S.P Collage,Srinagar
Parda Uthne Se Pehle
Front matter
पर्दा उठने
88स
से
पहले
राजेन्द्रकुमार शर्मा
KOKO
Sh. Ghulain Mohamed & Sons
Books.llers & Publishers
MAISUMA BAZAR.
SRINAGAR.
आत्माराम एएड संस
दिल्ली
.
जयपुर०
० जालन्धर
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PARDA UTHNE SE PAHLE
(One-Act-Plays)
by
Rajendra Kumar Sharma 891.434
Rs. 2.00
S P
28388
प्रकाशक
रामलाल पुरी संचालक
आत्माराम एण्ड संस
काश्मीरी गेट, दिल्ली-६
चौड़ा रास्ता, जयपुर
माई हीरां गेट, जालन्धर
प्रावरण
योगेन्द्रकुमार लल्ला
मूल्य
दो रुपए
मुद्रक
संष्ट्रल इलैक्ट्रिक प्रेस
कमला नगर
दिल्ली-६
COPYRIGHT ATMARAM & SONS, DELHI-8
हिन्दी के
मूर्धन्य कवि एवं साहित्यकार
श्रद्धेय श्रीरामधारी सिंह 'दिनकर'
को
सादर
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यह एकांकी संग्रह एकांकियों का यह मेरा दूसरा संग्रह है। ये एकांकी आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारित तथा पत्रिकायों में प्रकाशित हो चुके हैं; इनमें से कुछ नाटकों का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुग्रा है। सभी एकांकी रंगमंच पर खेले जा चुके हैं। इसलिए ये एकांकी पाठकों के लिए नये नहीं हैं। आकाशवाणी से तो रात-दिन नाटक प्रसारित होते रहते हैं पर इन नाटकों की विशेषता यह है कि ये रंगमंच की कसौटी पर परखे जा चुके हैं और खरे उतरे है । यह तो प्रत्यक्ष ही है कि हिन्दी-साहित्य में ऐसे नाटकों का अभाव है। वैसे तो हिन्दी में अनेक नाटक लिखे जा रहे हैं और प्रकाशित हो रहे हैं पर अधिकतर ये नाटक रंगमंच की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए नहीं लिखे जाते । नाटक का रंग- मंच से घनिष्ट सम्बन्ध है । यदि यह कहा जाय कि नाटक का जन्म रंगमंच के लिए ही हुआ है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। हिन्दी-एकांकी का इतिहास बहुत पुराना नहीं है । इसका प्रादुर्भाव श्री जयशंकर प्रसाद के एक चूंट' से होता है । प्रसाद जी के पहले कुछ रुपक लिखे गये थे किन्तु उनमें अादर्श एकांकी के गुणों का अभाव था 'एक चूंट' प्राप्त करने के पश्चात् हिन्दी-साहित्य की वाटिका में एकांकी का पौधा पनपने लगा। परन्तु शीघ्र ही चलचित्रों ने रंगमंच का स्थान ले लिया । इसलिए अधिकतर एकांकी केवल इसी उद्देश्य से लिखे गये 'कि वे किसी स्कूल; कालिज या विश्वविद्यालय की किसी पाठ्य-पुस्तक में सम्मिलित हो जायें। इस उद्देश्य से लिखे गये नाटकों की भाषा को जान-बूझकर जटिल बनाया गया, पात्रों के सम्वाद ऐसी भाषा में लिखे गये मानो वे सभी हिन्दी के बड़े भारी पंडित हों। ऐसे पात्रों का वास्त- विक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं होता ।
पुस्तक रूप स्वतंत्रता के साथ हमारे प्रत्येक क्षेत्र में एक नई लहर, नया विश्वास और नई उमंग पाई। इसके फलस्वरूप रंगमंच का पुनर्जन्म हुआ। रंग- मंच की वृद्धि और दर्शकों की बढ़ती हुई रुचि के साथ नाटककार होड़ न लगा सके । कुछ लेखकों ने इस कमी को दूर करने के लिए प्रशंसनीय कार्य किया परन्तु फिर भी यह निविवाद कहा जा सकता है कि रंगमंचीय नाटकों का हिन्दी साहित्य में प्रभाव है । मैंने इन नाटकों को में आने से पूर्व रंगमंच पर प्रस्तुत किया है, इनका निर्देशन किया है और इनमें अभिनय किया है । इन तीनों सोपानों को सफलतापूर्वक पार करने के उपरांत मैंने इन नाटकों को यह रूप दिया है और मुझे अब पूर्ण विश्वास है कि ये अभिनयात्मक दृष्टि से खरे उतरेंगे। इन नाटकों की भाषा मेरी भाषा नहीं है और न इनके पात्र मेरे कल्पित पात्र ही हैं। मैं भाषा की कृत्रिमता में विश्वास नहीं करता और विशेषकर नाटकों में । इन नाटकों के पात्र इस वसुधा के पात्र हैं। उनकी अपनी भाषा है, अपनी मान्यताएं हैं, अपना दृष्टिकोण और अपने विचार हैं। प्रत्येक पात्र स्वतन्त्र रूप से हमारे सामने प्राता है। मैंने उनको अपनी भावनामों, मान्यताओं, दृष्टिकोण के भावरण से ढकने का प्रयत्न नहीं किया है । आप उनको सही रूप में देख सकते हैं। जिन पात्रों का इन नाटकों में चरित्र-चित्रण किया गया है वे आपके पास-पास ही मंडराते रहते हैं और आप उन्हें भली-भांति पहचानते हैं । मैं अपने मित्र श्री चन्द्रप्रकाश गुप्ता और अन्य कलाकारों का प्राभारी हूँ, जिन्होंने इन नाटकों को रंगमंच पर प्रस्तुत करने में सहयोग दिया है। जी० आई० ६१६, -राजेन्द्रकुमार शर्मा नई दिल्ली विनय नगर,
क्रम
१. उधार देवता
२. एक दिन की छुट्टी
२१
३. बुरे फंसे नाम कमाने में ३५
४. समझौता
५१
५. किराये के आँसू ७५
६. पर्दा उठने से पहले
८६
इस संग्रह के एकांकियों को मंच पर
खेलने से पूर्व लेखक अथवा
प्रकाशक को अनुमति
लेना आवश्यक है
★ उधार देवता
पात्र
ग्वालिन
बनिया
पण्डित निरोगानन्द
दर्जी
रेखा
[ रंगमंच के पिछले भाग में एक दीवार दाई से बाई पोर पूरे रंगमंच पर बनी हुई है। इस दीवार में दो दरवाजे है जो अलग-अलग मकान के हैं। रंगमंच का पृष्ठ भाग ग्राम रास्ता है। दाएं विंग के पास एक लैम्प-पोस्ट है। दाई पोर का दरवाजा बाबू अमीरचन्द के मकान का है और दूसरा उनके पड़ोसी का । अमोरचन्द के दरवाजे पर काले कोयले से उनका नाम लिखा हुप्रा है जो लगता है कि किसी बच्चे ने लिख दिया है। रात के दस बजे का समय है। पर्दा उठने पर एक ग्वालिन दूध के बर्तन लिए रंगमंच पर प्रवेश करती है और बाबू अमीर- चन्द का दरवाजा खटखटाती है। ] ग्वालिन–(दरवाजा खटखटाती है) बाबू जी ! वाबु जी ! (कुछ ठहर कर) वाबु जी ! ग्रोह ! कोई बोलता ही नहीं ! (फिर खट खटाती है) बाबू जी, खोलते क्यों नहीं ? मैं ग्वालिन हूँ। यह अच्छी बात तो नहीं । बाबू जी, मैं सब जानें, बत्ती वुझा के लेट गए हो। (फिर खटखटाती है) बाबू जी, पैसों की सखत जरूरत है, तभी ग्राई हूँ. दरवाजा खोल दो, सारे नहीं तो कुछ पैसे ही दे दो। (फिर खटखटाती है) वाबू जी, प्रो बाबू जी, दो महीने से अधिक हो चुके हैं, एक घेला नहीं दिया। जब पाऊँ कुछ-न-कुछ बहाना बना दो। यह बात ठीक नहीं। हमारे भी बाल- बच्चे हैं, कहाँ से खिलावें ? उस दिन भी दरवाजा लगा के सो गए थे, अाज तो मैं पैसे ले के जाऊंगी। मैंने भी ग्राज कसम खा ली है, खाली हाथ नहीं जाने की ! (जोर-जोर से खटखटाती है) बाबू जी, खोल दो, नहीं तो दरवाजा तोड़ दूंगी। यह कहाँ का तरीका है ! बाबू जी ! (जोर से खटखटाती है) [ बनिए का प्रवेश ] बनिया-क्यों भई, बाबू अमीरचन्द का मकान यही है ?
४ पर्दा उठने से पहले ग्वालिन-हाँ, यही है भइया । बनिया-हाँ, याद अा गया । यही है । बाबू घर में हैं ? ग्वालिन हैं तो घर में, पर मुझे देख के बत्ती बुझा ली है। जान के सो गए हैं। बनिया-(व्यंग्य से) मैं इन सब बाबुप्रों को जानता हूँ। वैसे तो रोज रात के ग्यारह-ग्यारह बजे तक ताश खेलते रहेंगे । अब हम लोगों को देख के सो गया है । तू कब की यहाँ खड़ी है ? ग्वालिन-मैं तो अभी आई हूँ बहुत दरवाजा खटखटाया, कोई खोले नहीं। बनिया-हमारा ऐसा एक और भी ग्राहक है। सवेरे ही घर से निकल जाता है और रात को लौटता है। जब रात को जानो तो दरवाजा नहीं खोलता। ग्वालिन-तो तुम ही खुलवानो दरवाजा। बनिया-तू हट जा । देख, मैं कुण्डी खुलवाता हूँ। (दरवाजा खट- खटाता है) बाबू अमीरचन्द जी, कुण्डी खोल दो नहीं तो अच्छा नहीं होगा। हमारे साथ यह चार सौ बीसी मत करो। मैं फिर कहे देता हूं, सीधी तरह कुण्डी खोल दो। (फिर खटखटाता है) सौदा लेने तो ग्राधी रात को भी पा जाते हो । अब पैसे देने का नाम नहीं लेते। (बहुत जोर से दरवाजा खटखटाता है) मैं कहता हूँ, कुण्डी खोल दो नहीं तो मैं दरवाजा तोड़ डालूंगा। ग्वालिन-अब यह दरवाजा नहीं खोलेगा बनिया-खोलेगा कैसे नहीं ! आज मैंने भी पैसे लेके जाने हैं चाहे सारी रात यहीं सोना पडे । ग्वालिन-तुमने भी भइया इस बाबू से पैसे लेने हैं ? बनिया-री, हो। दो महीने खिलाया है। अब पैसे देने के नाम साप सूंघ गया। ग्वालिन–मेरे भी दो महीने के पैसे नहीं दिए ।
५ उधार देवता ? बनिया-तुम से यह दूध लेना होगा। ग्वालिन --हो, भवा, रोज सेर-भर दूध लेवे था। इस पर हर दूसरे- तीसरे दिन सेर दूध फालतू लेवे था। कदी कहा करे था बाज फिरनी बनानी है और कदी कुस्टरड । बनिया-हंसकर) कुस्टरड नहीं, कस्टरड ! ग्वालिन --मुझे क्या पता ! कुछ ऐसी ही गिटपिट गरे था। तत्र तो दूध ऐसे लेवे था मानो इसके घर की भंग हो । बनिया-यह कब से तुन से दूध लेता है ? ग्वालिन -पिछले साल इस वावु ने एक महीना दूध लिया, फिर कहने लगा दूध अच्छा नहीं है। उस महीने के पै। ई फेर पाने पर दिए । चार महीने हुए मुझे कहने लगा कि दूध फिर से दे जाया कर । बनिया-तो आजकल भी यह तुमसे दूध लेता है ? ग्वालिन--मुझे तो दो महीने हो गए बन्द किए को, पर दो महीने के पैसे लेने हैं ! कई वेर या चुकी हूँ, पैसे देने में ही नहीं अावे । बनिया-सुना है वायु की घर वाली बड़ी तेज है । बाबू जोरू का गुलाम है। वह सारा वेतन रख लेती है और इसे घेला भी नहीं देती। ग्वालिन–हां, यू तो मैंने भी देखा है । वाबु उससे डरे है। बनिया- भगवान् बचाए अाजकल की औरतों से ! पता नहीं क्या मन्तर पढ़ती हैं कि बाबू लोग उनके इशारे पर नाचने लग जाते हैं । ग्वालिन-यह रहने दे, लाला। औरतें तो सीधी होवे, पैसे देने से न रोकतीं। धनिया-कई बाबू तो इतने अच्छे होते है कि अपने-ग्राप पहली तारीख को पैसे दे जाते हैं । यह पता नहीं कहां से पल्ले पड़ गया ! ग्दालिन–मुझे भी अाज पांच साल हो गए इस मुहल्ले में दूध देते हुए । आज तक किसी ने मेरे पैसे न मारे । बनिया-तब तो तेरी किस्मत अच्छी है । तो बस
OP
पर्दा उठने से पहले
ग्वालिन—पारसाल एक बाबू की आगरा की बदली हो गई ।
उसने वहाँ से अगले महीने अपने पड़ोसी को मेरे पैसे मनीग्राडर कर
दिए और लिख दिया कि ग्वालिन को पैसे दे देना ! भगवान् भला करे
उसका, बड़ा नेक आदमी था।
बनिया-ऐसे आदमी कम होते हैं ।
ग्वालिन–तुम्हारी भैया, काहे की दूकान है ?
बनिया हम जनरल मरचण्ट हैं।
ग्वालिन-वह क्या होवे ?
बनिया-हम घर-गृहस्थी को सब चीजें रखते हैं। प्राटा, तेल, नून,
साबुन, बिस्कुट-हमारी दुकान पर सब चीजें मिलती हैं ।
ग्वालिन–तो यूं कहो पंसारी की दुकान है।
बनिया-शहर में इसे जनरल मरचैण्ट बोलते हैं ।
ग्वालिन–तो बाबू तेरे यहाँ से पाटा-दाल लावे था ?
बनिया-दियासलाई से लेकर प्राटे की बोरी तक हमारी दुकान से
उधार लेता था। पहले महीने तो पैसे फट दे दिए, फिर दो महीने तक
देने का नाम नहीं लिया। हमने भी पिछले महीने से सौदा देना बन्द
कर दिया है। पहले तो दफ्तर दुकान की तरफ से जाता था, पर अब
पता नहीं किधर से निकल जाता है।
ग्वालिन–यह चारपाई किसकी है ?
बनिया-किसी को भी हो, तू वैठ जा।
ग्वालिन–मैं तो ग्राज थक गई हूँ। शहर होकर आई हूँ।
बनिया-तो वैठ जा, पाराम कर ले ।
ग्वालिन-तू भी बैठ जा, लाला। हां, कोई तरकीब सोच जिससे तेरे
पैसे भी मिल जाएँ और मेरे भी।
बनिया-तेरा कौन-सा गांव है ?
ग्वालिन-बदरपुर ।
ब नया-बन्दरपुर
?
उधार देवता ग्वालिन–बन्दरपुर नहीं, बदरपुर ! यहाँ से तीन मील दूर है। बनिया-तु रोज आती है ? ग्वालिन-हाँ लाला, हमारा तो रोज का ही काम है । तड़के चार बजे गाँव से चलती हूँ, पूरा २५ सेर दूध बाँटती हूँ। तुम कहाँ के रहने वाले हो? बनिया-अब तो दिल्ली ही समझो। तुझे कितने पैसे लेने हैं ? ग्वालिन-दस कम पचास । तुमने कितने पैसे लेने है ? बनिया-मैंने तो बड़ी रकम लेनी है। पूरे ६० रुपए १३ पाने । ग्वालिन–लाला, तू अपने पैसे भी ले ले और मेरे भी दिलवा दे, तब तुझे मानूंगी। बनिया-मैं कौन-सा थानेदार लगा हूँ ! यहाँ अपनी रकम वसूल करनी कठिन हो रही है । पर मैं भी देखता हूँ कब तक नहीं देता, पाई- पाई दसूल करके छोड़गा। ग्वालिन-तो खुलवा न दरवाजा । बनिया-सच्ची बात तो यह है कि उसने हम दोनों को देख लिया, अब वह कुण्डी नहीं खोलेगा। ग्वालिन–तो फिर क्या करें ? बनिया-देख, मैं बताऊँ, तू फिर कभी आ जाना । अब तो चली जा, पाँच-छ: दिन पीछे या जाना । ग्वालिन-लाला, तू तो अमीर ग्रादमी ठहरा । तेरा सैकड़ों का लेन- देन है । तू चला जा। वाबू तेरे डर के मारे दरवाजा नहीं खोलता। बनिया-किसी ने ठीक कहा है। अपनी अक्ल और दूसरों का धन सवको ज्यादा लगता है। तू तो ४० रु० की खातिर इतना शोर मचा रही है। ग्वालिन–मेरे लिए तो यही बड़ी रकम है । बनिया-तू तो नाहक परेशान होती है। कल से दूध में दो लोटे और पानी मिला देना, तेरा हिसाब पूरा हो जाएगा।
पर्दा उठने से पहले ग्वालिन-गंगा कसम मैं तो दूध में पानी का छींटा भी नहीं डालती। में बनिया–ठीक है । तू दूध में पानी थोड़े ही मिलाती है, तू तो पानी में दूध मिलाती है ! ग्वालिन–कसी बात करे, भइया ! मैं तो निखालिस दूध बेचूं बनिया-क्यों भूठ बोलती है ? इन ४० रु० में कम से कम २० रु० का पानी होगा। ग्वालिन—रहने दे, लाला। तुम लोग क्या कम करो ? बनिया-हम कुछ न कुछ तो दें। पानी के पैसे तो नहीं लेते ! ग्वालिन–क्यों अधिक बात बढ़ावे, लाला? बनिया-कई बार तो तुम लोग नाले का गन्दा पानी मिला देते हो । यह भी कभी सोचा है जो बच्चा ऐसा दूध पियेगा वह मरेगा या जियेगा। ग्वालिन–दूध पी के कोई न मरे । बनिया-तु अपने घरम से कह दे कि पानी नहीं मिलाती। ग्वालिन-बड़ा पाया घरम-करम वाला! तुम बनिया लोग क्या कम करो, तौल में सदा डंडी मारो। कभी पूरा नहीं तोलो। बनिया सबको वेईमान समझती है। हम तेरी तरह दुनिया को नहीं ठगते। ग्वालिन—बड़ा आया हरिशचन्दर का अवतार ! तुम लोग आटे में मिट्टी मिलायो, मिर्गों में इंट पीस के मिला दो। ऐसा पाटा खाके लोग मरेंगे नहीं तो और क्या होगा ! बनिया–पर तू कौन-सा पाटा खाती है जो इतनी तगड़ी हो रही है ! ग्वालिन–मुए, तेरे घर तो खाने नहीं जाती, मैं तो गेहूँ छांट के, बीन के पाप पीसती हूँ। बनिया-कितने मर गए तेरे गांव में पाटा खाके ? तू 8 उधार देवता ? ग्वालिन-तुम तो मारने में कोई कसर न छोड़ो। पिछले महीने हमारे पडोस में एक लड़का छत पं से गिर गया। उसके घनी चोट आई। रात को उसके हल्दी लगा दी. पर मुए बनिए ने भगवान् जाने उसमें क्या मिलाया था। उसकी टांग सूज के दुगनी हो गई । भला इससे बढ़ के और क्या पाप हागा ? बनिया-अब बस कर ! तू औरत है या ग्वालिन-होश में बात कर ! बेईमान कहीं का ! बनिया-क्यों बड़-बड़ करे? बहुत हो गया नहीं तो... ग्वालिन-जवान संभाल के बात कर ! अब छ कहा तो जवान नोच लंगी। मेरा नाम दुर्गा है, दुर्गा ! बनिया-मेरा नाम भी सोहनलाल है, मोहनलाल ! ग्वालिन-(क्रोध में) मैं तेरा सोहन हलवा ही बना दूंगी ! बनिया-तू चुप करे या नहीं ! क्या करूँ तु औरत है । तेरी जगह मर्द होता तो मजा चखा देता। ग्वालिन-मैंने तेरे जैसे कई को सीधा कर दिया। परसों की बात है कि पंसारी ने सेर के १४ छटांक चावल तोले । मन्ने भी पकड़ लिया और सेर का बांट उठा के मारा, तनिक बच गया नहीं तो मुए की खोपड़ी फूट जाती। बनिया-तु तो फिर जैसे बच जाती ! पर याद रख यह तेरा गाँव नहीं, शहर है। ग्वालिन–यहाँ तो तुम लोग और भी लूट मचायो । पाने की चीज दो और बाबू के खाते में दो ग्राने लिखो । -तू चली जा यहाँ से ! मुझे गुस्मा पा गया तो ग्वालिन–तो क्या करेगा ? बड़ा पाया गुस्से वाला ! ये लाल-लाल आँखें किसी और को दिखाइयो । मैं ना डरने की इस धमकी से ! बनिया-जा कमीनी कहीं की ! ग्वालिन-कमीना तू और तेरे घरवाले ! बेईमान कहीं का ! बनिया-तू ?
ne
१०
पर्दा उठने से पहले
बनिया-अरी, हट यहाँ से !
ग्वालिन-खबरदार मुए अगर हाथ लगाया !
[ बनिया ग्वालिन का बर्तन फेंकता है। ग्वालिन बर्तन उठा के
मारने की कोशिश करती है। दोनों चिल्लाते हैं। इतने में पण्डित
निरोगानन्द प्रा जाते हैं। ]
पण्डित-प्र-र-र-र! आप लोग क्रोध क्यों कर रहे हैं ? क्या बात
है, बहन जा?
ग्वालिन—यह लाला खुद तो दुनिया भर की बेईमानी करे और
मुझे कहे दूध में पानी मिलाऊँ। मैं पूछू कौन है जो निखालिस दूध बेचे ।
बनिया-और जैसे दुनिया में मैं ही कम तोलता हूँ।
पण्डित-राम-राम ! इसका तो यह अर्थ हुआ कि आप दोनों ही
मानते हैं कि पाप धोखा देते हैं । कम तोलना और दूध में पानी मिलाना
दोनों ही पाप हैं।
बनिया-भई वाह ! क्या बात है ! बड़ी नई बात बताई है तुमने !
पण्डित-बहन जी, अन्त में धर्म और ईमानदारी की जीत
होती है।
बनिया-मैं पूछता हूँ तुम कौन हो ?
पण्डित-मेरा नाम पण्डित निरोगानन्द है ।
ग्वालिन-पण्डित जी, तुम क्या कथा करते हो ?
पण्डित-नहीं, मैं कथा नहीं करता। मैं तो
बनिया-चलते-फिरते नजर अायो, पण्डित जी। खामखां बीच में
अपनी टांग न अड़ायो।
पण्डित-यदि प्रापको चोट लग जाती तो मरहमपट्टी तो मुझे ही
करनी पड़ती।
बनिया-(जोर से हाथ जोड़कर) जाप्रो पण्डित निरोगानन्दजी,
अपना काम करो।
पण्डित-क्षमा करो, मैं तो केवल इतना ही जानना चाहता हूँ कि
११ उषार देवता ग्वालिन-तुम भी इस वावू लाला अमीरचन्द का मकान यही है ? बनिया-अमीरचन्द नहीं फकीरचन्द कहो! आँख के अन्धे नाम नैनसुख ! अम्मा ने नाम रख दिया अमीरचन्द और यह पता नहीं कि इसे सारी दुनिया का कर्जा देना है। को पूछो । तुम का करो? पण्डित-मैं खानदानी वैद्य हूँ। (खांसता है) अरे, तुम लोगों ने मेरा नाम नहीं सुना ? इस नगर में तो कोई ऐसा विरला ही होगा जो मुझे न जानता हो। बनिया-इसमें मेरा क्या कसूर, पण्डित जी। बात यह है कि पिछले पांच साल से मैं बीमार ही नहीं हुअा । क्या करूँ, एक छींक तक नहीं प्राई, नहीं तो आपके दर्शन हो जाते । पण्डित-मैं तो पिछले तीस वर्षों से नगरवासियों की सेवा कर रहा हूँ। ग्वालिन-पण्डित जी, एक वात पूछू ? पण्डित -कहो। ग्वालिन-ये खाँसी तुमको कब से है ? तुम से तो अपनी खांसी दूर नहीं होती ! वेचती हो न । ग्वालिन-हाँ, मैं तो दूध ही वेचूं । रोज पीती हो ? ग्वालिन–मुझे तो दूध अच्छा न लगे । मैं तो चाय पिऊँ। पण्डित–बस, यही हाल मेरा है । मुझे लोगों के इलाज करने से ही फुरसत नहीं मिलती कि अपनी ओर ध्यान दूं । बनिया-क्या बात बनाई है, वैद्य जी ! ग्वालिन-वैद्य सारे बहुत वातूनी होवें। हमारे गांव में भी एक वैद्य है । बस वातें बना के काली काली-सी गोलियां ही सबको दे दे । पण्डित-तुम लोग तो मूर्ख हो ! पण्डित-तुम दूध पण्डित-तुम कितना दूध १२ पर्दा उठने से पहले दूर कर दो, ग्वालिन–ठीक से बात करो, वैद्य जी। बनिया-तुमने तो पण्डित जी, अकल की गोलियां खा रखी हैं पण्डित-हे भगवान् ! किन लोगों से पाला पड़ा है ! हां, मैं यह पूछ रहा था कि अमीरचन्दजो का... बनिया-हां, इसी घर में रहते हैं। वैद्य जी, क्या तुमने भी उनसे पैसे लेने हैं ? पण्डित–हाँ भई, छः महीने से अपना और अपने सारे खानदान का उधार इलाज करवाता रहा। एक पैसा भी नहीं दिया। बनिया-वैद्य जी, आपने असली दवाइयां दी थीं ! पण्डित-दवाइयाँ भी कहीं असली और नकली होती हैं । जब लोग दर्द से चिल्लाते हुए मेरे पास पाते हैं उस समय तो कहते हैं कि सब कुछ ले लो पर दर्द परन्तु दर्द मिटते ही सब भूल जाते हैं । मैं ग्राज पैसे लेके ही जाऊँगा । क्या आप लोग भी पैसे लेने आए हैं ?. बनिया-ौर नहीं तो हम लोग दावत खाने आए हैं ! मैंने तो १०० रु० लेने हैं। ग्वालिन-और मैंने ४० रु० दूध के लेने हैं । बनिया-ग्ररी, सच-सच क्यों नहीं कहती २० रु० पानी के और २० रु. ग्वालिन-(क्रोध से) फिर लगा तू, अंट-शंट' पण्डित--शान्ति ! शान्ति ! ग्वालिन --मेरा नाम शान्ति नहीं, दुर्गा है । बनिया-अच्छा वैद्य जी महाराज, आप तो चलो, देर हो रही है । पण्डित-क्या मतलब ? बनिया--पण्डित जी ! आप फिर कभी पा जाना। पण्डित -- मैं आपसे तो कुछ नहीं मांग रहा हूँ ! बनिया-कितने पैसे लेने हैं, वैद्य जी ? पण्डित-२० रु० १२ पाने ।
१२ उधार देवता पण्डित-हम लोगों का दुःख दूर बनिया-वस, २० रु० की खातिर अापने इतनी तकलीफ की ? पण्डित-मैंने इसी तरह २०० रु० से अधिक लेना है। दवाइय, मेरे घर तो नहीं बनतीं ! बनिया-दवाइयों की एक ही कही, पण्डित जी ! पाप तो २ पैसे की सौंफ पीस लो और पुड़िया बनाकर ८ अाने ले लो। पण्डित-हम पैसे दवाई के नहीं बल्कि दवाई बताने के लेते हैं। वनिया-पाप लोगों की तो पांचों घी में हैं। एक बार दुकान में कोई पा जाए, फिर बिना कुछ दिए नहीं जा सकता। हमारे पास कई ग्राहक तो वैसे ही दिमाग चाट के चले जाते हैं । करते हैं । लोग हमारे पास रोते हुए पाते हैं और हँसते हुए जाते हैं । यूं ही कोई पैसा नहीं दे देता। बनिया-दवाई चाहे फायदा करे या न करे, तुम्हारे पैसे खरे । हमारी तो चीज ले जाके दस दिन बाद फिर लौटा देते हैं। तुम्हारे भी आज तक कोई दवाई लौटाने पाया है। पण्डित-ठीक है, लाला जी, मैं पापकी तरह रात-दिन लोगों की घोखा नहीं देता। बनिया-मैं सब जानता हूँ, तुम तो रात-दिन यही मनाते हो कि बीमारी फैले। पण्डित-लाला जी, क्यों अपनी पोल खुलवाते हो ? कभी सोचा आपने कि पाप कितना पाप करते हैं ? बनिया-हम कौन-सा पाप करते हैं ? पण्डित-खाने की चीजों में मिलावट करने से अधिक और क्या पाप है ? पिछले महीने जो सौंफ और धनिया लाया था, उसमें न जाने क्या मिला था, एकदम गला रुक गया । बनिया-लोग जव सस्ती चीज मांगते हैं तो हम असली कहाँ से दें पण्डित–पर इसका यह मतलब तो नहीं कि तुम लोगों के जीव से खेलो, उन्हें जहर दे दो।
१४ पर्दा उठने से पहले पण्डित-तुम बनिया-पण्डित जी, यह लेक्चर हमने भी बहुत सुन रखे हैं । हमारी दुकान पर तुम-जैसे प्राके ५ रु० सेर असली घी मांगें। ५ रु० तो हमें भी नहीं पड़ता, हम कहाँ से दे दें। हमने भी दुकान ४ पैसे कमाने के लिए खोली है। हमारे भी वाल-बच्चे हैं, पेट है । लोगों का पेट कभी नहीं भरता। तुम लोग हवेलियां खड़ी कर लेते हो और फिर भी रोते रहते हो । बनिया-तुम भी महल खड़ा कर लो, कौन रोकता है ! हमने किसी के घर डाका तो नहीं डाला। पण्डित -यह डाका नहीं तो और क्या है ! लोग भूख से चिल्लाते रहें, बच्चे रोटी के लिए तरसते रहें, पर तुम लोग अपने गोदाम का ताला नहीं खोलते । तुम लोग इस प्राशा में कि अनाज का भाव बढ़ेगा अपने गोदाम पर साँप बनकर बैठ जाते हो । बनिया-ज्यादा बातें न बनायो, वैद्य जी। तुम लोग तो मरीज मर जाए तो भी फीस ले लो। ग्वालिन—तुम लोग तो नाहक झगड़ते हो। हम लोग तो अपनी- अपनी रकम लेने आए हैं। हो सके तो बाबू को जगाग्रो, नहीं तो अपने- अपने घर चलो। [ नेपथ्य में बादल गरजने की मावाज ] ग्वालिन-लो, यह तो बरखा पा रही है । मैं तो चली। बनिया-अरी, ठहर जरा। हम लोग तो बातों में लग गए। वैद्य जी, तुम खुलवा प्रो दरवाजा । ग्वालिन–हाँ, पण्डित जी, हम लोग तो चिल्ला-चिल्लाकर हार गए । पण्डित-ग्रन्दर तो अंधेरा है। मालूम होता है बाबू जी सो गए हैं। बनिया-अजी, जान-बूझकर सो गए हैं । ग्वालिन-बाबू ने आगे भी कई बेर मुझे देख के बत्ती बुझा ली। पण्डित-मुझे नहीं मालूम था कि यह ऐसा है नहीं मैं पहले ही
उघार देवता
१५
पैसे ले लेता।
बनिया-हमें कौन-सा मालूम था नहीं तो हमारा क्या दिमाग
खराब हुअा था जो इसे उधार माल देते।
ग्वालिन-किसी के माथे पर थोड़ा लिखा है कि यह प्रादमी
कसा है।
बनिया-लो, यह तो वंदें भी छा गई ।
ग्वालिन-हाय राम ! अब क्या होगा ? जो वरखा होने लगी तो
कहाँ जाएँगे?
बनिया-अच्छा पण्डित जी, तुम दरवाजा खटखटायो ।
पण्डित–वाबू अमीरचन्द जी, जरा दरवाजा खोलिए ।
बनिया-अरे वायू, अब तो खोल दे ।
ग्वालिन-यूं न खोलेगा।
[ तभी एक दर्जा दौड़ा हुअा अाता है और तीनों से टकराता है ।
तीनों चिल्लाते हैं। ]
ग्वालिन-यो, देख के ! आँख हैं या बटन !
बनिया-तुम यादमी हो या पाजामा !
पण्डित-पाप अजीब प्रकृति के मनुष्य हैं !
दर्जी-अमा माफ करना, पड़ रही हैं। मैंने सोचा यहीं खड़ा
बूंदें
हो लूं।
पण्डित-(दरवाजा खटखटाता है) वा अमीरचन्द जी !
दर्जी—क्या कह रहे हो ! बाबू अमीरचन्द जी !
पण्डित-जी हाँ, अमीरचन्द ।
दर्जी-तो क्या अमीरचन्द जी का दौलतखाना यही है ?
बनिया-दौलतखाना नहीं कंगालखाना कहो, कंगालखाना !
दर्जी-अमा, वाह ! मैं तो इन्हीं का मकान ढूंढ रहा था । क्या वह
घर पर तशरीफ नहीं रखते ?
बनिया-तशरीफ घर पर ही है। तशरीफ को जान के सुला
१६ पर्दा उठने से पहले दिया है। दर्जी-अमा, पाप लोग कैसे तशरीफ लाए ग्वालिन-हम कुछ न लाए! हम तो अपने-अपने पैसे लेने आए हैं। पण्डित-तो क्या आपने भी इन बावू जी से कुछ लेना है? दर्जी-जी हाँ। बनिया-वाह भई, तुमने भी अभी पाना था । दर्जी-तो आप लोग... बनिया-हम सब यहाँ इसीलिए पाए हैं। मैंने किराने के १०० रु० लेने हैं, और इसने दूध के ४० रु० और पण्डित जी ने उसे २० रु० का चूरन खिलाया है। ग्वालिन-तुमने क्या किया, भाई ? दर्जी–मैं टेलर मास्टर हूँ। ग्वालिन–तो तुम स्कूल के मास्टर हो । पण्डित-मास्टर नहीं, ये दर्जी हैं, दर्जी ! बनिया-वाह ! भई अमीरचन्द, तूने भी दुनिया भर के पैसे देने हैं। पर हम लोग भी खूब इकट्ठे हुए हैं। पण्डित-यापने कितने पैसे लेने हैं ? दर्जी-मैंने पूरे ८ रु० लेने हैं । बनिया-तो तुम सूट भी उधार सीते हो ? दर्जी-ग्रमां, खैर हुई कि सूट नहीं सिया, नहीं तो ५० रु० पर चक्कू चल जाता। मैंने तो सिर्फ जाकेट तैयार की थी। पण्डित-जाकेट की सिलाई ८ रु० ! बनिया-कपड़ा भी तुमने दिया होगा। दर्जी--यह सिर्फ सिलाई के पैसे हैं । ग्वालिन-हाय राम ! सिलाई के ८ रु० ! हमारे गांव में तो २ रु० लें। दर्जी-यह गांव नहीं, शहर है।
उधार देवता १७ गया तो ग्वालिन–यहाँ तो तुम लोग खूब लूट मचा ग्रो। मैं कहूँ जाकेट में ४ पाने का धागा लगता होगा और कैची कौन-सी जाकेट काटने में घिस जावे । दर्जी कैची तो नहीं घिसती पर सारा दिन बैठे-बैठे यमर टेढ़ी हो जाती है। १५० रु० महीना दुकान का किराया और ४०० रु. कारीगरों को देता हूँ पण्डित–फिर भी जाकेट के ८ रु० तो बहुत हैं । बनिया-भई, तुम्हारा काम सबसे बढ़िया है । घाटे का कोई मत- लब ही नहीं। कोई नुक्स रह भी कह दिया अाजकल का फैशन है ! पण्डित-यह तो सत्य है। संसार के सारे फैशन दजियों की गल- तियों से ही निकलते हैं। दर्जी-अमा, यह क्या कह रहे हो ? हम कपड़ा एक नम्बर सोते हैं । नापसन्द होने पर दाम वापस करने की शर्त करें। बनिया-ये सब कहने की बातें हैं । पण्डित-सूट के तो ४०-५० लेते होगे । दर्जी-मैंने कहा न ५० रु० लेता हूँ ग्वालिन-५० रु० ! कलयुग है कलयुग दर्जी—मैं अपनी मेहनत के पैसे लेता हूँ, मेहनत के ! तुम्हारी तरह नहीं कि दूध में एक लोटा पानी मिलाया और १० ग्राने खरे कर लिए। ग्वालिन—मुंह संभाल के बात कर ! मैं सब जानूं तुम लोग कपड़ा चोरी करते हो । चोट्ट कहीं के ! दर्जी—क्या कह रही है ? हम तेरे जैसे गंवार के कपड़े नहीं सीते नहीं तो एक दिन में पागल हो जाएं ! हम बड़े आदमियों के कपड़े ? -. ? सीते हैं। ग्वालिन-और बड़े आदमियों की चोरी भी बड़ी होवे । मैं देखें शहर की औरतन का प्राधा कपड़ा तुम खा जायो ! ऐसा जम्पर सीवें कि
१८
पर्दा उठने से पहले
?
प्राधा पेट नंगा रेवे और पीठ तो सारी दिक्खे ।
दर्जी-एक दिन वह जम्पर पहन के तो देख, तू कितनी अच्छी लगे
ग्वालिन–मुए, तुझे शरम नहीं प्रावे यू कहते । यू न समझियो"
बनिया-अबे क्यों मजाक करे, दर्जी ? वह सच कहती है ।
दर्जी-मेरा नाम दर्जी नहीं, रामप्रसाद है।
बनिया-कोई परसाद हो पर हो तो दर्जी ।
दर्जी-४ पैसे का सौदा देने वाले लाला, तुम क्या समझो हमारी
अहमियत को !
बनिया-यह चार-चार पैसे का सौदा ही चार दिन न मिले तो
नानी याद या जावे ।
दर्जी-अरे रहने दे, लाला। हम न हों तो दुनिया की सारी तहजीब
उठ जाए। राजा हो या मन्त्री, दारोगा हो या संतरी, सबको हम
ही सजाते हैं । अमा, सच तो यह है कि हम अपने सिले हुए कपड़ों से ही
जिसे जो चाहें बना दें।
[ नेपथ्य में दस बजने की अावाज ]
पण्डित-ग्रोह ! दस बज गए । इस बहस से क्या लाभ ? अपनी-
अपनी जगह सभी बड़े हैं । क्यों न मिलकर कोई उपाय सोचें।
दर्जी--अमा, यह तो ठीक कहा । बेकार वक्त खोने से क्या फायदा ?
ग्वालिन–हम तो जोर लगा चुके । अब तुम लगाग्रो जोर ।
दर्जी-ऐसे काम नहीं चलेगा। मैं बताऊँ, बाहर से ताला लगा दो।
सवेरे उठके फिर पा जायेंगे ।
पण्डित-परन्तु मेरा विचार है कि ऐसा करने से पहले उन्हें एक
बार बता दें।
दर्जी—इसमें तो कोई हर्ज नहीं।
बनिया-ऐसा भी करके देख लो।
सब एक साथ-दरवाजा खोल दो नहीं तो हम लोग बाहर से ताला
लगा देंगे।
उषार देवता
१६
बनिया-एक बार फिर कहो।
[ सब फिर कहते हैं । रेखा का प्रवेश ]
रेखा-याप लोगों ने क्या शोर मचा रखा है ? रात के दस बज
चुके है । मुहल्ले में किसी को सोने दोगे या नहीं ?
ग्वालिन—बहनजी, हमने तो पैसे लेने हैं।
बनिया–हाँ, हम सबने पैसे लेने हैं ।
रेखा-किससे पैसे लेने हैं ?
दर्जी–बाबू अमीरचन्द से।
रेखा-जो इस मकान में रहते थे ?
पण्डित–जी हां।
रेखा-उनकी तो वदली हो गई।
वनिया-क्या कहा, वदली हो गई !
रेखा-हाँ, वह तो कल रात अागरा चले गए। मकान तो खाली
। मालिक-मकान पीछे से ताला लगा गया है ।
सब एक साथ -ऐं ऐं: 'ऐं...
awa
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एक दिन की छुट्टी
पात्र
विजय
अजय
धनिया
एक नवयुवक
विजय का मित्र
विजय का नौकर
विजय की पत्नी
विजय का अफसर
पुष्पा
वर्माजी
[ एक साधारण कमरा जिसमें एक चारपाई बिछो है ग्रोर दो कुर्सियां और एक छोटी-सी मेज भी रखी है. इसलिए अाप इसे अयन- गृह भी कह सकते हैं और बैठक भी। शेष सामान वही है जो एक साधारण क्लर्क के यहां हो सकता है । पर्दा उठने पर विजय एक कुर्सी पर बैठा दिखाई देता है। टांगे उसकी मेज पर रखी हैं। वह एक किताब के पन्ने उलट रहा है और कुछ गुनगुना रहा है। विजय-धनिया ! यो धनिया ! जी । ? धनिया-जी, वान जी ! विजय- क्या कर रहा है ? धनिया-मैं चींटियों में से खांड निकाल रहा हूँ, वाद् विजय-क्या कहा घनिया-हाँ हाँ 'खांड में से चीटियाँ निकाल रहा हूँ। विजय-देख किताव किधर रखी है ? धनिया-कौन-सी किताव ? विजय-जिस पर औरत की तसवीर है। धनिया-बाबू जी, अाजकल तो हर चीज पर औरत की तसवीर होती है । और तो और बाबू जी, बीड़ी के बंडल पर भी औरतों की तसवीर होती है । (जाने लगता है)। विजय-धनिया, एक गिलास पानी ला। धनिया-नल का या घड़े का? विजय—(कुछ सोचकर) अच्छा रहने दे । [ धनिया फिर जाने लगता है ] विजय-धनिया, चाय बना।
२४
पर्दा उठने से पहले
धनिया-बाबू जी, चाय की पत्ती तो..
विजय-सामने लाला की दुकान से ले प्रा। मेरे हिसाब में
लिखा देना।
धनिया-प्राज तो लाला की दुकान बन्द है, बाबू
जी
विजय-पागे से लाला की दुकान बन्द होने से एक दिन पहले देख
लिया कर कि कौन-सी चीज लानी है।
धनिया-बहुत अच्छा।
[ धनिया अन्दर जाने लगता है मगर फिर लौट प्राता है ]
धनिया-(डरते हुए) बाबू जी !
विजय-क्या है ?
धनिया-बाबू जी, मुझे छुट्टी चाहिए।
विजय–छुट्टी?
धनिया-बात यह है बाबू जी कि मेरी घर वाली बीमार है।
विजय-(प्राश्चर्य से) तेरी भी शादी हो गई ! तूने कभी बताया
नहीं।
धनिया-अापने कभी पूछा ही नहीं।
विजय—मैं सब जानता हूँ। तुम लोग छुट्टी लेने के लिए किसी न
किसी को बीमार कर देते हो।
धनिया-नहीं बाबू जी, मैं सच कहता हूँ।
विजय-मुझे समझाने चला है ! दफ्तर में भी मुझे ऐसी ही अर्जियों
से रोज पाला पड़ता है। कल दफ्तर में एक आदमी का तार पाया था
कि उसकी माँ मर गई है। बाद में पता चला कि छुट्टी के लिए बेचारे
की मां को तीन वार मरना पड़ा ।
[ दरवाजा खटखटाने की मावाज ]
विजय-(धनिया से) देख, कौन है ?
[ धनिया जाता है। दो-तीन क्षण बाद प्रजय प्रवेश करता है ]
विजय-प्रायो अजय, मैं तुम्हें ही याद कर रहा था। बड़ी देर से
एक दिन की २५ छुट्ट ? अकेला बैठा हूँ। बिलकुल बोर हो गया हूँ अजय-नो क्या प्राज दफ्तर से जल्दी पा गए ? विजय – जल्दी क्या, यहाँ तो ग्राज दफ्तर बिलकुल गोल कर दिया। प्रजय-क्या बात है ! मिलानो हाथ ! किसी ने अंग्रेजी में ठीक कहा है-Great men think alike ! बड़े प्रादमियों के विचार एक- से ही होते हैं। विजय-तुम भी क्या अाज दफ्तर नहीं गए ? अजय-गया तो था पर ग्राज कुछ काम करने का मूड नहीं था इसलिए मा-बदौलत भी लंच के बाद दफ्तर को 'गुड नाइट' कर पाए । विजय-तुम्हारा अफसर अच्छ। मालूम होता है । जव जी चाहता है, चले आते हो। अजय-ये अफसर सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। कोई भी अफसर छुट्टी देकर खुश नहीं होता। पर यहाँ भी बड़े पापड़ बेले हैं। वह ब्रह्म अस्त्र फेंकता हूँ कि कभी वेकार नहीं जाता। जानते हो याज क्या किया ? विजय-क्या किया? अजय-वह पिछले महीने मैंने उस ड्रामे में... क्या नाम था उसका 'हाँ' 'दाढ़ का दर्द' में बीमार का पार्ट किया था न । बस, वही एक्टिग आज दफ्तर में कर दी। विजय-पार्ट तो उस दिन तुमने बहुत अच्छा किया था । अजय-सच कहता हूँ अाज भी फौरन लोग इकट्ठे हो गए । एक गरमागरम दूध का गिलास ले आया । यार पी गए । एक, दो गोलियां ले प्राया। मैंने दूसरी तरफ मुंह करके जेब में डाल लीं। फिर साहब आया और कहने लगा-"रमेश, तुम अभी घर जाग्रो । काम की फिकर न करो, कल कर लेना।" [ दोनों हँसते हैं ] विजय—सच है, दफ्तर में अफसर से और घर में बीवी से बिना
२६
पर्दा उठने से पहले
झूठ बोले गुजारा नहीं होता।
अजय-यह तो सौ नए पैसे सच है। पर आज तुम दफ्तर क्यों
नहीं गए?
विजय-बस, कुछ न पूछो, यार । वह हमारी छोटी साली साहिवा
हैं न !
अजय-कौन, कान्ता ?
विजय-हाँ।
अजय-वह तो कलकत्ता है ।
विजय-जी हाँ ! बस, जब भी पाती है तो कोई न कोई आफत
लाती है।
अजय-तो क्या कान्ता पाई है ?
विजय-अभी पाई कहाँ है ! जब आयेगी तो पता नहीं क्या होगा!
कल रात दो बजे तार पाया। पहले तो यार मैं डर गया। मैंने कुण्डी
नहीं खोली। जब मुझे यकीन हो गया कि तार वाला है तब दरवाजा
खोला । लिखा था-'Reaching Tomorrow.
अजय-ग्रोह ! तो कल पाएगी !
विजय-नहीं भई, तारीख कल की पड़ी हुई थी। मतलब यह
कि
ग्राज प्राना था।
अजय-कलकत्ता से गाड़ी तो सुबह पाती है।
विजय-भई, कलकत्ता से तो कई गाड़ियां आती हैं, पर तार में कुछ
नहीं लिखा था । गाड़ी से आना है या हवाई जहाज से यह भी तो
नहीं लिखा !
प्रजय-तुम भी बस यूं ही हो ! जब कुछ न लिखा हो तो मतलब
गाड़ी से ही होता है।
विजय-नहीं भई, वह अभी तक एक बार गाड़ी से, दो बार
हवाई जहाज से और एक बार तो अपनी मोटर में ही कलकत्ते से यहां
तक पा चुकी है।
२७ एक दिन की छुट्टी यह ६ अजय-भई खूब विजय-अग्नी जो ग्राज परेड हुई है हम ही जानते हैं। कलकत्ते से पहली गाड़ी सुबह ६ बजे पाती है। श्रीमती जी ने बस ४ वजे से ही शोर मचाना शुरू कर दिया कि जाग्रो कहीं देर न हो जाए। मतलब कि ६ बजे स्टेशन पहुँचे । गाड़ी आई पर कान्ता जी नहीं पाई। ७ वजे हवाई अड्डे पहुँचे, हवाई जहाज ग्राया पर कान्ता जी नहीं आई। अजय-तो जनाब ने अपनी साली साहिबा का स्वागत करने के लिए छुट्टी ली है। विजय —सुन तो सही, घर पाया तो श्रीमती जी बोलीं कि दोपहर ११ वजे की और शाम ६ वजे की गाड़ी देख पाना, ३ वजे वाला हवाई जहाज भी देख पाना। क्या करता, अपना भाई-बहन होता तो पाराम से घर बैठ जाता पर श्रीमती जी की बहन जो ठहरी ! 'बहुत अच्छा' कहना पड़ा। अजय-तो अभी रात को स्टेशन जाना है ! विजय-नहीं भई, ११ बजे उन का दूसरा तार पा गया कि प्राज नहीं पा रही हैं ! अपने राम ने सुबह ही दफ्तर से छुट्टी ले ली। अजय-अर्जी भिजवा दी थी ? विजय-अर्जी किसके हाथ भिजवाता ? टेलीफोन कर दिया कि श्रीमतीजी को जोर का बुखार है । वह चारपाई से हिल नहीं सकतीं । अजय-ौर भाभी हैं कहाँ ? विजय-दोपहर को अपनी मौसी की लड़की के देवर की शादी में गीत गाने चली गई हैं। यहाँ भूठ भी बोले और दोपहर से घर में बैठे झक मार रहे हैं अजय-अच्छा दोस्त तो उठो। चलो, कहीं घूम पाएँ । विजय-कहाँ चलोगे ? अजय—चल यार, आज फिर सरकस ही देखा जाय । सुना है बहुत अच्छा है। बन्दर तबला बजाते हैं, घोड़े नाचते हैं और इन्सान हिन-
२८
पर्दा उठने से पहले
हिनाते हैं।
विजय-सरकस के तो अब टिकट मिल चुके ।
अजय-अब उठेगा भी या बातें ही बनाए जायेगा! टिकट नहीं
मिलेंगे तो लौट पाएंगे। वहाँ कोई हमें शेर तो पकड़ नहीं लेगा !
विजय-कितने बजे खतम होगा सरकस ?
अजय-साढ़े नौ बजे । जल्दी कर यार । पहन कोट और जूते !
विजय-अभी दो मिनट में तैयार होता हूँ। (टाई बांधने लगता
the
अजय-कल रात बड़ा मजा आया। कपूर को जानते हो न जो
हमारे पास रहता है ?
विजय-हां-हाँ, जिसकी बावी मास्टरनी है ?
अजय-भगवान् न करे किसी की बीबी मास्टरनी हो ! कल बेचारा
रात कुछ देर से आया तो उसकी बीवी ने जानते हो क्या किया ?
विजय-क्या किया?
अजय-उसने उससे सलेट पर २० बार लिखवाया-'मैं आइन्दा
८ बजे से पहले घर पहुँचूंगा। आइन्दा ८ बजे से पहले घर आऊंगा।
शंकरलाल कपूर बकलम खुद..'
विजय-शुक्र है भगवान् का अपनी बीवी मास्टरनी नहीं, नहीं तो
सारी उमर सलेट पर लिखते ही गुजर जाती। पर एक बात है यार ।
दफ्तर की छुट्टी का समय हो गया है। कहीं हमारा मैनेजर रास्ते में
मिल गया तो...
अजय-मैं बताऊँ, हाय में एक शीशी ले चल । वह मिल जाए
तो झट कह देना कि डाक्टर के यहाँ दवाई लेने जा रहा हूँ।
विजय-क्या बात है !
अजय-देख लो दोस्त क्या सूझी है !
विजय-अगर यार वह सरकस में मिल गया तो...
जय-प्रव अगर-मगर छोड़ ! भई सुन, वह राकेश
न, उसे भी
एक दिन की छुट्टो २६ धनिया-वाबू once साथ ले चलें। जय-देर हो गई है। अजय-पास में ही तो है । मैं चलकर तैयार करवाता हूँ, तू वहीं आ जाना ! [ धनिया का प्रवेश ] विजय-राकेश के यहाँ धनिया को भेज देते हैं। अजय-धनिया के बस का नहीं। मैं चलता हूँ, तू या जाना। विजय-अच्छा तो तु चल ! अजय--पर यार जरा जल्दी करना ! विजय-मैं अभी आया । जी, चाय बनाऊँ ? विजय-अब चाय रहने दे । विजय-देख धनिया, मैं सरकस देखने जा रहा हूँ। देर से पाऊँगा और तेरी बीवी जी शायद आज वहीं व्याह वाले घर ही रहेंगी। धनिया-(प्रसन्नता से) बहुत अच्छा बाबू जी ! विजय-मैं पाकर खाना खाऊंगा। [ विजय बाहर जाता है, पर दरवाजे तक जाकर वापस आ जाता है । वह इधर-उधर चक्कर काटने लगता है। ] विजय-(घबराकर) हे भगवान् ! अब क्या होगा ? क्या करूं ? धनिया-क्या हुअा बाबूजी ? कैसे लौट पाए ? विजय-तुझे क्या बताऊँ ! मैं मना करता रहा कि मत जायो, पर कौन सुनता है । इन औरतों से तो भगवान् ही वचाए धनिया-वाबू जी, वात क्या है ? विजय-तू क्या समझेगा ! वर्मा जी इधर ही पा रहे हैं । धनिया-कोन वर्मा जी ? विजय-मेरा अफसर ! तेरे अफसर का अफसर ! धनिया-तो क्या हुअा बाबू जी ? आप फिकर न कीजिए, मैं ऐसी ?
३० पर्दा उठने से पहले Pick चाय बनाऊँगा जो पी के उनकी तबीयत खुश हो जाए। विजय -(एकदम चुटकी बजाकर) धनिया, इधर आ । (धनिया को कुर्सी पर बैठने का इशारा करता है। धनिया कुर्सी पर बैठने में आनाकानी करता है पर विजय उसे पकड़कर बैठा देता है) धनिया, देख तुझे बीबी जी बनना पड़ेगा। धनिया-यह क्या कहते हो, बाबूजी ? (धनिया एक तरफ भागने लगता है पर विजय उसे फिर बैठाता है)। विजय-बात यह है कि सवेरे मैंने दफ्तर कहलाया था कि तेरी बीवी जी बीमार हैं । उन्हें बुखार है । अब यह मेरा अफसर उनकी खबर लेने आ रहा है और तेरी बीबी जी शादी में गई हुई हैं। अगर वह अब उन्हें यहाँ नहीं देखेगा तो समझेगा कि मैं हमेशा झूठ बोलकर छुट्टी लेता । पोर धनिया, अगर मेरी नौकरी चली गई तो तेरी भी नौकरी धनिया-पड़ोस वाली बीबीजी को बुला लाऊँ ? विजय-वेबकूफ कहीं का ! खुद भी पिटेगा, मुझे भी पिटवाएगा। धनिया-बाबू जी, मैं नीचे खड़ा हो जाता हूँ। वह आपका मकान पूछेगे तो मैं गलत पता बता दूंगा। विजय–बेकार बातें न बना ! उन्हें घर मालूम है। जल्दी कर ! वक्त बहुत थोड़ा है । वह सामने सड़क पर किसी से बातें कर रहे हैं, आते ही होंगे। धनिया-(घबराकर) तो मैं क्या करूँ, वावू जी ? जिप - तू जल्दी से अपनी बीवी जी की धोती पहन ले और कम्बल प्रोढ़कर सो जा । बस, 'हाय-हाय' करते रहना । धनिया-मुझे तो डर लगता है । विजय-डर किस बात का ? उसने कोई तेरा मुंह थोड़े ही देखना है। पांच-दस मिनट की बात है । (घोती देते हुए) ले पहन । धनिया-बाबू जी, पाजामे पर यह धोती कसे पहनूं ? विजय-अच्छा छोड़ ! ले जम्पर ही पहन ले और चुन्नी ले ले।
विजय-तु एक दिन की छुट्टी ३१ (विजय उसे जम्पर पहना देता है। सिर पर चुन्नी रख देता है और फिर पकड़कर उसे चारपाई पर लिटा देता है) बस हार-हाय करते र ना। (विजय दौड़कर एक तसला लाता है और चारपाई के नीचे रख देता है । फिर दौड़कर एक मेज लाकर धनिया के सिरहाने रख देता है)। विजय-(स्वगत) दवाई भो तो चाहिए । ( कुछ सोचकर) एक शीशी में स्याही डालकर पानी भर देता हूँ। (एक शीशी में थोड़ी-सी स्याही डालकर उसमें पानी भरकर मेज पर रख देता है) । विजय-(धनिया से) अरे, मुंट ढक ले । धनिया–(उठने का प्रयत्न करते हुए) बाबू जी, पानी पी पाऊँ । लेटा रह । मैं पानी ला देता हूँ । [ विजय एक गिलास में पानी लाकर धनिया को देता है । धनिया पानी पीकर गिलास विजय को पकड़ा देता है और विजय उसे मेज पर रख देता है। तभी दरवाजे पर खट-खट होती है । ] विजय-ले, वह या गए । अवे 'हाय हाय' तो कर । घनिया-हाय, मर गया ! मर गा ! विजय-मर गया नहीं, मर गई ! समझा ! धनिया-(कराहते हुए) मर गई ! मर गई ! [ विजय दरवाजा खोलता है । वर्माजी उसके साथ अन्दर आते हैं। ] विजय-ग्राप ! पाइए । वर्मा-कैसी तवीयत है अव ? विजय-कुछ ठीक है, पर खास फर्क नहीं । अापने बड़ी तकलीफ हैं की । बैठिए। [ धनिया के धीरे-धीरे कराहने की अावाज ] वर्मा-तुम्हारे मोहल्ले में ही वह किनारे वाली पीली कोठी है न, वह शर्माजी की है। अपने पुराने मित्र हैं । उनके लड़के की सगाई थी। वहाँ प्राया था। सोचा, तुम्हारे यहां भी हो चलूं ।
३२
पर्दा उठने से पहले
विजय-बड़ी तकलीफ की आपने ।
वर्मा-इन्हें तो काफी तकलीफ मालूम होती है ।
विजय-इस समय भी १०३° बुखार है ।
वर्मा—कल तो तुम दफ्तर पाए थे। कोई बात नहीं की। क्या
अचानक तबीयत खराब हो गई ?
विजय-जी ! कल रात अच्छी-भली खाना पका रही थी कि
एकदम 'एकदम पैरों में दर्द होने लगा बाद में पीठ में और फिर
सिर दर्द करने लगा।
वर्मा-बुखार कब चढ़ा?
विजय-जी आज सवेरे।
वर्मा-दर्द रात-भर होता रहा और बुखार सुबह चढ़ा।
विना -जी नहीं ! बुखार तो रात को ही चढ़ गया होगा, पर सुबह
डाक्टर ने देखा । हमारे पास तो थर्मामीटर था नहीं।
वर्मा-कौन से डाक्टर को दिखाया है ?
विजय-क्या नाम है उसका ? 'डाक्टर नहीं, हकीम साहब को
दिखाया है।
वर्मा-क्या बताया हकीम ने ?
विजय-कह रहे थे कि बस तीन-चार दिन में ठीक हो जाएंगी;
घबराने की कोई बात नहीं।
वर्मा-(शीशी की पोर देखते हुए) यह दवाई दी है ?
विजय-जी हाँ।
वर्मा-और
कुछ भी दिया है ?
विजय-(सोचकर) और 'जी हाँ एक इंजेक्शन लगाया था और
तीन पुड़ियाँ खाने को दी थीं।
वर्मा-तो ये हकीम लोग भी इंजेक्शन लगाने लगे !
विजय-प्राजकल तो सभी हकीम इंजैक्शन लगाते हैं ।
वर्मा-मैं तो राय दूंगा कि इन वैद्य-हकीमों के चक्कर में मत
एक दिन की छुट्टी ३३ भेज दूंगा। पड़ो। किसी अच्छे डाक्टर को दिखायो। विजय बात यह है कि इन्हें हकीम की दवा बड़ी सूट करती है । जब भी बीमार पड़ती हैं हकीम साहब की दवा से आराम हो जाता है । वर्मा-इस समय तो तबीयत ज्यादा खराब लगती है। विजय-जी नहीं, सुबह से तो कुछ फायदा है। वर्मा-पर अभी तो तुम कह रहे थे कि कोई फायदा नहीं। मेरी राय है कि किसी लेडी डाक्टर को भी दिखा दो। विजय-लेडी डाक्टर को ! वर्मा-हाँ भई, मेरी भतीजी ने भी इसी साल 1. B. B. S. किया है । उसे सुबह विजय-नहीं-नहीं, उन्हें नकलीफ देने की कोई आवश्यकता नहीं। वर्मा-तकलीफ कैसी ! वह तो अपनी ही बच्ची है। पुष्पा का प्रवेश ] विजय-तुम आ गईं ! पुष्पा हो। पुष्पा—यह कौन लेटा है ? विजय-इन्हीं की तबीयत खराब है। तुम उधर बैठो, मैं अभी आया। यह हैं हमारे मैनेजर । पुष्पा-(हाथ जोड़कर) नमस्ते । वर्मा-नमस्ते जी। विजय-तुम जाकर अंगीठी जलाप्रो । जानो भी ! [ पुष्पा अन्दर चली जाती है ] वर्मा- यह" विजय-जी यह मेरी साली है। [ पुष्पा का प्रवेश ] पुष्पा-पोह ! तो क्या कान्ता या गई ? कान्ता को क्या हुआ ? ?
३४
पर्दा उठने से पहले
विजय-नहीं, कान्ता नहीं पाई है । अच्छा जी, मैं कल दफ्तर मा
जाऊंगा।
वर्मा-दफ्तर की चिन्ता न करो। जब तक तुम्हारी श्रीमती जी
की तबीयत ठीक न हो तुम दफ्तर न पायो।
पुष्पा-मैं पूछती हूं बात क्या है ? यह कौन लेटी है ?
वर्मा-पापको मालूम नहीं इनकी श्रीमती जी बीमार हैं।
पुष्पा-क्या कहा इनकी श्रीमती जी ! फेरे तो मेरे साथ लिए हैं,
मैं भी देखू यह सौत कौन है ?
[ पुष्पा धनिया का कम्बल खींचती है ]
विजय-यह क्या कर रही हो ?
पुष्पा-(कम्बल खिचकर फेंक देती है) कौन है तू ? धनिया ! यह
सब क्या है ?
[ धनिया एकदम चारपाई से
कूदकर
नीचे प्रा जाता है ]
धनिया-(हाथ जोड़कर) मेरा कोई कसूर''नहीं, बीबी जी।
बाबूजी ने......
वर्मा-(हंसकर) इसकी क्या जरूरत थी, भई ! मैंने तो आज तक
कभी छुट्टी देने में प्रानाकानी नहीं की। फिर आज तो अपने मैनेजिंग
डाइरेक्टर यूरोप गए हैं । सवेरे सब उन्हें हवाई अड्डे पर छोड़ने गए थे।
उसके बाद ग्राज दफ्तर में छुट्टी कर दी थी।
विजय-सच !
बुरे फंसे नाम कमाने में
पात्र
जमना
: रेस्टोरेंट का बैरा
शम्भू
गुटरी
: तोन मित्र
गुटल्लू
सरस्वती
राकेश
गुल्लू
की मंगेतर
: सरस्वती का एक सम्बन्धी
स्थान-एक.
रेस्टोरेट
समय-रात के पाठ बजे
[ रंगमंच के एक तरफ एक छोटा-सा काउण्टर है। उसके पास एक
पालमारी है जिसमें बिस्कुट, अण्डे, केक इत्यादि चीजें रखी हुई नजर
पाती हैं। सामने तीन-चार मेज और कुसियां हैं। पोछे दीवार पर
फिल्म अभिनेत्रियों की तस्वीरें टंगी हुई हैं। बाकी चीजें निर्देशक अपनी
सुविधानुसार लगा सकता है जो कि एक ग्राम मामूली रेस्टोरेट में
होती हैं । पर्दा उठने पर जमना मेज साफ करता हुप्रा नजर अाता है।
कुछ देर बाद शम्भू, जो हॉकी की टीम को वर्दी में है एक हाथ में हॉकी
लिए हुए प्राता है। ]
जमना-साहब, आज मैच कैसा रहा ?
शम्भू-वराबर ।
जमना—तो हुजूर अाज फिर बराबर की रही। एक घंटे में कोई
गोल नहीं हुआ।
शम्भू-नहीं भई, दोनों तरफ बारा-बारा गोल हुए।
जमना-तब तो साहब गोली या तो इस गोल में रही, या उस
गोल में, बीच में तो पाई नहीं होगी।
शम्भू-तुम्हें खेल से बड़ी दिलचस्पी है, जमना ।
जमना-क्या पूछते हो साहबजी, मैं तो खानदानी खिलाड़ी हूँ । बस,
कसर इतनी है कि खेलता ही नहीं। मेरे मामा तो वो फुटबाल खेलते थे
कि क्या बताऊँ । दूर-दूर तक उनकी धाक थी । एक बार इतनी ऊंची किक
मारी कि एक उड़ते हुए हवाई जहाज के मुसाफिरों ने कैच कर ली थी।
शम्भू-तुम्हारा भी जवाब नहीं जमना।
जमना–यकीन मानिए हुजूर बिलकुल सच कह रहा हूँ। उनके हाथ
में २४ घंटे
फुटबाल ही रहती थी।
३८ पर्दा उठने से पहले शम्भू-पोर तुम्हारे हाथ में रसगुल्ला रहता है । जमना-दिनों के फेर हैं हुजूर, नहीं तो हमारे खानदान में आज तक किसी ने भी नौकरी नहीं की। शम्भू-जरा कम बोला कर । जमना-ग्राज तो वैसे ही मेरी जबान पर छाले पड़े हुए हैं । बोला ही नहीं जाता। शम्भू-अच्छा खाने के लिए क्या है ? जमना-फिर वही वात हुजूर ? यह पूछिए क्या नहीं है ? शम्भू-खूब जमना-कलकत्ते के रसगुल्ले, करांची का हलवा, आगरे का पेठा, मथुरा के पेड़े, हापुड़ के पापड़ और शम्भू-बस-बस ! पीने को जमना-चाय, कॉफी, कोको, लस्सी, सोडा, लेमन... शम्भू-अच्छा ए'ए'ए' 'तुम वो लायो । जमना-क्या साहब? शम्भ--एक गिलास पानी। जमना-आप मेच खेल कर पा रहे हैं, थके हुए हैं, खाली पानी न पीजिए। शम्भू-अच्छा तो जरा ठहरो। अभी वह गुटरी और गुल्लू भी आते होंगे। इक्ट्ठ ही चाय पियेंगे। जमना-गुटरी बाबू भी आ गए। [ गुटरी का प्रवेश ] गुटरी–कहो यार, सुना है कि प्राज तो एक दर्जन गोल शम्भू-एक नहीं, दो दर्जन । एक दर्जन उन्होंने किए और एक दर्जन हमने । गुटरी-तुम हॉकी खेल रहे थे या गेंद-डंडा ! शम्भू-तुम अपनी कहो। हुए।
बुरे फंसे नाम कमाने में
गुटरी-बस क्या कहूँ, अपनी तो किस्मत की बड़ी नाव
शम्भू-क्यों, क्या हुग्रा?
गुटरी--कुछ न पूछ यार ! किस्मत के प्रागे किमी का जो नही
चलता। किसी ने सच कहा है-
लाख कोशिश करे इन्सान क्या होता है,
होता है वही जो मंजूरे खुदा होता है !
शम्भ-कछ बताएगा भी!
गुट रो-क्या करें. चार, पांच बार गोन की तरफ हिट मारी मगर
बदकिस्मती से चार बार ग्राउट गई और एक बार गोलकीपर रोक
ली नहीं तो भगवान कसा ग्राज पाँच गोल किए ले ।
शम्भू-क्या कहने अापके ! अगर हमारे घर के ना मरने तो अपनी
फौज होती। इस अगर-मगर को छोड़, मीधी न रह बना कि..
गुटरी-एक गोल से जीते हैं ।
शम्भू-किसने किया?
गुटरी—यह भी पूछने की बात है। अपनी टीम में दो ही गोल
करने वाले हैं-मैं या सलीम अपनी तो ग्राज किरात ही टेढ़ी थी,
गोल कैसे होता?
शम्भू-जमना, जमना !
जमना-गुड
मानिग साहब ।
गुटरी-गुड इवनिंग जमना।
जमना-मुबारक हो हुजूर । अाज तो ग्रापकी टीम जीत गई ।
आप लोग भी खूब खेलते हैं। अापकी टीम से टक्कर लेना कोई बच्चों
का खेल नहीं ।
गुटरी-यह ले अठन्नी- छः पाने का सिगरेट का ऐकट ले ग्रा।
जमना-कौन-सा लाऊँ?
-पाकेट-मार ।
जमना-हाँ साहब पाप तो वही पीते है ।
गुटरो-
४० पर्दा उठने से पहले । शम्भू-अब तुम्हारा मंच किससे पड़ेगा? गुटरी-शेरे बबर । शम्भू-कैसी टीम है ? गुटरी-बस नाम को ही शेरे बबर है। उम्मीद है उसकी चरखी तो हम लोग घुमा देंगे। जमना-यह लीजिए। क्या अर्ज करूं। परसों मारकीट स सौदा ला रहा था। रास्ते में मैदान में देखा तो पाप खेल रहे थे । मैं साइकिल पर से उतरकर देखने लगा। आप भी खूब खेलते हैं । बस, कमाल है हुजूर । गेंद एक बार आपके पास पानी चाहिए, फिर बस गोल ही होता है। गुटरी-परसों तो हम लोग यूं ही खेल रहे थे। जमना-आपके मुकाबले का रेट प्रोट (Right out) तो दिल्ली में नहीं है हुजूर । यह बाकी दो पाने । गुटरी-इन्हें तुम्हीं रखो। जमना-चाय लाऊं? शम्भू-अच्छा ले पायो। जमना-खाने को क्या लाऊँ ? गुटरी-पाज हवा ही खाएंगे । बस पीने को ही ले प्रा। शन्भू-क्या वजा है ? गुटरी-सात बज चले हैं । क्या बात है ? कुछ जल्दी है ? शम्भू-गुल्लू ने भी यहाँ पाठ बजे आने को कहा था। गुटरी-गुल्लू भी प्रादमी तो एक नम्बर है। अपने आपको बड़ा खिलाड़ी समझता है। शम्भू-खिलाड़ी-विलाड़ी तो क्या है । उस बेचारे को यह भी पता नहीं कि गेंद वल्ले से मारते हैं या बल्ला गेंद से ! गुटरी-कल कितने रन बनाए थे ? शम्भू-दस । पर वह भी क्या कोई क्रिकेट का मैच था। किसी
बुरे फंसे नाम कमाने में
४१
को खेलना ही नहीं पाता था । ऐसा मालूम हो रा था जैसे गुल्ली-डडा
खेल रहे हो।
गुटरी-एक घंटा तो लगाता है पंड और दस्ताने पहनने में; और
विकट पर दम मिनट भी नहीं ठहरता ! हाँ, आदमी मजेदार है ।
शम्भू-कोई जलसा हो, नाटक हो, रामलीला हो या भाषण हो
रहा हो । बस, जहाँ शामियाना देखा वहीं पहुँच जाता है।
गुटरी--और फिर इन्तजार करता है कि लोग शोर करें और इसे
स्टेज पर प्राकर यह कहने का मौका मिले कि भाइयो, चप रहो ! ताकि
लोग उसे अच्छी तरह देख लें ।
शम्भू-पर भई, दोस्तों का दोस्त है और यारों का यार ।
गुटरो-लो, याद अा गया । इसकी तो सगाई हो गई है।
शम्भू-सगाई!
गुटरो–हाँ-हाँ, अभी दो-तीन दिन ही हुए हैं ।
शम्भू-भई वाह ! हम लोगों को खबर ही नहीं।
गुटरी-देख, वह पा रहा है गुल्लू ।
शम्भ-फिर हो जाय।
दोनों एक साथ-(गाकर) अजी देखो खिलाड़ी चले आ रहे हैं,
चले पा रहे हैं ; देखो खिलाड़ी चले पा रहे हैं ।
[ गुल्लू का प्रवेश
शम्भू--यह है श्री गुलशन तिवारी, क्रिकेट और हाकी के मशहूर
खिलाड़ी। वैसे इन्हें हम लोग मोहब्बत यानि प्यार से गुल्लू कहते हैं।
गुटरी-बड़ी खुशी हुई आपसे मिलके। मुझे गुलजारीलाल उर्फ
गुटरी कहते हैं।
गुल्लू-अच्छा जी !
[ सब हंसते हैं ]
गल्लू-ग्राज तो बड़े मूड में हो तुम लोग ।
शम्भू-कांग्रेचूलेशन्म !
४२
पर्दा उठने से पहले
कुछ।
गुटरी-यानि कि मुबारक हो ।
गुल्लू क्या बात है ?
गुटरी-एक नहीं दो-दो बातें हैं ।
शम्भू-पहले पार्टी दो, फिर पूछना क्यों ? जमना!
जमना-जी साहब ।
गुटरी-साहब से आर्डर लो।
जमना-नमस्ते साहब ! आप तो कई दिनों के बाद दिखाई दिए
हैं। भगवान् कसम आपका वह पिछले मैच का चउमा तो अभी तक
याद है । क्या गेंद काटी थी ! वाह ! वाह ! क्या लाऊँ, हुजूर ?
गुल्लू-पहले एक गिलास पानी ला ।
गुटरी-पानी से काम नहीं चलेगा ! अाज तो बढ़िया पार्टी होनी
चाहिए।
गुल्लू-बताएगा भी
शम्भू-क्या कहने जनाब के ! बड़े भोले बन रहे हो जैसे कुछ
मालूम ही नहीं। अभी तो रोटी को प्रोची कहते हो !
गुटरी-एक बात तो यह कि कल जनाब ने दस रन बनाए । अपना
रिकार्ड तोड़ दिया। कल पहली दफा स्कोर-बोर्ड पर तेरे लिए दोधेको
का प्रयोग हुअा।
गुल्लू-मैं तो सेंचरी बनाता अगर बी० एल० डब्ल्यू० न हो गया
होता।
शम्भू-बी० एल० डब्ल्यू० क्या बे !
गुल्लू-बैड लक बिफोर विकेट !
[ सब हंसते हैं ]
गुटरी–खैर, यह बात छोड़ो । अब असली बात पर मानो।
शम्भू-सुना है हुजूर बुक हो गए हैं।
गुल्लू-पहेली न बुझवायो। साफ-साफ कहो।
शम्भू–क्यों बनता है ! मतलब यह है कि तेरी सगाई हो गई है।
बुरे फसे नाम कमाने में ४६ गुटरी ग्राज र ल तो लड: :: : नगाई का रोनान करती है यो नगो गान-मगाई नगरी, गभी की। शम्म मानव यह कि पता: कोबार योनियों के वाद मिला या मन:-जम कारेर मारना पडेगा। गुटगे सुना है पर जाना है। गुल्लू लड़की पढ़ी-बी: छिन मन को विनर्ड बनान : अपने कालिज में प्रथम पका मिला था। गुटरो — फिर कार तुम्हारी को पानी पी में प्रो: भर... शम्भू-विचडी मे । गटरी -तुम्हारे मा कया सरले है गल्ल -बड़े भारी वाले हैं। शम्भू -हमने कहा न तुम्हारी तो किम्मत ही खुल गई। गुटरी-वन नहीं गई बल्कि यह कहो फट गई। गुल्ल --वह तो मुझे विदेश भी भेजने को धार है। गुटरो-वहाँ जाकर हमें भूल न जाना । जमना-हुजूर, इस बार में किम खिलाड़ी की फोटो छरी है । गल्लू-वाह भई ! यह तो नन्दू की फोटो है। का गजब की फोटो है ! गुटरी-पोज भी बहुत बढिया है। एक बार पान मिलना चाहिए वस; फिर नहीं छोड़ता। शम्भू-बिजली की मापिक दौड़ना है । क्या जादू है दम की हॉकी में ! गेंद तो इसकी हॉकी में चिपक ही जाती है । गुल्लू-कल Oll Heroes ने तीन खिलाड़ी इसके साथ लगा दिए, पर मजाल है जो कोई गेंद छीन ले ! लाजवाब कैरी करता है। tic ४४ पर्दा उठने से पहले शम्भ-जीयो नन्दू, जीग्रो । अगर तुम्हारा यही हाल रहा तो दोस्त अगले साल पाल इण्डिया टीम में प्रा जानोगे। गटरी-तुम लोग फिर लाइन से उतर गए। बात तो हो रही थी पार्टी की और कहां पहुंच गए। गुल्लू-यार, पार्टी भी ले लेना । पर एक काम तो करो। शम्भ-मिलामो हाथ ! यह कही पते की बात ! काम एक नहीं दो कहो, तुम्हारे लिए जान हाजिर है। गुल्लू-क्यों भई, मेरी फोटो किसी तरह अखबार में नहीं छप सकती! शम्भू-क्यों नहीं छप सकती ! गधे, घोड़े और बैलों तक की फोटो छप जाती है, फिर तुम तो.. गुल्लू-मजाक छोड़ो। गुटरी-क्या बात है ? किसी डॉक्टर ने बताया है कि फोटो छप- वायो या सपने में किसी परी ने सलाह दी है ! गुल्लू-तुमसे क्या छिपाना ? बात यह है कि परसों ही मेरी सगाई हुई है। अखबार में अगर मेरी फोटो छप जाय तो रोब जम जाएगा। मेरे होने वाले ससुर, मेरी होने वाली बीवी यानि कि अपनी लड़की की एक पत्रिका में छपी हुई फोटो मेरे पिताजी को दिखा रहे थे। अपनी भी छप जाय तव रहेगी बराबर की चोट । शम्भू-हूँ तो ससुर साहब पर रोब गांठना है फोटो छपवाकर ! गुल्लू--तुम लोगों की इतनी जान-पहचान है, कोई तरकीब सोचो। गुटरी-मैं बताऊँ, तू किसी तरह हाकी के मैच में तीन गोल कर दे तो तेरी फोटो छप जाएगी। शम्भू-तीन गोल तो यह एक ही तरह कर सकता है। गुल्लू-कैसे? शम्भू-सुबह चार बजे उठकर ग्राउण्ड में चला जा, तब कोई नहीं होगा। जितने जी चाहे गोल कर पाना ।
बुरे फंसे नाम कमाने में गुल्लू-तू फिर मजाक करने लगा ! मैं तो तुम्हें अपना जिगरी दोस्त समझकर कह रहा हूँ। गुटरी—मैं बताऊँ ! तू किसी अखबार को लिखकर भेज दे कि मैं पढ़ाई के लिए विदेश जा रहा है। फिर फोटो छप जाएगी। गुल्लू –नहीं भई, मेरे ससुर ने कहा है कि शादी के बाद दोनों को इंगलैण्ड भेज दंगा। शम्भू-प्रा गई। गुल्ल-कौन ? शम्भू-तरकीब । गुल्लू-जल्दी बता । शम्भू-अब यह तु मुझ पर छोड़ दे । अगले हफ्ते अखबार में तेग फोटो न पाई तो उस्ताद मछे मुडवा दंगा। गुल्लू-मूछे तो तेरे है ही नहीं। शम्भ -भई, विश्वास कर । मैं सच कहता हूँ अग्रवार में तेरी फोटो निकलवा दंगा। गुल्लू-पर कैसे? शम्भू—यह न पूछ । मेरा एक दोस्त है। अखबार का सम्बाद- दाता है। उसके मैने कई काम किए है मल्लू-कौन-से अखबार में ? शम्भू-तुझे ग्राम खाने से मतलब है या पेड़ गिनने से ! कह जो दिया कि फोटो अगले हफ्ते छप जाएगी। हां, बीस रुपए खर्च होंगे। गुल्लू-वीस नहीं पचास खर्च हो जाएँ। परवा नहीं, पर फोटो छपनी चाहिए। शम्भू-वस, तू वीस रुपए निकाल । इतने तो चाय पीने-पिलाने में लग जाते हैं। और जरूरत पड़ी तो देखी जाएगी। गुल्लू-यह ले वीस रुपए । पर देख कहीं..... शम्भ-भई, वहम की तो कोई दवा नहीं। विश्वास हो तो ठीक ४६ पर्दा उठने से पहले नहीं तो अपने रुपए अपने पास रख । गुल्लू-तू तो नाराज हो गया। शम्भू-नाराज होने की बात ही है । दस बार कह दिया कि फोटो छप जाएगी पर....... गुल्लू-अच्छा बाबा नाराज न हो। यह ले बीस रुपए। शम्भू-अब कल शाम तक अपनी फोटो दे जाना। गुल्लू-एक तो मेरी जेब में ही है। (जेब से फोटो निकालकर देता है)। गुटरी-यह तो ठीक नहीं। इसमें तो मुंह चौड़ा-सा नजर पा रहा है। शम्भू-मालूम होता है किसी चौड़े कैमरे से खींची गई है। कोई फड़कती हुई फोटो खिंचवामो, यार ! गुटरो-तुम्हारी फोटो, तुम्हारे ससुर देखेंगे, तुम्हारी वह भी देखेंगी । ऐसी फोटो होनी चाहिए जो वह अपनी सहेलियों को दिखाते न थके कि यह हैं मेरे वालम ! गुल्लू-तो और खिंचवा लेते हैं । सूट में खिचवाऊँ.. शम्भ-बह नीला सूट जो पिछले साल सिलवाया था उसमें खिचवानो गुल्लू-यह मैला है । धुलवाने में तीन-चार दिन लगेंगे। गुटरी-तुम भी बस, यार, यूं ही हो ! फोटो में तो मेला सूट और भी अच्छा पाएगा। गुल्लू-पोज भी कोई बढ़िया होना चाहिए। गुटरी-जाते हुए सामने वाली दुकान से कोई सिनेमा की पत्रिका लेते जाना । उसमें एक-से-एक बढ़कर पोज होते हैं। शम्भू-और हाँ Glazed paper पर फोटो लाना। दूसरे पेपर का प्रच्छा ब्लाक नहीं बनता। गुटरी-अब तो पार्टी होनी चाहिए।
बुरे फंसे नाम कमाने में ४७ गुल्लू –फोटो छप जाए तो वह बडिया पार्टी दंगा कि याद र यो । शम्भू-ग्राज पार्टी की रिहर्सल ही हो जाए। गुल्लू-मंगा लो यार, जो जी चाहे। गुटरी--जमना ! जमना-पाया, साहव । गुटरी-ले ग्रा एक-एक रसगुल्ला, दो-दो गलाव-जामन तीन-तीन रसमलाई। बोलो गुल्लू भाई ! गुल्लू-जिन्दाबाद ! शम्भू और गुटरो- गुल्लू भाई जिन्दाबाद [ तीनों हँसते हैं ] और दूसरा दृश्य स्थान-वही रेस्टोरेंट समय-एक सप्ताह बाद | दृश्य परिवर्तन के लिए पर्दा गिराने को अावश्यकता नहीं। रंगमंच पर कुछ क्षरण के लिए अंधेरा करने से ही काम चल सकता है एक मेज पर गुल्लू अकेला बैठा हुया सिगरेट पी रहा है। गुल्लू-जमना ! - जमना-पाया हुजूर गुल्लू —एक चाय ले प्रा। जमना-क्या शम्भू बाबू भी पा रहे हैं ? गुल्लू नहीं भई, मैं तो सामने रीगल में पिक्चर देखने पाया हूँ। अभी प्राधा घंटा वाकी है । सोचा यहीं बैठे। जमना-बड़ी लाजवाब पिक्चर है बाबू जी ! मिस बिल्लो ने कमान कर दिया है । सुना है, हुजूर, हवाई जहाज से छलांग मारती है। और उसके गाने 'मैं बम्बई की रानी, नहीं भरूँगी पानी !' पर तो साहब दुनिया टूटती है।
४ पर्दा उठने से पहले गुल्लू-अच्छा, चाय ला । बातें न बना। [ राकेश का प्रवेश ] राकेश-आप क्या किसी की इन्तजार कर रहे हैं ? गुल्लू-मैं तो फिल्म देखने आया हूँ। राकेश-कौन-सी ? गुल्लू-'वम्बई की रानी !' राकेश-क्या बजा है ? गुल्लू-अभी तो छः बजे हैं। राकेश-पिक्चर तो साढ़े छः बजे प्रारम्भ होगी। अभी आप घंटा बाकी है। गुल्लू-जी। राकेश-आपने टिकट ले लिया है ? पहले ही सीट रिजर्व करवा ली होगी? गुल्लू-जी हां, मैं तो तीन दिन पहले ही सीट रिजर्व करवा गया था। राकेश-प्राप अकेले ही सिनेमा देख रहे हैं या किसी की इन्तजारी है ? गुल्लू- वैसे तो पिक्चर का मजा अकेले नहीं पाता पर आज तो अकेला ही देख रहा हूँ राकेश अापका नाम? गुल्लू-बाप कौन हैं ? आखिर आप क्या चाहते हैं ? राकेश-कुछ नहीं, कुछ नहीं । मैं भी पिक्चर ही देख रहा हूँ। मैं भी बाहर अकेला था । आपका नाम गुलशन है न ? गुल्लू-जी हां, आपको कैसे पता लगा? राकेश-आपके मित्र आपको गुल्लू भी कहते हैं। गुल्लू-जी हाँ ! क्या बात है, आप साफ-साफ क्यों नहीं बताते ? राकेश-जरा अपनी कमीज का कालर तो हटाइए ।
बुरे फंसे नाम कमाने में ४६ गुल्लू-ग्राप च नते-फिरते नजर अाइए राकेश-हम तो पापको भी लेके चलेगे । गुल्लू-यह क्या बदतमीजी है ! राकेश-मैंने कहा न जरा बाहर चलिए । गुल्लू - ग्राप जाते हैं या नहीं? राकेश-नाराज न होदए । बाहर कुमारी सरस्वती यामी प्रतीक्षा में खड़ी है। गुल्लू - (प्रसन्न होकर) ग्राा भी खूब मजाक करते है। पहले क्यों नहीं बनाया ? मैं अभी चलता हूँ [ कमारी सरस्वती का प्रवेश ) राकेश-लीजिए, वह आ गई। गुल्लू- (खड़े होकर) नमस्ते । सरस्वती--(क्रोध से) पापको शर्म नही पाती ! गुल्लू-(घवराकर) क्या बात है ? राकश-यह देखिए अखबार में प्रापका फोटो छपा है । पढ़िए ! गुल्ल-(अखबार पढ़ता है) "खोए हुए व्यक्ति को तलाग- गुलशन उर्फ गुल्लू, उम्र २२ वर्ष, कद ५ फुट ६ टंच, रंग गंदमो, गरदन पर चोट का निशान, क्रिकेट और हाकी के खिलाड़ी, पिछ ने दो दिन से लापता हैं । जिन साहब को मिलें वह गुलजारीलाल उर्फ गुटरी को ४२०, लड्डू मंजिल, जलेबी चौक पर पहुँचा दें। सरस्वती-पापने मुझे कहीं मुंह दिखाने काबिल नहीं रखा। गुल्लू-कम्बख्त शम्भू ! मैं तुझसे निपट लंगा। खूब फोटो छपवाई है मेरी ! [ सरस्वती और राकेश क्रोध से बाहर चले जाते हैं ] गुल्लू-सुनिए तो, यह सब झूठ है । जमना-हुजूर चाय ! ६
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★ समझौता
पात्र
राकेश
निशा
मुन्शी खादिमअली :
माथुर साहब
सरला
एक सरकारी कर्मचारी
राकेश की पत्नी
तेल कम्पनी के एजेण्ट
राकेश का अफसर
माथुर साहब को पत्नी
में बप्पा
[ मध्यमवर्ग की एक साधारण बैठक जिसमें दो-चार कुसियाँ, मेज,
रेडियो इत्यादि सजावट की वस्तु प्रों के अतिरिक्त एक पलंग या तख्त
भी है । पर्दा उठने पर राकेश कुर्सी पर बैठा हुआ अपनी कमीज में बटन
लगाता हुप्रा दिखाई देता है। अकस्मात् उसकी उंगली में सूई चुभ
जाती है। ]
राकेश-(उंगली को झटका देते हुए) हाय राम ! मित्रो ! (दर्शकों
को पोर इशारा करते हुए) क्या बताऊँ ! सुबह सारा दिन दफ्तर में
काम करो और शाम को घर आयो तो देखो कि श्रीमती जी अभी स्कूल
से ही नहीं लौटीं। (अचानक चौंककर) हाय राम, यह तो कपड़ा जलने
की वू या रही है।
[ राकेश अन्दर भाग जाता है। कुछ देर बाद निशा, जिसके एक
हाय
और इसरे में विद्यार्थियों को कापियाँ है, प्रवेश करती है।
निशा कापियाँ एक मेज पर पटक देती है। }
निशा-धनिया ! यो धनिया !
राकेश-(नेपथ्य से) प्राया बीवी जी !
[ राकेश पाता है, पर निशा दूसरी ओर मुंह होने के कारण उसे
नहीं देखती।]
निशा-धनिया!
राकेश-जी वीवी जी !
निशा-(प्राश्चर्य से) ग्रोह ग्राप !
राकेश-धनिया तो इस समय अपने गांव में होगा।
निशा-मैं तो भूल ही गई कि धनिया कल रात एक महीने की छुट्टी
चला गया है।
राकेश-ग्राप बन्दे को ही धनिया समझिए। कहिए, क्या हुक्म है ?
एक गिलास पानी लाऊँ ?
निशा-रहने दीजिए, मैं खुद ही ले लेती हूँ।
५४ पर्दा उठने से पहले [ निशा अन्दर जाती है। राकेश कुर्सी पर बैठ जाता है। ] निशा-(नेपथ्य से) अजी सुनते हो ! राकेश-शुक्र है भगवान् का ! अभी तक तो सुनता हूँ। [ निशा का प्रवेश ] निशा-तुमने मुझे क्या समझ रखा है ? राकेश-पिताजी की बहू, अपने भाई की भाभी और अपनी निशा-मुझे तुम्हारी यह आदत पसंद नहीं । राकेश-और आदतें तो पसन्द हैं ! निशा-मैं पूछती हूँ खाली बैठे समय क्यों बरबाद कर रहे हो ? राकेश-मैं तो इस समय मौज कर रहा हूँ। निशा -ठीक है. काम करने के लिए मैं जो हूँ। सारा दिन नौकरानी की तरह जुटी रहती हूँ। राकेश-जी हाँ, मुझे तो वेतन जैसे घर बैठे ही मिल जाता है । निशा-हे भगवान् ! मुझे तो अब तू उठा ले । राकेश-भगवान् को क्यों कष्ट देती हो ! मैंने जो सिर पर उठ रखा है। निशा-अच्छा बाबा तुम जीते और मैं हारा । वकील के लड़के हो न । तुमसे कौन बहस करे ! राकेश-पर मैं तो तुम्हारे पिताजी की अक्लमन्दी की दाद देता हूँ जिन्होंने मेरे-जैसा दामाद ढूंढ लिया। अपने पिताजी तो इस मामले बुद्ध ही रहे। निशा-(क्रोध से) क्या कहा ? शर्म नहीं पाती... राकेश-क्षमा करना, मैं तो भूल ही गया था कि आज सुबह ही हम लोगों ने समझौता किया था कि बाज नहीं लड़ेंगे । निशा–पर तुम्हें तो बिना लड़े राकेश-(हाथ जोड़कर) ओहो, अब जाने भी दो। कोई और बात करो। में ?
समझौता
५५
[ क्षरण-भर दोनों चुप रहते हैं ]
राकेश-तुम्हारी सरलादेवी के क्या हाल-चाल हैं ?
निशा-किस चुडैल का नाम ले लिया अापने !
राकेश-क्यों, क्या आज बेंच पर खड़ा कर दिया उसने ?
निशा-वेंच पर क्या खड़ी करेगी ! पर माथे पर हर समय बल
पड़े रहते हैं । मजाल है जो भूलकर भी हंसी आ जाए ।
राकेश-खर, छोड़ो भी।
निशा—एक महीना हुअा है अभी पाए हुए, पर सबकी नाक में दम
कर दिया है। जब शाम को छुट्टी की घण्टी बजती है तभी बुलाकर
कुछ-न-कुछ काम दे देती है। खुद ता उसका घर जाने को जी नहीं
करता और न किसी को जाने देती है।
राकेश-शादी हो चुकी है उसकी ?
निशा-क्यों, तुम्हें क्या ?
राकेश-(झेपते हुए) कुछ नहीं, मैं तो यूं ही
निशा-हाँ, है तो मिसेज सरला देवी, पर घर जाने का नाम ही
नहीं लेती। घर में भी अपने पति से लड़ती होगी।
राकेश हे भगवान, तेरा लाख शुक्र है कि अपनी बीवी हैड
मिस्ट्रेस नहीं, केवल टीचर ही है।
निशा-असल में मर्द ऐसी ही औरतों से ठीक रहते हैं ।
राकेश-लो, अब उसकी तारीफ भी होने लगी ! पर मैं कहता हूँ
तुम उससे इतना डरती क्यों हो। उससे साफ-साफ क्यों नहीं कह देती
कि मेरा नौकर चला गया है, मुझे घर जल्दी पहुँचना है ।
निशा-पापको भी घर बैठे ही बातें बनानी पाती हैं ! उस दिन
कहा था कि एक घंटे की छुट्टी ले पाना तो झट कह दिया था-'नया
अफसर है, जरा सख्त है। उससे छुट्टी मांगने की हिम्मत नहीं पड़ती।'
राकेश-मैंने तो यह कहा था कि नया अफसर है, छुट्टी मांगना
अच्छा नहीं लगता।
पर्दा उठने से पहले निशा -रहने दो, जितनी खुशामद तुम लोग अफसर की करते हो उतनी हम नहीं करतीं। उस दिन तुम्हारे अफसर की कार बिगड़ गई तो कह रहे थे कि एक मील तक धक्का लगाया। घर आकर हाय-तोबा मचा दी। राकेश-नोकरी करना आसान काम नहीं, देवी जी ! तुम्हें तो छः महीने में नानी याद आ गई। धन्य हम हैं जो दस साल से नौकरी कर रहे हैं। निशा-(व्यंग्य से) अाप अनोखे ही दुनिया में नौकरी करते हैं, और तो राकेश-खैर, हम तो नौकरी करेंगे ही, लेकिन अगर तुम्हारा जी न करता हो छोड़ दो। निशा-कितनी जल्दी कह दिया छोड़ दो ! मैं पढ़ाना छोड़ दूं तो दो दिन में आटे-दाल का भाव मालूम हो जाय । राकेश-हर आदमी की बीवी तो नौकरी नहीं करती। उनका भी तो गुजारा होता है। निशा–पर देखो इन छः महीने में ही घर का नक्शा बदल गया है-सोफा-सेट पा गया है, पर्दे लग गए हैं, तुम्हारे दो नए सूट भी सिल गए हैं। राकेश—यह तो मानता हूँ। तो कहता कौन है तुम नौकरी छोड़ो। निशा-अभी तुम कह रहे थे। राकेश-तुम जो रोज आकर यही कहती हो कि थक गई, मर गई, बहुत काम है । अाज फिर हैडमिस्ट्रेस ने बिना बात डांट दिया । इस रोज की हाय-हाय से तो अच्छा है कि घर बैठो। निशा-देखो, इस समय मेरा लड़ने का मूड बिलकुल नहीं है । मैं बहुत थकी हुई हूँ। राकेश-अपना भी वहस करने का मूड नहीं है। कोई और बात छेड़ो। (कुछ ठहरकर) अच्छा, चाय के बारे में क्या ख्याल है ?
५७ समझौता निशा-बहुत नेक ख्याल है। राकेश-तो फिर अंगीठी जलाई जाय । निशा-जरूर जलाई जाय । राकेश-तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे अंगीठी अपने-ग्राप मुलग जाएगी। निशा–सचमुच धनिया के बिना तो बड़ी मुश्किल से दिन गुजरेगे । राकेश-सत्य वचन देवी जी ! निशा-ऐसा करो, अंगीठी जलाकर चाय का पानी तुम रख दो । चाय में बना दूंगी। राकेश-(व्यंग्य से) अाप इतना कष्ट करें यह मैं नहीं देख सकता । अंगीठी अाप जला दीजिए, चाय मैं वना दूंगा। निशा-मैं ग्राज बहुत थ को हुई हूँ। तुप स्टोव में तेल डलवा लायो । राकेश तेल की दुकान तो बहुत दूर है । निशा-कई बार तुम्हें कहा कि इकट्ठा तेन ले पाया करो। राकेश-खैर, अाज तो वहस न करने की कसम खा ली है इसलिए कुछ नहीं कहता। निशा-हीटर भी खराब पड़ा है। वह भी न बनवाया गया तुमसे । राकेश-ग्रामो, लाटरी डाल लें। दो पचियाँ बनायो । जिसका नाम निकल पाए वही चाय बनाए और दूसरा अंगीठी जलाए । निशा-ठीक है, बनायो पचियाँ । [ राकेश एक कागज के दो टुकड़े करके उन पर अपना और निशा का नाम लिख देता है और फिर उनकी गोलियाँ-सी बना लेता ।] निशा-कहीं दोनों पचियों पर मेरा नाम ही न लिख देना ! राकेश—देवी जी, मैं आपकी तरह खैर, उठायो पर्ची । निशा—यह लो। (एक पुड़िया उठाती है) । राकेश-(पुड़िया खोलकर नाम पढ़ते हुए) यह मारा ! ला, तुम्हारा नाम ही अंगीठी जलाने के लिए निकला । अाखिर भगवान् ने बिलकुल में
५८
पर्दा उठने से पहले
ठीक इन्साफ कर दिया। उसे पता है कौन-सा काम कौन कर सकता है।
निशा-(खिसियाकर) मैं तो मजाक कर रही थी। मैं तो देखना
चाहती थी कि पतिदेव किस तरह अंगीठी जलाते हैं । मैं तो पांच मिनट
में अंगीठी जला दूंगी।
[ निशा चली जाती है ]
राकेश-(गाते हुए)
धनिया, तेरी याद सताए,
चाय बनानी जव पड़ जाए।
प्रा जा धनिया,वापस पा जा।
प्राकर हमारी प्राग जला जा।
निशा-प्रा चुका धनिया ! लो, कोयला भी खतम है । मुग्रा
और घी भी खतम करके गया है।
राकेश-भई, प्राज की तारीख में अपनी किस्मत में फाका ही
लिखा है।
निशा-चलो, आज बाहर ही चाय पीएंगे और बाहर ही खाना
खाएंगे। रास्ते में कोयले वाले को सुबह कोयला भेजने के लिए भी कह देंगे।
राकेश-नेकी और पूछ-पूछ । पर
निशा-पर क्या ?
राकेश-मेरा मतलब है कि...
निशा-मैं सब समझती हूँ। तुम टाई लाने के लिए भी तो कह रहे
थे । चलो, वह भी ले पाना ।
राकेश-क्या ग्राज कहीं से मनीपार्डर पा गया है।
निशा-पिछले इम्तहान में जो मैं सुपरवाइजर लगी थी, उसका
आज यूनिवर्सिटी से मनीपार्डर पाया है।
राकेश-(प्रसन्न होकर) तो पहले क्यों नहीं बताया ! मुफ्त में
इतनी देर परेशान हुए। (खुशामद करते हुए) तुम सचमुच थक गई
होगी। सारा दिन खड़े रहना पड़ता है। तुम धन्य हो जो इतना काम
समझौता ५६ करती हो। स्कूल का सारा काम और फिर घर की देख-भाल । मेरी एक और सलाह है। निशा-क्या ? राकेश-लगे हाथ पिक्चर भी देख ली जाय । निशा-कौन-सी? राकेश-मियां-बीवी। उसी का तो यह गाना है [ गाकर ] प्रायो मिलकर हाथ बटाएँ । दोनों अपने काम पर जाएँ। [ दोनों एक साथ ] दोनों खर्चे, दोनों कमाएँ । प्रानन्द करें और मौज उड़ाएं। [ दोनों हंसते हैं ] राकेश-(कुर्सी पर बैठते हुए) हाय राम ! निशा-(घबराकर) क्यों, क्या हुआ राकेश-लो, मैं तो बताना ही भूल गया । अाज तो मेरे अफसर ने कहा था कि भई तुम्हारी तरफ मुझे एक दोस्त के जाना है। समय मिला तो तुम्हारे यहाँ भी ग्राऊंगा। निशा-हमारी हैडमिस्ट्रेस ने भी कहा था कि मुझे तुम्हारी तरफ जाना है । मैंने तो यूं ही कह दिया कि हमारे यहाँ भी प्राइयेगा तो बड़े नखरे से कहने लगी, “समय मिला तो आने की कोशिश करूंगी।" राकेश—यह तो बना-बनाया खेल बिगड़ गया । निशा-बिगड़ क्या गया ! हम लोग चलते हैं । ताला देखकर अपने आप वापस चले जाएंगे। राकेश–मेरे अफसर ने तो कहा था कि मैं जरूर पाऊँगा । वह आया तो ताला लगा देखकर बहुत भिन्नाएगा। हम लोगों ने सकिण्ड शो देखना है। ?
६० पर्दा उठने से पहले निशा–पर उनके लिए तो कुछ-न-कुछ बनाना ही पड़ेगा। खाना नहीं तो चाय तो बनानी ही पड़ेगी। राकेश-हां, यह तो सोलह आने सच है। निशा-(सोचकर) मैं बताऊँ, उसे ठण्डी लेमन की बोतल पिला देना। राकेश-पाज तो लच्छू की दुकान भी बन्द है। बोतल भी तो बाजार से लानी पड़ेगी। निशा—मेरी हैडमिस्ट्रेस तो शायद ही पाए। खैर, मुझे उसकी परवा नहीं। मैं कहती हूँ ताला लगानो और चलो। देखा जाएगा जो होगा। राकेश-तुम्हें क्या ! जो होगा वह तो मुझे भुगतना पड़ेगा। निशा-उस समय तो बड़े तीस-मारखां बन रहे थे। कहते थे, तुम इतना क्यों डरती हो ! राकेश-अच्छा बाबा, तुम जीती मैं हारा । बातें बनाने का वक्त नहीं है। मैं बाजार जाता हूँ। अाज तो ऐसी खातिर कर दो मेरे अफसर की जो फिर कभी छुट्टो मांगू तो मना न करे । निशा-मुझसे आज कुछ नहीं होगा। गकेश- ऐसा न कहो । तुम्हारी हैडमिस्ट्रेस पाएगी तो सारा काम मैं कर दूंगा। तुम पाराम से उसके पास बैठी रहना । निशा-उसने कितने बजे पाने को कहा था ? राकेश-सात बजे। निशा—तुम्हारी तो प्रकल मारी गई है ! पचीस मिनट में क्या बाजार से लौट प्रायोगे ? राकेश-हे भगवान् ! अब क्या करूं ? निशा-मैं बताऊँ, तुम चादर प्रोढ़कर लेट जाना। मैं कह दूंगी कि इनकी तबीयत खराब है। वह एक-दो मिनट बैठेगा और प्ररने आप चला जाएगा। कल की भी अर्जी भिजवा देना।
समझोता ६१ ! राकेश-हरो, जरा सोचने दो.... वह मारा ! सुनो, क्या तरकीब सूझी है ! वाह ! वाह ! वाह ! निशा-क्या? राकेश-तुम्हें भगवान् का धन्यवाद करना चाहिए कि उसने तुम्हें मुझ-जैसा बुद्धिमान पति दिया। सच कहता हूँ. एक तम ही कदर नहीं करती नहीं तो सब यार-दोस्त अपनी अकल की धाक मानते हैं । निशा--अब कुछ कहोगे भी ! राकेश-सुनो, जब मेरा अफसर पाए तो तुम बीमार बनकर लेट जाना । मैं कहूंगा, 'साहब, मैं अापके लिए चाय बनाता हूँ। इनकी तो तबीयत खराब है !' और यदि तुम्हारी हैडमिस्ट्रेस या जाए तो मैं लेट जाऊँगा। कहो, कैसी कही ! दोनों ही जल्दी भाग जाएंगे और हम लोग ठीक । निशा-ठहरो, जरा सोचने दो। राकेश-समस्या का यह ऐसा हल है मैडम, कि पाप मुझे सौ में सौ नम्बर दे सकती हैं। निशा-है तो कुछ राकेश–तो फिर हो गया समझौना । [ दरवाजे पर दस्तक को प्रावाज ] राकेश-मालूम होता है वह पा गया है। तुम यहीं चारपाई पर लेट जानो और यह चादर प्रोढ़ लो। निशा-मैं दूसरे कमरे में लेट जाती हूँ। राकेश–नहीं भई, तुम यहां लेटी होगी तो वह दो-चार मिनट में ही भाग जाएगा, नहीं तो पता नहीं कितनी देर में उठे। [निशा जल्दी से चारपाई पर लेट जाती है। राकेश दरवाजा खोलता है । मुन्शी खादिमाली सुरमेदानवी अन्दर पाते हैं । उनको प्रायु लगभग ४५ वर्ष है । अचकन और तंग मोरी का पाजामा पहने हुए हैं। एक हाथ में छड़ी है और दूसरे में एक पुराना चमड़े का बैग । ऐनक ।
६२
पर्दा उठने से पहले
वहन जी।
लगाए हैं, सिर पर कश्मीरी टोपी है। ]
मुन्शी-पादाव-अर्ज।
राकेश-प्रादाव-अर्ज।
मुन्शी-जहे-किस्मत, आप घर पर मिले तो सही। मैं पहले भी
आपके दरे दौलत पर हाजिर हो चुका हूं, पर बदकिस्मती से प्रापका
नियाज हासिल नहीं हो सका ।
राकेश–फरमाइए।
मुन्शी-पापके कीमती वक्त के दो-चार मिनट जाया करने की
इजाजत चाहता हूँ। हुक्म हो तो अर्ज करूँ।
राकेश-जी पाइए वैठिए ।
मुन्शी-नमस्ते बहन
राकेश-नमस्ते ।
मुन्शी-दुश्मनों की तबीयत कुछ अलील है । (निशा चारपाई से
उठने लगती है) पाप लेटे रहिए ।
निशा-नहीं, मैं ठीक हूँ । यूं ही जरा सिर दर्द कर रहा था।
मुन्शी–हाँ साहब तो खाकसार को खादिमाली सुरमे-दानवी
कहते हैं।
राकेश-सुरमे-दानवी !
मुन्शी-(हंसकर) जी हाँ, आप हैरान तो होंगे । जो भी पहली
मरतबा मेरा नाम सुनता है ताज्जुब करने लगता है। आप पूछेगे यह
नाम क्योंकर पड़ा, मैं खुद ही बता देता हूँ। बात यह है कि मेरे दादा
के दादा के दादा "खुदा उन्हें जन्नत नसीव करे''वह सुरमा बनाते थे कि
एक बार तो अन्धी आंखों में भी रोशनी पा जाती थी, फिर चाहे चली
जाय । एक मरतबा शहंशाह अकबर के नौ रत्नों में से एक की प्रांख
में तकलीफ हो गई। बस...
राकेश-जी मैं समझ गया।
[ निशा छींकती है ]
समझौता ६३ मुन्शी-ये छोंके भी खूब हैं, साहव । प्रादमी की जान ले कर छोड़ती हैं । क्या आपको सिरदर्द को ग्राम शिकायत रहती है ? निशा–कभी-कभी हो जाता है । मुन्शी-और साथ में छींकें भी ग्राती हैं । खुदा प्रापको सेहत वख्शे। यह दर्द पुराना हो जाय तो बस जी का जंजाल बन जाता है । राकेश–आप क्या हकीम हैं ? मुन्शो-नहीं, साहब, नहीं। न मैं हकीम हूँ, न वद्य । (खांसने लगता है) पापको जहमत न हो तो ना वीज को एक गिलास पानी... निशा-अभी लाती हूँ। (अन्दर जाती है)। राकेश-कहिए तो चाय मुन्शी-(प्रसन्न होकर) चाय ! वात यह है कि [ निशा पानी का गिलास लेकर पाती है ] निशा-बहुत अच्छा है आप चाय नहीं पीते । चाय तो नुकसान करती है । लीजिए, पानी लीजिए। मुन्शो-शुक्रिया ! क्या आप लोग कतई चाय नहीं पीते ? निशा-जी नहीं। मुन्शी--- (निराश होकर) ताज्जुब है ! अाजकल तो हर घर में चाय का होना उतना ही जरूरी समझा जाता है जितना नमक और हल्दी का । अापके जव मेहमान पाते हैं तो.. निशा-उन्हें पता है हम लोग चाय नहीं पीते मुन्शी-(गिलास से थोड़ा पानी पीकर) अापका घड़ा भी रेफरी- जेटर को मात कर रहा है । वल्लाह ! क्या ठण्डा पानी है ! मजा आ गया। राकेश-कहिए आप कैसे तशरीफ लाए ? मुन्शी–बस, कुछ न पूछिए, साहव । हवाई अड्डे तक तो बस मिल गई, उसके बाद तो साहब बड़ी देर खड़ा रहना पड़ा, कोई सवारी नहीं मिली। खरामा-खरामा ही पाना पड़ा। पर मैंने भी आज कसम खाई थी, कि आज तो आपके नियाज हासिल करके ही जाऊंगा। ?
६४ पर्दा उठने से पहले राकेश-यह -' राकेश-मेरा मतलब है मैं आपकी क्या खिदमत कर सकता हूँ? मन्शी-लाहोल-बिला-कुव्वत ! खादिम तो मैं हूँ। मैं वातों बातों में भूल ही गया । (बैग में से एक शीशी निकालकर) बहन जी, भाप इस तेल की मालिश कीजिए और फिर देखिए यह दर्द कैसे गायब होता है । निशा-आप रहने दीजिए । कुछ देर बाद अपने-आप ठीक हो जाएगा। मुन्शी-प्रजी, ग्राप तो तकल्लुफ कर रही हैं। एक बार प्राजमा कर तो देखिए। तेल कैसा है ? मुन्शी-इसे अमृत-तेल कहते हैं । बालों के लिए, सिर दर्द के लिए, निगाहों के लिए यह अमृत है अमृत राकेश-पापको यह कहाँ से मिला ? मुन्शी- ऐसी नायाब चीज खुशकिस्मती से ही मिलती है। यह संजीवन बूटी के कुनबे में से एक बूटी है जिससे यह तैयार किया जाता है । यह बूटी हिमालय पहाड़ पर १३,००० फिट की बुलन्दी पर पाई जाती है। राकेश-इस बूटी को कौन तोड़ता होगा? मुन्शो—कुछ न पूछिए। अाजकल साइंस जो करे सो थोड़ा है। हैली- कोप्टर से हिमालय की इस बूटी को तोड़ा जाता है। पिछले दिनों में तो यह खबर सुनने में पाई थी कि कुछ साइंसदां इस बूटी की खातिर हिमालय पर्वत ही खरीदने को तैयार हैं। राकेश-आप तो खूब दिलचस्प प्रादमी मालूम होते हैं ! मुन्शी-तारीफ तो इस बूटी की है । हाय कंगन को पारसी क्या और पढ़े-लिखे को फारसी क्या ! आप जरा लगाइए तो सही और फिर देखिए इसका कमाल । चन्द लहमों में आपका सिर-दर्द गायब हो जाएगा, अापका दिमाग ताजा हो जाएगा, पांखों में ठंडक पहुंचेगी। राकेश-मेरा मतलब है प्रापको यह तेल कहाँ से मिला?
समझौता मुन्शी-यह भी एक किस्सा है। एक दिन मेरा सिर दर्द के मारे फटा जा रहा था और मैं चारपाई पर लेटा खर्राटे मार रहा था कि इतने में मेरे एक दोस्त इसकी एक शीशी लाए। उन्होंने इत्तफाक से यह शीशी मेरे सिर पर रख दी। फिर क्या कहने ! मेरा दर्द गायब हो गया और मेरी आँख खुल गई। राकेश-(व्यंग्य से) दर्द के मारे आपकी ग्रांख लग गई और दर्द गायब होते ही मुन्शी- शायद मैं कुछ गलत कह गया । वात यह है कि.. राकेश – मैं समझ गया । अब पाप कहिए कि अापने कैसे तकलीफ की ? मुन्शी-तकलीफ कैसी ! मैंने अभी अर्ज किया था कि मुझे लोग खादिमअली सुरमेदानवी कहते हैं । बस यूं जानिए कि मैं सबका खादिम हूँ। अोह बहन जी, आपने तेल अभी तक नहीं इस्तेमाल किया। खैर, आप यह शीशी रखिए और इसका कमाल देखिए । शीशी मुन्शी-अजी, इसे पाप रखिए । राकेश—मेरा मतलब है अापको मुझसे क्या काम है ? मुन्शी-मुझे साहब कोई गरज नहीं। किसी ने ठीक कहा है कि खुदा की सबसे बड़ी इबादत उसके बन्दों की खिदमत है। मैं बाल बढ़ाने का, सिर-दर्द मिटाने का, जुकाम दूर भगाने का, आँखों को तरावट पहुँचाने का यह नुस्खा घर-घर बांटता फिरता हूँ। आप यह छोटी शीशी रखिए। राकेश-अच्छा तो इसे रहने दीजिए । मुन्शी-खुदा प्रापका भला करे। आप इसके सिर्फ पाठ आने इनायत फरमाइए। राकेश-आप इस तेल की कम्पनी के ऐजण्ट हैं ? मुन्शी-लाहोल-विला-कुव्वत ! मैं तो खिदमत करता हूँ आप राकेश-यह
६६
पर्दा उठने से पहले
लोगों की और अमृत तेल कम्पनी की।
राकेश-इन्हें आठ आने दे दो।
निशा-मेरे पास टूटे पैसे नहीं हैं । दो का नोट
मुन्शी-रेजगारी नहीं है तो न सही। मैं आपको दो रुपए वाली
बड़ी बोतल दे देता हूँ।
निशा-रहने दीजिए, मिल गई अठन्नी ।
मुन्शी-शुक्रिया ! प्रादाब-अर्ज ! (जाता है)।
[ राकेश जोर से दरवाजा बन्द करता है ]
राकेश-हे भगवान, बला टली ।
निशा-अब यह घर-घर इश्तहारबाजी करने का अच्छा रिवाज
चल पड़ा है।
राकेश-कुछ दिनों में तो ये इश्तहार वाले रात को जगाकर
इश्तहार पढ़वाया करेंगे।
निशा-बातें कैसी बना रहा था !
राकेश-ये लोग बातों की ही तो खाते हैं ।
[ दरवाजा खटखटाने की आवाज ]
राकेश-मैं दरवाजा खोलता हूँ। (राकेश दरवाजे तक जाता
और फिर लौट प्राता है) उठो, उठो, यह तो तुम्हारी हैडमिस्ट्रेस
लगती है। मैं लेटता हूँ, तुम दरवाजा खोलो।
निशा--मैं कहती हूँ वह नहीं है ।
[ दरवाजा खटखटाने की प्रावाज ]
राकेश-नहीं भई, मुझे तो ऐसा लगता है कि दरवाजा खटखटाने
वाला जनाना हाथ है।
निशा-यह
कैसे जाना?
राकेश-दरवाजा खटखटाने के साथ उसकी चूड़ियों की भी
अावाज पा रही है।
निशा-वह चूड़ियाँ नहीं पहनती।
६७ समझौता राकेश-प्रच्छा इस बार ध्यान से सुनना । (दोनों बड़ी उत्सुकता से दरवाजा खटखटाने की प्रतिक्षा करते है )। [ दरवाजा खटखटाने की प्रावाज ] राकेश-मुना तुमने निशा-खाक सुना ! जाकर दरवाजा खोलो। देखो तो सही कौन है। है [ राकेश दरवाजा खोलता है । नेपथ्य में कुत्ते के भौंकने की आवाज ] राकेश-धत्त तेरे की ! [ निशा जोर से हंसती है ] निशा-तो यह तुम्हारा अफसर ! राकेश-जी नहीं, तुम्हारी हैडमिस्ट्रेस ! [ दरवाजा खटखटाने को प्रावाज ] माथुर-मिस्टर राकेश ! राकेश-आया सर [ राकेश दरवाजे की तरफ जाता है। निशा चारपाई पर लेट नाती है। मिस्टर माथुर अन्दर पाते हैं। ] राकेश-नमस्ते जी, ग्राइए, अाइए वैठिए । (निशा से) यह हैं मिस्टर माथुर, हमारे नए मैनेजर । माथुर-(निशा से) नमस्ते । निशा-नमस्ते । हम लोग आपकी ही राह देख रहे थे। माथुर-हमारे एक रिश्तेदार इधर ही रहते हैं । उनके यहाँ पाया था । सोचा, यहाँ भी होता चलूं। निशा–वड़ी कृपा की आपने । माथुर-मेरे साथ मेरी वाइफ भी आई हैं। निशा-याप उन्हें नहीं लाए मायुर-वह वहीं गप्पों में लगी हैं। राकेश-उन्हें भी साथ लाते तो बहुत अच्छा रहता।
६८ पर्दा उठने से पहले निशा-प्रब के आप पाएं तो उन्हें जरूर साथ लाइएगा । मुझे उनसे मिलकर बड़ी खुशी होगी । निशा-(कराहते हुए) जरा पानी दीजिएमा । राकेश-मैं अभी लाया। [ राकेश अन्दर चला जाता है ] मायुर-अापकी क्या कुछ तबीयत खराब है ? निशा-जी हाँ। माथुर-क्या बात है ? निशा-कुछ कमर में दर्द है । माथुर-बुखार भी है ? निशा-बुखार तो नहीं है। राकेश-(प्राता है) यह लो पानी । माथुर-इन्हें कब से तकलीफ है ? राकेश-प्रभी शाम को स्कूल से आई कि सिर में दर्द हो मया । बुखार भी है। निशा-(घबराकर) दर्द सिर से शुरू हुअा था। अब तो कमर में 'दर्द है। माथुर-ग्राप भी क्या कहीं काम करती हैं ? राकेश-जी हाँ, यह स्कूल में टीचर हैं । माथुर-ठीक है, आजकल जब तक मियां-बीवी दोनों न कमाएं गुजारा नहीं चलता। आपको चाहिए कि घर के काम के लिए कोई नौकर रख लें। राकेश-नौकर तो है । वह कल ही छुट्टी गया है । माथुर-घर का सारा काम करना, और फिर छः घंटे स्कूल में पढ़ाना, यह बड़ा कठिन होगा। राकेश-घर के काम से तो यह नहीं डरती पर स्कूल में प्राजकल इनकी नई हैडमिस्ट्रेस की इन पर विशेष कृपा है !
समझोता
६६
निशा-ौरत क्या है, अफलातून है !
राकेश–पाँच बजे छुट्टी हो जाती है पर छः-सात से पहले नहीं
छोड़ती।
माथुर-कई औरतें बड़ी बेढब होती हैं । वह शादी-शुदा है ?
राकेश-जी ! उसके पति पर तो न-जाने क्या गुजरती होगी ।
निशा-वह तो हम सब से कहती है कि उसने अपने पति के नकेल
डाल रखी है। मजाल है जो वोल जाय !
माथुर-ऐसी औरत से तो भगवान् वचाए । अाप दो-चार दिन
पाराम कीजिए।
निशा-वह छुट्टी
कहाँ देती है !
माथुर-मिस्टर राकेश ! अाप एक-दो दिन को छुट्टी कीजिए, तब
तक इनकी तबीयत ठीक हो जाएगी।
राकेश-जी नहीं, मैं कल दफ्तर ग्राऊँगा।
माथुर-ग्राप दफ्तर की चिन्ता न कीजिए।
निशा–पाप बैठिए तो सही ।
राकेश-माफ कीजिए, मैं बातों-बातों में भूल ही गया। प्राप
चाय पीएंगे या कॉफी ?
निशा-आप स्टोव जलाकर पानी तो उबलने रख दीजिए ।
माथुर-नहीं भई, नहीं। मैं कुछ नहीं पीऊँगा।
राकेश-यह कैसे हो सकता है ! आप पहली बार हमारे यहाँ पाए
हैं, कुछ तो सेवा का मौका दीजिए।
माथुर-अभी तो आप इनकी सेवा कीजिए।
निशा-मेरी तबीयत अगर ठीक होती तो बिना खाना खिलाए न
जाने देती । इस दर्द को भी ग्राज ही होता था।
माथुर-जब आप अच्छी हो जाएंगी तो फिर कसर निकाल लूंगा।
निशा-अब जब आप पाएं तो बहनजी को जरूर साथ लाइएगा।
माथुर-अच्छा नमस्ते।
पर्दा उठने से पहले
निशा-नमस्ते । (उठने की कोशिश करती है)।
माथर-पाप लेटी रहिए । अच्छा राकेश, तुम कल दफ्तर से छुट्टी
करना ।
राकेश-बैंक्यू सर । नमस्ते ।
माथुर-नमस्ते।
[ मिस्टर माथुर चले जाते हैं । राकेश दरवाजा बन्द कर लेता है]
निशा—यह तो बहुत शरीफ आदमी लगता है । तुम तो यूं ही इस
की बुराई करते हो
राकेश—यह तो सब तुम्हारा लिहाज था।
निशा-तुम्हारी तो कल की छुट्टी भी मंजूर हो गई। कल कोयला,
चीनी वगैरा ले आना और मेरे पाने तक अंगीठी जला लेना और सब्जी
बना लेना। मैं पाकर चपातियां तंदूर से लगवा लूंगी।
राकेश-कल की कल देखी जाएगी। अब चलो, देर हो गई है।
निशा-ग्रच्छा चलो। ख्याल है अब वह नहीं पाएगी।
राकेश-अव वातें न वनाइए, मंडम जी और जल्दी चलिए।
निश-वस, मुंह-हाथ धो लू । अभी पाई ।
राकेश-तुम तो तैयार थीं ।
निशा-बिस्तर पर लेटने से सब खराब हो गया।
राकेश–जितनी देर औरतें तैयार होने में लगाती हैं उतनी देर में...
[ दरवाजा खटखटाने की प्रावाज ]
राकेश-लो, तुम्हारी वह भी प्रा गई।
निशा-(गुस्से में) सत्यानाश हो इसका ! (हंसकर) अभी आई।
तुम जल्दी से लेट जागो और हाय-हाय करने लगो । देखो, मैं कितनी
जल्दी इसे चलता करती हूँ। (राकेश लेट जाता है) यूं नहीं, मच्छी
तरह लेट जायो।
[ निशा दरवाजा खोलती है । सरला अन्दर पाती है ]
निशा-नमस्ते । पाइए । यह हैं मेरे पति ।
१ समझौता राकेश-नमस्ते । बैठिए। सरला-नमस्ते। राकेश-हम लोग आपकी ही राह देख रहे थे। निशा-मैंने सुबह वोला था टाइम मिलेगा तो ग्राऊंगा। इधर मैं अपने एक रिश्तेदार के ग्राई थी। राकेश-बड़ी कृपा की आपने । सरला- यह तो हमारा कर्तव्य है। राकेश-निशा आपकी बहुत तारीफ किया करती है । सरला-मैंने कभी किमी को नुकसान नहीं पहुँनाया । हाँ, कोई टीचर गलती करती है तो मैं रिपोर्ट जरूर कर देती हूँ निशा--जब से ग्राप पाई हैं स्कूल की हालत बदल गई है। सरला-ग्रभी तो स्कूल में बहुत गड़बड़ है। धीरे-धीरे सब ठीक कर दंगी। निशा-अाजकल की लड़कियाँ भी बहुत शंतान हैं । परसों मिस वर्मा ने एक लड़की से कहा, 'अगर मैं तेरी माँ होती तो मैं तुझे चार दिन में ठीक कर देती।' वह बोली, 'मैं कल पिताजी से पूछकर वताऊँगी।' सरला-मैं सबको सीधा कर दूंगी। राकेश-देखो पानी उबल गया हो तो गरम पानी को वोतल में डाल दो। सरला-ग्राप क्या." राकेश- मेरी तबीयत खराब है। कमर में दर्द हो रहा है। सरला-ग्राप कब से बीमार हैं ? निशा--कल से बुखार है । सरला-दिन में अापकी कौन देखभाल करता है ? निशा-कोई नहीं। पहले तो मैंने सोचा था अाज की छुट्टी ले लूं, पर फिर सोचा कि स्कूल का हर्ज होगा। मिस बंटो पहले से ही छुट्टी पर हैं।
७२ पर्दा उठने से पहले सरला-मैं तुमसे बहुत खुश हूँ। तुम लोग तो नौकर भी रख सकते हो। निशा-नौकर तो है। पर कल से एक महीने की छुट्टी चला गया है। सरला-मिस्टर राकेश, आपको चाहिए कि जब तक आपका नौकर छुट्टी पर है तब तक आप दफ्तर से छुट्टी ले लें। निशा—इनका साहब तो बहुत खराब है । कभी छुट्टी नहीं देता। राकेश-हम लोगों को छुट्टी बड़ी मुश्किल से मिलती है। निशा-इनका नया अफसर पाया है। उसने तो नाक में दम कर दिया है। इनसे काम भी वहुत लेता है। आपने क्या कहूँ, दफ्तर में इनके साथ दो-तीन लड़कियां भी हैं। इनका अफसर उन लड़कियों से तो गप्पें लड़ाता रहता है, और उनका काम इनको देता है। शाम को बड़ी देर तक बैठा उनसे बातें करता रहता है । सरला-तब तो बहुत खराब है । निशा-प्रादमी बहुत धोखेबाज होते हैं। राकेश-जी हाँ । (सोचकर) जी नहीं। [ दरवाजा खटखटाने को प्रावाज ] राकेश—देखना कौन है। सरला-अच्छा मैं चलती हूँ। राकेश-पाप बिना चाय पिए कैसे जा सकती हैं। सरला-नहीं, मैं लेट हो गई हूँ। राकेश—निशा, वह जो तुमने गर्म बोतल के लिए पानी रखा है, उसी से चाय बना दो। [ दरवाजा खटखटाने को प्रावाज ] निशा-आप लेटे रहिए । मैं देखती हूँ कौन है । (दरवाजा खोलती है। मिस्टर माथुर अन्दर प्राते हैं) कौन आप ! माथुर-माफ कीजिए, मैं अपनी ऐनक यहाँ भूल गया ।
समझौता ७३ निशा-मैं अभी देखती हूँ। माथुर-आपकी तो तबीयत खराव थी... निशा-जी हाँ, बात यह है कि सरला-(चौंककर) तुम यहाँ भी प्रा पहुँचे । तुम्हें कैसे पता लगा कि मैं यहाँ हूँ। माथुर—तुम तो कह रही थीं तुम्हें अपनी एक टीचर के जाना है। सरला-निशा हमारे स्कूल में टीचर है। पर तुम कहाँ मारे- मारे फिरते हो? राकेश-ौर ग्राप हमारी कम्पनी के मैनेजर है। बड़े शरीफ आदमी हैं। सरला-(व्यंग्य से) शरीफ अादमी हैं ! (क्रोध से) ग्राज तुम्हारी पोल खुल गई। मुझे सब पता लग गया कि तुम दफ्तर में क्या करते रहते हो? निशा-मैंने तो यह कहा था सरला-तुम चुप रहो ! माथुर-मुझे भी पता लग गया है। तुम मुझे क्या समझती हो ! राकेश-जी, वह तो... माथुर-ग्राप चुप रहिए ! सचमुच इन्होंने मेरी नाक में दम कर दिया है। सरला—क्यों यहाँ पर मेरा मुंह खुलवाते हो ! माथुर-कुछ ठौर-ठिकाना तो देख लिया करो। सरला-अपनी नहीं कहते ! मायुर—अब चलो भी ! [ कुछ देर तक दोनों के लड़ने की आवाज आती रहती है जो फिर धीरे-धीरे लुप्त हो जाती है। निशा और राकेश जोर से हंसते हैं । निशा-मियां-बीवी का एक दृश्य तो यहां ही देख लिया। राकेश-मैं तो घबरा गया था। पर इनकी ग्रापस की लड़ाई से अपनी पोल नहीं खुली, नहीं तो प्राज दोनों की नौकरी खतरे में पड़ गई थी । [ दोनों हंसते हैं ]
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किराये के आँसू
पात्र
रमेश
बांकेलाल
एक आवारा नवयुवक
नौटंकी और पुराने पारसी
थियेटर का एक अभिनेता
: रमेश का अफसर
सुरेन्द्र
पानवाला आदि
28388
[ रंगमंच के बीचोंबीच एक लकड़ी की दोवार है। इसके बाई
तरफ दीवार के साथ कमरा बना दिया गया है। इस कमरे के पीछे की
दीवार केवल पर्दे से भी बनाई जा सकती है। यह कमरा प्राधुनिक ढंग
से सजा हुअा है जिसमें सोफा-सेट, रेडियो, अलमारी, मेज, बुक-शैल्फ
इत्यादि करीने से लगाए गए हैं। कमरे के अन्दर प्राने का दरवाजा पोछे
वाली दीवार या परदे के साथ ही है । रंगमंच का दायाँ भाग एक ग्राम
रास्ता है जिसके अगले भाग में एक लम्प-पोस्ट है जिसके पास एक पान
वाला अपना छोटा-सा बक्स लेकर बैठा है।
पर्दा उठने पर रमेश नकली सफेद दाढ़ी लगाए हुए एक बूढ़े का
वेष धारण कर पान वाले के पास इधर-उधर घूम रहा है । उसे देखकर
ऐसा लगता है मानो वह किसी बड़ी समस्या में उलझा हुआ है। ]
रमेश-(अचानक पान वाले की तरफ देखकर) भई, एक पान
लगाना।
में
पानवाला—कैसा पान खाएंगे ?
रमेश—देसी पान । इलायची और सौंफ डाल देना।
[ इतने में बांकेलाल पीछे से प्राकर पान वाले के पास खड़ा हो
जाता है। बांकेलाल गहरे लाल रंग की कमीज और खाको
पतलून
है। एक मफलर गले के चारों तरफ लपेट रखा है। ]
रमेश-(बांकेलाल को पहचानते हुए) प्रोह ! आप ! पान खाएंगे?
बांकेलाल-(लापरवाही से) बनारसी पान । लो बोलो! चूना ज्यादा
और जरा जरदा भी डाल देना।
रमेश-(पान पकड़ाते हुए) यह लीजिए । सिगरेट ?
बांकेलाल-वह १४ आने पैकेट वाली एक ले लीजिए ।
रमेश-(पानवाले से) दो बढ़िया सिगरेट देना
[ रमेश पान वाले से सिगरेट लेकर एक बांकेलाल को दे देता है
पर्दा उठने से पहले है और दियासलाई से लाल की सिगरेट जलवा देता है। बांकेलाल सिगरेट जलाकर जाने लगता है मगर एक-दो कदम चलने के बाद एक जाता है।] बांकेलाल-शुक्रिया। मगर माफ कीजिए, मैंने प्रापको पहचाना नहीं। रमेश-पाप मुझे नहीं जानते पर मैंने अापको पहचान लिया है । बांकेलाल-लो बोलो! मुझे तो याद ही नहीं पा रहा कि आपको कहाँ देखा है ? रमेश-खैर, अब पाप जी भरके देख लीजिए। बांकेलाल-(रमेश को सिर से पैर तक गौर से देखते हुए) लगते तो इन्सान ही हो। रमेश-हाँ, अापका अनुमान ठीक ही है। मैं बताऊँ प्राप कौन हैं ? बांकेलाल-लो वोलो ! रमेश-आप हैं (कुछ !' वांकेलाल-क्या मतलब ? रमेश-मेरा मतलब है रात अापने 'लैला-मजनू' नाटक में मजनू के बाप का पार्ट किया था। बांकेलाल--ग्रोह ! लो बोलो! आपको ड्रामा कैसा लगा? रमेश-बहुत बढ़िया । आपने तो लाजवाब काम किया। बांकेलाल-(प्रसन्न होकर) लो बोलो ! जो मिलता है यही कहता है। रमेश-पाप तो सचमुच मजनू के बाप लग रहे थे। सच मानिए दर्शकों को विश्वास हो गया था कि मजनू चाहे मर चुका हो पर उसका पिता अभी तक जीवित है । कमाल है साहब बांकेलाल-लो वोलो ! मैं तो सदा ऐसी ही एक्टिग करता हूँ। (कुछ रुककर) तुम बड़े रंगीले हो । वाल सफेद हो गए हैं पर दिल बूढ़ा सोचकर) 'मजनू के वाप
किराये के प्रांसू
७३
नहीं हुग्रा।
रमेश ---- दिल बूढ़ा हुआ है और न बाल सफेद हुए हैं ।
[ बांकेलाल प्राश्चर्य से रमेश की दाढ़ी की तरफ देखता है ]
रमेश-(अपनी नकली दाढ़ी उतारते हुए) यह सब नकली है ।
बांकेलाल-(प्राश्चर्य से) लो वोलो ! यह क्या झमेला है ?
रमेश बात यह है कि मैं बड़ी मुसीबत में हूँ। आप मेरी मदद
कर सकते हैं ?
बांकेलाल-मैं !
रमेश–हाँ-हाँ श्राप ! मैं तो कल से अापको ढूंढ रहा हूँ। ग्रापसे
मुझे बहुत जरूरी काम है।
बांकेलाल-कहिए, मैं क्या कर सकता हूँ ?
रमेश-आप सब-कुछ कर सकते हैं। देखिए इनकार न कीजिएगा।
बांकेलाल-बतायोगे भी क्या करना है ?
रमेश—आपको मेरे पिताजी बनना पड़ेगा।
बांकेलाल-लो बोलो ! वेटे को गोद लेते तो मैंने भी सुना है पर
तू तो बाप को गोद लेगा ।
रमेश-मैं सच कह रहा हूँ
बांकेलाल –लो बोलो ! मुझे अपना बाप बना के तुझे क्या मिलेगा।
पहली बात तो यह है कि मैं दस-पन्द्रह वर्ष तक मरूँगा नहीं और दूसरे
अगर मरा भी तो दो-चार मो के विल ही छोड़ जाऊँगा ।
रमेश—मेरा मतलब है कि आपको मेरे पिताजी का अभिनय करना
होगा।
बांकेलाल-ऐक्टिग तो मैं तुम्हारे पिताजी के पिताजी की भी कर
दूंगा। नाटक कहां होगा?
रमेश—मेरे अफसर के घर पर, जो इस सामने वाले मकान में
रहता है।
बांकेलाल-लो वोलो ! क्यों मजाक कर रहे हो ? यहाँ स्टेज कैसे
पर्वा उठने से पहले NG है कुछ बनेगा? रमेश-स्टेज तो बना-बनाया है। मेरा मतलब है कि मैं एक दफ्तर में नौकर हूँ। मैं बिना छुट्टी दफ्तर से गायब रहा और इसी तरह एक-याध और कारनामे कर बैठा। इसके फलस्वरूप मुझे दफ्तर से मुग्रत्तल कर दिया गया है और सुना दिनों बाद बरखास्त भी कर दिया जाऊंगा। बांकेलाल-लो बोलो ! मुझे क्यों अपने झगड़े में फंसाते हो ? रमेश-घबरानो नहीं। आप इस मकान में चले जाइए और मेरे अफसर से मिलिए । आप उससे कहिए कि आप मेरे पिताजी हैं और जब से आपने यह सुना है कि मैं नौकरी से निकाल दिया जाऊँगा अापकी नींद हराम हो गई है, पारने खाना-पीना छोड़ दिया है, मैं आपके बुढ़ापे का सहारा हूँ..... मेरा अफसर बहुत रहम-दिल है। वह ग्रापका रोना-धोना देखकर मुझे माफ कर देगा। बांकेलाल-जैरामजी की। ( (जाने लगता है) अपने से यह काम नहीं होगा। कोई और पंछी ढूंढो । रमेश—ऐसा न कहो । मान जाग्रो। अापके थोड़ी देर ऐक्टिग करने से मेरा भला हो जाएगा । वैसे तो मैं खुद ही अपना पिता बनकर अपने अफसर के पास जा रहा था, इसीलिए यह सफेद दाढ़ी लगाकर पाया था। पर सौभाग्य से आप मिल गए। आपने रात इतना अच्छा अभिनय किया था कि दर्शकों के नेत्रों में आंसू आ गए थे। पाप यह काम बहुत अच्छी तरह से कर सकते हैं । मुझे पूरा विश्वास है कि अगर अाप अभिनय करेंगे तो मेरे अफसर का दिल जरूर पिघल जाएगा। मैं आपको इसकी फीस दूंगा। बांकेलाल-लो बोलो ! मैं तुम्हारे अफसर की क्यों खुशामद करूं? मैं किसी के प्रागे हाथ-पैर नहीं जोड़ सकता। रमेश--पर कहाँ सिर्फ हाय ही जोड़ने हैं। देखिए वह नाटक, क्या नाम था उसका.-हाँ "मियों की जूती मियां के सिर !'
किराये के आँसू ८१ - उसमें तो यापकी बीबी ने अापको झाड़ से पीटा था । बांकेलाल-वह नाटक की बात थी। रमेश –तो यह भी तो नाटक है। अापको केवल १० मिनट के लिए अभिनय करना है। बांकेलाल-हाँ, अभी आप फीस के बारे में क्या कह रहे थे ? रमेश -मैं कह रहा था कि मैं आपको इस १० मिनट के अभिनय के लिए २० रुपए दंगा। बांकेलाल -तो फिर मैं तुम्हारा काम कर दूंगा। रमेश –भगवान् श्रापका भला करे । मैं आपका ऐहसान कभी नहीं भूलूंगा और कभी प्रापको अावश्यकता पड़ी तो मैं प्रापका पिता बन जाऊँगा। बांकेलाल -हाँ, ठीक है। वक्त पर तो यादमी गध को भी बाप बना लेता है। रमेश—(व्यंग्य से) जी हाँ ! जी हाँ ! बांकेलाल-तो फिर अब मुझे जरा ठीक से समझा दो। रमेश-मैंने बताया न कि आपको मेरे अफसर के सामने गिड़- गिड़ाना है । मतलब यह कि अाप मेरे अफसर से कुछ इस तरह कहिएगा कि उसे आप पर रहम या जाए। इसके लिए आपको रोना पड़े, हाथ जोड़ने पड़ें, पांव पड़ना पड़े, जो-कुछ भी करना पड़े कीजिएगा। बांकेलाल-लो बोलो ! हाथ जोड़ना, पाँव पड़ना और रोना- ऐक्टिग में अलग-अलग तीन ऐक्शन हैं। रमेश-क्या मतलब ? बांकेलाल-हाय जोड़ने के दो रुपए, पाँव पड़ने के चार रुपए और रोने के पाँच रुपए होंगे। तो बहुत ज्यादा हैं, कुछ तो कम कीजिए । बांकेलाल-लो बोलो ! क्या बात करते हो, जी ! आजकल तो हर चीज की कीमत बढ़ रही है। और हाँ, रोना असली होगा रमेश-यह
५२
पर्दा उठने से पहले
या नकली?
रमेश-(प्राश्चर्य से) असली या नकली ! यह क्या बला है ?
बांकेलाल-लो बोलो! आपको यह भी पता नहीं ! मसती ?
में बाकायदा आँसू टपकेंगे और नकली में सिर्फ रोने की भावाप हो,
आँसू नहीं पाएँगे । असली रोने के पांच रुपए अधिक होंगे।
रमेश-वाह साहब ! आप तो आँसुत्रों की दुकान लगा के
बैठ गए !
बांकेलाल-यापकी मर्जी है खरीदिए या...
रमेश–ोह ! पाप तो नाराज हो गए"
बांकेलाल-लो बोलो ! नाराजगी की क्या बात है ? तो फिर
असली रोना रोऊँ या नकली ? मैं तो आपको यही राय दूंगा कि आप
असली रोना ही बुक कीजिए । दो चार-रुपए का मुंह न देखिए । मुझे
विश्वास है असली रोना कभी बेकार नहीं जाएगा।
रमेश–कुल कितने रुपए हुए ? (उंगलियों पर गिनते हुए) २ हाथ
जोड़ने के, ४ पांव पड़ने के और ५......
बांकेलाल-५ नहीं १०, असली रोने के। और २० एकटिंग
करने के।
रमेश-कुल ३६ हुए । खैर, मैं आपको ३० रुपए दे दूंगा।
बांकेलाल-मैंने पापको ठीक ही बताए हैं। इससे एक पैसा कम
न होगा।
रमेश—अच्छा साहब ३२ रुपए ले लीजिएगा। अगर मेरा काम
हो गया तो एक बढ़िया पार्टी दूंगा।
बांकेलाल-तुम भी क्या याद करोगे । तुम्हारा भी काम कर देते
हैं। अच्छा एक पैकेट सिगरेट तो दिलवानो।
रमेश-पाप जाते ही उनके पैर पकड़ लीजिएगा। रोने लग
जाइएगा। जब वह बहुत पूछे तब अपनी बात कहिएगा।
बांकेलाल-अच्छा तो फिर अपनी नकली दाढ़ी मुझे दे दो।
?
किराये के प्रांसू ८३ रमेश-हाँ, यह लीजिए। बांकेलाल-(दाढ़ी लगाते हुए) अच्छा तो मुझे डाय नाग लिख के दे दो। रमेश-मैं क्या डालयाग लिखू ! ग्रापको समझा तो दिया है बांकेलाल-कोई चिन्ता नहीं । मैं पुराने नाटकों में से डायलाग फिट कर लूंगा। रमेश-अच्छा तो बस पाप अन्दर चले जाइए । यही मेरे अफसर का मकान है । मैं एक तरफ हो जाता हूँ । [ रमेश एक तरफ हो जाता है। बांकेलाल दरवाजे में से अन्दर चला जाता है । बांकेलाल यहाँ पर अपने सम्बाद पुराने पारसी थियेटर के अभिनेता की तरह बोलता है । बांकेलाल-सरकार ! हुजूर ! [ सुरेन्द्र का कमरे में प्रवेश ] कौन हो? बांकेलाल- (रुमाल से प्रांसू पोंछते हुए) यह एक बदनसीब वाप है जिसका मरना या जीना आपके हाथ है। सुरेन्द्र-तुम क्या चाहते हो ? बांकेलाल-भिखारी हूँ तेरे दर का भीख चाहता हूँ। कुछ और नहीं चाहिए, बस रहम चाहता हूँ। सुरेन्द्र—(कुछ चिढ़कर) अजीब आदमी हो ! आखिर यह सब सुरेन्द्र-तुम क्या है ? बांकेलाल-मेरा लड़का प्रावारा है, पर बुढ़ापे का सहारा है । आप उसके अफसर हैं पर मेरे तो परमेश्वर हैं । सुरेन्द्र-देखो शोर नहीं मचायो। धीरे बोलो। क्या चाहते हो सीधी तरह बतायो ? बांकेलाल-हुजूर ! मेरे लड़के को आपने मोप्रत्तल कर दिया है और सुना है हुजूर उसे बरखास्त कर रहे हैं।
८४ पर्दा उठने से पहले सुरेन्द्र-क्या नाम है उसका ? अच्छा मैं अभी आया। [ सुरेन्द्र बाहर चला जाता है ] बांकेलाल-नाम ! हे भगवान् ! नाम तो पूछा ही नहीं, अब क्या करूं ? उस्ताद ठीक ही कहता था-बिना रिहर्सल स्टेज पर नहीं आना चाहिए। हाय अब क्या करूं ? [ सुरेन्द्र अन्दर आ जाता है ] सुरेन्द्र-हाँ तो क्या नाम है तुम्हारे लड़के का ? बांकेलाल-(बात टालते हुए) हुजूर । क्या नाम लूं उस नालायक का। सुरेन्द्र मोहन डबराल ! बांकेलाल-हुजूर, वही है मेरा लाल । सुरेन्द्र-वह बिना छुट्टी दफ्तर से गायव रहता है । वह बहुत शैतान है। बांकेलाल—मानता हूँ, हुजूर । इस वार माफ कर दीजिए। सुरेन्द्र-मैंने उसे चेतावनी भी दी थी। बांकेलाल-हुजुर बड़े नेक हैं । अाजकल तो अफसर मातहतों से कुछ न कुछ लेते हैं देता कौन है। सुरेन्द्र-उसने दफतर का कुछ फाइल भी खो दिया है । बांकेलाल-हुजूर, मैं नई फाइलें ला दूंगा। सुरेन्द्र-तुम जानो । मैं देखूगा कि क्या कर सकता है । बांकेलाल-सरकार प्राप मालिक हैं। आप सब-कुछ कर सकते हैं । उसकी मां ने तो रो-रोकर बुरा हाल कर लिया है । सुरेन्द्र--(प्राश्चर्य से) मा ! अभी कुछ दिन हुए उसने अपनी मां की मृत्यु के कारण छुट्टी ली थी। बांकेलाल-(कुछ सोचकर) हां हुजूर ! वह उसकी नहीं, मेरी माँ मरी थी। वह अपनी दादी को माँ ही कहता था। अपनी मां को चाची कहता है।
किराये के प्रांसू है सुरेन्द्र-अच्छा तुम बांकेलाल-- (एकदम पैर पकड़कर) हुजूर रहम ! मुझ पर कहर टूटा है, मुझे किस्मत ने लूटा है । सुरेन्द्र-इस बार तो मैं उसे दफतर में रख लगा मगर फिर कभी उसने.... बांकेलाल-हुजूर, अगर फिर वह ऐसी हरकत करे तो आप उसे गोली मार दीजिएगा । मैं आपके पास नहीं ग्राऊँगा । सुरेन्द्र-उसे कहो कि अब ठीक से काम करे । बांकेलाल-दुग्राएँ दूं, बड़ा इकबाल हो सरकार का सिला भगवान् देगा पापको उपकार का । [ बांकेलाल कमरे से बाहर गली में प्रा जाता है। सुरेन्द्र भी अन्दर चला जाता है । रमेश बड़ी उत्सुकता से बांकेलाल के पास पाता है ] रमेश-क्या हुआ ? करे बांकेलाल-मार दिया हाथ ! रमेश-क्या कहा उसने ? बांकेलाल-बस यही कि उसने कह दो फिर कभी ऐसा न करे । रमेश-सच ! [ रमेश एकदम बांकेलाल से चिपट जाता है ] रमेश-वाह, मेरे पिताजी ! जीग्रो भगवान् तुम फिल्म के हीरो बन जायो। बांकेलाल-अच्छा तो अव पैसे निकालो। -यह लो। [ अपनी एक जेब से दस का नोट निकालकर उसे देता है और अपनी दूसरी जेबें टटोलने लगता है। ] बांकेलाल-पर यार तुमने नाम तो बताया ही नहीं था । रमेश-(घबराकर) तो तुमने क्या कहा ! बांकेलाल-तम बांकेलाल को क्या समझते हो ! कई नाटकों में रमेश—यह
८६
पर्दा उठने से पहले
डायलॉग भूला हूँ पर ऐसा पैबन्द लगाता हूं कि मजाल है देखने वालों
को कुछ भी पता लगे।
रमेश-जल्दी बता । फिर क्या हुआ।
बांकेलाल-उसने कहा—'तुम्हारे लड़के का क्या नाम है ? सच
जानियो अपने तो होश नहीं रहे, काटो तो खून नहीं। पर मैंने जरा
सोचा और कह दिया, 'क्या नाम लूं उस नालायक का।'
रमेश तो क्या मेरा नाम ही नहीं बताया।
बांकेलाल—सुन तो सही। इसके बाद उसने खुद ही तेरा नाम
बता दिया। उसने कहा, 'मोहन डबराल' मैंने कहा, 'वही है मेरा
लाल !'
रमेश-हाय राम ! कर दिया सत्यानाश ! मेरा नाम तो रमेश
है। मोहन का भी मेरा जैसा केस है।
[ रमेश चल देता है ]
बांकेलाल-भई मेरे बाकी पसे ।
रमेश—वह मोहन डबराल से लेना।
[ रमेश के पीछे बांकेलाल भी 'सुनिए, सुनिए' कहता हुआ चला
जाता है ]
पर्दा उठने से पहले
पात्र
अनिल
शीला
धनीराम
एक नाटककार और निर्देशक
अनिल की पत्नी
एक सेठ का मुंशी
अनिल का बातूनी पड़ोसी
मक्खनलाल
अनिल का पुत्र
मुन्नू
पिंडीदास
सुब्रामनियम
वीना
अनिल के पड़ोसी
अनिल के नाटक की नायिका
भ [ मध्यम वर्ग की एक बैठक । बैठक निर्देशक को सुझ-बूझ और नाटक खेलने वाली संस्था की आर्थिक स्थिति के अनुसार सजाई जा सकती है। बैठक में रेडियो, बुकशेल्फ और अन्य सजावट की वस्तुओं अतिरिक्त अंगीठी पर एक टाइम-पीस भी रखा है । दीवार पर भगवान् कृष्ण या किसी और देवता का चित्र टंगा हुअा है । पर्दा उठने पर शोला एक कुर्सी पर बैठी हुई स्वेटर बुनती हुई दिखाई पड़ती है। पर्दा उठने के बाद नेपथ्य से आठ बजने की अावाज अाती है। शोला सुनकर स्वेटर बुनना दन्द कर देती है । शीला-सुबह आठ बजे के निकले हैं, रात के अाठ वजने को पाए। इनकी बला से कोई मरे या जिए ! ( उठकर घड़ी में चाबी देते हुए) न अपना होश न किसी दूसरे की खबर ! वस, रात-दिन रिहर्सल- रिहर्सल ! भगवान् न करे किसी के पति को नाटकबाजी की लत हो ( चौंककर ) हाय राम ! यह तो दाल नीचे लग गई । [ शीला अन्दर चली जाती है। दूसरे दरवाजे से अनिल धीरे-धीरे हाथ में जूते लिए हुए इधर-उधर देखता हुआ । एक बार अन्दर के दरवाजे की तरफ झांककर देखता है और फिर भगवान् के चित्र के सामने खड़ा हो जाता है। ] अनिल-हे भगवान् ! तुम तो अन्तर्यामी हो । तुम्हें तो पता लग गया होगा कि परसों मेरा नाटक है और अाज हीरोइन ने जवाव दे दिया है। अब क्या करूं ? इस बार तो किसी तरह लाज रख लो, प्रभु ! आगे कभी नाटक नहीं करूँगा, कभी नहीं करूंगा ! (कान को हाथ लगाने लगता है पर अचानक यह देखकर कि उसके हाथ में जूते हैं क्रोध से जूते फेंक देता है) क्षमा करना भगवान् । शोला—(जूते पटकने की आवाज सुनकर अन्दर से हो) सत्यानाश हो इस विल्ली का ! जरा दरवाजा खुला रह गया और झट अन्दर ! [ शीला की आवाज सुनकर अनिल बाहर दौड़ जाता है । शीला हाथ में बेलन लिये हुए प्राती है ] प्राता
पर्दा उठने से पहले
शीला- (इधर-उधर बिल्लो को ढूढते हुए) निकल बाहर !
अनिल-(डरते हुए दरवाजे पर खड़े होकर) इजाजत हो तो
रात यहीं काट लूं । सुवह फिर निकल जाऊंगा।
शीला-(संभलकर) प्रोह आप ! (फिर तुनककर) ठीक तो है।
घर तो आप रात काटने ही पाते हैं। आपने तो घर को सराय समझ
रखा है, सराय !
अनिल-तुम तो बस यूं ही नाराज हो जाती हो। कभी यह भी
पूछा है कि मैं किस मुसीबत में हूँ ! क्यों देर हो गई ?
शोला-तुम्हारे लिए घर पर रहना सबसे बड़ी मुसीबत है । बाहर
तो मौज रहती है, मौज !
अनिल-रिहर्सल कराने को तुम मौज कहती हो ।
शोला-रिहर्सल ! रिहर्सल ! तुम पर तो चौबीसों घण्टे रिहर्सल
का ही भूत सवार रहता
अनिल-रिहर्सल पर ही नाटक की सफलता निर्भर है, शीला तुम
नहीं जानती
शीला-(बीच में) मैं जानना भी नहीं चाहती । पर तुम कान खोल
कर सुन लो । मैं यह रिहर्सल विहर्सल कुछ नहीं जानती। कल से दफ्तर के
वाद सीधे घर पाना होगा, नहीं तो मुझे मेरे मेके भेज दो, पीछे सारे
दिन रिहर्सल किया करना। मैं पूछती हूँ नाटक का इतना ही शौक था
तो शादी क्यों की थी?
[ अनिल एकदम जोर से खांसता है और फिर पानी मांगता है।
शीला जल्दी से पानी लेकर पाती है। ]
शोला-लो, पानी पी लो।
अनिल-(पानी पीता है) हे भगवान्
शीला-कसी तबीयत है अब ?
अनिल-(हंसकर) मेरी तबीयत तो ठीक है । पर तुम्हारा पारा
कुछ उतरा कि नहीं !
पर्दा उठने से पहले ६१ अनिल-यह शोला-(बिगड़कर) मोह ! तो क्या यह खांसने की रिहर्सल कर रहे थे ! -यह तो तुम्हारा गुस्सा उतारने की एक खुराक थी। शोला-अच्छा, यह वहानेबाजी छोड़ो और.. अनिल-तुम्हें हमारे प्यार पर गुस्सा आता है और हमें तुम्हारे गुस्से पर प्यार शोला-मुझे तो तुम्हारी रिहर्सल पर गुस्सा पाता है । अनिल- (शरारत-भरे स्वर में) और प्यार किस बात पर पाता है ? शोला- (लजाकर) तुम्हें तो हर वक्त मजाक सुझता है ? अनिल-तो फिर इसका कोई समय नियत कर लो शोला-तुम्हें तो बातें बनानी पाती हैं ! यहाँ इन्तजार करते-करते जान निकल जाती है। अनिल-(अपने स्वर को और मोठा बनाते हुए) शीला तुम कितनी अच्छी हो ! मैंने पिछले जन्म में न जाने कौन से पुण्य किए थे जो तुम-जैसी पत्नी मिली । तुम-जैसी सुन्दर, सुशील और सुघड़ स्त्री तो बड़े भाग्य से मिलती है। [ शीला जाने लगती है ] अनिल-(चौंककर) अरे सुनो तो ! कहाँ चल दी ? शोला-तुम अपने ड्रामे का पार्ट याद करो। मुझे और बहुत काम है । अनिल-मैं यह नाटक नहीं कर रहा। मैं यह तुम्हें कह रहा हूँ। सचमुच शीला, तुम कितनी समझदार हो ! शोला-सुबह तो कह रहे थे कि किस मुर्ख से पाला पड़ा है ? अनिल-वह तो मेरी मूर्खता थी। मैं सचमुच वेवकूफ हूँ, जाहिल हूँ, नालायक हूँ और शोला-वस, इतना ही बहुत है । यह रही कलम-दवात, श्राज इतना ही लिख दो, बाकी फिर सही, नहीं तो भूल जाओगे । अनिल-मैं मजाक नहीं कर रहा ।
१२ पर्दा उठने से पहले शोला-प्रच्छा अब बातें न बनायो। कपड़े बदल लो और खाना खा लो। अनिल-मैं तो भगवान् को और तुम्हारे पिताजी को रात-दिन मन-ही-मन धन्यवाद दिया करता हूँ जिन्होंने तुम जैसी साक्षात् लक्ष्मी शोला-(बीच में टोकते हुए) मैं सब समझती हूं। मैं कहे देती हूँ तुम्हारे नाटक-वाटक खेलने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं। मैं कहती हूँ अगर तुम्हारे नाटक का खर्च टिकटों से पूरा नहीं होता तो क्या डॉक्टर ने बताया है कि नाटक खेलो। अनिल-मुझे तुम्हारे पैसे बिलकुल नहीं चाहिएँ । मैं सच कहता हूं अगर यह नाटक खेला गया, तो लोगों को टिकट नहीं मिलेगी। शीला-हाय राम तो क्या सत्रको मुफ्त दिखाप्रोगे ! अनिल-मेरा मतलब है शीला-हां, एक बात और सुन लो, मुझे तुम्हारा नाटक में लड़कियों के कन्धे पकड़ना और हाथ पा.ड़कर बाहर ले जाना बिलकुल पसन्द नहीं । अनिल-तुम तो बहुत नैरो माइंडेड हो ! वह मेरी पत्नी है । शीला—(क्रोध से) क्या कहा ? तो मैं क्या तुम्हारी अनिल-(घबराकर) मेरा मतलब है वह नाटक में मेरी पत्नी । हमें रंगमंच पर ऐसा अभिनय करना पड़ता है कि लोग समझने लगें कि हम सचमुच मिया-बीवी हैं। शीला-लोग समझे या न समझे, पर तुम समझ लो मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता। अनिल--ौर जो तुम्हें पसन्द नहीं वह मुझे पसन्द नहीं । अब मेरे नाटक की नायिका वीना नहीं है। शीला-तो कोई और उसकी बहन मिल गई होगी। पर मैं तो हैरान हूँ कि ये लड़कियां नकली बीवी बनने को कैसे तैयार हो जाती हैं । अनिल-अभिनय एक कला है शीला । शीला-मैं सब जानती हूँ। इन नकली बीवियों से तो तुम लोग पर्दा उठने से पहले ६३ गालियाँ भी सुन लेते हो, थप्पड़ भी खा लेते हो। पिछले नाटक में तुम्हारे कितने जोर का थप्पड़ मारा था उसने ? अनिल-वह तो नाटक का एक सीन था। शोला-कितनी रिहर्सल की थीं उस सीन की ? अनिल-वीस । शोला-तो वीस चाँटे लगाए थे उसने ! अनिल-(जरा झंपकर बात टालते हुए) अच्छा यह वहस छोड़ो। मैंने तो अाज से निर्णय कर लिया है कि मेरे नाटक की नायिका तुम होगी। शोला--में ! अनिल-हाँ, तुम । शोला-मुझसे यह नाच-गाना नहीं होगा। अनिल-तुम्हें न नाचना है, न गाना । केवल एक्टिग करनी होगी। शीला-तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है । अनिल-खराव नहीं, ठीक हो गया है। जानती हो ये हीरोइन कितने नखरे दिखाती हैं ! परसों मेरा नाटक 'अधूरा नाटक' खेला जाने वाला है और आज वीना रिहर्सल में नहीं पाई। शोला-मैं कहती हूं इन नाटकों के चक्कर में वेकार पड़ते हो । अनिल-क्या तुम नहीं चाहती कि दुनिया में मेरा नाम हो । यदि मेरा यह 'अधूरा नाटक' सफल हो गया तो रास्ते-चलते लोग इशारा किया करेंगे कि वह जा रहा है 'अधूरा नाटक' का लेखक और निर्देशक मेरे साथ तुम्हारी फोटो भी अखबारों में छपेगी और उसके नीचे लिखा होगा नाटक के लेखक और उनकी पत्नी । शोला-मुझसे यह न होगा। अनिल-ऐसा न कहो । टिकट बिक चुके हैं। लोगों को निमंत्रण भेजा जा चुका है।
१४
पर्दा उठने से पहले
शोला-तो उसे मना लो जाकर । उसके हाथ जोड़ो। पांव पड़ो !
अनिल-मुझसे यह न होगा
होगा । मैं सोचता हूँ उनकी क्यों
खुशामद करूं। तुम किससे कम हो ! तुम मेरा साथ दो तो मुझे किसी
की परवा नहीं।
शीला-मुझसे उस-जैसी एक्टिग न होगी।
अनिल-वह एक्टिग क्या खाक करती है ! जब गुस्से में जोर से
चीखती है तो ऐसा लगता है कि इंजन की सीटी बज रही हो और
जब धीरे वोलती है तो ऐसा लगता है मानो ग्रामोफोन की चात्री
खतम हो गई हो।
शीला-पहले तो बड़ी तारीफ करते थे !
अनिल-अपने मुंह से अपने नाटक की हीरोइन की कोन बुराई
करता है। (खुशामद करते हुए) देखो शीला, बहुत थोड़ा समय है ।
परसों नाटक है। हमें रात-दिन रिहर्सल करनी पड़ेगी। पर मुझे विश्वास
है कि तुम उससे अच्छा अभिनय करोगी। तुम वैसे भी उससे कहीं
अधिक सुन्दर हो। तुम्हारी आम की फांक की तरह आँखें, सेव की
तरह गाल, चीकू की तरह नाक और टमाटर से लाल होंठ, नारियल की
तरह घने वाल और 'और...
शोला-भूल गए अपना पार्ट ! (हंसी) तुम्हें तो अपना डायलॉग
भी याद नहीं है।
अनिल-(भैपकर) प्रोफ ! मैं अपना पार्ट नहीं याद कर रहा
बल्कि तुमसे सच कह रहा हूँ। सचमुच तुम्हारी ग्राम की फांक की तरह
अांखें, सेव की तरह
शोला-(हंसते हुए) तुम्हारा मतलब है मैं फलों की टोकरी हूँ !
अनिल-मैं मजाक नहीं कर रहा। विश्वास न हो तो शीशा
देख लो।
शोला-तीन दिन हो गए है शीशा टूटे । तुमसे कितनी बार कहा'
अनिल-खेर छोड़ो। इस समय तो तुम मुझ पर ही विश्वास
पर्दा उठने से पहले ६५ करो, शीला, तुम सचमुच हीरोइन बनने के योग्य हो । वीना तो वैसे भी स्टेज पर जंचती नहीं । उसके धंसे हुए गाल, पतली नाक और मोटे होंठों ने तो उसे पूरा कार्टून बना दिया है । शोला—पर तुम्हारे इश्तिहार उसे सौन्दर्य की मूर्ति, संगीत की देवी और नृत्य की रानी कहते हैं ! [ दरवाजे पर दस्तक ] अनिल-यह बेवक्त न जाने कौन आ टपका ! शीला -प्रखबार वाला लगता है । सबह भी अपने पैसे लेने आया था। । अनिल-तुम इससे कह दो कि अब के सरकारी नोटों की जगह हमारे ड्रामे के टिकट ले ले [ धनीराम दरवाजा खटखटाता है | धनीराम-अनिल बाबू ! अनिल-यह तो कोई और लगता है। मैं अन्दर चला जाता हूँ, तुम कह दो कि मैं घर में नहीं हूँ । [ शीला दरवाजा खोलती है ] धनीराम-नमस्ते, वहनजी । शोला-नमस्ते । पाइए अन्दर या जाइए। धनीराम-(अन्दर आकर) अनिल बाबू घर पर हैं ? शीला-जी नहीं वह तो....... धनीराम-क्षमा कीजिएगा । क्या अनिल वावू, जो प्रसिद्ध नाटक- कार हैं, यहीं रहते हैं ? शोला-जी हाँ, रहते तो यहीं हैं पर धनीराम- (जसे बिना सुने हो) वह तो महान् कलाकार हैं। उनके दर्शनों को आया था। कब तक लौटेंगे ? अनिल-मैं भई पा गया। आइए, आइए। [ शीला अन्दर जाती है ] १६ पर्दा उठने से पहले धनीराम-यापके नाटकों का जवाब नहीं साहव । अनिल-(खुश होकर) आपने मेरा पिछला नाटक देखा होगा। धनीराम-नहीं साहब, भला मैं नाटक कैसे देख सकता था । आपने पास तो भिजवाया ही नहीं था। अनिल-ग्राप कहाँ से तशरीफ ला रहे है ? धनीराम-मैं सेठ गरीबदास का मुन्शी धनीराम हूँ। अनिल-सेठ गरीवदास ? धनीराम-जी हाँ, परसों आपने उनसे एक कालीन और सोफा. सेट ड्रामे के हॉल में भिजवाने के लिए कहा था न ? अनिल-जी हाँ। धनीराम-(घिघियाते हुए) ये चीजें ठीक वक्त पर पहुँच जाएंगी। सेठ साहब को तो नाटक का शौक नहीं है पर सेठानी को रामलीला और नोट की बहुत पसन्द है। उन्होंने दस पास मंगवाए हैं और साहब हम तो पापका नाटक जरूर देखेंगे और बच्चों को भी दिखाएंगे । पांच पास मुझे दे दीजिए। सेठजी ने सोफा-सेट और कालीन पहुंचाने का काम मुझे ही सौंपा है। अनिल-ग्राप सोफा-सैट और कालीन मत भिजवाइएगा। अब जरूरत नहीं है। धनीराम-(प्राश्चर्य से) क्या नाटक नहीं खेला जाएगा ? अनिल-नहीं। धनीराम-मगर साहब टिकट बिक चुके हैं, उनका क्या होगा ? क्या ग्राप पैसे वापस करेंगे ? अनिल-जी हाँ, पैसे वापस कर दूंगा। धनीराम-(घबराकर) खैर टिकट वालों को तो आप पैसे वापस देकर शान्ति कर देंगे पर नापने पास वालों का भी सोचा है, उनका क्या होगा। अनिल-वे सब फेल हो जाएंगे। ?
पर्दा उठने से पहले ६७ कह धनीराम- (निराश स्वर में) जी... अच्छा नमस्कार ! चला जाता है)। अनिल-पास ! पास ! पास ! एक सोफा-संट के बदले पन्द्रह पास ! शोला-(तौलिए से हाथ पोंछती हुई अन्दर पाती है) मैंने तो उसे दिया था कि घर पर नहीं हो । पर जब उसने कलाकार, नाटककार कहा तो फौरन बाहर निकल पाए ! अनिल-देखो शीला, अगर मेरा नाटक न हुआ तो टिकट वाले पैसे वापस मांगेंगे, पास वाले मजाक उड़ाएंगे, दुनिया हँसेगी... शोला–पर मैंने तो कभी नाटक में पार्ट नहीं किया। अनिल—(खुश होकर) उसकी तुम चिन्ता मत करो। पिछले साल वह शर्मा का नाटक था क्या नाम था उसका, हाँ..."हम सब एक हैं"..उसमें उसकी हीरोइन ने तीन दिन पहले जवाब दे दिया । उसे तो चक्कर आने लगे। वेहोश हो गया । पर उसकी बीवी ने कहा-'तुम चिन्ता न करो । मैं नाटक में काम करूंगी।' उसने रात-दिन एक कर दिया और ऐसा अच्छा अभिनय किया कि कमाल कर दिया । अखबारों ने मिया-बीवी की तारीफ के पुल बांध दिए। शीला-अच्छा बाबा मुझे क्या है ! तुम सिखा दो, जैसा मुझसे होगा कर दूंगी। अनिल-(खुशी से उछल पड़ता है) शाबाश ! बैंक यू, शीला, बैंक तुम कितनी अच्छी हो ! अच्छा मानो रिहर्सल शुरू । तुम्हारा एक आधुनिक फैशनेबुल लड़की का पार्ट है । शीला-(सोचते हुए) फैशनेबुल लड़की के पार्ट के लिए कोई अच्छी साड़ी चाहिए । (गिड़गिड़ाकर) तुमसे कितनी बार कहा है कि एक साड़ी ला दो पर तुम सुनते ही नहीं। अनिल-मिसेज वर्मा से साड़ी मांग लेना शीला-मैं नहीं मांगूगी। यू करें
२८
पर्दा उठने से पहले
अनिल-अच्छा बाबा मैं किसी से मांग लाऊंगा।
शीला में किसी की उतरन नहीं पहनूंगी।
अनिल-मैं नई ला दूंगा।
गोला-(खुशी से) तो चलो पहले साड़ी ले पाएं । फिर आकर
रिहर्सल शुरू करेंगे .
अनिल-(समझाते हुए) शीला, समय बहुत कम है । रिहर्सल शुरू
कर दो। साड़ी कल ले पाएंगे।
शीला-और हाँ, वह मेरे टोप्स का टांका भी टूटा हुआ है, उसे
भी बनवा लाना।
अनिल-मैं यह सब कर दूंगा।
शीला-अच्छा तो खाना खा लो, फिर रिहर्सल शुरू करेंगे ।
अनिल-एक रिहर्सल तो कर लें, फिर खाना खाएंगे। बाहर की
कुण्डी लगा लो, कोई प्रा न जाए । नाटक तो तुमने पढ़ा था ?
शीला-एक बार पढ़ा तो था ।
अनिल-तो बस ठीक है । तुम रेखा का पार्ट कर रही हो । (शीला
हाय में पुस्तक देते हुए) लो, यहाँ से शुरू करो । हाँ-हाँ, शाबाश"
बोलो...
शोला-(डरते हुए) रवि, मैं तो तुम्हें अपना हृदय सौंप चुकी हूँ।
इसे कहीं खो न देना।
अनिल-शावाश ! जरा जोर से और दिल पर हाथ रखकर।
शीला-मैं तो तुम्हें अपना हृदय सौंप चुकी हूँ। (अपना हाथ वाई
मोर छाती पर रखती है)।
मनिल-ॐ हूँ ! दिल दाई तरफ नहीं होता। बाईं तरफ हाथ
रखकर कहो।
शीला-जब दिल दे ही दिया तो न दाई तरफ रहा न बाई
तरफ!
अनिल-अच्छा छोड़ो। मागे चलो।
पर्दा उठने से पहले है। अनिल-यह हुए) शोला-(पढ़ते हुए) क्या मैं भी तुमसे कुछ पूछ सकती हूँ ? अनिल-यूछो। शीला—(जिस तरह प्रध्यापक विद्यार्थी से प्रश्न पूछता है) 'क्या तुम मुझे सचमुच प्रेम करते हो ?' तो तुम इस तरह कह रही हो जैसे तुम दस का नोट देकर मुझसे हिसाब मांगती हो । शीला—तो तुम्हीं बोलकर दिखायो । अनिल-देखो यूं (अभिनय करते हुए) 'क्या तुम मुझे सचमुच प्रेम करते हो ?' मेरा मतलब है जरा शरमाकर, लजाकर, गरदन उठाकर, नजरें झुकाकर । शोला-(बिगड़कर) मुझसे नहीं होता । (किताब फेंक देती है)। अनिल-(मनाते नहीं, नहीं, मेरा मतलब है तुम बिलकुल ठीक कर रही हो । अच्छा आगे चलते हैं । (अभिनय) 'रेखा, तुम मेरा जीवन हो, प्राण हो, प्रात्मा हो। मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकता। जिस तरह प्राइसक्रीम रफीजिटर के बाहर नहीं रह सकती उसी तरह मैं तुमसे अलग होकर जी नहीं सकता।' शीला-तभी तो सारा दिन घर से बाहर रहते हो ! अनिल-मजाक छोड़ो। हाँ तो मैं कह रहा था कि मैं तुमसे अलग होकर जी नहीं सकता। (अभिनय करते हुए) रेखा, मैं तुम्हारे लिए आकाश के तारे तोड़ सकता हूँ, समुद्र में छलांग मार सकता हूँ, एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ सकता हूँ...' (शीला जोर से हंसतो है) हंसो नहीं। शोला-(हंसते हुए) सामने वाले नीम के पेड़ से दो दातुन तो तोड़ नहीं सकते और डींग मार रहे हो कि ऐवरेस्ट की चोटी पर चढ़ सकता हूं। अनिल-मेरी जान पर बनी है और तुम्हें मजाक सूझ रहा है ! शोला-बुरे दिन पाएं तुम्हारे दुश्मनों के ! अच्छा प्रागे बोलो। अनिल-(अभिनय करते हुए) रेखा, जी चाहता है कि हम-तुम १०० पर्दा उठने से पहले ऐसी जगह चलें जहाँ और कोई न हो। कोई न न हो । (दरवाजे पर दस्तक) यह कम्बस्त कोन आ गया ? अच्छा में देखता हूँ कौन है । दरवाजे पर दस्तक) कौन है ? (दरवाजा खोलता है)। मक्खनलाल-(प्रवेश करते हुए) अरे भई डरते क्यों हो? मैं हूं मक्खनलाल । जै रामजी की ! अनिल-जै रामजी की। पाइए मक्खनलालजी, कहिए क्या हुक्म है ? मक्खनलाल-हुक्म-बुक्म क्या, बात यह है कि इधर आए कई दिन हो मए थे । मैंने सोचा कि कहीं ग्राप यही न समझे कि मैं आपसे नाराज- वाराज हो गया हूँ। अनिल-यह आप क्या कह रहे हैं ! आप निश्चिन्त रहिए, अगर पाप छः महीने भी न पाएं तो भी हम यह नहीं सोच सकते। वैसे यह आप ही का घर है। मक्खनलाल-भई, अपने को तो तुमसे मिले बिना चैन ही नहीं पड़ती । क्या बताऊँ इन दिनों कुछ फुर्सत-वुर्सत ही नहीं मिली। बात यह थी कि... अनिल-(टालते हुए) कोई बात नहीं, आजकल काम से किसे फुर्सत मिलती है। मक्खनलाल-काम-वाम तो ऐसा ही था। बात यह थी कि मेरी मौसी का लड़का अनिल-(व्यंग्यात्मक ढंग से) पाप ठीक कहते हैं। माजकल मेहमानों के मारे नाक में दम है । मक्खनलाल-नहीं भई, मेहवान-वेहमान को तो हम सिर पर विठाते हैं । भागवान् के घर ही मेहमान आते हैं। जरा माचिस-वाचिस तो देना। 'अनिल-(जेब से दियासलाई निकालते हुए) यह लीजिए। मक्खनलाल-हाँ, तो मैं कह रहा था'लो, मैं सिगरेट की डिबिया- विबिया भी भूल पाया
पर्दा उठने से पहले
१०१
अनिल-जी सिगरेट !
मक्खनलाल-ग्राप वैठे रहो, मैं ले लेता है !
[ मक्खनलाल डिब्बी उठाने के लिए मेज की तरफ जाता है
अनिल-(स्वगत) यह तो चिपक ही गया। जाने का नाम ही नहीं
लेता।
मक्खनलाल-लो, भल गया। मैं क्या कह रहा था ?
अनिल-(क्रोध दबाते हुए) अाप कह रहे थे कि प्रापको कही
जरूरी काम से जाना है।
मक्खनलाल- (बेफिक्री से) काम-धन्धे तो दुनिया में लगे ही रहते
हैं। अाज तो मैंने सारे जरूरी काम-बाम एक तरफ रख दिए । वस,
आपसे मिलने-विलने का ही परोगराम बनाया है । (बड़े इतमीनान से
कुर्सी पर बैठ जाता है)
अनिल-बड़ी कृपा की पाप ने लेकिन
मक्खनलाल-हाँ तो मैं कह रहा था कि इन दिनों मेरी तबीयत
ववियत ठीक नहीं रही । वात यह थी कि...
अनिल-वर, अव तबीयत कैसी है पाप की ?
मक्खनलाल-ठीक है । पर पाँच-छः दिन जुकाम-काम हो गया
था। छीके-वीके ग्राने लगी थीं।
अनिल-अब तो ठीक हैं न पाप ?
मक्खनलाल-ग्रजी मैंने भी परवा-वरवा नहीं की । बस, जुशांदा
पिया और अपने काम में जुटा रहा । जुशांदा भी क्या, बस दो-चार
तुलसी-वुलसी के पत्ते लिए, तीन-चार काली-वाली मिर्च ली और...
अनिल-मतलब यह कि जुकाम ठीक हो गया।
मक्खनलाल-मैं तो अपनी देसी-वेसी दवाइयों का ही परयोग
करता हूँ। इन डॉक्टरों के पास सिवाय टीके-वीके के और मुलफादीन
की गोलियों के और है ही क्या !
अनिल -सुलपादीन । अापका मतलब सल्फा डायजीन की
१०२ पर्दा उठने से पहले गोलियों मक्खनलाल-हाँ कुछ ऐसा-वैसा ही नाम है । [दोनों चुप हो जाते हैं] मक्खनलाल-और क्या खबरें-वबरें हैं, अनिल बाबू ! अनिल-कोई खास बात नहीं । बात यह है कि मैंने एक हफ्ते से अखबार ही नहीं पढ़ा। मक्खनलाल-तो कोई अपने दफ्तर-वफ्तर की खबर सुनायो। अनिल-सब ठीक-ठाक है। मक्खनलाल-क्या बात है अनिल बाबू, तबीयत-वबीयत तो ठीक है ? कुछ उदास लग रहे हो। अनिल-बस, आप की ही कृपा है। मक्खनलाल-हो, वह आपका नाटक-वाटक कब हो रहा है ? अनिल-परसों। मक्खनलाल-लो परसों के एक सिनेमा के पास मिल रहे हैं । पर भैया हम तो तुम्हारा खेल देखेंगे। सिनेमा-विनेमा तो रोज ही देखते हैं । दो-चार पास-वास भिजवा देना। अनिल-पास तो मैं आपके घर ही भिजवा देता । आपने बेकार कष्ट किया। मक्खनलाल-कष्ट-वष्ट क्या ! यह तो अपना घर है। अपनी बिजली फ्यूज हो गई थी। मैंने सोचा दो-तीन घंटे अनिल बाबू के यहाँ ही पाराम-वाराम करेंगे। ( कुर्सी में और घस जाता है)। अनिल-दो-तीन घंटे ! (जहर का-सा चूंट पीते हुए) बात यह है कि हम लोग जरा बाहर जा रहे हैं । मक्खनलाल-अब रात-बात को कहाँ जानोगे ? अनिल-कुछ जरूरी काम है। मक्खनलाल-ऐसा भी क्या जरूरी काम-वाम है ! बैठो यहीं गप- शप लगाते हैं:
पर्दा उठने से पहले १०३ अनिल-हम लोगों का एक दोस्त के यहां खाना है । मक्खनलाल-तब तो घंटे-दो घंटे में लौट प्रायोगे । मैं यहीं बैठता हूँ। अनिल-दरअसल हम लोगों को एक शादी में जाना है। रात वहीं रहेंगे । मक्खनलाल-अच्छा तो भई फिर चलते हैं । देवू शायद मोहनलाल जी घर आ गये हों । हाँ, पास जरूर भिजवा देना ! नहीं तो मैं कल-बल खुद ही ले जाऊंगा। अनिल-ग्राप कष्ट न कीजियेगा । मैं पास भिजवा दूंगा। मक्खनलाल-अच्छा तो दम पास भिजवा देना । चिन्ता-विन्ता न करना कोई पास वेकार नहीं जायेगा और एक-याध बच भी गया तो अगले दिन वापस हो जायेगा। अनिल-(बला टालते हुए) अच्छा नमस्ते । मक्खनलाल- रामजी की ! अनिल-हे भगवान् ! मुश्किल से बला टली है । यह लोग न खुद कोई काम करते हैं और न किसी को करने देते हैं। (पुकारकर) शीला ! शीला ! शोला-(अन्दर से) अभी आई । अनिल-शीला, हमें एक मिनट व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। लो, मैं शुरू करता हूँ। (अभिनय करते हुए) "शीला, जब तुम सौरी, शीला नहीं, रेखा ! हाँ, रेखा, जब तुम मेरे पास होती हो तो मुझे स्वर्ग मिल जाता है मानो'मानो......' [ तभी दूर से बिल्ली की म्याऊँ-म्याऊं को प्रावाज आती है ] शीला-रसोई में बिल्ली घुस गई है । मैं अभी निकाल कर आई जल्दी से रसोई की तरफ जाती है)। अनिल-ग्रोह ! मुझे भी अपना पार्ट याद नहीं। (याद करते हुए) हाँ मानो अतृप्त होंठो को अमृत मिल गया हो । (अभिनय करते हुए) हैं १०४ पर्दा उठने से पहले शीला-भाड़ 'जब मैं तुम्हारे पास होता हूँ तो मैं इस दुनिया में नहीं होता । मुझे..' भाड़ में जाय तुम्हारी रिहर्सल ! ऐसी अशुभ बातें मुंह से न निकालो। अनिल-शीला, तुम समझती क्यों नहीं ! यह नाटक है, नाटक ! अच्छा छोड़ो तुम यहाँ से पढ़ो ! शोला-(पढ़ते हुए) मैं क्या जानूं तुम मेरे कौन हो ! पर हाँ, जब तुम मेरे पास नहीं होते तो ऐसा लगता है जैसे मेरी दुनिया प्राबाद हो गई हो...' अनिल-अोहो, यावाद नहीं बरबाद हो गई फिर से कहो। शोला-(बहुत तेजी से बोलती है) 'जब तुम चले जाते हो, तो मुझे ऐसा लगता है कि मेरी दुनिया बरबाद हो गई हो।' अनिल-ऊँह!मजा नहीं पाया । जरा एक्टिग करो। देखो, पहले सिचुएशन को समझ लो। (समझाते हुए) थोड़ी देर के लिए मान लो कि तुम मुझसे प्रेम करती हो और तुम्हारे पिताजी यह नहीं चाहते कि तुम्हारी शादी मुझसे हो । शोला-वह कब चाहते थे ! वह तो मामाजी ने... अनिल-अव छोड़ो भी ! अच्छा अागे चलो। शीला, जरा भावुक बनो । भूल जानो हम-तुम पति-पत्नी हैं । भूल जाओ कि हमारी शादी हो चुकी है। मुन्नू-(तभी बाहर तभी बाहर से मुन्नू पीपनी बजाता हुमा दाखिल हो जाता है)। ममी ! ममी ! (पोपनी बजाता है) शीला-लो, इसे म्यूजिक डायरेक्टर बना लो। अनिल-(क्रोध से) शीला, तुम्हें क्या हो गया है ? शोला-इतनी देर तक बाहर नहीं खेलते, बेटे । अनिल-अभी तो साढ़े आठ ही बजे हैं । जामो बेटा बाहर - खेलो। मुन्न-पापा जी, आप तो परसों कह रहे थे कि पाठ बजे के बाद पर्दा उठने से पहले १०५ बाहर नहीं खेलना चाहिए। अनिल-आज वाहर मौसम अच्छा है । मुन्नू-नहीं, पापा जी, मैं तो अापके साथ खेलूंगा। [शीला हंसती है पर जब अनिल उसको प्रोर देखता है तो एकदम चुप हो जाती है] अनिल-तुम तो ऐसे बैठ गई जैसे तुम से कोई मतलव ही नहीं। तुम्ही जरा कहो न इसे । (मुन्नू की अोर जाते हुए) अच्छा बेटा, यह, लो दो पाने, जाग्रो सामने लच्छू की दुकान से टाफी ले पात्रो मुन्नू–टाफी तो मेरे पास है । पापाजी, आपका नाटक परसों हो रहा है न ? [ शीला चली जाती है ] अनिल-हाँ। मुन्नू-मुझे पिकी और टुन्न के लिए दो पास चाहिए। अनिल-हाँ-हाँ, जरूर ले लेना । देखो अव जाग्रो टोनी के साथ खेलो। मुन्ना-पापाजी, रामलीला की कहानी सुनायो । अनिल-रात को सोते समय मुनाऊँगा । मुन्न-नहीं पापा जी, अभी सुनायो । अनिल-देखो मुन्न्लू गीता ग्रांटी आज नया वाजा लाई है। वह कह गई थी कि मुन्नू को भेज देना। मुन्नू-नया वाजा ! अनिल-हाँ-हाँ ! मुन्नू-ग्रहा जी, हम नया वाजा देखेंगे। (मुन्नू खुशी में कूदता हुप्रा बाहर चला जाता है)। अनिल-प्रोफ्फो ! अब तुम कहाँ चली गई ? शीला ! शोला ! [ शीला पाती है ]
१०६
पर्दा उठने से पहले
अनिल-तुम कहाँ चली गई थीं ?
शीला-अंगीठी में कोयले डालने गई थी। रिहर्सल के बाद खाना
खाना है या अाज व्रत ही रखना है !
अनिल-खाना भी खा लेंगे। तुम्हें चाहिए था कि इतनी देर में
आगे पढ़ लेतीं।
शीला-नाटक तो मैंने पढ़ा हुअा है ।
अनिल-अच्छा अब जरा आखिरी सीन की रिहर्सल कर लेते है।
किताब में दिखाते हुए) देखो, यहाँ से, शाबाश ! बोलो !
शोला-(पढ़कर) 'मेरे देवता ! मैं तो तुम्हारे चरणों की धूल हूँ,
मुझे यूं न ठुकरायो ।
अनिल-जरा गला दबा कर रोते हुए । शाबाश ! आगे चलो।
(शीला प्रागे बढ़ जाती है) पोहो ! मेरा मतलब आगे बढ़नेसे नहीं,"
मेरा मतलब आगे पढ़ने से -हाँ शाबाश जरा रोते हुए.''चलो...
मेरा मतलब पढ़ो।
शोला-(रोते हुए) 'मेरे देवता, मैं तो तुम्हारे चरणों की धूल हूँ।
मुझे यूं न ठुकरायो । शीला रमेश के पैरों पड़ती है । रमेश उसे
धक्का दे देता है।
अनिल-यह तो बैकेट में लिखा है। जो व्रकेट में लिखा हो
उसे नहीं बोलते।
शीला--मुझे क्या पता?
अनिल-(तभी जैसे कुछ याद आता है) वह मुन्नू की पिस्तौल
कहाँ रखी है ? मैं अभी लाया । तब तक तुम इस सीन को फिर से पढ़
लो। (अनिल मेज की दराज में, फिर किताबों की अलमारी में पिस्तौल
ढूंढता है, फिर अलमारी के नीचे से पिस्तौल उठाते हुए) लो, मिल गई।
अच्छा अब आगे चलो। मुझे जरा क्यू दो।
शीला-क्या है ?
अनिल-क्यू ! मेरा मतलब अपनी पहली लाइन फिर बोलो'.
१०७ पर्दा उठने से पहले शोला-यूं न ठुकरायो। अनिल-मेरी आँखों से दूर हो जा, नहीं तो मैं तुझे मार डालूंगा। शोला-इस जीवन से तो अच्छा है मैं मर जाऊँ। लो, चलायो गोली। तुम्हें मेरी कसम है। अनिल-मैं कहता हूँ हट जायो मेरे रास्ते से, (जोर से) मत बना पागल मुझे नहीं तो [ दरवाजे से मि० सुबामनियम और लाला पिंडीदास झांकते हैं ] शोला-चलायो गोली ! चलायो। अनिल-मुझे पागल न बनायो । चली जाओ ! नहीं तो खून हो जाएगा, खून [ सुबामनियम और पिंडोदास झपटकर अनिल को पकड़ लेते हैं ] सुब्रामनियम–व्हाट पार यू डूयिग जी ? पिंडीदास-यानि तुम की करता है ? अनिल-मुझे छोड़ दो ! सुब्रामनियम-तुम एजूकेटिड होकर यह क्या करना जी? पिंडीदास–यानि तुम पढ़या-लिखया बन्दा ! ए की करता है ? अनिल-मैं कहता हूँ मार लोग जाइए । सुब्रामनियम-तुम सिस्टर३ दूसरा कमरा में चले जायो जी। पिंडीदास–हाँ भेनजी, तुम इक पास्से हो जायो । अनिल-मैं कहता हूँ मैं अपने घर में कुछ भी करूं आपको क्या ! सुबामनियम-तुम मरडर' करेगा जी तो पुलिस हमको भी पकड़ेगा। पिंडीदास-यानि पड़ोसियों को भी गवाही देनी होगी। सुब्रामनियम-हमको भी विटनेस देना होगा। पिडीदास-यानि कि गवाही । १. प्राप क्या कर रहे हैं ? २. शिक्षित ३. बहनजो ४. तरफ ५. हत्या ३ हैं
१०८
पर्वा उठने से पहले
अनिल-झटका देते हुए छोड़ दो।
सुबामनियम, पिंडीदास-पुलिस ! पुलिस !
[ सुबामनियम और पिंडीदास गिर पड़ते हैं । शीला और अनिल
देखते हैं। फिर दोनों हंस पड़ते हैं। ]
सुब्रामनियम-वाट इज दिस,' अनिल बाबू ?
पिंडीदास--यानि, ए क्या है भई !
अनिल-ग्राप लोग तो खूब डर गए।
सुब्रामनियम-डरने का बात है जी ! हमारी दिल तो अभी तक
धुकुर-घुकुर करता जी।
अनिल--यह पिस्तौल तो मून्नू का है।
सुबामनियम-बट व्हाट इज दिस ?
पिंडीदास-यानि ए सब की था ?
अनिल-यह तो हम लोग रिहर्सल कर रहे थे।
सुबामनियम-रिहर्सल ?
पिडीवास-प्रो क्यों भई ?
अनिल-ड्रामे का रिहर्सल । परसों मेरा नाटक खेला जा रहा
है। उसी की रिहर्सल कर रहे थे ।
सुबामनियम-इज इट राइट सिस्टर ?२
पिंडीदास–यानि क्या यह सच है, भनजी ?
शोला--जी हाँ !
पिंडीदास-वाह भाई अनिल वाबू ! तुमने तो कमाल कर
दिया !
सुखामनियम--यह तो फर्स्ट अप्रैल के माफिक हो गया जी । अच्छा
भाई रिहर्सल करो । मैं चलता हूँ।
अनिल-माफ कीजिए, आप लोगों को...
पिडीदास-कोई नहीं। अब हम लोग जाता है।
१. यह क्या है २. ? बहनजी क्या यह सच है ?
?
पर्दा उठने से पहले
१०६
।
[ दोनों बाहर चले जाते हैं। शीला और अनिल हँसते हैं )
शीला-लो और करो रिहर्सल !
[ दोनों वापस आकर दरवाजे में से झांककर एक साथ कहते हैं ]
पिंडीदास, और सुब्रामनियम- नाटक का पास जरूर भेज देना।
(दोनों चले जाते हैं)।
अनिल-यह तो नाटक में नाटक हो गया।
शीला-बस करो ! मैं बाज ग्राई इस रिहर्सल से !
अनिल-(खुशामद करते हुए) यह न कहो शीला, नहीं तो मैं
सचमुच पागल हो जाऊंगा। अगर यह नाटक न खेला गया तो लोग
मुझ पर हंसेंगे, मेरा मजाक उड़ाएंगे। मेरा घर से बाहर निकलना
मुश्किल हो जाएगा।
शीला-अच्छा है। इस बहाने दो-चार दिन पाराम से तो घर
बैठोगे।
[ दरवाजे पर दस्तक ]
शोला-लो फिर कोई आ गया। देखो कौन
अनिल-तुम दरवाजा खोलो और कह दो कि मैं घर पर नहीं
हूँ। मैं अन्दर चला जाता हूँ।
[ शीला दरवाजा खोलती है ]
वीना-क्या मिस्टर अनिल यहीं रहते हैं ?
शीला-जी हां ! लेकिन वह इस समय घर में नहीं हैं।
[ अनिल अावाज सुनकर दौड़ा हुमा प्राता है ]
अनिल-कौन पाप ?
वीना-हैलो अनिल !
अनिल-याइए, पाइए ! मुझे तो किसी ने बताया कि पाप बाहर
चली गई हैं । हे भगवान् ! तूने मेरी लाज रख ली । बैठिए, वैठिए !
अनिल-(शीला से एक तरफ) जल्दी से चाय बना दो।
शीला-कौन है ?
२१० पर्दा उठने से पहले अनिल-मेरे अफसर की बीवी है । इसकी जरा अच्छी तरह खातिर कर दो। शीला-नमस्ते बहनजी। मैंने आपको पहचाना नहीं था। वीना-नमस्ते । अनिल-जाओ, जल्दी करो ! शीला-मैं अभी आई, बहनजी ! (चली जाती है) अनिल-मुझे विजय ने बताया कि अाप नाराज होकर बाहर चली गई हैं। सच जानिए मेरे तो होश उड़ गए, चक्कर आने लगे, परों के नीचे से जमीन खिसक गई। वीना-उन्होंने ग्रापको गलत बताया। अनिल-ग्राप सुबह रिहर्सल में क्यों नहीं पाई ? वीना-मुझे एक जरूरी काम हो गया था । अनिल-मगर मेरा तो हार्ट फेल हो गया होता। [ शीला एक हाथ में प्लेट लिए पाती है, पर दोनों की बातें सुन. कर चुपचाप पोछे खड़ी हो जाती है। ] वीना-मैं आपको कभी धोखा नहीं दे सकती। प्रनिल-पाप कितनी अच्छी हैं ! कितनी नेक हैं ! आप एक महान् कलाकार हैं। आप तो इतना अच्छा अभिनय करती हैं कि बस कमाल है। और उस पर अापकी यह परसनल्टी लोग देखो ही रह जाते हैं। वीना-झूठी तारीफ करना तो कोई प्रापसे सीखे । अनिल-मैं सच कहता हूँ। आप सौन्दर्य की मूर्ति, संगीत की देवी और नृत्य की राती हैं। [ शीला के हाथ से प्लेट गिर पड़ती है ] शीला-तो यह है वीना, जिसके लिए तुम कह रहे थे कि बोलती है तो ऐसा लगता है कि इंजन सीटी मार रहा है। वीना-नान्सन्स !
पर्दा उठने से पहले
१२१
शोला-(रोष-भरे स्वर में) मेम साहब ! गाली देना अपने घर
वालों को ! मैंने तुझ जैसी बहुत देखी हैं ।
अनिल-क्या कहती हो शीला ! वीना, इन का बुरा न मानना, इन
का तो दिमाग खराब है।
शोला- भूठ बोलते शर्म नहीं आती ! तुम्हीं तो कह रहे थे कि
नखरे दिखाती है । अकड़ती है । मैंने भी सोच लिया है उससे पार्ट नहीं
कराऊंगा।
वीना-यह सब क्या है ! आप मेरी वेइज्जती कर रहे है
शोला-बड़ी ग्राई इज्जत वाली !
वीना-मुझे पता नहीं था कि तुम इतने कमीने हो ! खबरदार !
अब जो (वीना क्रोध में जाने लगती है)।
शोला-जा-जा....."
वीना-खवरदार जो अब कोई मेरे पीछे पाया।
अनिल-वीनाजी, सुनिए तो सही...
वीना-शट-अप !
अनिल-चली गई ! शीला, यह तुमने क्या किया? शीला !
शीला !
शीला-जाग्रो, उसके हाथ जोड़ो और पैर पड़ो। मेरा तो दिमाग
खराब है।
प्रनिललेकिन मेरे अधूरे नाटक का क्या होगा?
शोला-कान खोल कर सुन लो मेरे जीते-जी अब तुम कोई नाटक
नहीं खेलोगे।
[ शीला अन्दर चली जाती है ]
प्रनिल-मेरा नाटक तो पर्दा उठने से पहले ही खतम हो गया।
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