदै राखी है वसाय के ॥ ३४३॥ (२८६) वार्निक तिलक। गुसाई जी ने कहा "त्रिपुरदास की जड़ावर का नाम तो नहीं सुना ?" उसने कहा कि "उनका सब धन नाश हो गया ! एक बहुत मुटिये वस्त्र का थान भेजा है, उसको मैंने वस्त्रों के नीचे बिछा रक्खा है।" श्रीगुसाईजी ने सुनते ही कहा कि वह वस्त्र इसी क्षण ला । प्रभु प्रवीण ने उनके मनकी प्रीति जान ली। वह विमन होके लाया, श्री- गुसाईजी ने अति शीघ्र ही, सीनेवालों को बुलाय व्योताय, सिला के, प्रभु के श्री अंग में पहिनाया, प्रभु को वह अत्यन्त सुखदाई हुआ। प्रभु ने अकथनीय सुख पाके कहा “अब हमारा जाड़ा गया" (प्रेम के भने सांवलिया) देखिये भक्त के स्नेह की सरसता प्रभु ने दिखाई । यह सबके हृदय में निश्चय हुआ कि श्रीनाथ ने इस प्रकार की रसिकाई.अपने हृदय में बसा रक्खी है । श्रीत्रिपुरजी की जय ॥ (६८) श्रीविठ्ठलेशसुत। (१०६) छप्पय । (४२०) (श्री) बिट्टलेस-सुत मुहृद श्रीगोबरधनधर ध्या- इयै ॥ श्रीगिरिधर जू सरससील, गोविन्द जु साथहि। बालकृष्ण जसवीर, धीर, श्रीगोकुलनाथहि ॥ श्री- रघुनाथं जु महाराज, श्रीजदुनाथहि भजि । श्रीधन- Foregardipetheir 8.५८२ श्रीभक्रमाल सटीक। (६६) श्रीवालकृष्ण (कृष्णदास) जी। चार्तिक तिलक। । गिरिधारी श्रीकृष्णचन्द्र ने श्रीकृष्णदामजी पर रीझ के अपने नाम में साझी किया अर्थात् आपका नामभी "कृष्ण" (बालकृष्ण वा कृष्णदास) रखवाया और आपके नाम का पद बनाया । आप गुरु श्रीवल्लभाचार्य सम्प्रदाय के अनुसार जो भजनकीरीति, तिसमें पूरे और गुणागार हुए । आपकी कविता निर्दोष तथा भनोखी हुआ करती थी। आप छठे ही वर्ष से भगवत्सेवा में प्रवीण हुए। आपकी वाणी को पण्डित लोग आदरते और वन्दना करते थे। कि जो अलंकृत तथा श्रीगोपालजी के सुयश से भूपित होती थी। आप श्रीवज की रज की बहुतही पाराधन और उसको धारण किया करते थे। आप सबों से सुचिन्तित थे अथवा सब प्रकार से निश्चिंत रह भगवचिन्ताही में लगे रहते थे, और सर्वदा महात्मा सन्तों के संग में रहा करते थे। श्रीराधाकृष्ण भजन का एक मात्र दृढ़ व्रत भापको था । (४२५) टीका । कवित्त । (४१८) प्रेम रसरास कृष्णदासजू प्रकास कियो, लियो नाथ मानि सो प्रमान जग गाइयै । दिल्ली के बजार मैं जलेबी सो निहारि नैन, भोग लै लगाई, लगी विद्यमानपाइयै ॥ राग सुनि भनिनी को, भए अनुराग बस, ससि मुख लालजू को जायकै सुनाइये। देखिरिमवार रीझि निकट बुलाइ लई, लई संग चले, जगलाज को बहाइ- यै ॥ ३४४ ॥ (२८५) वाति तिलक । श्रीवालकृष्णजी ने प्रेम रस की राशि प्रकाश की और आपके ठाकुर " श्रीनाथजी ने आपकी प्रेमनिष्ठा से अति प्रसन्न भी हुए सो यह बात जग में प्रसिद्ध है;"प्रेमरसराशि" नाम एक ग्रन्थ भी बनाया।उसको प्रभु ने अंगीकार किया। Ancona MOLECHOKE .

भक्तिसुधास्वाद तिलक ५८३ एक समय आप कुछ वस्तु लेने दिल्ली गए; वहां एक मिठाईवाले के यहां उत्तम जलेबियां कड़ाही से निकलती देख, उन जलेबियों को "श्रीनाथजी" को (मानसी) भोग लगाया । प्रेम के ग्राहक श्रीठा- कुरजी ने स्वीकार कर लिया। यहां मन्दिर में थार उसारने के समय जलेबियों का थार भी पाया गया । आगे चलकर एक बारमुखी के राग सुनकर आपने अनुरांगावेश में उससे पूछा कि "हे चन्द्रमुखी भक्तिनि ! मेरा शशिमुख लाला राग का बड़ा रसिक है, तुम उसको राग गान सुनाने के लिये मेरे साथ चलोगी?" उसने रिझवार समझ कहा कि ''हां, चलूंगी।" आप लोक की लज्जा छोड़, उस वारमुखी को अपने साथ लाए। (४२६) टीका । कवित्त । (४१७) नीके अन्हवाय, पट आभरन पहिराय, सोंधौ हूं लगाय, हरि- मन्दिर में ल्याये हैं। देखि भई मतवारी, कीनी लै अलापचारी, कह्यो "लाल देखें ?" वोली "देखे, में ही भाये है" ॥ नृत्य, गान, तान भावभरि मुसक्यान, दृग रूप लपटान, नाथ निपट रिझाये हैं। हैकै तदाकार, तन छूट्यौ अंगीकार करी, धरी उर प्रीति, मन सबके भिजाये हैं ॥३४५॥ (२८४) वार्तिक तिलक। उस वारमुखी को ब्रज में ला, भली भांति स्नान करवा, वसन भूषण पहिरा, शृङ्गार करा, सुगन्ध लगा, उसे "श्रीनाथ" जी के मन्दिर में लाकर ठाकुरजी के सामने खड़ीकर, आज्ञा की कि "म- नुष्यों को बहुत रिझाया; अब तेरा भाग्य चमका हमारे लालजी को रिझा।" वह हरि के दर्शन पा मनवाली हो नाचने गाने लगी। आ- पने पूछा "मेरे लला को तूने देखा ?" उसने उत्तर दिया कि "केवल देखाही नहीं वरन इनकी सौन्दर्य पर अपना तनमनभी वारचुकी। उसने गाया, नाचा, भाव बताया, अपनी सब कलाएं प्रगटकर भगवत् को अतिशय रिझा लिया । तदाकार हो गई। सवको प्रेम रङ्ग में भिगा दिया; शरीर उसी दशा में छोड़कर परमपदको पहुँच गई। RMERIKRECRecrCMCRICK BCCROR , . WHER+*** ५८४ श्रीभनमाल सटीक। (४२७ ) टीका । कवित्त । ( ४१६) आए, सूर सागरं सो कही "बड़े नागर हौ, कोऊ पद गावी, मेरी छाया न मिलाइयै” । गाये पाँच सात, सुनि जान मुसुकात, कही भलें जू प्रभात आनि करिकै सुनाइये | पस्यो सोच भारी, गिरिधारी उर धारी बात, सुन्दर बनाय, सेज धस्यो यो लखाइये। आय के सुनायो, सुख पायौ, पच्छपान लै बनायो, हूं मनायो रङ्ग छायो, अभू गाइयै ।। ३४६ ॥ (२८३) वार्तिक तिलक। श्रीसूरजी से मिले, श्रीसूरजी ने आपसे कहा कि "भाई । तुम बड़े चतुर हो, एक पद बनाक सुनाओ पर उसमें मेरे किसी पद की छाया न पाई जावे " आपने पांचसात पद सुनाए; पर सूरजी ने ! मुसक्याके बताया कि इनमें मेरे अमुक अमुक पदकी छायाहे । निदान । यह ठहरी कि आज रहे, कल नया पद सुनाया जावै । श्रापको बड़े सोच में देख श्रीगिरिवरधारीजी ने मन में विचार एक सुन्दर पद * बनाके आपके आसन पर रख दिया जिसको देख आप बड़े प्रसन्न हुए। आपने जाकर श्रीसूरजी को सुनाया। श्रीसूरजी ने अति सुख पाकर कहा कि "आपके ठाकुर ने अपने बाबा का ( आपका) पक्षपात कर आपके निमित्त स्वयं बना दिया है। दोनों मूर्ति भग- वकृपा के रङ्ग में पग गए । अव तक वह पद गाए जाते हैं। (४२८) टीका । कपित्त । (१५) कुवां में खिसिलि, देह छूटि गई, नई भई, भई यों असंका कळु और उर आई है। रसिकन मन दुख जानि, सो सुजान नाथ दिया दरसाय, तन ग्वाल सुख दाई है ॥ गोवर्द्धन तीर कही "आगे बलबीर गये श्रीगुसाई धीर सों प्रनाम," यो जनाई है । धनहू बतायो, खोदि पायो, विशवास आयो, हिये सुख छायो, सेक पंक ले बहाई है ॥ ३४७ ॥ (२८२) * कहते ह कि उस पद का प्रथम तुक यह है:- भावन बने कान्ह गोप चालक सँग बच्छ की खुर रेणु छुरित अलकावली.". । , गै NRNA SARI भकिसुधास्वाद तिलक। ५८५ वार्तिक तिलक । फिसल के कुआं में गिर पड़े; शरीर छूट गया; दिव्य नवीन देह पाई । लोगों ने अकालमृत्यु की भाशंका की । रसिक जनों के मन में दुःग्व हुआ । सो जानकर श्रीनाथ सुजानशिरोमणि ने दिखा दिया कि आप दिव्य ग्वालशरीर धरे गोवर्धन पर्वत की जड़ में यह कहते चले जा रहे हैं कि " बलवीर आगे गए हैं उनके पीछे जाता हूँ; गुसाईंजी से मेरा प्रणाम कह देना। और अमुक ठिकाने इतना धन है साधुसेवा में लगा देवें ।" खोदा गया तो वह द्रव्य मिला, सवको विश्वास आया, शंका रूपी पंक धुल गया सबका 'मन प्रसन्न हुआ ॥ (१००) श्रीगोकुलनाथजी। गुसाई गोकुलनाथ जी (श्री १०८ वल्लभाचार्यजी के पोते, श्री. विट्ठलनाथ के पुत्र ) के पास एक धनी ने लाखों रुपए भेंट देने के लिये लाकर विनय किया कि मुझे शिष्य कीजिये।" आपने उससे पूछा कि "किसी वस्तु में तुम्हारी विशेष प्रीति आशक्ति है ?" उसने उत्तर दिया कि "किसी में नहीं।" आपने कहा कि “जब तुममें प्रीति का बीज ही नहीं तो मैं तुम्हें शिष्य नहीं कर सकता; यदि किसी में प्रेम होता तो उसे मोड़कर श्रीशोभाधाम के चरणों में लगा दिया जाता॥" "कान्हा" नाम एक भंगी मन्दिर के बाहर झाडू लगाया क. रता और सामने से “श्रीनाथ" जी का दर्शन कर प्रेम में मग्न हुआ करता था। सवकी दृष्टि वालक (ठाकुरजी) पर न पड़े, इसलिये आपने एक भीत ( दीवार ) खिंचवा दी। दर्शन न पाने से कान्हा विन हुआ। श्रीठाकुरजी ने उसे नीन गत बगवर स्वम में बाजार "गोकुलनाथ से-कह कि यह भीन गिरवा दें।" कान्हाजी पर तो विनय नहीं कर सके पर रिमी से कह दिया । तब गोई उससे पूछा। उसने सब बाना कही । माप प्रेम में डूबे, सक BEST KKREGAR , *** เจเจ ५८६ श्रीभक्तमाल सटीक कृपापात्र जान हृदयसेलगालियाऔर नई भीतगिरवा दी क्योंकि उस सेस्वप्नका प्रमाण मिला।प्रेम की ग्राहकता की जय, प्रेमियोंकी जय॥ चौपाई। "कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानौं एक प्रेम को नाता ॥" १०१। १०२ श्रीवईमान । श्रीगंगलजी। (४२६ ) छप्पय । (४१४) "वईमान," "गंगल" गंभीर, उभै थंभ हरिभक्ति के॥श्रीभागौत बखानि, अमृत मय नदी बहाई अमल करी सव अवनि, ताप हारक सुखदाई ॥ भ- क्लन सों अनुराग दीन सों परम दयाकर। भजन जसो. दानन्द सन्तसंघट के आगर ॥ भीषमभट्ट अंगज उदार,कलियुगदाता सुगति के। "बर्द्धमान,” "गंगल" गंभीर, उभै थंभ हरिभक्ति के ॥२॥( १३२) (११)श्रीवर्द्धमानजी। (२) श्रीगंगलजी। (३) श्रीभीमभट्टजी ॥ वार्तिक तिलक ।। श्रीवर्द्धमानजी और श्रीगंगलजी, दोनों भाई "श्रीभीष्मभट्ट जी के पुत्र बड़े गम्भीर, उदार, त्रिताप हरनेवाले, सुख देनेहारे, बड़े दीनदयाल, भगवद्भनि के दो खम्भे, कलि के जीवों के सद्गति के देनेवाले हुए; श्रीमद्भगवत् की कथा कहने में मानो अमृत की नदी वहाते थे; संसार भर में आप दोनों का यश विदित था; हरि- भनों से बड़ा अनुराग रखते थे; सन्तसमूह में अग्र अथवा सन्तों के संग में आगर और श्रीयशोदानन्दनजी के भजन में निपुण थे। (४३०) छप्पय । (४१६ ) "रामदास" परतापते, "पेम गुसाई" षेमकर ॥ actoCKETERSCRIKASKICKRECECRESS ,

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५८७
भकिसुधास्वाद तिलक।
रघुनन्दन को दास, प्रगट भूमंडल जाने।सर्वस सीता-
राम और कछु उर नहिं आने ॥ धनुष बान सों प्रीति,
स्वामि के आयुध प्यारे । निकट निरंतर रहत होत
कबहूँ नहिं न्यारे । सूरवीर हनुमत सदृश, परम उपा-
सक प्रेम भर। “रामदास" परतापते, “मैं गुसाई'
षेमकर ॥८३ ।। ( १३१)
१०३) श्रीक्षेम गुसांईजी।
वार्तिक तिलक।
गुरु महाराज श्रीरामदासजी के प्रताप से, श्रीक्षेम गुसाईंजी
कल्याण करनेवाले हुए । जगत्भर में यह विख्यात है कि आप श्री-
रघुनन्दनजी के परम भक्त थे, कुछ भी हृदय में नहीं लाते थे, केवल
श्रीसीतारामजी को अपना सर्वस जानते थे; स्वामी के आयुध धनुष
बाण आपको अति प्रिय थे, धनुष वागा से अतिशय प्रेम रखते थे।
आपका मन श्रीयुगलसर्कार से अलग नहीं होता, सदेव श्रीचरणों
ही में रहता था। श्रीमारुतिजी की छाया सूर वीर, अनन्य उपासक
और परम प्रेमी थे।
( ४३१) छप्पय । (४१०)
"विट्ठलदास" माथुरमुकुट भयौ अमानी मानदा॥
तिलक दाम सोंप्रीति,गुनहिं गुन अंतर धारयौ । भक्तन
को उतकर्ष जनम भरि रसन उचारयो । सरल हृदै,
संतोप जहां तहां, पर उपकारी । उत्सव में सुत दान
कियो कर्म दुसकर भारी॥ हरि गोविन्द जै जैगोविन्द
गिरा सदा आनंददा। "विट्ठलदास माथुरमुकुद भयौ
अमानी मानदा॥८४॥ (१३०)
पेमकर क्षेमकर॥
KAR

REAK श्रीभक्रमाल सटीक। ५८८ चौबे ब्राह्मण . (१०४) श्रीविठ्ठलदासजी। वार्निक तिलक। श्रीविठ्ठलदासजी उत्तम माथुर थे 'सबाहिमानषद आपु अमानी।' आपको तिलक ( उर्द्रपुण्डू ) और कगठीमाला से बड़ी प्रीति थी। गुण ही गुण को (अवगुण को नहीं) उर में रखते थे। सन्तों भक्रोंकी बड़ाई जन्मभर आपकीजिह्वापर रही।सरलहृदय, सन्तोपशील, और परहितरत थे, ऐसा भारी दुष्कर कर्म किया कि उत्सव में पुत्र को भगवत् की न्यवछावर करके दान कर दिया। सदा "गोविन्द" नाम ऐसे प्रेम से उच्चारण किया करते थे कि सब को आनन्दमग्न करदेते थे ।। ( ४३२) टीका । कवित्त । ( ४११) भाई उभै माथुर, सुराना के पुरोहित हे, लरि मरे आपस में, जियो एक जाम है । ताको सुत विठ्ठल सु दास, सुख रासि हिये लिये, धैस थोरी भयो बड़ी सेवे स्याम हे ॥ बोल्यो नृप सभा मध्य, 'आवतन विप्र सुत, छिप लैकै आवों" कही, कह्यो "पूजे काम है" फेरि के बुलायो, “करौ जागरन याही ठौर," काहू समझायो "गावै नाचे प्रेम धाम है" ॥३४॥ (२८१) वार्तिक निलक । "श्रीविठ्ठलदासजी" के पिता और चचा उत्तम माथुर चौबे ब्राह्मण, और राना के पुरोहित थे; दोनों भाई आपस में लड़कर पहर भर में मर गए । विठ्ठलजी उस समय थोड़ी ही थैम के थे; पर लड़कपन ही से आप सुखराशि श्याम को अपने हृदय में रखते थे। राना के पास जाने आने की आवश्यकता नहीं समझते थे । एक दिन राना ने सभा में पूछा कि "वह विप्रसुत आना नहीं है ! क्या बात है ?" दुर्जनों ने कहा कि वह अपने तई लोभ रहित हरिदास अनुमान करता है।" राना ने शीघ्र चुना भेजा; आपने उत्तर दिया कि "श्रीहरिगोविन्दकृपा से गना के प्रताप से मेरी कामना पूर्ण है KALECRCHASE KAKAR .

- , WER भक्तिसुधास्वाद तिलक। ५८६ रानाजी को कष्ट क्यों दूं।" किसी ने कहा कि "वह नाचनेगाने में ही बैरागियों के साथ अपने घर अपना दिन बिताता है।" पुनः राना ने आपको कहला भेजा कि "आज रात को हरिकीर्तन जाग. रण हमारे ही यहां हो ॥" (४३) टीका । कवित्त । (४१०) गये संग साधुनि ले, विनै रंग रंगे सब, राना उठि आदर दे, नीके पधराये हैं । किये जा बिछौना तीनि छत्तनि के ऊपर ले, नाचि गाय आये प्रेम गिरे नीचे आये हैं ॥ राजामुख भयो सेत, दुष्टनि कों गारी देत, सन्त भरि अंक लेत, घर मधि ल्याये हैं । भूप बहु भेंट करी, देह वाही भांति परी, पाछे सुधि भई, दिन तीसरे जगाये हैं॥३४६ ॥ (२८०) वार्तिक तिलक। आप साधुओं को साथ लेकर पहुँचे; सबके सब विनय प्रेम में रंगे थे, और श्रीविठ्ठलजी के प्रेम का कहना ही क्या । राना ने उठकर समाज का आदर सम्मान किया। कई दुर्जनों के कहने से जागरण के लिये विछावन तिग्वने की छतपर कराया गया था। समाज को वहीं पधराया। श्रीविठ्ठलजी भगवद्यश नाम के कीर्तन में प्रेम से ऐसे बेसुध हुए कि तिखने पर से नीचे धम से गिर पड़े। राना का जी उड़गया, बहुत ही डरा, उन दुष्टों पर क्रोध करके दुर्वचन सुनाए । साधुओं ने आपको गोद में उठालिया, घर लाए । श्रीभकरक्षक भगवान की कृपा से आपको चोट का तनक नाम तक नहीं पहुँचा। शरीर वैसा ही पड़ा रहा, तीसरे दिन सुध बुध आयी, श्राप जागे । राना ने अपराध क्षमा कराया, वहुन कुछ भेंट . . पूजा भेजी॥ --- . (४४) टीका । कवित्त । ( ४०६ ) उठे जब, माय ने जनाय सब बात कही, सही नहीं जात निसि निकसे विचारिक। आये यो "छठीकर।" मैं, गरुड़ गोबिन्द सेवा, करत मगन हिये रहत निहारि कै ॥ राजा के जे लोग सु तौ ढूँदि करि रहे बैठि, तिया मात आई करै रुदन पुकारि कै । किये ले FREER ।

PEARSATAREKARSANKARI ५६० श्रीभक्तमाल सटीक। - 1 उपाय, रही किती हाहा खाय, ये तो रहे मँडराय, तब बसी मन हारि कै ।। ३५० ।। (२७६) बार्तिक तिलक। जब श्रीविट्टलजी की मूर्छा गई तो आपकी माताजी ने राना की परीक्षा की सब बात कह सुनाई । आप रात के समय अपने घर से चलदिये "छठीकरा ग्राम में पाए जहां श्रीयशोदाजी ने भगवान् की छठी की थी। वहां श्री " गरुड़गोविन्द" जी की सेवा पूजा में तत्पर हुए; प्रभु की छवि देख देख मग्न रहा करते थे। राना के नौकरों ने लाख दूँढा, कहीं नहीं पाया । पर आपकी स्त्री तथा माता को आप मिल; त्रिया और माता चिल्ला चिल्ला कर रोने लगीं; घर चलने के लिये बहुत कुछ कहा पर आपने एक न सुनी; वहीं जमे रहगए। तब हारकर आपकी स्त्री और माताजी भी वहीं रहीं। (४३५) टीका | कवित्त । (१०८) देख्यो जब कष्ट तन, प्रभू जू स्वपन दियो “ जावो मधुपुरी ऐसे तीन बार भाषियै । आये जहां जाति पांति छाये कछु और रंग; देग्यो एक खाती, साधु संग अभिलापियै ॥ निया रहै गर्भवती सती मति सोच रती. खोद भूमि पाई प्रतिमा सु धन राषियै । खाती को वुनाय कही "लही यहु लेहु तुम" उन पाँय परि कह्यौ रूप मुख चाषिये ॥ ३५१ ॥ (२७८) वार्तिक तिलक। आपको कुछ कष्ट में देख कर भगवत् ने तीन बेर स्वप्न में आज्ञा की कि “ मधुपुरी (श्रीमथुराजी) जाओ।" आज्ञानुसार मथुराजी गए, परन्तु वहां अपनी जाति को और ही रंग में अर्थात् भगवद्- भक्ति से विमुख पाया, इस कारण से एक बढ़ई साधु सेवी के घर में आसन किया। आपकी स्त्री परम सती गर्भवती थीं, इससे द्रव्य के अभाव से कुछ शोच हुआ । मिट्टी खोदते में श्रीसीताराम कृपा से बहुत सा धन और एक भगवत्प्रतिमा प्राप्त देख कर आप उस बढ़ई भक sks RSSC *** भकिसुधास्वाद तिलक । को देने लगे; पर भक्तजी ने पांव पड़कर विनय किया कि "भगवत् की और भागवत की सेवा के योग्य आपही हैं।" (४३६) टीका | कवित्त । (४०७) करें सेवा पूजा, और काम नहिं दूजा, जब फैलि गई भकि, भये शिष्य बहु भाय के। बड़ोई समाज होत, मानों सिंधु सोत आये विविध, वधाये गुनीजन उठे गाय के ॥ आई एक नटी गुण रूप धन जटी,. वह गावै तान कटी, चटपटी सी लगाय कै । दिये पट भूषन ले, भूख न मिटत किहूं, चहूं दिसि हरि पुत्र दियो अकु- लाय कै॥ ३५२॥ (२७७) कात्तिक तिलक। श्रीविठ्ठलजी पूजा छोड़ और कुछ नहीं करते थे, सो आपकी भगवत्सेवा ऐसी विख्यात हुई कि बहुत लोग आ आ के आपके चेलें हुए । वड़े धूमधाम से समाज होता था मानो उत्सव के सोते समुद्र में आ पहुँचते थे। गुणियों का नाचना गाना भी भले प्रकार से होता था। एक दिन एक गुणवती नटी ने भगवत् के आगे ऐसा नृत्य और कीर्तन किया कि बेसुध होकर श्रीविठ्ठलदासजी ने सब सम्पत्ति की तो बात ही क्या, वरच अपने पुत्र श्रीरंगीरायजी तक को भी श्रीभगवत् पर न्यवछावर करके उस नदी को दे दिया। दो० "रूप, चोज की बात पुनि, सरस कटीली तान । रसिक प्रवीणन के हिये, छेदन को ये धान ॥" (४३७) टीका । कवित्त । (४०६) " रंगी राय" नाम ताकी सिप्या एक रानासुता, भयो दुख भारी नेकु जलहूं न पीजिये । कहि के पठाई वासों, " चाहौ सोई धन लीजे, मेरो प्रभु रूप मेरे नैननिकू दीजिये " ॥ द्रव्य तो न चाहौं, रीमि चाहाँ तन मन दियो, " फेरि के समाज कियो बिनती को कीजिये । जिते गुनीजन तिनै दिये अनगन दाम, कस्यो आप, देत सो न लीजिये ॥ ३५३ ॥ (२७६) CALCASSES Karact पाछे नृत्य R** NRNA श्रीभक्तमाल सटीक। ५६२ - . N वातिक तिलक । श्रीरंगीरायजी की शिष्या राना की एक लड़की थी; इसने यह सुनकर कि "हमारे गुरुजीको उनके पिता श्रीविठ्ठलदासजीने अमुक नदिनी को दान कर दिया," अन्न जल छोड़ दिया और उसनटिनी । को कहला भेजा कि "मनमाना धन मुझसे ले मेरे गुरु भगवान् को मुझे दे कि दर्शन किया करूं।" उसने उत्तर दिया कि "मैं व्य की भूखी नहीं, हां रीझने पर तो तन मन धन सबही दे सकती हूं।" राजकन्या ने श्रीविठ्ठलजी से बहुत विनय करके, पुनः भागवत- समाज कराया। सब गुणी नाचे गाए, उनको इसने बहुत कुछ दिया, और इसने आप भी भगवत् के आगे नृत्य किया; श्रीविठ्ठलजी न्यव. छावर देने लगे पर न लिया। (४३%) टीका । कवित्त । (४०५) ल्याई एक डोला में बैठाय रंगीराय जू को, सुन्दर सिंगार, कही बार तेरी आइयै । कियो नृत्य भारी जो बिभूति सो तौ वारि लिये भरि अंकवारी भेंट किये द्वार गाइये ॥ "मोहन न्योछावर में भयो, मोहि लेहु मति, "लियो उन शिष्य, तन तज्यौ कहा पाइयै । कह्यौ जू चरित्र चड़े रसिक विचित्रन को, जो पै लाल मित्र कियो चाही, हिये ल्याइयै ॥ ३५४ ॥ (२७५) वार्तिक तिलक । श्रीरंगीरायजी के सुन्दर शृङ्गार कर, उनको डोले में विठला, वह नटिनी ले आई, और कहा कि "अब नृत्य करने की तुम्हारी बारी है।" श्रीरंगीरायजी ने ऐसा नृत्य तथा गान किया कि निपट रीझके नटी श्रीरंगीरायजी को न्यत्रछावर कर फिर श्रीविठ्ठलदासजी को देने लगी, पर जब आपने न लिया तो इनकी शिष्या राजकन्या ने इनको ले लिया और अति प्रसन्न हुई । उसी क्षण श्रीरंगीरायजी ने अपने प्राण भी भगवत् को न्यब. छावर कर दिये॥ बड़े बड़े रसिकों के चरित्र मैंने गा सुनाये, जो आप चाहते हो कि "श्रीयुगल सरि के चरणों में प्रेमापराभनि मुझे होवे," तो Getecturectel 1 ॐॐॐ भकिसुधास्वाद तिलक। ५६३ इन रसिकों के अपूर्व चरित्रों को अपने हृदय में आप धारण करें । ( ४३६ ) छप्पय । (४०४) हरिराम हठीले भजनबल, राना को उत्तर दियौ। उग्र, तेज, उदार, सुघर, सुथराई सीवा । प्रेमपुंज, रसरासि, सदा गद्द सुर (स्वर) ग्रीवा ॥ भक्तन को अपराध करै ताको फल गायो । हिरण्यकशिपु प्रहांद परम दृष्टांत दिखायौ । सस्फुट बकता जगत मैं, राज- सभा निधरक हियौ । हरिराम हठीले भजनवल, राना को उत्तर दियौ ॥८५॥ (१२६ ) (१०५) श्रीहरिराम हठीले। वार्तिक तिलक। श्रीहरिराम हठीले जी उग्र, तेजस्वी, उदार, सुघर, बड़े सुन्दर, प्रेमपुञ्ज, रसराशि थे; आपके गले का स्वर सदा गद्गद रहा करता था। जो कोई किसी हरिभक्त का अपराध कर उसका क्या फैन होता है, सो श्रीप्रसादजी के शत्रु हिरण्यकशिपु का उदाहरण देकर, राजसभा में, राना से, निधड़क और स्पष्ट रूप से कह ही सुनाया; भगवद्गजन के बल से जी में राना का कुछ डर न आया । (४४०) टीका | कवित्त । (४०६) राना सों सनेह, सदा चौपर का खेल्यौ करे, ऐसो सो संन्यासी भूमि संत की छिनाई है । जायकै पुकारयो साधु, झिरकि विडायो, पस्यो विमुख के धस, वात सांची ले झुठाई है ॥ भाये हरिराम जू पै, सबही जताई, रीति प्रीति करि बोले चल्यो आगे आवै भाई है। गये, बैठे, 'आयौ जन' मन में न ल्यायो नृप, तब समुझायो, मास्या; फेरि भ दिवाई है ।। ३५५॥ (२७४) वार्तिक तिलक । राना के दर्वार में एक संन्यासी था जो राना के साथ चौपर CRICKECRECRACTERECORRECRACREAC-tra MARATHI श्रीभक्रमाल सटीक। ५६४ . खेला करता और उस कारण वह बहुत मुँह लगा होगया था । उस ने एक वैरागी साधु की भूमि छिनवा दी । सन्त ने राजसभा में जाकर पुकारा; परन्तु उस विमुख ( संन्यासी ) के वश में होकर राना ने इन्हें झिड़की के साथ निकलवा दिया; सच्चे पुकार को झूठा समझा। बैरागी सन्त ने आकर श्रीहरिरामजी से अपना सब वृत्तान्त निवेदन किया। आप इन्हें भाई जानकर अथवा यह बात मन भाई मान, रीति प्रीति कर, बोले कि "चलो।" आप उनको लेकर राना के दर्वार में जा बैठे, पर राना तनक भी अपने मन में यह बात न लाया कि हरिजन आए हैं। तब आपने उस राना को फटकारा, और हिरण्यकशिपु की दशा सुनाकर उसे समझा दिया कि सन्त का अपराध करने का परिणाम कैसा होता है । राना ने साधु की भूमि फेर दी । वे परस्पर मुदित हुए । (४४१) छप्पय । (४०२) "कमलाकरभट" जगत में, तत्त्ववाद रोपी धुजा। पंडित कला प्रवीन अधिक आदर दे आरज। संप्रदाय सिरंक्षत्र, द्वितीय मनों "मध्वाचारज" ॥जेतिक हरि अवतार, सबै पूरन करि जान । परिपाटी "ध्वजविजे" सदृश, भागौत बखानै । श्रुति, स्मृति. संमत पुरान, तप्तमुद्राधारी भुजा । "कमलाकरभट” जगत में, तत्त्ववाद रोपी धुजा ॥८६॥ (१२८) (१०६) श्रीकमलाकरभट्टजी। वार्तिक तिलक। पण्डित श्रीकमलाकरभट्टजी ने जगत् में तत्ववाद की ध्वजा फहरायी थी। कना प्रवीण थे, और आर्य (श्रेष्ठ ) लोगों का बड़ा आदर मान किया करते । "श्रीमाध्वसम्प्रदाय" के सीस के छन, . BEEGCOM -RRIER HEARTHAKETsi भनिसुधास्वाद तिलक। ५६५ मानों द्वितीय "मध्वाचार्य" ही थे। भगवान् के जितने अवतार, । उन सबके सवही को पूर्ण अवतार मानते, अंश कला भेद नहीं रखते थे। "विजयध्वजी" परिपाटी के अनुसार "श्रीमद्भागवत' की कथा कहते; श्रुति, स्मृति, पुगण, सबसे सम्मत, किसी से कुछ विरोध नहीं रखते; अपने भुजाओं पर भगवत् आयुधों की तप्त मुद्रा " Fधारण किये हुए थे। (४१२) छप्पय । (४०१) व्रजभूमिउपासक" भट्ट सो, रचि पचि हरि एकै कियौ ॥ गोप्यस्थल मथुरा मंडल. जिते, "वाराह" वखाने। ते किये “ नारायण" प्रगट प्रसिद्ध पृथ्वी में जाने ॥ भक्तिसुधा कौ सिंधु. सदा सतसंग समाजन । परम रसज्ञ, अनन्य, कृष्णलीला को भां- जन ।। ज्ञान समारत पच्छ कों नाहिन कोउ खंडन वियौ। "व्रजभूमिउपासक” भट्ट सो, रचि पचि हरि एकै कियौ ।। ८७॥ (१२७) (१०७) श्रीनारायणभट्टजी। वार्तिक तिलक । श्रीनारायणभट्टजी बज की भूमि के उपासक हुए, नाम, रूप, लीला, धाम को एक ही करके ( अभेद) मानते थे। आपने धाराह पुराणानुसार श्रीमथुरामण्डल के सब गोप्यस्थल प्रगट किये । आप भक्तिपियूष के सागर, और सन्तों के समाजों में रहनेवाले, परम रसज्ञ, अनन्य, और श्रीकृष्णलीला के बड़े प्रेमी थे। किसी स्मार्त के 'पक्ष को खण्डन नहीं करते थे। (४४३ ) टीका । कवित्त । (४००) भट्ट श्रीनारायनंजू भये जपरायन, जाय जाही ग्राम तहां ॐॐॐॐAHRAISKY श्रीभक्तमाल सटीक। ५६६ N व्रत करि ध्याये हैं । बालिके सुना। इहां अमुको सरूप है जू, लीला कुण्ड धाम स्याम प्रगट दिखाये हैं। ठौर ठौर रास के विलास ले प्रकास किये, जिये यो रसिक जन कोटि सुख पाये हैं। "मथुरा" ते कही "चलो वेनी," पूछे "वेनी कहाँ ?” “ऊंचगांव" आप खोदि सोत लै लखाये हैं ॥ ३५६ ॥ (२७३) वार्तिक तिलक। श्रीनारायणभट्टजी बजभूमिपरायण हुए; जिस ग्राम में जाते बज का ही ध्यान किया करना ही आपका व्रत था; लोगों को बुलाकर बताते थे कि “यहाँ अमुक मूर्ति है, खोदो तो निकले यहां अमुक कुण्ड है, यहां अमुक धाम है," और प्रगट दिखा भी दिया करते थे। ठोर ठौर रहस्य विलास प्रकाश करते कि "यहाँ हरि ने अमुक लीला की है;" जिसको जानकर रसिकों को बड़ा ही आनन्द होता था। आपने कहा कि "श्रीवेणी तीर चलो।" लोगों ने पूछा कि "वेणी कहां है" आपने "ऊंचेगांव" में उनको लेजा, पृश्वी खोदवा, श्रीवेणीजी का स्रोत दिखा दिया । (४४४) छप्पय । (३६९) व्रजवल्लभ "बल्लभ,” परम दुर्लभ सुख नैननि दिये। नृत्य गान गुण निपुन रास में रस वरषावत । अब लीला ललितादि वलित दम्पतिहिं रिझावत ॥ अति उदार निस्तार, सुजस व्रजमण्डल राजत । महाम- होत्सवं करत, बहुत सवही सुख साजत ॥ श्रीनारायण- भट्ट, प्रभु, परम प्रीति रस बस किये । ब्रजबल्लभ *यहुतेरे कहते है कि श्राप (श्रीगल्लभजी), थानारायण भट्टजी के शिष्य थे, और और लोगों का कहना है कि दोनों परस्पर प्रेमी थे । श्राप श्रीनाभा स्वामी के समय में, और विक्रमी संवत् १६३२ सन् १५७५ ईसवी के लगभग वर्तमान थे। उस समय के बादशाह की सम्मति लेकर और श्रीनारायणमट्टजी की सहायता पाकर, आपने रहस्य- लीला के महोत्सव का प्रकाश किया ॥ RKINCRECRoot ५६७ HARIHAR भकिसुधास्वाद तिलक। "वल्लभ," परम दुर्लभ सुख नैननि दिये।८८॥(१२६) (१०८) श्रीवल्लभजी। वार्तिक तिलक। श्रीवल्लभजी ब्रजभूमि से बड़ी ही प्रीति रखते; और वजमण्डल के लोग भी आपसे चड़ी प्रीति करते थे; क्योंकि आपने सबके नेत्रों को श्रीरहस्यलीला का दुर्लभ सुख दिया था नृत्य, संगीत, और और गुणों में आप प्रवीण थे; और रहस्यलीला में आप आनन्द- रस की वी किया करते थे। श्रीललितादि सखियों समेत श्रीराधा- कृष्णजी को रिझाया करते थे। श्राप कलिजीवों के निस्तारक हुए । श्रीब्रजमण्डल में आज भी आपका सुयश छा रहा है । बड़े सुख साज के साथ, महामहोत्सव किया करते थे । श्रीवल्लभाचार्यजी ने श्रीनारायणभट्ट को, परम प्रीति से रस वश किया था। (४४५) छप्पय । (३९) संसारस्वादसुख बांत ज्यों, दुहुँ “रूप," "सनातन" त्यागि दियौ ॥ गौड़ देशवंगाल हुते सवही अधिकारी। हय गय भवन भंडार विभौ भूभुज उनहारी ॥ यहः 'सुख अनित्य विचारि वास वृंदावन कीन्हौ। यथालाभ संतोष कुंज करवा मनदीन्हौ॥ व्रजभूमि रहस्य राधा- कृष्ण भक्त तोष उद्धार कियौ । संसारस्वादसुख बांत ज्यो,दुहुँ"रूप,"सनातन,"त्यागिदियौ॥८६॥(१२५) (१०६) श्रीरूपजी। (११०) श्रीसनातदजी।* वार्तिक तिलक। श्रीरूपजी तथा श्रीसनातनजी दोनों भाइयों ने संसारस्वाद ॐ श्राप संवत् १६३० सन् १५७३ ई० कलिनन्द ४६७ में वर्तमान थे। KAROK - ५६८ श्रीभक्तमाल सटीक। " सब सुखों को उधान्त (वमन कियेहुए) की भाँति परित्याग किया। भाप गौड़देश बंगाले के शासक के एक बड़े.अधिकारीथे; आप दोनों भाई बड़े विभव वाले थे; हाथी, घोड़े, भवन, भूमि,भंडार, सब कुछ भूभुज (अवनीश) केसे रखते थे। एक समय रुपये गिनते गिनते ही सारी रात व्यतीत हो गई। यह अनित्य सुख आपको ग्लानि तथा बड़ी विरक्ति का कारण हुआ। अपने गुरु श्रीनित्यानन्द. जी की आज्ञा से दोनों भाइयों ने श्रीवृन्दावन में वास किया । यथा लाभसन्तोष यह आपमें पूरा था । केवल करवा कोपीन और श्री- वृन्दावन के कुंज के अतिरिक्त अन्य कुछ में आपने मन नहीं दिया। ब्रजभूमि के तीर्थों को और श्रीराधाकृष्ण भनसुखकारी के रहस्य को प्रकाश दिया। (४४६) टीका । कवित्त । ( ३६७) कहत वैराग, गए पागि नाभा स्वामी जू वे, गई यो निवर पांच लागी आंचि है। रही एक मांझ, धस्यौ कोटिक कवित्त अर्थ, याही ठौरले दिखायो कविताको सांचिहै ॥राधाकृष्णरसकी आचार- जता, कही यामें, सोई “जीवनाथभट्ट" छपै बानी नांचि है। बड़े अनुरागी ये तो, कहिवौ बड़ाई कहा, अहो जिन कृपादृष्टि प्रेम पोथी बांचि है ।। ३५७ ।। (२७२) वार्तिक तिलक। श्रीनाभा स्वामीज़ महाराज श्रीरूपजी श्रीसनातनजी के वैराग्य ही के वर्णन में, अपने छप्पय के पांच तुक तक निवर गए; ऐसे भनुरक्ति विरक्रि के आवेश में आप पग गए। बचे हुए केवल एकही तुक में श्रीस्वामीजू ने कोटि कवित्त के अर्थ रखदिय; कविता की सचाई और स्वरूप ऐसे ही ऐसे ठौर में प्रगट होते हैं। श्रीराधा- कृष्णरसके आचार्य श्रीरूपजी श्रीसनातनजी हैं, यह आपकी आचा- र्यता कही है। इसीप्रकार श्रीजीवनाथभट्टजी के छप्पय में भी वाणी की चमत्कृति प्रगट है । आप बड़े ही अनुरागी थे इसका कहना ही क्या है । अहो ! जिनकी कृपाकटाक्ष से प्रेमको पोथी पढ़ीजाती है। . .

- RAND भक्रिसुधास्वाद तिलक। ५६४ (४४७) टीका । कवित्त । (३६६) वृन्दावन ब्रजभूमि जानत न कोऊप्राय, दई दरसाय जैसी शुक- मुख गाई है । रीतिहुँ उपासना की भागवत अनुसार, लियो रससार सो रसिक सुखदाई है ॥ आज्ञा प्रभु पाय पुनि “ गोपीस्वर" लगे आय, किये ग्रंथ पाय भकि भांति सब पाई है । एक एक बात में समान मन बुद्धि जत्र, पुनकित गान दृग झरी सी लगाई है ।। ३५८ ॥ (२७१) वार्तिक तिलक । श्रीवजभूमि वृन्दावन को उस समय प्रायः कोई नहीं जानता था; श्रीरूपजी, श्रीसनातनजी, दोनों भाइयों ने ही श्रीकृष्ण चैतन्य महा प्रभुजी के अनुशासन से वहां आकर वैसी ही दिखा दी कि जैसी श्रीशुकदेव स्वामी ने वर्णन किया है। आपने उपासना की रसराशि रीति भी श्रीमद्भागवत के अनुसार प्रकाश की, कि.जो रसिकजनें। को अति सुखदाई है । श्रीयमुनाजी कुंजवन और दो चार घरों के पुरवे के अतिरिक्र उस समय वहां कुछ न था । श्रीहन्दा देवीजी की पूजा के लिये लोगों का जाना सुन आप दोनों भी वहीं जा रात्रि में बसे । वृन्दा देवीजी ने दर्शन दिया । पुनि श्रीकृष्ण भगवान् की आज्ञा पाके श्रीगोपीश्वर महादेवजी के दर्शन किये । श्रीशिवजी के अनुग्रह तथा स्वप्न देने से श्रीरूपजी ने श्रीहरिभक्ति के विविध ग्रन्थ, (भनिरसामृत, रससिद्धान्त, भग- वदुमृत, इत्यादि ) रचे कि जिनकी एक एक बात में मन बुद्धि के प्रवेश करने से गात पुलकित होता है, और नयनों से प्रेमाच की भाड़ी सी लग जाती है। श्रीवृन्दा देवीजी ने आज्ञा की, तब इनकी मूर्ति को दोनों महा- नुभावों ने खोद निकाली और स्थापना किया । जब किसी की गऊ बच्चा देती है तो वह कुछ दिन तक श्रीवृन्दा देवीजी को दूध चढ़ाता है। 4 angel अग श्रीभक्रमाल सटीक। . , ( ४४% ) टीका | कवित्त । (३६५) रहै "नन्दगांव," "रूप" आये, श्री "सनातन" 'भू महा सुख रूप भोग खीर को लगाइये । नेकु मन आई, सुखदाई प्रिया ला- हिली जू मानो कोऊ घातकी सुसाज सब ल्याइये ॥ करिके रसोई सोई, ले प्रसाद पायो, भायो, अमन सो आयो चद्धि, पूछी, सो जताइये । “फेरि जिनि ऐसी करो यही दृढ़ हिये धरो ढरी निज चाल," कहि अांखें भरि आइयै ॥ ३५६ ॥ (२७०) वार्तिक निलक। श्रीरूपजी नन्दगांव से श्रीसनातनजी के पास आए। इनकी यह इच्छा हुई कि तस्मई (क्षीरान ) युगलसार को भोग लगाकर सोई प्रसाद ऐसे महानुभाव को पवावें । यह बात जैसे मन में आई ही थी कि परम सुखदाइनि श्रीराधिका लाडिलीजू एक वालिका का रूप धर खीर भोग का सब सौंज लेही भाई। श्रीसनातनजी ने रसोई करके श्रीयुगलसर्कार को भोग लगाया। जव दोनों प्रेमियों ने प्रसाद पाया, तो अद्भुत स्वाद नाया बरन कुछ अमल सा चढ़ आया। श्रीरूपजी ने इसका कारण पूछा । श्रीसनातनजी ने उत्तर में सब वार्ता कह सुनाई । श्रीरूपजी में आज्ञा की कि फिर कभी ऐसा न हो, इस बात को हृदय में हद करके रक्खों । अपनी वि. रक्ति चाल पर ही चलो । दोनों मूर्ति श्रीललीजी की कृपा को स्मरण कर प्रेम जल आंखों से बरसाने लगे। (४४६) टीका | कवित्त । (६४) रूप गुण गान होत, कान सुनि सभा सघ अति अकुलान प्रान, मूरछा सी आई है। बड़े आप धीर रहे ठाढ़े, न सरीर सुधि, बुधि में न आवे ऐसी बात लै दिखाई है ॥ श्रीगुसाई "कर्णपूर" पाछे माय देखे आछे, नेकु ढिग भए, स्वास लाग्यौ तब पाई है। मानौ श्रागि अांच लागी, ऐसो तन चिह्न भयो, नयौ यह प्रेम रीति का पै जात गाई है॥३६॥ (२६६) KACCHINECRACK समीप गए, LIBRAR भनिसुधास्त्राद तिलक ६०१ गार्तिक तिलक । एक रात श्रीरूपजी श्रीगुसाईजी के समाज में श्रीहरिरूप गुण-यश नाम का कीर्तन गान ऐसा हो रहा था कि समाज के स- माज सब ही चेसुध हो रहे थे प्रेम में प्राण ऐसे व्याकुल हुए सबको मूर्छा सी आगई । परन्तु आप बड़े धीर थे खड़े ही रहे', हां इशरीर की सुधि तो न थी । गुसाई श्रीकर्णपूरजी के मन में आया कि 'आपको देखें तो।' सो ये आपके कुछ आपके श्वास जो इनके लगे तो ऐसे तप्त थे कि मानो आग की आंच लगी; इनके शरीर में फफोले पड़ आए। यह प्रेम रीति नई है किससे इसका वर्णन हो सके। (४५०) टीका । कवित। (३६३) "श्रीगोबिन्दचन्द"आयनिसिकौस्वपन दियो, दियौ कहि भेदसव जासों पहिचानिये । रहों में खरिकमांझपोर्षे निसि भोर सांझ, सी, दूध धार गाय, जाय देखि जानिये ॥प्रगट ले कियो, रूप अति ही अनूप छवि, कवि कैसे कहे, थकि रहै, लखि मानिये । कहां लो घखानों मेरै सागर न गागर मैं, नागर रसिक हिये निसि दिन आनिये ॥३६१॥ (२६८) चार्तिक तिलक। श्रीगोविन्दचन्द्रजी ने श्रापको स्वन में दर्शन देकर आज्ञा की कि "खरिक में अमुक ठिकाने मेरी मूर्ति है, भूमि खोदके निकालकर स्थापित करो;" पहिचानने के अर्थ गोविन्ददेवजीने पूरे पूरे वता दिये और यह भी कहा कि "गऊ सब भोर सांझ वहां मुझ को दूध चढ़ाती हैं, जाके देखो।" श्रीरूपजी श्रीसनातनजी ने श्री- गोविन्दचन्द्र की मर्ति प्रगट की; ऐसी अनूप प्रतिमा कि उसकी छवि वखानने में कवि लोग थकित होजाते हैं, देखते ही बनता है। १ कहते है कि श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के गालोके घासी होने पर श्रापके स. माज के लोग श्रीपुरुषोत्तमपुरी से श्रीवृन्दावन में श्रीरूप सनातनजी क पास चले पाए । २जर शरीर का अभिमान नहीं रहता तो मूर्जा नहीं होती हे। RAKRAM सब पते .

ॐ+HAIPUR ६०२ श्रीभक्रमाल सटीक। मैं कहां तक बखान करूँ सागर कहीं गागर (घड़े )में समा सकता है ? रसिक जनों के हृदय में प्रभु दिन रात विराजते हैं। (४५१) टीका । कविच । (३६२) रहें "श्रीसनातन" ज "नन्दगांव” “पावन" पै, भावन दिवस तीन दूध ले के प्यारियै । सांवरो किशोर, आप पूछे "किहिं ओर रहो ?" "कहे चारि भाई" पिता रीतिहूँ उचारिये ॥ गये ग्राम, वूझी घर, हरि पै न पाये कहूँ, चहूँ दिसि हेरि हेरि,नैन भरि डारिये। अब के जो आवै, फेर जान नहीं पाव; सीस लाल पाग भावे, निसि दिन उर धारियै ।। ३६२ ।। (२६७) वार्तिक तिलक। श्रीसनातनजी नन्दगांव में पावनसर पर रहते थे; श्रीप्रिया प्रियतमजी की कृपा से दूध मिला करता था; एक बेर तीन दिन पर्यन्त नहीं मिला । चौथे दिन एक सांवले किशोरने क्षीरान्न(खीर) प्रसाद लाकर दिया। आपने इनकी सुन्दरता देख पूछा "लाला। तुम रहते कहां हो ?" आपने उत्तर दिया कि में चार भाई हूँ, और अपने पिता का भी पता बताया। श्रीसनातनजीने उस गांव में जाकर उनका घर लोगों से पूछा परन्तु श्रीहरि का पता कहीं नहीं पाया! चारों दिशि ढूँढ़ थके, नेत्रों से आंसू बहाने और कहने लगे कि "वे चित्तचोर लाल पगियावाले अब यदि आवेंगे, तो फिर उनको जाने न दूंगा।" इसी भांति प्रभु के प्रेम में आप मग्न रहा करते थे।। (४५२) टीका। कवित्त । (११) कही व्याली रूप वेनी, निरखि सरूप नैन, जानी श्रीसनातन काव्य अनुसारियै । राधाप्सर" तीर द्रुम डार गहि भूलें,फूल, देखत लफलफात गति मति वारियै ॥ आये यों अनुज पास, फिरै आस पास, देखि भयो अति त्रास, गहे पांउ, उर धारियै । चरित अपार, उभै भाई हित सार पगे, जगे जग माहि, मति मन में उचारि- ये ॥ ३६३॥ (२६६) BIKSSHORTS CASOSAASTASAASAASAASAASA भनिसुधास्वाद तिलक। ६०३ वार्तिक तिलक। श्रीसनातनजी ने अपने अनूप काव्य में श्रीप्रियाजी की चोटी को व्याली रूप कहा है ( नागिन की उपमा दी है)।श्रीरूपजी को दुष्ट जीव की उपमा भली नहीं लगी पर काव्यरीति समझ चुप रह गए । एक दिन श्रीराधासर के तीर एक वृक्ष में झूला देखा कि बहुत सी सखियां श्रीलाड़िलीजी को भुला रही हैं, और श्रीललीजी की वेणी ठीक ठीक नागिन के बच्चे की ही भाँति लहराती अत्यन्त शोभा देती है । आपको उस काव्य का स्मरण हो आया और आनन्द में फूले न समाए, गति मति सब न्यवछावर कर दिया । अनुज ( छोटे भाई ) के पास श्रा, आपका परिक्रमा कर, पांव पड़, बड़े त्रसित हुए; और सम्पूर्ण वार्ता कह सुनाई ॥ दोनों भाइयों के प्रेम तथा चरित अपार, परमार्थसार, और जग में विख्यात हैं । मन बुद्धि को इसमें डुवा के परमसुख लेना चाहिये । श्रीरूप सनातनजी ने श्रीगोविन्दचन्द्रजी * की पूजा की आज्ञा अपने भतीजे " जीवगुसाईजी" को दी, ये गृहस्थाश्रम को त्याग कर आपके पास आगए थे। आमेर के राजा मानसिंह ने आपके दर्शन कर प्रार्थना की कि कुछ अाज्ञा कीजिये " अापने कहा " कोई अावश्यकता नहीं।" पर बड़ा हठ और विनय से आज्ञा की कि “श्रद्धा हो तो श्रीगो- विन्ददेवजी का मन्दिर बनवादो।" राजा मानसिंह ने (कहते हैं कि तेरह लाख रुपए में, अकबर बादशाह से आज्ञा लेकर लाल पत्थर सें कि जिससे उन्हीं दिनों में संवत् १६२१ । १६३१ में अकवरावाद (आगरे ) का किला बन रहा था) वनवा दिया ॥ (४५३) छप्पय । (६०) (श्री) हरिवंश गुसाई भजन की, रीति सकृत कोउ * राजा जयसिंह (जयपुर) वाराहपुराण में श्रीगोविन्ददेवजी के दर्शन का माहात्म्य सुन वृन्दावन में श्रा यही विनती प्रार्थना कर श्रीगोविन्दचन्द्रजी की जय पुर ले गया, यहा आपकी एक मूर्नि वनपाकर रस गया। यह बात “मुहम्मदशाह बादशाह के समय में हुई कि जिस का राज्य विक्रमी मंगत् १७७६ से १८०४ तकथा LakeSCIECE CCCTORRECORRES .

- 6-16: R ६०४ श्रीभकमाल सटीक। जानि ॥ (श्री) राधाचरण प्रधान हृदै अति सुदृढ़ उपासी। कुंज केलि दंपति, तहां की करत खवासी*॥ सर्वसु महा प्रसाद प्रसिद्ध ताके अधिकारी। विधि नि- षेध नहिं, दाम अनन्य उतकट व्रत धारी ॥ व्यास- सुवन पथ अनुसरै, सोई भलै पहिचानिहै । (श्री) हरिवंश गुसाई भजन की, रीति सकृत कोउ जानि- है।६० ॥ (१२४) स."अानन ओप मयर लजावत भावत भाव भरी निपुनाई। त्यों जलजात लजात बिलोकत कोमल पायन की अरुनाई॥ मङ्गन की दुति कोटि अनङ्ग के अङ्ग की मोचति जेट निकाई । को ब्रजवल्लभ धीर धरै लखि जानकीनाथ की सुन्दरताई ॥" प्रजनन्दन सहाय (ब्रजवल्लभ) अखतियारपुरी (शाहावादी) विरचित सवैया ॥ (१११) श्रीहितहरिवंशजी। वार्तिक तिलका गुमाई श्रीहितहरिवंशजी के भजन की रीति बिरलय कोई जान सकता है। श्रीप्रिया प्रियतम के चरणों के उपासक थे । श्रीराधाजी को प्रधान मानते थे। आपके हृदय में अति सुदृढ़ भक्ति थी। दम्पति के कुंजकेलि के विशेष कैंकर्यभावना में सखीभाव से किया करते थे। श्रीमहाप्रसाद में आपका विश्वास प्रसिद्ध है; उसके बड़े अधिकारी थे क्योंकि महाप्रसाद को अपना सर्वस्व जानते थे । 'विधि निषेध' (सामान्यधर्म ) पर चित्त न देकर, भागवतधर्म (विशेषधर्म ) मालाकंठी अनन्य भक्ति का उत्कट व्रत मन में रख. कर श्रीराधाकृष्ण की बड़ी भाग्यवती दासी रहे। श्रीव्याससुवन * 'खबासी" विशेष के कर्य । । 'दाम'माला। पाठान्तर " दाम जेट-समूद।। RANSKARAN = , , . , । २ ॐॐ R8 ॐनम भनिसुधास्वाद तिलक। (श्री १०८ शुकदेवजी) के *तथा आपके मार्ग पर चलनेवाला ही भाग्यभाजन इस पथ को पहिचान सकता है,और प्रायःप्रेमी रसिक जन कोई कोई जानते हैं। दो०"श्रीजानकी पद कंज, सखि ! करहिं जासु उर ऐन । विनु प्रयास तेहि पर द्रवहि, सियपिय राजिवनैन ॥ १ ॥ जय जानकि मय स्वामिनी, जय स्वामी सियनाह । सियसहचरि नित चाहती, सिय सियपिय की चाह ॥२॥" "नमो नमः श्रीजानकी, नमोनमो श्रीराम । कमलाअलि वर मांगती, युगलप्रेम निःकाम ॥३॥" "श्रीराधा जहँ पगधरे, कृष्ण धरै तहँ नैन।" (४५४) टीका । कवित्त । (३८६) हिनत की रीति कोऊ लाखनि मैं एक जान; "राधा" ही प्रधान माने पाछे कृष्ण ध्याइये । निपट बिकट भाव, होत न सुभाव ऐसो; उनहीं की कृपादृष्टि नेकु क्यों हूँ पाइयै ।। विधि औ निषेध छेद डारे, प्रान प्यारे हिये, जिये निज दास निसि दिन वहे गाइये । सुखदचरित्र, सब रसिक विचित्र नीके जानत प्रसिद्ध, कहा कहिके सुनाइ- यै ॥३६४ ॥ (२६५) वार्तिक तिलक । श्रीहितहरिवंशजी की भजन-रीति, लाखों में कोई एक जानता होगा; श्रीराधाकृष्णजी का ध्यान किया करते, पर प्रधान श्रीराधा ही जी को मानते थे। यह भाव निपट विकट है, ऐसा सुभाव श्री. युगलसर्कार की कृपा ही से होता है; आपकी ही कृपा से किसी को कुछ कुछ यह भाव मिल सकता है। आपविधि तथा निषेध के झंझटसेनिईन्द्र थे उनके प्राण प्राणनाथ ही थे जो हृदय में बसते थे; निशिदिन आप श्रीदम्पति की सेवा अति प्रीति से करते और दम्पति केलि का ही गान किया करते थे। सुखदाई विचित्र चरित्रों को सब विलक्षण रसिकजन भलीभांति जानते हैं यह प्रसिद्ध ही है, मैं कहांतक कह सुनाऊं ॥ * थीहरिवंशजी के पिता का भी नाम 'गास" जी था । | पाठान्तर "राधाई" ॥ RAPE . . RANIK 8362 ६०.६ श्रीभकमाल सटीक। 'श्रीराधावल्लभी' शृङ्गारभाव के प्राचार्य आप ही हैं। दो०"सुमुख, सुलोचन, सरल, सत, चिदानन्द, छविधाम । प्रानप्रान, जियजीव के, मुखके सुख, सियराम ॥" सो०प्रान तोर, मैं तोर, वुधि, मन, चित, यश, तोर सब । एक तुही तो मोर, काह निवेदों ? तोहि पिय॥ दो इत्र पान इत्यादि लिये, वचन कर्म मन नेम । रुपिया श्रीसम्मुख सदा, सादर खड़ी सप्रेम ॥ (४५) टीका | कवित्त । ( ३८०) आये घर त्याग, राग बढ्यो प्रिया प्रीतमसों, विप्र बड़ भाग हरि आज्ञा दई जानिये । तेरी उमै सुता, व्याह देवो, लेवो नाम मेरौ, इनकी जो वंस सो प्रसंस जग मानिये ॥ ताही द्वार सेवा विसतार निज भवन की अगतिन गति, सो प्रसिद्ध पहिचानिये। मानि प्रिय बात गहगह्यो सुख लह्यौ सब, कहाँ कैसे जात यह मत मन आनियै ॥ ३६५ ॥ (२६४) कार्तिक तिलक। आप देवनन्द (सार सहारनपूर ) के वासी, व्यासजी नाम गौड़ ब्राह्मण तथा श्रीतारा देवी के पुत्र थे। आपके पिता बादशाह के नौकर भारी अधिकार वाले थे। श्रीनृसिंह भगवान् की कृपा से दम्पति श्रीताराव्यास के पुत्र अर्थात् इन्ही श्रीहितहरिवंशजी का जन्म, विक्रमी संवत् १५५६ में हुआ । रुक्मिणि नाम स्त्री से अापके दो पुत्र और एक कन्या हुई, जिसके विवाह से श्रीकृषा से शीघ्र भार रहित होकर आप घर छोड़ श्रीवृन्दावन आए; श्रीयुगल- सार के चरणों में अधिक अनुराग बढ़ा, विशेषतः श्रीराधाजी के पदकंज में जिनकी कृपा अपार हुई ॥ एक ब्राह्मण बड़भागी को प्रभु ने स्पप्न में आज्ञा की कि हित- हरिवंशजी को मेरी आज्ञा सुनाके तुम अपनी दोनों लड़कियां व्याह दो; इनसे जग में प्रशंसनीय वंश होगा यह विश्वास करो; मैं उन्हीं के द्वारा निज भक्तों को भक्ति वृद्धि और बद्ध जीवों को कल्याण KACHECHAKKETS , язірязья 5+35+3+359 भक्रिसुधास्वाद तिलक। गति दूंगा इसको प्रमाण जानो।" इस प्रिय वाणी को सुन सब बड़े प्रसन्न हुए। जैसी रीति श्रीराधावल्लभजी की सेवा प्रीति की आपके सम्प्रदाय में प्रगट हुई, मन में समझने की बात है कही कसे जावै । आप बीड़ा प्रसाद को एकादशी व्रत से लाख गुणा अधिक समझते थे। इसकी चमत्कृति श्रीवृन्दावन में देखिये। वहां श्रीप्रियाजी का प्रताप प्रत्यक्ष है ॥ ( ४५६ ) टीका । कवित्त । ( ३८७ ) राधिकावल्लभलाल आज्ञा सो रसाल दई सेवा मो प्रकास औ विलास कुंज धामको । सोई विसतार सुखसार द्विग रूप पियो, दियो रसिकनि जिन लियौ पच्छ घामको ॥ निसि दिन गान रस माधुरी को पान उर अंतर सिहान एक काम स्यामास्यामको । गुन सो अनूप कहि, कैसे कै सरूप कहै, लहै मन मोद, जैसे और नहीं नामकौ ॥ ३६६ ॥ (२६३) वार्तिक तिलक। श्रीराधिकावल्लभलाल ने रसाल आज्ञा दी जिससे सेवा की रीति का और कुंज तथा धाम के विलास का प्रकाश हुआ । सोई सुखसार का विस्तारपूर्वक श्रीकृपा से आंखों से दर्शन पाया, और रसिकों को बताया, इन भाग्यभाजनों ने श्रीप्रियाजी की प्रधानता मान ली और आपका पक्ष लिया । रात दिन श्रीयुगलसर्कार के यश को गाते थे, रस माधुरी को पीते थे, कोई अन्य कामना नहीं रखते थे, केवल युगलसर्कार को हृदय के भीतर सिंहासन पर विराजमान कराए रहते थे। अनूप गुण नाम रूप हैं, मनही उनसे मोद पाता है; कहते नहीं बनता ॥ (४५७) छप्पय । (३८६) "आसधीर" उद्योतकर, "रसिक” छाप हरिदास की ॥ जुगल नामसौं नेम, जपत नित कुंजबिहारी। अवलोकत रहैं केलि, सखी सुख के अधिकारी ॥गान BLUCROCECREASKARO .

EHATRAPX** श्रीभक्रमाल सटीक। कला गंधर्व, स्याम स्यामा को तोपें। उत्तम भोग ल- गाय, मोर मरकट तिमि पोर्षे ॥ नृपति द्वार ठाढ़े रहें, दरसन आसा जास की। "आसधीर" उद्योत कर, "रसिक" छाप हरिदास की ॥६१ ॥ (१२३) (११२) श्रीहरिदासजी रसिक। पातिक तिलक । स्वामी श्रीहरिदासजी शृङ्गारउपासना में बड़े ही दृढ़ और धीर हुए । अपने पिता श्रीपासधीरजी के सूर्यवत् प्रताप से रसिकों में आप प्रसिद्ध हुए। आप "श्रीरसिकजी" इस नाम से प्रसिद्ध थे। आपका नेम प्रेम श्रीयुगल नाम (श्रीराधाकृष्ण ) से था; "श्रीकुंज- विहारी" को नित्य जपा करते थे। रसराज अर्थात् सखी सुख के अधिकारी थे, श्रीप्रियाप्रियतम की केलि (विहार ) को सदैव देखा करते; संगीत कला में गन्धर्व से बढ़के थे; अपने गान से श्रीयुगल सर्कार को तुष्ट रखते; उत्तम उत्तम भोग लगाया करते; प्रसाद सन्तों तथा वन्दरों, मयूरों, मछलियों को भी बड़ी प्रीति से पवाते थे। मा. पके दर्शन के लिये राजा लोग द्वार पर खड़े रहा करते थे। (४५% ) टीका | कवित्त । (३८५) स्वामी "हरिदास" रसरास, को बखान सके, रसिकता छाप जोई जाप मधि पाइयै । ल्यायो कोऊ चोवा, वाको अति मन भोवा वामैं, डायो लै पुलिन यह, "खोवा" हिये आइये ॥जानिक सुजान, कही "लै दिखावो लाल प्यारे", नैसुकु * उघारे पट सुगंध बुड़ा- इयै । पारस, "पापान" करि जज डरवाय दियौ, कियौ तब शिष्य ऐसे नाना विधि गाइयै ॥ ३६७ ॥ (२६२) वार्तिक तिलक । रसिक स्वामी श्रीहरिदासजी के रसरास वा शृङ्गारनिष्ठा का व. पन किससे हो सकता है । श्रीयुगल सर्कार के नित्यविहार में सखी * "मेसुकु" किंचित् पट, परदा तथा श्रीनङ्ग के वस्त्र ॥ । Personen BREAK भकिसुधास्वाद तिलक। भावना से प्रस्तुत रहा करते थे। एक समय युगल मंत्र का जाप कर रहे थे उसी के मध्य श्रीभगरत् का वचनामृत हुआ कि तुमको "र- सिक" कहकर लोग नाम लिया करेंगे। किती भक्त ने आपको चोया (इत्र) भेंट किया, जिसको वह अति उत्तम समझता और जो उसके जी को बहुत ही भाता था । आपने उसको ध्यान से होली में प्रभु के ऊपर और देखने में तो श्रीयमुनाजी के पुलिन ( रेत ) में, जहां बैठे थे, डाल दिया । उसने खेद कर मन में कहा कि "ऐसा उत्तम विष्णु- तैल, सो खो गया !” सुभान रसिकजी ने उसके मन की जान ली। आपने एक दास को आज्ञा की कि “ इनको ले जाकर श्रीवांके- विहारीलालजी के दर्शन कराओ।" लिवा जाकर उसने पट उघार के दिखाया तो श्रीविहारीजी के वस्त्र चोप्रा से तराशेर, तथा सारा मन्दिर वैसेही सुगन्ध से भरपूर पाया कि जैसा सुगन्ध उसके निवे- दित चोआ में था। श्रीस्वामीजी के इस प्रभाव को समझ कर वह बड़ा लज्जित और हर्षित हुआ। एक मनुष्य आपके पास शरणागत होने आया; उसने एक पारस मणि को भेंट में दिया। आपने पहिले उसे “पाषाण" कह यमुना सरित के जल में फेंकवादिया। तब उसको शिष्य किया। उस समय का बादशाह ( अकबर ), वेष छुपाके तानसेन के साथ जाकर आपके दर्शनों से कृतार्थ हुआ । संवत् १६११ से १६६२ के मध्य किसी समय की यह घटना है। ऐसे ऐसे चरित आपके नाना प्रकार से गाए गए हैं। (४५६ ) छप्पय । (४) उतकर्ष तिलक अरु दामको, भक्त इष्ट अति "व्यांस" के॥ काहू के आराध्य मच्छ, कच्छ, नर- हरि, सूकर । वामन, फरसाधरन, सेतबंधन, जु सैल- कर॥ एकन के यह रीति नेम नवधा सों लायें । सुकुल ReKE-SCRECReckoctorsCKETECREAMIN - KARAN ६१० श्रीभक्रमाल सटीक। सुमोखन सुवन अच्युत गोत्री जु लड़ायें। नौगुण तोरि नूपुर गुह्यौ महत सभा मधि रास के। उतकर्ष तिलक अरु दामकौ, भक्त इष्ट अति व्यास के॥४२॥ (१२२) (११३) श्रीहरिवंशजी के शिष्य श्रीव्यासजी। वार्तिक तिलक। संतसेवी श्रीव्यासजी उर्दूपुण्डू तिलक और श्रीतुलसी की कराठी माला पर विशेष आग्रह रखते, माहात्म्य वड़ाई करते तथा हरिभन्नों को आप अपना परम इष्टदेव ही मानते थे । कोई कोई श्रीभगवत् के मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुरामादिक अवतारों की आराधना करते हैं; कोई कोई श्रीकृष्णचन्द्रजी की उपासना करते हैं; किसी किसी के सर्वस्व श्रीसीतापति रामचन्द्रजी ही हैं; और किसी किसी को भगवत् की नवधा भक्ति का नियम होता है; परन्तु श्रीसुमोखनजी के पुत्र श्रीशुक्ल श्रीव्यासजी महाराज तो अच्युत गोत्री (भागवत, वैष्णव, भगवद्भक्त, सन्त) ही को अपना इष्ट जानकर भको ही के लाड़ प्यार उपासना पूजा किया करते थे। एक गत शरदपूनों के रास रहस्य समाज के समय श्रीप्रियाजी का नूपुर टूट गया; वहीं उसी क्षण अपने कंधे का नवगुण अर्थात् ( यज्ञोपवीत ) तोड़कर उसीसे श्रीपदपंकज के धुंघरू को गूंथकर आपने ठीककर पहना दिया। प्रेम की जय !!! (४६०) टीका । कवित्त । (३८३) आये गृह त्यागि, वृन्दावन अनुराग करि, गयो हियो पागि होय न्यारो तालों खीझिये । राजा लैन आयो ऐपै जायचो न भायो; श्रीकिशोर उरझायो मन, सेवा मति भीजिये ॥ चीरा जरकसी सीस चीकनो खिसिलि जाय, लेहु जू बँधाय, नहीं आप बांधि ली. जिये" । गये उठि कुंज, सुधि आई सुखपुंज, आये देख्यौ बँध्यौ मंजु, कही "कैसे मोपै रीझिये " ॥ ३६८ ॥ (२६१) akkOGook ANCE PRON RAHA भक्रितुधास्वाद तिलक। वार्तिक तिलक। श्रीव्यासजी सनाढ्य ब्राह्मण, ( महात्मा सुमोखन शुक्लजी बुंदेलखंडी ओड़छा निवासी के आत्मज) बड़े धर्मप्रचारक, श्रीराधा- वल्लभीय सम्प्रदाय के हुए । आपका पहिला नाम " हरीराम" था। " ओड़छे " के रहनेवाले थे। जब पैंतालीस वर्ष के हुए नब, संवत् १६१२ में, घर त्यागकर श्रीवृन्दावन पाए । आपकी पद्धति के (१) वृन्दावनी व्यासवंशी गुसाई, और (२)ोड़छा वाले गुसाई, दो नामों से विख्यात हैं । आपको श्रीवृन्दावन में विशेष निष्ठा थी; धाम के प्रेम में आपके अन्तःकरण पग रहे थे । जो श्रीवृन्दावन से जाया चाहता, आप उससे अप्रसन्न होते; ओड़छे का नरेश "मुद्र" एक समय आपको विनयपूर्वक लेने आया; पर आपको श्रीवृन्दावन से अन्यत्र जाना नहीं भाता था; राजा को दिखा र एक भंगिन के हाथ के पत्तन से श्रीगोविन्दप्रसाद सन्तों का उच्छिष्ट सीथ आप लेकर पागए (खा लिया), भला इस मर्म को नृपति क्या समझ सकता ? वह लौट गया; आप अति प्रसन्न हुए, आपकी मति और मन तो श्रीकिशोर- सेवा में गठे थे, कहने लगे कि "संसार एक पकौड़ी ही का हुआ ॥" एकवेर परमोत्तम चीरा श्रीटाकुरजी के सीस में बांध रहे थे, चिकनाई से सरक सरक जाते देख आप मन्दिर से यह कहते निकले कि " मुझ से बँधा लीजिए, यदि मेरा वांधा नहीं भात्रै तो आपही बांध लीजिये।" और सेवाकुंज दर्शन करने चले गए; कुछ क्षण बीते गृह के लोगोंने चीरा बांधे देख जा सुनाया; आप सुखयुंज पाय फिर गए तो ऐसा सुन्दर वधा दर्शन पाया कि हर्ष से फूले न समाए; सब दर्शन करके चीरा की बधाई की प्रशंसा करने लगे। आप बोले कि " जर आप ही ऐसा सुन्दर बांध सकते हैं तव भला इस दीन का बांधा क्योंकर भावै॥" (४६१) टीका | कवित्त । (३८०) संत सुम्ब दैन बेठे संगही प्रसाद लैन, परोसति तिया सब भां- तिन प्रवीन है । दूध बरताई ले मलाई छिटकाई निज, खीभि उठे, Receectactress SCRECRUCARECHAR KAKKARAN ६१२ श्रीभक्तमाल सटीका जानिपति पोषति नवीन है । सेवासों छुटाय दई, अति अनमनी भई, गई भूखबीते दिन तीन तन छीन है।सबसमझा, तब दंड को मनावे, अंग माभरन वेंचि साधु जैवै यों अधीन है ॥ ३६६ ॥ (२६०) वार्तिक तिलक। सन्तों को सुख देनेवाले (श्रीव्यासजी ) सन्तों को प्रसन्न रखने के अर्थ श्रीभगवत्प्रसाद साथही (पंगत में ) पाया करते थे। सब प्रकार प्रवीण स्त्री परसा करती थी यह सेवा उसी की थी। एक दिन दूध परसने में मलाई फिसलकर आपके पात्र में आ गिरी; आपको नवीन सन्देह हुआ कि पति जानकर विशेष पोपण मेरा इसके चित्त में आया; ऐसा सोचकर आपने उसपर बड़ा क्रोध किया। वह सेवा । उनसे आपने छुड़ा दी; सुशीला बड़ी अनमनी हो तीन दिन तक भूखी रहगई। उन्हें तनक्षीण देख सबने श्रीभक्तजी को समझाया तव आपने उन्हें यह दंडकियाकिवह सबभपण बेंचके सन्तों का एकभंडारा करदें॥ दो० "तब निज भूषण बैंचिक, नारी अति हरषाय । सन्तसमाज वुलाइक, सादर दियो खवाय ॥" तब आपने उनको फिर सेवा दी ॥ (४६२) टीका । कवित्त । (३१) सुता को विवाह भयौ, बड़ी उत्साह कियो, नाना पकवान सब नीके बनिआये हैं । भक्रनि की सुधि करी खरी अरवारी मति, भावना करत भोग सुखद लगाये हैं। प्राय गये साधु, कही पावे जाय; पोटनि बँधाय चाय कुंजनि पठाये हैं। बंसी पहिराई; द्विज भनि लै दृढ़ाई; संत, संपुट * में चिरैया दे, हित सों बसाये हैं॥३७०॥ (२५६) वार्तिक तिलक । आपकी लड़की के विवाह में, बड़े उत्साह से बारात के लिये नानाप्रकार के अच्छे अच्छे पकवान घरवालों ने बनवाए श्रीव्यास जी ने देखे । उन सबको सन्तों के योग्य समझकर आपकी भक्ति- . "सम्पुट' जिस डव्या में ठाकुरजी को रखकर बटुना में धरते हैं । सो चुलाय , KALACHERE । भकिसुधास्वाद तिलक। वती बुद्धि चंचल हो विचारने लगी; आपने भावना में भगवत् को भोग लगाकर चुपके से सन्तों भक्तों को बुलाबुलाकर कुछ को तो भोजन करा दिये और औरों को बड़ी बड़ी गठरी बँधा पारस दे दे दिये वरन् कुंजों में भेज भेज दिये । परिवारवालों को बारात के लिये पुनः सामां नहीं बनवानी पड़ी वरन् “मिली साजु जैसी की तैसी ॥" एक दिन एक बंशी सोने व चांदी की श्रीकिशोरजी के हाथों में धारण कराते समय श्रीअंगुली कुछ छिल गई, लहू निकल आया ! श्रीव्यासजी बहुत पछताए और शीघ्र ही जल से आई वस्त्र (भीगा कपड़ा) श्रीअंगुलियों में बड़े प्रेम से बांधा। * दृढ़ भक्ति तथा माधुर्य भाव की जय ॥ पश्चिम देश के एक ब्राह्मण आपके यहां सीधा ले अलग रसोई करते पानी चमड़े के छागले में भरके काम में लाते; आपने उनको नए जूते में भरके घी, और द्विज देवता के क्रुद्ध होने पर यह उत्तर दिया कि “जिस धातु का आपका जलपात्र है उसी धातु का तो यह घृतपात्र भी है ” विप्र जी लजित और भन्न हो भगवत्प्रसाद पाने लगे। यो उनको भक्रि में आपने दृढ़ कर दिया। एक सन्त श्रीयुगल सर्कार को गीत बड़ी अच्छी भांति से सुनाया करते थे। इसलिये आप उन्हें जाने के समय वरावर प्रेम से रोक लिया करते थे। एक दिन उस सन्त ने हठ करके अपने ठाकुर का बटुआ मांगा; आपने श्रीशालग्रामजी के बदले एक गौरैया चिड़िया उनके सम्पुट में रखकर चटुमा में धर के उनका बट्या उनके हाथों में दिया । मार्ग में जब श्रीयमुना तट पूजने को सन्त ने वटुमा खोला तो चिड़िया श्रीकृगसे जीती हुई निकलकर फुर्र से उड़ गई साधु देवता लौट आकर आपसे पूछने लगे "मेरे ठाकुरजी उड़ आए हैं ?" आपने कहा “देखलू ।" आप मन्दिर में से आकर कहने लगे कि "हां, वृन्दावन से नहीं जाया चाहते।" सन्त प्रसन्न हो प्रेमसे श्रीवृन्दावन में बसे । प्रेम धन्य, कृपाधन्य,यामनिष्ठा धन्य ।। " वह ठाकुरजी की उंगली में अभी तक भीगे कपड़े के बांधने की परम्परा चली जाती है। Cineer SHSCO RER KISA श्रीभकमाल सटीक। पस्यो, (४६३ ) टीका | कवित्त । (३८०) सरद उज्यारी गस रच्यो पिया प्यारी, तामें रंग बदयो भारी, कैसे कहिकै सुनाइये । प्रिया अति गनि लई, बीजुरी सी कौंधि गई, चकनाँधी भई छवि मंडल में छाइयै ॥ नूपुर सो दृष्टि छूटि , अरवस्यौ मन, तोरिकै जनेऊ, कस्यो वाही भांति भाइये । सकल समाज में यों कह्यो आज काम आयौ, ढोयो हौं जनम, ताकी वात जिय आइयै ।। ३७१॥ (२५८) बार्तिक तिलक। एक शरदपूनो की रातको रास हो रहा था, समाज में प्रेम रंग बहुत बढ़ाचढ़ा था वर्णन कैसे हो सके। श्रीप्रियाजी ने श्रावेश से ऐसी गति ली कि मण्डली में मानों विजनीसी चमक उठी ऐसा प्रकाश हो गया, सबकी आंखों में चकाचौंध हो गया। परन्तु श्री. प्रियाजी का नूपुर (घुघुरू) टूट गया, दाने छितरा गए । आपका मन चंचल हुआ, शीघही आपने अपना जनेऊ तोड़कर उससे ठीक ठाक कर चरण में धारण करा दिया; और उस भरे महात्माओं के समाज में बोले कि "यज्ञोपवीत के भार को जन्म भर ढोया पर वह आज काम आगया ॥" (४६४) टीका | कवित्त । (३७६) गायो " भक्त इष्ट अति, " सुनिके महंन एक, लैनकों परीच्छा आयौ, संग संतभीर है । भाव को जलावे, बानी व्यास को सुनावे, सुनि कही भोग आवै इहां, मानै हरि धीर है । तब न प्रमान करी, संक धरी, लै प्रसाद ग्रास दोच वार, उठे मानों भई पीर है । पातर समेट लई “ सीत करि मोकों दई; पावो तुम और;" पाव लिये, दृग मीर है ॥ ३७२ ॥ (२५७) वार्तिक तिलक। श्रीप्रियादासजी कहते हैं कि श्रीनामास्वामी ने जो अपने छप्पय (मून ६२) में यह कहा कि "भक्कइष्ट अति व्यास," सो सुनकर एक महन्तजी श्रीव्यासजी की परीक्षा लेने आए, उनके साथ सन्तों gkcicieocitectecte , RECHECHAR । भकिसुधास्वाद तिलक। ६१५ की भीड़भाड़ भी थी। श्रीव्यासजी को सुनाकर महन्त ने कहा "मैं भख से अतीव पीड़ित हूं।" आपने कहा "भोग का थार जाचुका तनक धीर धरिये पंगति हुभाही चाहती है।" यह सुन महन्त को इनके 'भक्तइष्ट' होने में शंका हुई श्रीनाभा स्वामी के वचन को प्रमाण न माना; पुनः "भूख भूख' बोल उठे । आपतो सन्तों में वस्तुतः श्रीहरि का भाव रखते थे ही, आपने चटपट कहा कि "हां भोग आता है"; यह कह आपने भोग मँगा ही दिया। महन्त- जी ने प्रसाद केवल दो चार ग्रास पाकर, पेट में पीड़ा के ओदर से छोड़ दिया। श्रीव्यासजी ने उसको भागवतप्रसादी मानकर अपने पाने के अर्थ पत्तल समेट के रखलिया; और, बोले कि "आपने बड़ी कृपा की जो मेरे लिये प्रसादी कर दी। पर आपने पूर्ण हो के पाया नहीं, सो और भोग आता है, कृपाकर आप अवश्य पाइथे।" प्रा. पका यह निश्छल हद भाव सन्तों में देख, महन्त जी के नेत्रों में अश्रु भर पाए; पांव पकड़कर कहने लगे कि "मैं परीक्षा लेने आया था वास्तव में आप भगवद्भक्तों को अति इष्टदेव मानते हैं, श्रीनामा स्वामी ने यथार्थ लिखा है।" . चौपाई। "साधु कह्यो तब भरो हुलासा । सत्य, व्यास ! तुम भनन-दासा ॥" (४६५) टीका । कवित्त । (३७८) भये सुत तीन, बांट निपट नवीन कियो, एक ओर सेवा, एक ओर धन धरयो है। तीसरी जु ठौर स्याम बंदनी ओंज्ञार धरी, करी ऐसी रीति, देखि बड़ी सोच पस्यौ है । एक ने रुपा जिथे; एक ने किशोर जू कों; श्री "किशोरदास" भाल तितककत्वों हैं । यापे दिये स्वामी हरिदास; निसि रात कीनौ, वही राज वनिनादि गायो मन हस्यौ है ॥ ३७३ ॥ (२५६) वातिक हितः। श्रीव्यासजी के तीन लड़के ये उनहिये आपने पंजी बड़ी विलक्षण ( नए ढंग की)की नीनों से कहा कि SUCtect श्रीभकमाल सटीक। जो जी चाहै इन तीनों में से सो सोही ले लेवे।" एक (रासदास) ने धन रुपए लिये; दूसरे (विलासदास ) ने सेवा (श्रीकिशोर ठाकु. रजी को); और तीसरे ने जिसका नाम श्रीकिशोरदास था स्याम- बंदनी और छाप तिलक माथे चढ़ालिया। स्वामी हरिदासजी से छाप धारण कराकर श्रीकिशोरदासजी हरिकृपा से भजनमें मग्न हुए। एक दिन श्रीकिशोरदासजी स्वामी श्रीहरिदासजी तथा श्री. व्यासदेवजी के साथ यमुनाजी के तट गए और वहां अपना बनाया एक भजन रहस्य का गा सुनाया । उसी रात को श्रीव्यासजी ने दिव्य रहस्य में उसी पद को श्रीललिताजी को गाते सुना । श्री. व्यासजी की और श्रीकिशोरदासजी की जय ! नय !! जय !!! (३६६) छप्पय । (३७७) (श्री) “रूप” 'सनातन" भक्तिजल,“जीवगुसाई" सर गंभीर॥वेला भजन सुपक,कषाय न कबहूँ लागी धृन्दाबन दृढ़वास जुगल चरननि अनुरागी ॥ पोथी लेखन पान अघट अक्षर चित दीनौ । सदग्रंथनि को सार सवै हस्तामल कीनौ । संदेह ग्रंथि छेदन समर्थ, रस रास उपासक परम धीर। (श्री) “रूप” “सना- तन" भक्तिजल, "जीवगुसाई"सरगंभीर ॥६३॥(१२१) ( ११४) श्रीजीवगुसाईं। वार्तिक तिलक। श्रीरूपजी और श्रीसनातनजी की भक्तिरूपी जल के, उनके भतीजे तथा शिष्य श्रीजीवगुसाई श्रीहरि कृपा से गम्भीर सरोवर के सरिस हुए: अर्थात् उन दोनों की भक्ति रूपी जल इनके हृदय सर में भर गया। उस सर के बेला (मर्जादा, घाट)सम श्रीभगवद् भजन की परिपक्वता (सिद्धता) को जानिये । श्रीजीवगुसाई की भनिरूपी जल में कपाय (काई) कदापि नहीं लगी ॥ BECORGES RECE अन ** भकिसुधास्वाद तिलक। आप पुस्तक लिखने में अति प्रवीण दत्तचित्त चमत्कार युक्त थे अर्थात् अति ललिताक्षर अति शीघ्र अति शुद्ध अति स्पष्ट तथा एक पृष्ठ लिखके सूखने को रख दूसरे पत्रा के पृष्ट को लिखकर फिर पूर्व पत्रा के पृष्टको लिखते थे परन्तु एक अक्षर घटबढ़ नहीं होता था। वेद पुराण शास्त्र स्मृति संहिताओं के भाव समझने में सिद्धान्त प्रमाण जानने में आपने पूरा चित्त लगाया ।। सब ऐश्वर्य और संपत्ति तृणसम परित्याग करके श्रीवृन्दावन में आके दृढ़ निवास किया । श्रीयुगलसर्कार के चरणों के बडे भारी अनुरागी हुए । सब सद्ग्रन्थों के सार को आपने ऐसा अभ्यास और मनस्थ किया था कि जैसे मनुष्य अपनी हथेली पर के आंवले को सम्पूर्ण प्रकार से रेखा रेखा भली भांति देखता है । सन्देह रूपी गिरहों को खोलने में आप परम समर्थ, महा वैराग्यवान्, शान्त, बड़े धीर, तथा रसज्ञ; और परम रहस्योपासक थे॥ आप एक दिन बहुमूल्य पाटाम्बर पहने थे, देखकर श्रीरूपसनातन- जीने कहा "विरक्त कहलाकर यह वस्त्र?"आपने उसी घड़ी किसी को देडाला और ग्राम के बाहर श्रीयमुनाजी के तीर कुटी बनाकर भजनमें मग्न रहने लगे । आपकी वृत्ति तथा प्रेम देखकर, श्रीरूप और सनातनजी ने विशेष शिक्षा दी और अत्यन्त कृपा की। गुप्त रखने की आज्ञा दी पर आपने सबके हित के लिये प्रगट कर दिये ।। (४६७ ) टीका । ववित्त । ( ३७६ ) किये नाना ग्रन्थ, हृदै प्रन्थि दृढ़ छेदि डारे, डा धन यमुना में आवै चहूँ ओर तें । कही दास "साधुसेवा कीजै” कहैं “पात्रता न," "करों नीके" करी; बोल्यौ कटु कोप जोर तें ॥ तब समझायौ, सन्तगौरव बढ़ायौ, यह सबकों सिखायौ, बोलें मीठौ निसि भोर तें। चरित अपार, भाव भक्ति को न पारावार, कियो ऊ वैराग सार कहै कौन छोरतें ॥ ३७४ ॥ (२५५) बार्तिक तिलक । आपने अनेक ग्रन्य बनाए जो हृदय की दृढ़ ग्रन्थियों को भली- SecuCKGROINE SCRestactackera , श्रीभक्तमाल सटीक। भांति काट देते हैं। आपके पास चारों ओर से लोग धन भेजते थे और भेट देते थे, औप आदर से लेकर श्रीयमुनाजी में फेंक दिया करते थे। शिष्य सेवकों ने धन को साधुमेवा में लगाने की वारंवार प्रार्थना की। उत्तर दिया कि “साधुसेवा करने योग्य पात्र तुमलोगों मैंसे कोई नहीं दीखता।" एक दास ने कहा "मैं भलीभांति करूंगा।" वह आज्ञा लेकर सन्तों की सेवा करने लगा। कुछ काल के अनन्तर एक दिन एक सन्त ने कुसमय में कुछ भोजन मांगा, इसने क्रोध करके कटुवचन कहे । तव सुनकर आपने बहुत समझाया सन्तों की महिमा बता कर कहा कि "इसी लिये न मैं कहता था कि साधुसेवा अति कठिन है।" सदैव मिष्ठ बोलने की सबको शिक्षा दी । स्त्री का मुख नहीं देखते थे। दो० "मीराजी ब्रज में गईं, ते निज भक्ति लखाय । सो पन दियो छुड़ाय सो, * मीरा कथा सुहाय ॥ आपके चरित अपार हैं । आपकी भक्तिभाव का पार कौन पा सकता है। वैराग्य धारण करने पर भी आपकी गूढ़वृत्ति भावभक्ति को पहुँचना सहज नहीं। एक परीक्षित कृपापात्र को कुटी सौंपके आप वृन्दावन के कुंजों में प्रेममत्त परम अकिंचन फिरने लगे। श्रीवृन्दावन से कहीं अन्यत्र रात्रि को न बसने तथा बड़ी भारी पा. ण्डित्य की प्रशंसा सुनकर बादशाह ( अकबर) ने थोड़ी घड़ी के लिये सत्संग के निमित्त, घोड़ों के रथ पर आगरे में बुलाकर फिर स्थ पर डाकही द्वारा उसी दिन श्रीवृन्दावन पहुंचा भी दिया। बादशाह के बड़े आग्रह पर यह आज्ञा की कि श्रीवृन्दावन में एक वड़ा भारी पुस्तकालय कर दो कि जिसमें सब वेद, पुराण, उप- पुराण, स्मृतियां, शास्त्र, संहिता आदि सब प्रकार की संस्कृत पोथियां संग्रहीत हों। बादशाह ने वैसाही किया ॥ (४६८) छप्पय । (३७५) वृन्दावन की माधुरी, इन मिलि आस्वादन कियौ। * थीमीराजी ने पूछा "श्रीकृष्णचन्द्र के अतिरिक यहां पुरुष और कौन ?" ("श्रीमीरावाईजी" की जीवनी देखिये) Skector SOCIENCREATMEENCHAKKAct

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भकिसुधास्वाद तिलक।
सर्वस राधारमन "भट्टगोपाल” उजागर। "हृषीकेश,
"भगवान,” "विपुलवीठल” रससागर ॥ "थानेश्वरी
जगन्नाथ,” "लोकनाथ” महामुनि “मधु,” "श्रीरंग".
कृष्णदास.” पंडित उभै अधिकारी हरि अंग ॥
"घमंडी,” “युगलकिशोर” भृत्य “भूगर्भ” जीव
दृढव्रत लियौ । वृन्दावन की माधुरी इन मिलि
आस्वादन कियौ ॥६४॥ (१२०)
वार्तिक तिलक।
श्रीवृन्दावन की माधुरी का आस्वादन श्रीकृपासे इन महानुभावों
को प्राप्त हुआ।
१ श्रीगोपालभट्टजी। उजागर, जिनके सर्वस्व श्रीराधारमणजी
ही थे।
२ श्रीअलिभगवान्जी।
३ श्रीविठ्ठलविपुल जी, रससागर ।
४ श्रीजगन्नाथथानेश्वरीजी।
५ श्रीलोकनाथजी।
६ श्रीमधु गुसाईजी, महामुनि।
७ श्रीश्रीरङ्गाजी।
८ श्रीकृष्णदास ब्रह्मवारीजी, अधिकारी।
६ श्रीकृष्णदास पंडितजी, हरि के अंग (मित्र )।
१. श्रीभूगर्भजी दृढ़व्रतवाले।
११ श्रीघमंडीजी।
१२ श्रीयुगलकिशोर भृत्य।
१३ श्रीजीवगोसाईजी।
१४ श्रीहृषीकेशजी
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है A PASRAEKHARA ६२० श्रीभक्तमाल सटीक। (११५) गुसाई श्रीगोपालभट्टजी। - (४६६) टीका । कवित्त । ( ३७४) श्रीगोपालभट्टजू के हिये वै रसाल वसे, लस यों प्रगट राधारवन सरूप हैं । नाना भोग राग करें, अति अनुराग पगे, जगे जग माहि, हित कौतुक भनूप हैं ॥ वृन्दावन माधुरी अगाध को सवाद लियो, जियो जिन पायौ सीथ, भये रस रूप हैं । गुनही को लेतं, जीव अवगुन को त्यागि देत, कस्तानिकेत, धर्मसेत, भनभूप है ।। ३७५ ॥ (२५४) वार्तिक तिलक। गुसाई श्रीगोपालभट्टजी शृङ्गार माधुर्य और धामनिष्टा में निपुण, गौड़ ब्राह्मण, महात्मा श्रीव्यंकटभट्टजी के बेटे, महाप्रभु श्रीकृष्ण चैतन्यजी के शिष्य ने,श्रीवृन्दावन की अगाध माधुरी का स्वाद लिया; आपके हृदय में वे रसाल नाम श्रीराधारमणजी प्रगट स्वरूपसे वसते थे । नाना प्रकार के भोगराग वडे अनुरागसे अर्पण किया करते थे; संसार में बड़े प्रसिद्ध हुए; आपके सर्वहितू होने के अनेक कौतुक हैं; जिसने आपकी सीथप्रसादी पाई वह जीवनमुक्त, रसका रूपही होगया; किसी जीवका अवगुण अपने मन में कभी न लाते थे, सब प्राणियों के गुणोंही को हृदय में सदा रखते थे। सब सम्पत्ति ऐश्वर्य को पारेत्याग कर श्रीवृन्दावन में आ बसे थे। धर्मसेत, करुणानिकेत और भनभूप हुए। एक वेर प्रभु अति कृपा करके (वैशाख की पूर्णमासी को ) बा- पके सेवावाले शालग्रामजी में से परम मुन्दर मूर्ति प्रगट हुए, जो श्रीराधारमणजी अभी तक मन्दिर में विराजमान हैं । भक्तरुचि रखनेवाले भावग्राहक श्रीप्रभु की जय ।। (११६) श्रीअलिभगवान् । (४७०) टीका | कवित्त । (७) अलिभगवान, रामसेवा सावधान मन, वृन्दावन आये कछ और रीति भई है । देखे रासमण्डल में विहरत रस रास,वादी बधि EME RECRUCCESKCOESI , मन सुन, भकिसुधास्वाद तिलक प्यास दृग, सुधि वुधि गई है । नाम धरि रास औ बिहारी, सेवा प्यारी लागी, खंगी हियमांझ, गुरु सुनी वात नई है । विपिनि पधारे, आप जाय पग धारे सीस, "ईश मेरे तुम," सुख पायौ, कहि दई है ॥ ३७६ ॥ ( २५३) वार्तिक तिलक। श्रीअलिभगवान् ने गुरु से श्रीराममन्त्र पाया। श्रीवृन्दावन में रास के बड़े ही प्रेमी हुए। दर्शन के बड़े प्यासे थे । श्रीठाकुरजी को "रासविहारी" जी कहते, और अच्छे प्रकार से सेवा करते थे। कृपा करके गुरुजी ने श्रीवृन्दावन में जाकर दर्शन दिये। गुरु आग- आपने श्रीचरण पर अपना सीस रखकर विनय किया कि "यद्यपि आप गुरु ईश से बड़े हैं, तथापि मेरा सम्पूर्ण मन तो रास. विहारीजी में बहुत आनन्द मानता है।" सुनकर श्रीगुरुभगवान् अलिभगवान् से प्रसन्न हुए और कहा कि "रातविहारीजी भी तो श्रीरामहीजी के अवतार हैं, रासविहारीजी ही में पगे रहो।" (११७) श्रीविठ्ठल विपुलजी। (४७१) टीका । कवित्त । (३७२) स्वामी हरिदासजू के दास, नाम बीठल है, गुरु से वियोग दाह उपज्यो अपार है। रात के समाज में विराज सव भवराज, बोलि के पठाये, आये आज्ञा बड़ो भार है ॥ युगल सरूप अवलोकि, नाना नृत्य,भेद, गान तान कान सुनि, रही न संभार है । मिलि गये वाही ठौर, पायौ भाव तन और, कहे रससागर सो ताकी यो बि. चार है ॥ ३७७॥ (२५२) वार्षिक तिलक। लीलारसिक तथा गुरुनिष्ठ श्रीविपुल विठ्ठलजी, स्वामी श्रीहरि- दासजी के शिष्य थे। श्रीगुरु के परमधाम जाने पर गुरु वियोग ने आपको बड़ा शोकाकुल करदिया; कहीं जाते आते न थे। एक रात वहां (श्रीवृन्दावन में ) रास के समाज में महानुभावों ने श्राप को बुला भेज'; आज्ञानुसार श्राप गए । श्रीयुगलसार के दर्शन कर, PostcheckRECRACTEGOKAKAKAR** श्रीभक्तमाल सटीक । ne - . . तथा गान घाजा की अपार माधुरी सुन, आप बेसुध होगए । उसी में श्रीगुरुं हरिदासजी की और श्रीयुगलसर्कार की दिव्य झांकी पाके श्रीविट्टलविपुलजी रससागर में मग्न हो, पंचभौतिक तने तज के दिव्य शरीर पा, परमधाम को पहुंच गए; प्रेम इसका नाम है। प्रेमाभक्ति की जय ॥ (११८) श्रीजगन्नाथ थानेश्वरीजी। (४७२) दीका | कवित्त । (३७१) महाप्रभु पारपद थानेस्वरी जगन्नाथ, नाथ को प्रकाश घर दिना तीन देख्यो है । भए सिप्य, जान आप नाम कृष्णदास धस्यौ, , कृष्णजू कहत सबै आदर बिसेख्यो है ॥ सेवा 'मनमोहनजू' कूप में जनाइ दई, वाहर निकास, करी लाड़, उर लेख्यो है । सुत रघुः नाथ जू कों, स्वप्न में श्लोक दान, दयाकै निदान; पुत्र दियो, प्रेम पेख्यो है ॥ ३७८ ॥ (२५१) वार्तिक तिलक । "महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्यजी” के पार्षद “थानेश्वरी श्रीजग- न्नाथजी" प्रथम अपने गृह में थे; पूर्वजन्मसंस्कार भाग्योदय भ. र्थात् श्रीहरिकृपा से गृह ही में प्राणनाथ भगवान् का प्रकाशमान रूप तीन दिवस देखा, अति ज्ञानानन्द को प्राप्त हुए । चौपाई। "मम दर्शन फल परम अनूपा । जीव पाव निज सहज स्वरूपा ॥" तब आके महाप्रभुजी के शिष्य हुए । आपने इनका "कृष्ण- दास" नाम रक्खा, सब लोग अति आदर से "कृष्णजी" ही कहते थे ॥ स्वप्न में "श्रीमनमोहनजी" ने कहा कि "हम अमुक कूप में हैं निकालकर पधरानो और सेवा करो।" बड़े प्रेम से वैसाही किया ॥ • आपके पुत्र (रघुनाथदास) विद्याहीन अपढ़ थे। एक समय आप इस चिन्ता में थे, स्वप्न में कृपानिधि सर्कार ने आपको एक SHERSCHSPICASACCHAT a ॐॐॐड R 'भक्तिसुधास्वाद तिलके। ६२३ श्लोक' बताकर-आज्ञा की कि “यही श्लोक पुत्र को पढ़ा दो।" आपने वह श्लोक पुत्र को दिया; सुत रघुनाथदास बड़े विद्वान् हरि- प्रेमी हुए । कृपा की जय ॥ (११९) श्रीलोकनाथ गुसाईजी। (४७३) टीका । कवित्त । (३७०) महाप्रभु कृष्णचैतन्यज़ के पारषद, लोकनाथ नाम, अभिराम सब रीति है। राधाकृष्ण लीलासौं रंगीन मैं नबीन मन, जैसे जल मीन तैसें निसि दिन प्रीति है ॥ "भागवत” गान रसग्वान, सो तौ प्राण तुल्य, अति सुख मान, कहैं गावै जोई मीति है । रसिक प्र. बीन मग चलत चरण लागि, कृपा के जनाय दई, जैसी नेह नीति है ॥३७६ ॥ (२५०) वार्त्तिक तिलक । महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्यजी के आप शिष्य थे, “लोकनाथ नाम था। आपकी सब रीति अति अभिराम थी। श्रीराधाकृष्णजी की नवीन लीला में आपका मन भली भाँति रँगा था; जैसे जल की प्रीति मीन को वैसेही आपको भी रूप नाम लीला धाम से प्रेम था। शृङ्गारमाधुर्यनिष्ठा में बड़े दृढ़ थे । श्रीवृन्दावन धाम से अतिशय प्रीति थी। श्रीमद्भागवत का गान कीर्तन सदा आपके प्राण सरिस था और श्रीमद्भागवत पाठ गान करनेवालों से बड़ा प्रेम रखते थे, यह कहते थे कि “भागवत पढ़नेवाले हमारे मित्र हैं। एक दिन रसिक प्रवीणजी मार्ग चलते एक को श्रीभागवत गाते सुन उसके पांवों पर गिर पड़े; और कृपा करके यह भेद उसको जना दिया जिससे औरों को भी श्रीभागवत ग्रन्थ और भागवत का माहात्म्य प्रसिद्ध हुधा॥ एक दिन इनके ठाकुर के भूषण चोरों ने चुरा लिये । थोड़ा आगे जाके सव अन्धे हो कर लौट आए श्रीरसिकजी के चरणों पर पड़े, आपने कृपाकर उन सबको सनाथ किया । BEEG Receck k KARNATAN*** , ६२४ श्रीभक्तमाल सटीक। (१२०)श्रीमधुगोसाईजी।। (४७४) टीका ! कवित्त । (०६६): श्रीमधुगोसाई आये वृन्दावन; चाह बढ़ी, देखें इन नैननि सों कैसोधौं सरूप है । ढुंदत फिरत बन वन कुंजलता द्रुम, मिटी भूख प्यास, नहीं जाने छाँह धूप है । जमुना चढ़त, काट करत,करारे जहां, बंसीवट तट डीठ परे वै अनूप है । अंक भरिलिये, दौर अजहूंलो सिरमौर चाहै भाग भाल साथ गोपीनाथ रूप है ॥३८०॥ (२४६) वार्षिक तिलक। श्रीमधगुसाईजी धामनिष्ठा में दृढ़, श्रीमधु" नाम श्रीवृन्दा वन में वंगाले से आए, तव यह चाह आपके मन में बढ़ी कि अपने नेत्रों से श्रीकृष्णचन्द्र को देखू कि वह रूप केसा है।" इस प्रेम की उत्कंठा में भरे हुए, भूख, प्यास, छाया, धूप, नींद, सब कुछ छोड़, वन वन, प्रति कुंज और लता वृक्षों के बीच में ढूंढते । फिरते थे। - चौपाई। "प्रियतम पद पंकज जब देखों। तब निज जन्म सफल करि लेखौं।' वार्तिक तिलक। वंशीवट के निकट में जहां श्रीयमुनाजी बढ़ी हुई, करारे काटि रही थीं, वहां आपने कृपाकर अनूप रूप से दर्शन दिये। मधुगुसाई जी दौड़ भक्तवत्सलजी को अंक में भरकर, अनिर्वाच्य परमानन्द को प्राप्त हुए ॥ चौपाई। "ऐसो सुख बरनिय केहि भांती। जनु चानकी पाइ जल स्वाती ॥ १॥ हरिदर्शन फल परम अनूपा । जीव पाव निज सहज स्वरूपा ॥२॥" प्रेम हो तो ऐसा दर्शन की प्यास हो तो ऐसी॥ तदनंतर उस साक्षात् रूप से भगवान् अर्चामूर्ति " गोपीनाथ" रूप हो, वहां विराजे; अवतक जिसके बड़े भाग हों, वह रसिक- सिरमौर के दर्शन करता है । प्रेम की जय, जय, जय ॥ kcicks BLOG HARSHITARATRENAKSHIRHARE भकिसुधास्वाद तिजक। ६२५ (१२१) श्रीकृष्णदास ब्रह्मचारीजी। (७५ ) टीका । कवित्त । (३६८) गुसाईं श्रीसनातन जू “मदनमोहन" रूप माथे पधराये कही सेवा नीके कीजिग"। जानों "कृष्णदास" ब्रह्मवारी अधिकारी भये, भट्ट श्रीनारायणजू सिख्य किये रीझिये ॥ करिकै सिंगार चारु, आपही निहारि रहै, गहै नहीं चेत भाव मांझ प्रति भीजिये । कहाँ लौ बखान करौं राग भोग रीति भाँति, अवलौं विराजमान देखि देखि जीजियै ॥ ३८१॥ (२४८) वार्तिक तिलक। प्रेमी श्रीकृष्णदास ब्रह्म वारीजी गुसाई श्रीसनातनजी के शिष्य थे, सो इनको योग्य, प्रेमी, तथा सुपात्र जानके आप (श्रीसनातन जी) ने प्रभु "श्रीमदनमोहन” विग्रहजी के कैंकर्य का भार कृष्णदास- जी के सीसपर धर, आपने कहा कि "प्रभु की सेवा भले प्रकार करो।" श्रीगुरुआज्ञा माथे ग्ख यथार्थ सेवा करने लगे, क्योंकि सेवा के अधिकारी ही थे। कुछ कालांतर में श्रीनारायण भट्टजी आपके (श्रीकृष्णदास ब्रह्मचारीजी के ) शिष्य हुए; उनको सेवा सौंपी; उ. नकी प्रेमाभक्ति प्रभु के रीझने योग्य थी, आपकी सानुराग सेवा क्या कही जाय, अति सुन्दर श्रृंगार करके श्रीवविको इकटक देखते निहारते प्रेम समाधि लग जाती थी, तन मन की सत्र सुधि भूलि मति चित्त भावानुराग में भीग जाते थे; और राग भोग की रीति भाँति कहांतक बखान की जाय । आपके प्रेम के लड़ाये हुए श्रीमद. नमोहनजी अबतक विराजमान हैं, कि जिनके दर्शन से जीवों का जीवन सुफल होता है। (१२२) श्रीकृष्णदास पंडितजू। (४७६ ) टीका । कवित्त । (३६७) श्रीगोविन्दचन्द रूपरासि रसरासि दास, कृष्णदास पंडित ये दूसरे यो जानि ले । सेवा अनुराग अंग अंग मति पागि रही, १श्रीरामदासजी और श्रीकृष्णदासजी भक्त कई हुए है। GORAKAASIK FAS ** HARRAIN श्रीभक्तमाल सटीक। , पागि रही मति जौपै तापै यह मानि लै ॥ प्रीति हरिदासन सो वि- विधि प्रसाद देत, हिये लाय लेत, देखि पद्धति प्रमानि लै । सहज की रीति में प्रतीति सो चिनीति करें, ढरै वाही ओर मन अनुभव थानि ले ॥३८२॥ (२४७) वार्तिक तिलक। रूप के राशि श्रीगोविन्दचन्दजी के रसराशि दास "प्रेमी श्री- कृष्णदासजी पंडित” जान लेना चाहिये । प्रभु की सेवा अनुराग के जितने अंग हैं उन सबों में इनकी मति पग रही थी। हे श्रोता जनो ! जो आपकी भी मति प्रेमसे पगी हो, तो यह वार्ता हितकरके मान लीजिये। श्रीकृष्णदासजी की हरिदासों वैष्यवों से अति प्रीति थी; सन्तों को श्रीगोविन्दजी का विविध प्रकार का प्रप्ताद देते हृदय में लगा लेते थे; इस प्रेम सम्प्रदाय को भी बुद्धि के नेत्रों से देखकर प्रमाण करना चाहिये । प्रेमी पंडितजी श्रीहरि और हरिभक्नों से सहजरीति ही से अति विनीत हो, प्रीति प्रतीति रख, उसी ओर ढरते थे। इस प्रेमभक्ति का अनुभव अपने मन में करना चाहिये । ( १२३) श्रीभूगर्भ गोसाईजू (४७७) टीका | कवित्त । (३६६) गुसाई “भूगर्भ" वृन्दावन दृढ़वास कियो, लियो सुख वैठि कुन "गोबिंद" अनूप हैं। बड़ेई बिरक्क अनुरक्त रूप माधुरी मैं, ताही का सवाद लेत मिले भक्त भूप हैं ॥ मानसी विचार ही अहार, सो निहारि रहँ, गहें मन वृत्ति, बेई, युगल सरूप हैं। बुद्धि के प्रमान उनमान में वखान कस्यौ भयौ बहु रंग जाहि जानै रस रूप हैं ॥ ३८३॥ (२४६) वार्तिक तिलक। गुसाईं श्री "भूगर्भजी" ने धामनिष्ठा दृढ़तापूर्वक वृन्दावन वास किया और अति अनूप श्री “गोविन्द" कुंज (मन्दिर) में विराज- मान होकर श्रीगोविन्ददेव भगवान् के प्रेमके सुखके लिये; आप ReKHESARKARKARISARKARICHANCHAR II-IN-HINE भनिसुधास्वाद तिलक। ६२७ संसार से अति विरक्त, और प्रभुरूप माधुरी के अति ही अनुरन थे; भनभूपों के साथ में मिले हुए उसी माधुरी का स्वाद लेते थे। मान- सी सेवा ही का निन्तवन आपका आहार था; मन की वृत्ति रूप दृष्टि से गौर श्याम युगल स्वरूप ही को निहारते रहते थे। आपकी अगम्य दशा को मैंने अपनी बुद्धि के प्रमाण ही भर अनुमान करके बखान किया है; आपके हृदय में अथाह प्रेमरंग भरा था; उसको रस रूप संत ही जानते थे। ( १७%) छप्पय । (३६५) (श्री) "रसिकमुरारि" उदार अति, मत्त गजहिं उपदेश दियौ ॥ तन, मन, धन, परिवार,सहित, सेवत सन्तन कहँ । दिव्य भोग, आरती, अधिक हरिहूँ ते, हियमहँ॥ श्रीरन्दाबनचन्द श्याम श्यामारंग भीने। मगन प्रेम पीयूष पयध परचै बहु दीने ॥ श्रीहरिप्रिय "श्यामानन्दबर” भजन भूमि उद्धार कियो। (श्री) "रसिकमुरारि" उदार अति, मत्त गजहिं उपदेश दियौ ॥८५ ॥ (११८) (१२४) श्रीरसिकमुरारिजी। वार्तिक तिलक । श्रीरसिकमुरारिजी अतिशय उदार हुए। आपने मतवाले हाथी को ज्ञानभनि उपदेश देकर अपना शिष्य कर लिया, और उदार ऐसे हुए कि परिवार सहित तन मन धन जन से सन्नों की सेवा करतेथे; कहांतक कहा जाय हरिभकों में श्रीहरि से भी अधिक भाव हृदय में मान, दिव्य भोग अर्पण कर, भारती किया करते थे। श्रीवृन्दावन युगलचन्द श्यामा श्याम के रंग में नागे, प्रेमदिर पयोधि में मग्न रहतेथे॥

4336456+ॐRE श्रीभकमाल सटीक। ६२८ । शेर । होंठ पर नाम वही, चित्त वहीं देह कहीं ॥ हाथ में कंज चरण, जाप वही, आप वहीं ॥१॥" (रूपकला) और बहुत से परिचय भी दिये । अपने गुरुदेव श्रीहरिप्रिय "श्यामानन्द " जी की श्रेष्ठ भजनरूपी भूमि का उद्धार किया। श्रीरसिकमुरारिजी ऐसे उदार हुए कि दुष्ट राजा की चीनी हुई भूमि को उद्धार किया, हरिसेवा में लोटा लिया । अपना तन मन धन लव कुछ सन्तों ही का समझते थे। (४७६ ) टीका | कवित्त । (३६४) रसिकमुरारि साधुसेवा विसतार कियो, पावै कौन पार, रीति भाँति कछु न्यारियै । संतचरणामृत के माट गृह भरे रहें, ताहीको प्रनाम पूजा करि उर धारियै ॥ यावें हरिदास, तिन्हें देत सुखराशि जीभ एक, न, प्रकाशिसकै, थकै सो विचारियै । करें गुरुउत्सव, लेदिन भान सवै कोऊ, द्वादस दिवस जन घटालागी प्यारि- यै ॥ ३८४ ॥ (२४५) वार्षिक तिलक। श्रीरसिकमुरारिजी ने संत-सेवा का वड़ाही विस्तार किया । आपकी अलौकिक रीति भांति का वर्णन कर कौन पार पा सकता है । गृह में संतो के चरणामृत के माट (पात्र ) भरे हुए वेदिकाओं पर रक्खे रहते, उन्हीं की पूजा, और उन्हीं को प्रणाम, हृदय में भाव धारण करके, किया करते थे। आपके स्थान में अनेक भागवद्- दास आते थे, उनको सत्कार कर, अति भारी सुख दिया करते थे। आपकी अनूठी प्रीति रीति कभी एक जीभ से प्रकाश नहीं हो सकती; विचार कर मन थक जाता है । जिस दिन गुरुउत्सव करते थे, उस दिन समस्त जीवमात्र को भोजनादिक से सत्कार करते थे, और संत जनों की घटा (समूह) बारह दिवस (दिनों) तक छाई रहती थी। Posleeches RECCALSCIENCE अURE NOR भकिसुधास्वाद तिलक। ६२६ (४०) टीका । कवित्त । (३६) संतचरणामृत को ल्यावो जाय नीकी भांति, जी की भांति जा. निबे को दास ले पठायो है। आनिके बखान कियौ लियो सब साधुन को, पान करि बोले “सो सवाद नहीं आयी है" ॥ जिते सभाजन, कही चाखौ देहु मन कोऊ महिमा न जाने कन, जानी छोड़ि आयो है। पूछी, कही कोढ़ी एक रह्यो, " आनो, ल्यायो, पीयो, दियो सुख पाय, नैन नीर ढरकायौ है ॥ ३८५ ॥ (२४४) वार्तिक तिलक। एक दिवस, भंडारे में बहुत संत * प्रसाद पा रहे थे; आपने एक शिष्य सेवक के जी की (हृदय की) गति जानने के लिये प्राज्ञा दी कि " अच्छे प्रकार से सब संतों का चरणामृत उतार लाओ।" चरणामृत लाकर उसने कहा कि "मैं सब संतों का चरणामृत ले आया हूँ।" आप पान कर बोले कि "क्या कारण है कि जैसा स्वाद नित्य आताथा वैसा नहीं आया।" जितने लोग सभा में बैठे थे उन सवों को भी चरणामृत देकर बोले कि "मन को एकाग्र कर पान करो, कहां वह स्वाद है ?" वे विचारे चरणामृत की महिमा और स्वाद किंचित्भी नहीं जानते थे क्या बताते । आप तो परमनिष्ट थे, आपने जानलिया कि किसी सन्तका चरणामृत लेते में छोड़ दिया है। पूछने से वह दास कहनेलगाकि "हां, एक कोढ़ी पधारी तो रहगया है।" आपने आज्ञा दी कि "उनका भी ले आओ।" फिर उनका भी मैंगा के जब आपने चरणामृत लिया, तब सुख स्वाद पाने से आपके नेत्रों से प्रेमानु झरने लगे ॥ जय ! जय !! -(४८१) टीका । कवित्त । (३६२) नृपति समाज में, विराजमान भक्तराज, कहैं, वे बिबेक, कोऊ कहनि प्रभाव है । तहां एक ठौर साधु भोजन करत, रौर देवौ दूजी सोंटा संग, कैसे आवै भाव है । पातरि उठाय श्रीगुसाईं पर डारि- दई, दई गारी, सुनी आप वोले देख्यो दाव है । सीथ सौं विमुख आपके एक भंडारे में बारह बड़े बड़े महाराजा श्राशा में उपस्थित थे। न - . * HPUR श्रीभक्तमाल सटीक। मैं तो, आनि मुख मध्य दियो; कियौ दास दूर, सन्तसेवा मैं न चाव है ॥ ३८६॥ (२४३) वार्तिक तिलक। किसी दिवस कई एक राजा और सज्जनों के समाज में भारान श्रीरसिकमुरारिजी बिराजे हुए भक्निविवेकमई वार्ता कह रहे थे, वे, सब श्रोता विवेक को ग्रहण करते थे क्योंकि आपका कथन बड़ाही प्रभावयुक्त था। उसी समय सब सन्त इकट्टे भोजन प्रसाद पाने को बिराजे थे उनमें से एक वेषधारी अपने सौटे ( दंडा) के लिये दूसरा पारस (प्रसाद पत्तल ) मांगता था, और पनवारा पत्तल न देने से झगड़ा करने लगा; आपके भण्डारी अधिकारियों को सौटे में भाव कैसे आता, इससे उन्होंने नहीं दिया। खीझकर वह पत्तल प्रसाद उठा, उसने श्रीगुसाईजी के ऊपर डाल गालियां भी दीं सुन- कर आप बोले "देखो सन्तकी कृपा से मेरा कैसा अच्छा दाव पड़- गया है, मैं केवल चरणामृत लेता, और सीथप्रसादी से विमुख था; सो इन सन्तने लाके मुख में डाल दिया।" यह कह उसको सोंटे का और उसका भी दो पत्तल पारस दिला दिये ॥ वह दास जिसने सोंटे का पत्तल नहीं दिया तिसको उस कर्य (बंदगी) से छुड़ा दिया, कि "सन्तसेवा में तेरा भाव अनुराग नहीं है, क्यों जी? सोंटे का पत्तल क्यों न दिया? इस सोटे से भांग घोट कर और पीकर सन्त तीन पारस उड़ाय जाते हैं ॥" (४८२) टीका । कवित । (३६१) बाग मैं समाज संत, चले श्राप देखिवें को, देखत दुरायो जन हुक्का, सोच पस्यो है । बड़ौ अपराध मानि, साधु सनमान चाहैं, घूमितन," वैठि कही “ देखौ कहूं धस्यो है "॥ जायकै सुनाई दास, काहूके तमाखू पास, सुनिकै हुलास बढ्यौ, आगे आनि कस्खो है । भूठेही उसांस भरि, सांचे प्रेम पाय लिये, किये मन भाये, ऐसे संका दुख हस्यो है ॥ ३८७॥ (२४२) Recks checketNKAKArkecker RSSISORIES भकिसुधास्वाद तिलक। ६३१ वार्तिक तिलक। एक समय आपकी वाटिका में संतों का समाज विराजमान था, आप दर्शन के लिये गये; एक वेषधारी नारियल (हुक्का) पीरहा था, आपको देख, संकुचित हो, नारियल (हुके को) छिपादिया; आप अपना बड़ा अपराध मान, उस साधु का सन्मान करने के लिये, मुंठही पेटथाम (पकड़ ) घूमकर बैठगए; और एक दाससे । कहने लगे कि “ मेरे पेट में बड़ी पीड़ा उठी है, कहीं (हुक्का) ना. रियल चिलम मिले तो यह उससे अच्छा हो।" सेवक को कहा कि "देखो किसी संत के पास हो तो ले आओ" वह सेवक सब संतों से पूछने लगा कि “किसी के पास पीने की तमाखू होय तो दी. जिये।" वह पीनेवाला जो संकुचित हुआ था सो बड़ा प्रसन्न हो, आगे ले आया। आप झूठेही पीने की भांति उसांस (फॅक) लेकर मानो उसको पानकर पीड़ा रहित होगये। इस प्रकार आपने संका सोच दुःख हरके उस साधु को प्रसन्न किया । (४८३ ) टीका । कवित्त । (३६०) उपजत अन्न गांव, आवै साधुसेवा ठांव, नयो नृप दुष्ट आय कांव कांव किया है। ग्रामसो जबत कस्यो कस्यो ले विचार आप स्यामानन्दजू मुरारि पत्र लिखि दियौ है ॥ जाही भाँति होहु ताही भाँति उठि आवौ इहां आये हाथ बांधि करि अचेहूँ न लियौ है । पाछे साष्टांग करी करी ले निवेदन सो भोजन में कही चले आये भीज्यौ हियों है ॥ ३८८ ॥ (२४१) वार्तिक तिलक। स्थान के संबंध में एकग्राम था, उसमें खेती से बहुत सा अन्न उत्पन्न होता था जिससे स्थान में संतलेवा होती थी। देववश एक नया दुष्ट राजा हुआ, उसने बहुत से दुर्वचन बोल, ग्राम ले लिया। जब्त करो"=ts bरोकलिया, लेलिया। २ जैसे एक स्त्री प्रियतम पति की श्राशा सुनकर मूसल को श्रोखली के ऊपर भाकाश में ही छोड़कर दौड़ी, तथा दूसरी स्त्री डोरी को कुएं में से बिना निकाले छोड़ आ पहुँची । (दोनों के मुसल घ डोरी डोल पैसैही अधड़ में रामकृपा से टँगे रहे ) ॥ RREARSANERGACASS 5 or -- ६३२ श्रीभक्रमाल सटीक ।- , । श्रीरसिकमुरारिजी के गुरुदेव "श्रीश्यामानन्द ” जी उस ग्राम में थे, वहां से आपको पत्र लिखा कि "तुम जिस भाँति हो उसी भाँति पत्र देखते ही चले आओ।" आप प्रसाद पाते थे आज्ञा सुनकर वैसेही चलदिये, सत्रह कोल में श्रीश्यामानन्दजी थे, आपके मुख हाथ जूठे थे, इससे पीछेही से साष्टांग दंडवत् कर हाथ जोड़ निवेदन किया कि प्रसाद पातेही में आज्ञा सुन वैसेही चन्ता आया हूं। यह सुनकर श्रीश्यामानन्दजी का हृदय कृपा प्रसन्नता से भीग गया। (४८४) टीका । कवित्त । (३५६) आज्ञा पाय, अचयो लै, दै पठाये वाही ठौर दुष्टसिरमौर जहां, तहां आप पाये हैं । मिले मुतसद्दी सिष्य, आइकै सुनाई वात, "जावौ उठि प्रात," यह नीच जैसे गाये हैं ॥ "हमही पठावे, काम करि समझावै सब, मनमें न आवै, जानी नेह डर पाये हैं। "चिंता जिनि करौ, हिये धरौ निहचिंतताई, "भूप सुधि पाई दिना तीन कहां छाये हैं" ॥ ३८६ ॥ (२४०) वार्तिक तिलक। श्रीगुरुआज्ञा पाय आपने आवमन किया मुंह हाथ धोये । आप को समर्थ जान, श्रीश्यामानन्दजी ने उस खल राजा के पास भेजा; जहाँ वह दुष्टसिरमौर था, वहीं आप आये। वहां के कायस्थ मंत्री लोग आपके शिष्य थे, वे सब आपके पास आए और वह राजा जैसा नीच था सो सब कह उन सबोंने प्रार्थना कीकि"आप प्रात:- काल यहां से चले जाइये, हमको उसके पास भेजिये, हम उसको 2.समझाकर सब कार्य सुधार लेंगे।" उन लोगों का कहना भापके मनमें नहीं आया, जाना कि ये लोग हमारे स्नेह से डरते हैं। तत्र शिष्यों को आपने समझाया कि "तुमलोग कुछ चिंता मत करो, हृदय में निश्चित रहौ, जाकर हमारा आगमन उससे कह दो।" 'शिष्य लोग आपके पास तीन दिन तक रहे; इससे राजा ने इन को बुलाकर पूछा " तुम लोग तीन दिन कहां रहे ?" इन्होंने १'मुतसद्दी" पटवारी, मन्त्री, दीवान, श्रेष्ठलेपक ॥ ECRECERENCHEMINISerect कहा कि ॥ निस भकिसुधास्वाद तिलक। हमारे श्रीगुरुजी आये हैं, उनके समीप थे ॥" (४५) टीका । कवित्त । (३५% ) सुनी आये गुरुवर, कही"ल्यावो मेरे घर, देखों करामात," वात यह लै सुनाई है । कह्यो आनि “अभू जावो," "चलो, उनमान देखें," चले सुख मानि, आयौ हाथी धूम छाई है ॥ छोड़िके कहार भाजि गये, न निहारि सके; आप रससार चानी बोले जैसी गाई है। "बोलो 'हरे कृष्ण कृष्ण,' छाड़ोगज तम तन," सनि गयौहिये भाव, देह सो नवाई है ॥ ३६० ॥ (२३६) वार्तिक तिलक । * दुष्ट राजा ने मंत्रियों के मुख से यह सुनकर कि "हमारे गुरु स्वामीजी आये हैं" कहा कि "उनको हमारे यहां लाओ, हम उन की कुछ 'करामात' देखें, तब गांव देंगे ।" उसने जब यह बात सुनाई, तव आपके शिष्यवर्ग ने फिर आपसे प्रार्थना की कि "स्वामी जी ! आप अब भी स्थान को चले जाइये" आपने उत्तर दिया "चलो, उसको देख क्या कहता करता है।" ऐसा कह, पालकी पर विराजमान हो, सुखपूर्वक पधारे ॥ उधर से दुष्ट ने बड़ा पागल और मनुष्यों को मारडालनेवाला, एक हाथी सामने छुड़वा दिया। हल्ला धूम मचा, कहार सब पालकी छोड़कर भागे; हाथी की ओर देख भी न सके । आप हाथी के प्रति प्रभावयुक्त परम रसीली वाणी बोले कि "हे चेतन ! तुम हाथी श. रीर का तमोगुण तनो, श्रीहरेकृष्ण श्रीहरेकृष्ण चोलो।" आपका प्रभाव-युक्त उपदेश सुनते ही हाथी का हृदय भा से भर गया; अं. पना मस्तक और सूंड आपके चरणों में नवाकर उसने प्रणाम किया। (४८६) टीका | कवित्त । (३५७) बहे हग नीर, देखि द्वै गयौ अधीर, आप कृपाकरि धीर कियो, दियो भनिभाव है । कान में सुनायो नाम, नामदे "गुपालदास,"' माल पहिराई गरें, प्रगट्यो प्रभाव है ॥ दुष्ट सिरमौर भूप लखि, उहिं ठौर नायौ, पांय लपटायो, भयौ हिये अति चाव है। निपट अधीन, BEACHECEMALEKASCHACHCHECH CALGCASANGA श्रीभक्तमाल सटीक। LCS गांव केतिक नवीन दिये, लिये कर जारि "मेरौ फल्यौ भाग दान है" ॥३६१॥ (२३८) वार्तिक तिलका हाथी आपके दर्शन कर वचनामृत सुन, प्रेम से अधीर होगया, नेत्रों से जलकी धारा चलने लगी; आपने कृपा से हाथी को धीरकर, भनिभाव दे, कान में भगवन्नाम मंत्र सुना दिया, "गोपालदास", नाम उसका रक्खा, गले में श्रीतुलसीजी की माला पहिना दी। आपका प्रभाव प्रगट देख दुटशिरोमणि राजा भी आपके स- मीप श्रा, चरणों में लिपट गया। इसके हृदय में भी प्रेम उत्साह हुआ, और अत्यन्त श्राधीन होकर, वह ग्राम तथा और कई नवीन ग्राम देकर, हाथ जोड़ प्रार्थना करने लगा कि "मेरे बड़े भाग्य है जो आपके दर्शन (४८७) टीका । कवित्त । (३५६) भयो गजराज भक्तराज, साधु सेवा साज, संतनि समाज देखि करत प्रनाम है । आनि डारै गोनि, बनजारनि की चारन सो, आ. येई पुकारन वै जहां गुरुधाम है ॥ भावत महोच्छौ मध्य, पावत प्र- साद सीथ, बोले आप हाथी सों, “यों निंद्य वह काम है" । छोड़ि. दई रीति, तब भवन सौ प्रीति बढ़ी, संगही समूह फिरै फेलि गयो नाम है ॥ ३६२ ॥ (२३७) वार्तिक तिलक। इस प्रकार श्रीरसिकमुरारिजी दुष्ट राजा को परचो दे, मत्त ग- जेन्द्र को शिष्य कर, साथ में ले, अपने स्थान में आए । अब तो वह गजराज पूरा भक्तराज हो गया; सन्तों को देखकर प्रणाम क. -रता; और सेवा भी करता था, जहां बनजारे (व्यापारी) रहते वहां से आटा दाल चावल की गोन (गठरी) स्थान में ले आता था। गजभक्त के गुरु स्थान में आकर उन बनजारों ने पुकार किया। उस हाथी का नियम था कि सन्तों के महोत्सव भण्डारे में श्रोता, सन्तों का उच्छिष्ट प्रसादी पाता था। जब भण्डारे में। . । . लोग *CROGRES RAAGICKR भई, हाथ HARIHANISARKARI REFRH भनिसुधास्वाद तिलक। ६३५ हाथी आया तब श्रीरसिकमुरारिजी ने कहा कि बनजारों की वस्तु बलात्कार ले आना निन्द्य काम है, छोड़ दो, गुरुआज्ञा मान गो- पालदासजी ने वह रीति छोड़ दी, परन्तु सब बनिकों ने आप सीधे का नियम कर दिया। सन्तों से हाथी की प्रीति बहुत बढ़ी । अव तो इन (गजगोपालदास ) के साथ में सन्तों की "जमात" फिरने लगी; "गजगोपालदास महन्त" का नाम सर्वत्र विदित हो गया। (४८८) टीका | कवित्त । (३५५) सन्त सत पांच सात संग, जित जात तित लोग उठि धावे, ल्यावें सीधे, बहु भीर है । चहूँदिसि परी हई, 'सूघा' सुनि चाह न श्रावत सो प्रानै कोऊ धीर है ॥ साधु एक गयो गहि लयो भेष दास तन, मन में प्रसाद नेम, पीवै नहीं नीर है। बीते दिन तीन चारि, जल लै पिवा धारि, गंगाजू निहारि मधि तज्यो यो सरीर है ॥ ३६३ ॥ (२३६) वार्तिक तिलक । महन्त गजगोपालदासजी के संग में पांच सात सौ मूर्ति सन्तों का समूह रहने लगा, जिस ओर जाते थे वहां सब लोग उठ दौड़ते, सन्तों के लिये सीधा सामग्री ला देते थे, लोगों की भीर लगजाती थी, इस गजेन्द्र की भक्ति की चारों दिशाओं में धूम मच गई । में इस बात को यमनप्रान्त राजा (सूबा) ने सुना; उसको हाथी के देखने की इच्छा हुई, वहुत लोगों को भेजा कि "पकड़ लाओ" परन्तु हाथी किसी के हाथ न आया । उसने कहा कि "जो कोई धीर हाथी को पकड़ लावै उसको हम बहुत द्रव्य देंगे।" यह सुन एक दुष्ट साधु-वेषधारी गया, पकड़ लाया; श्रीगोपालदासजी सन्त 5 का वेप देख चले आये। परन्तु गज गोपालदासजी का नियम च: रणात प्रसाद लेने का था, इससे आपने जल नहीं पिया, तीन चार दिन विना जल बीत गये, तव विचार कर लोग उनको श्री- गंगाजी की धारा में जल पिलाने ले गये। गज भक्त गंगा में प्रवेश कर, शरीर छोड़, भगवद्धाम को चले गये, भक्कों ने जयजय- कार किया। -- . .

** Shita श्रीभक्तमाल सटीक। - (४८६ ) छप्पय । (३५४) भवप्रवाह निस्तार हित, अवलंवन ये जन भये॥ सोझो, सीवां, अधार धीर, हरिनाम, त्रिलोचने आसाधर, द्यौराजनीर, सधना, दुखमोचन ॥ काशी- श्वर, अवधूत, कृष्णकिंकर, कटहरिया । सोएं. उदा. राम, नामइगर, व्रतधरिया ॥ पदम, पदारथ, राम- दास, विमलानन्द, अमृतश्रये। भवप्रवाह निस्तार हित,अवलंबन ये जन भये ॥ ६६ ॥ (११८) वार्तिक तिलक। संसार प्रवाह में बहे जाते हुए जीवों के निस्तार के लिये ये भगवद्भक्त अवलंबन रूप हुए। सोमाजी, सीवांजी, धीर मतिवाले अधारजी, हरिनामजी, त्रिलोचनजी, आशाधरजी, द्यौराजनीरजी, संसारी जीवों का दुख छुटानेवाले सधनजी, गुसाईं, काशीश्वर, भवधूतजी, कृष्णकिंकरजी, कटहरियाजी, सोभूजी, उदारामजी, श्रीरामनाम स्मरण व्रत धरनेवाले ड्रगरजी, पदमजी, पदारथजी, रामदासजी, और विमलानन्दजी ॥ इन (अठारह) भगवजनों ने अपने वचन और कर्मों से जीवों पर प्रेमामृत की वर्षा की। १ श्रीसोभाजी १० श्रीकृष्णकिंकरजी २ श्रीसीवांजी ११ श्रीकटहरियाजी ३ श्रीअधारजी १२ श्रीसोभूजी ४ श्रीहरिनामजी १३ श्रीउदारामजी -५ श्रीत्रिलोचनजी १४ श्रीडूगरजी •६ श्रीआशाधरजी १५ श्रीपदमजी ७ श्रीधोराजनीरजी १६ श्रीपदारथजी ८श्रीसधनजी १७ श्रीरामदासजी ६ श्रीकाशीश्वरजी १८ श्रीविमलानन्दजी॥ RECE CHECHKISCREEN -------- . भकिसुधास्वाद तिलक। (१२५) श्रीसदन (सधन)जी। (४६०) टीका । कवित्त । (५३) सदना कसाई, ताकी नीकी कस आई, जैसे वारैवानी सोने की कसौटी कस आई है । जीव को न वध करे, ऐपै कुलाचार ढरै धेचै मांस लाय, प्रीति हरि सो लगाई है ॥ गंडकीको सुत बिन जाने तासों तोल्यो करै, भरै हग साधु आनि पूजे, पै न भाई है । कही निसि सुपने मैं “वाही ठौर मोंको देवी, सुनौं गुनगान, रीझाँ हिय की सचाई है" ॥३६४ ॥ (२३५) वार्तिक तिलक । सधन जाति के कसाई थे उनकी (दुःखादि रूप ) कसौटी में बहुत अच्छी कस (परीक्षा) उतरी, जैसे बारह वानी सोना की कस कसौटी में उपटती है । यद्यपि जन्म कसाईकुल में हुआ तथापि आप जीव को नहीं वध करते थे, अपने कुल का आचरण जान और कसाइयों के यहां से मांस लाकर बेचा करते थे । पूर्व- संस्कार के वश स्वाभाविकही श्रीहरि से प्रीति लग गई; सप्रेम नाम स्मरण किया करते थे । दैवयोग से इनके पास एक गंडकीसुत (शालग्रामजी) थे उन्हीं से, विना जाने, मांस तौल २ के बेचा करते थे; एक साधु ने देखकर कहा कि “ये तो शालग्रामजी हैं इनसे मत तोलो, लाओ हम इनकी पूजा करेंगे।" श्रीसधनजी ने दे दिया। संत लाके पंचामृत आदिक संस्कार करके पूजा करने लगे परन्तु वह पूजा प्रभुको प्रिय न लगी; साधु ले रात्रि स्वप्न में आज्ञा दी कि हमको उसी सधना के यहां पहुँचा दो, वह हमारा नाम गुण सप्रेम गाता है सो सुनते उसके हृदय की सचाई पर हम रीझ गये हैं।" (४६१) टीका । कवित्त । (३५२) लैकै आयौ साधु, "मैं तो बड़ी अपराध कियो, कियो अभिषेक सेवा करी पै न भाई है । ए तो प्रभु रीझे तो पै जोई चाही सोई करौ, गरो भरि आयो सुनि, मति विसराई है । वेई हरि उर धारि, T-SCIRCRACHEcksokar , หาห์หห้เห็น श्रीभक्तमाल सटीक। स्वप्न में डारि दियौ कुलाचार, चले जगन्नाथ देव, चाह उपजाई है। मिल्यो एक संग संग जात, वे सुगात सब, तब श्राप दूर दूर रहैं जानि पाई है॥३६५ ॥ (२३४) वार्तिक तिलक। की आज्ञा सुन साधु शालग्रामजी को ले श्रीसधन. जी के पास आकर कहने लगे कि "मैंने बड़ा अपराध किया तुम्हारे यहां से शालग्रामजी को ले गया; अभिषेक प्रतिष्ठाकर पूजा सेवा किया परन्तु प्रभु को प्यारी न लगी; ये तुझी पर रीझे हैं; मुझे स्वप्न में आज्ञा दी कि हमको उसीके पास पहुँचा दो;' सो लो चाहे मांस तोलौ चाहे पूजा करों” ऐसा सुनते ही श्रीसधनजी प्रेम में मग्न हो गये, देह की सुधि बुधि भूल गई, गद्गद कंठ, रोमांच शरीर, हो गये। अव तो कुलाचार और पर को तज प्रभुको हृदय में धारणकर श्रीशालग्रामजी को ले, जगन्नाथजी के दर्शन को चल दिये । और भी यात्री मिले, उन्हीं के साथ साथ चले; पर वे सब इनको कसाई जान ग्लानि युक्त हुए; तव उनके मनका भाव जान उन सबका संग छोड़ आप पृथक् हो चले ॥ (४६२) टीका। कवित्त । (३५१) आयौ भग गाँव, भिक्षा लेन इक ठांव गयो, नया रूप देखि कोऊ तिया रीमि परी है। "धैठौ याही ठौर करी भोजन" निहोरि! कह्यो रह्यो निसि सोय, आई "मेरी मति हरी है ॥ लेवो मोको । संग;" गरौ काटौ तौ न होय रंग, बूझी और काटी पतिग्रीव, पे न डरी है। कही "अब पागो मोसो,' "नातौ कौन तोसों मोसों;" सोर करि उठी "इन मास्वौ" भीर करी है ॥ ३६६ ॥ (२३३) वार्तिक तिलक । मार्ग में एक ग्राम मिला, वहां एक घर में आप भिक्षा लेने गये। एक स्त्री इनका नवीन रूप देख, रीझ के कामवश हो, बोली कि "तुम भाज यहां ही भोजन करौ, रही," आपने वैसाही किया; वह स्त्री रात्रि में समीप आ कहने लगी "मेरी मति तुम पर राम eKESH CkcEREKAISE 1 अमर भक्रिसुधास्वाद तिलक । ६३६ गई है, मुझको अपने साथ ले चलो;" आप चोले कि "जो तू गला भी काट डाले तो भी मैं तुझसे प्रेम नहीं कर सकता ॥" उस दुष्टा ने और का और ही समझ, भय छोड़, अपने पति का कण्ठ काट डाला; और वह आ के कहने लगी कि 'अव मेरा अंग संग करौ।" श्रीसधनजी ने उत्तर दिया कि “मैं तो पहिले ही इनकार कर चुका हूं, तुझसे मुझको क्या सम्बन्ध है ?" तब तो रो रो पुकारने लगी कि "अपने साथ मुझे ले चलने के हेतु इसने मेरे पति को मार डाला है !" सुनकर गांव के सब लोग इकट्ठे हो गये। (४६३) टीका । कवित्त । (३५०) हाकिम पकरि पूछे; कहै हँसि "मास्यौहम," डास्यौ सोच भारी, कही "हाथ काटि डारिय"। कट्यो कर, चले, हरि रंग मांझ मिले, मानी जानी "कल चूक मेरी" यहै उर धारियै ।। जगन्नाथ देव, आगे पालकी पठाई लेन, सधना सो भक्त कहाँ? चढ़े न विवारिये। चढ़ि आये प्रभु पास, सुपनौ सो मिट्यो त्रास, बोले "दै कसौटी पै भक्ति विसतारिय" ॥ ३६७॥ (२३२) वार्तिक तिलक । जब वह दुष्टा स्त्री यों चिल्लाने पुकारने लगी कि “यह मेरे पति को मार, मुझे साथ चलने को कहता है," तब इस बात को सुन उस गांव के अधिपति ने सधन को पकड़वा के पूछा । आपने हस. कर कह दिया कि "हां हमने मारा है।” परन्तु उस ग्रामाधिप को इनकी भक्ति लक्षण देख के पूरा पूरा निश्चय नहीं हुआ, बड़ाभारी सोच करने लगा कि “अब मैं क्या करूं।" इससे इनका वध तो नहीं किया, केवल हाथ कटवा कर छोड़ दिया। हाथ कटने पर श्रीजगन्नाथजी के दर्शन को चल दिये । कुछ मन में दुःख मलीनता नहीं आई, वरंच प्रेम भनि की ओर अधिक मन मिला; विचारपूर्वक हृदय में यह निश्चय किया कि "मेरा h-ko+MA BACCOLICIRCive .

ॐॐॐ ६४० श्रीभक्रमाल सटीक । ASHAN कोई पूर्व का* पाप था सो प्रभु ने यह दण्ड दिवाकर शुद्ध करदिया। चौपाई। PAGESGUS "नहिं दुख यह रघुपति के दाया। कर्म भुगाय छुटावत माया ॥" उधर श्रीजगन्नाथ देवजी ने सधनजी के लेने को आगे अपनी पालकी भेजी। पण्डे लोग "सधन" भाको पूछते पूछते आकर बोले कि "पालकी पर चढ़कर चलो;" आप प्रभु की पालकी बिचारि नहीं चढ़ते थे, पण्डे प्रभु की आज्ञा अमिट सुना, बलात्कार उसपर चढ़ा- कर ले आये । श्रीसधनजी आ के प्रभु के दर्शन कर साष्टांग प्रणाम करने लगे। उसी क्षण हाथ ज्यों के त्यों हो गये, सब दुःख स्वप्न- सरीखा मिट गया । जगन्नाथजी कृपापूर्वक बोले कि "सधन ! तुम ने यथार्थ कसौटी दे दी परीक्षा में उत्तीर्ण हुए, दुःख में तुम्हारा मन मलीन नहीं हुआ अब आनन्दपूर्वक लोक में हमारी. भक्ति विस्तार करी ॥" ( १२६) श्रीगुसाईं काशीश्वरजी। (४६४ ) टीका । कवित्त । (३४६) श्रीगुसाई काशीश्वर, आगे अवधूत वर, करि प्रीति नीला- चल रहे, लाग्यौ नीको है । महाप्रभु कृष्णचैतन्य जू की आज्ञा पाय, आये वृन्दाबन, देखि भायौ भयौ हीको है ॥ सेवा अधिकार पायो, रसिक गोविन्दचन्द चाहत मुखारविन्द, जीवनि जो जीको है । * "वह पद भाषा हैक जैसे नैसे गायत है, हम तुम्हें गावत हैं सदा पेद पानी सौ । हम निर्मल गंगाजल माँ अन्हया तुम्हें, तुम रामे सधना के वधना के पानी सौ ॥" "जौला मेरे सन्तन में राजाति-भेद सदा, तो लो कहाँ कैसे वह पावै सुखसार है। मेरो साधु-नीच पदपंकज न धोयो जौलो, तौलो सव शास्त्रन को पढ़योई भार है।" + श्रीजगनाथजी ने विप्र रूप से हराकर श्रीसधनजी को बना दिया कि पूर्वजन्म तुम काशी में विप्र पण्डित थे। एक दिन एक गऊ एक कसाई के घर से भागी जाती थी । पीछे कसाई दौड़कर श्राया। पूछने से तुमने हाथों से बता दिया । यही गाय यह स्त्री हुई और वही कसाई उसका यह पति, जिसको पूर्वजन्म के पलटे उसने गला काटा है। और उसी दोप से तुम्हारे हाथमात्र काटे गए। मैं अपने भक्तों को कर्म भुगा के पाप छुड़ा ही देता हूं। cricket में । SECRECT 5 भकिसुधास्वाद तिलक। १ जितही लड़ावें, भावसागर बढ़ावें, कौन पारावार पावै, सुनै लागै जग फीको है ।। ३६८ ॥ (२३१) वार्तिक तिलक। गुसाई श्रीकाशीश्वरजी प्रथम दशा में श्रेष्ठ अवधूतवृत्ति वेप ; युक्त थे; विचरते हुए श्रीजगन्नाथक्षेत्र में आये; वहां रहना आपको ; बहुत अच्छा लगा; सो वहां रह गये । तदनंतर अपने गुरु महाप्रभु श्रीकृष्ण चैतन्यजी की आज्ञा पाकर श्रीवृन्दावन में आए। श्रीवृन्दावन को देख हृदय की प्यारी अभिलापा पूर्ण हुई। रसि- कचन्द "श्रीगोविन्द जी" की सेवा पूजा का अधिकार पाया। जी- 5 का जीवन प्राधार जो श्रीमुखार्विन्द, सो उसका दर्शन कर नित्य ही लाड़, प्यार, प्रेम करते । प्रेमभाव का समुद्र आपके हृदय में वढ़ता था, उसको वर्णन कर कौन पार पा सकता है ? आपकी दशा का वखान सुन सव संसार फीका लगने लगता है। (४६५) छप्पय । (३७८) करुनालाया, भक्तिफल, ए कलिजुग पादप रचे॥ जती रामरावल्लि, स्याम, खोजी, संतसीहाँ । दलहा, पन, मनोरथ, राँका, द्यौ! जय जीहा ।जाड़ों, चाची-- गुरू, सवाई, चाँदी, नात। पुरुषोत्तम सो सांच, चतुर, कीती, (मनको) जिहि मेट्यो आपा॥मति सुन्दर, धीगिश्रम संसार नाच नाहिन नचे। काना- छाया,भक्तिफल, ए कलिजुग पादप रचे॥७॥ (११७) वार्तिक तिलक। वृक्षों में दो वस्तु विशेषतः परहित की ही होती हैं, एक फल दू- सरे छाया । सो करुणारुप छाया, और भागवत चिपे भनिरूप फल, इनके संयुक, इन संतों को कलियुग में भगवान् ने वृक्षरूप रचा; अर्थात् सब परमार्थी हुए॥ SAUCIGLICHSHASH 5 "नाच चाल पाठान्तर ॥ RELECREGESTESCRIGER FOR श्रीभकमाल सटीक। ६४२ , , चीपाई। "संत बिटप, सरिता, गिरि, धरनी। पर हितहेतु सवनि की करनी॥" यती रामरावल्ल जी, श्यामजी, खोजीजी, संतसीहाजी, दलहा- जी, पद्मजी, मनोरथजी, गंकाजी,श्रीराम नाम जपनेवाले द्योगजी, जाडाजी, चाचागुरुजी, सवाईजी, चांदाजी, नापाजी सत्य सत्य यथा नाम तथा गुण युक्र पुरुषोत्तमजी और चतुरजी, जिन्होंने अपने मनका ममत्व और अपनपो मिटा डाला ऐसे कीताजी, इन सब । भक्तों की अति सुन्दर बुद्धि हुई;और परिश्रम रूपी “धीधांग" अर्थात् मृदंग के ताल के साथ, संसार की गति में ये भक्त नहीं नाचे ॥ १ श्रीरामरावल्लजी १० श्रीजाडाजी २ श्रीश्यामजी ११ श्रीचाचागुरुजी ३ श्रीखोजीजी १२ श्रीसाईजी ४ श्रीसीहाजी १३ श्रीचांदाजी ५ श्रीदलहाजी १४ श्रीनापाजी ६ श्रीपद्माजी १५ श्रीपुरुषोत्तमजी ७ श्रीमनोरथजी १६ श्रीचतुरजी ८ श्रीराकाजी १७ श्रीकीताजी ६ श्रीद्योगूजी (१२७) श्रीखोजीजी। (४६६) टीका । कवित्त । (३४७) "खोजी" जू के गुरु हरिभावना प्रवीन महा, देह अंत समै बांधि घंटा सो प्रमानिये । “पा प्रभु जब तब वाजि उठै, जानो यही;" पाये, पै न वाजी, बड़ी चिंता मन आनिये ॥ तनत्याग धेर नहीं हुते, फेरि पाछे आये, वाही ठौर पोढ़ि देख्यौ, आंव पक्यो मानिये । तोरि, ताके टूक किये, छोटो एक जंतु मध्य, गयो सो बिलाय, वाजि उठी जग जानिये ॥३६६ ॥ (२३०) वार्तिक तिलक । "खोजीजी" के श्रीगुरुदेवजी श्रीरामजी के ध्यान भावना में बड़े Reacher , RECENE . . * KARI भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६४३ ही प्रवीण थे। देह के त्यागसमय में प्रथम से एक घंटा बंधाकर उन्होंने यह कह रक्खा था कि "जब हम प्रभु के समीप प्राप्त होंगे, तव यह घंटा आपसे आप वजने लगेगा।" तदनंतर आपने शरीर त्याग किया। परन्तु घंटा नहीं बना। सव शिष्यों सेवकों के मन में बड़ी चिंता हुई। श्रीखोजीजी, अपने स्वामीजी के तनत्यागसमय न थे; कुछ पीछे आये। सबों ने यह वृत्तान्त सुनाया। तब खोजीजी ने गुरु को खोज निकाला अर्थात जहां पड़के गुरुजीने देह तजाथा, आपने वहां लेटके, देखा कि 'ऊपर एक बहुत सुन्दर पका हुआ आम का फल लगा है ।" मन में । विचार कर, उस फल को तोड़, दो टुकड़े कर, देखें तो एक छोटा सा जीव उसमें था। सो वह उसी क्षण बिला गया। और वह घंटा स्वयं बजने लगा । सबने जान लिया कि आम्र में के जन्तु का शरीर तज अव श्रीगुरु महाराज श्रीरामधाम में प्राप्त हुए ॥ (४६७) टीका । कवित्त । (१४६) शिष्य की तो जोग्यताई नीके मन आई, अजू गुरु की प्रबल ऐप नेकु घट क्यों भई । सुनौ याकी वात “मन बातवत गति” कही सही लै दिखाई; और कथा अति रसमई ॥ 'वे तो प्रभु पाय चुके प्रथम,' प्रसिद्ध; पाछे पायौ फल देखि हरि जोग उपजी नई। इच्छा सो सफल श्याम भक्त वश करी वही,रही पुर पच्छ सब बिथा उर की गई ॥ ४०० ॥ (२२६) वार्तिक तिलक । इस प्रसंग में शिष्य "खोजीजी" की अति श्रेष्ठता मन में निश्चय हुई, परंतु गुरुजी की प्रबलत्ता में किंचित् मात्र न्यूनता क्यों हुई ? इसकी वार्ता सुनिये, कि "मनकी गति वायु से भी अति चपल" भगवान् ने गीता आदिक ग्रन्थों में कहा है; सो आपने प्रत्यक्ष दिखाकर शिष्यों को उपदेश दिया कि मन ऐसा प्रबल है इससे सदा सावधान रहना चाहिये। (“अन्ते या मतिः सा गति;")। और दूसरी अति रसमई वार्ता यह है कि "खोजीजी के गुरुजी Krict *HANI *** श्रीभनमाल सटीक। ६४४ . तो ध्यानयोग से प्रभुको प्राप्त होही चुके थे," यह प्रसिद्ध है; परंतु पीछे बहुत अच्छा फल देख यह प्रभु के अर्पण योग्य है यह नवीन इच्छा उत्पन्न हो गई; सो इच्छा सफल करने के लिये भक्तवत्सल श्यामसुन्दर अंतर्यामी ने स्वयं लीला किया किंचित् ही काल में जो पूर्व प्रतिज्ञाथी सो पूर्ण कर सबके हृदय का शोक दुःख नाश किया ॥ ( १२८) श्री "रांकाजी," ( १२६) श्री "वांकाजी,। (४६८) टीका | कवित्त । (३४५) रांका पति, वांका तिया, वर्ते पुरपंढर में उर में न चाह रीति कळु न्यारिये । लकरीन बीनि करि, जीविका नबीन करें; धरै हरिरूप हिये, ताही सों जियारियै ॥ विनती करत नामदेव कृष्णदेव जूसों, कीजै दुख दूर कही "मेरी मति हारियै । चलो लै दिखाऊं, तव तेरे मन भाऊं," रहे वन विपि दोऊ थैली मगमांझ डारि- यै ॥ ४०१॥ (२२८) वार्विक तिलक। "शंका" नाम के हरिभक्क, उनकी पत्नी का "घांका" नाम पड़ा। दोनों अनुरागी “पंढरपुर" में वसते थे। प्रभु को छोड़ हृदय में किसी पदार्थ की चाह किंचित् भीनथी। लोकोत्तर निहकिंचन रीति थी, सूखी लकड़ियां वनसे बीन चुन लाते, वेंचकर नित्य नवीन जीविका करते थे। हृदय में श्रीहरि के रूप का ध्यान धरे रहते थे। मुख्य जीवन वही था। इन दोनों की दशा देख, श्रीनामदेवजी ने *श्रीकृष्णदेव- जी से विनय किया कि "हे कृपालु ! इनका दुःख नाश करिये ॥" प्रभु बोले कि "मेरी मति इनसे हारगई । कुछ लेते ही नहीं, तो क्या करू ? चलो, मैं तुमको इनकी सब दशा दिखाऊं, तब तुमको मैं अच्छा लगूंगा।" प्रभु नामदेवजी को साथ लिवाकर एक भर स्वर्ण मुद्रा (मुहर ) मार्ग में डालकर वन में छुप रहे ॥ (४६६) टीका । कवित्त । (३४४) -आये दोऊ तिया पति, पाछे वधू आगे स्वामी, औचकही मग- श्रीकधीरजर्जी, श्रीनामदेवजी और श्रीयांकापति रांकाजी उसी (पन्द्रहवीं) शताब्दी में विराजमान थे। SECRECORRECORRECRUCRORESCRIBE थेली . Recene -- । ROM भनिसुधास्वाद तिलक । ६४५ मांझ संपति निहारियै । जानी यो जुवति जाति, कभू मन चलि जाति, याते चेगि संभ्रम सों धूरि वापे डारियै ॥ पूछी "अजू ! कहा कियौ भूमि मैं निहुरि तुम ?” कही वही बात, बोली "धनहूं विचा- रियै”। कहै मोसौं रांका ऐपै वांका आज देखी तुही, सुनि प्रभु बोले बात सांची है हमारियै ॥४०२॥ (२२७) वार्तिक तिलक। आगे रांकाभनजी पीछे उनकी पत्नी दोनों उसी मार्ग में आये, भक्तजी ने औचक ही देखा कि मार्ग में द्रव्य की थैली पड़ी है । वि- चार किया कि "स्त्री की जाति है कहीं मन चल न जाय," इसलिये बहुत शीघ्रता से धूल लेकर उसपर डाल दी। उनकी पत्नी आकर पू. छने लगी कि "आपने यहां पर झुककर क्या किया है ?॥" आपने वही बात कह दी। श्रीभक्रिवतीजी बोली कि "आपके मन में अभी धन का ज्ञान बनाही है ?" सुनकर, प्रसन्न हो, कहने लगे कि मुझको तो सब “राका” कहते हैं, परन्तु आज मैंने जाना कि तू सच “बांका" है । दोनों की दशा देख वचन सुन नामदेवजी से प्रभु बोले कि "देखो, मेरी बात सत्य है कि नहीं ?" शान्ति और विराग की जय।। (५०० ) टीका | कवित्त । (३४३) नामदेव हारे हरिदेव कही और बात, जो पै दाह गात, चलो ल. करी सकेरिये । आये दोऊ वीनिये को देखी इकठौरी ढेरी द्वैहूं मिलि पावें तऊ हाथ नहिं छेरियै ॥ तब तो प्रगट श्याम ल्याये यों लिवाय घर, देखि मंड फोरौ कयौ ऐसे प्रभु फेरियै । विनती करत कर जोरि अंग पटधारी भारी घोझ पस्यौ लियो चीर मात्र हेरियै॥४०३॥(२२६) वात्तिक तिलक । जब भगवान् ने कहा कि "देखो मेरी ही बात सच्ची निकली, तब श्रीनामदेवजी ने हार माना । फिर प्रभु बोले कि "जो कदाचित् इनके परिश्रम का तुम्हें बड़ाही संताप है, तो चलो दोनों जने लक- ड़ियां चुन चुन कर इकट्ठा रख दें, ये दोनों जने ले जायगे परिश्रम थोड़ा होगा॥" REACREEN HTRANCE PER , ให้ श्रीभक्तमाल सटीक। श्रीकृष्णचन्द्र और नामदेवजी ने ऐसाही किया; जव रांका वांका लकड़ी चुनने आये तब देखें कि बहुतसी लकड़ी इकट्टी धरी हैं। दोनों ने उन लकड़ियों में हाथ तक नहीं लगाया, यहां तक कि दो लकड़ी भी कहीं इकट्टी मिलें तो दूसरे की धरी हुई जान वे उनको । नहीं छूते थे; तब श्यामसुन्दरजी प्रगट होकर दोनों को घरमें शिवा लाये और प्रभु तथा नामदेवजी ने कहा कि "तुम हठ छोड़कर कुछ तो लो।" भक्तों ने प्रार्थना की कि “जो आपसे कुछ चाहना कर लेवे, सो प्राणी तो 'मुँडफोरा' है, वह भक्त काहे को है, और ये नामदेवजी भी ‘मुंड़फोरा' सरीखे आपको वन वन में फिराते हैं !" यह सुन, नामदेवजी ने हाथ जोड़ विनय किया कि "प्रभुकी आज्ञा मान भला एक एक वस्त्र तो शरीर में धारण कर लीजिये," तब तो दोनों के सीस पर बड़ाही भार पड़ा, पर वस्त्रमान ले लिया । ऐसे अचाही निस्काम भक्कों की जय ॥ दो० "जाहि न चहिये कबहुँ कछु, तुम सन सहज सनेह । वसह निरन्तर तासु उर, सो राउर निज गेह ॥" (५०१) छप्पय । (३४२) पर-अर्थ-परायन भक्त ये, कामधेनु कलियुग्गके ॥ लक्ष्मण, लफरी, लई, सन्तें जोधपुर त्यागी । सूरजे, कुम्भनदास, विमानी, खेम विरागी ॥ भावन, विरही भरत, नफैर, हैरिकेस, लटेरा। हरिदास, अयोध्या चक्रपानि (दियो) सरजू तट डेरा॥तिलोक, पुखरदी, विजुली, उद्ध, वनचर वंस के । पर-अर्थ-परायन भक्त ये, कामधेनु कलियुग्ग के ॥ ६८ ॥ (११६) वार्तिक तिलक। • कलियुग के ये श्रीभगवद्भक, पराये के अर्थ साधने में तत्पर और कामधेनु के समान मनोर्थ के दाता हुए- Assistantarwecorat --- X अमन भक्निधास्वाद तिलक। १ श्रीलक्ष्मणभक्तजी ११ श्रीनफरजी २ श्रीलफराजी १२ श्रीहरिकेशजी ३ श्रीलड्डूजी लटेरा वंश में उत्पन्न ४ श्रीत्यागीसन्त * १३ श्रीहरिदासजी, और जी जोधपुर के १४ श्रीअयोध्या सरयूतटवासी ५ श्रीसूरजभक्तजी चक्रपाणिजी ६ श्री कुंभनदासजी १५ श्रीतिलोक सुनारजी ७ श्रीविमानीजी १६ श्रीपुखरदीजी ८ श्रीखमबैरागीजी १७ श्रीविजुलीजी, और है श्रीभावनजी १८ श्रीउद्धवजी, वनचर (हनु- १. श्रीविरहीभरतजी मान वंश) में उत्पन्न । (१३०) श्रीलइइभक्तजी। (५०२) टीका । कवित्त । (३४१) लड्डूनाम भक्त, जाय निकसे विमुख देश, लेसहूं न सन्तभाव जानें, पाप पागे हैं। देवीकों प्रसन्न करें, मानुस को मारि धरै, लै गये पकार, तहां मारिबे को लागे हैं। प्रतिमा को फारि, विकरार रूप धारि आई, लै के तरवार मूड काटे, भीजे वागे हैं । आगे नृत्य करै, दृग भरै साधु पांव धेरै, ऐसे रखवारे जानि जन अनुरागे हैं ॥ ४०४ ॥ (२२५) वार्तिक तिलक। लड्डूनाम के भगवन विचरते हुए वंगाले प्रदेश के एक विमुख ग्राम में पहुंचे; वहां के लोगों की संतों में भावभक्ति किंचित् भी न * कोई इसका अर्थ यों करते हैं कि सन्त ने जोधपुर को त्यागा। श्रीमतमाल जी की नामावली नहीं प्राप्त होने से नामों का ठीक पता लगाने में जो कठिनता होती है, भक्तमाली ही लोग जानते हैं। । यह कथा पूर्वही में प्रसंगतः जिपी जा चुकी है। "कुर्वानी"तथा जीवलिकी प्रथा विचित्र ही बात है । "इन दुहूँ राह विगाड़ी साधो, इन दुहुँ राह विगा। यापसमें दोउ (हिन्दू मुसलमान) लड़े मरत है, भेद काह नहिं जाना॥" "महरम हो सो जानै साधो, ऐसा देश हमारा है। कर नयनी दीदार, महल में प्यारा॥" . . इ HOR श्रीभनमाल सटीक। ६४८ - थी, केवल पाप में ही परायणथे। मनुष्य को मार बलिदान देकर देवी को प्रसन्न करतेथे। लड्ड्भनजी को अकेले देख, पकड़कर, खड्ग ले, मार डालने को उद्यत हुए । उनकी दुष्टता देख श्रीदेवीजी ने अपनी प्रतिमा फोड़, विकरालरूप धारण कर, प्रगट हो, वही खड्न चीन, कई दुष्टों के सीस काट डाले, और दुष्ट भाग गये । तब देवी श्री. लड्डुभनजी के आगे नेत्रों में प्रेम के आंसू भर कर नाचने लगीं; संत के चरणों को पकड़ कर प्रसन्न किया । सब देवी देवताओं के अंतर्यामी श्रीरामजी को ऐसे रक्षा करनेवाले जानकर, भक्त लोग सानुराग भजते हैं कृपा को समझ प्रेम मग्न होते हैं । सब ग्राम वासी भगवद्भक हो गए। (१३१) श्रीसन्तजी। (५०३) दीका | कवित्त । (३४०) सदा साधुमेवा अनुराग रंग पागिरह्यो, गह्यौ नेम भिक्षा व्रत गांव, गांव जाय के।आये घर से · पूछे तिया सों यों "संत कहां?" "संत । चूल्हे मांझ” कही ऐसे, अलसाय के ॥ वानी सुनि जानी, चले मग, सुखदानी मिले, “कही कित हुते ?" सो बखानी उर आय के । "बोली वह सांच, वही आंचही को ध्यान मेरे," आनि गृह किये मगन जिंवाय के॥४०५॥ (२२४) वार्तिक तिलक। श्रीसंतभनजी सदा साधुसेवा के अनुरागमें पगे प्रति ग्रामग्राम में जा, भिक्षा कर, नियम से संतसेवा करते थे। एक दिवस भिक्षा के लिये किसी ग्राम में गये थे, इनके पीछे गृह में संतजन आए। आपकी स्त्री से, जो कि बड़ीही विमुख और संसारिनि थी, सन्तों ने पूछा कि संतभनजी कहां गये ?" उसने अलसाकर रूक्षता से कहा कि "चूल्हे में गये” वैष्णव इसकी वाणी सुन, अति विमुख , जान, वहा से चल दिये। मार्ग में विविध प्रकार की भिक्षा लिए हुए संतसुखदाता श्रीसंतभनजी मिले और दण्डवत् किया। संतों ने पूछा कि कहां गये थे ?" तब, प्रभु प्रेरणा से आपके शुद्ध हृदय में ! TESCASCASARKASIASSASCHAUGASCASCHICHTE . , . " ห้าห้าห้ห้ชีพ भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६४६ जो स्त्री ने कहा था सो वार्ता भासगई, वोले कि "प्रभो ! जो स्त्री ने कही है वह वार्ता सत्य है, मुझे सदा अग्नि और चूल्हे ही का ध्यान बना रहता है, अर्थात् चूल्हे में अग्नि जला के रसोई बनाय प्रभु को भोग लगाय कब संत प्रसाद पावें । प्रभो! कृपाकरि चलिये।" सुनकर प्रसन्न हो लौट आये । आपने प्रीतिपूर्वक भोजन करा, संतों को आनन्द में मग्न कर दिया । (१३२) श्रीतिलोकसुनारजी। (५०४) टीका । कवित्त । ( ३३६) पूरब मैं ओक, सो "तिलोक" हो सुनार जाति, पायौ भक्तिसार, साधुसेवा उर धारियै। भूपके विवाह सुता,जोरौ एक जेहरि कौं, गढिवे को दियो, कह्यौ "नीके के संवारियै" । आवत अनंत संत औसरन पावै किहूं, रहे दिन दोय, भूप रोस यो संभारियै। "ल्यावौ रे पकरि; ल्याये; "छाडियै मकर कही, नेकु रह्यो काम, आवै नातो मारि डारियै ॥ ४०६॥ (२२३) वार्षिक तिलक। पूर्व देश में रहनेवाले, जाति के सुनार श्रीत्रिलोकजी सारांश भक्ति को प्राप्त होकर तन मन से संतसेवा में परायण थे । उस नगर के राजा की कन्या का विवाह था, अतः एक जोड़ी जेहार (चरणभूषण ) बनाने के लिये राजा ने द्रव्य देकर आज्ञा दी कि 'बहुत अच्छे प्रकार से बनाकर लामो॥" आपके घर नित्य अनेक मूर्ति संत आया करते; उनकी सेवा करने में आप लगे रहते थे; जेहिर बनाने के लिये कुछ और ही नहीं मिलता था, उसमें हाथ तक नहीं लगा सके। जब विवाह के दोही तीन दिन रह गये, तब राजाने सक्रोध आज्ञादी कि "उसको पकड़ लावो ।" लोगों ने ऐसाही किया, आपने राजा से कहा कि "मुझे छोड़ दीजिये, उसमें थोडासा काम रह गया है, जो उस दिन मैं न लाऊं तो मुझे मरवा डालियेगा, मेरे प्राण ले लीजियेगा।" (५०५) टीका । कवित्त । (३३८) आयो वही दिन, कर छुयो हूं न इन, "नृप करै प्रान बिन, REALESEACROSSAGE 015 श्रीभक्तमाल सटीक। ६५० . वन मांझ छप्यो जायकै। आये नर चारि पांच, जानी प्रभु आंच, गढ़ि लियो, सो दिखायो सांच, चले भनभाय के ॥ भूप को सलाम कियो, जेहरि को जोरौ दियौ, लियो कर, देखि नैन छोड़ें न अघाय कै। भई रीमि भारी, सब चूक मेटि डारी; धन पायौ ले मुरारी, ऐसे बैठे घर आयकै ॥४०७॥ (२२२) वार्तक तिलक। वही दिन ( अर्थात् राजकन्या के विवाह का दिन ) आ गया; पर इन्होंने तो उस भूपण के बनाने के लिये सुवर्ण को हाथ से भी नहीं छुमा । तव मन में विचार किया कि "राजा मारही डालेगा" इससे नाकर वन में छिप रहें। राजा के चार पांच जन इनके घर आये। कृपासिंधु प्रभु ने अपने भक्त को सकुटम्ब तापयुक्त जान, तिलोकभक का रूप धारण कर, अपनी चातुर्य से जेहरि बना कर, राज सेवकों को दिखा, वह चरणभूषण ले, अपने भक्त के अनुरूप आये, और राजा को जुहार कर, जेहरि का जोड़ा दिया। राजा हाथ में लेकर देखते ही मोहित होगया, देखने से नेत्र तृप्त न हुए; वड़ाही प्रसन्नहुआ, विलंब करने की सब चूक क्षमा कर, बहुतसा धन दिया। भगवान् लाकर भनके , घर में विराजमान हुए॥ (५०६) टीका । कवित्त । (३३७) भोरही महोछौ कियो, जोई मांगै सोई दियो, नाना पकवान रस खान स्वाद लागे हैं। संत को सरूप धरि, लै प्रसाद गोद भरि, गये तहां “पावै जू तिलोक गृह पागे हैं" ॥ "कौन सो तिलोक ?" "अरे दूसरो तिलोक मैं न" वैन सुनि चैन भयो, आये निसि रागे हैं। चहल पहल धन भस्यौ घर देखि दस्यो प्रभुपदकंज जानौ मेरे भाग जागे हैं॥४०८॥(२२१) वार्तिक विलक। । तिलोकरूपी प्रभु ने प्रातःकाल होते बड़ाही महोत्सव किया जिसने जाकर जो वस्तु मांगी उसको वही दिया, नाना प्रकार के १" सलाम'... =जोहार, दण्डवत् , प्रणाम, जयहरि, रामराम । SteRecrectocracKRICORNO , +3 भकिसुधास्वाद तिलक। पकवान अनूप रस स्वाद से भरे हुए, साधु ब्राह्मणों को खिलाये ॥ तदनंतर एक साधुका रूप धर प्रसाद लेकर वन में जहां भक्तजी बैठे थे वहां जा, प्रसाद देकर, प्रभु ने कहा कि "हम तिलोक के घर गयेथे, उन्होंने हमको पवाकर और दिया भी है, सो तुम पायो।" भक्तजी ने पूछा कि"महाराज! कौन तिलोक?" आप चोले कि "अरे इसी नगर का सुनार भक्क, और अन्यत्र तिलोकी में दूसरा ऐसा कौन है?" संतके वचन सुन आपको वड़ाही आनन्द हुआ, प्रभु की कृपा- कौतुक विचार प्रसाद पाकर सानुराग रात्रि में घर आये; देखें तो सुखमय चहल पहल हो रहा है और घर धन धान्य से भरा है; जान लिया कि श्रीलक्ष्मीजी भगवान् के पदपंकज इस घर में आये; मेरे बड़ेही भाग्य उदय हुए। प्रभु भक्तवत्सल की जय ॥ . (५०७) छप्पय । (३३६) अभिलाष अधिक पूरन करन,ये चिन्तामनि चतुर- दास ॥ सोम, भीम, सोमनाथ, विकी, विशाखो, लम- ध्यान । महदों, मुकुंद, गनेस, त्रिविक्रम, रघु, जग जाना ॥ बालमीक, वृद्धव्यास, जगर्ने, झांझू, वीठल आचारज। हरि , लाली, हरिदास, वाहवल, राघवे आरज । लाखौं, छीतर, उहवे, कपूर, घाटम, धूरी, कियौ प्रकास ॥ अभिलाष अधिक पूरन करन, ये चिन्तामनि चतुरदास ॥६६॥ (११५) यार्तिक तिलक। अपने अनुकूल जनों की अतिशय अभिलाषा पूर्ण करनेवाले, चिंतामणि के समान, परमार्थ पथ में चतुर, ये सब भगवदास हुए। नाम । सोमभक्त, भीमभक्त, सोमनाथजी, विकोजी, विशाखाजी, t . , MAR ARRI ROM श्रीभक्रमाल सटीक। ६५२ लमध्यानजी, महदाजी, मुकुंदभननी, गणेशभक्तजी, त्रिविक्रमजी, रघुभक्तजी, इन सबोंको सम्पूर्ण जगत् जानता था।वाल्मीकिभक्तजी, वृद्धव्यासजी, जगनजी, झांभूजी, विठ्ठल आचार्यजी, हरिभूजी, लालाजी, हरिदासजी,वाहुवलजी, परमश्रेष्ट राघवदासजी, लाखोजी, बीतरजी, उद्धवजी, कपूरभक्तजी, घाटमजी, धूरीजी, इन सवोंने अपने सुयश जग में प्रकाश किये। १ श्रीसोमजी १५ श्रीझांभूजी २ श्रीभीमजी १६ श्रीविठ्ठल प्राचार्यजी ३ श्रीसोमनाथजी १७ श्रीहरिभूजी* ४ श्रीविको (विकोदी) जी १८श्रीलालाजी* ५ विशाखाजी १६ श्रीहरिदासजी ६ श्रीलमध्यान ध्यानजी २० श्रीवाहुवलजी ७ श्रीमहदाजी २१ श्रीराघवजी आर्य (श्रेष्ठ) ८ श्रीमुकुन्दजी २२ श्रीलाखाजी! ६ श्रीगणेशजी २३ श्रीछीतरजी | इन्होंने जग १० श्रीत्रिविक्रमजी २४ श्रीउद्धवजी में अपने ११ श्रीरघुजी (जगविख्यात) २५ श्रीकपूरजी ( यश प्रकाश १२ श्रीवाल्मीकिजी २६ श्रीघाटमजी किये। १३ श्रीवृद्धव्यासजी २७ श्रीधूरीनी १४ श्रीजगनजी ( १३३) श्रीघाटमजी। श्रीघाटमजी, जाति के मीना, जयपुर राज्य के खोड़ी (घोड़ी) ग्राम के रहनेवाले, गुरुवचन में विश्वास और श्रीहरि में भक्ति कर उत्तम पदको प्राप्त हो कृतार्थ हुए। प्रथम उनकी बटमारी ठगी चोरी की वृत्ति रहा करती थी, भाग्यवश कुछ विवेक आया, किसी हरिभक्त का सुसंग हुआ, उन्होंने शिक्षा दी कि "वटमारी चोरी * लमध्यानी, ऐसा एक नाम कोई बताते हैं, कोई लखमन ध्यानी कोई हरिभूः और कोई हरिभूला, ऐसा नाम बताते हैं ।। RSSIECCLECRece भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६५३ ठगी छोड़ दो।" घाटम ने कहा "इसी धंधे से तो मेरी जीविका है।" संत ने कहा कि “अच्छा, चार वार्ता हमारी ग्रहण करौ ( १) सत्य बोलना (२) साधुसेवा (३) भगवत् अर्पण किये पीछे कुछ खाना (४.) और भगवत् आरती में जा मिलना।" सुनते ही चारों वाते अंगीकार कर भगवत्मंत्र भी ग्रहण किया। श्रीगुरु के चारों उप- देश पर आप अति दृढ़ हो गये। एक दिन साधु आये घर में कुछ भी न था खलिहान से गेहूं चुरा लाकर संतों को भोजन कराया परंतु भय था कि “पद के चिन्हों को देखने से मैं खलिहानवाले के हाथों से कहीं अभी पकड़ा न जाऊं।" इतने ही में आँधीयुक्त पानी बरसा, आपकी चिन्ता मिट गई; आपने निश्चितता से संतों की सेवा की। एक समय श्रीगुरु ने भगवउत्सव में घाटम को बुलाया उस समय में भी पास में कुछ न था; चिंता युक्त हो, चोरी करने राजा के गृह में आये, द्वारपालों ने पूछा, तब आपने सत्य उत्तर दिया कि "मैं चोर हूँ 'घाटम' मेरा नाम है" वे सब इनका उत्तम वेष देख समझे कि "इन्होंने अपने तई हँसी ही से चोर कहा है," कुछ न वोले । ये जाकर घुड़साल से एक उत्तम काले (मुश्की) रंग के घोड़े पर चढ़कर चले, अश्वरक्षकों ने रोका, फिर उनसे भी सत्य ही कहकर चले आये । श्रीगुरुगेह की ओर चले। संध्यासमय एक नगर में किसी हरिमंदिर में आरती होती थी वहां घोड़ा बांध कर आरती दर्शन कर भजन करने लगे। यहां राजा के यहां उस घोड़े की ढूंढ़ पड़ी। बहुत से लोग घोड़े के पांव का पता लेते उसी मंदिर के द्वार पर पहुँचे। भक्तवत्सल प्रभु ने उस घोड़े का स्वेत रंग कर दिया, घाटम चढ़ के जव वाहर निकले, तव राजभृत्य लज्जित हो सोचने लगे कि घोड़ा तो वैसाही है पर रंग इसका दूसरा है, अब राजा हमको दंड देगा; श्रीघाटमजी उनको भयभीत देखकर दयायुक्न बोले कि "वह चोर मैं हूं और यह घोड़ा भी वही है; प्रभु ने मेरी रक्षा हेतु कृपा- कर यह रंग बदल दिया। तुम चिंता न करो, तुम्हारी रक्षा के हेतु BCCelesterocietect CCECRACANCACC NA ६५४ श्रीभक्तमाल सटीक । . मैं घोड़े समेत तुम्हारे राजा के पास चलताहूं।" यह कहकर राजा के पास श्रा, आपने अपना सब वृत्तांत सुना दिया। चरणों पर पड़ राजाने बहुत सा द्रव्य और वह घोड़ाभी श्रीघाटमजी को दिया सब ले जाकर आपने श्रीगुरुजी को अर्पण किया। श्रीहरिगुरु भक्ति का ऐसा प्रभाव और प्रताप है । जय ॥ (५०%) छप्पय । (३३५) भक्त पाल दिग्गज भगत, ए थानाइत सूर धीर॥ देवानन्द, नरहरियानन्द, मुकुन्दै, महीपति, संतराम तम्मोरी। खेम, श्रीरंग, नंद, विस्नु, वीदी, वाजूसुत, जोरी॥ छीतम, द्वारिकादास, माधवें, मांडने, रूपा, दामोदरें । भल नरहरि, भगवान, वाल,कान्हेर, केसी, सोहैं घर ॥ दास प्रयाग, लोहंग, गुपाले,नायूँ सुत, गृह भक्कभीर । भक्तपाल दिग्गज भगत, ए थानाइत सूर धीर ॥ १०॥(११४) वार्त्तिक तिलक। ये महा भगवद्भन दिग्गजों के समान स्थानाधिपत्ति, परम सूर, धीर, सब भनों के पालनेवाले १ श्रीदेवानन्दजी ६ श्रीवाजूजी २ श्रीनरहरियानन्दजी १० श्रीवींदाजी ३ श्रीमुकुन्दजी ११ श्रीविष्णुजी दोनोंपुत्र ४ श्रीमहीपतिजी १२ श्रीछीतमजी ५ श्रीसन्तरामजी १३ श्रीद्वारिकादासजी ६ श्रीखेमजी १४ श्रीमाधवजी ७ श्रीश्रीरंगजी १५ श्रीमाण्डनजी ८ श्रीनन्दजी १६ श्रीरूपाजी ScotSHRECACCHECISC REATREACHERecies वाजूजी भले प्रकार अपने घर . AS भक्रिसुधास्वाद तिलक। १७ श्रीदामोदरजी २३ श्रीप्रयागदासजी १८ श्रीनरहरिजी २४ श्रीलोहंगजी १६ श्रीभगवानजी हीमें शोभा २५ श्रीनागजी २० श्रीवालजी पानेवाले॥ २६ श्रीगोपालजी श्रीनागू के पुत्र २१ श्रीकान्हरजी २२ श्रीकेशोजी इन सब संतसेवी भन्नों के गृह में भक्तों की भीर बनी ही रहा करती थी। (५०६) छप्पय । (३३४) बद्रीनाथ,उड़ीसे,हारिका सेवक सब हरिभजनपर॥ केसौ, पुनि हरिनाथ, भीम, खेतों, गोविंद, ब्रह्मचारी। बालकृष्णं, बड़भरथ,अच्युत, अपर्या व्रत-धारी॥पंडा गोपीनाथ, मुकुन्दा, गजेंपति, महाजस । गुननिधि, जसगोपाल, देइँ भक्तनि को सरबस ॥ श्रीअंग सदा सानिधि रहैं कृत पुन्यपुंज भल भाग भर । बद्रीनाथ, उड़ीसे, द्वारिका सेवक सब हरिभजनपर॥१०॥(११३) वार्तिक तिलक । श्रीवदरिकाश्रम (श्रीबद्रीनाथ)जी में, उड़ीसा जगदीश क्षेत्र में और श्रीद्वारकापुरी में चारोंधाम में श्रीजगन्नाथजी और श्रीरन- छोरटीकमजी के ये सेवक हरिभजन में परायण हुए ॥ १ श्रीकेशवजी श्रीभीमजी २ श्रीहरिनाथजी है श्रीखेताजी ३ श्रीब्रह्मचारीगोविन्दजी इन १० श्रीगोपीनाथपंडाजी } ये महा- ४ श्रीवालकृष्णजी ने संत ११ श्रीमुकुन्दजी यशयुक ५ श्रीवड़भरतजी सेवा १२ श्रीगजपतिजी ६ श्रीअच्युतजी का व्रत १३ श्रीगुणनिधिजी ७ श्रीअपयाजी किया १४ श्रीजसगोपालजी CRICS ASTRACT धारण Ka *** श्रीभक्तमाल सटीक । । इन्होंने हरिभक्तों को अपना तन मन धन सर्वस्व अर्पण किया, तीनोधाम में ये ११ भक्त भगवत् श्रीअंग के सदा समीप रहनेवाले, कृतपुण्य पुंज, भले प्रकार भाग्य से भरे हुए, तेजपुंज हुए। ( १३४)श्रीरुद्रप्रताप गजपतिजी। (५१०) टीका । कवित्त । (३३३) श्रीप्रतापरुद्र गजपति के बखान कियो, लियो भनिभाव महा प्रभु पै, न देखहीं किये हूं उपाय कोटि, ओटि लै संन्यास दियो, हियो अकुलायौ "अहो ! किंहू मोको पेखहीं" ॥ जगन्नाथ रथ आगे , नृत्य करें मत्त भये नीलाचलनृप पाय पस्यौ, भाग लेखहीं । छाती सों लगायो, प्रेमसागर चुड़ायो, भयो अति मन भायो, दुख देत ये निमेखहीं ॥ ४०६ ॥ (२२०) वार्तिक तिलक। श्रीरुद्रप्रताप गजपतिजी, नीलाचल पुरुषोत्तमपुरी के राजा थे। महाप्रभु श्रीकृष्ण चैतन्य जी से भक्तिभाव मन्त्र ग्रहण कर शिष्य हुए। महाप्रभु ने इनकी प्रेमपरीक्षा लेने के अर्थ किसी दिन से इन की ओर देखना छोड़ दिया। आपने कोटिन उपाय किये तथापि प्रभु ने नहीं ही देखा; तब संन्यास वेष का ओट लिया, और हृदय में अत्यन्त आकुलता हुई कि “ मुझे किसी प्रकार से श्रीगुरु कृपा. दृष्टि से देखें ॥" एक दिवस प्रेम से मत्त हुए महाप्रभुजी श्रीजगन्नाथजी के रथ के आगे नृत्य करते थे; भाग्य समझ, प्रेम से विह्वल हो, साष्टांग पड़ राजा ने चरणों को पकड़ लिया; महाप्रभुजी ने सत्य प्रेम देख, उठाकर छाती में लगा प्रेमानन्द के समुद्र में मग्न कर दिया। राजा का मनोरथ अति पूर्ण हुआ। श्रीहरि गुरु थोड़े ही काल अपने वियोग का दुःख देकर फिर सदा के लिये अखण्ड सुख दे देते हैं। (५११) छप्पय । (३३) हरिसुजस प्रचुर करजगत मैं, ये कविजन अतिसय * पाठान्तर मया KKRECricketc Artsatte - 13 भक्तिसुधास्वाद तिलक। उदार ॥ विद्यापति, ब्रह्मदास, बहोरन, चतुरविहाँरी। गोविंद, गंगा, रामलाल, वरसानियां मंगलकारी॥ प्रियदयाल, परसराम, भक्त माई, खाटीको । “नन्द- सुवन” की छाप कार्वत "केसौ” को नीकौ ॥ आस- करने, पूरने नृपति, भीष, जनदयाल, गुन नहिन पार । हरि सुजस प्रचुर कर जगत मैं, ये कविजन अ- तिसय उदार ॥ १०२॥ (११२) वार्तिक तिलक । श्रीहरि का सुजस जगत् में प्रचार करनेवाले ये सब कविजन अतिसय उदार हुए; नाम- विद्यापतिजी, ब्रह्मदासजी, बहोरमकविनी, बड़े चतुर बिहारी कविजी, श्रीगोविन्दसखाजी, गंगारामकविजी, वरसानियां श्रीराम- लाल जी, मंगलमय हरिचरित्र गानकर इन्होंने जीवों को मंगलमय करदिया, प्रियदयाल जी, परसरामजी, भक्त भाईजी, खाटीकजी; जिन्होंमें "नन्दसुअन" की छाप पड़ी है ऐसे कवित्त श्रीकेशवजी के अच्छे हुए । प्रासकरनजी राजा, पूरनजी राजा, भीषमजी, जन दयालजी; ये सब अपार गुणों से युक हुए ॥ १ श्रीविद्यापतिजी ६ श्रीपरशुरामजी २ श्रीब्रह्मदासजी १० श्रीभनभाईजी ३ श्रीबहोरनजी ११ श्रीखाटिकजी ४ श्रीविहारीजी १२ श्रीकेशवजी ५ श्रीगोविन्दस्वामीजी १३ श्रीप्राशकरनजी ६ श्रीगंगारामजी १४ श्रीपूरनजी ७ श्रीरामलालजी १५ श्रीभीपमजी ८ श्रीप्रियदयालजी १६ श्रीजनदयालजी A-KORECEICALENRSCIENCE Che , PEOPHORREARRIN ६५८ श्रीभक्तमाल सटीक। . -(१३५) श्रीगोविंदस्वामीजी । (५१२) टीका । कवित्त । (३३१) गोवर्द्धननाथ साथ खेलें, सदा झेलें रंग अंग, सख्य भाव हिये, गोविंद सुनाम है । स्वामी करि ख्यात, ताकी बात सुनि लीजे नीके, सुने सरसात नैन, रीति अभिराम है । खेलत हो लाल संग, गयो । लौट दाव लैकै, मारी वंचि गिल्ली देखि मन्दिर में स्याम है। मानि अपराध, साधु धक्का दै निकारि दियो, मति सो अगाध, कैसे जाने वह वाम है ॥ ४१०॥ (२१६) वार्तिक तिलक। श्रीविठ्ठल गुसाई के शिष्य श्रीगोविन्दस्वामी नाम से विख्यात, हृदय में सदा सख्य भाव रखकर, "श्रीगोवर्द्धननाथजी" से अंगसे अंग मिलाय रंग भेजने और साथ खेलनेहारे, अभिराम रीतिबाले की वार्ता भलीभांति सुनिये, कि जिसको सुनकर नेत्र प्रेमसे सजल सरस हो जाते हैं। आपको वाल्यावस्था ही से श्रीकृष्णचन्द्रजी प्रगट होकर दर्शन देते वरंच साथ खेला करते थे । एक दिन नन्दलालजी के साथ गिल्ली दंडा खेलते थे । प्रथम प्रभु का दाव था सो गोविन्द सखा को बहुत दौड़ाया, जब इनका दाव आया, तब नन्दलाल भगे; ये । पीछे दौड़े । श्यामसुन्दर को मन्दिर में देख, खेंचकर गिल्ली मारी। मन्दिर में एक साधु पुजारी थे, सो उन्होंने इनका बड़ा अपराध मान इनको धक्का देकर निकाल दिया। क्योंकि सख्यरस भरी अगाध मति को, वह प्रेम ले विमुख, कैसे जान सकता? आप भारी गये और महान कवि थे, अष्ट छाप में इनकी । गिनती थी। इनकी कदम्बखण्डी" नाम उपवन अबतक गोवर्द्धन जी के पास विद्यमान है। (५१३) टीका । कवित्त । (३३०) बैटयौ कुंड तीर जाय, निकसंगो पाय, वन दिये हैं लगाय, ताको फल भुगताइये। लाल हिय सोच पखौ, कैसे भस्यौ जात, वह - , SHAKRA تمومه . , . ins भकिसुधास्वाद तिलक। अस्यौ मगमांझ, भोग धस्यौ पै न खाइयै ॥ कही श्रीगुसाईज़ कों, मोकों ये न भाई कळू, चाही जो खबावो, तो पै वाकों जा मनाइयै । "वाको हुतो दाव मोपै, सो तो भाव जान्यौ नहीं, कही मोसों बातें सो कुमारे वेगि ल्याइये" ॥ ४११॥ (२१८) यार्तिक तिलक। जब उस साधु ने आपको धक्का देकर निकाल दिया, तब आप (श्रीगोविन्दसखाजी) जा के कुण्ड तीर बैठे; और ऐसा कहने लगे कि "वन में जाने को तो इस मार्ग से निकलेगा सही, जो अपने वैरागी को मुझे धक्का देने में लगा दिया, तिसका पलटा फल में भुगता ही लूंगा।" अब तो लाजजी के हृदय में बड़ा ही सोच पड़ा कि "वह सखा अपनी दाव लिये विना नहीं छोड़ेगा वह मार्ग ही में बैठा है।" आपके भागे भोग धरागया, परन्तु ग्रहण नहीं किया। प्रगट होकर श्रीगुसाईजी से कहा कि "मुझको यह भोग वस्तु कुछ नहीं अच्छी लगती, जो मुझे खिलाया चाही तो मेरे सखा को जा- कर मना लाओ, क्योंकि उसका दाव था सो मैंने नहीं दिया, तब उसने आकर मुझे गुल्ली मारी; उस भाव को तो साधु जान सका नहीं, उसको दुर्वचन कहकर धक्का दे दिया, वह क्रोध में भरा है; सो प्रिय कुमार को श्राप शीघ्र लिका लाइये " (५१४) टीका । कवित्त । (३२६) वन वन खेले विन वनत न मोकों नेक, भनत जुगारी अनगनत लगावेगो। सुधि बुधि मेरी गई, भई बड़ी चिंता मोहि, ल्याइये जू ढूंढ़ि कहूँ चैन ढिग आवैगो॥ भोग लगाये, मैं तो तनक न पाये,रिस वाकी जब जाये, तब मोहूँ कछु भावैगो । चले उठि धाये, नीठ नीठ के मनायल्याये,मन्दिर में खाय मिलि,कहीगरें नावैगो॥४१२॥(२१७) चार्तिक तिलक। श्रीलालजी ने गुसाईजी से कहा कि "देखिये, वन वन प्रति खेले विना, मेरा मन प्रसन्न नहीं ही होता; और वह वनमार्ग में बैठा मुझे गालियां दे रहा है, जो उधर मैं जाऊंगा तो अनेक चोट ल- गावैगा; मेरी तो सव सुधि वुधि भूल गई; बड़ी ही चिंता उत्पन्न हुई । NERASHTRA ६६० श्रीभक्रमाल सटीक। है, मेरे मित्र को ढूंढ़ लाइये तब मेरा मन प्रसन्नता युक्त हो, आपने जितने भोग लगाये हैं मैंने उसमें से अभी किंचित् भी नहीं पाया; उसकी रिस शान्त हो तब मुझे भी कुछ अच्छा लगेगा।" श्रीगुसाईंजी सुनते ही दौड़े; बड़ी कठिनता और बड़े यत्न से आपको मनाकर लाये, कहा कि "तुम्हारे प्रेमी ने कहा कि-आकर मेरे साथ मिलकर खायँ और गले मिले।" ऐसाही किया । (५१५) टीका । कवित्त । (३०) गये हे पहिरभूमि, तहां कृष्ण आये भूमि, करी बड़ी धूम, आक- बोडिन सौं मारि कै । इनहूं निहारि उठि मार दई वाही सो जु, कौतुक अपार, सख्यभाव रससार कै ॥ माता मगचाहे, बड़ी वेर भई, आई तहां, "कहां चार लाई" भोट पाई उर धारि के। आयो यो विचार अनुसार सदाचार कियो, लियो प्रेम गाढ़, कभं करत संभारि कै ॥ ४१३ ॥ (२१६) वार्तिक तिलक। एक दिवस, गोविन्दस्वामीजी वहिरभूमि (शौच) के लिये गयेथे, वहां ही प्रेमानन्द से झूमते श्रीकृष्ण चन्द्रजी आकर, उसी दशा में आक (मदार ) के फलों से आपको मार मार कर बड़ी धूम मचाने लगे; आपने देखा, तव उठकर उन्हीं फलों से श्रीकृष्णचन्द्र को भी आप मारने लगे । दोनों सख्यभाव रमसार में छके कौतुक मचा रहे थे, गोविन्दसखाजी माता, बड़ा विलम्ब जान मार्ग देख रही थीं, फिरविचारने लगी कि "कहां विलंब लगाया?" वहां ही आई; उनको देख श्रीकृष्णचन्द्र छिप गये; आप उसकी ओट (वहाने ) से बचे । और तब मन में विचार आया; शौच की सदाचार क्रिया की । इसप्रकारके गाढ़े प्रेम से छके, श्रीबड़भागीजी कभी सँभारसे, और कभीचे सभाले अपने मित्र के संग खेलाकरते थे। (५१६) टीका | कवित्त । (३२७) आवत हो भोग महासुन्दर, सुमन्दिर कों, रह्यो मग वैठि, कही "आगे मोहिं दीजिय" । भयो कोप भार, थारं डारि, जा पु- कार करी, भरी न. अनीति जात, सेवा यह लीजियै ॥ वोलि के GRECECAUR RECEResonal . हुए अपार . , ******* भकिसुधास्वाद तिलक। सुनाई, "अहो कहा मन आई?" तब बोलि के वताई, "अजू चात कान कीजिये । पहिले जु खाय, वन माम उठि जाय, पाछे पाऊं कहां धाय, सुनि मति रस भीजियै ॥ ४१४ ॥ (२१५) चार्तिक तिलक। एक दिन की बात है कि अति सुन्दर भोग का थार रसोई करने वाले मन्दिर में लिये आते थे; गोविन्दसखाजी मार्ग में बैठे बोले कि “पहिले मुझे पाने को दे दीजिये ।' सुनकर पूजा रसोई करने वालों को बड़ा क्रोध हुआ, थाल को पटक, जा, गुसाईजी से पुकार किया कि "ऐसी सेवा आप लीजिये, इस लड़के की अनीति हमसे नहीं सही जाती।" गुसाईंजी ने आपसे पूछा कि, "लाला ! तेरे मनमें क्या आई?" इन्होंने उत्तर दिया "अजी महाराज ! मेरी बात सुनिये, यह आपका लाला पहले खाकर वन में चला जाता है, मैं पीछे पाने को पाता हूं पीछे जाता हूं, तब वह मुझे मिलता नहीं, ढूंढ़ता फिरता हूं।" सुनकर गुसाईंजी की मति प्रेमरस से भीग गई। उस दिन से थार मन्दिर में पहुँचते ही इधर इनको भी पवा देते थे । (५१७) छप्पय । (३२६) जे बसे वसतमथुरामंडल,ते दयादृष्टि मो पर करौ॥ रघुनाथ, गोपीनाथ, रामभद्र, दासूस्वामी। गुंजा माली, चित उत्तम, पीठलें, मरहठ, निहकामी ॥ जदुनंदन, रघुनाथ, रामानंद, गोबिन्दै, मुरलीसोती । हरिदास मिश्र, भगवान, मुकुंदै, केसौ दंडोती ॥ चतुरभुज, चरित्र, बिष्णुदासे, वेनी", पदमो सिर धरौ । जे वसे वसंत मथुरामंडल, ते दयादृष्टि मो पर करो ॥ १०३॥ (१११) बार्तिक तिलक। जो भक्त मथुरामंडल में आगे-वसे हैं और जो अब वसते हैं, ते SCHECHAKRACHERRORKERS भी गान करता हूँ कि जो भक श्रीवज में वसे और बसें उनकी *** EKHi**** ६६२ श्रीभक्तमाल सटीक। सव मुझपर दयादृष्टि कीजिये । मोर कृपाकर मेरे सीस पर अपने चरणकमल रखिये। १ श्रीरघुनाथभक्तजी १२ गोविन्दभक्तजी २ श्रीगोपीनाथभक्तजी १३ मुरलीश्रोत्रीजी ३ श्रीरामभद्रभक्तजी १४ हरिदासमिश्रजी ४ दासूस्वामीजी १५ भगवानभक्रजी ५ गुंजामालीजी १६ मुकुन्दभक्तजी ६ चित्तउत्तमजी १७केशवदंडवतीजी : ७ वीठलजी १८ चतुर्भुजजी ८निष्कामभक्कमरहठजी १६ चरित्रभक्तजी ६ यदुनंदनभक्रजी २० विष्णुदासजी १० दूसरे रघुनाथभकजी २१ वेनीमजी ११ रामानन्दभक्तजी "भगवान" नाम के कई भक्त हुए हैं। (१३६ । १३७) श्रीगुंजामालीजी और आपकी पुत्रवधू। (५१८) टीका । कवित्त । (३२५) कही नाभा स्वामी आप, गायों में प्रताप, संत बसे व्रज वसैं सो तो महिमा अपार है । भये गुंजा माली "गुंजा" हार धरि नाम पस्यो, कस्यौ बास "लाहोर मैं आगे सुनौ सार है। सुतवधू विधवा सों वोलि के सुनायो लेहु धनपति गेह श्रीगोपाल भरतार है। देवो प्रभुसेवा," मांगे नारि वारवार यह डारे सब वारि यापै गर्ने जग छार है ॥ ४१५॥ (२१४) वार्तिकं तिलक। आप श्रीनाभास्वामीजी ने उन संतों का प्रताप कहा, सो में महिमा अपार है । गुंजा (चोंटली, धुंधची ) की माला धारण करने से गुंजा माली नाम पड़ गया; आप लाहौर में हुए आपकी सारांश कथा आगे सुनिये । आपकी पुत्रवधू ( पतोहूँ ) विधवा हो गई, आपने उसको बुलाके कहा कि "पतोहू ! तुम यह अपने पति का toctor SKHER iiicial ++ भक्तिसुधास्वाद तिलक। घर और धन लो, तुम्हारे भर्ता यही सेवामूर्ति श्रीगोपालजी हैं, अपने भर्ती को लो।" वह भनि संस्कारयुक्त थी ही, इससे प्रभु- सेवाही वारंवार मांगकर कहने लगी कि "मुझे प्रभु की सेवा ही दी- जिये और जगत् की वस्तु तो सब क्षार हैं में इनपर सब न्यवछावर करती हूँ, और कुछ नहीं लूंगी ॥" (५१६ ) टीका । कवित्त । (३२४) दई सेवा वाहि, और घर धन तिया दियो, लियो ब्रज घास, वाकी प्रीति सुनि लीजिये । ठाकुरविराज, तहां खेलें सुन औरनि के, डार इटा खोहा, पस्यौ प्रभुपर, खीझिये ॥ दिये वे बिडारि, धरयों भोग, पै न खात हरि, पूछी कही वेई भावें तब ही तो जीजिये । कह्यारिस भरि "धरि नीकी, भोर डार भरि, खावी," अव हाहा करी पायो, ल्याई रीझिये ॥ ४१६॥ (२१३ ) पातिक तिलक । इसप्रकार उसकी भक्ति देख श्रीगोपालमूर्ति उसीको दिया और धन घर सब अपनी स्त्री को दे, आप आकर श्रीवृन्दावन में बसे । अब उस पतोहू की प्रीति सुनिये, उसकी भक्ति देख प्रभु श्रीमूर्ति से खाने और उसके साथ बोलने भी लगे । एक दिन जहाँ ठाकुर बिराजे थे वहां औरों के लड़के ईंटा धूलि डालते खेलते थे सो वह मिट्टी धूलि प्रभु के ऊपर पड़ी, तब इन्होंने क्रोध कर लड़कों को भगा दिया। पीछे, भोग का थार रक्खा, सो प्रभुने कुछ न पाया। इन्होंने प्रार्थना कर पूछा तो आप बोले कि "वे लड़के आवे खेलें तभी मुझको प्रसन्नता होगी।" इन्होंने प्रणय कोप कर कहा कि "जो धूलिही आपको प्यारी है तो बड़े भोर लड़कों को बुला के डलवा दूंगी, अभी खाइये।" बहुत प्रार्थनाकिया और लड़कोंको बुला लाई, तब आपने भोजन किया और बहुत प्रसन्न हुए। (५२० ) छप्पय । (३२३) कलिजुग जुवतीजन भक्त राज महिमा सब जानै जगत । सीता, माली सुमंति, सोमा, प्रभुता, उमा Korcere RE श्रीभनमाल सटीक। . , भटियानी। गंगा, गौरी,कुँवरि,उवीठी, गोपाली, गने. सदेरॉनी ॥ कला, ली, कृतगंदौ, मानमती, मुचि, सतिभामाँ ॥ जमुनों, कोली", रामा, मृगौ, देवीदे* भक्तन विश्रामा॥जुगै जवाँ, कोकी,कमला, देवेंकी, हीरी, हरिचेरी, पोखेभगत। कलिजुगजुवतीजनभक्त राज महिमा सब जानै जगत ॥ १०४॥ (११०) वार्तिक तिलक । कलियुग में ये युवतीजन भक्रराज हुई, इनकी महिमा कीर्ति सब जगत् जानता है श्रीसीतासहचरीजी, झालीजी, सुमतिजी, शोभाजी, भटियानीउमाजी, गंगाजी, गौरीजी, कुँवरि, उबीठाजी, गोपालीजी, रानीगणेशदेईजी, क्लाजी, लखाजी, कृतगढ़ोजी, मान- मतीजी, परम पवित्र सतिभामाजी, यमुनाजी, कोलीजी, रामाजी, मृगाजी, देवादेईजो, ये सब हरिभक्कन को विश्राम देनेवाली हुई। जेवाजी,कीकीजी,कमलाजी, देवकीजी, हीराजी, हरिचेरीजी इन्होंने भोजन वनादिकों से हरिभक्कों की सेवा की। श्रीजनकनन्दिनी वा श्रीभानुसुता की बड़ी कृपापात्र हुई ॥ - १ श्रीसीतासहचरीजी ११ श्रीगोपालीजी २ श्रीमालीजी १२ श्रीरानीगणेशदेईजी ३ श्रीसुमतिजी १३ श्रीकलाजी ४ श्रीशोभाजी १४ श्रीलखाजी ५ श्रीप्रभुताजी १५ श्रीकृतगढ़ौजी ६ श्रीउमाभटियानीजी १६ श्रीमानमतीजी ७श्रीगंगाजी १७ श्रीसतिभामाजी ८श्रीगौरीजी १८ श्रीजमुनाजी ६ श्रीकॅवरीजी १६ श्रीकालीजी १० श्रीउबीठाजी २० श्रीरामाजी * 'देवा' अर्थात् देनयाली । वा देवादे दियो । . CAMERA ****** Nitor भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६६५ १ २१ श्रीमृगाजी २६ श्रीकमलाजी , २२ श्रीदेवाजी २७ श्रीदेवकीनी २३ श्रीजेवाजी) २८ श्रीहीराजी २४ श्रीजेवाजी जुगजेना २६ श्रीहरिचेरीजी २५ श्रीकीकीजी (१३८) श्रीगणेशदेई रानी। (५२१) टीका । कवित्त । (३२०) "मधुकरसाह" भूप भयो, देश “ओड़छे" को, रानी सो "गनेस- देई" काम बांकौ किया है । आवें बहु संत सेवा करत अनंत भांति, रह्यो एक साधु खान पान सुख लियौ है ॥ निपट अकेली देखि बोल्यौ "धन थैली कहां?" "होय तो बताऊं सब तुम जानो हियौ है" | मारी जांघ छुरी लखि लोहू वेगि भागि गयो, भयो सोच "जाने जिनि राजा बंद दियो है"॥४१७ ॥ (२१२) चार्तिक तिलक। श्रीमधुकरसाहजी ओड़छे के राजाथे इनकी रानी परम श्रीराम- भक्ता श्रीगणेशदेईजी ने भक्रिपथ में बड़ाही बांका काम किया आप अति प्रीति तथा अनेक भांति से सन्तसेवा करती थी; इस हेतु बहुन संत आया करते थे। किसी समय खान पान का सुखपाकर एक वेषधारी (नाममात्र का साधु) आपके यहां रह गया। आप के यहां वैष्णवमात्र को रोक (परदा)न था । एक दिन आप अकेली विराजी थीं, उसी समय में वह वेषधारी एक छूरी लिये आया और बोला कि "धन की थैली कहां है?" आपने उत्तर दिया “मेरे पास जो धन आता है लो आपलोगों की सेवा में लगजाता है, थैली नहीं है, होय तो बताऊं, मेरे हृदय को आप जानते हैं मैं धन नहीं रखती।" तथापि उस लोभी ने फिर मांगा और नहीं पाया; तब जंधे में बुरी मार दी ! रुधिर चलने लगा, कर वह दुष्ट भाग गया ॥ श्रीगणेशदेईजी को यह सोच हुआ कि “कहीं राजा न जाने, नहीं तो इसको दंड देंगे;" घाव को बांध दिया । Postate देख re H NAR श्रीभकमाल सटीक। नबीन कळू, . (५०) टीका | कवित्त । (३२१) वांधि नीकी भांति, पौढ़ि रही, कही काहसों न, आयो ढिग राजा, “मति आवौ, तियाधर्म है"। बीते दिन तीनजानी घेदन कछु, “कहिये प्रवीन मोसो खोलि सब मर्म है" ॥ टारी वार दोय चारि, नृप के विचार पस्यो, कस्यो समाधान "जिन आनौ जिय भर्म है" । फिस्यौ आस पास भूमि पर तन रासकरी, भक्निको प्रभाव छोडि तिया पतिसर्म है ॥ ४१८॥ (२११) वात्तिक तिलक। श्रीभक्तिभागिनीजी उस घाव को अच्छे प्रकार वांधकर पड़रहीं किसी से कुछ कहा नहीं; जव आपके समीप में आपके प्रति मधु. करसाहजी आये तब बोली कि “आप मत आइये मुझे स्त्री-धर्म हुआ है ।" तीन दिन बीते शुद्धता विचारि फिर आकर राजा ने आपको पड़ी ही देखा, जाना कि "कोई नवीन व्यथा है ।" आपसे पूछने लगे कि "हे प्रवीन प्रिये ! जो व्यथा होय सो सब मर्म खोल कर कहो।" सुनकर आपने दो चार वेर टाल मटोल किया; राजा ने नहीं माना; तब सत्य सत्य सब वृत्तांत कह कर समाधान करने लगी कि "आप कोई मन में भ्रम लाकर वैष्णवों में अभाव मत कीजियेगा; यह कोई मेरा कर्मही ऐसा था सो भी भोगही गया ।" राजाजी भी तो परम भागवत थे, सुनकर आपकी क्षमा और भक्रि पर न्यवछावर हो, परिक्रमा कर भूमि पर पडके प्रणाम किया, श्रीभनि का प्रभाव हृदय में धारण कर स्त्री पति की लज्जा छोड़ श्रीगणेशदेईजी में भक्ति का गौरव मानने लगे। श्रीगणेशदेईजी की एक और उत्तम कथा जो बुंदेलखण्ड देश के सब सजनों को विदित है सो सुनिये । श्रीमधुकरसाहजी श्री. कृष्णचन्द्रजी के उपासक थे और श्रीगणेशदेईजी राजाधिराज श्री- रामचन्द्रजी की उपासना युक्त थीं। इससे जव तब श्रीअयोध्याजी आती थीं। एक बार श्री अयोध्याजी आई, प्रेमवश कुछ दिन रहगई; श्रीमधुकरसाहजी का, भक्तिसम्बन्ध से, आप में बड़ा स्नेह था; इससे कई पत्र लिखे; परन्तु धाम के स्नेह विवशता से नहीं गई॥ EGHALALCREECReceofacts SECORRECORD ॐ भकिसुधास्वाद तिलक। ६६७ तब राजा ने लिख भेजा कि “अव अपने प्रभुको साथही लिवा- कर आना।" पत्र वांचके गणेशदेईजी ने प्रभु से प्रार्थना की कि "देखिये, राजा क्या लिखते हैं । निदान कुछ दिन श्रीअवध में और रहीं फिर यह विचार किया कि प्रभुके तो मेरे सरीखी बहुत किं- करी हैं किस किस के साथ में जायेंगे; परन्तु मैं भी ऐसे ओड़छे नहीं जाऊंगी; श्रीसरयूजी में प्रवेश कर प्राण त्याग कर दूंगी।" ऐसा निश्चय कर स्नान के बहाने से श्रीसरयूजी में डूब ही तो गई। उसी क्षण भक्तवत्सल कृपासिंधु श्रीरघुनंदनजी श्यामसुन्दर किशोर- मर्ति मणिविग्रह से आपके अंक में आगये । और गणेशदेईजी को तौर पर खड़ी कर दिया। फिर उस क्षण का प्रेमानन्द श्रीगणेशदेई- जी का कौन कह सकता है ? जहां आपकी स्थिति थी वहां प्रभुको लाकर विराजमान कर महाउत्सव किया । दान द्रव्य लुटाना बाजा वजवाना इत्यादिक आनन्द की धूम मची और सव वृत्तांत श्रीमधुकरसाहजी को पत्र द्वारा निवेदन किया । सुनकर बहुत द्रव्य और सेना समेत श्रीअवध आकर प्रभु के दर्शन कर कृतार्थ हुअा। प्रभु की प्रेरणा से श्रीगणेशदेईजी ने श्रीजानकीजीवनजी को इस प्रकार से ओड़छे लिवा ले चली कि पुष्य *वा पुनर्वसु नक्षत्र में वहां से प्रभु पधारे; जब तक पुष्य नक्षत्र रहा तब तक पधारती फिर २६ दिन मार्ग में एक स्थल में स्थित रहतीं, फिर सत्ताईसवें दिन पुष्य नक्षत्र में चलती इसीभांति केवल पुष्य ही में चलकर ओड़छे गये, वहां अकथनीय आनन्द उत्सव से प्रभु विराजमान हुए। पीछे आपके विग्रहअनुरूप श्रीजानकीजी' श्रीलक्षमणजी श्रीहनुमान्जी आदिकों की मूर्तियां प्रतिष्टा करके समीप में पधराई गई। कोई आगे बैठता नहीं था ॥. श्रीगणेशदेई जी का यह नियम था कि पूजा अपने हाथ से करती थीं । वहां के बहुत लोगों के मन में ऐसी शंका होती थीं कि "ये प्रभु रानी को स्वयं सरयूजी में नहीं मिले, किन्तु कोई यत्न से ले गजा * कोई महात्मा पुष्य नक्षत्र और काई पुनर्वसु वतात है ॥ SARGAMKRECCANCH RS ६६८ श्रीभकमाल सटीक। आई हैं।" इस वार्ता को श्रीजानकीवल्लभजी जान गये तब एक दिवस एकांत पूजा में रानी को आज्ञा दिया कि "वहुत काल से खड़ी हो बैठजाओ।" आप प्रणाम कर बोली, “कृपानिधे ! आप खड़े हैं, किंकरी कैसे बैठ जाय ?" प्रभु बोले " हम बैठ जायें फिर उठेंगे नहीं।" आप वोली "जैसी इच्छा होय ।" सबों के विश्वास के लिये आपके ऊपर कृपा कर श्रीजानकीवल्लभजी वीरासन से बैठ गये। अब तक बिराजे ही हैं। * ओड़ला नगर किसी हेतु से उजड़ गया परन्तु प्रभु और आपके सेवकवर्गमात्र अब तक रहते हैं। श्रावणशुक्ल तृतीया को आप झूलने पर विराजते हैं तब विशेष उत्सव मेला होता है। (५२३) छप्पय । ( ३२०) हरि के संमत जे भगत, ते दासनि के दास ॥ नरवाहने, बाहन बरीसं, जापू, जैमल, बीदावत । ज- यंत, धारा, रूपा, अनुभई, उदारावत ॥गंभीरे अर्जुन, जनार्दन, गोविंद, जीती । दामोदर, सांपिले, गैंदा, ईश्वर, हेमविदीता ॥ मयानन्द महिमा अनंत गुढीले, तुलसीदास। हरि के संमत जे भगत, ते दासनिके दास ॥१०५॥ (१०६) वार्तिक तिलक। 'श्रीभगवान् के अनुकूल जो भक्त हैं; मैं उन भनों के दासों का दास हूं। श्रीनरवाहनजी, श्रीवाहनवरीशजी, श्रीजापूजी, श्रीजयमलजी, श्रीविन्दावतजी, श्रीजयन्तजी, श्रीधाराजी, श्रीरूपाजी, श्रीअनु- भवीजी, श्रीउदाराक्तजी, श्रीगंभीरे अर्जुनजी, श्रीजनार्दनजी, * श्रीअयोध्याजी श्रीकनकमयनमें जो श्रीविग्रह हैं पार ठीक उसी मूर्ति के सदृश हैं। भेद केवल इतनाही है कि ये श्याम हैं और ये गौर ॥ ( रानी की स्थापित यंठो मूर्ति है) RECE CERICA . *** FAS भनिसुधास्वाद तिलक। ६६६ श्रीगोविन्दजी, श्रीजीताजी, श्रीदामोदरजी, श्रीसांपिलेजी, श्रीगदा- भक्तजी, श्रीईश्वरभक्तजी, श्रीहेमविदीताजी, ‘अपार महिमावाले श्रीमयानन्दजी, श्रीगुढीलेजी, श्रीतुलसीदासजी ॥ इन सब भक्तों के दास का मैं दास हूँ। १ श्रीनरवाहनजी | १२ श्रीजनार्दनजी २ श्रीवाहनवरीशजी १३ श्रीगोविन्दजी ३ श्रीजापूजी १४ श्रीजीताजी ४ श्रीजयमलजी १५ श्रीदामोदरजी ५ श्रीविन्दावतजी १६ श्रीसांपिलेजी ६ श्रीजयन्तजी १७ श्रीगदाभनजी ७ श्रीधाराजी १८ श्रीईश्वरजी ८ श्रीरूपाजी १६ श्रीहेमविदीताजी ६ श्रीअनुभवीजी २० श्रीमयानंदजी १० श्रीउदारावतजी २१ श्रीगुढीलेजी ११ श्रीगंभारे अर्जुनजी २२ श्रीतुलसीदासजी (दूसरे) (१३६) श्रीनरवाहनजी। (५२४) टीका । कवित्त । (३१६) रहैं भौगाँव नाँव, नरवाहन साधु सेवी, लूटि लई नाव जाकी, चंदीखाने दिया है । लौड़ी आवै देन कळू खायवे को; आई दया; अति अफुलाई, लै उपाय यह कियो है ॥ बोलो "राधावल्लभ" ओ लेवो "हरिबंश" नाम; पूछे "शिष्य" नाम कही; पूछी नाम लियो है । दई मँगवाय वस्तु राखि यो दुराय वात पाय दास भयो कही शमि पद दियौ है ॥ ४१६ ॥ ( २१०) वार्तिक तिलक। श्री नरवाहन" जी श्रीहरिवंशजी के शिष्य, परमं संतसेवी, "भोगाँव" में रहते थे। ब्रज के एक जमींदार थे और लुटेरे भी। कोई सेठ लक्षावधि की संपदा नाव में भरे गंगाजी में चला आता था, मापने संतसेवा के लिये सब लूटालिया, और उस सेठ को कारा- CHAKREACHES RECOR PAN ***** * ६७० श्रीभक्रमाल सटीक। गार (बन्दीघर ) में डाल दिया। उस वाणिक (सेठ) को भोजन देने एक लौंड़ी (टहलनी ) कारागार में जाती थी; देखकर उस दासी के हृदय में बड़ी दया आई, तब बहुत अकुलाके उसको एक उपाय बताया कि तुम बड़े ऊंचे स्वरसे, "राधावल्लभ श्रीहरिवंश !” इस प्रकार से नाम जपो; जब पूछा जाय तब कहना कि "मैं श्रीहरिवंश- जी का शिष्य हूँ।" उसने ऐसाही किया। श्रीनरवाहनजी ने पूछा कि "तुम यह नाम क्यों जपते हो?" उसने कहा "मैं श्रीहरिवंशी का शिष्य हूँ।" राजा नरवाहन बड़े ही गुरु- निष्ट थे । सुनतेही धन देकर कहा कि श्रीगुसाईजी से यह बात मन कहना।" वह वैश्य घर में आ, शीघ्रही श्रीवृन्दावन जाकर श्रीहित- हरिवंशजी का शिष्य होगया, और अपना वृत्तान्त भी कहा कि "नरवाहनजी ने लाखों का धन लेकर मुझे वन्दी में डाल दिया था, सो मैंने आपका नाम लिया और झूठही कहा कि "आपका शिष्य तब धन देकर मुझे घर भेज दिया।" सुनकर प्रसन्न हो श्री गुसाईजी ने दोनों को प्रभुपदप्रेम दिया। श्रीनरवाहनजी की जय ॥ आपकी गुरुभक्ति पर रीझकर इन्हीं की छाप देकर दो पद बना कर अपनी "चौरासी” (ग्रंथ ) में रख दिया ॥ (५२५) छप्पय । (२८) श्रीमुख पूजा संत की, आपुन ते अधिकी कही। यहै वचन परमान “दास गांवरी” 'जटियाने" भाऊ। "बूंदी"वनियां राम मंडोते मोहनबारी""दाऊँ"॥ "माडौठी" "जगदीसदास, 'लक्षमन" "चटुथावल भारी । “सुनपथ' में “भगवान;" सबै “सलखान" “गुपाल” उधारी ॥ "जोवनेर" "गोपाल' के भक्त इष्टता निर्वही॥ श्रीमुख पूजा संत की आपुन तें अधि- की कही ॥ १०६॥ (१०८) SCRESCRECRUCACHECKNOctsecr PramanianRSEAN भक्रिसुधास्वाद तिलक। से अधिक प्रभु . वार्तिक तिलक। भगवान् ने अपने श्रीमुख से अपनी पूजा से अपने भक्त संतों की पूजा अधिक कही है । इसी श्रीमुख वचन का प्रमाण मानकर इस छप्पय के कहे हुए भक्कों ने प्रभु के भक्तों को इष्टदेव मान पूजा सेवा की “जटियाने," में "श्रीगांवरीदासजी" को इसी वचन के प्रमाण संतों में भाव था। "वंदी" में श्री "वनिया- राम" जी को भी यही भाव था । "मॅडोते" में "मोहनवारीजी" "दाऊ" जी के भी संत इष्टता का ही भाव था । “माडौठी" में "जगदीशदासजी;" "चटथावल" में भी "लक्ष्मणभक्तजी" भारी संतसेवी थे; "सुनपथ" में "भगवान्भनजी;" सम्पूर्ण ' सलखान" नगर को "गोपालभनजी" ने उद्धार किया; "जोबनेर" में "गोपाल जी" की भक्नों में इष्टता का निर्वाह हुआ। श्लो०"आदिस्तु परिचर्यायां सङ्गिरपि वन्दनम् ॥ मद्भक्रपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः ॥१॥ नैवेद्यं पुरतो मह्यं चक्षुषा गृह्यते मया ॥ रसंवैष्णव जिह्वाग्रे गृह्णामि कमलोद्भव ॥ २॥" १ श्रीगामरी (गांवरी)दासजी ६ श्रीलक्ष्मणभक्रजी २ श्रीवनियारामजी ७ श्रीभगवान्भनजी ३ श्रीमोहनवारीजी. श्रीगोपालभक्तजी (सल०) ४ श्रीदाऊरामजी १ श्रीगोपालजी जोवनेर के। ५ श्रीजगदीशदासजी (१४०) श्रीगोपालभक्तजी। (५२६) टीका । कवित्त । (३१७) "जोवनेर" वास सो "गोपाल" भक्क-इष्ट ताको कियो निर्वाह, चात मोको लागी प्यारियै । भयो हो विरक्त कोऊ कुल में, प्रसंग सुन्यौ, आयौ यो परीक्षा लैन, द्वार पै विचारियै ॥ आय पस्यौ पाय, "पांय धारौ निज मंदिर में सुंदरि न देखौं मुख, पन कैसे टारियै ?"। " चलौ, जिन टारी तिय रहेंगी किनारो, करि, KAISE m PAॐॐॐRN श्रीभक्तमाल सटीक। ६७२ चले, सब छिपी, नैकु देखी, याके मारियै ॥ ४२०॥ (२०६) वार्तिक तिलक। जयपुरप्रदेश के “ जोबनेर" नामक एक पुर के वासी श्री " गोपाज" जी ने भक्त इष्टता का निर्वाह भत्तीभांति से किया, सो वार्ता सुनकर मुझे अति प्यारी लगी । आपके कुलका कोई जन विरक्त वैष्णव होगया था, वे आपके हरि भक्त को इष्ट मान सेवा करने का प्रसंग कहीं सुन, परीक्षा लेने के लिये द्वार पर आये। श्रीगोपालजी ने देखके चरणों में प्रणाम कर कहा कि “आप अपने घर में पधारिये।" वे बोले कि "मेरा प्रण है कि स्त्री का मुख न देखू, सो उस प्रतिज्ञा को छोड़ तुम्हारे घर के भीतर कैसे जाऊं?" आपने कहा "चलिये, अपनाप्रणमत छोड़िये, स्त्रियां एक ओर रहेंगी, आपके सामने नहीं आवेंगी।" तब वे गृह में गये, आपने स्त्रियों को छिपा दिया, परंतु एक स्त्री थोड़ा झांकने लगी, इन्होंने देखकर श्री. गोपालजी के गाल पर एक तमाचा जड़ही तो दिया । (५२७) टीका । कवित्त । (३१६) एक पै तमाचो दियौ, दूसरे ने रोल कियौ," देवी या कपोल ऐ" यो बानी कही प्यारी है । सुनि, आंसू भरि. आये, जाय लपटाये पाय,कैसे कही जाय यह रीति कल्लुन्यारी है ।। " भन-इष्ट "सुन्यो, मेरे बड़ो अचरज भयो, लई में परीक्षा, भई सिक्षा मोको भारी है। बोल्यौ अकुलाय, "अजू पैयै कहा भाय, ऐपै साधु सुख पाय कहैं, यही मेरी ज्यारी है" ॥ ४२१ ॥ (२०८) वार्षिक तिलक। थप्पड़ के लगते ही एक दूसरे ने तो क्रोध किया, पर श्रीगोपालजी *पक गोपाल जी काशी के निकट बाचुली ग्राम के, और एक गोपालभट्ट श्रीवृन्दावन के श्रीहरिवंशजी के ठाकुर के सेवक, एक गोपाल जी श्रीपयहारीकृष्णदासजी के शिष्यों में, एक गोपालजी काव व्रज के एक गोपालजी हरिव्यासदेव की दूसरी शाखा में भगवानदासजी के शिष्य, एक गोपालजी कवि वालपाड़े के, एक कवि ईटोरा के एक जटाधारी, पनरोड़ाके, एक गोपालजी " वल्लभायान ' के कर्ता, एक कायस्थ सिंहनद के, एक बड़नगर के, और एक गुजरात के ॥ इतने थ्री "गोपाल"जी प्रसिद्ध है ॥ KERAYAN , .

भक्रिसुधास्वाद तिलक।
६७३
हाथ जोड़ सन्त से बोले "हे इष्ट देव ! आपने एक कपोल को
तो कृपाकर तमाचा दिया परन्तु यह दूसरा कपोल आपके कर कमल
के स्पर्श से विहीन अपना अपमान मानेगा, कृपाकर थपेड़ा इस
कपोल को भी दीजिये।" क्षमाशील भकजी ने ऐसी पारी वाणी
कही, सुनते ही उन परीक्षा-कारी सन्त के नेत्रों में आंसू भर आये,
और उठकर चरणों में लपट के बोले कि "यह आपके लोकोत्तर
रीति की केसे प्रसंशा करूं, मैंने सुना कि 'आप हरिभन्नों को इष्टदेव
मानते हैं' सो मुझे बड़ाही आश्चर्य हुआ इसलिये मैंने परीक्षा ली।
उसमें मुझे यह बड़ी भारी शिक्षा हुई कि भगवद्भक्कों को इस प्रकार
मानना चाहिये और उनको ऐसा सहना चाहिये, और निष्ठायुक्त
पुरुषों की परीक्षा न लेनी चाहिये।
सुनते ही श्रीगोपालजी अकुला के वोले "अजी महाराज ! मैं
भाव को कहां पा सकता हूं, परन्तु सन्तजन कृपाकर मुझे अपना
"दास" कहते हैं, यही मेरा जीवन (ज्यारी) है।"
(५२% ) छप्पय । (३१)
परमहंस बंसनि मैं, भयौ विभागी बानरौ ॥
"मुरघरखण्ड निवास भूप सव आज्ञाकारी। रामनाम
विश्वास भक्तपदरज व्रतधारी॥ जगन्नाथ के द्वार दंडौ
तनि प्रभु पै धायौ । दई दास की दादि, * हुंडी करि
फेरि पठायौ ॥ सुरधुनी ओघ संसर्ग ते नाम बदल
कुच्छित नरौ । परमहंस बंसनि मैं, भयौ विभागी
बानरौ ॥ १०७॥ (१०७)
(१४१) श्रीलाखाजी।
वार्तिक तिलक।
श्रीलाखाजी वानर-वंश" में उत्पन्न होकर भी, परमहंस शो
के सुख, सुयश, भजन, तथा सुकृत के भागी (हिस्सेदार) हुए ।
* "दादि"-दाद) =म्याय, दया। यानरौन्धानरबंशी॥

ARX** श्रीभनमाल सटीक। ६७४ "मुरधरखण्ड" (मारवाड़) में आपका निवास था; आपके भजन और सन्त-सेवा के प्रताप से सब राजा आज्ञाकारी थे; महा- मन्त्र श्रीराम नाम में आपको दृढ़ विश्वास था और भगवेद्भकों के पदपंकज-रजके व्रतधारी थे। श्रीजगन्नाथ प्रभुके द्वार पर दर्शन के हेतु साष्टांग दण्डवत् करते हुए अपने गृह से पधारे। श्रीजगन्नाथजी ने अपने दास पर दया कर, जो अवश्य करने योग्य कार्य था उस को करने के लिये हुण्डी करा के फिर घरको भेजा। जैसे 'सुरधुनी ओघ' जो श्रीगंगाजी की धारा उसमें मिलने से कुत्सित मलीन नालाओं का भी नाम रूप पलट कर श्री "गङ्गा" ही का नाम रूप हो जाता है, इसी प्रकार, वानरवंश डोम जाति से भगवत् भागवत में मिलकर आप भी तद्रूप हो गये। दो० "तुलसी नारो जगत को, मिलै संग में गंग। महा नीचपन आदिको, शुद्ध करै सतसंग ॥ १॥" श्लो. यस्माद्यस्मादपिस्थानाद्गायामम्भ आपतत् । सर्व भवति गाङ्गेयं को न सेवेतवुद्धिमान् ॥ १॥" ६ कवित्त १२ का तिलक पृष्ठ ४७ में देखिये । भूलसे १०७ वें छप्पय को १११ वां छपगया है और "४२२३ कवित्त में" के स्थान पर “४२६ में" छपगया है ।। (५२६) टीका । कवित्त । (३१४) "लाखा" नाम भक्क, वाकौ "वानरौ" वखान कियो, कहै.जग डोम * जासों मेरौ सिरमौर है । करै साधुसेवा बहु पाक डारि मेवा, संत जेंवत अनंत सुख पावै कौर कौर है । ऐसे में अकाल * "कहै जगडोम" । पश्चिम वृन्दावन मारवाड़ आदि देशों की चोली यानी को न जाननेवाले "डोम" जाति से इस प्रान्तका डोम सूप बेचनेवाला चसफोड़ वा भँगी (हलाल खोर) जानते हैं, सो उनकी बड़ी भूल है क्योंकि उस देश में "डोम" "भाट," "चारण," हनकी जाति और वृत्ति एक समान “कथक" की सी होती है सोई डोम लाखाजी थे (इधर के डोम नहीं ), डोमही को 'वानरवंशी" भी करते है। इसी से मुंशी तुलसीराम, श्रीतपस्वीरामजी, भन्न कल्पद्रुमका और ज्वालाप्रसादजी ने लाखा- जी को श्रीहनुमानशी लिखा है । यहुन महारमा श्रीमाभास्मामी को भी इसी जाति में जम्म कहते है। विदित हो कि उधर का 'डोमवंश' इधर का 'डोम' नहीं। SecoctactactOSEHOcticlicitect , -- RSS भकिसुधास्वाद तिलक । ६७५ पस्यौ, आवै धरि माल जाल, कैसे प्रतिपाल करें, ताकी और ठौर है। प्रभुजू स्वपन दियो “कियौ मैं जतन एक गाड़ी भरि गेहूं भौंसि आवै करौ गौर *है ॥ ४२२ ॥ (२०७) वार्त्तिक तिलक। श्रीनाभास्वामीजी ने जिसको "वानर" कहके वर्णन किया, उन भवजी का “लाखा" नाम था, जगके लोग आपको “डोम" "हनुमान्वंशी" कहतेथे । श्रीप्रियादासजी कहते हैं कि भनिभूषित होने से मेरे तो सिरमौर हैं। आप बड़ी प्रीति से साधु-सेवा करते थे अनेक मेवे डाल के पकवान मिठाई बनवाकर भोजन कराते थे; जिन पदार्थों को पाने में ग्रास ग्रास में संतों को अनंत सुग्व होताथा ।। ऐसी सेवा करते समय में बड़ा अकाल पड़ गया, तब तो बहुत से लोग तिलक माला वैष्णव वेप धर आपके यहां आने लगे । अब सबोंका कैसे प्रतिपल करसक, विचार किया कि "इस घर को छोड़ कहीं चले जावें।" उसी रात्री में श्रीभक्तवत्सल रामजी ने स्वप्न दिया कि "तुम कहीं जाओ मत; हमने एक यत्न किया है, एक गाड़ीभर गेहूँ और एक दूध देती भैसि तुम्हारे यहां आवैगी, उसी से संतों की तथा और जीवों की सेवा सहायता करो।" (५३० ) टीका। कवित्त । ( ३१३ ) "गेहूं कोठी डारि गुंह भूदि नीचे देवो खोलि, निकसै अतोल पीसि रोटी ले बनाइयै । दूध जितौ होय सो जमायकै विलोय लीजै, दीजै यो चुपरि संग छांछि दै जिंवाइय” ॥ ग्वलिगई आंखें, भाखें तिया सों जु आज्ञा दई, भई मन भाई, अजू हरि गुनगाइथे । भोर भयें गाड़ी भैसि आई, वही रीति करी, करी साधुसेवा नाना भांतिन रिझाइथे ॥ ४२३ ॥ (२०६) यात्र्तिक तिलक। "उस गेहूंको कोठी में भर उसका मुंह मूंददेना नीचे से छेद कर निकालना, उसमें अप्रमाण गेहूं निकलेगा, उसको पीस पीस कर *"गौर" गौर विचार॥ RECENT * , BRARY REARRIER श्रीभक्रमाल सटीक। ६७८ . प्रथम ही संकल्प कर चुका हूं कि "साष्टांगही से जाकर प्रभु के दर्शन करूंगा," उस प्रतिज्ञा को मैं पालन किया चाहता हूँ, आप लोगभी मुझे यही वरदान दीजिये कि इसीप्रकार जाकर दर्शन करूं।" पंडों ने उत्तर दिया कि प्रभु की आज्ञा है, चढ़िये, और यह भी आज्ञा हुई है कि " जो सुमिरनी बनाकर लाये हैं, सो हमको बहुत प्रिय शीघ्र आकर पहिरावें ॥" ऐसा वचन सुन श्रीलाखाजी ने निश्चय प्रभुकी आज्ञा जानी, क्योंकि सुमिरनी की बात पते की थी। प्रभु का अनुशासन मान चढ़के चले; और भवजी यह कहने लगे कि “ मैंने जान लिया कि मुझसे लघु जीव को सर्कार अपने आश्रितों में चढ़वढ़ के किया चाहते हैं; आप प्रेम की पोथी पढ़पढ़ मेरे ऊपर कृपा विस्तार किया चाहते हैं।" भक्तजी ने, जा प्रणाम कर नेत्रों से दर्शन पाय, प्रभु के ऊपर तन मन प्राण सब न्यवछावर कर दिये श्राप श्रीजगन्नाथजी को अत्यंत प्यारे थे इससे प्रभु अपने निकट से पृथक् नहीं होने देते थे। (५३४) दीका ! कवित्त । ( ३०४) बेटी एक क्वाँरी व्याहि देत न विचारी मन धन हरि साधुनि को, कैसे के लगाइयै । "कीजै वाको काज” कही जगन्नाथ देवजू ने “लीजे मोपे द्रव्य" उर नेकहूं न आइयै ॥ विदा पैन भए चले ग भरि लये, गये भागे नृप भक्न मग चौकी अटकाइयै। दिया है.सुपन प्रभु जिनि हठ करौ अजू हुंडी लिख दई लई विनै के जताइयै ।। ४२७ ।। (२०२) बार्तिक तिलक श्रीलाखाभक्तजी की एक बेटी घर में कुँवारी (कुमारी) थी, इस विचार से उसका विवाह नहीं करते थे कि "मेरे पास जो धन है, सो श्रीहरि और संतों का है, इसमें से उसमें कैसे लगाऊं?" श्रीजगन्नाथजी ने स्वयं आज्ञादी कि"हमसे द्रव्य लेकर उसका विवाह अवश्य कर दो।” परन्तु आपके मनमें यह बात नहीं आई। कुछ दिन रहकर फिर गृह को चले, किन्तु द्रव्य लेने के भय से प्रभु के समीप विदा होने नहीं गये । प्रभु के वियोग से नेत्रों में जल RecchokkateCRENCE SteeCale । A भक्रितुधास्वाद तिलक। ६७६ भर, चले आये । श्रीजगन्नाथजी ने एक भक्त राजा को स्वप्न दिया उसने मार्ग में चौकी बैठा दी जब आये तब लोग राजा के पास ले गये राजा ने सत्कार कर विनय प्रार्थना की कि मुझे स्वप्न में प्रभु ने आज्ञा दी है सो आप हठ मत कीजिये कन्या के विवाह के लिये द्रव्य लीजिये तव आपने लिया, राजा ने हुंडी लिखा दी। (५५) टीका | कवित्त । (१०८) हुंडी सो हजार की, यो लैकै गृहद्वार आये, तामैं तें लगायौ सौक बेटी व्याह किया है । और सब संतनि वुलाय के खवाय दिये, लिये पग दास सुखरासि पन लियौ है ॥ ऐसें ही बहुत दाम वाही के निमत्त लेले संत भुगताये अति हरषित हियौ है । चरित अपार कछु मति अनुसार क्यों लह्यौ जिन स्वाद सो तो पाय निधि जियो है ॥ ४२७ ॥ (२०१) वार्तिक तिलक । दशसौ (एक सहस्र ) रुपये की हुंडी लेकर गृह में आ, इन्होंने केवल एकलौ रुपये लगाके तो अपनी कन्या का विवाह कर दिया, और शेष सब द्रव्य संतोंको बुलाकर दिव्य पदार्थ भोजन करादिये, सब संतों के चरण ग्रहण कर सुखी हुए । इसी प्रकार प्रथम भी कन्या के विवाह के निमित्त भक्त लोगोंने बहुत द्रव्य दिये थे; परंतु वह सब भी साधुओं को खिलाकर आप आनंदित हुए थे। 'श्रीलाखाभक्तजी के ऐसे ऐसे अपार चरित्र हैं; मैंने अपनी मतिके अनुसार कुछ वर्णन किये, जिन्होंने साधुचरित्र के रसका स्वाद पाया, वे भक्त यह श्रीलाखाजी की कथा सुन मानों निधि पाके जिये हैं। (५३६) छप्पय । (३०७) जगत बिदित "नरसी” भगत, (जिन) “गुजर" धर पावन करी ॥ महास्मारत लोग भक्ति लौलेस न जानें । माला मुद्रा देखि तासु की निन्दा ठानें । ऐसे *"मुद्रा"-छाप भगवत् श्रायुध के ॥ GESSACRECRUSHMA RECTOR SHRESTATISFASHASHTRIES ६७८ श्रीभक्तमाल सटीक । प्रथम ही संकल्प कर चुका हूं कि “साष्टांग ही से जाकर प्रभु के दर्शन करूंगा," उस प्रतिज्ञा को मैं पालन किया चाहता हूँ, आप लोगभी मुझे यही वरदान दीजिये कि इसीप्रकार जाकर दर्शन करूं।" पंडों ने उत्तर दिया कि प्रभु की आज्ञा है, चढ़िये, और यह भी आज्ञा है कि ' जो सुमिरनी बनाकर लाये हैं, सो हमको बहुत प्रिय है, शीघ्र आकर पहिरावें ॥" ऐसा वचन सुन श्रीलाखाजी ने निश्चय प्रभुकी आज्ञा जानी, क्योंकि सुमिरनी की वात पते की थी। प्रभु का अनुशासन मान चढ़के चले; और भनजो यह कहने लगे कि “ मैंने जान लिया कि मुझसे लघु जीव को सर्कार अपने आश्रितों में चढ़चढ़ के किया चाहते हैं; आप प्रेम की पोथी पढ़पढ़ मेरे ऊपर कृपा विस्तार किया चाहते हैं।" भरजी ने, जा प्रणाम कर नेत्रों से दर्शन पाय, प्रभु के ऊपर तन मन प्राण सब न्यवछावर कर दिये श्राप श्रीजगन्नाथजी को अत्यंत प्यारे थे इससे प्रभु अपने निकट से पृथक् नहीं होने देते थे। (५३४) दीका | कवित्त । (३०९) बेटी एक क्वाँरी व्याहि देत न विचारी मन धने हरि साधुनि को, कैसे कै लगाइयै । "कीजै वाकौ काज" कही जगन्नाथ देवजू ने "लीजै मोपे द्रव्य" उर नेकहूं न आइयै ॥ विदा पै न भए चले दृग भरि लये, गये आगे नृप भन मग चौकी अटकाइयै । दियौ है सुपन प्रभु जिनि हठ करौ अजू हुंडी लिख दई लई विनै के जनाइयै॥ ४२७ ॥ (२०२) कार्तिक तिलक । श्रीलाखाभक्तजी की एक बेटी घर में कुंवारी (कुमारी) थी, इस विचार से उसका विवाह नहीं करते थे कि "मेरे पास जो धन है, सो श्रीहरि और संतों का है, इसमें से उसमें कैसे लगाऊं?॥" श्रीजगन्नाथजी ने स्वयं आज्ञादीकि"हमसे द्रव्य लेकर उसका विवाह अवश्य करदो।" परन्तु आपके मन में यह बात नहीं आई कुछ दिन रहकर फिर गृह को चले, किन्तु द्रव्य लेने के भय से प्रभु के समीप विदा होने नहीं गये । प्रभु के वियोग से नेत्रों में जल MORE . RAINE भक्तिधास्वाद तिलक। ६७६ भर, चले आये। श्रीजगन्नाथजी ने एक भक्त राजा को स्वप्न दिया उसने मार्ग में चौकी बैठादी; जब आये तब लोग राजा के पास ले गये राजा ने सत्कार कर विनय प्रार्थना की कि मुझे स्वप्न में प्रभु ने आज्ञा दी है सो आप हठ मत कीजिये कन्या के विवाह के लिये द्रव्य लीजिये तब आपने लिया, राजा ने हुंडी लिखा दी। (५५) टीका | कवित्त । (६०८) हुंडी सो हजार की, यों लैकै गृहद्वार आये, तामैं तें लगायौ सौक बेटी व्याह किया है । और सब संतनि वुलाय कै खवाय दिये, लिये पग दास सुखरासि पन लियौ है ॥ ऐसें ही वहुत दाम वाही के निमत्त लैलै संत भुगताये अति हरपित हियौ है । चरित अपार कछु मति अनुसार क्यों लह्यो जिन स्वाद सो तो पाय निधि जियो है ॥ ४२७ ॥ (२०१) वार्तिक तिलक। दशसौ (एक सहस्र) रुपये की हुंडी लेकर गृह में आ, इन्होंने केवल एकसौ रुपये लगाके तो अपनी कन्या का विवाह कर दिया, और शेष सब द्रव्य संतोंको बुलाकर दिव्य पदार्थ भोजन करादिये, सव संतों के चरण ग्रहण कर सुखी हुए। ' इसी प्रकार प्रथम भी कन्या के विवाह के निमित्त भक्त लोगोंने बहुत द्रव्य दिये-थे; परंतु, वह सब भी साधुओं को खिलाकर आप आनंदित हुए थे। '... 'श्रीलाखाभलजी के ऐसे ऐसे अपार चरित्र हैं; मैंने अपनी मतिके अनुसार कुछ वर्णन किये; जिन्होंने साधुचरित्र के रसका स्वाद पाया, वे भक्त यह श्रीलाखाजी की कथा सुन मानों निधि पाके जिये हैं। (५३६) छप्पय । (१०७) जगत विदित "नरसी" भगत, (जिन) “गुज्जर" धर पावन करी॥ महास्मारत लोग भक्ति लौलेस न जानें । माला मुद्रा देखि तासु की निन्दा ठानें । ऐसे *"मुद्रा" छाप भगवत् श्रायुध के ॥ RECEN SCENCEKACKECTee หน้า श्रीभक्रमाल सटीक। ६८० . कलि अब्द ईसवी सन् कुल उत्पन्न भयौ, भागात सिरोमनि । ऊसर तें सर कियौ,खंडदोषहिंखोयोजिनिावहुत ठौर परचौदियौ, रसरीति भक्ति हिरदै धरी । जगत विदित "नरसी" भगत, (जिन) "गुजर"धर पावनकरी॥१०॥(१०६) (१४२) श्रीनरसी मेहताजी। संवत् शाके ४६४४ १५४३ १९६५ ४६६७ ! १६५३ १५६६ १५१८ दो० "हृदय राखि मेहता-चरित, भज श्रीसीताराम । 'तपसी' मिलिहे भक्तिमणि, पूजहिंसव मनकाम ॥" वार्तिक तिलक। जगत् में विख्यात श्रीनरसी भवजी हुए, जिन्होंने गुजरात देश की भूमि को और उस प्रदेश के वासियों को पावन किया; वहां के लोग बड़े ही स्मात, कर्मकाण्ड में आशक्त, और अज्ञानी थे। श्री- हरिभक्ति को लवलेश मात्र भी नहीं जानते; जो किसी को तुलसी की कंठी माला, वैष्णवीय तिलक (ऊर्द्ध पुण्डू), शंख चक्रादि मुद्रा धारण किये देखें, उसकी बड़ी ही निन्दा करते थे। ऐसे कुल में उत्पन्न होकर, आप भागवतशिरोमणि हुए। वह देश असरभूमि के समान भतिजलहीन अशुद्धतायुक्र था, उसं गुर्जरखंड (गुजरात) को भगवद्धर्म जल युक्र प्रेमपंकज विकसित सरोवर समान करके दोषों को जिन्होंने नाश किया और बहुत ठिकाने पर परीक्षा परचौ दिये ( सो टीका में वर्णन होंगे); ऐसे रस रीति भनि हृदय में धारण करनेवाले श्रीनरसी जी हुए। (उनको पुनः पुनः दण्डवत् ) ॥ शृङ्गारमाधुर्यनिष्ठा में आप गोपिकाओं के तुल्य हुए। (५३७) टीका ! कवित्त । (३०६) जूनागढ़" वास, पिता माता तन नास भयो, रहै एक भाई Caskeeckactickection .

स13 HEARTHRITIENTISH भकिसुधास्वाद तिलक। औ भौजाई रिसभरी है.। डोलत फिरत आय, बोलत "पियावौ नीर, भाभी पै न जानी पीर, चोली जरीवरी है ॥ “आवत कमाए, जल प्याये विन सरै कैसे? पियो,” यों जवाब*दियौ देह थरथरी है। निकसे विचारि " कहूं दीजै तन डारि," मानो शिव पै पुकार करी; रहे चित धरी है ॥ ४२६॥ (२००) वार्तिक तिलक । भक्तशिरोमणि श्रीनरसी मेहताजी का गुजरात प्रदेशके "जूनागढ़" में निवास था। आप नागर ब्राह्मण थे; माता पिता दोनों के तन छूट गये; घर में एक शाक्त भाई और क्रोध करनेवाली एक भावज (भौजाई ) थी। एक दिन आप डोलते फिरते किसी ओर से आय और बोले कि “भाभी ! पानी पिला दीजिये।" सुन के उसने प्यास की पीर तो नहीं जानी, पर जरवर के बोली कि "बड़ी कमाई करके तो आते हो! विना जल पिलाये कैसे काम चलेगा ? पी न लो, पीते क्यों नहीं हौ ।" उसका ऐसा उत्तर सुन, अपमान से आपका शरीर कांपने लगा। घर से निकल विचार किया कि “कहीं शरीर को तजदूं।" नगर के बाहर एक शिवालय था उसमें जाके मानों आपने अपना दुःख शिवजी से सुनाया । वह अपमान और शिवमहिमा चित्त में धरेहुए आप वहीं पड़े रहे । दो० "नरसी हो अति सरस हिय, कहा देउँ समतूल । कहेउ सरस शृङ्गाररस, जानि सुखनि को मूल ।। दीनी ताकों रीमिक, माला नन्दकुमार । राखि लियो अपनी शरण, विमुखनि मुख दै छार ॥ जहँ जहँ भक्कन को कछू, संकट परत है आनि । तहँ तहँ प्रापन वीधि ह्व, धरत अभय को पानि ॥" (श्रीध्रुवदासजी) (५८) दीका । कवित्त । (३०५) बीते दिन सात, शिवधामते न जात वार, "परै काहू तुच्छ द्वार, सोई सुधि लेत है "। इतनी विचारि, भूख प्यास दई टारि, लियौ SCRECRecketCALCHAR पुकार के . "जयाव"उत्तर ।

६८२ श्रीभक्तमाल सटीक। "अज- , प्रगट सरूप धारि, भयौ हिये हेत है ।। बोले "घर मांग," मांगिवौ न जानत हो; तुम्हें जोई प्यारौ सोई देवी, चित चेत है। पस्यो सोच भारी, "मेरी प्रान प्यारी नारी, तासों कहत डरत, वेद कहै 'नेति नेति' है" ॥ ४३० ॥ ( १६९) वार्तिक तिलक। आप उस सूने शिवमन्दिर में विना अन्न जल सात दिवस पड़े रहे, मन्दिर के बाहर नहीं गये; श्रीशिवजी ने विचार किया कि "कोई यदि किसी असमर्थ तुच्छ के द्वार पर भी पड़ा रहता है तो वह सुधि लेता है, और मैं तो महेश्वर हूं।" इससे श्रीनरसीजी की भूख प्यास पहिले नाश कर फिर कृपापूर्वक स्वरूप धारण कर प्रगट हो, वोले कि "वर मांग ॥" नरसीजी ने कहा "अजी महाराज ! मैं मांगना नहीं जानता, जो आपको प्यारा हो सो दे दीजिये; वही मुझको अच्छा लगता है।" श्रीशिवजी सोच विचार करने लगे कि जो मेरा प्रियतत्व है सो में अपनी प्राणप्रिया पार्वती से भी कहते डरता हूं, उसको वेद भी "नेति नेति" कहते हैं। ( ५३ ) टीका । कवित्त । (३०४) "दियों में वृकासुर को वर, डर भयो तहां, वैसे डर कोटि कोटि यापै वारि डारे हैं। बालक न होय यह पालक है लोकनि को, मन को विचार कहा दीजै प्रानप्यारे हैं ॥ जो नहीं देत मेरो बोलिवो अचेत होत;" दियौ निज हेत तन आलिन के धारे हैं । ल्याये वृन्दावन रास मण्डल, जटित मनि, प्रिया अनगन पीच, लालजू निहारे हैं ॥ ४३१ ।। (१६८) वार्तिक तिलक । "एक बार मैंने वृकासुर को वर दिया, उसमें मुझे पीछे भारी डर का सामना होगया, पर वैसे डर इसपर कोटिन न्यवछावर हैं; क्योंकि यह चालक नहीं है, वरन लोकों का पालक और निस्तारक है।' मनमें और विचार किया कि "प्रभु (हरि) मुझको प्रिय हैं उन्हीं को दूं, जो नहीं देता तो मेरा वचन वृथा होता है ॥" CREACHESecticistackakuckeko ka RAHARASHTRA * भकिसुधास्वाद तिलक। ६८३ इससे श्रीशंकर ने अपनी इच्छा से श्रीनरसीजी को सखी तन दिया और भाप भी वैसाही स्वरूप बनाकर अति कृपा से श्रीनित्य वृन्दावन रासमंडल का इनको दर्शन कराया, जहां मणिन जटित भूमि में अगणित अनेक प्रियाओं के मध्य लालजी के दर्शन हुए । (५४० ) टीका । कवित्त । (१०३) हीरनि खचित रासमंडल, नचत दोऊ रचित अपार नृत्य गान तान न्यारियै । रूप उजियारी, चंदचांदनी न सम, तारी देत कर. तारी, लालगति लत प्यारिये ॥ ग्रीवा की दुरनि, कर आंगुरी मुरनि, मुखमधुर सुरनि,सुनि श्रवन तपारियै। वजत मृदंग मुँहचंगसंग, अंग अंग उठति तरंग रंग छवि जीकी ज्यारियै ॥ ४३२॥ (१९७) बार्तिक तिलक । सोने से रचित हीराओं से जटित रालमंडल में दोनों प्रियाप्रिय. तम नाच रहे हैं। लोक से न्यारा नाच, और गान हो रहा है। श्री. श्यामाश्याम के रूप की अनूप उजियाली फैली है; चन्द्र और चां. दनी की समता कहां ? लालजी तारी दे २ कर प्यारी २ गति लेते ग्रीवां की ढुरनि, तथा हाथों की उंगलियों की मुरनि देख, मुखका मधुर स्वर सुन, आँखों कानों की ताप नाश हो जाती है; मृदंग वज रहा है, उसी के संग २ मुँहचंग भी बजता है और अंग अंग में जीव की भी जीवनी सी छवि के तरंग उठरहे हैं ॥ . (५४१ ) टीका | कवित्त । (३०२) दई लै मसाल * हाथ, निरखि निहाल भई; लाल डीठि परी को नई यह आई है । शिव सहचरी रंगभरी अटकरी, बात मृदु- मुसकात नैन कोर मैं जताई है ॥ चाहै याहि टारौ यह चाहै प्रान वारौ, तब श्याम ढिग आय कही नीके समुझाई है । " जावो यहै ध्यान करो; करौ सुधि, आऊं जहाँ;" आए निज ठौर, चटपटी सी लगाई है ॥ ४३३ ॥ (१९६) वार्तिक तिलका करुणायतन श्रीशिवजी ने नरसी सखी के हाथ में दीपक दिया; *"मसाल"=Jan-मएल, बड़ादीप ॥ CHECREESeekhe . Ke ******************* ६८४ श्रीभक्तमाल सटीक। . नरसी सखीजी श्रीलालजी को देखकर निहाल होगई; लालजी की भी दृष्टि इनके ऊपर पड़ी, जाना कि यह कोई नवीन सखी आईहै। फिर अनुमान से जाना कि यह रंगभरी शिवजी की सहचरी है। शिवजी ने भी मन्दमुसकाके नैनों की कोर से जनाया कि "इसको अंगीकार कीजिये" अंगीकार कराके शिवजी इसको वहां से टारके लिवा लाना चाहते थे, पर यह प्राण न्यवछावर किया चाहती थीं। तव समीप आकर श्यामसुन्दरजी ने भलीभांति समझाया कि "जाओ यही हमारा ध्यान किया करो, और जहां स्मरण करके बुलावोगे में उसी समय वहीं दर्शन दूंगा।"आज्ञा मान अपने ग्राम में तो आये, परन्तु उस दर्शनके वियोगकी चटपटीसी मनमें लगगई ॥ (५४० ) टीका । कवित्त । (३०१) कीनी ठौर न्यारी, विप्रसुता भई नारी, एक सुत उभै वारी, जग भक्ति विसतारी है । आ बहु संत, सुख देत हैं अनंत, गुन गावत रिझावत औ सेवा विधि धारी है ॥ जिती द्विजजात दुख भयौ अति गात, मान्यौ वडो उतपात, दोष करै न विचारी है। एतौ रूप सागर में नागर मगन महा, सके कहा करि चहूँ ओर गिरिधारी है ॥ ४३४॥(१६५) वार्तिक तिलक। श्रीनरसीजी अपने भाई से न्यारा एक स्थान बना कर रहने लगे। हरिइच्छा से एक ब्राह्मण की कन्या से विवाह हुआ, उस पत्नी से दो कन्या और एक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ जगत्.में आपने हरिभक्ति का बड़ाही विस्तार किया। आपके गृह में बहुत से संत आते थे, उनको अनेक प्रकार से परस्पर सुख दिया लिया करते थे। सदा प्रभु के गुणगान करते रिझाते, और भगवत्-भागवत-सेवा-विधि विधान से किया करते थे। आपका यह आचरण देख, जितने अभक्त ब्राह्मण थे वे बड़ा उत्पात मान दुःखी होकर आपसे बड़ा द्वेप करने लगे क्योंकि वे सब अविचारी तोथे ही। भौरश्रीनरसीजी तो प्रेमपथ में प्रवीण श्रीश्याम- सुन्दरजी के रूपसागर में मग्न रहते थे; दुष्ट लोग क्या कर सकते RECCLECRECREACHECRECAKUR - तीरथ करत साधु ********* भकिसुधास्वाद तिलक। ६८५ हैं ? आपके तो चारों ओर श्रीगिरिधारी रक्षक हैं, आप सर्वत्र श्री- गिरिधारी ही को देखते थे। (५४३) दीका । कवित्त । ( ३००) आये पुर, पूछ "कोऊ हुंडी लिखि देय हमैं ? द्वारिका सिधारिवे" । जे वे रहे दूषि, कही जात ही भगावै भूपि, नरसी विदित साह आगे दाम डारिये ॥ चरण पकरि गिरि जावा जो लिखावौ अहो कहौ बार बार सुनि बिनती न टारिबे । दियौ लै बताय घर; जाय वही रीति करी; भरी अँकवार "मेरे भाग, कहा वारिवे?" ॥ ४३५ ॥ (१६४) वार्तिक तिलक। एक समय तीर्थ करते कई संतजन जूनागढ़ में आकर पूछने लगे कि "हमेको द्वारिका जाना है, कोई वहांको हुंडीकर देनेवाला है ?" यह वात, जो खल आपकी निन्दा और विरोध करनेवाले थे उन्होंने सुनकर कहा कि “यहां बड़े विख्यात सेठ नरसी हैं, उनके पास जाते ही आपकी यह भूख जाती रहेगी; परन्तु इस यत्न से हुंडी करेंगे कि आगे रुपये रख देना और चरण पकड़ के दंडवत् कर वारंवार प्रार्थना करना तब हुंडी लिख देंगे;" और उन खलों ने आपका स्थान भी (जाकर) बता दिया। संतों ने वैसाही किया। श्रीनरसीजी उठकर मिले, और वोले कि मेरे बड़े भाग्य हैं कि आप आये, मैं क्या न्यवछावर करूं ॥"" (५४४) टीका । कवित्त । (२६६ ) सात सै रुपैया गिनि ढेरी करिदई आगे, लागे पग,"देवौलिखि," कही वारवारहै। जानो,बहकाए,प्रभु दाम दै पठाये, लिखी किये मन भाये, "साह सांवल उदार है॥वाही हाथ दीजियै, लै कीजियै निशंक काज;" गये जदुराजधानी पूछयो सो बजार है । इंदि फिरि हारे भूख प्यास मीडडारे,पुरतजि भये न्यारे,दुखसागर अपारहै।४३६॥(१६३) वार्तिक तिलक । संतों ने ७००) (सात सौ ) रुपए आपके आगे रख प्रणाम कर Crice KAKIKRAKASCALSCRE . , - GUR HTRA 13 ॐ श्रीभक्तमाल सटीक। ६८६ वारंवार कहा " हमको हुंडी जिखि दीजिये;" आपने जान लिया कि लोगों ने इनको भरमा के भेजा है। फिर निश्चय किया कि "प्रभु ही ने मेरे लिये यह द्रव्य भेजा है । सो उन्हीं को हुंडी लिख दूं।" प्रभु ही के नाम से लिख दिया और बता दिया कि "हमारे अदतिया बड़े उदार 'सांवलसाहु हैं, उन्हीं के हाथ हुंडी दे कर रुपए लेकर अपना कार्य करना॥" संत हुंडी लेकर द्वारिका आ नगर में 'सांवलियासाहु' की कोठी पूछने लगे । किसी ने नहीं वनाई; भूख प्यास छोड़ बहुत ढुंहा पर नहीं पाया; तब अति दुःखी होकर द्वारिका के बाहर गये । (५४५) टीका। कवित्त । (BE) साहको सरूप करि, आये कांधे थैली धरि," कौन पास हुंडी ? दाम लिजियै गनाय के " घोलि उठे " ढूंढ़ि हारे ! भलेजू निहारे आजु,” कही "लाज हमै देत, मैं हूं पाये आय के ॥ मेरौ है इकौ सौ वास, जानै कोऊ हरिदास, लेवो सुखरासि, करो चीठी दीजै जाय के। धरे हैं रुपैया ढेर, लिख्यो करी बेर बेर," फेरि आय पाती दई; लई गरे लायकै ॥ ४३७ ॥ (१६२) वार्तिक तिलक । तब श्रीकृष्णचन्द्रजी सेठ का रूप कर, कंधे पर थैली धरे, आकर कहने लगे कि “किस के पास नरसीजी की हुंडी है ? अपना दाम गिनाले ! चुकाले !!" सुनकर संत बोले “अजी! हम तुमको कर हारगये, भले आये;" आप बोले कि "मुझको बड़ी लज्जाहुई कि आपको हुंडी के रुपए मिलने में विलम्ब हुआ। मेरा गृह एकान्त में है, कोई कोई हरिजी के दास जानते हैं; अपने रुपये लीजिये और हमारा पत्र भी नरसीजी को देकर कहना कि 'वारंवार हुंडी लिखा करें, बहुत से रुपये यहां रक्खे हैं।" सन्तों ने रुपये ले द्वारिका तीर्थ यात्रा कर, लौट आ, नरसीजी को पत्र दिया। श्रीनरसी मेहताजी अति हर्षित हो पत्र लेकर सन्तों को गले से लगाकर मिले ॥ SHEREHE KAHANI भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६८७ (५४६ ) टीका | कवित्त । (२६७) "देखि आये साह ?" दौरि मिले उत्साह अंग, वेऊ रंग बोरे सन्त, संगको प्रभाव है। हुंडी लिखि दई,दाम लिये सो खवाय दिये, किये प्रभु पूरे काम, संतनि सों भाव है ॥ सुता ससुरारि, भयो छूछक बिचारि, सासु देत बहु गरि, जाको निपट अभाव है। पिता सों पठाई कहि, "छाती लै जराई इनि, जौपे कछु दियो जाय, आबैं" यह दावहै ॥ ४३८ । (१६१) पातिक तिलक । इन संतों से श्रीनरसीजी ने पूछा कि"श्यामल साह को आप देख आये ?” साधुओं ने उत्तर दिया कि "हां।" तब ये संत, और नरसीजी, परस्पर बड़े उत्साह से मिले । संतों को भी अब यह ज्ञात होगया कि, ये हुंडी का व्यापार नहीं करते;श्रीप्रभुही ने हमको रुपये और दर्शन दिये; इससे बड़भागी संत भी प्रेमरंग में डूवगये ॥ जो टुंडी के रुपयेथे सो सबके सब नरसीजीने सन्तोंही को खिला दिये; आपका संतों में भावथा इसलिये प्रभुने सब कामनाएं पूर्णकी। श्रीनरलीजी की बड़ी कन्या के पुत्र हुआ,सो लोक रीति में पिताके यहां से 'छक' ( ननसारी, पीली ) अर्थात् वस्त्र भूषण पकवान आदिक सब जाता है, सो नहीं गया। तब उस कन्या की सासु जो बड़ी कर्कशा थी सो गालियां देने लगी। पुत्री ने आपसे कहला भेजा कि “यहाँ सासु गालियां देकर मेरी छाती जलाता है, जो पिताजी के पास कुछ देने का हो तो अवश्य आकर दें ॥" (५४७) टीका । कवित्त । (२६६) चले गाड़ी ट्रॅटीसी,उभयबूढ़े बैलजोरि, पहुँचे नगरछोर,दिज कहीं जायकै । सुनत ही आई देखि मुंह पियराई, फिरी "दाम नहीं एक तुम कियौ कहा आय कै?' || "चिंता जिनि करौ, जाय सासु ढिग ढरी, लिखि कागद* में धरौ अति उत्तम अघाय के"। कही सम- झाय, सुनि निपट रिसाय उठी, कियौ परिहास, लिख्यो गांव खुनसाय कै॥ ४३६ ॥ (१६०) *कागदEF='कागज़' पक॥

*** श्रीभक्तमाल सटीक। ६१८ यातिक तिलक । एक टूटीसी गाड़ी में दो बूढ़े चैल जोड़ उसीपर चढ़, श्रीनरसी- जी चले; जब उस ग्राम में पहुँचे, एक ब्राह्मण ने पुत्री से कहा कि "तुम्हारे पिता आये हैं।" उसने आकर देखा कि कुछ पदार्थ पासमें नहीं | तब अति उदास मुख कर कहने लगी कि "जो आप कुछ लाये ही नहीं तो पाकर किया ही क्या ?" आपने उत्तर दिया कि "चिन्ता मत कर, सासु के निकट जाके कह कि "जो जो पदार्थ चाहै सो सब भले प्रकार एक कागद में लिख दें।" कन्या ने सासु से समझाकर ऐसा ही कहा । वह बहुत रिसाकर कहने लगी कि मुझ से हँसी की है।" फिर ग्रामभर के सब लोगों के नाम लिखवा दिये कि "इन सबको वस्त्र भूपण चाहिये॥" (५४८) टीका । कवित्त । (३५) कागद लै आई देखि दूसरे फिराई पुनि भूलै पे न पाई जात 'पाथर' लिखाये हैं। रहिये कों दई ठौर, फूटी ढही पौरि जाके बैठे सिरमौर आय बहु सुख पाये हैं ॥ जल दै पठायो भलीभांति के ओटायो, भई बरपा, सिरायौ, यों समोयकै अन्हाये हैं कोठरी सवारि, आगे परदा सो दियौ डारि, लै बजाई तार चेस अगनित आये हैं ॥ ४४०॥ (१८६) वार्तिक तिलक । पुत्री वह पत्र (सूची) लेकर आई; आपने देखकर कहा कि "फिर जा, किसी के लिये कोई वस्तु भूलगई हो, सो भी लिखवा ला, पीछे नहीं मिलेगी।" पुत्रीने फिर जाकर कहा; सासु बोली "मय क्या लिखाऊं? 'दो पत्थर' और लिखदे॥" श्रीनरसीजी के रहने के लिये किसीका एक फूटा टूटा पर था वही बता दिया गया था। श्रीभनसिरमौरजी उसी में जाकर विराजे, बड़े प्रसन्न हुए, पुत्री की सासु क्रोध से तपी तो थी ही, इससे जल वहुतही औटाकर भेजा, उसीक्षण वर्षाहुई, जल पड़ने से वह जल भी यथार्थ होगया। आपने स्नान किया । उस गृह में एक कोठरी थी उसको झार वहार कर द्वार में एक वस्त्र पर्दा डाल दिया, और वह REACTICAREECCHACHEARCH R भक्रिसुधास्वाद तिलक । ६८६ सूचीपत्र भीतर रख, तानपूरा ले, प्रभुको स्मरण कर आप वजा वजा- कर गानेलगे॥ जितने पदार्थ उ में लिखे थे सो सब उस कोठरी में प्रभुकृपासे पूर्ण होगये॥ (५४६ ) टीका | कवित्त । (६४) गांव पहिरायो, छवि छायौ, जस गायौ,अहो हाटक रजत, उ. पाथर हू आये हैं । रहि गई एक भूलें लिखत अनेक जहां, "लेही ताहीपास जाप सवमिलि पाये हैं" | विनती करत चेटी "दीजिये जू लाज रहै," दियौ मँगवाय, हरि फेरिक वुलाय हैं। अंग न समात सुना तात को निरखि रंग संग चली आई पति आदि विसराये हैं। ४४१ ।। (१८८) वार्तिक तिलक। श्रीनरसीजी ने सोने रूपे के आभूषण और सुन्दर वस्त्र सम्पूर्ण ग्राम के लोगों को पहिनाया; सब छवि से छागये; आपका आश्चर्य यश गाने लगे। और दो पत्थर भी सोने रूपे के*दिये। लिखने में उस ग्राम की एक स्त्री भूल गई थी वह आकर कहने लगीकि"जिस से सबको मिला है उसीके हाथों से मैं भी लूंगी।" कन्या ने आप से प्रार्थना की।कि "इसकोभी मँगवादीजिये जिसमें मेरी लाज रहै।" आपने फिर प्रभु को स्मरण कर वस्त्र भूषण मँगाकर. उसको भी दिये॥ श्रीनरसीजी की कन्या अपने पिता का यह प्रभाव प्रेम रंग उमंग देख अकथनीय आनन्दित हुई। पति आदिकों को विसराकर, आपके साथही साथ जूनागढ़ चली आई। (५५० ) टीका। कवित्त । (२६३) सुता हुती दोय, भोय भक्ति, रहीं घरही में, एक पति त्यागि, एक पतिहू न किया है । पुर मैं फिरत उभै गाइन सुचाइन सों, धन सों न भेंट, काहू नाम कहि दियौ है ॥ आई लगीं गाय कों, कही * कोई कहते है कि सोने की ईट तथा चांदी की ईट भी दी। Ke CREAKKACANCHORSCRECRUGRAA This is a HARE*** . ६६० श्रीभक्तमाल सटीक। समझाय, "अहो पायवे को नाही कळू पावै; दुख हियों हैं। चाही हरि भक्ति, तो मुंडाय के लड़ाय लीजै, कीजै चार दूर" रहीं, प्रेम रस पियो है ॥ ४४२ ॥ (१८७) वार्तिक तिलक । श्रीनरसीजी की दो कन्याएँ थीं; एक का नाम "कुँवर सेना" दूसरी का "रतन सेना," सो हरिभक्ति में लवलीन होकर घर ही में रहगई, बड़ी अपने पति को तज के और छोटीने तो अपना विवाह ही नहीं किया। जूनागढ़ में कोई सामान्य जाति की दो गानेवाली स्त्रियां आई, उन्होंने बहुत ठिकाने उत्साह से गान किया, परंतु एक पैसा भी नहीं मिला ! किसी ने कह दियाकि"नरसीजी के यहांजाकर गाओ;" वे आकर गाने लगीं। आपने उनको समझाकर कहा कि "यहां कुछ मिलेगा नहीं, पीछे तुम्हारा हृदय दुखी होगा;" उन्होंने नहीं माना; तब आपने कहा कि "यहां धन नहीं मिलेगा, श्रीहरिभक्ति चाही तो वालों को मुड़ाकर विरक होकर आओ, प्रेम से गाकर प्रभु को लाड़ लड़ाओ।" उन दोनों ने ऐसा ही किया । आपके यहां रहीं और प्रेमरस पान करने लगीं ॥ (५५१) टीका | कवित्त । ( २६२) मिली उभै सुता,रंग झिली संग गायन वै, चायनि सो नृत्य करें, भायनि बताय के । “सालंग" है नाम मामा मंडलीक मंत्री रहै कहै "विपरीत बड़ी" राजा सो सुनाय के ॥ बड़े बड़े दंडी और पंडित समाज कियौ, करौ वाकी भंडी, देश दीजिए छुटाय के। आये चार चोबदार*चलौ जू विचार कीजै भयो दरवार हमें दिये हैं पठाय कै" ॥४४३॥ (१८६) वार्तिक तिलक । .. अब तो श्रीनरसीजी की प्रेमवती दोनों कन्याएं और साथ साथ *चायवार Diya - दण्डधारीभृत्य ॥ ASCIESCREES RIGER secredicractor ISISTORE भक्तिसुधास्वाद तिलक । ६६१ वे दोनों रंगभरी गानवती ये चारों मिलके प्रभुके आगेगानपूर्वक वाजे वजा वजा भाव वता बताकर नाचा करती थीं। यह सब देख "सालंग” नाम ब्राह्मण जो श्रीनरसीजो का मामा और जूनागढ़मंडल के राजा का प्रधान मंत्रीथा, उसने राव (राजा) को सुनाकर कहा कि "नरसी बड़ा विपरीत आचरण कर रहा है" सो, राजा की अनुमति लेकर बड़े बड़े दंडी और पंडितों का समाज इकट्ठा कर उसने कहा कि "आप सब उसको शास्त्ररीति से परास्त कर कुमार्गी ठहराइये, तब हम देश से निकाल देंगे।" यह कहकर चार चपरासी भेजे कि “जाकर नरसी को बुला लाओ" ॥ 'आकर उन्होंने आपसे कहा कि "चलो, राजसभा में पंडितों का समाज बैठा है, सो वहां वाद और विचार के निमित्त तुमको सालंगजी ने बुलाया है, हमें इसी लिये भेजा ॥" (५५२) टीका । कवित्त । (२६१) "चारों तुम जावो टरि, भयौ हमै राजा डर; "सकै कहा करि? अजू चलें संग संगहीं" । नाचत वजावत ये चली ढिग गावत सुभावत मगन जानी भीजि गई रंगहीं ॥ आये वाही भांति, सभा प्रभा हत भई; तऊ बोले कहा रीति यह जुवती प्रसंग हीं ?"। कही "भक्ति गंध दूरि, पढ़े पोथी, परी धूरि, श्रीशुक सराही तिया माथुरनि भंगहीं" ॥ ४४४॥ (१८५) वार्त्तिक तिलक । श्रीनरसीजी ने सुनकर दोनों गानेवालियों तथा अपनी सुताओं से कहा कि " तुम चारौ कहीं टल जावो, मुझको राजा का भय है।" उन्हों ने उत्तर दिया कि "राजा क्या करसकता है ? हम चारों की चारों आपके साथ ही सभा में चलेंगी," और गाते वजाते नाचते, प्रेमरंग में भीगी, भाव में मग्न चलीं; उसी प्रकार चारों प्रेमवतियों को साथ लिये श्रीनरसीजीसभा में आये । आपकी भक्रि तेज देख वह सभा प्रभाहत होगई संवके मुख उतर गए । तथापि पूछा कि यह कौन रीति है और किसग्रंथ में लिखी है कि GRE COGESE - ६६२ श्रीभक्तमाल सटीका अपने साथ में निरंतर स्त्रियों को रखते हो? श्रीनरमी जी ने उत्तर दिया कि "आप सबको भगवद्भक्रि का गंध मात्र भी नहीं प्राप्त हुआ! इससे आपकी इस कोरी पंडिताई पर धूल पड़गई ! स्त्री हो या पुरुष हो, जिसमें भगवद्भक्ति हो उसीका साथ करना चाहिये; देखिये, श्रीमद्भागवत में परमहंस श्रीशुकदेवजी ने मथुरावासी ब्राह्मणों की स्त्रियों की कैसी श्लाघा प्रशंसा की है; और उन ब्राह्मणों ने स्वयं अपनी भनिवतीस्त्रियों की प्रशंसा कर अपने को धिक्कार दिया है।" (५५३) टीका | कवित्त । (२६०) बोलिउठ्यो विप्र एक "ठूछक प्रसंग देख्यौ;" कयौ रसरंग भस्यौ ढस्यौ नृप पाय में। कही "जू विराजौ, गाजी, नित सुख साजो जाय, किये हरि राय घस, भीजे रही भाय में"॥ धारौ उर और सिरमौर प्रभु मंदिर में सुन्दर केदारौ राग गावे भरे चाय मैं। स्याम कंठ माल टूटि आवत रसाल हियें, देखि दुख पावै परे विमुख सुभाय में ॥ ४४५ ॥ (१८४) वार्तिक तिलक। श्रीनरसीजी का भक्ति प्रभाव युक्त उत्तर सुन, प्रतिपक्षी लोग परास्त हुए; तब एक हरिभक्त ब्राह्मण देव ने राजा से श्रीनरसीजी के छूछक के प्रसंग का प्रभाव कह सुनाया कि "महाराज ! मैंने अपने नेत्रों से देखा है कि आपने एक कोठरी में पट डालकर प्रभु का यश गान किया सो अनेक प्रकार के अमूल्य भपण वसन निकले, ग्रामभर को पहिनाया" सनकर राजा श्रीन- रसीजी के चरणों में प्रणाम कर बोला “आप जाके सुखपूर्वक विरा- जिये, श्रीभगवन्नाम यश सदा गान कर आनन्द से गरजिये, क्योंकि आपने श्रीहरि को वश करलिया; सो उनके भाव प्रेम में मग्न रहिये।” सुनकर श्रीनरसीजी आनन्द से अपने घर चले आये। इसके अनंतर एक वार्ता और सुनकर हृदय में धारण कीजिये। भक्नसिरमौर श्रीनरसीजी प्रभु के मन्दिर में सुन्दर प्रेम उत्ताह में SEKSEKACCHECCC मैं पुहायौ ॐॐॐ भक्निसुधास्वाद तिलक। भरे "केदारा" राग में प्रभु का गुनगान किया करते थे, तब श्रीश्याम- सुन्दर के कंठ से फूलों की रसाल माला टूटकर आपको प्रसादी मिलती थी। यह चरित्र देख उस कठिन देश में बहुत लोग हरिभक्त होगए; पर जो विमुख स्वभाव के वश पड़े थेवे सहज हीदुखी हुए। (५५४ ) टीका | कवित्त । (28) नृपति सिखायौ जाय, "वृथा जस छायौ, काचे सूत हार, टूटै ख्यात करी है।" माता हरिभक्न भूप कही "जिनि करी कान," तऊ वानि राजस की माया मति हरी है ॥ गयौ ढिग मन्दिर के सुंदर मँगाय पाट तागौ वटवाय करि माला गुहि धरी है । प्रभु पहिराय कह्यौ "गाय अब जानि परै" भरै सुर, राग और गायौ पै न परी है ॥ ४४६ ॥ (१८३) कार्तिक तिलक । दुखी हो, जाकर दुष्टों ने राजा को सिखाया कि "देखिये इसका वृथा ही यश छागया है, कच्चे सूत से माला पुहा के प्रभुको पहिना कर गाने लगता है, फूलों का भार पाके कच्चा सूत टूट पड़ता है; परन्तु विख्यात कर दिया कि माला टूट के मुझे प्रसादी मिलती है।" राजा की माताजी श्रीहरि भक्ति-युक थीं, उन्होंने राजासे कहा कि “इन विमुखों की बात तुम मत सुना करो ॥" तथापि, रजोगुणी प्रकृति तो थी ही, मायानेमति हर ली; इससे राजा श्रीनरसीजी के मन्दिर में गया और सुन्दर रेशम मँगाय कई परत वटाके माला गुँथवाकर प्रभु को पहिरा कर कहा “अब गाइये, जो माला टूट पड़े ता मुझे निश्चय होवे।" श्रीनरसीजी ने और और रागों से (केदारा राग के अतिरिक्त क्यों कि इस राग को गिरौं रक्खा था) स्वर भरके गान किया परंतु माला नहीं गिरी। (५५) टीका । कवित्त । (२८८ ) विमुख प्रसन्न भये; तब तो उराहने दै नये नये चोज हरि सन- मुख भाखिये । “जाने ग्वाल वाल एक माल गहि रहे हिये, जिये लाग्यौ यही रूप, कहौ लाख लाखिये ॥ नारायण बड़े महा, अहा KactACKAGExcc . , - न ६६४ HERE श्रीभक्त्रसाल सटीक। , मेरे भाग लिख्यो, करै कौन दूरि छवि पूर अभिलाखिये । म्हारो कहा जाय आय परसे कलंक तुम्है, राखिये निसंक हार, भक्त मारि नाखिये ॥४४७॥ (१८२) वातिर तिलक। माला का न टूटना देख दुष्ट विमुख लोग बड़े ही प्रसन्न हुए, तव श्रीनरसीजी प्रभु के सन्मुख नये नये चीजों से उलाहना देकर कहने लगे, कि "मैंने ग्वाल के बालक का स्वभाव जानलिया, ऐसे कंजूस हो कि पैसे की माला हृदय में गहरहे हो, दी नहीं जाती; मैं क्या करूं, मेरे जी को तो यही रूप प्यारा लगता है, लाखों भांति सम. झाने से नहीं समझता । देखो ! श्रीलक्ष्मीपति नारायण ऐले महान बड़े हैं कि ब्रह्मांड भर को अनेक पदार्थ देकर पालन करते हैं और अपने भक्तों की इच्छा पूरी करते हैं; परंतु मेरे भाग में तो 'गोपाल' ही लिखे हैं उसको कौन अन्यथा कर सकता है ? इसी से में इन्हीं की पूर्ण छवि की अभिलापा करता हूं। यह दशा है कि एक माला अपने उरसे अलग नहीं करते हो*हे प्रभो ! इस कृपणता में मेरा क्या जायगा तुम्ही को कलंक लगेगा; लो अब हार को निशंक अपने कंठ में रक्खे रहना; मुझ भक्क को मारडालो।" (५५६ ) टीका । कवित्त । (२) रहें तहां साह, किये उभे ले विवाह जाने तिया एक भक्त कहै "हरिकों दिखाइयै"। नरसी कहीही "भलै," सोई प्रभु बानीलई, सांच करि दई, गए राग छुटवाइयै ॥ वोले, पट खोलि दिये, किये दरसन तान ताने पट सोवै वह कही "देवो भाइयै"। लिये दाम, काम कियो, कागद गहाय दियौ, दियौ का खाइवे कों, पायौँ लै भिजाइये ॥ ४४८ ॥ (१८१) वार्तिक तिलक। वहां एक सेठाथा उसने दो विवाह किये थे, उसकी एक नीबड़ी प्रभु ने माला क्यों न दिया कि नरसीजी न करारा राग नहीं गया और कदारा राम क्यों नहीं गाया कि वह बन्धक ( गिरों)रक्सा था। skCCUSE RECE . x- N ANSWARA १ ห% भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६६५ भक्का थी;सो उसने श्रीनरसीजी से कई बार प्रार्थना की थी कि "मुझे श्रीहरि के दर्शन करा दीजे;" आपने कहा भी था कि "बहुत अच्छा" सो प्रभु ने अपने भक्त की वाणी सत्य करने तथा केदारी रागछुड़ाने के लिये नरसीजी के रूप से जाकर पुकारा । स्त्री बड़भागी ने केवाड़ खोल दर्शन पाए, प्रणाम किया और उसका अभागी पति ( साहु) मुँह पर वस्त्र ओढ़े सोता रहा, उसने दर्शन नहीं किये, अपनी स्त्री से कह दिया कि "रुपए लेकर कागद (लिखत) दे दो” उसने द्रव्य लेकर रागवाली लिखत फेर दी और प्रेमसे कुछ मेवे मिठाई खिला विनय भी किया। चौपाई। "यह जानव सत्संग प्रभाऊ । लोकहु वेद न आन उपाऊ॥" प्रभुने कृपाकर उसको प्रेम से भिगा दिया ॥ कृपा की जय ॥ घर आने पर भी अभागों को भगवत् भागवत के दर्शन यों नहीं होते॥ दो० ॥ "तुलसी या संसार में, सब से मिलिये धाय । क्या जानें कोई रूप महँ, नारायण मिलि जायँ" ॥१॥ (५५७) टीका । कवित्त । (२८६) गहने धस्यो हो राग केदारो, सो साह घर, धरि रूप नरसी को, जाय कै छुटायौ है । कागद लै डास्यो गोद, मोद भरि गायउठे, आय भन्न झन्न स्याम हार पहिरायो है ॥ भयो "जै जै कार," नृप पाय लपटाय गयो, गह्यो हिये भाव सो प्रभाव दरसायो है । विमुख खिसाने भये, गये उठि, नये नाहि, चिन हरिकृपा भनिपंय जात पायौ है ॥ ४४६ ॥ (१८०) बार्तिक तिलक। श्रीनरसीजी ने संतसेवा के लिये कुछ द्रव्य लेकर केदारा राग सेठ के यहां गिरों रख दिया था। सो यो श्रीनरसीजी का रूप धारण कर रुपए दे, राग छुड़ा, गिरवीवाला पत्र फेर लाकर, प्रभु ने श्रीनरसीजी के गोद में डाल दिया; तत्र नाप जान गये कि कृपासिन्धु CHECRECRKARTERececreatextKkKER* *** se ***** ६६६ श्रीभक्रमाल सटीक। प्रभु छुड़ा लाये । इससे आनन्द युक्त केदारा राग गाने लगे ॥ और दिन तो माला ही टूट पड़ती थी, उस दिन कृपालु प्रभु की मूर्ति ने स्वयं चल के झन्न झन्न नूपुर बजाते आकर श्रीनरसीजी को अपने करकंज से ही माला पहिना दी । देखकर सब भक्तों ने "जय जय, धन्य धन्य" किया; राजा श्रीनरसीजी के चरणों में लिपट गया। और यह प्रभाव देख हृदय में भक्तिभाव को उसने धारण किया। अभागे दुष्ट विमुख लोग जो थे वे लजित हो, खिसिया के, उठ 'गये; परंतु श्रीनरसीजी को और प्रभुको प्रणाम तक नहीं किया। जान लो, विना प्रभु की कृपा के, भक्तिपथ के सन्मुख कोई कैसे हो सकता है ? चंपाई। "जो पे दुष्ट हृदय सो होई । मोरे सन्मुख आव कि सोई" ॥ रतन सेठ ने श्रीनरसीजी के ठाकुरजी से मानता की कि "यदि मेरे घर पुत्र होवे तो में अनुक सामग्री से आपकी पूजा करूं।" श्रीहरिकृपा से उसी संवत्सर के भीतर उसके लड़का हुआ। सेठानी (लड़के की माता) ने लाख कहा परन्तु कृपण रतन ने बहुत काल तक टाला ही किया पूजा नहीं ही चढ़ाई। लड़के के आत्मा ने अपने शरीर को त्याग दिया। तब तो रतन सेठ बड़ाही विकल हो श्रीनरसीजी के चरणों पर गिरा । उसकी स्त्री को अति दुःखी देख श्रीनरसीजी ने वृत्तान्त पुछा तब दम्पति ने मानता की वार्ता और उसका न पूरा करना कहकर लड़के के मृत्यु की बात कही और दोनों रोने चिल्लाने लगे। श्रीनरसीजी परम दयालु ने (जो सेठानी की भक्ति से प्रसन्न रहा करते थे )प्रभु से बड़ी प्रार्थना की । हरि ने कृपाकर उसके पुत्र को जिला दिया । दम्पति ने बड़े प्रेम तथा धूम से ठाकुरजी की पूजा की। और रतनसेठ भी बड़ा भक्त हो गया। यह घटना संवत् १६५२ की है ॥ श्रीनरसीजी मेहता का यह पद नागरीदास के, संग्रहीत "पदप्रसंगमाला" ग्रन्थ में है। CREAS CAN . " . - RAN भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६६७ (५५८ ) दीका । कवित्त । (८५) करन सगाई आयो, पायो वा भायो नहिं, घर घर फिस्यो, द्विज नरसी वतायौ है । आय, सुख पाय, पूछयो, सुत सो दिखाय दियौ, कियौ लै तिलक मन देखत चुरायौं है । “अजूहम लायक*न; "तुम सब लायक " सायक सो छुट्यो जाय नाम ले सुनायौ है । सुनत ही, माथौ ढोरिक, कहें "ताल कूटा वह, वाल बोरि आये, जावौ फेरि, दुख छायौ है " ॥ ४५०॥ (१७६) वार्तिक तिलक । एक ग्राम से किसी धनी ब्राह्मण की कन्या के विवाह के लिये 'उसका पुरोहित ब्राह्मण जूनागढ़ में आया। बहुत ठिकाने वर देखे परंतु उसको कोई अच्छा न लगा; किसी ने कहा कि “ एक पुत्र नरसीजी के बहुत सुन्दर है ।" सुखपूर्वक आके उस ब्राह्मण ने श्री. नरसीजी से पूछा । आपने पुत्र को दिखा दिया; देखते ही विप्रजी का मन हर गया। और उन्हों ने तत्काल तिलक करही तो दिया । नरसीजी ने कहा कि " कन्या के पिता धनी हैं, मैं उनके योग्य नहीं हूं" पुरोहितजी ने उत्तर दिया कि “आप सब लायक हैं।" तिलक करके वागा के समान वेग से आये, और कन्या के पिता से नाम सुनाया कि “मैं नरसीजी के पुत्र को तिलक चढ़ा आया हूं।" सुनते ही कन्या का पिता दुःखित तथा उदास हो माथा हिलाके और ठोंक के कहने लगा कि “वह तो तालकूटा है; मेरी कन्या को तुमने तो डुवा दिया, मुझको इस बात का बड़ा ही दुःख है; जाओ, तिलक फेर लाओ”। (५५६) टीका । कवित्त । (२८४) " काटिके अंगूठा डारौ, तब सो उचारौ वात, मन में विचारों, कियौ तिलक बनाय के " जाने "सुता भाग ऐसे" रहे सोच पागि सब आवै जब व्याहिबे को धन दै अघाय कै"॥ लगन है लिखि दियो, दियो, द्विज आनि लियो, डारि राख्यौ कहूं, गावे तालए लायक "योग्य । + देखि रोकिफोरि, पाठान्तर , , SH R ६६८ 15 श्रीभनमाल सटीका । वजाय के । रहे दिन चार, पै विचार नहीं नेकु मन, आये कृष्ण रुक्मिनी जू, भूमि मिले धाय के ॥ ४५१ ॥ ( १७८ ) वार्तिक तिलक। ब्राह्मण ने उत्तर दिया कि “मैं जिस अंगूठे से भले प्रकार तिलक कर आया हूं उसको यदि काट डालो तो ऐसी बात कहो, अब वह अन्यथा नहीं हो सकती, मन में विचार तो करो, मैं जाकर क्या कहूंगा ?" ऐसे वचन सुन उसने जाना कि "मेरी कन्या के ऐसेही भाग थे"; फिर सोच युक्त हो आपस में कहने लगे कि “जब विवाह करने आ तब बहुतसा धन दाइज देकर उसको अपने योग्य कर लिया जायगा"। फिर लग्नपत्र भी लिख दिया । ब्राह्मण ने आकर नरसीजी को दिया; आपने उस पत्र को कहीं योंही डाल दिया, और ताल वजा- बजा के श्रीहरिगुण गाने लगे । जव विवाह के चार ही दिन रह गये, और श्रापको उस की कुछ भी चिंता व विचार चरचा तक नहीं, तब श्रीकृष्णचन्द्र और श्रीरुक्मिणीजी कृपा कर रूप धर, आपके घर आये । आप प्रेम से झूम झूम दौड़ कर पग में जा लगे॥ (५६०) टीका । कवित्त । (२-३ ) ठोर ठौर पकवान होत, तिया गान करें, घुरत निसान, कान सुनिये न बात है । चित्र मुख किये ले विचित्र पट्टरानी आय, घोरी रंग चोरी पै चढ़ायो सुत, रात है ॥ करी सो ज्योनार, तामें मानस अपार आये द्विजनि बिचारि पोट बांधी, पै न मात है। मणि मै ही साज वाज गज रथ ऊंट कोर झमक किशोर अाज सजी यों बरात है ॥ ४५२ ॥ (१७७) वार्तिक तिलक। श्रीनरसीजी के गृह में आकर श्रीकृष्ण रुक्मिणीजी ने अपने संकल्प से ही, सव ऐश्वर्य प्रकट किये अनेक ठिकाने पर पकवान मिठाई वनने लगी, बहुत सी स्त्रियां गान करने लगीं, मंगलीक वाजे इतने बजने लगे कि कानों में बात नहीं सुन पड़ती; स्वयं KOREAK , , ॐ भक्रिसुधास्वाद तिलक। ६६६ श्रीपट्टरानीजी ने नरसीजी के पुत्र को मुख आदि अंगों में चित्र विचित्र श्रृंगार कर प्रेम रंग से डूबी हुई घोड़ी पर चढ़ाया, नेग दिये, फिर ज्यौनार हुई, उसमें असंख्य लोग आये,ब्राह्मण लोगों ने बहुत से दिव्य पदार्थ देख देख वड़ी बड़ी गठरियां वांधी; परंतु वे पदार्थ घटनेवाले तो थे ही नहीं । मणि सुवर्णो के साजसे सजे कोटान हाथी, रथ, घोड़े, ऊंट, उपस्थित थे, उनएर किशोर अवस्थावाले दिव्य मनुष्य चढ़े झमक रहे । ऐसी अद्भुत प्रकार की वरात सजी। (५६१) टीका । कवित्त । (२८२) नरसी सों कह गहें हाथ “तुम साथ चलो, अंतरिक्ष मैं हूं चलौं, इती बात मानिय” । कही " अजू ! जानौ तुम, मैं तो हिये आनौं यहै लहै सुख मन मेरो फेंट ताल आनिये” ॥ आपही विचारि सब भार सो उठाय लियो, दियौ डेरा पुरी समधी की पहिचानियै । मानस पठायो "दिन आयौ पै न आये,” अहो ! देखें छवि छाये नर पूछे ज वखानिये ॥ ४५३ ॥ ( १७६) वार्तिक तिलक। जव घरात सजगई तब श्रीकृष्णचन्द्रजी नरसीजी का हाथ पकड़ के बोले कि अब बरात को संग ले तुम चलो, और अंतरिक्ष से मैं भी चलता हूं, भला इतनी बात तो मेरी मान लो।" श्रीनरसी जी ने हाथ जोड़ प्रार्थना की कि "अजी महाराज ! बरात और विवाह, सब आप जानें आपका काम जाने, मैं तो यही जानता हूं कि जहां कहो फेंट वांध, ताल ले, आनन्द से श्रापका गुण गाता चलूं, मुझे और नहीं आता भाता" ॥ सुनकर प्रभु ने विचारा कि सब कहते हैं । इससे सब भार आपही उठा, घरात लाकर समधी की पुरी के निकट डेरा कराया। उधर समधीने विवाह का दिन जान, मनुष्यों को भेजा कि "देखो तो मार्ग में कहीं आते हैं ?" वे आकर वरात देख पूछने लगे कि "यह बहुत सुन्दर वरात किसकी है ?" बरातियों ने उत्तर दिया कि "श्रीमेहता नरसीजी की यह घरात हैं" ॥ GEOCTOGGEReso RRECReecteR-RRECact .

श्रीभक्रमाल सटीका . (५६२) टीका | कवित्त । (२८१) "नरसी वरात," मत जानी यह नरसी की, नरसी न पावै ऐसी समझ अपार है । प्राय के सुनाई, सुधि बुधि विसराई, कहाँ "करत हसाई, बात भाखौ निरधार है ॥ गयौ जो सगाई करि दर वर आयौ द्विज निज अंग मात कैसें रंग विसतार है । कही " एक घास धन रासि सों न पूजै किहूं; चहूं दिसि पूरि रही देखौ भक्ति सार है ॥ ४५४ ॥ (१७५) वार्तिक तिलक। " श्रीनरसी मेहताजी की वरात है " यह सुन वे लोग विचारने कहने लगे कि " यह नरसीजी की वरात तो नरों की वरात के समान नहीं है, अर्थात् देवतों की बरात के समान है, ऐसी बरात इस लोक में तो नरसी नहीं पा सकते।" ऐसी समझ अपार है। और उन लोगों ने, दौड़ के आकर बेटी के वाप ले बरात की बड़ी बड़ाई की । सुन कर उसकी सुध बुध भूल गई । विश्वास न करके वह कहने लगा कि "हँसी करते हो ? यथार्थ कहो;" इतने में जिन ब्राह्मण ने वर को तिलक किया था, सो भी बरात देख वहां ही आये। उन ब्राह्मणजी के प्रेम रंग का उमंग अंग में नहीं समाता था; वे कहने लगे कि " जितना तुम्हारा धन है सो बरात के घोड़ों के घास मात्र को नहीं पूरा पड़ सकेगा; देखो श्रीनरसीजी की भक्ति की सारांश चारों दिशाओं में छा रहा है।" (५६३) टीका । कवित्त । (२८०) चले अचरज मानि, देखि अभिमान गयो, लयो पाली ब्राह्मन को हमें राखि लीजिये " । जाय गहि पांय रहौ भाय भरि " दया करी;" गए दृगभरै पांव परै " कृपा कीजियै” ॥ मिले भरिअंक, लै दिखायो सो मयंकमुख; “ हूजियै निसंक इन्है भार सुता दीजिय" । व्याह करि आये; भक्तिभाव लपटाये; सब गाये गुण 'जाने जेते; सुनि सुनि जीजियै ॥ ४५५ ॥ (१७४) वार्त्तिक तिलक। कन्या का पिता ब्राह्मण के वचन सुन आश्चर्य मान, स्वयं चल RECORRESCR-CORRECRARg - OLIBRE भकिसुधास्वाद तिलक बरात देखा, अपने धनाढ्यपने का अभिमान छोड़, ब्राह्मण के चरणों में सीस नवाके कहने लगा कि "अब मेरी लज्जा मर्यादा आपही के रखने से रह सकती है।" ब्राह्मणजी बोले कि चलो, सजल नेत्र प्रेम से श्रीनरसीजी के चरणों को पकड़ के कहो कि "मेरी लज्जा आपके श्राधीन है, मर्यादा आपके ही हाथों में है आपके रक्खे रह सकती है, दया कीजिये अपना दास जानिये।" उसने ऐसा ही किया। नरसीजी ने समधी (सम्बन्धी) को उठाके, अंक भर मिलके, लाके श्रीप्रभु के मुखचन्द्र का दर्शन करवाया । प्रभुने आज्ञा दी कि "तुम निशंक रही, वरात के सत्कार का भार भी नरसी ही को है, तुम केवल कन्यादान मात्र करदो।" फिर दोनों ओर का सँभार श्रीप्रभु ही ने किया । बड़े आनन्द और धूमधाम से विवाह कर श्रीनरसीजी के घर आकर ऐश्वर्य सहित आप अन्तर्धान होगये ।। नरसीजी* व्याह कर कराके आये तो, परंतु अपनी भक्ति भाव ही में अधिकतर लिपटे रहे । भगवद्भक्त का यश संसार में प्रसिद्ध आपके हम जानते थे, उतने ही गान किये; इन गुणों को सुन सुन के जीना योग्य है। (१४३) श्रीदिवदास पुत्र श्रीजसोधरजी। (५६४ ) छप्पय । (२७६) "दिवदास' वंस "जसोधर” सदनभईभक्तिअन- पायनी ॥ सुतकलत्र संमत सबै गोविन्द परायन।सेक्त हरि हरिदास द्रवत मुख "राम"-रसायन॥सीतापति को सुजस प्रथम ही गवन बखान्यौ । मृत दीजै मोहि कबित सवही जगजान्यौ॥ गिरा गदित लीला मधुर, संतनि आनंददायनी।“दिवदास" बस "जसोधर' सदन भई भक्ति अनपायनी ॥ १०६ ॥ (१०५) *श्रीनरसा मेहताजीका समय,संवत् ६०० ले परंच१५५० से.१६५३तर,के मतभयो LokectuUG-SCAMSTER - हुआ। गुण जितने ७०२ श्रीभकमाल सटीक। , बार्तिक तिलक । श्रीभगवद्भक्त "दिवदास" जी के वंश में उत्पन्न श्री' जसोधर" जी थे, उनके घर भर के जनों को अनपायनी श्रीरामभक्ति हुई, आपके पुत्र * और स्त्री जन सब एकमत होकर भगवत् में परायण हुए; तन मन से श्रीहरि और हरिदास वैष्णवों की सेवा करते थे, और सबके मुखचन्द्रों से श्रीसीतारामयश रसामृत द्रवता था। एक दिवस आपके यहां श्रीसीतापतिजी का सुयश श्रीरामायण होता था, उसमें जो श्रीविश्वामित्रजी की यज्ञ की रक्षा हेतु प्रभुके प्रथम गवन का प्रसंग आया, वह कविता सब जगत् जानता है, मुनि ने श्रीचक्रवर्तीजी से मांगा कि “श्रीराम लक्ष्मण दोनों पुत्र मुझे दीजिये," तब श्रीअवधेश महाराज ने दिये, आप मुनि के साथ चले । सो, श्रीजसोधरजी इस कथा को पहिले पहिल सुनते ही प्रेमावेश से उस ध्यान में तन्मय हो गये और बोले "प्राणनाथ! मैं भी साथही चलंगा ॥" सुनकर प्रभु ने ध्यान ही में प्रत्यक्ष सरीखा दर्शन देकर कहा कि तुम यहांही रहौ, हम यज्ञरक्षा करके शीघ्र आते हैं।" वह वि- योग वचन सुन आपने प्राण न्यवछावर कर दिया । इस प्रकार की संतन को आनन्द देनेवाली मधुर लीला हुई । (१४४) श्रीनन्ददासजी। (५६५) छप्पय । (२७८) (श्री) नंददास आनंदनिधि, रसिक सु प्रभुहित रंगमगे॥ लीला पद रस रीति ग्रंथ रचना में नागर । सरस उक्लिजुत जुक्ति भक्ति रस गान उजागर ॥प्रचुर पयध लौं सुजस “रामपुर" ग्राम निवासी । सकल सुकुल संवलितभक्तपदरेनुउपासी॥चन्द्रहास अग्रज 1 सुहृद, परम प्रेम पै मैं पगे। (श्री) नंददास आनंद * रहते हैं कि यदिवदापात्मज श्रीजमोधर, जीके पुरजो बड़े भक्त थे, उनका पाठान्तर अंगज अर्थात् पुत्र ॥ नाम श्रीश्रमपरामजी था । 1 प्रज MOH RESS 16मर भक्तिसुधास्वाद तिलक। ७०३ निधि, रसिक सु प्रभुहित रँगमगे.॥ ११०॥ (१०४) वार्तिक तिलक । श्रीनन्ददासजी आनन्दनिधि रसिक प्रभु के प्रेम में मिले हुए थे; श्रीयुगललीला रसरीति पद ग्रन्थ की रचना में बड़े प्रवीण हुए; तथा भक्तिरसयुक्त सरस उक्ति युक्ति कथन और गान में अति उजा- गर थे । आप " श्रीरामपुर " ग्राम के निवासी थे; संमुद्रपर्यंत आपका सुयश विख्यात हुआ और सम्पूर्ण सुन्दर कुलवाले ब्राह्मणों में उत्तम ब्राहाण होते हुए भी श्रीभगवद्भक्कों के चरणरेणु की उपा. सना सेवा करते थे। श्रीचन्द्रहासजी के बड़े भ्राता श्रीनन्ददासजी अति सुहृद परम प्रेमरूपी जल में मीन के समान पगे रहते थे। आप श्रीकृष्णयश काव्यवाले अष्ट छाप ( आठ प्रसिद्धों) में एक थे। आपके ग्रन्थ, " पंचाध्यायी, रुक्मिणी मंगल, नाममाला,* अनेकार्थ, दानलीला, मानलीला" आदिक प्रसिद्ध हैं। सुनते हैं कि " अष्टछाप" में ये है-- १ सूरदास ५ चतुर्भुजदास २ कृष्ए दास ६ चेत स्वामी ३ परमानन्द ७नन्ददास ४ खिन्नदास चेत स्वामी ८ गोविन्द स्वामी चारों चेले स्वामी वल्लभा चारों चेले गोस्वामी विट्ठलजी के चार्यजी के (१४५) श्रीजनगोपालजी। (५६६) छप्पय । (२७७) संसार संकल व्यापक मई, जकरी जन गोपाल * नाममाला" तथा "अनेकार्थ" देखने और अवश्य कण्ठस्थ करने योग्य हैं ।

36 ७०४ श्रीभक्रमाल सटीक। की॥ भक्ति तेज अति भाल संत मंडलको मंडन। बुधि प्रवेश भागौत * ग्रन्थ संशय कौ खंडन ॥ नर- हड़ ग्राम निवास देस बागड़ निस्ताखौ। नवधा भजन प्रबोध अनन्य दासन व्रत धाखौ ॥ भक्त कृपा बांछी सदा पदरज राधा लालकी । संसार सकल ब्यापक भई, जकरी जन गोपाल की॥१११॥ (१०३) वार्मिक तिलक। श्रीजनगोपालजी की बनाई हुई प्रभु यशमई “ जकरी" जगत् भर में व्याप्त होगई । आपकाभाल ( ललाट ) भक्ति तेज से प्रकाश- मान्, सन्तों के मंडल का मंडन करता था; आपकी बुद्धि सबसंशयों की खंडन करनेवाली श्रीमद्भागवत ग्रन्थ में अतिशय प्रविष्ट हुई । नरहड़ नाम के ग्राम में निवास कर भक्ति उपदेश से उस बागड़ देश भर को निस्तार किया । नवधा भक्ति के सहित प्रवोध युक्त अनन्य भगवत्दासताका बन धारण किया और श्रीहरिभक्कोंके कृपा की तथा श्रीराधाकृष्णजी के चरणों की रजकी वांछा सदा रखते थे। ऐसे श्रीजनगोपालजी की “जकरी" सारे जगत् में फैल गई ॥ (१४६) श्रीमाधवदासजी। (५६७) छप्पय । (२७६) माधौ दृढ़ महि ऊपरें, प्रचुर करी लोटा भगति ॥ प्रसिद्ध प्रेम की बात, “गढ़ागढ़" परचौ दीयौ । ऊंचेतें भयौ पात श्याम सांचौ पन कीयौ ॥ सुत नाती पुनि सदृश चलत ऊही परिपाटी। भक्तनिसों अतिप्रेम नेम नहिं किहुँ अँग घाटी ॥ नृत्य करत नहिं तन सँभार, *"भागोत"-मागवत । १ जकरी-एक छंद विशष का नाम । ROCALENGE CCC grados भक्तिसुधास्वाद तिलक । ७०५ समसर जनकन की सकति । माधौ दृढ़ महि ऊपरें, प्रचुर करी लोटा भगति ॥ ११२ ।। (१०२) वार्तिक तिलक । श्रीमाधवभक्तजी ने अति प्रेम से भूमि के ऊपर लोटने की भक्ति को दृढ़ता से विख्यात किया (फैलाया)। आपने "गढ़ागढ़" में परचौ दिया; बहुत ही ऊंचे से गिरे और श्रीश्यामसुन्दरजी ने रक्षा कर आपका प्रण पूरा किया । आपके पुत्र नाती भी उसी परिपाटी से प्रेमपथ में चले, और भगवद्भकों से सकुटुम्ब आपका प्रेम नेम पूरा था किसी अंग में घट नहीं था ॥ श्रीहरिगुन गानकर नाचने लगते तव शरीर का कुछ सँभार नहीं रहता था, और गृहस्थाश्रम में इसप्रकार रहे कि जैसे श्रीजनकवंशी जल कमल-पत्रवत् संसार से निर्लेप रहते थे। आप "गढ़ागढ़" के रहनेवाले थे। (५६८) टीका | कवित्त । (२७५) गढ़ागढ़ पुर नाम “ माधौ " बढ़ि प्रेमि, भूमि लोटें, जब नृत्य करें, भूले सुधि अंग की । भूपति विमुख, झूठ जानिक परीक्षा लई, आनि तीन छाति पर देखी गति रंग की ॥ नूपुरनि बांधि, नाचि, सांच सो दिखाय दियो, गिस्यौ हूं कराह मध्य, जियो, मति पंग की। बड़ो त्रास भयौ नृप, दास विसवास बढ्यौ, बढ्यो उर भाव, रीति न्यारी या प्रसंग की॥ ४५६ ॥ (१७३) बार्तिक तिलक। गढ़ागढ़ नाम नगर में "माधव भक्त चढ़ बढ़ के प्रेमी हुए; नृत्य करते करते आपको अपने सब अंग की सुधि भूल जाती थी तव भूमि में लोटने लगते थे । वहां का राजा विमुख था; उसने जाना कि “झूठ ही पाखंड करते हैं;" इससे परीक्षा लेने के अर्थ १ श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभुजी के समसामयिक श्रीजगन्नाथपुरी वाले विख्यात प्रथम श्रीमाधवदासजी के अतिरिक्त ये दूसरे श्रीमाधवमत ती लोटनमति फेलाने घाले, तथा तीसरे पक श्रीमाधवम्वालजी साधुसेवी पग्म भागवत हुए। एक चौधे माधवजी सुकवि “ बरसाने " वाले हुए । Tecrets , . , H श्रीभक्तमाल सटीक। ७०६ . . ऊंची (तीसरी ) छत पर बिछौना बिछवाकर आपके प्रेम की गति देखने लगा। आप नूपुर बांधके नाचने लगे; फिर सच्चे प्रेम से लोटते हुए तप्त घृत के कड़ाह में गिर पड़े। परन्तु प्रभु ने इस प्रकार की रक्षा की कि आपका एक बाल भी न वांका हुआ। देखकर सबकी बुद्धि पंगु हो गई । राजा को बड़ा त्रास हुआ; भगवदासों में विश्वास बढ़ा; और श्रीमाधव भक्रजी का दास होकर भाव भक्रि की रीति ग्रहण की। इस प्रेमप्रसंग की रीति जगत् से न्यारी है। दो० "गाए नीकी भाँति सों, कवित रीति भन कीन । श्रीमोहन अपनाइ के, अङ्गीकृत करि लीन ॥" (श्रीध्रुवदासजी) दो० " तनक न रही विरक्तता, पड़ी हगन की छाप। कहुँ माला बटुआ कहूं, कहुँ गीता कहूँ आप॥१॥ पंडित पूजा पाकदिल, यह गुमान मति लाय। लगै जरब अखियान की, सवैगरव मिटिजाय ॥२॥" (श्रीभानुप्रताप तिवारी-चुनार, मिरजापूर.) (१४७) श्रीअङ्गदजी। (५६६) छप्पय । (२७४) अभिलाष भक्त " अंगद" कौ, पुरुषोत्तम पूरन कस्यो ॥ नग अमोल इक, ताहि सबै भूपति मिलि जा७ । साम, दाम, बहु करैं; दास नाहिन मत काचैं। एक समै संकट मैं, ले वै पानी महि डायो। “प्रभो! तिहारी वस्तु,” बदन ते बचन उच्याखौ ॥ पांच दोय सत कोस ते, हरि हीरा लै उर धस्यो। अभिलाष भक्त "अंगद" कौ,पुरुषोत्तम पूरन कस्यौ॥१३॥ (१०१) SURES , २-२ ७०७ ग्रन्थ ****** FORE भक्तिसुधास्वाद तिलक। वार्त्तिक तिलक। श्री "अंगद" भनजी की अभिलापा ओडेसानाथ श्रीपुरुषोत्तम जगन्नाथजी ने पूरी की। आपके पास एक बड़ा ही अनमोल नग (रत्न) था; उसको राजा और उनके समीपी लोग मांगते; साम, दाम, आदिक बहुत दिखाए (किये )। परंतु ये तो सच्चे भगवदास थे, इन्हों ने नहीं ही दिया। एक समय संकट में पड़, मन से ध्यान कर, आपने मुख से कहा " हे प्रभो ! यह आपकी वस्तु है, सो आप लीजिये;" और इतना कह रत्नको जल में डाल दिया। श्रीजगन्नाथ जी ने ७०० (सात सौ) कोस से लम्बा हाथ फैलाकर हीरा लेके अपने अंग में धारण किया । इस प्रकार प्रभु ने अपने मन की अभिलाषा पूर्ण की। आपका नाम पुनीत करनेवाला है । आपकी कविता नानकजी के साहिव" में संग्रहीत है। (५७०) टीका । कवित्त । (२७) " रायसेन ” गढ़ बास नृप सो "सिलाहदी" जू, ताको- यह काका रहै, “ अंगद " विमुख है । ताकी नारी प्यारी, प्रभु साधु- सेवा धारी उर, आये गुरु घर, कहैं कृष्ण कथा सुख है ॥ वैठे भौन कौन ? देखि कैसें मौन रह्यौ जात ? वोल्यो “तिया जात, कहा करौ नर रुख है ?" । सुनि उठि गये; वधू अन्न जल त्यागि दये; लये पांव जाय विषवस भयो दुख है ॥ ४५७ ॥ (१७२) वार्षिक तिलक। श्रीअंगदसिंहजी क्षत्री "रायसेन" गढ़के वासी, राजा, सिलाहदी- सिंह के चाचा,प्रथम अवस्था में विमुख थे; इनकी स्त्री रूपवती और भक्तिवती इनको बहुत प्यारी थी वह श्रीहरि तथा संतों की सेवा में तत्पर हुई । एक दिवस उसके गुरुदेव उसके घर आकर सुखपूर्वक भगवत्कथा कहते थे, स्त्री आनन्द से सुनती थी। अंगद देखकर वोला "स्त्री जाति के समीप अकेले वैठकर यह क्या कररहे हो? ॥" वे सुनकर तत्काल ही उठके चले गये; और स्त्री ने अन्न जल HE PROM NARE श्रीभक्रमाल सटीक। दोनों छोड़ दिया। अंगदजी प्रथम विषयवश तो थे ही दुःखित हो, स्त्री के चरण पकड़, प्रार्थना करने लगे। ( ५७१) टीका | कवित्त । (२७० ) मुख न दिखावे, याहि देख्यौ ही सुहावै, कही " भावे सोई करौ नेकु बदन दिखाइयै । मैं हूं जल त्यागि दियो, भन्न जात का पै लियो, जीवौं जव नीको तब आपु कछु खाइयै" ॥ वोली " मोसों बोलो जिन, छाडौं तन याही छिन, पन सांचौ होतो जौ पै सुनत समाइयै "। कहौ अव कीजै जोई, मेरी मति गई खोई भोई उर दया, बात कहि समझाइयै ॥ ४५८ ॥ (१७१) वार्त्तिक तिलक । परन्तु नारी ने मुख ही नहीं दिखाया; इनको तो रात दिन उसका मुख देखना बड़ा ही अच्छा लगता था, विकल हो बोले कि "जो तुमको अच्छा लगे सोई अब मैं करूं, मुझे अपना मुख मयंक तो थोड़ा दिखाओ, मैंने भी अन्न जल तज दिया है, मुझे जीना तभी भला लगेगा कि जब तुम कुछ खामोगी।" उसने उत्तर दिया कि “ मुझसे बोलो मत, नहीं तो इसी क्षण देह तज दूंगी, मेरा पन सच्चा तो तब था कि जब तुमने श्रीगुरुजी को रूखे वचन सुनाए थे मैं उसी क्षण तन को तज देती ॥" अंगदजी ने सुन अति दीन होकर फिर विनय किया कि अब तुम जो कही सोई मैं करूं, मेरी बुद्धि नष्ट हो गई।" तब तो भक्ति. वती को दया लगी, और समझाकर यों कहने लगी। (५७२) टीका । कवित्त । (०७१) वेई गुरु करौ जाय, पांयन में परो, " गयौ, चायनि लिवाय ल्यायौ, भयौ शिष्य, दीन है । धारी उर माल, भाल तिलक धनाय कियो, लियो सीत, प्रीति कोऊ उपजी नवीन है ॥ चढ़ी फौज * संग, चढ़पौ बेरी पुर, मारि बढ्यो, कढ़यो, टोपी लैकै हीरा सत, एक पीन है। डारे सब वेचि, पागपेच मध्य राख्यौ सुख्य, भाप्यो "सो अमोल करौं जगन्नाथ लीन हैं" ॥ ४५६ ॥ (१७० *"फौज" MERICTeceCRECReckeracter . t- सेना।

७०४ , RASHRSHAN भकिसुधास्वाद तिलक। वार्तिक तिलक। कि तुम जाके मेरे महाराजजी के चरणों में पड़, भगवत् की भक्ति के लिये उन्हीं को गुरु करौ।” सुनते ही अंगदजी घड़े उत्साह और दीनता से जाकर गुरुजी को लिवा लाये और शिष्य हो, कंठ में श्रीतुलसी माला, भाल में तिलक अच्छे प्रकार से करके, भोजन कराय, अंगदजी ने श्रीगुरु की सीथ (जूंठ ) प्रसादी ली । कोई नवीन प्रीति भक्ति उत्पन्न हुई, बड़े विनीत हो, भकिमार्ग में यथार्थ चलने लगे।" भक्ति, भक्न, भगवंत, गुरु " की जय ॥ एक समय राजा सिलाहदी सिंह, सेना समेत किसी दूसरे राजा पर चढ़ा, साथ श्रीअंगदसिंहजी भी थे; इनकी विजय हुई । उस राजा की एक टोपी श्रीअंगदसिंहजी के हाथ आई, उसमें एक सौ एक हीरे लगे थे, सौ होरे वेचकर तो संतों की सेवा में लगा दिये और एक हीरा जो महामुख्य उत्तम और अनमोल था, उसको अपने पाग ( पगड़ी) के पेच में रखके कहा कि "यह हीरा श्री- जगन्नाथजी को सप्रेम अर्पण करूँगा।" (५७३) टीका | कवित्त । (२७०) काना कानी भई, नृप वात सुनि लई, “कही हीरा वह देय, तौ पै और माफ* किये हैं" । आय समुझावै, बहु जुगति वनावे, याके मन मैं न आवै; जाय; सवै कहिदिये हैं। अंगद बहिन लागै वाकी भूवा पागै, तासों "देवो विष, मारौं” फिरि तू ही, पग छिये हैं। करत रसोई घोरि गरल मिलायो पाक, भोगहूँ लगायौ, " अजू आवो" बोलि लिये हैं ॥४६०॥(१६६) वातिक तिलक। इन १०१ (एकसौ एक) हीरोंकी वार्ता कानोंकान होते२ राजातक पहुँची। उसने आपके पास अपने मंत्रियों को भेजकर कहलाया कि "वह एक हीरा मुझको दे देवें, तो सौ हीरे मैंने क्षमाकिये वे लोग आकर बहुत युक्तियों से समझाया पर श्रीअंगदजी के मन में एक भी न आई। आप बोले "वह तो मैं श्रीजगन्नाथजीको अर्पण करचुका॥" SSC ASARAS PROPAGASCARA *"माफ़"mar%Dक्षमा ॥

ki श्रीभकमाल सटीक। आकर उन सबों ने राजा से कहा कि "वह ऐसे नहीं देंगे" फिर कुमंत्रियों से राजाने विष देना यो निश्चय किया, कि श्रीअंगदजीकी बहिन जो राजाकी फूफी (वुआ) लगती, और आपके ठाकुरजी की रसोई किया करती थी सो राजा ने उसके चरण पकड़कर कहा कि "विप देकर इसको मार डाल पीछे तुझे बहुत धन द्रव्य दूंगा" वह स्त्री ही जाति तो थी रसोई में घोर विष मिला, भोजन बना, प्रभुको अर्पणकर, उसने श्रीअंगदजी को प्रसाद पाने के लिये बुलाया ॥ (५७४) टीका। कवित्त । (२६६) वाकी एक सुता, संग लेके बैठे जेंवन कों, आई सो छिपाय, कही “जेंवो कह गई है "जेंवत न, वोधि हारी, तब सो विचारी प्रीति, भीति, रोय मिली गरे, रीति कहि दई है ॥ प्रभु ले जिंवाये रांड, भांड कै निकासि द्वार, दै करि किवार, सब पायौ ओप नई है। वह दुख हियें रह्यो । कह्यो कैसे जात काहू ? बात सुनी नृपहूं नै, जैसी भांति भई है ॥ ४६१ ॥ (१६८) वार्तिक तिलक । देखिये, श्रीअंगदजी की उसी वहिन की एक लड़की थी, आप नित्य उसको साथ लेकर प्रसाद पाते थे । उस दिन वह उसको कहीं छुपा भाई। आपनं उसको बुलाया; बहिन बोली "आप प्रसाद पाइये, वह कहीं खेलने निकल गई है," आपने प्रसाद नहीं पाया; उसने बहुत प्रकार प्ररोध किया तब भी विना उसके नहीं ही पाया। अपनी लड़की में आपकी इस प्रकार की प्रीति देख, लजित हो विप के भय से गले में लगके रोने लगी, और विष दिवाने का सब वृत्तांत भी कह सुनाया । सुनकर भंगदजी ने कहा कि " रांड | तने मेरे प्रभुको विष भोग लगा दिया ! अब मुझे कहती है मत पावो;" तत्काल उसको बाहर निकाल, कपाट दे, आप विष-मिश्रित संच प्रसाद पागये ॥ आपके भाव विश्वास से वह विष अमृत सरीखा हो गया क्योंकि acteSCHECK+ESCALERACK LECRECORAT - S नि भनिसुधास्वाद तिलक। प्रभुको विष भोग लग जाने की बात आपको बड़ी ही दुःखद थी। प्रसाद पाने से आपके देह में नवीन छवि प्रकाशित हुई जिस प्रकार यह समस्त वार्ता हुई राजा सुन के बड़ा लज्जित तथा विस्मित हुआ। (५७५) टीका ! कवित्त । (२६८) चले नीलाचल, हीरा जाय पहिराय आवें, पाय घेरि लीने नृप नरनि, खिसाय के। कही डारि देवौ, के लराई सनमुख लेवी, बस न हमारी, भूप आज्ञा आये धाय के ॥ बोले “नेकु रहौ, मैं अन्हाय पकराय देत," हेन मन और, जन डायो ले, दिखाय के । वस्नु है तिहारी प्रभु, लीजिये,” उचारी यह; बानी लागी प्यारी, उर धारी सुख पाय के ॥ ४६२ ॥ (१६७) वार्तिक तिलक। इसके अनंतर, श्रीअंगदजी हीरा लेकर नीलाचल धाम को चले कि श्रीजगन्नाथजी को पहिराय ही आऊं।" इतने में राजा के भेजे बहुत से शस्त्रधारी लोग आके आपको चारों ओर से घेर के कहने लगे कि “अब हीरा धर दीजिये, और नहीं तो सन्मुख युद्ध कीजिये; इसमें हमारा कुछ बस नहीं, हमने जो राजा की आज्ञा से धावा किया है।" आपने कहा कि “ एक क्षण भर क्षमा करो, मैं स्नान करके तुमको दिये देता हूं।" मन में तो आपके और ही था, हीरा ले, सबको दिखा, उसी.सर (तालाब) में डाल कर,पुकार उठे कि " हे प्रभो! यह आपकी वस्तु है, सो लीजिये।" भक्त की वाणी श्रीजगन्ना यजी को अति प्यारी लगी, इससे सात सौ कोस से हाथ वढ़ा हीरा ऊपर से ऊपर रोक लिया और आपने श्रीअंग में धारण कर लिया; सो आज तक श्रीअंग में सुशोभित है। (५७६ ) टीका । कवित्त । (२६७) एतो घर आये, वे तो जलमवि कूदि छाये, अनि अकुलाये, नेकु खोज हूं न पायौ है । राजा चलि आयो, सब नीर कढ़वायो, कीच देखि, मुरझायो, दुख सागर अन्हायो है ॥ जगन्नाथ देव NAGAR .

M RRRRRRRRE १७१२ श्रीभक्रमाल सटीक। आज्ञा दई," वाहि सुधि देवो, " आयकै सुनाई, नर तन विस. रायौ है । गयो, जाय देख्यौ उर पर जगमग रह्यो, लह्यो सुख नैननि कौ, कापै जात गायी है ॥ ४६३ ॥ (१६६) यात्र्तिक तिलक। श्रीअंगदजी तो अपने घर चले आए, और राजा के सब लोग जल में कूद पड़े; अकुला के ढूंढ़ने लगे परन्तु हीरा का खोज नहीं ही पाया । तब बहुत से लोग साथ ले राजा स्वयं आया; तालाब को काट उसने जल निकलवाया, कितनाही ढुंढ़वाया पर वह केवल कीच मात्र देख, मुरझा कर दुःखसिंधु में डूब गया । श्रीजगन्नाथ देवजी ने अपने जनों को आज्ञा दी कि “जाओ अंगदभन से समाचार कहि आओ कि तुम्हारा अर्पण किया हुआ हीरा प्रभु ने अपने श्रीअंग में धारण कर लिया।" सुनके आपने आनन्द से तन का भान भुला दिया; फिर श्रीपुरुषोत्तमपुरी में जाकर श्रीअंगदमी ने देखा कि " हीरा प्रभु के श्री अंग पर जग- मगा रहा है।" उस समय श्रीअंगदजी को जो नेत्रानन्द हुआ सो कौन कह सकता है ?" (५७७) टीका | कवित्त । (२६६) राजा हिय ताप भयो, दयौ अन्न त्यागि, कह्यौ आवै जोपै, भाग मेरे, ब्राह्मन पठाये हैं। धरना दे रहे कहे तृप के वचन सब, तब है दयाल आप पुर ढिग आये हैं ॥ भूप सुनि आगे आय पाय लप- टाय गयौ लयौ उर लाय दृग नीर लै भिजाये हैं । राजा सरबसु दियो जियो हरि भक्ति कियो हियो सरसायो गुन जाने जिते गाये हैं॥ ४६४ ॥ (१६५) वार्त्तिक तिलक । जब आप जाके श्रीजगन्नाथपुरी ही में रह गये, तब आपका प्रभाव समझ राजा के हृदय में बड़ा पश्चात्ताप हुआ, अन्न त्याग दिया; ब्राह्मणों को बुला बहुंत सत्कारकर कहा "आप लोग जाइये किसी FAR RO FRER भक्तिसुधास्वाद तिलक। ७१३ यत्न से चाचाजी को लिवा लाइये, तो मेरे बड़े भाग्यउदय हों; जाके ब्राह्मणोंने आपसे राजा की सब प्रार्थना सुनाई, और धरना दे उपवास किया। तब आप दयालु होकर आये । राजाने सुना कि पुर के पास आप आ पहुँचे,तव वह सजलनेत्र आगे आकर सप्रेम चरणों में लपट गया, आपने हृदय में लगा लिया, परस्पर प्रेमाश्रुपात से भिगो दिये । राजा ने आपको सर्वस्व अर्पणकर जीवन पर्यन्त सरस हृदयसे हरिभक्ति की। सन्तके आश्रित होकर किसने कल्याण नहीं पाया ? श्रीअंगद भक्तजी के जितने गुण हम जानते थे उतने गान किये हैं। (१४८) श्रीचतुर्भुजजी। (५७८ ) छप्पय 1 (०६५) चतुर्भुज नृपति को भक्ति कौ, कौन भूप सरवर करें ॥ भक्त आगमन सुनत सन मुख जोजन इक जाई। सदन प्रानि सतकार सदृश गोबिन्द बड़ाई ॥पाद प्र- छालन सुहथ राय रानी मन सांचैं । धूप दीप नैवेद्य, बहुरि तिन आगे नाचें ॥ यह रीति करौलीधीस की, तन मन धन आगे धरै । चतुर्भुज नृपति की भक्ति की, कौन भूप सरवर करें ॥ ११४॥ (१००) वार्तिक तिलक । " करौली" के राजा श्रीचतुर्भुजजी । की लोकोत्तर भक्रि की समता, कौन राजा कर सकता है ? चार कोस पर श्रीहरिभक्त का आगमन सुन सन्मुख जाके पर लिवा लाते और भगवान के समान • ये कलियुग के श्रीनगदजी हुए ॥ + एक चतुर्भुज दास श्रीविट्ठलनाथजी के शिष्य, रुणदासजी के सप्तम पुत्र, बड़े सुकार थे, व एक चतुर्भुज मिन भाया दशमस्कन्ध श्रीमद्भागवत के फर्ता थे और एक चतुर्भुज श्रीवैष्णदासजी को कहते हैं जिनकी करिता वल्लभीय मन्दिरों में गाई भी जाती है श्रीहरिवंशजी के शिष्य ॥ RECECSECRACANCY . fakti HI-HARS ७१४ श्रीभक्तमाल सटीक। सत्कार बड़ाई कर, सच्चे मन से, अपने हाथों से राजा रानी दोनों, चरण धो,चन्दन फूल माला धूप दीप नैवेद्य से पूजा आरतीकर, फिर हरिभक्त के आगे स्वयं नृत्य कीर्तन करते, और तन मन धन सब आगे रख अर्पण करतेथे। भक्तराज करौली के अधीश की इसप्रकार कीरीति थी, दूसरे किस नृपतिकी उपमा इसकी कही जा सकती है ?॥ ( ५७६ ) टीका । कवित्त । (०६४) पुर ढिग चारौओर चौकी राखी जोजन पै, जो जन ही आवै तिन्हें ल्यावत लिवाय के। मालाधारी दास मानि, आवै कोऊ द्वार जो पै, करै वही रीति सो सुनाई छप्पै गाय के ॥ सुनी एक भूप भक्त निपट अनूप कथा, सब को भंडार खोलि देत, बोल्यो धाय के। " पात्र औ अपात्र यों विचार ही जो नाही, तो पे कहा ऐसी बात?" दई नेकु मैं उड़ाय के ॥ ४६५ ॥ (१६४) वार्तिक तिलक। राजा श्रीचतुर्भुजजी ने अपने पुर के चारों ओर चार चार कोस पर चौकी बैठा रक्खी थी कि " जो (भगवजन ) कण्ठी तिलक धारण किये आते थे उनको वहां ही सत्कार पूर्वक लोग रखते थे; तब राजा आप स्वयं जाके वहां से उनको सादर घर लिवा लाते थे। जो कोई माला तिलक धारणकर आवै, उसको जैसा कि छप्पय में श्रीनाभास्वामी ने कहा है उसीरीति से पूजा सत्कार किया करते थे। इसप्रकार आपकी अनूप कथा एक दूसरे राजाने सुनी कि “कोई तिलकधारी जाय उसको अपना धनगृह (कोष) खोल देते हैं।" उसने कहा कि "जब उनको पात्रापात्र का विचार ही नहीं है, तब क्या भक्ति करते हैं ? किसी कामकी बात नहीं कुछ योग्यपात नहीं।" इसप्रकार, घात की बात में उसने उस प्रशंसा को चुटकियों में उड़ा दिया । (५८०) टीका । कवित्त । (२६३) भागवत गावै, भक्त भूप एक विप्र तहां, बोलिकै सुनावै "ऐसी मन जिन ल्याइये । पावै आसे कौन हृदय भौन में प्रवेश करि ? भरि अनुराग कहा उर मधि आइयै ?” ॥ करी लै परीक्षा भाट HOKA AK Hotel , भकिसुधास्वाद तिलक । ७१५ विमुख पठाय दियौ, "दियौ भाल तिलक द्वार दास यो सुनाइयै"। गयो, गयो भूलि, फूलि कुल विस्तार कियो लियौ पहिचानि अव जान कैसे पाइयै ॥ ४६५ ॥ (१६३). चार्तिक तिलक । उस राजा के यहां एक भक्तराज ब्राह्मणजी भागवत सुनाते थे; उन्होंने राजा के वचन सुनकर कहा कि “ऐसा मन में मत लाइये कि "उनको पात्र और अपात्र का विवेक नहीं है, न जानैं वे अपने हृदय में क्या भाव लाकर इस प्रकार अनुराग में भरके सर्वस्व अर्पण करते हैं; ऐसी किसी की शक्ति नहीं है कि भक्कों के हृदय में प्रवेशकर उनके मन की आशय जान लेवै।" श्रीभक्कवर पंडितजीके ऐसे वचन सुन, परीक्षा के लिये, एक विमुख भाट को तिलक माला धारण करा के उस राजा ने आपके पास भेजा, और कह दिया कि "वहांजा, ऐसाही वेष बना, अपने को "भगवदास" कहना।" भाट गया तो परंतु तिलक कंठी धारण करना और अपने तई वैष्णव बताना तो वह भूल ही गया; अपने अभ्यास से फूलके वंश विस्तार प्रशंसा करने लगा। लोगों ने जाना कि यह तो भाट है; फिर अब भीतर कैसे जाने पाता ? ॥ (५८१) टीका । कवित्त । (२६२) बीते दिन वीस तीस, आई वह सीख सुधि, कही "हरिदास" कोज आयो, यो सुनाइयै । बोले "जू निसंक जावो, गावो गुनगोविन्द के, आये घर मध्य, भूप करी जैसी भाइये ॥ भक्ति के प्रसंग कौन रंग कहूं नैकु जान्यो, जान्यो उनमान सों परीक्षा मँगवाइयै । दियौ ले भंडार खोलि, लियो मन मान्यौ, दई संपुट में कौड़ी डारि, जरी लपटाइयै ॥ ४६६॥(१६२) वार्तेक तिलक। उस भाटको कोई एक महीनाभर बीत गया पर अब अपने राजा की शिक्षा की सुधि आई; तव वेष बना उसने द्वारपाल वेतपाणि से १ "जरी" --स्वर्णसूत्र का यत्र, गोटा । REKAct - FA श्रीभक्तमाल सटीक। कहा कि "एक भगवदास आये हैं ऐसा जा सुनाइये।" लोगोंने कहा आपके लिये डेउढ़ी नहीं आप निःशंक जाके श्रीगोविन्द के गुण गाइये।" वह गृह में गया; श्रीचतुर्भुजजी ने भनवेष देख वैसीही पूजा की। , परंतु उस भाटके मन वचन में भक्ति प्रसंगके रंग का लेश भी नहीं पाया, सो राजा ने श्रीहरिकृपा से समझ लिया कि "किसी ने मेरी परीक्षा लेने के लिये भेजा है।" राजाने अपना द्रव्यागार (भंडार) खोल दिया, भाट ने मन मानी सम्पत्ति ली । तब, श्रीचर्तुभुजजीने एक कोड़ी स्वर्णसूत्र के पट में लपेट, एक उत्तम सम्पुट में रख, पीछे से यह भी भाट को दे दिया। (५२) टीका | कवित्त । (२६१) आयो वाही राजा पास, सभामैं प्रकाश कियो, लियो धन दियो, पाछे सोई ले दिखायौ है । खोलि के लपेटा मध्य संपुट निहारि कौड़ी, समुझि विचारै हारै मन में न आयो है ॥ बड़ौ भागवत विप्र पंडित प्रवीन महा, निसि रस लीन जानि आयकै बताया है। कस्यौ उनमानि, भक्त मानिवौ प्रधान जरी {दिक पठाई, ताहि गुण सम- भायौ है ॥ ४६८॥ (१६१) वार्तिक तिलक । वह अपने राजा के पास आ, सब वृत्तांत सादर सुना, जो धन लाया था सो, और पीछे जो राजा ने डव्या दिया सो भी, उस भाट ने आगे रख दिया। राजाने सम्पुट खोला तो उसमें गोटे से लपेटी एक कौड़ी देखी ! लाख प्रकार से विचारके हार गया परंतु उसका तात्पर्य इसकी समझ में नहीं ही आया। तब उसने अपने उन ब्राह्मण पंडितजी बड़े भागवत महा प्रवीन हरिरास लीन से रात्रि में इसका गूढार्थ तथा तात्पर्य पूछा । सब वृत्तान्त सुन कानी कौड़ी आदिक देख, तात्पर्य को समझ विचारकर, प्रसन्न हो विष भागवतजी ने राजा से, अज्ञान अंधकार में लीन जानके, बताया कि "देखिये ! श्रीचतुर्भुजजी ने ऐसा अनुमान किया है कि यह फूटी कौड़ी सरीखा भक्ति गुण हीन मनुष्य बहुमूल्य स्वर्णपट संपुट सरीखे GetectBACCES MISAR भक्रिसुधास्वाद तिलक। ७१७ भागवतवेप से आच्छादित आया है; सो उसी वेप को प्रधान मान, हमने पूजन सत्कार किया है।" (५८३) टीका | कवित्त । (२६०) राजा गझि पांव गहे; कहे "जू बचन नीके ऐपै नैकु आप जाय तत्त याको ल्याइये"। आये, दौरि पाय लपटाय भूप भाव भरे, परे प्रेमसागर में, चरचा चलाइये।चलिवे न देत, सुख देत चले लोलमन, खोलि के भंडार दियौ लियो न रिझाइये । उभै सुवा सारौ कही एक कर धारौ मेरे दई अकुलाय लई मानौ निधि पाइये ॥ ४६६ ॥१६०) वार्तिक तिलक । राजा सुन, लजित और अति प्रसन्न हो, पंडितजी के चरण पकड़ कहने लगा कि आपने बहुत अच्छे वचन कहे; परंतु आप चतुर्भुजजी के यहां तनक जाके इसका यथार्थ आशय लाइये।" पंडितजी सहर्ष करौली आये, भकराज ने दौड़कर चरणों में लिपट, बड़े भाव से पूजन किया। दोनों भक्तों ने प्रेमसागर में मग्न हरि- चर्चा चला, परस्पर सुख लिया । कुछ दिनरह पण्डित चलना चाहते राजा अनेक सत्संगसुखदेनहीं जाने देते। अन्त को चले, तो दोनों भक्कों के मन वियोग से चंचल हो गये । राजाने अपना कोश (धनगृह) खोल दिया कि "जो चाहिये लीजिये ।" पर श्रीपण्डितजीने कुछ भी नलिया।कहाकि "मैंने, पकी भकि ही देख अति प्रसन्न हो, परम लाभ पाया; ये जो आपके शुक और सारिका हैं, इन दोनों में से एक मुझे दीजिये।" वे दोनों पक्षी प्रभु का नाम सुनानेवाले, राजा को बड़े ही प्रिय थे; इससे अकुला के एक ( सारिका ) को दिया । ब्राह्मण ने उसे निधि के समान सानन्द लिया ॥ (५८४) टीका । कवित्त । (२५६) आयोराजसभा, बहुवातनि नखारौ जहां,चोलि उठी सारौं"कृष्ण कहो,” झारि डारे हैं । पूछ नृप "कहो,” "अहो ! लहौ सब याही सौजू, पच्छी वा समाज रहे हरि प्रानप्यारे हैं ॥ कोटि कोटि रसना SENCE SACOCREECHEETA प्रा- * FRERIAL श्रीभकमाल सटीक। बखानों पे न पाऊं पार;" सार सुनि भनि, आय सीस पांव धारे हैं। "राखी यह खग, पगि रह्यौ तन मन श्याम," अति अभिराम रीति मिले औ पधारे हैं ॥ ४७० ॥ (१५६) वार्तिक तिलक। श्रीभक्त पंडितजी उस सारिका को लेकर राजा की सभा में आये; वहां लोग अनेक सांसारिक वार्ता करते थे; सो सुन, वह मैना बोली "श्रीरामकृष्ण गोविन्द हरे कह; (जिस से संसार सागर पार हो, और वार्ता करने से यमयातना के भागी होगे)-" राजा ने पंडित. जी से पूछा कि "चतुर्भुजजी के प्रेम भाव की वार्ता कहिये ।" पंडितजी ने उत्तर दिया कि “आपको इसका पूछना ही क्या है ? इसी मैना के उपदेश से तो सब कुछ जान जाइये कि यह चिड़िया (पक्षी) उस समाज में रहती है, जब इसको श्रीहरि ही प्राणप्रिय हैं; तब उन राजा की क्या कहूं ? मैं कोटिन रसना से भी यदि उनकी भक्ति का बखान करूं, तो भी पार नहीं पासकता ॥" इस प्रकार प्रेम सारांश भक्ति युक्न वार्ता सुन, स्वयं श्रीचतुर्भुजी के यहां आकर राजा ने चरणों में प्रणाम किया, और वह सारिका देकर कहा "इस खग को आपही रखिये यह तन मन से श्यामसुन्दर में पग रही है।" अति अभिराम रीति से कुछ दिन श्रीचतुर्भुजजी का संग कर फिर मिल मिला के अपने गृह आकर भगवद्भक्ति में तत्पर हो वह राजा भी कृतार्थ हुआ ॥ ( १४६ ) श्रीमीराबाईजी*। (५८५) छप्पय । ( २५%) लोक लाज कुल-श्रृंखला तजि "मीरा" गिरिधर * धीमीराबाईजी की जीवनी धीरूपकलाजी को लिखी हुई सङ्गविलाल प्रेस में सचित्र छपी है, जिसका न्यवछावर ) है | २ श्रीमाराजी, श्रीरूपजी, श्रीसनातनजी, श्रीजीवगुपाई, प्रभृति संवत् १६११ से संयत् १६६२ के मध्य में अर्थात् अकबर बादशाह के समय में थे | ३ एक कविने संवत् १५७० में उनका विगजमान रहना लिखा है कोई १६३० और कोई १६४५ में उनका परमधाम जाना बताते है, कोई महाप्रभु श्रीकृष्ण वैतन्यजी के समय में बताते हैं इसी प्रकार उनके समय में यहुन मत-भेद है ॥ AKSHA CACANCEREACHECE न , ॐॐॐॐॐ भकिसुधास्वाद तिलक। भजी ॥ सदृश गोपिका प्रेम प्रगट, कलिजुगहिं दिखा- यौ। निरअंकुश अति निडर, रसिकजसरसनागायौ॥ दुष्टनि दोष विचारि, मृत्यु को उद्दिम कीयौ। बार न वांकौ भयौ, गरल अमृत ज्यौं पीयौ ॥ भक्ति निसान वजाय कै, काहू ते नाहिन लजी। लोक लाज कुल- शृंखलातजि "मीरा*" गिरिधर भजी॥११५॥(86) वार्तिक तिलक। श्रीमीराजी ने, भक्ति वाधक लोक लाज और कुलरीति की शृं- खला (वेडी) को तोड़कर, श्रीगिरिधरलालजी का भजन किया। श्रीगोपीजनों के समान प्रगट प्रेम कठिन कराल कलिकाल में दिखाया; और प्रेम प्रमत्तदशा से निरंकुश तथा निडर होकर रसना से रसिकशिरोमणिलाल का यश गान किया। आपकी यह प्रेमगुण युक्त भनिरीति देख, दोप विचार कर दुष्टों ने मृत्यु का उद्यम कर विष दिया; सो आपने महाविष को अमृत के समान पान कर लिया,और आपका एक बाल भी न टेढ़ा हुआ ॥ भक्तिरूपी दुंदुभी वजाकर किसी से लजानी नहीं । इसप्रकार श्रीमीराबाई जी ने श्रीगिरिधरलालजी का भजन किया । दो० "लाज छाँड़ि गिरिधर भजी, करी न कछु कुलकानि । सोई मीरा जग विदित, प्रगट भक्ति की खानि ॥१॥ नृत्यति नूपुर बांधिकै, नाचत ले करतार। विमल हियो भक्तनि मिली, तृण सम गनि संसार॥२॥ वन्धुनि विष ताको दियो, करि विचार चित्त आन । सो विष फिरि अमृत भयो, तब लागे पछतान ॥३॥ ललिता हू लइ चोलिकै, तासों हो अति हेत। आनंद सों निरखत फिरे, वृन्दावन रसखेत ॥ ४॥ (श्रीध्रुवदासजी) , COLLEGESCIENCE " *" मीरा पाठान्तर॥ SHOCKE RESS ห้เห็น *** श्रीभकमाल सटीका ७२० . (५८६) टीका | कवित्त । ( २५७) " मेरो*" जनम भूमि, झूमि हित नैन लगे, पगे गिरिधारी लाल, पिता ही के धाम मैं । राना के सगाई भई, करी व्याह सामा नई, गई मति बूड़ि, वा रँगीले घनश्याम मैं ॥ भाँवरे परत, मन साँवरेसरूप मांझ, तांवरै सी आवे, चलिचे को पति ग्राम में । पूछे पिता माता " पट श्राभरन लीजिये जू" लोचन भरत नीर कहा काम दाम मैं ॥ ४७१॥ (१५८) वार्तिक तिलक । परम भक्तिवती रूपवती श्री १०८ मीराबाईजीकी जन्मभूमि जो- धपुर राज्यान्तर्गत "मेरते" में थी; वहां के राव रत्नसेन की कन्या और जयमलजी की वहिन थीं। प्रेम से झूमकर आपके नयन श्री- गिरिधरलाल में लग के, पिता ही के गृह में पग गये; अर्थात् एक समय राजगृह के समीप किसी श्रीमान् के गृह में दूल्हे को खिड़की से देख पांच वर्ष की मीराजी गिरिधारीलाल के मंदिर में अपनी मातासे पूछने लगी कि “मेरा दूल्हा कहां है ?" माता (कोई कोई कहते हैं "भावज" ने कहा ) ने हँसकर श्रीगिरिधरलाल को बता दिया कि "यही हैं।" उसी क्षण से आपकी आंखें श्रीलालजी के प्रेम में रँग गई हृदय में अनुगग और अपनपी हो गया रात दिन एक पल न खोती थीं ! साथ रहती थीं पास सोतीथीं" "है तेरीही सारी चीजें मेरी । तू मेरा है प्यारा मैं हूँ तेरी॥" फिर जव योग्य अवस्थाहुई तब चित्तौर (मेवाड़)के राना सांगा के पुत्र भोजराजसे सगाईहुई । विवाहकी सामग्री पिता ने नवीन की परन्तु आपकी मति तो उस रँगीले श्यामसुन्दर में डूब गई थी; इससे भाँवरी पड़ने लगी उस क्षण आपका मन श्यामस्वरूप ही में मग्न था ॥ "मीरा, प्रभु गिरिधारिलाल सों करी सगाई हाल ॥" * राठौर घराने के राजवंश में जोधपुर राज्य के अन्तर्गत "मेरता" ग्राममें जन्म " की वहिन थीं। कोई २ कहते हैं कि चित्तौरगढ़ मेवाड़ के महाराना कुम्भ' के साथ इनकी शादी हुई थी । जो १४१८६०में गद्दी पर बैठा था, बड़ा चहादुर था । श्रीमीराजीने वैराग्य को " घाँघरा लहंगा" विवेक ज्ञान को "सारी" प्रेम को " सारी का रंग " भजन को “ सुर्मा अंजन" गाया है। लिया था | "जयमल . , भक्तिसुधास्वाद तिलक । ७२१ 'विवाह के अनंतर पति के ग्राम में चलने के समय आपको मूर्छा सी आ गई। माता पिता कहने लगे "वेटी ! पट वस्त्र भूषण जो तुझको लगे सो सब लो, दुखित मत हो।" आपने नेत्रों में जल भरकर कहा "मुझे धन भूपण तो कुछ भी नहीं चाहिये, परन्तु-॥" "देरी माई ! अव म्हाकों गिरिधरलाल ॥" (५-७) टीका । कवित्त । (२५६) "देवी गिरिधारीलाल, जो निहाल कियौ चाहौ, और धन माल सब राखिये उठाय के" । चेटी अति प्यारी, प्रीति रंग चढ्यौ भारी, रोय मिली महतारी, कही " लीजिये लड़ाय के" ॥ डोला पधराय, दृग दृग सों लगाय चलीं, सुख न समाय चाय, प्रानपति पाय के। पहुँची भवन सासु देवी पैगवन कियो निया अरु बर गठजोरी कस्यौ भाय के॥ ४७२ ॥ (१५७) वार्तिक तिलक । "जो मुझे प्रसन्न किया चाहौ, तो श्रीगिरिधारीलालजी को दो, और धन भूषण वसन सब अपना रख छोड़ो।" आप माता को अति प्यारी थीं, उसने देखा कि पुत्री को प्रभु के प्रीति का रंगभारी चढ़ा है इससे रो कर हृदय में लगा कर कहा कि "वेटी ! श्रीगिरिधर- लालजी को ले परम प्रेम से पूजा सेवा करना ॥" तब आप अपनी पालकी में पधरा के सामने आप भी नेत्रों को प्रभु के नेत्रों से मिला कर बैठ गई। और चलीं; अपने प्राणप्रिय प्राणनाथ गिरिधरगोपाल के पाने का आनन्द इतना था कि हृदय में नहीं समाता था। जो छवि दृष्टिगोचर होती थी वह श्रीमीराजी ही से पूछना चाहिये, दूसरा क्या जाने ? "जाकर जापर सत्य सनेह । सो तेहि मिलइ न कछ संदेहू ॥" राना के घर पहुँची; सासु उतार कर स्त्री पुरुष (अपने गांठ जोड़कर, देवी के गृह में लिवा गई। पुत्र )की * "माल" == धन धान्य ॥

अन PE ॐॐॐOPE श्रीभकमाल सटीक। ७२२ पै . . (५८) टीका । कवित्त । (०५५) देवी के पुजायवेकौं, कियो ले उपाय सासु, घर पुजाइ, पुनि वधू पूजि भाखियै । बोली "जू विकायो मायौ लाल गिरिधारी हाथ, और कौन नवे, एक वही अभिलाखिये" ॥ “बढ़त सुहाग याके पूजे ताते पूजा करो करौ जिनि हट सीम पायनि पै राखिय" । कही बार बार "तुम यही निरधार जानी वही सुकुमार जा पे वारि फेरि नाखिय" ॥ ४७३॥ (१५६) बार्तिक तिलक । मीराजीकी सासु ने, देवीकी पूजा का उपाय कर वर (अपने पुत्र) से पुजवा के फिर, आपको आज्ञा की कि "वह ! तुम भी देवी की पूजा करो, प्रणाम करो।" आपने उत्तर दिया कि "मेरा माथा तो श्रीगिरिधरलालजी के हाथ विक चुका है और के सामने अब नहीं झुकता, केवल उन्हीं के प्रणाम की अभिलाषा युक्त रहताहै।" फिर सासु कहने लगी कि “ देवीजी की पूजा करने से भाग सुहाग बढ़ता है, इससे हठ मत करो, पूजा करके चरणों में सीस रक्खो॥" आप बोली कि "मैं वारंवार कहती हूं, आप यही निश्चय जानिये, और को कदापि सीस नहीं नवाऊंगी।" चापाई। "धर्म नीति उपदेसिय तेही। कीरति भूति सुगति प्रिय जेही ॥" "केवल उन्हीं श्यामसुकुमार को मस्तक नवाऊंगी कि जिनके ऊपर तन मन सीस सव निवछावर करके फेंक दे चुकी हूं; आप व्यर्थ हठ मत कीजिये ॥" सर्वया । "पल काटौ सही इन नैनन के गिरिधारी विना पल अंत निहारे। जीभ कट न भजै नॅदनंदन, बुद्धि कटै हरिनाम विसारै ॥ "मीरा" कहै जरिजाहु हियो पदकंज बिना पल अंतर धारे। सीस नवे ब्रजराज विना वह सीसहि कादि कुवा किन डारै ॥" (५८६ ) टीका | कवित्त । (०५४) तब तो खिसानी भई, अति जरि बरि गई, गई पति पास "यह acteriotickeakisteresteCHOCIES , SASAR । भक्तिसुधास्वाद तिलक । ७२३ वधू नहीं काम की । अवहीं जवाब * दियौकियो अपमान मेरी, आगे क्यों प्रमान करै ?":भरै स्वास चाम की ॥ राना सुनि कोप कस्यौ, धत्यो हिये मारिबोई, दई ठौर न्यारी, देखि रीझीमति घाम की । लालनि लड़ावै गुन गाय के मल्हावै, साधु संग ही सुहावै, जिन्हें लागी चाह स्याम की ॥ ४७४ ॥ (१५५) वार्तिक तिलक। श्रीमीराजी का उत्तर सुन, सासु अति क्रोधित हो, जर वर के, अपने पति के पास जाकर कहने लगी कि “यह बहू तो कुछ काम की नहीं है, अभी ही उसने मुझे उत्तर दिया और अपमान किया, तब आगे मेरे वचनों का क्या प्रमाण करैगी?" ऐसा कह लोहार की भाथी सरीला श्वास भरने लगी। रानी की बात सुनकर, राना ने, वैष्णव शान भेद विरोध प्रभाव, तथा रजोगुण तमोगुण सुभाव से, अतिक्रोधित हो, श्रीमीराजी को मार ही डालना निश्चय कर, अपने अंतःपुर से न्यारा एक गृह आपके रहने को देदिया। आप एकांत देख बड़ी प्रसन्न हुई। अपने गिरिधरलाल को अष्टयाम लाड़ लड़ाती अति प्यार से सेवा पूजा भजन गुन गान किया करती और श्रीश्यामसुन्दर के सनेही संतों का संग छोड़ और कुछ आपको अच्छा नहीं लगलता था। मीराजी के लौकिक पति, कुमार ने दूसरा लिया और इस संसार से भी चलदिया । श्रीमीराजी पांवों में नूपुर वांध श्रीगिरिधरजी के सन्मुख अपने पद गाया और नाचा करती। साधुओं की सेवा सत्कार भी भली भांति से करती ॥" राना के विवाह कर । चौपाई। "सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु सत सरिस सुहाई ॥" माता पिता के दिये धन की त्रुटि तो थी ही नहीं। (५६) टीका । कवित्त । (२५३) आय के ननद कहे “गहै किन चेत भाभी | साधुनि सों हेतु मैं * "जयाय''= DIA-उत्तर ॥

सुख, जाको जाको दुख AR IRE ॐRE ७२४ श्रीभक्तमाल सटीक। कलंक लागै भारिय। राना देसपती लाजै;वाप कुल रती जात,मानि लीजै वात वेगि संग निरवारिय" ॥ "लागे प्रान साथं संत, पावत अनंत होय, ताको नीके करि टारियै। सुनिक, कटोरा भरि गरल पठाय दियौ, लियो करि पान रंग चढ्यौ यों निहारियै ॥ ४७५ ॥ (१५४) वार्तिक तिलक। मीराजी का भजन साधु संग देख एक दिन राना की कन्या (ऊदाबाई ) आके शिक्षा करने लगी कि "भाभी ! ( भावज) तुम चेत नहीं करती हो, साधुओं से प्रेम करने से बड़ा भारी कलंक लगता है; तुम्हारी रीति देख देश-पति राना लजित होता है; तुम्हारे पिता के कुल की भी मर्याद जाती (नष्ट होती) है; मेवाड़ ओर जोधपुर दोनोंकी हँसी होती है। मेरी बात मानकर अभी अभी वैरा- गियों का संग छोड़ दो।" वह समझाकर हार थकी पर आपने उत्तर दिया कि "मैं संतों के संगसे अनंत सुख पाती हूँ, इससे संत लोग मेरे प्राणों के साथ हैं; जिसको लाज और दुख हो, उसको तुम छुड़ाओ अथवा जिसको दुख लगे सो मेरे पास न आवे ॥" निदान, इस वार्ता को जब राना ने सुना, तब एक कटोरा भर महाविष तुलसी छोड़ "चरणामृत" कहकर भेज दिया। आपने सीस चढ़ा प्रसन्नतापूर्वक पान कर लिया। कुछ व्यतिकम होने की तो बात ही क्या ? बरंच आपके हृदय में प्रेम रंग की प्रभा चदगई और मुख की छवि अत्यन्त बढ़ गई ॥ उस समय जो पद गाया था उसकी पहिली कड़ी यह है:- "रानाजी जहर दियो, हम जानी ॥" (५६१) टीका | कवित्त । (२५२) गरल पठायौ, सो तो सीस लै चढ़ायौ, संग त्याग विष भारी, ताकी भार न सँभारी है। राना नै लगायो चर, वैठे साधु ढिग ढर, तवही खबर कर मारौ यहै धारी है-॥ राज गिरिधारीलाल, तिनहीं सों रंग जाल, बोलत हँसत ख्याल, कानपरी प्यारी है। जाय के rectorate Reso PER , - R भकिसुधास्वाद तिलक। ७२५ सुनाई, भई अति चपलाई, आयौ लिये तरवार, दै किवार, खोलि न्यारी है ॥ ४७६ ॥ (१५३) वार्तिक तिलक। श्रीमीराजी को राना ने विष भेजा सो तो सीस पर चढ़ा कर पानकर हो गईं, परंतु संतों का त्याग रूपी महाविषकी झार भी न सह सकीं; जब विष से आप नहीं मरीं, तब राना ने कई प्रतिहारों (चारों) से कहा कि "तुम यह मर्म लो जव वह किसी वैरागी के साथ एकांत बैठी हो तब शीघ्र आकर समाचार कहो, उसी क्षण मैं आकर उसको मार डालूंगा।" एक समय श्रीमीराजी श्रीगिरिधरलालजी के साथ एकांत में रस रंग भरी वार्ता करती हँसतीहुई चौपड़ खेलतीथीं, चातचीतको सुनकर जाके चरने रानासे कहा कि "इस समय मीरा किसीसे हँसी वार्ता कर रही है।" राना खड्ग लेकर अति चपलता से आया, और वोला कि "खोल किवाड़।" आपने तत्काल ही किवाड़ खोल दिये। (५६२) टीका | कवित्त । (२५१) "जाके संग रंग भीजि, करत प्रसंग नाना, कहां वह नर गयौ, वेगि दे बताइयै"। "आगे ही विराजै, कल्लू तोसों नहीं लाजै, अy देखि सुख साजै, आंखें खोलि दरसाइयै" ॥ भयोई खिसानो राना, लिख्यो चित्र भीत मानो, उलटि पयानो कियौ, नेकु मन आइयै । देख्यो हूं प्रभाव ऐपै भाव में न भिद्यो जाइ, बिना हरिकृपा कहो कैसे कर पाइयै ॥ ४७७ ॥ (१५२) वार्तिक तिलक । राना मीराजी के साथ किसी मनुष्य को न देख पूछने लगा कि "तू जिसके संग रंग भीज के अनेक प्रेम प्रसंग करती रही, सो मनुष्य कहां गया ? शीघ्र बता;" आपने उत्तर दिया कि वे पुरुष तुम्हारे आगे ही विराजमान हैं, कुछ तुम से लजाने वाले नहीं; नेत्र खोल देखो, अब भी सब सुख साजते हैं।" राना ने देखा तो श्रीगिरिधरजी के हाथ में पासे हैं जोकि चौपड़ में डालने को लिये थे। तब अति लजितहुआ, मानों चित्र का लिखा * .

अद ७२६ *- ARTISRO श्रीभकमाल सटीक। । है । लौटके अपनासा मुँह लिये चला आया, कुछ मन में विस्मित हुआ, पर प्रत्यक्ष प्रभाव देखकर भी प्रीतिभाव कुछ मन में नहीं पैठा; पैठे कैसे ? विना प्रभु तथा हरिभक्कों की कृपा के भक्तिभाव कोई कैसे पा सकता है ? ॥ (५६३ ) टीका | कवित्त । (५०) विषई कुटिल एक भेप धरि साधु लियो, कियो यो प्रसंग "मोंसों अंग संग कीजियै । आज्ञा मोंकों दई आप लाल गिरिधारी;" "अहो सीस धरि लई, करि भोजन हूं लीजिये" ॥संतनि समाज में विछाय सेज बोलि लियौ, “संक अब कौन की निसंक रस भीजिय" । सेत मुख भयो, विभाव सब गयो, नयौ पायन पे आय, "मोको भक्ति- दान दीजिये" ॥ ४७८ ॥ (१५१) यार्तिक तिलक । एक दिन की विचित्र वार्ता सुनिये, एक कुटिल विपई पापी दुष्ट साधु का भेष धारण किये हुए आके आपसे बोला कि "मुझे गिरि- धरलाल ने स्वयं आज्ञा दी है कि “तुम जाके मीरा को पुरुष संग का सुख दो,” सो तुम मुझसे अंग संग करो।" श्रीमीराजी ने उत्तर दिया कि "आज्ञा मेरे सीस पर है, प्रथम आप प्रसाद भोजन तो कर लीजिये, मैं सेवा को उपस्थित हूं।" आप संतों के समाजके मध्यमें सेजविलवाकर उस विषई से बोली कि "आप इस पथक पर सुखपूर्वक विराजिये और मुझे जो आज्ञा हो; जब प्रभुकी आज्ञा है ही तो अब किसकी शंकाहै ? आइये निशंक रस रंग में डूब के अंग संग कीजिये ॥" श्रीमीराजी के वचन सुन उसका मुख फीका पड़गया; . "उसके तो रही न जान तन में । काटोतो लहू न था बदन में॥" (नसीम) विषयभाव तज,आपके चरणों में पड़ गिड़गिड़ाने और कहनेलगा कि “मुझे अब हरिभाक्ति दान दीजिये।" आपने कृपादृष्टि से देख, KKRECE AAOSASSASARIO ७२७ , , NISASRASNA 13 भक्तिसुधास्वाद तिलक। उसको हरि सन्मुख करदिया। सन्तों की मण्डली को श्रीमीराजी के इस आचरण और चरित्र से बड़ा ही हर्ष प्राप्त हुआ; और आपका यश चारोंओर बहुत फैल गया । आपके हृदय में भक्तिप्रवाह के साथ रसमयी कविता का श्रोत भी आ मिला, आपके बहुत पद हैं। राना ने आपके मार डालने के लिये सर्प आदि प्रयोग भी किये पर न आप मरी ही, और न राना की आंखें ही खुलीं ॥ (५६४ ) टीका | कवित्त । (२४६) रूप की निकाई भूप "अकबर" भाई हिये लिये संग तानसेन देखिबेको आयो है । निरखि निहाल भयो, छवि गिरिधारीलाल, पद सुखजाल एक, तब ही चढ़ायो है ॥ वृन्दावन आई, जीव गुसांईज सों मिलि झिली, तिया मुख देखिवे को पन लै छुटायो है । देखी कुंज कुंज लाल प्यारी सुखपुंज भी धरी उर मांझ, आय देस, बन गायो है ॥ ४७६ ॥ (१५०) पातिक तिलक। अद्भुत प्रेम और आपके रूप की सुन्दरता सुनके अकबर बाद शाह के मन में छटपटी सी लगी लो एक दिन वह अपना ऐश्वर्य छिपाके तानसेन गायक के साथ आपके दर्शन को आया । श्रीगिरि- धरलाल के सहित मीराबाई का सुन्दररूप और भक्ति देख कृतार्थ हुआ। उसी समय तानसेन ने एक नवीन पद रच, माकर आपको अर्पण किया। फिर आपकी भक्ति की प्रशंसा करते दोनों चले गए। कहते हैं कि एक बहुमूल्य महा प्रभा हार भक्न भूषण श्रीमीरानी के करकमलों में गुसभेप अकबरने बड़ीश्रद्धा,नम्रता और आदरसे दिया। धाम प्रेम से वृन्दावन आई । “मीरा प्रभु गिरिधर के कारण जग उपहास सहाँगी॥" प्रशंसा सुन, एक दिन आप श्रीजीव गुसाईंजी के मिलने को गई, गुसाईजी ने कहला भेजा कि "मैं स्त्री का मुख नहीं देखता;" श्रीमीराजी ने उत्तर दिला भेजा कि "मैं तो आज तक पुरुप एक 'श्रीगिरिधरलालजीही को जानती थी और सब जीवमात्रको स्त्री सम HTTARA * ७२८ श्रीभक्तमाल सटीक। समझती थी, परंतु जीवगुसाईंजी दूसरे पुरुप वृन्दावन में बने बैठे हैं कि स्त्री का मुख नहीं देखते । श्रीवृन्दावन तो भगवान् श्री. कृष्णचंद्र का रंगमहल है आप महात्मा विख्यात होते हुये भी यदि अपने तई भी पुरुषही मानतेहों तो अन्तःपुर में जो आपने यों स्थान रक्खा है इस निडर साहस की सूचना श्रीराधा महारानी के पास अभी अभी क्यों न पहुँचाई जावे सो श्राप शीघ्र बताने की कृपा कीजिये कि सचही क्या आप अपने आपको पुरुष मानते हैं।" इस प्रकार उत्तर सुन गुसाईंजी स्वयं चलके अपना पन छोड़, आपके दर्शन किये। दोनों भक्तों ने प्रेम से मिल झिलके परस्पर दर्शन संभाषण सुख लिये; फिर, “सेवा" आदि वृन्दावन के कुंज कुं- जन प्रति सुखपुंज राधाकृष्णजी का दर्शनकर शोभा हृदय में धर, जो देखी थी, सो अपनी अनुभव भावना सव सप्रेम पदों से गान किया। राना के यहां की उत्पीड़न और उपद्रव से उदासीन हो, गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी की सम्मति पा द्वारिका आई। (५६५) टीका | कवित्त । (२४% ) राना की मलीन मति,देखि,बसी द्वारावति, रति गिरिधारीलाल, नित ही लड़ाइये । लागी चटपटी भूप भक्ति को सरूप जानि, अति दुख मानि, विप्र श्रेणी लै पठाइयै ॥ वेगि लै के आवौ मोकों प्रान दैजिवावौ अहो गये द्वार धरनौ दै विनती सुनाइयै । सुनि विदा होन गई राय रणछोर जू पै छोडौं राखौ हीन लीन भई नहीं पाइयै ॥४८० ॥ (१४६) वार्तिक तिलक । राना का वैरभाव और मलीनमति देख, आपने द्वारिकाजी में आकर निवास किया "द्वारिका को वास हो मोहिं द्वारिकाको वासा" नित्य सप्रेम श्रीगिरिधरलालजी को लाड़ लड़ाती थीं। उधर रानाके चित्तौरगढ़ में बहुत से उपद्रव होने लगे। तब इसने आपकी भक्ति का स्वरूप जाना । दुःखित हुआ, मन में यह चटपटी लगी कि “मीराजी यहां आजायँ तो भला।" तब बहुत से ब्राह्मणों BACHOCRACKGRECRACREACOLORicot ७२६ , HARIHARANARREARS भक्तिधास्वाद तिलक। को वुलाकर कहा कि “आप लोग जाकर मीराजी को लिवा लाइये, तो मानों मुझे प्राण जीवन दान दीजिये ।" द्वारावती जाके उन ब्राह्मणों ने बहुत भांति से कहा, परंतु आपके मन में एक न आई। तब ब्राह्मणों ने धरना देकर कहा कि “जब तक नहीं चलोगी तब तक हम अन्न जल नहीं ग्रहण करेंगे।" आपने कहा "अच्छा, मैं श्रीरणछोरजी से विदा हो आऊं।" आके एक पद बनाके गाया- "हूँ मुलतजी मैं आपसे मेरी यही है इलतिजा । चरणों से अपने अव अलग मुझको न दम भर कीजिये ॥ तुम विनु मेरो और न कोऊ कृपारावरी कीजिये। "मीरा के प्रभु गिरिधर नागर मिलि विजुड़न नहिं दीजिये ॥" प्रभु ने सप्रेम प्रार्थना सुन, मीराजी को सदेह अपनी मूर्ति में (प्रायःसंवत् १६४५ में) लीन कर लिया, मीराजी का केवल एक वत्र मात्र प्रभु के ऊपर रह गया। देखकर सब ने "जय जय"कार' किया।बाबू कार्तिकप्रसादजी ने और श्रीवियोगीजी ने भी आपका संक्षिप्त जीवनचरित्र लिखा है ॥ (श्रीकविकीर्तन ) . कलियुग मीरा भई गोपिका द्वापर जैसी, कृष्ण-भक्ति-सर-लीन मीन है है नहिं ऐसी। भजि गिरिधरगोपाल जगत सो नातो तोस्यो, विमुखन सों मुख मोरि स्याम सों नेहा जोस्यो ।। २७ ॥" राणा ने विप दियो पियो चरनामृत करिकै, चार न बांको भयो ध्यान पिय को हिय धरिकै। लोक-जाज तज प्रगटि संत-सँग गाई नाची, प्रेमविरह-पद रचे लालगिरिधर-गैंगराची ॥२८॥" (वियोगीहार) - श्रीमीराजी के अनन्तर, अकबर ने राना के नगर को लेलिया । यहां श्रीमीराबाई जी के उतनेही चरित्र लिखे गये कि जो श्रीप्रिया- दासजी ने लिखे हैं। Relect simonsen ' store FARRIER ७३० श्रीभक्तमाल सटीक। (५६६) छप्पय । (०४७) आमेर * अछत कूरम कौ, द्वारिकानाथ दरसन दियौ ॥ श्रीकृष्णदास उपदेस, परम तत्त्व परचौ पायौ। निरगुन सगुन निरूप तिमिर अज्ञान नसायौ ॥ काछ वाच निकलंक मनौ गांगेय युधिष्ठिर । हरिपूजा प्रह- लाद, धर्मध्वज धारी जगपर ॥ "पृथीराज" परचौ प्रगट तन संख चक्र मंडित कियौ । आमेर अछत कूरम कौ द्वारिकानाथ दरसन दियौ ॥ ११६ ॥ (६८) ( १५०) श्रीप्टथ्वीराजजी। पार्तिक तिलक। श्रीपृथ्वीराजजी कूर्म अर्थात् कछवाह आमेर नगर के राजा को आमेर ही में श्रीद्वारिकानाथजीने कृपा करके दर्शन दिया। पयहारी श्रीकृष्णदासजी के उपदेशसे आपको परब्रह्म तत्व का परचौ, अर्थात् साक्षात्कार ज्ञान, प्राप्त हुआ; श्रीरामजी के निर्गुण और सगुणरूप के निरूपण से गुरु श्रीकृष्णदासजीने अज्ञानरूपी अंधकार सव नाश कर दिया। आप कच्छ में निःक्लंक, अर्थात् स्वपत्नीव्रत जितेन्द्रिय श्रीगांगेय (भीष्मजी) के सरिस;सत्य वचन बोलने में श्रीयुधिष्ठिरजी के तुल्य; श्रीहरिपूजन में प्रहादजी के समान और सम्पूर्ण जगत् के लोगों से परे (श्रेष्ठ ) धर्म की धजा धारण करनेवाले हुए। श्रीपृथ्वीराजजी का यह परिचय प्रगट हुआ कि आमेर ही में द्वारिका के छाप शंख चक्र गदा पद्म के चिह्नों से आपका तन भूषित हुआ। (५९७) टीका । कवित्त । (२४६) पृथीराज राजा चल्यो द्वारिका श्रीस्वामी संग, अति रस रंग भयौ, आज्ञा प्रभु पाई है । सुनिके दीवान + दुख मानि, निसि कान लग्यो, कही "पग्यौ साधुसेवा भक्ति पुर छाई है ॥ देखियै * 'श्रामेर"-श्रावर पाठान्तर ॥ + "दीवान"=JIN=मुख्य मत्री, प्रधान ॥ . , + । --२ भक्रिसुधास्वाद तिलक । निहारि के विचार कीजै, इच्छा जोई," "लीजै नहीं साथ, जावौ;" वात ले दुराई है । आयौ भोर भूप हाथ जोरि करि ठाढ़ौ रह्यो; कह्यो "रही देश;" सो निदेस न सुहाई है ॥ ४८१ ॥ (१४८) वार्चिक तिलक । आमेर के राजा श्रीपृथ्वीराजजी, स्वामी श्रीकृष्णदासजी की आज्ञा ले साथ साथ द्वारिकाजी चलने को, प्रेमरंग से भरे सन्नद्ध हुए। यह सुन मुख्य मंत्री ने, दुःखित हो रात्रि में जाके श्रीस्वामी- जी से प्रार्थना की कि "प्रभो ! राजा साधु-सेवा में पग रहे हैं और. पुरभर में भक्ति छा रही है, इस समय इनके यहां से चले जाने से साधु-सेवा में विघ्न होगा आप दिव्यदृष्टि से देख विचार के जो अच्छा हो सो कीजिये ।" श्रीपयहारीजी ने कहा कि "तुम अच्छा कहते हो जाओ हम उनको साथ नहीं ले जायेंगे ॥" श्रीस्वामीजीने मंत्री की बात छिपा रक्खी; प्रातःकाल राजा आके स्वामीजी के आगे चलने के लिये हाथ जोड़ खड़े हुए; आपने आज्ञा दी कि "तुम यहां ही नगर में रहौ, साधु-सेवा करो।" सुनके राजा को आज्ञा प्रिय न लगी। (५६%) टीका | कवित्त । ( २४५) "द्वारावतीनाथ देखि, गोमती स्नान करों, धरों भुज छाप," आप मन अभिलाखियै । "चिंता जिनि कीजै तीनों बात इहां लीजे अजू;" दीजै जोई आज्ञा सोई सिर धरि राखियै ॥ आये पहुँचाय दूर, नैन जल पूर बहै, दहै उर भारी, "कहां संग रस चाखियै ?"। बीते दिन दोय, निसि रहे हृते सोय, भोइ गई भक्ति गिरा आय वानी मधु भाखियै ॥ ४८२ ॥ (१४७) वार्तिक तिलक । स्वामीजीसे राजाने प्रार्थना की कि श्रीद्वारिकानाथ के दर्शनकर गोमती स्नान करूंगा, और भुजाओं में शंखचक्रादिक छाप लूंगा, आप कृपाकर मुझे साथ ले चलने की इच्छा करिये। आपने उत्तर दिया "तुम चिंता मत करो दर्शन,स्नान,छाप, तीनों यहांही लो।" सुनकर राजाने कहा “जो आपकी आज्ञा है सो सीसपर रखता हूं।" RECORE CaCORE FAC Pok SHI ARH श्रीभक्रमाल सटीक। ७३२ . स्वामीजी ने द्वारिका को यात्रा किया, आप बहुत लम्बे तक पहुँचाके लौट आये । नेत्रों में प्रेमजल की धारा बहने लगी, हृदय में वडा अनुताप हुआ। मन में विचारने लगे कि स्वामीजी के साथ का सुख मुझ मंदभागी को न मिला, इस अनुताप से दो दिवस चीते तीसरी रात्रि में सोने लगे; श्रीकृष्णदासजी की भक्रियुक्र वाक्य श्रीद्वारिकाधीशजी के मन में व्याप्त होगई, इससे साक्षात् आके राजा से मधुर वाणी वोले ॥ (५६६)ीका । कपित्त । (४८) "अहो पृथीराज" कही, स्वामी ही सी बानी लही, आयो उठि दौरि वाही ठोर प्रभु देखे हैं । घुम्यो कह्यो कान धरी, गोमती स्नान करौ, सुनि के अन्हायो, पुनि वे न कहूं पेखे हैं । संख चक्र आदि छाप तन सब व्याप गई,भई यो अवार रानी आय अवरखे हैं। बोले “ रह्यौ नीर में सरीर, लै सनाथ कीजै, लीजै नाथ हियै,"निज -भाग करि लेखे हैं ॥४८३॥ (१४६) वात्तिक तिलक। সম্ভ ने श्रीकृष्णदासजी कीसी ही वाणी से पुकारा कि "ऐ पृथ्वी- राज !” राजा सुनके उठे और दौड़के वहां ही आये; देखें तो श्री- द्वारिकानाथजी खड़े हैं;प्रदक्षिणा कर साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु ने आज्ञा दी कि “कानों को मंद गोमतीजी में स्नान करो॥" आज्ञा सुन राजा ने प्रत्यक्ष श्रीगोमतीजी में स्नान किया, फिर प्रभु अंतर्धान होगये । उनको न देखा और शंखचक आदिक छा राजा के तन में सब अंकित हो गई। उठने में कुछ विलंब देख रानी ने भा देखा; आपने कहा कि "मैं गोमती के जल में रहा हूं, मेरे शरीर और वस्त्रों का जल ले. कर तुम भी स्पर्श करके अपने शरीर को सनाथ करलो ॥" (कोई कहते हैं कि गोमती ही जी प्रत्यक्ष थीं उसी में रानी को स्नान कगया) और कहा कि " हृदय में द्वारिकानाथजी का ध्यान भी कर लो;" रानी ने वैसाही कर अपने बड़े भाग माने ॥ Reache . । भकिसुधास्वाद तिलक। ७३३ (६००) दीका | कवित्त । ( २४३) भयौ जब भोर, पुर बड़ौ भक्ति सोर पस्यो, कस्यौ आनि दरसन भई भीर भारी है । आये बहु संत, औ महंत बड़े बड़े धाये, अति सुख पाये, देह रचना निहारी है ॥ नाना भेट आवे, हित महिमा सुनावे, राजा सुनत लजावे, जानी कृपा बनवारी है। मंदिर करायो, प्रभु रूप पधरायौ, सब जग जस गायौ, कथा मोको लागी प्यारी है ॥ ४८४॥ (१४५) बार्तिक तिलक । जब प्रभात में राजा बाहर माये, और सब लोगोंने शंखचक्रादि मुद्रा दोनों वाहु में देखे, तब तो नगर भर में आपकी भकि का वड़ा धूम मच गया; सब दर्शन के लिये आये बड़ी भारी भीड़ हुई; पुर में और पुर के समीप जितने बड़े बड़े भारी संत महंत थे सब दौड़ आये । आपके देह की रचना देख अतिसुखी हुए। भले लोग अनेक प्रकार की भेंट लाते हैं, कोई आपकी भक्ति की महिमा गाते हैं; राजा सुन लज्जित होकर श्रीवनमाली प्रभु की कृपा विचारते हैं। तदनंतर राजाजी बड़ा भारी मंदिर बनवा प्रभु को पधरा के सप्रेम पूजा भजन में तत्पर हुए। सम्पूर्ण जगत् के लोग आपका यश गान करते थे, श्रीपृथ्वीराजजी की यह कथा मुझे बड़ी प्यारी लगी है । (६०१) टीका | कवित्त । (२४२) विप्र दृगहीन सो अनाथ, वैजनाथ द्वार पस्यौ, चख चाहै,मास केतिक विहाने हैं। आज्ञा वार दोय चार भई “ये न फेरि होहिं, याको हठसार देखि, शिव पिघलाने हैं ॥ "पृथीराज" अंग के अंगोछा सों अंगोछौ जाय, आय के सुनाई द्विज गौरव डराने हैं। नयों मैंगवाय तन छ्वाय दियो वायौ नैन खुले चन भयौ जन लखि सरसाने हैं। ४८५॥ (१४४) वार्तिक तिलक। एक समय एक अंधा अनाथ ब्राह्मण श्रीवैद्यनाथ महादेवजी के द्वार पर नेत्रप्राप्ति के लिये जा पड़ा; कई मास व्यतीत हो गये स्वप्न में (वा समापियों के द्वारा)शिवजी ने दो चार वार आज्ञा दी SHES ७३४ श्रीभकमाल सटीका कि “ये नेत्र फूटने पर फिर ज्योतियुक्त नहीं होने के"परंतु ब्राह्मणने बड़ा हठ किया। उसके हठ का सारांशं देख, शिवजीने प्रसन्न होकर आज्ञा दी कि "जाओ, श्रीरामभक पृथ्वीराज के अंग पोंछने के अंगोछे से नेत्रों को पोंछौ, खुल जायँगे ॥" आकर उस ब्राह्मण ने वृत्तान्त आपसे कहा। प्रथम तो आप ब्राह्मण के गौरव से अपने अंग पोंछने का वस्त्र देने में डरे । तथापि नवीन वस्त्र मँगा, अपने अंग में छुला, विप्र को दिया। ब्राह्मणजीने 'खें पोंछी; तत्काल नेत्र खुल गये। ब्राह्मणजी सुखी हुए । भक्ति की महिमा जानी । सव लोग यह कौतुक देख पृथ्वीराज के प्रभाव से सरस हो, जयजयकार करने लगे। पृथ्वीराज की भक्ति की जय ॥ (६०२) छप्पय । (२४१) भक्तनि को आदर अधिक,राजवंशमें इन कियौ। लघु, मथुरा: मेरता भक्त अति जैमलं पोपे। टोड़े भजन.निधान रामचंद्र हरिजन तोषे ॥ अभैरामें एक रसहिं नेम नावां के भारी। करमसी, सुरतान, भगर्वान, वीरमै भूपति व्रतधारी ॥ ईश्वर, अखैराज, रायमले कन्हेरे, मधुकर नृप,सरवसु दियौ। भक्तनि को आदर अधिक, राजवंश में इन कियौ ॥ ११७॥ (६७) वार्तिक तिलक । राजवंशियों में इतने राजाओं ने भगवद्भक्कों का अति आदर सेवा सत्कार किया ॥ मथुरामें श्रीलघुजनजी, मेरता में श्रीजयमलजीने भनों को अति पोषण किया। टोड़े में भजननिधान श्रीरामचन्द्रजनजी ने हरिजनों का अति संतोप किया। श्रीनीवांजी ने तथा श्रीअभयरामजी ने साधुसेवाका भारी नेम एकरस निवाहा । करमसी में श्रीभगवान्जी, और सुरतान में बीरमजी, ये दोनों भूप साधुसेवाव्रत धारण करने वाले हुए। श्रीईश्वरजी, श्रीअक्षयराजंजी, श्रीरायमलजी, श्रीका- RecturemeCRECRACKeeck PACK 자 , HS भकिसुधास्वाद तिलक। ७३५ न्हरजी, श्रीमधुकरसाहजी, इन राजामों ने भगवद्भक्तों को अपना सर्वस्व दिया और जग में यश लिया ॥ १ श्रीलघुजनजी ७ श्रीवीरमजी २१ श्रीजयमलजी ८ श्रीईश्वरजी ३ श्रीरामचन्द्रजनजी है श्रीअक्षयराजजी ४ श्रीनीवाजी १० श्रीरायमलजी ५ श्रीअभयरामजी ११ श्रीकान्हरजी ६ श्रीभगवान्जी १२ श्रीमधुकरसाहजी श्रीसीतारामीय मुंशी तपस्वीरामजी ने लिखा है कि किसी वृद्ध भक्तमाली तथा शुद्ध भक्तमाल की प्रति के न मिलने से नामों का ठीक पता लगाना गड़ा ही कठिन है।" श्रीराधाकृष्णदासजी ने भी लिखा है कि खेद का विषय है कि मुझे श्रीहरिश्चन्द्र जी की लाइब्रेरी में और काशी-नागरीप्रचारिणी सभा में भी कोई शुद्ध प्रति इसकी (नामाजी कृत भक्तमाल की ) नहीं मिली" इससे नामों के पता लगाने में बहुत कुछ कठिनता पड़ी। श्रीराधाकृष्णदासजी ने ( १ ) "व्यासजी की वाणी" से छब्बीस २६, (२) "भगवत्रासिकजी की भक्तनामावली" से एकसौ उनतीस १२६, ( ३ ) "मलूक दासजी के ज्ञानबोध" से छ्यासह ६६, (४) "नागरीदास के पदप्रसंगमाला" से छत्तीस ३६, और (५) "धुवदासजी की भक्तनामावली" से एकसौ वाईस १२२ नामों की नामा- चलियां लिखी है। इसके लिये धन्यवाद देता हूँ । पर उन्होंने भी श्रीभक्तमाल की नामावली नहीं ही लिखी ॥ (१५१) श्रीजयमलजी*। (६०३ ) टीका । कवितं । ( २४०) मेरतें बसत भूप, भकिको संरूप जाने, जैमल अनूप कहि आये हैं। करी साधुसेवा रीति प्रीति की प्रतीति भई नई एक सुनौ हरि केसेके लड़ाये हैं। नीचे मानि मंदिर सो सुंदर विचारी बात, छात पर वंगला के चित्र ले वनाये हैं । विविधि बिछौना सेज राजत उदौना पानदान धरि सौना जरी परंदा सिवाये हैं ॥४८६॥ (१४३) वार्तिक तिलक । श्रीमीराबाईजी के भाई श्रीजयमलजी राजा मेरते (मीरथ) में बसते, भक्ति का अनूप रूप जानते थे, जिनकी कथा प्रथम * कहते हैं कि श्रीजयमलजी श्रीमीराबाईजी के छोटे भाई थे। इन्होंने मारथ (मेरठ) नगर को छोटी मथुरा ही बना रक्खा था | LECRETS PEK जाकी कथा PR श्रीभक्रमाल सटीकः। (कवित्त २३१ में ) कह आये हैं। उनकी सतों में प्रतीति हुई इस लिये रीति प्रीति से सेवा की। अब जिस प्रकार से श्रीहरि को लाड़ लड़ाया सो नवीन वार्ता सुनिये । मन्दिर में प्रभु की सेवा पूजा होती थी; परंतु इसको नीचा मान एक सुन्दर वात विचार, ऊपर छत पर बड़ा विचित्र बँगला बनवाया । उसमें चंदोवा, दिव्य सेज, सुन्दर तकिये, बिछौना, ओढ़ना श्रादिक सज सजाके, सुन्दर जड़ाऊ सुवर्ण के पानदान, इनदान आदिक सामग्री सब रख, जरी के परदे द्वारों में लगवाये, भली भांति सजवाया रचना कराया ॥ (६०४) टीका | कवित्त । (२३६) ताकी दारु सीढ़ी, करि रचना, उतारि धरै, भरै दूरि चौकी, आप भाव स्वच्छताई है। मानमी विचारें "लाल सेज पग धार, पान खात लै, उगार डार, पौढ़े सुखदाई है ॥तिया हूं न भेद जाने, सो निसनी धरी वान, देखे को किशोर सोयो फिरी भोर आई है। पति को सुनाई, भई अति मन भाई, वाकों खीमि डरपाई, जानी भाग अधिकाई है ॥४८७॥ (१४२) वार्तिक तिलक । उस सदन में चढ़ने के लिये केवल काठ की सीढी रक्खी। अपने हाथों सब रचना कर फिर सीढ़ी पृथक् धर देते थे। आपके मन में भावना की निर्मलता थी। इससे अलग चीकी दिया करते। यह मानसी भावना ध्यान करते थे कि "श्रीलालजी सेज पर पधारते हैं, पान खाते हैं, फिर पीकदान में उगाल डालदेते हैं। भक्कों के सुखदाता शयन करते हैं।" इस भेद को आपकी स्त्री भी नहीं जानती थी। एक रात वही काठ वाली सीढ़ी लगाकर चढ़के उसने झांकके देखा तो उस सेजपर कोई किशोर श्यामसुन्दर सोरहे हैं। लौट आई फिर प्रभात आके अपने पति जयमलजी को वह वार्ता सुनाई। आपने सुनके सुखपूर्वक अपना मनोरथ पूर्ण माना और ऊपर से स्त्रीको रिसाके डरवाया कि "साव- धान, सनो, अब ऐसा कभी न करना पर हृदय में उसका भाग अधिक जाना कि "धन्य है यह जिसने श्रीप्रभु के साक्षात् दर्शन Reckected FAL . " . , . RS भनिसुधास्वाद तिलक। पाये।" भावना हो तो ऐसी हद हो । सेवा हो तो थों वित्तशाट्य छोड़ कर।भापके अष्टयाम की जय, आपके मानसी भावना की जय ।। ( १५२) श्रीमधुकर साहजी। (६०५) टीका । कवित्त । (२३८) मधुकरसाह, नाम कियो लै सफल जाते, भेष गुनसार ग्रहै, तजत असार है। "ओड" की भूप, भक्त भूप, सुखरूप भयौ, लयो पनभारी जाके और न विचार है । केटी धरि आवै कोय, धोय पग, पीवै सदा, भाई दूखि, खर गर डायो मालभार है। पांय परछाल, कही "आज जू निहाल किये," हिये द्रये दुष्ट पांव गहे दृगधारहे॥४८८॥(१४१) बार्तिक तिलका "श्रीमधुकरसाह"जी, नाम देश बुंदेलखण्ड ओड़छा (टीकमगढ़) नगर के राजा, भकराज हुए। अपने नाम का गुण यथार्थ दिखा दिया अर्थात् जैसे मधुकर (भ्रमर) ऊंचे नीचे सब फूलों का सार रस और सुगंध ही मान लेता है ऐसे ही ऊंचे नीचे कोई शरीर में हरिभक्त का वेप देख वही सार ग्रहण करते थे, जाति पक्ष नहीं। जो कोई कंठी तिलक धारण कर आवै उसी का चरण धोके चरणा- मृत लेते परिकर्मा दण्डवत् करते थे। आपका ऐला व्रत भारी था ।। यह देख आपके भाइयों को अच्छा नहीं लगता था; दुष्टोंने एक दिवस एक गधे के तिलक कर, बहुत से माला पहनाय, आपके निवास की ओर कर दिया। आप देखते ही उस गर्दभ का चरण धो, चरणामृत ले, उसको भोजन कराया, और बोले "आज मैं कृतार्थ कि गर्दभ भी कंठी तिलक धारणकर मेरे घर आते हैं।" दो० "भूतल में अवलौं मिले, द्वै पद के बहु चारि चरन के आज ही, देख्यों संत लसंत ॥१॥" दुष्ट सघ यापकी निष्ठा देखकर नेत्रों में प्रेमजल भर चरणों पर पड़े, और हरिसन्मुख हुए। CEOCOCCOREGAOKEScal हुआ संत। sscrick न श्रीभक्तमाल सटीक। (१५३) राठौर श्रीखेमालरत्नजी। (६०६) छप्पय । (२७) खेमालरतन राठौर के, अटल भक्ति आई सदन ॥ "रैना” पर गुण राम भजन भागौत उजागर । प्रेमी परम “किशोरै उदर राजा रतनाकर ॥ हरिदासनके दास, दसा ऊंची, ध्वज धारी। निर्भे, *अननि, उदार, रसिक, जस रसना भारी॥ दशधा संपति, संत वल, सदारहत प्रफुलित बदनाखेमालरतन राठौरके,अटल भक्ति आई सदन ॥ ११८ ॥ (६६) वार्तिक विलक। क्षत्री राठौर श्रीखेमालरत्नजी के घर में, अटल ( अचल) भगवद्भक्ति ने आके निवास किया । श्रीखमालरत्नजी के पुत्र रामर- यनजी श्रीराम गुणश्रवण और भजन में परायण परम उजागर भागवत हुए । श्रीरामरयनजी के पुत्र “किशोरसिंहजी" परम प्रेमी ऐसे शुभ गुण युक्त हृदय वाले शोभित हुए कि मानों रत्नाकर (समुद्र) हैं। ये तीनों भक्त श्रीहरिदास संतों के परम दास और उत्तम दशा वाले हुए । साधुसेवारूपी कीर्ति की ऊंची ध्वजा गाड़के फहरा दिये; भक्तिमार्ग में निर्भय, अनन्य, और उदार होते श्रीरसिकराज प्रभुके यश रसना से अतिशय गान किये । संतों के वल से, दशधा कहिये प्रेमाभक्ति संपत्ति से युक्त, सदा सानन्द प्रफुल्लित मुख रहते थे। (१५४) राजा श्रीरामरयनजी। (६०७) छप्पय । ( २३६) कलिजुग, भक्ति कररी कमान, "रामरैन” के रिजु करी ॥ अजर, धर्म आचरयौ, लोक हित मनौ नील * निर्भय, अनन्य ॥ PartCECECTRICALCRECIPE *cker ******** भक्तिसुधास्वाद तिलक। ७३६ कठ । निंदक जग अनिराय कहा महिमा जानैगो भूसठ ॥ विदित गांधर्वी व्याह कियौ दुसकंत प्रमानै। भरत पुत्र भागौत सुमुख शुकदेव वखानै ॥ और भूप कोउ छै सकै, दृष्टि जाय नाहिन धरी । कलिजुग भक्ति कररी* कमाना "रामरैन"कैरिजुकरी॥११६॥ (६५) वार्तिक तिलक । कलियुग में किसी से न चढ़ने वाले कठोर धनुष (कमान ) स- रीखा अनुराग (भक्ति) को श्रीरामरयनजी ने सरलता से चढ़ा लिया; कभी जीर्ण न होनेवाला जो भगवद्धर्म सो आचरण किया; सबलोगों के हितकार करने में नीलकंठ (शिवजी) के समान श्रीरामभक्ति और लोक संपत्ति दोनों देनेवाले थे । और जगत् में दुर्मति वाला निंदक भूसठ (कुत्ता) आपकी महिमा को कैसे जान सकता है ? आपने लीला स्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र से अपनी कन्या का गांधर्व विवाह इस प्रकार कर दिया कि जैसे दुष्यंत राजा और शकुंतला का गांधर्व विवाह विदित भागवत में प्रमाण है । जिन दोनों से भरत नाम का पुत्र हुआ सो भागवत में शुकदेवजी ने बखान किया है, भला इस करनी को कोई राजा कैसे छू सकता है वरंच दृष्टि से देख भी नहीं सकता इस प्रकार कठिन भक्ति, आपने सरलता से की। (६०%) टीका। कवित्त । (२३५ ) पूनो में प्रकाश भयौ सरद समाज रास विविधि विलास नृत्य राग रंग भारी है । वैठे रस भीजे दोऊ, बोल्यो राम राजा रीझि, भेंट कहा कीजै विष कही जोई प्यारी है ॥ प्यार को विचारै न नि. हार कहूं नैकुछटा, सुता रूपघटा अनुरूप सेवा ज्यारी है । रही सभा सोचि, आप जाय के लिवाय ल्याये, भेष सों दिवाये फेरे, संपत लै वारी है ॥ ४८६ ॥ (१४०) वार्तिक तिलक । आपके लीलानुकरण निष्ठा भी बड़ी थी । आश्विन मास की * कररी-कड़ी। कमान 15 धनुष । , , . REACHES पूछा कि *ॐ*ARIES ७४० श्रीभक्तमाल सटीका शरद पूर्णमासी के समाज में रासलीला हुई; उसमें विविध प्रकार विलास नाच गान का भारी रंग बढ़ा;फिर दोऊ प्रिया प्रीतम प्रेमरस से भीगे विराजमान हुए । तब राजा रामरयन ने अपने समीपियों से प्रभु को भेंट क्या करना चाहिये?" सुनके एक अनु- रागी ब्राह्मण बोले कि "जो आपको प्यारी वस्तु होवे सो भेंट कीजिये।" तब, राजा अपना प्रियत्व विचारने लगे, किसी वस्तु में थोड़ी भी प्रियता न देखी; रूप के घटा के समान आपकी एक कन्या थी उसमें अपना प्रियत्व जान, सेवा के अनुरूप मान, देने के लिये निश्चय किया। सव सभा सोच विचार कर रही थी कि "ये क्या भेंट करेंगे?" आप स्वयं जाके वस्त्र भूपणों से श्रृंगार करा, लाके लीला स्वरूप प्रभु कोसुता का हाथ पकड़ा के अर्पण करदिया। फिरजो श्रीहरि भेष धारण किए लीला स्वरूप थे उन्हीं के साथ फेरे (भाँवरी) भी दिवाए, और धन संपत्ति इतना दिया कि जो जन्म भर योग्य भोग करने में न चुके ॥ ( १५५) श्रीरामरयनजी की धर्मपत्नी। (६०६ ) छप्पय । (३४) हरि, गुरु, हरिदासनि सों, रामघरनि सांची रही। आरज को उपदेश सुतौ उर नीकैधास्यौ। नवधा, दशधा, प्रीति, आन धर्म सवै बिसास्यौ॥अच्युत कुल अनुराग प्रगट पुरषारथ जान्यौ । सारासार विवेक, बात तीनौ मन मान्यौ ॥ दासत्व, अनन्य, उदारता, संतनि मुख, राजा कही। हरि, गुरु, हरिदासनि सों, रामघरनि सांची रही। १२० ॥ (६४) पातिक तिलक। श्रीहरि, और श्रीगुरु तथा श्रीहरिभक्कोंसे, श्री "रामरयनजी" की स्त्री सच्ची प्रीतियुक्त रही । आर्य (श्रेष्ठ) जनों का उपदेश हृदय में ACCORRECTORS - ॐ भक्रिसुधास्वाद तिलक। ७४१ भले प्रकार धारण किया। नवधा और “दशधा" (प्रेमा) भाकियों में प्रीति कर, और सब कर्म धर्म भुला दिये । अच्युत कुल वैष्णवों में प्रेम करना ही परम पुरुषार्थ जाना; और सार असार का विवेक भी यथार्थ हुआ । श्रीयुगलसर्कार की दास्यता, तथा अनन्यता, और संतसेवा में उदारता, ये तीनों वार्ताएं, भक्तिवतीजी को अति प्रिय लगतीथीं। उसका सुयश संत लोग और स्वयं राजा (उनके पति ही) अपने मुखसे कहा करते थे। (६१०) टीका | कवित्त । (२३३) आये मधुपुरी राजाराम अभिराम दोऊ, दाम पै न राख्यौ, साधु विप्र भुगताये हैं । ऐसे ये उदार राहखरच*भार नाहि, चलिबौ विचार भयो चूरा दीठ आये हैं ॥ मुद्रा सत पांच मोल खोलि तिया आगे धरै, दीजै वेचि गए नाभा कर पहिराये हैं। पति को वुलाइ कही नीके देखि रीझे भीजे कादिक करज | पुर आये दै पठाये हैं ॥ ४६॥ (१३६) वार्तिक तिलक। एक समय राजा रामरयन अपनी धर्मपत्नी के सहित श्रीमथुराजी में आके कुछ दिन रहे। पास में जो कुछ द्रव्य था, सो सब साधु ब्राह्मणों को देदिया; ऐसे उदार थे कि मार्ग के लिये कुछभी न रक्खा॥ अपने पुर में चलने का विचार हुआ; तो आपकी धर्मपत्नी के हाथों में कड़े दृष्टि पड़े; सो उन्होंने उतार के देदिया। कहा कि इन- को बेच दीजिये।" पांच सौ रुपये के मोल के थे। आप लेकर आये, श्रीनाभास्वामीजी के करकमल में पहना दिये। वह भनिवती देख अति प्रसन्न हो पति को बुलाके कहने लगी "आपने बहुत ही अच्छा किया, मैं देखकर अतिप्रसन्न हुई। यह सुन, आप भी प्रेम से भीज गये; फिर ऋण द्रव्य लेकर अपने पुर में आये, और वह द्रव्य अपने वहां से श्रीमथुराजी भेज दिया। * राह खरच"- - -पन्थ में व्यय के अर्थ धन, राद सर्च । "करज"--07- ऋण, कर्ज ॥ InstKARE KAROICCTROCEARNA , ७४२ RANA श्रीभक्तमाल सटीक । (१५६) राजकुमार श्रीकिशोरसिंहजी ॥" (६११) छप्पय । (२६२) अभिलाष उभै खेमाल का, ते किशोर पूरा किया। पांयनि नूपुर बांधि नृत्य नगधर हित नाच्यो। राम कलस मन रली सीस तातें नहिं वांच्यौ ॥ वानी विमल उदार, भक्ति महिमा विसतारी। प्रेम पुंज सुठि सील विनय संतनि रुचि कारी॥ सृष्टि सराहै राम सुव, लघु वैस लछन आरज लिया। अभिलाष उभै खे- माल का, ते किशोर पूरा किया ॥ १२१ ॥ (६३) पातिक तिलक। श्री "खेमालरत्नजी" के शरीर त्याग समय दो अभिलाष थे; सो उन दोनों को आपके पौत्र (पोते ) श्रीकिशोरजी ने पूर्ण किया ॥ अपने चरणों में नूपुर बांध, श्रीगिरिधरजी की प्रसन्नता हेतु नृत्य करते * और श्रीरामजी के पूजन हेत मन लगाके कलश में जल स्वयं लाया करते थे। एक दिन भी उस कलश से आपका सीस नहीं बचा; और छन्द बंध विमल वाणी से श्रीभक्ति की उदार महिमा विस्तारपूर्वक आपने गान किया। आप प्रेमपुज, अतिशय शीलवान् , विनय सम्पन्न थे, और लदा संतों की रुचि से चलते थे सम्पूर्ण सृष्टि के लोग सराहते थे कि श्रीरामरयनजीके पुत्र ने थोड़ी ही अवस्था में श्रेष्ठ (सयाने) जनों के सब लक्षण धारण कर लिये और सदा उसका निर्वाह किया। दो० “निर्वाह्यो नीके सर्वे, सुन्दर भजन को नेम । मोह छांडि अभिमान सब, भकन सों अतिप्रेम ॥१॥" . * नृत्य, नगधर (श्रीकृष्ण )ज के हित. और कलश, श्रीरामजी के हित; कहने का हेतु । ये राजा, पयहारी श्रीकृष्णदासजी, श्रीकीलदासजी. श्रीप्रसस्वामीजी के शिष्य श्रीरामोपासक थे, परन्तु वृन्दावनकी समीपता से श्रीकृष्णजी में भी अतिप्राति रखतेथे॥ CTECEKACCOCCAK RECICE भक्निसुधास्वाद तिलक । ७४३ (६१२) दीका। कवित्त । (२३१) खेमालरतन तन त्याग समै अश्रुपात, वात सुत पूछ अजू नीकें खोलि दीजिये। कीजै पुण्य दान बहु, संपति अमान भरी, धरी हिये दोई सोई कहा सुनि लीजिये। विविधि वड़ाई में समाई मति भई पैन नितही विचार अव मन पर खीजिये। नीर भरि घट सीस धरिक न ल्यायो और नूपुर न बांधि नृत्य कियो नाहि छीजिये॥४६१॥(१३८) वार्तिक तिलक। श्रीखेमालरत्नजी शरीरत्याग समय श्रीप्रभुकृपा से थे तो बड़े सावधान, परंतु अश्रुपात वहुत होते थे । देखके आपके पुत्र राम- रयनजी पूछने लगे कि "आप खोलके कहिये किस बात का दुःखहै? जो आज्ञा हो सो पुण्य दान करें, असंख्य द्रव्य भरीधरी है।" आप चोले "हमारी दो अभिलापा है सो सुनो; राजसी विविध बड़ाई में हमारी मति लीन थी इससे दोनों घातें नित्य ही विचारते ही रहे, परंतु हुई नहीं, इसलिये अब हम मन पर खीझ दुःख सहते हैं, एक तो यह कि प्रभुके पूजनहेतु जल भर, माथे पर घट धर, न लाये; दूसरी पगमें नूपुरबांध प्रभुके आगे नृत्य न किया,और शरीर अब छूटताहै !" (६१३) टीका | कवित्त । (२३०) रहे चुपचाप सबै जानी काम आप ही कौ, वोल्यौ यों किशोर नाती आज्ञा मोकों दीजिये । यही नित करौं नहीं टरौं जोलौं जीवे तन मन में हुलास उठि, छाती लाय लीजिये ॥ बहु सुख पाये, पाये वैसे ही निवाहे पन, गाये गुन लाल प्यारी अति मति भीजिये। भक्ति विसतार कियौ वैस लघु भीज्यो हियो, दियो सनमान संत सभा सब रीझियै ॥ ४६२ ॥ (१३७) वार्तिक तिलक। श्रीखमालरत्नजी के वचन सुन पुत्रादिक सब कोई चुप होरहे यह जान कि "यह तो आपही का कामथा, हमारा नहीं" परन्तु आपके नाती (पाता)श्रीकिशोरसिंहजी, उठ खड़े हो, हाथ जोड़बोले 'मुझको आज्ञा हो, दोनों नित्य नियम से जवतक जीऊंगा तबतक श्रीहरि- कृपा से बड़े हुलास से करूंगा।" - , 8-HASHA ७४४ श्रीभक्तमाल सटीक । पौत्रकी प्रेमप्रतिज्ञासुन श्रीखेमालरत्नजीने उठके चातीसे लगाया अत्यंत सुखको प्रात हुए । तदनंतर शरीर त्यागि प्रभुको प्राप्तहुए। श्रीकिशोरजी ने वैसा ही पन को निवाहा, श्रीयुगल सर्कार के गुण गान करते प्रेम में मति भीग गई, भनि को विस्तार किया। थोड़ी ही अवस्था में अनुराग से हृदय छक गया, आपकी दशा देख देख सन्तों के समाज रीझ के चड़ा सन्मान किया करते थे । श्रीकिशोरसिंह की जय ॥ (६१४) छप्पय । (२२६) खेमालरतन राठौर कै, सुफल बेलि मीठी फली ॥ हरीदास हरिभक्त भक्ति मंदिर को कलसौ । भजन भाव परिपक्व, हृदै भागीरथि जल सौ ॥ त्रिधा भांति अति अनन्य रामकी रीति निवाही । हरि गुरु हरि चल भांति तिनहि सेवा दृढ़ साही॥ पूरन इन्दु प्रमुदित दधि, त्यौं दास देखि बाढै रली। खेमालरतन राठौर कै, सुफल बेलि मीठी फली ॥ १२२ * ॥ (६२) वार्तिक तिलक । राठौर श्रीखेमालरलजी की मनोरथ घेलि, भविभूमि में अतिमिष्ट फल फली श्रीहरिजी के और हरिदासों के ऐसे भक्त (इनके सन्तान) किश्रीहरि निवास भनिरूपी मन्दिर के मानों कलश हैं । भजन और भावना से परिपक्क हृदय ऐसा निर्मल हुआ कि मानों गंगाजी का जल है; मन वचन कर्म तीनों से प्रभु में अनन्य होकर श्रीरामर- यनजीकी रीति का निर्वाह किया ।श्रीहरिरूपी गुरु का बल आपको श्रीहरि ही के समान था, दोनों की दृढ़ सेवा राज ऐश्वर्य से की, और * कोई महात्मा कहते हैं कि यह छप्पय राजकुमार श्रीकिशोरसिंहजी ही के वर्णन में है, और कोई ऐसा भी कहते है कि यह वर्णन श्रीखमाल जी के पाते (राम रयनजी के भतीजे, वा किशोरजी के छोटे भाई ) नाम श्रीहरिदासजी का है । सघ चात युक्त है आपके संतान ही का यश है। KAROO , 5 म ******** भकिसुधास्वाद तिलक। ৩৪৪ जैसे पूर्ण चंद्र को देख सानंदित समुद्र बहै, इसीप्रकार भगवत्दासों को देख मिल के आप अानन्द से बढ़ते थे। ( १५८) श्रीचतुर्भुजजी (कीर्तननिष्ठ) (६१५ ) छप्पय । (२८) (श्री)"हरिवंश" चरनवल "चतुरभुज,” "गोंड़" देश तीरथ कियौ ॥ गायौ भक्ति प्रताप सबहिं दासत्व दृढ़ायौराधावल्लभभजन अनन्यता वर्ग बढ़ायौ॥'मुर- लीधर' की छाप कवित अति ही निर्दूषन । भक्तनि की अघ्रिरेनु वहै धारी सिरभूषन। सतसंग महाआनन्द मै, प्रेम रहत भीज्यो हियौ। (श्री) "हरिवंश" चरनवल "चतुरभुज," "गोंड" देश तीरथ कियौ॥१२३॥ (61) वार्तिक तिलक । अपने गुरु श्रीहितहरिवंशजी के चरणों के वल से, श्रीचतुर्भुजजीने "गोंडवाना देश" अधमको, तीर्थ समान पवित्र कर दिया। श्रीभक्ति का प्रताप भले प्रकार गान कर वहां के सब जीवों को श्रीहरिदासता दृढ़ा दी और श्रीराधावल्लभजी के भजन अनन्यताका परिवार अति- शय बढ़ाया; अपनी कविता में "मुरलीधर" की छाप रखतेथे; आपका कवित्त अति ही निर्दूषण होता था, भगवद्भकों के चरणों की रेणु आपके भाल का भूपण थी। सत्संग में, महामानन्द देनेवाले प्रभु के प्रेम से आपका हृदय भीगा रहताथा ॥ कविता की बानगी लीजिये । (छप्पय) “श्वपच पहिरि जज्ञोपवीत, कर कुशनि गहत जब । करम करै अघ परै डरै पुनि विश्व त्रास तब ॥ पुनि ललाट पट तिलक देय तुलसी माला धरि । हरिके गुन उच्चरै पाप कुल कर्महि परिहरि । चतुर्भुज पुनीत अत्यंज भयौ मुरलीधर सरनौ लियो । तेहि पाछे किन लागिये जिन लोह पलटि कंचन कियौ ॥" UCHECRECReckone iOURSELFISHEKEESO । ।

। ********NARRENT ७४६ श्रीभक्तमाल सटीक। दो० "हरिवंश" नाम 'ध्रुव' कहत ही, वाढ़े आनँद वेलि । प्रेमरंगी उर जगमगे, नवल जुगलवर केलि ॥ १॥ निगम ब्रह्म परसत नहीं, सो रस सब ते दूरि । कियो प्रगट हरिवंश जी, रसिकनि जीवनिमूरि ॥ २॥" (६१६ ) टीका । कवित्त । ( २२७), गोंडवाने देश, भक्ति लेसहूँ न देख्यो कहूँ, मानुस को मारि इष्ट- देव को चढ़ायौ है । तहां जाय देवता के मंत्र लै सुनायो कान, लियौ उन मानि,गाँव सुपन सुनायौ है ॥"स्वामी चतुर्भुजजू के बेगि तुम दास होडु, नातो होय नास सव" गाँव भज्यो आयो है । ऐसे शिष्य किये, माला कंठी पाय जिये, पांव लिये, मन दिये, औ अनंत सुख पायौ है ॥ ४६३ ॥ (१३६) वार्तिक तिलक। दक्षिण नर्मदा के निकट "गोंडवाने" देश में श्रीचतुर्भुजजी ने कहीं भक्ति का लेश भी न पाया, और दुष्टता ऐसी देखी कि वहां के लोग मनुष्य को मार अपनी इष्ट देवता काली को चढ़ाया करते थे। वहां जाके उस देवताके कान में आपने भगवत् मंत्र सुनाया। देवता ने श्रद्धापूर्वक मंत्र ग्रहण कर उस ग्राम के सब लोगों को स्वप्न में शिक्षाकी कि "तुम सब शीघ्र स्वामी श्रीचतुर्भुजजी के दास (शिष्य) हो जाओ भगवत् की भक्रि करो, नहीं तो सबका नाश हो जायगा।" सुनते ही सम्पूर्ण ग्राम के लोग दौड़के आये । आपने सबको शिष्य कर माला कंठी तिलक धारण कराया; सबने आपके चरणों में प्रणाम किये । सबने हरिभक्ति-मार्ग में मन दिया; सब अति सुख को प्राप्त हुए। श्रीचतुर्भुजजी और उन देवीजी की जय ।। दो०"सकल देस पावन कियो, भगवत जसहि बढ़ाइ। जहां तहां निज एक रस, गाई भक्ति लड़ाइ ॥" (श्रीध्रुवदासजी) (६१७ ) टीका | कवित्त । (२२६ ) भोग लै लगा नाना, संतनि लड़ाव, कथा भागवत गानें, भाव SECSCANCE GK KALIKA R RBASTI भक्तिसुधास्वाद तिलक। ७४७ भनि बिसतारिये। भज्यो धन लैकै कोऊ, धनी पाछे परपो सोऊ, आनिकै दवायो, बैठि रह्यौ न निहारियै ॥ निकसी पुरान वात, करै नयो गात दिक्षा, शिक्षा सुनि शिष्य भयो, गह्यो यो पुकारियै । कहै "याजनम में न लियौं कलू,”दियों फारौ हाथले उवास्यौ प्रभु, लगी प्यारिये ॥४६४॥ (१३५) वार्तिक तिलक । श्रीचतुर्भुजजी वहां रहके नानाप्रकार के भोग श्रीभगवत् को लगाते और संतों को पवाते, लाड़ लड़ाते; श्रीभागवत कथा गानकर आपने सव लोगों में भावभात का विस्तार किया। एक दिन एक उपक्का किसी का धन लेकर भागा, वह धनी भी उसके पीछे २ दौड़ा; उचका आपकी कथा में घुस कर बैठ गया। धनी ने निहारा देखा, पर पाया नहीं । आपकी कथा में पुराणान्तर की यह वार्ता * निकली "कि जो कोई भगवत् मंत्र की दीक्षा लेता है, उस दिन से उसका दूसरा नया जन्म होजाता है।" ऐसा उपदेश सुन वह चोर वहांही आप का शिष्य होगया; और उसने पूजाकर वह द्रव्य पुस्तक पर चढ़ा दिया। जब श्रोता उठे तव धनी उचक्के को पकड़ पुकार के कहने लगा "यह अभी मेरा धन लेकर भाग आया है।" इसने कहा "मैंने इस जन्म में किसी का कुछ भी नहीं चुराया;" निदान उसने लोहे का फार तपाया हुआ हाथ में लेकर विश्वास पूर्वक कहा कि जो मैं "इस जन्म में कुछ भी न चुराया हो, तो मेरे हाथ न जलें।" प्रभु ने उसको बचा दिया हार्थों में उष्णता तक भी न आई । इसके विश्वास प्रतीति की रीति मुझे अतिही प्यारी लगी है। (६१८) टीका | कवित्त । (२५५) राजा झूठ मानि कह्यौ “करो बिन प्रान वाकौ, साधु ये विराज- मान लै कलंक दियौ हैं"। चले ठौर मारिकों, धारिबेको सके कैसे, *"राममंत्रोपदेशन माया दूरमुपागता । कृपया गुरुदेवस्य द्वितीयं जन्म कथ्यते ॥१॥ पितृगोत्री यथा कन्या स्वामीगोत्रेण गोत्रिका। श्रीरामभक्निमानेणाच्युतगोत्रेण गोत्रकः ।। २॥ इति नारदपंचराने प्रमाणम् ।। न SHARMAHAKRETS* ७४८ श्रीभक्तमाल सटीक। , . नैन भरि आये नीर बोल्यौ "धन लियौ है"। कहै तृर सांचौ बैंक झूठी जिन हजै संत, महिमा अनंत कही "स्वामी ऐसौ किया है"। भूप सुनि आयौ उपदेश मन भायो, शिष्य भयौ नयौ तन पायो भीजि गयो हियो है ॥ ४६५ ॥ (१३४) वार्तिक तिलक । । जब वह शपथ में शुद्ध होगया तव राजा ने जाना कि इसने साधु को झूठ ही चोरीका कलंक लगाया है,इससे अपने जनोंको आज्ञा दी कि “इसको मार डालो।" लोग आज्ञा सुन उसको वध करनेको चले। तव साधु (जो पहिले जन्म में चोर था) उसका वध कैसे सहिसकें, नेत्रों में जल भर, बोले कि इसको मारिये मत, मैंने धन लियाहै ।" राजा बोला कि "हे संत! तुम तो सच्चे होकर अब झूठही चोर क्यों वनते हो?" उत्तर दिया कि “यह श्रीस्वामीजी की अनंत महिमा है कि मुझे सञ्चा बना दिया।" अपना सब वृत्तांत कह गया। राजाने सुनके उसको छोड़ दिया; और यह मन में निश्चय किया कि "मैं भी शिष्य हो जाऊं" और शिष्य हो ही गया। नवीन तन पाकर प्रभु के प्रेम में राजा का हृदय भीग गया ॥ (६१६) टीका | कवित्त । (२२४) पकि रह्यो खेत, संत आयकर तोरि लेत, जिते रखवारे मुख सेत सोर किया है । कह्यौ स्वामी नाम, सुन्यौ कही “वडो काम भयो, यह तो हमारौ,"सोई आप मुनि लियोहै । लेकै मिष्टान भाय, सुमुख बखान कीनौ, "लीनौ अपनाय आज भीज्यो मेरो हियों है"ाले गये लिवाय नाना भोजन कराय, भकि चरचा चलाय, चाय हित रस पियौ है ॥ ४६६ ॥ (१३३) वार्तिक तिलक । एक समय श्रीचतुर्भुजजी अपने गृह में थे, आपका गेहूँ चने का खेत पक रहा था, संतों की जमात आकर तोड़ने लगी; रखवारों ने पुकारा कि "श्रीचतुर्भुजजी का खेतहै" सन्त बोले “वड़ी अच्छी बात हुई, तब तो यह हमाराही अन्न है।" और होरा के लिये चने की वाली बहुत सी तोड़ ली। खेत रखानेवालों का मुख सूख गया,हल्ला ELECRoctaccheck Sectester . भकिसुधास्वाद तिलक। ७४६ करने लगे। किसी ने जाके आपले पुकार किया कि "साधु सब खेत की बाली तोड़े लेते हैं और कहते हैं कि "यह तो हमाराही है।" आप सुनते ही प्रेमानन्द से पूर्ण हो, वहुत सा मीठा लेकर आये और प्रसन्न मुख से कहने लगे कि "आज मैं धन्य हुआ, मुझे संतों ने अपना लिया, अपना जाना ।" आपका हृदय प्रेमानंद से भीग गया फिर गुड़ दे, बाली पवाके गृह में लिवा ले गये, नाना प्रकार के भोजन कराये, फिरि भक्तिमार्ग की चर्चा सत्संग कर, परस्पर, प्रेमरस पी के छक गये ।। ( १५८) श्रीकृष्णदासजी चालक *। (६२० ) छप्पय । (२२३) चालक की चरचरी, चहूं दिशि उदधि अंत लौ अ- नुसरी ॥ सक्रकोप सुठि चरित प्रसिध, पुनि पंचाध्याई कृष्ण सक्मिनी केलि,रुचिर भोजनविधि,गाई॥"गिरि- राज धरन” की छाप, गिरा जलधर ज्यौं गाजै । संत सिखंटी खंड हुदै आनंद के काजै॥ जाड़ा हरन जग जड़ता कृष्णदास देही धरी। चालक की चरचरी, चहूं दिशि उदधि अंत लौ अनुसरी ॥ १२४ ॥ (६०) वार्तिक तिलक । चालक की रचना चरचरी छन्द की श्रीकृष्णदासजी की कविता चारों दिशाओं में वरंच समुद्रों के तट पर्यंत विख्यात हुई। उसी छन्द से इन ग्रंथों की रचना की, शक्रकोप से जो हुआ प्रसिद्ध "गोवर्धनचरित्र," और "रासपंचाध्याई," "कृष्णरुक्मिणी केलि" तथा रुचिर "भगवद्भोजनविधि" इत्यादि । और, अपने काव्य में "गिरिराजधरन"की छाप रक्खा करते थे। आपकी वाणी, मेघ की गर्जन समान है। संत समाज उसको सुन * श्रीरामदामों और श्रीकृष्णदास कई हुये हैं।

RAND नमसHERRHERE श्रीभकमाल सटीक । मयूर के सरिस आनंदित होते हैं। जगत् की जड़तारूपी जाड़ा हरने के लिये श्रीकृष्णदासजी ने श्रीसूर्य के सरीखा देह धारण किया था। दो० "युगल प्रेम रस अब्धि में, पस्यो पबोध मन जाय । वृन्दावन रस माधुरी, गाई अधिक लड़ाय ॥" (ध्रुवदास) ( १५६) श्रीसंतदासजी। (६२१) छप्पय । (२२) बिमलानंद प्रबोध बंश, “संतदास” सीवां धरम ॥ गोपीनाथ पद राग, भोग छप्पन मुंजाये। पृथु पद्धति अनुसार देव दंपति दुलराये ॥ भगवत भक्त समान, ठौर है कौ बल गायौ । कवित सूर सों मिलत भेद कछु जात न पायौ ॥ जन्म, कर्म, लीला, जुगति, रहसि, * भक्ति भेदी मरम । विमलानंद प्रबोध वंश, "संतदास” सीवां धरम ॥ १२५ ॥ (८६) वार्तिक तिलक । श्रीविमलानंदजी प्रबोधन के वंश में श्री "संतदासजी," भगव- धर्मकी सीमा (मर्यादा) हुए। श्रीगोपीनाथजी के चरणों में आपका अतिअनुराग था, सो नित्य छप्पन भोग अर्पण करतेथे। जिसप्रकार राजा पृथु सप्रेम प्रभुकी पूजा करते थे, उसी मार्गके अनुसार दुतार प्यार से श्रीराधाकृष्णजी की पूजा किया करते ॥ भगवत् और भगवद्भक दोनों का एक समान बल प्रताप गान किया। और आपके कवित्त श्रीसूरदासजी के कवित्त में ऐसा मिल कुछ भी भेद नहीं जान पड़ता था। उस कविता में प्रभु के जन्म, कर्म, लीला को युनिपूर्वक वखान किया, क्योंकि आप रहस्य भक्रिभेद का मर्म (छिपी बातों के) जाननेवाले थे । जाता, कि * रहसि रहस्य, गस ॥ Khetic G RECRUKHARE कर ॐॐॐ भकिसुधास्वाद तिलक । ७५१४ (६२२) टीका । कवित्त । (२२१) वसत "निवाई" ग्राम, स्याम सों लगाई मति, ऐसी मन आई, भोग छप्पन लगाये, हैं। प्रीति की सचाई यह जग में दिखाई, सेवें जगन्नाथ देव आप रुचि सौं जो पाये हैं ॥ राजा को सुपन दियो नाम लै प्रगट कियौ, "संत ही के गृह में तो जेंवों यों रिझाये हैं।" भक्ति के अधीन, सब जानत प्रवीण, जन ऐसे हैं रँगीन, लाल ठोर ठौर गाये हैं। ४६७ ॥ (१३२) वार्तिक तिलक। श्रीसंतदासजी निवाई ग्राम में वसते थे । श्रीश्यामसुन्दरजी से अपनी मति लगाई। मन में उत्साह हुआ सो नित्य छप्पन भोग लगाया करते थे। आपकी सच्ची प्रीति देख श्रीजगन्नाथजी बड़ी रुचि से आप ही के यहां भोजन करते थे। कुछ दिन में गृह में जो धन था सो भोग में उठ गया, तब प्रभु ने विचारा कि “मेरे.दास का मनोरथ पण अन्यथा न होय;" इससे, राजा को स्वप्न दिया, आपका नाम प्रगट कर कहा कि "मैं तो संतदास ही के गृह में नित्य छप्पन भोग भोजन करता हूं। उसने मुझे रिझा लिया है अर्थात् उनको मेरे भोग के लिये धन और सामग्री दिया करो।" आपकी आज्ञा सुन राजा ने वैसा ही किया। श्रीलालजी रँगीले, भक्ति के ऐसे अधीन हैं। सब प्रवीन जन जानते हैं। क्योंकि प्रभु की भक्नि विवशता ठौर ठौर में गान की गई है । भक्तवत्सल रंगीले की जय ॥ ( १६०) श्रीसूरदास मदनमोहन । (६२३) छप्पय । (२२०) (श्री) मदनमोहन सूरदास की, नाम शृंखला जुरी अटलागान काव्य गुणराशि,सुहृद,सहचरिअवतारी। राधाकृष्ण उपास्य रहसि सुख के अधिकारी॥ नवरस मुख्य सिंगार विविधिभांतिन करि गायौ। बदन उच्च- REGI-CHES KARNER ******** श्रीभक्तमाल सटीक। ७५२ गान रित वेर सहस पायनि लै धायौ ॥ अंगीकार की अवधि यह, ज्यों आख्या भ्राता जमल । (श्री) मदनमोहन सूरदास की,नाम शृंखला जुरी अटल ॥१२६ ॥ (८८) वार्तिक तिलक। श्रीमदनमोहन और सूरदास के नाम की शृंखला अचल जुट गई, अर्थात् आप थे तो नेत्रयुक्त परंतु नाम सूरदास था सो जहां पर सूरदास नाम है वहां मदनमोहन नाम के साथही है । आप गानविद्या और काव्य में अति प्रवीण और शुभ गुणों की राशि ही थे । सबके साथ सुहृदता रखते; सखी के अवतार ही थे। श्रीराधाकृष्ण आपके उपास्य; आप रहस्यसुख के अधिकारी थे। नव रसों में जो मुख्य शृंगाररस, उसको बहुत प्रकार से किया। आपकी कविता ऐसी फैलती थी कि जहां मुख से निकली, कि मानों सहस्त्र चरणों को धारण कर चारों दिशाओं में दौड़ गई । सो यह प्रभु के अंगीकार करने की सीमा है ऐसी प्रभुके और आपके नाम की आख्या हुई कि जैसे जमल भ्राता अश्विनी- कुमार सदा इकट्ठे रहते हैं। दो० "भली भांति सेए विपिन, तजि बंधुनि सों हेत । सूर भजन में एकरस, लांड्यो नाहिन खेत ॥" (६२४) टीका । कवित्त । (२१६) सुरदास नाम नैन कंज अभिराम फूले, झूले रंग पीके नीके जीके और ज्याये हैं। भये-सो अमीन * यो सँडीले के नवीन रीति प्रीति गुड़ देखि दाम वीस गुने लाये हैं ॥ कही पूबा पावै आप मदनगोपाल लाल परे प्रेम ख्याल लादि छकरा पठाये हैं। पाये निसि भये स्याम कियौ आज्ञा जोग लेकै अवही लगावौ भोग जागे फिरि पाये हैं॥ ४६॥ (१३१) वार्निक तिलक। आपका नाम "सूरध्वज" था परन्तु काव्यों में "सूरदास मदन- १. "अमान"-US-I-रक्षक, थाती रखनेवाला, अधिकारी॥

******** भनिसुधास्वाद तिलक। ७५३ मोहन" लिखा । सो यही विख्यात होगया। आपके दोनों नेत्र फूले कमल के समान थे, प्रभु का प्रेमरंग पीके सुन्दर अनुराग से झलते; मृतक सरीखे देहाभिमानको तज, स्वस्वरूपसे जीवित रहे । और अपने सत्संगसे और जीवोंकोभी सचेत किया। सो दिल्लीपतिकी ओर से सँडीले के अधिकारी (अमीन ) हुए। आपकी प्रभुमें प्रीति रोति नवीन थी । यहाँ (सँडोले) का गुड़ बहुत अच्छा देख विचार किया कि इस गुड़ का मालपुत्रा श्रीमदनगुपाललालजी को प्रिय लगेगा, इस प्रेम के कौतुक में पड़े । यद्यपि सँडीले से वृन्दावल तकके भाडाका दाम बीस गुना पड़ा तौभी गाड़ी में लादके भेज ही दिया। वह गुड़ वृन्दावन में आया, रात्रि बहुत बीतगई प्रभुका शयन होगया था; परंतु श्यामसुन्दर की आज्ञा स्वप्न में हुई कि "इसका मालपुआ अभी अभी भोग लगाओ" सबोंने आज्ञानुसार उसीसमय मालपुआ बनाया श्रीप्रेमग्राहकजी ने जागके भोजन किया । (६२५) टीका । कवित्त । (२१%). पद लै बनायौ, भक्तिरूप दरसायौ, दूर संतनि की पानहींको रक्षक कहाऊं मैं। काहू सीखि लियौ साधु लियो चाहै परचैकों आये द्वार मं. दिरकै खोलि कही आऊं मैं॥रह्यो बैठि जाय जूती हाथ में उठायलीनी, कीनी पूरी आस मेरी निसि दिन गाऊं मैं । भीतर बुलाये श्रीगुसाई बारदोय चार,सेवा सौंपीसार कह्यौ जनपग ध्याऊं मैं॥४६६॥(१३०) वार्तिक तिलक । आपने एक पद बनाया, उसमें दुर्लभ अनन्य भाक्ति का रूप दर्शाया, अंत में यह पद रक्खा, "सूरदास मदनमोहन लालगुण गाऊं । संतन की पानहीं की रक्षक कहाऊ॥" इस पद को किसी साधु ने सुन सीख के परीक्षा लेनी चाही; श्रीमदनमोहनजी के दर्शन को आए, द्वार में "सरध्वज" जी थे, साधु ने जूती आपके समीप उतार के कहा कि "देखना, मैं आता हूं।" और भीतर जाके बैठ रहे । आप पदत्राणों को हाथ से उठा- कर बोले "अब तक तो मैं अपनी अभिलापा को दिन रात गान ही RRCRECRUCHCHER ।

. । , SHRI ******** ७५४ श्रीभक्तमाल सटीक । मात्र करता था, परंतु आज संत ने मेरी अभिलाषा पूर्ण किया ॥" मंदिर के भीतर से श्रीगुसाईजी ने दो चार बार बुला भेजा; आपने प्रार्थना कर भेजी कि “आज मुझे संतने सारांश सेवा दी है। सो सेवा में संतचरण ध्यानपूर्वक कर रहा हूं, अभी इससे निवृत्त होकर दर्शन करूंगा।" यह सुन वह संत और गुसाईजी अति प्रसन्न हो, आकर हृदय में लगाया, और दोनों ने आपकी अतिप्रशंसा की। (६२६) टीका | कवित्त । (२१७) पृथीपति संपति ले साधुनि खवाइ दई, भई नहीं संक यों निसंक रंग पागे हैं। आये सो खजानौ लैन मानौ यह बात अहो पाथर लै भरे आप आधी निसिभागे हैं। स्को लिखि डारे, "दाम गटकेयेसंतनि नै, याते हम सटके हैं" चले जव जागे हैं। पहुँचे हुजूर, भूप खोलिक संदून देखें, पेखें आंक कागद मैं रीमि अनुरागे हैं ॥५.००॥ (१२६) चार्तिक तिलक। यह सँडीले की वार्ता है कि पृथ्वीपति ( बादशाह ) की तेरह लाख द्रव्य (रुपये) साधुवों को खिला दिया; मन में कुछ भी भय वा शंका न हुई ऐसे अशक प्रेमरंग से आप पगे थे । जब दिल्ली से नृपतिके शेजे लोग रुपये, लेने आये, तव मंजूपाओं में पत्थर भरके ताले जड़ दिये । प्रत्येक में यह पद लिख लिख के डाल दिया, (पद) "तेरह लाख सँडीले उपजे, सब साधुन मिलि गटके। सूरदास मदनमोहन * वृन्दावन को सटके ॥" आप आधी रात को ( जगके ) भागे। जब "संदूक्त' दिल्ली में आई तब वादशाह ने खुलवाके देखा तो पत्थर ही पत्थर भरे थे; वे स्के भी निकले । पढ़ेगए तो बादशाह अनुराग से प्रसन्न हुए । (६२७) टीका | कवित्त । (२१६) लैनकों पठाये, कही निपट रिझाये हमैं, मन मैं न ल्याये,लिखी १ "खजानो" Fily-द्रव्यसमूह, द्रव्यागार खज़ाना । २ "यका"= = पत्र, लेख, संक्षिप्त पत्र । ३ "हुजूर". --सामने, साक्षात् । ४ "संदूक"Erse=याक्स, मंजूषा, काठ की पिटारी॥ *"संडील के अमित धन सन्तन ने गटके। राजभय से मदनमोहन प्राधारात स्टके ," , . भक्रिसुधास्वाद तिलक। ७५५ "वन तन डायोहै"। 'टोडर' दीवान कह्यो "धनको विरान कियौ, ल्यावौ रे पकरि" मूढ़ फेरिके संभास्यौ है ॥ लैगये हुजूर, नृप वोल्यौ मोसों दूर राखौ," ऐसौ महाकुर सौपि दुष्ट कष्ट धारयो है । दोहा लिखि दीनौ "अकबर" देखि रीमि लीनौ, जावी वाही ठौर तोपै दर्व सव वारघौ है" ॥ ५०१ ॥ (१२८) वार्तिक तिलक । आपभागकेश्रीवृन्दावन में आये; "अकबरशाह"ने आपके लेनेके लिये मनुष्य भेजा कि जाकर कही कि "तुमने रुपये संतों को खिला दिये सो हम बहुत प्रसन्न हुए, अब तुम हमारे पास आवौ।" आपने उत्तर लिख भेजा कि "मैंने इस शरीर को वृन्दावन में डाल दिया है, अब मुझे वहां मत बुलाइये।” बादशाह माना परंतु बादशाह के दीवान "टोडरमल" ने यह कहकर “कि इसने धन को नष्ट किया" लोगों को भेजा कि "जाओ, पकड़ लाओ।" उस दुष्ट ने बादशाह की मति फेर दी। लोग आके आपको पकड़ लेगये। बादशाह ने कहा "मेरे पास मत लाओ" तब दुध टोडर ने "दसतम" नामक कारागाराध्यक्ष (जेलखाने के अधिपति) को सौंप दिया। उस दुष्ट ने आपको बहुत कष्ट दिया । तब एक दोहा लिखके आपने अकबर के पास भेजा। दो० "यक तम अँधियारो करै, शन्य दई पुनि ताहि । 'दसतम' ते रक्षा करी, दिनमनि अकवर शाह !॥" दोहा देख विज्ञ अकवर ने, बहुत प्रसन्न हो, श्रीकृपा से आज्ञा दी कि "तुम पर हमने तेरह लाख द्रव्य निछावर किया, तुम सुख- पूर्वक वृन्दावन चले जाओ।" (६२८ ) टीका | कवित्त । (२१५) आये वृन्दावन, मन माधुरी मैं भीजि रह्यो, कह्यौ जोई पद,सुन्यो रूप रस रास है। जादिन प्रगट भयो, गयो शत जोजन पै,जन पे सुनत भेद बाढ़ी जग प्यास है। "सूर" द्विज द्विजनिज महल टहल १"दीवान "JI, प्रधान, अधिकारी । २ "विरान"-उजाड़, नष्ट, क्षय । ३ "एजूर" y =सामने । ४ "दूर", समीप नहीं, फैलाये ॥ CAUSANGALOKGANAGAR .

HAR श्रीभकमाल सटीक। ७५६ . पाय चहल पहल हिये जुगल प्रकास है । मदनमोहन जू हैं इष्ट इष्ट महाप्रभु अचरज कहा कृपादृष्टि अनायास है ॥ ५०२॥ ( १२७) बार्तिक तिलक। राजराजेश्वर अकवरकी आज्ञा पा, श्रीवृन्दावन में आ,श्रीयुगल माधुरी में आपने मनको भिगा दिया; फिर जो पद आपने बनाये सो सुनने में रूप रस का रासही जान पड़ता था; जिस दिन पद प्रगट होता उसी दिन चार सौ कोस पहुँच जाता था। और उस पद का अर्थ काव्य रस भेद सुनते ही जगत् को प्यास बढ़ती थी। सूरध्वज द्विज, अपने प्रभु के महलकी टहल पाके अतिआनंदित हुए । युगल चन्दका प्रकाश हृदय में छारहा, सो ऐसा होना योग्य ही है, क्योंकि आपके श्रीमदनमोहनजी और महाप्रभुजी इष्ट थे, दोनों की कृपादृष्टि से युगल प्रकाश हृदय में होना आश्चर्य नहीं। (१६१) श्रीकात्यायिनीजी। (६२६) छप्पय । (२१४) कात्यायिनी के प्रेम की, बात जात कापै कही। मारग जात अकेल, गान रसना जु उचारै । ताल मृदंगी वृक्ष,रीमिअंबर तहँ डारै॥गोपनारि अनुसारि गिरा गदगद आवेशी। जग प्रपंच ते दूरि, अजा परसैं नहिं लेसी ॥ भगवान रीति अनुराग की, संत साखि मेली सही। कात्यायिनी के प्रेम की, वातजात कापै कही ॥ १२७॥ (८७) वार्तिक तिलक । श्री "कात्यायिनी"जी के प्रेम की बात किससे कही जा सकती है। आपकी यह दशा थी कि अकेली मार्ग में चलती हुई सरस रसना से प्रभु सुयश गाती ऐसे प्रेमावेश में एक जाती थी कि जो वृक्षों में पवन लगने से शब्द होता था उसको जानती कि ये मेरे CHERS ७५७ O-9-30 भक्तिसुधास्वाद तिलक। गान के साथ मृदंगादि राजा बजाते हैं; इससे उनके ऊपर रीझके अपने वस्त्र भूषण दे डाला करती थीं। आपका श्रीकृष्णचन्द्रजी में गोपवधू जनों के समान ही प्रेम था। प्रभु के गुणानुवाद करने में अनुराग के आवेश से वाणी गद्गद हो जाती थी। आपके चित्त में जगत्प्रपंच का भान ही नहीं; और माया का स्पर्श लेश नहीं। श्री- "कात्यायिनी"जी की भगवत्अनुराग की रीति देख संत जनों ने यही ठीक किया कि बस अनुराग इसी का नाम है । (१६२) श्रीमुरारिदासजी। (६६० ) छापय । (०१३) कृष्णविरह कुंती सरीर, त्यौं "मुरारि” तन त्या- गियौ । विदित "विलोंदा” गांव देस मुरधर सब जाने। महामहोच्छौ मध्य संत परिषद परवानै ॥ पगनि धूंघुरू बांधि रामकौ चरित दिखायौ । देसी सारँग- पानि, हंस ता संग पठायौ। उपमा और न जगत में, "स्थाविना नाहिन वियौ ॥ कृष्ण बिरह कुंती सरीर, त्यौं "मुरारि" तन त्यागियौ ॥ १२८ ॥ (८६) वार्तिक तिलक । श्रीकृष्णचन्द्रजी का विरह सुनते ही जिस प्रकार कुंतीजीने शरीर तज दिया उसी प्रकार श्रीसीतारामचन्द्रजी के विरह का पद गान ध्यान करते ही,श्री "मुरारिदास" जी ने भी शरीर को त्याग दिया। आप मारवाड़ देश में विख्यात विलौदा (वलवंडा) गांव में विराजते थे और प्रति संवत् में महामहोत्सव करते थे। एक समय के महोत्सव में भगवत्पारपदों के समान अनेक संत विराजमान थे; वहां आपने अपने चरणों में नूपुर बाँधकर श्रीरामजी का चरित्र ऐसा गान किया कि उस सप्रेम शब्द से सबको प्रभुका रूप और चरित्र नेत्रों में झलक पड़ा; अंत में आपने देशीय विधान EMOCRACTS H ৩ श्रीभक्रमाल सटीक। से ऐसा आलाप किया कि श्रीरघुनन्दन साङ्गपाणि के वनगवनरूप में चित्त प्रत्यक्ष पहुँच गया। प्रभुके साथ ही हंस (जीवात्मा ) को भी भेज दिया। शरीर ऐसाही रह गया। आपके तन त्यागने की उपमा श्रीकुंतीजी को छोड़ और है ही नहीं । (६३१) टीका । कवित्त । (२१२) श्रीमुरारिदास रहे राजगुरु, भक्त-दास, आवत स्नान किये कान धुनि कीजिये । जाति को चमार करै सेवा सो उचारि कहै “प्रभु चरणामृत को पात्र जोई लीजिये ॥ गये घरमाझ वाके, देखि डर कापि उठ्यो, "ल्यावौ देवो हमें, अहो पान करि जीजिय" कही " मैं तो न्यून तुच्छ;" बोले " हमहूं तें म्वच्छ जाने कोऊ नाहिं तुम्हें मेरी मति भीजिये " ॥ ५०३ ।। ( १२६) बार्तिक तिलक । श्रीमुरारिदासजी विनोंदा नगर के राजा के गुरुदेव, और भगव- द्भकों के पूरे दास थे। एक दिन स्नान किये चले आते थे एक ध्वनि आपके कान में पड़ी । एक जाति का चर्मकार अपने गृहमें भगवत्- पूजा कर नित्य पुकारता था कि "जो प्रभुके चरणामृत का पात्र हो, सो लेवै ।” सोई धनि सुन उसके गृह में आप गये; वह देखते ही भय से कांपने लगा; आप बोले " लाओ, मुझको दो, पान कर जीवन को सुफल करूं।" वह बोला " मैं अति तुच्छ, जाति का चमार हूं।" आप कहने लगे कि “ तुम तो भनियुक्र हो इससे मुझसे भी पवित्र हो; तुमको कोई जानता नहीं, तुम्हारा प्रेम देख मेरी मति सरस होगई है।" (६२२) टीका । कवित्त । (२११) बहै दृग नीर, कहै मेरे बड़ी पीर भई; तुम मति धीर; नहीं मेरी जोग्यताई है। लियौ ई निपट हठ, बड़े पटु साधुता मैं, स्यामै प्यारी भकि, जाति पांति लै बहाई है। फैलि गई गाँव, वाको नांव लै चवाव करें भरै नृप कान सुनि वाहू न सुहाई है। आयौ प्रभु देखिवेकों,गयों वहरंग उड़ि,जान्यो सो प्रसंग,सुन्यौ वहै वात छाई है।५०४॥(१२५) COCKEKOK GROCER AGRA , -- स भक्तिसुधास्वाद तिलक। ७५६ वार्तिक तिलक । उसके नेत्रों में जल बहने लगा; हाथ जोड़ वोला कि “मैंने जो पुकार के चरणामृत लेने को कहा सो बड़ा दुःख हुआ, आप महात्मा मुझे आपको चरणामृत देने की योग्यता नहीं है । " निदान आपने अत्यन्त हठ करके ले ही तो लिया क्योंकि साधुता में अति प्रवीण थे; विचार किया कि श्रीरामजी को भक्ति ही प्रिय है। इससे जाति पांति को प्रेम के प्रवाह में बहा दिया । यह बात सब नगर में फैल गई, सब विमुख लोग उसके जाति का नाम लेकर राजा के पास आपकी निन्दा करने लगे। सुनके वह वात राजा को भी नहीं अच्छी लगी; हृदय में अभाव आगया। एक दिवस श्रीमुरारिदासजी राजा के देखने को गये; देखें तो राजा का पहिला प्रेमरंग सब चला गया। आपने जाना कि वही बात है। फिर स्थान में आके और लोगों से भी सुना कि आपके चरणामृत लेने की निन्दा सव नगर में तथा राजा के हृदय में छा रही है ।। (६३३ ) टीका । कवित्त । (२१०) गए सव त्यागि, प्रभु सेवा ही सों राग जिन्हें, नृप दुख पागि, गयो, सुनी यह वात है । होत हो समाज,सदा भूपके वरप मांझ, दरस न काहू होत, मान्यौ उतपात है । चलेई लिवायचे को जहां श्रीमुरारि- दास, करी साष्टांग रास नन अश्रुपात है । मुखहूँ न देखेवाको,विमुख कै लेखे, अहो पेखे लोग कहै यह गुरु शिष्य ख्यात है ॥५०५॥ (१२४) वार्तिक तिलक । आप विरक्त तो थे ही, श्रीसीतारामजी की सेवा भजन छोड़ और किसी वस्तु में अनुराग न था; इससे सब छोड़ छाड़ किसी और स्थल में जा विराजे। आपका चले जाना सुन राजा दुखित हुआ। राजा के यहां प्रतिवर्ष संतन का समाज उत्सव होता था सो आप के चले जाने से किसी संत का दर्शन भी नहीं हुआ। तब राजा बड़ा उत्पात मान जहां श्रीमुरारिदासजी विराजे थे वहां आपको लिवा लाने के लिये गया और साष्टांग कर, हाथ जोड़ खड़ा हुआ। राजा के नेत्रोंसे प्रेमानु की धारा बहने लगी। आपने भक्ति विमुख जान te , .

******** श्रीभकमाल सटीक। NOTE ७६० उसका मुख भी न देखा; यह दोनों की दशा देख अच्छे लोग कहने लगे कि गुरु और शिष्य ऐसे ही होना चाहिये । दो० “गुरु निर्मोही चाहिये, शिष्य न छोड़ें प्रीति । स्वारथ छांहै, हरि मिले, इहे भजन की रीति॥१॥" (६३४) दीका । कवित्त । ( २०६ ) ठादी हाथ जोरि, मति दीनता में बोरि, "कीजै दंड मोपै कोरि यों निहारि मुख भाखियै । घटती न मेरी, आप कृपा ही की घटती है; बढ़ती सी करी तातें न्यूनताई राखियै ॥ सुनिकै प्रसन्न भये कहे ले प्रसंग नये, वालमीकि आदि दै दै नाना विधि साखिये । आये निज गाम, नाम सुनि सब साधु धाये भोई समाज वैसौ देखि अभिलाखियै ॥ ५०६॥ (१२३) वार्तिक तिलक। राजा अपनी मति दीनताई में भिगा, हाथ जोड़, खड़ा हुआ, और प्रार्थना करने लगा, कि "हे स्वामी ! मुझपर कोटानि दंड करके शुद्ध कीजिये और जो मेरे मन में मलीनता आई सो मेरी घटती नहीं किन्तु आपकी कृपा ही की घटती थी अब फिर आपने कुछ अधिक कृपा किया इसीले नम्रतापूर्वक विनय कर रहा हूँ।" विनय सुन आप प्रसन्न हुये और राजा को बाल्मीकि आदि के प्रसंग उपदेश सुनाये कि देखो श्वपच वाल्मीकि को श्रीकृष्णचन्द्रजी ने किस प्रकार का सत्कार किया; तथा श्रीशवरी निषादजी को श्रीरघुनन्दनः जी ने कैसी बड़ाई दी दिलाई और गज गणिकादिक भगवद्भक्ति से कैसे पवित्र हुये; इत्यादि । सुन राजा प्रेम प्रबोधयुक्त हुआ; फिर आप अपने पूर्वस्थान में आये;आपका आगमन सुन सब संत मिलने को दौड़े । फिर बड़ा उत्तम समाज हुआ राजा ने देखकर अपना अभिलाष पूर्ण माना॥ (६३५ ) टीका। कवित्त । (२०८) आये बहुगुनीजन नृत्य गान छाई धुनि ऐपै संत सभा मन स्वामी गुण देखिय । जानिकै प्रवीन उठे, नूपुर नवीन बांधि सप्तस्वर, तीन ग्राम,लीनभये पेखिये॥गायौ रघुनाथजूको वनको गमन समै तासँग GK T भकिसुधास्वाद तिलक। ७६१ गमन प्रान चित्र सम लेखियै । भयो दुख रासि, "कहां पैयै श्रीमुरा- रिदास;" गए रामशस, एतौ हिये अवरेखिये ॥ ५०७ ॥ ( १२२) .(बलमुवां) सब जग मास तजि आयउँ शरण बीच, सरस सुभाउ सुनि तोररे बलमुवा । मोहिं लगि कहवां भुनाय दीन्हो ताहि कहँ, करि लीन्हो हियरा कठोर रे बलमुवां ॥ तलफत रहत नयन छवि देखे बिनु, आँसुवा झरत अति जोररे वलमुवां । बिरह बियाधि वस तन जर जर भयो, चैन ना परत कभू थोररे वलमुत्रां ॥ तदपि न रंचहूँ आवत हिय दया तोहिं, अचरज लागत अथोररे बलमुवां। काहे तोहि कहहिं सुसंत सदग्रंथ श्रुति, रसिक उदार सिरमौररे बलमुवा । आश्रित जनन को दुखावन सिखायो कौन, जाते न हेरत हग कोररे बलमुबां । दर्शन आसहिं पतित प्राण जात नाहि, सहै निशि दिन दुख घोररे बलमुवां ॥ निरखि अनाथ हाथ गहि अपनायो कैसे,प्रथम न देख्यो अघमोररे बलमुवां । अव क्यों पिनात सकुचात औ लजात हाय, नयन करत मम ओररे बलमुवां ॥ निज गुण विरद विलोकु रघुवंश वीर, कृपासिंधु अवध किशोररे बलमुवां । नेह लता * चेरी की न सुधि लेहिं सियत, होयजैहैं बात यह शोररे बलमुवां ॥ बार्तिक तिलक। उस महोत्सव समाज में बहुत से उत्तम गुणीजन आये, नाच और श्रीरामयश गान की मंगल धुनि छागई । परन्तु सभा के अनु- रागी संतों के मन में अभिलाषा उत्पन्न हुई कि श्रीस्वामीजी के मुखसे गान और नृत्य गुण देखें तो भला । ऐसा जान परम प्रवीण श्रीमुरारिदासजी ने उठके नवीन नूपुर चरणों में बांध, सप्तस्वर तीन ग्राम में लीन हो पालाप कर, श्रीरघु- नाथजी के वन गमनका पद गान किया। उसी समय श्रीरामरूप में तदाकार हो आपके प्राणों ने भी प्रभुके साथ ही गमन किया।शरीर चित्र के समान रह गया । * (श्री जानकीशरण स्नेहलनाजी) नये मक्काल रिहानल मादि ग्रंथोंके रचयिता। ISROCURRECRACCkeecastelectelect ختم श्रीभक्तमाल सटीक। जन्म सबको बड़ा ही दुःख हुआ; कहने लगे " हाय अव श्रीमुरारि- दासजी को कहां पावै" आप तो श्रीरामजी के समीप प्राप्त हुये। सब इस सत्य प्रेमकी जैजैकार करने लगे। (१६३) भक्तमाल सुमेर गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी। कलि संवत् सन ई० शाके ४६३३ १५८६* १५३२ १४५४ परलोक ४७२१ १६८० १६२३ १५४५ (६३६) छप्पय । (२०७) कलि कुटिल जीव निस्तार हित, वाल्मीक "तुलसी" भयौ॥ त्रेता काव्य निबंध करिव सतकोटि रमायन। इक अक्षर उद्धरै ब्रह्महत्यादि परायन । अब भक्तनि सुखदैन बहुरि लीला विस्तारी । रामच- रन रस मत्त रटत अह निसि व्रतधारी॥संसार अपार के पार को, सुगम रूप नवका लयौ। कलि कुटिलजीव निस्तारहित बाल्मीक "तुलसी" भयौ ॥१२६॥ (८५) वार्तिक तिलक । कलियुग में कुटिल जीवों को भवसिंधुसे निस्तार करने के हेतु, श्री- वाल्मीकि मुनिवर श्री १०८तुलसीदासरूपसे अवतीर्ण हुए; त्रेतायुगमें शतकोटि श्रीरामायण काव्यनिबंध आपने किये थे,कि जिन श्रीरामा- यणों के एक एक अक्षर ऐसे पुनीत प्रभाववाले हैं कि उनको उच्चारण * प० शिवलाल पाठकजी कहते हैं कि “ श्रीगोस्वामीजी संवत् १५५४ में प्रगट हुये, पाँच वर्ष की अवस्था में गुरु से रामचरित श्रवण किया, ४० वर्ष सन्तों से सुन सुन कर, ३७ वर्ष मनन किया, तय ७८ वर्ष की अवस्था सं० १६३१ में मानस रचा, सं० १६८० में श्रीरामधाम पधारे॥" (१) प्रमाण भविष्यपुराणे ॥ "घाल्मीकिस्तुलसीदासः कली देवि ! भविष्यति । रामचन्द्रकथा साध्वी माघारूपां करिष्यति ॥१॥ (२) प्रमाण श्रीरामरक्षास्तोत्रे ॥ 'चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्ताम् । एकै. कमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्" ॥ १॥ Rectact-SCRECRACHECIA भक्तिसुधास्वाद तिलक। करने से ब्रह्महत्यादि अर्थात् ब्रह्महत्या गोहत्या बालहत्या स्त्रीहत्या मद्यपान इन महापापों में परायण पुरुष भी उद्धार को प्राप्त हो जाते हैं; अब इस युग में श्रीसीताराम भजनों को सुख देने के अर्थ फिर श्रीरामायणी ललित लीला भाषा काव्य निबंधविस्तार किया, सो उसकेभी एक एक अक्षर महापापों से उद्धार करनेवाले और भक्तोंको ब्रह्मानन्द देनेवाले हैं। आप स्वयं कैसे हैं कि श्रीसीताराम चरणकमलों के प्रेमरस से मत्त मधुवत (भँवर) की नाई अनन्य बन धारण किये दिन रात्रि श्रीरामनाम यश रटते (गुंजार करते) हैं। अपार संसार. सागर से पारहोने तथा कुटिलजीवों को पार करने के अर्थ सुगमरूप नौका,अर्थात् परब्रह्म द्विभुज सीतापति शार्ङ्गधर साकेतविहारीश्याम. सुंदर श्रीरामरूप, तथा तन्नाम ("घोरभव नीरनिधि नाम निजनाव रे"),और तद्गुण लीला कथा("भवसागर चह पार जो पात्रा । राम- कथा ता कहँ दृढ़ नावा")लुगमरूपीनौका लिया,ऐसे कलिकलुप विध्वं- शनाचार्य श्री १०८ तुलसीदासजी श्रीवाल्मीकि मुनिके अवतार हुए। कोई २ शंका करते हैं कि "श्रीवाल्मीकिजी ने मुक्त जीव होके क्यों जन्म लिया ?" उसका उत्तर, ईश्वर को तथा साकार मुक जीवों को ऐसी सामर्थ्य होती है कि पूर्वरूप से ज्यों के त्यों बने भी रहैं और अपने सत्य संकल्पसे रूपान्तर तथा अवतार भी धारण करलेवें, देखिए भगवान् अपने परमधाम में विराजमान भी रहते हैं और मत्स्यादि अवतार भी धारण कर लेते हैं। ऐसे ही श्रीवा. ल्मीकिजी को भी जानिए ॥ स्कन्दपुराण में लिखा है । श्लोक "वाल्मीकिरभवब्रह्मा वाणी वाक्य रूपिणी ॥ श्रीब्रह्माजी के अवतार श्रीवाल्मीकिजी हुए और सरस्वतीजी आपकी वाक्य हुई देखिए श्रीब्रह्माजीभी बने थे और वाल्मीकिजी भी हुए ऐसही जानिए ॥ श्रीगोस्वामीजी ने भी अपना अवतार सूक्ति कियाहै (पद)"जन्म जन्म जानकीनाथ के गुन गन तुलसिदास गाए" श्रीतुलसीदासजी के गान किए हुए प्रसिद्ध वारह ग्रंथ प्रमाण हैं ("सिय स्वामिनी") तव पद पदुम विहाय ना भरोस मोहि, जोहि जिय लीजै सुधि CRE ReeCricksCSCIENCEReciated *** श्रीभक्तमाल सटीक। ७६४ मेरी सिय स्वामिनी । यदपि ही अधमा मलीन अघ ओघ खानि, तदपि कहाऊं तेरी चेरी सिय स्वामिनी ॥ प्रभुहुँते सरस क्षमादि शुभ गुण सिंधु, कीरति वदति श्रुति तेरी सिय स्वामिनी । ताहि वल शोच त नाम लै उदर भरों, निदरि गुणादि कृत फेरी सिय स्वामिनी ॥ करत अधिक छोह ताप आप प्राणनाथ, जापै रंच तोर दृग हेरी सिय स्वामिनी । ताते बार बार करजोरि मांगों दीन होइ, राग्व निज चरणन नेरी सिय स्वामिनी ॥ द्रवत न कोशलकुमार तव नेह विनु, करै क्यों न योग कर्म ढेरी सिय स्वामिनी । जैहों नहिं द्वार ते निकारे हूं पे दयानिधे, सांची गुनी कहत हौं टेरी सिय स्वामिनी ॥ जौन माया योगी सिद्ध ज्ञानी विधि शंभु हूं लौं, निज वस माहि किये जेरी सिय स्वामिनी । सोउ तव भृकुटी बिलोकत रहति सदा, चाहति कटाक्ष कृपा केरी सिय स्वामिनी ॥ जनक- कुमारी रघुवंशमणि प्राणप्यारी, अव जनि कीजै नेकु देरी लिय स्वामिनी ॥ "नेहलता" * प्रीतम से दीजिये धरायकर, विगरी वनेगी एकै वेरी सिय स्वामिनी ॥ कवित्त । "रामलला नहळू त्यो विरागसंदीपिनी हूं,बरैवै बनाई बिरमाई मति साई की। पारर्वती, जानकी के मंगल ललित गाय, रम्य राम आज्ञारची कामधेनु नाई की ॥ दोही, औ कवित, गीतबंध, कृष्ण कथा कही, रामायने, बिन माह बात सब ठाई की । जग में सोहानी, जगदीश हूं के मनमानी, संत सुखदानी, बानी तुलसी गोसाई की ॥१॥" लोगोंने छोटे बड़े सोलह ग्रंथ भी माने हैं, परंतु उन ग्रंथों में श्रीगोस्वामीजी की वर्ण अर्थ शैली नहीं पाईजाती। "जीवान्मन्दमतीन्सुभाग्यरहिताज्ञात्वा कलर्दोषत- स्तत्कल्याणपरायणः परकविःश्रीमन्महर्पिसस्वयम् ।। वाल्मीकि कृपया सुहृत्सु तुलसीदासेति नाम्ना कला. वाविर्भूय चकार रामचरित भाषाप्रवन्धेन वै॥१॥" * स्नेहलताजी ( श्रीजान शम्णजी) श्रीप्रयोध्या हनुमानिवास भक्तमाली मानस उत्तर पक्षादि। Scotoucted ROCHECRECSCk भक्तिसुधास्वाद तिलक। ७६५ Sir George Grierson on Tulasi Dasa:- "Tulis Das is surely descrving of more notice thar is usually bestonell upon him in luistories of the dei clopment of the religious idea in India. "I give much less than the usual estimate when I say that fulls ninuly millions of people base their theories of moral and religiets conduct upon liin ( Tulasi Dus' ) writings. If ne tihe the miluence everciseil by loom at the prrent time as our test, he is ont of the three or four great writers of..Isin. "Over the whole of the Gangetic alloy his heat souh (the Rumayana ) is better known than the Bible is in Lugland " There is... 11 lien occasion requires it, sententious' aphoristic muthod of dealing with narrative, wlrich teens with similes drawn, not from the traditions of the sukools, but from natille hersell, and better thu Kali Dasa at his best." (1143) चौपाई। "चन्दौ तुलसिदास गोस्वामी । जासु सुमति सबके उर जामी॥" (६७) टीका । कपित्त । (२०६) तिया सों सनेह, विनु पूछे पिता गेह गई, भूली सुधि देह, भजे वाही ठौर आए हैं। बधू अति लाज भई, मिस सो निकसि गई, प्रीति राम नई, तन हाड़ चाम छाए हैं। सुनी जब बात, मानौ होइगयो प्रात, वह पाछे पछिनात, तजि, "काशीपुरी" धाए हैं। कियौ तहां बास, प्रभु सेवा लै प्रकास कीनौ, लीनो दृढ़ भाव, नैन रूप के तिसाए हैं। ५०८ ॥ (१२१) वार्तिक तिलक। आपका ब्राह्मण कुल में संवत् १५८६ में जन्म हुआ। यज्ञोपवीत होने पर विद्याध्ययन किया, विवाह गोना भी हुआ। स्त्री से स्नेहथा, उसके मायके (नैहर ) से पिता भ्राता कोई लिवाने आया, तब वह आपका अपने में स्नेह जान, विना पूछे ही, पिता के गृह चली गई । पीछे आप प्राके उसका जाना सुन, स्नेहसे देह दशा भूल, दौड़े हुये उसीके समीप जा पहुँचे । देख के स्त्री को अतिलज्जा आई ।। कुछ क्रोधयुक्र स्त्री के मुख से यही वाणी निकलपड़ी कि "आप श्रीरामजी में इस प्रकार प्रीति नहीं करते, कि जो नित्य नवीन CERECTGCLOSRECk CICROREA . , , SASARAN श्रीभक्तमाल सटीका ७६६ दोनों लोक में सुख सुयश देनेवाली है । मेरे शरीर में ऐसी प्रीति की सो इसमें मांस रुधिर हाड़ चाम छोड़ क्या और कुछ भी है ?" दो० "काम वाम की प्रीति जग, नित नित होत पुरान । . राम प्रीति नित ही नई, वेद पुरान प्रमान ॥ १ ॥ लाज न लागत आप को, दौरे आयहु साथ । धिक धिक ऐसी प्रीति को, कहा कहाँ मैं ? नाथ !" अस्थि चरम मय देह मम, तामें जैसी प्रीति । तैसी जौं श्रीराम मह, होति, न तो भव भौति ॥३॥ स्त्री के मुख से श्रीरामप्रेरित ऐसे वचन सुनते ही आपके हृदय में मानो ज्ञान वैराग्यरूपी सूर्य उदय हो गये; प्रथम की दशा रात्रि के समान, चली गई । आप उसी क्षण उसी ठिकाने से चलदियेस्त्री पीछे पश्चात्ताप करके कुछ प्रार्थना करने लगी; परन्तु आपने उसकी ओर देखा तक नहीं। यहां सज्जनोंने इतनी युक्त वार्ता और भी लिखी है कि श्रीतुल- सीदास जी कई कोस चले आये; एक ठिकाने श्रीगंगाजी में जल पान करके सो रहे, तो स्वप्न में श्रीशिवजी ने श्रीरामषडक्षर मंत्र- राज बताया, और कहा कि “ यही मंत्र और श्रीराम नाम तुम जपो, ក្នុង को श्रीरामजी दर्शन देंगे।" आप जागे, उसी क्षण से श्रीराम नाम में अतिशय तत्पर हुये इसी हेतु से श्रीशिवजी को गुरुदेव करके माने हैं (हित उपदेशक महेश मानौं गुरुकै ) “बाहुक" में । " मेरो माय बाप गुरु शंकर भवानिये" तदनन्तर श्री " वाराहक्षेत्र" में आकर श्रीरामानन्दीय म- हात्मा श्रीनरहरिदासजी से श्रीराममंत्रादिक पंच संस्कार ग्रहण * श्रीनरहरिदासजी की गुरुपरम्परा महात्माओं ने यों कही है:- (१) श्री १०८ रामानन्द स्वामी (२) श्रीअनन्तानन्दजी (३) श्रीनरहरिदासजी (४) इन्हीं श्रीनरहरिदासजी के शिष्य श्री स्वामी तुलसीदासजी है । और गो स्वामी श्री नाभाजी की परम्पराया है। (१) श्री १०८ रामानन्द स्वामी (२) श्रीअनन्तानन्द (३) श्रीकृष्णदास पैहारी जी (४) श्रीमग्रस्वामी (५) गोसाई श्रीनाभाजी महाराज । और, पाठक यह जानते ही हैं कि-दोनों (गोसाई श्रीनाभास्वामी तथा गोसाई श्रीतुलसीदासजी) एक ही समय में थे, और परस्पर समागम था । RECECAUGUSectCES SARASHTRA भक्रिसुधास्वाद तिलक। ७६७ कर श्रीरामायणजी सुना। फिर आज्ञा लेकर वहां से श्रीकाशीजी आये; वहां निवास कर श्रीसीताराम प्रभुजी की मानसी तथा प्रत्यक्ष सेवा में तत्पर होकर दृढ़ भजन भावना में आरूढ़ हुये *। सापके नेत्र श्रीराम दर्शन रूप स्वातिविन्दु के लिये चातक के समान प्यासे रहते थे। अनन्त श्रीगोस्वामि तुलसीदासजी के जीवनचरित्र बहुत सज्जनोंने कई प्रकार से वर्णन किये हैं किसी २ ने आपको कान्यकुब्ज ब्राह्मण कहा है परन्तु विज्ञोंने सरयूपारी ब्राह्मण लिखा है। उसमें कोई सुकुल ("सुकुल जनम" कवितावली) गर्गगोत्री कोई पराशरगोत्री द्विवेदी पत्यौजा के लिखते हैं । " तुलसी पराशर गोत दुचे पति औंजा के" ऐसा श्रीकाष्ठजिह्वा स्वामीजीने लिखा है। अस्तु, ब्राह्मणवंश ही को आपने पवित्र किया यह निश्चय हुआ। जन्मस्थान भी लोग कई ठिकाने लिखते हैं; चांदा जिले में यमुनातीर " राजापुर "को बहुत लोग कहते हैं परन्तु राजापुर आपका जन्मस्थान नहीं है । श्रीगोस्वामीजी का जन्मस्थान श्रीगंगा वाराहक्षेत्र (सोरों) के प्रान्त अन्तर्वेद में "तरी" नामक ग्राम में वा "तारी" था। आपने " राजापुर” में विरक्त होने के पीछे निवास कर भजन किया है, इसीसे वहां श्रीगोस्वामीजी के विराजमान की हुई संकटमोचन श्रीहनुमानजी की मूर्ति है । और श्रीरामायण अयोध्याकांड भी है। यह वार्ता वहां जाके भलीप्रकार निश्चय की गई है। आपके जन्मका संवत् १५८६ का निश्चय होता है। पिताका नाम श्रीमात्मारामजी और माता का श्रीहुलसीजी महानुभावों ने लिखाहै ॥ गोसाईजीने अपना नाम "रामबोला" भी कवित्तरामायण में लिखा है “रामबोला नाम हौं गुलाम रामसाहि को" ॥ * दो० पदयौं गुरू ते श्रीच शर, सन्त धीच मन जान । गौरी शिव हनुमत का, तब मैं ग्ची " चिरान" ॥१॥"। + "पुरान १८ पुरान चिरान" श्रीरामचरितमानस पुराणों की अपेक्षा अपनी रचना को चिरान कहा (पुरानी वस्तु को पुरान चिरान कहते हैं । चिरान शब्द की जड़ " चिर" जानिये)। SCRELCOHOCACHECOLOCALCICLECRECR +++86- श्रीभक्तमाल सटीक। ७६८ . (६३%) टीका | कवित्त । (२०५) सौच जल सेस पाय, भूतह विशेस कोऊ, वोल्यो सुख मानि, हनुमानजू वताए हैं । "रामायन" कथा, सो रसायन है काननि को, आवत प्रथम, पाछे जात, घृना छाए हैं । जाय पहिचानि, संग चले उर धानि, पाए वन मधि, जानि, धाय, पाय लपटाये हैं। करें तिरस्कार, कही "सकोगे न दारि, मैं तौ जाने रससार" रूप धस्यों जैसे गाए हैं ॥ ५०६ ॥ (१२०) वार्तिक तिलक। श्रीनाशीजी में* शौच को आप "असी" नदी के पार जाते थे शौचशेष जल स्वाभाविक एक कंटकी प्रेरके वृक्ष में नित्य डाल दिया करते थे। वहां अन्यत्र का एक प्रेत आकर रहता; और वह वहां पानी पीताथा, क्योंकि प्रेतों को अशुद्ध ही जल पीने का अधिकार है। एक दिन वह प्रेत प्रगट हो सुखपूर्वक आपसे बोला कि “मुझ प्रेत को आपने पानी देकर प्रसन्न किया। कुछ मांगिये । "आपने कहा "मुझे श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन करादो, और कुछ नहीं चाह- ना है।" उसने कहा "यह शक्ति तो मुझे नहीं है, परन्तु उपाय बत- लाता हूँ । अमुक ठिकाने श्रीरामायण कथा जो उनके कानों की रसायन है सो सुनने श्रीहनुमान्जी छुपके आते हैं, अति दीन मलीन रूप धारण कर, सबसे प्रथम आते और सबसे पीछे जाते हैं वे आपको दर्शन करा देंगे।" दो०"रामकथा जहँ कोउ कहै, तहँ तहँ पवनकुमार । सिर कर अंजुलि धरि सुनत, बहत नयन जलधार ॥१॥" श्रीगोस्वामीजी उस कथा में जाकर श्रीक पिराज ( हनुमत) जी को पहचान बैठे रहे । चले, तब आप भी पीछे पीछे चले। जब वन में निकल आये तब श्रीगोस्वाभीजी दौड़ के चरण पकड़ लपट गये। श्रीहनुमानजी कहने लगे छोड़ो २ तुम साधु होकर मुझे क्यों छूते हो ?" आप बोले "मैंने आपको श्रीराम-दास्य रस-सारांश-मूर्ति जानलिया; अव चरण नहीं छोडूंगा।" श्रीहनुमानजी ने तब प्रसन्न *और कोई कहते है कि श्रीगोस्वामी जी नित्य गंगापारही शौच जातेथे वही प्रेतमिला। Sket ।

. RI भनिसुधास्वाद तिलक । ७६६ होकर जैसा श्रीरामायण में आपका रूप कहागया है सो उस रूपसे दर्शन दे मस्तक पर हाथ रक्खा। (६३६ ) टीका । कवित्त । ( २०४) "मांगि लीने वर" कही "दीजै राम भूप रूप, अति ही अनूप, नित नैन अभिलाखियै।" कियौ ले संकेत, वाही दिन ही सो लाग्यो हेत, आई सोई समै चेत "कब छवि चाखियै ॥" आए रघुनाथ, साथ लछिमन, चढ़े घोरे, पट रंग बोरे हरे, कैसे मन राखिये। पाछे हनुमान आय बोले "देखे प्रानप्यारे ?" "नेकुन निहारे मैं तो भलें। फेरि भाखिय" ॥ ५१० ॥ (११६) वार्तिक तिलक । श्रीमारुतनन्दनजी ने आपसे कहा "वरदान मांगलो" श्रीगो- स्वामीजी ने कहा कि "अति अनूप श्रीराम भूप रूप के दर्शन को मेरे नयन नित्य अति अभिलापायुक्र हैं सो दीजिये।" श्रीकपीश्वरजी ने संकेत किया कि "चलो चित्रकूटजी में दर्शन होगा।" श्रीगोस्वामीजी उसी दिन दर्शनाभिलाष प्रेम उत्कंठा में भरे चले । श्रीचित्रकूट में आकर जहां श्रीहनुमानजी ने बताया था वहां बैठके यह विचार करने लगे कि वह शोभामृत मेरे नेत्र कब चखेंगे?" इतने ही में राजकुमार वेप से श्रीरघुनन्दनजी और लाल- लाइले श्रीलपणजी घोड़ोंपर चढ़े मृगयानुकूल हरित वस्त्र धारण किये एक मृगा के पीछे घोड़ा दौड़ाये आकर निकल गये। श्रीगो. स्वामीजी ने देखा तो, परन्तु मनमें श्रीराम लक्षमणजी का निश्चय न किया। पीछे श्रीहनुमानजी ने आकर पूछा "तुमने प्राणप्यारे प्रभुको देखा?" आप कहने लगे कि मैंने भले प्रकार निश्चय करके तो नहीं देखा फिर दिखलाने की कृपा कीजिये।" तब श्रीपवनतनयजी इने कहा अब हम भलीभांति से फिर दर्शन करावेंगे।"सो फिर मन्दा- किनी के तीर में श्रीसीतारामजी सिंहासन पर विराजमान श्रीभरत लालंजी छत्र लिये श्रीलक्ष्मण शत्रुघ्न दहिने बायें चंवर चलाते थे ** RECRecs ७७० श्रीभनमाल सटीक। ताते मत इस राजमाधुरी का दर्शन श्रीहनुमानजी कृपालु ने कराके श्रीतुल- सीदासजी को कृतकृत्य किया; फिर श्रीगोस्वामीजी काशीजी को चले आ, उसी दिव्यरूप की माधुरी का ध्यान करते थे (६४०) टीका | कवित्त । (२०३) हत्या करि विप्र एक, तीरथ करत आयौ, कहै मुख "राम, भिक्षा डारियै हत्यारे कौं।" सुनि अभिराम नाम धाम मै वुलाय लियो दियो लै प्रसाद कियौ सुद्ध गायो प्यारे कौं॥ भई द्विज सभा कहि बोलि के पठाये आप "केसे गयौ पाप, संग लैके जये, न्यारे कौं।" "पोथी तुम वाचौ, हिये सार नहीं सांची अजू कांची, दूर करै न अंध्यारे कौं" ॥ ५११॥ (११८) चातिक तिलक। एक समय काशीजी में एक ब्राह्मण हत्या करके अनेक तीर्थ करते आया और बड़े दीन स्वरसे पुकार के कहता था "राम,राम, हत्यारे को भिक्षा डाल दीजिये।" श्रीगोस्वामीजीने सुना कि"प्रथम अति अभिराम शत कोटि तीर्थ सम पावन नाम कह फिर अपने को हत्यारा भी कहता है यह कौन है ?" आपने निकल के पूछा। उसने अपना वृत्तान्त कहा । श्राप बोले कि "जो तुम इस प्रकार ग्लानि दीनतापूर्वक मेरे प्राणप्रिय परब्रह्म श्रीरामजी का नाम उच्चारण करते हो, तो शुद्ध होगये, आवो बैठो।" फिर उसको पंक्ति में बैठाके श्रीराम प्रसाद पवाये। (क०) "हरी भरी वाटिका सुधर्मकी, विशाल अति, जाके देखे छूटि जात सबै दुख द्वंद है । व्यास, शुक, नारद, मुनीश, शेप, शारदादि, पाराशर, वालमीक, मालिन को वृन्दहे ॥ चार सम्प्रदाय की बनाई चार रौशैं, 'रंग', शास्त्र, वेदतरु पाँति, राजत स्वछन्द है। चञ्चरीक 'तुलसी,' सप्रेम ताके मध्य पैठि, अजव निकास्यो 'रामयश' मकरन्द है ॥१॥" (डाक्टर रामलालशरण मास्टर "रंग") + CCCCCCCASC भकिसुधास्वाद तिलक। इसवार्ता को काशी के सव ब्राह्मणों पंडितों ने सुन कर सभा की और श्रीगोस्वामीजी को बुलाकर कहने लगे कि "विना प्रायश्चित्त किये इसका पाप कैसे छूटगया ? पनि से न्यारे किये हुये को आपने अपने साथ में लेकर भोजन किया, यह अयोग्य है।" आपने उत्तर दिया कि "आप लोग शास्त्रों के पुस्तक पढ़ते तो हैं परन्तु उन के सारार्थ में दृढ़ता सवाई नहीं करते; इसीसे आप लोगों का मत कच्चा है, हृदय का अज्ञान अन्धकार नहीं जाता; देखिये तो श्रीराम- तापनी आदिक श्रुतियों तथा हारितादि स्मृतियों में श्रीराम नाम की कैसी महिमा लिखी है।" (प्रमाण श्लोक) "ब्रह्मघ्नो गुरुतल्पगोपि पुरुषः स्तेयी सुरापो- ऽपि वा मातृभ्रातृविहिंसकोपि सततंभोगैकवद्धस्पृहः नित्यं राममिम जपन्घुपति भक्त्या हृदिस्थं तथाध्यायन्मुनिमुपैति किं पुनरसौ स्वा- चारयुक्तो नरः॥ १॥स्वप्ने तथासंभ्रमतःप्रमादाद्विजम्भणात्संस्खलना द्यभावात्।रामेति नाम स्मरतस्सद्वै नश्यत्यसंख्यद्विजधेनुहत्या॥२॥ रकारोच्चारणेनैव बहिनिर्याति पातकम् । पुनः प्रवेशकाले च मकारस्तु कपाटवत् ॥ ३ ॥ (श्रुतिः) य एतत्तारकं ब्राह्मणो नित्यमधीते स सर्व पाप्मानं तरतिस मृत्यु तरति स ब्रह्महत्यां तरतिसभ्रूणहत्यां तरतिस वीरहत्यांतरतिससर्वहत्यांतरति ससंसारं तरतिस सर्व तरति सोऽवि. मुक्तमाश्रितो भवति स महान् भवति सोऽमृतत्वं च गच्छति ॥ इति श्रुतिः रामतापिनीयोपनिषदि।" श्रीरामेति परं जाप्यं तारकं ब्रह्मसंज्ञ- कम्।ब्रह्महत्यादिपापघ्नमिति वेदविदो विदुः ॥१॥ इति सनत्कुमार- संहितायाम् । "तुलसी अघ सव दूर भै, रा अक्षर के लेत। तहां बहुरि आवे नहीं, 'मा' अक्षर पट देत ॥" (६४१) टीका । कवित्त ! (२०११ देखी पोथी बांच, नाम महिमाहूँ कही सांच, "ऐपै हत्या कर कैसें तर कहि दीजिये ?।" "आ जोप्रतीति कही", कही हाथ जेंवै शिवजूको बैल तव पंगति में लीजिय॥" यार में S KAHANI श्रीभक्तमाल सटीक । ७७२ दियो चले जहां पन किया, वोले "आप नामके प्रताप मति भीजि. यै । जैसी तुम जानो तैसी कैसे कै बखानो अहो " सुनिकै प्रसन्न पायो, "जैजै" धुनि रीझिये ॥ ५१२ ॥ (११७) वार्षिक तिलक। आपके कहने पर पंडितों ने उन पुस्तकों को वाच देखे तो ब्रह्म हत्यादिमोचनी श्रीराम नाम की महिमा सत्य सत्य लिखी थी तथापि पंडितों ने कहा कि “लिखा तो है परन्तु कैसे जान पड़े कि यह हत्या से छूट गया ?" आपने उत्तर दिया कि "जिस प्रकार से तुम लोगों को प्रतीत भावै सो कहो।" पंडितों ने आपस में संमत करके कहा कि " इसके हाथ का पदार्थ श्रीविश्वनाथजी का नन्दी ('पापाण का वैल) भक्षण करलेवै तव इसको शुद्ध जान पंक्ति में ग्रहण करलें।" आपने कहा बहुत अच्छा चलिये। थाल में प्रसाद भरके उसके हाथ में देकर समाजसहित नन्दी के पास आये, और श्रीतुलसीदासजी ने विनयपूर्वक नन्दीजी से कहा कि "आप श्रीराम नाम के प्रताप से मतिको सरस कर इसके हाथ का प्रसाद पाइये, क्योंकि श्रीराम नाम का प्रताप जैसा आप जानते हैं वैसा मैं नहीं कह सकता।" यह सुनते ही नन्दीश्वरजी प्रसन्न होकर सब प्रसाद पागये । देखके सब सज्जन गोस्वामीजी के विश्वास पर रीझ के "जय जय" धुनि करने लगे। श्रीराम नाम की जय, श्रीतुलसीदासजी की प्रतीति की जय ! (६४२) टीका । कवित्त । (२०१) आए निसि चोर, चोरी करन हरन धन, देखे श्याम घन, हाथ चाप सर लिये हैं। जव जव श्रावे, वान साँधि डरपा, एतौ अति मडरावें, ऐपै वली दूरि किए हैं ॥ भोर आय पूछे "अजू ! सांवरो किशोर कौन ?" सुनि करि मौन रहे, आंसू डारि दिए हैं। दै सबै लुटाय,जानी चौकी रामराय दई, लई उन्हीं दिक्षा सिक्षा, सुद्ध भए हिए हैं ॥ ५१३ ॥ (११६) चार्तिक तिलक। एक समय रात्रि में श्रीगोस्वामीजी के यहां कई चोर मिल के धन RAKESECHAR , , , *********** भक्तिसुधास्वाद तिलक ७७३ चुराने को आये; सो देखते क्या हैं कि एक घनश्याम सुन्दर वीर कटि में तरकस बांधे, हाथ में धनुप वाण लिये, खड़ा है । तब चोर चले गए, कुछ देर में फिर स्थान के दूसरी दिशा में आये, वहां भी रक्षक खड़ा धनुष बाण को संधान कर मानो मारही डालेगा। इसी प्रकार स्थान के तीनों दिशाओं में कई बार चोर आये, परन्तु उन सर्वतोमुख रक्षक ने सब ओर से रक्षा की, बरंच अपनी शोभा से चोरों के चित्त को भी चुरा लिया। इतने में रात्रि भी बीत गई । प्रभु के दर्शन से चोरों की कुछ और ही दशा होगई, हृदय में उस छवि के दर्शन की बड़ी अभिलाषा, और शुद्धता, आगई। सवेरे सब चोर श्रीगोस्वामीजी के समीप आकर पूछने लगे, कि "महाराज ! आपके स्थान में श्यामसुन्दर किशोर वीर धनुष वाण लिये कौन रहता है ? कहां है ?" और कुछ अपना वृत्तान्त भी कह सुनाया । आप सुनकर मौन हो रहे; और नेत्रों से आंसुओं की धारा चलने लगी। हृदय में यह अनुताप हुआ कि" हाय ! यह तुच्छ मायिक पदार्थ के लिये प्राणप्रिय श्रीरामकृपालुजी ने रात्रि में चौकी दी!" उसी क्षण सब द्रव्य बरतन आदिक पदार्थ लुटा दिये। श्रीरामदर्शन से, और श्रीगोस्वामीजी की दशा देख, चोरों के हृदय अतिशुद्ध होगये, चरणों में पड़ कर, प्रार्थना कर श्रीराममंत्र पंच संस्कार सदुपदेश लिये, और कृतार्थ हुये। सवैया । "अति सुन्दर रूप अनूप महाकवि कोटि मनोज लजावनिहारे । उपमा न कहूँ सुखमा के सुमंदिर मंदिरहूं के बचावनिहारे ॥ दिननायकहूँ निशिनायकहूँ मदनायक के मद नावनिहारे । सांवर राजकिशोर वशो-चित-चोरनहूँ के चौरावनिहारे ॥ १॥" (६४३) टीका । कवित्त । (२००) कियौ तन विप्र त्याग, तिया चली संग लागि; दूरहीं ते देखि, कियो चरण प्रनाम है । बोले यों "सुहागवती," "मयो पति होऊ सती," "अब तो निकसि गई ज्याऊं सेवो राम है" ॥वोलिक RAKACHAKAKOcticecreak AUGRESS *** REEKRISHASHAN श्रीभक्तमाल सटीक। कुटुंब कही “जो पै झकि करौ सही," गही तब वात जीव दियो अभिराम है । भये सव साधु व्याधि मेटी ले विमुखता की जाकी वास रहै तौ न सूझे श्याम धाम है ॥ ५१४॥ (११५) यात्र्तिक तिलक। श्रीकाशीजी में एक समय एक ब्राह्मण मरगया थाउसकी स्त्री पति के शरीर के साथ सती होने को चली जाती थी। मार्ग में श्रीगो- स्वामीजी को देख दूर ही से चरणों में प्रणाम किया; आपने आशिप दिया कि "सौभाग्यवती हो।" वह बोली “स्वामीजी! मेरे पति का तो शरीर छूट गया है, मैं सती होने जाती हूँ।" आपने कहा कि "अब तो मेरे मुख से निकल गई; जो तुम श्रीरामजी की भक्ति सेवा करो तो इसको जिवादूं।" उसके कुटम्व भर को बुलाके कहा कि "अाज से सब श्रीसीताराम नाम जपो और प्रेमभक्ति में परायण हो, तो यह श्रीरामकृपा से जी उठे।" सुनतेही ब्राह्मण के सब परिवार बोले कि हम सब जन्म भर भजन करेंगे जो यह जी उठे।" आपने कहा "सब हाथ उठाके 'जय-जय श्रीसीताराम' कहो।" सबने ऐसा ही किया । उन सबके साथ वह मृतक भी उठके हाथ उठाके "सीताराम" कहने लगा।उस. को जीवित देख "जय-जय-"कार धुनि हुई।तव तो वह ब्राह्मण और उसकी स्त्री तथा सब परिवार श्रीराममंत्र ग्रहण कर श्रीरामभक्तियुक्त साधु होगये । श्रीगोस्वामीजी ने सबकी भक्ति-विमुखतारूपी व्याधि छुड़ा दी कि जिस विमुखता की गंधिमात्र रहने से भी श्रीरामश्याम- सुन्दर का धाम नहीं सझ पड़ता। (६४४) टीका । कवित्त । ( १९६) दिल्लीपति पातसाह अहदी पठाये लैन ताकौ, सो सुनायो सबै विप्रज्यायौ जानियै । देखिबेकों चाहै नीकै सुखसों निघाहै, आय कही वहु बिनै गही चले मन आनिये ॥ पहुँचे नृपति पास, आदर प्रकास कियो, दियो उच्च आसन लै, बोल्यौ मृदुवानिये । “दीजै १ "पातसाह"=olis=बादशाह-नृपति, महीप । + , असर AR भक्तिसुधास्वाद तिलक। ७७५ करामात जग ख्यात सव मात किये,” कही "झूठ बात एक राम पहिचानिये" ॥ ५१५ ॥ (११४) वार्तिक तिलक । जब आपकी कृपा से ब्राह्मण जी उठा तब चारों ओर सुयश फैल गया। इस वातको दिल्लीपति!31s etoil, ra ने भी सुनके, आपका दर्शन करने के लिये, दूतों को काशी के सूवादार के पास भेजा, कि "जिन साधु ने मरे ब्राह्मण को जिला दिया है, उनको यहां भेजदो।" उस सूवादार ने श्रीगोस्वामीजी के समीप आकर प्रार्थना की कि “वादशाह आपका दर्शन किया चाहते हैं, कृपा करके सुखपूर्वक चलिये । महाराज ने बहुत प्रकार से विनय किया है ।" आपका बुलाना सुन यहां के बहुत से राजा सेवक लोगों ने कहा कि "स्वामी जी! हम सवोंको शंका होती है आप मत जाइये; आपके अर्थ में जो हम सबोंके प्राण लगें तो हम युद्ध में दे सकते हैं। सुनके आपने आज्ञा दी कि कोई शंकाकी वात नहीं है, हम जाके मिल आवेंगे।" आप सबको समझाके श्रीगंगाजी में नौका पर चढ़ प्रयागजी आये,वहां से श्रीयमुनाजी में नौका पर चले मार्ग के लोगों को दर्शन देते कृतार्थ करते दिल्ली में यवन राज के समीप गये; वह उठकर खड़ा हो बड़े उच्च आसन पर विराजमान कर मृदुवानी से बोला "आपने मरा मनुष्य जिवा दिया है यह वात सारे संसार में वि. ख्यात हो गई है इससे मुझको भी करामात दिखाइये । श्रीगोस्वा- मीजीने उत्तर दिया "करामात, अजमत आदिक झूठी बात हम एक भी नहीं जानते, केवल श्रीरामजी को जानते मानते भजते हैं।" (६४५) टीका | कवित्त । (१९८) "देखें राम कैलों" कहि, कैद किये, किये हिये "हृजिये कृपाल हनुमानजु दयाल हो।" ताही समै फैलि गए, कोटि कोटि कपि नये, लोचें तन खोचें चीर भयो यों बिहाल हो ॥ फोरै कोट, मारें चोट, किए डार लोट पोट, लीजै कौन ओट जाय, मान्यौ प्रलय १ "कैद"= ois = बन्दीघर में रखना। atsACANCIES ******HAANTARATHI ৩৩৪ श्रीभकमाल सटीक। काल हो । भई तव आँखें, दुखसागरको चाखें, अब वेई हमें राखें, भार, वारो धन माल हो ॥ ५१६ ॥ (११३) वार्तिक तिलक। आपका उत्तर सुन यवनराज सक्रोध चोला कि"देखें राम कैसे हैं," फिर अपने मनुष्यों को आज्ञा दी कि "इनको ले जाओ एक गृह में बैठाके पहरा में रक्खो, विना कुछ करामात दिखाये नहीं छोड़ेंगे।" लोगोंने ऐसाही किया । तव श्रीगोस्वामीजी ने हृदय में अपने करामातीसहायक श्रीहनुमान्जीको स्मरण कर विनय किया, "हे श्रीहनुमन् कृपासिंधो ! अब आप दया कीजिये।" उसी क्षण इन पदों को बनाके प्रार्थना की- (पद) “ऐसी तोहिं न बूझिये हनुमान हठीले । साहेच कहूँ न राम से तोसे न वप्सीले ॥” इत्यादि। (दूसरा पद) “समरथ सुवन समीर के रघुवीर पिारे । मोपरकीवी तोहिंजोकरलेहि भिमारे॥"इत्यादि।" आपकी प्रार्थना सुनतेही गजगृह में और सब नगर भर में को- टान कोट बन्दर फैल गये,सो कैसे कि नये अर्थात् स्वयं श्रीहनुमान्- जी बड़े विकराल अनन्त रूप धारण कर आगये और सबकी दुर्दशा करने लगे। नखों से दांतों से लोगों को नोचने लगे यहां तक कि यवनराज की नारियों वेगमों के वस्त्रों को चीर फाड़ डाले नोच चोथ के विकल कर डाला । वानरवृन्दों ने जैसा लंका में उपद्रव किया था वैसाही यहाँ उत्पात मचाया,कोटको तोड़ फोड़ डाला उन्हीं पत्थरों से लोगों को चोट मारते लोट पोट किये डालतेथे सब लोग हाय हाय कर रोने पुकारने लगे कि अब हम किस की ओट से बचें सघने यही जाना कि प्रलय हुआ, महाउत्पात देखा। तव यवनराज के हृदय की आंखें खुली, दुख के समुद्र में के निश्चय किया कि अब वेई फ़कीर हमारी रक्षा करेंगे उन्हीं के ऊपर हम अपना धन सम्पत्ति निवछावर कर देंगे। Prectscckulerkiseksi ल ७७७ RSHA RSS भक्निसुधास्वाद तिलक। (६४६) दीका कवित्त । (१९७) आय पाय लिये, "तुम दिये हम प्रान पावै," आप समझा "करामात नेकु लीजियै” । लाज दविगयो नृप, तब राखि लयौ, कह्यौ "भयो घर रामजू को वेगि छोड़ि दीजिये ॥” सुनि तजि दयौ और कस्वा लैकै कोट नयो, अवहूँ न रहे कोऊ वामै, तन छीजिये। काशी जाय, वृन्दावन आय मिले नाभाजू सों, सुन्यौ हो कवित्त निज रीझ मति भीजिये ।। ५१७॥ (११२) वार्तिक तिलक । बादशाह दौड़ता हुआ आके श्रीगोस्वामी जी के चरण पकड़ कर विनय करने लगा कि "अब हम लोगों के प्राण आपके दिये हये मिलते, और प्रकार से नहीं बच सके।" सुनके श्रीगोस्वामी जी ने कहा "कुछ काल करामात तो देख लो।" भापके वचन सुन अति लजित हो, कहने लगा कि "सब देख लिया अव रक्षा कीजिये ।" आपने आज्ञा की कि "जो रक्षा चाहो तो हाथ उठा- कर सब लोग श्रीरामजी की दोहाई दो।" उन्होंने ऐसा ही किया ।तब श्रीहनुमानजी ने अपना क्रोध उपद्रव शांत कर लिया । तदनन्तर श्रीगोस्वामीजी ने प्रथम पदों में जो श्रीहनुमानजी को प्रणय कठोरता कही थी उसके क्षमापन में इस पद से प्रार्थना की। *(पद) "अति आरत अति स्वारथी अति दीन दुखारी। इनको विलग न मानिये बोलहिं न विचारी" इ० । क्षमा होनेपर यवनराज ने श्रीगोस्वामीजी से बहुत प्रेम प्रार्थना कर कहा कि “अब मुझे कुछ आज्ञा दीजिये सो सेवा करूं," आपने कहा कि 'यह तुम्हारा घर, नगर श्रीरामजी का हो गया श्रीहनुमान्जी ने थाना कर लिया इसको तुम शीघ्र छोड़ दो;" आज्ञा सुन वह उस निवास को छोड़ दूसरा नया कोट निर्माण कराके उसीमें जा रहा । अब तक भी उत्त पुरानी जगह में कोई नहीं रहता; यदि रहै तो वह बन्दरों के मारे रहने न पावै।

असम Rai श्रीभक्तमाल सटीक । ৩৩৪ फिर श्रीगोस्वामीजी दिल्ली से काशीजी को चल दिये। मार्ग में वृन्दावन में आकर श्रीनामास्वामीजी से प्रेमपूर्वक मिले; श्रीनाभा- जी ने जो भक्तमाल में आपके यश का छप्पय लिखाथा सो सुनाया श्रीसीताराम कृपा स्मरण से दोनों ने परम सुख पाया ॥ (३४७) टीका | कवित्त । (१६६) मदनगोपाल जू को दरसन करि कही, "सही राम इप्ट मेरे दृष्टि भाव पागी है"। वैसही सरूप कियो, दियों ले दिखाइ रूप, मन अनुरूप छवि देखि नीकी लागी है ॥ काहू कही "कृष्ण अव- तारीजू प्रसंस महा, राम अंस," सुनि बोले “मति अनुरागी है । दशरथसुत जानौ, सुन्दर अनूप मानौ, ईशता बताई रति वीस- गुनी जागी है" ॥ ५१८ ॥ (१११) वार्तिक तिलक । वृन्दावन में श्रीगोस्वामीजी श्रीनाभा स्वामीजी को मिलके अति सुखी हुए; फिर उन्हींके साथ और वैष्णवों के सहित मुख्य मंदिरों में दर्शन करते, श्रीमदनगोपालजी के मंदिर में आये। वहां श्री- गोस्वामीजी दंडवत् प्रणाम करना चाहते थे कि एक कृष्णोपासक ने परशुरामदासजी कृत यह दोहा पढ़ा- •दो० "अपने अपने इष्ट को, नवन करें सब कोय । इष्ट विहीने परशुराम, नवै सो मूरख होय ॥ १॥" दो "परशुराम के वचन सुनि, मानत हिये हुलास । सीता रवन सँभारि के, बोले तुलसीदास ॥१॥ कहा कहाँ छवि आजकी, भले वने हो नाथ । तुलसी मस्तक तब नवै, धरो धनुष शर हाथ ॥ २॥ "मुरली लकुट दुराय के, धस्यो धनुप शर हाथ । तुलसी लखि रुचि दासकी, नाथ भये रघुनाथ ॥ ३॥" चौ० "यह प्रत्यच्छ देख्यौ संसारा, वृन्दावन माच्या जयकारा" एक समय ज्ञानगूदरी में श्रीगोस्वामीजी जा विराजे; किसी बज- वासी ने कहा कि "श्रीकृष्णचन्द्र अवतारी बड़े प्रशंसनीय हैं। k CHARGECRETD . .

ॐ न भकिसुधास्वाद तिलक। ৩94 (श्लोक) "एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्" सो इनको छोड़ आप अंशावतार श्रीराम जी को क्यों भजते हैं ?" सुनते ही श्रीगो. स्वामीजी श्रीरामरूप माधुर्यानुराग बुद्धियुक्त बोले मैं तो श्रीचक्रवर्ती महाराजाधिराज श्रीदशरथ जी के सुत जान परम सुन्दर अति अनूप मान सानुराग भजता था, आज आपने अंश ईश्वरता भी बतादी, इससे मेरी रति प्रीति श्रीराम श्यामसुन्दर जी में बीस गुनी जग उठी"॥ दो० "जो जगदीश तो अति भलो, जो भूपति तो भाग । तुलसी चाहत जन्म भरि, रामचरण अनुराग ॥१॥" चौर "यह सुनि जानि अनन्य उपासी।गहे चरण सब संत हुलासी॥" देखिये श्रीगोस्वामी जी यद्यपि श्रीरामपरत्व सर्वावतारित्वप्रमाण देकर उनको निरुत्तर कर सकते थे तथापि माधुर्यपरत्व ही से जीति लिये क्योंकि आप का सिद्धांत ऐसा ही है। दो० "जो मधु दीन्हें ते मरे, माहुर दियो न जाय। जग जित हारे 'परशुधर, हारि जिते रघुराय ॥" *दो. "फीके विना अनन्यता, यद्यपि बड़े महान । सुन्दरता धरवादि सब, विना नाक अरु कान ॥" 5 गोस्वामी श्री १०८ तुलसीदासजी महाराज तथा रामचरित मानस" की प्रशंसा में, काशीवासी साहित्याचार्य श्री अम्बिकादत्त व्यासजी ने जो कवित्त लिखे हैं, सो कविता भी देखने ही योग्य हैं । (पटना खड्ग बिलासप्रेस में मिलते हैं) श्रीजानकी घाट स्वामी श्री १०८पं० रामलभाशरण महाराजजी की प्राशानुसार एक वकील ने लखनऊ नवलकिशोर प्रेस में १९९५-१९८२ में जो रामचरित्रमानस छगई है, उसमें श्रीगोस्वामी जीवनी देखिये । . "श्री

७८०
श्रीभक्तमाल सटीक।
गोस्वामी श्री १०८ तुलसीदासजी के चरित्र अपार हैं । इस
दीन ने केवल उतनाही मात्र लिखा है कि जितना श्रीप्रियादासजी
के कवित्तों में वर्णित है।
श्रीभनमाल सुमेर गोस्वामी तुलसीदासजी 23
AADHAARIANDIANRA AAMAIIANIMALAIM
MALAAAAAAL
HALLAAMAA
numIT
TISTITTWITTER

9435*34
भक्तिसुधास्वाद तिलक।
चौ० रामनाम अनुराग गुसाईं. दीजिय, प्रभु ! निजदास कि नाई ॥
श्रीसीतारामार्पणमस्तु
KC HLECTeck
ScticeCAKACECTeactic

R अमर अध ७८२ श्रीभकमाल सटीक। - (१६३) श्रीमानदासजी। (६४०) छप्पय I (१६५) गोप्य केलि रघुनाथ की, मानदास परगट करी॥ करना वीर सिंगार आदि उज्ज्वल रस गायो। पर उपकारक, धीर, कवित, कविजन मन भायो॥ कौशलेश पदकमल अननि दासत व्रत लीनौ। जानकीजीवन सुजस रहत निसि दिन रँग भीनौ । रामायन नाटक की रहसि उक्ति भाषा धरी। गोप्य केलि रघुनाथ की मानदास परगट करी ॥ ॥१३०॥(८४) ॐ वार्तिक तिलक । श्रीजानकीजीवन रघुनाथ जी की गुप्त केलि (रहस्यलीला), श्रीमानदासजी ने काव्य द्वारा प्रगट की; उन लीलाओं में करुणा- रस, वीररस, उज्ज्वल शृङ्गाररस आदि, सबरस अति उज्ज्व- लता से गोन किये, और बड़े परोपकारी अति धीर हुये । आप का वित्त कविजनों के मन में बहुत अच्छा लगता था । श्रीकोशलेश रामचन्द्रजी के चरणकमलों में अनन्य दासता का व्रत धारण किया। श्रीजानकीजीवनजी के सुयश अनुराग के रंग में दिन रात भीगे रहते थे। श्रीरामायणजी तथा श्रीहनुमन्नाटक आदिकों की सब रहस्य उनियां भाषा में वर्णन की । ऐसे श्रीमानदासजी हुए आपने शृङ्गाररस और माधुर्य बहुत ही उत्तम रीति से लिखा है। -दो० "सी" कहते सुख ऊपजै, "ता" कहते तम नास। तुलसी "सीता" जो कहै, राम न छोड़ें पास ॥१॥ १ अननि-अनन्य। SAINSAARISAINING .

करे। RRRRRRRIERRERNORE भकिसुधास्वाद तिलक । ७८३ (१६४)श्रीगिरिधरजी। (६४६) बप्पय | (२६४) (श्री) वल्लभजू के वंशमें, सुरतरु गिरिधर भ्राजमान॥ अर्थ धर्म काम मोक्ष भक्ति अनपायनि दाता। हस्तामल श्रुति ज्ञान सब ही शास्त्र को ज्ञाता ॥ परिचर्या ब्रजराज कुँवर के मनकों दरशन परम पुनीत सभा तन अमृत वर्षे । विट्ठलेश नंदन सुभाव जग कोऊ नहिं ता समान। (श्री) वल्लभजू के वंश में सुरतरु गिरिधर भ्राजमान॥ १३१॥(-३) बार्तिक तिलक। श्रीभल्लभाचार्यजी के वंश में, श्री “गिरिधर" जी कल्पवृक्ष के समान शोभा को प्राप्त हुए । अर्थ धर्म काम मोक्ष तथा अनपायनी भक्ति के देनेवाले हुए । श्रुति सम्भव ज्ञान आपको हस्तामलक था, तथा सब शास्त्रों के ज्ञाता थे। आपकी की हुई सेवा परिचर्या श्री. ब्रजराजकुमार कृष्णचन्द्रजी के मन को खींच लेती थी। अति पुनीत दर्शनयुत सभा में बैठ वचनामृत की वर्षा करते थे। श्री- विट्टलेशनन्दनजी के सुभाव के समान जगत् में और किसी का सुभाव न हुआ॥ ( १६५.) श्रीगुसाई गोकुलनाथजी (६५० ) छप्पय । (१९३) *(श्री)वल्लभजू के वंशमै गुननिधि "गोकुलनाथ" *.पेकी किसी पाथी में इस छप्पय के अनन्तर एक छप्पय है कि जोपुरानी किसी प्रति में नहीं पाया जाता । निश्चय होता है कि उस पुस्तक के छपाने वाले के "विट्ठ नवंश कल्याण के शिष्य सोनि सद्गुण निकर, इत्यादि । CCCCCC-SCIENC •पुरुष सोनी थे।

*****RAPRAKER**** ७८४ श्रीभक्तमाल सटीक अति॥उदधिसद अक्षोभ सहज सुन्दर मितभाषी। गुरु वत्तन गिरिराज भलप्पन सेब जग साषी॥ विट्ठलेश की भक्ति भयो वेला दृढ़ ताकैं। भगवत तेज प्रताप, नमित नरवर पद जाकैं। निर्विलीक आसय उदार, भजन पुंज गिरिधरन रति वल्लभजू के वंशमें, गुननिधि "गोकुलनाथ" अति॥ १३२॥ (८२) वार्तिक तिलक। श्रीवल्लभजी के वंश में (आप के पोते ) श्री "गोकुलनाथजी" अति उत्तम गुणों के सिंधु हुये । समुद्र के समान क्षोभरहित, गंभीर सहज सुन्दर, मितभाषी हुये । और आपका शरीर पुष्ट गौरवयुक्त गिरिराज सम था, इस बात के साक्षी जगत् भरके लोग थे कि आप बड़ेभलप्पन साधुतायुक्त हुये । श्रीविट्टलेशजी की भक्तिसागर के आप दृढ़ वेला ( मर्यादा ) के समान हुये । श्रीभगवान् के तेज प्रतापयुक्त होने से आपके चरणों को श्रेष्ठ नर वन्दतेथे । सत्ययुक्त, उदार, अन्तःकरण भजनपुंज, गोवरधननाथ जी की प्रीति में पराया हुये:॥ (६५१) टीका । कवित्त । (१६२) आयो.कोऊ शिष्य होन ल्यायौ भेट लाखन की, भाखन की चातुरी पै मेरी मति रीझियै । कहूँ है सनेह तेरौ ? जाके मिलें विना देह व्याकुलता होय जोपै, तो पै दीक्षा दीजियै ॥ बोल्यौ "अजू मेरो काहू वस्तु सों न हेतु नैकु,” "नेति नेति कही हम, गुरु ढूंढ़ि लीजिये। प्रेमही की बात इहां करही पलदि जात," गयो दुख गात, कहो कैसे रंग भीजिये ।। ५१६ ॥ (११०) (शेर) आंखों में मेरी जगह है तेरी। चितवन तेरी कामना है मेरी ॥ REAKIGecketectionRECAUSectect , भक्तिसुधास्वाद तिलक। ७८५ में चेरि तेरी तेरा दिया सब । गुण गा सकुं तेरा में पिया कव ॥ जनकलली के पदकमल, जेहि उर करहीं ठौर । तेहि उर राजहि अवश्य श्रीरामरासिक शिरमौर ॥ जय जानकि मम स्वामिनी, जय स्वामी सिय नाह । सियसहचरि नित चाहती, लली लाल की चाह ॥ वार्तिक तिलक । एक समय कोई धनी मनुष्य लक्षावधि की सम्पत्ति भेट देने को लेकर श्री "गोकुलनाथजी" के समीप आया; आपके बोलने की चातुरी में मेरी मति रीझ गई कि उससे पूछा "किसी में तेरा इस प्रकार का स्नेह है कि जिसके मिले विना तेरे तन मन में व्याकुलता हो जाय ? यदि हो तो हम तुझको दीक्षा देव" वह बोला कि "मेरा किसी वस्तु में किंचित् भी स्नेह नहीं है ॥" सुनकर उत्तर दिया कि "हम तुझे शिष्य नहीं करेंगे तू अपने लिये और गुरु कहीं ढूँढ़ ले, क्योंकि हमारे भनिमार्गमें एक प्रेम ही प्रेम की वार्ता है, जो उसके प्रेम पदार्थ होवे तो शिष्य कर उसको संसार की ओर से, कल सरीखे, पलटके प्रभु में लगा देवें; और जो तेरे हृदय में प्रेमका वीजही नहीं है, तो श्रीभक्तिरूपी वृक्ष कहांसे उत्पन्न होगा ?" आपका उत्तर सुन वह दुखी होकर, चला गया। वह शून्य हृदय- वाला प्रभु के प्रेमरंग में कैसे भीजै ? (६५२) टीका । कवित्त *। (१६१) कान्हा हो हलोलखोर, घोरि दियो मन लेके स्याम रससांगर मैं नागर रसाल है । निसि को सुपन मांझ, निपुन श्रीनाथजून, आज्ञा दई, “भीत नई मई श्रोट साल है ॥ गोकुल के नाथजू सों * इसके पूर्व छप्पय की टिप्पणी देखिये । "विट्ठल वंश कल्यान के, शिष्य सोनि सद्गुण निकर ॥ इ०" यह एक छप्पय किसी छपी पोथी में है, परन्तु पुगनी किसी प्रति में नहीं पाया जाता । मूल ८० देखिये । श्राप सात भाई थे, श्रीविठ्ठलनाथजी की कथा देखिये, पांच वर्ष तक प्राप श्रीभगवत् आवेश विभूति थे। १ हो-घा । २ "हलालखोर भंगी। ३ भई हुई। २ 10 A - REARRRRRI ७८६ श्रीभक्तमाल सटीक। वेगि दै जताइ दीजै 'कीजे. याहि दूर छवि पूर देखौ ख्याल हैं' भोर जौ विचारै, नहिं धीरजकों धारे, “उहां जाऊं कोऊ मारे, पैड़ें परयौ यह लाल है" ॥ ५२०॥ (१०६) वार्तिक तिलक। श्रीगोकुलनाथजी ने देखा कि श्रीगोवर्द्धननाथजी के मंदिर के सामने खड़े होकर बहुत नीच लोग भी दर्शन करते हैं; इससे सामने एक भीत का आड़ खिंचवा दिया । एक “कान्हा" जात का भंगी था, परन्तु उसने अतिनागर रसाल श्यामसुन्दररूपी सागर में अपना मन मिला दिया। वह नित्य आता दर्शन करता था पर उस भीतके बनने से अव उसको दर्शन मिलना रुक गया, इससे वह बड़ा व्याकुल हुआ । तव प्रेमप्रवीण श्रीनाथजी ने रात्रिको स्वप्न में उसको आज्ञा दी कि "यह जो नवीन भीत ओट करनेवाली है सो हमारे मन में सालती है इससे तू गोकुलनाथजी से कहदे कि इसको शीघ्र गिरवादें हम अपने सामने सब शोभा से पूर्ण कौतुक देखा करें। उसने प्रभात में कहने का विचार किया परन्तु "धैर्य न हुआ, डर गया, कि "मैं कहने जाऊं, तो कोई मारै न; और ये लालजी मेरे पड़े पड़े हैं मुझको पुनः पुनः आज्ञा देते हैं।" "धन्य धन्य भंगी वड़ भागी । जगत पूज्य हरिपद अनुरागी ॥" (६५३ ) टीका | कवित्त । (१९०) ऐसे दिन तीन आज्ञा देते वे प्रवीन नाथ, हाथ कहां, मेरे विन नहीं सरैगो । गए द्वार द्वारपाल धोले, "जू विचार एक दीजै सुधि कान,” सुनि खीझे "वात करेंगौ" ॥ काहूने सुनाय दई, लीजिये बुलाय "अहो कही," और "दूर करौ," करे दूरि ढरैगो । जाय वही कही, लही आपनी पिछानि, मिले, सुन्यो “मेरौ नाम स्याम कह्यो, नहीं टरैगौ" ॥ ५२१॥ (१०८) वार्चिक तिलक। प्रेम में प्रवीण श्रीनाथजी ने कान्हा को इसी प्रकार स्वप्न में "

৩=৩
FRERAKAR
भक्तिसुधास्वाद तिलक
तीन रात्रि आज्ञा दी । तब उसने विचार किया कि "अब मेरा
बस नहीं है विना श्रीगोसाईजी के समीप गये काम नहीं चलेगा।"
जाकर द्वारपालों से विनय किया कि "मुझे कुछ कहना है सोआप
गोसाईजीके कान में सुना दीजिये"। सुनकर द्वारपाल खीझ उठे कि
"तू उनसे बात करेगा?"
परन्तु किसीने सुना दिया; तब आपने बुलाकर पूछा कि
"कहो,” उसने कहा कि आपके समीप से और लोग उठ जावे
तव कहूंगा; सब उठगये, तब कान्हा स्वप्न में जो नाथजी की
आज्ञा हुई थी सो सब कहगया । श्रीगोकुलनाथजी सुनके अति
हर्पित हुए कि "प्रभुने मुझे अपना जान आज्ञा दी, बड़ी मंगल
की बात है, और कान्हा से मिलके कहा कि "जो श्यामसुन्दरजी
ने मेरा नाम लेकर कहा है तो अवश्य करूंगा।" फिर वह भीत
गिरवादी। और प्रेमी कान्हा को कुछ कार्य किये विनाही भोजन
वस्त्रादि से सत्कार करने लगे।
(१६६) श्रीवनवारीदासजी।
(६५४) छप्पय । (१८६)
रसिक रंगीलो, भजन पुंज सुठि, "वनवारी” *
श्याम कौ ॥ वात कवित बड़ चतुर चोख चौकस अति
जाने । सारासार विवेक परमहंसनि परवानै ॥ सदा-
चार संतोष भूत सवको हितकारी। आरज गुन तन
अमित, भक्ति दशधा व्रतधारी ॥ दरसन पुनीत,
आसय उदार, आलाप रुचिर सुख धामको ।
रसिक रँगीलौ, भजन पुंज सुठि “वनवारी' श्याम
कौ ॥ १३३ ॥ (८१)
* वनवारी बनमाली॥
KASGASCRACK

७८ श्रीभक्तमाल सटीक। , वार्तिक तिलक। श्रीवनवारीदास, श्रीश्यामसुन्दरजी के अति रँगीले रसिक भक्त भजन पुंज थे । कविता और वार्ता करनी बड़ी चतुरता चोखाई और अति यथार्थता से जानते थे । सारासार विवेक में परमहंसों की नाई थे । सदाचार में तत्पर, संतोषी, सब प्राणियों के हितकारी, अमित श्रेष्ठ गुणों के निधान, और प्रेमाभक्ति व्रतको धारण करने- वाले थे। उदार अन्तःकरण, प्रियदर्शन रुचिर आलाप करने- वाले, सुखधाम श्याम के,थे ॥ आपके दर्शन से लोग पवित्र हो जाते थे। (श्लोक) "हे जिह्वे ! रस-सारज्ञे ! मधुरं किं न भाषसे ? मधुरं वद कल्याणि, सर्वदा मधुरप्रिये" ॥ १॥ (१६७) श्रीनारायण मिश्रजी। (६५५) छप्पय । (१८८) भागौतमली विधि कथन कौ, धनि जननी एकै जन्यौ॥नाम नरायण मिश्र, वंश नवला जु उजागर। भक्तन की अति भीर भक्ति दशधा को आगर । आगम निगम पुरान सार शास्त्रनिसब देखे । सुरगुरु, शुक, सनकादि, व्यास, नारद, जू विसेखे ॥ सुधा बोध मुख सुरधुनी, जस वितान जग मै तन्यौ। भागौत भली विधि कथनको, धनि जननी एकै जन्यौ ॥ १३४॥ (८०) वार्तिक तिलक । उजागर नवलावंश विभूषण श्रीनारायण मिश्रजी की माता . . । * प्रभु यश गान के। भागोत-श्रीभागवत ।। SECRACREASE REACHERE ७८६ , 15 भक्तिसुधास्वाद तिलक। धन्य हैं, जिनने, भली विधि से श्रीभागवत कथन करने के लिये, मापको अद्वितीय उत्पन्न किया। क्योंकि आगम, निगम (वेद) पुराण, शास्त्रों का सारांश देखे हुये, वृहस्पति, शुक, सनकादिक, व्यासदेव, नारदजी के समान श्राप थे। आपकी कथा में भगवत् भक्तों की भीड़ लग जाती थी, और प्रेमाभक्रि में प्रवीण सुधा बोध मुख अर्थात् निज मुख वचन से अमृत सम सुखस्वाद सुबोध देने वाले हुये । आपकी कथा का जसरूपी वितान, गंगाजी के जस के समान, जगत् में छागया ।। दो०-"नाम "नरायन मिश्रजी," "नवला वंश" सुहात । कोटि जन्म के तम हरॆ, आतपलौ विख्यात" ॥ १ ॥ महानुभव लोग कहते हैं कि आपको श्रीशुकदेवजी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर श्रीमद्भागवत समझने का आशीर्वाद दिया था। ( १६८) श्रीराघवदासजी। (६५६) छप्पय । (१८५) कलिकाल कठिन जग जीति यों, राघौ की पूरी परी॥काम, क्रोध,मद,मोह, लोभ की लहर नलागी। सूरज ज्यौं जल ग्रहै, बहुरि ताही ज्यौं त्यागी । सुन्दर शील सुभाव, सदा संतन सेवाव्रत । गुरु धर्म निकख निर्वह्यौ, विश्वमें विदित बडौ भृत ॥ अल्हराम रावल कृपा, आदि अंत धुकती धरी। कलिकाल कठिन जग जीति यौं राघौ की पूरी परी॥ १३५ ॥ (७९) वार्तिक तिलक । श्रीराघवदासजी ने जगत् में कठिन कलिकाल को जीतलिया, आपकी भक्ति साधुता पूरी पूरी निवाहि गई। काम,क्रोध, मद, मोह, लोभ इन सब अग्नियों की लहर आपको नहीं लगी; जैसे सूर्य अपनी किरणों से जलको सोष लेते हैं, और समय पर वर्षते हैं, ऐसे .

७६० श्रीभक्तमाल सटीक। . ही आपने भी सबसे धनादि लेकर साधुसेवा के समय में त्याग किया और सुन्दर शील सुभाव से युक्त, सदा संत सेवा का व्रत धारण निकख (कसौटी) में जैसे उत्तम सुवर्ण की परीक्षा हो जाती है, इसी प्रकार गुरुसेवाधर्म में आपका निर्वाह हो जाने से विश्व में बड़े गुरुसेवक विदित हुये। आपने श्री "श्रीअल्हजी और श्री. रामरावलजी की कृपा से, आदि से अंत तक धुकती अर्थात् प्रभुके ओर झुकतीही दशा को धारण कियेरहे । to श्रीरामराचलजी, श्रीअलहजी के शिष्य और धीराघवदासजी के गुरु है। (१६६) श्रीवावनजी। ६५७) छप्पय । (१८६) हरिदास भलप्पन भजन बल, “बावन" ज्यों बढ्यौ “वावन।” ॥ अच्युत कुल सों दोष सुपनेहूँ उर नहिं आने तिलक दाम अनुराग सबनि गुरु जन करि मानै ॥ सदन माहिं वैराग्य विदेहिन कीसी भांती। रामचरण मकरंद रहति मनसा मद माती॥ "जोगा- नंद” उजागर वंश करि, निसि दिन हरिगुन गावनौ। हरिदास भलप्पन भजन बल, "बावन" ज्यों बढ्यो "वावनौ" ॥ १३६ ॥ (७८) वार्तिक तिलक । श्रीहरिभक्कों के भलप्पन (कृपा) से, तथा श्रीसीताराम भजन के वल से हरिके दास "श्रीवावनजी" भी साधुत्व स्वरूपसे श्रीवावन भगवान् के समान चढ़े । अच्युतगोत्री वैष्णवों में, दैवयोग कोई दोष हो भी तथापि आप स्वने में भी उन दोनों को अपने हृदय (१) इस छाग्य के अर्थ करने में यहुतों ने विशेषण हरिदास शब्द को ही भक्त का नाम माना है, और "यावन" शब्द के दो येर होते हुए भी उस पर पूरा ध्यान नहीं दिया। (२) दोहा "कामी साधुहि 'कृष्ण' कहि, लोमा 'यावन' जानि । क्रोधी को 'नरसिंह' कहि, नहीं भक्त की हानि ॥ १॥"

७६१
ॐॐॐ
भक्निसुधास्वाद तिलक।
में नहीं लाते, परंच माला कंठी तिलक वेषमात्र धारण करनेवालों
को अनुराग सहित गुरुजन करके मानते थे । पिता श्रीविदेहजी की
नाई, गृह में रहते हुए ही परम वैराग्यमान थे।
श्रीरामचरणकमल के प्रेम मकरन्द से आपका मन रूपी भ्रमर
मदमत्त रहा-करता था। "श्रीयोगानन्द" जी के वंशको उजागर
करके दिन रात श्रीवावनजी श्रीसीताराम गुणगान किया करते थे।
(१७०) श्रीपरशुरामजी।
(६५८) छप्पय । (१८५)
जंगली देश के लोग सव, “परशुराम"कियपारषद॥
ज्यों चन्दन को पवन नीम्ब पुनि चन्दन करई।
बहुत काल तम निविड़ उदै दीपक ज्यौं हरई॥
श्रीभट पुनि हरि व्यास संत मारग अनुसरई।
कथा कीरतन नेम रसन हरि गुण उच्चरई॥
गोबिन्द भक्तिगदरोग गति,तिलक दाम सद बैद हद ।
जंगली देश के लोग सब, "परशुराम" किय पारषद ॥
१३७॥ (७७)
वार्तिक तिलक।
श्रीपरशुरामदेवजी ने अपने उपदेश से जंगली देश के लोगों को
भगवत् पार्षदों के समान कर दिया किस प्रकार कि जैसे दिव्य
मलयागिर चन्दन का पवन नींव के वृक्ष को चन्दन कर देता है;
और जैसे बहुत काल के सघन अन्धकार को दीपक हर लेता है;
इसी प्रकारजंगली लोगों का अज्ञान आपने हरलिया। "श्रीभट्टजी"
और "श्री हरिव्यासजी" के साधु मार्ग में आप भी चले; सदा
नेम से भगवत्कथा नाम कीर्तन श्रीहरि गुण रसना से उच्चारण
करते थे; जैसे रोगी को अनुपानयुक्त रसायन औषधि देकर सवैद्य
RRECIESGREATRIKRUSCARRESPEECRUARY

७६२ श्रीभक्तमाल सटीक। , , निरोग कर देते हैं। इसी प्रकार श्रीपरशुरामजी ने गोविन्दभक्ति- रसायन, मला तिलक अनुपान के साथ देकर, पाप रोग को नाश कर दिया। श्री "श्रीभट्ट" जी के श्रीहरिव्यासदेव शिष्य थे, जिनसे हरि- वंशी (राधावल्लभी) हरिदासी, आदि, पांच शाखाएं निम्बार्क सम्प्रदा की चली हैं। (छप्पय )"तिलक है सत अस्नान तिलक ब्राह्मन सिर सोहै। तिलक विना कछु करौ सबै फल निरफल जोहै ॥ तिलक तिया सिंगार तिलक नृप सीस लगावें । तिलक वेद परमान तिलक त्रैलोक चढ़ावै ॥ तिलक तत्त्व जुग जुग सदा तिलक मिलै सिधि पाइए। परसराम ब्रह्मांड में सुजस तिलक को गाइए" ॥१॥ दो० "कथा सुनै नहिं कीरतन, बकै आपनी बाइ । पापी मानुष परशुराम, के ऊंघे, उठि जाइ ॥१॥ श्रोता ऐसो चाहिये, जाके तन मन राम । वक्ताह हरि को भगत, जाके लोभ न काम ॥२॥ साधु तहां ही संचरै, जहां धर्म की सीर सरवर सूखे परशुराम, हंस न बैठे तीर ॥ ३॥" (६५६ ) टीका | कवित्त । (१८४ ) राजसी महंत देखि, गयौ कोऊ अंत लैन, बोल्यौ "ज अनंत हरि सगे, माया टारियै " । चले संग वाके, त्यागि, पहिरि कुपीन अंग, बैठे गिरि कंदशमें लागी ठोर प्यारिये ॥ तहां वनिजारों प्राय संपति चढ़ाय दई, दई और पालकी हूं, महिमा निहारिये ॥ जाय लपटायो.पाय, भाव मैं न जान्यौँ कळू, आन्यौं उर मांझ, आवे प्रान वार डारिय" ॥ ५२२ ॥ (१०७) वार्तिक तिलक । श्रीपरशुरामदेव जी को राजसी महंत दख, और उन के ये दोहे सुन, लोई परीक्षा लेनेको गया। दो"माया सगीन तन सगो, सगो न यह संसार । परशुराम, या जीवको, सगा सो सिरजनहार ॥१॥ SCREE RECORAScim REKHA -मन भकिसुधास्वाद तिलक। ७६३ कहते हैं करते नहीं, मुहँके बड़े लबार । कारो मुहड़ो होइगो, साई के दरबार ॥ २॥" उसने ये दोहे पढ़कर कहा कि "आपने तो लिखा है" कि 'इस जीव के केवल श्रीहरि सगे हैं माया नहीं सगी' इससे माया को छोड़ दीजिये । आपने कहा बहुत अच्छा" और केवल एक कौपीन पहन के उसके साथ चले। आके पर्वत के कन्दग में बैठे वह ठौर आपको बहुत अच्छा लगा। प्रभुको स्मरण करने लगे इतने ही में एक वनिजारा (वैपारी) आकर बहुतसी सम्पत्ति और एक पालकी चरणों में चढ़ाके शिष्य हुआ वह परीक्षा करने. वाला साथ था आपकी महिमा देख, दौड़ चरणों में लपट कहने लगा कि “मैं आप का प्रभाव कुछ नहीं जानता था, मनमें और ही विचार किया, अब मेरे मन में ऐसा आता है कि आपके ऊपर प्राण नेवछावर कर दूं ॥" (१७१) श्रीगदाधरभट्ट जी। (६६०) द्रप्पय । (१८३) गुननिकर “गदाधरभट्ट' अति, सबहिन को लागै सुखद ॥ सज्जन, सुहृद, सुशील, वचन रजप्रति- पालय। निर्मत्सर, निहकाम कृपा करुणाकौ आलय ॥ अनन्य भजन दृढ़ करनि धखौ वपु भक्तनि काजै। परम धरम कौ सेतु, विदित ट्रंदावन. गाजै । भागौत सुधा वरपै वदन, काहूकों नाहिन दुखद । [ननिकर गदाधरभट्ट अति, सवहिन को लागै सुखद ॥ १३८॥ (७६) वार्तिक तिलक । शुभ साधु गणों के पुंज श्री “गदाधर भट्ट” जी सब को सुख- दाता लगते थे । सज्जन, सुहृद, सुशील, श्रेष्ठों के वचनप्रतिपालक, , Zou ardhur CHAR श्रीभक्रमाल सटीक। ७६४ क निर्मत्सर, निःकाम, और कृपा करुणा के निधान थे । भगवद्भनों को अनन्य भजन दृढ़ कराने के लिये शरीर धारण किया। परम धर्म जो भगवद्धर्म उस के सेतु ही विख्यात थे। वृन्दावन में गर्न के अपने मुख से श्रीभागवत् रूपी अमृत की मेघ के सम वर्षा करते थे। और किसी को भी आप से दुख नहीं पहुँचता था। भाषा के अत्युत्कृष्ट कवि थे। इनके विरलता की अनेक कथाएं प्रसिद्ध हैं। ये बंगाली नहीं थे, और बांदावाले भी नहीं थे; और श्रीवल्लभा- चार्यजी के शिष्य गदाधर मिश्र, दूसरही थे। "भट्ट गदाधर,, विद्या भजन प्रवीन । सरस कथा वानी मधुर, सुनि रुचि होत नवीन ।” ( ६६१ ) टीका ! कवित्त । (१७) "स्याम रंग रँगी” पद सुनिकै, "गुसांईजीव" पत्र दे पठाये उभे साधु बेगि धाये हैं। "रैनी बिन रंग कैसे चढ्यो" अति सोव बढ्यो,” कागद में प्रेम मढ्यो तहां लेके आये हैं। पुरढिग कूप, तहां धैठे रस रूप, लगे पूछिवेको तिनही सो नाम लै बताये हैं । “ रही कोन ठौर," "सिरमौर वृन्दावन धाम," नाम सुनि मुग्छा है गिरे प्रान पाये हैं॥ ५२३॥ (१०६) वार्तिक तिलक। श्री गदाधरभट्ट जी, प्रथम अपने घर ही में, "सखी हों श्याम रंग 'रँगी । देख विकाय गई वह मूरति सूरति माहि पगी। इत्यादि ।" यह पद बनाया। वृन्दावन में उसीको श्रीजीवगोसाई जी सुनके ऐसे मोहिते हुए कि एक पत्र लिखा कि “रैनी ( रंगने वाले के स्थान) विनाही आपको श्याम रंग कैसे चढ़गया ? मेरे मन में वड़ाही सोच है। ऐसा प्रेम मढ़ा हुआ पत्र दो साधुवों के हाथ आपके यहां भेजावे लेकर उसी नगर के समीप आये; एक कप के ऊपर रस रूप श्रीगदाधरभट्ट जी प्रभाती (दंतून ) कररहे थे, सो माप ही से वे पूछने लगे कि “गदाधरभट्ट जी इस ग्राम में कहां पर रहते हैं ?" . Actre кез-кексъsses ७६५ RAKERHIHAR भनिसुधास्वाद तिलक । आपने पूछा कि "आप कहां रहते हैं ?" संतों ने उत्तर दिया कि "सिरमौर वृन्दावन धाम में।" 'श्रीवृन्दावन' का नाम सुनते ही श्रीगदाधरभट्ट जी प्रेमसे मूर्छित हो गिर पड़े मानो प्राण निकल गये (६६२) टीका । कवित्त । (१८१) काहू कही "भट्ट श्रीगदाधर जू एई जानी मानी उही पाती चाह फेरिकै जिवाये हैं। दियौ पत्र, हाथ लियो, सीस सौ लगाय, चाय, बांचत ही, चले, वगि वृन्दावन आये हैं ॥ मिले श्रीगुसाईजू सों आंखें भरि आई नीर, सुधि न सरीर धरि धीर वही गाये हैं। पढ़े सब ग्रंथ, संग, नाना, कृष्णकथा रंगरस की उमंग अंग अंग भाव छाये हैं ॥५२४ ॥ (१०५) वार्तिक तिलक। आपकी दशा देख उन संतों से किसी ने कहा कि “यही गदा. धरभट्टजी हैं।' तब उन संतों ने आप से कहा कि "हम आप के लिये पत्र लेकर आये हैं" सो सुनकर उठ बैठे, मानें। उस पत्र की चाह ही ने आपको फिरके जिला लिया। पत्र दिया, आप हाथ में ले शीश और नेत्रों में लगा कर प्रेमानन्द से पढ़ और वैष्णवों को सत्कार कर, सीधे वृन्दावन को चल ही दिये। श्री वृन्दावन में आकर श्रीजीवगोसाईंजी से मिले, नेत्रों में प्रेमा- म्बु का प्रवाह चलने लगा, देह की दशा भूल गई, फिर धैर्य धरके फिर वही पद गाने लगे। रहकर, संतसंग में उपासना के सब ग्रंथ पढ़, श्रीकृष्णकथा कहने लगे। आपके अंग अंग में भाव रसरंग की उमंग छागई। फिर आजन्म पर्यंत धाम ही में रहे।इनकी कथासुन- कर कितने ही पर्यंत लोग विरक्त हो गए। (६६३ ) टीका | कवित्त । (E) नाम हो कल्यानसिंह जात रजपूत पूत, बैठ्यो आय, कथा सों अभूत रंग लाग्यो है । निपट निकट वास “धौरहरा" प्रवास गांव हास परिहास तज्यो, तिया दुःख पाग्यो है ॥ जानी भट्ट संग सो अनंग वास दूर भई, करी लैकै नई आनि हिये काम जाग्यो है। REGISAALIRIKISTUSASCHMASHASHIRIKA . , ANNARAYAN श्रीभक्तमाल सटीक। मांगत फिरत हुती. जुवती औ गर्भवती, कही ले रुपैया वीस "नैकु कह्यो राग्यो है " ॥ ५२५ ॥ (१०४) वार्तिक तिलक। एक समय कल्याणसिंह नाम का राजपूत कथा में आ बैठा सुनते ही उसको लोकोत्तर प्रेम रंग लग गया । बहुत समीप ही "धौरहरा" ग्राम में रहता था; नित्य कथा सुनने से विषय विरक्त हो उनने नारी से हास विलास तज दिया । स्त्री दुखित हुई और जान गई कि 'इस भट्ट जी की कथा सुनने से इनकी काम वासना लूट गई है। स्त्री ने कामवश हो विचार किया कि "मैं भट्ट की नई निन्दा कराऊ !" एक युवा स्त्री गर्भवती भीख मांगती फिरती थी उससे कहा कि "मुझ से बीस रुपये ले जो मैं कहूं सो कर" । उसने कहा "बहुत अच्छा ॥" (६६४) टीका | कवित्त । ( १७६ ) गदाधरभट्टजू की कथा में प्रकाश कही "अहो कृपाकरी अव मेरी सुधि लीजिये"।दई लौंडी संग, लोभरंग चित भंग किये, दिये ले बोली “मेरो काम कीजिय" ॥ बोले आप "वैठिय नित करौं हिये, पाप नहीं मेरौ गई दर्शन दीजिये । श्रोता दुख पाय, भाखें" झूठी याहि मारि नाई” सांची कहि राखें, सुनि तन मन छोजियै ॥ ५२६ ॥ (१०३) वार्त्तिक तिलक । उसने कहा जा गदाधरभट्टजी की कथा में प्रकाश कर उन्हीं से अच्छे प्रकार कह कि "मेरे ऊपर कृपा कर आपने गर्भवती किया तो अब मेरी सुधि लीजिये।" इस प्रकार सिखाकर बताने के लिये लौंडी संग कर दी। द्रव्य के लोभ से वह आकर उसी प्रकार बोली कि "महाराज! आपका दिया गर्भ पूरा हुआ;मुझे रहने को ठिकाना बताइये।" सुनके उस कलंक से आपको कुछ क्षोभ न हुआ, घरंच आपने कहा कि "मैं तो तेरा नित्य स्मरण करताथा मेरा दोष नहीं KEE COct her बताय, -जू जाप GA ७६७ ****** भनिसुधास्वाद तिलक। तू कहां चली गई थी, भला आज दर्शन दिया, बैठ जा ।" उस दुष्टा के वचन सुन श्रोता लोग कहने लगे कि “यह झूठी बात कह रही है इसको हमें मार डालेंगे"। आपने कहा कि “यह सत्य कहती है ।” श्रोता लोग सुन तन मन से अति दुखी हुये ।। (६६५) टीका | कवित्त । (१७) फटि जाय भमि तो समाय जायँ श्रोता कहैं, वह दृग नीर है अधीर सुधि गई है । “राधिकावल्लभदास" प्रगट प्रकाश भास, भयौ दुख रास, सुनि सो बुलाय लई है ॥ "सांच कहि दीजै नहीं अभी जीव लीजै,” डरि, सबै कहि दियौ, सुख लियो संज्ञाभई है। कादि तरवार तिया मारिवे कल्यान गयो, दयौ परबोध "हमै करी दया नई है" ॥ ५२७ ॥ (१०२) पातिक तिलक। श्रोताजन अति दुखी होकर आपस में कहने लगे कि जो भूमि फट जाती हम सब समा जाते तो भला था इस दुष्टा के बचन न सुनते । सव के नेत्रों से जल वहने लगा अधीरता से देह सुधि भूल गई। तब, एक संत राधिकावल्लभदासजी जो बड़े बुद्धिमान थे, वे उसको समीपमें बुलाके कहने लगे कि "सच सच बता तू क्यों ऐसे वचन बोलती है ? झूठ कहेगी तो अभी तेरे प्राण ले लेवेंगे।" तब डरके उसने यथार्थ सब वात कह दी । सच्ची बात खुल गई। सुनके सव श्रोताओं को सुख और संज्ञा ( सुधि) हुई। कल्यानसिंहजी अपनी स्त्री की दुष्टता सुनते ही खड्ग निकाल उसका माथा काटने को दौड़े, भट्टजी ने बहुत प्रकार से प्रवोध कर निवारन किया और कहने लगे कि "उसने मुझपर नवीन दया की है" । (६६६) टीका | कवित्त-1 ( १७७.) रहे काहू-देस मैं महंत, आये कथा मांझ, आगे लै बैठाये देखें सबै साधु भीजे हैं। "मेरे अश्रुपात क्यों न होत?" सोंच सोत परे, करे लै उपाय दै लगाय मिर्च खीजे हैं ॥ संत एक जानिके जताय दई भट्टजको, गए उठि सव जव, मिलि अति रीमे हैं । “ऐसी चाह ActActCCRECRUN FACANCIENTRESS ।

, , ****************** श्रीभक्तमाल सटीक । होय मेरे" रोयकै पुकारि कही, चली जलधार नैन प्रेम आप धीजे हैं ॥ ५२८॥ (१०१) बार्तिक तिलक। एक समय की वार्ता है कि किसी देशके एक महंत कथा में आये; सब ने आदर से आगे बैठाया उनने देखा कि सब संतों के नेत्रों से प्रेमाम्बुकी धारा चल रही है; "मेरे आंसू क्यों नहीं चलते ?" इस सोच के प्रवाह में पड़गये। दूसरे दिन मिर्च पीसके लेते आये, खीझके, युक्ति से नेत्रों में लगाली, अश्रुपात होनेलगे। एक संत ने जानके भट्टजी से कहदिया। जब सब श्रोता उठगये तब भट्टजी अति प्रसन्न हो उनको छाती से लगा रोकर कहने लगे कि ऐसी रोने की मेरे भी चाह हो, तो भली है। आपके नेत्रों से जल की धारा चलने लगी। महंतके कृत्रिम प्रेम पर अति प्रसन्न हुये । आप के हृदय में लगाने से महंत के नित्य स्वतः अश्रुपात होने लगे। (६६७) टीका । कवित्त । (१७६ ) आयो एक चोर, घर संपति वटोरि, गांठि बांधी; लै मरोरि किहूं, उठै नाहिं भारी है। आयकै उठाय दई, देखी इन रीति नई, पूछ्यौ नाम, प्रीति भई, भूलो में विचारी है ।। बोले आप लै पधारो, होत ही सवारौ श्रावै और दसगुनी मेरे तेरी यह ज्यारी है। प्राननिकों आगे धरौ आनि के उपाय करी रहे समझाय भयो शिष्य चोरी टारी है ॥ ५२६ ।। (१००) वार्तिक तिलक । किसी रात को एक चोर आकर, घर की सव सम्पत्ति लेकर उसने गठरी बांधी; परन्तु गठरी भारी होगई किसी प्रकार उठती न थी; भट्टजी ने आकर चुपचाप उठा दी। चोर ने आपकी नवीन रीति देख, पूछा कि "आपका नाम क्या है ?" आपने नाम बताया, सुनते ही चोर के हृदय में प्रीति प्रगट हुई, और विचार करने लगा कि "ऐसे महात्मा के यहां चोरी करनी मेरी बड़ी भूल STACTICOLEGRESEARCROSkelete HOLES । . भकिसुधास्वाद तिलक । ७६६ है।" आपने कहा "लेकर पधारो, तुम्हारी तो यही जीविका है, और मुझे तो प्रभात होतेही इससे दशगुनी लोग दे जायेंगे।" चौर चरणों में पड़कर विनय करने लगा कि "मैं अब धन कैसे लेजाऊं ? मेरी इच्छा होती है कि आपके ऊपर अपना प्राण न्यवछावर कर दूं।" आप समझाने लगे कि तुमने प्राणों का भय छोड़ उपाय और परिश्रम किया है, ले जाओ।" निदान चोर चोरी, छोड़, आपका शिष्यहो गया । भनिमें तत्परहो संसारसे मुक्त हुआ। (६६८ ) टीका | कवित्त । ( १७५) प्रभु की टहल निज करनि करत आप, भक्ति को प्रताप जाने भागवत गाई है । देत हुते चौका, कोऊ शिष्य बहु भेटल्यायौ, दूरहीं ते देखि, दाल आयौ सो जनाई है ॥ "धोवौ हाथ, बैठौ आप," सुनिकै रिसाय उठे, सेवाही में चाय वाको खीझि समझाई है। हिये हित रासि जग आसको विनास किया, पियो प्रेम रस; ताकी वात लै दिखाई है ॥ ५३० ॥ (६६) वार्तिक तिलक। प्रभु की परिचर्या टहल नित्य आप अपने ही हाथों से किया करते थे, क्योंकि भक्ति की शति और प्रताप जिप्त प्रकार भागवत आदि ग्रंथों में कहा गया है सो आप भले प्रकार जानते थे। एक दिन आप पूजा के लिये चौका लगारहे थे, उसी समय एक शिष्य बहुतसा धन भेट लिये आया; आपका दास उसको देख, आकर, कहने लगा कि "अमुक सेवक चला आता है, आप हाथ धोकर बैठ जाइये चौका में लगा दूंगा।" आपने सुनकर खीजकर उस सेवक को शिक्षा दी कि “मैं अपना भजन फैकर्य छोड़ किसलिये बैठ जाऊं? ऐसा कौनसा बड़ा कार्य है ? सेवक आता है तो मेरी टहल देख और भी प्रभुकी सेवा में तत्पर होगा।" इत्यादिक, श्रीगदाधरभट्टजी के अलौकिक चरित्र हैं। आपके हृदय में सबका हितही वस्लता था । जगत की आसा को सर्वथा BucketCH Kedard ।

CIBRARS भक्तिसुधास्वाद तिलक। (१७२) श्रीकरमानंदजी। (६७०) टीका । कवित्त । (१७३ ) करमानंद चारन की पानी की उचारन मैं, दारुन जो हियो होय, सोऊ पिघलाइयै । दियौ गृह त्यागि, हरिसेवा अनुराग भरे, बटुवा सुग्रीव हाथ छरी पधराइयै ॥ काहू ठौर जाय गाडि, वहीं पधराये वापै ल्याए उर प्रभु, भूलि आये ! कहां पाइयै ? । फेर चाह भई, दई श्याम को जताय बात, लई मँगवाय, देखि मति ले भिजाइयै ॥ ५३१॥(६८) वार्तिक तिलक। श्रीकर्मानन्दजी चारण (गायक) की वाणी का उच्चारण गान सुन, कैसाही कठोर हृदय होय, पर कोमल ही हो जाता था। आप गृहत्यागके तीर्थादि दर्शन के लिये विचरने लगे, श्रीहरि पूजा सेवा के अनुराग में भरे, ठाकुर सालग्रामजी का वटुमा कंठ में, और हाथ में एक कुवरी छड़ी रखते थे; उसीको गाड़कर प्रभु का बटुआ झूला सा उसमें लटका देते थे। किसी एक ठिकाने गाड़कर श्रीठाकुरजी को पधराया, चलते समय प्रभु को तो लेलिया पर छड़ी उसी ठिकाने भूल आये । फिर दूसरे ठिकाने आकर देखें तो प्रभुके विराजने के लिये छड़ी नहीं, तब तो श्रीश्यामसुन्दरजी से विनय करने लगे कि "प्रभो ! उस समय मुझे आपने कृपाकर सुधि न करादी ! अब मैं आपके विराजने के लिये छड़ी कहाँ पाऊं?" प्रभु ने आपकी सच्ची सुन्दर प्रसन्न हो वहां ही छड़ी ऊपर से गिरा दी। आपने देखकर छड़ी धन्यवादपूर्वक ले, प्रेम से भीग के उसीमें प्रभु को पधरा दिया। दो० "प्रेम मग्न कल समय रहि, पुनि मन बाहिर कीन्ह । तब चारण निज नियम सों, सेवै पूजै लीन्ह ॥" ( १७३ । १७४) श्रीकोल्हजी, श्रीअल्हजी। (६७१) टीका । कवित्त । ( १७२) कोल्ह अल्हू भाई दोऊ, कथा सुखदाई सुनौ, पहिलो विरक्त, &SERECSCARROTECREENA-KA-Act +sh प्रार्थना सुन .

कर NIRRORS श्रीभक्तमाल सटीक। ८. नाश कर प्रेमरस पान किया । सो बात मैंने आप के चरित्र ही वर्णन कर दिखा दी। आप भी, भाग्यमान नृपति "अकवर ," के समय में विराज- मान थे। (६६६) पय । (१७४) चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एताहुवा ॥ चौमुख चौरी, चंड, जगत ईश्वर गुण जाने । करमा- नन्द अरु कोल्हे, अहँ, अक्षर परवाने । माधौ मथुरा मध्य, साधु, जीवानंद, सीवा। दूदी नारायणदाम,नाम माड्नै नतग्रीवा ॥ चौराँसी, रूपक चतुर, वरनत बानी, जूजुवा॥ चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एता हुवा ।। १३६ ।। (७५) वार्तिक तिलक । श्रीहरिजी के चरण शरण होकर भगवत् गुण गानेवाले चारण (कथक ) भक्त इतने हुए। १ श्रीचौमुख जी ८ श्रीसाधू जी २ श्रीचौड़ा जी श्रीजीवानन्द जी ३ श्रीचंड जी १० श्रीसीचा जी ये जगत में ईश्वरही के ११ श्रीदूदा जी गुण गाना जानते थे। १२ श्रीनारायणदास जी ४ श्रीकरमानन्द जी १३ श्रीमाड़न जी ५ श्रीकोल्ह जी प्रभु के चरणों में कण्ठ ६ श्रीअल्ह जी नगने वाले। इन्होंने भगवत पद रचना में १४ श्रीचौरासी जी प्रमाणिक अक्षर रक्खे। रूपक देखाने में चतुर और ७ श्रीमाधो जी वर्णज की वाणी में प्रवीण । श्री मथुरा में १५ श्रीजजुवा जी नामों का (उनके विशेषणों से अलग करके) ठीक पता लगाना अत्यन्त ही कठिन (वरन सच तो यह कि असम्भव ) है ॥ Check KHARA ८०१ भनिसुधास्वाद तिलक। LIBRARIES (१७२) श्रीकरमानंदजी। (६७०) टीका | कवित्त । (१७३) करमानंद चारन की बानी की उचारन मैं, दारुन जो हियौ होय, सोऊ पिघलाइये । दियौ गृह त्यागि, हरिसेवा अनुराग भरे, वटुवा सुग्रीव हाथ छरी पधराइयै ॥ काहू ठौर जाय गाड़ि, वहीं पधराये वापै ल्याए उर प्रभु, भूलि आये ! कहां पाइयै ? । फेर चाह भई, दई श्याम को जताय बात, लई मँगवाय, देखि मति लै भिंजाइयै ।। ५३१॥ (१८) वार्चिक तिलक। श्रीकानन्दजी चारण (गायक) की वाणी का उच्चारण गान सुन, , कैसाही कठोर हृदय होय, पर कोमल ही हो जाता था। आप गृहत्यागके तीर्थादि दर्शन के लिये विचरने लगे, श्रीहरि पूजा सेवा के अनुराग में भरे, ठाकुर साल ग्रामजी का वटुआ कंठ में, और हाथ में एक कुवरी छड़ी रखते थे; उसीको गाड़कर प्रभु का घटुमा झला सा उसमें लटका देते थे। किसी एक ठिकाने गाड़कर श्रीठाकुरजी को पधराया, चलते समय प्रभु को तो लेलिया पर छड़ी उसी ठिकाने भल आये । फिर दूसरे ठिकाने आकर देखें तो प्रभुके विराजने के लिये छड़ी नहीं, तव तो श्रीश्यामसुन्दरजी से विनय करने लगे कि "प्रभो ! उस समय मुझे आपने कृपाकर सुधि न करादी ! अब मैं आपके विराजने के लिये छड़ी कहां पाऊं?" प्रभु ने आपकी सच्ची सुन्दर प्रार्थना सुन प्रसन्न हो वहां ही छड़ी ऊपर से गिरा दी। आपने देखकर छड़ी धन्यवादपूर्वक ले, प्रेम से भीग के उसीमें प्रभु को पधरा दिया । दो० "प्रेम मग्न कछु समय रहि, पुनि मन बाहिर कीन्ह । तव चारण निज नियम सों, सेवै पूजै लीन्ह ॥" (१७३ । १७४) श्रीकोल्हजी, श्रीअल्हूजी। (६७१) टीका । कवित्त । ( १७२) कोल्ह अल्हू भाई दोऊ, कथा सुखदाई सुनौ, पहिलो विरक्त, SCHOREEKRECRUCAGES GOO श्रीभक्तमाल सटीक। नाश कर प्रेमरस पान किया । सो बात मैंने आप के चरित्र ही वर्णन कर दिखा दी। आप भी, भाग्यमान नृपत्ति "अकबर |" के समय में विराज- मान थे। (६६६) पप 1 ( १७४) चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एताहुवा॥ चौमुख चौरा, चंड, जगत ईश्वर गुण जाने । करमा- नन्द अरु कोल्हे, अल्हे, अक्षर परवाने । माधौ मथुरा मध्य, साधु, जीवानंद, सीवी दूदी नारायणदास नाम माइन नतग्रीवा ॥ चौराँसी, रूपक चतुर, बरनत बानी, जूजुओं ॥ चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एता हुवा।। १३६ ॥ (७५) कार्तिक तिलक । श्रीहरिजी के चरण शरण होकर भगवत् गुण गानेवाले चारण (कथक) भन इतने हुए। १ श्रीचौमुख जी श्रीसाधू जी २ श्रीचौड़ा जी है श्रीजीवानन्द जी ३ श्रीचंड जी १० श्रीसीवा जी ये जगत में ईश्वरही के ११ श्रीदूदा जी गुण गाना जानते थे। १२ श्रीनारायणदास जी ४ श्रीकरमानन्द जी १३ श्रीमाड़न जी ५ श्रीकोल्ह जी प्रभु के चरणों में कण्ठ ६ श्रीअल्ह जी नवाने वाले। इन्होंने भगवत पद रचना में १४ श्रीचौरासी जी प्रमाणिक अक्षर रक्खे। रूपक देखाने में चतुर और ७श्रीमाधो जी वर्णज की वाणी में प्रवीण । १५ श्रीजुजुवा जी नामों का (उनके विशेषणों से अलग करके) ठीक पता लगाना अत्यन्त ही कठिन (वरन सब तो यह कि असम्भव ) है। PLECOME . श्री मधुरा में।

مدة ال ختم LIBRARY/ 503 ॐ भकिसुधास्वाद तिलक। ( १७२) श्रीकरमानंदजी। (६७०) टीका | कवित्त । (१७३) करमानंद चारन की बानी की उचारन मैं, दारुन जोहियौ होय, सोऊ पिघलाइयै । दियौ गृह त्यागि, हरिसेवा अनुराग भरे, बटुवा सुग्रीव हाथ छरी पधराइयै ॥ काहू ठौर जाय गाड़ि, वहीं पधराये वापे ल्याए उर प्रभु, भूलि आये ! कहां पाइयै ? । फेर चाह भई, दई श्याम को जताय वात, लई मँगवाय, देखि मति लै भिंजाइयै ॥ ५३१ ॥(६८) वार्तिक तिलक। श्रीकर्मानन्दजी चारण (गायक) की वाणी का उच्चारण गान सुन, कैसाही कठोर हृदय होय, पर कोमल ही हो जाता था। आप गृहत्यागके तीर्थादि दर्शन के लिये विचरने लगे, श्रीहरि पूजा सेवा के अनुराग में भरे, ठाकुर सालग्रामजी का घटुआ कंठ में, और हाथ में एक कुवरी छड़ी रखते थे; उसीको गाड़कर प्रभु का बटुआ झूला सा उसमें लटका देते थे। किसी एक ठिकाने गाड़ कर श्रीठाकुरजी को पधराया, चलते समय प्रभु को तो लेलिया पर छड़ी उसी ठिकाने भूल आये । फिर दूसरे ठिकाने आकर देखें तो प्रभुके विराजने के लिये छड़ी नहीं, तब तो श्रीश्यामसुन्दरजी से विनय करने लगे कि "प्रभो ! उस समय मुझे आपने कृपाकर सुधि न करादी ! अब मैं आपके विराजने के लिये छड़ी कहां पाऊं?" प्रभु ने आपकी सच्ची सुन्दर प्रार्थना सुन प्रसन्न हो वहां ही छड़ी ऊपर से गिरा दी। आपने देखकर छड़ी धन्यवादपूर्वक ले, प्रेम से भीग के उसीमें प्रभु को पधरा दिया। दो. "प्रेम मग्न का समय रहि, पुनि मन चाहिर कीन्ह । तव चारण निज नियम सों, सेवै पूजै लीन्ह ॥" ( १७३ । १७४) श्रीकोल्हजी, श्रीअल्हूजी। (६७१ ) टीका । कवित्त । ( १७२) कोल्ह अल्हू भाई दोऊ, कथा सुखदाई सुनौ, पहिलो विरक्त, SACREAKSCREENAKSCREExckcertisters .

HITY श्रीभक्तमाल सटीक। ८०० - . नाश कर प्रेमरस पान किया । सो वात मैंने आप के चरित्र ही वर्णन कर दिखा दी। आप भी, भाग्यमान नृपति "अकवर " के समय में विराज- मान थे। (६३९) पय । (१७४) चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एताहुवा। चौमुख चौरां, चंडे, जगत ईश्वर गुण जाने । करमा- नन्दै अरु कोल्हे, अल्ह, अक्षर परवाने॥ माधौ मथुरा मध्य, साधु, जीवानंद, सीवादी नारायणदास नाम माड्न नतग्रीवा ।। चौरासी, रूपक चतुर, वरनत बानी, जूजुवाँ॥चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एता हुवा ।। १३६ ॥ (७५) कार्तिक तिलक। श्रीहरिजी के चरण शरण होकर भगवत् गुण गानेवाले चारण (कथक ) भक्त इतने हुए। १ श्रीचौमुख जी ८ श्रीसाधू जी २ श्रीचौड़ा जी है श्रीजीवानन्द जी ३ श्रीचंड जी १० श्रीसीधा जी ये जगत में ईश्वरही के ११ श्रीदूदा जी गुण गाना जानते थे। १२ श्रीनारायणदास जी १ श्रीकरमानन्द जी १३ श्रीमान जी ५ श्रीकोल्ह जी प्रभु के चरणों में कण्ठ ६ श्रीअल्ह जी नवाने वाले। इन्होंने भगवत पद रचना में १४ श्रीचौरासी जी प्रमाणिक अक्षर रक्खे । रूपक देखाने में चतुर और ७ श्रीमाधो जी वर्णज की वाणी में प्रवीण । १५ श्रीजजुवा जी नामों का (उनके विशेषणों से अलग करके) ठीक पता लगाना अत्यन्त ही कठिन (चरन सब तो यह कि असम्भव) है ॥ ARKARISRKAL श्री मथुरा मा.

. PI भनिसुधास्वाद तिलक। TERABS (१७२) श्रीकरमानंदजी। (६७०) टीका । कवित्त । (१७३) करमानंद चारन की बानी की उचारन मैं, दारुन जोहियौ होय, सोऊ पिघलाइयै । दियौ गृह त्यागि, हरिसेवा अनुराग भरे, बटुवा सुग्रीव हाथ छरी पधराइयै ॥ काहू ठौर जाय गाड़ि, वहीं पधराये वापे ल्याए उर प्रभु, भूलि आये ! कहां पाइये ? फेर चाह भई, दई श्याम को जताय वात, लई मँगवाय, देखि मति लै भिंजाइये ।। ५३१॥ (१८) चार्तिक तिलक। श्रीकानन्दजी चारण (गायक) की वाणी का उच्चारण गान सुन, कैसाही कठोर हृदय होय, पर कोमल ही हो जाता था। आप गृहत्यागके तीर्थादि दर्शन के लिये विचरने लगे, श्रीहरि पूजा सेवा के अनुराग में भरे, ठाकुर सालग्रामजी का बटुआ कंठ में, और हाथ में एक कुवरी छड़ी रखते थे; उसीको गाड़कर प्रभु का बटुआ झूला सा उसमें लटका देते थे । किसी एक ठिकाने गाड़कर श्रीठाकुरजी को पधराया, चलते समय प्रभु को तो लेलिया पर छड़ी उसी ठिकाने भूल आये। फिर दूसरे ठिकाने आकर देखें तो प्रभुके विराजने के लिये छड़ी नहीं, तब तो श्रीश्यामसुन्दरजी से विनय करने लगे कि “प्रभो! उस समय मुझे आपने कृपाकर सुधि न करादी ! अब मैं आपके विराजने के लिये छड़ी कहां पाऊं?" प्रभु ने आपकी सच्ची सुन्दर प्रार्थना सुन प्रसन्न हो वहां ही छड़ी ऊपर से गिरा दी। आपने देखकर छड़ी धन्यवाद पूर्वक ले, प्रेम से भीग के उसीमें प्रभु को पधरा दिया ॥ दो० "प्रेम मग्न कछु समय रहि, पुनि मन बाहिर कीन्ह । तब चारण निज नियम सों, सेवै पूजै लीन्ह ॥" (१७३ । १७४) श्रीकोल्हजी, श्रीअल्हूजी। (६७१ ) टीका | कवित्त । ( १७२) कोल्ह अल्हू भाई दोऊ, कथा सुखदाई सुनौ, पहिलो विरक, SRok ad FAKX KRTERRITORRORRH श्रीभक्तमाल सटीक। मद-मास नहीं खात है । हरि ही के रूप गुण वाणी में उचार करे, धरै भक्ति भाव हिये, ताकी यह बात है ॥ दूसरौ अनुज, जानौ खाय सब उन मानौ, नृपही को गावै प्रभु कभू गाय जात है । बड़े के अधीन रहै, सोई करे जोई कहै, ईश करि चहै, आप दीनता में मात है ॥ ५३२ ॥ (६७) वार्तिक तिलक। जातिके चारन जेठे श्रीकोल्हजी और छोटे श्रीअल्हूजी, दोनों भाइयों की सुखदाई कथा सुनिये । श्रीकोल्हजी विषय से विरक्त मद मांसादि तजके श्रीहरि के नाम रूप गुण वाणी से उच्चारण करते गाते भक्ति भाव हृदय में सदैव धारण करते थे। दूसरे आपके छोटे भाई अल्हूजी सब खाते पीते सदा राजा ही का गुण गान करते, कभी कभी श्रीप्रभु का भी यश गान करलेते थे। परन्तु अपने बड़े भाई के आधीन आज्ञाकारी रहते, ईश्वर के समान मानते, आप दीनता में लीन रहते थे। (६७२) टीका | कवित्त । ( १७१) बड़े आय कही चलो द्वारिका निहारै सही, मिथ्या जग भोग,यामैं आयु ही बिहात है। श्राज्ञा के अधीन चल्यो, आये पुर, लीन भये, नये चोज मंदिर में, सुनो कान बात है ॥ कोल्ह नै सुनाये सब जे जे नाना छंद गाये, पाछे अल्हू दोय चार कहे सकुचात है । भग्यो ही "ई" कारौ, प्रभु कही माला गरें डारो, ल्याए पहिरावे, कह्यो "मेरी बड़ी भ्रात है" ।। ५३३ ॥ (६६) बार्तिक तिलक। एकदिवसकोल्हजीने अल्हूजी से कहा कि “चलो द्वारिकाधीशजी के दर्शन करें क्योंकि यह संसारी भोग सब झूठा है, इसमें पड़े रहने से वृथा आयु चली जाती है । श्रीअल्हूजी बड़े भाई के आज्ञा. कारी तो थे ही, साथ साथ चल दिये; दोनों भाई द्वारिकापुरी में श्रा, स्नानादि कर, प्रभु के मंदिर में आये । सो वहां की नवीन चमत्कार युक्त वार्ता कान दे के सुनिये ॥ chche OCE , . , * **का भकिसुधास्वाद तिलक। ८०३ प्रथम श्रीकोल्हजी ने जो जो छन्द पदों में प्रभु के यश रचे थे सो सव सुनाये; पीछे श्रीअल्हूजी ने भी दीनता ग्लानि संकोच- युक्त दो चार पद सुनाये । इनके पद सुनते ही प्रभु “हु" कारी देते थे और अपनी प्रसादी माला देने की आज्ञा दी । पुजारी माला पहिराने को लाये, श्रीअल्हूजी ने कहा कि मेरे बड़े भाई- जी को माला दीजिये, में माला पाने का पात्र नहीं हूं। (६७३) टीका | कवित्त । ( १७०) दयौ पै न याहि दयौ बड़ौअपमान भयो, गयौ वूड्यौ सागर में, दुखको न पार है । वूड़तहीं आगे भूमि पाई, चल्यो भूमि प्रीति, सो अनीति भूलै नाहिं मानो तरवार है। सौंही आये लैन हरिजन, मन चैन मिल्यो, मिल्यो कृष्ण जाय, पायो अति सुखसार है । बैठे जव भोजन कों दई उभै पातर लै दूसरी जू कैसी कही वही भाई प्यार है ।। ५३४॥ (६५) वार्तिक तिलक । पुजारी ने उत्तर दिया कि “बड़े भाई को तो प्रभु की आज्ञा ही नहीं, कैसे दूं तुम्हारे ही लिये आज्ञा है;" और श्रीअल्हूजी के गले में माला डाल दी तब कोल्ह अपना अति अपमान जान अति दुखी होकर जा समुद्र में डूब गये । डूबते ही नीचे भूमि मिल गई, तव प्रीतिपूर्वक आगे को चल दिये; परन्तु माला नं पाने का अपमान भूलता नहीं । खड्ग लगने का सा दुख होरहा । उधर से हरिपार्षद आके लिवा ले चले तव मन में सुख हुआ और आगे जाके श्रीकृष्ण- चन्द्रजी का दर्शन प्रणाम कर अति आनन्द को प्राप्त हुये ॥ जब प्रसाद लेने को बैंठे तब प्रभु की आज्ञा से दो पत्रों में प्रसाद पूर्ण कार पार्षदों ने दिया। श्रीकोल्हजी ने पूछा कि दूसरा पारस किस के लिये है ? आज्ञा हुई कि "तुम्हारा छोटा भाई जो हमारा प्यारा है, उसके लिये लेते जाना ॥" (६७४) टीका | कवित्त । (१६६) सबै विष भयो, दुख गयौ सोई हुयो नयौ, दयो परमोध वाकी EMESTERNESHCHEREFORECASSETTE ८०४ श्रीभक्रमाल सटीक। बात सुनि लीजिये । "तेरौ छोटी भाई, मेरो भक्त सुखदाई," ताकी कथा लै चलाई जामें श्राप ही सों धीजियै ॥ "प्रथम जनम मांझ बड़ी राजपुत्र भयौ, गयौ गृह त्यागि सदा मोसो मति भीजिये । आयौ वन, कोऊ भूप संग राग रंग रूप, देखि चाह भई, देह दई भोग कीजिय" ॥ ५३५ ॥ (६४) वार्षिक तिलक। सगुण उपासक भक्तों की निराली विचित्र दशा सुनिये, प्रभुके वचन सुनते ही कोल्हजी का जो दुख भूल गया था सोई फिर नवीन हो आया अर्थात् मंदिर में मुझे माला न दी उसको दी, और यहां वह नहीं है तो भी प्रसाद दिये ॥ । प्रभु इनकी दशा देख उसके प्रथम जन्म की कथा कह के प्रबोध करने लगे जिसमें ये प्रसन्न हो जायँ । आप बोले कि "उसकी धात सुनो, तुम्हारा छोटा भाई मेरा सुखदाई भन्न प्रथम जन्म में बड़े राजा का पुत्र था, सो गृह तजि वनमें जाके मुझमें मन लगाके भजन करता था, वहां एक राजा शिकार खेलने आया एक दिन रह गया उसका भोग विलास देख इसको भी चाह इसीसे हमने देह दिया कि जिसमें भोग करके वासना से मुक्त हो मुझे . प्राप्त होवै॥" (६७५) टीका । कवित्त । (१६%) तेरेई वियोग अन्न जल सव त्यागि दियो जियो नहीं जात वाप वेगि सुधि लीजिये । हाथ पै प्रसाद दीनो, आय घर चीन्ह लीनों, सुपनौ सौ गयो चीति, प्रीति वासों कीजिये ।। द्वारिका को संग सुनि भावतही आगै चल्यो मिल्यो भूमि पर हग भरि वह दीजिये। कही सब बात स्याम धाम तज्यो ताही छिन करयो वन वास दोऊ अति मति भीजिये ॥ ५३६ ॥ (६३) वार्त्तिक तिलक । "अब वह तुम्हारे वियोग से, अन्न जल त्याग कर, मरणप्राय होरहा है जाओ शीघ्र उसकी सुधि लो।" प्रभुजी ने हाथ में प्रसाद SAGE ८०५ 633 RE-RECE भकिसुधास्वाद तितक। दिया सोई चिह्न लेकर चले । बाहर गये और शंख चक्रादि चिह्न लेकर, श्रीअल्हूजी को यहां न पाकर घरको चले। प्रथम अपमान की वार्ता स्वप्ने सरीखे भूल, उससे अतिप्रीतियुक्त हुये ॥ अपने गृह में पहुँचे । श्रीअल्हूजी ने सुना कि कोल्ह जो समुद्र में डूबगए थे, सो दिव्य द्वारिका में श्रीकृष्ण दर्शन सह पाके, चले आते हैं, तब आगे आये नेत्रों में जल भर भूमिपर साष्टांग प्रणाम किया, श्रीकोल्हजीने हृदय में लगाकर, वहीप्रसाद दे, श्रीकृष्णचन्द्रजी का कहा हुआ वृत्तान्त सुनाया । सुनते ही उसी क्षण घर को त्याग बन में जा, दोनों भाई सप्रेम भजन कर अन्तमें प्रभुको प्राप्त हुये ॥ (१७५) श्रीनारायणदासजी। (६७६ ) टीका | कवित्त । ( १६७) अल्हू ही के वंश में प्रसंस याहि जानिलेव, बड़ी और भाई छोटे श्रीनारायणदास है । दीरघ कमाऊ, लघु उपज्यो उड़ाऊ, भाभी दियौ सीरौ भोजन, लै भयो दुख रास है ॥ "देवौ मोको तातो करि,' बोली वह क्रोध भरि यहूं जा हुँ कारौ भर, "बावै ?' कियो हांस है। गयो गृह त्यागि, हरि पागि कस्यौ बेसे ही जू, भक्ति वस स्याम, कह्यो प्रगट प्रकाश है ।। ५३७॥ (६२) पातिक तिलक । चारन श्रीनारायणदासजी भी अल्हूजी ही के वंश में प्रशंसनीय हुये । इनके एक बड़ा भाई धन कमानेवाला था। आप छोटेथे धन उड़ाते थे कमाते नहीं॥ एक दिन भौजाई ने वासी भोजन खाने को दिया, आपको बड़ा दुख हुश्रा । तब वोले “मुझे अभी भोजन बनाकर दो।" तब भाभी क्रोध कर हुँकार भर के, बोली मार कर कहने लगी, "क्या तू भगवत्भक्त बाबा अल्हूजी है कि तेरी आज्ञानुसार सेवा करूँ ?" ऐसा वचन सुन नारायणदासजी गृहको तज, प्रेम में पग, अपने वावा के समान श्रीहरिभक्ति की । प्रभुने कृपा कर प्रगट दर्शन दे, कृतकृत्य किया ॥ ESCASCHICHAESCUSCASCASCASALSAIC Stre HAR श्रीभक्तमाल सटीक। ( १७६) श्रीप्टथ्वीराजजी । (६७७) छप्पय । (१६६) नरदेव उभै भाषा निपुन, “पृथीराज" कविराज हुव ॥ सवैया, गीत, श्लोक, वेलि, दोहा. गुन नवरस। पिंगल काव्य प्रमान बिविधि विधि गायौ हरि जस ॥ पर दुख विदुख,श्लाघ्य वचन, रचना जु बिचारै। अर्थ वित्त निर्मोल सबै सारंग उर धारै ॥ रुक्मिनी लता वरनन अनूप, वागीश वदन कल्यान सुवा नरदेव उभै भाषा निपुन, “पृथोराज” कविराज हुव॥१४०॥(७४) वार्तिक तिलक । बीकानेर के राजा श्रीपृथीराजजी, देववाणी (संस्कृत ) तथा प्राकृत भाषा (हिन्दी काव्य), दोनों ही में बड़े प्रवीण कविराज हुये। सवैया, गीत, पद, श्लोक, वेली, दोहा आदि छन्दों से नवरसों और गुणगणों से युक्त, पिंगल काव्य के प्रमाण सहित, विविध प्रकार से श्रीहरि-सुयश आपने गान किया। दूसरे का दुख जाननेवाले और यथाशक्रि निवारण करनेवाले थे, प्रशंसनीय वचन रचना विचारकर, और अर्थ वित्त निर्मोल सबका सागंश सारंग (भँवर) की नाई, हृदय में ग्रहण करतेथे। "रुक्मिणीलता" नामक ग्रंथ अति अनप ऐसा वर्णन किया कि मानों मुख में सरस्वती बैठी थीं, ऐसे "श्री- कल्यानसिंहजी" के पुरा पृथीराज हुये ।। (६७८ )ीका । कवित्त । ( १६५) मारवार देस बीकानेर को नरेस बड़ो, 'पृथीराज" नाम भक्त- राज कविराज है । सेवा अनुराग, और विषै वैराग ऐसौ, रानी पहिवानी नाहि मानो देखी आज है ॥ गयौ ही विदेस, तहां मान- सी प्रवेस कियो, हियो नहीं छुवै ! कैसे सरै मन काज है ?। बीते RECAUSEOCHCARE . .

८०७ PARORE + भक्तिसुधास्वाद तिलक। दिन तीन प्रभु मंदिर न दीठ परै ! पाछे, हरि देखि, भयो समाज है ॥५३८॥ (६१) वार्तिक तिलक। माड़वार देश बीकानेर नगरके राजा श्रीपृथीराजजी,श्रीकल्यान- सिंहजी के पुत्र, बड़े भक्तराज और कविराज थे। प्रभु की सेवा में अनुराग और विषय से विराग ऐसा था कि रानी को पहिचाना नहीं; मानो आज ही देखी है ॥ आप अपने गृहसे विदेश गयेथे वहां जो बीकानेर के मंदिर में प्रभु विराजे थे उन्हीं की मानसी सेवा किया करते थे। एक दिन मनसे उस मंदिर में प्रवेश किया, श्रीप्रभु के मंगल विग्रह के दर्शन स्पर्श नहीं हुए ! तव कैसे मानसी सेवा कार्य हो सके ? इसी प्रकार तीन दिन बीत गये मंदिर में प्रभु के दर्शन न हुए; पीछे चौथे दिन सेमानसी में प्रभु दिखाने लगे। तब मानसी सेवामें बड़ा सुख हुआ। (६७६ ) टीका | कवित्त । (१६४) लिखिकै पठायौ देस, सुन्दर संदेस यह "मंदिर न देखे हरि बीते दिन तीन है। लिख्यौ आयो सांच वांचिंतिही प्रसन्न भए लगे राज बैठे प्रभु वाहर प्रवीन है ।। सुनौ एक और यो प्रतिज्ञाकरी हिये धरी "मथुरा सरीर त्याग करें” रस लीन है । पृथीपति जानि के मुहीम दई कावुले की; बल अधिकाई, नहीं काल के अधीन है। ५३६ ।। (६०) वार्तिक तिलक। राजा ने पत्र में सुन्दर संदेस लिख देश को सांडिनी दौड़ाई कि "मैंने तीन दिन बीते श्रीहरिजी को मंदिर में नहीं देखा ! क्या हेतु है ?" यहां से लिख गया कि " मंदिर को सुधारने के लिये काम लगा था, इससे तीन दिन प्रभु वाहर विराजे थे" यह सत्य बात जान, राजाजी अति प्रसन्न हुये ॥ एक वात और सुनिये भक्ति रसलीन राजा ने यह प्रतिज्ञा की १"मुहीम"--- कठिन चढ़ाई । २ "कावुल"=Jits=देशांवशेष ।। * 354 ८०८ + श्रीभक्तमाल सटीक। , कि "मैं हरिकृपा से मथुराजी में शरीर त्याग करूँगा" ऐसा दृढ़ हृदय में रक्खे थे। कहीं इस वृत्तान्त को बादशाह ने सुनकर द्वेषवश आपको कावुल की लड़ाई में नियोजित कर दिया। राजा और लोगों की नाई कालके आधीन नहीं थे, इससे आपको देह में चल अधिक ही बना रहा, और जीवन की अवधिभी हरिकृपासे ज्ञात होगई ॥ (६८०) टीका । कवित्त । (१६३ ) जीवनि अवधि रहै निपट अलप दिन, कलप समान बीते पल न विहात है । आगम जनाय दियो, चाहे इन्हें सांचौ कियो, लियौ भक्ति भाव जाके छायौ गात गात है ॥ चल्यो चढ़ि साड़िनी पै लई मधुपुरी पानि, करिकै अस्नान प्रान तजे, सुनी बात है। जै जै धुनि भई व्यापि गई चहूँ ओर अहो; भूपति चकोर जस चंद दिन रात है ॥ ५४०॥ (38) वार्तिक तिलक । आपके जीवन की अवधि बहुतही थोड़े दिन रहगई इससे पल पल कल्प समान वीतने लगे। प्रभुजी सच्चा फिया चाहते थे इसलिये आगम जना दिया। आपके भक्ति भाव तो सर्वांग में पूर्ण था ही, उसी क्षण सांडिनी पर चढ़ चले; श्रीमथुराजी में आके विश्रान्त घाट स्नान कर, पद्मासन से बैठे प्रभु का ध्यान घर, प्राण त्याग कर दिये सब भक्तों ने जय-जयकार धुनि की और यह कीर्ति चारों ओर छागई। "श्रीपृथ्वीराज के यश चन्द्रमा को बादशाह चकोर सरीखाचित रहा था," यह वार्ता हमने श्रवण की है। एक और वार्ता सुनने योग्य है कि एक समय एक जंगल में श्रीपृथीराजजी तथा आपकी सेना को रहजाना पड़ा। भक्तवत्सल श्रीभगवत् ने सबको सुख देने के लिये एक नगर बसा दिया जिससे सेना सुखी हुई, राजा ने हरिकृपा के लिये अनेक धन्यवाद किये ॥ (१७७) श्रीसीवांजी। (६८१) छाय । (१६२) द्वारिका देखि पालंटती,अचढ़ सी कीधी अटल॥ SASSARORSristensais .

८०६ PERARASHTRAKARSARKAR भकिसुधास्वाद तिलक। असुर 'अजीज' * अनीति अगिनि मै हरिपुर कीधौं । सांगन सुत नैं सादराय रनछोरै दीधौ ॥धरा धाम धन काज मरन वीजाहूं मांडै । कमधुज कुटकै हुवौ चौक चतुरभुजनी चांडै॥वाढैलवाढ कीवी कटक, चांद नाम चांडै सबल ।हारिका देखि पालंटती, अचढ़ सीवै कीधी अटल ॥ १४१ (७३) वार्तिक तिलक। पालंटती ( जलकर पलटके छार); अचढ़ (दौड़ाकर चढ़); कीधी अटल ( अचल करदी); असुर (मुसलिम ); कीधौ ( कर दिया ); . ( समीप ); सांगनसुत (सीवां जी ); दीधौ (पुकार दिया ); मांडे (करते हैं ); कुटकै (कटक); कमधुधुज हुवो कवन्ध होकर ); चांडै (प्रवल लड़े); बाढ़ (धार); कीधी (करदिया )| कावावों के देश की भाषा ॥ (६८२) टीका | कवित्त । (१६१) कावा पति, सीवा, सुत सांगन कौ, प्यारौ हरि, द्वारावति ईश, यों पुकारें रक्षा कीजिये । सदा भगवान आप भक्त प्रतिपाल करें करौ प्रतिपाल मेरौ सुनि मति भीजियै ॥ तुरक अजीज नाम धामकों लगाई आगि लई वाग धोरन की आये टूक कीजिये । दुष्ट सब मारे प्रभु कटते उबारे निज प्रान वारि डारे यह नयो रस पीजिये ॥ ५४१॥ (८८) वार्तिक तिलक । एक समय स्वयं श्रीद्वारिकाधीश रणछोरजी ने, अपने परम प्रिय भक्त, श्री"सीवां"जी, "सांगन" जी के पुत्र, 'कावा' जाति के लोगों के स्वामी (राजा)को, (जाके, स्वरूप धर, दर्शन दे) सादर यों पुकारा कि" हे भक्त ! हे बीर ! मेरी तथा मेरी पुरी की रक्षा कीजिये, “अजीज खां" असुर (तुर्क) ने, मेरी पुरी द्वारावती को, अनीति दुष्टता से अग्निमय करदिया है ॥" - , * अजाज * R ८०८ श्रीभक्तमाल सटीक । कि "मैं हरिकृपा से मथुराजी में शरीर त्याग करूँगा" ऐसा दृढ़ हृदय में रक्खे थे। कहीं इस वृत्तान्त को बादशाह ने सुनकर द्वेषवश आपको कावुल की लड़ाई में नियोजित कर दिया । राजा और लोगों की नाई कालके आधीन नहीं थे, इससे आपको देह में वल अधिक ही बना रहा, और जीवन की अवधिभी हरिकृपा से ज्ञात होगई ॥ (६८०) टीका । कवित्त । (१६३ ) जीवनि अवधि रहै निपट अलप दिन, कलप समान वीतै पल न विहात है । आगम जनाय दियो, चाहें इन्हें सांचौ कियो, लियौ भक्ति भाव जाके छायौ गात गात है ॥ चल्यो चदि सांडिनी पै लई मधुपुरी श्रानि, करिकै अस्नान प्रान तजे, सुनी बात है। जै जै धुनि भई व्यापि गई चहूँ ओर अहो; भूपति चकोर जस चंद दिन रात है ॥ ५४०॥ (48) चार्तिक तिलक । आपके जीवन की अवधि बहुतही थोड़े दिन रहगई इससे पल पल कल्प समान बीतने लगे। प्रभुजी सच्चा किया चाहते थे इसलिये आगम जना दिया। आपके भक्ति भाव तो सर्वांग में पूर्ण था ही, उसी क्षण सांडिनी पर चढ़ चले; श्रीमथुराजी में आके विश्रान्त घाट स्नान कर, पद्मासन से धैठे प्रभु का ध्यान धर, प्राण त्याग कर दिये सब भक्तों ने जय-जयकार धुनि की और यह कीर्ति चारों ओर छागई। "श्रीपृथ्वीराज के यश चन्द्रमा को बादशाह चकोर सरीखा चिते रहा था," यह वार्ता हमने श्रवण की है। एक और वार्ता सुनने योग्य है कि एक समय एक जंगल में श्रीपृथीराजजी तथा आपकी सेना को रहजाना पड़ा। भक्तवत्सल श्रीभगवत् ने सबको सुख देने के लिये एक नगर बसा दिया जिससे सेना सुखी हुई, राजा ने हरिकृपा के लिये अनेक धन्यवाद किये ॥ (१७७) श्रीसीवांजी। (६८१) छ.य । (१६२) हारिका देखि पालंटती, अचढ़ सी कीधी अटल ॥ HERECRUECRECEIGROCEAKS ८०8 मै हरिपुर । दिया); HEARSHARE FHONE भनिसुधास्वाद तिलक। असुर 'अजीज' * अनीति अगिनि कीधौं । सांगन सुत नैं सादराय रनछोरै दीधौ॥धरा धाम धन काज मरन वीजाहूं मांडै । कमधुज कुटकै हुवौ चौक चतुरभुजनी चांडै ।वाट्टै लवाढ कीवी कटक, चांद नाम चाँडै सबलाद्वारिका देखि पालंटती, अचढ़ सीवें कीधी अटल ॥ १४१ (७३) वार्तिक तिलक। पालंटती ( जलकर पलटके छार); अचढ़ (दौड़ाकर चढ़); कीधी अटल ( अचल करदी); असुर (मुसलिम ); कीधौ (कर ने (समीप ); सांगनसुत (सीवां जी ); दीधी (पुकार दिया ); माई (करते हैं ); कुटकै (कटक ); कमधुधुज हुवो (कवन्ध होकर); चांडै (प्रबल लड़े); बाढ़ (धार); कीधी (करदिया ) ॥ कावावों के देश की भाषा ॥ (६८२) टीका । कवित्त । (१६१) कावा पति, सीवा, सुत सांगन को, प्यारौ हरि, द्वारावति ईश, यों पुकारें रक्षा कीजिये । सदा भगवान आप भक्त प्रतिपाल करें करो प्रतिपाल मेरो सुनि मति भीजियै ॥तुरक अजीज नाम धामकों लगाई आगि लई वाग घोरन की आये टूक कीजिये । दुष्ट सब मारे प्रभु कटते उवारे निज प्रान वारि डारे यह नयो रस पीजिये ॥ ५४१ ॥ (८८) वार्तिक तिलक । एक समय स्वयं श्रीद्वारिकाधीश रणछोरजी ने, अपने परम प्रिय भक्त, श्री सीवां"जी, "सांगन" जी के पुत्र, 'कावा' जाति के लोगों के स्वामी (राजा) को, (जाके, स्वरूप धर, दर्शन दे) सादर यो पुकारा कि" हे भक्त | हे वीर ! मेरी तथा मेरी पुरी की रक्षा कीजिये, “अजीज खां" असुर (तुर्क) ने, मेरी पुरी द्वारावती को, अनीति दुष्टता से अग्निमय करदिया है ॥" * अजाज:: ent k श्रीभक्तमाल सटीक । . प्रभु की पुकार सुन, श्रीसीवांजी ने विचार किया कि जो भगवान् स्वयं सब भक्तों का सदैव प्रतिपाल करते हैं, सो दयालु मुझ दीन को अपने धाम सहित अपनी रक्षा करने के लिये आज्ञा दे रहे हैं, इससे श्रीसीवांजी की मति प्रेम से भीग गई । बहुत ही शीघ्र, श्रीसीवांजी ने शस्त्र ग्रहण कर घोड़े पर चढ़, थोड़ी सी सेना साथ ले, धावा किया। श्रीद्वारिका पुरी को अग्नि से क्षार होते देख, रक्षा की। अजीजखां के आधीन जो वादशाही फौज थी, श्रीसीवांजी ने उससे भारी मार काट मचा दी । सब सेना समेत दुष्ट अजीजखां को काटडाला, जहन्नुम ( यमपुर ) भेज दिया। दूसरे लोग तो अपनी भूमि गृह धन इत्यादिक के लिये करके मर जाते हैं, पर ये (श्रीसीवांजी) श्रीचतुर्भुज प्रभुके निमित्त, चौक में, अति तीक्ष्ण युद्ध करके काम आए, अपने प्राण न्यवछावर करदिये । धाम तथा धामी को कष्ट से छुड़ाया । मुक्त हो श्रीसीवां- जी परधाम में जा विराजे । इस नवीन आत्मसमर्पण भक्तिरूपी रस को पान कर जगत में यश विस्तार कर गए । इस रस का आनन्द लीजिये । भक्तसुखद भक्तयशवर्द्धक प्रभु, नए नए अपूर्व ढंग से चमत्कृत चरित्र करके अपने भत्रों को विलक्षण बड़ाई और आनन्द देते हैं । कृपा की जय ॥ इस (१४१ ३) मूल में, बहुतेरे ( कावाओं के देश की भाषा के शब्दों के अर्थ, तथा “कमध्वज" वाली वार्ता, इस दीन की समझ में नहीं आई ! विज्ञ महात्मा कृपाकर इसको सुधार लेंगे। (१७८) श्रीमती रत्नावतीजी। (६८३) छप्पय । (१६०) पृथीराज नृप कुल वधू, भक्तभूप 'रतनावती" ॥ कथा कीरतन प्रीति भीर भक्तनि की भावै । महा महोछौ मुदित नित्य नंदलाल लड़ावै । मुकुंद चरण १ रलावती सुनखाजीत की कन्या है ॥ ..PIChtd वधू श्री भक्रिसुधास्वाद तिलक। चिन्तवन भक्ति महिमा ध्वजधारी। पति पर लोभ न कियौ टेक अपनी नहिं टारी॥ भल पन सवै विशेष ही. आमेर सदन सुनखाजिती। एथीराज नृप कुल बधू, भक्तभूप "रतनावती" ॥ १४२॥ (७२) वार्निक तिलक। आमेर के राजा परम भक्त श्रीपृथ्वीराजजी के कुल की "रत्नावती" जी श्रीहरिभक्कों में महारानी हुई । सत्संग, कथा, कीर्तन में अति प्रीतिवती हुई; और हरिभक्कों की भीड़ आपको परम प्यारी लगती थी। आनन्द से महा महोत्सव किया करती; नन्दलालजी को नित्य लाड़ लड़ाती थीं । मुकुन्द चरण चिन्तवन में तत्पर हो आपने भक्ति की महिमा की ध्वजा गाइदी । लोकलाज और रानीपने को तजदिया; भजन सत्संग की अपनी टेक नहीं त्याग की; पति पर लोभ नहीं किया, किन्तु उसको भक्ति विमुख जान उससे अपना चित्त हटा लिया । आमेर सदन वासिनी "सुनखाजीत” जी की सुता के भले पण, (प्रतिज्ञा ) तथा भलप्पन, (भलाई ) साधुता, का सब सजन लोग विशेष वर्णन करते हैं, ऐसी “श्रीरत्नावतीजी" हुई ॥ (६८४) टीका | कपित्त । (१५६ ) मानसिंघ राजा ताको छोटो भाई माधौसिंघ, ताकी जानौ तिया, जाकी वात ले वखानियै । ढिग जो खवासिनि सों स्वासनि भरत नाम रटति जटित प्रेम रानी उर आनियै ॥ नवलकिसोर कभं नन्द के किसोर कभू वृन्दावन चन्द कहि आंख भरि पानिये । सुनत विकल भई सुनिबे की चाह भई रीति यह नई कछु प्रीति पहिचानिये ॥ ५४२॥ (८७) वार्तिक तिलक। श्रीमती “रत्नावतीजी" राजा "मानसिंह" के छोटे भाई "माधवसिंह" की रानी थीं, जिनकी वार्ता वर्णन होती है। आपके xesiSOCHECRECRockck श्रीभक्तमाल सटीक। समीप जों दासी थी सो हरिभक्का, सानुराग स्वास भरती हुई नाम रटा करती थी॥ सुनके रानी के हृदय में भी कुछ प्रेम आजाता था। एक दिन, यह दासी "नवलकिशोर, नन्दकिशोर, वृन्दावनचन्द," इत्यादि नाम सप्रेम कह रही थी, और नेत्रों में जल भर रहा था; श्रीरत्नावती. जी भी सुनते ही विकल होगई, और नाम यश सुनने की चाहना . , " यह नवीन दशा होने से आप उस दासी की प्रीति कुछ पहिचानने लगीं। (५) टीका । कपित्त । (१५८) "बार बार कहै, वहा कहै ? उर गहे मेरो, बहे दृग नीर हो, शरीर सुधि गई है" । “पूछौ मत वात, सुख करो दिन रात, यह सहै निजगात, रागी साधु कृपा भई है" ॥ अति उतकंठा देखि, को सो विशेष सब, रसिक नरेलनि की वानी कहि दई है। टहल छुटाई, औ सिरहाने लै बैंठाई वाहि, गुरु वुद्धि आई; यह जानो रीति नई है ॥ ५४३ ॥ (८६) वार्तिक तिलक । रानी उस टहलनी से पूछने लगी कि "तू बारम्बार क्या कहती है ? किसका नाम लेती है ? मेरा हृदय पकड़ कर तू अपनी ओर खींचे लेती है !” रानी के भी नेत्रों में जलकी धारा चलने लगी, देह की सुधि भूलगई॥ दासी ने उत्तर दिया कि “आप यह वात मत पूछिये, दिन रात अपने राजसी सुम्ब में लीन रहिये; मुझपर अनुरागी साधु की अलभ्य कृपा हुई है, सो उस प्रेम के अलौकिक सुख दुख को मेरा ही तन मन सहता है ।" तब तो रानीजी की अतिसय उत्कण्ठा हुई; बोली कि “अवश्य ही मुझे सब बात बताव ॥" उसने अति श्रद्धा देख विशेष प्रेमपथ की वार्ता वर्णन कर, कुछ रसिकराज भको सन्तों की बानी और कथा कह सुनाई। EiLALALALIGALLAG भनिसुधास्वाद तिलक। ८१३ दो० "नेह नेह सब कोउ कहै, नेह करौ मति कोइ । मिले दुखी विठुरे दुखी, नेही सुखी न होइ ॥ १॥ नेह स्वर्ग ते ऊतरयो, भूपर कीन्हों गौन । गली गली ढूंढ़त फिरै, विन सिर को धर कौन ? ॥ २ ॥ बिरह असी जा उर धसी, लसी रसीली प्रीति । चहत न मरहम घाव पर, यह प्रेमिन की रीति ॥ ३ ॥ प्रेम कठिन संसार में, नहिं कीजै जगदीश । जो कीजै तो दीजिये, तन मन धन अरु शीश ॥४॥ धनि वृन्दावन धाम है, धनि वृन्दावन नाम । धनि वृन्दावन रसिक जन, धनि श्रीश्यामा श्याम ॥ ५ ॥" आली ! होली सुखद तेहि, जो श्रीसियपद पास । रूपकला फगुनहट लहि, झुरवति रहति उदास ॥६॥ इत्यादि उपदेश सुन, उस दासी को सेवा टहल करना छुड़ाके रानी ने अपने शीश के ओर बैठाया, और गुरुवुद्धि करके, उसका बहुत मान मर्याद आदर सत्कार करने लगी। यह नवीन प्रीति की रीति जानना चाहिये। (६-६) टीका । कवित्त । (१५७) निसि दिन सुन्यो करै, देखिबेको अरबरै, देखे कैसें जात जल- जात हग भरे हैं । कछुक उपाय कीजै, मोहन दिखाय दीजै, तब ही तो जीजे वे तो आनि उर अरे हैं ॥ दरसन दूर, राज छोड़े लोटे धुर, पै न पावै छवि पूर, एक प्रेमवस करे हैं । करौ हरिसेवा, भरि भाव धरि मेवा, पकवान रस खान, दै वखान मन धरे हैं ॥५४४॥(८५) वार्तिक तिलक। अब तो दिन रात उसी दासी के मुख से प्रभु रूप माधुरी का वखान और चरित्र सुना करती थीं; सुनते सुनते प्रभु के देखने की अतिशय चाह उत्पन्न हुई । मन और नेत्र अति विकल हुये । प्रेम के अश्रु बहने लगे। दासीसे कहाकि "कुछ उपाय करके मनमोहन के दर्शन करा दो, तब ही मेरा जीवन है, क्योंकि वे मेरे हृदय में teeHGRE RECRACKGAFTECTECa ।

ॐ HHATIS श्रीभकमाल सटीक। । समा गये हैं।" उसने कहा कि "महारानी ! दर्शन तो बहुत कठिन हैं, दर्शनाभिलापी लोग राज छोड़के धूल में लोटते हैं, अनेक उपाय करते हैं परन्तु उस छविसमुद्र के दर्शन नहीं पाते । हां, उसके वश करने का यत्न एक "प्रेम" ही है। इससे आप प्रेमभाव में परायण होकर, श्रीहरि की भोग पूजा सेवा में लगिये। उसमें अनेक रसीले मेवा पकवान वस्त्र भूषण फूल माला आदिक सब सानुराग अर्पण करिये ॥" श्रीरत्नावतीजी ने दासीजी का कहना सब अपने मन में लिया ॥ (६८७) टीका । कवित्त । (१५६) इन्द्रनीलमणि रूप प्रगट सरूप कियो, लियो वहै भाव यों सुभाव मिलि चली है। नाना विधि राग भोग लाड़को प्रयोग जामें, जामिनी सुपन जोग भई रंग रली है ॥ करत सिंगार छविसागर न वारपार रहत निहारि वाही माधुरी सो पली है । कोटिक उपाय करे, जोग जज्ञ पारपरै, ऐ पै नहीं पावै यह दूरप्रेमगली है ॥ ५४५॥(८४) वार्तिक तिलक । गनीजी, इन्द्रनीलमणि के स्वरूप प्रगट करा, प्रतिष्ठा पूर्वक, भावसे, अपनी उपदेशिका दासी के सुभाव में मिलकर, सेवा करने लगी । नाना प्रकार के राग भोग से लाड़ लड़ाती और प्रेम गुन गाती रात्रि में स्वप्न भी उसी सेवा अनुराग का देखती थीं। दिनमें श्रृंगार करके अपार छविसागर की छवि देखती रहती थीं। केवल प्रभु की माधुरी से युष्ट रहने लगीं। कोई कोटान उपाय करे, योग यज्ञ व्रतादिकों को कर के पार हो जाय, परन्तु इस प्रेमपथ को सहज नहीं पा सक्का; प्रेम मार्ग विलक्षण है॥ (६८८) टीका | कवित्त । (१५५ ) देख्योई चहति तऊ कहति "उपाय कहा ? अहो, चाह बात कहौ कौनको सुनाइयै ?।" कही जू वनावौ ढिग महल के ठौर एक चौकी लै बैठावो चहूं ओर समझाइये ॥ आवे हरि प्यारे तिन्है ल्यावें वे लिवाय इहां, रहै ते धुवाय पांय रुचि उपजाइये। नाना KALUCRE SASRIRLice भकिसुधास्वाद तिलक। ८१५ विधि पाक सामा आगै आनि धरै; आप डारि चिक देखो, स्याम दृगनि लखाइयै ॥ ५४६ ॥ (८३) वार्तिक तिलक । गनीजी प्रभु को साक्षात् देखना चाहती ही हैं, तथापि कहती हैं कि "क्या उपाय करूं ? प्रभु के दर्शन की चाह की बात किसको सुनाऊं?" तव हितकारिणि दासी ने शिक्षा की कि "अपने राजगृह के पास आप एक 'संतसेवाशा ना' वनवाइये, चारों ओर सावधान मनुष्यों की चौकी बैठा दीजिये, आज्ञा दे दीजिये कि जो कोई हरि के प्यारे भक्त साधु आधैं उनको सादर विनय कर इस सन्तनिवास में लिवा लावै, और यहां के लोग चरण धोकर आसन बिछा बैठाके नाना प्रकार के पकवान भोजन आगे घर भोजन कराया करें। आप ऊपर से चिक डालके दर्शन किया करें । तव श्यामसुन्दर प्रभु नेत्रोंसे दीख पड़ेंगे ॥" श्रीमती रत्नावतीजी ने ऐसाही किया, और करने लगी। (६८६ ) टीका । कवित्त । (१५४) आवै हरिप्यारे साधु सेवा करि टारे दिन किहूं पांव धारै जिन्हें ब्रजभूमि प्यारियै । जुगुलकिशोर गावे, नैननि वहावें नीर; ढगई अधीर रूप दृगनि निहारिये ॥ पूछी वा खवासी सों “जु रानी' कौन अंग ? जाके इतनी अटक संग भंग सुख भारिय"। चली उठि हाथ गयो, “रह्यौ नहीं जात, अहो सहो दुख लाज बड़ी तनक विचारिय" ॥५४७॥ (८२) वार्तिक तिलक। प्रभुके प्यारे साधु आया करते उनकी सेवा कर कुछ दिन बिताये । एक दिन किसी प्रकार ब्रजभूमि के रहनेवाले प्रेमी उपासक पधारे । युगलकिशोर के यश गान कर नेत्रों से प्रेमाश्रु बहाने लगे। रानी उनके दर्शन करते ही अधीर हो, उस दासी से पूछने लगी कि " भला कहो तो मेरे अंगों में 'रानी' कौनसा अंग है कि जिसके अनुरोध से मैं सत्संग सुख से विमुख हो रही हूं ? अब तो में इन RECORE CAKACCORRECRUKokestoster HAKR5 श्रीभक्तमाल सटीक। ८१८ , - राजा क्रोध से बोल उठा कि "मुंडी वैरागिनि का बेटाआ" पिता के वचन सुन प्रेमसिंहजी के मन में बड़ा दुःख हुआ ॥ (६६३ ) टीका | कवित्त । (१५०) कोप भरि राजा गयो भीतर, सो सोच नयो, पाछे पूछि लयो, को नरनि बखान के । तब तो विचारी, "अहो मोडा ही हमारी जाति,"भयो दुख गात, भक्ति भाव उर आन कै॥ लिख्यो पत्र माजी को "जु प्रीति हिये साजी जौ पै सीस पर पाजी आय राखो तजि प्रानं के। सभा मधि, सूप कही 'मोडीको विरूप भयौ' रहें अब मोडीकेही भूलौ मति जान के" ॥ ५५१ ॥ (७८) वार्तिक तिलक। राजा क्रोध में भर गृह के भीतर चला गया । कुमार प्रेमसिंहजी ने सोचयुक्त, लोगोंसे इस वचन का हेतु पूछा; उन्होंने रानी का सव वृत्तान्त कह सुनाया। तव प्रेमसिंहजीने विचारा कि "ओह ! जो मैं मोड़ी का पुत्र हूँ, तो मैं भी मोड़ा (वैरागी) ही हूँ, अर्थात् में साधु हूँ, तो तो अच्छा है।" अपनी माता का भक्ति भाव समझ बड़ा सुखी हुआ, और उसी क्षण इसने अपनी माताजी को पत्र लिखा कि "आपने जो भगवद्भक्नि प्रीति हृदय में धारण की, सो अब भली भांति सत्य कीजिये; चाहे प्राण तज दीजिये परन्तु इस टेक को नहीं तजियेगा; क्योंकि आज मेरे सीस पर यह बीती कि राजा ने भरी सभा में 'मोड़ी का पुत्र' मुझको कहा; सो जिसमें अब मैं मोड़ीही का पुत्र रहूँ, इस वातको जान कर कदापि भूलिये नहीं ॥" (६६४) टीका । कनित्त । (१४६ ) लिख्या दै पठाये घेगि मानस, लै आये जहां रानी भक्ति सानी हाथ दई, पाती वांचिये । आयौ चढ़ि रंग, वांचि सुत को प्रसंग, बार भीजे जे फुलेल, दूर किये, प्रेम सांचियै॥ आगे सेवा पाक निसि महल बसत जाय, ल्याय याही ठौर प्रभु नीके गाय नाचिये। नृप अन्न त्यागि दियो दियौ, लिखि पत्र पुत्र, भई मोडी आज, तुम हित करि जांचिये ॥ ५५२॥(७७) KESARRIERRECOREGREERE गया। भक्तिसुधास्वाद तिलक। ८१६ यार्तिक तिलक । कुँवरजीने पत्र लिख दिल्ली से मनुष्य के हाथ भेज दिया। जहां भक्ति रस से भीगी रानीजी थीं शीघ्र वहां लाके उसने पत्र दिया । पत्र पढ़, पुत्र की प्रार्थना सुन आपको प्रेम रंग का मावेश आ. सच्ची प्रेमिन तो थी ही, उसी क्षण फुलेल से भीगे हुए वालों को मुड़वा कर मुंडीहो गई । आगे संतों को भोजन करा, रात्रि में राजस्थान में जा शयन करती थीं, अव उस दिन से उसी संतशाला ही में प्रभु को लाके दिनरात पूजा गान नाच भजन करने लगी. और राजा का अन्नादि लेना छोड़ दिया। उन्हीं मनुष्यों के हाथ पत्र लिख पुत्र को भेज दिया कि "आज तुम्हारी प्रेम प्रार्थना सुन, मैं सच्ची मोड़ी हो गई; तुम आनन्द से सच्चे मोड़ा (वैरागी) रहना ॥" (६६५) टीका । कवित्त । (१४८) गए नर पत्र दियो, सीस सो लगाय लियौ, चांचि के मगन हियो, रीझि बहु दई है । नौवत वजाई द्वार बांटत वधाई; काहू नृपति सुनाई कही "कहा रीति नई है" ॥ पूछे भूप लोग कह्यौ मिटे सव सोग भये मोडी के जू जोग स्वांग कियौ बनि गई है । भूपति सुनत बात, अति दुख गात भयो, लयौ वैर भाव चढ्यो त्यारी इत भई है ॥ ५५३ ॥ (७६) चार्तिक तिलक । उन लोगों ने पत्र लेकर जा कुँवर जी को दिया, प्रेमसिंह पत्र को ले मस्तक में लगा, पढ़ कर प्रेमानन्द में डूब गये। और बहुत सा द्रव्य याचकों को बधाई बांट, द्वार पर मंगल के बाजे बजवाने लगे। किसी ने माधवसिंह से कहा कि "कुंवर के द्वार पर आज रीझ बटती, बधाई बजती है। उसने कहा “पूछो कि यह नया आनन्द किस हेतु है ?" राजा के लोगों ने भाकर पूछा । प्रेमसिंहजी ने उत्तर दिया कि "हमारी माता ने अव यथार्थ विरक्त भक्त भेष बना लिया; हम सच सच मोड़ी के होगये। उसी आनन्द कीबधाई है।" REACHERE ।

सर श्रीभक्तमाल सटीक। राजा को यह बात सुनते ही अतिशय दुख, क्रोध तथा वैर उत्पन्न हुआ । कुँवर को घात करने को सेना सहित चढ़ चला । प्रेमसिंहजी भी सुन युद्ध के लिये सन्नद्ध हुये ॥ (६६६) टीका | कवित्त । (४७) नृप समझाय राख्यो “देस में चवाय है है" बुधिवंत जन आय सुत सों जताई है। वोल्यौ “विपै लगि कोटि कोटि तन खोये, एक भक्ति पर आवै काम यह मन आई है ॥ पाय परि, मांगि लई, दई जो प्रसन्न तुम राजा निसि चल्यो जाय करों जिय भाई है । आयो निज पुर ढिग दुरि नर मिले आनि कयौ सो बखानि सब; चिन्ता उपजाई है ॥ ५५४ (७५) वार्तिक तिलक । मंत्रियों ने माधवसिंह को बहुत समझाया कि “ देखिये; यदि आप पुत्र का घात करेंगे तो लोक में बड़ीही निन्दा होगी इससे क्षमा कीजिये।" और इधर प्रेमसिंहजी को भी आकर समझाया। कुँवरजी कहने लगे कि संसारी विषय के हेतु मैंने कोटिन शरीर खोडाले, एक शरीर भला भगवद्भक्ति पर भी काम आजाय तो बहुत अच्छा है।" बुद्धिमान् लोगों ने कुँवर के चरणों में पड़, क्षमा कराई और दोनों ओर शान्त किया । तव माधवसिंह दिल्ली से रात्रि में चला कि जाकर रानी को मार डालंगा । अपने पुरके पास आया; उसके सब लोग आकर मिले और रानीका सब वृत्तान्त सुनाया । उसको बड़ी चिन्ता उत्पन्न हुई (६६७) टीका । कवित्त । (८४१) भवन प्रवेस कियो, मंत्री जो बुलाय लियो, दियौ कहि "कटी नाक लोहू निरवारियै । मारियो कलंक हू न आवै" यो सुनावै भूप काहू बुधिवंत नै बिचारि लै उचारियै ॥ "नाहर जु पीजरा में दीजे छाडि लीजै मारि पाछे ते पकरि वह बात दावि- डारिये।" सवनि सुहाई; जाय करी मन भाई; आयो, देख्यौ वा खवासी कही "सिंह- जू निहारियै” ॥ ५५५ ।। (७४) RECRACKERLUSecurackersChereCRECE . " भक्तिसुधास्वाद तिलक। ८२१ वार्तिक तिलक। माधवसिंह ने अपने घर में जाकर मंत्रियों को बुलाकर कहा कि "इस स्त्री ने मेरी नाक काट ली ! पर जब तक रानी रहेगी तब तक मानो रक्त चल रहा है, सो बन्द करो जिसमें मारने का कलंक भी न लगै और इसका वध होही जाया" सुनकर कोई संसारी बुद्धिमान विचारके बोला कि "जो पिंजड़े में बाघ है उसीको उसघरके भीतर छुड़वा दीजिये । वह रानी को मार डालेगा पीछे बाघ को पकड़ के वात छिपा लेंगे कह देंगे कि-बाघ छूट गया था सो उसने रानी को मार डाला-" सुनते ही राजा और सब कुमंत्रियों को यह बात अच्छी लगी, जाकर ऐसा ही किया ॥ रानी पूजा करती थी वह दासी देख कर बोली कि "देखिये सिंह आया। (६६८) टीका । कवित्त । (१४५) करै हरिसेवा भरि रंग अनुराग दृग, सुनी यह बात नेकु नैन उन टोरे हैं। भाव ही सो जाने, उठि अति सनमाने, "अहो! आज मेरे भाग, श्रीनृसिंह ज पधारे हैं" ॥ भावना सचाई वही शोभा ले दिखाई फूल माल पहिराई, रचि टीको लागै प्यारे हैं । भौन ते निकसि धाए, मानौ खंभ फारि आये, विमुख समूह ततकाल मारि डारे हैं ॥ ५५६ ॥ (७३) बार्तिक तिलक। रानीजी, आनन्द से भरी, नेत्रों को अनुराग रंग से रंग के, श्रीहरिसेवा करती थीं; यह बात सुन नैन उठा के उधर देख श्री- नृसिंहभाव से निश्चय कर बोली कि "आज मेरे भाग्यवश श्री- तृसिंहजी पधारे हैं" और उठके प्रणाम कर पूजा की सामग्री ले अति सन्मान पूर्वक पूजा करने को चलीं ॥ सर्वान्तर्यामी प्रभु ने भावना की सचाई देख, नृसिंह रूप की शोभा से दर्शन दिया। आप जाके श्रीनृसिंहजी को तिलक दे, माला पहिरा, भोग लगा के भारती प्रणाम कर, प्रीतियुक्त दर्शन करने लगी। श्रीरत्नावतीजी की जय ॥ ki R RE श्रीभक्तमाल सटीक। फिर व्याघ्र रूप प्रभु उस घर से निकले, मानो श्रीप्रह्लादपतिजी खंभा को फाड़कर प्रगट हुये । जो दुष्ट पिंजड़ा लेकर छोड़ने आये थे उन सबको उसी क्षण हिरण्यकशिपु के समान मार डाला। श्रीनृसिंह भगवान् की जय ॥ (६६६ ) टीका | कवित्त । (१४.४ ) भूप को खचरि भई, रानी जू की सुधि लई, सुनी नीकी भांति; आप नम्र ढके आये हैं । भूमि पर साष्टांग करी, कैकै यो मति हरी, भरी दया आय वाके वचन सुनाये हैं ॥ “करत प्रनाम राजा, बोली “अजू लालजू कौं,” "नैकु फिरि देखो" "एक ओर ए लगाए है"। बोल्यो नृप "राज धन सवही तिहारो धारों" पति पैन लोभ कही "करौ सुख भाये हैं" ॥ ५५७ ॥ (७२) वार्तिक तिलका जो व्याघ्र को छोड़ने आये थे वे सब मारे गये और लोग भाग गए, जाके माधवसिंह से उन्होंने कहा कि."वाघ लोगों को मार के चला गया।" पूछा कि “रानी की क्या दशा हुई ?" लोगों ने कहा कि "वे तो श्रानन्द से भजन कर रही हैं; उन्होंने बाघ की पूजा की तब कूद के बाहर आ उसने लोगों को मारा।" यह प्रभव सुन राजा ने, अति नम्र होकर श्रीरत्नावतीजी के पास आ, भूमि पर पड़के, कई बार साष्टांग प्रणाम किये क्योंकि परचो पाकर मति हरगई। राजा को प्रणाम करते देख उस दासी ने, दया से पूर्ण हो, रानी को वचन सुनाया कि "राजाजी प्रणाम करते हैं," आप बोली कि 'श्रीनन्दलालजी को प्रणाम करते हैं," उसने विनय किया "भला थोड़ा इधर दृष्टि तो कीजिये" रानी ने उत्तर दिया, कि “नेत्र एक ओर लगे हुये हैं, अब दूसरी दिशि नहीं हो सक्ने ॥" तब माधवसिंहजी ने विनय किया कि "राज और धन सब तुम्हारा है, जो मनमें आवै सो करो" रानीजी को तो पति पर लोभ . , . *सब प्रतियों में ऐसा ही पाठ पाया गया। HTEENSURENTNESS PAR RSE भक्तिसुधास्वाद तिलक। ८२३ था ही नहीं, कह दिया कि "आप अपने मन माने राजसुख कीजिये; मैं अपने सुखदायक में लगीहूं ॥" (७०० ) टीका | कवित्त । (१४३ ) राजा "मानसिंह" "माधौसिंह" उभै भाई चढ़े, नावपरि हूं, तहां बुड़िवे को भई है। वोल्यौ बड़ौ भ्राता “अब कीजिये जतन कौन ? भोन तिया भन" कहि छोटे सुधि दई है । नैकु ध्यान कियो, तव पानि किनारौ * लियो, हियो हुलसार्यो, जेट चाह नई लई है। कस्यौ आय दरसन विनै करि गयो भूप, अतिही सनूप कथा, हिये व्यापिगई है ॥ ५५८ ॥ (७१) वार्तिक तिलक । एक समय राजा मानसिंह और छोटे भाई माधवसिंह दोनों, किसी महानदी के पार होने को नाव पर चढ़े थे, दैवयोग नाव डूबने लगी। मानसिंहजी अतिशय घबरके भाई से बोले कि 'अब क्या यत्न करना चाहिये ?" माधवसिंह ने कहा, "मेरे गृह की स्त्री परम भक्त है;" बस दोनों जनोंने रानीजी का ध्यान किया। उसी क्षणे राम कृपा से नौका तीर पर लग गई। दोनों भाई अपना नवीन जन्म मान अति आनन्दित हुये; और मानसिंहजी को रानीजी के दर्शन की नवीन चाह उत्पन्न हुई । सो आकर दर्शन विनय किया, तब अपने घर गये। इस प्रकार महा भक्का रानी श्रीरनावती- जी की अतिशय अनूप कथा मेरे हृदय में व्याप्त थी सो सुना दी ॥ ( १७६ ) श्रीजगन्नाथपारीष । (७०१ ) छप्पय । (१४२) पारीप प्रसिद्ध कुल काँथड़या, जगन्नाथ सीवाँ धरम ॥ (श्री) रामानुज की रीति प्रीति पन हिरदै धायो। संस्कार सम तत्त्व हंस ज्यौं बुद्धि विचाखौ॥ सदाचार, मुनि वृत्ति इंदिरा पति उजागर। रामदास * "किनागै"= 1.5 = तीर, तर, छोर, पांजर ॥ RECENCREASE * 155 श्रीभक्रमाल सटीक । ८२४ सुत संतअननिदसधाको आगर॥ पुरुषोत्तमपरसादतें, उभै अंग पहिरयौ वरमा पारीषप्रसिद्धि.कुल काँथड़या जगन्नाथ सीवाँ धरम ॥ १४३ ॥ (७१) वार्तिक तिलक। पारीप ब्राहाण, काँथड्या कुल में उत्पन्न श्रीरामदासजी के पुत्र भक्त श्रीजगन्नाथजी भागवतधर्म की सीमा हुये । अनन्त श्रीरामा- नुज स्वामीजी, की रीति से भगवत् प्रीति पन ( नियम ) आपने अपने हृदय में धारण किया । पंचसंस्कार तथा शास्त्र संस्कार और सब जगत् में सम व्याप्त भगवत् तत्व को, बुद्धि से, दूध के समान सार विचार के, हंसवत्, ग्रहण कर आपने असत् वस्तु को जल के सम त्याग किया। मुनि जनों की सी सदाचार वृत्ति, धारण कर, श्रीलक्ष्मी संप्रदाय में, परम प्रकाशमान हुये । और साधु सुभाव, अनन्य शरणागत, दशधा (प्रेमा) भक्ति में परम प्रवीण हुए । अपने गुरु श्रीपुरुषोत्तमजी की कृपा से वाह्यान्तर दोनों अंगों में वर्म ( वखतर ) धारण किया अर्थात् आप राजा के पुरोहित सूरवीर विख्यात थे इससे प्रगट शरीर में कवच पहिनतेथे दूसरा सूक्ष्म अन्तर अंग में क्षमा सहिस्नुता भक्ति का कवच पहिना जिसमें अन्तर श- त्रुओं के शस्त्र आपको न लगें। और दोनों भुजाओं पर भगवदायुध छाप तथा सूक्ष्म अन्तर अंग में श्रीचरण चिह्न ध्यान भी कलिके शस्त्रों के लिये कवच थे सो सब धारण किए। दो० "नैन सजल तिहिं रंग में, चित पायौ विश्राम । विवस बेगि कै जात सुनि, लाल लाडिले नाम ॥" (१८०) श्रीमथुरादासजी। . (७०२) छप्पय । (१४१) कीरतन करत कर सुपनेहूं, मथुरादास न मंडयौ। सदाचार, संतोष, सुहृद, सुठि, सील, सुभासैं । हस्तक नजर भकिसुधास्वाद तिलक। दीपक उदय, मेदि तम, वस्तु प्रकासै ॥ हरि को हिय विस्वास नंदनंदन वल भारी । कृष्ण कलस सों नेम जगत जानै सिरंधारी॥ (श्री) वर्द्धमान गुरु वचन रति, सो संग्रह नहिं छंडयौ । कीरतन करत कर सुपनेहूं, मथुरादास न मंडयों ॥ १४४॥(७०) वार्तिक तिलक । श्रीमथुरादासजी के भगवन्नाम कीर्तन स्मरण करते समय, चेटकी का कर, (करतव्य, जादू, पाखण्ड), स्वपने में भी नहीं मंडित हुआ; अर्थात् प्रथम जो मंडित किये हुये था सो आपके जाने से रुक गया। पूर्वाचार्यों के सदाचार, संतोप, सावधानता, सुहृदता, अतिशय शील आदिक गुण सुन्दर आप में झलकते थे; और भगवत् विषय वस्तु तत्व का ज्ञान ऐसा था कि जैसे हाथ में दीपक लेने से गृह के सब वस्तु प्रकाशमान होते हैं । आपके हृदय में श्रीहरि नन्दनन्दनजी का विश्वास वल बड़ा भारी था। श्रीकृष्ण पूजा जल का कलश नित्य नियम से आप अपने मस्तक पर रखकर लाते थे, यह सब जगत् जानता है । अपने गुरु "श्रीवर्द्धमान" जी के वचनों में अतिशय प्रीति थी, उसका संग्रह जन्मभर आपने नहीं छोड़ा। (७०३)ीका । कपित्त । (१४०) वसकै “तिजारे" मांझ, भक्तिरस रात करी; करी एक बात, ताको प्रगट सुनाइये । आयौ भेषधारी कोऊ करै सालग्राम सेवा, डोलत सिंहासन पै, आनि भीर छाइयै ॥ स्वामी के जु शिष्य भयौ, तिनहूँ के भाव देखि, वाही को प्रभाव आय कह्यो हिय भाइये। नेकु आप चलो, उह रीतिको विलोकियै जु, बड़े सरवज्ञ, कही "दूखै नहीं जाइयै" ॥ ५५६ ॥ (७०) वार्तिक तिलक । तिजारे ग्राम में निवास कर, रसराशि-भक्ति की आपने एक बात s .

KHASRO श्रीभक्तमाल सटीक। . ओर की, सो हम प्रगटकर सुनाते हैं । उस ग्राम में एक चेटकी(धूर्त) वैष्णव का वेष धारण किये आया; सो श्रीशालिग्रामजी की पूजा करता था, चेटक यह करता किसिंहासन पर शालिग्रामजी आपसे आप डोलते रहते थे। यह विचित्रता देख लोगोंकी भीड़ छा गई। स्वामी मथुरादासजी के शिष्यों को भी देखकर बड़ा भाव उत्पन्न हुआ, उसका प्रभाव कहकर, आपसे उन्होंने विनय किया किं 'थोड़ा चलके उसरीति को देखिये।" आप तो बड़े सर्वज्ञ थे; बोले कि “हमारे जाने से उसका हृदय दुखित होगा इससे नहीं जायँगे ॥" (७०४) टीका | कवित्त । (१३६ ) पाय परि, गये लेके, जाय ढिग ठाढ़े भये, चाहत फिरायो, पै न फिरै सोच पस्यौ है । जानि गयो आप, कछ याही को प्रताप, ऐपै मारौं करि जाप यों विचार मन धस्यौं है । मूठ लै चलाई, भक्ति तेज आगे पाई नहिं, वाही लपटाई, भयौ ऐसी मानौ मस्यौ है द्वै करि दयाल, जा जिवायो, समझायौ; प्रीतिपंथ दरसार्यो, हिय भायौ, शिष्य कस्यों है ॥ ५६० ॥ (६६) वार्त्तिक तिलक । पर, शिष्य लोग चरणों में पड़के लिवा गये। आप मन में भगवन्नाम कीर्तन करते जाकर समीप में खड़े हुये । उसने शालि- ग्रामजी को फिराना डोलाना चाहा, पर नहीं डोले फिरे। चेटकी सोच हुआ । जान गया कि इसीका प्रताप है जो नहीं डोलते; इससे में अपने जादू का मंत्र जपके इसको मारडालूं" यह मनमें निश्चय कर (मारणमन्त्र ) की मूठ चलाई ॥ श्रीमथुरादासजी की भक्ति तेज के आगे वह प्राप्त नहीं हुई, वरंच वह मूठ उलट कर उसी को लगी, मृतक समान हो गिरपड़ा। सुनके, दयालु हो, जाकर आपने जिलाया, और समझा कर उपदेश दे श्रीभगवद्भक्ति प्रीति का मार्ग दिखाया। तव जादू तज, आपका शिष्य हो, साधुता में प्रवृत्त हुआ, भगवद्गजन करने लगा। श्रीशालिग्रामजी की सच सच पूजा करने लगा। Recialist-tecteache SHOCOLACRORKa को बड़ा , . ८२७ MARRIENTARNARENERAS भनिसुधास्वाद तिलक। (१८१)श्रीनारायणदास नृतक। (७०५ ) छप्पय । (१३८) नृतक नरायनदास कौ, प्रेमपुंज आगेबढ्यौ ॥ पद लीनौ परसिद्ध प्रीति जामें दृढ़ नातो। अक्षर तनमय भयौ मदन मोहन रंगरातो ॥ नाचत सब कोउ आहि, काहि पै यह वनि आवै। चित्र लिखितं सो रह्यौ त्रिभँग देसी जु दिखावै ॥ "हँडिया * सराय” देखत दुनी, हरिपुर पदवी को चढ़यौ । नृतक नरायनदास कौ, प्रेमपुंज आगे बढ्यौ ॥ १४५॥ (६६) वार्तिक तिलक। नृतक (नाच करनेवाले कथक ) श्रीनारायणदासजी का प्रेम- पुंज आगेही को घढ़ता गया अर्थात् प्रभुके समीप तक पहुँच गया। एक समय सप्रेम नृत्य करने को खड़े हो, प्रसिद्ध पद जिसमें प्रथम ही "दढ़ प्रीति का नाता" ऐसा शब्द पड़ा है सो गाने लगे- पद-("सांचो एक प्रीति को नातो ।। के जाने राधिका नागरी कै मदनमोहन रँगरातो ॥") सो "मदनमोहन रँग रातो" इन अक्षरों में तनमय होगये अर्थात् मदनमोहन के अनुराग में रंगके लीन होगये । नाचते गाते तो सबही हैं, परंतु जैसी श्रीनारायणदासजी से वन आई, वैसी दूसरे से कहां बन आती है । पद गान के ध्यान में ऐसे तदाकार हुए, कि मानों चित्र के लिखे हैं; और जिस नित्य निकुंज देस में त्रिभंगी लाल श्रीराधिकाजी सहित विराजते विहार करते हैं, मन चित्त से वहां जाकर प्रत्यक्ष दर्शन किए। हड़िया सराय में सब लोगों के देखते २ उसी दशा में तन तज ऊपर हरिपुर के मार्ग में चढ़ प्रभुको प्राप्त हुये ॥ * हड़िया समय जो प्रयागराजसे छ कोस हे । प्रसिद्ध "मुल्ला दो प्याजा" घाला हड़िया सराय । + "पदवी"मार्ग, पथ, रास्ता ॥ uka SURE ACERESTI 4 '८२८ PRESS श्रीभक्तमाल सटीक। (७.६) टीका | कवित्त । (१३७) हरिही के आगे नृत्य करै, हिये धरै यही, ढरै देस देसनि में जहों भक्त भीर है। "हँडिया सराय" मध्य जायकै निवास लियो, लियो सुनि नाम सो मलेछ ज्ञाति "मीर*"है ॥ वोलिके पठाये, "महाजन हरिजन,सवै आयौ है सदन" गुनी ल्यावौ चाह पीर है। आनिकै सुनाई, भई बड़ी कठिनाई, "अब कीजै जोई भाई वह निपट अधीर है"॥ ५६१ । (६८) वार्त्तिक तिलक। श्रीनारायणदासजी का नियम था कि श्रीहरि की मूर्ति ही के आगे नाचते अन्यत्र नहीं; जहां जहां श्रीभगवद्भक्त बसते थे, उन्हीं देशों में विचरा करते थे। एक समय "हड़िया सराय" में एक भगवत्भन के घर में जा के ठहरे; नृत्य गान किया, उसकी धूम ग्रामभर में हुई। हँडिया सराय का अधिपति ( हाकिम ) म्लेक्ष जाति “मीर" था, सो सुन कर उसने आपको सनेसा भेजा कि मेरे यहां महाजन भक्तजन सब कोई आये हैं, और मुझे भी बड़ी चाह है, सो अवश्य आइये । लोगोंने आकर सुनाया ॥ आपके हृदय में बड़ा संकष्ट पड़ा; आपने कहा कि "मैं वहां नहीं जासक्ना।" फिर लोगों ने आकर कहा कि "वह आपके लिये वहुत अधीर होरहा है, हाकिम है, जो आपको अच्छा लगै सो कीजिये। (७०७) टीका | कवित्त । (१३६) विना प्रभु आगे नृत्य करिये न नेम यह, सेवा वाके आगे कहीं कैसें विस्तारिये। कियो यो विचार ऊंच सिंहासन माला धारि तुलसी निहारि हरि गान कस्यौ भारियै । एक ओर चैठयो मीर, निरखें न कोर दृग, मगन किशोररूप, सुधि ले बिसारिये । चाहें कछु वारौं परे औचकही प्रान हाथ, रीभि सनमान कीनो मीच लागी प्यारियै ।। ५६२ ॥ (६७) वार्तिक तिलक। आपने उत्तर दिया, "यह मेरा नेम है कि 'प्रभुके ही आगे नृत्य * 'मीर' = सयदा प्रतिष्ठित मुसलमानजाति ॥ RECESSION CE . " .

८२६२ REAKER भकिसुधास्वाद तिलक। करूं अन्यत्र नहीं, और प्रभु के सेवा स्वरूप उस यवन के आगे कैसे पधराऊं?" फिर सबका आग्रह देख, परवशता विचार कर, ऐसा यत्न किया कि ऊंचे सिंहासन पर श्रीतुलसीजी ॐ की माला विराजमान की; भाव दृष्टि से श्रीभगवत् में और तुलसीजी में अभेद देख, अति उत्तम नृत्य गान किया। एक ओर वह "मीर" ( यवनपति) भी बैठा था, उसकी दिशि भूलकर भी आपने न देखा । भाव की सबलता से युगलकिशोर रूप में ऐसे मग्न हुये कि देहकी सुधि किंचित भी न रहगई । मानसी में श्रीप्रभु पर आपने कुछ नेवछावर करना चाहा; अचानक प्राण हाथ पड़गये; युगलरूप में रीझ, सनमानपूर्वक, वही (प्राण ही) नेवछावर कर फेंक के, प्रभुको प्राप्त होगए । नित्य 'विहार में जा मिले । आपकी मृत्यु हमको अतिही प्रिय लगी। सो० "प्राण तोर, मैं तोर, बुधि, मन, चित, यश, तोर सव । एक तुही तो मोर, काह निवेदौं ? तोहिं पिय !" (रूपकला) (७१८ ) छप्पय । (१३५) गुनगन विसद गोपाल के, एते जन भये भूरिदा ॥ वोहिथ, रामगुपाल, कुंवरवर, गोबिन्दै, मांडिले । छीतस्वामि, जसवंत, गदाधर, अनंतानंद, मल ॥ हरि नाभमिथ, दीनदास, बछपाल, कन्हेरे जसगायन । गोलूं, रामदास, नारद, श्याम, पुनि हरिनारायन । कृष्णजीवन, भगवानजन, श्यामदास, विहारी, अमृ- तदा । गुन गन बिसद गोपाल के, एते जन भये भूरिदा ॥ १४६ ॥ (६८) वार्तिक तिलक। श्रीभगवत् के विशद गुणगण सुयशरूपी बड़ाभारी दान देनेवाले अर्थात् कथनकर जीवोंको सुनानेवाले इतने सुजन हुये, उनके नाम॥ * श्रीवैष्णव, श्रीशालग्राम तथा श्रोतुलसी में अभेद मानते हैं । BUREAUCRECORKOKACHROCAREERed PARES*XNARENAKARMA ८३० श्रीभक्तमाल सटीक। इन सशेने भले प्रकार श्रीहरियशामृत की वरषा की। (१) श्रीवोहिथजी (१२) श्रीवछपालजी (२) श्रीरामगोपालजी (१३) श्रीकन्हरजी (३) श्रीकुंवरवरजी (१४) श्रीगोसूजी (४)श्रीगोविन्दजी (१५) श्रीरामदासजी (५) श्रीमांडिलजी (१६) श्रीनारदजी (६)श्रीछीतस्वामीजी (१७) श्रीश्यामजी (७) श्रीयशवन्तजी (१८) श्रीहरिनारायणजी (८)श्रीगदाधरजी (१६) श्रीकृष्णजीवनजी (६)श्रीअनन्तानन्दजी (२०) श्रीजन भगवानजी (१०) श्रीहरिनाभ मिश्रजी (२१) श्रीश्यामदासजी (११) श्रीदीनदासजी (२२) श्रीबिहारीजी (७०६ ) छप्पय । (१३४) निरवत भये संसारतें,ते मेरे जजमान सब । उद्धव, रामरेनें, परसराम, गंगा, धूषेत निवासी । अच्युतकुले, ब्रह्मदास, विश्राम, सेपसाईके वासी ॥ किंकर, कुंडा, कृष्णदास, खेम, सोठी, गोपानदै । जैदे, रोघौ, बिर्दुर, दयालें, दामोदर, मोहन, परमानदै ॥ उद्धव, रघुनाथी, चतुरोनगेन, कुंज ओक जे बसत अव। निरवत भये संसारतें, ते मेरे जजमान सब ।। १४७॥ (६७) वार्तिक तिलक। जो भक्त संसार से निवृत्त हुये वे सब मेरे यजमान हैं और मैं उनका यशगायक याचक हूं, उनमें विशेषोंके नाम । (१)श्रीउद्धवजी (३)श्रीपरसरामजी ( २ ) श्रीरामरेनुजी (४) धूपेतनिवासी श्रीगंगाजी COcreecret RECRUICROREKKE RRCE 113 भकिसुधास्वाद तिलक। (५) श्रीअच्युतकुलजी (१५) श्रीराघौजी (६) श्रीब्रह्मदासजी (१६) श्रीजयतारन विदुरजी (७)सेपसाईके वासी श्रीविश्रामजी (१७) श्रीदयालजी (८)श्रीकिंकरजी (१८)श्रीदामोदरजी ( 8 ) श्रीकुंडाजी (१६)श्रीमोहनजी (१०)श्रीकृष्णदासजी (२०) श्रीपरमानन्दजी (११) श्रीखेमजी (२१) दूसरे श्रीउद्धवजी (१२)श्रीसोठाजी (२२) श्रीरघुनाथीजी अव (१३)श्रीगोपानन्दजी वृन्दावनकुंज के निवासी (१४) श्रीजयदेवजी (२३)श्रीचतुरोनगनजी॥ ( १८२) श्रीजयतारन विदुरजी। (७१०) टीका | कवित्त । (१३३) झीथडौ ढिगही में जैतारन विदुर भयो, भयो हरिभक्त, साधु- सेवा मति पागी है । बरषा न भई सब खेती सूखि गई, चिंता नई, प्रभु आज्ञा दई, बड़ी बड़भागी है ॥ “खेत को कटावी, औ गहावी, लै उड़ावी, पावो दो हजार मन भन्न,” सुनी प्रीति जागी है । करी वही रीति, लोग देखें न प्रतीति होत, गाए हरि मीत राशि लागी अनुरागी ॥ ५६३ ॥ (६६) वार्तिक तिलक । जोधपुर राज्य में झीथड़ा गांव के पासही में श्रीहरिभक्त "जयतारन-विदुरजी" अपनी मति संतसेवा में लगानेवाले हुये। एक समय वर्षा न होनेसे सब खेती सूख गई। दुर्भिक्ष पड़ा, आपको संतों के भोजन के लिये नवीन चिन्ता हुई। तब स्वप्न में कृपासिन्धु प्रभु ने आज्ञा दी, क्योंकि आप बड़े भाग्यवान थे, कि " सूखे खेत को कटाकर गहाओ उड़ाओ (उसावो), उसमें तुमको २००० (दो सहस्र), मन अन्न मिलेगा।" आज्ञा सुनते ही जागे; अतिप्रीतिमान हो आपने वैसाही किया। लोग देखकर विश्वास के अभाव से हँसते थे और विदुरजी श्री. १ "हजार"=१००० सहस्रन्दस सौ ॥ ACTLECR SACS .

4 ८३२ *************** श्रीभक्तमाल सटीक। कृपालु हरि के चरणों में प्रीति विश्वास पूर्वक गुन गाते थे; इससे दो सहस्रं मन की गशि लगगई। देख कर सबने अनुराग से “जय जय" कार किया। (कुछ आश्चर्य नहीं)॥ चौपाई। "सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु शत सरिस सोहाई ॥" कैसे सेवक - दो "राम अमल माते फिरें, पावै प्रेम निशंक । आठ गांठि कोपीन में, कहा इन्द्र सो रंक ॥" ( १८३) स्वामी श्रीचतुरोनगन (नागाचतुदासजी)। (७११)छप्पय । (१६२) श्रीस्वामी चतुरोनगन, मगन रैन दिनभजन हित॥ सदा जुक्त अनुरक्त भक्त मंडल को पोखत। पुर मथुरा व्रजभूमि रमत, सवहीं को तोखत ॥ परम धरम दृढ़ करन देव श्रीगुरु आराध्यौ । मधुर वैन मुठि, ठौर ठौर हरिजन सुखसाध्यौ॥संतमहंत अनंतजन, जसविस्ता- रत जासु नित। श्रीस्वामी चतुरोनगन, मगनरैन दिन भजन हित ॥ १४८ ॥ (६६) वार्तिक तिलक । नागा (नंगे) नग्नरूप श्रीस्वामी "चतुरोजी" दिन रात भजन में मग्न रहते थे। सदा भगवत् अनुराग युक भक्त मंडल को भी अनुराग से पुष्ट करते, मथुरापुरी तथा श्रीब्रजभूमि में रमते-हुये सब को सुख संतोप देते थे; परम धर्म दृढ़ करने के लिये श्रीगुरुदेव की अति अलौकिक सेवा की; आपने अति मधुर वचन सुनाके ठौर २ में हरिभक्तों को सुख दिया। सब संत महंत और समस्त सज्जनलोग श्रीनागाजी का यश नित्यही विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं । "चतुरदास" वृन्दाविपिन बास कियो भलि भांति ॥" SHESAR . HERRERA 557255 ORESORT भक्तिसुधास्वाद तिलक। ८३३ दो "तृणतें नीची आपको, जानि बसे "वन" माहि। मोह छोड़ि ऐसे रहे, मनो चिहारिहु नाहिं ॥" (७०) टीका । कवित्त । (१३१) आयो गुरु गेह यो सनेहसों लै सेवा करें,धरै सांचो भाव हियें अति मति भीजिये । टहल लगाय दई नई रूपवती तिया, दियौ वासों कहि "स्वामी कहै सोई कीजिये" ॥ देख्यो उरभाव अंग संग को लखाव भयौ दयौ घर धन वधू'कृपाकर लीजिये। धाम पधराय,सुख पायकै, प्रनाम करी, धरी ब्रजभूमि उर बसे, रस पीजियै ॥ ५६४ ॥ (६५) वार्तिक तिलक। आपके श्रीगुरुजीघरमें आये,अतिसच्चे सनेह भाव से मतिको भिगो. कर सेवा करने लगेऔर नवीन अवस्थावाली अति रूपवती अपनी धर्मपत्नीको गुरुजी के टहल में लगाकर कह दिया कि "जो स्वामीजी की आज्ञा हो सोई करना।" सब काल इकट्टे रहने से अंग संगका उरझाव होजाना जान लिया । तब घर और धन तथा अपनी स्त्री श्रीगुरु महाराज को सब देकर विनय किया कि "ये सब कृपा करके लीजिये।" अति आनन्दित हो उन्हें गृह में पधरा, साष्टांग प्रणाम कर , आज्ञा मांग, आकर, प्रजभूमिमें बस, श्रीभगवत्प्रेमरस को पान किया करते॥ दो०" गजधन, गोधन, भूमिधन, हेम, रत्न धन खान । जब आवत संतोष धन, सब धन धूरि समान ॥" (७१३ ) टीका | कपित्त । ( १३०) श्रीगोविंदचंदजू को भोर ही दरस करि; केसव सिंगार; राज- भोग नंदग्राम में । गोवर्धन, राधाकुंड वैकै, आवे वृंदावन, मन में हुलास नित करें चारि जाम मैं ॥ रहे पुनि पावन पै भूखे दिन तीन दूध लै प्रवीन, एऊ रंगे स्याम मैं । माग्यो "नैकु पानी ल्यावौ;" फेर बह प्रानी कहाँ ? दुख मति सानी, निसि कही "कियो ॥ ५६५॥ (६४) वार्तिक तिलक। आप वृन्दावन में नित्य आनन्द हुलास से प्रदक्षिणापूर्वक इस STAGECTEDGEOGREECTESC GRECRestertocke , बीते, आये काम ८३४ श्रीभक्तमाल सटीक। प्रकार विचरते थे कि श्रीगोविन्ददेवजी की भोर मंगला आर्ती का दर्शन, और श्रीकेशवदेवजी की श्रृंगार आर्ती का दर्शन कर, राज भोग नन्दग्राम में देखते । गोवर्द्धनजी राधाकुंड होकर चौथे पहर वृन्दावन में आजाते थे। एकवेर पावन मानसरोवर पर दैवयोग से तीन दिन भूखे रहगये । तब भक्रवत्सल प्रवीण श्रीनन्दकुमारजी ने सुन्दर मनुष्यरूपसे दूध लाके पान कराया। श्रीचतुरदासजी को वह रूप बड़ा प्यारा लगा। बोले कि "थोड़ा जल भी पिला दो॥" आप पानी लेनेको गये; फिर कहां देख पडै ? उस रूप के वियोग से नागाजी को बड़ा दुख हुआ तब रात्रि को स्वप्न में श्रीप्रभु ने कहा कि "वह दूध मैं ही तुमको पिला गया था ॥" सवैया । "डोलत हैं इक तीरथ, एकनि बार हजार पुरान बके हैं एक लगे जप में, तप में, इक सिद्धि समाधिन में अटके हैं। बूझि जो देखत हो, रसखानि जू, मूढ़ महा सिगरे भटके हैं। सांचे हैं वे, जिन आपन ज्यौं; इहि सांवरोश्यामपैवारि छके हैं ॥१॥" (७१४) टीका । कवित्त । (१२६ ) "पानी सौं न काज, ब्रजभूमि मैं बिराज दूध, पीवो घर घर," यह आज्ञा प्रभु दई है। "एतो ब्रजवासी सब क्षीर के उपासी, कैसे मोको लेन देहैं ?" कही "दै हैं;" सुनी नई है ॥ डोले धाम धाम श्याम कयौ जोई मानि लियो, दियो परचे हूं, परतीति तव भई है। जहां जा छिपा पात्र, वेगि माप ढूंढि ल्याउँ, अति सुख पावें, कीनी लीला रसमई हे ॥५६६ ॥ (६३) वार्तिक तिलक। "और तुमने जल मांगा सो मैंने इसलिये नहीं दिया कि, अव जल से कुछ प्रयोजन मत रक्खो, ब्रजभूमि में विराजमान हो ब्रजवासियों के घर घरमें जाकर दूध ही पियाकरो" प्रभुकी ऐसी आज्ञा सुन स्वप्न ही में आपने विनय किया कि "ये ब्रजवासी सब अतिप्रेम से दूध ही की उपासना करते हैं। (अर्थात् यशोदाजी ने के हेतु आपही को गोद से उतार दिया था)॥ Ma Merone . दूध न ।

RISHRA भक्रिसुधास्वाद तिलक। ८३५ सर्वया । "जप, यज्ञ, सुदान, सुमात्रै करें, बहु कूप, रु वापी तड़ाग वनावें । करें व्रत, नेम, सुइन्द्रियनिग्रह, उग्रह योग समाधि लगावें ॥ कहै रसखानि, हृदय तिनके कवहूँ नहिं जो सुपने महँ आवें। ताहि अहीरकी छोहरियां लछिया भर छांछ पै नाच नचावें ॥१॥" सो मुझे वे लोग, हे सुखसागर ! दूध कैसे लेनेदेंगी।” प्रभुने कहा "हमारी आज्ञा है, देंगी।" आपकी नवीन आज्ञा सुनकर मानली॥ उस दिनसे सबके घर घर जाके दूध लिया करते थे। ब्रजशसि- योंसे कह दिया कि "मुझे नन्दकुमार की आज्ञा है दो," किसी किसी ने नहीं दिया उनको आपने परचोदिया जैसे उनका सम्पूर्ण दूध फटगया वा कीड़ा पड़गया, एवमादि तब लोगोंको प्रभुकी आज्ञाकी प्रतीति हुई; दूध देनेलगे। कोई २ हांसी से दूधका पात्र छिपा देती थीं, तब श्रीनागाजी स्वयं जाके ढूँढ़ लेते । तब सब बड़ा सुख मानती थीं इस प्रकार की रसमयी लीला आपने की ।। (७१५) छप्पय । (१२८ ) माधुकरी मांगि सेवै भगत, तिनपर हौं बलिहार कियौ ॥ गोमा परमानन्द, प्रधान, द्वारिका, मथुरा खोरां। कालख सांगानेर भलौ भगवानेको जोरा॥ वीठल ठोंड़े, खेमं पंडा गुनौ रै. गाजै । श्यामसेन के वंश, "चीधरं" "पीपी" रवि राजै॥ जैतारने गोपाले के, केवल कूबै मोल लियौ । माधुकरी मांगि से3 भगत, तिनपर है। बलिहार कियौ ॥ १४६ ॥ (६५) वार्तिक तिलक। जिन जिन महात्माओं ने माधुकरी मुट्ठी भिक्षा मांग कर हरि- भक्तों की सेवा की, उनके ऊपर मैं अपना तन मन धन सब बलिहारी करता हूँ। SECRECCPRESCORSCIENCELEBCALGAON . 5 श्रीभक्तमाल सटीक । (१) गोमा में परमानन्दजी ( ) सेन भन के वंश में (२)द्वारिका में प्रधान भक्तजी श्यामदासजी। (३) मथुरा में खोरा भक्तजी (१।१०) और चीधड़जी तथा श्री (४५) कालख में और सांगानेर पीपाजी, दोनों संत- में भगवान् का भला सेवी सूर्य के समान जोड़ा अर्थात् प्रकाशमान भगवानजी कालख में (११।१२)जैतारनजी के और दूसरे भगवान्जी सां गोपालजी के भी मैं गानेर में बलिहारी जाता (६) टोड़े में चीठलजी (१३) श्रीकेवलदासकूबाजीने (७) गुनौरे में खेम पंडा, भक्तों अपने कूवरही से मुझे की सेवाकरसुखसेगर्जतेथे माल लेलिया। (१८४) श्रीकूबाजी (केवलदास) (७१६) टीका | कवित्त । (१२७) कहत कुम्हार, जगकुलनिसतार कियो, “केवल" सुनाम साधु सेवा अभिराम है। आये बहु संत, प्रीति करी लै अनंत, जाको अंत कौन पावै, ऐपै सीधी नहीं धाम है ॥ वडीए गरज *, चले करज निकासिबेकों, बनिया न देत, “कुवा खोदी कीजै काम है"। कही बोल कियो तोल लियौ नीके रोलकरि, हित सो जिवाँये जिन्हें 'प्यारो एक श्याम है ॥ ५६७ ॥ (६२) वार्तिक तिलक। आपको सब जगत् कुम्हार जाति कहते हैं श्री ''केवल" जी नाम था आपने अपने कुलभर वरन जगत् भर को भवसागर के पार उतार दिया, अति उत्तम रीति से साधुसेवा करते थे। एक दिवस हुनसे संत घर में आये, देख अति अनंत प्रीति की; परन्तु घरमें अन्न सीधा कुछ नहीं । बड़ीचाहनासे ऋण लेनेको गये पनियों ने नहीं दिया, एक ने कही कि "जो मेरा कुआं खोद देने को वचन दो तो मैं ढूँ॥" * 'गरज़" श्राश्यकीय चाह । + "रज"0" ऋण, उधार ॥ RECHECKKAKURAKACieoc R भक्तिसुधास्वाद तिलक। ८३७ आपने कहा “बहुत अच्छा खोद दूंगा," उसी वचन पर सब सामग्री लाकर, जिन सन्तों को एक श्रीसीतारामजी ही प्यारे हैं, उनको बड़े प्रेम से भोजन कराया ॥ श्रीअयोध्याजी लक्ष्मणकिला तथा सारन चिरांद में जो स्थान हैं, वहां के महात्मा, "श्रीकेवल कूबाजी ही के द्वारा" के हैं । (७१७ ) टीका । कचित्त । । १२६ ) गए कुवा खोदिवेको, सुवा ज्यौँ उचारै नाम, हुवा काम जान्यो वनिभयो सुख भारी है। आई रेत भूमि, झुमिमाटी गिरि दवे वामैं, केतिक हजार मन होत कैसे न्यारी है ॥ सोक करि, आये धाम, "राम" नाम धुनि काहूँ कान परी, बीत्यो मास, कही वात प्यारी है । चले वाही ठौर स्वर सुनि प्रीति भौंर परे, रीति कछु और, यह सुधि चुधि टारी है ॥ ५६८ ॥ (६१) वार्तिक तिलक। संतों के चले जाने पर आप जाकर कुमां खोदने लगे, और मुख से शुक (तोते ) के समान सप्रेम श्रीसीताराम नाम उच्चारण करते, बहुत प्रसन्नतापूर्वक नीचे तक खोद लेगये। "कीर ज्यौं नाम स्टै तुलसी सो कहै जग जानकीनाथ पढ़ायो" कुआं तैय्यार होते देख चनियां और भी आनन्दित हुये ।। इतने ही में नीचे वालू मिली वस ऊपर से टूटके सहस्रों मन मिट्टी आपके ऊपर गिरपड़ी ! वह कैसे निकल सकै ? सवोंने जाना कि दबकर मरगये; शोक करते चलेआये ॥ एक मास पीछे उस ठिकाने कोई गया उसके कानों में श्रीराम नाम की धुनि पड़ी, गांव में दौड़ आया मुखदप्रिय समाचार सुनाया, सब लोग आकर वहां श्रीराम नाम का शब्द सुन मानों प्रीति के भँवर में पड़गये । सबकी तनमन की सुधि भूलि गई, क्योंकि वह नामोच्चारण और ही सप्रेम रीति से सुनाई देता था। (७१८) टीका । कवित्त । (१२५) माटी दूर है करी, सव पहुँचे निकट जव, बोलिकै सुनायो "हरि" "दूर" अलग ॥ .

6 ARTHA श्रीभकमाल सटीक । . , चानी लागी प्यारियै । दरसन भयो, जाय पांय लपटाय गए, रही मिहराब सी है, कूबहू निहारियै ॥धरयो जलपात्र एक, देखि बड़े पात्र जाने, आने निज गैह पूजा लागी अति भारिय। भई द्वार भीर, नर उमड़ि अपार आये, महिमा विचारि बहु संपति लै वारिये ॥ ५६६॥ (६०) वार्तिक तिलक । गांव के सब लोग लगकर अति शीघ्रता तथा सावधानता से हाथोंहाथ मिट्टी निकालकर आपके निकट पहुँचे । “हरेराम हरेराम' यह वाणी कह कर सुनाया, अति प्यारी लगी; श्रीकेवलजी का दर्शन कर लोग चरणों में लिपट गये देखा कि श्रीरामकृपा से नीचे गुफा (मेहराव 8) सरीखा हो रहा था, नीचा बहुत था; इससे एक मास भर वहीं बैठे रह गए इससे आपकी पीठ में कूबर होगया। "कुवाजी" कहलाने लगे । आपके आगे एक नल भरा पात्र रक्खा हुआ था। सबने जाना कि ये श्रीरामजी के बड़े कृपापात्र हैं, सोनिकाल के बाजा बजाते बड़े प्रेमसे घरलाकर लोगोंने विराजमान किया। सबने आपको बड़ीभारी पूजा चढ़ाई। एक एक से सुनकर बहुत से लोग आये द्वार में बड़ी ही भीड़ हुई। श्रीकेवलजी की महिमा विचार कर लोगोंने बहुतसा धन चढ़ाया, और नेवछावर करके लुटा भी दिया । (७१६ ) टीका | कवित्त । ( १२४) सुंदर स्वरूप श्याम ल्याये पधरायवेको, साधु निज धाम आय कूबाजूके बसे हैं । रूपको निहारि मन में विचारि कियौ आप "करैं कृपा मोकों प्रभु" अचल है लसे हैं ॥ करत उपाय संत टरत न नैक किहूँ कहीजू अनंत हरि रीझे स्वामी हसे हैं। भयो "जानराय" नाम जानि लई ही की बात, अंग मैं न मान सदा सेवा सुख रसे हैं ।। ५७० ॥ (५६) वार्तिक तिलक । श्रीकेवलजी "कूबाजी" विख्यात हो संतसेवा करने * "मिहराब"-12 A , अनुपामार श्रद । . RPIRATE भक्रिसुधास्वाद तिलक। ८३६ लगे। कोई संत प्रभुकी बहुत सुन्दर श्याम मूर्ति अपने मंदिर में पधराने को लिये जाते थे; मार्ग में कूबाजी के यहां निवास किया, आपने मोहनी स्वरूप को देख, मन में विचार कर, प्रार्थना की कि "प्रभु मुझ पर कृपाकर रहजाते, तो भला था।" आपकी प्रार्थना सुन प्रभु वहां ही अचल होगये; वे संत उठाने के लिये लाख उपाय करने लगे पर किंचित् भी नहीं टरे । श्रीकेवलजी ने हँस के कहा "अजी! हरि अनन्त हैं आपके उठाये नहीं उठेंगे, मुझपर प्रसन्न होकर यहां ही रहेंगे।" संत आपका वचन सत्य जान, छोड़कर चलेगये । कूबाजीने अति प्रसन्न होकर कहा कि मेरे हृदय की बात जान गये इस से आपका नाम "जानराय" जी है, प्रभुको पधराके सुख से पग सेवा करने लगे। (७२०) दीका । कवित्त । (१२३) चले द्वारावति, "छाप ल्यावें," यह मति भई; आज्ञा प्रभु दई' फिरि घरही को आये हैं। "करौ साधुसेवा, धरौ भाव दृढ़ हिये मांझ, टरौ जिनि कहूं कीजै जे जे मन भाये हैं"। गेह ही में संख चक्र आदि निज देह भए, नये नये कौतुक प्रगट जग गाये हैं। गोमती को सागर सौ संगम सो रह्यो सुन्यौ, सुमिरनी पठायकै यों दोऊ ले मिलाये हैं ॥ ५७१ ॥ (५८) बार्तिक तिलक । कूबाजी के इच्छा हुई कि 'द्वारिकाजी जाके शंख चक्रादिक छाप ले आऊं' सो घर से चल दिये। भगवत् की आज्ञा हुई कि "तुम हृदय में दृढ़ भाव रखकर साधुसेवा करो; यहां से न टरो कहीं नहीं जाव, तुम्हारे मन में जो जो अभिलाषा होगी सो सब यहां ही पूर्ण हो जायगी।" आज्ञा मान लौट के घरही चले आये। श्रीजानरायजी के समीप ही शंख चक्रादिक छाप आपके बाहों में स्वतः अंकित होगये। इत्यादिक नवीन २ कौतुक तथा चमत्कार प्रभुकृपा से प्रगट देख सब जगत् यश गान करने लगा। गोमती और समुद्र के बीच में RECR-SCREECRECRKHERI 5 15 १RSHAN श्रीभक्रमाल सटीक । बड़ी रेती है, समुद्र की लहर आने से दोनों का संगम हो जाता है; एक समय लहर आना संगम होना वन्द होगया। श्रीकेवलजी ने सुना कि संगम न होने से माहात्म्य की हानि हुई, और रेती उड़ने से वहां के लोग बड़े दुखी हैं। तब आपने श्रीसीताराम नाम स्मरण करने की अपनी सुमिरनी माला भेज दी उसको रख देने से गोमती समुद्र का संगम पूर्ववत् होने लगा। (७२१) टीका | कवित्त । (१२२) भए शिष्य शाखा, अभिलाषा साधु सेवाही की, महिमा अगाध, जग प्रगट दिखाई है। आए घर संत, तिया करति रसोई, कोई आयो वाको भाई, ताको खीर ले बनाई है ॥ कूबाजी निहारि जानी याको हित दूरसों सौ कीजियै विचार एक सुमति उपाई है। कही "भरि ल्यावौ जल" गई डरि कलपै न लई तसमई सब भननि जिमाई है ॥ ५७२ ॥ (५७) वार्तिक तिलक । श्रीकेवलजी के अनेक शिष्य और प्रशिष्यों की शाखाएं हुई; उन सबको साधुसेवा ही की अभिलाषा उत्तरोत्तर बढ़ी; क्योंकि श्रीकूबाजी ने संततेवा की अथाह महिमा प्रत्यक्ष दिखा दी। एक दिवस गृह में संत आये दैवसंयोग से उनकी स्त्री का भाई भी आ पड़ा; आपकी स्त्री ने सन्तों के लिये नित्य कीसी रसोई की, पर अपने भाई के लिये खीर बनाई कूबाजीने यह चरित्र देखकर विचारा इसकी प्रीति अपने भाई में है, इससे मैं ऐसा उपाय करूं कि अपने प्यारे भाइयों को खीर खिला दूं, नारी को प्राज्ञा दी कि "जा जल भरला" वह गई परन्तु डरतीहुई, कि खीर खिला न दे,' आपने तुलसी छोड़ प्रभु को अर्पणकर सघ तसमई हरिभक्तों को पवादी ॥ (७२२, टीका | कवित्त । (१२१) बेगि जल ल्याई, देखि आगिसी बराई हिये, झांके मुँह भाई, दुख सागर वुड़ाई है । विमुख विचारि, तिया कूबाज निकारि दई, गई पतिकियो और, ऐसी मन आई है ॥पस्यौई अकाल बेटा बेटी सो न पाल सकें, तक कोऊ ठौर मति अति अकुलाई है । लिये संग MOREOGHAR COMKOREGA - भकिसुधास्वाद तिलक। ८४१ कस्यो जोई, पुत्र सुता भूख भोई, आय परी झीथड़ा में स्वामी को सुनाई है ॥ ५७३ ॥ (५६) वार्तिक तिलक । जल ले बहुत त्वरा से आके संतों को खीर पाते देख क्रोधाग्नि से जलती हुई, भाई का मुख देख दुखसमुद्र में डूबगई। आपने उसको विमुख पा, घर से निकाल दिया । उसने जाके दूसरा पति करलिया और उससे बेटी वेटे हुये । एक समय दुकाल पड़ा, वह पुरुष अपने ही भूखों से मरने लगा, तब इसके वेटी बेटों को कैसे पाल सके। निदान अति व्याकुल हो, वह उस पति और बेटी बेटों को लिये भूख से पीड़ित "झीथड़ा" में आके रोरोकर स्वामीजी को विनय सुनाने लगी। (७२३) टीका । कवित्त । (१२०) नाना विधि पाक होत, संत आवे जैसे सोत, सुख अधिकाई, रीति कैसे जात गाई है। सुनत बचन वाके दीन दुख लीन महा, निपट प्रवीन मन माझ दया आई है ॥ "देखि पति मेरौ और तेरौ पति देखि याहि फैसे के निवाहि सके परी कठिनाई है। रही द्वार झारयो करो पहुँचे अहार तुमै" महिमा निहारि हग धार लै बहाई है ॥ ५७४॥ (५५) वार्तिक तिलक। आपके यहां नित्य श्रीसीतारामजी के लिये अनेक प्रकार की रसोई होरही है, चारों ओर से जैसे समुद्र में नदियां आती हैं इसी प्रकार संत आते हैं आपकी सेवा की रीति और आनन्द की अधि- कता कैसे कही जासकी हैं ? से भरे दीन वचन उस स्त्री के सुन, आप साधुता में अति प्रवीण तो थे ही, मन में दया लाकर बोले कि "री मूर्ख ! देख मेरे पतिका प्रभाव कि कैसा आनन्द हो रहा है और अपने पतिको भी देव फैली कठिनता में पड़रहा है । अच्छा, वाहर पड़ीरह, द्वार में झाडू लगाया कर, तुम सबको खाने को मिला करेगा।" आपकी महिमा देख भाग्यहीना रोनेलगी। FaceBREACHERECTECREENScts ห้าม ८४२ श्रीभक्तमाल सटीक। (७२४) टीका । कवित्त । ( ११६) कियौ प्रतिपाल तिया परी को अकालमास भयो.जब समै विदा कीनी उठिगई है। अतिपछितात वह वात अव पावै कहाँ ? जहां साधु संग रंग सभा रसमई है। करें जाको शिष्य, संतसेवाही बता "करी जो अनंक रूप गुन चाह मन भई है"। नाभाजू बखान कियो, मोकों इन मोल लियो, दियौ दरसाय सब लीला नितनई है॥५७५॥ (५४) वार्तिक तिलक । • जबतक अकाल के मास पूर्ण नहीं हुये, तबतक पति पुत्रों के सहित उस स्त्री को भोजन दिलाया; फिर समय होने पर विदा करदिया; चली गई : यह रसमई संतसभा के संगका प्रेम रंग देख, उसने मनमें अतिपश्चात्ताप किया। परन्तु वह बात अब कैसे पासकै ? श्रीकूवाजी जिसको शिष्य करते, उसको संतसेवा ही.का इस प्रकार उपदेश देते थे कि "जो तुम्हारे मनमें भगवत्के रूप गुणोंकी चाह हुई है तो प्रीति से यही करो।" श्रीप्रियादासजी कहते हैं कि जो श्रीनाभास्वामीजी ने बखान किया, "केवल कूबे मोल लियो" सो मैंने आपकी नित्य नवीन लीला कहकर दरसा दी कि श्रीकेवलजी संतसेवा ही के लिये "कूवा” हुये। संतों की जय, संत सेवियों की जय ।। (१२५) छप्पय । (११) श्रीअन अनुग्रह तेंभये, शिष्य सबै धर्म की धुजा। जंगी, प्रसिद्ध प्रयागं, विनोदी, पूरन, बनवारी। नर- सिंह, भलभगवान, दिवाकर, दृढ़व्रत धारी ॥ कोमल हृदै किशोर, जगत, जगन्नाथ, सलूंधौ। औरी अनुग उदार खेम, खीची, धरमधार, लघुऊधौ । त्रिविधि तापमाचन सबै, सौरभ प्रभु निज सिर भुजा।श्रीमग्र अनुग्रह तें भेय, शिष्य सबै धर्म की धुजा॥१५०॥(६४) BCCICROCHACHECHAK . , (१) अब भक्रिसुधास्वाद तिलक। ८४३ वार्तिक तिलक । स्वामी श्रीअग्रदासजी की कृपा अनुग्रह तें, उनके ये सब शिष्य भागवतधर्म की ध्वजा के सरीके हुए । जिनके मस्तक पर प्रभु समर्थ "सौरभ" अर्थात् श्रीअग्रस्वामीजी ने अपना करकमल रक्खा वे सब अपने, तथा शरणागतजीवों के, तीनों ताप छुड़ानेवाले हुये; जिनमें परम प्रसिद्ध- श्रीजंगीजी (६ ) कोमल हृदयवाले (२) श्रीप्रयागदासजी श्रीकिशोरजी (३) श्रीविनोदीजी (१०)श्रीजगतदासजी (४) श्रीपूरनदासजी (११) श्रीजगन्नाथदासजी (५)श्रीवनवारीदासजी (१२) श्रीसलूधौजी (६) श्रीनरसिंहदासजी (१३) श्रीभग्रदेवानुगामी (७) श्रीभगवानदासजी (शिष्य) श्रीखेमदासजी (८) श्रीरामभजन दृढ़ (१४) श्रीखींचीजी व्रत धारण करनेवाले (१५) श्रीधर्मदासजी परमधीर श्रीदिवाकरजी (१६) श्रीलबुऊधौजी इत्यादि। (७२६) छप्पय । (१७) भरतखंड भूधर सुमेर टीलोलाहाँकी पद्धति प्रगट ॥ अंगज परमानंद दास जोगीजग जागै।खरतर, खेम, उदारध्यान, केसी हरिजन अनुरागै॥ सस्फुटत्योला शब्दलोहकर वंश उजागर । हरीदासं कपि प्रेम, सबै नवधा के आगर ।। अच्युत कुल सेवै सदा, दासन तन दसधा अघट ।भरतखंड भूधर सुमेर टीला लाहाकी पद्धति प्रगट ॥ १५१॥ (६३) वार्तिक तिलक। (१) भरतखंडरूपी सुमेर पर्वत के टीला (शिखर) के समान श्री "टीला" जी भन्न हुये ॥ CECRETCRICKETEGER-KARANG .

८४४ . ARTHAKHRESAXASIK श्रीभक्तमाल सटीक। (२) उनके शिष्य श्री “लाहा" जी हुये; इनकी पद्धति कहिये शिष्य-परम्परा परम प्रकाशमान हुई । (३) आपके अंगज (पुत्र) श्रीपरमानन्ददासजी जगत् में विख्यात योगी हुये॥ (४-७) अतिउदार खरतरदासजी, खेमदासजी, ध्यानदासजी, केशोदासजी, इन सवाका श्रीहरिभकों में बड़ाही अनुराग हुआ । (८) सस्फुट प्रसिद्ध त्योला शब्द अर्थात् "त्योला" इति विख्यात लोहार जाति के वंश में जन्मलेकर उसको उजागर किया। (६) और हरीदासजी का कपि श्रीहनुमान्जी में बड़ा प्रेम था, नवधा भक्ति में सब ही निपुण हुये ॥ ये सब अपनी देह में दासता को धारण कर अच्युतकुल वैष्णवों की सेवा करते थे, इससे भगवत् की अनपायिनी प्रेमाभक्ति को प्राप्त हुये। (१८५ ) श्रीकन्हरजी (श्रीविठ्ठलमृत)। (७२७) छप्पय । (११६ ) मधुपुरी महोछौ मंगलरूप “कान्हर” कैसौ को करें। चारि बरन आश्रमरंकराजा अन पावै । भक्तनि को बहु मान विमुख कोऊ नहिं जावै ॥ बीरी चन्दन वसन कृष्ण कीरतन वरखै।प्रभुके भूपन देय महामन अतिसयहरखै। "वीठल सुतविमल्यौफिरै,दासचरण रज सिर धरै। मधुपुरी महोछौ मंगलरूप “कान्हर" कैसौ को करै ॥ १५२ ॥ (६२) बार्तिक तिलक। मथुरापुरी में मंगलरूप महाउत्सव "श्रीकान्हरजी" के समान और कौन करसता है ? जिस उत्सव में चारो वर्ण चारो आश्रम के जन, राजा से रंक तक सबको सादर भोजन अन्न मिलता था। Basic-RESCRECAGRectackerle Recs FA2 RAI भक्रिसुधास्वाद तितक। ८४५ और भगवद्भकों का अंतिसन्मान से सत्कार होता था, विमुख कोई नहीं जाता था। "दीया जगत अनूप है, दिया करौ सब कोय । घरको धत्यो न पाइयै, जो कर दिया न होय ॥" सभासमाज में चन्दन माला बीड़े मेवादिक और वस्त्र दिये जातेथे।फिर गुणीजन श्रीकृष्ण- कीर्तन यशगान की वर्षा करते थे; उस समय श्रीकान्हरजी प्रभु के भूषण उतार गुणीजनों को देकर मन में अति आनन्दित होते थे। श्रीविठ्ठल जी के परम विमन पुत्र श्रीकान्हरजी संतों के चरणकी रज शीशपर धारण करने के लिये प्रमुदित चारों ओर फिरते थे । ( १८६) श्रीनीवाजी। (७२% ) छप्पय । (११५ ) भक्तनि सों कलिजुग भलैं, निवाही "नीवा,' खेत- सी॥आवहि दास अनेक उठि सु आदर करि लीजै। चरण धोय दंडौत सदन में डेरा दीजै ॥ ठौर ठौर हरि- कथा हृदै अति हरिजन भावें । मधुर वचन मुह * लाय विविधि भांतिन्ह जु लड़ा. ॥ सावधान सेवा करै, निर्दूषन रति चेतसी ॥ भक्तनि सों कलिजुग भलैं, निवाही "नीवा" खेतसी ॥ १५३॥ (६९) वार्तिक तिलक । कलियुगमें श्रीनीवाजीने भगवद्भक्कों से प्रीतिरीति खेतसरीखी। भलेप्रकार निर्वाह किया; अर्थात् जैसे किसान किसी विनसे भी खेत की प्रीति नहीं छोड़ता ऐसेही आपके गृह में अनेक भगवदास माते थे उन सबको उठकर अतिश्रादरपूर्वक आगे से ले दण्डवत् प्रणामकर चरण धोके गृह में आसन कराते थे आपको हरिभक्त बहुत ही प्यारे * 'महुँपाठभेद । दा० "दरिया हारसा प्रीति फरु, ज्या किसन की गति । दाम नौगुनो, ऋण घना, तऊ खेत सी प्रीति ॥ १ ॥ राम नगावहु आप में, ज्यों किसान मन खेत । गमचरण सीताण सहि निशिदिन तहां सचेत ॥२॥" SECRECREECHIKARACleaCkCACROct - SCIES ८४६ श्रीभकमाल सटीक। , लगते, सब ठिकाने में हरिकथा वैठाकर मधुर वचन कह प्रसन्न करते, बहुन प्रकार से लाइ लड़ाते थे। नीवाजी के चित्त में निर्दूपण प्रीति थी इससे अति सावधानता से संतों की सेवा करते थे। (१८७) श्रीतूंवर भगवान् (भगवान् तूंवरसेठ) (७०६) दापय । (११४) बसन बढ़े कुंतीवधू, त्यों "तूंवर भगवान” कै ॥ यह अचिरज भयौ एक, खांड घृत मैदा वरषै। रजत रुक्म की रेल सृष्ट सवही मन हरषै ॥ भोजन रास विलास कृष्ण कीरतन कीनौ। भक्तनिको बहुमान दान सही को दीनौ ॥ कीरति कीनी भीमसुत, सुनि भूपमनोरथ आनके । बसन वढ़े कुन्तीवधू, त्यों "तूंवर भगवान" कै॥ १५४॥ (६०) वार्तिक तिलक। जैसे श्रीद्रौपदीजी के वस्त्र बढ़े थे, ऐसे ही "तूंवर" जाति के सेठ भत "श्रीभगवानदासजी" के अन्न द्रव्यादि सब उत्सवके पदार्थ प्रभुकृपा से बढ़। यह एक आश्चर्य हुआ कि जो मितका पदार्थ रक्खा था सो खांड घृत मैदा आदिक देते समय में इतना बढ़गया कि वर्षासी हुई । और सुवर्णरूपकी मुद्रा भी रेलारेल दी गई। सम्पूर्ण सृष्टि के लोग देखके मन में हर्षित हुये । भोजन कराते समय भी सेब पदार्थ बढ़े, फिर रासविलास श्रीकृष्णकीरतन कराया और भगवद्भक्तों को बहुमान्य से सब पदार्थ अर्पण कर सबको दान दिया। भीमजी के पुत्र (श्रीभगवानदास ) ने मथुरा में ऐसी कीर्ति की कि जिसको सुनकर राजा लोग मनोरथ करने लगे कि ऐसी करनी हम भी करें परन्तु बनेगी नहीं ॥ दो० 'करत महोच्छव प्रेमभर, बहुविधि करत समाज । पटरस असन जिंवाय जन, देत वसन सिरताज ॥१॥" ACCA KHURSHAKRECENCE - *****KARAAREERS भकिसुधास्वाद तिलक। ८४७ (७.० ) टीका | कवित्त । (११३ ) बीतत वरस मास आवे "मधुपुरी," नेम प्रेमसौं महोछौ रास हेम ही लुटाइयै। संतनि जिवाँय, नाना पट पहिराय, पाछे द्विजन बुलाय, कहुँ पूजें, पै, न भाइये ॥ आयो कोऊ काल, धन माल जा बिहाल भए, चाहे पन पात्यो पाए "अलप कराइये" । रहे विध दूपि सुनि भयौ सुख भूख बढ़ी, आयौ यो समाज करौ ख्वारी मन आइयै ॥ ५७६ ॥ (५३) वार्तिक तिलक । सेठ श्रीभगवानजी का नियम था कि वारह महीना बीते गृह से बहुतसा द्रव्य ले, मथुराजी में आकर प्रेम से महोत्सव, रासलीला करते सुवर्ण लुटाते थे; फिर संतों को भोजन कराके अनेक प्रकार के वस्त्र पहिराते थे। पीछे, ब्राह्मणों को बुलाकर कुछ पूजन करते ।। परन्तु ब्राह्मण प्रसन्न नहीं होते थे। कोई ऐसा काल आपड़ा कि धन सम्पत्ति घटने से और ही दशा होगई, तथापि अपना नियम नहीं छोड़ा। थोड़ा द्रव्य ले, लाकर विनय किया कि "थोडासा नियम करा दीजिये।" ब्राह्मण लोग प्रथम से दुखित तो थे ही, सुनके मनमें सुखी हो उन्होंने विचार किया कि "भला हुआ, आओ, अब इसका उत्सव समाज सब बिगाड़ देंगे।" (७३१.) टीका । कवित्त । (११२) ' अति सनमान किंयौ, ल्याए जोई सौपि दियौ, लियो गांठ बांधि, तव बिनती सुनाइयै। "संतनि- जिवावी, भावै रास लै करावी, भावै जेंवौ सुख पावो, कीजै बात मन भाइये ।" सीधौ ल्याय कोठे धस्यो, रोक हो, सो.. थैली भयो, 'द्विजन बुलाय देत कि हूं निघटाइयै । जितनी निकासे ताते सौगुनी बढ़त और, एक एक ठौर बीस गुनौ दै पठाइयै ॥ ५७७॥ (५२) 'चार्तिक तिलक। आप जहां टिके थे उन पंडाओं को बड़े सन्मान से, जो कुछ धन लाये सो सौंप दिया। उन्होंने जव गांठि में बांध लिया, तब आपने * विहान"J-2-कुदशाको प्राप्त । + ज्वारी"cl-अनादर, मानहानि । KAREERX Sear- -60 R ८४८ श्रीभक्तमाल सटीक। - उनको विनय सुनाया कि "इतना ही धन है, इसीमें चाहे संतों को भोजन कराइये, चाहे रासलीला कराइये, चाहे आप सब ब्राह्मणलोग भोजन कीजिये । जो आपके मन में रुवै और सुखहोय सोई कीजिये।" वे उस द्रव्य से सीधा मँगाकर कोठार में रख, और रोकड़ रुपये थैली में भर, प्रथम ब्राह्मणों ही को बुलाके सीधा और दक्षिणा देने लगे।मन में यह ठीक किया कि "शीघ्र ही सब चुक जाय तो इसका दुर्यश होय ।” परन्तु प्रभुकृपा से जिस वस्तु में से जितना निकालते थे उसका सौगुना वह वस्तु बढ़ती जाती थी, एक एक ठिकाने में बीस वीस गुना दिये, भेजे, तो भी सव पदार्थ वनाही रहा । उसीमें वैष्णवों का भी भोजन, और रासलीला भी हुई; तथापि पदार्थ वना ही रहा । भक्त-मनोरथपूरक कृपालु की जय ॥ , छप्पय । "सुनि सठ द्विज मन हर्प, लगे वांटन धन रासा। इक छटांक जहँ देन देहि तेहिं हरषि पचासा ॥ यहि विधि धन पट असन कुटिल अति भूरि लुटायो। नेकु न घटइ मौंज, सबन मन विस्मय पायो । पुनि परेउ चरण "अवगुण छमहु," प्रभुता बढ़ी अपार जव। लजा राखी हरि भगत की; भए शिष्य बहु आय तव ।। विदित हो कि इस (भगवान् ) नाम के भी भन कई हुए हैं । (१८८) श्रीजसवन्तजी। (७) छप्पय । (१५ ) जसवंत भक्ति जयमाल की, रूड़ा राखी राठवड़ ॥ भक्तनि सो अति भाव निरंतर, अंतर नाहीं । कर जोरे इक पाय, मुदित मन आज्ञा माहीं ॥श्रीकृन्दावनवास, कुंज क्रीडा रुचि भाव। राधावल्लभ लाल नित्तप्रति ताहि लड़ावै ॥ परम धरम नवधा प्रधान, सदन सांच PleCRICKECTORRORESTRICT Rected ८४६ १ " * भनिसुधास्वाद तिलक । निधि प्रेम जड़ । “जसवंत” भक्ति “जयमाल" की, रूड़ा राखी साठवड़ ॥ १५५ ॥ (५६) वार्तिक तिलक । राठवड़ अर्थात् "राठूर जाति" के क्षत्री "श्रीजसवन्तसिंहजी,' ने अपने बड़े भाई "श्रीजयमालसिंहजी" की भकि की रूड़ा रक्खी अर्थात् उनके पीछे उस भाक्ति को ग्रहण कर सुन्दर रक्षा की, वह हीन न होने पाई । भगवद्भक्तों से छल छोड़ निरंतर प्रेमभाव करते; आनन्द से हाथ जोड़े, आज्ञा में एक चरण से खड़े रहते थे; और श्रीवृन्दावनवास कुंजक्रीड़ा दर्शन में अति प्रीति थी; श्रीराधाव- ल्लभलाल को नित्यप्रति लाड़ लड़ाते थे, प्रेम किया करते; और सव धर्मों का सार नवधा भक्ति, तथा प्रधान प्रेमाभक्रिरूपी वडी भारी निधि हृदयरूपी गृहमें सदा संचित करते, परम प्रेममें मग्न हो जड़ सरीखे हो जाते थे। आप श्रीहरिदासजी के शिष्य थे। (१८६) श्रीहरिदासजी। (७३३ ) छप्पय । (११०) "हरीदास" भक्तनि हित, धनि जननी एकै जन्यौ। अमित महागुन गोप्य सार वित सोई जानै। देखत कौ तुलाधार दूर आसै उनमानै ॥ देय दमामौ* पैज विदित दृन्दावन पायौ। राधावल्लभ भजन प्रगट पर- ताप दिखायौ ॥ परम धरम साधन सुदृढ़, कलियुग कामधेनु में गन्यौ।."हरीदास" । भक्तनि हित, धनि जननी एकै जन्यौ ॥ १५६ ॥ (५८) वार्तिक तिलक। श्रीहरिदासजी की माता धन्य हैं कि जिन्होंने भगवद्भक्तों का हित. * "दमामों" नगारा, डंका। "श्रीहरिदासजी" नाम के कई महात्मा श्रीमतमालजी में वर्णित हैं।

श्रीभक्तमाल सटीक। कार करने के लिये एक अद्वितीय पुत्र उत्पन्न किया। प्रभुके अमित महागुन गुप्त और भगवत्चरित्रों का सारांश जाननेवाले जाति के तुलाधार ( बनिये ) तो थे ही, इससे शास्त्रों की और सज्जनों की गम्भीर आशय देखके अनुमान से तोल लेते थे। वृन्दा- वन प्राप्ति होनेका अपना पैज (प्रण), दमामा डंका बजाकर ले. लिया, इससे श्रीराधावल्लभजी के भजन का प्रत्यक्ष प्रताप दिखा दिया। भगवद्भक्ति साधन में अति सुदृढ़ कलियुग में कामधेनु की समान गिनेगये। दो० "हरीदास कुल वनिक में, प्रेमभाक्त की खान । पुर काशी ढिग रहतही, वृन्दावन तज प्रान ॥" (७३४ ) टीका । कवित्त । (१०६ ) हरीदास वनिक, सो कासी ढिग बास जाकौ, ताकौ यह पन तन त्यागौं ब्रजभूमहीं । नयौ ज्वर नाड़ी छीन, छोड़ि गए बैद तीन, बोल्यो यो प्रवीन "वृन्दावन रस भूमहीं ॥" बेटी चारि संतनिको दई "अंगीकार करौ, धरौ डोली माझ मोको ध्यान दृग घूमहीं "। चले सावधान राधावल्लभको गान करें, करै अचिरज लोग परी गाँव धूम हीं ॥ ५७६ ॥ (५१) चाचिकतिलक। श्रीहरिदासजी बनिये काशीजी के समीप में वसते बड़े संतसेवी भक्न थे; आपका पन था कि "मैं वृन्दावन ही में शरीर छोडूं।" कालज्वर होने से नाड़ी छूटगई; दो तीन बैद भी छोड़के चलेगये। इन परम प्रवीण ने कहा कि "मेरा मन वृन्दावन के प्रेमरस से झूम रहा है ।" चार बेटियां थीं, सजनों.को देकर, प्रार्थना की कि "इनको अंगीकार कीजिये, और मुझे डोली में धर वृन्दावन को ले चलिये, मेरे नेत्र वहीं ध्यान से घूमते हैं । दो० "वनप्रमोदके फिरत हैं मम आँखिन जे कुंज। हरिप्रसाद मैं फिरव कब ? तेइ कुंजन सुख पुज ॥ १॥" नाड़ी छुटगई तो भी सावधानता से श्रीराधावल्लभजी (रूपकला) .

८५१ ) . . भक्तिसुधास्वाद तिलक। का नाम गान करते चले; ग्राम में धूम पड़गई; लोग आश्चर्य करने लगे कि "यह वृन्दावन कैसे पहुँच सक्ना है ?" (७५) टीका । कवित्त । (१०% आवतही मग मांझ टिगयौ तन, पन सांचौ कियो स्याम, वन प्रगट दिखायौ है । आय दरसन कियो, इष्ट गुरुप्रेम भरि नेम पस्यौ पूरौ, जाय चीरघाट न्हायो है ॥ पाछे आए लोग,सोग करत भरत नैन वैन सब कही, कही "ताहीदिन आयो है"। भक्तिको प्रभाव यामें भाव और आनौ जिनि, विन हरिकृपा यह कैसे जात पायो है।५८०॥(५०) वार्तिक तिलक। आप आते थे, बीचही में शरीर छूटगया । प्रभु ने पन सच्चा कर सबको प्रतीत कराने के लिये वैसा ही दिव्य दूसरा शरीर दिया उसीसे वृन्दावन में आकर श्रीराधावल्लभजी के और अपने गुरु गोसाईं सुन्दरदासजी के, सप्रेम दर्शन करके, चीरघाट स्नानकर, नेम पूरा किया। पीछे लेआनेवाले लोग नेत्रों में शोकजल भरे वृन्दावन में आकर कहनेलगे कि "अमुक दिन मार्ग में हरिदासजी का शरीर छूटगया, यहां नहीं पहुँचे ॥" सुनके सुन्दरदासादि कहने लगे कि "उसी दिन तो आकर श्री. राधावल्लभजी का हरिदास ने दर्शन किया है ॥" दो."चीरघाट न्हावत दिख्यौ, वृन्दावन नर नारि । कही सुयश सो ताहिकर, करहु हर्ष दुख टारि ॥" यह सुन सब लोगों को बड़ा ही हर्ष हुआ। भक्ति का प्रभाव ऐसा ही है । प्रभु अपने भक्तों का प्रण अवश्य पूर्ण करते हैं । इसमें कोई और भाव कुतर्क का न लावै कि "वह प्रेत होकर आये होंगे।" वह प्रभुका दिया दिव्य ही शरीर था; विना हरिकी कृपा ऐसा नहीं होता। ( १६० । १६१) श्रीगोपालभक्त । श्रीविष्णुदास। (७६६) छप्पय 1 ( १०७) भक्ति भार जूड़ें जुगल, धर्म धुरंधर जग विदित ॥ 'वांवोली" "गोपाल" गुननि गंभीर गुनारटादच्छिन BEHARE PREMEMORRHORE ।

८५२ श्रीभक्तमाल सटीक। दिसि विष्णुदास गांव “काशीर" भजन भट॥ भक्तनि सोयह भाय भजै गुरुगोविंद जैसे।तिलक दाम आधीन सुवर संतनि प्रति तैसें ॥ अच्युत कुल पन एकरस, निबद्यौ ज्यौं श्रीमुख गदित । भक्ति भार जू जुगल, धर्म धुरंधर जग बिदित ॥ १५७॥(५७) वार्तिक तिलक । ये युगल भक्त एक गुरु के शिष्य कर्म वचन मनसे मिलके भक्ति- रूपी भारको उठानेवाले भागवतधर्म-धुरंधर जगत् में विख्यात हुये। (१) काशीजी के समीप "वावुलिया” ग्राम में बसनेवाले "श्रीगोपालभनजी" दिव्य गुणों से भरे हुये बड़े गम्भीर भगवद्गुणों को रटा करते थे। (२) दूसरे दक्षिणदिशि "काशीर" ग्राम के वासी "श्रीविष्णु- दासजी" भगवद्भजन में बड़े सुभट हुये। दोनों महानुभावों का हरिभक्कों में यह भाव था कि जैसा श्री- नाभाजी स्वामी ने कहा है "भक भक्ति भगवन्त गुरु चतुर नाम वपु एक ऐसाही गुरु गोविन्द के समान जानके संतसेवा करते थे और जता श्रेष्ठ संतों को मानतेथे वैसाही कंठी तिलकमात्र धारण करने वालों के भी आधीन रहते थे। अच्युत कुल का प्रेमपण दोनों भक्कों का, जैसा भगवान् ने श्रीमुख से कहा है कि "मेरे भक्त को मुझसे अधिक माने," इसी प्रकार एक रस निबह गया। (७३७) टीका । कवित्त । (१०६) रहे गुरुभाई दोऊ, भाई साधुसेवा हिये, ऐसे सुखदाई, नई रीति लै चलाइये । जायें जा महोछी मै बुछाए हुलसाए अंग संग गाड़ी सामा सो भंडारी दै मिलाइयै ।। याको तातपर्य सत घटती न सही जात, वात वे न जाने, सुखमानै मन भाइयै । बड़े गुरु सिद्ध जग महिमा प्रसिद्ध, चोले बिनै कर जोरिसोई कहिके सुना- इये ॥ ५८१॥ (४६) CaseeMCCORRECK । ॐ भक्तिसुधास्वाद तिलक। ८५३ वार्तिक तिलक। दोनों गुरुबन्धुओं के हृदय में संतसेवा की बड़ी प्रीति थी; सज्जन ऐसे सुखदाता थे कि दोनों ने मिलके एक नवीन उत्तम रीति चलाई । जहां संतसेवा महोत्सव में बुलाये जाते, वहां अति आनन्दपूर्वक घर से घृत आटा आदिक सामग्री गाड़ी में भर ले जाके चुपचाप भंडारी कोठारी को दे, उनकी सामग्री में मिलवा देते थे । इसका तात्पर्य यह कि जिसमें कहीं सामग्री घटने से सज्जनों की निन्दा न हो। इस बात को उत्सव-करनेवाले नहीं जानते थे । जब सामग्री पूर्ण होजाय तव सुखं मानते थे। दोनों गुरुभाइयों के श्रीगुरुं स्वामी जगत् में प्रसिद्ध महिमायुक्त सिद्ध थे; उनसे दोनों हाथ जोड़ आप दोनों ने विनय सुनाये, कि- (७३८ ) टीका | कवित्त । (१०५) वाहत महोछौ कियो हुलसत हियो नित, लियो सुनि बोले "करौ गिदै तियारियै ।" चहूंदिशि डास्यो नीर, कस्यौ न्योती ऐसे धीर, पावै बहु भीर संत, ठौरनि संवारियै ॥ आए हरिप्यारे चारौ खूटतें निहारे नैन, जाय पगुधारे सीस बिनैले, उचारिये । भोजन कराय दिन पांच लगि छाय रहे पट पहिराय सुख दियो अति भारिये ॥ ५८२ ॥ (४८) वार्तिक तिलक। "हे नाथ ! संत महोत्सव करने के लिये हृदय में नित्य हुलास होता है ।" सुनकर स्वामीजी ने कहा कि "अच्छा है, शीघ्र जुटाव बनाव करो। संतों का नेवता हम यहां ही से किये देते हैं।" ऐसा कह जल लेकर चारों दिशाओं में डाल दिया । ऐसे धीर समर्थ थे कि सब संतों के यहां नेवता पहुँच गया। आपने आज्ञा दी कि "संतों की बड़ी भीड़ आवेगी रहने के लिये छाया ठौर वनाओ।" ऐसा ही किया। चारों खूट से हरिप्यारे संत आविराजे, दोनों भाइयों ने नेत्रों से दर्शन प्रणाम कर, श्रीगुरुचरणों में सीस नवाके विनय सुनाया कि “महाराज ! संत तो बहुत आये, सामग्री इतनी कहां है ? " श्रीगुरुने श्राज्ञा की कि "जितना मनमाने उतना *"तयारिय"--:'sb = तयारी वनाव, जुटाव ॥

८५४ श्रीभक्रमाल सटीक। . M सुख दिया। दो, घटेगा नहीं, देनेहारे प्रभु समर्थ हैं।" आज्ञा सुन, सुखीहो, भोजन कराके, पांच दिन तक सत्कार किये, फिर संतों को वस्त्रादिक पहिनाके बड़ा भारी (७३६) दीका । कवित्त । (१०४) आज्ञा गुरु दई “भोर श्रावो फिरि आसपास, महासुखरासि नामदेव जू' निहारियै । उज्ज्वल वसन तन एक ले प्रसन्न मन, चले जांत चेगि सीस पांयनि धारियै ।। वेई देवताय 'श्रीकवीर' अति धीर साधु, चेले दोऊ भाई परदक्षिना बिचारियै । प्रथम निरखि "नाम" हरखि लपटि पग लगि रहे छोड़त न बोले सुनो धारिये ॥ ५८३॥ (४७) वानिक तिलक। श्रीगुरुदेवजी ने दोनों शिष्यों को आज्ञा दी कि "बड़े प्रभात इस संतशालाकी प्रदक्षिणा करना; उज्ज्वल वस्त्र धारण किये अकेले प्रसन्न मन चले जाते हुए महासुखराशि श्रीनामदेवजी का दर्शन तुमको होगा, शीघही चरणों में सीस रख प्रणाम करना, फिर श्री. नामदेवजी ही परम धीर साधु श्रीकबीरजी का दर्शन करादेंगे।" आज्ञा सुन दोनोंभाई परिक्रमाको चले। पहिले श्रीनामदेवजीका दर्शन पा हर्षित हो चरणों में लिपटगये,छोड़ते न थे,नव श्रीनामदेवजी ने कहा कि “अव चरण छोड़के हमारा वचन सुनो।" (७४०) टीका | कवित्त । (१०३) साधु "अपराध जहाँ होत तहां प्रावत न, होय सनमान सब संत तोही आइये । देखि प्रीति रीति हम निपट प्रसन्न भए," लये उर लाय "जावौ श्रीकवीर पाइयै ॥” आगें जो निहारें भक्तराज हग धारें चली बोले हसि आप "कोऊ मिल्यो सुखदाइयै ?" कह्यो "हां जू," मान दई भई कृपा पूरन यों, सेवाको प्रताप कहाँ कहां लगि गाइयै ॥ ५८४॥ (४६) वात्तिक तिलक । "सुनो, जहां साधुवों का अपराध होता है वहां हम नहीं आते, और जहां सब संतों का सम्मान होता है तहां ही हम आते हैं; , , k भकिसुधास्वाद तिलक । तुम्हारी प्रीति रीति देख हम प्रसन्न हुए," ऐसा कह दोनों को हृदयमें लगा आज्ञा दी कि "जाओ भागेश्रीकवीरजीको पाओगे।" दोनों भक्त चलके देखें तो भक्तराज श्रीकवीरजी चले जाते हैं, चरणों में पड़ गये, नेत्रों से जलकी धारा चलने लगी । श्रीकबीरजी ने हँसके पूछा कि 'कोई और सुखदाई संत अर्थात् नामदेवजी तुमको मिले हैं ?" भक्तों ने उत्तर दिया कि "हां महाराज मिले।" उसी प्रकार श्रीकबीरजी ने भी दोनों को कृपा से मान दिया। इस प्रकार श्रीगुरु और संतों की पूर्ण कृपा पा, भगवत् प्राप्ति के अधिकारी हुये ॥ कहिये, संतसेवा का प्रताप कैसे कोई कह सक्ता है ?" दो० "जिन जिन भक्तनि प्रीति की, ताके बस भए नि । सैन होइ नृप टहल किय, नामा (नामदेव) छाई छानि ॥१॥" "जगत बिदित पीपा, धना, अरु रैदास, कवीर । महाधीर, दृढ़ एक रस, भरेभक्ति गम्भीर ॥ २ ॥" (७८१) छप्पय । (१०२) कील्ह कृपा कीरति विशद, परम पारषद सिष प्रगट ॥ आसकरने रिषिराज, रूप,भगवान, भक्तगुर। चतुरदासँ जग अभै छाप, छीतर जु चतुर वर ॥ लाखै अद्भुत, रायमलँ खेम मनसा क्रम वाचा। रसिक राय- मल, गौरं देवा दामोदर हरिरँग राचा ॥ सबै सुमंगल दास दृढ़,धर्म धुरंधर भजन भट। कील्ह कृपा कीरति विशद, परम पारषद सिष प्रगट॥१५८ ॥ (५६) वार्तिक तिलक। श्रीगुरु कोल्हदेवजी की कृपासे सब शिष्य श्रीसीतारामजी के परम पारषद उज्ज्वल कीर्तिवाले प्रगट हुये ॥ (१) श्रीमासकरनजी राजर्पि। (१३) श्रीरूपदासजी, श्रीभगवानदासजी परम गुरु भक॥ bruary ८५६ श्रीभकमाल सटीक। (४) श्रीचतुरदासजी ने जगत् में अभै छाप पाया ॥ (५६) श्रीछीतरजी अतिशय चतुर; श्रीलाखैजी बड़े अद्भुत ॥ (७ श्रीरायमलजी मन वचन कर्म से क्षेम (मंगल ) युक्त । (18।१०।११) श्रीरसिकरायमलजी, श्रीगौरदासजी, श्रीदेवा- दासजी, श्रीदामोदरजी, श्रीहरि के प्रेम रंग में रंग गये ॥ ये सब परम मंगलरूप श्रीरामदासत्व में दृढ़, धर्मधुरंधर, श्री. सीताराम भजन के सुभट हुये ॥ (१६२) श्रीनाथभट्टजी। (७४२) छप्पय । ( २०१) रसरास उपासक भक्तराज, "नाथभट्ट" निर्मल बयन ॥आगम निगम पुरान सारशास्त्रनिजुविचारयौ। ज्यौं पारौ दै पुटहिं सबनि को सार उधाखौ ॥ श्रीरूप सनातन जीव भट्ट नारायन भाख्यौ । सो सर्वस उर सांचि जतन करि नीके राख्यौ ॥ फनी वंश गोपाल सुव, रागा अनुगा को अयन । रसरास उपासक भक्त- राज, "नाथभट्ट" निर्मल क्यन ।। १५६ ॥ (५५) बार्तिक तिलक । "रसरास" (शृंगार रस) के उपासक भक्तराज श्रीनाथभट्टजी निर्मल वचन बोलनेवाले थे। आगम और निगम पुराण सत शास्त्रों को विचार के सबोंका सारांश निकाल के जैसे पारा में औपधियों का पुट देकर सिद्ध रसायन बना लेते हैं ऐसे ही आपने रसायन कर लिया। जो श्रीरूप सनातनजी ने तथा श्रीनारायणभट्टजी ने प्रेम- भक्ति प्रतिपादन कथन किया था, सो सर्वस्व भले प्रकार यत्न से अपने हृदय में संचित कर रक्खा । फ; उत्पन्न ऊंचेगाँव ८५७ ANSAR भकिसुधास्वाद तिलक। वाले के पुत्र गोपालदासजी के पुत्र नाथभट्ट जी रागाऽनुगा भक्ति के स्थान ही हुये ॥ Cशृङ्गाररस को "रसराशि" इस लिये कहा करते हैं कि इसमें पांचो रसों की राशि होती है अर्थात् इस रस के उपासक में सब रसों की बातें इक्ट्ठी ही पाई जाती हैं । (१९३) श्रीकरमैतीजी। (७४३) छप्पय । (१००) कठिन काल कलिजुग्ग में, “करमैती" निःकलंक रही॥ नस्वर पति रति त्यागि, कृष्णपद सो रति जोरी । सबै जगत की फांसितरकि, तिनुकाज्यों तोरी॥ निर्मल कुल कांथड्या धनि परसा जिहिं जाई। विदित वृन्दावन बास संत मुख करत बड़ाई ॥ संसारस्वाद- मुख बांत करि, फेर नहीं तिन तन चहीं । कठिन काल कलिजुग्ग में, “करमैती"निःकलंकरही॥१६०॥(५४) दो० सवै कहत"हम रामके", सवहिं आस, पिय ! तोरि । मैं बिनवौं पिय ! तुम कहो, "रूपकला है मोरि ॥" वार्तिक तिलक । कलियुग ऐसे कठिन काल में जन्म लेकर श्रीकरमैतीजी कलि- युग के अघों से वची और निष्कलंक ही रहीं । संसारी मिथ्या पति की रति को त्यागकर,श्रीकृष्ण चरणों में दृढ़ रति की।" वसी श्याम मूरति हिये वादयो प्रेम अपार।" जगत्के सव संबंधियों की प्रीतिरूपी फांसी तर्ककर, तृणसमान तोड्डाली । निर्मल "काथड्या" कुलधन्य है और पिना "परशुरामजी" धन्य है कि जिनके ऐसी हरिभक्का पुत्री उत्पन्न हुई । विख्यात घृन्दावनवास किया, जिसकी बड़ाई सव संत अपने मुख से करते थे, संसारस्वाद विषयसुख को वमन करके, फिर उन सुखों की ओर देखा भी नहीं। RCRACKKRckc*cker RACK अकअप श्रीभक्रमाल सटीक। ८५८ .. . (७४४) टीका | कवित्त । (86) शेषावति नृपके पुरोहित की बेटी जानौ, वास है खड़ेला करमैती जो बखानिये । बस्यो उर श्याम, अभिराम कोटि काम हूं ते, भूले धाम काम सेवा मानसी पिछानिये ॥ बीत जात जाम तन वाम अनुकूल भयो, फूलि फूलि अंग गति मति छवि सानिये । आयौ पति गौनौ लैन, भायो पितु मातु हिये, लिये चित चाव पट अाभरन आनियै ॥ ५८५ ॥ (४५) वार्त्तिक तिलक । शेपावति नगर के राजा के पुरोहित खड़ेला के रहनेवाले श्री. परशुरामजी की कन्या श्रीकरमैतीजी को जानिये ॥ कोटानि काम से अधिक अभिराम श्यामसुन्दर ने आपके हृदय में निवास किया; इससे गृह के कामों को भूल, केवल मानसी पूजा करने लगीं। सेवा करते करते पहर के पहर चीत जाते थे; यद्यपि देह तो कुटिल स्त्री जाति का था, तथापि प्रभुकृपा से अति अनुकूल होगया । अंग अंग से प्रफुल्लित हो आपने अपनी मति की गति को श्रीकृष्ण छवि में मिला दिया । जिससमय पति गवनालेने पाया उस समय माता पिताको बहुत प्रसन्नता हुई;बड़े आनन्दसे वस्त्र भूषणमादि सव साज प्रस्तुत किये। (७४५) टीका | कवित्त । (६) पस्यौ सोच भारी कहा कीजियै विचारी, "हाड़ चाम सों सँवारी देह रति के न काम की। तातें देवी त्यागि मन ! सोवै जनि, जाग अरे, मिटै उर दाग*एक सांची प्रीति स्याम की ॥ लाज कौनकाज ? जौ चाहै नजराज सुत, बड़ौई अकाज, जौपे करै सुधि धाम की। जानी भोर गौनो होत, सानी अनुराग रंग, संग एक वहीं, चली भीजी मति वाम की ॥ ५८६॥(४४) वार्तिक तिलक। श्रीकरमतीजी को बड़ा भारी सोच पड़ा विचार करने लगी कि "अब क्या करूं? इस पुरुष की देह हाड़ मास चाम से बनाई, प्रीति 'दाम" =ES - चिह्न, कलंवित चिह्न ॥ CHHALEGRECE жексенське ८५.६ **มา भक्निसुधास्वाद तिलक । करने के योग्य नहीं; इससे इसे त्याग देना चाहिये । हेमन ! तू सोवै मत, मोहनींद से जाग के सच्ची प्रीति एक श्रीश्याम की कर, जिससे हृदय की मलीनता मिटजाय; जो श्रीब्रजराजनन्दसुत को चाहै तो लाज मत कर; जो घर की सुधि करेगा तो वड़ाही अकाज होगा।" मन को ऐसे समझाकर जिस दिन के प्रभात में गौना होना था उसी रात्रि में अनुराग रंग से पगी, मति को प्रेम में भिगाकर, अकेले एक प्रभु ही का ध्यान साथ ले, आप चल दीं ॥ ( ७४६ ) टीका । कवित्त । (६७) आधी निसि निकसी यो बसी हिये मूरति सो, पूरति सनेह तन सुधि बिसराई है। भोर भये सोर पस्यौ, पस्यौ पितुमातुसोच, कस्यौ लै जतन ठौर ठौर ढूंढ़ि आई है ॥ चारों ओर दौरे नर, आये ढिग दुरि जानि, ऊंट के करंक मध्य देह जा दुराई है । जग दुरगंध कोऊ ऐसीबुरी लागी, जामें वह दुरगंघसोसुगंधसी सुहाई है ॥५८७(४३) वातिक तिलक । आधी रात को निकलकर चल दीं। वही साँवली भूरति हृदय में वसी,स्नेहको पूर्ण करती और उसीने शरीरकी सुधि भुला दी।प्रभात होने पर बड़ा कुलाहल पड़ा; माता पिता अत्यन्त सोचकर यत्न से ठौर २ ढूंढ़ आये, और बहुतसे लोगोंको चारों ओर ढूंढनेको दौड़ाए ॥ श्रीकरमैतीजी ने जाना कि ढूंढ़नेवाले लोग समीप आगये, तब, एक मरे ऊंट के करंक को सिआरों ने खोल डाला था उसी में घुस: कर छिप गई । देखिये, आपको जगत् के पापों की दुर्गंधि इतनी दुःसह लगी कि आपने उसके सामने उस करंक की दुर्गधि को सुगंध के सम मान लिया। (७४७) टीका । कवित्त । (१६) बीते दिन तीन वा करंक ही मै संक नहीं,बंक प्रीति रीति यह कैसें करि गाइयै । आयो कोऊ संग, ताही संग गंग तीर आई, तहां सो अन्हाई दै भूपन वन आइयै ॥ ढूंढ़त परसराम पिता मधुपुरी आये, पते लै बताये जाय मथुरा मिलाइयै । सघन विपिन ब्रह्मकुंडपर, वर एक, चढि करि, देखी, भूमि अँसुवा भिंजाइयै ॥ ५८८ ॥ (४२) CHECHECRECRUCkACerest .

. . CE FE भक्तिसुधास्वाद तिलक। ८६१ सवैया । "रामहै मातु, पिता, सुत,वन्धु, औ संगि, सखा, गुरु, स्वामी, सनेही। रामकी सौं हैं, भरोसो है राम को, समरँगी रुचि, राचौ न केही॥ जीवत राम, मुए पुनि राम, सदा रघुनाथहि की गति जेही । सोई जियै जग में तुलसी, नतु डोलत और मुए धरि देही ॥१॥" (७४६ ) टीका | कवित्त । (६४) कही तुम कटी नाक, कटै जोपै होय कहूं, नाक एक भनि, नाक लोक में न पाइयै । बरस पचास लगि विषैही में बास किया, तऊ न उदासभय चवेकों चबाइयै॥ देखे सव भोगमैं न देखे,एक देखे श्याम, तातें तजि काम तन सेवा में लगाइयै । एततें ज्यौं प्रात होत, ऐसे तम जातभयो, दयो लै सरूप प्रभु, गयो, हिये आइयौ। ५६ ०॥(१०) वार्तिक तिलक। और, "जो तुमने कहा कि मेरी नाक कटगई सो विना विचार का वचन है क्योंकि कटै तो तब जो कहीं नाक हो भी तो सही? नाक तो एक भगवद्भक्ति ही है, सो भक्ति के विना इस लोक में और स्वर्गलोक में जितने जीव हैं वे सव नकटे ही हैं। विचार करो कि पचास वर्ष तक तुमने विषय भोग किया, तथापि उससे उदास न हुये, चबाए हुए ही को चबाते हो, अर्थात् जैसे पशु एकवेर घास को चबाके लील जाता है उसीको फिर पागुर करके चबाता है, ऐसे ही संसारी लोग कार्य एक बेर कर फिर उसीको अनुमोदन चिन्तवन करते हैं। देखो मैंने सव भोगों की ओर देखते भी नहीं देखा, एक श्यामही की ओर देखा। इससे तुम भी सब काम भोग को तज तन मन को हरिभजन में लगाओ ॥ "बहु विधि वचन कठोर कहि, सबै निरादर करो किनि। वृन्दा-1 चनको छोड़िये, यह आओ मन भूलि जिनि॥" ऐसा श्रीकरमैतीजी का उपदेश सुन, जैसे प्रभात होते रात्रि चली जाती हैं ऐसे ही परशुरामजीका तम अज्ञान चलागया; श्रीकरमैतीजी ने एक शालि. ग्राम स्वरूप दिया, सो लेकर घरको चले गये,श्रीकरमैतीजी के वचन हृदय में धारण किये रहे। CROSECRECRUS Rececreaction ॐ ८६० नाम श्रीभक्तमाल सटीक । . . , वार्तिक तिलक। उसी खाकर (करंक)ही में बैठे तीन दिन बीत गये मनमें कुछ भी शंका नहीं। यह बांकी प्रीति की रीति किस प्रकार गान हो सकती है ? चौथे दिन कोई श्रीगंगा को जाता था उसीके साथ आकर गंगा में स्नानकर, अपने सब भूषण दान दे, वृन्दावन में चली आई। हरि स्मरण में मग्न रहती थीं। पीछे, आपके पिता परशुरामजी ढूंढ़ते २ मथुराजी में आये; और मथुरियों से पता पाकर उनको साथ में ले सघन वन ब्रह्म कुंड के समीप एक वट के वृक्षपर चढ़, श्रीकरमैतीजी को देख उन्होंने आंसुओं से भूमि को भिगा दिया। (७४८) टीका | कवित्त । (६५) उतरि के आय रोय पाय लपटाय गयो, “कटी मेरी नाक जग मुख न दिखाइये। चलौ गृह वास करौ लोक उपहास मिटे, सासु घर जावो मत, सेवा चितलाइयै ॥ कोऊ सिंह व्याघ्र अजू वपुकों बिनास करे, त्रास मेरे होत, फिरि मृतक जिवाइये।" बोली "कही सांच बिन भनि तन ऐसो जानो जौपै जियो चाहौ, करौ प्रीति, जस गाइये" ॥ ५८६ ॥ (४१) वार्तिक तिलक। परशुराम वृक्ष से उतर के रोते हुये श्रीकरमैतीजी के पास पहुँच चरणों में लपटकर कहनेलगे कि "बेटी! तुम्हारे चले आनेसे संसारमें मेरी नाक कटगई; मैं लज्जा से किसीको मुख नहीं दिखाता। तुम चलो अपने घरमें निवास करो, लोककी उपहास मिटै, ससुराल मत जाओ, घरही में चित्त लगा के भजन पूजा करो, यहां वनमें कोई सिंह व्याघ्र खाजाय, तो मुझे बड़ा दुःख होगा, तुम्हारी माता और मैं मृतकप्राय हूं, सो फिर चलकर दोनोंको जिलाओ॥" आपने उत्तर दिया कि "सत्य कहते हो, भक्ति के विना शरीर को मृतक ही जानो, जो जिया चाहो, तो श्रीप्रभु के पद में प्रीति कर, श्रीनाम यश को गान करो॥" KOREGREECRE ॐ भकिसुधास्वाद तिलक। सवैया । "रामहै मातु, पिता, सुत,बन्धु, औ संगि, सखा, गुरु, स्वामी, सनेही। रामकी सौं हैं, भरोसो है राम को, रामरँगी रुचि, राचौ न केही ॥ जीवत राम, मुए पुनि राम, सदा रघुनाथहि की गति जेही। सोई जिये जग में तुलसी, नतु डोलत और मुए धरि देही ॥१॥" (७४६ ) टीका | कवित्त । (६४) कही तुम कटी नाक, कटै जोपै होय कहूं, नाक एक भनि, नाक लोक में न पाइयै । बरस पचास लगि विषही में वास कियौ, तऊन उदासभये चचेकों चवाइयै॥ देखे सव भोगमैं न देखे,एक देखे श्याम, तातें तजि काम तन सेवा में लगाइयै । एततें ज्यौं प्रात होत, ऐसे तम जातभयौ, दयो लै सरूप प्रभु, गयो, हिये आइयै॥ ५६०॥(४०) वार्तिक तिलक । और, "जो तुमने कहा कि मेरी नाक कटगई सो विना विचार का वचन है क्योंकि कटै तो तब जो कहीं नाक हो भी तो सही? नाक तो एक भगवद्भकि ही है, सो भक्ति के विना इस लोक में और स्वर्गलोक में जितने जीव हैं वे सब नकटे ही हैं। विचार करो कि पचास वर्ष तक तुमने विषय भोग किया, तथापि उससे उदास न हुये, चवाए हुए ही को चबाते हो, अर्थात् जैसे पशु एकवेर घास को चबाके लील जाता है उसीको फिर पागुर करके चबाता है, ऐसे ही संसारी लोग कार्य एक वेर कर फिर उसीको अनुमोदन चिन्तवन करते हैं। देखो मैंने सब भोगों की ओर देखते भी नहीं देखा, एक श्यामही की ओर देखा । इससे तुम भी सब काम भोग को तज तन मन को हरिभजन में लगाओ॥ विधि बचन कठोर कहि, सबै निरादर करो किनि । वृन्दा-3 बनको छोड़िये, यह आओ मन भूलि जिनि॥" ऐसा श्रीकरमैतीजी का उपदेश सुन, जैसे प्रभात होते रात्रि चली जाती है ऐसे ही परशुरामजीका तम अज्ञान चलागया; श्रीकरमैतीजी ने एक शालि. ग्राम स्वरूप दिया, सो लेकर घरको चले गये,श्रीकरमैतीजी के वचन हृदय में धारण किये रहे। RestocketChecRUGIUIGAURecke ii . . .

अHAHR श्रीभक्तमाल सटीक। ८६० वार्तिक तिलक। उसी खाकर (करंक)ही में बैठे तीन दिन बीत गये मन में कुछ भी शंका नहीं। यह वांकी प्रीति की रीति किस प्रकार गान हो सकती है ? चौथे दिन कोई श्रीगंगा को जाता था उसीके साथ आकर गंगा में स्नानकर, अपने सब भूषण दान दे, वृन्दावन में चली आईं। हरि स्मरण में मग्न रहती थीं ॥ पीछे, आपके पिता परशुरामजी ढूंढ़ते २ मथुराजी में आये; और मथुरियों से पता पाकर उनको साथ में ले सघन वन ब्रह्म कुंड के समीप एक वट के वृक्षपर चढ़, श्रीकरमैतीजी को देख उन्होंने आंसुओं से भूमि को भिगा दिया । (७४८) टीका । कवित्त । (६५) उतरि के आय रोय पांय लपटाय गयो, “कटी मेरी नाक जग मुख न दिखाइये। चलो गृह वास करौ लोक उपहास मिटै, सासु घर जावो मत, सेवा चितलाइये ॥ कोऊ सिंह व्याघ्र अजू वपुकों विनास करे, त्रास मेरे होत, फिरि मृतक जिवाइये ।” बोली "कही सांच बिन भनि तन ऐसो जानो जौपै जियो चाही, करौ प्रीति, जस गाइये" ॥ ५८६ ॥ (४१) वार्तिक तिलक। परशुराम वृक्ष से उतर के रोते हुये श्रीकरमैतीजी के पास 'पहुँच चरणों में लपटकर कहनेलगे कि “वेटी! तुम्हारे चले आनेसे संसारमें मेरी नाक कटगई; मैं लज्जा से किसीको मुख नहीं दिखाता । तुम चलो अपने घरमें निवास करो, लोककी उपहास मिटै, ससुराल मत जाओ, घरही में चित्त लगा के भजन पूजा करो, यहां वनमें कोई सिंह व्याघ्र खाजाय, तो मुझे बड़ा दुःख होगा, तुम्हारी माता और मैं मृतकप्राय हूं, सो फिर चलकर दोनोंको जिलाओ॥" आपने उत्तर दिया कि "सत्य कहते हो, भक्ति के विना शरीर को मृतक ही जानो, जो जिया चाहो, तो श्रीप्रभु के पद में प्रीति कर, श्रीनाम यश को गान करो।" RECGLEGE RECRUI .

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PECIAL भकिसुधास्वाद तिलक। सर्वया । "रामहै मातु, पिता, सुत,वन्धु, औ संगि, सखा, गुरु, स्वामी, सनेही। रामकी सौं हैं, भरोसो है राम को, रामरंगी रुचि, राचौ न केही॥ जीवत राम, मुए पुनि राम, सदा रघुनाथहि की गति जेही। सोई जिये जग में तुलसी, नतु डोलत और मुए धरि देही ॥१॥" (७४६ ) टीका । कवित्त । (६४) कही तुम कटी नाक, कटै जोपै होय कहूं, नाक एक भनि, नाक लोक में न पाइयै । बरस पचास लगि विही में वास कियो, तऊ न उदासभये चवेकों चवाइयै॥ देखे सव भोगमैं न देखे,एक देखे श्याम, तातें तजि काम तन सेवा में लगाइयै । एततें ज्यों प्रात होत, ऐसे तम जातभयो, दयो लै सरूप प्रभु, गयो, हिये भाइयै॥ ५६०॥(४०) वार्तिक तिलक। और, "जो तुमने कहा कि मेरी नाक कटगई सो विना विचार का वचन है क्योंकि कटे तो तब जो कहीं नाक हो भी तो सही? नाक तो एक भगवद्भक्ति ही है, सो भक्ति के विना इस लोक में और स्वर्गलोक में जितने जीव हैं वे सब नकटे ही हैं। विचार करो कि पचास वर्ष तक तुमने विषय भोग किया, तथापि उससे उदास न हुये, चवाए हुए ही को चवाते हो, अर्थात् जैसे पशु एकवेर घास को चबाके लील जाता है उसीको फिर पागुर करके चबाता है, ऐसे ही संसारी लोग कार्य एक बेर कर फिर उसीको अनुमोदन चिन्तवन करते हैं। देखो मैंने सब भोगों की ओर देखते भी नहीं देखा, एक श्यामही की ओर देखा। इससे तुम भी सब काम भोग को तज तन मन को हरिभजन में लगायो॥ "वहु विधि बचन कठोर कहि, सबै निरादर करो किनि। वृन्दा- ४ वनको छांद्रिये, यह शानो मन भलि जिनि ॥" ऐसा श्रीकरमैतीजी का उपदेश सुन, जैसे प्रभात होते रात्रि चली जाती है ऐसे ही परशुरामजीका तम अज्ञान चलागया; श्रीकरमैतीजी ने एक शालि- ग्राम स्वरूप दिया, सो लेकर घरको चले गये,श्रीकरमैतीजी के वचन हृदय में धारण किये रहे ।। RRCESSECRECIESicketeracterised Kuwrector .

RNORॐ श्रीभकमाल सटीक। ८६२ (७५०) टीका । कवित्त । (६३) आयें निसि घर, हरिसेवा पधराय, चाय मन को लगाय, वही टहल सुहाई है। कहूं जात आरत न भावत मिलाप कहूं, आप नृप पूछे द्विज कहाँ ? सुधि आई है ॥ बोल्पो कोऊ जन धाम स्याम संग पागे, सुनि अति अनुरागे,'बेगि खबर मँगाई है। कही तुम जाय "ईश इहांई असीस करौं," कही भूप आयो, हिये चाह उपजाई है ॥ ५६१ ॥ (३६) वार्तिक तिलक। परशुरामजी रात्रि में अपने घर आये, और श्रीहरिसेवास्वरूप पधराके उत्साह से मनको लगाकर पूजा टहल भजन करनेलगे, किसी का मिलाप अच्छा नहीं लगता, इससे कहीं भी नहीं जातेपाते थे। एक दिन राजा ने स्मृति कर लोगों से पूछा कि "बहुत दिन हुये ब्राह्मण परशुरामजी यहां नहीं आये कहां हैं ?" किसी ने कहा कि " श्रीवृन्दावन से आ, अब अपने घर ही में प्रेम से पगे भगवद्गजन करते हैं ।" सुनके राजा को अनुराग हुआ; शीघही मनुष्य को भेजकर कहवाया कि "हम दर्शन किया चाहते हैं।" श्रीपरशुरामजी ने उत्तर कहला भेजा कि "मैं राजाजी को यहां ही से आशीर्वाद देता हूं, मनुष्य तन पाकर जिस राजा की सेवा करनी चाहिये उसीकी कर रहा हूँ।" उसने आकर कहा । सुनकर राजा को दर्शनों की प्रीति चाह उत्पन्न हुई। दो० "जो मन से भासा गई, योगी गुरु जगदास । नृप गुरु निश्चय जानिये, जब मन में नृप आस ॥ १॥" चौपाई। "जिनके नयन सन्त नहिं देखा। लोचन मोरपंख के लेखा ॥२॥" दो० "सन्त दरस को जाइये, तजि पालत अभिमान । ज्यों ज्यों पग आगे पढ़ें, उतने यज्ञ समान ॥३॥" (७५१) टीका | कवित्त । (६२) देखी नृप प्रीति रीति, पूछी, सब बात कही, नैन अश्रुपात, वह रँगी श्याम रंग मैं।" वरजत आयो "जायके लिवाय SELECR-CHCHECKkMeacticekECRECRACY भक्तिसुधास्वाद तिलक। ८६३ ल्याऊँ पाऊँ जौ भाग मेरे" बढ़ी चाह अंग मैं ॥ कालिन्दी के तीर ठाढ़ी. नीर दृग, भूप लखी, रूप कछु औरै, कहा कहै वे उमंग मैं । कियो मने लाख बैर ऐपै अभिलाष राजा कीनी कुटी, आए देस, भीजें सो प्रसंग मैं ॥ ५६२ ॥ (३८) वार्तिक तिलक । आकर परशुरामजी की प्रीति देख, राजाने भक्ति होने का हेतु पूछा । आप श्रीकरमैतीजी का सव वृत्तान्त सुना के नेत्रों में आंसू भैर कहने लगे कि "वह तो श्यामसुन्दर के रंग में रंग गई।" राजा ने कहा कि "मैं जाता हूं लिवा लाऊँगा।" आपने कहा कि "महा- राज ! आप मत जाइये, वह नहीं आवैगी॥" तथापि राजा ने उत्तर दिया कि मैं जाता हूं जो दर्शन पाऊँ और लिवा लाऊँ तो मेरा बड़ा भाग्य उदय हो ।” प्रीति चाह के अधि- कता से श्रीवृन्दावन में आकर देखें तो श्रीयमुनाजी के तीर में खड़ी नेत्रों में प्रेम जल भरके प्रभु का चिन्तवन कर रही हैं । राजा ने प्रणाम कर रूप अवलोकन किया तो कुछ और ही अकथनीय अनुराग के उमंग की प्रभा चमक रही है । राजाने चलने की प्रार्थना की; आपने अभियुक्त उत्तर दे दिया । तव यहां ही कुटी बनाने को विनय किया। आपने तव भी वारंवार निषेध किया । तथापि राजा ने ब्रह्मकुण्ड के पास एक कुटी वनवा ही दी । सो अवतक उपस्थित है। फिर राजा श्रीकरमैतीजी के दर्शन प्रेम से भीज देश में आकर भक्ति में तत्पर हुआ ॥ ( १९४) श्रीखगसेनजी कायस्थ । (७५२) छप्पय । (६१) गोविंदचंद गुन ग्रथनको “खर्गसेन' वानी विसद ॥ गोपी ग्वाल पितु मातु नाम निरनै कियौ भारी।दान केलि दीपक प्रचुर अति बुद्धि उचारी ॥ सखा सखी गोपाल, काल लीला में वितयौ। कायथकुल उद्धार *CRECGC ।

NRN ८६४ श्रीभक्तमाल सटीक। भक्ति दृढ़ अनत न चितयौ ॥ “गौतमी तंत्र" तंत्र" उर ध्यान धरि, तन त्याग्यो मंडल सरद । गोविन्दचंद गुन ग्रथन को "खर्गसेन” बानी विसद ॥ १६१॥ (५३) वार्तिक तिलक। श्रीगोविन्दचन्द्रजी के गुणों को ग्रथित करने के लिये "खर्गसेन (खड्गसेन )" जी की बानी बड़ीही उज्ज्वल थी। गोपिका और ग्वालों के माता पिताओं के नाम ग्रथों से दूढ़ २ कर एक ग्रंथ वनाया, और दानकेलि लीला, दीपमालिका चरित्र, बड़ी बुद्धिमानी से रचना किया। श्रीगोपालजी और उनके सखा सखियों की लीला वर्णनही में अपना सम्पूर्ण काल बिताया। जातिके कायस्थ, अपने कुलका उद्धार करनेवाले, दृढ़ भक्तिको छोड़ आपने किसी ओर देखाभी नहीं। "गौतमी तंत्र" की रीति से ध्यान धर, शरद रासमंडल में, देह को तज नित्य रासमंडल में प्राप्त हुये ॥ दो. "खरगसेन के प्रेम की बात कही नहिं जात लिखत ललित लीला करत, गए प्रान तजि गात ॥" (७५३ ) टीका । कवित्त । (-) ग्वालियर वास, सदा रास को समाज करें, सरद उजारी, अति रंग चढ़यौ भारी है । भावकी बढ़नि दृगरूप की चढ़नि ततथेई की रढनि जोरी सुन्दर निहारी है ॥ खेलत में जाय मिले त्यागि तन भावना सो झेलत अपार सुख, रीझि देहवारी है । प्रेमकी सचाई ताकी रीति लै दिखाई, भई भावकनि सरसाई, बात लागी प्यारी ॥ ५६३॥ (३७) वार्तिक तिलक। कहते हैं कि ये श्रीहितहरिवंशजी के संप्रदायभुक्त थे । श्राप ग्वालियर में बसते सदा रासका समाज करतेथे। एक समय शरद उजारी में रास होता था उसमें प्रेमरंग बहुत बढ़गया नृत्य में परस्पर भाव की बढ़न नेत्रों में रूप की चढ़न युक्न "ताताई" आदि गान करनेवाली श्यामा श्यामकी सुन्दर जोड़ी को निरख .

ॐॐॐRTHI भक्तिसुधास्वाद तिलक भावनासे मिलके, अपार सुख को प्राप्त हो, रीझके देहको नेवछावर कर, तज, नित्यकेलि में जा मिले ॥ दो०"चदिकै काम तुरंग पर, चलियो पावक माहि । प्रेमपंथ अतिशय कठिन, सब कोउ निवहत नाहि ॥१॥" यह प्रेमकी सचाई की रीति दिखाई दी, जिसको देख सुनके भावुकों के मन में अनि सरसता हुई। यह बात मुझे बड़ी ही प्यारी लगी॥ (१६५) श्रीगंगग्वालजी। (७५४) छप्पय । (८६) सखा श्याम मनभावतौ, “गंगग्वाल" गंभीर मति ॥ स्यामाजूकी सखी नाम आगम विधि पायौ। ग्वाल गाय ब्रजगांव टथक नीके करि गायौ॥ कृष्ण केलि मुखसिंधु अघट उर अंतर धरई।ता रसमें नित मगन असद आलाप न करई ॥ व्रजवासास, "ब्रज- नाथ"गुरु भक्त,चरण रज अननि गति।सखा श्याम मनभावतो, "गंगग्वाल" गंभीरमति ॥ १६२॥(५२) वार्तिक तिलक । "पियप्यारी को जस कह्यौ, रागरङ्ग सों गाइ॥" श्रीश्यामसुन्दरजी के मनभावते सखा श्रीगंगग्वालजी बड़ी गंभीर बुद्धिवाले थे। श्रीराधिकाजी की सखियों के नाम आगम ग्रंथों से खोजके, और गायों के नाम, ब्रजग्रामों के नाम, पृथक २ आपने भले प्रकार गान किये। श्रीकृष्णचन्द्रजी की केलिसुखसिंधु एकरस हृदय के अन्तर धारण कर उसीके रसमें सदा निमग्न रहते असत वाती कभी नहीं करते थे। श्रीवज में वसके, वजराज ही की आशा रखते थे और अपने गुरु श्रीवजनाथ जी की चरणरज के अन- न्य गति भक्त थे। सम्भवतः, श्रीवल्लभाचार्यजी के प्रपौत्र "श्रीनजनाथजी"॥ BEEEEECHESKAR USTICE ser नाम श्रीभनमाल सटीक। दो. "काया कसो, कि वन वसो, हँसो, रहो गहि मौन । तुलसी मन जीते बिना, मिटै न, है दुख जौन ॥ १॥" "प्रेम नीर गंभीर अति, कोउ न पावत थाह । मीन लीन रसरसिक जो, सोई पावत ताह ॥२॥" ( ७५५) टीका | कवित्त । (%) पृथ्वीपति भायो वृन्दावन, मन चाह भई सारंग सुनावै कोऊ जोरावरी* ल्याये हैं । वल्लभहूंसंग, सुर भरतही, छायौ रंग, अतिही रिझायो, दृग अंसुवा वहाये हैं ॥ ठाढ़ी कर जोरि बिनै करी, पै न धरी हिये, जिय, ब्रजभूमि ही, सो बचन सुनाये हैं। कैद करि साथ लिये दिल्ली ते लुटाय दिये "हरीदास तूंवर" ने आये प्रान पाये ॥ ५६४ ॥ (३६) वात्तिक तिलक । एक समय अवनीश (बादशाह सम्भवतः अकबर ) वृन्दावन में आया, मध्याह्न के समय उसके मनमें चाह हुई कि “यहां कोई अच्छा गानेवाला हो तो मुझे सारंग राग सुनावै।" लोग इन्हींको अति प्रशंसनीय प्रवीण जान, वल से लिवा लाये। एक वल्लभनाम गुणी गायक भी साथ में आया; मिलके दोनों के स्वर भरतेही, अति. शय रंग छागया सबके नेत्रों से प्रेमके आंसू बहने लगे। अति प्रसन्नता से खड़ा हो हाथ जोड़ भूपाल ने विनय किया कि "मेरे साथ चलिये।" आपने उत्तरं दिया कि "मेरा जीवन बजभूमि ही है इसको नहीं छोड़ सका ॥" निदान, यवनराज बलात्कार पकड़ साथमें दिल्ली ले ही गया। वहां से राजा "तूंवर हरीदास" (पाटमनगर के राजा हरीदास तोद- रजी राजपूत ) ने उससे प्रार्थना कर, आपको लुड़वा दिया।ब्रज में आए, प्रियतम के दर्शन पाए । "मृतक शरीर प्रान जनु भंटे ॥" जान पड़ता है कि ये श्रीवल्लभाचार्यजी के सम्प्रदाय में थे। * जोरावरा' - घरदस्ती, बलात्. बलसे If 'कैद"s.-धन्दी ।। CARECHAKRAccitSCREEKC अमन भकिसुधास्वाद तिलक। (१६६) श्रीसोतीजी। (७५६)बप्पय । (८७) "सोती" श्लाघ्य संतनिसभा, दुतिय दिवाकर जानियो । परमभक्ति परताप, धर्मध्वज नेजा*धारी। सीतापति को सुजस बदन शोभित अति भारी ॥ जानकीजीवन चरण शरण थाती थिर पाई। नरहरि गुरु परसाद, पूत पोते चलि आई॥ "राम उपासक" छापदृढ़, और न कछु उर आनियो। “सोती” श्लाघ्य संतनिसभा, दुतिय दिवाकर जानियो ॥ १६३॥ (५१) पातिक तिलक । संतों की सभा में परम प्रशंसनीय श्री "सोती" जी को दूसरे सूर्य जानना चाहिये; जैसे भानु का प्रताप होता है ऐसा ही आपका परम भक्ति रूपी प्रताप था। और धर्म की ध्वजा के दण्ड को धारण करने वालों में उत्तम वीर थे । श्रीसीतापतिजी तथा श्रीसरयू अयो. ध्याजी का बड़े भारी सुयश कथन से आपका वदन अत्यन्त शोभित था। श्रीजानकीजीवनजी के चरणों की शरणागति रूप महानिधि आपके हृदय में स्थिर रक्खी हुई थी। श्रीगुरु " स्वामी नरहरिदास" जी की कृपा प्रसाद से वह महा- निधि पुत्र पौत्रों तक एक रस चली आई। "श्रीरामउपासक सोती" आपकी दृढ़ छापथी। श्रीसीतारामजी के नाम रूप लीला धाम प्रीति छोड़ मन में और कुछ भी नहीं चिन्तवन करते थे ॥ दो० "राम सनेही, राम गति, राम चरण-रति जाहि । तुलसी फल जगजन्म को, दियो विधाता ताहि ॥ १॥" ( १९७) श्रीलालदासजी।. (७५७) छप्पय । (८६) जीवत जस, पुनि परमपद, "लालदास” दोनौं *ने जा''=x;"दण्ड ॥ RECRECRCHASACHIKEKOCCAD PANKRANTRA ८६८ श्रीभनमाल सटीक। . . - . लही॥ हृदै हरीगुण खानि, सदा सतसँग अनुरागी। पद्मपत्र ज्यों रह्यौ, लोभ की लहर न लागी ॥ विष्णु- रात सम रीति "धेरै” त्यो तन त्याज्यो।भक्त वराती वृन्द मध्य, दूलह ज्यों राज्यो॥ खरी भक्ति "इरिषां- पुरे" गुरु प्रताप गाढ़ी गही। जीवत जस, पुनिपरमपद, लालदास दोनों लही ।। १६४ ॥ (५०) कहते हैं कि मुसलिम हुक्मरां (दाराशिकोह ) को इन महात्मा के कदमों में बड़ा एतनाद था । वार्तिक तिलक । जीते में सुयश और शरीर त्यागने पर परमपद श्रीहरिकृपासे श्री- लालदासजी को दोनों दिव्य सम्पत्ति प्राप्तहुये। आपका हृदय श्री- हरिगुणों की खानि था। और सदा सत्संग के अनुरागी थे और जैसे जल में कमल का पत्र रहता है परंतु उसमें जल नहीं स्पर्श होता ऐसेही आप जगत में थे पर जगत् के दोष लोभादिकों की लहर आपको नहीं लगी। जिस रीतिसे परीक्षितजी ने श्रीमद्भागवत सुनते समाप्त में तनु त्यागा, उसी प्रकार "धेरे" (बबेरे ) ग्राम में आप ने भागवत सुनते कथा पूरी होतेही शरीर त्याग दिया । जैसे बरातियों के वृन्द में दूलह सोहता है, ऐसेही आप भगवद् भक्तों के मध्य में शोभा पाते थे। आपने, अपने गुरुस्थान "हरिपां- पुर" में रहके, श्रीगुरुप्रतापसे उत्तम भक्ति अति दृढ़तासे ग्रहण की। इस प्रकार से यश तथा मोक्ष दोनों के आप भागी हुये ॥ ( १९८) श्रीमाधव ग्वाल । (७५% ) छप्पय । (८५) भक्तनि हित भगवतरची, देही "माधव ग्वाल" की। निसिदिन यहै विचार दास जिहि विधि सुख पावें। तिलक दाम सों प्रीति, हृदै अति हरिजन भावें ॥पर- SARKFCCCCCCRece: .

arta भकिसुधास्वाद तिलक। ८६६ मारथ सों काज हिये स्वारथ नहिं जाने। दसधा मत्त मराल सदा लीला गुण गान ॥ प्रारत हरिगुण सील सम, प्रीति रीति प्रतिपाल की । भक्तनि हित भगवत रची, देही "माधव ग्वाल" की ॥ १६५ ॥ (४६) वार्तिक तिलक। श्रीभगवद्भक्नों के हित करने ही के लिये "श्रीमाधवग्वालजी" के देह को श्रीब्रह्माजी ने रचा । जिस प्रकार भगवदासों को सुख प्राप्त हो, उसी विचार में दिनरात लगे रहते थे। तिलकदाम (उर्द्ध पुण्डू और कराठीमाला ) से बड़ी ही प्रीति थी, और उसके धारण करनेवाले हरिजन आपके हृदय में अति प्यारे लगते थे। केवल परमार्थ से प्रयोजन रखते, स्वार्थ-जानतेही नहीं थे। प्रेमाभक्ति से मत्त हंसके समान सदा हरिलीला गुणगान रूपी मुक्का चुनते थे । चौपाई। । "कथा तुम्हारि सुभगसरि नाना । जाके श्रवन समुद्र समाना । भरहिं निरंतर होहिं न पूरे । तिनके हृदय सदन सुभरूरे ॥" दो० "यश तुम्हार मानस विमल, हँसिनि जीहा जासु । मुकताहल गुणगण चुनइ, राम वसहु मन तासु ॥" और हरिगुण सुनने के लिये सदा आर्त रहते थे। बड़े ही शील समतापूर्वक सबसे, और मुख्यतः हरिभकों के साथ, निर्मलं अन्तः करण से प्रीति रीति प्रतिपाल करते थे । चौपाई। "रामभक प्रिय लागहिं जेही । तेहि उर बसहुँ सहित वैदेही ।" (१९६) श्रीप्रयागदासजी। (७५६ ) छप्पय । (८४) 'श्रीअगर सुगुरु" परतापतें, पूरी परी "प्रयाग" की। मानस वाचक काय रामचरणनि चित्त दीनौ। ReceKEKKRECRCRACKASKAR CAMARCH ८७० । MARATHAKRREARRERAR श्रीभक्तमाल सटीक । भक्तनि सो अति प्रेम, भावना करि सिर लीनौ ॥ रास मध्य निर्जान देह दुति दसा दिखाई। “आडौ बलियों" अंक महोछौ पूरी पाई॥"क्यारे" कलस औली ध्वजा, विदुष श्लाघा भाग की। "श्रीअगर सुगुरु" परतापते, पूरी परी "प्रयाग” की ॥ १६६ ॥ (४८) वार्चिक तिलक । श्रीसीताराम कृपा से स्वामी श्री६ अग्रदासजी को गुरु पाके, उनके प्रताप से "श्रीप्रयागदासजी" की भगवद्भागवत में भक्ति और सब प्रकारसे पूरी पड़ी। मन वचन कर्मसे श्रीसीतारामजी में तत्पर हो युगल चरणों में चित्त लगाया। और भगवद्भकों से अति प्रेम भावना कर, उनको आते देख माथे से लेते, अर्थात् चरणों में मस्तक रख धागे से लेकर सेवा किया करते थे। एक समय "आरा बलिया" ग्राम में संतसेवा की उत्तम ध्वजा गाड़ने का, और "क्यारे ग्राम" में भगवन् मंदिर में कलश चढ़ाने का महोत्सव था; दोनों ठिकाने से आपको नेवता आया । एकही दिन दोनों उत्सव में एक शरीर से कैसे जा सके और एक उत्सव में जाने से एक का अपमान होता इससे विचार कर दोनों ग्राम के मध्य में बैठकर दोनों उत्सव करनेवालों से विनय किया कि "इसी ठिकाने से दोनों ओर पंगति बैठा दो और दोनों ओर से पूरी परसते चले आओ दोनों ओर से पूरी प्रसाद दो; मैं दोनों उत्सवों का प्रसाद पाऊंगा।" लोगों ने कहा कि "कोसभर का अन्तर दोनों ग्रामों में है, इतनी पंगति के लिये पदार्थ नहीं पूजेगा।" आपने आज्ञा दी कि "श्रीगुरुप्रताप से सब पूरा पड़ जायगो ॥" लोगोंने ऐसा ही किया। आपने दोनों महोत्लवों की पूरी प्रसाद पाया, और सवाही के लिये सब पदार्थ पूरा पूरा होगया। अन्त में रासलीला होती थी उसमें प्रभुकी प्रत्यक्ष छवि आपको दीखपड़ी; उसी समय देह त्याग कर भगवद्र्धाम को प्राप्त +ॐॐॐॐ 5 हुये GK - भनिसुधास्वाद तिलक। आपके भाग्य की वड़ाई प्रशंसा विदुप सज्जनों ने किया और किसीने लिखा है कि श्रीप्रयागदासजी ने दो देह धारण कर दोनों उत्सवों में जाके ध्वजा और कलश चढ़ाया । जैसा हो सो विज्ञ लोग जानें; दोनों हो सकता है। "खेले राम रंगीली कागरी आज रंगीलो फाग। चन्द्रकला विमलादि रंगीली प्यारी रंगीली नागरी ॥ कनक महल भजि कुंज २ प्रति उमगि रह्यो अनुरागरी। युगल प्रिया अधिकार सदा के अग्र स्वामि पद लागरी ॥" (२००) श्रीप्रेमनिधिजी। (७६०) उप्पय । (३) प्रगट अमित गुन "प्रेमनिधि," धन्य बिन जे नाम धस्यौ । सुन्दर सील सुभाव, मधुर बानी, मंगल करु । भक्तनिकों सुख दैन फल्यौ बहुधा दसधा तरु॥ सदन बसत निर्वेद, सारभुक, जगत असंगी। सदाचार उडार नेम हरिदास प्रसंगी ॥ दया दृष्टि बसि "आ- गरें" कथा लोग पावन कस्यौ । प्रगट अमित गुन "प्रेमनिधि," धन्य विप्रजे नाम धरयौ ॥ १६७॥ (४७) वात्तिक तिलक। श्री "प्रेमनिधि"जी में अपार प्रेम गुण प्रगट था, वास्तव में आप प्रेम के निधि ही थे। इससे जिस ब्राह्मण ने आपका यह नाम रक्खा था सो धन्य है । प्रेमके साथही और भी गुण आपमें थे, आप सुन्दर शीलवान् स्वभावयुक्त, और मंगल करनेवाली मधुर वाणी आपकी परमानन्ददा थी। भगवद्भक्नों को सुख देनेवाले प्रेम लक्षण भक्ति रूपी बहुत फलोंसे युक्न मानो कल्प वृक्ष थे । घर रहकर भी वैराग्य युक्त, सारग्राही, जगत् से असंग थे। जाति के ब्राह्मण सदाचार नियम में तत्पर, अति उदार, हरि- ester Face ८७२ श्रीभकमाल सटीक। दासों के संग में निरत भजन में रत हुये। जीवोंके ऊपर उदार दृष्टि कर, (समीपही वृन्दावन वास छोड़) आगरेमें रहकर वहां के लोगों को कथा सुनाके पावन कर भवपार उतार दिया । दो. "परहित रत, सियराम पद, भकि, सदा सत्संग। सहज विराग, उदार जे, का वन ? का गृहरंग ? ॥१॥" "जे जन रूखे विषय, पुनि, चिकने रामसनेह । ते वसि नित सियराम पद, कानन रहहिं कि गेह ॥२॥" (७०१) टीका | कवित्त । (२) प्रेमनिधि नाम, करें सेवा असिराम स्याम, आगरी सहर निसि- सेस जल ल्याइयै । घरखा सु रितु, जित तित,अति कीच भई, भई चित चिंता "कैसे अपरस आइयै ॥ जो पै अंधकार ही में चलौं तो विगार होत," चले यो विचारि "नीच लुवै न सुहाइये"। निकसत द्वार जब देख्यौ सुकुमार एक हाथ में मसाल "शाके पाछे चले जाइये" ॥ ५६५ ॥ (३५) वार्तिक तिलक। श्रीप्रेमनिधि नाम के भक्त श्रीश्यामसुन्दर की पूजा सेवा अति अभिराम करते थे। आगरे नगर में रहते, नित्य कुछ रानि रहते ही श्रीप्रभु के लिये श्रीयमुना जल लाया करते थे। एक दिवस वर्षा के ऋतु में मार्ग में जहां तहां कीच होगई। रात्रि थोड़ी शेष थी, तथापि अंधकार बड़ा था; आपके मनमें चिन्ता हुई कि "किस प्रकार से अछूत जल लाऊं ? प्रकाश होनेपर जाऊं तो लोगों से छू जायगा" जो अंधेरे में जाऊं तो भी ठीक नहीं। फिर मन में ठीक किया कि "अन्धकार में चलना ही अच्छा है, नीच तो नहीं लुयेंगे।" ऐसा निश्चय कर, घर से निकलते ही देखते क्या हैं कि "एक मुकुमार हाथ में प्रकाश लिये आगे जा रहा है ॥" दो० "प्रेम-कि-निधि-प्रति प्रेमनिधि,भस्यौ प्रेम उर जाल. सोई मूरति धारिकै, प्रगट भयो तिहि काल ॥ १॥" "दीप हाथ लिय ढीठ अस, यमुना तट.जो चोर । SECRECORRECORCCESS । **** KHARASHTRA भकिसुधास्वाद तिलक। ८७३ कै माखन ? के दधि, हरे ? हरै किं सखिचित मोर ॥२॥ मोहित हो आपने विचारा कि "राम कृपा से इसी के पीछे पीछे चला चलूं ॥" "जैसे धन धाम भाम श्याम जू के लागे काम, होत अभिराम, दुखग्राम नाशै मन की। जैसे रसिकाई-औ-अनन्यताई बात मुख शोभित है क्रियामान-ज्ञानवान-जन की ॥ (७६२) टीका । कवित्त । (८१) जानी यह वात पहुंचाए कहूं जात यह अवहीं विलात भले चैन कोऊ घरी है । जमुना लौ आयो, अचरस जा लगायौ मन, तन अन्हवायो, मति वाही रूप हरी है ॥ घट भरि धस्यौ सीस, पट वह आय गयौ, आय गयौं घर, नहीं देखी, कहा करी है । लगी चट- पटी अटपटी न समझि परै, भटभटी भई नई, नैन नीर झरी है ॥ ५६६॥ (३४) वार्तिक तिलक। आप यह समझे कि "यह किसी को पहुंचाकर लौटा जाता है, जहां इसका घर होगा वहां तो चलाही जावेगा भला जय क्षण उजाला है तव ही तक सुख सही।" वह मनमोहन प्रकाशयुत (मशालची) श्रीयमुनाजी तक आया; आपने मनमें आश्चर्यमान, तन से स्नान किया परन्तु आपकी बुद्धि को उस सुकुमार के रूप ने हर लिया। स्नान कर, जल भर, घड़ा माथेपर धर, चले ही, कि झट वही आकर भागे २ चला; अपने घर आप आ पहुँचे कि वह अन्तर्धान हो गया, उसको न देखा ! न जाने कहां गया? कुछ पता न चला। अब तो मन और नेत्रों में उसके देखने की चटपटी पड़ी, यह अटपटी बात समझ में नहीं आती, नई भटभटी भई कि यह कहां गया ? नेत्र बिचारे जलकी झड़ी करने लगे। चौपाई। "वरसै मघा झकोरि झकोरी । मुर दुउ नैन चुवें जनु ओरी !" (पद्मावत-मलिकमुहम्मद जायसी) PROCESSkechCrice HARATI ८७४ श्रीभक्रमाल सटीक। (पद) "नयन लगि जायें जो राजिव नैन । भटकत हैं दरसन अभिलापे, खटकत हैं दिन रैन ॥". दो० "पुतरी कारी आंख की रूपं श्याम को मान । वासों सब जग देखिये, वा विन अन्धो मान ॥ १॥" श्रीप्रेमनिधि के सोच विचार तथा अपार प्रेम-किस से वर्णन हो सकते हैं? दो० "जब लगि भक्रि सकामता, तब लगि कच्ची सेव । : कह कधीर वे क्यों मिलें, निहकामीनिज देव॥" ' (कवीरसाहब) (७६३ ) टीका | कवित्त । (८०) कथा ऐसी कहे जामें गहे मन भाव भरै, करें कृपादृष्टि दुष्टजन दुख पायौं है । जायकै सिखायो वादशाह उरदाह भयो, कही तिया भलीको समूह घर छायो है ।। आए चौबदार कहै चली एही वारवार, भारी प्रभु आगे धस्यौ चाहै सोर लायो है । चलै तब संग गए पूछे नृपरंग कहा? तियनि प्रसंगरौ ? कहिके सुनायर्यो है ॥५६७ ॥(३३) वार्तिक तिलक । श्रीप्रेमनिधिजी श्रीभागवत की कथा इस प्रकार कहते थे कि जिसको मन एकाग्र हो ग्रहण कर प्रेमभाव से भर जाता था। स्वयं पाठक समझ सकते हैं कि श्रीप्रेमनिधिजीकी कथन कैसी विलक्षण तथा प्रभावयुक्त होती होगी। उनकी कथा में पुरुषों और स्त्रियों की बहुत भीड़ होती थी। जीवापर आपकी ऐसी कृपादृष्टि देख दुष्टोंने स्वभावतः दुख पाकर जाके नृपति (पादशाह) से भूठी निन्दा की कि "उसके घरमें नगरभर के अच्छे अच्छे घरोंकी सब स्त्रियां आके बैठी रहती हैं। कवित्त। "याजु कलिकाल ऐसो आयो है कराल अति, राखे भगवान टेक, तो तो वृन्द जीजियै । वोनिये न चालिये जु, बैठि, पिंड पालिये जु,खि कान दोउ मंदि, मौनघत लीजिये। देखी अनदेखी जानि, सुनी अनसुनी मानि, माला गहिपानि, हानिलाभचित न दीजिये। Rection भकिसुधास्वाद तिलक। कीजिये न रोष जो पैकहै कोऊ बीस सीस, लीजै धरि सीस, जग- दीस साखि किजिये ।। १॥", यवनराज ने सुनते ही क्रोधाग्नि से जलके लोगों को भेजा कि “उसको वुलालाओ" आकर उन्होंने कहा कि “इसी क्षण चलो।" उस समय आप जलसे भारी भरके प्रभुके पीनेको आगे रखना चाहते थे, पर उन लोगोंका कठोरहांक सुन उनके साथ चल ही दिये। गये; यवनराज पूछने लगा "तुम्हारा क्या रंग है ? हम सुनते हैं कि नगरभर की अच्छी २ नारियों का प्रसंग रखते हो" उसका कहना सुन आपने उत्तर दिया। (७६४) टीका । कनित्त । (७६) कान्ह भगवान ही की बात सो बखानि कहाँ; आनि बैठे नारी नर लागी कथा प्यारी है । काहू को बिडारे, झिरकारे, नैकु टारे, बिपै दृष्टि के निहारे, ताको लागै दोष भारी है" ॥ “कही तुम भली तेरी गली ही के लोग मोसों आयकै जताई वह रीति कछु न्यारी है" । बोल्यो “याहि राखौ सब करो निरधार नीके," चले चोबदार लेके, रोके प्रभु धारी है ।। ५६८ ॥ (३२) बार्तिक तिलक। "खोटी कहनेवालों का मुँह कौन रोके, परन्तु मैं तो श्रीकृष्ण भगवान् की ही कथा बखान करता हूं; सुनने के लिये नारी पुरुप सब आकर बैठते हैं क्योंकि सबको प्यारी लगती है, उसमें कोई किसीको अपमान करके उठा दे, या विषय दृष्टि से देखे, तो उसको बड़ा भारी दोष होता है, इससे मैं किसी को निषेध नहीं करता ॥" यवनराज ने कहा कि "तुमने तो अच्छी बात कही परंतु तुम्हारे समीप ही के लोगों ने आकर हमसे जताया है कि उसकी रीति कुछ और ही प्रकार की है-" ऐसा कह, सेवकों को आज्ञा दी कि "ले जाओ, इसको नजर बन्द (वन्धन पहरे में) रक्खो, इसका निर्णय हो जायगा, तब छोड़ेंगे।" आज्ञा सुन चोवदारों ने लेना कर बन्धन में डाल रक्खा ॥ श्रीप्रेमनिधिजी प्रभु से प्रार्थना करने लगे। ત્રજ્ઞાત્ર ભક્ત , HREATARRANTARNXNXNXNXNARY ८७६ श्रीभक्तमाल सटीक। N प्रभुने कृपाकर विनय को श्रवण में धारण किया । (७६५) टीका, कवित्त । (७८) सोयो बादशाह निसि, आयकै सुपन दियो, कियो वाको इष्ट- भेव, कही "प्यास लागी हैं"। "पीवौ जल," कही "श्रावखाने ले बखाने" तब अति ही रिसाने "को पियांव, कोऊ रागी है !" ॥ फेर मारीलात अरे सुनी नहीं बात मेरी; आप फुरमावौ * जोई प्यावे बड़भागी है । सोतो तें लै कैद कस्यो सुनि अरबस्यौ डस्यौ भस्यौ हिये भाव मति सोवत ते जागी है ॥५६॥ (३१) वार्तिक तिलक । जब रात को यवनराज सोया, तब प्रभुने यवनों के इष्ट देव (मुहम्मद साहिब ) का रूप वेष बनाकर स्वप्न में उसको आज्ञा की कि "हमको प्यास लगी है," सुनके भूपाल ने सादर कहा कि "जल पीजिये।" आपने पूछा कि “पानी कहां है ?" उसने बताया "आवखाने में है ॥" तब आपने रिस में आकर कहा कि "वहां कोई प्रेमी सेवक तो है ही नहीं, पिलावै कौन ?" वह कुछ न बोला । तब आपने उसको एक लात मारकर पूछा कि "अरे तूने हमारी बात सुनी अनसुनी करदी?" तब घबड़ाके कहने लगा कि "जिस बड़भागी को आप आज्ञा दीजिये सो पिलावै" आपने आज्ञा की कि "उस पिलानेवाले प्रेमी को तो तूने पकड़कर कैद किया है ।" ऐसा सुन वादशाह बहुत घबड़ाया, डरा, और उसके हृदय में भक्तिभाव उत्पन्न हुआ। उसकी सोती हुई बुद्धि जाग उठी और स्वयं उसकी नींद भी टूट गई । चौपाई। "अब सेमझ कछु सो नर नाहू । टेढ़ देखि शंका सबकाहू ॥". दो० "सन्तननिन्दा अति चुरी, भूलि सुनो जनि कोइ । किये सुने सब जन्म के, सुकृत डारे खोइ ॥.१ ॥" 1 * 'फरमायौ". अशा काजिय । LEGACCIRCLCOMECREGISCCRececar R ৩৩ . RRRRRRRAN 18 भनिसुधास्त्राद तिलक (७६६) टीका । कवित्त । (७७)- दौरे नर ताही समै बेगि दै लिवाय ल्याए, देखि लपटाये पाय नृप दृग भीजे हैं। "साहिब *तिसायें, जाय अवहीं पियावौ नीर, और पै न पीवें, एक तुमहीं पै रीझे हैं । लेवौ देस गांव," "सदा पीवहीं सो लाग्यौ रहों, गहों नहीं नैकु धन पाय बहु छीजे हैं"। 'संग दै मसाल, ताही काल में पठाये, यों कपाट जाल खुले, लाले प्यायौ जल, धीजे हैं ।। ६००॥ (३०) वार्तिक तिलक। यवनराजकी आज्ञासे उसीक्षण लोग दौड़े जाके श्रीप्रेमनिधिजी को लिवालाये, वादशाह देख नेत्रों में प्रेम के आंसू भर आपके चरणों में पड़के कहने लगा कि “साहिब को तृषा लगी है; और के हाथ से नहीं पीते; एक आपही पर प्रसन्न हैं, आप शीघ्र अभी जाकर जल पिलाइये, और मुझसे देश गांव जो चाहिये सो लीजिये, मुझे दास समझिये, मैं सदा चरणों ही से लगा रहूंगा।" आपने उत्तर दिया कि "मैं उसीसे लगा रहता हूं धन कुछ भी नहीं लूंगा मुझको बहुत धन मिला और चला गया । धन अनित्य है ॥" बादशाह ने उसी क्षण प्रकाश के साथ आपको घर भेजवा दिया । सब किवाड़ खुले, आके स्नानकर, आपने प्रभु को जलपान कराया। आप प्रसन्न हुये और प्रभु भी प्रसन्न हुये। श्रीमनिधिजी की जय । प्रेम की जय जय जय ॥ (२०१) श्रीराघवदास दूवलौजी। (७६७) छप्पय । (७६) "दूवलो" जाहि दुनियां कहै, सो भक्त भजनमोटौ महंत ॥सदाचारगुरुशिष्य,त्याग विधि प्रगट दिखाई बाहेर भीतर विसद, लगीनहिं कलियुग काई । राघौ रुचिर सुभाव असद आलाप न भावै। कथा कीर्तन नेम मिलें संतनि गुन गावै॥ तायतोलि पूरौ निकप, * "साहिब"Ale=प्रभु I + "मसाल"Jiao = प्रकाश ॥ "दुनियां =Lis=संसार ॥ CAREEKRECRUKULACES ।

८७८ ॐ*SSISTER श्रीभक्तमाल सटीक। ज्यौं घन अहरनि हीरौ सहंत ।"दूबलो” जाहि दुनियां कहै, सो भक्त भजनमोटौ महंत ॥ १६८॥ (४६) वार्तिक तिलक। जिन राघव को संसार के लोग "दुबलेजी" वा "दूबरजी" कहते सो भगवद्भक्ति और नामस्मरण भजन में बड़े मोटे महत थे। सुन्दर आचार तथा गुरु शिष्य की रीति त्याग विधि आपने अपने आचरणों से प्रगट दिखा दिया। बाहर और भीतर हृदय से अति निर्मल थे। कलियुग की काई मलीनता नहीं लगने पाई। "श्रीराघव- दासदुषलेजी का स्वभाव बहुत ही अच्छा था क्योंकि आपको असद् वार्ता का कहना सुनना प्रिय नहीं लगता था। संतों में मिले हुये नियम से श्रीहरिकथा नाम कीर्तन प्रभु के गुणों को सदा गाते थे। जैसे सुवर्ण को तपाय के कसौटी में कसने से चोखाई की परीक्षा होती है और हीरा की अहरनि (निहाई) पर रखकर धन की चोट सहने से परीक्षा होती है ऐसे ही आप गुरु संतों की चोट सहनेवाले परीक्षा में पूरे थे, भक्ति, भजन और सत्संग में मोटे महन्त थे अपने पदों में आप "दुघरा" वा "दूवर" छाप (भोग) रखते थे। (७६८ ) छप्पय । (७५) दासनि के दासत्त को, चौंकस चौकी ए मड़ी। हरिनारायणं, नृपति पदमै, “बेरछै” बिराजै। गांव "हुसंगाबाद" अटल, ऊँधौ, भलछाजै॥ भेलै तुलसी- दास, भट ख्यात, देवकल्यानौ। बोहिथ बीराराम दास, 'सुहेलै" परम सुजानौ ॥ "औली” परमानंद कै, ध्वजासबल धर्म की गड़ी। दासनिके दासत्त को, चौकस चौकी ए मड़ी ॥१६६ ॥ (४५) वार्तिक तिलक। श्रीभगवदासों की दासता के लिये, ये चौकस चौकी मढ़ी हुए - . . . H REC नर ८७६ E भक्रिसुधास्वाद तिलक । अर्थात् जैसे मार्ग चलने वालों को टिकने की चौकियां होती हैं, ऐसे ही श्रीभगवदासों के रहने के अर्थ इन संतसेवियों के पुनीतगृह सुशोभित हुये॥ (११२) वेरछैग्राम में श्रीहरिनारायणजी, और राजा पदुमजी विराजमान हुए ॥ (३।४) हुसंगाबाद नगर में श्रीअटलजी और ऊँधोजी बहुत अच्छे शोभित हुए। (५।६) पासही में मिले हुये श्रीतुलसीदासजी तथा देवंकल्यानजी संतसेवा में विख्यात सुभट थे ॥ (७) सुहेले में भवसागरकी नौका सरीखे वीरारामदासँजी परम - सुजान थे।और- (८) "ओली" में श्रीपरमानन्दजी के द्वार पर भागवतधर्म की दृढ़ ध्वजा गड़ी थी॥ (७६६) छप्पय । (७४) अवलासरीर साधन सवल, ए वाई हरिभक्ति वल॥ देमा, प्रगट सब दुनी, रामावाई, बीरां, हीरामनि। लाली, नीरा, लॅक्षि, जुगल पार्वती, जगत धनि ।। खीचनि, केसी, धनी, गोमती, भक्त उपासिनि । वाद- रौनी, विदित गंगा, जमुना, रैदाँसिनि॥ जेवी, हरिषी जोइसिनि, कुँवरिराय, कीरति अमल । अबला सरीर साधन सबल, ए बाई हरिभक्ति बल ॥ १७०॥ (४४) वार्त्तिक तिलक । इन चाइयों के शरीर तो भवला स्त्रियों के थे, परन्तु सवल साधन करके ये श्रीहरिभक्ति में बड़ी बलवान हुई । १)सव जगत् में प्रगट (२) श्रीरामाचाईजी श्रीदेमावाईजी (३) श्रीवीरांवाईजी SECRECECAREER Keerica FRESHARISHA श्रीभक्तमाल सटीक। ८८. " . (४) श्रीहीरामनिजी (१४)जगत् विख्यात (५) श्रीलालीजी श्रीवादरानीजी (६)श्रीनीगंजी (१५) श्रीगंगाबाईजी (७)श्रीलक्ष्मीवाईजी (१६) श्रीयमुनाबाईजी (18) दोनों "पार्वती (१७) श्रीरदासिनिजी जगत् में धन्य हुई (१०) श्रीखीचनिजी (१८) श्रीजेवाबाईजी (११) श्रीकेशीजी (१६) श्रीहरिपांवाईजी (१२) श्रीधनाबाईजी (२०) श्रीजोइसिनिजी (१३) श्रीगोमतीजी, श्रीहरि- (२१) निर्मलकीर्तियुक्त भक्कों की उपासना करनेवाली श्रीकुँवरिरायजी (२०२) श्रीकान्हरदासजी। (७७०) छप्पय । (७३) "कान्हरदास” संतनिकृपा, हरि हिरदैलाहौलह्यो। श्रीगुरु शरणै आय भक्ति मारग सत जान्यौ।संसारी धर्महि छाँड़ि झूठ अरु सांच पिछान्यौ ॥ ज्यौं साखा द्रुम चंद जगतसों इहिं विधि न्यारौ । सर्वभूत सम दृष्टि, गुननि गंभीर अति भारौ ॥ भक्त भलाई बदन नित, कुबचन कबहुँ नाहिन कह्यौ । कान्हरदास संतनि कृपा, हरि हिरदै लाही लह्यौ ॥ १७१ ॥ (४३) वार्तिक तिलक । श्रीकान्हरदासजी ने संतों की कृपा से अपने हृदय में परम लाभ श्रीहरिस्वरूप को पाया । श्रीगुरु शरण में आकर सुन्दर भक्ति के मार्ग को यथार्थ जाना, संसारियों के धर्म कर्मों को छोड़, जगत् को झूठा तथा आत्मस्वरूप को सत्य पहिचाना। जैसे लोग बतलाते हैं कि अमुक वृक्ष की शाखापर वह चन्द्रमा दिखाता है" पर चन्द्रमा १ पिछान्यो गहिचाना॥ SECRECEBCALCRuchee CTECIRCASGE ८८१ भक्तिसुधास्वाद तिनक। उस शाखा से लाखों वोस पर है, इसी प्रकार चन्द्रशाखा न्याय से श्रीकान्हरदासजी कहनेमात्र ही को तो संसार में रहे परन्तु वस्तुतः पृथक् थे । और सर्व भूतों में समदृष्टि से भगवद्रूप व्याप्त देखते; शुभगुणों से भरे, अतिगंभीर, समुद्र के समान थे; अपने मुखसे भगवद्भक्तों की भलाई वडाई सदा कहते; कुवचन कभी न बोले । इस प्रकार आपने अपने हृदय में हरिरूप का लाभ उठाया। (२०३।२०४) श्रीकेशवलटेरा; श्रीपरशुरामजी। (७७१) पर । (७०) लट्या "लटेरा"ान विधि, परम धरम अति पीन तन ॥ कहनी रहनी एक, एक प्रभु पद अनुरागी। जस वितान जग तन्यौ संत संमत बड़भागी ॥ तैसोई पून सपूत नूत फल जैसोई परसा। हरि हरिदासनि टहल, कवितु रचना पुनि सरसा ॥ (श्री) सुरसुरानन्द सं- प्रदाय दृढ़, "केसर" अधिक उदारमनालट्यौ'लटेरा, आनबिधि,परम धरम अति पीन तन॥ १७२ ॥ (४२) वार्तिक तिलक। (१) श्रीकेसवलटेराजी जगत् की विधि से अति दुर्वल थे। दो "नारायण तू भजन कर, काह करेंगे कूर । अस्तुति निन्दा जगत की, दोउनके शिर धूर" ॥ और परमधर्म श्रीभगवद्गकि से परम पुष्ट थे। दो "स्वामि सखा पितु मातु गुरु, जिनके सब तुम्ह तात। तिनके मन मन्दिर वसहु, सीयसहित दोउ भ्रात" ॥ आपकी कहनी और रहनी एक समान थी, तथा श्रीसीताराम- चरणानुराग में अद्वितीय थे। आपके संतसंमत सुयश का वितान लोक में तन गया था। (२)जैसे बड़भागी श्रीकेशवजी थे वैसेही आपके सुकृत वृक्ष ८८२ श्रीभक्तमाल सटीक। के नवीन फल सपूत पूत श्रीपरशुरामजी श्रीहरि और हरिदासों की सेवा टहल में तत्पर हुये । तथा हरियशयुक्र कवित्त अति सरस रचते थे। श्री १०८ सुरसुरानन्दस्वामीजी के संप्रदाय में दृढ़ श्री. केशव लटेराजी अतिशय उदार मनवाने हुये । स्वामी श्री १०८ सुरसुरानन्दजी की जय ॥ (२०५)श्रीकेवलरामजी। (७७०) छप्पय । (७१ ) "केवलराम" कलियुगके, पतित जीव पावन किये॥ भक्ति भागवत विमुख जगत, गुरु नाम न जानैं। ऐसे लोक अनेक ऐचि सनमारग आनें ॥ निर्मल रति निहकाम, अजा तें सदा उदासी । तत्त्वदरसी तम- हरन, सील करुना की रासी ॥ तिलक दाम नवधा रतन, कृष्णकृपा करि दृढ़ दिये। "केवलराम" कलि- युग के, पतित जीव पावन किये ॥ १७३ ॥(४१) वार्तिक तिलक। श्रीकेवलरामजीने कलियुग के पतित जीवोंको पावन किया ।जो जगत के जीव भनि भन भगवंत गुरु को नाममान भी नहीं जानते थे, उनको भी विमुखता से खींचकर, भनि सतमार्ग में प्रारूढ़ कर दिया। प्रभु के विषे आपकी निर्मल प्रीति थी, विषयसुख से निष्काम, माया से सदा उदासीन रहते थे। अनात्म, आत्म, परमात्म तीनों तत्वों को ज्ञानदृष्टि से यथार्थ देखनेवाले विवेकी थे और सब जीवों का अज्ञानरूपी अन्धकार हरनेवाले, शील और करुणाकी राशि ही थे। आपने जीवों को तिलक कंठी माला और नवधा भक्तिरूपी रत्न तथा श्रीकृष्ण कृपालुता भले प्रकार दृढ़ा दी । इस प्रकार कलियुग के बहुत से पतित जीव आपने पावन किये। costo ।

। 29 भक्तिसुधास्वाद तिलक। ८८३ (७७६ ) टीका | कवित्त । (७०) घर घर जाय कहै यहै दान दीजै मोकों कृष्णसेवा कीजै नाम लीजै चित लायकै । देखे भेषधारी दस बीस कहूं अनाचारी, दये प्रभु सेवा निकों रीति दी सिखायकै ॥ करुणानिधान कोऊ सुने नहीं कान कहूं, वैल के लगायो सांटो लोटे दया आयकै। उपट्यो प्रगट तनमनकी सवाई अहो, भए तदाकार कहाँ केसे समझायकै॥६०१॥ (२६) वार्तिक तिलक। आप सबोंके घर में जा जाके यही कहते थे कि "श्रीकृष्णसेवा करो और चित्त लगा के उनका नाम लिया करो; मुझे यही दान दो।" जहां कहीं दस वीस वैष्णव वेषधारी अनाचारी देखते थे, उनको अपने पास से प्रभुकी मूर्तियां देकर सेवा पूजा भजन की रीति सिावला देते थे। करुणानिधान तो आप ऐसे थे कि वैसा कहीं कोई कानों से सुनने में भी नहीं आता, एक समय मार्ग में कोई बनजारा बैल लिये जाता था, आप भी पास पास चले जारहे थे, उसने अपने बैल को एक सांटी मारी, यह देखते ही श्रीकेवलरामजी दया से भूमि पर गिर पड़े, लोगों ने उठाकर देखा तो आपकी पीठ में वही सांटी ज्यों की त्यों प्रत्यक्ष उपटी है ! देखिये, आपके मनकी कृपाकी सचाई कि तदाकार होगये। यह आश्चर्य रीति किसप्रकार कहने और समझाने में आसक्ती है ? (२०६) श्रीआसकरनजी। { ७७४ ) छप्यय । (६६) (श्री) मोहन मिश्रित पदकमल, "आसकरन" जस विस्तखौ ॥ धर्मसीलगुनसीव महाभागौत राजरिषि । पृथीराजकुलदीप भीमसुत विदित कील्ह सिषि ॥ सदा- चार अति चतुर, बिमल बानी, रचना पद । सूर धीर उद्दार विनै भलपन भक्तनि हद ॥सीतापति राधासुवर, AURA .

८८४ श्रीभक्तमाल सटीक। भजन नेम कूरम धस्यौ। (श्री) मोहन मिश्रित पद- कमल, "आसकरन” जस विस्तखौ ॥ १७४॥ (४०) वार्तिक तिलक। श्रीजानकीमोहन और श्रीराधिकामोहन दोनों मोहन मिश्रित चरणकमलोंकी आसा करनेवाले श्री "श्रासकरनी' ने प्रभुका तथा अपना यश विस्तार किया। आप, कूर्मवंशी (कछवाह) श्रीपृथीराज- जी के कुल के दीपक, भीमसिंहजी के पुत्र, श्रीस्वामी कील्हदेवजी के शिष्य, नरवरगढ़ के राजा परम विख्यात हुये। बड़े धर्मशील, शुभ गुणों के सीम, महाभागवत राजर्षि, सूर, धीर, अति उदार, विनय- युक्त, सदाचार तत्पर, हरिभक्कों से अनुराग तथा भलप्पन करनेवालों में श्रेष्ट हुये । विमल वानी से, प्रभु सुयशयुतपद, रचना करने में अति चतुर थे । श्रीसीतापति और श्रीराधावर के पूजन भजन का नियम आपने अपने हृदय में दृढ़ धारण किया ॥ ( ७७५ ) टीका | कवित्त । (६८) नरवर पुर ताको राजा नरवर जानौ मोहन जू धरि हिये सेवा नीके करी है । घरी दस मंदिर में रह रहे चौकी द्वार, पावत न जान कोऊ ऐसी मति हरी है ॥ पस्यो कोऊ कामे आय अवहीं लिवाय ल्यावो कहे पृथीपति लोग कान में न धरी है। प्राई फौज भारी, सुधि दीजिये हमारी,सुनि वह बात टारी,परीअति खरबरी है।६०२॥(२८) वार्तिक तिलक । श्रीआसकरनंजी-सव नरों में श्रेष्ठ नरवरगढ़ के राजा युगलमोहन जी को हृदय में धारण कर बहुत अच्छी सेवा पूजा इस प्रकार करते थे कि दश बड़ी दिन चढ़े तक मंदिर में रहते थे, और द्वारपर चौकी खड़ी रहती थी कि उतने समय भीतर कोई भी नहीं जाने पाता था। ऐसी मति भजन में एकाग्र थी । एक समय संयोगवश नरवरगढ़ में बादशाह आया और दोपहर के पहिले ही सुभटोंको आज्ञा दी कि "आसकरनजीको अभी लिवा लाओ" राजभटों ने, आकर भवराज के द्वारपालों से कहा, पर CANCE CARD ८८५ । 5 भकिसुधास्वाद तिलक। किसी ने उन दूतों की नहीं सुनी। तब वहुत भारी सेना आई सेनापति ने कहा कि "राजा को हमारी बात सुनाओ" लोगों ने वह बात भी टाल दी। तब सेनापति लोग क्रोध से अति आतुर हुये। (७७६ ) टीका | कवित्त । (६७) कहिके पठाई, "कही कीजियै लराई" सुनि रुचि उपजाई चलि पृथीपति आयो है । पस्यो सोच भारी, तब वात या विचारि कही "आप एक जावी," गयो अचिरज पायो है ।सेवा करि सिद्धि, साष्टांग द्वैकै भूमि परे, देखि बड़ी बेर, पांव खडग लगायो है । कटिगई एड़ी, ऐपै टेढ़ीहू न भौंह करी करी नित नेम रीति धीरज दिखायो है ॥ ६०३ ॥ (२७) वार्तिक तिलक। सेनापति ने वादशाह के पास कहला भेजा कि "यदि आज्ञा हो तो हम युद्ध का आरंभ करें, क्योंकि हमारा वृत्तान्त राजा के पास कोई भी पहुंचाता ही नहीं।" सुनकर वादशाह के मन में राजा के देखने की रुचि उत्पन्न हुई । स्वयं आया । तव राजा के मंत्री आदिकों को बड़ा सोच पड़ा, विचार कर यवनाधीश से बोले कि "केवल एक आप मंदिर के भीतर जाइये." मनमें आश्चर्य मान भीतर जाकर देखा कि "आसकरनजी पूजा समाप्त कर भूमि में पड़े साष्टांग प्रणाम कर रहे हैं।" दो० "प्रेम सहित असुमन ढेर, धर युगलको ध्यान । नारायण ता भक्त को, जगमें दुर्लभ जान" ॥ ध्यानयुक्त बड़ीबेर पड़ेदेख; यवनराज ने राजा के चरण में धीरे से खट्न माग | आपकी एड़ी कटगई तथापि न दुख का कुछ भान, और न भौंह तक टेढ़ी हुई । जिस प्रकार नित्य प्रणाम करने का नियम था उसी प्रकार धैर्य देखने में आया । चौपाई। "मन तहँ जहँ रघुबर वैदेही। बिनु मन, तन दुख सुख नुधि केही"। E RA 51 -- श्रीभक्तमाल सटीक। ८८६ (७७७) टीका । कचित्त । (६६) उठि चिक डारि तव पाठे सो निहारि, कियो मुजरा *विचारि, वादशाह अति रीझे हैं । हित की सचाई यहै, नेक न कचाई होत, चरचा चलाई भाव सुनि सुनि भीजे हैं ॥ चीते दिन कोऊ नृपभक्त सो समायो, पृथीपति दुख पायो, सुनी भोग हरि छीजे हैं। करें विप्र सेवा तिन्है गांव लिखि न्यारे दिये वाके प्रान प्यारे लाड़ कगै कहि धीजे हैं ॥ ६०४ ॥ (२६) वार्तिक तिलक। फिर उठकर प्रभु के मंदिर में चिलमन (व्यवधान, चिक) डाल, पीछे देखा, बादशाह को खड़े पा, यथोचित जोहार किया आदाय वजालाया। बादशाह, राजाकी भक्रि प्रीति नियम की सचाई तथा दृढ़ता देख विचारकर अतीव प्रसन्न हुआ। फिर कुछ भाव भनि का प्रश्न क्रिया । श्रीआसकरनजी के मुग्व से उत्तम उत्तर सुन, सरस हृदय होकर, चला गया । चौपाई। प्रभु से सच्चा सो जीना । श्रीहरि साने मनके मीना"। कुछ कालान्तर में वह भक्त राजा (श्रीआसकरनजी) भगवत् धाम को पधारे; वादशाह सुन बड़ा दुखी हुा । पीछे यह भी सुना कि "उनके प्रभु को भोग राग यथार्थ नहीं लगता।" तय पूजा सेवा करनेवाले नाह्मणों को राज्य से न्यारे ग्राम लिख दिया और कहा कि 'प्रासकरनजी के प्राण प्यारे प्रभु को यथार्थ पूजन प्रेम लाड़ प्यार किया करो।" ब्राह्मण वैसाही करने लगे। यवनराज अति प्रसन्न हुये ॥ (२०७) श्रीहरिवंशजी। (७७८)छप्पय । (६५) निहिकिंचनभक्तनि भजै, हरि प्रतीति हरिवंस" == जुहार. प्रणाम ॥ + "पीजे है" प्रसन्न ,सुखो हुए । 'मुजरा .

।
भक्सुिधास्वाद तिलक ।
के ॥कथा कीर्तन प्रीति, संतसेवा अनुरागी। खरिया
खुरपा रीति ताहि ज्यों सर्वसु त्यागी॥ संतोषी, सुठि,
सील, असद आलाप न भावै ॥ काल वृथा नहिं जाय
निरंतर गोविंद गावै ॥ सिष सपूत श्रीरङ्ग को, उदित
पारषद अंस के। निहिकिंचन भक्लनि भजै,हरिप्रतीति
"हरिवंस" के ॥ १७५ ॥ (३६)
वार्तिक तिलक ।
निष्किंचन होके अर्थात् कुछ पदार्थ का संग्रह नहीं रखके, श्रीहरि
विपे प्रीति प्रतीनियुक़ होके, "श्रीहरिवंश भक्त" निकिचन (विरक्त)
हरिभकों की सेवा करते थे।
चौपाई।
"तेहिते कहत संत श्रुति टेरे । परम अकिंचन प्रिय हरि केरे"॥
श्रीसीतारामकथा श्रवण तथा नाम कीर्तन में अति प्रीति, और
संतसेवा में परम अनुराग था ॥
दो. "रसिकन को सतसंग नित, युगल ध्यान दिन रैन ।
परम विराग सुवेष वर, वोलत सुखद सुथैन" ।
जैसे एक समय एक राजा ने गंगास्नान कर अपने पास के
लाखों रुपये के पदार्थ दान कर दिये, और उसी समय एक घसि-
यारा जिसके पास केवल खरिया (जाली) और खुर्पामात्र था उसने
भी दोनों (सर्वस्व) दान कर दिया; स्वर्ग में राजा और घसियारा
दोनों में घसियारा राजा से उत्तम लिखा गया क्योंकि घसियारे ने
अपना सर्वस्व दान किया; ऐसेही "हरिवंशजी" सर्वस्व के त्यागी
(दानी)थे॥
अति संतोपी, परम सुशील थे; असत् वार्ता का कहना और
सुनना आपको कभी न अच्छा लगता, थोड़ा भी काल वृथा नहीं
जाता; निरन्तर श्रीगोविन्दगुण गान करने थे। श्रीरंगजी के बड़े
AMRSAGAR

८५८ . श्रीभक्रमाल सटीक । सपूत शिष्य श्रीहरिवंशजी भगवत् पार्षदों के अंश से उदय (प्रगट ) हुये ॥ (२०८) श्रीकल्यानजी। (७१६) पय । (६४) हरिभक्ति,भलाई, गुन गंभीर, बाँटें परी "कल्यान" ; के॥ नवकिशोर दृढ़व्रत अनन्य मारग इक धारा। मधुर वचन मन हरनं सुखद जानत संसारा॥ पर उप- कार विचार सदा करुना की रासी। मन बच सर्वस रूप भक्तपद रेनु उपासी ॥ "धर्मदास” सुत सीलसुठि, मनमान्यौ कृष्ण सुजान के। हरिभक्ति, भलाई, गुन गंभीर, वाँटें परी "कल्यान" के ॥ १७६ ॥ (३८) वार्तिक तिलक । श्रीहरिभक्ति, और सबसे भलाई करनी, तथा सन्तगुणों की गंभीरता "श्रीधर्मदासजी के पुत्र श्रीकल्यान भनजी" के बखरे में पड़ी।नवल नन्दकिशोर के दृढ़ प्रेमप्रतमें आपकी अनन्य मनकी वृत्ति नदी के धारा की नाई एकरस लगी रहती थी । मनहरन मधुर वचनों से सबको सुखद थे यह बात संसार में विदित थी । सदा, परोपकार, सारासार विचार, और करुणा की राशि थे । मन वचन तन धन सर्वस्व रूप से हरिभक्कों के चरणों की रेणु की उपासना करते थे । आप सुठि, सुशीलयुक्त, श्रीकृष्ण सुजानजी के मन के भावते हुये ॥ (२०६) श्रीबीठलदासजी। (७८०) ईप्पय । (६३) वीठलदास' हरिभक्ति के, दुहूं हाथ लाइ लिये। आदि अंत निर्वाह भक्तपद रज व्रतधारी। रह्यो जगत सों ऐंड़, तुच्छ जाने संसारी ॥ प्रभुता पति की पधति २४२ इल डूइड ॥

stor ८८६ wwers भकिसुधास्वाद तिलक । प्रगट कुल दीप प्रकासी । महत सभा में मान जगत जानै रैदासी॥ पद पढ़त भई परलोक गति, गुरु गोविंद जुग फल दिये। “वठिलदास" हरिभक्ति के, दुहूं हाथ लाडू लिये ॥ १७७॥ (३७) वार्तिक तिलक। श्रीवीठलदासजी दोनों हाथों में श्रीहरिभक्ति के लड्डू लिये अर्थात् जीवनावधि इस लोक में हरिभक्तिमय सुयश, और शरीर छूटने पर भगवद्धाम का लाभ उठाया । श्रीहरिभक्तों के चरणरज सेवन का व्रत धारणकर आदि से अंत तक निर्वाह किया; जगत् से ऐंडयुक्त होकर संसार के धनी लोगों को तुच्छ समझा । प्रभुता पति की पद्धनि अर्थात् श्रीश्री (लक्ष्मी) संप्रदाय में प्रगट कुलदीप होकर प्रकास किया । सर्व जगत् जानता था कि आप रैदासजी के वंश में उत्पन्न हुये तथापि महज्जनों के सभा में आपका बड़ा मान होता था। श्रीरामलुयशयुत पदको पढ़ते, पढ़ते परलोक गति हुई अर्थात् तन तजके श्रीरामधाम को प्राप्त हुये । इस प्रकार श्रीगुरुगोविंद ने युगल फल दिये॥ (७८१ ) छप्पय । (६२) भगवंत रचे भारी भगत, भक्तनि के सनमान को॥ "काहब *" श्रीरँग सुमति, सदानंदं सर्वसु त्यागी । स्यामदास "लघुलंब"अननि, लोखै अनुरागी॥ मारू मुदित कल्याने, “परस" वंसी-नारायनं। "चेता” ग्वाल - 'काहर' कोई महात्मा बताते है कि (३) काह (२) श्रीरङ्ग (३) सदानन्द (४) श्यामदाम (५) मारू (६) मुदित (७) कल्यान (८) परम (६) बंसी (१०) नागपन (११) चना (१२) ग्याल गोपाल (१३) शङ्कर थे मव (तेरहो नाम भक्तों ही के है । और किसी ने लघुलंब के स्थान में पाठान्तर ' लघुवंश" बताया है। और नीव कुल में उत्पन्न श्यामदास यह अर्थ उसके किये व BSCRIBCORECAUSECRECRUARk SI - CIRCASHEMANTRA ८६० श्रीभक्तमाल सटीक। गोपाल, संकर लीला पारायन ॥ संतसेय कारज किया, तोषत स्याम सुजान को। भगवंत रचे भारी भगत, भक्तनि के सनमान को ॥ १७८ ॥ (३६) वार्तिक तिलक । श्रीभगवन्त ने, अपने भक्तों के सन्मान के अर्थ, अपने इन भारी भक्तों को बनाया। जिन्होंने सन्तों की सेवा की और अपने कार्य से श्रीश्यामसुजान को संतुष्ट किया ॥ (१) काहब ग्राम में श्रीरंगजी (५) मारवाड़ में श्रीकल्यान सुन्दरमति वाले जी मुदित सन्तसेवक (२) श्रीसदानन्दजी, अपना (६) परस में श्रीवंशीनारा- सर्वस्व त्याग करनेवाले यणजी (३) श्रीलघुलंब ग्राम में श्री- (७)चेता में गोपालजी ग्वाल श्यामदासजी अनन्य (=) भगवत्लीलापरायण (४) श्रीलाखैजी अनुरागी श्रीशङ्करजी (२१०) श्रीहरीदासजी। (९८२) छप्पय । (६१ ) तिलक दाम पर कामको, हरीदास" हरि निर्मयो। सरनागत कों "सिवरः” दान “दधीच;" टेक "बलि'। परम धर्म “प्रहलाद;" सीस देन “जगदेव” कलि ॥ वीकावत बानैत भक्तपन धर्मधुरंधर । "तूंवर” कुल- दीपक, संतसेवा नित अनुसर ॥ पारथपीठ*अचरज कौन, सकल जगत में जस लियो। तिलक दाम पर *'पारपीठ"-श्रीपारथ (अर्जुन ) जी की पाढ़ी ( वंश) में-श्रीअर्जुनजी के पुत्र धौअभिमन्युजी, उन के श्रीपक्षितजी, सो परीक्षितजी की पीढ़ी (वंश) में श्रीहरि- दासजी गे। श्रीअर्जुनजी के समान कह तो आश्चर्य ही क्या ? + पाठान्तर कौन, य.चन । REGREECKGREACHECRESCRIESCOCOLOCALECTECREC ।

भनिसुधास्वाद तिलक। ८६१ काम कों; "हरीदास” हरि निर्मयो ॥ १७६ ॥ (३५) वार्तिक तिलक। तिलक कंठी मालामात्र धारण करनेवाले वैष्णवों के भी कामना पूर्ति करने के लिये हरि ने श्रीहरीदासजी को निर्मान किया । आप के गुण गण अति अनुपम थे, शरणागत जन की रक्षा करने के लिये राजा शिवि के समान; दान देने में दधीचि के सरीखे; दान देकर सत्यता की टेक न छोड़ने में राजा बलि के सदृश; परम धर्म भगवद्- भक्ति में प्रहादजीके सरिस थे और रीझके सीस तकदे देने में कलि- युगमें जैसे जगदेवथे उसी प्रकार के थे। श्रीहरीदासजी वीकावत भक्तपन का बाना धरनेवाले, धर्मधुरंधर, "तूंवर” कुलके दीपक, संतसेवा में नित्य तत्पर रहनेवाले थे (वंशका प्रभाव)। "वीकावत वानैत भनवंश, पाण्डव अवतारी। कपि जो चीरा लियो उठाय सीस अम्बर कइ मारी। पीठ परीक्षित (पारथ) सार का सभा साख सन्तन कही। टेक एक बंसी तनी, जन गोविंद की निर्बही" ॥ (७८३) टीका | कवित्त । (६०) प्रह्लाद आदि भक्त गाए गुण भागवत संघ इक ठौर आए देखे "हरिदास" मैं । "रीमि 'जगदेव," सों यों काहिकै बखान कियौ, जानत न कोऊ सुनौ कस्यौं लै प्रकास मैं ॥ रहै एक नटी सनिरूप गुण जटी गावै लागै चटपटी मोह पावै मृदु हाँस मैं। राजा रिझवार कर देवे को विचार, पैन पावै सार कादै सीस "राख्यौ तेरे पास मैं ॥ ६०५॥ (२५) वार्तिक तिलक। श्रीप्रह्लादजी,शिवि, दधीचि, वलि इन भक्कों के गुण श्रीभागवत ग्रंथ में प्रसिद्ध है; उन सबोंके गुण इक? श्रीहरीदासजी में देखेगये ।। श्रीनाभास्वामीजी ने रीझ में जगदेवजी के समान बखान किया सो "जगदेव" की रीझ का वृत्तान्त (श्रीप्रियादासजी) कहते हैं कि *"बीकायती रानी" के समान श्रीहरीदास जी का व.न, भक्ति में था। सय संसार में इन्होंने यश लिया। Cocockscretc ** PARENA ॐ 55555 ८६२. श्रीभकमाल सटीक । . कोई नहीं जानता, इससे में प्रकाश करता हूँ। एक शक्तिरूपिणी नाचनेवाली नटी रूप गुणयुक्त बड़ी चटकीली तान गाके मंद मंद हँसी से मोह उत्पन्न करती थी । राजा जगदेवरिझवार, देखके, देने को विचार करता, परन्तु उसके योग्य कोई द्रव्य नहीं पाया तब नटी से कहा कि मैंने अपना सीस तुझको दिया, काटले ।" नटी ने उत्तर दिया कि "सीस अब मेरा है, अभी मैं आपके ही पास रखती हूँ॥" (७८४) दीका । कवित्त । (५६) दियो कर दाहिनो में, यासो नहीं जाचौ कहूं, सुनि एक राजा भेदभाव सों बुलाई है। निर्तकरि गाई रीझि "लवो कही;" आई "देहु" प्रोड्यो वायों हाथ;रिश भरिकै सुनाई है ॥"इतौ अपमान " पानि दक्षिन लै दियो अहो "नृप जगदेवजू कों;" "ऐसी कहा पाई है ?" । "तासो दसगुणी लीजे, मोको सो दिखाय दीजै;" "दई नहीं जाय काहू, मोहिये सुहाई है" ॥ ६०६ ॥ (२४) वार्तिक तिलक। जब जगदेव ने मस्तक देदिया तब नटीने कहा कि, "मैंने अपना दाहिना हाथ आपको दिया, अब इस हाथ से किसीसे न मांगूंगी और न लूंगी।" यह सुनकर उस नटी को एक राजा भेदभाव से बुलाकर नाच करा और रीझ के कुछ देने लगा। उसने पायां हाथ बढ़ाया । राजा रिसा के कहने लगा कि "वायां हाथ पसार तुम हमारा अपमान करती हो?" उसने उत्तर दिया कि "मैं अपना दाहिना हाथ राजा जगदेवजी को देचुकी हूं, उसके समान वस्तु दूसरा कौन देसकता है ?" राजा कहने लगा कि "उसने क्या दिया ? मुझे दिखादो; मैं उससे दशगुणी वस्तु दूंगा।" नटी बोली कि "उसने मुझे बहुत प्यारी वस्तु दी है सर्वस्त दिया है; वैसा कोई भी नहीं देसकता।' एक महात्माने लिखा है कि वहनटी श्रीकालीजी का अंश अवतार थी। (७-५) टीका | कवित्त । (५८) किती समझावै "ल्यावों" कहै, यह जक लागी, गई बड़भागी LECRURec-CAREEKARE CRE* RECCLER . RE PHERA भक्तिसुधास्वाद तिलक। ८६३ पास "वस्तु मेरी दीजियै” । काटिदियो सीस, तन रहे ईशशक्ति लखो, ल्याई बसीस थार ढांपि, देखि लीजिये ॥ खोलिकै दिखायो, नृप मुरछा गिरायो तन, धन की न बात अव याको कहा कीजिये।मैं जु दीनौ हाथ जानि आनि ग्रीव जोरि दई लई वही रीझि पद तान सुनि जीजियै ॥ ६०७ ॥ (२३) वार्तिक तिलक । नटी ने बहुत समझाया, पर उस राजा ने बड़ी हठ से कहा कि "वह वस्तु लेही भावो।" नटीने जगदेव के पास जाके कहा कि "मेरी वस्तु मुझे दीजिये।" राजाने अपना सीलकाट दिया । नटी ने शरीर को बड़े यत्न सेरखवा सीसकोथाल मेंधरके ढांक के इस राजा के पास लाकरदिखाके कहाकि "श्रीजगदेवजी की दी हुई वस्तु देखो।" देखते राजा मूञ्छित हो गिरपड़ा, कहने लगा कि "धन तो है नहीं यह तो मस्तक है, यह मैं कैसे देसकता हूं?" नटी ने कहा कि "ऐसी वस्तु पाकर तव अपना दाहिना हाथ देदिया है।" फिर उस नटी की शक्ति देखिये कि माथा लाकर जगदेवजी के गले में जोड़कर वही पद तान गाने लगी, सीस जुड़ गया, वह जी उठा॥ (७८६) टीका | कवित्त । ( ५७ ) सुनी जगदेव रीति, प्रीति नृपराज सुता पिता सो बखानि कही वाही को लै दीजिये । तव तो बुलाये समझाये बहु भांति खोलि वचन सुनाये "अजू बेटी मेरी लीजिये" ॥ नट्यो सतवार जब कही "डारी मारि," चले मारिवे कों, बोली वह "मारौ मत भीजिय" । "दृष्टि सो न देखै" कही "ल्यावौ काटि मूंड;" लाए, चाहै सीस आखिन को, गयौ फिरि, रीझियै ॥ ६०८ ॥ (२२) वार्तिक तिलक। रूप और गान पर कौन नहीं रीझता ? जगदेवजी का यह सव वृत्तांत एक बड़े राजा की बेटी ने सुन उसपर प्रीति से श्रासन १ 'वकसीस"Anारितोषिक । GERRISSE SCIENCES RECE SHI ॐ545 श्रीभकमाल सटीक। ८६४ जाति। होकर, अपने पिता से कहा कि “मेरा उसीसे विवाह करदो।" दो०"विद्या अरु बेली, तिया, ये न गर्ने कुल जो इनके नियरे बसैं, ताही को लपटाति" ॥१॥ "प्रीति न जानै जात कुजात । भूख न जानै रूखा भात" ॥ तब वह जो बड़ा राजा था कि जिसके राज के अंतर्गत जगदेव राजा था, सो उसने जगदेव को बुलाकर बहुत प्रकार समझाकर खुलके कहा कि "मेरी बेटी तुम लो॥" इसने नहीं अंगीकार किया। तब उस राजा ने जगदेव के मार डालने की आज्ञा दी। उसकी बेटी ने कहा कि “मैं उसके प्रेम में डुवी हूं, मारो मत, मेरे सामने लाओ।" लोगों ने कहा कि तुम्हारी ओर दृष्टि नहीं करेगा;" तवं वह दुष्टा बोली कि "सीस काट के लाओ" जब मस्तक काटकर लाये, राजा की बेटी जगदेवजी के नेत्रों को देखने लगी; तव सीस का मुँह फिर गया। यह बातरीकने समझने योग्य है॥ (७-७ ) टीका । कवित्त । (५६ ) निष्टा रिझवार रीति कीनी बिस्तार यह सुनौ साधुसेवा हरीदास ज़ ने करी है। परदा न संतसौ है देत हैं अनन्त सुख रह्यौ रुख जानि भक्त सुता चित धरी है ॥ दोऊ मिलि सो रितु ग्रीषम की छात पर गात पर गात सोये सुधि नहीं परी है । दातुन के करिये को चढ़े निसि सेस आप चादर उढ़ाय नीचे आए ध्यान हरी है ॥ ६०६ ॥ (२१) वार्तिक तिलक । यह तो जगदेव रिझवार-निष्ठा विस्तार से वर्णित हुई । अब जिस प्रकार श्रीहरीदासजी ने साधुसेवा की है सो सुनिये । आपके गृह में साधुमात्र को ओट (परदा) नहीं था, अनेक प्रकार से सेवा कर सुख देते थे। खान पान पाकर एक वेषधारी आपके यहां रह गया, सो हरीदासजी की कन्या से विषयासक्त होगया। एक दिवस ग्रीपम ऋतु छनपर दोनों इक्हे सोतेथे श्रीहरीदासजी कुछरात्रि शेष में प्रभाती (दतुअन ) करने के लिये अकस्मात् कोठे पर चढ़े सो BR RECReciECEKECRes ।

अर NE भनिसुधास्वाद तिलक। ८६५ दोनों को देख के अपना दुपट्टा ओढ़ाकर, नीचे आ श्रीभगवत् का ध्यान करने लगे। दो० "या भव पारावार को, उलँधि पार को जाय । तिय छवि छाया ग्राहिनी, बीचहि पकरय आय ॥ १॥ रसन सिसन संजम करै, प्रभु चरनन तरवास । तवहीं निश्चै जानिये, राम मिलन की आस" ॥२॥ (७८) टीका | कवित्त । (५५) जागि परे दोऊ, अरवरे देखि चादर कों, पेखि पहिचानी सुता पिताही की जानी है। संत दृगनये चले वैठे मग पग लये गये ले एकांत में यों विनती वखानी है ॥ "नेकु सावधान हैक कीजिये निसंक काज, दुष्टराज छिद्र पाय कहै कटुवानी है । तुमको जु नाव धरै जरै सुनि हियो मेरो, डरै निन्दा आपनी न होत सुखदानी है ॥ ६१० ॥ (२०) वार्तिक तिलक । दोनों जागे और दुपट्टा देख घबड़ागये; कन्याने पहिचाना कि यह मेरे पिता ही का वस्त्र है, नामका साधु ऊपर से उतर लज्जा से नेत्र नवाये चला; श्रीहरीदास मार्ग में नीचे बैठे थे देखकर, उसके चरणों में प्रणाम कर एकान्त में लेगये और विनयपूर्वक शिक्षा करने लगे कि "ऐसा कार्ययुक्ति सावधानी से किया करिये, निःसंक होकर करने में दुष्ट लोग छिद्र देख पाय क्टुबानी कहते हैं; आप सब संतों की निन्दा सुन मेरा हृदय जलेगा इससे मैं डरता हूं; सन्त की निन्दा अपनी ही निन्दा है सो अपनी निन्दा सुख देनेवाली नहीं होती है (वा, सन्त की निन्दा अप्रिय है मुझे, और मैं अपनी निन्दा से नहीं डरता, वह तो सुखदाई है, "निन्दकवपुरा प्राण हमारा") (७-४) टीका । कवित्त । (५५) इतनी जतावनी में भक्तिकों कलंक लगै, ऐपै संक वही, साधु घटती न भाइयै। भई लाज भारी, विषैवास धोय डारी नीके, जीके दुख रासि, चाहै कहूं उठि जाइयै ॥ निपट मगन किये नाना विधि asketCCAKACAKACREARRECRecisiskar *ॐ * s ८६६. ANSWER श्रीभक्तमाल सटीक। । , सुख दिये, दियेपै न जान, "मिलि लालन लड़ाइये" । गोविन्द अनुज जाके बांसुरी को सांचोपन मन मैं न ल्यायौ नृप इहि विधि गाइये ।। ६११ ॥ (१६) वार्तिक तिलक। मैंने आपको इतनी बात जो जताई सो मैं उचित नहीं समझता मानो मेरी भक्रि में इतना कलंक सरीखा लगा, पर क्या करूं? साधु की निन्दावा घटती मुझे नहीं अच्छी लगती इससे इतना कहा है।' सुनकर उस साधु को बड़ी भारी लज्जा और ग्लानि हुई, सब विषय दुर्गंध को छोड़ मनमें बड़ा दुखी हो, वहां से चले जाने को चाहा; परन्तु आपने बहुत समझा कर उसको अनेक प्रकार का सुख दे रक्खा और कहाकि "मैं और आप मिलजुलकर प्रभुको लाड़लड़ाएँ।" श्रीहरीदासजी के छोटे भाई "श्रीगोविन्द" जी थे उनकी यह प्रतिज्ञा थी कि श्रीकृष्णचन्द्रजी के आगे और संतों के समीप में बहुत उत्तम बांसुरी बजाते थे यह मुन बादशाह ने कहा कि “मुझे वासुरी सुनादो।" पर आपने किसी प्रकार उसके समीप नहीं बजाया। अपनी टेक नहीं छोड़ी। इस प्रकार, हमने श्रीहरीदासजी की कथा गान की। "टेक एक वंशी तनी "जन गोविंदकी निर्वही ॥ युगल- चन्द किरपाल तासु को दास कहावै । वादशाह सों पैंज हुकुम नहि बेणु बजावै ॥ &........ जिला मिर्जापूर "चुनार" के पण्डित श्रीभाण्डप्रताप तिवारी जी,जिन्हों ने श्रीकधीरजी की साखी, तथा श्रीगोस्वामीजी की विनय- पत्रिका और भक्तमाल को अंग्रेजी में उल्था किया है, इन महाशय से भी मुझे समय समयपर सहायता मिली है । इसके लिये इन महाशय को मेरे अनेक धन्यवाद हैं । शोककी बात है कि इनकी ये तीनों पुस्तकें छपी नहीं॥ RECISCOPECI-GCRONICROCKIRCReciaCRICA निज पग तें RECCANCLAGCLCALSO ARRIA भनिसुधास्वाद तिलक। ८६७ (२११) श्रीकृष्णदासजीन ( ७६०) छप्पय । (५३) नन्दकुँवर "कृष्णदास” कों, नूपुर दियौ ॥ तान-मान सुर ताल सुलय सुंदरि सुठि सोहै। सुधाअंग भ्रूभंग गान उपमाकों को है। रत्नाकर संगीत, रागमाला, रंगरासी । रिझये राधालाल, भक्तपद- रेनु उपासी ॥ स्वर्णकार "खरगू” सुवन, भक्तभजन- पद दृढ़ लियौ। नन्दकुँवर "कृष्णदास" कों, निज पग तें नूपुर दियौ ॥१८० ॥ (३४) वार्तिक तिलक। श्रीकृष्णदासजी को नृत्य करते समय में श्रीनन्दकुमारजी ने अपने चरणों से नूपुर (धुंधुरू) निकाल के पहना दिया। आप नृत्य भेद और गान में बड़े प्रवीण थे। पद तान का प्रमान स्वर ताल अच्छी लय ये सब आपके गान नृत्य में अंग सुंदर शोभते थे। सुधा भू भंग आदिक व्यंजक अभिनय और गान अनुपम था। संगीत रत्नाकर और रागमाला, रंगरासि आदि में जो गान नृत्य के भेद लिखे हैं सो सब आप जानते थे । इन गुणों से श्रीराधालालजी को प्रसन्न कर लिया । श्रीहरिभक्कों के चरणरेणु के उपासक स्वर्ण- कार (सोनार) “श्रीखड़गूजी" के पुत्र (कृष्णदासजी) ने भगवद्भक्तों के भजनका पद दृढ़कर ग्रहण किया ॥ जिनको गाना भलेप्रकार आता है, जिनका स्वर अति मधुर है, जिनको प्रेम के पद बहुन कण्ठस्थ हैं वा स्वयं रच सकते हैं, और गाने के समय जो रसका अनुभव करते हैं, उन बड़भागियों की प्रशंसा किससे हो सकती है । (७६१) टीका । कवित्त । (५२) कृष्णदास ये सुनार राधाकृष्ण सुखसार, लियौ सेवाकरि पाछे язеѕеxxxx ८६६. श्रीभक्तमाल सटीक। सुख दिये, दिये न जान, "मिलि लालन लड़ाईय" । गोविन्द अनुज जाके बांसुरी को सांचोपन मन मैं न ल्यायौ नृप इहि विधि गाइयै ॥ ६११॥ (१६) वार्तिक तिलक। मैंने आपको इतनी बात जो जताई सो मैं उचित नहीं समझता मानो मेरी भक्ति में इतना कलंक सरीखा लगा, पर क्या करूं ? साधु की निन्दा वा घटती मुझे नहीं अच्छी लगती इससे इतना कहा है ।' सुनकर उस साधु को बड़ी भारी लज्जा और ग्लानि हुई, सब विषय दुर्गंध को छोड़ मनमें बड़ा दुखी हो, वहां से चले जाने को चाहा; परन्तु आपने बहुत समझा कर उसको अनेक प्रकार का सुख दे रक्खा और कहाकि "मैं और आप मिलजुलकर प्रभुको लाडलड़ाएँ।" श्रीहरीदासजी के छोटे भाई "श्रीगोविन्द" जी थे उनकी यह प्रतिज्ञा थी कि श्रीकृष्णचन्द्रजी के आगे और संतों के समीप में बहुत उत्तम बांसुरी बजाते थे यह सुन बादशाह ने कहा कि "मुझे बांसुरी सुनादो।" पर आपने किसी प्रकार उसके समीप नहीं वजाया। अपनी टेक नहीं छोड़ी। इस प्रकार, हमने श्रीहरीदासजी की कथा गान की। "टेक एक वंशी तनी "जन गोविंद' की निर्बही ॥ युगल- चन्द किरपाल तासु को दास कहावै । बादशाह सों 4ज हुकुम नहिं बेणु बजावै ॥ & . ., जिला मिर्जापूर "चुनार" के पण्डित श्रीभाण्डप्रताप तिवारी जी,जिन्हों ने श्रीकवीरजी की साखी, तथा श्रीगोस्वामीजी की विनय- पत्रिका और भक्तमाल को अंग्रेजी में उल्था किया है, इन महाशय से भी मुझे समय समयपर सहायता मिली है। इसके लिये इन महाशय को मेरे अनेक धन्यवाद हैं । शोककी बात है कि इनकी ये तीनों पुस्तकें छपी नहीं ॥ , CLES AAAAH totke CHECK भक्तिसुधास्वाद तिलक। ८६७ (२११) श्रीकृष्णदासजीन (७६०) छप्पय । (५३) नन्दकुँवर “कृष्णदास" कों, निज पग ते नूपुर दियौ ॥ तान-मान सुर ताल सुलय सुंदरि मुठि सोहै सुधा अंगभ्रूभंग गान उपमाकों को है॥रत्नाकर संगीत, रागमाला, रँगरासी । रिझये राधालाल, भक्तपद- रेनु उपासी । स्वर्णकार "खरगू” सुवन, भक्तभजन- पद दृढ़ लियौ। नन्दकुँवर “कृष्णदास" कों, निज पग तें नूपुर दियौ ॥ १८० ॥ (३४) चार्तिक तिलक। श्रीकृष्णदासजी को नृत्य करते समय में श्रीनन्दकुमारजी ने अपने चरणों से नूपुर (घुघुरू) निकाल के पहना दिया। आप नृत्य भेद और गान.में बड़े प्रवीण थे। पद तान का प्रमान स्वर ताल अच्छी लय ये सब आपके गान नृत्य में अंग सुंदर शोभते थे। सुधा भू भंग आदिक व्यंजक अभिनय और गान अनुपम था। संगीत रत्नाकर और रागमाला, रंगरासि आदि में जो गान नृत्य के भेद लिखे हैं सो सब आप जानते थे । इन गुणों से श्रीराधालालजी को प्रसन्न कर लिया। श्रीहरिभक्कों के चरणरेणु के उपासक स्वर्ण- कार (सोनार) “श्रीखड़गूजी" के पुत्र (कृष्णदासजी) ने भगवद्भक्तों के भजनका पद दृढ़कर ग्रहण किया ॥ जिनको गाना भलेप्रकार आता है, जिनका स्वर अति मधुर है, जिनको प्रेम के पद बहुन कण्ठस्थ हैं वा स्वयं रच सकते हैं, और गाने के समय जो रसका अनुभव करते हैं, उन वड़भागियों की प्रशंसा किससे हो सकती है। (७६१) टीका । कविच । (५२) कृष्णदास ये सुनार राधाकृष्ण सुखसार, लियौ सेवाकरि पाछे KHAH कर Cot *c*c*crosokhare ८८ श्रीभक्तमाल सटीक। नृत्य विसतारियै । है करि मगन काहू दिन तन सुधि भूली, एक पग नूपुर सो गिस्यो न संभारियै ॥ लाल अति रंग भरे जानी जति भंग भई पांय निज खोलि आय बांध्यो सुख भारियै । फेरि सुधि आई देखि धारा लै बहाई नैन कीरति यों छाई जग भनि लागी प्यारियै ॥ ६१२॥ (१८) वार्तिक तिलक। श्रीकृष्णदासजी सोनार ने श्रीराधाकृष्णजी की भकिका सुखसार लिया । पहिले सप्रेम सेवा पूजा करते, पीछे प्रभु के आगे नृत्य विस्तार करते थे। एक दिन नाचते समय आनन्द में मग्न हो शरीर की सुधि भूल गए । एक चरणका नूपुर गिर गया। उसको आपने सुधारा नहीं। श्रीनन्दलालजी ने नृत्य देख रंग में भरे जाना कि नृत्यकी जति गति भंग हुआ चाहती है। इससे अपने चरणका नूपुर खोल कृष्ण- दास के पग में बांध अति सुख पाया। फिर पीछे जब देहकी सुधि तब देखें तो अपना नूपुर भूमि में पड़ा है और प्रभुका नूपुर अपने पग में ॥ प्रभुकी कृपालुता को समझ नेत्रों से प्रेम जलकी धारा बहने लगी। इसप्रकार आपकी कीर्ति जग में छागई, और भक्ति सबको प्रिय लगी। (७६२) छप्पय । (५१) परमधर्म प्रति पोषकौं, संन्यासी ए मुकुटमनि ॥ चितसुखें टीकाकार भक्ति सर्वोपरि राखी। श्रीदामोदर तीर्थ राम अर्चन विधि भाखी ॥ चन्द्रोदय हरिभक्ति नरसिंहारन कीनी। माधों, मधुसूदन सरस्वती, परम- हंस कीरति लीनी॥ प्रवोधानंद, रामभद्रू, जगदानंद, RecelecteCRECOcriticickectecKeech ८६8 RSHAN भनिसुधास्वाद तिलक । कलिजुग्ग धनि । परमधर्म प्रति पोषकौं, संन्यासीए मुकुटमनि ॥ १८१ ॥ (३३) वार्तिक तिलका परमधर्म अर्थात् श्रीभगवद्भक्ति को अपने २ ग्रन्थद्वारा परमपुष्ट करनेवाले ये संन्यासी सब संन्यासियों के मुकुटमणि के समान हरिभक्त हुये ॥ (१) चितसुखानन्द सरस्वती ने गीता आदिक की चितसुखी टीका में श्रीभक्ति ही को सर्वोपरि वर्णन किया है। (२) श्रीदामोदरतीर्थजी ने श्रीरामार्चन चंद्रिका में श्रीरामपूजन विधि भत्रिपूर्वक वर्णन किये हैं। देखने योग्य है । (३) नृसिंहारण्यजी ने श्रीहरिभक्तिचंद्रोदय ग्रंथ सप्रेम नि- र्माण किया ॥ (४.५.) मधुसूदन सरस्वतीजी ने भकिरसायन आदिक ग्रंथ बनाये। ऐसे ही माधवानन्द सरस्वतीजी हुये । इन्होंने परमहंस कीर्तिका लाभ लिया ॥ (६)श्रीप्रवोधानन्दजी । (७) श्रीरामभद्रसरस्वतीजी । (८) श्रीजगदानन्दजी श्रीहरिभक्तिप्रतिपोष करनेवाले कलियुग में धन्यतर हुये ॥ (२१२) श्रीप्रबोधानंदसरस्वतीजी। (७६३) टीका | कवित्त । (५०) श्रीप्रबोधानंद, बड़े रसिक आनन्दकन्द, श्री "चैतन्य चन्द" जू के पारखद प्यारे हैं। राधाकृष्णकुंजकेलि, निपट नवेलि कही, झेलि रसरूप, दोऊ किए ग तारे हैं । वृन्दावन वास को हुलास लै प्रकाश कियो, दियो सुखसिंधु, कर्म धर्म सब टारे हैं। ताही सुनि सुनि कोटि कोटि जन रंग पायो, विपिन सुहायौ, बसे तन मन वारे हैं ॥ ६१३॥ (१७) * "संन्यासी" वैरागी, उदासी, वियोगी और विरक्त ॥ REGCREAKINCREACTS , ७

ELECISCAKACCHCECENGIKACHECHECHAIRRHEAR
श्रीभक्तमाल सटीक ।
बार्तिक तिलक।
श्रीप्रबोधानन्दजी बड़े ही रसिक, आनन्दकन्द श्रीकृष्णचैतन्य
जी के प्रिय पार्षद थे । श्रीराधाकृष्णकुंजकेलि अति नवीन वर्णन
किया और रूपरस को पान कर युगलचन्द को अपने नेत्रों के तारे
कर लिये। आपने अपने काव्यमें श्रीवृन्दावन वास के उल्लाश का
प्रकाश कर उपासकों को सुखसिंधु में मग्न किया। और कर्म धर्म
को न्यारे करदिया । उस ग्रंथको सुन २ के करोड़ों लोगोंने प्रेम रंग
को पाया। आपने स्वयम् सुन्दर श्रीवृन्दावन में उसके तन मन धन
सब नेवछावर करदिये॥
(२१३) श्रीहारकादासजी।
(७६४) छप्पय । (४६)
अष्टांग जोग तन त्यागियौ, "हारिकादास" जानै
दुनी।सरिता “कूकस"गाँव सलिलमें ध्यान धरयो मन।
राम चरण अनुराग सुदृढ़ जाके सांचौ पन ॥ सुत
कलत्र धन धाम ताहि सों सदा उदासी। कठिन मोह
को फन्द तरकि तोरी कुल फांसी ॥"कोल्ह" कृपा बल
भजनके, ज्ञान खड्ग माया हनी । अष्टांग जोग तन
त्यागियौ, "हारिकादास” जानै दुनी॥१८२॥ (३२)
बार्तिक तिलक ।
श्रीद्वारिकादासजी, कमसे यम, नियम, आसन, प्राणायाम,
प्रत्याह , धारणा, ध्यान, इन सातों अंगों को साधके, आठवें अंग
समाधि में स्थित होकर, ब्रह्मरंध्र फोड़, तन त्याग के, श्रीराम धाम
को प्राप्त हुये, यह सब संसार जानता है ।
कूकस ग्राम के निकट, नदी के जल में स्थित हो, मनमें ध्यान
धरा । आपके प्रेमभक्ति का प्रण सच्चा था इससे श्रीरामचन्द्रचरणों
१ "दुनी"=ys दुनिया, संसार ॥
BECRECRAKASKHEKACHCRACTECHECK
,

,
,
+3
भक्तिसुधास्वाद तिलक ।
में अतिशय दृढ़ अनुराग कर, स्त्री पुत्र धन धाम आदिकों से सदा
उदासीन हो, कठिन मोह जाल की सव फांसियां तोड़ दीं। अपने
गुरु स्वामी श्रीकील्हदेवजी की कृपादत्त भजन के बल से, ज्ञानखड्ग
ले, अविद्या माया को नाश कर, अष्टांग योग से तन त्याग, श्रीराम
धाम में जा बसे॥
(२१४) श्रीपूर्णजी।
(७६५) छप्पय । (४८)
पूरन प्रगट महिमा अनंत, करिहै कौन बखान॥
उदै अस्त परवत गहिर मधि*सरिता भारी। जोग
जुगति विस्वास, तहां दृढ़ आसन धारी॥ व्याघ्र सिंघ
गुंजै खरा कछु संक न मानै। अईन जातें पौन उलटि
ऊरध को आनै ॥ साखि शब्द निर्मल कहा, कथिया
पद निर्वान । पूरन प्रगट महिमा अनंत, करिहै कौन
वखान ॥ १८३ ॥ (३१)
वार्तिक तिलक।
श्रीपूर्णदासजी की अनंत महिमा प्रगट हुई उसको कौन बखान
सकेगा। उदयाचल और अस्ताचल के मध्य में जितनी नदियां हैं
उन सबोंमें अति गहिरी सरिता श्रीगंगाजी के निकट, हिमाचल में,
आप योगयुनि से भगवत् के विश्वासपूर्वक दृढ़ आसन धारण कर,
ध्यान समाधि लगा, समीप में व्याघ्र सिंह खड़े हुये गर्जतथे, अपने
अपान वायुको प्राण में मिलाकर उद्धही को ले जाते, नीचे नहीं
जाने पाता । पापने साखी, शब्द, निर्मल कहकर निर्वान पद मोक्ष
का उपाय वर्णन किया। निश्चय होता है कि ये पूर्णजी वही हैं कि
जिन "पूर्ण विराटीजी" का 'द्वारा' है ॥
*नर्थात् श्रीगंगाजी ॥
CALCCACCICKGROCCCCCCC

EXAS *** श्रीभक्रमाल सटीक। 5६०२ (२१५.) श्रीलक्ष्मणभट्टजी। (७६६ ) छप्पय । (४७) श्रीरामानुज पद्धति प्रताप, “भट्ट लक्षमन” अनु- सरयौ ॥ सदाचार मुनित्ति भजन भागात उजागर। भक्तनि सों अति प्रीति भक्ति दसों को आगर ॥ संतोषी मुठि सील हृदै स्वारथ नहिं लेसी॥ परम धर्म प्रतिपाल संत मारग उपदेसी ॥ श्रीभागौत बखान के, नीर क्षीर विवरनं करयौ । श्रीरामानुज पद्धति प्रताप, "भट्ट लक्षमन” अनुसरयौ ॥ १८४॥ (३०) वार्तिक तिलक । अनन्त श्रीरामानुजस्वामीजी की पद्धति (संप्रदाय ) के प्रताप से श्रीलक्ष्मणभद्रजी शरणागति भकिमार्ग में यथार्थ प्रवृत्त थे। सदाचार तथा मुनिवृत्ति से, भजन करनेवाले उत्तम भागवत हुये। और भगवद्भकों से अति प्रीति करते, दशधा (प्रेमा)भक्ति के स्थान ही थे। अति संतोपी, परमसुशील, स्वार्थरहित परम धर्म प्रतिपालक, संतमार्ग के उपदेश करनेवाले थे। श्रीभागवत की कथा कहकर नीररूपी मायिक पदार्थ और क्षीररूपी परमार्थ वस्तु दोनों का विवरण करके पृथक् २ दिखा देते थे। ऐसे विराग ज्ञान भक्ति के धाम आप थे। (२१६) स्वामी श्रीकृष्णदास पयहारीजी। (७६७) कुंडलिया (४६) गलतें गलित अमित गुण, सदाचार सुठि नीति। दधीचि पायें दूसरि करी, कृष्णदास कलि जीति ॥ १ दसधा-पराभक्ति ( नवधा के परे) ।२ विवरम-विवेक । ३ छप्पय ३- कवित्त ११६ देखिये ॥ BeaucracketCHCHEEG ACTICE HCECRECE THAKERARAMETRIKATRE भकिसुधास्वाद तिलक। ६०३ कृष्णदास कलिजीति, न्यौति नाहर पल दीयौ । अतिथिधर्म प्रतिपालि, प्रगट जश जग में लीयो। उदासीनता अवधि, कनक कामिनि नहिं रातो। राम- चरण मकरंद रहत निसिदिन मदमातो॥गलतें गलित अमित गुण, सदाचार सुठि नीति ।दधीचि पाछे दूसरि करी, कृष्णदास कलि जीति ॥ १८५ ॥ (२६) वार्तिक तिलक। जैसे दधीचिपिजी ने देवताओं के मांगने से अपना शरीर देदिया, ऐसे ही दधीचिगोत्र में उत्पन्न श्रीस्वामी कृष्णदास पयहारी जी ने कलिकालको जीत दधीचिकी नाईं दूसरी बात की। एक समय आपकी गुफा के सामने वाघ आया तो आपने उसको अतिथि जान नेवताकर आतिथ्यधर्म प्रतिपाल पूर्वक अपना पल (मांस) काट के दिया। इसप्रकार के प्रसिद्ध यश को आप जग में प्राप्त हुये। उदासीनता (वैराग्य) की मर्यादा हुये। और इस संसारसागर में जो कनककामिनी रूप दो भँवर सबको डुवा देनेवाले हैं उन दोनों के रंग से आप नहीं रँगे। केवल श्रीरामचरणकमल के अनु- रागरूपी मकरंद से भ्रमर की नाईं मदमत्त आनन्दित रहते थे। संतों के अमित दिव्य गुणों से गलित अर्थात् परिपक्व, सदाचार, अति नीतियुक्त, “गलते" गादी में विराजमान हुये ॥ (७६८) टीका । कवित्त । (४५) बैठे हे गुफा में, देखि सिंह द्वार आय गर्यो, लयौ यों विचारि "हो अतिथि आज आयो है"। दई जांघ काटि डारि, “कीजिये अहार अजू" महिमा अपार धर्म कठिन वतायो है ॥ दियौ दरसन आय, सांच मैं रह्यो न जाय, निपट सचाई, दुख जान्यौ न, बिलायो है। अन्न जल देबे ही कों झीखत जगत नर, करि कौन सके जन मन भरमायो है ॥ ६१४ ॥ (१६) CARECHACRESCRECORECARE RECE , K भक्तिसुधास्वाद तिलक । ६०५ : वात्तिक तिलक। श्रीगदाधरदासजी की भकि, आदि से अन्त तक सदा एकरस भले प्रकार से निवह गई। प्रफुल्लित मन से दिन रात श्री "लालविहारी" जीका नाम जपते रहते थे, और प्रभुकी सेवा सहज स्नेह से किया करते। सदा आनन्द के रस से झूलते भगवद्भकों से अति प्रीति रखते थे। आपकी रीति सबके मन में भाती थी और अन्तःकरण की आशय अतिशय उदार रही । रसना से हरिकीर्ति गाते, हृदय में श्रीहरिका विश्वास लाने; किसी और की आशा आपने स्वमे में भी नहीं की ॥ (८००) टीका । कपित्त । (४३) बुरहानपुर ढिग याग तामें बैठे आय करि अनुराग गृह त्याग पागे स्याम सों। गांव में न जात, लोग किते होहा खात, सुख मानि लियो गात, नहीं काम और काम सों॥ पत्यौ अति मेह, देह वसन भिजाय डारे, तब हरि प्यारे बोले सुर अभिराम सों। रहै एक साह भक कही जाय ल्यावो उन्हें मन्दिर करावी तेरौ भयो घर दाम सों ॥ ६१५॥ (१५) पातिक तिलक । श्रीगदाधरदासजी वैराग्य से गृह को त्याग के श्रीश्यामसुन्दर के प्रेम में पगे ॥ बुरहानपुर के निकट आकर विराजे । लोग बहुत प्रार्थना करते, परन्तु आप ग्राम में नहीं जाते थे आपके मन और शरीर ने यहां ही सुख मान लिया। आप और कामों से प्रयोजन नहीं रखते थे॥ एक दिन मेघों ने जलकी बड़ी वर्षा की आपके सब वस्त्र भीग गये, भनका दुःख देख भगवान् को बड़ी दया लगी, तब एक भक्त सेठ को स्वप्न में अति अभिराम स्वर से भाज्ञा दी कि तेरे घर में वहुत द्रव्य भरा है इससे जा मेरे प्रिय भक्त गदाधरदास को लिवा ला सुन्दर मंदिर बनवा दे। तेरे घर में श्रीलक्ष्मीजी की कृपा बनी रहेगी। SECSROG ACLECRUCICKENC " श्रीभक्तमाल सटीक । वार्तिक तिलक। एक समय स्वामी श्री ६ कृष्णदासजी गलताकी गुफा में बैठे थे देखें तो एक व्याघ्र आकर खड़ा है। आपने विचार किया कि "यह कभी यहां नहीं आया इससे हमारा अतिथि है इसको भोजन देना चाहिये," अपनी जंघाओं का मांस काटकर उसके आगे डाल दिया और कहा "कि इसका शाहार करो।" देखिये आपकी अपार महिमा, हिंसक अतिथि को भी भोजन देना बताया अर्थात् अपनी करनी से उपदेश दिया। वह मांस खाकर व्याघ्र चला गया। श्री ६ कृष्ण- दासजीकी यह धर्मपालनरूप अतिशय सचाई देख परम धर्मधुरंधर श्रीरामजी से नहीं रहा गया; कोटि काम अभिरूप से प्राकर दर्शन दिये और मस्तकपर कमलकर धर सव दुःख दूर कर दिये । जंघा भी ज्यों की त्यों होगई.। श्री १०८ पयहारीजी नयनानन्द पाकर कृतार्थ हुये॥ देखिये लोग अतिथि को अन्न जल देने में मँखते हैं आपके समान कर्म कौन करसकता है इस बात को मनमें विचार करने से ही जीव घवड़ा जाते हैं स्ने कर कैसे सके ? ॥ (२१७) श्रीगदाधरदासजी। (७६६ ) छप्पय । (४४) " भलीभांति निवही भगति, सदा “गदाधरदास" ॥ लालबिहारी जपत रहत निशिवासर फूल्यो। सेवा सहज सनेह सदा आनँद रस मूल्यौ ॥ भक्तनि सों अति प्रीति रीति मबही मन भाई। आसय अधिक उदार रसन हरिकीरति गाई ॥ हरि विश्वास हिय आनिकै, सुपनेहुँ आन न आस की । भलीभांति निवही भगति,सदा “गदाधरदास" की ॥१८६॥(२८) अEEck-crea SALA । , भनिसुधास्वाद तिलक। ६०५ वात्तिक तिलक । श्रीगदाधरदासजी की भक्ति, आदि से अन्त तक सदा एकरस भले प्रकार से निवह । प्रफुल्लित मन से दिन रात श्री लालविहारी" जीका नाम जपते रहते थे, और प्रभुकी सेवा सहज स्नेह से किया करते । सदा आनन्द के रस से झूलते भगवद्भक्तों से अति प्रीति रखते थे। आपकी रीति सबके मन में भाती थी और अन्तःकरण की आशय अतिशय उदार रही। रसना से हरिकीर्ति गाते, हृदय में श्रीहरिका विश्वास लाते; किसी और की आशा आपने स्वप्ने में भी नहीं की ॥ (८००) टीका । कवित्त । (४३) बुरहानपुर ढिग बाग तामें बैठे आय करि अनुराग गृह त्याग पागे स्याम सों। गांव में न जात, लोग किते होहा खात, सुख मानि लियो गात, नहीं काम और काम सों ॥ पस्यौ अति मेह, देह वसन भिजाय डारे, तब हरि प्यारे बोले सुर अभिराम सों। रहै एक साह भक्त कही जाय ल्यावो उन्हें मन्दिर करावी तेरौ भयौ घर दाम सों ॥ ६१५॥ (१५) वार्तिक तिलक । श्रीगदाधरदासजी वैराग्य से गृह को त्याग के श्रीश्यामसुन्दर के प्रेम में पगे ॥ बुरहानपुर "के निकट आकर विराजे । लोग बहुत प्रार्थना करते, परन्तु आप ग्राम में नहीं जाते थे आपके मन और शरीर ने यहां ही सुख मान लिया । आप और कामों से प्रयोजन नहीं रखते थे। एक दिन मेघों ने जलकी बड़ी वर्षा की आपके सव वस्त्र भीग गये, भक्तका दुःख देख भगवान् को बड़ी दया लगी, तब एक भक्त सेट को स्वप्न में अति अभिराम स्वर से भाज्ञा दी कि तेरे घर में बहुत द्रव्य भरा है इससे जा मेरे प्रिय भक्त गदाधरदास को लिवा ला सुन्दर मंदिर बनवा दे। तेरे घर में श्रीलक्ष्मीजी की कृपा चनी रहेगी। CASCHSASABREGASUGAR , AAHIRATRE श्रीभक्तमाल सटीक। 7. सुनाए; बड़ी कठिनता (८०१) टीका । कवित्त । (४) नीठ नीठ ल्याये हरि बचन सुनाए जब, तब करवायो ऊंची मंदिर सवारिक । प्रभु पधराये, नाम "लाल" औं "विहारी" श्याम अति अभिराम रूप. रहत निहारिक ॥ करें साधुसेवा जामें निपट प्रसन्न होत, बासी न रहत अन्न सो पात्र झारिके। करत रसोई जोई राखी ही छिपाय सामा आए घर संत, आप कही "ज्यावी प्यारिक" ॥.६१६ ॥ (१४) पातिक तिलक। वैश्य भन ने प्रभु की आज्ञा मान आपके पास आकर ग्राम में चलने की प्रार्थना की। नहीं अंगीकार किया; तब श्रीहरि के वचन से लिवालाये, और सुन्दर विचित्र ऊंचा मन्दिर बनवाके प्रभु को पधराया । ठाकुरजी का नाम "श्रीलाल- विहारी" जी रक्खा । अंति सुन्दर श्याम स्वरूप को देखते प्रेम में मग्न होजाते थे। सन्तों की सेवा ऐसी करते कि जिसमें साधु अति प्रसन्न होते थे अन्न आदिक जो आता,सो दूसरे दिन को नहीं रहता, अन्न के पात्रों को (अशेष ) झार करके सोते थे । परन्तु रसोई करनेवाले कुछ सामग्री भगवत् के भोग के लिये छिपा रखते थे । एक समय रात में संत आय; श्रीगदाधरदासजी ने रसोइयों पुजारियों से कहा कि जो कुछ सामग्री होय सो प्रीतिपूर्वक बनाके भोजन करावो ॥" (८०२) टीका | कवित्त । (४१) बोल्यो प्रभु भूखे रहें ताके लिये राख्यौ कछू भाष्यो तव आप काढ़ौ भोर और आवेगौ । करिके प्रसाद दियो लियौ सुख पायो सब सेवारीति देखि रही जग जस गावैगौ ॥ प्रात भये भूखे हरि गए तीन जाम ढरि रहे क्रोध भरि कहै कबधों छुटावेगौ । आयो को ताही समें दो सत रुपैया धरे वोले गुरु "सीस ले के मारों" किती पावैगौ ॥ ६१७॥ (१३) वार्तिक तिलक। आपके वचन सुन शिष्य वोला कि "ठाकुरजी भूखे रह जाते LOCKSCHICHAKESKUS CAS ) मन- EASI भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६०७ हैं इस लिये थोड़ा सा अन्न रख छोड़ा है।" आपने कहा वही निकाल के सन्तों को पवावो, प्रातःकाल और आवेगा" शिष्य ने रसोई कर भोग लगा के सन्तों को दिया; सन्त प्रसाद पाकर सुखी हुये; श्रीगदाधरदासजी की सेवारीति देख कहने लगे कि "आपका यश सब जगत् गावेगा॥" प्रातःकाल कुछ आया नहीं; प्रभु भूखे ही रह गये ! तीन पहर वीत गये !! तब आपके शिष्य क्रोध कर कहने लगे कि "देखो, अव तक भोग नहीं लगा, हम लोग भूखे मरते हैं, न जानें इस दुःख को ब्रह्मा कव छुड़ावैगा ?" उसी समय कोई भक्त आकर श्री- गदाधरदासजी के सामने दो सौ रुपये पूजा रक्खी । आप बोल उठे कि "ये रुपये लेकर इसके माथे में मारो, जितनी इच्छा हो उतना पावै, भूख से व्याकुल हो रहा है ।" (८०३) टीका | कवित्त । (४० डस्यो वह साह, “मत मोपै कछु कोप कियो ?” किया समाधान सब बात समझाई है । तब तो प्रसन्न भयो अन्न लगै जिती देत, सेवा सुख लेत, साधु रुचि उपजाई है ॥ रहे कोऊ दिन, पुनि मधुपुरी वास लियो, पियो ब्रजरस लीला अति सुखदाई है । लाल लै लड़ाए, संत नीके भुगताए गुन जाने जिते, गाये,, मति सुन्दर लगाई है ॥६१८॥ (१२) वार्तिक तिलक । आपके वचन सुन वह भक्त सेठ डरगया कि "स्वामीजी ने कुछ मुझ पर तो क्रोध नहीं किया ।" तब श्रीगदाधरदासजी ने सब वात समझाकर उस भक्त का समाधान किया । वृत्तान्त सुन सेठ प्रसन्न हुआ; और जितना अन्न लगता उतना देने लगा। उत्तम रुचि से साधुसेवा का सुख लेने लगा। आप कुछ दिन वहां रहकर फिर श्रीमथुरापुरीमें आकर बसे।अति सुखदाई ब्रजलीलारस को पान किया; इस प्रकार आपने श्रीलाल- जी को लाड़ लड़ाया और भले प्रकार संतसेवा का सुख लिया। ReceCRECAlertRECReetuReKECT ।

ARRRRRRRRRRXX ६०८ श्रीभक्तमाल सटीक। "हम आपके जितने गुण (यश) जानते थे उतने सुन्दर मति लगा के गात वि.ये॥" दो गदाधरजी श्रीकृष्ण चैतन्यमहाप्रभु के चौंसठ महन्तों में थे। एक गदाधरदास श्री ६ कृष्णदास पयहारीजी के शिष्य थे । एक गदाधरजी बांदावाले, और एक गदाधरजी श्रीवल्लभाचार्य- जी के शिष्यों में थे। श्रीगदाधर वाणी बड़ी उत्कृष्ट कविता हुई। (२१८) श्रीनारायणदासजी। (८०४) छप्पय । (38) हरिभजन सीव स्वामी सरस, श्रीनारायणदास अति ॥ भक्ति जोगः जुत, सुदृढ़ देह, निज वल करि राखी । हिये संरूपानन्द, लाल जस रसना भाखी ॥ परिचै.प्रचुर प्रताप जानमनि रहस सहायक श्रीनारा- यण प्रगट मनौ लोगनि सुखदायक ॥ नित सेवत संतनि सहित, दाता उत्तर देसगति । हरिभजन सीव स्वामी सरस, श्रीनारायणदास अति ॥ १८७॥ (२७) वार्तिक तिलक। अति सरस मतिवाले श्रीहरि भजन की सीमा स्वामी श्रीनारा. यणदासजी हुये । अतिशय दृढ़ भक्तियोग से युक्त अपने देह को वीर्य बल के सहित कर रक्खा, और स्वरूपानन्द में मन मग्न किया। जीभ से श्रीलालजी के नाम और यश कहा करते थे। अपने विख्यात प्रताप से परिचय भी दिया; ज्ञानियों में शिरोमणि भगवत् रहस्य के सहायक थे। आपकी वड़ाई कहां तक की जाय लोगों को सुख देने के लिये मानो साक्षात् श्रीनारायण स्वयं प्रगट हुये । हित सहित नित्य संतों की सेवा करते, उत्तर देश बदरिकाश्रम के जीवों को गति देनेवाले हुये ॥ "श्रीनारायणभट्टजी,(जिनकी कथामूल८७ कवित्त ३५६ में कह ELES SONAKCele - 808 , । भकिसुधास्वाद तिलक । आए हैं, )"भट्ट नारायन अति सरस, ब्रजमण्डल सों हेत, ठौर ठौर रचना करी, प्रगट कियो संकेत॥" सोभास्करजी के पुत्र श्रीसनातन. गोस्वामी के शिष्य थे । बताते हैं कि उनका जन्म संवत् १६२० (१५६३ ई.) में हुआ था। •ir Go ter tit roin ने भी १५६३ ई० लिखी है । सं० १६८८ में आपका जन्म किसीने भूलसे लिखा है। "आपका" ब्रजभक्ति बिलास" नामक ग्रन्थ श्रीराधाकृष्णदास के मतानुसार १५५३ ईसवी में बना। एक श्रीनारायण दास की कथा मुल १४६ कवित्त ५६११५६२ में कही है। और एक नारायणदास जी इस ( मूल १८७ ) में वर्णित हैं । इत्यादि । इत्यादि ॥" श्रीतपस्वीरामजी सीतारामीय ॥ (८०५) टीका । कवित्त । (३) : आये बद्रीनाथजू तें, मथुरा निहारि नैन, चैन भयो, रहैं जहां केसौजू को द्वार है । आवे दरसनी लोग जूतिन को सोग हिये, रूप को न भोग होत कियौ यो विचार है ॥ करें रखवारी, सुख पावत हैं भारी, कोऊ जानै न प्रभाव, उर भाव सो अपार है । आयो एक दुष्ट पोट पुष्ट सो तौ सीस दई, लई, चले मग ऐसौ धीरज को सार है ॥ ६१६॥ (११) बार्तिक तिलक। स्वामी श्रीनारायणदासजी बद्रीनाथ (बदरिकाश्रम) जी से था- कर मथुराजी को नेत्रों से देख अति मानन्दित हुये, फिर श्रीकेशव- देवजी के द्वार पर रहने लगे। वहां पर दर्शन करनेवाले लोग आते थे, उनके जोड़े(पन ही)चुरा ले जानेकी संका मनमें बनी रहती थी। दो०"हरि के मन्दिर जात हैं, हरिदर्शन के आस । लम्बी दंडवत करत, पर, चित्त पनहियन पास ॥" आपने विचार किया कि " इन सबको दुचितई से प्रभुके रूप दर्शन का सुख नहीं होता।" इससे आप द्वार पर बैठे जूतियों की रक्षा किया करते थे, गूढ़ और परहितरत सुभाव की वलिहारी। Rok ॐॐॐ * SHASHA ६१० श्रीभकमाल सटीक। - प्रभु रूप चिन्तवन से भारी सुख में मग्न रहते थे, अन्तर के अपार प्रेम भाव का प्रभाव कोई नहीं जानता था ॥ एक दिन एक दुष्ट आया; ऊपर का वैष्णव वेष आपके नहीं देखा इससे बड़ी भारी गठरी आपके सीसपर रखवाय के ले चला, आपने कुछ भी न कहा हरि ही की इच्छा समझे ऐसे धैर्य दीनता और ज्ञान का सारांश आपके हृदय में था। वलिहारी और जयजय आपकी ।। (८०६ ) टीका । कवित्त । (३७) कोऊ बड़ो नर, देखिमग पहिचानि लिये, किये परनाम भूमिपरि, भरिनेह को। जानिकै प्रभाव, पांव लीने महादुष्ट हूँ नै, कष्ट अति पायो, छुटयो अभिमान.देह को ॥ बोले आप "चिंता जिनि करो, तेरौ काम होत;" नैन नीर सोत "मुख देखौं नहीं गेह को" । भयो उपदेश, भक्ति देस उन जान्यो, साधु सक्निको विलेस, इहां जानौ भाव मेह को ॥ ६२० ॥ (१०) घातिक तिलक । मार्ग में किसी श्रीमान् भक्तनरने देख पहिचान कर पूर्ण स्नेह से भूमि पर साष्टांग प्रणाम किया। तब वह दुष्टं भी आपका प्रभाव जान चरणों में गिरपड़ा; और देह का अभिमान छोड़ ग्लानि से दुखित हो रोने लगा । श्रीनारायणदासजी ने कहा कि "तुम चिंता मत करो, तुम्हारा यह कार्य मेरे शरीर से हुआ सो भला है,॥" दो० "क्षमा बड़ेन को चाहिये, ओछन के उतपात । कहा विष्णु को घटिगयो ? जो भृगु मारी लात ॥" आपके ऐसे साधुताके वचन सुन वह नेत्रों में जल भरके प्रार्थना करने लगा कि "मैं अब घर का और घरके लोगों का मुख नहीं देखूगा।" तब आपने कृपाकर उसको भकिमार्ग का उपदेश देकर कृतार्थ किया । दखिये सन्तों की ऐसी शक्ति है, कि जैसे मेघ दुष्ट और सज्जनों के खेत में समान वर्षा करते हैं, इसी प्रकार सन्त सब ही पर कृपादृष्टि वृष्टि कर कृतार्थ करते हैं । NeCLECTe- . M . भक्तिसुधास्वाद तिलक। (२१६) श्रीभगवानदासजी। (८०७ ) छप्पय । (२६) भंगवानदास श्रीसहित नित, सुहृद सील सजन सरस ॥ भजन भाव आरूढ़, गूढ़ गुन बलित ललित जस । श्रोता श्रीभागौत रहसि ज्ञाता अक्षर रस ॥ म- थुरापुरी निवास आस पद संतनि इकचित । श्रीजुत "पोजी" "स्याम” धाम सुखकर अनुचर हित ॥ अति गंभीर सुधीरमति,हुलसतमनजाकेदरसाभगवानदास श्रीसहित नित,सुहृद सील सज्जन सरसं॥ १८ ॥(२६) वार्तिक तिलक। श्रीभगवानदासजी नित्य ही भनि श्री के सहित,, सर्व भूतों के सुहृद, शीलवान, सरस हृदय युक्त,अति सजन हुये। श्रीभगवद्भजन भावनामें आरूढ़, प्रभुके गढ़ गुण और ललित यश से आच्छादित अन्तःकरण वाले थे । श्रीभागवत कथा के रहस्य के और अक्षरोंके रस के जाननेवाले श्रोता थे । मथुरापुरी में बसते, और सन्तों के पद की अनन्य आशा चित्त में रखते थे। श्रीयुत खोजीजी तथा श्री. स्यामदासजी के गृह के सुखकारी हितकारी सेवक शिष्य थे। अति गंभीर, सुन्दर धीर मति युक्र थे, और अपने दर्शन से सब जनों के मनमें प्रेमानन्द का उल्लास करदेते थे। (८०८) टीका । कवित्त । (३५) जानिबेकों पन, पृथीपतिमन श्राई, यो दुहाई, लै दिवाई "माला तिलकन धारियै"।मानिानि प्रान लोभ,केतिकनि त्याग दिये छिए, नहीं जात, जानि वेगि मारि डारियै ॥ भगवानदास उर भक्ति सुख. रास भरघो, कस्यो लै सुदेस बेस रीति लागी प्यारिय। रीझयों नृप देखि, रीमि, मथुरा निवास पायौ, मंदिर करायो, "हरिदेव" सों निहारियै ॥ ६२१ ।। (6) GORESCRETC SCEROCEOGI-MECC - 26 IHAR श्रीभक्तमाल सटीक। , । वार्तिक तिलक। एक समय पृथ्वीपत्ति (बादशाह ) के मनमें यह आया कि "बहुतसे लोग माला और तिलक धारण किये रहते हैं, देखें तो कि इनमें सच्ची प्रीति और निष्ठा किसकी है ?" इसलिये मथुरामें डोंडी (मुनादी ) फिरवा दी कि "जो कोई माला तिलक धारण करेगा वह मारडाला जायगा." उसकी आज्ञा मान अपने प्राण के लोभसे बहुत लोगोंने माला तिलक तजदिये। बहुत से लोग गृह में छिपे रहे, क्योंकि जानते थे कि जो पृथ्वीपति जानेगा तो शीघ्र मारडालेगा। परन्तु श्रीभगवानदासजीके हृदय में तो भक्तिसुखका सिन्धु भरा था, इससे सुन्दर दीर्घ. द्वादस तिलक और बहुतसी तुलसीकी माला धारणकर पृथ्वीपति के समीप गये । देखके हृदय में प्रसन्न हो, ऊपर से सुष्ट होकर उसने पूछा कि "तुमने मेरी आज्ञा क्यों नहीं मानी ?" आपने अशंक उत्तर दिया कि "हमारे मत में सिद्धान्त है कि जो माला तिलक धारणकर प्राण त्याग करता है, वह अवश्य भगवान् के धाम को जाता है । इस लाभ के लिये आपकी आज्ञा को धन्य माना।" आपकी सच्ची निष्ठा देख नृपति ने "जो इच्छा हो सो मांगो।" आपने कहा कि "मैं जीवनावधि मथुरा निवास चाहता हूं।" उसने लिख दिया कि “मथुराकी अध्यक्षता जबतक जियो तबतक करो।" श्रीगवानदासजी ने जन्मभर मथुरा वास किया, और गोवर्द्धनजी के समीप श्रीहरिदेवजीका मन्दिर बनवाया सो अबतक विराजमान है, दर्शन करिये ॥ (२२०) श्रीकल्याणसिंहजी। (208) छप्पय । (३४) भक्तपक्ष, उदारता, यह निवही "कल्यान" की। जगन्नाथ कौ दास निपुन, अति प्रभु मन भायौ। परम पारषद समुझि जानि प्रिय निकट बुलायौ ॥ प्रान पयानौ करत, नेह रघुपति सों जोस्यो । मुत दारा धन RECECRER SAKSE AAEEGCRECHARY । पूछा कहा कि ।

भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६१३ धाम मोह, तिनुका ज्यों तोस्यो। कौंधनी ध्यान उर में लस्यौ, "राम" नाम मुख "जानकी” । भक्तपक्ष, उद्दारता, यह निवही "कल्यान" की॥ १८६ ॥ (२५) वार्तिक तिलक। श्रीभगवद्भक्तोंका पक्ष करना और उदारता अर्थात् धन आदिक पदार्थ तथा प्राणतक दूसरे को देदेना, श्रीरामकृपा से ये दोनों बातें नोनेरे नगरवाले श्रीकल्यानसिंहजीकी, जीवनपर्यन्त निवह गई। आप श्रीजगन्नाथजीकी दासता में अति निपुण थे और श्रीप्रभु के मन में भाते थे। श्रीजगन्नाथजी ने अपना परम पार्षद विचार, प्रिय जान, अपने निकट बुला लिया । अन्त में प्राण त्याग करते समय अपना स्नेह केवल श्रीरघुनन्दनजी से लगाया, और स्त्री पुत्र धन धाम आदिकोंका मोह तृण के समान तोड़ डाला। "जरौ सो सम्पति सदन सुख, सुहृद मातु पितु भाइ । सन्मुख होत जो रामपद, करै न सहज सहाइ ॥” आप ऐसे बड़भागी थे कि अन्त में श्रीरघुवरजी के कटि कौंधनी (करधनी) का ध्यान हृदय में साक्षात् आगया और. मुख से "श्रीजानकी राम" नाम उच्चारणकर प्राणको त्याग के साकेत श्रीरामधामको प्राप्त हुये ।। श्रीहरिभक्तों के पक्ष करनेका एक वृत्तान्त यह है कि एकसमय अपने स्थान नोनेरे नगर से अपने भाई अनूपसिंह के सहित उत्सव दर्शनार्थ श्रीवृन्दावनको चले जाते थे मार्ग में देखा कि एक धनी सरावगी दुष्ट एक दीन वैष्णवको दुःख देरहा है । आपने इन वैष्णव साधुका पक्षकर उस दुष्ट से बचा लिया । तथा धनादिक दे सुखी करदिया ॥ श्रीराधाकृष्णदासजी के अनुमान में श्रीरूप गोस्वामी के शिष्य कल्यानदास यही महानुभाव हैं । परन्तु शृङ्गारनिष्ठावाले श्री- कल्यानदासजी और दास्यनिष्ठावाले कल्यानसिंहजी दो जान पड़ते हैं। SKSERECAREE ६१४ श्रीभकमाल सटीक। (२२१ । २२२) श्रीसंतदास; श्रीमाधवदास। (१०) छप्पय । (३३) सोदर “सोभूराम” के, सुनौ संत तिनकी कथा॥ "संतदास” सदत्ति जगत छोई करिडास्यो। महिमा महाप्रवीन भक्ति वित धर्म विचास्यो।बहुरयो "माधव- दास” भजन बल परचौ दीनौ। करि जोगिनि सों बाद बसन पावक प्रति लीनौ ॥ परम धर्म विस्तार हित, प्रगट भए नाहिन तथा । सोदर “सोभूराम” के. सुनौ संत तिनकी कथा ॥ १६० ॥ (२४) वार्तिक तिलक। हे सन्त जनो ! श्रीसोभूरामजी के दोनों भाइयों की कथा सुनिये। श्रीसन्तदासजी ने सवृत्तियुक्त, जगत् को छोई (सीठी) के समान निरस तुच्छ जानके छोड़ दिया, और भगवत् धर्म भक्ति ज्ञान को प्रबीनता से विचार कर हृदय में धारण किया। इससे आपकी महा- महिमा हुई। दूसरे भ्राता श्रीमाधवदासजी ने भजन के बल से ऐसा परची दिया कि एक समय कनफटे योगी लोग आपसे विवाद करते बोले कि "हम अपने श्रृंग और मुद्रा को अग्नि में डालते हैं, और तुम अपनी कराठी माला डालो, देखें कि किसके जलते हैं।" आपने कहा कि "मैं कंठी माला अग्नि में नहीं डालूंगा, मैं अपना अँचला वस्त्र अग्नि में डालता हूँ, तुम अपने पत्थर के मुद्रा, स्तूंगी को डालो।" ऐसा ही किया, कनफटे के सुंगी, मुद्रा जल गये परन्तु प्रापका वस्त्र न जला, आपने अग्नि से ज्यों का त्यों वस्त्र ले लिया। परम धर्म (भक्ति) के विस्तार के लिये जैसे सोभूरामजी के भ्राता प्रगट हुए वैसा दूसरा नहीं हुआ ॥ - १'हो'सीठी ॥ . , वाले ॥ GALORESCREE SAARESSATARSALAR भक्तिसुधास्वाद तिलक। माधवदास कई हुए हैं- ७ माधवदास भगवत् रसिकजी के १ श्रीमाधवदास जिनका वस्त्र पिता अग्नि में न जला। ८ माधवदास दादूजी के शिष्य । २श्रीमाधवदासजी जगन्नाथपुरीया माधवभट्ट काश्मीरी । ३श्रीमाधवदास साधुसेवी। १०माधवदास(मीरमाधव)कावुली ४ माधवदास गढ़ा के। ११माधवदास कायथ सहारनपुर ५ माधवदास वरसानेवाले । ६ माधवदास कपूर खत्री। इत्यादि (२२३) श्रीकान्हरदासजी । (११) छप्पय । (३०) बूडिऐ विदित, “कन्हर” कृपाल, आत्माराम, प्रा- गमदरसी॥ कृष्णभक्ति को थंभ, ब्रह्मकुल परमउजा- गर । क्षमासील, गंभीर,सर्व लच्छन को आगर॥ सर्वसु हरिजन जानि, हदै अनुराग प्रकासै । अमन, बसन सनमान करत, अति उज्ज्वल आस ॥ “सोभूराम प्रसाद तें, कृपादृष्टि सब पर बसी।बूडिऐ विदित, "क- न्हेर" कृपाल, आत्मारामागम, दरसी ॥१६१॥(२३) वार्तिक तिलक । बूड़िया ग्राम में श्रीकन्हरदासजी जगत् विख्यात, परमकृपाल, अपने आत्मा में रमण करनेवाले, आगमदर्शी अर्थात् भविष्य जाननेवाले हुये । श्रीकृष्णभक्रिरूपी गृह के स्तंभ ( खंभा ) आधार के समान, ब्राह्मण कुल में उत्पन्न, अति प्रकाशमान, क्षमाशील, गंभीर, सर्व शुभ लक्षणों के स्थान हुए । श्रीहरिभक्तों को हृदय में अपना सर्वस्व जान, अतिशय प्रेम करते; खान पान वस्त्रादि देकर एक श्रीक-हरजी, विटुनदास चौर्य के पुत्र थे । और ये श्रीकन्दरदासजी ज्ञानी भक्त थे । CA REGARD । ६१७ - RAK** भक्तिसुधास्वाद तिलक । श्रीगोविन्ददासजीको, सब जगत् के जीवोंका हित करनेवाले और सब शुभ गुणों में (सु-स्व) अपने समान जानकर श्री ६ नारा- यणदासजी (श्री १०८ नाभास्वामीजी) ने स्वयं भक्तरत्नमाला दी, अर्थात् अर्थ तथा आख्यायिकायुक्र इस "भक्कमाल" को उन्हें पढ़ा दिया था। और श्रीगोविन्ददासजी ने संपूर्ण भक्रमाल को कण्ठस्थ कर रक्खा, बड़े मीठे स्वर से पढ़ा करते थे। निश्चय होता है कि यह छप्पय भनमाल पूर्ण हुये पीछे स्वयं श्रीकृपालु नामास्वामीजीही ने लिख दिया है। (यह छप्पय बड़े मननकर रखने के योग्य है) और "नारायणदास ने दिया" ऐसा परोक्ष (अन्यपुरुष ) नाम लिखा, सो अपना नाम परोक्ष से भी लिखनेकी कवियोंकी रीति प्रसिद्ध है ही॥ जो मूल १०२ कवित्त ४१० में श्रीगोविन्दस्वामी वर्णित हैं, उनसे ये महात्मा भिन्न हैं। (२२५) श्रीनृपमणि जगतसिंहजी। . (८१३) छप्पय । (३०) भक्तेश भक्त, भवतोषकर, संत नृपति "वासो" कुँवर ॥ श्रीयुत नृपमनि “जगतसिंह” दृभक्ति परा- यन। परम प्रीति किये सुवस शील लक्ष्मीनारायेन ॥ जासु सुजश सहजहीं कुटिल कलि कल्प जुघायक। आज्ञा अटल सुप्रगट, सुभट कटकनि सुखदायक ।। अति ही प्रचंड मारतंड सम, तम खंडन दोरदंड वर । भक्तेश भक्त, भवतोष कर, संत नृपति "वासो" कुँवर ॥ १६३ ॥ (२१) वार्तिक तिलक। भनों के स्वामी, श्रीभगवान् के तोप प्रसन्नता करनेवाले, "संत SREESH SCREEGRLSCREECREC

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श्रीभक्तमाल सटीक।
अति सनमान करते थे; श्रीसोभूरामजी की कृपा प्रसन्नता पाके
अति प्रसन्न मन से, सब जीवों को कृपादृष्टि से देखते थे।
(२२४) श्रीगोविंददासजी "भक्तमाली"।
(१०) छप्पय । (३१)
"भक्त-रत्नमाला" सुधन, "गोविंद" कंठ विकास
किय ॥ रुचिर सीलघननील लील रुचि, मुमति सरित
पति । विविधि भक्त अनुरक्त ब्यक्त, बहु चरित चतुर
अति ॥ लघु दीरघ सुर सुद्ध बचन अविरुद्ध उचारन।
बिस्व बास विस्वास दास परिचय विस्तारन । जानि
जगत हित, सब गुननि सुं सम, “नरायनदास” दिय॥
भक्तरतनमाला" सुधन,
गोविंद" कंठ विकास
किय ॥ १९२ ॥ (२२)
वार्तिक तिलक ।
श्रीभगवद्भक्त नामयशरूपी रत्नों की महामूल्य माला (यह
भनमाल ग्रंथ ) श्रीगोविंददासजी के कंठ में विकाशित हुई, अर्थात्
उन्होंने कण्ठाग्र (कण्ठस्थ) किया। आप अति सुन्दर शीलवान् श्री.
रामघनश्याम सुन्दरजी की लीला में सचिवाले सुन्दर मति के सिंध
ही थे। अनेक भक्कों में अनुराग करनेवाले, और उन भक्कों के
यथार्थ स्पष्ट चरित्रों के जाननेवाले, अति चतुर थे । श्रीभक्तमाल
पढ़ते में जहां जैसा लघु दीर्घ अक्षर और म्वर चाहिए वहां वैसे ही
शुद्ध अविरुद्ध शब्द उच्चारण करते थे। विश्वनिवासी भगवान् का
सदा विश्वास करनेवाले, संतों के परिचै को अर्थात् जो परीक्षा
प्रभाव प्रगट हुये उनको, आप विस्तारपूर्वक कहा करते थे।
१ "सु" स।
'श्रीनारायणदास" जी श्रीनामाजी गोस्वामी भक्षमा कर्ता ।
३ "महरनमाला"- यही "मरमाल 'प्रय ॥
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६१७ . . 4141570487345548948970 भक्तिसुधास्वाद तिलक । श्रीगोविन्ददासजीको, सब जगत् के जीवोंका हित करनेवाले और सब शुभ गुणों में (सु स्व) अपने समान जानकर श्री ६ नारा- यणदासजी (श्री १०८ नाभास्वामीजी)ने स्वयं भक्तरत्नमाला दी, अर्थात् अर्थ तथा आख्यायिकायुक्त इस "भक्कमाल” को उन्हें पढ़ा दिया था। और श्रीगोविन्ददासजी ने संपूर्ण भक्तमाल को कण्ठस्थ कर रक्खा, बड़े मीठे स्वर से पढ़ा करते थे। ह निश्चय होता है कि यह छप्पय भक्तमाल पूर्ण हुये पीछे स्वयं श्रीकृपालु नाभास्वामीजीही ने लिख दिया है। (यह छप्पय बड़े मननकर रखने के योग्य है)। और "नारायणदास ने दिया" ऐसा परोक्ष ( अन्यपुरुष) नाम लिखा, सो अपना नाम परोक्ष से भी लिखनेकी कवियोंकी रीति प्रसिद्ध है ही॥ जो मूल १०२ कवित्त ४१० में श्रीगोविन्दस्वामी वर्णित हैं, उनसे ये महात्मा भिन्न हैं॥ (२२५) श्रीनृपमणि जगतसिंहजी। . (१३) छप्पय । (३०) भक्तेश भक्त, भवतोषकर, संत नृपति "वासो" कुँवर ॥ श्रीयुत नृपमनि “जगतसिंह” दृढ़भक्ति परा- यन । परम प्रीति किये सुवस शील लक्ष्मीनारायन । जासु सुजश सहजहीं कुटिल कलि कल्प जुघायक। आज्ञा अटल सुप्रगट, सुभट कटकनि सुखदायक ।। अति ही प्रचंड मारतंड सम, तम खंडन दोरदंड वर । भक्तेश भक्त, भवतोष कर, संत नृपति "वासो" कुँवर ॥ १६३ ॥ (२१) वार्त्तिक तिलक। 'भकों के स्वामी, श्रीभगवान् के तोप प्रसन्नता करनेवाले, "संत KAREECIASKAR MA ६१८ श्रीभनमाल सटीक। . . राजा आनन्दसिंह" के और "बासोदेई" के कुँवर (पुत्र), नृपशिरोमणि श्रीजगतसिंहजी जगत् में परम भक्र हुये। आप दृढभक्ति में तत्पर थे। परम प्रीति से आपने श्रीलक्ष्मीनारायणजी को स्वाभाविक अपने वश करलिया। जिन भक्तराजजीका सुन्दर यश, सहज ही में, कुटिल कलिकाल के कल्प कहिये सामर्थ्य अर्थात् पापका धायक (नाशक) था। आपकी आज्ञा अटल अर्थात् कोई मेट नहीं सकता था, यह बात प्रगट है । आप ऐसे सुभट थे कि जहां वीर सेनाओं में प्राप्त होते वहां सबको अति 'युद्धोत्साह सुख देते थे। आपके श्रेष्ठ भुज- दंडोंका प्रताप अज्ञान और अन्धकाररूपी शत्रुवों के नाश करने के लिये अतिप्रचंड मार्तण्ड (सूर्य) के समान था। (१४) टीका | कवित्त । (२९) जगताको पन मन सेवा श्रीनारायणजू, भयौ ऐसौ पारायण, रहै डोला संग ही । लरिवेको चलै आग, आगे सदा पाछे रहै, ल्यावै जल सीस, ईश भस्यौ हियो रंग ही ॥ सुनि जशवन्त जयसिंह के हुलास भयो, देख्यौ, दिल्ली मांझ, नीर ल्यावत अभंग ही। भूमि परि, बिनेकरी, “धरी देह तुमही ने, जातै पार्यो नेह भीजिगये यों प्रसंगही” ॥ ६२२ ॥ () वार्तिक तिलक । सन्तनृपति आनन्दसिंह के बेटे श्रीजगतसिंहजीका श्रीलक्ष्मी- नारायणजीकी सेवा में बड़ा प्रेमपण और मन ऐसा तत्पर था कि, जो अपने गृह से कहीं जाते थे तो उत्तम पालकीपर विराजमानकर श्रीलक्ष्मीनारायणजीको आगे २ ले चलते थे और चाकर सरिस श्राप पीछे पीछे; परन्तु जब युद्ध करनेको चलते थे, तब आपही आगे रहा करते थे और प्रभुकी पालकी पीछे रहा करती थी। पूजा सेवा की जितनी कृत्य हैं सो सव अपने ही हाथोंसे करते, यहांतक कि प्रभु के स्नान के लिये जल प्रेमरंग से भरे नित्य अपने माथेपर रखकर लाया करते थे। एक वेर शाहजहांनाबाद (दिल्ली) में सब राजा इकटे थे, तब आपका जश लाना सुनके जयपुरके राजा जयसिंह और जशवन्तसिंह ल भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६१६ जीके मन में दर्शनका हुलास हुआ; दोनों जाके मार्ग में बैठे; श्रीजग- तसिंहजी ब्राह्मण, वैष्णव, सिपाहियों, और शतावधि मनुष्यों के साथ नंगे पांव, सुवर्ण के कलश में जल मस्तकपर लिये, सीताराम नाम जपते चले आते थे, वे दोनों राजा देख प्रेम से भर, भूमिपर पड़, प्रणामकर, प्रशंसा करने लगे, कि "मनुष्यदेह धरने का फल आप ही ने पाया, कि जो आपका श्रीप्रभु में ऐसा प्रेम है ॥" (१५) टीका | कवित्त । (२८) नृपति जैसिंहजू सों वोल्यो “कहा नेह मेरे ? तेरी जो बहिन ताकी गंध को न पाऊं मैं। नाम "दीपकुँवरि" सो बड़ी भकिमान जानि, वह रसखानि ऐपै कल्लुक लड़ाऊं मैं ॥ सुनि सुख भयो भारी, हुती रिस वासोटारी, लिये गांव काढ़ि फेरि दिये, हरि ध्याऊं मैं । लिखि कै पठाई “वाई करें सो करन दीजै, लीजै साधु सेवा करि निसि दिन गाऊं मैं ॥ ६२३ ॥ (७) वार्तिक तिलक। श्रीजगतसिंहजी सुनके राजा जयसिंहजी से कहने लगे कि "मेरे क्या प्रेमभक्ति है, आपकी बहिन जो, 'दीपकुँवरि' नामकी हैं, सो अवश्य बड़ी ही भक्का हैं, और प्रेमरसकी खान ही हैं, उनके प्रेमका गंध भी मैं नहीं पासक्ता; हां, उन्हींकी प्रीति रीति देख सुनके संग प्रभाव से मुझे भी प्रभुकी ओर कुछ २ प्रेमभक्ति हुई है लाड़ लड़ाता हूं।" आपके वचन सुन जयसिंहजीको बड़ा ही आनन्द हुआ। किसी कारण से “दीपकुँवरि" से अप्रसन्नता होगई थी, सो अपनेजी से हटा कर, उनके ग्राम (जागीर) जो ले लिये थे सो सब छोड़ देकर, प्रार्थनापत्र लिखकर, अपराध क्षमा कराकर, प्रसन्न किया। और अपने प्रधान मंत्रियोंको लिख भेजा कि "बाईजी (बहिन ) जो पूजा भजन दान साधुसेवा आदिक करें, सो भलेप्रकार करने देना; धनादिक जो लगे सो देना; मैं उनकी कृपा से श्रीहरि के ध्यान में लगूंगा। और भगवद्यश गान करूंगा॥" SRUSSACROCESS C (3E THERE भकिसुधास्वाद तिलक । ६२१ दो० "गिरिधर स्वामी पर कृपा, बहुत भई, दशकुंज। रसिक रसिकनीको सुजल, गायो तिहि रस पुञ्ज ॥" (श्रीध्रुवदास) ग्वाल पदवी आपने श्रीनन्दनन्दनजी के सखा होने से पाई थी गिरिधरजी कई हुये हैं । एक बरसानेवाले- दो० "बरसाने गिरिधर सुहृद, जाकें ऐसा हेत। भोजन ह भक्तन बिना, धस्यौ रहै, नहिं लेत॥" ओर श्रीवल्लभाचार्यजी के पोते, विठ्ठलनाथ के बेटे श्रीगिरिधर- जी मूल में तथा मूल १३१ में वर्णित हुए। (८१७) टीका | कवित्त । (०६) गिरिधर ग्वाल, साधुसेवा ही को ख्याले जाके, देखि यौनिहाल होत प्रीति सांची पाई है । संत तन छूटे हूंते लेत चरणामृत जो, और अब रीति कहाँ कापै जात गाई है ॥ भये द्विज पंच इकठोरे सो प्रपंच मान्यौ, आन्यो सभामांझ कहँ “छोड़ो न सुहाई है । जाकै हो अभाव मत लेवौ, मैं प्रभाव जानों मृतक यों बुद्धि ताको चारो" सुनि भाई है ॥ ६२४ ॥ (६) वार्तिक तिलक । श्रीगिरिधर ग्वाजजी परम भक्त हुये । आपके चित्त में सदा साधु- सेवा ही का चिन्तवन बना रहा करता था । सन्तों का दर्शन करते ही प्रेमानन्द से निहाल होजाते थे। क्योंकि प्रभु की कृपा से सञ्ची प्रीति प्राप्त थी, यहां तक कि साधु का प्राण छूट जाने पर भी चरणा- मृत लेलेते थे, तब सजीव सन्तों में आपकी जैसी प्रीति रीति थी वह कौन कह सकता है ? इस बात को देख सब ब्राह्मण प्रपंच पंचायत और सभा कर श्रीगिरिधरजी को बुलाकर कहने लगे कि "मृतक वैष्णवों का चरणामृत लेना छोड़ दो यह भला नहीं है।" उनके वचन सुन आपको नहीं अच्छे लगे; उत्तर दिया कि "जिसके अभाव हो वह मत ले, मैं तो भगवद्भक्तों का प्रभाव जानता १ 'ख्याल' -खय लम् - =सुरति, सुधि, स्मरण ॥ LectCALCHECARE , HERE श्रीभक्तमाल सटीक। ६२० (२२६) श्रीगिरिधरग्वालजी। (१६) छप्पय । (७) गिरिधरन ग्वाल, गोपाल कौ, सखा सांच लौ संग कौ ॥प्रेमी भक्त, प्रसिद्ध गान, अति गद गद बानी। अंतर प्रभु सों प्रीति, प्रगट रहै नाहिन छानी *॥ नृत्य करत आमोद विपिन तन बसन बिसारै । हाटक पट हित दान रीझि ततकाल उतारै ॥ "मालपुरै' मंगल करन रास रच्यौ, रसरंग कौ। गिरिधरन ग्वाल, गोपाल को, सखा सांच लौ संग कौ ॥१६४॥ (२०) बार्तिक तिलक। श्रीगोपालीदेई के पुत्र श्रीगिरिधरग्वालजी श्रीगोपालजी के सच्चे संगी सखा थे। प्रसिद्ध प्रेमी भक्त; परम उदार और कवि थे; प्रभु- यश गान करते समय में आपकी अति गदगद वानी हो जाती थी। आपके अन्तर हृदय की प्रीति छिपाने से भी नहीं छिपती थी; नाम गुण गाते, गुण श्रवणकरते में प्रगटहोजाती थी; जबश्रीवृन्दावन के एकांत वन में प्रेमानन्द से मत्त, गुणगान कर नाचने लगते थे, तव देह के वस्त्र, व देह का भान, भूल जाते थे; जो और कोई भगवद्यश गान करने लगे, तो रीझ के अपने सुवर्ण के आभूषण और वस्त्र तत्काल उतार के देदेते थे। एक समय "मालपुर" ग्राम में मंगल का करनेहारा रास रचके कराया देखके परम प्रेम रसरंग में पगके घर का सब धन वस्तु प्रभु को भेंट कर दिया। . 'छानी छन्न-छिपाई, ढाकी । दो० • प्रेम छिपाए ना छिपे, हो ही जात प्रकाम। दाये दूये ना दौ, कस्तूरी को बास ॥' SCARRESCRECTRESCRECRECRecracketest . - . 360HERS भकिसुधास्वाद तिलक । ६.२१ दो० "गिरिधर स्वामी पर कृपा, बहुत भई, दशकुंज । रसिक रसिकनीको सुजस, गायो तिहि रस पुञ्ज ॥" (श्रीध्रुवदास) बाल पदवी आपने श्रीनन्दनन्दनजी के सखा होने से पाई थी। गिरिधरजी कई हुये हैं । एक बरसानेवाले- दो० "वरसाने गिरिधर सुहृद, जाकें ऐसा हेत भोजन ह भक्कन बिना, धस्यौ रहै, नहि लेत॥" और श्रीवल्लभाचार्यजी के पोते, विठ्ठलनाथ के बेटे श्रीगिरिधर- जी मूल ८० में तथा मूल १३ १ में वर्णित हुए। (८१७) दीका । कवित्त । (२६) गिरिधर ग्वाल, साधुसेवा ही को ख्याले जाके, देखि यो निहाल होत प्रीति सांची पाई है । संत तन छूटे हूंते लेत चरणामृत जो, और अब रीति कहौ कापै जात गाई है ॥ भये द्विज पंच इकठोरे सो प्रपंच मान्यो, आन्यो सभामांझ कहें “छोड़ो न सुहाई है । जाकै हो अभाव मत लेवो, मैं प्रभाव जानौं मृतक यों बुद्धि ताको चारो" सुनि भाई है ॥ ६२४ ॥ (६) चार्तिक तिलक । श्रीगिरिधर ग्वालजी परम भक्त हुये । आपके चित्त में सदा साधु- सेवा ही का चिन्तवन बना रहा करता था । सन्तों का दर्शन करते ही प्रेमानन्द से निहाल होजाते थे। क्योंकि प्रभु की कृपा से सच्ची प्रीति प्राप्त थी, यहां तक कि साधु का प्राण छूट जाने पर भी चरणा- सृत लेलेते थे, तब सजीव सन्तों में आपकी जैसी प्रीति रीति थी वह कौन कह सकता है ? इस बात को देख सब ब्राह्मण प्रपंच पंचायत और सभा कर श्रीगिरिधरजी को बुलाकर कहने लगे कि "मृतक वैष्णवों का चरणामृत लेना छोड़ दो यह भला नहीं है।" उनके वचन सुन आपको नहीं अच्छे लगे; उत्तर दिया कि "जिसके अभाव हो वह मत ले, मैं तो भगवद्भक्तों का प्रभाव जानता हूं १ 'ख्याल' =सयल- JAS =सुरति, सुधि, स्मरण ॥ HokGACASSOSORECALCREGNREC , RSSES श्रीभक्तमाल सटीक। ६२० . (२२६ ) श्रीगिरिधरवालजी। (८१६) छप्पय । (७) गिरिधरन ग्वाल, गोपाल कौ, सखा सांच लौ संग कौ ॥ प्रेमी भक्त, प्रसिद्ध गान, अति गद गद वानी। अंतर प्रभु सों प्रीति, प्रगट रहै नाहिन छानी *॥ नृत्य करत आमोद विपिन तन बसन विसारै । हाटक पट हित दान रीमि ततकाल उतारै ॥ “मालपुरै' मंगल करन रास रच्यौ, रसरंग कौ। गिरिधरन ग्वाल, गोपाल कौ, सखा सांच लौ संग कौ ॥१६४॥ (२०) बार्तिक तिलक। श्रीगोपालीदेई के पुत्र श्रीगिरिधरग्वालजी श्रीगोपालजी के सच्चे संगी सखा थे । प्रसिद्ध प्रेमी भन; परम उदार और कवि थे; प्रभु- यश गान करते समय में आपकी अति गद्गद वानी हो जाती थी। आपके अन्तर हृदय की प्रीति छिपाने से भी नहीं छिपती थी; नाम गुणगाते, गुण श्रवणकरते में प्रगटहोजाती थी; जवश्रीवृन्दावन के एकांत वन में प्रेमानन्द से मत्त, गुणगान कर नाचने लगते थे, तब देह के वस्त्र, व देह का भान, भूल जाते थे; जो और कोई भगवयश गान करने लगे, तो रीझ के अपने सुवर्ण के आभूषण और वस्त्र तत्काल उतार के देदेते थे। एक समय "मालपुर" ग्राम में मंगल का करनेहारा रास रचके कराया देखके परम प्रेम रसरंग में पगके घर का सब धन वस्तु प्रभु को भेंट कर दिया। , * "छानी"छन्न-छिपाई, ढाकी । । दो० "प्रेम छिपाए ना छिपे, हो ही जात प्रकाम | दाये ये ना दौ, कम्तृरी की बास ॥' LOCAESEASORLSCRECRGARH , ६२१ में तथा PORAN भकिसुधास्वाद तिलक । दो० "गिरिधर स्वामी पर कृपा, बहुत भई, दशकुंज । रसिक रसिकनीको सुजस, गायौ तिहि रस पुञ्ज ॥" (श्रीध्रुवदास) ग्वाल पदवी आपने श्रीनन्दनन्दनजी के सखा होने से पाई थी। गिरिधरजी कई हुये हैं। एक बरसानेवाले- दो० "बरसाने गिरिधर सुहृद, जाकें ऐसा हेत। भोजन ह भक्कन बिना, धस्यो रहै, नहिं लेत॥" और श्रीवल्लभाचार्यजी के पोते, विठ्ठलनाथ के बेटे श्रीगिरिधर- मूल मूल १३ १ में वर्णित हुए। (८१७) टीका । कवित्त । (२६) गिरिधर ग्याल, साधुसेवा ही को ख्याल जाके, देखि यो निहाल होत प्रीति सांची पाई है । संत तन छूटे हूंते लेत चरणामृत जो, और अब रीति कहौ कापै जात गाई है ।। भये द्विज पंच इकठोरे सो प्रपंच मान्यो, आन्यो सभामांझ कहें “छोड़ो न सुहाई है । जाकै हो अभाव मत लेवौ, मैं प्रभाव जानों मृतक यों बुद्धि ताको बारो" सुनि भाई है ॥ ६२४ ॥ (६) चातिक तिलक । श्रीगिरिधरग्बालजी परम भक्त हुये । आपके चित्त में सदा साधु- सेवा ही का चिन्तवन बना रहा करता था। सन्तों का दर्शन करते ही प्रेमानन्द से निहाल होजाते थे। क्योंकि प्रभु की कृपा से सच्ची प्रीति प्राप्त थी, यहां तक कि साधु का प्राण छूट जाने पर भी चरणा- मृत लेलेते थे, तब सजीव सन्तों में आपकी जैसी प्रीति रीति थी वह कौन कह सकता है ? इस बात को देख सब ब्राह्मण प्रपंच पंचायत और सभा कर श्रीगिरिधरजी को बुलाकर कहने लगे कि "मृतक वैष्णवों का चरणामृत लेना छोड़ दो यह भला नहीं है।" उनके वचन सुन आपको नहीं अच्छे लगे; उत्तर दिया कि "जिसके अभाव हो वह मत ले, मैं तो भगवद्भक्तों का प्रभाव जानता १"ख्याल' =प्रय ल= = =सुरति, सुधि, स्मरण ।। COGESECRECORG SCHOCAL HARIHAR ६२२ श्रीभक्रमाल सटीक। कि वे कभी मरते नहीं, वे तो प्रभु के ध्यान में समा जाते हैं, आप लोग भी सन्तों में से मृतक वुद्धि उठा लीजिये ॥" आपकी वार्ता सुन अच्छे लोगों को बहुत अच्छी लगी॥ (२२७) देवी श्रीगोपालीजी। (८१८) छप्पय । (२५) "गोपाली" जनपोषकों, जगत "जसोदा" अवतरी॥ प्रगट अंग में प्रेम नेम सों मोहन सेवा । कलियुग कलुष न लग्यौ, दासतें कबहुँ न छेवा ॥ वानीसीतल; सुखद, सहज गोविंद धुनि लागी। लेक्षन कला गंभीर, धीर, संतनि अनुरागी॥अंतर सुद्ध सदा रहै, रसिक भक्ति निज उर धरी। "गोपाली" जनपोषकों, जगत "जसोदा" अवतरी॥ १९५॥ (१६) वात्तिक तिलक । श्री "गोपाली" जी हरिभक्त जनों के पोपणं करने के लिये मानों श्री "यशोदा" जी ने अवतार लिया । तन मन में प्रेम प्रगट दीखता था; श्रीमोहनलाल की सेवा पूजा सप्रेम नियम से करती थीं, कलियुगकृत पाप आपके तन मन में नहीं छूगया, और आपने भगवद्दासों से अंतर कपट कभी न किया; वाणी शीतल सुख देनेवाली बोलती, सहजही गोविन्द नाम की धुन लगी रहती थी; शुभ लक्षण, कलाचातुर्य, गाम्भीर्य, धीरता आदिक गुणों से सम्पन्न, और सन्तों में अति अनुरागवती थीं। "श्रीगोपालीजी" का अन्तःकरण सदा शुद्ध रहता था, उस शुद्ध हृदय में आपने वात्सल्य रस की भक्ति धारण की । आपके पुत्र बड़े हरिभक्त हुए। (२२८) श्रीरामदासजी। (८१६) छप्पय । (२४) श्रीरामदास रसरीति सों,भली भांति सेवत भगत॥ SHARECHAkectact .

R भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६.२३ सीतल, परम सुसील, बचन कोमल मुख निकसै। भक्त उदित रवि देखि, हृदै बारिज जिमि विकसै ॥ अति आनंद, मन उमँगि संत परिचर्या करई । चरण धोय, दंडौत, विविध भोजन बिस्तरई ॥ "बछ- वन" निवास, विस्वास हरि, जुगल चरण उर जग- मगत । श्रीरामदास रसरीति सों, भलीभांति सेवत भगत ॥ १६६॥ (१८) वार्तिक तिलक । श्रीरामदासजी परम प्रीति रसरीति से भलीभांति भगवगनों की सेवा करते थे। अति शीतल, परम सुशील, स्वभाव से आपके मुखसे सदा कोमल वचन निकलते थे; जैसे उदित सूर्य को देख कमल विकसते हैं, इसी प्रकार हरिभक्कों को देख अति प्रफुल्लित होते थे, मनमें अति आनन्द उमगा के, संतों की सेवा परिचा इस प्रकार करते थे कि प्रथम दण्डवत् कर चरणों को धो विभव विस्तार से विविध भांति के भोजन कराते थे । बजके "वत्सवन"में निवास कर, श्रीविहारीजी में विश्वासयुक्र जगमगाते श्रीहरियुगल चरणों को हृदय में धारण किया । (८२०) टीका । कवित्त । (२३) सुनि एक साधु आयो, भक्तिभाव देखिवेकों, बैठे रामदास, पूछ "रामदास कौन है ?"। उठे श्राप धोए पांव, "श्रावै रामदास अब, "रामदास कहो ? मेरे चाह और गौन है "॥ "चलौ जू प्रसाद लीजै, दीजै रामदास आनि,” “यही रामदास, पग धारी निज भौन है"। लपटानौ पायन सों, चायन समात नाहि, भायनि सों भस्यौ हिये, छाई जस जौन्ह है ।। ६२५ ॥ (५) वार्तिक तिलक । श्रीरामदासजी की प्रीति रीति साधुसेवा की बड़ाई सुन, एक १"जौन्ह"-उजाला ॥ RECReecRECRECORNESCHECHECHEECICROCH .

ग PRERNETISH श्रीभनमाल सटीका , . साधु भक्तिभाव देखने के लिये आये; श्रीरामदासजी धैठे थे; सो उन्हीं से पूछा कि "रामदास कौन हैं ?" आप उठके सन्त को दण्डवत् कर, चरण धो, बोले कि "अभी आता है रामदास आप चलिये प्रसाद पाइये," सन्त ने कहा कि "रामदास कहां हैं ? उन के दर्शन की मुझे विशेष चाह है, प्रसादादिककी चाह सामान्य है।" तब आपने हाथ जोड़कर विनय किया कि "चलिये प्रसाद पाइये, तव मैं रामदास को बुला दूंगा।" सन्त ने पुनः कहा कि "नहीं रामदास- जी के दर्शन कर, नच पाऊंगा।" तब आप बोले कि "आप अपने गृह में पधारिये, रामदास' यही है ।" साधुजी सुनतेही चरणों में लपट गये, प्रेमानन्द हृदय में नहीं समाता था, और भाव से भर के कहने लगे कि “धन्य आप हैं, आपके यशरूपी चन्द्रमा की जोन्ह (जोन्हाई, उजियारी) जगत् में छा रही है ।।" (०१) टीका | कवित्त । (७) वेटीको विवाह, घर बड़ी उतसाह भयो, किए पकवान नाना, कोठे मांझ धरे हैं। करें रखवारी सुत नाती दिये तारो रहै; और ही लगाये तारौ खोल्यो नहीं डरे हैं । आये गृह संत तिन्है पोट बँध- वाय दई, पायो यों अनन्त सुख ऐसे भाव भरे हैं । सेवा श्रीविहारी- लाल, गाई पाक सुद्धताई, मेरे मन माई, सब साधु उर हरे हैं ॥६२६ ॥ (१) वार्तिक तिलक। आपके गृहमें बेटी के विवाह का बड़ा उत्साह था, वरात के लिये घरके लोग पकवान मिठाई बनवा, कोठेमें रक्खे, ताला दे, पौत्रादिक आपसे डरते, रक्षा करतेथे। सन्तों की एक 'जमात' आई, श्राप गृहके लोगोंका भय छोड़,दूसरी कुंजी लगाकर ताला खोल,सन्तों को सव पकवान की गठरियां बँधवादी; सन्त पाकर अति सुखी हुये; देकर आप भी सुखी हुये। सन्तों के प्रेमभाव से आप ऐसे भरे थे। श्री- विहारीलालजी की सेवा सप्रेम करते थे भोग के लिये पाक रसोई अति स्वच्छता से कर, सन्तों को प्रसाद पवाते थे। आपकी सचाई SAKeCCREECE पुत्र . . FRE K भकिसुधास्वाद तिलक। ६.२५ ने सब सन्तों का मन हरलिया और मेरे मनको अति प्रिय लगी इससे मैंने गान किया है। श्रीरामदास बहुत हुए-एक ये, एक श्रीडाकोर के क्षेत्र के रहने वाले, एक रामदासजी श्रीमीराबाई के पुरोहित, एक चौहान राजपूत, एक समाच के रहनेवाले इत्यादि ॥ (२२६) श्रीरामरायजी। (२२) छप्पय । (२१) विप्र सारसुत घर जनम, रामराय हरि रति करी॥ भक्ति, ज्ञान, बैराग, जोग, अंतरगति पाग्यौ। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मतसर, सव त्याग्यौ॥ कथा कीरतन मगन सदा आनँद रस झूल्यौ। संत निरखि मन मुदित, उदित रवि पंकज फूल्यौ ॥ वैर भाव जिन द्रोह किय, तासु पाग खसि, वें परी। विप्र सारसुत घर जनम, रामराय हरि रति करी ॥ १९७॥ (१७) वार्तिक तिलक। सारस्वत ब्राह्मण के घर में जन्म लेकर, श्रीरामरायजीने भगवत् से प्रीति की । आपका हृदय भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, योग इन साधनों से पग रहा था; और काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर आदि दुर्गुणों को आपने त्याग किया था । श्रीहरिकथा कीर्तन में मग्न होकर सदा आनन्द के रस से झूलते थे। जैसे सूर्य को उदित देख कमल फूलते हैं इसी प्रकार आप सन्तों को देख प्रमुदित प्रफुल्लित होते थे; आपसे जिसने बैरभाव से द्रोह किया उसके सीसकी पाग भूमि में गिर पड़ी। एक समय सज्जनों की सभा में एक धनी दुष्ट आपसे द्रोहकर निन्दा करने लगा, उसकी पाग प्रभुप्रेरणा से अनायास भूमि में १ वै-भूमि ॥ CHECHAKREGNACHIKEKALIS , 5 534 श्रीभक्तमाल सटीक। ६२६ यों गिरपड़ी कि जैसे किसी ने धौल मारा हो । वह अति लज्जित हो, सभा से चलीगया। एक रामरायजी ये, और एक राठौर खेमालरत के पुत्र रामरैन हैं। मूल १५२ । श्रीकन्हरदासजी के महामहोत्सव में, संवत् १६५२ में, सब सन्तोंने मिलकर "गोस्वामी' की पदवी श्री १०८ नाभाजी को दी ॥ श्रीकन्हरदास पर श्रीसोभूरानजी की भी कृपा हुई थी। (२७०) श्रीसोभूरामजी (मूल १६०) ब्राह्मण, श्रीहरिव्यासजी के शिष्य बड़े भन हुए। इनका एक मन्दिरअभीतक उड़ीसा जगा- धरी के पास वर्तमान है । आपके नगर के पास श्रीयमुनाजी वहती थीं। एक चेर बाढ़से क्लेशित हो नगर के लोग आपके पास पहुंचे, आपने आकर श्रीयमुनाजी से विनय, किया कि "माता पुत्रों को पालती है, न कि डुवाती है । यदि ऐसीही रुचि हो तो कुदाल (फावड़े) से मै इधर बढ़ने के लिये आपको मार्ग वनाएं।" सुनके श्रीयमुना- जी प्रसन्न हो हट गई। फिर उधर न चढ़ी ॥ वहांके नगरअधिपति ( हाकिम) ने, शंखध्वनि सुन चाहा कि आप पर कोप करे। उसके मनकी जानकर, आप प्रातःकाल उसके पास पहुँचकर बोले कि यदि मुझसे आपको क्लेश होता है तो जहां आपकी इच्छा हो में चला जाऊो" "हाकिम ने क्षमा मांगी, विनय किया। (२३०) श्रीभगवन्तजी (श्रीमाधवदास के पुत्र)। (८०३) छप्पय । (२०) भगवन्त मुदित उदार जस, रस रसना आस्वाद किय ।। कुंजबिहारी केलि सदा अभ्यन्तर भासै। दम्पति सहज सनेह प्रीति परमिति परकासै ॥ अननि भजन रस रीति पुष्ट मारग करि देखी। विधि निषेध वल त्यागि पागि रति, हृदय विशेखी॥"माधव” सुत संमत रसिक, तिलक दाम धरि सेव लिय । भगवन्त KANCECRUCIActical ++S भकिसुधास्वाद तिलक। ६२७ मुदित उदार जस, रस रसना आस्वाद किय ॥ १६८ ॥ (१६) चार्तिक तिलक। श्रीभगवन्त भक्तजी ने भगवत् का सरस उदार यश अपनी जीभ से आस्वादन किया । श्रीकुंजविहारीजी की केलि आपके हृदय में सदा भासती थी, दंपति श्रीराधाकृष्णजी का स्नेह और परम प्रेम प्रकाशित होता था; अनन्य रसरीति मजन के पुष्ट मार्ग को देखके उसीमें प्रवृत्त थे, और साधारण धर्म अर्थात् विधिनिषेध कर्मों के चलको तजके, विशेष प्रीति से आपका हृदय पगा था; श्रीमाधव- दासजी के पुत्र (भगवन्तजी) ने सन्त सम्मत रसिक, कंठी तिलक धारण कर,भगवत् भागवत सेवा ग्रहण किया ।। (२४) टीका । कवित्त । ( १६ ) सूजा के दिवान भगवंत रसवंत भए, वृन्दावन बासिन की सेवा ऐसी करी है । विप्र के गुसाई साधु कोऊ नजबासी जाहु, देत बहु धन एक प्रीति मति हरी है ॥ सुनी गुरु देव, अधिकारी श्री. गोविंद देव, नाम हरिदास "जाय देखें" चित धरी है । जोग्यताई सीवाँ प्रभु दूध भात मांगि लियौ कियो उत्साह तऊ पेखें अरवरी है ॥ ६२७॥ (३) वार्तिक तिलक। श्रीभगवन्तभनजी आगरे के सूवा के .मुख्य मंत्री, बड़े रसवंत थे। वृन्दावनवासियों की ऐसी सेवा की कि जो ब्राह्मण, गोसाईं, सन्त, कोई 'ब्रजवासी' उनके पास जाता, उसको बड़ी मनोहर प्रीति रीति से बहुत धन देते थे। एक समय श्रीगोविंददेवजी के अधिकारी "श्रीहरिदासजी" भगवन्तजी के गुरुदेव ने आपके यहां जाने का निश्चय किया वे श्रीहरिदासजी योग्यताई के सीमा ऐसे थे कि जिन से श्रीगोविंदजी ने दूध भात मांग के भोजन किया। तथापि आपने श्रीभगवन्तजी * नवाच शुजाउल्मुल्क सूवादार के दीवान ॥ RECAUSAGESECRETORRELEGREGLES دراپ نداء 'ملک در دل اگره *HECCARICHECOGRESCOCCAM श्रीभक्तमाल सटीक। . लोगों से पूछा कि "अरे क्रूर लोगो ! मुझे कहां लिये जाते हो ?" लोगों ने उत्तर दिया कि "जिसका आपनित्य ध्यान करते थे, उसी वृन्दावन को लिये चलते हैं," आपने कहा कि "फेर ले चलो, यह शरीर श्रीवृन्दावन जाने का पात्र नहीं है, वहां जलावोगे तव प्रिया प्रियतम को दुःसह दुर्गन्धि प्राप्त होगी, जो जानेवाला है, सो जीव तो युगल के पास पहुँचेहीगा।" ऐसे भाव के भरे श्रीमाधवदास- जी आगरे में आकर शरीर छोड़ प्रिया प्रियतम को प्राप्त हुये ।। दो० "जे जन रूख विषय रस, चिकने राम सनेह । तुलसी ते प्रिय राम के, कानन वसहिं कि गेह॥ १॥" "भजन भरोसे राम के, मगहर तजे शरीर । अविनाशी की गोद में, विलसैं दास कबीर ॥२॥" (२३२) श्रीलालमती देवीजी। (२८) छप्पय | (१५) दुर्लभ मानुष देह कौ, “लालमती” लाहौ लियौ। गौर श्याम सों प्रीति, प्रीति जमुना कुंजनि सों। बंसीवट सों प्रीति, प्रीति व्रजरज पुंजनि सों। गोकुल गुरुजन प्रीति, प्रीति घन बारह वनं सों। पुर मथुरा सों प्रीति, प्रीति गिरि गोवर्डन सों ॥ वासअटल बन्दा ६ विपिन, दृढ़करि सो नागरि कियौ । दुर्लभ मानुष देह कौ, "लालमती" लाहौ लियौ ॥ १६६ ।। (१५ *) यहां किसी छपी प्रति में एक छप्पय अधिक है; पर किसी लिखी प्रति में वह पाया नहीं जाता ॥ चार्तिक तिलक। देवी श्रीलालमतीजी ने दुर्लभ मनुष्य देह का लाभ भले प्रकार * नोट'-शाहजहां ने तजि दुनियाई । औरंगजेब की फिरीदुहाई"। श्रीधरनीदास, मांझी, सारन, श्रीसरयूतट GES SACREACHEKANCHANG - । . CheckCRACHECCANCECRECIECRERAS भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६३१ लिया। क्योंकि गौर श्याम श्रीराधाकृष्णजी में अति प्रीति थी। जमुनाजी में और जमुना कूल के कुंजों में अति प्रीति, बंसीबट में और ब्रजरज के पुंजों में प्रीति, गोकुल में तथा गोकुल निवासी गुरुजनों में प्रीति, और सघन वारहो वन में प्रीति, पुर मथुरा से प्रीति, और गिरिगोवर्द्धन से प्रीति थी; उस नागरी ने अर्थात् प्रीति- पथ-प्रवीना ने इन सबों की प्रीति से युक्र अचल दृढ़ वृन्दावन वास कर, मनुष्य देह का लाभ लिया । श्रीराधाकृष्ण में प्रीति वात्सल्य भाव से इन्हें थी सो जानिये ॥ मूल १६६ तक गोस्वामी श्रीनाभाजी महाराज समर्थने इतने एक सहस्र से अधिक भक्कों सन्तों के नाम और यश के वर्णन को समाप्त किया। अव शेप १५ में आप कुछ माहात्म्य, विनय, तथा अनुक्रमणिका लिखते हैं। (८२६) छप्पय । (१४) कबिजन करत बिचार बड़ौ कोउ ताहि भनि । कोउ कह अवनी बड़ी जगत आधार फनिज्जै । सो धारी सिर सेस सेस शिव सूषन कीनौ। शिव आसन कैलास भुजा भरि रावन लीनौ ॥ रावन जीत्यौ वालि बालि राघो इक सायक दँड़े। "अगर*" कहै त्रैलोक में हरि उर धरें तेई बड़े ॥ २०० ॥ (१४) धरणी, श्रीशेषजी, श्रीशिवजी, कैलास, रावण, बालि, श्रीराघव रामचन्द्रजी, क्रम से एक से एक बड़े, पर श्रीअग्रजी कहते हैं कि तीनों लोकमें श्रीराघव को जो हृदय में धारण करता है सोई सय से बड़ा है, उन्हीं को भेजना चाहिये ॥ (20) छप्पय । (१) हरि सुजश प्रीति हरिदास कैं,त्यौं भावै हरिदास- * बोध होता है कि श्रीअग्रदासजीके इन छप्पयों को श्रीनाभास्वामीने परम उत्तम मंगलप्रद जानकर यहा स्थ न दिया है अथश मंगल के लिये अपने ही इन छन्दों में "श्रीअनजी का छाप दे दिया है । इति शुभ || SECREA .

15 S * श्रीभकमाल सटीक । १३२ , जस ॥ नेह परसपर अघट निवहि चारों जुग आयौ। अनुचर को उतकर्ष स्याम अपने मुख गायौ ॥ श्रोत प्रोत अनुराग प्रीति सवही जगजानैं। पुर प्रवेश रघुवीर भृत्य कीरति जु बखाने । अगर अनुग गुन बरनते सीतापति नित होय बस । हरिसुजश प्रीति हरिदास कैं, त्यों भावै हरिदासजस ॥२०१॥ (१३) पार्तिक तिलक । श्रीभगवान् हरिका सुयश सुनने में जैसे हरिदासों की प्रीति है, ऐसेही अपने दालों का सुयश (भकमाल ) सुनने में श्रीहरिकी भी प्रीति हैश्रीभगवत् और भगवद्भकों का परस्पर अघट एक रस स्नेह कृतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग, इन चारों युगों में निवह आया, और जैसे भक्त लोग भगवत्की कीर्ति कहते हैं तैसे ही भगवान् भी अपने भक्तों की कीर्ति कहते हैं, सो देखिये "भागवत एकादश" में उद्धव के प्रति श्रीकृष्णचन्द्रजी ने अपने अपने अनुचरों (भक्नों) के उत्कर्ष अर्थात् अतिशय यश अपने मुखसे गान किये हैं, और प्रभु श्रीरघुबीरजीने भी (जब वन से आकर श्रीअवधपुर में प्रवेश करने लगे तब) श्रीभरत वशिष्ठ सुमन्त्र आदिकों से अपने भृत्य हनुमत्, सुग्रीवादि वानरों की कीर्ति श्रीमुख से वखान की है । इसप्रकार भगवत्का भक्कों के विषय अनुराग और भक्कों की भगवत् में प्रीति ओत प्रोत है सो सम्पूर्ण जगत् जानता है। श्रीअग्रस्वामी कहते हैं कि दासों के गुण वर्णन करने से तथा सुनने से श्रीसीतापतिजी नित्यही वस होते हैं इससे वर्णन करना चाहिये ॥ श्लोक भागवते। "निरपेक्ष मुनिं शांत निर्वैरं समदर्शनम् । अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूर्वयेत्यंघिरेणुभिः ॥ साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् । मदन्यं ते न जानन्ति नातेभ्यो मनागपि ॥" RECTESCORKEEGREAKECHECRECOcto ..

। R भक्तिसुधास्वाद तिलक । ६३३ तथा वाल्मीकीयरामायणे । "सख्यं च रामः सुग्रीवे प्रभावञ्चानिलात्मजे । वानराणाश्च तत्कर्म त्वाचचक्षे च मंत्रिणाम् ॥" चौपाई। "ये सब सखा सुनहु मुनि मेरे । भये समर सागर कहँ बेरे ॥ मम हित लागि जन्म इन हारे । भरतहुँ ते मोहिं अधिक पियारे॥" (३१) छप्पय । (१२) उतकर्ष मुनत संतनि कौ, अचरज कोऊ जिनि करौ॥ दुर्वासा प्रति, स्याम दासबसता हरि भाषी। ध्रुव, गज. पुनि प्रह्लाद, राम, शवरी फल साखी ॥ राजसूय जदुनाथ चरण धोयजूंठ*उठाई।पांडव विपति निवारि, दियौ विष विषया पाई ॥ कलि विशेष परचौ प्रगट, आस्तिक ढकै चित धरौ । उतकर्ष सुनत संतनि कौ, अचरज कोऊ जिनि करौ॥२०२॥ (१२) * "जवते रसखानि विलोकत ही, तयते कछु और न मोहिं सोहातो। प्रीतिकी रीति में लाज कहां, कछु है सो बड़ो यह प्रेमकै नातो ॥" वार्तिक तिलक। श्रीभक्तमालकार स्वामी सवसे कहते हैं कि सन्तोंका उत्कर्ष अर्थात् उत्तम प्रताप प्रभाव प्रभु के दिये परचो आदिक सुनके कोई आश्चर्य मत करो कि “यह कैसे हुआ ? हमारे मन में नहीं आता।" देखो चारों युगों में भगवान ने अपने भक्तोंकी रक्षा की, और उनके साथ अनेक आश्चर्य चरित्र किये । दुर्वासाजी से श्रीनारायणभगवान् जीने श्रीमुख से कहा कि “हे मुने | हम अपने भक्तोंके आधीन, और उनके वस.हैं।" और देखो ध्रुवजीपर कैसी कृपां की और गजराजकी कैसी रक्षा की, प्रह्लादभन के लिये किस प्रकार खंभा फाड़ के PARECRUCUON KUCINGINGRECIPES * ६३४ श्रीभक्तमाल सटीक। - नृसिंहरूप धारण किया और श्रीरघुनन्दनजी ने श्रीशबरीजीपर कैसी कृपा करके फल खाये तथा उनके चरणों से जल शुद्ध किया, और माता के समान मानि परमपद दिया। ये सब भक्त साखी दे रहे हैं श्रीयुधिष्ठिरजी के राजसूय यज्ञ में श्रीयदुनाथ (कृष्ण) जीने भकों के चरण धोये और जूंठेपाने उठाये, फिर पाण्डवों की विपत्ति नाश की, ऐसेही श्रीचन्द्रहासभा ने विष के पलटे विपया स्त्री पाई, इसप्रकार कृतयुग, त्रेता, द्वापर के भक्तों की कथा पुराणों में प्रसिद्ध है; और कलियुग में विशेष भकों के परचौ प्रगट जो हम ( श्रीनाभा- स्वामी) ने गान किया है जैसे पृथ्वीराजको प्रभु ने द्वारका से आकर दर्शन दिया, नामदेव के हाथ से दूध पिया, कर्माकी खिचड़ी खाई, त्रिलोचनमक के घर में रह के चौदह महीने सन्तसेवा की, सदावती- भनका बेटा मरगया जला दिया और फिर आगया; इत्यादिक (2 और आज भी श्रीहरिकृपा विशेष अलोकिक अनुभूत होही जाती है,)सो श्रीहरिकृपा में आस्तिक होकर वित्त में विश्वास धारण कर सुनो और भक्तिपथ में चलो। (34 फल स्तुति ) ( 33 ) दोहा । (११) पपादप पेड़हिं सींचते, पावै अँग अँग पोष। पूरवजा ज्यों बरनते,सवमानियो सँतोष॥२०३॥(११) वार्तिक तिलक । श्रीनाभास्वामीजी ने जिन सन्तों के यश इस ग्रंथ में नहीं वर्णन किये उनसे तथा मागे होनेवाले सन्तों से प्रार्थना करते हैं। कि जैसे वृक्ष के मूल को सींचने से उसके स्कंध शाखा आदिक सब अंग पुष्ट और हरित होते हैं ऐसे ही पूरवजा की नाई अर्थात् दो- पहर के पीछे की छायाजैिसे छोटी से बढ़ती जाती है वैसेही अपनी प्रीति श्रद्धा बढ़ा के आपके पूर्वज श्रीप्राचार्य गुरुजन यश जो मैंने वर्णन किये उसी में आप सबभी अपने तई सम्मिलित समझकर संतोष मानिये और मुझ पर प्रसन्न हूजिये । GENCELLEGuesteCRECE मूल पुरुषों के Para I भक्तिसुधास्वाद तिलक । ६३५ (८३३ ) दोहा । (१०) भक्त जिते भू लोक मैं, कथे कौन पै जाय। समुंदपान श्रद्धा करै,कहँचिरिपेटसमाय॥२०४(१०) वार्तिक तिलक । भूलोक में जितने भगवद्भन हैं वे सब किससे कहे जा सकते हैं ! जैसे सब समुद्रों का जल पी लेनेकी कोई चिरि (चिड़िया ) श्रद्धा करे तो क्या यह हो सकता है ? ॥ (३४) दोहा । (६) श्रीमूर्ति सबवैष्णवलघु, दीरघगुणनि अगाध । आगे पीछे वरनते, जिनि मानौ अपराध ॥२०५ (६) वार्तिक तिलक । श्रीनाभास्वामीजी सब वैष्णवों से प्रार्थना करते हैं कि "प्राप सव श्रीभगवत्, शालग्रामजी की मूर्ति हैं, सो जैसे शालग्रामजी की मूर्ति और श्रीतुलसीदल बड़ा होय या छोटा हो पर उनका गुण माहात्म्य सबोंकाही अथाह है। ऐसे ही, आप सबका गुण माहात्म्य अथाह है, किसीका आगे किसीका पीछे वर्णन हुआ है, सो कृपा करके यह पहले पीछे वर्णन का दोपन मानियेगा,क्षमाकीजियेगा।" (३५) दोहा । (3)' फल की सोभा लाभ तरु, तरुसोभा फल होय। गुरू शिष्य की कीर्तिम,अचरजनाही कोय॥२०६ (5) चार्तिक तिलक । जैसे वृक्ष में लगे रहने से फलों को शोभा मिलती है, और फलों से वृक्ष को भी अधिक शोभा प्राप्त होती है ऐसेही गुरु शिष्य की कीर्ति में है अर्थात् गुरुरूपी वृक्ष से फजरूपी शिष्य को कीर्ति शोभा प्राप्त होती है और फारूपी शिष्यों से गुरु वृक्ष को अधिक कीनि शोभा मिलती है, इसमें कोई आश्चर्य नहीं। दोनों पिछले छप्पय भी देखिये ॥ १ 'सर"-समुद्र सागर ॥

ASTRATION श्रीभकमाल सटीक। ६३६ (८३६)दोहा । (७) चारि जुगन मैं भगत * जे, तिनके पदकी धूरि। सर्वसु सिर धरि राखिहौं, मेरो जीवन मूरि॥२०७। (७) वार्तिक तिलक। चारों युगों में जो भगवद्भक हुए हैं, और होंगे, उन सबोंके चरणों की धूलि में अपने सीस पर धारण कर रक्तूंगा, क्योंकि वही मेरा धन प्राण सर्वस्व और जीवनमूरि है ।। "सियकन्त ! तेरी मोहनि मूरत पै वारी हूं। तुम मेरे प्राणनाथ में दासी तुम्हारी ॥" (-३७ ) दोहा । (६) जग कीरति मंगल उर्दै, तीनो ताप नसायँ । हरिजनको गुण वानते,हरिहृदिअटलवसायँ २०८॥६ इसे मनस्थ कीजिये। वार्तिक तिलक । श्रीहरिजनों के गुण वर्णन करना परम साध्य है, जो कोई हरि- भक्नों का गुण वर्णन करता है उसके तीनों ताप नाश होते हैं और जगत् में कीर्ति तथा मंगल का उदय होता है, और उसके हृदय में श्रीहरि अचल निवास करते हैं। दो. "सवहि कहावत राम के, सवहि राम की भास । राम कह जेहि "आपनो", तेहि भजु तुलसीदास ॥" (८३% ) दोहा । (५) हरिजन को गुण वरन ते, जो करै असुया आय। इहां उदर वाट्टै विथा, औ परलोक नसाय॥२०६॥(५) वार्तिक तिलक। श्रीहरिजनों के गुण यश वर्णन करने में श्रीभकमाल की कथा * श्रीलालदासजी यमुनातटनिवासी के चरणों में दागशिकोह। पुण्यपुंज को बड़ी श्रद्धा थी। (श्रालमगीर spite को शाप सा दिया था)। ALESEASEKAS GER ६३७ भकिसुधास्वाद तिलक। कहते सुनते में, जो कोई दुष्ट आकर असूया (निन्दा कुतर्क ) करता है, उसके पेट में, इस लोक में जलंधर, शूल, आदिक रोगों की व्यथाएँ बढ़ती हैं, और परलोक भी नष्ट होजाता है । श्लो० "यो हि भागवतां लोके उपहासं द्विजोत्तम । करोति तस्य नश्यन्ति धर्ममर्थायशः सुताः ॥ १ ॥ निन्दां कुर्वन्ति ये मूढा वैष्णवानां महात्मनाम् । पतन्ति पितृभिस्सा महा रौरवसंज्ञके ॥ २॥" चौपाई। "होहिं उलूक सन्त निन्दारत । मोहनिशा प्रियज्ञानभानु मत ॥" "सन्तद्रोह, प्रीति मोहूं सों, मेरो नाम निरन्तर लैहै । अग्रदास भागात वदत है, मोहिं भजत, पर यमपुर जैहै।" (८३६) दोहा 1 (४) जौ हरि प्राप्तिकी आस है, तौ हरिजन-गुन गाय। नतरुसुकृत मुंजे वीजज्यों, जनमजनम पछिताय २१० इसे कभी नहीं भूलिये ॥ वार्तिक तिलक। जो श्रीहरिरूप प्राप्ति होने की आशा किसी को होय नो श्रीहरि:- भक्कों के गुण यश सप्रेम गान करे (श्रीभकमाल पाठ करे) इससे श्रीहरि अवश्य मिलते हैं । और जो श्रीभगवद्भकों के सुयश का निरादर करके और अनेक सुकृत धर्मकर्मों का पास करता है तो, जैसे भूजा वीज (अन्न) भूमि में चोने से जमता नहीं है वरञ्च सड़ जाता है, ऐसे ही उसके सुकर्म भी व्यर्थ होजाते हैं। वह प्राणी जन्म जन्म पश्चात्ताप करता है और करेगा। प्रियपाठक ! यह समझने की बात है। (८४०) दोहा । (३) भक्तदाम संग्रह, करै, कथन, स्रवन, अनुमोद। सो प्रभु प्यारौ पुत्र ज्यौं, बैठे हरि की गोद ॥२११॥(३) स ६३८ श्रीभक्तमाल सटीक। . . . वार्त्तिक तिलक । श्रीभक्कदाम ( "भनमाल" ) इस ग्रन्थ को जो कोई प्रेमपूर्वक कहेगा और सुनेगा तथा संग्रह अनुमोदन करेगा अर्थात् भाव और अर्थ विचार के आनन्दित होगा सो प्रभु के पुत्र के समान प्यारा होगा, और श्रीहरि के गोद (अंक)में बैठेगा। ६ यह श्रीनाभा स्वामीजी कृत आशीर्वाद है ।। श्लो. "तिष्ठते वैष्एवं शास्त्रं लिखितं यशमन्दिरे। तत्र नारायणो देवः स्वयं वसति नारद ॥१॥" (४१) दोहा । (२) अच्युतकुलजस यक बेरहुँ, जाकी मति अनुरागि। उनकी भक्तिमुकृत को, निहचै होय विभागि११२॥२ वार्तिक तिलक। इस अच्युत कुल (वैष्णवों) के यश में एक घर भी जिसकी मति ने अनुराग किया, अर्थात् प्रेमपूर्वक कथन या श्रवण किया, सो अनुरागी इन सब सन्तों के भक्ति भजन सुकृत का विभागी होगा अर्थात् अवश्य भाग पावेगा इसमें सन्देह नहीं है । (८४२) दोहा । (१) भक्तदाम जिन जिन कथी, तिनकी जूठनि पाय। मों मतिसार अक्षरहै, कीनौं सिलौ बनाय २१३(१) वार्तिक तिलक । जिन जिन महानुभावों वाल्मीकि शुकादि ने भगवद्भक्तों के सुयश की माला कही है उन्हीं की जूठनि पायके मेरी मति सारांश उच्चशिला बनाकर चुन विन के दो चार अक्षर और मिला के भक्क- माल बना दी है । (आपकी दीनता है)। (८४) दोहा । (०) काहू के वल जोग जग, कुल करनी की आस। mediated Okes *भजन ॥

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Asix भनिसुधास्वाद तिलक। ६३६ भक्तनाममालाअगर, उर(वसो)नारायणदास२१४(०) इतिमूल भक्तमाल वार्त्तिक तिलक। किसी को योग का बल है और किसी को यज्ञ का बल है और किसी के कुल का वल है तथा किसी को अपनी करनी के फल की आसा है परन्तु मेरे तो योग यज्ञ कुल करनी किसी की भी प्रासा नहीं है, केवल यही आस है कि अनन्तश्रीगुरु अग्र स्वामी की कृपा से मुझ नारायणदास (नाभा) के हृदय में श्रीअग्रदेव तथा यह भक्त नाम-माल वसैं (या, वसे हैं)॥ इति श्रीमद्रामानन्दीय वैष्णव श्री १०८ अग्रदेवशिष्य नाभाख्य (सियसहचरी) श्रीनारायणदास ग्रथिता भगवद्भक रत्नमाला सटीक सतिलक समाप्ता, श्रीभगवत्प्रीयताम् ।। श्रीगोविन्ददासजी (छप्पय १६२) को स्वयं श्रीनाभा स्वामी जी ने यह “भननाममाला" पढ़ाई ( "तसनीफ रा मुसन्निफू नेको कुनद् वयां") टीकाकर्ता श्रीप्रियादासजी अब आगे वर्णन करते हैं कि- कवित्त । रसिकाई कविताई जीन्ही दीनी तिनि पाई भई सरसाई हिये नव नव चाय हैं । उर रंगभवन में राधिका रवन वसे लसें ज्यों मुकुर मध्य प्रतिबिंब भाय हैं ॥ रसिक समाज में विराज रसराज कह चहें मुख सब फूले सुख समुदाय हैं । जन मन हरि लाल मनोहर नांव पायो उनहूं को मन हरि लीनौ ताते राय हैं ॥ ६३०॥ इनहीं के दास दास दास प्रिया दास जानो तिन ले चखानो मानौ टीका सुखदाई है । गोवर्द्धननाथ जू के हाथ मन पस्यो जाको करयो वास वृन्दावन लीला मिलि गाई है।मति उनमान को लह्यो ELECSCRACKINGEReectCKROORS FOR *** श्रीभक्तमाल सटीक। मुख संतनि के अंत कौन पावै जोई गांव हिय आई है। घट बढ़ जानि अपराध मेरौ क्षमा कीजै साधु गुणग्राही यह मानि मैं सुनाई फून जाते बार्तिक तिलक। श्री ५ मियादासजी कहते है कि- मेरे गुरुदेवजी (श्रीमनोहरदासजी) स्वयं बड़े कवि और भारी रसिक तो थे ही, वरन ऐसे महात्मा थे कि आपने जिसको जिसको कृपा करके कविताई तथा रसिकाई दी, उस उसने भी पाई तात्पर्य यह है कि ये दोनों वस्तु श्रीगुरुदेवप्रसाद से मुझे भी मिलीं; हृदय में सरसता के नये नये उत्साह हुए । श्रीगुरुदेवजी के हृदय- रूपी रंगभवन में श्रीराधिकारमणजी इस प्रकार विराजते थे कि जैसे दर्पण रूपका प्रतिबिंव विराजता है। आप रसिकमण्डली के मध्य में विराजमान होकर जब रसराज (शृङ्गार ) कहते थे, तव सब सज्जन सुनके आपके मुखकी ओर देख देख मुख से फूल थे। श्रीलालजी ने तो अपने जनों के मन हर लेने से "मनोहर" नाम पाया, पर मेरे गुरु भगवान्जी ने श्रीमनोहरलाल का भी मन हरलिया, इससे सच्चे “मनोहरराय" थे ॥ ६३० ॥ अब टीकाकार दो चरणों में तो परोक्ष और दो चरणों में प्रत्यक्ष विनय सज्जनों से करते हैं कि-जानिये कि इन्हीं श्रीमनोहरराय के दासों के दासका दास प्रियादास है किजिसनेश्रीभकमाल की यह सुख देनेवाली टीका बखान की है और जिसका मन श्रीगोवर्द्धननाथजी के हाथों में पड़ गया, इसी से श्री वृन्दावन में वास करके यह भगवत् भागवतों की मिलित लीला जिसने (मुझ प्रियादास ने ) गान की । सो, मैंने जिस प्रकार सन्तों के मुख से सुना वैसा ही अपनी मति के अनुसार गाया। सन्तों के चरित्र का अन्त कौन पा सकता है ? कि सम्पूर्ण गान करै, जितनी हृदय में आई उतनी कथा मैंने गान की (गाई)सन्तों की इन कथाओं के कहने में जो घटी बढ़ी हो गई हो,सोमेरा अपराध आपकृपा करके क्षमाकीजियेगा। क्योंकि साधु लोग केवल गुणों ही को ग्रहण करते हैं, अवगुण में दृष्टि नहीं RKERCANCHECRECRUCRGECHECK न * भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६४१ देते। ऐसा समझ के मैंने यथा मति कथा सुनादी है ।। ६३१ ॥ कवित्त । कीनी भकमाल सुरसाल नाभा स्वामी जू नै तरे जीव जाल जग जन मनजोहनी । भक्ति रस वोधनी सो टीका मति सोधनी है वांचत कहत अर्थ लागे अति सोहनी ॥ जो पै प्रेम लक्षना की चाह अवगाहि याहि मिटै उरदाह नैकु नैननिहूं जोहनी । टीका और मूल नाम भूल जात सुनै जब रसिक अनन्य मुख होत विश्वमोहनी ॥ ६३२॥ नाभा जू कौ अभिलाष पूरन लै कियो मैं तो ताकी साखी प्रथम सुनाई नीके गाइकै । भक्ति विस्वास जाके ताही कों प्रकाश कीजे भी रंग हियो लीजै संतनि लड़ाइकै ॥ संवत प्रसिद्ध दस सात सत उन्हत्तर फालगुन ही मास बदी सप्तमी बिताइक। नारायणदास सुख रास भक्रमाल ले के प्रियदास दास उर बसौ रही छाइकै ॥ ६३३॥ भगिनि जरावी लेके जल में बुड़ावा भावै सूली पै चढ़ावी घोरि गरल पिवायवी । वीलू कटवावौ कोटि सांप लपटावी हाथी आगे डरवावी ईति भीति उपजायवी ॥ सिंह पै खवावी चाहो भूमि गड़वावौ तीखी अनी विधवावो मोहि दुख नहीं पायवी । ब्रजजन- प्रान कान्ह बात यह कान करौ भक्ति सों बिमुख ताको मुख न दिखायवी ॥ ६३४॥ इति" भक्तिरसघोधिनी वार्तिक तिलक । श्रीनामा स्वामी कृत सुन्दर रसाल भनमाल जो भक्तजनों के मन चुभ जाती है, और जिस को कथन, श्रवण करके अनेक जीव जगत् से तर जाते हैं, उसी श्रीभक्तमाल की यह "भक्तिरस * "ति"-(श्लोक) अतिवृष्टिनापिकाशलमा शुभाः । स्थव परचक्र च सप्तैता ईतयः स्मृताः ॥ १॥" अर्थात् अत्यना वर्षा का होना, पों का नहीं होना,चूहोंका उपद्रव,दिड़ियों का उपद्रप,और शुकादि चिड़ियानाका उपद्रम,आपस का द्रोह, पराए किसी का अत्याचार, इन सातों को, स्मृतियां कहती है कि, इति" यही है। PACES ote ।का। " จ ॐॐARH श्रीभक्रमाल सटीक । ६४२ 1 । बोधिनी" टीका मति को शुद्ध करनेवाली है । इसको पढ़कर अर्थ कहने में अतिही सुहावनी लगती है । जो कदाचित् किसी को प्रेम लक्षणा भक्ति की चाह हो, और इस टीका को मानसिक नेत्रों से देख के अवगाहे अर्थात् इसमें प्रवेश करे, तो अवश्य उसके हृदय की ताप मिट जाय, और प्रेमाभक्ति को प्राप्त हो। इसको सप्रेम सुनने में टीका और मूल का नाम भूल जाता है, यह भेद नहीं बूझ पड़ता कि हम मूल सुन रहे हैं कि टीका । और, भगवत् रसिक अनन्यों के मुख से तो इसकी कथा विश्वमोहिनी हो जाती है ॥ ६३२॥ श्रीलालप्यारी प्रियदासजी कहते हैं कि श्रीनाभा स्वामीजी का अभिलाप मैंने पूर्ण किया। उस अभिलाष की साक्षी मैंने प्रथम ही प्रारंभ में भले प्रकार गान करके सुना दी है । जिसको भगवद्भक्ति में विश्वास हो, उसी को यह ग्रंथ प्रकाश करना (सुनाना ) चाहिये, अभक अविश्वासी को नहीं; भनियुक्त को सुनाने से उसका हृदय प्रेमरंग से भीग जायगा तब प्रेम लाड़ लड़ाके सन्तों की सेवा करेगा। प्रसिद्ध विक्रमीय संवत् १७६६ (सत्रह सौ उन्हत्तर) के फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को टीका (भनिरसबोधिनी) पूर्ण हुई। टीकाकार (श्री ५ प्रियादासजी) प्रार्थना करते हैं कि "हे श्रीनारायणदासजी स्वामी (श्री १०८ नाभा स्वामी)! अपनी सुखरास भक्तमाल लेके मुझ प्रियादास को अपना दास जानकर मेरे हृदय में बस के छा रहिये"॥६३३॥ अन्त में, श्रीप्रियादासजी कहते हैं कि हे प्रभो मेरे जन्म जन्मान्तरीय दुष्कर्म पातकों से जो आपकी इच्छा हो, तो चाहे मुझे अग्नि में जला दीजिये, जल में डुबा दीजिये, सूली पर-चढ़वा दीजिये, हलाहल विष घोर के पिवा दीजिये, बहुत से विच्छुओं से कटवा दीजिये, इत्यादि इत्यादि, परन्तु करुणानिधे ! आपकी भक्ति से जो विमुख हो उसका मुख मुझे कभी मत दिखलाइये। यही मेरी प्रार्थना है, प्राणनाथ !! ६३४ ॥ इति श्री "भक्करसबोधिनी" टीका' समाता ॥ KOPASKIRKSHOCHES SACRECRURES E भनोंकी नामावली। *श्री: * चौवीस निष्ठाओं में विभक्त २६६ भक्तों की नामावली। (मुन्शी तुलसीरामके विचारानुसार) (१) अर्चा प्रतिमा निष्ठा, १७ भक्त | १ अल्हजी (रसाल वृक्ष) ४६४|११ रामदासजी एकादशी २ अल्हजी कोल्हजी ८०१ डाकोर ४५६ ३ कर्मानन्दजी १२ सदनजी सघना ६३७ ४ कोल्हजी अल्हजी १३ सन्तदास प्रबोधवंश ७५० ५ चन्द्रहासजी १४ स्वामी गोपालजी ४५३ ६ जगन्नाथ थानेश्वरीजी ६२२ १५ सिलपिल्ले की भवा ४०८ ७ देवा पंडाजी ४४० ८धनाजी ५२८/१६ सिलपिल्ले की भक्ता है नामदेवजी १४११ सुता जमींदारकी ३२८ १. पृथीराजजी हरिमन्दिर ८०६१७ सीवां जी (0) अहिंसा दया, ६ भक्त । १ केवलरामजी(लकीसाटी)८८२ ५ शिविराजा १७३ ४३७ ६ हरिव्यासजी देवी से ३ मयूरध्वजजी ताम्रध्वज १७७, ४ रांगाजी (कुम्हार) રૂ (३)श्रात्मनिवेदन, शरणागति, १० भक्त । १ अक्रूरजी २११६ ३ ग्राह २गजजी १३२| ४ जटायूजी महाराज ६४ Ste २ भुवन चौहानजी १३६ ॐ श्रीभकमाल सटीक। ६४४ ५जगन्नाथ ८२३ ६ भानजा मा ४२३ ६ ध्रुवजी महाराज १२८/१० मा भानजा ४२३ ७विभीषणजी महाराज ८५११ लक्ष्मण भट्ट विन्ध्यावलीजी १७६/१२ राघवानन्द स्वामी ३०३ (४) उपवास व्रत, २ भक्त । १ अम्बरीषजी महाराज ६६) २ रुकमांगदजी (५) कर्मधर्म निष्ठा, ७ भक्त । १ दशरथजी चक्रवर्ती ७० ४ भीष्मजी ७३ २ दधीचिजी १७६ ५ सुधन्वाजी सुरथजी १७१ ३ बल्लिजी ७३ ।। ६ सुरथजी सुधन्वाजी १७१ २१३।। ७ हरिश्चन्द्रजी महाराज १७० (६) कीर्तन निष्ठा, १६ भक्त । १ कमलाकरभट्टजी ५६४/१० वर्द्धमानजी गंगलजी ५८६ २ कृष्णदासजी चालक ७४६/११ वालमीक महर्षिजी १५३ ३ गंगलजी वर्द्धमानजी ५८६/१२ भट्टजी ५७० ४ चतुर्भुज मुर्लीधर ७४५१३ मथुरादासजी ८२४ ५ जयदेवजी महाराज ४, ६ तुलसीदास गोस्वामीजी १४ शुकदेवजी परमहंस ७४, भक्तमालसुमेर सचित्र ७६२/ ७नन्ददासजी ४६३ । ७०२ २२६) नारायणमिश्रजी ७८८१५ सुखानन्दजी ह परमानन्दजी सारंग ५६५/१६ सूरदासजी ५६३ (७) गुरु निष्ठा, १० भात । १ खोजीजी ६४२ ३ गुरुनिष्ठ शिष्य ४७५ २ गजपति रुद्रप्रतापजी ६५६ ४ घाटमजी- ६५२ भकोंकी नामावली। ६४५ ५ चतुर स्वामी (स्त्री भेंट) ८३२/१० पृथ्वीराज कछवाहा ७३० ६ जीवाजी तत्वाजी ५४२/११ राघोदासजी दूवले ७८६ ७ तवाजी जीवाजी ५४२ रुद्रप्रतापजी गजपति ६५६ ८ नरवाहनजी ६६६१२ विष्णुपुरीजी ३८४ है पादपद्मजी २८५ (०) दया अहिंसा (अहिंसा दया )२ ८) दास्यनिष्ठा १६ भक्त। १ अंगदजी २४५/१० प्रयागदासजी ८६६ २ कल्यानसिंहजी ६१२ ११ भगवानभनजी ६११ ३ केशव लटेराजी ८८१ ४ खेम गुसाई ५८६१२ रामरायसारस्वतविप्र १२५ ५ खेमाल राजा ७३८,७४४/१३ रैदासजी महाराज ४७७ ६ गोपालभट्टजी गुसाई ६२०१४ रंगजी ७दिवाकर भोलारामजी ५७४ १५ सोतीजी पीपाजी ८६७ ४६८ ६ प्रह्लादभक्तराजजी ७०१६ हठीनारायणजी १६७८ संवत २०८ (0) धर्म कर्म (कर्म धर्म (६) धर्म प्रचारक २१ भक्त। १ अगस्त्यजी २१६/ ८ निम्बार्क स्वामीजी २६५ २ कृष्णदासजी पयहारी ३०८६ पयहारी कृष्णदासजी ३०८ ३ कृष्णचैतन्य नित्यानन्द ५५६/१० वल्लभाचार्यजी ४गोविन्ददासजीभकमाली६१६११ विष्णुस्वामी २७५ ५. चतुर्भुजजी ७४५/१२ ब्रह्माजी जगत्पिता ६ नारायणभट्टजी ५६५१३ माधवाचार्यजी २७६ ७ नित्यानन्दकृष्ण चैतन्य ५५६१४ श्रीरामानन्दस्वामी २८७ KakisteotesNISTER Ste RSS श्रीभक्तमाल सटीका ६४६ . . १५ रामानुजस्वामी २६७१६ सनातनजी रूपजी ५६७ १६ रूपजीसनातनजी ५६७२० सोभूरामजी १७ शिवजीआशुतोष ६७२१ हरिव्यासदेव १८शंकराचार्यजी ३२२२२ हितहरिवंशजी (१०) धामनिष्ठा ८ भक्त। १ काकभुशुंडिजी ८१ ५ भूगर्भ गुसाई ६२६ २ काश्येश्वरजी ६४०, ६ मधुगुसाई ६२४ ३ प्रबोधानन्द सरस्वती ८६६/७ लालमतिदेवीजी ६४२ ४भगवन्तदीवानमाधवसुत:२६, ८ हरिदासजी तोलनेवाले भुशुंडीजीकाक (वनिक) ८४६ (११) नाम ७ भक्त। १ अजामेलजी ७५ ५ पंद्मनाभजी २ अन्तरनिष्ठ राजा ४७२/ ६ ब्राह्मण एक ३ अन्तरनिष्ठ की रानी ४७२/ ४ कबीरजी साहिब ४८५ ७ ब्राह्मणी (0) प्रतिमा अची (१) (१२) प्रेम १७ भक्त। १ अम्बरीषजी और ७ नारायणदासजी नृतक ८२७ उनकी रानी विट्ठलदासजी चौवे ५८७४ २ कात्यायनी देवीजी ५६ ६ विदुरजी ३ कृष्णदासजी नूपुरप्राप्त ८६७१० विदुरानीदेवीजी ४ कृष्णदासजी ब्रह्मचारी ६२५११ भनदास कुलशेखर ३६८ ५गदाधर भट्ट ६६३१२ माधोदासजी (गढ़ागढ़)७०४ ६ जसोधरस्वामीजी दिव १३ मुरारिदासजी (विलोंदा)७५७ दास वंशी ७०१/१४ रतिवन्तीजीदेवी Soad ४६८१ ७५६ । ।

SEX भक्तोंकी नामावली। ६४७ २७८ ४२८ २५२ MORE १५ लीलानुकर्ण (नीलाचल)४०१,१७ सुतीक्षणजी प्रेमसिन्धु २१८ १६ सवरीजी महारानी (०) व्रत उपवास (४) (१३) भेप ८ भक्त। १ गिरिधरग्वाल (तीर्थ ) ६२० राजा(भाइसन्तसनमान)४७० २ चतुर्भुजराजा (करौली) ७१३ ७ लालाचार्यजी(जामात ३ भगवानदासजी(मथुरा),११' वर्वरमुनि) ४ मधुकरसाहजी(ओड़छा)७३७ ८ हंस पक्षी ५ रसखानजी मालाधारी (१४) महाप्रसाद ४ भक्त। १ भंगदसिंहजी(कलियुग)७०६) सप्तद्वीप के भक्त २ पुरुषोत्तमपुरी के राजा ४०३ ४ सुरसुरानन्द स्वामी ५३५ ३ श्वेतद्वीप भक्न (खग)जी२५६/ श्रीसुरसुरी ५३६ (१५) माधुर्य शृङ्गार २० भक्त। १ अग्रदेव स्वामीजी ३१८११ जसवन्तजी २कमतीदेवीजी ८५७१२ नरसीमेहताजी ६८० ३ कन्हरदासजी (वोड़िये) १३ बनवारी रसिक रँगीले ७८७ ४ कल्यानजीधर्मदाससुत १४ बिल्वमंगलजी, ३७३ ५ कील्हजी स्वामी ३१५/१५ मानदासजी ६ कृष्णदासजी पंडित ६२५१६ मीराबाईजीदेवी ७ केशवभट्ट काश्मीरी ५६५/१७ रत्नावलीदेवीजी ८ गुहनिषादजी प्रेमी १८७१८ लोकनाथजी गोसाई ६२३ ६ गोपालभट्टजी ६२०१६ सूरदास मदनमोहन ७५१ १० गोपिका वृन्द श्रीब्रजकी १५०/२० हरिदासजीरतिक 4 ७८२ RSS ६४८ श्रीभक्तमाल सटीक। (१६) लीला मूर्ति में निष्ठा ६ भक्त। १ अली भगवानजी ६२० ४बल्लभजी (नारायण भट्ट के)५६६ २ खड्गसेनजी कायस्थ ८६३५ विपुल विट्टलजी ३ नाथ भट्टजी फनिवंशी ८५७६ रामरैनजी (खैमाली) ७३८ (१७) वात्सल्य १० भक्त। १ कर्मा चाईजी ४०६ ६ गोकुलनाथजी गोसाई ५८५ २ कृष्णदासजीबिट्टलेशसुत ५७६ ७ जसोदामाताजी २५० ३ कौशल्या बड़ी अम्बाजी १४५ ८ नन्दजी महाशय २४८ (सतरूपाजी) १४५ : विट्ठलनाथ गुसाई ५७५ ४ गुंजा (माली) जी ६६२१० त्रिपुरदास कायस्थ ५७६ ५ गिरिधर विट्टलेशसुत ७८३ (१८) वैराग्य सान्ती १४ भक्त। १कामध्वजजी ४४३ ८माधोदासजीजगन्नाथीय५४६ २ गदाधरजी विहारीलालजी ६ रघुनाथ गुसाई गरुड़ ५५७ ३ जीव गुसाईजी ६१६ १० रन्तिदेवजी १८५ ४ द्वारिकादास योगीश ११ रांकाजी वांकाजी *.६४४ ५ नारायणजी अल्हवंशी ७८८१२ श्रीधर स्वामीजी ३७०३४४८ ६ परशुरामजी ७६११३ सुरसुरीजी महारानी ५३६ ७ बांकाजी रांकाजी ६४४१४ हरिवंश निष्किञ्चनजी (०.) शरण आत्मनिवेदन (३.) (०) शान्ति विराग (२८). • ( १९.) श्रवणनिष्ठा ४ भक्त। १ गरुड़जी खगेश ८१३ परीक्षितजी राजा. १४४ .२ नारदजी देवर्षि ६६४ लालदासजी २०५ RakegROERSECRENCE भक्तोंकी नामावली। ६४६ १२५१ (०) शृङ्गार माधुर्य (२०) सख्यनिष्ठा ५ भक्त। (१३०,४ गोपसहचर ग्वालवृन्द (२५० १ अर्जुनजी पाण्डव २११ श्रीवजके २ गोविंद श्रीविठ्ठलशिष्य ६५८५ सुदामाजी ३ गंगग्वालजी (२१) सत्सङ्गसाधुसेवा २६ भक्त। १ कान्हर श्रीविठ्ठलसुत ८४४१६ मनसुखदास स्त्रीनथ २ केवलकूचा ८३६/१७ माधव ग्वाल ३ गनेशदेई रानी ६६५/१८ रामदास ४५६ ४ गोपालीजी देवी १६ रसिक मुरारिजी ५ गोपाल बांबोली ८५१२० रानीजी सुत विष देनी ६ ग्वालजी भैंसवाले भक्त ४४६२१ राजा उस रानी का ४६१२२ राजा उस वाई का ८तिलोकजी सोनार ६४६२३ राजान बाई रामरैन ७४० तिलोचनदेव ३८८२४ लाखाजी १० नन्दब्राह्मण वैष्णवसेवी ४६३/२५ सदाबती साहूकार ११ नीमाजी महाजन १२ विष्णुदासा काशीर २६ संतभक चूल्हेवाले १३ दो वाई सुत विष देनी ४१५२७ सेनजी ५३१ १४ चारमुखी ४६५२८ हठीलेहरिराम - ५६३ १५ (जयतारन)विदुर हरिपाल ब्राह्मण पेतीवाले ८३१|| निकिचन ४५० (०) साधुसेवा सत्संग (०१) (२२) सेवानिष्ठा १० भक्त। १ आसकरन ३ जगतसिंह नृपमणि २ कुमार किशोरसिंह ७४२ ४ जयमलजी ४१४ ७ जस्सू स्वामी ६७३ ८४५/ ७४२ SH FREE श्रीभक्तमाल सटीक। ६५० ११६४ ५ नरहरियानन्द ५३७ शेषजी जगदाधार १४४ ६ प्रेमनिधिजी २४१ ७ विष्वक्सेनजी ७०१० हनुमानजी ८ लक्ष्मीदेवीजी श्रीरामदूत (२३) सौहार्दनिष्ठा ५ भक्त। १ कुन्तीदेवीजी १३४ ३ युधिष्ठिरजी पाण्डेव २ जनकजी राजर्षि ७२) ४ द्रौपदीजी महारानी १३५ मिथिलेश सीरध्वज १६४ ५ वृषभानुजी पुण्यपुंज २५० (२४) ज्ञानी १३ भक्त। १ अलर्कजी १८२) विश्वामित्रजी २३१ २ ऊधवजी (१७४ ३ कान्हर समदृष्टि (भरतखंड) ५.३८ ४ नारायण बदरिकाश्रम ५ पूरनजोगी विराटी ११ लस्वामी ५३८ ६ वशिष्ठजी गुरुवर्य १६४७ ७ वहुलाश्वराजामिथिला १२ श्रुतिदेवविप्र मिथिला २८३ वाल्मीक द्वापरयुग १५६/१३ ज्ञानदेवजी ३८७ संक्षिप्तयन्त्र (१) १२६१० जड़भरतराजा २२० पृष्ठ युग पूर्ण | मूल टीका | उपसंहार जिनकी कथा | फितने नाम कपित्त कवित्त यर्णित भक्तों के २६२ सतयुग,प्रेता, द्वापर, १३२/ २७ १०५ ... १८० मत ३८२ ६४० फलि १७ शताब्दि |७११/१८७ ५२४ २३५ भक्त जो १३.२१४ ६२६ ५ ४१५ कपा CREALGAR भकोंकी नामावली। ६५१ गम संक्षिप्त यन्त्र (२) नं० निष्ठा भल नं० निष्ठा भक्त १ | अर्चा प्रतिमा १७ | १४ | महाप्रसाद ४ अहिंसा दया २० ६ १५ | माधुर्य शृङ्गार १२, १६ / लीलामूर्ति आत्मनिवेदन शरणागति उपवासमत १७/ वात्सल्य कर्म धर्म ७ १८ | वैराग्य शान्ति १४ कीर्तन १६ श्रवण ac गुरुनिष्ठ ૨૨ २० सरय ४ दास्य १६ | २१ सत्संग साधुसेवा ૨૯ धर्मप्रचारक २२ | सेवा १० धामनिष्ठ २३ सौहार्द ११ । नामनिष्ठ ७ २५ ज्ञानी १२ / प्रेमी १७ सहस्र में से २६६ १३ । मेष ABALA GEECHESeed ORAR ६५२ श्रीभक्तमाल सटीक । ॥ श्रीः॥ , . (१) साधु शिरोमणि संतवर, हरिदासन के दास । पंडितवर "श्रीप्रेमनिधि", प्रियवर "मधुकर वास" ॥१॥ जानकिघाट प्रसिद्ध श्रीस्वामि विवेक प्रवीन । "रामवल्लभाशरणजी", शोभा नित्य नवीन ॥२॥ भनमाल भागौत श्री, वाल्मीकि तुलसीक । संत समाज वखानहीं, होत पियूषहु फीक ॥ ३ ॥ (२) श्रीजानकिवर शरणजी, पंडित प्रेमागार । "सहस धार"लक्ष्मण किला, परम प्रसिद्ध उदार ॥४॥ (३) श्यामसुन्दरी शरणाजी, रसिक संत अविकारि। कनकभवन श्रीप्यारिपिय, चरण प्रेम अधिकारि॥५॥ (४) हनुमतपद-पंकज मधुप, संत गोमतीदास। नेम प्रेम रत सर्वहित, शृंगारी तपरास ॥ ६॥ (५) स्वामी गंगादासजी, परमहंस शुचि शिष्ठ । रामनरायनदासजी, पंडित संत सुनिष्ठ ॥७॥ (६) लक्ष्मण शरण सुसन्तवर, कामद कुंज निवासि । पूज्य वृद्ध विवेक निधि, प्रणतपाल तपरासि॥८॥ (७) सप्तऋषी श्रीअवध के, परम सुपूज्य महान । भक्त उदार सुनेम के, खानि सुसन्त सुजान ॥ ६ ॥ नम्र निवेदन। जय श्रीजानकीवल्लभ करुणानिधि प्रियतम प्रभो, प्राणनाथ, तुम्हारी जय । नमामि नमामि । तुम्हारी कृपासे इस "भक्ति-पुधा- स्वाद तिलकयुत श्रीभक्रमाल" को प्रथम श्रीकाशीजी में सन् १९०३ में तुम्हारी "प्रणयकलाजी"(बलदेवनारायणसिंह)ने छ: जिल्दों में छपवाया, (और केवल पूर्वार्द्धही को खड्गविलासप्रेस में भी)। इसकी दूसरी आवृत्ति १६१३ में लखनऊ नवलकिशोर यन्त्रा- लय से एक जिल्द में निकली ॥ ackscorrect . । Si *** भक्तिसुधास्वाद तिलक। अब तुम्हारी ही असीम कृपा से यह तीसरी आवृत्ति भी पुनः नवलकिशोर प्रेस से ही प्रकाशित होती है । लो, प्यारे ! अपनी वस्तु तुम अपनाने की कृपा करो। जैसे तुम्हारे अनन्य प्रेमी भक्कों को तुम्हारा चरित (मानस. रामायण) प्रिय है, वैसेही स्वयं तुमको श्रीनामाजी कृत यह भक्ति नाम माला गलेका हार है; इस रहस्य और मर्म वो गोस्वामी श्री. नाभाजी और उनके शिष्य श्रीगोविन्ददासजी एवम् श्रीप्रियादासजी भली भांति जानते हैं । यही समझकर तुम्हारे एकान्त प्रेमियों को भी यह माला विशेष प्रिय है और यह उनका धन ही है, इसके अनुमोदक पाठकों पर तुम्हारी कैसी कृपा रहती है इसके कहने की आवश्यकता नहीं- "सो जानइ जेहि देहु जनाई "॥ "चार जुगन में भक्त जे, तिनके पद की धूरि । सरबस सिर धरि राखिहौं, मेरी जीवनि मूरि ॥" स्वामी पंडित श्रीप्रेमनिधि रामवल्लभाशरण महाराजजी, पं० श्री गंगादासजी भक्तमाली, श्रीतपस्वीराम भक्रमालीजी, पं० श्रीराम नारायणदासजी तथा श्री श्यामसुंदरीशरणजी की कृपा जो इस दीन पर तुम्हारी प्रेरणा से हुई उसके लिये तुमको किन वचनों में और किस अन्तकरण से धन्यवाद दूँ॥ अन्त में इस दीनकी यह भी प्रार्थना है कि तुम्हारी कृपा उन सजनों पर हो जिनने इस तृतीय संस्करण के मुद्रण में किसी प्रकार का उत्साह और श्रद्धायुत परिश्रम दिखाया है अर्थात् ॥ (१) वाचू श्रीराधारमनजी (२) वृधनविहारीलाल और (३) श्रीगनेशप्रसाद (४)श्रीशीतलासहाय पुनः॥ यह तुमको समर्पित है । बीसवीं (२० वी) जनवरी सन् १६१६ से ही बावू वलदेवनारायण- सिंह की यह इच्छा थी कि नवलकिशोर प्रेस इस ग्रंथकी तीसरी श्रा- वृत्ति छापने की कृपा करे परन्तु दूसरी आवृत्ति की सैकड़ों प्रतियां रहने के कारण बलदेव बाबू को सफलता नहीं हुई थी॥ श्रीअयोध्याजी १९८३ दीन रुपिया (रूपकला)॥ RECE

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६५४
श्रीभकमाल सटीक ।
*श्रीः *
* श्रीहनुमतेनमः *
१. श्रीसमर्थ रामदास स्वामी की जय (दक्षिण में)
२. श्री तुकारामजी की जय (दक्षिण में)
३. श्रीधरनीदासजी महराजकी जय
(श्रीसरयूतट माँझी स्थान जिला छपरा सारन)
४. श्रीपरसादीदासजी की जय
(परसा ग्राम महाराजगंज के पास जिला सारन छपरा)
५. स्वामी श्रीरामचरणदासजी की जय
(ग्राम परसा, महाराजगंज के पास जिला सारन छपरा)
६. स्वामी श्रीरामदास श्यामनायिकाजी की जय
(विष्णुपुर वेगूसराय जिला मुंगेर)
७. स्वामी श्रीरामचणदाप्त हंसकलाजी की जय (गुड़हट्टाभागलपूर)
८. स्वामी श्रीरामवल्लभाशरण प्रेमनिधिजी की जय जय जय
(श्रीजानकीघाट, अयोध्याजी)
६. श्रीटीकमदासजी महाराज की जय
(काशीनरेश का मंदिर श्रीकाशीजी)
१०. श्रीयुगलप्रियाजी की जय ('चिरान श्रीगंगातट, जिला छपरा)
११.श्रीरामचरणदासजीमहाराजकीजय(बड़ीकुटियाश्रीअयोध्याजी)
१२.श्रीजानकीवरशरणजीकीजय(लक्ष्मण किलापर,श्रीअयोध्याजी)
१३.श्री गोमतीदासमाधुर्यलताजी की जय
(श्रीहनुमनिवास, श्रीअयोध्याजी)
१४.श्रीपं०गंगादासजीपरमहंसकी जय(बड़ीकुटिया श्रीअयोध्याजी)
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RASIXxxs**** भक्तिसुधास्वाद तिलक। ६५५ श्रीहनुमते नमः (सन्त भगवन्त) कवित्त । "जैसे प्रभु मानुष वपुष धरि लीला करें, तैसे सुखशीला हैं चरित सब सन्त के । सठन की सिला सम कुमति सुशीला करें, भंजें भवचाप ज्यों कुदोष जे दुरन्त के ॥ विमल बचन धनु वान ही ते जातुधान काम कोह लोभ मोह मारै उर अन्त के । चारौ जुग जीवन उधारकारी रसराम सन्त अवतार समराम भगवन्तक॥१॥ (सन्त बिन कैसे कोऊ जाने भगवन्तको)। कवित्त । माया को देखाय के छिपाय भगवन्त जब तब सन्त बुद्धि सौ बतावत अनन्त को । धारै भगवन्त जब मानुष वपुष तव सन्त भगवन्त कहि गावे रसवन्त को॥ ईश्वर न कोई जीव नश्वर कुवादी कह तिन्हें सन्त जाति वाद थापें सीताकन्त को । नाम को सुनायके जना रस राम रूप सन्त बिन कैसे कोऊ जाने भगवन्तको॥२॥ कवित्त । नाम रूप लीला धाम निष्ठा रसरंगप्रेम भनी नौधा भक्ति परा प्रेमा रस पांच है । गाई है सँचाई भरी कथा सन्त सेविन की जिनको सुनत साधु सेवा मन रांच है ॥ प्रेमिन को पूरो प्रेम नेमिन को नेह नेम कान को करत मिटै मद मान आंच है। पागि प्रीति आभा दियो नाभा जू अलभ्य लाभा भाष्यो भकमाल मध्य भक्ति- रूप सांच है ॥३॥ दो० "भवसागर भवरत्न बहु, भक्त सु तिनकी माल । नाभा जू आभा भरी, अप॑ हरिहिं विशाल ॥१॥ हरि भक्तनि हिय वीस धरे, माला कंठ अमोल धन्य सुजन जे प्रेम ते, वांचहिं सुनहि अमोल ॥ २ ॥" श्रीश्यामनायिकायै नमः । श्रीहंसकलायै नमः ॥ श्रीप्रेमनिधयेनमः॥ Recker SECSAKES CARRIA hto FRIEWS श्रीभक्तमाल सटीक। श्रीसियसहचरी गोस्वामी नाभाजी (श्रीनारायणदास) दो० "भकमाल आचार्य्यवर, श्रीनाभा पदकज । भवसागर दृढ़ नाव पड़, बन्दों मङ्गल पुंज ॥ १॥" "श्रीनामा नभ उदित ससि, भक्तमाल सो जान । रसिक अनन्य चकोर द्वे, पान करें रसखान ॥ २॥" छप्पय । 'कमलनाभ अज विष्णु के, त्यो अग्रनाम नाभा भयो । उन हरि आज्ञा पाय सकल ब्रह्मांड उपायो। इन गुरु आज्ञा पाय भक्त निर्णय को गायो॥ चार युगन के भक्त गुणन की गूंथी माला। अंगहि अंग विचित्र वनी यह परम रसाला ॥ बजवल्लभ अचरज कहा, सीतापति जाप जयो। कमलनाभ अज विष्णुके, त्यों अपनाभ नाभा भयो" ॥३॥ कवित्त । नाभाजू विसाल बुद्धि आज्ञा अग्र धारि सिर, विरचे कराल शस्त्र काटन को भ्रम जाल | पढ़त अनन्द चाढ़े रसिक सु भन हिये, सरल मनोहर सुखद कविता रसाल ॥ भने अजवल्लभ अविद्या कर अन्धकार करे दूर, सन्तनको सहज करे निहाल । प्रेम दीप बारे उर, पतित उधारे कोटि, कागते मराल करे, सांची ऐसी भक्तमाल ॥ ४॥ . सर्वथा। भक्तन को यश पुंज घटोर सु नाभा अलौकिक माला बनायो। ताकर टीको किया प्रियादासजू सन्तन को अतिही मन भायो॥ त्यों ब्रजवल्लभ रूपकला सिय किंकरि 'भाश' अनूप लगायो। "भनसुधा रस"स्वाद"ललामसुप्रेमिनको मनमोद बढ़ायो॥५॥ सर्वया । चारु सरोज सो छप्यै सुहावन सन्तन को मन भृङ्ग लुभायो। सादर पान करे रसको ज्यों चकोर मयङ्ग के नेह भुलायो । CHECRECRecRACTION +NEWS भक्तिसुधास्वाद तिलक । ६५७ प्रेम पराग को त्यों ब्रजवल्लभ गन्ध मनोहर है जग छायो। पावनि भक्तन को गुन गाथ की माल अनूपम नाभा बनायो॥ ६ ॥ दो भक्त नारायण भक्त सव, धरे हिये दृढ़ प्रीति । वरने आधी भांति सो, जैसी जाकी रीति ।। "श्रीहनुमत् जन्म विलास" में नामानुरागी मुन्शी रामअम्बे सहायजी ने लिखा है कि- चौपाई। "एक दिवस, हरि हरिरस पागे । योगाभ्याप्त करन तहँ लागे॥ नैन मंदि बैठे गुणसागर । तपनिधान कपिवंशदिवाकर । वह्यो प्रस्वेद शरम अति कीन्हा । गुप्तभेव गिरिनायक चीन्हा । सो श्रमविन्दु ईश गहि लीन्ही । जगतारनकी इच्छा कीन्ही ।। शिवानाथ तेहि राख्यो गोई । यह प्रसंग जाना नहिं कोई ॥ हे मुनिगण ! हे तपवलराला । यहां भविष्य सुनो इतिहासा ॥ हे है जब कलिकर परचारा । छीजै भनिभाव आचारा॥ तब गिरीश सो विन्दु सुहाई। नभमगतजिहिं देव सुखदाई ॥ दो० "गहै भूमि वरबिन्दु सो, हरि जन काज विचार । उपजै ताते रूप शुभ, भक्ति योग आगार ॥ नैन मंदि बैठे कपी, यहिते होइ अनैन । "हनुमतवंशी" विमल मति, योग भक्ति तप ऐन ॥ सो अयोनिजा, योगधन, जाको वर्ण न ज्ञात । स्वयं सिद्ध, पातक विगत, जग में हो विख्यात ॥ 'भक्तमाल' अद्भुत रचै, पूरै जन मन काम । 'नाभा' 'नाभा' सब कहैं, 'नभोभूज' हो नाम॥" स्वामी अनन्त श्रीरामानन्दजी महाप्रभु के प्रशिष्य तथा श्री- अनन्तानन्दजी के शिष्य श्रीकृष्णदासपयहारीजी के कृपापात्र श्री १०८ अग्रदासजी तथा श्रीकीलहजी ने एक दिन किसी वन के मध्यमार्ग में एक पांच वर्ष के अन्धे पालक को देखा, जिसके माता पिता कौन थे सो कैसे जाना जाय ? पर यह निश्चय होता है कि महाघोर अकालके कारण उन्होंने उन्हें अनाथ छोड़कर चल देने StatistKkKAKAL , - BHARATI ६५८ श्रीभक्तमाल सटीक ।' का साहस किया अतएव निर्दयी कहलाना अंगीकार किया । 'महात्माओं ने उन्हें वानर वा हनुमान्वंशीय लिखा है और महाराष्ट्र वा लांगूली ब्राह्मण श्रीरामदासजी के भाई के वंश में उनका उद्भव वर्णन किया है। किसी किसी ने उन्हें 'डोम जाति का लिखा : है, जो जाति उस देश में उत्तम भाट, चारण, तथा कत्थक की सी। है (इधर का सा नीच वसफोड़ डोम नहीं ); किसी महात्माने उन्हें अयोनिज लिखा है और श्रीहनुमानजी का अंशावतार बताया है । किसी ने ब्रह्माजी के अवतार श्रीलाखा भक्त की जाति का कहा है। (पृष्ठ ५११५६ देखिये ) अस्तु, श्रीहरि भक्तों की जाति पांति व- तव्य नहीं है। उक्त दोनों महानुभाव वहां रुके। असहाय बालक देख उन्हें "लागि दया कोमल चित संता" अतएव उन लोगों ने कृपादृष्टि की। सच कहा है "सन्त त्रिशुद्ध मिलहिं परि ताही । चितवहिं राम कृपा करि जाही॥" दोनों महानुभावों ने पूछा “वालक ! तुम कौन हो ?" उत्तर मिला "महाराज ! आप इस पंचभूत रचित क्षणभंगुर शरीर को पूछते हैं ? वा परमात्मा के करुणापात्र अविनाशी जीवात्मा को?" (पाठक ! होनहार बिरवान के होत चीकने पात)।"शारद दारु नारि समे स्वामी । राम सूत्रधर अन्तर्यामी ॥" उन महानुभावोंने उन पर श्रीहरिकृपा होनेवाली समझ, अपने कमण्डलु के जल के छींटे से बालक की आंखों में ज्योतिप्रदान किया। और अपनी "गलता" गादी में-लाकर श्रीरामकृपा से सन्तों की। सीथ प्रसादी तथा चरणामृत पाने को बताकर, भजन के समय पंखा करने की सेवा दी, नारायणदास 'नाभा' पुकारे जाने लगे। सन्तों के चरणोदक तथा सीथ प्रसादी से जो पाला जाय एवम् महा- नुभाव की सेवा कैंकर्य का सौभाग्य जिसको हो उस भागवत कृपापात्रं महाभाग्यभाजन का कहना ही क्या है । ऐसे भागवत- कृपा की जय तथा हरिकृपा की बलिहारी। एक समय श्रीअग्रस्वामीजीमानसीभावनामै निमग्नथे, और(आप श्री ६ नाभाजी)नियमानुसार पंखा झलरहे थे। इतने में श्रीस्वामीजी SMOK ९५४ भक्तिसुधास्वाद तिलक । महाराज के एक चेले ने, (जो समुद्र पर एक जहाज में जा रहा था ) जहाज के रुक जाने से विकल हो आरत वाणी से पुकारते हुए, श्री अग्रदेव महाराज का ध्यान किया । श्रीरामकृपाभाजन नाभाजी अपने महा प्रभुजी की अनुपम रहस्य श्रीसेवा में यों विघ्न आ पड़ना सह न सके कृपापूर्वक उसी पंखे के वायु बल से उन्होंने जहाज को चला दिया; और श्रीमहाराजजी से प्रार्थना की कि प्रभो! दीनवन्धो ! वह वोहित तो आपकी कृपा से ही आपदा से बचकर कहीं का कहीं निकल गया और दूर जा रहा; अब आप, अपने श्रीचित्त को उधर न ले जाकर, शान्तिपूर्वक स्वकार्य में तत्पर रहें और पुनः उसी अनुपम भावना में लगें। यह सुन नेत्र उघार, उनकी ओर निहार, श्रीस्वामीजी ने पूछा "कौन बोला?" (आपने श्री १०८ नाभाजीने) हाथ जोड़ विनय किया और कहा कि "नाथ ! वही शरणागत वालक, जिसे आपने सीथप्रसाद से कृपापूर्वक पालाहै ॥" इतना सुनते ही आप नवीन आश्च में आकर विचारने लगे कि "भगवत् भागवत कृपा से इसकी यहाँ तक पहुँच हो गयी!" और साथ ही श्रीस्वामीजी के मन में मानन्द भी छा गया कि अपना लगाया वृक्ष यों फूलने फलने लगा। श्री १०८ अंग्रदेवजी ने आप के हाथ से पंखा ले लिया और यह आंज्ञा.दी कि "वत्स ! तुझ पर भक्कों सन्तों का अनुग्रह और प्रभाव हुआ; अतः तु श्रीहरिभक्तों का चरित्र गान कर ॥" आपने सादर निवेदन किया “प्रभो ! भगवद्गुण तो उलटा सीधा गा लेना इतना कठिन नहीं है, पर भागवतों का यश वर्णनकरना तो महा कठिन है।" श्री १०८ स्वामीजी महाराज ने समझाया कि "पुत्र! जिनने, तुझे सागर में वोहित और मेरे हृदय में श्रीस्वरूप दिखा दिया, वे ही तुझे अपना तथा और और महानुभावों का अलौकिक एवम् पवित्र चरित्र दिखा देंगे। सोतू अव भागवतयश कहही चल ॥" ऐसा वरदानात्मक श्रीवचनं सुन के आप उद्यत होगये । और आपने "श्रीभकमाल" को २१४ छन्दों में रच डाला । जिसमें चारों युगों के भक्तों का पुनीत यश वर्णित है ।

HARASTREATREE श्रीभकमाल सटीक। ६६० श्रीकान्हरदासजी के भण्डारे महामहोत्सव में संवत् १६५२ में बहुत महानुभाव इकटे थे। वहीं सबों ने मिलकर आपको "गोस्वामी' कीपदवी दी॥ श्रीभक्तमालजी* का बनना विज्ञजनोंने ("संवत् १६३१ के पीछे और संवत् १६८० के पहले"), १६४६ के लगभग निश्चय कियाहै। आपके परमधाम गमनका समय महात्माओंसे १७१६ मुनागयाहै। श्रीप्रियादासजी ने जो श्रीनामा स्वामीजी की आज्ञा से १७६६ में टीका बनाई; वह अाज्ञा (पचासवर्ष पीछे)"ध्यान के समय हुई थी।" श्रीभक्तमाल ग्रन्थ की प्रशंसा किस से हो सकती है। इसके विषय में जो कुछ कहा जाय वह थोड़ा ही है । "विना भिक्रमाल' भक्निमणि अति दूर है।" एक तो इसमें भक्तों की गुणावली है ॥ दो० "सब सन्तन निर्णय कियो, श्रुति, पुराण, इतिहास । भजबे को द्वौ सुघर हैं, की हरि, की हरिदास ॥" तिस पर इसके रचयिता स्वयम् परम भक्त ठहरे ॥ पद्य होने के कारणं श्रीप्रियादासजी की टीका सर्वसाधारण की समझ में नहीं आती थी अतएव श्रीसीतारामशरण, भगवान् प्रसादजी ने सन्त चरित्र जानने की सुगमता के लिये तथा अपने आनन्द के निमित्त गद्य में "भनिसुधाबिन्दु स्वाद” नामक तिलक लिखाहै । यह पुस्तक अपने नामके अनुसार ठीक बनी है तथा पाठकों के हृदय में पीयूपधारा प्रवाहित करती है । इसमें सन्देह नहीं । भक्ति तथा प्रेम की जय मनाता हुआ मैं इस प्रबन्ध को समाप्त करता हूँ। गोस्वामि श्रीनामाजी "श्रीनाभा नभ उदित सति, भक्तमाल सो जान । रसिक अनन्य चकोर है, पान करै रस खान ।” (षटपदी) "कमलनाभ अज विष्णुके, त्यों अग्र नाम नाभाभयो । उन हरि आज्ञा पाय सकल ब्रह्माण्ड उपायौं । * दोहे १७, कुंडलिया १, छप्पय १६६ सब छन्द २१४ R भक्तिसुधास्वाद तिलक। इन गुरु आज्ञा पाय भक्त्रमाला शुचि गायो॥ चार युगन के भक्त गुणन की गूंथी माला। अंगहि अंग विचित्र बनी जू परम रसाला ॥ लघु मोहन अचरज कहा सीतापति जाप जयौ। कमलनाभ अज विष्णुके त्यों अयनाभ नाभाभयौ ॥" श्रीभक्तमाल के कर्ता श्रीअनस्वामी के शिष्य श्रीनाभा स्वामीजी श्रीरामानन्दीय वैष्णव थे और भकिमार्ग के प्रचारक । जिस किसी प्राणी में श्रीभगवत्की भक्ति हो उसी के आदर करनेवाले थे। नीच जाति और भक्तिरहित उच्च जाति अभिमानी दोनों ही को बराबर समझते । परमहंस संहिता श्रीमद्भागवत में श्रीशुकदेवजी परमहंस का भी यही सिद्धान्त है । "श्रीधर श्रीभागौत में परमधरम निर्णय कियो।" भगवत् भक्तों को ही अपना पूज्य शिरोमणि मानते थे। चौपाई। "जाति पांति पूछे नहिं कोई । हरि को भजै सो हरिका होई ॥" "कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगतिकर नाता।" दो० "अय कहै तिहुँ लोकमें हरिउरधर सोई वड़ो॥" चौपाई। "पर हित यस जिनके मन माहीं । तिन कहँ जग दुर्लभ कछु नाही" दो० "भक्ति भक्त भगवन्त गुरु चतुर नाम वपुएक ॥" जीवमात्र को हरिसन्मुख करना यही आपका उद्देश्य था और यही श्रीरामानन्द स्वामीजी के सम्प्रदाय का मत है। 'चौपाई। "कर नित करहिं रामपद पूजा । रामभरोस हृदय नहिं दूजा ॥ भगति हीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल वारिद देखिय जैसा ॥ सोह सैलगिरिजा गृह आये। जिमि नर रामभक्ति के पाये ॥" श्लो० "शतकोटिमहामन्त्राश्चित्तविभ्रमकारकाः। एक एव परोमन्त्रो 'राम' इत्यक्षरद्वयम् ॥" पतितपावन नाम 'श्रीराम' की जय || RA इति श्रीभक्तिसुधास्वाद तिलक समाप्त ॥ श्रीसीतारामार्पणमस्तु ॥ cketCAKACCRect ++UCKSEX PERHRETERARRERAKATARA भक्तमान सटीक। श्रीसीतारामाभ्यां नमः। श्रीहनुमते नमः। भक्तिसुधास्वाद श्रीभक्तमालके तिलक के कर्ता की संक्षिप्त जीवनी। "स्वामी श्री १०८ रामचरणदास महाराजजी के शिष्य, श्रीवास्तव कायस्थ मुंशीतपस्वीराम भक्रमालीजीके आत्मज, श्रीसीतारामशरण भगवान्प्रसाद रूपकलाजी बाईस वर्ष की अवस्था में सन् १८६३ ईसवी में ३० रु० पर पटनेके सब इन्स्पेक्टर-ऑफ़ स्कूल्स नियतहुए। शाहाबाद, गया, चम्पारन, सारन, मुजफ़्फ़रपूर, दर्भगा इत्यादि जिलों में फिरने के अनन्तर, पूरनिया नार्मल स्कूल के हेडमास्टर ८० रुपये पर नियत हुए; १८६७ में १०० रु० की डिपुटी. इन्स्पे- क्टरी का पद पाकर मुंगेर गए; जहां प्रायः बारह वर्ष रहे; सन् १८७८ से २०० रु० वेतन पाने लगे; और १८८१ में भागलपूर गए । सन् १८८४ में श्रीसीताराम कृपा से आपकी उन्नति गजटेड & J ३०० रु० मासिक पर हुई । १८८६ में आप फिर पटने श्राए । संवत् १६४२ (१८८५ ई०) में आपके पिताजी का वैकुंठ- वास हुआ, और १६४७ (१८६० ई.) में आपकी स्त्री का भी, सन् १८६५ में श्रीमाताजी का भी ।। (२) तीस ३० वर्ष से अधिक गवर्नमेंट की नौकरी कर संवत् १९५० (१८६३ ई०) में काम छोड़, श्रीसीताराम कृपा से सीधे श्रीअयोध्याजी पहुँचे, आपने वैराग्य धारण किया । । (३)श्रीभक्तमाल का तिलक, इत्यादि लिखे ॥ आप (सन् १८६३ ई०, से श्रीसीताराम कृपा का धन्यवाद गुणानुवाद गाते गवाते हुए, बरावर श्रीसरयू अयोध्याजी के शरण में विराज रहे हैं। डेढ़ सौ महीना पेन्शन पाते हैं।" "प्रसाद रामनाम के पसारि पाय सूतिहौं ॥" RECECRECTECRETAccccRSCRECRAClesce .

1195 जीवनी। ६६३ भक्तमाल सटीक के भक्तिसुधास्वाद तिलक के प्रकाशक की संक्षिप्त जीवनी सचित्र। श्रीसीतामढ़ी जिला मुज़फ़्फ़रपूर ग्राम वुलाकीपूर में ऐठाना कायस्थ वावू वलदेवनारायणसिंहजी का जन्म संवत् १६१७ के फाल्गुन में हुआ। आपने सन् १८८२ में एन्ट्रेन्स पास किया। मुजफरपूर एक्सट्रा सबजज्जकी कचहरी में पेशकार और सन् १८८३ में गया अडिश्नल सबजज्ज के सरिश्तेदार वहाल हुए । १८८६ में नौकरी छोड़, तारीख ६ अगस्त से गयाजी में वकालत करने लगे। गयाजी में भी एक उमदा मकान और वाटिका है आपके परन्तु दो लड़कियां हैं। (२) बाबू वलदेवनारायणसिंहजी श्रीरामानन्दीय वैष्णव थे। आपने तीर्थाटन भी किया था । वकालत छोड़ श्रीअयोध्यावास करने लगे। श्रीस्वर्गद्वारका रूपकला कुंजभी आपही का बनवाया हुआ है । आपके "रुक्मिणी बल्देवफण्ड" से उसकी मालगुजारी अदा और मरम्मत होती है । इसको श्रीरूपकलाजी के निमित्त वक्फ़ कर दिया है। (३) श्रीभक्तमाल सटीक सतिलक को आपही ने श्रीकाशीजी में छपवाकर प्रकाशित किया। श्रीअयोध्याजी ही में १६८२ संवत में आप परमधाम गये ॥ आप बड़े धर्मात्मा, विवेकी, उदार और भजनानन्द और विशेषतः नामानुरागी थे। इनका चित्र यह है ॥ पुत्र नहीं EGALORERACK

RAN
भक्तिसुधास्वाद तिलक।
६६४
श्रीसीताराम
बाबू बल्देवनारायण सिंह । (१६०३)

- . 13 श्रीभक्तगुण और लक्षण। ६६५ श्रीश्यामनायकाय नमः । श्रीहंसकलायै नमः । श्रीमनिधये नमो नमः ॥ भक्तगुण और लक्षण। श्रीहंसकलाशिष्य वाचू खेदनलाल लिखित । "सुनु मुनि सन्तनके गुण जेते । कहि न सकहिं शारद श्रुति तेते ॥' (१) भगवत् नाम, मन्त्र, जाप (२४) विराग और उदासीन वृत्ति (२)भगवत पदकंज स्मरण (२५) भगवत् भागवत चरणामृत- (३)श्रीगुरुहरि पदपद्म में परा पान सादर सप्रेम अनुरक्नि (२६)श्रीमहाप्रसाद सेवन (४)भागवतों (भक्कों) की सेवा(२७) शृङ्गार आदिक रसनिष्ठा (५)भगवत्धाम में निवास (२८)जगत् को निज प्रभुमय (६) श्रीअयोध्याजी में प्रेम देखना मन क्रम वचन से (७ हरिलीला कथा श्रवण (२६)भागवतधर्मों का मनन (८) हरियश स्तुति कीर्तन ३०) भजन, कैंकर्य, दास्य, सेवा (६)भक्तों के यश कीर्तन (३१) भगवत् आस विश्वास (१०)श्रीरूप का ध्यान K३२)केवल एक भगवत् आस (११)सादर लीला दर्शन और भरोस (१२)सादर भक्तपदवन्दन (३३)आत्म निवेदन सर्व समर्पण (१३) ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक करना (३४)जगत् जाल का समेटना (१४)कएठी धारण (वैष्णववेष) (३५)परनिन्दा, परदोष तजना (१५)माला (सुमिरिनी) फेरनी (३६)छल कपट कुटिलाई का त्याग (१६)भगवदायुध छापधारण (३७) सरलता, सुशीलता, सत्य- (१७)प्रपत्ति शरणसूचक नाम व्यापार से भूषित होना (१८)प्रपन्नता (शरणागति) (३८)मितभापिता और मिष्ट (१६)भागवत् (भक) पद प्रेम भाषण, मौन (चुप) (२०)भगवतविमुखोंसे दूर रहना (३६) दीनता, नम्रता (वस्तुतः), (२१)कुसमाज से अलग रहना विनय, कार्पण्य (२२)वैरी से वैर तजना (४०)मद, मान, अभिमान छो. (२३)वैष्णव भक्कसन्त का संग इना (मन वचन कर्म से) FACCIA RAI ' मता, निर्मलता चलाना ६६६ भक्तमाल सटीक। (४१) क्रोध छोड़ना, क्षमा और(६३ १६५) दम;नियम और संयम सहनशीलता धारण करनी(६६) मृत्युकाल को न भूलना (४२) लोभ से बचना, और संतोप(६७)अमूल्य समय को न खोना धारण प्रसन्नता (६८) श्रद्धा (६६) अमाया (४३)विषयवासनात्याग, निष्का-(७०) कुपथ को छोड़ना (७१।७२) सुपथ चलना और (४४) परनारी को नागिनी सी .देखना, कलंकमूल जानना (७३) दास्यनिष्ठा (४५) परवित्त को विषवत् जानना(७४) शृङ्गारनिष्ठा (४६) दम्भ नहीं (मन क्रम वचन)( ७५ ) निर्जन एकान्तप्रियता (४७) अहिंसा, कर्म मन वाणी से(७६) माधुर्य ऐश्वर्य, दोनों (४८) दया, करुणा, कृपा,छोह ७७) सख्यनिष्ठा (४६)सच्चा वर्ताव ७८ ) सौहार्दनिष्ठा (५०) सत्य वचन (प्रिय करके) (७६) वात्सल्यनिष्ठा (५१) कुन हीनता (८०) अपने को जगत्पिता माता (५२) मोह परित्याग का पुत्र मानना (५३) भक्रि पक्ष का आश्रय (८१)भजन में चित्त अचंचल, (५४)शोच विचार विवेक तथा मन को स्वाद और (५५) अनघता, पाप से डर आनन्द माना (५६) जितेंद्रियता और मितभो-1(८२) पवित्रता, शौच, शुद्ध- गिता धर्मानुकूल अन्तःकरण होना (५७)मानदाता अर्थात् औरों को (८३) अल्पाहार, विना भूख के मान देना कर्म वच मन भोजन न करना (५८)धीरता गम्भीरता भारीपन (८४)शील,उदारता,दान,परहित (५६)विगत सन्देह होना (८५) अपने दूपणों, अपराधों, (६०)परगुणसुनकर हर्षित होना और दोषों को समझना (६१)सब पर समदृष्टि, समता उनपर ग्लानि लज्जा भय (६२) भागवत व्रत किया करना और पश्चात्ताप करना : ELLOLLIOLICAKACCHE और लक्षण। FORSॐॐ FAL AMITRA भनगुण ६६७ (८६) सन्ध्या, अर्द्धरात्रि और किया चाहे उसको कदापि ब्रह्ममुहूर्त को भगवत पद न करना चिन्तवन ध्यान में अवश्य (६५) मरने की घड़ी जिसकी सुरति को लगाना ओर चित्त जाना भला (८७) श्रवण, नयन, रसना और समझाजाता है उसी ओर मन को विशेषतः रोकना सदा मन चित्त लगाना (45)अन्तःकरण को भगवत् विन, (६६)इसघड़ी के कृत्य कर्तव्यको अन्य किसीमेंरमने न देना भविष्य पर न उठा रखना (८६) कर्म इन्द्रियां जो कर्म करें (६७) मत्सर तज, अपने सरिस उसमेंअन्तःकरणकोलगने औरों के लिये चाहना न देना स्वांस न खोना(EE ) अहंता ममतामैं मोर हम (६०) भगवत् कृपाओं को स हमार तजके, जो कुछ मझना और धन्यवाद का जानते हैं उसको चरितार्थ रना गुण गाना करना, आचरण में (६१) प्रियतम प्रभु से बातें कि-(६६) अष्टयाम मानस भावना या करना (१००) सरति सदैव अचल वहीं (६२) अपने तई भजन पूजा वा (१०१) गुप्त जाप और उच्च स्वर किसी सुकर्मकाकर्तानजानना से भी नामोच्चारण करना (१३) निद्रा, आलस्य, प्रमाद, (१०२) अभ्यास, जतन, श्रम असावधानता त्याग, (१०३ )शान्ति,निर्द्वन्द्वता विरति स्मरण भजन सत्संग में (१०४)प्रेमदशा,जैसे गद्गद्वचन रमना सजल नयन इत्यादि (६४) श्रीगरु भगवत् और भाग-'(१०५) विप्रचरण अति प्रीति ॥ वताके सामने जो काम न (१०६)श्रीसरयूगंगा यमुनामहिमा (१०७) कवित्त- 'श्रद्धा' ई फुलेल औ उक्टनो 'सरवन कथा' मैल अभिमान अंग अंगनि छुड़ाइये । 'मनन' 'सुनीर' अन्हवाइ अंगुठाइ 'दया' 'नवनि' वसन, 'पन' सोंधो, लै लगाइये ॥ आभरन 'नाम' 'हरि' RECASTAKic-CRACHARBAR ॐॐ भक्तमाल सटीक। ६६८ 'साधुसेवा' कर्णफूल, 'मानसी' सुनथ, 'संग' अंजन, वनाइये । "भक्ति महारानी" को सिंगार चारु, वीरी 'चाह', रहै जो निहारि लहै लाल प्यारी गाइये ॥१॥ चड़े भकिमान, निशिदिन गुणगान करें, हरै जगपाप, जाप हियो परिपूर है । जानि सुखमानी हरि सन्त सनमान सचे, बचेऊ जगत रीति, प्रीति, जानी मूर है ॥ तऊ दुराराध्य, कोऊ कैसे के अराधि सकै, समझो न जात, मन कंप भयो चूर है । शोभित तिलक भल, माल उर राजै, ऐपै 'विना भक्तमाल भनिरूप अति दूर है' ॥२॥ (१०८) श्रीभनमाल, श्रीभागवत, श्रीनारदभत्रिसूत्र, श्रीराम- चरित्रमानस, श्रीजानकीस्तवराज, श्रीरामस्तवराज, भगवद्गीता, श्रीवाल्मीकीय रामायण, इत्यादि को पाठ करनातथा सुननासुनाना। चौपाई। एवमादि हरिजन गुण जेते । कहि न सकहिं श्रुति शारद तेते ॥ जलसीकर महिरज गनि जाहीं। हरिजनगुण नहिं बरनि सिराहीं ॥ दीन खेदनलाल * * बावू खेदनलाल कसयन्दन पेन्शनर, श्रीस्वामी हंसकलाजी के शिष्य । महल्ला गुहट्टा शहर भागलपुर RECENCRECAREERUCHAR श्रीभक्तमाल माहात्म्य । ६६६ RECEREMESTEROCERECOGLEGE श्री भगवतन्यो नमः ।। अथ श्रीभक्तमालमाहात्म्य। वृन्दावनवासी श्रीवैष्णवदासजी प्रणीत । दो० वन्दा भक्कमुमाल भल, भक्तन यश मुद मल। जोअति प्रियभगवंतकों, हरन घोर त्रयशूल ॥१॥ रसिकरूप हरिरूप पुनि, श्री चैतन्य स्वरूप । हृदय कूप अनुरूप रस, उझल्यो वहै अनूप ॥२॥ श्री नारायणदास जी, कीन्ही भक्कसुमाल । पुनि ताकी टीका करी, प्रियादास सुरसाल ॥३॥ ताको साधुनि के कहे, करौं महात्म बखानि । लै ग्रंथन मत साधुनिक, परचे रसकी खानि ॥४॥ भक्तनिकी महिमा कही, कपिल ऋषी भगवान । नारायण अरु शौनकहुँ, मैं का करौं बखान ॥ ५॥ सबै शास्त्र हैं आरसी, जन महिमा प्रतिबिंध । रति हग बिन मुझे नहीं, ज्यों अंधहि तरु निव ॥ ६ ॥ और शास्त्र के श्रवण के, फल श्रीहरि निरधार । ते यहि के श्रोता अहो, याते महिम अपार ॥७॥ जोइ चाहै हरिप्राप्तिको, सुनै सोइ हरपाय । या में दुइ इतिहास हैं, सुनिये चित्त लगाय ॥८॥ चौगाई। प्रियादास के मित्र ललामा । श्री गोवरधननाथ सुनामा ॥ १॥ तिन श्री भक्तमाल पदिलए । साभरि की रामत को गए॥२॥ मग में श्री गोविंद देव के । दरश हेतु गे सुरन सेव के ॥३॥ तहँ श्री राधारमन पुजारी।हरिप्रियरसिकअनन्यसुभारी ॥४॥ सोतिन कहँ राखे सुख साजा। भक्तमाल सुनवे के काजा ।। ५ ॥ होन लगी तहँ भक्तसुमाला । जहां विराजत गोविंदलाला ॥ ६ ॥ कछुक दिनन तो वांचत भए। पुनि साभरि के रामत गए ॥ ७॥ यह कौल कीन्हों निरधारा । पूरन करिही फिरती वारा ॥८॥ BLOCALCREACRORREACHESSARKESTRESE 4954 POST भक्रमाल सटीक। रामत करि जव आए सही। काल्हि कथाकहि है तवकही ।। || पै कह रही सँभार सुनाहीं। तब श्री प्रभुनिशि सपने माहीं॥१०॥ कही पुजारी सो यह पाता । हमने कथा सुनी सखदाता ॥११॥ श्री रैदास भक्त की अहो । कथा भई अव आगे कहो॥१२॥ दो० सनत पुजारी के हगन, आंसू बहे अपार । याके श्रोता आप हैं, यहै कियो निरधार ॥ १ ॥ चौपाई। । पुनि दूजो इतिहास सुनो अव । प्रियादास टीका कीन्हीं जब ॥१॥ तव ब्रज परिकरमा को गये। फिरत फिरत होड़ल जा छये॥२॥ लालदास तहँ रहैं महन्ता । बड़े सन्तसेवी रसवन्ता ॥३॥ सव समाज तिन राख्यो सही । भक्तमाल कहिये यह कही ॥४॥ भक्तमाल तहँ होन सुलागी । सुनन लगे सब लोग सुभागी ॥५॥ यक दिन तहँ निशि आये चोरा । सबै वस्तु लीन्हीं सुढंढोरा ॥६॥ ठाकुर हूँ को ते ले गये। हरिही के ये कौतुक नये ॥७॥ प्रात भये सवही दुख छाये । प्रियादास हूं अति अकुलाये |८|| कथा कही न रसोई कीनी । वहुरो यहि दुख में मतिभीनी ॥६॥ ठाकुर को ये चरित न प्यारे । यहि ते चोरन संग पधारे ॥१०॥ तब तो श्रीमहंत यह कही। हरि तो त्यागिगये मोहिंसही॥११॥ तुमहूं त्याग करोगे जो पै । मेरी गति का होइहै तोपै ॥१२॥ नाते हरि इच्छा मन दीजै । कहिये कथा रसोई कीजै ॥१३॥ तब श्री प्रियादास यों कही। अव ते कथा न कहिहौं सही ॥१४॥ श्रीनाभाजी वचन उचारे । ज्यों जनको हरिके गुन प्यारे ॥१५॥ त्यों जन के गुन प्यारे हरिको । अब यह सतमानै उरधरिको ॥१६॥ अस कहि सब दिन भूखे रहे । तव सपने हरि चोरनि कहे ॥१७॥ मोहिं जहां के तहँ पहुँचावो । नातरु तुम बहुतो दुख पावौ ॥१८॥ दुगुने दुःख परे हैं हम पर । चौगुन दुख डारव हम तुमपर॥१६॥ एक भक्त मम है दुखमाहीं । भक्तमाल पुनि सुनी सुनाहीं ॥२०॥ अस सुनि चोर उठे अधराता । ठाकुर को ले हरषितगाता ॥२१॥ &er-1996-1995 श्रीभक्तमालमाहात्म्य। ६.७१ ढोल बजावत गावत आये। संग सवै सामग्री लाये ॥२२॥ प्रात होन पायो नहिं सही। यक दुजाय सबनसों कही ॥२३॥ चोर तुम्हारे ठाकुर ल्यावत । झांझ वजावत गावत आवत ॥२४॥ सुनि सव साधु निपटहरषाये। नाम उचारत सनमुख धाये ॥ २५ ॥ सुधि वुधि गई प्रेम उर छाये। जाय परस्पर मिले सोहाये ॥ २६ ॥ चोरों कछु कहिसकन वतिया। गभरि आये फाटतछतिया॥२७॥ पुनि धरि धीर कहन असलागे। स्वपने कह्यो जो हरिदुखपागे॥२८॥ दोहरे दुःख परे हैं हमको । देह दुःख चौहरे तुमको ॥ २६ ॥ नातो अवहिं हमाहि ले चलो। सन्तनि को देवी अति भलो ॥ ३०॥ यक दुख मम जन भूखे सही। सुने जु भक्कमाल पुनि नहीं ॥३१॥ सुनि यह पात सबै हर्षाने । नाभा वचन सत्य सब जाने ॥ ३२॥ गेह ल्याय वड़ उत्सव कीनों। सबको मन जन चरितन भीनों॥ ३३॥ याके श्रोता हैं हरि आपै । सब यह जानि.तजे मन तापै ॥ ३४ ॥ दो० हाथ कंकनहिं आरसी, कहा दिखाये माहि। हरि श्रोता विन सवनि के, यो मन अटकत नाहिं ॥ ३५॥ चौपाई॥ श्रोता वक्ता को फल जोई । कापै कहि आवत है सोई ॥ ३६॥ जो लिखाय उर राखे याको। अन्तकाल हरिप्रापति ताको ॥३७॥ तहां एक सुनिये इतिहासा। आयो प्रियादास कोउ पासा ॥३॥ तिन कहि भक्तमाल जोत्राही । मोहिं लिखायदेहु प्रभुताही ॥ ३६॥ तिन तेहिकही सुनहु सुखरासा। कहन सुनन को है अभ्यासा॥१०॥ सो कहि मैं कल्लु कहिनहिंजानौं । सुनबेहुँकीगतिनहिपहिचानौं ॥४१॥ आप कहे तो करिहो काहा । तिनयककह्योवचनअवगाहा ॥४२॥ महाराज में ही व्यवहारी । गृह कामनि मैं वूड्यों भारी ॥४३॥ साधु संगतिहुँ को नहिं धारी । ताते मैं मन माहिं विचारी ॥४४॥ मरती वार हृदय पर धरिहाँ। इतने साधुन संग उपरिहौं ॥ ४५ ॥ सुनि यह बात नयन भरिआये। बहुत बड़ाई करि सुखछाये॥ ४६॥ ताको पोथी दियो लिखाई । सो लै घर गवन्यो सुखपाई ॥४७॥ RECE SCRIGHCHACLES ।

ॐ RASTARAKHNERNET भनाल सटीक ६७२ गृह कारज में अटक्यो भारी । आई ताहि मीच भयकारी ॥४८॥ यमके दूतनि आय दयायो। यो त्रास पुनि कंठ रुकायो॥ ४६॥ पुत्रादिक रोवहिं विललाता । तिन्हें सपनदै कही सुवाता ॥ ५० ॥ भकमाल की पोथी लाई । मो छाती में देहु लगाई ॥ ५१ ॥ ते लाये पोथी रसभरी । मरत पिता के हिय पर धरी || ५२ ॥ सब यमदूत धरत डरि भाजे ।ज्यों कायर शूरन के गाजे ॥ ५३ ॥ कंठ खुल्यो नैननि जल ढाख्यो । हरे राम गोविंद उचास्यो ॥ ५४ ॥ पुनि सव भवनि दरशन दीनौ । हिये माहि अानंद सो भीनो ॥५५॥ सुत हरषे पुनि पूछी अहो । कहा भयो सो हमसों कहो ॥ ५६ ॥ सो कह यमदूतनि दुख दीन्हों। हरिभकनि उवारिअवलीन्हों॥ ५७॥ नामदेव रैदास कबीरा ।धना सेन पीपा मति धीरा ॥५८॥ ठाढ़े मोहिं कहैं यह बाता । हमरे सँग आवहु हे ताता ॥ ५६ ॥ सो मैं अब इन के सँग जैहौं । यमदूतनि के मुख न चितेहाँ ॥ ६०॥ अस कहि राम कृष्ण उच्चारत । नैनमंदि हरि को उरधारत ।। ६१ ॥ पण त्यागि हरिको मिलिगयो। बेटन को अतिही सुख भयो॥६२ ॥ तब ते तिनने यह मन भज्यो । जिन काहू कुलमें तन तज्यो॥६३ ॥ तिनके हिये धरेउ यहि काहीं । तुलसीचरणामृत मुखमाहीं ॥ ६४॥ तिन कुटुंव नेवते जे आये । तिनसवकोयहचरितसुनाये ॥ ६५ ॥ सोहम लिखनि कियो है सही। और कहो महिमा का रही॥६६॥ शेष सहस मुख जेहिं गावे गुन । सोउ जन चरणरेणु जांचे पुन॥६७ ॥ आपते अधिक दासको गावें । जनकीसहिमाकिमिकहिावै॥६॥ प्रियादास अतिहीं सुखकारी। भक्तमाल टीका विस्तारी ॥ ६६ ॥ तिनको पौत्र परम रेंग भीनों। वकनहित महात्म यहकीनों॥७॥ दो० "भक्तमाल के गंधकों, लेत भन अलि आय । भेक विमुख ढिगहीं वसैं, रहैं कीच लपटाय ॥" इति श्रीभक्तमालमाहात्म्यं सम्पूर्णम् ।। - TOG SACRECAUCRACHECRECRUARESO SRIRLS समालोचना। ६७३ ॥ प्रमाणिका छन्द॥ नमामिभक्तमाल को॥ "पढ़ें जो आदिअन्तलों बढ़ें सो पर्मतंत लों, दहै अनन्त साल को नमामिभक्तमाल को॥१॥ कथा करै जो चाहि की व्यथा रहै न ताहिकी, मिले सो रामलाल को नमामि भकमालको ॥ २॥ प्रकार नौ की भक्ति जो सो अंग होत शक्ति सो, कह गिरा रसाल को नमामिभक्तमाल को ॥३॥ गढ़े सो अन्य भाव है लहै जो भक्ति दाव है, यही प्रमाण भाल को नमामि भक्तमाल को ॥ ४॥ अभक्त भक्ति को लहै सभक्ति मुक्र है रहै, गिनै सो तुच्छ कालको नमामि भक्तमालको ॥ ५॥ करै जो पाठ प्रात में सरै सुकाज गात में, हरैहि कर्म जाल को नमामि भक्तमाल को ॥६॥ मिलाय दुग्ध होत सर्पि चक्रते, तथा सुबुद्धि बाल को नमामि भक्तमाल को ॥७॥ वहूपमा कहाँ कहा कहे न पार को लहा, वखान सूर्य ख्याल को नमामिभक्तमाल को॥८॥" तक्रतेजु . HECE Donostante creCRACHNAKOSH भकमाल सटीक। Khesari ६७४ ॥ श्री॥ काशीकान्यकुञ्जसभातः समालोचना श्री ५ युत-महामान्य-धन्यतम-सौजन्यमूर्तिभिः श्रीसीताराम शरणैर्भगवत्प्रसादैः श्री १००८ नाभास्वामिकृत-भक्तमालग्रन्थस्य । तदुपरि श्री १०८ प्रियादासप्रणीतटीकाप्रबन्धस्यापि निर्मातो भक्ति सुधा स्वाद नामको व्याख्यानरूपः संदर्भो भक्ति रसिक जनानां चेतस्सु परमाह्रादमुत्पादयति । प्रायश्चैतादृशी सरलता सरसता च व्याख्यानग्रन्थेषु न क्वापि दृग्गोचरीभूता, प्रशंसनीयः खलु व्याख्यातुर्महाशयस्य परिश्रमः किंच वहुस्थलेषु प्रियादासेन यः कथाभागो न समासादितः, सोपि भगव- द्भक्तिपरायणैर्भगवत्प्रसादैर्महता परिश्रमेणान्विष्य परिपूर्तिमापितः॥ तथाच अस्य ग्रन्थस्य पूर्वोभागस्तिलकका प्रेषितस्तत्समालो चनायां सभातो यानि दूषणानि परिमाष्टुं विज्ञप्तिः कृता तद्विषये यथाशक्यं यतते ग्रन्थकारः॥ समायात द्वितीयभागे ऋष्यशृङ्ग (शृङ्गीऋषि) वृत्तान्तं समी. क्ष्यापूर्वतरं साश्चर्या भवन्ति सभ्याः ॥ एवंच स्वपचवाल्मीकेः कथापि भगवद्भक्तिं सुदृढ़ दृढयति ॥ गोपिकावृन्दस्य भगवञ्चरणारविन्दे परमप्रेमबोधिकां गीतिं दृष्ट्वा प्रस्तरमयहृदयस्यापि द्रवता भवति । इत्थमनेक गुणगणगुम्फि- तोयं ग्रन्थः सुभक्त जनानां परमोपादेयः॥ भाषापि प्रसंशनीया, पुष्टचिक्कणपत्राणामुपरि मुद्रण मिति शम् । श्रीकाशीजी टेढ़ीनीम (हस्ताक्षर) काशीनाथ तारीख १७ मार्च सन् १६०५ मंत्री, कान्यकुब्ज सभा (हस्ताक्षर) सहकारी मंत्री, का० स० Jani Ram Shastri. CRISASSASSASSASSA SSCREEG HTTPS समालोचना। पण्डित श्री ५ रामवल्लभाशरण जी, पण्डित श्री५ गंगादासजी भक्तमाली, पण्डित श्री ५ रामनारायणदास जी। (श्रीअयोध्याजी, १४ नवम्बर १९०५) "भकिसुधास्वाद नामक व्याख्यारूप संदर्भस्य काशीकान्यकुब्ज सभाया या सुष्टुतरा समालोचनाऽस्ति, तद्विषये श्रीपण्डित रामव- लभाशरणस्थ परमहंस गंगादासस्य श्रीपण्डित रामनारायणदासस्य च सम्मतिरस्ति ॥ श्रीकाशी "भारतजीवन" (८ अगस्त १६०४) (५ मार्च १९०६) "श्रीभक्तमाल । टीका, तिलक सहित । श्रीसीतारामशरण भगवान्प्रसाद विरचित । छपाई सफ़ाई बहुत अच्छी प्रशंसनीय है। विशेषता यह है कि पुस्तक शुद्धतापूर्वक छपी है ॥" "भक्तपुरुषों के अवश्य धारण करने के योग्य है । कथा उत्तमरूप से वर्णित है।" पण्डित श्रीगंगादासजी परमहंस। "छप्पय तथा कवित्त की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया हुआहै । चन्द्रप्रभा प्रेस की उत्तमता का कहना ही क्या है । इस तिलक की सहायता से अब साधारणतः सवको बड़ी सुभीता होगी; और प्रेमी जन तो अतिशय आनन्द प्राप्त करेंगे। जहां प्रवन्ध में बहुत गुण होते हैं, वहां दोप का होना भी अवश्य ही है । किन्तु, हितकारी तिलककार की सच्ची दीनता प्रार्थना, उससे बढ़ी हुई है ॥" (१५ मार्च १९०६) BEEG CREASONS । ra 9944795 HOFSHIFTS ह७६ भकमाल सटीक। श्री वेङ्कटेश्वर समाचार [२३ फेब्रिवरी १६०६] "जो कुछ लिखा गया है बहुत सुन्दर लिखा गया है । पुस्तक संग्रह करने योग्य है।" "श्री वेङ्कटेश्वर समाचार" (१३ अप्रेल १६०६) "भनमाल 1 श्रीस्वामी नाभाजी कृत मूल छप्पय, प्रियादासजी प्रणीत टीका कवित्त, तथा श्रीसीतारामशरण भगवान्प्रसादजी (अयोध्या निवासी) कृत भाषा वार्तिक तिलक सहित । प्रत्येक भाग का मूल्य १) है । पुस्तक का विषय जैसा उत्तम है, छपाई इत्यादि भी वैसीही अच्छी है। वैष्णवों को तो अवश्य मँगानी चाहिये ॥" Nabla Swami's Bhaktamala, with annotations by Shri Sitn Ram Sharan Bhagwan Prasad of alyodhya, published by B. Baldeva Narayan Sinha, a pleader of Gaya, will prove a very valuable addition to every efficient library of Hindi Literature. 10-4'06. (Sd.) HARJIWAN LAL, B.A I have gone through the first three volunies of the work. It is a book I have read with Leen interest and much pleasure. I think every Hindi library should have a copy of this valuable publication, and no Hindu family should be without a copy of this book which is bound to evolve sincere love for the Maker in any mind it meets, . Norogong, Bundelkhand, (Sd.) Mathura Prasad, B.A. SARLARKESARKAR NE ISRO समालोचना। তত रामायणी कविवर श्रीरामप्रसादशरणजी। "शुद्ध अंतःकरण में विशेषरूप से वास करनेवाले प्रभु ने, अपने एक कृपापांत्र (श्रीरूपकलाजी) के करकमल में विचित्र लेखनी देकर इस अपूर्वकार्य पर उद्यत करही तो दिया जैसी कठिन रास्ता थी वैसेही "भक्ति सुधा स्वाद" के रसिक तिलककार ने राह निकाली और वह सीधा पथ भी कैसा कि जिस पर चलने से श्रीरामकृपा से फिर कठिनता से भेंटही न हो । सूक्ष्म विचार से तिलककार ने निस्सन्देह आवश्यकीय कार्य किया है, कि श्रीनाभाजी का मूल और साथही साथ श्रीप्रियादासजी की टीका और फिर सरल भाषा में दोनों का भावार्थ; ठौर ठौर पर भापा और संस्कृत ग्रंथों के प्रमाण के साथ, कि जो अन्तःकरण से मोह की जड़ को उखाड़ कर भक्रमाल के मूल का जमा दे, वर्णन किया है। सुगमता और सरलता को देखकर शुद्धता ने भी पूरा साथ दिया। मूल दोहे, छप्पय और कवित्तों क भावार्थ के अतिरिक्त प्रायः कठिन शब्दों के अर्थ भी लिख दिये हैं। चौथे कवित्त के अर्थ में भक्ति पंचरस का वशीकरण यन्त्र देखकर अन्तःकरण अपना तन्त्र मंत्र भूल ही जाता है। यह तिलक, रसिक के रस का भी पता बताता है श्रीसन्तों के चरणारविंद में तिलककार की प्रीति प्रतीति और सत्संग की व्यवस्था वताए देती है ॥ छप्पय के तिलक में श्रीचरणचिह्नों का वर्णन महारामायण आदि ग्रंथों के अनुकूल और रसों की और परमात्मा जीवात्मा के चौबीस २४ सम्बन्धों की, व्याख्या कैसा विचित्र यन्त्रों में दर्शाया है कि जिसको करतल गत आमलक ही सा कहना चाहिए-॥ रसिक तिलककारजीने एक सराहनीय कार्य यह भी किया है कि प्रत्येक छप्पय और कवित्त के साथ ऐसा अङ्क लगा दिया है कि जिससे RECSCAMERICAREER Ravor* श्रीभकमाल सटीक। ६७८ सर्वत्र शीघ्र ही यह निश्चय हो सकता है कि मूल में से कितने हो चुके और कितने अब शेष रह गये हैं ॥" रामप्रसादशरण दीन "माधुरी” "व्याख्यान की भापा सरल और मनोहारिणी है । प्रत्येक पढ़े- लिखे हिन्दी-प्रेमियों को यह भक्तमाल मँगाकर अवश्य पढ़ना और लाभ उठाना चाहिए । जिन्हें अध्यात्मज्ञान प्राप्त करने के लिये बड़े-बड़े ग्रन्थों के पढ़ने का अवकाश न मिलता हो, उनके लिये यह ग्रंथ अति लाभदायक है। काराज, छपाई-सफ़ाई अति उत्तम । पृष्ठ-संख्या लगभग १०००, सजिल्द का मूल्य" ३॥) खड्गविलास प्रेस से दो भागों में निकलने की बात थी; परन्तु एक ही भाग (मूल्य १)) उत्तम रूप से प्रकाश होकर रहगया कलियुग खण्ड नहीं छपा । कारण यह बताया गया कि प्रकाशक (वावू घलदेवनारायण सिंहजी) ने उसका अधिकार नवलकिशोर प्रेस को देदिया ॥ अस्तु ॥" महेशप्रसाद (बी० ए०) 'मानस पीयूप' ---"श्रीभक्तमाल और भनिरसवोधिनी की समालोचना की तो आवश्यकता ही नहीं। तिलक 'भनि सुधास्वाद' की प्रशंसा जो और महानुभाव कर चुके हैं उनको दुहराना आवश्यक नहीं । इस तीसरी आवृत्ति में पाठक कुछ विशेषता (चरणचिह्न चित्रइत्यादि) स्वयं अनुभव करेंगे ॥ तिलककार के जीतेजी २० वर्ष के बीचही में तीन संस्करण होजाना ऐसे ग्रंथकी कम प्रशंसा नहीं है।" BHAKIRGENTENCIECXKCISCkCRICRORECE

HOKHARA
समालोचना।
୨୬
६७६
(मूल "छप्पय १ देखिये)
NÄNNIANAS
"पर"
( अवतारी)
व्युद
यिभु
अर्चा
अन्तर्यामी
मांगा
अंश
शक्ति
भावेश विभूति
पूण
कला
Sir George Grierson's "Gleanings from the
Bhakta Mala."
सर डाक्टर जार्ज ग्रियर्सनजी से ।।
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15 कर श्रा श्रीभक्तनामावली वर्णमालाक्रमानुसार ॥ भको के नाम भक्तों क नाम पृष्ठ अवाजी ४६४ २३८ २०० ६३६ ६८८ २६२ २५४ ६६८ क अनदवम्वामीजी अगस्त्यजी इजा अहरजी अहदासहजी नादिराजी श्रच्युतजी श्रायुतकुलजी अक्षयराजजी अजामिलजी अटलजी अनिजा नधारजी अनसूयाजी अन्तरीक्षजी अन्तनिटराजा अनन्तनी अगससा अगस्तानन्दजी अनन्तानन्दजी अनुभवीजी अपयाजी अभयरामनी अभिनन्दजी अमूतिजी अम्बरीषजी महाराज श्रम्परीपजा की रानी नजुनजी पाएडव अर्जुनजी अलिभगवाजी प्रत जी अरहजी श्रधालनाग ROCHERE पृष्ठ २११, अरहजी ३.८ अल्हारामजी २१६ | अहजी अर्चा रसाल १४. श्रशुक्ल जी २४५ अशावजी ७०६ श्राविहोताजी २.६ आशारणी ६५५ भातीजी ८३० आशकरणजी ३. प्रासाधरजी ७५ आसाधारजी ८७६ | इवाजी महाराज २.४ इलावतखण्ड के भक्त ६३६ / ईश्वरजी २२४ । ईशरजी २०२ / उतङ्कजी ४४. उत्तानपादजी १६ उद रामजा ३०४/ उदाररावतजी ३०४ | उद्धवजी ६५% | उद्धव पनचर जी ६५५ / उद्धवजी ७३४ | उद्धवजा उपनन्दा २६५ | उपाठाजी ६६ उमाभटियानीजी ६६ | उरकासुभटजी ७८,२१४ | ऊधोजी १३० २१९,२४६ चीफजी ५.०माभुजी १८२ / मपिजी पिसमूह सहस्त्र अठासी एलापनजा २०२ ६३० ६५६ ६६४ २४० २२६ PATI श्रीभक्तनामावली वर्णमालाक्रमानुसार । ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ६१५. फीतानी ... ७० ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ७७ ... ... ... ... । ... ... भरा के नाम पृष्ठ भनी के नाम पृष्ठ पेल पुरूरवाजी... १६२ किशोरजी ८४२ कटहरियाजी ६३६ किशोरदासजी ६१६ कान्हरदासजी... ३१४ । किशोरसिंहजी राजकुमार ७४२ कन्दरजी ४४ । कोकीजीयाई ६६४ फहरदासजी ६४१ कपिल भगवान् कीर्तिजी २५० करजी ६५१ , कील्ददेवजी ३२५ फविजी ... २०२ पुंधरा सहचरी फवीरजी श्रीरामानन्दीय ४८५,८५४ कॅनरवरजी २६ कमला (लनमीजी) ८०,२०४ फॅथरिराईजी ८७६ कमलाजी ६६४ मरीजी फमलारमहजी ... ५६४ गुण्डाजी करगाजनजी २०२ कुन्तीजी १३४ कर्मचन्दजी ३१२ कुमुदजी फरमायाजी ८०६ कुमुदजी परमानन्दजी ई । ऊमुदामजी पारमंतीजी २७, कुम्भनदासजी ६४६ करकोटककी २६० । फुरुराग के भक्त २५४ पदमजी २२३ ' कुशद्वीप के भक्त २५२ कानन्दजी २४८ कृयाजी कलाजी ६६४ सतगढ़ौजी कल्याणजी ३१४ पणदासजी पयहारी ३०८,६०२ कल्याणजी र कृष्णकिंकरजी ६३६ कल्याणजी कृष्ण चैतन्य ५५६ फल्याणसिंहजी ६२२ पणजीयनजी कश्यपजी २३४ कृष्णदासजी विट्टलेशसुत काञ्चनघडीप के भक्त २५२ | कृष्णदासजी .. कारयायनी ७५६ । शपणदास चालक कात्यायनीजी ७५६. कृष्णदास पण्डित कान्हरजी ६५४ | कृष्णदास ब्रह्मचारी ५८१ कान्हरजी ७३४ | केतुमालयएड के भक्त... कान्हरदासजी... ८८० | केशीजी याई कान्हरदासजी... ६१५ | केशवभट्टजी काश्मीरी... कामध्यजगी ४४३ केशवजी ६५४ काशीश्वरजी गुसाई ६४० केशवजी फिकरजी ५३० केशवजी किम्पुरखण्ड के मत २५४ । केशवजी ५४३ SCALSCRECSCRec*ctact CIES ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ५७६ ... ... ७३ .. ... ... ... ... ... ... ... ८७६ ... ... ... ... ७५७ .... ...

EARNA THE R श्रीभक्तमाल सटीक। ९८२ भक्तों के नाम २२५ भला के नाम केशपदण्डवतीजी केशव लटेशजी क्षेचराजी केवल कृमाजी केवलरामजी कोलीजी बाई कोहली परजी कौशिल्या महारानीजी तुमुनिजी कोचीप के भक्त रोम गौसाईजी खासेनजी खरतरजी खाटीकजी सीचनिजी खीचीनी खेताजी पेमजी रोमजी पेमजी सेमजी गोसाई खेमपगडाजी सेमविरागीजी खमालरतजी राजा खाजाजी खोराजी गजगोपालदासजी गजपतिरुद्र-तापजी गजराजजी নালী गणेशदेई रानीजी गदाधरजी गदाधरदासजी गदाधरमट्टजी गदाधारीबी गदामती गन्धमादनजी पृष्ठ ६६१ गम्भीरे अर्जुन पर गयजी ३१४ | गयेशजी ८३. गरुड़जी ८१ ६२/ गवयजी ६६४ | गवाक्षजी ८०१ / गर्गजी १५५ ग्राहजी २३७ / गाधिजी २५० गालवानन्दजी ५८७ | गावरीदासजी ६७० १६३ गिरिधरजी विट्ठलेश सुत (सुरतरु) ७५३ ८९३ गिरिधरजी ग्वालजी દ૨૦ ६५७ / गिरिधरजी -७६) गुआमालीजी, पुनरधू ४० गुदेलीजी ६५५ | गुणनिधिजी ६५४ } गुरु और शिष्य पादपाजी ... गुरु शिष्य . ८४२ | गुहनिपादजी ५८६ | गोकुलनाथजी गोसाई ३५ | गोकुलनाराजी ५८५,५८० ६४६ गोशलदासजी ३१४ ७३८,७४४ | गोपालजी नागूपुत्र ६४२ गोपालजीजोवनेरी ६७१ ८३५ । गोपालजी सलखानी ६३५ | गोपन्द ६५६ गोपालजी भात (चापोलीके) १३. गोपालजी ग्नाल ६५१ / गोपालभजी ६६५ | गोपालीजी नागू के पुन ६४ ८२६ गोपालीजी ६२२ ६८४ | गोपानन्दजी २६ ७६३ | गोपिकावृन्द १५० ३१४ गोपीनाथजी ६६८ | गोपीनाथजीपएडा ६५५ २४० गोपिन्दी ५७६ rector ..

ॐR SARERA ... श्रीभक्रमाल सटीक । ... ६४६ ... . ... ... ... ... .. ... ... . ... ... ... ... . ... भक्तों के नाम जयतारतविदुरजो जयदेवजी जयदेवजी जयन्तजी जयन्तजी जयन्तीजी जयमलजी जयमलजी जयमलजी जयमालजी जसगोपाल जी... जलवन्तजी जम्पयन्तजा जसोधरजी म्यामी जसोघरजी जाडाजी जापूजी जाबालीजी जामवन्तजी जीताजी जीयगुसांईजी जीचाजी तत्त्वाजी जीपानन्दजी तुजुपाजी सेवाजी जेवाजी जेवाबाईजी जे इसिनिजी भांजी मालीजी सीलाजी ठेकरामजी ... ... ... १५ ... AR ... पृष्ठ भक्तों के नाम ८३१ । तिलोकजी सुनार ३४६ / त्रिलोचन जी ३८८ ८३० | त्रिविक्रमजी ६६८ तुलसीदासजी भक्तमाल सुमेरु गोश्रीतुलसीदासजी७६२ २०३ / तुलसीदासजी (२) १५५ नृघर भगवान्जी .... ४४४ न्यागीसन्त जोधपुरी ७३४ | त्योलाजी ८४६ दक्षजी १६४ ..: ६५५ | दाखी (दाक्ष्य ) २३७ ८२६ | दधिमुखजी ८३८ दधीविजी ..'४६१ | दरीमुग्य जी २३६ ७०१ | दलहाजी दयालजी ६६८ दाऊरामजी ६७० -२३३ | दामोदरजी ८४,२४६ | दामोदरजी ६२८ ! दामोदरजी १३०,६१- दामादरजी ५४२ दामोदरनीजी ८०० । दालभ्यजी २२६ ... ८०० दासूजी ६१३ ६६३ / दिलीपजी ६६३ | दिवदासजी ८७६ ! दिवाकरजी नाममात्र ८४२ ८७६ | दिवाकरी भोलाराम २५ दीनदासजी ८२६ ६३३ / द्विविदी २३६ ४३ दुर्वामाजी २२३ ३१४ दूदाजी २३६ देमांजी ५४२ | देवकरणजी २५६ | देयकीजी २७० देवहूतीनी १४७ ५७३ देवलजी च यमूर्नजी ENGILICORRECTECRECT ... ... ... । ... ... ... ... ७०१ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... 200 ... इगरजी EGE ... तराजी जीवाजी तक्षकजी तानध्य मजी ... ... ... त्रिपुरदासजी ...

33111 श्रीभक्तनामावली वर्णमालाक्रमानुसार। भक्तों के नाम ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... २५७ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ८२७ ... ... ... भक्तों के नाम पृष्ठ पृष्ठ देवाजी ३१४] नरहरिजी देवाजी ४३५,४४० नरहरिजी ८६७ देवाजी ६६३ | नरहनिन्दस्वामी देवाजी पंडा .... ४४० नरहर्यानन्दजी... देवाचार्यजी ३०२ | नलजी नीलजी... देवानन्दजी ६५४ | नहुपजी १६५ घौग्रजी ६४१ / नागूजी ६५३ द्योगजनौर ६३६ / नाथमद फणिवंशी दुमिलजी २०२ / नापाजी द्रौपदीजी १३५/ नामदेवजी और उनकी माता ३२८ द्वारकादासजी... ...100 नारदभगवान् देवर्षि द्वारकादासजी... ६५५) नारदजी ६६ धनाजी ५२४ ] नारायणदास श्रल्हवंशी ८.५,६०० धनाजी 28 ) नारायणदास वदरिकाश्रम घरानन्दजी ... २४ । नारायणदासनृतक धर्मदासजी ८४२ | नारायणमहजी ५६५ धर्मानन्दजी ... २४८ | नारायणमिथजी धर्मपालकजी २३८ | नित्यानन्दजी অমলনী ७५ निमिमिथिलेश विदेहजी... ঘর। ६६८ / निम्बादित्यजी (निम्बार्क सानी)... २६५ घूषतनिवासी श्रीगाजी ८३० / निकिञ्चन हरिपाल ४५० धृष्टिजी २३८ ) निकिशन हरिवंश धुवजी १२८ | नीचाजी ध्रुवनन्दजी २४८,२४६ नीयाजी :... ७३४ ध्यानजी ८४३ | नाराजी नन्दली नवो ... २३८ । नीलजी नन्दजी बावा २५% नील (नीलधज) २६४ नन्दजी २४६ / नृसिंदारण्यजी नन्दजी ६५४) पत्रकजी २३६ नन्दजी वैष्णयसेवी ४६३ / पत्रिजी २३४ नन्दद सजी ७.२ पदार्थजी नफग्जी ६५६ | पाजी (महापद्म) २५६ नरवाहनजो ६६६/ पद्मनी ६३६ नरसिंहदापजी... १२ | गाजी नरसीमेहताजी... ६८० पाजी नरहरिजी (नरहरिमानन्द) स्वामी ५३७ / पद्मावतीजी (पहा) नरहरिदासजी... ३१३ ] पद्मारतीजी ३७० SACROIRCLESCRICONCakaceCHCECREAL ... ... ... ... ... ... .. ... ... ... ... .. ... ... .. .. ... ... ... ...

ACTOR ९८६ श्रीभकमाल सटीक। भक्तों के नाम ... ... ... .. .. ... ... ... b. ... .. ... ... .." ... ... ... ... ... ... म३५ ... ... ... .. ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... भहों के नाम पृष्ठ पृष्ठ पानामजी ५३६ पुरान अठारह २३५ पद्मनाभजी ३१४ | पुष्करद्वीप के भक्त पनसजी ... २३६ / पूरनजी ६५७ पयदजी ... २५२ ] पूरनदासजी ८४२ पयहारीजी ...३०४,६०२,३०८ | पूर्णजीयोगी विराट पयहारी कृष्णदास ७३० । पृथुजी ५१,५३,१४०, १४३ परमानन्दजी सारंग ५६५ | पृथुजी १४३ परमानन्दजी ३७३/ पृथ्वीराज कछवाहा ७३० परमानन्दजी (सारंग) ५६५ | पृथ्वीराजजीहरिमन्दिर ८०६ परमानन्दजी ८७८ प्रचण्डजी ७६ परमानन्ददासजी ८४३ | प्रचेताजी ६४५ परशुरामजी ६५७ प्रधानजी परशुरामजी (शान्ति).. ७६१ | प्रयल जी परशुरामजी (त्योरा) ८८१ | प्रबुद्धजी २०२,२०३ परशुरामजी ८२६/प्रयोधानन्द सरस्वती परांकुशमुनिजी २६६ | प्रभुताजी ६६३ पराशरजी २३५ प्रयागदासजी... ८६६ परीक्षितजी महाराज १४४,२०५ | प्रयागदासजी... परजन्यजी बड़े गोए २४८ | प्रयागदासजी... पर्वतजी २३५ प्रसादनिष्टनृपतिजी ५०३ लक्षद्वीप के भक्त प्रसूतीजी ... पाण्डव.पांच भाई ७८ | महादजी ७०,२०८ पादपद्मजी २८५ | प्राचीनयहीजी... १६३ पार्वती सहचरी ... ८७६ मियदयालजी... ६५७ पिप्पलायन (विप्पलजी) प्रियव्रतजी २४३ पिप्पलाद (पिप्पल) शमीफजी २०२ प्रेमकन्दजी २५२ ४६८ | प्रेमनिधिजी ७१ पीपाजी ८३५ प्रेमसिंहजी पुसरजी यफुलजी २५२ पुण्डरीकाक्षजी बछपालजी पुरुजी बड़भरतजी पुरुषाजी धनियारामजी ६७१ पुरुषोत्तमजी ६४१ | बर्द्धमानजीगंगल ५८६ पुरुषोत्तमपुरी का राजा... ४०३ बलजी पारपद सोलह बलिजी ...१७६,७३, २१३ पुलस्यजी २८ बलिपत्तीजी १५२, १७६ पुलहजी २१८ | यहुलाश्वाराजा मिथिला १४१ RECECRATEEKESTAstruct-GREECHANICHARE ... .. ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... पीपाजी कृपालु... ... ... ... ... ... ... ... .. ... ... ... ... ... ... ७७ ... ... ...

ॐॐॐ श्रीभक्तमाल सटीक। ६८८ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... .. ... ... ... ... ... ... ... ६५५ ... ... ... ... ... ... भक्तों के नाम भुशुण्टाजी (काक) भुवनजी चौहान भूगर्भ गुसाई भूरि ( भूरिपेण) जी भृगुजी भेपनिष्ठ राजा भोजजी मकरन्दजी मंगलजी मधुरादासजी... मधुनी मधुकरठजी मधुकरसाह ोड़छे मधु गुसांईजी मधुवर्ती मधुसूदन सरस्वतीजी मध्वाचार्यजी... मनुजी दशरथजी मनुजी, मन्वन्तर मनुस्मृति मनोरथजी मन्दालसाजी महारानी मयूरध्वजजी ताम्रध्वज मयन्द (मैन्द ) जी भयानन्दजी मरबठजी निष्कामी महदाजी महीपतिजी मांडनजी मांडनजी माण्डव्यजी मांडिलजी माधवदासजी जगन्नाथीय माधवजी गदागढ़ माधवजीचारणगायक माधयानन्द संन्यासी... माधवग्वालजी पृष्ठ भक्तों के नाम पृष्ठ माधवदास ४३७ | माधवदासजी शोभूराम के भ्रा० ६१८ | माधवजी भक्तपाल १५४मानदासजी .. २२८ | मान्धाताजी १६७ ४७० मानमतीजी ६६३ २४६ मामू (मामा) भानजा ४२३ २५२ | मार्कण्डेयजी २३४ २४६ | मायादर्शजी ८२४ | मिथिलेश जनकजी २४६ | मीराबाईजी ७१८ २५२ / मुकुन्दजी ६५१,६५२ ७३७ मुकुन्दनी ६२४, ६१८ मुकुन्दजी २५२ मुकुन्दजी ८८ मुचुकुन्दजी १४१ २७६ | मुरली धोत्रियजी ६६१ ७२ मुरारिदासजी बिलौदा ওভুক্ত १६६ | मृगाजी ६६३ २३७ | मैत्रेय कौपारव १२५. ६४१ | मोरध्वज (मयूरध्वज) जी १४७ मोहनजी ८२४ १७७ / मोहनवारीजी ६७१ २३६ | यशपत्नीजी ६६८ | यदुजी ६६१ ६५१,६५२ | यदुनाथजी ५७६ ६५४ | यमराजजी, श्रीचित्रगुप्त २३७ ६५४ , यमुनाजी ६६३ ८०० यमुनाबाईजी... २३० | ययातिजी २६ | यशोदामाता २५० ५४६ | याज्ञवल्क्ष्यजी २०२ ७०४,७०६ | यामुनाचार्यजी २६६ ८०० | युधिष्ठिरजी पारडय ६५ | युगुलकिशोर भृत्यजी ६१८ ८६८ / यूथपाल १- पदम ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... यदुनन्दन भहाजी ... ... ... ... .. ... ८७६ ... ... ... १६५ ... ... ... ... ... ...

********* श्रीभक्तनामावली वर्णमालाक्रमानुसार। १८६ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... .- ... ... ... ... ... भक्तों के नाम पृष्ठ मनों के नाम पृष्ठ योगानन्दजी ३१२ | रामदासजी वीरा योगानन्दजी ३१२,७६० / रामदासजी छप्पय में नाममात्र योगेश्वर नव (8) १४६,१४६, २०२ रामदासजी १० में नाम मात्र ८२३ फकजी २५२ | रामदासजी यच्छयन के ६२३ रघुजी महाराज १८१,१६३ | रामभद्रजी ६८ रघुजी १६३ | रामभद्रजी रघुनाथजी ५७६ | राममिश्रजी २६६ रघुनाथजी ६६१ | रामलालजी. ६५७ रघुनाथ गुसाई गरुदशी राजा श्रीरामरयनजी खेमाली ७३८ रघुनाथदासजी ६२२ | रामरयनजी की धर्मपत्नौराजान या७ि४० रघुनाथीजी ८२६ / रामरायजी १२५ रगजी ३०६ रामरायलजी... ६४१ रजारामजीकुन्दार ३१५ रामरावलजी... ७६० रगदासजी ५२४ | रामरेणुजी ८२६ रखीरायजी ५६१ / रामाजी रतावनीदेवी... ८१०] रामसचिव २३८ रतिवन्तीजी.. ४०१ रामसहचर वर्ग रन्तिदेवजी १८५] रामानन्द भगवान् २८७ रमराकखण्ड के मन २५४ | रामानन्दमतजी ६६२ रयदासिनजी रामानुज प्राचार्यजी भाप्पकार रससानजी रसदानजी स्वामी २६७ ধাত্রী २५२ / रामाशईजी रसिकमुरारिजी ६२७ रायमलजी ७३४ रसिकरायमलजी ८५५ | राष्ट्रवर्द्धनजो रयजी २६४ | रकमाङ्गदी रहगए १६५ | रुक्माङ्गदसुता.. राघवजी ६५१ | रुद्रप्रतापगजपति राघवदासजी... ७६ रूपजी रामवदासी यते -७७ | रूपदासजी राघवानन्द स्वामी ३.३ रूपाजी राघरजी ८२६ रुपाजी रांका, बांकाजी ६५४ रैदासजी ४७७ राजा भेपनिष्ठ ४७० रैदासिनिजी ७६ रामगोपालजी २६ लक्ष्मएभाजी ६४६,६७६ रामचन्द्रजनजी ७३३ लक्ष्मएमजी ६०२ रामदासजीडाकोरएकादशी ४५६ लक्ष्मी (कमला) जीमहारानी ... रामदासजी ३२२ | लक्ष्मीबाईजी ... ... ... ... २५२ ... ... .. ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ८० ... ..८७६ S 880 श्रीभक्तमाल सटीक। ... ... ... ..4 ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... .. ... ... ... ... लाजी लाजी ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... भक्तों के नाम भक्तों के नाम पृष्ठ लणाजी ६६३ | विनोदीजी लघु ऊधौजी ... ... ८४२ | चिप्रजीएक ४६ लघुजनजी ७३४ विप्रपत्नीजी ४६८ लड्डूजी ५३८ । विभीषणजी महाराज लड्डूजी भगत ६४७ | विमलानन्द लफराजी ६४६ | विरही भरतजी लमध्यानी ६५१ विश्राम ८३० लाखाजी ६७३ विश्वामित्रजी ... ८५१ विपदइ दो रानियां ४०२,४१५ ... ८५५,८१ विष्णुपुराण २३७ लाखोजी ६५१ | विष्णुजी ६५४ लालदासजी ८६७ विष्णुदासजी ३१४ लालमतीजी देवी ६३० | विष्णुदासजी ६६१ लालाजी ६५१ विष्णुदासजी काशीर लाखाचार्यजी जामात ... २७७ विष्णुपुरीजी लालीजी ... ८७६ | विष्णुस्वामी २७५ लाहाजी म४३ | विष्वक्सेनजी कृपालु २१४, ७६ लीलानुकरण भक्तजी (नीलाचल) ४०१ | वृद्धव्यासनी ६५ लोकनाथ गोसाईजी ६१८, ६२३ वृपभानुजी पुण्यपुञ्ज २८० लोकालोक पर्वत के भक्त २५३ | वैवस्वत मनुजी मन्वन्तर ७०, १६८ लोमशजी २२६ बोपदेवजी २६७ लोहंगजी ६५४ | वोहिथजी वनवारी रसिक रंगीले ७८७, प्रजनाथजी ८६५ वनवारीदासजी 'बज नारि-वृन्द सहचरियां २५१, २४६ पीनारायणजी ८८६ | प्रतहठीनारायणजी व्यासजी ६०६, ६१० ५९०,३६४ व्यास भगवान्... ५०, ५३ वल्लभनारायणभट्ट ... ५६५ | शंकरजी पाशुतोष ६७ वल्लभनन्दजी ... २४८ | शंकरभक्ती वशिष्ठजी २२०,२३७ | शंकराचार्यजी वामदेवजी ३३० | शंकुजी बासुकीजी २५६ | शठकोपजी स्वामी २६७ विजयजी ७६ | शतधन्वाजी ११४ विजयजी २३८ | शतातपजी .१.२३७ चिदुरजी ७८,१०७ | शनैश्चरजी २३७ चिदुरानीजी १०७ शयरी ७८,८७ विदुरजी जयतारन ३०, ८३१ | शरभङ्गजी २०० विद्यापतिजी ६५६ | शरभजी २३६ CUSeak ACKER ... ... ... ... ... ... ... ७८७ ... ... वल्लभावार्यजी ... ... ... ... १.. ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... .. 4.. ... ... ... RECRUCISC अERSNESH श्रीभक्तनामावली वर्णमालाक्रमानुसार ६६१ पृष्ठ ... ... ... ... ... ६२४ ६४८ ... ... ... ... ७७ सन्तरामजी ... ... ६५३ ... ... ... ३१४ २८२,२०२ १४. समीकजी १३६ | सम्बर्तजी ६६३ / सलूधौड़ी ... २३७ ८४२ ६४१ . ... ... ... ... ... UR | सांपिलेली ... ... मलों के नाम पृष्ठ भक्तों के नाम शाकद्वीप के भक्तः २५२ सनकादि करुणासिंधु... शांखरपजी २३७ सन्तदासजी प्रबोधवंश शारदजी २५१ / सन्तदासजी शाल्मली द्वीप के भक्त २५२ सन्तजी शिबिजी राजा १७३ सन्तभक्त चूल्हेवाले शीलजी शुकदेवजी परमहंस परणा- सनातनजी सिन्धु ७०,२०६,२२६ / सीरीधी श्रवनकादि ८८०००, ऋषि १४५ / स्मृतियों के कर्ता श्वेत द्वीप भारत निष्ठ शेषजी जगदाधार शोभाजी शौनकजी १३६, १४५ सवाईजी श्यामजी ६४१ | माखी गोपालभक्ती श्यामदासजी... ८२६, ८३५ / साधुजी श्यामासजी (लघुलंय के) श्रीकृष्ण चैतन्यजू ५५६ | सारीरामदासजी श्रीदामाजी २४६ | सिलपिलमनवाई श्रीश्रीधरजी स्वामी ३७०, ४४८ सहचरियां श्रीभीनाथ मुनिजी २६७ सहचर अठारह श्रीरङ्गजी ३०४, ३०६ सिलपिल्लेभ० जमादारसुता श्रीरङ्गजी ...८८६ ६१८ ६५४ सीता सहवरीजी श्रुतिउदधिजी २८४/सीवांजी श्रुतिदेवजी १४१,२८३ | सीहाजी श्रुतिधामजी ८४ सुसानन्दजी श्रुतिप्रज्ञाजी. २८२ सुग्रीवजी महाराज श्वेतद्वीप के श्रीखगजी... २५६ सुदामानी सगरजी १६५ सुधन्याजी सतधन्वा १६४ सुनीतिजी संजयजी २०१ | सुनन्दजी श्रादि पार्षद... सत्यभामाजी... ६६३ | सुनन्दजी सतरूपा त्रयसुता १४५ / सुषलजी सत्यवतमी १६३ | सुबाहुजी सतीजी उमाजी सुभद्रजी सदानन्दजी सुमतिजी सदावती महाजन ४३१ सुमन्तर्जा सचिवयर सधनाजी (सदन) ६३७ सुमेरदेवजी kck SKHEKAR ६६८ ३१२ ४०८ ... ... २३३ ६३३,५०२ ८० ... ... ... ... ... ... ... ... ८४ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... १४७ ...७६,७ २४८ २४६ ... ... ... ... ... ... .. २४६ ... ... ... ...

ॐ RSHAN श्रीभक्तमाल सटीक। ६२ भक्तों के नाम ... ६६१ ६८७ ... .. ... ... ... ... ... २६ ६३६ ... ... ...८७ ४४६,४५० ... ... ... ... ... ५६३ ३०३ २५३,२५५ ... ५७१ ६०६ ... ... ... ... ... भक्तों के नाम पृष्ठ सुरथजी सुधन्या १७१ | हरिदास (हरीदास जी) सुरसुरानन्दस्वामी ५३५ | हरिदास (मिश्र ) जी सुरसुरीदेवजी ५३६ हरिदास रसिकजी सुराष्ट्रजी २३८ हरिनाथजी सुशीलजी ७६ | हरिनाम (मिथ)जी सुपेरणजी ७६, २३६ | हरिनामजी सुतीक्ष्णजी प्रेमसिंधु (श्रीमास्त्य हरिनारायणजी शिष्य) ३१८,२१६ | हरिनारायणजी सूनजी १४५ | हरिपाल ब्राह्मणदेव सूरजीदासमदन ५६३ | हरिभूजी सूरजजी ३१३ हरिराम हठीलजी सूरजी ६४६ हरियानन्दजी कृपालु सूरदास मदनमोहनजी ७५१ | दरियर्पखण्ड के भक्त सेनजी ५३१ | हरिव्यासजी देवीपूज्य सोमाजी ६३६ | हरिव्यासदेव सोठाजी ८३० हरिव्यासजी देवीपूज्य सोतीजी ८६७ | हरिवंशजी निस्किञ्चन सोभूराम ६१५, ६३६ | हरिपायाईजी सोमजी ६५१ / हरीदासजी (हरिदास) सोमनाथजी ६५१ | हारीतजी सौमरिजी २२२ | हारेदास हनुमानरामदूत हितहरिवंशजी ८२, २१०, २३६, २४१ महावीरजी हिरण्यखण्ड के भक्त हरिजी 'हरिकेस (हपकिश)जी हरिश्चन्द्रजी हरिचरेजी ६६३ | हमदासजी हरिदासजी ६४६ | हेमविदिताजी हरिदासजी ६५१ | हंसपक्षी का जोड़ा हरिदासजी ८४३ | त्रिलोचनजी E११ | शानदेवजी ... म ... ...७६ ... ... ... ... ८४६ २३७ ८९० ६०३,७४३ २५३, २५५ ६६३ ८७६ ... ... ... ... ... २०२/ हीराजी ६४६ । हीरामणिजी १७० हपीकेशजी ... ३१४ ... ... ... ... ... ... हरिदासजी तोलनेवाले S. R. S. B. P. R. K. SAHASRACTICHOREAKISGARLOGLECRE E THEHE श्रीभकमाल सटीक। ६६३ श्रीरामवल्लभायै नमः अधिक विलम अब जनि करु बालम! लेहु मोहि वेगि बुलाय, रामा ॥१॥ जनम अनेक को गर्न मोरे प्रीतम ? एहु में छब्बिस साठ (८६)रामा । जरजर देहिया भजन ना बने कुछु ठादि न हूँ चिनु लाठ, रामा ॥२॥ लगत पहाइहु ते दिन भारी, तोहि विनु परम सुजान ! रामा ॥ वीतति चिन्तत सोचत रतिया, जस तत होत विहान, रामा ॥३॥ इह के समैया महोत्सव, प्यारे, अब जनु गुड़िया के खेल, रामा॥ खास निवास जहां तोर सियवर, आऊँ तजि जग के झमेल, रामा॥४॥ सऊँ मैं निशिदिन सिय-पद-पंकज, लखि पिय परम निहाल, रामा । रूपकला सिय-किंकरि विनवे, होहु पिय वेगि दयाल, रामा ॥ ५ ॥ श्रीसीतारामार्पणमस्तु 5. R. B. P.R... EctertCSCLAREEKREGASCARSACRIKAR kast +Е ६६४ श्रीभक्तमाल सटीक। (दो०) जय सरयू जगपावनी, श्री साकेत सिंगार। सुर नर मुनि मन भावनी, महिमा अगम अपार ॥ विशद गुणद तव अमिय जल, शरणागतसुरधेनु । भक्ति, ज्ञान, सुख चारिफल, अभिमत प्रद तव रेनु॥ (क) लेत मुख नाम 'रामनेत्रना' च 'रामगङ्ग' देत सुख संग भारी भवभीति भूलती। शरद शशी के कल कीरन समान तुंग तरल तरंग ताके ताप निरमूलती ॥ परसत पाथ सीतानाथ अनुराग चाग बेलि रस केलि उर फैलि फलि फूलती। मातु ! तव कूल, कौन पूछ धाद्धि सिद्धि भुक्ति, मुक्ति मुंड माउन के भारन में भूलती ॥ (दो०) सकल मनोरथ वर सुलभ, देखत तोर तरंग। तम बिनसे विकस हिये, सिय-पिय-प्रेम-उमंग ॥१॥ अवध वास नित तीर तव, संत संग सुख-मूल । तव प्रसाद सिय सहित पिय, जन्म-जन्म अनुकूल ॥२॥ " जानिय तबहिं जीव जग जागा । जब सब विषय बिलास विरागा। हित सन हित, रत रामसन, रिपु सन बैर विहाव । उदासीन संसार सन, तुलसी सहज सुभाव ।। (दो०) "विगड़ी जन्म अनेक की, सुधरै अघहीं आज ॥ होहु राम को राम जपु, तुजसी तजि कुसमाज ॥१॥" सवैया कौशिकि, गंडकि, गंग, हिमाचल मध्यहि श्रीमिथिलेश जिला है । श्रीकमला, शिलनाथ, जलेशर श्रीगिरिजा विच धाम किला है ॥ कुंड विहार निहारि नहाय हिये रस रंग सुप्रेम खिला है । श्रीसिय की प्रिय जन्मथली, रघुनन्दन मोद करी "मिथिला है ॥१॥ RECECTION 4342 PHOTOSHOOT STIROPORRISON ॥ श्रीः । सांख्यसार। . . पंच स्थूल गंध॥ दो० "अद्भुत रचना राम की, नर तन भचरज गेह। खेल तत्व बत्तीस का, राम रचित नर देह ॥१॥ रचना रुचिरविचारिहिय, उपजत सहज सनेह । अन्तर्यामी राम लखि, कनकलता करु नेह ॥२॥ चौपाई। * बत्तिस की है वनी यह काया। अन्तर्यामी, आत्मा, मायौँ । अहकार, वुद्धि, मन, वित्त । चारो अन्तःकरण हैं मित्त ॥ प्राण, अपान, उदान, समान । पंचम व्यान, पाँच हैं प्राण ॥ स्थूल तत्व सुनु तू ।शून्य समीर तेज जल भू॥ पंच कर्म इन्द्री के नाँव । हस्त, उपस्थ, गुदा, मुँह पवि ॥ पंच ज्ञान इन्द्री पहिवान । श्रोत, खवा,ग,रसना, घान॥ विषय पाँच कीन्हे जगअंध । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, जीव नित्य तुम जानो इसको। तुम मरते नहि, मानो इसको । जीव देह दोनों दो कैसे। पक्षी पिंजड़ा देखिय जैसे ॥ पक्षी पिंजड़े का उड़ जावे । देह अनित्य नाश को पावै ॥ अधम शरीर नहीं है अपना । सतहरिभजन जगत सब सपना॥ जरै मरे नहिं जीक, तरै तब । सियपिय पदरति होय हृदयजय ।। दो० काल पुकारत सीस पर, जग जीवन दिनचार । कनकलता संसार महँ, राम भजन है सार ॥१॥ काम क्रोध मद मोह तजि, जो न भजै श्रीराम । पुनि पुनि आवै जाय जग, सो न लहै विश्राम ॥ २॥ सकल सुखद भवभयहरण, सिय पिय राम सनेह । जाके हिय नहिं राम रति, ताके सिर पर खेह॥३॥" * (१) सूक्ष्म या लिंग शरीरके तत्वों की गिनती में २२ से ३२ तकका भदे हुवा करता है, इस न्यूनाधिकताका कारण एक तत्व को दूसरे तत्त्व के भीतर गिनलेना है। (२) अन्तर्यामी पुरुषोत्तम, परनाम परमात्मा, परम तत्व, हृदयस्थहरि। (३) श्रात्मा-पुरुष, जीवात्मा, हंस। (४) माया-प्रकृति । * SAKESER PAN ६६ श्रीभक्तमाल सटीक। श्रीअयोध्या निवासी श्रीसीतारामशरण भगवानप्रसाद रूपकाला. लिखित ग्रन्थ लखनऊ मुंशी नालकिशोर प्रेस बुकडिपो से १ भकमाल १ जिल्द में तीसरी आवृत्ति ३॥ २ भागवत गुटका पटना खड्ग विलास से १ श्रीमीराबाईजी तीसरी आवृत्ति सचित्र २ श्रीअष्टयाम तीसरीआवृत्ति (मानस पूजा) ३ श्रीभगवद्गीता वारहवां अध्याय दूसरी आवृत्ति (लघु) ४ भगवद्गीता चारहवां अध्याय सटीक ५ स्वामी पं० श्रीरामवल्लभाशरणजी (सचित्र) ६ श्रीसीतारामीय प्रथम पुस्तक चौथी आवृत्ति ७ श्रीपीपाजी ८ श्रीचरणचिह्न चित्र ६ काल (समय) दुसरी आवृत्ति १० श्रीसुन्दरकांड रामचरितमानस, दूसरी आवृत्ति (क) श्रीसीतारामनामयश संकीर्तन, दूसरी आवृत्ति खड्गविलास) (ख)श्रीभक्ति भवानी, प्रोफेसर लाला भगवान्दीन की 5) 15855 श्री मीरा बाई की जीवनी, मूल्य सचित्र ॥४) लेखक-श्रीसीतारामशरण भगवान् प्रसाद जी रूपकला। "इसमें मीराबाई का जीवनचरित तथा उनकी भगवद्भक्रि और प्रीति का बड़ा सुन्दर वर्णन है । पढ़ कर चित्त गद्गद हो जाता है । प्रत्येक पनि प्रेमप्रवाह से परिपूर्ण है, भक्रिभाव का तो मानो भण्डार है " " जीवनी बड़ी खोज से लिग्बी गई है" " ग्रन्थकार ने जीवनचरित के पेराये में भक्ति प्रेम इश्क के भद्भुत् चमत्कार सिद्धान्तों को श्रीमीरावाई का उदाहरण देखकर दरसाया है। CREACHE

Shri Bhakrmaal

Author
Nabhaji
Title
Shri Bhakrmaal
File name
Shri Bhakrmaal
Text
OCR done
Citation
1914
Published
2012/11
Publisher
Lakhnow.,naval Kishore Press
Language
Sanskrit
Pages
1033
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313601
Barcode
99999990322272.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
ULBlF4DJfci
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