Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun

Pawamchariwo Vol-1; (1957)

Bhayani, H.c. · 2010/02

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मूर्तिदेवी ग्रन्थमाला अपभ्रश ग्रन्थाक:१ पउमचरिउ, भाग-१ (अपभ्रश काव्य) पहला सस्करण :१६५७ चौथा सस्करण :१६८९ मूल : स्वयंभूदेव मूल सम्पादक : डॉ एच सी.भायाणी अनुवादक : डॉ० देवेन्द्रकुमार जैन मूल्य :२५/- प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ, १८, इस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नयी दिल्ली-११०००३ मुद्रक शकुन प्रिंटर्स पचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली-११००३२ भारतीय ज्ञानपीठ PAUMA-CHARIU (PART-I) of Svayambhudeva Text edited by Dr. H. C. Bhayani and translated by Dr. Devendra Kumar Jain. Published by Bharatiya Jnanpith, 18, Institutional Area, Lodi Road, New Delhi- 110003 Printed at Shakun Printers, Naveen Shahdara, Delhi-110032 Price: Rs. 25/- प्रकाशकीय - भारतीय दर्शन, सस्कृति, साहित्य और इतिहास का समुचित मूल्यांकन तभी सम्भव है जब सस्कृत के साथ ही प्राकृत, पालि और अपभ्रंश के चिरा- गत सुविशाल अमर वाङ्मय का भी पारायण और मनन हो। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि ज्ञान-विज्ञान की विलुप्त, अनुपलब्ध और अप्रकाशित सामग्री का अनुसधान और प्रकाशन तथा लोकहितकारी मौलिक साहित्य का निर्माण होता रहे । भारतीय ज्ञानपीठ का उद्देश्य भी यही है । इस उद्देश्य की आशिक पूर्ति ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी ग्रन्थमाला के अन्तर्गत सस्कृत, प्राकृत, पालि, अपन , तमिल, कन्नड, हिन्दी और अंग्रेजी मे, विविध विधाओ मे अब तक प्रकाशित १५० से अधिक ग्रन्थो से हुई है। वैज्ञानिक दृष्टि से सम्पादन, अनुवाद, समीक्षा, समालोचनात्मक प्रस्तावना, सम्पूरक परिशिष्ट, आकर्षक प्रस्तुति और शुद्ध मुद्रण इन ग्रन्थों की विशेषता है। विद्वज्जगत् और जन-साधारण मे इनका अच्छा स्वागत हुआ है । यही कारण है कि इस ग्रन्थमाला में अनेक ग्रन्थो के अब तक कई-कई सस्करण प्रकाशित हो चुके है। अपभ्रश मध्यकाल में एक अत्यन्त सक्षम एव सशक्त भाषा रही है। उस काल की यह जनभापा भी रही और साहित्यिक भाषा भी। उस समय इसके माध्यम से न केवल चरितकाव्य, अपितु भारतीय वाड्मय की प्रायः सभी विधाओं में प्रचुर मात्रा मे लेखन हुआ है। आधुनिक भारतीय भाषाओ-हिन्दी, गुजराती, मराठी, पजाबी, असमी, वाग्ला आदि की इसे - - यदि जननी कहा जाए तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। इसके अध्ययन मनन के बिना हिन्दी, गुजरानी आदि आज की इन भाषाओ का विकासक्रम भलीभांति नहीं समझा जा सकता है। इस क्षेत्र में शोध-खोज कर रहे विद्वानो का कहना है कि उत्तर भारत के प्राय सभी राज्यो मे, राजकीय एव सार्वजनिक ग्रन्थागारो मे, अपभ्र श की कई-कई सौ हस्तलिखित पाण्डुलिपियों जगह- जगह सुरक्षित है जिन्हे प्रकाश में लाया जाना आवश्यक है । सौभाग्य की बात है कि इधर पिछने कुछेक वर्षों से विद्वानो का ध्यान इस ओर गया है। उनके मत्प्रयत्नो के फलस्वरूप अपम्रग की कई महत्त्वपूर्ण कृतियाँ प्रकाश मे भी आई है। भारतीय ज्ञानपीठ का भी इस क्षेत्र में अपना विशेष योगदान रहा है। मूर्तिदेवी ग्रन्यमाला के अन्तर्गत ज्ञानपीठ अब तक अपभ्र श की लगभग २५ कृतियाँ विभिन्न अधिकृत विद्वानो के महयोग से सुसम्पादित रूप मे हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित कर चुका है। प्रस्तुत कृति 'पउम- चरिउ' उनमे से एक है। मर्यादापुरुषोत्तम राम के चरित्र से सम्बद्ध पउमचरिउ के मूल-पाठ के सम्पादक है डॉ० एच सी भायाणी, जिन्हे इस ग्रन्थ को प्रकाग मे लाने का श्रेय तो है ही, माय ही अपभ्रश की व्यापक सेवा का भी श्रेय प्राप्त है । पाँच भागो मे निवद्ध इम ग्रन्थ के हिन्दी अनुवादक रहे है डॉ. देवेन्द्र कुमार जैन । उन्होने इस भाग के सस्करण का सशोधन भी स्वय कर दिया था। फिर भी विद्वानो के सुझाव सादर आमन्त्रित हैं । भारतीय ज्ञानपीठ के पथ-प्रदर्शक ऐसे गुभ कार्यो मे, आशातीत धन- राशि अपेक्षित होने पर भी, सदा ही तत्परता दिखाते रहे हैं । उनकी तत्परता को कार्यरूप में परिण करते हे हमारे सभी सहकर्मी । इन सबका आभार मानना अपना ही आभार मानना जैसा होगा। । श्रुतपचमी, ८ जून, १९८६ गोकुल प्रसाद जैन उपनिदेशक भारतीय ज्ञानपीठ प्राथमिक वक्तव्य - महाकवि स्वयम्भू और उनकी दो विशाल अपभ्रंश रचनाओं- पउमचरित और हरिवंश-पुराणके सम्बन्धमें बहुत कुछ लिखा जा चुका है। इनका सर्वप्रथम परिचय-"Svayambhu and his two poems is Apabhransa" by H. L. Jain (Nagpur University Journal. vol. I. 1935 ) द्वारा प्रकाशित हुआ था। कविके एक छन्द- ग्रन्थका अन्वेषण कर उसका उपलभ्य भाग डॉ. एच. डी. वेलणकरने सम्पादित कर प्रकाशित कराया (वं. रा. ए. सो. जर्नल १९३५ और १९३६ ) 1 तत्पश्चात् सन् १९४० में प्रो. मधुसूदन मोदीका 'चतुर्मुख स्वयंभू अने त्रिभुवन स्वयंभू' शीर्षक लेख भारतीय विद्या अंक २-३ में प्रकाशित हुआ जिसमें लेखकने कविके नामके सम्बन्धमें वडी भ्रान्ति को है । सन् १९४२ में पं. नाथूराम प्रेमीका 'महाकवि स्वयम्भू और त्रिभुवन स्वयम्भू लेख उनको 'जैन साहित्य और इतिहास' नामक पुस्तकके अन्तर्गत प्रकट हुआ। तत्पश्चात् सन् १९४५ में पं. राहुल सांकृत्यायनका 'हिन्दी काव्यधारा' ग्रन्य प्रकाशित हुआ जिसमें कविकी रचनाके काव्यात्मक अवतरण भी उद्धृत हुए। भारतीय विद्या-भवन, बम्बईसे डॉ. एच. सी. भायाणी द्वारा सम्पादित होकर कविका 'पउमचरित' प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गया है और अवतक उसके दो भाग निकल चुके है । अतएव प्रस्तुत रचना-सम्बन्धी विशेष जानकारीके लिए यह सब साहित्य देखने योग्य है। कविका दूसरा महाकाव्य 'हरिवंशपुराण' अभी सम्पादन-प्रकाशनको वाट जोह रहा है। प्रस्तुत प्रकाशनमें डॉ. देवेन्द्रकुमारने डॉ. भायाणी द्वारा सम्पादित पाठको लेकर उसका हिन्दी अनुवाद दिया है । इस विषयमें अनुवादकने ।

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पउमचरित
अपने वक्तव्यमें कुछ आवश्यक वातें भी कह दी है। उन्होंने जो परिश्रम
किया है वह स्तुत्य है । तथापि, जैसा उन्होने निवेदन किया है-
"इतने बड़े कविके काव्यका पहली बारमें सर्वांग-सुन्दर और शुद्ध
अनुवाद हो जाना सम्भव नही ।" अतएव स्वाभाविक है कि विद्वान्
पाठकोको इसमें अनेक दूपण दिखाई दें। इन्हें वे क्षमा करेंगे और
अनुवादक व प्रकाशकको उनकी
सूचना
देनेकी कृपा करेंगे।
डॉ. देवेन्द्रकुमारजी तथा भारतीय ज्ञानपीठके प्रयाससे अपभ्रंश भापाके
आदि महाकविकी यह विशाल रचना हिन्दी पाठकोके सम्मुख उपस्थित हो
रही है, इसके लिए वे दोनो ही हमारे धन्यवादके पात्र है।
हीरालाल जैन
आ. ने. उपाध्ये
१७-२-५८]
प्रधान सम्पादक

दूसरे संस्करणकी भूमिका आदरणीय भाई लक्ष्मीचन्द्रजीका आग्रह है कि मैं पउमचरिउ भाग-१ के दूसरे संस्करणकी एक पृष्ठीय भूमिका शीघ्र भेज दूं। पहले संस्करणको भूमिकामें मैंने लिखा था कि इतने वडे कविके काव्यका पहली बार में सर्वांग सुन्दर अनुवाद हो जाना सम्भव नही । अनुवादका अर्थ, शब्दशः अर्थ कर देना नहीं, बल्कि कविके भाव-चेतना, चिन्तन-प्रक्रिया और अभिव्यक्तिकी भंगिमासे साक्षात्कार करना 1 अत: जव दुवारा अपने अनुवादको देखनेका प्रस्ताव भारतीय ज्ञानपीठने रखा तो मुझे अपना उक्त कथन याद आ गया और मैंने पुननिरीक्षणके बजाय उसकी पुनर्रचना कर डाली । मैं अनुभव करता हूँ कि ऐसा करके जहाँ मैंने पहले अनुवादकी कमियां दूर की, वही महाकवि स्वयम्भूके प्रति ईमानदारी भी वरती। इस समय अपभ्रंश साहित्यके अध्ययनमें आत्म-विज्ञापनका बाजार गरम है। लोगोकी ढपली अपना राग बजाने और उसे दूसरोके गले उतारनेमे इसलिए सफल है कि एक तो आम पाठक आलोच्य साहित्यसे वैसे ही दूर है, और थूसरे अपभ्रंश साहित्यके अध्ययनका दृष्टिकोण, आजसे चालीस साल पहलेके दृष्टिकोण जैसा ही है, बल्कि और विकृत ही हुआ है । आज भी कुछ पण्डित उमे आभीरोको भापा मानते है, जवकि आभीर जातिका कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नही रहा, और रहा भी हो तो आटेमें नमकके बरावर । याद रखनेकी बात है कि यह नमक भी स्वदेशी था। परन्तु कुछ हिन्दी पण्डित आज भी नमकको ही विदेशी नही मानते, पल्कि माटेको भी विदेशी मानते है। इधर तुलनात्मक अध्ययनके नामपर हिन्दी प्रेमाख्यानोको शैली अपभ्रंश चरितकाव्योमें खोजी जा रही है । - पउमचरित आश्चर्य तो यह है कि इस प्रकारको मान्यताएं उच्चशोधके नामपर विश्वविद्यालयोसे उपाधियां लेकर स्थापित हो रही है । मैं समझता हूँ इसका विरोध करनेकी हिम्मत सरस्वतीमें भी नहीं है, क्योकि आखिर यह भी उनकी गिरफ्त में है, 'इण्टरव्यू' सरस्वती नही, ये लोग लेते है। इसका प्रारम्भिक इलाज यही है कि मूलकाव्योका प्रामाणिक अनुवाद सुलभ कर दिया जाये। और यह काम भारतीय ज्ञानपीठ जिस निष्ठासे कर रहा है उसकी सराहना की जानी चाहिए । इस अवसरपर मैं स्व. डॉ. हीरालाल और स्व. डॉ. गुलाबचन्द्र चौधरीका पुण्यस्मरण करता हूँ। श्री चौवरीने जैन साहित्यके लिए बहुत कुछ किया, और वह बहुत कुछ करनेको स्थितिमें थे। परन्तु अचानक चल बसे । दुख यह देखकर होता है कि जैन समाज, महावीरके २५००वें निर्वाण महोत्सव वर्षमें 'पुरस्कारों' की वर्षा कर रहा है, लेकिन स्व. चौधरीको ओर किसीका ध्यान नही ! अभी भी समय है और इस सम्बन्धमें कुछ स्थायी रूपसे किया जा सकता है । परमचरिउके अनुवा मूल प्रेरणा मुझे आदरणीय पण्डित फूलचन्द्रजोने दी थी, और आदरणीय लक्ष्मीचन्द्रजीने सहयोग दिया-दोनोंके प्रति मैं अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ, साथ ही सम्पादक मण्डलके प्रति भी। पूरा करने में ११४ उषानगर. इन्दौर-२ फरवरी १६७५ -देवेन्द्रकुमार जैन

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एउमचरित लोकमूलक ?-इसका सही-सही विचार किये विना-आगे बढना कठिन ही नहीं असम्भव है। वैसे कविने स्वयं अपने प्रस्तावनावाले रूपकमें कहा है कि इसमें कही-कही दुष्कर शब्दरूपी चट्टानें है । चट्टाने नदीकी धाराओमें दिख जाती है और वे उसे काटकर निकल जाती है, परन्तु स्वयम्भूके सघन दुष्कर शब्दरूपी शिलातलोकी कठिनाई यह है कि अर्थ की धाराएँ उन्हीमें समाहित है। उसका भेदन किये बिना अर्थ तक पहुँचना कठिन है । स्वयम्भू- जैसे क्लासिक कविके अनुवादके लिए जो समझ, अभ्यास और अनुभव आज मुझे प्राप्त है, वह आजसे बीस साल पहले नही था। दूसरे स्वयम्भू-जैसे जीवनसिंह कवियोकी रचनाओका निर्दोष और सम्पूर्ण अनुवाद एक वारमें सम्भव नहीं। इघर बहुत-से अपभ्रंश काव्य प्रकाशित हुए है, और उसके विविध अगोपर शोध प्रबन्ध भी देखने में आये है, जो इस बातके प्रमाण है कि हिन्दी जगत् अपभ्रश-भापा और साहित्यके प्रति आकृष्ट हो रहा है, यद्यपि अपभ्रंशमें शोधके निर्देशक सिद्धान्त दिशाएं अभी भी अनिश्चित है। इसका एक कारण अपभ्रशके प्रमुख काव्योत्रा हिन्दीमें प्रामाणिक अनुवाद न होना है। स्व डॉ हीरालाल जैन द्वारा सम्पादित अपभ्रंश काव्य इसके अपवाद है। उन्होने मूलपाठके समानान्तर हिन्दी अनुवाद भी दिया है। भारतीय ज्ञानपीठ इस दिशामें विशेष प्रयत्नशील है, उसीका यह परिणाम है कि 'पउमचरिउ' हिन्दी जगत्में लोकप्रिय हो सका। भारतके विभिन्न विश्वविद्यालयोमें 'उसके अंश पाठ्यक्रममें निर्धारित होनेसे उसकी विक्री बढी है । 'पउमचरिउ'के प्रथम काण्डको दुबारा छापनेकी सम्भावनाको देखते हुए मा. भाई लखमीचन्दजीने मुझे लिखा कि "मैं सारे अनुवादको अच्छी तरह देख लूं जिससे उसमें अशुद्धियां न रह जायें।" इस दृष्टिसे जब मैंने अनुवादको देखा तो लगा कि पुराने अनुवादमें सुधार करनेके बजाय उसकी पुनर्रचना ही ठीक है। ऐसा करने में ही कविके साथ न्याय हो सकता है । मैं अब अपभ्रंश काव्यके प्रेमी पाठकोके लिए यह विश्वास दिला सकता हूं कि प्रस्तुत अनुवादको शुद्ध और प्रामाणिक बनाने में मैंने कोई कसर नही उठा रखी। फिर भी अपभ्रंश कान्यके मूल्याकनमें प्रास्ताविक ११ दिलचस्पी रखनेवाले विद्वानोसे निवेदन है कि यदि उनके ध्यान में गलतियां आयें तो वे निःसंकोच मुझे सूचित करनेका कष्ट करें जिससे भविष्यमें उनका साभार परिमार्जन किया जा सके। मैं भाई लखमी- चन्द्रजीके प्रति हमेशाकी तरह अपना आभार व्यक्त करता हूँ। यह वर्ष तीर्थकर महावीरकी २५००वी और हिन्दी सन्त कवि तुलसीके 'राम- चरितमानस' की ४००दी वर्षगांठ है, मतः भूमिकाके रूपमें अनुवादके साथ 'पउमचरित और रामचरितमानस' का कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओपर मैंने तुलनात्मक परिचय भी दे दिया है जिससे पाठक यह जान सकें कि दो विभिन्न दार्शनिक भूमिकाओं और समयोमें लिखे गये उक्त रामकाव्योमे 'भारतीय जनमानस' किन रूपोमें प्रतिविम्वित हुआ है। १४९६८४ ११४ उषानगर -देवेन्द्रकुमार जैन 'पउमचरिउ' और 'रामचरितमानस स्वयम्भू और उनकी रामकथा स्वयम्भूने आचार्य रविषेण ( ई. ६७४) का उल्लेख किया है, और पुष्पदन्तने (ई. ९५९) स्वयम्भू का । अतः स्वयम्भूका समय इन दोनोके वीच आठवी और नौवी सदियोके मध्य सिद्ध होता है। कर्णाटक और महाराष्ट्रमें उस समय घनिष्ठ सम्पर्क था, अतः अधिकतर सम्भावना यही है कि स्वयम्भू महाराष्ट्रसे आकर यहां बसे । कुछ विद्वान् स्वयम्भूको कन्नौजसे प्रवजित इस आधारपर मानते है कि प्रसिद्ध राष्ट्रकूट राजा ध्रुवने कन्नौजपर आक्रमण किया था और उसीके ममात्य रयडा धनंजयके साथ स्वयम्भू उत्तरसे दक्षिण आये। परन्तु यह बहुत दूरको कल्पना है जिसका कोई ऐतिहासिक आधार नही। स्वयम्भूको माताका नाम पद्मनी और पिताका मारुतदेव था। कविकी दो पलियां थी-आदित्याम्मा और अमृतम्मा। एक अपुष्ट आधारपर उनकी तीसरी पली भी बतायी जाती है। एक धारणा यह भी है कि स्वयम्भूने अपनी तीनो रचनाएँ अधूरी छोडी जिन्हें उनके पुत्र त्रिभुवन स्वयम्भूने पूरा किया। परन्तु यह धारणा ठीक प्रतीत नही होती । क्योकि यह विश्वास करना कठिन है कि स्वयम्भू जैसा महाकवि सभी रचनाओंको अधूरा छोड़ेगा। एकाध रचनाके विषयमें तो यह सच हो सकता है, परन्तु सभी रचनाओके सम्बन्धमें नहीं । पउमचरिउके अलावा उनकी दो रचनाएं और है-'रिट्ठणेमि चरिउ' और 'स्वयम्भूच्छन्द'। स्वयम्भूके अनुसार रामकथा तीर्थकर महावीरके समवशरणसे प्रारम्भ होती है। राजा श्रेणिक पूछता है और गौतम गणघर उसे बनाते हैं। उनके अनुसार, भारतमें दो वंश थे-एक इक्ष्वाकुवंश (मानव वंश) और 'पउमचरित' और 'रामचरितमानस दूसरा विद्याधर वंश । आदि तीर्थंकर ऋषभनाथ इसी परम्परामें राजा हुए । उनके पुत्र भरत चक्रवर्तीकी लम्बी परम्परामें सगर चक्रवर्ती सम्राट हुआ। वह विद्याधर राजा सहस्राक्षकी कन्या तिलककेशीसे विवाह कर लेता है। सहस्राक्ष अपने पिताके बैरका बदला लेनेके लिए, विद्याधर राजा मेघवाहनको मार डालता है। उसका पुत्र तोयदवाहन अपनी जान बचाकर तीर्थंकर अजितनाथके समवशरणमें शरण लेता है। वहां सगरके भाई भीम सुभीम तोयदवाहनको राक्षसविद्या तथा लंका और पाताल लंका प्रदान करता है। यहीसे राक्षसवंशकी परम्परा चलती है जिसमें आगे चलकर रावणका जन्म होता है। इसी प्रकार इक्ष्वाकु कुलमें राम हुए। तोयदवाहनकी पांचवी पीढीमे कीर्तिधवल हुआ। उसने अपने साले श्रीकण्ठको वानरद्वीप भेंटमें दिया जिससे वानरवंशका विकास हुआ। 'वानर' श्रीकण्ठके कुलचिह्न थे । राक्षसवंश और वानरवंशमें कई पीढियों तक मैत्री रहनेके बाद श्रीमालाके स्वयवरको लेकर दोनोमें विरोध उत्पन्न हो जाता है। राक्षस वंशको इसमें मुंहकी खानी पडती है । जिस समय रावणका जन्म हुआ उस समय राक्षस कुलकी दशा बहुत ही दयनीय थी। रावणके पिताका नाम रत्लाश्रव था और मौका कैकशी। एक दिन खेल-खेलमें भण्डारमें जाकर वह राक्षसवंशके आदिपुरुष तोयदवाहनका नवग्रह हार उठा लेता है, उसमें विजड़ित नवग्रहोमें रावणके दस चेहरे दिखाई दिये, इससे उसका नाम दशानन पड़ गया। रावण दिन दूना रात चौगुना बढने लगा। उसने विद्याधरोसे बदला लिया। पूर्वजोको खोयी जमीन छीनी। विद्याधर राजा इन्द्रको परास्त कर अपने मौसेरे भाई वैश्रावणसे पुष्पक विमान छीन लिया। उसकी बहन चन्द्र नखाका खरदूषण अपहरण कर लेता है। वह बदला लेना चाहता है, परन्तु मन्दोदरी उसे मना कर देती है । वालीकी शक्तिको प्रशंसा सुनकर रावण उसे अपने अधीन करना चाहता है। परन्तु बाली इसके लिए तैयार नहीं है । रावण ।

१४ पउमचरिउ उसपर आक्रमण करता है परन्तु हार जाता है। बाली दीक्षा ग्रहण कर लेता है। नारद मुनिसे यह जानकर कि दशरथ और जनकको सन्तानोके हाथ रावणको मृत्यु होगी, विभीपण दोनोको मारनेका पड्यन्त्र रचता है । वे दोनो भाग निकलते है। दशरथ कौतुकमंगल नगरके स्वयंवरमें भाग लेते है। कैकेयी उन्हें वरमाला पहना देती है। इसपर दूसरे राजा दशरथपर आक्रमण करते है, कैकेयी युद्ध में उनकी रक्षा करती है, दशरथ उन्हे वरदान देते है । दशरथके ४ पुत्र होते है, कौशल्यासे रामचन्द्र, कैकेयीसे भरत, सुमित्रासे लक्ष्मण और सुप्रभासे शत्रुघ्न । जनकके एक कन्या सीता और एक पुत्र भामण्डल उत्पन्न होता है । परन्तु इसे पूर्वजन्मके वैरसे एक विद्याधर राजा उडाकर ले जाता है। जनकके राज्यपर कुछ वर्वर म्लेच्छ राजा आक्रमण करते है। सहायता मांगनेपर दशरथ राम और लक्ष्मणको भेजते है । वे जनककी रक्षा करते है । स्वयंवरमें वज्रावर्त और समुद्रावर्त धनुष चढा देनेपर सीता रामको वरमाला पहना देती है। दशरथ अयोध्यासे बारात लेकर आते है। शशिवर्धन राजाकी १८ कन्याओंकी शादी रामके दूसरे भाइयोसे हो जाती है । बुढापेके कारण दशरथ रामको राजगद्दी देना चाहते है । परन्तु कैकेयी अपने वर मांग लेती है जिनके अनुसार राम को वनवास और भरतको राजगद्दी मिलती है। उस समय भरत अयोध्यामें ही था। राम वनवासके लिए कूच करते है। स्वयम्भूके अनुसार वास्तविक राघव-चरित यहीसे प्रारम्भ होता है । गम्भीरा नदी पार करनेके बाद राम जव एक लतागृहमें थे, तव भरत उन्हें अयोध्या वापस चलनेके लिए कहता है। राम अपने हाथसे दुवारा उसके सिरपर राजपट्ट वाँध देते है । भरत जिनमन्दिरमें जाकर प्रतिज्ञा करता है कि रामके लौटते ही वह राज्य उन्हें सौंप देगा। चित्रकूटसे चलकर राम वशस्थल नामक स्थानपर पहुँचते है, जहां सूर्यहास खड्ग सिद्ध करते हुए शम्बुकका धोखेसे सिर काट देते है। उसकी मां चन्द्रनखा अपने पुत्रको मरा देखकर हत्यारेका पता लगाती है । राम-लक्ष्मणको 'पउमरिज' और 'गमचरितमानम' भागार मा आमोद प्रेममें बदल जाता है । वह उनने अनुनित प्रस्ताव सन्नी है। आमानित गर भगा देते हैं । राम-रावणके मंघपंकी Titan प्रारम्भ होनी है। परदूपा के हाग्नेपर चन्द्रनया गवणके पान आरआनो गार गुनानी है। वह अवलोकिनी विद्याको महायतासे गौना आय र लेता है। मार्गमे जटायु और भामण्डलका अनुनर विसाधर मा विरोध करता है। परन्तु उनकी नहीं चलती। लंका पागकर मीना नगर प्रवेश करनेने मना कर देती है, रावण उसे ममममेटम देता है। गण नीताको फुमलाता है। परन्तु रायणी यामय ग्यनीय चिति देवार मन्त्रिपरिषद्को बैठक प। सोगरे मर गाने नम गुपोयको पत्नीका उदार पट मुग्रीय ( Aft ) Reir मग्नं है कि वह उनकी नौतापी गोज- मोगा। पहले तो गाव नर गाना, परन्तु बादमें लक्ष्मण मेय: चार नामान नीलामी मो, form भेजता है। मोताका पता गनगर मारा। मीनाकी प्रतिमा पी शिवह परिवार माणगा। हनुमानने नमागार मारता माग गय पन्नास-II सफल Taim और गान माले दो माग जाता है। "TITENT. चार मा गाम और ri.fimc m मर र बार, | ra : Tamift.r, नगर ":, : Mirmirमहो -"-.. :::Fri, *. re: :: :: :: :: :: 1 -- - . । "* . . . . . . . . . .ग '...-.:: :: मर पउमचरिउ उसके शवको कन्धेपर लादकर छह माह तक घूमते-फिरते है । अन्तमें आत्मबोध होनेपर दीक्षा ग्रहण कर लेते है । तपकर मोक्ष प्राप्त करते है। तुलसी और मानस तुलसीदास १६वी सदीमें हुए। इनका बचपन उपेक्षा, कठिनाई और संकटमें बीता। पिताका नाम आत्माराम दुबे था और माताका हुलसी। इन्होने राजापुर, काशी और अयोध्यामें निवास किया। उन्हे रामकथा सूकर क्षेत्रमें सुननेको मिली । तुलसीका प्रामाणिक इतिवृत्त न मिलनेपर उनके विषयमें तरह-तरहको किंवदन्तियां है, जिनका यहाँ उल्लेख अनावश्यक है। कहते है कि एक बार ससुराल पहुँचनेपर इनकी पत्नी रत्नावली इन्हें झिड़क देती है जिससे कविको आत्मबोध होता है और वह रामभक्तिमें लग जाता है। उनका मन रामके लोककल्याणकारी चरितमें रम गया, उन्होने निश्चय कर लिया कि मैं रामके चरित की लोकमानसमें प्रतिष्ठा करूंगा। तुलसीके अनुसार रामकथाकी परम्परा अगस्त मुनिसे प्रारम्भ होतो है । वह यह कथा शिवको सुनाते है, शिव पार्वतीको, और बादमें काकभुशुण्डीको । उनसे यह कथा याज्ञवल्क्यको मिलती है और उनसे भारद्वाजको । कवि, इसके अलावा उन स्रोतोका उल्लेख करता है जिन्होने उसके कथाकाव्यको पुष्ट बनाया। मुख्यरूपसे वह आदिकवि और हनुमान्- का उल्लेख करता है, क्योंकि एक रामकथाका कवि है और दूसरा रामभक्ति- का प्रतीक । तुलसीके लिए दोनो अपरिहार्य हैं । कवि सन्तसमाजको चलता- फिरता तीर्थराज कहता है जिसमें रामभक्तिरूपी गंगा, ब्रह्मविद्यारूपी मरस्वती और जीवन की विधि निषेधमयी प्रवृत्तियो को यमुनाका संगम दूसरे शब्दोमे, "ब्रह्मविद्याको आधार मानकर प्रवृत्ति-निवृत्तिका विचार रनेवाला सच्चा रामभक्त ही वास्तविक तीर्थराज है।" रामचरित मानस- | बुनावट समझनेके लिए यह एक महत्त्वपूर्ण सकेत है। कविने प्राकृतजन र प्राकृत कवियोका उल्लेख किया है। परन्तु यहाँ उनका प्राकृतसे प्राय लौकिकजन या कविसे है, न कि प्राकृतभाषाके कवि, जैसा कि ।

'पउमचरित' और 'रामचरितमानस' कुछ लोग समझते है । अपने मानसरूपकमे वह स्पष्ट करते है-कवि मानव को मूल समस्या यह है कि प्रभुके साक्षात् हृदयमें विद्यमान होते हुए भी मनुष्य दीन-दुखी क्यों है ? पुराणोके समुद्रसे वाष्पोके रूपमे जो विचाररूपी जल माधुरूपी मेघोफे रूपमें जमा हो गया था, वही बरसकर जनमानसमें स्थिर होकर पुराना हो गया। कविको बुद्धि उसमें अवगाहन करती है, हृदय आनन्दमे उल्लसित हो उठता है और वही काव्यरूपी सरिताके रूप में प्रवाहित हो उठता है, लोकमत और वेदमत के दोनों तटोको छूती हुई उसकी यह रामकाव्यरूपी सरिता बहकर अन्तमें रामयज्ञके महाममुद्रमें जा मिलती है । और इस प्रकार कविको काव्ययात्रा उसके लिए तीर्थयात्रा है। पहले काण्डमे परम्परा और स्रोतोके उल्लेग्वके बाद, रामजन्मके उद्देश्योपर प्रकाश डालता है। फिर रामभक्तिके सैद्धान्तिक प्रतिपादन के बाद उस्लेप है कि दशरयके चार पुत्र हुए। विश्वामित्रके अनुरोधपर दारय राम-लक्ष्मणको यज्ञकी रक्षा के लिए भेज देते है, वहां राम धनुपयज्ञमे भाग लेते है, और मोतामे उनका विवाह होता है। रामको राजगद्दी देनेपर पोकेमो अपने वर मांग लेती है, फलस्वरूप रामको १४ वपोंका वनयाम मिलता है। भरत ननिहाल मे लौटता है और अयोध्या सन्नाटा देखकर हैरान हो उठता है । यादमें असली दात मालूम होनेपर वह रामको मनाने जाता है । अन्त में रामगो चरणपादुकाएं लेकर यह गजकाज करने लगता है। जपन्तके प्रमंगगे बाद राम विविध मुनियोंमे भेंट करते हुए आगे बढ़ते । गयी यहन नूपगम्या गम-रक्षण अनुचित प्रस्ताव रखती है । PIT त नाक-कान काट लेने है। इस घटनामे उनके विगंधको सायना पर जाना है। राम मोतामा अग्निप्रया करा देते है, यहाँ वन समानी रानी मगर रमे राश्ण छाया मौताशा अपहाण काम भोगो मारे गुगीन मिनी गालाह । मापार मुवी पानी ताग गरिरगने है । ri मामबागाने है। मान मोगर मेंट ३.mramin पउमचरित होकर रामसे मिल जाता है। अन्तमें रावण युद्ध में मारा जाता है और राम विभीषणको राज्य सौंपकर अयोध्याके लिए कूच करते है । राज्याभिषेकके बाद तुलसीका कवि रामराज्यकी प्रशंसा करता है। भक्ति और ज्ञानके विश्लेपणके बाद कवि पूर्वजन्मोका उल्लेख करता है। अन्तमें काकभुशुण्डी गण्डके प्रश्नोका उत्तर देते हुए कहते है कि संसारका सबसे बड़ा दुख गरीवी है और सबसे बडा धर्म अहिंसा है । दूसरोकी निन्दा करना सबसे बडा पाप है । सन्त वह है जो दूसरोके लिए दुख उठाये और असन्त वह जो दूसरोको दुख देनेके लिए स्वयं दुख उठाये । इस फल कथनके बाद रामचरित मानस समाप्त होता है । कथानक पउमचरिउ और रामचरित मानसके कथानकोकी तुलनासे यह बात सामने आती है कि एकमें कुल पांच काण्ड है और दूसरेमें ७ काण्ड । 'मानस'की मूलकथाका विभाजन आदिरामायणके अनुसार सात सोपानो में है । 'चरिउ' में सात काण्डकी कथाको पांच भागोमें विभक्त किया गया है। 'चरिउ' का विद्याधर काण्ड 'मानस' के बालकाण्डकी कथाको समेट लेता है, दोनो में अपनी-अपनी पौराणिक रूढियो और काव्य सम्बन्धो मान्यताओके निर्वाहके साथ, पृष्ठभूमि और परम्पराका उल्लेख है। थोड़े-से परिवर्तनके साथ अयोध्या काण्ड और सुन्दर काण्ड भी दोनोमें लगभग समान है, लेकिन 'चरित' में अरण्य और किष्किन्धा काण्ड अलगसे नहीं है, इनकी घटनाएं उसके अयोध्या काण्ड और सुन्दर काण्डमें आ जाती है । मानसके अरण्यकाण्डकी घटनाएँ (चन्द्रनखाके अपमानसे लेकर जटायु-युद्ध तक) चरिउके अयोध्या काण्डमें है। तथा किष्किन्धा काण्डकी घटनाएं (राम-सुग्रीव मिलन, सीताकी खोज इत्यादि ) चरिउके सुन्दर काण्डमें है। वस्तुतः देखा जाये तो किष्किन्धा काण्ड और अरण्य काण्डकी घटनाएं एक दूसरेसे जुडी हुई है, और उन्हें एक काण्डमें रखा जा सकता है । स्वयम्भूने दोनोका एकीकरण न करते हुए एकको उसके पूर्वके काण्डमें जोड़ दिया है 'पउमचरित' और 'रामचरितमानस' और दूसरेको उसके वादके । इस प्रकार दो काण्डोकी संख्या कम हो गयी। लेकिन रामके प्रवृत्तिमूलक और उद्यमशील चरित्रको दोनो प्रधानता देते है। रामायणका अर्थ है, रामका अयन अर्थात् चेष्टा या व्यापार । त्रिभुवन स्वयम्भू भी अपने पिताकी तरह रामकथाको पवित्र मानता है। तुलसी- दास तो आदिसे अन्त तक उसे 'कलिमल समनी' कहते रहे हैं । त्रिभुवन स्वयम्भूका कहना है कि जो इसे पढता और सुनता है उसकी आयु और पुण्यमें वृद्धि होती है । त्रिभुवन स्वयम्भू लिखता है-"इस रामकथारूपी कन्याके सात सर्गवाले सात अंग है, वह चाहता है कि तीन रत्नोको धारण करनेवाली उसके आश्रयदाता "विन्दई का मनरूपी पुत्र इस कन्याका वरण करे ।" हो सकता है विन्दइका चंचल मन दूसरी कथा-कन्याओंको देखकर लुभा रहा हो और कविने उसका चित्त आकर्षित करनेके लिए नयी कथा-कन्याकी रचना की हो। अपनी कथा-कन्याके सात अंग बताकर त्रिभुवनने यह तो संकेत कर ही दिया कि उन्हें उसके सात काण्डोकी जानकारी थी। वनमार्ग 'मानस' में रामको वनयात्राका मार्ग आदिरामायणके अनुसार है । शृंग- बेरपुरसे प्रयाग, यमुना पार कर चित्रकूट । वहाँसे दण्डकारण्य । ऋष्यमूक पर्वत और पम्पा सरोवर । माल्यवान् पर्वतपर सौताके वियोगमे वर्षाऋतु काटना। रामकी सेनाका सुबेल पर्वतपर जमाव, समुद्रपर सेतु बांधकर लंकामें प्रवेश। इसके विपरीत स्वयम्भूके रामको वनयात्राका मार्ग है- अयोध्यासे चलकर गम्भीर नदी पार करना। वहाँसे दक्षिणको भोर राम प्रस्यान करते है, बीच में जाकर भरत राममे मिलते है, कवि उम स्थान का नाम नहीं बताता। वह एक सरोवरका लतागृह था। वहांसे तापस वन, धानुष्क बन और भील वस्ती होते हुए वे चित्रकूट पहुंचते है, फिर संगपुर नगर में प्रवेश करते हैं। नलकूबर नगरसे विन्ध्यगिरिको मोर मुडते है. नर्मदा और ताप्ती पार कर, कई नगरों में से होकर दण्डक वनसे क्रौंच- २० पउमचरित नदी पार कर वंशस्थलमें प्रवेश करते है। 'मानस' और 'आदिरामायण' में चित्रकूटसे लेकर दण्डकवन तकके मार्गका उल्लेख नही है। चरिउमें अयोध्यास निकलकर राम सीधे गम्भीर नदी पार करते है, स्वयम्भूका गगा जैसी नदी पार करनेका उल्लेख न करना सचमुच विचारणीय है। लेकिन लक्ष्मणको शक्ति लगनेपर हनुमान् जब उत्तर भारतको उड़ान मारते है, तो उसमें समुद्र-मलयपर्वत-कावेरी, तुंगभद्रा, गोदावरी, महा- नदी, विन्ध्याचल, नर्मदा, उज्जैन, पारियात्र, मालव जनपद, यमुना, गंगा और अयोध्याका उल्लेख है। इसमें गम्भीरका उल्लेख नहीं है। दोनो परम्पराओके भौगोलिक मार्गोकी खोजसे उस सामान्य मार्गका पता लगाया जा सकता है जिससे रामने वस्तुतः यात्रा की थी। क्योकि पौराणिक मतिरंजनाएं भौगोलिक मार्गकी वास्तविकताको नहीं झुठला सकती। अवान्तर प्रसंग आदिकवि और स्वयम्भूकी रामकथाको तुलनासे दूसरा तथ्य यह उभरकर आता है कि मूलकथामै दोनोमें अवान्तर प्रसग जुडते गये हैं। 'चरिउ'में ऐसे अवान्तर प्रसंग है : विभिन्न क्योकी उत्पत्ति, भरत बाहु- बलि-आख्यान, भामण्डल आख्यान, रुद्र भूति और वालिखिल्य, वजकर्ण और सिंहादर, राजा अनन्तवीर्य, पवनंजय आख्यान, गरुणगांवका कपिल मुनि, यक्षनगरी, कुलभूपण और देश-भूपण मुनियोका आख्यान । मानसमें ऐसे आख्यान है-शिवपार्वती आख्यान, कैकयदेशके प्रतापभानु की पूर्वजन्मकी कथा, निषादराज गुह, केवट, भरद्वाज, वाल्मीकि, अगस्त्य और सुतीक्ष्ण ऋपियोमे भेंट । अहल्याका उद्धार, जयन्त प्रसग और शबरी आख्यान । उक्त अवान्तर प्रसंगोंका उद्देश्य मुख्य कथाको अग्रसर या गतिशील बनाना उतना नहीं है कि जितना अपने मतको प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति देना। जहाँ तक दोनो काव्योमें समान रूपसे उपलब्ध चरित्रोका प्रश्न है उनके चरित्रकी मूलभूत विशेषताएं एक सीमा तक सुरक्षित है, शेष परिवर्तन अपनी-अपनी मान्यताओके अनुसार है, विस्तारभयसे यहां उनका उल्लेख 'पउमचरित' और 'रामचरितमानस' २१ नही किया जा रहा है। विशिष्ट पात्रोके चरित्रकी चर्चा भी नहीं की जा रही है क्योकि वह तुलनात्मक अध्ययनमें सहायक नहीं है । दार्शनिक विचार स्वयम्भू और तुलसी दोनो स्पष्टतापूर्वक और आग्रहके साथ अपने दार्शनिक विचार प्रकट करते है, जैनदर्शनके अनुसार सृष्टिको व्याख्या करते हुए वह कहते है कि संसार जड और चेतनका अनादि-निधन मिश्रण है। मिश्रणकी इस रासायनिक प्रक्रियाका विश्लेषण नितान्त कठिन है। तात्त्विक दृष्टिसे चेतन आनन्दस्वरूप है, परन्तु जड़कर्मने उसपर आवरण डाल रखा है इसलिए जीव दुखी है, आत्माएं अनेक है, प्रत्येक आत्मा स्वयंके लिए उत्तरदायी है। इस प्रकार स्वयम्भ द्वैतवादी और बहु- आत्मवादी हैं। राग चेतनासे मुक्ति पानेके लिए यह विवेक विकसित करना जरूरी है कि जड़से चेतन अलग है, इस विवेकको बीतराग-विज्ञान कहते है। चित्तकी शुद्धिके लिए राग चेतनासे विरति होना जरूरी है। परन्तु इसके साथ और इसीकी सिद्धिके लिए स्वयम्भूने तीर्थंकरोकी विभिन्न स्तुतियां और प्रार्थनाएं लिखी है, श्रद्धाके अतिरेकमें वह तीर्थंकरों को भगवान् त्रिलोक पितामह, त्रिलोक शोभालक्ष्मीका आलिंगन करने- वाला, यहाँतक कि मां-बाप मान लेते है । तुलसीका दार्शनिक मत सूर्य की तरह स्पष्ट है, क्योंकि उनकी काव्य चेतनाको मूल प्रेरणा ही भक्ति चेतना है । भगवत्प्राप्तिके बजाय भक्ति ही तुलसीका साध्य है। "सगुणोपासक मोक्ष ना लेही तिन्ह कहुं रामभक्ति निज देही।" भक्तिको अनुभूतिको निरन्तरता भी उसका एक गुण है : "रामचरित जे सुनत अघाही रस विसेस तिन जाना नाही" स्त्रयम्भूके वीतराग विज्ञानके लिए विरक्ति आवश्यक है और जिनभक्ति, विरक्तिम सहायक है। तुलसीके लिए भक्ति मुख्य है, विरक्ति उसमें सहायक है। अर्थात् एकके लिए भक्ति विरक्तिका एक साधन है जबकि ५७मचारउ दूसरेके लिए विरक्ति भक्तिका। एक बात और, तुलमीके राम समस्त लीलाएं करते हुए भी, व्यक्तिगत रूपसे उनमे तटस्थ है, जबकि स्वयम्भूके राम जीवनकी प्रवृत्तियोंमें सक्रिय भाग लेते हुए भी उनमें आसक्त है, वह इस आसक्तिको नहीं छिपाते । लेकिन जीवनके अन्तिम क्षणोमें विरक्तिको अपना लेते है । वस्तुत इसमें दो भिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणोकी दो भिन्न परिणतियां है जो जीवनको पूर्णता और सार्थकताके लिए प्रवृत्ति और निर्वृत्तिका समुचित समन्वय आवश्यक मानती है । चरितकाव्य-घटनाकाव्य-महाकाव्य काव्य--प्रवन्धकाव्यके मुख्य दो भेद है-चरितकाव्य और घटना- काव्य । घटनाकाव्यमें यद्यपि घटना मुरय होती है, परन्तु उसमें वर्णनात्मकता अधिक रहती है। इसलिए कुछ पण्डित घटनाकाव्यको वर्णनात्मक माननेके पक्षमें है। वर्गन चरितकाव्यमे भी होते है । परन्तु उसमें किमी पौराणिक या लौकिक व्यक्तिके चरितका एक क्रममें वर्णन होता है। जहां तक अपभ्रंशमें उपलब्ध चरितकाव्योका सम्बन्ध है, वे अधिकतर पौराणिक या धार्मिक व्यक्तियोंके जीवनवृत्तको आधार लेकर चलते है। चरितकाव्यके दो भेद किये जा सकते है। धार्मिक चरित- काव्य और रोमांचक चरित काव्य । परन्तु यह विभाजन भी अधिक ठोस नहीं है। क्योंकि चरितकाव्यमें भी रोमाचकता रहती है, ठीक इसी प्रकार रोमाचककाव्योमें धार्मिकताका पुट रहता है। शृंगार और शौर्यकी प्रवृत्ति दोनोमें रहती है । कुछ हिन्दी मालोचक, 'चरितकाव्य' को चरितकाव्य और घटनाकाव्यको महाकाव्य मानते है । 'रामचरितमानस' और 'पद्मावत' को महाकाव्य सिद्ध करने के लिए, उन्हें घटनाकाव्य मानते है, जबकि वे विशुद्ध चरितकान्य है। मानसके चरितकाव्य होनेमें सन्देह नहीं, परन्तु पद्मावत भी चरितकाव्यको कोटिमें आता है। पद्मावतमें मुख्य-रूपमे रन्नमेनका वह चन्ति वणित है जो पद्मावती के पानेसे सम्बद्ध है। मेरे विचारमै चरितकाव्य भी घटनाकाव्य हो सकता है। महाकाव्यके 'पउमचरित' और 'रामचरितमानम' लिए यह जरूरी नहीं है कि वह घटनाकान्य हो हो । 'घटना' महाकान्यकी कसोटी नही, उसके लिए महत्तत्त्वका समावेश भार उदार दृष्टिकोणकी आवश्यकता है। यदि 'मानस' 'चरिउ' और 'पद्मावत' में महतत्त्व और व्यापक उदारता है, तो वे चरितकाव्य होकर भी महाकाव्य है इसके लिए उन्हे घटनाकाव्य सिद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं। क्योकि चरितकाव्य भी महाकाय हो सकते है। इसमे सन्देह नही कि अपभ्रंश चरितकाव्योका विकास संस्कृत पुगण काव्योसे हुआ। यह बात सस्कृतम रविषेणके 'पधचरित' और 'स्वयम्भू' के 'पउमचरिउ' के तुलनात्मक अध्ययनमे स्वतः स्पष्ट हो जाती है । इधर अपभ्रंगके कुछ युवातुर्क अध्येता अपनग कायके दो भेद करने के पक्ष है-(१) चरितवाय और ( २ कथाकाव्य । परन्तु अपभ्रश वायके स्वरूप और शिल्पको देखते हा यह विभाजन ठीक नही । एक ही कवि अपने काव्यको चरित भी रहता है और कथाकाव्य भी। यह कहना भी गलत है कि चरितकाचौका नायक धार्मिक व्यक्ति होता है जबकि लौकिक कथाकायोका लौकिक पुरुप उदाहरण के लिए धनपालका 'भविनयत्ताहा' को 'भविमयत्त चरिउ' भी पहा जा सकता है । उसका नायक भविसयत्त 'सामान्य लौनिक' व्यक्ति नही है, जैसा कि कुछ लोग समझते हैं, लौकिक और अलौकिक व्यक्तियोका परित नित्रण करना अपभंग चरित-कवियोंका उद्देश्य भी नहीं है। दूसरा उमाहरण है 'गिरिवालनरिका । रही-कही उसका नाम 'मिरिवालयहा' भी मिलता है। अपनाकाव्य, यन्नुतः विशिष्ट प्रबन्धकान्य है, जिन्हें बगगानी ने चरितकामदास्यासाव्य कहा जा सकता है, केवल 'चन्धि' या 'पा' गामी आधार पर उनमे भेर करना गरन है। स्वयम्भू और पुराना दोनों अपभग निधि है और उन्होंने अपनी लयाको 4 महापाकी है जो उनके मितव्योम प्रस, नमानी चटा कामही गमाग है, आगे नगर होरा नरनाथ टार नदिन २.":नाम, बह धानिरी - पत्मचरित । हो सकती है, जैसे पाहिलका 'पठमसिरी चरि'। कहनेका अभिप्राय यह किलपनंग वियोंके चरितकाव्य गैर क्याकायाम विशेष अन्तर नहीं किया। ये कवि कभी अपने कान्यको नात्यानककाव्य भी कहते हैं, बभिप्राय वही है। जहां तक 'प्रेमतत्त्व' की प्रचुरताका सम्बन्ध है, वह चरितकाव्योंमें भरपूर है, परन्तु वे विमृद्ध प्रेमकाव्य नहीं है । कुछ विश्व- विद्यालयोंके हिन्दी.विभागोंके अन्तर्गत अपत्रंश चरितकाव्योंका प्रभाव हिन्दीके प्रेमाख्यानक कायॉपर खोजा गया है जो सचमुच विचारणीय है, क्योकि प्रेमकाव्य और प्रेमात्यानक काव्योंमें मौलिक अन्तर है। प्रेमकाव्य एक प्रकारले श्रृंगार काव्य है जबकि प्रेमाख्यानक काव्य ऐसा लौकिक प्रेमाल्यान है जिसके द्वारा कवि लौकिक प्रेमके द्वारा बलोकिक प्रेमका वर्णन करता है । हिन्दी सूफी कवियोंमें रूट प्रेमाख्यानक काव्योंपर अपभ्रंश चरितकाव्योंका प्रभाव खोजना बहुत बड़ी ऐतिहासिक भूल है ? लेकिन हिन्दीमें अपभ्रंश सम्बन्धी खोज, अधिकतर इसी प्रकार को ऐतिहासिक भूलोंकी निष्पत्ति है, जिसपर गम्भीरतासे ध्यान देनेको बावश्यकता है। युगीन परिस्थितियां स्वयम्भूका समय स्वदेशी सामन्तवादको स्थापनाका समय है, ७११ ईसवी मुहम्मद दिन कासिमका सिन्धपर सफल आक्रमण हो चुका था, और उनके बाई साल बाद लगभग मुहम्मद गोरी को अन्तिम जीतके साय गंगाघाटीसे हिन्दू सत्ता समाप्त हो चुकी थी। लेकिन पूरे अपनश साहित्यमें इन महत्त्वपूर्ण घटनामोंका लामास तक नहीं है। समाज और धर्मके केन्द्रमें राज्य या। शक्ति और सत्ता पुष्पका फल था। सामाजिक विषमताओंको परिणतिको व्याल्या पूज्यपादके द्वारा की जाती थी। 'कन्याका स्थान समाजमें निम्न माना जाता था। वह दूसरेके घरकी शोभा बढ़ानेवाली थी। स्वयम्भूके राम भी नादर्श है-"जो भी राजा हुना है या होगा, उसे दुनियाके प्रति कठोर नहीं होना चाहिए, न्याय प्रजाका पालन करते हुए वह देवताओं, ब्राह्मणों और श्रमणोंको पीड़ा न दे।" स्वयम्भूके समय विन्ध्याटवीमें भीलोंकी मजबूत बस्तियां थीं। स्वयंवरको 'पटमचरित' और 'रामचरितमानस' २५ - प्रथा थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि उस समय चीजोमें मिलावट होती थी । तुलसीसे सात-आठ सौ माल पहले, स्वयम्भूने लिखा था कि कलियुगमें धर्म क्षीण हो जाता है, इससे स्पष्ट है कि कलियुगको धारणा संसारके प्रति भारतवासियोंके निराशावादी दृष्टिकोणका परिणाम है, उसका विदेशी आक्रान्ताओसे कोई सम्बन्ध नहीं । जहां तक 'मानस' में समकालीन 'सास्कृतिक चित्र' के अंकनका प्रश्न है, वह स्पष्ट रूपसे उभरकर नहीं आता। परन्तु ध्यानसे देखनेपर लगता है कि समूचा रामचरितमानस युगके यथार्थकी ही प्रतिक्रिया है। उनके अनुसार वेद विरोधी ही निशाचर नहीं है, परन्तु जो दूसरेके धन और स्त्रीपर डाका डालते है, जुआड़ी है, मां वापकी सेवा नहीं करते, वे भी निशाचर है । इस परिभाषाके अनुसार नैतिक आचरणसे भ्रष्ट प्रत्येक व्यक्ति निशाचर है । तुलसीके समय आध्यात्मिक गोषणकी प्रवृत्ति सबसे अधिक प्रबल थी। कवि कहता है कि लोग अध्यात्मवाद और अद्वैतवादको चर्चा करते है, परन्तु दो कौड़ीपर वूसरोकी जान लेनेपर उतारू हो जाते है । तपस्वी पैसेवाले है, और गृहस्थ दरिद्र है । इसका अर्थ यह नहीं है कि तुलसीदास समाजवादी और प्रगतिशील थे। वस्तुतः समाजमे नैतिक क्रान्ति चाहते थे, रामके चरितका गान उनके इसी उद्देश्यकी पूर्तिका साहित्यिक प्रयास था। इसमें सन्देह नहीं कि दोनो कवि अपने युगके नतिक पतनसे अत्यन्त दुखी थे। परन्तु एक जिनभक्ति द्वारा समाज और व्यक्तिमें नैतिक क्रान्ति लाना चाहता है जबकि दूसरा, रामभक्ति द्वारा। दोनो कवि गमकथाके मूलम्वरूपको स्वीकार करके चलते है ? कथाके गठनमे चरित्र-त्रित्रण और नैतिक मूल्योको महत्त्व दोनोने दिया है। स्वयम्भू सीताके निर्वासनका उल्लेख तो करते है, परन्तु सीताके स्वाभिमानको आंच नहीं आने देते। 'मानम' की सीताके निर्वासनका विषय स्वयं तुलमीदास पी जाते है। कुल मिलाकर दोनो कवियोका उद्देश्य एक आवारमूलक आस्तिक चेतनाको प्रतिष्ठा करना रहा है । -देवेन्द्रकुमार जैन

अनुक्रम
पहली मन्धि
४-२४
मपम जिनकी वन्दना, मुनिजनपी पन्दना, मानार्ग-वन्दना,
चौबीग तीर्थकरीको वन्दना, रामकपा-नदीमा पना, कपाको
परम्परा, पाविना गंगल्प और आत्मलघुता, गज्जन-दुर्जन वर्णन,
मगध देगका वर्णन, गजा भैणिका वर्णन, विएगालपर
महावीरके समवशरणमा आगमन, गजा गिाका गालाल
समवशरणके लिए प्रगान, श्रेणिनाग महावीरकी वन्दना,
गमकथा सम्बन्धमें श्रेणिकमा प्रश्न, गौतम द्वारा तीन लोक
और कुलघरोका वर्णन, देवागनाओका मगदेवीको सेवा लिए
मागमन, सोलह सपनोका उल्लेरा, मापम जिनका जन्म ।
दूसरी सन्धि
२६-४४
इन्द्र द्वारा नवजात जिनो अभिषेकके लिए प्रस्थान, कलाबोके
प्रदर्शनके साथ जिनका अभिपेमा, इन्द्रका भगवान्को अलकार
पहनाना, इन्द्र द्वारा जिनको स्तुति, जिनका लालन-पालन,
शिक्षा-दीक्षा, कर्मभूमिका आरम्भ, ऋपभको गृहस्थोमें मग्न
देवकर इन्द्रको चिन्ता, नीलाजनाका अभिनय और मृत्यु,
जिनका विरक्त होना, लोकान्तिक देवोका आना और जिनकी
दीक्षा, जिनकी तपस्याका वर्णन, दूसरे साधनोका पतन और
आकाशवाणी, कच्छ-महाकच्छका जिनके पास आना, धरणेन्द्रका

अनुक्रम माकर उन्हे समझाना और भूमि देकर विदा करना, जिनकी आहारयात्रा और जनता द्वारा उपहार दिया जाना, श्रेयासका आहार देना और रत्नोंकी वर्षा । तीसरी सन्धि ४४-६० जिनका पुरिमतालपुरमे प्रवेश, उद्यानका वर्णन, शुक्लध्यान और केवलज्ञानकी उत्पत्ति, प्रातिहार्योका उल्लेख, समवशरणकी रचना, इन्द्रका आगमन, देवनिकायोका उल्लेख, ऐरावतका वर्णन, इन्द्रके वैभवका वर्णन, देवोका यान छोडकर समवशरणमे प्रवेग, इन्द्र द्वारा जिनकी स्तुति, राजा ऋपभसेनका समव- भरणभे आना, मामूहिक दीक्षा और दिमध्वनि, सात तत्त्वोका निरूपण, जिनका विहार और भरतकी विजययात्रा। चौथी सन्धि ६०-७६ भरतके चक्रका अयोध्या प्रवेश, मन्त्रियो द्वारा इसके कारणका निवेदन, दूतोका बाहुबलिमे निवेदन, उत्तेजनापूर्ण विवाद, लौटकर दूतो द्वारा प्रतिवेदन, भरत द्वारा युद्धको घोपणा, बाहुबलिकी सैनिक तैयारो, मन्त्रियो द्वारा बीचबचाव और द्वन्द्व युद्धका प्रस्ताव, दृष्टियदमे भरतकी हार, जलयुद्ध और उसमे भरतनी हार, मल्लयुद्धमे भरतका हारना, भरतका बाहुवलपर पक्र फेंकना, चक्रमा बाहुवलिके वगमे आ जाना, कुमारका निवेद, कुमार द्वारा दीक्षा ग्रहण, उनकी साधनाका वर्णन, भरता कामपर मपजिनकी वन्दना के लिए जाना, भरतमा जिनमे पानिको मिति न मिलनेका कारण पूछना, भरत दाग धग-बायना और बालिनी पेवलज्ञानको ចច ។ पउमचरित पाँचवीं सन्धि ७६-९४ इक्ष्वाकुकुलका उल्लेख, अजित जिनका संक्षिप्त वर्णन, सगर चक्रवर्तीका वर्णन, उसका सहस्राक्षको कन्यासे विवाह, सहस्राक्ष की मैघवाहनपर चढाई, उसके पुत्र तोयदवाहनका पलायन, उसका अजितनाथके समवशरणमें जाना और दीक्षा लेना, महाराक्षसका लंकानरेश बनना, सगरके पुत्रोकी कैलासयात्रा और खाई खोदना, धरणेन्द्रके प्रकोपमें उसका भस्म होना, सगरकी विरक्ति, सगर द्वारा दीक्षाग्रहण, महाराक्षसके पुत्र देवराक्षसका जलविहार, श्रमणसंघका माना और उसका वन्दनाके लिए जाना, महाराक्षसकी राक्षससेना, देवराक्षसका गद्दीपर बैठना। छठी सन्धि ९४-११४ उत्तराधिकारियोकी लम्बी सूची, अन्तिम राजा कौतिघवलका होना, उसके साले श्रीकण्ठका आना, सेनाका आक्रमण, कमलाका बीचबचाव और सन्धि, श्रीकण्ठका वानरद्वीपमें रहनेका निश्चय, वानरद्वीपमें प्रवेश, वानरद्वीपका वर्णन, वज्र- कण्ठकी उत्पत्ति, श्रीकण्ठको विरक्ति और जिनदीक्षा, नवमी पीढीमें राजा अमरप्रभका होना, उसका वानरोंपर प्रकोप, मन्त्रियोके समझानेपर कुलध्वजामें वानरोका मंकन, तडित्केश द्वारा वानरका वध, वानरका उदधिकुमार देव बनना और बदला लेना, सबका जिनमुनिके पास जाना, धर्म-अधर्म वर्णन और पूर्व-भव-कथन, तडित्केशकी जिनदीक्षा। सातवीं सन्धि ११४-१२८ कुमार किष्किन्ध और अन्धकका स्वयंवरमें जाना, आदित्य- नगरकी श्रीमालाका स्वयंवरमें माना, किष्किन्धका वरण, अनुक्रम २९ विद्याधरोका वानरवंशियोपर आक्रमण, अन्धक द्वारा विजय- सिंहको हत्या, उसका वधूसहित नगर में प्रवेश और विद्याधरोका आक्रमण, तुमुलयुद्ध, अन्धककी मूर्छा और भाईका विलाप, पाताललंकामे प्रवेश, वानरोंका पतन, किष्किन्धाका मधुपर्वतपर अपने नामसे नगर बसाना, मधुपर्वतका वर्णन, सुकेशके पुत्रोंकी किष्किन्ध नगर जानेको तैयारी, मालिकी लंका वापस लेनेकी प्रतिज्ञा, लंकापर अभियान, युद्धमे मालिकी विजय । - आठवीं सन्धि १३०-१४२ मालिका राज्य विस्तार, इन्द्र विद्याधरकी बढती, दोनोमें संघर्ष, दौत्य सम्बन्धका असफल प्रस्ताव, युद्धका सूत्रपात, विद्यायुद्ध और मालिका पतन, चन्द्र द्वारा मालिकी सेनाका पीछा करना, इन्द्रका रथनूपुर नगरमे प्रवेश, राज्यविस्तार । . नौवीं सन्धि १४२-१५८ मालिके पुत्र रत्लाश्रवका कैकशीसे विवाह, स्वप्नदर्शन और उसका फल, रावणका जन्म, रावणका नौमुखवाला हार पहनना, मांका वैश्रवणके वरकी याद कराना, रावणकी प्रतिज्ञा और विद्या मिद्ध करना, यक्षका उपद्रव, माया विद्याकी प्राप्ति और घर लौटना । प्रदर्शन, - दसवीं सन्धि १५८-१७० रावण द्वारा चन्द्रहास खड्गको मिद्धि, सुमेरु पर्वतकी वन्दना, मारीच और मन्दोदरीका आगमन, रावणका लोटना, मन्दोदरी- का रूप-चित्रण, विवाहका प्रस्ताव और विवाह, रावण द्वारा गन्धर्वकुमारियोका उद्धार, उनसे विवाह, दूसरे भाइयोके विवाह, पउमचरित कुम्भकर्णका उपद्रव करना और वैश्रवणके दूतका आना, दूतका असमान और अभियान, वैरवग और रावणमें भिडन्न, मायाका प्रदर्शन, लंकापर रावगको विजय । ग्यारहवीं सन्धि १७२-१८६ रावणकी पुष्पकविमानसे यात्रा, जिन-मन्दिरीका दूरसे वर्णन, हरिपेणका आख्यान, सम्मेद शिखरको यात्रा, त्रिजगभूषणको वनमें करना,रावणकी हस्ति-क्रीडा, भट द्वारा यमयातनास वर्णन, यमको नगरीपर आक्रमण, यमपुरीका वर्गन और बन्दियोकी मुक्ति, यम और उसके सेनानियोंसे युद्ध, युद्धमें यमकी पराजय, रावणका लंकाको प्रत्यान, माकागसे समुद्रको शोभाका वर्णन । वारहवीं सन्धि १८८-२०० मन्त्रिपरिषद्, रावणका परामर्ग, रावणका बालिके प्रति रोप, चन्द्रनखाका अपहरण, रावणका माक्रोग, मन्दोदरीको समझाना, रावणके दूतको बालिसे वार्ता, दूतका रुष्ट होकर लौटना, अभियान, द्वन्द्व-युद्धका प्रस्ताव, विद्या-युद्ध, रावणको हार, वालि- द्वारा दीक्षाग्रहण और सुग्रीवका रावणसे वैवाहिक सम्बन्ध, सहनगतिकी विरहवेदना और उसका प्रतिगोषका संकल्प । तेरहवीं सन्धि २०२-२१६ रावणकी वालिके प्रति आशका, कैलासयात्रा और वालिपर उपसर्ग, कैलासपर इसकी हलचल, धरणेन्द्रका उपमर्गको टालना, इसको प्रतिक्रिया और अन्त पुर द्वारा क्षमा-प्रार्थना, रावण द्वारा वालिकी स्तुति, जिनमन्दिरोकी वन्दना, रावणका प्रस्थान, खर- दूषण द्वारा उसका स्वागत, निशाका वर्णन।

भनुक्रम
चौदहवीं सन्धि
२१८-२३२
प्रभातका वर्णन, वसन्तका वर्णन, रेवा नदीका वर्णन, रावण
और सहस्रकिरणको रेवामें जलक्रोडा, जलक्रीडाका वर्णन,
रावण द्वारा जिनपूजा, पूजामें विघ्न, रेवाके प्रवाहका वर्णन,
रावणका प्रकोप, जलयन्त्रोका श्लिष्ट वर्णन, युद्धकी तैयारी।
पन्द्रहवीं सन्धि
२३२-२४८
युद्धका वर्णन, देवताओकी आलोचना, सहस्रकिरणका पतन,
उसके पिता द्वारा क्षमाकी योजना, सहस्रकिरणकी मुक्ति और
जिन-दीक्षा, मगधको ओर प्रस्थान, पूर्वो जनपदोपर विजय, पुनः
कैलामकी ओर, नलकूबरका यन्त्रीकरण, उपरम्भाका रावणसे
गुप्तप्रेम, नलकूबर
नरेशका पतन, क्षमादान और प्रस्थान ।
सोलहवीं सन्धि
२४८-२६६
इन्द्रके मन्त्रिमण्डलमे गुप्त मन्त्रणा, रावणको दिनचर्याका वर्णन,
इन्द्रसे उसकी तुलना, सन्धिके प्रस्तावका निश्चय, मन्त्रियोमें
परामर्श, चित्राग दूतका प्रस्थान, नारदसे सूचना पाकर रावणकी
तत्परता, दूतको वात-चीत, इन्द्रकी शक्ति और प्रभावके उल्लेख
के माथ मन्धिका प्रस्ताव, इन्द्रजीत द्वारा सन्धिकी शर्त, युद्धको
चुनौती, दूतका इन्द्रसे प्रतिवेदन ।
सत्रहवी सन्धि
२६६-२८८
युद्धका प्रारम्भ, व्यूहको रचना, युद्धका वर्णन, इन्द्रका पतन,
इन्द्रका बन्दी बनना, सहस्रारके अनुरोधपर इन्द्रको मुक्ति,
रावणको सन्धिकी शर्त।

३२ पउमचरित अठारहवीं सन्धि २८८-३०२ मन्दराचलको प्रदक्षिणा, अनन्तरथको केवलज्ञानको उत्पत्ति, रावणको प्रतिज्ञा, प्रह्लादराजकी नन्दीद्वीप यात्रा, पवनजयको अंजनासे सगाई, कुमारकी कामवेदना, मित्रकी सान्त्वना, दोनगे- का आदित्यनगर पहुंचना और कुमारका रुष्ट होना, विवाह और परित्याग, कुमारका युद्धके लिए प्रम्यान, मानसरोवरपर डेरा, चकवीके वियोगमे प्रेमका उद्रेक, चुप-चाप आकर अंजनामे एकान्त भेंट। उन्नीसवीं सन्धि ३०२-३२४ मिलनका प्रतीक चिह्न देकर कुमारका प्रस्थान, सास द्वारा अजना- पर लांछन, घरसे निष्कासन, पिताके घर पहुंचना, पिताका तिरस्कार, अंजनाका विलाप, मुनिवरसे भेंट, उनकी सान्त्वना, सिंहका आना और देव द्वारा उनकी रक्षा, हनुमानका जन्म, प्रतिसूर्यका अंजनाको ले जाना, हनुमानका शिलापर गिरना, पवनकुमारका युद्धसे लौटना और विलाप, पवनको उन्मत्त अवस्था, पवनका गुप्त संन्यास, उमकी खोज, उसका पता लगाना, हनुरुह द्वीपको प्रस्थान । वीसवीं सन्धि ३२४-३३९ हनुमानका यौवनमें प्रवेश, हनुमान और पवनमें विवाद, हनुमान्- का रावण द्वारा स्वागत, वरुणकी तैयारी, तुमुल युद्ध, वरुणका पतन, अन्त पुरको मुक्ति, वरुणकी कन्यासे रावणका विवाह, हनुमान् आदिका ससम्मान विदा ।

कविराज-स्वयम्भूदेव-कृत पदाचरित जो नवकमलोंकी कोमल सुन्दर और अत्यन्त सघन कान्ति- की तरह शोभित हैं और जो सुर तथा असुरोंके द्वारा वन्दित हैं, ऐसे ऋषभ भगवान्के चरणकमलोंको शिरसे निमन करो॥१॥ जिसमें लम्बे-लम्बे समासोंके मृणाल हैं, जिसमें शब्दरूपी दल हैं, जो अर्थरूपी परागसे परिपूर्ण है, और जिसका बुधजन रूपी भ्रमर रसपान करते हैं, स्वयम्भूका ऐसा कान्यरूपी कमल जयशील हो ॥२॥ पहले, परममुनिका जय करता हूँ। जिन परममुनिक सिद्धान्त-वाणी मुनियोंके मुखमें रहती है, और जिनकी ध्वनि रात-दिन निस्सीम रहती है ( कभी समाप्त नहीं होती), जिनके हृदयसे जिनेन्द्र भगवान् एक क्षणके लिए अलग नहीं होते। एक क्षणके लिए भी जिनका मन विचलित नहीं होता, मन भी ऐसा कि जो मोक्ष गमनकी याचना करता है, गमन भी ऐसा कि जिसमें जन्म और मरण नहीं है । मृत्यु भी मुनिवरोंकी कहाँ होती है, उन मुनिवरोंकी, जो जिनवरकी सेवामें लगे हुए हैं। जिनवर भी वे, जो दूसरोंका मान ले लेते हैं (अर्थात् जिनके सम्मुख किसीका भान नहीं ठहरता), जो परिजनोंके पास भी पर के समान जाते हैं (अतः उनके लिए न तो कोई पर है, और न स्व), जो स्वजनोंको अपने में तृणके समान समझते हैं, जिनके पास नरकका ऋण तिनकेके बराबर भी नहीं है। जो संसारके भयसे रहित हैं, उन्हें भय हो भी कैसे सकता है ? वे भयसे रहित और धर्म एवं संयमसे सहित हैं ।।१-था। पत्ता-जो मन-वचन और कायसे कपट रहित हैं, जो काम और क्रोधके पापसे तर चुके हैं, ऐसे परमाचार्य गुरुओंको स्वयम्भूदेव (कवि) एकमनसे वंदना करता है ।।९।।

पढमो संधि
तिहुमणलग्गण-खम्भु गुरु
पुणु भारम्भिय रामकह
परमेट्टि णवेप्पिणु।
आरिसु जोएप्पिणु ॥१॥
[१]
पंणवेप्पिणु भाइ-भडाराहों। संसार-समुदुत्ताराहों ॥३॥
पणवेप्पिणु भजिय-जिणेसरहों। दुजय-कन्दप्प-दप्प-हरहों ॥२॥
पणवेप्पिणु संमवसामियहाँ। तइरोक्क-सिहर-पुर-गामियहाँ ॥३॥
पणवेप्पिणु अहिणन्दण-जिणहों। कम्मट्ट-दुट्ट-रिउ-णिज्जिणहों ॥३॥
पणवेवि सुमइ-तित्थङ्करहों। वय-पञ्च-महादुन्दर-धरहों ॥५॥
पणवेप्पिणु पउमप्पह-जिणहो। सोहिय-भव-लक्ख-दुक्ख-रिणहाँ ॥६॥
पणवेप्पिणु सुरवर-साराहों। जिणवरहो सुपास-भडाराहों ॥७॥
पणवेप्पिणु चन्दप्पह-गुरुहो । भवियायण-सउण-कप्पतरूहों ॥८॥
पणवेप्पिणु पुप्फयन्त-मुणिहें। सुरभवणुच्छलिय-दिव्व-झुणिहें ॥१॥
पणवेप्पिणु सीयल-पुङ्गमहाँ। कल्लाण-झाण-णाणुग्गमहों ॥१०॥
पणवेप्पिणु सेयं साहिवहों। अच्चन्त-महन्त-पत्त-सिवहाँ ॥११॥
पणवेप्पिणु वासुपुज-मुणिहें। विप्फुरिय-णाण-चूडामणिहें ॥१२॥
पणवेप्पिणु विमल-महारिसिहें। संदरिसिय-परमागम-दिसिहें ॥१३॥
पणवेप्पिणु मङ्गलगाराहों। साणन्तहों धम्म-मडाराहों ॥१४॥
पणवेप्पिणु सन्ति-कुन्थु-अरह। तिणि मि तिहुमण-परमेसरहँ ॥१५॥

.. पहली सन्धि त्रिभुवनके लिए आधार-स्तम्भ परमेष्ठी गुरुको नमन कर तथा शास्त्रोंका अवगाहन कर कविके द्वारा रामकथा प्रारम्भ की जाती है। [१] संसाररूपी समुद्रसे तारनेवाले आदि भट्टारक ऋषभ जिनको प्रणाम करता हूँ। दुर्जेय कामका दर्प हरनेवाले अजित जिनेश्वरको प्रणाम करता हूँ। त्रिलोकके शिखरपर स्थित मोक्ष- पुर जानेवाले सम्भव स्वामीको प्रणाम करता हूँ। आठ कर्म- रूपी दुष्ट शत्रुओंको जीतनेवाले अभिनन्दन जिनको नमस्कार करता हूँ। महा कठिन पाँच महाव्रतोंको धारण करनेवाले सुमति तीर्थकरको प्रणाम करता हूँ। संसारके लाख-लाख दुःखोंके ऋणका शोधन करनेवाले पद्मप्रभु जिनको प्रणाम करता हूँ। सुरवरों में श्रेष्ठ, आदरणीय सुपार्श्वको प्रणाम करता हूँ। भन्यजनरूपी पक्षियोंके लिए कल्पतरुके समान चन्द्रप्रभु गुरुको प्रणाम करता हूँ। जिनकी ध्वनि स्वर्गलोकतक उछलकर जाती है, ऐसे पुष्पदन्त. मुनिको प्रणाम करता हूँ। कल्याण ध्यान और ज्ञानके उद्गम स्वरूप, श्रेष्ठ शीतलनाथको प्रणाम करता हूँ। अत्यन्त महान् मोक्ष प्राप्त करनेवाले श्रेयान्साधिपको प्रणाम करता हूँ। जिनका केवलज्ञानरूपी चूड़ामणि चमक रहा है ऐसे वासुपूज्य मुनिको प्रणाम करता हूँ। परमागमोंका दिशाबोध देनेवाले विमल महाऋपिको प्रणाम करता हूँ। कल्याणके आगार अनन्तनाथ सहित आदरणीय धर्मनाथको प्रणाम करता हूँ। शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ और अरहनाथको प्रणाम करता हूँ जो तीनों ही तीनों लोकोंके परमेश्वर हैं।

६
पउमचरित
पणवेवि मल्लि-तित्थङ्करहो।। तइलोक्क-महारिसि-कुलहरहों ॥१६॥
पणवेप्पिणु मुणिसुब्वय-जिणहों। देवासुर-दिण्ण-पयाहिणहों ॥१७॥
पणवेप्पिणु णमिणेमीसरह। पुणु पास-वीर-तित्थङ्करहँ ॥१०॥
-
घत्ता
इय चउबीस वि परम-जिण पणवेप्पिणु मा
पुणु अप्पाणउ पायडमि
रामायण-कावें ॥१९॥
[२]
वद्धमाण-मुह-कुहर-विणिग्गय ।
भक्खर-बास-जलोहमणोहर।
दीह-समास-पवाहावकिय ।
देसीभासा-उभय-तडजल ।
भस्थ-बहल-कल्लोलाणिहिय ।
एह रामकह-सरि सोहन्ती।
पच्छह इन्द्रभूह-आयरिएं।
पुणु पहर्वे संसाराराएं।
पुणु रविसेणायरिय-पसाएं।
पउमिणि-जणणि-गन्म-संभूएँ।
अइ-तणुएण पईहर-गा।
रामकहा-णइ एह कमागय ॥१॥
सु-अलङ्कार-छन्द-मच्छोहर ॥२॥
सक्कय-पायय-पुलिणालतिय ॥३॥
क वि दुक्कर-घण-सह-सिलायक ॥४॥
आसासय-समतूह-परिट्रिय ॥५॥
गणहर-देवहिं दिट वहन्ती ॥६॥
पुणु धम्मेण गुणालङ्करिएं ॥७॥
कित्तिहरेण अणुत्तरवाएं ॥८॥
बुद्धिएँ भवगाहिय कइराएं ॥९॥
मारुयएव-रुव-अणुराए ॥१०॥
छिन्वर-णासें पविरल-दन्ते ॥११॥
घत्ता
णिम्मल-पुण्ण-पवित्त-कह-
जेण समाणिजन्तऍण
कित्तणु माढप्पह।
थिर कित्ति विढप्पह ॥१२॥

पदमी संधि
त्रिलोक महाऋषियोंके कुलको धारण करनेवाले मल्लि तीर्थकर
को प्रणाम करता हूँ। देव और असुर जिनकी प्रदक्षिणा देते
हैं ऐसे मुनिसुव्रतको मैं प्रणाम करता हूँ। नमि और नेमि,
तथा पार्श्व और महावीर तीर्थकरोंको मैं प्रणाम करतः
हूँ ॥१-१८॥
घत्ता-इस प्रकार चौबीस परम जिन तीर्थकरोंकी भाव-
पूर्वक वन्दना कर मैं स्वयंको रामायण कान्यके द्वारा प्रगट
करता हूँ॥१९॥
[२] वर्धमान (तीर्थ कर महावीर ) के मुखरूपी पर्वतसे
निकलकर, यह रामकथारूपी नदी क्रमसे चली आ रही है,
जो अक्षरोंके विस्तारके जलसमूहसे सुन्दर है, जो सुन्दर
अलंकार और छन्दरूपी मत्स्योंको धारण करती है, जो दीर्घ
समासोंके प्रवाहसे कुटिल है, जो संस्कृतप्राकृत रूपी किनारोंसे
अंकित है, जिसके दोनों तट देशीभाषासे उज्ज्वल हैं, कहीं-कहीं
कठोर और धन शब्दोंकी चट्टानें हैं, अर्थोकी प्रचुर तरंगोंसे
निस्सीम है, और जो आश्वासकों (सगों) रूपी तीर्थोसे
प्रतिष्ठित है। शोभित रामकथा रूपी इस नदीको गणधर देवोंने
बहते हुए देखा। बादमें आचार्य इन्द्रभूतिने, फिर गुणोंसे
विभूषित धर्माचार्य ने । फिर, संसारसे विरक्त प्रभवाचार्य ने।
फिर अनुत्तरवाग्मी कीर्तिधर ने। तदनन्तर आचार्य रविषेणके
प्रसादसे कविराजने इसका अपनी बुद्धिसे अवगाहन किया।
स्वयम्भू माँ पद्मिनीके गर्भसे जन्मा। पिता मारुतदेवके रूपके
लिए उसके मनमें अत्यन्त अनुराग था। अत्यन्त दुबला, लम्बा
शरीर, चिपटी नाक, और दूर-दूर दाँत ॥१-११।।
धत्ता-निर्मल और पुण्यसे पवित्र कथाका कीर्तन किया
जाता है जिसको समाप्त करनेसे स्थिर कीर्ति प्राप्त होती
है ॥१२॥

पउमचरित
[३]
वुहयण सयम्भु पइँ विण्णवइ। मई मरिसउ अण्णु णाहिं कुकइ ॥१॥
वायरणु कयाविण जाणियउ।
णउ वित्ति-सुत्तु वक्साणियउ ॥२॥
णउ पञ्चाहारहो तत्ति किय । उ संधिहें उपरि बुद्धि थिय ॥३॥
णउ णिसुभट सत्त विहत्तियउ। छविहउ समास-पउत्तियउ ॥४॥
छवारय दस लयार ण सुय ।
वोसोवसग्ग पच्चय पहुय ॥५||
ण बलावल धाउ णिवाय-गणु । णउ लिनु उणाइ चक्कु वयणु ॥६॥
ण णिसुणिउ पञ्च-महाय-कन्छ । णउ भरहु गेउ लक्पणु वि सन्चु ॥७॥
णउ बुझिउ पिङ्गल-पत्यार । उ मम्मह-दण्डि-अलझारु ॥
ववसाउ तो वि णउ परिहरमि। वरि रढाबद्ध कन्वु कामि ||९||
सामण्ण मास छुद्ध सावदउ । छुडुआगम-जुत्ति का वि घढउ ॥१०॥
छुड होन्तु सुहासिय-वयणाई। गामिल्ल-मास-परिहरणाई ॥११॥
हुँ सज्जण-लोयहाँ क्उि विणउ। जं अवुहु पंदरिसिउ अप्पणउ ॥१२॥
जइ एम विरूसइ को वि खलु । तहों हत्थुत्यल्लिउ लेउ छलु ॥१३॥
घत्ता
पिसुणे किं अभत्थिऍण
किं छण-चन्दु महागहेंग
जसु को वि ण रुच्चइ।
कम्पन्तु वि मुच्चइ ॥१४॥
[४]
भवहत्यवि खायणु गिरवसु। पहिलउ णिरु वण्णमि मगहदेसु ॥१॥
जाहिं पाक-कलमें कमलिणि णिसण्ण । मलहन्त तरणि थेर व विसण्ण ॥२॥
जहिं सुय-पन्तिउ सुपरिट्टियाउ । णं वसिरिस्मरगय-कण्ठियाउ ॥३॥
जहिं उच्छु-वणई पवणाहयाई। कम्पन्ति व पोलण-भय-गया ॥४॥
जहिं णन्दणवण मणोहराहूँ। णच्चन्ति व चल-पल्लव-कराई ॥५॥

पढमो संधि [३] बुधजनो, यह स्वयम्भू कवि आपलोगोंसे निवेदन करता है कि मेरे समान दूसरा कोई कुकवि नहीं है । कभी भी मैंने व्याकरणको न जाना, न ही वृत्तियों और सूत्रोंकी व्याख्या की। प्रत्याहारोंमें भी मैंने सन्तोष प्राप्त नहीं किया । संधियोंके ऊपर मेरी बुद्धि स्थिर नहीं। सात विभक्तियाँ भी नहीं सुनी, और न छह प्रकारको समास-प्रवृत्तियाँ ही। छह कारक और दस लकार नहीं सुने । बीस उपसर्ग और बहुत-से प्रत्यय भी नहीं सुने। बलावल धातु और निपातगण, लिंग, उणादि वाक्य और वचन भी नहीं सुने । पाँच महाकाव्य नहीं सुने, और न भरतका सब लक्षणोंसे युक्त गेय सुना । पिंगल शास्त्रके प्रस्तारको नहीं समझा। और न दंडी और भामहके अलंकार भी। तो भी मैं अपना व्यवसाय नहीं छोड़ेगा, बल्कि रडावद्ध शैलीमें काव्य रचना करता हूँ। संप्राप्त सामान्य भाषामें कोई आगम युक्तिको गढ़ता हूँ। ग्राम्य भाषाके प्रयोगोंसे रहित मेरी भाषा सुभाषित हो। मैंने यह विनय सज्जन लोगोंसे ही की है और अपना अज्ञान प्रदर्शित किया है। यदि इतनेपर भी कोई दुष्ट रूठता है तो उसके छलको मैं हाथ उठाकर लेता हूँ ॥१-१३।। पत्ता--उस दुष्टको अभ्यर्थनासे भी क्या लाभ, जिसे कोई भी अच्छा नहीं लगता? क्या काँपता हुआ पूर्णिमाका चन्द्रमा महाग्रहणसे बच पाता है ? ॥१४.। [४] समस्त खलजनोंकी उपेक्षाकर, पहले मैं मगध देशका वर्णन करता हूँ। जहाँ कमलिनी पके हुए धान्यमें ऐसी स्थित है, जो मानो सूर्यको नहीं पा सकनेके कारण वृद्धाकी तरह उदासीन है ? जहाँ बैठी हुई तोतोंकी पंक्ति ऐसी लगती है मानो वनलक्ष्मीका पन्नोंका कण्ठा हो । जहाँ हवासे हिलते हुए इंखों के खेत ऐसे लगते हैं जैसे पेरे जानेके डरसे कॉप रहे हों। जहाँ सुन्दर नन्दन वन, अपने चञ्चल पल्लव रूपी हासे ऐसे

पठमचरिठ
जहिं फाढिम-वयण दाठिमाई। णज्जन्ति ताई णं का-मुहाई ॥६॥
जहि-महुयर-पन्तिउ सुन्दराउ । केयइ-केसर-स्य-धूसराउ ७॥
जहिं दक्खा-मण्डव परियलन्ति । पुणु पन्थियरस-सलिलई पियन्ति॥८॥
घत्ता
तहिं तं पट्टणु रायगिहु धण-कणय-समिद्ध।
गं पिहिविएँ णव-जोवणएँ सिरे सेहरु आइदउ ॥९॥
[५]
चउ-गोउर-चउ-पायारवन्तु । हसइदमुत्ताहल-धवल दन्तु ॥११॥
णच व मरुधुय-धय-करग्गु । धरह व णिवढन्तठ गयण-मगा ॥२॥
सूलग्ग-मिण्ण-देवउल-सिहरु । कणइ व पारावय-सद-गहिरु ॥२॥
घुम्मइ व गऍहि मय-मिम्मलेहिं । उह व तुरनहिं चञ्चलेहिं ॥४॥
पहाइ व ससिकन्त-जलोहरेहिं ।
पणवइ व हार-मेहल-भरेहिं ॥५॥
पक्खलइ व णेउर-णियलएहिं । विप्फुरद व कुण्डल-जुयलएहि ॥६॥
किलिकिलइ व सब्वजणुच्छवेण । गज्जद व मुख-मेरी-रवेण ॥७॥
गायइ बालाविणि-मुच्छणेहिं । पुरवइ व पण्ण-धण-
कणेहिं ॥८॥
घत्ता
णिवडिय-पणे हिं फोस्फलें हिं छुह-चुण्णासकें।
जण-चलणग्ग-विमदिऍण
महि रङ्गिय रहें ॥५॥

पदमो संधि ११ लगते हैं मानो नाच रहे हों। जहाँ खुले हुए मुखोंके दाडिम ऐसे लगते हैं जैसे वानरोंके मुख हों। जहाँ केतकीके पराग-रजसे धूसरित मधुकरोंकी पंक्तियाँ सुन्दर जान पड़ती हैं। जहाँ द्राक्षाओंके मण्डप झरते रहते हैं, पथिक जिनसे रसरूपी जलका पान करते हैं ॥१-८॥ पत्ता-उसमें धन और सोनेसे समृद्ध राजगृह नामका नगर है, जो ऐसा लगता है जैसे नवयौवना पृथ्वीके शिरपर चूड़ामणि बाँध दिया गया हो ॥९॥ [५] चार गोपुर और चार परकोटोंसे युक्त तथा मोतियोंके सफेद दाँतोंवाला वह नगर ऐसा जान पड़ता है जैसे हँस रहा हो। हवामें उड़ती हुई ध्वजारूपी हथेलियोंसे ऐसा लगता है जैसे नाच रहा है, गिरते हुए आकाशमार्गको जैसे धारण कर रहा हो ? जिनके शिखरों में त्रिशूल लगे हुए हैं, ऐसे मन्दिरों तथा कबूतरोंके शब्दोंसे गम्भीर जो ऐसा लगता है जैसे कल-कल कर रहा हो! मदविह्वल हाथियोंसे ऐसा लगता है जैसे धूम रहा हो, चंचल घोड़ोंसे ऐसा लगता है जैसे उड़ रहा हो, चन्द्रकान्त मणिकी जलधाराओंसे ऐसालगता है जैसे नहा रहा हो, हार और मेखलाओंसे परिपूर्ण ऐसा लगता है जैसे प्रणाम कर रहा हो, नूपुरकी शृंखलाओंसे ऐसा लगता है जैसे स्खलित हो रहा हो, कुंडलोंके जोड़ोंसे ऐसा लगता है जैसे चमक रहा हो । सार्वजनिक उत्सवोंसे ऐसा लगता है कि जैसे किलकारियाँ भर रहा हो, मृदंग और भेरीके शब्दोंसे ऐसा लगता है जैसे गर्जन कर रहा हो, बाल वीणाओंकी मूर्च्छनाओंसे ऐसा लगता है जैसे गा रहा है, धान्य और धनसे ऐसा लगता है जैसे 'नगर प्रमुख हो॥१-८॥ पत्ता-गिरे हुए पानके पत्तों, सुपाड़ियों तथा लोगोंके पैरोंके अग्रभागसे कुचले गये चूनेके समूहसे उसकी धरती लाल - पठमचरिट [६] वहिं सेणिउ णा गय-णिवासु। उवमिजइ गरवइ कवणु तासु ॥१॥ किं तिणयणु णं णं विसम-चक्षु । किं ससहरु णं णं एक-पक्खु ॥२॥ किं दिणयह णं णं दहण-सोलु । कि हरि णं णं कम-मुअण-लीलु ॥३॥ किं कुक्षरु णं णं णिच्च-मत्तु । किं गिरि णं णं ववसाय-चत्तु ॥४॥ किं सायरु णं णंखार-णीर। कि वम्म णं णं हय-परीरु ॥ किं फणिवइ णं णं कूर-माउ । किं मारउणणं चल-सहाउ॥६॥ किं महमहु णं णं कुडिल-बक्कु । किं सुरवइ णं गं सहस-अक्तु ॥७॥ भणुहरइ पुणु वि जइ सो ब्जे तातु। वामधु व दाहिण-भद्ध जासु ॥८॥ घत्ता ताव सुरासुर-वाहणे हिं वीर-जिणिन्दहाँ समसरणु गयणगण छाइट। विउलइरि पराइड ॥९॥ [७] परमेसरु पच्छिम-जिगवरिन्दु । चलणग्गे चालिय-महिहरिन्दु ॥१॥ णाणुज्जलु उ-कल्लाण-पिण्ड । चउ-कम्म-दहणु कलि-काल-दण्ड चडतोसातिसय-विसुद्धनातु । भुवणत्तय-वल्लहु धवल-छत्तु ॥३॥ पण्णारह-कमलायत्त-पाउ। अल्लल्ल-फुल्ल-मण्डव-सहाउ ॥१॥ चउसट्टि-चामरुधुलमाणु चउ-सुरणिकाय-संधुन्चमाणु ॥५॥ थित विउल-महीहर वद्धमाणु । समसरणु वि जसु जोयण-पमाणु ॥६

पठमो संधि
रंगसे रंग गयी ||२||
[६] उसमें नीतिका आश्रयभूत राजा श्रेणिक शोभित है।
कौन-सा राजा है कि जिसकी उससे तुलना की जाये। क्या
बिनयन ( शिव ) की ? नहीं नहीं, वह विषमनेन हैं। क्या
चन्द्रमा की ? नहीं नहीं, उसका एक पक्ष है । क्या दिनकर की ?
नहीं नहीं, वह दहनशील है। क्या सिंहकी ? नहीं नहीं, वह
कम (परम्परा) को तोड़कर चलता है। क्या हाधी की ? नहीं
नहीं, वह हमेशा मत्त रहता है। क्या पहाड़की ? नहीं नहीं, वह
व्यवमायसे शून्य है ? क्या समुद्र की ? नहीं नहीं, वह खारेपानी-
वाला है। क्या कामदेव को ? नहीं नहीं, उसका शरीर जल
चुका है। क्या नागराज की ? नहीं नहीं, वह क्रूर-स्वभाववाला
71 क्या कृष्णकी? नहीं नहीं, उनके वचन कुटिल हैं। क्या इन्द्र
की नही ना, उमकी एजार ऑग्में हैं। उससे वही समानता
कर सकता है जिसका आधा दाहिना भाग, उनके पायें आधे
भाग नमान12-८॥
पता-ननेमे आकागरूपी आंगन, सुर और असुरों के
पानानेछा गया। तीर्थकर जिनेन्न महावीरका ममवशरण
विलागिरि (विपुलारल) पर पहुंचा ||२||
[] जिनोने अपने पर अमभागसे पर्वतराज सुमेरको
माजी शानने ज्वल और नार फ्ल्यागासे
नानपारमानिया कौरा नाम कर दिया है,
STREER,जिनागर जीनामनिसायास
Fariगांनी मुयोग लिए दिया है. जिन पर धवन
Prima पर विन्नारपर मिल गला.
": नामानि ति की जानी
Par शिर गर्दनान विपुनानलपर वार
जन प्रमागधा! मनन
! ".का

१४
परमपत्ति
पापार विणि घउ गोउराई। वारह गण वारह मन्दिराई ॥n
उग्मिय चड माणव-धम्म जाम। तुरमाणे केण वि गरेण ताम ॥८॥
घचा
चलण णवेणुि विगविउ सेणिड महरामो ।
जंझायहि समाहि सो जग-गुरु आलो ॥९॥
॥२॥
[0]
जग-वयणई कण्णुप्पलिकरेवि। सिंहासण-सिहरहाँ ओयरेवि ॥१॥
गउ पयहँ सत्त रोमन्चियगु।
पुणु महियलें णाविठ
उत्तमगु
देवाविय लहु माणन्द-मेरि । यरहरिय वसुन्धरि जग-जणेरि ॥शा
स-कलत्तु स-पुत्तु स-पिण्डवासु। स-परियणु स-साहणु सट्टहासु ॥४॥
गउ वन्दण-हत्तिएँ जिणवरासु । भासणीहूउ महीहरासु ॥५॥
समसरणु दिदु हरिसिय-मणेण । परिवेदिउ वारह-विहाणेण ॥६॥
पहिलए कोट्टएँ रिसि-संधु दिट्ट । वीयएँ कप्पङ्गण-जणु णिविठ्ठ ॥७॥
तइयएँ अजियनगणु साणुराज । चव्यएँ जोइस-वर-अच्राउ un
पञ्चमें विन्तरिट सुहासिणीत।
छट्टएँ पुणु-भवण-णिवासिणीउ ॥९॥
सत्तम भावण शिवाण साव । भट्टमें विन्तर संसुद्ध-माव ॥१०॥
णवमएँ जोइस णमिउत्चमङ्ग। दहमए कप्पामर पुलइयङ्ग ॥११॥
एयारहमए गरवर णिविट्ट। वारहमए तिरिय णमन्त दिट्ठ ॥१२॥
घत्ता
दिछु मदारउ वीर-जिण सिंहासण-संठिछ।
विहवन-मत्यएँ सुह-णिलए णं मोक्ख परिहिट ॥१॥

पढमो संधि
१५
परकोटे और गोपुर थे । उसमें बारह गण और बारह ही कोठे
थे। जैसे ही चार मानस्तम्भ बनकर तैयार हुए वैसे ही किसी
आदमीने शीघ्र ही ॥१-८॥
घत्ता-चरणोंमें प्रणाम कर, राजा श्रेणिकसे निवेदन
किया-"तुम जिसका ध्यान और स्मरण करते हो, वह जगत्
गुरु आये है ॥९॥
[८] जनके वचनोंको अपने कानोंका कमल बनाकर
(सुनकर या अलंकार बनाकर ) राजा सिंहासनसे उतर पड़ा।
पुलकित अंग होकर और सात पैर आगे जाकर, उसने धरतीपर
अपना शिर नवाया। फिर उसने आनन्दकी भेरी बजवा दी, जग-
को उत्पन्न करनेवाली धरती उससे हिल गयी। राजा अपने परि-
वार, पुत्र, अन्तःपुर, परिजन और सेनाके साथ सहर्ष जिनवर-
की वन्दना भक्तिके लिए गया। वह महीधरके निकट पहुंचा।
उसने हर्पित मन होकर बारह प्रकारके गणोंसे घिरा हुआ
समवशरण देखा। पहले कोठेमें उसने ऋषिसंघको देखा।
दूसरेमें कल्पवासी देवोंकी देवांगनाएँ बैठी हुई थीं, तीसरेमें
अनुरागपूर्वक आर्यिकाएँ थीं, चौथेमें ज्योतिष देवोंकी देवांगनाएँ
थीं, पाँचमें 'शुभ बोलनेवाली' व्यन्तर देवोंकी देवांगनाएँ थीं,
उठेमे भवनवासी देवांगनाएँ थी, सातवेमें समस्त भवनवासी
देव और आठवमें श्रद्धाभाववाले व्यन्तरवासी देव थे। नौवेमें
अपना शिर झुकाये हुए ज्योतिप देव बैठे थे। और दसवेमें
पुलकितांग कल्पवासी देव थे । ग्यारहवें में श्रेष्ठ नर बैठे थे और
पारहवे में नमन करती हुई खियाँ ? ॥१-१२॥
पत्ता-सिंहासनपर विराजमान आदरणीय वीर जिन ऐसे
दियाई दिये जैसे त्रिभुवनके मस्तकपर स्थित शिवपुरमें मोक्ष
ही परिस्थित हो॥१॥

पठमचरित
[९]
सिर-सिहरे चडाविय-करयलग्गु । मगहाहिउ पुणु वन्दणहं लग्गु ॥१॥
'जय णाह सम्व-देवाहिदेव । किय-णाग-णरिन्द-सुरिन्द-सेव ॥२॥
जय विहुवण-सामिय-तिविह छत्त । अट्टविह-परम-गुण-रिद्धि-पत्त ॥३॥
जय केवल-णाणुभिण्ण-देह । वम्मह-णिम्महण पण?-णेह ॥४॥
जय जाइ-जरा-मरणारि-छेय । वत्तीस-सुरिन्द-कियाहिसेय ॥५॥
जय परम परम्पर वीयराय । सुस्मउड-कोडि-मणि-चिट्ठ-पाय ।।६।।
जय सम्व-जीन-कारुण्ण-भाव । भक्खय भणन्त णहयल-सहाव' ॥७॥
पणवेप्पिणु जिणु तग्गय-मणेण । कुणु पुच्छिउ गौत्तमसामि तेण ॥८॥
घत्ता
'परमेसर पर-सासणेहि
सुन्वइ विवरेरी।
कहें जिण-सासणें केम थिय कह राहव-केरी ॥९॥
[१०]
जगें लोएँ हि ढक्करिवन्तएहि । उप्पाइउ मंतिउ मन्तएहि ॥१॥
जह कुम्में धरियउ धरणि-वीद् । तो कुम्मु पडन्तउ केण गीदु ॥२॥
जइ रामहाँ तिहुअणु उवरें माइ। तो रावणु कहिँ तिय लेवि जाइ ॥३॥
अण्णु वि खरदूसण-समरें देव ।
पहु जुज्झइ सुज्झइ भिच्चु कैच ॥४॥
किह तियमइ-कारण कविवरण । वाइजह वालि सहोयरेण ॥५॥
किह वाणर गिरिवर उन्वहन्ति । वन्धेवि मयरहरु समुत्तरन्ति ॥६॥

पदमो संधि - [९] मगधराज अपने दोनों हाथ सिररूपी शिखरपर वढाकर (सिरके ऊपर रखकर ) फिर वन्दना करने लगा,- "नाग, नरेन्द्र और सुरेन्द्रने जिनकी सेवा की है, ऐसे सब देवोंके अधिदेव नाथ, आपकी जय हो। आठ प्रकारके परम गुण और ऋद्धिको प्राप्त करनेवाले, तथा जो त्रिभुवनके स्वामी हैं और जिनके पास तीन प्रकारके छत्र हैं, ऐसे आपकी जय हो । काम- को नष्ट करनेवाले नष्टनेह, जिनका शरीर केवलज्ञानसे परिपूर्ण है, ऐसे आपकी जय हो । वत्तीस प्रकारके सुरेन्द्रोंने जिनका अभिषेक किया है, जन्म-जरा और मरणरूपी शत्रुओंका जन्होंने अन्त कर दिया है, ऐसे आपकी जय हो। देवताओके मुकुटोंके करोड़ों मणियोंसे जिनके चरण धर्पित हैं, ऐसे परमश्रेष्ठ वीतराग आपकी जय हो। आकाशकी तरह स्वभाव- वाले, अक्षय, अनन्त, तथा सब जीवोंके प्रति करुणाभाव रखनेवाले आपकी जय हो।" इस प्रकार तल्लीन मन होकर तथा जिन भगवान्को प्रणाम कर, राजा श्रेणिकने गीतमगणधरसे पृहा ।।१-८॥ पत्ता-हे परमेश्वर, दूसरे मतोंमें रामकी कथा उलटी सुनी जाती है, जिनशासनमें वह किस प्रकार है. बताइए ? ||२|| [१०] दुनिया में चमत्कारवाही और भ्रान्त लोगोंने भ्रान्ति त्पन्न कर रखी है । यदि धरतीकी पीठ कछुएने उठा रक्खी है. मां निरते हुए कछुएको फोन उठाये है ? यदि रामके पेटमें मिनुवन समा जाता तो रावण उनकी पत्नीका अपहरण कर Vा जाना है ? और भी है देव. घर-दूपणके युद्ध में यदि स्वामी ला. तो उसने अनुचर में शुद्ध होता है ? नगे भाई मायने नीति अपने भाई चालीको किन प्रकार नारा? पार पाडला नक्तेद, ममुद्रको वारकर पार पर मी : गा गवण यमगुव और बील हायांवाला था ,

१८
पउमचरित
किह रावणु दह-मुहु बीस-हत्थु । अमराहिव-भुव-वन्धण-समत्थु ॥७॥
वरिसद सुअइ किह कुम्भयण्णु । महिसा-कोडिहि मि ण धाइ अण्णु॥८
घत्ता
पर-णारीहिँ समणु ।
सो मन्दोवरि जणणि-सम्र किह लेइ विहीसणु' ॥९॥
जे परिससिउ दहवयणु
[१]
तं णिसुणे वि युच्चइ गणहरेण । सुणे सेणिय कि बहु-वित्थरेग ॥१॥
पहिलर आयासु अणन्तु साउ । णिरवेक्नु णिरक्षणु पळय-भाउ ॥२॥
तइलोक्कु परिट्टिउ मज्झ तासु । चउदह रज्जुय आयामु जासु ॥३॥
तेत्थु वि झल्लरि-मझाणुमाणु ।
घिउ तिरिय-लोउ रज्जुय-पमाणु ॥४॥
तहि जम्बूदीउ महा-पहाणु ।
वित्थरण
लक्खु जोयण-पमाणु ॥५॥
चउ-खेत्त-चउद्दह-सरि-णिवासु । छबिह-कुलपन्वय-उड-पयासु ॥६॥
तासु वि अम्मन्नर कणय-संलु । णवणवइ-उव सहसेक-मूलु ॥७॥
तहाँ दाहिण-भाएं भरहु थक्कु । छक्खण्डालविउ एक-चक्कु ॥८॥
घत्ता
कप्पयरुच्छपणा।
तहिं ओपप्पिणि-काले गएँ
चउदह-रयणविसेस जिह
कुलयर-उप्पण्णा ॥९॥
[१२]
पहिलड पहु पडिसुइ सुयवन्तउ । वीयउ सम्मइ सम्मइवन्तउ ॥१॥
तइयउ खेमकर खेमकरु। चउथउ खेमन्धरु रणे दुद्धरु ।।२।।
पञ्चमु सीमङ्करु दोहर-कर।
छ?उ सीमन्धर धरणीधर ॥३॥
सत्तमु चारु-चक्खु चक्खुम्भउ । तासु कालें उप्पज्जइ विम्मउ ॥४॥
सहसा चन्द-दिवायर-दसणे।
सयलु वि जणु आसङ्कित णिय-मणें ॥५
'अहाँ परमेसर कुलयर-सारा ।
कोउहल्लु महु एउ भडारा' ॥६॥

पढमो संधि क्या वह इन्द्रके हाथोंको बाँधनेमें समर्थ था? क्या कुम्भकर्ण आधे वर्ष सोता था, और करोड़ भैसोंका भी अन्न उसे नहीं होता था ?॥१-८॥ घत्ता-जिसने रावणको समाप्त करवाया, परस्त्रियों के प्रति जिसका मन अच्छा था, वह विभीषण मॉ के समान मन्दोदरीको किस प्रकार पत्नीके रूपमें ग्रहण करता है ? ॥९॥ [११] यह सुनकर गणधर बोले, "बहुत विस्तारसे क्या, हे श्रेणिक सुनो, पहला समूचा अनन्त अलोकाकाश है जो निरपेक्ष निराकार और शून्य है, उसके मध्यमें त्रिलोक स्थित है, जिसका आयाम चौदह राजू प्रमाण है ? उसमें भी डमरूके मध्य आकारके समान और एक राजू प्रमाण तिर्यक् लोक है। उसमें, एकलाख योजन विस्तारवाला महा प्रमुख जम्बूद्वीप है। जिसमें चार क्षेत्र और चौदह नदिया है। जो छह प्रकारके कुलपर्वतोंके तटोंसे प्रकाशित है। उसके भी भीतर सुमेरु पर्वत है, जो एक हजार योजन गहरा, और निन्यानवे हजार योजन ऊँचा है। उसके दक्षिणभागमें भरत क्षेत्र स्थित है, छह खण्डोंसे विभूपित उसका एक चक्रवर्ती राजा है ॥१-८॥ घत्ता-उसमें अवसर्पिणी कालके वीतनेपर, कल्पतरु उच्छिन्न हो गये और चौदह विशेष रत्नोंके समान चौदह कुलकर उत्पन्न हुए ॥९॥ [१२] पहला श्रुतिवन्त प्रतिश्रुत राजा, दूसरा सन्मतिवान् सन्मति, तीसरा कल्याण करनेवाला क्षेसंकर, चौथा रणमें दुर्धर क्षेमन्धर, पाँचवाँ विशालवाहु सीमंकर, छठा धरणीधर सीमन्धर, सातवाँ चारुनयन चक्षुष्मान् । उसके समयमें एक विस्मयकी वात हुई। सहसा सूर्य और चन्द्रमाके दिखनेसे सभी लोग अपने मनमें आशंकित हो उठे, ( उन्होंने कहा), "हे कुलकर श्रेष्ठ परमेश्वर भट्टारक ! हमें कुतूहल हो रहा है।"

२०
पउमचरित
तं णिसुणेवि णराहिउ घोसइ ।
पुज्व-विदेहें तिलोभाणन्दें।
कम्म-भूमि लइ एवहि होसइ ॥७॥
कहिउ आसि महु परम-जिणिन्हें ॥
घत्ता
तारायण-पुप्फहाँ।
अवसप्पिणि-रुक्खहाँ ॥९॥
णव-सम्झारुण-पल्लवहाँ
आयई चन्द-सूर-फलई
[१३]
पुणु जाउ जसुम्मउ अतुल-था। पुणु विमलवाहणुच्छलिय-णामु ॥१॥
पुणु साहिचन्दु चन्दाहि जाउ । मरुएउ पसेणइ णाहिराउ ॥२॥
तहाँ णाहिहें पच्छिम-कुलयरासु । मरुएवि सई व पुरन्दरासु ॥३॥
चन्दहाँ रोहिणि व मणोहिराम । कन्दप्पहो रह व पमण्ण-णाम ॥७॥
सा गिरलंकार जि चारु-गत्त । आहरण-रिदि पर मार-मेत्त ॥५॥
तह णिय-लायण्णु जै दिण्ण-सोहु । मलु केबलु पर कुंकुम-रसोहु ॥६॥
पासेय-फुलिङ्गावलि जें चारु । पर गत्यउ मोत्तिय-हारु भारु ॥७॥
लोयण जि सहावें दल-विसाल । आडम्बर पर कन्दोह-माल ||
घत्ता
कमलासाएँ ममन्तऍण अलि-वलएं मन्दें।
मुहलीहयउ कम-जुयलु
किं णेउर-सः ॥९॥
[१४]
तो एत्यन्तर माणव-वेसें। आइड देविड इन्दाएसें ॥३॥
ससि-वयणिउ कन्दो-दलचित। कित्ति-बुद्धि-सिरि-हिरि-दिहि-लच्छिउ
सप्परिवारउ दुकाउ तेत्तहैं। सा मरुएवि मडारो जेत्तहं ॥३॥
का त्रि विणोउ कि पि उप्पायह। पदइ पणच गायइ वायइ ॥४॥

पढमो संधि २१ यह सुनकर राजाने घोषणा की कि लो अब कर्मभूमि आरम्भ होगी। पूर्व विदेहमें त्रिलोकके लिए आनन्द स्वरूप परम जिनेन्द्रने यह बात मुझसे कही थी॥१-८॥ घत्ता-जिसके नवसन्ध्या अरुण पत्ते हैं, और तारागण पुष्प हैं, ऐसे इस अवसर्पिणी कालरूपी वृक्षके ये सूर्य और चन्द्र, फल हैं ? ॥९॥ [१३ ] फिर अतुल शक्तिवाले यशस्वी हुए। फिर प्रसिद्ध नाम विमलवाहन, फिर अभिचन्द्र और चन्द्राम हुए। तदनन्तर मरुदेव, प्रसेनजित् और नाभिराज हुए। उन अन्तिम कुलकर नाभिराजकी मरुदेवी वैसी ही पत्नी थी, जिस प्रकार इन्द्रकी इन्द्राणी। वह चन्द्रमाकी रोहिणीकी तरह सुन्दर और कामदेवकी रतिकी भॉति प्रसन्ननाम थी। वह बिना अलंकारोंके ही सुन्दर शरीर थी, आभरणोंका वैभव उसके लिए केवल भारस्वरूप था, उसका अपना लावण्य था जो उसे इतनी शोभा देता था कि केशरका.रस लेप ( रसोह>रसोघ>रसका समूह ) केवल मैल था। प्रस्वेद (पसीना ) की चमकदार बंदोंकी पंक्तिसे वह इतनी सुन्दर थी कि भारी मुक्ताहार उसके लिए केवल भार स्वरूप था। उसके लोचन स्वाभाविक रूपसे विशालदलवाले थे, कमलोंकी माला, उसके लिए केवल आडम्बर थी॥१-८॥ पत्ता-कमलोंकी आशासे धीरे-धीरे चक्कर काट रहे भ्रमर- समूहसे उसके दोनों पैर रुनझुन करते थे, नूपुरोंकी ध्वनि उसके लिए किस काम की ? ॥९॥ [१४] कुछ दिनों बाद इन्द्र के आदेशसे देवियाँ मानव रूप धारण कर आयीं। चन्द्रमुखी और नीलकमल के दलकी भॉति आँखोंवाली वे थीं कीर्ति, बुद्धि,श्री, ह्री, धृति और लक्ष्मी। सपरि- वार वे वहाँ पहुची जहाँ वह आदरणीय मरुदेवी थी। कोई- एक विनोद करती है, कोई पढ़ती है, कोई नाचती है, कोई २२ पउमचरित का वि देइ तम्बोल स-हत्यें। सन्चाहरणु का वि सहुँ वत्थे ॥५॥ पाडइ का वि चमरु कम धोवइ । का वि समुजलु दप्पणु ढोवइ ॥६॥ उक्खय-खग्ग का वि परिरक्खइ। का वि किं पि अक्खाणउ अक्खइ १७ का वि जक्खकद्दमेण पसाहइ। का वि सरीरु ताहें संवाहइ ॥४॥ घत्ता वर-पलं पसुत्तियएँ सुविणावलि दिट्ठी। तीस पक्ख पहु-पड्नणएँ वसुहार वरिटी ॥९॥ [१५] दीसइ मयगल मय-गिल्ल-गण्ड। दीसइ वसहुक्खय-कमल-सण्ड ॥१॥ दीसइ पञ्चमुहु पईहरच्छि। दोसइ णव-कमलारुढ लच्छि ॥२॥ दीसइ गन्धुक्कड-कुसुम दामु । दीसइ छणचन्दु मणोहिरामु ॥३॥ दीसइ दिणयरु कर-पज्जलन्तु । दीसइ अस-जुयलु परिममन्तु ॥४॥ दीसइ जल-मङ्गल-कलसु वण्णु । दीसइ कमलायरु कमल-छण्णु ॥५|| दोसइ जलणिहि गज्जिय-जलोहु । दीस सिंहासणु दिग्ण-सोहु ॥६॥ दीसइ विमाणु घण्टालि-मुहलु। दीसइ णागालउ सव्वु धवलु ॥७॥ दीसइ मणि-णियरु परिप्फुरन्तु । दीसइ धूमदउ धगधगन्तु ॥८॥ धत्ता इय सुविणावलि सुन्दरिए मरुदेविए दीसइ । गम्पिणु णाहि-गराहिवहाँ सुविहाणएँ सीसइ ॥१॥ [१६] तेण वि विहलेविणु एम वृत्तु । 'तर होसइ तिहुअण-तिलउ पुत्तु ॥ जसु मेरुमहागिरि-ण्हवणवीदु । णह-मण्ड महिहर-खम्भ-गीढ ॥२॥ जसु मङ्गल कलस महा-समुह । मनणय कालें वत्तीस इन्द' ॥३॥ तहों दिवसही लग्गै वि अधु वरिसु । गिन्वाण परिसिय रयण-परिसु॥४ पढमो संधि गाती है, कोई बजाती है, कोई अपने हाथसे पान देती है, और कोई अपने हाथसे समस्त आभूपण । कोई चामर डुलाती है, कोई पैर धोती है, कोई उज्ज्वल दर्पण लाती है, कोई तलवार उठाये हुए रक्षा करती है, कोई कुछेक आख्यान कहती है; कोई सुगन्धित लेपसे प्रसाधन करती है, कोई उसके शरीरकी मालिश करती है ।।१-८॥ पत्ता-उत्तम पलंगमें सोते हुए (एक रात) उसने स्वप्नावलि देखी ! तीस पक्षोंतक (पन्द्रह माह) रत्नवृष्टि होती रही ! ॥९॥ [१५] वह देखती है-मदसे गीले गडस्थलबाला मत्तगज; देखती है-वृषभ, जिसने कमल समूह उखाड़ रखा है; देखती है-बड़ी-बड़ी आँखोंवाला सिंह; देखती है-नवकमलोंपर वैठी हुई लक्ष्मी; देखती है-उत्कट गन्धवाली पुष्पमाला; देखती है मनोहर पूर्णचन्द्र; देखती है-किरणोंसे प्रचण्ड दिनकर, देखती है-घूमता हुआ मीनोंका जोड़ा, देखती है, जलसे भरा हुआ मंगल-कलश, देखती है-कमलोंसे आच्छन्न सरोवर, देखती है-जलनिधि जिसका जलसमूह गरज रहा है। देखती है- शोभादायक सिंहासन । देखती है-घण्टियोंसे मुखरित विमान, देखती है-अत्यन्त धवल नागालय । देखती है-चमकता हुआ मणिसमूह, देखती है जलती हुई आग ॥१-८॥ घत्ता~यह स्वप्नावलि सुन्दरी मरुदेवीने देखी, और सवेरे जाकर उसने नाभिराजासे कहा ||९|| [१६] उसने भी हंसते हुए इस प्रकार कहा, 'तुम्हारे त्रिभुवन-विभूषण पुत्र होगा, जिसका स्नानपीठ मेरु महापर्वत होगा, पर्वतोंके खम्भोंपर अवलम्बित, आकाशरूपी मण्डप होगा, महासमुद्र जिसके मंगलकलश होंगे। और अभिषेकके समय वत्तीस प्रकारके इन्द्र आयेंगे। उस दिनसे लेकर आधे बरसतक देवोंने रत्नवृष्टि की । शीघ्र नाभिराजाके घरमें ज्ञानदेह

२४
पउसचरित
लहु णाहि-गरिन्टहाँ तणय गेहु । अबइण्णु मडारउ णाण-देहु ॥५॥
थिउ गन्मम्मिन्तरें जिणवरिन्दु। णव-णलिणि-पत्ते णं सलिश-विन्दु॥६
वसुहार परिमिय पुणु वि ताम । अण्णु वि अट्ठारह पक्ख जाम ||७||
जिण-सूरु समुहिट तेय-पिण्डु । वोहन्तु मध-जण-कमल-सण्डु ॥४॥
मोहन्धार-विणासयह
उइड मडारउ रिसह-जिणु
घत्ता
केवल-किरणाया।
स इभु वण-दिवायरु ॥९॥
इय एत्य पटमचरिए
'जिण जम्मुप्पत्ति' इस
धणञ्जयामिय-सयम्मुएव-कए।
पढम चिय साहियं पध्वं ॥१०॥

पढमो संधि
२५
आदरणीय ऋषभजिन अवतरित हुए। वह गर्भके भीतर ऐसे
स्थित हो गये, जैसे नव कमलिनीके पत्तेपर जलकी बूंद हो।
फिर भी, जबतक अठारह पक्ष नहीं हुए, तबतक रत्नोंकी वर्षा
होती रही। तेजस्वी शरीर जिनरूपी सूर्य, भव्यजन रूपी कमल-
समूहको बोधित करता हुआ उदित हो गया ॥१-८॥
घत्ता-आदरणीय ऋषभजिन उत्पन्न हुए जो मोहान्धकार-
का नाश करनेवाले, केवलज्ञानकी किरणोंके समूह स्वयं विश्वके
लिए दिवाकर थे ॥९॥
इस प्रकार यहाँ धनंजयके आश्रित स्वयम्भूदेव
द्वारा रचित, 'जिन जन्म-उत्पत्ति' नामक
पहला पर्व
पूरा हुआ ॥५॥

विईओ संधि जग-गुरु पुण्ण-पवित्तु तइलोकहाँ मनलगारठ। महसा णेवि मुरेहि मरहि अहिसित्तु भडारउ ॥१॥ [१] उप्पण्गएँ निहुअण-परमेमरें। अट्टोत्तर-महास-लक्सण-धरें ॥१॥ भावण-भवणे हि या पबजिय । णं णव-पाउसे णव वण गजिय ॥२॥ विन्तर-नयहि पटह-महामई टम-दिसिवह-णिग्गय-णिग्योसई ॥३ तोडम-नवणन्तर जि अहिहिय । मीसण-सीहणिणाय समुट्टिय ॥४॥ कापामर-मवहि जय-चण्ड । मई जि गरम-रसार-विमहउ ॥५॥ भाषण-कम्पु जाउ अमरिन्द्रहीं। जाणे विजम्मुप्पत्ति जिणिन्दहाँ ॥६॥ घटिर नुरन्नु मया अइरावए। कण्ण-चमर-उद्यानिय-छप्पए ॥७॥ मेलमि रिमपिणह-युग्म-स्यलें। मय-सरि-सोत्त-मित्तनाण्ट-स्थलें ॥८॥ मुगाइ दम-पय-णेतु विपिय-कोमल-यमलु रहद भारुढ गयवरें। कमलायर णाई महीहरें॥९॥ [२] अमर-गट मंछिउ जा। धण किउ करणमट नावे हि ॥१॥ पर घरमाउर-मंगट। महिपायांह ग्यिण्णा ॥२॥ टीगि-:-गिरा। मर-पोपपरिणि तला विडला बागम-मीमटाना यण-नारण अपमान मन मग पर यि । परियतिम निवार सामने पांग-रग मणि-मीमाः। पप-महाणि पदग्गेम ॥६॥ ।

दूसरी सन्धि विश्वगुरु पुण्यपवित्र त्रिभुवनका कल्याण करनेवाले भट्टारक ऋषभको देवता लोग शीघ्र मेरु पर्वतपर ले गये और वहाँ उनका अभिषेक किया। [१] एक हजार आठ लक्षणोंसे युक्त, त्रिभुवनके परमेश्वर ऋषभके जन्म लेनेपर भवनवासी देवोंके भवनोंमें शंख वज उठे, मानो नव वर्षाऋतुमें नवधन गरज उठे हों, व्यन्तर देवोंके भवनोंमें हजारों भेरियाँ बज उठी, जिनका निर्घोष दसों दिशा- पथोंमें गूंज रहा था। ज्योतिप देवोंके भवनोंमें भीषण सिंहनाद होने लगा, कल्पवासी देवोंके भवनों में भीषण ध्वनिसे युक्त सौ जयघण्ट वजने लगे। इन्द्रका आसन कॉपने लगा। जिनेन्द्रका जन्म जानकर इन्द्र शीघ्र ही ऐरावत महागजपर सवार हुआ, जो अपने कानरूपी चमरोंसे भ्रमरोंको उड़ा रहा था। मेरु पर्वतके शिखरके समान है कुंभस्थल जिसका तथा जो मदजल- की धाराओंसे सिक्त है ।।१-८॥ घत्ता-ऐसे महागजपर आरूढ़, सहस्रनयन इन्द्र इस प्रकार शोभित था, जैसे महीधरपर, हँसते हुए कोमल कमलोंसे युक्त कमलाकर हो ॥९॥ [२] जैसे ही इन्द्रराज चला वैसे ही कुवेरने स्वर्णमय नगरकी रचना की, जो चार गोपुरोंसे सम्पूर्ण और सात परकोटोंसे सुन्दर था। यक्षने बड़े-बड़े मठ, विहार और देव- कुलों, सरोवर, पुष्करिणियों, बड़े तालाबों और गृहवाटिकाओं, सीमा-उद्यानों और अगणित स्वर्णतोरणोंसे युक्त साकेत नगरकी रचना कर दी। इन्द्रने तीन बार उसकी प्रदक्षिणा की। जिसके २८ पउमचरित सब्ब-जणहाँ उबसोवणि देप्पिणु । अग्गए माया-बालु थवेप्पिणु ॥७॥ णिउ तिहुमण-परमेपरु तेत्तहँ । सपरिवार पुरन्दरु जेत्तहें ॥४॥ घत्ता झत्ति सुरेहि विमुक्क चरणोवरि दिहि विसाला। मत्तिएँ भच्चण-जोगु णावइ णोलुप्पल-माला ॥९॥ [३] बाल-कमल-दल-कोमल-वाहउ । भह चढाविउ तिहुअण-णाहर ॥३ सुरवइणाऽरुण-वार-दिवायरु । संचालिउ त मेरु-नहीहरु ॥२॥ सत्तहिं जोयण-सहि तहितिउ । सण्णवइहिं तारायण-मन्तित ॥३॥ उप्परि दस-जोयणे हि दिवायरु । पुणु अमीहि लक्विजइससहरु ॥४॥ पुणु चऊहिं णक्खरह पन्ति। वुह-मण्डलु वि चहि तहितिउ ॥५॥ असुर-मन्ति तिहिं निहिं मंत्रच्छरु । तिहि अङ्गारठ तिहि जि सणिच्छरु ॥ अट्ठाणवइ सहाम कमप्पिणु। अण्णु वि जोयण-सउ ल प्पिणु ॥७॥ पण्डु-सिलोवरि सुरवर-सारउ । लहु सिंहामण बिउ मढारत ॥८॥ घत्ता णावइ सिरण लएत्रि मन्दरु दरिमावइ लोयहाँ। कि होइ ण होइ व जोयहाँ ॥९॥ 'एहउ तिहुभण-णाहु [४] ण्हवणारम्म-भरि अप्फालिय। पडहाऽमर-किकर-कर-ताडिय ॥१॥ पूरिय धवल सद्ध कित कलयळु । केहि मि वौसिउ चतविहु मजालु ॥२॥ केहि मि आढत्तई गेयाइ मि । सरगय-पयगय-तालगयाइ मि ॥३॥ केहि मि चाइउ वज्जु मणाहरु । वारह-तालउ सोलह-अक्खा ॥४॥ केहि मि उच्वेल्लिउ मरहुराउ। णव-रस-अट्ट-भाव-संजुत्तठ १५॥

विईओ संधि स्तन पीन हैं, और जो चन्द्रमाकी तरह कोमल है, ऐसी इन्द्रकी महादेवी इन्द्राणी सवलोगोंको मोहित कर तथा माँ के आगे मायावी वालक रखकर तीन लोकोंके परमेश्वर जिनको वहाँ ले गयी, जहाँ इन्द्र अपने परिवारके साथ था॥१-८॥ घत्ता-देवोंने शीघ्र ही, भगवानके श्रीचरणोंपर अपनी विशाल दृष्टि भक्तिसे इस प्रकार फेंकी, जैसे पूजाके योग्य नील कमलोंकी माला ही हो ॥९॥ [३] वाल कमलके दलोंके समान कोमल बाँहोंवाले, त्रिभुवननाथको इन्द्रने गोदमें ले लिया, और अरुण बाल दिवाकरके सामने उन्हें यह सुमेरु महीधरकी ओर ले चला। वहाँसे सात सौ छियानवे योजन दूर तारागणोंकी पंक्ति थी, उसके ऊपर दस योजनकी दूरीपर सूर्य, फिर अस्सी लाख योजन की दूरीपर चन्द्रमा, फिर चार योजनकी दूरीपर नक्षत्रोंकी पंक्ति थी। वहाँसे चार योजन दूरपर बुधमण्डल, फिर वहाँसे क्रमशः वृहस्पति शुक्र मंगल और शनि ग्रह हैं। वहाँसे अट्ठानवे हजार योजन चलकर तथा एक सौ योजन और चलकर सुरवरोंमें श्रेष्ठ, परम आदरणीय ऋषभ जिनको पाण्डुकशिलाके ऊपर सिंहासनपर स्थापित कर दिया गया ॥१-८॥ पत्ता-मन्दराचल पर्वत (उन्हें) अपने सिरपर लेकर मानो लोगोंको बता रहा था कि देख लो यह त्रिभुवननाथ है या नहीं ॥२॥ [४] अभिपेकके शुरू होनेकी भेरी बजा दी गयी । देवाके अनुचरोर हाथास ताडित पढह भी वजने लगे। सफेद शंख फेश दिये गये । कोलाहल होने लगा। किसीने चार प्रकारक मंगलोंकी घोषणा की। चिनीने स्वर पद और ताल से युक्त गान प्रारम्भ कर दिया। किमीने सुन्दर वाद्य बजाया जो बारह साल भर नाल असगेसे युक्त था। फिीने भरत नाट्य

पउमचरित
केहि मि उन्मियाई धय-चिन्धई। केहि मि गुरु-थोचई पारद्धई ॥६॥
केहि मि लइयउ मालइ-मालउ । परिमल-वहल उमसल-वमालउ ॥७॥
केहि मि वेणु केहि वर-वीणउ । केहि मितिसरियाउसर-लोणउ ॥८॥
घत्ता
जं परियाणिउ जेहिं तं तेहि सव्वु विण्णासिउ ।
तिहुअण-सामि मणेवि णिय-णिय-विण्णाणु पयासिउ ॥९॥
[५]
पहिलउ कलसु लइउ अमरिन्दें। वीयउ हुअवहेण साणन्दें ॥१॥
तइयउ सरहसेण जमराएं। चउथउ णेरिय-देवें आएं ॥२॥
पञ्च वरुणे समरें समत्थें ।
छ?उ मारुएण सई हत्थें ॥३॥
सत्तमउ वि कुवेर अहिहाणे । अट्ठमु कलसु लइउ ईसाणे ॥४॥
णवमउ संभाविउ धरणिन्दें। दसमउ कलसु लइज्जइ चन्दे॥॥
अण्ण कलस उच्चाइय अण्णे हि । लक्ख-कोडि-अक्खोहणि-गणे हि ॥६॥
सुरवर-वेल्लि अछिण्ण रएप्पिणु। चत्तारि वि समुद्द लखेप्पिणु ॥७॥
खीर-महण्णवे खीरु मरेप्पिणु । अण्णहाँ अण्णु समप्पइ लेप्पिणु ॥४॥
घत्ता
हाविउ एम सुरेहि
णं णव-पाउस-काले
वहु-मङ्गल-कलसें हि जिणवर ।
मेहें हिं अहिसित्तु महीहरु ॥९॥
[६]
मङ्गल-कलसें हि सुरवर-सारउ । जय-जय-सद हविउ भडारउ ॥१॥
तो एत्यन्तरें हय-पडिवक्खें । गेण्हेंवि बज्ज-सूइ सहसखें ॥२॥
कण्ण-जुअलु जग जाहाँ विज्झइ । कुण्डल-जुअलु अत्ति आइज्झइ ॥३॥
सेहरु सीसे हारु वच्छत्थलें। करें कङ्कणु कडिसुत्तउ कडियलें ॥४॥
तिहुमण-तिलयहाँ तिलउ थवन्ते । मणे आसङ्कित इससयणेत्तें ॥५॥

३१ विईओ संधि प्रारम्भ किया जो नौ रसों और आठ भावोंसे युक्त था। किसीने ध्वज-पताकाएँ उठा ली। किसीने बड़े-बड़े स्तोत्र प्रारम्भ कर दिये । किसीने मालतीकी माला ले ली जो परागसे परिपूर्ण और भ्रमरोंसे मुखरित थी। किसीने वेणु, किसीने वर वीणा ले ली। कोई वीणाके स्वरमें लीन हो गया ॥८॥ घत्ता-उस अवसर पर जिसे जो ज्ञात था, उसने उसका सम्पूर्ण प्रदर्शन किया। उन्हें त्रिभुवनका स्वामी समझकर सब ने अपना-अपना विज्ञान प्रकट किया ॥९॥ [५] पहला कलश देवेन्द्र ने लिया, दूसरा सानन्द अग्नि ने। तीसरा हर्पपूर्वक यमराज ने, चौथा नैऋत्य देव ने। पाँचवाँ समर में समर्थ वरुण ने, छठा स्वयं पवनने अपने हाथमें लिया। सातवाँ कुवेरने बड़े स्वाभिमानसे लिया। ईशानने आठवॉ कलश लिया। नौवाँ धरणेन्द्रने लिया, दसवाँ कलश वन्द्रने लिया । दूसरे-दूसरे कलश दूसरे-दूसरे देवोंने उठा लिये जिनकी संख्या एक लाख करोड़ अक्षौहिणीमें है। सुरवरोंकी लगातार कतार बनाकर, चारों समुद्रोंको लाँघकर, क्षीरमहा- सागरका क्षीर भरकर, तथा एकसे दूसरे को देते हुए ॥१-८॥ पत्ता-देवोंने वहुत मंगल कलशों से जिनवरका अभिषेक किया, मानो नववर्षाकालमें मेघोंने महीधर का ही अभिषेक किया हो ॥९॥ [६] सुरवर श्रेष्ठ परम आदरणीय ऋषभ जिनका जय जय शब्दोंके साथ, मंगल-कलशोंसे अभिषेक किया गया। इसके अनन्तर, शत्रुका नाश करनेवाला इन्द्र वज्रसूची लेकर जगन्नाथके दोनों कान छेद देता है और शीघ्र ही कुण्डल युगल उन्हें पहना देता है। सिरपर चूड़ामणि, वक्षस्थलपर हार, हाथमें कंगन, और कटितलमें कटिसूत्र । त्रिभुवन तिलक को तिलक लगाते हुए सहस्रनयनके मनमें आशंका हो गयी। फिर

पउमचरित
पुणु आदत्त जिणिन्दहाँ वन्दण । जय तिहुभण-गुरु णयणाणन्दण ॥६॥
जय देवाहिदेव परमप्पय । जय तियसिन्द-विन्द-बन्दिय-पय ॥७
जय णह-मणि-किरणोह-पसारण । तरुण-तरणि-कर-णियर-णिवारण ॥८॥
जय गमिएहि गमिय पणविजहि । अरुहु बुत्तु पुणुकहाँ उवमिज्जहि ॥९॥
घत्ता
जग-गुरु पुण्ण-पवित्तु विहुमणहाँ मणोरह-गारा।
मवें भवे अम्हहुँ देज
जिण गुण-सम्पत्ति मडारा ॥१०॥
वामकरङ्गुष्ठउ णिद्वारे वि।
[]
णाय-णरामर-णयणाणन्दहाँ। वन्दण-हत्ति करन्तों इन्दहाँ ॥१॥
रूवारोयणे स्वासत्त। तित्ति ण जन्ति पुरन्दर-णेतई ॥२॥
जहि णिवडियाँ तहिं जें पङ्गुराई। दुव्वल-ढोरई प व खुत्तई ॥३॥
वालहों तेत्थु अमिउ सचारवि ॥४॥
पुणु वि पडीवउ मयण-वियारउ । गम्पि अउज्झहें थविउ भडारउ ।।५।।
सूर मेर-गिरि व परियञ्चित । पुणु दस-सय कर करें विपणच्चिउ ॥६
सालङ्कार स-दोरु स-णेउरु । सच्छरु सप्परिवारन्तेउरु ॥७॥
जणणिए जं जि दिछ अहिसित्तउ । रिसह मणे वि पुणु रिसहुजें वुत्तउ ॥
घत्ता
णिय-बेइ-रिद्धि परियढइ ।
विवरिज्जन्तु कईहि वायरणु गन्थु जिह वदइ ।।९।।
कालें गलन्तएँ णाहु
[6]
अमर-कुमार हि सहुँ कोलन्तहाँ। पुन्चहुँ वीस लक्ख लइन्तहाँ ॥१॥
एक-दिवसें गय पय कूवारें। 'देवदेव मुभ मुक्खा-मारें ॥२॥
जाहं पसाएं भम्हे अण्णा । ते कप्पयर सच्च उच्छण्णा ॥३॥

३३ विईमो संधि उसने जिनेन्द्रकी वन्दना प्रारम्भ की,-"त्रिभुवनगुरु और नेत्रों- को आनन्द देनेवाले आपकी जय हो, सूर्यकी तरह किरण- समूहको प्रसारण करनेवाले, और तरुण सूर्यको किरणोंके प्रसारको रोकनेवाले आपकी जय हो, नमि-विनसिके द्वारा नमित आपकी जय हो ॥१-९|| पत्ता-"विश्वगुरु पुण्यसे पवित्र त्रिभुवनके मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले, हे आदरणीय जिन, जन्म-जन्म में हमें गुण सम्पत्ति दे" ॥१०॥ ७] "नाग, नर और अमरोंके नेत्रोंको आनन्द देनेवाले तथा जिनकी वन्दना भक्ति करते हुए इन्द्र के रूपमें आसक्त नेत्र तृप्तिको प्राप्त नहीं हुए। वे जहाँ भी गिरते वहीं गड़कर इस प्रकार रह जाते जैसे कीचड़में फंसे हुए दुर्वल ढोर (पशु) हों। इन्द्रने, चालक जिनके बायें हाथके अंगूठेको चीरकर, उसमें अमृतका संचार कर दिया, और उसने जाकर, कामका नाश करनेवाले आदरणीय जिनको वापस अयोध्या में रख दिया। जैसे सूर्य, सुमेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा करता है, उसी प्रकार जिनकी इन्द्रने प्रदक्षिणा की और एक हजार हाथ बनाकर नाचा, अपने अलं- फार, दोर, नूपुर स्वर-परिवार और अन्तःपुरके साथ । जव माँने उन्हें अभिषिक्त देखा तो उन्हें ऋपम समझकर उनका नाम अपम रख दिया ॥२-८|| पना-ममय चीननेपर स्वामीकी देह-ऋद्धि उसी प्रकार वरने लगी जिन प्रकार कवियोंके द्वारा व्याख्या होनेपर व्याक- रणन्ध फैलता जाता है ॥२॥ [८] अमरकुमारोंके माथ क्रीड़ा करते हुए उनका वीम गय पूर्व नगर शीत गया । एक दिन प्रजा करुण स्वरमे पुकार जी- "देय देव. हम भूधको मारले मरे जा रहे हैं। जिनके प्रमान अपने को धन्य ममझ रहे थे, वे सारं कल्पवृक्ष

३४
पउमचरिउ
।
एवहिं को उवाउ जीवेवए। भोयणे खाणे पाणे परिहेवएँ ॥४॥
तं णिसुणेवि वयणु जग-सारउ । सयल-कलउ दक्खवइ मडारउ ॥५॥
अण्णहुँ असिमम्मि किसि वाणिजउ । अण्णहुँ विविह-पयारउ विजउ ॥६॥
कइहि दिणे हिं परिणाविउ देविउ । णन्द-सुणन्दाइड सिय-सेयिउ ॥७॥
सउ पुत्तहुँ उप्पण्णु पहाणहूँ। भरह-वाहुबलि-अणुहरमाणहँ ॥४॥
घत्ता
पुन्वह लक्ख तिसहि गय रज्जु करन्तहाँ जावे हि ।
चिन्तामणे उप्पण्ण सुरवइ-महरायहाँ तावे हि ॥९॥
पवत्तइ
[९]
तिहुअण-जग-मण-णयण-पियारउ । मोयासत्तउ णिऍवि भडारउ ॥१॥
मणे चिन्ताविउ दुससयलोयणु। करमि किं पि वइरायहाँ कारणु ॥२॥
जेण करइ सुहि-सत्त-हियत्तणु । जेण तित्थ-प
-पवत्तणु ॥३॥
जेण सीलु वउ णियमु ण णासइ । जेण अहिंसा-धम्मु पयासइ ॥४॥
एम वियप्प वि छण-चन्दाणण। पुण्णाउस कोक्किय णीलक्षण ॥५॥
तिहुक्षण-गुस्हें जाहि ओलग्गएँ। णहारम् पदरिसहि अग्गएँ' ॥६॥
तं आएसु लहेवि गय तेत्तहें। थिउ अत्याणे भडारउ जेत्तहँ॥७॥
पाउजिए हि पउनिउ तक्खणे। गेउ वज्जु जं वृत्त
लक्खणें ॥८॥
घत्ता
रॉ पइट्ट तुरन्त कर-दिद्वि-भाव-रस-रञ्जिय ।
विभम भाव-विलास दरिसन्तिऍ पाण विसजिए ॥९॥
जणीलक्षण पाणे हि मुक्की।
'धिद्धिगत्यु संसारु असारउ ।
[१०]
जाय जिणहों ता सङ्कगुरुको ॥१॥
अण्णहों अण्णु होइ कम्मारउ ॥२॥

विईओ संधि नष्ट हो गये । इस समय जीने, भोजन, खान, पान और पहि- रनेका उपाय क्या है ?" यह वचन सुनकर, जग-श्रेष्ठ उन्हें सब विद्याओंकी शिक्षा देते हैं। दूसरों के लिए असि, मसि, कृषि और वाणिज्य । और दूसरोंके लिए विविध प्रकार की दूसरी दूसरी विद्याएँ ? कई दिनों के बाद, उन्होंने नन्दा सुनन्दा नामक श्रीसे सेवित दो देवियों से विवाह किया। उनके, भरत और वाहुबलि के समान प्रधान सौ पुत्र हुए ॥१-८॥ पत्ता-जव राज्य करते हुए उनका त्रेसठ लाख पूर्व बीत गया, तो इन्द्रमहाराजके मनमें चिन्ता उत्पन्न हुई ॥९॥ [९] "त्रिभुवनके जन मन और नेत्रोंके लिए प्रिय आदरणीय जिनको भोगोंमे आसक्त देखकर इन्द्र अपने मनमें सोचने लगा कि मैं वैराग्यका कुछ तो भी कारण खोजता हूँ जिनसे यह पण्डितों और सात्त्विक लोगोंका मनचीता करें, जिससे तीर्थका प्रवर्तन प्रवर्तित हो, जिससे शील, व्रत और नियम का नाश न हो, जिससे अहिंसाधर्मका प्रकाश हो।" या विचार कर इन्द्रने पुण्यायुवाली चन्द्रमुखी नीलांजनाको चुलाया और कहा, "त्रिभुवन स्वामीकी सेवामें जाओ, उनके सामने नाट्यारम्भका प्रदर्शन करो।" यह आदेश पाकर, वह घा गयी जहां आदरणीय अपने आन्धानमें बैठे हुए थे, प्रयोग- कनाभीने तत्काल, जैसा कि लक्षणशास्त्रमे कहा गया है, गेय और वाद्य प्रारम्भ कर दिया॥१-८|| पत्ता-कर. वृष्टि, भाव और रमसे रंजित नीलांजनाने मुरन्न नमान्दा प्रयदा किया और विभ्रम भाव तथा विलास दिखाते-दियाने उमने अपने प्राण छोड़ दिय" ||९|| [2] नीनजनाको प्राणोंसे मुक्त देवकर जिनको बहुत पड़ी हो गयी। (या नाचने लगे) अमार मंमारको शिकार। इनमें एक के लिए दूनरा कमरत होता है ?

पउमचरित
भण्गहाँ अण्णु करइ मिच्चत्तणु' । तं जि हुउ बइगयहाँ कारणु ॥३॥
लायन्तियहि ताम पढिवोहिउ । 'चारु देव ज सई उम्मोहिउ ॥४॥
उत्रहिहिं णव-णव-कोडाकोदिउ। जहउ धम्मु सत्यु परिवाडिउ ॥५॥
ण?ई टपण-शाग-वरित्तई। दाण-झाण-मजम-सम्मत्तई ॥६॥
पञ्च महव्यय पञ्चाणुञ्चय । तिण्णि गुणन्वय चट मिक्खावय ॥७॥
नियम-सील-उवधाम-सहास'। पड़े होन्तण हवन्तु असेस' un
.
वत्ता
ताम विमाणारुढ
'पड़े विणु सुण्णट मोकन्तु
उ-दिसु चउ देव-णिकाया।
णं जिण-हकारा आया ॥९॥
[११]
मिविया-जाणं मुरवर मारउ ।
जय-जय-म चढिड भडारट ||
देवहि ग्यन्यु देवि उच्चाइट। णिविम तं मिद्धत्थु पराइड ॥२॥
नहि उबवणे धावन्त थावि । भरहहाँ राय-लच्छि करेंलाचि ।।
'मह परम-निहाण' मणन्त । किट पयागें णिक्सवणु नुरन्ते ।।
मुदिड पज भरेपिणु लझ्यट। चामीयर-पढलानर थवियर ॥॥
गण् वि जग-मण-यगाणद। वित्त वीर-समुह मुरिन्हें ॥३॥
नण
समाणु
गयह चड महाप पखदया ॥७॥
परिमिट समिजित गह-संघाए । पद वग्मुि धि काभोमार्ग ॥८॥
मन इया।
पणुयुपा अदा
पिरित चलनापाई
मित्रहो नि विमार।
धूमाउल-नाग-मालट ॥०॥

विईमो संधि एकको चाकरी दूसरा करता है ।" यह वात उसके लिए वैराग्य का कारण हो गयी। तभी लौकान्तिक देवोंने आकर परमजिनको प्रतिवोधित किया, "हे देव, बहुत सुन्दर जो आप स्वयं मोहसे विरक्त हो गये। निन्यानवे कोड़ा-कोड़ी सागर पर्यन्त समयसे धर्मशास्त्र और परम्परा नष्ट हो चुकी है, दर्शन, ज्ञान और चारित्र नष्ट हो गये हैं, दान-ध्यान-संयम और सम्यक्त्व नष्ट हो गया है, पॉच महात्रत, पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और शिक्षा- व्रत नष्ट हो चुके है, नियम, शील और सहस्रों उपवास नष्ट हो चुके हैं, अब आपके होनेसे ये सब होंगे ॥१-८॥ पत्ता-इतने में चारों निकायोंके देव विमानोंमें आरूढ़ होकर आ गये, मानो जिन भगवानके लिए यह बुलावा आया हो कि आपके बिना मोक्ष सूना है ।।९।। [११] तब सुरश्रेष्ठ आदरणीय जिन जय-जय शव्दके साथ शिविका यानमें चढ़े । देवोंने कन्धा देकर उसे उठा लिया और पलभरमें वे सिद्धार्थ उपवनमें पहुँच गये । उस उपवनके थोड़ी दूर स्थित होकर, भरत के हाथमें राज्यलक्ष्मी देकर, परम- सिद्धोंको नमस्कार करते हुए 'प्रयाग' ( उपवन ) में उन्होंने तुरत संन्यास ग्रहण कर लिया। पॉच मुट्ठियोंमे भरकर, वाल ले लिये और स्वर्णपटलके ऊपर रख दिये। जनोंके मन और नेत्रोंको आनन्द देनेवाले सुरेन्द्रने उन्हें लेकर क्षीरसमुद्र में डाल दिया। स्नेहसे प्रेरित होकर चार हजार राजाओंने भी उनके साथ प्रत्रज्या ग्रहण कर ली। जिस प्रकार चन्द्रमा ग्रहसमूहसे घिरा रहता है, उसी प्रकार नवदीक्षित राजाओंसे घिरे हुए परमजिन आधे वर्ष तक कायोत्सर्गमें स्थित रहे ।।१-८॥ पत्ता-ऋपभ जिनकी हवामें उड़ती हुई विशाल जटाएँ ऐसी लगती थीं मानो जलती हुई आगकी धूमाकुल ज्वाल- माला हो ||९||

पउसचरिड
[१२]
जिणु अविउलु अविचलु वीसत्थउ । थिउ छम्मासु पलम्बिय-हत्यउ ॥१॥
जे णिव तेण समउ पब्वइया ।
ते दारुण-दुबाएं लइया ॥२॥
सीउण्हें हि तिस-भुक्स हिं खामिय । जिम्मण-णिहालस हिं विणामिय॥३॥
चालण-कण्डयणइ भलहन्ता। महि-विच्छिय-परिवेटिजन्ता ॥४॥
घोर-चोर-तव-चरणेहि मग्गा । णासें वि सल्लुि पिएवऍ लग्गा ॥५॥
केण वि महियले घत्तिउ अप्पर । 'हो हो केण दिछ परमप्पउ ॥६॥
पाण जन्ति जइ एण णिओएं। तो फिर तण काइँ परलोएं ॥७॥
को वि फलइँ तोडेप्पिणु भक्खइ। 'जाहे' मणेवि को वि काणेक्खइ ॥८॥
घत्ता
को वि णिवारइ कि वि आमेल्लावि चलण जिणिन्दहों।
'कल्लएँ देसहुँ काइँ पच्चुत्तरु मरह-णरिन्दहों ॥९॥
[१३]
तहिं तेहएँ पडिवाएँ अवसरें। दइवी वाणि समुट्टिए अम्बरें ॥१॥
अहाँ अहाँ कूड-कवड-णिग्गन्यहों। कापुरिसहों अणाय-परमत्यहाँ ॥२॥
एण महारिसि-लिङ्ग-गहणे । जाइ-जरा-मरण-त्तव-डहणे ॥३॥
फलइँ म तोडहों जलु मा डोहहों। गं तो णीसङ्गत्तणु छण्डहों' ॥४॥
तं णिसुर्णेवि तिस-भुक्खादणे हि । उधूलिउ अप्पाणउ अण्णे हि ॥॥
मण्ण हि अण्ण समय उपाइय । तहि अवसर णमि-विणमि पराइय॥६
कच्छ-महाऋच्छाहिव-गन्दण। वर-करवाल-हत्य णीसन्दण ॥७॥
वेणि वि विहि चलणे हिं णिवडेप्पिणु । थिय पासेंहि जिणु जयकारेप्पिणु ।।
।
घत्ता
चिन्तिउ णमि-विणमीहि 'वुत्तर विण चोल्लइ णाहो।
एउ ण जागहुँ आसि
किड अम्हहिं को भवराहो ॥९॥

विईमो संधि [१२] जिन भगवान्, छह माह तक हाथ लम्बे किये हुए अविकल, अविचल और विश्वस्त रहे। लेकिन जो राजा उनके साथ प्रबजित हुए थे, वे दारुण दुर्वातमें जा फंसे । शीत, उष्ण, भूख और प्याससे शीर्ण हो गये, जंभाई, नींद और आलस्यसे वे हार मान बैठे। चलना और खुजलाना न पा सकनेके कारण, साँप और बिच्छुओंने उन्हें घेर लिया। वे धीर-धीर तपश्वरणसे भग्न हो गये । भ्रष्ट होकर पानी पीने लग गये। कोई महीतल. पर पड़ गया। (कोई कहने लगा), हो हो, परमपद किसने देखा, यदि इस तपमें प्राण जाते है तो फिर उस परमलोकसे क्या ? कोई, फल तोड़कर खाता है, कोई 'मैं जाता हूँ' कहकर तिरछी नजरसे देखता है॥१-८ पत्ता-कोई जिनेन्द्रके चरणोंको छोड़कर जानेके लिए थोड़ा-सा मना करता है यह कहकर कि कल हम भरत नरेन्द्रको क्या जवाब देंगे?॥९॥ [१३] उस अवसरपर आकाशसे देव-वाणी हुई, "अरे कूट, कपटी, निम्रन्थ कापुरुप, परमार्थको नहीं जाननेवालो, तुम जन्म-जरा और मृत्यु तीनोंको जलानेवाले महाऋषियोंके इस वेषको धारण कर, फल मत तोड़ो, पानी मत पिओ। नहीं तो दिगम्बरत्व छोड़ दो!" यह सुनकर, प्यास और भूखसे पीड़ित कुछ दूसरे साधुओंने अपने ऊपर धूल डाल ली, दूसरोंने दूसरे मत खड़े कर लिये। इसी अवसरपर नमि और विनमि वहाँ पहुँचे कच्छप और महाकच्छपके वेटे । विना रथके हाथों में तलवार लिये हुए। दोनों ही, जयकार पूर्वक, दोनों चरणोंमें प्रणाम कर जिनवरके पास वैठ गये। ॥१-८॥ घत्ता-नमि और विनमि अपने मनमें सोचने लगे कि बोलनेपर भी स्वामी जिन नहीं वोलते, हम नहीं जानते कि हमने कौन-सा अपराध किया है ।।९।।

पउमचरित [१४] जइ वि ण कि पि देहिं सुर सारा। तो वरि एक्कसि वोल्लि भडारा ॥१॥ अण्णहुँ देसु विहवि दिण्णउ । अम्हहुँ किं पहु णिहाखिण्णउ ॥२॥ अण्णहुँ दिण्ण तुरङ्गम गयवर । अम्हहुँ काइँ क्रियउ परमेसर ॥३॥ अण्णहुँ दिण्णउ उत्तिम-वेसउ । अम्हहुँ आलावेण वि संसउ' ॥४॥ एस जाम गरहन्ति जिणिन्दहों। आसणु चलिउ ताम धरणिन्दहाँ॥५ अवहि पउवि सप्परिवारउ । आउ खणखें जेत्थु भडारउ ॥६|| लक्खिड विहि मि मझें परमसरु । ससि सूरन्तराल णं मन्दरु ॥७॥ तुरिउ ति-बारउ मामरि देविणु। जिणवर-वन्दणहत्ति करेप्पिणु ॥८॥ पुच्छिय धरणिधरेण थिय कजे कवणेण घत्ता 'विणि वि उण्णाविय-मत्था । उक्रवय-करवाल-विहत्था ॥९॥ [१५] तं णिसुणेवि दिण्णु पच्चुत्तर । 'पेसिय वे वि आसि देसन्तरु ॥१॥ दूरवाणु जाम तं पाबहुँ। जाम वलेवि पढीवा आवहुँ ॥२॥ ताम पिहिमि णिय-पुत्तहँ देप्पिणु । अम्मह थिउ अवहेरि करेप्पिणु ॥३॥ तं णिसुवि विहसिय-मुह-वन्दे । दिण्णउ विजउ वे धरणिन्दे ॥४॥ 'गिरि-वेयवहाँ होहु पहाणा । उत्तर-दाहिण-सेड्ढिहिं राणा' ||५|| तं णिसुणे वि णमि-विणमिहिं बुञ्चइ । अण्णे दिग्गी पिहिवि न रुचाइ ॥६॥ जह जिग्गन्यु देइ सइँ हत्थे । तो अम्हे वि लेहुँ परमत्य ॥७॥ तं णिसुणेवि वे नि अवलोऍवि । थिउ जग्गएँ सो मुणिवरु होऍवि ॥८॥ हुन्थु थलिउ तण घत्ता गय वे वि लएप्पिणु बिज्जउ । थिउ दाहिण-से दिहि विजउ ॥३॥ उत्तर-सैनिनहि एक विईओ संधि ४१ [१४] सुर श्रेष्ठ हैं, यदि कुछ नहीं दें, तो भी आदरणीय एक बार बोल तो ले, दूसरोंको तो देश विभक्त करके दे दिया, हे स्वामी, हमारे प्रति आप अनुदार क्यों हैं ? दूसरोंको आपने तुरंगम और गजवर दिये है, हे परमेश्वर हमने क्या किया है ? दूसरोंको आपने उत्तम वेश दिये है, परन्तु हमसे बात करनेमें भी सन्देह है ? इस प्रकार वे जव जिनवरकी निन्दा कर रहे थे कि तभी धरणेन्द्रका आसन कम्पायमान हुआ, अवधिज्ञानसे सब जानकर, परिवारके साथ आधे पलमें वहाँ आया, जहाँ आदरणीय परमजिन थे। दोनों (नमि और विनमि ) के बीच, परमेश्वरको धरणेन्द्रने इस प्रकार देखा, जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमाके बीच में मन्दराचल हो। तुरन्त तीन प्रदक्षिणा देकर, जिनवरकी वन्दना भक्ति कर ॥१-८॥ धत्ता-धरणेन्द्रने पूछा, "तुमलोग अपने दोनों हाथ ऊपर- कर, हाथमें तलवार लेकर, किसलिए यहाँ बैठे हो" ||९|| [१५] यह सुनकर उन्होंने उत्तर दिया, "हम दोनोंको देशान्तर भेजा गया था। लेकिन जबतक हम वहाँ पहुंचे और वापस आयें, तबतक अपने पुत्रोंको धरती देकर, यह हमारी उपेक्षा कर यहाँ स्थित है। यह सुनकर, हँसते हुए (हँस रहा है, मुखचन्द्र जिसका ऐसे) धरणेन्द्रने उन्हें दो विद्याएँ दी, और कहा, तुम दोनों विजया पर्वतको उत्तर-दक्षिण श्रेणियों के प्रमुख राजा बन जाओ।" यह सुनकर नमि-विनमि वोले, "दूसरोंके द्वारा दी गयी पृथ्वी हमें नहीं चाहिए, यदि वास्तवमें परम जिन (निर्ग्रन्थ ) अपने हाथसे दे तो हम ले ले।" यह सुनकर और उन दोनोंकी ओर देखकर धरणेन्द्र, उनके सामने मुनिवरका रूप धारण कर बैठ गया ।।१-८॥ पत्ता-उसने हाथ ऊँचा कर दिया ('हाँ' कर दी) वे दोनों भी विद्या लेकर चल दिये। एक उत्तर श्रेणी और दूसरा दक्षिण पउमचरित [१६]] तहि अवसर उच्चाइय-वाहहाँ। महि-विहरन्तहों तिहुअण-णाहहाँ ॥१ बहु-लायण्ण-वण्ण-संपण्णड । आणइ को वि पसाहें वि कण्णउ ॥२॥ चेलिउ को वि को विह्य चञ्चल। रयण को वि को वि वर मयगल॥३॥ को वि सुवण्णई रुप्पय-थालई। को वि धणई धण्णइँ असरालइँ ॥४॥ को वि अमुल्लाहरण. ढोयह। ताइँ भडारउ णउ अवलोयइ ॥५॥ सन्चई धूलि-समहूँ मण्णन्तउ । पट्टणु हस्थिणयरु संपत्त ॥६॥ जहिं सेयंसें दसणु पाहिउ । छुडु छुड णिय-परिवारहों साहिउ ॥७ 'अज्जु पइदु अगङ्ग-वियारउ । मइँ पाराविउ रिसहु भडारउ ॥८॥ इक्खु-रसहो भरियालि जंजे। घर वसु-हार पवरिसिय तं जे ॥९॥ ताम चडदिसु लोए छाइड। सञ्चउ जे जिणु वार पराइड ॥१०॥ घत्ता णिग्गड 'थाहु' भणन्तु भमिउ ति-भामरि दिन्तु स-कलत्तु स-पुत्तु स-परियणु। मन्दरहों जेम तारायणु ॥११॥ [१७] वन्दें वि पइसारियउ णिहेलणु । किउ चलणारविन्द-पक्खालणु ॥३॥ भण्णु वि गोमएण संमजणु । दिग्ण जलेण धार पुणु चन्दणु ॥२॥ पुप्फई अक्खयाउ वलि दीवा। धूव-वास जल-वास पडीवा ॥३॥ कर-पक्खालणु देवि कुमार। ससहर-सण्णिहेण मिझारें ॥४॥ अहिणव-इक्खुरसहाँ भरियालि। ताव सुरेहि मुक्कु कुसुमञ्जलि ॥५॥ साहुकार देव-दुन्दुहि-सरु । गन्ध-वाउ वसु-वरितु गिरन्तर ॥६॥ कलण-रयणहं कोडिड वारह पडिय लक्ख वत्तीसट्ठारह ॥७॥ अक्खय-दाणु मणे वि सेयंसहों। अक्खयतइय गाउ किउ दिवसहों।

विईभी संधि १५ श्रेणीमें स्थित हो गया ।।९।। [१६] उस अवसर पर, अपने हाथ ऊँचे किये हुए त्रिभुवननाथ ऋषभ जिन, धरती पर विहार करने लगे। कोई उनके पास, सौन्दर्य और रंगसे युक्त अपनी कन्याको सजाकर लाता है । कोई वस्त्र, कोई चंचल अश्व, कोई रत्न, और कोई मद विह्वल गज। कोई चाँदी की थालियाँ और स्वर्ण । कोई वहुत-सा धन धान्य । कोई अमूल्य आवरण ढोकर लाता है। परन्तु परम आदरणीय उनकी ओर देखते तक नहीं। सवको धूलिके समान मानते हुए वह हस्तिनापुर नगरमें पहुंचे। वहाँ विमोहने स्वप्न देखा (स्मृतिमें देखा) "उसने अपने परिवारसे कहा है कि आज कामदेवका नाश करनेवाले आये हैं और मैने उन्हें पारणा (आहार) करायी है । मैने इक्षु-रसकी जितनी अंजली भरी धरमें उतनी ही रत्नवृष्टि हुई। इतने में चारों दिशाओंमें लोग छा गये, सचमुच जिनभगवान् उसके द्वार आ चुके थे ॥१-१०॥ पत्ता-ठहरिये कहता हुआ वह निकला, और अपनी स्त्री पुत्र और परिजनोंके साथ उसने तीन प्रदक्षिणा दी, जैसे तारा- गण मन्दराचलको देते हैं ॥११॥ [१७] वन्दनाकर, वह उन्हें घरके भीतर ले आया। उनके चरण कमलोंका प्रक्षालन किया। और दूध दहीसे उन्हें धोया, जलकी धारा दी और चन्दन लगाया। पुष्प अक्षत नैवेद्य दीप और फिर धूप जल चढ़ाया। श्रेयांस कुमारने हाथोंका प्रक्षालन कराकर, चन्द्रमाके समान शृंगारसे ताजे गन्नेके रससे उनकी अंजलि भरी ही थी कि देवोंने पुष्पांजलि की वर्षा की। साधु- कार, और देव-दुन्दुभियोंका स्वर गूंज उठा, सुगन्धित हवा चलने लगी, रत्नोंकी वर्षा होती रही, बारह करोड़ वत्तीस लाख अठारह रत्त वरसे! श्रेयांसके दानको अक्षयदान मानकर --

४४
पउमचरित
घत्ता
जिमित भडारड जे सेयंसें अप्पड मा वि ।
वन्दिउ रिसह-जिणिन्दु सिरे सइ भु व-जुवलु चड़ावै वि ॥९॥
इय एत्य प उ म च रिए
'जिणवर-णिक्खमण' इम
धणञ्जयासिय-सय म्भु एव-कए।
वीयं चिय साहियं पच्वं ॥
[ ३. तईओ संधि]
तिहुमण-गुरु तं गयउरु मेल्लें वि खीण-कसाइउ ।
गय-सन्तउ विहरन्तर पुरिमतालु संपाइड ॥
[१]
दीहर-कालचक्क-हएण वरिस-सहासें पुण्णऍण ।
सयडामुह-उजाणवणु हुकु भडारड रिमह-जिणु ॥३॥
रम्मं महा जं च पुण्णाय-णाएहिं । कुसुमिय-लया-वेल्लि-पल्लव-णिहाएहिर
कापूर-कोल-एला-लवतेंहि । महु-माहवी-माहुलिङ्गी-विडडेहि ॥३॥
मरियल्ल-जीरच्छ-कुंकुम-कुडनेहिं । णव-तिलय-वउलेहि चम्पय-पियजेहिं ॥४
णारङ्ग-गग्गोह-आसत्य-रुक्खेहिं । कङ्केल्लि पउमक्ख-रुहक्ख-दक्खेहिं ॥५॥
खजूरि-जम्विरि-धण-फणिस-लिम्वहिं । हरियाल-ढउएहिबहु-पुत्तजीवेहि।।६॥
सत्तच्छयाऽगस्थि-दहिवण्ण-णन्दीहि । मन्दार-कुन्दिन्दु-सिन्दूर-सिन्दीहिं॥७॥
वर-पाडली-पोप्फली-णालिकेरीहिं । करमन्दि-कन्थारि-करिमर-करीरेहिं ॥८॥

विईओ संधि उस दिनका नाम अक्षय तृतीया पड़ गया। पत्ता-परम आदरणीय ऋपम जिनने वह सब खाया, जो राजा श्रेयांसने भावपूर्वक दिया। उसने अपने दोनों हाथ सिर पर रखकर ऋपम जिनेन्द्रकी वन्दना की! ॥९॥ इस प्रकार यहाँ धनंजयकं आश्रित स्वयंभूदेव द्वारा विरचित 'जिनवर निष्क्रमण' नामक दूसरा समाप्त हुआ। पर्व तीसरी सन्धि जिनकी कपाय क्षीण हो चुकी है, ऐसे परमशान्त परमगुरु उस हस्तिनापुर नगरको छोड़कर, विहार करते हुए पुरिमताल ( उद्यान ) पहुंचे। [१] लम्बे सगय चक्र के एक हजार वर्ष बीत जाने पर आदरणीय ऋपभजिन शकटामुख उद्यान-वन में पहुँचे जो महान् उद्यान, खिली हुई लताओं पल्लवों और वेलों के समूह से युक्त था। पुन्नाग, नाग वृक्षों तथा कपूर, ककोल, एला, लवंग, मधु- माधवी, मातुलिंगी, विडंग, मरियल्ल, जीर, उच्छ, कुंकुम, कुडंग, नवतिलक, पद्माक्ष, रुद्राक्ष, द्राक्षा, खजूर, जंबीरी, धन, पनस, निम्ब, हड़ताल, ढौक, बहुपुत्रजीविका, सप्तच्छद, अगस्त, दधिवर्ण, नंदी, मंदार, कुन्द, इंदु, सिन्दूर, सिन्दी,

४६
पउमचरिउ
कणियारि-कणवीर-मालूर-तरलेहि । सिरिखण्ड-सिरिसामली-साल-सरलेहिए
हिन्ताल-तालेहिं तालो-तमालेहिं । जम्बू-वरम्वेहि कञ्चण-कयम्वेहि ॥१०॥
भुव-देवदारुहि रिटेर्हि चारेहिं । कोसम्म-सज्जेहिं कोरण्ट-कोहि ॥१॥
अञ्चइय-जूहिहिं जासवण-मल्लोहिं । केयइए जाएहि अवरहि मि जाईहिं॥१२
घत्ता
तहिँ दिट्ठउ सुमणि?उ वड-पायउ थिर-थोरउ ।
वण-वणियह सुहु-जणियहें उप्परि धरिउ व मोरउ ॥१३॥
[ २ ]
तहिँ थाएँ वि परमेसरण आइ-पुराण-महेसरण ।
विसय-सेपणु संचूरित
सुक्क-झाणु भाऊरियउ ॥१॥
एक-सुक्क-झाणग्गि पलित्तहों। दो-गुण-धरहों दुविइ-तव-तत्तहों ॥२॥
तियगारहो ति-सल्ल फेडन्तहों। चउविह-कम्मिन्धणई डहन्तहाँ ॥३॥
पश्चिन्दिय-दणु-दप्पु हरन्तहों। छविह-रस-परिचाउ करन्तहों ॥४॥
सत्त-महाभय परिसेसन्तहों। अट्ट दुट्ठ मय णिण्णासन्तहाँ ॥५॥
णवविहु वम्भचेरु रक्खन्तहों। दसविहु परम-धम्मु पालन्तहों॥६॥
सुइ एयारहंग जाणन्तहों। वारह अणुवेक्खउ चिन्तन्तहों ॥७॥
तेरसविहु चारित्तु चरन्तहों। चउदसविह-गुणथाणु चडन्तहों ॥८॥
रणारह पमाय वजन्तहों। सोलहविह कसाय मुञ्चन्तहाँ ॥९॥
रत्तारह संजम पालन्तहों। अट्ठारह वि दोसणासन्तहों ॥१०॥
घत्ता
सुह-शाणहों गय-माणहों अइपसण्ण-मुहयन्दहों।
धवलुजलु तं केवलु णाणुप्पण्णु जिणिन्दहों ॥११॥

तईओ संधि - वर, पाटली, पोपली, नारिकेल, करमंदी, कंबारी, करिमर, करीर, कनेर, कर्णवीर, मालूर, तरल, श्रीखण्ड, श्रीसामली, साल, सरल, हिन्ताल, ताल, ताली, तमाल, जम्बू, आम्र, कचन, कदम्ब, भज, देवदारु, रिह, चार, कौशम्ब, सद्य, कोरण्ट, कोंज, अच्चइय, जुही, जासवण, मल्ली, केतकी और जातकी वृक्षांसे रमणीय था ॥१-१२।। पत्ता-वहाँ, स्थिर और स्थूल सुन्दर वटवृक्ष ऐसा दिखाई दिया, मानो, सुख देनेवाली वनरूपी वनिताके ऊपर मुकुट रख दिया गया हो" ॥१३॥ [२] आदिपुराणके महेश्वर परमेश्वरने उस स्थानमें स्थित होकर विपयरूपी सेना नष्ट की और अपना शुक्ल ध्यान पूग किया। एक शुक्ल ध्यानकी अग्नि प्रज्वलित करते हुए, दो गुणम्धान और दो प्रकारका तप धारण करते हुए, स्त्रीत्वका वन्ध करानेवाली तीन झल्योंका नाश करते हुए, चार घातिया कर्मोकि ईधनको जलाते हुए, पंचेन्द्रिय रूपी दानवका दर्प हरते हा, छब्बीस प्रकारके रसका परित्याग करते हुए, सात महा- मदोंको परिशेप करते हुए, आठ दुष्ट मदोंका नाश करते हुए, नी प्रकारकं ब्रह्मचर्यकी रक्षा करते हुए, इस प्रकारके परम धर्मका पालन करते हुए, ग्यारह अंगोंके शास्त्रको जानते हुए, बारह अनुप्रेक्षाओका चिन्तन करते हुए, तेरह प्रकारके चारित्र- का आचरण करते हुए, चौदह प्रकारके गुणस्थानों पर चढ़ते ह, पन्द्रह प्रमाणोंका वर्णन करते हुए, सोलह कपायोको छोड़ते हए. मत्रह प्रकारके संयमका पालन करते हुए और अठारह प्रकार के दोपोका नाश करते हुए; ॥२-२०॥ घत्ता-शुभध्यान, गतमान और अत्यन्त प्रसन्न मुखचन्द्र ऋषभ जिनको धवल उज्ज्वल केवलज्ञान उत्पन्न हुआ।१२।।

४८
पउमचरिउ
साहिय-णिय-सहाव-चरित चउतीसऽइसय-परियरिउ ।
थिउ जिणु णिधुय-कम्म-रउ णं ससहरु णिजलहरउ ॥१॥
पुण्ण-पवित्तु पाव-णिण्णासणु। अण्णुप्पण्णु धवलु सिंहासणु ॥२॥
किसलय-कुसुम-रिद्धि-संपण्णउ। अण्णेत्तहें असोउ उप्पण्णउ ॥३॥
दिणयरकोडि-पयाव-समुज लु। अण्णेत्तहँ पसण्णु भामण्डलु ॥४॥
अण्णेत्तहें ओणामिय-मत्था। चामरिन्द थिय चमर-विहत्था ॥५॥
अण्णेत्तहे तिहुअणु धवलन्तउ । थिउ उद्दण्ड-धवल-छत्त-त्तउ ॥६॥
अण्णेत्तहँ सुर-दुन्दुहि वजइ । णं पक्खुहणे महोवहि गजइ ॥७॥
दिच भास अण्णेत्तहँ मासइ । अण्णेत्तहँ कम्म-रउ-पणासइ ॥८॥
कुसुम-वासु अण्णेत्तहँ वासइ ॥९॥
अट्ठ वि पाडिहेर उप्पण्णा । णं थिय पुण्ण-पुञ्ज आसण्णा ॥१०॥
घत्ता
इय-चिन्धई जसु सिद्धइ
गह चकहों तइलोकहों
पर-समाणु जसु अप्पर।
सो जै देउ परमप्पउ ॥११॥
[४]
वारह-जोयण पोढिमउ
मणहरु सव्वु सुवण्णमउ ।
चउदिसु चउरुजाण वणु सुर-णिम्मत्रिउ समोसरणु ॥१॥
तिविहु कणय-पायारु पभाविउ । वारह कोढा सोलह वाविउ ॥२॥
माणव-थम्स चयारि परिट्टिय । कञ्चण-तोरण-णिवह समुट्ठिय ॥३॥
चउ गोउरइ हेम-परियरिय।। णव णव थूहई तहि वित्थरियई ॥४॥
दह धय पउम-मोर-पञ्चाणण |
गरुड मराल-वसह वर-वारण ||५||
अण्णु
वि वत्य-चक-छत्त-द्धय । फरहरन्त अञ्चन्त समुण्णय ॥६॥
एक्कएँ धएँ अहिणव-छायहुँ । सउ अट्ठोत्तर चित्त-पढायहुँ ॥७॥

तईओ संधि [३] जिन्होंने अपना स्वभाव और चारित्र सिद्ध कर लिया है, जो चौतीस अतिशयोंसे युक्त हैं, और जिन्होंने कर्म- रूपी रजको धो दिया है, ऐसे परम जिन स्थित हो गये, मानो मेघरहित चन्द्रमा ही हो। और भी उन्हें, पुण्य पवित्र और पापोंका नाश करनेवाला धवल सिंहासन उत्पन्न हुआ। दूसरे स्थानपर किसलय और कुसुमोंकी ऋद्धिसे परिपूर्ण अशोक वृक्ष उत्पन्न हुआ, एक दूसरी ओर, करोड़ों सूर्योके प्रतापसे समुज्ज्वल भामण्डल प्रसन्न हुआ। दूसरी ओर, अपना माथा झुकाये और हाथमें चमर लिये हुए चामरेन्द्र देव खड़े थे। एक ओर, तीनों लोकोंको धवल करते हुए दण्डयुक्त तीन छत्र उत्पन्न हुए, एक ओर देवदुन्दुभि बज रही थी, मानो पूर्णिमाके दिन समुद्र गर्जन कर रहा हो, एक ओर दिव्यध्वनि खिर रही थी, दूसरी ओर कर्मरज ध्वस्त हो रही थी, एक ओर पुष्प वृष्टि सुवासित हो रही थी तो दूसरी ओर उन्हें आठ प्रातिहार्य उत्पन्न हुए, मानो पुण्यका समूह ही आकर उपस्थित हो गया हो ॥१-१०॥ घत्ता-ये चिह्न जिसको सिद्ध हो जाते हैं और जो परको अपने समान समझता है, ग्रहमण्डल और त्रिभुवनमें वही परमात्मा देव है ॥१॥ [४] वारह योजनकी समस्त धरती सुन्दर और स्वर्णमय थी। देवों द्वारा निर्मित समवसरण था, जिसमें चार दिशाओं- में चार उद्यान-वन थे। तीन स्वर्ण-परकोटे थे। बारह कोठे और सोलह वावड़ियाँ। चार मानस्तम्भ स्थित थे। स्वर्ण- तोरणोका समूह था । स्वर्णजड़ित चार गोपुर थे। उनमें नौ-नौ धूनियां लगी हुई थीं । दस ध्वज थे जिनमें कमल, मयूर, पंचा- नन, गरुड़, हंस, वृपभ, ऐरावत, दुकूल, 'चक्र और छत्र अंकित थे। प्रत्येक ध्वजमें अभिनव कान्तिवाली एक सौ आठ चित्र

पउमचरित
'कि अच्छहु
तं मममरणु परिहिउ जावहि । अमर-राउ मंचलिउ तावहिं ॥४॥
चलियई आसणाई अहमिन्दहुँ । विमहरिन्द-अमरिन्द-णरिन्दहूँ ॥१॥
घत्ता
जिणसंपइ जाणावह
सुरवइ सुरवर-विन्दहुँ ।
आगच्छहु जाहु महारउ वन्दहुँ' ॥१०॥
[५]
तं णिमुणेवि पउगमरे हि कडय मउड-कुण्डल धरै हि ।
मणि-रयण-प्पह रञ्जिय णिय-णिय जाणई मस्जियई ॥१॥
केहि मि मेस महिस विस कुजर । केहि मि तच्छ रिच्छ मिग सम्बर ॥२
कहि मि करह वराह तुरङ्गम।
कहि मि हस मऊर विहङ्गम ॥३॥
केहि मि मस सारङ्ग पवगम । केहि मि रहबर परवर जगम ||
केहि मि वग्घ सिंघ गय गण्डा । कहि मि गरुड कोच्च कारण्डा ॥५॥
कहि मि सुसुआर मच्छोहर। एम पराइय सयळ वि
दम पयार वर भवण-णिवासिय । विन्तर अट्ट पञ्च जोईसिय ॥७॥
वहुविह कप्पामर कोकन्तउ । ईसाणिन्दु वि आउ तुरन्तउ ॥८॥
विम्मम-हाव-भाव-संखोडिहिं। परिमिउ चउवीसऽच्छर-कोडिहि ॥९॥
सुरवर ॥६॥
घत्ता
पेक्स वि वलु किय-कलयलु चउविह-देव णिकायहाँ।
धाइय पर
कहिय-धर
सुरवर-वल्लह-रायहाँ ॥१०॥
[६]
ताव-गलिय-दाणोज्झरउ कण्ण-चमर-हय-महुयरउ ।
जिग वन्दण-गवणंमणउ परिवहिउ अइरावणउ ॥१॥
जोयण-कक्ख-पमाणु परिहिउ । वीयउ मन्दरु णाई समुहिउ ॥२॥
उप्परि पेक्खणाई पारद्धई। चामीयर-तोरण णिवद्ध ॥३॥
उडिभय धय धूवन्तहँ चिन्धई। कियइँ वणई फल-फुल्ल-समिदई ॥१॥

तईओ संधि पताकाएँ थीं। जैसे ही वह समवसरण बनकर तैयार हुआ वैसे ही अमरराजने कूच किया। अहमिन्द्रों, नागेन्द्र, नरेन्द्र और देवेन्द्रोंके आसन चलायमान हो गये ॥१-९॥ धत्ता-इन्द्र देवोंको जिनवरकी सम्पदा बताता हुआ कहता है कि "वैठे क्या हो, आओ, आदरणीय जिनवर की वन्दनाके लिए चले ॥१॥ [५] कटक, मुकुट और कुण्डल धारण करनेवाले प्रमुख देवोंने जब यह सुना तो वे मणियों और रत्नोंकी प्रभासे रंजित अपने-अपने यान सजाने लगे। कोई मेष, महिष, वृषभ और हाथीपर | कोई तक्षक, रीछ, मृग और शम्बरपर । कोई करभ, वराह और अश्वपर | कोई हंस, मयूर और पक्षीपर। कोई शशक, श्रेष्ठ हिरण और वानरपर । कोई रथवर, नरवरोंपर। कोई वाघ,गज और गेडेपर | कोई गरुड़, क्रौंच और कारण्डव- पर । कोई शुंशुमार और मत्स्यपर। इस प्रकार सभी सुरवर वहाँ पहुँचे। इस प्रकारके भवनवासी देव, आठ प्रकारके व्यन्तर, पॉच प्रकारके ज्योतिषी देव । अनेक प्रकारके कल्पवासी देव बुला लिये गये, ईशानेन्द्र भी तत्काल आ गया, विभ्रम हाव- भावसे क्षोभ उत्पन्न करनेवाली चौवीस करोड़ अप्सराओंसे घिरा हुआ १-९॥ घत्ता-चार निकायोंकी कोलाहल करती हुई सेनाको देखकर, इन्द्रराजके दण्ड धारण करनेवाले आदमी दौड़े ॥१०॥ [६] इतनेमें, जिससे मदजलका निर्झर बह रहा है, जो कानसे भ्रमरोंको उड़ा रहा है और जिसका मन जिनभगवान् की वन्दनाके लिए व्याकुल था, ऐसा ऐरावत महागज आगे वहा । वह एक लाख योजन प्रमाण था, जैसे दूसरा मन्दराचल ही परिस्थित हो, ऊपर प्रदर्शन प्रारम्भ हो गये। स्वर्णनिर्मित तोरण बाँध दिये गये । ध्वज उतार दिये गये, चिह्न हिलने लगे।

પર
पउमचरिउ
पोवरिणित णव पडूय सरवर । दाहिय वावि तलाय लयाहर ॥५॥
तहि अइरावणे गलगज्जन्तएँ। दीहर-कर-सिक्कार मुअन्तएँ ॥६॥
विजिन्नन्नु चमर-परिवाडिहि । सत्ताव,महिं अच्टर-कोडिहि ॥७॥
चडिर
पुरन्दर
मग परिओम ।
जय-मङ्गलु-दुन्दुहि-णिग्योसे ॥८॥
वन्द्रिण-फम्कावयहि पडन्तहि । कहियवाले हि ढोउ ण दिन्तेहि ॥९॥
इन्द्रहों नणिय द्वि अग्रलोवि । के वि विमूरिय विमुहा होऍवि ॥१०॥
वत्ता
'मल-धरणई तव-चरणई
ज
जण-बल्लहु
क दिबु भरह करेसहुँ ।
इन्दत्तणु पावेसहुँ ॥११॥
[-]
ताम सुरासुर-वाहणई फलई व सग्ग-दुमहों तणई।
जिणवर-पुण्ण-बाय-हयई हेहामुहई समागयई ॥१॥
अवरोप्पर चूरन्त महाइय ।
गिरि-मणुसोत्तर-सिहरु पराइय ॥२॥
णिय-करें खञ्जेवि भणइ पुरन्दरु । उच्चासण-आरुहणु असुन्दरु ॥३॥
जाई विउन्त्रण-सत्तिएँ हूय।। तुरिउ ताइँ आमेलहु रूअ ॥४॥
थिय देवासुर इन्दाएम। सत्र पडीवा तेण जि वेसें ॥५॥
णाणा-जाण-विमाणे हि तेत्तह। ढुक्कु समोसरणे जिणु जेत्तहें ॥६॥
सयल वि दूरोणाविय-मत्था । सयल वि कर-मउलअलि-हत्था ॥७
सयल वि जयजयकार करन्ता। सयल वि थोत्त-सयाई पढन्ता ॥८॥
सयल वि अप्पाणउ दरिमन्ता।
णामु गोत्तु णिय-णिलउ कहन्ता ॥९॥
घत्ता
हिं वेला सुर-मेलए तेय-पिण्डु जिणु छन्नड़ ।
गयणगण तारायण
छण-मयलन्छणु णज्जइ ॥१०॥

तईओ संधि
वन, फल-फूलोंसे समृद्ध थे। उसमें पुष्करणियाँ, नव पंकज,
सरोवर, जलाशय, बावड़ी, तालाव और लतागृह थे। अपनी
लम्बी सूंड़से जलकण फेकता हुआ ऐरावत गरजने लगा।
जिसे, सत्ताईस करोड़ अप्सराएँ कतार में खड़े होकर चमरोंसे
हवा कर रही थीं, ऐसा इन्द्र मनमें प्रसन्न होकर, जय और
दुन्दुभिके निर्घोपके साथ हाथीपर चढ़ा। बन्दीजन और
यामन स्तुतिपाठ पढ़ रहे थे। दण्डधारी जन प्रणाम कर रहे
थे। इन्द्रकी उस ऋद्धिको देखकर, कितने ही लोग विमुख हो
दुःख मनाने लगे ॥१-१०॥
घत्ता-मलको हरनेवाला तपश्चरण करके किस दिन हम
मरेगे, और दुर्लभ जनप्रिय इन्द्रत्व प्राप्त करेगे ॥११॥
[७] इतने में, सुरों और असुरोंके विमान नीचे आ गये,
मानो वे स्वर्गरूपी वृक्षके फल थे, जो जिनवरके पुग्यकी हवासे
आहत होकर नीचे आ गये। महनीय वे एक दूसरेको धक्का
देते हुए मानुपोत्तर पर्वतके शिखरपर जा पहुंचे। तब अपना हाथ
उठाकर इन्द्र कहता है, "ऊँचे आसनपर बैठना ठीक नहीं, जिन्हें
विक्रियाशक्तिसे जो-जो रूप प्राप्त हैं उन्हें तुरन्त छोड़ दो।"
इन्द्र के आदेशसे, जो देव पहले जिस रूपमें थे वे वापस उसी
रूपमें स्थित हो गये। वे नाना विमानों और यानोंसे वहाँ
पहुंचे जहाँ समवसरणमें परम जिन थे। सबने दूरसे ही उन्हें
माथा चुकाकर प्रणाम किया, सबके हाथोंकी अंजलियाँ उधी
हुई थीं। सभी जयजयकार कर रहे थे। सभी सैकड़ो स्तोत्र
पद रहे थे। सभी अपना परिचय दे रहे थे, अपना नाम-गोत्र
और निकाय बताते हुए ॥१-२॥
पत्ता-देवताओंर उस जमघटके अवसरपर तेजपिण्ड
जिन ऐले शानित थे, जैसे आकाशके प्रांगणमें तारागणोंके बीच
पूर्णचन्द्र हो । ॥१०॥

पउमचरित
[८]
सुर-करि-खन्धुत्तिण्णऍण बहु-रोमञ्चुभिण्णएँण।
सप्परिवारे सुन्दरेण
थुइ आढत्त पुरन्दरेण ॥१॥
'जय अजरामर-पुर-परमेसर । जय जिण आइ पुराण महेसर ||२||
जय दय-चम्म-रयण-रयणायर । जय अण्णाण-तमोह-दिवायर ॥३॥
जय ससि मन्त्र-कुमुय-पडिवोहण । जय कल्लाण-णाण-गुण-रोहण ॥४॥
जय सुरगुरु तइलोक-पियामह ।
जय-संसार महाडइ-हुयवह ॥७॥
जय वम्मह-णिम्महण महाउस । जय कलि-कोह-हुआसणे पाउस ॥६॥
जय कसायघण-पलयसमीरण । जय माणइरि-पुरन्दरपहरण ॥७॥
जय इन्दिय-गयउले पञ्चाणण । जय तिहुमण-सिरि-मामालिङ्गण ॥८॥
जय कम्मारि-मडफ्कर-मक्षण । जय णिमल णिरवेक्स णिरक्षण ॥९
घत्ता
तुह सासणु दुह-णासणु एवहिं उण्णइ चडियउ ।
जे होन्तण पहवन्तण जगु संसार ण पडियउ॥१०॥
[९]
तं वलु तं देवागमणु सो जिणवरु तं सभसरणु।
पेक्खैत्रि उववण अवयरित जाउ महन्तउ अच्छरिउ ॥१॥
पण पुरिमताले जो राणउ । रिसहसेणु णामेण पहाणउ ॥२॥
सो देवागमु णिऍवि पहासिउ । 'को सयडामुह-वणे आवासिउ ॥३॥
कासु एउ एवड्डु पहुत्तणु ।
जेण विमाणहि णवइ णहङ्गणु' ॥४॥
तं णिसुणेवि केण अफालिउ । एम देव मई सव्वु णिहालिउ ॥५॥
भरहेसरहों वप्पु जो सुव्वइ । महि-बल्लहु भणेवि जो थुम्वइ ॥६॥
केवल-णाणु तासु उप्पण्णउ । अट्ठ-महागुणड्ढि-संपण्णउ' ॥७॥
तं णिसुणेवि मरहे मेलिउ।
स-वलु स-बन्धुवग्गु संचल्लिड ॥6॥
तं समसरणु पइड तुरन्तउ। 'जय देवाहिदेव' पभणन्तड ॥९॥

तईओ संधि [८] रोमांचसे अत्यन्त पुलकित शरीर इन्द्र ऐरावतके कन्धेसे उतर पड़ा और उसने अपने परिवारके साथ स्तुति प्रारम्भ की "हे, अजर-अमर लोकके स्वामी, आपकी जय हो, आदिपुराणके परमेश्वर जिन, आपकी जय हो। दयाल्पी रत्नके लिए रत्नाकरके समान, आपकी जय हो। अज्ञानतमके समूहके लिए दिवाकरके समान, आपकी जय हो, भन्यजनरूपी कुमुदोंको प्रतिवोधित करनेवाले आपकी जय हो, कल्याण गुण- स्थान और ज्ञानपर आरोहण करनेवाले आपकी जय हो, हे वृहस्पति, त्रिलोकपितामह, आपकी जय हो, संसाररूपी अटवी के लिए दावानलकी तरह आपकी जय हो, कामदेवका मथन करनेवाले महायु, आपकी जय हो, कलिको क्रोधरूपी ज्वाला शान्त करनेके लिए पावसकी तरह, आपकी जय हो, कषायरूपी मेघोंके लिए प्रलयपवनकी तरह, आपकी जय हो, मानरूपी पर्वतके लिए इन्द्रवज्रके समान, आपकी जय हो, इन्द्रियरूपी गजसमूहके लिए सिंहके समान, आपकी जय हो, त्रिभुवन- शोभारूपी रामाका आलिंगन करनेवाले, आपकी जय हो, कर्म- रूपी शत्रुओंका अहंकार चूर-चूर करनेवाले आपकी जय हो, निष्फल अपेक्षाहीन और निरंजन, आपकी जय हो ॥१-९|| पत्ता-तुम्हारा शासन दुःखका नाश करनेवाला है, इस समय यह उन्नतिके शिखरपर है, इसके प्रभावशील होनेपर जग भवचक्रमें नहीं पड़ेगा ॥१०॥ [९] वह सेवा, वह देवागमन, वह जिनवर, वह समव- सरण, ( इन सबको) उपवनमें अवतरित होते हुए देखकर, महान् आश्चर्य हुआ, ऋषभसेन नामक राजाको, जो पुरिम- ताल पुरका प्रधान राणा था। उस देवागमको देखकर उसने कहा, "शकटामुख, उद्यानमें कौन ठहरा है ? इतना बड़ा प्रभुत्व किसका है, कि जिससे विमानोंके कारण आकाश झुक गया -

५६
पउमचरित
घत्ता
तेएं तण
पइसन्तण
'एं वेसेंण उडेसण
सुरह मि विव्ममु लाइड।
किं मयरद्धउ आइउ' ॥१०॥
[१०]
पेक्खेवि तं देवागमणु सो जिणु तं जि समोसरणु ।
भव-भय-सऍहिं समल्लइड रिसहसंणु पहु पन्चइउ ॥१॥
तेण समाणु परम गम्भेमर । दिक्ख. ठिय चउरासी णरवर ॥२॥
चउ-कल्लाण-विहूइ-सणाहहाँ। गणहर ते जि हूय जग-णाहहाँ ॥३॥
अवर वि जे जे भावे लइया । चउरासी सहास पव्वइया ॥४॥
एयारह-गुणठाण-समिद्धहूँ। तिण्णि लरख सावयहुँ पसिद्धहुँ ॥५॥
अजिय-गणहाँ सङ्घ के वुज्मिय। देव वि दुक्क्यि-कम्म-मलुझिय ॥६॥
थिय चउपासे परम-जिणिन्दहों। ण तारा-गह पुण्णिम-चन्दहों ॥७॥
वइरई परिससवि थिय वणयर । महिस तुरङ्गम केसरि कुञ्जर ॥८॥
घत्ता
अहि णउल वि थिय सयल वि एकहि उवसम-माण ।
किय-सेवहाँ पुरणवहाँ केवल-णाण-पहाण ॥९॥
[११]
ताम विणिग्गय दिव्व झुणि कहइ तिलोअहाँ परम-मुणि ।
वन्ध-विमोक्ख-कालवल धम्माहम्म-महाफलई ॥१॥
पुग्गल-जीवाजीव-पउत्तिउ। भामव-संवर-णिज्जर-गुत्तिउ ॥२॥
सजम-णियम-लेस-वय-दाण: । तब-सीलोववास-गुणठाण ॥३॥
सम्मइंसण-णाण-चरित्तइँ। सग्ग-मोक्स-ससार-णिमित्त: ॥४॥

तईनो संधि chc' ।" यह सुनकर किसीने कहा, "हे देव, मैने सब कुछ देख लिया है, जो भरतेश्वरके पिता सुने जाते हैं, और जिनकी महीवल्लभ कहकर स्तुति की जाती है, उन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है, वह आठ महान गुणों और ऋद्धियोंसे सम्पूर्ण है।" यह सुनकर, और अभिमानसे मुक्त होकर राजा ऋपभसेन सेना और बन्धुवर्गके साथ चला। वह शीघ्र उस समवसरण में, देवाधिदेवकी जय बोलता हुआ पहुंच गया ।।१-९।। पत्ता-तेजके साथ प्रवेश करते हुए उस राजाने देवोंको भी विभ्रममें डाल दिया, कि इस वैशमें कामदेव किस संकल्पसे यहाँ आया है ? ॥१०॥ [१०] वह देवागमन, वह जिन और वह समवसरण देखकर संसारके सैकड़ों भयोंसे आकुल ऋपभसेन राजाने संन्यास ग्रहण कर लिया। उसके साथ, अत्यन्त गर्वीले चौरासी राजाओंने दीक्षा ले ली, जो चार कल्याणोंकी विभूतिसे युक्त जनके स्वामी परम जिनके गणधर बने। और भी अपने-अपने भावके अनुसार चौरासी हजार नरवर प्रत्रजित हुए, जो ग्यारह गुणस्थानों से समृद्ध थे, तीन लाख प्रसिद्ध श्रावक, आर्यिकागणकी संख्या कौन जान सकता है, पापकर्मके मलसे रहित देवता भी, परम जिनेन्द्र के चारों ओर इस प्रकार स्थित थे. जैसे पूर्णचन्द्र के आसपास तारा और नक्षत्र हो। वनचर भी अपना वैर भूलकर स्थित थे, महिप, तुरंग, सिंह और गज ॥१-८11 पत्ता-सांप और नेवला सभी उपदाम भाव धारण कर एक जगह स्थित हो गये. कृतसेव पुरदेव ऋषभ जिनके केवल- सानके प्रभावसे ||२|| [११] उननेमें दिव्यध्वनि निकलनी शुरू हुई। निलोकके महामुनि कहते हैं, "वन्धन-मोक्ष, काल-बल, धर्म-अधर्मका

५८
पउमचरिउ
णव पयत्य सज्झाय-ज्झाण.।
सायर-पल्ल-पुन्च-कोडीयउ।
कालइँ खेत्त-भाव-परदचई।
णरय-तिरय-मणुअत्त-सुरत्त ।
तित्थयरत्तणाई इन्दत्तइँ ।
सुर-णर-उच्छेहाउ-पमाण ॥५॥
लोयविहाय-कम्मपयडीयउ ॥६॥
वारह अङ्गइ चउदह पुन्बई ॥७॥
कुलयर-हलहर-चक्कहरत्त: ॥८॥
सिद्धत्तणइ मि कहइ समत्तई ॥९॥
घन्ता
कि बहुवेण आलावण तिहुअणे सयले गविठ्ठउ ।
णउ एक्कु वि तिल-मैत्तु वि तं जि जिणेण ण दिट्ठउ ॥१०॥
[१२]
धम्मक्खाणु सयलु सुणे वि चञ्चलु जीविउ मणे मुणवि ।
भव-भव-मय-सय-गय-मणही उवसमु जाउ सन्च-जणहाँ ॥१॥
केण वि पञ्चाणुब्बय लइया।
लोउ करेवि के वि पन्वइया ॥२॥
केहि मि गुणवयाइँ अणुसरियई । केहि मि सिक्खावयइँ परियई ॥३॥
मउणाणस्थमियई अवरेश्वहिं। अण्ण हि किय णिवित्तिअण्णेकहि ॥४
जो जं मग्गइ तं तहाँ देइ । हत्थु भडारड णउ खञ्इ ॥॥
अमर वि गय सम्मत्तु लएप्पिणु। णिय णिय-लिय-वाहणहि चडेप्पिणु ॥
जिण-धवलहों वि धवल सिंहासणु। पण्णारस-विसट्ट-थेरासणु ॥७॥
अग्मिय सेय छत्त सिय-चामरु । दिव्य मास भामण्डलु सेहरु ॥६॥
घत्ता
तिहुअण-पहु हय-वम्महु
तहों थाणहाँ उज्जाणहों
केवल-किरण-दिवायरु।
गड तं गङ्गा-सायरु॥९॥

तईओ संधि
महाफल, पुद्गल जीव और अजीवकी प्रवृत्तियाँ, आश्रव संवर-
निर्जरा और गुप्तियाँ, संयम-नियम-लेश्या-व्रत-दान-तप-शील-
उपवास, गुणस्थान-सम्यग्दर्शन-ज्ञान और चरित्र, स्वर्ग-मोक्ष
और संसारके कारण, नौ प्रशस्त सत् ध्यान, देवों और मनुष्यों-
की मृत्यु और आयुका प्रभाव । सागर पल्य पूर्व और कोड़ा-
कोड़ी। लोकविभाग कर्मप्रकृतियाँ। काल-क्षेत्र-भाव-परद्रव्य ।
वारह अंग और चौदह पूर्व, नरक, तिथंच, मनुष्यत्व और
देवत्व, कुलकर, वलदेव और चक्रवर्ती । तीर्थकरत्व और इन्द्रत्व
और सिद्धत्वका वह संक्षेपमें कथन करते हैं ॥१-९||
घत्ता-बहुत कहनेसे क्या ? उन्होंने त्रिभुवनकी खोज कर
ली थी, तिलके बरावर भी ऐसा नहीं था कि जिसे जिन
भगवान्ने न देखा हो ॥१०॥
[१२] समस्त धर्माख्यान सुनकर और जीवनको मनमें
चंचल समझकर, भवभवके सैकड़ों भयोंसे भीतमन सबको
उपशमभाव प्राप्त हुआ। किसीने पाँच अणुव्रत लिये, कोई केश
लोंच करके प्रबजित हो गया, किन्हींने गुणवतोंका अनुसरण
किया, किसीने शिक्षाव्रत लिये, दूसरोंने मौन और अनर्थदण्ड
व्रत ग्रहण लिया, दूसरोंने दूसरोंसे निवृत्ति ले ली, जो-जो
मॉगता, वह उसे वह-वह देते। आदरणीय जिनने अपना हाथ
नहीं खींचा। देव भी सम्यक्त्व ग्रहण करके चले गये अपने-
अपने निकायोंके लिए विमानोंपर आरूढ़ होकर । जिन धवल
का सिंहासन भी धवल था। पन्द्रह कमलोंपर उनका स्थिर
आसन था। सफेद तीन छत्र लगे हुए थे; सफेद चामर, दिव्य-
ध्वनि और भामण्डल ||१-८॥
वत्ता-कामका नाश करनेवाले, त्रिभुवनके स्वामी और
केवलज्ञान दिवाकर परम जिन उस उद्यानसे गंगासागरकी
ओर गये ॥९॥

पउमचरित
[३]
तहि अवसर भरहेसरहों सयल-पुहइ-परमेसरहों।
पर-चक्केहि मिणविय कम जार रिद्धि सुर-रिद्धि-सम ||१॥
मालूर-पवर-पीवर-थणाहै।
छण्णवइ सहास वरङ्गणाहे ॥२॥
तहाँ दह-पञ्चासउ णन्दणाहुँ । चउरासी लक्खइँ सन्दणाहुँ ॥३॥
चउरासी लक्खइँ गयवराहुँ ।
अट्ठारह कोडिड हयवराहुँ ॥४॥
कोडीउ तिण्णि वर-घेणुवाहुँ । बत्तीस सहास राहिवाहुँ ॥५॥
वत्तीस सहास मण्डलाहुँ । कम्मन्त कोडि पवहइ हलाहुँ ॥६॥
णव णिहियउ रयण सत्त-सत्त । छक्खण्ड इ मेइणि एक-छत्त ॥७॥
घत्ता
जिह वप्पण
तिह पुतण
माहप्पण
जुमन्तण
लइड णाणु तं केवलु।
स ई भु य-वलण महीयलु ॥॥
४. चउत्थो संधि
सहिहुँ वरिस-सहासहिं पुण्ण-जयासहि भरहु अउज्झ पईसरह ।
णव-णिनियर-धारउ कलह-पियारउ चक्क-रचणु ण पईपरइ ॥१॥
[१]
पइसरइ ण पट्टणे चक्क-स्यणु । जिह अवुहब्भन्तर सुकइ-वयणु ॥१॥
जिह वम्मयारि-मुहें काम-सत्थु । जिह गोढङ्गणे मणि-रयण-पत्थु ॥२॥
जिह वारि-णिवत्रणहत्यि-जूहु । जिह दुज्जण-जणे सजण-ममूहु ॥३॥

चउत्थो संधि [१३] उसी अवसरपर समस्त पृथ्वीके महेश्वर भरतेश्वर- को देवोंकी ऋद्धिके समान ऋद्धि प्राप्त हुई, जिसकी परम्परा शत्रुराजाओं द्वारा भी नमित थी । वेलफलके समान प्रवर और स्थूल स्तनवाली उसकी छियानवे हजार रानियाँ थी। उनके पाँच हजार पुत्र थे। चौरासी लाख रथ, चौरासी लाख गजवर, अठारह करोड़ अश्ववर, बत्तीस हजार राजा, बत्तीस हजार मण्डल, खेतीके लिए एक करोड़ हल, नौ निधियॉ, चौदह रत्न, छह खण्डोंकी एकछत्र धरती ||१-७॥ घत्ताजिस प्रकार पिताने गौरवके साथ केवलज्ञान प्राप्त किया इसी प्रकार पुत्रने जूझते हुए अपने हाथोंसे धरती प्राप्त की। चौथी सन्धि जयकी आझासे पूर्व साठ हजार वर्षांके बाद भरत अयोध्या में प्रवेश करते हैं। परन्तु नया और पैनी धारवाला फला प्रिय उसका चक्ररत्न प्रवेश नहीं करता। [2] चक्ररत्न नगरमे प्रवेश नहीं करता, जिस प्रकार अज्ञानीमै सुकविकी वाणी, जिस प्रकार ब्रह्मचारीक मुखमे कामगाख, जिस प्रकार गोठप्रांगणमे मणि रत्न और वस्त्र, जिन्न प्रकार वारके टेमे गजसमूह. जिम प्रकार दुर्जनांके बीच मजनसमूह. जिस प्रकार कृपणक घर भिक्षुकममूह, जिन प्रकार शुक्ल पक्षमे कृष्ण पक्षका चन्द्र, जिस प्रकार

६२
पउमचरित्र
जिह किविण-णिहेलणेपणइ-विन्दु । जिह बहुल-पक्खें खय-दिवस-चन्दु ॥
जिह कामिणि-जणुमाणुसें अदचें। जिह सम्मईसणु दूर-भव्वं ॥५॥
जिह महुअरि-कुलु दुग्गन्धे रण्णें। जिह गुरु-गरहिउ अण्णाण-कणे ॥६॥
जिह परम-सोक्षु संसार-धम्म। जिह जोव-दया-वरु पाव-कम्मे ॥७॥
पढम-विहत्तिह तप्पुरिसु जेम । ण पईसइ उज्झहें चक्कु तेम ॥८॥
घत्ता
तं पैक्खेंवि थक्कन्तउ
विग्घु करन्तउ णरवइ वेहाविद्धड ।
'कहहु मन्ति-सामन्तहाँ जस-जय-मन्तहाँ किमहु को वि अमिद्धउ' ॥९॥
[२]
तं णिसुणे वि मन्तिहिं वुत्तु एम । 'ज चिन्तहि तं तं सिद्ध देव ॥१॥
छक्खण्ड वसुन्धरि णव णिहाण। चउदह-विदेहि स्यणेहिं समाण ॥२॥
गवणवइ सहास महागराहुँ। वत्तीस सहास देसन्तराहुँ ॥३॥
भवराइ मि सिदइँ जाइँ जाइ। को लक्खे वि सक्कइ ताई ताई ॥४॥
पर एक्कु ण मिज्झइ साहिमाणु । सय-पञ्च-सवाय-धणु-प्पमाणु ॥५॥
तित्थङ्कर-णन्दणु तुह कणिछु । अट्ठाणवइहिं माइहि वरिठ्ठ ॥६॥
पोभण-परमेसरु चरम-देहु । अखलिय-मन्टु जयलच्छिनोहु ॥७॥
दुवार-वइरि-वीरन्त-कालु। णामेण बाहुबलि वल-विसालु ॥४॥
घत्ता
सोहु जेम पक्खरियउ खन्तिएँ धरियउ जइ सो कह वि वियदृइ ।
तो सहुँ खन्धावार एक्क-पहारें पइ मि देव दलवइ ॥१॥
[३]
तं वयणु सुर्णेवि दट्ठाहरेण । मरहेण मरह-परमेसरेण ॥१॥
पट्टविय महन्ता तुरिय तासु । 'युच्चइ करें केर णराहिवासु ॥२॥
जइ णउ पडिवण्णु कयाबि एम । ता तेम करहु महु मिडइ जेम' ॥२॥

चउत्थो संधि - ? निर्धन मनुष्यमें कामिनी-जन, जिस प्रकार दूरभव्यमें सम्यग्दर्शन, जिस प्रकार दुर्गन्धित वनमें मधुकरी-कुल, जिस प्रकार अज्ञानीके कानमें गुरुकी निन्दा, जिस प्रकार संसारधर्म- में परम सुख, जिस प्रकार पापकर्म में उत्तम जीवदया, जिस प्रकार प्रथमा विभक्तिमें तत्पुरुप समास प्रवेश नहीं करती, उसी प्रकार अयोध्यामें चक्ररत्न प्रवेश नहीं करता ॥१-८।। पत्ता-विघ्न करते हुए उस स्थिर चक्रको देखकर नरपति भरत क्रोधसे भर उठा और बोला, "यश और जयका रहस्य जाननेवाले हे मन्त्रियो, कहो क्या कोई मेरे लिए असिद्ध (अजेय) वचा है ? ॥९॥ [२] यह सुनकर मन्त्रियोंने इस प्रकार कहा, "देव, जो तुम सोचते हो वह तो सिद्ध हो चुका है। छह खण्ड धरती, नौ निधियाँ, चौदह प्रकारके रत्न, निन्यानवे हजार खदानें और वत्तीस हजार देशान्तर। और भी जो-जो चीजें सिद्ध हुई है, उनको कौन दिखा सकता है ? परन्तु एक स्वाभिमानी सिद्ध नहीं हुआ है, वह है साढ़े पांच सौ धनुप प्रमाण, तीर्थकर- का पुत्र, तुम्हारा छोटा भाई, परन्तु अट्ठानबे भाइयोंमें बड़ा पोदनपुरका राजा, चरम शरीरी, अस्खलितमान और जय- लक्ष्मीका घर, दुर्वार वैरियोंके लिए अन्तकाल, वलमें विशाल, और नामसे बाहुवलि ॥१-८॥ बत्ता-सिंहकी तरह संनद्ध, पर शान्ति धारण करनेवाला, वह यदि कमी आ जाये, तो एक ही प्रहारमें सेनासहित, हे देव, तुम्हें चूर चूर कर दे" ||९|| ३] यह सुनकर, भरतके परमेश्वर भरतने ओंठ काटते दुग. मीत्र उनके पास मन्त्री भेजे कि उससे कहो कि "वह राजाको उपना माने । यदि किसी प्रकार वह यह स्वीकार नहीं फरना ना ना करना जिससे वह हमसे लड़ जाये।" सिखाये

पदमचरित
सिक्वविय महन्ता गय तुरन्त । णिवसिढ़े पोयणु-णयह पत्त ४
पुज्जेंवि पुच्छिय 'भागमणु काई। तेहि मि कहिय वयणा ताई ॥५॥
'को तुहुँ को भरहु ण भेउ को त्रि। पुहवीसरु दीसइ गम्पि तो वि ॥६॥
जिह मायर अट्ठाणवइ इयर । जीनन्ति करें वि तहाँ सणिय कर
सिंह सुहुँ मि मढफरु परिहरवि । जिउ रायहाँ करी कर लवि' ॥८॥
वत्ता
तं णिसुणे वि मय-मीस वाहुवलीसें मरह-दूअ णिमच्छिय ।
'एक कर वप्पिक्की पिहिमि गुरुकी अवर कर ण पडिच्छिय ॥९॥
[४]
पवसन्त परम-जिणेपरेण । जंकि पि विहज्जेवि दिण्णु तेण ॥१॥
तं अम्हहुँ सासणु सुह-णिहाणु । किड विप्पिड णड केण वि समाणु ॥
सो पिहिमिहें हउँ पोयणहाँ सामि। उ रेमि ण लेमि ण पासु जामि ॥
दिखूण तेण किर कवणु कञ्जु । किं तासु पसाएँ करमि रज्जु ॥४॥
किं तहों वलेण हर्ड दुण्णिवारु । किं तहाँ वलेण महु पुरिसयारु ॥५॥
कि तहों वरुण पाइक-होउ । कि तहों वलेण सम्पय-विहोउ' ॥६॥
जंगजिउ वाहुवलीसरेण । पोयण-पुरवर-परमेसरेण ॥७॥
तं कोवाणल-पजसन्तएहि । णिउमच्छिउ भरह-महन्तएहि ॥८॥
घत्ता
'जह दि तुन्छ इमु मण्डलु बहु-चिन्तिय-फलु भासि समप्पिउ वप् ।
गामु सोमु खलु खेत्तु वि सरिसब-मेत्तु वि तो वि ण हि विणु कप्पै ॥९॥
तं वयणु सुणेवि पलम्ब-बाहु । णं चन्दाइचहुँ कुविउ राहु ॥१॥
'कहों तणउ रज्जु कहाँवणउ भरहु । जं जाणहु तं महु मिलेंवि करहु ॥२॥

चउत्थो संधि ६५ गये मन्त्री तुरन्त गये। और आधे निमिषमें पोदनपुरमें पहुँच गये। आदर करके वाहुवलिने पूछा-"किसलिए आगमन किया।" उन्होंने भी वे वचन सुना दिये, "तुम कौन, और भरत कौन ? दोनोंमें कोई भेद नहीं है तो भी जाकर उससे तुम्हें मिलना चाहिए, जिस प्रकार दूसरे अट्ठानवे भाई है, जो उसकी सेवा कर जीते हैं, उसी प्रकार तुम अभिमान छोड़कर राजाकी सेवा अंगीकार कर जिओ" ॥१-८॥ पत्ता-भयभीषण बाहुबलिने यह सुनकर भरतके दूतोंको अपमानित करते हुए कहा, "एक बापकी आज्ञा, और एक उनकी धरती, दूसरी आज्ञा स्वीकार नहीं की जा सकती ? |९|| [४] "प्रवास करते हुए परम जिनेश्वरने जो कुछ भी विभाजन करके दिया है, वही हमारा सुखनिधान शासन है । मैने किसीके साथ, कुछ भी बुरा नहीं किया, मैं उसी धरतीका स्वामी हूँ। न मैं लेता हूँ न देता हूँ और न उसके पास जाना । उससे भेंट करनेसे कौन काम होगा? क्या मै उसकी कृपा- से राज्य करता हूँ, क्या उसकी ताकतसे मैं दुर्निवार हूँ ? क्या उसकी ताकतसे मेरा पुरुषार्थ है ? क्या उसकी ताकतसे मेरी प्रजा है? क्या उसकी ताकतसे मैं सम्पत्तिका भोग करता हूँ ?' इस प्रकार जब पोदनपुरनरेठा वाहुबलि गरजा, तो भरतके मन्त्रियोंका क्रोध भड़क उठा, उन्होंने उसका तिरस्कार किया ।।१-८॥ पत्ता-"यद्यपि यह भूमिमण्डल तुम्हे पिताके द्वारा दिया गया है, परन्तु इसका एकमात्र फल बहुचिन्ता है, विना कर हिये, ग्राम, मीमा, खल और क्षेत्र तो क्या ? सरसोंके बराबर धरती भी तुम्हारी नहीं है" ॥९॥ [५] यह वचन सुनकर प्रलम्बबाहु बाहुबलि क्रुद्ध हो उठा मानो सूर्य और चन्द्र पर राह ही कुपित हुआ हो। (वह चोला), ? ?

६६
पउमचरित
सो एकच वहइ गन्छ ।
णउ जाणइ होसह केम कज्जु ।
परियलइ जेण तहाँ तणउ दप्पु ।
वावल्ल-मल्ल-कण्णिय-करालु ।
तं सुणे वि महन्ता गय तुरन्त ।
जंजेम चविउ त कहिउ तेम ।
किर वसिकिउमई महिवी सन्दु ॥३॥
कहों पासिउ णीसावष्णु रज्जु ॥
तं तेहउ कल्लएँ देमि कप्पु ॥५॥
मुग्गर-भुसुण्डि-पटिस-विसालु' ॥६॥
णिविसद्ध भरहहाँ पासु पत्त ॥७॥
'पइँ तिण-सरिसो वि ण गणइ देव ॥
घत्ता
ण करइ केर तुहारी रिउखयकारी णिन्मउ माणे महाइट।
मेइणि-रवणु समु. वि रण-पिटु मण्डे वि जुज्म-सज्ज थिउ दाइड ॥९॥
[६]
तं णिसुणे वि शत्ति पलित्तु राउ। जलणु जाल-माला-सहाउ ॥१॥
देवाविट लहु सण्णाह-तूरु । सण्णमइ सनहसु सुहड-सूरु ॥२॥
आरिट वलु चउरमु ताम। अट्ठारह अक्खोहणिड जाम ॥३॥
परिचिन्तिय णव णिहि संचलन्ति । जे सन्दण-वेसे परिभमन्ति ॥४॥
महाकाल कालु माणव पण्ड । पउमक्खु सहखु पिनलु पचण्ड ॥५॥
गइसप्पु रयणु णव णिहिउ एय। णं थिय बहु-मायहिं पुण्ण-भेय ॥६॥
णव-जोयणा तुनत्तणेण । वारह सप्पासनत्तणेण ॥७॥
अट्टोयर गम्भीरत्तणेण । सहुँ जक्ख-सहासे रक्खणेण ॥८॥
दावि वत्यई की वि भोयणइँ देइ । कावि रयणइ का वि पहरण िणे ॥९॥
कॉवि हय गय कॉवि ओसहिउ परइ । विष्णाणाहरणहुँ को वि हरह ॥१०॥

चउत्यो संधि ? 'किसका राज्य ? किसका भरत ? जैसा समझो वैसा तुम सब मिलकर मेरा कर लो, वह एक चक्रसे ही यह घमण्ड करता है कि मैंने समूची धरती ( महीपीठ) अधीन कर ली है। नहीं जानता वह कि इससे क्या काम होगा ? समस्त राज्य, किसके पास रहा? मैं उसे कल ऐसा कर दूंगा कि जिससे उसका सारा दर्प चूर-चूर हो जायेगा? वह क्या वावल्ल मल्ल और कर्णिकसे भयंकर तथा मुद्गर भुसुण्ढि और पट्टिशसे विशाल होगा।" यह सुनकर मन्त्री शीघ्र गये और आधे पलमें भरतके पास पहुंचे। जैसा उसने कहा था वैसा उन्होंने सब बता दिया कि हे देव, वह तुम्हें तिनकेके बराबर भी नहीं समझता ॥१-८॥ पत्ता-शत्रुओंका नाश करनेवाली वह तुम्हारी आज्ञा नहीं मानता । महनीय वह मानमें परिपूर्ण है। मेदिनीरमण वह सौतेला भाई बलपूर्वक रणपीठ रचकर युद्धके लिए तैयार बैठा है ॥९॥ - [६] यह सुनकर राजा तुरत आगबबूला हो गया, मानो ज्वालामालासे सहित आग ही हो? उसने शीघ्र प्रस्थानकी मेरी वजवा दी, और सुभटशूर वह शीघ्र वेगसे तैयार होने लगा, इतनेमें चतुरंग सेना उमड़ पड़ी, तव तक अठारह अक्षौहिणी सेना भी आ गयी। चिन्तन करते ही नवनिधियाँ चलने लगी, जो स्यन्दनके रूपमें परिभ्रमण कर रही थीं। महाकाल, काल, माणवक, पण्ड, पद्माक्ष, शंख, पिंगल, प्रचण्ड, नैसर्प ये नौ रत्न और निधियाँ भी ये ही थीं, मानो पुण्यका रहस्य ही नौ भागोंमे विभक्त होकर स्थित हो गया हो। ऊँचाई में नौ योजन, लम्बाई-चौड़ाईमें बारह योजन, गम्भीरतामें आठ। जिसके एक हजार यक्ष रक्षक हैं ? कोई वस्त्र, कोई भोजन देती है, कोई रत्न देती है और कोई प्रहरण (अस्त्र) लाती है । कोई अश्व और गज, कोई औपधि लाकर रखती है।

पउमचरित
घत्ता
चम-चक-सेणावह हयगय-गहवइ छत्त-दण्ड-णेमित्तिय ।
कागणि-मणि-स्थवइ थिय खग्ग-पुरोहिय ते वि चउद्दह चिन्तिय ॥१॥
भसङ्ख ॥था
[७]
गउ भरहु पयाणउ देवि जाम । हेरिऍहिं कणि?हाँ कहिउ ताम ॥१॥
'सहसा णीसरु सण्णहें वि देव । दीसइ पडिवक्खु समुदु जेम' ॥२॥
तं सुणे वि स-रोसु पलम्ब-वाहु । सण्णज्झइ पोयण-णयर-णाहु ॥३॥
पडु पडह समाहय दिण्ण सड्ड । धय दण्ड छत्त उन्मिय
किउ कलयलु लइयई पहरणाई। कर-पहर-पयट्टई वाहणा: ।।५।।
णीसरिउ सत्त सङ्घोहणीउ । एक्कर सेण्णएँ अक्खोहणीउ ॥६॥
भरहेसर-बाहुवली वि ते वि। आसण्णइँ ढुक्कइँ वलइँ वे चि ॥७॥
। सवडंमुह धय धयवढहुँ देवि 160
हय हयहुँ महानाय गयवराहुँ । मड भव्हुँ महा-रह रहवराहुँ ।।९।।
घत्ता
देवासुर-बल-सरिस। वदिय-हरिसई कन्चुय-कवय-विसट्टई।
एकमेक कोकन्तइँ रणे हकन्तई उभय-वलइँ - भन्मिट्टई ॥१०॥
[6]
अभिट्टई वड्डिय-कलयलाई। भरहेसर-वाहुवली-वलाई ॥॥
वाहिय-रह-चोइय-वारणा। अणवरयामेल्लिय-पहरणाइँ ॥२॥
लुअ-जुण्ण-जोत्त-खण्डिय-धुराई । दारिय-णियम्ब-कप्पिय-उराइँ ॥३॥
णिवट्टिय-भुभ-पाडिय-सिरा।। धुय-खन्ध-कवन्ध-पणचिराइ ॥१॥
गय-दन्त-छोह-मिण्णुज्मदाइ। उच्चाइय-पटिपेल्लिय-मडाइँ ॥५॥
पडिहय-विणिवाइय-गयघडाई । अच्छोडिय-मोडिय-धयवदाइँ ॥६॥

चउत्थो संधि ६९ कोई विज्ञान और आभरण लाती है ।।१-२०॥ पत्ता-चर्म, चक्र, सेनापति, हय, गज, गृहपति, छत्र, दण्ड, नैमित्तिक, कागनी, मणि, स्थपति, खड्ग और पुरोहित इन चौदह रत्नोंका भी उसने चिन्तन किया ।।११।। [७] जैसे ही कूच करके भरत गया, वैसे ही सन्देश- वाहकोंने छोटे भाईसे कहा, "हे देव, शीघ्र तैयार होकर निकलिए । प्रतिपक्ष समुद्रकी तरह दिखाई दे रहा है।" यह सुनकर पोदनपुरनरेश बाहुबलि क्रोधके साथ तैयार होने लगा। पटपटह बजा दिये गये। शंख फूक दिये गये, असंख्य ध्वज दण्ड और छत्र उठा लिये गये, कोलाहल होने लगा, शस्त्र ले लिये गये, सेनाएँ हाथोंसे प्रहार करने लगी, क्षुब्ध कर देने वाली सात सेनाएँ निकली, एकमें एक अक्षौहिणी सेना थी। भरतेश्वर और वाहुबलि, दोनों ही, निकट पहुंचे, दोनों सेनाएँ भी। आमने-सामने ध्वजपटोंपर ध्वज देकर। घोड़ोंसे घोड़, महागजोंसे महागज, योद्धासे योद्धा, महारथोंसे महारथ ॥१-२॥ धत्ता बढ रहा है हर्प जिनमें, कंचुक और कवचसे विशिष्ट ऐसी दोनों सेनाएँ, युद्धमें हॉक देती हुई, एक-दूसरे को ललकारती हुई, देवासुर सेनाओंकी तरह एक-दूसरेसे भिड़ गयीं ॥१०॥ [८] भरतेश्चर और बाहुबलिकी सेनाएँ भिड़ गयीं, कोलाहल होने लगा, रथ हॉक दिये गये। हाथी प्रेरित किये जाने लगे। लगातार अस्त्र छोड़े जाने लगे। जीर्ण जोते (रथोंकी ) कट गयीं, धुरे टुकड़े-टुकड़े हो गये, नितम्ब कट गये, उर टुकड़े-टुकड़े हो गये, भुजाएँ कट गयीं, सिर गिरने लगे. कन्धे कांपने लगे, कवन्ध नाचने लगे। गजदन्तोंके प्रहारसे योद्धा छिन्न-भिन्न हो गये, भटोमें धक्का-मुक्की होने लगी। प्रतिप्रहारसे गजघटा धरतीपर गिरने लगी। ध्वजपट गिरने

पउमचरित
मुसुमूरिय-चूरिय- हवराहूँ।
रुहिरोलइँ सरे हि विहावियाई।
दलवष्टिय-लोहिय-रहयवराई ।।७॥
गं वे वि कुसुम्भेहि रावियाई ।।८।।
घत्ता
पेक्खें वि वलइँ घुलन्त महिहिं पडन्तइँ मन्तिहि परिय म मण्डहाँ।
किं वहिएण वराएं भढ-संघाएँ दिहि-जुन्यु चरि मण्डहाँ ॥५॥
[९]
पहिलड जुज्झेवउ दिहि-जुज्यु । जल-जुज्झु पटीवड मल्ल-जुन्यु ॥॥
जो तिणि मि जुज्म जिणइ अज्जु । तहाँ णिहि तहाँ रयणइ तासु रज्जाशा
तं णिसुण वि दुक्खु णिवारिया। साहण. वे वि ओसारियाई ॥३॥
लहु दिहि-जुन्झु पारदु तेहिं । जिण-णन्द-सुणन्दा-णन्दणेहिं ॥४॥
अवलोइड भरहें पदमु भाइ । कइलासे कजण-सइलु गाइँ ॥५॥
असिय-सियायम्ब विहाह दिहि। णं कुवलय-कमल-रविन्द-विहि ॥६॥
पुणु जोइड वाहुवलीसरेण । सरें कुमुय-सण्डु णं दिणयरेण ॥७॥
अवरामुह-हेटामुह-मुहाई। णं वर-वहु-वयण-सरोरुहाई ॥८॥
पत्ता
उवरिल्लियएँ विसालएँ भिउडि-करालएँ हेहिम दिट्टि परजिय ।
णं णव-जोवणइत्ती चञ्चल-चित्ती कुलबहु इजएँ तजिय ॥९॥
[१०]
जं जिणें वि ण सकिउ दिहि-जुन्झु । पारडु खणः सलिल-जुन्छ ॥१॥
जलें पइटः पिहिमि-पोयण-णरिन्द । णं माणस-सरवरें सुरनाइन्द ॥२॥
एत्यन्तरें महि-परमेसरेण । आढोहें वि सलिलु समच्छरेण ॥३॥
पमुक्क झलक सहोयरासु। णं वेल समु? महिहरासु ॥४॥
छुड वाहुवलिहें वच्छयलु पत्त। णिमच्छिय असइ व पुणु णियत्त ॥५॥

चउत्थो संधि और मुड़ने लगे। महारथ चकनाचूर किये जाने लगे, हयवर चूर होकर लोटने लगे। तीरोंसे छिन्न-भिन्न और रक्तरंजित, दोनों सेनाएँ मानो कुसुम्भीरंगसे रंग गयीं ॥१-८॥ पत्ता-सेनाओंको नष्ट होते और धरतीपर गिरते हुए देखकर मन्त्रियों ने रोका कि मत लड़ो, वेचारे योद्धाओंके वधसे क्या ? अच्छा है यदि दृष्टि-युद्ध करो ॥९॥ [९] पहले दृष्टियुद्ध किया जाये, फिर जलयुद्ध और मल्ल- युद्ध । जो तीनों युद्ध आज जीत लेता है, तो उसकी निधियाँ, उसके रत्न और उसीका राज्य ! यह सुनकर, दोनों सेनाएँ बड़ी कठिनाईसे हटायी गयीं। उन्होंने शीघ्र ही दृष्टियुद्ध प्रारम्भ किया, (जिननन्दा और सुनन्दाके पुत्रोंने )। पहले भरतने अपने भाईको देखा, मानो कैलासने सुमेरु पर्वतको देखा हो। उसकी काली, सफेद और लाल दृष्टि ऐसी लग रही थी मानो कुवलय कमल और अरविन्दोंकी वर्षा हो। उसके बाद वाहु- वलिने देखा, मानो सरोवरमें कुमुद-समूहको दिनकरने देखा हो। उनके ऊपर-नीचे मुख ऐसे जान पड़ते थे मानो उत्तम वधुओंके मुखकमल हों ।।१-८॥ घत्ता-भौहोंसे भयंकर ऊपरकी विशाल दृष्टिसे नीचेकी दृष्टि पराजित हो गयी, मानो नवयौवनवाली चंचल चित्त कुलवधूसासके द्वारा डॉट दी गयी हो ॥९॥ [१०] जब भरत दृष्टि-युद्ध न जीत सका, तब क्षणार्धमें जलयुद्ध प्रारम्भ कर दिया गया। पृथ्वीका राजा भरत और पोदनपुरका राजा बाहुबलि दोनों जलमें घुसे, मानो मानस सरोवरमे ऐरावत गज घुसे हों। इसी बीच, धरतीके स्वामीने ईर्ष्याके साथ पानीको हिलाया और भाई पर धारा छोड़ी, मानो समुद्रकी वेला महीधर पर छोड़ी गयी हो। वह धारा शीच ही बाहुबलिके वक्षस्थल पर पहुंची, और असती स्त्री की

पउमचरित
परथिय(१) र तोय तुमार-धवल । णं णहें तारा-णिउरुम्ब वहल ॥६॥
पुणु पच्छ' वाहुवलीसरण । आमल्लिय सलिल-झलक तेण ॥७॥
उढाइय चल-णिम्मल-तरङ्ग । णं संचारिम आयास गन ॥८॥
ओहटिउ भरहेसरु थिउ मुह-कायरु गरुअ-रहल्लए लइयउ ।
सुरयारहण-वियाएं विरह-झलक्कएँ मग्गु व दुप्पव्वइयउ ॥९॥
[११]
जंजिणेंविण सक्किउ सलिल-जुझु। पारधु पडीवड मल्ल-जुन्झु ॥१॥
आवील-विकच्छउ वल-महल्ल । अक्खाडएँ णाई पइट्ट मल ॥२॥
ओवग्गिय
पुणु
किय
वाहु-सह
णं भिडिय सुवन्त-
-तियन्त सद्द ॥३॥
वहु-वन्धहिं दुकर-कत्तरीहि । विण्णाणहि करणहि मामरीहि ॥४॥
सहुँ भरहे सुइरु करवि वामु । पुणु पच्छएँ दरिसिउ णियय-थामु ॥५॥
उच्चाइउ उभय-करें हिं णरिन्दु। सकेण व जम्मणे जिण-वरिन्दु ॥६॥
एत्यन्तरें वाहुवलीसरासु। आमेलिउ देवेहि कुसुम-वासु ॥७॥
किउ कलयतु साहणे विजउ घुटु । णरणाहु विलक्खीहूउ सहु ॥४॥
घत्ता
चक्क-रयणु परिचिन्तउ उप्परि घत्तिउ चरम-देहु ते वञ्चिउ ।
पसरिय-कर-णिउरुम्वें दिणयर-विम्वें णाई मेरु परिभञ्चिउ ॥९॥
.
[१२]
जं मुक्कु चाकु चक्सरेण।
तं चिन्तिउ वाहुवलीसरेण ॥३॥
'किं पहु अप्फालमि महिहि अन्जु । णं ण धिगत्थु परिहरमि रज्नु ॥२॥
रजहाँ कारण किज्जइ अजुत्तु । धाएवउ भाएर वप्पु पुत्तु ॥३॥

चउत्यो संधि तरह अपमानित होकर शीघ्र ही लौट आयी। उसके वक्षस्थल पर जलके तुषार धवल कण ऐसे मालूम हो रहे थे मानो आकाशमें प्रचुर तारा समूह हो! फिर बादमें बाहुबलीश्वरने जलकी धारा छोड़ी, मानो चंचल निर्मल तरंग ही हो, मानो आकाशगंगा ही संचारित कर दी गयी हो ॥१-८॥ पत्ता-भरतेश्वर हट गया। भारी लहरसे आक्रान्त वह अपना कायरमुख लेकर रह गया, उसी प्रकार जिस प्रकार, कामकी पीड़ासे व्यथित, विरहकी ज्वालासे भग्न खोटा संन्यासी ॥९॥ [११] जव भरत जलयुद्ध नहीं जीत सका तो उसने शीघ्र ही मल्लयुद्ध प्रारम्भ किया। कसकर लंगोट पहने हुए दोनों ही क्लमें महान थे, अखाड़े में जैसे मल्लोंने प्रवेश किया हो, ताल ठोकते हुए उन्होंने आक्रमण किया, मानो सुबन्त तिङन्त शब्द आपसमें भिड़ गये हों। बाहुबलिने वहुवन्ध, ढुक्कुर, कर्तरी, विज्ञान करण और भामरीके द्वारा, भरतके साथ खूब देर तक व्यायाम कर, फिर बादमें अपनी शक्तिका प्रदर्शन किया। दोनों हाथोंसे नरेन्द्रको उठा लिया जैसे इन्द्रने जन्मके समय जिन- वरको उठा लिया था। इसके अनन्तर देवोंने बाहुबलीश्वरके ऊपर कुसुम वृष्टि की। सेनामें कोलाहल होने लगा। विजयकी घोषणा कर दी गयी। नरनाथ अत्यन्त व्याकुल हो उठा ॥१-८॥ पत्ता-भरतने रत्नका चिन्तन किया और उसे बाहुबलिके ऊपर छोड़ा, चरस शरीरी वह, उससे बच गये, (ऐसा लग रहा था), जैसे अपनी प्रसरित किरण समूहसे युक्त दिनकरने मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा की हो ।।९।। [१२] जव चक्रेश्वरने चक्र छोड़ा, तव बाहुबलीश्वरने सोचा कि मैं प्रभुको आज धरती पर गिरा दूं, नहीं नहीं, मुझे धिक्कार है, मैं राज्य छोड़ देता हूँ। राज्यके लिए अनुचित किया जाता

पउमचरित
किं आए साहमि परम-मोक्तु । जहि लम्मइ भचलु भणन्तु सोक्तु ॥४॥
परिचिन्तेवि सुइरु मणेण एम । पुणु थविउ णराहिउ ढिम्भु जेम ॥५॥
'महु तणिय पिहिमि तहुँ मुझे माय । सोमप्पहु केर करेइ राय' ॥९॥
सुणिसल्लु करवि जिणु गुरु भणेवि । थिउ पञ्च मुटिसिरे लोड देवि ॥७॥
ओलम्बिय-करयलु एकु वरिस। अविभोलु भचलुगिरि मेरु सरिसु ॥८॥
पत्ता
वेड्ढिउ सुठु विसालेह वेल्ली-जाले हिँ अहि-विच्छिय-वम्मीयहि ।
खणु वि ण मुकु भडारउ मयण-वियारउ णं संसारहों मीयहिं ॥९॥
[३]
एत्थन्तरें केवल-णाण-बाहु । कहलासें परिटिड रिसहणाहु ॥१॥
तइलोक-पियामहु जग-जणेरु । समसरणु वि सभाणु स-पादिहरु ॥२॥
थोवेहि दिवसेंहि मरहेसरो वि। तहाँ वन्दण-हत्तिएँ भाउ सो वि ॥३॥
थोत्तुग्गीरिय गुरु-पुरउ भाइ। परलोय-मूलें इहलोउ णाई ॥४॥
वन्देप्पिणु दसविह-धम्म-पालु।
पुणु पुच्छिउ तिहुवण-सामिसालु ॥५॥
'वाहुबलि भडारा सुह-णिहाणु। के कजें अज्जु ण होइ णाणु ॥६॥
तं णिसुणवि परम-जिणेसरेण । वजरिउ दिन्ध-मासन्तरेण ॥७॥
'अज वि ईसीसि कसाउ तासु । जं खेत्ते तुहारऍ किड णिवासु ॥४॥
घत्ता
जइ भरहहों जि समप्पिड तो किं चप्पिउ मई चलणेहि महि-मण्डलु ।
एण कसाएं लइयउ
सो
पवइयत तेण ण पावह केवलु' ॥९॥

चउत्यो संधि है, भाई, बाप और पुत्र को मार दिया जाता है। इससे क्या, मैं मोक्षकी साधना करूँगा ? जहाँ अनन्त और अचल सुख प्राप्त होता है। बहुत देर तक मनमें यह विचार करनेके बाद वाहुबलिने नराधिपको बच्चेकी भाँति रख दिया और कहा, "हे भाई, तुम मेरी धरतीका भी उपभोग करो, हे राजन् ! सोमप्रभ भी आपकी सेवा करेगा। इस प्रकार उन्हें अच्छी तरह निःशल्य कर, जिनगुरु कहकर, पाँच मुट्टियोंसे केश लोंच करके वह स्थित हो गये, एक वर्ष तक अवलम्बित कर, सुमेरु पर्वतकी तरह अकस्पित और अविचल ॥१-८॥ धत्ता-बड़ी-बड़ी लताओं, साँपों, बिच्छुओं और वामियोंने उन्हें अच्छी तरह घेर लिया, मानो संसारकी भीतियोंने ही, कामको नष्ट करनेवाले, परम आदरणीय बाहुबलिको एक क्षणके लिए न छोड़ा हो ॥९॥ [१३] इसके अनन्तर केवलज्ञान है बाहु जिनका, ऐसे ऋपभनाथ कैलास पर्वत पर प्रतिष्ठित हुए। त्रिलोकके पितामह और जगत्पिता का,समवशरण,गण और प्रातिहार्योंकेसाथ।थोड़े ही दिनोंके बाद, भरतेश्वर भी उनकी वन्दनाभक्ति करनेके लिए आया । गुरुके सम्मुख स्तोत्र पढ़ता हुआ ऐसा शोभित हो रहा था, मानो परलोकके मूलमें इहलोक हो। इस प्रकारके धर्मका पालन करनेवाले उनकी वन्दना कर, फिर उसने त्रिभुवन स्वामि- श्रेष्ठसे पूछा, "हे आदरणीय, शुभनिधान बाहुबलिको किस कारण आज भी केवलज्ञान नहीं हो रहा है ?" यह, सुनकर परमेश्वरने दिव्यभाषामें कहा-"आज भी ईपत् ईर्ष्या कपाय उनके मनमें है कि जो उन्होंने तुम्हारी धरती पर निवास कर रखा है ॥१-८॥ पत्ता-जब मैंने अपनी धरती भरतको समर्पित कर दी, तव मैंने अपने पैरोंसे उसकी धरती क्यों चाप रखी है ? उनमें यह

पउमचरित
[१४]
तं वयणु सुर्णेवि गउ भरहु तेत्थु । वाहुबलि-भडारउ अचलु जेत्थु ॥१॥
सव्वगु पडिउ चलणेहि तासु । 'तउ तणिय पिहिमि हउँ तुम्ह दासुर
विण्णवइ समावइ एम जाम । चउ घाइ-कम्म गय खयहाँ ताम ॥३॥
उप्पण्णउ केवल-णाणु विमलु । थिउ देहु खणढ़े दुद्ध-धवलु ॥४॥
पउमासणु मूसणु सेय-चमरु ।
भा-मण्डलु एक ज छत्तु पवरु ॥५॥
भत्यक्कएँ आइट सुर-णिकाउ । तित्थयर-पुत्तु केवलिउ जाउ ॥६॥
थोवहिं दिवसहि तिहुअण-जणारि। णासिय घाइय-कम्म वि चयारि ॥७॥
अट्ठविह-कम्म-वन्धण-विमुक्कु । सिद्धउ सिद्धालउ णवर ढुक्कु ॥८॥
घत्ता
रिसहु वि गउणिवाणहाँ साणय-थाणहाँ भरहु वि णिन्खुइ पत्तउ ।
अक्ककित्ति थिउ उज्मह दणु दुग्गेज्झहें रज्जु स ई भु अन्तउ ॥९॥
५. पञ्चमो संधि
अक्सइ गोत्तम-सामि
सुणि सेणिय उत्पत्ति
तिहुमण-लद्ध-पसंसहुँ।
रक्तस-वाणर-वंसहुँ ॥३॥

पञ्चमो संधि कषाय है, इसीलिए प्रव्रज्या लेनेके बाद भी वे केवलज्ञान नहीं पा सके ॥९॥ [१४] यह वचन सुनकर भरत वहाँ गया जहाँ आदरणीय वाहुवलि अचल स्थित थे। उनके चरणों में सर्वांग गिरकर, उन्होंने कहा, "धरती तुम्हारी है, मैं तुम्हारा दास हूँ।" जबतक भरत यह निवेदन करता है और क्षमा माँगता है तबतक वाहुबलिके चार घातिया कर्म नष्ट हो गये। उन्हें विमल केवलज्ञान उत्पन्न हो गया। आधे क्षणमें ही उनकी देह दुग्धधवल हो गयी । पद्मासन अलंकार श्वेतचमर एक भामण्डल और प्रवर छत्र उत्पन्न हो गये । सहसा देवसमूह वहाँ आ गया क्योंकि तीर्थकरके पुत्र बाहुवलि केवली हुए थे। थोड़े ही दिनों में त्रिभुवनके शत्रुने चार घातिया कर्मका नाश कर दिया। और इस प्रकार, आठ कर्मोके बन्धनसे विमुक्त होकर सिद्ध हो गये और सिद्धालयमें जा पहुंचे ॥१-८॥ पत्ता-ऋषभनाथ भी शाश्वत स्थान निर्वाण चले गये। भरतेश्वरको भी वैराग्य हो गया। दनुके लिए दुर्भाह्य अयोध्या नगरीमें अर्ककीर्ति प्रतिष्ठित हुआ। यह स्वयं राज्यका भोग करने लगा ॥९॥ पाँचवीं सन्धि गौतम स्वामी कहते हैं, "श्रेणिक, तीनों लोकोंमें प्रशंसा पानेवाले राक्षस एवं वानर वंशकी उत्पत्ति सुनो।"

७८
पउमचरित
[.]
तहि जै अउज्महि वह कालें । उच्छपणे णरवर-तरु-जालें ॥३॥
विमलेक्खुक्क-वंसें उप्पण्णउ। धरणीधरु सुरुव-संपण्णउ ॥२॥
नासु पुत्तु णामें तियसभउ । पुणु जियसत्तु रणगणें दुजउ ॥३॥
तासु विजय महरयि मणोहर । परिणिय थिर-मालर-पओहर ॥४॥
ताहं गम भव-भय-खय-गारउ। उप्पजइ सुउ अजिय-मडारउ ॥५॥
रिसहु जेम वसुहार-णिमित्त । रिसहु जैम मेरुहि अहिसित्तउ ॥६॥
रिसहु जेम थिउ वालक्कीलए। रिसहु जेम परिणाविउ लीलए ।
रिसहु जेम रज्जु इ भुञ्जन्ते। एक्क-दिवसें णन्दणवणु जन्ते ॥८॥
घत्ता
पवणुद्धउ सरु दिट्ट
णाई विलासिणि-लोउ
पप्फुल्लिय-सयवत्तउ ।
उन्मिय-करु णचन्तउ ॥९॥
[ २ ]
सो जि महासरु तहि जे वणालए । दिट्ठ जिणाहिवेण वेत्तालए ॥१॥
मउलिय-दलु विच्छाय-सरोरुहु । णं दुजण-जणु भोहुलिय-मुहु ॥२॥
तं णिएवि गउ परम-विसायहों। वह एह जि गइ जीवहाँ जायहाँ॥३
जो जीवन्तु दिट्ट पुन्वण्हए। सो अङ्गार पुञ्ज अवरणहए ॥४॥
जो णरवर-लक्खेंहि पणविजइ । सो पहु मुउउ अवारें णिज्जइ ॥५॥
जिह सम्झाएँ एउ पङ्कय-वणु । तिह जराएं घाइज्जइ जोवणु ॥६॥
जीविउ जमेण सरीरु हुआसें । सत्तहँ काले रिद्धि विणासें ॥७॥
चिन्तइ एम भडारउ जावं हिं। लोयन्तियहि विवोहिउ तावहिं॥८॥

पनमो संधि
[१] बहुत समय बीत जानेपर अयोध्यामें राजाओंकी वंश-
परम्पराका वृक्ष उच्छिन्न हो गया। तब विमल इक्ष्वाकुवंशमें
सौन्दर्यसे सम्पूर्ण धरणीधर नामका राजा हुआ। उसके दो पुत्र
हुए, एक नामसे त्रिरथंजय और दूसरा जितशत्रु, जो युद्धप्रांगणमें
अजेय थे। उसकी विजया नामकी सुन्दर स्थूल वेलफलके समान
स्तनोंवाली पत्नी थी। उसके गर्भसे भवभयका नाश करनेवाले
आदरणीय अजित जिन उत्पन्न होंगे। ऋषभनाथकी तरह जो
रत्नवृष्टि के निमित्त थे। उन्हींके समान सुमेरु पर्वतपर अभिषिक्त
हुए । ऋषभकी भाँति बालक्रीड़ामें स्थित थे, ऋषभके समान ही
उन्होंने लीलापूर्वक विवाह किया। ऋषभके समान उन्होंने
स्वयं राज्यका उपभोग किया, एक दिन नन्दनवनके लिए जाते
हुए।
पत्ता-हवासे चंचल एक सरोवर देखा, जिसमें कमल
खिले हुए थे, वह ऐसा लग रहा था मानो विलासिनी-लोक ही
हाथ ऊँचे किये हुए नाच रहा हो ॥९॥
२] उसी सरोवरको उसी वनालयमें, जब जिनाधिपने सायं-
काल देखा तो उसके कमल कुम्हला चुके थे, उसके दल मुकुलित
हो गये थे, जैसे अपना मुख नीचा किये हुए दुर्जनजन ही हों। यह
देखकर उन्हें बहुत दुःख हुआ-"लो लो प्रत्येक जन्म लेनेवाले
जीवकी यही दशा होगी। पूर्वाह्नमें जो जीवित दीख पड़ता है,
वह अपराहमें राखका ढेर रह जाता है, जिस नरश्रेष्ठको लाखों
लोग प्रणाम करते हैं, वही प्रभु मरनेपर स्मशानमें ले जाया जाता
है। जिस प्रकार सन्ध्यासे यह कमलवन, उसी प्रकार जरासे
चीवन नष्ट होता है । यमसे जीव, आगसे शरीर, समयसे शक्ति,
पिनागसे ऋद्धि नाशको प्राप्त होती है। जब आदरणीय अजित
जिन यह सोच ही रहे थे कि लोकान्तिक देवोंने आकर उन्हें
प्रतियोधित किया।॥८॥

८०
पउमचरिउ
चउबिह-देव-णिकाएं
जिणु पन्वइड तुरन्तु
घत्ता
आए कलि-मल-नाहियउ।
दमहि सहामहि सहियउ ॥९॥
[३]
थिउ छट्टोववासें सुर-सारउ ।
वम्हयत्त-घर थक्कु मढारउ ॥१॥
रिसहु जेम पारणउ करप्पिणु । चउदह संवच्छर विहरेप्पिणु ॥२॥
सुक्क-आणु आऊरिउ णिम्मलु । पुणु उप्पण्णु णाणु तहों केवलु ॥३॥
अट्ट वि पाडिहेर समसरणउ । जिह रिसहहाँ तिह देवागमणउ ॥४॥
गणहर णवइ लक्खु वर-माहुहुँ। वम्मह-मल्ल-णिसुम्मण-य हुहुँ ॥५॥
तहिं में काले जियसत्तु-सहोयरु । तियसञ्जयहाँ पुत्तु जयसायरु ॥६॥
जयसायरहों पुत्तु सुमणोहरु । णाम सयर सयल-चकेसरु ॥७॥
भरहु जेम सहुँ णवहि णिहाणहि । रयणे हि चउदह-विहहि-पहाणहिं ॥४॥
घत्ता
सयक-पिहिमि-परिपालु एक्क-दिवसें चहुलगे।
जीउ व कम्म-वसेण णिउ अवहरेंवि तुरतें ॥९॥
[४]
दुहु तुरङ्गमु चञ्चल-छायहाँ। गयउ पणास वि पच्छिम-भायहाँ॥१॥
पइसईसुण्णारण्णु महाडइ। जहिं कलि-कालहों हियवउ पाडइ॥२॥
दुक्खु दुक्खु हरि दमिउ परिन्दें। ण मयरद्धउ परम-जिणिन्दें ॥३॥
वाम महा-सरु दीसह स-कमलु । चल-वीई तरङ्ग-मगुर-जलु ॥४॥
तहि लय-मण्ड उप्पल्लाणवि । सलिलु पिएवि तुरङ्गमु ण्हाणे वि॥५॥
समु मलइ वेत्तालहों जावे हि । तिलयकेस सम्पाइय ताहि ॥६॥
धीय सुलोयणाहाँ चलवन्तहाँ। वहिणि सहोयरिदससयणेत्तहाँ ॥७॥
किर सहुँ सहियहि ढुक्कइ सरवरु । दीसह ताम सयरु पिहिमीसरु ॥८॥

पलामो संधि पत्ता-चार निकायोंके देवोंके आनेपर कलियुगके पापोंसे रहित अजित जिनने तुरन्त दस हजार मनुष्योंके साथ दीक्षा ग्रहण कर ली ॥९॥ [३छठा उपवास करनेके अनन्तर आदरणीय अजित ब्रह्म- दत्तके घर पहुंचे। ऋषभनाथके समान आहार ग्रहण कर और चौदह वर्ष तक विहार कर उन्होंने अपना निर्मल शुक्लध्यान पूरा किया। फिर उन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हो गया । आठ प्राति- हार्य और समवसरण, तथा जिस प्रकार ऋषभके लिए देवागमन हुआ था उसी प्रकार इनके लिए भी हुआ। गणधर और काम- रूपी मल्लका विनाश करनेवाले बाहुओंसे युक्त नौ लाख साधु (उनके साथ) थे। इसी अवसरपर जयसागरका, जो त्रिदशंजय- का पुत्र और जितशत्रुका भाई था, सगर नामका सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। भरतके समान ही नौ निधियों और चौदह प्रकारके मुख्य रत्नोंसे युक्त था ॥१-८॥ धत्ता--एक दिन समस्त धरतीका पालन करनेवाले उसे (सगरको) उनका चंचल घोड़ा उसी प्रकार अपहरण करके ले गया, जिस प्रकार जीवको कर्म ले जाता है ।।२।। [४] वह दुष्ट घोड़ा, चंचल कान्तिवाले पश्चिम भागमें भाग कर एक सूने जंगलवाली महाटवीमें प्रवेश करता है। उस अटवी- को देखकर कलिकालका भी हृदय दहल उठता था। राजाने बड़ी कठिनाईसे घोड़ेको वशमें किया, जैसे जिनेन्द्रने कामदेव- को वशमें किया हो। इतने में उसे कमलोंसे युक्त महासरोवर दिखाई देता है, जिसकी तरंगें चंचल थीं, और जल लहरोंसे भंगुर था। वहाँ लतामण्डपमें उतरकर, पानी पीकर और घोड़े- को स्नान कराकर जैसे ही वह सन्ध्याकालका थोड़ा-सा समय विताता है, वैसे ही तिलककेशा वहाँ आती है, बलवान सुलोचन को कन्या और सहस्रनयनकी सगी बहन । वह सहेलियोंके साथ ६

पउमचरित
घत्ता
विद्धी काम-सरेहिं एक्कु वि पर ण पयः।
णाई सयम्वर-माल दिहि णिवहाँ आवदृइ ॥९॥
केण वि कहिउ गम्पि सहसक्खहाँ। 'कोहल कि एउ ण लक्खहाँ ॥१॥
एक्कु अणग-समाणु जवाणउ । णउ जाणहुँ कि पिहिमिह राण ॥२॥
तं पेक्खेंवि सस तुम्हहँ केरी।
काम-गहेण हूअ विवरेरी' ॥३॥
त णिसुणेवि राउ रोमञ्चित । अन्मन्तरे आणन्दु पणचिउ ॥४॥
'णेमित्तियहि आसि ज वुत्तउ ।
ऍउ तं सयरागमणु णिरुत्तउ' ॥५॥
मण परिचिन्तवि पप्फुल्लाणणु ।
गउ तुरन्तु तहिं दससयलोयणु ॥६॥
ते चउसद्वि-पुरिसलक्खण-धरु । जाणेंवि सयरु सयल-चकेसर ॥७॥
सिर करयल करेवि जोकारिउ । दिण्ण कण्ण पुणु पुरै पइसारित ॥४॥
घत्ता
लीलएँ भवणु पइछु विजाहर-परिवैदिउ ।
तुसेंवि दिण्णड तेण उत्तर-दाहिण-सेढिउ ||९||
[६]
तिलकेस लएप्पिणु गउ सयरु। पइसरिउ अउज्झाउरि-जयरु ।।१।।
सहसक्नु वि जणण-वहरु सरोवि । विजाहर-साहणु मैलवेंवि ॥२१॥
गड उप्परि वासु पुण्णघणहों। जें जीविउ हरिउ सुलोयणहाँ ॥३॥
रहणेउरचकवाल-जयरें। विणिकाइउ पुण्णमेहु समरें ॥४॥
जो तोयदवाहणु तासु सुड। सो रणमुहें कह वि कह वि ण मुउ ॥५
गउ हंस-विमाणे तुट-मणु । जहिं अजिय-जिणिन्द-समोसरणु ॥६॥
मम्भोस दिण्ण अमरेसरण । स-वइर-वित्तन्तु कहिउ गरेंण ॥७॥

पञ्चमो संधि सरोवरपर पहुँचती है कि इतनेमें उसे पृथ्वीश्वर सगर दिखाई देता है ।।१-८॥ घत्ता-वह कामवाणोंसे आहत हो जाती है और एक भी पग नहीं चल पाती। वह राजाको इस प्रकार देखती है जैसे स्वयंवरमाला ही डाल दी हो ॥१॥ [५] किसीने जाकर सहस्रनयनसे कहा, "क्या आपने यह कुतुहल नहीं देखा, एक कामदेवके समान युवक है, नहीं मालूम किस देशका राजा है, उसे देखकर तुम्हारी वहन कामग्रहसे पीड़ित हो उठी है" यह सुनकर सहस्रनयन पुलकित हो गया, और भीतर ही भीतर आनन्दसे नाच उठा, 'ज्योतिपियोंने जो कहा था, निश्चय ही यह उसी राजा सगरका आगमन है। यह सोचकर उसका चेहरा खिल गया। वह तुरन्त वहाँ गया, जहाँ सगर था। उसे चौसठ लक्षणोंसे युक्त पूर्ण चक्रवर्ती राजा सगर जानकर सिरपर हाथ ले जाकर, सहस्रनयनने जयकार किया। उसे कन्या देकर नगरमें प्रवेश कराया ॥१-८।। घत्ता-विद्याधरोंसे घिरे हुए उसने भवनमें लीलापूर्वक प्रवेश किया। सन्तुष्ट होकर उसने उत्तर-दक्षिण श्रेणी उसे प्रदान की ॥९॥ [६] सगर तिलककेशाको लेकर चला गया। उसने अयोध्या नगरीमें प्रवेश किया। सहस्रनयनने भी अपने पिताके वैरकी याद कर, विद्याधर सेनाको इकट्टी कर, उस पूर्णधनके ऊपर आक्रमण किया, जिसने उसके पिता सुलोचनके प्राणोंका अपारण किया था। रधन पुरचनवालपुरमें युद्ध में पूर्वमेध माग गया। उसका पुत्र जो तोयदवाहन था, वह युद्धके बीच गिनी प्रकार नाहीं मरा । यह नन्तुष्ट मन अपने हमविमानमें कार या गया. जहाँ अजित जिनेन्द्रका नमवसरण था। एनने उसे अभय वचन दिया। उसने शत्रुमाहित अपना नारा

पउमचरित
जे रिउ अशुपच्छएँ लग्ग तहाँ।
गय पासु पडीवा णिय-णिवहाँ ॥
घत्ता
तोयदवाहणु देव पाण लएविणु ण ।
जिम सिद्धाल' सिधु तिम समसरण पइठ्ठठ ॥९॥
[]
तं णिसुणे वि पहु शत्ति पलित्तउ । णं खड-हार हुआसणें वित्त ॥१॥
'मरु मरु जइ वि जाइ पायालहौँ । विसहर-मवण-मूल-घण-जालहीँ॥२॥
पइसइ जइ वि सरणु सुर-सेवहुँ । दसविह-मावणवासिय-देवहुँ ॥३॥
पइसइ जइ वि सरणु थिर-थाणहुँ । अछ विहहुँ विन्तर-गिब्वाणहुँ ॥४॥
पइसइ जइ वि सरणु दुव्वारहुँ। जोइस-देवहुँ पन्च-पयारहुँ ॥५॥
कप्पासरहुँ जइ वि अहमिन्दहुँ । वरुण-पवण-वइसवण-सुरिन्दहुँ ॥६॥
महु तोयदवाहणु' पइज करें वि गड दससयलोयणु ॥
पेक्षेवि माणथम्भु जिणिन्दहों। मच्छरु माणु वि गलिड गरिन्दहो॥४॥
सो वि गम्पि समसरणु पइड । जिणु पणवेप्पिणु पुरउ णिविठ्ठल ॥९॥
विहि मि मवन्तराइ बजरियई। 'विहि मि जणण-वइरई परिहरियई ।।
मरइ तो वि
घत्ता
भीम सुमीमहि ताम अहिणव-गहिय-पसाहणु।
पुन्व-भवन्तर हें अवरुण्डिड घणवाहणु ॥११॥
[4]
पमणइ मीमु मीम-मडमाणु । 'तुहु महु अण्ण-भवन्तरेणन्दणु ॥१॥
जिहि चिरु तिह एवहि मि पियारउ'। चुम्बिउ पुणु वि पुणु वि सयवारउ॥२॥
'लइ कामुक-विमाणु अवियारें। लइ रक्खसिय विज सहुँ हारें ॥३॥
भण्णु वि रयणायर-परियश्चिय । दुप्पइमार सुरेहि मि वन्चिय ॥२॥

पचमो संधि ८५ वृत्तान्त उसे बताया। उसके पीछे जो दुश्मन लगे हुए थे, वे लौटकर अपने राजाके पास गये ॥१-८॥ घत्ता-उन्होंने कहा-"देव, तोयदवाहन अपने प्राण लेकर भाग गया, वह समवसरणमें उसी प्रकार चला गया है जिस प्रकार सिद्धालयमें सिद्ध चले जाते हैं" ।।९।। [७] यह सुनकर राजा सहस्रनयन क्रोधसे जल उठा, मानो आगमें तृणसमूह डाल दिया गया हो। "मर-मर, वह यदि पातालमें भी जाता है जो विषधरभवनके मूल और मेघजालसे युक्त है। यदि वह इन्द्रकी सेवा करनेवाले दस प्रकारसे भवनवासी देवोंकी शरणमें प्रवेश करता है, यदि वह स्थिर स्थानवाले व्यन्तर देवोंकी शरणमें जाता है, यदि वह दुर्वार पाँच प्रकारके ज्योतिषदेवोंकी शरणमें जाता है, कल्पवासी देव अहमेन्द्र, वरुण, पवन, वैश्रवण और इन्द्रकी शरणमें जाता है, तो भी वह मुझसे मरेगा, यह प्रतिज्ञा करके सहस्रनयन वहाँसे कूच करता है। जिनेन्द्रका मानस्तम्भ देखकर, राजाका मान मत्सर गल गया। उसने भी जाकर, समवसरणमें प्रवेश किया, जिनमगवान्को प्रणाम कर सामने बैठ गया। वहाँ दोनोंके जन्मान्तर बताये गये, दोनोंसे पिताका वैर छुड़वाया गया ॥१-१०॥ घत्ता-तव अभिनव प्रसाधनसे युक्त तोयदवाहनका भीम सुभीमने पूर्वजन्मके स्नेहके कारण आलिंगन किया ॥११॥ [८] भयंकर योद्धाओंका भंजन करनेवाले भीमने कहा, "तुम जन्मान्तरमें मेरे पुत्र थे । जिस प्रकार उस समय, उसी प्रकार इस समय भी तुम मुझे प्यारे हो।" उसने उसे बार-बार सौ बार चूमा । विना किसी विचारके यह कामुक विमान लो, और हारके साथ, यह राक्षसविद्या भी, और समुद्रसे घिरी हुई, जिसमें प्रवेश करना कठिन है, जो देवताओंकी पहुँचसे

पउमचरित
तीस परम जोयण विस्थिण्णी। लक्षा-णयरि तुज्झु म. दिण्णी ॥५॥
अण्णु वि एक-वार छज्जोयण ।
लइ पायाललक घणवाहण' ॥६॥
भीम-महामीमहुँ आएसें। दिण्णु पयाणउ मणे परिमोसें ॥७॥
विमलकित्ति-विमलामल-मन्तिहिं । परिमिउ अवरहि मि सामन्तेहिं ॥८॥
घत्ता
लङ्काउरिहि पइट्ट अविचल रज्जे परिहिउ ।
रक्खस-वंसहाँ गाई पहिलउ कन्दु समुछिउ ॥९॥
[९]
वहवे काले वल-सम्पत्तिएँ। अजिय-जिणहाँ गउ वन्दण-हत्तिएँ ॥१॥
तं समसरणु पईसइ जावे हि । सयरु वि तहिं जे पराइड ताहि ॥२॥
पुच्छिउ णाहु पिहिमि-परिपालें। 'कइ होसन्ति भवन्त कालें ॥३॥
तुम्हें जेहा वय-गुण-वन्ता। कह तित्थयर देव भइकन्ता ॥४॥
तं णिसुण वि कन्दप्प-वियारउ । मागह-मासएँ कहइ भडारउ ॥५॥
'मई जेहउ केवल-संपण्णउ । एक्कु जि रिसहु देउ उप्पण्णउ ॥६॥
पइ जेहउ छक्खण्ड-पहाणउ । भरह-णराहिउ एक्कु जि राणउ ||७||
पइँ विणु दस होसन्ति गरेसर । मई विणु वावीस वि तित्थङ्कर ॥८॥
णव वलएव णव जि णारायण । हर एयारह णव जि दसाणण ||९||
अण्णु वि एकुणसडि पुराणई। जिण-सासणे होसन्ति पहाणई' ॥१०॥
घत्ता
तोयदवाहणु ताम भावे पुलउ वहन्तउ ।
दस-उत्तरें सएण भरहु जेम णिक्खन्तउ ॥११॥
[१०]
णिय-णन्दणहों णिहय-पडिवक्खहाँ । लङ्का-णयरि दिण्ण महरक्खहाँ ॥१॥
वहवे काले सासय-थाणहों। अजिय भडारउ गउ णिवाणहों।।२।।
सयरहाँ सयल पिहिमि भुञ्जन्तहों। रयण-णिहाणई परिपालन्तहाँ ॥३॥

N पञ्चमो संधि ८७ वंचित है, ऐसी तीस परमयोजन विस्तारवाली लंकानगरी, मैने तुम्हें दी। हे तोयदवाहन, एक और भी एक द्वार और छह योजनवाली पाताललंका लो।" इस प्रकार भीम और महाभीमके आदेशसे मनमें सन्तुष्ट होकर उसने प्रस्थान किया। विमल- कीर्ति और विमलवाहन मन्त्रियों तथा दूसरे सामन्तोंसे घिरे हुए॥१-८॥ अविचल रूपसे राज्यमें इस प्रकार प्रतिष्ठित हो गया जैसे राक्षस- वंशका पहला अंकुर फूटा हो।।९।। [९] बहुत दिनों बाद सेना और शक्तिसे सम्पन्न होकर वह अजितनाथकी वन्दना भक्ति करनेके लिए गया। जैसे ही वह समवसरणमें प्रवेश करता है वैसे ही सगर वहाँ आता है। वह भगवानसे पूछता है, "हे स्वामी, आनेवाले समयमें, आपके समान वय गुणवाले अतिक्रान्त कितने तीर्थकर होंगे?" यह सुनकर कामका विदारण करनेवाले आदरणीय परम जिन मागध भाषामें कहते हैं, "मेरे समान-केवलज्ञानसे सम्पूर्ण एक ही ऋपभ भट्टारक हुए है, तुम्हारे समान छह खण्ड धरती का स्वामी नराधिप भरत, एक ही हुआ है। तुम्हें छोड़कर दस राजा और होंगे, मेरे विना वाईस तीर्थंकर और होंगे। नौ चलदेव और नौ नारायण, ग्यारह शिव, और नौ प्रतिनारायण । और भी उनसठ, पुराणपुरुष जिनशासनमें होंगे ॥१-१०॥ घत्ता-तब तोयदवाहन भावविभोर हो उठा और एक सौ दस लोगोंके साथ भरतकी तरह दीक्षित हो गया ।।११।। [१०] प्रतिपक्षका नाश करनेवाले अपने पुत्र महारक्षको उसने लंकानगरी दे दी। बहुत समय होनेके बाद आदरणीय अजित जिन शाश्वत स्थान-निर्वाण चले गये। रत्नों और निधियोंका परिपालन, और समस्त धरतीका उपभोग करते हुए

८८
पउमचरित
सठि सहास हूय वर-पुत्तहुँ । सयल-कला-विण्णाण-णिउत्तहुँ ॥४॥
एक दिवसें जिण-मवण-णिवासही। वन्दण-हत्तिएँ गय कइलासहाँ ॥५॥
मरह-कियई मणि-कञ्चण-माणई। चउवीस वि बन्देप्पिणु थाणई ॥६॥
भणइ मईरहि सुछ वियक्खणु । करहुँ किं पि जिण-भवणहुँ रक्खणु ७॥
कठेवि गङ्ग भमाडहुँ पासें हिं । तं जि समथिउ भाइ-सहासेहिं ।।।
घत्ता
दण्ड-रयणु परिचित वि खोणि खणन्तु ममाडिउ ।
पायालइरिहं णाई वियड-उरस्थलु फाडिउ ॥९॥
[११]
तक्खणे खोहु जाउ महि-लोयहाँ। धरणिन्दहाँ सहास-फड-डोयहाँ ॥१॥
आसीविस-दिछिएँ णिक्खत्तिय । सयल वि छारहों पुञ्ज पवत्तिय ॥२॥
कह वि कह विण विदिटिहि पडिया। भीम-भईरहि वे उवरिया ॥३॥
दुम्मण दीण-वयण परियत्ता। लहु सफेय-णयरि संपत्ता ॥४॥
मन्तिहि कहिउ 'कहवि तिह मिन्दहाँ । जिह उडुन्ति ण पाण णरिन्दहाँ ॥५॥
ताम सहा-मण्डउ मण्डिज्जइ । आसणु आसणेण पीडिज्जइ ॥६॥
मेहलु मेहलेण आलग्गें। हारें हार मउडु
मउडग्गें ॥७॥
सयर-णरिन्दासण-संकासई। वइसणाहुँ वाणवह सहासई ॥८॥
धत्ता
णरवइ आउल-चित्तु सव्वत्थाणु विहावइ ।
सछि सहासहुँ मज एक्कु वि पुत्तु ण आवइ ॥९॥
[१२]
भीम-भईरहि ताम पइट्ठा ।
णिय-णिय-आसणे गम्पि णिविट्ठा।।१।।
पुच्छिय पुणु परिपालिय-रज्जें।
'इयर ण पइसरन्ति किं कज्जे ॥२॥
तेहि विणालणाई विच्छायई। तामरसाई व णिधुयगायई ॥३॥

पचमो संधि राजा सगरके साठ हजार पुत्र हुए, जो समस्त कलाओं और विज्ञानमें निपुण थे। एक दिन वे कैलासके जिनमन्दिरोंके दर्शन करनेके लिए गये। भरतके द्वारा बनवाये गये मणि और स्वर्ण- 'मय चौवीस मन्दिरोंकी वन्दना कर अत्यन्त विचक्षण भगीरथ कहता है कि जिनमन्दिरोंकी रक्षाके लिए कुछ करना चाहता हूँ। गंगाको निकालकर मन्दिरोंके चारों ओर घुमा दिया जाये, इसका दूसरे हजारों भाइयोंने समर्थन किया ॥१-८॥ पत्ता-उन्होंने दण्डरलका चिन्तन कर, धरती खोदते हुए घुमा दिया, जैसे उसने पातालगिरिका विकट उरस्थल फाड़ दिया।॥९॥ [११] नागलोकमें उसी समय क्षोभ उत्पन्न हो गया। धरणेन्द्रके हजारों फन डोल उठे। उसने अपनी विषैली दृष्टिसे देखा उससे सव कुछ राखका ढोर हो गया। भीम और भगीरथ किसी प्रकार उसकी दृष्टिमें नहीं पड़े इसलिए ये दोनों बच गये। दुर्मन दीनमुख वे लौटे और शीघ्र ही साकेत नगर पहुंचे। तव मन्त्रियोंने कहा, "किसी प्रकार ऐसे रहस्यका उद्घाटन करो जिससे राजाके प्राण-पखेरून उड़ें।" एक ऐसा सभा भण्डप बनाया जाये जिसमें आसनसे आसन सटे हों, और मेखलासे मेखला लगी हो, हारसे हार, तथा मुकुटसे मुकुट । सगर राजा- के आसनके समान बैठनेके लिए वानवे हजार आसन बनाये जायें॥१-८॥ पत्ता-व्याकुल चित्त राजा सव स्थानको देखता है कि साठ हजार पुत्रोंमें से एक भी पुत्र नहीं आया है ।।९।। [१२] इतनेमें भीम और भगीरथने प्रवेश किया। वे अपने- अपने आसनपर जाकर बैठ गये। तब राज्यका पालन करनेवाले भगीरथने पूछा, "किस कारणसे दूसरे पुत्र नहीं आये ? उनके विना ये आसन शोभाहीन हैं, और हैं निधूत-

९०
पउमचरित
तं णिसुणेवि चयणु तहाँ मन्तिहिं । जाणाविउ पच्छण्ण-पउत्तिहि ॥२॥
'हे गरवइ णिय-कुलहाँ पईवा। गय दियहा कि एन्ति पढीवा ।।५।।
जलवाहिणि-पवाह णिचूडा । परियत्तन्ति काई ते मुढा ॥६॥
घण-घट्टियई विज्जु-विप्फुरियई। सुविणय-वालमाव-संचरियई ॥७॥
जलवुन्वुव-तरङ्ग-सुरचावहै। कह दीसन्ति विणासु ण भावइ ॥८॥
घत्ता
भरह-वाहुवलि-रिसह काल-भुभतें गिलिया ।
कर दीसन्ति पढीवा उज्झहिं एकहि मिलिया ।।९।।
[१३]
जं णिहरिसु समासए दिपणउ । तं चकवइहें हियवउ मिण्णउ ॥१॥
'तेण 0 ते अस्थाणु ण दुक्का ।
फुड्डु महु केरउ पेसणु चुका ॥२॥
लद्धावसर हिं जं अणुहुन्तउ ।
मइरहि-भीमहि कहिउ णिरुत्तउ ॥३॥
तं णिसुणेवि राउ मुच्छंगउ । पडिउ महदुमुच्च पवणाहउ ॥४॥
तहि मि कालें सामिय-सम्माणेहि । भिञ्चहिं जेम ण मेल्लिड पाणे हि ॥५॥
दुक्खु दुक्खु दूरझिय-यणु । उठ्ठिउ सव्वगागय-चेयणु ॥६॥
'किं सोए कि खन्धावार । वरि पावज्ज लेमि अवियारं ।।७।।
आयएँ लच्छिएँ वहु जुज्झाविय । पाहुणया इव वहु बोलाविय ॥८॥
घत्ता
जो जो को वि जुवाणु तासु तासु कुलउत्ती।
मेइणि छेञ्छइ जेम कवणे गरेंण ण भुत्ती' ॥९॥

पानमा संघि मोरे नमान । राजाके यह वचन सुनकर मन्त्रियोंने गन्न अभियान बताते हुए कहा, "ह राजन् . अपने कुलके प्रा. और दिन. जाकर क्या वापन आते हैं ? नदीक जो प्रया का क. मूर्य उनके वापस आनेकी आगा क्यों करते भयोमा वर्षण. विशुनका कुरण, न्यप्न और बालभावकी Fa, जलबुदबुद तरंग और इन्द्रधनुप कितनी देर दिखते है, ज्यानका विनाश नहीं होता? ॥१-८॥ पना भग्न बावलि और ऋषभ फाल रूपी नाग द्वारा नगर निगर। क्या वे एक साथ मिलकर अब अयोध्याम feer 1: मन्त्रिमाने नशेपमें जो उनमारण दिया उससे गन- मगर निगया। बाद लोचना, सि जिन मा रमारमे नाग मरेकमसे पट रि. मेगा मगाम हो चुका । अवनर मिलने पर भीग और ने का अनुभव किया था पामय पा दिया। मा in UK गना ने पवन मानकर मार *: RITA अवसर पर मप्रागाने, सम्मानिन अपमाति, मेना में ना कर परेशान नाना "": { वा मोना) -मन ... | ...... ... ..Part - ८.1 وم rom Er. AHI 14 पउमचरित [१४] पभणिउ मीमु 'होहि दिख रज्जहाँ । हउँ पुणु जामि थामि णिय-कज्जहाँ ॥ तेण वि वुत्तु 'णाहिं वउ भामि । छेन्छइ पई जि कहिय णउ भुञ्जमि ॥२ चतु भीम मइरहि हक्कारिउ । दिण्ण पिहिमि वइसण वइसारिउ ॥३॥ अप्पुणु भरहु जेम णिक्खन्तउ । तउ करवि पुणु णिवुइ पत्तउ ॥४॥ ता एत्त विणिहय-पडिवक्खहाँ। रज्जु करन्तहाँ तहाँ महरक्खहाँ ॥१॥ देवरक्खु उप्पण्णउ णन्दणु । णरवइ एक-दिवसें गउ उववणु ॥६॥ कोलण-वॉहिहें परिमिउ णारिहि । पहाइ गइन्दु व सहुँ गणियारिहि ॥७॥ णिवडिय तासु दि ितहिं भवसरे । जहि मुउ महुयरु कमलमन्तरें॥८॥ । घत्ता चिन्तिउ 'जिह धुअगाउ रस-लम्पड अच्छन्तउ । तिह कामाउर सन्चु कामिणि-वयणासत्त' ॥९॥ [१५] णिय-मणे जाइ विसायहाँ जाउँ हिँ । सवण-सङ्घु संपाइड ताहिँ ॥१॥ सयल वि रिसि तियाल-जोगेसर । महकइ गमय वाइ वाईसर ॥२॥ सयल वि वन्धु-सत्तु-सममावा । तिण-कञ्चण-परिहरण-सहावा ॥३॥ सयल वि जल्ल-मलसिय-देहा । धोरत्तणण महीहर-जेहा ॥४॥ सयल वि णिय-तव-तेएं दिणयर । गम्भीरत्तणेण रयणायर ॥५॥ सयल वि घोर-वीर-तव-तत्ता। सयल वि सयल-सङ्ग-परिचत्ता ॥६॥ सयल वि कम्म-बन्ध-विद्धंसण। सयल विसयल-जीव-मम्भीसण||७॥ सयल वि परमागम-परियाणा । काय-किलेसेवक-पहाणा पनमो संधि ९३ [१४] उन्होंने भीमसे कहा, "तुम राज्यमें दृढ़ होओ मैं अब अपने कामके लिए जाता हूँ।" तब उसने कहा कि मैं भी परम्परा भग्न नहीं करूँगा, आपने इसे वेश्या कहा है, मैं इसका भोग नहीं करूँगा ? सगरने भीमको छोड़ दिया, और भगीरथ- को बुलाया, उसे धरती दी, और आसन पर बैठाया, और स्वयं भरतके समान प्रवजित हो गया । तप करके उसने निर्वाण प्राप्त किया। यहाँ पर प्रतिपक्षका नाश करनेवाले और राज्य करते हुए उस महारक्षके देवरक्ष पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा एक दिन उपवनमें गया। स्त्रियोंसे घिरा हुआ वह जब क्रीड़ावापिकामें नहा रहा था ( जैसे हाथी अपनी हथिनियोंके साथ नहा रहा हो) कि उस समय उसकी दृष्टि, कमलके भीतरके मरे हुए भ्रमर पर पड़ी ॥१-८॥ धत्ता-उसने सोचा, "जिस प्रकार रसलम्पट यह भ्रमर निश्रेष्ट है उसी प्रकार कामिनीके मुखमें आसक्त सभी कामीजनों की यही स्थिति होती है" ॥९॥ [१५] जैसे ही उसे अपने मनमें विपाद हुआ, वैसे ही वहाँ एस. श्रमण संघ आया। उसमें सभी ऋपि त्रिकाल योगेश्वर थे। महाकवि व्याख्याता वादी और वागीश्वर थे। सभी शत्रु और मित्रमें समभाव रखनेवाले, और तृण और वर्णको समान करमे छोड़नेवाले, सभी मूखे पसीने और मलसे युक्त शरीरवाले, और धैर्य, महीपरके समान थे। सभी अपने तपके तेजसे दिनकरफी नरह थे और गम्भीरतामे ममुद्रकी तरह । मभी धोर-चोर नपसे नपे हए थे और समस्त परिग्रहको छोड़नेवाले । मनी फनयन्धका विवंम फरनेवाले और मभी, सभी आप को जमवचन देनेवाले थे। सभी परमागमोक, , अगसार और फायनामे एपसे एक यहफर थे॥१-८॥

९४ पउमचरित घत्ता सयल वि चरम-सरीर सयल वि उज्जुय-चित्ता । णं परिणणहें पयह सिद्धि-बहुय वरहता ॥९॥ [१६] तो एस्थन्तर पह आणन्दिउ । सो रिसि सधु तुरन्त वन्दिउ ॥१॥ पमणि विण्णवेवि सुयसायर । मो मो भन्यम्भोय-दिवायर ॥२॥ भव-संसार-महण्णव-णासिय । करें पसाउ पवजह सामिय' ॥३॥ जम्पइ साहु 'साहु लङ्केसर। पई जीवेवउ अट्ठ जै वासर |॥४॥ जं जाणहि तं करहि तुरन्तर' । णिविसद्धेण सो वि णिक्खन्तउ ॥५॥ अट्ट दिवस संल्लेहण मावि । अट्ठ दिवस दाण. देवावैवि ॥६॥ अट्ठ दिवस पुज्जउ णीसारे वि। अट्ट दिवस पडिमउ अहिसारवि ॥७॥ अट्ठ दिवस आराहण वाएँ वि । गड मोक्खहों परमप्पउ झाऍवि ॥ घत्ता तहाँ महरक्खहाँ पुत्तु देवरक्खु वलवन्तउ । थिउ अमराहिउ जेम लङ्क स ईभुअन्तत ॥९॥ ६. छट्ठो संधि चरसद्धिहि सिंहासणे हि भइकन्तहि आणन्तए मित्तिए। पुणु उप्पण्णु कित्तिधवलु धवलिउ जेण भुअणु णिउ-कित्तिए ॥१॥ यथा प्रथमस्तोयदवाहनः । तोयवाहनस्यापत्यं महरक्षः । महरक्ष- स्यापत्यं देवरक्षः । देवरक्षस्थापत्यं रक्षः। रक्षस्थापत्यमादित्यः । आदित्य- छट्ठो संधि ९५ पत्ता-"सभी चरमशरीरी, सभी सरल चित्त मानो सिद्धरूपी वधूसे विवाह करनेके लिए वर ही निकल पड़े हों॥९॥ [१६] इसके अनन्तर राजा आनन्दित हो उठा। उसने तुरन्त उसे ऋषि संघकी वन्दना की। उसने प्रणाम करते हुए कहा, "भव्यरूपी कमलोंके लिए दिवाकर और भवसंसारके महासमुद्रका नाश करनेवाले हे स्वामी, कृपाकर मुझे प्रव्रज्या दीजिए" । साधु बोले, "हे लंकेश्वर ! बहुत अच्छा, तुम आठ दिन और जीनेवाले हो, इसलिए जो ठीक समझो वह तुरन्त कर लो"। वह भी आधे पलमें ही प्रबजित हो गया। आठों दिन उसने संलेखनाका ध्यान तथा दान दिलवाया, आठों दिन पूजा निकलवायी, आठों दिन प्रतिमाका अभिषेक किया, आठों दिन आराधना पढ़ी और इस प्रकार परमपदका ध्यान कर वह मोक्षको प्राप्त हुआ ॥१-८॥ पत्ता- उस महारक्षका बलवान पुत्र देवरक्ष गद्दीपर बैठा और इन्द्रके समान लंकाका स्वयं उपभोग करने लगा ॥९॥ छठी सन्धि अनन्त परम्परामें चौसठ सिंहासन बीत जानेके बाद कीर्तिधवल उत्पन्न हुआ, जिसने अपनी कीर्तिसे भुवनको धवल कर दिया। जैसे पहला तोयदवाहन, तोयदवाहनका पुत्र महरक्ष । महरक्षका पुत्र देवरक्ष। देवरक्षका पुत्र रक्ष । रक्षका पुत्र आदित्य | आदित्यका पुत्र आदित्यरक्ष। आदित्यरक्षका पउमचरिउ । स्यापत्यमादित्यरक्षः । आदित्यरक्षस्थापत्यं भीमप्रमः । भीमप्रमस्यापत्यं पूजार्हन् । पूजाहतोऽपत्यं जितभास्करः । जितमास्करस्यापत्यं संपरिकीतिः । संपरिकोतरपत्यं सुग्रीवः । सुग्रीवस्यापत्यं हरिग्रीव. । हरिग्रीवस्यापत्यं श्रीग्रीवः । श्रीग्रीवस्यापत्य सुमुखः। सुमुखस्यापत्यं सुव्यक्तः। सुव्यक्त स्थापत्यं मृगवेगः। मृगवेगस्यापत्यं मानुगतिः। भानुगतेरपत्यमिन्द्रः। इन्द्रस्यापत्यमिन्द्रप्रभः । इन्द्रप्रभस्यापत्यं मेघः । मेघस्यापत्यं सिंहवदनः। सिहवदनस्यापत्यं पविः। पवरपत्य मिन्द्रविटुः । इन्द्रविटोरपत्यं भानु- धर्मा । मानुधर्मणोऽपत्यं मानुः । भानोरपत्यं सुरारिः। सुरारेरपत्यं त्रिजटः। त्रिजटस्थापत्यं भीमः। भीमस्यापत्यं महामीमः। महामीमस्यापत्यं मोहनः । मोहनस्यापत्यमङ्गारकः । अङ्गारकस्यापत्यं रविः । वेपत्य चकारः। चक्रारस्यापत्यं वडोदरः। वज्रोदरस्यापत्यं प्रमोदः। प्रमोद- स्थापत्यं सिंहविक्रमः । सिंहविक्रमस्यापत्यं चामुण्डः । चामुण्डस्यापत्यं घातकः । घातकस्यापत्यं भीष्मः । मीष्मस्थापत्यं द्विपबाहुः । द्विपवाहोर- पत्यमरिमर्दनः । अरिमर्दनस्यापत्यं निर्वाणमक्तिः । निर्वाणभक्तरपत्यमुन- श्रीः । उग्रनियोऽपत्यमहद्भक्तिः । अहंद्भक्तरपत्यं अनुत्तरः । अनुत्तरस्यापत्य गत्युत्तमः। गत्युत्तमस्यापत्यमनिलः । अनिलस्थापत्यं चण्डः । चण्डस्या- पत्यं लङ्काशोक. । लङ्काशोकस्यापत्यं मयूरः। मयूरस्यापत्यं महाबाहुः । महाबाहोरपत्यं मनोरमः। मनोरमस्यापत्यं भास्करः। भास्करस्यापत्यं बृहद्गतिः । बृहद्गतेरपत्य बृहत्कान्त. । बृहत्कान्तस्यापत्यमरिसंत्रासः । अरिसंत्रास्यापत्यं चन्द्रावतः। चन्द्रावतस्यापत्यं महारवः। महारवस्थापत्यं मेघध्वनिः। मेघध्वनेरपत्यं ग्रहक्षोमः । ग्रहक्षाभस्यापत्यं नक्षत्रदमनः । नक्षत्रदमनस्यापत्यं तारकः । वारकस्यापत्यं मेघनादः । मेघनादस्यापत्य कीविधवलः । इत्येतानि चतुःषष्टिसिंहासनानि । । ।

छट्टो संधि पुत्र भीमप्रभ । भीमप्रभका पुत्र पूजार्हन् । पूजाहनका पुत्र जितभास्कर। जितभास्करका पुत्र संपरिकीर्ति। संपरिकीर्तिका पुत्र सुग्रीव । सुग्रीवका पुत्र हरिग्रीव । हरिग्रीवका पुत्र श्रीग्रीव । श्रीग्रीवका पुत्र सुमुख । सुमुखका पुत्र सुव्यक्त । सुव्यक्तका पुत्र मृगवेग। मृगवेगका पुत्र भानुगति । भानुगतिका पुत्र इन्द्र । इन्द्रका पुत्र इन्द्रप्रभ । इन्द्रप्रभका पुत्र मेघ । मेघका पुत्र सिंहवदन। सिंहवदनका पुत्र पवि । पविका पुत्र इन्द्रविटु । इन्द्रविटुका पुत्र भानुधर्मा । भानुधर्माका पुत्र भानु । भानुका पुत्र सुरारि । सुरारिका पुत्र त्रिजट । त्रिजटका पुत्र भीम । भीमका पुत्र महाभीम । महाभीमका पुत्र मोहन । मोहनका पुत्र अंगारक । अंगारकका पुत्र रवि । रविका पुत्र चक्रार । चक्रारका पुत्र वज्रोदर वज्रोदरका पुत्र प्रमोद । प्रमोदका पुत्र सिंहविक्रम। सिंहविक्रमका पुत्र चामुण्ड | चामुण्डका पुत्र घातक । घातक- का पुत्र -भीष्म । भीष्मका पुत्र द्विपवाहु। द्विपवाहुका पुत्र अरिमर्दन, अरिमर्दनका पुत्र निर्वाणभक्ति, निर्वाणभक्तिका पुत्र उग्रश्री। उग्रश्रीका पुत्र अर्हद्भक्ति । अहद्भक्तिका पुत्र अनुत्तर। अनुत्तरका पुत्र गत्युत्तम । गत्युत्तमका पुत्र अनिल । अनिलका पुत्र चण्ड । चण्डका पुत्र लंकाशोक। लंकाशोक- का पुत्र मयूर । मयूरका पुत्र महावाहु । महावाहुका पुत्र मनोरम । मनोरमका पुत्र भास्कर | भास्करका पुत्र बृहद्गति । बृहद्गतिका पुत्र बृहत्कान्त । बृहत्कान्तका पुत्र अरिसन्त्रास । अरिसन्त्रासका पुत्र चन्द्रावर्त । चन्द्रावर्तका पुत्र महारव । महारवका पुत्र मेघध्वनि । मेघध्वनिका पुत्र प्रहक्षोभ । ग्रह- क्षोभका पुत्र नक्षत्रदमन । नक्षत्रदमनका पुत्र तारक। तारकका पुत्र मेघनाद। मेघनादका पुत्र कीर्तिधवल। ये चौसठ सिंहासन हुए।

पठमचरिट [.] सुर-कीलए रज्जु करन्ताहो। लहाउरि परिपालन्ताहो ॥३॥ एक्चहि दिणे विजाह-पवरु । लच्छी-महीएविहे भाइ-णरु ॥२॥ सिरिकण्ट-णामु णिव-मेहुणउ । रयणउरहाँ आइउ पाहुणउ ॥३॥ स-कलत्तु स-मन्ति-सामन्त-वलु। तहाँ अहिमुहु भाउ कित्तिधवलु ॥४॥ स-पणामु समाइच्छिड करेंवि । पुणु यिउ एक्कासगैं वइसरवि ॥५॥ एत्यन्त हयगायनहचडिट । अत्यकए पारकर पढिउ ॥६॥ मायार वि वारइँ दाई। दिट्ठहँ छत्त-य-चिन्धाइँ ॥७॥ णिसुयइँ रण-तर. वज्जिय। हय-हिंसियभायवराज्जियई ॥४॥ दुन्धार-वइरि-सय रोकियई। पञ्चारिय-खारिय-कोलियइँ ॥९॥ धत्ता तं पेक्षेत्रिणु वरि-बलु कित्तिधवलु सिरिकण्ठे धीरित। 'ताव णजिणवरु जय नणमि जाव ण रणें विवक्तु-सरसारित ॥३०॥ [२] सिरिकण्ठहों जोऍवि मुह-कमलु । कमलाएँ पवुत्तु कित्तिधवलु ॥२॥ 'किंण मुणहि धण-कञ्चण पउरु । विज्जाहर-सेनिहिं मेहटरु ||२|| तहि पुप्फोचर-विजाहिवइ । तहाँ तणिय दुहिय हट कमलमइ ॥३॥ छुडु बुद्ध उच्चेल्लें वि णीसरिय । चमरहरिहि णारिहि परियरिय || नहि अवसर धवल-विसालाइ। वन्देप्पिणु मेरू बिणाला: ।।५।। स-विमाणु एन्तु णहें णियवि सई । पत्तिय णयणुप्पल-माल मई ॥३॥ तइयहुँ जै जाउ पाणिग्गहणु। एवहिं णिकारण काई रणु l मा णिय-णिय-सेण्णई णिवहाँ। तहों पासु महन्ता पट्ठवहाँ छटो संधि [१] देव क्रीडाके साथ राज्य करते और लंकाका परिपालन करते हुए एक दिन कीर्तिधवलके पास महादेवी लक्ष्मीका भाई विद्याधर, श्रीकण्ठ नामका, राजाका साला, स्थनूपुर नगरसे अतिथि वनकर आया, अपनी स्त्री मन्त्री सामन्त और सेनाके साथ । कीर्तिधवल उसके सामने आया तो उसने प्रणामपूर्वक उसका समादर किया और दोनों एक आसन पर बैठ गये। इतने में अश्व, गज और रथों पर आरूढ़, अचानक शत्रु आ गया। उसने चारों द्वार अवरुद्ध कर लिये । छत्र ध्वज और चिह्न दिखाई देने लगे । बजते हुए युद्धके तूर्य सुनाई दे रहे थे। अश्व हिनहिना रहे थे और गज चिग्घाड़ रहे थे। दुर्वार सैकड़ों वैरी रुद्ध थे, उलाहना देते, चिढ़े हुए और पुकारते हुए ॥१-९॥ घत्ता-उस शत्रुसेनाको देखकर श्रीकण्ठने कीर्तिधवलको धीरज बँधाया, कि जब तक मैं युद्ध में विपक्षको तीरोंसे छिन्न- भिन्न नहीं कर दूंगा, तब तक जिनवरकी जय नहीं बोलूंगा ॥१०॥ [२] श्रीकण्ठका मुखकमल देखकर, उसकी पत्नी कमलाने कीर्तिधवलसे कहा, "क्या आप नहीं जानते कि विद्याधर श्रेणी- धन और स्वर्णसे भरपूर मेघपुर नगर है। उसमें पुष्पोत्तर नामक विद्यापति राजा है। मैं उसीकी कमलावती नामकी कन्या हूँ। एक दिन मैं सहसा घूमने के लिए चमरधारिणी स्त्रियोंके साथ निकली । उस अवसर, सुमेरु पर्वतके धवल और विशाल जिनमन्दिरोंकी वन्दनाके लिए, विमान सहित आते हुए देखकर, मैंने नेत्ररूपी कमलकी माला डाल दी। और उसी समय मेरा पाणिग्रहण हो गया। अब बिना किसी कारण युद्ध क्यों ? अपनी-अपनी सेनाओंको नष्ट न करे, उसके पास मन्त्रियोंको भेजा जाय" १-८॥ में

पउमचरित
घत्ता
णिसुणे वि तं तेहउ वयणु पेसिय दूय पवाइय तेत्तहें ।
उत्तर-वारें परिट्ठियउ पुप्फोत्तरु विजाहरु जेचहें ॥९॥
विण्णाण-विणय-णयवन्तऍहि ।
'परमेसर एत्थु अ-खन्ति क्उ ।
सरियउ णीसरेवि महीहरहों।
मोत्तिय-मालउ सिर कुञ्जरहों।
धाराउ लेवि जलु जलहरहों।
उप्पजवि मझें महा-सरहाँ।
सिरिकण्ठ-कुमारहाँ दोसु कउ ।
संणिसुणवि णरवइ लज्जियउ ।
विजाहरु वुत्तु महन्तएँ हि ॥१॥
सम्वउ क्ण्णउ परस्मायण ॥२॥
ढोयन्ति सलिलु रयणायरहों ॥३॥
उवसोह देन्ति अण्णहाँ णरहों ।भा
सिञ्चन्ति अगु णव-तरुवरहों ॥५॥
लिणिउ वियसन्ति दिवायरहों ॥३
तउ दुहियएँ लइड सयम्वरउ' ॥७॥
थिउ माण-मडफर-वजियउ॥८॥
घत्ता
'कण्णा दाणु कहिं (2) तणउ जइ ण दिण्णु तो तुडिहि चडावइ ।
होइ सहावे मइलणिय छेय-काल दीवय-सिह गावइ' ॥९॥
[ ४ ]
गठ एम भणेवि णराहिवइ । सिरिकण्ठे परिणिय पउमवइ ॥३॥
वहु-दिवसें हिँ उम्माहय-जणणु । णिय-सालउ पेक्खंधि गमण-मणु ॥र
सभा
मण कित्तिधवलु। 'जिह दूरीहोइ ण मुह-कमलु ॥३॥
तिह अच्र हुँ मजण पाण-पिय । किं विहि ण पहुच्चइ एह सिय ॥२॥
महु अस्थि अणेय दीव पवर । हरि-हणुरह-हंस-सुवेल-धर ॥५॥
कुस-कञ्चण-कञ्चुअ-मणि-रयण । छोहार-चीर-वाहण-जवण ॥६॥
पन्धर-वजर-गीरा वि सिरि। तोयावलि-सन्झागार-गिरि ॥७॥
वेलन्धर-सिद्धल-चीणवर रस-रोहण-जोहण-किकुधर ॥४॥

छटो संधि घत्ता-उसके इन वचनोंको सुनकर दूत भेजे गये, जो वहाँ पहुँच गये कि जहाँ उत्तर द्वारपर पुष्योत्तर विद्याधर था।॥९॥ [३] विज्ञान विनय और नीतिवान् मन्त्रियोंने पुष्पोत्तर विद्याधरसे कहा, "हे परमेश्वर, इतना अशान्तिभाव क्यों ? सब कन्याएँ दूसरेकी भाजन होती हैं। नदियाँ पहाड़ोंसे निकलकर पानी समुद्रमें ढोकर ले जाती हैं। हाथीके सिरसे मोतियोंकी माला वनती है, परन्तु शोभा बढ़ाती है दूसरे मनुष्यों की ! धाराएँ मेघोसे जल ग्रहण कर नव तस्वरोंके अंगोंको सोचती हैं। महासरोवरके मध्यमें उत्पन्न होकर भी कमलिनियाँ खिलती हैं दिवाकरसे। इसमें श्रीकण्ठ कुमारका क्या दोष ? तुम्हारी कन्याने स्वयं उसका वरण किया है ?" यह सुनकर पुष्पोत्तर लज्जासे गड़ गया। उसका मान और अहंकार दूर हो गया ॥१-८॥ पत्ता-कन्यादान किसके लिए ? यदि वह न दी जाय तो कलंक लगा देती है। क्षयकालकी दीपशिखाकी भाँति कन्या स्वभावसे मलिन होती है ॥९॥ [४] इस प्रकार कहकर नराधिपति चला गया, श्रीकण्ठने कमलावतीसे विवाह कर लिया। बहुत दिनोंके बाद पिताके लिए व्याकुल अपने सालेको जानेके लिए इच्छुक, देखकर कीर्ति- धवल सद्भावसे कहता है, "तुम मेरे प्राणप्रिय अपने आदमी हो, इसलिए इस प्रकार रहो जिससे तुम्हारा मुख-कमल दूर न हो, क्या तुम्हें इतनी सम्पदा पर्याप्त नहीं है ? मेरे पास अनक बेड़े, बड़े द्वीप हैं, हरि, हणुरुह, हंस, सुवेल, धर, कुश, कंचन, कंचुक, मणिरत्न, छोहार, चीर, वाहन, वन, वन्चर, जिरगिरि, श्री, तोयावलि, सन्ध्याकार गिरि, वेलन्धर, सिंहल, चीमावरास, रोहण, जोहण और किष्कधर ॥१-८।।

१०२ पउमचरित घत्ता मार-मरखम-भीम-तड णिवाडेप्पिणु धम्मु जिह एय महारा दीव विचित्ता। जं भावइ तं गेण्हहि मित्ता' ॥९॥ सिरिकण्ठहों ताम मन्ति कहइ । 'कि वहवें वाणर-दीड लइ ॥३॥ जहिँ किक्कु-महोहरु हेम-इलु। विप्फुरिय-महामणि-फलिह-सिलु ॥र पवलङ्कुरु इन्दणील-गुहिल । ससिकन्त-णीर-णिज्झर-वहल्छ ॥३॥ मुत्ताहल-जल-तुसार-दरिसु। जहिं देसु वि तासु जै अणुसरिसु ॥४॥ अहिणव-कुसुमइँ पक्कई फलई। कर गेज्झइँ पण्णइँ फोप्फल: ॥५॥ जहिं दक्ख रसालउ दीहियउ। गुलियउ अमरेहि मि ईहि [य] उ॥ जहिँ णाणा-कुसुम-करम्वियई। सीयलइ जलइँ अलि-चुम्वियइँ ॥७॥ जहिं धण्ण फल-संदरिसियई। धरणिहें भगाई व हरिसिय ॥४॥ घत्ता तं णिसुर्णेवि तोसिय-मणेण देवागमणहाँ अणुहरमाणउ । माहव-मासहाँ पढम-दिणें तहि सिरिकण्ठे दिण्णु पयाणउ ॥९॥ [६] लडेप्पिणु लवण-समुह-जलु । तं वाणर-दीउ पइट्छ वलु ॥३॥ जहि कुहिणिउ रविकन्त-पहड । सिहि-सङ्कएँ उवरि ण देइ पउ ॥२॥ जहि वाविउ वउलामोइयउ । सुर-सङ्कएँ गरेण ण जोइयउ ॥३॥ जहिं जल िणाहिं विणु पङ्कऍहिं । पङ्कयइँ जाहिँ विणु छप्पऍहि ॥४॥ जहि वण. णाहिं विणु अम्वऍहि । अम्वा वि णाहिं विणु गोच्छएँ हि ॥ गोच्छा वि णाहि विशु कोइलें हिं। कोइलउ शाहि विणु कलयले हि ॥ जहिं फलइँ णाहि विणु तरुवरेंहि । तरुवर विणाहि विणु लयहरों हिं ॥७॥ लयहरई णाहिँ णिक्कुसुमियई। जहिँ महुयर-विन्दई ण भमियई ॥८ ट्ठोसंवि १०३ पत्ता-भारभर क्षम, भीमवट, ये मेरे विचित्र द्वीप हैं। 'धर्म' की तरह, इनमें से एक चुनकर, हे मित्र, जो अच्छा लगे वह ले लो।।२।। [५] तब श्रीकण्ठका मन्त्री कहता है, 'बहुत कहनेसे क्या, बानर द्वीप ले लीजिए, जिसमें किष्क पहाड़ और त्वर्णभूमि है, जिसमें चमकती हुई महामणियोंकी बड़ी-बड़ी चट्टाने हैं। प्रवालों और इन्द्रनीलसे व्याप्त है, जिसमें चन्द्रकान्त मणियोंसे निर्झर वहते हैं, जिसमें मुक्ताफल जलकणोंकी तरह दिखाई देते हैं, जिसमें देश, एक दूसरेके समान हैं ? अभिनव कुसुम, पके हुए फल, करग्राह्य हैं पत्ते जिनके, ऐसे सुपाड़ीके वृक्ष । जहाँ मीठी द्राक्षा लताएँ हैं, जो देवोंके द्वारा चाही गयी हैं। जहाँ शीतल, तरह-तरहके फूलोंसे मिश्रित और भौरोंसे चुम्बित जल हैं। जहाँ दानोंको प्रदर्शित कर रहे धान्य ऐसे लगते हैं जैसे धरतीके हर्षित अंग हों।।१-८|| पत्ता-यह सुनकर श्रीकण्ठका मन सन्तुष्ट हो गया। उसने चैत्र माहके पहले दिन उस द्वीपके लिए प्रस्थान किया, उसका यह प्रस्थान देवताओंके समान था ।।२।। [६] लवणसमुद्रका जल पार करते ही उसकी सेनाने वानर द्वीपमें प्रवेश किया। उसकी पगडण्डियाँ सूर्यकान्तमणिसे आलोकित हैं, आगकी आशंकासे कोई उसपर पैर नहीं रखता। जहाँ वगुलोंसे आमोदित बावड़ीको देवोंकी आशंकासे मनुष्य नहीं देखते, जिसमें विना कमलोंके जल नहीं है, और कमल भी विना भ्रमरोंके नहीं हैं, जहाँ विना आम्रवृक्षोके वन नहीं आम्रवृक्ष भी विना मंजरियोंके नहीं हैं। मंजरिग भी विना कोयलोंके नहीं हैं, कोयले भी 'कलकल' ध्वनिके बिना नहीं हैं, जहाँ फल पेड़ोंके विना नहीं हैं, पेड़ भी लताओंके विना नहीं हैं, लताएँ भी विना फूलोंके नहीं हैं, और फूल.भी ऐसे नहीं हैं

१०४
पउमचरित
घत्ता
साहउ णड विणु वाणरहि णड वाणर जाह ण बुक्कारो।
ताइँ णियन्तउ तहि थिउ विज्जालड सिरिकण्ठ-कुमारो ॥९॥
[]
पहु तेहिं समाणु खेड करेवि । अवरहि धरावेंवि सई धरै वि ॥१॥
गड किवकु-महीहरहो (१) सिहरु । चउदह-जोयण-पमाणु णयरु ॥२॥
किउ सहसा सव्वु सुवण्णम। णामेण किक्कुपुरु अण्णमउ ॥३॥
जहिँ चन्दकन्ति-मणि-चन्दियउ। ससि मणेवि अ-दियह जे वन्दियउ ।।
नहिं सुरकन्ति-मणि विस्फुरिय । रवि मणेवि जलाई मुमन्ति दिय॥५॥
जहिं णीलाउलि-भू-मगुर।
मोत्तियतोरण- उद्दन्तुर ॥६॥
विहमदुवार-रत्ताहर। अवरोप्पर विहसन्ति व धरई ॥७॥
उप्पण्णु तास कोडावण । सिरिकण्ठहों वजकण्ठुतणउ ||८||
घत्ता
.
एक-दिवसें देवागमणु णिऍवि जन्तु णन्दीसर-दीवहों।
वन्दण-हत्तिएँ सो वि गउ परम-जिणहों तइलोक-पईवहाँ ॥९॥
[८]
स-पसाहणु स-परिवार स-घउ। मणुसुत्तर-महिहरु जाम गउ ॥१॥
पडिकूलिउ ताम गमणु णरहों। सिद्धालउ णाई कु-मुणिवरहों ॥२॥
मई अण्ण-भवन्तरें काइँ किउ। जे सुर गय महुजि विमाणु थिउ ॥३॥
वरि घोर-बीर-तउ हउँ करमि। णन्दीसरक्खु जे पइसरमि' ॥४॥
गउ एम भाव णिय-पट्टणहाँ। संताणु समप्पें वि णन्दणहाँ ॥५॥
ण.संगु जाउ णिविसन्तरण। जिह वजकण्ठ कालन्तरण ॥६॥

छट्टो संधि जिनमें भ्रमर न गूंज रहे हों ।।१-८।। पत्ताशाखा बिना वन्दरोंके नहीं हैं, वानर भी ऐसे नहीं जो बोल न रहे हों। उन्हें देखता हुआ विद्याधर श्रीकण्ठ वहीं वस गया ॥१॥ [७] श्रीकण्ठ उनके साथ क्रीड़ा करने लगा। उन्हें दूसरों- से पकड़वाता, और स्वयं पकड़ता। वह किष्क महीधरकी चोटीपर गया। और उसपर चौदह योजन विस्तारका नगर बनाया । समूचा स्वर्णमय और अन्नमय था, उसका नाम किष्कपुर रखा गया। जिसमें चन्द्रकान्त मणिकी चाँदनीको चन्द्रमा समझकर लोग असमयमें ही वन्दना करने लगते । जहाँ सूर्यकान्त मणिको कान्तिको सूर्य समझकर दीपक ज्वालाएँ छोड़ने लगते, जहाँ नीले मणियोंकी कतारोंसे भंगुर भौहोंवाले, मोतियोंके तोरणोंसे दाँत निकाले हुए और विद्रुमद्वाररूपी रक्तिम अधरोंवाले घर ऐसे मालूम होते हैं जैसे एक-दूसरेपर हँस रहे हैं। तब इसी बीच श्रीकण्ठका मनोरंजन करनेवाला वसकण्ठ नामका पुत्र हुआ॥१-८॥ धत्ता-एक दिन नन्दीश्वर द्वीपको जाते हुए देवागमनको देखकर त्रिलोक प्रदीप परमजिनकी वन्दना भक्तिके लिए वह भी गया ||२|| [८] अपनी सेना, परिवार और ध्वजके साथ जैसे ही वह मानुपोत्तर पर्वतपर गया, वैसे ही उसका गमन प्रतिरुद्ध हो गया, वैसे ही, जैसे खोटे मुनिके लिए सिद्धालय रुद्ध हो जाता है। वह सोचता है, "मैंने जन्मान्तरमें क्या किया था कि जिससे दूसरे देवता चले गये, परन्तु मेरा विमान रुक गया । अन्छा, मैं भी घोर वीर तप करूँगा जिससे नन्दीश्वर द्वीपमें प्रवेश पा सकूँ।" यह सोचकर वह अपने नगरको लौट गया, राज्यपरम्परा अपने पुत्रको सौपकर आधे पलमे प्रत्रजित हो

१०६
पउमचरित
तिह इन्दाउहु तिह इन्दमइ ।
तिह रविपहु एम सुहासण।।
तिह मेरु स-मन्दरु पवणगइ ॥७॥
चवगयई अट्ट सोहासणइँ ॥४॥
घत्ता
णवमा णाम अमरपहु
वासुपुज्ज-सेयंस-जिणिन्दुहुँ ।
अन्तर विहि मि परियउ छण-पुव्वण्हु जेम रवि-चन्दहुँ ॥९॥
[ ९ ]
परिणन्तहों लङ्काहिव-दुहिय । तहों पङ्गणे केण वि कइ लिहिय ॥५॥
दीहर-लंगूलारत्त-मुह । कमु दिन्ति व धावन्ति व समुह ॥२
तं पेक्खें वि साहामय-णिवहु । भइयए मुच्छाविय राय-बहु ॥३॥
एत्थन्तरै कुविउ णराहिवइ । 'तंमारहु लिहिया जेण कई' ॥४॥
पणवेप्पिणु मन्तिहि उवसमिउ । 'कइ-णिवहु ण केण वि भइकमिउ ॥५
एयहुँ जि पसाए राय-सिय । तउ पेसणयारी जेम तिय ॥६॥
एयहुँ जे पसाएं रण अजउ । जगें वाणर-वंसु पसिद्धि-गउ ॥७॥
सिरिकण्ठहाँ लग्गे विकइ-सयई। एयइँ जे तुम्ह कुल-देवय: ।1८॥
घत्ता
तं णिसुणैविपरितु?ऍण भइकमिय (१) णमिय मरिसाविय ।
णिम्मल-कुलहों कलङ्कु जिह मउ चिन्धैं धएं छत्तै लिहाविय ॥९॥
[१०]
ते वाणर-वंसु पसिद्धि-गउ । विणि वि सेदिउँवसिकरवि थिउ ॥७॥
उप्पण्णु कइदउ तासु सुउ। कइधयहाँ वि पडिबलु पवर-भुउ ॥२॥
पडिवलहाँ वि णयणाणन्दु पुणु। पुणु खयराणन्दु विसाल-गुणु ॥३॥
पुणु गिरिणन्दशु पुणु उवहिरउ। तहाँ परम-मित्तु पडिपक्ख-खउ ॥४॥
तडिकेसि-णामु लङ्काहिवइ। विजाहर-सामिउ गयणगइ ॥५॥
एक्कहि दिणे उववणु णीसरिउ । पुणु वुद्दण-वाविहं पइसरिउ ॥६॥

छटो संधि गया। जिस प्रकार वनकण्ठ, इन्द्रायुध, इन्द्रमूर्ति, मेरु, समन्दर, पवनगति और रविप्रभु, इस प्रकार आठ सुखद सिंहासन वीत गये ||१-८॥ घत्ता-नौवाँ अमरप्रभ, वासुपूज्य और श्रेयान्स जिनेन्द्रके बीचमें ऐसे ही प्रतिष्टित था, जैसे सूर्य और चन्द्रमा, दोनोंके मध्य पूणिमाका पूर्वाह्न ॥९॥ [९] लंका नरेशकी कन्यासे विवाह करते समय उसके आँगनमें किसीने बन्दरोंके चित्र बना दिये। लम्बी पूंछ और लाल-लाल मुँहवाले जैसे छलांग भरकर सामने दौड़ते हुए। वानरोंके उस चित्रसमूहको देखकर मारे डरके, राजवधू मच्छित हो गयी। इससे राजा क्रुद्व हो गया। (उसने कहा ), "उसे मार डाला जिसने ये बन्दर लिख"। तव मन्त्रियोने उसे शान्त किया कि वानरममूहका अतिक्रमण आजतक किसीने नहीं किया। इन्हींके प्रमादसे यह राज्यश्री, तुम्हारी आज्ञाकारी स्त्रीके समान है। इन्हींक प्रसादसे तुम युद्ध में अजेय हो। और इन्हीके कारण वानरवंश दुनियामें प्रसिद्ध हुआ। श्रीकण्ठके समयसे लेकर ये सैकड़ों वानर तुम्हारे कुलदेवता रहे हैं ।।१-८|| घत्ता-यह सुनकर सन्तुष्ट मन अमरप्रभने उनसे क्षमा माँगी और प्रणाम किया, तथा अपने पवित्र कुलके चिह्नके रूपमें उन्हें पताकाओं, ध्वज और छत्रोंपर चित्रित करवाया।॥९|| १०] उसीसे यह वानरवंश प्रसिद्ध हुआ। और वह दोनों श्रेणियोंको जीतकर रहने लगा। उसका पुत्र कपिध्वज उत्पन्न हुआ, कपिध्वजका प्रवर भुज प्रतिवल, फिर प्रतिवलका नयना- नन्द, फिर विशालगुण खेचरानन्द, फिर गिरिनन्दन, फिर उदधिरथ, उसका परममित्र, शत्रुपक्षका क्षय करनेवाला, तडित्केश लंकानरेश था। विद्याधरोंका स्वामी, और आकाश- गामी वह एक उपवनमें गया और स्नान करनेकी वावड़ीमें ।

१०८
पउमचरित
महएवि ताम तहाँ तक्खणेण ।
तेण वि णारायहि विधु कइ ।
थण-सिहरहि फाडिय मक्कडेण ॥७॥
गउ तड जड तस्वर-मूलें नइ ॥८॥
घत्ता
लद्ध-णमोकारहों फलण
णियय-भवन्तर संमरवि
उवाहिकुमार देउ उप्पण्णउ ।
विजुकेसु जउ त अवइण्णउ ॥९॥
[11]
तडिकेसु णिएवि विहाइयउ। 'हउँ एण हयासें धाइयउ ॥१॥
अजुवि मणे सल्लु समुवहइ । जउ पैक्सइ उ कइवर वहइ ॥२॥
केत्तडउ वहेसइ खुदु खलु ।
उप्पायमि माया-पमय-वलु' ॥३॥
तो एम भणे वि साहामियई। गिरिवर-संकासइँ णिम्मियइँ ॥४॥
रत्तमुहई पुच्छ-पईहरई। वुक्कार-घोर-घग्घर-सरई ॥५॥
आणत्तई उप्परि धाइयई। जल थल आयासें ण माइयइँ ॥६॥
अण्णई उम्मूलिय-तरवरई। अण्ण. संचालिय-महिहरई ॥७॥
अण्ण उग्गामिय-पहरणई। अण्णइ लंगूल-पईहरई ॥८॥
घत्ता
भण्णइँ हुयवह हत्याई
रूवई कालहाँ केराई
अपण. पुणु भणे हि उप्पाएँ हि ।
भावे वि थियई णाई वहु-भाऍहि ॥९॥
[१२]
भण्णहिं कोकिउ लङ्काहिवइ । 'विह पहरु पाव जिह णिहड कई॥३॥
तं णिसुणे वि णरवइ कम्पियउ। 'किं कहि सि पवनमुजम्पिय' ॥२॥
किं कहि मि कइन्दहाँ पहरणई। आयलहुभाइँ ण कारणई ॥३॥
चिन्तेवि महामय-पत्थऍण । वोल्लाविय पणविय-मत्यऍण ॥४॥
'के तुम्हई काइँ भ-सन्ति किय । कज्जेण केण सण्णहें वि थिय' ॥५॥

१०९ छट्ठो संधि - घुसा। इतने में उसकी महादेवीके स्तनके अग्रभागको तत्काल एक वानरने फाड़ डाला। उसने भी तीरोंसे वानरको छेद दिया। कपि तरुवरके मूलमें वहाँ गया, जहाँ एक मुनिवर थे ।।१-८॥ पत्ता-वह वानर णमोकार मन्त्र पानेके फलके कारण स्वर्गमें उदधिकुमार देव हुआ। अपने जन्मान्तरको याद कर जहाँ तडित्केश था वहाँ वह देव अवतीर्ण हुआ|९|| [११] तडित्केशको देखते ही वह क्रोधसे भर उठा, "मैं इसी हताशके द्वारा मारा गया। आज भी इसके मनमें शल्य है, और जहाँ देखता है, वहीं वानरोंको मार देता है। यह क्षुद्र नीच कितने बन्दर मारेगा, मैं 'मायावी वानर सेना' उत्पन्न करता हूँ।" यह सोचकर उसने पहाड़के समान बड़े-बड़े वानरों- की रचना की । लालमुख और लम्बी पूंछवाले वे वुक्कार और घग्घरके घोर शन्द कर रहे थे। आज्ञापित वे ऊपर दौड़ रहे थे, जल, थल और नम कहीं भी नहीं समा रहे थे। कुछने बड़े- बड़े पेड़ उखाड़ लिये, कुछने महीधर संचालित कर दिये, कुछने हथियार ले लिये और कइयोंने अपनी लम्बी पूछे उठा पत्ता-कुछ हाथमें आग लिये हुए थे, दूसरे, दूसरे-दूसरे साधनोंसे युक्त थे। ऐसा जान पड़ता था, मानो कालके रूप ही अनेक भागोंमें आकर स्थित हो ॥९॥ [१२] एकने जाकर लंकानरेशको ललकारा, "हे पाप, उसी प्रकार प्रहार कर जिस प्रकार कपिको मारा था।" यह सुनकर राजा कॉप गया कि कहीं वानर भी वोलते हैं ? क्या कहीं वानरोंके भी हथियार होते हैं ? यहाँ कोई मामूली कारण नहीं है ? महाभयसे आक्रान्त और अपना मस्तक झुकाते हुए उसने कपिसे कहा, "आप लोग कौन हैं ? यह अशान्ति क्यों मचा रखी है ? किस कारण आप तैयार होकर यहाँ स्थित हैं ?" लीं॥१-८॥

पउमचरित तं णिसुर्णेवि घविउ पमय-णिवहु । 'किं पुन्च-बइर वीसरिउ पहु ॥१॥ जइयहुँ जल कीलएँ आइयउ । महावि कज्ज कइ घाइयउ ||७|| रिसि-पञ्चणमोकाहुँ चलॅण। सुरवर उप्पण्णु तेण फलण 100 घत्ता वहरु तुहारउ संभरवि सो हर्ड जि थिउ वहु-भाएँ हिं। सेरउ अच्छहि काई रण जिम अमिह जिम पडु महु पाऍहिं ॥९॥ [१३] त णिसुणेवि णमिउ गराहिवइ । अमरेण वि दरिसिय अमर-गइ ॥३॥ णिउ विजुकेसु कर धरेंवि तहिं । णिवसइ महरिसि चउणाणि जहि ।।२।। पयाहिण करवि गुरु-मत्ति किय । वन्देप्पिणु विणि मि पुरउ थिय ॥३॥ सव्वगित सुरवरु हरिसियउ। 'ऍहु जम्मु एण महु दरिसियउ था अज्जु वि लक्खिजइ पायडउ । महु केरउ एड सरीरडउ' ।।५।। तं पेखेंवि तडिकंसु वि डरिउ । णं पवण-छित्तु तरु थरहरिउ ॥६॥ पुणु पुच्छिउ महरिसि 'धम्मु क्ह। परिभमहुँ जेण ण णरय-पहें ॥७॥ तं णिसुवि चवइ चारु चरिउ । 'महु अस्थि अण्णु परमायरिउ ॥८॥ सो कहइ धम्मु सवत्तिहरु । पइसहुँ जि जिणालउ सन्तिहरु' ॥९॥ परिओसें तिणि वि उच्चलिय। वाहुबलि-मरह-रिसह व मिलिय..॥ घत्ता दिठ्ठ महारिसि चेह-हरें गरवइ-उवहिकुमार-मुणिन्देहि । परम-जिणिन्दु ममोसरणे ण धरणिन्द-सुरिन्द-परिन्दे हि ॥ [१४] पणवेप्पिणु पुच्छिउ परम-रिसि। 'दरिसावि मडारा धम्म-दिसि ॥३॥ परमेसरु जम्पइ जइ-पवरु । तइ-काल-बुद्धि चउ-णाण-धरु ॥२॥ 'धम्मेण जाण-जम्पाण-धय । धम्मेण मित्र रह-तुरयनाय ।।३।।

छटो संधि यह सुनकर वानरसमूह बोला, "क्या राजा तुम पुराना वैर भूल गये कि जब तुम जलक्रीड़ाके लिए आये थे और महादेवीके कारण तुमने कपिको मारा था। ऋषिके पंचणमोकार मन्त्रके प्रभावसे मैं सुरवर उत्पन्न हुआ ॥१-८11 धत्ता-तुम्हारे वैरकी याद कर, यहाँ मैं एक होकर भी अनेक भागोंमें स्थित हूँ। अव तुम युद्धमें शान्त क्यों हो ? या तो लड़ो या फिर मेरे पैरों में गिरो" ||९|| [१३] यह सुनकर राजा नत हो गया। अमरने भी अपनी अमरगति दिखायी। वह तडित्केशको हाथ पकड़कर वहाँ ले गया जहाँ चार ज्ञानके धारक महामुनि थे। प्रदक्षिणा देकर गुरुभक्ति की और वन्दना करके दोनों सामने बैठ गये । देवका अंग-अंग हर्षित हो उठा। (वह बोला), "यह जन्म इन्होंने हमें दिखाया, आज भी मेरा यह प्राकृत शरीर देखा जा सकता ।" उसे देखकर तडित्केश भी डर गया मानो हवाके झोंकेसे तरुवर ही कॉप उठा हो ? फिर उसने महामुनिसे कहा, "धर्म वताइए, जिससे मैं नरकपथमें भ्रमण न करूं।" यह सुनकर सुन्दर चरित मुनि कहते हैं, "मेरे एक दूसरे परम आचार्य है, वह सब प्रकारकी पीड़ा दूर करनेवाला धर्म बताते हैं, हम शान्ति जिनालयमें प्रवेश करें।" परितोषके साथ तीनों चले जैसे भरत, बाहुबलि और ऋषभ मिल गये हों॥१-१०॥ घत्ता-नरपति उदधिकुमार और मुनीन्द्रने चैत्यगृहमें परमाचार्यको देखा, मानो समवशरणमें परमजिनेन्द्र को धरणेन्द्र देवेन्द्र और नरेन्द्रने देखा हो ॥१२॥ [१४] प्रणाम कर उन्होंने परमऋषिसे पूछा, "आदरणीय, धर्मकी दिशाका उपदेश दें।" परमेश्वर, जो मुनिप्रवर त्रिकाल बुद्धि और चार ज्ञानके धारी हैं, कहते हैं, "धर्मसे यान, जपाव (?) और ध्वज होते हैं, धर्मसे मृत्यु, रथ, तुरंग और गज मिलते हैं, " .. -- पउमचरित धम्मेणाहरण-विलेवण । धम्मेण कलत्तई मणहरई। धम्मेण पिण्ड-पीणत्यणउ । धम्मेण मणुय-देवत्तणई। धम्मेण अल्ह-सिद्धत्तणई। धम्मेण णियासण-मोयणई ॥४॥ धम्मेण छुहा-पण्डर-घरइँ ॥५॥ चमरई पाडन्ति वरङ्गणउ ॥६॥ वलएव-वासुएवत्तणई ॥७॥ तित्थङ्कर-चकहरत्तण ि॥6॥ घत्ता इन्दा देव वि सेव करन्ति । चण्डाल वि पङ्गणएँ ण उन्ति' ॥९॥ एवं धम्में होन्तऍण धम्म-विहुणहों माणुसहाँ [१५] तडिकेसे पुच्छिउ पुणु वि 'अण्णहिं भवे को हउँ को व सुरु ॥m जइ जम्पइ 'णिसुणुत्तर-दिसएं। जाओ सि आसि कासी विसएँ ।२।। तुहुँ साहु एहु धाणुकु नहि। आइउ तरु-मूले वि थिओ सि जहि॥३॥ णिग्गन्थु णिऍवि उवहासु कउ। ईसीसुप्पण्णु कसा तउ ।। भावि काविस्थ-सग्ग-गमणु । पत्तो सि णवर जोइस-भवः ।।५।। तत्यहाँ वि चवेप्पिणु सुद्धमइ । हूओ सि एत्थ लाहिवइ ।।६।। धाणुकिउ हिण्डेंवि भवाहणें। उप्पण्णु पवङ्गमु पमय-वणे ॥७॥ पई हउ समाहि-मरणेण मुर। पुणु गम्पिणु उवहि-कुमार हुड' ॥६॥ घत्ता तं णिसुणे वि लकेसरण रज्ज सुकेसु थवि परमत्थे । मुऍवि कु-वेस व राय-सिय तब-सिय-वय लइय सई हत्थे ॥९॥ [१६] जं विज्जुकेसु णिग्गन्थु थिउ । पा हि मुहिहि सिरे लोउ किउ ॥१॥ तं कडय-मउड-कुण्डल-धरेण । सम्मत्तु लहउ दिड सुरवरेण ॥२॥ एत्यन्तर किक-पुरेसरहों। गउ लेहु कइय-सेहरहों ॥३॥ महि-मण्ड घत्ति दिछु किह । णावालउ गङ्गा-बाहु जिह || छट्टो संधि ११३ धर्मसे आमरण और विलेपन, धर्मसे नृपासन और भोजन, धर्मसे सुन्दर स्त्रियाँ, धर्मसे चूनेसे पुते सुन्दर घर, धर्मसे पीन स्तनोंवाली वारांगनाएँ सुन्दर चमर डुलाती हैं। धर्मसे मनुष्यत्व और देवत्व, बलदेवत्व और वासुदेवत्व । धर्मसे अर्हत् और सिद्ध तीर्थकरत्व और चक्रवर्तित्व ॥१-८॥ घत्ता-एक धर्मके रहनेपर इन्द्र और देवता सेवा करते हैं, जबकि धर्महीन आदमीके घरके ऑगनमें चाण्डाल तक नहीं रहते" ॥९॥ [१५] तडित्केशने तब पुनः गुरुसे पूछा, "दूसरे भवमें मैं कौन था, और यह देव क्या था ?' यतिवर बताते हैं, "सुनो, उत्तर दिशामें काशीमें तुमने जन्म लिया था। तुम साधु थे, और यही वहाँ धनुर्धारी था। यह तरुमूलमें आया जहॉ कि तुम वैठे हुए थे । निर्ग्रन्थ देखकर उसने तुम्हारा मजाक उड़ाया, इससे तुम्हें भी थोड़ी-सी कषाय हो गयी। कापित्थ स्वर्गके गमनका निदान भंग कर, तुम केवल ज्योतिपभवनमें उत्पन्न हुए। वहाँसे आकर, शुद्धमति यह लंकाका नरेश हो। वह धानुष्क भी भवग्रहणमें घूमने-फिरनेके बाद, वानर बना । तुमसे आहत, समाधिमरणसे मरकर स्वर्गमें देव हुआ उदधिकुमारके ॥१-८॥ घत्ता-यह सुनकर लंकानरेशने राज्यमें सुकेशको स्थापित कर, वास्तवमें कुवेश और राज्यश्रीको छोड़ते हुए तपश्रीरूपी वधूका पाणिग्रहण लिया ।।९।। १६] जब तडिल्केश निर्ग्रन्थ हुआ तो उसने पाँच मुट्ठियों- से केशलोंच किया । कटक, मुकुट और कुण्डल धारण करनेवाले उस उदधिकुमार देवने भी सम्यक्त्व ग्रहण कर लिया। इसके अनन्तर किष्क नगरके राजा कपिध्वज श्रेष्ठके पास लेखपत्र गया। महीमण्डलमें पड़ा हुआ वह ऐसा दिखाई दिया जैसे नामसे" ८ १११ पउमचरित बहुउउ सहा जेम वन्धण-विमुफ पंणिस्यउलु। सलु ॥५॥ जुबई जगु वण्णु समुन्वहइ । आयरिड व चरिउ कहड पहा ॥॥ णं अक्सर-पन्तिहिं पहु मणिउ । 'तुम्हहुँ सुकेसु परिपालणिउ । तटिक तव-सिय लढ्य करें। जंजाणहि तं पहूँ तुहु मि करें' लेहु घिप्पिणु उवहिरउ पुरं पटिचन्दु परिट्टियर घत्ता पुत्तहाँ रज्जु देवि णिक्सन्तउ । चाणरदीउ स ई भुअन्तउ ॥९॥ ७. सत्तमो संधि पठिचन्दनों जाय किहिन्धन्धय पवर-भुव । गं रिमा-जिणामु मरह-याहुबलि पे वि मुय ॥१॥ [.] सुदु हुनु मरीर संपति पत्त। वहिं अवमरे कण वि कहिय यत्त ॥१॥ 'यटका धग-कणय-पउरें। दाहिण-मेटिहि आइवणपर ॥२॥ Frजामन्दर मामेण राट । यमा अपग-महिमि महार | मिरिमाल-गाम नहीं गणिय दुहिय । इन्दीवरच्छि एण-पन्द-मुदिय men कयली पदल-गोमार पाउ। मा पर पिमह कहीं वि मार ॥५॥ गियि पयर-उपदि। गमु मनिटभिएहि ॥ टोय निमाण परिय जोह। मंत्रल्स हर दिन-सीद ॥ निमित दाक्षिण-रेरिपरा जहि मिमिपापिनार समय सप्तमो संधि वह गंगाके प्रवाहकी तरह नावालउ (नामोंकी भरमार, और नावोंका घर) हो । विरक्त कुलकी तरह बन्धनसे मुक्त था। खलकी तरह स्वभावमें वक्र था। वह युवतीजनके समान वर्णको धारण करता है, आचार्यकी तरह चरित और कथा कहता । मानो अक्षर पंक्तियोंके प्रभुसे कहा गया, “तुम सुकेश- का पालन करना। तडित्केशीने तपश्री अपने हाथमें ले ली, हे प्रभु, तुम जैसा ठीक समझो, वह करो" ॥१-८॥ धत्ता-लेख ग्रहण कर उदधिरवने पुत्रको राज्य देकर दीक्षा ग्रहण कर ली। नगरमें प्रतिचन्द्र प्रतिष्ठित हुआ और वानर द्वीपका वह खुद उपभोग करने लगा ||९|| सातवीं सन्धि प्रतिचन्द्रके दो पुत्र हुए, प्रवरवाहु किष्किन्ध और अन्धक, मानो ऋषभजिनके दो पुत्र, भरत और बाहुबलि हों। [१] उन दोनोंने शीघ्र ही शरीर सम्पदा ( यौवन ) प्राप्त कर ली। उस अवसरपर किसीने यह बात कही-"विजयार्ध पर्वतको दक्षिण श्रेणीमें धन और स्वर्णसे परिपूर्ण आदित्यनगर है। उसमें विद्यामन्दिर नामका राजा है। सुन्दर वेगमती उसकी अग्रमहिपी है। श्रीमाला नामकी उसकी कन्या है, जिसकी आँख नीलकमलके समान और मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान । वह वाला केलेके अंकुरके समान सुकुमार है । वह कल किसीको माला पहनायेगी।" यह सुनकर किष्किन्ध और अन्धक दोनों प्रवल कपिध्वजियोंने जानेकी तैयारी की। विमान निकाल लिये गये। योद्धा उनमें सवार हुए, आकाशमें चलते हुए उनकी शोभा निराली थी। आधे पलमें दक्षिण श्रेणीमें पहुँच गये जहाँ समस्त विद्याधर इकट्ठे हुए थे ॥१-८।।

११६
पउमचरिउ
घत्ता
किष्किन्धं दिख
धउ राउलउ सु (१) पवणहउ ।
करयल सिरिमालह तण ॥९॥
हकारइ णाई
[२]
णिय-णिय-थाणेहि णिवद्ध मञ्च । महकवि-कव्वालाव व सु-सच ॥१॥
भारूढ सन्ध मन्चेसु तेसु चामियर-गत्त-मणि-भूसिएसु ॥२॥
परिभमिर-ममर-झङ्कारिए ।
णिविढायवत्त-अन्धारिएसु ॥३॥
रविकन्त-कन्ति-उजालिएसु । आलावणि-सद्द-वमालिएसु ॥४॥
मञ्चसु तेसु थिय पहु चडेवि । वम्मह-गढ णाडिजन्ति (?) के वि ।।५॥
भूसन्ति सरीर वारवार । कण्ठाइ मुअन्ति लयन्ति हार ॥६॥
सुन्दर सच्छाय वि कणय-डोर। अलियं जि घिवन्ति मणेवि थोर ॥७॥
गायन्ति हसन्ति पुणासणत्य। अङ्गइँ मोडन्ति वलन्ति हत्य ॥८॥
स-पसाहण सव्व
'किर होसइ सिद्धि'
घत्ता
थिय सम्मुह वरइत्त किह ।
आयएँ आसएँ समय जिह ॥९॥
[३]
सिरिमाल ताम करिणिहें वलग्ग । णं विज्जु महा-घण-कोडि लग्ग ॥१॥
सयलाहरणालङ्करिय-देह । णं णहें उम्मिल्लिय चन्द-लेह ॥२॥
अग्गिम-गणियारिहें चडिय धाइ । णिसि-पुरउ परिट्रिय सन्झ णाइ ॥३॥
दरिसाविउ णर-णिउसम्वु तीएँ। णं वण-सिरि तरुवर महुयरीएँ ॥४॥
उहु सुन्दरि चन्दाणण-कुमार। उग्घाउ जहु रणें दुण्णिवारु ॥५॥
उहु विजयसीहु रिउपलय-कालु । रहणेउर-पुरवर-सामिसालु ॥६॥
सयल वि णरवर वञ्चन्ति जाइ। अवरागम सम्मादिहि णाई ॥७॥

सप्तमो संधि ११७ धत्ता-किष्किन्धने देखा कि राज्यकुलका ध्वज हवा में उड़ रहा है, जैसे श्रीमालाका हाथ उसे पुकार रहा हो ॥९॥ [२] अपने-अपने स्थानों पर मंच बने हुए थे जो महाकविके काव्य-वचनकी तरह सुगठित (अच्छी तरह निमित) थे । सोनेके गत्तों और मणियोंसे भूषित उन मंचोंपर सब वैठ गये। जिनमें भ्रमण करते हुए भौंरोंकी ध्वनि गूंज रही है, सघन आतपत्रोंसे अन्धकार फैल रहा है, सूर्यकान्तकी किरणोंसे जो आलोकित हैं, जो वीणाके शब्दोंसे मुखर हैं, ऐसे संचोंपर चढ़- कर राजा लोग बैठ गये । वामन और नट की तरह कोई अपना अभिनय कर रहे थे। बार-बार अपना शरीर अलकृत करते हुए उतारकर हार धारण करते। कोई सुन्दर अच्छी कान्तिवाली सोनेकी करधनी, यह कहकर कि यह बड़ी है, झूठमूठ फेक देता, कोई आसनपर बैठे-बैठे हँसते और गाते है, अंग मोड़ते है और हाथ घुमाते हैं ।।१-८॥ पत्ता-सभी वर प्रसाधन किये हुए सामने ऐसे स्थित थे, जैसे 'सिद्धि होगी' इस आशा से सभी समद (प्रसन्न) हो ॥९॥ [२] तब श्रीमाला हथिनीपर चढ़ गयी मानो विजली ही महामेघमालासे जा लगी हो । समस्त आभरणों से अलंकृत उनकी देह ऐसी जान पड़ती थी मानो आकाशमें चन्द्रलेखा प्रकागित हुई हो । एक स्त्रीने राजसमूह उसे इस प्रकार दिखाया, मानो मधुकरी वनश्रीको तरुवर दिखा रही हो। (वह कहती), "हे मुन्तरि. वह कुमार चन्द्रानन है, वह युद्धमें दुनिवार उद्धृत है, वह शत्रुओके लिए प्रलयकाल विजयसिंह है, जो रथनपुर नगर का श्रेष्ट स्वामी है। वह सभी नरवरोंको छोड़ती हुई, उसी प्रकार आगे बढ़ती है जैसे सम्यग् दृष्टि दूसरोंके आगमको

११८
पउमचरित
पुर उज्जोवन्तिय दीवि जेम । पच्छइ अन्धार करन्ति तेम ॥6॥
ण सिदि कु-मुणिवर परिहरन्ति । दुग्गन्ध रुक्ख णं भमर-पन्ति ॥९॥
घत्ता
गणियारिए वाल
णिय किक्किन्धों पासु किह ।
सरि-सलिल-रहल्लिएँ (१) कलहंसहाँ कलहंसि जिह ॥१०॥
[४]
किक्विन्धहों घल्लिय माळ ताएँ। णं मेहेसरहों सुलोयणाएँ ।
आसण्ण परिट्रिय विमल-देह । णं कणयगिरिह णव-चन्दलेह ॥२॥
विच्छाय जाय सयल वि णरिन्द । ससि-जोण्हऍ विणु णं महिहरिन्द ॥
णं कु-तवसि परम-गइहें चुक्क ।
णं पङ्कय-सर रवि-कन्ति-मुक ॥४॥
एत्थन्तरै सिरिमाला-वईहु। कोवग्गि-पलीविउ विजयसीहु ॥५॥
'अन्भन्तर विजाहर-वराहुँ ।
पइसारु दिण्णु किं वन्नराहु ॥६॥
उद्दालहाँ वहु वरइत्तु हणहो। वाणर-वंस-यहाँ कन्दु खणहाँ ॥७॥
तं वयणु सुणेप्पिणु अन्धएण। हकारित अमरिस-कुद्धएण nen
'विजाहर तुम्हें
लड् पहरण पाव
घत्ता
अम्हें कइय कवणु छलु ।
जाम ण पाडमि सिर-कमलु' ॥९॥
दुद्धराह ॥२॥
[५]
तं वयणु सुणेप्पिणु विजयसीहु। उत्थरिउ पवर-भुव-फलिह-दीहु ॥१॥
अभिटु जुज्झु विजाहराह । सिरिमाला-कारण
साहणइ मि अवरोप्परु मिडन्ति । णं सुकइ-कन्व-वयण घडन्ति ॥३॥
भञ्जन्ति खम्म विहदन्ति मञ्च । दुकवि-कव्वालाव व कु-सञ्च ॥४॥
हय गय सुण्णासण संचरन्ति । णं पंसुलि-लोयण परिममन्ति ॥५॥
रणु विजाहर-वाणरहे जाम । लङ्काहिउ पत्तु सुकेसु ताम ॥६॥

सप्तमो संधि छोड़ देता है । दीपिका जैसे आगे-आगे प्रकाश करती हुई, पीछे अन्धकार छोड़ती जाती है, जैसे सिद्धि खोटे मुनिवरको छोड़ देती है ॥१-९|| घत्ता हथिनी वालाको किष्किन्धके पास इस प्रकार गयी। जैसे नदीकी लहर कलहंसीको कलहंसके पास ले जाती है ॥१०॥ [४] उसने किष्किन्धको माला पहना दी, मानो सुलोचनाने मेघेश्वरको माला पहना दी हो। विमलदेह वह उसीके पास बैठ गयी, मानो कनकगिरि पर नवचन्द्रलेखा हो। सभी राजा कान्तिहीन हो गये, मानो चन्द्रज्योत्स्नाके विना महीधरेन्द्र हों, मानो परमगतिसे चूका हुआ खोटा तपस्वी हो, मानो सूर्यकी कान्तिसे रहित कमलोका सरोवर हो। इसी बीच विजयसिह श्रीमालाके पतिपर क्रोधकी ज्वालासे भड़क उठा, "श्रेष्ठ विद्या- धरोंके मध्य वानरोंको प्रवेश क्यों दिया गया ? वधू छीन लो, और वरको मार डालो, वानरवंशरूपी वृक्ष की जड़ खोद दो।" यह शब्द सुनकर, अमर्षसे भरकर अन्धकने उसे ललकारा ॥१-८॥ पत्ता-तुम विद्याधर हो और हम वानर? यह कौन-सा छल है ? ले पाप, आक्रमण कर जवतक मैं तेरा सिरकमल नहीं गिराता ॥९॥ [५] यह वचन सुनकर प्रवल और विकसित वाहुओंवाला विजयसिह उछल पड़ा! इस प्रकार श्रीमालाके लिए दुर्धर विद्याद्यरोंमें संघर्ष होने लगा। सेनाएँ भी आपसमे उसी प्रकार भिड़ गयीं, मानो सुकविके काव्य वचन आपसमें मिल गये हों। शून्य आसनवाले अश्व और गज घूम रहे हैं, मानो कुकविके अगठित काव्य वचन हों। जिस समय विद्याधरों और वानरो- का युद्ध चल रहा था, असमय लंकानरेश सुकेश वहाँ पहुंचा।

१२० पउमचरित आलग्गु सो वि वणे जिह हुभासु । जस दुक्का सो सो लेइ णासु ॥७॥ तहि अवसर वेहाविद्धएण। रणे विजयसीहु हड अन्धएण ॥८॥ घत्ता महि-मण्डल सीसु दीसइ असिवर-खण्डियउ। णावइ सयवतु तो. वि हंसे छण्डियउ ॥९॥ विणिवाइएँ विजयमइन्दै खुद्दे। किएँ पाराउट्ठएँ वल-समु.॥३॥ तुट्ठाणणु मणइ सुकेसु एम। 'सिरिमाल लएप्पिणु जाहुँ देव' ॥२॥ ते वयणे गय कण्टइय-गत्त । णिविसद्ध किक्कु-पुरक्खु पत्त ॥३॥ एतहें वि दुट्ठ-णिटवण-हेउ । केण विणिसुणाविउ असणिवेउ ||४|| 'परमेसर पर-णरवर-सिरोहु । ओलग्गइ पाणे हिं विजयसीहु ॥५॥ पडिचन्दहों सुऍण कइदएण । आवटिउ जम-मुहें अन्धएण' ॥३॥ तं वयणु सुविण करन्तु खेउ। सण्णहें वि पधाइउ असणिवेड ॥७॥ चठरङ्गे विजाहर-वलेण। परिवेढिउ पट्टणु ते छलेण ॥८॥ घत्ता हकारिय देवि 'पावहाँ पमय-महद्धयहो। लइदुलन कालु णिग्गहाँ किचिन्धन्धयहाँ ॥९॥ [७] पुणु पच्छएँ विप्फुरियाणणेण । हल्लारिय विजुलवाहणेण ॥9॥ 'अरें माइ महारउ णिहर जेम। दुद्धर-सर-धोरणि धरहों तेम' ॥२॥ तं णिसुणेवि दूसह-दसणेहि। पडिचन्द-परिन्दों णन्दणेहि ॥३॥ णिग्गन्तहिं जण-णिग्गय-पयातु । किउ पाराउट्ठउ लेण्णु सावु ॥४॥ सो असणिवेउ अन्धयहाँ वलिउ । तडिवाहणेण किहिन्धु खलिउ ॥५॥ पहरणई मुयन्ति सु-दारुणाहै। खणे भग्गेयई खणे वारुणाई ॥६॥ खणे पवणयह खणे थम्मणाई। खणे वामोहण-उम्मोहणा ।।७।।

सप्तमो संधि १२१ वह वनमें दावानलकी तरह युद्ध में भिड़ गया,वह जहाँ पहुँचता, वहीं विनाश मच जाता । उस युद्ध में क्रोधसे भरे हुए अन्धकने विजयसिंहका काम तमाम कर दिया ॥१-८॥ घत्ता-तलवारसे कटा हुआ उसका सिर धरती पर ऐसा दिखाई देता है मानो हंसने कमल तोड़कर छोड़ दिया हो ।।९।। [६] क्षुद्र विजयसिंहके मारे जाने, और सेनारूपी समुद्रका पार पानेके बाद, प्रसन्नमुख सुकेश इस प्रकार कहता है, "हे देव, श्रीमालाको लेकर चलें।" इन शब्दोसे पुलकित शरीर वे गये और आधे क्षणमें किष्किन्ध नगर जा पहुँचे । यहॉपर भी किसीने दुष्टोंका नाश करनेमें प्रमुख अशनिवेगसे जाकर कहा, "हे परमेश्वर, शत्रुराजाओंमें श्रेष्ठ विजयसिंहको, जो प्राणोंसे सेवा करता है, प्रतिचन्द्रके पुत्र कपिध्वजी अन्धकने यमके मुँहमें पहुंचा दिया है।" यह वचन सुनकर अशनिवेग बिना किसी खेदके तैयार होकर दौड़ा और विद्याधरोंकी चतुरंग सेनासे छलपूर्वक उसके नगरको घेर लिया ॥१-८॥ घत्ता-उन दोनोंको ललकारा, "अरे पापी कपिध्वजी किष्किन्ध और अन्धक निकलो, तुम्हारा काल आपहुंचा है"||९|| [७] उसके बाद तमतमाते हुए मुखवाले विद्युद्वाहनने ललकारा, "अरे, जिस प्रकार तुमने मेरे भाईको मारा है उसी प्रकार तुम मेरी दुर्धर तीरोंकी बौछार झेलो।" यह सुनकर प्रतिचन्द्रके दुर्दर्शनीय पुत्रोंने निकलकर, जिसका प्रताप लोगोंको विदित है, ऐसी समूची सेनाको यहाँसे वहाँ छान मारा। अशनिवेग अन्धककी ओर बढ़ा। विद्युद्वाहनने किष्किन्धको स्खलित किया, वे भयंकर अस्त्रोंसे प्रहार करने लगे। क्षणमें आग्नेय अस्त्र, और क्षणमें वारुणास्त्र । क्षणसे पवनास्त्र, क्षणमें स्तम्भन अस्त्र, क्षणमे व्यामोहन और सम्मोहन । क्षणमें

१२२
पउमचरित
खणे महियल खणे णहयले भमन्ति । खणे सन्दणेखणे जे विमाणे थन्ति ।।
भायामें वि दुक्खु
घत्ता
अन्धट खग्गें कण्ठे हउ।
जे सो विजयमइन्दु गउ ॥९॥
णि पन्थ तेण
[4]
एत्तहें वि मिण्डिवालेण पहउ । किकिन्ध-णराहिउ मुच्छ गउ ॥१॥
अच्छन्तउ परिचिन्तें वि मणेण। आमल्लिउ विजुलवाहणेण ॥२॥
तहिं अवसर ढुकु सुकेसु पासु । रहवरें छुहेवि जिउ णिय-णिवासु ॥३॥
पडिवाइस चेयण-भाउ लद्ध । उढन्ते पुच्छिउ परम-वन्धु ॥४॥
'कहिं अन्धउ' 'पेसण-चुक्कु देव'। णिवडिउ पुणो वि तडि-रुक्खु जेम ॥५॥
पुणु पडिवाइउ पुणु आउ जीउ । हा पइँ विणु सुण्णउ पमय-दीउ ॥६॥
हा माय सहोयर देहि वाय । हा पइँ विणु मेइणि विहव जाय ॥७॥
घत्ता
तो मणइ सुकेसु संसउ णाह जिएवाहाँ।
सिर णिक्खए खग्गै अवसरु कवणु रुएवाहाँ ॥८॥
[९]
विणु कजे वहरिहिं अङ्गु देहि ।
पायाललङ्क पइसरहुँ एहि ॥३॥
जीवन्तहुँ सिज्मइ सन्चु कज्जु । एत्तिउ ण विहउँ ण वि तुहुँ ण रज्जु॥२
तं णिसुणे वि वाणर-वंस-सारु । णोसरिउ स-साहणु स-परिवार ||३||
णासन्तु णिए वि हरिसिय-मणेण । रहु वाहिउ विज्जुलवाहणे ॥४॥
कर धरिउ असणिवेण्ण पुत्तु । कि उत्तिम-पुरिसह एउ जुतु ॥५॥
णासन्तु णवन्तु सुवन्तु सत्तु ।
भुञ्जन्तु ण हम्मइ जलु पियन्तु ॥६॥
में विजयसीहु हउ भुय-विसालु। सो णिउ कियन्त-दन्तन्तराल ॥७॥

सप्तमो संधि १२३ धरतीपर, क्षण में आकाशमें घूमते हुए। एक क्षण में विमानमें, एक क्षणमें स्यन्दन में ॥१-८॥ धत्ता-बड़ी कठिनाईसे अशनिवेगने खड्गसे अन्धकको कण्ठमें आहत कर, उसे उसी पथपर भेज दिया, जिसपर कि विजयसिंह गया था ॥९॥ [८] यहाँ भी भिन्दपालसे आहत किष्किन्ध राजा मूच्छित हो गया। उसे पड़ा हुआ देखकर विद्युद्वाहनने छोड़ दिया। उस अवसरपर सुकेश उसके पास पहुंचा और रथवरमें डाल- कर उसे नृपभवनमें ले गया। हवा करने पर उसे होश आया। उठते ही उसने अपने भाईको पूछा। किसीने कहा, "अन्धक कहाँ देव, वह तो सेवासे चूक गया।" वह फिर किनारेके पेड़की तरह गिर पड़ा। फिरसे हवा की गयी और उसमें चेतना आयी। वह कहने लगा, "हा, तुम्हारे विना वानरद्वीप सूना हो गया, हे भाई, हे सहोदर, तुम मुझसे बात करो, हा, तुम्हारे विना यह धरती विधवा हो गयी ॥१-७|| घत्ता-तब सुकेश कहता है,"हे स्वामी, जब जीनेमें सन्देह हो और सिर पर तलवार लटक रही हो, तब रोनेका यह कौन- सा अवसर है ।। [8] बिना कामके तुम शत्रुओंको अपना शरीर दे रहे हो, आओ पाताललोक चलें। जीवित रहनेपर सव काम सिद्ध हो जायेगे। यहाँ तो न मैं हूँ, न तुम, और न यह राज्य ।" यह सुनकर वानरवंश-शिरोमणि अपनी सेना और परिवारके साथ वहाँसे भाग निकला। उसे भागता हुआ देखकर हर्षितमन विद्युद्वाहनने अपना रथ हाँका । तव अशनिवेगने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, "उत्तम पुरुषके लिए यह ठीक नहीं है, भागते, प्रणाम करते, सोते, खाते और पानी पीते हुए शत्रुको मारना ठीक नहीं। जिसने विशालवाहु विजयसिंहको मारा

पउमचरित
तं णिसुणेवि तडिवाहणु णियत्तु । लहु देसु पसाहिउ एक-छत्तु ॥४॥
णिग्यायहाँ लङ्क
भुत्तई इच्छाएँ
घत्ता
अण्णहँ अण्णई पट्टणई।
सु-कलत्तई व स-जोधणई ॥९॥
[१०]
विन्ध सुकेसह पुर हरेवि । अवर वि विजाहर वसि करेवि ॥१॥
वहु-दिवसेंहिं धण-पडलह णिएवि। तं विजयसीह-दुहु संमरेवि ॥२॥
सहसार-कुमारहों देवि रज्जु । अप्पुणु साहिउ पर-लोय-कज्जु ॥३॥
वहु काले किचिन्धाहिवो वि । गउ वन्दण-हत्तिए मेरु सो वि ॥४॥
पल्लुटु पडीवउ णर-वरिछु । महु पवर-महीहरु ताम दिछ ॥५॥
जोवइ व पईहिय-लोयणेहि। हसइ व कमलायर-आणणेहि ॥६॥
गायइ व भमर-महुअरि-सरेहि। पहाइ व णिम्मल-जल-णिज्झरेहि ॥७॥
वीसमइ व ललिय-लयाहरेटिं। पणवइ व फुल्ल-फल-गुरुभरेहि ॥८॥
घत्ता
त सेलु णिएवि कोलावि णिय पय पउरु ।
किउ पट्टणु तेत्थु किक्किन्धे किक्किन्धपुरु ।।९।।
[११]
महु-महिहरो वि किक्किन्यु वुत्तु । उच्छ्राउ ताम उप्पण्णु पुत्तु ॥१॥
अण्णु वि सूररउ कणिठ्ठ तासु । वाहुवलि जेम भरहेसरासु ॥२॥
एत्तहँ वि सुकेसहाँ तिणि पुत्त । सिरिमालि-सुमालि-सुमल्लवन्त ॥३॥
पोढत्तण वुञ्चइ वेहिं ताउ । 'किण जाहुँ जेत्थु शिक्किन्धराउ' ॥४॥

सप्तमो संधि १२५ - था, वह तो यमको दाढ़ोंके भीतर भेज दिया गया है। यह सुनकर विद्युद्वाहनने प्रयत्न छोड़ दिया। शीघ्र ही उसने अपने देशका एकछत्र प्रसाधन सम्हाल लिया ॥१-८॥ घत्ता-निर्घातको लंका और दूसरोंको दूसरे-दूसरे नगर दिये जिन्हें वे, यौवनवती स्त्रियोंकी तरह भोगने लगे ॥९॥ [१०] किष्किन्ध और सुकेशके नगरोंका अपहरण कर, तथा दूसरे विद्याधरोंको अपने अधीन बना, बहुत दिनोंके वाद मेघपटलोंको देखकर अपने भाई विजयसिंहके दुःखको याद कर, विद्युद्वाहन विरक्त हो गया। कुमार सहस्रारको राज्य देकर उसने अपना परलोकका काम साधा। बहुत समयके अनन्तर किष्किन्धराज भी मेरु पर्वतपर वन्दना-भक्तिके लिए गया । वह नरश्रेष्ट वापस लौटा, इतने में उसे मधु नामक विशाल महीधर दिखाई दिया, जो अपने प्रदीर्घ नेत्रोंसे ऐसा लगता था कि जैसे देख रहा है, कमलाकरोंके मुखोंसे ऐसा लगता था कि जैसे हँस रहा है, भ्रमर और मधुकरियोंके स्वरोंसे ऐसा लगता था जैसे गा रहा है, निर्मल पानीके झरनोंसे ऐसा लगता था जैसे स्नान कर रहा है, लतागृहोंसे ऐसा लगता था जैसे विश्वस्त कर रहा है, फूलों और फलोंके गुरुभारसे ऐसा लग रहा है, मानो प्रणाम कर रहा है ॥१-८॥ घत्ता-उस पर्वतको देखकर उसने अपनी प्रमुख प्रजाको बुलवा लिया। किष्किन्धने वहाँ किष्किन्ध नामका नगर बसाया ||९|| [११] तबसे मधुमहीधर भी किष्किन्धके नामसे जाना जाने लगा। उसके ऋक्षरज पुत्र उत्पन्न हुआ। उससे छोटा, दूसरा एक और सूररज हुआ, वैसे ही जैसे भरतेश्वरका छोटा भाई बाहुबलि । यहाँ सुकेशके भी तीन पुत्र हुए, श्रीमालि, सुमालि और माल्यवन्त । प्रौढ़ युवक होनेपर उन्होंने अपने पितासे पूछा, १२६ पउमचरिठ सई 1॥ तसुणे विजणेरें वृत्तु एम। थिय दादुप्पाडिय सप्पु जेम ।।५।। कहिं जाहुँ मुएँ वि पायाळलक। चउपासिउ वइरिहुँ तणिय घणवाहण-पमुह गिरन्तराई। पत्तियई जाम रजन्तराई ॥७॥ अणुहूय लङ्क कामिणि व पवर । महु तणएँ सोसें भवहरियणवर ॥6॥ घत्ता तं बघणु सुणेवि 'उदएँ रज्ज मालि पलित्तु दवग्गि जिह । णिविस वि निजइ ताय किह ॥९॥ 1 । [१२] महुँ कहिय भडारा पई जि णित्ति । तिह जीवहि जिह परिममइ कित्ति ॥ तिह हसु जिह ण हसिनइ जणेण । तिह भुञ्ज जिह ण मुच्चहि धणेग ॥२॥ तिह जुन्यु जिह णिव्वुइ जणइ अड्ड। तिह तजु जिह पुणु वि ण होइ सगु॥३॥ तिह चउ जिह बुच्चइ साहु साहु । विह संचरु जिह सयणहं ण डाहु men तिह सुणु जिह णिवसहि गुरुहुँ पासें। तिह मरु जिह णावहि गम्भवासें ॥५॥ तिह तउ करें निह परितवइ गत्तु । तिह रज्जु पालं जिह णवइ सत्तु ॥६॥ किं जाएँ रिउ लासकिएण। किं पुरसे माण-कलकिएण ॥७॥ किं दचे दाण-विवजिएण । किं पुत्र मइलइ वंसु जेण ॥८॥ घत्ता जइ कल्लएँ ताय लक्षाणयरि ण पइसरमि। तो णियय-जणेरि इन्दाणी करय धरमि ॥९॥ [१३] गय रयणि पयाणउ परएँ दिण्णु । हउ तूरु रसायलु णाई मिण्णु ॥१॥ संचल्लिट साहणु णिरवसेसु । आरूढ के वि णर गयवरेसु ॥२॥ नुरएसु के वि के वि सन्दणेसु । सिविएसु के वि पञ्चाणणेसु ॥३॥ परिवेढिय लक्षा-णयरि तेहिं । णं महिहर-कोटि महा-धणेहिं था सप्तमो संधि १२७ "हम वहाँ क्यों न जायें जहाँ किष्किन्धराज है ?" यह सुनकर पिता बोला, "हम यहाँ उस साँपकी तरह हैं, जिसकी दाढ़ उखाड़ ली गयी है, पाताल-लंका को छोड़कर कहाँ जायें, चारों ओरसे दुश्मनोंकी शंका है? मेघवाहन प्रमुख, राज्यान्तर यहाँ जवतक निरन्तर बने हुए हैं, जिस लंका नगरीका हमने कामिनी की तरह भोग किया है, वही हमसे छीन ली गयी है" ॥१-८॥ पत्ता-यह वचन सुनकर मालि दावानलकी तरह प्रदीप्त हो उठा, "हे तात, राज्यके छीन लिये जानेपर एक पल भी किस प्रकार जिया जाता है ? ||२|| [१२] हे आदरणीय, आपने ही यह नीति मुझे बतायी है कि उस प्रकार जीना चाहिए जिससे कीर्ति फैले, उस प्रकार हँसो कि जिससे लोग हँसी न उड़ा सकें, इस प्रकार भोग करो कि धन समाप्त न हो, इस प्रकार लड़ो कि शरीरको सन्तोष प्राप्त हो, इस प्रकार त्याग करो कि फिरसे संग्रह न हो, इस प्रकार बोलो कि लोग वाह-वाह कर उठे, ऐसा चलो कि स्वजनोंको डाह न हो, इस प्रकार सुनो जिस प्रकार गुरुके पास रह सको, इस प्रकार मरो कि पुनः गर्भवासमें न आना पड़े। इस प्रकार तप करो कि शरीर तप जाये, इस प्रकार राज्य करो कि शत्रु झुक जाये। शत्रुसे आशंकित होकर जीनेसे क्या? मानसे कलंकित होकर जीनेसे क्या? दानसे रहित धनसे क्या? वंशको कलंकित पुत्रके होनेसे क्या? ॥१-८॥ पत्ता-हे तात, यदि कल मैं लंकानगरीमें प्रवेश न करूँ, तो अपनी माँ इन्द्राणीको अपनी हथेली पर रखू ॥९॥ [१३] रात बीत गयी, दिन आ गया। नगाड़े वज उठे, रसातल विदीर्ण हो उठा। समस्त सेना चल पड़ी। वे दोनों भी गजवरपर आरूढ़ हो गये। कोई अश्वोंपर, कोई रथोंपर । कोई शिविकाओंमें। कोई सिंहोंपर। उन्होंने लंकानगरीको

१२८
पउमचरित
णं पोट-विलासिणि कामुएहि । णं सयवत्तिणि फुल्लन्धुएहि ॥५॥
किउ कलयलु रहसारिणहि । पडिपहाई तुरई तूरिएहि ॥६॥
सविहिं सङ्घ तालिग हि ताल । चउ-पासिउ उठ्ठिय मड-बमाल ॥७॥
घाइउ लवाहिउ विप्फुरन्तु । रणें पाराउटुड वलु करन्तु ॥४॥
घत्ता
जं मत्त-गइन्दु
पञ्चाणणहाँ समावडिउ।
गम्पिणु मालिह अभिडिउ ॥५॥
सरहसु णिग्याउ
[१४]
पहरन्ति परोप्पर तरुवरेहि। पुणु पाहाणेहि पुणु गिरिवरहि ॥३॥
पुणु विज्जास्वहि मीमहि । अहि-गरुड-कुम्भि पञ्चाणणेहि ॥२॥
पुणु णाराएहि भयङ्करहि। मुयइन्दायाम-पईहरहि ॥३॥
छिन्दन्ति महारह-छत्त-धयई।
वइयागरण व वायरण-पयई॥४॥
एत्यन्त वाहिय-सन्दणेण । दणुबह-इन्दाणिहें गन्दणेण ॥4॥
सयवारउ परिअञ्चेवि गयणे।
हर खरगें छुद्ध कियन्त-वयणें ॥३॥
णिग्याउ पडिउ णिग्घाउ जेम। महियले णर णहें परितुट्ट देव ॥७॥
चत्तारि वि धुव-परिहव-कलङ्क। जय-जय-सहेण पइट्ट लङ्क 116||
घत्ता
सन्ति सन्तिहरें
सुविलासिणि जेम
गम्पिणु वन्दण-हत्ति किय ।
लङ्क स ई भुञ्जन्त थिय ॥९॥

सप्तमी मंधि १२९ घेर लिया जैसे महामेघोंने महीधर श्रेणीको घेर लिया ह । मानो प्रोड विलासिनीको कामुकोंने, मानो कमलिनीको भ्रमरो- ने। वेगसे आपूरित वे कोलाहल करने लगे, तूर्यकोंने नगाड़े वजा दिये। शंखधारियोंने शंख और तालवालोंने ताल। चारों ओरसे योद्धाओंका कोलाहल उठा। चमकता हुआ लंकानरेश दोड़ा, युद्धमें सेनामें हलचल मचाता हुआ॥१-८॥ पत्ता-निर्यात हर्पित होकर मालिसे इस प्रकार भिड़ गया जिस प्रकार मत्त गजेन्द्र सिंह के सामने आ जाये ॥९॥ [१४] दोनों आपसमें प्रहार करते है, तस्वरोंसे, पापाणोंसे, गिरिवरोंसे, भीषण सर्प, गरुड, कुम्भी और सिंह आदि नाना विद्यारूपोंसे, भयंकर तीरोंसे, (जो मुजगेन्द्र के आयामकी तरह दीर्घ थे), महारथ छत्र और ध्वजोंको उसी तरह छिन्न-भिन्न कर देते हैं जिस प्रकार चैयाकरण व्याकरणके पदों को। इसी पोप राक्षम और इन्द्राणीका पुत्र मालिने अपना रथ हाम्कर, अफाशमं सो यार घुमाकर निर्घातको तलवारसे आहत कर, गम गुपमे डाल दिया । निर्यात आहन होकर निर्यातकी तरह भरतीपर गिर पड़ा. आकाटामे देवता सन्तुष्ट हुए. चारोंने पगमवका कलंक धो डाला। उन्होंने जय-जय शब्दके साथ गर्गम प्रवेश किया ।।१-८!! पनामानिनायक मन्दिर में जाकर उन्होंने वन्दना-भक्ति भी विकाग्निीती नग लंकाका उपभोग करते वामनगद ॥५॥ .

१३०
पउमचरिउ
अट्ठमो संधि
मालिहँ रज्जु करन्ताहाँ
सहसा अहिमुहिहूआई
सिद्धइ विज्जाहर-मण्डलई।
सायरहाँ जेम सम्बई जलई ॥५॥
[१]
तहि अवसरै छुह-पकापण्डुरें। दाहिण-मेड्ढिहि रहणेउर-पुरै ॥१॥
पिहुल-णियन्त्रिणि पीण-पभोहरि । सहसारहीं पिय माणस-सुन्दरि ॥२॥
ताह पुत्तु सुर-सिर-संपण्णउ । इन्दु चवेवि इन्दु उप्पण्णउ ॥३॥
भेसइ मन्ति दन्ति भइरावणु । सेणावह हरिदेनि
भयावणु ॥४॥
विज्ञाहर जि सब किय सुरवर । पवण-कुवेर-वरुण-जम-ससहर ॥५॥
सव्वीस वि सहसइ पेक्खणयहुँ । णार्हि पमाणु खुज्ज-वामणयहुँ ॥६॥
गायण जाइ सुरिन्दत्तणयहुँ । णामई ताई कियई अप्पणयहुँ ॥॥
उच्चसि-रम्म-तिलोत्तिम-पहुइहिं । अट्ठायाल-सहस-वर-जुवइहिं ॥८॥
घत्ता
परिचिन्तिउ विज्जाहरण
ताई ताई महु चिन्धाई
तहाँ जाई-जाई भाखण्डलहों।
लइ हउँ जि इन्दु महि-मण्डलहौँ॥९॥
[२]
जुएं खय-काले णिडु(?) गिड्डालिहें । जे जे सेव करन्ता मालिहँ ॥३॥
ते ते सिलिय गराहिब इन्दहाँ। भवर जलोह व अवर-समुहहाँ ॥२॥
कप्पु ण दिन्ति जन्ति सिरिंगारहि (?)। आण करन्ति वि णाहकारहिं ॥३॥
रेण वि कहिउ गम्पि वहाँमालिह। 'पहु संकन्ति(१)ण तुम्ह णिडालिह(१)
को वि सहसारहों णन्दणु। तासु रन्ति सम्व मिचत्तणु' ॥५॥
तं णिसुणेवि सुकेसहों पुत्ते। कोव-जलण-जालोलि-पलिते ॥६॥

अट्ठमो संधि १३१ आठवीं संधि मालिके राज्य करनेपर सभी विद्याधर-मण्डल सिद्ध हो गये, उसी प्रकार जिस प्रकार सभी जल समुद्रकी ओर अभिमुख होते हैं ॥१॥ [१] उस अवसरपर दक्षिण श्रेणीमें चूनेसे पुता हुआ सफेद रथनूपुर नगर था। उसके राजा सहस्रारकी विशाल नितम्बोंवाली, पीन-पयोधरा मानससुन्दरी नामकी पत्नी थी। उसके सुरश्रीसे सम्पूर्ण पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसे इन्द्र कहकर पुकारते थे। उसका मन्त्री बृहस्पति, हाथी ऐरावत, सेनापति भयानक हरिकेश था। उसने पवन-कुवेर-वरुण-यम और चन्द्र सभी विद्याधरों और सुरवरोंको अपना बना लिया। उसके छब्बीस हजार नाटककार थे। कुब्ज और वामनोंकी तो कोई गिनती नहीं थी। इन्द्रकी जितनी गायिकाएँ थीं, उनके अनुसार उसने अपनी गायिकाओंके नाम रख लिये, जैसे उर्वशी, रम्भा, तिलोत्तमा इत्यादि अड़तालीस हजार श्रेष्ठ सुन्दर युवतियाँ थीं॥१-८॥ पत्ता-उस विद्याधरने सोचा कि इन्द्रके जो-जो चिह्न ह वे-वे मेरे भी हैं, लो मैं भी पृथ्वीमण्डलका इन्द्र हूँ ॥९॥ [२] जो-जो मालिकी सेवा कर रहे थे उसकी भाग्यश्री कम होनेपर, वे सब राजा इन्द्रसे मिल गये, वैसे ही, जैसे दूसरे-दूसरे जल दूसरे समुद्रमें मिल जाते हैं। श्रीसम्पन्न होकर भी वे कर नहीं देते। अहंकारी इतने कि आज्ञाका पालन तक नहीं करते। तब किसीने जाकर मालिसे कहा, "भाग्यहीन समझकर, तुमसे लोग आशंका नहीं करते। कोई इन्द्र नामका सहस्रारका पुत्र है, सब उसीकी चाकरी कर रहे हैं।" यह सुनकर सुकेशका पुत्र मालि कोपाग्निकी ज्वालासे भड़क उठा।

૧૨૨
पउमचरिउ
देवाविय रण-भेरि भयङ्कर । घरु (१) सण्णहें वि पराइय किङ्कर ॥७॥
किष्किन्धहाँ किक्किन्धहाँ णन्दण। दिण्णु पयाणउ वाहिय सन्दण ॥८॥
घत्ता
'गमणु ण सुज्झइ महु मणही' तं मालि सुमालि करै हिँ धरह ।
'पेक्खु देव दुणिमित्ताई सिव कन्दइ वायसु करगरइ ॥९॥
[३]
पेखु कुहिणि विसहर-छिज्जन्ती। मोक्कल-केस णारि रोवन्ती ॥३॥
पेक्खु फुरन्तउ वामउ लोयणु । पेक्खहि रुहिर-हाणु वस-मोयणु ॥२॥
पेक्खु वसुन्धरि-तलु कम्पन्तउ । घर-देवउल-णिवहु लोहन्तउ ॥३॥
पेक्खु भकाले महा-धणु गज्जिउ । णहें णञ्चन्तु कवन्धु मलज्जिउ' ॥४॥
तं णिसुणेवि वयणु तहाँ वलियउ । 'वच्छ वच्छ जइ सउणु जि वलिया
तो किं मरइ सव्वु ऍउ भलियउ । दइउ मुएवि भण्णु को वलियउ ॥६॥
छुड धीरत्तणु होइ मणूसहों। लच्छि कीति भोसरइ ण पासहो' ॥७॥
एम मणेप्पिणु दिण्णु पयाणउ । चलिउ सेण्णु सरहसु स-विमाणउ ॥८॥
घत्ता
हयनाय-रहवर-णरवरहि
महियले गयण ण माइयउ ।
दीसइ विन्झ-महोहरहों मेहउलु णाई उद्धाइयउ ॥९॥
[ ४ ]
तं जमकरणहाँ अणुहरमाणउ । णिसुणेंवि रक्खहाँ तणउ पयाणउ॥१॥
उमय-सेढि-सासन्त पणट्ठा।
गम्पिणु इन्दहों सरणे पइट्ठा ॥२॥
तहिं अवसर बलवन्त महाइय ।
मालिह केरा दूभ पराइय ॥३॥
'अहाँ अहो रहणेउर-पुर-राणा । कम्पु देवि करें सन्धि अयाणा ॥४॥
दुजउ लङ्काहिउ समरगणे।
छुद्ध जेण णिग्याउ जमाणणें ॥५॥
राय-लच्छि तइलोक-पियारी। दासि जेम जसु पेसणगारी ॥६॥

अट्ठमो संधि १३३ उसने भयंकर रणभेरी बजवा दी। अनुचर सन्नद्ध होकर पहुंचने लगे। किष्किन्ध और उसका पुत्र दोनोंने रुष्ट होकर प्रस्थान किया ॥१-८॥ घत्ता-उस समय मालि सुमालिका हाथ एकर कहता है, "हे देव, देखिए कैसे दुनिमित्त हो रहे हैं । सियार चिल्लाता है, कौआ आवाज कर रहा है ॥९॥ [३] नागिनोंसे क्षीण होती हुई पगडण्डी, और केश खोलकर रोती हुई स्त्रीको देखिए। देखिए वसुन्धराका तल काँप रहा है, जिसमें घर और देवकुलोंका समूह लोट-पोट हो रहा है। देखिए असमयमें महामेघ गरज रहे हैं, आकाशमें नंगे धड़ नाच रहे हैं।" यह सुनकर उसका मुख मुड़ा। वह बोला, "वत्स- वत्स, यदि शकुन ही बलवान हैं, तो क्या यह झूठ है कि 'सब मरते हैं। दैवको छोड़कर और कौन बलवान् है । यदि मनुष्य- में थोड़ा धैर्य हो, तो उसके पाससे लक्ष्मी और कीर्ति नहीं हटती। ऐसा कहकर उसने प्रस्थान किया। विमानों और हर्षके साथ सेना चल पड़ी ॥१-८॥ घत्ता-अश्वगज, रथवर और नरवर धरती और आकाशमें नहीं समाये । ऐसा दिखाई देता जैसे विन्ध्याचल से महामेघ उठे हों ।।९॥ [४] राक्षसके अभियानको यमकरणके समान सुनकर दोनों श्रेणियों के विद्याधर भागकर इन्द्र की शरण में चले गये। इसी अवसरपर मालिके महनीय बलवान दूत वहाँ आये। उन्होंने कहा, "अरे अजान, रथनूपुरके राजा, तुम कर देकर सन्धि कर लो। युद्ध-प्रांगणमें लंकानरेश अजेय है जिसने निर्यातको यमके मुखमें डाल दिया है, त्रिलोककी प्रिय राजलक्ष्मी, १३४ पउमचरित तेण समाणु विरोहु असुन्दरु' । 'दूउ भणेवि तेण तुहुँ चुक्त। आऐहिं वयणे हि कुविउ पुरन्दला॥ गं तो जम-दन्तन्तरु ढुक्कड ८॥ को सो लक-पुराहिवइ जो जीवेसइ विहि मि रणे घत्ता को तुहुँ किर सन्धि कहो तणिय । महि णीसावण्ण तहो त्तणिय ॥९॥ [५] गय ते मालि-दूय णिन्भच्छिय । दुग्वयणावमाण-पदिहत्थिय ॥ सण्णज्झाइ सुरिन्दु सुर-साहणु । कुलिस-पाणि अइरावय-वाहणु ॥२॥ सण्णज्झइ तणु-हेइ हुआसणु । धूमद्धउ कुयारि मेसासणु ॥३॥ सण्णज्झइ जमु दण्ड-मयकरु । महिसारुड पुरन्दर-किहरु ॥४॥ सण्णज्झइ णइरिउ मोग्गर-धरु । रिच्छाख्दु रणङ्गण दुन्दरु ॥५॥ सण्णज्झइ वरुणु वि दुईसणु । णागवास-करु करिमयरासणु ॥६॥ सण्णज्झाइ मिग-नामणु समीरणु। तरुवर-पवरुग्गामिय-पहरणु ॥७॥ सण्णमा कुवेर फुरियाहरु। पुष्फ-बिमाणारूढ सत्ति-करु ॥८॥ सण्णज्झइ ईसाणु विसासणु । सूल-पाणि पर-वल-संतासणु ॥९॥ सण्णाइ पञ्चाणण-गामि। कुन्त-पाणि ससि ससिपुर-सामि॥१० घत्ता जाइँ वि दिल्लीहोन्ताई ताइ मि रण-रस-पुलउग्गयह। णिऍवि परोप्परु चिन्धाई सुहहुँ कवयइँ फुहवि गयई ॥११॥ ताम परोप्पर वेहाविद्धई। पढम भिडन्त अग्गिम-खन्नई ॥१॥ मुसुमरिय-उर-सिर-मुह-कन्धर । पच्छिम-माअ-सेस थिय कुञ्जर ॥२॥ पुच्छुग्गीरिय पडिपहरन्ति । 'कहिंगय अग्गिम-माय' भणन्ति व॥३॥ नोह वि अमुणिय-जढर-उरस्थल । 'कहिंगय रिउ' पहरन्ति व करयल भट्टमो संधि जिसकी दासीकी तरह आज्ञाकारिणी है। उसके साथ विरोध करना ठीक नहीं।" इन शब्दोंसे इन्द्र क्रुद्ध हो गया, 'दूत हो' यह सोचकर तुम्हें छोड़ दिया, नहीं तो अभी तक यमकी दाढ़के भीतर चले जाते ॥१-८॥ धत्ता-कौन वह लंकाका अधिपति, कौन तुम, और किससे सन्धि ? युद्धमें दोनोंमें-से जो जीवित रहेगा, समस्त धरती उसीकी होगी ॥९॥ [५] दुर्वचन और अपमानसे आहत मालिके दूत अपमानित होकर चले आये। जिसके पास सुरसेना है, हाथमें वन है और ऐरावतकी सवारी है ऐसा इन्द्र सन्नद्ध होता है, जिसका शरीर ही अस्त्र है, धूम ध्वज है, जलका शत्रु मेप जिसका आसन है, ऐसा अग्नि सन्नद्ध होता है, दण्डसे भयंकर महिपपर बैठा हुआ इन्द्रका अनुचर यम सन्नद्ध होता है, मुद्गर धारण करने- वाला रीछपर आरूढ रणांगणमें कठोर नैर्ऋत्य तैयार होता है, जिसके अधर स्फुरित हैं, और जो हाथमें शक्ति धारण करता है, ऐसे पुष्प विमानमें आरूढ़ कुबेर तैयारी करता है । वृपभ जिसका आसन है, जो हाथमें त्रिशूल लिये है, ऐसा शत्रुसेनाको सतानेवाला ईशान सन्नद्ध होता है, सिंहगामी, हाथमें भाला लिये हुए, शशिपुरका स्वामी चन्द्रमा तैयार होता है ।।१-१०॥ घत्ता-जो लोग ढीले-पोले थे, उन्हें भी असमय उत्साहसे रोमांव हो आया, एक-दूसरेके ध्वज-चिह्न देखकर योद्धाओंके कवच तड़क गये ॥१॥ [६] तब सबसे पहले क्रोधसे भरी हुई दोनों ओरकी अग्रिन सेनाएं आपसमे भिड़ गयीं । गजोंके वक्ष, सिर, मुख, कन्धे नष्ट हो चुके थे, उनका पिछला भाग शेष रह गया था। फिर भी वे पछ उठाकर प्रतिप्रहार कर रहे थे, जैसे यह सोचते हुए कि हमारा अंगला भाग कहीं गया? योद्धा भी अपने पेट और उरस्थलका

१६६
पउमचरित
सचूरिय तुरङ्ग-धय-सारहि । चक्क-सेस थिय णवर महारहि ॥५॥
तहिं अक्सरें रहणेउर-सारहीं। धाइउ मल्लवन्तु सहसारही ॥६॥
सूररएण सोमु रणे खारिउ ।
उच्छुरएण वरुणु हकारिउ ॥७॥
जमु किक्किन्धे धणउ सुमालि । पवणु सुकेसें सुरवइ मालि ॥८॥
घत्ता
'एत्तिउ कालु ण वुझियउ तुहुँ कवणहुँ इन्दहुँ इन्दु कहें।
रण्डै हिँ मुण्डेहि जिभिएँ हिँ कि जो सो रम्महि इन्दवहें' ॥९॥
[]
तं णिसुणेवि चोइउ अइरावउ । णावह णिज्झरन्तु कुल-पावउ ॥१॥
मालि-पुरन्दर मिडिय परोप्पर। बिहि मि महाहउ जाउ भयकरु ॥२॥
जुज्झाई सेस-णरें हिं परिचत्तइँ । थिय पडिथिरई करेप्पिणु णेत्त: ॥३॥
इन्दयालु जिह तिह जोइजह । रक्खें रक्ख-विज चिन्तिज्जइ ॥४॥
भीम-महामीमें हिं जा दिण्णी । गोत्त-परम्पराएँ भवइण्णी ॥५॥
सा विकराल-वयण उद्धाइय । परिवढिय गयणयलेंण माइय ॥६॥
चिन्तिउ वरुण-पवण-जम-धणएँ हि । 'पत्तु इन्दु चरिए हि अप्पणए हि ॥७॥
दूएं वृत्तु आसि रायगणें।
दुज्जउ मालि होइ समरगणे ॥४॥
घत्ता
ताई पत्था पुरन्दरण माहिन्द-विज्ज लहु संभरिय ।
वड्ढिय तहें वि चउग्गुणिय रवि-कन्तिए ससि-कन्ति व हरिय ॥९॥
[८]
तं माहिन्द-विज अवलोऍवि । मणइ सुमालि मालि-मुहु जोऍवि ॥१॥
'तइयहुँ ण किउ महारउ वृत्त । एवहिं आयउ कालु णिरुत्तउ' ॥२॥

भट्ठमो संधि १३७ ? ख्याल न रखते हुए, 'शत्रु कहाँ गया ? यह कहते हुए करतलसे प्रहार करते हैं, अश्व, ध्वज और सारथि चूर-चूर हो गये। केवल महारथियोंके हाथमें चक्र वाकी वचा। उस अवसरपर, रथनूपुर श्रेष्ठ सहस्रारके ऊपर माल्यवन्त दौड़ा, सूर्यरवने सोमको युद्धमें ललकारा, ऋक्षराजने वरुणको हकारा। किष्किन्ध- ने यमको, सुमालिने धनदको, सुकेशने पवनको, मालिने इन्द्रको॥१-८॥ पत्ता-(मालि कहता है) "इतने समय तक मैं नहीं समझ सका कि तुम किस इन्द्रके इन्द्र हो, क्या तुम वह इन्द्र हो जो रुण्ड-मुण्डों और जिह्वाओंके द्वारा इन्द्रपथमें रमण करता है ?" ||९|| [७] यह सुनकर इन्द्रने ऐरावतको प्रेरित किया, जैसे वह झरता हुआ कुलपर्वत हो। मालि और इन्द्र आपसमें भिड़ गये, दोनोंमें भयंकर महायुद्ध हुआ। शेष योद्धाओंने युद्ध छोड़ दिया, वे अपने नेत्र स्थिर करके रह गये। वे इस प्रकार देखने लगे जैसे इन्द्रजालको देखा जाता है, राक्षसने राक्षस विद्याका चिन्तन किया:जो भीम महाभीम द्वारा दी गर्या थी, और जो उसे कुल परम्परा से मिली थी। अपना मुख विकराल बनाये वह दौड़ी, वह इतनी बढ़ी कि आकाशतलमें नहीं समा सकी। वरुण, पवन, यम और कुवेर सोच में पड़ गये, इन्द्रके दूत उसके पास पहुंचे। उन्होंने कहा, "दूतने राजसभामें ठीक ही कहा था कि मालि युद्धमें अजेय है ।।१-८॥ पत्ता-उनके प्रस्तावपर इन्द्रने शीघ्र माहेन्द्र विद्याका स्मरण किया, वह सूर्यकान्त और चन्द्रकान्तकी तरह उससे चौगुनी बढती चली गयी ॥९॥ [८] माहेन्द्र विद्याको देखकर सुमालि मालिका मुख देखकर कहता है, "उस समय तुमने हमारा कहना नहीं माना, अब लो १३८ पडमचरित तं णिसुणे वि पलम्ब-भुय-डालें। अमरिस-कुद्धएण रण माळे ॥३॥ वायव-वारुण-अग्गेयस्थई। मुक तिणि मि गयई णिरत्थई ॥४॥ जिह अण्णाण-कणे जिण-वयणई । जिह गोहङ्गणे वर-मणि-रयण ॥४॥ जिह उवयार-सयई अकुलीणएँ। वयई जेम चारित्त-विहीणएँ ॥६॥ गम्पि पहाणु मिलिउ पहाणें। घरुणहों वरुणु हुवासु हुआसणें ॥७॥ हसिउ पुरन्दरेण 'भरे माणव । देव-समाण होन्ति किं दाणव' 1॥ घत्ता मणइ मालि 'को देउ तुहुँ जं बन्धहि ओहहहि वि वलु पउरु सु सयलु णिरिक्खियउ । इन्दयालु पर सिक्खियउ॥९॥ [ ९ ] तं णिसुणेवि वयणु सुरराएँ। विद्ध णिडालें मालि णाराएं ॥१॥ लहु उप्पावि चित्तु णरिन्। णाई वरकुसु मत्त-गइन्दै ॥२॥ सहसा रुहिराअम्बिरु दीसिउ । ण मयगल सिन्दूर-विहूसिउ ॥३॥ वाम-पाणि वण देवि अखन्तिएँ। मिण्णु णिडाले सुराहिउ सत्तिएँ ॥४॥ विहलवलु भोणल्ल महीयलें। कलयलु घुटु रक्ख-वाणर-चलें ॥५॥ मालि सुमालि साहुकारिउ । 'पइँ होन्तएँ णिय-वंसुद्धारिउ' ॥६॥ सहसखें। एन्तउ धरविण सकिउ रखें ॥७॥ सिह पाडेवि रसायले पडियउ। कह वि ण कुम्म-बी भन्मिदियउ॥८॥ उद्वेवि मुकु चक्षु वयणु मढ ण वीसरित घन्ता धाविउ कवन्धु रोसावियउ । कुम्भत्थलें असिवर वाहियउ ॥९॥ वे-वारट भइरावयहाँ

अट्ठमों संधि
इस समय निश्चित रूपसे काल आया है" यह सुनकर, लम्बी हैं
बाँहें जिसकी ऐसे मालिने क्रोधसे भरकर वायव, वारुण और
आग्नेय अस्त्र छोड़े। वे तीनों ही व्यर्थ गये, उसी प्रकार, जिस
प्रकार अज्ञानीके कानोंमें जिनवचन, जिस प्रकार गोठबस्तीके
आँगनमें उत्तम मणिरत्न, जिस प्रकार अकुलीन व्यक्तिमें सैकड़ों
उपकार, जिस प्रकार चरित्रहीन व्यक्तिमें व्रत । प्रभंजन प्रभंजन-
से, वायु वायुसे और अग्नि अग्निसे जा मिला। इसपर इन्द्र
हुँसा, "अरे मानव, क्या देवके समान दानव हो सकते
हैं ?॥१-८॥
पत्ता-मालि कहता है, "तुम कौन देव, तुम्हारा प्रबल
बल मैने पूरा देख लिया है, जो तुम बाँधते हो, फिर उसीको
हटा लेते हो, तुमने केवल इन्द्रजाल सीखा है ।।९।।
[९] यह वचन सुनकर इन्द्रने तीरसे मालिको मस्तकमें
आहत कर दिया। तब नरेन्द्रने शीघ्र उस तीरको निकाल लिया,
जैसे महागज श्रेष्ठ अंकुशको निकाल ले। मस्तकमें सहसा रक्त
की धारासे लाल वह ऐसा दिखा जैसे सिन्दूरसे विभूषित
मैगल हाथी हो ? जल्दी-जल्दीमें धावपर बायाँ हाथ रखकर
मालिने इन्द्रको शनिसे ललाटमें आहत कर दिया। वह
विह्वलांग होकर धरतीपर गिर पड़ा। राक्षस और वानरकी
सेनाओंमें कोलाहल होने लगा। सुमालिने मालिको साधुवाद
दिया कि तुम्हारे होनेसे ही अपने वंशका उद्धार हुआ। सहस्राक्षने
उठकर शीघ्र चक्र छोड़ा, आते हुए उसे राक्षस नहीं रोक सका।
वह चक्र उसके सिरपर होते हुए धरतीपर जा पड़ा, किसी
तरह कछुए की पीठसे जाकर नहीं टकराया ॥१-८।।
धत्ता-मुख अपना घमण्ड नहीं भूला । रोपसे भरा कवन्ध
दौड़ रहा था। दो वार उसने ऐरावतके कुम्भस्थल पर तलवार
॥
चलायी ॥९॥

पउमचरित
[१०]
जं विणिवाइड रक्खु रणगणें। विजउ घुछ भमराहिव-साहणे ॥॥
णटु कइय-वलु भय-भीयउ। गलियाउहु कण्ठ-ट्ठिय-जीयउ ॥२॥
केण वि ताम कहिउ सहसक्खहाँ । 'पच्छले लग्गु देव पडिवक्खहों ॥३॥
वहुवारउ णिसियर-कइचिन्धेहिं । जैव सुकेस-किकिन्धेहिं ॥४॥
एय जि विजयसीह खय-गारा। तिह करें जेम ण जन्ति मडारा' ॥५॥
तं णिसुणेवि गउ चोइउ जावे हिं । ससहरु पुरुङ परिटिउ ता हिं ॥६॥
'महु आदेसु देहि परमेसर । मारमि हउँ जि णिसायर वाणर ॥७॥
सेण्णु वि धत्तमि जम-मुह-कन्दरें । दसण-सिलायल-जीहा-ककरें ॥४॥
घत्ता
इन्दे हत्थुथल्लियट धाइड ससि सर वरिसन्तु किह ।
पच्छलें पवणाहऍ घणहाँ धाराहरु वासारत्तु जिह ॥९॥
[११]
'मरु मरु वलहाँ वलहों किं णासहों। धाराहर-माछडहों हयासही ॥१॥
सुरयण-णयणानन्द-जणेरा ।
कुद्ध पाव तं (१) वासव-केरा' ॥२॥
त णिसुणेवि दूरुज्झिय-सङ्कउ । अहिमुहु मल्लवन्तु पर थक्कउ ॥३॥
गहकल्लोलु णाई छण-चन्दहाँ। णाई मइन्दु महग्गय-विन्दहों ॥४॥
'अरें ससङ्क स-कलङ्क अलजिय । महिलाणण वे-पक्ख-विवजिय ॥५॥
चन्दु मणेवि जें हासउ दिजइ। पई वि को विकिरण घाइजई' ॥६॥
एम चवेपिणु चाव-सणाहर । मिण्डिवाल-पहरणण समाहउ ॥७॥
सुच्छ पराइय पसरिय-वेयणु । दुक्खु दुक्ख किर होइ स-चेयणु ॥४॥

अट्ठमो संधि । [१०] जैसे ही युद्ध-प्रांगणमें राक्षसका पतन हुआ, वैसे ही इन्द्रकी सेनाने विजयकी घोषणा कर दी। भयभीत वानर सेना नष्ट हो गयी। आयुध गल गये और प्राण कण्ठोंमें आ लगे। तब किसीने जाकर सहस्राक्षसे कहा, "हे देव, शत्रुसेनाके पीछे लगिए,निशाचर और कपिध्वजियों सुकेश और किष्किन्धके द्वारा बहुत बार हम विदीर्ण किये गये। विजयसिंहका नाश करने- वाले यही हैं । ऐसा करिए, हे आदरणीय, जिससे ये लोग वापस नहीं जा सकें।" यह सुनकर इन्द्र जैसे ही अपना गज प्रेरित करता है, वैसे ही चन्द्र उसके सामने आकर स्थित हो जाता है, "हे देव, मुझे आदेश दीजिए। निशाचरों और वानरोंको मै मारूँगा । सेनाको भी यममुखरूपी गुफामें फेंक दूंगा। जो दाँतरूपी गिलाओं और जिहासे कर्कश है ॥१-८।। पत्ता-न्द्रने हाथ ऊँचा कर दिया । तीर वरसाता हुआ चन्द्रमा इस प्रकार दौड़ा, जिस प्रकार मेघके पछाऊँ हवासे आहत होनेपर वर्षा ऋतुमें धाराएँ दौड़ती हैं ।।९।। [११] वह बोला, "मरो मरो, मुड़ो मुड़ो, हताश वर्षा ऋतुके पानगे, क्यों नष्ट होते हो? सुरजन नेत्रोंको आनन्द देनेवाली न की सेना मुद्ध है। हे पाप ।" यह सुनकर, अपनी शंका दूर पर मान्यवन्त आकर उसके सन्मुन्ब न्धित हो गया, जैसे पूर्ण पन्ना लामन राष्ट्र, जैसे महागजसमार के सामने सिंको। का पाला. "अरे कलंकी वेशन चन्द्र, महिलाओंकी तरह तेरा मोनोपलाग्ने रहता। चन्द्र कटकर तेरा मजाक या जाना है या नुमसे भी कोई युद्धमे मारा जायेगा। 23 भिन्दपाल ने चारदिन चन्न आरत हो मांजगी। वरना पलने लगी। धीरे-धीरे पठिनाई ना भाग-८॥ 1 . --- Pum १४२ पउमचरित घत्ता दूरीहूया ताम रित मयलन्छणु मणे अवतसइ किह । सिरु संचालइ करु धुणइ संकन्तिहें चुकु विप्पु जिह ॥९॥ [१२] ताम महा-रहणेउर-पुरवरु। जय-जय-स पइसइ सुरवरु ॥१॥ पत्रण-कुवेर-वरुण-जम-खन्द हिं। णड-फम्फाव-छत्त-कइदन्देहि ॥२॥ वन्दिण-सयहि पवढिय-हरिसेंहि। विजाहर-किण्णर-किंपुरिस हिं ॥३॥ जोइम-जक्ख-गरुड-गन्धन् हिं। जय-जय-कार करतहि सवहिं॥४॥ चलणेंहिं गम्पि पडिउ सहमारहाँ । णं भरहसरु तिहुमण-मारहों ॥५॥ समिपुरि महिह दिण्ण विक्खायहों। धणयहाँ लङ्क किक्कु जमरायहाँ ॥६॥ मह-णयरें वरुणाहिउ उवियउ । कञ्चणपुर कुवेरु पट्टवियउ ॥७॥ घत्ता अण्णु वि को वि पुरन्दरण तहि अवसर जो संभावियड । मण्डलु एक्कक्कड पवरु सो सव्वु स इं भुनावियउ ॥८॥ [ ९. णवमो संधि] एत्थन्तरै रिद्धिह जन्ताही पायाल-लक भुञ्जन्ताहों। उप्पण्णु सुमालिहँ पुत्तु किह रयणासउ रिमहहाँ भरहु जिह ॥३॥ [१] सोलह-आहरणालङ्करित। णं भययरित ॥ वहु-दिवसें हि आउच्छेवि जणणु । गउ विजा-कारण पुष्फवणु ॥२॥ थिउ अक्खसुत्तु करयल रैवि। जिह मह-रिसि परम-माणु धरॅवि ॥३ सयमेव मयणु णवमोसंधि १४३ पत्ता-तवतक दुश्मन दूर जा चुका था, मृगलांछन अपने मनमें सन्त्रस्त हो उठा। वह सिर चलाता, हाथ धुनता जैसे संक्रान्तिसे चूका ब्राह्मण हो? ।।९।। [१२] तव सुरवर इन्द्र जय-जय शब्दके साथ महान् रथ- नूपुर नगर में प्रवेश करता है । जय-जय करते हुए पवन, कुवेर, वरुण, यम, स्कन्ध, नट, वामन, कविवृन्द, हर्षसे भरे हुए सैकड़ों बन्दीजन, विद्याधर, किन्नर, किंपुरुष, ज्योतिपी, यक्ष, गरुड और गन्धवोंके साथ इन्द्र जाकर सहस्त्रारके चरणों में उसी प्रकार पड़ गया जिस प्रकार भरतेश्वर त्रिभुवन- श्रेष्ठ ऋषभनाथके चरणों में। उसने चन्द्रमा को शशिपुर, विख्यात धनदको लंका, यमको किष्क नगर दिया। वरुणको मेघनगरमें स्थापित किया। कुवेरको कंचनपुरमें प्रतिष्ठित किया ॥१-७॥ पत्ता-उस समय जो कोई वहाँ था, इन्द्रने उसका आदर किया । एकसे एक प्रवर मण्डलका उसने सत्रको स्वयं उपभोग कराया ॥८॥ नौवीं सन्धि इसके अनन्तर, वैभवसे रहते और पाताल लंकाका उपभोग फरते हुए सुमालिको रत्नाश्रव नामक पुत्र उसी प्रकार हुआ जिम प्रकार ऋषभको भरत हुए थे॥१॥ [१] मोलह प्रकारके अलंकारोंसे शोभित वह ऐसा जान पड़ना जैसे न्दयं कामदेव अवतरित हुआ हो। बहुन दिनों यार, पितासे पूछकर विद्या मिद्ध करनेके लिए वह पुष्पवनमें गया। उसी अवसरपर गुणोंफा अनुरागी व्योमविन्दु वहाँ

१४४
पउमचरित
तहि अवसर गुण-अणुराइयउ ।
रयणासर लक्खिउ तेण तहिं ।
लइ सच्चउ हूयउ गुरु-वयणु ।
कइकसि णामण वुत्त दुहिय ।
ऍहु पुत्ति तुहारउ भत्तारु ।
सो पोम विन्दु सपाइयउ ॥४॥
'इमु पुरिस-रयणु उप्पण्णु कहि ॥५॥
ऍहु सो णरु ऍउ त पुष्फवणु' ॥६॥
पप्फुल्लिय-पुण्डरीय-मुहिय ॥७॥
माणस-सुन्दरिह व सहसारु' ॥४॥
घत्ता
गड धीय थवेवि णियासवहाँ उप्पण्ण विज रयणासवहों।
थिउ विहि मि मझें परमेसरिहि णं विझु तावि-णम्मय-सरिहिं ॥९॥
[२]
अवलोइय वहु रयणासत्रेण । णं अग्ग-भहिसि सइँ वासवेण ॥१॥
सु-णियम्विणि परिचकलिय-थणि । इन्दीवरच्छि पकय-वयणि ॥२॥
'कसु केरी कहि अवइण्ण तुहुँ । तउ दूरे दिहि जे जणइ सुहु' ॥३॥
तं सुणेवि स-सङ्क कण्ण चवइ । 'जइ जाणहाँ पोमविन्दु णिवइ ॥४॥
हउँ तासु धीय कण ण वरिय । कइकसि णामें विजाहरिय ॥५॥
गुरु-वयणहिं आणिय एउ वणु । तट दिण्णी करें पाणिग्गहणु ॥६॥
तं णिसुणे वि सुपुरिस-धवलहरु । उप्पाइउ विजाहर-णयरु ॥७॥
कोकाविउ सय वि वन्धुजणु । सहुँ कण्णएँ किउ पाणिग्गहणु ॥८॥
घत्ता
वहु-काले सुविणउ लक्खियउ अस्थाणे णरिन्दहों अक्खियउ ।
'फाडेप्पिणु कुम्म कुञ्जरहुँ पञ्चाणणु उव पइठ्ठ महु ॥९॥
उच्चोलिहें चन्दाइच थिय ।
"अटुङ्ग-णिमित्तइँ नाणऍण।
तं णिसुणेवि दइएं विहसिकिय (2)
बुच्चइ रयणासव-राणऍण ॥२॥

णवमो संधि १४५ पहुँचा। उसने वहाँ रत्नावको देखा। उसे लगा कि ऐसा पुरुपरत्न कहाँ उत्पन्न हुआ ? तो गुरुका वचन सच होना चाहता है, यही वह नर है और यही वह पुष्पवन है। तब उसने खिले हुए कमलोंके समान मुखवाली अपनी कैकशी नामकी पुत्रीसे कहा, "हे पुत्री, यह तुम्हारा पति है उसी प्रकार, जिस प्रकार मानस सुन्दरीका सहस्रार" ॥१-८॥ पत्ता-वह कन्या वहीं छोड़कर अपने घर चला गया, इधर रत्नावको भी विद्या सिद्ध हो गयी। वह दोनों परमेश्व- रियोंके बीच में ऐसे स्थित था, जैसे ताप्ती और नर्मदा नदियोंके वीचमें विन्ध्याचल ॥९॥ २] वधूको रत्नावने इस प्रकार देखा, जिस प्रकार इन्द्र अपनी अग्रमहिपीको देखता है। अच्छे नितम्बों और गोल स्तनों- वाली उसकी आँखे इन्दीवरके समान और मुख कमलकी तरह था। (वह पूछता है), "तुम किसकी ? और कहाँ उत्पन्न हुई ? तुम्हारी दृष्टि दूरसे ही मुझे सुख दे रही है ।" यह सुनकर कन्या शंकाके स्वरमें कहती है, "यदि जानते हैं व्योमबिन्दु राजा को। मैं उसकी कन्या हूँ, अभी किसीने मेरा वरण नहीं किया है, मैं कैकशी नामकी विद्याधरी हूँ। गुरुके वचनसे मुझे इस वनमे लाया गया, तुम्हारे करमें मेरा पाणिग्रहण दे दिया गया है।" यह सुनकर उस पुरुपश्रेष्ठने एक विद्याधर नगर उत्पन्न किया । सब बन्धुजनोंको वहीं बुलवा लिया, और कन्याके साथ वियाह कर लिया ॥२-८॥ पत्ता-बहुत समय बाद उसने सपना देखा, और दरवारमें गजासे कहा, "हाथीका गण्डस्थल फाड़कर एक सिंह उदर में घुन गया है मेरे ॥९॥ [३] कटिबन्न (उच्चोलि? ) में चन्द्र और सूर्य स्थित हैं।" यह सुनकर प्रिय मुसकरा उठा। अष्टांग निमित्तोंके जानकार

१४६
पउमचरित
'होसन्ति पुत्त तउ तिण्णि धणे। पहिलारउ ताहं रउद्दु रणें ॥३॥
जग-कण्टउ सुरवर-डमर-करु । मरहद्ध-णराहिउ चक्रधर' ॥४॥
परिओसें कहि मिण मन्ताहुँ ।
णव-सुरय-सोक्खु माणन्ताहुँ ॥५॥
उप्पण्णु दसाणणु अतुल-वलु। पारोह-पईहर-मुय-जुयलु ॥६॥
पक्कल-णियम्बु विस्थिण्ण-उरु । णं समगहों पचविउ को वि सुरु ॥४॥
पुणु भाणुकण्णु पुणु चन्दणहि । पुणु जाउ विहीसणु गुण-उवहि ॥
घत्ता
तो उप्पाडन्तु दन्त गय? करयलु छुहन्तु मुहे पण्णयहुँ।
आयएँ कोलए रामणु रमइ ण कालु वालु होऍवि ममइ ॥९॥
[१]
खेलन्तु पईसइ भण्डारु । जहिं तोयदवाहण-तणउ हारु ॥३॥
णव-मुहइँ जासु मणि-जडियाइँ । णत्र गह परियप्पें वि घडियाइँ ॥२॥
जो परिपालजइ पण्णऍहि । भासीविस-रोसाउण्णऍहि ॥३॥
सामण्णहो भण्णहों करइ वहु । सो कण्ठउ दुट्ठउ दुच्चिसहु ॥४॥
सहसत्ति लग्गु करें दहमुहहों। मित्तु सुमित्तहों अहिमुहहाँ ॥५॥
परिहिउ णव-भुहइँ समुट्टिय.। णं गह-विम्बई सु-परिट्टियाँ ॥६॥
णं सयवत्तई संचारिम। णं कामिणि-वयणइ कारिम. ॥७॥
वोल्लन्ति समउ वोल्लन्तऍण । स-वियारु हसन्ति हसन्तऍण ॥८॥
घत्ता
क्खेप्पिणु ता. दहाणणइँ थिर-तारई तरलइँ लोयण' ।
ते दहमुहु दहसिरु जणेण किउ पञ्चाणणु जेम पसिद्धि गठ ॥९॥

णवमो संधि राजा रत्नाश्रवने कहा, "हे धन्ये, तुम्हारे तीन पुत्र होंगे ? उनमें पहला, युद्धमें भयंकर, जगके लिए कण्टकस्वरूप, देवताओंसे विग्रहशील और अर्धचक्रवर्ती होगा । नवसुरतिके सुखका उपभोग करते और परितोषसे कही न समाते हुए, उन दोनोंके, अतुल बल प्रारोहकी तरह लम्बी भुजाओंवाला दशानन उत्पन्न हुआ। पुट्ठोंसे परिपुष्ट और विशाल वक्षःस्थलवाला वह ऐसा लगता कि जैसे स्वर्गसे कोई देव च्युत होकर आया हो। फिर भानुकर्ण, चन्द्रनखा, और फिर गुणसागर विभीषण उत्पन्न हुए ॥१-८॥ घत्ता-तब कभी गजोंके दाँतोंको उखाड़ता हुआ, कभी सॉपोंके मुखोंको करतलसे छूता हुआ, रावण इन लीलाओंसे क्रीड़ा करता है, मानो काल ही वालरूप धारणकर घूमता हो॥९॥ [४] खेलता हुआ वह भण्डारमें प्रवेश करता है, जहाँ तोयद- वाहनका हार रखा हुआ था। जिसके मणियोंसे जड़े हुए नौ मुख थे, जो मानो नवग्रहोंकी कल्पना करके बनाये गये थे। वह हार विषैले और क्रोधसे भरे हुए नागोंसे रक्षित था। कठोर कान्तिसे युक्त वह दुष्ट कण्ठा, दूसरे सामान्य जनका वध कर देता । परन्तु वह रावणके हाथमें आकर वैसे ही आ लगा, जैसे सुमित्रके सामने आनेपर मित्र उससे मिलता है। उसने उसे पहन लिया, जिसमें उसके दस मुख दिखाई दिये, मानो ग्रह-प्रतिविम्ब ही प्रतिष्ठित हुए हों, मानो चलते-फिरते कमल हों, मानो कृत्रिम कामिनी-मुख हों, जो वोलते समय बोलने लगते, और हँसते समय हँसने लगते ॥१-८।। पत्ता--स्थिर तारों और चंचल लोचनोंवाले उन दसमुखों- को देखकर लोगोंने उसका नाम दसमुख रख दिया, वैसे ही जैसे सिहका नाम पंचानन प्रसिद्ध हो गया ।।९।।

पउमचरिउ
[५]
जंपरिहिउ कण्ठवणेण । किउ वद्धावणउ सु-परियणेण ॥१॥
स्यणासउ कइकसि धाइय।। आणन्दें कहि मि ण माइयई ॥२॥
णिसुणेप्पिणु आइउ उच्छुग्छ ।
किष्किन्धु.स-कन्तउ सरउ ॥३॥
सयदेहि णिहालिड साहरणु । दह-गीउम्मीलिय-दइ-वयणु ॥२॥
परिचिन्तिउ 'णउ सामण्णु णरु । ऍहु होइ णिरुत्तउ चहरु ॥५॥
एयहाँ पासिड
रज्जु
वि विउलु । कइ-जाउहाण-बलु
रण
अतुलु ॥६॥
एग्रहों पासिउ सुरवइहें खउ । जम-वरुण-कुवेरह णाहि जउ' 1॥
घत्ता
अण्णेक-दिवस गज्जन्तु किह णव-पाउस जलहर विन्दु जिह ।
ण] जन्तउ पेक्खेंवि वइसवणु पुणु पुच्छिय जणणि 'एहु कवणु' ॥८॥
[६]
त णिसुणवि मउलिय-णयणियएँ बजरिउ स-गग्गर-वयणियएं ॥१॥
'कउमिकि जणेरि एयहाँ तणिय । पहिलारी पहिणि महु त्तणिय ॥२॥
वीसावसु विज्जाहरु जणणु । एहु माइ तुहारउ वइसवणु ॥३॥
वइरिहि मिलेवि मुह मलिण किय । मायरि व कमागय लक हिय ॥४॥
एयहाँ उद्दालें वि जेमि तिय । कइयहुँ माणेसहुँ राय-सिय ॥५॥
णिन्मच्छिय जणणि विहीसणण ॥६॥
'वइसवणहों केरी कवण सिय । दहवयणहों णोक्खी का विकिय ॥७॥
पंक्वेसहि दिवसहि थोवएँ हिं। आएँ हि अम्हारिस-देवऍहि ॥४॥
रत्तुप्पल-हूभालोयणग।
घत्ता
जम-खन्द-कुवेर-पुरन्दरहिं रवि-वरुण-पवण-सिहि-ससहहि ।
मणुदिणु दणुवइ-क्न्दावणहों घरै सेव करेवी रावणहों ॥९॥

णवमोसाँध [५] जब रावणने वह कण्ठा पहना, तो परिजनों ने उसे बधाई दी। रत्नाश्रव और केकशी दोनों दौड़े, वे आनन्दसे कहीं भी फूले नहीं समा रहे थे। यह सुनकर इच्छुरव आया। किष्किंध, और पत्नी सहित सूर्यरच आया। सबने अलंकारों से सहित उसे देखा कि उसकी दस गरदनोंपर दस सिर उगे हुए हैं। उन्होंने सोचा, “यह सामान्य आदमी नहीं है, यह निश्चय से चक्रवर्ती है । इसके पास विपुल राज्य है और राक्षसोंकी अतुल सेना है, इसके पास इन्द्र का क्षत्र है, यम, वरुण और कुवेर की जीत नहीं है" ||१-७॥ पत्ता-एक दिन वह ऐसा गरजा, जैसे नवपावस में मेघ- समूह गरजता है । आकाशमें वैश्रवण को जाते हुए देखकर उसने माँ से पूछा, "यह कौन है ?॥८॥ - [६] यह सुनकर, अपनी आँखे बन्द करके, गद्गद् वाणीमें वह बोली, "इसकी मॉ कौशिकी है, जो मेरी बड़ी बहन है । विद्याधर विश्वावसु इसका पिता है। यह वैश्रवण तुम्हारा भाई (मौसेरा) है। शत्रुओंसे मिलकर इसने अपना मुँह कलं- कित कर लिया है, अपनी माताके समान क्रमागत लंकानगरीका इसने अपहरण कर लिया है। इसको उखाड़कर, मै स्त्रीके समान कब राज्यश्री मानूगी ?" तब रक्तकमलके समान जिसकी आँखे हो गयी हैं, ऐसे विभीषणने मॉको बुरा-भला कहा, "वैश्रवणकी क्या श्री है ? दशाननसे अनोखी श्री किसने की है ? थोड़े ही दिनोंमें हमारे दैवके प्रसन्न होनेपर तुम देखोगी ? ॥१-८॥ पत्ता-यम, स्कन्ध, कुबेर, पुरन्दर, रवि, वरुण, पवन, शिखी ( अग्नि) और चन्द्रमा, प्रतिदिन राक्षसोको रुलानेवाले रावणके घरमें सेवा करेगे। ||९||

१५०
पउमचरित
[ ७ ]
एकहि दिणें आउच्छे वि जणणु। गय तिण्णि वि भीसणु भीम-वणु ॥३॥
जहिं जक्ख-सहास. दारुण. । जहि सीह-पयइँ रुहिरारुण ॥२॥
जहि णीसासन्तेंहिं अजयरें हिं। दोल्लन्ति डाल सहुँ तरुवर हिं ॥३॥
जहिं साहारूढई विप्पयई। अन्दोलण-परम-माव-गयई ॥४॥
तहि तेहएँ भोसण भीम-वणें ।
थिय विज्ज झाणु
भरवि मण ॥५॥
जा भटक्खर हिं पसिद्धि गय । णामण सन्च-कामन-स्य ॥३॥
सा विहिं पह हि पासु मइय । णं गाढालिगण-गय दइय ॥७॥
पुणु झाइय सोबह-अक्खरिय । जय (१)-कोटि-सहास-दहुत्तरिया॥
घत्ता
ते भायर अविचल-प्राण-रुइ दहवयण-विहीसण-माणुसुइ ।
वणे दिठ जक्ख-सुन्दरिए किह जिण-वाणिए तिणि वि लोय निहं ॥५॥
[0]
जं जक्खिएँ गवणु दि वण। तं वम्मह-वाण पइट्ठ मणे ॥॥
'वोल्लाविउ वोल्लइ किं ण तुहुँ । किं वहिरउ किं तुह गाहिं मुहु ॥२॥
किं झायहि अक्खसुत्तु धिवहि । महु केरउ स्व-सलिलु पिवहि' ॥३॥
दहगीव-पसरु अनहन्तियएँ। स-विलक्खउ खेडु करन्तियएं ॥१॥
वच्छत्थले पहउ सुकोमलण। कण्णावयंस-णीलुप्पलेंग ॥५॥
अण्णेकर वुत्तु वरङ्गणएँ। पप्फुल्लिय-तामरसाणगएँ ॥६॥
'तुहुँ जाणहि एहु णरु सञ्चमउ । उप्पाइड केण वि कमउ' ॥३॥
पुणु गम्पिणु रण-रस-अढियहाँ । जक्खहाँ बजरिउ भणदियहाँ ॥४॥
घत्ता
कडी-कलाव-केडर-घर पइँ तिण-समु मपणें वि तिण्णि गर ।
वणे विज्जड माराहन्त थिय णावइ जग-भवणहों खम्म किय ॥९॥

নী খি [७] एक दिन तीनों भाई अपने पिनासे पूछकर, भीषण भीम पनमें गं जदाजारों भीपण यक्ष थे, जहां बनने काल मिर पचा थे, जी अजगरोंके मान लेनेपर बोय पेरोक गाय मामा हिल उठना थी। जामाने नट जोग हिलते हुए अनिष्ट नाग । उम भीषण व iman. में ध्यान धारण कर बैठ गये। जोगट मेवारी मशागनारूप प्रनित विधा थी, यादी प्राम Tiपामग, माना धिताही प्रगाः गिन गाने नीला भागवानी निवासन Finanानाजार पगे मजार किया 11-11 पानीनों भाई अघिन मानम ग्न, गन, दिनानुरा पन में उन्हें पर वादन म मनियानीनगीनी लोगों को देना {titीन गाना यो का सामना कर INE मनाने ४. RREEdi " FE: पान पाल REET MA ::mir... in ... Re: 7 . 4 p4 4 . 14 ::mire ...ri 1 -- 4 । 1. . . * . A Hu . . indi. ...: .":-23 १५२ पउमचरित [९] तं णिसुणे वि जम्बूदीव-पहु। णं जलिउ जलण जाला-णिवहु ॥३॥ 'सो कवणु एत्थु णिकम्पिरउ । जगँ जीवइ जो महु वाहिरउ' ॥२॥ अहिमुहु पयह तहाँ आसवहाँ। सुय दिट्ट ताम स्यणासवहीं ॥३॥ 'अहाँ पन्चइयहाँ अहिणवहाँ। कं झायहाँ कवणु देउ थुणहाँ ' ॥४॥ जं एकु वि उत्तर दिण्णु ण वि । तं पुणु वि समुहिउ कोव-हवि ॥५॥ उवसग्गु घोरु पारम्भियउ । वहुरूव हिं जक्खु वियम्भियड ॥६॥ आसीविस-विसहर-अजयरें हिं। सदूल-सीह-कुञ्जर-वरें हिं ॥७॥ गय-भूय-पिसाएँ हिं रक्खस हिं। गिरि-पत्रण-हुआसण-पाउ0हि ॥४॥ घत्ता दस-दिसि-बहु अन्धारउ करवि भोरुम्मॅवि जनवि उत्थरै वि । गउ णिप्फलु सो उवसग्गु किह गिरि-मत्थएँ वासारतु जिह ॥९॥ [१०] जं चित्तु ण सकिउ अवहरवि । थिउ तक्खणे अण्ण माय धरॅवि ॥१॥ दरिसाविउ सयल वि वन्धुजणु। कलुणउ कन्दन्तु विसण्ण-मणु ॥२॥ कस-धाएँ हिं घाइज्जन्तु वर्ण। 'णिवडन्तुहन्त खण जे खणें ॥३॥ श्यणासवु कइकसि चन्दणहि । हम्मन्तई जइ ण अम्हे गणहि ॥४॥ तो सरणु मणेविपडिव(र)क्ख करें रिउ मारह लग्गइ पुत्त धरें ॥५॥ तं पुरिसयारु किं वीसरिउ । णव-वयणु जेण कण्ठउ धरिउ ॥६॥ अहाँ भाणुकण्ण करै चारहडि । सिरि माहि लगाउ छार-हडि ॥७॥ अहाँ धरहि विहीसण जत्ताई। वणे मेच्छहिँ पिहिज्जन्ताई ॥८॥ -- - णमो संधि [९] यह सुनकर जम्बूद्वीपका स्वामी वह यक्ष ऐसे जल उठा मानो अग्निज्वालाओंका समूह हो। ऐसा कौन-सा अविचल व्यक्ति है जो मुझसे बाहर रहकर दुनियामें जीवित है ?” उनके स्थानके सामने जाकर उसने रलाश्रवके पुत्र रावणको देखा। वह बोला, "अरे नये संन्यासियो, किसका ध्यान करते हो, किस देव की स्तुति कर रहे हो ?" जब उन्होंने एक भी उत्तर नहीं दिया, तो फिर उस यक्षकी क्रोधज्वाला भड़क उठी। उसने भयंकर उपसर्ग करना शुरू कर दिया, वह स्वयं अनेक रूपोंमें फैलने लगा। विषदन्त-विषधर और अजगर, शार्दूल-सिंह और कुंजर, गज-भूत-पिशाच, राक्षस-गिरि-पवन-अग्नि और पावस से ॥१-८॥ पत्ता-उसने दसो दिशाओंमें अन्धकार फैला दिया। रुक- कर, जीतकर, उछलकर उसने उपसर्ग किया, परन्तु वह वैसे ही व्यर्थ गया, जैसे गिरिराजके ऊपर वर्षाऋतु व्यर्थ जाती है ।।९॥ [१०] जब वह यक्ष उनका चित्त विचलित न कर सका तो उसने तुरन्त दूसरी माया धारण की । उसने उनके सभी बन्धु- जनोंको विषवमन और करुण विलाप करते हुए दिखाया। वनमें कोडोंके आघातसे पीटे जाते हुए और क्षण-क्षणमें गिरते- पड़ते हुए। रत्नाश्रव, कैकशी और चन्द्रनखा पीटी जा रही हैं, यदि हमें तुम कुछ नहीं गिनते, तो फिर कहो क्या प्रतिपक्षकी शरणमे जाये ? शत्रु मारता है और पीछे लगा हुआ है, ऐ पुत्र, वचाओ। क्या वह अपना पुरुपार्थ भूल गये, जिससे नौमुखका कण्ठा तुमने धारण किया था। अरे भानुकर्ण, तुम अपना शौर्य धारण करो, इसका सिर तोड़ दो जिससे वह धूलसे जा मिले । अरे विभीपण, जाते हुए इन्हें पकड़ो, वनमे ये म्लेच्छके द्वारा पीटे जा रहे हैं॥१-८॥

परमचरित
घत्ता
मैं पुत्तहों गड पडिरक्ख किय जं कालिय पालिय वविय ।
सो णिप्फलु सयल किलेसु गड जिह पावहाँ धम्मु विभक्खियउ' ॥९॥
[1]
जंकण विणउ साहारियउ । तं तिणि वि जस्खे मारियउ ||
पुश तिहि मि जगहुँ दरिसावियउ । सिव-साण-सिचालहि खाविया!
गवि चलित वो वितहों साणु थिरु । माया-रावणड करेवि सिरु ॥३॥
भग्गएँ पत्तिउ अविचल-मणहँ । माइहि रविकण्ण-विहीसणहें ॥३॥
तं णिऍवि सीसु रुहिरारुणउ । ते झाणहाँ चलिय मणामणउ 11411
णिद्धई सुद्धइँ थिर-जोयणहै। ईसीसि पगलियाँ लोग्रण३ ॥६॥
सिर-कमलई ताह मि केराई। उवणाऍवि दुक्ख-जणेराई ॥७॥
रावणहों गम्पि दरिलावियई। पउमई व णाल-महावियई ॥६॥
घत्ता
एम वि रावणु अचलु थिउ तं देवहिं साहुकारु किउ ।
विजहुँ सहासु उप्पण्णु किह तित्थयरहों केवल-णाणु जिह ॥९॥
[१२]
मागया कहकहन्ती महाकालिणी । गग्रण-संचालिणी भाणु-परिमालिणी॥
कालि कोमारि वाराहि माहेसरी। धोर-वीरासणी जोगजोगेसरी ॥२॥
सोमणी रयण वम्माणि इन्दाइणी । अणिम लहिमति पण्णत्ति कमाइणी ॥३
उहणि उद्याटिणी थम्भणी मोहणी । वहरि-विद्धसणी भुवण-संखोहणी ॥४॥
वारणी पावणी भूमि-गिरि-दारिणी । काम-सुह-दाइणी वन्ध-वह-कारिणी॥५
सन्त्र-पच्छायणी सम्व-आकरिसिणी विजय जय जिम्मिणीसच-मय-णासणी
सति-संवाहिणी कुटिल अवलोयणी। अग्गि-जल-धम्मणी छिन्दणी मिन्दणी।
आसुरी रक्ससी वारुणी वरिसणी । दारुणो दुण्णिवारा य दुरिसणी ॥४॥

णवमो संधि १५५ । पत्ता-अरे पुत्रो, तुम प्रतिरक्षा नहीं करते, जो हमने तुम्हें पाला-पोसा और बड़ा किया, वह हमारा सब क्लेश व्यर्थ गया, वैसे ही जैसे पापीमें धर्मका व्याख्यान ॥९|| [११] जब किसीने भी उन्हें सहारा नहीं दिया, तब उन तीनोंको यक्षने मार डाला। फिर उन तीनोंको उसने ऐसा दिखाया कि श्मशानमें शृगालोंके द्वारा वे खाये जा रहे हैं। इससे भी उनका स्थिर ध्यान विचलित नहीं हुआ। तब माया- रावणका सिर काटकर, अविचल मन भानुकर्ण और विभीपणके सामने फेंक दिया। रुधिरसे लाल उस सिरको देखकर उनका मन थोड़ा-थोड़ा ध्यानसे विचलित हो गया। उनकी स्निग्ध गुद्ध और स्थिर देखनेवाली ऑखे थोड़ी-थोड़ी गीली हो गयी। उनके भी दुख उत्पन्न करनेवाले सिररूपी कमलोंको ले जाकर रावणको दिखाया मानो मृणालसे रहित कमल ही हों ।।१-८|| पत्ता-जब भी रावण इस प्रकार अचल रहा, तब देव- ताओंने साधुकार किया। उसे एक हजार विद्याएँ उसी प्रकार सिद्ध हो गयी, जिस प्रकार तीर्थकरोंको केवलज्ञान उत्पन्न होता है। ॥२॥ [१२] कहकहाती हुई महाकालिनी आयी । गगनसंचालिनी, भानु परिमालिनी, काली, कौमारी, वाराही, माहेश्वरी, घोर चीरासनी, चांगयोगेश्वरी, सोमनी, रतन ब्राह्मणी, इन्द्रासनी, अणिमा. लघिमा, प्रज्ञप्ति, कात्ययनी, डायनी, उच्चाटनी, म्नम्भिनी, मोहिनी, वैरिविध्वंसिनी, भुवनसंक्षोभिणी, वारुणी, पावनी, भूमिगिरिदामणी, कामसुखदायिनी, बन्यवधकारिणी, सर्वप्रन्यादिनी, सर्वआकर्षिणी, विजयजयजिम्भिनी, सर्वमद- नागिनी. शक्तिमवाहिनी, कुडिलअवलोकिनी, अग्नि-जल नमानी, छिन्दनी. भिन्दनी. आमुरी, रामसी, वारुणी, वर्षिणी, द्वारा र्निपारा और दुर्दर्शिनी ।।१-८॥

१५६
पउमचरित
घत्ता
आएहि वर-विजेहि आइयहिं रावणु गुण-गण-अणुराइयहिं ।
चउदिसि परिवारिउ सहइ किह मगलञ्छणु कण ताराहुँ जिह ॥९॥
[१३]
सन्चोसह थम्मणी मोहणिय । संविद्धि महङ्गण-गामिणिय ॥१॥
आयउ पञ्च वि ववगयउ तहिं । थिउ कुम्मयण्णु चल-झाणु जहि ॥२॥
सिद्धत्य सत्त-विणिवारिणिय । णिग्विग्घ गयण-संचारिणिय ॥३॥
आयर चयारि
पुणु चल-मणहाँ। आमण्णउ थियउ विहीसणहों ॥४॥
एत्थन्तर पुण्ण-मणोरहेण । वहु-विजालतिय-विग्गहेंण ॥५॥
णामेण सयंपहु णयरु किउ । ण सग्ग-खण्ड अवयरें वि थिउ ॥६॥
अण्णु वि उप्पाइउ चेइहरु । मणहरु णामेण सहससिहरु ॥७॥
उत्तुगु सिड्नु उण्णइ करें वि।
णं वन्छइ सूर-विम्वु धरै वि ॥८॥
घत्ता
तं रिद्धि सुणेवि दसाणणही परिओसु पवढिउ परियणहों।
भायई कइ-जाउहाण-वलई णं मिलें त्रि परोप्परु जल-थलई ॥९॥
[१४]
ज दिट्ट सेण्ण सयणहुँ तणिय । परिपुच्छिय पुणु अवलोयणिय ॥१॥
ताएँ वि संवीहिउ दहवयणु ।
'ऍहु देव तुहारउ वन्धु-जणु' ॥२॥
त णिसुणे वि णरवइ णीसरित । णिय-विज-सहासें परिवरित ॥३॥
गं कमलिणि-सण्डे पवरु सरु । ण रासि-सहासें दियसयरु ॥४॥
स-विहीसणु कुम्मयण्णु चलिउ । णं दिवस-तेउ सूरहों मिलिड ॥५॥
तिणि मि कुमार सचल्ल किर। उच्छलिय ताम फरमाव-गिर ॥६॥
रयणासत्रु पत्तु स-वन्युजणु । तं पट्टणु त रावण-मवणु ॥७॥
तं सह-मण्डउ मणि-वेयडिउ ।
तं विज-सहासु समावडिउ ॥८॥

णवमो संधि १५७ घत्ता-रावणके गुण-गणोंमें अनुरक्त, आयी हुई इन विद्याओंसे घिरा हुआ रावण वैसे ही शोभित था, जैसे ताराओं- से घिरा हुआ चन्द्रमा ।।९॥ [१३] सर्वसहा, थम्भणी, मोहिनी, संवृद्धि और आकाश- गामिनी ये पाँच विद्याएँ वहाँ पहुँची, जहाँ चलितध्यान कुम्भकर्ण था। सिद्धार्थ, शत्रु-विनिवारिणी, निर्विघ्ना और गगन- संचारिणी ये चार चंचलमन विभीषणके निकट स्थित हो गयीं। इसके अनन्तर बहुत-सी विद्याओंसे अलंकृत और पुण्य- मनोरथ रावणने स्वयंप्रभ नामका नगर बसाया, मानो स्वर्ग- खण्ड ही उतरकर स्थित हो गया हो। उसने एक और चैत्यगृह बनाया, अत्यन्त सुन्दर उसका नाम सहस्रकूट था। उसकी ऊँची शिखरे उन्नति करके मानो सूर्यके बिम्बको पकड़ना चाहती हैं ॥१-८॥ पत्ता-"रावणके उस वैभवको देखकर परिजनोंका सन्तोष बढ गया, वानरों और राक्षसोंकी सेनाएँ आकर मिल गयीं, मानो जलथल मिल गये हों।" ||९|| [१४] अपने लोगोंकी उस सेना को देखकर रावणने अव- लोकिनी विद्यासे पूछा । उसने भी दशाननको बताया, “हे देव, ये तुम्हारे बन्धुजन हैं।" यह सुनकर राजा बाहर निकला। अपनी हजार विद्याओंसे घिरा हुआ वह ऐसा लग रहा था, मानो कमलिनी-समूहसे प्रवर सरोवर, मानो हजार राशियों से सूर्य । कुम्भकर्ण भी विभीषणके साथ चला, मानो दिवसका तेज सूर्य- के साथ मिल गया हो। जैसे ही तीनों कुमार चले वैसे ही चारणोंकी वाणी उछली । रत्नाश्रव बन्धुजनोंके साथ वहाँ पहुँचा। वह नेगर रावण का भवन, मणियोंसे वेष्टित वह सभाभवन आयी हुई हजार विद्याएँ ॥१-८|| .

१५८
पउमचरित
घत्ता
पेक्खेप्पिणु परिभोसिय-मणेण णिय तणय सुमालिहें णन्दणेण ।
रोमञ्चाणन्द-णेह-जुऍहिं चुम्बेवि अवगूढ स इंभु वहि ॥९॥
[१०. दसमो संधि]
साहिउ छट्टीववासु करवि णव-णीलुप्पल-णयणेण ।
सुन्दरु सु-वंसु सु-कलत्तु जिह चन्दहासु दहवयणेण ॥१॥
[.]
दससिरु विजा-दससय-णिवासु । साहेप्पिणु दूसहु चन्दहासु ॥१॥
गउ बन्दण-हत्तिएँ मेरु जाम । संपाइय मय-मारिच्च ताम ॥२॥
मन्दोबरि पवर-कुमारि लेवि । रावणहों में भवणु पइट वे चि ॥३॥
चन्दणहि णिहालिय तेहिं तेत्थु । 'परमेसरि गउ दहवयणु केत्थु ॥४॥
तं णिसुणेवि णयणाणन्दणीऍ । बुच्चइ रयणासव-णन्दणीऍ। ॥५॥
'छुडु छुडु साहेप्पिणु चन्दहासु । गउ महिमुहु मेर-महीहरासु ॥६॥
एत्तिएँ आवइ वइसरहु ताम' । तं लेवि णिमित्तु णिविट्ट जाम ॥७॥
वेत्तालऍ महि कम्पणहँ लग्ग । संचलिय असेस वि कउह-सग्ग ॥८॥
खणे अन्धारउ खण चन्दिणउ खणे धाराहरु वरिसइ ।
विजउ जोक्खन्तउ दहवयणु णं माहेन्दु परिसइ ॥९॥

दसमो संधि
१५९
घत्ता-देखकर, सन्तुष्ट मन होकर सुमालिके पुत्र रत्नाश्रवने
अपने पुत्रोंको चूमकर पुलकित वाहुओंसे आलिंगनमें भर
लिया ॥९॥
दसवीं सन्धि
नवनील कमलके समान नेत्रवाले रावणने छह उपवास
कर, सुन्दर तथा सुवंश और सुकलत्रकी तरह चन्द्रहास खड्ग
सिद्ध किया।
[१] हजार विद्याओंके निवासस्थान चन्द्रहास खड्ग साध-
कर, जव वन्दना-भक्ति करनेके लिए सुमेरु पर्वत पर गया, तव
मन्मारीच आये। प्रवर कुमारी मन्दोदरीको लेकर वे रावणके
घरमें प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने चन्द्रनखाको देखा और पूछा,
"परमेश्वरी, दशानन कहाँ गया है ? यह सुनकर नेत्रोंको आनन्द
देनेवाली रत्नाश्रयकी कन्याने कहा. "चन्द्रहास खड्ग साधकर
अभी-अभी नुमेरु पर्वतकी ओर गये हैं। तबतक आप यहाँ
आकर बैठे।" उसे (मन्दोदरी) को लेकर क्षण-भर वे बैठे ही
धे कि सन्ध्या समय धरती कॉपने लगी, समस्त दिशामार्ग
चलित होके ॥१-८॥
पना-एक पलमे अंधेरा. दूसरे पलमें चाँदनी। पलमें
मेमोथा वर्मा, मानो गवण देखता हुआ माहेन्द्री विद्याका
पदान कर रहा था ॥२॥

१६० पउमचरिउ [३] मम्मीसँवि मन्दोवरि मएण । चन्दणहि पपुच्छिय मय-गएण ॥१॥ 'एँउ काइँ मडारिएँ कोउहल्लु । पवियम्भइ रऍ पेम्मु व णवल्लु' १२॥ स वि पचविय 'किं ण मुणिउ पयाउ । दहगीव-कुमारहों ऍहु पहाउ'.॥३॥ तं णिसुर्णेवि सयल वि पुलइयग । अवरोप्पर मुहई णिएहुँ लग्ग ॥४॥ एत्यन्तरें किक्कर-सय-सहाउ । मय-दूसावासु णियन्तु आउ ॥५॥ 'एहु को आवासिउ समभरेण । पणवेवि कहिउ केण वि गरेण ॥६॥ 'विजाहर मय-मारिच्च के वि। तुम्हहँ मुहवेक्खा आय वे वि' ॥७॥ तं णिसुणे वि जिगवर-मवणु ढुक्कु । परियञ्चेवि चन्द वि ताण-मुक्कु ॥८॥ घत्ता सहसत्ति दिट्टु मन्दोवरिए दिटिएँ चल-मउँहालए। दूरहों जै समाहउ वच्छयलें णं णीलुप्पल-मालए ॥९॥ । [३] दोसइ वेण वि सहसत्ति वाल । णं भसले अहिणव-कुसुम-माल ॥१॥ दीसन्ति चलण-णेउर रसन्त णं महुराव वन्दिण पढन्त ॥२॥ दीसह णियम्वु मेहल-समग्गु । ण कामएव-अस्थाण-मग्गु ॥३॥ दोसइ रोमावलि छुदु चडन्ति । चडन्ति । णं कसण-वाल-सप्पिणि ललन्ति ॥४॥ दीसन्ति सिहिण उवसोह देन्त । णं उरयलु भिन्नै वि हस्थि-दन्त ॥५॥ दीसह पप्फुल्लिय-वयण-कमलु । णीसासामोयासत्त-मसलु ।।६।। दीसइ सुणासु भणुहुभ-सुभन्धु । णं णयण-जळहीं किउ सेउ-वन्धु ॥५॥ दीसह णिडाल सिर-चिहुर-छपणु । ससि-विस्वु व णव-जलहर-णिमण्णु ॥

दसमो संधि १६१ [२] मन्दोदरीको अभय वचन देते हुए, डरकर मयने चन्द्रनखासे पूछा, "यह कौन-सा कुतूहल है, जो अनुरक्तमें नये प्रेमकी तरह फैल रहा है ?" उसने उत्तर दिया, "क्या तुम यह प्रताप नहीं जानते ? यह दशाननका प्रभाव है ?" यह सुनकर सभी पुलकित होकर एक-दूसरेका मुख देखने लगे। इतने में सैकड़ों अनुचरोंके साथ, मयके निवासस्थानको देखते हुए रावण आया। उसने पूछा, “यहाँ ठाठ-बाटसे किसे ठहराया गया है ?" तव प्रणाम करते हुए किसी एक नरने कहा, "मय और मारीच कई विद्याधर तुमसे मिलनेकी इच्छासे आये है।" यह सुनकर वह जिनवर-भवनमें पहुंचा। वहाँ सन्त्राससे मुक्त जिनकी प्रदक्षिणा और वन्दना की ॥१-८॥ घत्ता-फिर सहसा मन्दोदरीने अपनी चंचल भौहोंवाली दृष्टिसे उसे देखा, जैसे वह दूरसे ही नील कमलोंकी मालासे वक्षस्थलमें आहत हो गया हो ॥९॥ [३] उसने भी सहसा वालाको देखा,मानो भ्रमरोंने अभिनव कुसुममालाको देखा हो। मुखर चंचल नूपुर ऐसे लगते थे मानो चारण मधुर स्वरमें पढ़ रहे है। मेखलासे रहित नितम्ब ऐसे दिखाई देते हैं मानो कामदेवके आस्थानका मार्ग हो, धीरे-धीरे चढती हुई रोमावली ऐसी दिखाई देती है, मानो काली बाल नागिन शोभित हो, शोभा देनेवाले स्तन ऐसे दिखाई देते हैं, मानो हृदयोंको भेदने के लिए हाथी दॉत हो। खिला हुआ मुख- कमल ऐसा दिखाई देता है जैसे निश्वासोंके आमोदमे अनुरक्त भ्रमर उसके पास हों। अनुभूत सुगन्ध उसकी नाक ऐसी मालूम देती है मानो नेत्रोंके जलके लिए सेतुबन्ध बना दिया गया हो। सिरके बालोंसे आच्छन्न ललाट ऐसा दिखाई देता है मानो जैसे चन्द्रविम्ब नवजलधरमें निमग्न हो ॥१-८।।

१६२ पउमचरित घत्ता परिभमइ दिहि तहों नहिं जें तहि अण्ण हिँ कहि मि ण थकह । रम-लम्पट महुयर-पन्ति जिम केयह मुवि ण सक्कइ ।।९।। [४] दहगीव-कुमारहाँ लहें वि चित्तु । गुन्यन्तरें मारिच्चेण वुत्तु ॥9॥ 'वेयहाँ दाहिण-सेढि-पवरु। णामेण देवसंगीय-णयह ॥२॥ तहिं अम्हई मय-मारिच माय । रावण विवाह-कज्जेण आय ॥३॥ लइ तुज्झु जें जोग्गउ गारि-रयणु । उ टु देव करें पाणि-गहणु ॥४॥ एड ज मुहुत्तु णक्खत्तु वारु। जं जिणु पञ्चक्खु तिलोय-सारु ॥५॥ कल्लोण-लच्छि-मङ्गल-णिवासु । सिब-सन्ति-मणोरह-सुह-पयासु'॥६॥ तं णिसुणे वि तु? दहमुहेण । किउ तक्खणे पाणिग्गहणु तेण ॥७॥ जय-तूहि धवलहि मझलेहि । कञ्चण-तोरणे हि समुजलेहिं ॥४॥ तं वहु-वरुणयणाणन्दयरु णं उत्तम-रायहंस-मिहुणु घत्ता विसह सयंपहु पट्टणु । पप्फुल्लिय-पकय-व(य)णु ॥९॥ [५] अवरेक-दिवसें दिढ-वाहु-दण्ड । विजउ जोक्खन्तु महा-पयण्डु ॥१॥ गउ तेत्थु जेत्थु माणुस-वमालु । जलहरधरु णाम गिरि विसालु ॥२॥ गन्धब-वावि जहिं जग पयास । गन्धव-कुमारिहिं छह सहास ॥३॥ दिव-दिवें जल-कील करन्तु जेत्थु । रयणासव-णन्दणु ढुक्कु तेत्थु ॥४॥ सहसत्ति दिछ परमेसरीहिं। णं सायल्सयल-महा-सरोहिं ॥५॥ ण णव-मयलन्छणु कुमुइणीहि । णं वाल-दिवायर कमलिणीहि ।।६।। सबउ रक्खण-परिवारिया। सन्बउ सवालङ्कारियाउ ||७|| दसमो संधि १६३ पत्ता-उसपर उसकी दृष्टि जहाँ भी पड़ती वह वहीं घूमती रहती। दूसरी जगह वह ठहरती ही नहीं। उसी प्रकार जिस प्रकार रसलम्पट मधुकर पंक्ति केतकीको नहीं छोड़ पाती ॥५॥ [४] दशग्रीव कुमार का मन लेकर, इनके अनन्तर, मारीच वोला, "विजयाध पर्वत की दक्षिण श्रेणी में देवसंगीत नगर है। वहाँ हम मय मारीच भाई-भाई हैं। हे रावण, हम विवाह लिए आये हैं। इसे ले ले, यह नारीरत्न आपके योग्य है। हे देव, उठिए और पाणिग्रहण कीजिए । यही वह मुहूर्त, नक्षत्र और दिन है। जो जिन की तरह प्रत्यक्ष और त्रिभुवनश्रेष्ठ है । कल्याण, मंगल और लक्ष्मी का निवास है। शिव शान्त सुख मनोरथको पूरा करनेवाला।" यह सुनकर सन्तुष्ट मन रावणने तत्काल पाणिग्रहण कर लिया, जयतूर्य, धवल, मंगल गीतों, उज्ज्वल स्वर्ण तोरणोंके साथ ॥१-८|| पत्ता-तत्र वधू और वर नेत्रोंके लिए आनन्ददायक, स्वयंप्रम नगरमें प्रवेश करते है, मानो उत्तम राजहंसों का जोड़ा खिले हुए पंकजवनमे प्रवेश कर रहा हो ॥९॥ [५] एक और दिन, महाप्रचण्ड दृढ बाहुवाला रावण विद्या- का प्रदर्शन करता हुआ वहाँ गया, जहाँ मनुष्योंके कोलाहलसे व्याप्त मेघरव नामक विशाल पर्वत था। वहाँ दुनियाकी प्रसिद्ध गन्धर्व यावड़ी थी। उसमे छह हजार गन्धर्व कुमारियाँ प्रति- दिन जलक्रीडा करती थीं। रत्नावका पुत्र वहाँ पहुँचा । उन परमेश्वरियोंने उसे अचानक इस प्रकार देखा जैसे समस्त महासरिताओंने समुद्रको देखा हो, मानो नव कुमुदिनियोने नव चन्द्रको.मानो कमलिनियोंने बाल दिवाकरको । सबकी सब रनकोसे घिरी हुई थीं। सभी मत्र प्रकारके अलंकारोंसे अहत थी ।।१-७॥

१६४
पउमचरित
घत्ता
मन्त्रउ मणन्ति पउ परिहर वि वम्मह-मर-जजरियउ ।
'पई मलेबि अपणु ण भत्तार परिणि णाह सई वरियउ' ॥४॥
।
[६]]
एत्यन्तर पारखिय-महि । लहु गम्पिणु गमण-वियावडेहिं ॥१॥
जाणाविउ सुन्दर-सुरवरातु ।
'मन्या कण्णउ एकहीं णरासु ॥२॥
कर लग्गउ तेण वि इच्छियाउ । पच्चेल्लिड सुसमाइच्छियाउ' ॥३॥
तं णिसुर्णेवि सुर-सुन्दरु विरुद्ध । उदाइउ णाई कियन्तु कुदु ॥४॥
भण्गु वि कणयाहिउ वुह-पमाणु । तं पेक्खे वि साहणु अप्पमाणु ॥५॥
विहिएँ हि वुत्तु 'णउ को वि सरणु । तउ अम्हह कारणे दुक्कु मरणु' ॥६॥
रावणेण हसिड "किं सायएहि । किर काइँ सियालहि घाइएहि ॥७॥
घत्ता
भोसोवणि विजएँ सो चवि बद्धा विसहर-पासेंहिं ।
जिह दूर-भन्न भव-संचिऍहि दुधिय-कम्म-सहास हि ॥८॥
।
[७]
आमेल्लेवि पुज्जेवि करेंवि दास । परिणेप्पिणु कण्णहें छवि सहास॥३॥
गउ रावणु णिय पट्टणु पवितु । स-कियत्यु सयल-परियणेण दिव ॥२
वहु-काले मन्दीररिहें जाय । इन्दइ-घणवाहण वे वि माय ॥३॥
एत्तहँ वि कुम्मपुर कुम्मयण्णु। परिणाविउ सिय-सपय पवण्णु ॥४॥
रतिन्दिउ लङ्काउरि-पएसु। जगडइ वइसवणहाँ तणउ देसु ॥५॥
गय पय कूवारे कोउ हुउ । पेसिउ वयणालङ्कार-दूउ ॥६॥
दहवयणहाणु पइठ्ठ गम्पि। तेहि मि किउ अब्भुत्थाणु किं पि॥७
पभणिउ 'सुमालि-पहु देहि कण्णु । पोत्तर णिवारि इ3 कुम्मयण्णु ॥४॥

दसमो संधि घत्ता-कामदेवके तीरोंसे जर्जर सभी अपनी मर्यादा तोड़ती हुई बोली, "तुम्हें छोड़कर दूसरा हमारा पति नहीं है, विवाह कर लीजिए, हमने स्वयं वरण कर लिया है" |८|| [६] इतने में जानेके लिए व्याकुल सभी आरक्षक भटोंने जाकर देववर सुन्दरको बताया, "सव कन्याएँ एक आदमीके हाथ लग गयी हैं, उसने भी उन्हें चाहा है, प्रत्युत अच्छी तरह चाहा है।" यह सुनकर सुरसुन्दर विरुद्ध हो उठा, वह क्रुद्ध कृतान्तकी भॉति दौड़ा, एक और कनक राजा और बुध के साथ । अप्रमाण साधनके साथ उसे देखकर कन्याएँ बोली, "अब कोई शरण नहीं है, तुम्हारी हम लोगोंके कारण मौत आ पहुंची है।" इसपर रावण हंसा और बोला, "इन आक्रमण करनेवाले सियारोंसे क्या? ॥१-७॥ घत्ता-उसने अवसर्पिणी विद्यासे कहकर, विषधर पाशोंसे उन्हें बँधवा लिया, उसी प्रकार जिस प्रकार भवसंचित हजारों दुष्कृत कर्मोसे दूरभव्य बाँध लिये जाते हैं ॥८॥ [७] उन्हें छोड़कर सत्कार कर अपने अधीन बनाकर उसने छह हजार कन्याओंसे विवाह कर लिया। रावण अपने घर गया। प्रवेश करते हुए कृतार्थ उसे समस्त परिजनोंने देखा । बहुत समयके अनन्तर, मन्दोदरीसे दो भाई इन्द्रजीत और मेघवाहन उत्पन्न हुए। यहाँ कुम्भकर्णने भी कुम्भपुरमें प्रवीण श्री सम्पदासे विवाह किया। रात-दिन वह लंकापुर प्रदेशके वैश्रवणचाले देशमे सगड़ा करने लगा। प्रजा विलाप करती हुई गयी। राजा क्रुद्ध हो उठा। उसने वचनालंफार दूत भेजा। वह जाकर दयाननके दरवारमे प्रविष्ट हुआ। उसने भी उसके लिए थोड़ा- सा अभ्युत्थान किया। दूत बोला, "सुमालि राजन्, कन्या दो, और अपने पोते इस कुम्भकर्णको मना करो ॥१-८॥

१६६
पउमचरित
घत्ता
भवराह-सएहि मि
वइसवणु
तुम्हहि समउ | जुज्मइ ।
उज्झन्तु वि सवर-पुलिन्दऍहि विज्यु जेम ण विरूष्मइ ॥९॥
[-]
पर आएं पेक्खमि विपढिवण्णु । जे णाहि णिवारहाँ कुम्मयण्णु ॥१॥
एयहाँ पासिउ तुम्हह विणासु । एयहाँ पासिउ भागमणु तासु ॥२॥
एयहाँ पासिउ पायाल-कङ्क । पइसेवउ पुणु वि करेवि सर ॥३॥
मालि वि जगढन्तउ आसि एम । मुउ पटेंवि पईवं पयङ्ग जेम ॥४॥
तइयहुँ तुम्हहुँ वित्तन्तु जो ज्जें। एवहिं दीसइ पडिवउ वि मो ॐ ॥५॥
वरि ऍहु जै समप्पिउ कुळ-कयन्तु । भच्छउ तहाँ घर णियलई वहन्तु ॥६॥
तं णिसुणेवि रोसिउ णिसियरिन्दु । 'कहाँ तणउ घणउ कहाँ तणउ इन्दु'॥
अवलोइउ भीसणु चन्दहासु । पडिवक्ख-पक्ख-खय-काल-वासु ॥८॥
पइँ पढमु करप्पिणु वलि-विहाणु । पुणु पच्छऍ धणयहाँ मलमि माणु'॥९॥
सिरु णावेंवि वुत्तु विहीसणेण । 'विणिवाइएण दूवेण एण ॥१०॥
घत्ता
परिममइ अयसु पर-मण्डल हि तुम्हहँ एउ ण छजइ ।
जुज्झन्वउ हरिण-उलेहि सहुँ किं पञ्चमुहु ण लजइ' ॥११॥
[ ९ ]
णीसारिउ दूउ पणदु केम । केसरि-कम-चुक्कु कुर गु जेम ॥१॥
एतह वि दसाणणु विप्फुरन्तु । सण्ण] वि विणिग्गड जिह कयन्तु॥२॥
णीसरिउ विहीसणु भाणुकण्णु ।
रयणासउ मट मारिच्चु अण्णु ॥३॥
णीसरिउ सहोवर मल्लवन्तु ।
इन्दइ घणवाहणु सिसु वि होन्तु।।।
हउ तूरु पयाणउ दिण्णु जाम । दूएण वि धणयहाँ कहिउ ताम॥५॥

दसमो संधि पत्ता-सी अपराध होने पर भी वैश्रवण तुम्हारे साथ युद्ध नहीं करेगा, उसी प्रकार, जिस प्रकार, शाबर पुलिन्दोंके द्वारा जलाये जानेपर भी. विन्ध्याचल उनके विरुद्ध नहीं होता ॥२॥ [८] पर अब इसे में आपत्तिजनक समाना है। यदि आप कुम्भकर्ण का निवारण नहीं करते। इसके पास तुम्हारा निनाटा i, धनदा आना. इसके हाथमे है। इसके कारण ही. तुन्हें शंकर पाताल में प्रवेश करना पड़ेगा। मालि भी इसी प्रकार शगदा किया करता था। वह उसी प्रकार मारा गया, जिन प्रगर प्रदीप में पतंग। उन ममय तुम लोगोका जो हाल हुआ का, ऐसा लगता फिल ममय वही वापस होना चाहना । अन्दा यही है कि उन फुलकनान्तको मुझे माप दें, या फिर वा बेटियों पानकर अपने घरमे पढ़ा रहे ।" यह सुनकर निशाचरल पिन हो का, "क्निका धनद ? और फिमका " उसने अपना भीषण चन्द्रदाम बना देगा जिसमें प्रतिपक्षपात का क्षय करने लिए काला निवास था। वह नो" पाने तुम्हाग बलि विधान कर, फिर बादमे, धनदका मान फगा।" नव निर नवाते हुए, विभीषणने कहा. "मनको माग्नेने गया 112-मा पना-अनुमान प्रवा फैलगा, तुम्हें या मनाना a. गया मनसे मना आ पंचामन जित नहीं ܝܺ -- - निभानामा पंग :: नमी, गजा मन्नत Trmirmiri Sri Rोग निकले। Re Pीनि: . Re":". HAR ने RE

१६८
पउमचरित
'मालिहें पासिउ एयहाँ मरटु । उक्खन्धु देवि भण्णु वि पयर्ट्स ॥६॥
तं वयणु सुणवि सण्णहे दि जक्खु । णोसरिउ णा: सई दससयक्खु ॥७॥
थिउ उ.वि गिरि-गुञ्जक्खें जाम । तं जाउहाण-वलु दुक्कु ताम ॥४
घत्ता
हय समर-तूर किय-कलयल। अमरिस-रहस-विसई।
वइसवण-दसाणण-साहण
विणि वि रणे अभिट्टई ॥९॥
[१०]
केण वि सुन्दर सु-रमण सु-सेव । मालिशिय गय-घड वेस जेव ॥१॥
स वि कासु वि उरयल वेझु देह । णं विवरिय-सुरए हियउ लेइ ॥२॥
केण वि आवाहिउ मण्डलग्गु ।
करि-सिंह गिबहेवि महिहि लग्गु॥३॥
केण वि कासु वि गय-घाउ दिण्णु । किउ स-रहु स-सारहि चुण्णु चुग्णु॥४॥
केण वि कासु वि उरु सरहिं भरिउ । लक्खिजह णं रोमन्चु धरिट ||५||
केण वि कासु वि रण मुकु चक्कु । थिउ हियएँ धरेंवि णं पिसुण-वकु॥॥
एत्थन्तर धणए ण किउ खेउ । हकारिउ आहवें कह कसेउ ॥७॥
'लइ नुन्यु जुज्झु एत्तड कालु। दुक्को सि सीह-दन्तन्तरालु' Rel
घत्ता
त णिसुर्णेवि रावणु कुइय-मणु वइसवणहाँ आलग्गउ ।
कह उभेवि गजेंवि गुलगुलविणं गयवरहों महग्गउ ॥९॥
["]
अम्बुहर-लील-संदरिसणेग ।
सर-मण्डउ किड तहिं दस-सिरेण॥३॥
विणिवारिउ दिणयर-कर-णिहाउ । गिप्ति दिवसुकि ति सन्देहु जाउ ॥२॥

दसमो संधि १६९ जाकर धनदसे कहा, "मालिको इतना अहंकार है कि एक तो उसने घेरा डाल दिया है और दूसरेको भी उकसाया है ।" यह सुनकर धनद तैयार होकर निकला, मानो स्वयं सहस्रनयन निकला हो। वह उड़कर जबतक गुंजागिरिपर डेरा डालता है, तबतक राक्षसोंको सेना वहाँ आ पहुँची ॥१-८|| पत्ता-युद्धके नगाड़े बज उठे। अमर्ष और हर्षसे विशिष्ट कोलाहल होने लगा। वैश्रवण और रावण दोनोंकी सेनाएँ युद्ध में भिड़ गयीं ॥९॥ [१०] किसीने गजघटाका उसी प्रकार आलिंगन कर लिया, जिस प्रकार अच्छा विलासी वेश्याका आलिंगन कर लेता है। गजघटा भी किसीके उरतलमें घाव कर देती है, मानो विपरीत सुरतिमें हृदय ले रही हो। किसीने तलवारसे आघात किया, और हाथीका सिर कटकर धरतीपर गिर पड़ा। किसीने किसीपर गदेसे आघात किया और रथ तथा सारथिके साथ चूर्ण-चूर्ण कर दिया। किसीने किसीके वक्षको तीरोंसे भर दिया, वह ऐसा दिखाई देता है, मानो उसने रोमांच धारण किया हो। युद्धमें किसीने किसीके ऊपर चक्र छोड़ा, वह उसके वक्षपर ऐसे स्थित होकर रह गया, मानो दुष्टका वचन हो। इस बीच युद्धमे खिन्न न होते हुए रावणको ललकारा, "ले तुझे लड्नेका इतना समय है, तू सिंहकी दाढ़ोंके बीचमें अभी ही पहुँचता है" ॥१-८॥ बत्ता-यह सुनकर कुपितमन, रावण वैश्रवणसे ऐसे आ भिदा जैसे अपनी सूंड़ उठाकर, गरजकर और गुल-गुल आवाज करते हुए महागज दूसरे महागजसे भिड़ गया हो ।।९।। [११] अपनी मेघलीलाका प्रदर्शन करते हुए दयाननने तारोंका मण्टप तान दिया, तब दिनकर-अस्त्रसे उसका निवारण कर दिया गया, इससे यह सन्देह होने लगा कि दिन है या

१७०
पटमचरिट
सन्दणे हएँ गएँ भय-चि उत्ते। जम्मागें विनागें णरिन्दानं ॥3॥
थरयरहरन्दसर लग केन । घणवन्त नानुसें पिश नेम ॥2॥
स्वेग विहय वागेहि वाण । नुणिवरण कमाय व दुछमाण ॥
घणु पाडिट पाडिरहन-दण्ड । दहमुहमहु किट मय-सण्ड-बग्दा॥
अपगंग चडेप्पिणु मिडिउ राउ। गं गिरि-संवायहाँ कुल्सि-बाल IISE
हर घगर मिण्डिबालेग उरसे
ओगा नागु ल्हसिएँ दिवसें ॥८॥
गित णिय-गन्निहि बलवणु विलय दमागणे घुट ।
'कहिं जाहि पाव जावन्तु नहु' कुम्नयण्णु श्राद्ध ग९॥
[१९]
'गएं सन्मगु किर कवगु खत्रु ।
घाइनइ गामन्त्री विमनु ॥३॥
संनिहाइ जन्न-सयाह कागि। किर शाम यथावइ मूल-पाणि ॥२॥
नवनवि धरिट विहाम्गंग । विकायर-गर विद्धंमग ॥३॥
सो हन्मइ तो पहणइ पुगो वि।
पहणइ पुगो वि! सिटस जावत णिवितो विn
पासर बराट गिय-पाण लेवि। यिउ माणुन मच्छर मुऍवि ॥५॥
एत्यन्वरें वइसबगहाँ मणिछ ।
सुल्नु व पुन्-विमाणु दिन्छ ।।
वहिं चडि गराहिल मुऍवि सङ्का पट्टविय पसाहा के विला
मपुर पुणु जो वो को विचण्ड । तहाँ वहाँ दुइ जिह कालदण्ड।
निय-वन्धव-ससहि परिवरिट दगुवाइ हुदमन्दमन्तर ।
साहिण्डइ लीलऍ इन्दु जिह देस-स यं मु अन्तड ॥९॥

दसमो संधि १७१ इसका रात । रथ, गज, अश्व, ध्वजचिह्न, छत्र, जम्पान विमान और राजाओंके शरीरोंमें घर-घर करते हुए तीर ऐसे जा लगे मानो धनवान आदमीके पीछे चापलूस लोग लगे हों। यक्षेन्द्र धनदने भी तीरोंसे तीरोंको काटा वैसे ही, जैसे मुनिवर आती हुई कपायोंको काट देते है । धनुप गिर गये और छत्र तथा दण्ड भी जा पड़े। उसने दशमुखके रथके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। तब वह दूसरे रथपर चढ़कर राजासे भिड़ा, मानो वज्रका आधात गिरि समूहसे मिला हो। धनद भिन्दिपाल अस्त्रसे छातीमें आहत हो गया। और दिनका अन्त होनेपर सूर्यकी तरह लुढक गया||१-८॥ पत्ता-वैश्रवणके सामन्त उसे उठाकर ले गये, दशाननने विजयकी घोषणा कर दी। तब कुम्भकर्ण क्रुद्ध हो उठा, "हे पाप, तू जीते जी कहाँ जाता है" ॥९॥ [१२] "इसके समान कौन क्षत्री है, भागते हुए भी घात किया जाये, जिससे सैकड़ों वर्षोंका पैर मिट जाये।" यह कहते हुए वन हाथमें लेकर कुम्भकर्ण जैसे ही दौड़ता है, वैसे ही विभीषणने उसे रोक लिया, यह कहकर कि “कायर मनुष्य- को मारनेसे क्या ?' उसे मारना चाहिए, जो फिरसे प्रहार करता है, क्या सॉप निर्विष होकर भी जिन्दा न रहे ? वह वेचारा अपने प्राण लेकर नष्ट हो रहा है।" तव कुम्भकर्ण मत्सर छोडकर चुप हो गया। इसके बीच वैश्रवणका सुकलत्रकी तरह मनको अच्छा लगनेवाला पुष्पक-विमान दिखाई दिया। नराधिप रावण शंका छोड़कर उसपर चढ़ गया, कितने ही लोगोंको इसने लंका भेज दिया। वह स्वयं जो-जो भी चण्ड था, उसके पाम कालदण्ड की तरह पहुँचा ।।१-८|| पत्ता-दुर्दमनीयोंका दमन करता हुआ और अपने वान्धव और स्वजनोंसे घिरा हुआ राक्षस रावण, इन्द्रकी तरह लीला- पूर्यफ घूमने लगा, सैकड़ों देशोंका उपभोग करता हुआ ||९||. -

पउमचरित
[११. एगारहमो संधि ]
पुप्फ-विमाणारुढऍण दहवयणे धवल-विसालाई।
णं घण-विन्दई भ-सलिलइँ टिटुइ हरिसैण-जिणालाई ॥१॥
७
[]
तोयवाहण-वंस-पईवें। पुच्छिउ पुणु सुमालि दहगीवें ॥३॥
'अहो अहोंताय वाय ससि-धवलइँ । एयई किंण जलुग्गय-कमलई ॥२॥
किं हिम-सिहरइँ सा. वि मुक्क। किं णक्खत्तई थाणहाँ चुक्कई ॥३॥
दण्डुण्ड-धवल-पुण्डरियई। किं काह मि सिसुप्परि धरियइँ ॥४॥
अम्मारम्म-विवजिय-गमई । किं भूमियले गयई सुम्मन्नई ॥५॥
किय-मङ्गल-सिङ्गार-महासई। किं आवापियाई कलहंसह ॥३॥
जसु सम्वनइँ खण्डवि खण्डेवि। किय गउ कोवि पडीउ छरवि॥७॥
कामिणि-वयोहामिय-छायई। किय ससि-सयई मिलेप्पिणु आयर
घत्ता
कहइ सुमालि दसाणणहाँ 'जण-णयणाणन्द-जगेराई।
जिण-मवणइँ छु-पतियई एयई हरिसैणहाँ केराइँ ॥९॥
अट्टाहियह मझें महि सिद्धी । णव-णिहि-चउदह रयण-समिदी।१॥
पहिलए दिवसें महारह-कारणे जाणेवि जगणि-दुख गउ तवगै॥२॥
वीयएं तावस-मवणु पराइड । मयणावलिह मयण-जरु लाइड ॥३॥
तइयएँ सिन्धुणयर सुपलण्णउ । हत्यि जिणेप्णुि लड्या कण्ण॥४॥
वेयमईएँ उत्थएँ हारिठ। जयचन्दह हियवएँ पइसारित ॥५॥
पञ्चमें गङ्गाहर-महिहर-रणु । तहिं उप्पण्णु चक्कु तहाँस-रयणु ॥३॥

एगारहमो संधि १७३ ग्यारहवीं सन्धि पुष्पक विमानमें बैठे हुए रारणने हरिपेण द्वारा निर्मित धवल विशाल जिनमन्दिर देखे जो ऐसे जान पड़ते थे जैसे जलरहित मेघवृन्द हों ॥१॥ [१] तव तोयदवाहन कुलके दीपक रावणने सुमालिसे पूछा, "अहो तात, चन्द्रमाके समान धवल ये क्या जलमें खिले हुए कमल हैं ? क्या हिमशिखर नष्ट होकर अलग-अलग दिखाई दे रहे है ? क्या नक्षत्र अपने स्थानसे चूक गये हैं ? क्या मृणाल- सहित धवल कमल किसी शिशुके ऊपर रख दिये गये हैं ? क्या ये ऐसे भूमिगत मेघ हैं कि जिनका वर्षाके प्रारम्भमें गर्व नष्ट हो गया है ? क्या यहाँ ऐसे कलहंस वसा दिये गये हैं कि जो हजारों मंगल शृंगारोंसे युक्त हैं ? क्या कोई अपने यशके सौ-सौ टुकड़े कर उन्हें वापस यहाँ छोड़ गया है ? क्या यहाँ ऐसे सैकड़ों चन्द्र आकर इकट्ठे हैं कि जिन्हें कामिनियोंकी मुखकान्तिके सामने नीचा देखना पड़ा है ?" ॥१-८|| घत्ता-सुमालि रावणसे कहता है, "लोगोंकी आँखोंको आनन्द देनेवाले और चूनेसे पुते हुए ये हरिषेणके जिनमन्दिर हैं ॥९॥ [२] हरिपेणको अष्टाह्निकाके दिनोंमें नवनिधियाँ और चौदह रत्नोंसे युक्त धरती सिद्ध हुई थी। पहले दिन वह महारथ (यात्रा) के कारण उत्पन्न होनेवाले मॉके दुःखको जानकर वहाँ गया। दूसरे दिन वह तापसवन पहुँचा जहाँ उसने मदनावलीकी विरह पीड़ाको स्वीकार किया । तीसरे दिन सिन्धु नगरमें सुप्रसन्न हाथीको वशमें कर कन्यारत्न प्राप्त किया। चौथे दिन वेगमतीका अपहरण करते हुए उसका प्रवेश जयचन्द्र के हृदयमें कराया। पाँचवें दिन गंगाधर

पउमचरित
।
छ?ऍ पहिमि
हूम आवग्गी भण्णु वि मयणावलि करें लगी॥७॥
सत् गम्मि जणणि जोक्कारिय । अट्ठम दिवसें पुज्ज णीसारिय ॥८॥
घत्ता
एयई तेण वि णिम्मिय
आहरण व वसुन्धरिह
ससि-सङ्ख-खीर-कुन्दुजलहूं।
सिव-सासय-सुहइ व अविचल.'॥९॥
[३]
गउ सुणन्तु हरिसेण-कहाणउ । सम्मेय-इरिहिं मुक्कु पयाणउ ॥१॥
ताम णिणाउ समुटिउ मीसणु । जाउहाण-साहण-संतासणु ॥२॥
पेसिय हत्य-पहत्य पधाइय। वण-करि णिऍवि पडीवा माइय ॥३॥
'देव देव किउ जेण महारउ । अच्छह मत्त-हस्थि अइरावउ ॥४॥
गजणाएँ अणुहरह समुदहों। सीयरेण जलहरहों रउहाँ ॥५॥
कदमेण णव-पाउस-कालहों। णिज्झरेण महिहरहों विसालों ॥६॥
रुक्खुम्मूळणेण दुचायाँ। सुहड-विणासणेण जमरायहाँ ॥७॥
दसणेण भासीविस-सप्पहों। विविह-मयावत्थर कन्दप्पहाँ ॥४॥
घत्ता
इन्दु वि चवि ण सकियउ खन्धारण एयहाँ वारणहों।
गड चउपासिउ परिममेवि जिम मत्थ-हीणु कामिणि-जणहों ॥९॥
अण्णुप्पण्णु दसण्णय-काणण ।
उमय-चारि सम्बङ्गिय-सुन्दरु ।
सत्त समुत्तुगड णव दीहरु ।
णिद्ध-दन्तु महु-पिङ्गल-लोयणु ।
[४]
माहव-मास देसै साहारण ॥१॥
भद-हत्थि णामेण मणोहरु ॥२॥
दह परिणाहु तिण्णि कर वित्थरु ॥३॥
भयसि-कुसुम-णिहु रत्त-कराणणु॥४॥

एगारहमो संधि महीधरके युद्ध में उसे रत्नसहित चक्र प्राप्त हुआ। छठे दिन ममची धरती उसके अधीन हो गयी और मदनावली उसे हाथ लगी। सातवें दिन जाकर उसने मॉका जय-जयकार किया, और तब आठवें दिन पूजायात्रा निकाली ||१-८|| पत्ता-शशि, क्षीर, शंख और कुन्दके समान ये मन्दिर उसी हरिपेण द्वारा वनवाये गये हैं जो ऐसे जान पड़ते हैं जैसे पृथ्वीके अलंकार हों, या अविचल शिव-शाश्वत सुख हों ||२|| [३] इस प्रकार हरिपेणकी कहानी सुनते हुए उसने सम्मेद शिखरकी ओर प्रस्थान किया। इतनेमें एक भीषण शब्द हुआ जो राक्षसोंकी सेनाके लिए सन्तापदायक था। उसने इस्त- प्रहस्तको भेजा, वे दौड़कर गये और एक वनगज देखकर वापस आये । उन्होंने कहा, "देवदेव, जिसने महाशब्द किया है, वह मदवाला ऐरावत हाथी है, जो गर्जनमें भयंकर समुद्र का, जलकण छोड़नेमें महामेघोंका, कीचड़में नव वर्षाकालका, निर्झरमे विशाल पर्वतोका, पेड़ोंको उखाड़नेमें दुर्वात (तूफान) का, सुभटोंके विकासमें यमराजका, काटनेमें दन्तविष महा- नागका और विभिन्न मदावस्थाओंमें कामदेवका अनुकरण करता है ॥१-८॥ पत्ता-इस महागजके कन्धेपर इन्द्र भी नहीं चढ़ सका, वाद इसके चारों ओर घूमकर नसी प्रकार चला गया जिस प्रकार निर्धन व्यक्ति कामिनीजनके आस-पास घूमकर चला जाना ॥२॥ [४] और यह उत्पन्न हुआ है माहारण देशके दशार्ण काननमें मंत्र मामे ! यह चौरम सांग सुन्दर, भद्र हस्ति है । यह मानहाय उंचा. नी हाथ लन्या और दस हाथ चौड़ा है। इनकी सृढ़ नीन हाथ लयी है। दांत चिकने, आँख मधुकी पउमचरित पञ्च-मङ्गलावत्तु मयाला। वह-तरट्टि-थणय-कुम्मस्थलु । उण्णय-कन्वरु सूयर-पच्छलु। चाव-वंसु थिर-मंसु थिरोयरु । चक्क कुम्भ-धय-छत्त-रिहालउ ॥५॥ पुलय-सरोरु गलियाण्डत्थलु ॥६॥ वीस-णहरु सुअन्ध-मय-परिमलु॥७॥ गत्त-दन्त-कर-पुच्छ-पईहरु ॥८॥ घत्ता एम अणेयई लक्खणई हस्थि-पएसहुँ सबहु मि कि गणियई णाम-विहूणाई। चउदह-सयई चउरूणाई' ॥९॥ . [५] तं णिसुणेवि दसाणणु हरिसिउ। उ ण मन्तु रोमञ्च व दरिसिउ ॥१॥ 'जइ तं भद्द-हत्थि उ साहमि। तो जणणोवरि असि वरु वाहमि'॥२॥ एउ भणेवि स-सेण्णु पधाइट। तं पएसु सहसति पराइउ ॥३॥ गयवइ णिए वि विरोल्लिय-णयणे । हसिउ पहत्थु णवर दह-वयणें ॥४॥ 'हउ जाणमि पचण्डु तम्बेरम् । णवर विलासिणि-रूड व मणोरमु॥५॥ हउँ जाणमि गइन्द-कुम्मस्थलु । णवर विलासिणि घण-थण-मण्डल॥६॥ जाणमि सु-विसाणई अ-कलाई । णवर पसण्ण-कण्ण-ताटकई ॥७॥ हउँ जाणमि भमन्ति भमर-उलई । णवर णिरन्तर-पेल्लिय-कुरलई ॥४॥ घत्ता जाणमि करि-खन्धारहणु अञ्चन्तु होइ भय-भासुरउ । उन्बहह णवल्लु णाई सुरउ' ॥९॥ णवर पहत्थ मन्जु मणहाँ एगारहमो संधि १७७ तरह पीली, अलसीके फूलकी तरह, लाल सूड और मुख । पाँच मंगलावों (मस्तक-तालु आदि ) से युक्त और मदका घर है। चक्र, कुम्भ, ध्वज आदिकी रेखाओंसे युक्त उसका कुम्भस्थल उत्तम युवतीके स्तनोंके समान है। शरीर पुलकित है, गण्डस्थलसे मद' झरता है, कन्धे ऊँचे हैं, पिछला हिस्सा सुडौल है, उसके बीस नख हैं, उसका मद परागकी तरह सुगन्धित है। चापवंशीय, स्थिर मांसवाला और विशाल उदर ! उसका शरीर, दाँत, सूंड़ और पूंछ लम्बी है ॥१-८॥ पत्ता-इस प्रकार जो नामरहित अनेक लक्षण गिनाये गये हैं, वे सब कुछ चार कम चौदह सौ उस हाथीके प्रदेशमें हैं ॥९॥ [५] यह सुनकर रावण हर्षित हो गया। भीतर न समानेके कारण वह पुलक रूपमें प्रकट हो रहा था। वह बोला, “यदि मै भद्रहस्तिको अपने वशमें नहीं करता तो अपने पिताके ऊपर तलवारसे आक्रमण करू?" यह कहकर वह सेनासहित वहाँके लिए दौड़ा, और शीघ्र ही उस प्रदेशमें जा पहुंचा। अपनी घरती हुई आँखसे उसे देखकर, रावणने केवल प्रहस्तका उपहास किया, "मैं इस प्रचण्ड हाथीको केवल विलासिनीके रूपकी तरह सुन्दर जानता हूँ, मैं गजेन्द्रके कुम्भस्थलको केवल विलासिनीका सघन स्तनमण्डल समझता हूँ, उसके अकलंक दाँतोंको केवल सुन्दर कर्णावतंस मानता हूँ, उसपर घूमते हुए भ्रमरकुलको मै केवल विलासिनीके निरन्तर लहराते हुए वालोंके रूप में जानता हूँ ॥१-८।। पत्ता-मैं जानता हूँ कि हाथीके कन्धेपर चढ़ना अत्यन्त खतरनाक होता है, फिर भी हे प्रहस्त! मेरा मन नये सुरित- भावसे उद्वेलित हो रहा है" ||९||

पउमरित
पुप्फ-विमाणहाँ लोणु दसाणणु। दिदु णियत्थु किउ केस-णिवन्धणु॥३॥
लइय लट्ठि उग्बोमिउ कलयलु । तुरई हयइँ पधाइड मयगलु ॥२॥
महिमुहु धणय-पुरन्दर-बहरिहें। वासारत्तु जेम विन्झइरिहें ॥३॥
पुक्खरै ताडिउ लक्कुडि-घाए। णावइ काल-मेहु दुचाएं ॥४॥
देइ ण देइ वेज्यु उरे जावे हि । विज्जुल-विलसिय करणे तावे हि ॥५॥
पच्छले चडिउ धुर्णेवि भुव-डालिउ। 'वुवुद मणेवि खन्थें अप्फालिउ॥६॥
जद्धिउ पुणु वि करेणालिङ्गेवि । सुविणा(?)दइउ जेम गउ लवि॥०॥
खणे गण्डयलें
ठाइ
खण कन्धरें। खण
चउहु मि चरणहुँ अम्भन्तरें
घत्ता
दीसह णासइ विप्फुरह
चलु लक्खिजइ गयण-यलें
परिममइ चउदिपु कुञ्जरहों।
ण विजु-पुजु णव-जलहरहाँ ॥९॥
[ . ]
हत्थि-वियारणाउ एयारह । अण्णउ किरियउ वीस दु-बारह॥१॥
दरिसेंवि किउ णिप्फन्दु महा-गउ । धुत्तें वेस-मर१ व भग्गउ ॥२॥
साहिउ मोक्खु व परम-जिणिन्दें। 'होउ होउ' ण रडिड गइन्हें ॥३॥
'भले भलें' पभणिउ चलणु समप्पिउ। तेण वि वामगु? चप्पिड ॥४॥
कण्ण धरैवि मारुतु नहाइउ । करॅवि वियारण अड्कुसु लाइड ॥५॥
तेण विनाण-जाग-आगन्दें। मेलिउ कुसुम-वासु सुर-विन्दे॥६॥
णच्चिउ कुम्मयण्णु स-विहीसणु । हत्थु पहत्थु वि मउ सुयसारणु ॥०॥
मल्लवन्तु मारिच महोयरु । रयणासठ सुमालि बजोवर ॥८॥

एगारहमो संधि [६] पुष्पक विमानमें बैठे हुए उस रावणने अपना परिकर और केश खूब कस लिये। लाठी ले ली, और कलकल शब्द किया। तूर्य बजाते ही. मदोन्मत्त हाथी धनद और इन्द्रके दुश्मनके सामने दौड़ा ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार वर्षाऋतु विन्ध्याचलके सामने दौड़ती है। लाठीसे सूंडपर वह वैसे ही आहत हुआ जैसे दुर्वातसे मे घ । जबतक वह बिजलीकी तरह चमकती हुई अपनी सूंडसे रावणके वक्षस्थलपर चोट करे, उसकी सूड़को आहत कर वह उसके पिछले भागपर चढ़ गया, और बुद्बुद कहकर उसके कन्धेपर चोट की, फिर उसने सूंडसे आलिंगन किया और स्वप्न में (?) प्रियकी तरह वह उसे लाँधकर चला गया। पलमें वह गण्डस्थलपर बैठता और पलमें कन्धेपर, और एक क्षणमें चारों पैरोंके नीचे॥१-८॥ धत्ता-वह महागजके चारों ओर दिखता है, छिपता है, चमकता है, चारों ओर घूमता है। वह ऐसा जान पड़ता है, जैसे आकाशतलमें महामेघोंका चंचल बिजली-समूह हो ।।९।। [७] हाथीको वशमें करनेकी ग्यारह और दो बार बीस अर्थात् चालीस क्रियाओंका प्रदर्शन कर उसने महागजको निस्पन्द बना दिया, वैसे ही जैसे धूर्त वेश्याके घमण्डको चूर- चूर कर देता है, जिस प्रकार परम जिनेन्द्र मोक्ष साध लेते हैं, उसी प्रकार (उसने महागजको सिद्ध कर दिया)। हाथी होउ- होउ रटने लगा। उसने भी 'भल-मल' कहकर अपना पैर दिया, उसने भी बायें अँगूठेसे उसे दबा दिया। वह कान पकड़कर हाथीपर चढ़ गया और वशमें कर अंकुश ले लिया। यह देखकर विमान और यानोंपर बैठे हुए देवताओंने पुष्प- वृष्टि की। विभीषणके साथ कुम्भकर्ण नाचा। हस्त, प्रहस्त, मय, सुत और सारण भी नाचे। माल्यवन्त, मारीच और महोदर, रलाव, सुमालि और वञोदर भी नाच उठे ॥१-८॥ - १८० पउमचरित घत्ता हरिस-रसेण करम्वियउ तहिं रावण-गट्टावऍण वीर-रसु जेण मणे मावियउ। सो णाहिं जो ण णच्चावियउ॥५॥ [८] तिजगविहूसणु णामु पगासिउ । णिउ तहिं सिमिरु जेत्थु आवासिउ॥१ थिउ सहसा करि-कह-अणुराइउ । तहि अवसर भडु एकु पराइड ॥२॥ पहर-विहुरु रुहिरोल्लिय-गत्तउ । परवइ तेण गवि विण्णत्तउ ॥३॥ 'देव-देव किक्किन्धहाँ तणए हिं। सब्बल-फलिह-सूल-हल-कणए हि ॥४॥ असिवस्-मस-मुसण्ढि-णाराएँ हि । चक्क-कोन्तमाय-भोग्गर-धाएँ हिं॥५॥ जमु भारोडिउ भग्गा तेण वि। धरवि ण सकिड विहि एकण वि॥६॥ पञ्चेल्लिउ जिल्लरिय वाणेहि। कह वि कह वि णउ मेलिउ पाणेंहिं ॥७॥ तं.णिसुणेवि कुइड रक्सद्धड । हय संगाम-भेरि सण्ण ॥ चन्दहासु करयले करवि घत्ता स-विमाणु स-वलु संचल्लियउ । भायासहाँ ण उत्थलियउ ॥९॥ महि लहेप्पिणु मयरहरु [ ९ ] कोव-दवग्गि-पलित्तु पधाइट। णिविसे त जम-णयह पराइड ॥३॥ पेक्खइ सत्त णरय भइ-रउरव । उठिय-वारवार-हाहारव ॥२॥ पेक्खइ गइ वइतरणि वहन्ती। रस-वस-सोणिय-सलिल वहन्ती ॥३॥ पेक्खा गय-पय-पेल्लिजन्तई। सुहड-सिरइ टसत्ति मिजन्त: ॥४॥ पेक्खइ णर-मिहुणई कन्दन्तई। सम्वलि-रुक्ख पराविजन्तई ॥५॥ पेक्षा भण्ण-जीव छिजन्तई। छणठण-सहें पउलिजन्तइँ ॥३॥ -- एगारहमो संधि पत्ता-वहाँ एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जो रावणके नाचनेपर न नाचा हो, हर्षसे पुलकित न हुआ हो और मनमें वीररस अच्छा न लगा हो ॥९॥ [८] उसका नाम त्रिजगभूषण रखा गया और वह उसे वहाँ ले गया जहाँ सेनाका शिविर ठहरा हुआ था। गजकथा- का अनुरागी वह वहाँ स्थित था कि इतनेमें एक भट वहाँ आया। प्रहारसे विधुर उसका शरीर खूनसे लथपथ था। उसने नमस्कार कर राजासे निवेदन किया, "देवदेव, किष्किन्ध- के बेटोंने सन्वल, फलिह, शूल, हल, कणिक, असिवर, झस, संठी और तीरों तथा चक्र, कोंत, गदा, मुद्गरके आघातोंसे यम- पर आक्रमण किया, उसने उन्हें नष्ट कर दिया। दोनोंमें से एक भी उसे नहीं पकड़ सका, बल्कि बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो गये, किस प्रकार उनके प्राण-भर नहीं निकले" यह सुनकर रक्षध्वजी कुपित हो गया। युद्धकी भेरी बज उठी और वह तैयारी करने लगा ॥१-८॥ पत्ता-अपने हाथमें चन्द्रहास तलवार लेकर विमान और सेनाके साथ वह चला जैसे धरतीको लॉघकर समुद्र ही आकाश- मे उछल पड़ा हो ॥९॥ [९] कोपको ज्वालासे प्रदीप्त वह दौड़ा और शीघ्र ही आधे पलमे यमकी नगरी पहुंच गया। वहाँ देखता है अत्यन्त रौरव सात नरक, उनमें बार-बार हा-हा रव उठ रहा था, देखता है वहती हुई वैतरणी नदीको जो रस, मज्जा और रक्तके जलसे भरी हुई थी, देखता है कि हाथीके पैरोंसे पीड़ित सुभटों- के सिर तड़तड़ कर फूट रहे हैं। देखता है कि सॉवर वृक्षके पत्तोंसे सिरोंमें चीरे जाते हुए मनुष्योंके जोड़े क्रन्दन कर रहे हैं। देखता है कि दूसरे जीव आगमें जलते हुए छनछन शब्दके

१८२
पउमचरिज
कुम्भीपाके के वि पञ्चन्ता । एव वविह-दुक्खइँ पावन्ता ॥७॥
सयल विमम्मीस वि मेल्लाविय। जमउरि-रक्खवाल घल्लाविय ॥४॥
कहिउ कियन्तहों किडरहि
विद्धंसिउ असिपत्त-वणु
घत्ता
'चइतरणि भग्ग णासिय णस्य ।
छोडाविय णरवर-वन्दि-सय ॥९॥
[१०]
अच्छइ एउ देव पारकाउ । मत्त-गइन्द-विन्दु णं थक्कड' ॥१॥
तं णिसुणेवि कुविउ जमराणउ । 'केण जियन्तु चत्तु अप्पाणउ ॥२॥
कासु कियन्न-मित्तु सणि रुहिउ। कासु कालु आसण्णु परिहिउ ॥३॥
जे णर-वन्दि-विन्दु छोडाविउ । असिंपत्त-वणु अण्णु मोडाविड ॥४॥
सत्त वि णरय जेण विद्धंसिय । जें वइतरणि वहति विणापिय ॥५॥
तहों दरिमावमि अज्जु जमत्तणु' । एम भणेंवि णीयरित स-साहणु ॥६॥
महिसासणु दण्डपाय-पहरणु । कसण-देहु शुभाहल-लोयणु ॥४॥
केत्तिउ भोसणच वणिजह । मिच्चु वुत्तु पुणु कहाँ उवमिनइ।।४॥
घत्ता
जमु जम-सासणु जम-करणु जम-उरि जम-दण्ड समोबाइ।
एक्कु जि तिहुमण पलय-करु पुणु पञ्च वि रणमुहँ को धरइ ॥९॥
[१]
जं जमकरण दिट्ट भय-भीसणु । धाइउ तं असहन्तु विहीसणु ॥३॥
णवर दसाणणेण भोसारित ।
अप्पुणु पुणु कियन्तु हकारिउ ॥२॥
'अरे माणव वलु वलु विण्णासहि । मुहियएँ जं जमु णामु पयासहि ॥३॥
इन्दहों पाव तुझुणिकरुणहों। ससिहें पयहाँ धणयहाँ वरुणहो18
सव्वहँ कुल-कियन्तु हउँ आइउ । थाहि थाहि कहि जाहि भवाइड'॥५॥

१८३ एगारहमो संधि साथ छीज रहे हैं, कितने ही जीव कुम्भीपाकमें पकते हुए तरह-तरहके दुःख पा रहे हैं। उसने सबको अभयदान देकर मुक्त कर दिया। यमपुरीके रखानेवालोंको भी भगा दिया॥१-८|| पत्ता-यमके किंकरोंने तब जाकर कहा, "वैतरणी नष्ट हो गयी है और नरक नष्ट हो गये है, असिपत्र वन ध्वस्त है और सैकड़ो बन्दीजन मुक्त कर दिये गये हैं" ।।९।। [१०] "हे देव, यह एक दुश्मन है जो मत्त गजेन्द्रसमूहके समान स्थित है।" यह सुनकर यमराज क्रुद्ध हो गया, ( और बोला)-"किसने जीते जी अपने प्राण छोड़ दिये हैं ? कृतान्त- का मित्र शनि किसपर क्रुद्ध हुआ है ? किसका काल पास आकर स्थित है ? जिसने बन्दीजनोंको मुक्त किया है, और असिपत्र वनको तहस-नहस किया है, जिसने सातों नरक नष्ट किये है, जिसने बहती हुई वैतरणीको नष्ट कर दिया, उसको मै आज अपना यमपन दिखाऊँगा।" यह कहकर वह सेनाके साथ निकला । मैंसे पर आरूढ, दण्ड और प्रहरण लिये हुए, कृष्ण शरीर, मूंगोंकी तरह लाल-लाल आँखोंवाला था वह । उसकी भीषणताका कितना वर्णन किया जाये ? बताओ मौतकी उपमा किससे दी जा सकती है ?॥१-८॥ पत्ता-यम, यमशासन, यमकरण, यमपुरी और यमदण्ड यदि इनमें से एक भी आक्रमण करता है, तो वह त्रिभुवनमें प्रलयंकर है, फिर युद्धमें पाँचोंका सामना कौन कर सकता है।।९।। [११] जब भीषण यमकरणको देखा, तो उसे सहन न करता हुआ विभीषण दौड़ा, केवल दशानन उसे हटा सका। उसने खुद यमकरणको ललकारा, "अरे मानव मुड़-मुड़, नष्ट हो जायेगा । तू व्यर्थ ही अपना नाम 'जम' कहता है । हे पाप, इन्द्रका, निष्करुण तेरा, चन्द्रका, सूर्यका, धनद और वरुणका, सवका यम में आया हूँ ? ठहर-ठहर, विना आघात खाये कहाँ

१८४
पउमचरित
तं णिसुविणु वइरि-खयंकर । जमण मुक्कु रणे दण्ड भयंकर ॥६॥
धाइड धगधगन्तु आया। एन्तु खुरप्पें छिण्णु दसासें ॥७॥
सय-सय-खण्ड करेप्पिणु पाडिउ । णाई कियन्त-भडफरु साडिउ ॥८॥
धणुहरु लेवि तुरन्तऍण
तं पि णिवारिउ रावणण
घत्ता
सर-जालु विसजिउ भासुरउ ।
जामाएँ जिस खलु सासुरउ ॥९॥
[१२]
पुणु वि पुणुवि विणिवारिय-धणयहाँ। विद्धन्तहाँ रयणासव-तणयहाँ ॥३॥
दिहि-मुहि-सधाणु ण णावइ । णवर सिलीमुह-धोरणि धावइ ।।२।।
जाणे जाणे हुए हए गय-गयवरे। छत्ते छत्ते धर धए रहें रहवरें॥३॥
म. म. मउ. मउ करें करयलें। चलण चलणें सिर सिरे उरें उरयल।
भरिय वाण कड़भाविय-साहणु
पछु जमो वि विहुरु णिप्पहरणु ॥५॥
सरहहाँ हरिणु जेम उद्धाइउ । णिविसे दाहिण-सेडि पराइउ ॥६॥
तहिं रणेटर-पुरवर-सारहों इन्दहों कहिउ अण्णु सहसारहो॥७॥
'सुरवइ लइ अपणड पहत्तणु । अण्णहाँ कहाँ वि समपि जमत्तणु॥८॥
घत्ता
मालि-सुमालिहिं पोत्तएँ हि दरिसाविउ वह वि ण महु मरणु ।
लजए तुज्यु सुराहिवइ धणएण वि लइयउ तह-चरणु ॥९॥
[१३]
तं णिसुवि जम-वयणु भसुन्दरु । किर णिग्गइ सण्णहें वि पुरन्दरु ॥१॥
जग्गए नाम मन्ति थिउ भैसइ । 'जो पहु सो सयलाई गवेसइ ॥२॥
तुहुँ पुणु भावइ णाई भयाणउ । सो जे कमागउ लहहें राणउ ॥३॥

एगारहमो संधि १८५ जाता है ?" यह सुनकर वैरियोंका क्षय करनेवाले यमने अपना भयंकर दण्ड युद्धमें फेंका, वह धकधक करता हुआ आकाशमें दौड़ा, उसे आते हुए देखकर रावणने खुरुपासे छिन्न-भिन्न कर दिया, सौ-सौ टुकड़े करके उसे गिरा दिया। मानो कृतान्तका घमण्ड ही नष्ट कर दिया हो ॥१-८॥ पत्ता-तब यमने तुरन्त धनुष लेकर तीरोंकी भयंकर वौछार की, रावणने उसका भी निवारण कर दिया, उसी प्रकार जैसे दामाद दुष्ट ससुराल का ॥९॥ [१२] धनदका काम तमाम करनेवाले, बार-बार आक्रमण करते हुए, रत्नाश्रवके पुत्र रावणकी दृष्टि और मुट्ठाका सन्धान ज्ञात नहीं हो रहा था, केवल तीरोंकी पंक्ति दौड़ रही थी। यान-यान, अश्व-अश्व, गज-जवर, छन्त्र-छत्र, ध्वज-ध्वज, रथ- रथवर, योद्धा-योद्धा, मुकुट-मुकुट, कर-करतल, चरण-चरण, सिर-सिर, उर-उरतल बाणोंसे भर गया, सेनामें कड़ आहट फैल गयी। यम भाग गया, विधुर और अस्त्रविहीन । सरभसे जैसे हरिण चौकड़ी भरकर भागता है वैसे ही वह एक पलमें दक्षिण श्रेणीमें पहुंच गया। वहाँ उसने रथनूपुरके श्रेष्ठ इन्द्र और सहस्रारसे जाकर कहा, "हे सुरपति, अपनी प्रमुता ले लीजिए ! यमपना किसी दूमरेको सौप दीजिए ।।१-८|| धत्ता-मालि और सुमालिके पोतोंके द्वारा मेरी यह हालत हुई है, किसी प्रकार मेरा मरण-भर नहीं हुआ, हे सुराधिपति, तुम्हारी लज्जाके कारण धनदने भी तपश्चरण ले लिया है" ||२|| [१३] यमके इन असुन्दर शब्दोंको सुनकर पुरन्दर भी तैयार होकर जैसे ही निकलता है, वैसे ही वृहस्पति सामने आकर स्थित हो गया और बोला, "जो स्वामी होता है वह आदिसे लेकर अन्त तक पूरी वातकी गवेषणा करता है, परन्तु तुम अज्ञानीकी तरह दौड़ते हो, वह लंकाका क्रमागत राजा

१८६
पउमचरित
तुम्हें हिं मालिहें काले भुत्ती । मण्ड मण्ड जिह पर-कुलउत्ती ॥५॥
ताह में पढमु जुत्तु पहरेवउ । जउ उक्खन्धे पड़ जाएवउ ॥५॥
देहि ताम ओहामिय-छायहों। सुरसंगीय-णयह जमरायहाँ ॥६॥
भुत्तु
मामिज मय-मारिच्चे हि'। एम भणेवि णियत्तिउ मिच्च हि ॥७॥
दहमुहो वि जमउरि उच्छुस्यहाँ। क्रिश्चिन्धउरि देवि सूररयहाँ ॥६॥
गउ लकहें सक्डंमुहर
तोयदवाहण-वंस-दलु
घत्ता
णहें लग्गु विमाणु मणोहरउ ।
णं काले वद्धिउ दीहरउ ॥९॥
[१४]
मीसण-मयरहरोवरि जन्ते उद्धसिहामणि-छाया-मन्ते ॥१॥
परिपुच्छिउ सुमालि दिण्णुत्तरु । 'किं णहयलु' 'ण ण रयणाय ॥२॥
'कि तमु किं तमालतर-पतिउ' । 'णं ण इन्दणील-मणि-कन्तिउ' ॥३॥
'किं एयाउ कीर-रिन्छोलिड'। 'णं णं मरगय-पवणालोलिउ' ॥४॥
'कि महियलँ पडियई रवि-किरणई। 'णं णं सूरकन्त्रि-मणि-रयण३' ॥५॥
'कि गय घडउ गिल्ल निल्लोलर'। 'णं णं जलणिहि-जल-कल्लोल'॥६॥
'स-बवसाय जाय किं महिहर'। 'णं ण परिममन्ति बले जलयर'॥७॥
एम चवन्त पत्त लंकाउरि । जा तिकूड-महिहर-सिहरोवरि ॥६॥
जणु
णोसरिउ
सन्खु
परिओसे।
दियवर-पणइ-तूर-णिग्धोसें ॥९॥
णन्द-वद्ध-जय-सह-पउत्तिहिं । सेसा-अग्धपत्त-जल-जुत्तिहि ॥१०॥
घत्ता
लङ्काहिवइ पइट्टु पुरै
परिवबु पटु अहिलेउ किउ।
जिह सुरवइ सुरवर-पुरिहिं तिह रज्जु सइ भु अन्तु थिउ॥११॥

एगारहमी संधि - | तुम लोगोंने मालिके समय, परकुलकी कन्याकी तरह बलात् उसका सेवन किया है। उनपर तुम्हारा पहले ही प्रहार करना उचित था, इस प्रकार हड़बड़ीमें जाना उचित नहीं। इसलिए, जिसकी कान्ति क्षीण हो गयी है ऐसे यमराजको सुरसंगीत नगर दे दीजिए, जिसका कि मय और मारीचके द्वारा भोग किया जा चुका है।" रावण भी ऋमरजको यमपुरी और सूर्य- रजको किष्किन्धापुरी देकर ॥१-८।। पत्ता-लंका नगरीकी ओर उन्मुख होकर चला । आकाशमें जाता हुआ उसकासुन्दर विमान ऐसा लगा मानो समयने तोयद- वाहन वंशके दलको एक दीर्घ परम्परामें बाँध दिया हो ॥९॥ [१४] भयंकर समुद्रके ऊपरसे जाते हुए, अपने ऊर्ध्व शिखामणिकी छायासे भ्रान्त रावण पूछता है और मालि उत्तर देता है। क्या नभतल है ? नहीं नहीं रत्नाकर है ? क्या तम है या तमालंकार नगर है ? नहीं-नहीं, इन्द्रनील मणियोंकी कान्ति है ? क्या ये तोतोंकी पंनियाँ हैं ? नहीं-नहीं, पवनसे आन्दोलित मरकतमणि हैं। क्या ये धरतीपर सूर्यकी किरणे पढ़ रही हैं ? नहीं नहीं, ये सूर्यकान्त मणि हैं । क्या यह गीले गण्डस्थलोंवाली गजघटा है ? नहीं नहीं, ये समुद्र-जलकी लहरें हैं । क्या यह पहाड़ व्यवसायशील हो गया है ? नहीं नहीं, जलमें जलचर घूम रहे हैं ? इस प्रकार बातचीत करते हुए वे लंका नगरी पहुँच गये, जो कि त्रिकूट पर्वतके शिखरपर स्थित थी। द्विजवर बन्दीजन उन्हीं तूर्योके शब्दोंके साथ, सभी परितोषके साथ बाहर आ गये। सभी कह रहे थे, "प्रसन्न होओ, बढ़ो।" सभी निर्माल्य अर्धपात्र और जल लिये हुए थे ॥१-१०॥ घत्ता-लंकानरेश नगरमें प्रविष्ट हुआ। राज्यपट्ट बाँधकर उसका अभिषेक किया गया। जिस प्रकार सुरपुरीमें इन्द्र, उसी प्रकार अपनी नगरीमें राज्यका भोग करता हुआ वह रहने लगा।

१८८-
पउमचरित
[१२. वारहमो संधि]
पमणइ दहवयणु दीहर-णयणु णिय-अस्थाणे णिविट्ठउ ।
'कहहाँ कहाँ णरहों विजाहरहों भन्ज वि कवणु अणिटुड' ॥१॥
[१]
तं णिसुणवि जम्पइ को वि गरु । सिर-सिहर-चढाविय ग्मय करु ॥१॥
'परमेसर दुजउ दुछ खलु।
चन्दोवरु णामें
अतुल-वलु ॥२॥
सो इन्दहों तणिय कर करवि । पायाल-लक थिड पइमरॅवि' ॥३॥
अवर दोच्छिउ णरवरण । 'कि सकें किं चन्दोयरेण ॥४॥
सुन्वन्ति कुमार अण्ण पवल । उच्छुत्यहाँ गन्दण णील-णल'॥५॥
अण्णेक बुच्चइ 'हउँ कहामि । दो-पासिउ जइ ण धाय लहमि॥६॥
किकिंधपुरिहिं करि-पवर-भुउ । णामेण वालि सूरश्य-सुउ ॥७॥
जा पारिहच्छि मई दिट्ट तहाँ। सा तिहुयणे णड अण्णहाँ णरहों।
घत्ता
रहु वाहें वि अरुणु हय हणे वि पुणु जा जोयणु विण पावइ ।
ता मे रुममें वि जिणवरु णवि तहि में पढीवड आवद ॥९॥
[२]
तहाँ जं चलु तं ण पुरन्दरहों। ण कुवेरहों वरुणहाँ ससहरहों ॥१॥
मरु वि रालइ बद्धामरिसु । तहों अण्णु णराहिउ तिण-सरिसु ॥श
महुगम-महीहरु कहि मि गउ । तहि सम्मउ णाम लइड वर ॥३॥
णिग्गन्धु गुणवि विसुद्ध-मद । अण्णहाँ इन्दहाँ वि णाहिं गमह॥॥
तं तहर पनि गीढ-मट । पग्बज लेवि गड मररठ ॥५॥
'मह होमइ कम वि कारण । समरगणु समउ दमाणण' ॥६॥

वारहमो संधि बारहवीं सन्धि अपने सिंहासनपर बैठा हुआ, विशालनयन रावण पूछता है-"अरे मनुष्यो और विद्याधरो, बताओ आज भी कोई शत्रु है ?" ? [१] यह सुनकर अपने शिररूपी शिखरपर दोनों हाथ चढ़ा- कर एक आदमी बोला,"परमेश्वर! चन्द्रोदर नामक अतुल बल- शाली दुष्ट खल अजेय है । वह इन्द्रकी सेवा करते हुए, पाताल लंकामें प्रवेश कर रहता है।" तब एक दूसरेने इसका प्रतिवाद किया, "इन्द्र और चन्द्रोदर क्या हैं ? ऋक्षुरजके पुत्र नील और नल अत्यन्त प्रबल सुने जाते है।" एक औरने कहा, "मै वताता हूँ यदि अगल-बगलसे मुझपर आघात न हो। किष्किन्धापुरी- में गजशुण्डके समान हाथवाला, सूर्यरजका पुत्र बाली है। उसके पास जो कण्ठा (?) मैने देखा है, वह त्रिभुवनमें किसी दूसरे आदमीके पास नहीं है । ॥१-८॥ पत्ता-अरुण (सूर्य) अपना रथ और घोड़े जोतकर एक योजन भी नहीं जा पाता कि तबतक वह मेरुकी प्रदक्षिणा देकर और जिनवरकी वन्दना करके वापस आ जाता है ? ॥९॥ [२] उसके पास जो सेना है, वह इन्द्र के पास भी नही है, कुवेर, वरुण और चन्द्र के पास भी नहीं। अमर्षसे भरकर वह सुमेरु पर्वतको चलायमान कर सकता है। उसकी तुलनामें दूसरे राजा तृणके समान है। कभी वह कैलास पर्वतपर गया था। वहाँ उसने सम्यग्दर्शन नामका व्रत लिया है कि 'विशुद्धमति निर्ग्रन्थ मुनिको छोड़कर और किसी इन्द्रको नमस्कार नहीं करूंगा। उसे इस प्रकार दृढ देखकर, पिता सूर्यरजने प्रव्रज्या ग्रहण कर ली, यह सोचकर, (या इस डरसे ) कि मेरा किसी कारण दशानन-

पउमचरित
अवर वुत्तु 'ण इस घडइ । कइवसिउ कि अम्हहुँ भिडइ ॥३॥
सिरिकण्ठहों लगे वि मित्तइय। अण्णु त्रि उवयार-सएहि लइय ॥८॥
घत्ता
अहवह वाणर वि सुरवर-गर वि रतुप्पल-दल-णयणहाँ।
तासया वि सुहट जा समर-ज्मड णड णिएन्ति दहवरणहाँ ॥९॥
[३]
तं वालि-सल्लु हियवएँ धरॅवि। तो रावणु अण्ण वोल्ल करें वि ॥३॥
गड एक-दिवसें सुर सुन्दरिह। जा अवहरणेण तणूयरिहं ॥२॥
ता हरवि णीय कुल-भूसणे हिं। चन्दहि ह(व?)रिय खर-दूसणेहि॥३
णासन्त णिएवि सहोयरेण । णयरेणानकारोदएण ॥४॥
णं उबरें छुहें वि रक्खिय-सरणु। किय(?)तेहि मि चन्दोवस्-मरणु ॥५॥
विणिवाइड जत्यणे में थिर । जो दुकिउ सो तं वारु पिड ॥६॥
कु लग्गजरयणियर-वलु । रह-तुरय-णाय-णरवर-पवलु ॥७॥
भलहन्तु वारु तं णिप्पसह। गउ वह वि पडीवड णिय-णयहादा
घत्ता
छुडु युद्ध दहवयणु परितुष्ट-मणु किर स-कलत्तउ आवइ ।
उम्मण-दुम्मणउ असुहावणउ णिय-वरु ताम विहावइ ।।९।।
[-]
नुरमाणे कण वि बजरिड।
खर-दूसण-कण्णा-दुच्चरिउ ॥१॥
अत्थक्कए आयस्बिर-णयणु । कुढे लग्गइ स-रहसु दहवयणु ॥२॥
करें धरिउ ताम मन्दोबरिएँ। णं गड्डा-पाहु जउण-सरिए ॥३॥
'परमेसर क्हों वि ण अप्पणिय । जिह कण तेम पर-मायणिय ॥४॥
एक इ करवाल-भयङ्करहुँ। चन्दह सहास विजाहरहुँ ।।५।।
जइमाण-वडीवा होन्ति पुणु । तो घर अच्छन्तिएँ कवणु गुणु ॥६॥

पारहमो संधि १९१ से युद्ध होगा।" एक औरने कहा, "यह ठीक नहीं जंचता, क्या कपिध्वजी हमसे लड़ेगा ? श्रीकण्ठसे लेकर हमारी मित्रता है और भी हमारे उनके ऊपर सैकड़ों उपकार हैं ॥१-८॥ घत्ता-अथवा चाहे वानर हों, सुरवर या अन्यवर ? वे सारे योद्धा, रक्तकमलके समान नेत्रवाले रावणकी युद्धकी चपेट नहीं देख सकते" ||९|| [२] तब, बालीका खटका अपने मनमें धारण कर, रावणने दूसरी बात शुरू कर दी। एक दिन जब वह सुरसुन्दरी तनूदरा- का अपहरण करनेके लिए गया, तबतक कुलभूषण खरदूषण चन्द्रनखाका अपहरण करके ले गये। अलंकारोदय नगरमें सहोदरने उन्हें भागते हुए देखकर, उन्हें बचानेके लिए छिपाकर शरणमें रख लिया। उन्होंने सहोदर चन्द्रोदरको मार डाला। जो सिंहासन पर स्थित था उसे नष्ट कर दिया, जो आया उसको उसीके रास्ते भेज दिया। रथ, तुरग, गज और मनुष्योंसे प्रबल, जो राक्षस-सेना पीछे लगी हुई थी, द्वार न पा सकनेके कारण रुक गयी और मुड़कर वापस अपने नगर चली गयी ॥१-८॥ घत्ता-इतनेमें शीघ्र ही जब रावण सन्तुष्ट मन अपनी पत्नीके साथ आता है तो उसे अपना घर उदास, सूना और असुहावना-सा दिखाई देता है ॥९॥ [४] शीघ्र ही किसीने खरदूषण और कन्याका दुश्चरित उसे बताया। सहसा रावणकी आँखें लाल हो गयीं और वेगसे वह उसके पीछे लग गया। इतनेमें मन्दोदरीने उसका हाथ पकड़ लिया, मानो यमुना नदीने गंगाके प्रवाहको रोक लिया है । वह बोली, "परमेश्वर, चाहे वह कन्या हो या बहन, ये अपनी नहीं होती। तुम एक हो, और वे तलवारोंसे भयंकर चौदह हजार विद्याधर हैं, यदि वे तुम्हारी वात मान भी ले, तो भी लड़की को घरमे रखनेसे क्या लाभ । इसलिए युद्ध छोड़- ---

१९२
परमचरित
पट्टवहि महन्ता मुऍवि स्णु ।
तं वयषु सुर्णेवि मारिच-मय ।
कण्णहें करन्तु पाणिग्गहणु' ॥७॥
पेसिय दहवत्त तुरिभ गय ॥८॥
घत्ता
तेहिं विवाहु किउ खरु रखें थिउ अणुराहहें विज्ज-सहित ।
वणे णिवसन्तियहें वय-बन्तियाँ सुड उप्पण्णु विराहिउ ॥९॥
[५]
एत्यन्तरें जम-जूरावणेण। तं सल्लु धरेप्पिणु रावणेण ॥१॥
पट्टविउ महामइ दूत तहि । सुग्गीव-सहोयरु वालि जहि ॥२॥
वोल्लाविउ थाएँ वि महिमुहण। 'हउँ एम विसज्जिउ दहमुहण ॥३॥
एक्कूणवीस-रज्जन्तरई। मित्तइयएँ गयइँ णिरन्तरई ॥४॥
कों वि कित्तिधवलु णामेण चिरु । सिरिकण्ट-कज्जे थिउ देवि सिरु ॥५॥
णवमउ परिणाविउ अमरपहु । जे धएँ हि लिहाविउ कइ-णिवहु॥६॥
दहमउ कइ-केयणु सिरि-सहिउ । एयारहमउ पडिवलु कहिउ ॥७॥
वारहमउ णयणाणन्दयरु। तेरहमउ खयराणन्दु वरु ॥८॥
चउदहमउ गिरि-क्वेिरवलु (2)। पण्णारहमउ णन्दशु अजउ ॥९॥
सोलहमउ पुणु को वि उवहिरउ । तडिकप-विगमे किड तेण तउ ॥१०॥
सत्तारहमउ विधिन्धु पुणु । तहाँ कवणु सुरेसे ण किउ गुणु॥१३॥
अट्ठारहमउ पुणु सूररत।
नमु मझवि तहों पहसार कडा
तुहुँ एवहिं एक्कुणवीसमउ। अणुहुों रज्जु मणे सुएवि मउ॥१३॥
घत्ता
माउ णिहाल मुहु तंणमहि तहुँ गम्पि दसाणण-राणउ ।
जेण देइ पवलु चउरङ्ग-वलु इन्द्रहों उवरि पयाणउ' ॥१४॥

वारहमो संधि
१९३
कर, मन्त्रियोंको भेजिए और कन्याका पाणिग्रहण कर दीजिए।"
यह वचन सुनकर उसने मय और मारीच को भेजा। प्रेपित वे
तुरन्त गये ॥१-८॥
पत्ता-उन्होंने विवाह कर लिया। विद्यासहित खर राज्यमें
स्थित हो गया। चन्द्रोदरकी विधवा पत्नी व्रतवती अनुराधाके
वनमें निवास करते हुए विराधित नामका पुत्र हुआ।।९॥
[५] इसके अनन्तर, यमको सतानेवाले रावणने उक्त शल्य
अपने मनमें रखते हुए महामति दूतको वहाँ भेजा, जहाँ
सुग्रीवका सगा भाई वाली था। दूतने वालीके सामने उपस्थित
होते हुए कहा कि मुझे यह बतानेके लिए भेजा गया है कि
हमारी उन्नीम राज्यपीढ़ियाँ निरन्तर मित्रतासे रहती आयी हैं,
कोई कीर्तिधवल नामका पुराना राजा था जो श्रीकण्ठके लिए
अपना सिर तक देनेको तैयार था। नौवीं पीढीमें अमरप्रभ
हुआ जिसने राक्षसोंमें अपना विवाह किया और जिसने ध्वजों
पर वानरोंके चित्र अंकित करवाये। दसवाँ श्रीसहित कपि-
पंतन हुआ। ग्यारहवाँ प्रतिपालके नामसे जाना जाता है।
तेरहवाँ श्रेष्ठ खेचरानन्द हुआ। चौदहवाँ गिरिकिंवेलरवल,
पन्द्रहवाँ अजितनन्दन, सोलहवां फिर उदधिरथ, जिमने
तटिकेगके वियोगमे संन्यास ग्रहण किया। सत्तरहवाँ फिर
शिपिन्ध हुआ, उसकी सुरेशाने फौन-नी भलाई नहीं की।
अटार फिर सूर्यरज हुआ, यमका नाम कर जिसे इन
नगरीने प्रवेश दिलाया गया । तुन अब उनीनवे हो. अतः मनसे
का दूर फर राज्यका भांग करो ॥१-१३||
पना-आओ उसका मुख देखें, वहीं चलकर दशाननको
नाम नमस्कार करा जिससे यह अपनी चतुरंग सेनाके माथ
पर नया रफा बनवा सके ||१४||

पउमचरिड
[६]
जं किउ जयकारु णाम-गहणु । तं णवर वलेंवि थिउ अण्ण-मणु॥३॥
ण करेइ कण वयणाई पहु। जिह पर-पुरिसहाँ सु-कुलीण-वहु॥३॥
एत्यन्त दहमुह-दूभएण । अच्चन्त-विलक्खी हुभएँ ण ॥३॥
णिन्मच्छिड मेल्लवि सयण-किय । 'जो को वि णमेसइ तासु सिय॥४॥
णीसरु तुहुँ आयहाँ पट्टणहों। णं तो मिटु परए दसाणणहाँ' ॥५॥
तं णिसुणेवि कोव-करम्विएण । पडिदोच्छिउ सोहविलम्विऍण॥६॥
'भरें वालि देउ किं पई ण सुउ। महु महिहरु जेण भुहि विहुउ॥७॥
जो णिविसद्धण पिहिवि कमइ । चत्तारि वि सायर परिममइ ॥८॥
।
घत्ता
जासु महाजसेंण रणे अणवसैंण धवलीहूअउ तिहुवणु ।
तासु वियहाहाँ अब्मिट्टाहों कवणु गहणु किर रावणु' ॥९॥
[७]
सो दूर कडय-बयणासि-हड । सामरिसु दसासहाँ पासु गउ ॥३॥
'किं वहुए एत्तिउ कहिउ मह । तिण-समड विण गणइ वालि पइँ' ।।
तं वयणु सुणेप्पिणु दससिरण । चुच्चइ रयणायर-व-गिरण ॥३॥
'जह रण-मुहें माणु ण मलमि तहों। तो छित्त पाय रयणासवहों' ॥१॥
आरुहें वि पइज्ज पयट्टु पहु।
णं कहाँ वि विरुद्ध कूर-गहु ॥५॥
थिउ पुष्कविमाणे मणोहरएँ । णं सिद्धसिवालए सुन्दरएँ ॥६॥
करें णिम्मलु चन्दहासु धरिउ । णं घण-णिसण्णु तडि-विकुरिउ ॥७॥
णीसरिए पुर-परमेसरेण । णीसरिय वीर णिमिसन्तरेण ॥८॥

चारहमो संधि १९५ [६] जब दूतने जयकारके साथ रावणका नाम लिया उससे वाली केवल अन्यमनस्क होकर और मुंह मोड़कर रह गया। स्वामी दूतके वचनोंपर कान नहीं देता, उसी प्रकार, जिस प्रकार कुलवधू परपुरुषके वचनोंपर । इसके अनन्तर रावणके दूतने समस्त सज्जनोचित आचरण छोड़ते हुए बालीका यह कहते हुए अपमान किया, "जो कोई भी हो, जो नमस्कार करेगा, श्री उसीकी होगी, या तो तुम इस नगरसे चले जाओ, नहीं तो कल रावणसे युद्धके लिए तैयार रहो।" यह सुनकर क्रोधसे आगबबूला होते हुए सिंहविलम्बितने इसका प्रतिवाद किया, "अरे क्या वालीके विषयमें तुमने नहीं सुना जिसने मधु पर्वतको अपनी भुजाओंसे नष्ट कर दिया, जो आधे पलमें सारी धरतीकी परिक्रमा कर, चारों समुद्रोंके चक्कर काट आता है ॥१-८॥ धत्ता-युद्धमें इसके स्वाधीन यशसे सारा संसार धवलित है। युद्धमें प्रवृत्त होनेपर उसे रावणको पकड़ना कौन-सी वड़ी बात है ?" ॥९॥ [७] कटुशब्दोंकी तलवारसे आहत वह दूत क्रोधके साथ रावणके पास गया और बोला, "वहुत क्या, मुझसे इतना ही कहा कि वाली तुम्हें तृण बरावर भी नहीं समझता।" यह वचन सुनकर रावण समुद्रके समान गम्भीर स्वरमें वोला, "मैं अपने पिता रत्नाश्रवके पैर छूनेसे रहा यदि मैंने युद्धमें उसका मान-मर्दन नहीं किया।" यह प्रतिज्ञा करके वह चल पड़ा मानो कोई क्रूर ग्रह ही विरुद्ध हो उठा हो । वह सुन्दर पुष्प विमानमें ऐसे बैठ गया जैसे सुन्दर शिवालयमें सिद्ध स्थित हो जाते हैं। उसने हाथमें चन्द्रहास खड्ग ले लिया मानो वादलोंमें बिजली चमक उठी हो, पुरपरमेश्वरके निकलते ही वीर पलके भीतर निकल पड़े ॥१-८॥

१९६
पउमचरित
घत्ता
'अम्हहुँ पय-मरण णिरु गिठ्ठरण म मरउ धरणि वराइय' ।
एत्तिय-कारणेण गयणगणेण णावइ सुहट पराइय ॥१॥
[८]
एत्तहँ वि समर-दुज्जोहणिहि चउदहहिं परिन्द-अखोहणिहि ॥१॥
सण्णहें वि वालि णीसरिउ किह । मज्जाय-विवज्जिड जलहि जिह॥२॥
पणवेप्पिणु विणि वि अतुल-बल। थिय भग्गिम-खन्धेहि णील-णल ॥३॥
विरइउ आरायणु रणे अचलु । पहिलउ जै णिविद् पायाल-वलु॥४॥
पुणु पच्छएँ हिलिहिलन्त स-भय । खर-खुहि खणन्त खोणि तुरय ॥५॥
पुणु सइल-सिहर-सण्णिह सयढ। पुणु मय-विहलइल हस्थि-हड ॥६॥
पुणु णरवइ वर-करवाल-धर । भासण्ण दुक तो रयणियर ॥७॥
किर समरें मिडन्ति मिढन्ति गइ। थिय अन्तरै मन्ति सु-विउल-मइ॥6॥
घत्ता
'वालि-दसाणणहाँ जुज्झण-मणहाँ एउ काई ण गवेसहाँ।
किएँ खएँ वन्धवहुँ पुणु केण सहुँ पच्छए रज्जु करेसहों ॥९॥
[९]
जो कित्तिवल-सिरिकण्ठ-किउ । किक्किन्ध-सुकेसहिं विद्धि णिउ ॥१॥
तं खयहोणेहु मा णेह-वरु । जइ धरॅवि ण सक्कहों रोस-भरु ॥२॥
तो वे वि परोप्परु उत्थरहों जो को वि जिणइ जयकार तहाँ' ॥३॥
वंणिसुणेवि वालि-देउ चवइ । 'सुन्दर भणन्ति लवाहिवइ ॥४॥
खउ तुज्झु व मज्झु व णिबडउ। जिम धुव जिम मन्दोवरि रडउ ॥५॥
किं वहहिं जीवें हिं घाइए हिं। वन्धव-सयणहि विणिवाइऍहि ॥६॥
लइ पहरु पहरु जइ अस्थि छलु। पेक्खहुँ तुह विज्जहुँ तणउ वलु'॥७॥

वारहमो संधि 'घत्ता-सुभट केवल इस कारणसे, आकाश मार्गसे वहाँ पहुँचे कि कहीं हमारे पैरोंके निष्ठुर भारसे बेचारी धरती ध्वस्त न हो जाये ॥९॥ [८] यहाँ भी समर में अजेय, राजाओंकी चौदह अक्षौहिणी सेनाएँ, बालीके सन्नद्ध होते ही इस प्रकार निकल पड़ी, जिस प्रकार मर्यादाविहीन समुद्र हो । अतुलबल नल और नील दोनों ही प्रणाम करके अग्रिम सेनाओंमें स्थित हो गये। उन्होंने युद्ध में अपनी अचल व्यूह रचना की। पहले पैदल सेना स्थित थी। उसके पीछे हिनहिनाते हुए समद घोड़े थे जो अपने तेज खुरोंसे धरती खोद रहे थे। फिर शैलशिखरोंकी भाँति रथ थे। फिर मदसे विह्वलांग गजघटा थी। फिर राजा श्रेष्ठ तलवार अपने हाथमें लिये स्थित था। इतनेमें निशाचर निकट आये। जबतक वे लोग युद्ध में भिड़ें या न भिड़ें कि इतने में दोनोंके वीच विपुलमति मन्त्री आया ॥१-८॥ पत्ता-उसने कहा, "युद्धके इच्छा रखनेवाले, आप दोनों (वाली और रावण ) इस वातका विचार क्यों नहीं करते कि स्वजनोंका क्षय हो जानेपर फिर राज्य किसपर करोगे" ||९|| [९] जो कीर्तिधवल और श्रीकण्ठने किया, जिसे किष्किन्ध और सुकेशीने आगे बढ़ाया, उस स्नेहके तरुको नष्ट मत करो। यदि आप अपने रोपके भारको धारण करनेमें असमर्थ हैं, तो आपसमें लड़ लो, जो जीतेगा उसकी जय-जयकार होगी।" यह सुनकर वाली कहता है कि हे लंकाधिपति, यह सुन्दर कहता है । क्षय, तुम्हारा या मेरा, दोनोंमें से एकका हो ? जिससे ध्रुवा या मन्दोदरी विधवा हो, वहुत-से जीवोंको मारने या वजन बन्धुओंके पतनसे क्या? इसलिए यदि कोशल है, तो प्रहार करो, देखें तुम्हारी विद्याओंका वल!" यह .

१९८
पउमचरिउ
संणिसुणेवि समर-सएहि थिरु । वावरेंवि लगु वीसद्ध-सिरु ॥८॥
आमेल्लिय विज महोयरिय (2)। फणि-फण-फुक्कार दिन्ति गइय ॥९॥
घत्ता
वालिं भीसणिय अहि-णासणिय गारुड-विज विसज्जिय।
उत्त-पडुत्तियएँ कुल-उत्तियएँ णं पुण्णालि परजिय ॥१०॥
[१०]
दहवयणे गरुड-परायणिय । पम्मुक्त विज णारायणिय ॥१॥
गय-सह-चक्क-सारङ्ग-धरि । चउ-भु गरुडासणभामण-करि ॥२॥
सूररय-सुएण वि संमरिय ।
णामेण विज माहेसरिय ॥३॥
कङ्काल-कराल तिसूल-करि। ससिमाउरिनगग-खट्टन-धरि ॥४॥
किर अवर विसजइ दहवयणु । सय-वारउ परिभञ्चेवि रणु ॥५॥
स-विमाणु स-खग्गु महावलेण । उच्चाइउ दाहिण-करयलॅण ॥६॥
णं कुभर-करण कवलु पवरु । णं वाहुबलीसें चक्कहरु ॥७॥
गहें दुन्दुहि वाडिय सुरयणेण । किउ कलयल कइधय-साहणेण ॥८॥
घत्ता
माणु मलेवि तहाँ लङ्काहिवहाँ वद्ध पटु सुग्गीवहाँ ।
'करि जयकार तुहुँ अणुमुझे सुहु मिचु होहि दहगीवहाँ ॥९॥
[११]
महु तणउ सीसु पुणु दुण्णमउ । जिह मोक्ख-सिहरु सव्वुत्तम ॥१॥
पणवेप्पिणु तिल्लोकाहिवइ । सामण्णही अण्णहाँ ण णवह ॥२॥
महु तणिय पिहिवि तुहुँ मुक्षि पहु। रिझड कइ-जाउहाण-णिवहु ॥३॥
अपणु मि जो पई उवयास किट । वायही कारण जमराउ जिउ ||
वहाँ मई किय पढिउवयार-किय । भावग्गी भुजहि राय-सिय' ॥५॥

वारहमो संधि - - सुनकर सैकड़ों युद्धमें अडिग रावणने युद्ध करना शुरू कर दिया । उसने सर्पविद्या छोड़ी जो सोंके फनसे फुफकार छोड़ती हुई चली ॥१-९|| घत्ता-बालीने सोका नाश करनेवाली भीषण गारुडविद्या विसर्जित की। वह उसी प्रकार पराजित हो गयी, जिस प्रकार कुलपुत्री की उनि-प्रति-उक्तियोंसे 'वेश्या' पराजित हो जाती है।॥१०॥ [१०] दशवदनने गरुड़-विद्याको नष्ट करनेवाली नारायणी विद्या छोड़ी, जो गदा-शंख-चक्र और धनुषको धारण किये थी, उसके चार हाथ थे और हाथी पर गमन करती थी। तब सूर्यरजके पुत्र बालीने माहेश्वरी विद्याका स्मरण किया, कंकालों- से भयंकर हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाली, चन्द्रमा-गौरी-गंगा खट्वांगसे युक्त था। तव दशवदनने एक और विद्या छोड़ी, जिसे महावली बालीने रणमें सौ बार परिक्रमा देकर विमान और खड्गके साथ रावणको दाहिने हाथपर ऐसे उठा लिया जैसे वडा हाथीने वड़ा कौर ले लिया हो, या बाहुबलिने चक्र ले लिया हो। देवताओंने आकाशमें नगाड़े बजाये और कपि- ध्वजियोंकी सेनामें कोलाहल होने लगा ॥१-८ पत्ता-इस प्रकार लंकानरेशका मान-मर्दन कर तथा सुग्रीव को राजपट्ट वाँधकर वालीने कहा, "नमस्कार कर तुम रावणके अनुचर बन जाओ और सुख भोगो" ||९|| [११] "मेरा सिर दुर्नमनशील है उसी प्रकार, जिस प्रकार मोक्षशिखर सर्वोत्तम है। त्रिलोकाधिपतिको प्रणाम करनेके बाद अव यह किसी दूसरे को नमस्कार नहीं कर सकता। हे स्वामी, मेरी धरतीको आप भोगें और वानर तथा राक्षसोंके समूहका मनोरंजन करें। और तुमने जो उपकार किया है, तातके लिए तुमने यमराजको जीता था, उसके लिए मैंने यह प्रत्युपकार

२००
पउमचरित
ग' एम भणेप्पिणु तुरिउ तहि'। गुरु गयणचन्दु णामेण जहि ॥६॥
तव चरणु इस तग्गय-मणण । उप्पण्णउ रिद्विड तक्खणेण ॥७॥
अणुदिणु जिणन्तु इन्दिय-वहरि । गउ तित्थु जेत्थु कहलास-गिरि ॥en
घत्ता
उप्परि चडिट तहाँ भट्ठावयहाँ पञ्च-महावय-धारउ ।
अत्तावण-सिलहे सासय-इलई णं थिउ वालि भडारउ ॥९॥
[२]
एत्तहें सिरिप्पह मइणि तहों। सुग्गीवें दिग्ण दसाणणहों ॥१॥
वोलाविउ गउ लक्षा-णयरें। णल-णील विसजिय किक-पुरै ॥२॥
सुर धुव-महएविहें संथविउ । ससिकिरणु णियबुरज थविउ ॥३॥
वहिं अवसर उत्तर-सेढि-विहु । विजाहरु णामें जलणसिहु ॥४॥
तहाँ धीय सुतार-णाम गरेण । मग्गिज्जइ दससयगइ-वरण ॥५॥
गुरु-वयणे तासु ण पट्टविय । सुग्गीवहाँ णवर परिविय ॥६॥
परिणेवि कण्ण णिय णियय-पुरु। दससयगइहें वि विरहगि गुरु ॥७॥
पजलइ उप्पायइ कलमलउ। उण्हटण सुहाइ ण सीयल ॥
उब्मन्तउ कहि मि पइट्टु वणु।
साहन्तु विज्ज थिउ एक-मणु ॥९॥
घत्ता
ताइ मि धण-पउरें किक्किन्ध-पुर अङ्गङ्गय वढन्तई ।
थियइ रयण [इं] गईं वेणि विजणई रज्जु स ई भुञ्जन्तइँ ॥१०॥

वारहमो सधि
किया, तुम अब स्वतन्त्र होकर राज्यशीको उपभोग करो।
यह कहकर, वह वहाँ शीघ्र चला गया जहाँ किमिगनवन्द)
नामके गुरु थे। उसने एकनिष्ठासे तपश्चरण ले लिया, उन्हें
तत्क्षण ऋद्धि उत्पन्न हो गयी। प्रतिदिन इन्द्रियरूपी शुत्रुको
जीतते हुए वह वहाँ गये, जहाँ कैलास पर्वते है Hall
धत्ता-पाँच महाव्रतोंके धारी वह अष्टापद शिखरपर चढ़
गये और आतापिनी शिलापर इस प्रकार स्थित हो गये जैसे
शाश्वतशिलापर स्थित हों! ||९||
[१२] यहाँ सुग्रीवने उसकी वहन श्रीप्रभा रावणको दे दी।
उसे लेकर वहाँ लंका नगर चला गया। नल और नीलको
किष्कपुर भेज दिया गया। ध्रुवा महादेवीके पुत्र शशिकरणको
भी उसने अपने आधे राज्यपर स्थापित कर दिया। उस अवसर-
पर उत्तर श्रेणीका स्वामी ज्वलनसिंह नामक विद्याधर था।
उसकी सुतारा नामकी कन्या भी, जिसे सहस्रगति नामक
वरने मांगा। परन्तु ज्वलनसिंह गुरुके आदेशसे उसे न देते
हुए सुप्रीवसे उसका विवाह कर दिया। विवाह करके कन्या
वह अपने घर ले आया, उससे सहस्रगतिको भारी विरहाग्नि
उत्पन्न हुई। वह जलता, पीड़ित होता और कसमसाता। उसे
न उध्यता अच्छी लगती और न शीतलता । उद्भ्रान्त वह वनमें
कहीं चला गया और एकाग्र मन होकर विद्याकी सिद्धि करने
लगा ॥१-९॥
पत्ता-तबतक धनसे प्रचुर किष्किन्ध नगरमें अंग और
अंगद चढने लगे और दोनों ही दिन-रात राज्यका स्वयं उपभोग
करते हुए रहने लगे ॥१०॥

२०२
पउमचरित
[१३. तेरहमो संधि]
पेक्खेप्पिणु वालि-भडारउ रावणु रोसारियउ।
पमणइ कि मई जीवन्तण
जाम ण रिउ मुसुमूरियउ' ॥१॥
[१]
दुवई
विज्जाहर-कुमारि स्यणावलि णिचालोय-पुरवरे ।
परिणवि वलइ जाम ता थम्भिउ पुप्फविमाणु अम्बरे ॥१॥
महरिसि-तव-तेएं थिउ विमाणु ण दुक्किय-कम्म-वसेण दाणु ॥२॥
णं सुके खोलिउ मेह-जालु ।
गं पाउसेण कोइल-बमालु ॥३॥
णं दूसामिऍण कुटुम्ब-वित्तु ।
णं मच्छे धरिउ महायवत्तु (?)॥४॥
णं कश्चण-सेले पवण-मणु ।
णं दाण-पहावे णीय-भवणु ॥५॥
णीसहर
हुयल
किङ्किणीउ। णं सुरऍ समत्तएँ कामिणीउ ॥६॥
धग्धर हि मि घवधव-घोसु चत्तु । णं गिम्भयाल ददुरहुँ पत्तु ॥७॥
णरवरहुँ परोप्परु हूउ चप्पु । अहाँ धरणि एजेविणु धरणि-कम्पु॥८॥
पडिपेल्लियउ वि ण वहइ विमाणु । णं महरिसि भइयएँ मुभइ पाणु ॥९॥
घत्ता
विहडइ थरहाइ ण दुका
उप्परि वालि-भडाराहों।
छुड छुड परिणियउ कलत्तु व रइ-दइयहाँ वड्डाराहाँ ॥१०॥
[२]
दुवई
तो एत्थन्तरण कयं पहुणा
सन्व-दिसावलोयणं ।
सम्व-दिसावलोयणेण वि रतुप्पलमिव णहगणं ॥१॥
'मरु कहों अथक्क[ए]कालु कुद्ध । कर केण भुयनम-चयण छु ॥२॥
के सिरण पडिच्छिउ कुलिस-घाउ । को णिग्गउ पञ्चाणण-मुहाउ ॥३॥

तेरहमो संधि 무 तेरहवीं सन्धि आदरणीय बालीको देखकर रावण रोपसे भर उठा। (अपने मनमें ) कहता है, "जवतक मैं शत्रुको नहीं कैचलता, मेरे जिन्दा रहनेसे क्या ?" ॥शा [१] नित्यालोक नगरकी विद्याधरकुमारी रत्नावलीसे विवाह कर जब वह लौट रहा था कि आकाशमें उसका पुष्पक विमान रुक गया, मानो पापकर्मसे दान तक गया हो, मानो शुक्र नक्षत्रसे मेघजाल स्खलित हो गया हो, मानो वर्षासे कोयलका कलरव, मानो खोटे स्वामीस कुटुम्वका धन, मानो मच्छने महाकमलको पकड़ लिया हो, मानो सुनेर पर्वतने पवनको गतिको, मानो दानके प्रभावसे नीच भवन । उसकी किंकिणियाँ शब्दशून्य हो गयीं, जैसे सुरति समाप्त होनेपर कामिनी चुपचाप हो जाती है। घण्टियोंने भी धन-धन शब्द छोड़ दिया, मानो मेंढकोंके लिए ग्रीष्मकाल आ गग हो। नरश्रेष्ठोंमें काना-फूसी होने लगी ........ बार-बार प्रेरित करनेपर भी विमान नहीं चलता, नहीं चलता, मानो महामुनिके भयसे प्राण नहीं छोड़ता ॥१-२॥ घत्ता-विघटित होता है, थर-थर करता है, परन्तु वह विमान आदरणीय बालीके ऊपर नहीं पहुँचता, वैसे ही जैसे नयी विवाहिता स्त्री अपने प्रौढ़ पतिके पास नहीं जाती ॥१ना [२] तव, इस वीच रावणने सब दिशाओं में अवलोकन किया। सब ओर देखनेसे उसे आकाश ऐसा लगा जैसे रक्त- कमल हो। फिर वह अचानक क्रुद्ध हो उठा, मानो काल ही शुद्ध हुआ हो। उसने कहा, "किसने साँपके मुंहको क्षुब्ध किया है ? किसने अपने सिरपर वजाबात चाहा है ? सिंहके मुंहसे

२०४
पउमचरित
कॉ पइट्ठ जलन्मए जरूण-जालें। को ठिउ कियन्त-दन्तन्तराल' ॥४॥
मारिचे युचई 'देव देव । स-भुमामु चन्दण-रुक्खु नेम ॥५॥
लम्बिय-थिर-थोर-पलम्व-बाहु ।
अच्छइ कइलासही उबरि साहु ॥६॥
मेरु व अकम्पु उवहि व अखोहु । महियलु व बहु-क्समु चत्त-मोहु ॥७॥
मन्झण्ह-पयड व उग्ग-तेउ । तहों तव-सत्तिएँ पढिखलिउ वेर॥॥
ओसारि विमाणु दवत्ति देव । फुइ ण जाम खलु हियउ जेम' ॥९॥
घत्ता
तं माम-वयणु णिसुणेप्पिणु दहमुहु हेहामुहु वलिउ ।
गयणगण-लच्छिह केरठ जोधण-माह णाई गलिड ॥१०॥
[३]
दुवई
तो गज्जन्त-मत्त-मायङ्ग-तुङ्ग-सिर-घट्ट-कन्धरो ।
उक्खय-मणि-सिलायलुच्छालिय-हल्लाविय-वसुन्धरी ॥१॥
बहु-सूरकन्त-हुयवह-पलित्तु । ससिकन्त-णोर-णिज्झर-किलितु ॥२॥
मरगय-मऊर-संदेह-वन्तु । णील-मणि-पहन्धारिय-दियन्तु ॥३॥
वर-पउमराय-कर-णियर-तम्बु । गय-मय-णइ-पक्खालिय-णियम्बु ॥४॥
तरु-पडिय-पुष्फ-पगुत्त-सिहरु ।
मयरन्द-सुरा-रस-मत्त-भमरु ॥4॥
अहि-गिलिय-गइन्द-प्रमुत्त-सासु । सासुग्गय-मोत्तिय-धवलियासु ॥६॥
सो तेहउ गिरि-कइलासु दिछ। अण्णु वि मुणिवरु मुणिवर-वरि ॥०॥
पञ्चारित 'लइ मुणिमओ सि मित्त । स-कसाय-कोव-हुववह पलित्त ॥८॥
भजु वि रणु इच्छहि मई समाणु । जइ रिसि तो कि थन्मिउ विमाणु॥९॥

२०५ - तेरहमो संधि कौन निकलना चाहता है ? जलती हुई आगकी ज्वालामें किसने प्रवेश किया है ? यमकी दाढ़ोंके बीच कौन बैठा है ?" मारीच ने कहा, "देवदेव, जिस प्रकार सॉपोंसे सहित चन्दन वृक्ष होता है, उसी प्रकार लम्बी-लम्बी स्थूल बाहुवाले महामुनि कैलास पर्वतके ऊपर स्थित हैं, मेरुके समान अकम्प और समुद्र की तरह अक्षुब्ध, महीतलके समान बहुक्षम, त्यक्तमोह (मोह छोड़ देनेवाले) और मध्याह्नके सूर्यको तरह उग्र तेजवाले । उनकी शक्तिसे विमानका तेज रुक गया है। हे देव, विमान शीघ्र हटा लीजिए जिससे हृदय की तरह फूट न जाये ॥१-९॥ घत्ता-अपने ससुरके शब्द सुनकर रावण नीचा मुख करके रह गया। मानो गगनांगनारूपी लक्ष्मीका यौवनभार ही गल गया हो। ॥१०॥ [३] उसने (उतरकर ) वह कैलास गिरि देखा, जिसके स्कन्ध गरजते हुए मत्तगजोंके ऊँचे सिरोंसे घर्षित हैं, जो प्रचुर सूर्यकान्त मणियोंकी ज्वालासे प्रदीप्त और चन्द्रकान्त मणियोंकी धारासे रचित है, जो मरकत मणियोंसे मयूरोंका भ्रम उत्पन्न करता है, जिसने नीलमहामणियोंकी प्रभासे दिशाओंको अन्ध- कारमय कर दिया है, जो श्रेष्ठ पद्मराग मणियोंके किरण- समूहसे लाल है, जिसके तट, हाथियोंके मदजलकी नदियोंसे प्रक्षालित हैं, जिसके शिखर वृक्षोंसे गिरे पुष्पोंसे व्याप्त है, जिसमें मकरन्दोंकी सुरा पीकर भ्रमर मतवाले हो रहे हैं, साँपोंसे दंशिन महागज जिसमें साँसें छोड़ रहे हैं. और सासोंसे निकले हुए मोतियोसे जिसकी दिशाएँ धवलित हो रही है। एक और मुनिवरको उसने वहाँ देखा । उसने उन्हें ललकारा, "लो मित्र, मुनि होकर भी तुम कपायपूर्वक क्रोधाग्निकी ज्वालामे जल रहे हो, आज भी मेरे साथ युद्ध करनेकी इच्छा रखते हो, नहीं तो, जब मुनि थे तो विमान क्यों रोका ?" ॥१-९॥ ।

२०६
परामचरित
पाहाण,
घत्ता
जं पई परिहव-रिणु दिपण तं स कलन्तरु अल्लवमि ।
जेम उम्मूले वि
कहलासु में सायर घिमि' ॥०॥
[ 8 ]
दुवई
एम भणेवि झत्ति पडिट इव वालिह तणण सावेणं ।
तलु मिन्देवि पइठ्ठ महिदारणियहें विजहें पहावेणं ॥१॥
चिन्तेप्पिणु विज-सहासु तेण । उम्मूलित महिहरु दहमुहेण ॥२॥
सु-पसिद्ध सिद्धउ लद-संसु । णावइ दुप्पुत्ते णियय-चंसु ॥३॥
अहवइ णवन्तु द्रुक्किय-मरेण । तइलोक्कु बखित्तु (१)व जिणवरेणा।।
महवइमुवइन्द-ललन्त-णाल।
णीसारित महि-उवरहाँ च वालु॥५॥
महवइ णं वसुह महीहराहूँ।
छोडाविय वालालुनिराह n६॥
महवइ चलवलइ भुअङ्ग-य? । णं धरणि-अन्त-पोहलु विसटु ॥७॥
खोलुक्खउ खोणि-खयालु माइ । पायालहों फार्दिउ उमरु णाई ॥८
गिरिवरण चलन्त-चठ-समुद। अहिंमुह उत्यल्लाविय रउद ॥४॥
घत्ता
जं गयट मासि णासेप्पिणु सायर जार माणियट ।
तं मण्ड हरेवि पढीवट
जलु-कु-कलत्तु व माणियठ ॥10॥
[ ५ ]
दुवई
सुरवर-पवस्करि कराकार-करग्गुग्गामिएँ धरे।
भग्ग-सुयङ्ग-उरग-णिग्गय-विसग्गि-लग्गन्त-कन्दरे ॥१॥
कत्यइ विहडियइँ सिलायलाई। सहलग्गई कियई व खलहलाई॥२॥
कत्यइ गय णिगाय उद-सुण्ड । गंधरएँ पसारिय वाहु-दण्ड ॥२॥
कत्यइ सुअ-पन्तिर उठियाउ ।
ன்
तुहा मरगय-कण्ठियाउ॥॥
कत्यइ ममरोलिङ धावडाट। उइन्ति व कहलासहो जढाउ ॥५॥

तेरहमो संधि पत्ता-"पहले जो तुमने पराभवका ऋण मुझे दिया था, उसे अब कालान्तरमें मैं चुकाता हूँ। पाषाणकी तरह इस कैलासको उखाड़कर समुद्र में फेंकता हूँ" ॥१०॥ [४] ऐसा कहकर, वह शीघ्र वालीके शापके समान नीचे आ गया। मही विदारिणी विद्याके प्रभावसे वह तलको भेदकर भीतर घुसा। अपनी हजार विद्याओंका चिन्तन कर रावणने पहाडको उखाड़ लिया जैसे कुपुत्र प्रसिद्ध सिद्ध प्रशंसाप्राप्त अपने वंशको उखाड़ दे। अथवा जिस प्रकार पापभारसे झुकते हुए त्रिलोकको जिनवर उखाड़ देते हैं, अथवा सर्पराजकी तरह सुन्दर है भाल जिसका, ऐसा वालक, धरतीके उदरसे निकला हो; अथवा व्यालोंसे लिपटे पहाड़ोंसे धरती छूट गयी हो, अथवा चिलबिलाता हुआ सॉपोंका समूह हो, अथवा धरतीकी आँतोंकी ढेर विशेष हो। खोदा गया धरतीका गड्डा ऐसा जान पड़ता है, मानो पातालका उदर फाड़ दिया गया हो । पहाड़के हिलते ही चारों समुद्रोंमें सर्पमुखोंकी तरह भयंकर उथल-पुथल मच गयी ॥१-९|| घचा-जो जल भाग था और जिसका प्रेमी समुद्रने भोग किया था उसे कुकलत्रकी तरह बलपूर्वक पकड़कर पहाड़ ले आया ॥१०॥ [५] इन्द्रके महान् ऐरावतकी सूंड़के समान आकारवाली हथेलीसे धरतीको उठानेपर भुजंग भग्न हो गये, उनसे निकलनेवाली उम्र विषकी ज्वालाएँ गुफाओं से लगने लगी, कहीं शिलातल खण्डित हो गये और शैलशिखर स्खलित हो गये, कहीं सूंड़ उठाकर हाथी भागे, मानो धरतीने अपने हाथ फैला दिये हों, कहीं तोतों की पंक्तियाँ उठीं, मानो मरकतके कण्ठे टूट गये हों, कहीं भ्रमरपंक्तियाँ दौड़ रही थीं, मानो

२०८
पउमचरित
कत्थइ वणयर णिग्गय गुहेहि । गं वमइ महागिरि बहु-मुहेहि ॥६॥
उच्छलिउ कहि मि जल धवल-धारु । णं तुमुवि गउ गिरिवरहों हारु ॥७॥
कत्थइ उद्वियह वलाय-सयई। णं तु?वि गिरि-अट्ठाइँ गयई ॥८॥
कत्थइ उच्छलियई विदुमाई। णं रुहिर-फुलिङ्गइँ अहिणवाइँ ॥९॥
घत्ता
अण्णु वि जो अण्णहाँ हत्यण णिय-थाणहाँ मेल्लावियउ ।
णिञ्चल ववसाय-विहूणउ कवणु ण भावइ पावियउ॥१०॥
दुवई
ताम फडा-कढप्प-विप्फुरिय-परिप्फुड-मणि-णिहायहो ।
भासण-कम्पु जाउ-पायालयले धरणिन्द-रायहो॥१॥
अहि अवहि पउने वि भाउ तेत्थु । रावणु केलासुद्धरणु जेत्थु ॥२॥
जहिं मणि-सिलायलुप्पीलु फुटु । गिरि-डिम्भहाँ णं कडिसरउ तुटु ॥३॥
जहि वणयर-थट्ट-मर? मगु ।
जहिं वालि महारिसि सोवसग्गु॥४॥
जल्ल-मल-पसाहिय-सयलनात्तु । विजा-जोगेसर रिद्धि-पत्तु ॥५॥
तिण-कणयकोडि-सामण्ण-भाउ ।
सुहि-सत्तु-एक-कारण-सहाउ ॥६॥
सो जइवरु कुचिय-कर-कमेण । परिभञ्चित णमिउ भुअङ्गमेण ॥७॥
महियल-गय-सीलावलि विहाइ । किय अहिणव-कमलमणिय णाई ॥४॥
रेहइ फणालि मणि-विप्फुरन्ति । णं वोहिय पुरउ पईव-पन्ति ॥९॥
धत्ता
पणवन्त दससयलोयणण हेट्ठामुहु कहलासु णिउ ।
सोणिउ दह-मुहहि वहन्तड दहमुहु कुम्मागार किउ ॥१०॥

तेरहमो संधि
२०९
कैलास पर्वतकी जटाएँ उड़ रही हों, कहीं गुहाओंसे वानर
निकल आये, मानो महागिरि बहुत-से मुखोंसे चिल्ला रहा हो,
कहीं जलकी धवलधारा उछल पड़ी हो, मानो गिरिवरका हार
टूट गया हो, कहीं सैकड़ों वगुले उड़ रहे थे, मानो पहाड़की
हड़ियाँ चरमरा गयी हों, कहीं मूंगे उछल रहे थे मानो अभिनव
रुधिरकण हों।।१-९॥
घत्ता-दूसरा भी कोई, जो दूसरेके द्वारा अपने स्थानसे
च्युत करा दिया जाता है, व्यवसायसे शून्य और गतिहीन
वह किस आपत्तिको नहीं प्राप्त होता ॥१०॥
[६] इसी वीच जिसके फनसमूहपर मणिसमूह चमक
रहा है, ऐसे धरणेन्द्रका पाताललोकमे आसन कॉप उठा।
अवधिज्ञानसे जानकर नागराज वहाँ आया जहाँ रावणने
कैलास पर्वत उठा रखा था। जहाँ उत्पीड़नसे शिलातल फूट
चुके थे, जैसे पहाड़रूपी शिशुके कटिसूत्र बिखर गये हों, जहाँ
वनचर समूहका अहंकार चूर-चूर हो गया, जहाँ महामुनिपर
उपसर्ग हो रहा था। पसीनेके मैल और मलसे जिनका शरीर
अलंकृत था और जो विद्यायोगेश्वर और ऋद्धियोंके धारी थे।
तृण और स्वर्णमें जो समानभाव रखते थे। मित्र और शत्रुके
प्रति जिनका एक-सा स्वभाव था, ऐसे उन मुनिवरकी अपने
हाथ-पैर संकुचितकर नागराजने प्रदक्षिणा कर प्रणाम किया।
धरतीपर उसकी फणावली ऐसी मालूम देती है जैसे अभिनव
कमलोंकी अर्चा हो । मणियोंसे चमकती हुई उसकी फणावली
ऐसी प्रतीत होती है मानो सामने जलायी हुई प्रदीप पंक्ति
हो ॥१-९||
पत्ता-धरणेन्द्र के नमस्कार करते ही कैलास पर्वत नीचा
होने लगा, रावणके दसों मुखसे रक्तकी धारा बह निकली और
वह कछुएके आकारका हो गया ॥१०॥

पउमचरित [] दुवई जं अहिपवर-राय-गुरुभारछन्त-धरेण पेल्लिओ। दस-दिसिवह-भरन्तु दहवयणे घोराराउ मेल्लिओ ॥१॥ तं सह सुणेवि मणोहरेण सुरवर-करि-कुम्भ-पयोधरेण ॥२॥ केजर-हार-णेउर-धरेण । खणखणखणन्त-कङ्कण-करेण ॥३॥ कञ्ची-कलाव-रसोलिरेण । मुह-कमलासत्तिन्दिन्दिरेण ॥४॥ विव्मम-विलास-भूभङ्गरेण । हाहारउ किउ अन्तेउरेण ॥५॥ 'हा हा दहमुह जय-सिरि-णिवास । दहवयण दुसाणण हा दसास ॥६॥ वीसद्ध-गीव वीसद्ध-जीह । दससिर सुरवर-सारङ्ग-सीह' ॥७॥ मन्दोवरि पमणइ 'चारु-चित्त । अहाँ वालि-मडारा करें परित्त ॥८॥ लङ्केसहो जाइ ण जीउ जाम । मत्तार-भिक्ख महु देहि ताम' ॥९॥ घत्ता तं कलुण-वयणु णिसुणेप्पिणु धरणिन्दे उद्धरिउ धरु । मघ-रोहिणि-उत्तर-पत्तण अङ्गारेण व अम्वुहरु ॥१०॥ [८] दुवई सेल-विसाल-मूल-तल-तालिउ लङ्काहिउ विणिगी। केसरि-पहर-णहर-खर-चवढण-चुक्को इव महग्गओ ॥१॥ लुअ-केसर-उक्खय-णह-णिहाउ । गं गिरि-गुह मुऍवि मइन्दु आउ ॥२॥ कुण्डलिय-सीस-कर-चरण-जुम्मु । ण पायालहों णीसरिउ कुम्मु ॥३॥ कक्खढ झड-णिसुढिय-फड-कडप्पु । णं गरुड-मुहहाँ णी सरिउ सप्पु ॥४॥ भयलन्छणु दूसिउ तेय-मन्दु । णं राहु-मुहहाँ णीसरिउ चन्दु ॥५॥ गउ तेत्तहँ जेत्तहे गुणभाणालि । अच्छइ अत्तावण-सिलहिं वालि परिमन् वि वन्दिउ दससिरेण । पुणु किय गरहण गग्गर-गिरेण ॥७॥ .

तेरहमो संधि [७] नागराजके भारी भारसे आक्रान्त धरतीसे दशानन पीड़ित हो उठा। उसने जोरसे शब्द किया जिससे दसों दिशाएँ गूंज उठीं । रावणके सुन्दर अन्तःपुरने जव वह शब्द सुना तो वह हाहाकार कर उठा। उसके स्तन ऐरावतके कुम्भस्थलके समान थे, वह केयूर हार और नूपुर पहने हुए था, उसके हाथके कंगन खन-खन बज रहे थे, कटिसूत्र रुनझुन कर रहे थे, मुखरूपी नील कमलोंके पास भौरे मड़रा रहे थे, विनम और विलाससे उसकी भौहें टेढ़ी हो रही थी। (वह विलाप करने ठगी), "हा, श्रीनिवास दशानन ! दस जीभ, हाथ-पैरवाले हे दशानन ! इन्द्ररूपी मृगोंके लिए सिंहके समान हे दससिर !” मन्दोदरी कहती है, "हे चारुचित्त आदरणीय, रक्षा कीजिए, जिससे लंकेश्वरके प्राण न जाये ! मुझे अपने पतिकी भिक्षा दीजिए।" ॥१-९॥ घत्ता-यह करुण वचन सुनकर धरणेन्द्रने धरती उठा दी, वैसे ही जैसे मघा और रोहिणीके उत्तर दिशामें व्याप्त होनेपर मंगल मेघोंको उठा लेता है ॥१०॥ [८] पर्वतके मूलभागसे प्रताडित लंकानरेश ऐसे निकला, जैसे महागज सिंहके प्रहारके नखोंकी खरी चपेटसे वच निकला हो, मानो गिरिगुहासे ऐसा सिंह आया हो जिसके अयाल कट गये हैं और नाखून टूट हो चुके हैं। मानो पातालसे कछुआ निकला हो जिसने अपना सिर, कर और चरण-युगल पेटमें कुण्डलित कर रखा है। कर्कश आघातसे नष्ट हो गया है फन-समूह जिसका, ऐसा सॉप ही गरुड़के मुंहसे निकला हो। मृगलांछित दूषित और क्षीण तेज चन्द्र ही मानो राहुके मुखसे निकला हो। वह वहाँ गया, जहाँ गुणालय वाली आतापिनी शिलापर आरूढ़ थे। प्रदक्षिणा करके रावणने वन्दना की और

२१२
पउमचरित
'मई सरिसउ अण्णु ण जगें अयाणु। जो करमि केलि सीहें समाणु ॥६॥
मई सरिसउ अण्णु ण मन्द-मग्गु । जो गुरुहु मि करमि महोवसगु ॥९॥
घत्ता
जं तिहुवण-णाहु मुएप्पिणु
तं सम्प्रत्त-महामहों
अण्णहों णमिउ ण सिर-कमलु ।
लदु देव पई परम-फलु' ॥१०॥
.
[९]
दुवई
पुणरवि वारवार पोमाऍवि दसविह-धम्मवालय।
गउ तेत्तहें तुरन्तु त जेत्तह मरहाहिव-जिणालयं ॥१॥
कइलास-कोडि-कम्पावणेण । किय पुज जिणिन्दहाँ रावणेण ॥२॥
फल-फुल्ल-समद्धि-वणासइ व्य । सावय-परियरिय महाडइ व्व ॥३॥
अहिणव-उल्लाव विलासिणि व्व। णर-दड्ढ़-धूव खल-कुट्टणि व्व ॥४॥
वहु-दोव समुहन्तर-महि च । पेल्लिय-चलि णारायण-मह व्व ||५||
घण्टारव-मुहलिय गय-घड ब्व । मणि-रयण-समुजल-अहि-फड ब्व॥६
पहाणढ़ वेस-केसावलि ।
गन्धुक्कड कुसुमिय पाडलिव्व ॥७॥
तं पुज्ज करें वि आढत्तु गेउ । मुच्छण-कम-कम्प-तिगाम-भेउ ॥
सर-सज्ज-रिसह-गन्धार-बाहु । मज्झिम-पञ्चम-घइवय-णिसाहु ॥९॥
घत्ता
महुरेण थिरेण पलोहण
गायइ गन्धव्वु मणोहरु
जण-वसियरण-समस्थऍण ।
रावणु रावणहत्थऍण ॥१०॥

तेरहमो संधि
२१३
फिर गद्गद स्वरमें अपनी निन्दा करने लगा, "मेरे समान
दुनियामें कोई अज्ञानी नहीं है, जो सिंहके साथ क्रीड़ा करना
चाहता है। मेरे समान दूसरा मन्दभाग्य नहीं है कि जो मैने
गुरुपर ही भयंकर उपसर्ग किया ॥१-९॥
घत्ता-उन त्रिभुवन स्वामीको छोड़कर मैं किसी औरको
जो अपना सिरकमल नही झुकाया, ऐसे उस सम्यग्दर्शनरूपी
वृक्षका परम फल प्राप्त कर लिया" ॥१०॥
[९] दस प्रकारके धर्मका पालन करनेवाले बालीकी वार-
बार प्रशंसा कर रावण वहाँ गया जहाँ भरतके द्वारा बनवाये
गये जिनालय थे। कैलास पर्वतको कॅपानेवाले रावणने जिनेन्द्र
भगवानकी पूजा की, जो वनस्पतिकी तरह फल-फूलोंसे समृद्ध,
महाअटवीकी तरह सावय (श्रावक और श्वापद पशु ) से
घिरी हुई, विलासिनीकी तरह अत्यन्त उल्लाव ( उल्लाप%
आलाप )से भरी हुई, खलकुट्टनीकी तरह णर दढ धूव (मनुष्योंके
द्वारा जिसमें धूप जलायी गयी, कुट्टनी पक्षमें, (नष्ट कर दी गयी
धूर्तता जिसकी), समुद्रके भीतरकी तरह बहुत दीप (दीपक
और द्वीप) वाली, नारायणकी मतिकी तरह पेल्लिय बलि
(नैवेद्य और राजा बलि) से प्रेरित गजघटाकी तरह घण्टाओंसे
मुखरित, साँपके फनकी तरह मणि और रत्नोंसे समुज्ज्वल,
वेश्याके केशोंकी तरह स्नानसे विलसित, खिले हुए गुलावकी
तरह उत्कट गन्धसे युक्त थी। पूजा करनेके बाद रावणने अपना
गान प्रारम्भ किया । वह गान मूर्च्छना क्रम कम्प और त्रिगाम,
पड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद इन
सात स्वरोंस युक्त था ॥१९॥
पत्ता-मधुर स्थिर और लोगोंको वसमें करनेमें समर्थ
अपनी वीणा से रावण ने मधुर गन्धर्व गान किया ॥१०॥

२१४
पउमचरित
[१०]
दुवई
सालङ्कारु सु-सरु सु-वियड्दु सुहावर पिय-कलत्तु वं ।
आरोहि-अध (व?) रोहि-याइय-संचारिहि सुरय-तत्तु वं ॥१॥
णव-बहुभ-णिडालु व तिलय-चारु । णिग्धण-यणयलु व मन्द-तार ॥२॥
सण्णद्ध-वलं पिव लड्य-ताणु । धणुरिव सज्जीउ पसण्ण-वाणु ॥३॥
तं गेउ सुणेपिणु दिण्ण णियय । धरणिन्दे सत्ति अमोहविजय ॥४॥
तियसाह णवेप्पिणु रिसह-देउ । पुणु गड णिय-णयरहों कइकसेउ॥५॥
एत्यन्तर सुग्गीउत्तमासु। उप्पपणउ केवलु णाणु तासु ॥६॥
वाहुबलि जेम थिउ
सुद्धनगत्तु। उप्पण्णु अण्णु धवलायवत्तु ॥७॥
मामण्डलु कमलासण-समाणु । वहु-दिवसें हिं गड णिवाण-थाणु ॥८॥
दससिरु वि सुरासुर-डमर-भेरि। उन्बहइ पुरन्दर-बहर-खेरि ॥९॥
घत्ता
'पइसरवि जेण रण-सरवरें मालिहें खुडियउ सिर-कमलु ।
वहाँ खलहाँ पुरन्दर-हंसहाँ पाडमि पाण-पक्ख-जुअलु' ॥१०॥
पयटु तुरन्तु रावणो।
[११]
दुवई
एम मणेवि ठेवि रण-मेरि
जो जम-धणय-कणय-वुह-अट्ठावय-धर-थरहरावणो ॥१॥
णीमरिएँ दसाणणे णिसियरिन्द । णं मुक्कस णिग्गय गइन्द ॥२॥
माणुण्णय णिय-णिय-वाहणत्य।
दणु-दारण पहरण-पवर-हत्थ ॥३॥
समुह बड णिविड गय-घड वर(१)। णन्दीसर-दीवु व सुर पयह ॥४॥
पायाललङ्क पावन्तएण। दहगीवें वइरु वहन्तएण ॥५॥
पज्जलिउ जलणु जालासएण(?)nan
बुञ्चइ 'खर-दूसण लेहु ताव । खल खुद्द पिसुण परिधि? पाव ॥७॥

तेरहमो संधि [१०] वह संगीत प्रिय कलत्रकी भाँति अलंकार सहित सुस्वर विदग्ध और सुहावना था, सुरतितत्वकी तरह आरोह, अवरोह, स्थायी और संचारी भावोंसे परिपूर्ण था। नववधूके ललाटकी तरह तिलक (टीका, राग) से सुन्दर था, मेघरहित आसमानकी तरह मन्दतार (तारे, तार ) था, सन्नद्ध सेनाकी तरह लइयताण (त्राण, कवच और तान ) था, धनुपकी तरह सज्जीउ (ज्या और जीवन सहित) प्रसन्न वाण (तीर और रागविशेष ), था। उस संगीतको सुनकर धरणेन्द्रने अपनी अमोघविजय नामक विद्या रावणको दे दी । इसी बीच सुप्रीवके बड़े भाई वालीको केवलज्ञान उत्पन्न हो गया। वह बाहुबलीके समान शुद्ध शरीर हो गया, दूसरे उन्हें धवल छत्र कमलासनके समान भामण्डल उत्पन्न हुए। बहुत दिनोंके अनन्तर उन्होने मोक्ष प्राप्त किया। सुर और असुरोंके लिए भयंकर भेरीके समान रावण इन्द्रके प्रति शत्रुताके भावसे उद्वेलित था ॥१-९|| पत्ता--जिस (इन्द्र)ने युद्धके सरोवरमें प्रवेश करके मालिका सिरकमल तोड़ा, उस दुष्ट इन्द्ररूपी हंसके प्राणरूपी पक्ष-युगल- को गिराकर रहूँगा ||१०|| [११] यह सोचकर और युद्धकी भेरी बजवाते हुए रावण तुरन्त चल पड़ा, जो यम-धनद-कनक-बुध-अष्टापद और धरतीको थर-थर कंपा देनेवाला था। रावणके प्रस्थान फरते ही निशाचरेन्द्र इस प्रकार निकल पड़े, जैसे मुक्तांकुश माधी ही निकल पड़े हो । मानसे उन्नत वे अपने-अपने वाहनों- पर सवार थे। दनुको विदीर्ण करनेवाले उनके हाथोम प्रबल प्रहरण थे। मामने पताका थीं और गजवटा टकरा रही थी, ऐसा लगता था कि सुर नन्दीश्वरद्वीप जा रहे हों। अपने मनमें घर धारण करनेवाले दशानन पाताल लंकाको पाते ही शत-दात वाराणी तरह भड़क उठा। उसने कहा, "नयनक बल, क्षुद्र, २१६ पउमचरिउ तं वयणु सुणेप्पिणु मामएण । लङ्काहिउ बुझाविङ मएण ॥४॥ 'सहुँ सालएहि किर कवण काणि । जइ घाइय तो तुम्हहुँ जि हाणि॥९॥ लहु वहिणि-सहोवर-णिलएँ जाहुँ । आरूस वि किजइ काई ताहुँ॥१०॥ घत्ता वयणु सुणे वि दहवयणेण मच्छरु मणे परिससियउ । चूडामणि-पाहुड-हत्थउ इन्दइ कोक्त पेसियउ ॥११॥ तं [१२] दुवई • भाइय तेत्थु ते वि पिय-वयहिं जोक्कारिउ दसाणणो। गउ किक्विन्ध-णयरु सुग्गीउ वि सिलिउ स-मन्ति-साहणो ॥१॥ साहिउ अरि-अक्खोहणि-सहासु। एत्तडिय सङ्घ णरवर-बलासु ॥२॥ रह-तुरय-गइन्दहुँ णाहि छेउ । उवहइ पयाणउ पवण-वे ॥३॥ थिय अग्गिम-वेल्लि-महाविसालें। रेवा-विन्झइरिहिं अन्तराले ॥४॥ अस्थवणहाँ ढुक्कु पयगु नाम । अल्लीण पासु णिसिअड य(?)णाव॥५॥ वरि-सग्ग-वत्थ सीमन्त-वाह । णक्खत्त-कुसुम-संहर-सणाह ॥६॥ कित्तिय-चञ्चतिय-पाण्डवास । भगव-भेसइ-कण्णावयंस ॥७॥ वहुलक्षण ससहर-तिलय-तार । जोपहा-रहोलिर-हार-मार ॥८॥ णं वञ्चेवि दिहि दिवायरासु । णिसि-बहु मल्लीण णिसायरासु ॥९॥ घत्ता विण्णि वि दुस्सील-सहावई सुरउ स ई भुञ्जन्ताई। 'सा दिणयह कहि मि णिएसउ' णाई स-सङ्कइँ सुत्ताई ॥१०॥ इय इत्थ प उ म च रिए धणक्षयासिय-स य म्मु ए व-कए। कई ला सुद्ध र ण मिणं तेरसम साहियं पत्र । प्रथमं पर्व -- .

तेरहमो संधि पापी और ढीठ खरदूषणको पकड़ो।" यह वचन सुनकर ससुर मयने लंकेश्वरको समझाया कि बहनोईके साथ क्या वैर? यदि वह मारा जाता है तो इसमें तुम्हारी ही हानि है, शीघ्र ही वहन और बहनोईके घर चलें, क्रोध करके भी उसका तुम क्या कर लोगे?॥१-१०॥ पत्ता-ये वचन सुनकर रावणने अपने मनसे मत्सर निकाल दिया और चूड़ामणिका उपहार हाथमें देकर उसने इन्द्रजीतको बुलाकर भेजा ॥११॥ [१२] खरदूषण भी वहाँ आये और प्रिय शब्दोंमें रावणको नमस्कार किया। सुग्रीव भी मन्त्री और सेनाके साथ किष्किन्धा नगर चला गया। उसने शत्रुकी एक हजार अक्षौहिणी सेना सिद्ध कर ली। श्रेष्ठ नरोंकी भी इतनी ही संख्या उसके पास थी। रथ, तुरग और गजराजोंका उसके पास अन्त नहीं था। उसने पवनगतिसे प्रस्थान किया। उसकी अग्रिम सेना रेवा और विन्ध्याचलके विशाल अन्तरालमें ठहर गयी। इतनेमें सूर्यका अस्त हो गया, कि निशा पास ही अटवीमें व्याप्त हो गयी, उत्तम दिव्य वस्त्रको धारण करती हुई। नक्षत्र और कुसुमोंके शेखरसे युक्त उसका सीमन्त (चोटी) था। कृत्तिकासे उसका गण्डवास अंकित था । शुक्र और बृहस्पति उसके कर्णावतंस थे, अन्धकार अंजन, शशधर स्वच्छतिलक, ज्योत्स्नाकी किरण परम्परा हार- भार था । मानो सूर्यकी दृष्टि बचाकर निशारूपी वधू निशाकरमें लीन हो गयी ॥१-२॥ पत्ता-दुश्शील स्वभाववाले दोनों ही स्वयं सुरतिका सुख भोगते हुए इस आशंकाके साथ सो रहे थे कि कहीं दिनकर उन्हें देख न ले ॥१०॥ इस प्रकार धनंजयके आश्रित स्वयम्भू देवकृत पद्मचरितमें , कैलास-उद्धरण नामका तेरहवाँ पर्व समाप्त हुआ।

२१८
पउमचरित
[१४. चउदहमो संधि ]
विमल विहाणऍ कियण पयाणएँ उययइरि-सिहर रवि दोसइ ।
'मई मेल्लेप्पिणु णिसियर लेप्पिणु कहि गय णिसि' णाई गवेसइ ॥१॥
[१]
सुप्पहाय-दहि-अंस-रवण्णउ । कोमल-कमल-किरण-दल-छपणउ ॥१॥
जय-हर पइसारिउ पइसन्ते ।
णावइ मङ्गल-कलसु बसन्ते ॥२॥
फग्गुण-खलहों दूर
णोसारिउ । जेण विरहि-जणु कह व ण मारिउ॥३॥
जेण वणप्फइ-पय विम्माडिय । फल-दल-रिद्धि-मडफर साडिय ॥४॥
गिरिवर गाम जेण धूमाविय । वण-पट्टण-णिहाय संताविय ॥५॥
सरि-पवाह-मिहुणइँ णासन्त. जेण वरुण-धण-णियलेंहि चित्तई ॥६॥
जेण उच्छु-विड जन्ते हि पीलिय । पत्र-मण्डव-णिरिक आवीलिय ॥४॥
जासु
रज पर रिद्धि पलासहों। तहाँ मुहु मइलैं वि फग्गुण-मासहो॥४॥
घत्ता
पङ्कय-धयणउ कुचलय-णयणड केयइ-केसर-सिर-सेहरु ।
पल्लव करयल कुसुम-णहुजलु पइसरइ वसन्त-गरेसरु ॥९॥
[२]
डोला-तोरण-वारें पईहर।
पइट वसन्तु वसन्त-सिरी-हरें ॥१॥
सररुह-वालहरें हिरव-णेउरु ।
आवासिउ महुअरि-अन्तेउरु ॥२॥
कोइल-कामिणीउ उज्जाणे हिं।
सुय-सामन्त लयाहर-थाणे हिं ॥३॥
पश्य-छत्त-दण्ड सर णियर हिं। सिहि-साहुलउ महीहर-सिहरहि॥४॥

चडदहमो संधि २१९ चौदहवीं सन्धि दूसरे दिन सुन्दर सवेरा होनेपर रावणने प्रयाण किया। उदयगिरिके सिरपर सूर्य दिखाई दे रहा था, मानो यह खोजते हुए कि मुझे छोड़कर और निशाकरको लेकर निशा कहाँ चल दी? ||१॥ [१] सुप्रभातकी दहीके समान किरणोसे सुन्दर और कोमल किरणोंके दलसे आच्छन्न, अरुण सूर्यपिण्ड ऐसा मालूम पड़ता है मानो वसन्तने अपने जयगृहमें प्रवेश करते हुए, मंगलकलश- का प्रवेश कराया हो, फागुनरूपी दुष्टके दूतको निकाल दिया गया जिसने विरहीजनोंको किसी प्रकार मारा भी नहीं था, जिसने वनम्पतिरूपी प्रजाको तहस-नहस कर दिया, फलों और पत्तोंकी ऋद्धिको नष्ट कर दिया, गिरि और गाँवोंको जिसने कुहरेसे भर दिया, वन और नगरोंके समूहको जिसने खूब सताया, नदीके प्रवाह मिथुनोंको नष्ट कर जिसने वरुणके हिम- धनकी शृंखलाओंमें डाल दिया, जिसने इक्षुवृक्षोंको यन्त्रोंसे पीड़ित किया, तैरनेके मण्डपसमूहको पीड़ा पहुँचायी, जिसके राज्यमें केवल पलाशको ही वृद्धि प्राप्त हुई, उस फागुन माहका मुख काला करके ॥१-८॥ घत्ता-पंकज है मुख जिसका, कुवलय जिसके नेत्र है, केतकीका पराग सिरशेखर है, पल्लव करतल है, कुसुम उज्ज्वल नख हैं, ऐसा बसन्तरूपी नरेश्वर प्रवेश करता है ||२|| [२] झूलों और वन्दनवारोसे जिसके द्वार सजे हुए है, ऐसे बसन्तके श्रीगृहमें वसन्तने प्रवेश किया । कमलोंके वास- गृहोंमें शब्द ही है नूपुर जिसके, ऐसा मधुकरीरूपी अन्त:पुर ठहर गया। कोयलरूपी कामिनी उद्यानोंमे शुकरूपी सामन्त लतागृहोंमे, पंकजोंके छत्र और दण्ड सरोवर-समूहमें, मयूर

पउमचरित
कुसुमा-मञ्जरि-धय साहार हि ।
वाणर-मालिय साहा-वन्देहि ।
मझु ताल कल्लोलावा हि ।
एम पइछ विरहि विद्धन्तउ ।
दवणा-गण्ठिवाल केयारहिं ॥५॥
महुअर मत्वाल(१)मयरन्दहि ॥६॥
भुक्षा अहिणव-फल-महणासँहि ॥७॥
गयवइ-धम्म हि अन्दोलन्तउ ॥८॥
घत्ता
पेखें वि एन्तहों रिद्धि वसन्तहाँ महु-इक्खु-सुरासव-मन्ती।
गम्मय-वाली भुम्भल-भोली णं भमइ सलोणहाँ रत्ती ॥९॥
[३]
णम्मयाएँ मयरहरहाँ जन्तिएँ। णाई पसाहणु लइड तुरन्तिएँ ॥१॥
घवघवन्ति जे जल-पउभारा । ते जि णा िणेउर-झङ्कारा ॥२॥
पुलिणइ जाई वे वि सच्छाय।। ताई में उड्ढणा िणं जाय: ॥३॥
जं जलु खलइ वलइ उल्लोलइ। रसणा-दामु तं जिणं घोलइ ॥१॥
जे आवत्त समुट्ठिय चहा। ते जि णाई तणु-तिवलि-तरहा ॥५॥
जे जल-हस्थि-कुम्म मोहिल्ला । ते जि णाई यण अधुम्मिल्ला ॥६॥
जो हिण्डीर-णियरु अन्दोलइ । णावइ सो जै हारु रझोलइ ॥७॥
जं जलयर-रण-रभिउ पाणिड । तं जि णाई तम्बोलु समाणिउ ॥८॥
मत्त-हस्थि-मय-मइलिउ जं जल । तं जि णाई किउ अक्सिहि कजल ॥९
जाउ तरनिणि भवर-ओहउ । ताउ जि ममुराउ ण मउहउ ॥१०॥
जाउ ममर-पन्तिउ भल्लीणउ । केसाबलिउ ताणं दिण्णउ ॥१||
घत्ता
मज्डों जन्ति मुह दरमन्तिएँ माहेमर-लह-पईवहुँ ।
मोहुप्पाइड णं जरु लाइउ तहुँ सहसकिरण-दहगीवहुँ ॥१२॥

चउदहमो संधि १२१ और कोयल, महीधरोंके शिखरोंपर, कुसुमोंकी मंजरी रूपी ध्वजाएँ आम्र वृक्षोंपर, दवणरूपी ग्रन्थपाल केदार वृक्षोंमें, वानर रूपी माली शाखा-समूहोंमें, मधुकररूपी मत्त बाल परागोंमें, सुन्दर ताल लहरोंके आवासोंमें, भोजनक अभिनव फलोंके भोजनगृहोंमें ठहरा दिये गये । इस प्रकार विरहीजनोंको सताते हुए, गजगतिसे झूमते हुए वसन्तने प्रवेश किया ॥१-८॥ पत्ता-आते हुए वसन्तकी ऋद्धि देखकर मधु, ईख और सुरासवसे मतवाली तथा विह्वल और भोली नमदारूपी वाला प्रियसे अनुरक्त होकर घूमने लगती है ॥९॥ [३] समुद्र के पास जाते हुए उसने शीघ्र ही अपना प्रसाधन कर लिया। जो उसमें जलके प्रवाहका घवघव शब्द हो रहा है, वहीं उसके नूपुरोंकी झंकार है, जितने भी कान्तियुक्त किनारे हैं, वे ही उसके ऊपर ओढ़नेके वख हैं, जो जल खल- बल हुआ करता और उछलता है, वही रसनादामकी तरह शोभित है। जो उसमें सुन्दर आवर्त उठते हैं, वे ही उसके शरीरकी त्रिवलियोरूपी लहरें हैं। जो उसमें जलगजोंके कुम्भ शोभित है, वे ही उसके आधे निकले हुए स्तन हैं, जो फेन- समूह आन्दोलित है, वह उसके हारके समान ही हिलडुल रहा है, जो जलचरोंके युद्धसे रक्तरंजित जल है, वही उसके ताम्बूलके समान है, मदवाले गजोंसे जो उसका पानी मैला हो गया है, वही मानो उसने आखोंमें काजल लगा लिया है, जो तरंगे ऊपर-नीचे हो रही है, वह मानो उसकी भौहोंकी भंगिमा है, जो उसमें भ्रमरमाला व्याप्त है, वह उसने कशा- चली चाँध रखी है ।।१-१२॥ धत्ता-माहेश्वर और लंकाके प्रदीप सहस्रकिरण और रावणके वीचमें जाते हुए और अपना मुँह दिखाते हुए उसने उनको मोह उत्पन्न कर दिया जैसे उन्हें ज्वर चढ़ गया ||१२|| २२२ पउमचरित [४] सो वसन्तु सा रेवा तं जलु । सो दाहिण-मारुट मिय-सीयलु ॥१॥ ताई असोय-णाय-चूय-वणई। महुअरि-महुर-सरइँ लय-भवणई ॥२ ते धुयगाय ताउ कीरोलिउ। ताउ कुसुम-मञ्जरि-रिन्छोलिउ ॥३॥ ते पल्लव सो कोइल-कलयलु । सो केयइ केसर-रय-परिमलु ॥४॥ ताउ णवल्लउ मल्लिय-कलियउ । दवणा-मञ्जरियउ णव-फलियउ ॥५॥ ते अन्दोला तं जुवईयणु । पेक्खेंवि सहसकिरणु हरिसिय-मणु ॥६ सहुँ भन्तेउरण गउ तेत्तहें। णम्मय पवर महाणइ जेत्तहँ ॥७॥ दूरे थिउ आरक्खिय-णिय-वलु। जलु जन्तिर हिं णिरुद्धउ णिम्मलु ॥ घत्ता वद्धिय-हरिसड जुवइहि सरिसउ माहेसरपुर-परमेसरु । सलिलभन्तर माणस-सरवरें णं पइ सुरिन्दु स-अच्छरु ॥९ [५] सहसकिरणु सहसत्ति णिउड्डेंवि । आउ णाई महि-वहु अवरुण्डवि ॥३॥ दिट्ट मउडु मधुम्मिल्लउ। रवि व दरुग्गमन्तु सोहिल्लउ ॥२॥ दिहु पिडालु वयणु वच्छत्यलु । णं चन्दधु कमलु णह-मण्डलु ॥३॥ पभणइ सहसरासि 'लइ दुक्कहाँ। जुज्झहाँ रमहाँ हाहाँ उलुक्कहों" ॥४॥ तं णिसुणे वि कडक्ख-विक्खेविउ । वुड्डड उक्कराउ महएविउ ॥५॥ उप्परि-करयल-णियह परिटिउ । णं रतुप्पल-सण्ड समुहिउ ॥६॥ णं केयइ-आरामु मणोहरु । णक्ख-सूइ कडउल्ला केसरु ॥७॥ महुयर सर-मरेण अल्लीणा। कामिणि-मिसिणि मणेंविणं लीणा ॥

चउदहमो संधि ૨૨૫ [४] वही वसन्त, वही नर्मदा और वही उसका जल । वे ही अशोक नाग और आम्रवृक्षोंके वन और मधुकरियोंसे मधुर और सरस लतागृह, वे ही कम्पित शरीर कीरोंकी पक्तियाँ, वही कुसुममंजरियोंकी कतारें, वे पल्लव, वही कोयलों- का कलरव, वही केतकीके केशररजका परिमल, वे ही मल्लिका- की नयी कलियॉ, नयी-नयी फलित दवणामंजरी। वे झूले, वे युवतीजन । देखकर सहस्र किरणका मन प्रसन्न हो गया। अपने अन्तःपुरके साथ वह वहाँ गया, जहाँ विशाल नर्मदा नदी थी। अपनी आरक्षित सेना उसने दूर ठहरा दी, यन्त्रोंसे निर्मल जल रोक दिया गया ।।१-८॥ घत्ता-चढ रहा है हर्ष जिसका, ऐसा माहेश्वरपुरका नरेश्वर, युवतियोंके साथ पानीके भीतर इस प्रकार घुसा मानो अप्सराओंके साथ इन्द्र मानसरोवरमें घुसा हो ॥१॥ [५] सहन्नकिरण सहसा डूबकर जैसे धरतीरूपी वधूका आलिंगन करके आ गया। उसका अर्धोन्मीलित मुकुट ऐसा शोभित हो रहा है, मानो थोड़ा-थोड़ा निकलता हुआ सूर्य हो। उसका ललाट, मुख और वक्षस्थल ऐसा लग रहा था मानो आधा चन्द्र, कमल और नभमण्डल हो। सहस्रकिरण कहता है. "लो, पास आओ, रमो, जूझो, नहाओ, छिपो।" यह सुन- कर और कटाक्षसे क्षुब्ध होकर, दोनों हाथ ऊपर कर महादेवी पानी में डूब गयी । पानीके ऊपर उसका करतल समूह ऐसा लग रहा था मानो रक्तकमलोंका समूह पानीमें-से उठा हो, मानो केनकीका सुन्दर आराम हो, जिसमें नख, सूची ( कॉटे, जो केतकीमें रहते हैं) और कटिसूत्र केदार है। इस प्रकार कामिनीको कमलिनी समझकर स्वरभारसे व्याप्त भ्रमर उसमें लीन हो गये ।।१-८॥

२२४
पउमचरित
घत्ता
सलील-तरन्तहुँ उम्मीलन्तहुँ मुह-कमल हुँ केह पधाइय ।
आयइँ सरसई किय (?) तामरसइँ गरवइह भन्ति उप्पाइय ॥९॥
[ ६ ]
भवरोप्पर जल-कील करन्तहुँ । घण-पाणालि-पहर मेल्लन्तहुँ ॥१॥
कहि मि चन्द-कुन्दुजल-तारं हिं । धवलिउ जलु तुहन्त हिँ हारहि ॥२'
कहि मि रसिउणेउर हिँ रसन्तहि । कहि मि फुरिउकुण्डलँहि फुरन्तें हिं।।
कहि मि सरस-तम्बोलारत्तड । कहि मि वउल-कायम्बरि-मत्तउ ॥४॥
कहि मि फलिह कप्पू हि वासिउ । कहि मि सुरहि मिगमय-वामीसिउ ।।
कहि मि विविह-मणि-रयणुजलियउ । कहि मि धोम-कजल-संवलियउ॥६
कहि मि वहल-कुङ्कुम-पिञ्जरियउ । कहि मि मलय-चन्दण-रस-भरियउ ।।"
कहि मि जक्खकद्दमण करम्विउ । कहि मि भमर-रिन्छोलिहि चुम्विउ।
।
घत्ता
विद्दुम-मरगय- इन्दणील- सय- गमियर-हार-संघाए हि ।
वहु-बण्णुजलु णावह णहयलु सुरधणु-धण-विजु-वलायहि ॥९॥
[ ७ ]
का वि करन्ति केलि सहुँ राएं। पहणइ कोमल-कुवलय-धाएं ॥१॥
का वि मुद्ध दिट्टएँ सुविसालएँ । का वि णवल्लए मल्लिय-मालए ॥२॥
का वि सुयन्धेहि पाडलि-हुल्ले हि । का वि सु-पूयफलें हि वउल्लं हि ॥३॥
का वि जुण्ण-वण्ण हि पट्टणिऍहि । का वि रयण-मणि-अवलम्वणिऍहि ॥४
का वि विलेवणेहि उवरियहिं। का वि सुरहि-दवणा-मञ्जरियहिं ॥५॥
कहें वि गुज्झु जलें अधुम्मिल्ल । णं मयरहर-सिहरु सोहिल्लउ ॥६॥

चउदहमो संधि २२५ घत्ता- -लीलापूर्वक तैरते और निकलते हुए मुखकमलोंके लिए कितने ही (भौरे ?) दौड़े। राजाको यह भ्रान्ति हो गयी कि इनके समान रक्तकमल क्या होंगे ? |९|| [६] एक दूसरेके ऊपर जलक्रीड़ा करते हुए, सघन जलधारा छोड़ते हुए, कहीं चन्द्रमा और कुन्द पुष्पके समान उज्ज्वल और स्वच्छ, टूटते हुए हारोंसे जल सफेद हो गया, कहीं ध्वनि करते हुए नूपुरोंसे ध्वनित हो उठा, कहीं स्फुरित कुण्डलोंसे जल चमक उठा, कहीं सरस पानसे लाल हो उठा, कहीं वकुल कादम्बरी (मदिरा) से मत्त हो गया, कहीं स्फटिक कपूरसे सुवासित हो उठा, कहीं-कहीं सुगन्धित कस्तूरीसे मिश्रित था, कहीं-कहीं विविध मणिरत्नोंसे आलोकित था, कहीं धोये हुए काजलसे मटमैला था, कहीं अत्यधिक केशरके कारण पीला था, कहीं मलय चन्दनके रससे भरा हुआ था, कहीं यक्ष कर्दमसे मिश्रित था, कहीं भ्रमरपंक्तियोंसे चुम्बित था ।।१-८॥ पत्ता-विद्रुम, मरकत, इन्द्रनील और सैकड़ों स्वर्णहारों के समूहसे रंगविरंगा नर्मदाका जल ऐसा जान पड़ता था मानो इन्द्रधनुष, घनविद्युत् और बलाकाओंसे युक्त आकाश- तल हो॥९॥ [७] कोई एक राजाके साथ क्रीड़ा करती हुई कोमल इन्द्र- नील कमलसे उसपर प्रहार करती है । कोई मुग्धा अपनी विशाल दृष्टिसे, कोई नयी मालतीमालासे, कोई सुगन्धित पाटल पुप्पसे, कोई सुन्दर पूगफलो और बकुल कुसुमोंसे, कोई जीर्णवर्ण पट्टनियोंसे, कोई रत्न और मणियोंकी मालासे, कोई बचे हुए विलेपनसे, कोई सुरभित दवणमंजरी लतासे । कोई किसी प्रकार जलके भीतर छिपी हुई आधी ऊपर निकली हुई ऐनी दिखाई देती है, मानो कामदेवका चूडामणि शोभित

२२६
पउमचरित
कहें वि कसग रोमावलि दिट्ठी। काम-वेणि गं गले वि पइट्ठी ॥७॥
कहें वि थणोवरि ललइ अहोरणु । णाई अगङ्गहाँ केरउ तोरणु ॥६॥
घत्ता
कहें वि स-रुहिरई दिइँ णहर थण-सिहरोवरि सु-पहुँत्त ।
वेगेण वलग्गहों मयण-तुरङ्गहों ण पाय छुडु छुडु खुत्त ि॥९॥
[८]
तं जल-कील णिएवि पहाणहुँ । जाय वोल्ल णहयलें गिब्वाणहुँ ॥१॥
पभणइ एक्कु हरिस-संपण्णउ। 'तिहुअणे सहसकिरणु पर धण्णउ ॥२॥
जुवइ-सहासु जासु स-वियारउ । विन्मम-हाव-भाव-वावारउ ॥शा
णलिणि-वणु वदिणयर-कर-इच्छउ । कुमुय-वणु वससहर तण्णिच्छउ (१)
कालु जाइ जसुमयण-विलासें । माणिणि-पत्तिजवणायासें ॥५॥
अच्छउ सुरउ जेण जगु मत्तउ । जल-कीलए जि किण्ण पजत्तउ' ॥६॥
तं णिसुणे वि अवरेक्कु पवोल्लिउ । 'सहसकिरणु केवल सलिलोल्लिड ॥७॥
इत्थु पवाहु मणोहर-वन्तउ । जो जुवइहि गुज्झन्तु वि पत्तउ ॥६॥
घत्ता
जण खणन्तरें सलिलम्मन्तर गलियंसु-धरण-वावारएँ।
सरहसु ढुक्कउ माणे वि मुक्कउ अन्तेउरु एकए वारए ॥९॥
[९]
रावणो वि जल-कील करेपिणु । सुन्दर सियय-वेइ विरएप्पिणु ॥१॥
उप्परि जिणवर-पडिम चडाववि । विविह-विताण-णिवहु बन्धा वि ॥३
तुप्प-खीर-सिसिहि अहिसिजेवि । णाणाविह-मणि-रयणेहि अजेवि॥३॥
गाणाविहहिं विलेवण-भेऍहिं। दीव-धूव-वलि-पुष्फ-णिवेऍहि ॥४॥

वरदहमो संधि किनीकी काली रोमावली दिग्बाई दी मानो कामवेणी पागल कर वहाँ प्रवेश कर गयी, किमीके स्तनपर उपरका वस्त्र पनामाभित था मानो कामदेवका तोरण हो॥१-८॥ पत्ता-किसीके स्तनके ऊपर रक्तरंजित प्रचुर नखक्षत लि मालूम होते थं मानो तेजीसे भागते हुए कामदेवक सश्यांक पैर गड़ गये ६ । ।।९।। [८] उन जलक्रीडाको देखकर प्रमुख देवताओंम यात- घांत होने लगी। एक हर्पित होकर कहना है, "त्रिभुवनमें मान्यकिरण ही धन्य है, जिसके पास विभ्रम हावभावकी खाने युक्त और बिलासपूर्ण हजारों स्त्रियाँ हैं, जो नलिनी- वनर नमान दिनकर (मूर्य और राजा सहनकिरण) की friकी छा ग्पनी है, कुमुद वन जिस तरह चन्द्रमाको नाता है, उसी प्रकार चे नायकिरणको चाहती है, जिनका नमा काविलान और मानिनी स्त्रियांका मनानक प्रयालमें जाना। जिनके लिए दुनिया मतवाली का पति उसे प्राम। जलमोडाम क्या पयांम नहीं।" गा. सुनकर एक मरने का "मानकिरण केवल पानीका बुलबुला, गुन्दर F. मा प्रकाजिमम हिप जानेपर भी वा गुनियोर सरा ला-८॥ जिन का पानी भर टोल वलगावीर pr बासनापर मान मा पूर्वर मारामारी की "...: ef.त्रिय * :- कर म. iiiiii ।

पउमचरिउ . पुज करवि किर गायइ जावहिं। जन्तिएहि जलु मेल्लिउ ताहि॥५॥ पर-कलत्तु संकेयहाँ ठुकर । णाई वियड्ढहि माणेवि मुक्त ॥६॥ धाइउ उहय-तडई पेल्लन्तउ । जिणवर-पवर-पुज रेल्लन्तउ ॥७॥ दहमुह पडिम लेवि विहढप्फड। कह वि कह विणीसरिउ वियावड़ा घत्ता भणइ 'णरेसहों तुरिउ गवेसहाँ किउ जेण एउ पिसुणत्तणु । किं बहु-वुत्तेण तासु णिरुत्तेण दक्खवमि अजु जम-सासणु' ॥९॥ [१०] जो एत्थन्तर लडाएसा। गय मण-गमणाय गवेसा ॥१॥ रावणेण सरि दिढ वहन्ती। मुय-महुयर-दुक्खेण व जन्ती(?)॥२॥ वन्दण-नसेंण व वहल-विलिन्त्री। जल-रिदिएँ णं जोधणइत्ती ॥३॥ पन्थर-वाहेण व पीसत्थी। जच्च-पदृवस्थ व णियत्थी ॥१॥ कोणाहोरणई व पंगती। वालाहिय-णिदाएं व सुत्ती ॥५॥ गल्लिम-दन्तहि व विहसन्ती। णीलुप्पल-णयणहि व णिएन्ती ॥६॥ उिल-सुरागान्धेण व मत्ती। कंयइ हहि व णचन्ती॥७॥ हुअरि-महुर-सरु व गायन्ती। उज्झर-मुरवाई व वायन्ती ॥८॥ घत्ता अरमिय-रामहों णिरु णिकामहों आरूसँवि परम-जिणिन्दहाँ। पुज हरेप्पिणु पाहुडु लेप्पिणु गय गावइ पासु समुदहों ॥९॥ . [११] हि अवसर जे किकर धाइय । ते परिवत्त लएप्पिणु आइय ॥१॥ हिय सुणन्तहों खन्धावारहों। 'लइ एत्तडउ सारु संसारहों ॥२॥ हेसरवइ गर-परमेसर । सहसकिरणु णामण गरेसर ॥३॥ जल-कोल तेण उप्पाइय । सा भमरेहि मि रमवि ण णाइय॥४॥ गुम्बइ कामु को वि किर सुन्दर । सुरवइ मरहु सयर-चक्केसरु ॥५॥ .

चउदहमो संधि वह गान प्रारम्भ करता है, वैसे ही यन्त्रोंसे पानी छोड़ दिया जाता है, वह पानी ऐसे पहुँचा जैसे परस्त्री संकेतस्थानपर पहुँच जाती है, या जैसे विदग्ध भोगकर उसे छोड़ देते हैं । वह पानी दोनों किनारोंको ठेलता हुआ जिनवरकी पूजाको वहावा हुआ दौड़ा। रावण हड़बड़ाकर और जिनप्रतिमाको लेकर कठिनाईसे बाहर निकला ॥१-८।। पत्ता-उसने लोगोंसे कहा, "खोजो उसे जिसने यह दुष्टता की है, वहुत कहने से क्या, आज मैं निश्चित रूपसे उसे यमका शासन दिखाऊँगा" ॥९॥ [१०] इसके अनन्तर आदेश पाते ही मनसे भी अधिक गतिशील अनेक लोग खोज करने गये। रावण नर्मदाको वहते हुए देखा, जैसे वह मृतमधुकरोंके दुःखसे (धीरे-धीरे) जा रही हो, चन्दनके रससे अत्यन्त पंकिल, जलकी ऋद्धिसे यौवनवती, मन्द प्रवाहसे विश्रब्ध, दिव्य वस्त्रोंको धारण करती-सी, वीणा और अहोरण (दुपट्टा) से अपनेको छिपाती-सी, व्यालोंकी नींदसे सोती हुई, मल्लिकाके समान दाँतोंसे हँसती हुई, नील कमलके समान नेत्रोंसे देखती हुई वकुल (), सुराकी गन्धसे मतवाली केतकीके हाथोंसे नाचती हुई, मधुकरी और मधुकरके स्वरसे गाती हुई, निझररूपी मृदंगोंको वजाती हुई ॥१-८|| पत्ता-स्त्रीका रमण नहीं करनेवाले निष्काम परम जिनेन्द्र- से रूठकर ही ( उनकी ) पूजाका अपहरण कर, उपहार लेकर मानो वह समुद्र के पास गयी ॥९॥ [११] उस अवसर जो भी अनुचर दौड़े, वे खबर लेकर वापस आ गये । सुनते हुए स्कन्धावारसे उन्होंने कहा, "लो, संसारका सार इतना ही है, माहेश्वरका अधिपति सहस्र- किरण नामका नरेश्वर है। उसने जो जलक्रीड़ा की है वैसी क्रीड़ा देवताओंको भी ज्ञात नहीं। सुना जाता है कोई सुन्दर

२३०
पउमचरित
महवा सणक्कुमार ते सयल वि । उ पावन्ति तासु एक-यल वि ॥६॥
का वि अउच्च लील विम्माणिय । धम्मु अत्थु विणि वि परियाणिय॥७॥
काम-तत्तु पुणु तेण जै णिम्मिट ।
अण्ण रमन्ति पसव-कोदूमिउ ॥८॥
घत्ता
मइ पहवन्तण भुयणे तवन्तण गयणत्थु पयङ्ग ण णा (मा')वइ ।
एण पयारेण पिय-वावारण थिउ सलिलें पईसवि णावई' ॥९॥
[ १२ ]
i
विरेक्केण
वृत्त 'मई लक्खिड।
सच्चउ सव्वु एण जे अक्खिउ ॥१॥
पुणु तहों केरउ अन्तेउरु।
ण पञ्चक्खु जे मयरद्धय-पुरु ॥२॥
उर-मुरयहुँ पेक्खणया-हरु । लायण्णम्म-तलाउ मणोहरु ॥३॥
सेर-मुह-कर-कम-कमल-महासरु । मेहल-तोरणाहं छण-वासरु ॥४॥
ण-हस्थिहि साहारण-काणणु । हार-सग्ग-वच्छहों गयणगणु ॥५॥
हर-पवाल-पवालायायह। दन्त-पन्ति-मोत्तिय-सइणयरु ॥६॥
हा-कलयण्ठिहि गन्दणवणु।
कण्णन्दोलयाहं वेत्तत्तणु ॥७॥
यण-ममरहुँ केसर-सेहरु । ममुहा-भङ्गहुँ जहावय-घरु ॥४॥
धत्ता
काई वहुत्तण (पुण) पुणरुतण मयणग्गि-डमरु संपण्णउ ।
णरहुँ भणन्तहुँ मण-धण-वन्तहुँ धुउ चोरु चण्डु उप्पण्णउ' ॥९॥
[१३]
परेकेण वुत्तु 'मइँ जन्तई। दिवई णिम्मले सलिलें तरन्तइँ ॥१॥
सुन्दरई सुकिय-कम्माई व । सुघडियाई अहिणव-पेम्माई व ॥२॥
गगलाई सु-किविण-हिययाई व । णिउण-समालिय सुकइ-पयाई व ॥३॥
चारिमइ कु-पुरिस-धणाई व । कारिमा कुणि-वयणाई व ॥४॥

चउदहमो संधि २३१ कामदेव, इन्द्र, भरत, सगर, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती वे मब भी, उनकी एक कलाको नहीं पा सकते । वह कोई अपूर्व लीलाको मानता है, और धर्म तथा अर्थ दोनोंको जानता है ? कामतत्त्वकी रचना तो उसीने की है, दूसरे लोग तो पसाये हुए कोदोंका रमन करते हैं ।।१-८॥ पत्ता-प्रभावान् मेरे भुवनमें तपते हुए आकाशमें स्थित सूर्य शोभा नहीं पाता, इस कारणसे प्रिय व्यापारके साथ वह पानीके भीतर प्रवेश करके स्थित है" ॥९॥ [१२] एक औरने कहा, "इसने जो कुछ कहा है, सचमुच वह सब मैने देखा है, पुनः उसका अन्तःपुर मानो साक्षात् कामपुर है, जो नूपर, मुरज और नृत्यकारोंको धारण करता है, सौन्दर्य जलके तालाबसे सुन्दर है, शिर मुखकर चरणरूपी कमलांसे युक्त सरोवर है, मेखलाओं और तोरणोसे उत्सवका दिन है, स्तनरूपी हाथियोंसे साहारण-कानन है, हार- रूपी स्वर्गवृक्षोंसे गगनांगन है, अधररूपी प्रवालोंके मूंगोंका आकर है, दाँतोंकी पंक्तिरूपी मोतियोंका रत्नाकर है, जिह्वारूपी कोयलोंके लिए नन्दन वन है, कानोंके आन्दोलनसे लचीलापन है, लोचनरूपी भ्रमरोंसे केशरशेखर है और भौहोंकी भंगिमासे नृत्यकर है ॥१-८॥ घत्ता-बहुत या बार-बार कहनेसे क्या ? मदनाग्नि भयंकरता से सम्पूर्ण वह मनरूपी वित्तवाले अनन्त लोगोके लिए धूर्त प्रचण्ड चोर ही उत्पन्न हो गया है" ॥९॥ [१३] एक औरने कहा, "मैने निर्मल पानीमें तिरते हुए यन्त्र देखे हैं, जो पुण्य कर्मोंकी तरह अत्यन्त सुन्दर अभिनव प्रेमकी तरह सुगठित हैं, अत्यन्त कृपणके हृदयकी तरह कठोर हैं, सुकविके पदोंकी तरह निपुण समास (सुन्दर समास, दूसरे पक्षमें काठकी कलशियोंसे रचित ) हैं, कुपुरुपके

पउमचरित
पइरिकइ सजण-चित्ताई व । वदइँ अत्यइत्त-वित्ता व ॥५॥
दुल्लद्धणियई सुकलताई व । चेट्ट-विहूणहैं वुड्डन्ता व ॥६॥
वारि वमन्ति ताई सिरि-णासहिं । उर-कर-चरण-कण्ण-णयणासेहि ॥७॥
थमवि
मुक्का
तेण
पुज रेलन्तु पढुक्त ॥८॥
तेहि एउ जलु
घत्ता
तं णिसुणेप्पिणु 'लेहु' मणेप्पिणु असिवरु स ई भु वेण पकड्ढिउ ।
सहइ समुज्जलु ससि-कर-णिम्मलु णं पत्त-दाण-फलु वढिउ ॥९॥
जल-कीलाएँ सयम्भू
चउमुहएवं च गोग्गह-कहाएँ।
महं (ई) च मच्छवेहे अज वि कइणो ण पावन्ति ।
[१५. पण्णरहमो संधि]
दाण-मयन्धेण गयनान्धण
जग-कम्पावणु
रण
रावणु
जेम
सहसकिरणे अग्भिट्टउ ॥१॥
मइन्दु वियदृड।
[१]
भाएसु दिण्णु णिय-किङ्करहुँ । वज्जोयर-मयर-महोयरहुँ ॥५॥
मारिच्च-मयहुँ सुय-पारणहुँ। इन्द्रइकुमार-धणवाहणहुँ ॥२॥
हय-हत्थ-पहत्य-विहीसणहुँ। विहि-कुम्भयण्ण-खर-दूसणहुँ ॥३॥
ससिकर-सुगीव-णोल-णलहुँ। अवरहु मि अणिट्ठिय-भुयवलहुँ ॥४॥
उद्धाइय मच्छर-मलिय-कर। मीसावण-पहरण-णियर-धर ॥५॥
सहसयरु वि जुतइहिं परियरिठ। छुड जे.छुहु सलिलहोंणीसरि॥३॥

पण्णरहमी संधि २३१ धनकी तरह गतिशील हैं, कुट्टनीके वचनोंकी तरह कृत्रिम (या काले ) हैं, सज्जनोंके चित्तकी तरह भरे हुए हैं, भिखारीके धनकी तरह अच्छी तरह बँधे हुए है, सुकलत्रोंकी तरह दुर्लध्य हैं, डूबते हुओंके समान चेष्टाविहीन हैं, पानी छोड़ते हुए उर-कर-चरण-कर्ण-नेत्र और मुखवाले, श्रीका नाश करते हुए उन यन्त्रोंसे रोककर यह पानी छोड़ा गया है जो पूजाको बहाता हुआ आया" ॥१-८॥ पत्ता-यह सुनकर, 'पकड़ो', यह कहकर रावणने स्वयं अपने हाथमें तलवार ग्रहण कर ली, जो चन्द्रमाकी किरणकी तरह निर्मल एवं उज्ज्वल ऐसी शोभित है मानो सुपात्रमें दिये गये दानका फल बढ़ गया हो ॥९॥ जलक्रीड़ामें कवि स्वयम्भूको, गोग्रहकथामें चतुर्मुख देवको और भद्र कवि मत्स्यवेध में आज भी कवि नहीं पा सकते । पन्द्रहवीं सन्धि से दान मदान्ध गन्धराज के साथ जिस प्रकार सिंह भिड़ जाता है, वैसे ही जगको कँपानेवाला रावण सहस्रकिरणके साथ भिड़ गया ॥१॥ [१] उसने अपने अनुचरों-वज्रोदर, मयर, महोदर, मारीच, मय सुत, सारण, इन्द्रकुमार, धनवाहन, हस्त, प्रहस्त, विभीषण, दोनों कुम्भकर्ण, खर, दूषण, चन्द्र, सुग्रीव, नल, नील और भी दूसरे निस्सीम बाहुवलवालोंको आदेश दिया। मत्सरसे हाथ मलते हुए भयंकर हथियारोंका समूह धारण करनेवाले वे उठे। युवतियोंसे घिरा हुआ सहस्रकिरण भी जल्दी-जल्दी पानीसे पउमचरित ताणन्तरे तूर णिसुणियई। पणवेप्पिणु मिच्चहि पिसुणियई ॥७॥ 'परमेसर पारक्कउ पडिउ । लइ पहरणु समरु समावडिउ' ॥८॥ पत्ता तं णिसुणेप्पिणु धणु करें लेप्पिणु णिसियर-पवर-समूहहाँ। थिउ समुहाणणु णं पञ्चाणणु णाई महा-गय-जूहहाँ ॥९॥ [२] ज जुज्झ-सज्जु थि लेवि धणु। तं दरिट असेसु वि जुवइयणु ॥१॥ मम्मीसित राएं वुण्ण-मणु । 'कि अण्णहों णाउँ सहसकिरणु ॥२॥ एक्केक्कहों एक्कक्कर में करु । परिरक्खइ जइ तो कवणु डरु ॥३॥ अच्छहाँ भुव-भण्डवें वइसरवि । जिह करिणिउ गिरि-गुह पइसरवि ॥४ जा दलमि कुम्भि-कुम्मस्थलई। होसन्ति कुडुम्विहि उक्खलई ॥५॥ जा खणमि विसाण. पवराई। होसन्ति पयहाँ पच्चवराई ॥६॥ जा कड्ढमि करि-सिर-मोत्तियई। होसन्ति तुम्ह हारत्तिय. ७॥ जा फाडमि फरहरन्त-धयई। होसन्ति वेणि-वन्धण-सयई ॥6॥ घत्ता एम भणेप्पिणु तं धीरेप्पिणु णरवइ रहवरें चडियउ । जुवहु करुणेण ()xx विणु अरुणण णाई दिवायरु पडियउ॥९॥ [३] एत्यन्त आरोडिउ भ. हिं णं केसरि मत्त-हत्थि-ह.हिं ॥१॥ सो एक्कु अणन्तउ जइ वि वलु । पप्फुल्ल तो वि तहाँ मुह-कमलु।२।। जं अखत्ते सहसयरु। तं चविउ परोप्परु सुर-पवरु ॥३॥ 'भहाँ अहाँ अणीइ रक्खेहि क्यि । एक्कु ऍ वहु अण्णु यि गयणे थिय।

पण्णरहमो संधि
।
निकला। उसके अनन्तर नगाड़े सुनाई देने लगे। अनुचरों ने
प्रणाम कर सूचित किया, "देव-देव, शत्रु आ धमका है, युद्ध
आ पड़ा है। हथियार लीजिए" ॥१-८॥
पत्ता-यह सुनकर, हाथमें धनुष लेकर वह निशाचरोंके
प्रवल समूहके सम्मुख उसी प्रकार स्थित हो गया, जिस प्रकार
सिह महागज-यूथके सम्मुख बैठ जाता है ।।९।।
[२] जब वह धनुष लेकर युद्धके लिए तैयार हुआ तो
अशेष युवती जन डर गयी। खिन्न मन उसको राजाने अभय
वचन देते हुए कहा, "क्या सहस्रकिरण किसी दूसरेका
नाम है ? जब मेरा एक-एक हाथ एक-एककी रक्षा करता है
तो तुम्हें किस बातका डर है ? तुम भूमण्डपमें प्रवेश कर
बैठी रहो, जिस प्रकार हथिनियॉ गिरिगुहामें घुसकर बैठ जाती,
हैं । मै जो हाथियोंके कुम्भस्थल तोड़ें गा वे परिवारके लोगोके
लिए ऊखल हो जायेगे, जो मै प्रवर दाँत उखाउँगा, वे प्रजाके
लिए मूसल हो जायेगे। जो मै हाधियोंके सिरसे मोती
निकालूंगा, वे तुम्हारे लिए हार हो जायेगे। जो मै फहराती
हुई ध्वजाएँ फाउँगा, वे तुम्हारी चोटी बाँधनेके लिए सैकड़ों
फीतेका काम द्वेगे" ॥१-८॥
पत्ता-इस प्रकार कहकर, उन्हे धीरज बंधाते हुए वह राजा
रथवरपर चढ़ गया, मानो युवतियोंके करुणाके कारण, मानो
विना अरुणिमाके सूर्य प्रकट हुआ हो ।।९।।
[३] इसके अनन्तर योद्धाओंने आक्रमण किया, मानो मत्त
गजघटाने सिंहपर हमला बोला हो। वह अकेला है और
शत्रुसेना अनेक है, फिर भी उसका मुखकमल खिला हुआ है।
जव इस प्रकार अक्षात्रभावके विरुद्ध सहस्रकिरणपर हमला
किया गया तो देवताओंमें वातचीत होने लगी, "अरे-अरे,
राक्षसोंने बहुत बड़ी अनीति की है । यह अकेला, वे बहुत, उसपर

पउमचरित
पहरणई पवण-गिरि-वारि-हवि । आएहि सरिस जणें मीरु ण वि॥५॥
तं णिसुणवि णिसियर लज्जियई । थिय महियलें विज्ज-विवजियई ॥६॥
तो सहसकिरणु सहसहि करहिं । णं विद्धइ सहस-सहस-सरहिं ॥७॥
दूरहों जि णिरुद्धउ वहरि-वलु। णं जम्बूदीवें उवहि-जलु ॥८॥
घत्ता
अमुणिय-थाणहों किय-संधाणहाँ दिहि-मुहि-सर-पयरहों।
पासु ण दुक्का ते उल्लुकह तिमिर जेम दिवसयरहों ॥९॥
।
[४]
भट्टावय-गिरि-कम्पावणहाँ। पडिहारें अक्खिउ रावणहाँ ॥१॥
'परमेसर एक्के होन्तऍण । वल सयलु धरिउ पहरन्तएण ॥२॥
रणें रहबरु एक्कु में परिभमइ । सन्दण-सहासु णं परिममइ ॥३॥
धणु एक्कु एक्कु णरु दुइ जें कर। चउदिसहि णवर णिवडन्ति सर ॥॥
करु कहाँ वि कहों वि उरु कप्परिउ । करि कहाँ वि क्हों वि रह जजरिड'।५॥
तं णिसुणवि उवहि जेम खुहिउ । लहु तिजगविहूसण भारहिउ १६॥
गउ तेत्तहँ जेत्तहें सहसकर । कोकिउ 'मरु पाव पहरु पहरु ॥७॥
हउँ रावणु दुजउ केण जिउ ।
जें
पाराउट्ठल धणउ किउ' ॥८॥
घत्ता
एम भणन्तण विद्धन्तेण स-रहि महारहु छिण्णउ ।
पणइ-सहासें हिं चउ-पासें हिं जसु चउदिसु विक्खिण्णउ ॥९॥
माहेसरपुर-बइ विरह किउ
अंजण-महिहरें सरय-वणु।
[ ५ ]
णिविसद्ध मत्त-गइन्दै थिउ ॥३॥
उत्थरिउ स-मच्छर गीठ-घणु ॥२॥

पण्णरहमो सधि २३७ भी आकाशमें स्थित हैं। उनके अस्त्र हैं पवन, गिरि, वारि और अग्नि। लोगोंमें इनके समान डरपोक दूसरा नहीं है।" यह सुनकर निशाचर लज्जित हुए और आकाशतल में विद्याओंसे रहित हो गये। सहस्रकिरण अपने हजारों हाथोंसे हजार- हजार तीरोंसे शत्रुको वेधने लगा। उसने दूर ही शत्रुबलको उस प्रकार रोक लिया, जिस प्रकार जम्बूद्वीप समुद्रजलको रोके हुए है।।१-८॥ पत्ता-स्थानको नहीं देखते हुए, दृष्टि, मुट्ठी और सरसमूह- का सन्धान करनेवाले उसके पास शत्रुबल नहीं पहुँच सका, वह वैसे ही छिप गया जैसे सूर्यके सामने अन्धकार ||९|| [४] तब प्रतिहारने अष्टापदको कॅपानेवाले रावणसे कहा, "अकेले होते हुए भी उसने प्रहारके द्वारा समूची सेनाको अव- रुद्ध कर दिया है, युद्धमें वह एक रथवर घुमाता है, पर लगता है जैसे हजार रथ घूम रहे है। एक धनुष, एक मनुष्य और दों हाथ, परन्तु चारों दिशाओंमें तीरोंकी वर्षा हो रही है। किसीका कर, तो किसीका उर कट गया है। किसीका हाथी तो किसीका रथ जर्जर हो गया है।" यह सुनते ही रावण समुद्र- की तरह क्षुब्ध हो गया और शीघ्र ही त्रिजगभूषण गजवर- पर चढ़ गया। वह वहाँ गया, जहाँ सहस्रकिरण था। उसने ललकारा, "हे पाप ! भर, प्रहार कर, मै रावण हूँ, किसने मुझे जीता, मैने धनदको भी यहाँसे वहाँ तक देख लिया है" ॥१-८॥ घत्ता-ऐसा कहते हुए और प्रहार करते हुए उसने सारथी सहित महारथको छिन्न-भिन्न कर दिया। चारों ओर खड़े हुए इंजारो बन्दीजनोंने उसके यशको चारों दिशाओमें फैला दिया ॥९॥ [५] जब माहेश्वरपुरका राजा रथविहीन कर दिया गया, तो वह एक पल मे मदोन्मत्त गजेन्द्रपर सवार हो गया, मानो

૨૧૮
पउमचरित
सण्णाहु खुरुप्पें कप्परित।
लवाहिउ कह व समुचरिउ ॥३॥
जे सव्वायाम मुभइ सर।
लुअ-पक्ख पक्खि णं जन्ति धर ॥१॥
दससयकिरणेण णिरिक्खियउ। पच्चारिउ 'कहि पशु सिक्खियउ॥५॥
जजाहि ताम भटमासु करें। पच्छल जुज्झेजहि पुणु समर' ॥६॥
तं णिसुणे वि जमेण व जोइयउ। कुअरु कुञ्जरहाँ पचोइयउ ॥७॥
आसपणे चोऍवि विगय-भउ । परवइ पिडालें कोन्तेण ह ॥
घत्ता
जाम
मयड्कर
असिवर-करु पहरइ मच्छर भरियउ ।
ताम दसासण आयाण उप्पएवि पहु धरियउ ॥९॥
[६]
णि णिय-णिलयहाँ मय-वियलियउ। णं मत्त-महागउ णियलियउ॥१॥
'मा मइ मि धरैसइ दहवयणु' । णं भइयएँ रवि गउ अत्यवः ॥२॥
पसरिड अन्धारु पमोफलट । णं णिसिएँ वित्त मसि-पोट्टलठ ॥३॥
समि उग्गट सुटु सुसोहियउ। णं जग-हरें दीवउ बोहियउ ॥४॥
सुविहाणे दिवायर उग्गमिठ। णं रयणिहि मइयवटु ममि ॥५॥
तो गवर जर चारण रिमिह । सयकरहों विणासिय-भव-णिसिह ॥६॥
गय वत्त 'सहामविरणु धरिट'। चटविह-रिसि-सन्त परियस्टि ७॥
घत्ता
रावणु जैतहें गड (मो) तत्तहें पन-महावय-धारउ ।
दिदु दमाण मेयसँग णायद रिमहु मदारठ ॥८॥

पण्णरहमो संधि २३९ अंजनगिरिपर शरद मेघ हों। धनुष लिये हुए और मत्सरसे भरकर वह उछला और खुरपेसे कवच काट दिया, लंकाधिप किसी प्रकार बच गया। जब वह पूरे आयामसे तीर छोड़ता तो ऐसा लगता, जैसे विना पंखों के पंखी धरतीपर जा रहे हों। सहस्रकिरण ने निरीक्षण किया और ललकारा, "कहाँ धनुष सीखा है ? जाओ-जाओ, पहले अभ्यास कर लो, वादमें फिर युद्धमें लड़ना।" यह सुनकर यमकी तरह उसकी ओर देखते हुए रावणने हाथीको हाथीकी ओर प्रेरित किया। विगत- मद उसने हाथीको निकट ले जाकर सहस्रकिरणको मस्तकपर भालेसे आहत कर दिया ।।१-८॥ धत्ता-जबतक भयंकर और मत्सर भरा हुआ वह असिवर हाथमें लेकर प्रहार करता तवतक दशाननने आयास करके उसे पकड़ लिया ||९|| [६] मदविगलित उसे रावण अपने घर ले गया, मानो शृंखलाओसे जकड़ा हुआ महामत्त गज हो। इतने में, कहीं दशानन मुझे भी ने पकड़ ले मानो इस डरसे सूरज डूव गया। अन्धकार मुक्तभावसे फैलने लगा मानो निशाने स्याहीकी पोटली खोल दी हो। अत्यन्त सुशोभित चन्द्रमा उग आया मानो जगरूपी घरमें दीपक जल उठा हो। सुप्रभातमें सूर्यका उदय हो गया, मानो निशाका मइयवट्ट (मैला मार्ग ? ) चला गया। इतनेमें भवनिशाका नाश करनेवाले जंघाचरण महामुनिके पास सहस्रकिरणका यह समाचार गया कि वह पकड़ लिया गया है। तव चार प्रकारके ऋषि संघोसे घिरे हुए ॥१-७॥ घत्ता-पाँच महाव्रतोंको धारण करनेवाले जंघाचरण महा- मुनि वहाँ गये जहाँ रावण था। दशानन ने उनके उसी प्रकार दर्शन किये जिस प्रकार श्रेयांसने आदरणीय ऋषभजिनके किये थे ।।८॥

२४०
पउमचरित
[७]
गुरु वन्दिय दिण्णइँ आसणई। मणि-वेयडियइँ सुह-दसणइँ ॥१॥
मुणि-पुंगउ चवइ विसुद्धमइ । 'मुएँ सहसकिरणु लंकाहिचइ ॥२॥
ऍहु चरिमदेहु सामण्णु ण वि । महु तणउ भव्व-राईव-रवि' ॥३॥
तं णिसुनें वि जम-कम्पावणेण । पणवेप्पिणु वुच्चइ रावणेण ॥४॥
'महु एण समाणु कोउ कवणु । पर पुजहें कारग जाउ रणु ॥५॥
भन्जु
वि
जें पहु सा जि सिय । अणुहुंजउ मेइणि जेम तिय' ॥६॥
तं णिसुवि सहसकिरणु चवइ । 'उत्तमहाँ एउ किं संभवइ ॥७॥
तं मणहर सलिल-कील कवि। पइँ समउ महाहवें उत्थर वि ॥
घत्ता
एवहिँ मायएँ विच्छायएँ राय-सियएँ कि किजइ ।
वरि थिर-कुलहर अजरामर सिद्धि-बहुव परिणिजइ' ॥९॥
[८]
ते वयणे मुक्कु विसुद्ध-मइ । माहेसर-पवर-पुराहिवइ ॥१॥
णिय-णन्दणु णियय-याणे थवें वि । परियणु पट्टणु पय संथवें वि ॥२से
णिक्खन्तु खण निगय-मउ । रावणु वि पयाणउ देवि गउ ॥३॥
परिपेसिउ लेहु पहाणाहाँ। अणरण्णहों उज्झहें राणाहों ॥४॥
मुह-वत्त कहिय 'दहमुहॅण जिउ । लड़ सहसकिरणु तव-चरण थिउ' ॥५॥
तं णिसुणेवि गरवइ हरिसउ । ईसीसि विसाउ पदरिसियउ ॥६॥
संगाम-सहासहिं दूसहहाँ सिय सयल ससप्पवि दसरहहों॥७॥
सहसत्ति सो वि णिक्खन्तु पहु। भण्णु वि तहाँ तणउ अणन्तरहु ॥४॥
घत्ता
ताम सुकेसँग
लसेंण जमहर-अणुहरमाणउ।
जागु पणासवि रिउ वासें वि मगहहँ मुस्कु पयाणउ ॥९॥

पण्णरहमो संधि
२४१
[७] गुरुकी वन्दना करके मणिनिर्मित और शुभदर्शन
आसन उन्हें दिये गये। विशुद्धमति मुनिश्रेष्ठ बोले, "लंकाधि-
पति, तुम सहस्रकिरणको छोड़ दो, यह सामान्य व्यक्ति नहीं,
चरमशरीरी है, मेरा पुत्र और भव्यरूपी कमलोंके लिए सूर्य ।"
यह सुनकर यमको कपानेवाले दशाननने प्रणाम करते हुए कहा,
"मेरा इनके साथ किस बातका क्रोध ? केवल पूजाको लेकर हम
दोनोंमें युद्ध हुआ, यह आज भी प्रमु हैं और वही इनकी लक्ष्मी
है, यह स्त्रीकी तरह धरतीका भोग करें।" यह सुनकर सहस्र-
किरण कहता है, "श्रेष्ठ व्यक्तिसे क्या यह सम्भव है ? वह
सुन्दर जलक्रीड़ा कर और तुम्हारे साथ युद्ध में लड़कर ।।१-८।।
घत्ता-अव इस फीकी राज्यश्रीका क्या करना ? अच्छा है
कि श्रेष्ठ स्थिरकुलवाली अजर-अमर सिद्धिरूपी वधूका पाणि-
ग्रहण किया जाय ।।१।।
[८] इन शब्दोंके साथ मुक्त विशुद्धमति माहेश्वर अधिपति
सहस्रकिरण अपने पुत्रको अपने स्थानपर स्थापित कर, परिजन,
पट्टण और प्रजाको समझाकर निडर वह एक क्षणमें दीक्षित
हो गया। रावण भी प्रयाण कर चला गया। तब अयोध्याके
प्रधान राजा अणरण्यको लेखपत्र भेजा गया, उसमें मुख्य बात
यह कहीं गयी थी कि दशमुखसे जीवित बचा सहस्रकिरण
तपश्चरणमे स्थित हो गया। यह सुनकर राजा प्रसन्न हुआ
और थोड़ा-सा विषाद भी उसने प्रदर्शित किया । हजारों युद्धोंमे
दुम्मद दशरथको समस्त श्री समर्पित कर, राजा अणरण्यने भी
दीक्षा प्रण कर ली और उसके दूसरे पुत्र अनन्तरथने ॥१-८॥
पत्ता-तब सुकेश और लंकेशने यमगृहके समान यनको
नष्ट करने और शत्रुको सन्त्रस्त करनेके लिए मगधके लिए कूच
किया॥९॥

२४२ पउमचरित णारउ धीर विमरु वसिकवि। तहाँ तणिय तणय करयले धरै वि णव णव संवच्छर तेत्थु थिउ । पुणु दिण्णु पयाणउ मगहु गउ ॥२॥ पेक्खेंवि रावणु आसदियउ । महु महुरपुराहिउ वसिकियउ ॥३॥ जसु चमरे अमर विष्णु वरु । सूलाउहु सयलाउह-पवरु ॥४॥ णिय तणय तासु लाएवि करें। थिउ णबर गम्पि कइलास-धरै ॥५॥ मन्दाइणि दिट्ठ मणोहरिय । ससिकन्त-णीर-णिज्झर-मरिय ॥६॥ गय-मय गइ मइलिय-उभय-तड। स-तुरझम-अक्षर ण्डाग भड १७॥ वन्देप्पिणु जिणवर-भवणाई । दहमुहु दक्खवइ णिव्वाणाई ॥८॥ 'इह, सिद्ध सिद्धि-मुहकमल-अलि । जिणवरु भरहेसरु बाहुवलि ॥९॥ घत्ता एत्थु सिलासणे अत्तावणे अच्छिड वालि-भडारउ । जसु पय-माण गरुयारण हउँ किउ कुम्मायारउ' ॥१०॥ [१०] जम-धणय-सहासकिरण-दमणु । जं घिउ अट्ठावऍ दहवयणु ।।।। तं पत्त वत्त णलकुवरहीं। दुल्लद्ध-णयर-परमेसरहाँ ॥२॥ परिचिन्तिउ 'हय-गय-रह-पवलें। आसपणे परिदिएँ वइरि-वलें ॥३॥ एत्थु वि अमराहिवें रण अजए। जिण-वन्दणहत्तिएँ मेरु गएँ ॥४॥ एहए अवसर उवाउ कवणु' । तो मन्ति पोलिड हरिदवणु ||५|| 'वलवन्तइँ जन्तई उट्ठवहाँ। चउदिसु आसाल-विज उवहाँ ॥६॥ जं होइ अछेउ अभेउ पुरु। ता रक्खहुँ पावइ जाण सुरु' ॥७॥ तं णिसुणे वि तैहि मि तेम किउ । सइ-चित्तु व णयरु दुलछु थिउ १८॥

पण्णरहमो संधि - [९] नारदको धीरज देकर मरुको वशमें कर उसकी कन्यासे पाणिग्रहण कर लिया। नौ वर्ष वहाँ रहकर फिर कूच कर वह मगध के लिए गया। रावणको देखकर मथुराका राजा मधु आशंकित हो उठा, रावणने उसे वशमें कर लिया, उसे चमरेन्द्र देवने समस्त आयुधोंमें श्रेष्ठ मूलायुध वरमें दिया था। उसकी कन्या भी अपने हाथमें लेकर, वह जाकर कैलास पर्वतकी धरतीपर ठहर गया। उसे सुन्दर मन्दाकिनी नदी दिखाई दी, जो चन्द्रकान्त मणियोंके नीर निर्झरोंसे भरी हुई थी, गजमदसे नदीके दोनों तट मैले थे। योद्धाओंने अश्वों और गजोंके साथ स्नान किया। जिनवरके भवनोंकी वन्दना करनेके पश्चात् दसमुख निर्वाण स्थानोंको दिखाने लगा, "यह सिद्धिरूपी वधूके मुखकमलका भ्रमर, भरतेश्वर और वाहुवलि हैं ।।१-९॥ घत्ता-इस आतापिनी शिलापर आदरणीय वाली स्थित थे जिनके भारी पदभारसे मैं कछुएके आकारका बना दिया गया था॥१०॥ [१०] यम, धनद और सहस्रकिरणका दमन करनेवाला दशमुख जब अष्टापद पर्वत पर था, तभी यह बात दुलंध्य नगरके राजा नलकूवरके पास पहुँची।" वह सोचने लगा, "अश्व, गज और रथोंसे प्रवल शत्रुसेनाके निकट है, दूसरे इन्द्रके युद्धमें अजेय रावण इस समय जिनकी वन्दना-भक्ति करनेके लिए मेरु पर्वतपर गया हुआ है, इस अवसर पर क्या उपाय किया जाये।" तव हरिदमन नामक मन्त्री बोला, "बलवान् यन्त्र उठवा दो, चारों दिशाओंमें आशालीविद्या स्थापित कर दो जिससे नगर अछेद्य और अभेद्य हो जाये, तभी इसकी रक्षा कर सकते हैं कि उसे भेद न मिले ।" यह सुनकर उन्होंने भी ऐसा ही किया और सतीके चित्तकी तरह नगरको दुलंध्य बना दिया।॥१-८॥

२४४
पउमचरित
घत्ता
ताव विरुद्रं हि जस लुढे हि रावण-मिच्च-सहासें हि ।
वेड्ढिउ पुरवरु संवच्छरु णावइ वारह-मासें हि ॥९॥
-
११]
जन्तहं भइयऍ विहढप्फ. हि । दहमुहहाँ कहिउ केहि मि महि ।
'दुग्गेज्यु मडारा तं णयरु। दूसिद्धहुँ जिह तिहुअण-सिहरु ॥२॥
तहि जन्त-सयई समुडियई। जमकर जमेण व छड्डियइँ ॥३॥
जोयणहाँ मझें जो संचरइ । सो पढिजीवन्तु ण णीसरई' ॥४॥
तं णिसुणे वि चिन्तावण्णु पहु थिउ ताम जाम उवरम्म बहु ॥५॥
अणुरत्त परोक्खए जे जसँण ।
जिह महुभरि कुसुमभान्ध-वसण ॥६॥
ण गणइ कत्पूरु ण चन्दमसु । ण जलह ण चन्दणु तामरसु ॥७॥
तह दसमी कामावत्य हुय । विसग्गि-दड्ढ णउ कह मि मुय ॥४॥
घत्ता
'इमु महु जोवणु ऍहु (सो) रावणु एह रिदि परिवारहों।
नइ मेलावहि तो हलै सहि एत्तिड फलु संसारहों' ॥९॥
।
[१२]
तं णिसुणवि चित्तमाल चवइ । 'मइँ होन्तिए काइँ ण संभवइ ॥१॥
आएसु देहि छुड एचडट। एउ सुन्दरि कारणु केत्तडउ ॥२॥
तुह रूवहाँ रावणु होइ जइ । लइ वट्टइ तो एत्तडिय गई' ॥३॥
तं णिसुणवि मणहर महरयलु । उवरम्भहें विहसिउ मुह-कमलु ॥४॥
'हले हले सहि ससिमुहि हंसनाइ । सो सुहउ ण इच्छइ कह वि जइ ॥५॥
भासाल-विज तो देहि वहाँ। अण्णु वि वमरहि दसाणणहाँ ॥६॥

पण्णरहमो संधि २४५ घत्ता-तबतक विरुद्ध यशके लोभी रावणके हजारों अनुचरोंने पुरवरको उसी प्रकार घेर लिया जिस प्रकार वर्ष को बारह माह घेरे रहते हैं ।।९।। [११] यन्त्रोंके भयसे घबड़ाये हुए कितनों ही भटोंने दशमुखसे कहा, "हे आदरणीय, वह नगर दुर्गाद्य है ! उसी प्रकार, जिस प्रकार असिद्धोंके लिए मोक्ष । वहाँ सैकड़ों यन्त्र लगे हुए हैं, यमके द्वारा छोड़े गये यमकरणोंके समान । एक योजनके भीतर जो भी चलता है तो वह प्रतिजीवित नहीं लौट सकता।" यह सुनकर रावण जबतक चिन्ताकुल रहता है तबतक नलकूबरकी वधू उपरम्भा, उसका परोक्षमें यश सुनकर उसी प्रकार आसक्त हो उठती है जिस प्रकार मधुकरी कुसुम गन्धसे वशीभूत होकर । न उसे कपूर अच्छा लगता है और न चन्द्रमा। न जलार्द्रता चन्दन और न कमल । वह कामकी दसवीं अवस्थामें पहुँच जाती है। वियोगकी विषाग्निसे दग्ध वह किसी प्रकार मरी भर नहीं ॥१-८॥ धत्ता यह मेरा यौवन, यह रावण, यह परिवारका वैभव, हे सखी! यदि तू मिलाप करवा दे तो संसारका इतना ही फल है।" ॥९॥ [१२] यह सुनकर चित्रमाला कहती है, "मेरे होते हुए क्या सम्भव नहीं है ? इतना आदेश-भर दे, शीघ्र। यह कितनी-सी बात है ? रावण यदि तुम्हारे रूपका होता है (तुममें आसक्त होता है), तो लो ऐसी ही चाल होगी।" यह सुनकर सुन्दर है अधरतल जिसका, उपरम्भाका ऐसा मुखकमल खिल गया। वह बोली, "हे-हे चन्द्रमुखी हंसगति, वह सुभग यदि किसी प्रकार न चाहे, तो उसे आशाली विद्या दे देना और

२४६
पउमचरित
बुच्चइ रहमु भड-लिह-लुहणु। इन्दाउहु भन्छ। सुमरिसणु' ॥७॥
तं णिसुण वि दुई णिग्गय । लकसावासु णवर गइग ॥८॥
घत्ता
कहिउ दसासहाँ सुर-तासहों जं उवरम्मएँ वुत्तउ ।
'एत्तिउ दाहण तुह विरहण सामिणि मरइ णिस्तउ ॥९॥
[ १३ ]
उवरम्भ समिच्छहि अज्जु जइ । तो जे चिन्नहि तं संभवइ ॥१॥
भासाली सिज्झइ पुरवर वि। सुमरिसणु चक्कु णलकुवर वि' ॥२॥
तं णिसुणेवि सुख वियखणहाँ। अवलोइड वयणु विहीसणहों ॥३॥
पइसारिय दुई मजणएँ। थिय वे वि सहोयर मन्तणएँ ॥४॥
'अहाँ साहसु पमणइ पहु मुयवि । जं महिल करइ तं पुरिसुण वि ॥५॥
दुम्महिल जि भीसण जम-णयरि । दुम्महिल जि असणि जगन्त-यरि ॥६॥
दुम्महिल जि स-त्रिस भुयङ्ग-फड । दुम्महिल जि वइवस-महिस-सड॥७॥
दुम्महिल जि गरुय वाहि णरहों। दुम्महिल जि वग्धि महा घरहों ॥८॥
घत्ता
मणइ विहीसणु सुह-दसणु 'एत्थु एउ ण घट्टइ।
सामि णिसण्णहाँ णड अण्णहाँ भेयहाँ अवसरु वट्टइ ॥९॥
[१४]
जइ कारणु वहरि सिद्धऍण । णयरें धण-कणय-समिद्धऍण ॥१॥
तो कवडेण वि "इच्छामि" भणु । पुण्णालि असञ्चि दोसु कवणु ॥२॥
छुड केम वि विज समावडउ । उवरम्म तुज्यु पुणु मा वडड' ॥३॥
संणिसुणवि गउ दहगीउ तहिँ। मजणयहाँ णिग्गय दूइ जहि ॥४॥
देवई वत्यई ढोइयई। आहरणइ स्यणुजोइयई ॥५॥
केजर-हार-कडि सुत्ताई। णेउरई कडय-संजुत्ताई ॥६॥

पण्णरहमो संधि
२४.
रावणसे यह भी कहना कि योद्धाओंकी लीख पोंछ देनेवाला
जो सुदर्शन चक्र इन्द्रायुध कहा जाता है, वह भी है।" यह
सुनकर दूती गयी। वह केवल रावणके डेरेपर पहुंची ॥१-८॥
घत्ता-उपरम्भाने जो कुछ कहा था, वह उसने देवोंको
सन्त्रास देनेवाले दशाननसे कह दिया। इतना और कि "तुम्हारे
वियोगके दाहसे स्वामिनी निश्चित रूपसे मर रही है" ||९||
[१३] यदि तुम आज भी चाहने लगते हो, तो जो सोचते
हो वह सम्भव हो सकता है। आशाली विद्या सिद्ध होती है,
और पुरवर भी, सुदर्शन चक्र और नलकूवर भी।" यह सुनकर
उसने अत्यन्त विचक्षण विभीपणका मुख देखा। दूतीको स्तान
करने के लिए भेज दिया गया और दोनों भाई मन्त्रणाके लिए
बैठ गये। "अहो साहस, जो स्वामी छोड़नेके लिए कहता है,
जो महिला कर सकती है, वह मनुष्य नहीं कर सकता।
दुर्महिला ही भीषण यम नगरी है, दुर्महिला ही जगत्का अन्त
करनेवाली अशनि है। दुर्महिला ही विषाक्त सर्पफन है ।
दुर्महिला ही यमके भैंसोंकी चपेट है, दुर्महिला ही मनुष्यकी
बहुत बड़ी व्याधि है, दुर्महिला ही घरमें वाघिन है" ।।१-८॥
पत्ता-शुभदर्शन विभीषण कहता है, “यहाँ यह घटित
नहीं होता। हे स्वामी, बैठे हुए यहाँ भेदका दूसरा अवसर
नहीं है ||९||
[१४] यदि कारण, शत्रुको जीतना और धन कंचनसे समृद्ध
नगरको प्राप्त करना है, तो कपटसे यह कह दो, 'मैं चाहता
हूँ।' असती और वेश्यामें कोई दोष नही। शायद किसी प्रकार
विद्या मिल जाये, फिर तुम उपरम्भाको मत छूना"। यह
सुनकर दशानन वहॉ गया जहाँ दूती स्नान करके निकल रही
थी। उसे दिव्य वस्त्र और रत्नोंसे चमकते हुए आभूपण दिये
गये। केयूर हार और कटिसूत्र और कटकसे युक्त नूपुर ।

२४८
पउमचरिउ
अवरइ मि देवि वोसिय-मणण ।
आसाल-विज मग्गिय खणण ॥७॥
ताएँ वि दिण्ण परितुट्टियाएँ । णिय हाणि ण जाणिय मुद्धियाएँ॥
घत्ता
ताव विसालिय भासालिय पहें गजन्ति पराइय ।
तं विजाहरु णलकुवर मुऍवि णाई सिय भाइय ॥९॥
[१५]
गय दूई किउ कलयलु भ. हिं। परिवेदिउ पुरवरु गय-घ. हि ॥१॥
सण्णहवि समर णिच्छिय-मणहाँ। णलकुन्वरु भिडिउ विहीसणहाँ ॥२॥
वलु वलहौं महाहवें दुजयहाँ। रहु रहहाँ गइन्दु महागयहाँ ॥३॥
हउ हयहाँ णराहिवु गरवरहीं। पहरण-घर वरपहरण-धरहों ॥४॥
चिन्धित चिन्धियहाँ समावडिउ । वइमाणित वइमाणिह भिडिउ ॥५॥
तहिं तुमुलें जुज्झं भीसावणेण । जिह सहसकिरणु रण रावणेण ॥६॥
तिह विरह करेविणु तक्खणेण । णलकुव्वर धरिउ विहीसगण ॥७॥
सहुँ पुरण सिद्ध तं सुअरिसणु । उवरम्भ ण इच्छइ दहवयणु ॥४॥
घत्ता
सो ले पुरेसरु णलकुबरु णियय केर लेवाविउ ।
समउ सरम्मएँ उवरम्मएँ रज्जु स ई भुक्षाविउ ॥९॥
[१६. सोलहमो संधि]
णलकुचरे धरियएँ विजएं घुटे वहरिह तणएँ ।
णिय-मन्तिहि सहियउ इन्दु परिट्ठिउ मन्तणएँ ।
ने गूढपुरिस पट्टविय तेण । ते आय पडीवा तक्खणेण ॥१॥
परिपुच्छिय 'लइ अक्खहाँ दवत्ति । केहउ पडु केहिय तासु सत्ति ॥२॥
किं वलु केहउ पाइक-लोउ । किं वसणु कवणु गुणु को विणोउ ॥३॥

सन्नद्ध होकर सोलहमो सोच और भी सन्तुष्ट मनसे देकर उसने एक पलमें आशाली विद्या माँग ली। परितुष्ट होकर उसने भी दे दी, वह मूर्खा अपनी हानि नहीं जान सकी ॥१-८॥ घत्ता-तबतक आशाली विद्या आकाशमें गरजती हुई आ गयी, मानो नलकूबर विद्याधरको छोड़कर उसकी लक्ष्मी ही आ गयी हो ॥५॥ [१५] दूती चली गयी। योद्धाओंने कोलाहल किया। गज- घटाओंसे पुरवरको घेर लिया। नलकूबर भी निश्चित मन विभीषणसे भिड़ गया। महायुद्ध में दुर्जेय बलसे वल, रथसे रथ, महागजसे गज, अश्वसे अश्व, नरवरसे नरवर, प्रहरणधारी प्रहरणधारीसे और चिह्न चिह्नसे भिड़ गये। वैमानिकोंसे वैमानिक। उस तुमुल घोर संग्राममें जैसे सहस्र- किरणको भीषण रावणने, उसी प्रकार विभीषणने तत्काल नलकूबरको विरथ कर पकड़ लिया। पुरके साथ सदर्शन चक्र भी सिद्ध हो गया । परन्तु दशाननने उपरम्भाको नहीं चाहा ।।१-८॥ घत्ता-पुरेश्वर उसी नलकूबरसे अपनी आज्ञा मनवाकर उपरम्भाके साथ उसको राज्य भोगने दिया ।।९।। . सोलहवीं सन्धि नलकूबरके पकड़े जाने और शत्रुओंकी विजय घोषणा होने पर इन्द्र अपने मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणाके लिए बैठा । [१] उसने जो गुप्तचर भेजे थे वे तत्काल वापस आ गये। उसने पूछा, "लो जल्दी बताओ, वह (रावण) कितना चतुर है ? उसकी कितनी शक्ति है ? कितनी सेना है ? प्रजा कितनो हैं ?

२५० पउमचरित त णिसुणे वि दणु-गुण-पेरिए हैं। सहसक्खहाँ अक्सिउ हेरिएहि ॥१॥ 'परमेसर रणें रावणु अचिन्तु । उच्टाह-मन्त-पहु-सत्ति-वन्तु ॥५॥ चउ-बिन-उमल छग्गुण-णिया। हि-तु सत्त-पय-पयासु ॥६॥ सत्तविह-सण-विरहिय-सरीरु। बहु-बुन्दि-सत्ति-सम-काल-भीर ॥७॥ अरिवर-उच्चग्ग-विणासयालु । अट्ठारहविह-तिस्थाशुपालु ॥८॥ घत्ता तहाँ केरएँ साहुणे सच्चु सामि-सम्माणियउ । णउ कुदड लुदूर को वि भीरु अवमाणियउ ॥९॥ [२] विणु णित्ति एक्कु वि पड ण देइ । अविह-विणोएं दिवसु णे ॥१॥ पहरदु पयाव-गयेमणेण । मन्तटर-नवसण-पेमणेण ॥२॥ पहरुद्ध णवर सन्दुभ-रणेण । अहरड अत्याण-णिवन्धर्णण ॥३॥ पहरदु पहाण-देवचणेण । मोयण-परिहाण-बिलखणेण ॥४॥ पहरख दन्य-अचलोयणेण । पाहुद-पदिपाहुइ-नोवणेण ॥॥

सोलहमो संधि क्या व्यसन है, कौन-सा गुण है ? क्या विनोद है ?" यह सुन- कर राक्षस गुणोंसे प्रेरित गुप्तचरोंने इन्द्रसे कहा, "परमेश्वर, युद्धमें रावण अचिन्त्य है, वह उत्साह मन्त्र और प्रभुशक्तिसे युक्त है। चारों विद्याओंमें कुशल, और ६ गुणोंका निवास है । उसके पास ६ प्रकारका वल और ७ प्रकारकी प्रकृतियाँ हैं। उसका शरीर ७ प्रकारके व्यसनोंसे मुक्त है । प्रचुर बुद्धि, शक्ति, सामर्थ्य और समयसे गम्भीर है । ६ प्रकारके महाशत्रुओंका विनाश करनेवाला और १८ प्रकारके तीर्थोंका पालन करनेवाला है।।१-८॥ धत्ता-उसके शासनकालमें सभी स्वामीसे सम्मानित हैं। उनमें कोई क्रुद्ध लुब्ध नहीं है। कोई भी भीरु और अपमानित नहीं है ॥९॥ [२] नीतिके बिना वह एक भी पग नहीं देता, आठ प्रकारके विनोदों में अपना दिन विताता है। आधा पहर प्रतापकी खोजमें, और अन्तःपुरकी रक्षा और सेवामें, आधा पहर गेंद खेलने, अथवा दरवार लगाने में, आधा पहर स्नान और देवपूजामें, भोजन-कपड़े पहनने और विलेपनमें । आधा पहर द्रव्यको देखने १. विद्याएं ४ है-आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति । साख्य योग और लोकायत को आन्वीक्षिकी कहते है । साम, ऋग् और यजुर्वेद त्रयी कहलाते है । कृषि, पशुपालन और वाणिज्य वार्ता है । गुण ६ होते है-सन्धि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव । वल ६ है मूलवल, भृत्यवल, श्रेणिवल, मित्रबल, अमित्रवल और आटविकबल । प्रकृतियां ७ है-स्वामी, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, सेना और सुहृद् । व्यसन ७ है- धूत, मद्य, मास, वेश्यागमन, पापधन, चोरी, परस्त्रीसेवन । अन्तरंग शत्रु ६ है-काम, क्रोध, लोभ, मान, मद और हर्प। तीर्थ अठारह है- मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, दौवारिक, अन्तर्वशिक, प्रशास्ता, समाहर्ता, सविधाता, प्रदेष्टा, नायक, पौर, व्यावहारिक, कर्मान्तक, मन्त्रि- परिषद्, दण्ड, दुर्गान्तपाल और आटविक । । । -

२५२
पउमचरित
पहरडु लेह-वायण-खणेण ।
सासणहर-हेरि-विसजणेण ॥६॥
पहरडु सहर-पविहारणेण।
अहवइ अन्भन्तर-मन्तणेण ॥७॥
पहरडु सयल-बल-दरिसणेण । रह-य-हय-हेइ-गवेसणेण ॥८॥
घत्ता
सेणावइ-संभावणण ।
जम-याण परिहिट परमण्डल-आरुसणण ॥९॥
पहरडु णराहिउ
[३]
जिह दिवसु तेम गिन्त्राण-राय। णिसि गेइ करेप्पिणु अट्ट भाय ॥३॥
पहिलए पहरखें विचिन्तमाणु । अच्छइ णिगूदु पुरिसे हि समाणु ॥२॥
वोयए पुणो बि ण्हाणासणेण । अहवह णवरह-सुह-दसणेण ॥३॥
तइयएँ जय-तूर-महारवेण । अन्तेउरु विसइ मणुच्छवेण ॥४॥
चउत्थएँ पञ्चमें सोवण-खणेण । चउदिसु दिढेण परिरक्खणेण ॥५॥
छट्टए हय-पडह-विउज्झणेण । सव्वस्थसत्थ-परिबुज्झणेण ॥६॥
सत्तम मन्तिहि सहुँ मन्तणेण । णिय-रज्ज-कज्ज-परिचिन्तणेण ॥७॥
अट्ट में सासणहर-पेसणेण । सुविहाणे वेज्ज-संभासणेण ॥८॥
महणसि-परिपुच्छण-आसणेण । णिम्मित्ति-पुरोहिय-घोसणेण ॥९॥
घत्ता
इय
सोलह-भाएँ हि दिवसु वि रयणि वि णिन्वहइ ।
मणु जुज्झहाँ उप्परि तासु णिरारिउ उच्छहइ ॥१०॥
[४]
तुम्हहुँ घई एक्क वि णाहि तत्ति । सुविणए विण हुय उच्छाह-सत्तिा॥
वालत्तणे णड णिहउ सत्तु ।
णाह-मेत्तु जि कियउ कुढार-मेत्तु ॥२॥
जइयहुँ णामउ छुड छुडु दसासु । जइयहुँ साहिउ विजा-सहासु ॥३॥

२५३ सोलहमो संधि और उपहार प्रत्युपहार रखनेमें, आधा पहर पत्र वाँचने और आदेश प्राप्त गुप्तचरोंको निपटानेमें, आधा पहर स्वच्छन्द विहार और अन्तरंग मन्त्रणामें, आधा पहर समस्त सेनाके निरीक्षण तथा रथ-गज-अश्व और वनके अन्वेषणमें ॥२-८॥ घत्ता-आधा पहर सेनापतिका सम्मान करनेमें व्यतीत करता है। यदि वह शत्रुमण्डलसे नाराज होता है, तो उसे सीधा यमके स्थान भेज देता है" ||९|| [३] "हे देवराज, जिस प्रकार दिवस उसी प्रकार वह रातको भी आठ भागोंमें विभक्त कर बिताता है। पहले आधे पहरमें गूढ पुरुषोंके साथ विचार-विमर्श करता हुआ बैठा रहता है, दूसरेमें स्नान और आसन, अथवा नवरतिके शुभ- दर्शन करता है। तीसरेमें जयतूर्यके महाशब्दके साथ प्रसन्नमन अन्तःपुरमें प्रवेश करता है । चौथे पहरमे खूब सोता है और चारों दिशाओंकी दृढ़तासे रक्षा करता है। छठे पहरमें नगाड़े वजाकर उसे उठाया जाता है, वह सर्वार्थ शास्त्रोंका अवलोकन करता है। सातवे में मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा करता है। अपने राजकार्यकी चिन्ता करता है। आठवमें शासनधर जनोंको भेजता है और प्रातःकाल वैद्यसे सम्भाषण करता है। रसोईघर- पूछताछ करता है और बैठता है, नैमित्तिकों और पुरोहितोंसे वात करता है ॥१-९॥ घत्ता-इस प्रकार १६ भागोंमें विभक्त कर वह दिन और रातको व्यतीत करता है । युद्ध करनेके लिए उसका मन निरन्तर उत्साहसे भरा रहता है" ॥१॥ [४] तुममें सन्तोष करने लायक एक भी बात नहीं है। उत्साहशक्ति तुममें स्वप्नमें भी नहीं है। जव शत्रु छोटा था, तब तुमने उसे नहीं मारा, जो नखके वरावर था वह अब कुठारके बराबर हो गया, जब दशाननका नाम ही नाम हुआ में

२५१
पउमचरित
जइयतुं करें लग्गउ चन्दहासु । जइयहुँ मन्दोवरि दिण्ण नासु ॥१॥
जइयहुँ सुरसुन्दरु वधु कणउ । जइयहुँ ओसारिउ समरें धणड ॥५॥
जइयहुँ जगभूसणु धरिउ गाउ । जइयहुँ परिहविउ कियन्त-राउ ॥६॥
जइयहुँ सु-तणूयरि गउ हरेवि । अण्णु वि रयणावलि कर धरवि ॥७॥
तइयहुँ ज णाहिं जं णिहउ सत्तु । तं एवहिं घड्डारउ पयत्तु' ॥४॥
घत्ता
बुवइ सहसक्खें
'कि केसरि सिसु-करि वहइ ।
पच्चेल्लिउ हुभवहु सुक्त पायउ सुहु डहइ' ॥९॥
[५]
पञ्चत्तरु देवि गइन्द-गमणु । पुणु दुक्कु सक्कु एकन्त-भवणु॥3॥
जहि भेउ ण मिन्दइ को वि लोउ । जहिं सुअ-सारियहुँ विणाहि ढोउ ॥२॥
वहिं पइसेंवि पमणइ अमर-राउ । 'रिउ दुज्जउ एवहि को उचाउ ॥३॥
कि सामु भेउ कि उववयाणु । किं दण्ड अवुज्झित्र-परिपमाणु ॥१॥
किं
कम्मारम्भुववाय-मन्तु। किं पुरिस-दन्व-संपत्ति-वन्तु ॥५॥
कि देस-काल-पविहाय-सारु । कि विणिवाइय-पबिहार-चारु ॥६॥
कि कज्ज-सिद्धि पञ्चमउ मन्तु । को सुन्दर सच्च-विसार-वन्तु' ॥७॥
तो मारदुवाएं बुत्तु एम।
'जे पइँ पारद्धड तं जि देव ॥6॥
कज्जन्ते णवर णिचडइ छेउ । पर मन्तिहि केवल मन्त-मेड' ॥९॥
तं णिसुणे वि मणइ विसालचक्नु । 'पहु पई उग्गाहिउ कवणु पक्खु॥१०॥
घत्ता
ता अच्छा सुरवह
जो णीसेसु रज्जु करइ ।
पहु मन्ति-विहूणउ चटरनिहि मि ण संचरइ ॥३॥

सोलहमो संधि
था और जब उसने हजार विद्याएँ सिद्ध की थीं, जव उसके
हाथमें तलवार आयी थी, जब उसे मन्दोदरी दी गयी थी, जब
उसने सुरसुन्दर और कनकको वाँधा था, जब उसने युद्धसे
धनद को खदेड़ा था, जव उसने त्रिजगभूषण महागजको
पकड़ा था, जब उसने कृतान्तको सारा था, जब वह तनूदराका
अपहरण करनेके लिए गया था, और भी रत्नावलीसे पाणिग्रहण
किया था, उस समय तुमने जो शत्रुका नाश नहीं किया, उससे
अब वह इतना बड़ा हो गया ॥१-८॥
घत्ता-इन्द्र कहता है "क्या सिंह गजके वच्चेको मारता
है, बल्कि आग सूखे पेड़को आसानीसे जला देती हैं" ॥९॥
[५] यह उत्तर देकर गजगतिसे चलनेवाला इन्द्र एकान्त
भवनमें पहुँचा । जहाँ कोई भी आदमी भेदको न ले सके। जहाँ
शुक और सारिकाको भी नहीं ले जा सकते । वहाँ प्रवेश कर
अमरराज पूछता है, "इस समय शत्रु अजेय है, क्या उपाय हैं ?
क्या साम, दाम और भेद ? क्या दण्ड जिसका परिणाम अज्ञात
है ? कर्म आरम्भ और उपवयका मन्त्र क्या है, पौरुष द्रव्य
और सम्पत्तिसे युक्त होनेका उपाय क्या है ? देशकालका
सर्वश्रेष्ठ विभाजन क्या है ? प्रतिहारको किस प्रकार ठीको
विनियोजित किया जाये ? कार्यकी सिद्धिका पाँचवाँ मन्त्र
क्या है ? सत्य विचारवान् सुन्दर कौन है ?" यह सुनकर
भारद्वाजने कहा, "हे देव, जो आपने प्रारम्भ किया है, वही
ठीक है। कार्यके समाप्त होने पर ही इसका रहस्य प्रकट
होगा। परन्तु मन्त्रियोंसे केवल मन्त्रभेद करना चाहिए।"
यह सुनकर विशालचक्षु कहता है, "यह तुमने कौन-सा पक्ष
उद्घाटित किया है ? ॥१-२०॥
घत्ता–इन्द्र तो ठीक जो अशेष राज्य करता है नहीं तो प्रभु
मन्त्रीके बिना शतरंज में भी चाल नहीं चलता" ॥११॥

१५६
पठमचरिउ
[]
पारासर पमणइ विहि मणोज्नु । णउ एक्के मन्तिएँ रज्ज-कज्जु' ॥३॥
पिसुणेण कुत्तु 'वेणि वि ण होन्ति । भवरोप्परु घडवि कु-मन्तु देन्ति'॥२॥
काउटि दुबइ 'कवण मन्ति । तिणि विचेयारि विचारुमन्ति'॥३॥
मशु चवह 'गरुम वारहहे बुद्धि । जउ एक विहिं निहिं कज्ज-सिद्धि'॥४॥
संणिसुणे वि पमणइ अमरमन्ति । 'भइसुन्दरु जइ सोलह हवन्ति ॥५॥
मिगुणन्दणु वोलह 'बुद्धिवन्तु । अकिलेसें वोसहिं होइ मन्तु' ॥६॥
संणिसुणेवि चवह सहासणयणु । विशु मन्ति-सहासे मन्तु कवणु ॥७॥
अपणही अण्णारिस होइ बुद्धि । भकिले में सिज्मइ कज्ज-सिद्धि' ॥८॥
घत्ता
जयकारिठ सव्वहिं 'अम्महुँ केरी बुद्धि जइ ।
वो समउ दसासें सुन्दर सन्धि सुराहिवद ॥९॥
[.]
वुह अस्थसस्य पमणन्ति एव । कहिं लन्मइ उत्तम सन्धि देव ॥१॥
एकु वि मालिहें सिरु खु. वि धित्तु । अण्णु वि जह रावणु होइ मित्तु ॥२॥
को तउ परमेसर कवण हाणि। अहि असइ तो वि सिहि महुर-वाणि॥ ॥
बह साम-मेय-दाणेहिं जि सिद्धि । तो दण्डै पउझिएँ कवण विद्धि॥४॥
अच्छन्ति वालि-रणु संभरेवि । सुग्गीव-चन्दकर कुछ वे वि ||५||
गल-णील ते वि हियवएँ असुन्छ । सुन्वन्ति णिरारिउ अत्य-लुद्ध ॥६॥
खर-दूसणा वि णिय-पाण-मीय । कज्जेण जेण चन्दणहि णीय ॥७॥
माहेसरपुरवइ-मरुणरिन्द । अवमाणे वि वसिकिय जिह गइन्दा॥
घत्ता
माएहिं उवाएँ हिं मेइज्जन्ति गराहिवइ ।
दहवयण-णिहेलणु जाइ दूर चित्तङ्गु जइ' ॥९॥

सोलहमो संधि २५७ [६] तब पाराशर कहता है, "दो मन्त्री होनार र है। एक मन्त्रीसे राज्यकार्य नहीं होता।" नारदने कहा-"दो भी नहीं होने चाहिए । एक दूसरेसे मिलकर खोटे सलाह दे सकते हैं।" तव कौटिल्यने कहा, "इसमें क्या सन्देह है, तीन या चार मन्त्री ही सुन्दर हैं।" मनु कहते हैं, "वारह मन्त्रियोंकी बुद्धि भारी होती है, एक-दो या तीन मन्त्रियोंसे कार्य-सिद्धि नहीं होती।" यह सुनकर बृहस्पति कहता है, "अति सुन्दर है यदि सोलह मन्त्री हों तो।” भृगुनन्दन कहता है, “वीस होनेपर मन्त्र बिना कष्टके विवेकपूर्ण होता है।" यह सुनकर इन्द्र कहता है, "एक हजार मन्त्रियोंके विना कैसा मन्त्र ? एकसे दूसरेको बुद्धि होती है और बिना किसी कष्टके कार्यकी सिद्धि हो जाती है" ॥१-८॥ घत्ता-तव सबने इन्द्रका जयकार किया और कहा, “यदि हमारा मन्त्र माना जाये तो हे इन्द्र, दशाननके साथ सन्धि सुन्दर है" ॥९॥ • [७] "पण्डित और अर्थशास्त्र यही कहते है कि हे देव, उत्तम सन्धि करना कठिन है। एक तो तुमने मालिका सिर काटकर फेक दिया, दूसरे यदि रावण तुम्हारा मित्र बनता है तो इसमें क्या नुकसान है ? मयूर सॉप खाता है, परन्तु वाणी सुन्दर बोलता है। यदि साम, दाम, दण्ड और भेदसे सिद्धि होती है दण्डका प्रयोग करनेसे कौन-सी वृद्धि हो जायेगी? वालीके युद्धको याद कर सुग्रीव और चन्द्रोदर दोनों क्रुद्ध है। नल और नील, वे भी हृदयसे अप्रसन्न हैं। सुना जाता है कि वे धनके अत्यन्त लोभी हैं। खरदूषण भी अपने प्राणोंसे डरे हुए हैं। वे जिस प्रकार चन्द्रनखाको ले गये थे। माहेश्वरपुरपति और राजा मरुको अपमानित कर महागजको वशमें किया ।।१-८॥ घत्ता-इन उपायोंसे राजाका भेदन करना चाहिए। यदि चित्रांग दूत दशाननके घर जाये तो यह मुन्दर होगा" ||९|| कर लेना

२५८
पउमचरित
[८]
तं मन्ति-वयणु पडिवण्णु तेण । चित्तगत कोकिउ तक्खणेण ॥१॥
सिक्खवइ पुरन्दर किं पि जाम । गउ णारउ रावण-मवणु ताम ॥२॥
'ओसारे वि दिज्जइ कण्ण-जाउ । परिरक्खहि खन्धावार साउ ॥३॥
आवेसइ इन्दहाँ तणउ दूउ । चवीस-पवर-गुण-सार-भूउ ॥४॥
सो भेउ करेसइ णरवराहें । सुग्गीव-पमुह-विज्जाहराहँ ॥५॥
सहुँ तेण महुर-वयणेहिं तेव । वोल्लिज्जइ सन्धि ण होइ जेव ॥६॥
सो थोवउ तुहुँ पुणु पवलु भजु । आवग्गड ज लइ हरेवि रज्जु ॥७॥
एत्थु जे अवसरें संगाम सक्कु । सङ्किज्जइ गंतो पुणु असक्कु ॥6॥
मरु-जग्गै दसाणण
उवयारहों तहाँ मई
घत्ता
जं पई विग्घहं रक्खियड ।
परम-भेउ ऍहु अक्खियउ' ॥९॥
[९]
गउ णारउ कहि मि णहङ्गणेण । सेणावह वुत्तु दसाणणेण ॥१॥
'पर-गूढपुरिस ण विसन्ति जेम। परिरक्खहि खन्धावार तेम' ॥२॥
एतडिय परोप्पर वोल्ल जाव । चित्तगु स-सन्दणु आउ ताव ॥३॥
पुर-रहाडवि बहु संथवन्तु ।
णक्खन्तोमालियहन्ति-वन्तु (2) ॥४॥
रण-दुग्ग-परिगह-महि णियन्तु । उत्तरों पडुत्तर चिन्तवन्तु ॥५॥
वहुसथ-बुद्धि-णोइड सरन्तु । मारिचि-मवणु पइसइ तुरन्तु ॥६॥
स-सणेहु समाइच्छिउ करेवि । णिउ पासु णरिन्दहों करें धरेवि ॥७॥
वइसणउ दिण्णु संवाहु थोरु । चूडामणि कण्ठउ कडउ दोरु ॥6॥
पुज्जेप्पिणु कप्पिण गुण-सयाई । पुणु पुच्छित 'वलहु पमाणु काई ॥९॥

सोलहमो संधि २५९ । [८] उसने मन्त्रीके वचनको स्वीकार कर लिया। उसने तत्काल चित्रांग दूतको बुलवाया। इन्द्र उसे कुछ तो भी सिखाता है, जबतक, 'तबतक नारद रावणके पास जाता है। और उसे एकान्तमें ले जाकर कानमें कहता है, "अपने स्कन्धा- वारको सुरक्षित रखो, चौवीस श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त इन्द्रका दूत आयेगा, वह नरवरों और सुग्रीव प्रमुख विद्याधरोंमें फूट डालेगा, उसके साथ मधुर वचनोंमें इस प्रकार बात करना, जिससे सन्धि न हो । वह थोड़ा है, और आज तुम प्रवल हो, वह तुम्हारे राज्यका अपहरण कर स्थित है, इस अवसर पर संग्राममें इन्द्रको संकटमें डाला जा सकता है, नहीं तो बादमें वह अशक्य हो जायेगा" ॥१-८॥ घत्ता-“हे दशानन, मरुयज्ञमें जो तुमने विघ्नोंसे मेरी रक्षा की, उसी उपकारके कारण मैने यह परम रहस्य तुम्हें बताया" ॥९॥ [९] नारद आकाशमार्गसे कहीं चले जाते हैं। दशानन सेनापतिसे कहता है, "कोई गूढ पुरुष किसी भी प्रकार प्रवेश न कर सकें, स्कन्धावारकी ऐसी रक्षा करना।" जबतक दोनों में इस प्रकार वातचीत हो रही थी तबतक चित्रांग रथसहित वहाँ आया। पुर, राष्ट्र और अटवी तथा युद्ध दुर्ग परिग्रह और धरती को देखता हुआ, उत्तर-प्रत्युत्तरका विचार करता हुआ बहुत-से शास्त्र चुद्धि और नीतिका अनुसरण करता हुआ वह तुरन्त मारीचके भवनमें प्रवेश करता है। सस्नेह उसका आदर करके मारीच उसका हाथ पकड़कर राजाके पास ले गया। रावणने भी उसे बैठाकर बढ़िया पान, चूडामणि, कण्ठा, कटक और दोर प्रदान की। आदर कर और सैकड़ों गुणोंकी कल्पना करते हुए उसने पूछा, "आपकी कितनी सेना है ?" ||१-९||

२६०
पउमाचार
वुचइ चित्तगण
घत्ता
'किं देवहाँ सीसइ गरेण ।
जंण वि दिठ्ठ दिवायरण' ॥३०॥
तं कयणु दुलकर
[१०]
तं वयणु सुणेवि परितुछ राउ । 'मई चिन्तिउ को वि कु-दूउ आउ॥१॥
जिम सासणहरु जिम परिमियत्थु । एव हि मुणिमओ-सि णिसिद्ध-अत्थु ॥२॥
धण्णा सुरवइ तुहुँ जासु भत्त । वर-पञ्चवीस-गुण-रिद्धि पत्तु ॥३॥
मणु मणु पेसिउ कन्जेण केण' । विहसेवि
वृत्तु चित्तंगएण ॥१॥
'पहु सुन्दर अम्हहुँ तणिय बुद्धि । सुहु जीवहुँ वे वि करेवि सन्धि॥५॥
रूववइ-णाम रुवे पसण्ण ।
परिणेप्पिणु इन्दहाँ तणिय कण्ण ॥६॥
करि लङ्का-णयरिह विजय-जत्त । चल लच्छि मणूसहाँ कवण मत्त ॥७॥
घत्ता
इस वयणु महार तुम्हह सव्वहं थाउ मण।
जिह मोक्खु कु-सिद्धहाँ तेम ण सिज्झइ इन्दु रणें ॥८॥
सत्तु-संतावणेण
[१]
तं सुण वि
चित्तइगु पमणिउ रावणेण ॥१॥
'वेयड्ढहाँ सेदिहि जाई जाई। पण्णस व सहि वि पुरवराई ॥२॥
सम्बई महु अप्पें वि सन्धि करहों । णं तो कल्लए संगामें मरही' ॥३॥
तं णिसुणेवि पहरिमियगएण । दहवयणु वुत्तु चित्तगएण ॥४॥
'एक्कु वि सुरवइ सयमेव उग्गु । अण्णु वि रहणेउर-णयरु दुग्गु ॥५॥
परिममियउ परिहउ तिण्णि तासु । सरिसाउ लाउ रयणायरासु ॥६॥
संक्म वि चयारि चउदिसासु । चउ-बारई एकएँ सहासु ॥७॥
वलवन्त जन्तई मीसणाहूँ।
अक्खोहणि अक्खोहणि घणाहं ॥८॥

सोलहमो संधि पत्ता-चित्रांग कहता है, "नरकी क्या देवसे तुलना की जा सकती है" जो सूर्यने भी नही देखा, वह भी क्या उसे दुर्लध्य है ?" ॥१॥ [१०] यह सुनकर रावण सन्तुष्ट हुआ। उसने कहा, "मैने समझा था कोई कुदूत आया है, आप जैसे आज्ञाकारी हैं, वैसे ही यथार्थद्रष्टा है। आप निषिद्ध अर्थों को भी विचार करनेकी क्षमता रखते हैं, वह इन्द्र धन्य है जिसके पास तुम-जैसा दूत है, जिसे पचीस गुण और ऋद्धि प्राप्त हैं, बताइए वताइए, किस लिए तुम्हें भेजा है ।" तब हँसते हुए चित्रांगने कहा, "हे परमेश्वर, हमारा यही सुन्दर विचार है कि दोनों सन्धि कर, सुखसे जीवित रहें। रूपमें सुन्दर, रूपवती नामकी इन्द्रकी कन्यासे विवाह कर लंकानगरीमें विजययात्रा निकालें, मनुष्य- की लक्ष्मी चंचल होती है, उसकी क्या सीमा ?" ॥१-७|| पत्ता-“यह हमारा वचन, आप इसको अपने मनमें थाह ले, जिस प्रकार कुसिद्धको मोक्ष सिद्ध नहीं होता, उसी प्रकार युद्ध में इन्द्रको नहीं जीता जा सकता" ॥८॥ [११] यह सुनकर शत्रुको सतानेवाले रावणने चित्रांगसे "विजया पर्वतकी श्रेणीपर जो पचास-साठ पुरवर हैं, वे सब मुझे देकर सन्धि कर लो, नहीं तो कल संग्राममें मरो।" यह सुनकर प्रहर्षितजंग चित्रांगने रावणसे कहा, "एक तो इन्द्र स्वयं उग्र है, दूसरे उसके पास रथनूपुर नामका दुर्ग है । वह तीन परिखाओं से घिरा हुआ है जो रत्नाकरके समान विशाल हैं, चार दिशाओंमें चार परकोटे हैं, चार द्वारोंपर एक-एक हजार सैनिक है। बलवान् और भीषण यन्त्रोंकी एक- एक अक्षौहिणी है ॥१-८॥ कहा,

२६२
पउमचरित
घत्ता
जोयण-परिमाणे जो सो |उ जियइ।
जिह दुज्जण-वयणहुँ को वि ण पासु समिल्लियइ ॥९॥
[१२]
जसु एहउ अस्थि सहाउ दुग्गु । अण्णु
वि
साहणु अञ्चन्त-उग्गु ॥१॥
जसु अट्ट लक्ख भद्दहुँ गयाहुँ। वारह मन्दहुँ सोलह मया ॥२॥
संकिण्ण-गइन्दहुँ वीस लक्ख । रह-तुरय-भडहें पुणु णस्थि सद्ध ॥३॥
एहउ पहिलारउ मूल-सेण्णु । वलु वीयउ मिच्चहँ तणउ अण्णु ॥४॥
वइयउ सेणी-वलु दुण्णिवारु । चउथउ मित्त-वलु अणाय-पारु ॥५॥
दुज्जउ पञ्चमउ अमित्त-सेण्णु ।
छट्टउ भाडविउ अणाय-नाण्णु ॥६॥
रावण पुणु वूहहं पाहि छेउ । अमरा वि वलह ण मुणन्ति भेउ ।।७॥
हयनाय-रह-णर-जुज्झहुँ तहेव । सो सुरवइ जिज्जइ समरें केव ॥८॥
घत्ता
बुच्चइ दहवयणे
'जइ तं जिणमि ण आहयणे ।
जालामालाले जलणें ॥९॥
तो अप्पउ घत्तमि
[१३]
इन्दइ पभणइ 'सुर-सार-भूम। किं जम्पिएण वहवेण दूभ ॥३॥
जं किउ जम-धणयहुँ विहि मि साह । जे सहसकिरण-णलकुवराह ॥२॥
तंतुह वि करेसह ताउ अज्जु ।
लहु ठाउ पुरन्दरु जुज्झ-सज्जु ।।
तं वयणु सुणे वि उट्टन्तएण। चित्ततें बुच्चइ जन्तएण ॥४॥
'णिम्मन्तिमो-सि इन्देण देव । विजयन्त इन्दइ तुहु मि तेव ।।५।।
सिरिमालि कुमार हिं ससिधएहिं । सुग्गीव तुहु मि साहद्धएहि ॥६॥

सोलहमो संधि २६३ पत्ता-जो व्यक्ति एक योजनके भीतर चला जाता है वह जीवित नहीं बचता, उसी प्रकार, जिस प्रकार 'दुर्जन मनुष्यसे कोई नहीं मिलता ॥९॥ [१२] जिसके ऐसे सहायक और दुर्ग हों तथा दूसरे भी साधन अत्यन्त उग्र हां। जिसके पास आठ लाख भद्रगज हों, बारह लाख मन्द और सोलह लाख मृगगज, बीस लाख संकीर्ण गज हों, तथा रथ, अश्व और योद्धाओंकी संख्या ही नहीं है । यह उसकी पहली मूल सेना है, दूसरी सेना अनुचरों की है। तीसरा दुनिर श्रेणी वल है, चौथा अज्ञातपार मित्र- बल है, पॉचवी अजेय अमित्र सेना है, छठी है आटविक सेना, जिसकी गणना अज्ञात है। हे रावण, उसकी व्यूह-रचनाका अन्त नहीं है, देवता भी उसकी सेनाका भेद नहीं जानते । अश्व, गज, रथ और नरोंके उस युद्धमें वह इन्द्र तुम्हारे द्वारा कैसे जीता जा सकता है ? ॥१-८॥ घत्ता-दशवदनने तब कहा, "यदि उसे मै युद्ध में नहीं जीतूंगा तो ज्वालमालाओंसे युक्त आगमें अपने आपको होम दूंगा?" ॥९॥ [१३] इन्द्रजीत कहता है-"हे सुरसारभूत दूत, बहुत कहनेसे क्या? जो हाल हमने यम और धनदका किया, और जो सहस्रकिरण और नलकूबरका!तात,आज वही हाल तुम्हारा करेगा । इसलिए इन्द्र ठहरे और युद्ध के लिए तैयार हो जाये।" यह वचन सुनकर और उठकर जाते हुए चित्रांगने कहा, "हे देव, इन्द्रके द्वारा आप निमन्त्रित है, इन्द्रजीत विजयन्तके द्वारा तुम भी आमन्त्रित हो। श्रीमालि कुमार शशिध्वजके द्वारा आमन्त्रित है, सुग्रीव, तुम भी शाखाध्वजियों (वानरों)के द्वारा आमन्त्रित हो, यमराजके द्वारा जाम्बवान्, नल और नील,

२६५
पउसचरित
जमराएं जम्बव-गील पलहों।
सोमेण विहीलण कुन्मयण्ण ।
हरिकेसि हत्य-पहत्य-खलहों ॥७॥
सदरहि मिहि मि के वि अण्ण ||८
परिवाहिएँ तुम्ह?
घत्ता
दिण्णरु एउ णिमन्तणउ।
गरज-पहारा-मोयण ॥९॥
मुक्षेवट सहि
[ १४ ]
गड एम मण वि चित्तगु तेत्यु ।
सुर-परिमित
सुरवर-राउ नत्थु ॥१॥
'परमेसर दुजउ जाउहाण।
ण करेइ सन्धि तुम्हें हिं समाणु' ॥२
तं णितुणे वि पक्लु अराइ-परख । सगज्झइ सरहसु दससयक्तु ॥३॥
हय भरि-वर पडु पठह वज। किय मत्त महागय सारि-सज्ज nen
पक्सरिय
तुरङ्गम इत्त सयड। जस-लुद्ध कुद्ध सण्णद्ध सुहढ ॥५॥
वीसावतु वसु रण-भर-समत्य । जम-ससि-कुवेर पहरण-विहत्य ॥६॥
किंपुरिस गरुड गन्धव सक्ख । किण्णर गर अमर विरल्लियक्ख ॥
संणयर-पलोलिहि वलु ण माइ। तंणहयलेण उत्पऍवि जाइ ॥८॥
घत्ता
णिग्गउ भइरावएँ चडि।
गं विल्यहाँ उप्परि
सरय-महावणु-पायडिउ ॥९॥
सपणहें वि पुरन्दर
[ १५ ]
मिग-मन्द नद-संकिण्ण-पाएँहि । घड विरऍवि पञ्चहि चाव-सऍहि ॥१॥
पिउ नग्गएँ पच्छएँ मड-समूहु । सेणावइ-मन्तिहिं रइस वूहु ॥२॥
सुरवर स-पवर-पहरण-कराल । घण-कपसहि पाहि लोयवाल ||
उसियाहर रतुप्पल-दलक्ख ।
गएँ गएँ पण्णारह गत्त-रक्स ॥धा
हय पञ्चपञ्चचञ्चल वलग। मढ तिण्णि तिण्णि हऍहएँ स-सग्ग।।५
ऍट वेत्तिट रक्तणु गयवरातु । तेचित न पुणु वि थिट रहवरासु ॥६॥

सोलहमो संधि २६५ प्रवल शत्रुपक्ष हरिकेशके द्वारा खल-हस्त और प्रहस्त, सोमके द्वारा विभीषण और कुम्भकर्ण निमन्त्रित है। इसी प्रकार दूसरों-दूसरोंके द्वारा दूसरे-दूसरे आमन्त्रित हैं ॥१-८|| पत्ता-परम्पराके अनुसार ही तुम्हें यह निमन्त्रण दिया गया है, तुम सब भारी प्रहारोंका भोजन करोगे!" ॥९॥ [१४] यह कहकर चित्रांग वहाँ गया जहाँ देवताओंसे घिरा हुआ इन्द्र था। वह बोला, "परमेश्वर, राक्षस अजेय है, वह तुम्हारे साथ सन्धि करनेको तैयार नहीं है।" यह सुनकर त्रुपक्ष और इन्द्र तैयार होने लगा। भेरी और तूर्य, पट्ट-पटह तथा वज्र वजा दिये गये। मत्त महागजोंकी झूलें सजा दी गयीं। तुरंगको कवच पहना दिये। रथ जोत दिये गये। यश के लोभी क्रुद्ध सुभट तैयार होने लगे। रणभारमें समर्थ विश्वावसु, वसु हाथमें हथियार लेकर, जम-शशि और कुवेर, किंपुरुष, गरुड़, गन्धर्व और यक्ष-किन्नर, नर और विर- ल्लियाक्ष अमर । जव नगरके मुख्य द्वारपर सेना नहीं समायो तो वह उछलकर आकाश तलमें जा पहुँची ।।१-८॥ पत्ता-इन्द्र सन्नद्ध होकर ऐरावतपर चढ़ गया मानो विन्ध्याचलके ऊपर शाके महाधन आ गये हों ।।९।। [१५] मृग-मन्द-भद्र और संकीर्ण गजों और पांच सौ धनुर्धारियोंसे घटाकी रचनाकर, आगे-पीछे भद्र समूह बैठ गया । सेनापति और मन्त्रियोंने व्यूहकी रचना की। प्रवर हथियारोंसे भयंकर सुरवर सघन कक्षों और पक्षों में लोकपाल, ओठ चवाते हुए, रक्त कमलके समान आँखोंवाले पन्द्रह अंग- रक्षक प्रत्येक गजके पास थे। पाँच-पाँच चंचल अश्व रखे गये, प्रत्येक अश्वके साथ तीन-तीन योद्धा तलवारके साथ रखे गये। महागजोंका यह जितना भी रक्षण था, उतना ही रक्षण रथवरों पउमचरित घउदह अङ्गलिहिं णरो णरासु । पञ्चहि पञ्चहि गउ गयवरासु। रयणिहि तिहिं तिहि हउ हयवरासु।।७ धाणुक्किउ छर्हि धाणुकियासु ॥४॥ घत्ता तं वूहु रएप्पिणु समरगणे मेइणि भीसणु दूर-वमालु किउ। सक्कु स ई भू सैवि थिउ ॥९॥ [१७. सत्तरहमो संधि] मन्तणएँ समत्तएँ दूएँ णियत्तएँ उभय-वलहँ अमरिसु चडइ । तइलोक-मयङ्करु सुरवर-डामरु रावणु इन्दहों अमिडइ ।। [१] किय करि सारि-सज्ज पक्वरिय तुरय-थट्टा । उब्भिय धय-णिहाय स-विमाण रह पया ॥१॥ भाहय समर-भेरि भोसावणि । सुरवर-वइरि-वीर-कम्पावणि ॥२॥ हत्थ-पहस्थ करें वि सेणावइ । दिण्णु पयाणउ पचलिउ णवह ॥३॥ कुम्भयपणु लकेस-विहीसण । णल-सुग्गीव-णील-खर-दूसण ॥४॥ मय-सारिच्च-मिच्च-सुअसारण । अङ्गड्य-इन्दइ-घणवाहण ॥५॥ रण-रसेण मिजन्त पधाइय । णिविसे समर-भूमि संपाविय ॥६॥ पञ्चहिं धणु-सएहिं पहु देप्पिणु । रिउ-चूहहाँ पडिवू हु रएप्पिणु ॥७॥ णिवडिउ जाउहाण-बलु सुर-वलें। पहय-पडह-परिवढिय कलयले ।। जाउ महाहउ भुवण-भयकरु । उद्विउ रउ महलन्तु दियन्तर १९॥

सत्तरहमो संधि का था। नर से नरके बीच १४ अँगुलियोंकी दूरी थी, रात्रिमें ११ । उतनी ही अश्वसे अश्वके वीचमें भी। गजवरसे गजवरके बीच पाँच और धनुर्धारीसे धनुर्धारीके बीच ६ अँगुलियों की ॥१-८॥ धत्ता-उस व्यूहकी रचना कर उन्होंने तूर्योका भीषण कोलाहल किया, उस समय ऐसा लगा मानो युद्धके प्रांगणमें धरती और इन्द्र स्वयं अलंकृत होकर स्थित थे ॥९॥ सत्रहवों सन्धि मन्त्रणा समाप्त होने और दूतके वापस जानेपर दोनों सेनाओंमें रोप बढ़ गया। त्रिलोकभयंकर और देवताओंक लिए भयंकर रावण इन्द्रसे भिड़ जाता है। [१] हाथी अम्बारीसे सजा दिये गये, अश्व-समूहको कवच पहना दिये गये । ध्वजसमूह उड़ने लगे। विमान और रथ चलने लगे। भयंकर समरभेरी बजा दी गयी जो इन्द्रके शत्रुओंको कँपा देनेवाली थो। हस्त और प्रहस्तको सेनापति बनाकर, प्रयाण देकर राजा स्वयं चला। कुम्भकर्ण, लंकेश- विभीषण, नल, सुग्रीव, नील, खरदूषण, मय, मारीच और भृत्य, सुतसारण, अंग, अंगद, इन्द्रजीत और धनवाहन। रणरस (उत्साह) से भीगे हुए सब लोग युद्धके लिए दौड़े और पलमात्रमें युद्धभूमिमें पहुंच गये । रावण भी पाँच सौ धनुषोंसे मार्ग देकर शत्रुन्यूहके विरुद्ध प्रतिव्यूहकी रचना करता है। देवसेना राक्षस सेनापर टूट पड़ी। आहत नगाड़ोंका कोलाहल होने लगा। भुवनभयंकर महायुद्ध हुआ। धूलि दिशान्तरोंको मैली करती हुई छा गयी ॥१-२||

पउमचरित
घत्ता
णर-हय-गय-गत्तई रह-धय-छत्तई सम्बई खणे उधूलियई।
जिह कुलई दुपुत्ते तिह वड्ढन्ते वेण्णि वि सेण्णई मइलियई ॥१०॥
[२]
विम्मम-हाव-भाव-मूमङ्गरच्छराई ।
जायइँ सुर-विमाणइं धूलिधूसराई ॥३॥
ताव हेइ-घट्टणेण करालउ। उच्छलियउ सिहि-जाला-मालउ ॥२
सिवियहि छत्त-धऍहि लग्गन्ति । अमर-विमाण-सयाई दहन्तिउ ॥३॥
पुणु पच्छल सोणिय-जल धारउ । स्य-पसमणउ हुभास-णिवारउ ॥४॥
ताहिं असेसु दिसामुहु सित्तउ । थिउ णहु णाई कुसुम्भऍ वित्तउ ॥५॥
अण्णउ परियत्तउ गयणनहीं। णं घुसिणोलिउ णह-सिरि-अङ्गहाँ ॥६॥
जान वसुन्धरि गहिरायग्विरि ।
सरहस-सुहड-कवन्ध-पणच्चिरित्र
करि-सिर-मुत्ताहलेहिं विमीसिय । सन्झ व ताराइण्ण पदीसिय ॥८॥
रह खुप्पन्ति वहन्ति ण चकइ । वाहण-जाण-विमाण थकई ॥९॥
घत्ता
तेहएँ वि महारणें मेहणि-कारणें रत्तै नमन्ते तरन्ति गर ।
जुज्झन्ति स-मच्छर तोसिय-अच्छर णाई महण्णवें वारियर ॥१०॥
[३]
तो गज्जन्त-मत्त-मायङ्ग-वाहणेणं ।
अमरिस-कुछएण गिव्याण-साहणेणं ॥१॥
जाउहाण-साहणु पडिपेल्लिउ । णं खय-सायरेण जगु रेलिउ ॥२॥
णिसियर परिभमन्ति पहरण-भुभ । णं आवत्त-शुद्ध जल-वृन्खुव ॥३॥

सत्तरहमो संधि २६९ घत्ता-मनुष्य, अश्व और हाथियोंके शरीर, रथ, ध्वज, छत्र सव एक क्षणमें धूलसे भर गये। जिस प्रकार खोटे पुत्रोके बढ़नेसे कुल मैले हो जाते हैं, वैसे ही दोनों सेनाएँ धूल-से मैली हो गयीं ॥१०॥ [२] विभ्रम हाव-भाव और भ्रूभंगसे युक्त अप्सराएँ और देवताओंके विमान धूलसे धूसरित हो गये। इतने वज्रके संघर्षसे उत्पन्न भयंकर आगकी ज्वालमाला उठी, जो शिवि- काओं और छत्रध्वजोंसे लगती हुई सैकड़ों अमरविमानोंकों जलाने लगी। फिर वादमें रक्तकी धारासे धूल शान्त हुई और आगका निवारण हुआ। उस रक्तधारासे अशेप दिशामुख सिक्त हो गये और आकाश ऐसा लगा जैसे कुसुम्भरंगमें डाल दिया गया हो, अथवा नमरूपी लक्ष्मीका कुंकुम-जल आकागमें फैल गया हो। रक्तसे लाल धरती, सुभटोंके वेगपूर्ण धड़ोंसे जैसे नाच रही हो, हाथियोंके सिरोंसे गिरे हुए मोतियोंसे मिश्रित वह ऐसी लगती थी मानो नक्षत्रोंसे व्याप्त सन्ध्या दिखाई रही हो । रथ (कीचड़में ) गड़ गये, उनके पहिये नहीं चलते थे, वाहन, विमान और यान रुक गये ॥१-९॥ पत्ता-धरतीके लिए लड़े गये उस महायुद्धमें मनुष्य रनमें तिर रहे हैं। ईर्ष्यासे भरकर और अप्सराओंको सन्तुष्ट करते हुए ऐसे लड़ते हैं मानो महासमुद्रमें जलचर लड़ रहे हो॥१०॥ [३] तब, गरज रहे हैं मतवाले महागज जिसमें, ऐसी देवसेना क्रोध और अमर्पसे भरकर राक्षसोंकी सेनापर उसी प्रकार पिल पड़ती है जैसे प्रलय-समुद्र विश्वपर। हाथमें प्रहरण लिये हुए राक्षस घूम रहे हैं मानो क्षुब्ध और जलके बुलबुलों-

पउमचरित
पेक्खें वि णिय-वलु ओहट्टन्त ।
पेक्स वि उत्थल्लन्त छत्तई।
पेखें वि फुटन्त, रह-वीढई।
पेक्दैवि हयवर पाडिजन्ता ।
मायामप्पिणु रहनाय-वाहणें।
वाणर-चिन्धु महागय-सन्दणु ।
सुरवगला मुहें आवदृन्तउ ॥४॥
मत्त-गय मिजन्तई गत्तई ॥५॥
जाण-विमाणइँ ममरुवगीढह ॥६॥
सुहड-मडफ्फर साडिज्जन्ता ॥७॥
भिडिउ पसण्णकित्ति सुर-साहणे ॥८॥
चाव-विहत्थु महिन्दहाँ गन्दणु ॥९॥
घत्ता
गर-हय-गय तज्ज वि रह-धय मा वि वूहहाँ मझें पइहु किह ।
वम् हि विन्धन्तउ जीविउ लिन्तउ कामिणि-हियउ वियड्ड जिह॥१०॥
[४]
सुरवर-किङ्करहि उत्थरै वि अहिमुहेहिं ।
लइड पसपणकित्ति तिक्वेहि सिलिमुहेहिं ॥३॥
तो एत्थन्तर दिढ-मुअ-डालें। रावण-पित्तिएण सिरिमाले ॥२॥
रहवर वाहिउ सुरवर-वन्दहों। पढमउ 'मिट्टु महाहवें चन्दहो॥१॥
कुन्त-विहत्थहों सीहारुतहों। जयसिरि-पवर-णारि-अवगूढहाँ ॥४॥
'भरै स-अलङ्क वङ्क महिलाणण । पुरउ म थाहि जाहि मयलन्छण' 141
तं णिसुर्यों वि ओखण्डिय-माण। ल्हसिउ मियङ्गु थक्कु जमराणउ ॥
महिसारुद्ध दण्ड-पहरण-धरु । विहुमण-जण-मण-णयण-मयकलासा
सो वि समुस्थरन्तु दणु-दुद्दउ ।
किट णिविसद्ध पाराउट्ठ ॥८॥
ताम कुबेरु थक्कु सवढम्मुहु । किड णाराऍहि सो वि परम्मुहु ॥९॥
घत्ता
सिरिमालि धणुद्धरु रणमुहँ दुद्धरु धरै वि ण सक्किउ सुरवर हिं।
संताउ करन्तर पाण हरन्तर वम्महु जेम कु-सुणिव हिं ॥१०॥

सत्तरहमो संधि
वाले आवत हों। अपनी सेना नष्ट होती और सुरोंके बगुला-
मुखमें जाती हुई देखकर, उछलते हुए छत्र और मत्तगजोंके
नष्ट होते हुए शरीर देखकर, फूटे हुए रथपीठ और भ्रमरोंसे
आलिंगन यान-विमान देखकर, यवरोंको गिरते और सुभटों-
का घमण्ड नष्ट होते हुए देखकर, प्रसन्नकीर्ति रथ और गजसे
युक्त सुरसेनासे आयामके साथ भिड़ गया, कपिध्वजी, महागज
जिसके रथमें जुता है और धनुष जिसके हाथमें है ऐसा वह
महेन्द्रका पुत्र ॥१-९॥
घत्ता-नर, हय और गजोंकी भर्त्सना कर, रथध्वजोंको
भग्न कर वह व्यूहके बीच इस प्रकार स्थित था जैसे कामसे
विद्ध जीवन लेता हुआ विदग्ध कामिनी-हृदय हो ॥१०॥
[४] इन्द्र के अनुचरोंने सामने आकर तीखे तीरोंसे प्रसन्न-
कीतिको विद्ध कर दिया। इसी बीच दृढभुजरूपी शाखा-
वाले रावणके पितृव्य श्रीमालने अपना रथ देवसमूहकी ओर
बढ़ाया, पहले वह महायुद्ध में चन्द्रमासे भिड़ा, जिसके हाथमें
माला था, जो सिंहपर आरूढ़ था और विजयलक्ष्मीसे
आलिंगित था। (श्रीमालने ललकारा)-"अरे कलंकी वक्र
महिलानन ! मृग लांछन, मेरे सामने खड़ा मत रह, चला जा।"
यह सुनकर, खण्डितमान चन्द्रमा खिसक गया। तव यमराज
सामने आया, भैंसेपर बैठा हुआ, हाथमें दण्ड लिये हुए ।
त्रिभुवनके जनमन और नेत्रों के लिए भयंकर । उछलते हुए उस
दुष्ट दानवका भी आधे पलमें पार पा लिया। तब कुवेर सामने
आया । परन्तु उसने तीरोंसे उसे भी विमुख कर दिया ॥१-९।।
घत्ता-युद्धमें धनुर्धारी श्रीमाली दुर्धर-सा मुखरोंके द्वारा
वह पकड़ा नहीं जा सका उसी प्रकार, जिस प्रकार कुसुनिवरों
द्वारा संताप करनेवाला और प्राणोंका अन्त करनेवाला कामदेव
वशमें नहीं किया जा सकता ॥१०॥

२५२
पउमचरिउ
[५]
भग्गे कियन्त समरें तो ससि-कुवेर-राए ।
केसरि-कणय-हुअवहा मल्लवन्त-जाए॥१॥
तिण्णि वि मिडिय खत्तु आमेलॅवि । धय-धूवन्त महारह पेल्लेंवि ॥२॥
तीहि मि समकण्डिउ रयणीयरु। णं धाराहर-घणे हि महीहरु ॥३॥
सरवर-सरवरेहिं विणिवारिय । तिण्णि वि पुटि देन्त ओसारिय ॥४॥
अमर-कुमार णवर उद्धाइय।
रिउ जिह एक्कहिं मिलेंवि पराइय ॥५॥
लइय सिलीमुहेहि सिरिमादि । परम-जिणिन्द-चरण-कमलालिं ॥६॥
अद्धससीहिं सीस उच्छिण्णइँ । णं णीलुप्पलाइ विक्खिण्णइँ ॥४॥
जउ जउ जाउहाणु परिसकह । तउ उ अहिमुहु को वि ण थक्कइ॥८॥
णिऍवि कुमार-सिरई छिजन्तई। रण-देवयह वलि व दिजन्तह ॥९॥
घत्ता
सहसक्नु विरुज्झइ किर सण्णज्झइ ताव जयन्ते दिण्णु रहु ।
'मई ताय जियन्ते सुहड-कयन्ते अप्पुणु पहरणु धरहि कहु' ॥३०॥
[ ६ ]
जयकारेवि सुरवई धाइभो जयन्तो ।
'णिसियर थाहि थाहि कहिं जाहि
महु
जियन्तो ॥१॥
वाहि वाहि सवडम्मुहु सन्दणु ।
हउँ धव देमि पुरन्दर-णन्दणु ॥२॥
तीरिय-तोमर-कण्णिय-धायहुँ। वहु-वावल्ल-मल्ल-णारायहुँ ॥३॥
भद्धससिहि खुरुप्प-खेल्लग्गहुँ । पटिस-फलिह-सूल-फर-खग्गहुँ ॥१॥
मोग्गर-लउडि-चित्तदण्डुण्डिहिं । सन्वल-हुलि-हलमुसल-भुसुण्डिहिप
झसर-तिसत्तिपरसु-इस-पासहुँ । कणय-कोन्त-घण-चक-सहासहुँ ॥६॥
रुक्ख-सिलायल-गिरिवर घायहुँ। हवि-जल-पवण-विज्जु-संघायहुँ ॥७॥
तं णिसुणे वि सिरिमालि-पहरिसिउ । सुरवइ-सुअहों महारहु दरिसिउ॥८॥
'पइँ मेल्लेप्पिणु जय-सिरि-लाहा। को महु अण्णु देइ धव आहवें ॥९॥

सत्तरहमो संधि २७३ [५] उस युद्ध में कृतान्त, चन्द्र, कुवेरराज, केशरी, कनक, अग्नि और माल्यवन्तके नष्ट होनेपर तीनों क्षमाभाव छोड़कर फहराती हुई ध्वजाओंवाले वे महारथी निशाचर इस प्रकार भिड़ गये, मानो मूसलाधार मेघ पहाड़ोंसे टकरा गये हों।" श्रेष्ठ तीरोंसे श्रेष्ठ तीर काट दिये गये। वे तीनों पीठ देकर भाग गये। केवल नये अमरकुमार दौड़े। और जहाँ शत्रु था वहाँ आकर स्थित हो गये। शिलीमुखोंसे श्रीमालिको इस प्रकार ले लिया जैसे भ्रमर जिनभगवान्के चरणोंको। अर्धचन्द्रसे चन्द्रमा का सिर काट दिया, और नील कमल फैला दिये गये हों, जहाँ-जहॉ राक्षस पहुँचता है, वहाँ-वहाँ उसके सामने कोई नहीं टिक सका । विखरे हुए छत्र कुमारोंके सिर ऐसी शोभा पा रहे हैं, मानो युद्धके देवताके लिए बलि दे दी गयी हो ॥१-९|| धत्ता-तब इन्द्र विरुद्ध हो उठता है, और सन्नद्ध होता है, इतने में जयन्त अपना रथ बढ़ाता है, "हे तात, सुभटोंके लिए यम के समान मेरे रहते हुए आप शस्त्र धारण क्यों करते हैं ?"॥१०॥ [६] इन्द्रकी जय बोलकर जयन्त दौड़ा, "निशाचर ठहर, कहाँ जाता है मेरे जीते हुए ? सामने अपना रथ वढा, इन्द्रपुत्र तुझे चुनौती देता हूँ, तीरिय, तोमर और कर्णिकाके आघातसे, प्रचुर वावल्ल भालों और तीरोंसे, अर्धचन्द्रो, खुरुप्प और शैलानोंसे, पट्टिस-फलिह-शूल-फर और खड्गसे, मुद्गर-लकुटी-चित्रदण्ड और डण्डिसे, सव्वल-हूलि-हल-मुसल और भुसुण्डीसे, झसर-त्रिशक्ति-फरसु और इबुपासोंसे, हजारों कनक-कोंत-घन-चक्रोंसे, वृक्ष-शिलातल और गिरिवरके आघातासे, अग्नि, जल, पवन और विद्याओंके संघातोंसे।" -यह सुनकर श्रीमाल हॅसा और उसने अपना महारथ इन्द्रके सामने कर दिया और कहा, "तुम्हें छोड़कर दूसरा कोन युद्ध में चुनीती दे सकता है"।। १-९॥

३७१
पउमचरित
घत्ता
तो एव विसेसेंवि सर संपेलवि छिण्णु जयन्तहों तणउ धउ ।
गयणगण-लच्छिह कमल-दलच्छिहें हारु णाई उच्छलेंवि गउ ॥१०॥
[७]
दहमुह-पित्तिएण दणु-देह-दारणेणं ।
मुसुमूरिउ महारहों कणय-पहरणेणं ॥१॥
एउ ण जाणहुँ कहिं गउ सन्दणु । चुक्कउ कह वि कह वि सुर-णन्दणु॥२॥
दुक्खु दुक्खु मुच्छा-विहलवल। उहिउ उद्ध-सुण्ड गं मयगलु ॥३॥
मीसण-भिण्डिवाल-पहरण-धरु ।
जाउहाण-रहु किउ सय-सकरु ॥४॥
सो वि पहार-विहुरु णिच्चेयणु । मुच्छ पराइड पसरिय-चेयणु ॥५॥
धाइउ धुणेवि सरीरु रणझण। कूर महागहु णाई णहगणें ॥६॥
विणि मि दुजय दुद्धर पवयल। विण्णि मि भीम-गयासणि-करयला
वेणि मि परिममन्ति णह-मण्डलें। लीह दिन्ति रावणे आखण्डलें ॥८॥
सुरवइ-णन्दणेण मायामेंवि । कुलिस-दण्ड-सण्णिह गय-मामवि॥९॥
घत्ता
आहउ वच्छत्थले पडिड रसायलें पाण-विवजिउ रयणियर।
जउ जाउ जयन्तहों णिसियर-तन्तहाँ चित्तु णाई सिरे रय-णियरु ॥१०॥
[0]
जं सिरिमालि पाडिमो अमर-णन्दणेणं ।
ता इन्दइ पधाविभो समड सन्दणेणं ॥१॥
अरे दुन्विपढ्ढ
मम ताउ वहवि कर्हि नाहि सण्ढ॥२॥
वलुवलु हयास
मई जीवमाण कहि जीवियास' ॥३॥
वयणेण तेण
मरें धणुहरु किउ सुर-णन्दणेण ॥४॥
उत्थरिय वे वि
समरगणे सर-मंडवु करवि ॥५||
रिउ महणेण
आयामें वि दहमुह-णन्दणेण ॥६॥

सत्तरहमो संधि धत्ता-इस प्रकार अपनी विशेपता बताकर और तीर चलाकर उसने जयन्तका ध्वज छिन्न-भिन्न कर दिया, मानो कमलके समान नेत्रोंवाली गगनरूपी लक्ष्मीका हार ही उछलकर चला गया हो ॥ १०॥ [७] राक्षसोंके शरीरोंका विदारण करनेवाले कनक अखसे दशमुखके पितृव्य (चाचा) ने उसके रथको तहस-नहस कर दिया । यह भी पता नहीं लगा कि रथ कहाँ गया, किसी प्रकार इन्द्रका पुत्र वच गया। मूर्छासे विह्वल वह बड़ी कठिनाईसे ऐसे उठा, जैसे ऊपर सूंड़ किये हुए महागज हो। भीषण भिन्दिपाल शस्त्रको धारण करनेवाले उसने राक्षसके रथके सौ टुकड़े कर दिये, प्रहारसे विधुर वह संज्ञाशून्य हो गया। मूर्छा चली गयी, उसमें चेतना आ गयी। अपना शरीर धुनता हुआ वह आकाशमें क्रूर महाग्रहके समान दौड़ा। दोनों ही अजेय और प्रवल थे। दोनोंके हाथमें भयंकर गदाएँ थीं। दोनों आकाशमें घूम रहे थे, इन्द्र और रावणकी लीक देते हुए । तब इन्द्रपुत्रने वज्रदण्डके समान, आयामके साथ गदा घुमाकर ॥१-९॥ पत्ता-वक्षस्थलपर आघात किया। निशाचर प्राणविहीन होकर रसातलमे जा गिरा। जयन्तकी जीत हो गयी, मानो निशाचर समूहके सिरपर धूल पड़ गयी।॥१०॥ [८] जर अमरपुत्र इन्द्रने श्रीमालको मार दिया, तो उसके सामने इन्द्रजीत दौड़ा, "अरे दुर्विदग्ध, धूर्त, मेरे तातको मारकर कहा जाता है ? हताश मुड़-मुड़, मेरे जीते हुए तुझे जीनेकी आशा कैसे ?" यह वचन सुनकर अमरपुत्रने अपने हाथमे धनुष ले लिया। तीरोंका मण्डप तानकर, वे दोनों युद्धके प्रांगणमें उछले । शत्रुका नाश करनेवाले दाग-मुखके । ?

२७६
पउमचरित
विणिहय-पहर हि
रक्सिउ सरोरु
उप्पऍवि जाम
सण्णाहु छिण्णु तीसहि सरेहि ॥७॥
कह कह वि णाहिं कप्परिउ वीलाना
किर धरइ पुरन्दरु पत्तु ताम ॥९॥
घत्ता
उग्गामिय-पहरणु चोइय-वारणु अन्तरै थिउ अमराहिवइ ।
भरें परिवर-महण रावण-णन्दण उवार बलि चारहडि जइ ॥१०॥
[१]
खत्तु मुएवि सन्वेहि मिडि-मासुरेहिं ।
लक्षाहिवहाँ णन्दणी वेडिभो सुरहिं ॥१॥
वेटिड एकु अणन्तर्हि रावणि । तो वि ण गणइ सुहड चूणामणि ॥२॥
रोकड वळइ धाइ अन्मिइ । रिट पण्णास-सट्टि दलवइ ॥३॥
सन्दण सन्दणेण संचूरइ गयवर गयवरेण मुसुमूरइ ॥४॥
तुरउ तुरङ्गमेण विणिवायइ । णरवर णरवर-धाएँ घायइ ॥५॥
जाम वियम्मइ सन्वाया। ताव सु-सारहि सम्भइ-णाम ॥६॥
पमणइ 'रावण किं णिचिन्तउ।
मल्लवन्त-णन्दणु अत्यन्त ॥७॥
अण्णु वि रावणि उइउ अखत्ते । वेढिठ सुरवर-वलेंण समतें ॥४॥
दुजउ जइ वि महाहवें सभइ । एक्कु अणेय जिणेंवि किं सकई ॥९॥
घत्ता
ते वयणे रावणु जण-जूरावणु
चडिउ महारह खग्ग-करु ।
लक्खिनइ देवहि वहु-अवळे हि णाई कियन्तु जगन्तयरु ॥१०॥
[..]
दूरत्येण णिसियरिन्देण सुरवरिन्दो।
सीहेणं विरुद्धणं जोइनो गहन्दो ॥१॥

मत्तरहमो संधि २३७ पुत्र इन्द्रजीतने आयाम करके, शस्त्रोंको आहत करनेवाले तीस तीरोंसे उसका कवच छिन्न कर दिया। शरीर किसी प्रकार वच गया, वह कटा नहीं। जैसे ही वह उछलकर उसे पकड़ने- वाला था, वैसे ही इन्द्र वहाँ आ गया। ॥१-९|| पत्ता-शस्त्र लिये हुए, हाथीको प्रेरित करके अमरराज बीचमें आकर स्थित हो गया और बोला, "अरे शत्रुका मर्दन करनेवाले रावणपुत्र, यदि वीरता हो तो मेरे ऊपर उछल"॥१०॥ [९] इस प्रकार क्षात्रधर्मको ताकमें रखते हुए, भौहोसे भास्वर सभी देवोने लंकाराजके पुत्र इन्द्रजीतको घेर लिया । एक रावणपुत्रको अनेकोने घेर लिया, वह सुभट श्रेष्ठ तब भी उनको कुछ नहीं गिनता। रोकता है, मुड़ता है, दौड़ता है, लड़ता है, पचास-साठ शत्रुओं का सफाया कर देता है। रथको रथसे चूर कर देता है, गजवरको गजवरसे कुचल देता है। तुरंगको तुरंगसे गिरा देता है, मनुष्य, मनुष्यके आघातसे घायल होता है। इस प्रकार जब इन्द्रजीत पूरे आयामके साथ सवको अश्चर्यमे डाल रहा था कि इतनेमे सन्मति नामक सारथी कहता है, "आप निश्चिन्त हैं माल्यवान्का पुत्र मारा गया है, और भी इन्द्रजीतको अक्षात्रभावसे घेर लिया है समस्त सुरवर सेनाने । महायुद्धमें यद्यपि वह अजेय है, फिर भी अकेला वह अनेकोंको कैसे जीत सकता है ?" ॥१-९|| पत्ता-यह शब्द सुनकर जनोंको सतानेवाला रावण हाथमें तलवार लेकर महारथमें चढ़ा, अत्यन्त अहंकारसे भरे हए देवोंने उसे जगका अन्त करनेवाले कृतान्तकी तरह देखा ॥१॥ [१०] दूरस्थ निझाचरराजने सुरराजको इस प्रकार देखा, जैसे विरुद्ध होकर सिंह गजराजको देखता है । वह कहता है,

पउमचरित
'सारहि वाहि वाहि रहु तेत्तहें। आयवत्तु आपण्डुरु जेत्तहँ ॥२॥
जेत्तहँ अइरावणु गलगजइ ।
जेत्तहें भीसण दुन्दुहि वजइ ॥३॥
नेत्तहें सुरवइ सुर-परिगरियउ । जेत्तह वज-दण्ड करें धरियउ' ॥४॥
तं णिसुणे वि सम्मइ उच्छाहिउ । पूरिउ सङ्ख महारहु वाहिउ ॥५॥
किउ कलयलु दिण्णई रण-तूरई। हसियई सणि-जन-मुहई व कूरई ॥६॥
समरु घुटु वलइ मि अभिट्टई। रण-रसियई सण्णाह-विसट्टई ॥७॥
पवर-तुरझम पवर-तुरङ्गहुँ । भिडिय मयन मत्त-मायनहुँ ॥४॥
रह रहबरहुँ परोप्परु धाइय। पायालहुँ पायाल पराइय ॥९॥
धत्ता
मेल्लिय-हुक्काई दिण्ण-पहारई सिर-कर-णाल णमन्ताई।
मिडियई अ-णिविण्णई वेण्णि मि सेण्णई मिहुणई जॅम भणुरत्ताई ॥१०॥
[११]
जाउ महन्तु आहवो विहिं विहि जणाहुँ ।
इन्दइ-इन्दतणयहुं इन्द-रावणाहुं ॥१॥
रयणासव-सहसार-जणेरहुँ । मय-मेसइ-मारिच्च-कुवेरहुँ ॥२॥
जम-सुग्गीवहुँ दूसम-सोलहुँ । अणल-णलहुँ पलयाणिल-गोलहुँ ॥३॥
ससि-अङ्गयहुँ दिवायर-अङ्गहुँ । खर-चित्तहुँ दूसण-चित्तनहुँ ॥४॥
सुभ-चमू हुँ वीसावसु-हत्थहुँ । सारण-हरि-हरिकेसि-पहत्थहुँ ॥५॥
कुम्भयपण-ईसाणणरिन्दहुँ। विहि-केसरिहि विहीसण-खन्दहुँ ॥६॥
घणवाहण-तडिकेसकुमारहुँ । मल्लवन्त-कणयहुँ दुव्वारहुँ ॥७॥
'जम्बुमालि-जीमुत्तणिणायहुँ । वज्जोयर-वजाउहरायहुँ ॥८॥
वाणरधय पञ्चाणणचिन्धहुँ एम जुन्झु अब्मिटु पसिद्धहुँ ॥९॥

सत्तरहमो संधि -- "सारथि-सारथि, रथ वहाँ हॉको, जहाँ सफेद आतपत्र है। जहाँ ऐरावत गरज रहा है, जहाँ दुन्दुभि वज रही है। जहाँ इन्द्र देवताओंसे घिरा हुआ है। जहाँ उसने वनदण्ड हाथमें रखा है।" यह सुनकर सन्मति सारथिका उत्साह बढ़ गया, शंख बजाकर उसने अपना रथ आगे बढाया। कोलाहल होने लगा। तूर्य वजा दिये गये । अनि और यमके मुख दुष्टोंकी तरह हंसने लगे। समर होने लगता है, सेनाएँ भिड़ती हैं, उत्साहसे भरी हुई और कवचोंसे आरक्षित । प्रबल अश्व, प्रबल अश्वोंसे, गज गजवरोंसे, रथ रथवरोंसे और पैदल, पैदल सैनिकों से ॥१-९॥ हुंकार छोड़ते हुए, प्रहार करते हुए, सिर कर और नाक झुकाये हुए बिना किसी खेदके दोनों सेनाएँ अनुरक्त मिथुनोंकी भॉति आपसमें भिड़ गयीं ॥१०॥ [११] दोनों सेनाओंमें दोनों ओरसे भयंकर युद्ध हुआ। इन्द्रजीत और जयन्तमें तथा रावण और इन्द्रमे । पिता रत्नाश्रव और सहस्रारमें, मय-बृहस्पति-मारीच और कुबेरमें, विपमशीलवाले यम और सुग्रीवमें, प्रलयकालके अनलकी लीला धारण करनेवाले अनल और नलमे, चन्द्रमा और अंगद में, सूर्य और अंगमें, खर और चित्रमें, दूपण और चित्रांगमें, सुत और चमूमें, विश्वावसु और हस्तमें, सारण और हरिमें, हरिकेश और प्रहस्तमे, कुम्भकर्ण और ईशान नरेन्द्रमे, विधि और केशरीमें, विभीपण और स्कन्धमें, बनवाहन और तडिकेशीके कुमारमें, दुर्वार्य माल्यवन्त और कनकमें, जम्बू और मालिमे, जीमूत और निनादमें, वोदर और वज्रा- युधमे, वानरध्वजियों और सिंहध्वजियोंमें; इस प्रकार प्रसिद्ध- प्रसिद्ध लोगोमे युद्ध हुआ॥१-९॥

पउमचरित
घत्ता
करि-कुम्भ-विकत्तणु गोल्लिय-तणु जो रण जासु समावडिउ ।
सो तासु समच्छरु तोसिय-अच्छरु गिरिह दवग्गि व भन्भिडिउ ॥१०॥
[१२]
को वि किवाण-पाणिए सुरवहू णिएवि ।
ण मुअइ मण्डलग्गु पहरं समल्लिएवि ॥१॥
को वि णीसरन्तन्त-चुन्मलो। भमइ मत्त-हस्थि व स-सङ्घाली ॥२॥
को वि कुम्भि-कुम्भयल-दारणो। मोतिओह-उजलिय-पहरणो ॥३॥
को वि दन्त-मुसलुक्खयाउहो । धाइ मत्त-मायन-सम्मुहो ॥४॥
को वि खुडिय-सीसो धणुद्धरो । वलइ धाइ विन्धइ स-मच्छरो ॥५॥
को विवाण-विणिभिण्ण-वच्छओ। वाहिरन्तरबरिय-पिच्छो ॥६॥
सोणियारुणो सहइ गरवरो। रत्त-कमल-पुलो व्य स-ममरो ॥७॥
को वि एक्क-चलणे तुरङ्गमे । हरि व विस्थिओ ण मरिए कमे ॥८॥
को वि सिरउडे करें वि करयले। जुज्झ-भिक्ख मोह पर-वले ॥९॥
धत्ता
मडु को वि पडिच्छिरु णिन्वट्टिय-सिरु सोणिय-धारुच्छलिय-तणु ।
लखिजइ दारुणु सिन्दूरारुणु फरगुणें णाई सहसकिरणु ॥१०॥
[१३]
कत्थाइ मत्त-कुञ्जरा जीविएण चत्ता ।
कसण-महाघण व दीसन्ति धरणि-पता ॥१॥
कत्थ इ स-विसाणइँ कुम्मयलहूँ। रणवहु-उक्खलइँ स-मुसलहँ ॥२॥
कस्य इ हय करवालहि खण्डिय । अन्त-ललन्त खलन्त पहिण्डिय ॥३॥

सत्तरहमो संधि २८१ धत्ता-गजकुम्भको विदीर्ण करनेवाले पुलकित शरीर जिस. के सामने जो योद्धा आया, अप्सराओंको सन्तुष्ट करनेवाला वह मत्सरसे भरकर उसी प्रकार भिड़ गया, जिस प्रकार गिरिसे दावानल।" ॥१०॥ [१२] कोई सुरवधूको देखकर, कृपाण हाथमें लिये हुए आघात खाकर भी तलवारको नहीं छोड़ रहा है। कोई अपनी निकली हुई आँतोंसे विहल इस प्रकार घूम रहा था, जैसे शृंखलाओंसे बंधा हुआ मत्तगज हो, गजके कुम्भस्थलको विदीर्ण करनेवाले किसीका अस्त्र मोतियोंके समूहसे उज्ज्वल था। दन्त और मूसलोंके लिए निकाल रखा है आयुध जिसने, ऐसा कोई वीर मत्तगजके सम्मुख दौड़ता है। कट गया है सिर जिसका, ऐसा कोई धनुर्धारी मुड़ता है दौड़ता है और मत्सरसे भरकर वेधता है। किसीका वक्षस्थल तीरोंसे इतना विद्ध है कि उसके बाहर-भीतर पुंख आरपार लगे हुए हैं ? कोई रक्तसे लाल व्यक्ति ऐसा सोभित है मानो भ्रमरसहित रक्त कमलोंका समूह हो । कोई एक पैरके अश्वपर आसीन, विष्णुके समान ही एक कदम नहीं चल पाता। कोई अपने करतल सिर- तटपर रखकर शत्रुसेनामें युद्धकी भीख माँग रहा है ।।१-२॥ पत्ता-कट चुका है सिर जिसका, जिसके शरीरसे रक्तकी धाराएं उछल रही हैं, तथा प्रति इच्छा रखनेवाला भट ऐसा दारण दिखाई देता है, जैसे फागुनमे सिन्दूरसे लाल सूर्य ||१०|| [१३] कहींपर जीवनसे त्यक्त मत्तगज ऐसे जान पड़ते हैं जैसे काले महामेघ धरतीपर आ गये हों। कहींपर दातों महित पन्मन्बलगने जान पड़ते हैं मानो रणरूपी वधूके उपल और गूगल। कहीपर तलवारोंसे सण्डित अश्व स्पलिन होते

२८२
पउमचरित
कत्थ इ छत्त. हयई विसालई णं जम-भोयणे दिपणई थालई ॥४॥
कत्य इ सुहड-सिराइ पलोह।। णाइँ अ-णाल णव-कन्दोह। ॥५॥
क्स्थ इ रहचकई विच्छिण्णई। कलि-कालहों आसण व दिण्णह॥६॥
कत्थ वि भडहाँ सिवगण दुकिय । 'हियवउ णाहि' मणेवि उढुकिय ॥७॥
कत्थ वि गिद्ध कबन्धे परिटिउ । णं अहिणव-सिरु सुहड्डु समुहिउ ॥८॥
कत्थ इ गिद्धे मणुसु ण खदउ। वाणेहिं चञ्चुहि भेउ ण लद्धत ॥९॥
पत्ता
कत्थ इ गर-रुण्डे हि कर-कम-तुण्डे हि समर-वसुन्धरि भीसणिय ।
वहु-खण्ड-पयारे हि णं सूआरे हि रइय रसोइ जमहों तणिय ॥१०॥
[१]
तहि तेहऍ महाहवे किय-महोच्छवेहि ।
कोक्किउ एकमेकु लङ्केस-वासवेहि ॥१॥
'उर उ सकसक परिसकहि । जिह णिविउ मालि विह थकहि ॥२॥
हउँ सो रावणु भुवण-मयङ्करु । सुरवर-कुल-कियन्तु रणें दुद्धरु' ॥३॥
तं णिसुणेवि वलिउ आखण्डलु। पच्छायन्तु स हि णह-मण्डलु ॥३॥
दहमुहो वि उत्थरिड स-मच्छरु । किउ सर-जालु सरोहि सय-सकर ॥५॥
तो एत्थन्तर हय-पडिवक्खें। सरु अग्गेउ मुक्कु सहसखे ॥६॥
धाइट धगधगन्तु धूमन्तउ । चिन्धेहिं छत्त-धऍहि लग्गन्त ॥७॥
रावण-वलु
णासंधिय-जीक्ति। णासइ जाला-मालालीविउ nell
घत्ता
रयणियर-पहाणे वारुण-वाणे सरवरगि उल्हावियउ ।
मसि-वण्णुपरत्तउ धूमलनातउ पिसुणु जेम वोल्लावियउ ॥९॥

सत्तरहमी संधि २८३ हुए आँतोंसे शोभित घूम रहे हैं। कहींपर आहत विशाल छत्र ऐसे जान पड़ते हैं मानो यमके भोजनके लिए थाल दे दिये गये हों, कहींपर योद्धाओंके सिर लोट-पोट हो रहे हैं मानो विना नालके कमल हों, कहींपर टूटे-फूटे रथचक्र पड़े हुए हैं, जैसे कलिकालके आसन विछा दिये गये हों, कहींपर योद्धाके पास सियारन जाती है और 'हृदय नहीं है। यह कहकर चल देती है, कहींपर गीध धड़पर बैठा है, जैसे सुभटका नया शिर निकल आया हो, कहींपर गीध मनुष्यको नहीं खा सका, वह तीरों और चोंचोंमें भेद नहीं कर सका ।।१-२॥ पत्ता-कहींपर मनुष्योंके धड़, हाथ और पैरोंसे समरभूमि इस प्रकार भयंकर हो उठी, मानो रसोइयोंने बहुत प्रकारस यमके लिए रसोई बनायी हो ॥१०॥ [१४] उस महा भयंकर युद्धमें, महोत्सव मनानेवाले लंकेश और देवेशने एक दूसरेको पुकारा, "अरे-अरे शक्र शक्र, चल, जिस तरह मालि का वध किया उसी तरह स्थित हो। मैं वही भुवनभयंकर रावण हूँ, देवकुलके लिए यम और युद्धमें दुर्धर ।" यह सुनकर इन्द्र मुड़ा और तीरोंसे उसने आकाशको आच्छादित कर दिया । तब दशानन भी मत्सरसे भरकर उछला और उसने तोरोंसे शरजालके सौ टुकड़े कर दिये। इस वीचमें प्रतिपक्षको नष्ट करनेवाले इन्द्रने आग्नेय तीर छोड़ा, वह धकधक करता धुआं छोड़ता हुआ तथा चिह्नवज और छत्रोंसे लगता हुआ दौड़ा। जीवनकी आशंकासे युक्त, आगको लपटोंमें झुलसती हुई रावणकी सेना नष्ट होने लगी ।।१-८|| पत्ता-तव निशाचरोंके प्रमुख रावणने वारुण वाणसे आग्नेय तीरकी ज्वालाको शान्त कर दिया, जो दुष्टकी तरह धूमिल शरीर और काले रंगको लेकर चला गया ।।२।।

२८४
पउमचरित
[१५]
उपसमिए हुभासणे वयणमासुरेणं ।
वहल-तमोह-पहरणं पेसियं सुरेणं ॥१॥
किउ अन्धारउ तेण रणगणु । कि पि ण देक्खइ णिसियर-साहणु॥२॥
जिम्मइ अङ्ग वलइ णिहायइ । सुअइ अचेयणु ओसुविणायइ ॥३॥
क्खें विणिय-पल ओणल्लन्तड। मेल्लिउ दिणयरस्थु पजलन्तउ ॥४॥
अमराहिव्रण राहु-वर-पहरणु ।
णाग-पास सर मुअइ दसाणणु ॥५॥
स्वर-मुअङ्ग-सहासेंहि दट्टउ । मुर-बलु पाण लएवि पण?उ ॥६॥
पारुडत्थु वासवण विसजिउ । विसहर-सरवर-जालु परजिड ॥७॥
खगउड-पवणन्दोलिय मेइणि । ढोला-रूढी णं वर-कामिणि ॥८॥
रक्स-पवण-पडिपहय-महीहर । णञ्चाविय स-दिसिवह स-सायर ॥९॥
घत्ता
मैले वि रिउ-घायणु सरु णारायणु तिजगविहूसणे गएँ चढिउ ।
जेत्तहँ अइरावणु तेत्तहँ रावणु जाऍवि इन्दहाँ अभिडिउ ॥१०॥
[ १६ ]
मत्त गइन्द दोवि उभिण्ण-कसण-देहा ।
णं गजन्त धन्त सम-उत्थरन्त मेहा ॥१॥
परोवरस्स पत्तया।
मयम्वु-सित्त-गत्तया ॥२॥
थिरोर थोर-कन्धरा। पलोह-दाण-णिज्झरा ॥३॥
स-सीयर व्च पाउसा। मयन्ध मुक-अङ्कुसा ॥४॥
विसाल-कुम्भमण्डला।
णिवद्ध-दन्त-उज्जला ॥५॥
अथक-कण्ण-चामरा। णिवारियालि-गोयरा ॥६॥
समुद्ध-सुण्ड-भीसणा।
विसट्ट-घण्ट-णीसणा ॥७॥
मणोज-गेज-पन्तिणो। भमन्ति वे विदन्तिणो ॥८॥

सत्तरहमो संधि १८५ [१५] अग्निबाणके शान्त होनेपर भास्वरमुख इन्द्रने अन्ध- कारका बाण छोड़ा। उसने युद्धके प्रांगणमें अन्धकार फैला दिया, निशाचरोंकी सेनाको कुछ भी दिखाई नहीं देता, सेना जुभाई लेती, उसके अंग झुकने लगते, नींद आती, वेहोश होती, सोती और स्वप्न देखती। अपनी सेनाको अवनत होते हुए देखकर, दशानन जलता हुआ दिनकर अख छोड़ा। इन्द्रने राहु अब छोड़ा। रावण नागपाश अत्र चलाता है। हजारों बड़े-बड़े साँपोंसे डंसी गयी देवसेना प्राण लेकर भागने लगती है। इन्द्र गरुड़ अस्त्र चलाता है जो साँपोंके प्रवर शरजालको पराजित कर देता है। गरुड़ोंके पंखोंके पवनसे आन्दोलित धरती ऐसी मालूम होती है मानो वरकामिनी हिंडोलेमें बैठी हो। पंखोंके पवनसे प्रतिहत महीधर दिशापथों और समुद्र सहित धरतीको नचाने लगे। ॥१-९॥ घत्ता-तब शत्रुनाशक नारायण वाण छोड़कर रावण त्रिजगभूषण हाथीपर चढ़ गया और जहाँ ऐरावत महागज था, वहाँ जाकर इन्द्रसे भिड़ गया ॥१०॥ [१६] दोनों ही महागज अत्यन्त कृष्णशरीर और मतवाले थे, मानो खूब गरजते हुए, समान रूपसे उछलते हुए महामेघ हों। दोनों एक दूसरेके पास पहुंचे। दोनोंका शरीर मदजलसे सिक्त था, दोनोंके वक्ष और कन्वे विशाल थे, दोनोंसे मदकी धारा वह रही थी, दोनों पावसकी तरह जलकणोंसे युक्त थे, दोनों मदान्ध और निरंकुश थे, दोनोंके गण्डस्थल विशाल थे, दोनोंके गठित उज्ज्वल दाँत थे, दोनोंके नहीं थकनेवाले कर्णरूपी चामर लगातार भ्रमरोंको उड़ा रहे थे, दोनों उठी हुई गुंडोंसे भयंकर थे, दोनोंके घण्टोंसे विशिष्ट ध्वनि हो रही थी। जैसे सुन्दर गीत पंक्तियाँ हों, दोनों महागज घूम रहे थे ॥१-८॥ ।

२८६
पउमचरित
घत्ता
मयगले हि महन्ते हि विहि मि भमन्तहिं सुरवइ-लकाहिचें पवर ।
भव-भवणेहि छूढी णं महि मुढी भमइ स-सायर स-धरधर ॥९॥
[१७]
तिजगविहसणेण किउ सुर-करी णिरस्थो।
परिभोसिय मिसायरा ल्हसिउ वइरि-सत्थो ॥१॥
रावणु णव-जुवाणु वलवन्तउ। अमराहिउ गय-प्रेस-महन्त ॥२॥
ममें विण सक्किउ करिवरु खचिउ । रक्खें सयवारउ परियञ्चिउ ॥३॥
गउ गएण पहु पहुणोद्ध । झम्म देवि अंसुऍण णिवद्ध ॥
विजउ घुटु रयणीयर-साहणें। देवें हि दुन्दुहि दिग्ण दिवङ्गण ॥५॥
ताव जयन्तु दसाणण-जाएँ। आणिउ वन्धेवि वाहु-सहाएँ ॥६॥
जमु सुग्गीवें दूसम-सीलें। अणलु णलेण अणिल रण णीलें ॥७॥
खर-दूसणे हिँ चित्त-चित्तगय । रवि ससि लेवि आय अगङ्गय ॥८॥
सुरवर-गुरु मएण णिभिच्चे।
लइउ कुबेरु समरें मारिच्चें ॥९॥
घत्ता
जो
जसु
उत्थरियउ सोतें धरियउ गेण्हेंवि पवर-वन्दि-सयई।
गउ सुरवर-डामरु पुरु भजरामरु जिशु जिह जिणेवि महामयह॥३०॥
[१८]
लङ्क पुरन्दरे णिए जय-सिरी-णिवासी।
सहसारेण पत्थिवो पत्थिओ दसासी ॥१॥
'अहाँ जम-धणय-सक्क-कम्पावण । देहि सुपुत्त-मिक्ख महु रावण' ॥२॥
तं णिसुणेवि भणइ सुर-वन्धणु । 'तुम्हवि अम्ह वि एउ णिवन्धणु ॥३॥
जमु तलवरु परिपालउ पट्टणु । पङ्गणु णिकित करउ पहाणु ॥४॥
पुष्फ-पयरु
घरै देउ वणासइ ।
सहुँ गन्धब्वे हि गायउ सरसइ ॥५॥

सत्तरहमो संधि २८७ पत्ता-दोनों घूमते हुए मदकल महागजोंके साथ इन्द्र और रावण ऐसे मालूम पड़ रहे थे, मानो भवरूपी भवनसे युक्त धरतीरूपी मुग्धा सागर और समुद्रके साथ घूम रही है । ॥९॥ [१७] त्रिजगभूषण महागजने ऐरावतको निरस्त कर दिया। निशाचर प्रसन्न हो गये । शत्रुसमूहका पतन हो गया। रावण नवयुवक और बलवान् था जब कि इन्द्रकी वय और तेज जा चुका था। खींचनेपर भी ऐरावत महागज हिल नहीं सका, राक्षसने सौ बार उसे छुआ। गजने गजको और स्वामीने स्वामीको उठा लिया। घूमकर उसने वस्त्रसे उसे वाँध दिया। निशाचरोंकी सेनामें विजयकी घोषणा कर दी गयी। देवताओंने आकाशमें दुन्दुमि वजा दी। तबतक इन्द्रजीत जयन्तको अपनी वाहुओंसे बाँधकर ले आया, विषमशील सुग्रीव यमको, नल अनलको, नील अनिलको, खर-दूषण, चित्र-चित्रांगद्- को और अंग-अंगद सूर्य-चन्द्रको लेकर आ गये। निर्भीक मयने बृहस्पतिको और मारीचने कुवेरको पकड़ लिया ॥१-२॥ घत्ता-जिसने जिसपर आक्रमण किया, उसने उसको पकड़ लिया। इस प्रकार सैकड़ों प्रवर वन्दियोंको पकड़कर, इन्द्रके लिए भयंकर रावण अपने नगरके लिए उसी प्रकार गया, जिस प्रकार परमजिन महामदोंको जीतकर अजर-अमर पदको प्राप्त करते हैं ॥१०॥ [१८] इन्द्रको लंका ले जानेपर, सहस्रारने जयत्रीके निवास राजा रावणसे प्रार्थना की, "यम, धनद और शक्रको कंपानेवाले रावण, मुझे पुत्रकी भीख दो।" यह सुनकर देवोंको बाँधनेवाले रावणने कहा, "तुम्हारे हमारे बीच यह शर्त है कि यम वलवर ( कोतवाल) होकर नगरकी रक्षा करे, प्रभंजन हमारा आंगन साफ करे, वनस्पति घरपर पुष्पसमूह दे,

२८८
पउसवरित
वस्य-सहासई हवि पन्खालउ ।
लोण्ह करंट मियङ्गु गिरन्तर।
अमरराउ मजणउ भरावट।
पडिवण्णु सन्चु सहसारें।
कोसु असेसु कुवेरु णिहाल3 ॥६॥
सीयलु णहयलें तवउ दिवायरु ॥७॥
अण्णु वि धणेहि छडउ देवावर'८
मुक्कु सक्कु लालङ्कारें ॥९॥
মুম্বা
णिय-रज्जु चिवन्जवि गड पन्चज वि सासयपुरहों सहसणयणु ।
जय-सिरि-बहु मण्डै वि थिउ भवरुण्डेंवि स इँ भु य-फलिहिं दहक्यणु।१०
इय चार-पउमचरिए धणक्षयासिय-समम्भुएव-कए।
नाणह 'रावण वि जयं सत्तारहम इमं पन्वं ॥
[१८. अट्ठारहमो संधि
रणे माणु म वि पुरन्दरहाँ परियन्न वि सिहरई मन्दरहों।
आवइ वि पडीवर जाम पहु ताणन्तर दिछ अणन्तरहु ।।
[2]
पेक्सप्पिणु गिरि-कलण-सुमदु । जिण-वन्दण-दूरुच्छलिय-सद्ध ॥१॥
सुरवर-सय-सेव-करावणेण ।
मारिच्चि पपुच्छिउ रावणेण ॥२॥
'मढ-मञ्जण-भुवणुच्छलिय-णाम । उहु कलयलु सुम्मइ काइँ माम' ॥३॥
तं णिसुणेवि पमणइ समर-धीर। 'एहु जइ णामेण अणन्तवीर men
दसरह-मायर अणरण्ण-जाउ। सहसयर-सणेहें तवसि जाउ ॥५॥
उप्पण्णड एयहाँ एत्थु णाणु । उहु दीसइ देवागमु स-जाणु' ॥६॥

सत्तरहमो संधि २८९ गन्धवोंके साथ सरस्वती गान करे, अग्नि हजारों वस्त्र धोये, कुवेर अशेप कोशकी देखभाल करे, चन्द्र सदैव प्रकाश करे, दिवाकर आकाशमें धीरे-धीरे तपे, अमरराज नहानेका पानी भराये और मेघोंसे छिड़काव कराये।" सहस्रारने यह सब स्वीकार कर लिया, लंकानरेशने शक्रको मुक्त कर दिया।॥१-१०॥ पत्ता-अपना राज्य छोड़कर और प्रव्रज्या लेकर सहस्रार शाश्वत स्थानको चला गया और रावण जयश्रीरूपी वधूको अलंकृत कर अपने भुजस्तम्भोंसे उसका आलिंगन कर रहने लगा ॥११॥ धनंजयके आश्रित, स्वयम्भूदेवकृत पद्मचरितमें रावण- विजय नामक १७वॉ पर्व पूरा हुआ। अठारहवीं संधि युद्ध में इन्द्रका मान-मर्दन कर, सुमेरु पर्वतके शिखरॉकी प्रदक्षिणा कर, जब दशानन लौट रहा था तो उसने अनन्तरथके दर्शन किये। [१] जिसमें दूर-दूर तक जिनकी वन्दनाके शब्द उछल रहे है, ऐसे सुभद्र स्वर्णगिरिको देखकर, सुरवरोंसे अपनी सेवा करानेवाले रावणने मारीचसे पूछा, “योद्धाओंका संहार करने- वाले, प्रसिद्धनाम ससुर, वह क्या कोलाहल सुनाई दे रहा है ?" यह सुनकर समरधीर मारीच कहता है, "यह अनन्तवीर नामके मुनि है, अणरग्णसे उत्पन्न दशरथके भाई, जो सहस्रकिरणके स्नेहके कारण तपस्वी हो गये थे इन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है,

२९०
पउमचरिउ
तं वयणु सुणेप्पिणु णिसियरिन्दु । गउ जेत्तहँ तेत्तहँ मुणिवरिन्दु ॥७॥
परियन्चवि ण- वि थुणे वि णिविट्ठ। सयलु वि जणु वयइँ लयन्तु दिछ।८॥
घत्ता
महवयई को वि कों वि भणुवयई को वि सिक्खावयई गुणन्वयह ।
कों वि दिनु सम्मत्तु लएवि थिउ पर रावणु एक्कु ण उवसमिउ ॥९॥
[२]
धम्मरहु महारिसि भणइ तेत्थु । 'मणुयत्तु लहें वि वइसर वि एत्थु॥१॥
अहाँ दहमुह मोहन्धारें छूढ । रयणायरें रयणु ण लेहि मूढ ॥२॥
अमियालएं अमिउ ण लेहि केम । अच्छहि णिहुअउ कट्ठमउ जेम' ॥३॥
तं वयणु सुणेप्पिणु दससिरेण ।
वुच्चइ थोत्तुग्गीरिय-गिरेण ॥४॥
'सकमि भूमद्धएँ झम्प देवि । सक्कमि फण-फणिमणि-रयणु लेवि ५॥
सक्कमि गिरि-मन्दरु णिलेवि। सक्कमि दस दिसि-वह दरमलेवि ६॥
सक्कमि मारुइ पोट्टले छुहेवि । सक्कमि जम-महिस समारुहेवि ॥७॥
सक्कमि रयणायर-जलु पिएवि । सक्कमि आसीविसुअहि णिएवि ॥८॥
घत्ता
सक्कमि सक्कहाँ रणे उत्थरै वि सक्कमि ससि-सूरहूँ पह हर वि ।
सक्कमि महि गउणु एक्कु करें वि दुद्धरु णउ सक्कमि वउ धरै वि ॥९॥
[३]
परिचिन्त वि सुइरु णराहितेण । 'लइ लेमि एक्कु
वर'
वुत्तु
तेण ॥१॥
'जं मई ण समिच्छइ चारु-गत्तु । तं मण्ड लएमि ण पर-कलत्तु' ॥२॥
गउ एम भणेप्पिणु णियय-णयरु । थिउ अचलुरज्जु भुञ्जन्तु खयरु ॥३॥
एत्तहें वि महिन्दु महिन्दु णामें। पुरव” इच्छिय-अणुहभ-कामे ॥४॥
तहों हिययवेय णामेण भज्ज । तह दुहियक्षणसुन्दरी मणोज्ज ॥५॥

अट्ठारहमो संधि वह यानोंके साथ देवागम दिखाई दे रहा है ।" यह शब्द सुन- कर निशाचरराज वहाँ गया जहाँ मुनिवरेन्द्र थे। प्रदक्षिणा, नमन और स्तुति कर वह वहाँ बैठ गया। उसने वहाँ लोगोंको व्रत ग्रहण करते हुए देखा ॥१-८॥ धत्ता कोई महाव्रत, और कोई अणुव्रत । कोई शिक्षाबत और गुणव्रत । कोई देखा गया दृढ़ सम्यक्त्व लेता हुआ। परन्तु रावणने एक भी व्रत नहीं लिया ॥९॥ [२] तब धर्मरथ महामुनि वहाँ कहते हैं, "अरे रावण, मनुष्यत्व पाकर और यहाँ बैठकर मोहान्धकारसे छूट । मूर्ख रत्नाकरसे भी रत्ल ग्रहण नहीं करता। अमृतालयसे अमृत क्यों नहीं लेता, एकाकी ऐसा बैठा है, जैसे काष्ठसे बना हो।" यह वचन सुनकर, रावण, स्तोत्रका उच्चारण करनेवाली वाणीमें वोला, "मैं आगको ढक सकता हूँ, शेषनागके फनसे मणि ग्रहण कर सकता हूँ, मन्दराचलको उखाड़ सकता हूँ, दसों दिशाओंको चूर-चूर कर सकता हूँ, हवाको पोटलीमें बाँध सकता हूँ, यम- महिषपर चढ़ सकता हूँ, समुद्रका जल पी सकता हूँ, आशीविष साँपको ला सकता हूँ॥१-८॥ धत्ता-युद्धमें इन्द्रको पकड़ सकता हूँ, चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभा छीन सकता हूँ। धरती और आसमान एक कर सकता हूँ, परन्तु कठोर व्रत ग्रहण नहीं कर सकता" ।।९।। [३] तब बहुत समय तक सोचनेके बाद, "लो, एक व्रत लेता हूँ" उसने कहा, "जो सुन्दरी मुझे नहीं चाहेगी, उस पर-स्त्रीको मैं बलपूर्वक नहीं ग्रहण करूँगा।" यह कहकर वह अपने नगर चला गया और अपने अचल राज्यका उपभोग करने लगा। यहाँ भी 'महेन्द्र' नामका राजा अपनी इच्छाके अनुसार कामको भोग करता हुआ रहता था। उसकी हृदय- वेगा नामकी सुन्दर पत्नी थी। उसकी अंजना सुन्दरी नामकी २९२ पउमचरित मिन्दुएण रमन्तिहें थण णिएवि । थिउ गरवइ मुह कर-कमलु देवि टप्पण्ण चिन्त 'कहाँ कपण देमि । लइ वहइ गिरि-कइलासु णेमि ॥७॥ विजाहर-सयई मिलन्ति जेत्यु । वर अवलं होसइ को वितेत्थु ॥८॥ घत्ता गट एम भणे वि पहु पन्वयहाँ जिण-अट्टाहिए अट्टावयहाँ। आवामिड पासेंहि णोय. हि णं तारायणु मन्दर-त. हिं ॥९॥ [४] एतह वि ताव पल्हायनाउ । सहुँ क्टमइऍ रविपुरहों भाउ ॥३॥ म-विमाणु म-साहणु म-परिवारु । अण्णु वि तहि पवणाय-कुमार ॥२॥ एक्कतह दूमावासु लइट। णं वन्दणहत्तिएँ इन्दु भइउ ॥३॥ भयर विजेजे भामण्ण-भच । ते ते विज्जाहर मिलिय सव्व ॥४॥ पहिलाएँ फरगुगगन्दीपराहें । किय ण्हवण-पुज्ज तइलोक्क-णाह॥५॥ विणे वीय विहि मि णराहिवा] । मित्तइय परोप्परु हम ता] ॥६॥ परजाएँ बेड रेवि वुत्तु । 'तटतणिय कण्ण महु तणउ पुत्तु ॥७॥ विण कीरइ पाणिग्गहणु राय'। तं णिसुण वि तेण वि दिण्ण वाय ॥८॥ परिओनु पबटिड मजणाहे । मइलियई मुहइँ सल-दुजणाहँ ॥९॥ वत्ता 'बहु अक्षण बाउकुमार बरु' घोनेप्पिणु गयणाणन्दयरु । 'तइयार वापर पाणिग्गहणु' गय गरवइ णियय-णियय-भवणु १०॥ यन्न दुग्जट दुग्गिया। नयणाउन पत्रणक्षय कुमार ॥१॥ पर विमदन पर दियमु पनु । अच्छद विम्हाणले इम्प टेन्नु ॥२॥ धुनाह वरद धगधगट चिनु। मन्दिर अमन्नर परितु ॥३॥ रन्दिणट चन्दु चन्दन दु। रप्पर-कमलदलमज्ज-मदद ॥

अट्ठारहमो संधि 4 सुन्दर कन्या थी। एक दिन गेंद खेलते हुए उसके स्तन देखकर राजा अपने मुँहपर कर-कमल रखकर रह गया । उसे चिन्ता उत्पन्न हुई कि मैं किसे कन्या दूँ, लो मैं कैलास पर्वत ले जाता हूँ। जहाँ सैकड़ों विद्याधर मिलते हैं, वहाँ कोई न कोई वर अवश्य होगा ॥१-८॥ घत्ता-यह विचारकर जिन-अष्टाह्निकाके दिनोंमें राजा अष्टापद पर्वतपर गया और निकटके भागमें ठहर गया, मानो मन्दराचलके तटोंपर तारागण हों ॥२॥ [४] यहाँ भी आदित्यपुरसे प्रहादराज अपनी पत्नी केतुमतीके साथ आया और अपने विमान, सेना और परिवारके साथ, कुमार पवनंजय भी। उन्होंने एक जगह अपना तम्बू ताना, मानो वन्दनाभक्तिके लिए इन्द्र ही आया हो। और भी जो-जो आसन्नभव्य थे, वे सव विद्याधर वहाँ आकर मिले । पहले उन्होंने फागुन नन्दीश्वर त्रिलोकनाथकी अभिपेक- पूजा की। दूसरे दिन सब नराधिपोंकी परस्परमें मित्रता हुई। प्रह्लादने मजाक करते हुए पूछा, "तुम्हारी कन्या हमारा पुत्र, हे राजन्, विवाह क्यों नहीं कर देते।" यह सुनकर प्रहादराजने भी वचन दे दिया। सजनोंको इससे सन्तोष हुआ, परन्तु खल और दुर्जनोंके मुख मैले हो गये ॥१-९॥ घत्ता-"अंजना वहू, और वर-नेत्रोंको आनन्द देनेवाला वायुकुमार, तीसरे दिन विवाह" यह वोषणा कर राजा अपने- अपने घर चले गये ॥१०॥ [५] इसी बीच में दुर्जेय और दुर्निवार कुमार पवनंजय कामातुर हो उठा। आनेवाले तीसरे दिन को भी वह सहन नहीं कर सका, किसी तरह विरहानलको शान्त करनेका प्रयत्न करता है। उसका चित्त धुआँता है, मुड़ता है, धकधक करता है, जैसे घरमें भीतर भीतर आग लगी हो। चाँदनी चन्द्र

२९४
पउमचरित
।
दाहिण-सारुड सीयल जलाई। तहाँ अग्गि-फुलिङ्गई केवलाई ॥५॥
णिड्डहइ अगुवाई अणड्ड।
सज्जण-हिययाई व पिसुण-सङ्गु ॥६॥
णीससइ ससइ वेवइ तमेण । घाहावइ धाहा पन्चमेण ॥७॥
उड्ढण-आहरण-पसाहणाई। सम्बई अङ्गहाँ भसुहावणाइँ 16
घत्ता
पासेउ वलग्गइ ल्हसइ तणु तं इजिउ पेक्णवि भण्ण-मणु ।
पमणिउ पहसिऍण णिएवि मुहु 'किं दुन्वलिहुयउ कुमार तुहु ॥९॥
[]
विरहग्गि-दह-मुह-कारण । पहसिउ पवुत्त पवणञ्जएण ॥३॥
'भो गयणाणन्दण चारचित्त । ण विसहउँ तइयउ दिवसु मित्त ॥२
जइ अज्जु ण लक्खिड पियहें वयणु । तो कल्लएँ महु णित्तुलड मरणु' ॥३
तं णिसुणेचि बुच्च पहसिएण। कमलेण व वयणे पहसिएण ॥४॥
'फणि-सिर-रयणेण वि णाहिं गण्णु । ऍउ कारणु केत्तिउ जे विसण्णु ॥५॥
किं पवणहाँ कवणु वि दुप्पवेसु'। गय वेणि वि रयणिहि तप्पवेसु॥६॥
थिय जाल-वक्तएँ दिट्ट वाल। णं मयण-वाण-घणु-तोण-माल ॥७॥
मारो वि सर
विरहेण जाहें। को वण्णेवि सक्कइ रुवु ताहें ॥४॥
घत्ता
वं बहु पेक्खें वि परितोसिएण वरइत्तु पसंसिउ पहसिएण।
'तं जीविउ सहलु भणन्त सिय जसु करें लग्गेसइ एह विय' ॥९॥
[ ]
एस्थन्तरें अट्ठमी-चन्द-भाल
मुह जोऍवि चवइ वसन्तमाल ॥३॥
'सहला उ माणुस-जम्मु माएँ । मत्तारु पहाणु ल्हु जाएँ' ॥२॥

२९५ अट्ठारहमो संघि जलाई-चन्दन-कपूर-कमलदलोंकी मृदु सेज, दक्षिणपवन और शीतल जल, उसके लिए केवल आगकी चिनगारियाँ थो। अनंग उसके अंग-प्रत्यंगको जलाता है, उसी प्रकार, जिस प्रकार दुष्टोंका संग सज्जनोंके हृदयको । निश्वास लेता, साँस छोड़ता, (अज्ञानसे) काँपता, पंचम स्वरमें चिल्लाता, उत्तरीय आमरण और प्रसाधन सभी उसके अंगोंको असुहावने लगते ॥१-८।। घत्ता-पसीना-पसीना होने लगता, शरीर टूटता। उसकी अन्यमन चेष्टा और मुंह देखकर प्रहसित बोला, "कुमार, तुम दुर्बल क्यों हो गये" ॥९॥ [६] विरहाग्निसे जिसका मुंहकमल दग्ध हो गया है, ऐसे पवनंजयने कहा, "हे नेत्रोंको आनन्द देनेवाले सुन्दरचित्त मित्र, मेरे लिए तीसरा भी दिन असह्य है, यदि मैं आज प्रियतमा का मुंह नहीं देखता तो कल मेरा मरण निश्चित है।" यह सुनकर प्रहसित, जिसका मुख कमलके समान है, वोला, "नागराजके सिरका भी रत्न किस गिनतीमें है ! फिर यह कितनी-सी बात है कि जिसके लिए तुम इतने दुखी हो। क्या पवनका कहीं भी प्रवेश असम्भव है ?" इस प्रकार तपस्वीका रूप बनाकर रातमें दोनों गये। उन्होंने जालीके गवाक्षमें बाला- को वैठे हुए देखा, मानो कामदेवके वाण धनुष और तूणीरकी माला हो। जिसके वियोग में कामदेव ही स्वयं मर रहा हो, उसके रूपका वर्णन कौन कर सकता है ?॥१-८॥ पत्ता-उस वधूको देखकर प्रहसितको परितोष हुआ और उसने वरकी प्रशंसा की, "तुम्हारा जीवन सफल है, जिसके हाथ अनन्तश्रीवाली यह स्त्री हाथ लगेगी ||९|| [७] इसके अनन्तर, अष्टमीके चन्द्रके समान है भाल जिसका ऐसी अंजना सुन्दरीका मुख देखकर, वसन्तमाला कहती है, "हे आदरणीये, तुम्हारा मनुष्यजन्म सफल है जिसे

पउमचरित
तं णिसुणवि दुम्मुह दुट्ट-वेस ।
'सोदामणिपहु पहु परिहरेवि ।
जं अन्तरु गोपय-सायराहुँ ।
जं अन्तर केसरि-कुमराह ।
जं अन्तर गरुड-महोरगाहुँ ।
जं पुण्डरीय-चन्दुजयाहुँ।
सिरु विहुणे वि भणइ वि मीसकेस॥३॥
थिउ पवणु कवणु गुणु संभरेवि ॥४॥
जं जोइगणहं दिवायराहुँ ॥५॥
जं कुसुमाउह-तित्थङ्कराहँ ॥६॥
जं अमरराय-पहरण-णगाडें ॥७॥
तं विजुप्पहु-पवणञ्जयाहुँ' ॥४॥
घत्ता
आऍहिं भालावें हिं कुविउ णरु थिउ भीसणु उक्खय-खग्ग-करु ।
'किं वयणेहि वहुएहिं वाहिरहि रिउ रक्खउ विहि मि लेमि सिरई ॥९॥
[८]
कडु-अक्सरेण परिमासिरेण । करें धरिट पहजणु पहसिएण ॥१॥
'जं करि-सिर-रय गुजलिय(?)देव । तं असिवर मइलहि एत्थु केम ॥२॥
लजिजहि वोल्लहि णाई मुक्खु'। णित णिय-आवासहाँ दुक्खु दुक्खु ॥३
दस-वरिस-सरिस गय रयणि तासु । रवि उग्गउ पसरिय-कर-सहासु ॥३॥ .
कोका वि णरवइ पवर वर (?) हय भेरि पयाणउ दिण्णु णवर ॥५॥
अन्जणसुन्दरिहें तुरन्तएण। उम्माहउ लाइउ जन्तएण ॥६॥
संचल्लइ पउ पउ जेम जेम। कप्पिजइ हियवउ तेम तेम ॥७॥
तेहएँ अवसरे वहु-जाणएहि । कर-चरण धरेप्पिणु राणएहि ॥८॥
घत्ता
वलि-वण्ढ मण्ड परियत्तियउ तेण वि उवाउ परिचिन्तियउ ।
'लइ एकवार करयले धरेवि' पुणु वारह वरिसई परिहरहिं' ॥९॥

अट्ठारहमो संधि पवनंजय जैसा पति मिला।" यह सुनकर कोई दुर्मुख दुटवेश- वाली अपना सिर पीटती हुई मियकेशी चोली, “प्रभु विद्युत्लभ- को छोड़कर, पवनंजयकी याद करनेमें कौन-सा गुण है ? जो अन्तर गोपद और समुद्र में, जो जुगनू और सूर्यमें, जो अन्तर सिंह और गजमें, जो कामदेव और तीर्थकरमें, जो अन्तर गरुड़ और महानागमें, जो वन और पर्वतराजमें, जो पुण्डरीक और चन्द्रमामें है वही विद्युत्प्रभ और पवनंजयमें है" ॥१-८|| घत्ता-इन आलापोंसे पवनंजय कुपित हो गया, उसने अपने हाथमें तलवार निकाल ली और बोला, "बाहरी औरतों और वचनोंसे क्या शत्रु रक्षित है ? मैं दोनोंका सिर लेता हूँ ॥९॥ [८] तब, कटु-अक्षरोंसे तिरस्कृत प्रहसितने पवनंजयका हाथ पकड़ लिया और कहा, "हे देव, जो असिवर गजोंके निरोंके रत्नोंसे उज्ज्वल है, उसे इस प्रकार मैला क्यों करते हो, तुम्हें लज्जा आनी चाहिए कि तुम मूर्खकी तरह वोलते हो।' वह बड़ी कठिनाईसे उसे अपने आवासपर ले गया। उसकी रात दस वर्षके समान बीती । सवेरे अपनी हजारों किरणे फैलाता हुआ सूर्य निकला। राजाने श्रेष्ठ लोगोंको बुलाया, भेरी बजा दी गयी। अंजनामुन्दरीके लिए तुरन्त कृच करवा दिया गया। परन्तु जाते हुए वह उन्मत्त हो गया। जैसे-जैसे वह एक पग चलता वैसे-वैसे उसका हृदय काँप उठता। उन अवसरपर यहुत-से जानकार राजाओंने उसके हाथ-पैर पकड़कर॥२-८॥ पत्ता-जवरदस्ती उसे मोड़ा। उसने भी अपने मनने उपाय सोच लिया। "एक बार उसका पाणिग्रहण कर, फिर बारह वर्पक लिए छोड़ दूंगा।

१९८
पउमचरित
[१]
तो दुक्खु दक्खु दुम्मिय-मणेण । किउ पाणिग्गहणु पहजणेण ॥१॥
थिउ वारह वरिसई परिहरेवि । णवि सुबइ आलवइ सुइणवे(?)वि॥२॥
वारे विण जाइ ण (?) जेम जेम । खिज्जइ झिज्जइ पुणु तेम तेम ॥३॥
उज्झन्तउ उरु विरहाणलेण ।
णं वुज्झावइ अंसुअ-जलेण ॥१॥
परिवार-भित्ति-चित्ताई जाई। णीसास-धूम-मलिया ताई ॥५॥
दिल्लई आहरणई परियलन्ति । णं णेह-खण्ड-खण्ड पडन्ति ॥६॥
गड रुहिर णवर थिउ भइणु अत्यि। ण णावह जीविउ अस्थि णस्थि ॥७॥
तहिं तेहएँ काले दसाणणेण । सुरवर-कुरङ्ग-पञ्चाणणेण ॥८॥
घत्ता
जो दुम्मुहु दूउ विसजिय
सो आयउ कप्प-विवज्जियउ।
हय समर-भेरि रहवरें चडिउ रणें रावणु वरुणहाँ अन्भिडिउ ॥९॥
[१०]
एत्यन्तर वरुणहों णन्दणेहिं । समरगणें वाहिय-सन्दणेहिं ॥१॥
राजीव-पुण्डरीएहिं पवर ।
खर-दूसण पा. वि धरिय णवर ॥२॥
गय पवण-गमण केण वि ण दिट्ठ । सहुँ वरुणे जल-दुग्गर्ने पइट्ट ॥३॥
'सालयहुँ म होसइ कहि मि घाउ'। उन्बेढ वि गउ रमणियर-राउ ॥४॥
णीसेस-दीव-दीवन्तराहुँ।
लहु लेह दिण्ण विज्जाहराहुँ ॥५॥
अवरक्कु रणगणे दुज्जयासु। पठविउ लेहु पवणक्षयासु ॥६॥
तं पेक्सवि तेण विण किड खेउ । णीसरिउ स-साहणु वाउ-वे ॥७॥
थिय भन्जण कलसु लएवि वारें। णिन्मच्छिय 'भोसरु दुढ दारे' ॥८॥

अट्ठारहमो संधि २९९ [९] तब उसने बड़ी कठिनाई और दुर्मनसे विवाह किया। उसने बारह वर्षके लिए छोड़ दिया। स्वप्नमें भी न याद करता और न बात करता । जैसे-जैसे वह उसके द्वार तक नहीं जाता, वैसे-वैसे वह वेचारी खिन्न होती और छीजती। उसका हृदय विरहाग्निमें जलने लगा, मानो वह उसे आँसुओंके जलसे बुझाती । परिवारकी दीवालोंपर जितने चित्र थे, वे सब उसके विश्वासके धुएंसे मैले हो गये। ढीले आभूषण इस प्रकार गिर पड़ते, जैसे उसके स्नेहके खण्ड-खण्ड हो गिर रहे हों। रुधिर सूख गया। केवल चमड़ा और हड्डियाँ बची थीं। यह मालूम नहीं पड़ता था कि 'जीव है या नहीं। ठीक इसी अवसरपर सुरवररूपी कुरंगोंके लिए सिंहके समान दशाननने ॥१-८॥ घत्ता-जो दुर्मुख नामका दूत भेजा था, और जो समय- समयसे रहित है (जिसका कोई समय निश्चित नहीं है ), ऐसा दूत आया। उसने कहा, "समरभेरी बज चुकी है, और रावण रथवरपर चढ़कर युद्धमें वरुणसे भिड़ गया है" ॥९॥ [१०] इसी बीच वरुणके पुत्रों, राजीव-पुण्डरीक आदिने युद्धमें अपने रथ आगे बढ़ाते हुए प्रवर खरदूषणको धरतीपर गिरा दिया। पवनगामी भी गये, उन्हें किसीने नहीं देखा, और वरुणके साथ जलदुर्ग में प्रविष्ट हो गये। 'सालोंपर हमला न हो' (यह सोचकर) उन्मुक्त निशाचर-राज रावण भी वहाँ गया है। उसने समस्त द्वीप-द्वीपान्तरोंके विद्याधरोंके लिए लेखपत्र भेजा है। एक लेख युद्ध-प्रांगणमें अजेय पवनंजयके लिए भी भेजा है। उस लेखपत्रको देखकर पवनंजयने जरा भी खेद नहीं किया और सेनाके साथ कूच किया। अंजना द्वारपर कलश लेकर खड़ी थी। उसने उसे अपमानित किया, "हे दुष्ट स्त्री, हट" ||१-८॥ ।

पउमचरित
घत्ता
तं णिसुणे वि अंसु फुमन्तियएँ वुञ्चइ लोहउ कड्दन्तियएँ ।
'अच्छन्ते अच्छिउ जीउ महु जन्ते जाएसइ पई जि सहुँ' ॥९॥
[११]
तं वयणु पडिड णं असि-पहारु । अवहेरि करेप्पिणु गउ कुमार ॥१॥
मासण-सरवर भावासु मुक्कु । अत्यवणहाँ ताम पयगु ढुक्कु ॥२॥
दिई सयवत्तई मउलियाई। पिय-विरहिय-महुअरि-मुहलियाइँ॥३॥
चक्की वि दिट्ट विणु चक्कएण । वाहिज्जमाण मयरद्धएण ॥४॥
विहुणन्ति चञ्चु पङ्खाहणन्ति । विरहाउर पक्कन्दन्ति धन्ति ॥५॥
तं णिएँ वि जाउ तहाँ कलुण-माउ । 'मई सरिसउ अण्णु ण को वि पाउ॥६॥
ण कयाइ वि जोइड णिय-कलत्तु । अच्छइ मयणग्गि-पलित्त-पत्तु ॥४॥
परिअत्तेवि संमाणित ण जाम । रणें वरणहाँ जुन्झु ण देहि ताम'16॥
।
घत्ता
सन्माउ सहायहाँ कहिउ तुणु पहसिऍण वुत्तु 'ऍहु परम-गुणु' ।
उप्पएँ वि णहङ्गणे वे वि गय णं सिय-अहिसिञ्चणें मत्त गय ॥९॥
[१२]
णिविसेण भत्त अक्षणहें भवणु । पच्छण्णु होवि थिउ कहि मि पवणु॥१॥
गड पहसिउ अन्भन्तरें पइट। पणवेप्पिणु पुणु आगमणु सिट्ठ ॥२॥
'परिपुण्ण मणोरह अन्जु देवि । हउँ आयउ वाउकुमार लेवि' ॥३॥
तं णिसुणेवि मणइ वसन्तमाल । थोरंसु-सित्त-थण-अन्तराल ॥४॥
'भव-मव-संचिय-दुह-भायणाएँ। एवड्दु पुण्णु जइ भक्षणाएँ ॥५॥
तो कि वेयारहि' अइ जाव । सयमेव कुमार पइटु नाच ॥६॥

--- - -- भट्ठारहमो संधि ३०१ पत्ता-यह सुनकर, आँसू पोंछते हुए और लकीर खींचते हुए उसने कहा, "तुम्हारे रहते हुए ही मेरा जीव है। तुम्हारे जानेपर वह भी साथ चला जायेगा" : [११] यह वचन कुमारको असिंप्रहारकी तरह लगा। वह उसकी उपेक्षा करके चला गया। मानस-सरोवरपर उसने अपना डेरा डाला। तबतक सूर्यास्त हो गया। कमल मुकुलित दिखाई देने लगे, प्रियके वियोगमें मधुकरियाँ मुखरित हो उठी, चकवी भी बिना चकवेके, कामदेवके द्वारा पीड़ित दिखाई दी, चोंचको पीटती और पंखोंको नष्ट करती हुई, विरहातुर वह चिल्लाती और दौड़ती हुई। उसे देखकर कुमारको करुणभाव उत्पन्न हो गया। (वह सोचता है)- "मेरे समान कोई दूसरा पापी नहीं है, मैंने अपनी पत्नीकी ओर देखा तक नहीं, वह कामकी ज्वालाओंमें जल रही है। जबतक लौटकर मै उसका सम्मान नहीं करता, तवतक वरुणके युद्धमें मैं नहीं लड़ेगा" ||१-८॥ धत्ता-अपने सहायकसे उसने अपना सद्भाव बताया। प्रहसितने भी कहा, "यह अच्छी बात है।" आकाशमें उड़कर दोनों गये, मानो लक्ष्मीका अभिषेक करनेके लिए दो महागज जा रहे हों ॥१॥ [१२] निमिप मात्रमें वे अंजनाके भवनमें जा पहुंचे। पवनकुमार कही छिपकर बैठ गया। प्रहसित भीतर घुसा और प्रणाम करते हुए, उसे आगमन वताया, "हे देवी, आज तुम्हारा मनोरथ परिपूर्ण है, मैं पवनकुमारको लेकर आया हूँ।" यह सुनकर वसन्तमाला, जिसका स्तनोके वीचका हिस्सा आँसुओंसे गीला हो गया है, बोली, "यदि अंजनाका इतना बड़ा पुण्य है तो क्या सोचते हो"! (यह कहकर) वह जबतक

पउमचरित
महुरक्खर विणयालाव लिन्तु ।
आणन्दु सोक्खु सोहागु दिन्तु ॥७॥
मल्लके चडि कर लेवि देवि । विहसन्त-रमन्तई थियई वे वि ॥८॥
घत्ता
स ई भु वहि परोप्परु लिन्ताइँ सरहसु आलिङ्गणु दिन्ताई।
णीसन्धि-गुणेण ण णाया दोषिण वि एवं पिव जाया ॥९॥
इय रामएवचरिए
धणजयासिय-सयम्भुएव-कए ।
'प व णम्ज णा वि वा हो' भट्ठारहम इमं पन् ।
[१९. एगुणवीसमो संधि]
पच्छिम-पहरै पहाणेण भाउच्छिय पिय पवसन्तऍण ।
'तं मरुसेज्जहि मिगणयणि ज मई अवहस्थिय मन्तएण' ॥
[१]
जन्तएण आउच्छिय जं परमेसरी।
थिय विसण्ण हेहामुह अञ्जणसुन्दरी ॥१॥
कर मलिकरेप्पिणु विण्णवह । 'रयसलहँ गम्भु जइ संभव ॥२॥
तो उत्तर काई देमि जणहों। ण वि सुज्झाइ एउ मज्झु मणहाँ' ॥३॥
चित्तण तेण सुपरिटवें वि।
कङ्कणु अहिणाणु समल्लवि ॥धा
गउ परवइ सहुँ मित्तेण वहिं। माणससरें दूसावासु जहिं ॥५॥
गुरुहार हूम एत्तहे वि सह। कोकावेवि पमणइ केउमइ ॥६॥
'एउ काई कम्मु पई आयरिउ । णिम्मलु महिन्द-कुल धूसरित ॥७॥

एगुणवीसमो संधि रोती है कि कुमार प्रवेश करता है। मधुर अक्षर और विनया- लाप करते हुए, आनन्द-सुख और सौभाग्य देते हुए, एक दूसरेका हाथ लेते-देते हुए वे पलंगपर चढ़े। दोनों हँसने और रमण करने लगे ॥१-८॥ धत्ता-अपनी बाँहोंमें एक दूसरेको लेते हुए सहर्ष आलिंगन देते हुए दोनों एक हो गये और उन्हें वियोगकी बात ज्ञात नहीं रही ॥२॥ इस प्रकार धनंजयके आश्रित स्वयम्भूदेव कृत 'पवनंजय- विवाह' नामका अठारहवाँ यह पर्व समाप्त हुआ। उन्नीसवीं सन्धि अन्तिम पहर में प्रवास करते हुए पवनंजयने प्रियासे कहा, "हे मृगनयनी, जो मैने भ्रान्तिके कारण तुम्हारा अनादर किया, उसे क्षमा करो।" [१] जाते हुए प्रियने जब परमेश्वरीसे यह पूछा तो अंजनासुन्दरोने दुःखी होकर अपना मुंह नीचा कर लिया। वह हाथ जोड़कर प्रार्थना करती है, "रजस्वला होनेसे यदि गर्भ रह जाता है तो लोगोंको मैं क्या उत्तर दूंगी ? यह बात मेरी समझमें नहीं आ रही है ?" तब उसके चित्तके विश्वास और पहचान के लिए कंगन देकर कुमार पवनंजय अपने मित्रके साथ वहाँ गया, जहाँ मानसरोवरमें उसका तम्बू था। वहाँ वह सती गर्भवती हो गयी। तब केनुमती उसे बुलाकर कहती है, "यह तूने किस कर्मका आचरण किया है, निर्मल

३०४
पउमचरित
दुम्बार-बरि-विणिवाराहों। मुहु मइलिउ सुभहाँ महाराहों' ॥८॥
तं सुवि वसंतमाल चवइ । 'सुविणे वि कलकण संभव ॥९॥
घत्ता
इमु करणु इमु परिहण इमु कञ्चीदामु पहाणहाँ।
गं तो का वि परिक्स कर परिसुज्महुँ जेण मझें जणहाँ ॥१०॥
[२]
तं णिसुणवि वेवन्ति समुट्टिय अप्पुणु ।
वे विताउ कसधाएँहि हयउ पुणुप्पुणु ॥१॥
fक जारहों णाहिं सुवण्णु घरें। जे कढउ घढावें वि छुहइ करें ॥२॥
अण्णु वि प्रत्तिउ सोहणु कठ । ज करणु देइ कुमार तउ' ॥३॥
कटुभरसर-पहर-भयाटरउ । संजायउ वे विणिरुत्तरउ ||
हमारेवि पणित कूर-भहु ।
'हय जोतें महारह-वी चदु ।।५।।
प्रयट दुहर अवलक्षण । ससि-धवलामल-कुल-लन्छणउ ॥६॥
माहिन्दपुरहों दूरन्तरेण परिधिववि आउ सहुँ रहवरेण ॥७॥
जिह मुभ ण आवद्द वत्त महु' तं णिसुणेवि सन्दणु जुत्तु लहु ॥८॥
गट चे विचटावि णवर तहि । मामिणि-करत आएसु जहिं ॥१॥
घत्ता
जयरहो दूर परन्तरण अक्षण एवन्ति भोमारिया।
'मा मजहि जामि ह' सहुँ धाहा पुणु जोहारिया ॥१०॥
[३]
कूर-बार परिभत्ता रवि भायन्तओ।
घाणा रट दुस्सु व भमहन्ती ॥१॥
मापन-नयहि मांगण अट । यादव गिलह व उपरिव पटः ॥२॥
मिमिया घभिहारी-स्व हि रुवद य विव-महिं स्टरहि ॥३॥

३०५ एगुणवीसमो सधि महेन्द्रकुलको तूने कलंक लगाया है, दुर्वार वैरियोंका निवारण करनेवाले मेरे पुत्रका मुख मैला कर दिया ।" यह सुनकर वसन्तमाला कहती है, "स्वप्नमें भी कलंककी सम्भावना नहीं है ॥१-९॥ पत्ता-यह कंगन, यह परिधान और यह सोनेको माला कुमार पवनंजय की है। नहीं तो कोई परीक्षा कर लो जिससे लोगोंके बीच हम शुद्ध सिद्ध हो जाये" ॥१०॥ [२] यह सुनकर केतुमती स्वयं कॉपती हुई उठी। उसने दोनोंको कोड़ोंसे बार-बार मारा। "क्या यारके घरमें सोना नहीं है, जो कड़े गढ़वाकर हाथमें पहना सकता है। और तुम्हारा इतना सौभाग्य कैसे हो सकता है कि कुमार तुम्हें कंगन दे।" उसके कटु वचनोंके प्रहारके डरसे व्याकुल होकर वे दोनों चुप हो गयीं । उसने क्रूर भटको बुलाकर कहा, "घोड़े जोतो और महारथकी पीठपर चढो, कुलक्षणो चन्द्रमाके समान पवित्र कुलको कलंक लगानेवाली इस दुष्टाको महेन्द्रपुरसे बहुत दूर रथसे छोड़ आओ, जिससे इसकी चात मुझ तक न आये।" यह सुनकर उसने शीघ्र रथ जोता, उन दोनोंको चढाकर वह केवल वहाँ गया जहाँके लिए स्वामिनीका आदेश था॥१-९॥ घत्ता-नगरसे दूर वनान्तरमें उसने रोती हुई अंजनाको. उतार दिया, "आदरणीये क्षमा करना, मैं जाता हूँ" यह कहकर जोरसे रोते हुए नमस्कार किया ॥१०॥ [३] "क्रूर वीरके वापस होनेपर सूरज डूब गया, मानो वह अंजनाका दुःख सहन नहीं कर पा रहा था। भीषण रातमें अटवी और भी भयानक थी, जैसे खाती हुई, लील्ती हुई, ऊपर गिरती हुई, श्रृंगारीके शब्दोसे डराती हुई, सियाकि २०

पउमचरित
पुप्फुवइ व फणि-फुकारऍ हि। बुक्कड़ व पमय-बुक्कारऍहि ॥४॥
मा दुक्छ दुल्न्यु परियलिय णिमि । दिणबरण पमाहिय पुन्व-दिमि ॥५॥
गयड णिय-णयह पराइया । अग्गए पटिहारु पधाइयउ ॥६॥
'परमवर आइय मिग-णयण । अक्षणसुन्दरि सुन्दर-वयण' ॥७॥
तं नव जाय दिहि णरवरहाँ। 'लहु पट्टण हह-मोह करहों ॥८॥
उम्महाँ मणि-वजण-तोरणई। वर-वेसड लेन्तु पसाहणई ॥९॥
घत्ता
मध पसाहहाँ मत्त गय पल्लाणहाँ पवर तुरङ्ग-यढ ।
(जय-) मनल-नाइँ आहणहाँ सवढम्मुह जन्तु अमेम भउ ॥१०॥
[ ४ ]
भवि एम पडिपुच्छिड पुणु वदावओ।
'कर नुरल कह रहवर को वोलायो' ॥१॥
पदिशाम पोलिय अनुल-यलु। 'ण कोवि महाउणकि पि वलु॥२॥
अाय वमन्तनाला महूँ। आइय पर प्रत्तिर कहिट महु ॥३॥
मा अंगुल-जर-मित्त-धण। टोमा गुन्हार विमण्ण-मण' ॥४॥
संगिमुनि थिउ हानुहट । णं गरबइ मिर यज्जेण हर |
'टुम्लील दृ
मं पदमरट ।
विणु वे जयरहाणीमरउ' ॥६॥
बनगइ आगन्दु मन्नि मुरधि । अपरिस्पिड किजद कर णनि ॥७॥
मामुट हौन्ति विरभाग्छि। महमहहें वि अवगुणारियट ॥८॥
घत्ता
मुरइ-कहाजिर गल-मदन हिम-परलियट कमलिणिहि निह ।
रान्तिमा परिमिट णिय-मुहाँ पल-माअट निह ॥९॥

एगुणवीसमो संधि भयंकर गब्दोंसे रोती हुई, सॉपोंकी फूत्कारसे फुफकारती हुई, बन्दरोंकी वुक्कारसे घिधियाती हुई-सी ! बड़ी कठिनाईसे वह रात वीती। और पूर्व दिशामे सूर्य हँसा । जाती हुई वह किसी तरह अपने पिता नगर पहुंची। प्रतिहारने आगे जाकर कहा, "हे परमेश्वर ! मृगनयनी, सुन्दरमुखी अंजना आयी है ।" यह सुनकर राजाको सन्तोप हुआ। ( उसने कहा) 'शीव नगर में वाजारकी शोभा कराओ, मणिस्वर्णके वन्दनवार सजाओ, सुन्दर वेप और प्रसाधन कर लिये जाये ॥१-९॥ वत्ता-सभी मत्तगज सजा दिये जाये, प्रवर अश्वोंको पर्याणसे अलंकृत कर दिया जाये, सामने जाती हुई समस्त भटसेना जयमंगल तूर्य वजाये" ॥१०॥ [४] यह कहकर वधाई देनेवाले राजाने पूछा-"कितने घोड़े, कितने रथवर और साथ कौन आया है ?" तव अतुलवल प्रतिहारने उत्तर दिया, "न तो कोई सहायक है, और न कोई सेना है ? अंजना वसन्तसेनाके साथ आयी है, मुझसे केवल इनना कहा गया है, सिर्फ आँसुओके जलसे उसके स्तन गीले हो रहे है, वह गर्भवती और दुःखी दिखाई देती है ।" यह मुनकर राजा नीचा मुंह करके रह गया, मानो किसीने उसके सिरपर वज मारा हो। वह बोला, "दुष्ट दुःशील उसे प्रवेश मत दो, बिना किसी देरके नगरसे बाहर निकाल दो।" इसपर विचार कर आनन्द मन्त्री कहता है, "विना परीक्षा किये कोई काम नहीं करना चाहिए, सासे बहुत बुरी होती हैं, वे महासतियोको भी दोप लगा देती हैं ।।१-८॥ पत्ता-जिस प्रकार सुकविकी कथाके लिए दुष्टकी मति, और जिस प्रकार कमलिनीके लिए हिमघन, उसी प्रकार अपनी बहुओंके लिए दुष्ट साँसें स्वभावसे शत्रु होती है" ॥९॥ --

पउमचरित
[५]
सासुआण सुण्हाण जणे सुपसिद्धई।
एकमेक-वइराई
अणाइ-णिवाई॥१॥
भत्तारु भणेसइ जे दिवसु । विरुआरी होसइ तं दिवसु ॥२॥
वयणेण तेण मन्तिह तणण । आरुटु पसण्णकित्ति मणेण ॥३॥
'किं कन्तएँ णेह-विहूणियएँ। कि कित्तिए वइरिहि जाणियएँ ॥४॥
किं सु-कहए णिरलङ्कारियएँ । किं धीयएँ लन्छण-गारियएँ ॥५॥
घरें अञ्जण समरङ्गण पवणु । गम्भहाँ संवन्धु एत्थु कवणु' ॥६॥
तं णिसुणे वि णरण णिवारियउ । पढहउ देप्पिणु णीसारियउ ॥७॥
वणु
गम्पि
पइटर
मीसणउ। धाहाविउ पहणवि अप्पणउ ॥८॥
'हा विहि हा काइँ कियन्त किउ । णिहि दरिसें विलोयण-जुयलहिउ'॥९॥
घत्ता
विहि मि कलुणु कन्दन्तियहि वण दुक्खें को व ण पेल्लियउ ।
सच्छन्देहिं चरन्तऍहिं हरिणेहि वि दोवउ मेलियः ॥१०॥
[६]
वारवार सोआउर रोवइ अक्षणा ।
'का वि णाहि मई जेही दुक्खहं मायणा ॥३॥
सासुअए हयासऍ परिहविय । हा माएँ पई वि णउ संथविय ॥२॥
हा माइ-जणेरही णिटुरक्षा। णीसारिय कह स्यन्ति पुरहों ॥३॥
कुलहर-पइहरहि मि दइगहु मि। पूरन्तु मणोरह सब्बहु मि' ॥४॥
गटभेसरि जउ जउ संचरइ । तउ तउ रुहिरहाँ छिलरु भरइ ॥॥
विस-भुक्ख-किलामिय चत्त-सुह । गय तेत्थु जेत्थु पलियक-गुह ॥६॥
तहिं दिहु महारिसि सुद्धमइ।
णामेण मडारउ अमियगइ ॥७॥
अत्ताधण-तावें तापियउ।
छुडु जे छुदु जोग्गु खम्मावियउ ॥४॥
तहिं भवसर वे वि पद्धकियउ। णं दुक्ख-किलेसहिं सुछियउ ॥९॥

एगुणवीसमो संधि ३०९ ? [५] "लोगोंमें यह प्रसिद्ध है कि सासों और बहुओंका एक दूसरेके प्रति बैर अनादिनिबद्ध है। जिस दिन पति इस बातका विचार करेगा, उस दिन बहुत बुरा होगा।" लेकिन मन्त्रीके इन वचनोंसे राजा प्रसन्नकीर्ति अपने मनमें क्रुद्ध हो उठा। वह बोला, "स्नेहहीन पत्नीसे क्या ? शत्रुको जाननेवाली कीर्तिसे क्या ? अलंकार-विहीन सुकविकी कथासे क्या ? कलंक लगाने- वाली लड़कीसे क्या ? घरमें अंजना, और युद्ध में पवनंजय, यहाँ गर्भका सम्बन्ध कैसा ?” यह सुनकर एक नरने अंजना- का निवारण कर दिया और ढोल बजाकर निकाल दिया। वह भीषण वनमें घुसी। और अपनेको पीटती हुई जोर-जोरसे चिल्लायी, "हे विधाता, हे कृतान्त, तुमने यह क्या किया, तुमने निधि दिखाकर दोनों नेत्र हर लिये ॥१-९|| धत्ता-करुण विलाप करती हुई उन दोनोंने वनमें किसको द्रवित नहीं किया, यहाँ तक कि स्वच्छन्द चरते हुए हरिणोंने भी मुँहका कौर छोड़ दिया ॥१०॥ [६] अंजना शोकातुर होकर बार-बार रोती है कि "ऐसी कोई भी नहीं, जो मेरे समान दुखकी भाजन हो । हताश सास- ने तो मुझे छोड़ा ही, परन्तु हे मॉ, तुमने भी मुझे सहारा नहीं दिया, हे निष्ठुर भाई और पिता, तुम लोगोंने रोती हुई मुझे नगरसे कैसे निकाल दिया । अव कुलगृह, पतिगृह, पति भी सभीके मनोरथ पूरे हों।" गर्भवती वह जैसे-जैसे चलती वैसे-वैसे खूनका चूंट पीकर रह जाती। सुखोंसे परित्यक्त, प्यास और भूख से तिलमिलाती हुई वे दोनों वहाँ गयीं, जहाँ पर्यकगुहा थी। वह उन्होंने शुद्धमति महामुनि आदरणीय अमितगतिके दर्शन किये । आत्माके तपको करनेवाले जो योग्य और क्षमाशील थे। उस अवसरपर वे दोनों वहाँ पहुँची, मानो दुख और क्लेशसे वे सूख चुकी थीं ॥१-२||

पउमचरिउ
घत्ता
चलण णवेप्पिणु मुणिवरहाँ अक्षण विष्णवइ लुहन्ति मुहु ।
'अण्ण-मवन्तर का मई विउ दुछिउ जे अणुहदमि दुहु' ॥१०)
[७]
पुणु वसन्तमालाएं वुत्तु 'णउ तेरउ ।
एउ सन्वु फलु एयहाँ गमहाँ केरउ' ॥१॥
तं णिसुणे वि विगय-राउ-मणइ । 'ऍड गव्यहाँ दोसुण संभवई' ॥२॥
जइ घोलइ 'होमइ तणउ त। रहु चरिम-देहु रणें लद्ध-जड ॥३॥
पई पुत्र-भवन्तरें सई करण । जिण-पडिम सवत्तिह मच्छरेंण ॥en
परिचित्त पत्त तं एहु हुहु ।
एवहिं पावेसहि रूयल-सुहु' ॥५॥
गउ एम भणेप्पिणु अभियगइ। ताणन्तरं दुक्कु मयाहिवइ ॥६॥
विहुणिय-तणु दूरग्गिण्ण-कम्। सणि असणि णाई जमु काल-समु॥७॥
कुञ्जर-सिर-रुहिरारण-णहरु । कीलाल-सित्त-सर-परारु ॥२॥
अइ-वियड-दाढ-पाढिय-बयणु । रत्तुप्पल-गुञ्ज-सरिस-णयणु ॥९॥
खय-सायर-रव-गम्भीर-गिरु ।
लगूल-दण्ड-दुइय-सिर ॥१०॥
धत्ता
तं पेक्खें वि हरिणाहिवइ भन्जण स-मुच्छ महियलें पडइ ।
विजा-पाणऍ उप्पऍवि भायास वसन्तमाल रडइ ॥११॥
[८]
'हा समीर पवणक्षय मणिल पहाणा ।
हरि-कियन्त-दन्तन्तरें वइ अक्षणा ||१||
हा कम्मु काइँ किड केउमइ। खले सुइय लहेसहि कवण गइ ॥२॥
हा ताय महिन्द मइन्दु धरैं। सु-पर-पणमिति पडिरय करें ॥३॥
हा मायरि तुहु मि ण संथवहि। मुच्छाविय दुहिय समुत्यवहि ॥४॥
गन्धवहीं देवहों दाणवहों। विजाहर-
किर माणवहीं ॥५॥

एगुणवीसमो संधि ३११ घत्ता-मुनिवरके चरणोंकी वन्दना कर, अंजना अपना मुंह पोंछती हुई निवेदन करती है, "मैने अन्यभवमें ऐमा कौन- सा पाप किया, जिससे दुखका अनुभव कर रही हूँ" ॥१०॥ ७] तब वसन्तमाला बोली, "यह तेरा नहीं, यह सव फल तेरे गर्भका है ?" यह सुनकर वीतराग मुनि कहते हैं-"यह गर्भका दोष नहीं है।" यति घोषणा करते है, "यह चरम शरीरी और युद्ध विजय प्राप्त करनेवाला है। तुमने पूर्वजन्म- में अपने हाथसे सौतकी ईर्ष्याके कारण जिनप्रतिमाको फेंका था, उसी कारण इस दुखको प्राप्त हुई। अब तुम्हे समस्त सुख प्राप्त होगा।" यह कहकर अमितगति वहाँसे चले गये। इसी वीचमें वहाँ एक सिंह आया, शरीर हिलाता हुआ, और दूरसे ही पैरोंको उठाये हुए, जैसे शनि, वज्र या यम हो । जिसके नख गजोके शिरोंके खूनसे लाल है, जिसकी अगल भी रक्तरंजित है, जिसका मुख अति विकट दाढ़ोंके कारण वुला हुआ है, जिसके नेत्र लाल कमल और गुंजाफलके सनान लाल जिसकी वाणी प्रलयसमुद्रके समान गम्भीर है, जो पूलके दण्डसे अपने सिरको खुजला रहा है ॥१-१०॥ घत्ता-ऐसे उस सिंहको देखकर अंजना मूञ्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। तव विद्याके वलसे आकाशमें जाकर वसन्तमाला जोर-जोरसे चिल्लायी ॥११॥ [८] "हा समीर पवनंजय, अनिल प्रभंजन! अंजना इस समय सिंहरूपी यमकी दाढ़ोंके भीतर है। हा, केतुमतीने यह कौन-सा काम किया। उसने इसे छोड़ा है, वह कौन-सी गनि प्राप्त करेगी ? हा तात महेन्द्र, सिंहको पकड़ो,सुप्रसन्नीनि, तुम रक्षा करो, हा मॉ, तुम भी सान्त्वना नहीं देती। तुम्हारी कन्या मूच्छित है, उठाओ इसे । अरे गन्धर्वो, देवदानवो विद्याधरो,

पउमचरित
जक्खहाँ रक्खहाँ रक्खहों सहिय । णं तो पश्चाणणेण गहिय ॥६॥
तं णिसुणेवि गन्धव्वाहिबह । रणें दुजउ पर-उवयार-भइ ॥७॥
मणिचूड रयणचूडहँ दइउ । पञ्चाणणु जेत्थु तेत्थु भइड ॥६॥
अट्ठावउ सावउ होवि थिउ ।
हरि पाराउट्ठउ तेण किउ ॥९॥
घत्ता
ताहि गयणहाँ भोअरवि अन्जणहें वसन्तमाल मिलिय ।
'इहु अट्ठाव होन्तु ण वि ता वट्टइ (१) मासि माएं गिलिय॥१०॥
[१]
एम वोल्ल किर विहि मि परोप्पर जायें हिं।
गीउ गेउ गन्धवे मणहरु ताहि ॥१॥
तं णिसुणे वि परिओसिय णिय मणे(१)। 'पच्छण्णु को वि सुहि वसइवणार
असमाहि-मरणु में णासियउ। अण्णुवि गन्धव्वु पयासियउ'शा
अवरोप्परु एम चवन्तियहुँ । पलियक-गुहहिं अच्छन्तियहुँ ॥४॥
माहवमासहों वहुल?मिएँ। रयणिहें पच्छिम-पहरबै थिएँ ॥५॥
णक्ख सवणे उप्पण्णु सुउ ।
हल-कमल-कुलिस-झस-कमल-जुङ॥३॥
चकस-कुम्भ-सङ्घ-सहिउ।
सुह-लक्खणु अवलक्षण-रहिउ ॥७॥
ताणन्तर पर-बल-णिम्महण । पटिसूरे सुर-सम-प्पहण ॥४॥
गहें जन्ते वे वि णियच्छियउ । ओअरवि विमाणहाँ पुच्छियउ॥१
घत्ता
'कहिं जायउ कह वदियउ कहाँ धीयउ कहाँ कुलउत्तियउ ।
कसु केरउ एवड्ड् दुहु
वण अच्छहाँ जेण रुमन्तियउ' ॥१०॥

एगुणवीसमो संधि ३१३ किन्नरो, मनुष्यो, यक्ष, राक्षसो, वचाओ मेरी सखी को, नहीं तो सिंह उसे पकड़ लेगा।" यह सुनकर परोपकारमें है बुद्धि जिसकी, तथा जो युद्धमें अजेय है, ऐसा चन्द्रचूड़का पुत्र, विद्याधरराज रविचूड़ वहाँ आया, जहाँ सिंह था, और वह स्वयं अष्टापदका बच्चा बनकर बैठ गया। इस प्रकार सिंहको उसने भगा दिया ॥१-२॥ घत्ता-इतनेमें आकाशसे उतरकर वसन्तमाला अंजनासे मिलती है। (अंजना कहती है ) यहाँ अष्टापद होनेसे वह सिंह नहीं है, वह अष्टापद भी मायासे विलीन हो गया है।॥१०॥ [९] इस प्रकार दोनोंमें मधुर वातचीत हो ही रही थी तब- तक गन्धर्वने एक सुन्दर गीत गाया। उसे सुनकर अंजना अपने मनमें सन्तुष्ट हुई, उसे लगा कि कोई सुधीजन छिपकर वनमें रहता है, जिसने इस असामयिक मरणसे बचाया और यह गन्धर्वगान प्रकाशित किया। इस प्रकार. आपसमें बातचीत करती हुई वे पर्यंक गुफामें रहने लगीं। तव चैत्र कृष्ण अष्टमी की रातके अन्तिम पहरके श्रवण नक्षत्रमें अंजनाको पुत्र उत्पन्न हुआ जो हल-कमल कुलिश-मीन और कमलयुगके चिह्नोंसे युक्त था। चक्र-अंकुश-कुम्भ-शंखसे सहित शुभ लक्षणोंवाला वह अशुभ लक्षणोंसे रहित था। इसके अनन्तर जिसने शत्रुसेना- का नाश किया है और जिसकी प्रभा सूर्यके समान है ऐसे प्रतिसूर्यने आकाशमार्गसे जाते हुए उन दोनोंको देखा। उसने विमानसे उतरकर उनसे पूछा ॥१-९॥ -"कहाँ पैदा हुईं, कहाँ बड़ी हुईं, किसकी कन्या हो, किसकी कुलपुत्रियाँ हो, किसका तुम्हें इतना बड़ा दुःख है जिसके कारण तुम वनमें रोती हुई रह रही हो" ॥१०॥ घत्ता-

पउमचरित
[१०]
पुणु वमन्तमाला' पडुत्तर दिजइ ।
जिरवमंसु तहाँ णिय-वित्तन्नु कहिजह ॥१॥
'अक्षणसुन्दरि णामण इम । सइ सुद्ध मुन्द जिह जिण-पडिम ॥२॥
मणवेय-महाएविहं तणय। जइ मुणहाँ महिन्दु तेण जणिय ॥३॥
पायड पसण्णकित्तिह भइणि । मणहर पवणन्जयाहों घरिणि' ॥४॥
विजाहरु तं णिसुणेवि वयणु ।
पभणइ वाहम्म-भरिय-णयणु ॥५॥
'हउँ मा महिन्द्रहों महुणउ । सु-पसण्णकित्ति महु भायणउ ॥६॥
तउ होमि महोयरु माउलउ । पडिसूरु हणूरुह-राउलउ' ॥७॥
तं णिमुणे वि जाणेवि सरेंचि गुणु । अत्तिल्लु तेहि ता रुण्णु पुणु ॥४॥
जं
लइन
भासि पुण्णेहि विणु। तं दिण्णु दिहिह णं सोय-रिणु ॥९॥
घत्ता
सरहसु साइउ देनाएँहि जं एकमक आधीलियउ।
अंसु पणाले णासरह
णं
कलुशु महारसु पीलियउ॥१गो
[११]
दुक्खु दुक्सु साहार वि णयण लुहावि ।
माउलेण णिय णियय-विमाणे चडावेंचि ॥१॥
सुर-करिवर-कुम्भत्थल-थणहें। गयणगणे जन्हेिं भक्षणाहें ॥२॥
णीसरिज वालु अइ-दुल्ललिउ । णं णहयल-सिरिह गम्भु गलिहें ॥३॥
मारुइ दवत्ति णिवडिउ इलहें। णं विज्जु-पुज्जु उप्परि सिलहें ॥४॥
उच्चाएं वि णित विज्जाहरहि । णं जम्मण जिणवरु सुरव हि ।।५।।
अक्षणहें समप्पिउ जाय दिहि । णं णठ्ठ पडीवउ लधु णिहि ॥६॥
णिय-पुरु पइसारवि णरवरेण । जम्मोच्छउ किउ पडिदिणयरेण ॥७॥

एगुणवीसमो संधि [१०] तब वसन्तमालाने उत्तर दिया, उसने उसका (अंजना- का) और अपना सारा वृत्तान्त बता दिया । इसका नाम अंजना सुन्दरी है, यह सती उसी प्रकार शुद्ध और सुन्दर है जिस प्रकार जिनप्रतिमा। यह महादेवी मदनवेगाकी कन्या है, यदि महेन्द्रको आप जानते हैं, उन्होंने इसे जन्म दिया है। यह प्रसन्नकीर्तिकी प्रकट बहन है, और पवनंजयकी सुन्दर गृहिणी।" यह वचन सुनकर विद्याधरकी आँखे ऑसूसे भर आयीं। वह बोला, "आदरणीये, मैं महेन्द्रका साला हूँ, प्रसन्न- कीर्ति मेरा भानजा है, मैं तुम्हारा सगा मामा हूँ, प्रतिसूर्य हनुरुह द्वीपके राजकुलका ।" यह सुनकर, जानकर और अतुल गुणोंकी याद कर वह फिरसे रोयो कि पुण्योंके विना जो कुछ मैने ( पूर्वजन्ममें ) अर्जित किया था, विधाताने वही मुझे शोक-ऋण दिया है ॥१-९॥ घत्ता-हर्षपूर्वक एक दूसरेको स्वागत देते हुए उन्होंने जो एक दूसरेको आलिंगन दिया, उससे अश्रुधारा इस प्रकार वह निकलती है, मानो करुण महारस ही पीड़ित हो उठा हो ॥१०॥ [११] कठिनाईसे उसे ढाढ़स बँधाकर और ऑसू पोंछकर मामाने उसे अपने विमानमें चढ़ाकर ले गया। ऐरावतके कुम्भस्थलके समान है स्तन जिसके ऐसी वसन्तमाला जव आकाशमार्गसे जा रही थी, तब वह अत्यन्त सुन्दर बालक विमानसे गिर पड़ा, मानो आकाशतलरूपी लक्ष्मीसे गर्भ ही गिर गया हो। हनुमान् शीघ्र ही धरती पर गिर पड़ा, मानो शेलाके ऊपर विद्युत्पुंज गिरा हो, विद्याधर उसे उठाकर ले ये, मानो जन्मके समय सुरवर ही जिनेन्द्रको ले गये हों। उन्होंने अंजनाको सौप दिया। उसे धीरज हुआ, जैसे नष्ट हुई नेधिको उसने दुवारा पा लिया हो, नरवर प्रतिसूर्यने अपने रमें ले जाकर उसका जन्मोत्सव मनाया ॥१-७||

३१६
पउमचरित
घत्ता
'सुन्दरु' जगें सुन्दरु मणे वि 'सिरिसइलु' सिलायलु चुपणु णिउ ।
हणुरुह-दीव पवडियउ 'हणुवन्तु' णामु ते तासु किउ ।।८॥
[ १२ ]
एत्तहे वि खर-दूसण मेल्लाबेप्पिणु ।
वरुणहाँ रावणहो वि सन्धि करेप्पिणु ॥१॥
णिय-णयरु पईसइ जाव मरु । णीसुण्णु ताम णिय-घरिणि-घरु ॥२॥
पेक्खप्पिणु पुच्छिय का वि तिय । 'कहिं अक्षणसुन्दरि पाण-पिय' ।।३।।
तं णिसुणवि बुच्चइ वालियएँ। 'णव-रम्भ-गन्भ-सोमालियएँ ॥४॥
किर गम्भु भणे वि पर-णरवरहों। केउमइए धल्लिय कुलहरहों ॥५॥
त सुर्णे वि समीरगु णीसरिउ । अणुमरिसहि वयसहि परियरिउ ॥६॥
गउ तेत्थु जेत्थु तं सासुरउ । किर दरिसावेसइ सा सुरउ ॥७॥
पिय इट्टण दिढ णवर तहि मि । असहन्तु पहजणु गउ कहि मि ॥८॥
परियत्तिय पहसियाइ-सयण ।
दुक्खाउर ओहुलिय-वयण ॥९॥
घत्ता
'एम भणेजहु केउमइ पूरन्तु मणोरह माएँ तउ ।
विरह-दवाणल-दीवियउ पवणञ्जय-पायवु खयहाँ गउ' ॥१०॥
[ १३ ]]
दुक्खु दुक्खु परियत्तिय सयल वि सजणा।
गय रुयन्त णिय-णिलयहाँ उम्मण-दुम्मणा ॥१॥
पवणजओ वि पडिवक्ख-खउ । काणणु पइसरइ विसाय-रउ ॥२॥
पुच्छइ 'अहाँ सरवर दिट्ट धण। रत्तुप्पल-दल-कोमल-चलण ॥३॥
अहौं रायहंस हंसाहिवइ ।
कहें कहि मि दिट्ठ जइ हंसनाइ ॥४॥
अहाँ दीहर-णहर मयाहिवइ । कहें कहि मिणियम्विणि दिट्ट जह|५||
अहाँ कुम्मि कुम्भ-सारिच्छ-थण । “केतह वि दिट्ट सइ सुद्ध-मण ॥६॥

एगुणवीसमो संधि ३१७ - घत्ता-वह सुन्दर था, दुनिया उसे सुन्दर कहती, 'श्रीशैल' इसलिए कि शिलातल चूर्ण किया था। हनुवन्त नाम इसलिए, क्योंकि हनुरुह द्वीपमें उसका लालन-पालन हुआ था |८|| [१२] यहाँपर भी खरदूषणको मुक्त कराकर तथा रावण और वरुणकी सन्धि कराकर वर पवनंजय जब अपने नगर में प्रवेश करता है तो उसे अपनी पत्नीका भवन सूना दिखाई दिया । उसने एक स्त्रीसे पूछा, "प्राणप्रिय अंजना कहाँ है ?" यह सुनकर वह कहती है, "नवकदली वृक्षके गाभके समान सुन्दर उस बालिकाके गर्भको परपुरुषका गर्भ समझकर केतुमतीने उसे कुलगृहसे निकाल दिया।" यह सुनकर पवनंजय वहॉसे निकल गया। अपनी समानवयके मित्रोंसे घिरा हुआ वह वहाँ गया जहाँ उसकी ससुराल थी कि शायद वह प्रिया वहाँ दिखाई देगी? लेकिन उसकी इष्ट प्रिया केवल वहाँ भी नहीं दिखाई दी। इसे असहन करता हुआ पवनंजय कहीं भी चला गया। नीचा मुख किये, दुःखातुर, प्रहसितके साथ वह लौट पड़ा ॥१-९॥ पत्ता-केतुमतीसे इस प्रकार कह देना कि हे माँ, तुम्हारे मनोरथ सफल हो गये, पवनंजयरूपी वृक्ष विरहकी ज्वालामें जलकर खाक हो गया ।।१०|| [ १३ ] सभी सज्जन बड़ी कठिनाईसे वापस आये । उन्मन, दुर्मन वे रोते हुए बड़ी कठिनाईसे अपने घर गये ॥१॥ प्रतिपक्षका हनन करनेवाला विषादरत पवनंजय भी जंगल में प्रवेश करता है और पूछता है-अरे हंसोंके अधिराज राजहंस ! बताओ यदि तुमने उस हंसगतिको कहीं देखा हो, अहो दीर्घ-नखवाले सिंह, क्या तुमने उस नितम्बिनीको कहीं देखा है ? हे गज, कुम्भके समान स्तनोंवालीको क्या तुमने

पउमचरित
अहाँ अहाँ असोय पल्लविय-पाणि । कहिं गय परहुए परहूय-बाणि ॥७॥
अहाँ रुन्द चन्द चन्दाणणिय । मिग कहि मि दिट्ट मिग-लोयणिय ।।८
अहाँ सिहि कलाव सण्णिह-चिहुर । ण णिहालिय कहि मि विरह-विहुर' ।।९
एम मवन्ते विउले वणे
सासय-पुर-परमेसरेंण
घत्ता
णग्गोह-महादुमु दिठ्ठ किह ।
णिक्खवणे पयागु जिगेण जिह ॥१०॥
[१४]
त णिएवि वड-पायवु अण्णु वि सरवरु ।
कालमेहु णामेण खमाविउय गयवरु ॥१॥
'जं सयल-काल कण्णारिउ ।
भकुस-खर-पहर-वियारियउ ॥२॥
आलाण-खम्भे जं आलियउ । जं सङ्घल-णियरहिं णियलियउ॥३॥
त सयलु खमेजहि कुम्मि महु। तहिं पच्चक्खाणउ लइउ लहु ॥४॥
'जइ पत्त वत्त कन्तहें तणिय । तो णउ णिवित्ति गइ एत्तडिय ॥५॥
जइ घ. पुणु एह ण हृय दिहि । तो एत्थु मज्यु सण्णास-विहि' ॥६॥
थिउ मउणु ल एवि णराहिवइ । प्रायन्तु सिद्धि जिह परम-जइ ॥७॥
सच्छन्दु गइन्दु वि संचरइ । सामिय-सम्माणु ण वीमरइ ॥८॥
पढिरक्खइ पासु ण मुभइ किह । मव-मव-किउ सुछिय कम्मु जिह॥९॥
घत्ता
ताम रुमन्तें पहसिएण अक्खिउ जणणिहें वुण्णाणणहें।
'एड ण जाणहुँ कहि मि गड मरुएउ विभओएं भजणहें ' ॥१॥

एगुणवीसमो संधि देखा है, उस शुद्ध और सतीमनको देखा है। अहो अशोक ! पल्लबोके समान हाथवाली, उसे देखा है ? हे कोकिल, कोकिलवाणी कहाँ गयी ? अरे सुन्दर चन्द्र ! वह चन्द्रमुखी कहाँ गयी, हे मृग, बताओ क्या तुमने मृगनयनीको देखा है ? अरे मयूर! तुम्हारे कलापकी तरह बालोंवाली उसे क्या तुमने देखा है ? क्या वह विरह विधुरा तुम्हें दिखाई नहीं दी ॥२-९|| घत्ता-उस विपुल बियावान जंगलमें भटकते हुए उसे एक महान् वटवृक्ष इस प्रकार दिखाई दिया कि जिस प्रकार शाश्वतपुरके परमेश्वर जिनभगवान्ने दीक्षाके समय प्रयागवन देखा था।॥१०॥ १४ ] उस वटवृक्ष और दूसरे एक सरोवरको देखकर पवनंजयने अपने कालमेघ नामके गजवरसे क्षमा माँगी। जो हमेशा मैने तुम्हारे कानों में शब्द किया, अंकुशके खरप्रहारोंसे जो विदीर्ण किया, आलात खम्भेसे जो तुम्हे बाँधा, श्रृंखला और वेढ़ियोंसे जो नियन्त्रित किया, हे गज, वह सब तुम क्षमा कर दो। उसने शीघ्र वहाँ यह प्रतिज्ञा कर ली, “यदि पत्नीका समाचार मिल गया, तो मेरी यह संन्यास-गति नहीं होगी, पर यदि मेरा यह भाग्य नहीं हुआ, तो मैं संन्यासविधि ले लूंगा।" राजा मौन होकर उसी प्रकार, स्थित हो गया जिस प्रकार परममुनि सिद्धिका ध्यान करते हुए मौन हैं। । वह गज स्वच्छन्द विचरण करता, परन्तु स्वामीके सम्मानको नहीं भूलता। वह उसकी रक्षा करता, और किसी भी प्रकार उसका साथ नहीं छोड़ता, जैसे भवभवका किया हुआ पुण्य साथ नहीं छोड़ता ॥१-९॥ धत्ता इसी बीच, दुखी है चेहरा जिसका, ऐसी पवनंजय- की माँसे रोते हुए प्रहसित ने कहा, "यह मैं नहीं जानता कि अंजनाके वियोगमें पवनंजय कहाँ चला गया है" ॥१०॥ धारण करते

पउमचरित
[१५]
त णिसुर्णेवि सम्वझिय-पसरिय-वेयणा ।
पवण-जणणि मुच्छाविय थिय अच्चेयणा ॥१॥
पत्रालिय हरियन्दण-रसेंण । उज्जीविय कह वि पुण्ण-वसेंण ॥२॥
'हा पुत्त पुत्त दक्खवहि मुहु । हा पुत्त पुत्त कहिं गयउ तुहुँ ॥३॥
हा पुत्त आउ महु कमें हिं पडु। हा पुत्त पुत्त रहगएहिं चहु ॥४॥
हा पुत्त पुत्त उववर्णेहि भमु । हा पुत्त पुत्त झेन्दुए हि रमु ॥५॥
हा पुत्त पुत्त अस्थाणु करें हा पुत्त महाहवें वरुणु धरें ॥६॥
हा वहुए वहुएँ मइँ भन्तियएँ। तुहुँ घल्लिय अपरिक्खन्तियएँ' ॥७॥
पल्हाऍ धीरिय 'लुहहि मुहु ।
णिकारण रोवहि काई तुहुँ ॥४॥
हउँ कन्ते गवेसमि तुत्र तणउ ।
इमु मेइणि-मण्डल केत्तडउ' ॥९॥
घत्ता
एम भणेवि णराहिवेण उवयार करवि सासणहरहुँ ।
उभय-सैढि-विणिवासियहुँ पहविय लेह विजाहरहुँ ॥१०॥
[१६]
एक्कु जोहु संपेसिउ पासु दसासहो ।
अक्क-सक्क-तइलोक्क-चक्क-संतासहो ॥१॥
भवरेक्कु विहि मि खर-दूमणहुँ । पायाललङ्क-परिभूसणहुँ ॥२॥
अवरक्कु कइद्धय-
-पत्थिवहाँ।
सुग्गीवहाँ किक्किन्धाधिवहाँ॥३॥
भवरेक्कु किक्कुपुर-राणाहुँ । णल-णीलहुँ पमय-पहाणाहुँ ॥४॥
अवरेक्कु महिन्द-णराहिवहाँ। तिकलिङ्ग-पहाणहाँ पस्थिवहाँ ॥५॥
भवरेक्कु धवल-णिम्मल-कुलहों। पडिसूरहों अञ्जण-माउलहाँ ॥६॥
दूवत्तए पत्तए गीढ-भय । हणुबन्तहाँ मायरि मुच्छ गय ॥७॥
अहिसिञ्चिय सीयल-चन्दगण । पढ वइय वर-कामिणि-जणेण ॥४॥
आसासिय सुन्दरि पवण-पिय । णं श्रिय तुहिणाहय कमल-सिय ॥९॥

१२.
एगुणवीसमो सधि
[१५] यह सुनकर पवनंजयकी माँके सव अंगोंमें वेदना
फैल गयी । वह मूच्छित और संज्ञाशून्य हो गयी। हरिचन्दनफे
रससे छिड़ककर (गीला कर ) किसी प्रकार पुण्यके वशसे
वह फिरसे जीवित हुई। (वह विलाप करने लगी), "हा
पुत्र-पुत्र, मुझे मुँह दिखाओ, हा पुत्र, पुत्र, तू कहां गया, हे पुत्र
आ, और मेरे चरणोंमें पड़, हा पुत्र-रथ और गजपर चढो,
हा पुत्र-पुत्र, उपवनोंमें घूमो, हा पुत्र, पुत्र, तुम गेंदोंसे खेलो,
हा पुत्र-पुत्र, तुम सिंहासनपर बैठो, हा पुत्र-पुत्र, महायुद्ध में तुम
वरुणको पकड़ो, हा बहू-हा वहू, मैंने विना परीक्षा किये हुए
तुझे निकाल दिया। तब प्रह्लादने उसे धीरज बंधाया, "अपना
मुंह पोंछो, अकारण तू क्यों रोती है, हे कान्ते, मैं तेरे पुत्रकी
खोज करता हूँ, यह पृथ्वीमण्डल है कितना ? ||१-९।।
पत्ता-यह कहकर और उसका उपचार कर राजाने
शासनधरोंके द्वारा विजयाकी दोनों श्रेणियोंमें निवास
करनेवाले विद्याधरोंके पास लेख भेजा ||२०||
[१६] एक योद्धाको सूर्य, शक्र और त्रिलोकमण्डलको
सतानेवाले रावणके पास भेजा, एक और, दोनों खर और
दूपणको, जो पाताललंकाके भूषण थे, एक और, कपियोंके
राजा, और किष्किन्धाधिप सुग्रीवके पास, एक और वानरोंमें
प्रमुख किष्कपुरके राजा नल और नीलके पास, एक और
त्रैलोक्यमें प्रधान राजा महेन्द्रके पास, एक और धवल और
पवित्र कुलवाले, अंजनाके मामा प्रतिसूर्यके पास | उस खोटे
पत्रके पहुंचते ही भयभीत हनुमान्की माँ मूच्छित हो गयी।
उसपर शीतल चन्दनका छिड़काव किया गया, और उत्तम
कामिनीजनने हवा की। पवनंजयकी प्रिया अंजना आश्वासित
हुई, मानो हिमाहत कमलश्री हो ॥१-९॥
२१

१२२
पटमचरित
घत्ता
ताम विधीरिय माउलेण 'मा माएं विसूरत करि मणहाँ।
सिद्धहाँ सासय-सिद्धि जिह तिह पर दक्खवमि समीरणहाँ' ॥१०॥
[१७]
पुश पुणो वि धीरेप्पिणु अक्षणसुन्दरि ।
णिय-विमाणे आरुढ णराहिव-केसरि ॥१॥
गउ तेत्तहँ जेत्तहँ केउमइ। अण्णु वि पल्हाय-राहिवइ ॥२॥
गरवर-विन्दाई मसेसाई। मेलेप्पिणु गयई गवेसाई ॥३॥
तं भूभरवाढ दुक्काई। घण-उलई व थाणही चुकाई ॥४॥
पवणक्षउ जहिं आरहें वि गठ। सो कालमेहु वणे दिछु गउ ॥५॥
उद्धाइड उक्कर उन्वयणु। तण्डविय-कण्णु तम्विर-णयणु ॥६॥
तं पाराउट्ठर करवि वलु। गउ तहिं जे पडोवउ भतुल-बलु ७॥
गणियारिउ ढोइय वसिकियउ । णव-लिणि-सण्डे भमरु वथियउ॥८॥
किकरहि गवेसन्तेहि वर्ण । लक्विड वेल्लहले लया-भवण ॥९॥
जोक्कारित विजाहर-सए हिं। जिह जिणवर सुरहि समागए हिं०
मउणु एवि परिट्रिय
ण चवइ ण चल्लइ झाण-परु ।
जाय भन्ति मणे सबहु मि 'कट्ठम किण्ण णिम्मविड णरु' ॥११॥
[१]
पुणु सिलोउ अवणीयल लिहित स-हत्यण ।
'भजणाएँ मुइयाएँ मरमि परमत्येण ॥१॥
जीवन्तिहँ णिसुणमि वत्त जइ। तो वोल्लमि लइ एचडिय गई' ॥२॥
तं णिसुणे वि हणुरुह-राणऍण । वज्जरिय वत्त परिजाणऍण ॥३॥
तामरस-ल्हास-सरिसाणणड । विणि मि वसन्तमालाणउ ॥१॥

एगुणवीसमो संधि धत्ता-तब मामाने भी उसे समझाया, "हे आदरणीये, अपने मनमें विषाद मत करो, सिद्ध जैसे शाश्वत-सिद्धिको देखते हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हें पवनकुमारको दिखाऊँगा" ॥१०॥ [१७] इस प्रकार बार-बार अंजना सुन्दरीको समझाकर वह नराधिप सिंह अपने विमानमें बैठ गया। वह वहाँ गया, जहाँ केतुमती और प्रह्लादराज थे। अशेष नरवर समूह एक साथ होकर उसे खोजनेके लिए गये, वे उस भूतरवा अटवीमें पहुँचे, जो ऐसी मालूम होती थी, जैसे अपने स्थान च्युत मेघ- कुल हों। पवनंजय जिस गजपर बैठकर गया था, वह कालमेघ उन्हें वहाँ दिखाई दिया। अपनी सूंड और मुख ऊंचा किये हुए, कान फैलाये हुए, लाल-लाल आँखोंवाला वह महागज दौडा, सेनाने उसे नियन्त्रित किया, वह अतुलवल फिर वापस वहां गया। हथिनी ले जानेपर वह उसी प्रकार वशमें हो गया जिस प्रकार कमलिनियोंके समूहमें भ्रमर स्थित रहता है । वनमें खोजते हुए अनुचरोंने उसे बेलफलोंके लतागृहमें बैठे हुए देखा। सैकड़ों विद्याधरोंने उसे वैसे ही नमस्कार किया, जिस प्रकार आये हुए देव जिनवरको नमस्कार करते हैं ॥१-१०॥ पत्ता-वह मौन लेकर बैठा था, ध्यानमें लीन, न बोलता है और न डिगता है, सभीको यह भ्रान्ति हो गयी, क्या यह मनुष्य काष्ठमय निर्मित है" ।।११।। [१८] उसने अपने हाथसे धरतीपर श्लोक लिख रखा या, "अंजनाके मर जानेपर मै निश्चित रूपसे मर जाऊँगा।" यदि उसके जीनेको खबर मुनूंगा, तो बोलूंगा। वस मेरी इतनी ही गति है।" यह पढकर हनुरुह द्वीपके राजाने अंजनाका ममाचार उसे दिया कि किस प्रकार म्लान रक्त कमलक. ममान मुखवाली बसन्तमाला और अंजना दोनों. दोनों नगरोसे

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वीसमो संधि निकाली गयीं, किस प्रकार अकेली वनमें घूमी, किस प्रकार सिंहने उपसर्ग किया और अष्टापदने उन्हें बचाया, किस प्रकार पृथ्वीका आभूषण पुत्र प्राप्त किया, किस प्रकार आकाशमें ले जाते हुए शिलापर गिर पड़ा और किस प्रकार उसका नाम पड़ा, यह सारा वृत्तान्त कह दिया। यह वचन सुनकर वह उठा, प्रतिसूर्य उसे अपने नगरमें ले गया॥१-२॥ पत्ता-प्रभंजन वहाँ अंजनासे मिला दोनों अपनी-अपनी कहानी कहते हुए हनुरुह द्वीपमें प्रतिष्ठित हो गये और स्वयं राज्यका उपभोग करने लगे ॥१०॥ वीसवीं सन्धि जबतक भट चूड़ामणि हनुमान बढ़कर युवक हुआ, तबतक सुरसन्तापक रावण वरुणसे भिड़ गया। [१] दूतके आगमनसे उसका क्रोध बढ़ गया । स्वयं दशानन हर्षके साथ तैयारी करने लगा। वह हजारों निशाचरोंसे घिरा हुआ था, उसने चारों ओर शासनधर भेजे। खरदूषण-सुग्रीव राजाओंको, नल-नील और महेन्द्रनगरके महेन्द्रको । प्रह्लाद, प्रतिसूर्य और पवनंजयको। वरुण और रावणके समरकी बात जानकर, स्वजनकी विजयकी आशासे पूरित पवनंजय और प्रतिसूर्यने हनुमानसे कहा, "वत्स-वत्स, तुम धरतीका पालन करो और राजलक्ष्मीको कामिनीकी तरह मानो। हमें रावणकी आज्ञाका पालन करना है और शत्रुसेनाकी विजयश्रीरूपी वधू- का अपहरण करना है ।" यह सुनकर शत्रुरूपी पर्वतके लिए बिजलीके समान हनुमान्ने चरणोंको प्रणाम कर कहा-॥१-८॥ २२ पउमचरित घत्ता 'कि तुम्हें विरुज्झहाँ अप्पुणु जुज्झहों मइँ हणुवन्त हुन्तऍण । पावन्ति वसुन्धर चन्द-दिवायर किं किरणोहें सन्तएण' ॥९॥ [२] भणइ समीरणु 'जयसिरि-लाहउ । भज्जु वि पुत्त ण पेक्खिड भाहउ ॥१॥ भज्ज वि वालु केम तुहुँ जुज्झहि । अज्जु वि वूह-भेउ णउ बुज्झहि' ॥२॥ तं णिसुणेवि कुविउ पवणजह । 'वाल कुम्मि किं विडविण माह॥३॥ वालु सीहु किं करि ण विहाढइ । कि वालग्गि ण डहइ महाडइ ॥४॥ वालयन्दु कि जण ण मुणिज्जइ । वालु भडारउ कि ण थुणिज्जइ ॥५॥ वालु भुवनमु काई ण डकइ । वाल रविहें तमोहु किं थकई' ॥६॥ एम मणेवि पहजणि-राणउ । लङ्काणयरिह दिण्णु पयाणउ ॥७॥ दहि-अक्खय-जल-मङ्गल-कलसहि । गड-कइ-वन्दि विप्प-णिग्योसहि ॥४॥ घत्ता हणुवन्तु स-साहणु परिभोसिय-मणु एन्तु दि लङ्केसरण । छण-दिवसें वलन्त किरण-फुरन्त तरुण-तरणि णं ससहरण ॥९॥ [३] दूरहोंज तहलोक्क भयावणु। सिरु णावें वि जोक्कारित रावणुm तेण वि सरहसेण सम्वनिउ । एन्तउ सामीरणि आलिगिन्ड ॥२ चुम्व वि उच्चोलिहिं वहसारिउ । वारवार पुणु साहुक्कारित ॥३॥ 'धण्णउ पवणु जासु तुहुँ गन्दणु । भरहु जेम पुरएवहाँ णन्दणु' ॥ एम कुसल-पिय-महुरालाहिं। कङ्कण-कञ्चीदाम-कलावे हि ॥५॥ तं हणुवन्त-कुमार पपुज्ज वि। वरुणहाँ उपरि गउ गलगन्ज चिया वीसमो संधि पत्ता-"मुक्ष हनुमानके जीवित होते हुए तुम विरुद्धोंसे स्वयं लड़ोगे, क्या सूर्य-चन्द्रमा किरणसमूहके होते हुए धरती पर आते हैं ?" ||९|| . [२] तब पवनंजय कहता है, "हे पुत्र, अभी तक तुमने न तो युद्ध देखा है और न विजयश्रीका लाम । अभी भी तुम घालफकी तरह हो, तुम क्या लड़ोगे; अभी भी तुम युद्धव्यूह नहीं जानते।" यह सुनकर हनुमान क्रुद्ध हो गया, "क्या गजशिशु पेड़को नहीं नष्ट कर सकता, शिशु सिंह क्या हाथीको विघटित नहीं करता, क्या शिशु आग अटवीको नहीं जलाती, क्या बालचन्द्रको लोग सम्मान नहीं देते, क्या बालक योद्धाकी प्रशंसा नहीं की जाती, क्या वाल सर्प काटता नहीं है, बाल रविके सामने क्या तमका समूह ठहर सकता है ?" यह कहकर हनुमान्ने लंकाके लिए कूच किया। दही, अक्षत, जल, मंगल-कलश, नट, कवि-वृन्द और ब्राह्मणों के निर्घोषके साथ ॥१-८॥ धत्ता-सन्तुष्ट मन हनुमानको अपनी सेनाके साथ रावणने इस प्रकार देखा मानो पूर्णिमाके दिन चन्द्रमाने आलोकित किरणोंसे भास्वर तरुण-तरणिको देखा हो ।।९।। [३] जो त्रिलोक भयंकर है, ऐसे रावणको उसने दूरसे ही सिरसे प्रणाम किया। उसने भी आते हुए हनुमान्का हर्ष और पूरे अंगोंसे आलिंगन किया । चूमकर अपनी गोदमें बैठाया, और बार-बार उसे साधुवाद दिया, “पवनंजय धन्य है जिसके तुम पुत्र हो, ऋषभनाथके पुत्र भरतके समान ।" इस प्रकार कुशलप्रिय और मधुर आलापो, कंकण और स्वर्ण डोरके समूह- से उसका सम्मान कर रावण गरजता हुआ वरुणपर चढ़ाई करनेके लिए गया। अपना कूच बन्द कर शरद्के मेघकुलके

३२८
पउमचरित
वेलन्धर-धर मुक्त-पयाणउ । थिउ वलु सरयम्भ-उल-समाण ॥७॥
कहि मि सम्वु-मर-दूसण-राणा । कहि मि हणुव-णल-णील-पहाणा॥
कहि मि कुमुम-सुग्गीवनङ्गय । गं थिय घट्ट हि मत्त महागय ॥९॥
घत्ता
रेहइ णिसियर-वलु वडिय-कलयलु थडे हि थडेंहि मावासियउ ।
णं दहमुह करत विजय-जणेरड पुषण-पुन्ज पुले हि थियउ॥१०॥
[४]
तो एत्यन्तरें रणे णिकरुणहाँ। चर-पुरसहि जाणाविउ वरुणहाँ ॥१॥
'देव देव कि अच्छहि भविचलु। वेलन्धरें आवासिउ पर-वलु' ॥२॥
चारहुँ तणउ वयणु णिसुणेप्पिणु । वरुणु णराहिउ भोसारेप्पिणु ॥३॥
मन्तिहिं कण्ण-जाउ तहाँ दिजइ । 'केर दसाणण-केरी किजह ॥४॥
जेण धणउ समरगणे वकिउ । विजगविहूसणु वारणु वसि किड॥५॥
जे
भट्ठावर गिरि उद्धरियउ। माहेसर-वइ णरवइ धरियड ॥६॥
जेण णिरत्थीकिउ णल-कुव्वरु । ससहरु सूरु कुवेर पुरन्दरु ॥७॥
तेण समाशु कवणु किर आहउ। केर करन्तहुँ कवणु पराहउ ॥८॥
घत्ता
तं णिसुणेवि दुद्धरु वरुणु धणुद्धर पजलिउ कोष हुवासणण।
'जइयहुँ खर-दूसण जिय वेणि मि जण तइज काइँ किउ रावणेण' ॥९॥
[५]
एव मणेवि भुवणे जस-लुद्धउ । सरहसु वरुणु राउ सण्णद्धड ॥१॥
करि-मयरासणु विप्फुरियाहरु । दारण-णागपास-पहरण करु॥२॥
ताडिय समर-भेरि उम्भिय धय। सारि-सज किय भत्त महागय ॥३॥
हय पक्खरिय पजोत्तिय सन्दण | णिग्गथ वरुणहों केरा णन्दण ॥४॥
पुण्डरीय-राजीव धणुद्धर ।
वेलाणल-कल्लोल-वसुन्धर ॥५॥

वीसमो संधि ३२९ समान सेना बेलन्धर पर्वतपर ठहर गयी। कहीं पर शम्बूक, खर-दूषण राजा, कहींपर हनुमान , नल-नील प्रमुख, कहींपर कुमुद, सुग्रीव, अंग और अंगद, मानो मत्त महागजोंके समूह ही ठहरे हों ।।१-२॥ घत्ताकोलाहल करता हुआ और समूहोंमें ठहरा हुआ निशाचर-बल ऐसा मालूम हो रहा था, मानो दशाननकी विजय- का जनक पुण्यपुंज ही समूहोंमें ठहरा हो ॥१०॥ ४] इसी अवधिमें निष्करुण वरुणसे, उसके चरपुरुषोंने कहा, "हे देव-देव, अचल क्यों बैठे हो, शत्रुसेना बेलन्धरपर ठहरी हुई है।" गुप्तचरोंकी बात सुनकर राजा वरुणको हटाते हुए एकान्तमें मन्त्रियोंने उसके कानमें कहा-"रावणकी आज्ञा मान लीजिए, उसने धनदको युद्धके प्रांगणमें कुचला, त्रिजग- भूषण महागज वशमें किया, जिसने अष्टापद पहाड़ उठाया, राजा माहेश्वरपतिको पकड़ा, जिसने नलकूबरको अखविहीन कर दिया। चन्द्रमा, कुबेर, सूर्य और इन्द्रको हराया, उसके साथ कैसा युद्ध, और आज्ञा मान लेनेपर कैसा पराभव ?" ॥१-८॥ घत्ता-यह सुनकर दुर्धर धनुर्धारी वरुण कोपकी ज्वालासे भड़क उठा, "कि जब मैंने खर और दूषण दोनोंको जीत लिया था, उस समय रावणने क्या कर लिया था" ॥९॥ [५] यह कहकर, भुवनमें यशका लोभी वरुण हर्षपूर्वक युद्धके लिए सन्नद्ध होने लगा। गजके ऊपर मकरासनपर आरूढ, फड़क रहे हैं ओठ जिसके, और दारुण नागपाश शस्त्र हाथमें लिये हुए। रणभेरी बजा दी गयी, ध्वज उठा लिये गये,हाथियों- को अम्बारीसे सजा दिया गया, अश्वोंको कवच पहना दिये गये, रथ जोत दिये गये। वरुणके पुत्र निकल पड़े। पुण्डरीक,

परमपरित
वोपारि-रा-नगालामुह । पेलघर-मुषेम वेकामुह ॥५
RET-गलगप्रिय-मागला पालामुह-जगह-गालावति ॥०॥
जलकलाभणेय साध्य मरहम मान-भूमि पराइय ॥८॥
पिरपि गारद मिय जाग गरि पाप-गू किट ताहि ॥९॥
पत्ता
কাল গনি মা-মলি লিষয়।
राम REE FREE विपरणरायण
-11||
किय-भाई टरगलिय-ग। रावण-उरण यस ई भालग्गः ॥१॥
गय-घर-घण-
पाय-गतः । रुपन-चमर-मलयाणिल-पराग
इन्दणील-णिमि-णामिय-पसर। मूरकन्ति-णि लद्वारसर। ॥३॥
उपपय-करिपुम्भस्थल-मिर । फभिय-अमि-मुमाल-णियर ॥४॥
पम्मुफेर मेप-करयान । दस-दिमिवह-धाइय-कीलाल ॥५॥
गय-मय-णा-पपरवामिय-धायई। गधाग्यि-कबन्ध-गंधाय ॥६॥
ताप दसाणणु परुणहों पुतहि । वेटिउ धन्दु जेम जोमुत्ते हि ॥७॥
केसरि जेम महागय-गृहहि । जीउ जैम दुपम्म-समूहहिं ॥८॥
घत्ता
एकलउ रावणु भुवण-मयावणु मम भणन्त वहरि-वलें।
स-णियम्बु स-कन्दर गाइ महीहरु मस्थिमन्तएँ उवहि-जलें ॥९॥

वीसमो संधि
१६.
राजीव, धनुर्धर, वेलानल, कल्लोल, वसुन्धर, तोयावलि, तरंग,
बगलामुह, वेलन्धर, सुबेल, बेलामुख, सन्ध्या गलगर्जित,
सन्ध्यावलि, ज्वालामुख, जलोह, ज्वालावलि और जलकेताइ
आदि अनेक वरुण पुत्र दौड़े, हर्षके साथ युद्धभूमिपर पहुँचे ।
जबतक गरुड़-ज्यूह बनाकर वे स्थित हुए कि तबतक शत्रुओंने
अपना चाप-व्यूह बना लिया ।।१-९।।
पत्ता-एक दूसरेसे बलिष्ठ, ईर्ष्यासे भरे हुए दूरसे ही
कोलाहल करते हुए और पुलकित, रावण और वरुणके दल
आपसमें लड़ने लगे॥१०॥
[६] कवच पहने और खड्ग उठाये हुए रावण और वरुणके
दल लड़ने लगे। जिनके शरीर गजघटाके सधन प्रस्वेदसे युक्त
थे, उनके कर्णरूपी चमरोंसे जो दक्षिणपवनका आनन्द ले रहे
थे, इन्द्रनीलरूपी निशासे जिनका प्रसार रोक दिया गया था,
सूर्यकान्त मणियोंसे जिन्हें दिनको दुबारा अवसर दिया गया,
उखाड़ दिये हैं महागजोंके कुम्भस्थल जिन्होंने, तलवारसे
निकाल लिये है मुक्तासमूह जिन्होंने, जो एक दूसरेपर तलवार
चला रहे हैं, दसों दिशापथोंमें रक्तकी धाराएँ वह रही
जिसमें, गजमदके जलमें धोये जा रहे हैं घाव जिसमें, नचाये
जा रहे हैं धड़ जिसमें । तबतक वरुणके पुत्रोंने दशाननको इस
प्रकार घेर लिया, जिस प्रकार मेघ चन्द्रमाको घेर लेते हैं,
जैसे सिंह हाथी घेर लेते हैं, जैसे जीव दुष्कर्मोके समूहसे
घेर लिया जाता है ।।१-८॥
धत्ता अकेला भुवनभयंकर रावण अनन्त शत्रुसेनामें
उसी प्रकार घूमता है, जिस प्रकार समुद्रमन्थनके समय तट
और गुफाओंके साथ मन्दराचल ॥९॥

पउमचरित
[]
ताम वरुणु रावणहों वि मिच्चे हि । विहि-सुभ-सारण-मय-मारिच हि ॥॥
हत्थ-पहत्य-विहीसण-राऍहि । इन्दह-घणवाहण-महकाएँहि ॥२॥
अङ्गगय-सुग्गीव-सुसेणेहि । तार-तरह-रम्भ-विससेणे हि ॥३॥
कुम्मयण्ण-खर-दूसण-धीरेहि। जम्बव-णल-णीलेंहि सोण्डीहि ॥॥
वेढिउ खत्त धम्मु परिसेसवि। तेण वि सरवर-धोरणि पेसेंवि ॥५॥
खेडिय अणडुह व्व जलधारहि । ताम दसाणणु वरुण-कुमार हि ॥६॥
आयामवि सव्वहिं समकण्डिड। रहु सण्णाहु महाधड खण्डिउ ॥७॥
तंणिएवि णिय-कुल-णेयारें। सरहसेण हणुवन्त-कुमारें ॥८॥
घत्ता
रणउहें पइसन्त वहरि वहन्ते रावणु उम्वेढावियट ।
अवियाणिय-लाएं णं दुचाएं रवि मेहह मेल्लावियउ ॥९॥
[८]
सयल वि सत्तु सत्तु-पडिकूले।
संवेवि विजा-लङ्गलें ॥१॥
लेइ ण लेइ जाम मरु-णन्दणु । ताम पधाइट वरणु स-सन्दणु ॥२॥
'अरे खल खुद्द पाव वलु वाणर। कहि सञ्चरहि सण्ढ अहवा जर' ॥३॥
वं णिसुणेप्पिणु वलिउ कइद्ध। सोहु व सीहहाँ वेहाविद्धउ ॥४॥
विण्णि वि फिर मिडन्ति दणु-दारण। णागपास-लगल-पहरण ||
ताम दसाणणु रहवर वाहेवि । भन्तर थिउ रण-भूमि पसाहवि ॥६॥
और वलु वलु हयास भर माणव । मइँ कुविएण ण देय ण दाणव ॥७॥
'जं किउ जम-मियङ्क-घणयकहुँ। सहस-किरण-णलकुम्वर-सक्कहुँ ॥6॥
घत्ता
अवरहु मि सुरिन्दहुँ गरवर-बिन्दहुँ दिण्णई आसि जाई जाई ।
परिहव-दुमइत्तई फलइँ विचित्तई तुज्यु वि देमि ताई ताई ॥९॥

वीसमो संधि
[७] तबतक वरुणको रावणके अनुचरोंने घेर लिया, दोनों
सुतसार और मयमारीचने, हस्त-प्रहस्त और विभीषणराजने,
महाकाय इन्द्रजीत और घनवाहनने, अंग-अंगद-सुग्रीव और
सुषेणने, तार-तरंग-रम्भ और वृषभसेनने,कुम्भकर्ण और खरदूषण
वीरोंने, जाम्बवान नल, नील और शौण्डीरने । इन्होंने घेर लिये
क्षात्रधर्मको ताकपर रखकर। उसने भी सरवरोंकी बौछार की।
तबतक दशानन वरुणकुमारोंके साथ उसी प्रकार क्रीड़ा करने
लगा जैसे बैल जलधाराओंसे। आयाम करके उसे सवने घेर
लिया, और उसका रथ, कवच और महाध्वज खण्डित कर
दिया। यह देखकर, अपने कुलका
नेतृत्व करनेवाले हनुमान
कुमारने हर्षके साथ ॥१-८||
पत्ता-युद्धमुखमें प्रवेश कर, दुश्मनोंको खदेड़कर, उसी
प्रकार रावणको मुक्त किया, जिस प्रकार अविज्ञात-मार्ग दुर्वात
मेघोंसे रविको मुक्त करता है ।।९।।
[८] शत्रुसे प्रतिकूल होनेपर सभी शत्रुओंको हनुमान्ने
विद्याकी पूँछसे घेर लिया, और जबतक वह पकड़े या न पकड़े
तबतक वरुण अपने रथके साथ दौड़ा। वह बोला, "अरे खल
क्षुद्र पापी वानर, मुड़, हे नर या साँड़, कहाँ जाता है ?" यह
सुनकर वानर मुड़ा जैसे सिंह सिंहपर क्रुद्ध होकर मुड़ता है।
दनुका दारण करनेवाले वे दोनों आपसमें भिड़ते हैं, नागपाश
और पूंछके प्रहरण लिये हुए । तव दशानन रथ हाँककर, रण-
भूमिमें पहुंचकर वीचमें स्थित हो गया । वह बोला, "अरे
हताश मनुष्यो, मुड़ो-मुड़ो, मेरे क्रुद्ध होनेपर न देव रहते हैं
और न दानव । यम, चन्द्र और धनद अर्कका मैंने जो किया,
सहस्र-किरण, नलकूवर और इन्द्रका जो किया ॥१-८॥
घत्ता-और भी सुरवृन्द और नरविन्दोंको तुमने जो
पराभवके बुरे-बुरे फल दिये हैं, वे मैं तुझे दूंगा" ॥९॥

पउमचरिउ
[]
तं णिसुणेवि अतुलिय-माहप्पें । हिमच्छिउ जलकन्तहों वप्पें ॥३॥
'लकाहिव देवाइड अवर हिं। सूर-कुवेर-पुरन्दर-अमरहिं ॥२॥
हउँ पुणु वरुणु वरुणु फलु दावमि । पइँ दहमुह-दवग्गि उल्हावमि' ॥३॥
दोच्छिउ रावणेण एत्यन्तरें। 'केत्तिउ गज्जहि सुहडन्भन्तर ॥४॥
महिमुहु थक्कु ढुक्कु वलु बुज्झहि । सामण्णाउहहि लइ जुज्झहि ॥५॥
मोहण-थम्मण-डहण-समयहि । को विण पहरइ दिव्वहि अत्यहि ॥६॥
एम भणेवि महाहवें वरुणही। गहकल्लोलु भिडिउ णं अरुणहाँ॥७॥
तहिं अवसर पवणन्जय-सारें। आयामें वि हणुवन्त-कुमारें ॥८॥
घत्ता
णरवर-सिर-सूलें णिय-र ड्यूले वेढेंवि धरिय कुमार किह ।
कम्पावण-सीले पवणावीले तिहुवण-कोडि-पएसु जिह ॥९॥
[१०]
णिय-णन्दण-बन्धणण स-करुणहों। पहरणु हत्थे ण लग्णइ वरुणहों ॥१॥
रावणेण उप्पऍवि णहङ्गण। इन्दु
जेम तिह धरित रणगणें ॥२॥
कलयलु घुछ हयइँ जय-तूर । जलणिहि-सद्द सह-आय-दूर ॥३॥
ताव माणुकण्णेण स-णेउरु । आणिउ णिरवसेसु अन्तेउरु ॥४॥
रसणा-हार-दाम-गुप्पन्तउ।
गलिय-घुसिण कद्दमें खुप्पन्त ॥५॥
अलि-झङ्कार-पमुहलिज्जन्तउ । णिय-भत्तार-विभोग-किलन्तउ ॥६॥
मंसु-जलेण धरिणि सिञ्चन्तउ । कज्जल-मलेंण वयइँ मइलन्तउ ||७||
तं पेक्खवि गजोल्लिय-गतें। गरहिउ कुम्मयण्णु दहवतें ॥४॥
घत्ता
'कामिणि-कमल-वणई सुभ-लय-मवणइँ महुअरि-कोइल-अलिउलइँ।
एयइँ सुपसिद्धई वम्मह-चिन्धइँ पालिज्जन्ति अणाउलइँ ॥९॥

वीसमो संधि
[९] यह सुनकर अतुल माहात्म्यवाले जलकान्तके पिता
वरुणने तिरस्कारके स्वरमें कहा, "लंकाधिप तुम दूसरे सूर्य
कुवेर और इन्द्रादि अमरों द्वारा जिता दिये गये हो, मैं वरुण
हूँ, और तुम्हें वरुण फल दूंगा, तुम्हारे दसमुखोंकी आगको
शान्त कर दूंगा।" तव रावणने उसे खूब झिड़का, “सुभटोंके
बीचमें कितना गरज रहा है, सामने आ, अपनी शक्ति समझ ले।
सामान्य आयुधोंसे ही युद्ध कर, मोहन, स्तम्भन, दहन आदिमें
समर्थ दिव्य अस्त्रोंसे आज कोई भी नहीं लड़ेगा।" यह कहकर
वह वरुणसे भिड़ गया, मानो ग्रह-समूह वालसूर्यसे भिड़
गया हो ॥१-८॥
घत्ता-नरवरोंके शिर है शूल जिसमें, ऐसी कम्पनशील
और पवनसे आन्दोलित अपनी पूँछसे हनुमान् वरुण कुमारोंको
घेरकर ऐसे पकड़ लिया जैसे त्रिभुवनके करोड़ों प्रदेशों को॥९॥
[१०] अपने पुत्रोंके वाँधे जानेसे दीन वरुणके हाथमें कोई
अस्त्र नहीं आ रहा था। तब दशाननने आकाशमें उछलकर,
युद्धके प्रांगणमें उस इन्द्रको पकड़ लिया। कोलाहल होने लगा,
जयतूर्य वजने लगे, समुद्रके शब्दकी तरह तूर्य शब्द दूर-दूर तक
गया। तवतक भानुकर्ण नूपुर सहित समूचे अन्तःपुरको ले
आया, जो करधनी, हार और मालाओंसे ढका हुआ, गलित
केशरकी कीचड़में निमग्न, भौरोंके झंकारोंसे मुखरित, अपने
पतियोंके वियोगसे क्लान्त, आँसुओंसे धरती सींचता हुआ,
काजलके मलसे मलिन मुख था । यह देखकर हर्पित शरीर
रावणने कुम्भकर्णको निन्दा की॥१-८॥
पत्ता-कामिनीरूपी कमल वन, शुक-लताभवन मधुकरी
कोयल और अलिकुल, ये कामदेवके प्रसिद्ध चिह्न हैं, इनका
अनाकुल भावसे पालन होना चाहिए ॥९॥

पउमचरित
[..]
तं णिसुणेवि स-डोरु स-णेउरु । रविकागेश मुक्कु अन् उरु ॥१॥
गउ णिय-णयह मडप्फर-मुक्कड। करिणि-जूहु गं वारिह चुकड ॥२॥
कोकावेप्पिणु वरुणु दसासें। पुज्जिउ सुर-जय-लच्छि-णिवासें ॥३॥
'अवलुय मं तुहुँ करहि सरीरहीं। मरणु गहणु जउ सम्वहाँ वीरही ॥४॥
णवर पलायणेण लज्जिज्जइ । जें मुहु णामु गोत्तु मइलिजई ॥५॥
दहवयणहों वयणेहि स-करुणे। चलण णवेप्पिणु वुच्चइ वरुणें ॥६॥
'धणय-कियन्त-सक्क जें वदिय। सहसकिरण-णलकुन्वर वसि किय॥७॥
तासु मिडह जो सो जि भयाणउ । भजहाँ लग्नं वि तुहुँ महु राणउ ॥४॥
घत्ता
अण्णु वि ससि-वयणी कुवलयणयणी महु सुय णामें सच्चवइ ।
करि ताएँ समाणउ पाणिग्गहण विज्जाहर-भुषणाहिवइ' ॥९॥
[१२]
कुसुमाउहकमला वुह-णयणे । परिणिय वरुण-धीय दहवयणें ॥१॥
पुप्फ-विमाणे चडिउ आणन्दें। दिण्णु पयाणउ जयजय-सहें ॥२॥
चलियई णाणा-जाण-विमाणइँ । रयणई सत्त णवद्ध-णिहाण ॥३॥
अट्ठारह सहास वर-दारहुँ । अद्धछ?-कोडीउ कुमारहुँ ॥४॥
णव अक्खोहणीउ वर-तूरहुँ । (णरबर-अक्खोहणिउ सहासहुँ ॥५॥
अक्खोहणि णरवर-गय-तुरयहुँ)। भक्खोहणि-सहासु चउ-सूरहुँ ॥६॥
लङ्क पइट्ट सुटु परिओंसें। मङ्गल-धवलुच्छाह-पघोसें ॥७॥
पुज्जित पवण-पुत्तु दहगी।। दिज्जइ पउमराय सुग्गीवें ॥८॥
खरण अणङ्गकुसुम वय-पालिणि । जल-णीले हि धीय सिरिमालिणि ॥९॥

वीसमो संधि [११] यह सुनकर भानुकर्णने डोर नूपुरसे सहित अन्तःपुरको मुक्त कर दिया। अहंकारसे शून्य, वह अपने नगरके लिए उसी प्रकार गया मानो वारिसे (जलसे या हाथी पकड़नेकी जगहसे) हथिनियोंका झुण्ड छूट गया हो। देव- लक्ष्मीके विलाससे युक्त दशाननने वरुणको बुलाकर उसका सम्मान किया और कहा, "शरीरका नाश मत कीजिए, मृत्यु ग्रहण और जय, सब वीरोंकी होती है । केवल पलायन करनेसे लज्जित होना चाहिए, जिससे नाम और गोत्र कलंकित होता है।" रावणके शब्द सुनकर, सकरुण वरुणने उनके चरणों में प्रणाम करते हुए कहा, "जिसने धनद, कृतान्त और वक्रको सीधा किया, सहस्र किरण और नलकूबरको वशमें किया, उससे जो लड़ता है वह अज्ञानी है, आजसे लेकर, तुम मेरे राजा हो" ॥१-८॥ पत्ता-और भी मेरी चन्द्रमुखी कुमुदनयनी सत्यवती नामकी कन्या है, हे विद्याधर भुवनके राजा, उसके साथ आप पाणिग्रहण कर लीजिए ||२|| [१२] बुधनयन दशमुखने कामदेवकी लक्ष्मीके समान वरुणकी कन्यासे विवाह कर लिया। आनन्दके साथ पुष्प- विमानमें चढ़ा, और जय-जय शब्दके साथ उसने प्रयाण किया। नाना यान और विमान चल पड़े, सात रत्न नये खजाने, अठारह हजार सुन्दर स्त्रियाँ, तीन करोड़ कुमार, नौ अक्षौहिणी वरतूर्य, हजारों मनुष्योंकी अक्षौहिणियाँ, नरवर गज और अश्वोंकी अक्षौहिणियाँ, शूरोंकी चार हजार अक्षौहिणियाँ, साथ लेकर सन्तोष पूर्वक मंगल धवल और उत्साहकी घोषणाओंके मध्य रावणने पवनपुत्रका सत्कार किया, सुग्रीवने उसे अपनी कन्या पद्मरागा दी, और खर पउमचरित भट्ट सहास एम परिणेप्पिणु । गड णिय-णयह पसाउ भणेप्पिणु॥१०॥ सम्बु कुमार वि गउ वणवासहाँ। खग्गहो कारण दिणयरहासहाँ ॥११॥ घत्ता सुग्गीवशान्य ण-णील वि गय खर-दूसण वि कियस्थ-किय । विज्जाहर-कीलए णिय-णिय-लीलएँ पुरइँ सई भुम्जन्त थिय ॥१२॥ इय 'वि ज्जा हर क ण्डं'। एहि 'उज्मा क ण्डं'। धुवरायवत इयल। णामेण सामिअवा। तीए लिहावियमिणं। 'सिरि-विज्जाहर-कण्ड। वीस हि आसासएहि मे सिटुं॥१॥ साहिज्जन्तं णिसामेह ॥ अप्पत्ति णची सुयाणुपाढेण (?) । सयम्भु धरिणी महासत्ता ॥ वोसहि भासासएहि पडिवद्धं । कण्डं पिव कामएवस्स ॥ इह पढम विज्जाहरकण्ड समस चीसमो संधि व्रतोंका पालन करनेवाली अनंगकुसुम । नल और नीलने अपनी कन्या श्रीमालिनी। इस प्रकार वह आठ हजार कन्याओंका पाणिग्रहण कर, साभार अपने नगर चला गया। शम्यूकुमार वनवासके लिए चला गया, सूर्यहास तलवार सिद्ध करनेके लिए" १-११॥ धत्ता-सुग्रीव अंग, अंगद, नल, नील भी गये, खरदूषण भी कृतार्थ हुए, सव विद्याधरोंकी क्रीड़ाके साथ भोग करते हुए, रहने लगे॥१२॥ इस प्रकार वीस आश्वासकोंका यह विद्याधर काण्ड मैंने पूरा किया । अव अयोध्याकाण्ड लिखा जाता है, उसे सुनिए। ध्रुवराजके वात्सल्य से,. अमृतम्मा नामकी महासती, स्वयम्भूकी पत्नी है, उसके द्वारा लिखाया गया यह वीस आश्वासकों में रचित है। यह विद्याधर काण्ड काम- देवके काण्डके समान प्रिय है। विद्याधर काण्ड पूरा हुआ।

Pawamchariwo Vol-1; (1957)

Author
Bhayani, H.c.
Title
Pawamchariwo Vol-1; (1957)
File name
Pawamchariwo Vol-1; (1957)
Text
OCR done
Published
2010/02
Publisher
New Delhi., Bhartiya Gayanpeth Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
368
Library
Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun
Classification
Bhartiya Sanskrati
DLI number
344716
Barcode
99999990236008.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
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