Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Shri Dandkadi Jain Prachin Stavanadi Sangrah
Front matter
प्रस्तावना छन मैन घुमो मने मेनो! मापस माणोम णे भाषा स्तवनाहिक या नाना पु- स्वानी प्रस्थापनानी मति आवश्यकता र शफे नहीं पता पूर्ण मा पुस्तक या हेतुपी पहार पाउमामा माम्म म कोना सदुपदेशपी विगेर सहम एकीकत मणावषी योग्य पारी पण मुझी या पे ले के हींदुस्तानना-पमा परेरो मने गा मोपा या ग्याँ मापमा परित्र पूग्य पाद सचम चारित्र रत्नपी नि- भूपित गुरुणीजी मारामामो पिपरी रमो छ स्पा स्पा मापूनीफ समयमा मैन श्री पर्गमा तेम पापीकामओमा स्वास परम पमित्र रित राग परमात्मानी मपिनियन प्रभावशाली धर्म क्रियामा नेमम पर मात्माना भमोफिक गुण गान करताना उभ्यम माटे पुरता उत्साह हालल फरेमा दृष्टिगोपर पाप के दरक खीयोमने पासीमामो पोतार्नु दुर्मभ्य मानुष्य जीवन नो पीतराम परमास्माना धर्म सेग्नपी मम मना गण गान करवायी पापन फर वो है शिपाय मा निसार दुनापामा आस्म कल्याणनो बादशाही मार्ग पीमो कयो ? यतमा म सेम डे मा चस्माइने पुरा पापा मारे भो , मनोमा समान समायना पुस्तको घणा उपायेला डे, तो पण माचीन महा पुरुषोना अपुर मार नामा पणां स्वरनो घत्पर्षदनो समामा स्तु तीमा पिगर रस्त सीसीव पानामोमा पटी रोसा ना सोने माम मसे एवा हेतुपी परम रपपारी पूज्यपाद भी भी भी मोहन मामी महाराम साहसमीना संपाराना सामीमी महागमभी मुरभीनी नेमना पिम्प गुरुणीमी माहारामभी हीरभीमी तेमना ३ - शिष्यागुरुणीजी महाराजश्री हरखश्रीजी महाराजके जेओ दक्षिण गुजरात, मारंवाड, मेवाडे, काठीयावाड आदि हीदुस्तानना घणा शहरो अने गामोमां विचरी घणी भावीकाओ तेम वालीकाओ उपर उपकार करी पोतानुं दीव्य चारित्र शोभावी रह्या छे तेंमना सदूपदे- शथी मलेल द्रव्यनी संहार्येवडे आ पुस्तक प्रसिद्ध करवामां आव्यूं छः आ पुस्तकनी अंदर उत्तम प्रकारना विषयो दाखल करेला छे प्रथम दंडकना ३० द्वार विस्तारथी दाखल करेला छे पछी सम्यक- व विचार गर्भित श्री महावीरजीन स्तवन उत्तमविजयजी कृत सं- यम श्रेणीनुं स्तवननी ढालो, गोडी पाश्वनाथजीना स्तवनो चैत्यवं- दनो स्तुतिओ सझायो विगेरे धणी उपयोगी बावतो दाखल करेली छे वली आ पुस्तकनी अंदर पुज्यपाद परम उपगारी सुप्रसिद्ध मुनी माहाराजश्री मोहनलालजी महाराज साहेवनो तेमज़ तेमना पाट पटं- धर पंन्यासजी महाराजश्री हर्ष मुनीजीना टुंक द्वंतांन साथे तेमना फोटा मुकवामां आवेला छे. आ पुस्तक पसिद्ध करवामा जे जे भाइओ तथा व्हेनोए मदद करी छे तेमना मुवारक' नाम आ पुस्तकनी साथे [जोडवा साथे ते- मनो खरा अंतःकरणथी आभार मानवामां आवे छे. आ पुस्तकमां घणा विपयो हस्त लीखीत पाना उपरथी लेवामां आवेला छे. बनती महेनते लखावी सुधारी छपाववामा आवेल छे अने तेनी मुल जे असल भापा छे नेज भाषामां पण केटलाक स्तवनो छपावेल छे छतां पण दृष्टि दोपथी या यंत्र दोषयी शास्त्र विरुद्ध या अशुद्ध H रंपा होय वे मारे मुसभामो मेनोनी क्षमा पाहुं ई मने सुपारी बांधवा मसामण करई सी प्रसिद्ध कर्ता आ पुस्तक मसिद करपामा जे पारयो दया पनो तरफपी मदद मलेसी में सेना प्रबारक नामो नीचे समय से २०.-०-० शेठ पालुभा शामचंद तरफपी स तसे गाम २५-०-० क्षेठ पीरवंद दीपर मरफी व अमदाबाद ३.-५-० शेठ पीमनसास गरशीनी परिनी सोमारपदी बार माणेक सपना २०-- लापामी फतामीनी विमा नाजुबाए म पुना २५-:--. मणीलास माणेकरंद मना १५-०-० कस्तुरषद पदनी पिपमा पाइ गरी म पुना १०-~० शंकरसास मगनलाम मु पुना १०-०. रुष्णानी पासागी म पुना १०-.-. भगवानमी दाबानी १०-०-० मारबतीत्रा रूपाभी पन्याजी थी हर्षमुनीजीन टुंक यतांत भो महान्मा शाव मुद्रा परमपूग्य भीभीभी १००८ श्री मोम- सारभी माराम साहेस तेमना धिप्प गमिर्म गुण गुरु सेवा कर मामा इन फ्यास भी दर्प मुनीमी तो पहागम भीना परम- कमसने स्पस्या नहीं मपात पन्पासभी मारामभीना पासे रमा कमी को छफ कमनी पांसरीनो स्पाग परी ममरो पीजे माप ऐफ महारामभीने जेडीने गया नही मा
થી ૧૦૦૮ સુની મેહનલાલજી મહારાજના શિષ્ય તપગચ્છ
પંન્યાસજી શ્રી હરમુનિ જાહોજ
--
L
---
'
+ 4
- - —-
દીક્ષા
સ્વર્ગવાસ,
સ વત ૧૪
સંવત ૧૯૨૪
તુ ત ૧૯૪૪
ફાગણ માસ.
ચઇતર સુદ ૯
ઈશાખ સુદ ૯
VADILAL & O.
No text on this page.
के पन्यासजी इर्षमुनीजीए तो पोताना गुरुजी महात्मा मोहनलालजी मा- हाराजनां चरणकमलनी सेवामांज पोताना आत्माने कृतार्थ मान्यो वृधावस्थाने लीधे अथवा व्याधिने लीधे के प्रकृति ठीक न होवाने लीधे मोहनलालजी माहाराज पोते कोइ दीवस व्याख्यान वांची शके नही तो ते वखते तेमना शिष्यमां मान्य पन्यासजीश्री हर्षमुनीजी पाट 'उपर बेसी देसना करता हता ते पंन्यासजी हर्षमुनी कहेवा हता थोडा बोला तथा शास्त्रमा कह्या प्रमाणे उपदेशने करनारा होवाथी ते महामुनीश्री पंन्यास हर्षमुनीजीनुं व्याख्यान सांभलीने मुंवाइनो तथा सुरतनो संघ आनंद पाम्यो सारा अंतःकरणवाला पन्यास श्री हर्षमु- नीजी धर्मथी डरीने सुत्र प्रमाणे यथार्थ अने परीमिन एटले वहु वधारे नही ने तेम वहु ओछ नही परंतु जरुर जेटलुंज बोलनारा कोइने पण अप्रीटा लागे तेम नहीं वर्तनारा इत्यादि घणा गुणवान पुरुष हता ते- मना दर्शनथी सौ कोइने आनंद थतो हतो. एक वखते कोइए श्री मोह- नलारजी महाराजने पुछयु के हे महाराज तमारा शियोमा आपणा 'पदने कोण शोभावशे ए सांभलीने वीजाओए कह्यु के ए वात पुछ्वी नकामीछे कारणके हालमा जे पंन्यासजी हर्षमुनीजी शोभावे छे तेज प- छीथी पण शोभावशे त्यारवाद पंन्यासजी हर्षमुनीजी कांतिमुनीजी तथा देवमुनीजीए कह्यु के अमोए पहेलेथी अंगीकार करेली तपागछनी समा- चारी प्रमाणे आपणे अनुसरवानी इछा राखीए छीए तेज वखते नयम- नीजी कल्याण मुनीजी पद्ममुनीजी क्षेमागुनीजी वीगरे घणा शिष्योए कह्यु के अमारे तो पंन्यासजी हर्षमुनीजीनुं शरण छे अर्थात पंन्या- सजी हर्पमुनीनी करशे ते प्रमाणे करी शुं वाद श्री मोहनलालजी ६ माराराजे ने स्चे ने ममामे करो एम दर्पथी कही काळ नमीक थाम्योपी मोनिसासमी माहारा पीपार करयो के भो योग-ए ये मसरों साक्षाव मरत के योगना प्रमामयी मरिच मीगर परम योगीयो अमर या गपेला के सेम से योगना महीमाने वर्गमा वर्ण- तांम भी मोहनसासमी माराम वत्काल विपि प्रमाणे प्रत्यास्पान मिगेरे करीने पोसाना मात्माने डेली समापीमां मोरी दीमो एटले दहोत्सर्ग फरमाने पाटे मा देानी मतिम समाधिमा पेठा भने मा मसार संसारनो देन बखते मा मिनपर मेहनो स्याग कयों अर्याद कास करयो पन्यासमी हर्षमुनीमी काविनीमी पीगर मादे साधु तथा गुरुणमी सुरभीमी पीगेर सापवीमो नगीनवास कपुरपंद मी- गर भारक भाषीकामो मपशोपमा पल्या भाद सुरवना सेपे मायुं के यो मोइनसाम्नी माहाराने संपारो पराम्पो वेम प्रमाणे पन्यासमी भी र्प सनीमी पण सपारो पसारने एम नाणीने सुर तना संप पंन्यासजी मुनीमीने गुरुनी पाटे पेसाच्या संपत १९६३ भासा काम करयो सारपार पन्यासमी भी रपमुनीमी नी आहामा साघु तथा सापपीओ पीचारवा एता पे पन्पासमीर्ष सनीमीप अवकाल मुपी समुदाप सारो पलाम्पो देशो देशपी गि- परता मुरतना संपनी यणी मिनति वी पाटे मुरवपां पषार्याने देन दोबसे भरीर नरम रोनाथी भने पार पपारे नरम परापी पन्पामभी मिनीए माम् रे पपने साफ नही पाप ने मंव समपनी स्थिति जाणीप मारा सपाटामा फोर पण मारा गया पर्गन्यास नयी पम भाणी ते मत परिमय मुरीपर पण सुरवर्मा पपार्या हता तेमने बोलावीने कहुं के मांरा संघाडामां कोइ पन्यास नथी माटे मारा षे शिष्योने पन्यास पदवी आपजो तेज वखते कमल वीज्य सुरीश्वरे पण कहुं के क्या शिष्योने आपवी त्यारे पंन्यासजीश्री हर्ष- मुनीजीए कहुं के मारा मोटा शिष्यजयमुनीने अने क्षांतिमुनीने ते वे शिष्योने आपनो ते वखते कमलवीज्य सुरीश्वरे पण पंन्यास हर्षमुनी- जीनुं वचन कवुल कर्यु सुरतना संघे पण पंन्यासजीनुं वचन कबुल कर्यु ज यमुनीजी मोटा शिष्यने ज्ञानवान जाणीने पन्यास पदवी आपवानी कहीने शांति मुनीजीने पंन्यास,पदवी आपवानी केम कही के दीक्षा लीधी तीदारथीज पंन्यासजी पासेज रहेतां हता उमरे नाना छ, प्रण महागुणीने क्षमावंतने विनय गुण घणो हतो ने ज्ञान पण इतुं तेथी तेमने पण पंन्यास पदवी आपवानुं कहुं त्यार पछी पंन्यासजी हर्षमुनी- जीए काल कर्यो ते न वखत साधु माहाराज साधवीओ सुरतनो संघ घणोज अपशोशमा पडीयो केमके आवा महात्मा गुरु ओचिंता काल करवाथी सुरतना संघने धणुज लागी आव्यु साधु साधवीओए जाणु के हवे अमारा संघाहाना नायक पन्यासजी हर्षमुनीजीए काल कों ते घणु खोटूं थयु केमके अमारा संघाडामां गंभिर्य ज्ञान गुनवान गुरुनी खामी पडी गइ छ माटे घणो अपशोश लागे छे. परंतु भावी आगल कोइनुं चालतुं नथी. विशेष शुं लखg. ली. श्री. मोहनलालजी जैन पाठशाळाना सेक्रेटरी झवेरी. मोहनलाल डाह्याभाइ. ८ अमदावाद.
- सो ६ स्वपन दामो अनुक्रमणीका विषय पृह विषय १दरकना (३०) द्वार तिमा स्वपन गमे। निस्वार सहित १-४८ १३ स्पर्षदनो १२३ २ श्री सम्पत्य गमिव भी च्चम् प्रकारना नाना महापीरजीन स्तपन मोटा मलीने (५२) ४९१४ मन्म नमस्कार ३ परिस उत्तम पिज्यनी १५ भादीमीन स्स्वन १४७ रुव संयम श्रेणीनु स्त १६ श्री गोरी पार्षनायमीन पन दासो ६० १४८ ५ श्रीवारंगागिरि सार्य मग्न १७ भी पर्युपणनी स्तुती श्री मनीवनायगीन स्त १६२ बन दास्रो २ ६५ १९ १६३ ५ भीराणकपुर तीर्यन स्त समायो बन दालो ३ ६८ २० कलातीनी महाप ६ भीभीनामा विपिर्नु स्व २१ पंदनपालगन गीत मन रासो ७ ७२ २२ रिमापहीनी ७ भीमान पंचमी तिपिर्नु २३ चंद्रावतीनी समाय स्तन दालो ३ ८३ २४ मीसीनी सझाप ८मान पपपी विपिर्नु स्त २५दीपालीनी समाय पन रासो ६ ९४ २६ पटिममणनी मझाय १७७ ९ भी मौन एकादशी वि २७ मरदेवी मातानी सप्लाय १७८ पिर्नु स्वरन वालो ५ ९४ २८ सोम सुपनानी समाप १७९ १. श्री पीस स्थानक त २९ गौतमस्वामीनी समाय १८१ पर्नु स्तवन रामो ६ ९९ ३.जीर राशीनी समाप १८३ ११ एसो सीवरनीनर्नु ३१ अनिम्मण रिसे उपदर १८६ स्तरन पायो। १.९ ३२ समुफम नीरोनी उत्पति १२भी मास्पतानीन म १८८५
श्री वीत रागाय नमः
अथ श्री दंडक द्वार प्रारंभ.
--
प्रथम नाम द्वार, बीजो लेश्या द्वार, त्रीजो
शरीर धार, चोथो अवगाहना छार, पांचमो सं-
घयण झार, बछो संजा हार, सातमो संस्थान
शार, श्राठमो कषाय द्वार, नवमो इंश्यि धार,
दसमो समुद्घात- हार, अगीयारमो अष्टि हार,
बारमो दर्शन चार, तेरमो ज्ञान द्वार, चउदमो
जोग छार, पंदरमो उपयोग द्वार, सोलमोने स.
तरमो नपजवा चववानो द्वार, अढारमो आयुष्य
द्वार, भोगणीसमो प्रर्यालि द्वार, वीसमो थाहार
द्वार, एकवीसमो अने बाविसमो गति श्रागति
द्वार, त्रेविसमो वेद द्वार, चोविसमो चवनधार,
(२)
पचीसमो प्रायद्वार, घीसमो संपदादार, सचा
वीसमो धर्मद्वार, महावीसमो योनी द्वार, उंग
श्रीसमो कुखकोमी द्वार, त्रीसमो मल्प वहुस्प
द्वार हवे प्रथम नाम द्वार कहे रे सातनारकीनो
एक दमक, दस जुधनपतिनादसना दसदमक,
पांच स्थावरनां पांच दमक, प्रण विगजिना
प्रण दमक, तिर्यंच पींद्रिनो एक दमक, मनु
प्पनो एक भक, एक ध्यंतरनो दमक, एक ज्यो
तिपनो वमक, एक वैमानिकनो बमक, ए चो
वीत दमक घमा, घसा, सेना, अजना, रिक्षा,
मघा, माधवनि असुरफुमार, नागठमार सुवर्ण
कुमार, विद्युत कुमार, श्रमिकुमार, दीपकुमार,
मदाधिकुमार, बीशीकुमार वायुकुमार, स्तनि
सकमार, पृथ्वी, राणी, सेठ, वात, वनस्पत्ति, घे
इजि, तेऽत्री, चौरिंद्रि, सिजपचेंद्रि, मनुष्प,
व्यतर, ज्योतिप, वैमानिक, ए प्रथम नाम बार वे
(३) लेश्या द्वार कहे . कृपालेश्या, निललेश्या, कापोत- लेझ्या, तेजोलेश्या, पालेश्या, शुकदलेश्या, नारकीने प्रथम ऋण लेदया, दहा जुवनातिने प्रथम चार लेश्या, तेज, वासने प्रथम बालेश्या, बेइंद्री, तेइंद्री, अने चौरेंद्रीने प्रथम त्रस लेश्या, तिर्यंच पंचेंद्रिी, अनेस- लुप्यने लेश्या, व्यंतरने प्रथमती चार लेश्या, ज्योतीपीने, सुधर्मा, इसान देवलोके एक सेजो लेश्या, श्रीजे, चोथे, पांचमे देवलोके एक प्रश्न लेश्या, बहा देवलोकथी नपरांत, सघळेदेवलोके एक शुकल लेश्या, ए बीजु लेश्या हार, हवे बीजो शारिर द्वार कहे . शरीर पांच, जदारीक शरीर, वैक्रीय शरीर, आहारक हारीर, तेजस शरीर, कारमण शरीर, आहारक चौद पूर्धधारीने, तेज सते आहार पचने, कार्मण ते जीवजेगतीए जाय- तीदा कर्मलेळा जाय नारकी, दृसन्नूवन- पति, व्यंतर ज्योतिष, वैमानिक २ चचद दंडके
(४)
प्रण शरीर वैक्रीय, तेजस, कारमण, पृथ्वी, पाणी,
अमि, वनस्पति, इंद्रि, तेईति घोरी, ए
सात वमके त्रण शरीर, उदारीक, तेजस, कार
मण वातकाय थने तीज पंचिंद्रि, ए वे दंडके
प्यार शरीर, उदारीक, किय, तेजस, फार्मण,
मनुष्यने पांघ शरीर, ए शरीर बार हवे चौथो
अवगाहना द्वार कहे सात नारकीनी अषगा
इना जघन्यथी अंगुषनो असरूयातमो नाग,
उसकीष्टो पाषसे धनुष प्रथमनरके जघन्यपी
प्रराक्षाय इतक्रीप्टो पोशा भाउ धनुपने उ में
गुस बीजो नरके जघन्यत्री पोणापाठ धनुप भने
उमंगुस, चसक्रीप्टो सामा पवर घनुप भने पार
मंगुल श्रीनी नरकेजघन्यथी सामा पंदर धनु
पने यार अंगुल, नसक्रीप्टो एकत्रीस धनुर अने
एक हाय चोधी नरकेनघन्ययी एफसोस धनुष
भने एक हाय, सतकीटो सामावासर धनुष्य'
(५)
पांचमी नरकेजधन्यथी सामाबास धनुष्य,
उतक्रीष्टी लवासो धनुष बही नरकेजधन्यथी
सवालो धनुष्य, उतक्रीष्टी अढीसोधनुष सातमी
नरके जघन्यथी अढीसो धनुष, उतकोष्टी पांचले
धनुष. वैक्रीय करे तो हजार धनुष, नारकी ला
तेने पोताना शरीरथी वैक्रीयशरीर बमला करे.
मनुष्यनी अवगाहनाजधन्यथी अंगुलनो असं-
हयातमो नाग उतन्हीटी त्रप गाजनी वैक्रीय
करेतो लाख जोजनधी कांश्क अधिक सवा प.
होरवार रहे. दसवनपतिव्यंतर, ज्योतिष, वै-
मानीकनीजधन्यथी अंगुलनो असंख्यातमो नाग,
उत्तक्रीष्टी दसजुवनपति, व्यंतर, ज्योतिषी, वैमा.
नीक, सुधर्मा, सानदेवलोके सात हाथनीकाय
त्रीजे, चोथे देवलोके हाधनी काया पांचमे,
के देवलोके पांच हाथनीफाया सातमे थामे
देवलोके चार हाथनी काया, नवमे, दसमे, भगीया
-
रमे सपने पारमे देवलोके प्रण हायनीकाया नयवके
बेहापनी काया चार अनुचर विमाने एक हाधनी काया
सर्षि सीछे एक मुमा हानीकाया वैक्रीय करे सो
लाख जोजननुकरे,पदर वीवस सुधी रहे अने जघन्यपी
तो सर्व थानके, अंगुननो असल्यासमो नाग पांच
स्थावरनीजधन्य तथा उसकीरी पण थुगुप्सनो घस
ख्यातमो नाग पपा वनस्पतिनो उतकीटो हजार जो
जनयी अधीक, ये श्द्री, तेत्री, चोरिधीनोजघन्यश्री
अगुलनो भसख्यातमो नाग, उतकीटो वे दिनो धार
जोनननु, वे इंदिन प्रश गाउनु, चोरिद्री, एफजो
अनतीन पचिन्दीनोजघन्यथी भंगुक्षनो यतस्यातमो
माग, उतकीयो हजारजोजन कीय करे तो नक्से
जोजननु, चार महुरत सुधी रहे पेहेलो प्रारो
येसता त्रण गाम्नी काया नतरता पे गाउनी काया
पीजो मारो बेसता घे गाउनी काया उस
रसा एक गाउनी काया श्रीमो मारो वेसते एकगा
उनी काया उसरते पाचसे धनप्यनीफाया चोयो मारो
(७)
बेसते पांचसो धतुपनी काया उतरते सात हाधनी
काया. पांचसो पारो वेलता सात हाथनी काया
उत्तरले एक हाथनी काया हो भारो वेसते
एक हायनी काया उतरते मुंला हायनी काया, हवे
चडता आराठवे. पेहेठो आरो सता मुंझा हाथनी
काया उतरते एकदापनी काया बीजो यारो बेसते
एक हायनी काया उतरते सात हायनी काया, त्रीजो
आरो बेसलेतात हायनी काया उतरते पांच से धनुषनी
काया. चोपोथारो बेसते पांचले धदुधनी काया जा
तरते एकगाउनी काया पांचमो मारो बेखते एकमा-
उनीकाया उतरते बे गाउनी काया क्हो आरो बेसते
बे गाउनी काया उतरते त्रमा गाउनी काया ए चम
ता छवारा जलचर गर्जजनी हजार जोजननी काया,
जलचर लमुछीमनी हजार जोजननी काया घंलचर
गर्भजनी त्रण गाउनी काया थलचर समुर्चीमनी
सातगाउनी काया.खेचर गर्नजनी नव धनुषनी काया,
खेचर समुर्गमनी नव धनुषनी काया उरपरी सर्प
गर्नजनी हजार जोजननी काया, उरपरी सर्प समु
•मनी नव जोजननी काया नुजपरी सर्पगर्जजनीनय
गाउनी काया ए उतकृष्टी, जघन्यत्री तो सर्वनी
अंगुलना असख्यातमा नागनी कायाएअषगाइना
दार हवे पाचमो संघयण द्वार कहेडे वजरुपनना
राष सघयरा, रुपननाराच सघयण, नाराच सघयण,
अर्घनाराच लघयण, कीवीका संघयपा, वेषठ संघ
यण एक संघयश नारकी, वप्त जुवनपति, व्यंतर,
ज्योतिष, धैमानिक पांचस्थावर, एचगणीत वेमके
एके सघयण नधी हामका नदी, मांस नरी, रुधीर
नदी, ते असंघयणीचे इंद्री से इंत्री, चौरीदीप प्रश
दटके एक वेषठीउ तीन पींनी,मनुष्यने छए संचयण
समु.म्, तीज पचीत्रीने, मनुष्यने छेवछो सघयण
ए सघयपादार दवे सहाद्वार कहे छे थाहार सना,
जय सझा, मइपुन सझा, परीग्रह संझा, क्रोष सझा,
मान सज्ञा, माया सशा, लोन सझा, ठष सझा,
. , , (९) लोक संज्ञा, सुख संज्ञा, दूख संझा, दूर्गंग संज्ञा, शोक संज्ञा, मोह संज्ञा, धर्म संझा, एसोल संझा, महिथी बावीस दंभके पनर संज्ञा होय, तीर्थजपं. चींद्री, अने मनुष्यने सोल संज्ञा होय. धर्म संझा बधी ए बठो संज्ञाहार.हवे सातमो संस्थानद्वार कहेले. सम चतुरन संस्थान, निग्रोद परीममल संस्थान, सादि संस्थान वामन संस्थान, कुब्ज संस्थान, हुंभक संस्थान, नारकी पांच स्थावर त्रण विगलेंडीए नव दंगके एक हुमक संस्थान होय दप्स नुवनपति, व्यंतर, ज्योतिषी, वैमानीक ए तेर दमके एक सम चतुरस्त्र संस्थान होय. तीर्यज पंचोंद्रीने,मनुष्यने गए संस्थान होय समुहीम तीयंच, मनुष्यने एक हुंमक संस्थान होय ए संस्थानध्वार दवे कपायध्वार कहे . क्रोध, मान, माया, लोन, ए चार कषाय चोवीसे दमके होय छे. देवताने लोन घणो, नारकीने कोष पणो, तीयेचने माया घणी, मनुष्यने मान घणो ए कपाय-
(१०)
भ्यार हये नवमो छीपध्यार कहे छे फरस इंत्री,
रस रुद्री, प्राण इद्री, पच इंत्री, प्रोस इंत्री, नारकी,
दस मुवनपति, व्यतर ज्योतीषी वेमानीक, तीज
पचीत्री, मनुष्यने पाच हवी दोय एकेंद्रीने फरस इनो
अने वेश्त्रीने फरस अने रस इंद्री होय रे तेईदीने
फरस इंद्री,रस इत्री, प्राणवी होय चोरींद्रिीने फरस
श्द्रो रस इद्री, प्राश श्द्री घछ इद्री ए चारे होय ।
हवे दममो समुवघात चार कदे ने घेदनी समुद
घात, कपाय समुदघात, मरण समुदघात, वैक्रीय
समुपधात तेजस समुवघात, माहारक तमुवघात,
केवली समुदघास, नारकीने, वाकायने चार समु
वघात घेवनी, कपाय, मरण, पैकीय ए चारे दोय
दस भुवनपसि, व्यंतर, ज्योतिपी, वैमानीक सीपंज
पीवी, प चना दमके पाच समुवघात होय,
पेदनी, कपाय, मरांत, क्रिय, तेजस ए पांच होय
घे इद्री, ते इंद्री, चौरेंद्री, पृथ्वी, आप, रोन, घनस्पति,
(११) ए सात दशके त्रण समुदघात होय. वेदनी, कषाय, मरणांत मनुष्यने साते लमुदधात होय ए समुदघात द्वार. हवे अगीयारमो दृष्टीदार कहे . समकीत दृष्टी,मीश्र दृष्टी, अने मिथ्या दृष्टी.नारकी,दसजुवन- पति, व्यंतर, ज्योतीष, बैमानिक तीर्यज पंचीनी अने मनुष्य ए सोल दंडके त्रणे दृष्टी होय पांच स्थावर ने एक मिथ्या दृष्टी होय त्रण बीगलेंद्री ले बे दृष्टी होय समकीत दृष्टी अने मीथ्यादृष्टी ए दृष्टिद्वार. बारमो दरसन द्वार कहे , चनु दर्शन, अचलु दर्शन, अवधि दर्शन, केवल दर्शन, नारकीने, दस जुवनपत्ति, व्यंतर, ज्योतीष, बैमानीक, तीर्थचपंचेंद्री, ए पंदर दमके त्रण दर्शन होय. चतु, अचक्षु, अवधि दर्शन. पांच स्थावर ने एक अचक्कु वर्शन होय.बेइंद्री तेश्द्रीने एक अचुद दर्शन दोय, चौरींद्रीने चहु, अचलु, ए बे होय, मनुष्यने चारे दर्शन होय, ए दरमणद्वार. तेरमो ज्ञानद्वार कहे . मतीज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधि
(१२)
शान, मन पर्यष ज्ञान, केवल ज्ञान, मति अज्ञान,
श्रुत मज्ञान, वीजग अज्ञान, पांच स्थावर मे वे
अज्ञान रोय, मती प्रज्ञान, श्रुत प्रज्ञान ए में होप
प्रणा विगतीने वे अज्ञान भने वे ज्ञान दोय ठे
मती ज्ञान, भुत ज्ञान, मती अक्षान, श्रुत अज्ञान
नारको, बस भुवनपति, व्यंतर, ज्योतीपी, बैमानीक
तीर्यच पचींत्री ए पदर धमके प्रशसान अने प्रय
भमान होय छे मतीज्ञान, श्रुत ज्ञान, प्रयधी ज्ञान,
मती थज्ञान, श्रुत भयान, विनंग शान मनुष्यने
पांच शान अने प्रश अज्ञान होय ए मानदार घठ
वमो जोगदार कहे छ चार मनना, चार पचनना
भने सात कायाना एम पंदर मोम सस्प मम बोग,
असत्य मन जोग, सस्पमृपा मन जोग असत्य
ममा मन जोग सत्य वचन जोग, असत्य
वचन जोग, ससमृपा वचन जोग, यसतमृपा
यघन जोग, उदारोक काय जोग, उदारीक मीन
काय जोग, वैकीयकाय जोग, वैक्रीय मीश्रकाय जोग, थाहारककाय जोग, श्राहारक सीश्रकाय जोग, कार्मणकाय जोग, नारकी, दस जुवनपति, व्यंतर ज्योतीची, वैपानीकए चउद दंगके धगीयार जोन, चार सनना, चार वचनना, त्रण कायाना वै- कीयकाय जोग, वैक्रीय मीश्रकाय जोग, कार्मण- काय जोग तीर्यच पंचीद्रीना दंमके तेर जोग चार मनना, चार वचनना, पांच कायाना उदारीककाय जोग,उदारीक मीश्रकायजोग,वैकीयकायजोगवैक्रीय मिश्रकायजोग, कार्मणकाय जोग पांचे स्थावरमां थी चार स्थावर ने त्रण जोग, उदारीककाय जोग, उदारीक मिश्रकाय जोग, कार्मणकाय जोग वाउ कायना दमके पांच जोग उदारिककाय जोग, उदारिक मिश्रकाय जोग. बैकीयकाय जोग; वैकीय मीश्रकाय जोग. कार्मणकाय जोग. बे इंद्री; ते इंद्री, चौरीदी ए व्रणे दंगके चार जोग उदारीककाय जोग, , ,
(१४)
उदारिक मिश्रकाय जोग, कार्मकाय जोग अत
त्यमृपा वचन जोग मनुष्यने पदर जोग दोय छे
ए जोगदार. हवे पदरमो उपयोगदार कहे ने उप
योग पार पाच मान त्रण अज्ञान, चार दर्शन मती
ज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधि ज्ञान, मन पर्यव ज्ञान,
केवल ज्ञान, मती अज्ञान, श्रुत भज्ञान, विलग
ज्ञान, बक्कु दर्शन, थचक्षु दर्शन, अबधि दर्शन,
केवल दर्शन, नारकी, दस जुवनपति, व्यसर, ज्यो
सीपी, वैमानीक तीज पचीद्री ए पदर दमके नव
उपयोग प्रण ज्ञान, प्रण अज्ञान, प्रश दर्शन मति
झात, श्रुत झान, अवधि शान मती प्रशान, श्रुत
भज्ञान, बिन्नग ज्ञान, चक्षु वर्शन, प्रधान वर्शन,
अवधि वर्शन पांच स्थावर ने भरा उपयोग, मति
थज्ञान, भुत प्रज्ञान, धयान दर्शन, ए प्रश इंद्री
ते नी ने पांच उपपोग, मसी ज्ञान, श्रुत ज्ञान,
मति अज्ञान, श्रुत प्रज्ञान, अचक्षु पर्शन ए पाप
(१५) चौरीद्रीने छ उपयोग होय मति ज्ञान, श्रुत ज्ञान, मति अज्ञान, श्रुत अज्ञान, चक्षु दर्शन, अचक्षु दर्शन ए छ मनुष्यले वार उपयोग होय ए उपयोगद्वार सोलमो सतरमो उपजवा, चक्वानोद्वार कहे ये नारकी एक समये जघन्यथा एक, बे, ऋण आदेद इजावत उतकोष्टा संख्याता असंख्याता उपजे अने चवे दस भुवनपती व्यंतर, ज्योतीषी, वैमानीक, ए तेर दंडके एक, बे, त्रण यादेदश्ने संख्याता असंख्या- ता उपजे ने बवे. तीर्यंच पंचांद्री एक, बे, त्रण आदे दने संख्याता असंख्याता उपजे ने चवे, मनुष्यने एक, बे, त्रन, आदे दने संख्याता उपजे ने चवे समुर्बिम् मनुष्य असंख्याता उपजे अने चने चार स्थावरमां असंख्याता उपजे ने चवे. तिमां अनंता उपजे ले चवे. बे इंद्री, ते इंद्री, चौरीद्री एक, बे, नण, आदे दक्ष जावत उतकृष्टा संख्याता असंख्याता उपजे ने चवे ए उपजवाचववानोबार . । वनस्प-
(१६)
हवे अवारमो मायुष्पदार कहे हे सर्वे मारकीर्नु
आयुप बघन्यथी दसहजार पर्पनु चतकीप्टो तेत्रीस
सागरोपमनु प्रथम नरफे जघन्यथी दसदजार धर्षनु
उत्तकोप्टो एक सागरोपमनु पीजे नरके जघन्यधी
एक सागरोपम अने उतकृष्ट प्रय सागरोपमोजी
नरके जगन्यथी प्रपा सागरोपमनु उत्तफीप्टो सात
सागरोपमनु चोपी नरके जघन्यपी सात सागरोपम
नु उतकीप्टो दससागरोपमनु पांचमी नरके जगन्यपी
दस सागरोपम भने उतकीप्टोसत्तर सागरोपमर्नु छड़ी
मरके जघन्यधी सचर सागरोपमनु उतकोप्टो या
वीन सागरोपमनु सासमी नरके जघष्यथी बावीस
सागरोपनर्नु उतकीप्टो सेबीस सागरोपमर्नु यस
नुयनपतिना बीत इंफ्ना नाम कहे ठे चमर इंद्र,
यल इंच, धर्मेछ, भूतार्नेह, पपवेव, वणवालि, हरीकत,
हरी सीह, ममी सीह, अमी मानय, पूरण, विसती,
अधकत, जलप्रन, ममित गति, मरिगयाइन, विक्रम,
१७ प्रभर्जन, घोस, महाघोस, ए वीस इंद्र मध्ये चमर इंद्रनी जातनो जघन्यथी दस हजार वर्ष, उतकृष्टो साडात्रण पल्योपमर्नु बल इंद्रनी जघन्यथी दस ह- जार वरसन, उतकृष्टो एकसागरोपमथी अधीक एनी देवीनो जघन्यथी दस हजार वर्षनो उतकृष्टो, साडा- चार पल्योपमनुं. हवे दक्षीण पासाना नव इंद्रनुंज- घन्यथी दस हजार वरस, उतकृष्टो दोढ पल्योपमर्नु हवे उत्तर पासाना नव इंद्रनुं जघन्यथी दस हजार वरसर्नु उतकृष्टो बे पल्यापमनु. हवे ए इंद्रोनी देवीओनुं जघन्यथी दस हजार वरसर्नु उतकृष्टो बे पल्योपमनो दक्षीणना नवे इंद्रनी देवीओर्नु जघन्यथी दस हजार वरसर्नु उतकृष्टो एक पल्योपमनुं पृथ्वीकायर्नु जघन्यथी अंतर मुहुर्त*, उ- तकृष्टो बावीस हजार वरसनो. हवे बादर पृथ्वीनो भेद करे छे. सनाह पृथ्वी गोपीचंदनादीकनो जघन्यथी अंतर मुहुर्तनो उतकृ- ष्टो एक हजार वरसनो. बीजी शुद्ध पृथ्वी नदीनी भेखडादिकनो जघन्यथी अंतर मुहुरतनो उतकृष्टो पावीस हजार घरसनु श्रीजी घालुका चवेतवेल प्र- मुखनो जघन्यथी अंतर मुहूर्तनु उतकृष्टो चौदह- जार वरसनो चोथा मणसीला हरीआल सरमाटीफर्नु जघन्यथी अंतर मुहूर्तनु, उत्कष्ट सोलहजार वरसनु पाचमी सरकरा सुवर्णादिक सात धातुनु जघन्यधी अंतर मुट्ठर्तनु अने उत्कष्टथी पाषीस हजार वर्पनु अपकायनु जघन्यथी अतर मुहर्तनु अने उत्कप्टधी मात हजार वर्पनु सेउकायर्नु जघन्ययी अतर मु- हुर्सनु अने उत्कष्टथी त्रण अहारात्रीनु वाउकायनु, जघन्यथी अंतर मुहूर्तर्नु अने उत्कष्टयी प्रण हजार वर्पनुं वनस्पतिकायनु जघन्यथी असर मुहुर्तनु अने उत्कृष्टथी दस हजार वर्षनु वे इंद्रीनु जघन्यथी अ नर मुहुर्तनु अने उत्कृष्टयी पार वर्षनुं ते इद्रीनुज- घन्यधी अंतर मुहर्तनु अने उत्कृष्टथी ओगणपचास दीवसर्नु पौरिंद्रीतुं जघन्यथी अंसर मुहर्तनु अने उस्कृष्टथी छ मासर्नु आयुष्य होय छे तीर्य पंचें- दिना पांच मेद के जलघर, थलघर, खेचर, उरपरी सर्प, भूजपरी सर्प, पम पांच समुर्डीम् अने पांच ग- १९ - भज मली दस भेद. ते मध्येथी समुर्डीम् जलचरनुं जघन्यथी अंतरमुहुर्तनुं अने उत्कृष्टपूर्वक्रोड वरसतुं समुर्डीम् थलचरर्नु जघन्यथी अंतरमुहुर्तनुं अने उ- स्कृष्ट चोरासी हजार वर्षमुं. गर्भज चोपगार्नु जघन्यथी अंतरमूहुर्त उत्कृष्टथी त्रण पल्योपमनु, समुीम् खेच- रनुं जघन्यथी अंतरमुहुर्त अने उत्कृष्टथी बोतेरहजार वर्नु, हवे गर्भज खेचरनुं जघन्यथी अंतरंमुहुर्त अने उत्कृष्टथी पल्योपमनो असंख्यातमो भाग. समु- छीम् उरपरी सर्पनुं जघन्यथी अंतरमुहुर्तनुं अने उत्कृष्टथी त्रेपन हजार वर्षतुं. गर्भज उरपरी सर्पन जधन्यथी अंतरमुहुर्त अने उत्कृष्टथी पूर्वक्रोडवरसर्नु समुर्चीम् भुजपरी सर्पनुं जघन्यथी अंतर मुहुर्तर्नु अने उत्कृष्टथी बेंतालीस हजार वर्षनुं तेमज गर्भज भुजपरी सर्पनुं जघन्यथी अंतर मुहुर्त अने उत्कृष्टथी पूर्व क्रोड वर्षतुं आयुष्य होय छे. हवे समुर्थीम् म- नुष्यनुं जघन्यथी तथा उत्कृष्टथी अंतरमुहुर्ततुं. ग- र्भज मनुष्यनुं जघन्यथी अंतरमुहुर्तनुं अने उत्कृष्टथी त्रण पल्योपमर्नु. व्यंतर देवतार्नु जघन्यथी दसह- जार वर्षतुं अने उत्कृष्टथी एक पल्योपमनु. व्यंत- रोनी देवीर्नु जघन्यथी दसहजार वर्पनु अने उक- प्टथी अर्थ पल्योपमनु ज्योतीपीना पांच मेद छे. चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र अने तारा, घढमार्नु जघ- न्यथी पल्योपमनो घोषो भाग अने उस्कृष्टयी एक पल्योपम अने एक लाम्ब वरसथी काइक अधिक, चनमानी देवीनु जघन्यथी पल्योपमनो पोधो भाग अने उत्कृष्टथी अर्ध पल्योपमने पचास हजार वर्षभी काइक अधिक सूर्यनु जघन्यथी पल्योपमनो पोयो भाग अने उत्कृष्टथी एक पल्योपम अने एक हजार वर्पथी काइक अधिक सूर्यनी देवीनु जघन्यधी 'पल्योपमनो चोयो भाग अने उत्कृष्टयी अर्घ पल्यो- पम अने पचास हजार वर्षी काइक अधिक ग्रह जघन्यथी पल्यापमनो घोयो भाग अने उत्कृष्टशी एक पल्योपमर्नु प्रहनी देवीनु जघन्यथी पल्यापमनो चोथो भाग अने उत्कृष्टधी अब पल्योपम नक्षप्रर्नु जधन्यथी पल्यापमनो चोथो भाग अने उस्कृष्टथी अर्ध पम्योपम,नक्षमनी देवीनु जगन्यथी पल्यापमनो चोयो भाग अने उस्मृष्टी पल्यापमना चोथा भाग-
२१
थी कांइक अधिक. तारानुं जघन्यथी पल्योपमनो
आठमो भाग अने उत्कृष्टथी पल्योपमनो चोथो भाग,
तारानी देवीनु जघन्यथी ताराथी अर्ध जाणवू.
वैमानीक देवताओगें आयुष्य कहे छे. सुधर्मा
देवलोकनुं जघन्यथी एक पल्योपमनुं अने उत्कृष्टथो
बे सागरोपम. इसान देवलोकनु जघन्यथी एक
पल्योपमथी कांइक अधिक उत्कृष्ट बे सागरोपमथी
कांइक अधिक. परिग्रहीता देवीनुं जघन्यथी सात
पल्योपमर्नु अने उत्कृष्टथी पचास पल्यापमनु. अपरी
ग्रहिता देवी, जघन्यथी नव पल्यापमर्नु अने उत्कृष्ट
पंचावन पल्योपमनु.सनतकुमार देवलोकनु जघन्यथी
चे सागरोपमर्नु अने उत्कृष्ट सात सागरोपमनु.चोथा
माहेंद्र देवलोकनु जघन्यथी बे सागरोपम अधिक
अने उत्कृष्टथी सात सागरोपमथी कांइक अधिक.
ब्रह्म देवलोकनुं जघन्यथी सात सागरोपमनुं उत्कृष्ट
दस सागरोपमनुं छठा लांतक देवलोकनुं जघन्यथी
दस सागरोपमनुं उत्कृष्टथी चौद सागरोपमनु. सा-
तमां. माहा शुक्र देवलोकनुं जघन्यथी चौद सागरो
: पमर्नु उस्कृष्टथी सत्तर सागरोपमर्नु आठमा सहसार देवलोकनु जघन्यथी सत्तर सागरोपमर्नु अने उत्क- प्टथी अढार सागरोपमनु नवमा आणंत देवलोकर्नु जघन्यपी अहार सागरोपम अने उकृष्टपी ओगणीस सागरोपम दसमा प्राणत देवलोक जघन्यथी ओ- गणीस सागरोपम् अने उत्कृष्टथी वीस सागरोपमर्नु. अगीआरमा आरण देवलोकनु जघन्यथी बीस सा- गरोपम अने उत्कृष्टथी एकवीस सागरोपमर्नु बारमा अच्युत देवलोक जघन्यथी एकवीस सागरोपम अने उत्कृष्टथी पायीस सागरोपमर्नु आयुष्य छ पहेली वेफर्नु जघन्यथी वावीस सागरोपम अने उस्कृष्ट प्रेषीस सागरोपम बीजी मेवेकर्नु जघन्यथी ग्रेवीस सागरोपम अने उत्कृष्टयी चोवीस सागरोपम त्रीजी प्रेवेकर्नु जघन्यथी चोवीस सागरोपम अने उत्कृष्टधी पश्चीस सागरोपमर्नु चोथी षेकनु जघन्यथी पचीस सागगेपम अने उत्कृष्टथी छब्बीस सागरोपमर्नु पा- चमी प्रेवेकर्नु जघन्यथी छठवीस सागरोपम अने उत्कृष्टधी सतावीस मागगेपमर्नु छट्टी प्रवेफर्नु जप-
२३
,
न्यथी सत्तावीस सागरोपम अने उत्कृष्टथी अठ्ठावीस
सागरोपमनु. सातमी ग्रैवेकर्नु जघन्यथी अठ्ठावीस
सागरोपम अने उत्कृष्टथी ओगणत्रीस सागरोपमर्नु.
आठमी ग्रेवेकर्नु जघन्यथी ओगणत्रसि सागरोपम
अने उत्कृष्टथी त्रीस सागरोपमर्नु. नवमी अवेकर्नु
जघन्यथी त्रीस सागरोपम अने उत्कृष्टथी एकत्रीस
सागरोपमन. हवे पांच अनुत्तर विमानमा वीजय,
वीजयंत, जयंत, अपराजीत, ए चारनु जघन्यथी
एकत्रीस सागरोमर्नु अने उत्कृष्टथी तेत्रीस सागरो-
पमर्नु, अने पांचमां सर्वार्थसीद्धर्नु जघन्य अने
उत्ष्टकृथी तेत्रीस सागरोपमनुं आयुष्य हाय छे.
पहलो आरो बेसते त्रण पल्योपमर्नु आउखुं
उतरवे ब पल्योपमनुं. बीजो आरो वेसते वे पल्यो-
पमनुं उतरते एक पल्योपमर्नु. त्रीजो आरो बेसते
एक पल्योपमनुं उतरते पूर्व कोड वरसनु. चोथो
आरो वेसते पूर्व क्रोड वरसनुं उतरते सवासो वरसनुं
पांचमो आरो वेसते सवासी वरसनुं उतरते वीस
वर्षमुं. छटो आरो वेसते वीस वरसनुं उतरते सोळ
वर्षनु ए उतरता आरा छे पहेलो आरी सता सोल परसर्नु आवखु उत- रता वीस वरसनु बीजो आरो वेसता वसि करसर्नु अने उतरता सवासो परसनु आउखु श्रीजो आरो वेसता सवासो परसनु अने उतरता पूवक्रोड परसर्नु चोथो आरो सता पूर्वक्रोड वरसर्नु अने उतरता एफ पस्योपमनु पाचमो आरो सता एक पल्याप मर्नु अने उतरता व पल्योपमन छटो आरो सता ये पल्पोपमनु अने उतरता प्रण पल्यापेमर्नु प छ आरा चरता छ ए आयुष्य द्वार हये ओगणीसमु पर्याप्ति कार कहे छे आहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति इद्रिय पर्याप्ति श्वासोश्वास पर्याति भापा पर्याप्ति, मन पर्याप्ति पछ पर्याप्ति छ नेमा नारकी, भुवनप- ति, व्यतर, ज्योतिपी, बेमानीक, मनुष्य अने सीर्यच एसोल दरके छप पर्याप्ति पाच स्थावरने चार पर्याप्ति, आहार-शरीर-मुंग्रीय अने श्रासोश्वास ए चार, ये इंद्री, से इद्री, चोरठी, अने असली पचंदीने मन विना पांच पर्याप्ति होय छे, ए पर्याप्ति द्वार हो , २५ वीसमो आहार द्वार कहे छे. ओजा आहार रोमा आहार अने कवल आहार एम त्रण प्रकारना आ- हार छे तेमां-नारकी-भुवनपती-व्यंतर, ज्योतीषी- वैमानीक अने पांचस्थावरो ए ओगणीस दंडकोने ओजा आहार अने रोमा आहार एम बे आहार होय छे, अने बे इंद्री-ते इंद्री-चौरिंद्री तथा तीर्यच अने मनुष्य ए पांच दंडके त्रणे आहार होय छे. जीव चवे ते वखते-एक-बे-त्रण समय सुधी अणाहारी उपज्या पछी आहारी होय ए आहार द्वार. अथ एकवीसमुं गतिद्वार. गति-गमन करवू-कया दंडकनोजीव कया कया दंडके जाय एम जे कहे ते अहिं गतिद्वार जाणवू. नारकी जीवो नारकीमाथी नीकळी, गर्भज तिर्यच अने गर्भज मनुष्य एम बे दंडकमां जाय छे. दशभुवनपति, व्यंतर, ज्योतिषी अने सौधर्म तथा इशान देवलोकना देवो भवांतरे, पृथ्वीकाय,अप्का- य, वनस्पतिकाय, पंचेंद्रिय तिर्यच अने मनुष्य एम , दटके जाय -- २६ पाच दडके जाय, तथा सनत् कुमारादिसहस्त्रार पर्य- तना देवो गर्भज तियेच अने मनुप्य पम थे दंडके जाय, ने सहस्त्रारथी उपरना देवलोकना देवो एक गर्मज मनुप्यनाज छे पृथ्वीकाय, अप- काय,वनस्पतिकाय तथा वेइंद्रिय, तेइंद्रिय अने चौरि द्रिय ए छ दडकना जीवो, भवातरे पाच एकद्रिय, त्रण विगलेंद्रिय, तथा सिर्यच पचेंद्रिय अने मनुष्यना मळी दश दडफने विपेजाय अने वाउकाय सथा ते उकायनाजीवो ए उपर कहेला दश दठकमाधी एक मनुप्यना दंडक सिषाय पाकीना नव दंडकने विपे जाय छे गर्भनिर्यच पचेंद्रिय अने गर्भज मनुष्यना दडफांधी सख्याता आयुष्यवाळा जीयो पोताना फर्मानुसार २४ दंडका जाय तथा असख्याता आ- युप्यवाळा तो सेर देवतानाज दंडके जायछे सख्याता आयुष्यवाळा गर्भज मनुष्यमाथी धनरुपमनाराच सघयणना पणी कोइफ जीव आठे कर्म खपावीने सिद्धगति मांहे पण जाय छे एम सामान्ये चोवीसे दंडफना जीमोतीति जी २७ हवे चोवीसे दंडकना जीवोनी गति पांचसेने त्रेसठ जीवभेदने विषे कहे छे:-पहेलेथी छष्टीनारकी ना जीवो आयुक्षये नारकामाथी नीकळीने पंदर कर्म भूमिनां गर्भजमनुष्यपर्याप्ता, पंदर कर्मभूमिनां गर्भ- जमनुष्य अपर्याप्ता तथा पांचगर्भजतिर्यचपर्याप्ताने पांचगर्भजतिर्यचअपर्याप्ता एवं चालीशजीवभेदने विषे जाय, तथा सातमी नारकीथी नीकल्यां जीवो तो पांच गर्भज तिर्यच पर्याप्ताने पांच गर्भज तिर्यच अपर्याप्ता एमदशजीवभेदने विषे जाय छे. दशभुवनपति, सोलव्यंतर, पंदरपरमाधामी, दशतिर्यग् जंभक, दशज्योतिषी, सौधर्म, इशान अने एक किल्वीषिया एम चोसठ जातिनां देवोमांथी नीकल्या जीवो, पंदर कर्मभूमिनागर्भज मनुष्य अने पांच जातिना गर्भज तिर्यंच तथा बादर पृथ्वीकाय, वादर अपकायने वा. दरप्रत्येकवनस्पतिकाय मळी त्रेवीसपर्याप्ता तथा त्रे वीस अपर्याप्ता एवं छेताळीस भेदमां जाय छे. सनतं कुमारथी मांडीने सहस्त्रार पर्यंत छ देवलोकना देवो, वे किल्वीषिया जातिना देवो अने नवलोकांतिकना २८ देवो एम सत्तर जातिना देवोमांधी नीफल्या जीयो, पांच गर्भज तियेच अने पदर कर्म भूमिना मनुष्य नामळी वीस पर्याप्ता तथा वीस अपर्याप्ता एवं चाळीस भेदमा जाय छे नवमा आणत देवलोकधी मांडीने पारमा अच्युत देवलोक सुधीना धार देव लोकना देवो अने नव अवयफ तथा पाच अनुत्तरवि 'मानना देवो एसर्वे मळीने अहार देवलोकना नीक- स्याजीय, ते पदरकर्म भूमिना मनुष्या जाय छे नारकीनो यक दंडक तथा देवसाना तेर दडक मळीने चोद दंडकनी गति कही जीवमात्र उत्पति काळे अपर्याप्तावस्थाए होय अने पछीथी पर्याप्ता थाय, य अपेक्षाए अहीं नारकी तथा देवतानी गति पर्या प्ता तथा अपर्याप्सा जीवभेदे कहीछे तो से करण अपर्याप्ता जाणवा करण अपर्याप्ता जीव अवश्य पर्याप्ता थायज, तथा समहणी विगेरेमा कपुं छे के नारकी तथा देवता चवीने पर्याप्ता तिर्यच अने मनुग्य थाय एमां कोई विरोध नथी पृथ्वीकाय, अपकाय, घनस्पतिकाय तथा ये २९ इंद्रिय, तेइंद्रिय अने चौरिंद्रिय एवं छ दंडकना जीवो आयुक्षये आप आपणा दंडकमांथी नीकळीने, पंदर कर्म भूमिना गर्भज मनुष्य पर्याप्ता, पंदर गर्भज म- नुष्य अपर्याप्ता, एकसोनेएक समुच्छिम मनुष्य अने अडताळीसतिर्यचना ए सर्वे मळीने एकसोने ओगणा एंशी जीवभेदने विषे पोतपोताना कर्मानुसार जाय छे. तेउकाय अने वाउकाय ए बे दंडकना नीकळ्या जीव. अडताळीस भेदना तिर्यंचमां जाय छे. एवी रीते बावीस दंडकनी गति कही. गर्भज तिर्यच पंचेद्रिय एवा जलचरजीवो आ- ठमांथी बारमा दैवलोके, नव ग्रैवेयके अने पांच अ- नुत्तर विमाने जाय नहि माटे सर्व पांचसे ने त्रेसठ जीवभेदमांथी ए अढार स्थानकना पर्याप्ता तथा अपर्याप्तामळी छत्रीस जीवभेद बादकरता बाकीना पांचसेंने सतावीस जीवभेदमा जलचर जीवो जाय छे. गर्भजउरपरिसर्पजीवो उपर कहेला पांचसेंने सत्तावीस जीवभेदमांथी सातमी अने छठ्ठी नारकीना पर्याप्ता तथा अपर्याप्ता मळी चार भेद वर्जीने वा.
३०
फीना पाचसेंने शेवीस जधिमेदमां जाय छे गर्भज
थलचर जीवो (चोपगा) उपर कहेला पांचसेने स
ताधीस जीवभेदमांधी सातमी, छठी अने पांचमीना
रकीनापर्याता तथा अपर्याप्ता मळी छ मेद पर्जी ने
वाकीना पाचसे ने एकवीस जीवमेदने दिये जाय छ
गर्भज खेचर जीयो उपर कडेला पाचसेंने सताषीस
जीव भेदभाथी सातमी, छठी, पाचमी अने चोथी
नारकीना पर्याप्ता तथा अपर्याप्ता मळी आठ भेटव
जीन थाफीना पाचसेंने ओगणीस जीवभेदमा जाय
छे गर्भज मुजपरिसर्पजीवो उपर कहेला पाचसेने
सत्तावीस जीव भेदमापी सातमी, छठी, पाचमी,
चोथी अने प्रीजी नारकीना पर्याप्ता तथा अपर्याप्ता
मळी
दश
भेद वर्जीने घाफीना पाचसेने सत्तर जीव
भेदमा जाय छे हवे असंज्ञी तिर्यंच पंचेंद्रिय जीवा
आयुक्षये निकलीने प्रणसेंने पंचाणु भेदने विपे जाय
तेना नाम कहे छे, दश भुवन पति, सोल ध्यंतर,
पंदर परमाधामी, दशतिर्यग् जुभक, छप्पन्न अंतर
दीपना मनुष्यो, पहेली नारकी अने पंदर फर्म
३१ मिना मनुष्यो एवं एकसोने वीस पर्याप्ता तथा अपर्याप्ता मळीने वसेंने छेताळीस तथा एकसोने एक समुर्छिम मनुष्यो अने अडताळीस भेद तिर्य- चना गणतां त्रणसेंने पंचाणुं जीवभेद थया तेमां अ- संज्ञी तिर्यंच पचेंद्रियनी गति जाणवी. एवं त्रेवीस दंडकनी गति कही. मनुष्यना दंडके गति कहे छे. प्रथम समुछिम मनुष्य आयुक्षये, समुच्छिम मनुष्यमाथी नीकळ्या, पंदर कर्म भुमीज मनुष्य पर्याप्ता, पंदर कर्म भुमिज अपर्याप्या, एकसोने एक समुछिम मनुष्य अने अडताळीस भेदना तिर्यच एवं एकसोने ओगणा एंसी जीवभेदमां जाय छे पंदर कर्म भुमिना गर्भज मनुष्योमाथी जीवो नीकळीने पांचसेंने त्रेसठ जीवभे दमां जाय छे. त्रीस अकर्म भुमिना मनुष्यमांथी नीक ळ्या जीवो, दशभुवनपति; सोल व्यंतर, पंदर परमाधा मी, दशतिर्यग् जंभक, दश ज्योतिषी, एक किल्वीषिया अने सौधर्म तथा इशान ए बे देवलोक मळी चोसठ जीवभेदमां ने थी नोकळ्या जीयो, दश भुवनपति, सोलव्यंतर, पं दर परमाधामी अने दश तिर्यग अमक पम एका- पन जीवभेदमा जाय छे इति गतिदार अथ धावीस, आगतिवार आगति-आगमन-कया दङकने विपे कयाकया दढकना जीवो आवीने उपजे एम जे कहेतु तेनु नाम अहिं आगतिदार जाणवू नारकी तथा देवताना मळी चौट दरकने विपे एक तियेय पद्रिय अने वीजा मनुष्य एम थे दड- क माहेथी जीवो आवी उत्पन्न थाय के पृथ्वीकाय, अप्रकाय अने वनस्पतिकाय पम प्रण दडकने विपे एक नारकविजीने पाकीना श्रेधीशे दरफमाहेयी जी- वोआधी उत्पन्न याय छे तेउकाय, पाउकाय, ये ई- द्विय, ते इंद्रिय अने चौरिंद्रिय एम पाच दंडकने विप थावरना पाच, विगलेंद्रियना प्रण, निर्यच पचेंद्रिय अने मनुप्य पम दश दंडक माहेथी जीवो आवी उ त्पन्न थाय छे निर्यच पद्रियना दंडकने विपे यो ३३ वीशे दंडकमाथी जीवो आवी उत्पन्न थाय छे. मनुष्यना दंडकने विषे. तेउकाय अने वाउकाय" सिवाय वाकीना बावीश दंडकमांहेथी जीवो आवी उत्पन्न थाय छे. एम सामान्य चोवीशे दंडकनी आगति कही. हवे चोवीशे दंडके, पांचसे त्रेसठ जीवभेदमांथी आगति कहे छे-पहेली नरके. पंदरकर्मभूमीज ग- र्भज मनुष्य, पांच गर्भज तिर्यच पंचेंद्रिय अने पांच, समुछिमतिर्यंच पंचेंद्रिय एम पच्चीशभेदना जीव आवी उपजे. बीजी नरके. पंदर कर्मभूमिज गर्भज मनुष्य अने पांच गर्भज तिर्यच पंचेंद्रिय एम वीस भेदना जीव आवी उपजे.त्रीजीनरके. पंदर कर्म भू- मिज गर्भज मनुष्य तथा गर्भज जलचर, थलचर, उरपरिसर्प अने खेचर एम ओगणिश भेद माहेथी जीव आवी उपजे. चोथी नरके पंदरकर्मभूमिज गर्भ ज मनुष्य तथा गर्भज जलचर थलचर अने उरपरि सर्प एम अढारभेदमाहेथी जीव आवी उपजे.पांचमी नरके पंदर कर्मभुमिज गर्भज मनुष्य तथा जलचर अने उरपरिसर्प एम सत्तर भेदमाहेथी जीव आवी ३४ उपजे छीनरके पदर कर्ममुमिज गर्मज मनुष्य अने गर्भज जलचर एम सोल भेद महिथी जीव आधी उपजे सातमी नरके पण पैदर कर्ममुमिजग- भज मनुष्य अनेजलचर एम सोलभेदमाहेथी आवी उपजे नरकने विपे अपर्याप्ता जीवो जाय नहि प प्रकारे नारकीना दडके आगति कही दशभुवनपति, सोल व्यतर, पदर परमाधामी अने दशतिर्यगञ्जुभफ प एकावनजातिना देवोनेविपे एकसो एक क्षेत्रना गर्भज ममुप्यपर्याप्ता, पाचगर्भज तिर्यच पर्याप्ता अने पांच असंज्ञी तिर्यच पचेंद्रिय एम एफसोने अगियारभेदमांथी जीष आयी उपजे दश प्रकारना ज्योतिपी अने सौधर्म पम अगियार जातीना देयोने विपे पदर कर्मभूमिज गर्मज मनुष्य, श्रीस अफर्मभुमिज गर्भजमनुष्य अने पाच गर्भज तिर्यच पम पचास भेदमाहेयी जीवो आवी उपजे घीजा इशान देवलोकने विपे पंदरकर्मभुमि, पांचहरि वर्प, पाच रम्यक, पाचदेषकुरु ने पाच उत्तरकुरु एष पात्रीस क्षेत्रना गर्भज मनुप्पो तथा पांचगर्मजसिर्यच एम चालीश भेदमाहेधी जीव आधी उपजे पहेला . , ३५ किल्वीषिया जातिना देवाने विषे पंदर कर्मभुमि,पांच उत्तरकुरुने पांच देवकुरु एवं पचीस क्षेत्रना गर्भज मनुष्यो तथा पांचगर्भज तिर्यंच पंचेंद्रिय एम त्रीस भेदमाहेथी जीव आवी उपजे. त्रीजाथी आठमासुधी छ देवलोक, नव लोकांतिक अने बे किल्वीषिया एम सत्तर जातिना देवोने विषे पंदर कर्मभुमिज गर्भज मनुष्य अने पांच गर्भज तिर्यंच पंचेंद्रिय एम वीस भेदमाहेथी जीवो आवी उपजे. नवमा आणंत देव- लोकथी मांडीने पांच अनुत्तर विमान पर्यत्ना अढार देवलोकने विषे पंदर कर्मभुमिज गर्भज मनुष्यना भेदमांहेथी जीव आची उपजे. एवी रीते एक नार- कीनो दंडक तथा तेर देवताना दंडक मळीने चौद दंडके आगति कही. पृथ्वीकाय, अपकाय अने वनस्पतिकाय एत्रण दंडकनेविपे अडताळीसभेदना तिर्यच, एकसोने एक समुचिम मनुष्य तथा पंदर कर्मभुमिज गर्भज मनु- व्य पर्याता,पंदर कर्मभुमिना गर्भज मनुष्य अपर्याप्ता तथा पंदर परमाधामी, दश भुवनपति, सोलव्यंतर, दशतिर्यग् ब्रूभक,दश ज्योतिषी, सौधर्म तथा इशान A
,
३६
अने एक फिल्थीपिया जातिना देवो एम सर्वे मळी
घसेंने ताळीस भेदमाइथी जीव आवी उपजे ते
उकाय, याउकाय, घेइंद्रिय, सेइंद्रिय, चौरिद्रिय
अने असंज्ञीतिर्यच पंचेंद्रियने विपे एकसोनेएक
समुच्छिम मनुष्य अपर्यासा, पंदर कर्ममुमिज मनुष्य
पर्याप्ता, पंदर कर्म भुमिज मनुष्य अपर्याप्ता अने
अडताळीस भेदना तिर्यच एम एकसोने ओगणाएंसी
भेटमांडेयी जीव आवी उपजे गर्भज तिर्यच पंचें-
द्रिय एवा जलचर, थलचर, उरपरिसर्प, भुजपरिसर्प
अने खेचरने विपे एकसोने पक समुश्छिम मनुष्य
अपर्याप्ता, पंदर कर्ममुमिज गर्भज मनुष्य पर्याप्ता,
पंदर कर्मभुमिज मनुष्य अपर्याप्ता, अडताळीस
- मेदना सियेच तथा पंदर परमाधामी, दशभुवनपति,
सोलब्यंतर, दश तिर्यग् अभक, दश ज्योतिप, प्रण
किल्विषीया नव लोकांतिक भने सौधर्मथी मारीने
आठमा सहस्त्रार पर्यत् देवलोक तथा सात नारकी
पम सर्षे मळीने बसेंने सहसठ जीवभेद महिमी
जीव आवी उपजे प्रेवीस ददके आगति कही
सर्मिग पनपने विवे पटर मर्म ममिन -
,
३७
नुष्य पर्याप्ता, बादर पृथ्वीकाय पर्याप्ताअपर्याप्ता,
बादर अपकाय पर्याप्ता अपर्याप्ता, बादर प्रत्येक
वनस्पतिकाय पर्याप्ता अपर्याप्ता, सुक्ष्म पृथ्वीकाय
पर्याप्ता अपर्याप्ता सुक्ष्म अपकाय पर्याप्ता अपर्याप्ता
सुक्ष्म साधारण वनस्पतिकाय पर्याप्ता अपर्याप्ता, बा,
दर साधारण वनस्पतिकाय - पर्याप्ता अपर्याप्ता त्रण
विकलेंद्रियना पर्याप्ता अपर्याप्ता, तथा वीस तिर्यच
पंचेंद्रियना अने एकसोने एक समुच्छिम मनुष्य एम
सर्वे मळीने एकसोने इंकोतेर भेदमांथी जीवो आंवी
उपजे. पंदर कर्म भुमिज गर्भज मनुष्यने वीषे उपर
कहेला एकसोने इंकोतेर जीवभेद तथा नव्वाणु दे,
वताना भेद अने पहेलीथी छठ्ठीनारकी सुधीना ना:
रकी एम सर्वे मळीने बसेंने छोतेर भेदमाहेथी जीव
आवीउपजे. त्रीस अकर्म भुमिना मनुष्यने विषे पंदर
कर्मभुमिज गर्भज मनुष्य पर्याप्ता अने पांच गर्भज
तिर्यंच पर्याप्ता मळी बीस भेदमाहेथी जीव आवी
उपजे. छप्पन्न अंतर द्वीपना मनुष्यने विषे पंदर कर्मः
भुमिज गर्भज मनुष्य पर्याता तथा पांच गर्भज
तिर्यचपर्याता अने पांच समुश्छिम तिर्यंच पंचेद्रिय
पर्याप्ता एम पश्चीसमेदहियी जीव आवी उपजे.
एवी रीसे घोवीस टंडके आगति कही
प्रेवीसमुं वेद द्वार कहे छ
खी वद, पुरुष वेद, नपुपक वेद नारकी स्मा-
वर अने प्रण विगलेंद्री एनव दंटके एक नपुंशक
बेद होय छे, दसमुषन पती, व्यतर, ज्योतीषी, अने
बैमानीकने, स्त्री वेद अने पुरुष वेद एम चे वेद होय
मनुष्य अने तीयेच पचेठीने प्रणे-येद होय वेद
दार हषे चोवीसमो भुवन द्वार कहे छे प्रथम नरके,
श्रीस लाख नरकावासा धीजी नरके, पचीस लाम्ब
नरकापासा श्रीजी नरके, पंदर लाख नरकावासा.
थोथी नरके, दस लाख नरकावासा पांचमी नरके,
प्रण लाख नरकावासा छही नरके, पांच उणा एक
लाख नरकावासा अने सातमी नरके, पांच नरका-
पासा सर्वे मलीने चोरासी लाख नरकावासा छे, पे-
हली नरके तेर पाथडा, धीजी नरके अगीआर पाथ
डा, श्रीजी नरके नय पायटा, चोधी नरके सात पा.
घडा, पाचमी नरके पाच पापडा, छट्टी नरके प्रण
पाथहा अने सातमी नरके एक पाथडो, संघ मलीने
? ३९ ओगणपचास पाथडा छे. पहेली. रत्नप्रभा, बीजी शर्करा प्रभा, त्रीजी वालुका प्रभा, चोथी पंकप्रभा, पांचमी धुम प्रभा, छठी तम प्रभा, सातमी तमतमा प्रभा. रत्नप्रभा पृथ्वीनो पीड एक लाखने अंसी हजार जोजन, शर्करा प्रभा पृथ्वीनो पीड एक लाखने वत्रीस हजार जोजन, वालुका प्रभा पृथ्वीनो पीड एक लाखने अठ्ठावीस हजार जोजन, पंकप्रभा पृथ्वीनो पी. ड एकलाखने वीस हजार जोजन, धुमप्रना पृथ्वीना पीड एकलाखने अढार हजार जोजन, तमप्रभा पृ- थ्वीनो पीड एकलाखने सोलहजार जोजन, तमत- मा प्रभा पृथ्वीनो पीड एकलाखने अढार हजार जोजन, ए साते नारकर्नुि जाडपणुं जाणवू. रत्नप्रभा पृथ्वीनो पीड एकलाख अंसीहजार जोजन छे तेमां. थी एकहजार जोजन हेठे मुकी अने एकहजार जो- जन उपर मुकी बच्चे एकलाखने इठोतेर हजारर्नु पोहोलापणुं ते मांहे नरकावासा छे. अने तेमां दस भुवन पतीना भुवन छे, जघन्यथी जंबु द्वीप जेवडा मध्यमथी संख्याता जोजन प्रमाण अने उत्कृष्टथी असंख्याता जोजनना छे. हवे उपर एकहजार जोज- ननुं मुकैलं छे तेमांथी सो जोजन हेठे अने सो जो- , ४० जन उपरनु मुकी वाकी पचमा रहेला आठसो जो- जनमा आठ व्यतर देयोना मुवनो छे से जघन्यथी भरतक्षेत्रना प्रमाणवाला, मण्यमयी महाविदेह क्षे. अना प्रमाणवाला अने उकृष्ट जवुदीप जेवरा मोटा होय छे पली उपरना भागमा सो जोजन रहेलं छे सेमाची हेठे दस जोजन अन उपर दस जोजन मुकी वचमा रहेला अॅशी जोजननी पहोलाइमा आठ पाणन्यंतर देयोना नगर छे ते जघन्यथी भरतक्षेत्र जेवढा अने उस्कृष्टथी जवुद्वीप जेवहा होय छे सुक्ष्म पांच स्थावरो चोटे लोकमा व्यापला छे. चादर पांच स्थायरो, विगलेंद्री तथा तीयेच पंचेंद्री लोकमा ठसो उस छे, मनुष्य अडीदीपमा पीसतालीस लाख जो जन माहे छे हवे पांच ज्योतीपीना मेद कहेछे स- ममुतला पृथ्वीपी सातसेने नेनु जोजन उचा जइप तो स्यां प्रथम तारा छे ते उपरे दस जोजन आये सूर्य हे, ते उपरे प्रण जोजन आये ग्रहस्पति छे, ते उपरे प्रण जोजन आवे मंगल छे,ते उपरे प्रण जो जन आय सनीसर छे पटले कसो दस जामन माहे ज्योतीपीना असम्याता यिमानो छ त उपरे
४१
एक राज उंचो सुधर्मा अने इसान देवलोक छ, सु-
'धर्मा देव लोकमां बत्रीस लाख विमान, बत्रीस
लाख देहेरा, अने तेमां जीन बिंब सत्तावन क्रोडने
साठलाख छे. इसान देव.लोके, अट्ठावीसलाख वि-
मान अने अठ्ठावीस लाख देहेरा छे, तेमां जीनबिंब
पचास क्रोड अने चालीसलाख छे. सनतकुमार देव
लोके बारलाख विमान अने बारलाख देहेरा छे,
तेमां जीनबिंब एकवीस क्रोडने साठलाख छे, मां-
हेंद्र देव लोके आठ लाख विमान अने आठ लाख
देहेरा छे, तेमां जीनबिंब चौद कोडने चालीसलाख
छे. ब्रह्मदेव लोके चारलाख विमान अने चारलाख
देहेरा छे, तेमां जीनबिंब सातक्रोड अने वीसलाख
छे, लांतक देव लोके, पचास हजार विमान अने
पचास हजार देहेरा छे, तेमां जीनबिब नेवुलाख छे.
सुक्र देवलोके चालीसहजार विमानने चालीसहजार
देहेरा छे, तेमां जीनबिंव बहोंतेरलाख छे. सहसार
देवलोके छ हजार विमानने छ हजार देहेरा छे, तेमां
जीनर्विव दसलाख अॅसीहजार छे. आणंत अर्ने प्रा.
णंत देवलोके चारसे विमान अने चारसे देहेरा छे,
,
४२ तेमां जीनर्विव षहोतर हजार छे आरण अने अ- च्युत देवलोके प्रणसें विमान अने प्रणसे देहरा छे तेमा जीनविंध चोपन हजार के प्रथम त्री के एक- सो अगीआर विमानने एफसो अगीआर देहेरा छे, तेमा जीनर्विष प्रणसेनेवीस, बीजे त्रीके एकसो सात विमान अने एफसो सात दहेरा छे, तेमा जीन विध धारहजार आठसोने चालीस, प्रीजे श्रीके एक सो -विमान एकसो देहेरा अने तेमांजीनर्विव धारहजार, पाच अनुत्तर विमान पाच विमाने, पाच देहेरा तेमा जीनर्षिय छसे छे सर्व मलीने विमान चोरासी लाम्ब सत्ताणहजार नेप्रेषीस छे एटला देहेरा तेमा जीनषि एकसो कोड घावन मोड चोराण लाख चुंवालीसहजार सातसेंने साठ एउर्व लोकनो सर- वालो छे हवे भुवनपसीनी सन्ध्या कहे छे चमर ई ने चोत्रीसलाग्व मुवन, घलईदने प्रीसलाव भुवन, घरणेंद्रने वालीस लाख भुवन, भुतानेंद्रने चालीस लास्त्र भुवन, वर्णदेवने अस्त्रीस लाख मुवन, वणु- दालीने श्रीसलाख भुवन, हर्फितने चोवीस लाख मुवन, हरीसेहने प्रीसलाख भुयन, अग्निसहने चा- - " लीसलाख भुवन, अग्नि मानवने छत्रीसलाख भुवन, पुरणीने चालीसलाख भुवन, विसष्टने छत्रीसलाख भुवन, जलकंतने चालीसलाख भुवन, जलप्रभने छ- त्रीसलाख भुवन, अमितगनीने चालीसलाख भुवन, मरीगवाहनने छत्रीसलाख भुवन; विलंबने चालीस लाख भुवन, प्रभजनने, छेतालीसलाख भुवन, घो- सने पचासलाख भुवन, महा घोसने छेतालीसलाख भुवन, सर्व इंद्रने सात क्रोडने बोंतेरलाख भुवन एटला देहेरा तेमां जीनबिंब तेरसे नव्यासी कोडने साठलाख छे. तीर्छा लोकमां बत्रीसहजार अने ओ- गणसाठ देहेरा तेमां जीनबिंब त्रणलाख एकागुंह- जार व्रणसेंवीस छे. व्यंतर अने ज्योतीषीमां असं-- ख्याता जीनबिंब छे, एना भुवन अने देहेरा गणवा मां न आवे. हवेत्रणभुवनना देहेरानी संख्या कहेछे आठ क्रोडने सत्तावनलाख ओगणत्रीस हजार ने- व्यासी एटला देहेरां, तेमां जीनबिंब, पंदरसेने वे- तालीस क्रोड अट्ठावनलाख छत्रीसहजार अने एंशी एटला त्रणभुवनमांजीनविंब जाणवा. सर्वार्थ सीधी वार जोजन सीद्ध सील्ला छे ते लांबी अने पहोली पीसतालीसलाख जोजन छे वचमा आठ जोजन -- H
४४
जाटी छे छेटे अगुलना असंख्यातमा भाग जेटली
पासली छे, मांखीनी पांख जेवी ते उपरे एक जोज
नमा सीद्धो छ गाउने छठे भागे अथवा जोजनना
चोवीसमा भागे जइए से वारे सीख परमात्मा आवे
ते सीद्ध परमात्मानी अवगाहना श्रणसे तेत्रीस घ
नुष्यने पत्रीस अंगुलनो प्रमाण छे एवा श्री सीड
‘परमात्मा छे तेमने माहारो समय समय नमस्कार
होजो एभुवन द्वार॥हवे पचीसमो प्राण दार कहेछे
प्राण दस छे, फरस इंद्री रसइंद्री, प्राण इंद्री, पह
इंग्री, श्रोत इंदी, मनोषळ, वचन घल, कायपल,
श्वासोश्वास, आउखु, नारकी, दुसभुवनपसी, व्यं
सर, ज्योतीपी, बैमानीक, तीर्यच पचेनी अने मनुष्य
ए सोल दरके दस प्राण होय छे पाच स्यामरने
चार प्राण फरस इवी, कायपल, श्वासोश्वास अने
आउखुं तेइद्रीने सात प्राण, फरस इद्री, रसईद्री,
भ्राणइंद्री, कायपल पचनपल, श्वासोश्वास अने आ
उखु चोरीद्रीने आठ प्राण फरस इंबी, रसइबी, प्रा
णइंद्री चाइनी, फायपल, पवनयल वासोश्वास
अने आउखु असन्त्री पंचेद्रीने नव प्राण फरस इंग्री,
रसइद्री, माणटी. पक्षइंद्री, श्रोतईद्री, फाययल.
४५ 1 , वचनवल, श्वासोश्वास अने आउ, ए प्राणद्वार- हवे छवीसमुं संपदाद्वार कहेछे. संपदावीस छ, चक्र रत्न, दंडरत्न, खडगरत्न, कांगीणीरत्न, मणीरत्न, छत्ररत्न, चर्मरत्न, ए सातरत्न एकीद्री छे. गाथापती पुरोहितरत्न, सेनापतिरत्न, वार्धिकरत्न, गजरत्न, अश्वरत्न, स्त्रीरत्न, ए सात पंचींद्रीरत्न छे. तीर्थकर, चक्रवर्ती, वलदेव, वासुदेव, केवली, साधु, श्रावक, अविरति-समकित दृष्टि, मांडलिकराजा, ए वीस संपदा. पेलीनरकनो नीकल्यो सात एकीद्री विना वाकीनी-सोलसंपदा पामे. बीजी नरकनो नीकल्यो पंदर संपदा पामे, सतएकीद्री अने चक्रवर्ती वि. नानी त्रीजी नरकनो नीकल्यो, सातएकीदीरत्न, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव, विना तेर संपदा पामे.. चोथी नरकनो नीकल्यो. सात एकीदीरत्न, तीर्थकर, चक्रवर्ती बळदेव, वासुदेव, विना बार संपदा पामे. पांचमी नरकनो नीकल्यो सात एकीदीरत्न, तीर्थकर चक्रवर्ती बळदेव, वासुदेव, अने केवली, विना अगी- आर संपदा पामे. छठ्ठीनरकनो नीकल्यो, सात पंचेद्री रत्न, श्रावक, अविरती समकित दृष्टि, ए दस संपदा पामे. सातमी नरकनो नीकल्यो, अश्वरत्न गजरत्न, ५६ अविरती समकित दृष्टि, ए त्रण सपदा पामे दस मु- वनपती, व्यतर, ज्योतीपीए पार दडफमाथी नीक- ल्यो, तीर्थकर अने वासुदेव विना एकवीस संपदा पामे पृथ्वी, अप, वनस्पति, तीर्यच पचीनी अने मनुष्य ए पाच दंडकमाथी नीकल्यो, तीर्थकर, च- क्रवर्ती, बलदव, वासुदेव विना ओगणीस संपदा पामे तेउफाय, वाउकायनो नीकल्यो, सात एकी- द्री रत्न अश्व रस्न, गज रत्न, प नव सपदा पामे वे इंद्री ते इंद्री, चौरींदीनो नीकन्यो, तीर्थकर, च क्रवर्ती बलदेव, वासुदेव, केवली, विना अडार स पदा पामे बैमानीकर्मा सुधर्मा, इशान देवलोकनो नीकल्यो, श्रेवीस संपदा पामे त्रीजा देवलोकपी आठमा देवलोक सुधीनो नीकळी, सात एकांट्री रत्न विना सोल सपदा पामे नवमां देवलोकथी न बषयक सुधीनो नीकल्यो सात एकीद्री रत्न, अश्व रत्न, गजरत्न, ए नय विना चौद सपदा पामे पांच अनुत्तर विमाननो नीकल्यो तीर्थकर, चक्रवर्ती, पळ- देव, केवली, साघु, पावक, मांटलीकराजा, अविर- ती समकित दृष्टि, ए आठ संपदा पामे ए संपदा द्वार-सचावीसमो धर्मदार फहेछे नारफी, दसभुवन , . पती, व्यंतर, ज्योतीषी, बैमानीक, पांच स्थावरो, त्र- ण विगलेद्रीए वावीस दंडके धर्म नथी. तीर्यय पंची. द्री अने मनुष्यने करणी रूप धर्म छे. ए धर्मद्वार- हवे अठ्ठावीसमो योनी द्वार कहेछे पृथ्वी काय, अ- पकाय, तेउकाय, अने वाउकाय ए चारने सात सा. तलाख योनी के प्रत्येक वनस्पतिकायने दस लाख अने साधारण वनस्पति कायने चौदलाख योनी छे, वे इंद्री, ते इंद्री अने चौरींद्रीने बेए लाख योनी छे, तीर्यय पंचेंद्रीने, नारकीने, देवताने ए दरेकने चार चार लाखयोनी छे मनुष्यनी चौदलाखयोनी छे ए योनीद्वार ओगणत्रीसमूं कुल कोडी द्वार कहे छे नारकीनी प- चवीसलाख कूल कोडी भूवन पतीनी वीस लाख कुल कोडी, व्यंतरनी वे लाख कुल कोडी, ज्योती- षीनी बे लाख कुल कोडी, वैमानीकनी बे लाख कुल कोडी, पृथ्वीकायनी वार लाख, अपकायनीसात ला- ख, तेउकायनीत्रणलाख, वाउकायनी सात लाख, वनस्पतिकायनी अठ्ठावीस लाख कुल कोडी, बेई. द्रीनी सातलाख, ते ईद्रीनी आठलाख अने चौरी- द्रीनी नवलाख कुल कोडी, जलचरनी साडाबारला- ख, थलचरनी चौदलाख, खेचरनी बारलाख कुल --- ४८ कोटी, उरपरी सर्पनी दसलाल, अने भुजपरी सर्प- नी-नषलाख कुल कोडी, मनुष्यनी बारलाख कुल कोटी, सर्वे भइने एक कोडने सत्ताणुलाख कुल कोरी थई, ए कुल कोटी द्वार, श्रीसमो अल्प घड त्य द्वार सर्वथी थोडा गर्भज पयीता मनुष्य, तेथी वादर अग्नि काय जीव असख्यात गुणाअधिक तेयी वैमानीक देवता असख्यात गुणाअधिक, तेथी दस भुवनपसी देवता असंख्यात गुणा अधिक, तेथी नारकीना जीव असख्यात गुणा अधिक, तेथी व्यं- तर असख्यात गुणा अधिक, तेथी ज्योतीपी देवता असंख्यात गृणा आधिक, तेथी चौरीद्रीना जीव अ- संख्यात गुणा अधिक, तेथी तीयेय पंचींद्रीनाजीव वि- शेपाधीक, तेथी घे इंद्रीना जीव विशेषाधिक तेथी ते इंद्रीना जीव विशेषाधिक, तेथी पृथ्वीफाय जीव अ- सल्यास गुणा, तेथी अपकायना जीव असंख्यात गुणा अधिक, तेथी पाउफायना जीव असंख्यात गु पा अधिक, तेथी वनस्पतिकापना जीव अनंत गुणा अधिक ए प्रीसमुंद्वार संपूर्ण दंडकना श्रीसदार संपूर्ण समाप्त, श्री सम्यक्त्व विचार गर्भित श्री महावीरजिनस्तवन. ढाल पेहेली एछिडीकिहां राखी एदेशी. इगविध दुविध त्रिविद्य चउविधवलि ॥ पणविध दशविधजाणो ॥ ए समकित शिवतरूतुं वीजक ॥ संप्रति परे मन आणोरे ॥ प्राणी समकित शुध आराधो ॥ जेम शिवमारग साधोरे ॥ प्राणी० सम० ॥ १ ॥ ए आंकणी ॥ इगविध तुज आणा रुची दुविहा ॥ द्रव्य भावथी कहिये ॥ निश्चयने व्यवहारे अथवा ॥ समकित दुविध स- दइयें रे ॥ मा० ॥२॥ सद्दहणा सूधी तुज मागम ॥ परमारथ नवीजाणे ॥ समकित द्रव्यथकी तस कहिये ॥ भावथी तत्व चखा- णेरे ॥ प्रा० ॥ ३ ॥ मिथ्यापुद्गल शुद्धनु वेदन ॥ समकित द्रव्य कहावे ॥ भावथि तत्व रुचिपण तिमहिज ॥ तत्व रुची परिभावेरे ॥ प्रा० ॥ ४॥ पुद्गलरूपी अरूपी अ पुद्गल ॥ ए पण द्विविधनुं देखे।। क्षायोपशमिकवेदक पुद्गल।।शेप अपुद्गल अलेखेरे। प्रा० ॥५॥निश्चय समकित शुभ, आतमनो.॥ ज्ञानादिक परिणाम ॥ अथवा आतम समकित कहिये ॥ गुण गुणी भेद न ठामरे ॥ प्रा० ॥ ६॥ मि. थ्या दृष्टीतणी संस्तवना ॥ त्यागादिक व्यवहार ॥ वलिय निसर्गा- पर अधिगमथी ॥ विहुँ भेदे निरधाररे प्रा० ॥७॥ जिम कोई मा- रंग भूलो पंथी । भमतो मारग आवे ॥ कोइक उपदेशादिक योगे ॥ कोइक थाग न पावेरे ॥ प्रा० ॥८॥ ज्वर पण सहेजे औपध योगे, माये, एक न भाय ॥ पारग, पर एशते समकित ।। इनि परे द्विविवे यायरे ॥मा० ॥९॥ जावी समरण ममुल यकी जे ॥, वास निसर्ग विषारो ॥ गुरुउपदेशादिकधी माग्यं ॥ वे अधिगम पिच प्रारोरे ॥०॥ १० ॥ पारफ रोषक दीपकदे ।। प्रिरिपे पण ए भास्। भयमा उपञ्चम क्षायोपनिमिफासायिक मेवे दास्युरे ॥मा० ॥ ११ ॥ भिम भार वे सिम कीर्छ । ते फारक स सास ।। म घोपरि रुविधी रोचफ । नहि, किरिया, अभ्यासरे ॥ मा० ॥ १२ ॥ मिभ्या दृष्टि थको पण पोते ॥ धर्म फयादिक सारे ॥ दीपक परें परने दीपावे ॥ दीपक उपचाररे ॥ ० ॥ ॥ १३ ॥ से समकित भिम परर्स मीवे ॥ तिम तुम आगल दासु सुम मागम नप न्पाप शुभोदपि ॥ परमारय रस पासुरे ॥ माणी समकित मुल अराषो ।। १४ ॥ पास पीमी देतुन सिदवि मीठगे ए देशी पीर मिणेसर साहिल सुणभो । निम सेपक मरदासरे ।। दीन दयाकर ठाकुर मापो । तुमपरणे सम पासरे।। पी० ॥१॥ लो फाफाशि रखो भपिनासी । भान मनादि मनंतर ॥ ए मम पर घणा दुस बहुण ॥ भोगपियां मगर्मवरे ॥ पी० ॥२॥ मुल्मनि गोद पस्पो हुँ सामी ॥ मनादि गणस्सा नामर ॥ तिहाँमे पीम अनता पदम ॥ परावरिण स्पामिरे ॥ मी० ॥३॥ मम्पहार रासें इस पसिभो ॥कास मनवो भोगरे । फर्मपरिणाम नृपति आ देशे। सादा मम्पवा योगेर ॥ बी० ॥ ४॥ तिहां एकण सासा ५१ सासमें कीर्घा । भवसतरे जाजेरारे । ए दुख तुजविण कुण छोडावे । स्वामी मुज भवफेरारे । वी० ॥ ५ ॥ व्यवहाररासी लइ उत- कर्षे ।। काल अनंत अनंतोरे ।। थुल निगोदने पृथवी पाणी ॥ तेज अनिल त्रस जंतोरे । वी० ॥ ६ ॥ तिहांपण हुं वसिओ तुम पाखें ॥ मिथ्या मतने जोरेरे ॥ हरिहर देव करीमें मान्या ।। तुं न चढयों मन मोरेरे ॥ वी० ॥ ७॥ तेण में छेदन भेदन ताडन । भूख तृपा गुरु भाररे ।। गर्भवासने जन्म जरा दुख ।। भोगवियां निरधाररे ।। वी० ॥ ८॥ इम चउगइ भवना दुख फरसी ॥ वार अनंती अ- नाणीरे ॥ पाला दृष्टांते इग पुद्गल ।। परावर्त स्थिति आणीरे ।। वी० ॥ ९ ॥ भव्यपणादिक ने परिपाके || गिरिसरि दुपल न्यायेंरें ॥ अध्यवसाय विशेष करण जे ।। अनाभोंगथी थाय रे ॥ वी० ॥ ॥१०॥ ते त्रिविधे भाख्यं तिहां पहेलु ॥ यथामत्त वली बीजुरे । करण अपूरव नामे कहीयें ।। अनिवृत्त करण ते त्रीजुरे ॥ पीठ ॥ ११ ॥ यथा प्रवृत्त करणे आयुविण ॥ सात करम करी खीणरे ॥ कोडा कोडी सायर इगपलनो ।। असंख्य भाग तिणे हीणरें। । वी० ॥ १२ ॥ इहा कर्कस निविड गुपिलजिम ग्रंथी भेदन दु- कर कामरे ।। कर्म परिणाम जनित धन जीवनो ॥ रागद्वेष परिणा- मरे ॥ वी० ॥ १३ ॥ ते ग्रंथी नवी भेदी जीवे ॥ पहेलि इणे सं- साररे ॥ वार अनंति अभव्य पण आवे ।। ग्रंथी लगें निरधाररे ।। ॥ वी० ॥ १४ ॥ भव्य अभव्य रहे तिहां ग्रंथी ॥ संख्य असंख्यो कालरे । अरिहंतादिकनी ऋद्धि देखी ॥ संयमने उजमालरे ।। वी. ॥ १५ ॥ तिहा लहे श्रुत समायक द्रव्ये ॥ सेप लाभ नही तासरे ॥ तिहरायी प्रेम्यपण नीवे ॥ पण नहि शिवपुर मासर ॥ वी० ॥ ॥ १६ ॥ कोरफ भम्प महातम तेइमां ॥ पाने भमनो पार ॥ निन शिव कार पार मिम तवलिण || मेदे पल मनोहारर ॥पी० ॥ ॥ १७॥ करण अप्रम परम निशुप ॥ विमते अपी मायरे । नंदीने अतर महरसमा मनिचिकरणे नायर ॥ पी० ॥ १८॥ ॥ मिथ्यामोर तणीस्पिति घनु ॥ मरमहरत एफोरे ॥ उदय क्षण उपरें ओसधी ॥ से समरय मुषियेफार ॥ पी.॥ ॥ १९ ॥ भनिति करण मिशेपे अंतर ॥ महरसकाल मनपोर ।। मतरकरण पर विरा पजे ॥ दसिम अमाय सर्पोरे ॥ भी०॥ ॥ २०॥ मिमननवादग्पे धन उस्सर । पामी ठाम पलायर ।। तिम मिथ्या पेदन वनश्व सम ।। अतरफरणे थापर वी० ॥२१॥ अंतरफरण करे मिथ्यावनी ॥ पिरिपग पाई मिनन्पानेर।। सरक- रण यकी यिति हठी ॥ पइसी महरत मानर ॥ पी० ॥ २२ ॥ नएयी उपरमी थिति पीमी ॥ सिदा प्रथम स्थिति जाणोर ॥ मि ध्यादलीपर्नु पेदन दयी ।। मिभ्पाष्टी बखाणार ।।बी ॥ २३ ॥ अवरमहरत से पिविनाश ॥ नही मिथ्यादल पदोर मंवरपरणनो प्रथम समय तिदा ॥ हापशम निरयदोर ॥ पी० ॥ २४ ॥ पर- मानंद मगन गेइ ममिम ॥ माती फरफ मशेपर | न्यायमत दरप जिम गार ॥ न्याय पनागम पसर ।। पी० ॥ २५॥ ॥स धीजी सरिसमाणी ए ऐसी ॥ीपर तुमी समषित परस्प ॥ पा( मपी भामा १३ तरस्युरे ॥ धनधन तुम सेवा ॥ एथी मन वंछीत फल लेवा ॥ ते करवा मुज हेवारे ॥ ३० ॥१॥ तिहां कोई देश विरति तससरसी सर्व विरतिलहे हरिसीरे ॥ध० ॥ मिच्छामयण कोदर वा सरिखं ।। उपशम ओषधपरखुरे ॥ध० ॥ २ ॥ जल वस्त्रादिकनेदृष्टांते ।। तुज आगम कहेखांतेरे ॥ध० ॥ मिथ्यापुंजकरेत्रणसोधी ।। उपशम करीशुभवोधीरे ॥ ३० ॥ ३ ॥ शुद्धने अर्द्ध विशुद्धते वीजो ॥ अ- विशुद्ध मतरीजोरे ॥ ध० ॥ उपशमथी पडिओमनवामे ॥ क्षायोपश- मिक पामेरे ॥ ५० ॥४॥ मिश्र तथा मिथ्यात्वने फरसे ॥ करम मतीइम हरसेरे ॥ ध० ॥ बीजुंक्षायोपशमिक कहिये, उपशमपरिपण लहियेरे ॥ ध० ॥ ५॥ मिच्छापुंजकरीत्रिण निरणे ॥ कोई अपूरव करणेरे ॥ ध० ॥ शुद्धपुज तिहांवेदतोज्ञानी, जिनवचनामृतपानीरे ।। ध० ॥ ६ ॥ उपशमपाम्याविण तुजनामे ॥ क्षायोपशमिकपामेरे ॥ ध० ॥ यथाप्रवृत्तिकरणत्रयक्रमथी ॥ अंतरकरणेतुनथीरे ॥ ध० ॥ ७॥ जेलहेउपशम भवजल तरवा ।। तसत्रणपुंजन करवारे ॥ध० आलंबन अलहंती ईयल, जिमसंठाण नमूकेरे ॥ ३० ॥ ८॥ मिश्र पुंज अणलाभी उपशमे ॥ तिममिथ्याते इंकेरे ॥ ५० ॥ उपशमसम- कितथीतिणिपडिओ ॥ जइ मिथ्या गुण अडिओरे ॥ध० ॥ ९ ॥ इम सिद्धांतीनिज मत खोले ॥ कल्पभाष्यपण वोलेरे ॥ ध० ॥ ते त्रणपुंजर्नुसंक्रमभाडं ॥ जिनवयणेमनराखुरे ॥ ध० ॥ १० ॥ मिथ्या दलिकथीपुद्गल खिंची ॥ समकितदृष्टीविंचीरे ।। ध० ॥ संकरमावे समकित मीसें ॥ शुभपरिणामे हिंसेरे ॥ ध० ॥ ११ ॥ समकितदृष्टी भीस आकपी । समकितमाहेहपीरे ।। ध० ॥ संकरमावे मिथ्यादृष्टी ॥ मिथ्यामागुणपष्टीर ॥ प० ॥ १२ ॥ समकिव पृनस मिथ्यादि ॥ पण मीमें नदि पारे । प० ।। मिठासीम नही पान ।। पण पुजछे हनेरे ॥ १० ॥ १३॥ मियासीण यये दोष भी ।। मीस सये एक पुमीर ।। १० । लायक समकित पुल ना ? मिन मागम इम भामेरे ॥ १० ॥१४॥ सोपित मयण कोला थाने । समकित पाल मानेरे ॥ १० ॥रने विष सादिक पाशे ॥ शुदपशु सस नासेरे ॥ १५ ॥ तिमम प्रभास इसीपिफर्सगे॥ वस किरिया मन रगर । प० ॥ मिप्पा, मिमिव समकित माये ॥ वन- सण मिप्या मायरे ॥ १० ॥ १६ ॥ सपकितवी पदिकमी पाई ॥ बसी समकिवलहे माईरे ॥ १० ॥ते प्रम म परे विहां फरी ।। मिछ मपूर विपरीर ॥ १० ॥ १७ ॥ अनिधि बसें से रसीमो समकित ने सीमोरे ।। १० । समकित परेजिहां विरतिनपावे ॥ मायफरण ये आमेरे ॥ ५० ॥करण मपूग्य काममे भागे ॥मि रतिमही वि जागेरे ॥ १० ॥ १८॥ अंतरमहरा यस सापेः ।। निम परिगामे पारे ॥ ५० ॥ उघो नियम नही दि कोई ।। दि हाणी समोईर ॥ ५० ॥ १९ ॥ अनाभोग परिणामनी राणे॥ गा पिरति नमी नाणेर ॥ १० ॥ मरुत फाण पको ये माणी ॥ पिरी सहे निरनि मुराणीर ।। . ॥ २०॥ मामोगें 9 मिरवियी स्वसिपा ॥ तिपम मिथ्यागुणे रसियार || प० ।। मंतरमहरनमा सरे मारी । मपन्य पकी फिरी पाठीर ॥ १० ॥ २१ ॥ उत्प महका मामी । माप करणारे सांस्वीरे ।। प• ॥ीपर फर्मम- हनि हरियाद । ति जोगो रणदिरे ।। १० ॥ २२ ॥को मिरा ५५ धित समकेत फेरी ॥ ते लहे मिथ्या वेरीरे ॥ध०॥ छठीनरक लगें ते जाय ॥ समय मते कहेवायरे ॥ध० ॥ २३ ॥ आऊ बंधविना ऊच्छाहे ॥ फिरी समकित अवगाहेरे ॥ध० ॥ वैमानिकविण आउ न वांधे ॥ कर्म मती मत सांधेरे ॥ध० ॥ २४ ॥ समकित पतित कहे मतवांधे । उत्कृष्टी स्थिति बांधेरे ॥१०॥ भिन्न ग्रंथिने आगम न्याने ॥ स्थिति उत्कर्ष न मानेरे ॥ध० ॥ २५ ॥ इणीपरें भेद मतांतर जाणे ॥ पण संदेह न आणेरे ॥ध० ॥ निःशांकित तुज वयण आराधे ॥ न्यायें तस गुण वाधेरे ॥ध० २६ ॥ ढालचोथी विनयवहोसुखकार अथवा सालिभद्रभोगीरहो एदेशीछे.॥ ॥ दर्शन मोह विनाशथीजी ॥ जेनिर्मल गुणठाण । ते समकित ओघे कयुंजी ॥ ते भवियण हित आणरे ॥ जिन जी तुज आणासु- रंग ॥ मुझ नगमे मिथ्यासंगरे ॥ जि० ॥१॥ ए आंकणी।। मिच्छा दरसण मोहनीजी ॥ उपशमि उपशमजाण ॥ धुरग्रंथी भेदे कांजी ।। उपशमश्रेणी प्रमाणरे ॥ जि० ।। २ ।। नाश उदीरण मिच्छनोजी ।। अनुदीरण समठाम ॥ क्षयउपशमथी उपजेजी ॥ क्षयोपशमिका नाम रे ॥ जि० ॥३॥ त्रिविधि मोह विनासथीजी ।। त्रीजुंक्षायिकनाम क्षपकश्रेणी चढतांहुएजी ॥ जेहथी शिवपुर ठामरे । जि० ॥ ४ ॥ विपाक प्रदेश वेढवुजी ॥ द्विविध उदय विष्कंभ ॥ उपशमतुं तेहने कहेजी ।। आगममां थिरथंभरे ॥ जि० ॥५॥ नाश विपाकोदय यकी जी ।। वेदन तेह-रे नाम ।। उपशमि ते नवि संभवेजी ।। क्षा- योपामिक ठामरे ॥ जि० ॥ ६ ॥ मिस्ण पदस वेदराजी ॥ द अनुद विहा दोय ॥ सिपाक मवेशोदय यकीनी ॥ मनुनम सममी जोपरे ॥ जि० ॥ ७ ॥ मण पर दुग मिष्ठा वणाजी ॥ ज सपा- वीरे शेप ॥ वदन सपा विहांजी ।। मतिम पुनस होयर ॥ मि० ॥८॥ स पेदन वने कामी ॥ वेदक पोपुर नाम ॥ उपत्रम बमा पांचमी ।। सासादन गुण पामर । जि० ॥९॥ अवरमा रख एकनी मी।। उपशम स्थिति उषेस । उत्कप पर आपली भी ।। नपन्य समय होय शेपरे जि०॥१०॥ मशुद्धपम नापा वणीनी ।। इच्छायें तिहां वास । मण पसाय उदये हुयेमी पापी सपथम नाथरे ॥ जि० ॥११॥ उपशमयी परवामकामी॥न गयो मिछा रे भाव ॥ वापत सासादन कमी ।। उपक्षम स्वाद सहावर ॥ निक ॥ १२ ॥ अंतरमहरत कालनीमी ॥ उपशम स्थिति गुणलाण ।। सासादन पट मानसीमी ॥दक समय ममाणरे ॥ मि० ॥१॥ स्पिप्ति सागर वेत्रीसनीनी ॥ साधिक क्षायक जाण ॥ममणी स्थिति पापी कहीनी ॥ क्षायोपामिक गर । मि० ॥१५॥ उपशम सासादन कमी ।। आमव बेल्गर पंच ।। पदक एक पेसा इसेमी ॥ तिमहिम सायक संचर ॥ नि० ॥१५॥पार मर्मस्स उस्मर्पयामी सायोपशमिम पाप ॥ ये तस गुणगणा महुमी ॥ समिलनो सह कोपरे । मि० ॥ १६ ॥ उपभम मागुण ठाणमामी, मषित गुण पदरस । सापक गुणठाणे सपेमी ॥ मादिम प्रणरिमशेपर ।। त्रि. ! १७ मरिरवि गुणगणा यामी ।। भापत सत्तम ठाण || एक पदफ पीज हामी ॥ क्षायोपामिफ माणर || नि० ॥१८॥सा- ५७ सादन सासादनेजी ॥ भाखे अंग उवंग || न्याये शिवसुख ते लहे जी ।। जशतुज आण अभंगरे ॥ जि० ॥ १९ ॥ । , ॥ ढाल पांचमी शांतिसुधारस कुंडमां तुंरमे मुनिवर ए देशी. ।। धन धन शासन ताहरूं । माहरूं जिहांमन लीनरे।। क्षण पण तसविण नविरहे ॥ जिमजल भर विण मीनरे ॥ धन० ॥१॥.देश विरति दरशणथकी । पलिय, पहुत्तमां जाणिरे । अनुक्रमे चरण- श्रेणीविहुं ॥ संख्यसायर गुण खाणिरे ॥ धन० ॥२॥ तेहिज भवें हुए तेहने । जेहनेसत्तगखीणरे ॥ चउतियभव उत्कर्पथी। पुव्ववद्धा उये पीणरे ॥ धन० ॥३॥ वद्धायु सुर नगरनुं । तेहने तियभव तंतरे ॥ आउ असंख्यनर तिरितणु ॥ तसपण चउभा अंतरे । धन ॥ ४ ॥ समकित स्थितिहोए ओगथी। अंतरमूहूरत एकरे॥ साहिय खओवसमासिरी ॥ सायर छासहि छेकरे ॥ धन० ॥ ५॥ इग अ- थवा बहु आसरी ॥ दरसणनो उपयोगरे । जघन्य उत्कृष्ट थकी कह्यो । अंतरमृरत भोगरे । धन० ॥ ६॥ दरसणलब्धि शुभ सुर- लता ॥ क्षयोपशमादिक रूपरे ॥ अंतरमूहुरत माननी॥ जघन्यथी कहेजिनभूपरे ॥ धन० ॥ ७ ॥ छासठ सायर सविमली ॥ नरभव हिय उतकृष्टरे । तेहथी उर्द्ध जो नविदिए । समकित रयणने पृष्टरे ॥ धन० ॥ ८॥ ने निश्चय शिवपदलहे ॥ ए एकजीवने योगरे ।। जीवनानाश्रित सर्वदा ।। दरसणनो उपयोगरे ॥ धन० ॥ ९॥ अंत- रमुहुरत एकनुं ॥ जघन्य अंतरमन आणरे ॥ अर्द्ध पुद्गल परावर्तनं । यस उत्कृष्ट परिमाणरे ॥ पन० ॥१०॥ीन नानाभिव नदि झए । समफिस मंतर लेभर ॥ सत्र मापश्पक सचिमा ।। ए अमि- कार रिशेपर ॥ मन० ॥११॥ दरिष सहन उपदेभयो । उपभम प्रमुल ने पंचरे ॥ आप निसग रुप मेदयी ॥ दविष वस परपंचरे । पन० ॥ १२ ॥ निसगुपएस माणा ।। सुप पीया ममिरा मरे । अभिगमा मोग किरियाई ।। संक्षेप धम्म ए नामरे । पन० ॥ १३ ।। गुरुउपदेचविण सहेमपी । मिनापणे परवीतरे ॥हने तेने जाणमो ॥ मयम निसर्ग रुचि रीतरे ॥ घन०॥१४॥सपि गुरुवपदेशची ॥ सारे गण मापरे ॥ते उपदेशषि नर फमो । इम तुम आगम यापरे ॥पन० ॥ १५॥ कारण प्रमुख अमाणको ॥ मन मिन मागम सेमर ॥ साय आपरुषि तुफो । माल तूपा- दिक परे । पन० ॥ १६ ॥ त्र मणतो समकिवलो।।मसम प्रसन्न परिणामरे ॥ गोविंद पापफनीपरे ॥ सुचई सनामरे ॥ मन० ॥ १७ ॥ देशर्ष समोरसमयी ॥सवर्ष पिस्तारिरे । चद- कमा पेसरिंदुपरे । पीया भगवारिरे ॥ धनः ॥ १८ ॥ मभिगम सुमनाणने ॥ भरपयफी मगाइरे। अंगपान मस्त ॥ शाम सम्वनिरबारे ॥ ॥ पन० ॥ १९ ॥ दम्पना मात्र माम्पामिणे ॥ सर्व प्रमाणे मसेसरे ॥ सर्वनयेषिम घसकर्ष । पिम्छारा मकसे भर ॥पन० ॥ २० ॥ देशणनाण चारित पनी ॥ विमदिन यो तम कामरे । मुमवि गुपविकिरियारपे ॥ वेकिरिया गनामरे ॥ धन० ॥ २१ ॥ आगम कोमिद मपीहुए ॥मय विपि पुचरे ॥ सते पर्म तेरने क४॥ निमधिमाविप पुंचरे ॥ पन० ॥ २२ ॥ पम्म
५९.
अधम्म प्रमुख दव्य ॥ चरण सुय धम्मना भेदरे ॥ जेजिन भापित
सदहे ॥ तेधम्मरुई निरवेदरे । धन० ॥ २३ ॥ एदशविध दरशण
कह्यु, उत्तराध्ययनमजाररे । अध्ययने अडवीसमें ॥न्याय सागर
सुखकाररे ॥ धन० ॥ २४ ॥
ढालछठी माइ धन्नसुपनतुंदेशी.
जडजलपणपोते सिंच्युकाठनबोले ॥ तससंगतिलोडं तेहनेपण
तसतोले । तेम हुँ गुणहीणो तोपण दास तुमारो ॥ अवगुणउवेखी
प्रभुजी पारउतारो ॥१॥ तुं गुणमणि दरिओ उद्धरिओं जगजेणे ॥
मुजकांइनतारयो तुज संगतिनही तेणे ॥ अलगो तहिविलगो तुंमुझ
दिलथीदेव ॥ अविचलपदआपो॥ढीलतणीसीटेव॥२॥ नहीता मुझ
दावे नहीमुकुंकरुंसोर ॥ जालीदिलभीतर धालीकरसुंजोर ॥ जासो
किम दीधा, विणशिवसुखजिनराज ॥ सहेजे जो देशो तो रहेशे तुम
लाज ॥ ३ ॥ अविनयमुझखमजो हुंछु मूढअयाण ॥ करतांनविआवे
वीनतडीजिनभाण ॥ वालक जेमबोले कालोगहिलोवोल ॥ तेमात
पितामन, लागे, अमृततोल ॥ ४ ॥ इणिपरे प्रभुस्तविओ समकित
लेशविचारे ॥ आगमअनुसारे मुझमतिने अनुहारे ।। संवतरुतुरसमुनि
चंद्रसंवत्सरजाणी ॥ १७६६ ॥ भादरवेमासे सीतपंचमीगुणखाणि ।।
॥ ५॥ श्रीतपगच्छनायक श्रीविजयरत्नमूरिंद ॥ सुरगुरुजश आगले
करजोडेमतिमंद ॥ तसराजेपंडित उच्चमसागरसीस ।। कहेन्यायसागर
प्रभु पूरोसंघजगीस ॥६॥
अथ श्री पडित उत्तम विययजीकृत संयम श्रेणीनु स्तवन ॥राल परेसी मथम गोंगासावणेमवेमी एवेशी ॥ फेवल मान दिमाफरुनी ॥ सिद्ध पुद मुस्खदाप । माक्म सपद मोंगपेजी ।। पर्दमान निनराय ॥ गुणोदपि शासन नायक पीर । मेरु महिमर पीर ।। गुणो० ॥ भास० ॥१॥ एमाकणी ॥ मनुममि संयप फरसतोनी ॥ पाम्पो धायक भाव ॥ संयमभेणी फुलरेगी । पई पद निपाव ॥ गु० ॥२॥ पाचक नवनिमय रच्योमी । संसपें सजाय ॥ विस्वरि मिन गुण गावांमी ॥मीहा पापन याय ॥ गु० ॥ ३ ॥ पारकपॉप स्वय उपचमेगी ।। सरव निरविगुणठाण ॥ तेना आदिम गणमांमी । पर्यगर्नु परिमाण ॥ गु० ॥४॥सर- वाकाल मदेशपीनी ॥ मर्नेव गुणा अरिमाग ।। पूरवकल्पना मान्य- मामी ।। मासे तुं महा माग ।। गु० ॥५॥ माग अनते माविधीमी ॥पीपे ठाणे सदि ॥इम अनत मागुचरेमी ॥वानकनिहोय सिदि ॥ मु० ॥६॥ अंगुस माग मसंस्लमांमी ।। बेमाकाश मदेश ॥ खेवा पानक नीपबेमी ॥ करफ वास निोस । गु० ॥७॥पीमा कर ठाणमामी ॥ मादि असम्पांस माम ।। वदनवर व भागनामी ॥ पानक काक माण ॥ गु.॥८॥ इम नंव माग दिनेमी ।। पाक करक मध्य ॥ ठाम मसम्यांस दिनामी ॥रक माने सद ॥ गु० ॥९॥ मागेनत मागनाभी । पानक फरक माद ,
६१
॥ तदनंतर संख्य भागनुंजी ॥ थानक एक विख्यात |गु० ॥१०॥
ते ऊपर द्वय द्धिनाजी ॥ जेता ठाण अतीत ॥ ते कीधे संख्यभाग-
मुंजी ॥ वीज्युं ठाण पवित्त । गु० ॥ ११ ॥ इम वृद्धि द्वय अंतरेजी
॥ कंडक माने इछ । अंससँख्यातें वृद्धिनाजी । थानकजिनवर पुछ
॥ गु० ॥ १२ ॥ वलि पूरव द्वय वृद्धिनाजी॥ थानक सरव करेह ।।
आगल गुण संख्यातनुंजी ॥थानक एक धरेह ।। गु० ॥ १३ ॥
इम त्रिक वृद्धिने अंतरेजी ॥ गुण संख्यातना ठाण ॥ कंडक माने
नीपजेजी ॥ जाणे तुं वर नाण ॥ गु० ॥ १४॥ पुनरपि त्रिक दृद्धी
तणाजी ॥ पूरी थानक सर्व ॥ असंख्यात गुण वृद्धिनुजी । थानक
एक अगर्व ।। गु० ॥ १५ ॥ चउरंतर चउरंतरेंजी ॥ थानक कंडक
मेय ॥ असंख्यात गुण वृद्धिनाजी ॥ पंडीत वीर्य वरेय ॥२०॥१६॥
उपर वली चउ वृद्धिनाजी ।। फरसे थानक सार ॥ तदनंतरनंत गुण
नुंजी ॥ थानक एक उदार ॥ गु० ॥ १७ ॥ पंच पंच वुढी विजी
।। ठाण एक इक जोय ॥ इम अनंत गुण वुडिनाजी ॥ कंडक माने
होय ।। गु० ॥ १८ ॥ उपर वली पंच वृद्धिनाजी ।। फरसे संयम
ठाण ॥ प्रवचन अनुसारें काजी ॥ पट थानक परिमाण ।। गु०
॥ १९ ॥ असंख्य लोकाकाशनाजी ॥ प्रदेश ने परिमाण ॥ इक पट
थानक ऊपरजी ॥ ऊठे वलि पट ठाण ॥ गु० ॥ २०॥ ए संयम
गुण ठाणमांजी ।। जे वरते मुनि सोय ॥ वंद्य अपर भजनापणेजी ।।
भाष्यकल्पमा जोय ॥ गु० ॥ २१ ॥ पट थानक संयम तणाजी ।।
कहेतां स्तवतां वीर ॥ क्षमाविजय जिन भक्तिथीजी ॥ उत्तम लहे
भव तीर । गु० ॥ २२॥
६२ गस पीमी सुरवीमहीनानीदेशी पस्तु समाव प्रकाशफ भाशिव लोगालोग ।। भीर नगव गुरु मोगो रत्नत्रयीनो मोग ॥ सयमना पट यानिक सक्षम युदि गम्य || स पर विलोपन हेसे या यंत्र सुरम्प ॥१॥ माग भनंतर दिना गण करफ सार ।। छे पयपि वे असल्याव ठई तस बिंदु पार ।। मसंरूप माग रदिनु यानफ मागस एफ ॥ सस गमें उसु एको मन परी भविदि विवेफ ॥ २ ॥ पर पर विंदु भंवर इम होप एकाचार ॥ वदनवर पर विंदु सपना बीस चदार ॥ मागस भाग सम्पावर हदिनो वीमो माण ॥ इस पर पिया ठपको मींग शत परिमाण ॥३॥ पर पीमा वीस एका मींग सत समुदाय ॥ भागनी सदि माहे पां वे गुण दि कहाय ॥ संस्म्यात गुणनी पबिमा वीमो आदि उदार ॥ इम सरि मीर्ग का पिप ठमि विमा पार॥४॥ पीस बीमा भत एका पण सय विंदु मान ॥ संस्म्याव गुण पदि मो पोको धुरि मंगण ।। इस पर पोका माणतां कि बीस कि शव जोय ॥ पण सप एका मींदा पंसपीससे होय ॥५॥ पेस- नंव गुण पदि पदे उनि पंधक पंग ॥ पुनरपि पूरम रीते मी अक सुरंग ॥ दिनार परी पंचक इस पंप पर मग पाय || मार्गे पण पंचपीससे मीगं अंक फराय ॥ ६॥ पापरा पोगदा प्रगम पगरा एफा पिंदु ॥ पट वानका संपनी संसया को मिनपं ।। पर पीस सय पगसय पंच पीस सप सार ॥ मंका मीरा गमती साता पारानार ॥ ७॥ संपम भेणिमा भेणि लपक सरिमा प्यान ॥
६३ पाती करमनो क्षयकरी पाम्यो पंचम ज्ञान ॥ प्रवचनसारनी वृत्तिमा यंत्रनी ठवणादीठ ॥ क्षमाविजय जिन वयणथी उत्तम चित्त पविठ॥८॥ ढाल त्रीजी एकवीसानी देशी. आतम रामीरे, शिव विसरामी नित्यनमु ॥ प्रभुजी स्तवतारे पाप पोताना निगनु । पटथानिकरे जे अह ठाण परूपणा ।। सुणो सपणारे वयणा कल्पनी भाप्यना ॥१॥ त्रूटकः-आदि असंख अंस वृद्धिथी कहो । माग अनंत अंस केटलां ॥ हेठथानिक एम पूछत । कइयें कंडक जेतलां ॥ भाग संख्या तह गुण संख्याते अ- संख अनंतह गुण वली ॥ तस प्रथमथी कहे अब अनंतर ॥ कंडक माने केवली ॥ २॥ इत्यनंतरमार्गणा एकांतररे मार्गणा सुणो सवि संतरे ॥ भाग संख्यातेरे मूल थानक्थी तंतरे ॥ हेठे थानिकरे भाग अनंतना भाखीये ॥ एककंडकरे कंडक वर्गते दाखीये ॥३॥ त्रूटक ॥ दाखीये गुण संख्यातथी वली ।। असंख अनंत गुणथी तथा । पढम ठाणथी एक अंतर ॥ कंडक वर्ग कंडक यथा ॥ इति एकांतर मार्गणा ।। एक अंतर मार्गणा कही ।। सुणो यंतर मार्गणा ॥ संख्यात गुणथी हेठथानक अनंत भागना सुभमना ॥ ४ ॥ कंडक घनरे, कंडक वर्ग दु, गुणो करो ॥ एक कंडकरे तस संख्या मनमां धरो॥ दुग अंतररे असंख्य अनंत गुणथी लह्यां ॥ अथ स्थानकरे पूरव परें जाणो कह्यां ॥५॥ इति द्विकांतरमार्गणा त्रूटकः-त्रिके अंतर कोई पूछे ।। आदि असंख्य गुण वृद्धिथी । हे भाग अनंत केरां ॥ ठाण कहो गुरु वयणथी ॥ कंडक वर्ग, वर्ग कीजे ॥ कंडक घन त्रिक उपरें ॥ कंटक मर्ग त्रिक एक रफ ॥ रोए ते मनमा परे ॥ ६ ॥ छठी दिनार परेला ठाणथी इठलां ॥ पीय सदिनार मानक प्रमपेतला ॥ इवि त्रिकांवर मार्गणा, परंतररे अनवगुणा दिम ठाणयी । हेट वानकरे भाग मर्नस ना मानयी ॥ ७ ॥ यूक, परिमाणयी ते अष्ट कंडफ ॥ पर्गमा पर घना ॥ पार कंडक वर्ग भागल || एफ फरक सोमना ।। इति चतुरंतर मार्गणा, पर्यनसाननी मार्गणा ते ॥ पर यानि पूर करे ॥ मूलथी संयम ठाण फरसी ॥ पीर विम् फेमल परे ॥ ८ ॥ उपर मध्ययीर संयम पानिक पे मजे ॥ नियमार हेठ पतरी पुनरपी समे ॥ मवर्मुहर्चनीरे ही शनि ठाणमा रोय सनि नेर मानीदेखे गानमः ॥ ९ ॥ ॥ मप्पबहुम विधार परवा अनव गुणना पोटला ॥ तेहयी गुणा सस्य केरा ॥ फाफ नर्ग पंडम मला ।। पच्गनुपूर्षि हि उत्तर पान्यायें भारी ।। क्षमाषिमय जिन परण उचम भक्तिमारे पापीये ॥ १०॥ राल चोयी रागपन्याश्री फलसरूप गायो गायोर मने पीर भगवगुरू गायो॥ एवणीछे संयम भेणी थानक पदविषठपणा यंत्र पनायो । माठाण पल्पण परता ॥ मनुम जनम फ्स पायोर ।। भले० ॥ १ ॥ सुर निरंमन अल्ब अगोचर ।। एहिम साध्य मुरायो । मानक्रिया अपसंपी फ रसो॥ अनुमर सिदि उपापोर ॥ मले० ॥२॥श्रदा मान मर्या छ तोपण । जोनपि नाप पमायो॥ध्य तरु उपमवे पामे ॥ संयम ठाणमो नायोर मल० ॥३॥ मम खर पंदन मारनो गाइक ।
६५ भारनो भागी कहायो । तिनिपरें ज्ञानी संयम हीनो ॥ सदगतीये नविजायोरे ॥ भले०॥४॥ आश्रव त्यागें संवर परिणति ।। अवि- रति सरव उठायो । स्व स्वरूपमां थिरता तेहिज ॥ संयम शुद्ध ठहरायोरे ।। भले० ॥ ५ ।। अनुभव सुरतरु फलने काजे । कीजें आत्म अमायो॥ सन मुखभावे जेह प्रवर्तन ॥ तेह निवर्त निदायोरे ।। भले० ॥ ६ ज्ञानक्रिया दुग चक्रे शोभित ॥ संयम रथ सुखदायो ॥ अनुभव धोरी युत शिव नगरे ॥ जाता विघ्ननथायोरे ॥ भले. ॥ ७ ॥ रायसिद्धारथ वंश विभूपण ॥ तिसलाराणीजायो । अजअ- जरामर सहेजानंदी ॥ ध्यान भूवनमां ध्यायोरे ॥ भले०॥८॥ संवत नंद निधि मुनि चंद्रे ।। देव दयाकर पायो ॥ प्रथम जिनेसर पारण दिवशे ।। स्तवना कलश चढायोरे ।। भले० ॥ ९ ॥ विजयदेवसूरीस पटोधर ।। विजयसिंह सवायो ॥ सत्यशिष्याधार कपूरविजयबुध । क्षमाविजय पुण्य पायोरे ।। भले० ॥ १० ॥ सरतमांहे सूरय मंडण ॥ श्रीजिन विजय पसायो ॥ विजयदयामूरिराजे जगपति ॥ उत्तम विजय मल्हायोरे ॥ भले० ॥११॥ अथ श्रीतारंगगिरितीर्थमंडन श्रीअजितनाथजिन स्तवन- ढाल १ ली. राग-मेडी उपर मेह झरोखे वीजळी हो लाल-ए देशी. आणंद अधिक उच्छाह धरी दिलमां घणो हो लाल धरो० बहुदिननो उमाह सफळ थयो मुझतणो हो लाल सफळ० ॥ १॥ भवतारण तारंग अचल जव निरखीओ हो लाल अचल.
भपवारण तारंग अपस मब निरसीमो मो लाल मस
दीयां देग विसास परी पण रस्सिमो दो साल परी० ॥२॥
देर कलस अभिराम भनार्स सोइतो दो लास नमा०
गगनभु मारे भाव मासाद मन मोइतो सात मासाद० ॥ ३ ॥
मारपासनरिंद परममावक कयों हो लास परम०
मन्य पप मिमीद गे नृप उदयों को सासणे ॥४॥
तेणे कीयो इमारमिहार नामे ऐपस मसमे दो साल नामे०
महीयसमाहि भयंत माणे त्रिमपनविसो हो सास मागे० ॥ ५ ॥
भेग मनिवमिणंद गमांक मनोहर हो सास गमाक०
विजयामात मसार सोमागी संदरू हो सास सोमागी० ॥ ६ ॥
पटनुनी बनरामि पिरापे पहुपरे हो सास मिराले०
कोरिषिला निहां दीठे मषिमन मन हरे हो सास भवि०॥७॥
सारणदेवीनाम मछे रसपासिका दो साल म.
ए गिरिनी मनोहार मषिक मुसदापिका हो सास भरिक० ॥ ८॥
पार पाणे परी परमविएस निकदीये हो मात्र दुस०
मेटी ममिवमिनंद सदा आणदीपेरो सास सदा० ॥९॥
खोरण पम सत्ता केमरनी कोरगी दो सास केगरनी०
पूवव्यस मनूप सोमा मविग्गणी हो सास पोमा० ॥ १० ॥
सिदाबससम पर मानंदपुर पासपी हो सास मानद
सफल करो अपवार सदर्शनासपी से सास सुदर्षन० ॥ ११ ॥
६७ - 4 . . ढाळ २ जी. राग-नणदलनी देशी. साहिव अजितजिणंद अवधारीये, दासतणी अरदास हो; सा० श्रीतारणगिरिमंडणो, महीमां महिमनिवास हो ॥सा॥१२॥ सा० गुण अनंत छे ताहरे, तो को न दिओ एक हो; सा० तिणगुणथी तुझने मिल्यो, भक्तितणे सुविवेक हो । सा०॥१३॥ सा० रयणायर एक रयणडे, देतां न होय हाणि हो; सा. तिणे नाशे लोकनी आपदा, वाधे सुजसनी वाणी हो।।सा०॥१४॥ सा० सुनजरथी होइ, सेवक शुद्ध सुवोध हो; सा० तरणिप्रभा पण दुरथी, करे कमलाकरबोध हो ॥सा०॥१५॥ सा० गिरुआ गुणवंता जिके, होय ते समभाव हो; सा० न्हानां म्होटां नचि गणे, सविने तारे नाव हो ।सान॥१६॥ सा हाथे दोय कुसुमांजली, वासे वाम अवाम हो; सा० चंद्रज्योति सघळे समी, उंच नीच गुणधाम हो सा०॥१७॥ सा० मेह महीतले वरसतां, न गणे ठाम कुठाम हो; सा० चंदन निजवासे करी, तरुवर परिमल धाम हो ॥सा॥१८॥ सा० फलदल जाया वहु करे, पंथीजन विश्राम हो; सा. वाटे जे सुरतरु फळ्या, उपगारी गुणधाम-हों सा०॥१९॥ सा० न्हाना सामु विशेष जे, साहिवने चित्त होय हो; सा० निर्णण पण गुणवंत ते, लोक कहे सहुकोय हों ॥सा०॥२०॥ सा इम जाणीने तारीये, वीनतडी दिल आण हो; . N ६८ सा० मापी लाग्या पारसे, वेरने की करो ताण से सा॥२१॥ सा० लोचन के साइरे, वरीया सेपक लाल हो; सा- को वेणे श्यं आपीयं, ते पस समने दास द्रो सा ||२२॥ सा० विच परश्यो वो प्रशो, ए नियमहारान हो; सा सेक्क पण सुखीयो होये, पपक्षे साहिम काम हो ।सा०॥२३॥ सामानविमस वेजे पपे, प्रमुवामंदरी साय हो। सा० मरेर परीने मानीये, पीनतमी भगनाप हो ॥सा०॥२४॥ फसन - . भवनांक्विारण भगतारण, तारगगिरिवरमरणो, भीअमिवनिनपर नामदिणपर, दुरिवतिमिरवितरणो; पतीस भक्षिय रयण मणिगण, मवमवण रयणापरो, भीमानविमलप्रीदनदित, सकसमंगल सुरंफरो ॥२५॥ भय श्रीराणकपुरतीर्थर्नु स्तवन सन १सी राग-दंगरपारु-ए पेधी मासमे मणमी प्रेमभु रे सास, गारं अपममिणवरे, मनमोहन मारा सफस मनोरप माहरोर लाल, पठस्पो अंगे माणदरे मन मा १ विसमनतिलक सोहामणो से लाल, मोटो शवि प्रासाद र मन० समस उंचपणे करी रे सास, कर गगनई मादरे मन (HIRI
६९
सिद्धनिलयने पहोंचवा रे लाल, उभाग्यो मार्नु थंभ रे गन०
जोतां वृप्ति न पामीये रे लाल, छुटीजे भवदंभरे मन० ॥प्रह.॥३॥
नलिनीगुल्मविमाननी रे लाल, मांडणी एह अचंभरे मन०
पूतळी मिसे मानु आवीने रे लाल, जोवाथिर थई रंभरे मन.॥प्रह.४॥
मोटो देश मेवाड छे हो लाल, जिहां राणिकपुर अभिराम रे मन
पोरवाड तिहां परगडोरे लाल, धन्नोशा जस नामरे मन. मह.॥५॥
धन्य धानलदे तेहनीरे लाल, तरुणी पुण्यप्रधान रे मन०
धर्मकारज करी मोटिकारे लाल,अविचल राख्यु नाम रे मन.॥प्रह.॥६
अहमूपोसहे आदरी रे लाल, धरतां धर्मनुं ध्यान रे मन०
सुधर्मवासी सुर कहेरे लाल, वांछित देउं दानरे मन. मह.॥७॥
वर माग्यो देवलतणोरे लाल, अनोपम अतिहि उद्दाम रे मन०
पट्ट आलेखी आपीयोरे लाल, सुरविमान उपमान रे मन.पह.॥८॥
देपा शिलावटने दियोरे लाल, कोरणी वितथ न होय रे मन०
पत्थरखाण कही तिहां रे लाल, विघन नहि ईहां कोयरे मन.पह.॥९
ढाळ २ जी.
राग-कोइ लो पर्वत धुंधलो रे लोल-ए देशी.
संवत चौदपंचाणुमां रे लोल, शुभमुहूरते शुभवाररे जिणंदराय.
-मोटे मंडाणे मंडावीयो रे लोल, धरणे ऋषभविहार रे जिणंदराथ.
॥ आवो आवो श्रीजिन बंदीयेरे लोल ॥ १० ॥ आंचली०॥
भ्रह्मांड माडी मांडणी रे लोल, कीधां वळी पंचमेर रे जिणंद०
प्रौढो प्राकार चिहुं दिशेरे लोल, मार्नु मोइने करवा जेररे जिणंद०
॥ आवो० ॥११॥
--
दारी पोराधी दीपवीरे सोल, पिटु दिशे पोळसे पाररे निर्णद
सस्सयोराधीयोनिमे रे खोल, मार्नु चौगभ्रमण निवाररे मिणंद०
॥मापो० ॥ १२ ॥
समय शिर यांमा मसारे लोड, पौदसयां धोमीश रे मिणद
सोरणमोलि सोहामणीरे लोल, एक एक दिने पत्रीसरे मिर्णद.
॥ मायो० ॥ १२ ॥
निविषमकारे कोरणी रे सोस, पूक्ली गणीय न भाप रे निर्णद.
मंडप पार पिदिशेरे लोस रगर्मटप सुखदाय रे निणद.
॥आपो० ॥ १४॥
सासकट तेमा सोहीये रे लोप्स, अष्टापद मविपिपरे मिद
नानिपिपरे नव भारी र सोल, विहां अनेकमिनपिर मिणंद.
॥मानो० ॥१५॥
रापणळे महपादुफा र लोस, मानु दिई ममि उचगर निर्णद.
॥ मानो० ॥१६॥
स्वर्गे धावत देहरी रे सोस, विम पापीतळ पा र मिर्गद०
ए समबरणे माणीये र लोस, तेहपो न दीगे कोपर मिणद.
|| मागो० ॥१७॥
साल भी
राग-पोरणीमा-ए देशी
संभव पौत्सवाणुए रे, शुसि पंपमी शुभ योग,
मासचालवणी मसी रे, माणी महुपिप रंग रे
॥ भीमिन सेवीये ॥१८॥
७१
सुविहिततपगच्छ यतिपति रे, श्रीसोमसुंदरसूरि
करे प्रतिष्टा अतिभली जिते मंगलतूर रे ॥ श्री० ॥ १९ ।।
मूळनायक श्रीऋषभजी रे, चउमुख थापे रे तेह;
समवसरणनी थापना रे, चउगतिवारक तेह रे ॥ श्री० ॥ २० ॥
परिकरयुत त्रिहुं भूमिका रे, त्रिभुवननो उद्धार;
चउवीससहसने माजनेरे, विवप्रतिष्ठा तेणीवाररे । श्री० ॥ २१ ॥
नाटक विविधप्रकारनां रे, ओछय अतिघणा थाय;
संघ आवे दशदिशितणा रे, भेटी पावन थाय रे ॥ श्री० ॥ २२ ॥
अचल हुओ अवनीतळे रे, तीरथ महिमावंत,
धरणविहार मनोहरुरे, जस गुणनो नहि अंतरे ॥ श्री० ॥ २३ ॥
आजलगे तेह चैत्यनी रे, पूजा भक्ति विशेष;
दिन दिन थाये दीपती रे, थापे पुण्यनी रेख रे ।। श्री० ॥ २४ ॥
चिहुं दिशना संध सामटा रे, जो आवे समवार;
पण संकटता नवि हुवेरे, एहवो चैत्यविस्ताररे ॥ श्री० ॥ २५ ॥
शाश्वत चैत्य ते सांभरे रे, दीठे हणि प्रासाद,
जन्म सफल तेहनो हुवेरे, नाशे सवि विषवाद रे ॥ श्री० ॥२६॥
चार प्रासाद पासे अछे रे, पुण्यतणा ते ठाम
आजलगे थाता अछे रे. विवपासादना काम रे ।। श्री० ॥ २७ ॥
तेहर्नु ध्यान सदा धरे रे, समकित निर्मळ थाय;
ज्ञानविमल सुखसंपदा रे, पामे सुजस सवाय रे ॥ श्री० ॥ २८ ॥
७२। -- अय श्रीजिनपूजाविधिनुं स्तवन दुदा भीमिनरदननिपासिनी, समरी शारदमाय; पंचममंग पुरे भणी, मामीलीपी कामाप ॥१॥ देशविरतिनी मांरणी, होरसमकित शुला मिनमायी योग शुभ, पाप निर्मल पुन ॥ २ ॥ वा १ली. मणमिय पासमिणंट पाप, पमण भाविपि, प्रथम मविकमन भावशू, ए मोर भूमि वद ।। अत्यम मालन दुर्गपनीय, कुल संगसि वरणे मे मिनमति दीण होय, तेरने पण तरचे ॥३॥ शुमस्थानक नोइ परी, दूपण सपि छरे।' पर पेसर्वा पाममागे, पेरासर महे ।। भूमियकी दोराय वेच, सिंहासन स्पापे, समचोरस संगण मोड, मिम शिपसुख मापे ॥४॥ शुक्र मत्स ने राहु परिप, शूल मपृत ने म्पतिपात लात, इस्पादिक टाळे ॥ शुभमुहूत गुरुभारलय, धुरि कसम्म पराये; मोच्छवा मिनराज सिंच, परमा पपराये ॥4॥ सारा राशि नक्षत्र योनि, गण नाटीयर्ग, मिपते नामे मापणे, होप जे मिनरंग । योगिनी काल ७३ - चैत्रमासे होइ शोक रोग, जेठे धन हाणि; आषाढे तिम भाद्रमासे, होय शूनुं ठाण, ॥६॥ आश्विन कार्तिक मास होय, क्लेशादिक दुःख, माघे भय होय अग्निनो, मागशरे धन सुख ॥ श्रावण ने वैशाख पोप, फागुण सुखकार; ए मासे जिनराजविंव, ठवतां जयजयकार. ॥ ७॥ दीपोत्सव विजयादि दिवस, जेह लोकमधान, तिण दिवसे पण थापना, कीजे सावधान ॥ काष्टलेप पाषाण चित्र, लोह दंतनी दाखी; देरासरे मूलविव ते. स्थापन नवि राखी ॥८॥ अंगोपांगे हीन होय, खंडित विणपरिकरे नासिका दोषे दुष्ट जेह, नवि तेह देरासरे । पूरवे चौपद नाश होय, इशाने भमता; अग्निकुणे भय अग्निनो, वायुऋणे संचित ॥९॥ नैऋते निर्धन कार जाणी, उत्तरे होय हाणि; जिनवर सन्मुख टाळवी, दिशि विदिशि प्रमाण ॥ दक्षिण पश्चिम सन्मुखे, जिनवर बिंब स्थापे; सुख संपत्ति संतान सुख, जगमां जस व्यापे ॥ १० ॥ वास्तुकशास्र प्रमाण जाण, वकवटतपयंत्र; ग्रंथ विवेकविलास देखी, तिम स्थापन मंत्र ।। शंका कंखा दोष पोष, न धरे मिथ्यात इम देरासर धरे ठवे, धन तेहनी मात ' ॥११॥ , ,
,
एपे मिणविधि पूजा करे, भावक निर्मळभक्ति
संक्षेपि से रिपि कई, जेहनी फेवी शक्ति ॥१२॥
पळ २भी
राग-पत्नमालानी देशी
प्रथम पूरणदिवे महमा उपरदिशे, सन्मुख स्नान भरि भाषरे ए;
शुद्रनिर्मळनळे तेसमर्थन करे, यवनानु नीर विहां पावरे ५ ॥१३॥
फे दिये किसी भक्ति मनमा पञ्ची, मेसी परनासिप पामठे ए;
पोतिक पहेरीने भीवयतना होइ, विमपरे स्नानजल परतवेए.॥१४॥
परणे पालडी ठये मुखे जिनगुण स्तवे, निर्मल पोतिक परियोए;
एकपर निर्मळ उचरासंगनु, माठपरकोश से भारतो ५ ॥१५॥
पस दोय मिनार पुनतां नर परे, नारीने मन प्रण दासीये ए;
नारी नरनसनो पासो नवि करे, तान जिनमक्तिच रासीयेए १६
पन एप काय पन पसने समिका, पूना पगरण अदि सावनी ए,
सापपे पाचवे पठिन निर्मने, मविप्नन सिदिसापन मणीए॥१७॥
सिपिपकी पंदन मोरसीये पसी, मरी पुरि रजवकचोलटीए,
निनपरपिपने पुनणी पुनीने, पण नपे कनफजसकलससेए ॥१८॥
मंगसपणां विहा दोप र परे, पदन पारकी करी करे प;
भुदरमादि मेळपी मेबी, हिंगुस फेशरम्प भरे ए ॥ १९ ॥
वेत नावेम मोगरेस पूमा भनि, अरगमा मपीर तिहां निस्तरेपः
पुरं वचरदिने मुखे मिनपूजयो, मरिफ्नर एणीपरे ममसरेए ॥२०॥
, दक्षिणसन्मुखे मरणनो भय कहे, अग्रिसंतापमय संभवे ए; नैऋते विन्ध संतानसुख पश्चिमे, वायु चोथे ठामे सुत हरे ए ॥२१॥ पूर्वदिशे संपदा उत्तरे फळ बहु, इशाने धर्मनी वासना ए; इणिपरे जाणतो भविकजन पूजतो, छेदतो बंध दुःखपाशनाए।।२२।। चरण अंगुष्टयुग जानुयुग करयुग, अंसयुग मस्तके निलवटी ए; कंठे हृदयस्थळे उदर नाभिमंडळे, अंगे नवतिलक दक्षिणवटीए।॥२३॥ विविधयुक्तं करी भक्तिशुं नवनवी, भातिनी आंगीय विरचिये ए; सातनारक नर तिरिगति नवविध, दुःखटळे जो जिन चरचीए ए॥२४॥ दुहा. तदनंतर जिनवरतणे, कंठे कुसुमचि दाम; गुणसंयुत गुंथी ठवे, करतो भाव प्रणाम ॥२५॥ ढाळ ३ जी. राग-जिनगुण गावे हो नागकुमारी-ए देशी. जिनगळे ठावे हो कुसुमची माळा, जिनगुण गावे हो भावविशाला. । जिन०॥ जिन गुण गावे हो देइ देइ ताला, जिन गुण गावे हो के भावे त्रिकाला, चंपक केतक दमणो मरुओ जाइ जुइवाला; नाग पुन्नागप्रियंगु अशोक, मोगर मालतीमाला ॥ जि० ॥२६॥ कृष्णागरु कस्तुरी अंबर, कुंदरुष्क घनसारा; तुरुष्क सेलारस वाती सुंदर, धूप घटी विस्तारो ॥ जि० ॥२७॥ -
निम मिम धूप रो सिम धुरंगवि, दोहग दुर्मति नाशे,
भूप वांग फेरैचों मपिने, परिषलपाप पणासे ॥ जि० ॥२८॥
सोकालोकमकाशक दीपक, तुं मिन इम को दीगो
दीपकपूमा करसो मपिमन, तुम परे ते पिरमीयो । मि० ॥२९॥
अण पुम करी इणिपरे मांगे, मिनमारग अनुसरतो;
दर्शन शान पारित्र प्रण आपो, मलवपूमा करवो । मि० ॥३०॥
स्वर्गादिक फस मिनमाना, तेह भणी फळ रोपे
भीफल पुगीफळ नागादिक, परभव दुरसी न हो ॥ नि० ॥३१॥
पिविष मसरी नैवेपमा, करतो मने इम राखे।
विषमुल मुखडसी मर मापो, जिम मविपाक पाखे ॥जि०॥३२॥
दक्षिणदिवे प्रतिमाने दीरो, मे धूप करीने
फस नैवेपादिक जिनसन्मम्म, भूपण मिनकरे दीये ॥ मि० ॥३॥
साठ नव प्रण कर गुरु मम्मिम, अघन्य भरमा समे;
भ्यान चैत्पदन नरदाक्षिण, विम बामा धामांगे ॥ नि० ॥ ३४ ॥
पदमपिण पूना नपि दासी, वे की परमाते,
पासपूमा मध्याने सांजे, पप दीप बहुमावे
॥ मि० ॥२५॥
मिनमदक्षिणा दीये मंपिक पे, पण साव एकनीस,
चतगा भ्रमण न होपे दाने, ए फसवीसावीस ॥ नि० ॥ ३६॥
अष्टप्रकारे पे निन पूजे, मष्टकर्म होये दुरे,
भाठ मनता गुण ने पामे, शिपसुस्त होय मर || मि० ॥ ३७ ॥
भएमगल वस परे नित्य होगे, मारमरासिदि पाये।
माठे प्रवधनमावा सुपी, हनी थे जिन गापे ॥ मि० ॥ ३८ ॥
७७ दुहा. जिन पूजता चित्त घरो, एह अवस्था तीन; छद्मस्था ने केवली, सिद्धस्वरुप अदीन ॥ ३९ ॥ ढाळ ४ थी. राग सामेरी-समवसरण सुरवाजा वाजे-ए देशी. छमस्थाना त्रण प्रकार, जन्म राज्य श्रामण्य उदार; भाविजे तिम सार, इंद्र उच्छंगे लिए जिम सुरगिरि; कलश धरी रहे जिणपरे सुरवर, शिर उपरे नीर ठवंत. ॥४०॥ जिणवेलाए कीजे पखाळ, निर्मळनीरे कलश विशाळ; जन्मावस्था (जन्माअवस्था ) सार । चंदन केशरने घनसार, पुष्प चढावे जेणीवार; राज्यावस्था सार ॥ ४१ ।। केशरहित शिर मुख पेखीजे, श्रामण्यावस्था जाणीजे साधुपणुं भावीजे, जिनमुख निरखी रीजे ॥ वीजी अवस्था केवलीकेरी, चउविध सुर रहे जिनने घेरी; वाजे भुंगल भेरी ॥ ४२-॥ प्रातिहारज आठ विराजे, कोडि गमे तिहां वाजां वाजे वयरादिक सवि भाजे॥ रुप्य हेम मणि त्रण गढ सोहे, त्रणभुवननां मनहां मोहे; परखदा दशदोइ वोहे ॥४३॥ बउमुख चउविध धर्म प्रकाशे, वार छन रहे अधर आकाशे चोवीस चामर खास ॥ - . . 7 - उभयपासे केमि पदार, समष्टि सुरमासा पार धर्मपम तिहा पार ॥४४॥ सासमोयणनो पस पिस्वार, पादपीठ सिंहासन सार; भविशय त्रीश ने पार ।। सुर ममरीपाळे तिहां मंग, ममरहमर परे नाटक पंगा " मान अधिक मन रंग ॥ ४५ ॥ सचरमेद मा पूमा की, फेनली मपस्था इम मानी समकिक्नु फल सीधे ॥ 'सिद भवस्था कहीए एइ, पर्यकासन मेग पेह कारस्सग्गे रमा येह ।। ४६ ।। माप या वेम अमने वारी, मष्टकर्मनो छेश निमारो समफिस देइ सुषारो॥ भगचितामणि है मानाय, मंगपांपप हुँ भिमपुर साप; जगगुरु देहि मनाय ॥१७॥ परमपुरुप पर पुरुपोचम, बुरे क्यों 4 मोहमहासम भरणागत मन शरणो॥ ममरममर मर मरिनापी, विम करो समर्ने मुखनिसासी, वो दर तुम सापाशी ।। ४८ ॥ चैस्पन्दन करवा मापीये, गर्मावासे मिम नपि मागीले इगिपरे पिनति की। { संपमे पीररिमस मिनदेव, रिणिपरे पे करे मिननी सेम) नपरेप नितुमेव ॥ १९ ॥ .
७९ . दुहा. जे जिनभक्तिये दुमणो, न धरे जिनशुं नेह; नररुपे ते नारकी, नय कहे तेहनी. देह ॥५०॥ भावसहितभक्तिये करी, नवि कीधी जिनसेव; दासपणुं परभव लहे, नय कहे ते नितुमेव ॥५१॥ डाळ ५ मी. राग आशावरी-नमो रे नमो श्रीशजयगिरिवर-ए देशी. श्रीजिनपूजा विधिशुं कीजे, शिवसुख स्हेजे लीजेरी; जिन तुज मुखमुद्रा निरखंतां, मुज तनमन अतिरीझेरी॥श्री०॥५२॥ पंचवरण वर कुसुमची माला, जे जिनकंठे आरोपेरी; ते नरने शिववनिता वरवा, वरमाळा गळे ओपेरी ।। श्री० ॥ ५३॥ कुसुमकलीनो छेद न कीजे, पत्रभंग नवि कीजेरी; उत्तमस्थानक तरुवरकेरु, उत्तमगंध ग्रहीजेरी ॥ श्री०॥५४॥ कीडे खाई कुवसने बांध्यु, पगे लाग्यु भोंये पडीयुरी; नाभिथकी जे हेटुं धरीयु, तिम शिर उपर चढीमुरी ॥श्री० ॥ ५५ वासी राख्यु लोके फरश्युं, कोयु करथी खलिरी; गंधविहुणु ओणुं दुणुं, अवर देवने माळरी ॥ श्री०॥५६॥ पत्र कुसुम एहवं वरजीजे, पहेरीजे शुभवेशजी%B उज्वलनिर्मळ वस्त्र अखंडित, जेह सुपोत सुपेसजी ॥ श्री० ॥ ५७॥ एणीपेरे विधिशुं जे जिन पूजे, धूजे-पातिक तासजी; नय जिनगुणपूजानो रसीयो, भवेभवे तुमपय दासजी ॥श्री०॥५८॥ - -4
मस्तु
स्नात्र पंदन दीप मस धूप कुसुम नयेय मन पामरे,
पास अक्षव देवदम्पादि वामित्र नाटक गीव पुति
पत्र पत्र फल मविप्रसिद ॥
पसविसूपण भतियां, एम एकवीस मकार;
नप को पूमी विनषा, मिन ! हमने मरमस तार । ५९ ।।
आठ सचर एकनीशनिप, एफशक्ने रळी माठ,
एक सासाठ नपर, पम पूनाविपि पाठ ॥६०॥
रखे मिनपूजा फळ कई, लही अपनी सास;
जिनमतिमा निनसारिसी, ए गणपरनी माख ॥६१ ॥
सठ ६ ही
राग-करसानी देशी
मपिकजन भावणुं जिनपपूमा क्रा, जिम मरोएर भवमलपि सोहिलो
पेपिरवितर्ण फम पर मोटई, मुगुणा सेह नर गणिए पहिस्से
। मपिफ०॥ ६२ ॥
घोपफस देरे नायगा. मन परे, एष्ठ फस उपमे गमम भणीने,
सात मठ घरण सारमो हो मिनपरे, मेहने महमने फल काहीजे
। मषिक० ॥६३ ॥
दसमफल अपये पार दादनमफम,पक्ष(१५)उपपास पल देव दीठे,
मासफल पूना परत फर एणिपर, साल पूमायकी पाप निटे
। मविक ॥६४॥
८१
.
सोगणुं पुण्य जिनविवने पूजता, सहसगुणु चंदने लेप करतां;
लाखगणुं कुसुमची माळ आरोपतां, अनंतगणुं पुण्य नाटक करंतां.
॥ भविक० ।। ६५ ॥
प्रहसमे पूजधी सर्व संकट टळे, मध्यदिने जन्मना पाप नाशे;
संध्यपूजाथकी सात भव पाप सवि, नादपूजाथकी दुःखपणासे.
। भविक० ॥६६॥
नीरपूजाथकी अंगनीरोगता, चंदने सुजश सौभाग्य वाधे;
वस्त्रथी विस्तरे सुतसुतापरिकरा, फळथकी देवताआयु साधे.
॥ भविक० ॥६७ ॥
धूपथी परजले पाप संताप सवि, दीपथी दलिद्रनी कोडि जावे;
अक्षते ज्ञानचारित्रधन संपजे, छुटककुसुमथी राज्य पावे.
॥ भविक० ॥ ६८ ॥
वासपूजाथकी धमनी वासना, नाटके तीर्थपद होय हाथे;
पंचवर्णी कुसुमदाम जे गळे ठवे, शिववधू तेहने ग्रहे वाथे.
॥ भविक० ॥ ६९ ॥
मंगलदीपथी मंगलमालिका, आरतीए अरतिउचाट भांजे;
छत्र चामरथकी भविकजन सहजथी, तेजप्रताप महपूर राजे.
। भविक० ॥ ७० ॥
शान लहे द्रव्धपूजाथकी धन घj, ध्वजथकी सर्वमांहि मान पामे;
जिनप आभरणपूजाथकी भविजना, चक्रवर्त्यादिपद इंद्र पामे.
॥ भविक० ॥ ७१॥
इणीपरे रमते सोषम अगी ममस, जे परे भाषच साम जाणी;
एम पहुफसवती देवपूमा छवी, सकसविधि शाखा पखाणी
।। मापिक० ॥७२॥
भाददिनकस्पनी सूचि मामकरण-प्रमुख बहुप्रयमा मिमि सुणीजे
माणपारुप ससेपयी ए कयो, देमपूजा समये ए मणीचे
॥ मनिफ० ।। ७३ ॥
मतपगरम्परगगनदिनमणिसमो, श्रीमिमयममीद राजे
पटितराय करिषीरबिममसणो, शिप्प नपषिमस को भरिक काणे
। मविक० ॥ ७४ ॥
राळ ७ मी
राग पन्यामी
प्रमो रे भनि माप परीने प्रमो
शिरसुखदाया त्रिभुवननायक, ए सम पेन न दुमोर मवि०॥७५॥
पण रोप नो शिमसुलरी, मो मरमययी धूमो;
यो मकिष्ट वन मन मेठी, श्रीनिनमरपद नो र ।। भवि० ॥७६।।
पभरसचिव चिसदियी, मिथ्यामवरमपुमो;
भीमिनररण गरण करी मानिन, फर्मपविभु प्रसोरामिनि ॥७॥
मोहमियन महिनामाया, नामादि मम ममो;
मिम अपर परमरगा, उपग्निोर मरुशोर ।। ममि० ॥ ७८ ।।
शिरसुससापन मिनबर पुनन, कामगनी पर दुसो,
नप करे ए दिवधीख ममारी, मानी भरि मक्मुिसो र
॥ मपि ॥ ७९ ॥
८३
कलश (दुहा).
चंद्र (१) वेद (४) भोजन (१७)वरिस (१७४१) विजयदशमी बुधवार;
पुजाफल रचना रची, समीशहेर मोझार.
॥८०॥
वीरचंद्र आग्रह करी, कीधो एह स्तवन्न
भणतां नवनिधि संपजे, सुणतां चित्त प्रसन्न.
८१ ॥
।। इति श्रीजिनपूजाविधिस्तवनं सम्पुर्णम् ॥
अथ श्रीज्ञानपंचमीतिथिर्नु स्तवन.
ढाळ १ ली.
राग-फागनी देशी.
प्रणमी श्रीगुरुपदकज, ज्ञाननी प्राप्ति उपाय:
पंचमीतप महिमा कहुं, सुणजो भविसमुदाय ॥
त्रिगडे बेठा मिठा, गिरुया वीरजिणंद;
दे उपदेश अनेकथा, निसुणे सुरनरछंद
ज्ञानलोचन सुविलासे, लोकालोकप्रकाश;
भक्ति मुक्तिदातार छे, ज्ञान परमसुखवास ॥
ज्ञान विना नर पशु कहे, लहीए कांड न भेद;
ज्ञानदीपक समज्ञानी, सर्वाराधक वेद
देश आराधक किरिया, ज्ञान विना ते अंध;
ज्ञानसहित जे किरिया, ते सोनुं ने सुगंध ।
दक्षिणावर्तक शंख, दुधे भरियो तेह;
॥१॥
,
॥ २ ॥
८४ . मानी वासोवासमा, कठिन करम करे और ॥३॥ मानसहित कतकिरिया, ते तरिया मपसिंधु महानिधीयमां भतरा पंचमी मानम ॥ मगपतीप्रमुख मागमाहि, मानवणा बहुमान; पोस मान मनुमवे, किरिया तास प्रपान ॥४॥ २भी राग-साहसीनी देशी पंचमीवपनिधि सामन्मे सासनी रे, निम पामा मापारतो मिनगणपरमनि उपदिशे सा०।। मक्षिण ने हिकारतो ॥५॥ मागशिर माप फागुण मसा सा॥ पेठ मापार चालवो पट कापी पी सीमीए सा०॥ सुभदिने सदगुरु सालो ।। ६॥ दार देव मुहारीये ॥सा०॥ गीतारय गुरुवदवो पोयी शक्ति पूजीए सा०॥ ममापना मारी नांदितो ॥७॥ एमपक मावश्यक करो ॥सा०॥ देवंदन प्रणे काळयो। प्रमपर्यने पानीए । सा० ॥ मारमसपित्तपरिहारतो ॥८॥ पंचमीस्तवन पुरको सा०॥ पपसे चोय उपासतो; प्रिषिष परविष गुरुने मुख सा०॥ मपमा पौपभ सासवो ॥९॥ गीवारय पासे पठे ।। सा० ॥ मन परे क्स उपगारवो मापग्मीय रक्तप्टपदे ॥सा०॥ पंच परस सारा सारवो ॥१०॥ जपम्पपदे एम मागीए सा०॥ मपवा की एक सर्पको उनमणे मारापीमे ||सा०॥ मिम पहोंचे मनापतो ८५ ढाळ ३ जी. राग-शारद बुद्धिदाइ-ए देशी. निज शक्तिने सारु, उजमणु करो वारु; वित्त खरचो मोटे मने, प्रतिमा भरावो चारु ।। ज्ञान दर्शन चारित्र टीका, त्रिणे ज्ञानने पुजे; पापना पुजीने गुरुपरे काउसग्ग कीजे ॥ १२॥ बेटक. पांच एकावन लोगस्सकेरो, पंच पंच वस्तु ढोवे; पाठा परति रुमाल ने लेखण, वासकुंपी ने जोवे ।। पाटी पोथी ठवणी कवली, पूंजणी नोकारवाली दोरा चावखी थापनाचारज, तिम मुहपत्ति सुंवाळी ॥ १३ ॥ कागळ ने कांठा, खडीआ वत्तरणा कांबी झरमर चंदरुआ, वाळाकुंची लांबी ॥ आरती धूपधाणा, मंगलदीप शृंगार; प्रासाद ने प्रतिमा, तेहना वळी शणगार ॥१४॥ बेटक. सारसार वस्तु जगतमां, ज्ञान दर्शन उपगरणा; केशर सुखड अगर कपूर, वाती ध्वज अंगलूहणां- पंच अहव शक्ति पंचवीश, पंचवाटनो दीवो, फल पकवान धान वहु मेवा, कुसुम प्रमुख बहु सेवा ॥१५॥ 'पूरब अथ उत्तर, दिशि विदिशि ईशान;
८६ नमो नाणस्सफ्दने, ध्यामो गई सापपान । साइम्मीवास की, गीतगाने मागीजे; ए करणी करता, मानने भाराधीचे ॥१६॥ यूटक साधी ईम शिषपद साई, मिम गुणर्ममरी परदप लो सौभाग्य बळी भान भारापुं, करी निम निर्मल विच ।। से सर्वध कथायी कहेमो, सडेमो पारितकाज, माननिमलगुरु भाणा पसाये, मपिक चदय होय माम ॥१७॥ -- अय श्रीपंचमीनिपिनु स्तवन प्रणमी मेमे पासमिन, पदपंकम ममिराम; पचमीतपमहिमा पह, सुणवां सीझे काम ॥१॥ मतफामपिक पिरानवी, दारपती इति नाम: नेमिमिणेसर भाषीया, रैपवगिरि शुभठाम ॥२॥ फेसर पंदन भाषीया, पेठी परसदा पार; परदचगणपर क्व तिहा, प्रभ फरे सुपिचार ॥३॥ देसण नाण परिचनी, फहो वियि केही रोय; पिपरिपि ते मारापीये, पे भीमिन सोप ॥४॥ पौद माम्म पूर्णिमा, ममापासी ए विपि पार; 1 ८७ ॥५॥ चारित्र पोसह आदरी, लहीये भवजलपार पंचमी बीज इग्यारसी, ज्ञानतणी तिथि एह; ज्ञानभक्ति बहु साचवो, जिम होय निर्मल देह ॥६॥ नवतिथि शेषे कीजीये, दर्शनभक्ति विशेषः जिनपुजन कल्याणका-दिक साधर्मिक देख ॥७॥ तेहमांहि वळी निमळी, कार्तिकपंचमी जेह; झानाराधननी कही, नेमिजिने धरी नेह ॥ ८ ॥ एह दिवस आराधतां, पाम्युं निर्मळ नाण; वरदत्त ने गुणमंजरी, सुणज्यो तास वखाण ॥९॥ ढाल १ ली. राग-दान कहे जगे हुं वडो-ए देशी. जंबूद्वीपे भरतमां, पद्मपुरी अतिसाहे रे; सुषमा जेहनी जोयतां, सुरनरना मनमोहे रे. ॥ श्रीजिनवर एम उपदिशे ॥१०॥ अजितसेन जस राजिओ, तस घरणी यशोमतीराणी रे; वरदत्त तेहना सुत भलो, सकलकळा गुणखाणी रे॥श्री० ॥११॥ आठवरसनो जव थयो, तव मूंक्यो निशाळे रे; अक्षर मात्र न आवडे, जिम जळमां शेवाल रे ॥ श्री० ॥१२ ।। अनुक्रमे यौवन पामीओ, विणठ्यु कोहे देहो रे; रति नवि पामे केहथी, न धरे कांइ सनेहो रे ॥ श्री० ॥ १३ ॥ हवे तिणहीजपुरमा वसे, सिंहदास जिनधर्मी रे; - .
८८
कोटिधम म्पपारीमो, संपमुस्प शुभकर्मी रे ॥ भी० ॥ १४ ॥
कप्रक्रुिका सस गेदिनी, गुणर्ममरी बस पेटी रे
पसने मुंगी परतनु, रोगवणी छे पेटी रे ॥ भी० ॥१५॥
सोसमरसनी सा या, पण वस कोइ न हो रे
मातपिवा परिमन सफे, यस दुरखे दुस्खीया पी रे ॥ भी० ॥१६॥
दुरा
पणे समये तम एकदा, विजयसेन गउनाय,
पउनाणी गुरुगुण मर्या, मनिपरिफरे सनाय ॥ १७॥
नागरमन सपि मागीयो, सुतसपुत नरनाप
सिंहदास वनया सहित, पदे भीमनिनाष ॥१८॥
गर २ मी
राग-नारी फुली अविमसी मन भमरारे--ए देसी
गलेशनाशिनी देशना हिवमाणी रे, माखे भीगुरुराम:
। मुणो भनि माणी रे॥
मान मारापन सापगो हि० भरणपठनने काजे सुणो० ॥ १९ ॥
मान विरापे पे मने रित० से परमपे मनहीण सुणो.
सपने पो पिरापता हिव० ते मृगा दुम्सदीण मुणो० ॥ २० ॥
फायाथी पे विरापता दिव. तस कुष्ठादिकरोग सुणो०
विरिषविरामन माननी दिव० चे मूस करे मोग मुगो० ॥ २१ ॥
पुत्र फरण पन मिषनो हिस० तेरने होये नाम सुणो०
आपिन्यापि वस परमपे हित० निर्षिक वनु वास मुणो० ॥ २२ ॥
८९
सिंहदास इम सांभळी हित० पूछे उलट आणी सुणो०
कहो भगवन्? किण कर्मथी हि मुज तनया गुणहीण सुणो० ॥ २३ ॥
गुरु कहे एह संसारमा हित० सुखदुःख कर्ममे हाथ सुणो.
कर्मथकी वळिया नहीं हित० चक्री हलघर साथ सुणो० ॥ २४ ॥
एइनो पूरवभव सुणो हित० हृदये विचारो हेव सुणो०
कर्मतणी गति एहवी हित० गुरुभाखे ततखेव सुणो० ॥ २५ ॥
ढाळ ३ जी.
राग-कंत तमाकु परिहरो-ए देशी.
धातकीखंडे भरतमां, मनोहर खेटकनाम नरराज;
नयरमांहि व्यवहारिओ, धनवंत वसुदेव नाम नरराज.
पूरवभव तुमे सांभळो ॥ २६ ॥
सुंदरी नामे गेहिनी, तस सुत पंच रसाल नरराज
आसपाल पहेलो भलो; वीजो ते तेजपाल नरराज ॥ पू० ॥ २७॥
गुणपाल त्रीजो कह्यो, धर्मपाल धर्मसार नरराज;
लावण्यरुपे शोभती, वळी तस पुत्री चार नरराज ॥ पू० ॥ २८ ॥
लीलावती ने शिलावती, रंगावती तिम जाण नरराज;
मृगावती चोथी भली, महिमा गुणनी खाण नरराज ॥ पू० ॥ २९ ॥
पंडित पासे मोकल्या, ते पांचे निजनंद नरराज
चपलाइ करता घणुं, माहोमाहि दंद नरराज
॥ पू० ॥ ३० ॥
पंडित मारे तेहने, ते रोये घरे जाय नरराज
पंडितने उपले हण्यो, जो फरीतुम न सुहाय नरराज ।। पू० ॥ ३१ ॥
-
दासपकी विणे मणे होये, शिसवे इणिपरे माम नरराम;
कंठशोष कीपायकी, क्षु अधिकई पाप नरराम ॥ पू. ॥ ३२ ॥
पाटी पोयी प्रमुखये, परमाळे विणिधार नरराम,
मूर्खपणाची वेरने, नरि परणावे नार नरराम
॥ ॥ ३३ ॥
तिणे दुरसे दु:सीमा खीमस्ये, भाखे शेठ पचन नरराम;
मंगम मुरल रासीया, फीयो अहिस ननम नरराम ॥ पू० ॥३४॥
प्रत्युचर सर सी कहे, ए सपनो तुम दोप नरराम,
मर्मपानके उपसेरणी, माणी मतिषणो रोप नरराम ॥ पू० ॥ ३५ ॥
से तुम तनया उपनी, शानाशासना कीप नरराम;
अगे पीरी रोग , ए फल तास प्रसिद नरराम ॥०॥३६ ।।
४ यी
राग-पीर पसाणी राणी पेलणामी-ए देशी
पुग्यमव इम समिळीमी, माविस्मरण स्पो वाम;
कहा भगमम् ! स्व एरर्नुनी, कर्म रणनु निदान
॥ पान मारापन मादरोमी ॥ ३७॥
इणे अपसर परदत्तनोमी, फर्म पुछे नूप साम;
गुरु को एहिम भग्तमानी, भीपुर शेठ मसु नाम | मा० ॥ ३८ ॥
पमुसार पमुदेन पिछ हतानी, तेहना पुत्र गुणात;
गुरुलगी देशना मामीभी, पनादि वेणे एकात मा० ॥ ३९ ॥
संगम पहुमणे मादयोंमी, मरिमनिमुंदर पास
नमुदर प्रभुनगुणयधमी, धरिपद उपे र उल्लासे । मा० ॥ ४० ॥
३ पंचसयसाधुने वाचनाजी, आपतो करतो सज्झाय; एकदिन पोरिसी सूयतांजी, प्रश्नमां रयणि विहाय ।। ज्ञा० ॥४१॥ निद्रा न करी शके गच्छधणीजी, चिंतवे मनमांहि एम; धन्य मुरख मुज बांधवोजी, किसीय चिंता नहि तेम ॥ ज्ञा०॥ ४२ ॥ एह मूर्खपणुं लहुजी, चित्ते धर्यु जेह अज्ञान; बारदिन मौन करीं उपन्योजी, ताहरो पुत्र निदान ॥ ज्ञा० ॥४३॥ वृद्धभ्राता थयो हंसलोजी, मानससरोवरमांहिः इम सुणी जातिस्मरण लघुजी, वरदत्ते देशनामांहि ॥ ज्ञा० ॥४४॥ भूपति शेठ बेहुं भणेजी, सूरि आगळ करजोडी; विधि कहो ज्ञान आराधवाजी, जेम पहोंचे मनकोडी ॥ ज्ञा० ॥४५॥ ढाळ ५ मी. राग-वीरजिणेसरचरणकमळकमळाक्यवासो-ए देशी. भाषे तव मुनिनाथ साथ निसुणे चित्त आणी, उज्वलपंचमी दिवसे जेह आराधे प्राणी चोथभगत जिन वांदवा पूजा त्रिहुं काळ, सावधकरणी नवि करे ब्रह्मचर्य संभाळे, ॥ ४६॥ मास मास एणिपरे करे तिहां पांसठमास, उजमणुं करे तेहy पंच वस्तु प्रकाश; पाटी पोथी परति पंच ठवणी ने कवली, नोकारवाळी पूंजणी चावखा पंचवर्णी. पंच जाति फल पंच पंच, जिनविंव प्रासाद, ॥४७ ।।
पंच पाविना दम्प पेर, टाळो पंच ममाव; मासे मासे न फरी पके वो कार्षिक पंचमी, अमाळी मारापीये भाजीप परी एम ॥४८॥ असम कपूर मुर्गध दम्य लेइ पुस्तक पूर्व, ठवणी पामोठ उपरे पापीने रीजे पंचर्षि दीपक करे विम स्वस्विफ पर, पंचवर्ण फस सुखटी पन रोवे भर ॥४९॥ मो नमोनाण(स्स) माण गुणे सरसम दोप उचर सहामो शुद पत्र परे निर्मळ होय; गुस्सखे सप परभणखाण रुपानाष्टुं मुके, मागमीय इम उपरे पछे विपि नपि पके जो पोसहने कारणे ए विधि न करी शके, यो पीले दिन सापपेतो कीचि मलके, रोग सोग संताप दुस भावे संपद पावे, मनुक्रमे सुरसुल भोगनी अमरामर पाये ॥५१॥ से धप मेहुँ नणे भादों यया र नीरोग, विणे सोगाम्पनी पंचमी को से ऐई सोग ऐम रममण परिस करे परदस भिसा, सहस (१०००) कन्या परणी विहां मनुषमे लिपे दीसा ॥५२॥ गुणर्ममरी पण यह नीरोग गुण परणी, पचपी तपनी विपि अनेक कोपी निर्मस परणी ९३ ॥ ५३ ।। . अंते संयम आदरी विहुं विजयविमाने; वत्रीशसागर आयुमान पहोता शुभध्याने. ढाळ ६ ही. राग-शारद बुद्धिदाइ–ए देशी. जबूपुर्वविदेहे विजयपुष्कलावती नाम, पुंडरीकिणीनयरी अमरसेननृप धाम; गुणवती तस राणी तस कुखे उपन्न, वरदत्तजीव सुरना गुण लक्षण संपुन्न, Jटक. गुणलक्षण संपुन्ना पेखी शूरसेन दिओ र्नाम, वार वरसनो एकशतकन्या परणाव्यो अभिराम; तीर्थकरमुखथी पूरवभव निसुणी चारित्र लेइ, वर्ष सहस एक पाळी केवळ सिध्या कर्म खपेइ. हवे रमणीविजये नरसिंहभूपतिगेहे, अमरावतीकुखे गुणमंजरीजीव तेह; उपन्नो आवी सुग्रोव ठविरं नाम, बहु कम्या परण्यो राजतेज वहुधाम. त्रूटक. बहुधा सुख विलसंतां हुआ पुत्र चोराशीहजार, थापी पुत्र राज्ये लेइ संयम केवळ पाम्या सार; पूर्वएकलख भवि प्रतिबोधी पाम्या अविचल सुख, ॥५४॥ । 1 । --
९४
सौभाग्यपंचमीनो तप करा जाये दुर्गविदुस ॥५५॥
पर संबंध निमुणी मान मारापो माणी,
माशावना टागे जिम थामो गुणलाणी;
एम माणी नाणी मुणीये ए हित माणी,
भीमिनपरगणपरनी पानी उत्सम पाणी
घूटक
उचमपाणी जिननी सुणीने मतियुम्या मपिमाणी,
पंचमनाण लहेमा कारणे ए साधी सहिनाणी
भीपिनयपिमलकनिरागसुसेरक पीरविमसकपिराय,
नपविमल तस शिप्प को एम पाने सुमस सबाप ५६।।
अथ श्रीमानकादशीतिथिर्नु स्तवन
उली
राग-प्रतिजिन एफ मन बिनवि-ए पेशी
देव सोरठ द्वारापुरी, श्चय हरिनारदुप,
पादपकुलनभदिनमणी, सौम्पगुणे निम पदुए
॥समने धर्म समापरो । माकणी ।।
नैमिनिर्णद समोसा, सनिबर राइसमडार (१८०००)प,
स्पतगिरि मुणी आगीया, देहरी मुग्नफारुए ॥ ॥२॥
निमुणी देशना पुणी, एकादचीफ्त सारुप;
माननी लिपि मारापो, मापे भिमसुन्न सारुए ॥र० ॥३॥
दाखे सुव्रतमुनिकथा, निसुणे परखदा वारुए; पुण्यविशेषथकी फले, विधिथी शुभ आचारुए ॥ दृढ० ॥४॥ घातकीदक्षिणभरतमां, विजयपुरी सुविशाळुए; पश्चिमदिशि ईपुकारने नृप नामे पृथिवीपाळ ॥ दृढ० ॥ ५ ॥ चंद्रवती तेहनी प्रिया, नगरशेठ सूरनामए; पुत्र अनेक छे तेहने, सकलकळा गुणधामए. ॥ दृढ० ॥६॥ जिनधर्मे वहुनेहीओ, आवश्यकव्रतधारुए; एकदिन गुरूमुखे ज्ञानना, सुण्यो महिमा हितकारुए ॥ दृढ० ॥ ७ ॥ तव गुरु धवल एकादशी, दिन आराधन भाख्योरे; ज्ञानवळे तस हित भणी; विधि सघळो तिहां दाख्योरे ॥ दृढ० ॥ ८॥ ढाळ २ जी. राग-पुण्य प्रशंसीए ए देशी. मौनपणे पोसह करे रे, अहोरत्तो चौविहार; पठन गुणन जिन नामनां रे, करतां धर्म विचार रे. ॥ भवि व्रत आदरो ।।९।। पारणे उत्तरवारणे रे, एक भक्त आहार; उभयटक आवश्यकं रे, करे सचित्तपरिहार रे ॥ भ० ॥ १० ॥ ज्ञानतणी पूजा करे रे, साहम्मिवात्सल्य सार; जिन आगळ ढोणुं करे रे, पूजा विविधप्रकार रे ॥ भ० ॥ ११ ॥ संविभागवत साचवी रे, पारण एम करंत; बारवरस पूरे थये रे, उजमणु मनखंत रे ॥ भ० ॥१२॥ .
मिनवरने नप भूपणां रे, मत्येके मम्पार, धान पकवान प्रमुख बहुरे, लसावे अंग अम्याररे । म०॥ १३ ॥ सपमति पहुनिषि करेर, मानोपगरण सार; उपणी कवली पावली रे, पाग प्रमुख अग्यार रे विगंगमा विम सार रे ॥ भ० ॥ १४ ॥ एणिपरे बहुपिषि साघवेरे, एक वरस ते सर्प, अम्पार भग्यारस उमळी रे, कीर्षु प्रण पर्व रे ॥म० ॥१५॥ उनमणाना दिनयकी र, पमरमें दिने वेरा शूलरोगे मरी सुर पपोरे, आरणकल्पे गुणगेहरे ॥म० ॥१६॥ रान भी राग-मादिकरण भीमादिमिनमी-प पेशी विहांयी पवि मा मरवमाजी, शौरीपुरे पुष्पवनी; समादयधम्पपारियोभी, प्रीतिमतीनो पदमी ॥ माये मरियण व्रतपरोमी ॥ १७ ॥ ससइखे मुर उपन्यामी, नासनिक्षेपण ठाममी; निपि प्रगटपे माम्सय करेगी, मुमत दीर्घ नाममी । मा० ॥१८॥ साधुसमीप संग्रहेमी, समकित निम प्रत मारमी; पापनपये परणारियोनी, कन्या मम्यार उदारभी । मा० ॥ १९ ।। संयम ननफ मादोजी, सापे आतमफाजनी; मुक्त परम्वामी पयोमी, कोहि भग्यार पन सामनी मा०॥२०॥ धर्मपोपरि भावीपानी, को विदों पर रिचारमी, ९७ जातिस्मरणथी ते ग्रहेजी, पूरवळ्यो आचारजी ॥ भा० ॥२१॥ एक दिन पोसह आदर्योजी, मौनी निशि परिवारजी%3B ते निसुणी चोर आवियाजी, धन लेवा तेणीवारजी; कीधो प्रदीप प्रचारजी । भा० ॥ २२ ।। दीठा काउस्सग्गे रह्याजी, लेवे धननी कोडिनी; थंमे शासनदेवताजी, नहीं कोइ धर्मनी जोडिजी ॥ भा० ॥ २३ ।। लोके राय जणावीओजी, आवीयो चोकीदारजी; थंभाणा सवि ते तिहांजी, अचरिज एह अपारजी ।। भा०॥ २४ ॥ ढाळ ४ थी. राग-हमचडीनी देशी. मन थिर करीने पोसह पारे, विधि सघलो आराधे; राजा पण तेहने घरे आव्यो, भेटे भगति बहु साधे रे. हमचडी. ॥ २५ ॥ अभयदान मांगी मृकाव्या, तस्कर व्यसनथी वार्या; शेठपदे राजाए थाप्यो, तसपरिजन सत्कार्या रे हमचडी. ॥ थ६ ।। वळी एकदा अग्यारसदिवसे, सपरिवार व्रतधार; लाग्यो अग्नि ज्वलतुं पुर देखी, धर्मशरण करे साररे हमचडी ॥२७॥ धर्मशाखा सुव्रतगेहादिक, मूकी अवर सवि जली; देखी नरपति बोले एहने, धर्मे विघन सवि टळीरे हमचडी..॥२८॥ एकशतवहोंतेर पुत्र थया तस. सघळीण नारीकेरा:
कोरिननाएं पन सपि मूकी, लीये सेपम गई शार इमपरी ॥२९॥
मयशेखरपउनाणी गुरुथी, मग अयार मभ्यासे;
ण्ड महम पत पार छम्मासी, एक तिम चार पठमासी रे.
एमपटी ॥३०॥
एम प करवा समानिने, मौनएकादशीदिषसे
मंग पीग पा उपमावी, पण स्पिरतागुण पिकसेरे इमरी ॥३१॥
एक मिप्यासुर क्षोमण फाचे, परमनिन मुखे मागी
भादराई मा मेपम सावे, यो पेदना मावे रे हमपरी ॥ ३२ ॥
को म्पवर जो पसतीने पाहिर, भाये वो मुस पाये।
समो न मान्पो मस्तक हणीभो, पण निममन न उगा रे
एसरी ॥२३॥
एणिपरे पाविकर्म सपापी, पामी केपसनाम,
सिद पयो सुररंद मीने, मोम करे विहाणरे इमपटी ॥३॥
पनिता पण मग्यारे संयम, लेइ निरवीधार;
मासससेखण भिगति पामी, बळी गहु वस परिवार रे
हमपरी ।। ३५ ॥
पाळ५मी
राग- करमोरीने निनपाये सागु-प देशी
मेपिनिर्णदे फेम भागे, पर संपंप कामे पिचरागे
सांमजी कृष्ण प दिनस आरापे,सायिकसमकितना गुणगावे ॥३६॥
९९ अरजिनव्रत नमिजिनवर ज्ञान, मल्ली जन्म व्रत केवलज्ञान; एकचोवीशीमां पंचकल्याण, त्रणचोवीशीना पन्नर कल्याण ॥३७॥ एकक्षेत्रे एम.भणीजे, दशक्षेत्रे दोडशो जार्णीजे; अतीत अनागत ने वर्तमान, पंचास पंचास एम प्रमाण ॥ ३८ ॥ नेकुंजिनना नाम गणीजे, एक वणने एकज लीजे; अढारमो ओगणीश ने एकवीश, वर्तमान जिन ए निशदीश ॥३९।। सातमो चोथो छठो एह; अतीत अनागतना जिन जेह; मोटुं पर्व कह्यु तिण हेते, जिनशासनने वळी शैवसंकेत ॥४०॥ मागशर शुदी अग्यारस पाळे, ते सवि कर्मना मेल खपावे; जावज्जीव कीजे शुभभावे, भवभवनां तेम संकट जावे श्रीज्ञानविमलमूरि एणीपरे भाखे, एह चरित्रतणी छे साखे, आराधे जे जिनकल्याण, होवे तस घरे कोडि कल्याण ॥ ४२ ॥ ॥४१॥ , . अथ श्रीवीशस्थानकतपर्नु स्तवन. दुहा. श्रीजिनमुखकजवासिनी, ब्रह्माणी श्रुतदेवी3B थानकतपमहिमा विधि, हुं पभणु नितमेव. ॥१॥ जिन सिद्ध पवयण गुरु थिविर, बहुश्रुत तपसी जेह; वात्सल्य कीजे एहनें, वहुनाणोपयोगे तेह. ॥२॥ दसण विनय आवश्यके, शीले निरतीचार; प्रमादि क्षण पण नहीं. तप अनाशंस विचार. ॥३॥ .
- ॥ ७॥ भतिपिसंगिमागे करी, पविष दान आहार, वैयारण यस दालीये, उपसर्गादि निवार ॥४॥ परविप सप समापिनामशान अभ्यास भुवमति वीर्यप्रभापना, एकीच पुण्यनिवास ल १सी राग ये करमोर्गन मिन पाये सागु-ए देषी हवे थानकसप खेपिपर कोणे, तेहतणो पिभि इम निसुणी समकितवारी घे नरनारी, सपिपरिवारी ने ब्रमचारी ॥६॥ उत्तरपारणे एकाहारी, वि विपि मिनपूर्व निरभारी; मावश्यक दुगवेल समाळे, यतना सही मीननी पाळे गुरुमक्ति पळी रिपिनो रागी, धर्मसक ने विपयनो त्यागी सग्ननसंगी कपटे न लिंगी, तरच पणनो जे अविरगी एरा लक्षणनो पे माणी, मश्वपरे मीठी मस नाणी, ते ए तप करमा उनमार, निनपद गांपेपुन्यविशाल गुस्मुसयी फल पाना निमुमी, विपि अनुसार करतो करणी दोपसास पदनुं करे गणम, सेभयी परित्र पार्नु हमे पम ॥१०॥ साघु भाषक ए तपने धार, पोय हमासमगव नदार प्रथम मंतिममिन सर्व मारायां, शेपे गद्ग पूर्वभवे साया॥११॥ थापक पोसा करी मारापे, मुलगपिपियेवो मिनपद माप षीने दिने पूनादिक फरणी, साचतो लिपिशु निम भरणी ॥१२॥ यपि काउसमा प्रये न दाण्या,पणसुपिरितमनिये लिपिमा राष्पा, ॥८॥ - - . १०१ एहथी दर्शनशुद्धि विशेषे, तप चारित्रतणे पण लेखे ॥१३॥ एक नवकारने काउसग्गे, पलिय सुरायु वंधे सग्गे; ओगणीशलाख ने सहस त्याशी,दुगशत सडसह सहस पांत्रीशआणो; दुसय दुसहि पल्योपम आय, वांधे सुरतुं करी मन ठाय ॥१५॥ तेहभणी काउसग्ग छ जुत्त, त्रिकरणयोगशु विधि सुपवित्त, सामायिक करीने जो कीजे, तो सहेजे संसार तरीजे ॥१६॥ थानक थानक काउसग्ग करवा, सामायिके भवजलधि तरवा; नाम ठाम हवे एहनां दाखे, ग्रंथ विचारामृतनी सारखे ॥ १७॥ ढाळ २ जी. राग मारुनी-चेतन चेतीये रे--ए देशी. जिनपूजाविधि ग्रंथांतरथी जाणज्यो रे, कहेतां वाधे विस्तार जे विशेषपदारथ जगमां जाणीये रे, तेहनी भक्ति उदार, ते तिहां जोडीये सार ॥ १८ ॥ जिनवर पूजीये रे, पामी नरभवयोग; धर्म अतुल छे जगमां श्रीजिनवरतणोरे, आराध्ये शिवयोग. ॥जि० ॥ए आंकणी ॥ नमोअरिहंताणं गणीए प्रथमपदे भलंरे, तेपण अड सत्तर प्रकार; पूजा कीजे वळी प्रासाद करावीये रे,तस आशातना वार।।जि०॥१९॥ तस प्रत्यनीकनी संगति सहजे वारीयेरे, काउसग्ग चोवीश वा वार; अवर्णवाद आच्छादन जस थुति गाइये रे, भक्ति बहुमान उदार. ॥ जि० ॥२०॥ .
देवपासमूपालपरे धीमे भो रे, पामे मिनपद म
मनोरमा खस परणी गणपरपदवी सहीरे, प्रथम थानकने प्रेम
॥जि० ॥ २१ ॥
भक्ति करो मषि पोणे यानके सिद्धनीरे, विष मरावो सास
मणीरुप्पसोमन धातुसणी पहुरे, सिद्गुण कीरिने राध ।।मि०॥२२॥
नमोसिद्धार्ण दोय सहस नपीये सदार, परम निषि सरि रोप;
कारसम्म मामय पपर मोगम्मसणोर,तन्मयन्याने मोयामि ॥२
मरितने पण पीस पद ए मा य मेरे, घोशी मपरा पाव
एने म्याने सिदस्वरुपीमातमारे,सादि अनंत हुर मात जि०॥२॥
महावीर्य पुररीक मष्टापद रैवतारे, भीसम्मेवादिक ठाम
विषिश्व कीजे याबके पर मगमीयेरे,बपि मिनपद पाम मि० ॥२५॥
हस्विपास्नृप चिश्मषानवणीपरे र, त्रीमे भये जिन थाप;
मंत्री गणपरपद पामी भिव मानश्यर,गोमापद सुपसाय मि० ॥२६॥
श्रीजे यानके प्रवधनमक्ति कही ममी रे, प्रबधन पशि संप;
ममणादिक मागम मुरुपवारे, कीजे न तस्स पर्छप मि०॥२७॥
समकिवीता शासनमक्का मे मविप्राणीया रे, कीये तास सहाय;
मामहान नवदीमिव ददादिकसणोरे, अनुग्राकरे निरमायामि २८॥
'नमोपनपणस्स' गणीये कावसम्गकीमीयेरे,सोगस्स परमपमा पार
चिंतन करवा मिनाचशेठवणीपरे रे,रममा वस नार मि०२९॥
खेटने मिनपद गणपरपद पली नारीनेर, पामी सो विसुल
श्रीधे पानके भक्ति करो एम मापशु रे, महिमा मोदिम सम्स
॥ जि०॥३॥
१०३ , . - ढाळ ३ जी. राग-पारधीयानी देशी चोथे थानके कीजीये रे, शक्ते गुरुनी भक्ति रे गुणरसिया; आचारी आचार्यनीरे, छत्रीशगुणनी व्यक्ति रे चित्तवप्तिया ॥३॥ 'नमोआयरियाणं ' गणोरे, छत्रीस लोगस्स काउसग्गरे गुण त्रिकरण विनये सेवना रे, अति उच्छाह अथग्ग रे चित्त० ॥३२॥ पुरुषोत्तमनृपनी परे रे, जिनपद लहीए सार रे गुण अन्न पान वसती ने वेयावच्चेरे, पूजाने सत्कार रे चित्त० ॥३३॥ पद पंचमे वळी थिविरनी रे, सेवा बहुविध होय रे गुण श्रुतपर्यायवयथी वळी रे त्रिविध लोकोत्तर जोय रे चित्त० ॥३४॥ सीदाता सम संयमे रे, थिर करतां होय थेर रे गुण० नमोथेराणं' ध्याइए रे, काउसम्ग त्रण पण तेर रे चित्त० ॥३५॥ पद्मोत्तरनृपनी परे रे, जिनपद लहीए क्षेम रे गुण छठे वहूश्रुतने नमो रे, उपाध्यायपद प्रेम रे चित्त० ॥३६॥ 'नमोउवझायाणं' जपोरे, काउसग्ग लोगस्स पचवीशरे गुण विविधभक्ति तस साचवोरे, बहु श्रुतनी सुजगीश रे चित्त. ॥३७॥ महेंद्रपालनृपनी परे रे, जेम सुतशीलप्रधान रे गुण० जिनगणधरपद पामश्ये रे, जेहनी मोटी माम रे चित० ॥३८॥ तपसी साधुपद सातमे रे, भक्ति करो द्रव्यभाव रे गुण 'नमोलोएसव्वसाहूर्ण'रे, सगवीश लोगस्स खास रे चित्त०॥३९ ॥ वीसामण वात्सल्यथी रे, प्रमुख करो घणी सेव रे गुण० .
I४०॥ १०४ वीरमद्रमनिनी परे रे, मिनपद सो सयमेन रे पिच मानोपयोग मक्षिणे रे, पिक्पो आग्मे ठाण रे गुण 'नमोनाणस्स'पद कासगे रे, पण एकापन मानरे विच० ! ४१॥ मानोपगरण मानने रे, शानीने महमान रे गुण. जपसदेपरामा परे रे, पषि मिनपद नाम रे पि० ॥४२॥ गळ ४ पी राग-मेटी उपर मेर सखे मीमनी रो सास मरुसे-ए देधी नरसं पानक दर्शनपर्नु भ्याइए दो मासके पर्नु० 'नमोदसण(स्स) करी नापफ पाप पलाइए हो सासके पाप० पण मयपा सरसठ लोगस्सने पिवीए दो साल सोग० सुगुरु सुदेव सुभर्म ए दर्शनमंतीए हो सास ए दर्शन ॥४३॥ दर्घनना उपगरण पधारो महुपरे रो सार पपारो० निकादि टोष निमारी पिच परो लास निमारी० निम हरिविक्रमभूप निर्नेद्रपदपी सारो सात मिनेंद्र० गर्भनयी पी भानपारिष गुण गदगद हो सास पारिभ० ॥४४॥ यसर्मपद 'नमोपिनयस्स' गणी मारापीए से सात गणी० गुणिपद मेरनो विनय पम्मेदे सापीय से सास पर. एषा दशरिष मेद विनय कासग रो रो माप पि. दश मयमा बारम मागस्स फरी मपतरा से साम सोग• ॥५५॥ दर्शन शान पारिन न तप उपफारीनो दो पास के व० मोस मिनय पण मेद ए मनापारनो दो सासकै जना १०५ धनश्रेष्ठिपरे तेह मुनिव्रत आदरी हो लाल मुनि० वांधे जिनपद नाम करी किरिया खरी हो लाल करी० ॥४६॥ उभयकाळ आवश्यक पड्विध साचवे हो लालके षड्० सामायिक बहुवार करी पाचवे हो लाल करी० 'नमोचरित्त'पद माप सत्तर अथ पांचनो हो लाल सत्तर० करे काउसग्ग दश सामाचारी संचनो हो लाल सामा० ॥४७॥ निरतीचारे भक्ति करे चारित्रनी हो लाल करे० सर्वविरति देशविरति करे चित्त चित्रथी हो लाल करे० अरुणदेवभूपालपरे ते जिन होये हो लाल परे० वारसमुं हवे ठाण शीलवतर्नु कहे हो लाल शील. ॥४८॥ चिंतामणिपरे लील शील जे आदरे हो लालके शील० नवविधवाडी विशुद्ध अढार भेदे धरे हो लाल अढार० व्रतधारीनी भक्ति साधुश्रावकतणी हो लाल साघु० लोगस्स नव वा अढार काउसग्गे भणी हो लाल काउ० ॥४९ ।। 'नमो वंभवयधारिणं' पाठ, जपे सदा हो लालके पाठ० चंद्रवर्मनृप जेम लहे जिनपद मुदा हो लाल लहे. तेरमे थानके एह प्रमाद क्षण नवि करे हो लाल प्रमाद० 'नमोकिरियाण' जाप करी भवजल तरे हो लालके करी० ॥५०॥ वळी पिंडस्थ पदस्थ रुपस्थ रुपातीतनु हो लालके रुपा० ध्यान धरे वळी धर्म शुकलनी रीतिर्नु हो लाल के शुकल. 'करे प्रमादपरिहार आचार अनुमोदना हो लाल आचा०
कारसमा र पणपीस मक्रिय मातादना सास अक्रि० ॥५१॥
निरविचार किया सापे मियापापिने दो साल के विकपा०
हरिसाहनप पेम वे जिनपद सापीने से मासके मिन०
पोदमे स्पानके पास मम्मतरतप धरे हो लास अभ्यं०
'नमोलस्स' गमे पाठ सोगस्स दादश करे हो लाल सोग० ॥५२॥
मनास भनिदान करी पिच निर्मल से लार करी०
कपनकेतुप पेम सो जिनपद मल दो लास सो.
पनरमे पानके पर रचिव अनादि हो सास उपित.
शुद मविपिसचिमाग करे प्रमादिके रो सास कर०
देह भणी 'नमोगोयम' गणीये कासग्गे हो लास गणी.
एकादश सोगस्स सुपात्रादिक मगे हो लास अपात्रा०
रत्नकनारूप तान ने मन्मय पात्र मेरो लास के पन्म०
मिनमुनिमापक समरिति मिथ्यास्तिमात्र के दो लास मि० ॥५४॥
पणिपरे पात्र विचार संनिमाग प्रव पर दो लास समि०
नरवाइननुप पेम मिन मन सरे दो सासक या.
मन पर काय विशुद एवं ने मावर दो लास पा०
मानपिपळगुणराशि वनमा विस्तर हो सास सस० ॥ ५५॥
सार ५ मी
राग-मुनि मन सरोपर इसमो-ए पेटी
पंयारपपद सोम, भपि सुमे माये मारापो रे
जिनप्रियममनि गुणी, देशपिए मेरपी सापो र ॥५६॥
१०७
,
श्रीजिनवर एम उपदिशे ॥ ए आंकणी ।।
उपसर्गादिक टाळवे, चैयावच्च विशेष रे
ते भणी अपडिवाइ कह्यु, प्रवचने उचित संपेख रे ॥श्रीजि०॥५७॥
जिन उत्कृष्ट गुणीमांहि, ते 'जिणाणं गणीयेरे;
काउसग्ग पांच लोगस्सनो,अधिगतगुरुमुखे सुणीयेरे।श्रीजि०॥५८॥
जिमूतकेतुनृपतिपरे, तीर्थकरपद फरसे रे;
राणीयशोमती तेहनी, गणघरपदे भव तरसे रे ॥ श्रीजि० ।। ५९ ॥
पद समाधि हवे सत्तरमुं, द्रव्यभावे उपजावे रे
मूरिमुख चउविह संघने, सुपरशु सुविधि सिखावेरे ॥श्रीजि०॥६॥
संघमां उत्तम मुनिवरा, ते भणी 'नमोचारित्र' जपीए रे;
विघननिराकरवे करी, पण लोगस्स कर्म खपीएरे ॥श्रीजि०॥६॥
श्रीपुरंदरनृपनी परे, जिनपद लहे सुखकार रे;
बंधुमती तेहनी प्रिया, होशे तस गणधार रे ॥श्रीजि० ॥ ६२ ॥
पद अढारमे आदरो, अपूर्व ज्ञान- ग्रहण रे;
अंगानंग आवश्यके, भणीये करी योगोवहाण रे ॥ श्रीजि० ॥६३॥
तत्त्वज्ञाननी चिंतना, 'नमोनाणस्स' पद जाप रे;
काउसग्ग पण अथ वारनो, ज्ञानथी टळे सवि पापरे|श्रीजि०॥६४॥
सागरॆदुनृपनी परे, तीर्थकरपद पामे रे;
आदर करीने आशातना, टाळतो सवि दुःख वामे रे||श्रीजि०॥६५॥
हवे श्रुतपद ओगणीशमुं, श्रुत ते गणधरे रचियु रे;
चौदपूरवी दशपूरवी, प्रत्येकबुद्धबुद्धि खचिउ रे ॥ श्रीजि० ॥६६॥
१०८ पिपिई प्रोई देयवं, मत्पनीकवा टाळे रे, मंग अनग सलाषीए, शक्ति शासन प्रहमाळेरे ॥ भीमि०॥६७॥ 'नमोसुपस्स' पर ध्याइए, पर मय पणयासीय रे; सोगस्स काउसमग कीजिये, परीये भक्ति मप रे ॥भीमि०॥६॥ सक्क अध्ययनपद पाडा, मेवादिक पूग रे, पारीये भंगने पूर्णना, वो पाप भुवसीला रे ॥ मीनि० ॥ ६९ ॥ रस्नपूरपनी पर, स्यादा नहीं का र मिनपद सही शिमगवि सहे, पावे पुम्पनी का रे ॥मीनि०॥७॥ मापनवीयपमापना, पीस स्थानक नाणो ; पिपानिमिच उपवेष तपे, उमति करे सुममाणो र ॥भीजि ७१॥ वीपमविष्ठायावरा, साहमियत्सस-मादि रे, धर्मकया रिपिन कर, टाली सयसममाद रे ॥ भीमि० ॥ ७२ ॥ 'नमोनीन्यस्स' पद पिक्पि, फारसमा सोमस्स पार रे मेरुममनरपतिनी पर, पामे निनपद सार र ॥ भीमि० ॥७३॥ पूर्वस्थान सपि परमा, मामे विपेपरी परियो रे, एक एकमा पपता निषे, करवा पाविक रिपो रे मीमि०७४|| ममे न मापे मेहने, पी। असमापिना गण रे; पीशस्थानकतप सेना, भीमानपिमसमक्ष भामेरे मीजि०॥७५।। सब ६दी राग-प्राविजिन मामणे मार-ए देशी स्थानक मोशे इस मारापो, पोसाकरी मवि प्राणीनी, १०९ सूरिवायगमुनि चरितपदे चउ, सर्वविरति सहीनाणीजी. ॥ ७६ ॥ वलिहारी ए जिनतणी ।। आंचळी. ॥ एहनो पार न पामीए, कोइ कहेतां गुणसमुदायजी; उजमणां उलट धरी कीजे, निजधनने अनुसारेजी; धन लही तप नवि उजमे,कांइ तेहनो अफल जमवारोजीव०॥७८॥ सूरतवंदर सुंदर श्रावक, स्थानकतप आदरताजी; नेहतणो विधि जाणण हेते, प्रवर पुण्य अनुसरताजी ॥१०॥७९॥ ग्रंथ विचारामृतथी निसुणी, ज्ञानविमल गुरुवाणीजी; समकितअनुभव उल्लसे एहथी, अवर न एह समाणीजी ॥व०॥८॥ संवतरसऋतुमुनिविधु(१७६६) मासे, पोपपदी आठम बुधवारेजी भणवा काजे स्तवन कर्यु ए, नितु नितु मंगळचारजी व०॥८१॥ अथ श्रीसत्तरिसय (१७०) जिन स्तवन. राग-गोडी. ढाल १ ली. जंबूद्वीप विदेहमां एकेकी विजये; वत्रीश जिनवर विचरता, उत्कृष्टे समये ॥१॥ प्रेम धरीने प्रणमीए, ॥ आंचली०॥ श्रीजयदेव कर्णभद्रजी, लक्ष्मीपति अनंत विशाल गंगाधरूं प्रियंकर अमरदत्त ॥ प्रेम० ।।२॥ कृष्णनाथ गुणगुप्त छे पद्मनाभ जलधारः युगादित्य परदधमी करकेत महाकाय सार ॥ प्रेम० ॥ ३ ॥ मरण्यपास हरािर नर्स अमरफेतु रागेंद्र शादिदेव अनंवकर गरमम सागरपंद्र ॥ प्रेम० ॥ ४ ॥ सामीपंद्र महेपर अपमनी सोमकावि नेमिमद ममितमद महिमापर भीरापेपरचद्र । मेम० ॥ ५॥ मभिवनाथ दही भरता, ऐरपते मुपद पोत्रीप मंदीपना, मिन शानदिर्णद ॥ प्रेम० ॥६॥ सठ २ भी राग- --पीरमिणेसर परणामस ए देशी अपमानिदो पातकीसरे मिन काहीए, विपरता प निनबरा प्रणमी शिर महीए, मीरसेनने पसेन नीसकाविक सहीए, सनक्शी रूपिमकनाप मंकर सहीए, भीमगांक सनिम्ति विमल मागमिक दुफवार, सुपापिप मास पर्णवेष पसमित्र सुपर ॥१॥ मभूववाहन पूर्णिमेनु रेपोक्ति कासवाल, नसिणीदत विपापवि सुपार्न मानुनाप विशेष रिशिष्ट प्रममन मलपम मनिषद पिपाल, डुरंग महागीर भूतानंद वीर्येश रसास ॥२॥ पीजे निदेहे पाकीसी जिनपत्रीश, पर्मवच भूमिपती मलय मनीभ ॥३॥ ॥५॥ -सुमित्र नंदीषेण प्रभानंद पद्माकर नामे, महाघोष चंद्रप्रभ भूमिपाल प्रणाम सुमतिसेन अच्युतदेव तीर्थभूत ललितांग, अमरचंद्र समाधिदेव मुनिचंद्र एकांग; श्रीमहेंद्रने शशांक जगदीश्वर देवेंद्र, श्रीगुणनाथ नारायणेंद्र उद्योतजिनेंद्र. श्रीकपिल प्रभाकर जीनदीक्षित सकल, श्रीशिलारजिन वज्रधार सहस्राक्ष जिन अमल; अशोकाख्य वत्रीशमा ए त्रीजीविजये जाणो, कर्पटनाथ सिद्धांतनाथ भरते दोइ आणो श्रीजयनाथने पुष्पदंत ऐरवते दोय कहीए, एम अडसजिनवरा धातकीमांहे लहीए; प्रहसमे प्रेमे प्रणमतां होय समकित शुद्ध, साते सुख सहेजे मळे ज्ञानविमलनीवृद्धि. ढाळ ३ जी.. राग-भैरवी. मेघवाइन जीवरक्षकस्वामिरे, श्रीमहापुहषने पापहर नामरे; श्रीमृगांक मूरिसिंह जगत्पूज्य वंदीरे, सुमति महामहेंद्रने अमरभूति वंदीरे. कुमारचंद्र वीरषेण श्रीरमणनाथरे, -- ॥ ७॥ ।
॥८॥
॥ ९ ॥
१२२
स्वयंम् अघळ मकरफेतु सिदायरे
भीसफर विजपम नरसिंह शतानंदरे,
हदारफ चंदासप चित्रगुप्त मंदीरे
सरप महायश उप्माफ मयुम्ननापर,
महावेन पुष्पफेतु कामदेष सनापर;
समरकेतु ए पुप्फरवरमारे,
प्रथम विदेहे करे पर्मनी पदिरे
भीमसमचद्र मासेन बजूनामर,
सुपर्णगाडु कानंद पीर्यनामर
बिमसद यशोपर महावल सारर,
पयरसेन निमसदोष मीमनाप सारए
मेस्सम भद्रगुप्त रसिंह मुत्रत पारर,
परिचंद मतिभेय मतिमापर पाररे,
कनकफेतु अजिस्वीर फस्टमित्र माणीर,
मापदच दिवकर परुणवच आणिर
मसकीर्ति नागेंद्र भीमहिमपरदपर,
कृतग्रम मरेंद्र पर्दमान मुद्दच सेवीर;
पीने विदेरे पुप्फर प्रवीभदेवर,
प्रमास ममावफ दोप मरवमा सेपर
भीमनाहि पलमद्रागिन दोयरे,
मेरपवे दोय एम अरसहि होयर,
समप सत्तष्टमां मंदीये क्षेमर
॥ १०॥
॥ १२ ॥
॥१३॥
११३
5
डाळ ४ थी.
-
फडखानी देशी.
प्रहसमे जिनतणां नाम संभारीये, वारीए कर्मनी कोडि हेला;
विनसंघात सवि दुश्मन दरद सवि, दुर जेम पवनथी अर्कतूला;
॥ प्र० ॥ १४ ॥
जिनतणा नामनो यंत्रविधि पूजता, शुद्ध समकित होइ सुयश वाघे;
संकट निकट आवे नहिं तेहने, ज्ञानचारित्रना योग साधे
। प्र० ॥ १५ ॥
ज्ञानविमलाजिगुणरयणरयणायरा, सुगुरुपसायथी एह पामी;
भावना पावना करो तुमे भविजना,सिद्धिसुंदरीतणा थाओ स्वामी
। प्र० ॥१६॥
-
।।१।।
अथ श्रीशाश्वतीजिनप्रतिमास्तवन,
विधुमंडल परे निर्मली, श्रतदेवी गुणखाण;
प्रणमी जे आगम धुरे, बभीलीपि जिनवाण.
ते आगममां भाखीया, त्रिहुं लोके सुखदाय,
जिनपडिमा जिनघर वळी, सासयभाव कहाय,
उर्ध्वलोक मांहे चैत्य छ, निर्मल अंक के शंख,
त्रिहुं द्वारे करी सोहीए, सवि विमानना शंख,
॥२॥
॥३॥
सस १ स्त्री राग-सामेरी भयो मयोनी देशी सौधर्मदेवलोक पोल माण, पत्रीशसास विमान चैइ जाण, विहां प्रतिमा परिमाण तो, भरिफ पदो तम्बट माण ॥ मापसी० ॥ कारि सचापनने साठलाल, इश्शाने महापीमलाल, चैत्य विमाननी शाखसो, ।। ममि० ॥४॥ पचासकोरि चामीशलारस मस्मिा, श्री मीनवरनी सोहे मुस्लमांक मुरषर कस पडु महिमातो, ॥ मपि० ॥ ५ ॥ चारलास घेई सनकमारे, एकनीयकोटि सारसार उदार, मिनमतिमा मुस्कारतो, पबि० ॥६॥ माद्रि चाप माठलास्त, सिंग परदकोटी पासीशसास मंछित मुरतमारलतो, ॥ भवि०॥७॥ पारसास पाप प्रादेपलोके, सावकोरि पीसनास निके प्रविमा कंदु कतो, ॥ मनि० ॥ ८॥ सासपमान सांवके मिनमवन, ने माल परिमा गुणसदन देखी हरलिस पदनवो, । यदि ॥९॥ सके पासीनसास्स मिनगर, तिरसास्त प्रविमा ना ने। सासपमावे जेदवो, ।।मवि० ॥१०॥ चस्प सास्सपट के सरकारे, मशीसास दशमास उदार, मतिमाने कर मारवो, ॥ भवि० ॥११॥ मानस माणत दो देवलोक दीसे, दो दो एव पेह मिनति दी। प्रमोक्ष एधीश सहस्सवो ॥ मवि० ॥१०॥ ,
११५
दोहशो दोढशो आरण अच्युते, चेइविंव सगवीशसहस्स युत;
दीशे अति अद्भूततो,
॥ भवि० ॥ १३ ॥
वारदेवलोके एकसोशी, विच चैत्यप्रते छे सुजगीशी3B
उपरे एकशोवीशतो
॥ भवि० ॥१४॥
प्रथम ग्रैवेयकत्रिके चैत्यसार, एकशोअग्थार तिहां विव उदार;
त्रणशेवीश तेरहजारतो (१३३२०)
|| भधि० ॥१५॥
मध्यत्रिके चैत्य एकशोसात, बारसहस्स अठशत विख्यात;
चालीश अधिक विष जाततो
॥ भवि० ॥ १६॥
एकशत चैत्य उपर त्रिके आण, वारसहस्स तिहां विव प्रमाण;
अवेयके इम जाणतो,
॥ भवि०॥ १७ ॥
पंचानुत्तरे पांच प्रासाद, छसय विव प्रणमुं आल्हाद;
नमतां टळे विषवाढतो,
॥ भवि० १८॥
लाखचोराशी सहसस्रत्ता', त्रेवीश उपरे चैत्य प्रमाण;
उर्दू लोक मांहे जाणुंतो,
॥ भवि० ॥१९॥
एकशोबावनकोडि लाखचोराणुं. सहस्सचुमालीश उपरे आणु;
-सातसेंसाठ विव जाणुं तो,
॥ भवि० ॥२०॥
उर्द्धलोके ए संख्या लहीए, तेह तणी आणा शिरवहीए;
प्रणमी भवभयगमीएतो
।। भवि० ॥२१॥
उंचा वहोंतेरयोजन जेह, लांवा शत विस्तारे तेह;
पचासयोजन जिनगेहतो
। भवि० ॥ २२ ॥
सवि वैमानिके जिनवर गेहि, प्रतिमा सगकर माने देहि
अद्य पणमय धनषि तेहतो
भवि०॥२३॥
॥ २५ ॥ सायफ्सेणी ममल सासी, मिनमतिमा निनसरीसी दास्नी; मानी मणपरे भासी वो ॥ भबि० ॥ २४ ॥ सन २मी उसालानी देशी भाप एफपीयो विपग्मेकरे सासपनिनपर मिनपरु, क्स संस्पार माख सुमनो मुखकर, पंचमम्परे पंच्याशी प्रासाद छ, दससास्समरे पसे भाषिक प्रतिमा स्पे गर्दवारे विष पीच मासाद, बोधीवशयरे पिंग ममो (म) भयग्य , पसारगिरिरे मधीमासाद सोरामपा, उन्नुसपरे विच नमी सर मामला ॥ २६ ॥ यमकापसेर दश मासाद कमा तिहां, मिनपरिमारे पार बंदी से विक वर्षपरगिरिरे पीस पैस्प किंग भीस, चित्रपिचिोरे पण पण पद निंग में पने ॥२७॥ सधेरै दसर्या मतिमा पारधे, इसकाररे पर पा वि भेषी पार, चितारयेरे पीशमासाद नमीभीए, निनपरिमारे चोमीस पी सीमीये ॥ २८ ॥ वीर्षवैवारपरे पैस्य एकशोसरि आमा, ११७ -- वीशसहस्सारे चारशें बिंब जिननां कहां चैत्य चालीशरे दिग्गजकूटे जाणीए, चारसहस्सारे आठशे विव वखाणीए ॥ २९ ॥ दशतरुरे जंबूममुख जे शाश्वता, अग्यारशंसत्तरिरे प्रासाद तिहां मनभावता; तिहां प्रतिमारे एकलख चालीशसहस्सरे, चारशे उपरेरे प्रणमीजे सुजगीशरे. ॥३०॥ कंचनगिरिरे सहस्सएक छे देहरां, तिहां एकलखरे पीशसहस्स वळी जिनवरा; त्रणशेअंशीरे कुंड तणा प्रासाद छे, पणयालीशरे सहस्सछसय जिन विव छे ॥ ३१ ॥ द्रहे अॅशीरे जिनघर सुंदर सोहीए, तिहां प्रतिमारे छन्नुसय मनमोहीए; महानदीएरे सत्तरि (७०) जिनघर दाखीए, तिहां प्रतिमारे सहस्स चोराशी भाखीए ॥ ३२॥ सरवालेरे मनुष्यलोके चेइहरा, एकत्रीशशतरे ओगण्याशी उपरे वरा; निहां प्रतिमारे व्रणलख एकाशीहजाररे, चारशेअंशीरे उपरे होइ सुखकाररे ॥३३॥ चार प्रासादरे मानुपाचरगिरि जाणीये, तिहां प्रतिमारे चारश एशी वरवाणीये. -
॥३४॥
॥ ३५ ॥
॥३६॥ .
११८
धारकडलेर चारशे मनु विपर,
पार रुचकर पारशें उन्नु मनिलंपर
मदीपरेर दीपे यापन मिनारा,
पोसठसयर विप भरवालीन मनोहरा;
रामपानीर सोल प्रासाद 8 फरा,
विय एफसास्सर नवनतनीश उपर परा
नंदीधरर आठ इम निणपर फामा,
माठसास्सार प्रणशत मासाठि बिव लमा:
सरमाळेर निणगर भयो तिन्छासाका,
मात्रीशयर भोगणसाठ समि रत्नना
विहां मतिमारे प्रणास सहसएकाश्या,
प्रणव पीर पीस उपर परमाणपा,
खे उचकेर सनदीसर मिनघरा,
परबारार साठे ए अपर विचार परा
विपाररे पफसोगीश प्रविमा कही,
पार वादार एफसवमाठ माहे सही,
एफसो पापीसरे सोल पुष पार वारणे,
मोचरसोरै मभ्यसिदसिहासणे
विधांसोफरे पापचे पनुप प्रतिमा हुवे,
पन्य व मनर पूर्व मणमेने जुपे,
गनदंतारे पसरलारा र मेरुमने,
साकारेरे मानुपोचरे मिनममन्ने
॥ ३७॥
॥ ३८ ॥
॥ ३९ ॥
११९
पचासजोयणरे दीर्घ विस्तारे पचवीश छे,
छत्रीश जोयणरे उंचा सवि भविमने रुचे;
एम असुरनीरे जेह निकाये जिनघरा,
सवि जाणोरे एह प्रमाणे भविवरा. ॥४०॥
मेरुचूलारे यमक कंचन नदी कुंड द्रहे,
दोइ वैताढयेरे दिग्गजकूट तरुवर जहे,
कोशदीहारे अर्द्धकोश विस्तार छे,
चौदशेचालीशरे धनु उंचा सवि चेइअ छे. ॥४१ ।।
कल्याणकरे श्रीजिनना सुरवर करे,
अहाइमहोत्नवरे नंदीश्वर हर्षभरे:
इंद्राणीरे राजधानीए आवी मली,
करे नाटकरे भावना भावे मनरुली.
॥ ४२ ॥
शाश्वतचैत्येरे
षट्थानक
हुवे अतिभला,
रंगमंडपरे मुखमंडपमणिपीट भला;
थूभ अशोकतरुरे वापी निर्मलजल भरी,
चैत्यध्वजरे प्रतिचैत्ये होइए खरी.
॥४३॥
एभ महिमारे विस्तार आगमे घणा,
जीवाभिगमेरे जंबुपन्नत्तीप्रमुखे सुण्या;
वहु देवारे देवी भक्ति करे धणी,
हित सुख निवृत्तिरे धर्मकाजे समकितधणी. ॥४४॥
१२.
-
राउ ३ भी
पेशी ससनानी
अयोसोके मिनमपन पे, ममनपविमा सार ससना;
और बोसठलास छे, मसुरनिकाय मझार ससना
।। पापता मिनवर बंदीए ॥ ४५ ॥
एकझोपैदरकोरि उपर, सिंग मछे पीपलास लसना
भुलभीसस नागकुमारमा, पैस्य ए मायनभास स० ॥ शा०४६ ।।
पिप तिहां पठी माणीये, एकनोएकावनकोरी ससना
वीशलाल पळी सापिका, मममीजे फरमोरि स० ॥ मा० ॥४७॥
पहोंचेरसाल सुपर्णकाया, मिनपरचे प्रमाण ललना
एकशोमोगणवीसमोरि, साउसास उपर नाण स० सा०॥४८॥
रिपुत् अपि दीप ज्दपिमा, दिशि यणीपकुमार सपना
ए पट् मसुरनिफायर्मा, सरीसा पा सुगर ल० ॥शा० ॥ ४९ ॥
पचिरलास निनघर ममा, प्रत्येक सुखकार सतना
एफसोपत्रीशकोरि पिंक भला, एपीवान मनोरार ल०॥शा०||५०॥
एन्नुलाल मिनधर भला, पायुङमारनिकाय मलना०
एफसोपहोंचेरकोरि विष छे, अभीसास मुखदाय सामा०॥५१॥
सातकोटिरिचरितमम्बा, सपिइ मोलोक लाग्ना०
तेरनेनम्पासीकोटि के, साठमारपिनो योक सामा० ॥ २ ॥
त्य पैत्प प्रनिविय , एमोअनी प्रमाण सामना
सावहाच उचा उत्सेपांगुले, म जि मुविधाण स० ॥०॥५३॥
१२१ , नवनिकाय नागादिके चेइ, पचवीश योजनदीह ललना. साढावार पहुलपणे, अठदस उंचा लीह ल. ॥ शा० ॥ ५४॥ तास अर्द्धमाने कह्या, व्यतरमां जिनगेह लळना. असंख्यात ते जाणीये, प्रणमुं आणी नेहं ल० || शा० ॥ ५५ ॥ असंख्यात जिनघर अछे, ज्योतिपीमां गुणधाम ललना. मान तेहर्नु नवि का, पूरव ग्रंथ प्रमाण ल० ॥ शा० ॥ ५५ ॥ व्यंतर ज्योतिपी भवनमां, शाश्वत चैत्ये होय ललना. अशीअधिकएकशतवली, विव सभा मिली जोय ल० ||शा० ॥५७।। उत्पाद अभिषेक अलंकृते, व्यवसाय सुधर्मा नाम ललना, सभा पांच त्रिवारणे, चउ चउ प्रतिमामान ल० ॥ शा० ॥ ५८ ॥ साठविव सभा पांचना, एकशोवीश प्रासाद ललना, एम मली एकशोऐंशी हुवे, प्रणमुं मन आल्हाद ल० ॥ शा०॥५९॥ वैमानिक जिनघर परे, दीर्घपृथु उच्चमाण ललना. रुचककुंडलनंदीसरे, चैत्यतणा परिमाण ल. ॥ शा० ।। ६० ॥ ऋषभचंद्रानन नामथी, वारिषेण वर्द्धमान ललना. षड्द्रव्यतणी पेरे शाश्वती, जिनप्रतिमा परिमाण ल० ॥ शा० ॥६१॥ ढाल ४ थी. राग-माइ धन सुपनांतरे ए देशी. हवे सघला शासय चैत्य संख्या कहुं सार, त्रिभुवनमा जे छे दीटे जयजयकार; आठकोडिसत्तावन्लाखविसयने व्यासी,
१२२
बंद पड़ी पूषेचे होइ समक्विवासी
।। ६२॥
पभरसपकोरि सासीस बली कोर,
वेम सास महापन छत्रीनसास्स वेम जोरि;
ऐंशी पसी सापिक मक्तिमा विसरनमाहि,
ए प्रासयमाणे पण मन उच्छादि
॥६३ ॥
पापी पसी अधिफ फुट नदी सरु जैसे,
ममस पसी संभव पद को परी पील,
विहां वे नहीं कोई बहुभुक्षपनप्रमाण,
पण गायासंख्या ए सनि स्थानक माण
॥-६४ ।।
पसी समरिम तीरय अपरमिो केइ नामी,
शव॑मव भणपद समेत भमुदगिरि नाम;
मिह मिनकरयाणक पपा पाया नाम,
सावत्यी गमपुर रामगृह अमिराम
पुरपट्टण गामे नाम पिविषप्रकार,
मचि (१) मगरू (२) निभाकत (३) अनिभाकत (४) पार;
मिसवनमा पली 8 मिनवरना माकार,
बस पंदन करा पोपिनीम विस्तार
।। ६६ ॥
समविशुद्ध करमा मोय एर उपाय,
शुभयोग निमिते मिनपूमा धिक्याय;
निक्षेपा चार मिनना एकणिस्प,
ध्यावा भरि रोपे निरापरण निग रूप
॥ ६७ ॥
१२३
वीतरागनी बुद्धि वीगरागता आणी,
जिनप्रतिमा जाणो जिनसरीखी भविप्राणी
श्रीज्ञानविमलप्रभु प्रणमे जे जनद्वंद,
तस उदय अनोपम अनुभव परमाणंद
॥ ६८ ॥
॥१॥
॥ २॥
॥३॥
अथ श्रीसिद्धचक्रर्नु चैत्यवंदन.
श्रीसिद्धचक्र आराधतां, सुखसंपत्ति लहीए;
सुरतरु सुररमणी थकी, अधिकज महिमा कहीए.
अष्टकर्म हाणी करी, शिवमंदिर रहीए;
विधिशुं नवपद ध्यानथी, पातिक सवि दहिए.
सिद्धचक्र जे सेवशे, एक गना नरनार;
मनवांछित फळ पामशे, ते सवि भुवन मजार.
अंगदेश चंपापुरी, तस केरो भूपाल;
मयणा साथे तपतपे, ते कुंवर श्रीपाल.
सिद्धचक्रजीना नमणथी, जस नाठा रोग;
तत्क्षण त्यांथी ते लहे, शिवसुख संजोग,
सातसें कोढियाहंता, हुवा निरोगी जेह;
सोवनवाने जलहले, जेहनी निरुपम देह.
तेणे कारण तमे भवि जनो, मह उठी भक्ते
आशो मास चैतर थकी, आराघो जुगते.
सिद्धचक्र त्रण कालना, वंदो वळी देव
॥ ४ ॥
॥५॥
॥७॥
१२५ परिषम करी उमयकास, मिनर मुनि सेय ॥८॥ नपर ध्यान से परी, मसिपासो भपि श्रीस, नवम भाविस वपतपो, जेम होप सीलम लीस पाल पद मरिवर्नु, निस्प की पान पीई पद पठी सिदनु, करीए गुणग्राम ॥ १०॥ मायारम पीने पदे, मपा मप मस्कार, पो) पद उपनायर्नु, गुण गाई उदार समै साघु दु सही, भरीदीपमा बेह पंयमपदमा से सही, परमो परी सनेह ॥ १२॥ छने पवे दर्षन नर्स, दर्भन मनपाल मानपद नम साव, खेम पाप पलाई ॥ १३ ॥ माग्स पद रुरे म', पारित्र मुसंग नयमेपद पर वप सपो, निम फस सहो मर्मग ॥ १४॥ पही नरपद ध्यानयी, जपा नाठे कोर परित पीरपिमरणो, नयदे करमोर ॥१५॥ इति ।। अप भीसिदमगमाननु पैस्पसंदन सिद्ध सकम सपर सदा, अपिचल अविनाशी; पाश्ये 8 पळी पाप छ, यया मर्म विनानी ॥१॥ मोकालोफमकान सास, कहेना कोण शूरो; सिद्ध पुद पर पारगत, गुणयी नहि मधुरो ॥२॥ मनव सिद एणीपेर नई ए, पली अनंत अरिहत साननि मत गुण सपदा पाम्पा से भगत ॥ ३ ॥ इति ॥
१२५ अथ श्रीअतीतचौवीशीजिनचैत्यवंदन. अतीतचौवीशी प्रथम देव, जिन केवलज्ञानी; निर्वाणी सागर हा-जस विमल अभिधानी ॥१॥ सर्वानुभूति श्रीधर सुदत्त, दा- मोदर सुतेजा, स्वामी सुव्रत सुमतिने, शिवगती सुहेजा ॥२॥ अ- स्ताघ नेमीश्वर अनिल, यशोधर कृतार्थ जिणेश; शुद्धमति ने शिव- करो, स्पंदन संप्रति कहेश ॥ ३ ॥ इति० ॥ अथ श्रीवर्तमानचोवीशीजिनचैत्यवंदन. ऋषभ अजित संभव अभि-नंदन, आराधं सुमति; पममभने मुपास चंद्र-भ ध्याउं सुविधि ॥ १ ॥ शीतल श्रेयांस वासुपूज्य, विमलनाथ अनंत; धर्म शांति ने कुंथुनाथ, अर मल्लि भगवंव ॥२॥ मुनिसुव्रत नमि नेमजी, पार्थ वीर चौवीश; धीरविमलपंडित तणो, कहे ज्ञानविमलसूरीश ॥ ३ ॥ इति० ॥ अथ श्रीअनागतचौवीशीजिनचैत्यवंदन. पद्मनाभ पहेला जिणंद, श्रेणिक नृपति जीव; सुरदेव वीजा नमुं, सुपास श्रावक जीव ॥१॥ श्रीसुपास त्रीजा बली, जीव को- णिक उदाइ; स्वयंप्रम चोथा जिणंद, पोटिलमुनि भाइ ॥२॥ सर्वा- नुभूति जिन पांचमा, दृदायुश्रावक जाण; देवश्रुत छठा जिणंद, का- र्तिकोट वखाण ॥ ३॥ श्रीउदयजिन सातमा, शंख श्रावक जीव श्रीपेडाल जिन भाउमा, आनंदमुनि जीव ॥४॥ पोटिल नवमा वं.
१२६
दिए, भीम पर सनद, शतकीर्षि दनमा मिर्णद, प्रवकमाव: मा
गंद ॥ ५॥ सुव्रतमिन मगीयारमा, देवकीगणी नाण, अमममिन
पर पारमा श्रीकन गुण साण ॥ ६ ॥ निष्फपाय मिन रमा,
सस्पकीवियापर, निप्पुराफ मिन घोदमा, पलमा सोरफर ।। ७ ।।
भीनिर्मम मिन पदरमा, भीर मुखसा भाविका; चित्रगुप्त मिन मा
समा, रोहिणी भीम माविका ॥८॥ भीसमाघि मिन सचरमा,
रेमसी भाषिका भाण भीसंवर निन मगरमा, जीप सतासी पसाण
॥ ९ ॥ भीयोपर मोगणीशमा, जीपकप्णदीपायन, रिमयनाम
निन पीनमा, नीकर्ण सहायण ॥ १०॥ एकमासमा भीमधिनाय
रुप्ण नारद कहीए। अपर भापक जीप देव, पानीसमा सहीए ।
११ ॥ मनवीर्य सेवीचमा, नीय ममरनो घेर भीमद मिन चोरी
समा, साविपुद गुणगह ॥ १२ ॥ ए पोपीये निणरा, दोशे मा
यो फासे, भाव सहित ते पदिए, करनोटी माले ॥ १३ ॥ लाउन
वर्ण प्रमाण माय, मंतर सरि सरिता; समवि निन पोपीशी पर,
पडने सरि निरम्बा ॥ १४ ॥ पररयाणक सेना प, होशे परी
म दिवस: पीररिममगुरुना फारे, मानपिपालमूरीम ॥ १५ ॥ इति ।।
मप भीपी पिग्मानमिनीस्पदन,
परेमा मिनरर निरमान, भीसीमेपर सामी, युगमपर बीमा
नमः सम भेतरनामी ॥ १॥ श्रीमा बाहु जिनेसर, पण मगन
पोपा मिन श्रीमुराह पर पली जुगते ॥ २॥ श्रीमुमान पचम
१२७ -- , जिन ए, छठा स्वयंप्रभ स्वामी; ऋपमानन जिन सातमा, हुं प्रणमुं शिरनामी ॥ ३ ॥ अनंतवीर्य जिन आठमा, सूरमभ छे नवमा; श्री- विशाल दसमा जिणंद, जस मोटो महिमा ।। ४ ॥ श्री वज्रधर अगीयाग्मां, वारमा चंद्रानन; चंद्रबाहु जिन तेरमा, जसवर्णो कंचन ॥ ५ ॥ सुजगरवामी जिन चौदमा, बंदु उलट आणी; श्रीइश्वर जिन पंढरमा, नमीए नित्म जुविहाण ॥ ६ ॥ नेमिप्रभ जिन सोलमा, सु- खदायक जेह; सत्तरमा श्रीवीरसेन, वंदु धरी नेह ॥ ७ ॥ महाभद्र अद्वारमा, देवजगा ओगणीस; अजित वीर्यजिन वीशमा, ज्ञानविमल. मरीश ॥ ८ ॥ इति० ॥ - अथ श्रीसाधारणजिनचैत्यवंदन. चउजिन जंबुद्वीपमा, अडधातकी खडे; पुष्कर अर्ध आठ जाण, एम विशेष अखंडे ॥ १॥ अडपणवीस चवील नवम, विजये विच, रंनाः वाल तरुण नृप पद पणे, बली अपर अरिहंता ॥ २॥ सिचे- रसो उत्कृष्टथी ए, भरहेरवय प्रमाण; ज्ञानविमल जिनराजनी, शिर धरीये शुभ आण ॥३॥ इति ।। अथ श्रीशाश्वतजिनचैत्यवंदन. लाख बहोत्तेर कोडी सात, अधो लोक प्रासाद; तिहां प्रतिमा वली वंदिए, मनमां धरी आल्हाद ॥१॥ तेरसेकोडि नव्याशी कोड, साठ लाख सोहावी; व्यंतर ज्योतिषीमा प्रासाद, तस सख्या भावी
१२८
॥ २॥ मगनपतिमा एकपा ए, सासय मिनपर गेह शानविमलपी
नाणीए, मागम नि:संदेह ॥ ३॥ इति ॥
भय भीमापवमिनमसिमाससंख्यास्यवदन
तिम्सोफे प्रम सास, येसप मोगणसाठा मिनपर पसे
धापना, सिहो विच मनि ॥१॥ सास एका साल पण, प्रण
सप ने पीश मणमु अपर मशालता, बहुसां वेदीशे ॥२॥ म
मोलोके सगकर मिविए, मनुष पंपशव मान, विर्ण लोफ दिए,
मानयिमर पिच माग ॥ ३ ॥ इति० ॥
अप भीजपसोकम्पिशायमिनत्पदन
फर्यको सौभम मावि, अनुचर भारे, सासससाणं सुसमी,
फल देनीस मिनगेह ॥ १॥ एकसोकोर पापनकोरि, मसी पोरा
काल, सास सुपामीस सातसें, उपर समि मास ॥२ ।। सगकर
माणे भन्यव सगे, एकावरंभी मिन विंग, एक अनीस भनुपर
मगे, भानग्यान मविलय ।।३॥ इवि०॥
मप भीशानवमिन पैस्पपंदन
मास सताबन कोरिने, अहसप प्यासी निस्पा चैत्य शुरू
पात्रता, प्रतिमानी परवे ।। १ ।। कोरिपमरसप उपर, पेंतालीस
कोहि मारनसास पीस, उपर एशी नोति ॥ २॥ एम त्रिपु-
१२९ वनमा शाश्वता ए, चैत्यबिंब जिनराय; भाव धरीने प्रणगतां, ज्ञान- विनल सुख द्याय ॥ ३ ॥ इति० ॥ . अथ श्रीपंचतीर्थादि चैत्यवंदन. शत्रुजय रैवतगिरि सभेत, अर्बुद अष्टापद; पाना चंपा राजगेह, मथुरादिक जिनपद ॥ १॥ जिहा जिन पंच कल्याणक, स्थानक सुविशेष; लघु अंगुठ प्रमाण बिंब, जिनना जिहां लेखे ॥२॥ नाभ स्थापना द्रव्यथीए, भाव निक्षेपे सार; ते सविओने वंदना, ज्ञानविमल जयकार ॥३॥ इति० ॥ अथ श्रीचौवीशजिनगणधरादिसंख्यामय चैत्यवंदन. एकसहसने चारसें, वावन वळी जाणो; सविजिनना पुंडरीक आदि, अंते गौतम आणो ॥ १ ॥ अडवीशलख अडयालसहस, मु- नि जिनकर दीशा; लखचुमालीस सहसछियाल, चउसय एट शिष्या ॥ २ ॥ ए साहुणी जिनवर तणी, ए सविहुती जाण; शुद्धसंयम आराधता, ज्ञानविमल गुणखाण ॥ ३ ॥ इति ।। . अथ श्रीउत्कृष्टकालना केवलिसाधुओनी संख्यामय चैत्यचंदन. उत्कृप्टे काले हुचे, केवली नव कोड; साधु वली नवसहसकोड, संप्रति नवि खोड ॥१॥ वेकोडि केवलधरा, मुनि दोय कोडि स- संयम गुणमणि ज्ञान व्यान, जे हुवा ने होशे ॥ २॥ ते स- हस;
१३० पित ने बदना ए, मानविमस करि भाष, गुणिजन मुनिजन बदना मामाम सरवा नाय || ३ ॥ इति ॥ मय भीमगरपणधर्मनगमित मिनरम्यनंदन दान साम भोगोपभोग, पल पण अतराय; हास्य अगति रति भय दुगछा, शोक परमवाय ॥१॥ काम मिथ्यात अमान निद्रा, भविरति ए पांच, राग देष दोय दोप, प महाग्स संघ ॥ २ ॥ ए पेणे दर कर्या ए, सेने पहीये देष, मानविमलप्रम परणनी, पांचे आनिश सेव ॥३॥ इति ।। अप श्रीमटारदोपपर्मनगर्भित जिनस्परदन मोप मान मद सोम माया, महान अरति रति, रिसारित अनंग ते, मत्सर ममीति ॥१॥ योग भी तणे मीति रति, मीरा मसग ठाप असर प्रकट निक, नदि जेणे अगे ॥२॥ देर सये भिर सारो ए, ते करिए निरपार, मानरिमपमा समनना, पुष्प मणा मार ॥३॥ इति ॥ अप भीमाम्माविहार्यगतिमिन यमदन पार गुणो स्नुयी भठोक, देर भी पाजे पामर सि पि दिश, पार छवि राजे ॥१॥ सिंहासन सपा-पीठ, मामास टीपे दिम्पपनि मीठासपी, सपतरस भोप ॥२॥ इसम हष्टि पपसर- १३१ णनीए, प्रातिहार्यअड एह; ज्ञानविमनमरि इम कहे, छे तेहशु मुज नेह. ॥ ३ ॥ इति. ॥ अथ श्रीअतिशयगर्भितजिनचैत्यवंदन. अतिशय चार अति भला, होय जन्मथी साथे: रोग शोग मल खेद रहित, जस अग सनाथ ॥ १ ॥ पंकज परिमल सासोश्वास, गोखीर सरिखा; रुधिर मास आहारनिहार, नहि केणे निरखा।।२।। यातिकर्मक्षयथी हुवे ए, अतिशय बली अगीयार; ओगणीस सुरकृत इम चोत्रीस, अतिशय ज्ञान भंडार ॥ ३ ॥ इति । - अथ श्रीपंचपरमेष्ठिगुणगर्मितजिनचत्यवंदन. वार गुण अरिहंत देव, प्रणमी जे भाव; सिद्ध आठ गुण सम- रतां, दुख दोहग जावे ॥१॥ आचारज गुण छत्रीस, पचवीश उवज्झाय; सत्तावीस गुण साधुना, जपतां सुख धाय ॥२॥ अ- शेत्तर सय गुणमली ए, इम समरो नवकार; धीरविमलगुरुनो कहे, ज्ञान विमल सुखकार ।। ३ ॥ इति० ॥ अथ श्रीशरीरवर्णगर्मितजिनचैत्यवंदन. पद्मप्रभने वासुपूज्य, दोय राता कहीये; चंद्रप्रभने सुविधिनाथ, दोय उज्वल लहीये ॥ १ ॥ मल्लिनाथने पार्श्वनाथ, दोय नीला नि- रख्या; मुनिसुव्रतने नेमनाथ, दो अंजन सरिखा ॥२॥ सोले जिन .
१३२
कचन समा ए, पाषा मिन पठनीसपीरविमल गुरूरामनो कहे
मानविमलमीभ ॥ ३ ॥ इति ॥
भय भीशरीरममागगमिवजिन स्पादन
पघसया धनुमान जाण, भीमषम निणंद, पंचास चणा करो
सात मुषिषि जिणा ॥१॥ दश उणा करता हुपे, मा मनंत प
पास पंचोणं दक्ष धनुप क्षेम, नव फरे है श्रीपास ॥ २ ॥ सात
हाय तनु पीरमी ए, पागा मिन बावीस भाप परीने पंदना परे
शानक्मिससुरीश ॥३॥ इति ॥
मय भीलाग्नगर्भितविनर्षस्यपंदन
मुपम गम इस फपि काय, कमल स्वस्तिक चि मच्छ, श्रीव
पर सगि जीप महिप, मुपर तिम अप ॥१॥ सेण पञ मग ण
गमो भावि नदार म कसप नील कमस, शंख फणि सिंह अ
दंव ॥ २ ॥ रुपमादिक मिनार सणाए, परषा मिन पठमीमा सान
बिमम मस सेरता, मुग्न लहे विधामीस ॥३॥
.
मप भीमनगणनागर्मित मिन धन्पादन
प्रयप मिण सणा मसा, मरर काहीजे चावि तणा मप मार
मार, ना मग नेम म्हीये ॥१॥ दम पर पास निणदना, स.
नापी भीनार अपतीपार दिई मष, पाम्या मरममतीर ॥२॥
.१३३ जिहांथी समकित फरसीयु ए, तिहांथी गणीए एह, धीरविमल पंडित तणो, ज्ञानविमल गुण गेह ॥ ३ ॥ इति. ।। । अथ श्रीभवगणनागर्भितजिनचैत्यवंदन. सत्तरिसय ठाणे कडा, ए भव जिनवरना; बीजे ग्रंथे दाखिया, नव मुनिसुव्रतना ॥ १ ॥ चंद्रप्रभना आठ भव, नव भव सुविधिजि- णंद, ऋषभ तेर ने शांति वार, नवभव नेमिजिणंद ॥ २ ॥ दश पास शेष ने त्रिहुं. वीर तणा सगवीश; ज्ञानविमलसूरि एम कहे, वंदो जिन चउवीश ॥ ३ ॥ इति. ॥ अथ श्रीटीक्षातपगर्भितजिनचैत्यवंदन. सुमतिनाथ एकास', करी संयम लीध; मल्लि पास जिनराय दोय, अट्टमे सुप्रसिद्ध ॥ १ ॥ छठ भक्ते करी अवर सर्व, लीये सं- यम भार; वासुपूज्य करी चोध भक्त, थया श्रीअणगार ॥ २ ॥ वर्ष अने पारणुं करे ए, इक्षु रसे रिसहेश; परमान्ने वीजे दिने, 'पारणुं अवर जिनेश ॥ ३॥ इति. ॥ अथ श्रीदीक्षास्थानगर्भितजिनचैत्यवंदन. विनीता नगरीए लीये, दीक्षा प्रथमजिणंद; द्वारामतीए नेमिनाथ सहसावन द्वंद ॥ १॥ शेषतीर्थकर जन्मभूमि, लीये संयम भार; अ- णपरण्या श्रीमल्लिनाथ, तेमज नेमिकुमार ॥२ ॥ वासुपूज्य पास वी- १३४ रबीए, स्पं पपा नपि एर, अवर राम्यमोगपी थया, मानविमस गुणमेह ॥३॥ इवि ॥ अप भीदीलापरिवारगर्मितजिनचेस्पसंदन चार सदस्सी अपमदेव, भीमीर एकाकी; पण शत सापे मष्ठि पास, साम्स सापे पाकी ॥ १ ॥ पशव सापे पासपूम्य, सीये सयम मार मणपग्मन मिहा उपये, मविने मुसफार ॥२॥ एम घनवी मिनपराए, समार मुल थाप मानमिमम्मसुरि एम करे 1 होनो मिनसुपसाय ॥ ३ ॥ इति ॥ अप भीमोक्षगमनपरिमारगर्मिवभिनरन्पन्दन एफाकी भीपीर पास, तेधीश मुनि साये, परश्या प्रयीम नेमि नयमत शु शांति ॥ १॥ पणसय शु मल्लि मुपास, आसय शु पर्म पटशव मनि टु पामुपूग्य, स्मो मे शिर मर्म ॥२॥ अनंतनाव- मिन साम्सनु प, मपम ने दक्ष इमार, परममने माठशें, उपर प्रण उदार ॥ ३ ॥ विमलनाथ परसास्सन, सिदा मुखकार) सप- भदेव अष्टापदे, नमीपर गिरनार ॥ ४ ॥ संपा पासुपूम्प पीर-पा- वापुरी सार; भष्टकर्मनो सप करी, पाम्पा मगजल पार ।। ५॥ शेप पीस संमत गिरिए, शिपमुस सपो रदार मानसिमम सुम संपदा, जेन अभर मपार ॥ ६ ॥ इति ॥ T
-
१३५
अथ श्रीसीमंधरजिनचैत्यवंदन.
पहेला प्रणमुं विहरमान, श्रीसीमंधर देव; पूर्व दिशे इशान कुणे,
वंदु हुं नित्यमेव ॥ १॥ पुख्खलवइ विजया तिहां, पुंडरीकिणी
नयरी; श्रीश्रेयांस राजा भलो, जीत्या सवि वयरी ॥ २ ॥ देहमान
धनुष्य पाचशे, माता सत्यकी नंद; रुकिमणी राणी नाहलो, वृषभ
लंछन जिनचंद ॥ ३॥ चौराशीलाखपूरव आय, सोवनवरणीकाय;
वीग लखपूरव कुमार वासि, तेम तेसठ राय ॥४॥ गणधर चोराशी
कह्या ए, मुनिवर एकसो कोडि; पंडितधीरविमल तणो, ज्ञानविमल
कहे करजोडी ॥ ५॥ इति. ॥
-
अथ श्रीनवपदनुं चैत्यवंदम.
दर्शन ज्ञानचारित्र भेदे, पण पण पण पंदर; तप सग पण वा-
वाग ए, शत एक अह अवर ॥ १॥ तेरसहस्य गुणुणुं गणी, नव-
पढ आराधो; लब्धि सिद्धि विद्या निधान, सहेजे शिवपद साधो
॥ २ ॥ बांधो एम भवकर्मने, पामो सिद्धपर्याय; ज्ञानविमलमूरि एम
कहे, गुद्धद्रव्य होइ जाय ॥ ३ ॥ इति.॥
अथ श्रीमेरुगिरिचैत्यवंदन.
जंबु पूर्व कुरुक्षेत्र माहि, वडो मेरु सुदर्शन; लाखजोयण उन्नत
प्रमाणे, शत सघळो वनि कंचन ॥ १ ॥ भद्रशाल नंदनवने, सुमनस
पांडुक नाम; चार चार जिनगेह त्यां, चूलाए एक धाम ॥ २॥
१३६
सचर प्रासाद पम शावताए, पाये मेरु महार; शानपिमएमरि एम
को, वे दो निरभार ॥ ३ ॥ इति ।
अय भीषाफीबरपुष्करादगतमेकगिरिबस्फवंदन
पावफीसरे मे दोय, एक गिमय पीजो भवल, पुष्करा पण
टोय मेरु, मदर लियतमम ॥१॥ सारस चाराशी जोयणमान,
मेरु सघना माण, सत्तर प्रासाद छ एम मली, पंचाशी पखाणं ॥२॥
करनवर्णए शापवा ए, मीवाभिगममिरार; सानभिमसत्रि एमका,
पन्य ये करे दीदार ॥ ३ ॥ इति ॥
भय भीग्योतिमम्पितनिनपत्यपवन
समभूसमयी उपर, ज्योखिमक कही; माठ मदेशनो मेस्तो,
पायसममागमहीने ॥ ॥ सगसपनपति (७९ ) जोयणे, चा
मे वारामाउसये पुरा यया, रविमास सारा ॥२॥ अशीमोयण
पर प, अधि भरल पुप गुरु मंदा मानविमसमरि एम करे, ए ज्या
तिपक अमंद ॥३॥ इति ॥
मप भीग्यातिपास्पितमापतजिनयत्यरंदन
नरसे नोयग ज्योविमा, पुष्करा सहीये पुष्करायी ग्यो-
विपक, स्पिरमावे काहीप ॥ १॥ मससमदीप मने सब, शाश्वती
मिनमाविमा जीपामिगमे ए विपार, मोटो मस महिमा ॥ २ ॥
१३७ नामाकारद्रव्यभावथीए सवि क्षेत्रे सर्वकाल; ज्ञानविमलसूरि एम कहे, जिनविणु ए सवि आल ॥ ३ ॥ इति. ॥ अथ श्रीजन्माभिषेकस्थानगर्भितजिनचैत्यवंदन. पांडुकंवल चारे शिला, एक दक्षिण उत्तर; दोय शिला वली जाणीये, एक पूरव एक अपर ॥ १॥ पूर्व पश्चिम दोय दोय, सिंहा- सन होय; दक्षिण उत्तर एक एक, सिंहासन जोय ॥ २॥ जन्म समय दशवीशनो ए, ओकण समये जन्म, ज्ञानविमलसूरि एम कहे, ते चंदु शुभसम ॥ ३ ॥ इति. ॥ अथ श्रीवीजतिथिर्नु चैत्यवंदन. दुविध धर्म आरायवा, भविजन वीज आराधो; जेम अंतर परमातमा, संप्राप्ति फल साथो ।। १ ।। अभिनंदन जिन सुमतिनाथ, वली शीतलस्वामी; इत्यादिक वहुजिनवरे, केवलसिरि पामी ॥ २ ॥ जन्म दिवस पण केइकनाए, केइक लह्या निर्वाण; ज्ञानविमलगुणथी वधे, जो कीजे तप मंडाण || ३ ॥ इति. ॥ अथ श्रीवीजतिथिर्नु चैत्यवंदन. दुविधवंधनने टालीए, जे वली रागने द्वेष; आतरौद्र दोय अ- शुभ व्यान, नवि करो लवलेश ॥ १ ॥ वीजदिने वली वोधि बीज, चित्त ठाणे वावो; जेम दुःख दुर्गति नवि लहो, जगमां जश चायो ।
१३८ ॥२॥ मायो करी मारना ए, पापो शुम गुणगण, शानविमल सपवेगवी शेप कोरिकल्याण ॥ ३ ॥ इति ॥ अप भीज्ञानपचमीतियिन पेस्पंदन सामसमाने सोहरामणा, भीनेमिमिणेसर; समयसरण पेठा करे। उपपेट सोईकर ॥१॥ पंचमी तप भाराषता, सो पंचम नाण पांच परस सारा तपा, ए के तपपरिमाण ॥ २ ॥प्रेम परदपगुण मंजरीए, माराम्पो वप पहा मानविमस्मगुरु एम को, पन्य पन्य जगा सेए ॥ ३ ॥ इति ॥ अप धीमष्टमीलिपिनु चैत्पांदन मावत्रिगुण मिनपर वणी, नित्य को सेवा, पाली मज मन मतिषणी, निम गण मन रेषा ॥१॥ मातिहाराम माठ छ, ठक- राइ डा माठे मगल मागले मेहने वली राये ॥२॥ माजे भय माठ मोटकाए, माठ करम कर दूर; माठमदिन मारापा, मान विमस भरपूर ॥ ३ ॥ इति ॥ मय भीमष्टमीतिपिर्नु पत्पदन रामसिदारय कुलविनो, भिमादे मात, हरिसन कंचनवाने, सात हाय सोहात ॥१॥ आयु पहविर परस मान, समसारप सापी, निश्पद पाम्पा परीय ध्यान, संमम मारापी ॥ २॥ मारे
१३९
मद छेडी करीए, प्रणमो वीरजिणंद, ज्ञानविमलप्रभु सेवतां, नित्य
नित्य आनंद ॥३॥ इति. ॥
अथ श्रीअग्यारशतिधिनुं चैत्यवंदन.
अंग अग्यार आराधीए, एकादशीदिवसे; एकादशमतिमा वहो..
समकित गुण विकसे ॥१
विकसे ॥१॥ एकादशी दिवसे थया, दीक्षाने नाण:-
जन्म लद्या केइ जिनवरा, आगम परिमाण ॥ २ ॥ ज्ञानविमल गुण
वाधतां ए, सकलकलाभंडार; अग्यारश आराधतां, लहीये भवजल
पार ॥३॥ इति.॥
.
अथ श्रीअग्यारगतिधिनुं चैत्यवंदन.
आज ओच्छव थया मुज घरे, एकादशी मंडाण; श्रीजिननां
त्रणों भला, कल्याणक घर जाण ॥ १॥ सुरतरु सुरमणि सुरघट,
कल्पवेली फली माहरे; एकादशी आराधतां, बोधिवीज धणु चित्त
ठारे ॥ २ ॥ श्रीनेमिजिणेसर पूजताए, पहोंचे मनना कोड; ज्ञान
विमळगुणथी लहो, प्रणमो बे करजोडी ॥ ३ ॥ इति. ॥
-
अथ श्रीचौदशतिथिर्नु चैत्यवंदन.
चउसुपन लहे मावडी, सवि जिनवर केरी; ते जिन नमतां
चौदराज-लोके न होय फेरी ॥१॥ चौदरत्न पति जेहनां, प्रणमे पद
आवी; चौदविद्याना थया जाण, संजमसिरि आवी ॥२॥ चौदरा
१४० मभिर उपर, सिद सफसगुणठाण मानविमल पायानयी, रोप अयस अपिठाण ॥ ३ ॥ इवि || भप भीचोदशतिथि चत्पपंदन चौदयन वकारणे, विधार्द्धमान, पर्दमान मुल मापना, एर परमनिपान ॥ १ ॥ वर्षमानमिनरामनो, फरो ममिका ध्यान धौदपूरष मेद भीपना, ए यवना मधान |॥ २ ॥ षोद पूमनो सार छ ए, बौदधीए मिनराम; सानविमएपी माणीए, एना सकल दीनान ॥ ३॥ इति ॥ भप भीषदचलिना रासायी पत्पदन भीरागण गीते भरित नमो भगवत्र नमो, परमेंसर भीनिनराम नमा, पथप मिनेसर मेमे पेलव, सिदो सपला काम नमो ॥ मरिहत० ॥१॥ मस पारंगत परममहोदय, मसिनाची मासफ नमो भनर अमर मदत अविसयनिषि प्ररखनननधिमयक नया ॥ भरित०॥२॥ तिपण भरियण मणमण मंछिय-पुरण पेपरसाम नमो लमि मामि पाय नमुमाले-करमोडीने दिपाल नमो || मरिव० ॥ ३ ॥ सिद पद सं मगनन सजन-नपनानंदन देव नमा, सकलगुगमुर नरवग्नापक, मार मानिा सर नपो ॥ अगित० ॥ ४ ॥ तु मीप यर मुनकर सादिष, त निकारण पपु नपा, भरगागत जीपन दिन
.
१४१
वत्सल, तुहि कृपारससिंघु नमो ॥ अरिहंत ॥ ५॥ केवलज्ञानादर्शे
दर्शित, लोकालोक स्वभाव नमो; नाशित सकळकलंक कलुपगण,
दुरित उपद्रव भाव नमो ॥ अरिहंत० ॥६॥ जग चिंतामणि जगगुरु
जगहित-कारक जगजननाथ नमो घोर अपार भवोदधि तारण, तुं
शिवपुरनो साथ नमो ॥ अरिहंत० ॥ ७ ॥ अशरण शरण निरागी
निरंजन, निरुपाधिक जगदीश नमो; वोधि दीयो अनुपम दानेसर,
ज्ञानविमलसूरीश नमो ॥ अरिहंत० ॥ ८ ॥
॥१॥
॥२॥
अथ श्रीचतुर्विंशतिजिन चैत्यवंदन,
आदिनाथप्रभु प्रथमदेव, सेवे सुखकारण,
वीजा अजितजिणंददेव, भवपापनिवारण
त्रीजा संभव सुखकरु, ए वांछितदातार;
अभिनंदन चोथा नमुं, जिम पामुं भवपार
सुमतिनाथ सुपरि नमुं. जिन पंचम कहीए;
पद्मप्रभ छठा जिणंद, जपतां सुख लहीए
जिनसुपाससामी सातमा ए, सेव्ये संपत्ति कोडि;
श्रीचंद्रप्रभमभु आठमा, नमता नावे खोडी
सुविधिनाथ शिवतणो साथ, नवमा भगवंत;
दशमा शीतलनाथसामी, सेव्ये भवअंत
श्रेयांसजिन अग्यारमाए, जगजंतुजयकार:
चारमा श्रीवासुपूज्य, पूज्ये सुख सार
॥३॥
॥५॥
॥६॥
॥७॥ H१०॥ सेरमा श्रीविमपनाप, भवमावठ मैये अनंतनायमिन पदमा, दुर्गवि दुस गये, पर्मनायमस पभरमाए, प्रणम्पे परमार शांतिमिणेसर सोल्मा, समरये नित आणंद सतरमा मावे नमो; मपि सकपाल, भारमा अरनायदेम, अरिइस दमास मल्लीनाय भोगणीनमाए, शिवसंपदावार, मुनिसुषवमिन बीमा, विश्लतणो आधार एकवीमा नमिनापनी निरस्पे निमि सहीए, नेमिनाप याबीनमा, मस ध्याने सरीपे पार्मनाय तेषीभमाए, जस नामे दु ख नाय, पदमानमिन बोपीशमा समता सुस भाप अतीत अनागस वर्षमान, सेमिनार कहीण, स्वर्गमपातापमाई, मिनमतिमा सहीए से सपि पंदो भाषशुए, भरिका मन उल्लास माननिमम मसुनामी, मिप सहो शिवपुरमास ॥११॥ ॥१२॥ ॥१३॥ ॥१४॥ भय भी पार्भनाय पत्पदन नमदेव नागेंद्र मंदार मासा, मरिंद एटापौरुपादारविद ॥ परा नद सदर्भ लक्ष्मी सनाप, स्तुपे देवषिवामणि पार्थनाय ॥१॥ क्मो रामिपि नासन पासरश, स्वरसेनते मियांस निषेस ।। ममा १४३ लोन पद्मावती प्राणनाथं, स्तुवे देव चिंतामणि पार्श्वनाथं ॥ २ ॥ नव श्री निवासं नवां भोदनीलं, नतानां श्री दानदानेसलीलं, त्रीलो- कस्यपूज्यं त्रीलो स्यनाथ, स्तुवे देवचिंतामणि पार्श्वनाथं ॥ ३ ॥ इत व्याधि वेतालभूतादि दोपं, कृताशेषपुण्यावली पुण्यपोषं ॥ मुरकू श्री पराभूत दोपाधिनाथं, स्तुवे देवचिंतामणि पाश्वनाथं ॥ ४ ॥ नृपस्या श्वसेनस्य वसेवतंस, जना नामनगे मानसेगज हंसं ॥ प्रभाव प्रभावाहिश्री सिंधुनाथं, स्तुवे देवचिंतामणि पार्श्वनाथं ॥५॥ कली- भाविनी कल्पवृक्षोपमानं, जग त्यालने संतति सावद्यानं ॥ चिरंमेद- पाट स्थितं विश्वनाथं, स्तुवे देवचिंतामणि पार्श्वनाथं ॥ ६ ॥ इति नांग्रेद्रनरामर, वंदित पढांभोज प्रवर्तितेजा !! देवपाल कुटकस्थः, सजयति चिंतामणि पार्श्वनाथं ॥ ७ ॥ इति श्री पार्श्वजिन स्तोत्र समाप्तः ॥ ॥ अथ पर्युषणर्नु चैत्यदन ॥ सकल पर्व श्रृंगारहार ॥ पर्युषण कहीए । मंत्रमांही नवकार मंत्र । महिमा जग लहिए ॥ १॥ आठ दिवस अमार सार । अाइ पालो ।। आरंभादिक परीहरी । नरभव अजुवालो ॥२॥ चैत्यपरि पाटी सुद्ध साधु ॥ विधी वंदन जावे । अष्ठम तप संवत्सरी । पहि- कमणुं भावे ॥३॥ साधर्मिक जन खामणांए । त्रिवीधिशुं कीजे || साधु मुख सिद्धांत कान ।। वचनामृत रस पीजे ॥ ४ ॥ नव व्या- ख्याने कल्पमूत्र ॥ विधी पूर्वक शुणीए ॥ पुजा नव प्रभावना
१४४
निमपातकरणीए ॥ ५ ॥ मयम पीर परित्र पीन ॥ पार्षचरित्र
भर || नेमि चरित्र प्रथम संप ।। मुख सचिपूर ॥ ६॥ पम
परिम पपिम पम ॥ शाखा समुदाय ।। स्परिरापती पहुसुमपुर ।।
सरिलो पहिवाय ॥ ७॥ सामाचारी सुदवाए । परगंपास्वाणो !!
शिव मुख प्राप्तीम सही ।। सुरसर सममाणो ॥ ८॥ चौट पूर्णपर
भी भद्रपालु ॥ भाणेफ्ल्प उद्धरियो । नपमा पुर्षयी पुग प्रमान
आगम मलदरिमा ॥९॥
सामवार भी कसम्म । जे मुणे भरिमाणी।।गौतमने को मीरजीन।।
सीराणी ॥१०॥ फालिक परि फारणेये । पजुसण किपा/परणे
भादरमा सुदि पायमा ॥ निम फारम सिदा ॥ ११ ॥ पंचमीकरणी
पोपमा । मीनयर पपन प्रमाणे ॥ पीर यपी नसे.सी ॥ मरसे ते
आणे ॥ १२ ॥ श्री लक्ष्मीसागर सुरीस्पर्कए । प्रमोदसागर सुख-
फार ॥ पूर्व पजसण पालना ॥ शेषे मयजयकार ॥ १३ ॥ इति
पगुपणा पैस्पर्षदन संपूर्ण ॥
॥ मय पप्पणार्नु पैत्यनंदन पी॥
॥ देशी विमल केरसमी॥
पुण्योदयपी भापीया ॥ पर्ण पासण सार ॥ सम्म रग पमा-
मणा ॥ मंगल परस अपार ॥१॥ महीपरमा सुरगिरीमगे ॥वक-
मा मुरतरु जेम ॥ मुरगणा मुरपति पदो ॥ पर्ष पमुसम वेम ॥२॥
अमरपटो ममदावीए ।। मीन दयाने साग ॥ सत्प पपन मुस
भांसीए ॥ पोरी मेधुन स्पाग ॥ ३ ॥ मार्रम पूर्ण लिए नी
रमीए जुगार ॥ कनीमो कसा न कीमीए । सीनो परिहार ॥४॥
१४५ द्रव्य भावजीन पूजीए ॥ निरमल करी निज गात्र ॥ विनती करी गुनीराजने || दीजे दान सुपात्र ।। ५ ॥ सद्गुरु पासे सांभलो । कल्पसूत्र मनोहार । तीजा औषधनी पेरे ॥ पुण्य पुष्टी करनार ॥६॥ एकवीसवार जे सांभले ॥ कल्पसूत्र सुखकंद ॥ सात आठ भवमां लहे ।। पदवी परमानंद ॥७॥ जीनवर चैत्य जुहारीए ॥ मुनि वंदन हिनकार || वरसी पडिक्कमणुं करी ॥ आलोइए अतिचार ॥ ८ ॥ साधर्मिकने खांमणां । करिए सचि नरनार ॥क्षायक आ- राधक कयो । अवर विराधकधार ॥ ९ ॥ अष्टम तप वली कीजीए ॥ सामी वछल रंग || लाभ अनेक तो पांमीए । वरीए शिव सुख चंग ॥ १० ॥ इण विद्यपरव आराधिए । थीर करी मन वचकाय तो गुण माणेकसे कधी थइ ॥ आतम शीव जाय ॥ ११ ॥ इति चैत्यवंदन संपूर्ण ।। ॥ इती श्री जन्म नमस्कार लिख्यते ॥ श्रीसेāजय मंडणो ॥ श्रीआदी जीणंद ॥ पद अरविंद न मइ ।। जास सुर असुर नरिंद ।। काया घणुसय पंचउंच ॥ वृषभ विराजे ॥ गोमुख जक्ष चक्रेस्वरी ॥ शाशन सुरां छाजे ।। नाभिनर स्वर वंसमां, जाग्यो अभिनवसुर ॥ त्रिकरण शुद्धि पुजतां ॥ लछी लहो भरपुर ॥१॥ पुरव पून्ये पामीए ॥ पजुसण पर्व पूजा ॥ पोसह करो भावे ॥ मुको मनि गर्व ॥ जीव अमारी तणो पडह । भावे पजडावो । नव निधि मंगल मालिका | जीम संपति पात्रो ॥ पूजाने प्रभावनाए । पचखाण उदार । पडिकमणु वली क्रीजीए । साहमी वछल सार १४६ ॥ २ ॥ छठ करो ममि मान्सुं ॥ मीन पुमा रवीने ॥ अठोचरने सकर मद ॥ मानक्ति फरी चे | पर कस कल्पमत्र ।। ओम्पस आणी ॥ नाणे सोना रुप्यने ।। पुमी सुमो पानी । प्रथम परीत्र भीगीरनु ।। जग जनमन सुखकार ।। फल्स भरा दस कसा ! मर सत्तावीस सार ॥ ३ ॥ सनद सुपन भषि सामन्ये ।। सतण संयुक्त । मन्म हुन श्रीपीरन ।। बिहु पारा मन ॥ पनदिसि कमरि करें ॥ भोम्ब अमिराम ॥ इन सेषे उण्य कर । कर जीन गुणग्राम ।। भी सिद्धारय सपतिए ।। मन्मोउम करय ।। इस माणघनद देव ।। द्रष्ये घर भरय ॥४॥ मीन किटानीसातणो । छ अधिकार || केपलनाण सेइ करी ।। पाम्या पर पार ।। पीजे दीन भीप्ति ॥ परनर्माण संपच ॥ इत्यादिक मुणा पिस्वर ।। भीपीर चरीच ॥ सेला पर विक्से परोए । मठम तप मनुर ॥ नामफेतु भारक परें ॥ जीम र मयमयकार ॥ ५॥ परिसाढाणी पार्धनाय ॥ भी मी परीन ।। मीनपति केरा आवरा । मुणी या ए पनि ॥ रुपम परीप पिरावमी ॥ यति समाचारी ॥ भामि सुणतां मार समुद्र ।। तरम्प नरनारी ॥ सबमी दिनकग || म महोउपसार किस मूत्र सतमार मित || सुनीए सुखपार || ६ || पार पोस पहापसी ॥धुरी साइम स्वामी || पाट परंपर निमपमान || सुरीस मुपांमी ।। कीमे चत्य परिपाटका | स्वामी स्नामा । परिसमणु करो मापन ॥बहु ढानन दीजे ॥ भीरिजप आण- मुर्गम्पाए ॥ पगए वि मक समान ॥ पंरित ईस निमयतणो । पीर पर गुणन ॥ ७ ॥ इति जन्म नमस्कार समाप्त ॥
१४७ अथ श्री आदीजीन स्तवन- . । श्री आदीनाथ आगले बेरे स्तुति करी ते स्तवन ।। ॥ हरियो चालिरे ।। ए राग । नमो नमो श्रीआदि जीणंदने । करी त्रिविध प्रणाम ॥ पंचाभि गमने नमन करंति । केवलज्ञानि नामे । प्रभुजी प्यारारे । पुन्यथकी में दीठा ॥ प्राण आधारारे । सरस सुधाथी मीठा ॥१॥ राज पुरुष उपयोग करावे, कोलाहलने समावे ।। साचि वाणी ए भावना भावे । सहुने अचग्जि थावे ॥ वार्जीत्र नाद बजावे ॥ प्र. ॥ २ ॥ हुँतो काबरी वावर द्वीपनी ।। सास भरीए देही ॥ स्वामी बरोबर को नवी दिठो ॥ तुहि अने हो उदाही ।। प्र. ॥ ३ ॥ तुं निकलंक अने निरमोही ॥ तुं अद्रोही उदासी ।। माहाग मनमाहेथी केणीपेरे ॥ कहो हवे केम फरी जासी ।। प्र.४ । जीम पंकजमां मधुकर पेस ॥ तिम मनकजमा पेठा 1 तुम दरशन पामे नवि हरखे ॥ ते निरगु- णीने घिठा ॥ प्र. ५॥ हुँ तिर्यचणीने वली पक्षिणी ॥ लाखेणी तुम सेवा ।। पामि एतो अनोपम भावे || जीम मुख्या वरमेवा ।। प्र. ॥६॥ भवयव तारी आणाशिर चहिए ॥ होजो अविचल भाये। तेहथी गोरस समकित सुधु । ज्ञानने चरणे जमावे ॥ प्र. ७ ॥ जेम घृत आप स्वभावे निर्मल रस ॥ सोध्यो कहो किम जाण ॥ तिम तुम हेते सुध स्वरुपर्नु ॥ निरावरण प्रगटाचे ॥ प्र. ८ ॥ इंद्र अनंता जो समकाले । भगति करे जो कवही । तोपण प्रभु गुण समतान
आवे । तो सिर्षपणी केली ॥ म ९ ॥ सारिकार्णणि पर आदि
पनि । गुण स्तुति करपा सागी । साहु मसंग जुना ए मपरिम ।
मान पिमसमति मागी । प्रमजी प्यारार ॥ १० ॥ इति मादी
जीन स्वपन
भय श्री गोही पार्श्वनाथ जीन स्तवन
प्रणमीनीत परमेसरु, मापी अविचल मन ।।
घुतायी गुरुता कर, हुं सारद सरसव ॥१॥
मुग उपर प्रया परो, दीणे दोमत देव ।।
गुण गाई गीला वणा, भवे भवे भगवान ॥२॥
भपस मेंग गोटि पणी, सहुको भावे संप ।।
महीमदापादी मोटको, नारंगो नारंग ॥ ३ ॥
मतीमा प्रमे पासनी, मगटी पारण माहि ॥
भगवि फर पे मपीमना, रुण ते ए कोगाय ॥ ४ ॥
उत्पचि हनी रपर्स, शास्त्र तणी परि सास ।।
मोय गुण मोटा वर्णा, भासे करीनन भाप ॥५॥
१४९ ढाल पहेली. नदि जमुनाके तीर ॥ ए देशी ॥ कासि देस मझारके नगरि वणारसी, एह समोवड कोय नहि लंकाजसी ॥ राज करे तिहां राजके अश्वसेन नरपति, राणी वामा नामके तेहनी दीपति ॥ १ ॥ जन्म्या पास कुमारके तेणे राणीए, ओच्छच फीधा देवके इंद्र इंद्राणीए ॥ जोवन परण्या प्रेमके कन्या प्रभावती, नीत नीत नवला वेस करि देखावती ॥ २ ॥ दीक्षा लेह वनवास रह्या काउसग्ग जिहां, उपसर्ग कर काजके मेघमाली आ- च्यो तिहां ॥ कष्ट देइने तेह गयो ते देवता, पाम्या केवल ज्ञान आवी नर सेवता ॥ ३ ॥ वरस ते सोनो आउखो भोगवी उपन्यां, जोति मांहे मली जोत तिहा केइ सपनां ।। पाटण माहि मुरत त्रिण्ये पासनी, भरावी भूहरा माही राखी केइ मासनी ॥४॥ कदिन मतमो तेह गोडीनी लेइ करि, पोहोत्या आवास माहे, तरके लेइ धरी ॥ खाडखणीने माहि तरके घालि जिहां, सुएनीत प्रते तेह सज्यावाली तीहा ।। ५ ।। एक दीन मूहणां मांहि आविने एम कहे, तिणे अवसर ते तरकहिया मांहि सबहे ॥ नहितर मारी समरडी सहवेहूं तुजने, ते माटे घर माहेथी काहं मुजने ॥६॥ पारकर मांहेथी मेघोसा इहां आवसे, ने तुज देसे टका पाचजो लावसे ।। देजे मुरत एहके काहि तेहनी, मत कहेजे कोइ आगल वात केहने ॥७॥ यासे जोड कल्याणके ताहर आनथी, वापसे पंचामाहाके नाम ते लाजी ।। मनसुवीहीनोतरक थाय ते आँकलो, आगले जे थाए वात ते भवियण सांभलो ॥ ८ ॥ .
॥ ॥ माहरा पर सपाइ गेसा ॥ ए देवी ॥ लाल गोयण समुपरमान, तेहमा मरत क्षेत्रपरपान ॥ माहरा अग्ण सनेरि मुणगो विहां पारकर देस ने करो, जेम नारीने सोने भूदो ॥१॥ मा. ॥ सास माहे भीम गीता, म सवियो माद बेम सीवा ।। मा० ॥पाधि पारि म मेर, तिम परबत माहि मोटो नेर । मा० ॥२॥ देव माहिम इंद्र, ग्रा गुण माहि नीम चंद्र 40 मा० ॥ पचीस सास ते वेस, विम पारकर देस पीसेसरे ।। मा० ॥३॥ विहां रदेसर नामे नपरी, तिहां रोवा नयी कोर पयरी मा० ॥ विहां राम फर वंगार, वे मो भात वणो परमाररे ॥ मा० ॥४॥ विपणीम का म्पापारी, जेहने मपपरा सरसी नारी ॥ मा० ॥ विद मोटा में और मपान, ते वो घग्दस बापन "मा० ॥५॥ विहां कामपसा उपमहरी, सह संघमाही छे अपि कारी ।मा० ॥ दस पुत्र कस्त्र परिवार, जस मानिस के दरबारर मा० ॥६॥ से कामससानी पार, सा मेषोकीप ममाइ मा०॥ एक दिन सासो बनेपी, पेठा बातो कर एहनी ॥ मा० ॥७॥ दायी पन तुमे पणो सा, मानो वस्तु का ॥ मा० ॥ गुमराव माह तुम नागो, पेमा लाम मावे त सेमो ॥ मा० ॥८॥ स॥ यहाने ए देसी ।। सा कानम काराव, मेपा मणी दीनरात ५ सांमली सइदए, असतो इस का ॥१॥ माइस गुमरात, साप करि परमात ।।
१५१
सकुन भला सहिए, तो चालु वहिए ॥२॥ धन घणो लेइ हाथ,
परिवारे कर्यों साथ ॥ कंकु तिलक कीओ ए, सीफल हाथ दीओ ए
॥ ३॥ लेइ उंठ कंतार, आव्यो चहुटामझार ॥ कन्या सनमुख
मलीए, करति रंग रलीए ॥ ४ ॥ मालण आविताम, छाव भरी छे
दाम ॥ वधावे सेट भणीए, आजीस दे घणीए ॥५॥ मच्छयुग
ममल्या खास, वेद बोलतो व्यास ॥ पत्र भणीजोगणीए, वृषभ
हाथे धणीए ॥ ६ ॥ डावो बोले सांड, दधिना भरीओ भांड ॥
खरडावो खरोए, लोक कहे हैये धरो ए ॥ ७ ॥ आगल आव्या
जाम, मारग वूठाताम ॥ भेरव जमणी मलीए, देवडावी वलीए ॥८॥
जीमणी रुपारेल, तारी वांधी तिणवेल || नीलकंठ तोरण कीओ ए,
उलस्यो अति हीओ ए ॥९॥ हनुमंत दीधी हांक, मधुरो बोलें
काक ॥ लोक कहे सहुए, काम होसे वहुए ॥ १० ॥ अनुक्रमे चा-
ल्या जाय, आव्या पाटण मांहे ।। उतारो भलो कीयाए, सेठजी ।
वीयाये ।। ११ ।। नीसभर सुता जीहां, जक्ष आविने त्यांही सुइणुं
एम कहे ए, ते सघलो सद्दहे ए ॥ १२ ॥ तरकतणो के धांम, तेहने
घरे जइ जद ताम || पांचसे रोकडा ए, तुज देसे दोकडा ए ॥१३॥
देसे प्रतिमा एक, पास तणी सुविवेक । तेहथी तुज थासे ए, चिंता
दुर जसे ए ॥ १४ ॥ संभलावी जक्षराज, तरक भणी कहे साज
।। प्रतिगां तुं देजे ए, पांचसे धन लेजे ए ॥ १५॥ इम करतां पर
भान, तरक भणी कहे वात ॥ मनमा गहगहे ए, अचरीज कुण लहे
ए॥ १६ ॥
१५२
॥रास ॥ मासणारामोगी ॥
तरक ममी दीए पापसे दाम, मनिमा आणी नीम ठगमरे पा
सभी मने सुग ।। पुमी प्रतिमा हरव मराणो, माम आणीने खरच
नाणोर ॥१॥ पा० ॥ मम पसते ए सरसी आमी, न आपसे
दाम सपार ।। पा० ॥ दाम हनेरु विहां सीपो, मन मान्यो फारम
किमो र ॥ २॥ पा० ।। ता भरीया से पीस, मागस रापण
पुर सह माल्या || टाण सेमा दाणि मसी माम्या र || पा० ॥
गणे उग्ने मुले मेसे, एफ मोशे भपिको देखर ।। ४ । पा० ॥
ममी सहदाणी पीचार मना, ए पोतक दीसे छे ए मार ।। पा०
॥ मेपा माने गणी मसी पूछे, कहो सेठजी फारण सं २ ॥ पा०
॥ ५ ॥ सा मेपो को सामसो दाणी, अमे सरव गोडीनी आणीर
॥ पा० ।। वे मरव ए परकी मारे, फीम जाटवीए पीजे गार ||
पा० ॥६॥ पारसनाय सणे सुपसा ये, दाणी मेली ठाण घर ना
पर ।। पा० ॥ मात्रा करि सहुनीम घर भावे, मीन पुमी आनंद
पावर ॥ पा० ॥ ७॥ अनुक्रमे पारकर मांद माप, सवेन्चर नगर
के पार || प० ॥ पपामणी दीधी घेणे पुरुष, ययो रसीयान
पण परसेर ॥ पा० ॥८॥
-
॥राळ || राणकपुर रलीयामणोर मास देशी ॥
संप मापे मसी सामटोर साम, दरीसण परा काम मषि
भागीर ।। रोम नगारा इदारे, नादे मंबर गान ||म० ॥१॥
. रे १५३ सुणजो वात सोहामणीरे लाल, ओच्छव'मोहोच्छव करि घणोरे लाल ॥ भेटया श्री पारसनाथ ॥ भ० ।। पुजा प्रभावणा करि घणी लाल, हरख पाम्या सहु साथ ।। भ० ॥ सु०॥२॥ संवत चउ दस त्रीसमारे लाल, कार्तिक सुदनी वीज ।। भ० ।। थावर घारे था पीयारे लाल, नरपति पाम्या रीज ।। ३ ।। भ० ॥ सु० ।। एक दिनकाजलसा कहेरे लाल, मेघा साने वात | भ० ॥ नाणुं अमारं लेइ करीरे लाल, गया हुता गुजरात ॥ ४ ॥ भ० ।। सु० ॥ ते धन तुमे कीहा वावरयुरे लाल, तेघो लेखो आज ॥ भ० ॥ तव मेघो कहे सेठजीरे लाल, खरन्या धरमने काज ।। भ० ॥ सु० ॥ ५ ॥ सामीजी माटे रुपीआरे लाल, पांचसे सिद्धा दाम ॥ भ० ।। काज- ल कहे तमे सु कर्युरे लाल, ए पथ्थर कीण काम ।। भ० ।। सु० ॥ ॥ ६॥ काजल भणी मेघो कहेरे लाल, ए व्यापार सौ भाग ।। ॥ भ० ॥ ते पांचसे सीर माहरेरे लाल, तेमां नहि तुम लाग ।। ॥ भ० ॥ सु० ॥ ७ ॥ मेधा सानी भार्या रे लाट, मरगा दे जे नाम ॥ भ० ॥ मेरोने महिओ सारिखोरे, बहु रति जसना काम 11 भ० ।। सु० ।। ८ ।। , ।। हाल ॥ कंत तमाकु परिहरो ।। ए दी। सा काज मेघा भणी. बीहुँ जण माहे संवाद || मोरा लाल ॥ तिहा मेधो धनराजने, एक दीन कीधो साद ॥ मा० ।। सूणजो वात सोहामणी ॥ १ ॥ आ प्रतिया तो नगे भार - १५४ मो० ॥ मार परस सम तिह, पुमी मतिमा नीव ॥ मा० ॥२॥ मु०॥ एक दीन माणे इम को, मेघासाने पास ॥ मो० ॥ सु मम सापे भावचे, परपारि प्रमात ॥ मो० ॥३॥ म्० ॥ नहील सेजे भाषस तणी, चारण मास छ । मो० ॥ मार्गट राइका सगा, दोइ एपम के पर ।। मो० ॥ ४ ॥सू० ॥ पास खेरे सु एकसो, मत से कोई साथ ॥ मी० ॥ पाडायल मणी कणे, मुमने रा- सले हराय ।। मा० ॥ ५ ॥ ० ॥ एम मेपाने मीछनी, कम गया निम ठगम ॥ मो० । रखी उगमते तीहा, करमा माग्यो काम । मो० ॥६॥ सु०॥मि सीपी भावल वणी, अपम माग्या दाम || मो० ॥ नोवरी काम सामी तमी, भागे ठे सप नाप । मो० ॥ ७ ॥ यम मेपो से योउने, सेटी पात्यो माप । मो० ॥ मनुक्रमे मारग पाला, माम्पा पलांडा मार। मो० ॥८॥ ॥ अममीसा रगानो परमोलीया ।। ए देशा ।। विरागने मोम पल पणा, दीसे रुप वणो न पारोर ।। विहां भूक्ने प्रेव म्पतर घणा, देसी सेठ कर विषारोर ॥१॥सा मेपो मन मोहि पितये, इस कृण करस मारी सारोर ॥ तम अक्ष मागीने इम का, ह प्रवर फीकर समारोर ॥ २ ॥ सा० ॥ बेहेम शेफीने पासीमो, आम्पो रमा गोटिपुर गामर ।। विहां पार का सरोपर नहि, नदि माइस मंदिरना गमर ॥ ३ ॥ १० ॥ विदो पोल थैमाणी पाल नरि, रखे सेठ सो दिसगीरोर ।। माहरी - १५५ पासे नथी कांइ दोकडा, कुण जाणे पराइ पीरोरे ॥ ४ ॥ सा० ।। तिहां रान पडी वी आयम्यो, चिंतातुर थइने सुतोरे । तव मेघाने आवी इम कहे, महणा माहे जक्ष एकंतोरे ॥ ५ ॥ सा० ॥ हवे सां- भल मेघा हूं कहुं, आवसे गोडीपूर गामरे । माहरो देहरासर करजे जीहां, उत्तम जोइने ठामरे ॥ ६ ॥ सा० ॥ तुं ज्याजे दक्षिण दिस भणी, तिहां पडयूं छे नीलं छाणरे ॥ तिहां कुवो उमटरये पाणीनो, बलि प्रगटसे पाणीनी खाणरे ॥ ७॥ सा०॥पासे उग्यो छे उज्वल आकडो, ते हेठल धन छे बहुलोरे ॥ तिहां पुरयो छे चोखा तणो साथीओ तिहां पाणी तणो कुओ पोहलोरे ॥ ८ ॥ सा० ॥ . ॥ हाल ॥ सीता तो रुपे रुवडी ॥ ए देशी ॥ सीलावट सीरोही गामे, तिहां रहे छे चतुर छे कामे हो,सेठजी सांभलो ॥ रोग छे तेहने शरिरे, नमणुं करी छांटो नीर हो ॥१॥ सेठ । रोग ज्यासेने सुख थासे, बेठो इहां काम कमासे हो । सेठ. । ज्योतीकनीमीत जीवरावे, देहरा सरपाइओ मंडावे हो ॥ २ ॥ । से० ॥ ते जक्ष गयो इम कहिने, करे सेठजी उध्यम वहिने हो । से० ॥ सीलावटने तेडावी, वली धननी खाण खणावी हो ॥ से० ॥३॥ गोंडीपुर गाम वसावे, सगा साजनने तेडावे हो ॥ से० ॥ इम करतां बहु दिन वीतां, थयो मेघो जगत्र वदीता ॥ ४ ॥से०॥ एक दीन साकाजल आवी, कहे मेघाने वात बनावी हो ॥ से० ॥ ए काममां भाग अमारो, अर्ध ताहरो हो । से० ॥ ५ ॥ इम करि - १५६ चारा सरकरिए, मो भगमा अस परीए । से॥ब मेमो कई तेने, खे दाम मोहए ले करने हो । से० ॥ ६ ॥पारसनाप बनें मुपसाये, पणा दाम के पसी मादी दो ॥से० ॥ एक दिन केोता सुमे, आवे ए पपर कीणे कामे हो । स० ॥७॥ोष बसे पाण वसीमो, मापणापानगरमा मसीमो ॥ से० ॥ सा काना मन पिते, मारूं मेघो तो निमिवे हो ॥ से० ॥८॥ ॥ ठाम || नेपीसर मगमप करे सोल। (ए देशी) परणाई पुत्री मारीर सोल, वेरीने सेणीपारर । परनर ॥ नात गमाई मापणीर सोस, सरचीने पन मपाररे ॥ ५० ॥१॥ सांभलमो भोवामनोर लोग, जो मेपो मारु तो सरिर सो, वो एम उपजे कराररे ॥ १० ॥ देवप कराई हुमबीर मो, तो नाम रहे नीर पाररे ॥ १० ॥२॥ म चिव पिसबी पीराइनोरे मोल, कर का जस सतकासरे ॥ १० ॥ मगा सामनने देगरीयार सो, गोरीमा गापे घमासरे ॥१०॥३॥ सा०॥सा मेघा मणी नोवररे लोर, मोकले कामाल सादर ॥ प० ।। भीगा उपर भाग्योर स्रो, मर उप करिने भारि ॥१०॥४॥ सा० ॥ इस सामसी मेयो निस मेरे सो, किम करि भइए त्याहिर ।। प० ॥ काम ममा के पर्युर मो, देहरासरन माहिरे सो । प० ॥५॥ सा० । वन मेपो को सानरे मो, लेटी नामो परिवारर ।। १० । काम मेसी कीम मा पीपेर सो, वे माणो नीरधारर || १० ॥ ६ ॥सा० मरगा दन मेरीनेर सोल, पुत्र कसय परिवारर ॥१०॥ मेपाना सह सायनर 7 १५७ लो, तेडी आव्यो तेणीवाररे ॥ च० ७ ॥ सा० ॥ सांभल काजल कहे मेघो कीहारे लो, इहांना आव्या सामाटरे । च० ॥ तो मेधा वीण कीम सरेरे लो, नात तणी ए वाटरे । च० ८ ॥ सा० ॥ -- ॥ दाल नंद सलूणा नंदनारे लो. ।। ए देशी ।। जक्ष कहे मेघा भणीरे लो, ताहरे हवे आवी बनीरे लो ।। का- जल आवसे तेडवारे लो, कुड करी तुने छेतडवारे लो ॥१॥ तु मतजाजे तिहां कणेरे लो, जेहेर देइ तुजने हणेरेलो ॥ तेडया वीण जाये नहिरे लो, तो प्रभू नमण लेजे सहिरे लो ॥२॥ दुध माहे देसे खरुरे लो, नमण पीधे जासे परुरे लो ॥ ते माटे तुजने कहुंरे लो, माने वचन महामणुरे लो ॥ ३॥ गयो जक्ष कहि ते हवेरे लो, काजलसा आव्या ए हवेरे लो ॥ कहे काजल क्रमे सांभलोरे लो, आवो मेली आमलोरे लो ॥४॥ तुम आव्या विण कीम सरेरे लो; नात जातमां सोभीए किणी परेरै ला, तुम सरीखा आवे सगारे लो; तो अम मन थाए उमगारे लो ॥ ५ ॥ हूं आव्यो धरती भरीरे लो, तो कीम जाउं पाछा फरिरे लो ॥ जो अमने कांइ लेखवारे लो, तो. आडो अवलो मत देखवोरे लो ॥६॥ हठ करी बेठा तुमेरे लो, खोटी थइ ए छे अमेरे लो ।। मेघो मन चिंतवेरे लो, अतीता' कीम पुखेरे लो ॥ ७॥ काजल साथे चालीयोरे लो, भुदेसरमां । आवीयोरे लो ।। नमण वीसारयुं तिहांकणेरे लो, भावीवस्य आवी बनेरे लो ॥८॥ -- १५८ ।। रास ॥ कापीस रोपाणी सागणो ।। ए देनी ।। नात नमार मापणी, पेइने पहु मान वर कन्या परनावीयां, दीपां पहुसो दान ।। १ । कामस को नारी भभी, मघो अमे मेसा ॥ विमण देणे विप मेसीने, दुममा मांविण पेला ॥२॥ दुप समीठे मासरी, तुमने ई कहि मरीसे । मेपाने मेसो नदि, मीस्प ममण पीरस्पे ॥ ३ ॥ म नारी को पीरमी, मेघाने मन मारो || कुसमा लाग्न लागस्य, जास्ये पांच माकारो ॥ ४ ॥ कामस वे माने नही, नारि काीने हारी || मन माग्यो मोवी धाग्यो, वेदन ना साग कारि ॥ ॥ इम सीलवी नीम नारीने, भीमपा बहु मठा में मेरा एकण पालीप, रखे हेठा ॥६॥ म माम्य तिण राणीए, मीस्प पाली माहि || कामल को मन मामी, पीपो मेघे स्पाहि ॥ ७ ॥ मेघाने पे ववस्तीणे, मिप घ्याप्यु भंग ।। स्वा- सोवास रमी गया, पाम्पो गति स्पु रगे ॥ ८ ॥ - ॥ स || फोहर गुणवीरे माहरियोगणारे ।। ए मना ॥ मामी पगादे पीउन देखवर, रोति को विणार॥ पा महीयोने सेरी से पण पेह नणार, मवि पशु करे पोकाररे ॥ १।। फीटइल रिमा ए सेसु फरयु र, नापी सान लगाररे ॥ मुस्तकिम देखारिस सोकमार, सुजने पडो धिकार ॥२॥ फी० ॥ वीरता न न नाम मन पाए र, सारी मानीनु हुणस हसरे ॥ भार ना फरम प छाम्यं नहि र, पडि दीसे में सन माकरे ॥ ३ ॥ फी० ॥ एला - १५९ लखीया ए छठी अक्षरारे, तो हवे दीजे केहने दोसरे ॥ नीरधारि मेली गयो नाहलोरे, कहिए न कीघो मुजने रोसरं ॥ ४ ॥ फी० ॥ इम विलवंती मृगादे कहेरे, वीरडा ते तोडि माहरीरे आसरे ॥ तु- जने किम उलल्युं एहबुरे, जीवीस तीन पंचासरे ॥५॥ फी० ॥ कुड करिने मुजने छेतरीरे, ते कीधो मोटो अन्यायरे ।। माहरा नान- कडा वालुअडारे, केहने मीलस्ये जोइ ध्यायरे ।। ६ ।। फी० ।। अ- धविच देहरा रह्या आजथीरे, जगमां नाम राख्यु नीरधाररे ॥ नग- रमां घरोघर वातो चीस्तरीरे,सहु कोना दील माहि आव्यो खाररे ॥ ७ ॥ फी० ॥ वेश राखीने मेघो मारीओरे, ए तो काजल कपट भंडाररे ॥ मननो मेहेलो दिठो एहवोरे, दुम भणे नरनाररे 11८ }} फी० ॥ - ॥ ढाल ।। पुरव मात पुण्ये पामीए (ए देशी.) बेहनी अगनि दाह देइ करी, आव्या सहु निज ठामहो । बेहनी काजल कहे तु मत रोए, न करूं एहवो काम हो ॥ १ ॥ बेहनी लेख लख्यो ते लाभीए, तो दीजे केहने दोमहो ॥ बेहनी जन्म जरा मरणे भर्यो, तो राखयो शो सोसहो ॥२॥०॥ ए संसार छे कारमो, खोटो माया जालहो ॥ एक आवे ठाली भरी, जेहवी अरहटनी मालहो ॥ ३ ॥ ३० ॥ सुख दुःस्व सरज्या पामीए, नहि कोदने हाथहो । वे० ।। मत करे फीकर तुं आजथी, वहुली आपणी हाथहो ॥ ४॥ बे० ॥ खावो पीवो सुख भोगवो, मफरो + १६० पीकर गार हो ॥ ५० ॥ जे मोरए वे समने कहो, न करो दिलमा विधारहो । मे० ॥५॥० ॥ नीननो मासाद करायम्, महिवत रासस नामहो । जव आपणा पर सगी, कीम करिमो हुँ कामहो ॥०॥ ६ ॥ ० ॥ सोराने हाये मुपसु, गोदिपुर गामहो ।०॥ पालो मापण सह मली, ईसा भाष दामो ॥ ये० ॥७॥०॥ अनुक्रमे आम्या सा मसी, गोरिपुर गाम मोझारसे । मीननो मा- साद करापीमी, कानमसा विणपारो ॥ ० ॥ ८ ॥ ० ।। ॥ बाल कोरेसणों परदेरे ॥ ए देशी ॥ देहरे सीस्वर पसा मो, पिर न रो विममार | रामल मनर्मा मितपे, पे करमुं प्रकार ॥१॥ मविफमन सभिलार ।। धीमी पार परापीमा, परगा तवकास ॥ सुरणा मार मक्ष आपीन मराने फहे म् पीसाम ।। २ ।। भगा तु पाप नाइन, पिर स्पे सीर रापानमन मस कीम रोष, मेयो मारयो सेर ।। भगा ॥३॥ सेहर सीम्बर चारापीमो, नाम रास्यं जगाति । मुरति यापी पासनी, संघ आप सणरे ॥म ४ ॥ संपत बौद पाँमानमा, प्रविष्टा कीप । मरिमा महरो मेया वणो, नेणे जगा जस सीप ॥म० ॥ ५॥ देशी परदेशी घणां, माप साफ मनेफ ॥ मारपरि मगर्नक्ने, माणी मपिप पिवेक । म० ॥ ६ ॥ सरपे दम्प पर्णा विरा, राप राणा विणार ॥ मानव माने सासनी, टाले कष्ट अपार ॥ म० ॥ ७॥ नीरपनीमाने पन दीए, अपधीयाने पुत्र माप ।। रोगीने निसार रोगी, टाले दासीद दे सत्र ।। म० ॥ ८॥ .
१६१ ॥ ढाल ॥ अम घर आंवो मोरीओ ॥ ए देशी ।। आज घर रंग वधामणां, आज त्रुठा श्री पारसनाथ ॥ आज चिंतामण आवी चढयो, आज सफल फली सवीआस ||१॥ आ० ।। आज सुरतरु फलीओ आंगणे. आज प्रगटि मोहनवेल । आज वीछ- डीया वालां मल्या, आज अम घेर हुइ रंगरेल ॥ २ ॥ आ० ॥ आज अम घर आंवो मोरीओ, आज त्रुठो सोवन धार ।। आज दुधे वृठां मेहला, आज गंगा आवी घर वार ॥ ३॥ आ० ॥ आज गायो गोडिपुर धणी, आ नगर ते महियल माहे ॥ चोमासो कीधो चुपसू, श्री संघ केरे उछांहे ॥ ४ ॥ आ० ॥ श्री हिरविजयसूरिसलं, तेहनां शुभविजय कविसीस ॥ तेहना भावविजय कवी दीपतां, तस सीस नमुं नीस दीस ॥ ५॥ आ० ॥ तेहना रुपविजय कविराजनां, तेहना कम नमुं करजोड ।। वली रंगविजय रंगे करी, हुं तो प्रणमुं प्रणत करजोड ॥ ६ ॥ आ० ॥ आगा संवत अढारसतलोतरे, भाद्र- वमास उदार ॥ तिथि तेरस चंद्र वासरे, इस नेम विजय जयकार || ७|| आ० ॥ ॥ इति गोडी पार्श्वनाथ स्तवन संपूर्ण ।। ॥ अथ श्री पर्युपणनी स्तुति लि०॥ पर्व पजुसण पुण्ये पांमी ॥ परिघल परमाणंदजी ॥ अति आडं- वर ओच्छव सवला ॥ धरी धरी बहु आणंदजी ॥ सासन अधिप- तिजीन पति विरइ ॥ पर्व तणा फल दाख्यानी ॥ आमरति तणा ढंढेरा फेरी || ना गाती ॥ 9 ॥ - ---
१६२
मासी ॥ षयन पदे फसालीमी ॥ पुरपनोसा मरोरप मारां ॥
निरुपम पर्व निरालीजी ।। पिपय मांस पफान फरीने ॥ संघ सयल
सतोपोमी ॥ चोपीस मीनवर पूमा रपाषी ॥ पुज्य पमित्र पर पो
पोमी ॥ २॥ सफल मुत्र सिर मुगट नगीनो ॥ पल्पसूत्र नग जा
गोमी ।। वीर प सनेमीसर भवर ॥ आदी घरीष पखांणोमी ॥
यीरामपीने सामाघारी ॥ पावली गुण गेहमी । इणी पेरेमुग्र स
पिस्तर मुंणता ॥ यांन सपन निम दामी ॥ ३ ॥ इणीपरें पर पजु
सण पाली ॥ पाप पनि परारीएमी ।। उमछरी परिकमणु करा ।।
फरपाण मग परीएमी ॥ यक्ष गोमप्प पकेसरी देवी ॥ माण
मद्र अमादमी ॥ भी मुममिमय फपि शिप्प समरने ॥ निसिग्नि
करो पपाइमी ॥४॥ इवी पजुसण स्तुति समाप्त !
।। अय पमुसगनी योइ सिम्यते ॥
नीन भागपमें चोपरगी गाइ । बिम्प चोमासा चार मठार ॥
पनुसण सपाइ ॥ ते ए मम दिन भाष्पा माणी । उठो आलस
छोटो माणी । पर्मनी नीक मंडाणी ॥ पास पढीक्मणां करो
माइ ॥ मासखमण पाससमण मठार ॥ फल्प मठम मुख मार ॥
दान दया पुना नमुरीनी ॥ पापना मुणीए कल्पमुत्रनी ॥ मामा
पीर जीनबरनी ॥ १ ॥ सामसी चीरनु परीत्र मिनाल ॥ पन्न
स्वमे मन्मा उनमात ॥ ननम महोऊन उजमाल ॥ आमलकीर मुरने
ने राम्पा ॥ दीक्षा लेइ केपम उपनायो । भगीयस गमसे माम्पो
१६३ a) पासनेमी संबंध साभलीए ॥ सहु जीननां आंतगं सांभलीए ।। आदी चरित्रमा भलीए ॥ वीर तणा गणधर इग्यार ॥ थीवरालीनो सुणो अधिकार ।। एकरणी भवपार ॥ २ ॥ आसाढिथि दिन पंचास ॥ पजुसण पडिकमणुउ दत्रास ।। एकउणु पणीभास ॥ सामाचारी साधुनो पंथ ॥ वस्तै जयणा एनि ग्रंथ ॥ पाप न लागे अक्ष्य ॥ गुरु आणाए मुनिवर राचै ॥ रागी घरे जड वस्तु न जाचै ॥ चाले मारग साचे ॥ विगय खावानो संचआणे ॥ आ मम सांभलतां सर्व जाणै ।। श्री वर्धमान वखाणे ॥३॥ कुमार कानमां कांकरी चंपै ॥ वीडाइ शुदत्रक तणु कंपै ॥ मीछामी दुक्कई जंपै ॥ इम जे मन आंमला न चीछोडे । आ भव परभव दुःख बहु जोडे ॥ पडे नरकने खाडे ।। आराधीक जे खमये खमाये ॥ मन सुद्धे अधिकरण समावै ॥ ते अक्षय सुख पावै ।। सिद्धा एकासुरीनीध्यकारी || श्री महीया प्रभ- सुरी गछधारी ॥ भाव रतन सुखकारी ॥ ४ ॥ इति श्री पजूसणनी थोय समाप्त ॥ ॥ अथ श्री पजुसणनी थोय लीख्यते ॥ पुन्यवंत पोसाले आवो ॥ परव पजुसण आवी वधावो ॥ धर्म- ना पंथ चलावो ।। घाचीनी घांणी छोडावो ॥ जीव वंधणनी जाल छोडावो ॥ बंधीवानना बंध खोलावो ॥ आठ दिवस लगि अमर पलावो ॥ स्वामी वछल मेहेंल कढावो ॥ जीन सासन दीपावो ॥ पोसा पडिकमणां सक्ति भावो ॥ काम कपाय अंतरथी टालो ॥ श्री १६४ पीरमीणवनी पूजा रवाशे ॥१॥ पुस्तक र राति जगो विचे ॥ गामीत्र पानी गुस्ने दीजे ॥गहुँली सेवक गाइने || कसप सुत्र आ रंग मसाण ॥ पीर जन्म दिन सउको मा ॥ निशाले गरj ो ॥ सांरपा पेंडा पवासां ॥ खटिना रेसस्मिाना लीयोरीलासा ॥ परमावना रसास्या पीर पणो पहिलो अधिकार ॥ पासे नेमी- जीन मंतर स्पार ।। माद चारित्र सुमे पारो ॥२॥ जपुनी पाटें प्रम- म्य गुणमन परिये ॥ भी संभप गुण परीये । जुगस पकीर उप- रीये ॥ स्या घेरें पोमासु रणा ॥ असद सियस दरांमण दिर्घा ॥ पुली भद्र नाम पण सीपा । पारण गायु बालरीया ॥ सामसर्ता ससपासक परिया ॥ वीर स्पामि परीयां ॥ इम पीरापली भापी मेह ॥ सहस समिसतानु । फलप मांह मणीये एा ॥३॥ जसमस रुपावाद माहासो ॥ पुमी पोथी मान पिरारा ॥ उममी सांग समालो ॥ इस पूजा की गुरु मगे ॥ समरीमा मन सु रंग ॥ पारसे सुणो एक अग ॥ सासु अमाइने अली चारली ॥ज्मरी माई सामसीमा ॥ भवणे पापम टलीर्मा ।। ए भर पर- मा किजे करणी ॥ सीपद मेोस पाणने पटणी ॥ सीमाम्माहा दुख परणी ।। ४ ॥ इति चोय संपूर्ण । ॥ मय फसापतीनी समाय सीस्पवे ॥ नगरीकोसंपीना रामा कहीए ॥ नाम पे संपराप ॥ येन मणी ने मेरसा मोफस्पा ॥ कर्मे से भाइ न कापायर ॥ फला- १६५ चतीरे शीरोमणी नार ॥ ए आंकणी ॥ १॥ पेलीने रयणी राजा मोले पधारा ॥ पुछे बेरखडानी वात ॥ कहो ने स्वामी तमे बेर खडा गमाव्या ॥ सरखी न राखी नाररे ॥२॥ कलावती० ॥ चीजीने रयणी राजा मोले पधारा ॥ पुछे बेरखडानी वात ।। कोते तपने बेरखडां गमाव्या ॥ तु नथी सीयलवती नाररे ॥ कला० ॥ ॥३॥ गणुं जीगेरे जेणे बेरखडां घडाव्या ॥ अवसर आव्यो तेह अवसर जाणी ॥ जेने बेरखडां मोकल्यां ॥ तेमे पेरां छे एजरे ॥४ या कलावती ॥ मारे मन तेहने हु तेने मन ।। तेने मोकल्यां छे एज ।। रातदीवस मारे हैडे नविसरे । दीठे हरखन मायरे ॥५॥ क- लावती ।। एणे वचने राजा रोषे भराणो॥ तेडाव्या सुभट बेचार सुकी नदीमां जो छेदन कराव्या ॥ कर लइ वेलोरो आयरे ॥६॥ कलावती ।। बेरखडां वांची राजा मनमां वीसे ।। मे कीघो अपराध ॥ वीण अपराधे मेतो छेदन कराव्यां ॥ मे किधो अन्यायरे ॥ ७॥ कलावती ॥ एणे अवसरे राजा धान न खाय ॥ तेडाव्या राय बे चार ।। रात दिवस राजा मनमां विमासे || जो आवे सीयलवंती नाररे ॥ ८ ॥ कलावती ।। सुकां सरोवर जळ लेहेरे जाए ॥ वृक्ष 'नव पलव थाय ॥ करनव आवे ने मा बेटो धवरावे ॥ इमने सीयल तणो महीमायरे ॥ क० ॥ ९ ॥ एणे अवसर महावीरजी पधारा पुछे पुरव भवनी वात ॥ स्यास्या अपराध कीधा हो प्रभुजी ।। तेमने कहोने आजरे ॥ कलावती० ॥१०॥ तुंरे हती वाइ राजानि कुंवरी एहतो सुडानी जात ॥ सेजे सेजेरे तेंतो वाणज मायु ॥ भागी न्सुडानी पाखरे ॥ कलावती० ॥ ११ ॥ तमे तमारी बस्तु संभारो १६६ ॥ माहारे समम केरो भाष ॥ दीक्षा से माहाविरनी पसि । पोच भु मुक्ति मोझारर । कलामवी० ॥१२॥ पुत्र हवा से रायने दीयो ॥ पोते सीषो सनम मार ॥ समय सुंदर मनी एणी पेरे भणसे ।। मस मापा गमण निवाररे । वारो मन पारर ।। फसापती॥१३॥ इति सपूर्ण ॥ इति चंदन वाला गीत सिसयवे ॥ कोसाम्पिवे नगरी पपारीमा । पहोरपा वे भी महावीर ममीग्रोर इम पीसयो । समे शु माणो नगदीश हो स्वामी ॥१॥ मामणी एम हा सठगुरु ।। कोरसान दाहादसे ॥ मुनि ममता घर घरमार ॥ मुखडी गवर संकी मेसा ॥ एतो मनमा न आणे सगार भो ।। स्वा० ॥२॥ राजाना मोल लगा गया ।। स्टी वे पापोल ॥ निज यानिक मापी रमा ॥ स्पांवो रायी घोटाना गम हो। ॥ स्वा० ॥२॥ सनाना मोष लगा गया ॥ मुनी करी घेर जाय ।। सोपाय कमेटी पाए ॥ त्यांतो दीठा ऐ चंदन पाल हो ॥ स्पा० ॥४॥ पदनासा पारणे हेठी नवरा तो संपे पटानीने सा गयो ॥ एतो पोले में कडयो पोस ॥५॥ स्वा० । माइ सुमार घेर योडली ॥ हुई मारो नाथ ॥ एषा परन भ्यारे समिम्पा । एरले भारणी कीपो फाल हो ॥ म्या० ॥६॥ मीम फपरीने मरी गपा ।मरा न सागी पार ॥ पतो मरी गपा पवकास हो ॥स्सा- ॥७॥खरेयी हेग परया ॥ टपरले वे पैदनवास ॥ बाद तु मारे ॥ १६७ घेर वेटडी ॥ हुँ छु तारो तात ॥ वाइ न करीस आपज घात हो । स्वा० ॥ ८ ॥ खंधे चढावी लेइ गयो । गेर छे चेतानार ॥ जाउरे वजारमा वेचवा ॥ नकर जाइराज पोकार हो ॥ स्वा० ॥९॥ खंधे चढांवी लेइ गयो ॥ वेचे ते वजार मांही उभी करी ॥ एतो मुलवे चेइयां नार हो ॥ स्वा० ॥ १० ॥ लाख टका बाइ मुलवे ॥ मो माग्यां ते आपां मुल ॥ लाख टकाना बइ अधलाख ॥ बाइ तम घेर केवो आचार हो ॥ स्वा० ॥ ११ ॥ राग ठाठ बनाववा ।। करवा ते सोल सणगार ॥ हीचोला खाडे हींचवा ॥ अम घेर चाववा लेइ पान हो । स्वा० ॥ १२ ॥ मारो भठ पडयो अवतार हो । मे स्यां करां तां पाप हो ॥ पेला समर्या भगवंत हो ॥ मेना आराध्या अरिहंत हो स्वा० ॥ १३ ॥ में तोडी पुन्यनी पाल हो ॥ आकास उभा दे- वता ॥ साभले ते एवा बोल ॥ एने उलटीआ व्यंतर वानहर हो ॥ स्वा० ॥ १४ ॥ आंख नाक वलुरीयां एतो ॥ एतो नासी गइ तन- काल हो ।। खांधे चढावी लेइ गया ॥ वेचे ते बजार मांही ॥ चौ- टामां उभी करी ॥ एने मुलवे सुदरशन शेठ हो ॥ स्वा० ॥१५॥ लाख टकारे वाइ मुलवे ॥ मो माग्या ते आपे मुल ॥ लाख टकाना बाइ अधलाख ॥ भाइ तमघर सो आचार हो । स्वा० ॥१६॥ पोसा प्रतीक्रमणा अती घणा ॥ आंवीळनो नही पार ॥ अपवास एकासणा नित करवां ॥ अमघर पाणी गलवां त्रणवार हो । स्वा० ॥ १७ ॥ मे आराध्या अरिहंत ॥ में समरा श्री भगवंत हो । मे वांधी पुन्यनी पालहो । शेठ वखारमाथी आवीआ । स्वा०॥१८॥ धुये ते सेठना पाप ॥ मुल ए मनमां चिंतव्यु एतो नीस्व करीने रा- १६८ स्वीरो॥राये वे घास्पा सफला ॥१९॥ सा० ॥ पगे ते घासी हेर ॥ मस्तके संध्या पेणीना फेश ॥ अनेया गुप्त दार हो ॥ पटेल सो दाहाये बीहा ययु ॥ क्यो गर ते चदनबार ॥ सरसी सैयरो ।। एतो परमा न भाषे लगार हो ॥ २० ॥ स्वा० ॥ बीज के दामो स्पा गयो || पपा गा वे चंदनवास ।। वने एन मोरे पापी मेली ॥ एवो क्यु न माने एगार ॥ २१ ॥ सा० ॥ श्रीमो वाटो तिहा पयो । यो गा बानपाल ।। दमे एने सारवाइ फरी मेमी ॥ ए वो सातरमो नमोने सगार हो । स्वा० ॥ २२ ॥ योयो वे वाडो त्या ययो । क्यां गइ पदनपाल || भेठे वे कान्यो कटारसो रखे मारीशमारे पेट हो । स्वा० ॥ २३ ॥ मुलानाशा गा ववकास हो ॥शेठे पागेसीने पुछीयं ।। क्यां गा से पंदनवास ॥ हापे से मासा दशकलां ।। पगे पाली हेर । मस्तकें मयारे पीणी केश हो॥ एमने घायर्या गुप्त दार हो । स्वा० ॥ २४ ॥ शेठे ते वासा मागी मां ॥कारया पंदनवास ॥ पने सारी उमरा माही ॥२५॥ सा० ॥ सुपर खूणे पाकुसा वेसारा वे परमाहा ।। ऋग्मी माय समारने वेदना हो ॥ २६ ॥ सा० ॥ मासीने पारणे ॥मुनी ममे दे परेघरे भात ॥ सपही मोगमार वीहां मली ॥ पण न दीी मा मुनी पार से । २७ । स्वा० ॥ स्यांपी से प्रम पाण पल्पा ।। पीस से पानयास || मारो मठ पो ममतार रो ॥ मे स्पा कीपा खां पाप ॥ स्मा० ॥ २८ ॥ मेना माराव्या मरिरव हो । मेना समरा मगत रो॥ मे तोरी पुन्यनी पास हो । वा० ॥ २९ ॥ सनी पार पसी नोमु दीगे से मा पार ॥ सपसी मोगवाद विहां १६९ मली ॥ त्यांतो वोरावे चंदनवाल हो ॥ स्वा० ॥ ३० ॥ अठम केरे पारणे । वोरावे ते चंदनवाल ॥ वोरावी करो तमे पारणुं ॥ तमारो सफल हुओ अवातार हो ॥ ३१ ॥ स्वा० ॥ हाथे ते थयो सोना चूडलो ॥ पगे थइ सोनानी हेड ॥ मस्तके थया वेणीना केश हो । सेथो थयो मोतीनी सेरो हो। स्वा० ॥३२॥ शेठ लवार तेडी आविया शुं थयुं ते चंदनवाल ॥ पीता तुं मारे पसाय हो ॥ एटले आव्या मुनी माय हो ॥ शु थयुं चंदनवाल ।। माता तुमारे पसाय हो । स्वा० ॥ ३३ ॥ दश देशना राजवी ॥ चंदनवालाने त्यां जाय ।। त्यां कणे वार करोड वत्रीसनी वृष्टी हो स्वा० ॥ ३४ ॥ त्यां कणे अठाइ महोच्छव थाय हो ॥ त्यां कने देवताइ वाजां वाग हो । त्यां तो नाटारंम हो थाय हो । त्यो लब्धि विजयगुण गाय हो । स्वा० ॥ ३५ ॥ ॥ इति चंदनवाला गीत समाप्त ।। || सझाय ॥ गुरु सन मुख रही विनय विवेके ॥ इरिआ वहि पहि कमिएजीरे ॥ आ भव परभव पातिकहणीए । गुण श्रेणीए चढीए सुत अनुसरीएजी रे ॥ तरिए आ संसार पातिक हणीएजीरे ॥ सद गुरुने आधार पार उतरीएजीरे ॥१॥ खट अक्षरनो अर्थ सुणीने ॥ जाणीयुं मस्तक डोलेजीरे ॥ मिछामी डोकडंनि युक्तिए ॥ भद्र बाहु गुरु बोले । सुत ॥ २॥ पुठवी अप तेंउ वाउ साधारण । तर १७० बादर मालम्भीरे ॥ प्रतेक तरु निगल दीपनया || अपनता मस्वीच ॥ मत ॥ ३ ॥खे पंद्री जम यर खेपर ॥ उर पर मम परिनिसे गीरे ।। गरम समुठी मेद पमता ॥ अपनवा ए पीस ॥ मुत॥४॥ नारकी साये पम भपमा ।। पर मेद मन पारोमी रे ॥ फर्म समी अर्म मुमीना ॥ पनरविस पीचारो ॥ सुत ॥ ५ ॥ रुपन अवर पीपना माणस | गर्म समसम मेदेजीर ॥ वे अपमवा पनवा गर्मज || प्रणसे सणसीमेदे ॥ सुत ॥ ६ ॥ मपन पती दश स्प श्रीममक ।। पभर परमा पामीमीर ॥ पंवर सोसने मोतिक दस सण ॥ किम मिस्त्रीया सुर पामि ॥ सुव ।। ७ ॥पार सरगने नव लोकांतिक ।। नप प्रेवेक पंप मनुतरनामीरे ॥ ए नपाणु पमता अप नता ॥ एकसो अठाणु मरना ॥ मुत ॥ ८॥ अमिया मादे दस पद साये। पांचसेने सेठ गणवांनी रे ।। उपनसे ने प्रीस यया ते ॥ गगने ये रणवां ॥ सुख ॥ ९॥ अगियार सासने पसे सठि । मन पचन काया तिगुणामी रे ॥ वेत्रीसहस अने सावसे पसि ॥ से पली मागळपि गुणा || सुख ॥१०॥करे फरावे ने भनुमोदे ॥ एक लाल तेरसे पासीशमी रे ॥ प्रण काण सुगण वादित मल ॥ पार हमारने विष ॥ मुत ॥ ११ ॥ केवस सीप मनी सुगुरु आवम ॥ गुमा सास मगरमी रे ॥ चोनीसासने एफसो पीस । सरपाले मयभारो ॥ सत ॥ १२ ॥ छठे बरसे दीक्षा सीपी ॥ नममे केवल पारवामी र ॥जस मीटा करता मामयो ।। नीपरनी पसीहारी ।। सुत ॥ १३ ॥ इम कही साधु भाषक पाति- क ॥ दाली लहे. भव पारजी रे ॥ श्री सुभवीरनुं सासन वरते ।। एकवीश वरस हजार ॥ सुत ॥ १४ ॥ ईति. ॥ अथ चंद्रावतिनी सझाय ॥ जस मुख सोहे सरसति माय ॥ प्रणमी वीर जीनेश्वरराय ॥ साधु सहुको सुंणज्यो एह ॥ मंत्र यंत्र तंत्रादिक तेह ॥ १ ॥ वैधक पोतीक कूटी कर्म ॥ मृखथी न कहिये एहनो मर्म || अनस्थ उपजे तेहथी घणां ॥ जेम एहथी मूवां पांचे जणां ॥२॥ कुंडलपुर खत्री एक ठांम ॥ भीमसेन छे तेहनो नाम नारी तेहनी चंदावति ॥ दोसन दीसे तेहमां रती ॥ ३ ॥ चंदावती मृकी घरवार एक दीवस ते थयो असवार ॥ चाल्यो चतुर ते कींक मझार ॥ चंदावती ते करे वीचार ॥ ४ ॥ एक मने जो किजे धर्म ॥ तो नीकाचीत छूटे जे कर्म ॥ घर पासे तिहां मुनिवर रहे ॥ चंदा- वतीने धर्मज कहे ॥ ५॥ प्रतिवोधि कीधि श्राविका ॥ थई ते जिन शासन भाविका । वहोरण गया तेह मुनिराय ॥ चंद्रावती ते प्रणमी पाय ॥ ६ ॥ नयणे नीर झरे ते घणुं ॥ दुख देखी हवे आपणुं । घणा दीवस पीउ चाले थया ॥ खर्चि वजे मेली नवी गया ॥७॥ दीन वचन तेहनुं जव सुंण्यो ॥ दुख थयो ते मुनीवरने घणो ॥ जो. स जोइने कर्यो विचार ॥ दीवस सातमे आवे भरतार ॥ ८॥ जोस जोइने मुनीवर वोल्यो । कहेल दिवसे कंतज मल्यो । त्यारे खूसी थई चंद्रावती मंन ॥ तेणे रांध्यु सुंदर अंन्न ॥९॥ प्रथम प्रति लाभो मुंनीराज ॥ नीमित कही सारो मज काज ॥ भीमसेन मन १७२ भरके बोस्पो-ए पाबंदी एएने मल्यो ॥१०॥ एने पर्ख मायं भन्न ॥ नो ए मेहुरो एकम मैन । सडग कारी मारवा घस्पो॥ देसी पनीनर मनमा इस्पो ॥ ११ ॥ नारी को नवि कीजे रोस । ईणे मकाभ्यो ताइरो भोस।वे मारे में मा' मन्न ।। मणी पपन सुमे पारो मन ॥ १२ ॥ मोमोस सनियर मतकास ॥आ घोरी स्य मणसे पात || जोस जोक्ने फहे वकास ॥ वो मेग्ने उपजसे काल ॥ १३ ॥ भोस मोइने मनीपर मम्पो ॥ चदर बपे रपो घोरी वणो । घोसा पगने रातुं मम ।। सीसपट टील के तुरंग ॥ १४ ॥ मुणी पाम तेगे तक्कास दर पपेरी कारयो पास ॥ अनस्य देखी पदारवी ॥ पाल लाइ मा महासती ॥ १५ ॥ मीमसेन मन परीयो पास ॥ आप ह वो फरियो काम । इला पारे पुरखे तसे । दुख करना लागो वेटसे ॥ १६ ॥ में स् की काम-मन रय पार कीपा माग ॥ भन्न पाणी मनीमर परीहरी || कास कियो निस मन करी ॥ १७ ॥ एपादोस का घणा-मंत्र यंत्र संवादिफ वणा ।। के माया ममवा मोर ॥ पारिव नहि कसयो सोह ॥ १८ ॥ो दोप न प रती॥ कहो मनने सुधिपती ।। पणी परे सरको मनितर मणे ॥ोप रहित वे श्रीपपुर पर ॥१८॥ सापीक नामे परो रुप हुनो । घर पदो त निमित को फुल मा सुमो नीमीत म ममे ॥ पुम पारी छ। दुर गवि गमे ॥ २० ॥ सपगपतिमी रिस रिद ॥ पटोपर रिमयसेन सरिद ॥रल्पा आनंद पंटीव परसीस ॥ रसपिमयको मामगीस ॥ सपुर्ण समाय १७३ ॥ अथ भीलडीनी सझाय लिख्यते ॥ मरसामि सासण वीन ॥ मागु एक पसाओ । सतीय शीगे- मणी गायशुं । डीगामणराउ ।। वनो से अती रुयडो ॥१॥ तुमें साहस धीरा ॥ भीली चाली खेलवा ॥ इह वनय मजारो ॥वनो ॥ २ ॥ भीली कहे स्वामी सुंणो ॥ मारो वचन विचारो ॥ फल खावा अमे जाइशु ॥ इह वनय मजारो ॥ वनो ॥ ३ ॥ भील कहै गोरी सुंणो ॥ इह वनय मत जावो । कोइ पुरुष तने देखशे । डीगामणरावो । वनो ॥ ४ ॥ अंग अमारो नही आभई ।। जैसो वसीओ हारो ।। अवर पुरुष मारे बांधवो ॥ मारे भीलज राहो ॥ ॥ ५॥ सामी तणो आदेश लही ॥ भीलडी रमण चाली ।। देखी वन रलीआमणा ।। भीलडी रमण लागी ॥ गनो ॥ ६ ॥डीगामण राय पालक चढयो । आव्यो वन मोझारो ॥ फल खावै तिहा रस भाखै ॥ देखै एकज नारो ॥ वनो ॥ ७ ॥डीगामणराय दष्टे पडयो । जव भीली नाठी ।। खमण खमण गुफा माहे ॥ भीली तर पैठी वनो ॥ ८॥ कैतु अपसरा देव कन्या ॥ के तुं देवल पुतली ॥ एक अचंभो मोहने । दीशे रुपस स्वरुप ॥ वनो ॥ ९ ॥ नहुँ अपसरा देव कन्या ॥ नही देवल पुतली ॥ जनम दीयो मोरी मावडी ।। रुप दीयो कीरतार ॥ गज गज गैले छातीआंरा दुखसै पायो ॥ जमननी वाली पदमणी ॥ वोलै अमृत वाणी ॥ वनो० ॥ ११ ॥ भला मुंड! मारा जुंपडा ॥ देखो अधिक वासो ॥ मोह स- रीखा राजवी कांइ ॥ मुंको निरधारा ॥ वनो० ॥ १२ ॥ भले भले १७४ मेरा पटा ॥ नही सप सगार ॥ वनपचन दमे कोदो सागशे पाप || बनो० ॥ १३ ॥ सास दास मृत भोमन ॥ निव नवसां वयोल ॥ पैरण पीस पटोलगं सो चकहोस । पनो० ॥ १४ ॥ मोजननो काइ सरावीमो ॥ रामा भरय अजाणो ॥ पैरण पान पोसटा ॥ मुज भीलम राणो । रनो० ॥ १६ ॥ भीम एण्या के फर प्या ॥ यह मग संसारी ।। सैइस पुरुप सेष्मा यणा ॥ नही पापना पायोरा ॥ बनो० ॥ १७॥ राय फरे परपान सुणो ॥ ए रुपै रुटी गरीने ॥ भीलडीने मार मंदीर माणो ॥ मनो० ॥ १८॥ परधान घरी नद आमीमो ।। सागो मीसदीने पाप ॥ राय कई प्राण तजु ।। मुं पर मोरी माप । पनो० ॥ १९ ॥ सुपयनी रामीमो ॥ तुन की पाप ॥ पचना पन तमे भयो | तुमन लागशे पाप । मनो० ॥ २० ॥ मेरु उगे तेरगु ॥ पश्मि उग भाण ।। सील मार नही सई । मो जास मन माण ॥ पनो० ॥२१॥ राय तु रंगयी उसपों ।। शगो मीलीने पाय ॥ बनना सपन घणा कमां ॥ पणा ते समग्यो मोरापो ॥ मनो० ॥२२॥ मेर पाग्यां भुगल पाग्या ।। पाया पदंग वाम ॥ मीली मदिर सचिरी ॥ परत्यो जय मनकार ॥ पनो० ॥ २३ ॥ आनद पन पसापी ए ॥ पागल रुदी ।। सीपलस को पायनो ॥ नही पार भीमटीने तोल ॥ पनो० ॥ २५ ॥ ॥ इति भीमहीनी समाप संपूर्ण ॥
१७५ ॥ अथ दीवालीनी सजाय लिख्यते ॥ वंदी वीरजीनेस्वर पाय ॥ गुरु गोयम गणधर राय ॥ तस निर्वाण अने वली नाण ॥ ते आराधे श्रावक जाण ॥१॥ मुक्ते पोतो वीरजीणंद । ओछव करे सुरासुर द्वंद ॥ कल्याणी कदीन भणीए एह ।। तपे करी आराधे तेह ॥२॥श्रावक मलीआराधे अढार आराधेपोशह आ- चार सोल पहोर साभले वखांण ॥छंडे रोग भोगते जाण ॥३॥ जीर्णी राते जीन मुक्ते गया ॥ अणु धरी कंथु आ बहु थया । तीणे का- रण गुरु आ रीपिराज अणसण लइने सरां काज ॥ ४ ॥ जीणवर साधु साववीतणो ॥ पडयो विरह ते कारण घणोतेह दीवस आवे जेणीवार ।। कहो केम थाय हरख अपार ॥ ५ ॥ तेजे कारण कीजे तप । घणो संभारीने कुल आपणो । पुजा करीए धरीए ध्यान ।। राग भीग परहरीए पान ॥ ६ ॥ कोइ जीव अज्ञानी जाण ॥ हरख धरे पापने ठाण ॥ मांडे मुल थकी आरंभ ।। खावा पीवानो प्रारंभ ।। ७ ॥ गहु पलालोवणविसेव ।। दीवाली आवे छे हेव ॥ करे लाडु ने सांकली। इंद्री रस वाहल फली ॥ २ ॥ तेम सुले माटी छाण ।। जगनाथनी भागे आण । दले खांडे नवी जयणा करे ॥ खाटकी साला पाचे वावरे ॥ ९ ॥ चोमासा माहि बहुला जीव ।। नील फुल कंथुआ अतीव ॥ कंगारी कीडी करोलीआ ।। राते अंधारे रोली- आ ॥ नाठी सान वासीओ कर ।। सामायक पोशापरी हरे॥ पान- फळ साडी सणगार ॥ अधीका कर तेह गमार ॥ ११ ॥ धनतेरस न्हाण उल्लास ।। जीव हणीने बांधे पास ॥ सेवो लाडवा हरखे जमे ॥ सील न पाले जुगटे रमे ॥ १२॥ घर सीपे कारे सा- यीमा । सान्या तस्सा जे फेइ मापीमा । पर्वतगी नवी सामे सार ॥ पठन्स भमावास्या धर्म सभार ॥ १३ ॥ पली नो जो अधिकां पाप || फुल फ्सन कर संताप || भागी गल जेषु फरे ये गल || ममि प्रनालिने मागे घेत ॥ १४ ॥ घर पर दीपा सीये फरे ॥पसा जीप ते माही भरे ॥ मेराइयांनु मोरे नाम ।। पर घर फरसा पर प्रणाम ॥ १५ ॥ पासी पीकम- णांनो कास ॥ ते दविसार मुरखपाल ॥ सर फावे श्रापक नाम || नवी नाणे सासन दुरूम ठाम ।। १६ ।। असाम दीपा परमराते ।। फारे अमछीने अम प्रमाते ॥ पउता कुर मिना नवी नमे ।। देखो लोक असाने ममे ॥ १७ ॥ गौचमस्सामी पाम्या मान । से इतणु पनीने नाम || मुहार भगरा परवा फर ।। सांजे सानन भणी सचरे ॥१८॥ परेर मोडे गहु सगगार, काम मोग पर्यो परि- वार ॥ संसी भाभी कर सकोमा वांधे फर्मन भय रावोस ॥१९॥ पछी वसी फर भाषीम ॥ सादा पीतां मारे रीम ॥ सस मंत्र यणा सापे मेह ॥ धर्म न आरापे प्राणी चेद ॥२०॥ दीवाली कल्पी नाम सा साजनने नमाडे वमाम ॥ भम केपसी फरे आहार ॥ नोमो लोफरणो म्यनार ॥ २१ ॥ मान्यो पर्म दीवस जर।। पापे करी पिरापे र ॥र्म निकाचित पापे पास ॥ एणी रीके रूस अनंतो फाल ॥ २२ ॥ ने मुक्ति मछे दुकरी ॥ वेनी मसी संपरमो पड़ी ॥ संसारीक मुल दुस सरूप । पानी समापे आ- १७७ तम भुप ।। २३ ॥ दोहीलों दीसे नरभव जेह ॥ तेहमांही दुर्लभ जीन धर्म तेह ॥ जीन वाणी ते दुर्लभ सुणे ॥ मीथ्या मतीने दुर्लभ हणे ॥ २४ ॥ तपगछ गयण विभासण भाण ॥ श्री हीरविजय सुरी जाण ॥ वाचक भानुचंदनो शीष्य ॥ देवचंद्र प्रणमे नीसदीस ।। इति दीवालीनी सझाय संपूर्ण ॥ ॥ अथ पडिकमणानी सझाय लिख्यते । गोयम पुछे श्री महावीरनेरे ।। भाखो भाखो प्रभुजी संबंधरे ।। पडिकमणाथी स्यु फल पांमीएरे । स्यु स्युं थाय प्राणीने बंधरे ।। गो ॥१॥ सांभलो गोयम जे कहुं पून्यथीरे ॥ करणी करतां पुन्य नो बंधरे ॥ पुन्यथी दुजो अधिकोको नहिरे ॥ जेथी थाय सुख सं- बंधरे ॥ गो ॥२॥ इछा पडिकमणु करी पामीएरे ॥प्राणीने पुन्यनुं बंधरे । पुन्यनिकरणी जे उवेखस्येरे ॥ परभवे थास्ये अंधोअंधरे ।। गो ॥३॥ पाच हजारने उपर पांचशेरे ॥ द्रव्य खरची लखावे जेहरे ॥जीवाभिगमइपजावणारे ॥ मुंबके भंडारे पुन्यनि रेहरे ॥ गो॥ ४ ॥ पांच हजारने पांचशेरे ।। गायो गर्भवति जेहरे ॥ तेने अभयदान देतां थकारे । मुहपत्ती आप्यानु पुन्य एहरे ॥ गो ॥५॥ दसहजार-गोकुल गायो तणारे ॥ एकेको दशहजार प्रमाणरे ॥ तेहने अभयदान देतां थकारे ॥ उपजे प्रांणीने विरवांणरे ॥ गो ॥६॥ तेथी अधिकुं उतम फळ पामिएरे ॥ परने जे उपदेश देधार्नु जाणरे ॥ उपदेश यकी संसारी तरेरे ॥ उपदेशे पामे-परिमल नाणरे ॥ गो १७८ ६॥७॥श्री मीनमंदीर मभिनन सोमतारे । सिसरनु स्वरष करावे चेहरे ॥ एकेको माप पारन पेस्पनोर || परपलो भाप्यानु पुन्प एरे ।। गो ॥ ८ ॥ माससमणनि वपस्मा फरर ।। अक्वा पनर फरावे पारे । एरवा को पन्नर करती पकार ।। कांगसीर मापानु फस पर ।। गो ॥९॥ सहस मगसी दान सासा वपुरे ।। उपये भाणीने पुन्पनु परे । स्वापि सगापे गुरुने वान फेर ॥ प्रवेश पाए प्रपनु पंपर ।। गो ॥१०॥मोन प्रवीमा सोचनमय कर। सास अगसीनु प्रमाणर || एकेकी मतीमा पापस भनुपनीरे ॥रीयापही परिकमानो ए प्रपाणरे ॥ गो ।।११।। मामश्यक पमर जुगवे प्रप भार ।। माम्म्पो परिकमणानो संपपरे ।। मीनाभिगवा आवस्यक मोरमोर ॥ समुल माखे पीर जीणंदर ॥ गो ॥ १२ ॥ पाप जस को भया परर । पासस्पे परिकमणानो म्हारर || अनुघर सम सुख पामे मादुर । पामस्पे पमिनन मगजल पाररे||गो॥१३॥ रवि परिकमणानी समाम संपूर्ण ।। || मप भी मरुदेवीमावामी समाय डिस्पते ।। एक दिन मम्दनी भाइ ।। का मरम्ने भयसर पार ॥1॥ सुणो प्रेम परी । सुवो पटसर पृथवी माये ॥ मारा मवर्न दुरव नदी भागेर ॥२॥ सुमो० ॥ पामर य पराये । माहारो ऋपम पंथे भापर ॥ ३ ॥ सु० ॥ सुंत्ये सरसा मोमन मासी । माहारो अपम नीच उपसासीर ॥ ४ ॥सु० ॥ तवो मदीरमरि मुग्न १७९ विलसे ॥ मारो अंगज धरती फरसेरे ॥ ५॥ सु०॥ तुंतो सजन कुटंवमा माले ॥ मारो ऋषभ एकवडो चालेरे ॥ ६॥ सु०॥ तुंतो विषयतणां सुख सूचे ॥ मारा सुतनी वात न पुछेरे ।। ७ ।। सु० ॥ इम कहती मरुदेवी वयणे ॥ आंसु पडलागी नयणेरे ॥ ८॥सु० ॥ इम सहस वरसने अंते ॥ लयो केवल ऋषभ भगवंतेरे ॥ ९ ॥ सु० ॥ हवे. भरत भणे सुंणो आइ ॥ श्रुत देखी करो वधाइरे ॥१०॥ ॥ सु० आइ गज अंध बेसार्या ॥ श्रुत मलवाने पउधाोरे ॥११॥ सु० ॥ कहे एह अपुरव वाजां ॥ किहां वाजे छे ए ताजारे ॥१२।। सु० ॥ तव भरत कहे सुणो आइ ॥ ए तुम सुतनी ठकुराइरे ॥१३॥ । सु० ।। तुम सुत ऋषि आगे सहुनी ॥ त्रण तोले सुरनर बहुनीरे ॥ १४ ॥ सु० ॥ हरखे नयणे जल आवे ।। तव पडल बेहु खरी जावेरे ॥ १५ ॥ सु०॥ हु जाणती दुःखीओ कीधो ॥ सुखीओ सहुथी छे अधीकोरे ॥ १६ ॥ सु० ॥ गयो मोह अनीत्यता आवे ।। तव सिद्धस्त्र रुपीआयोरे ॥१७॥ सु० ॥ तव ज्ञान विमल वधु नारी तक परगटी अनुभव सारीरे ॥ १८ ॥ सु० ॥ ॥ इति मरुदेवीनी सझाय संपूर्ण । ॥ अथ श्री सोल सुपनानी सझाय लिख्यते ॥ सुपन देखेपेलडे ।। भांगी कल्प वृक्षनी डालरे । राजा संजम लेशे नही । दुःखम पंचम कालरे ॥ चंद्र गुप्त राजा सुणो ॥ १ अकाले मरज आथम्यो । तेहनो शो निस्लामे ॥ नगी Diet काम्मा ॥ वेने मन्यान नही होसेरे ॥ ॥२॥त्रीवेदमा पारणी ॥ हनो को विस्ताररे ।। सामापारी सुइ बह दोसे । बार आटे पर्म होशेरे ॥ ॥ व मनही दीर्ग नाप ॥ पोया मुपन विस्ताररे ॥पा गुरु धर्मनि ॥ पानवा पनीर रोसेर ॥ ०॥ ४ ॥ पांचमे नाग दीठो बार फेणो॥ वेदनो सो निस्ताररे ।। परस योगने मारे । दोसे पार दुकासर । ५० ॥ ५ ॥ देव पिमान छठे मस्मो ॥ मानो सो विस्तारर || मिया मधापारनी ॥ सपि ते निसेप रोसेरे ।।१०॥ ६ ॥ सन्यं वे करता मध्ये ।। ॥ सासमे कमल विकासरे ॥ एका नही से सत पणीया ॥ पुदा अदा मव होशेरे ॥ यापना पापसे माप मापणीपणे मीर ममीक घश दोशेरे ॥१०॥ ७ ॥ सुपन देखी माठमे ॥मागीआनो प मस्कार दोशेरे ॥ सपोप होशे मैन पर्मनो ॥ परे मिप्यास्त्र पोर मपामे ॥ १० ॥ ८ ॥ सुका सरोबर दी पण दीसें ॥ दक्षिण बीस होला पाणीर ॥षण दीसे धर्म होसे नहीर ॥ दक्षिण टीशे पर्म दोधेर ॥ १० ॥ ९ ॥ सोनानीर चासी मध्ये ॥ इतरो लाप के वीररे ।। उपवणारे सक्ष्मी ॥ निषसमे सेरे ॥ १० ॥ १० ॥ हापी मापे गे पांदरो ॥ पेनो सो पिस्तारर ।। मसे छ राना उषा होसे । मनसी रितु ठे होरपेर ॥०॥ ११॥ समुद्र मरमादा मुंकी पारमे ॥ सानो स्पो विस्ताररे । शिम्म साने पत्र पुत्रित ॥ नपि रासे मरनादा सगाररे ॥ ५० ॥ १२ ॥ रामईपर बटो पोठीए । वनो सो निस्वारर ॥ चा से मीन धर्म छोटीने ॥ रामा वे निष पर्म मादरसेरे ॥ ५० ॥ १३ ॥ रस्न प्रांतारे दिठा १८१ चउदमे ॥ तेहनो सो विस्ताररे ॥ भरतक्षेत्रना साधु साधवी॥ तेहने हेत मेलावो थोडो होशेरे ॥ चं० ॥ १४ ॥ महारथे जुता वाछडा ।। तेहनो सो विस्ताररे । बालक धर्म करसे सही ॥ बुढा प्रमादमा 'पडया रसेरे ॥ चं० ॥ १५ ॥ हाथी लडे मावत विना । तेहनो सो विस्ताररे ॥ वरस थोडाने आंतरे ॥ माग्या नही वरसे मेधरे ॥ चं० ।१६।। व्यवहार सूत्रनी चूलिका मध्ये ॥ भद्रबाहु मुनि एम भाखेरे । सोले ते सुपननो अर्थ ए॥ सांभलो राय सुधिरोरे ॥चंद्र०॥१७॥ ॥ इति सोल सुपनानी सझाय समाप्त । गौतम स्वामीनी सझाय. गौतम स्वामी पृछा करे ॥ कहोने स्वामी वर्द्धमानजीरे ॥ केणे कर्मे निर्धन निर्वशी ॥ केणे कर्मे निःफल होय स्वामी ॥ परधर भांगे ने परदमे ॥ तेणे कर्मे निर्धन होय ॥ गौतम ॥१॥ गौतम ॥ था- पण मोसो जे करे ॥ तेणे कर्मे निर्वशी होय ॥ गौनम ॥ केणे कर्मे चैश्याने ने विधवा ॥ केणे कर्मे नपुंसक होय ॥ स्वामी ॥ गौतम ॥ २॥ दुर गंछा करे जैन धर्मनी ॥ तेणे कर्मे वैश्या होय ॥ गौतम । शियळ खंडीने भोग भोगवे ।। तेणे कर्मे विधवा होय ।। गौता ना३॥ गौतम ॥ वेश्यानो संग जे करे ।। तेणे कर्मे नपुंसक होय ।। गौतम ॥ ४ ॥ केणे कर्मे गर्भ पीगळी जाय ॥ केणे कर्मे पीठी भइ च्या जाय ॥ स्वामी ।। वाडी वेडे कुणा मोगरा ॥ तेणे कर्म गर्भथी जाय ॥ गौतम ॥ ५ ॥ गौतम || फूल विधीने कर्म वाधीया ॥ मे कमें पीठी मर्या माय ॥ गौतम ॥ के कर्मे हुनाने पागला । केणे कर्मे मावि मंग ऐप ॥ सामी ॥ गेम ॥६॥ पासो काटे परमीपनो ॥ वेमे कर्मे पागुसा ऐप ॥ गौतम ॥ बप करे पर जीवनो ॥ येणे कमें माति मध रोप ॥ गौतम ॥७॥ गौतम ॥ केणे कर्मे धोक्पम उपये ॥ कमे कमें कसंफ परंस ॥ स्वामी ॥ गौवम ॥ ८ ॥ पेरो बयो पे फर ।। देणे कर्मे धोक्प सपजत । गौतम । सोटी शाल पुरीने कम पांचीया | तेणे कर्मे फलंक परत ॥ गौतम ॥९॥ गौसम ॥ फेणे कर्मे विपपर उपजे ॥ केणे कर्म जस हरीण होय । सामी । गौतम ॥ १०॥ रिश भर्या मर मण- पोसीया ॥ वेणे कमें पिपपर होय ॥ गौतम ), जे जीर रागे पापी या ॥ तेणे कर्मे जराहीण होय ।। गौसम ॥ ११ ॥ गौतम ॥ केले फर्म नीर निगोदमां ॥ण कर्मे तिर्यंचा नाय || स्वामी ।। गौतम ॥१२॥ मीप मोरे म्पापीयो । तेणे कर्मे निगोदर्मा नाम । गौतम भीप मायाए म्पापीयो ॥ तेणे कर्मे तिरमा माय । गौतम ।। १३ ।। गोवम || णे कर्म मीर एकदीमा ॥ फणे कर्मे पचेद्रीर्मा माप || स्वामी || गौतम ॥ १४ ॥ पांच दीयरस नरी कर ॥ वेगे कमें एकादीमा माय ॥ गौतम ॥ पांप इद्रीयन पे करे ॥ तेणे कर्मे पदीमा माप || गोवम ॥ १५ ॥ गौतम || कणे कर्मे भीमटा बहु ममे ॥ फणे कर्म पोय ससार ॥सामी ॥ गौतम ॥ १६॥ पे जीव मोह मछर कर ॥ सेणे कमें ससार मर्मत ॥ गोतम जे जीप सतोप पामीया ॥ तेणे में योरोप संसार || गौतम || ॥१७॥ गौसम ॥ देणे कर्म मीरा म इसे कैसे करें नीर १८३ कुळ होय ॥ स्वामी ॥ गौतम ॥ १८ ॥ दान दीधा सुपात्रमा । तेणे कर्मे उंच कुळे जाय ॥ गौतम ॥ दान दीधा अणसुजता ।। तेणे कर्मे नीच कुळ जाय । गौतम ॥ १९ ॥ गौतम ।। केणे कर्मे जीवहा नरकमां ॥ केणे कर्मे स्वर्ग विमान || स्वामी ॥ गौतम ॥ २०॥ जे जीव लोभे व्यापीयो । तेणे कर्मे नरकमा जाय ॥ गौतम ॥ दान शियळ तप भावना ॥ तेणे कर्मे स्वर्ग विमान ॥ गौतमः ॥ २१ ॥ गौतम ॥ राजगृही प्रभु आविया ॥ श्रेणीक वंदवा जाय ॥ गौतम । चेलणा करे अति गहुं अली || हयडे हर्ष न माय || स्वामी ॥२२॥ गौतम ।। गौतमे केवल मागीयु ॥ दीयो ते वीर वर्द्धमान || स्वामी ३१ जो वछ गौतम सांभलो ॥ मोहे न होय निर्वाण ||गौतम ॥२३॥ गौतम ॥ रुप विजय कवि इणीपरे । भाखे श्री भगवान ॥ गौतम ॥ जे ना भणे जे साभले । तस घर मंगल माळ || गौतम ॥२४॥ संपूर्ण. ॥ जीवरासीनी सझाय. ।। मोह मीथ्यातकी निंदमे ॥ जीवा सुतो काल || अनंत भव माहे तुं भटकीयो ॥ जीवाते सांभल वीरतंत ॥ जीवा तुंतो भोलोरे ॥माणी इम रुलीयोरे संसार ॥ १ ॥ एसा केइ अनंत जीन हुवा ॥ जीवा उतकृष्टो ग्यान अगाध ।। इण भवथो लेखो लीयो ॥ जीवा कुण बतावे तारी जात ।। जीवा ।। २ ।। पृथवी पाणी अगनमे ॥ जीवा चोथी वायुकाय ।। एकर काया मधे ।। जीवा काल असंख्यातो जाय ॥ जीवा ॥३॥ पंचमी काय बनस्पती ॥ जीवा साधारण १८४ मस्पैक । साधारमा तुं पस्पो ॥ जीपा के सांममी मुवीपेक ।। भीमा ॥ ४ ॥ म मानी गोदम ॥ जी एण मसंस्पाती माण " असंख्याता प्रवर एक सेगमे ।। मीपा एम गोगमसस्मा प्रमाण ॥ मीपा ॥५॥माण एक शरीरम ।। मीमा भीर अनंता प्रमाण एक गोळा मपे ॥ भीगा भरीर मसंम्पावा जाण ॥ एकर एक शरीरमे ॥ भीमा भीष अनंत प्रमाण ॥ भीमा ॥ ६॥ वेमाषी ब- नादी भीवरा ।। मीना मोक्ष भाये पीरा पास ॥ एफ सासी भरीर नहो। भीवा महुवे मनवे कास।भीवा ॥७॥ एफर ममपी सग ॥ भीमा भप मर्मता होप ॥ वली पीसले तेइने ।। मीषा मन्म मरण तुं पोय ॥ मीपा ॥८॥दोप घी कापी मपे॥जीवा पेसट सहस सो पांच ॥बनीस अधीका माणग्यो ।। मीमा एकर- पनी स्वाप ।। मीषा ।॥८॥शन मेदन दोना वेदना ।। मीना मरण सही पहु पार || नीण सतीनीगोदम ॥ श्रीषा मनस्गुणी वीचार ॥ जीवा ॥ १० ॥ एकीदीमापी नीकल्पो ॥ भीरा श्री पाम्पो दोप || तर पुन्याह वार्ग ॥ भीमा यी मनती होय ॥ मीरा ॥११॥ इम सेरंद्री पोखी जीपमा । मीप से ये साख ए. जात ॥ दुख दीग संसारमे || जीरा मुणवा समरिन पातमीमा ॥ १२ ॥ मसपर पसचर खेचर ॥ मीणा उर पुर सम पुर मात ॥ सीव वाप प्रसा सही ॥ भीमा दुस समा दीनराव ॥भीरा ॥१३॥ इम भर्मवो भीवो ॥ जीना पाम्यो नरमय सार ।। गर्मायासमे दुस समा । मीपा ने भामे कीरतार | मीरा ॥ १४ ॥ मम्तक वो इटगे होये ।। मीना सपर रे पेडु पाप ॥ मांसपो मादी मष्ठी घेई १८५ जीवा इम रह्यो वीष्ट-घर माय ॥ जीवा ॥ १५ ॥ बाप वीरज माता रुघ्र ॥ जीवा इस दोलीयो ते आहार ॥ भुली गयो जन्म्या पछे । जीवा सेखी करे अविचार ॥ जीवा ॥ १६ ॥ उठे कोड सुइ लाल करे ।। जीवा चांपे रुं रुं माय ॥ अष्टगुणी हुवे वेदना ॥ जीवा गर्भा वासारे माय ॥ जीवा ॥ १७॥ जनमता हु कोड गुणी ॥ जीवा मरणंता कोडाकोड ॥ जन्म मरणता जीवडा ॥ जीवा जाणजो मोटी खोह ॥ जीवा ॥ १८ ॥ देश अनारज उपनो ॥ जीवा इंद्री हीणो होय ॥ आउखु ओछु होये ॥ जीवा धर्म कीसी वीध होय ॥ जीवा ॥ १९ ॥ कदाचीत नरभव पामीयो ॥ जीवा उतम कुले अ. वतार ॥ देहनीरोगी पामीने ॥ जीवा रइ खोयो जम वार ॥ जीवा ॥ २० ॥ ठग फासीगर चोरटा ॥ जीवाधीवरकसायरी न्यात ॥ उपजीनी मुवो नही ॥ जीवा एसान रही कोइ जात ॥जीवा।।२१।। चउद राज लोकमां ॥ जीवा जनम मरणनी जोड ॥ जीवा खाली वालाग्रमात्रए ॥ जीवा एसीनरहीकोइ ठोड ।। जीवा ॥२२॥ एह जीव राजा हुवेगा जीवा हस्ती वांध्या वार ॥ कबहीक करमावसे ॥ जीवा न मील्यो अन उधार ॥ जीवा ॥ २३ ॥ इम संसार भमतो थको । जीवा पाम्यो समकीत सार॥ आदरीने छिटकावी दीयो ॥ जीवा जाय जन्मारो हार ॥ जीवा ॥ २४ ॥ खोटा देवज सरदीया ।। जीवा लागो कुगुरु केडं । खोटो धर्मज आदरी ।। जीवा कीधा चउ गती फेर ॥ जीवा ॥ २५॥ कवहीक नरके गयो । जीवा कपहीक हुवो तुं देव ॥ पुन्य पापना फल थकी । जीवा लागी मीथ्यातनी देव ॥ जीवा ॥ २६ ॥ ओघाने वली मोमती ॥ जीपा मेरु जेषता बोध - पसी समकीव बिना ।। भीया कारन नरीला सीप ॥ मीमा 1॥२७॥ बार मानसणा पी । जीया नरफ सावमी नाय॥ पग्द पुरमनो भाग्यो । जीमा पठे नीगोद माहे ॥ २८ ॥ भीमा ।। मग पंदनी पर्म पाम्पा परी ॥ मीमा कदीयन नाप फोक । कदाधीत फ्टमाइ हुये ॥ भीरा अर्ष परगस मारे मोत ॥जीमा ॥ २९ ॥ सुत्पने पादरपमे || भीमा मेसी पर्गणा साप । एक पुदगल पाय- तेननी ॥ मीना भीणी घणी पात ॥जीमा ॥ ३४ ॥ अनंत नीव मुगवे गया । नीरा नाली मातम दोप ॥ नही गया नही ना पसे ।। मीमा एक नीगाठनी भात मोक्ष ।। जीमा ।। ३१ ॥ पाप मायोइ आपणा । मीरा 'अमव नाग रोक ॥ तेथी देवलोकमा बम्रो ।। भीरा पनर मम मोरे मोक्ष ।। ३२ ॥ जीवा ।। पापा भाष मुणी परी॥ मीषा संर्ण आणी नाइ । न्यु आयो सेम गयो । मीषा सक्ष पोरासी मारे। भीगा ॥३३॥ कर वम नर पीतवे मीना माणे मभीर संसार ॥ सारो मार्ग सापीने ॥ मीमा भाप संगती मझार | भीमा ॥ ३४ ॥दान शीयस वप भावना ॥ नीषा एणम रासो मेम ।। कोर कल्याण के वने ॥ नीषा मान बीमल को एम ॥ श्रीवा ॥ ३५॥ ॥ संपूर्ण इती मतिबमण पिशे उपदेश मावापर मक्ति रागने सीपर भीतीरगम परिकमणामा प्रीवि भक्तिनो रांग विचारतो वे भाषी रीस एक पतिकमण-पील कार- सग ।। पीई पपस्लाम ए प्रणमां भीवि मनुष्ठान के कमके एणी ॥ म १८७ संगतथी आगळ गुण वधे माटे प्रीतिराग छ ॥ अने ॥ एक सामा- यिक वीजो चोवीसथो त्रीजो गुरुने वंदण करवो ए त्रणमा भक्ति अनुष्ठान छ । यति धर्म माहे पांच क्रिया कहे छे पहेली विपक्रिया वीजी गरल क्रिया, त्रीजी अनुष्ठान क्रिया, चोथी तदहेतु क्रिया, पांचमी. अमृत क्रियाए पांच भेदे क्रिया जाणवी ॥ विप क्रिया कोणे कहीए ग्रह- स्थि आवे त्यारे क्रिया कर तेने विपक्रिया कहीए ॥ बीजी गरल- क्रिया कोणे कहीए ते गरलक्रीया कालांतरे फल आपे हडकीया वायुनी परे हडकवा लागे त्यारे मरण पामे तेम चारित्रीयो अति नियाणु करे तो बेत्रण भवमा ते वस्तु पामे पण चारित्रनुं फल पामे नही तेने गरलक्रिया जाणवी ॥ त्रीजी अनुष्ठान क्रिया कहे के अवि- वेके करीने अथवा क्रिया करवा बेसे त्यारे क्रिया करवानुं भान नही मन रहित क्रिया करे तेने कंइ फल दायक जाणवी नही तेने अनुष्ठान क्रिया कहीए । चोथी तद हेतुं क्रिया कहे छे चारित्र ले- नार वैरागी भद्र परिणामी देसना सांभले शुध रागे वध ते क्रिया करे पण विधी सुध नहीय परंतु सरवाले तेथकी विशुद्ध थाय माटे चोथी क्रिया फलदायक जाणवी. पांचमी अमृत क्रिया कहे छे आगम प्रमाणे सुध क्रिया करे क्रिया करवामा अध्वसाय सारा करे क्रिया करवामा सुध्ध अनुष्ठानद् आचरण करे एवातो कोइक वि- रला प्राणी दीसे छे माटे पांच क्रियामां अभृत क्रीयानुं फल मोक्ष आपवावालुं छे माटे अमृत क्रिया जाणवी ए पांच कियामांत्रण क्रिया आदरवा योग्य नथी ने बेचोथी ने पांचमी क्रिया आदरता गोरा
१८८
समर्शम् जीयोनी उत्पनी विशे
गायक मत्रमे २४ पार पणी
मेंसके मुत्रमे १६ पार पण
गावपा गपेटी मोरीके सत्रमे ८ पार पण नरमारीके सत्रमे
पार पार पछे छपरिम भीम एपणे
१४) पूर्षका नाम
१) पहिला पुर्व उत्पाद
२) पीमो-भग्रापणी,
३) अमिो-वीर्यवाद
४) चोयो-सता भाणीपे
५) पोपमा-नार गरपण
६) ण्ठो-सस्य प्रवाद
७) सासमो-भावम
८) माठमो-कर्म प्रसाद
९) नबमो-पत्साम्पान मवाद
१०) दामो-रिम्पा पाद
११) मगीमारमे नाम कस्याण
१२) पारमे-माणापु
१३) रमे-फ्रिया विलास
१४) चौद-विसार
No text on this page.