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Devanandamahakavya Of Sri Meghavijayopadhyaya

Pandit Bechardas.j. Doshi

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मेघविजयोपाध्यायविरचित
देवानन्दमहाकाव्य
टिप्पणी-आदि समलंकृत तथा ग्रन्थकार-परिचय,
सरल हिंदी सारार्थ आदि समन्वित
सम्पादक
पं० बेचरदास जीवराज दोशी ।
[जैनन्याय-व्याकरणतीर्थ; भूतपूर्व प्राकृतसाहित्याध्यापक गूजरातपुरातत्त्वमन्दिर,
भगवतीसूत्रादि अनेकागमग्रन्थानुवादक-संशोधक-सम्पादक-इत्यादि ]
प्रकाशन-कर्ता
संचालक-सिंघी जैन ग्रन्थमाला
अहमदाबाद-कलकत्ता
विक्रम १९९४]
प्रथमावृत्ति, पशत प्रति ।

SINGHI JAINA SERIES
A COLLECTION OF CRITICAL EDITIONS OF MOST IMPORTANT CANONICAL, PHILOSOPHICAL
HISTORICAL, LITERARY, NARRATIVE ETC WORKS OF JAINA LITERATURE
IN PRAKRIT, SANSKRIT, APABHRAMŠA AND OLD VERNACULAR
LANGUAGES, AND STUDIES BY COMPETENT
RESEARCH SCHOLARS.
FOUNDED AND PUBLISHED
BY
ŚRIMÁN BAHADUR SINGHJI SINGHI OF CALCUTTA
IN MEMORY OF HIS LATE FATHER
SRI DĀLCHANDJI SINGHI.
GENERAL EDITOR
JINA VIJAYA MUNI
HONORARY MEMBER OF THE BHANDARKAR ORIENTAL RESEARCH INSTITUTE OF POONA AND GUJRAT
SAHITYA SABHA OF AHMEDABAD; FORMERLY PRINCIPAL OF GUJRAT PURATATTVAMANDIR
OF AHMEDABAD; EDITOR OF MANY SANSKRIT, PRAKRIT, PALI, APABHRAMSA,
AND OLD GUJRATI WORKS.
NUMBER 7
TO BE HAD FROM
TYAVASTHĀPAKA, SINGHĨ JAINA GRANTHAMĀLĀ
ANEKANT-VIHAR
-
9, SHANTI NAGAR,
PO. SABARMATI, AHMEDABAD.
SINGHI SADAN
48, GARIYAHAT ROAD
BALLYGUNGE, CALCUTTA
Botided 3
All rights reagrued
[ 1937. A. D.

DEVANANDA MAHAKAVYA
OF
ŚRÍ MEGHAVIJAYOPADHYAYA
CRITICALY EDITED IN THE ORIGINAL SANSKRIT FROM AN OLD MSS. WITH NOTES,
INDEX AND HINDI INTRODUCTION, SUMMARY ETC.
BY
PANDIT BECHARDĀS J. DOSHI
JAINA NYAYA-VYĀKARAŅA TÍRTHA; LATE TEACHER IN PRAKRIT, PURATATTVA MANDIRI
TRANSLATOR AND EDITOR OF BHAGAVATI SÛTRA AND MANY OTHER
CANONICAL WORKS
PUBLISHED BY
THE SANCHĀLAKA-SINGHĨ JAINA GRANTHAMĀLĀ
AHMEDABAD.CALCUTTA
V. E. 1994
First edition, Five Hundred Copies.
2987 A.D.

DEVANANDA MAHAKAVYA
OF
ŚRÍ MEGHAVIJAYOPADHYAYA
CRITICALY EDITED IN THE ORIGINAL SANSKRIT FROM AN OLD MSS. WITH NOTES,
INDEX AND HINDI INTRODUCTION, SUMMARY ETC.
BY
PANDIT BECHARDĀS J. DOSHI
JAINA NYAYA-VYĀKARAŅA TÍRTHA; LATE TEACHER IN PRAKRIT, PURATATTVA MANDIRI
TRANSLATOR AND EDITOR OF BHAGAVATI SÛTRA AND MANY OTHER
CANONICAL WORKS
PUBLISHED BY
THE SANCHĀLAKA-SINGHĨ JAINA GRANTHAMĀLĀ
AHMEDABAD.CALCUTTA
V. E. 1994
First edition, Five Hundred Copies.
2987 A.D.

देवानन्दमहाकाव्य-विषयानुक्रम । पृ० १- ४ .... .... .... .... ५-१२ १-१० किंचित् प्रास्ताविक [मुख्य सम्पादक लिखित].... प्रस्ताव ना-ग्रन्थकारपरिचय, समस्यापूर्तिवर्णन, सरल हिंदी सारार्थ १ कथानायक-उत्पत्तिवर्णननामा प्रथमः सर्गः २ नायकाभ्युदयवर्णननामा द्वितीयः सर्गः ३ युवराजस्थापन-मरुधर-मेदपाट-सुराष्ट्राविहारवर्णन-नानापादसमस्याङ्कितः तृतीयः सर्गः ४ यमकरम्यः चतुर्थः सर्गः ५. दक्षिणदिग्विजयनामा पञ्चमः सर्गः १०-१२ २२-३९ .... .... ३०-४८ .... ४९-५७ ६ पट्टधरस्थापन-षड्ऋतुवर्णनो नाम षष्ठः सर्गः .... ..... ५७-६९ ७ श्रीविजयदेवसूरीश्वरनिर्वाणगमन-तत्पप्रभाकरश्रीविजयप्रभसूरीश्वराभ्युदयवर्णननामा सप्तमः सर्गः .... .... .... .... ६९-७७ .... .... .... ८ ग्रन्थकर्तृप्रशस्तिः ९ देवानन्दमहाकाव्यान्तर्गतानां विशेषनाम्नां संग्रहः ७९-८० देवानन्दमहाकाव्य-विषयानुक्रम । पृ० १- ४ .... .... .... .... ५-१२ १-१० किंचित् प्रास्ताविक [मुख्य सम्पादक लिखित].... प्रस्ताव ना-ग्रन्थकारपरिचय, समस्यापूर्तिवर्णन, सरल हिंदी सारार्थ १ कथानायक-उत्पत्तिवर्णननामा प्रथमः सर्गः २ नायकाभ्युदयवर्णननामा द्वितीयः सर्गः ३ युवराजस्थापन-मरुधर-मेदपाट-सुराष्ट्राविहारवर्णन-नानापादसमस्याङ्कितः तृतीयः सर्गः ४ यमकरम्यः चतुर्थः सर्गः ५. दक्षिणदिग्विजयनामा पञ्चमः सर्गः १०-१२ २२-३९ .... .... ३०-४८ .... ४९-५७ ६ पट्टधरस्थापन-षड्ऋतुवर्णनो नाम षष्ठः सर्गः .... ..... ५७-६९ ७ श्रीविजयदेवसूरीश्वरनिर्वाणगमन-तत्पप्रभाकरश्रीविजयप्रभसूरीश्वराभ्युदयवर्णननामा सप्तमः सर्गः .... .... .... .... ६९-७७ .... .... .... ८ ग्रन्थकर्तृप्रशस्तिः ९ देवानन्दमहाकाव्यान्तर्गतानां विशेषनाम्नां संग्रहः ७९-८० किंचित् प्रास्ताविक जिन विजयदेव सूरिका काव्यमय चरित-वर्णन प्रस्तुत देवानन्द महाकाव्यमें किया गया है, वे सूरि जैनधर्मके बहुत अच्छे प्रभावक पुरुषोंमेंसे एक हो गये हैं । एक प्रकारसे जैन समाजके ये अन्तिम समर्थ और तेजस्वी आचार्य थे । इनके बाद आज तक वैसा कोई प्रभावशाली, प्रतापवान् और प्रतिभापूर्ण आचार्य नहीं हुआ। जिस प्रकार मुगल सम्राटोंमें अकबर, जहांगीर और शाहजहाँ ये तीनों सम्राट् भारतवर्षके गौरवके उत्कर्षक हुए उसी प्रकार, जैनाचार्यों में भी हीरविजय सूरि, विजयसेन सूरि और विजयदेव सूरि ये तिनों आचार्य जैन समाजके गौरवके उत्कर्षक हुए। इन तीनों आचार्योंका मुगल सम्राटोंने खूब सत्कार किया था और इनके ज्ञान और चारित्रसे प्रभावान्वित हो कर म्लेच्छ कहे जानेवाले उन अनार्य सम्रा- टोंने भी जैन धर्मके प्रति अपना ऊंचा आदरभाव व्यक्त किया था । उन मुगल सम्राटोंकी तरह इन जैनाचार्योंका इतिहास भी बडा विस्तृत और महत्त्ववाला है। ये आचार्य भी, अपने समाजके एक प्रकारके सम्राट् थे। सम्राटोंकी ही तरह इनकी आज्ञा भी, जैन समाजके धार्मिक विधानोंमें, अनुल्लंघनीय समझी जाती थी। सम्राटों-ही-की तरह जैन समाजमें इनका शासनतंत्र चलता था। जिस तरह, सम्राट अपने साम्राज्यकी रक्षा और वृद्धिके प्रयत्नमें आजन्म तल्लीन रहते थे और भारतवर्षके इस कोनेसे उस कोनेतक घूमते रहकर अपने शासनकी सुव्यवस्था में व्यस्त रहते थे उसी तरह ये आचार्य भी जैन धर्म और जैन संघकी रक्षा और वृद्धिके प्रयत्नमें आजन्म दत्त- चित्त रहते थे और जहां जहां इनके अनुयायी जन-गण और धर्म-स्थान होते थे वहां वहां ये सतत परिभ्रमण करते रहते और अपने शासनकी सुव्यवस्थामें लगे रहते थे । यद्यपि ये आचार्य बडे निरीह, निष्परिग्रही, तपस्वी, आत्मदर्शी और जिते- न्द्रिय थे- कंचन और कामिनीसे सर्वथा अलिप्त थे- तथापि अपने धर्म और समाजकी उन्नति और प्रतिष्ठाके निमित्त ये राजा- महाराजाओं और सम्राटोंके दरबारोंमें उपस्थित होते थे, अपने शिष्योंको उनकी इच्छानुसार उनके हितोंमें प्रवृत्त करते थे और उनके सुख-दुःखोंमें समवेदना और सहानुभूति भी प्रकट करते थे। और उसके बदलेमें, ये और कुछ न चाह कर सिर्फ भूतदया, प्राणीरक्षा और अहिंसाका उनसे प्रचार और पालन करवाते थे; अधर्मी और आत्याचारी द्वारा सताये जानेवाले प्रजाजनों और धर्मनिष्ठ मनुष्यों की रक्षा करवाते थे और आत्मकल्याण करनेके साधनभूत धर्मस्थानोंकी पूजा और पवित्रताका सुप्रबन्ध करवाते थे। न ये किसी प्रकारकी सवारी पर चढते थे, न किसी पर अपना बोज लादते थे। न किसीके यहां भोजनका भार डलवाते न किसीके घर पर जा कर मान-पान करवाते। चाहे सियाला हो चाहे उन्हाला- ये नंगे सिर और नंगे पैर ही सदा घूमते फिरते । चौमासेके ४ महिने ये एक जगह स्थिरवास करके रहते और फिर आठ महिने इधर-उधर परिभ्रमण करते रहते । कमी ये दक्खिनमें हैदराबाद और उससे आगे तक चले जाते और फिर वहांसे उत्तरमें लाहोर और उससे भी आगे तक पहुंच जाते; कभी पच्छिममें ठेठ समुद्रके किनारे दीवबन्दर तक चले जाते और कभी पूर्वमें पटना और उससे भी परे पार्श्वनाथपहाड (सम्मेतसिखर) तक सफर कर आते । भिक्षाके समय, हाथमें झोली ले कर, गृहस्थके घर अज्ञात रूपसे जा पहुंचते और धर्मलाभका आशीर्वाद दे कर, अपने उचित लूखा-सूका जैसा आहार मिल गया, उसे ले कर अपने मकान पर चले आते और एकान्तमें बैठ कर बिना किसी प्रकारके आखादका उपभोग करते हुए, उसे निगल जाते । पानी ये हमेशा गरम किया हुआ पीते । सूर्यास्तके बाद न कसी कुछ खाते न कभी कुछ पीते । रातको कोरी जमीनपर एक पिछोड़ी बिछा कर सो जाते । न धूलकी पर्वाह कस्ते न पत्थर-कंकड की । न सख्त गर्मीमें कभी पंखा विकात और मन सख्त सर्दीमें कभी आग सुलगाने । बडे बडे धन-कुबेर इनके दृढ उपासक थे-पक्के भक्त थे: इनक मल एक शब्द पर लारा २ देवानन्दमहाकाव्य । रूपये न्योछावर कर देते थे; पर ये अपने लिये किसीसे कभी कुछ एक कौडी भी नहीं मांगते थे। वर्गकी अप्सरायें जैसी रूपवती और लक्ष्मीवती हजारों स्त्रियां प्रतिदिन इनके सामने १०-१० वार ऊठबैठ कर नमन करती और घंटों हाथजोडे बैठकर इनका धर्मोपदेश सुनती; लेकिन निमेपमात्र भी इनकी आँग्वमें, कभी किसी प्रकारके विकारकी, कोई रक्तिमा उद्भूत नहीं होती थी । ऐसी तो इनकी चर्या धी; और ऊपर बतलाया वैसा इनका उदात्त ध्येय था। साबुताका यह परम आदर्श था। प्रस्तावित काव्यके नायक विजयदेव सूरिके प्रगुरु आचार्य हीर विजय मूरिकी ऐमी परम साधुताका हाल सुनकर अकबर बादशाहने बडे आदरके साथ उन्हें अपने दरवार-फतहपुर सीकरीमे बुलवाये । मृरिकी प्रशान्त मूर्ति, भव्य आकृति, उत्कृष्ट विरक्ति और अमृतोपम वाणीका अनुपम अनुभव कर वह महान् मुगल सम्राट अत्यंत प्रमुदित हुआ। अकबर जैमा उत्कट जिज्ञासु था, परीक्षक भी वैसा ही उत्कट था। उसकी परीक्षा उत्तीर्ण होना आसान नहीं था। बडे बडे धुरन्धर विद्वान् और त्यागी-बैरागी उसकी कठोर परीक्षामें निष्फल हो जाते थे और उसके तेजमें वे अपना अस्तित्व लुप्त वर या तो उसके सेवक बन जाते थे या उसके शिष्य हो रहते थे। एक ही नजरमे वह अपने सन्मुख आनेवाली व्यक्तिका हीर परख लेता था और एक-ही-दो शब्दोंमें वह उसका मूल्य भी कर देता था। अपने समकालीन मंसारका वह सबसे श्रेष्ठ चतुर और तेजस्वी पुरुष था । हीरविजय सूरिकी साबुताकी उसने यथेष्ट परीक्षा की ओर उसमे वे सोलह आने संपूर्ण सफल निकले, तब उसने उनको अपना परम पूज्य हितोपदेशक माना और 'जगद्गुरु' की पदवी देकर उनका उत्कृष्ट सम्मान किया । कोई ३-४ वर्ष हीरविजय सूरि फतहपुर सीकरी और आगरेके आसपास घूमते रहे और वारंवार अकबरको अपना धर्मोपदेश सुनाते रहे । वादशाहने उनके उपदेशसे स्वयं मांसभक्षण आदि बहुत कम कर दिया और पशु-पक्षियोंका शिकार करना भी बहुत कुछ छोड दिया । जैनधर्ममें परम पवित्र माने जानेवाले पर्युपणा पर्वके ८-१० दिन तक सारे ही साम्राज्यमें किसी भी प्राणीकी कोई कतल न की जाय ऐसी बादशाही आज्ञा भी जाहीर की गई । जैनधर्मक पवित्र स्थानोंको कोई किसी प्रकारकी हानि न पहुंचावे इसके लिये भी कई फरमान उसने निकाले और उन्हें हीरविजय सूरिके स्वाधीन किये। बादमें वृद्धावस्थाके कारण सूरिजी तो गूजरातमे वापस चले आये, लेकिन वादशाहकी इच्छासे अपने विद्वान् शिष्य उपाध्याय शान्तिचन्द्रजीको उसके दरबारमें रख आये। पीछे से भानुचन्द्र, सिद्धिचन्द्र, विवेकहर्ष आदि और भी सूरिजीके प्रभावशाली शिष्य वारंवार अकबरी दरबारमे आने-जाने और रहने लगे। यह सब इतिहास बहुत वडा है और उसका विशेष वर्णन करना यहांपर आवश्यकभी नहीं है । हीरविजय सूरिके गूजरातमें चले आने बाद, पीछेसे वादशाहने, उनके पट्टधर आचार्य विजयसेन सूरिको भी अपने दरबारमें, जब वह लाहोरमें था, बुलवाये और उनका भी उसने यथेष्ट सम्मान किया और उन्हें 'सवाई हीरजी' की पदवीसे विभूपित किया । हीरविजय सूरिकी वृद्धावस्था और शारीरिक अस्वस्थताका समाचार पाकर विजयसेन सूरि अकबरके दरबारमें अधिक नहीं ठहर सके और अपने गुरुकी सेवा करने निमित्त गूजरात लौट आये । वे गूजरात पहुंचे भी नहीं थे कि, इधर काठियावाडके ऊना गांवमें सं० १६५२ में हीरसूरिका वर्गवास हो गया । इन्ही विजयसेन सूरिके पट्टधर ये विजयदेव सूरि हुए । इनको आचार्य पद सं० १६५५ मे, खंभातमें दिया गया था। उस समय इनकी उम्र कोई २१-२२ वर्षकी थी । सं० १६७२ में इनके गुरु श्रीविजयसेन सूरिका खर्गवास हो गया और उस समयसे ये अपने संघके सर्वप्रधान नायक बने । हीरविजयसूरि के समयमें ही, उनके शिष्योंमें परस्पर कुछ विचार-भेद उत्पन्न हो गया, और वह धीरे धीरे बढता गया। विजयसेन सूरिके सामने उसने कुछ उग्र रूप धारण किया और फिर इन विजयदेवके समयमें वह पूर्णरूपसे वृद्धिंगत होकर अाखिरमें इनके गच्छमें तीन भेद पड गये। हीरविजय सूरिके जिस विशाल गच्छके विजयसेन सूरि अकेले ही गणनायक थे और जिनका एकछत्र शासन था उसी गच्छके, विजयदेव सूरिके सामने तीन पक्ष होकर, उसमें ३ गणनायक हो गये; और एक ही किंचित् प्रास्ताविक । ३ गुरुके शिष्य-प्रशिष्य परस्पर एक-दूसरेके विरोधी वन कर गच्छ और संघके संगठनमें शिथिलता उत्पन्न करनेके निमित्त बन गये। गच्छके इस विरोधी वातावरणका प्रतिघोष ठेठ जहांगीरके दरवार तक जा पहुंचा। हीरविजय सूरिके शिष्योंमेंसे कईयोंके साथ जहांगीरका बचपनसे ही काफी परिचय था और वह अपने स्वर्गस्थ पिताकी, इन धर्मोपदेशकोंके साथवाली नीतिका यथोचित पालन भी करना चाहता । इस लिये उसने जब यह सुना कि हीरविजय सूरिके शिष्य, आपसमें अनबन हो जानेके कारण परस्पर एक दूसरेके विपक्षी बन रहे है और जिन विजयदेव सूरिको, हीरविजय सूरिके पट्टधर विजयसेन सूरिने अपना उत्तरा- धिकारी बनाया है उसके बारेमे कई शिष्य-प्रशिष्य अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं; तब उसने सोचा कि देखना चाहिए कि यह विजयदेव सूरि कौन हैं और कैसे है ? । नियमानुसार उसने अपना फरमान भेज कर इन सूरिको अपने दरबारमें वुलवाये । जहांगीर उस समय मालवेके मांडू शहरमें था और विजयदेव सूरि खंभातमें चातुर्मास रहे हुए थे। बादशाहकी आज्ञा आते ही सूरिजी मांडूं की ओर चलदिये और आश्विन सुदि १४ के दिन वहां पहुंच कर वादशाहसे मिले । जहांगीर इनकी विद्वत्ता, तेजस्विता और क्रियानिष्ठा को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ; और इनके विपक्षियोंने जो जो बातें, इनके विषयमें उसके सामने कही थीं उनका इनमें विपरीतभाव जान कर, उसने इनको खूब सत्कृत किया और यह जाहिर किया कि-हीरविजय सूरिके ये ही यथार्थ उत्तराधिकारी हैं; और इस लिये इनको जहांगीरी महातपाकी उपाधि दे कर उस गच्छके सच्चे अधिनायक प्रमाणित किये। इस प्रकार, यद्यपि इन्हीं के गुरुभ्राता आदि कहे जानेवाले कितनेएक यतिजनों द्वारा इनके ऐकाधिपत्यमें कुछ विक्षेप उपस्थित किया गया और गच्छवासी यतिजन दो-तीन पक्षोंमें विभक्त हो गये; तो भी तत्कालीन जैन समाजमें इनका प्रभाव सर्वाधिक रहा और ये सबसे अधिक ख्यातिलाभ करते रहे । बादशाह जहांगीर के सिवा, मेवाडपति राणा जगत्सिंह, जाम- नगराधीश लाखा जाम, ईडरनरेश राय कल्याणमल आदि बहुतसे राजा-महाराजा भी इनका खूब आदर-सत्कार करते थे। जैन समाजके तो हजारों ही बडे बडे श्रीमान् और सत्तावान् श्रावकगण इनके परम भक्त थे । ये बडे बुद्धिमान और प्रभावशाली तो थे ही, साथमें क्रियावान् भी पूरे थे। छठ, अहम आदि उपवास तथा आयंबिल, निवी आदिकी तपस्या ये निरंतर किया करते थे । भोजन जिस दिन करते उस दिन भी प्रायः एक ही वक्त करते । इन्होंने अपनी सारी उम्र में, २ शिष्योंको आचार्य बनाये, २५ शिष्योंको उपाध्याय पद दिये और ५०० को पंडित पद दिये । इनके निजके हाथसे २०० शिष्य दीक्षित हुए और १०० साध्वीयां दीक्षित हुई । सब मिला कर २५०० यति-साधु इनके आज्ञानुवर्ती थे और ७००००० (सात लाख) श्रावक-श्राविकाओंका विशाल समूह इनकी उपासना करता था। इनके उपदेशसे सेंकडों ही नये जैन मन्दिर बने, और पुराने सुरक्षित हुए । हजारों जिन मूर्तियोंकी इन्होंने प्रतिष्ठा की । जहां जहां ये गये वहां वहां श्रावक लोकोंने जैनधर्मकी प्रभावना करनेके लिये संघयात्रा, प्रतिष्ठामहोत्सव, साधर्मिकवात्सल्य और दान-पुण्य आदि अनेकानेक सत्कृत्य कर लाखों-करोडों रूपये खर्च किये। अपने गच्छनायक गुरु विजयसेन सूरिकी मृत्युके बाद कोई ४०-४१ वर्ष तक ये इस प्रकार अपने संघका शासन करते रहे । पहले इन्होंने अपने कनकविजय नामक सुयोग्य शिष्यको, पाटणमें, सं० १६८१ में आचार्यपद देकर विजयसिंह सूरिके नामसे उद्घोषित कर उन्हें अपना उत्तरधिकारी निश्चित किया था; परंतु दुर्भाग्यवश इनके जीवितकाल-ही-में, सं० १७०९ में उनका स्वर्गवास हो गया; इससे फिर, वीरविजय नामक एक दूसरे योग्य शिष्यको, सं० १७१० में, गन्धार बन्दरमें रहते हुए नया आचार्यपद देकर विजयप्रभके नामसे उनको अपना सर्वाधिकारित्व समर्पण किया। इनका आज्ञानुवर्ती सारा जैन समुदाय, देवसूरसंघके नामसे प्रसिद्ध हुआ और आज भी यह नाम जहां तहां प्रचलित है। सं० १७१३ में, उसी ऊना नगरमें, जहां इनके प्रगुरु हीरविजय सूरिका खर्गवास हुआ था, वहां इनका भी खर्गवास हुआ और उसी जगद्गुरुके समाधिस्थानके पास श्रावकोंने इनका भी पवित्र समाधिस्थान बनाया।

देवानन्दमहाकाव्य । इस प्रकार इन सूरिके जीवन-वृत्तान्तके साथ संबंध रखनेवाला इतिहास बडा विस्तृत है और वह तत्कालीन जैन समाजकी परिस्थितिका ज्ञान करानेमें बहुत ही अधिक महत्त्व रखता है। इनके जीवनका विस्तृत वर्णन जिसमें दिया गया है वह विजयदेवमाहात्म्य नामका संस्कृत ग्रंथ है । इस ग्रंथको हमने कोई १०-१२ वर्ष पहले सम्पादित कर जैनसाहित्यसंशोधक-ग्रन्थमालामें प्रकाशित किया था। उसकी छोटीसी भूमिकामें उस समय हमने लिखा था कि - 'यह विजयदेवमाहात्म्य १७ वीं शताब्दीके जैन धर्मके इतिहासकी दृष्टिसे एक बहुत ही महत्त्वका ग्रन्थ है। जैन आचा- यों में विजयदेव सूरिको अन्तिम प्रभावशाली आचार्य गिन सकते हैं । इनके समयमें जैन यतिसमुदाय और श्रावकवर्गमें बहुत घटनायें घटीं और क्रान्तियां हुई। धार्मिक और सामाजिक परिस्थितिके अवलोकनकी दृष्टिसे इन घटनाओंका इतिहास बहुत ही रोचक और सूचक है। इसलिये यह सारा इतिहास इस ग्रन्थके-विजयदेव माहात्म्यके- दूसरे भागके रूपमें प्रकट करनेका विचार रखा है।'... इत्यादि । हमारा वह विचार अभीतक सफल नहीं हुआ; सम्भव है वह कार्य इसी ग्रन्थमालाके लिये निर्धारित हुआ हो । उक्त विजयदेवमाहात्म्य अब प्रायः अप्राप्यसा हो गया है। इच्छा है कि उसकी पुनरावृत्ति की जाय और उसके साथका यह सारा इतिहास खूब विस्तारके साथ लिखा जाय । प्रस्तुत देवानन्द महाकाव्यमें जो इन सूरिका चरित-वर्णन है वह तो बहुत ही संक्षिप्त है । यह तो एक चमत्कृति बतलानेवाला अलंकारमय काव्य है, वर्णनात्मक चरित्र ग्रंथ नहीं; इसलिये इसमें विस्तृत वर्णनकी कोई गुंजाईश भी नहीं है और अपेक्षा भी नहीं है। इसका उद्दिष्ट रस तो कवित्व है। तो भी काव्यकारने सूरिजीके जीवनकी प्रधान प्रधान घटनाओंका संक्षिप्त सूचन ठीक ठीक कर दिया है। इसके सम्पादक सुहृद्वर पं० श्रीबेचरदासजीने अपनी प्रस्तावनाके साथ इस काव्यका जो परिचय और सरल सार दिया है उससे संस्कृत नहीं जाननेवाला जिज्ञासुवर्ग भी काव्यका आशय ठीक समझ सकेगा और अपनी जिज्ञासा-तृप्ति कर सकेगा । जो संस्कृतज्ञ हैं उनको तो इसके पाठमें विशिष्ट आनन्द प्राप्त होगा ही। . अनेकान्त विहार .. - शान्तिनगर, अहमदाबाद । कार्तिक शुक्ला १५, सं० १९९४ जिनविजय।

॥ प्रस्तावना ॥ १. देवानन्दमहाकाव्यके संपादनका साधन प्रतुत देवानन्द महाकाव्यका संपादन करनेमें हमें मात्र एक ही प्रति प्राप्त हुई है, और वह प्रति खुद ग्रन्थकारके निजी अक्षरसे लिखित प्रथम प्रतिके ऊपरसे लिखी हूई मालूम होती है। ग्रन्थकार देवानन्दकी अंतिम प्रशस्तिमें लिखते हैं कि- "गोपालगिरिदुर्गेऽस्य लेखनं लेखनन्दनम् । वाचकैर्मेघविजयैः कृतं सुकृतहेतवे” ॥ अर्थात्-वाचक मेघविजयजीने प्रस्तुत ग्रन्थका लेखन गवालियरमें किया है। उपयुक्त प्रस्तुत प्रति, ग्रन्थकार लिखित प्रथम आदर्शके आधारसे लिखी होने पर भी प्रतिमें कहीं कहीं अशुद्धियां रह गई हैं, जिसका सूचन संपादकीय टिप्पणमें किया गया है। प्रतिके पत्र सव मिलाकर ४६ हैं। प्रत्येक पत्रमें ११-१२ पतियां हैं और प्रत्येक पङ्किमें ३५-३७ अक्षर हैं। आजु-बाजु और ऊपरके हांसियेमें ग्रन्थकारकृत टिप्पणीयां भी लिखी गई हैं। प्रतिमें प्रायः सर्वत्र पदच्छेद किया गया है । संधिद्वारा अदृश्यताको पाये हुए इ, ई, उ, ऊ वगैरह खरोंको भी खास खास चिन्होंसे बताये हैं। टिप्पणीमें कई जगह कोशोंके नामों का भी उल्लेख किया गया है। उल्लिखित कोशोंके स्थल शोध कर हमने उसके कांड पृष्ठ आदि भी दे दिये हैं। कई जगह व्याकरणके सूत्रोंका भी उल्लेख आता है। वे सूत्रादि कौनसे व्याकरणके हैं यह बात भी टिप्पणीयोमें हमने यथाप्राप्त बताई है। प्रति, अभीतक अच्छी हालतमें है। प्रतिकी दीर्घता लगभग १३ अंगुल है और पृथुता ६-७ अंगुल है । यद्यपि ग्रन्थका संपादन बडी सावधानीसे किया गया है फिर भी यदि कोई अशुद्धियां दृष्टिगोचर हों तो विज्ञ पाठक उन्हें सूचित करने की कृपा करें। संवत् १७५५ में श्रीमेरुविजयजीके शिष्य श्रीसुन्दरविजयजीने प्रस्तुत ग्रन्थकी लिपि कराई थी। यह उल्लेख देवानन्द महाकाव्यकी अंतिम प्रशस्तिमें है- "शरेन्द्रियाद्रीन्दुमितेऽत्र वर्षे चालीलिखत् काव्यमिदं सुशिष्यः। श्रीमेरुशब्दाद् विजयज्ञराजां श्रीसुन्दरादिर्विजयाभिधानः" ।। --अंतिम प्रशस्ति । कवि श्रीमेघविजयजीके जीवन-परिचयके विषयमें लिखनेके लिए अधिकाधिक साधन हमें श्रीमान् मोहनलाल दलीचंद देशाई बी. ए. एल् एल् वी. द्वारा प्राप्त हुए हैं; एतदर्थ श्रीदेशाईजी धन्यवादाह है। हमने आजसे कोई २३ वर्ष पहले श्रीमेघविजयजीके संबंधमें एक लेख जैनशासन समाचार पत्र में प्रकट किया था उसका उपयोग भी प्रस्तुत प्रस्तावनामें किया गया है। ६२. काव्यकारका परिचय इस देवानंद महाकाव्यके प्रणेता उपाध्याय मेघविजयजी है। उनके जीवनका समस्त वृत्तांत तो उपलब्ध नहीं है अर्थात् उनके माता-पिता, मूल निवासस्थान, मूल नाम, साधु होनेके बाद उनका विहारक्षेत्र, उनके विशिष्ट उपासक इत्यादिका वृत्तांत जाननेका कोई साधन नहीं है। परंतु साधुदशाका जो कुछ थोडा बहुत वृत्तांत प्राप्त होता है वह उनकी निजकी कृतियोमेंसे है; और इस प्रकार है- उपाध्याय मेघविजयजी श्वेताम्बर जैन संप्रदायानुसारि तपागच्छके यति थे और वे प्रसिद्ध सम्राट अकबरके कल्याणमित्र श्रीहीरविजयसूरिजीके संतानमें से थे। उनके दीक्षागुरु पंडित कृपाविजय थे और श्रीविजयदेवसूरिके - देवानन्दमहाकाव्य । पट्टधर श्रीविजयप्रभसूरिजीने उनको वाचक पदवी देकर उन्हें उपाध्याय बनाये थे' । इतनी हकीकत मेघविजयजीके बनाए हुए सब ग्रन्थोंकी अंतिम प्रशस्तिमें मिलती है। ग्रन्थकार श्रीशंखेश्वरपार्श्वनाथके बडे भक्त मालूम होते हैं। यह बात उनकी कृतियोंसे मालूम होती है । ग्रन्थके आरंभमें और ग्रन्थान्तर्गतप्रकरणों में भी उन्होंने जहां तहां ऐं का निर्देश किया है इससे मालूम होता है कि उनका श्रद्धा- मंत्र 'एँ' बीजमूलक है । प्रस्तुत काव्यकी आदिमें श्लोक नवमे में 'सिद्धि' शब्दका निर्देश करके ग्रन्थकारने अपने प्रगुरु मुनिसिद्धिविजयजीका भी स्मरण किया है। और यह बात 'सिद्धि' शब्दके टिप्पणमें स्पष्ट भी की है। ग्रन्थकारको श्रीविजयप्रभसूरिके द्वारा उपाध्याय पद मिला था। १७२७ में प्रस्तुत समस्यापूर्तिकी रचना की। १७४७ में मातृकाप्रसादग्रंथका निर्माण किया और १७५७ में चंद्रप्रभा नामक व्याकरणविपयक ग्रंथ बनाया। तथा १७६० में सप्तसंधानमहाकाव्यकी रचना की। इससे ग्रन्थकारका समय १८ वीं शताब्दी में होना निश्चित है। ग्रंथकार व्याकरण- शास्त्र, ज्योतिःशास्त्र और अध्यात्मशास्त्रके अच्छे विद्वान् थे। साहित्य और अलंकारके विद्वान् तो थे ही । उनकी अनेक कृतियोंसे उनका तत्तद्विषयक पांडित्य प्रकट होता है । ग्रन्थकारनिर्मित ग्रंथसूचि इस प्रकार है- -- mom १ "जयतु विजयदेवश्रीगुरोः पट्टलक्ष्मी-प्रभुरिह विजयादिः श्रीप्रभः सूरिशक्रः ॥ तत्सेवासक्तचेता अनवरततया प्राप्तलक्ष्मीविशिष्य शिष्यः श्रीमत्कृपादेविजयपदभृतः रात्कवेर्वाचकधीः । मेधः पद्माप्रसादाद् विशदमतिजुषां श्राव्यकाव्यं चकार ॥" -देवानन्दमहाकाव्यप्रशस्ति । "तदनु गणधरालीपूर्वदिग्भानुमाली विजयपदमपूर्व हीरपूर्व दधानः ॥ ६६ ॥ कनकविजयशर्माऽस्यान्तिषत् प्रौढधर्मा शुचितरवरशीलः शीलनामा द्वितीयः । कमलविजयधीरः सिद्धिसंसिद्धितीरस्तदनुज इह रेजे वाचकश्रीशरीरः ॥ ६७ ॥ चारित्रशब्दाद् विजयाभिधानस्त्रयः सगर्भा धृतशीलधर्माः । एषां विनेयाः कवयः कृपाद्याः पद्यास्वरूपाः समयाम्बुराशी ॥ ६८ ॥ तत्पादाम्बुजभृङ्गमेघविजयः०-" -श्रीशांतिनाथचरित्र। वंशवल्ली- हीरविजय । कनकविजय शीलविजय कमलविजय - सिद्धिविजय - चारित्रविजय कृपाविजय मेघविजय २ देवानन्दमहाकाव्य, सर्ग चतुर्थ-पञ्चम-षष्ठ और सप्तमका प्रारंभ । देखो पृ० ३९, ४९, ५७, ६९ । ३ देवानन्दमहाकाव्य, देखो पृ० ५७, ६९। ४ "खसाध्यसिद्धिं श्रयिताऽस्मि निःश्रमम्"। "सिद्धिम् इति च श्रीसिद्धिविजयं श्रयिताऽस्मि।" -देवानन्दमहाकाव्य, पृ० २टिप्पण ११॥ ५ "प्राप्तस्फुरद्वाचकख्यातिः श्रीविजयप्रभाख्यभगवत्सूरेस्तपागच्छपात्।"-शांतिनाथचरित्र । ६ “मुनि-नयन-अश्व-इन्दुमिते वर्षे हर्षेण सादडीनगरे। ग्रन्थः पूर्णः समजनि विजयदशम्यामिति श्रेयः॥" देवानन्दमहाकाव्यप्रशस्ति। ७. “ओं नमः सिद्धमित्यादेवर्णान्नायस्य वर्णनम् । चक्रे श्रीमेघविजयोपाध्यायो धर्मसाधनम् ॥" "संवत्सरे अश्व-वार्धि-अश्व-भूमिते पोष उज्वले । श्रीधर्मनगरे ग्रन्थः पूर्णश्रियमशिश्रियत्॥" --मातृकाप्रसाद । ८ "विजयन्ते ते गुरवः शैल-शर-ऋषि-इन्दुवत्सरे तेषाम् । आदेशाद् देशपतेः स्थितिः कृता राजधान्यन्तः ॥ चातुर्मास्यामस्यां नाम्ना श्रीआगरावराख्यायाम् । नानायोगैरुचि रचिता चन्द्रप्रभा सुधिया ॥" --चन्द्रप्रभाका प्रांतभाग। "वियद्-रस-मुनि-इन्दूनां प्रमाणात परिवत्सरे। कृतोऽयमुद्यमः पूर्वाचार्यचर्या प्रतिष्ठितः ॥"---सप्तसंधानमहाकाव्यप्रांतभाग ।

प्रस्तावना। १ देवानन्दमहाकाव्य-रचनासमय सं० १७२७ । यह काव्य मारवाडके सादडी नगरमें बनाया था ऐसा ग्रन्थकारने स्वयं लिखा है और उसकी प्रतिलिपि गवालियरमें स्वयं ग्रन्थ- कारने की है, यह भी स्वयं लिखा है। २ मातृकाप्रसाद - रचनासमय १७४७ । यह ग्रन्थ अध्यात्मविषयक है। इसमें 'औं नमः सिद्धम्' के वर्णाम्नायपर विवरण किया है और 'आँ' शब्दका रहस्य स्पष्टरूपसे बताया है। प्रस्तुत ग्रंथ धर्मनगर (धरमपुरी) में बना है ऐसा स्वयं ग्रन्थकारने लिखा है। ३ चन्द्रप्रभा-रचनासमय १७५७ । यह ग्रन्थ व्याकरणका है। हेमचंद्ररचित सिद्धहेमचंद्र नामक व्याकरणको कौमुदीके रूपमें बनाकर प्रस्तुत ग्रंथ बनाया है । इसकी रचना आगरामें हुई थी ऐसा खुद ग्रन्थकारने 'ग्रन्थांतमें कहा है। ग्रन्थका परिमाण आठ हजार श्लोक है। ४ शांतिनाथचरित्र - रचनासमय नहीं लिखा है । इस ग्रन्थमें नैषध कायकी समस्यापूर्ति है । विषय, भगवान् श्रीशांतिनाथजीका जीवन वर्णन है । यह ग्रंथ विजयप्रभसूरिके शासनमें बनाया गया था, इससे प्रतीत होता है कि ग्रंथका निर्माण काल १७१० के बादका है। क्यों कि वीरविजयमुनि, १७१० में आचार्य होकर विजयप्रभसरि बने थे। दिगविजयमहाकाव्य - रचनासमय नहीं ज्ञात हुआ। तो भी इसमें विजयप्रभसूरिका जीवन-वर्णन है, इससे यह ग्रन्थ भी १७१० के बादका ही होना चाहिए । इसमें तेरह सर्ग है; और ग्रन्थकारके बनाए हुए सब काव्योंमें यह सबसे बड़ा है। ६ सप्तसन्धानमहाकाव्य-रचनासमय १७६०। यह काव्य बडा चमत्कारी है। इसमें एक ही श्लोकमें सात पुरुषोंकी कथा कही गई है । ऋषभदेव, शांतिनाथ, पार्श्वनाथ, नेमिनाथ, महावीर स्वामी, कृष्णचंद्र और रामचंद्र-इन सात महापुरुषोंका जीवन चरित्र इस काव्यके प्रत्येक श्लोकमें वर्णित हैं। ग्रन्थप्रमाण अनुष्टुप् श्लोक ४४२ है। ग्रन्थकार कहते हैं कि- आचार्य हेमचंद्रका बनाया हुआ सप्तसन्धानकाव्य था परंतु वह अब नहीं मिलता है इस कारण हमने यह नया बनाया है"। महाकवि धनंजयने द्विसन्धान महाकाव्य बनाया है । परंतु द्विसन्धानकाव्यसे यह सप्तसन्धानकाव्य विशेष चमत्कृतिपूर्ण है। । १ "मुनि-नयन-अश्व-इन्दुमिते वर्षे हर्षेण सादडीनगरे। ग्रन्थः पूर्णः समजनि विजयदशम्यामिति श्रेयः"॥-देवानन्दमहाकाव्य,प्रान्तप्रशस्ति । २ देखो सातवां टिप्पण। ३ देखो आठवां टिप्पण। ४ नैषधकाव्यकी उक्त समस्यापूर्तिका नमूना इस प्रकार है- "श्रियाममिव्यकमनोऽनुरक्तता विशालसालत्रितयश्रिया स्फुटा। तया बभासे स जगत्रयीविभुर्वलत्प्रतापावलिकीर्तिमण्डल:" ॥१॥ -शांतिनाथचरित्र, प्रारम्भिकश्लोक । "गच्छाधीश्वरहीरहीरविजयाम्नाये निकाये धियां प्रेष्यः श्रीविजयप्रभाख्यसुगुरोः श्रीमत्तपाख्ये गणे। शिष्यः प्राज्ञमणेः कृपादिविजयस्याशास्यमानाग्रणीश्चके वाचकनाममेघविजयः शस्यां समस्यामिमाम्"।-शांतिनाथचरित्र,प्रतिसर्गप्रान्तप्रशस्ति। ५ देखो नवम टिप्पण। "सूत्रतः सूत्रिता ग्रन्थे द्विचत्वारिंशदन्विता । चतुःशतीह काव्यानां सप्तसन्धाननामनि" ॥ ७ "श्रीहेमचन्द्रसूरीशैः सप्तसन्धानमादिमम् । रचितं तदलामे तु स्तादिदं तुष्टये सताम्" ॥ -सप्तसंधानमहाकाव्यप्रांतभाग ।

प्रस्तावना। १ देवानन्दमहाकाव्य-रचनासमय सं० १७२७ । यह काव्य मारवाडके सादडी नगरमें बनाया था ऐसा ग्रन्थकारने स्वयं लिखा है और उसकी प्रतिलिपि गवालियरमें स्वयं ग्रन्थ- कारने की है, यह भी स्वयं लिखा है। २ मातृकाप्रसाद - रचनासमय १७४७ । यह ग्रन्थ अध्यात्मविषयक है। इसमें 'औं नमः सिद्धम्' के वर्णाम्नायपर विवरण किया है और 'आँ' शब्दका रहस्य स्पष्टरूपसे बताया है। प्रस्तुत ग्रंथ धर्मनगर (धरमपुरी) में बना है ऐसा स्वयं ग्रन्थकारने लिखा है। ३ चन्द्रप्रभा-रचनासमय १७५७ । यह ग्रन्थ व्याकरणका है। हेमचंद्ररचित सिद्धहेमचंद्र नामक व्याकरणको कौमुदीके रूपमें बनाकर प्रस्तुत ग्रंथ बनाया है । इसकी रचना आगरामें हुई थी ऐसा खुद ग्रन्थकारने 'ग्रन्थांतमें कहा है। ग्रन्थका परिमाण आठ हजार श्लोक है। ४ शांतिनाथचरित्र - रचनासमय नहीं लिखा है । इस ग्रन्थमें नैषध कायकी समस्यापूर्ति है । विषय, भगवान् श्रीशांतिनाथजीका जीवन वर्णन है । यह ग्रंथ विजयप्रभसूरिके शासनमें बनाया गया था, इससे प्रतीत होता है कि ग्रंथका निर्माण काल १७१० के बादका है। क्यों कि वीरविजयमुनि, १७१० में आचार्य होकर विजयप्रभसरि बने थे। दिगविजयमहाकाव्य - रचनासमय नहीं ज्ञात हुआ। तो भी इसमें विजयप्रभसूरिका जीवन-वर्णन है, इससे यह ग्रन्थ भी १७१० के बादका ही होना चाहिए । इसमें तेरह सर्ग है; और ग्रन्थकारके बनाए हुए सब काव्योंमें यह सबसे बड़ा है। ६ सप्तसन्धानमहाकाव्य-रचनासमय १७६०। यह काव्य बडा चमत्कारी है। इसमें एक ही श्लोकमें सात पुरुषोंकी कथा कही गई है । ऋषभदेव, शांतिनाथ, पार्श्वनाथ, नेमिनाथ, महावीर स्वामी, कृष्णचंद्र और रामचंद्र-इन सात महापुरुषोंका जीवन चरित्र इस काव्यके प्रत्येक श्लोकमें वर्णित हैं। ग्रन्थप्रमाण अनुष्टुप् श्लोक ४४२ है। ग्रन्थकार कहते हैं कि- आचार्य हेमचंद्रका बनाया हुआ सप्तसन्धानकाव्य था परंतु वह अब नहीं मिलता है इस कारण हमने यह नया बनाया है"। महाकवि धनंजयने द्विसन्धान महाकाव्य बनाया है । परंतु द्विसन्धानकाव्यसे यह सप्तसन्धानकाव्य विशेष चमत्कृतिपूर्ण है। । १ "मुनि-नयन-अश्व-इन्दुमिते वर्षे हर्षेण सादडीनगरे। ग्रन्थः पूर्णः समजनि विजयदशम्यामिति श्रेयः"॥-देवानन्दमहाकाव्य,प्रान्तप्रशस्ति । २ देखो सातवां टिप्पण। ३ देखो आठवां टिप्पण। ४ नैषधकाव्यकी उक्त समस्यापूर्तिका नमूना इस प्रकार है- "श्रियाममिव्यकमनोऽनुरक्तता विशालसालत्रितयश्रिया स्फुटा। तया बभासे स जगत्रयीविभुर्वलत्प्रतापावलिकीर्तिमण्डल:" ॥१॥ -शांतिनाथचरित्र, प्रारम्भिकश्लोक । "गच्छाधीश्वरहीरहीरविजयाम्नाये निकाये धियां प्रेष्यः श्रीविजयप्रभाख्यसुगुरोः श्रीमत्तपाख्ये गणे। शिष्यः प्राज्ञमणेः कृपादिविजयस्याशास्यमानाग्रणीश्चके वाचकनाममेघविजयः शस्यां समस्यामिमाम्"।-शांतिनाथचरित्र,प्रतिसर्गप्रान्तप्रशस्ति। ५ देखो नवम टिप्पण। "सूत्रतः सूत्रिता ग्रन्थे द्विचत्वारिंशदन्विता । चतुःशतीह काव्यानां सप्तसन्धाननामनि" ॥ ७ "श्रीहेमचन्द्रसूरीशैः सप्तसन्धानमादिमम् । रचितं तदलामे तु स्तादिदं तुष्टये सताम्" ॥ -सप्तसंधानमहाकाव्यप्रांतभाग ।

प्रस्तावना। २ किया है। ग्रन्थकारने उक्त ग्रंथका संबंध 'स्थानांग' नामक तीसरे अंगसे बताया है। यह ग्रंथ संस्कृत प्राकृत दोनों भाषाओंमें मिश्रित है। १० युक्तिप्रबोध नाटक, ११ हस्तसंजीवन और उसकी वृत्ति (रेखाशास्त्र) १२ उदयदीपिका (प्रश्न निकालनेकी पद्धति), १३ पंचाख्यान, १४ वीसायंत्रविधि, १५ अर्हद्गीता (तत्त्वगीता'), १६ पंच- मीकथा, १७ लघुत्रिषष्टिशलाकाचरित्र-इत्यादि और भी अनेक ग्रंथ मेघविजयजी उपाध्यायके बनाए हुए हैं । इसके उपरांत गुजराती भाषामें भी उनकी कितनी एक रचनाएं विद्यमान हैं। १ स्वाध्याय जैनशासन दीपक, २ स्वाध्याय जैनधरमदीपक, ३ स्वाध्याय आहारगवेषणा ये तीन सज्झायें कविराज श्रीमेघविजयजीने बनाई है। 'विजयदेवनिर्वाण रास' भी इनकी एक गुजराती कृति है। इससे ग्रन्थकारकी मातृभापाभक्ति प्रतीत होती है। ग्रन्थकारका एक स्वहस्तलिखित पत्र भी विद्यमान है और वह पत्र ग्रन्थकारने सं० १७६० भादरवा शुदि० १ को गवालियरसे अपने शिष्य मुनि सुंदरविजय जो जिहानाबाद (दिल्ली) नगरमें चातुर्मास थे उन पर लिखा हुआ है। इस प्रकार ग्रंथकारका अनेक विषयोंमें प्रकांड पांडित्य प्रकट होता है। प्रस्तुत ग्रंथ, श्रीसिंघीजैनग्रन्थमालामें मेरे द्वारा संपादित होकर प्रकट होता है, इसके लिए में आचार्य श्रीजिनविजयजीका और ग्रंथमालाके प्राणरूप श्रीमान् बहादूरसिंहजी सिंघीका ऋणी हूं । आशा करता हूं कि इस प्रकार और भी श्रीसिंघीजैनग्रंथमालामें नवीन नवीन ग्रंथोंका संपादन कर श्रुतज्ञानकी उपासनाका भागी बनूं । अमदावाद भारतीनिवास नं. १२,ब. बेचरदास । . १ उदयदीपिकाके प्रारंभका भाग- "नत्वार्हन्तं पार्श्वभावद्रूपं शर्केश्वरस्थितम् । श्रीश्राद्धमदनात् सिंहे धर्मलाभः प्रतन्यते ॥ १ ॥ श्रीकेशवकृतार्चस्य श्रीपार्श्वस्य प्रभावतः। प्रभासभाजनानन्दहेतुरत्रास्तु वस्तुतः ॥ २॥ कृपामूलेऽहतां धर्मे श्रीमेघविजयोदयः । गवां रसप्रसारेण भूयाद् जीवनसम्पदे" ॥ ३ ॥ २ अन्तभाग- "श्रीमेघविजयः प्राप्तोपाध्यायपदविश्रुतः । भूविश्वेत्यादिकाव्यस्य व्याख्यानं चकृवानिदम् ॥ ३ "इतोऽधिकं किञ्चन मातृकाया व्याख्यानमादेशि मया वितत्य । श्रीतत्त्वगीताहितसत्प्रतीताध्यायेषु सद्ध्येयधियोत्तरेषु" ॥ -मातृकाप्रसाद । ४ श्रीमेघविजयजीकी गूजराती भाषाका नमूना:- "इम जैन धरम शुद्ध जाणो नाणउ संका तेहनी, धुरि भले भणतां शास्त्र गणतां शुद्ध मति हुइ जेहनी । तपगच्छनायक सुगुणग्राहक श्रीविजयप्रभगणधरो, तस पट्टधारी ब्रह्मचारी विजयरत्नसूरीसरो॥ तस आण नित्य प्रमाण राखि कवि कृपाविजया तणउ । कहे सीस वाचक मेघविजया सेवक वाणी सवि भणउ।" -खाध्याय जैनशासनदीपक । ५ पत्रका अंतिम भाग- "श्राद्ध सर्वनै बिहुं पारई धर्मलाभ कहवो । वलता देख सविशेष समाचारइं लिखवा । अत्र जलद चारु छइ । गोहु दोढ मण । चिणा बे छई । सुगाल छई । साता मानयो । संवत १७५६ भाद्र सुदि १॥ पत्रका आदि भाग- "अत्र शर्म कर्म छई। तत्रनो ताहरो लेख श्रावण सुदि १२ नो लिख्यो लेख आव्यउ । समाचार जाण्या। तथा क्षेत्र आश्री लिख्युं ते तो काल एहवो ज छ । सर्वत्र क्षेत्र दुर्भिक्षरूप थया छ । पन्नग व्याप्त छई । तेणे जिम तिम निर्वाह करवो ॥" -यह पत्र सारा गद्य में है। ।

१० देवानन्दमहाकाव्य । ३. देवानन्द महाकाव्यकी समस्यापूर्तिका परिचय प्रस्तुत सप्तसर्गात्मक महाकाव्य, माधकी समस्यापूर्तिरूप है। समस्यापूर्ति वा पादपूर्तिका स्वरूप इस प्रकार है-"या समासार्था पूरणीयार्था कविशक्तिपरीक्षणार्थम् अपूर्णतयैव पठ्यमानार्था वा सा समस्या"-अमरकोश- टीका प्रथमकाण्ड, शब्दादिवर्ग श्लो० ७; अथवा "भिन्नाभिप्रायस्य श्लोकादेः तदीयत्वेन प्रत्यभिज्ञायमानानां भागानां वकृतेन परकृतेन वा भागान्तरेण समसनं सन्धानं समस्या"-माधवी, शब्दकल्पद्रुमकोश । अर्थात-कविकी शक्तिके परीक्षणार्थ जिसका अर्थ पूरणीय है ऐसा पाद वा पादोंका उच्चारण, जिसको सुनकर प्रतिभाशाली कवि पूरणीय अर्थको पूरा कर देवें । अथवा जिसका अभिप्राय भिन्न भिन्न है ऐसे श्लोकादिकका अपनी वा परकी कृतिसे सन्धान करना याने भिन्न भिन्न अभिप्रायवाले अपूर्ण श्लोकको अपने अभिप्रायसे संगतरीतिसे पूरा करनेका नाम समस्यापूर्ति वा पादपूर्ति है। माघकी पादपूर्तिरूप प्रस्तुत देवानंदमहाकाव्यमें समस्यापूर्तिका उक्त लक्षण ठीक ठीक घटमान है । काव्यकार उपाध्याय मेघविजयजी प्रस्तुत समस्यापूर्तिमें सर्वथा सफल हुए हैं. इतना ही नहीं किन्तु इस समस्यापूर्तिमें उनकी नवनवार्थशालिनी प्रकांड सर्वतोमुखी प्रतिभाका भी पता चलता है। माघका मुख्य विषय कृष्णवासुदेवकृत शिशुपाल-वध है और प्रस्तुत काव्यका नायक वासुदेव कुमार-जो पीछेसे विजयदेवसूरि बनता है- है। माघके और देवानंदकाव्यके नायक वासुदेवपदाङ्कित है । कृष्णवासुदेवको दिल्ली जाना पडता है इसी तरह हमारे चरित्र नायकको भी जहांगीर बादशाहके पास दिल्ली जाना पड़ा है और कृष्णवासुदेवने रैवतक पर्वतके दर्शन किये थे इसी प्रकार हमारे चरित्रनायक भी तीर्थयात्राके लिए रैवतकगिरिको गए थे । इस प्रकार माघके नायकों और प्रस्तुत काव्यके नायकमें थोडा बहुत साम्य है। प्रस्तुत समस्यापूर्ति में माघके सात साँका ही संबंध है। समस्यापूर्ति के लिए मानके श्लोकका अंतिम चरण-चतुर्थ चरण-अधिकतासे लिया गया है और कहीं कहीं आद्य चरण, द्वितीय चरण और तृतीय चरण भी उपयोगमें लाया गया है । संपादककृत टिप्पणो में यह बताया गया है कि प्रस्तुत समस्यापूर्तिरूप काव्यमें कहां माघका प्रथम चरण है, कहां द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ चरण है; और साथमें माघके श्लोकका पाठभेद भी दर्शाया गया है । विसर्ग, अनुस्वार, पृथक्पद, समस्तपद, विभक्तिके वचनका भेद, क्रियापदभेद, 'श' 'म' 'न' 'च' का भेद, अत्यंत सदृश समानार्थक शब्दका निक्षेप, समानार्थक शब्दका न्यास, संधिभेद, शब्दस्थानभेद, लिपिकारभेद-इत्यादि पर उक्त पाठभेद निर्भर है, और संपादकीय टिप्पणोमें जहां जहां वैसा पाठभेद हुआ है यह सब माघके श्लोकोंका प्रमाण देकर स्पष्टतया बताया गया है। समस्यापूर्ति भी पद्मबंधादिकी तरह एक प्रकारका चित्र-आश्चर्यकर-काव्य है, इसी कारणसे उसमें विसर्ग, अनुस्वारका अधिक महत्त्व नहीं, माघमें कहीं 'ललनाः' पाठ हो और इसमें 'ललना' पाठ हो इससे समस्यापूर्तिकी लेश भी क्षति नहीं। माघमें कहीं 'दिवम्' पाठ हो और यहांपर 'दिव' पाठ हो तब भी समस्यापूर्तिमें कमी नहीं आ सकती । समस्यापूर्तिमें पूरणीय चरणके शब्दोंको नहीं बदलकर अर्थकी पूर्ति करनी होती है। कहीं कहीं 'सुति' के स्थानमें 'च्युति', 'हव्यवह' के स्थानमें 'हव्यभुज' 'पयोज' के स्थानमें 'सरोज' इस प्रकारका परिवर्तन प्रस्तुत समस्यापूर्तिमें आया है परंतु यह परिवर्तन समस्याकारका खुदका किया हुआ है वा माघके ही पाठांतर है यह निश्चय नहीं हो सकता। और इस प्रकारका कचित् कचित् परि- वर्तन समस्याकारका हो, तब भी समस्यापूर्तिके लिए बाधक नहीं, क्यों कि जहां सर्गोंके सर्गों तक समस्यापूर्ति चलती हो वहां इतना परिवर्तन अवश्य हो जाता है। प्रस्तुत समस्यापूर्तिमें खास खूबी यह है कि मायके चरणोंका नया ही अर्थ समस्याकारने निकाला है। अर्थकी यह खूबी काव्यकारने अपनी टिप्पनीमें दी है। माघमें जहां जहां श्लोकके प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ चरणमें यमक है वहां वहां समस्याकारने यमक रखकर बडी चातुरीसे अर्थानुसंधान किया है। जैसी चमत्कृति माघमें है ऐसी ही चमत्कृति प्रस्तुत काव्यमें हैं। समस्याकारका मुख्य उद्देश कविताके द्वारा गुरुभक्तिको प्रगट करनेका है। इसी कारणसे प्रस्तुत काव्यमें नायकका संपूर्ण चरित्र सविस्तर नहीं बताकर संक्षिप्त सारार्थ । ११ मात्र मोटी मोटी बातें दिखलाई हैं और अपनी सारी प्रतिभा समस्यापूर्ति के कार्य में लगाकर काव्यजगतमें चमत्कृति पैदा कर गुरुकी महिमा बढाई है। काव्यकारने और भी प्रसिद्ध प्रसिद्ध काव्योंकी समस्यापूर्ति बनाई है इससे उनकी प्रतिभापूर्ण कवित्वशक्तिका पता चलता है। कविकुलकिरीट कालिदासके मेघदूतकी और श्रीहर्षरचित नैषध काव्यकी भी समस्यापूर्ति काव्यकारने वनाई है; इससे प्रतीत होता है कि काव्यकार एक अद्वितीय सिद्धहस्त समस्या- पूरक थे। काव्यकार एक अद्वितीय कवि होने पर भी कहते हैं कि- "नोद्रेकः कवितामदस्य न पुनः स्पर्धा न साम्यस्पृहा श्रीमन्माघकवेस्तथापि सुगुरोमें भक्तिरेव प्रिया । तस्यां नित्यरतेः सुतेव सुभगा जज्ञे समस्याऽद्भुता सेयं शारदचन्द्रिकेव कृतिनां कुर्याद् दृशामुत्सवम् ॥ माघः सान्निध्यकृद् भूयाद् मल्लिनाथैस्तथैश्यताम् । हास्येन मम दास्येऽस्मिन् यथाशक्त्युपजीदिते ।। अस्या न मधुरा वाचो नालंकारा रसावहाः। पूर्वसङ्गतिरेवास्तु सतां पाणिग्रहश्रिये ॥" अर्थात्-किसी प्रकारके कविताके मदसे प्रस्तुत समस्यापूर्ति नहीं बनाई है । एवं श्रीमान् माघकविके साथ हमारी स्पर्धा भी नहीं है, तथा उनके समान होनेका भी हमारा दावा नहीं है । मात्र हमारे सुगुरुकी भक्तिको प्रस्तुत समस्यापूर्तिसे व्यक्त की है। हमारे प्रस्तुत कार्यमें यशःशरीरी माघकवि भी सहाय करें, टीकाकार मल्लिनाथ प्रभृति हमारी तरफ निगाह रक्खें । हमने तो यथाशक्ति यह दास्य कार्य किया है। प्रस्तुत समस्यापूर्तिकी वाणी मधुर नहीं अलंकार भी रसावह नहीं मात्र पूर्वसंगति मात्र है । तो भी गुरुभक्तिप्रदर्शक हमारी यह कृति सज्जनोंके करकमलमें हो ऐसी हमारी मनःकामना है। ये संस्कृत पद्य समस्याकारने देवानन्द महाकाव्यकी अंतिम प्रशस्तिमें दिये हैं। देखिए तो सही, इन पद्योंसे कर्ताकी सरलता, नम्रता, निरभिमानिता और गुरुभक्तिका रस किस प्रकारसे टपक रहा है । वर्तमान कालके मुमुक्षु लोक, कविराज मेघविजयजीके इन गुणोंका अनुकरण करें और काव्यरसके पिपासु गण प्रस्तुत काव्यको पढ कर माघके पढनेका आनन्दानुभवके साथ एक सुप्रसिद्ध जैनाचार्यके वृत्तान्तसे भी परिचित बनें । इति शुभम् । ६४. देवानन्दमहाकाव्यका सरल और संक्षिप्त सारार्थ । [१] सब द्वीपोंमें उत्तम जंबूद्वीप । उसमें गंगानदीसे सुशोभित भारतवर्ष । भारतवर्षमें सर्वोत्तम देश गूजरात । वह समीपवर्ती समुद्रसे सुशोभित है । उसमें विकखर कमलयुक्त अनेक सरोवर हैं । उसके अनेक खेतोंमें संख्यातीत हल रात-दिन चलते रहते हैं । उन खेतोंमें उत्तमोत्तम ईख पकती है। गूजरात देशमें पार्श्वनाथ भगवानका शंखेश्वरनामक अद्भुत तीर्थ है, और दूसरे भी अनेकानेक पवित्र तीर्थोंसे वह देश अलंकृत है। गूजरात देशमें गौओंका क्षीर नित्य प्रति झरता रहता है इससे उसका 'गूर्जर' नाम यथार्थ है। इस प्रकार अनेक शोभासे विभूषित गूर्जर देशमें पहाडकी तलहट्टिकाके पास इलादुर्ग (ईडर) नामक श्रेष्ठ नगर है । उस नगरका राजा नारायण है । नारायणके पिताका नाम पुंज और पितामहका नाम भाण था । राजा सुप्रसिद्ध राठोड वंशका था। उस नगरमें स्थिर नामका सर्वोत्तम व्यवहारी रहता था। स्थिरके पिताका नाम माधव था। स्थिरकी पत्नी रूपा थी जो बडी सुरूप और पतिव्रता थी। जब रोहिणी नक्षत्र शुभयोगयुक्त था तब विक्रम संवत् १६३४ के पोष शुक्ल त्रयोदशी रविवारके शुभ दिन, रूपाबाईने एक अद्भुत पुत्रको जन्म दिया। अद्भुतताके ही कारण पुत्रका नाम वासुदेवं रक्खा गया । १ "चतुस्त्रिंशत्तमे वर्षे षोडशस्य शतस्य हि । पौषे मासे सिते पक्षे त्रयोदश्यां दिने रवौ" ।-विजयदेवसूरिमाहात्म्य, सर्ग १, श्लो. १८ । २वासकमार-विजयदे मा० ।

देवानन्दमहाकाव्य । [२] बालक वासुदेव युवान हुआ तब माताकी इच्छा उसको विवाहित करनेकी हुई । परंतु, पुत्र तो जैनी दीक्षाको वरना चाहता था। पुत्रके दीक्षा लेने के विचारको जानकर माताने, पिताने और भाईयोंने उसको खूब समझाया, दीक्षाके दुःख बतलाए और दीक्षा न लेकर गृहस्थ बननेको कहा, परंतु युवक वासुदेव अपने विचारसे लेश भी चलित न हुआ; किंतु मातापितादिकको दीक्षाका परमार्थ समझाकर, अपना विचार सविशेप दृढीभूतकर दीक्षाके लिए उसने मातापिताकी संमति प्राप्त की । पुत्रस्नेहसे उसकी माताने भी दीक्षा लेनेका संकल्प किया। पुत्र वासुदेवने दीक्षा लेनेके पूर्व तीर्थयात्राका विचार किया। दीक्षाके लिए गुरुको भी ढूंढना तो था ही। तीर्थयात्राके निमित्तसे वह कार्य अधिक सुकर हो गया। अपने राजाके द्वारा यात्राप्रवासके लिए स्थल-स्थलमें सुप्रबंध करनेके हेतु नगरके राजाकी संमति लेकर स्थिर व्यवहारीका पुत्र वासुदेव तीर्थभ्रमणार्थ चल पड़ा। उस समय जैन धर्मके महान् आचार्य श्रीविजयसेनसूरि राजनगर (अमदावाद) में विराजमान थे। अकबर पादशाहको प्रतिबोध करनेवाले महान तेजस्वी आचार्य श्रीहीरविजयजीके वे पट्टधर शिष्य थे। तीर्थयात्रा करते करते युवक वासुदेवकुमार, अमदावादमें आ पहुंचा और श्रीविजयसेनसूरिजीके उपाश्रयमें गुरुवंदनके लिए गया। गुरुकी उपदेशपूर्ण वाणी सुन कर वासुदेव कुमारने गुरुको कहा कि-"मुजको दीक्षा दीजिए"। वासुदेवकुमारकी सोल्लास विनंती सुन कर गुरुने कहा कि-"वत्स ! तेरे ही निवास स्थलमें तेरेको दीक्षा देना उचित है, अर्थात् तेरी दीक्षाविधि ईडरमें करना समुचित है; परंतु तेरे अत्याग्रहसे तेरी दीक्षाविधि यहांपर-अमदावादमें-भी करना अनुचित नहीं । राजनगरके श्रावकोंने मिलकर वासुदेवकुमारका दीक्षोत्सव किया और अमदावादकी हाजापटेलकी पोलमें प्रियालवृक्षके नीचे सकलसंघ-समक्ष श्रीविजयसेनसूरिने युवक वासुदेवको संवत् १६४३ के माघ शुदि दशमीको दीक्षित करके उसका 'विद्याविजय' नाम प्रकट किया। दीक्षोत्सवके समय सारे देशमें अमारि रखनेका प्रबंध हुआ था और दानका प्रवाह अविरत बहता था । अब वासुदेवकुमार नहीं परंतु मुनि विद्याविजय पांच व्रतोंको धारण कर उनका यथाशक्ति पालन करने लगे और शास्त्रोंका अध्ययन करनेके लिए तत्पर हुए । अपने प्रबल प्रयत्नसे मुनि विद्याविजय ज्ञान और क्रिया दोनों मार्गके पारगामी हुए। एक समयकी बात है कि बादशाह अकबरने श्रीविजयसेनसूरिजीको अपने दरवारमें आनेका आमंत्रण भेजा। राधनपुरसे विहार करते हुए सूरिजी लाहोरमें बादशाहके दरबार में पधारे और धर्मके स्वरूपकी चर्चा की । सूरिजीने बादशाहको कहा कि-'दयामय धर्म ही सर्व श्रेयका असाधारण कारण है। उस समय कई ब्राह्मणोंने बादशाहको कहा कि-'हुजूर! खुदाकी बनाई हुई परमपवित्र श्रीगंगा माताजीको ये जैनाचार्य नहीं मानते' । इसका उत्तर देते हुए आचार्यने कहा कि-'राजन् ! ऐसी बात नहीं है। हम जैन लोक गंगाजी को बडी पवित्र मानते हैं और इसी कारण हमारे जैन मंदिरोंकी प्रतिष्ठामें गंगाजलके विना चल ही नहीं सकता' । ऐसा कहकर दरबार में आए हुए ब्राह्मणोंको आचार्यजीने निरुत्तर कर दिए । फिर आचार्यजी, भूतल पर विहार करने लगे और जैन धर्मके उपदेशका प्रचार करने लगे। १ विजयदेवमाहात्म्यमें श्रीवल्लभोपाध्यायने लिखा है कि-"राजनगरमें अपने पुत्रको और अपनी पत्नीको दीक्षित करानेके लिए स्थिर शेठ खुद आया था और किरायेके मकानमें रहता था। "अथ श्यहम्मदावादे स्थिरः श्रेष्ठी समाययौ । पुत्रस्य खस्य पढ्याश्च दीक्षापाहणहेतवे ॥"-सर्ग ५ श्लो. १। २ “षोडशस्य शतस्यास्मिन् त्रिचत्वारिंशवत्सरे । दशम्यां माघशुक्लस्य दीक्षाऽभूद् यस्य सोऽवतात् ॥” सर्ग ५ श्लो० ५२ । ३-४ विजयदेवमाहात्म्य, सर्ग. ६, श्लो० १३-२१ । म संक्षिप्त सारार्थ। १३ ["बादशाहके आग्रहसे सूरिजीने लाहोरमें दो चातुर्मास किए और बाद अपने गुरु श्रीहीरविजयजीको ऊना- नामक ग्राममें रोगग्रस्त जानकर वे लाहोरसे गुरुजीके पास आनेको निकल पडे । गूजरात तरफ आते आते रास्तेमें सादडीमें चोमासा करना पड़ा और वहां ही श्रीविजयसेनसूरिजीने सुना कि श्रीहीरविजयजी गुरु, स्वर्गको सिधार गए । गुरुजीका स्वर्गगमन सुनकर आचार्यजीको बडी ग्लानि हुई। सादडीसे आचार्यजी पाटण पहुंचे, वहांसे खंभात होकर अमदाबादको गए। अमदाबादमें और उसके पास सिकंदरामें श्रीसंघके आग्रहसे आचार्यजीने एक एक चातुर्मास किया । वहांसे लाटापल्ली (लाडोलपुर) में और वहांसे अपने गुरुके निर्वाण स्थल उन्नतपुर (ऊना) में आए । वहांसे विहार करते करते और अनेक ग्राम और नगरोंको अपने सदुपदेशसे पावन करते हुए आचार्यजी सूरतको गए । वहांसे फिर ऊनाको गये। श्रीविजयसेनसूरिजीके एक श्रेष्ठ शिष्य नन्दिविजयमुनि बडे पंडित थे और अनेक भाषाओंके ज्ञाता थे। उस समय दीव बंदरमें फिरंगीयोंका राज्य था । वे फिरंगी लोक दुरात्मा थे। उन फिरंगीयोंके गुरु 'पादरी' कहलाते थे। उक्त नन्दिविजय मुनिने अपने कौशलसे फिरंगीयोंको बडे प्रसन्न कर लिये। अतिप्रसन्न होनेसे फिरंगीलोक जिन- धर्ममें भक्ति रखने लगे, जिनप्रवचनको जानने लगे और जैन साधुओंकी सेवामें तत्पर भी रहने लगे। फिरंगीयोंने अपने गुरु पादरीको कहा कि-'जैन मुनियोंको दीवबंदर में आनेके लिए निमंत्रण भेजा जाय' 'जैन मुनियोंको देखनेकी तीव्र इच्छा सब फिरंगीयोंमें व्यक्त हुई है। पादरीने श्रीविजयसेनसूरिको दीवबंदर में आनेके हेतु अपने हाथसे पत्र लिख भेजा। परंतु दीवके अग्रणी मुनिभक्त श्रावक मेघजीकी संमति जब तक न मिले तब तक सूरिजी दीवमें जानेको उत्सुक न हुए। क्यों कि उक्त मेघजीश्रावक फिरंगीयोंका बडा प्रियमित्र था और दीवका फिरंगी राजा क्रूर था। इधर पादरीका पत्र पाकर सूरिजी न आए तब मेघजीके कहनेसे फिरंगीयोंके राजाने स्वयं पत्र लिख भेजा और उस पत्रसे सूरिजी दीवको पधारे । आचार्य और फिरंगीयोंके राजाके बीच धर्म-वार्ता हुई, फिरंगीयोंका राजा प्रसन्न हुआ और उसने आदरके साथ जैन मुनियोंको दीवमें रहनेकी संमति दी। अब सूरिजीने दीवसे विहार किया और फिरते फिरते वे अमदावादके पास शकंदरामें आ पहुंचे। वहां मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमीको मुनि विद्याविजयको पंडित पद दिया।] बाद खंभातके अग्रणी श्रावक और सोमश्रेष्ठिके बड़े भाई श्रीमल्लके आमन्त्रणसे आचार्यजी खंभात आए । श्रीमल्ल बडा धनाढ्य था और गुरुभक्त भी। आचार्यजीने खंभात आकर संवत् १६५७ वैशाख शुदि चोथके दिन अपने प्रिय शिष्य पंडित विद्याविजयको आचार्य-पद दिया और अपनी गद्दीका समर्पण किया । आचार्य-पद देनेके साथ ही विद्याविजयमुनिका नाम विजयदेवसूरि प्रकट हुआ और वे विजयसेनसूरिके पट्टधर बने । यही विजय- देवमूरि प्रस्तुत काव्यके नायक हैं । आचार्यपदके प्रसंग पर खंभातके श्रावक श्रीमल्लने बडा उत्सव किया और उत्सवमें दान भोजन वगैरहके लिए बड़ा भारी खर्च करके, अपने समानधर्मियोंकी अधिकाधिक सेवा की । पाटणमें सं० १६५८ पौष वदि ६ गुरुको श्रीविजयदेवसूरिका वंदना-महोत्सव हुआ। उस महोत्सवके खर्चका सारा भार सहस्रवीर श्रावकने अपने ऊपर लिया । कनकविजय और लावण्यविजय यह दो मुनि विजयदेवसरिके शिष्य थे । एक समयकी बात है कि, जहांगिरशाह बादशाहने चरित्र नायक सूरिजीको अपने दरबार में सादर बुलाए । सूरिजी १[ ] इस कोष्ठकके अंदरका भाग विजयदेवसूरिमाहात्म्यसे लिया गया है। वहां यह भाग, सर्ग ६, श्लो० ४५ से ११६ श्लोक तक है। ऊपर, इस भागका सार मात्र दिया गया है। २ "श्रीमत्पत्तनसद्ले निरमाद् वन्दनोत्सवम् । सहस्रवीर आनन्दाद् यस्य द्रव्यव्ययाद् धनात्" ॥ ९३ ॥ 'षोडशस्य शतस्यास्मिन् अष्टपञ्चाशवत्सरे । षध्यां पौषस्य कृष्णायां गुरुवारे शुभावहे" ॥ ८४ ॥-श्रीविजयदेवसूरिमाहात्म्य, सर्ग ७ ॥

देवानन्दमहाकाव्य। , विहार करते हुए दिल्लीको पहुंचे। धर्म-चर्चा और वाता-विनोदसे सूरिजीने बादशाहको प्रमोदित किया । सूरिजीकी तपप्रधान उग्र क्रियाओंसे विशेष प्रसन्न होकर बादशाहने सूरिजीको 'महातपा' का बिरुद दिया। बादशाहके सन्मानसे सूरिजीके विपक्षी-कुपक्षी लोक श्याममुख हो गये । [३] अब विहार करते करते सूरिजी ईडर को आए । वहांके राजा कल्याणमल्लने ईडर आए हुए सूरिजीका बडा स्वागत किया और सूरिजीके प्रवेशोत्सवमें भी अग्र भाग लिया। ईडरके चतुर्विध संघमें सर्वत्र आनंदका उल्लास छा गया। ईडरका राजमंत्री सहजू श्रेष्टी सूरिजीका उपासक था और बडा धनाढ्य था । सहजू शाहने सूरिजीके पास आकर भक्तिविनम्र शब्दोमें कहा कि 'गुरुजी ! आपके पधारनेसे आपकी जन्मभूमि धन्य हुई है । आपके पूर्वज बड़े धार्मिक थे । गुरुजी ! अब आपको मेरी विनंती है कि आप अपने योग्य शिष्यको ईडरमें अपना पट्टधर बनाकर-अर्थात् आचार्यपद देकर ईडरनगरको विशेष धन्य कीजिए। आपके होनहार पट्टधरके आचार्यपदका उत्सव करनेकी मेरी बडी तीव्र भावना है' । सूरिजीने, सहजू शाहकी बात ध्यानपूर्वक सुनी और यथासमय उसकी भावना पूर्ण करनेको कहा। ईडर आनेके पूर्व ही सूरिजीने अपने योग्य शिष्यको पाठक याने उपाध्याय पद, सं० १६७३ माघमासके शुक्ल पक्षमें उत्तम दिन आनेपर, पाटणमें ही दे दिया था । उपाध्याय कनकविजय प्रकांड पंडित थे। उपाध्याय होनेके पूर्व ही मुनि कनकविजय अपने गुरुसे चौदह विद्या पढ चूके थे, उपांगसमेत एकादशांगीका अवगाहन कर चुके थे और चौदह पूर्वोका (2) भी अध्ययन कर सारे जैन प्रवचनके पारगामी बन चूके थे । ईडरके पास साबली नामका ग्राम है, वहां जीवहिंसाकी अधिक प्रवृत्तिको देखकर वहांके श्रावक रत्नसिंह पारखने सूरिजीसे सावली आनेकी विनंती की; और कहा कि-'आपके आनेसे सावलीमें चलती हुई जीवहिंसा रुक जायगी और जैन धर्मकी महिमा भी होगी' । सूरिजी सावली आए और वहांके ठाकुरको प्रतिबोधित कर जीवहिंसाको रुकवा दी। वहांसे फिर सूरिजी ईडरको पधारे। ईडरके नाकरशाह के पुत्र शाह सहजूने आचार्य-पदका बडी धामधूमके साथ उत्सव किया और सूरिजीने अपने शिष्य उपाध्याय श्रीकनकविजयको सं० १६८२ वैशाख शुदि छठके दिन आचार्य-पद देकर अपना पट्टधर बनाया और उसका नाम विजयसिंहमूरि प्रकट किया । अब दोनों सूरिजी महाराज-अर्थात् श्रीविजयदेवसरि और श्रीविजयसिंहमूरि दोनों गुरुशिष्य-ईडरसे विहार करके सीरोहिका (शीरोही) नगरको पहुंचे, तब पुंजा- शाहके पुत्र पोरवाडशिरोमणि शाह तेजपालने बडा प्रवेशोत्सव किया था। शीरोही पहुंचनेके पहले शाह तेजपालकी विनंतीसे सूरिजी आबुकी यात्राके लिए गए, साथमें शाह तेजपालेका संघ भी था । सूरिजीने शीरोहीमें सुखपूर्वक चातुर्मास बिताया। उस समय जालोरका मंत्री श्रीजयमल्ल सूरिजीके पास पहुंचा तब सूरिजी विहार योग्य समय होनेपर स्वर्णगिरिको चले। वहांका राजा जालंधरसिंह था। स्वर्णगिरिमें पहुंचने पर राजाने और लोगोंने सूरिजीका बडा आदर किया। उस समयके अधिकाधिक आदर-सत्कारको देखकर श्रीविजदेवमूरिजीको खंभातनगर याद आ गया जहां कि अपने आचार्य-पदका बडा भारी उत्सव हुआ था। इधर ही श्रीविजयसिंहमूरिका वंदनामहोत्सव हुआ अर्थात् श्रीविजयदेवसरिजीने अपने शिष्य श्रीविजयसिंहसरिको सिंहासनके ऊपर विराजमान करके संघसमक्ष वंदन १ अथास्ति पत्तनं नाम पत्तनं पत्तनोत्तमम् । रत्नयोनि यतो लोकास्तद् ब्रुवन्ति च नापरम्" ॥ ३४ ॥ "षोडशस्य शतस्याब्दे त्रिसप्ततितमे रमे। माघमासावदातस्य पक्षस्योत्तमवासरे" ॥ ५६ ॥-विजयदेवमाहात्म्य, सर्ग ९ । २ “अथ शश्वद् गुरोः पार्श्वे सर्वा विद्याश्चतुर्दश । सोपाइँकादशाशीयुक् पूर्वाण्यपि चतुर्दश" ॥ १॥-विजयदेवमाहात्म्यसर्ग ९ । ३ "विजयदेवसूरीन्द्रं वसन्तं तत्र सांप्रतम् । प्रणत्य रत्नसिंहोऽयं श्राद्धो विज्ञपयत्यथ" ॥ ८४ ॥-विजयदेवमाहात्म्य, सर्ग ९ । ४ "व्यवहारी सदाहारीश्वरेश्वरपुरस्कृतः। तत्र पावित्रभृगात्रः श्रेष्ठी वसति नाकरः" ॥ ६८ ॥-विजयदेवमाहात्म्य, सर्ग ९ । ५ "प्रत्यर्बुदाचलं तीर्थ तेजपालस्वतोऽचलत् । प्रत्यहं वन्दमानोऽमा समायान्तं गणाधिपम्" ॥ २५३ ॥-विजयदेवमाहात्म्य, सर्ग ९ ।

देवानन्दमहाकाव्य। , विहार करते हुए दिल्लीको पहुंचे। धर्म-चर्चा और वाता-विनोदसे सूरिजीने बादशाहको प्रमोदित किया । सूरिजीकी तपप्रधान उग्र क्रियाओंसे विशेष प्रसन्न होकर बादशाहने सूरिजीको 'महातपा' का बिरुद दिया। बादशाहके सन्मानसे सूरिजीके विपक्षी-कुपक्षी लोक श्याममुख हो गये । [३] अब विहार करते करते सूरिजी ईडर को आए । वहांके राजा कल्याणमल्लने ईडर आए हुए सूरिजीका बडा स्वागत किया और सूरिजीके प्रवेशोत्सवमें भी अग्र भाग लिया। ईडरके चतुर्विध संघमें सर्वत्र आनंदका उल्लास छा गया। ईडरका राजमंत्री सहजू श्रेष्टी सूरिजीका उपासक था और बडा धनाढ्य था । सहजू शाहने सूरिजीके पास आकर भक्तिविनम्र शब्दोमें कहा कि 'गुरुजी ! आपके पधारनेसे आपकी जन्मभूमि धन्य हुई है । आपके पूर्वज बड़े धार्मिक थे । गुरुजी ! अब आपको मेरी विनंती है कि आप अपने योग्य शिष्यको ईडरमें अपना पट्टधर बनाकर-अर्थात् आचार्यपद देकर ईडरनगरको विशेष धन्य कीजिए। आपके होनहार पट्टधरके आचार्यपदका उत्सव करनेकी मेरी बडी तीव्र भावना है' । सूरिजीने, सहजू शाहकी बात ध्यानपूर्वक सुनी और यथासमय उसकी भावना पूर्ण करनेको कहा। ईडर आनेके पूर्व ही सूरिजीने अपने योग्य शिष्यको पाठक याने उपाध्याय पद, सं० १६७३ माघमासके शुक्ल पक्षमें उत्तम दिन आनेपर, पाटणमें ही दे दिया था । उपाध्याय कनकविजय प्रकांड पंडित थे। उपाध्याय होनेके पूर्व ही मुनि कनकविजय अपने गुरुसे चौदह विद्या पढ चूके थे, उपांगसमेत एकादशांगीका अवगाहन कर चुके थे और चौदह पूर्वोका (2) भी अध्ययन कर सारे जैन प्रवचनके पारगामी बन चूके थे । ईडरके पास साबली नामका ग्राम है, वहां जीवहिंसाकी अधिक प्रवृत्तिको देखकर वहांके श्रावक रत्नसिंह पारखने सूरिजीसे सावली आनेकी विनंती की; और कहा कि-'आपके आनेसे सावलीमें चलती हुई जीवहिंसा रुक जायगी और जैन धर्मकी महिमा भी होगी' । सूरिजी सावली आए और वहांके ठाकुरको प्रतिबोधित कर जीवहिंसाको रुकवा दी। वहांसे फिर सूरिजी ईडरको पधारे। ईडरके नाकरशाह के पुत्र शाह सहजूने आचार्य-पदका बडी धामधूमके साथ उत्सव किया और सूरिजीने अपने शिष्य उपाध्याय श्रीकनकविजयको सं० १६८२ वैशाख शुदि छठके दिन आचार्य-पद देकर अपना पट्टधर बनाया और उसका नाम विजयसिंहमूरि प्रकट किया । अब दोनों सूरिजी महाराज-अर्थात् श्रीविजयदेवसरि और श्रीविजयसिंहमूरि दोनों गुरुशिष्य-ईडरसे विहार करके सीरोहिका (शीरोही) नगरको पहुंचे, तब पुंजा- शाहके पुत्र पोरवाडशिरोमणि शाह तेजपालने बडा प्रवेशोत्सव किया था। शीरोही पहुंचनेके पहले शाह तेजपालकी विनंतीसे सूरिजी आबुकी यात्राके लिए गए, साथमें शाह तेजपालेका संघ भी था । सूरिजीने शीरोहीमें सुखपूर्वक चातुर्मास बिताया। उस समय जालोरका मंत्री श्रीजयमल्ल सूरिजीके पास पहुंचा तब सूरिजी विहार योग्य समय होनेपर स्वर्णगिरिको चले। वहांका राजा जालंधरसिंह था। स्वर्णगिरिमें पहुंचने पर राजाने और लोगोंने सूरिजीका बडा आदर किया। उस समयके अधिकाधिक आदर-सत्कारको देखकर श्रीविजदेवमूरिजीको खंभातनगर याद आ गया जहां कि अपने आचार्य-पदका बडा भारी उत्सव हुआ था। इधर ही श्रीविजयसिंहमूरिका वंदनामहोत्सव हुआ अर्थात् श्रीविजयदेवसरिजीने अपने शिष्य श्रीविजयसिंहसरिको सिंहासनके ऊपर विराजमान करके संघसमक्ष वंदन १ अथास्ति पत्तनं नाम पत्तनं पत्तनोत्तमम् । रत्नयोनि यतो लोकास्तद् ब्रुवन्ति च नापरम्" ॥ ३४ ॥ "षोडशस्य शतस्याब्दे त्रिसप्ततितमे रमे। माघमासावदातस्य पक्षस्योत्तमवासरे" ॥ ५६ ॥-विजयदेवमाहात्म्य, सर्ग ९ । २ “अथ शश्वद् गुरोः पार्श्वे सर्वा विद्याश्चतुर्दश । सोपाइँकादशाशीयुक् पूर्वाण्यपि चतुर्दश" ॥ १॥-विजयदेवमाहात्म्यसर्ग ९ । ३ "विजयदेवसूरीन्द्रं वसन्तं तत्र सांप्रतम् । प्रणत्य रत्नसिंहोऽयं श्राद्धो विज्ञपयत्यथ" ॥ ८४ ॥-विजयदेवमाहात्म्य, सर्ग ९ । ४ "व्यवहारी सदाहारीश्वरेश्वरपुरस्कृतः। तत्र पावित्रभृगात्रः श्रेष्ठी वसति नाकरः" ॥ ६८ ॥-विजयदेवमाहात्म्य, सर्ग ९ । ५ "प्रत्यर्बुदाचलं तीर्थ तेजपालस्वतोऽचलत् । प्रत्यहं वन्दमानोऽमा समायान्तं गणाधिपम्" ॥ २५३ ॥-विजयदेवमाहात्म्य, सर्ग ९ ।

देवानन्दमहाकाव्य । उत्सव किया। तैलंगदेशके वादशाहने श्रीसूरिजीके उपदेशसे गौहत्याका निपेध किया। वहांसे सूरिजी फिर भाग्य- नगरीको आए और वहां अनेक प्रकारके नये नये उत्सव हुए। वहांसे सूरिजी वीजापुरको गए और वहां भी धर्मका बडा प्रभाव हुआ। बादशाहने बंदियोंको छोड दिए । यहां भी साथमें आए हुए श्रावक देवचंद्रने बडा भारी दानप्रवाह बहाया । सूरिजीने कवि श्रीवीरविजयजीको ‘पंडित'का पद दिया। अब फिर श्रीअंतरिक्षपार्श्वनाथके दर्शन कर सूरिजी बुरानपुरको आए और वहां चातुर्मास बिताया। गूजरातके संघका आग्रह होनेसे फिर वहांसे सूरिजी गूजरातको चले। विहार करते करते सूरिजी सूरतको आए । गूजरातदेश तो मोरकी तरह सूरिजीके आगमनकी प्रतीक्षामें था ही। [६] अब विहार करते करते सूरिजी गन्धपुर (गंधार) बंदरको पहुंचे । वहां अमदावादसे और अणहिल्ल- वाडसे अनेक लोक सूरिजीके वंदनको गए। धनजी शाह और रतनजी शाहके आग्रहसे सूरिजी वहां ठहर गये । साहिबदेतनयने और अखेशाहने बडा उत्सव किया और सूरिजीने अपने प्रिय शिप्य पं० वीरविजय मुनिको' सं० १७१० वैशाख शुदि १० मीके दिन आचार्यपदसे विभूपित करके उसका नाम विजयप्रभसूरि प्रकट किया । इसके बाद सूरिजी फिर सूरतको चले । वहांसे सूरिजी अहमदपुरको (अमदावादको ? ) गए । धनजी शाह नामका श्रावक सूरिजीका बडा उपासक था । [७] धनजी शाह और उसकी पत्नी धनश्रीने मिल कर बहुत बडा उत्सव किया। महमूंदिकाकी (रुपये रुपयेकी ) प्रभावना की । विजयदेवसरिजी और विजयप्रभसूरिजी दोनों शाहपुरमें आए। शाहपुर अमदावादका एक विभाग है । अमदाबादमें चातुर्मास करके सूरिजीने विमलगिरिकी यात्राके लिए प्रस्थान किया। साथमें रायचंद्र वगैरह भक्तिमान् श्रावक भी चले थे। वहांसे सूरिजी ऊनाको गए और वहां अपने प्रगुरु श्रीहीरविजय- जीकी समाधिका दर्शन किया और यहां ही श्रीविजयदेवसूरिजीने भी समाधि ली । संवत् १७१३ आषाढ शुक्ल एकादशीके दिन प्रातःकालको श्रीविजयदेवसरिजी स्वर्गधामको गए। अपने गुरुके विदेहवाससे श्रीविजयप्रभसूरिजीको बडा खेद हुआ। श्रावक रायचंद्रने वहां एक बडा विहार बनवाया और उसके ऊपरके ध्वजदंडमें धजा चढाई । ऊनाके पास दीवबंदरमें श्रीविजयप्रभसूरिजीने संघके आग्रहसे दो चातुर्मास बिताये । अब श्रीविजयप्रभसूरि देव- पाटण और जूनागढमें चातुर्मास करके पोरबंदरमें आए। फिर वहांसे अब्धिकूल (वेरावळ) को गए । वहांसे सूरिजी विमलगिरिकी यात्राके लिए प्रस्थित हुए । साथमें वेरावळ और पोरबंदरका श्रावक-समूह भी था। यहांसे सूरिजी धनौष (आधुनिक घोघा ?) नामक प्राममें आए और पर्युषणाका महापर्व वहां ही बिताया। वहांपर जसूनामकी एक भक्त श्राविकाने प्रतिष्ठोत्सव किया । यहाँसे सूरिजी गूजरातकी ओर चले और अमदावाद पहुंचे। वहां, सूरिजीने बीबीपुर नामके अमदावादके उपपुर में रहकर पर्युषणाके महापर्वकी आराधना की। यहांसे सूरिजी श्रीशंखेश्वर- पार्श्वनाथके दर्शनके लिए प्रस्थित हुए। १ “पट्टे न्यस्तःस इह गुरुणा बन्दिरे गन्धपुर्याम् , खैकाद्रीला १७१० शरदि समहं राधसम्यग्दशम्याम्"॥-मेघदूतसमस्यालेख,श्लो० १०६। २ प्रस्तुत देवानंदाभ्युदयमहाकाव्यमें सात सर्गमें मुख्यरूपसे श्रीविजयदेवसूरिजीका और भानुषगसे श्रीविजयप्रभसूरिजीका वृत्तांत आया है । काव्य, भाषकी समस्यापूर्तिरूप है इससे इसमें समस्याके पूरणका ही मुख्य लक्ष्य रक्खा गया है । इसी कारणसे श्रीविजय- देवसूरिजीका वृत्तांत भी इसमें बहुत संक्षेप से आया है । सविस्तर जिज्ञासुओंको सूचना है कि-वे, विजयदेवसूरिजीका विशालवृत्तांत देखनेके लिए खरतरगच्छीयश्रीश्रीवल्लभपाठकविरचित श्रीविजयदेवमाहात्म्यको आधन्त पढ़ें।

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प्राप्ता यम्य प्रमादेन विद्या श्रेयस्करी मया ।
इदमयंते तस्मै श्री-विजयधर्मसूरये ।।
कृतज्ञो बेचरात:

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महोपाध्यायश्रीमन्मेघविजयविरचितं [ माघमहाकाव्यसमस्यारूपं ] ॥ देवानन्दमहाकाव्यम् ॥ प्रथमः सर्गः। श्रियः प्रियः पार्श्वजिनेश्वरः श्रियं तनोतु पूर्णेन्दवमण्डलाननः । ननाम वामां समवेक्ष्य यं श्रितं हिरण्यगर्भाङ्गभुवं मुनि हरिः॥१॥ जयत्ययं श्रीविजयादिदेववाक्-प्रभुर्दधत् तीव्रमहातपोमहः । श्रिया परब्रह्मसमं स्मरेन्धने प्रसिद्धमूर्ध्वज्वलनं हविर्भुजः ॥२॥ किमैन्द्रवज्रं रविमण्डलं त्विषा किमेतदित्याकुलमीक्षितं जनैः ॥ [षट्पदी] सरखतीं पीनपयोधरां स्तुमः क्रमबयाम्भोजलससितेच्छदाम् । यंदाश्रये स्यान्नृपतेः कविर्वच:-क्रमादमुन्नारद इत्यबोधिसः ॥३-४॥ ग्रन्थकारकृतानि टिप्पणानि 5 १ 'हिरण्यगर्भाङ्गभुवम्' हिरण्यं सुवर्णम् तद्वन्निर्मला गर्भावय ५ सितच्छदाः श्वेताम्बराः । वभूः-ताम् । “तित्थयरमायरो पच्छन्नगम्भाओ जर-रुहिर नदीपक्षे पीनं पयो-जलम्-धरति इति । क्रमद्वयेन पट्टे क्रीड- कललाणि य न हवंति" इति आवश्यकचूर्णौ नियुक्तौ । न्मरालाम्। २ 'मुनिम्' ज्ञानयुतम् “समणे भगवं महावीरे" इत्यादिपाठात् । ६ 'यदाश्रये' यस्याः सरखत्याः आश्रयः यदाश्रयः। ३ 'पीनपयोधराम्' जिनवाक्पक्षे पीनः पुष्टः पयोधरो मेघः ७ '-क्रमादमुन्नारद' अमुद् अहर्षः तस्य नारः विक्षेपः ध्वंस: प्रन्थकृत् यया। हर्षः तं दत्ते इति । ४ 'क्रमद्वयाम्भोजलसत्सितच्छदाम्' क्रमद्वयम्-परंपरया ८ 'इत्यबोधिसः' इत्या प्राप्तव्या बोधिसा ज्ञानलक्ष्मीर्यस्य सः । सूत्रा-ऽर्थग्रहणरूपम् । इण् गतौ धातोः क्यप् । संपादककृतानि टिप्पणानि 1 हिरण्यवत् समुज्वला गर्भाङ्गभूः गर्भाशयस्थानं यस्याः ताम्-'ईदृशी वामां मातरं श्रितम्-आश्रितं यं पार्श्वजिनं मुनि समवेक्ष्य हरिः-इन्द्रः ननाम-इति । 'हिरण्यगर्भाङ्गभुवम्' इत्यादि माघे प्रथमे सर्गे प्रथमश्लोके चतुर्थः पादः। 2'महः' इति कर्मकारकम् । 'प्रसिद्धमूलज्वलनम्' इत्यादि मा० प्र० स० श्लो० २ द्वितीयः पादः। "किमेतदित्या-' इत्यादि मा०प्र० स० श्लो० २ चतुर्थः पादः। 4 अत्र ‘पयोधर' शब्दोल्लेखेन अन्यकृत् खाभिधां सूचितवान् पयोधरो मेघः, ग्रन्थकारश्च मेघविजयः। 'षट्पदी' नाम छन्दः। माघकाव्यटीकाकृत् पण्डितमल्लिनाथको- लाचल: कथितवान् यत्-"दिवाकरस्तु वृत्तरत्नाकरटीकायां प्रथम- पठितेन । "द्विधाकृतात्मा किमयं दिवाकरो विधूमरोचिः किमयं हुताशनः" इति चरणद्वयेन सह इममेव श्लोकं षट्पदच्छन्दस उदाहरण- माह" । इति समस्याकृताऽपि 'षट्पदी' इति सूचितम् । यस्याः सरखत्याः आश्रये वचःक्रमात् कविः, नृपतेः अमु- चारदः-हर्षदः स्यात् पुनश्च इत्यबोधिसः-यस्य बोधिसा ज्ञानलक्ष्मीः इत्या प्राप्तुं योग्या अस्ति ईदृशः कविः । [अमुदा नार+द-अमुन्नारद] [इत्य+बोधि+सा-इत्यबोधिस] माघे तु 'क्रमादमुं नारद इति-अबोधि सः [प्र० स० श्लो. ३ चतुर्थः पादः] इति पदविभागः। .

२ 5 देवानन्दमहाकाव्यम् । [प्रथमः सर्गः] सदक्षजातिप्रणयं कलाधरं धरन्तमुच्चैर्भुवनोपकारकम् । यशोऽर्जुनं सज्जनमाश्रये श्रिये स्फुटोपमं भूतिसितेन शम्भुना ॥५॥ असन्जनं प्राप्य गुणाधिकापि गौर्भवेदसोमालतयाऽतिदुर्गमा । सुसीमतां नैति रेसेऽपि बिभ्रतं धरा धरेन्द्रं व्रततीततीरिव ॥६॥ प्रभोः प्रणेतुं गुणगौरवं स्तवं गुरुं कविं वा न वितर्कये क्षमम् । सदा-सुरासक्तमति खकान्तिभिर्विडम्बयन्तं शितिवाससस्तनुम् ॥७॥ तथापि गौरं चरितैर्गुरुं स्तुवन् स-मौक्तिकश्रीफललिप्सुरस्म्यहम् । तपोमहोभिः सहितं समुन्नतं धनं घनान्ते तडितां गुणैरिव ॥ ८॥ कृपाश्रयात् खीयगुरोः प्रसादतः खसाध्यसिद्धिं श्रयिताऽस्मि निःश्रमम् । समीरणाद' रेणुरुपैति सजितं कुथेने नागेन्द्रमिवैन्द्रवाहनम् ॥९॥ अथात्र जम्बूपपदेऽस्ति भारतं प्रभारतं द्वीपकुलप्रदीपके । महोदयं ध्यायदिवाऽस्य गङ्गया विभातमच्छस्फुटिकाक्षमालया ॥ १० ॥ 10 १ 'सदक्षजातिप्रणयम्' दक्षजातिः पण्डितः, पक्षे पार्वत्याम् अतिप्रणयः स्नेहः । २ 'गौः' गौर्वाणी भूर्वा । ३ 'असोमालतया' असोमालतया जाती एकवचनम् । असो- मालता कठिनता तया। ४ 'सुसीमताम्' शैत्यम् ग्रामसीमतां वा । ५ 'रसेऽपि रसे जले शृङ्गारादौ वा । ६ 'गुरुम्' गुरोः देवसेव्यतेन उपमा । ७ 'कविम्' शुक्रस्य गौरखेन । ८ 'सदा-सुरासक्तमतिम् देवाः सुराः, पक्षे असुराः, बलभ- द्रपक्षे सुरा मद्यम्। ९ ‘स मौक्तिकश्रीफललिप्सुरस्म्यहम्' स अहम्-जाज्यपात्रम् । मुक्तिसंबन्धिधिया युक्तफले । यद्वा समग्र-औक्तिकस्य वाचिस्यक फले लिप्सुः । “तृन्नुदन्त-" [२।२।९०। हैम.] इत्यादिना षष्ठीनिषेधात् । १० 'कृपाश्रयात्' कृपा इति खीयगुरोः श्रीकृपाविजय इति नामसूचा। ११ 'खसाध्यसिद्धिम्' सिद्धिमिति च श्रीसिद्धिविजय श्रयिताऽस्मि । १२ 'कुथेन' "कुथ: स्यात् करिकम्बलः" इत्यनेकार्थ. श्लो. १४ । [“कुथः कुशः, कुथः कीटः, प्रातःस्नानी द्विजः कुथः" इति अनेकार्थमजरी श्लो. १४-श्लोकाधि० 1] ~RAN 1 'स्फुटोपमम्' इत्यादि मा०प्र० स० श्लो. ४ चतुर्थः पादः 2 यथा व्रततीतती: बिभ्रतं घरेन्द्रं प्राप्य गुणाधिकाऽपि धरा अतिदुर्गमा रसरहिता भवति तथा गुणाधिकाऽपि वाणी असजनं प्राप्य असोमालतया अतिदुर्गमा भवति पुनश्च रसेऽपि सुसीमतां न एति। माघे तु 'धराधरेन्द्रम्' इति एकं पदम्-प्र० स० श्लो. ५ चतुर्थः पादः । 3 बलभद्रो हि सुरायां सदा आसक्तः इति प्रसिद्धम् अतः सदासुरासक्तमतिं बलदेवम् इति भावः । विडम्बयन्तमित्यादि-मा० प्र० स० श्लो०६ चतुर्थपादः। 4. 'समौक्तिक- इति पदस्य १ 'सम+औक्तिक-' अथवा २ 'सम्मौक्तिक-'. अथवा ३ 'स: मौक्तिक-- इति त्रिधा पदवि- भागः। १ समानि समप्राणि औक्तिकानि, २ मौक्तिकेन सहितम्, ३ सः-अहम्-प्रन्थकारः मौक्तिकयुकश्रीपाललिप्सुः इति च अनुक्रमेण अर्थों बोध्यः। 'घनं घनान्ते तडितां गणैरिव' इति मा० प्र० स० श्लो० ७ चतुर्थपादः । अत्र तु 'गणैः' स्थाने लिपिकारप्रमादात् 'गुणैः' पाठः प्रतिभाति । 5 'कृपा' शब्देन ग्रन्थकारः खं गुरुं कृपाविजयं स्मरति । 'कुथेन' इत्यादि मा० प्र० स० श्लो० ८ चतुर्थपादः । माघे अत्र पादे 'इन्दवाहन' शब्दः प्रयुक्तः । अत्र तु 'ऐन्द्रवाहन' शब्द इति मेदः । 6 "विभान्तमच्छस्फटिकाक्षमालया' इति मा०प्र० स० श्लो. ९ चतुर्थपादः । अत्र तु 'विभान्त-' स्थाने "विभात-' इति तथा 'स्फटिक- स्थाने 'स्फुटिक-' इति च दृश्यते । चित्रकाव्ये अनुखार-विसर्गयोः सतोरपि अनुच्चारणं न दोषावहम् इति कवि- समयात् 'विभान्त-' पदं सानुखारं सदपि अत्र समस्यायां ग्रन्थ- कारेण तत् निरनुसार विवक्षितम् । 'स्फुटिक' शब्दोऽपि स्फटि- कपर्यायो भवेत् अथवा प्रमादाद 'स्फटिक' स्थाने 'स्फुटिक' इति जातम् ।

5 [प्रथमः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं से गूर्जरचा इति नीवृतां वरश्चकास्ति तमिस्त्रिदिवं सचित्रयन् । सदोडुनेत्रैरदसीयभासनामवेक्षमाणं महतीं मुहुर्मुहुः ॥ ११ ॥ अनन्तपट्टे खटिकाक्षरैर्ग्रहच्छलादमुष्येव विलिख्य संस्थितिम् । संस्कर्तुमभ्यस्यति विश्वकृत् सदा पदं महैन्द्रालयचारुचक्रिणः ॥ १२ ॥ सरस्यतिस्मेरपयोजकाननानिशास्थितोऽलिप्रकरः समुत्पतन् । इहाऽऽबभौ कि रविनारदागते वेन पीठादुदतिष्ठदच्युतः ॥ १३ ॥ यदीश्वरस्यारिनिसूदनात्मसु श्रुतेषु गीतेषु बुधैरधाकृती । सुरैः समं वा दनुजैर्विसर्जितौ सुतेन धातुश्चरणौ भुवस्तले ॥ १४ ॥ समुद्रमारान्मणिढीकनाकृतेऽभ्युपेतमेषोऽर्चयति दुमैः सुमैः। गृहानुपैतुं प्रणयादभीप्सवो भवन्ति नाऽपुण्यवतां मनीषिणः ॥ १५ ॥ वदन्ति केदारगणाः खरेखणैरितीव सद्रेखितविश्ववास्तवं । दिवः समादाय मेदादमुं पुमांश्चिरंतनस्तावदभिन्यवीविशत् ॥१६॥ विशामसौ श्रीतनयाँभिनन्दनः समुन्नतज्योतिरपास्ततापनः। महौषधिप्रत्तरुचिः समुद्गतेरचूचुरचन्द्रमसोऽभिरामताम् ॥ १७ ॥ स्त्रीराज्यभूमौ युवतीजना इवोद्गृहीतपत्रासय इक्षुयष्टयः। प्रीणन्ति सौवाङ्गनिपीडनै रसैमहानुभावा हि नितान्तमर्थिनः ॥१८॥ इहास्ति शर्केश्वरतीर्थमद्भुतं सनायकं पार्श्वजिनाभिभूभुजा। भुजंगमानां यमुपप्लवे भजन नतेन मूनां हरिरग्रहीदपः ॥ १९॥ श्रियं स शोश्वरपार्श्वतीर्थकृद् दधेऽर्थितार्थप्रथनाद् मरुत्तरोः । अचूचुरचैत्यमचर्यचारुतां सुमेरुशृङ्गस्य तदा तदासनम् ॥ २० ॥ 10 15 20 ५ 'मदादमुं' मदाद् अहंकारात् । ६ अमुं देशं विधिर्मदात् दिवः अभिनिवेशितवान् । ७ 'श्रीतनयाभिनन्दनः' कन्दर्पः, पक्षे श्रीः लक्ष्मीः, तनयाः १ 'स' स इति प्रसिद्धः । २ 'अनन्तपट्टे' अनन्तम् नभः । ३ 'सुतेन धातुश्चरणौ' धातुः सुतेन ब्रह्मदत्तन नारदेन वा- देवैः सह कृतः नारदेन हेतुभूतेन सुरैः असुरैः समं कृतः तथा असुरैः सुरैः समं कृतः तौ द्वावपि । ४ 'खरेखणैः' हलोल्लेखनैः । पुत्राः तैर्वर्धनः । ८ 'उद्गृहीतपत्रासयः' उद्गृहीताः पत्राणि एव असयः खगाः यैस्ते। 1 सचित्रयन्-त्रिदिवं सचित्रं साश्चयं कुर्वन् इति भावः- सह चित्रेण सचित्रः-सचित्रं करोति सचित्रयति, अस्य वर्तमान- कृदन्ते प्रथमैकवचने सचित्रयन् । 'अवेक्षमाणम्' इत्यादि मा० प्र० स० श्लो. १० चतुर्थपादः। 2 'खटिका' गूजरातीभाषायां 'खडी' इति प्रसिद्धा या बालै- लेखशालायां खलिपिपरिकर्मणि उपयुज्यते । 'पदं महेन्द्रालयचारु चक्रिणः' इति मा० प्र० स० श्लो. ११ चतुर्थपादः । अत्र तु “महेन्द्र' स्थाने 'महैन्द्र' इति तथा 'महैन्द्रा- लयचारुचक्रिणः' इति एक पदम् इति विमेदः । 3 'जवेन' इत्यादि मा०प्र० स० श्लो० १२ चतुर्थपादः । रविनारदागतेः रविवत् तेजस्वी पूज्यो वा यो नारदः तस्य आगतेः-आगमनात् इति भावः । 4. 'सुतेन' इत्यादि मा० प्र० स० श्लो० १३ चतुर्थपादः । 5 अत्र श्लोके पादद्वयं समस्यारूपेण गृहीतं कविना । तच्च मा० प्र० स० श्लो० १४ तृतीय-चतुर्थपादौ । माघे 'नापुण्यकृताम्' इति पाठमेदः। 6 मा० प्र० स० श्लो. १५ चतुर्थपादः । 7 मा० प्र० स० श्लो. १६ चतुर्थपादः । 8 मा० प्र० स० श्लो. १७ चतुर्थपादः । 9 मा० प्र० स० श्लो० १८ चतुर्थपादः। 10 मा०प्र० स० ठो० १९' चतुर्थपादः ।

४ 5 10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [प्रथमः सर्गः] जिनप्रभुः संकटकोटिकिं(?)कृत् पुरःस्थदीपैः प्रतिबिम्बितैस्तनौ । विदिद्युते वाडवजातवेदसः शिखाभिराश्लिष्ट इवाऽम्भसां निधिः ॥ २१ ॥ करम्बिताः पादनखांशुराशिभित्रभुः प्रभोगौरवपुःप्रभाभराः। प्रदीपदीप्रद्युतिपुञ्जसंयुजस्तुषारमूर्तेरिव नक्तमंशवः ॥ २२ ॥ प्रसादयन् मर्त्यगणः सविस्मयस्तथाऽपरोऽमर्त्यगणोऽनिमेषक् । प्रभोः पुरोऽन्योऽन्यनिषक्तरोचिषौ तदेकवर्णाविव तौ बभूवतुः ॥ २३ ॥ अयं हि कैवल्यधरः खसेविनां ददाति कैवल्यपदं न तन्महत् । तदद्भुतं यद्ददते नृणां सृजस्तपोधनाभ्यागमसम्भवा मुदः ॥ २४ ॥ दशावतारः कमलोपमाननः फणीश्वरोत्सङ्गविनिर्मितासनः । जिनः प्रभावान्नरकान्तकारकः स पुण्डरीकाक्ष इति स्फुटोऽभवत् ।। २५ ॥ जगत्पवित्रे विषयेऽत्र सन्त्यतः पराणि तीर्थान्यथ किं पुनर्विधिः। अमुं चकारेति धियेव मा हरः शुचिस्मितां वाचम-वोचदच्युतः ॥ २६ ॥ मदादनम्राननमार्जुनेर्जुनी पयः किरन्ती चरति प्रतिस्थलम् । पिबन् यथार्थाभिध एष तन्महैर्व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् ॥ २७॥ अथास्त्यमुष्मिन् नगरं गुरोगिरेरिलादिदुर्गाख्यमुपत्यकाश्रितम् । त्रिविष्टपस्यापि च यन्मणीगृहैरदस्त्वयाँ नुन्नमनुत्तमं तमः ॥ २८ ॥ कृतः प्रजाक्षेमकृता प्रजासृजा सुपात्रनिक्षेपनिराकुलात्मना। पुरप्रदेशः स ऋचामिव ध्वनिनिधिः श्रुतीनां धनसम्पदामिव ॥ २९ ॥ हरिप्रियां या नगरी गरीयसीं सदा समव्याप्यतयेवं शिश्रिये । कथश्चिदैकात्म्यवशात् तया पुनर्गिरोऽथवा श्रेयसि केन तृप्यते ॥ ३० ॥ पुरन्दरस्यापि पुरं प्रणूयते पुराणविद्भिर्निजवृत्तिसिद्धये । 3 15 20 emamaram- यथार्थनामा । - १ 'अमुं चकारेति धियेव मा हरः' विधिः अमुं देशम्- इति धिया इव चकार । 'इति' इति किम् ? अच्युतः कृष्णः, हरो रुद्रः, मा शुचिस्मितां हास्यवाणीम् , अवोचत् अवादीत् । २'मा' योगे अडभावेऽपि 'अ' इति अव्ययं विस्मये । यद्वा 'मा' इति अव्ययं भिन्नम् । ३'-नम्राननमार्जुने' आर्जुनं तृणगणः । ४ 'अर्जुनी' गौः। ५ 'यथार्थाभिध एष' गूर्जराणां गोप्रधानलेन तत्राणात् ६'-रदस्खया' अया लक्ष्म्या । ७ 'समव्याप्यतयेव' या नगरी लक्ष्मी शिश्रिये, पुनः गिरः २-३ शिश्रिये । तया लक्ष्म्या वाणीनामैक्यात् सर्वपदार्थानामभि- धेयत्वात् । यत्र यत्र निषिद्धलं तत्र तत्र अधर्मलम् , यत्र यत्र अधर्मलं तत्र तत्र निषिद्धलम् इति समव्याप्तिः । तथा यत्र लक्ष्मीः वर्णादिर्भावः तत्र तन्नामशब्दः, यत्र यत्र शब्दः तत्र तत्र तद्वा- च्योऽर्थः इति समव्याप्तिः । वागर्थयोः सदा संपृकलात् । 1 मा० प्र० स० श्लो. २० तृतीय-चतुर्थपादौ अत्रापि तावेव तृतीय-चतुर्थपादौ। 2 मा० प्र० स० श्लो० २१ चतुर्थपादः । मा० प्र० स० श्लो० ११ चतुर्थपादः। 4 मा०प्र० स० श्लो. २३ चतुर्थपादः । 5 मा०प्र० स० श्लो. ९४ चतुर्थपादः । 6 मा० प्र० स० श्लो. २५ चतुर्थपादः । 7 मा० प्र० स० श्लो. २६ चतुर्थपादः । 8 मा० प्र० स० श्लो०.२७ चतुर्थपादः । 9 मा० प्र० स० श्लो. २८ माघस्य पूर्वार्धम् अत्रापि पूर्वा- घम् । माघस्य चतुर्थपादः अत्रापि स एव । 10 मा०प्र० स० श्लो. २९ चतुर्थपादः।

५ 10 [प्रथमः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं न चास्त्यमुष्या नगरीति मेकरोत् गुरुस्तवैवागम एष धृष्टताम् ॥ ३१ ॥ सुवर्णसालोज्वलयोगपभृत् कृताभिषेकं निशि चान्द्रवारिभिः। स्वबिम्बितार्काक्षगुणं दधत् पुरं किमस्ति कार्य गुरुयोगिनामपि ॥ ३२ ॥ उदीर्णरागप्रतिरोधकं जनैविहारवृन्दं विहितं सुदर्शनैः । उपेयुषो मोक्षपथं मनखिनः स्वमुच्चकैदर्शयतीव केतुभिः ॥ ३३ ॥ नभोगभावात् त्रिदिवं मुनीश्वरैर्गृहीतमध्यात्मशा कथञ्चन । अतोऽधिकं यत्र जर्भन्तमुजगुः पुरातनं त्वां पुरुष पुराविदः ॥ ३४ ॥ यदाश्रयश्रेणिशिखासुखाश्रयात् सदा वसन्ति युसदामिहाश्रयाः। दधात्यतोऽधः कथमप्यतिमैरहीश्वरः स्तम्भशिरस्सु भूतलम् ॥ ३५ ॥ शिकसौहार्दधरैर्धनाधिपै तापि या पुण्यजनैरलङ्कृता । प्रभाविशेषादरणैर्वृषांश्रयैर्भवान् भवोच्छेदकरैः करोत्यधः ॥ ३६ ॥ वसद्भिरस्यां मनुजैर्विसर्जितः स्रगादिनिर्माल्यभरोऽपि यत्र सा। सुगन्धदानात् पवनैर्विदेशगैर्गुरुर्धरित्री क्रियतेतरां त्वया ॥ ३७॥ पुरं पुरन्ध्रीचललोचनाञ्चलैः स्मरं यदुज्जीवयते हरादितम् । फणाभृतां पूस्त्वमिहेदृशं मुदः पदं दृशः स्याः कथमीशैमादृशाम् ॥ ३८ ॥ यदम्बुजाक्षीर्निशि चन्द्रशालिकाविलासिनी क्तुमिव मरातुराः। सुराः श्रयन्तेऽन्वहमृक्षलक्षतः क्षपातमस्काण्डमलीमसं नभः ॥ ३९॥ सरोभिरुन्निद्रपयोरुहाननैर्व्यधायि याऽऽमोदधरैर्धरश्रियः। १ 'गुरुस्तवैवागम एष धृष्टताम्' अमुष्याः पुर्याः गुरुस्तवा ७ 'पुण्यजनै-'पुण्यजनाः धार्मिकाः यक्षा वा । अधिकवर्णनयोग्या नगरी नास्ति इति आगमः सिद्धान्तः धृष्टताम् ८ 'प्रभाविशेषा-प्रभावी यः शेषो नागराजः तस्य आदरैः । अकरोत् । ९ 'वृषाश्रयै-' वृषः धर्मः वृषभश्च । २ 'खबिम्बितार्काक्षगुणम्' खस्मिन् संक्रान्तसूर्यानुबिम्बरूपा १० 'भवान्' भवान् एकादशरुद्रान् जयति । क्षमालां दधत् । ११ 'खया-' तु+अया-अया विरुद्धा भूमिः, सुगन्ध- ३ 'नभोगभावात् त्रिदिवं मुनी-' भोगविचारे त्रिदिवम् अतः पुराद् नाधिकम् यतः तत्र नभोगभावः स्पष्टः-नभोगा देवाः १२ 'स्याः' हे भोगावति ! खम् ईदृशं नेत्रमुदः स्थानं कथं तेषां भावः अखिलम् । स्याः। 'स्याः' इति क्रियापदम् । ४ तदेव आह-'यत्र जभन्तमुज्जगुः' यत्र पुराणपुरुष कृष्णम् १३ 'कथमीशमादृशाम्' ईशस्य रुद्रस्य माया लक्ष्म्या दृक् आं लक्ष्मीम् भजन्तम्-जभन्तम्-पुराविदः उज्जगुः । एतेन दर्शनं येभ्यस्ते-तेषां फणाभृताम्-ईशालंकारकारिणाम् । भोगचातुर्य तत्र नास्ति इति भावः । १४ 'सरोभि-' सरोभिः या पर्वतलक्ष्म्याः तिरस्क्रिया व्यधायि, ५ 'खाम्' तु+आं लक्ष्मीम् । तया पर्वतश्रिया सा तिरस्क्रिया प्रत्युत व्यधायि । किंभूतया तया? ६ 'शिवैकसौहार्दधरै-शिवं मोक्षः सदाशिवो वा। द्विपद्विषः उपास्यया सेव्यया । 15 लक्ष्म्या वा। 1 मा० प्र० स० श्लो० ३० चतुर्थपादः । 2 मा० प्र० स० श्लो० ३१ चतुर्थपादः । 3 मा० प्र० स० श्लो. ३२ माघस्य प्रथम-तृतीयपादौ अत्रापि प्रथम-तृतीयपादौ । 4 मा० प्र० स० श्लो. ३३ माघस्य द्वितीय-तूर्यचरणौ अंत्रापि तावेव। 5 मा०प्र० स० श्लो० ३४ चतुर्थपादः । 6 मा०प्र० स० श्लो. ३५ चतुर्थपादः । 7 मा० प्र० स० श्लो. ३६ चतुर्थपादः । 8 मा० प्र० स० श्लो. ३७ चतुर्थपादः । माघे तु 'मीश ! मादृशाम्' इति पदविभागः, अत्र तु 'मीशमाहशाम्' इति समस्तं हेयम् । 9 मा० प्र० स० श्लो• ३८ चतुर्थपादः ।

ur 10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [प्रथमः सर्गः] तया द्रुमाणां कुसुमैरुपास्यया द्विपद्विषः प्रत्युत सा तिरस्क्रिया॥४०॥ चतुष्पथे पण्यमगण्यमुचितं श्रितैः प्रभांकृत्कृतसत्यकर्मभिः। उपेत्य देवैः क्रियते ऋयिव्रजैर्मियस्त्वदाभाषणलोलुपं मनः ॥ ४१ ॥ पुरी पुरन्ध्रीजनरूपसम्पदा सदा जयन्तीं जयवाहिनीजनम् । स्थितस्य दूरे दिशति खनिन्दनामहिद्विषस्तद्भवता निशम्य ताम् ॥ ४२ ॥ अथ स्फुरद्विक्रमभूमभूरभूत् सुराष्ट्रकूटान्वयभूर्भुवः प्रभुः। रवीन्दुदम्भान्नभसे यदर्पितं हिरण्यपूर्व केसिपुं प्रचक्षते ॥४३॥ स भानुभानुर्भुवि भानुसंज्ञया बभौ बृहद्भानुविभानुभावभृत् । प्रतापरूपं श्रयताऽऽयतार्थभीमनस्सु येन गुसदां न्यधीयत ॥ ४४ ॥ तदङ्गजः पुञ्ज इति श्रियाऽऽख्यया जयंश्च मुझं नृपवर्ग आदिमः। यदाश्रयादाह हरिश्चलेल्यमुं प्रवादमुच्चैरयशस्करं श्रियः ॥ ४५ ॥ रणेऽतिरीणबहुइष्टपिजलैस्सदाऽसुरीभासनयाऽऽस्यसन्निधौ । खजीवनार्थ जवसानि यावर्गणैस्तमाशङ्कय तदादि चक्रिरें ॥ ४६॥ समञ्जसेनैष जनार्दनं जयन् यया प्रजारञ्जनमार्जयजयी । व्यधायि तस्यै शिरसा रसान्मिलत्करैस्त्रिसन्ध्यं त्रिदशैर्दिशे नमः ॥४७॥ चमूप्रचारैरचलाप्रकम्पिना द्विषां गणो येन रणाङ्गणे क्षणात् । प्रकोपकम्पादरणैरिवारुणैरुरोविदारं प्रतिचस्करे नवैः ॥ ४८ ॥ तदात्मजन्माङ्गजमञ्जिमा जने द्विधापि नारायणशब्दविश्रुतः। पुरं वलक्षं विदधद् यशोधनैर्बभूव रक्षाक्षतरक्षणं दिवः ॥ ४९ ॥ १'प्रभाकृत' सूर्यरूपः रूप्यकः सत्यंकारपदे दिवि न्यस्तः । अयं हरिः तस्माद् राज्ञः श्रियं प्रत्याहर्तुमक्षमः तदा अपवादं चकार। २'-थस्खदाभाषण- खत् समुच्चयवाची। १० -रीण-रीणेः भमैः । ३'-द्विषस्तद्भवता' स एव भवः तद्भवः तस्य भावः तद्भवता । ११'-दृष्टपिक्षलै-' दृष्टं खपरचक्रजं भयम् तेन पिजला ४ 'ताम्' तां पुरी निशम्य अहिद्विषः इन्द्रस्य मद्भवता निन्दा व्याकुलाः तैः-भृशमाकुलैः। दिशति दत्ते-पुर्या अहं दूरे स्थितः तेन मद्भवो न प्रशस्य इति भावः। १२ 'सहासुरी' इति वा पाठः । ५ 'कसि'' “कसिपुर्भोजना-ऽऽच्छादौ” इति हैमः। ["कसि १३ 'जवसानि' तृणानि । पुर्भोज्य-वस्त्रयोः' है. अने० सं० कां० ३ श्लो० ४३३ ] १४ 'समञ्जसेनैष "न्याय-सुदेशरूपं समअसम्" इति हैमः। ६ 'प्रतापरूप' 'प्रताप-कीर्ती' इति वा पाठः । १५ -दिशे नमः' दिक्शब्देन लक्षणया रीतिः नीतिमार्गों वा। ७. 'श्रयतायतार्थभी-' आयता दीर्घा अर्थभीः देवानां १६ "रक्षःक्षतरक्षणं दिवः' रक्षोभिः क्षता भन्ना रक्षणं रक्षा चित्तनिहिता। यस्य तत् दिवः पुरम्-उज्जवलयन् । रक्षसां क्षतानि प्रहारा: ८ 'पुज' पक्षे नृषु पवर्गेषु ज आद्यः । मुजस्तु अन्त्यः । तेभ्यो रक्षणं यत्र तत् । रक्षोभिः कृतं भनम् लक्षणं दर्शनं ९ 'प्रवाद-' प्रवादकथनेन हरेः असामर्थ्य व्यजितम्-यद् यस्य तत्। 74 15 1 मा०प्र० स० श्लो० ३९ चतुर्थपादः । 2 मा० प्र० स० श्लो०४० चतुर्थपादः । 3 मा० प्र० स० श्लो०४१ चतुर्थपादः । 4 मा० प्र० स० श्लो:४२.चतुर्थपादः । माघे तु कशिपु- नामा राक्षसः, अत्र तु तत्स्थाने 'कसिपु' पदं भिन्नार्थकम् । शकार- सकारयोरैक्यमत्र ज्ञेयम् । 5 मा० प्र० स० श्लो० ४३ चतुर्थपादः । 6 मा० प्र० स० श्लो. ४४ चतुर्थपादः । 7 मा० प्र० स० श्लो० ४५ चतुर्थपादः । माघे तु "गणैर्य- माशा' इति पाठमेदः । 8 मा० प्र० स० श्लो० ४६ चतुर्थंपादः । 9 मा० प्र० स० श्लो. ४७ चतुर्थपादः । 10 मा०प्र० स० श्लो० ४८ चतुर्थपादः । माघे तु 'रक्ष:- क्षतरक्षणं दिवः' इति पदच्छेदमेदः ।

[प्रथमः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं स शास्ति शास्ता जगतीं हरेः श्रियं हरन् विहारैर्बलिराजबन्धनात् । भक्तेर्भरात् कारयते बलेन यः प्रसादमिच्छ(च्छा)सदृशं पिनाकिनः ॥५०॥ जवानिगृह्णन्नरिमण्डलं बलादुपाददे मण्डलमग्रणीः सताम् । ददौ पुनस्तस्य सुराङ्गनाजनखयंग्रहाश्लेषसुखेन निष्क्रयम् ॥५१॥ नभोनिविष्टानुहुरूपिणः सुरान् भयात् प्रगेऽनाशयदाद्यनिःखनैः। प्रतापमांधाय रविच्छलाद् व्यधाद् य इत्थमस्वास्थ्यमहर्निशं दिवः ॥५२॥ वदान्यभावादधरीकृतामरद्रुमस्य राज्ञः पटहध्वनेस्त्रसन् । खपादयोः कन्दरमन्दिरोदरे बलस्य शत्रुः प्रशशंस शीघ्रताम् ॥ ५३॥ निविडवानोऽस्य भियाऽभ्रकुम्भिनं विधुच्छलादुच्छिर नभोऽम्बुधौ । दिवं विहायैकदिगंशमाश्रयन्निनाय विभ्यद् दिवसानि कौशिकः ॥५४॥ जगन्नयैः सन्नयनं नयनयं दरिद्रताद्रावकदानमुद्रया। ररच लोकानपि हातुमाहितं न चक्रमस्याऽऽक्रमताधिकं धरम् ॥५५॥ उवास तत्र व्यवहारिणां वरः स्थिराभिधो माधवदेहसम्भवः । वपुस्त्विषा श्रीहरणान्मनोभुवः प्रकम्पयामास न मानसं न सः ॥ ५६ ॥ गिरः श्रियः क्षान्तिवदान्यतादयो गुणाश्च मुक्त्वा त्रिजगत् समं समे । तदीयमस्थानतयेव दुष्कलेर्जवेन कण्ठं सभयाः प्रपेदिरें ॥५७॥ पदे पदेऽहन्निलयैः स्वकारितैर्यशःसगभैरथ सङ्घयात्रया। तां स गां चकिरहीशितुर्यथोदुवाह दुःखेन भृशानतं शिरः ॥ ५८॥ पतिव्रता प्राप्तवपुःखरूपतः शचीव रूपा इति रूपरूपिणी । 10 15 १'-नाशयदाद्य-' इत्यस्य स्थाने 'नाशय वाय' इत्यपि पाठः । वाद्यनिःखनैः-प्राभातिकवायशब्दैः । २'प्रतापमाधाय' यः राजा इत्थं रविच्छलात् प्रतापम् आधाय इत्थमिति हे प्रताप! वं सुरान् नाशय इत्यर्थे 'वाद्यनिःखनैः' इति पाठः। अन्यस्यापि भूपस्य प्रतापाद् वैरिणां ग्रामेषु रात्रौ निवासः, प्रातः प्रणाशः स्याद् इति भावः । ३ 'बलस्य शत्रुः' शत्रुः पादयोर्बलस्य शीघ्रता प्रशशंस । ४ -लादुच्छिरसं' उच्छिरसम् उन्मस्तकम् । ५ 'हातुमाहितं न चक्र-' पर्वतं त्यक्तुम्-आहितं चक्रं न आक्रमत-न चचाल। अस्य राज्ञः आहितं चक्रम् । अहितानामिदम् आहितं चक्रम्- रिपुगणः अधिकं महान्तम् , पर्वतं धरम् , घरम्, हातुम्-यतुम्, न आक्रमत-न उद्यम चकार । ६ 'माधवदेहसंभवः'-माधवपुत्रतया कान्या च स्मरं जिगाय । ७ 'जवेन कण्ठं सभयाः' कण्ठम्-उपकण्ठम् , "सत्यभामा भामा" इति न्यायात् । "कण्ठो ध्वनौ सन्निधाने ग्रीवायां मदनद्रुमे" इति अनेकार्थः [है. अने. सं. कां. २ श्लो० १०१] । कण्ठम्-समीपम् । ८ तथा स गां चक्रि-' गाम्-भुवम् । ९ 'रूपरूपिणी'-प्रशस्तरूपवती । 1 मा० प्र० स० श्लो० ४९ चतुर्थपादः । अत्र तु 'मिच्छ- सदृशम्' इति लेखकप्रमादः । 2 मा० प्र० स० श्लो. ५. चतुर्थपादः । 8 मा० प्र० स० श्लो० ५१ चतुर्थपादः । माघे 'महर्दिवं दिवः' इति पाठः। मा.प्र.स.लो.५२ चतर्थपादः । 5 मा० प्र० स० श्लो० ५३ चतुर्थपादः । 6 मा० प्र० स० श्लो० ५४ चतुर्थपादः । माघे "धिकन्धरम्' इति अखण्डम् । 7 मा० प्र० स० श्लो० ५५ चतुर्थपादः । 8 मा० प्र० स० श्लो० ५६ चतुर्थपादः । 9 मा०प्र० स० श्लो० ५७ चतर्थपादः ।

5 10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [प्रथमः सर्गः] शुचिखभावैर्जगतीं तमोहरैरलश्चकारास्य वधूरहस्करः ॥ ५९ ।। खबन्धुकर्णोत्पलयुग्ममन्तिके निवेश्य तस्या वदनानुजीविना । निबद्धवेणीतमसः प्रसादनैन नर्मसाचिव्यमकारि नेन्दुना ॥ ६० ॥ मुखश्रियाऽस्यास्तुलितं विधु विधिर्षभञ्ज पूर्ण न पुनयंचूर्णयत् । अयं ततः पुष्करदन्तिनो यथा विषाणमद्यापि पुनः प्ररोहति ॥ ११ ॥ विलासलीलाकलनाय तस्थिवानजस्रमस्याः सविधेऽप्सरोजनः । सखीमिषात् तद्विरहोष्मणाऽऽतुराः प्रकम्पनेनानुचकम्पिरे सुराः ॥ ६२ ॥ तयाऽऽस्यपाणिक्रममञ्जिमाक्रमैर्जितश्रि पद्मं महिकाश्रुनिर्भरम् । व्यनक्ति भृङ्गैरसुखैज्वलत्क्रुधा तनूनपाद्भूमवितानमाधिजैः ॥ ६३ ॥ पयोधेर-श्रोणिभरश्रियाऽनया निर्भत्सितं कुम्भयुगं रयेण नः। दिगन्तमाप्तैरिति सजलजया चिराय याथार्थ्यमलम्भि दिग्गजैः ॥ १४ ॥ अजिह्मकृद् ब्रह्म तदङ्गसङ्गतं पुनात्यतुच्छोच्छ्रितवालमन्वयम् । किमद्भुतं यच्छ्वणार्द्धवेक्षणः कुलैन भेजे फणिनां भुजङ्गता' ॥ ६ ॥ प्रवेणिवादादधरीकृतः स्मयो वचःप्रपञ्चैरमृतं तयोचितम् । भुवो भरातर्न तथापि भोगिभिः कुलैर्न भेजे फणिनां भुजङ्गता ॥ १६॥ [पाठान्तरम् ] श्रुतिद्वयीदर्शनतः स्फुरद्रुचि द्वयं इंशोर्नाटयतः स्मराश्रयम् । कलत्ररत्नस्य कलाः किलाखिलाः पुरेऽस्य वास्तव्यकुटुम्बितां ययुः ॥ ६७ ।। उडूनि मुक्तास्रजि चित्रके गुरुर्विधुः खगः कुण्डलयोः कृतस्थिती । सुरा भजन्तः किमु कामिनीमणेः पुरेऽस्य वास्तव्यकुटुम्बितां ययुः ॥१८॥ [पाठान्तरम् ] अथाश्रयत् कोऽपि सुरः स्फुरत्मभो भवाय गर्भ शुभदोहदोद्भवः। तदाश्रयेऽस्याः शुचिपाण्डुरं भृशं वपुर्जलार्द्रापवनैर्न निर्ववौं" ॥ ६९॥ असूत सा पोषवलक्षपक्षजे त्रयोदशेऽहयङ्गजरत्नमद्भुतम् । 15 20 १ 'तमोहरै-' तमः पापम् तिमिरं वा । २'-कारास्य वधूरहस्करः' अस्य व्यवहारिणः वधूः च पुनः अहस्करः शुचिखभावैर्जगतीं अलंचकार । उभयोर्निर्दोषत्वध्वनिः । 'च'कारोऽध्याहार्यः । ३ 'अनुजीविना'-भृत्लेन । ४ निबद्धवेणीतमसः' तमो राहुः । ५ 'पयोधर'-स्वनः। ६-'श्रोणि-नितम्बः। ७'नः' अस्माकम्। 'यच्छ्रवणाद्भवेक्षणैः' ध्रुवनेत्रकथनं तेषां कर्णे एव नेत्रखात् । ९ 'भुजङ्गता' वक्रता। १० 'दृशोर्नाटयतः' दृशोयम् आकर्णान्तविश्रान्तम् । छायार्थे यः श्रुतेः शास्त्रस्य द्वयं पश्यति तस्य रुचिः स्फुरति । ११ 'पुरेऽस्य' पुरे शरीरे। mmmmmmm 1 मा०प्र० स० श्लो० ५८ चतुर्थपादः । 2 मा० प्र० स० श्लो. ५९ चतुर्थपादः । मा० प्र० स० श्लो०६० चतुर्थपादः 4 मा० प्र० स० श्लो० ६१चतुर्थपादः । 5. मा० प्र० स० श्लो० ६२ चतुर्थपादः। मा०प्र० स० श्लो. ६४ चतुर्थपादः । 7 मा०प्र० स० श्लो० ६३ चतुर्थपादः । 8 मा० प्र० स० श्लो०६३ चतुर्थपादः । 9 मा० प्र० स० श्लो०६६ चतुर्थपादः । 10 मा० प्र० स० श्लो० ६६ चतुर्थपादः । 11 मा०प्र० स० श्लो०६५ चतुर्थपादः ।

४ 5 10 [प्रथमः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं नृपादयोऽप्युत्सवकर्म चक्रिरे सदाभिमानकधना हि मानिनः ॥ ७० ॥ क्रमेण जन्मस्य महे निवर्तिते स वासुदेवाह्वयमादधे शिशुः। विधृत्य चिच्छक्तिमसौ तमोऽवधेर्विलचयलङ्कां निकषा हनिष्यति ॥७१ ॥ स लाल्यमानोऽश्चितपञ्चधात्रिणा तथा क्रमेणावयवानपुषत् । अशिश्रियद् विश्वकलाश्रियों यथा प्रतीयते सम्प्रति सोऽप्यसः परैः ॥७२॥ तदेव देवाग्रिमजन्मजन्मसत्-वपुर्विशेषश्च गिरां श्रियां च सः। रवेः प्रभेव प्रकृतिः सुनिश्चला पुमांसमभ्येति भवान्तरेष्वपि ॥७३ ॥ बभूव भूवल्लभचेतसां प्रियः स्मरस्वरूपोऽपि स धर्मधर्मधीः। सदर्थभाक् चन्द्ररुचिर्यशोभरैरसंशयं सम्प्रति तेजसा रविः ॥७४ ॥ कुमारमद्रेस्तनयेव सादरं तमङ्कमारोप्य जनन्यथोत्सुका । निरीक्षमाणावयवान् म सद्वयो-वितीर्णवीर्यातिशयी(यान् ?) हसत्यसौ ॥७५॥ प्रकाममालिङ्गय निचुम्ब्य मू_वक् विवाहकर्म क्रियते तवाङ्गभूः। प्रमोदनीयाः सुहृदोऽनया दिशा व्यापादनीया हि सतामसाधवः ॥ ७६ ॥ तनय ! नय विनोदशर्म नस्त्वं वितनु सनर्म सदोरसो रसाः। रुचिरुचिरचलेक्षणाकुचाग्रध्रुवपरिरम्भनिपीडनक्षमत्वम् ॥७७॥ खीयैस्तद्वचनाऽग्रहेऽपि सहसा वीवाहसत्याकृतेः प्रारब्धेऽतिमहोत्सवे प्रभवति श्रेयस्करे कर्मणि । १-'धना हि मानिनः' मानिनः ज्ञानिनः । ६ 'सम्प्रति सोऽप्यसः' यथा सम्प्रति तत्क्षणमेव दृष्ट्वा नायं स इति लोकैायते इत्यनेन रमणीयता 'असः' इति । "क्षणे क्षणे २ 'क्रमेण जन्मस्य जन्मशब्दः अकारान्तः उणादौ । यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः" इति वचनात् । ३ 'वासुदेवाह्वयमादधे शिशुः' 'विलङ्घयलङ्कां निकषा' असौ ७ 'देवाग्रिमजन्म-' सुरसत्कपूर्वभवबद्धम् । वासुदेवः चिच्छक्ति विधृत्य अवधेर्विलचि निस्सीमम् , तमः पापम् ८ 'कुमारमद्रेस्तनयेव' कुमारम् स्कन्दम् । राहुं वा हनिष्यति । किंभूतां चिच्छक्तिम् ! अरकाम् उग्राम्- ९-'नया दिशा' दिशा रीत्या । दीप्ताम् निकषा पार्श्वे बालखेऽपि अस्मिन् भवे । यद्वा अलम्-अत्य- १. 'सदोरसो रसाः' सदा उरसः-वक्षसः । र्थम् , काञ्चिद् अनिर्वचनीयाम् । ११ 'रुचिरुचिरचलेक्षणाकुचाग्र-' रुचिरुचिरचलेक्षणाकुचामध्रुव- ४ 'लाल्यमानोऽञ्चित- अश्चितम् प्रशस्तम् । परिरम्भनिपीडनक्षमख वितनु कुरु, उरसः वक्षसः । यद्यपि ५ 'पञ्चधात्रिणा' पञ्चानां धात्रीणां समाहारः पञ्चधात्रि-तेन । जनन्या इदं वचो न घटते, तेन जननीपदेन धात्री ग्राह्या । 15 - 1 मा० प्र० स० श्लो० ६७ चतुर्थपादः । 2 मा० प्र० स० श्लो० ६८ चतुर्थपादः । माघे "विलक्ष्य लङ्काम्' इति पदविभागः । अत्र तु 'विलजि अलङ्काम्-अरङ्काम्'- अथवा 'अलम् काम्' इति पदच्छेदः । अत्र र-लयोरैक्यं ज्ञेयम् । 3 मा० प्र० स० श्लो० ६९ चतुर्थपादः । 4 मा०प्र० स० लो० ७२ चतुर्थपादः । अत्र माघस्य ७२ श्लोकगतम् 'प्रकृतिः सुनिश्चला' इति तृतीयचरणमपि । 5 मा० प्र० स० श्लो० ७०.चतुर्थपादः । 6 मा० प्र० स० श्लो० ७१ चतुर्थपादः । माघे तु '-वीर्याति- शयान्' इति पाठः । 7 मा० प्र० स० श्लो० ७३ चतुर्थपादः । माघे "विपादनीया हि' इति पाठः। 8 मा० प्र० स० श्लो० ७४ चतुर्थपादः। माघे-कुचाग्रदुत- परिरम्भ-' इति पाठः ।

देवानन्दमहाकाव्यम् । [द्वितीयः सर्गः] ऐन्द्रः केकिकलापभृद्धलरिपोः छायां सृजन्नञ्जसा व्योम्नीव भ्रकुटिच्छले न वदने केतुश्चकारास्पदम् ॥ ७८ ॥ ॥ इति श्रीदेवानन्दे महाकाव्ये दिव्यप्रभापरनाम्नि माघसमस्यायां ऐंकाराङ्के महोपाध्यायश्रीमेघ- विजयगणिविरचिते कथानायक-उत्पत्तिवर्णननामा प्रथमः सर्गः ॥ श्री ॥ १ ॥ 5 10 द्वितीयः सर्गः। उद्विवाहिषया मात्राभ्यर्थितः स भवाप्तभी। जैनी दीक्षामुपादित्सुरासीत् कार्यद्वयाकुलः' ॥१॥ अखण्डमण्डनश्रीणां सपिण्डाऽचण्डरोचिषाम् । सम्पृक्तानां विवाहार्थमथासावासदत् सदैः ॥२॥ सें पितृव्योऽग्रजन्मा च बभौ भूविघ्नभेदिनी। रहेःस्थले ज्वलत्येवमसौ नरशिखित्रयी ॥३॥ भ्रातस्तात ! मनोभावा दीक्षां गोचरयन्ति मे। सुखंमन्या वने जन्य ! पौरुषेयवृता इव ॥ ४ ॥ श्रुत्वाऽस्यैवं वचः स्थैर्यात् ताभ्यामूहे सविस्मयम् । सद्यः संयुक्तमात्रा च त्रिकूटशिखरोपमा ॥५॥ मातुर्धातुश्च हरभावैर्विभाव्यान्तरभावनाम् । तं पितृव्यः कृताक्षेपमाचचक्षे विचक्षणः ॥ ६॥ वीक्ष्या दीक्षा तटस्थित्या वत्स! नान्तर्निमजनैः। ऋषिकुल्येव सिद्धानां शुद्धवर्णा सरखंती ॥७॥ अविमृष्टमशक्याथ नाद्रियन्ते मनखिनः। वनौकसः प्रशस्यं किं नाटकीयस्य वस्तुनः ॥८॥ ..15 20 १'ऐन्द्रः केकिकलाप-' ऐन्द्रः केतुर्वजः ब्योनि बलरिपोः शक्रस्य वदने छायां सुजन् आस्पदं चकार । किंभूते वदने ? न भ्रकुटिच्छले प्रसन्ने इत्यर्थः-प्रकुट्याः छलं स्खलितं यत्र तस्मिन्-ईदृशे न । “छलं छद्मस्खलितयोः" इति अनेकार्थः [है. अने. सं. कां. २ श्लो. ४७५] । २ 'उद्विवाहिषया-परिणिनायिषया । ३-'सद सदः' सदः सभाम् । ४ 'स पितृव्यो- स बालः । ५. 'रहःस्थले'-एकान्ते। ६ वने जन्य !' "जन्यो जामातृवत्सले । जनके जननीये च" इति अनेकार्थः । [है. अने. सं. कां. २ को. ३५२-३५३]। 'त्रिकूटशिखरोपमा' त्रिकूटशिखराणि इव-मात्रा ताभ्यां च-त्रिभिः न चेले इत्यर्थः । 'शुद्धवर्णा सरखती' गङ्गा दीक्षाऽपि ऋषिकुलयोग्या शुद्ध- वर्णा श्वेताम्बरसत्का, गङ्गापक्षे निर्मला । सिद्धानां सरखतीव सरखती-वाणी। .... 5 मा० द्वि० स० श्लो. ४ चतुर्थपादः । 6 मा. द्वि० स० श्लो० ५ चतुर्थपादः। 7 मा० द्वि० स० श्लो०६ चतुर्थपादः । 8 मा० द्वि० सं० श्लो०७ चतुर्थपादः । 9 मा. द्वि० स० श्लो. चतुर्थपादः । - AARAM VAAMAN 1 मा०प्र० स०को ७५ चतुर्थपादः । माघे '-छलेन' इति तृतीयान्तम् । 2 मा० द्वि० स० श्लोक १ चतुर्थपादः । - मा० द्वि. स.को. २ गतं द्वितीयचरणम् अत्र चतुर्थम् । 4 मा.द्वि. स. श्लो०३ चतुर्थपादः ।

5 10 [द्वितीयः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं ११ भुक्त्वा ततश्चिरं भोगं स्मेरदग्भिः स्मराकरम् । क्रियाः क्रिया जरन्नुच्चैरिज्यायै तपसः सुत! ॥९॥ श्रुत्वेत्यूचे स तद्वाचं मदनद्रुमसारणीम् । तात ! किं नैव दुःखाय वय॑न्तावामयः सं च १ ॥ १० ॥ आयुर्वायुरिवाऽस्थेयश्चिकुराः सम्पदकुराः । शस्त्रीव स्त्रीभवः काममतो दुःखाकरोति माम् ॥ ११ ॥ भवन्तोऽप्यनुमन्यन्तां ग्रहीष्ये सौख्यदं व्रतम् । कः सामग्र्यामवाप्तायां सन्दिग्धे कार्यवस्तुनि ? ॥ १२ ॥ किं पुनर्वार्तिकैर्भाष्यैः सूत्रवत् सर्वतो मुखम् । तत्त्वमेव वदन्त्यार्याः प्रकृत्या मितभाषिणः ॥ १३ ॥ ततोऽश्रुसेकाजाड्यार्तेनेव किश्चिद् विवक्षया । अकम्पि मातुरोष्ठेन बिम्बचुम्बनचञ्चना ॥ १४ ॥ वत्स ! व्रतवचः शून्यवाद्युपन्यासवन्मम । प्रतिभाति नयैतां तद् गिरमुत्तरपक्षताम् ॥ १५॥ भर्तुर्वियोगे भामिन्या दिक् सूनुर्मातुरातुरे । करोति यः लुषाऽऽलोकपरिपूतपुटे दृशौ ॥ १६ ॥ आश्लेषलोलपवधूस्तनकार्कश्यसाक्षिणीम् । कुरु त्वं भूरिसौरभ्यां वनमालां मुखानिलैः ॥१७॥ आक्रीडे: क्रीडया ब्रीभिरङ्गभूरभूतरोः। प्रसवानीव धेह्यङ्गसङ्गिनी खेदविप्रुषः ॥१८॥ स्वद्विवाहोऽस्तु दायाद ! जन्मतद्दारकर्मभिः। सानुबन्धां नजं द्वारे विदधचूतपल्लवीम्" ॥ १९॥ १ 'तपसः सुत !' तपसः व्रतस्य, इज्यायै यज्ञाय, क्रियाः ६ 'आक्रीडेः क्रीडया' आक्रीड उद्यानम् । क्रियाः सुत है। ७-'रङ्गभूरङ्गभूतरोः' हे अङ्गभूः! अनभूतरोः स्मरतरोः । २-'वामयः स च स भोगः । ८-'विषुषः बिन्दवः। ३-स्थेयश्चिकुराः' चिकुराः चपलाः । ९ 'दायाद !' "दायादौ पुत्र-बान्धवौ" इति। [है. अने. ४ 'बिम्बचुम्बनचञ्चुना' बिम्बतुल्येन । चुम्बनं प्रीत्या, सा सं. कां. ३ श्लो. ३२५] प्रीतिः सुहृद्भावे इति लक्षणया तुल्यत्वमित्यर्थः । १०-'चूतपल्लवीम्' आम्रपल्लवमालाम् । माथुरदेशीयभाषया ५ 'भुषाऽऽलोक-' वध्वा दर्शनेन । चूतपल्लवी। 15 20 hna 1 मा. द्वि० स० श्लो० ९ चतुर्थपादः । माघे तु 'सुतः' इति भेदः। 2 मा० द्वि० स० श्लो. १० चतुर्थपादः । 3 मा० द्वि० स० श्लो० ११ चतुर्थपादः । माघे-'मदो दुःखा- करोति' इति पार्थक्यम् । 4 मा. द्वि० स० श्लो. १२ चतुर्थपादः । 5 मा० द्वि० स० श्लो. १३ चतुर्थपादः । 6 मा० द्वि० स० श्लो. १४ चतुर्थपादः । माघे तु-'चुचुना' इति पाठः। 7 मा० द्वि० स० श्लो. १५ चतुर्थपादः । 8 मा० द्वि० स० श्लो० १६ चतुर्थपादः । 9 मा० द्वि० स० श्लो० १७ चतुर्थपादः । 10 मा. द्वि० स० श्लो. १८ चतुर्थपादः । 11 मा० द्वि० स० श्लो. १९ चतुर्थपादः । माघे तु-'चौतप- लवीम्' इति भिन्नः पाठः।

देवानन्दमहाकाव्यम् । [द्वितीयः सर्गः] 5 10 आमुष्मिककृते सूनो ! नैहिकी त्यज सम्पदम् । नरो हि नरकः शीलं कृतानुव्याधमुद्वमन् ॥ २० ॥ प्रदोषोऽङ्कस्थसूर्यत्यक् कुक्षिस्थेन्दुनिबद्धधीः। ग्रहैर्जाहस्यते नूनमुदंशुदशनांशुभिः ॥ २१ ॥ इति प्रसूवचोवातैर्मन्दराँगः स नाचलत् । चक्रेऽवकं तपः कृत्य-क्रिया केवलमुत्तरम् ॥ २२ ॥ आमुष्मिकसुखस्यांशोऽऽप्यहिक्या नातिशय्यते । सम्पदा पूर्णयेद्धोऽग्निः त्विषा नात्येति पूषणम् ॥ २३ ॥ धर्मः पद्म इवोबुद्धः शुद्धहंसाभिनन्दनः। सेव्यो भव्यैर्जनन्यैवं प्रवाचः कृतिनां गिरः ॥ २४ ॥ धर्माद् रसादिवं स्वल्पादपि कल्याणसाधनम् । इति सूत्रस्य सद्वाण्यो भाष्यभूता भवन्तु में ॥ २५ ॥ श्रेयसः श्रेयसः श्रेणी गिरेरिव सरिद् भवेत् । पापादापद्भवो ज्ञातुमिति दुर्मेधसोऽप्यलम्' ॥ २६ ॥ अनुपार्जितपुण्यस्य जन्मान्तर्गडुजन्मिनः । निमित्तादपराद्धेषोर्धानुष्कस्येच बल्गितम् ॥ २७ ॥ मुक्त्यङ्गनानुरागाय विहाय व्रतपश्चकम् । असमः शमिनामन्यो नास्ति मन्त्रो महीभृताम् ॥ २८ ॥ तत्राप्यार्य व्रतं तुर्य पावनं दुरुपावनम् । जगज्जैत्रस्मरादिभ्यः परेभ्यो भेदशङ्कया ॥ २९॥ ब्रह्मोष्णरश्मेर्वालार्चिश्चक्रवर्तिप्रवृत्तयः । तत्पूर्णतेजः स्तोतुं कैर्वाचस्पत्यं प्रतन्यते?" ॥ ३० ॥ निस्तोषं योषिदाश्लेषाद् मन्थनां द्रविणक्षयम् । 15 20 - . १ 'आमुष्मिककृते' आमुष्मिकः परभवः । २ 'कृतानुव्याधमुद्वमन्' कृतः अनुव्याधः संपर्को यस्य तत्- विहितस्वीकारम् । अनुव्याधो वा पश्चात्तापः । ३ 'इति प्रसू-'प्रसूः माता । ४-'मन्दरागः स नाचलत्' मन्दो रागो यस्य । पक्षे मन्दरो यः-अगः पर्वतः मेरुः । ५ 'पूर्णयेद्धोऽग्निः' इद्धो दीप्तः । ६ 'रसादिव' रसात् पारदात् । ७ 'कल्याणसाधनम्' कल्याणं मोक्षः खण च । ८ 'श्रेयसः' पुण्यात् । 'श्रेयसः' मङ्गलस्य । ९ 'अपराद्धषोः' च्युतशरस्य । १० 'महीभृताम्' क्षमाभृताम् । ११ 'दुरुपावनम्' दुःखेन समीपे रक्षणीयम् । १२ 'योषिदाश्लेषात्' समुद्रस्त्रियो नद्यः तासां नित्यसंगात् । -~- 1 मा. द्वि० स० श्लो० २० चतुर्थपादः । 2 मा० वि० स० श्लो० २१ चतुर्थपादः । माघे -मुदप्रदश- नांशुभिः' इति पाठः। 3 मा. द्वि० स० श्लो०२२ चतुर्थपादः । 4 मा. द्वि० स० श्लो०.२३. चतुर्थपादः । अत्र माघे च समा- नार्थ समप्रमुत्तरार्धम् । 5 मा. द्वि० स० श्लो० २५ चतुर्थपादः । 6 मा० द्वि० स० श्लो० २४ चतुर्थपादः । 7 मा० द्वि० स० श्लो० २६ चतुर्थपादः । 8 मा० द्वि० स० श्लो. २७ समग्रमुत्तरार्धम् । 9 मा० द्वि० स० श्लो० २८ चतुर्थपादः । 10 मा० द्वि० स० श्लो. २९ चतुर्थपादः । 11 मा० द्वि० स० श्लो० ३० चतुर्थपादः । माघे तु 'प्रता- यते' इति भिन्नम् ।

[द्वितीयः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं 5 10 प्राप्नोति पुरुषो नूनं दृष्टान्तोऽत्र महार्णवः ॥ ३१ ॥ मूलं धर्मतरोर्ब्रह्म कूलं भवपयोनिधेः । येन लुब्धेन नालम्बि न वर्द्धयति तस्य ता ॥ ३२॥ श्यामासक्तरुचिः कामोल्लासाद् राजापि च क्षयी। सुवृत्तशीलो निर्दोषस्तत्रोदाहरणं रविः ॥ ३३ ॥ बालस्याऽबालगीःसाररेवं बुद्धा प्रसुरपि । पार्थक्येन मृदि न्यस्तमुदकं नावतिष्ठते ॥ ३४ ॥ उच्चैःकुलगिरी स्वस्था सिंहीव स्यामहं न किम् । यजन्यस्त्वं प्रशस्यश्रीः सैंहिकेयोऽसुरद्विषाम् ॥ ३५ ॥ चक्रे प्राचीव मित्रेण त्वयाऽहं पुत्र ! निस्तमा । पुत्रौ क्रोडष्णिहौ स्यातां सहजप्राकृतावपि ॥ ३६ ॥ प्रतीक्ष्यः पृथुकोऽपि स्यात् पुण्यधीन न्यथा महान् । पुण्यनैपुण्यमय॑त्वे लक्ष्यं लक्षणमेतयोः ॥ ३७ ॥ धन्यस्त्वं योऽजयद् बाल्ये महामोहमहीश्वरम् । कृष्णायितः स तन्मूलं महद् वैरतरोः स्त्रियः ॥ ३८ ॥ धन्यस्त्वं वासुदेवोऽसि महामोहमहीश्वरम् । जित्वा त्यजन् मूलमेता महद् वैरतरोः स्त्रियः ॥ ३९ ॥ [पाठान्तरम् ] तत् प्रव्रज मया सार्द्ध त्वहते मां से बाधते । प्रोषितार्यमणं मेरोरन्धकारस्तटीमिव ॥ ४०॥ एवं मातृगिरः शृण्वन् स्थिरसूः स्थिरमूहिवान् । धर्मे त्वरा हितं स्थैर्यमलमश्रेयसे यतः" ॥४१॥ 15 28 १'ता' ता लक्ष्मीः । "ता सा श्रीः कमला" इति कोषः २ 'श्यामासक्त-' "श्यामा स्त्री मुख्य (मुग्ध ?) यौवना" इति अनेकार्थध्वनिमञ्जरिः [लो. ९६ श्लोकाधि०] श्यामा रात्रिः। ३ 'सुवृत्तशीलो' वृत्तम् आचरितम् , शीलम् स्वभावः । 'निर्दोषः' दोषा रात्रिः। ४'-तिष्ठते' अवपूर्वस्थाधातोः आत्मनेपदम् । ५ 'उच्चैःकुल-' वंशपर्वते । ६ -द्विषाम्' असुरद्विषाम् देवानां प्रशस्यश्रीः । ७ 'प्रतीक्ष्यः' पूज्यः । ८ 'पृथुकः' बालः । ९ '-महीश्वरम् नृपम् । १० 'वासुदेवो-' वासुदेवनाम यथार्थ नागवशीकरणात् तस्य, स्त्रियस्त्यक्ताः। ११ 'स' महामोहः । NAM SANKRAHANare 1 मा० द्वि० स० श्लो. ३१ चतुर्थपादः । 2 मा. द्वि० स० श्लो० ३२ चतुर्थपादः । माघे 'ता' स्थाने ताम्' इति भिनं पदम् । माघे 'ताम्' इति द्वितीयान्तम् , अत्र तु 'ता' इति प्रथमान्तम् । 3 मा. द्वि० स० श्लो० ३३ चतुर्थपादः । 4 मा० द्वि० स० श्लो० ३४ चतुर्थपादः। 5 मा० द्वि० स० श्लो० ३५ चतुर्थपादः । माघे '-ऽसुरगु- हाम्' इति भिन्नता। 6 मा० द्वि० स० श्लो० ३६ चतुर्थपादः । 7 मा० द्वि० स० श्लो० ३७ चतुर्थपादः । 8 मा० द्वि० स० श्लो० ३८ चतुर्थपादः । 9 मा. द्वि० स० श्लो० ३८ चतुर्थपादः । 10 मा० द्वि० स० श्लो० ३९ तृतीय-चतुर्थपादौ अत्रापि तावेव । 11 मा० द्वि० स० श्लो. ४० चतुर्थपादः ।

5 देवानन्दमहाकाव्यम् । [द्वितीयः सर्गः] अथ प्रतस्थे तीर्थानि नन्तुं निजजनैः समम् । स्थिरस्य वार्ता संयोज्य स सुतश्रवसः सुतः ॥ ४२ ॥ तस्य तीर्थनमस्यार्थ प्रस्थितस्य वयः शुभाः। प्रदक्षिणाक्रियायै स्माऽऽशेरैते तेऽभिमारुतम् ॥ ४३ ॥ अहंपूर्विकयेतीव द्रुमाः पुष्पैरवाकिरन् । विलम्बमर्चितुं धीरोऽविराध्यं तं सहेत कः? ॥ ४४ ॥ तत्पार्श्वस्था दुमा वल्लीकान्तां श्लिष्टा रविप्रभाम् । आवश्छदनैः प्राप्तवयात्यं सुरतेष्विव ॥ ४५ ॥ खयं नेत्रश्रिया न्यङ्कन जितान नाम्यातपादिभिः । 10 तस्याऽपश्यद् वने दृश्यान् जननी क्लेशकारिणः ॥४६॥ शीतवातास्तमानचुस्यन्तो वर्णपङ्कवत् । भालेऽम्बुजानां सामोददेहिनस्तद्वरं रजः ॥ ४७ ॥ नाम नाम स तीर्थानि स्वयं तीर्थोपमां दधे । न कुर्वन्ति महात्मानः संज्ञायै जन्म केवलम् ॥ ४८ ॥ 15 अथ श्रीमान् मुनीशोऽभूत् श्रीहीरविजयः प्रभुः। आसीद् यस्मिन् महः कीर्तिरुभयं तद् महखिनि ॥४॥ पुष्पदन्ताविवाऽऽयोज्य धात्राऽयं निर्ममे प्रभुः। गिरा मुजस्तपस्तेजस्तन्मदिनः स्फुटं फलम् ॥५०॥ श्रीतपागच्छसम्राजमिन्दिरैनं यदाश्रयत् । हियैवासीत् ततः कृष्णो लघुर्बहुतणं नरः" ॥५१॥ १ 'स सुतश्रवसः' राज्ञः कर्णस्य वार्ता संयोज्य-राजानमा ९ 'पुष्पदन्ता-' हीः चन्द्रः, रविः सूर्यः, तयोः जयो यत्र पृच्छय इत्यर्थः । “सुतः पुत्रे नृपे" इति अनेकार्थः [है. अने. सही-रवि-जयः तेजसा की- च । सं० कां० २ श्लो० २०५] । १० 'गिरा' वाण्या, म्रदिनः मार्दवस्य, फलं स्फुटं कुर्वन् । २ 'वयः' पक्षिणः । ११'-स्तेजतद्' तपस्तेजः तनोति इति तपस्सेजस्तत् । ३ 'आशेरते' आशयं चक्रुः प्रदक्षिणाक्रियायै । १२ -वासीत् गोविन्दः लज्जया कृष्णः श्यामः, च पुनः ४ 'अविराध्यम्' पूज्यम् । लघुः वामनः। ५'-वैयात्यम्' वियातो धृष्टः तद्भावो वैयासम् । ६ 'न्यहून्' मृगविशेषान् । १३ 'बहुतृणम्' तृणकल्पः आसीत् । कल्पार्थे 'बहुच्' प्रत्ययः। ७'क्लेशका-' नाम्याऽऽतपादिभिः क्लेशकारिणः । १४ 'नरः' "नरः कृष्णेऽर्जुने च" इति कोषः [है. अने. ८ 'महा' तेजः । तद्' जगत्प्रसिद्धम् । सं. कां. २ श्लो. ४२३] 1 मा. द्वि० स० श्लो. ४१ चतुर्थपादः । माघे तु 'स श्रुत. 4 मा० द्वि० स० श्लो० ४४ चतुर्थपादः । श्रवसः सुतः' इति पाठः । 5 मा. द्वि० स० श्लो.४५ चतुर्थपाद: माघे तु समस्तः सः। अत्र तु चित्रकाव्यत्वेन 'श्रुत--' इत्यस्य रेफो लुप्तः, शकारच 6 मा० द्वि० स० श्लो. ४६ चतुर्थपादः । सकारो गण्यते इति न समस्यापादमेदः । 2 मा० द्वि० स० श्लो० ४२ चतुर्थपादः। माघे तु 'शेरते' 7 मा०वि० स० श्लो० ४७ चतुर्थपादः । इति क्रिया । 8 मा० द्वि० स० श्लो. ४८ चतुर्थंपादः । माघे 'मनखिनि'। मा. द्वि० स० श्लो०४३ चतुर्थपादः । माघे तु 'विरा 9 मा.द्वि. स.लो. ४९ चतुर्थपादः । भ्यन्तम्' इति अखण्डम् , क्रिया च क्षमेत इति । 10 मा० द्वि० स० श्लो० ५. चतुर्थपादः । 20 Pr.. PRAD4 +16 ..

[द्वितीयः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं १५ 5 10 निस्त्रिंशस्त्रिजगत्रासी यस्तेजः स्कन्दवैरिणाम् । प्रत्यूष इव नव्यश्रीस्तपनो जातवेदसाम्॥५२॥ तस्याऽकब्बरभूजाने?धिदानाद् यदीयका । दिग्दन्तिदन्तावालम्ब्य कीर्तिर्यामधिरोहति ॥५३॥ प्रोद्दीपिते प्रतापेऽस्य कुपक्षाः क्षीणतां ययुः। शशाः किं यत्र विध्वस्तमृगपूगो मृगाधिपः ॥५४॥ सौभाग्यभाग्याभ्युदयं प्रभोः स्तोतुं क्षमेत कः। पूर्ण सुवर्णशैलेन्द्र कोऽम्भसा परिषिञ्चति ? ॥५५॥ उबेल्लद्भाग्यसौभाग्यवल्ली पल्लविनीं जने । कविन स्तोत्ररूपेण कोऽम्भसा परिषिञ्चति ? ॥५६॥ प्रभोः क कीर्तिपाथोधिः सुधाद्याः कैकदेशिनः । सादृश्यं यान्ति न कापि सर्पिषस्तोयबिन्दवः ॥ ५७॥ श्रीमान् विजयसेनाख्यस्तत्पहे सूरिराड् बभौ । क्षणाद् येनान्तरा क्षिप्ता दूष्यास्ते शत्रुसज्ञिताः ॥ ५८ ॥ स्वशक्त्युपचये केचिदस्य सूरेः सुदृष्टयः। परेऽप्युपेत्य पादाब्जसेवाहेवाकितां दधुः ॥५९ ॥ लिलयिषतो लोकान् अलङ्घयानलघीयसः । विधिरष्टश्रवा जज्ञे श्रोतुमस्य गुणानिव ॥६॥ कीर्त्यांभोगः श्रुताभोगः सदाभोगेः शुभश्रियः। तादात्म्यभाक् प्रभौ तस्मिन् बुद्धर्भोग इवात्मनि ॥ ६१ ॥ निर्दम्भविद्यादम्भोलिभिन्नदुर्भावभूभृता। सूरीन्द्रेण शमैर्जिग्ये सुदमो दमघोषजः" ॥ ६२॥ उर्वी सुपर्विणी कुर्वन् श्रीराजनगरे गुरुः। अन्येधुराययौ योगपूर्णस्तस्योत्सवाय सः ॥ ६३ ॥ 15 20 १'-कब्बर-' अकए अचलो वरो यस्य स-अक+वर- अकबरः। -'पूगो' "पूगः समूहः" [अनेकार्थध्व० श्लो. १३४ अर्धश्लोकाधि०] ३ 'दूष्या-' दूषणार्हाः। ४'-आभोगः' विस्तारः । ५-आभोगः' ज्ञानम् । ६'-दम-' दमघोषो नाम पूर्वऋषिः तस्मात् जात इव लुप्तोपमा । 'सुपर्वि-' सोत्सवाम् , सदेवाम् । AMA.. ......ALAAAAA~ 1 मा० द्वि० स० श्लो० ५१ चतुर्थपादः । 2 माद्वि० स० श्लो० ५२ चतुर्थपादः । 3 मा. द्वि० स० श्लो. ५३ चतुर्थपादः । माघे तु '-मृग- यूथो मृगाधिपः' इति । 4 मा० द्वि० स० श्लो० ५४ चतुर्थपादः । 5 मा० द्वि० स० श्लो० ५४ चतुर्थपादः । 6 मा० द्वि० स० श्लो० ५५ चतुर्थपादः । 7 मा. द्वि० स० श्लो० ५६ चतुर्थपादः। 8 मा० द्वि० स० श्लो० ५७ प्रथमपादः । माघेऽपि स एव प्रथमपादः। 9 मा० द्वि० स० श्लो० ५८ पूर्वार्धम् । माघेऽपि तदेव पूर्वार्धम्। 10 मा० द्वि० स० श्लो० ५९ चतुर्थपादः। 11 मा. द्वि० स० श्लो० ६० चतुर्थपादः । 12 मा. द्वि० स० श्लो० ६१ चतुर्थपादः ।

5 10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [द्वितीयः सर्गः] त्यजतोऽलङ्कृती सबळ स्थिरसूनोरोईशा नेशुरेनांसि कामायोः फणीन्द्रा इव शत्रवः ॥ ७ ॥ प्राची-रव्योरिवानूषः प्रसू-सून्वोर्विभासतोः। दीक्षावेषात् ततः स्मोचैः फलत्युत्साहपादपः ॥ ८८ ॥ बुद्धिशस्त्रप्रकृत्यङ्गो घनसंवृतिकञ्चकः। चारेक्षणः स चारित्राद् रेजे राजेव नीरजाः ॥ ८९ ॥ तपःशुक्लदशम्यां तं प्रावाजयत सोत्सवम् । सूरीन्द्रः प्रभया जेता रसभोगविदः कवेः ॥ ९ ॥ विद्याविजय इत्याख्यां सूरिश्चके यथार्थदृक् । स्थाने न मोहः क्वापि स्याद् रसभागविदः कवेः ॥ ९१ ॥ अशिक्षत स भिक्षूणामयनं विनयाश्रयम् । अप्रश्रितो विपन्मूलं प्राप्ते काले गदो यथा ॥ ९२॥ शुश्रूषया गुरोरेष कृत्लशास्त्ररसं पपौ। दशाकर्ष इव लेहं दशया ह्यन्तरस्थया' ॥१३॥ नैष्टिको दैष्टिकोत्कृष्टः स विद्याविजयो मुनिः। अविरुद्धं क्रियाज्ञान-दयं विद्वानपैक्षत ॥ ९४ ॥ भूयोऽन्तिषन्मणीभर्तुरनेनैव कलाभृता। उल्लासोऽब्धेरिवर्षीणां तथा नेतुमहीभृतः ॥ ९५ ॥ जुष्टेश्वरेक्षणार्चिष्मद् गङ्गातीरे तपस्यतः। राज्ञः कलाभृतस्ताराः प्रयान्ति परिवारताम् ॥ ९६ ॥ इतीव तप्यतस्तीनं तपस्तस्य खयं गुणाः । 15 20 ४'-प्रश्रितः' अविनीतः । विनीतः प्रश्रितः । ५ 'नैष्ठि-' नैष्ठिकब्रह्मचारी । "नैष्ठिकसुन्दर । त्वया"-इति कुमारकाव्ये [पश्चमसर्गे श्लो. ६२] ६ 'दैष्टि-' दैष्टिकः शास्त्रवेत्ता देवपरश्च । ७ -हीभृतः' ऋषीणां महीभृतः भूपस्य । तथा तेन प्रकारेण, अन्धेः सागरस्य ऋषीणां 'नेतुः' प्रापयितुर्वृद्धिम् इति शेषः । ८-'र्चिष्मद्' क्रियाविशेषणम्-सेवितहरनेत्रदहनं यथा स्यात् तथा तपस्यतः । १'-नूषः' प्रभातकालाद् अनु इत्यनेन रकभात्यागः श्वेतपरि- धानं सूचितम् । २-रेक्षणः' चारे ईर्यया गतौ ईक्षणे यस्य । राजपक्षे चाराः गूढपुरुषाः। ३'-भागविदः' प्रभया धिया, कवेः कवीनां जेता-ज्ञानवान् । 'कवेः' इति जात्या एकवचनम् । रसाः शृङ्गारादयः तेषां सांकर्येऽपि भागान् वेत्ति तस्य । कवेः शुक्रस्य जेता । रसो जलम् , तस्य भागान् लभते जलचारिखात् शुक्रस्य । nia mimmim 1 मा. द्वि० स० लो८८ चतुर्थपादः । 2 मा० द्वि० स० श्लो. ८९ चतुर्थपादः । 3 मा० द्वि. सलो.८२ प्रथमद्वितीयौ पादौ, अत्रापि तो एव । माघे 'बुद्धिशस्त्रः' इति भित्रम् । 4 मा. द्वि० स० श्लो. ८३ चतुर्थः पादः । माघे "रसभा- वविदः' इति पाठमेदः। मा-दिसलो. चतुर्मः पादः । 6 मा. द्वि० स० श्लो० ८४ चतुर्थः पादः । 7 मा. वि. स. श्लो. ८५ चतुर्थः पादः । माघे 'दशयाभ्य. न्तरस्थया' इति पाठः। 8 मा० द्वि० स० श्लो० ८६ चतुर्थः पादः। माघे "विद्वान- पेक्षते इति। 9 मा. द्वि० स० श्लो. ८७ चतुर्थः पादः । 10 मा. वि. स. लो. ९. चतुर्थः पादः।

[द्वितीयः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं 5 10 प्रादुरासन्निर्विकारं शब्दा इव विहायसः ॥ ९७ ॥ अथाकब्बरभूभर्ता गुरुमाजूहवन्मुदा। यः सर्वसूरिमालासु नायको नायकायतें ॥९८ ॥ तदृष्टभूभृदाचष्टे हृष्टो धर्मानुयोजनम् । सूरिर्वचांस्युत्ततार स्थाणूनि बलवन्ति च ॥ ९९ ।। श्रेयो दयामयं श्रेयो वाङ्मयेषु प्रतिष्ठितम् । जन्तो_त-घृणे स्यातां निदानं क्षयसम्पदः ॥ १० ॥ गङ्गा मान्या प्रतिष्ठादावित्याद्युपदिदेश सः। जयन्नेकपदे भवान् य उदात्तः स्वरानिव ॥१०१॥ जितकाशी ततः सूरिर्विजहार धरातले । वृन्दं प्रबोधयँस्तेज:-समूहः स महीभुजाम् ॥ १०२॥ दत्वा विद्वत्पदं विद्या-विजयायोहिवान् गुरुः। मत्पट्टेऽयं श्रियाऽपुष्पं-बाणः सन्धानमेष्यति ॥१०॥ ध्यानाध्यक्षः सुरोऽप्यूचे पट्टोदयनगेऽर्कवत् । अयं सुधीस्तपोवार-बाणः सन्धानमेष्यति ॥ १०४॥ अथास्ति स्तम्भतीर्थाच्या नगरी खैमहोभरैः। वर्देशांस्तन्वती व्यस्त-प्रेदोषमनुगामिनः ॥ १०५ ॥ तत्रायात् सोत्सवं सूरि-भूरितेजाः स शूरवत् । श्यामयन दुर्मतीस्तप्तान साग्नीनेधानिवानिलः ॥१०६ ॥ तत्र सोमाग्रजः श्रेष्ठी श्रीमल्लो भर्भरीभजन् । पुण्यश्रियेव पाथोधिर्महानद्या नगापगाः" ॥ १०७ ॥ समं सगोत्रैः सोऽन्येाः सूरिं व्यज्ञापयत्तराम् । ज्ञान-क्रियाभ्यां सर्वेऽनु-गन्तारस्त्वामतः परे ॥१०८॥ 15 20 १'नायको हारमध्यमणिः । २ 'स्थाष्णूनि' साधकानुमानसहितानि । विपक्षे बाधकतर्क- साधूनि । ३ 'जित-जिताहवः । ४ 'बाणा' श्रिया कान्या पुष्पबाणः सरः । पुष्पं रागः, बाणः द्वेषः, तद्रहितः-अपुष्पवाणः । ५ 'व्यस्त-व्यस्तप्रदोषं यथा स्यात् तथा-यत्र पुरे संध्या- समयो नास्ति । ६ भर्भरी'-भर्भरीशब्दः श्रीपर्यायः औणादिकः । [है. धातुपा० ग० ९ धा० २७ पृ० २४१] ७'-स्वा-खाम् अनुगन्तारः। 1 मा० द्वि० स० श्लो. ९१ चतुर्थः पादः । मा० द्वि० स० श्लोक ९२ चतुर्थः पादः । 3 मा० द्वि० स० श्लो० ९३ चतुर्थः पादः । माघे 'स्थानि" इति भेदः। व्याकरणरीत्या तु 'स्थाष्णूनि' इति कथं साधु स्यात् ? 4 मा० द्वि. स.लो.९४ चतुर्थः पादः । 5 मा० द्वि. स. लो०.९५ चतुर्थः पादः। 6 मा० द्वि० स. लो०.९६ चतुर्थः पादः। माघे 'महीभृ. ताम्' इति मेदः। 7 मा०वि० स० श्लो० ९७ चतुर्थः पादः । 8 मा० द्वि० स० श्लो. ९७ चतुर्थः पादः । 9 मा० द्वि० स० श्लो०.९८ चतुर्थः पादः । माघे-पम- नुयायिनः' इति भेदः। 10 मा० द्वि० स० श्लो. ९९ चतुर्थः पादः। 11 मा. द्वि० स० श्लो. १०० चतुर्थः पादः । माघे 'नगा- पगम इति एकवचनम् । 12 मा० द्वि० स० श्लो. १०१ चतुर्थः पादः। .

देवानन्दमहाकाव्यम् । [तृतीयः सर्गः] স্কুলৰঘৰীৰীযথাসৰৱালাৰ নানঃ হাসান। व्यहरदवनिपीठेऽप्यन्दवीं नीतिमङ्कस्थलनियतनिषण्णश्रीः श्रुतां शुश्रुवान् सः ॥ १३० ॥ ॥ इति महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते श्रीदेवानन्दकाव्ये दिव्यप्रभापरनाम्नि ऐड्वारा माघ- समस्यायां नायकाभ्युदयवर्णननामा द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥ तृतीयः सर्गः। को बेरदिग्भागमपास्यमा गमागस्त्यमुष्णांशुरिवावतीर्णः। अपेतयुद्धाभिनि वेशसौम्यो हरिहरिप्रस्थमथ प्रतस्थे ॥१॥ जगत्पवित्रैरपि तन्नपादैः स्पष्टुं जगत्पूज्यमयुज्यताऽऽर्कः। यतो बृहत्पार्वणचन्द्रचारु तस्यातपत्रं विभरांबभूवे'॥२॥ 3. । । . १'-ऐन्दवीं नीतिमकस्थ-' ऐन्दवीं नीतिम्-अमीकृतवान् । "अको भूषा-रूपक-लक्ष्मसु" [है. अने० सं० कां० २ श्लो. १] इति अनेकार्थः। २ [को । बेरदिग्भागम् । अपास्यमा । र्गम् । आगस्त्यम् । अपेतयुद् । धाभिनि । वेशसौम्यो । इति पदविभागः] [अर्थ. वैषामेवम् ] स 'हरिः' इन्द्रः खामी, हरिप्रस्थम्' पर्वततटं प्रति प्रतस्थे । किम्भूतं [हरिप्रस्थम् ? ] 'बेरदिग्भागम्' उश्च आ च वा, ताभ्यां युक्ता इश्च लश्च दश्च इ-ल-दाः ते सन्ति अस्मिन् इति [वा+इलद+इन्-वेलदी] वेलदी स चासौ 'ग्' गकारः, तेन भाति ईदृशः अः अकारः तम् गच्छति प्राप्नोति तत् वेलदिग्भागम्-इलादुगम्-इत्यर्थः । पुनः किम्भूतम् [इलादुगम् ? ] 'र्गम्' 'रम्' रकारं गच्छति गेम्-इलादुर्गनाना प्रतीतम् । 'अपास्यमा' अम् , अर्हन्तम्-सिद्धम् , पाति रक्षति-अपः आस्यमा मुखचन्द्रो यस्य । मास्-सकारान्तः चन्द्रवाची । 'अपेतयुद् अश्च पा च अपौ तयोः ईः लक्ष्मीः यस्य ईक् तः तकारः तेन यौति मिश्रीभवति-अपेतयुत् । 'धाभिनि' न विद्यते भीः यस्य अभिः, स चासौ नी: नायकः, धो धनदः-तद्वद् अभिनीयंत्र तद् धाभिनि हरिप्रस्थम् । 'वेशसौम्यो, वा अथवा ईशश्चासौ सौम्यश्च । पक्षे 'बेरदिग्भागम्' धेरै शरीरम् , तस्य दिग् देशः-जन्मभूमिः, तत्र. भान्ति ईदृशा अगाः पर्वतास्वरवो वा यत्र-[बेर+दिग्+ भ+अग] बेरदिग्भागम् । 'आगस्त्यम्' आगः अपराधः अन्यायः तं त्यजति इति 'ड' प्रत्यये आगस्त्यम् । सौम्यः हरिः मुनीन्द्रः । ३ [आर्कः । तपादैः । आतपत्रम् । बृहत्पार्वणचन्द्रचारु । इति विभागः] 'आर्कः' अरीणां समूहः आरम् , तत् करोति आरयति णिचि किपि आर, स एव आर्कः-प्रतिपक्षसंघः। 'तनपादैः' स एव भगवान् नपादः पूज्यपादः येषां तैः-तन- पादैः । “नकारो जिन-पूज्ययोः" इति कोषः [एकाक्षरकोश- श्लो. २२-२३ ] "नो नाथेऽपि" इति विश्वशम्भुः । 'जगत्' इति श्लोकस्य अखिलार्थश्वायम्- आर्कः प्रतिपक्षसंघः खयम् अयुज्यत-कर्मकर्तरि रूपम् । तेन कारणेन तस्य आतपत्रं मुनिगणः बिभरांबभूवे-तस्य गच्छः संभृतः, कैः जगत्पवित्रैर्मुनिभिः, किं० मुनिभिः स एव भगवान् नपादः पूज्यपादो येषां तैः-तनपादेः । यहा परगणानां नपादाः पूज्यपादास्तैः । किं कर्तुम् ? जगत्पूज्यं स्पष्टम्-वन्दितुम् । 'आतपत्रम्' तपं त्रायन्ते तपत्राः मुनयः, आवत् तपना यत्र तत् भातपत्रं गणः कुलं वा । यद्वा तपाऽभावः अतपम् ततः त्रस्यन्ति 'ड' प्रत्यये अतपत्रा मुनयः तेषां समूहः आतपत्रम् । किम्भूतम् ? 'बृहत्पार्वणचन्द्रचार' बृहन्ति पार्वणानि धर्मकार्याणि येषां ते चन्द्राः चन्द्रशाखिनो मुनयः तैः रम्यम् । बृहत् पार्वणचन्द्र- चारु-पार्वणचन्द्रे चारु निर्मलम् । मा० द्वि. स.लो. ११८चतुर्थपादः । माघे -निष- ण्णश्रीश्रुति भेदः 2 मा. तु.स.... लोकः, समस्खोऽपि श्लोकः केवलमत्र पदच्छेदमेदः । 3 या तु. स. २. श्लोकः अखण्डोऽपि, केवलं : पद विभागे भेदः । .

२३ तृतीयः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं मृणा लसूत्रामलमन्तरेणस्थितश्चलबामरयोर्द्वयं सः। भेजेऽभितः पातु कसिद्धसिन्धोरभूतपूर्वा श्रियमम्बुराशेः॥३॥ चित्राभिरस्योपरि मौलिभाजां भाभिर्मणीनामनणीयसीभिः । नीराजनेवाऽजनि सजनौधैर्विनिर्मिते कर्मणि पूजनायाः ॥४॥ पदे पदे नम्रपावतंसप्रत्युप्तगारुत्मतरत्नभासा । भर्तुर्विहर्तुश्चरणाम्बुयोनेर्यवाङ्कुरश्रीरनुनीयते स्म ॥५॥ गुरुश्चलंश्चारुचरित्रपात्रैः परीवृतो नीवृदुपासकैच। बहीयसा दीप्तिवितानकेन जिगाय गङ्गाकसुताप्रसङ्गम् ॥६॥ कृपालतामङ्कुरयन् मनोन्तश्चचाल तेषामपि भूसुजां सः। यैर्वह्निरूपं विदधेऽङ्गभाजां विक्षोभजासक्लपितैरिवाऽसौ ॥७॥ उभौ यदि व्योनि पृथक्प्रवाहावमहँसिन्धोमिलितौ भवेताम् । तेनोपमीयेत विभोः प्रवेशे सानुगाभ्युद्गतसङ्घयोगः ॥८॥ पुरः प्रवेशे दिवसस्य साक्षाद् दधे मणिर्दीधितिदीपिताशः। माङ्गल्यमुक्तास्रजि नायकत्वं मूर्ध्नि ध्वजस्यार्जुनकुम्भशोभाम् ॥९॥ मुक्तामयं पादयुगे नतानां भाति स्म दामाऽप्रपदीनमस्य । अङ्गुष्टनिष्ठयूतमिवोर्ध्वमुच्चैः प्रेम्णा पयस्तत्परिपाचनाय ॥१०॥ पुरन्दरेणापि पुरःक्षमीन्दोः कल्याणनाम्नाऽभिगमाय चके। गजवजो राजिकुथैः पयोजैर्यमखसुचित्र इवोदचाहः ॥ ११ ॥ प्रसाधितस्याथ मधुद्विषोऽभूत् लक्ष्मीः सहक्षा करिणां कुलस्य । 10 15 १ मृणा । लसूत्रा । आम । लम् । अन्तर्-एणस्थितः । च । आम । रयोयम् । अमितः। पा। कसिद्धसिन्धोः । अम्बुराशेः। इति पदविभागः] मृणा हिंसा, लम् लोपनम् , आम जगाम-प्राप । [किम्भूता मृणा ? लसूत्रा-लोपनं सूत्रं यस्याः सा-लोपनसूत्रा-लोपकारिणी- सर्वसंहारिणी] "अम द्रम हम्म मीम गम्लं गतौ" 'अन्तर् एणस्थितः' अन्तर् चित्ते एणस्थः चन्द्रः शान्तिजिनो वा जातः अस्मिन् इति एणस्थितः । 'च आम रयोयम्' आम प्राप । रयोः लयो-लक्ष्म्योः, द्वयम्- युगलम् । “ल लोपन्नम्" [एकाक्षरकोश-लो० २९-३१] "ला लक्ष्मीः" इति च विवशम्भुः । 'अभितः' में भयम् जातं यस्यासौ भितः-न भितः अभितः । 'पा' खामी । 'कसिद्धसिन्धोः' कानाम्-आत्मनां सिद्धः सिन्धुः संसाररूपो यस्मात् स तस्य । २ अम्वुराशेः सागरपक्षस्य-[सागरान्तमुनिशब्दप्रसिद्धस्य यथा 'चन्द्रसागरमुनि' इत्यादिकस्य ] पा खामी अभूतपूर्वां श्रियम्- अश्रियं मेजे। ३ 'असौ करवाले। 1 मा० तृ. स. ३ श्लोकः अक्षरशः अत्र न्यस्तः पदविभक्ति- रन्यथा । माघे तु '-ऽभूतपूर्वी रुचमम्बुराशेः' इति भेदः। 2 मा० तृ० स० श्लोक ४, अत्र अस्य श्लोकस्य पूर्वार्धं पूर्वार्ध- तया उपन्यतम्। 3 मा० तु. स० श्लो० ५ द्वितीयचरणमत्र द्वितीयतया । 4 मा० तृ. स. श्लो. ६, अस्य तृतीयचरणमत्र तृतीय चरणतया। 5मा० तु. स. श्लो० ७ चतुर्थचरणम् । 6 मा० तृ० स० श्लो. प्रथमपादः अत्र प्रथमपादतया । अन्यदपि साम्य श्यते। 7 मा० तु. स. श्लो० ९द्वितीयचरणमत्र द्वितीयचरणतया । 8 मा०. तृ० स० श्लो. १. द्वितीय-तृतीयचरणौ अत्रापि तथैव । 9 मा० त० सा० श्लो० ११ चतुर्थः पादः । "-श्चित्र इवोद- भास" इति पाठमेन्दो माघे।

5 10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [वृतीयः सर्गः] वियत्प्रयुक्तक्रमपुष्करस्य वराहदेहेन महीं दिधीक्षैः ॥ १२ ॥ अनन्तनागाभरणस्य चाग्रस्थलस्थितश्रीललनस्य तस्य । न पार्वती श्रीबिभिदे भवार्दा विष्णोरिवागात् करिणां व्रजस्य ॥१३॥ प्रवृत्तिसिन्धोः पुलिने ललन्त्या भृङ्गावलेस्ताण्डवमण्डपौ । प्रकाशकार्कश्यगुणौ दधानाः कुम्भाविभाश्चेलुरभि क्षमीन्द्रम् ॥ १४ ॥ ते नागजाऽभ्यक्तवराङ्गभागा नागा विरेजुश्चलिता इवागाः। येषां गते गपतिः शुचेऽभूद् नितान्तमाक्रान्त इवाङ्गनानाम् ॥ १५ ॥ यां यां प्रियः प्रेक्षत कातराक्षी तत्कुम्भश्वा स्तनसाम्यशंसी। सा सा हिया नम्रमुखी सुमुक्तास्रजो मणिं दर्शयति स्म तस्मै ॥ १६ ॥ तस्याऽतसीसूनसमानभासो गर्जत्पयोदेन समस्य मूर्त्या । न हास्तिकस्योज्वलकिङ्किणीभिर्बलाहकश्रेणिरुचिर्न चक्रे ॥ १७ ॥ कुम्भस्थलस्थापितरौप्यकुम्भ-भ्राम्यन्मयूखावलिमण्डलेन । गौरागगर्वाद गजयूथनाथा मदेन शक्रद्विपमन्वकार्पः ॥१८॥ आधोरणैः खाङ्गविभूषणान्तः-सङ्क्रान्तकान्ताचलहक्सहस्रः। नित्यं हरेः सन्निहिता निकामं सहस्रनेत्री व्यभिचार्यते स्म ॥१९॥ प्रफुल्लसप्तच्छदसन्धिगन्धिरनन्यसाधारणतां दधानः। चकार लाजोकिरणं किमुच्चैर्गजव्रजः पुष्करसीकरेण ॥ २०॥ स्पृशंश्च नासाऽवयवैधरित्री व्यूहो द्विपानां धरणीधवस्य । राज्यश्रियो भद्र इति प्रतीते नापि तस्यैव स नन्दकोऽभूत् ॥ २१ ॥ न नीतमन्येन नतिं कदाचिद् धराधवः सादिबलं बलीयः। बलाङ्गकोत्फुल्लवननि सार्द्धमादाय सूरीन्दुमभिप्रतस्थे" ॥ २२॥ बिभर्ति यामैन्दवबिम्बभासाऽकृष्णार्णवाभ्यर्णचरैकहंसः। १-'पुष्करस्य' कृष्णपक्षे चरणकमलम् । पक्षे पुष्करं शुण्डाग्रम् । सदृशमहसि कण्ठे यत्र सीमाविवादः" ॥ [अयं श्लोकः, २-'नागाभरणस्य' कृष्णपक्षे अनन्तः शेषनागः । हरपक्षे 'अनन्तनागा--इत्यादिश्लोकभावेन साम्यं बिभर्ति ] बहुसर्पभूषणस्य । नागाः करिणोऽपि । ४'व' उपमायाम् ३-'ललनस ललना स्त्री हस्तिनी च । ५-'मुक्तास्रजो' मुकासग्दर्शनात् मम स्तनशोभानिर्जितौ कुम्भौ "स्फुटिक-भरकतश्रीहारिणोः प्रीतियोगात् मुक्तादण्डं ददतुः-मुक्ताः स्तनयोराभरणानि बभूवुः इति भावः । तदवतु वपुरेकं काम-कंसद्विषोर्वः । ६-'त्फुल्लवन-'वसन्तेन उत्फुल्लं यद् वनम् तद्वत् श्रीर्यस्य तत् । भवति गिरिसुताया नियमम्भोधिजायाः ७-न्दवबिम्ब-' चन्द्रभासा उज्वलो यः अर्णवः । 15 20 7 1 मा. तृ० स० लो० १२ प्रथमपादोऽत्र प्रथमपादतया। 2 मा० तृ० स० श्लो. १३ द्वितीयपादो द्वितीयपादतया। 3 मा.तृ..स० श्लो०१४ तृतीयपादोऽत्र तृतीयपादतया। 4:मा. तृ० स० लो० १५ चतुर्थपादः । 5 मा० तु. स.लो. १६ प्रथमपादोऽत्र प्रथमपादतया माने कातरक्षीः इति मेदः । अत्रसं तृतीयचरणमपि.. १६ ग्ोकगतद्वितीयचरणेन सह साम्यं बिभर्ति । 6 मा० तृ० स० श्लो० १७, अस्य प्रथमपादोऽत्र प्रथमपाद- तया। 7 मा० तु. स. श्लो० १७, द्वितीयपादोन द्वितीयपादतया। 8 मा० तृ० स० श्लो. १८, अस्य तृतीयचरणमत्र तृतीयतया। 9 मा० तृ. सालो. १९ द्वितीयपादो द्वितीयपादतया । 10 मा० तु. सलो. १९ चतुर्थचरणमत्र चतुर्थतया । 11 मा० तु. स. लो. २०, भस्य प्रथमचरणमत्र प्रथमतया।

२५ 5 10 [तृतीयः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं स सूरिराट् तामुदुवाह शोभामभ्यापतत्सादिबलान्तिकस्थः ॥ २३ ॥ विवन्दिषुः सूरिपदारविन्दं महीधवः सैन्धवमारोह । महारथः पुष्यरथं रथाङ्गी साक्षादिवोक्षाणमिव त्रिनेत्रः ॥ २४ ॥ नृपेऽधिरूढे क्रमतः प्लुतानि चकार धाराचतुरस्तुरङ्गः । सव्याक्षिदृष्टो हरिणा विहायस्तलं विविक्षन्निव पन्नगारिः ॥ २५ ॥ यियासतस्तस्य महीध्ररन्ध्रभिदां पटीयान् पटहप्रणादः । गन्धर्वराजामधिमण्डलाङ्क प्रोत्साहयामास नटप्रवृत्तिम् ॥ २६ ॥ अजन्यजयं नृपवाजिराजां धत्री धरित्र्याः फणिना ततोऽधः। तत्क्लान्तिमेते चलपुच्छवातैरुत्क्षिप्य पांशुं शमयाम्बभूवुः ॥ २७ ॥ गजैः संवीतैस्तुरगैर्विनीतैर्युतानि संसक्तभटाऽयुतानि । क्रियाफलानीव सुनीतिभा बलानि भूनायकमन्वयुस्तम् ॥ २८ ॥ जनैरहंपूर्विकया प्रणुन्नधुरीणभावात् पतिते सुवर्णे। पिष्टेरिणाँ रेणुकणाः सुवर्णक्षोदयुतश्चक्षुदिरे रथौधैः ॥ २९ ॥ न लङ्घयामास महाजनानां शिरांसि रेणुः करिणां मदाः। यतीशितुः किन्तु पदप्रसादाद धरातलस्योद्भुषणं शशंस ॥ ३० ॥ नतत्रिंकोत्साहरसेन वाहा मुहुर्यदुचिक्षिपुरग्रपादौ । विरेजुरुच्चैःश्रवसं तदुच्चैविजेतुकामा इव सम्मुखीने ॥ ३१॥ क्रमात् पुरानिर्मितसख्यसौख्यान सह प्रवृद्धान् भुवनप्रसिद्धान् । प्रक्रीडितान रेणुभिरेत्य तूर्णं ननाम सूरीनवनीदिनेशः ॥ ३२ ॥ चतुर्विधः सङ्घजनोऽप्यनंसीदपूर्ववत् तानपि पूर्वदृष्टान् । अनेकशः संस्तुतमप्यनल्पा नवं नवं प्रीतिरहो करोति" ॥ ३३ ॥ उपेयुषो वर्त्म निरन्तराभिरस्तोकलोकस्य नतिक्रियाभिः। प्रतीक्ष्यमाणोऽथ गुरुः सुधर्मलाभाशिषा पूर्जनमभ्यनन्दत्" ॥ ३४ ॥ 15 20 १ 'सैन्धव-' अत्राय भावः-पूर्व राजा गजेऽधिरूढः पश्चात् श्रीगुरौ दूराद् दृष्टे विनयाद् अश्वेऽधिरूढः । .२ 'रथाङ्गी' चक्री। ३ 'गन्धर्वराजाम्' अश्वरत्नानाम् । ४ 'अजर्यम्' सौहार्दम्-अजनि । ५-'वीतै'-"यातमङ्कुशवारणम् । निषादिनां पादकर्म यतं वीतं तु तद् द्वयम्" ॥ इति कोषः । ६ 'अरिणा' चक्रेण । ७-'दुषणं' रोमोद्गमम् । ८'-त्रिको-' “अग्रकायसमुल्लासात् कुञ्चितास्यं नतत्रिकम्" । ९ 'सह' इति सर्वत्र योगः-सह प्रवृद्धान्, सह भुवनप्रति- द्धान्, सह रेणुप्रक्रीडितान् । JNARMA 1 मा० तृ० स० श्लो० २१ द्वितीयपादो द्वितीयतया। 2 मा० तृ० स० श्लो. २२ तृतीयपादोऽत्र तृतीयतया । 3 मा० तृ० स० श्लो० २३ चतुर्थपादः । 4 मा० तृ० स० श्लो० २४ अविकलं पूर्वार्ध पूर्वार्धतया । माघे '-रन्ध्रभिदापटीयान्' इति भेदः । 5 मा० तृ० स० श्लो. २५ द्वितीयपादोऽत्र द्वितीयतया । 6 मा० तृ० स० श्लो० २६ तृतीयचरणमविकलं तृतीयचरण- तया, चतुर्थ तु माघे 'सैन्यानि सोमान्वयमन्वयुस्तम्' इति । दे०४ 7 मा० तृ० स० श्लो० २७ चतुर्थपादः । 8 मा० तृ० स० श्लो० २८ प्रथमपादोऽत्रापि प्रथमपादः । 9 मा० तृ० स० श्लो० २९ द्वितीयपादो द्वितीयतया। माघे '-रग्रपादान्' इति । 10 मा० तृ० स० श्लो. ३० तृतीयचरणमत्र तृतीयतया । 11 मा० तृ० स० श्लो० ३१ उत्तरार्धमत्राविकलमुत्तरार्धतया । 12 मा० त० स० श्लो. ३२ प्रथमचरणमत्र प्रथमचरणतया ।

10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [तृतीयः सर्गः] परिष्कृतत्वेन दिशः पिशङ्गीर्या कुर्वती काश्चनभूमिभासा । दिनोदयस्य श्रियमाश्रितानां यतीश्वराणां पुरतः शशंस' ॥ ३५ ॥ प्रविश्य तस्यां पुरि पौरनन्दी गणाग्रणीस्तां वसतिं पुपाव । अनिर्विदा या विदधे विधात्रा भुवो विभूषेव भुविर्जयाय ॥ ३६॥ पुरी सनाथा प्रभुणा जनानां गतागतैर्वृद्धिमतीव चक्रे । सनेमिनी द्वारवती सखीं तां छायेव या वर्जलधेर्जलेषु ॥ ३७ ॥ रथाङ्गभऽभिनवं वराय हरियथा द्वारवती ससर्ज। तथैव मन्ये गुरवे ध्रुवेण विनिर्मिता नर्मवती पुरीयम् ॥ ३८ ॥ पयोधिना तुङ्गतरङरङ्गच्छटोच्छलच्छङ्खकुलाकुलेन । पुरी दधौ साम्यमहो महोघे तदाभिनृत्यत्तुरगिप्रवृत्त्या ॥ ३९ ॥ निनंसया सङ्गतपौरनारीलानैस्तडागोऽत्र तदा तरङ्गैः। लोलैरलोलद्युतिभाञ्जि मुष्णन् रत्नानि रत्नाकरतां जगाहे ॥४०॥ हल्लीसकैः प्राप्तपरिश्रमाणामुपेयुषीणां पुलिनेऽङ्गनानाम् । सरोऽविलम्बादिव मानमत्र विस्तारयामास तरङ्गहस्तैः ॥४१॥ 15 यत्सालमुत्तुङ्गतया विजेतुं शशाक न स्वःप्रभुवैजयन्तः। तत्र न्यवात्सीनरनाथमन्त्री वणिक्षु सभ्यः सहजूमहेम्यः ॥ ४२ ॥ चतु:समामर्दविसन्धगन्धः प्राकारभित्या सहसा निषिद्धः । निर्गत्य यत्सौधगवाक्षमार्गे प्रादुर्विचक्रे चरितं गृहस्य ॥ ४३ ॥ अथान्यदासौ गुरुमाह मन्ये त्वदुद्भवादेव शिवाय देवैः। आराधितोऽद्धा मनुरप्सरोभिः प्रसादितोऽसूत कुलाग्रिमं ते ॥४४॥ त्वत्पूर्वजाः केचिदिहैव पूर्व जातास्त्रिवर्गाचरणैः सुरााः। यद्योषितः स्फाटिकसौधमूर्ध्नि नभोगता देव्य इव व्यराजन्" ॥४५॥ कान्तेन्दुकान्तोपलकुहिमेषु स्वत्पूर्वजानामिह मन्दिरेषु । १'अनिर्विदा' या पुरी निर्वेदः खावमाननम् तद्रहितेन सोत्सा ५ 'पयोधिना' समुद्रेण समम् । हेन कृता। ६ 'चतुःसमा'-"कर्पूरा-ऽगरु-ककोल-कुडमैस्तु चतुःसमम्" २ 'भुविर्'-खर्ग- ७ 'सहसा' इत्यव्ययं नानार्थे अव्ययानामनन्तार्थखात् । गन्धः ३' नेमि- समासान्तविधेः अनित्यत्वाद् न कच् । ४' जलधेर्जलेषु' या जलधेर्जलेषु खः स्वर्गस्य छाया इव प्रति ८ 'आराधितोऽद्धा' देवैः आराधितः अप्सरोभिः प्रसादितः । बिम्बमिव अस्ति तां द्वारवती सखी चक्रे-लक्षणया तुल्या आसीत् । अद्धा निश्चितम् । 1 मा० त० स० श्लो० ३३ द्वितीयचरणमत्र द्वितीयचरण 6 मा० तृ० स० श्लो० ३८ उत्तरार्धमत्र अविकलमुत्तरार्धतया, तया । माघे '-नवप्रभासा' इति । केवलं माघीय 'अवाप' स्थाने अत्र 'जगाहे' किया । 7 मा० तृ० स० श्लो० ३९ चतुर्थपादः । 2 मा० तृ० स० श्लो० ३४ तृतीयचरणमत्र तृतीयचरणतया। 8 मा० तृ० स० श्लो. ४० प्रथमचरणमत्र प्रथमतया । माघे 3 मा० तृ. स. श्लो० ३५ चतुर्थपादः । 'यच्छाल-' इति भेदः। 9 मा० तृ. स० श्लो० ४१ द्वितीयपादो द्वितीयतया । 4 मा० तृ० स० श्लो. ३६ प्रथमचरणमत्र प्रथमतया । 10 मा० तृ० स० ग्लो०४२ तृतीयपादो तृतीयतया। 5 मा० तु. स.लो. ३७ द्वितीयपादो द्वितीयतया । 11 मा तृ० स० श्लो०४३ चतुर्थपादः । 20 कर्ता। NIRAJ [तृतीयः सर्गः ] 10 10 महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं छाया विरेजुर्विलसद्वधूनां शरीरभाजः कमला इवैषाम् ॥ ४६ ।। तवागमादेव ततो विशेषाजालागताभ्योऽधिगृहं गृहिण्यः। इहोच्छलद्भूरिसुमावलीभ्यः प्रकाशमभ्यस्य दृशोर्दिशन्ति ॥४७॥ त्वदृष्टिसम्भावनयाश्रयाली पीयूषयूषात्मतयेव शुभ्राम् । चक्रुर्युवानः प्रतिविम्बिताङ्गाः स्ववेषवर्णैर्विविधामिहाद्य ॥४८॥ अथात्र शिष्ये खपदप्रतिष्ठां प्रणीय नः प्रीणय चित्तनिष्ठाम् । महः क्रियान्मेऽस्य गृहे स्वबिम्बैः सजीवचित्रा इव रत्नभित्तीः ॥ ४९ ।। गुरोगिरः श्रुत्युदितप्रसत्तेस्तदा स्मिता पाण्डुकपोलकाभ्याम् । बिम्बे सवर्णेऽपि सुवर्णलिप्त-स्तम्भेषु भेजे नवदर्पणश्रीः ॥ ५० ॥ शुकाङ्गनीलोत्पलनिर्मितानां स्रजां विलेसुः प्रतिसद्म राज्यः। कटाक्षमाला इव पर्वलक्ष्म्यास्तथेति साधु प्रभुणाऽभ्युपेते ॥५१॥ मणीमयेष्वङ्गणकेषु धाम्नां लिप्तेषु भासा गृहदेहलीनाम् । अन्तःस्थिताऽपीन्दुमुखी तदाऽऽसीद् अभ्यागतेवार्थिजनाय दातुम् ॥५२॥ तत्रोत्सवस्य श्रवणामृतेन नाभूत् पुरी सा श्रवणेन तूर्णम् । यस्यामलिन्देषु न चक्रुरेव लोकाः खधाम्नां प्रतिकर्म नर्म ॥५३॥ अस्याः खसेवास्ति पुरी द्वितीया पार्श्वेऽद्वितीया खलु साबलीति । न वेद यस्यां मणिकुट्टिमत्वात् मुग्धाङ्गना गोमयगोमुखानि ॥५४॥ गोपानसीषु क्षणमास्थितानां दिदृक्षयाऽभ्येत्य दिवो वधूनाम् । जालेषु लीलालसमानुषीणां मुखेन सख्यं समुदेत्यमुष्याम् ॥ ५५ ॥ नृत्यप्रलोभाद् वलभीस्थितानामालम्बिभिश्चन्द्रकिणां कलापैः। जातातपत्रप्रभया प्रभुत्वं या व्यायामास पुरी पुरीणाम्" ॥५६॥ स्फुरत्करैरप्यकरैर्विलास-व्यासक्तरामैरपि चाऽविरामैः । रेजे विचित्रैरपि या सचित्रगृहविहारैरपि हारिहारैः ॥५७ ॥ अथैत्य तस्यां पुरी सूरिमन्त्र-दिध्यासयाऽधत्त स धारणां ताम् । अन्तर्निलीनेन्द्रियवृत्तिरेनं यस्यां जनः कृत्रिममेव मेने ॥५८॥ 15 20 -- 25 ३ 'शुकाङ्ग-'शुकाङ्गवन्नीलानि यानि उत्पलानि । १ 'खबिम्बैः' खेषां सगोत्राणां बिम्बैः संक्रान्तैः २ 'सवर्णे-' गुरोः सुवर्णवर्णलात् बिम्बे सवर्णे समानेऽपि स्मितेन ईषत्पाण्डुकपोलकाभ्यां पाण्डुवात् सुवर्णलिप्तस्तम्भेषु नव- दर्पणश्रीर्मेजे। ४ 'तदाऽऽसीद-' तदा तस्मिन् समये आसीत् । ५ 'यस्याम्' धारणायाम् । 1 मा० तृ० स० श्लो० ४४ प्रथमपादः प्रथमतया । 2 मा० तृ० स० श्लो. ४५ द्वितीयपादो द्वितीयतया। 3 मा० तृ० स० श्लो० ४६ तृतीयपादः तृतीयतया । 4 मा० तृ० स० श्लो० ४६ चतुर्थपादः । 5 मा० त० स० श्लो० ४७ चतुर्थपादः । माघे तु 'मणिदर्पण- श्रीः' इति भेदः। 6 मा० तु. स. श्लो० ४८ प्रथमपादः प्रथमतया । 7 मा० तृ० स० श्लो. ४८ द्वितीयपादो द्वितीयतया । 8 मा० तृ० स० श्लो० ४८ तृतीयपादः तृतीयतया । 9 मा० तृ. स. श्लो. ४८ चतुर्थपादः चतुर्थतया। 10 मा० तृ० स० श्लो० ४९ प्रथमपादः प्रथमतया । 11 मा० तृ० स० श्लो० ४९ द्वितीयपादो द्वितीयतया । 12 मा० तृ० स० श्लो० ५० तृतीयपादः तृतीयतया । 13 मा० त० स० श्लो० ५१ चतुर्थपादः ।

5 10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [तृतीयः सर्गः] क्षितिप्रतिष्टोऽपि मुखारविन्दैधितद्युतोष्णांशुरिवाऽप्रधृष्यः । ज्वलत्तपोज्योतिरसौ समाधि दधज्जिगाय द्युसदीशतेजः ॥५१॥ तदेयुषीर्देववधूर्विलासै रागं विविक्ता इव वर्द्धयन्तीः। योगाद् गुरुं क्षोभयितुं न दक्षा बबाधिरे धीरकटाक्षलक्षाः ॥ ६०॥ रम्भाः स्मरं भावयितुं मनोन्तर्मधुं व्यधुस्तेन मणीचकानाम् । मधूनि वक्राणि च कामिनीनामन्योन्यमामोदविवादमीयुः ॥ ६१ ॥ प्रियः प्रियैर्वचसां विलासैः स्त्रियः प्रसन्ना विहिता रतान्तः। सख्याः शुकस्तान्निवदंस्तदान्ते-वासित्वमाप स्फुटमङ्गनानाम् ॥ ६२॥ छन्नेष्वपि स्पष्टतरेषु यत्र पिकानुवादान्मणितेषु सख्यः। प्रत्यायिताः सङ्गमरङ्गसौख्यं भेजुः स्वयं जातफलाः कलानाम् ॥ ६३ ॥ वासांसि लज्जावधये धृतानि खच्छानि नारीकुचमण्डलेषु । करप्रयोगस्य भियेव नूनं नाविघ्नयंस्तत् प्रियदृष्टिपातान् ॥ ६४ ॥ रतप्रवृत्तौ शतधा बभूवुः क वोन्नतानां तनुभिनिरोधः [इति वा पाठः]। लतामिलच्छाखिषु तत्प्रवृत्ति-हीरक्षणायेव वधूधृतानि आकाशसाम्यं दधुरम्बराणि रतश्रमाम्भ:पृषदाऽऽर्द्रितानि ॥६५॥ अविक्रियं चेति मधुक्रियाभिस्तमैक्ष्य रम्भाः प्रणिधानशुद्धम् । खविभ्रमं विभ्रममेव जजुन नामतः केवलमर्थतोऽपि ॥६६॥ यस्यामज॑िह्मा महतीमपंङ्कां भक्तिं वितेनुर्गणधारिणोऽपि । सूरेः क्रमाच्छासनदेवताऽऽविर्वभूव सा भक्तिवशात् सहर्षा ॥ ६७ ॥ भवादृशा ध्यानधिया खयोगसीमानमत्यांयतयोऽत्यजन्तः । स्मरन्ति मे श्रीप्रभवस्ततोऽहं धन्येति साऽऽभाष्य गुरूननंसीत् ॥ ६८॥ यदर्थमुद्यत्तपसा त्वयाहं स्मृता तदाज्ञापय देव ! सद्यः। जनैरजातस्खलनैन जातु भवादृशैर्येयमिहार्थवन्ध्यम्" ॥ ६९ ॥ १-वधू- २-३ द्वितीयाबहुवचनम् । देववधूः कटाक्षलक्षा ४- मजिम्हा' अवकाः आर्जवसहिताः । बबाधिरे-उपतापाय जाता इति भावः । किम्भूताः कटाक्षलक्षाः ? ५-'मपङ्काम्' अपापाम् । श्रीराः अनिमेषलात् । ६-"विर्बभूव' प्रत्यक्षा अभूत् । २ 'तान्' वचोविलासान् । ७-'त्यायतयो- अतिआयतयः अतिशोभनोत्तरकालाः । "अतिरतिक्रमे च" [ ३११४५] इति तत्पुरुषसमासः । शोभनो ३ इतः चलारि अपि पदानि समस्यन्ते अधिकारबहुलानु- राजा अतिराजा। रोधात् । ८-स्खलनै'-निरतीचारैः । 15 20 +--- 1'मा० तृ० स० श्लो० ५२ प्रथमपाद: प्रथमतया । माघे '-रविन्दै' इति । 2 मा० तृ० स० श्लो०५३ द्वितीयपादो द्वितीयतया । 3 मा० तृ० स० लो० ५४ उत्तरार्धमुत्तरार्धतया, केवलम् अ- क्षरमेदः। 4 मा तृ० स० श्लो० ५५ चतुर्थपादः । 5मा० तृ० स० श्लो० ५६ प्रथमपादः प्रथमतया । 6 मा० तु. स. श्लो० ५६ द्वितीयः पादो द्वितीयतया । 7 मा० तृ० स० श्लो० ५६ तृतीयः पादः तृतीयतया । 8 मा० तृ० स० श्लो० ५६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 9 मा० तृ० स० श्लो.५७ प्रथमः पादः प्रथमतया । माघे '-मपवाः' इति । 10 मा० तृ० स० श्लो० ५७ द्वितीयः पादो द्वितीयतयाः। 11 मा० त० स० श्लो० ५७ तृतीयः पादः तृतीयतया ।

२९ 5 10 [ तृतीयः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं को यौवराज्यश्रियमहतीति श्रुत्वा गुरोर्वाचमुवाच देवी । समेऽपि शिष्या उचिता हि यैन येऽप्यमुच्यन्त विनीतमार्गाः ॥ ७० ॥ परस्परस्पर्द्विपरायरूपा जितेन्द्रिया ज्ञप्तिगुरुवरूपाः। शिष्यास्तवैतेषु गुणैः प्रधानः श्रीपाठकोऽसौ कनकाभिधानः ॥ ७१ ॥ कैलाः कलाः सर्वकलाङ्गनासु पौरस्त्रियो यत्र निधाय वेधाः। खकोशमध्यादिव तत् ततस्ता यथाहमादाय जगत्सु युङ्क्ते ॥७२॥ स्थानेऽस्य दीक्षैव यदेतदहीं कन्यां विधातुं विदुषो न वेधाः । श्रीनिर्मितिः प्राप्तघुणक्षतैकवर्णखरूपाऽस्य रत्तरस्य ॥७३॥ शङ्के ततः किं जनरञ्जनाय श्रियं स नव्यामिव योजयित्वा । प्रत्याददानः खघुणप्रणीतवर्णोपमावाच्यमलं ममार्ज' ॥ ७४॥ क्षुण्णं यदन्तःकरणेन वृक्षास्तदेव दिव्याः प्रतिसाधयन्ति । इतीव मन्ये गुरुचिन्तितोऽर्थः समर्थितः शासनदेवतोक्तैः ॥ ७५ ॥ यचेतसाऽचिन्ति धनादि सालाः फलन्ति कल्पोपपदास्तदेव । गुरुः प्रसत्त्येह परत्र भोगानाभोगरूपान् दिशति ह्यचिन्त्यान् ॥ ७६ ॥ क्रमात् समाधेरुपरम्य सम्यक् सूरेरिलादुर्गपुरि प्रवेशे । अध्यूँषुषस्तामभवन् जनस्य मनोमुदः स्वर्गसदोऽपि वन्द्याः ॥ ७७॥ पदप्रतिष्ठास्पदवेदिकायां विस्तारयामास जनाश्रयान्तः। स श्रेष्टिमुख्यः सहजूमणीभिर्याः सम्पदस्ता मनसोऽप्यगम्याः ॥७८ ॥ कला दधानः सकलाः खभाभिरुद्भासयन सौधसिताभिराशाः। तन्मण्डपे मौक्तिकरत्नराशिश्चकार नीचैर्भगणं द्विधाऽपि ॥ ७९ ॥ सुदुर्लभां सोदरवल्लभामप्यभङ्गसौभाग्यभरेण पार्थात् । 15 20 १'द्वये-' लौकिक-लोकोत्तररूपमेदात् । २ 'कलाः' पाठकस्य नागर्यः-प्रधानाः मुख्याः । अन्यकलास्तु ग्रामीणवनिताः ३ 'विदुषो' विदुषशब्दः औणादिकः पाण्डित्यै । ४ 'प्राप्तघुण-' प्राप्तं घुणक्षतैकवर्णखरूपं यया सा। ५ 'जरत्तरस्य' इत्यनेन जरायां शिल्पिनः शिल्पक्रियाक्षमबज्ञापन घुणाक्षरन्यायसमर्थनं च। ६ 'आभोग-' विस्ताररूपान् । 'अध्यूषुष-' ताम् इलादुर्गनाम्ना 'ईडर' इति प्रसिद्धां पुरी वासेन आश्रितस्य । ८ 'वन्द्याः' प्रशस्याः स्तवनीयाः। ९ 'द्विधाऽपि' उच्चलेन कान्या च इति द्विधा । १. 'सोदर-' सोदरवल्लभां लक्ष्मीम् । चन्द्रपक्षे सोदरां भगि- नीम् , प्रियाम् इष्टाम्-ततो विशेषणसमासः। 1 मा० तृ० स० श्लो० ५७ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 2 मा० तृ० स० श्लो० ५८ प्रथमः पादः प्रथमतया । 3 मा० तृ० स० श्लो० ५८ द्वितीयः पादः द्वितीयतया। माघे 'विधाय' इति । 4 मा० तृ० स० श्लोक ५८ तृतीयः पादः तृतीयतया । माघे 'श्रीनिर्मितिप्राप्त-इति। 5 मा० तृ० स० श्लो० ५८ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 6 मा० तृ० स० श्लो० ५९ प्रथमः पादः प्रथमतया । 7 मा० तृ० स० श्लो० ५९ द्वितीयः पादः द्वितीयतया । माघे -स्खदैव" इति । 8 मा० तृ० स० श्लो० ५९ तृतीयः पादः तृतीयतया । माघे 'अध्यूषुषो यामभवन् जनस्य' इति । 9 मा० तृ० स० श्लो० ५९ चतुर्थः पादः चतुर्थतया। 10 मा० तृ० स० श्लो. ६० पूर्वाध पूर्वाधतया ।

10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [तृतीयः सर्गः] गुरोर्निशम्यागमनं कुमारैः संवर्द्धिताः स्वखपुरे पुरेशाः १०३ ।। आपूर्यमाणोत्तमतूर्यनादैः स्खलत्खलीनं हरिभिर्विलोलैः । संयोज्य सैन्यं च मुदाभिजग्मुः संदेशतोऽस्मादथ देशमुख्याः ॥ १०४ ॥ देशान्नरेशाः प्रमदाभिवेशात् तथा रथाश्वेभभरेण चेलः। परस्परोत्पीडितजानुभागाः नागाद् यथा तत्र तिलोऽपि भूमिम् ॥ १०५ ॥ स्मरध्वजानां ध्वनिभिर्ध्वजानां चलाञ्चलैर्जातभियां हरीणाम् । धारोद्धरत्वात् सरलाध्वगत्या दुःखेन निश्चक्रमुरश्ववाराः ॥ १०६ ॥ निरन्तरालेऽपि विमुच्यमाने मार्गे नृपाद्यैः पुरतश्वलद्भिः। पदं दधानो गुरुरीर्ययैव प्रतिस्थलं तीर्थमधत्त देशम् ॥ १०७ ॥ श्रद्धावतासावनुगम्यमानो दूरं पथि प्राणभृतां गणेन । ग्रामादनुग्रामविहाररीत्या सीरोहिकां प्राप मुनिप्रजापः ॥१०८॥ विवन्दिषाऽभ्युद्गतसङ्घलोकः समं निषेव्यैरभिरूपरूपैः । तेजोमहद्भिस्तमसीवं दीपैः प्रावेशि तस्यां वैशिनां वनीपैः ॥ १०९ ॥ तेजोऽग्रिमैास्तवभाविपौरैनिमीयमाणेषु महेषु तत्र । कियाननेहाः सकृपैर्गणीन्द्रद्विपरसंबाधमयाम्बभूवे ॥ ११० ॥ शनैरनीयन्त रयात् पतन्तो देवांहिपद्मे वणिजः प्रणन्तुम् । निजैर्निशायां विविधैरुपायैः प्रबोध्य धामाधिकधर्मलुब्धाः ॥१११ ॥ क्रमादमुष्या मुनिमुख्ययाने रथाः क्षिति हस्तिनखादखेदैः। नीता विना यत्नमपीभ्यरथ्यैस्तथैकवालाकलनादलुब्धैः ॥ ११२॥ प्रत्युद्ययौ श्रीजयमल्लराजः स्पर्धानुधावलसङ्घराजः । सयत्नसूताऽऽयतरश्मिभुग्नग्रीवाश्वभाखद्रथभूषिताध्वा" ॥ ११३ ।। वश्याऽस्य सोमालकरैश्चचालाऽचलानुरागादिव कृष्यमाणा। समं समुद्यद्भिरेनोऽनुबन्धाद् ग्रीवाग्रसंसक्तयुगैस्तुरङ्गैः ॥ ११४ ॥ बलोमिभिस्तत्क्षणहीयमानवनेषु नेषुभ्रंमरा निवासम् । १-तमसीव' सीरोहीनगरस्य पर्वतवनवेष्टितत्वेन तमसः ४-'जयमल-जयमल्लनामा मन्त्री तस्य राजा अथवा तस्य अधिकतेजस्वात् स एव राजा । २ वशिनामधीशैः' इति वा पाठः ५ 'अनो'-अनस् शकटम् । ३ तेजोऽनिमै- तेजः तेजःपालनामा मन्त्री, अग्रिमः ६-'तत्क्षणहीयमान'-तस्मिन् क्षणे उत्सवे, हीयमानेषु गम्य- मुख्यः येषां तैः । वास्तवः तात्त्विकः भावोऽस्ति एषाम् । मानेषु । 15 20 ----- उपमान NRNA 1 मा० स० तृक श्लो०.६६ प्रथमः पादः प्रथमतया। 2 मा० स० तृ: श्लोक ६६ द्वितीयः पादः द्वितीयतया । 3 मा० स० तृ० श्लो०६६ तृतीयः पादः तृतीयतया । 4 मा० स० तृ. श्लो० ६६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया। 5.मा० स० तृ० श्लो०६७ प्रथमः पादः प्रथमतया । 6 मा० स० तु. लो० ६७ द्वितीयः पादः द्वितीयतया । मा० स० तु. ग्लो०६७ तृतीयः पादः तृतीयतया माघे 'तमसेव' इति पाठः । माघटीकाकृता 'तमसि इत्यपि पाठो निरदेखि परन्तु 'तमसा' इत्येव पाठः साधीयान् इति समर्थितम् । 8 मा० स० तृ० श्लो. ६७ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 9 मा० स० तृ० श्लो०६८ प्रथमः पादः प्रथमतया । 10 मा० स.तृ.श्लो०६८ द्वितीयः पादः द्वितीयतया । 11 मा० स० तृ० श्लो० ६८ तृतीयः पादः तृतीयतया । 12 मा. स.तृ. लो०६८ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । .

5 10 [तृतीयः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं चलद्गजास्यस्थलदानपानगोष्ठीषु निष्ठां दधतः पटिष्टाम् ॥ ११५ ॥ मत्तद्विपेन्द्राश्वशताङ्गवृन्दै रथ्या भुजाया वलयैरिवास्याः। देशश्रियो वेषविशेषभूषां तदाऽभ्यपुष्यजयमल्लराजः ॥ ११६ ॥ लताभिराकीर्णसुमानि गृह्णत्युर्वीभृतो नामयति द्विधाऽस्मिन् । प्रायेण निष्कामति चक्रपाणी दिक्चक्रमाक्रान्तमभूत् क्रमेण ॥ ११७ ।। जातैजनाभित्रिदशाङ्गनाभिर्जगत् समादातुमिवोद्यतेऽस्मिन् । प्रायेण निष्कामति चक्रपाणी भिया प्रियाः खे परिरेभिरे द्राक् ॥ ११८ ॥ धराभिसाराय रयाद्धयानां खुरक्षतैर्दीपितमन्मथेव । प्रायेण निष्कामति चक्रपाणी रेणुच्छलाच्छादयति स्म भानुम् ॥ ११९ ॥ सौभाग्यशोभां दधति क्षमायास्तस्मिन्नुदीतारुणचूर्णपुजैः। प्रायेण निष्कामति चक्रपाणी द्यौर्भानुचक्षुस्त्रपया न्यमीलत् ॥ १२० ।। महान् महोऽभूत् स गुरुप्रवेशे प्रत्यालयोत्तम्भितकेतुसेतुः । गतागतैर्यत्र जनस्य तस्यां नेष्टं पुरो द्वारवतीत्वमासीत् ॥ १२१ ।। पुरः स्फुरत्स्वर्णगिरिस्तदानीं जालंधराह्वानभृतः क्षमीन्दोः। क्षितीन्दुतन्त्रैर्युगपत्प्रवेशे नेष्टं पुरो द्वारवतीत्वमासीत् ॥ १२२ ॥ पारेजलं नीरनिधेरपश्यन् दिशामधीशा जयमल्लराजः। सिद्धाङ्गनाभिननु गीयमानं भृशं यशः श्रीगुरुभक्तिगौरम् ॥ १२३ ॥ पारेजलं नीरनिधेरपश्यन् निजाभिषेके हरिवेश्मभूषाम् । सस्मार देवः समयं तमेव सादृश्यमाशास्य पुरः पुरोऽस्याः ॥ १२४ ॥ विभोर्निदेशान्नृपतिः स साक्षाद् मुरारिरानीलपलाशराशीन् । रसालजान् वन्दनकोत्सवैषी प्रसारयामास चतुष्पथेषु" ॥ १२५ ॥ कर्पूरपूर्णZगनाभिचूर्णैः संवास्य पत्रै रचिता अपीह । 15 20 १ 'द्विधा'-राजानः पर्वताश्च । २ 'चक्रपाणौ' चक्र कटकं पाणौ हस्ते यस्य मन्त्रिवाद । चक्रपाणी वासुदेवे लुप्तोपमा । चक्र चक्रलक्षणं रेखारूपं पाणी यस्य-एतेन भाग्यसूचा। ३ 'चक्रपाणौ' चक्रपेषु चक्रवर्तिषु अणुर्लधुः ब्रह्मदत्तः तत्र- लुप्तोपमा । ४ 'द्वारवतीव-द्वारं गोपुरम्-तद्वत्त्वम् , यद्वा द्वारिकावं इष्टं न आसीत् , काकुः अपि तु इष्टमेव-इयं द्वारिका-एवेति भावः । ५ 'द्वारवतील-' एतन्नगरशोभया द्वारवतीलं दिदृक्षणां न इष्टं प्रियम् । ६ 'सिद्धा-सिद्धा देवविशेषाः । ७ 'हरिवेश्म-' "स्तम्बभूर्विष्णुगेहम्" [है. अभि. कां. ४ श्लो. ४५] इति स्तम्भतीर्थ-नाम । 1 मा० स० तु. श्लो० ६९ प्रथमः पादः प्रथमतया । 2 मा० स० तृ० श्लो० ६९ द्वितीयः पादः द्वितीयतया ।माघे 'रथ्याभुजायाः' इति । 3 मा० स० तृ.श्लो० ६९ तृतीयः पादः तृतीयतया । 4 पूर्ववत् । 5 पूर्ववत् । 6 पूर्ववत् । 7 मा० त० स० श्लो० ६९ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 8 पूर्ववत् । 9 मा० तु. स. श्लो० ७० प्रथमः पादः प्रथमतया । 10 पूर्ववत् । 11 मा० तृ० स० श्लोक ७० द्वितीयः पादः द्वितीयतया। माघे 'पलाशराशीः' इति ।

5 10 11 मा० त० स० श्लो. देवानन्दमहाकाव्यम् । [ तृतीयः सर्गः द्रुमावलीरुत्कलिकासहस्रसौरभ्यलोभान्न जहुर्द्विरेफाः ॥ १२६ ॥ समुन्मिलत्सजनदुग्धसिन्धी नितम्बिनीविद्रुमराजिभाजि । रेजुर्मरुञ्चश्चलधूपधूमाः प्रतिक्षणोत्कूलितशैवलाभाः ॥ १२७॥ लक्ष्मीभृतोऽम्भोधितटाधिवासान् प्राच्यानुदीच्यानथ दाक्षिणात्यान् । स्थलाचलेभ्यो वणिजोऽभ्युपेतान् स भोजयामास नियोगिराजः ॥ १२८ ॥ धनानि वर्षन् बहुधा सुधाभुग-द्रुमानसौ नीरदनीलभासः। मन्त्री विजिग्ये फलितांस्तदेते हियेव भूमिं प्रणमन्ति सद्यः ॥ १२९ ॥ निजे निवेश्यासनि सिंहमूरिं शिष्यं गुरौ वन्दनकं ददाने । लतावधूसम्प्रयुजोऽधिवेलं तस्थुर्जनाश्चित्रितभूमहाभाः ॥ १३०॥ अथ प्रभुः स्थापितसिंहसरीन् कांश्चित् तदैवार्पितवाचकाङ्कान् । आशास्य शिष्यानधिकश्रियस्तान् बहकृतान् स्वानिव पश्यति स्म ॥१३१ ।। आश्लिष्टभूमि रसितारमुच्चैर्मन्थाचलनोन्मथितं पयोधिम् । तिरश्चकार ध्वनिधीरताभिस्तदा गुरुर्धर्मकथास्तथाख्यत् ॥ १३२ ॥ सुधासरः श्रीविबुधैर्निषव्यं लोलद्भुजाकारबृहत्तर ः। गुरुखरूपं समवाप्य तापः प्रापद् विनाशं न जनस्य कस्य ? ॥ १३३ ॥ दिक्षया मन्त्रिवदान्यताया धावन्तमन्तर्धनिनं सुदूरात् । फेनायमानं पतिमापगाना-मवारयत् किं कृपणखभावः ? ॥ १३४ ॥ दाने ददानेऽर्थिनमर्थितार्थ-भरेण खिन्नं करकम्पनेन । निषेधयन्तं पथि फेनितास्य-मसावपस्मारिणमाशशङ्के" ॥ १३५ ॥ पीत्वा जलानां निधिनाऽतिगाद्धाद् लसगुणानां गुरुवाक्सुधां ताम् । वृष्टं सुवर्ण जयमल्लराजा पार्श्वेऽभवत् स्वर्णगिरिस्तदङ्कः ॥ १३६ ॥ पूज्यक्रमाम्भोरुहभक्तिभावाद् वृद्धिं गतेऽप्यात्मनि नैव मान्तीः। धियां निधिः प्राप्तमुदस्तदाऽऽविश्वके स्फुरद्रूप्यकभावनाभिः ॥ १३७ ॥ १ 'छमान्-' द्रुमाणां मेधतुल्यताख्यापनेन परोपकारितम् पतयः संगृहीताः। अंतीवधन्यत्वं च । ३ 'करकम्पनेन' पूर्व दत्तदाना याचका गृहं प्रति चलिताः २ 'लतावधू-' लतया कस्तूर्या संस्कृता वधूः लतावधूः-मध्यप- पुनर्दानाय आहूताः 'अस्माकमतः परं धनेन अलम्' इति आशयेन दलोपः । लतावत् वधूभिः संयुक्ताः अधिवेलं मुहूर्तवेलामधिकृत्य करचालनेन निषेधं चक्रुः न पुनर्वाचा-धनेन मुखपूरणात् । जनानां सांकर्यात् दर्शनान्तरायो मा भूत् इति दिदृक्षया स्त्रीभिः ४ 'लसद्गुणा-' लसद्गुणानां जलानां निधिना समुद्रेण । 1 मा० तृ० स० श्लो० ७० तृतीयः पादः तृतीयतया । माघे 7 मा० त० स० श्लो० ७२ प्रथमः पादः प्रथमतया । 'घनावलीरुत्कलिका'-इति । वेङ्कटेश्वरमुद्रिते माघपाठे 'वनावली 8 मा० तृ० स०. श्लो० ७२ द्वितीयः पादः द्वितीयतया । माघे रुत्कलिका--' इति । 'लोलवजाकारबृहत्तरङ्गम्' इति । वेङ्कटेश्वरमुद्रिते माघपाठे 'लोल- 2 मा० तृ० सं० श्लो०७० चतुर्थः पादः चतुर्थतया । द्भुजाकारवृहत्तरजम्' इति । 3 मा. तृ० स० श्लो०७१ प्रथमः पादः प्रथमतया । 9 मा० तृ. स. श्लो. ७२ तृतीयः पादः तृतीयतया । 4 मा० तृ० स० श्लो. ७१.द्वितीयः पादः द्वितीयतया। 10 मा० तृ० स० श्लो. ७२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 5 मा० तु. स. श्लो. ७१ तृतीयः पादः तृतीयतया । 6 मा० तु. स.को ७१ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 12 मा० त० स० श्लो० ७३ द्वितीयः पादः द्वितीयतया। 20 . Su~ Mi/m/VVHANA ...... .

[तृतीयः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं ३५ एवं विभुं पुण्यविभूतिमन्त्रा-ऽनुभूय मध्येमरुदेशमाप्तम् । क्षिप्ता इवेन्दोः सरुचोऽधितीरं शिष्या गुणौघैरभिजग्मुरीशम् ॥ १३८ । तदेव देवाज्जलदातिवृष्ट्या मरुनदीमातृकतां जगाहे । क्षिप्ता इवेन्दोः सरुचोऽधितीरं हंसावलीराकलयन्नतोऽगात् ॥ १३९ ॥ प्रतिस्थलं धन्वनि धन्वभृद्भिर्भूपैः स सम्मान्य कृतप्रवेशः । संवर्द्धितः पौरकनीविमुक्ता मुक्तावलीराकलयाञ्चकार ॥ १४ ॥ साटोपमूर्वीमनिशं नदन्तो धर्मोपदेशेषु मरौ विहृत्य । पवित्रयन्तः कतिचित् समान्ते जग्मुर्गणीन्द्रा गिरिमेद॑पाटम् ॥ १४१॥ आदाय सिन्धोजर्लदा धरित्री यैः प्लावयिष्यन्ति समन्ततोऽमी। तदम्भसा सञ्चयपानभूते व्यालोकयत् ते सरसी वशी सः ॥ १४२ ॥ समीयुषः सङ्घजनस्य यानि स्नानैमिथः सङ्घटनाच्युतानि । तान्येकदेशान्निभृतं पयोधेन्त्यैिव रत्नानि समाश्रयस्ते ॥१४३ ॥ तटेष्वटद्वारणवाजिराजि स्त्रीसौरभेयीजलबिम्बितानि । तान्येकदेशान्निभृतं पयोधेः साम्यं सरस्योः प्रकटं विचक्रुः ॥ १४४ ॥ श्रीमज्जगत्सिहमहीमहेन्द्र-विवन्दिषाभ्यागमने गजेन्द्रान् । सूरिमदैः सिक्तभुवोऽङ्गभाजः सोभांसि मेघान् पिबतो ददर्श ॥ १४५ ॥ उद्धृत्य मेघैस्तत एव तोयमहाय भूमिः परिपूर्यते स्म । सुखादुता स्यात् कथमन्यथाऽस्मिन्-अम्भोधराम्भोनिवहे विहेतुः ॥ १४६ ॥ शास्त्रैदृढीकृत्य दयासमर्थ-मर्थ मुनीन्द्ररिव सम्प्रणीताः। तथा कथास्तस्य नृपस्य वश्यक्रियासु निष्ठाः सहसोपदिष्टाः ॥ १४७ ॥ आनायनिक्षेपनिषेधमत्र सन्धाय सूरेरुपदेशरूपात् । 10 15 20 . १ 'क्षिप्ता इवेन्दोः' गुणौधैः क्षिप्ताः प्रेरिता इव इन्दोः चन्द्र- शाखीयोपाध्यायादेः शिष्याः 'सरुचः' रुचिशाखीयमुनियुक्ताः 'अघितीरम्' समीपम् । अधिकं तीर्यते अनेन अघितीरो गुरुस्तं वा। २ 'हंसाव- द्वितीयकाव्येऽपि हंसावलीः हंसशाखीयमुनीनां श्रेणी: पश्यन् । 'क्षिप्ताः' इत्यादि प्राग्वत् । ३ 'साटोपमू-' साडम्बरं भुवम् । । ४ 'गिरिमेद- गिरिभिः उपलक्षितः मेदपाटदेशः मध्यपद- लोपसमासः । ५ 'कदेशान्' एकदा समकालम् , ईशान् गुरून् सम्मुखागतस्य संघस्य । 'ईशान्' इति [ समीयुषः ] इत्यस्य क्वसुप्रत्ययस्य कर्म । ६ 'निभृतम्' निभृतं निश्चितं यथा स्यात् तथा । निभृतं राशीभवनं वा। ७ 'ते' ते द्वे सरसी कर्मभूते रत्नानि समाश्रयन् ८ 'सरस्योः' पीछोला-उदयसागरयोः तडागयोः । ९ 'इव संप्र-' इवशब्दोऽत्र भिन्नक्रमः-संप्रणीता इव नवाः कृता इव । १० 'आनाय- "आनायो मत्स्यबन्धनम्"। ११-उपदेश-' प्रशस्तोपदेशात् । 1 मा० तृ० स० श्लो० ७३ तृतीयः पादः तृतीयतया । माघे 'स रुचोऽधिवेलम्' इति पृथक् पृथक् । 2 पूर्ववत् । 3 मा० तृ० स० श्लो०७३ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 4 मा० तृ० स० श्लो० ७४ प्रथमः पादः प्रथमतया । 5 मा० तृ० स० श्लो. ७४ द्वितीयः पादः द्वितीयतया। 6 मा० तृ० स० श्लो. ७४ तृतीयः पादः तृतीयतया । 7 पूर्ववत् । 8 मा० तृ० स० श्लो० ७४ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 9 मा. तृ० स० श्लोक ७५ प्रथमः पादः प्रथमतया । माघे 'उद्धृत्य' इति। 10 मा० त० स० श्लो. ७५ द्वितीयः पादः दितीयतया ।

5 10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [तृतीयः सर्गः] आलोकयामास हरिः पतन्तीभत्तया तदंहृयोजनता जगत्याः ॥ १४८॥ व्युत्क्रम्य मासांश्चतुरः पुरेऽस्य गच्छन्तमार्य तमनुव्रजन्तीः। न रक्षितुं ताः क्षितिपः शशाक नदीः स्मृतीर्वेदमिवाम्बुराशिम् ॥ १४९ ॥ विक्रीय दिश्यानि धनान्युरूणि संलब्धलाभा वणिजो द्विधाऽपि । पुरीव चक्रुर्विपिनेऽस्य सेवां क भोगलाभो न हि भाग्यभाजः ॥१५० ॥ स्थित्वा खदेशेऽब्दयुगं शमीन्दुर्दैप्यानसावुत्तमलाभभाजः। चिकीर्षुराहातुमितान् सुराष्ट्रां चचाल नन्तुं विमलाचलेन्द्रम् ॥ १५१ ॥ शत्रुञ्जये श्रीपरमादिदेवं नत्वाऽब्धितीरं प्रभुराप्तवांश्च । तरीषु तत्रत्यमफल्गु भाण्डं निक्षिप्य सङ्घोऽप्यभिजग्मिवांश्च ॥ १५२ ॥ अज्झाहरे श्रीजिनमाश्वसेनि तथोन्नते हीरगुरोः क्रमाब्जे । प्रणम्य तत्रैत्य स बोधिबीजं सांयात्रिकानावपतो ददर्श ॥१५३ ॥ उत्पित्सवोऽन्तर्नदभर्तुरुच्चीपाख्यपुर्याः प्रमदान्निवासाः । गुरोः प्रणामाय सनागरीका रेजुर्विमाना इव केतुपक्षैः ॥ १५४ ॥ लङ्कापुरी किं विजिताऽनयैव गरीयसा निःश्वसितानिलेन । चलोमिमालाप्रतिबिम्बदम्भात् सवेपथुर्नीरधिमध्युवास ॥ १५५ ॥ मुक्ताफलैर्वीचिकरान् वितत्य तत्रेश्वरं वर्धयतः पयोधेः। पयांसि भक्त्या गरुडध्वजस्य तदुत्सवज्ञीप्सुतयोद्विचेलुः ॥ १५६ ॥ पुरः प्रवेशे शमिनामिनस्य प्रसूनवृष्ट्यादिमहं नृदेवाः। चक्रुस्तदैक्ष्योच्छलदूर्मिदम्भाद् ध्वजानिवोचिक्षिपिरे फणीन्द्राः ॥ १५७ ॥ तमागतं वीक्ष्य युगान्तवन्धु-भुजं भुजङ्गप्रभुपूजनीयम् । संस्थाप्य मासांश्चतुरः क्षमीशं ननन्द सङ्घोऽनघभक्तिकृत्यैः ॥ १५८ ॥ ततः क्रमात् सञ्चलितं यतीन्द्रमुत्सङ्गशय्याशंयमम्बुराशिः। उर्मीकरैर्देवकपत्तनस्थं भुजिष्यवद् वीजयति स्म वातैः ॥ १५९ ॥ 15 20 १ 'हरिः' जगत्या भुवः हरिः इन्द्रः-जगत्सिहनामा। २.'ताः'जनताः। ३ 'खदेशे-' खेषाम् आत्मीयानां, खानां ज्ञातीनां वा देशो गूर्जरत्रा तत्र वर्षद्वयम् । ४' आवपतो- सम्यक्तबीजम् आवपतः प्ररोहयतः। ५ '-वीचिकरान्' वीचय एव कराः पाणयः तान् । ६ 'युगान्त-' युगस्य शकटाप्रभागस्य अन्तैधमीर्घतादिगु- गैबन्धुभूतौ भुजौ यस्य सः-तम् । ७ 'मुत्सङ्ग-' मुदा हर्षाणां संगो यत्र तादृक् शय्या-उपाश्रयः तत्र स्थितम् । AAP VAAHmmune.Art 4.MARANAI AAPLA. । 1 मा० त० स० श्लो०.७५ तृतीयः पादः तृतीयतया । 22 मा० तु. स..लो. ७५ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । ३ मा० तृ० स० श्लो. ७६ प्रथमः पादः प्रथमतया । 4 मा० तृ, स० श्लो०.७६ द्वितीयः पादः द्वितीयतया। 5 मा० तृ० स० श्लो० ७६ तृतीयः पादः तृतीयतया । 6 मातृ० स० श्लो० ७६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे -नावपतोऽभ्यनन्दत्' इति । 7 मा० तृ० स० श्लो. ७ प्रथमः पादः प्रथमतया । 8 मा० तृ० स० श्लो० ७७ द्वितीयः पादः द्वितीयतया । 9 मा० तृ० स० श्लो."७७ तृतीयः पादः तृतीयतया । 10 मा० त० स० श्लो० ७७ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 11 मा० तृ० स०.श्लो०.७८ प्रथमः पादः प्रथमतया । 126मा० त० स० श्लो० ७८ द्वितीयः पादः द्वितीयतया ।

७ [ तृतीयः सर्गः] महोपाध्यायधीमेघविजयविरचितं देवागमे देवकपत्तनाख्यमुत्सङ्गशय्याशयमम्वुराशिः। गर्जन्मृदङ्गध्वनिसन्निधानैरनर्तयच्चञ्चलकेतुहस्तम् ॥ १६० ॥ अथाभ्युपेतं बहुवुद्धिधाम्नामुत्सङ्गशय्याशयमम्बुराशिम् । श्रीवीरशब्दाद्विजयं स्वशिष्यं पस्पर्श हस्ताम्बुरुहा शमीशः ॥१६१ ॥ अदूष्यवैदुष्यधरं तमैक्ष्य स्तुवन् कलाभ्यासगुरूं तदीयम् । प्रत्युजगामेव गुरुप्रमोद-मेदखलैस्तुष्टमनास्तदङ्गैः ॥ १६२ । सूरिः सरवानिव तं कलाभिस्तूर्णं प्रपूर्ण समवेक्षमाणः । सोमं प्रकृत्येव समुल्ललास प्रसारितोत्तुङ्गतरङ्गबाहुः ॥१६३ ॥ उत्सङ्गिताम्भःकणिको नभवान् इवर्षिराजोऽप्रतिबन्धचारी। वीरेण तेनान्तिषदाऽनुगम्यः सन्तापमुा द्विविधं जहार ॥ १६४ ॥ प्रभोः स गाम्भीर्यगुणैर्यशखानुदन्वतः खे दलवान् ममार्ज । अहर्निशं सेवनया रजांसि नूनं विनेयो विनयैरनूनः ॥ १६५ ॥ शिष्यः प्रतीरे चरतः स विद्वानुदन्वतः खेदलवान् ममार्ज। सूरेविहारे तपतस्तपांसि बाह्यांस्तथाऽभ्यन्तरगान विधेयः ॥ १६६ ॥ स्थिते गुरौ स्थानवतः प्रसुप्ते सुप्तस्य निर्देशदिशैव मार्गम् । तस्यानुवेलं व्रजतोऽतिवेलं तपस्यतः श्रीर्ववृधे मुमुक्षोः ॥१६७ ॥ अहर्निशं बोधधरस्य वैया-वृत्त्यादिकृत्येषु निदेशवृत्तेः। तस्यानुवेलं व्रजतोऽतिवेल-मीर्यासमित्यासं यशःप्रकाशः ॥ १६८ ॥ प्रतिस्थलं मण्डलतीर्थभावं समर्थयन्तं जलधेः समीरः। सुखः सिषेवे श्रमणाधिपं तम्-एलावनास्फालनलब्धगन्धः ॥ १६९ ॥ 10 15 20 .. the १'-मुत्सङ्ग-' उत्सङ्गः कोडः स एव शय्या तत्र स्थितम् । २'-धान्नामुत्सङ्ग'-बुद्धिधाम्नां समुद्रम् । उत्सङ्गे शयौ करौ उत्सङ्गशयौ, तो यस्य स्तः तद् उत्सङ्गशयि जिनबिम्बम्-तत्र आशयो यस्य सः तम्-जिनबिम्बध्यायिनम् । ३ 'ख दल-'खे धने दरवान् सभयः-गतधनस्पृहः । यद्वा खे ज्ञातौ दलवान् बहुज्ञातिः इत्यर्थः । ४ 'रजांसि पापलक्षणानि । ५ विधेयः' "विधेयो विनयस्थः स्यात्" इति हैमः। अभि. कां. ३ श्लो० ९६] ६ '-अनुवेलम्' ईर्यासमित्या व्रजतः । ७-'अतिवेल'-अतिबेरं शरीराविक्रमेण तपस्यन्तम् । “बेरं शरीरम्" कोषे । [है. अने० सं० कां० २ श्लो० ४४८] ८ व्रजतः तस्य आतिवेलं समुद्रवेलातिक्रमेण तथा यश:- प्रकाशः आस दिदीपे “अस गति-दीप्ति-आदानेषु" धातुः । ९ 'सुखः' सुखयति इति सुखः । “पचायच्"। - ....... -MA 1 पूर्ववत् । 2 पूर्ववत् । केवलम्-माघे '-राशिः' इति । 3 मा० तृ० स० श्लो. ७८ तृतीयः पादः तृतीयतया । 4 मा० तृ० स० श्लो० ७८ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 5 मा० तृ० स० श्लो. ७९ प्रथमः पादः प्रथमतया । माघे '-कणको' इति । 6मा० तृ० स० श्लो० ७९ द्वितीयः पादः द्वितीयतया । माघे 'खेदलवान्' इति समस्तम् । 7 पूर्ववत् । 'खेदलवान्' इति माघवत् । 8 मा० तृ० स० श्लो० ७९ तृतीयः पादः तृतीयतया । माघे 'व्रजतोऽधिवेलम्' इति । 9 पूर्ववत् । 10 मा० तृ० स० श्लो० ७९ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'एलालतास्फा-' इति ।

३ 5 10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [तृतीयः सर्गः] उत्तालतालीवनसम्प्रवृत्त-निर्यासपानानृपतीनिषिध्य । अन्वीयमानः सबलं गुरुस्तैर-जनप्रबोधाय भुवि व्यहार्षीत् ॥ १७० ॥ अन्धेरहम्पूर्विकया तरङ्गाः समीरसीमन्तितकेतकीकाः । नन्तुं प्रवृत्ता इव तीरदेशे प्रेम्णा व्यलोक्यन्त यतिक्षितीशैः ।। १७१ ।। उत्सारितैरुच्चतरस्तरार्मुक्तामणीदेवमणीचकौघैः। आसेदिरे लावणसैन्धवीनां प्रसादनानां विधयस्तदैभिः ॥ १७२ ॥ वीरस्य तस्य प्रशमानुकम्पा-वबोधभत्त्यादिगुणान् निशम्य । खर्जन्मतोऽस्योजंगिरे विडोजश्-चमूचरैः कच्छभुवां प्रदेशाः ॥ १७३ ॥ सङ्कानुगच्छद्धन तूर्यनाद-स्पोद्धतध्वानवतः पयोधेः । सरित्प्रसङ्गैः सुभगा निगूढाश-चमूचरैः कच्छ वां प्रदेशाः ॥ १७४ ।। लवङ्गमालाकलितावतंसाः श्रीसूरिराजानुगसङ्घलोकाः । तीर्थेषु यात्रार्चनदानकृत्यैर-बभुर्घनस्थ प्रतिमलरूपाः ॥ १७५ ॥ सुधा इवान्धर्वसुधावतीर्णास्त नालिकेरान्तरपः पिबन्तः। श्रीदेवसूरेरनुयायिभावाद् नरा धुसद्मान इव व्यराजन् ॥ १७६ ॥ मुक्तावलीभूषितकण्ठदेशा लजाप्रसूनैर्धतकर्णपूराः । आवादिताऽऽक्रमुकाः समुद्रात् प्रियौचितीः प्रापुरनङ्गवत्यः ॥ १७७ ॥ विहृत्य सिन्धोः सविधे तदेवं गन्तुं प्रवृत्ता गिरिदुंर्गमीशाः । श्रुत्वान्तरे सङ्घजनस्य तस्मादभ्यागतस्य प्रतिपत्तिमापुः ॥ १७८ ॥ तुरगशताकुलस्य परितः परमेकतुरङ्गजन्मनः परिविदितागमस्य सततं रहितस्य सदा शुभागमैः । 16 20 RIPAawanlaba. १-निर्यास-' -रस- २-एभिः' गुरुभिः सेवाप्रकारा आसेदिरे प्राप्ताः । ३ 'वीरस्य तस्य जन्मतः । ४ 'खर खरें। ५'-उज्जगिरे' गीताः बिडोजश्चमूचरैः देवैः । 'कच्छभुवाम्' कच्छनान्नो देशस्य भूमीनां प्रदेशाः । ७'कच्छभुवां' वनभूमीनाम् । ८ '-घनस्य प्रति-' घनाघनः श्यामः तद्वत् लवजावतंसैः तेऽपि लोकाः श्यामतया प्रतिमल्ला । ९ 'लज्जा' लाजमर्यादा नाम वनस्पतिविशेषः समुद्रतीरे एव भवति । १० 'गिरिदुर्ग-' गिरिदुर्ग गिरिनारायणनामतीर्थम् गिरिनार इति भाषा। ११ 'शुभागमैः' शुभाः प्रशस्ताः अगमा वृक्षाः तैः । 1 मा० तृ० स० लो० ८० प्रथमः पादः प्रथमतया । 22 मा० त० स० श्लो०८० द्वितीयः पादः द्वितीयतया । मा० तृ० स० श्लो. ८० तृतीयः पादः तृतीयतया । 4 मा० तृ० स० श्लो० ८० चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 5 पूर्ववत् । 6मा० तृ० स० श्लो० ८१. प्रथमः पादः प्रथमतया । 7 मा० त० स० श्लो० ८१ द्वितीयः पादः द्वितीयतया । माघे 'नारिकेला-' इति । 8 मा० तृस० श्लो. ८१ तृतीयः पादः तृतीयतया । 9 मा० तृ० स० श्लो. ८१ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'प्रतिपत्तिमीयुः' इति मेदः।.

[चतुर्थः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं बहुकमलाकरैन्द्रकलितस्य जनस्य गुरुप्रभावतशू- चिरविगतश्रियो जलनिधेश्च तदाऽभवदन्तरं महत् ॥ १७९॥ ॥ इति श्रीदेवानन्दमहाकाव्ये दिव्यप्रभापरनाम्नि ऐकाराङ्के माघसमस्यार्थे श्रीतपागच्छीयमहोपा- ध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते युवराजस्थापन-मरुधर-मेदपाट-सुराष्ट्राविहारवर्णनानानापाद- समस्याङ्कितस्तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥ 5 10 चतुर्थः सर्गः। ॥ श्रीशङ्केश्वरपार्श्वनाथाय एँ नमः ॥ अथ प्रभातप्रभया विभिन्नं निशस्तमिस्रं ग्रहकान्तिमिश्रम् । प्राप्याश्रितं दुर्गमिवोग्ररत्नम् असौ गिरि रेवतकं ददर्श ॥१॥ शृङ्रभः सुभगं निजाङ्क-व्यालीनपीनदुलतावलीनाम् । मा घर्मबाधास्त्विति सूर्यरश्मीन् पुनः पुना रोडुमिवोन्नमद्भिः ॥२॥ सेवे शिवाभूर्भुवि तीर्णकामो वितीर्णकामो भगवान् सदा यम् । कृतालये कोमलताभिरामं लताभिरामन्त्रितषट्पदाभिः ॥३॥ श्रीनेमिनाथं जिनमानिनंसुर् न मानिनं सुस्थरुचिः स शैलम् । तमुद्ययौ सङ्कुलताभिरामं लताभिरामश्रितषट्पदाभिः ॥४॥ [पाठान्तरम् ] सहस्रसङ्ख्यैर्मनुजैः स सत्रा-ऽधिरुह्य नेमीश्वरमस्य शृङ्गे। ननाम वक्त्रांशुजितेषराका-निशाकरं साधुहिरण्यगर्भम् ॥५॥ स्पृष्टस्फुटस्फाटिकचैत्यमेष तुष्टाव तं नेमिनमञ्जनाभम् । कैलासवेश्मानमिभाजिनेन विभक्तभस्मानमिव स्मरारिम् ॥ ६॥ ददर्श देवं महितुं गतानां विद्याधराणां महितुगतानाम् । 15 : 20 १-'कमलाकरै-' कमलाकरा वणिजः । -ऐन्द्र-' ऐन्द्रम् इन्द्रसमूहः, यद्वा इन्द्रः खामी भगवान् स एव इति खार्थे अणि ऐन्द्रः तेन सहितस्य । २-प्रभावत-' गुरुणा प्रभावान् गुरुप्रभावान् तस्य । ३ 'तीर्णकामो' तीर्णः मुक्तः कामः सरः येन । पक्षे दत्ता- भिलाषः । ४ 'कृतालये' लताभिः कृताश्रये । ५'-आमन्त्रितषट्पदाभिः' आमन्त्रितम् अभ्यस्तम् , षट्पदं नाम भ्रमरविलसितं रतं यासु ताः-ताभिः । यद्वा षट्पदे छन्दो- विशेषे आमन्त्रिताः स्तुताः ताभिः । आहितान्यादिवत् परनिपातः । ६ 'साधुहिरण्य-' साधूनां धातारम् शिवमार्गविधेर्विधानात् । 'महितुगतानाम्' स गुरुः, विद्याधराणां राजिं ददर्श । ७ 1 मा० तृ० स० श्लो० ८२ प्रथमः पादः प्रथमतया, चतुर्थः पादः चतुर्थतया। 2 मा० च० स० श्लो. १ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'रैवतकम्' इति । 3 मा० च० स० श्लो. २ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'पुनः पुना' इति । 4 मा० च० स० श्लो. ३ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 5 मा० च० स० श्लो० ३ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 6 मा० च० स० श्लो० ४ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'साधु' इति पृथक् पदम् । इषराका-आश्विनपूर्णिमा शारदी पूर्णिमा ।। 7मा० च० स० श्लो०५चतर्थः पादः चतर्थतया -- 5 10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [चतुर्थः सर्गः ] स राजिमुत्पिञ्जलजातपत्रैर्विहङ्गमानां जलजातपत्रैः ॥७॥ सरोजिनीपत्रलवाऽऽदरेण दृष्टोज्झिता चित्रलवा दरेण । राजी सशोभाऽजलजा-ऽऽतपत्रैर्विहङ्गमानां जलजा-तपत्रैः ॥ ८॥ शिरःस्फुरत्केतुसुधाशिसिन्धून कपोतपोतस्थितिनीलकण्ठान् । गिरिं जगाहे स गुरुर्विहारान् रुद्राननन्तानिव धारयन्तम् ॥९॥ तद्यावयाऽऽत्मानमसौ पवित्रम् आधाय तस्माद् विजहार सूरिः । यामस्य पश्यन् विषयप्रधानं शुचीरपः शैवलिनीर्दधानम् ॥ १० ॥ रामांभिरामाभिकदर्शनीयं वत्सादिवत् सादिजनैरनूनम् । शस्याँनि शस्यानि च दुष्करात-रक्षोभिरक्षोभितमुद्ब्रहन्तम् ॥ ११ ॥ लाभादिलाऽभादिह रत्नमुक्ता-राज्या सुराज्याऽऽशु तमाप येन । देवो नृदेवोऽनृतनु विनोदं रक्षोभिरक्षोभितमुद्वहन्तम् ॥ १२ ॥ तद्राजधान्यां नगरे नवीने तस्थौ गुरुयंत्र विहारपतेः । भवन्ति नैव स्तुवतां जनानाम् उच्छ्रायसौदर्यगुणा मृषोद्याः ॥ १३ ॥ क्रमाद् गणिवीर इह प्रभूणां दृष्टया गुणोधैर्ववृधे तथालम् । यथा स्युरस्याग्रभुवां मुनीनाम्-उच्छायसौन्दर्यगुणा मृषोद्याः ॥ १४ ॥ तस्याः पुरश्चारुपयोधिवेला-दुकूलभाजस्तुलना कथं स्यात् । एकापणादेव समेत्य यस्यां जग्राह रत्नान्यमितानि लोकः ॥ १५ ॥ कान्ताननेभ्योऽन्यपदे सरस्यों-ऽऽरमजनानां चिरमजनानाम् । १ महि उत्सववत् तुझं तानं गीतलयो यस्याः ताम् । किम्भू ५ 'रामा-' नार्यः । अभिरामा अभिकाः कामुकाः तैर्दर्शनीयम् । तानाम् ? विहंगैः पक्षिभिः मा उपमानं येषां ते-तेषाम् । महितुं ६ 'वत्सा दिवत्' वत्सादिदेशवत् अश्वारोहैः पूर्णम् । पूजितुम् , जलजातानि कमलानि तेषां पत्रैः । किम्भूतैः पद्मपत्रैः? ७ 'शस्यानि' धान्यानि फलानि वा-उद्वहन्तम्-वाणि । उत्-अतिशयेन पिञ्जराणि पिङ्गानि नवानि पत्राणि येपु तैः पत्रैः । ८ 'दुष्किरात-' भिल्लरूपराक्षसै अक्षोभितम् । २ 'तपत्रैः' तपं तपगणं त्रायन्ते तपत्रा गुरवः तैः पक्षिणां ९ 'देवो नृदे-' देवः नाना नृरूपेण देवः आशु तं देशम् , श्रेणी दृष्टा । किंभूता ? पद्मिनीपत्रखण्डस्य आदरेण चित्ररवा येन कारणेन तं देशम् आप तेन रत्नमुकाराज्या लाभात् इला भूः नानारुता, दरेण भयेन उज्झिता । किंभूता ? आतपत्रैः छत्ररूपैः अभात् । किंभूता? सुराज्या । किंभूतो देवः? अनृतनुत् पद्मपत्रैः सशोभा सश्रीका। किंभूता? जलजा अजलजा स्थलजा १० 'रक्षोभि-' रक्षोभिः पिशाचदेवैः छलग्रहादिना अक्षोभितम्- ३. यामस्य यामनाना राजा तस्य । अनुपद्रुतम् । ४ 'शुचीरमः' शुचीः अपः पवित्राणि जलानि तद्रूपाः शैव ११ 'मृषो-' असत्याः। लिनीः नदी:-शेवालवतीर्वा । यद्वा 'सुचीरपः' सुषु चीरं श्वेतं १२ 'आरमज-' आ समन्तात् रमजनानाम् , चिरमज्जनानि पाति यः सुचीरपः। नानानि तेषां योग्ये सरसि । 15 असत्यवारकः। राजी। -- 1 मा. च०स० श्लो०६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 2 मा० च० स० श्लो. ६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । मा० च० स० श्लोश चतुर्थी पादः चतुर्थतया । माघे कदाननेकानिव' इति मेदः। 4 मा० च० स० श्लो० ८ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 5 मा. सु.लो. चतुर्थः पादः चतुर्थवया । 6 मा० च० स० श्लो. ९ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 7 मा० च० स० श्लो० १० चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'उच्छ्रायसौन्दर्य-' इति पाठः। 8 मा० च० स० श्लो. १० चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'उच्छ्राय' इति । 9 मा०च० स० श्लो० ११ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । .

5 [चतुर्थः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं योग्येऽत्र भृङ्गी रमते विमुक्त-रसाऽऽनमत्तामरसा न मत्ता ॥१६॥ मुक्ताशया प्रावृषि कश्मलेऽपि नदीप्रवाहे घनदीप्रवाहे । हंसा जहत्यत्र जलाश्रयाणां रैसा नमत्तामरसा न मत्ताः ॥१७॥ यस्यां जगत्प्राणकनाणकार्थम्-उदृकशालासु जलाध्वनाऽऽप्तः । भूभर्तुरुद्भासितमूर्तकीर्तेर्-लीलां दधौ राजतगण्डशैलः ॥ १८ ॥ ततश्चतुर्मासकपारणायां श्रीसिद्धशैलं शमिनामधेशाः। श्राद्धैः समृद्धैः सह सङ्घसार्थम्-आनिन्यिरे वंशकरीरनीलैः ॥ १९॥ निषेवते यत्र जिनेषु मुख्यं सभा सुराणां रसभासुराणाम् । नादृष्ट-दृष्टादिरिहाप्यते तत् विपन्नगानामविपन्नगानाम् ॥ २० ॥ छायां ध्रुवां यत्र करोति सान्द्रा रसालराजिः सुरसॉलराजि । क्लिश्नाति नारी न तदातपस्य विपन्नगानामविपन्नेगानाम् ॥ २१ ॥ [पाठान्तरम् ] अथाद्विसन्धेः स्फुटिकानुबन्धे रेजेऽधिकं सङ्घनिवेशबिम्बम् । पात्रे गुणाढ्ये प्रकृतेर्यदाहुः सङ्क्रान्तिमाक्रान्तिगुणातिरेकाम् ॥ २२ ॥ दृष्टोऽपि शैलः स मुहुर्मुनीन्दोरपूर्ववद् विस्मयमाततान । क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः ॥ २३ ॥ अत्यायतं तं सहसाधिरोहुँ मत्या येतं दुश्चरितान्नितान्तम् । उत्कं धरं कश्चिदुपेत्य सूरिम्-उत्कन्धरं दारुक इत्युवाच ॥ २४ ॥ 10 15 १ 'भृङ्गी' नारीमुखेभ्यः अन्यत्र भृङ्गी न रमते । किंभूता मृङ्गी ? विमुक्तानि रसेन आनमन्ति तामरसानि यया सा । मत्ता पुष्टा। २ 'नदीप्रवाहे' मौक्तिकलोमेन हंसा जलाश्रयाणां भूमीन जहति । नदीश्रोतसि, घनेन मेघेन दीप्तो वाहो वहनं यत्र तस्मिन् । किंभूता हंसाः ? मत्ताः पुष्टाः । ३ 'रसा-' भूमीः । नमन्ति तामरसानि यासु ताः । ४ - नाणकार्थ- अर्थेन नित्यसमासः। ५'संघ- संघोऽत्र चतुर्वर्णः तीर्थरूपः साधु-साध्वी-श्रावक- श्राविका-समुदायस्सार्थः तत्प्रसङ्गी अन्यलोकवर्गः । ६ 'वंशकरीर- वंशः अन्वयः स एव करीरः कुम्भः तत्र नीलेः नीलरत्नतुल्यैः। ७ 'नादृष्ट-'अदृष्टं वयादि । दृष्टं स्व-परचक्रजं भयंन आप्यते। किंभूतं भयम् ? नगानां विपत्-तरूणां पर्वतानाम् आपत् । अविपदः अदोषाः ससंपदो वा नगा द्वमा येषु तेषाम् । ९ 'रसाल- आम्रपतिः । १० 'सुरसाल-' सुरसालेन देवतरुणा राजते यः स सुरसालराट् तत्र पर्वते। ११ 'नारीम्' नगानां शैलानाम् आतपस्य विपत् नारी न क्लिश्नाति । १२ -अविपन्नगानाम्' अविपन्नं पूर्ण गानं यस्यास्ताम् । १३ 'अत्यायतम्' अतिदीर्घ धिया मत्या । १४ 'यतम्' यतं दुश्चरिताद् उपरतम् । १५ 'दारुक-'दारूणि के मस्तके यस्य सभारवाही संघसारथिर्वा । 1 मा० च० स० श्लो० १२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 2 मा० च० स० श्लो० १२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'मत्ता। 3 मा० च० स० श्लो० १३ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 4 मा० च० स० श्लो. १४ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 5 मा० च० स० श्लो. १५ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 6 पूर्ववत् । 7 मा. च. स. श्लो. १६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया। माघे 'संक्रान्तिमाकान्त-' इति । 8 मा० च० स० श्लो. १७ संपूर्णोऽयं श्लोकोऽत्र । केवलम्- 'मुनीन्दोः स्थाने माघे 'मुरारेः' इति पाठः ।। 9 मा० च० स० श्लो. १८ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । अन्य- दपि साम्यं वर्तते।

४२ 5 देवानन्दमहाकाव्यम् । [चतुर्थः सर्गः] रत्नांशुभिर्गगनरत्नरुचा सपना चित्रयन्तमवनीं च जलैः पवित्रः। चूडामणीयितजिनप्रथमांहिमेनम्-उद्वीक्ष्य को न भुवि विस्मयते नगेशम् ।।२५।। सुरधनुषि तते तपात्ययावुभयतटस्फुटकाञ्चनोपलोऽसौ । कलयति शिखरी विलम्बिघण्टाद्वयपरिवारितवारणेन्द्रलीलाम् ॥ २६ ॥ [ पुष्पिताग्रा ] गिरिरयं वियताऽधित सङ्गतिं सहरितालसमाननवांशुकः । वसुतटीः श्रयतेऽत्र सुरो नटन् सहरिता लसमाननवांशुकः ॥ २७ ।। निजगिराशिषमाह तवा मत्-सहरितार ! समान ! नवां शुकः। तदनु राजगणः कुरुते नर्ति सहरितारसमाननवांशुकः ॥२८॥ [ द्रुतविलम्बितम् ] एवं गिरौ निवसतः स गिरोऽस्य शृण्वन्-आरुह्य शैलमभिनम्य युगादिदेवम् । दभ्रे पुरोनिहितवीरमुनिः समत्वम्-उत्सङ्गसङ्गिहरिणस्य मृगाङ्कमूर्तेः ॥ २९ ॥ सङ्घस्य तेन चरता धुरि दारुकेण खाम्यादिदेश पथि दर्शितभूरिचैत्यः । उद्धारलाभमिह तीर्थकृतो गृहस्य मुत्सङ्गसनिहरिणस्य मृगाङ्कमूर्तेः ॥ ३०॥ देवादेशाल्लक्ष्मणैस्तैः सरीमैर्जीर्णोद्धारा निर्मितास्तद्विहाराः। चक्रुश्चञ्चत्केतुभिः प्रान्तरातवर्लोकस्त्रीगात्रनिर्वाणमत्र' ॥ ३१ ॥ प्रथमेशितुर्विहितपूजना दीपैनैस्तदयुः पदं गृहमणेर्जना दीपनैः । दृषदोऽपि यत्र धनगूढचामीकराः सवितुः कचित् कपिशयन्ति चामी कराः ॥३२॥ 10 15 १'-गगनरन-' -सूर्य-। २ 'सहरिताल-' सहरिता दिक्सहितेन । 'अल-समान-' अल- अलम्-हरितालम् तेन तुल्यनवकिरणः । ३ 'वसुतटीः सहरिताः' खर्णतटी: सहरिताः सनीलतृणाः । किम्भूतः सुरः? लसमाननवांशुक:-दीप्रनव्यवसनः । ४ 'तवानमत्-'. हे आनमत्सचन्द्रनक्षत्र ! । सम्रान !-ज्ञानस- हित ! । शुकः निजगिरा नवां तव आह वक्ति । ५ 'सहरितार- ससुवर्ण-रूप्यतुल्यनववसनः । ६ 'मुत्सङ्ग-' मुदां संगा यस्माद् यस्य वा ईदृक् संगी सेवकः । मृमः अश्वश्चिहं यस्याम्-ईशी मूर्तिर्यस्य-शान्तितीर्थकृतः । wimminwww.ram 1माच० सश्लोक, १९ चतुर्थं पादः चतुर्थतया । माघे 'को भुवि न' इति । 2 मा० च: सलो. २० उत्तरार्धम् । माघे 'वहति गिरि- रयं विलम्बि- इति शब्द-भेदः .अर्थमेदो न विद्यते । 8 मा० च: सलो. २१ द्वितीय-चतुर्थपादौ द्वितीय- चतुर्थपादत्वेन । ७'-लक्ष्मणैः-' इभ्यैः। ८ 'सरामै सस्त्रीकैः । ९ 'प्रान्त- “प्रान्तरम्-दूरशून्योऽध्वा" [है. अभि० कां. ४ ग्लो० ५१] १० 'दीपनै-कश्मीरजद्रव्यैः । ११ -चामीकराः' यत्र पदे स्थाने दृषदोऽपि धनं बहु, गुप्त खणे यासु ता:-तादृशः-सन्ति । १२ 'कपिशयन्ति' तथा यत्र सूर्यस्य अमी कराः कपिशयन्ति वानरहस्तवद् भान्ति-मन्दप्रकाशा भवन्ति-इत्यर्थः । Sarrian .. 4 मा. च० स० श्लो. २१ द्वितीय-चतुर्थपादौ द्वितीय- चतुर्थपादत्वेन । 5 मा० च० स० ग्लो. २२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 6 मा० च० स० श्लो० २२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 7 मा० च० स० श्लो० २३ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 8 मा० च. स. श्लो० २४ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । .

४ [चतुर्थः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं ददृशुः पदं तदिह सारसं गोचिंतं सुदृशः प्रियैः सपदि सारसङ्गोचितम् । सरितोऽपि यत्र जलगूढचामीकराः सवितुः कचित् कॅपिशयन्ति चामी कराः॥३३॥ तीर्थादथ प्रचलितः प्रभुराप तीर्थ-द्रङ्गं स तुङ्गगृहशृङ्गगणैरुदीतम् । यत्राम्वुयन्त्रविगलज्जलरूपमधेर्विष्वक् तटेषु पतति स्फुटमन्तरिक्षम् ॥ ३४ ॥ सौधानां स्फुटिकघटास्फुटाइमगर्भसन्दर्भवहति ततिः सपद्मरागैः । सङ्गोत्यां विधिदुहितुः कलिन्दजाया वैदग्धीमिह सरितः सुरापंगायाः ॥ ३५ ।। पुरे दैवात् त्वमुपात्तदेहाऽसमानवप्रे मणिसा नुरागी। जाताः प्रजास्तत् त्वयि देव ! कामं सैमा नवप्रेमणि सानुरागाः ३६॥ इत्थं स मार्गणगणैरभिनयमानः प्रापाश्रमं दधतमुज्वलभित्तिभागे। हेमाम्बुजैर्भसितभासितनोः पुरारेरुदह्रिलोचनललामललाटलीलाम् ॥ ३७॥ स्थितवति च गुरुस्थिताविहेशेऽभ्युदयदशाऽजनि सा जनस्य यस्याम् । गृहततिरतिमोदचित्रितोद्यत्-परिणतदिक्करिकास्तटीबिभर्ति ॥ ३८ ॥ स्थाने स्थाने तरुणनृणां सङ्गीतैर्गीतैः स्त्रीणां मुदितजने । सद्रङ्गे द्रङ्गे रेजुः सरसफलाः शालीनां लीनां श्रेणीमिह तरवो बिभ्राणाः ॥ ३९ ॥ वृष्टेऽम्भोदे सुरभिधने सापीने पीने क्षेत्रे बहललतानालोके । लोके रेजुः सजलसरस्यालीनों लीनां श्रेणीमिह तरवो विभ्राणाः ॥४०॥ भाखत्सुपर्वविलसज्जननन्दनेन नित्यं सुवर्णवरगोत्रभृता पुरेण । जिग्ये तदा श्रमणराजि विदेहवर्षमेतेन भारतमिलावृतवद् विभाति ॥४१॥ रुचिरचित्रतनूरुहशालिभिर्दिनकरैरिव रश्मिधरैरिह । सशरदं जलदतुमतीय तैर्जनपदेऽतिजगे जगदर्चितैः ॥४२॥ 10 15 -- 20 १ 'सारसम्' सरस इदं सारसम् । २ 'गोचितम्' गोभिर्जलैः चितं पुष्टम् । ३ 'सारसङ्गो-' प्रियैः सारः श्रेष्ठो यः संगः तस्य उचितम् । ४ 'कपिशयन्ति' यत्र सरितः नद्यः सूर्यस्य कराः कपिशिताः कुर्वते-नदी: पिङ्गलास्तन्वन्ति सूरांशवः । ५ 'विधि-' सरखत्याः। ६ 'कलि-' यमुनाया। ७ 'सुराप-' गङ्गायाः। 'पुरे' "पुरेऽत्र दैवात् बकमङ्गयुक्त्याऽ-" इति पाठान्तरे मूर्तिमत् मणिसानुः रत्नशृङ्गम् आगाः । “सानुः पुनपुंसके। ९ -समान-' किंभूते पुरे ? असमानव अतुल्यप्राकारे । १० 'मणिसा' उपात्तदेहा मूर्तिमती वं मणिसा-रनलक्ष्मीः ११'नुरागाः' नुः मनुष्यस्य, अत्र पुरे आगाः आगतः। १२ 'समा'सकलाः। १३'-भसित-'मं नक्षत्रम् तद्वत् सितस्य । १४ 'सापीने-' आपीनम् ऊधः तेन सहिते। १५'-आलीनां' सखीनां श्रेणिम् लीनाम्-आश्रिताम् बिभ्राणाः पोषयन्तः। १६ 'श्रमण-' श्रमणराजि विभाति सति-भासमाने सति । १७ 'भारत-' भारतं विदेहवर्ष जिग्ये । किंभूतं भारतम् ? इलया आकृतवत्-भुवा परिक्तवत् । "क्तवतु" प्रत्ययः । 1 पूर्ववत् । 2 मा०.च० स० श्लो० २५ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'स्फुटमन्तरीक्षम्। 3मा० च० स० श्लो० २६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 4 मा. च० स० श्लो० २७ द्वितीय-चतुर्थपादौ समस्यात्वेन । 5 मा० च० स० श्लो० २८ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 6 मा० च० स० श्लो. २९ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 7 मा० च० स० लो० ३० चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'लीनामालीमिह' इति भेदः। 8 पूर्ववत् 9 मा. च. स. श्लो० ३१ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 10 मा० च० स० श्लो०३२ प्रथमः पादः प्रथमतया। " - देवानन्दमहाकाव्यम् । [चतुर्थः सर्गः] जिगमिषुर्मुनिराडथ दक्षिणां दिशमसौ शमसौहृदभृजनैः। अनुययेऽश्वरथेन पुरःसृताववयवैरिव जङ्गमतां गतः ॥४३॥ कुशेशयैर्यत्र जलाशयोषिता मुदा रमन्ते कलंभा विकखरैः । ययौ तमध्वानमयं सुयोषितामुदारमन्ते कलभाविकखरैः ॥ ४४ ॥ चमूषु येषां कनकैः समन्विता मुदा रमन्ते कलभाः विकखरैः। नृपास्तमिभ्यैः पथि गीतमन्विता मुदा रमं ते कलभाविकवरैः ॥ ४५ ॥ श्रीसूरतौ नृपतिसमनि वार्द्धिपक्षादे विभुं जयरमा परमाभिवत्रे । तल्लक्ष्म साम्प्रतमपि बतिराजयोऽत्र स्थानं परैरपरिभूतममूर्भजन्ते ॥ ४६ ।। जयश्रिया भूषितमत्र देवं विनिद्रनेत्रैः प्रविलोकयन्त्यः । बभुः स्त्रियः स्मेरमणीचकैर्वा मधुव्रतवातवृतैर्ऋतत्यः ॥४७॥ पुरि तोषमत्र परमापुरितो जनतास्त्रिसन्ध्यमुनिराजनताः। सरसत्वमेव यदियात् सरसः पवनश्च धूतनवनीपवनः ॥ ४८ ॥ दिवसा व्यतीयुरचिरादिव सा सुषमाऽऽस यामिह दधौ सुषमा । नितरां च तां नु जनयनितरां पवनश्च धूतनवनीपवनः ॥ ४९ ॥ विद्वद्भिरागमपरैर्विवृतं कथश्चिद् ग्रन्थं शशास भगवान् कुमतव्यपोहम् । सम्यग्गणर्षभजनस्तमधीत्य मैत्या गूढार्थमेष निधिमत्र गणं बिभर्ति ॥५०॥ सूरीशे प्रचलति दक्षिणां जनौधैः सङ्कीर्णे पथि पदवन्दनाय निन्ये । प्राणेशः कथमपि पाणिना निजस्त्रीमुत्तुङ्गस्तनभर(भङ्ग?)भीरुमध्याम् ॥५१॥ पथे जिहानः स विभुर्ददर्श वनं तताऽनेकतमालतालम् । 10 15 १ 'कलभा-'कलभाः, करभा वा २-उदारमन्ते' अन्ते समीपे, उदारम् अध्वानं ययौ ३ 'कलभावि- कलाः मधुराः, भविकाजाता भाविका मजल- शब्दाः तेषां खरैः। ४ 'पथि गीत-'ते नृपाः तं गुरुम् अन्विताः । किंभूतं गुरुम् ? इभ्यैः पथि मार्गे गीतं वर्णितम् । ५ 'मुदा रम' हर्षेण, रमं मनोज्ञम्-जारीमालगीतरम्यम् । ६ 'कल-कल: भावो येषु अस्ति ते कलभाविनः खार्थे के कलभाविकाः तादृक्खरैः। ७. अमू-वतिराजयः-मुनिश्रेणयः । ८'-वा' इवार्थे । ९ '-राजनताः अत्र पुरि जनताः परं तोषम् आपुः । किंभूताः जनताः ? त्रिकालं सूरिं नताः । १० अत्र अन्योक्तिः-यत्र सरसः पवन इयात् तत्र सरसबमेव भवेत् । ११ "सुषमा नु वितर्के इतरां नवीनाम् सुषमा जनयन् । यो सुषमां शोभा सुषमा प्रथमारकः दधौ सा सुषमा आस । १२ 'मत्याः' मत्याः निधानम् गूढार्थ बिभर्ति पुष्णाति । १३ “पथे' 'पथ' शब्दः अकारान्तः बृहद्वृत्तौ [ सिद्धहेमचन्द्राख्य- शब्दानुशासनस्य ] तद्धिते । : 1 मा० च० स० श्लो० ३२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 2 मा. च० सं० श्लो. ३३ तृतीयपादं विना सर्व समानम् । 3 मा. च०स० श्लो० ३३ द्वितीय-चतुर्थपादौ समस्यात्वेन । 4 मा० च० स० श्लो० ३४ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'स्थान परैरनभिभूतममूर्वहन्ति इति भेदः । वहन्ति' स्थाने 'भजन्ति' इत्यपि माघपाठः । वाद्धिपक्षः सागरगच्छानुयायिभिः मुनिभिः । वार्षिः-सागरः। 5 मा० च० स० ग्लो० ३५ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 6 मा० च० स० श्लो० ३६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 7 पूर्ववत् । आस-दिदीपे-असी दीप्तौ भौवादिक उभयपदी । लिखितादर्शे-'नवमीपवनः' इति प्रतिभाति । 8 मा० च० स० श्लो० ३७ प्रथम-चतुर्थपादौ समस्यात्वेन । माघे "निधिमत्रगणम्' इति भेदः । 9 मा० च० स० श्लो० ३८ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे- 'भरभजमीरुमध्याम्' इति । अत्र आदर्श "मा' शब्दो न लिखितः ततश्च छन्दोभतो भाति, अत्र लिपिकारप्रमादः।। ।।..

6 [चतुर्थः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं न पुष्पिताऽत्राधिगते मुनीन्दावनन्तताने कतमा लताऽलम् ॥५२॥ सुश्राद्धधर्मचतुराश्चतुराहयाद्यास्तत्सङ्घभक्तिमनुयोजनमादधानाः । मार्गे वितेनुरचलस्य तपखिभर्तुर्नार्योऽनुरूपमधिवासमधित्यकासु ॥५३॥ पुरमवरङ्गसाहितनयेन कृतस्थिति विभुराप संहितनयेन युतम् । ध्रुवदिवसं च यत्र सरंसा सरसामिह विदधाति धौतकलधौतमही ॥५४॥ चातुरीत्याख्यया श्रेयसा कान्तया दानशीलादिना श्रेयसाऽकान्तया। भक्तयाऽसौ शिवासन्नतापाङ्गया सेव्यतेऽनेकया सन्नतापाङ्गया ॥५५॥ तत्र स्थिते गणधरे कतिचिद् दिनानि नित्यं महेभ्यविहितोत्सवसान्द्रदेशात् । गन्तुं स्त्रियः स्तनभरादलसाः म तूर्यनियंत्खरश्रुतिसुखादिव नोत्सहन्ते ॥५६॥ तस्मिन्नित्थं गच्छति काले बहुलाभे शुक्रेऽचालीचातुरिकाप्रेरणयासौ । सौरैः पादैनिर्मलरूपे धनमार्गे छायामच्छामृच्छति नीलीसलिलस्य ॥ ५७ ॥ स प्रययौ मुनिसङ्घमुदीरन् सारतरागमना यतमानम् । साहिपुरोपवनं कुसुमाली-सारतरागमनायतमानम् ॥५८॥ श्राद्धततिः समियाय गुरुं तं सारतरा गमनाऽऽयतमानम् । वाहनिका गजराजिविरूढा सारतरांगमनायतमानम् ॥ ५९॥ 10 १२ 15 १ 'अत्र' वने, 'अधिगते' प्राप्ते, मुनीन्दौ गुरौ, अनन्तताने बहुविस्तारे । अत्र वने कतमा लता न पुष्पिता ? अपि तु सर्वाः । २'-अधित्यकासु' वगलांणादेशे पर्वतोपरिस्थिते पर्वतोवं- भूमिषु । ३ 'अवरङ्ग-' अवरङ्गनाम्ना साहिपुत्रेण कृता स्थितिः वसतिः यस्य तत्। ४ 'संहित- सम्यग्पुष्टनीत्या युतम् । ५ 'सरसा' यत्र सरसा मही सरसा सजला दिनं ध्रुवं सदा विदधाति । ६ नगण-जगण-भगण-जगणैः लघुना गुरुणा प्रतिपदम् अदः छन्दः। ७ 'श्रेयसा' मङ्गलरूपेण । 'कान्तया स्त्रिया। ८ 'श्रेयसा' धर्मेण । 'कान्तया' मनोज्ञया । यद्वा 'अकान्तया' अकं दुःखम् तस्य अन्तो यस्याः सा तया । ९ 'शिवा-'शिवो मोक्षः तदासन्नतायाम् अपाङ्गः कटाक्षो यस्याः तया। १० 'सन्न-' गततापशरीरया । ११ 'बहुलामे कार्तिकतुल्ये शुक्रे ज्येष्ठे मासि । यद्वा बहुलः कृष्णपक्षः तस्य आभा छाया यत्र अथवा बहुः लाभो धर्मस्य यत्र । १२ ‘सौरैः' सूरिसंबद्धः सूर्यसंबद्धैर्वा । १३ 'घनमार्गे' नभसि । १४ -'ऋच्छति' शत्रन्तम् । १५ 'सारतरागमनाः' अरतरागं यद् मनः तत्सहितः [स+ अरतराग+मनाः-सारतरागमनाः] 'यतमानम्' यतनया चलन्तम् । १६ 'सारतरा-' सारतरागम्-अतिश्रेष्ठवृक्षम् [सारतर अगम्- सारतरागम् ] 'अनायतमानम्' आयतो दीर्घः, मानो गर्वः तद्र- हितम् । १७ 'सारतरा' धनबला । गमने-गतो, आयतमानम्-यत्नं कुर्वाणम्-गमने आ समन्तात् यत्नभाजम् । १८ 'सा अरतरागमना यतमानम्' सा श्राद्धततिः, अरतराग- मना-रते रमणे राग:-रतरागः । अरतरागं मनः यस्याः सा। यतमानम्-यतो बद्धः मानः-अहंकारो येन तं गुरुम्-मानस्य जेता- रम् । यद्वा 'सारतराऽऽगमना' श्राद्धततिः-सारतरम् अतिश्रेष्ठं आगमनं संमुखीनरीत्या यस्याः सा सारतरागमना-श्रावकाणां ततिः । 1 मा. च० स० श्लो० ३९ द्वितीय-चतुर्थपादौ समस्यात्वेन । 2 मा० च० स० श्लो०४० चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 3 मा० च० स० श्लो० ४१ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 4 मा० च० स० श्लो० ४२ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 5 मा० च० स० श्लो० ४३ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । माघे- -'वनश्रुति'-इति भेदः। 6 मा० च० स० श्लो० ४४ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । मत्त- मयूरवृत्तम् । 7 मा० च० स० श्लो० ४५ द्वितीय-चतुर्थपादौ समस्यात्वेन । 8 पूर्ववत् । - ४ 10 15 देवानन्दमहाकाव्यम् । [चतुर्थः सर्गः] नत्वा जनः प्रभुमिति स्तुतिमाततान देवागमेन भवतो जनता ननन्दुः । तद् वय॑ते किमिह यत् सरसीष्वपीमा व्याकोशकोकनदतां दधते नलिन्यः॥६॥ निजमण्डलाभ्युदयिनीर्घनागमे कमलाकरः सपदि दर्शनाय ते । अभिमन्त्रयत्युत तरङ्गभृद्वयो-विरुतेन वत्सलतयैष निम्नगाः ॥ ११ ॥ पुरमिदमुदितेशमरु कनकौघैः सारसं च मुदिते समरु । इह पाकपिशङ्गलतारजसा रोधश्चकास्ति कपिशं गलता ॥ ६२॥ पुरमुखमहिमांशुसमं हरिचीरैः कानने च महिमासु समम् । इह शाकपिशङ्गलतारजसा रोधश्चकास्ति कपिशं गलता ॥१३॥ मधुकरविटेपानमिता ननु मुक्तवा योषितोऽत्र विटपाऽनमिताः। ददृशुरनिभृतं सहसा वनराजीसंश्रिता मुनिभृतं सहसा ॥ ६४ ॥ इत्थं जनैः स गणभृत् पथि वर्ण्यमानः सद्रनतोरणमुपाश्रयमाविवेश । पूषेव शारदघनाभ्रमदभ्रशुभ्रमूर्ध्वप्रसारितसुराधिपचापचारु ॥६५॥ स्थितवति गणपे महे महेभ्यकमलदृशो भृशमुजगुर्थशांसि । प्रतिदिनमधिसंस्थिता निवासान् शिखरशिलाशिखिशेखरानमुष्य ॥६६॥ सवधूकाः सुखिनोऽस्मिन्ननवरतममं दरार्गतामरसदृशः। तत्सेवां नाभ्यमुञ्चन्ननवरतममन्दरागताऽमरसदृशः ॥ ६७ ॥ वर्षासु नित्यनवदानजिनार्चनादेः पुण्ये प्रसर्पति महे नगरी तदाऽभात् । १ 'सरसी-' सरसीषु अपि इमा नलिन्यः प्रबुद्धपद्मपुष्पतां १३ 'मधुकरविटपानमिता-' मद्यहस्तविटपान् मुक्ता वनराजी- दधते । संश्रिताः अमिता बहवः योषितः मुनिभृतं गणनाथं योषितः ददृशुः २'-वयो-' पक्षिशब्देन । 'निम्नगाः' नदीः अभिमन्त्रयति अनिभृतं यथा स्यात् तथा औत्सुक्येन-एतेन स्वैरिण्योऽपि धर्मपरा आमन्त्रयति। जाता इति भावः । ३ 'पुरसिद-' इदं पुरं कनकौधैः कपिशम् '-उदितेशम्-' १४ 'सहसा' हासेन सहिता-हर्षवत्यः । उदितखामिकम् । १५ 'अमुष्य' नगरस्य ४ 'अरुक्' रोगरहितम् । १६ 'अस्मिन् ननवरतमम' सुखिनः नराः सनारीकाः अत्र ५ 'सारसम्' सरसः तट रजसा कपिशम् । नगरे तस्य गुरोः सेवां न अभ्यमुञ्चन् । कथम् ? यथा स्यात् तथा ६ 'मुदिते'-हर्षिते । न नवे रते रमणे ममं ममलं यत्र तत् ननवरतममम् । नञ्प्रति- ७ 'समरुकू' तुल्यकान्ति । रूपक 'न' इत्यव्ययेन समासः । ८ 'पाकपिशङ्गालता' पाकेन परिपक्वतया पिशक्षा या लता सा १७ 'दरागता-' दरम् ईषत् आगतां प्राप्तां गुरोः सेवाम् । पाकपिशालता। "पुरमुखम्'-प्रतोली। १८'-अरसदृशः' किंभूताः सुखिनः ? अरसाः अलसाः दृशो १. 'अहिमांशुसमम् अचन्द्रसमानम् । येषां ते अलसदृशः गुरुदर्शनविस्मयात् । ११ 'हरिचीरैः' स्वर्णवस्त्रैः । १९ -अमन्दरागताऽमरस-' अत एव अनवरतं नित्यम् अम- १२ 'कानने च महिमासु' वने उत्सवेषु समम्-सदृशं भाति । न्दरागतया निबिडप्रेमभावेन अमरतुल्याः। 1 मा० च० स० श्लो. ४६ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । : 2 मा० च० स० श्लो० ४७ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 3 मा. च० स० श्लो. .४८ उत्तरार्धमुत्तरार्धतया । माघे 'परिपाकपिशा-' इति भेदः । पूर्ववत् । 5.मा. च० स० श्लो०४८ प्रथमः पादः प्रथमतया ! 6 मा. च० स० श्लो० ४९ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 7 मा० च० स० श्लो. ५. चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'शिखरशिखाः शिखि-' इति पार्थक्यम् । 8 मा० च० स० श्लो. ५१ समग्रः श्लोकः । माघे उत्तरार्धा- रम्भे 'नासेवन्ते रसवन' इति भेदः।

5 10 [चतुर्थः सर्गः] महोपाध्यायधीमेघविजयविरचितं कान्तेव मण्डपमिषाद् वसनं वितत्य धूपायतीव पटलैनवनीरदानाम् ॥ ६८॥ वेश्म खं कृतवरमण्डपं महेभ्यर्मार्गादौ तपंतपने महेन नीते । रत्नानां निचितरुचाऽचकात् पुरेऽस्मिन्-आकाशे रचितमभित्ति चित्रकर्म ॥ ६९ ॥ गृहोचवसुधासिततमा तमाखपि कराकरादिह तदा । जिगाय रुचिराचिरात् ध्रुवमपामपाय॑धवला बलाहकततीः ॥ ७० ॥ मैत्र्यादिचित्तपरिकर्मविदो विधाय क्लेशप्रहाणमिह लब्धसबीजयोगाः । यां ते रमां ययुरमा यशसाऽधुनान्ये वाञ्छन्ति तामपि समाधिभृतो निरोद्धुम् ? ॥७१॥ सूरेः श्रुतोज्ज्वलयशाः क्षितिपातिसाहिरानम्य यां खविषयेऽधित जीवरक्षाम् । नैवाधुना तदनुजा गुणरागिणोऽस्य वाञ्छन्ति तामपि समाधिभृतो निरोद्धुम् ॥७२॥ क्षितिपतिपतिशासनाद् विहाराः व्रतिपतिदेशनया जनैः प्रणीताः। तदनु च कनकैर्विमानलक्ष्मीमिह दधति स्फुरिताणुरेणुजालाः ॥ ७३ ।। नाम्बुदेऽभ्युदयिनि प्रिया प्रियान् खानमा नमति कालिमालया। का प्रजा न विनता गुरौ तथाऽस्वानमानमतिकालिमालया ॥ ७४ ॥ तीर्थानि नन्तुमथ तेन पथा चचाल सङ्घ: समं स गुरुणा करुणाकरेण । यत्राचलेषु झरधौतलताजटालास्तीवं महाव्रतमिवात्र चरन्ति वप्राः ॥ ७५ ।। यद्देशे धृतहरिवर्णनावि-नोदाः पानीयाः सुरसवनागमैनेरादेः । व्यासस्य द्रुपदभुवाऽविनाकृतानां साधर्म्य दधति गिरां महासरस्यः ॥ ७६ ।। वसति यत्र जनो विभैया युतः प्रतिपुरं रिपुभाविभयाऽयुतः। १'-मार्गादौ' मृगशिरःप्रमुखमासेषु मासकल्पकरणादौ । १० 'वप्राः' तटानि । २'तपत-' तपगणभानौ । ११ 'यद्देशे' यस्मिन् देशे महासरस्यः व्यासस्य गिरी साम्यं ३ 'गृहोचवसु-' गृहोचभूमिः मेघश्रेणीर्जिगाय इत्यन्वयः। दधति । किंभूताः गिरः? धुता या हरिवर्णा पीतवर्णा नौः प्रवहणं ४-'अपामपायध-' अपाम् अपाये नाशे धवला । तस्याम्-नावि नोदाः प्रेरणाः यासु । विभक्तरलुक् । 'नरादेः' ५ 'समाधिभृतो-'यां रमां श्रियं ते गुरवः प्रापुः तां समाधि जीवस्य । 'सुरस-' सुरसं यत् वनं जलम् तस्य आगमैः 'पानीयाः' भृतोऽन्ये योगिनोऽपि संग्रहीतुं वाञ्छन्ति यशसा सह । पातुं योग्याः । 'द्रुपद-' द्रूणां पदं स्थानं या भूः पृथ्वी तया ६ 'गुणरागिणो-' अस्य समाधिभृतः सूरेः गुणरागिणः अविनाकृताः-युक्ताः । तत्साहिपरंपराजाताः अधुनाऽपि तां जीवदयां निषेधुं नैव वाञ्छन्ति । पक्षे नरादेः अर्जुनप्रभृतेःसुरसं यद् वनम् अरण्यम् तत्र आगमैः ७'खानमा' खान् अमा सह । द्रष्टुं योग्याः । 'हरि-' हरिः कृष्णः तस्य स्तुति विलासधराः यत्र ८'काऽऽलिमा-' का आलिमालया सखीश्रेण्या । नोदाः प्रेरणाः । 'द्रुपद-' द्रुपदभुवा पाञ्चाल्या युक्तानाम् । तथा ९ -अखानमान-' न विद्यते खाने शब्दवचने, माने काय 'सुरस-' सुराणां सवनाय स्नानाय आगमाः तैः-इत्यपि । “नरः बहुमाने, मतौ बुद्धयाम् कालिमा कृष्णता तस्या आश्रयो यस्याः सा कृष्णेऽर्जुनेऽपि च"। [है. अने० सं० का० २ श्लो० ४२३ ] -भावशुद्धा त्रिधाऽपि । १२ "विभया' विभा प्रभा तया-कान्त्या। 15 - 1 मा० च० स० श्लो० ५२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 2 मा० च० स० श्लो० ५३ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 3 मा. च० स० श्लो. ५४ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 'करा- करातू'-किरणसमूहात् इति भावः । 4 मा० च० स० श्लो० ५५ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 5 पूर्ववत् । 6 मा० च०.स. श्लो० ५६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 7 मा० च० स० श्लो० ५७ द्वितीयचतुर्थपादौ समस्यात्वेन । 8 मा. च० स० श्लो० ५८ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 9 मा० च० स० श्लो. ५९ चतुर्थः पादः चतुर्थतया ।

5 देवानन्दमहाकाव्यम् । [चतुर्थः सर्गः] ललति चानुवनं चमरीचयः कनकरत्नभुवां च मरीचयः ॥७॥ नत्वा गिरौ पथि जिनं कलिकुण्डपार्श्वभाखन्तमम्बुधितटे करहेडपार्श्वम् । देवोऽभिनम्य न दधेप्रतिबद्धचाररागीव सक्तिमधिकां विषयेषु वायुः ॥ ७८ ॥ सङ्घ भक्त्या कृतजिनमनं तीर्थे तत्र स्थितमतिचलनः । खिन्नं भेजुर्जलनिधिपवनाः क्रीडायासश्रमशमपटवः ॥७९॥ उक्षार्थिनालम्भि न जन्मतोऽपि स दानतो येन विषाणिनागः। तस्मै ददे सजनेन तत्र सदानतोयेन विषाणिनागः ॥ ८०॥ तीर्थान्यथैवमभिनम्य कृतप्रयाणे सङ्के प्रतिखनगरं समयोचिताभिः। सेवाविधाभिरयमध्वनि वेद सूरिन द्वन्द्वदुःख मिह किश्चिदकिञ्चनोऽपि ॥ ८१ ॥ कृतनगरनिवेशं प्रौढशोभाभिरामं श्रमणपदमधीशः शिश्रिये हंसगौरम् । ध्वजपटलजटालं बिभ्रदुद्भूतिभावैरधिगतधवलिम्नः शूलपाणेरभिख्याम् ॥ ८२ ॥ प्रभोस्तव वचःश्रुतेर्विमलशीलधानादरॊदनङ्गविमुखा जनास्तनुभृतां वधानादराः । निशम्य वचनं कवेरपि च नात्र कादम्बरं हरन्ति रतये रहः प्रियतमाङ्गदम्बरम् ।।८३॥ देव ! तवात्र शीलवचसि श्रुतवति सततं माऽन्यजनस्य दर्शन मिति द्रुततरगमनाः। 15 चित्रितमध्यभूषु भवनं दिनमुखसमये काञ्चनकन्दरासु तरुणीरिह नयति रविः ॥ ८४ ॥ पुरि तदिह निगम्या प्रावृडित्याग्रहेणाऽऽस्थित बहुधनभाजां योगभाजां महेज्यः । नभसि नभसि रुद्ध सैन्द्रचापोत्तरीयैहलधरपरिधानश्यामलैरम्बुवाहैः ॥ ८५ ॥ ॥ इति श्रीदेवानन्दे महाकाव्ये दिव्यप्रभापरनानि ऐकाराङ्के माघसमस्यार्थे श्रीतपापक्षीयमहोपा- ध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते यमकरम्यश्चतुर्थः सर्गः सम्पूर्णः ॥ 10 १ 'वायुः वायुः इव अप्रतिबद्धरागचारी गुरुः विषयेषु देशेषु अधिकं सकिं प्रीति न दधे पुपोष-अन्तर्णिगर्थः-लोकानामिति गम्यम्। २ 'विषाणि- येन अर्थिना 'जन्मतः' आरभ्य 'दानतः' 'स' प्रसिद्धः 'उक्षा' वृषभः 'न' 'अलम्भि' प्राप्तः। किंभूतः उक्षा ? विषाणिषु शिषु नागः श्रेष्ठः । 'तस्मै' अर्थिने 'सदानतोयेन' दानाञ्जलिजलयुक्तेन 'संघजनेन' 'विषाणिनागः' विषाणी दन्तवान् नागः गजः 'दे दत्तः । ३ 'द्वन्द'-द्वन्दं शीतातपादि । ४ '-शीलधानादराद-' विमलशीलधरणस्य आदरात् । 'विमल- शीलधानाः' इति भिन्नं पदम् । 'दरात' भयात् । ५ 'कादम्बरम्' कादम्वर्याः कषायाः तेषु भवं कादम्बरम् । ६-'काद् अम्बरम्' प्रियतमाशरीरात अम्बरं वसनं न हरन्ति । 'रतये क्रीडायै न पुनः संभोगाय । ७ 'अन्यजनस्य' दर्शनं मा स्यात्-“असूर्यपश्या राजदाराः" इति न्यायात् । ८ 'रविः' काञ्चनस्य कन्दलाः अङ्कराः यासु तासु चित्रितमध्य- भूषु द्रुततरगमनाः तरुणीः भवनं नयति रविः । naaranand 1 मा० च० स० लो० ६० तृतीय-चतुर्थपादौ माघे 'स्फुरति चानुवनम्' इति क्रियामेदः । 2 मा. च० स० श्लोक ६१ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 3 मा. च०स० श्लो०६२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 4 मा च० स० श्लो० ६३ द्वितीय चतुर्थपादौ समस्यात्वेन, केवलम् पदच्छेदभेदः । 5 मा० च० स० श्लो० ६४ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 6 मा० च० स० श्लोक ६५ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 7 मा. च० स० श्लो.० ६६ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 8 मा० च० स० श्लो० ६७ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । माघे 'काश्चनकं दरासु' इति पदविभागः । 9 मा० च० स० श्लो. ६८ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन ।

5 [ पञ्चमः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं पञ्चमः सर्गः। ॥ श्रीशङ्केश्वरपार्श्वपरमेश्वराय नमः ॥ देवप्रतिष्ठितविधावथ देवचन्द्रः श्राद्धः श्रियो व्यधित याः स्फुटभावं चन्द्रः। तन्मण्डपे च शुशुभे तुलनाऽवसाने तासां गिरौ च वनराजिपटं वसाने॥१॥ सुरेस्तपोभिरमलैनिहतान्तराये तत्र क्षणे क्षितिपतेरभवत् सहायः। पुन्नागवान् कदलिकॉवलिचारुरुच्चैलक्ष्मी दधत् प्रतिगिरेरलघुर्बलौघः ॥२॥ यात्रां जलस्य गुरुणा सह संविधातुं सो बलेन मिलिते चलिते निजाली। प्रैषीदिवेक्षितुमिहानयनाय सर्वाः पृथ्वी रजः करभकण्ठकडारमाशाः ॥३॥ साडम्बराः सुरविधोः स्वजनाश्ववाराः उत्क्षिप्यमाणचमरालिलसत्कुमाराः। रेजुस्तदा प्रतिपदं निजवर्गपूर्णास्तूर्ण पयोधय इबोर्मिभिरापतन्तः ॥४॥ यात्राभिषेकमहनाञ्जनसक्रियासु विम्यावलेवनिततर्यरवैविहस्तौ । लुब्धौ वधूकलरवैः स्खलनेऽपि नालमन्योन्यतः पथि बताऽविभितामिभोष्ट्रौं ॥५॥ एवं वितीर्णविभवं सुकृतेषु रूप्यैः सम्पूज्य भोज्यवसनैः प्रतिलाभयन्तम् । तं बह्वमन्यत गुरुर्भुवि देवचन्द्रं सर्वः प्रियः खलु भवत्यनुरूपचेष्टः ॥६॥ नान्दीरवैः सह महीशबलानुगम्ये सऽभियाति समहं समचैत्यनत्यै । वीक्षोत्सुकाऽपि रभसाजनदृष्टिमार्गे विस्रस्तवस्त्रमवरोधवधूः पपात' ॥७॥ श्रीदेवचन्द्रवणिजः सदनात् तदानीं सङ्घस्य भोजनदिने मुदितार्थिसार्थे । धूमा महानसभुवो दिवि मेघरूपाश्चक्रीवदङ्गरुहधूम्ररुचो विसस्रुः ॥८॥ सर्वे वणिग्मणिवरेण सुरेन्दुना ते सम्मानिताः प्रतिगृहं स्वजनाश्ववाराः। जग्मुः क्रमात् पथि मुदा हयनर्तनाय शैलस्य दर्दरपुटानिव वादयन्तः ॥९॥ सम्मान्य रत्नवसनैः क्षितिराजराजा दत्तः सुरेन्दुवणिजे विपणौ तुरङ्गः। 10 15 20 १'देवचन्द्रः' देवचन्द्रः याः श्रियः शोभा व्यधित तासां तुलना साम्यं तन्मण्डपे 'च' पुनर् गिरौ शुशुमे । २ -चन्द्रः' "चन्द्रोऽम्बु-काम्ययोः । वर्णे सुधांशौ कर्पूरे कम्पिल्ये मेचके च" इति अनेकार्थः [ है. अने. सं. कां. २ श्लो. ४०६] ३ '-अवसाने' अवनम् अवः जीवरक्षा तस्याः सानं दानं यत्र मण्डपे । “षणूयी दाने धातुः" । यद्वा अवसाने अनन्ते-'अव- सान'शब्दस्य अवोपसर्गाकारलोपे वसानः अन्तः तनिषेधे अव- सानः अनन्तः। ४ 'कदलिका- "कदली वैजयन्यां रम्भायां हरिणान्तरे" इति विश्वः । [विश्व० लान्तव० श्लो० ६७] ५ 'पृथ्वी' पृथ्वी सर्वा आशा दिशः ईक्षितुम् आनयनाय रजः प्रेषीत् । ६ 'सुरविधोः' देवचन्द्रस्य । ७ 'सुरेन्दुना' देवचन्द्रेण । 1 'स्फुटभावं चन्द्रः' इत्यत्र भावशब्दशिरस्थोऽनुखारः अस्य चित्रकाव्यत्वेन अत्र न गण्यते, अतो न छन्दोभङ्गः। मा० पं० स० श्लो. १ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 2 मा. पं० स० श्लो० २ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 3 मा० पं० स० श्लो० ३ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे "पृथ्वीरजः' इति समस्तम् । दे० 4 मा० पं० स० श्लो० ४ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 5 मा. पं० स० श्लो०५ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 6 मा. पं० स० श्लो० ६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 7 मा. पं० स० श्लो० ७ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 8 मा. पं० स० श्लो०८ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 9 मा० पं० स० श्लो. ९ माघे 'दर्दुरपुटा'-इति ।

5 देवानन्दमहाकाव्यम् । [ पञ्चमः सर्ग:] प्रीत्योल्लसन्निव समाश्रयणेऽस्य जात्यश्चित्रं चकार पदम पुलालयेन ॥ १० ॥ बिम्बाभिषेचनदिक्षुनरेन्द्रसान्द्रपश्चाद्वैलोद्दलचलत्तुरगप्रणुन्नः। पूतः प्रभोरिव पदैर्दिवमाप्तुमिच्छु: पांशुर्दिशां मुखमतुच्छयदुत्थितोऽद्रेः ॥ ११ ॥ सूरिस्ततोऽथ नगरान्नगराजितेऽगात् द्रङ्गेश्वरङ्गपदभाजि जनैरभाजि । तन्युञ्छनस्थितिरतस्तदलं विरेजुर्मुक्ताफलप्रकरभाजि गुहागृहाणि ॥ १२॥ उत्साहिसाहितनयप्रतिशासनेन रङ्गत्तुरङ्गचतुरङ्गचमूयुजाऽस्मिन् । सङ्घन सार्द्धमयमाश्रयदुच्चचूलं खावासभागमुरगाशनकेतुर्यष्ट्या ॥ १३ ॥ ऐरावती तनुरुचं शुचिसम्भवेन विभ्राणमेनमुदयन घनायमानम् । संवीक्ष्य कोपि न परत्र जनः स्म तेजो वर्द्धिष्णुमाश्रयमना गतमभ्युपैति ॥ १४॥ ज्येष्ठंस्थितौ स्थितमदुःस्थितमुग्रलक्ष्मी संरा मीशमिह धर्ममहोत्सवेषु । ऋष्टुं महोदयमिव खजनेन दूरादुबाहुनाऽऽजुहुविरे मुहुरात्मवाः ॥ १५ ॥ विश्वेक्षणक्षणजरूप्यकदक्षिणाभिर्देशोभिधान्वयविधामभिधारयन्तः। श्राद्धास्तदार्थिजनकल्पितदानकल्पैः कल्पद्रुमैः सह विचित्रफलैर्विरेजुः ॥ १६ ॥ उन्नीय पुण्यमपनीयमपुण्यमेवं पार्श्व निनंसुरगमद् गुरुरन्तरिक्षम् । 10 १'-पुला-' पुला नाम प्लुतायनेकापरनामा हयानां गतिविशेषः । २'-पश्चाद्वलोदलच- "वल धातुः" आत्मनेपदी । पश्चाद् वलते इति पश्चाद्वलः स चासौ उद्बलः अधिकवीर्यः चलन् यस्तुरगः तेन प्रणुन्नः प्रेरितः। ३ 'गुहा-' गुहावत् गृहाणि गुहागृहाणि । यद्वा 'गुहा' इति भिन्नपदम् । ४'-उरगाशन-' गरुडध्वजेन उच्चचूलम् । ५ 'ऐरावतीम्' ऐरावतो हस्तिमल्लः तत्संबन्धिनी शरीरका- न्तिम् । पक्षे खल्परुचिम् । धनपक्षे ऐरावती विद्युतम् । ६ 'शुचि-' “शुचिः शुद्धे सितेऽनले । ग्रीष्मा-ऽऽषाढानुपहते- धूपधाशुद्धमन्त्रिणि शृङ्गारे च" इति अनेकार्थः [ है. अने० सं० कां. २ श्लो० ५९] ७'-एनम्-' एनं गुरुं वीक्ष्य कोऽपि जनः परत्र 'गतम्' गमनं नाभ्युपैति स्म। ८'-आश्रयमना-' आश्रये मनो यस्य स आश्रयमनाः । ९ 'ज्येष्ठ-' चतुर्मासके। १. '-क्षण-' "क्षणः कालविशेष स्यात् पर्वण्यवसरे महे। व्यापारविकलत्वे च परतन्त्रलमध्ययोः" इति अनेकार्थः [ है. अने. सं. कां. २ श्लो. १३३] ११ 'देशा-' देशनाम दक्षिणा इति सत्यं कुर्वन्तः । १२ -दानकल्पैः' अर्थजनेषु कल्पितः कृतः दानकल्पो दान- विधिर्यते-तैः । १३ 'सह' इवार्थे । - 1 मा० पं० स० श्लो० १० चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । माघे 'पुलायितेन' इति भेदः। पुला नाम सुताद्यनेकापरनामा हयानां गतिविशेषः । तदुक्तं हयलीलावत्याम्- "लुता प्लवङ्गितामाहुर्या धारा पुलनाभिधा । पुनरेनां रलोपान्तां पुलामित्याह देशिकः ॥ तल्लक्षणं च तंत्र- वोक्तम्- क्षिपति समविशेषानुत्क्षिपत्यप्रपादान प्रसरति पुरतोऽश्वः साधु धारा पुलाख्या । विलसति समपादोत्क्षेपणाकुञ्चनानां करुणमिह गतिज्ञाः प्राहुरन्ये पुलाख्याम्" ॥ इत्यादि हयगतिसंबन्धि सविस्तर वर्णनं माघस्य मल्लिनाथीयटीका- तोऽवगन्तव्यम्। 2 मा. पं० स० श्लो० ११ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'मुखमतुत्थयदुत्थितो-' इति मेदः । अत्र ‘च्छ'-'त्थ' कारयोः लिपिसाम्यमेव पाठभेदनिबन्धनम् । लिखितप्रतौ तु 'अतुच्छयत्' इति स्पष्टं वाच्यते । आचार्यहेमचन्द्रस्तु एनमेव पादं खीये धातुपारायणे (पृ०२८८) "पांशुर्दिशां मुखमतुत्थयदुत्थितोऽदेः" इत्येव निर्दिशति, अतोऽवगम्यते यत् 'अतुत्थयत्' इति साधु- तरम् । लिपिकारप्रमादाच 'अतुच्छयत्' इति जातम् । “तुत्थ आच्छादने इति चौरादिको धातुः"-मल्लिनाथटीका । 3 मा. पं० स० श्लो० १२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया। 4 मा. पं० स० श्लो० १३ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 5 मा. पं. स. वो०१४ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 6 मा. पं० स० श्लो० १५.चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 7 मा. पं० स० श्लो० १६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया ।

[ पञ्चमः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं गत्वाऽऽतपत्रितफणागणमस्य पद्मं वक्त्रं श्रियः सभयकौतुकमीक्षते स्म'॥ १७ ॥ निन्ये विभुर्मणिमयप्रतिमाः प्रतिष्ठां सस्तदर्चनमहो स्थितिरुत्तमानाम् । व्याप्तौ अँवोऽपि वरदीपनचन्दनानि गण्डस्थलीः शुचितया न चुचुम्बुरासाम् ॥१८॥ कर्पूरपूर्णवरवर्णरसानुलेपैर्देवार्चनाय सुगतागतचञ्चलाक्षी। आलिङ्गयन् व्रतिवरा रभसा रसागण्डस्थलीः शुचितया न चुचुम्बुरासाम् ॥१९॥ [पाठान्तरम् ] अन्योन्यभोजनविधानकृतावधान: सङ्घो न नैकपुरजः प्रतिगन्तुमैच्छत् । इभ्यर्विना वितरणेऽतिशयं खवारे सङ्घर्षणा सह गुणाभ्यधिकैद्रासम् ॥ २० ॥ स्थित्वा दिनानि कतिचित् प्रतिजग्मुषोऽस्य सूरेरथो पथि जनैर्मिलिता जनानाम् । बर्हानपूर्वनगरानगराजसत्कपादा इवाधिवभुरावलयो रथानाम् ॥ २१ ॥ बर्हानपूर्जनकृताग्रहतस्त्वराभिरागन्तुकं सबहुसङ्घगुरुं निशम्य । तत्रोत्सवोच्छ्रितपतत्रितदूष्यराजितारावलीविरचनैर्व्यरुचन्निवासाः ॥ २२ ॥ आनन्दनन्दकतयाभिनदत्सु नान्दीनादेषु सम्मदकलैर्धवलैर्वधूनाम् । आस्तां जनः क्षणमवापि न चापि रात्रौ निद्रासुखं वसनसद्मसु राजदारैः ॥ २३ ॥ राजन्यराजिगजवाजिविराजिसङ्घनिर्दिश्यमानपदसूरिवरप्रवेशे । तद्विस्मयस्मितमुखी विविधक्रियाभिः शीतोदरी युवदृशां क्षणमुत्सवोऽभूत् ॥२४॥ सर्वत्र चित्रशतपत्रमुखीभिरुचैर्निर्मीयमाणबहुमङ्गलसंविधानः। 10 15. ] १-फणा- "गोविषाणे फणा ज्ञेया भुजंगस्य फणः फणा । फणा जटा फणा तृष्णा फणा मन्थानकुण्डली" ॥ इति अनेकार्थ- मञ्जरी [श्लोकाधि० श्लो० ९० २ 'वक्त्रम्' अस्य पार्श्वप्रभोः वक्त्रं पद्ममिव इति लुप्तोपमा । ३ 'व्याप्तौ' भूव्यापनेऽपि केसरादेः मर्यादानतिक्रमः । प्रतिमानां नैर्मल्यं ज्ञापितम् । ४ 'शुचि-' ब्रह्मचारी सदा शुचिः । ५ 'स्ववारे' इभ्यैः खवारे खसमये विशेषात् दानशौण्डैर्भाव्य- मिति भावः। ६ 'संघर्षिणा' संघश्च ऋषिश्च संघर्षिः । सर्वो द्वन्द्वो विभाषया अन्यथा दुःखिताः स्युः इति तेषां अधिकदानरसिकलं ज्ञापितम् । ८ '-उत्सवोच्छ्रित-' उत्सवेन हेतुना उच्छ्रितानि उन्नीतानि । पतत्रं पक्षः तद्वद् आचरितानि दूष्याणि पटमण्डपाः तेषां श्रेणिः तस्यां तारावलीविरचनैः मुक्ताग्रथनैः । तारावलीनां रजुश्रेणीनां विरचनैर्वन्धनैः उड्डयनाय उद्यता इति भावः । “तारा मुक्तादिसंशुद्धौ तरले शुद्धमौक्तिके” इति विश्वः [ विश्व० रान्तव० श्लो० ४१] "तारावली रज्जुसंततिः" इति केचित् । “दूष्यं वस्त्रे च तद्गृहे" इति विश्वः [ विश्व० यान्तव० श्लो० २९] 'व्यरुचन्' “धुझ्योऽद्यत- न्याम्" [ ३३१४४ हैम.] इति परस्मैपदम् । ९ आचार्यहेमचन्द्रस्तु खीयदेशीनाममालाटीकायां कृशार्थस्य छातशब्दप्रतिरूपस्य 'छाअ' शब्दस्य विवरणप्रसङ्गे एनं चतुर्थ पादमित्थं निर्देिशति-"छातोदरी युवदृशां क्षणमुत्सवोऽभूत्"- देशीनाममाला वर्ग ३, गाथा ३३ । एकवद् इति । - ७ '-दुरासम्' संघर्षिणा सह वितरणे दाने अतिशयं विना दुःखेन स्थीयते-यदा ते अधिकाधिकं दधुः तदैव ते सुखिता भवन्ति 1 मा. पं० स० श्लो. १७ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'वक्त्रश्रियः' इति भेदः। 2 मा. पं० स० श्लो. १८ चतुर्थः पादः चतुर्थतया। 3 पूर्ववत् । 4 मा. पं० स० श्लो. १९ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 5 मा० पं० स० श्लो० २० चतुर्थः पादः चतुर्थतया । माघे 'अभिबभुः' इति । 6 मा. पं० स० श्लो० २१ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 7 मा. पं० स० श्लो० २२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 8 मा. पं० स० श्लो० २३ चतुर्थः पादः चतुर्थतया ।

5 देवानन्दमहाकाव्यम् । [पञ्चमः सर्गः] श्रीभाग्यनामनगरी सुधुराबुपेते नित्योत्सवोच्छ्रितचलवजराजिवातैः। स्वःस्पर्द्धिनी गिरितटीमलकां निनाय नान्यस्य गन्धमपि मानभृतः सहन्ते ॥ ४३ ॥ दूरादुपेत्य दुरितस्थितिदारिदारैर्युक्तैविधाय विधिना विविधार्घदानम् । भव्याङ्गिनी गुरुपदाम्बुरुहि व्ययान्नो मम्ले यथागतमगामि कुलरलीनाम् ॥ ४४ ॥ तत्रोत्सवैरभिनवैर्विभवैः प्रभाव्य जैनं मतं मुनिपतौ चलिते हयेन्द्राः। नीताः पथं कथमपि त्वपथेन चेलु वात्मनीनमथवा क्रियते मदान्धैः ॥ ४५ ॥ सूरेरमुष्य पथि पुष्यति चाभिमुख्यं विद्यापुरौकसि जने सहचारिणीव । आतिथ्यतथ्यविधयेऽथ मिथस्तथैकानागान् बबन्धुरपरान् मनुजा निरासुः ॥४६॥ सिन्धोस्तटे वनवटेषु पटीकुटीषु सार्थागताभिगतसङ्घजनस्य तस्य । चर्चिक्यगन्धरतिनेक्षणदोषमोषात् कण्ठे गुणत्वमलिनां वलयेन भेजे ॥४७॥ विद्यापुरे भगवदागमनेन सद्यः प्राक् तद्विनिर्णयकृतां गणकाग्रणीनाम् । वर्धापने बहुधनैः सदनेऽभ्यनन्दि शास्त्रं हि निश्चितँधियां क न सिद्धिमेति ॥४८॥ स्तम्भं महान्तमुचितं सहसा मुमोच दानं ददावतितरां सरसाग्रहस्तः। बद्धापरांणि परितो निगडान्यलावीत् द्राग बन्दिनां क्षितिपतिः प्रमदात् तदानीम् ॥४९॥ भद्रोत्तमस्य कलभैस्य सुकल्पितस्य दानोदये परिणतस्य रतेत्रिपद्याम् । श्राद्धस्य शुद्धसमरोचितभाविनः श्रीः स्वातन्त्र्यमुज्वलमवाप करेणुराजः ॥५०॥ 10 15 : १ 'भव्याङ्गिनाम्' किम्भूतानां भव्याङ्गिनाम् ? गुरुपदाम्बुरुहि अलीनाम , तेषां कुलैः समूहै: व्ययात् द्रव्यव्ययकरणात् नो मम्ले न संकुचितम् किन्तु यथागतं सोत्साहम् अगामि । .. २'-आत्मनीन-' आत्मने हितम् आत्मनीनम् । ३ 'मदान्धैः' "मदो रेतस्यहंकारे मद्ये हर्षेभदानयोः। कस्तूरि- कायां क्षैब्ये च" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो० २२८] ४ "विद्यापुरौ-' विद्यापुरे ओकः गृहं यस्य स-तस्मिन् । ५ निरासुः' एकान् कतिचिद् गजान् बबन्धुः अपरान् जलपा- नाद्यर्थं निरासुः । अस्यतेः परोक्षा । ६ 'चर्चिक्य-' चर्चिक्यं विलेपनम् । ७ 'निश्चितधिया-' 'विभक्तधना प्रातरः विभक्ताः' इतिवत् निश्चिता धीरपि निश्चिता इति उपचर्यते । अत एव अत्र गम्यमा- नार्थखात उत्तरपदस्य अप्रयोगलक्षणो लोपः । ८ 'स्तम्भम्' 'उचितम्' "स्तम्भः स्थूणा-जाड्ययोः" इति अने- कार्थः [ है. अने० सं० कां. २ श्लो० ३०७] "उचितं विदिते अभ्यस्ते मिते युक्ते" इत्यपि [ है. अने० सं० कां० ३ श्लो० २४२] ९ 'बद्धापराणि' बद्धः अपरो जनो येषु तानि-उभयोः एकब- न्धनरूपाणि । १० 'भद्रोत्तमस्य' "भद्रं तु मङ्गले । मुस्तकश्रेष्ठयोः साधौ काश्चने करणान्तरे । भद्रो रामचरे हस्तिजातो मेरुकदम्बके ॥ गवि शंभी" इति अनेकार्थः [ है. अने० सं० कां० २ श्लो० ४३१- ४३३ ] भदैः उत्तमस्य । पक्षे भद्रं मङ्गलम् काञ्चनं वा तेन श्रेष्ठस्य । सुकल्पितस्य' सजितस्य । ११ 'कलभस्य' कला मधुरा भा यस्य-सुविचारस्य । १२ ‘दानोदये' दानम् मदः तस्य उदये । १३ 'परिणतस्य' परिणतः तिर्यग्दत्तप्रहारः । १४ '-त्रिपद्याम्' त्रिपदी उत्पादादिः तत्र रतेर्धारणात् । पदो त्रिपदी गात्रबन्धः तस्यां रतेः । १५ 'समरो- "समरो युद्ध-संघयोः" इति अनेकार्थध्वनिम- अर्याम् । लो. २१० पादाधि०] १६ -'अवाप' श्राद्धस्य तथा हस्तिनः श्रीः उज्वलं दीप्तं खात- व्यमवाप । “उज्ज्वलस्तु विकाशिनि शृङ्गारे विशदे दीप्ते". इति अनेकार्थः [ है. अने० सं० कां. ३ श्लो० ६२०] । - - 1 मा. पं० स० श्लो. ४२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 2 मा. पं० स० श्लो. ४३ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 3 मा. पं. स. श्लो०४४ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 4 मा. पं० स० श्लो. ४५ चतुर्थः पादः चतुर्थतया। 5.मा० पं० स० श्लो० ४६ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 'अलिनाम्' भ्रमरवाचकः 'अलिन्' शब्दः नकारान्तोऽपि । 6 मा. पं० स० श्लो० ४७ चतुर्थः पादः चतुर्थतया। वेङ्कटेश्वरमुद्रिते माघे 'शास्त्रं सुनिश्चित-' इति पाठः स एव पाठो मल्लिनाथेन व्याख्यातः। 7 मा. पं० स० श्लो०४८ प्रथमतः पादत्रयं समस्यात्वेन । 8 मा० पं० स० श्लो. ४८ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 'परिणतस्य' "तिर्यग्घाती परिणतो गजः"-[है. अभि. का० ४'लो. २०७] [पञ्चमः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं श्रीदेवचन्द्र इति जात्यमणिर्वणिक्षु प्रागवण्यवर्तत रसात् तरसा न दानात् । खस्वामिनापि च निषिद्धतथाप्रवृत्तिर्मन्दोऽपि नाम न महानवगृह्य साध्यः ॥५१॥ तत्कारिताऽऽहंतनवाकृतिसत्प्रतिष्ठां कृत्वा निधाय विबुधेन्द्रपदं से बीरे। जेष्ठस्थितिद्वयविधेरनु कारकोऽभूदिच्छाविहारवनवासमहोत्सवानाम् ॥ ५२ ॥ मार्गेऽथ साहिवचसा प्रभुमन्वितायां चम्बां तु सङ्घजनकारितभोजनेषु । यन्ता बलात् सुहितमाशयति स्म पिण्डं लेहच्युतिलपितबाहुरिभाधिराजम् ॥५३॥ नत्वाऽन्तरिक्षजिनपार्श्वपदो क्रमेण देवर्षिराज इह सङ्घघनाग्रहेण । बहानपूर्वनगरं शुचिमासि जाग्रन्नीलाभ्रपतिपरिवेषमिवाधिजग्मुः ॥५४॥ देवे स्थितेऽनुभवनं नवनन्दिकृत्यदानार्हतार्चनतपःकरणोत्सवेषु । सज्जीकृतेर्निशि विपल्ययना अपीयुः संलक्ष्यपल्ययनवध्रपदास्तुरङ्गाः ॥ ५५ ॥ पर्वखिहाहतविहारनवोपहारसङ्गच्छदङ्गधरजङ्गमतोत्तरङ्गः। प्रोचैर्महेषु सहसाऽभिवहंस्त्रिलोक्या रोमाञ्चतामिव जगाम रजः पृथिव्याः ॥५६॥ राजन्यजन्यतदजन्यपरंपराभिः क्षुब्धो न सत्त्वजलधिजलधीरणाभिः। प्राचीनदेवजनुषोऽनुगतेन सूरिः शेषेण तेजस इवोल्लसता रराज' ॥५७ ॥ मासानतीत्य चतुरोऽस्य पुनर्धरित्रीसङ्घाग्रहाजिगमिषोरथ तत्प्रयाणे । सञ्जग्मिवान् पथि सपल्ययनः शिवाय श्रीवृक्षकी पुरुषकोन्नमितानकायः ॥५८॥ सूरेरनुव्रजनकृज्जनभक्तिकार्ये यः सङ्घनायकतया समयेऽभिषिक्तः। तस्मै हरिः क्षितिभृतापि ददे वपुष्मान् उच्चैःश्रवा जलनिधेरिव जातमात्रः ॥ ५९॥ चाषोऽचलत् फलभुगस्य तदाऽपंसव्यः श्रव्याणि देव्यपि चकार रुतानि सव्यां। भव्यान्युवाच रुचिवल्गितहेषितेन मिश्रं दधद्दशनबर्बुरशब्दमश्वः ॥ ६ ॥ याने गुरोरनुगमाभिगमैर्नृपाणां सङ्घस्य चानुचलने स्खलनेऽचलायाम् । 10. 15 20 १ 'वीरे' वीरविजयकवौ । २. '-अभ्र- "अनं तु त्रिदिवे गगनेऽम्बुदे” इति अनेकार्थः [ है. अने० सं० कां० २ श्लो० ३८२] अभ्रम् अभ्रकम् । ३ 'पर्वसु' चतुर्दश्यादिषु । ४'जलधीरणाभिः' जडधियां सागरपाक्षिकाणां वा ईरणाभिः । ५ '-धरित्री-' धरित्रीपदेन गूर्जरत्रादेशः। ६ 'श्रीवृक्ष-' हृद्-वक्त्रावर्ती हयः श्रीवृक्षकी । ७'-पुरुषक-' पुरुष एव पुरुषकः तेन उन्नतः ऊर्ध्वावस्थितः अप्रकायः यस्य सः । "पश्चिमेनाप्रपादेन भुवि स्थिवाऽप्रपादयोः । ऊर्ध्वप्रेरणया स्थानम्-अश्वानां पुरुषः स्मृतः" ॥ ८ 'अपसव्यः' दक्षिणः। ९ 'सव्या' वामा। vi. 1 मा. पं० स० श्लो० ४९ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 2 मा. पं० स० श्लो० ५० चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 3 मा. पं० स० श्लो० ५१ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । माघे 'स्नेहसुति'-इति मेदः। 4 मा. पं० स० श्लो० ५२ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 5 मा० पं० स० श्लो०५३ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । माघे -वर्ध-' इति । 6 मा० पं० स० श्लो० ५४ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 7 मा. पं० स० श्लो० ५५ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 8 मा. पं० स० श्लो० ५६ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । श्रीवृक्षकी अश्वविशेषः । तलक्षणं च- "वक्षोभवावर्तचतुष्टयं च कण्ठे भवेद् यस्य च रोचमानः । श्रीवृक्षकी नाम हयः स भर्तुः श्रीपुत्रपौत्रादिविवृद्धये स्यात्" ॥ इत्यादि सविस्तरं वर्णनं माघस्य मल्लिनाथीयवृत्तितोऽवबोद्धव्यम् । 9 मा. पं० स० श्लो० ५७ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 10 मा० पं० स० श्लो० ५८ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । माघे 'दशनचर्चुरशब्द-' इति भेदः।

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5 [ षष्टः सर्ग:] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं वैतालिका नृपसंभे सुकृतस्य तस्य भोगावली कलगिरोऽवसरेषु पेटुः ॥ ६९॥ सूरेविहारकरणादिति गूर्जरत्रा मोहाभ्यमित्रजिनशासनभूभृतोऽभूत् । मूर्त सुकृत्यचरितैः परितो दुरन्ताऽलक्ष्मीविडम्ब शिविरं शिवकीर्तनस्य ॥७॥ अवन्त्या ऐन्दव्या विमलसलिलैः पाद्यंकृदगः स विन्ध्यः पीताब्धि मुनिवरमितं दक्षिणदिशः। विभोः स्फातिं मां त्वं नय विनयतोऽज्ञापयदिति बलाक्रान्तः क्रीडाद्विरदमथितोवीसहरवैः ॥७१॥ महो बिभ्रत् सौरं विवुधकलितो देवगुरुराट् दधानोऽसौ चैन्द्रश्रियमिह सदा यद् विहरति । खरेवायं देशो नदति गिरिरित्युच्चकनको बलाकान्तः क्रीडद्विरदमथितो/रुहरवैः ॥७२॥ [ पाठान्तरम् ] ॥ इति श्रीदेवानन्दे महाकाव्ये दिव्यप्रभपरनाम्नि ऐङ्काराङ्के माघसमस्यार्थे महोपाध्यायश्रीमेघ- विजयगणिविरचिते दक्षिणदिग्विजयनामा पञ्चमः सर्गः । श्रीः ॥ ५ ॥ षष्ठः सर्गः। 15. ॥ ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लौं ह्यौँ श्रीशद्वेश्वरपार्श्वनाथाय नमः ॥एँ नमः॥ अथ रिम्सुममुं युगपद्गिरौ नृसुरयोरवधार्य जपक्रमे । कमपि धित्सुमवेत्य ससंभ्रमं निजपदे जपदेवतयाऽऽजगे॥१॥ अथवा- अथ गणेन्दुरितो दुरितोज्झितः प्रवरगन्धपुरेऽधृत धारणाम् । १ 'नृपसभे' नृपाणां सभा नृपसभम् तत्र । २ 'मोहाभ्यमि-' मोहजयोद्यतस्य जिनशासनराजस्य शिबिरं चमूनिवेशः गूर्जरत्रा बभूव । ३ 'दुरन्ताऽल- दुष्टः अन्तो यस्याः ईदृक् अलक्ष्मीः मिथ्या- खम् तस्या विडम्बि निवारकम् । ४ "शिवकीर्तन- शिवं निरुपद्रवं कीर्तनं स्तुतिर्यस्य तस्य । ५ पाद्य-' पादार्घ पाद्यम् । ६ 'बलाक्रान्तः' बलां महीम् आक्रान्तः च्याप्तः । “बलो हस्ती बलं सैन्य बलं सत्त्वं बला औषधीः रत्नयोनिः बलो दैत्यो बला लक्ष्मीबला मही" इति अनेकार्थध्वनिमजरी [श्लो० ७७ श्लोकाधि.] ७ 'सौरम्' सूरेः इदं सौरम् । पक्षे सूरस्य रवेः सुराणां वा इदम्-सौरम् । ८ '-कनको' "कनको नागकेसरे धत्तूरे चम्पके काञ्चनार- किंशुकयोरपि" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० का० ३ लो. ११] ९ 'बलाक्रान्तः' "बलं रूपे स्थामनि स्थौल्य-सैन्ययोः ।। बोले बलस्तु बलिनि काके दैसे हलायुधे" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो० ४८८-४८९] १० 'अथ रिरंसुममुम्' अथ अमुं श्रीदेवसूरि मनुष्य-देवयोः गिरी वाण्यौ अवधार्य जपविधौ रिरंसु रन्तुमनसम् , च पुनः कमपि नरं शिष्यम् निजपदे धित्सुं स्थापयितुकामम् अवेत्य ज्ञासा जपदेवतया आजगे आगतम् । ११ 'निजपदे' “पदं विभक्त्यन्ते स्थाने शब्दे वाक्ये-अङ्क- वस्तुनि त्राणे पादे पादचिहे व्यवसाये उपदेशे च" इति अनेकार्थः [है. अने. सं. कां. २ श्लो० २२५-२२६] 1 मा. पं० स० श्लो० ६७ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । माघे 'भोगावली:'। 2 मा. पं० स० श्लो०६८ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 3 मा. पं० स० श्लो० ६९ चतुर्थः पादः चतुर्थत्वेन । 4 पूर्ववत् । 5 मा० ष. स .०१ प्रथमः पादः प्रथमतया । .

५८ 5 देवानन्दमहाकाव्यम् । [ षष्ठः सर्गः] कचन योजयितुं निजमुत्तमे भुवि पदं विपदन्तकृतं सताम् ॥२॥ नवपलाशपलाशवनं पुरस्ततरसालरसालयन हितम् । मुनिजपाय जायतमैक्ष्य स हृदि ननन्द न नन्दनतोऽधरम् ॥ ३ ॥ जपरसात् परसात् त्रिदशोऽप्यगात् गतमलं तमलं च परीक्षितुम् । व्यधित साधितसालदलायुधः स सुरभि सुरभि सुमनोभरैः ॥ ४ ॥ विलुलितालकसंहतिरामृशन् निधुवनश्रमवारि मृगीदृशाम् । हरिरपीयत फुल्लनसा मृगैः प्रसवयन सर्वयाककुभावलीम् ॥५॥ विघटयन्नलिनावलिसम्पुटान् प्रकटयन् मदनानमुद्भटम् । परिमलैर्मुनिराजमनुन्मिलत्कुवलयं बलयन् मरुदाववौ ॥ ६॥ तुलयति स्म विलोचनतारकामिह भुवः कुसुमाश्रयणेऽलिनी । मिथुनमप्यभवत् तदवेक्षणादनुनैगं तु न गन्तुमिह क्षमम् ॥७॥ कुसुमकेलिचिकी रसिकः स्त्रिया प्रसवविक्रयिकां करुणाशयः। इति जगाद सुमानि जनेऽद्य दा मलिनि मालिनि ? माऽधयोषिताम् ॥ ८॥ स्फुटमिवोज्वलकाञ्चनकान्तिभिर्वनमवेक्ष्य घनं नवचम्पकैः। प्रियमिहारमयत् सुरते वधूः पिहितं पिहितं कुसुमाम्बरैः ॥९॥ तिलकपुष्परजोऽनुरजद् दिशो भृशमराजत राजतरोचिषा। भसितमप्रियदाहभवं वृषाकपिशितं पिर्शितं मदनाग्निना ॥ १० ॥ [इति ग्रन्थविस्तरमिया प्रथमपादसमस्यात उपरम्यते ] 10 15 --------- १ "विपदन्त-' धारणाविशेषणम्-विपदन्तकृतं धारणाम् । २'-पलाश-' पलाशा:-पत्राणि । ३ '-रसालरसा-' रसालानाम्-आम्राणाम् , रसायां भूमौ । ४-लयनै-' व्यापनैः-व्याया। ५'-जपाय' ऋषीणां जपाय योग्यम् । ६ 'जपायत-' जपाभिः जातिभिः-जातिकुसुमैः आयत विस्तीर्णम् । ७ 'परसात्' परवशः। ८ 'सुरभिम्' वसन्तनातुम् । ९'हरिः वायुः। १० 'सवयः-' सपक्षिका दिपा पुष्पवती कुर्वन् । ११ -नुन्मिलत्' मुनिराजं च पुनः अनुन्मिलत् संकुचत् कुवलयम् । चकारोऽध्याहारात् बलवन्तं करोति बलयति शतृप्रत्यये बलयन् । पक्षे बलयन् नामयन्-ध्याने प्रह्वीकुर्वन् सूरिम् । १२ '-नगं' अनुनगं प्रतिवृक्षम् । १३ -चिकी-' चिकीर्षति इति चिकीः । १४ 'मलिनि' किंभूते जने ? मलिनि अर्थात् सशोके। १५'-योषिताम्' हे मालिनि! अधवयोषितां पुष्पाणि अद्य मा दाः। “धवः पतिर्धवो भीरुक्षजातेधवो मतः" इति अनेकार्थध्वनिमञ्जरी [श्लो० १३५ अर्घश्लोकाधि०] १६ 'कपिहितम्' वनवानरयोग्यम् । १७ "पिहितम्' पुष्पवसनैराच्छादितम् । १८'-दाह-' अप्रियाविरहभृतः। १९ -कपिशितम्' वृषाकपिः शिवः तद्वत् सितम् । २. 'पिशितम्' "पिशत् अवयवे" तुदादिः । पिश्चितम्- विस्तारितम् । 1.मा०प० स० श्लो. १ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 2 मा०प० स० श्लो०१प्रथमः पादः प्रथमतया। 3 मा०प० स० श्लो०२ चतुर्थः पादः चतुर्थतया । 4 मा०प० स० श्लो० ३ प्रथमः प्रथमतया। 5 मा०प० साली ३ चतुर्थ: चतुर्थतया । 6 मा०प० स० श्लो. ४ प्रथमः प्रथमतया। माघे "विलोचन- तारकाः' इति पाठः। 7 मा० ष० स० श्लो. ४ चतुर्थः चतुर्थतया । केवलं 'पद- च्छेदमेदः। 8 मा० ष० स० श्लो. ५प्रथमः प्रथमतया । 9 मा०प०स० श्लो५ चतुर्थः चतुर्थतया ।

६९ 5 [ षष्ठः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं रविकरैर्नलिनी प्रविबोधिता सरसिजाऽऽस्यममी कथमापपुः । इह रुषा परुषा मधुपवजानुपरि ते परितेपुरतो भृशम् ॥ ११ ॥ कमलकोमलकोशपदात् तदा कृतरवा तरवारिवदुल्वणा । स्मरनृपस्य हृताध्वगचेष्टितध्वनिरगांन्निरगान्मधुपावलिः ॥१२॥ विविधर्वाग्विधया सुधयाऽऽशुगा धृतरसा तरसा प्रियसङ्गमे । तमनुकूलयति स्म हदि समयच्छिदुरयाऽदुरयोचितमङ्गना ॥१३॥ मृगशामपि नैव मुनीश्वराः शिखरिधीरताँ रतयाचनैः। सुषमया सुरभेः सुरभेदकेश्वरजितार्जिंता वशमाययुः ॥ १४ ॥ विभुरभून्न विचालयितुं सुरो जपरतेः परतेजसमीश्वरम् । व्यमुचदम्वुमुचां घटयोचकैरनृतयाऽनृतया वनपादपः ॥१५॥ जलधिमुच्छलितं च्छलितन्त्रतः स विरचय्य पुरः सुर इत्यवक् । ब्रज विभोऽन्धितटे लहरी वहन्नवलते वलतेऽभिमुखं तव ॥१६॥ विरम दुश्चरणाचरणादतो भज नवप्रमदाः प्रमदालसाः। तव किमद्भुतरूपरवौ यथा मम न सौमनसौ मनसो मुदे ॥१७॥ मुंर इति प्रभुमादिशति क्षणादर्थ सुशासनशासनदेवता । पुरत एव वपुलतया प्रिया वलिभाऽऽलिभयादिव सखजे ॥१८॥ 10 15 . १'-अगात्-' अगं वृक्षम् अतति इति अगात् [अग+ अतू अगात्] २'-वाग्विधया' किंभूतया सुधया ? विविधवाक्प्रकारया। ३ 'तरसा' शीघ्रम् । ४ सय- स्मयः अहंकारः तस्य छेदे समर्थया । ५'-अदुरया-' दुर् दुष्टा, आ लक्ष्मी:-दुरा न दुरा अदुरा तया चितं व्याप्तं तम्-अदुरया-चितम्-नायकम् । यद्वा न दुष्टः अयो भाग्यं यस्य तेन आचितं व्याप्तम्-अदुरयाचितम् [अ+ दुर्+अय+आचित-] ६'-रिधीरतया-'घिया बुद्ध्या रतं धीरतम् , शिखरिणि धीरतं यस्याः सा तया सुषमया । ७ 'सुषमया' किंभूतया ? सुरमेर्वसन्तस्य सुषमया शोभया, सुराणामपि भेदको जेता ईश्वरः तस्य जिता-जयकारिण्या । ८'-अरजिता' रजखन्तं करोति रजयति, णौ मलर्थलोपे क्तप्रत्यये रजिता न रजिता अरजिताः-अलिप्ताः । यद्वा 'न वश- माययुः' काकुः वशं प्राप्ताः तदा वसन्तशोभया अरम् अत्यर्थ जिता:-अरजिताः। ९'-अनृतयाऽन्तया' अनृतया असत्यया विकुर्वितया, अनु- तया अप्राप्तया [ऋत प्राप्त । अन्-ऋत-अनृत] १० 'वनपादपः' वनं जलं पातीति वनपो वरुणः, ततः अपः वारीणि व्यमुचत् अम्बुमुचां घटया । ११ 'ब्रज विभो !' हे विभो ! अन्धितटे व्रज । किंभूते ? वह- नवलते, लहरी तव अभिमुखं वलते-तत्र रत्नसद्भावालोमेन क्षुभ्यतु । यद्वा भयसंदीपनम्-अयं समुद्रः आयाति' तट याहि इति भावः। १२ 'सौमनसौ' यथा मम सौमनसौ देवसंबन्धिनौ रूप-रवौ मनसो मुदे भवतः तथा तव किं न मुदे ? १३ 'सुर' सुरे देवे प्रभुम् इति आदिशति सति शासनदेवता पुरत एव वपुलतया सखजे खशरीरेण आगत्य मिमीले-शरीरेण मिलिता सांक्षाद् बभूव इत्यर्थः । १४ 'वलिभया' किंभूतया वपुलतया वलिभया त्रिवलीयुक्तया। १५'-आलिभया-' आलिः अनर्थः तद्भयादिव एवं गुरुं विरु- द्धवचनैनिमन्त्रयन् अनर्थ सुरः प्राप्स्यति इति । “आलिः सख्या- वलीसेवनर्थेषु" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो०.४६४] nimme जिता" इति मेदः । 5 मा० १० स० श्लो. १० चतुर्थः चतुर्थतया। 6 मा०प० स० श्लो. ११ चतुर्थः चतुर्थतया। 7 मा०प० स० श्लो. १२ चतुर्थः चतुर्थतया । 8 मा० १० स० ओ० १३ चतुर्थः चतुर्थतया। माघे- -'अलिभया- 1 मा० ष० स० श्लो० ६ चतुर्थः चतुर्थतया । 2 मा० ष० स० श्लो. ७ चतुर्थः चतुर्थतया । 3 मा०प० स० श्लो। चतुर्थः चतुर्थतया । 'माधे-'चित. मानाः' इति:पाठ:: 4 मा. ष० स० श्लो. ९ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे-खर- 5 देवानन्दमहाकाव्यम् । [षष्ठः सर्गः] सुरगिरेरपि धैर्यगुरुं गुरुं बत किमादिशसि भ्रमसम्भ्रमात् । रजति यो न हरेः प्रियया स किं कलकलोऽलकलोलशाऽन्यया ॥ १९ ॥ अजगणद् गणशो न सुराङ्गनास्तरुणतारुणताभृदयं पुरा । जरसि पश्यति किं स मनोभुवा विधुरिता धुरि ताः कुकुरस्त्रियः ॥ २० ॥ इति निवार्य सुरार्यमणं दिवो मृगशाऽस्य जगे गुणसङ्गतिः। कलगिरा यदुपश्रुतिभिर्लयात किमु मुहुर्मुमुहुर्गतभर्तृकाः ॥ २१ ॥ अहिपतेरवशाऽऽर वशा रसाजपनिलीनमना नमनाशया। परिजनस्य निवार्य धरागतावधिगमं धिगमङ्गलमश्रुगः ॥ २२ ॥ श्रुतसुरी भुवनत्रितयेश्वरी श्रियमिति प्रवदन्त्यचिरादगात् । न समुपैम्यधुनेत्युदिता शनैरवितथा वितथाः सखि ! मा गिरः ॥ २३ ॥ अवगमर्त्यगणो गणवासवं जपं विधेयविधेयमिहादिश । विनयतो नयतोयधिरप्यतः स्वरमृतैरमृतैरिव निर्ववौं ॥ २४ ॥ प्रभविता भवितायि पदे नु मे क इह पट्ट दित्युदितेऽमुना । ऋतुभुजा तु भुजार्जितसद्यशोध्वनिभृता निभृताक्षरमुजगे' ॥ २५ ॥ जयति वीरपदाद विजयः सुधीः समयिनामयि ! नाथ ! रविः स यः। समुनियोगनियोगतपःक्रमैरुदवहद् दवहव्यभुजः श्रियम् ॥ २६ ॥ परमते रमते खलु यन्मतिः प्रवचने वचनेऽपि च यः पटुः। " 10 15 १ 'कलकलो-' कला मधुरा अजीर्णा कला यस्य सः । २-अलकलोल-' अलकैः पक्ष्मकेशैः लोले दृशौ यस्याः सा तया-मानुष्या न रजति हरेः प्रियया शच्या श्रिया वा । ३ 'धुरि' धुरि इति प्रथमं पश्यत्यपि न तर्हि तद्भोगवार्ता का? ४ 'कुकुरस्त्रि-'कु कुत्सितम् कुलं देहः विण्मूत्रमयखात् यासां ताः । “कुलं कुलगणे देहे गेहे जनपदेऽन्वये” इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो० ४६९] ५'-अस्य' प्रभोः। ६ 'लयात्' "लयस्तूर्यत्रयीसाम्ये संश्लेषण-विलासयोः" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो० ३७० ] लक्षणया मूर्च्छया। ७ 'अहिपतेः-'धरणेन्द्रस्य वशा स्त्री रसाद् अवशा शीघ्रम् आर प्राप। ८'-अश्रुणः' पृथिव्याम् आगमने विरहात अश्रुणः अधिगमं परिजनस्य निवार्य अमङ्गलं धिग् इति । ९ 'समुपैमि-' हे सखि ! अहं संप्रति न समुपैमि' इति शनैः उदिता गिरः अवितथाः सत्याः मा वितथाः कार्षीः-शीघ्र- मेव आगच्छ इति । १० 'जप-जपस्य विधेयो विनयः तस्य विधेयं कार्य कथय । अतः देववाक्याद् नयपयोधिः निर्ववौ-निवृतिं सुखं प्राप खः खर्गस्य अयाचितैः अमृतैः अमृतैः पीयूषैरिव । ११ पट्ट- “पश्चतुष्पथे पीठे राजादेः शासनान्तरे" इति अनेकार्थः [ है. अने० सं० कां० २ श्लो. ९१] १२ 'ऋतुभुजा देवेन । १३ 'निभृताक्षर-'निर्णीतवर्णम् । १४ 'समयिना-समयिना सिद्धान्तविदाम् रविः । “समयः शपथे भाषा-संपदोः काल-संविदोः । सिद्धान्ताचारसंकेतनिय- मावसरेषु च" इति अनेकार्थः [ है. अने० सं० कां. ३ श्लो. ५०२-५०३] १५'-योगनियोग-' मुनीनां योगा उपधानानि, नियोगः आज्ञा, तपश्च तेषां ऋमैः। १६ 'दवहव्य-' दवानलहव्यभुजः। 1 मा० ष० स० श्लोक १४ चतुर्थः चतुर्थतया । 2 मा०प० स० लो १५ चतुर्थः चतुर्थतया । मा०प० स० श्लो०.१६.चतुर्थः चतुर्थतया । मा०५० स० ग्लो० १७ चतुर्थः चतुर्थतया। 5.मा.प. स.लो. १८ चतुर्थः चतुर्थतया। 6 मा० १० स० श्लो. १९ चतुर्थः चतुर्थतया । 7 मा. १० स० श्लो० २० चतुर्थः चतुर्थतया । 8 मा०प० स० श्लो० २१ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे 'दव- हव्यवहश्रियम्' इति मेदः ।

६१ 5 [षष्ठः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं विरतिधीरतिधीर ! विवक्ष्यति शुचिरसौ चिरसौरभसम्पदः ॥ २७ ॥ नवमतिर्वमति स्म न सद्रुचिं जनिकृती निकृतीन दधावयम् । घनवशं न वसन्तदिने वने भ्रमदलौ मदलौल्यमुपाददें ॥२८॥ सपदि मूर्ध्नि सहैव सुधाभुजां कविविधोर्विविधोक्तिकृतामिति । सरसचन्दनरेणुरनुक्षणं विचकरे च करेण वरोरुभिः ॥ २९ ॥ अथ गतेषु सुरेषु जगद्गुरुं जपतपोमहसाऽर्कमिवोद्धरम् । समभिवन्दितुमिभ्यततिः श्रुतखसमया समयाजगंतीधरम् ॥ ३०॥ अहमदादणहिल्लकपत्तनाद् जनपदाजनताचलने नरः। सुहृदमन्वयितुं पितृवारणे न चकमे च कमेकरसं रहः ॥ ३१ ॥ रथगतिः स्तनितानि वदान्यतां पथि जनो जगृहे प्रसरत्कुथम् । द्विपगणस्य घनस्य धनुर्भूतः शबलिमा बलिमानमुषो वपुः ॥ ३२॥ पथि रथेषु चलत्सु समीरणैः प्रकटिता पिहिता पटमण्डपैः। नववधूरभितः कि, शारदैरचिररोचिररोचत वारिदैः ॥ ३३ ॥ व्युपैरतं परतन्त्रविधेलयात् तमधिगम्य गुरुं जनता नता। पुरमपि स्थितये सदने क्षणैर्विधुरबन्धुरबन्धुरैमैक्षत ॥ ३४ ॥ सधनरत्नमुखव्यवहारिणामिह महाग्रहतो विहगेक्षणे । मुनिपतेरनुकूलतया ववौ जनमनोनमनो घनौरुतः ॥ ३५ ॥ 10 15 १ 'चिरसौरभ-' हे अतिधीर! असौ सुधीः सूरीणां समूहः सौरम् तस्य भा यासु ताः भाश्च ताः संपदश्च विवक्ष्यति परिणेष्यति । चिरं सौरभसंपदः चिरसौरभसंपदः “विस्पष्टपटुः" इत्यादिवत् समासः। २ 'जनिकृती' जनेर्जन्मनः कृती दक्षः । ३ 'निकृती-' मायाः । 'मदलौल्यम्' मदेन चापल्यम्- मनोविकारम् । ४ 'वरोरुभिः' सुधाभुजां देवानाम् वरोरुभिः बीभिः कवि- विधोः वीरस्य मूर्ध्नि सरसचन्दनरेणुः विचकरे विकीर्णः । ५ 'जगती-जगती क्षमा तद्धारकम् । ६ 'अहमदा-' पदैकदेशे पदसमुदायोपचारात् अहमदाबाद- नगरात् । ७ 'कमेक' कम्-सुहृदम्-मित्रम् अन्वयितुम् अनुयातुं न चकमेन इयेष। ८ 'रथगतिः' रथगतिः घनस्य खनितानि जगृहे, जनः वदान्यतां दातृत्वं जगृहे । तदा घनस्य शबलिमा गजगणस्य वपुर्जगृहे । किंभूतस्य गजगणस्य ? बलिमानमुषः। ९ 'प्रसरत्कुथम्' करिकम्बलयुक्तम् । १० "किमु किमु वितर्के नववधूः अरोचत अथवा शारदैर्वारिदैः पिहिता विद्युत् । ११ 'व्युपरतम्' निवृत्तम् । १२ -विधुरबन्धुः-' जनता क्षणैः उत्सवैः विधुरबन्धुः व्याकु- लखजना पुरमपि अबन्धुरं भीमम् ऐक्षत। १३ '-अबन्धुरम्-' यद्वा अपाम् अन्धवः कूपाः तैः राजते- अबन्धुरम् । यद्वा "बन्धुरा पण्ययोषायाम्" [है. अने० सं० कां० ३ श्लो० ५७५] इति वचनात् तद्रहितं सुशीलम् । १४ '-धन-रन-'धनजीसहितरत्नमुख्यव्यवहारिणाम् । १५ 'जनमनोनमनो-' जनमनः नमयति-प्रह्वयति-तत्परं करोति इति जनमनोनमनः। १६ 'धन- "घनो मन्दो धनं नित्यम्" इति मञ्जरी । www 6 मा०प० स० श्लो० २७ चतुर्थः चतुर्थतया । 7 मा०प० स० श्लो० २८ चतुर्थः चतुर्थतया । 8 मा०प० स० श्लो. २९ चतुर्थः चतुर्थतया । 9 मा०प० स० ग्लो०३. चतुर्थः चतुर्थतया । 1 मा०प० स० श्लो. २२ चतुर्थः चतुर्थतया । 2 मा०प० स० श्लोक २३ चतुर्थः चतुर्थतया । 3 मा० ष० स० श्लो०२४ चतुर्थः चतुर्थतया । 4 मा०प० स० श्लो० २५ चतुर्थः चतुर्थतया । 5 मा० १० स० श्लो. २६ चतुर्थः चतुर्थतया ।

: 5 देवानन्दमहाकाव्यम् । [षष्ठः सर्गः] चरमतीर्थकृतश्चरणाम्बुजप्रहितपत्रगिरामिव बोधनैः। नृपतिवाद्यततिथंगदन्महाध्वनिजयोन्निजया वनसम्पदा ॥ ३६॥ अथ स साहिवदेतनयोऽतनोत् पटुपटैनवमण्डपमुच्चकैः। इह रतिर्वहुमार्जनया नृणां नवनवा वनवायुभिराधे ॥ ३७ ।। शमिततापमपोढमहीरजः प्रथमविन्दुभिरम्बुमुचोऽम्भसाम् । प्रविरलैरचलाङ्गणमङ्गनाजनसुंगं न सुगन्धि न चक्रिरे ॥ ३८ ॥ प्रशमितं रजसा शमितं जनैः प्रमुदितं सुदृशामुदितत्विषा । अजिरमम्बुरुहैमनुजाः सभाँ-जनसुगं न सुगन्धि न चक्रिरे ॥ ३९॥ सदखईत्यभिधेयमहेभ्यभूरचितचारुदुकूलजनाश्रये । घनघनौघविघटनया दिवमरतिसूरतिशून्यदशाऽऽश्रयत् ॥ ४०॥ निरुपमौक्तिकमौक्तिकपङ्किभृद्धरिवितानवितानकभौजितम् । तदधुनापि भियैति दिवोऽम्बुधौ कृशशिखं शशिखण्डमिव च्युतम् ॥४१॥ सरसभुक्तिसुयुक्तविधौ दधौ स कलधौतमयीः पृथुपात्रिकाः। वसुंहिताः सुहिताः पयसा जना विदधिरे दधिरेऽणुविडम्बनाम् ॥४२॥ सकलसङ्घविशां परिधापने तदधिवासनया सनयाँगतः। 10 15 १ 'महाध्वनिजयान्' राजमार्गे जयारावान् । २ 'नवनवा' "प्रकारे गुणवचने च” इति द्विर्भावः। ("प्रकारे गुणवचनस्य"-८1१1१२ इति पाणिनीयसूत्रम् ) कर्मधारयवद्- भावात् विभक्तेलक। ३'-अम्बुमुचो-' अम्बुमुचः जलवाहका जनाः 'सिक्का' इति भाषाप्रसिद्धाः ।। . . ४ 'अचलाङ्गणमङ्गना' अचलाङ्गणम् । अङ्गनाजनसुगं चक्रिरे । सुष्छु गच्छति इति सुगः अङ्गनाज़नः सुगो यत्र तत्-अङ्गनाजन- सुगम् । अम्भसां प्रथमबिन्दुभिः न सुगन्धि इति न किन्तु सुगन्धि। ... ५. प्रशमितम्' 'प्रशमितम्' इत्यत्र खार्थे ण्यन्तलम् । ६ 'सुदृशा-' सुदृशां सम्यक्लवताम् स्त्रीणां वा उदितखिषा प्रमुदितं विकसितम् । ७ सभाजनसुगम्' "सभाजन प्रीति-सेवनयोः" दर्शनेऽपि चुरादिः ।. ८. सदखई-'. सन् सत्पुरुषः-अखईसुतः वर्धमाननामा । ....९ धनौघ-'धनस्य संघस्य धनौधेन भृत्येन वाद्यप्रकारेण वा विघटना संमर्दः. तया नमः शून्यमिव जातम्-देवानाम् अत्र आगमनेन वर्गोऽपि शून्यः । “घनः सान्द्रे दृढे दायें विस्तारे मुद्गरेऽम्बुदे । संघे मुस्ते" इति अनेकार्थः [ है. अने० सं० का. २ श्लो० २५८] १० 'अरतिसू-' अरतिं सूते इति अरतिसूः । ईदृशी शून्यदशा दिवमाश्रयत् । ११ 'निरुपमौक्तिक-' उपमाया औक्तिकानि वाक्प्रपञ्चरूपाणि तानि अतिक्रान्तानि ईदृशानि मौक्तिकानि । १२ -वितानवितानक- वितानाश्चन्द्रोदयाः तेषां वितानक विस्तारः समूहो वा। १३ '-भाजितम्' कान्त्या जितम् । १४ 'च्युतम्' दिवः च्युतं शशिखण्डम् अधुना भिया अम्बुधौ एतीव यातीव-चन्द्रोदयानां भया कान्त्या जितं शशिखण्डं भिया भयेन समुद्रे यातीव । १५ 'वसुहिताः' वसूनां धनानां योग्याः । दुग्धेन भृताः दधि- रेणुविडम्बनाः तिरस्क्रियाः । १६. यद्वा दधि राति दत्ते यतत्र दधिरे, अणुः अल्पा या विडम्बना ताम्-संप्रति दधि न ग्राह्यम् । १७ तदधिवासनया' गन्धमाल्यादिना यः संस्कारः स:- अधिवासना तया । १८ 'सनयागतैः' नयेन नीत्या आगतम्-आगमनं तत्सहितैः । - . 1 मा०प० स० लो० ३१ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे ध्वनिजया निजया' इति मेदः । 2 मा०प० स० श्लो० ३२ चतुर्थः चतुर्थतया । मा०प० स० श्लो०:३३ चतुर्थः चतुर्थतया ।। 4 मा०प० स० श्लो० ३३ चतुर्थः चतुर्थतया । 5 मा० ष० स० श्लो० ३४ तृतीयः पादः तृतीयतया । माघे 'दिवः' इति । 6 मा०प० स० श्लो०३४ चतुर्थः चतुर्थतया । 7 मा०प० स० श्लो०:३५ चतुर्थः चतुर्थतया । ।

[षष्ठः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं 5 प्रतिहतैकमलैः सितिमाप्यहो शुभरजो भरजोलिभिरादधे॥४३॥ निजरजः पटवासमिवाकिरत् तरुणतोरणनीरजधोरणिः । विवुधवीरशिरस्युदयप्रभानियतिकाऽऽयतिकार्यनिवेदिनीं ॥४४॥ पुरमुदश्चितकेतुकरां सी दिवमिवाऽऽहयितुं कृतसत्क्रियाम् । अमहयत् कुसुमैन किमुष्मणामनवनी नवनीपवनावलिः ॥४५॥ व्यरचि चित्रपटैरतिचित्रकृत् स चतुरैरभिषेचनमण्डपः। दृढविधेयधियोऽपि यमीक्षितुं ववलिरे वलिरेचितमध्यमाः ॥ ४६ ॥ निधिवियन्नगभूमितवत्सरे धवलमाधवदिकतिथिवासरे। तदभिषेकमहेऽभिहिते जनैरननुते ननृते नवपल्लवैः ॥४७ ।। विवुधवीरवराय निजं पदं रसमये समये गुरवो ददुः। 10 कलगिरा जगुरेणदृशांगणास्तमथ मन्मथमन्थरभाषिणम् ॥४८॥ विजयतःप्रभनामगुरोगिरा प्रविदधच्छरदामयुतं जयम् । त्वमिह नाथ ! भुवं सुकृतैर्नृणामपरथाऽऽप रथावयवायुधः ॥ ४९ ॥ घुसृणचन्दनचूर्णविलेपनोत्सर्वशिरा वशिराः स नवः सभाम् । ध्रुवमबोधयदर्थिभृशाहतक्षमेघनामघनाशनकीर्तनः ॥५०॥ जगति नैशमशीतकरः करैर्हसति सान्द्रतमस्सु सँहायवान् । इति विनीतकवेवरवाचकपदमदादमदाऽसुमतां गुरुः ॥ ५१ ॥ विदलिता कमला कमलालयाऽमृतरुचा खुदयेन तमक्षिपत् । १ 'सितिमा-' अलिभिः अपि धवलता धृता तर्हि नृणां धव रम्-ईदृग् भाषते इत्येवंशीलम् । लत्वे किं चित्रम् ? इति 'अपेः' भिन्नक्रमयोजितस्यार्थः । ९ 'रथावयवा- अपरथा प्रकारान्तरेण रथावयवः चक्रम् २'-उदयप्रभा-' उदयस्य भाविसूरिपदस्य या प्रभा तस्या तदायुधः चक्री कृष्णो वा भुवम् आप प्राप। नियतिः निश्चयो यत्र ईदृक् आयतिकार्यम् तस्य ज्ञापिका । १० 'उत्सवशिरा उत्सवः अत्र इच्छाप्रसरः । “उत्सवोऽमर्षे '-अनवनी' उष्मणां तापानाम् अनवनी अरक्षिका [अन्+ महे इच्छाप्रसर उत्सुके” इति अनेकार्थः [ है. अने० सं० कां. ३ अवनी] श्लो० ६८९] ४ "निधि- सं० १७०९ वर्षे वैशाखसितदशमीतिथौ । ११ 'वशिराट्' सूरिः। ५'-अनन्ते' न विद्यते अनृतम् अलीकं दूषणं यत्र । १२ 'अर्थिभृशा-' अर्थिमिः मृशम् आहतानि-गन्धर्वैर्वादि- ६ 'नवपल्लवैः' पल्लवोऽत्र विस्तरः । “पल्लवः किशले बले। तानि क्षमाणि तालादीनि घनानि यस्यां सा ताम्-अर्थिभृशाह- विटपे विस्तरे" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां. ३ श्लो. तक्षमघनां सभाम् । ६९८] यद्वा पल्लवैः गीतपदलेशैः। १३'-अघना-' पापनाशनस्तवनः । ७ 'निजम्' "निजमात्मीय-नित्ययोः" इति वैजयन्ती। १४ 'सहाय-'ग्रहतारकादिसहायसहितः । ८'मन्मथ-' मन्मथस्य मन्थं भङ्गं राति दत्ते मन्मथमन्थ १५'-अमदासु-' मदरहितप्राणिनां पूज्यः । 15 ३ 1 मा० ष० स० श्लो०३६ चतुर्थः चतुर्थतया।माघे-'राददे। 2 मा०प० स० श्लो. ३७ प्रथमः प्रथमतया । मा० ष० स० श्लो० ३७ चतुर्थः चतुर्थतया। 4 मा० १० स० श्लो० ३८ चतुर्थः चतुर्थतया। 5मा०प० स० ग्लो. ३९ चतुर्थः चतुर्थतया । 6 मा०प० स० श्लो. ४. चतुर्थः चतुर्थतया । माघे '-भाषिणः' इति । 7 मा०प० स० श्लो. ४१ चतुर्थः चतुर्थतया । 8 भा० ष० स० श्लो० ४२ चतुर्थः चतुर्थतया । 9 मा०प० स० श्लो० ४३ प्रथमः प्रथमतया ।

5 10 15 "आलि. देवानन्दसहार हाकाव्यम् । [षष्ठः सर्गः] सपदि सौरमहो वद नाम्बुजं न महतामंहताः कचनारयः ॥५२॥ धनवतां नवताण्डवकारिणां ध्वनिलयानिलया मुरजावले। जलधरभ्रमनृत्यकृतक्रमखरमयूरमयू रमणीयताम् ॥ ५३॥ अनुपदं नु पदं सुगुरौ श्रिते परविभा रविभासुरभूषणैः । असिचयैः सिचयैरिव मान्मथैः रुरुचिरे रुचिरेक्षणविभ्रमाः ॥५४॥ अनवमं नवमङ्गलमाश्रिते वजनभोजनभोगरसार्पणे । समधुरा मधुरा निदधे सुधानिरसनै रसनैरवृथार्थता ॥ ५५ ॥ जगति सद्गुरुकीर्तिभिरुज्ज्वले न रुचिता रुचिता किल मौक्तिकी। तदरतेरिव हृद्विवरं दधौ परिभवोऽरिभवो हि सुदुःसहः ॥५६॥ उपवनात् पवनाश्व ववुः शुभाः सुषमया खमयाद् विशदप्रभाम् । भृशमये ! समयेऽत्र रसाश्रये न कमलं कमलम्भयदम्भसि ॥ ५७ ॥ चरमतीर्थकृतोऽजनि नामभृत् तदपराह्वयसूरिपदोत्सवे । श्रुतंतदीरितकोमलगीतकः समैनृणामनृणामतनोद दशाम् ॥ ५८ ॥ भवनमेव न मे गुरुरेतु किं वरवधूरवधूततयेतिगी। उपगतेऽस्य रुचिं निपपौ धनध्वनिमिषेऽनिमिषेक्षणमग्रतः ॥ ५९॥ इति यतिक्षितिपालपदोत्सवे वसुकृतैः सुकृतैर्जनितं यशः। कुलगिरौ जगुरुन्मददेवताः सततगास्ततगानगिरोऽलिभिः ॥६॥ निजपदे खविनेयनिवेशनादनुययावथ सूरतिबन्दिरे । १ 'सौरम्-' सूरेः इदं सौरम् । पक्षे प्रभाते सूर्यतेजः चन्द्रम् ११ 'चरमतीर्थ-' चरमाहन्नाम जन्मनि वर्धमान-नाम इत्यर्थः अक्षिपत् । 'हे जन !' इति अध्याहारात् वं वद । तस्यैव जिनस्य अपरनाम 'वीर' इति, तन्नाम्नः सूरिपदोत्सवे । २ 'महताम्' महताम् अरयः क्वचन अहता न । १२ 'श्रुत-'श्रुतानि तस्य सूरेः ईरितानि उक्तानि गीतानि ३ 'जलधर-' जलधरस्य भ्रमेण नृत्ये कृतो यः क्रमेण खरो यैस्ताहशा मयूरा यत्र तत् । १३ 'समनृणाम्' सर्वनराणाम् 'अनृणाम्' ऋणरहिताम् । ४'-अयुः' अयुः प्रापुः रम्यताम्-रमणीयताम् । १४ 'वरवधू-' किंभूता वरवधूः ? इतिगीः इतीति किम् ? किं ५'रुचिरेक्षण-' स्त्रियः। गुरुमै भवनं न एतु। ६ 'समधुरा' तुल्यविभागेन मधुरा रुचिरा । १५ 'घनध्वनि-' घनानां ध्वनिस्पर्धने उपगते प्रत्यासन्ने अस्य ७ 'सुधानि-' सुधाया निरसनं पराकरणं येभ्यस्तैः । 'रसनै-' गुरोः कान्ति निपपौ सादरं ददर्श । "मिषं व्याजे स्पर्धने च" इति "रसनं ध्वनिते खादे" इति अनेकार्थः [ है. अने० सं० कां. ३ अनेकार्थः [ है. अने० सं० कां. २ श्लो० ५५५] १६ 'अनिमिषे-'न निमिषति इति अनिमिषम् ईदृक् ईक्षणं ८-अवृथार्थता' यथार्थता अशनै जनैर्निदधे । यत्र कर्मणि । ९ 'मौक्तिकी' मौक्तिकी रुचिता कान्तिभावः न शोभिता । १७ 'अलिमिः' अलिभिः अम्भोरसैः ततगानगिरः देवताः । अत एव अरतेः दुःखात हृद्विवरं छिद्रे पत्ते म । १० 'सुषमया' शोभया। अने० सं० कां० २ श्लो• ४६३] अलिभिरिव इति लुप्तोपमा । Chana 1 मा०प० स० श्लो ४३ चतुर्थः चतुर्थतया। 6 मा. ष० स० श्लो० ४८ चतुर्थः चतुर्थतया । 2 मा० १० स० श्लो०४४ चतुर्थः चतुर्थतया । 7 मा० ष० स० श्लो. ४९ तृतीयः तृतीयतया।माघे 'गीतक' मा० ० स०को०.४६ चतुर्थः चतुर्थतथा । इति विसर्गविहीनम् । 4 मा० ष० स० श्लो०४७ चतुर्थः चतुर्थतया । 8 मा० ष० स० श्लो०४९ चतुर्थः चतुर्थतया। 5 मार० स० श्लो.४५ चतुर्थः चतुर्थतया । 9 मा०प० स० को०.५० चतुर्थः चतुर्थतया। येन सः । ग्लो ३९४] 5 10 [षष्ठः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं यतिपतिः प्रविभाव्य ऋतौ पुरःशरंदि नीरदिनीर्यदेवो दिशः ॥ ६१ ॥ शुंचिरयादिनमप्यधितापयन् प्रथमतोऽथ मतो न घेनाद् भुवः। इह वनी रतयेऽस्य शिरीषजां हरिवधूरिव धूलिमुदक्षिपत्' । ६२ ॥ स्मितमिव स्फुटयन्नवमल्लिकां शुचिरयं चिरयन दिवसानभात् । तदभिनन्दनमाशु रजाकणैर्दिवि तता विततान शुकावलिः ॥ १३ ॥ प्रकृतपुष्करहंसचिरस्थितिः कृशैरसां सरसां प्रणयन् भुवम् । तुलयति स्म यतिस्मयभेदनः से शरदं शरवन्तुरदिग्मुखाम् ॥ ६४ ॥ [ग्रीष्मः ] नभसि साम्भसि सान्द्रघनाघने सहरिता हरिताहृति क्षितिः। भरमपारमपाऽध्वधरस्पेशामतनुताऽतनुतापकृतं दृशोः ॥६५॥ वरतनो रतनोदकलागुरुर्घनवनीनवनीपकरः कथम् । मृदुतरो दुतरोरघनानिलः सतुहिनस्तु हिनस्तु वियोगिनः ॥ ६६ ॥ खनवतो नवतोयधराद् वधू सहसा सहसा तडितां प्रियम् । भृशमनार्शमनाः खयमाश्रयत् न सहसा सहसा कृतवेपथुः ॥ ६७ ॥ [इति वर्षाः ] शरदभादू रदभासिहसश्रिया धवलया वलयायितपङ्कजैः। धृतरुचा तरुचारुसुपल्लवैर्मृदुतया द्रुतयाधरलेखया ॥ ६८॥ रतरसात् तरसाऽत्र निरंशुकादयिता दयिता दयिताग्रहात् । १ 'पुरःशरदि' पुरः-अग्रे शरद् यस्य तत्र-वर्षाकाले । ताम् । “तुल्यौ तिलाने कृसरत्रिसरौ” इति हैमः । । हैम-अभि- २ 'नीरदिनी- मेघवतीः । धानचिन्तामणौ का० ३ श्लो० ६२] ३ 'यदवो' 'यत्' इति अव्ययम् । अवति रक्षति अवः-रक्षकः १२ 'स-' आषाढः शरदं शरतुं तुलयति स्म । पचायचि रूपम् । १३ 'सहरिता' सतृणा। ४ 'शुचि-' शुचिः आषाढः अयात्-प्रापत् । १४ 'हरिता-' हरिः सूर्यः तस्य तापहृति मेघे। ५'घनाद्' धनात् प्रथमतः पूर्वम् इनं सूर्यम् खामिनं वा १५ 'अपाध्वधरस्पृशाम्' विरहिणीनाम् । 'अतनु- स्मरः । अतनुत इति क्रिया। ६ 'हरिवधूः-' हरेः सूर्यस्य वधूरिव वनी वनसमूहः अस्य १६ 'दुतरोर-' दुता उपतप्ताः रोराः दरिद्राः यस्मात् सः। इनस्य रतये सुखाय शिरीषजां शीतलां कोमलां धूलिं चिक्षेप । उपतापे ७ "चिरयन् चिरं कुर्वन् । १७ 'नसहसा' हसेन हास्येन सह सहसा-न सहसा नसहसा 'तदभिनन्दन' तस्स आषाढस्य अभिनन्दनं वर्धापनम् । शोकयुक्ता । नञ्प्रतिरूपेण 'न' इति अव्ययेन समासः। ९ 'शुका-' शिरीषपुष्पराजिः । “शुकं प्रन्थिपणेऽरलू-शिरी १८ 'भृशमनाश-'भृशम् अनाशम्-आशारहितं मनो यस्याः सा। षपुष्पयोः" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो. १९] १९ -आश्रयत्' सा स्त्री तडितां सहसा बलेन 'कृतवेपथुः' १. 'पुष्कर- गगने । '-हंस- सूर्यः । पक्षे पुष्करं कमलम् , कृतकम्पा खयमेव प्रियमाश्रयत् न तु बलेन । सहसा शीघ्रं वा । हंसः मरालः । प्रकृता पुष्करे गगने हंसेन सूर्येण चिरस्थितियत्र । २० 'दुतया-' प्राप्तया । "दुं गतौ धातुः"-भ्वादिः । ११ 'कृशरसाम्' शुष्काम् । पक्षे तिलान्नस्य सा लक्ष्मीर्यस्यां सा २१-अयिता' अयिता निर्गता। "अय गती धातुः"। 15 तापयन् । "टुदु धातुः" "-खादिः। 1 मा०प० स० श्लो. ५१ चतुर्थः चतुर्थतया । 2 मा०प० स० श्लो० ५२ चतुर्थः चतुर्थतया । 3 मा. प० स० ० ५३ चतुर्थः चतुर्थतया । 4 मा० ष० स० श्लो० ५४ चतुर्थः चतुर्थतया । 5 मा०प० स० श्लो. ५५ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे 'दृशाम्' इति। 6 मा. प. स. श्लो. ५६ चतुर्थः चतुर्थतया । 7 मा० १० स० श्लो० ५७ चतुर्थः चतुर्थतया । 8 मा०प० स० श्लो० ५९ चतुर्थः चतुर्थतया ।

देवानन्दमहाकाव्यम् । [षष्ठः सर्गः] हियमिता यमिताऽपि पयोमुचा निवसितेने सितेन सुनिर्ववौ ॥ ६९ ॥ नवसुधा वसुधाभरणं विधोः कलेमजालमजातरसक्षयम् । सिततमाः ततमानभृता प्रियं वनितयाऽनितँया न विषेहिरें ॥ ७० ॥ [इति शरत् ] कमलिनीमलिनीकरणे सहे कुसुमितासु मितासु वनीष्वपि । सुकरणकरणैः स्म रसं श्रियः स्मरमयं रमयन्ति विलासिनः ॥७१ ॥ सरलतारलताः परिकम्पयन् मदनवेदनवेगवतीय॑धात् । हिमहता महता तरसा प्रियैर्वियुवतीर्युवतीः शिशिरोऽनिलः ॥७२॥ बलवतो लवतोऽपि महः क्षयं नयति संयति संगमनं जने । रविरतोऽविरतो जडसन्निधौ न हि महाहिमहानिकरोऽभवत् ॥ ७३ ॥ [ इति हेमन्तः ] नरमणे ! रमणे तपसि स्त्रिया सह स ना हसनाय समीरितः। अरुणभोऽरुणभोग्यरजश्चयो द्युतिरयं तिरयन्नुदभूदु दिशः ॥७४ ॥ मदमिते दमिते स्वगुणैर्मयि त्यज रसाजरसा न बिभेषि किम् ? । वचनयाचनया निशि भेजिरे घनमतो नमतोऽनुमतान् प्रियाः ॥७५ ॥ निजगदुः कुसुमेन वशीकृताः स्मरनृपस्य जयं दलालिनः। रतिकराः स्वरुतैरनुकात्मनां सपदि कुन्दलतादलतालिनः ॥ ७६ ॥ प्रवदतः वसुमेन दधौ भृशं वरयशांसि तपोदलतालिनः। 10 15 . १ 'यमिता- बद्धा मेघेन वृष्ट्या च बद्धाऽपि । २ 'निवसितेन' अभ्रर्निवसितेन इव सुनिवौ-सुखं प्राप । 'इव' अव्ययाभावे लुप्तोपमा । ३ 'नवसुधा'. 'विधोश्चन्द्रस्य नवा या सुधा तया भुवो भरणम् । 'नवसुधा' इति भिन्नं पदम् । बहुवचनान्तम् । ४ 'कलम- कलमक्षेत्रम् । ५ सिततमाः' विधोर्नवसुधाः सिततमाः शुभ्राः, पुनः किम् ? वसुधाभरणम्। ६ 'ततमान-' विस्तीर्णमानवत्या । ७ प्रियम् अनितया अप्राप्तया : वनितया एतानि वस्तूनि न विषेहिरे। ८ 'सहे' सहः मार्गशीर्षमासः । ९ 'सुकरणै-' सु-सुष्टु, करणानि कामासनानि तद्रूपाद्वैतयुद्धः । १० 'विलासिनः' रसिकान् रमयन्ति स्म । रसं सरमयम् । द्वैकय॑म् । ११ -वियुवतीः' प्रियैर्वियुक्ताः युवतीः । १२ संयति' युद्धे । १३ '-अविरतो- अविरतः । विशेषेण रतो वा । १४ 'तपसि' माघे । “तपाः शिशिर-माघयोः" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो० ५६७] १५'अरुणभो-रक्तकान्तिः । १६ 'अरुणभोग्य-' "अरुणोऽऽनूरु-पिङ्गयोः । संध्यारागे बुधे कुष्टे निश्शब्दाऽव्यक्तरागयोः” इति अनेकार्थः [ है. अने० सं. कां. ३ श्लो० १८१] १७ 'द्युतिरयम्' करवेगम् चकाराध्याहारात् दिशः तिरयन् । १८ 'मदमिते' इते प्राप्ते मयि मदं त्यज । १९ 'अनुमतान् प्रियान् प्रियाः नार्यः । २. 'दलता' विकखरेण । अलिनः भृङ्गाः । २१'-अनुकात्मनाम्' कामिनाम् । २२ 'कुन्दलता-'कुन्दलताया दले तालिनः करास्फोटकृतः। २३ 'तपोद-' तपोदलतालिनः तपाः शिशिरः स एव दलं हस्त्यादिसाधनम् तद्भावः तेन अलति शोभते ईदृक् राजा, तस्य वरयशांसि प्रवदतः । “अली भूषण-पूर्णता-निषेधेषु धातुर्वादिः" . 5 मा० ष. स० श्लो. ६३ चतुर्थः चतुर्थतया । अकाराप्रश्लेषे विरतः। ~ 1 मा० ष० स० श्लो० ५८ चतुर्थः चतुर्थतया। माघे 'निव- सिंतेव' इति मेदः। मा० ष० स० श्लो०६० चतुर्थः चतुर्थतया । 3 मा० १०.स. लो. ६१ चतुर्थः चतुर्थतया । 4 मा० ५० स० लो० ६९ चतुर्थः चतुर्थतया । माधे 'चिचिरानिलः 6 मा० ष० स० श्लो० ६४ चतुर्थः चतुर्थतया । 7 मा० ष० स० श्लो. ६५ चतुर्थः चतुर्थतया । 8 मा०प० स० श्लो० ६६ चतुर्थः चतुर्थतया ।

5 [ षष्ठः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं नवमृदङ्गंधिया दलतालिन समधुकुन्देलता दलतालिनः'॥७॥ [इति शिशिरः] अथ वसन्त:- दधुरधिकरुषं स्त्रियो न रागं मतनुतरतये वसं ता न का। नवसुरभिसुमस्रजाऽन्यथैवमतनुत रतयेव सन्तानका ॥ ७८॥ [झ्भावृत्तम् ] कोपनाँऽपि न पिकध्वनिमारादक्षमिष्ट मधुवासरसारम् । रन्तुमैहत वरेण निपीय दक्षमिष्टमधु वासरसारम् ॥ ७९ ॥ [ स्वागता] प्रस्थातुकामेऽथ पुरी मुनीनों प्रभावनीकेतनवैजयन्ती। सार्थागमं बोधयितुं नु तेने प्रभावनी केतनवैजयन्ती ॥ ८०॥ [उपजातिवृत्तम् ] तनुमन्वधिपं रजो यियासोः परितस्तार रवेरसत्यवश्यम् । त्वरया जनसन्तते खराये परितस्ताररवे रसत्यवश्यम् ॥ ८१॥ शुचिधर्मणि वारिकणैर्विलसद्भुचिरं कमनीयत रागमिती। पथि तज्जनतासु पयोजमुखी रुचिरं कमनीयतरागमिता ॥ ८२॥ [ तोटकम् ] नगरेऽहमदाह्वये यतीन्द्राः सहसाज्यन्त नदीपपॉटलाभे । गुरुसङ्गमजैः क्षणैर्जनैस्तैः सह सायन्तनंदीपपाटलाभे ॥ ८३ ॥ [ औपच्छन्दसिकम् ] 10 ८ 'वासरसा' वासे वासगृहे रसो यस्याः सा । ९ 'मुनीनाम्' मुनीनां प्रभौ प्रस्थातुकामे पुरी केतनेषु गृहेषु । पताकाः तेने। १ 'नवमृद-' नवमृदङ्गबुड्या 'दलतालिनः' दले तालिनः तालक्रियासाम्यवन्तः । अथवा दलेषु तलन्ति प्रतिष्ठन्ते इति दलतालिनः । “तल प्रतिष्ठायां धातुः" । "दलम् अर्धम् , दलं पर्णम् , दलं हस्त्यादिसाधनम्" इति मञ्जरी [श्लो. १४० अर्ध- श्लोकाधि० "तालः कालक्रियामाने हस्तमान-दुमेदयोः ॥ करा- स्फोटे करतले च" इति अनेकार्थः [ है. अने० सं० कां० २ श्लो० ४७९-४८०] २ 'समधुकुन्दलता' अलिनः भ्रमरान् दधौ पुपोष, केन ? खसुमेन कुसुमेन दलता विकखरेण । ३ 'दधुर-' याः स्त्रियः अधिकरुषं दधुः, न रागं मतनुतर- तये दधुः ताः स्त्रियः वशं कः न अतनुत, कया नवसुरभिपुष्पल- तया। क इव ? संतानक इव लतया स्त्रियः वशं करोति । ४ 'रतया' लतया हारेण कस्तूर्या वा "लता कस्तूरी" अनेकार्थे [है. अने० सं० कां० २ श्लो० १८८-१८९] ५ 'संतानक:' कल्पवृक्षः। ६ 'प्रभा- "वसुयुगविरतिर्ननौ रौ प्रभा" । ७ 'कोपना-" कोपनाऽपि बी पिकध्वनि 'न सेहे । वसन्तदिने श्रेष्ठम् इष्टमधु निपीय दक्षं यथा स्यात् तथा रन्तुम् अरम् अत्यर्थम् ऐहत । १० '-अनीकेतनवा-' अनीकेन सेनाया इतः अवाप्तः नवः स्तुतिर्यया सा। ११. "एजयन्तीः' चलन्तीः पताकाः । १२ 'प्रभावनी' प्रभायाः अवनी प्रभावनी-कान्तेर्भूः-स्थानम् । १३ 'तनु-' अधिपम् अनुयियासोर्जनसंततेः रजः रवेः तर्नु परितस्तार असतीवत् अवश्यं सर्वतः परिसपत् । १४ 'खराये' खरः तित्तिरः तदादौ रसति शब्दं कुर्वाणे । "तित्तिरः खरकोषे गर्दभो वा". १५ 'शुचि- आषाढतापे । १६ 'रागमिता' मार्गे रागं लोहिविमानम् इता प्राप्ता । "इश् गतौ-" अदादिः । १७ 'कमनीय-' कमनीयतरं बहुश्रेष्ठम्, अगं तरुम् , इता । "इंगतो" भ्वादिः । १८ 'नदीप- नदीपः समुद्रः तस्य पाटो विस्तारः तस्य लाभो यत्र-समुद्रवद्विस्तृते । १९ 'सायंतन-'संध्याभवदीपवत् पाटला श्वेतरक्ता आभा यत्र । 1 मा०प० स० श्लो०६६ चतुर्थः चतुर्थतया । 2 मा०प० स० श्लो० ६७ द्वितीय-चतुर्थो द्वितीय-चतुर्थ- तया। 8 मा० १० स० श्लो० ६८ द्वितीय-चतुर्थो द्वितीय-चतुर्थ- तया। -4 मा० १० स० श्लो० ६९ द्वितीय-चतुर्थों द्वितीय-चतुर्थ- तया। 5 मा० ष० स० श्लो० ७० द्वितीय-चतुझे द्वितीय-चतुर्थ- तया। 6 मा० १० स० श्लो० ७१ द्वितीय-चतुर्थों द्वितीय-चतुर्थ- तया। 7 मा०प० स० श्लो० ७२ द्वितीय-चतुर्थों द्वितीय-चतुर्थ- तया।

देवानन्दमहाकाव्यम् । [ षष्ठः सर्गः] इह वीक्ष्य देवमुदितं रसंभासाऽसमयाऽवनौ घनमदभ्रमराणि । शिखिभिर्जनस्य सुमनांसि ननन्दुः समयाऽऽवनौघनमदभ्रमराणि ॥ ८४ ॥ [कुटिलकवृत्तम् ] नातिरासीदुदये मुनीन्दोः समुद्धृताशङ्कमनीचकाशे । महर्महद्भिर्वसुधा सुधान्यैः समुद् धृताशं कमनी चकाशे' ॥ ८५ ॥ सुधयेवं सुसाधिताऽथवा किमभिनद्धारसमा न सा रसेन । गुरुगीन नृणां द्विधाऽपि तापमभिनद्धा रसमानसारसेन ॥८६॥[ औपच्छन्दसिकम् ] रेमे नुन्ना यो मधुमत्ता बहुरङ्गैः कामे कान्ते सारंसिकाकाकुरुतेन । दृष्टे देवे ब्रह्मणि भोगात् म निवृत्तिं कॉमेकान्ते सा रसिका का कुरुते न ॥ ८७॥ [मत्तमयूरवृत्तम् ] स्पष्टीकृते पँटुनटेन चमत्कृतेन्द्रकेशे रते स्मरसहाः संवतोषितेन । स्त्रैणेने चात्र निशि जागरणेषु रागे के शेरते स्म रसहासवतोषितेन ॥ ८८ ॥ [ वसन्ततिलका] 10 -------- १ 'रसभासा' वीर्यकान्त्या । 'असमया' अतुल्यया । 'अवनौ' । भूमौ । . २ 'धन-'घनं निबिडम् , अदभ्रं बहुलम् , 'अराणि' क्रिया। ३ 'शिखिभिः' शिखिभिः श्रावकैः अराणि जयजयारवश्चके । ४ 'अवनौघ- समया समीपे अवनस्य रक्षणस्य ओघे प्रवाहे नमन्ति प्रह्वीभवन्ति च तानि-अभ्रमेण तत्त्ववार्तया राजन्ते इति- अभ्रमराणि विशेषणेन "नाम नाम्ना" [३-१-१८ हैम.] इति समासः। ५ 'समुद्धृता- समुदता दूरीकृता आशङ्का भयं संकोचो वा यत्र कर्मणि। ६ 'अनीच-' न विद्यते नीचः वातनहनः ? काशो रोगो यत्र तस्मिन् अनीचकाशे। ७ 'समुद् धृताशं कमनी' उत्सवैः समुत् सप्रमोदा । धान्यैः धृताशम् उद्धृतदिक् यथा स्यात् तथा । 'कमनी' अभिरूपा । 'वसुधा' भूः । 'चकाशे' दिदीपे । ८ 'सुधया' अमृतेन । ९ 'धारसमा' मेघतुल्या । धारो जलधरः "धारो मेघः" अनेकार्थे [ है. अने० सं० कां० २ श्लो० ४२१] १. 'गुरुगीः सा प्रसिद्धा गुरुगीः द्विधाऽपि नृणां तापं न न अभिनत् काकुः । गुरुगीः सुधया साधिता इव । ११ "किम-किमिति विकल्पे सारसेन चन्द्रेण अभिनद्धा व्याप्ता । किंभूतेन ? रसे शृङ्गारादौ मानं बहुमानं यस्य तेन समा- सात् 'रसमानसारसेन' । “सारसः चन्द्रः” इति अनेकार्थे [ है. अने. सं. कां०३ श्लो. १५४] १२ 'या' या स्त्री सारसिकानां 'सारू' इति प्रसिद्धानां सारसप- क्षिकान्तानाम् यद्वा कामिनां काकुरुतेन वक्रोक्तिवचसा । १३ 'कामे स्मररूपे कान्ते रेमे । १४ 'सारसिका- "सारसो मैथुनी कामी गोनर्दः पुष्कराहयः" इति यादवः। १५ 'कामेका-सा नारी का भोगनिवृत्तिं न कुरुते स्म । एकान्ते' एकान्ते केवलखरूपे देवे साक्षात् ब्रह्मणि दृष्टे का निवृत्तिं नाऽकार्षीत्। १६ “एकः केवलः । अन्तः खरूपम्" इति अनेकार्थे [ है. अने० सं० कां० २ श्लो० २ तथा १५५] १७ 'पटुनटेन' पटुनटेन रते रमणे, किंभूते रते ? 'चमत्कृते- न्द्रकेशे' चमत्कृतेन्द्रवरुणे । "केशः वरुणः" अनेकार्थे [है. अने. सं० कां० २ श्लो० ५३३] १८ "अभिषवे" "अभिषवः कण्डनं पीडनं मजनं स्नानमपि" [हैअने० सं० का० ४ श्लो० ३०३] तेन तोषि- तेन-'सवतोषितेन' । खार्थे ण्यन्तत्वात् तुष्टेन । १९ 'बणेन' तथा स्त्रैणेन रागे धवलगाने स्पष्टीकृते के सर- सहाः शेरते स्म। स्त्रीपक्षे सवः प्रसवः पुत्रादिः तेन तुष्टेन । निशि उषितेन रसेन हासवता-[रसहासवता+उषितेन] सरणं स्मरः स्मृतिः तां सहन्ते सरसहाः पण्डिताः-ज्ञानिनः-चतुराः । 1 मा०प० स० लो० ७३ द्वितीय-चतुर्थों द्वितीय-चतुर्थ- वया। 2 मा० ष० स० श्लो० ७४ द्वितीय-चतुर्थों द्वितीय-चतुर्थ- तया.... मा०प० स० श्लो० ७५ द्वितीय-चतुर्थों द्वितीय-चतुर्थ- तया। 4 मा० १० स० श्लो० ७६ द्वितीय-चतुर्थों द्वितीय-चतुर्थ- तया। 5 मा०प० स० श्लो. ७७ द्वितीय-चतुर्थी द्वितीय-चतुर्थ- तया। ।।

[सप्तमः सर्गः] ६९ महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं गुरुयशोधवलावलिमङ्गना रसंकलामलपल्लवलीलया। श्रुतिमदादिव तन्ननृते वनैरसँकलामलपल्लवलीलया ॥ ८९॥ [द्रुतविलम्बितम्] साचार्यचन्द्रमसि शान्तरसानुयुक्त ज्येष्ठस्थितेरनु हितं तरसा नु युक्ते धन्येन गौरिति नतेन्द्रगिराविहर्तुं विनत्यनोदि समयूरगिरा विहर्तुम् ॥१०॥ इति श्रीदेवानन्दे महाकाव्ये दिव्यप्रभापरनाम्नि ऐकाराङ्के माघसमस्यार्थे महोपाध्याय- श्रीमेघविजयगणिविरचिते पट्टधरस्थापन-षड्ऋतुवर्णनो नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६॥ 5 10 सप्तमः सर्गः। ॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लौँ अहं 3 शकेश्वरपार्श्वपरमेश्वराय नमः ॥ एँ नमः॥ अथ समयमवेत्य वन्दनायाः कुरु गुरुराज ! महेन पावनं नः। सफलय सुदृशा मनोरथाली भवति महत्सु न निष्फल प्रयासः ॥१॥ इति धनवचसोऽनुमन्तरीशे भुवि कुसुमानि शरा इवाभिपेतुः। रतिवरयितुरुङ्गटस्य यस्य न कुसुमपञ्चकमप्यलं विषोदुम् ॥२॥ व्यरचि रुचिभराश्चितं दुकूलै पटुतरदृष्यमदृष्यमिभ्यराजा । हियमिह वरंचित्रपुत्रिकाणां न्यदधत विभ्रमसम्पदोऽङ्गनासु ॥३॥ इह विपणिगृहापणेषु भित्तेः शुचिसिचयास्तरणैः कृते पिधाने । नवकुतुकदिक्षया स्पृशन्त्या भुजलतिका मुहुरस्खलत् तरुण्याः ॥४॥ निजयुवतिजनांस्तदाऽजुहाव महति महे धनजीमहेभ्यसिंहः । नटनमिव दधौ वदस्तदीयो ध्वनिमधिकं कलमेखलाकलापः ॥५॥ परिमिलति जने घने क्षणेऽस्मिन् स्थिततरलोचनयोर्नदेववध्वोः। 15 १'-अङ्गना' अङ्गना गुरोः यशोधवलानि गीतविशेषाः तेषाम् आलिम् अलपत् । २ 'रसकलाम' मधुराम् । ३ 'लवलीलया' लवली लताभेदः तद्वत् लयः विलासो यस्याः सा। "लयस्तूर्यत्रयीसाम्ये संश्लेषण-विलासयोः" इनि अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो० ३७०] ४ 'असकला-' अखण्डा:-नवाः, अमलाः निर्मलाः । ५ 'युक्वेः' तरसा बलेन । 'नु' वितर्के । ६ गिरौ-इहर्तुम्' इह लोके विहर्तुं हितं योग्यम् ऋतुं बिभ्रति सति नतम् ऐन्द्रं यम् ईदृशो गिरिः पूज्यः तस्मिन् । “गिरिः पूज्यः" अनेकार्थे [ है. अने० सं० कां० २ श्लो० ३९९] धन्येन धनजीनाम्ना इति गौः वाक् अनोदि प्रेरिता । ज्येष्ठस्थितेः चतुर्मास- कस्य अनु पश्चात् । 'समयूरगिरा' मयूरयुक्तसरखत्या-तत्तुल्येन कामे कान्ते [श्लो० ८७] इत्यादिवत् प्रयोगः । यद्वा मयूरगी: षड्जखरः तेन सहितेन-लाभकृत्सरवादिना । ७ 'सुदृशाम्' सम्यक्तभाजाम् । ८'-दूष्य-' "दूष्यं वस्त्रे च तद्गृहे च" इति विश्वः[श्लोक २९ यद्वितीय] ९ 'वरचित्र-' वरचित्रपुत्रिकाणां विभ्रमसंपदः स्त्रीषु ह्रियं न्यदधत। 1 मा० ष० स० श्लो० ७८ द्वितीय-चतुर्थो द्वितीय-चतुर्थ- तया। 3 मा० स० स० श्लो. १ चतुर्थः चतुर्थतया । 4 मा० स० स० श्लो० २ चतुर्थः चतुर्थतया । 5 मा० स० स० श्लो० ३ चतुर्थः चतुर्थतया । 6 मा० स० स० श्लो०४ चतुर्थः चतुर्थतया । 7 मा० स० स० श्लो० ५ चतुर्थः चतुर्थतया। 2 मा० १० स० श्लो० ७९ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे 'बिभ्र- त्यचोदि' इति पाठमेदः ।

5 देवानन्दमहाकाव्यम् । [ सप्तमः सर्गः] भुवि पदमवदद्भिदां विमुश्चत् स्वरसमसक्तंमलक्तकच्छलेन'॥६॥ सुरयुवतिरिहाख्यदेहि नारि ! कलय विमानसमां रमा स्थलेऽस्मिन् । सुकृतभरभवे भुविर्भवे त्वमनृतगिरं गुणगौरि ! मा कृथा माम् ॥७॥ अतनुत धनजीप्रिया धनश्रीः प्रणयगिरा निजसङ्घभुक्तिभक्ती। स्मरत न सुदृशोऽत्त दत्त साधाविति च तथापि संखीषु मेऽभिमानम् ॥ ८॥ गुरुरपि विजयप्रभं गणेन्द्र खपदनिवेशितवन्दितं तमूचे । चिरमिह मम पधारिलक्ष्मीर्भवति भवत्वसुहृजनः स कामः ॥९॥ प्रतिपदनटनेषु तूर्यनादे प्रणदति काऽपि सखीं यियासुमाह । गुरुयुगमयि ! दर्शयांऽऽलि ! पुण्ये भव मम मानिनि ! जीविते दयालुः ॥१०॥ प्रमुदितधनजीभ्यदत्तदानैनवनेपथ्यविभूषणस्तदार्थी । न भवति पतिरित्यनादृतां स्त्री किल कथमप्यनुकूलयाञ्चकार ॥ ११ ॥ प्रतिजनमहदिकाप्रदाने पथि निबिडे स्म मिथः स्त्रियौ बुवाते । कथमथ मम सङ्गतिः श्रमार्तेः स्तनजघनोद्वहने तवापि चेतः ॥ १२ ॥ इति धृतगुरुवन्दनाद्धतश्रीरतिशयवान् खगुणैस्तदागणेयः । अभिनवगणभृद् द्विधाऽपि मार्गे न्यधित मिमान इवावनिं पदानि ॥ १३ ॥ चिरयसि न समं मयैषि नन्तुं त्वकमपरां तु समीहसेऽस्तु सा ते । गुरुयुगमगमत् पुरोऽनुगम्य प्रियमिति कोपपदेन काऽपि सख्याः ॥१४॥ अथ गुरुयुगलस्य तत्र शाखापुरगमने पथि विस्तृतेऽम्बरेऽन्यत् । पुनरपि कृतसंवरं वितत्यै स्थलभुवि कन्दुविभ्रमं बभार ॥ १५ ॥ 10 15 १ 'विमुञ्चत् विमुञ्चत् खरसं न्यस्यत् । २ 'असक्त- देवपक्षे भुवि असक्तम्-अलग्नम् । नरपक्षे असक्तं नित्यम् । ३ 'भुविर्भ-' देवभवे । ४ 'मा कृथा-' देवावतारे असत्यवाचं मा कृथाः । ५ 'सुदृशो-' हे सुदृशः।यूयम् अत्त भक्षयत, साधौ दत्त दानम् । ६. 'मेऽभिमानम्' कुरुत सखीषु मेऽभिमानम् । अजल्पनादिक मा स्मरत। ७ 'खपद- पूर्व स्वपदे निवेशितः पश्चाद् वन्दितः-इति समासः। ८-असुहृजनः' सः प्रसिद्धः कामः असुहृदः जना यस्य ईदृग् अस्तु-निष्प्रसरोऽस्तु । यद्वा असुहृत् प्राणहारी-हिंसकः सः 'कामः' के मस्तके आमः रोगः तत्सहितोऽस्तु । ९ 'आलि!' हे आलि ! अयि-इति संबोधने गुरुयुगं दर्शय पुण्ये धर्मरूपे जीविते दयालुर्भव । . १० 'प्रतिजन-' जनं जनं प्रति-प्रतिजनं महामुद्रादानः । ११ 'मार्गे' लौकिके लोकोत्तरे मार्ग प्रवचने पदानि क्रम- न्यासाः सिद्धान्तपदानि वा । 'मिमानः' अवनिमानं प्रत्यक्षतो गणनरीत्या वा। १२ 'प्रिय- प्रियम्-धंवम् अनुगम्य । १३ 'कन्दुक-' पदन्यासस्थाने एकं वस्त्रं विस्तारितम्-द्वितीयं पुनर्वितत्यै प्रस्तारणाय-कृतसंवरं धृतं तत् कन्दुकवत् रुरुचे । 1 मा० स० स० श्लो. ६ चतुर्थः चतुर्थतया । 2 मा० स० स० श्ले. ७ चतुर्थः चतुर्थतया । 3 मा० स० स० श्लो.८ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे 'मेऽभि- मानः। 4 मा० स० स० श्लो०९ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे 'सकामः इति अखण्डम्। 5मा० स० स० श्लो. १० चतुर्थः चतुर्थतया । --- 6 मा० स० स.. श्लो. ११ चतुर्थः चतुर्थतया । 7 मा० स० स० श्लो. १२ चतुर्थः चतुर्थतया । 8 मा० स० स० श्लो० १३ चतुर्थः चतुर्थतया । 9 मा० स० स० श्लो. १४ चतुर्थः चतुर्थतया। माथे 'सख्या इति । 10 मा० स० स० श्लो० १५ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे तट- भुवि' इति । H ७ 5 [ सप्तमः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं इह घनजनसङ्कुलप्रदेशे युवतिरनीयत नायकेन नन्तुम् । कथमपि पुरतो विगृह्य तस्या मृदुममृदुव्यतिबद्धमेकबाहुम् ॥१६॥ निवसितकुचपार्श्वतः प्रगल्भा व्यनमदुपेत्य जनान्तरेऽपि सूरीन् । पथि जनमपसारयन्त्यभीकं कुचमितरं तदुःस्थले निपीड्यं ॥ १७ ॥ अनुगतनवसूरिणा स साकं सकलपुरेषु महोत्सवैविहृत्य । अहिमदपुरि सूरिरब्दमाप्य पदमथ मन्मथमन्थैरं जगाम ॥ १८ ॥ स्थितवति च गुरौ पुरेऽत्र दाने तपसि जिनार्चनशीलसन्निधाने । व्रतनियमविधौ सधर्मयोगात् प्रियमबला सविलासमन्वियाय ॥ १९ ॥ अनुजनकसिंपुप्रदानपूर्वमभिनवनन्दिमहैस्तदोपधानम् । निशि विनिहितजागरेषु गानैः स्वभुजलतांविभवेन काचिदूहे ॥ २० ॥ स्थितिमिह विजयप्रभस सूरिनगरवरान्तरधत्त वेदमासान् । दृढचरणगुणैर्जयन् मुनीशान विषमवितीर्णपदं बलादिवाऽन्यान् ॥ २१ ॥ दृढचरणगुणैर्दधत् समाज्ञा विषमवितीर्णपदं बलादिवाऽन्याः [इति वा पाठान्तरम्-उत्तरार्द्ध ] तपसि जपविधौ क्रियाविवेके शुचिचरणे समये द्विधापि बोधे । गुरुमतिशयवांस्तथा स हीरप्रतिमतयाऽनुययावसंशयानः ॥ २२ ॥ पुरनगरवरान्तरालरथ्यागुरुयुगवाक्यरसौघवाहिनीनाम् । सरित इव गतागतैर्वधूनां प्रणदितहंसकभूषणा विरेजुः ॥ २३ ॥ अधृत रतधृतेर्निवृत्तिवर्म गुरुवचसा बहुशो जनो विजित्य । 10 15 .. १'-अभीकम्' कामिनम् । २ 'तदुरः-' तथैव प्रीतिजननेन मार्गप्राप्तेः-इति आशयः । ३'-अब्दम्-' अब्दं मेघ मेघागमम् । ४ 'मन्मथ-' कामसूचकम् यद्वा मन्मथस्य मन्थं ध्वंसं राति दत्ते तत् । “मन्मथः कामचिन्तायां पुष्प-चाप-कपित्थयोः" इति अनेकार्थः [ है. अने० सं० कां० ३ श्लो० ३११] "मन्थरः सूचके.कोशे मन्दे पृथौ मथि" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां०३ श्लो० ५८३] ५ 'सधर्म-' समानधर्माणां संबन्धात् । ६ -कसिपु-' भोजन-वसनप्रदानपूर्वम् । 'खभुज' स्वभुजोपार्जितधनेन । ८ 'विषम-' विषमे दुष्करे तपःप्रमुख वितीर्ण दत्तं कृतं पदं स्थानं व्यवसायो वा यत्र कर्मणि । ९ 'समाज्ञाः' कीतीर्दधानः । १० '-अन्याः' असदृशाः-अपूर्वाः "अन्योऽसदृशेतरयोः" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो० ३३६] ११ 'समये समयः सिद्धान्तः कालश्च । १२ 'वाहिनी-' वाहिनीपक्षे शब्दितहयघुर्घरालंकाराः । "ओघः प्रवाहः संघातो द्रुत-नृत्त-परंपराः उपदेशे" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो० ५२] १३ -हंसक-' हंसकं नूपुरम् , पक्षे हंसाः । “हंसोऽर्के मत्स- रेऽच्युते । खगाश्वयोगिमन्त्रादिभेदेषु परमात्मनि ॥ निर्लोभ-नृपतौ प्राणवाते श्रेष्ठेऽप्रतः स्थिते” इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां. २ श्लो० ५८१-५८२] तथा वधूनां गुरुयुगवाक्ये रसो यस्य स चासौ ओघः सार्थस्तस्य वाहिनीनाम्-गन्त्रीणाम्-गतागतैः। 1 मा० स० स० श्लो० १६ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे 'व्यति- विद्ध-' इति । 2 मा० स० स० श्लो १७ चतुर्थः चतुर्थतया । 3 मा० स० स० श्लो०, १८ चतुर्थः चतुर्थतया । 4 मा० स० स० श्लो० १९ चतुर्थः चतुर्थतया । 5 मा० स० स० श्लो० २० चतुर्थः चतुर्थतया । 6 मा० स० स० श्लो० २१ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे 'बला- दिवाऽन्या' इति । अत्र लिखितादशैं 'विषमवितीर्णपदंबलाऽदिवा'- इत्येवं पदच्छेदः कृतः । तदनुसारी अर्थों न ज्ञायते । 7 मा० स० स० श्लो. २२ चतुर्थः चतुर्थतया । 8 मा० स० स० श्लो० २३ चतुर्थः चतुर्थतया ।

७२ 5 10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [ सप्तमः सर्गः] मधुपिकरुतलक्षणत्रिलोकीव्यधपटुमन्मथचापनादशङ्काम् ॥ २४ ॥ गुरुनमनतदुक्तिपानयोगात् नगरजने मुदितेऽन्तरुत्सवेन । वहिरपि बहुधान्यभूर्नु नृत्यमतनुत नूतनपल्लवाङ्गुलीभिः ॥२५॥ अथ परमगुरुस्ततो विहृत्य विमलगिरि समवाप्य सोऽप्यधीशम् । कुसुमितवनकैतवात् परागैः समुपहरन् विचकार कोरकाणि ॥ २६ ॥ अलभत सहचारिरायचन्द्रप्रमुखजनोऽपि नृपेश्वरातिथेयीम् । प्रतिपदमसकृत् तदुत्तमानामनुगमने खलु सम्पदोऽग्रतस्थाः ॥२७॥ दिवि सुरतरवो हिया बभूवुर्भमरमिषान्मलिनास्तु रायचन्द्रे । नृपपुरजनसङ्घभोज्यदानैर्दधति परिस्फुटमर्थतोऽभिधानम् ॥ २८ ॥ मुनिविभुरभिनम्य मारुदेवमतिचरणं पुरतोऽस्य चालुलोच । खसमयविधिना ततस्तमः खं प्रसभमनीयत भङ्गमङ्ग! नाना ॥२९॥ अभिगतसहगामिसङ्घलोकैर्विहितमहं पुरमुन्नतं गतस्य । गुरुपदनमने प्रभो रसालः शिरसि मुदेव मुमोच पुष्पवर्षम् ॥ ३० ॥ समयमिह विमृश्य देवसूरिरनशनमुच्चगिरोचचार कल्यैः। तदवगमनतो जनेन दैवात् विगतदयं खलु खण्डितेन मम्ले ॥ ३१ ॥ दिनमतिविरसं दिशोऽपि धूम्रा जगदपि खिन्नमजन्यजन्ययोगैः। वियति घनरजोऽमिलदू धरोचैस्तनतटरोधि तिरोदधेशकेन ॥ ३२ ॥ अवतरदमराध्वतो विमानं झटिति ददर्श दिशः प्रभासमानम् । सुरयुवतियुतं जनालिरुचैविपुलतरोन्मुखलोचनावलग्नम् ॥ ३३ ॥ त्रिदिवमधिगमेन पावय त्वं मुनिनृप ! भूः प्रतिबोधितेति वाचः। त्रिदशमृगहशोऽवतीर्य नेमुः स्फुटतरलक्ष्यगभीरनाभिमूलाः" ॥ ३४ ॥ मधुरतरगिरा जगौ सुरस्त्री व्यतनुत मौक्तिकवर्द्धनानि काचित् । 15 20 १-शङ्काम्' "शङ्का स्यात् संशये भये" [है. अने० सं० कां० २ श्लो० १७] इत्यपि । २-नु' वितर्के। ३ "विचकार विकाशयामास । ४ 'खम्' 'अङ्ग' इति संबोधने । नाना अनेकप्रकारम् खं खकीयम् तमः पापम् भङ्गम् अनीयत । ५ 'कल्यः' नीरुक-रोगरहितः । ६ 'विगतदयम्' यथा स्यात् तथा दैवात् खण्डितेन छिभनेव मम्ले संकुचितम् । ७'-अजन्य- अजन्यः उत्पातः। ८ 'अंशुकेन' सूर्येण "अंशुः सूत्रादिसूक्ष्मांशे किरणे चण्ड- दीधितौ” इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो०५३०] ९ 'अवलमम्' उच्चैः अवलमम् । 1 मा० स० स० श्लो० २४ चतुर्थः चतुर्थतया । 2 मा० स० स० श्लो० २५ चतुर्थः चतुर्थतया । मा० स० स०लो. २६ चतुर्थः चतुर्थतया । 4 मा० स० स० श्लो०:२७ चतुर्थः चतुर्थतया। 5 मा० स० स० श्लो०२८ चतुर्थः चतुर्थतया । 6 मा० स० स० लो०२९ चतुर्थः चतुर्थतया । माधे'-मा- नानाम् इति । 7 मा० स० स० श्लो० ३० चतुर्थः चतुर्थतया । 8 मा० स० स० श्लो० ३१ चतुर्थः चतुर्थतया । 9 मा० स० स० श्लो. ३२ चतुर्थः चतुर्थतया । 10 मा० सं० स० श्लो. ३३ चतुर्थः चतुर्थतया । 11 मा० स. स. लो० ३४ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे '-नाभिमूला' इति । ।

७ 5 [सप्तमः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं गुरुनिहितहगाऽऽनतोत्तरीयग्रहणपदं न चिरं विलम्ब्य काचित् ॥ ३५ ॥ अथ किल कथिते सखीभिरत्र क्षणमवधृत्य भुविनिवासिनीभिः। गुण-विधु-हय-भू-मिताब्दयोगे (१७१३) स गुरुरधाद् दृढमासनं समाधेः ॥ ३६ ॥ शुचिशुचिभव (११) तिथ्यहर्मुखेगात् स्मृतपरमेष्ठिपदः स्वरेष देवः। व्यरचि च शिविका जनेन गुर्वी प्रतिपदसंयमितांशुकावृताङ्गी ॥ ३७ ।। गुरुवपुषि निवेशितेऽथ तस्यामरुददलं जनता नती स्ववक्षः। बहलकरुणयाँलुठद् मुमूर्च्छ किमपि रसेन रसान्तरं भजन्ती ॥ ३८ ॥ अगुरुमलयजार्जुनाभ्रपूर्णज्वलितचिती तनुमैक्ष्य(१) किं नु जीवन् । खरयमिति सुरी जगौ प्रसद्य स्फुटमपि भूषयति स्त्रियस्त्रपै व ॥ ३९॥ मृगमदघनसारचन्दनाढ्याऽत्यरुणसिचा पिहिता चिताङ्गनेव । न कमिह नवमोहमांशु निन्ये स्फुटमपि भूषयति स्त्रियनपैव ॥४०॥ अहह दहति गात्रमत्र वहौ ज्वलितमभूद् भुवनं शुचा किमन्यत् । अवहितमनसा जनैन सूरेः प्रणिदधिरे दैयितैरनङ्गलेखाः ॥ ४१ ॥ कतिपयदिवसैर्विहारमुच्चै रुचिरमचीकरदन रायचन्द्रः। द्रुतमहनि शुभेऽस्य तेन केतोः कृतभुजमूलमबन्धि मूर्ध्नि माला ॥ ४२ ॥ अथ गुरुविरहातमाह सङ्घ: समयविदं विजयप्रभाख्यसूरिम् । अकमधरय धीर ! तीर्थमन्यैरधिकमधित्वदनेन मा निपाति ॥४३॥ पथि पथि सुशौं गणो मुखाजादू वचनरसस्य पिपासया त्रिसायम् । 10 15 १ 'क्षणम्-' खासिसखीभिः उक्ते क्षणम् उत्सवं मला । २ 'शुचि-' शुचिः आषाढः तस्य उज्वल-एकादश्याम् । ३'बहलकरुणया' जातरसेन शोकेन रसान्तरं भूमध्यम् । ४ 'नु' उत्प्रेक्षायाम् । "स्फुटो व्यक्त-प्रफुल्लयोः" अनेकार्थः [है. अने० सं० को ० २ श्लो० ९८] ५'-त्रपै' अहं अपै-हे त्रियः। अहं लज्जां करवाणि वः युष्मान् प्रसद्य अयं गुरुः किं जीवन् स्वर्ग भूषयति इति सुरी जगौ । ६ 'नवमोह-' चितापक्षे नवमोहः मूर्छा । पक्षे मोहनं वशी- करणम् । अत्र उत्प्रेक्षायां समस्या लाप्या। "त्रपा लज्जा-कुलटयोः इति अनेकार्थः [ है• अने० सं० कां० २ श्लो० २९१] ७'-दयितै- दया करुणा जाता येषां ते तैः । । 'अनङ्गलेखाः' जगत् 'शुचा' शोकेनेव दग्धं जातम् अन्यत् किमुच्यते अनङ्गलेखाः अशाभावसमाचाराः सावधानतया न ध्याताः । “रेखाऽल्पके छद्मनि आभोगोल्लेखयोः" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो० २४] ९ '-भुजमूल-' "मूलं पार्वाद्ययोरुडौं" [है. अने. सं. कां० २ श्लो० ४९५] "भुजो बाहौ करे" इति अनेकार्थः [है. अने० सं० कां० २ श्लो. ७२] कृतानि भुजमूलानि करादीनि यत्र तत्-हस्तबिम्बानि लिखितानि इत्यर्थः । विहारस्य मूर्ध्नि तेन रायचन्द्रेण केतोर्ध्वजस्य माला अबन्धि । १. 'अधरय' हे धीर । अकम्-दुःखम् अधरय-पराकुरु । ११'-अधिसत्-' खयि अधिकृत्य वर्तते-इति अधिसत् । १२ '-अनेन' अनेन दुःखेन अन्यैः कुमतिभिः तीर्थ मा निपाति तीर्थम् । १३ 'सुदृशाम्' सम्यक्खवताम्, स्त्रीणां वा गणः नववदन- कमलात् रसस्य पिपासया मधुप इव आजिहीते-आयाति । 1 मा० स० स० श्लो० ३५ चतुर्थः चतुर्थतया। माघे -ग्रहण- पदेन' इति । 2 मा० स० स० श्लो०३६ प्रथमः प्रथमतया । ३ मा० स० स० श्लो० ३६ चतुर्थः चतुर्थतया । 4 मा० स० स० श्लो० ३७ चतुर्थः चतुर्थतया । 5 मा० स० स० श्लो० ३८ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे 'स्फुट- दे०१० मभिभूषयति' इति । अत्र लिखितादर्श 'ऐक्ष्य' इति प्रयोगः कथं साधुः ? 'आ+ईक्ष्य-एक्ष्य' स्यात् । 6 मा० स० स० श्लो० ३८ चतुर्थः चतुर्थतया। 7 मा० स० स० ग्लो० ३९ चतुर्थः चतुर्थतया । 8 मा० स० स० श्लो० ४० चतुर्थः चतुर्थतया । 9 मा० स० स० श्लो० ४१ चतुर्थः चतुर्थतया ।

5 .. देवानन्दमहाकाव्यम् । [ सप्तमः सर्गः] विषयरसमपास्य सम्भृतोऽसावधरममुं मधुपस्तवाजिहीते ॥४४॥ रविरिव तदलङ्कुरुष्व सिंहासनमुदयाद्रिमुदीतपुण्यभासा । तिमिरमपनय प्रमादजन्यं भवति हि विक्लवता गुणोऽङ्ग नाना ॥४५॥ ध्वनति नृपतितूर्यधीरघोषे नटति नटे गुरुपट्टमाश्रयत् सः। परमगुरुरतोऽतिर्मुजनाल्याऽऽग्रहपरया विविदे विदग्धसंख्या ॥ ४६ ॥ स्थितवति गुरुपट्टकेऽत्र भट्टारकतरणौ यदभूत् प्रमोदरूपम् । हृदि हरिणदृशां तदा प्रनृत्यत्-करवलयखनितेन तद् विवd ॥ ४७ ॥ करसरसिजवासमासदत् श्रीः परमगुरोः श्रुतदेवताऽऽश्रयदं गाम् । जगति सुभगताऽस्य सर्वतोऽङ्गमकलितचापलदोषमालिलिङ्ग ॥४८॥ गुरुमतिधृतिकीर्तिभाग्यतेज:-प्रसरमवेक्ष्य मृगीदृशां मुदासीत् । हृदि बहिरपि सोन्नतेऽमिताऽऽसामुरसि रसादवतस्तरे स्तनाभ्याम् ॥ ४९ ॥ चतुर इह पुरे व्यतीत्य मासान् विमलगिरि सह सङ्घमाप सूरिः। जनततिरमृजत् स्रजोर्चनार्थ न्यपतदथोचतरूचिचीषयाऽन्या' ॥ ५० ॥ प्रभुरपि समहोत्सवं ननाम प्रथमजिनं च तमार्चयत् स सङ्घः। शिरसि जिनमिहार्चयायि! कश्चित् खयमिति मुग्धवधूमुदास दोाम् ॥५१॥ युवतिकुलमलं जगाविहानु सघुसूणचन्दनपूजं जिनस्य । नटनपटुबटुं स्म चाहरन्ती त्वरयति रन्तुमहो जनं मनो भूः ॥५२॥ कतिपयदिवसान्तरे गुरूणां प्रतिवलने पथि भूमिकोऽपि लघ्वी। अनुपदमशनाय सङ्घमुच्चैरभवदमुञ्चति वल्लभेऽतिगुर्वी" ॥५३॥ जलधरसमयेऽन्तरे पयोधेः सुविभवमन्दिरबन्दिरे स्थितेऽस्मिन् । 10 15 20 १ 'अपास्य' त्यक्ता अमुम्-अधरं हीनं विषयरसम् । २ "संमृत:- सावधानः । ३ 'हि' हि निश्चितम् विक्लवता अगुणः दोषः। 'अ' संबोधने 'नाना' अनेकप्रकारः। ४ 'अतिमुत्' पदृस्थाने आग्रहकारिण्या जनश्रेण्या अतिमुत् हर्षः। ५ 'विविदे' लब्धः "विद लामे" धातुः । ६ "विदग्ध- विदग्धानां चतुराणां सखीव सखी तया। “७ भट्टारक-' भगेन ज्ञानादिना तारके पृषोदरादिलात् साधुः । ८ 'गाम् वाणीम् । ९ 'मुद् आसीत्' मुद् हर्षः । सा मुत् हृदि अमिता मानम् अप्राप्ता बहिरपि आसां स्त्रीणाम् उरसि स्तनाभ्यामुलते अवत- स्तार-विस्तारमाप । १० 'अन्या' काचित् जनततिः । ११ 'उदास' अयि इति आमन्त्रणे इह शिरसि जिनम् अर्चय इति हेतोर्मुग्धवधू दोाम् उदास उच्चैश्चकार । १२ 'भूः' मनोरूपा भूः बटुं रन्तुं रमयितुं जनं लोकं वरयति स्म । मनश्चित्तम् आहरन्ती मोहयन्ती । १३ “भूमिका-' भूमिका प्रयाणभूः । 1 मा० स० स० श्लो० ४२ चतुर्थः चतुर्थतया । 2 मा० स० स० श्लो. ४३ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे -अनानाम्' इति । मा० स० स० श्लो०४४ चतुर्थः चतुर्थतयां । 4 मा. स. स. श्लो० ४५ चतुर्थः चतुर्थतया । 5 मा० स० स० श्लो०४६ चतुर्थः चतुर्थतया । 6 मा० स० स० श्लो. ४७ चतुर्थः चतुर्थतया । 7 मा. स. स. श्लो० ४८ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे '-चत- रोच्चिची-' इति । 8 मा. स. स. श्लो. ४९ चतुर्थः चतुर्थतया । 9 मा० स० स० श्लो० ५० चतुर्थः चतुर्थतया। माघे 'मनोभूम। 10 मा० स०स० श्लो० ५१ चतुर्थः चतुर्थतया ।

5 10 15 [ सप्तमः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं सुकृतमिह जनश्चकार तत् किं किमिव न शक्तिहरं स साध्वसानाम् ॥५४॥ नगरमिदमतीव धर्मयोग्यं धननिचितं कनकं त्वमत्र हीरः। इति कुरु गुरुराज ! वार्षिके द्वे भवतु यतः सदृशोश्चिराय योगः ॥ ५५॥ इति गृहिवचसा द्वितीयवर्षा अपि स निनाय गुरुस्तथैव तंत्र । मृदुवचनसुधारसैर्जनानां चिरपरिपूरितमेव कर्णयुग्मम् ॥५६॥ अथ गुरुचलने क्रमात् पुरोऽस्याः सकलजनेऽनुगते प्रसूं सुतोऽवक् । कृतयुगमगमत् वतोपतापी शठकलिरेव महांस्त्वयाद् यदत्त ! ॥ ५७॥ अथ गुरुरगमत् क्रमान्नगर्याः सकलजनानुगतौ पति प्रियोचे । यदि चलयसि मामाँ न तन्मे शठ ! कलिरेव महांस्त्वयाऽद्य दत्तः ॥ ५८॥ [पाठान्तरम् ] वदति जयपदानि भट्टलोके प्रणदति वाद्यगणे प्रभासमायात् । गुरुरभिधृततोरणं वधूनां सम॑मसिताम्बुरुहेण चक्षुषा च ॥ ५९॥ कृतसुरपुर-जीर्णदुर्गवर्षः स गुरुरगात् पुरवन्दिरेऽस्य लक्ष्म्या। सुजनपरदृशोः क्रमात् सुधाभिर्द्वयमपि रोषरजोभिरापुपूरे ॥ ६० ॥ सुकृतभरवहैर्महैः स तत्र शरदमतीत्य ययावुपान्धिकूलम् । तदधिगममुदा पुरे रसाली मृदुकुसुमे यदाऽहताऽप्यमूर्च्छत् ॥ ६१ ॥ अवसरमिममाप्य शुद्धबुद्धिर्वितरणभोजनपौषधांश्च कुर्वन् । इह तपसि पुरो गुरोर्निदः सपदि हिरण्मयमण्डनं स पत्न्या ॥६२ ॥ १ 'साध्वसानाम्' भयानां शक्तिहरं सुकृतं किं किं न चकार ७ 'वधूनाम्' वधूनां चक्षुषा 'च' इवार्थे असिताम्बुरुहेण समं कृततोरणं प्रभासनगरम् । 'चक्षुषा' इति जातौ एकवचनम् । २ 'हीरः' नगरं कनकम् ख हि-निश्चितम् ईरकः-धर्मस्य ८ यद्वा ममो ममखम् तेन सह यत् सिताम्बुजं तेन । अमम. प्रेरकः पक्षे वं हीरगुरुः । [हि+ईरः हीरः] निर्मम-इत्यादिवत् प्रयोगः । ३ 'वार्षिके' द्वे पर्युषणे पर्वणी । ९ '-सुरपुर-' सुरपुरं देवकपत्तनम् , जीर्णदुर्गम् तत्र ४ 'तत्र' द्वीपबन्दिरे। च कृतचतुर्मासः। ५'यदत्त [यद+अत्त!] हे अत्त! हे मातः! अत्ता मातृ- १० 'लक्ष्म्या' शोभया। वाची तत्संबोधनम् । मातरं पुत्रोऽवक्-हे मातः! यद् यस्मात् ११ '-कूलम्' कूलं वेलाकूलम् “सत्यभामा भामा" इति हेतोः कृतयुगम् अयात्-गतम् , महान् वृद्धः शठकलिः प्राप्तः न्यायात् पदैकदेशे पदग्रहः । "शठो मध्यस्थपुरुषे धूर्ते धत्तूरकेऽपि च" इति अनेकार्थः [ है. १२ -सुमे नय-' यद्वा नयदैः न्यायकारकैः अहता अवारिता अने० सं० कां० २ श्लो. १०७] धावन-वल्गन-नर्तनादिभिः इति शेषः । ६'-अमा' सह । यदि माम् अमा सह न चलयसि तर्हि १३ 'निदधे इह नगरे पन्या करणभूतया तपसि स कश्चिद् मे मह्यम् हे शठ! खया अद्य कलिरेव दत्तः कलहः क्लेशो वा । शुद्धबुद्धिः गुरोः पुरो हिरण्मयमण्डनं गूंहलीति प्रसिद्धं दधौ । 1 मा० स० स० श्लो० ५२ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे 'ससा. 5 मा० स० स० श्लो० ५५ चतुर्थः चतुर्थतया । ध्वसानाम्। 6 मा० स० स० श्लो० ५६ चतुर्थः चतुर्थतया। 2 मा० स० स० श्लो.५३ चतुर्थः चतुर्थतया । 7 मा० स० स० श्लो० ५७ चतुर्थः चतुर्थतया । 3 मा० स० स० श्लो० ५४ चतुर्थः चतुर्थतया । 8 मा० स० स० श्लो० ५८ चतुर्थः चतुर्थतया । 4 मा. स. स. श्लो० ५५ चतुर्थः चतुर्थतया। माघे 'शठ ! 9 मा० स०स० श्लो. ५९ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे कलिरेष महांस्खयाद्य दत्तः' इति । 'सपन्याः' इति। सजनः।

10 देवानन्दमहाकाव्यम् । [ सप्तमः सर्गः]] तदनुजलधिमध्यवन्दिरेऽस्य पुनरपि पर्युषणाद्वयस्य कर्तुः। समयमिव विहर्तुमन्यदैष्यो(?) भ्रमररुतैरुपकर्णमाचचक्षे॥ ६३ ॥ सुकृतिकृतघनाग्रहं विहाय द्रुतमपि बन्दिरमीशिता मेरुदत् । विमलगिरिमयाद् जिनाद्यनत्यै न परिचयोऽमलिनात्मनां प्रधानम् ॥ १४ ॥ दृढपरिचितवन्दिरस्थसङ्घोऽप्यवलत गच्छपति प्रणम्य तस्मात् । मुकुलितनयनः सबाष्पवृन्दैर्घनमहतामिव पक्ष्मणां भरेण ॥ ६५ ॥ बेहुधनसुदृशां गवा धनौघेऽकृत वरपर्युषणां स सूरिरत्र । सुरयुर्वेतिभिरभ्यनामि खेदादपगतकुङ्कुमरेणुभिः कपोलैः ॥६६॥ सुकृतरतिजमूस्त्रिया जिनार्चा गुरुरयमानयति स्म सत्प्रतिष्ठाम् । अमहयदबला च ताः पयोजः करकमलैः पुनरुक्तरक्तभाभिः ॥ ६७ ॥ अथ जिगमिपुरेष गूर्जरत्रां प्रथमजिनं प्रणिपत्य सिद्धशैले। पथि हरिणदृशामवन्दि वृन्दैः स्तनँयुगलैरितरेतरं निषण्णैः ॥ १८॥ द्रुततरगमनैर्विधाय यात्रां धनजनसङ्गतसूरिसार्थमाप्य । कलमनुचलनेष्वगायि वेगं करिकलभोरुभिरुभिर्दधानः ॥१९॥ अभिगतघननागरीघसङ्घरथगजवाजिपदातिसान्द्रमार्गम् । वनमपि नगरायितं जनानां भृशविनिवेशवशात् परस्परस्य ॥ ७० ॥ अथ नगरमहम्मदादिवादं समुपगते मुनिपेऽद्भुते तरुण्यः। स्थिरतरनयनैः शचीत्वमापुश्चिरमपि ताः किमुत प्रयासभाजः ॥ ७१ ॥ अभिनयकरणैर्जनाकुलान्तर्गमनवशाच गुरोर्नतेस्त्रिसायम् । स्रगपि मृगदृशां मणेरधस्तादथ शतशर्करतां जगाम तासाम् ॥७२॥ परमगुरुगिरा रतेर्निवृत्तेर्नववयसि ग्रहणे तदा विरेजे। 15 20 १-इष्यो-' वसन्तः। २ 'मरुद्वत्' वायुवत् । ३'-अमलिना- उज्वलमनसाम् । बहुशः कृतयात्रखात् परिचिते अनादरः इति न ज्ञेयम् “नवं नवं प्रीतिकरम्" इति न्यायात् । ४ 'धनौघे-'घनौघनामनगरे । 'गवा' वाचा । ५'सुर-तत्र देवीभिः प्रणतः। ६ 'रेणुभिः' दूराद् आगमः खेदेन ज्ञाप्यते तेन कश्मीरजलेपैः कपोलैः उपलक्षिताभिः। ani 1 मा० स० स० श्लो० ६० चतुर्थः चतुर्थतया । लिखितादशैं 'अन्यदेष्यो-इत्यस्ति पर अन्यदा+इष्यो' इत्यनयोः 'अन्यदैष्यो'- इति कथं स्यात् 2 मा० स० स० लो०६१ चतुर्थः चतुर्थतया। माघे 'परि- चयो मलिना। मा० स० स० श्लो० ६२ चतुर्थः चतुर्थतया । 4 मा० स० स० श्लो० ६३ चतुर्थः चतुर्थतया । ७ 'जिनार्चा' जसूनामश्राविकया कारितप्रतिमाः प्रतिष्ठां गुरुरानयत् । ८ 'स्तन-' स्तनयुगलैः कृता अन्योऽन्यं मिलितैः । स्त्रीणामति. बाहुल्यव्यजकमेतत् । ९ 'ऊरुभिः' वेगं दधानः अनुचलनेषु कलम् अगायि । १० 'परस्पर-' अन्योन्यगाढावस्थानात् । ११ 'शचीख-' अद्भुते चित्रे स्थिरदग्भिः तरुण्यः शचीलम- इन्द्राणीभावमापुः । “किमुत' इति वितर्के । 'प्रयासभाजः' संकुल- लात् श्रमप्राप्ता इव । - 5 मा० स० स० श्लो. ६४ चतुर्थः चतुर्थतया । 6 मा० स० स० श्लो० ६५ चतुर्थः चतुर्थतया । 7 मा० स० स० श्लो० ६६ चतुर्थः चतुर्थतया । माघे 'कल- भकरोरुमि-' इति । 8 मा० स० स० श्लो० ६७ चतुर्थः चतुर्थतया । 9 मा० स० स० श्लो०६८ चतुर्थः चतुर्थतया । 10 मा. स. स. ग्लो० ६९ चतुर्थः चतुर्थतया 5 10 [ सप्तमः सर्गः] महोपाध्यायश्रीमेघविजयविरचितं पियपितृकुलचैत्यकुम्भरूपं कुचयुगमुज्वलमेव कामिनीनाम् ॥ ७३ ॥ ददति वितरणं यथेष्टमिभ्ये युवतितपोमहमाप्य वाद्यघोषैः। तदनुमतिकृतेऽन्ययेशवस्त्रं स्तनपिहितामियवक्षसा ललम्बें ॥ ७४ ॥ व्रतमधित जिनार्चनानि तेनेऽभिनवमहैश्च दिदेश दानमिष्टम् । उपगुरु जनता न किं सुकृत्यं व्यवृणुत वेल्तियाहुवल्लरीका ॥ ७ ॥ नगरमिव महोदयैः स वीवीपुरमपि पर्युषणां पुपाव कुर्वन् । स्तुतिमणिविततौ सता ततस्ते तरलतया तरुणेन पस्पृशाते ॥ ७६ ॥ इत्थं जैनप्रवचनमिहोद्भाव्य शङ्गेश्वरस्थं पार्श्व नन्तुं तपगणगुरुर्जग्मिवान् सङ्घयुक्तः। अध्वक्लान्तेर्नवरसयुजां स्मेरपद्माननानां खेदापूरो युवतिसरितां व्याप गण्डस्थलानि ॥७७॥ अनमदभिनन्द्रं पार्श्वविश्वाधिनाथम् स गुरुररुणतेजा मेघलक्ष्मी प्रभाव्य । महयितुमिममिभ्याः खं शुचीचक्रुरद्भि- वनविहरणखेदम्लानमम्लानशोभाः ॥७८॥ ॥ इति समस्या संपूर्णा जातः(ता)। इति श्रीमद्देवानन्दे महाकाव्ये दिव्यप्रभापरनाम्नि ऐकाराङ्के माघसमस्यार्थे श्रीतपागच्छे महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते श्रीविजयदेवसूरीश्वरनिर्वाणगमन-तत्पट्टप्रभा- करश्रीविजयप्रभसूरीश्वराभ्युदयवर्णननामा सप्तमः सर्गः सम्पूर्णः ॥ [इति श्रेयः ॥ पूर्ण(%) च तस्मिन् अन्थोऽपि सिद्धिमध्यास्त ॥ श्रीरस्तु ।। ॥ कल्याणमस्तु ॥ लेखकपाठकयोः ॥ श्रीः ॥ छ । 15 20 का० सं० कां. ३ श्लो. १९५] “तरलो भाखरे चले हारम- ध्यमणौ बितें" इत्यपि है. अने० का० सं० कां. ३ श्लो० ६४६] तत्र सता पण्डितेन। १ 'अन्यया' अन्यया कयाचित् कान्तया तत् तपसः आज्ञायै पतिवस्त्रं गृहीतम् । किंभूतया ? खनाभ्यां पिहितं प्रियवक्षो यया आलिङ्गनकारिकया तपसः आज्ञां मयं कर्तुं देहि तां विना गन्तुं न युक्तमिति आशयेन । २ 'वेल्लित-' जनता किंभूता? वेल्लिता प्रसारिता बाहुरूपा वल्लरी लता यया सा-धर्मव्यये मुत्कलितहस्ता। ३ 'ते-' ते द्वे नगरम् बीबीपुरं च स्तवनरत्नमालायां तरल- तया मणिभावनया संदर्भिते ग्रथिते तरुणेन नवेन । "तरुणः कुचकुप्ये स्यादेरण्डे यूनि नूतने" इति अनेकार्थः [ है. अने. ४ 'मेघलक्ष्मीम्' पक्षे मेघस्य मम लक्ष्मी कृत्वा वाचकपद- दानाम् । अन्योऽपि अरुणतेजाः सूर्यः मेघलक्ष्मी प्रभावयति वर्धयति "आदित्याज्जायते वृष्टिः" इति श्रुतेः । ५ 'महयितुम्' इत्थं श्रीभगवन्तं महयितुं पूजयितुम् “मह धातुक्षुरादिः"। 1 मा० स० स० श्लो० ७० चतुर्थः चतुर्थतया । 2 मा० स० स० श्लो० ७१ चतुर्थः चतुर्थतया । 3 मा० स० स० श्लो० ७२ चतुर्थः चतुर्थतया । 4 मा० स० स० श्लो० ७३ चतुर्थः चतुर्थतया । 5 मा० स० स० श्लो० ७४ चतुर्थः चतुर्थतया । 6 मा० स० स० श्लो. ७५ चतुर्थः चतुर्थतया । .

देवानन्दमहाकाव्यम् । [ सप्तमः सर्गः] अथ प्रशस्तिः 10 जयतु विजयलक्ष्म्या पार्श्वविश्वकभाखान् अभिमतसुरशाखी सैष शङ्केश्वरार्यः । जयतु विजयदेवश्रीगुरोः पट्टलक्ष्मीप्रभुरिह विजयादिः श्रीप्रभः सूरिशक्रः॥ ७९ ॥ तत्सेवासक्तचेता अनवरततया प्राप्तलक्ष्मीविशिष्य, शिष्यः श्रीमत्कृपादेर्विजयपभृतः सत्कवेर्वाचकश्रीः । मेघः पद्माप्रसादाद विशदमतिजुषां श्राव्यकाव्यं चकार, देवानन्दं सदैन्द्रोज्वलविपुलधिया शोध्यतां शोध्यमत्र ॥ ८॥ माघः सान्निध्यकृद् भूयाद् मल्लिनाथैस्तथैक्ष्यताम् । हास्येन मम दास्येऽस्मिन् यथाशक्युपजीविते ।। ८१ ।। नोद्रेकः कवितामदस्य न पुनः स्पर्धा न साम्यस्पृहा, श्रीमन्माघकवेस्तथापि सुगुरोर्मे भक्तिरेव प्रिया । तस्यां नित्यरतेः सुतेव सुभगा जज्ञे समस्याऽद्भुता सेयं शारदचन्द्रिकेव कृतिनां कुर्याद् दृशामुत्सवम् ॥ ८२॥ अस्या न मधुरा वाचो नालङ्कारा रसावहाः। पूर्वसङ्गतिरेवास्तु सतां पाणिग्रहश्रिये ॥ ८३ ॥ कचिद् वक्रोक्तिसाचिव्यमप्यस्या दोषकृन्न हि । सौभाग्यवशतो जहे यदर्थ कृतिनामपि ॥ ८४ ॥ मुनि-नयना-श्वे-न्दु-मिते (१७२७) वर्षे हर्षेण सादडीनगरे । ग्रन्थः पूर्णः समजनि विजयदशम्यामिति श्रेयः॥८५॥ 15 20 शरेन्द्रियाद्रीन्दुमितेऽत्र (१७५५) वर्षे व्यलीलिखत् काव्यमिदं सुशिष्यः। श्रीमेरुशब्दादु विजयज्ञराजां श्रीसुन्दरादिर्विजयाऽभिधानः ॥१॥ युग्मं सम्यग्मङ्गलं सौरमस्मिन् माघेवर्णि ज्ञाननित्योदयाय । अस्याभ्यासाद्' जाड्यनाशात् प्रभावः प्रौढिं धत्ता मेरुवत् श्रीश्च धीराः॥१॥ एकादशशतश्लोकः श्लोको लोके समेधताम्।वाचकेऽध्यापके चास्य देयान्नित्यं समेधताम् ॥२॥ 25 गोपालगिरिदुर्गेऽस्य लेखनं लेखनन्दनम् । वाचकैमघविजयैः कृतं सुकृतहेतवे ॥३॥ ॥ इति ग्रन्थप्रशस्तिः ॥ सम्पूर्णा जातः(ता) ॥ ॥ इति श्रेयः॥ श्रीः ।। PIwledge २ 'समेधताम्' सबुद्धिभावम् । १ 'इभ्याः मेघलक्ष्मीम् अद्भिर्जलैः प्रभाव्य वर्धयित्वा स्वम् आत्मानं शुचीचक्रुः-पवित्रं विदधुः-आषाढीचकुरिति वा । मेघ- लक्ष्मीम्-प्रावृषि भाषाढे वा मेघोदयम्-ज्ञाला श्रीजिनम् अनंसीत् । ३ 'लेख-लेखा देवाः।

देवानन्दमहाकाव्यान्तर्गतानां विशेषनाम्नां संग्रहः । ३५,३६ टि. १ अकबर [ नृपः] १५,१९ अखई-भू [वर्धमान-नामा श्रेष्ठिसुतः] ६२ अज्झाहर [ श्रीपार्श्वनाथतीर्थम् -'अजाहरा' इति नाना प्रतीतम् ] ७६,-टि०७ २१ २ अजातशानवी [इन्द्रप्रस्थं नाम नगरम् ] अणहिल्लकपत्तन [ 'अणहिलपुर पाटण' नाना प्रतीतम् ] अमरेन्दुविबुध [ अमरचन्द्रकविर्वाचकपदाङ्कितो जैनमुनिः] ५३, -टि. ११ अवरंगपद [ 'औरंगाबाद' नाम्ना प्रसिद्ध नगरम् ] अवरंग-साहितनय [ 'औरंगजेव' नाना ख्यातो नृपपुत्रः] ४५, -टि. ३ अहमदाबाद (अहमद,-अहिमद,-अहमदाबाद) ['अमदा- बाद' नाना विश्रुतं नगरम् ] ६१,-टि. ६,६७,७१, ७६ अंतरिक्ष [श्रीपार्श्वनाथतीर्थम्-'अंतरीखजी' नाम्ना ख्यातम् ] ५०,५५ इलादुर्ग (इलादिदुर्ग) ['ईडर' नान्ना ख्यातं नगरम् ] ४,२२ -टि. २,२९ उदयसागर [ 'उदयसागर' नामकं सरोवरम् ] ३५ टि.८ उन्नतपुर [ सौराष्ट्रदेशान्तर्गतं 'ऊना' इति ख्यातं नगरम् ] ७२ कच्छ [ देशस्य नाम] ३८ कनकविजय (कनक) [विजयदेवसूरिशिष्यः] २१,२९,३० करहेड ['करेडा' इति प्रसिद्ध श्रीपार्श्वनाथतीर्थम् ] कलिकुंड [ तन्नाम्ना ख्यातं श्रीपार्श्वनाथतीर्थम् ] कल्याण [ तन्नाम्ना नृपः] कुल्लपाकपुर [ तैलंगदेशप्रसिद्धं श्रीआदिनाथतीर्थम् ] ५३ कृपाविजय (कृपा,-कृपादिविजय) [ग्रन्थकारस्य गुरुः] २,२ जगत्सिंह [ तन्नामा राजा] जयमल्लराज [तन्नामा मन्त्री ] ३२,३२ टि. ४,३३,३४ जसू [जसूनाम श्राविका] जहांगिरसाहि [तन्नामा मोगलवंशीयः क्षितिपतिः] जारी [जारीमङ्गलगीतरम्यम् ] ४४ टि.५ जालंधर [तन्नामा राजा] जीर्णदुर्ग [ 'जूनागढ' इति नाम्ना ख्यातं नगरम् ] ७५,-टि० ९ जम्बू [जम्बूद्वीपः] तपागच्छ (तपगण)[जैनपरंपरायां प्रसिद्धस्य आम्नायस्य संज्ञा ] १४,४०-टि० २ तिलिङ्गभाग (त्रिलिङ्गविषय,-तिलिङ्गदेश) ['तैलंग' देशस्या नाम] ५३,५३ टि. तेजःपाल [नामा मन्त्री] ३२ टि.३ दक्षिणा ['दक्षिण' देशनाम] ५.टि. ११ देव [जामवंशीयो राजा] ४०,-टि.९ देव (देवर्षिराज,-देवगुरुराद,-देवसूरि) [विजयदेवसूरिः] ५२,५५,५६,५७,५७ टि. १० देवकपत्तन (सुरपुर) ['देवपाटण' इति प्रसिद्धं नगरम् ] ३६, ३७,७५,-टि०९ देवचन्द्र (सुरविधु,-देवचन्द्र वणिक्,-सुरेन्दु,सुरेन्दु वणिज) [तनामा वणिक् ] ४९,४९ टि. १-६-७-५५ देवानन्द [प्रस्तुतमहाकाव्यस्य नाम] द्वारिका (द्वारवती) [प्रसिद्धा नगरी] ३३,-टि०४ द्वीप (द्वीप बन्दिर,-बन्दिर) [ 'दीव' नाम्ना प्रसिद्धं नगरम् ] ३६,७५ टि. ४,७६ धनजी (धन, धन्य)[तन्नामा श्रेष्ठी] ६१,-टि० १४,६९,७० धनश्री [धनजी श्रेष्ठिनः पत्नी] नवीन नगर ['जामनगर' नाम्ना ख्यातं पुरम् ] नारायण [तन्नामा नृपः] पमा [देवीनाम] पुरबन्दिर [ 'पोरबन्दर' इति प्रसिद्ध नगरम् ] ७५ प्रभास (प्रभासनगरम् )['प्रभासपाटण' नाना ख्यात नगरम् ] ७५,-टि०७४ पीछोला [ मेदपाटदेशे तन्नामकं सरोवरम् ] ३५ टि.८ पुज [तन्नामा नृपः] बगलाणादेश [ 'बागलाण' इति ख्यातः प्रदेशः] ४५ टि. २ बन्दिर ['दीव बन्दर' इति ख्यातं नगरम् ] बर्हानपूर (बर्हानपूर्वनगर) ['बुरानपुर' इति ख्यातं नगरम् ] ७८ ४८ टि. १०,७७ ६ गिरिदुर्ग (गिरिनार,-गिरिनारायण नाम तीर्थम्) [गिरनार' इति ख्यातं तीर्थम् ] ३८,३८ टि. १० गूर्जरना [ 'गूजरात' देशः]३,५७,७६,३६ टि० ३,५५ टि० ५ गोपालगिरि [ग्वालियर' नाना ख्यातं नगरम् ] गंगा [प्रसिद्धा नदी]] १९ गंधपुर [ 'गंधार' नाम्ना ख्यातं नगरम् ] ५७ Jहली [खस्तिकवत् विशिष्टः रचनाविशेषः] ७५ टि० १३ धनौध (नाम नगरे) [तनामकं नगरम् ] ७६,७६ टि. १४ चतुर [तन्नामा श्रावकश्रेष्ठी] चातुरी (चतुरिका,-चतुरां) [श्रावकत्रेष्ठिनः चतुरस्य पत्नी] ४५,५३,५३ टि. १२ चूतपल्लवी [आम्रपल्लवमाला माथुरदेशीयभाषया चूतपल्लवी ] ११ टि०१० चन्द्रशाखीय [ 'मुनिचन्द्र' 'सोमचन्द्र' इत्येवं चन्द्रान्तनाम धारिणः चन्द्रशाखीयोपाध्यायादेः शिष्याः] ३५ टि. १ ६ टि०३ बीबीपुर [अमदाबाद नगरस्य उपपुरम् ] भाग्यनगर [ तन्नामकं नगरम् भानु [तनामा राजा] ७७,७७ ५३, टि. ५,५४ ६ देवानन्दमहाकाव्य-विशेपनामसंग्रहः । विद्यापुर [ दक्षिणदेशे 'बीजापुर' नाम्ना प्रसिद्धं गगरम् ] ५४,- टि. ४ : भारत [ भारतं क्षेत्रम्] मरुदेश ['मारवाड' नाम्ना प्रसिद्धो देशः] मल्लिकापूर (मलिकापुर) ['मलकापुर' नाम्ना ख्यातं नगरम् ] ५२,-टि. १५ महमूंदिका [गजमुद्रायुक्तं नाणकम्-भाषायां 'चलणी नाणु' इति प्रसिद्धम्] महातपा [तपखिनः श्रीविजयदेवसूरेः राजप्रदत्तं बिरुदम् ] २१ माघकवि [माघकाव्यादिप्रणेता प्रसिद्धः कविः] माधव [तन्नामा श्रीविजयदेवसूरेः पितामहः श्रेष्ठी] मारुदेव [ आदिनाथतीर्थकरः] ७२ मेघ [प्रस्तुतकाव्यकर्ता मेघविजयः] ७७,-टि०४ मेदपाट ['मेवाड' इति ख्यातः प्रदेशः] ३५,-टि. ४ मेरुविजय [प्रस्तुतकाव्यलिपिकर्तुः श्रीसुन्दरविजयस्य गुरुः ] ७८ याम ['जाम' इति प्रसिद्धो राजवंशः] ४०,-टि.३ रत्न [तन्नामा श्रेष्ठी] ६१,-टि० १४ राजनगर [ 'अमदाबाद' नाम्ना विश्रुतं नगरम् ] १५ रायचंद्र [तनामा श्रेष्ठी] ७२,७३,-टि० ९ राष्ट्रकूट [ 'राठोड' इति प्रसिद्धो राजवंशः] ६ रुचिशाखीय ['विद्यारुचि' 'ज्ञानरुचि' इत्येवं रुच्यन्तनामधारिणो मुनयः] ३५ टि०२ रूपा [श्रीविजयदेवसूरेातुर्नाम] रेवतक [ 'गिरनार' इति ख्यातः पर्वतः] लाजमर्यादा [तन्नामा वनस्पति विशेषः समुद्रतीरे एव भवति ] ३८ टि.९ लावण्यविजय [ तन्नामा मुनिः] वत्सादि [ 'वत्स' नामा देशः तदादि ] ४०,-टि०६ वर्धमान [भगवान् महावीरः] वर्धमान [ श्रेष्ठि-अखईसुतः] ६२ टि.८ वाधिपक्ष ['ज्ञानसागर' इत्येवंविधसागरान्तनामधारिणां मुनीनां पक्षः] वासुदेव [श्रीविजयदेवसूरे|ल्यनाम ] ९,१३,१६,१८ विजयदेव (देव,-देवर्षिराज,-देवसूरि)[प्रस्तुतकाव्यनायकस्य श्रीविजयदेवसूरे म] १,२०,३८,५५,५६,७७ विजयप्रभ [यः पूर्व मुनिदशायां विबुधवीरविजयः स एव आचा- र्यपदं प्राप्य विजयप्रभसूरिः विजयदेवसूरेः पट्टधरः] ६३, ७०,७१,७३,७७ विजयसेन [श्रीहीरविजयसूरेः पट्टधरः सूरिः काव्यनायकश्रीविज- यदेवसूरेः गुरुश्च] विजयादिसिंह (सिंहसूरि) [यः पूर्व मुनिदशायां कनकविजयः स एव आचार्यपदं प्राप्य विजयसिंहसरिः विजयदेवसूरेः ३०,३४ विद्या विजय (विद्यादिविजय)[ आचार्यपदप्राप्तेः प्राक् श्रीविजय- देवसूरे म] १८,१९,२० विमलगिरि (विमलाचल,-शत्रुजय,-सिद्धशैल) [ सौराष्ट्र- देशान्तर्गतं तन्नामक तीर्थम् ] ३६,४१,७२,७६ वीरविजयकवि (वीर) [ तन्नामा जैनमुनिः] ३७,३८,४०, ४२,५५,६०,६३,६४ श्लो० ५८ वेलाकूल (अब्धिकूल) [ सौराष्ट्र देशान्तर्गतं 'वेरावल' नाना प्रतीतं नगरम् ] ७५ टि. ११ शत्रुजय (विमल गिरि) [ तन्नामकं तीर्थम् ] शाखापुर [उपपुरं संनिवेशः] श्रीमल्ल [स्तम्भतीर्थवास्तव्यस्य श्रीसोमवेष्ठिनः अग्रजः तन्नामा श्रेष्ठी] १९,२० शंखेश्वर [ तन्नामकं श्रीपार्श्वनाथतीर्थम् ] ३,७७ सहजू [ तन्नामा श्रेष्ठी ई डरनगरवास्तव्यः] २६,२९ सादडी [मारवाडप्रदेशे एतनामकं प्रसिद्धं नगरम् ] साबली [तन्नामा ग्रामः] २७ साहिपुरोपवन ['साहिपुर' नामक ग्रामस्य उपवनम् ] साहिबदेतनय [ 'साहिबदे' नामकस्य कस्यचित् तनयः] ६२ सिद्धशैल (विमलगिरि) [तन्नामक तीर्थम् ] सिद्धिविजय [ग्रन्थकर्तुः गुरोः श्रीकृपा विजयस्य गुरुः] २,- ७ टि०११ २१ .. ४४ सीरोहिका (सीरोहीनगर) ['शीरोही' नामकं नगरम् ] सुरपुर (देवकपत्तन) ['देवपाटण' नाम्ना प्रसिद्ध नगरम् ] ७५,-टि. १ सुरविधु (देवचन्द्र) [तन्नामा श्रेष्ठी] सुराष्ट्रा [ 'सोरठ' नाम्ना प्रसिद्धः प्रदेशः] ३६ सूरतिबन्दिर (सूरति,-स्फूर्तिबन्दिर) [ 'सुरत' नाना प्रसिद्धं नगरम् ] ४४,५६,६४ सोम [तन्नामा श्रेष्ठी] १९. सुन्दरविजय [ अस्य काव्यस्य लिपिकारो जैनमुनिः] स्थिर [श्रीविजयदेवसूरेः पिता] स्तम्भतीर्थ (हरिवेश्म) ['खंभात' नाना प्रसिद्धं नगरम् ] १९, ३३ टि०७ स्फूर्तिबन्दिर (सूरति) वर्णगिरि तन्नामा पर्वतः] ११३३,३४ हरिवेश्म [ स्तम्भतीर्थस्य अपरं नाम] हाजापाटक [अमदावादमध्ये 'हाजा पटेलनी पोल' इति नाना प्रसिद्धः पाटकः] हीरविजय (हीरगुरु,-हीर) [श्रीविजयदेवसूरेः प्रमुरुः प्रभावको जैनाचार्यः] १४,३६,७१,७५,-टि०२ . १,३३,-टि०७ - १७

Devanandamahakavya Of Sri Meghavijayopadhyaya

Author
Pandit Bechardas.j. Doshi
Other authors
Ccl
Title
Devanandamahakavya Of Sri Meghavijayopadhyaya
File name
Devanandamahakavya Of Sri Meghavijayopadhyaya
Text
OCR done
Citation
1937
Publisher
The Sanchalaka_singhi_jaina Granthamala
Language
Sanskrit
Pages
99
Library
Scl
DLI number
326185
Barcode
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Digital publisher
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